Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shri Damachritam Natakam

Shri Lalbhadur · 2012/04/01

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संस्कृत-विद्यापीठ-प्रकाशनमालायाः सप्तविंश पुष्पम् वुन्देलखण्डीय-'आनन्दराय'-महीप-सभापण्डित- श्रीनरहरिदीक्षित-सूनु- पण्डित-कवि-श्रीसामराजदीक्षित-प्रणीत श्री रामचरि म ( नाटकम् ) प्रधानसम्पादक डॉ० मण्डनमिश्र मीमासा-दर्शन-साहित्याचार्य एम० ए०, पी-एच० डी०, प्राचार्य मूलग्रन्थसम्पादक प्रो० बाबूलालशुक्ल शास्त्री एम० ए०, साहित्याचार्य मध्यप्रदेश-साहित्य-अकादमी-सम्मानित सस्कृत-प्राध्यापको विभागाध्यक्षश्च शासकीयस्नातकोतर-महाविद्यालय , शाजापुर (म० प्र०) सम्पादक प्राक्कथनलेखकश्च डॉ. रुद्रदेवत्रिपाठी, आचार्य एम० ए०, पी-एच० डी०, डी० लिट०, अनुसन्धान-प्रकाशन-विभागाप्रवाचकोऽध्यक्षश्च श्री। हादुरशास्त्री-न्द्रीय- स. स . -विद्या ठम् शहीद जीतसिंह मार्ग, कटवारिया सराय, नई दिल्ली-११००१६ अन्न छन्दमा प्रयोगनैपुण्यमपि विविधवृत्तप्रयोगैआयते। (यन दण्डकस्य भवभूतिमनुसृत्य विशिष्ट प्रयोग कृत कविनाऽनेन)। प्रकृतिवर्णनमपि कवेरसामान्य कवित्व प्रकटयति । अत कवेरिय कृति प्रौटा सकलगास्त्रकलाभिजत्व प्रकटयितु समर्थेति निश्शङ्क कथयितु शक्यते । एतस्य सम्पादनकर्मणि साहाय्यमाचरद्भ्य उपर्युक्तसस्थानाधिकृद्भय साभिनन्दन धन्य- वादम् । एतस्य प्रकाशनादिपु च परम साहाय्य कुर्वता विद्यापीठस्य प्राचार्याणा डॉ० सी० आर० स्वामिनाथमहाभागाना तथा मुसम्पाद्य प्राक्कथनलेखनेन सम्भूष्य च शोधप्रभाया प्रकटीकुर्वता डॉ० रद्रदेवत्रिपाठि एम-ए०, पी० एच-डी०, डी० लिट्० महाभागाना सुहृत्तमानामपि चामन्दमुपकारभारमुहहन् धन्यवादांश्चार्पयन् सस्मरामि सौजन्यम् । एतम्मिन् मम्करणे प्रमादजातानि मुद्रणादिजातानि च स्खलितानि सशोध्य विद्वांस पाठ का लाभान्विता भवेयरस्य परिशीलनेन कुर्वन्तु च ममेम श्रम सफलमिति विनिवेद्यान्ते मापनिमुमापतिञ्च प्रार्थये यदेतत् नाटक सहृदयमनस्सु परमा मुदमादधत् विलसतु । इति । विदुपामाश्रय बाबूलालशुक्ल , शास्त्री .

प्राक्कथन सस्कृत नाट्य-माहित्य की विशाल मणिमाला में एक और अपूर्व तया अब- तक अप्रकाशित "श्रीदामचरितम्" नामक नाटकमणि का सयोजन इस नाटक के प्रकाशन से हो रहा है, यह सभी साहित्यानुरागियो के लिये आनन्द का विषय है। प्रस्तुत नाटक के उद्धार का श्रेय है-- मध्यप्रदेश के संस्कृत-साहित्यसेवी एव अनेक दुर्लभ-ग्रन्थो के उद्धार तथा सुसम्पादन मे तल्लीन विद्वद्वर्य प्रा० श्री बाबूलालजी शुक्ल, शास्त्री, एम० ए०, साहित्याचार्य को जिन्होने अतीव परिश्रम-पूर्वक उज्जैन तथा पूना के प्राच्यग्रन्थसग्रहालयो से पाण्डुलिपिया प्राप्त करके उक्त नाटक का समुचित सम्पादन किया है । सम्कृत-माहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र-स्वरूप महान् कवि, सफल नाटक- कार एव भगवतीत्रिपुरसुन्दरी के परम उपासक श्रीसामराज दीक्षित की यह कृति अपने विषय की विशिष्टता, नाटयणास्त्रीय लक्षणो के पूर्ण निर्वाह, अपूर्व कल्पना- सौष्ठव, विशिष्ट एव विचित्र घटनाक्रम, विविध भापा-प्रयोग, अलकृत गद्य-पद्य -विन्याम तया छन्द -प्रयोग- प्रावीण्य आदि के कारण नाटक-साहित्य में अपनी म्वतन्त्र सत्ता स्थिर करती है । इसी दृष्टि से साम्प्रतिक समीक्षा-मरणि का साह- जिक निर्वाह भी समुचित समझ कर हम कतिपय त यो का परिशीलन प्रस्तुत कर रहे है, विश्वास है, पाठकगण इसमे ग्रन्थकार एव ग्रन्य की गरिमा का कुछ आभास पा सकेगे। प्रस्तुत नाटक के रचयिता 'श्रीसामराज दीक्षित' चका fraf:17 ३ 7 समादर २ अन्त साक्ष्यो से भी विदित होता है कि- (१) श्री सामराज दीक्षित दाक्षिणात्य ब्राह्मणकुल मे उत्पन्न 'बिन्दुपुरन्दरे' कुलोपाधि से वुक्त विद्वद्वर श्री नरहरि दीक्षित के सुपुत्र थे। अपनी पाण्डित्य-प्रति- भा तथा भगवती त्रिपुरसुन्दरी की अनन्य कृपा मे ये भूमण्डल को भासित करते हुए बुन्देलखण्ड के महादानी शामक श्री अानन्दराय महाराज के आश्रय मे सभा- पण्डित के रूप मे बहुत वर्षों तक रहे । विद्वानो के गुणातिणय का करने तथा उदारता-पूर्वक दान देने मे प्रय्यात श्री प्रानन्दराय नृपति ने आपको जो भूमि और ग्राम-क्षेत्रादि उपहृत किये ये उनका स्वामित्व किमी न किमी रूप मे आज तक बीदीक्षित जी के वशजो के पास चला आ रहा है। मथुरा मे श्री बालकृष्ण जी दीक्षित इमी परिवार के माने जाते है। (२) श्री दीक्षितजी ने अपना उत्तरकाल मथुरा मे व्यतीत किया था । आप एक महान् मिद्ध उपासक थे। थी दोक्षित के अनन्य उपासक होने के कारण ही आपने अपनी कृतियो मे दो ग्तोन एव एक प्रमुख पूजाग्रन्य 'पूजारत्न' की भी रचना की थी। जो कई पटलो मे विभक्त है । इस ग्रन्य का महत्व आज भी उस मम्प्रदाय मे अत्यन्त अधिक है । नवरात्रि की उपामना मे उमकी पद्धति का आश्रय लेकर पूजाएँ मम्पन्न की जाती है । (३) इनका दीक्षानाम 'सत्यानन्दनाथ' था । इसी से ज्ञात होता है कि ये पूर्णभिपिक्न थे, क्योकि इम दीक्षा के ममय ही आनन्दनाथान्त नाम नथा गुरु-पादु- काम्नाय का उपदेश होता है। श्रीमामगज दीक्षित ने 'धूर्तनर्तक' प्रहमन के मूत्रधार और नटी के सवाद के रूप मे प्रस्तुत आरम्भिका मे मूत्रधार के मुख से नान्दी के पश्चात् कहलाया है कि-"भगवान् नरसिंह की यात्रा के अवसर पर मसुरो के समूह ने मुझे कहा है कि मैं श्रीसामराज दीक्षित प्रणीत धूर्तनर्तक प्रहमन का अभिनय कराऊ।" इत्यादि । तथा वही यह एक आर्या भी प्रस्तुत नरहरिकुलाधिचन्द्रो नरहरिमान्यो हि सामराजो य नरहरिवन्द्यतनुश्रीनरहरिचरणाब्जगेलम्ब ॥४॥ की है (१) प्रस्तुत नाटक मे ही नटी की यह उक्ति द्रप्टव्य है - 'नटी-अथ क पुन आनन्दरायो यम्य कर्णमदृशम्य त्रिभुवनजनकर्णप्राघुणिका वीनि स?' इत्यादि । (२) इस सम्बन्ध मे मथुरास्थित प० श्री गोविन्दजी चतुर्वेदी, (दण्डी घाट स्थित) ने तया पू० श्री अमृतवाग्भव आचार्य जी ने भी यही बताया है। - ५ (७) आर्या त्रिशती ओर (८) शृङ्गारामृतलहरी" ये आठ कृतिया प्राप्त होती है। इनमे क्रमाक ३ तथा ४ सख्यावाली कृतियाँ 'पूजारत्न' ग्रन्य मे भी हे अत कुल ६ रचनाएँ मुख्यत इनकी हे, ऐसा मानना उपयुक्त होगा ।' श्रीसामराज दीक्षित का वैदुष्य श्रीदीक्षित की रचनाओ के अवलोकन से यह स्वत सिद्ध हो जाता है कि ये विभिन्न शास्त्रो के मर्मज्ञ विद्वान् थे । इनके द्वारा प्रणीत 'धूर्तनर्तक' एव प्रस्तुत नाटक के प्रस्तावनाशो से ज्ञात होता है कि श्रीदीक्षित माहित्यशास्त्र, तर्कशास्त्र एव मन्त्रशास्त्र के प्रौढ ज्ञाता थे तथा प्राकृत, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पेशाची आदि भाषा- ओ पर भी पूर्णाधिकार रखते थे । माहित्य-शास्त्र मे अलङ्कार-विधान का अनुराग तया गद्य-पद्य-निर्माण मे अपूर्व कुशलता इनके कवित्व का मनोरम रूप है । वर्ण्य-विषय को अतिसूक्ष्म-चिन्तन- पूर्वक प्रस्तुत करने की कला एव विशाल शब्दसागर का अवगाहन कर नये-नये पदार्थो के निरूपण की क्षमता यहा देखते ही बनती है, गद्यच्छटा मे सभी प्रकार की गद्य-विधाओ का समुचित सन्निवेश तथा पद्य-विधान मे छोटे-बडे छन्दो का प्रयोग, लघु एव दीर्घ ममामो का समावेश, अनुप्रास-यमकादि शब्दालङ्कारो की झकार तथा उपमा-रूप कादि अर्यालङ्कारो का अनुपम विन्याम प्रस्तुत कवि के शास्त्र-तत्त्व- निप्णात होने की पूर्णरूपेण अभिव्यञ्जना करते है। तभी तो कवि अपनी वचोमाधुरी की म्बय प्रगमा करने मे सडकोच नही करता । मूत्रवार का कयन हे कि तन्वते निर्व ति यम्य वाचो लोकस्य कर्णयो । रतिप्रमत्तवनिता-कडूणक्वाणमञ्जुला ॥३॥ वेल्लन्क लोनमालातटघट नमिलत्केनसन्तानमूर्च्छत्- क्षीरोदक्षोदीक्षावितरणपटवो यस्य वाचा पपञ्चा केषा शेषाहिगौरा हृदयपटकुटीमेत्य साहित्यरज्ज्यत्- सौहित्याना रसाना विदधति न झरै पूर्णमानन्द सिन्धुम् ।। नाटक को पूर्तिरूप पुष्पिका मे भजन्नु कवयो नैलिम्पवृत्ति भुवि, स्फीता दीक्षित सामराजचिदुप सूक्ती सुधाम्यन्दिनी । (५।२५ रयादि) १- इनकी अन्य रचनाओ का भी कुछ अनुमान किया जाता है, पिता न मे नामसाम्य ही हो सकता है, अत यह गवेषणा है ।। केटलागरम् । - पाय पायमिमा को प्रतिबोध देने मे सर्वथा समर्थ है । उपकार का डिण्डिमघोप न करते हुए 'दायाँ हाथ दे और बाये हाथ को ज्ञात न हो' इसकी अभिव्यक्ति भी श्रीकृष्ण द्वारा द्वारिका मे श्रीदामा को प्रत्यक्ष कुछ न देकर अपने आदेश से श्रीदामपुरी का निर्माण करवाना एक प्रभावपूर्ण दृष्टान्त है, जो कि कवि ने नाटक के माध्यम से प्रति- पादित किया है ।कृपा करने पर भी अहम्भाव का अभाव यहा व्यत है । नाटक का मूल वृत्त अतिप्रसिद्ध ग्रन्थ 'श्रीमद्भागवतमहापुराण' के दशमस्कन्ध मे महर्षि वेदव्यास ने दो अध्यायो मे सुदामा के चरित से सम्बन्धित नाटकोक्त कथा का वर्णन किया है। यत्र तत्र कृष्णकथा के प्रसङ्ग से अन्य ग्रन्थो मे भी इस प्रसङ्ग की चर्चा हुई । हिन्दी एव अन्य भारतीय भाषाओ के कवि भी सुदामा के चरित्र की प्रस्तुति में पीछे नहीं रहे है । किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि सस्कृत नाटक के क्षेत्र मे श्रीसामराज दीक्षित ही ऐसे प्रयम टीकाकार है जिन्होने श्रीदामा के चरित को नाटक के रूप मे प्रस्तुत किया । सक्षेप मे अन्य पात्रो की सहायता से विपय-वस्तु को प्रसगोचित परिवेष मे सकलित कर यथावसर कल्पना का पुट देते हुए मूलवृत्त को उज्ज्वल बनाया गया है। कयानक मा सार इस प्रकार है ८ दय के पश्चात् श्रीदामा जाने की अनुमति लेकर विदा हो जाते है । मार्ग मे गालव श्रीकृष्ण द्वारा कुछ भी न देने की चर्चा करता है किन्तु श्रीदामा इस प्रमग को 'अच्छा ही हुआ' यह कहकर टाल देता है। अपने गाव पहुचने पर दोनो देखते है कि पर्णशाला के स्थान पर महल बना हुआ है, दोनो विस्मित हो जाते है तभी कञ्चुकी आकर सारी घटना को स्पष्ट करता है । श्रीकृष्ण अपने मित्र से मिलने की इच्छा से विमान द्वारा श्रीदामपुर पहुचते है, वहा आर्या वसुमती एव श्रीदामा रुक्मिण्यादि परिकर सहित श्रीकृष्ण का स्वागत करते है और भरत वाक्य के साथ नाटक पूर्ण होता है। सस्कृत-भापा एव लोकभापाओ मे 'सुदामाचरित' श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार ह हई । ब्राह्मण ने गुरगृहवाम के समय हुई कृष्ण की मैत्री से अपने भाग्य को मगहा और 'माक्षात् ब्रह्मस्वल्प कृष्ण का अध्ययन के लिए गुरुगृह मे रहना एक विडम्बन ही या' ऐमा माना । यहा एक अध्याय पूर्ण हो जाता है। दूमरे अव्याय मे श्रीकृष्ण कुछ मुस्कुराते हुए अपनी भाभी द्वाग भेजे गये उपायन (भेट) को मागते है । सकोचवश ब्राह्मण कुछ न कहकर नीचा मुह किये चुप बैठा रहता है । तब नगवान् स्वय अपने मित्र और उमसी पतिव्रता पत्नी की कामना को पूर्ण करने की इच्छा मे उन पृथुको की पोटली को खीत्र नेते है और 'अहो ! यह उपायन मेरे लिये भेजा गया है, यह मुझे बहुत प्रिय है, इन तण्डुलो मे में और विश्व तृप्त हो जाएगे' ऐमा कहते हुए एक मुट्ठी भरकर खागये और जव दूसरी मुट्ठी माने लगते है ना लदमी उनका हाथ पकड लेनी है । लक्ष्मी कहती है कि 'हे विश्वात्मन् । टम लोक मे अयवा परलोक मे मनुष्य को नर्वविध सम्पत्ति प्राप्ति के लिये आपको मन्तुष्ट करने हेतु दनना ही पर्याप्त है।' उस रात्रि मे ब्राह्मण वही कृष्ण के महल में रहता है आर ग्वय को स्वर्ग में रहते हए के ममान मानता है।

१० मे भी इस सम्बन्ध मे कुछ कहा गया है । विशाल सस्कृत-साहित्य की प्रवृत्तियो मे व्याप्त स्तुतिमाहित्य मे भगवान् श्रीकृष्ण की भक्तवत्सलता का जहा-जहा आख्यान हुआ है, उसमे भी सुदामा का स्मरण होता ही रहा है । दक्षिण के मूर्धन्य कवि श्रीवेदान्तदेशिक ने 'कुच- लमुनि' का स्मरण 'वैराग्य-पञ्चकम्' के प्रथम पद्य मे इस प्रकार किया है - क्षोगीकोण-शताशपालनकलादुरिगर्वानल क्षुभ्यत्क्षुद्रनरेन्द्र-चाटु-रचना धन्या न मन्यामहे । देव मेवितुमेव निश्चिनुमहे योऽसौ दयालु पुरा, धानामुष्टिमुचे कुचेलमुनये धत्ते स्म वित्तेशताम् ॥ इत्यादि । भारतीय भाषाओ मे 'सुदामा-चरित' हिन्दी भाषा के 'सुदामा-चरित' ११ कथा का इतिवृत्तात्मक वर्णन अपेक्षित था, वहा दोहा छन्द का प्रयोग मर्मस्पर्शिता को बढाता हे । अलकारो का सहज प्रयोग तथा काव्योचित सौन्दर्य के साथ हृदय के उन्मुक्त भावो की अभिव्यक्ति उत्तम है तथा भाषा का प्रवाह अत्यन्त हृदयग्राही है। विषय की प्ररतुतिगत मनो- रमता के कारण श्री नरोत्तमदास के कतिपय छन्द तो हजारो नर-नारियो को फण्ठर य-से हैं । एक दो उदाहरणो से यह बात और भी स्पष्ट हो जाएगी। यया - सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय !, ताको कहा अब देति है सिच्छा ? जो तप के परलोक सुधारत, सम्पति की तिनके नहि इच्छा। मेरे हिये हरि के पद-पद्धज, वार हजार ले देषु परिच्छा, और नि को धन चाहिये बावरि, ब्राह्मण को धन केवल भिच्छा ।। . [] M [] सीस पगा न झंगा तन मे प्रभु , जान को श्राहि, बर्म केहि ग्रामा, धोती फटी-सी लटी दुपटी अरु, पाय उपानह की नहि मामा । द्वार खडी द्विज दुर्बल एक, रह यो चकि सो वसुधा अभिगमा, पूछत दीन-दयाल को धाम, बतावत श्रापनो नाम सुदामा ।' हलधरदास और भूधरदाम ने अपने सुदामाचरित्रो में एक ही छन्द 'ठण्यय प्रयोग किया है, जब कि आलम कवि ने 'ककुम' छन्द को व्यवहन किया। वाजपेयी ने विविध छन्दो मे इस काव्य को ग्रथित किया है । इन कवियो न Tमा पार ब्राह्मणी मुदामा पत्नी के चरित्र-चित्रण मे यत्र तत्र परिवर्तन और परिवार की कथासूत्र को रोचक बनाने का पूरा प्रयत्न किया है । आन्ध्र भागवतकार पोतन्ना (पोतनामात्य, पोतराज) ने १५ वी शती के भागवतमहापुराण के चार प्रमुख भक्तो के वर्णन मे 'कुचेल' (सुदामा) का वणन 1ि भावानुबन्ध के साथ किया है । वहा कुचेल विद्या-विनयसम्पन्न ब्राह्मण है, करण का कार मित्र है तथा उनके चरित्र से यह अभिव्यक्त किया है कि भगवान् भक्तपराधीन है । Thi १- इनके अन्य कुछ आर पद्यो को हम तुलना मे आगे प्रस्तुत कर रहे है । २- द्रष्टव्य- (क) सुदामा-चरित, नरोत्तमदास, स० बद्रीदास सारस्वत, साहित्य रत्त- भण्डार, आगरा। (ख) सुदामा-चरित्र, हलधर, प्र० स०, खड्गविलास प्रेस, पटना । (ग) सुदामा-चरित, आलम, प्र० स० नागरी प्रचारिणी सभा, काशी। (घ) सुदामा-चरित्र, वीरवाजपेयी, नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ । - - 'सुदामा-चरित' के रूप मे खण्डकाव्यो की रचना की है । इनके रचयिताओ मे प्रथम दो कवियो ने 'सुदामा-चरित्र' और तृतीय ने 'सुदामा को भाषा श्लोक' ऐसे नाम दिये है। रचना गाधीयुग से प्रभावित होने के कारण तात्कालिक स्थिति के प्रभाव से पूर्ण है । जिस प्रकार 'कामायनी' की श्रद्वा ऊन और 'साकेत' की सीता सूत कातने की बात करती है, उसी प्रकार सिग्देलजी के सुदामा-चरित्र मे पौराणिक सुदामा की पत्नी भी सूत कातने का उपक्रम प्रस्तुत करती है। वर्तमान का प्रतिविम्ब इन नेपाली काव्यो मे बहुत अच्छा उतरा है । उदाहरणार्थ 'सुदामा महल के चौकीदारो से डरता है कि कही वे पीट न दे । शासक वर्ग द्वारा जो धन का दुरुपयोग किया जाता है और धनी के पास जो दुष्प्रवृत्तिया बढती रहती है उसका चित्रण सिग्देलजी की इन पक्तियो मे द्रष्टव्य हे यो पूरा धनवान् छ यो धन लिने बारो बनाऊ भनी, वेस्या चोरहरू प्रयत्न छलका गर्धन करोडो पनी । जेले सत्यथ वाट यो मन हटी भारी बिलाखी हुने, सारा जीवन को छ सार जुन सो बर्बाद पारी दिने ॥ सुदामा की आत्मग्लानि, पत्नी के प्रति खीझ, धन के प्रति अनास्था के उदा- हरण भी अच्छे है । यथा - जो बित्त ले प्राप्त हरू टुटाई, बर्बाद गर्द छ सदा झगडा लगाई। लोकापवाद अति पार्द छ सुन्न नित्य, देखिन्न सो स्थिरपनी छ सदा अनित्य ॥2 श्रीलामिछा ने ब्राह्मणी के मुख से अपनी दीनता का जो वर्णन करवाया है, वह बडा ही रोचक है। यथा सदा तुन्दा तुन्दा पतरि भई सारी त तनकी, बती तुन्नू मैले तवल पुगि गै एक मन की। चोलीया की हाली कति कहनु यो दात् सरम की, बिना खानू पीनू सब गरनु यो काम घर की इतना ही नही वह जहा भी सहायतार्थ जाती है लोग उसे तुच्छ दृष्टि से देखते है और वह उनके भाव समझकर लज्जावण कुछ कह भी नहीं पाती। इस असमजस का चित्रण बडी सजीवता से इस प्रकार हुआ है जहा जान्छू ताहा दिदि बहिनिका काम करले, पाई माग्ली भन्या मन गरि त हेर्छन् नयन ले। १- सुदामाचरित्र, कृष्णनाथ सिग्देल पृ० २३ । २- वही, 'भापारत्न' से उदृत ।

'प्रकृति की रमणीयता से नाटक की चाम्ना मे अभिवृद्धि होती है' इस आशय से उपवन के वृक्ष, लताएँ, पशु, पक्षी आदि नाटक के मजीव अग माने जाते है । इम दृष्टि से सस्कृतनाट को मे अन्त प्रकृति के माथ ही वाह्य प्रकृति का सुन्दर एव विशद वर्णन हुआ है । यद्यपि यहाँ ऐमे वर्णन मे पूरी सूचियो का जो ममुल्लेख हुआ है, वह नाट्य-मञ्च की दृष्टि मे तथा प्रेक्षकानुभूति की दृष्टि से अनुपयोगी कहा जाएगा, किन्तु उसे हम द्वारिका के तत्कालीन महाराजा विराज के प्रमद- वन की कल्पना के आधार पर ममाहित कर मकते है । 'भवभूति ने अच्छे नाटको का लक्षण देते हुए कहा है कि भूम्ना रसाना गहना प्रयोगा सौहार्दद्यानि विचेष्टितानि । औद्धत्यमायोजितकाममूत्र चित्रा कया वाचि विदग्धता च ॥ (मालतीमावव १/६) अर्थात् 'विभिन्न रसो का प्रचुर एव गह्न प्रयोग, प्रीतिपूर्ण, रचिर एव कमनीय कार्य-कलापो का अभिनय, पराक्रम और प्रणय का चित्रण, विचित्र कथावस्तु नथा निपुण मवाद, (ऐसे लक्षणो मे युक्त नाटक ही उत्कृष्ट माने जाने है । ) दशस्पककार धनञ्जर ने इमीलिये स्पष्ट किया है कि प्रानन्दनि प्यन्दिषु रूपकेषु, व्युत्पत्तिमात्र फलमत्पबुद्धि । योऽपीतिहासादिवदाह सापुस्तम्मै नम स्वादुपरामुखाय ॥ (दशस्पक १/६) अत आनन्दातिरेक की विशुद्ध अभिव्यक्ति ही नाटक- निर्मिति का फल है और वह श्रीदीक्षित के प्रस्तुत नाटक द्वारा मुलम है, और यही कारण है कि प्रस्तुत नाटर की रचना शैनी भी उत्तम बन पटी है ।

१७ प्रादेशादथ देशिकस्य दवतो दर्वोकरेणावृता- न्येधान्यानयतो कुत्तोऽपि समभूद् यत् कोऽपि कम्पक्रम ॥३॥१५॥ प्रमदोद्यान मे प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण शीतल पवन का वर्णन करते हुए उसे कामी की उपमा देते हे (३।१६), सुमित्र द्वारा वनश्री के वेभव का आख्यान करने पर वे भी अपनी बहुज्ञता को व्यक्त करने मे नहीं चूकते । मध्याह्न मे वृक्षो के पास छाया का होना भी उनकी दृष्टि मे प्रिया को उत्सगित करना है छायापतौ समन्तात् करसञ्चार कुर्वति दिशासु । उत्सङ्गयन्ति तरवो मुग्धवधूटोमिव च्छायाम् ॥३॥१६॥ मूर्यास्त के वर्णन मे भी श्रीकृष्ण का रसिक स्वभाव प्राची को तिमिराभिसा- रिका के रूप मे देखता है (३।२८) । चन्द्रोदय के पूर्व अन्धकार को 'कुलटामोहनक- लामहाध्वान्तस्कन्ध' (३।२६) कहकर जगत् को व्याकुल करनेवाला बतलाना तथा चन्द्रोदय के विभिन्न कल्पनामूलक वर्णनो के साथ ही भामा, रुक्मिणी, जाम्बवती आदि के प्रति अनुराग का निदर्शन उनकी सरसता का उज्ज्वल प्रतीक ही तो है। यथा- क्षणमाविष्कृतमाना क्षणमभिदृष्टप्रसादमापुर्या । घनलयनिर्मोकवती शशाङ्कलेखेव मा हरति ॥४॥२॥ अथवा दन्तान्तरालिकास्ते श्यामलरेखा हरति मे चित्तम् । अधरसुधासम्बन्धादुदित इव शैवलारोहा ॥४॥५॥ इत्यादि। विदूपक सुमित्र, गालव और कनकचण्ड का भी अपना-अपना स्वतन्न व्य- क्तित्व यहा निखारा गया है। उनकी प्रतीक उक्ति मे काव्योचित कला का उन्मेप है, भणिति- भङ्गी का विभावन है तथा कया-शैली का कमनीय विलास हे । स्त्रीपानो मे नटी के गान के अतिरिक्त कही पद्य-प्रयोग नहीं है । प्राय मभी सक्षिप्तवचनाए है । हा, गद्य प्रयोग मे वे अपने वैदग्ध्य को व्यक्त करने मे अवश्य सफल हुई प्रतीत होती है और उनका महिलोचित मार्दव भी अक्षुण्ण बना रहता है । इसी दृष्टि से दरिद्र की पत्नी और अन्य सखिया भी प्रवुद्ध ह । काव्यशास्त्रीय विशेषताएँ 'श्रीदामचरित' नाटक का कवि काव्यशास्त्र की सभी विधाओ से सुपरिचित तथा उनका सुप्रयोग करने मे पूर्ण सक्षम है । शृङ्गाररस तथा प्रसङ्गानुसार अन्य रसो की योजना मे भी प्रावीण्य दिखाने का पूरा प्रयास किया है। हास्यरस का परि- - पाय भी विदूपा की विचित्र उक्तियो मे प्राय झलकता है। अलकारो का मनोरम मन्निवेश कवि श्रीदीक्षित ने बहुधा किया है । शब्दाल- शागे में अनुप्राम पर विगेप मनोयोग प्रदर्शित हुआ है। यथा- कुञ्चत् कल्पतरूणि मूकितगुरूण्यापन-वित्ताधिपा- न्याक्रन्दद् रिपुवल्लभानि विदलद्ब्रह्माण्डभाण्डानि च । फम्पद् दिग्दयितानि रज्ज्यदवलान्याह्लादिबन्धुव्रजा- न्याकुञ्चत् कमतानि यस्य चरितान्यामोदयन्ते जगत् ॥१॥१७॥ यहा टेकानुप्रास तथा शतृप्रत्ययान्त शब्दो के प्रयोग से एक आकर्षक ध्वनि- मान्य पी सृष्टि की गई है । इस प्रकार के नादसौन्दर्यवर्धक प्रयोगो मे श्रीदीक्षित ने वरन ही सफलता प्राप्त की है । यही अनुप्राम वृत्त्यनुप्रास के रूप मे भी जहा उतरा है रहा वहुत ही अच्छे स्वरूप को लेकर बिखरा है। दण्डकल्प स्तुति की पडि तियो मे नपा प्रामगिक जन्य गद्य एव पचो में इसका प्रयोग द्रष्टव्य है-- (क) जयाकृष्टकण्ठीरवाकुण्ठवैकुण्ठलुण्ठाकदंतेय- कण्ठाटवीलोचनोत्कण्ठपाठीनवेप- म्फुरत्कामठी० (ग) देवदामोदरोदारदारारिरसादर सादर साधयन् माधु० ॥२॥२॥ (ग) उच्छनबहलवी चिनिचयचुम्बितचपलवेलादलदेलादलदलननागर (इत्यादि गध, ३ प्रक) स.गर ।

यमक का प्रयोग बहुत कम हुआ है । श्लेप अलकार भी एक-दो ग्याना २) प्रयुक्त हुआ है । यथा उपमा उपनिषद्गहने हरिरूपि यत्, प्रणवनाकतले हरिपि यत् । दहरविष्णुपदे हरिरूपि यत्, किमपि धाम पुरो हरिरूपि यत् ॥३६॥ यहा हरि शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थो का समावेश मननीय है । अर्थालङ्कारो मे उपमा-पूर्णापमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, उत्लेय, निषेध, अर्थापत्ति, अर्थान्तरन्यास- विरोधाभास, परिसख्या, अतिशयोक्ति, अपह नुति आदि विभिन्न अल हागे का प्रयोग हुआ है । कुछ उदाहरण प्रेक्षणीय है परागस्थगनात्लुब्धवर्णा श्रामोदशालिन । हरन्ति हन्त सन्ताप सज्जना इव वायव ॥३॥३॥ पूर्णोपमा काश्चनोत्का इव कलितोद्वेगा, काश्चन कलहान्तरिता इव कलिकोपक्रमभाज पुनर्मदनबाणासनातिमुक्तशिलीमुखभिन्ना , काश्चन स्वाधीनपतिका इव प्रियालापसङ्गता स्वच्छन्दकृतवृ- क्षारोहा । (इत्यादि । ३ अ०, सुमित्रोक्ति) अस्तपातुकधांशुकिरणारुणिताञ्चलम् । वस्तेऽन्तराले तिमिरश्यामल जगदम्बरम् ॥३॥२२॥ उत्प्रेक्षा विश्रामस्थानमिव मिहिकाया, कुलगृहमिव वर्षाया उत्पत्तिस्थानमिव चन्द्रालोकस्य, निर्वृतिपदमिव शीतजातस्य, श्रागार मिव शृङ्गारस्य० (इत्यादि ३ अक०, सुमित्रोक्ति) उल्लेख प्रास्थानी सद्गुणना निखिलनयवनी निर्गमो बोधसिन्धो- रालान श्रीकरेणो कुलवसतिगृह भारतीविभ्रमणाम् । इत्यादि ॥१०॥ विरोधाभास - विडोजसाप्यगोत्राभिदा, सुरूपेणापि धनदेन, महेश्वरेणाप्यनुग्रेण, जगत्प्रा- णेनाप्यप्रभञ्जनेन० इत्यादि (५ अ० कनकचण्ड की उक्ति) परिसख्या यत्र च शूलसम्बन्धो योगेषु, गदाभियोग पीताम्बरे, कपालित्व शङ्करे, वलहानिरसुरेषु, क्षयप्रचारो भवनेषु, हस्तेन कन्यावयवाभिमर्शन ज्योति - शास्त्रे इत्यादि (वही 1) रूपक - बहुत से स्थलो पर ये ही जतद्वार श्लेपपुष्ट होकर अगवा अन्यान्य अल जागे से समन्वित होकर अङ्गाङ्गिनावमकर भी बन गये हैं।

२०
- अभिनव कल्पना और आधुनिक दृष्टि
की दीक्षिनजी ने चमत्कृत उक्तियो और विभिन्न अभिनव कल्पनाओ के साथ
ही कुछ जावनिक दृष्टि को भी अपनाया है, जिसमे नाटक के आयाम को नये अवदान
भी अलव्ध हुए हैं। श्रीकृष्ण जव योमयान द्वारा श्रीदामपुरी की ओर जाते है, तो
मार्ग मे लाम-पवत भी आता है, वही शिव का निवास है । उनका शरीर जिसे
विपक हिमगिरि-स्थित राक्षसो के खाने के लिये भात का ढेर बताता हे-- वह
अर्धनारीश्वरस्प है,
अत गजानन ओर कार्तिकेय जब माता का स्तन्यपान करना
चाहते है तो एक स्तन के कारण उनमे परस्पर युद्ध होने लगता है, यह उक्ति विनोद
के नाथ अद्भुत भी है । प्रथा -
प्रेणानचटितयो शिवयो पुरस्तात् स्तन्यायिनौ द्विरदनाननकोकियोतु ।
एकम्मनाश्रयतयाऽहमह पुरम्नादित्यद्भुताञ्चितशिव मृवमारभेले ॥५॥४॥
एक निभनि-चिन और एक शास्त्रकाव्य का उदाहरण भी द्रप्टव्य है-
यन्नाता जगता यमाह निगमस्तत्त्वञ्च येनाप्यते,
यस्मै योगिजनो नम प्रकुरते यस्मात् परो नापर ।
यम्यतत्मकललजीवभुगो यस्मिन् जगद् दृश्यते,
सान्द्रानन्दमय पुराणपुरुष स्याच्चक्षुधोगोचर ॥२॥१०॥

२१ गर्जति घनो न वर्षति वर्षति नो गर्जति प्रथितम् । जल्पति न चोपकुरुते जन उपकुरुते न जल्पति कदापि ॥५॥१४॥ इस कथन से 'गरजै सो बरसै नही' इत्यादि उक्ति को व्यक्त किया है । ऐसी ही कुछ अन्य उक्तियो का समावेश अर्थान्तर-न्यास के माध्यम से भी हुआ है । जहा काल के बारे मे कुछ कहा गया है, वहा काल को कालहलिक (३।३१) कहकर रविरथल से अवकृष्ट तथा तिमिरोघ द्वारा समीकृत बताकर नभ क्षेत्र मे नक्षत्र- बीजो का वापक (बोनेवाला) बतलाया है । वही 'तिमिरमयनीलवर्ण' मे चित्र बनाता हुआ 'काल-चित्रकार' हे । कही कालसमुद्धारक' (५।३४) है तो अन्यत्र 'काल-मन्त्री' के रूप मे व्यक्त है । सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्रोदय, चन्द्रास्त, समुद्र, द्वारका- पुरी, गोपुर, प्रमदवन, हिमालय, कैलास और श्रीदामपुरी के वर्णनो मे कविवर श्री दीक्षितजी ने गद्य और पद्य दोनो ही रूपो मे अपने काव्य-कोशल को अद्भुत प्रतिभा के द्वारा मनोरम पद्वति स पुरस्कृत किया है । हिन्दी चरित्रो के साथ तुलना उद्यान-वर्णन मे हिन्दी के कवि हलधरदास ने अपने 'सुदामाचरित्र' मे पुप्पो की एक सूची-सी प्रस्तुत की है। यथा- केसरि कुसुम गुलाब केतुकी मालती वेली, सेवति सुभग नेवार कुन्द नागेस चमेली। चम्पा करत बवग बेलि लहरी अपराजित, जूही मधुर सुगन्धराज मुनिपुष्प सुवासित । चन्द्र कला श्रीमल्लिका श्रीबसन्त सूरजमुखी, सबै फूल फूले सुभग भ्रमर जुथ होते सुखी । (पृ० २३६) सम्भवत यह देखकर दीक्षितजी कैमे पीछे रहते ? उन्होने भी वृक्षो की एक प्रौढ सूची उद्यानाधिकारी सुमित्र द्वारा अपने उद्यानस्वामी श्रीकृष्ण के सम्मुख प्रस्तुत करवा दी, जिसमे- 'धनसार, पीतसार, त्वक्सार, सिन्दुवार, कोविदार, मन्दार, सहकार, कणिकार, शितिसार, जम्बोर, वानीर, करवीर, पाटीर, वीरपुर, खपुर, मालूर, खदिर, कदर और बदर' जैसे १६ वृक्ष रान्त, 'ताल, तमाल, हिन्ताल, कृतमाल, नक्तमाल, कन्दराल, चलदल, दधिफल, जन्तुफल, निवुल, पिचुल, चतुरड्गुल, मञ्जुल, वजुल, मयुष्ठील, मधुल, गुडफल, विडुल, फेनिल, उद्वाल, कदली, लाङ्गली, लवली और शाल्मली' आदि लान्त पदोवाले २४ विविध वृक्षो के नाम तथा साथ ही अन्य १६ वृक्षो के नामो की सूची दर्शनीय है । और इतने से ही सन्तुष्ट न होकर वही स्वय श्रीकृष्ण, १ द्रप्टव्य, गद्याश, श्रीदामचरितम्, पृ २६ । .

२२
उत्रेता,
साथी विदूपक, अतिथि मुदामा तथा गालव के द्वारा भी इसी क्रम में अन्य अनेक
वनीपवि और पुप्प,-फलवती लताओ के वर्णन भी कर दिये है । इन्ही वर्णनो मे
पूणापमा, रूपक, परिसख्या और विरोधाभास का भी पर्याप्त सहयोग लिया है ।
नरोत्तमदास ने
सुदामा
की पत्नी द्वारा-
महादानि जिनके हितु जदुकुल करवचन्द ।
ते दारिदस ताप ते रहे न किमि निरद्वन्द्व ॥
कहला कर द्वारका भेजना चाहती है, तो सुदामा-
कह्यो सुदामा वाम
सुनु वृथा और सन भोग ।
सत्य भजन भगवान् को धर्म सहित जप जोग ।
कहकर ब्राह्मण के धन के रूप मे भिक्षा का महत्त्व दिखनाता है । जब कि
यहा दीक्षितजो ने 'मकलदोर्गत्यगदागदङ्कार' श्रीकृष्ण के पास दारिद्रयदु ख-निवारण
पे लिये प्रेरित करनेवाली अपनी पत्नी वसुमती को 'भिक्षा, मानवाले मानव के लिये
छन्दोरीति के ममान जिहालाधय मे गुर को भी लघु बनाने वाली' कही गई है, तया---
।
-

२३ और--- "द्वारका जाहु जू द्वारिका जाहु जू पाठहु जाम यह जक तैरे" । ऐसा कहला कर उनकी पत्नी के प्रति खीझ का प्रदर्शन किया है जब कि दीक्षितजी ने पहले सुदामा को आत्म-सन्तोषी और शिष्य गालव के द्वारा बहुत उकसाने पर कृष्ण को 'कृपण' कहकर ही सन्तोष मान लिया है। एतदर्थ निम्न दो पद्य दर्शनीन है पीतया मदिरया प्रमाद्यति, स्पष्टयैव धनसम्पदा जन. । तच्छमस्य परिपन्थिनीमिमा, सड्गृहीतुमपि क समुत्सहेत् ॥४॥४०॥ बहुलाव्ययसमुदायादासादयत कमप्यर्थम् तुहिनपदतुल्यरूपात् कृपणादपि वेपते काय ॥४१५१ तथा अन्तिम कामना भी श्रीदाम की यही है कि-- पर्यस्त दौर्गत्य पर्यस्तो मे शरीरसादश्च । कृपया कसद्विषतो भवोऽपि पर्यस्ततामेतु ॥५६शा 'श्रीदामचरित' मे छन्दोविधान काव्य के रसास्वाद मे छन्दो का उचित प्रयोग भी अत्यन्त आवश्यक माना जाता है । भाव कैसे भी हो, गीतिमत्ता के आवरण मे प्रस्तुत होने पर वे अधिक हृदयग्राही बन जाते है । आनन्दकारी, अभिप्राय-वाहक एव रसप्रवाही छन्दो का प्रयोग काव्य के प्रत्येक अग में समादृत है । कविवर श्रीसामराज दीक्षित भी इस प्रकार के छन्दोविधान मे सिद्वहस्त है । प्रस्तुत नाटक मे १५० से अधिक पद्य है और उनमे प्राय २५ प्रकार के छन्दो का प्रयोग हुआ है । जिनके नाम इस प्रकार है- १. अनुष्टुप् २६ ८- द्रुतविलम्बित ४५ - पक्ति ३- इन्द्रवत्रा १ १०- पुष्पिताग्रा ४. उपजाति ११- पृथ्वी ५- गाहा ३ १२- प्रहर्षिणी १३- भुजङ्गप्रयास ७- दण्डक ३ १४- मन्दाक्रान्ता ३ १ २- आर्या ७ ह ६- गीति ३ १ १ २४ ३ १ ४ १५- मात्रिक (?) २०- शार्दूलविक्रीडित १६. मालिनी २१- शालिनी १७. रयोद्धता २ २२- शिखरिणी १८. वसन्ततिलका है २३. स्रग्धरा १६. वियोगिनी ३ २४- हरिणी तथा २५-गद्यरुप दण्डक प्रभेद ५ १ १ इनके पर्यालोचन से स्पट हो जाता है कि सस्कृतकाव्यो मे प्रयुक्त होने- सभी प्रकार के छन्द इनमे प्रयुक्त है और वे सभी अभिप्रायानुरूप विधान में सफल प्रतीत होते है । वाले प्राय इस प्रकार यह नाटक सभी दृष्टियो से महत्त्वपूर्ण है । ऐसे उत्तम नाटक का प्रकाशन करने मे राष्ट्रिय सस्कृत संस्थान के निदेशक महोदय डॉ० रामकरण शर्माजी की मत्प्रेरणा तथा विद्यापीठ के प्राचार्य डॉ० मण्डन मिश्रजी का प्रोत्साहन सदा हमारे साथ रहा है जत उन के प्रति कृतज्ञताज्ञापन करते हुए कामना करता हू कि- मात रति ! वानियो कति कति प्रत्लानि रत्नानि नो, ग्रन्यानामिह सति यानि बहुशो लुप्तानि लिप्तानि । नुप्ताना पुनराद्धृतौ हृदि मदा निष्ठाऽरतु तेषा तया, लिप्नाना च परिप्यती भरतु मे प्रज्ञा ततस्तत्परा ॥ इत्यल पल्लवितेन । तितोगदिनम् २०१० विद्वदशवद डा० रद्रदेव त्रिपाठी *

पण्डित-कवि-
श्रीसामराजदीक्षित-प्रणीत
श्रीदामचरितम्
( नाटकम् )

श्रीदामचरित'-नाटकस्य पात्र-परिचय परप-पात्राणि १- सूत्रधार २. दारिद्र्यम् ३- श्रीदामा नाटकीय-प्रयोगस्य निर्देशक । ब्रह्मणाऽदिप्ट मध्यमलोकावेक्षणार्थमुपेत पात्रम्। श्रीकृष्णचन्द्रस्य सखा । श्रीदाम्नोऽन्तेवासी। ४- गालव ५. गन्धर्व स्पप्रिय ६- प्रिवरप गगनयानेन ब्रमन् कश्चन गन्धर्वविशेप । कप्रियस्य सखाऽपरो गन्धर्व । भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र । श्रीकृष्णस्य नर्ममचिव । ७. कृष्ण विदूपक ६- प्रनिहारी पुरुप १०- प्रतिहारी श्रीकृष्णस्य द्वारपाल । श्रीदाम्नो द्वारपाल । ११- पुरुष सुमिन १२. पुरोहित - १३- फञ्चुको श्रीकृष्णम्य प्रमदोद्यानावित पुरुप । अतिथि-मपर्यादिकारक आचार्य । आर्याया वसुमत्या मेवक । श्रीदामपुर-परिचाया कश्चन पुरप । १४- कनकचर Hom- स्त्री-पानाणि १. नटी २. दुर्मति ३. यमनी सूत्रधार-महयोगिनी । दारिद्रगन्ध पत्नी। - श्रीदाम्न पल श्रीसामराजदीक्षितप्रणीतम् श्रीदा चरित (नाटकम्) अथ प्रथमोऽङ्क (नान्दी) जलधरसदृशे मुकुन्दवक्षस्यचिररुचिप्रतिभा समुद्वहन्त्या हृदि कमलभुव श्रिय वितन्वन् गरुडमणेर्हरताद शर्म कृष्ण ॥१॥ (नान्द्यन्ते सूत्रधार ) - सूत्रधार. (विभाव्य) -- चित्ते नित्य चकास्ता नृपवर-रचनारम्भविध्वसहेतु- र्वेदान्तज्ञेयतत्त्वो बहुतरगहनामेयवृत्तप्रपञ्च । यस्यामोघान् गुणौधान् कविवररचना वर्णितु नैव शक्ता, य द्रष्टु योगिपडिक्त फ्लमति' रसघनानन्दसन्दोहकन्दा ॥२॥ (परितो विलोक्य) अलमतिविस्तरेण । भो भो विकचनवनीलनलिनदल कोमलकायकान्ति-सक्रान्ति-किर्मीरित-व्यष्टसहस्रगोपी-पीवर-कुचस्थलपुनरुक्ति मृगमदपत्रस्य भङ्ग ररुधिरमन (नो १) मदचमूसमररसिकदितिजनिजनित निधन - समेधित - धर्मकर्म - विधुतकलुपजगदवनमुदितमुनिजन - कृतपारायणस नारायणस्य यदुवशावतसस्य चरणनलिनमिलदमलजनानुसरदतिविपुल धनलिप्सया मयि केनचित् सौभाग्यजुपा निक्षेप इवायमर्थ सस्थापितोऽसि यदभ्याश सभ्यानामागतेन त्वया केनापि रूपकेण प्रमोदामोदितमनसो वय विधेय इति । तत् प्राप्तावसरमनुतिष्ठ प्रियया सह कुशीलवै सङ्गीतकम् (परिक्रम्यावलोक्य च) अनाहूतैव विदितवृत्तान्तेव प्रिय गृहीततत्तद्भ मिकासम्भारा समुपस्थिता । अये । १ प्रतिमा समु-ब० । २ हरताम् शर्म-ब० ३ क्रमति-ब०।

२ प्रथमोऽडू (तत प्रविशति नटी) नटी -अज्जउत्त, णट्टप्पप्रद विन तुम्ह मणा दीसई। [आर्यपुत्र, नृत्यप्रवृत्तमिव युष्माक मनो दृश्यते । सूत्रधार -प्रिये, पररञ्जना एव गुणा भवन्ति । यत अहृत्वा तरुणानीकमनासि स्फुरता वृथा । कुरङ्गाक्षीकटाक्षाणा दुर्लभा परमागता ॥३॥ -- अपि च-- ? विवेचिता गुणाभिजभूषयन्ति नर गुणा । परीक्षिता हि मणय शोभा कामपि तन्वते ॥४॥ तदमीपा विदुपामुपहारीकृत्य शोधयेय तावन्निजगुणान् । नटी -ता कि पि अच्छि तारिस स्वत्र [तत् किमप्यस्ति तादृश रूपकम् ?] सूत्रधार -(म्मृत्येव महपम्) प्रिये, साधूपलव्धमेतेपा रञ्जक प्रेक्षणकम् । स्मरमि नरहरि- दीक्षितमूनुना दीक्षितसामराजेन प्रानन्दरायरञ्जनाय 'श्रीदामचरितम' नाम नाटक म्यय विरच्य तदग्रेऽभिनेतु मह्यमपितमासीत् । नटी -- (क्षण ग्मृत्वा) का मे मामगयो जेण धुत्तणट्टन प्पहमण कदुअ वन पट्टाविदा । [फोऽमो नामगजो येन 'धूर्तनर्तक' प्रहमन कृत्वा वय नर्तापिता । मूत्रधार -अथ frम् ।

श्रीदामचरितम् सूत्रधार -प्रिये, स एव कामाभिराम आकलासप्रथमशिखरादासुवेलाचलान्ता- दापौलोमी-विहरणगिरेराप्रतीची दहार्यात् । विश्वे विष्वड मधुरशिशिरान् चञ्चलाकूणिताक्ष, पाय पाय श्रवणपुटकर्यद्गुणानुद्गृणन्ति ॥ ६ ॥ अपि च कुञ्चत्कल्पतरूणि मूकितगुरूण्यापन्नवित्ताधिपा-- न्याक्रन्द्रद्रिपुवल्लभानि विदलद्ब्रह्माण्डभाण्डानि च । कम्पद्दिग्दयितानि रज्ज्यदवलान्याह्लादिबन्धुव्रजा- न्याकुञ्चत्कमठानि यस्य चरितान्यामोदयन्ते जगत् ॥ ७ ॥ अपि च-- प्रास्थानी सद्गुणानानिखिलनयवनोनिर्गमो बोधसिन्धो- रालान श्रीकरेणो कुलवसतिगृह भारतीविभ्रमाणाम् । वापी वाणीसुधाया सकलसुजनतामूलमद्रिः कृपाया, केलीसिन्धु क्षमाया धवलयतितरा य स्वकीा जगन्ति ॥८॥ अपि च उत्फुल्लपद्मानि विहाय पद्मा- सद्माकरोद्यन्नयनाम्बुजन्म । कुतोऽन्यथतद्दलनेऽथिसार्थो, दारिद्रयनामापि सरीसरीति ॥ ६ ॥ (सहर्षमात्मगतम्) नवरसरसिक कविविनीत, भरतकुल वयमात्तशास्त्रतत्त्वा । चरितमपि हरे प्रभु कलावा- नपिलमिद सुकृतर्ममाविरासीत् ।। १० ।

४ प्रथमोऽङ्क. तथा हि- -- अफलितास्वपि भूरुहराजिषु, प्रसवसौरभसक्तमधुव्रतान् । विरतमञ्जलगुञ्जितविभ्रमान्, फलधिया रसिका परिचिन्वते ॥ ११ ॥ नटी -अह वि सुरहिं वट्टावइस्स । [अहमपि सुरभि वर्धापयिष्ये इति गायति) चदणगधसुहेहिं दाहिणपवणेहि रुक्खजादीप्रो । सुरहिज्जदि वसते सता कारेंति अप्पणो सरिस ॥ १२ ॥ [चन्दनगन्धसुखदक्षिणपवन वृक्षजातीय । सुरभीयन्ति वसन्ते सन्त कुर्वन्त्यात्मन सदृशम् ॥ (सविपादहासम्) को उण अह्मदेण्ण परिहरिन अप्पसारिच्छ करिस्सदि । [क पुनरम्मन्य परिहत्यात्ममदृश करिष्यति । मूत्रधार -प्रिये, अल विपादेन। य अन्तरात्मा भूताना देवदेवो जगत्पति । श्रीदाम इव नास्माफ दारिद्रय स हरिष्यति ॥ १३॥ तदान्तरमरणीयाय साधयाव । (ति नियान्नी) प्रस्तावना (ता पपिराति दाग्गिय गुमंनिश) दुर्मति -कध अध रमाए चिठ्तीए तुम्हाण प्पवेसो पकिदिमु। [कयमथ रमायास्तिष्ठन्त्या श्रीदामचरितम् किञ्चोदञ्चितशीतकुञ्चिततम प्रत्यङ्गभन्मस्फुरत्- कम्प सयतजाठरानलवल देवालये रात्रय ॥ १४॥ (सोच्छ्वासम्) तदाश्रयाय स्थानमन्वेपयामि । (इति पनिकामति) - दुर्मति ---अज्जउत्त, तुम्हे लच्छीए पडिउला । कइ उण महुमहणन्म दिया हुटिम्मति । [आर्यपुत्र, त्वामपि लक्ष्मी प्रतिकूला। कथ पुन मधुमथनन्य प्रिया भविष्यन्ति ।। दारिद्र्यम् --प्रिये, महत् खल रहस्यमिदम् । स्त्रीस्वभावसुलभलीत्यात् कदाचित् त्वत्तो नश्येदिति नाभिधातुमुत्सहे । दुर्मति --(सश्लाघ्यम्) तुम्ह पडिपथी कदा विजादो अन जणो। [युग्माक प्रतिपन्यी कदापि जातोऽय जन ।] दारिद्र यम् (सस्मितम्) दिष्टविनिष्टपक्षपातेषु धीरेप । दुर्मति -- (सस्मितम्) तहिं घरिणी सुमदि उच्झिन सोहग्गम्हि । तुम्हेहिं तये रममाणेहिं अह विसुमरिदा। [तदा गृहिणी सुमतिं त्यक्त्वा सौभाग्य गताम्मि। त्वया तया रममाणेनाहमपि विस्मृता।] दारिद्रयम् --(साशङ्कम्) न खल्वेवम्। किन्त्वकाण्डलब्धायास्त्वत्परिपन्थिन्या निग्रहे यदितर- स्माभिर्न त्वमाहूता । तदलमनागसीह कोपवन्धेन दुर्मति ---रहस्साइ ढक्कतेसु तुम्हेसु कह ण कुप्पिस्स । [रहस्यानि छादयत्सु भवत्सु कथ न कुप्ये । ] रेद्रयम् --प्रिये, किन्तवास्त्यकथनीयम् । शृणु । थियोऽप्यह प्रियो मधुसूदनस्य । यत स्वानुगृह्येपु तूर्णमपहृत्य रमा मामेव नियोजयति । ततो वैराग्यादय आगत्य मामुपजीव्य व्यतितिष्ठन्ते । दुर्मति --तेसु प्रायदेसु मह कह वावारो । तेष्वागतेषु मम कय व्यापार । दारिद्र यम् ---यातेषु महितेपु तेषु कुलयोपिदाचारविदुष्यास्तव स्वत एव व्यावर्तते व्यापार । युष्माक प्रवेश प्रकृतिपु ।] दारिद्रयम् ---प्रिये, त्वमेव तत्र द्वारम् । दुर्मति --कह विन । [कथमिव । ।

प्रथमोऽङ्क,
दारिद्र्यम् --त्वमादौ हृदयानि श्रीजुपा प्रविश्य कर्मम्वनास्था जनयन्ती पापादो प्रवर्तयन्ती
तानि, अद्य यथेप्टचेप्टाप्रवृत्तेपु तेपु स्वत एवोद्विग्ना रमा तान् जहाति । ततो
मम सुलभ एव प्रवेश । इति ।
दुर्मति --(मगर्वम्) ण अह सिरीए उव्वावरी हुवीअ तुम्ह प्पवेसे कारण होमि । [नन्वह
श्रिया उच्चाटिनी भूत्वा तव प्रवेशे कारण भवामि ।
दारिद्र यम ---प्रिये, त्वया महधर्मचारिण्या गुणमयत्रिमूर्तिष्वपि मुलभमात्मन प्रवेश मन्ये।
(गाढ परिप्वज्य)
इन्द्रधनाधिपकमला किमलाघवमाश्रयन्ति नो तावत् ।
यावन्न देवि भवती भवतीवा केलिमावहति ॥ १५ ॥
तथापि प्रियाप्रेमानुवद्वमनसा हरिणा मामपनीय क्वचित् स्वानुगृह्येष्वपि
दिश्यते कमला । तत् कतिपयदिन यावदधनव
गुरोरनुज्ञया कृतोपयमनस्य
कण्ठावलम्बित-मरम्वतीदाम्न श्रीदाम्न पाश्रयेणायुर्गमये ।
दुर्मति --नाग्निस्ग महाभाग्रस्ग तवम्मिणो ममदमवेरग्गप्पहुदीहि अहिछिदम्स पुरदो
अह कह चिट्टिम्म । [तादृशस्य महाभागस्य तपस्विनश्शमदमवैराग्यप्रभृति-
मिनधिष्ठितग्य पुन्तोन कथ म्थाम्यामि ।]
दारिद्र यम् ---प्रिो. 7न प्रागेव दत्तोत्तग्मतन् । (म्बगतम्) गगनदनुज्ञया प्रवृत्तम्यापीवृणे
पणि न मे मागमामाश्यति प्रसादम् । यतो हि महान्त
अभिनवातपरिणयन विद्वाम धर्मकर्मरतम् ।
नाभिभर्वात स्थविर गजानमनागस चालम ॥ १६ ॥

७ श्रीदामचरितम् ? दुर्मति. ---अज्जउत्त, कह उण सिरीसरस्सईण वैर ? [प्रार्यपुत्र, कथ श्रीसरस्वत्योर्वैरम् ?] दारिद्र्यम्--प्रिये, कलहो नाम स्त्रीणा कुलधनम् । तत्रापि नीचमूर्खजनरक्ता श्रीरन्तर्वाणि- कुलान्यनुगृह णन्ती वाणी चेत्यसमानशीलव्यसनितया न तयोरधिरोहति प्रेम- भूमानम् । भवतु यथा तथा वा। विप्रेषु तु श्रियो नाञ्चति कुञ्चितोऽप्यपाङ्गभङ्ग । यतो दृश्यत एव-- गृहीतो हृदये धर्म कण्ठे बद्धा सरस्वती । एतैरितीव विप्रेभ्य स्वैर श्रीरपसर्पति ॥ १८ ॥ (नेपथ्ये) प्रवुद्धोऽस्मि । अयमह रान्यवशेष विज्ञायागत एव श्रीमच्चरणाभ्यर्णम् । दारिद्र्यम्--प्रिये, एष श्रीदामा सहान्तेवासिना रात्रिशेष विज्ञातुमित एवाभिवर्तते। तदेन तावत् प्रतिपालयाव । (इति परिक्रम्य स्थितौ) (तत प्रविशति श्रीदामा शिष्यश्च) श्रीदामा--वत्स गालव, कियदवशेषा यामवती? गालव (दिशोऽवलोक्य) कल्यकल्पैव । यत गृहीतताराकुसुमस्य दूरमावृष्टचन्द्रस्तबक प्रतीच्या । श्रयत्यन्धुतिपाटला दिड नभस्तरो पल्लवभावमैन्द्री ॥ १६ ॥ अपि च अनूरकरसरारुणितमन्यतोऽप्येकत , सिताशुकिरणावलीवलनयावलक्षीकृतम् । क्वचिन्निविडवारिदव्यतिकरण नीलान्तर, निजत्रिगुणरूपता स्फुटयतीव विष्वड नभ ॥ २० ॥ अपि च प्रात्तरणरलमेभि स्वाभाविकभूषणवतीनाम् । इति रात्रिसख्युपहत प्राची नक्षत्रभूषण त्यजति ॥ २१ ॥ श्रीदामा--(विलोक्य) वत्स, कल्यकल्पैवेति किमाह । नन्वेप भगवाश्वनचक्रचड क्रममाण- विरहकारी- अग्रे काश्यपिना निवारिततमस्तोमेन मृगावली- दण्ड ताण्डवयद्भिरम्बुजकुलरारब्धपत्तिकम ।

प्रथमोऽडाक
सन्ध्याशोणवितानभाजि गगनप्रान्ताजिरे सस्थितो,
मन्द मन्दमुदेति भूपतिलकस्पर्धाकरोऽहस्कर ॥ २२ ॥
गालव
(विलोक्य)
पूर्वमहीधरशिखरे निद्राणो धर्मकरमाली ।
पक्षिकलकलविवुद्ध पश्यति रोषादिवोद्ग्रीवम् ॥ २३ ॥
अपि च
शोणीकृत स्वकिरण रसेन पूर्वाचल पतग ।
श्रुत्वेन्दुनावलक्षितमुद्गतरोषारुणोऽम्बरे पतति ॥ २४ ॥
श्रीदामा -- वत्म, तद्यावदुपहतसमित्कुशकुमुममपहितविविधविधिसमुपकरणमेतिह्यवानुप-
चरितकतिपयधनिकमहमतिथिममयमनतिक्रममाण आगत एव ।
गालव -~(मम्मितम्)-इतरानभिधानपूर्वकमतिथिग्रहणमेवाचार्य कृतम् ।
श्रीदामा-वत्म, प्रायमेषु मार गार्हस्थ तत्राप्यतिथिसपर्येति ग्रामनन्ति प्रागमविद ।
यम् -- (महनोपमृत्य) भगवन् अयमह भवदातिथेयोमर्थयमान प्राप्तोऽस्मि । तम
साम्प्रत माम्प्रतमतिथिममय ममुरलदघ्य गन्तुम् ।
-(गिलोर मभयम् । किश्चिदामृत्य समयम्)
गालच
ग्रही आप
वग्निप्टकोकममितद्धमनीनियाय
पाय-फटन्मलममुत्यितपूतिगन्ध ।
विप्त ? व्यत्तरपटच्चरगुप्तगृह्यो,
योध्यपेशनिवह प्रषिकीणंदन्त ॥ २५ ॥

धीदामचरितम् है (नेपथ्ये) अब्रह्मण्यम् अह्मण्यम् । गालव-(कर्ण दत्वा) कथमाचार्याणामिवार्तबर । (पुनर्नेपथ्ये) अहह । कप्ट कप्टम् । अतिथित्पधारिणा दारिदयेण बलादविभाव्य वञ्चित- स्तपस्वी श्रीदामा। । गालव- (सोद्वेगरोपम्) क्थ दारिद्रयहतकेनात्मदाचार्योऽभिभूत । तद्यावदेनमर्थं माथायनोपलप्स्ये । (इति परिकामति) (इति नितान्ता नर्वे) इति प्रथमोऽङ्क अथ द्वितीयोऽङ्कः (तत प्रविशत प्रवेशियों मस्यौ) एका-हला कुमुदिणी विरेण उण दिवासि । तेण अण्ण ब्व तुह त्व पेत्खामि । सखि कुमुदिनि, चिरेण पुनर्दप्टासि । तेन अन्यदिव तव रूप प्रेक्षे। ] अपराहला गलिणी, घरम्मवावडाए, मह अवसरो चित्र ण होइ । अज्जाए गोरीवदण कुणतीए नुमणाइ उच्चेउ पेसिदम्मि । दिठ्ठिया तुम दिवासि । सखि नलिनी, गृहकर्मव्यापताया ममावसरोऽपि न भवति । अद्यार्यया गौरीवन्दन कुर्वन्त्या सुमनात्युच्नेतु प्रेपितास्मि । दिप्ट्या त्व दृप्टासि ।] नलिनो-हला, कित्ति तुह अज्जा तत्तहोदीए पमस्स कुणइ । [सखि, किमिति तवार्या तत्रभवत्या नभम्य करोति । ] कुमुदिनी--दोगच्चपच्चादेमत्य । [दौर्गत्यप्रत्यादेशार्थम्] नलिनी-तेण त हीअदि । तिन तद्धीयते ] कुमुदिनी-~~-अह इम् । अथ किम् ] नलिनीता अम्हसहीए सिरिदामघरिणीए कहिस्म । तदस्मत्सख्यं श्रीदामग- हिण्यै कथयिष्ये। ] १० द्वितीयोऽस ? ? कुमुदिनी-किं ताए (कि तया नलिनी--सहि, उज्जमणप्पहुदि तिस्मा पइस्स दालिद्द उवदिं। सपद सो वुढ्ढो ण सक्केइ चलिदु वि । सा उण पाएहि पीडिज्जती मुणालिअव्व किलामती कह वि घरव्वावार उव्वरुहइ । त दळूण मह मण उव्वावरीअदि। [सखि, उद्यमनप्रभृति तृष्णा प्राप्य दारिद्र्यमुपस्थितम् । सम्प्रति स वृद्धो न शक्यते चलितुमपि । सा पुन पादयो पीडयन्ती मृणालिकेव क्लाम्यन्ती कथमपि गृहव्यापारमुपरोहति । ता दृष्ट्वा मम मन उच्चावचीयति । कुमुदिनी--ना मम वि एन आवस्सन । जाव अज्जाए जहछिद वढ्डाप्पत्ति उवलहिन तुह णिवेदइस्स । [तन्ममाप्येत्तदावश्यकम् । यावदार्याया यथादिष्ट वृद्ध- प्रवृत्तिं तव निवेदयिष्यामि । ] नलिनी--महि, एव्व करीअदु । अह वि सरगद त चेअ अण्णेसामि [सखि, एव क्रियताम् । अहमपि मारगत तमेवान्वेपयामि ।] (इति निष्कान्ते ) - प्रवेशक (तत प्रविशति श्रीदामा गतवश्च)

श्रीदामचरितम्
११
-
स्वप्नेऽपि शर्म नानुभवपयमकारति । अयत्रा वृनममुना पराधीनत्रवृतिना
तमेवैतदनुक्लादृष्टप्रवृत्तिनिमित्तमत्रितजगतीताजननज न प्रार्थनानाही-
भिर्याचदगीकृत्येद जन करोमि । (बग शिधाप }
जयाकृष्टकण्ठीरवाकुण्ठवैकुण्ठलुष्ठाकदैतेयकण्ठाटवीलोठनोत्कण्ठपाठीनवेपम्फुरत्कामठों
वृत्तिमाश्रित्य विभ्रन्महीं त्वम् ।
तथा पोत्रिपोत्र पवित्र वितन्वन् सगोत्रञ्च गोत्रा । विपि प्रकया देवर्षिय कपनमपंग
दैतेयपर्षत्पतिप्राणजातम् बलि हेलया व्यालमालाविलामालपन्यं विनन्वन् ।
अल कार्तवीर्य स्वर्वीर्येण गर्वेण निर्वीर्यमुत्सार्य भूमि समर्वादमाषु कुर्वन्, अद्ववाद-
सर्वस्वगाघसर्वपक्रोधविक्रोशसड क्रान्तिसडक्रन्दसड न्दनक्रामविनान्नलड्वेगपद्धगया
गालिभास्वत्प्रताप!
देवदामोदरोदारदारारिरसादर सादर साधयन् साधु कसादिससारमंमारमामाइनन् ।
बुद्धवृद्धोद्धतानेकवुद्धिप्रबोधस्फुटत्स्फारवेदापहार प्रलुप्तक्रियाजातसञ्जानकारुण्य है।
यवनार्णव कुम्भसमुद्भव मा परिपाहि दशाकृतिकोय॑तनो?
कलयाशु निजाशुगसङ्करसहतदैत्यजनाशुग देव हरे ।
जुम्भन्नवाम्भोजशोभातिदम्मापहारस्फुरत्पादपायोजरज्यन्नखद्योतखद्योतितानेक
निस्तन्द्रचन्द्रस्फुरन्मदुरोदारपाथोजमार्थप्रभाव्यर्थकश्रीलमत्वाङ्ग,
नवाम्बुजमण्डलगर्वविमोचनलोचनशोचनजातविमोकदिवौकपलोककिरीटविटङ्ककुटद्धक -
कोटिमहाश्मजरश्मिविराजितपाद ?
अल्पितभूधरतल्पितपन्नगनायक जल्पितकोटि विधायक कल्पितससृतिहायक दायक
मोक्षफलस्य मलस्य विधर्षक ?
जय जय शर शरदुदितशिशिरकरनिकररुचिर रुचिरसुचिरचितमल मलमलयनिलय-
मुपनय मम सुररिपुसमररसपर ।
चिन्य सदवर्वेदैर्गम्य सम्यड नम्यो यम्य ।
स्वान्तरन्त कान्त ज्योति प्रान्त दीप्ताशस्त्वम् ।
विप्गो पाया पाया सदा सामराजस्य भक्ति प्रयच्छेति याजा
मृषा मास्तु लक्ष्मीपते हे नमस्तुभ्यमस्तु ॥ २ ॥
अनुवन्धवशेन जन्मिना भवताधारि दशावतारिता ।
मधुसूदन मत्कृते कथ हृदय ते न भवत्युरव्ययम् ॥ ३ ॥

।२ द्वितीयोऽङ्क अपि च- विश्वेश वीक्ष्यसे यद्गुणहीनस्त्व न मा गुणिनम् । तस्मादेव जनेऽस्मिन् नेक्षन्ते निर्गुणा प्रभव ॥४॥ (सविलक्षस्मितम्) तथ्यमकरो प्रवाद त्वमह चैको न मे स्पृश ग्रन्थिम् । वदतीति ममैवाश सुखी भवान् दु खिन तु मा त्यजेति ॥५॥ अपि च-- तव । अज्ञातजन्ममृत्युव्यसनस्यानन्दविग्रहस्य नृहरे कथ भविष्यति परदु खध्वसनेच्छाऽपि ॥६॥ भवतु । किमनेन परिदेवनेन । स्वत पिप्पलास्वादतरलाना नान्तरीयक प्रि- याकरोति दुखाकरोति च । तद्यावद् ब्राह्मण्या वसुमत्या गृहोपकरणो- दन्तमुपलये । (इति परिकामति) (प्रकाशम्) वत्स गालव, क्व तावद् ब्राह्मणीमन्वेपयामि ? गालव-भगवन्, एपोटजाजिरे नलिन्या किमपि मन्त्रयन्ती तनमवती तिष्ठति । श्रीदामा--(विनोय) कथ प्रफुलमुग्रकमलेवाद्य ब्राह्मणी । -- भगवन नित्य प्रमन्नेव तत्रभवती । यत तिमिरागमशून्याना दिशन्तीना रज क्षयम् । वापीनाञ्च पुलस्त्रोणा सत्ववत्त्वात् प्रसन्नता ॥ ७ ।

१३ श्रीदामचरितम् गालव--स्वयमेव प्रकाशमेष्यति । नलिनी--तदो तदो । ततस्तत ] वसुमती--तदो तेण चुवुअम्मि अह धारिदा। ततस्तेन चिवुकेऽह धृता।] श्रीदामा--(सामूयम्) कथ चिबुकग्रहोऽपि । नलिनी-तदो तदो । (ततस्तत ] वसुमती--प्राणदुव्वेगेण विसुमरिदह्मि । (स्मृत्वा) तदो तेण दिव्वरूविणा गगणगण- कसकुभस्स कुभिणो पुठ-वलहीए आरोहिन अह फुरलकुसुमसणाह विविह- रुक्खभरिज्जत उज्जाण णीदा । [आनन्दोद्वेगेन विस्मृतास्मि । (स्मृत्वा) तदा तेन दिव्यरूपिणा गगनाङ्गणकपकुम्भस्य कुम्भिन पृष्ठवलभ्यामारोह या इह फुल्लकुसुमसनाथ विविधवृक्षमरितमुद्यान नीता । ] श्रीदामा--कथमुद्यान नीता । अलमत पर श्रुतेन । गालव---भगवन् कथावशेष तावत् पालय । - श्रीदामा--(अश्रुतमिव सरोपम् ) अपि बन्धकीस्याने यदस्य पुरुषापसदस्यानुरागवणया- ऽनार्यकार्यपरया दोर्गत्यव्यत्यस्त श्रीदामहतक विप्रलभ्य सप्त पितृकुलानि निरयपयमवतारितानि । अथवा मूर्खापसद श्रीदामहतक, अनुभव साधु- तपश्चरणाग्निहोत्रादिफलम् । (आकाशे) साधु रे परयोपारसिक, दुर्गत वृद्ध कुरुपञ्च मामवेत्य हर्तुमिच्छसि मत्सहचारिणीम् । एप त्वा स्मर्तव्य- पद प्रापयामि । (इति द्वित्रिपदानि गत्वा) अथवा एनामेव पापका- (चा)रिणी विनीता करोमि । (इति गन्तुमिच्छति) गालव~भगवन्, कथावशेप पालय । (इति अवष्टम्भयत्ति), नलिनी--तदो तदो । ततस्तत ] वसुमती-तदो तह चित्र करिकधठिदेण तेण पफुल्लपम्मपु टरीअ-कुवलय-कदोह- परिमलुग्गारो वहूदमहुअरमहुरझकारभरिद चक्कचक्कगचोरचाउरी- चरिद सरिद प्रोन्नरिभ दुवणभाअणम्मि सिसिर सरिदसण दुद्ध पाइदा । तदा तथैव करिकन्धस्थितेन तेन प्रफुल्लपद्मपुण्डरीककुवलयकन्दलपरिमलो- द्गरप्रभूतमधुकरमधुझङ्कारभरित चकचक्राङ्गचकोरचातुरीचरित सरित- मुत्तीर्य च दुर्वर्णाभाजने शिशिर शशिदर्शन दुग्ध पायिता । श्रीदामा-~-(दन्तानिप्पीड्य) हन्त दुरितचरितभरिते ईदृशानि सखीपु शसन्त्याम्नपापि नरणटि गिर श्रीदामचरितम् नलिनी--सहि, कुमुदिणीए अत्ताए अणुठिठद गोरीए व्वद करेसु । जेण एदस्स सिविणप्रस्स सच्चत्तण पेरिखस्ससि । [सखि, कुमुदिन्या आर्यया अनुष्ठित गौर्या व्रत कुरु । येनैतस्य स्वप्नस्य सत्यत्व प्रेक्षिष्यस्ते ।] वसुमती-सहि अस्सवम्मि । जाणम्मि णिोप्रो जुज्जइ जेव्व । ता प्रज्जउत्तस्स सवणातिहि एद व्वद कदुन अणुचिठ्ठिस्स । [सखि, आश्रवास्मि । जानामि नियोगो युज्यत एव । तदार्यपुत्रस्य श्रवणातिथिमेत व्रत कृत्वाऽनुष्ठास्यामि ।] श्रीदामा--शोभन स्वप्न । तदनुरूपैवेय गोरीव्रतादेशिनी नलिन्या वाणी। तत्सर्वथा शुभोदकवायति प्रतिभाति । गालव--भगवन्, द्वाराणि खलु शुभाशुभज्ञानस्य शकुनस्वप्नादीनि । तदसशय शसित एव कतिपयरहोभिरमुनातिशय फलस्य । श्रीदामा--(सावधानम्) सर्वथा नमोऽस्त्वघटितघटनापटीयसे वेधसे । तद्भवत्वदसीय- मुखादवगतस्वप्नवृत्तो यथोचित करिप्ये । (इत्युपसर्पति) नलिनी--(दृष्ट्वा । जनान्तिकम् ) सहि, एसो तुह वल्लहो उवगदो। सराि, एष तव वल्लभ उपगत ।] वसुमती-(भुग्नगीवम्) कह अज्जउत्तो । (कथमार्यपुत ।) (सहोत्तिाउति) श्रीदामा--आर्य सुव्रते, अलमलम् । तपोदौर्गत्ययोगाभ्या पिन्नमेवाङ्गक प्रत्युत्थानादिना भूय फ्लेशितु तन्न साम्प्रतम् ॥ ८ ॥ (इति नाट्येन यथोचितमुपविशन्ति) युगयो रहस्यनान्ति पातिभिररगाभि स्वमौग्ध्यमावेदितम् । तव । नलिनी--णहि णहि तारिसो को वि रहस्सो जो तुगत पुरदो विहा कीदि । शि- विण दाव घिनसहीए गह अग्गदो करिद । ता कहतराणताण आम्हाण तुम्हे आअदा। नहि नहि तादृश कोकिम रहस्य गद् भवत पुरतो गाच्छायो स्वप्न तावत् प्रियरारया मगागत कथितम् । तत कथितशृणतोरावयोर्ग- यमागता ।] स्वप्न । (सोपहाराम्) धिवरानाशरण- श्रोदामा--(सादर श्रुत्वा) रमणीय सुयमनुभवतु ब्राह्मणी । वसुमती--तुम्ह पसाएण । (गप्पत्प्रसादेन) श्रीदामचरितम १७ वसुमती-अज्जउत्त सच्च एद सव्व । तहवि तुम्ह (इत्योक्त ) [ आर्यपुत्र, सत्यमिद सर्वम् । तथापि तव (इत्य|क्त) ] श्रीदामा--कथमोक्त्या खण्डितो वचनक्रम । किमस्माकम् ? वसमती-(अपवार्य) सहि, कह पूजारहाण एव्व कहिस्स। [सखि, कथ पूजाणा- मेव कथयिप्ये ? ] नलिनी--जहदिकहणे ण दे आदीणो । (यथास्थितकथने न ते प्रादीनव ) श्रीदामा-कथ मुद्रितैव वात्रि ? वसुमती-(सन्मितम्) तुम्हकुलक्कमागदो एमो जेब प्राजीवो । ता जुज्जइ गमण ति पडिभादि । [यमत्कुलक्रमागत एप एवाजीव । तद् युज्यते गमन- मिति प्रतिभाति।] श्रीदामा--(स्वगतम्) इयमेव ब्रवीति । ममापि तावत्- यस्त्राता जगता यमाह निगमस्तत्त्वञ्च येनाप्यते, यस्मै योगिजनो नमः प्रकुरुते यस्मात् परो नापर । यस्यैतत्सकलस्रजीवभुजगो यस्मिन् जगद् दृश्यते, सान्द्रानन्दमय पुराणपुरुष स्याच्चक्षुषोर्गोचर ॥१०॥ (इति सपुलक क्षण न्थित्वा ) (प्रकाशम्) तद्भवतु यथाभिरोचते भवत्यै । अस्ति किमपि तन्नयनविषयीकर्तमुपायनम् । वसुमती--(म्मृत्वेव) अप्ण कि वि णत्यि । पर रअताण पिहुआण अत्थे पिहुना ण मुठ्ठिमिदा ठाविदा नि ति । ताण गठिय वधिन कज्जे सज्जो होदु अज्जउत्तो । [अन्न किमपि नास्ति ! पर रुदता पृथुकानामर्थे पृथका ननु मुप्टिमिता स्थापिता तिप्ठन्ति । तेपा प्रन्थि बद्ध्वा कार्ये मज्जो भवत्वार्य-पुत्र । ] श्रीदामा-(सविमर्श स्वगतम्) किं पथुकै २, अथवा भक्तवत्पल म देव । (प्रकाशम्) तद् देहि । (इति गृहीत्वा रन्यि वध्नाति) वमुमती--(सस्मितम) देहीति इज्जैव भिस्याए पणवो भणिदो अज्जउत्तेन । (दि- लोक्य) गठि वि सोह ज्जेव्व । जाणे ता अन्दा मइला हुविस्मदित्ति समेदि । दहीति इहेब भिक्षाया प्रणतो भणित प्रार्यपुत्रेण। (विलोक्य) रन्थिरपि शोभनैव । जाने ने अक्षता सफला भविष्यन्तीति शम्यते । श्रीदामा-अम्नु यथा नथा ।( पावें विलोक्य) गालव, नाभयावम्नावत् । ।

तृतीयोऽङ्क १८ । गालव--भगवन्, अभिजिन्नामाय मुहूर्त । तत् त्वरितमेव प्रास्थानिकसूक्तपठन- पुरस्सर स्थाने प्रस्थातुम् । श्रीदामा--किमयमभिजित् । (ऊर्ध्वमवलोक्य) स एष दिनस्य मध्यमो मुहूर्त । अहो माध्याह्निकी वेला । इह हि-- क्षण मध्ये स्थित्वा गगनपरिमाण तुलयति, त्रयीभते तेजस्यभिहितनिजक्रीडनरसा । दलत्पद्माटव्यामभिसृमरमाद्यन्मधुकरी, मरन्दव्यात्यूक्षीमहह दधतेऽमी मधुलिह ॥ ११ ॥ गालव--इह हि-- C सवितरि ललाटतापिनि घर्मक्लमतश्चिर हि पञ्चाननास्यकुहरमुच्छालुविशति पक्षिणा पड्क्ति ॥ १२ ॥ (विमृश्य । सस्मितम्) नक्षत्र शशिना कृपीटजनुषा युक्त समासादित, यत्तद्धर्ममयूखमालिनिरुचामाचार्यक कुर्वति । पातङ्गमणिभि स्फुटद्भिरमलज्वालाकुलर्जज्वले न ध्वान्तापगमाय नाम्बुजवनीहासाय तत्साहसम् ॥ १३ ॥ श्रीदामा--ब्राह्मणि, साधयावस्तावत्। वसुमती--(सास्त्रम्) सुप्रधगधवहदोलिदचदणसदाणिदा सुहारा होदु तुह मग्गा । अह वि णलिणीसदिठ्ठ गोरीवद जाव करेमि । [सुगन्धगन्धवहान्दोलित- चन्दनसन्तानिता सुखकरा भवन्तु युप्माक मार्गा । अहमपि नलिनीसन्दृष्ट गौरीव्रत तावत् करिप्यामि ।] (इति निप्कान्ता सर्वे इतिद्वितीयोऽङ्क, अय तृतीयोऽङ्क (नन प्रविणति गगनयानेन गन्धव )

२०
तृतीयोऽङ्क
प्रियरूप. --आत्मसाम्यमिति किमाश्चर्य वयस्यस्यासीत् ।
पश्य-
विगलितकल्मषनिवहैश्चेतोर्भािवितोऽनुलवम् ।
वितरति निरजनोऽय स्वाभेद जन्मिना तरसा ॥२॥
रूपप्रिय --तद्वयस्य, त्वया सह गच्छतो मम रासरसे भगवानपि लोचनगोचरो भविष्यति ।
प्रियरूप -सखे, तत् त्वरित गत्वा श्रीदाम्नोऽपि प्रवृत्तिमुपालभामहे । (इति निष्क्रान्ती)
प्रवेशकः।
तत प्रविशति श्रीदामा गालवश्व)
श्रीदामा --वत्स, अद्य ‘स्वभवनात् प्रस्थितानामस्माक जातानि कानिचिच्छुभसूचकानि
शकुनानि ।
गालव --का खलु तन वार्ता । शृणोतु भवान्-~-वामे वातायवो, दक्षिणे दात्यूहव्यूहा ,
पुर पारावता , कुजे केकी, दिवि मिथुनानि, कूलेपु कुम्भा जलसम्भृता
अनुकूला नद्यो वायवश्व ।
श्रीदामा
-(पवनस्पर्शमभिनीय । सानन्दम्)
परागस्थगनाल्लुलब्धवर्णा प्रामोदशालिन ।
हरन्ति हन्त सन्ताप सज्जना इव वायव ॥३॥
गालव--(स्वगतम् । प्रायो वयोऽवस्था मेदेन विपया अपि भिद्यन्ते ।
यतन्न एवं मम-
गृहीता मन्दपानीया धूतमध्यसरोरुहा ।
दारयन्ति मन कामनाराचा इव वायव ॥४॥
(म्तोकमन्तर गत्वा) पुरोऽवलोक्य । (प्रकाशम्) भगवन्, किमिद महीमिलना-
यातविततव्योमेव निग्रिलनिशावमानापगततिमिरविश्रामधामेव उच्छलल्लीय-
मानतागनिकरमिव दश्यते ।
श्रीदामा -चन्म, उच्छतहलवीचिनिचयचुम्बितचपलवेलादनदेलाद नदलननागर मागर ।
य एप
-
उच्छलदहलोत्नोलचलत्कम्बुफुलच्छलात् ।
नयत्याडमिटिकाउण्डान् शोतारामण्डलम् ॥५॥

श्रीदामचरितम् २१ यश्च-दिवस इव चलदहिमकर , प्रोतुरिव धृतगिरिकानन , माङ्गलिकलय इव शोभिततरङ्गमाल , विन्ध्य इव पालितदण्डायामवेल , नानागमहितोऽपि बुद्धख्याततत्त्व , दुग्धपरिणाम इव लब्धोचितदधिभाव , । य एप , -- - कामपाठीनपुच्छक्षुभिततिमिकुलाकाण्डसड घट्टलोलत्- पानीयात्कवेल्लन्मणिगणकिरणाकीर्णकिर्मोरिताम्भ एनामन्वर्थसज्ञा जलनिधिवसना चित्रशालीयधाटी- मालम्बन् बालवीचीनिचयकुहकतो बद्धनीवि करोति ॥६॥ गालव. – (विलोक्य । सभयम्) भगवन् पश्य । अयमपानिधर्मध्यादाकाशचुम्बिशिखनिवह शिखावान् वाडव समुल्लसति । श्रीदामा – (सस्मितम् ) वत्स, नासौ वाडव । विद्रुतजात्यभास्वरकर्तिस्वरमयी द्वारिका । गालव -कथ द्वारका प्राप्तो स्व ? श्रीदामा -अथ किम् । गालव -- सहर्पम्) तर्हि त्वरयत् भगवान् । येनातिथिसमय एव श्रीकृष्णदेवस्य मन्दिर प्राप्य पडसोपेतचतुर्विधाभ्यवहार्येणौदर्यवीतिहोत्र निर्व त्तचापल कुर्व । - श्रीदामा – (सरोषस्मित तिर्यगणा पश्यन्) धिड मर्ख, नित्यमौदर्यकार्यमन्तरा न ते विचार्य- मस्ति । (पुरोऽवलोक्य) (सहर्पम्) कथमिय पूरपूर्वदर्शनापि नयनयोरमृत- बिन्दुसन्दोहान् निस्यन्दयति । यैषा गोमती प्रत्यासन्नगोकुला मधुरा केवल नात्र गमनस्वमा । यत्न च पीताम्बरा अनन्तभोगिभाज प्रत्यासन्नपद्मालया गोविन्द- विग्रहा इव ग्रहा । येषु च न गदाचिता, न वैकुण्ठाश्रया , न विपक्षोद्धृता , नानगजनका नाक्षिगतजैवातृका , अपि समाहितधनञ्जया युधिष्ठिरप्रिया कलितमुदर्शना , रचितरमणीरागा अच्युता विहितकला-कलापसज्जना सज्जना । या च पातालपुरी-कञ्चुकिभि कुण्डलिभि सकम्बलैगिरावृता एककर्कोटक मञ्चरदनेककर्कोटकाऽपहमति । कुबेरकपालिगोत्रभृत्तपन- प्रेतपतिरक्ष पाशिप्रभजनचन्द्रादिममधिमविष्टिता नैतद्विधजनाश्रया स्वर्ग- भूमिमपि । . गालव --(पुरो विलोक्य) पुरत इद दृश्यते महदन्तराल तत् पूरयित् सुवर्णसमृद्धिर्नासीत् कृष्णदेवस्य । श्रीदामा -(सम्मितम् ) वत्स, गोपुग्मेतत् (विलोक्य) दक्षिणेन गोमती दरीदृश्यते कम्यचित् सुपर्वण ग्रालय तदुपस्पृश्य तस्या पुण्य पय तञ्च प्रदक्षिणीकृत्य यावत् पुर प्रविशाव ।

शोध-प्रभा २२ (इति परिक्रम्य तथा कृत्वा देवालयाभिमुख दृष्ट्वा) अये अय भक्ति- रहित विमुख सिहमुख । (सप्रणिधानम् ) पाहि दनुजसवतघातकारण रणचटुर्लासह तुलितमुखपद्म । वज्रसखनख विपुलबल वेदसार कृतविभव चक्रखण्डित- सकलखल-देवमुनिमनुजवन्द्यपादपङ्कज शशिविमल ससारबन्धविघटनकुशल विषयवासनाछेदकर धर्मार्थकाममोक्षद रसिकचक्रपिनाकाभयदकर ॥७॥ अपि च-- चिन्तयन्निव भक्ताना मोक्षमार्गमनुक्षणम् । व्यादाय मुखमास्ते य स देव पातु न सदा ॥८॥ (इति स्तुत्वा नत्वा परित्रामति) वत्स, क्वचिद्धाराभृतो श्वानसीश्च वल्गयन्ति सादिन क्वचित्पुष्करिण कुण्डलीकृतकरान्नागानभिनन्दन्ति नरेन्द्रा , क्वचिदरि- पृष्ठपातिनो रथानमानिनश्च वृथा एव कर्पन्ति, क्वचिद् गुप्तमन्त्रा अक्षपरि- वृत्तिज्ञातसख्या मन्त्रिणो दृश्यन्ते, क्वचित् कषायितनेत्रा दण्डधरा धार्टिका यतयश्च विलोक्यन्ते, क्वचित् कृतसुवर्णालङ्कारजातिवृत्तयो नाडिन्धमा कवयश्च वीक्ष्यन्ते, क्वचिद् विन्दुमती जाति सभा च भासते, क्वचित् काव्यैरिव सप्रास मयमकैश्चाररुपचरिता प्रतोलीयम् । तद् विविक्तपथा श्रीकृष्णप्रासादद्वार- मासादयाव । (इति परिकामत) (तत प्रविशति रुक्मिणीसत्यभामाभ्या सह पर्यस्य श्रीकृष्ण मञ्चपादावलम्बी मिस्थो विदूपक परितश्च स्त्रीकदम्ब ।) कृष्ण – वयस्य, मानो नामावलाना कामुकचित्तवशीकरणाय कार्मणम्, येन पारिजातोद्देशेन घृतमानयाऽनया दूरमाकुलीभूत नश्चित्तम् । विदूषक ---मअण्णे राधाए बह्मणम्म मण व । [मध्याह्ने क्षुबया ब्राह्मणस्य मन इव । ] कृष्ण -- (गम्मितम् ) नदागते पारिजाते क्षणमपगतमानाभ्यामाभ्या जह्न कलिन्दतन- गभ्यामिवादन्वान् निर्वत्तोऽम्मि । विदूषक -(भामा पिलास्य) वाम्ग, दाणि भामाए माणो पाहुणिनो त्ति तयामि । [वयय, उदासी मामाया मानो प्राघुणिक ति तकयामि । गृण -नया मागत्या तर क्षति ।

श्रीदामचरितम २३ विदूषक. --मह बह्मणी वि एब्ब चिन भामादेइए चरिद सुणिय सत्र करिस्सदि त्ति चित उवहेमि । [मम ब्राह्मण्यपि एवविध भामादेव्याश्चरित श्रुत्वा स्वय करिप्यतीति चिन्तामुहामि ।] कृष्ण --कि तेन ? विदूषक ---तुए उण घणख्खर विअ उवणीदो देवरुक्खो मारिसस्स सक्को सिंह ज्जेब उप्पाड- इस्सदि। [त्वया पुनर्पणाक्षरमिवोपनीतो देववृक्षो मादृशस्य शक्त सिह इव उत्पादयिष्यति । ] (तत प्रविशति प्रतिहारी) प्रतिहारी--(सप्रणामम्) देअ, सिरिदामत्तिणामहेनो को वि बह्मणो महतेवामिणा पडिहार- भूमि अलकरेदि । दिव, श्रीदामेतिनामधेय कोऽपि ब्राह्मणो महान्तेवामिना प्रतिहारभूमिमलङ्करोति । ] कृष्ण (सम्मरण सोत्कण्ठम्) कय श्रीदामा । तत् त्वरित प्रवेश्यताम् । विदूषक -को मो निरिदामा ? [को मौ श्रीदामा?] कृष्ण -अम्मन्महान्यायी प्रियवयम्य । विदूषक --ब्रह्मतो वि अम्मो ? [अम्मत्तोऽपि वयम्य] कृष्ण --एक्नीश्रियत्वे निमु वक्तव्यम् । विदूषक -~-ना मोचेन पियवग्रम्पो होदृ । अण नाणीदि म गिग्रवह्मणी चरणाम गिद । [तत् न एव प्रियव्ययो भवतु । अनृनानीहि मा निजाह्मघाश्चगणी पितम । प्रविचापटीपेण पुनप) (मसम्नमम्) देय, प्रायदे पायद । दिब, ग्रागत प्रागत 11 । - २४ शोध-प्रभा - एसो अग्गे कहेम्मि । सभमेण विशुमलिदे कहणिज्जे । (क्षण स्मृत्वा) भट्टके, आअदे दलिद्देण आलिगिदेव्व किशे शिलाजालमेत्तदशणिज्जे शतखडसूज्जतव. सणपेलतगठिदगठिसठवणवावडकले कण्णाशवेद लबिज्जतकुच्चकुच्चरछादि- अदेवासिएण ददाइपशालिअ हग्गेअबम्हण त्ति भणते दुवाले ठ्ठिदे हग्गेत पेख्खि रखदवरणत्थले पेटपुटिभेप्रशण्णा शुण्णिप्रजणगहिलधवलिज्जो वदलोअणताफए अदेवासिण ददाइ पसालिग्र हग्गेम बम्हण त्ति भणते दुवाले ट्ठिदे हग्गे त पेखिख एशे किमक्कले किभूदे कि पालड एत्ति शकिए शभमभमिज्जते देअसाश आगदे। [एपोऽग्रे कथयामि । सम्भ्रमेण विस्मृत कथनीयम् । (क्षण स्मत्वा) भर्त आगतो दारिद्र्येणालिङ्गित इव कृशशिराजालमात्रदर्शनीये शत- खण्डसूच्यमानवसनपरिधितग्रन्थितग्रन्थिसस्थापनव्यापृतकरे कृष्ण लम्बितकूर्च- सञ्छादितवक्ष स्थले उदरपृष्ठभेदसज्ञाशून्यितजनगतिलधवलित पश्यल्लोचन- तारकै यदेवाशिषेण दन्तान् प्रसार्य अह ब्राह्मण इति भणन् द्वारे स्थिते सति त प्रेक्ष्य एप कि कृते, किभृते, कि न इति शङ्कया सम्भ्रमभ्रममाण देवसकाशमागत ।) विदूषक - (सहासम्) रमणीयो वनस्सो प्पिग्रवनस्सस्स । [रमणीयो वयस्य प्रियवयस्यस्य ।] (सक्रोधम्) धिड मूर्ख, स्वानियोगेऽपि च क्रमसे । (पुरुप साशङ्कमोप्ठान्तर एव किञ्चिद्वदन् मनागपसरन् निष्क्रान्त ।) कृष्ण - (प्रतिहारिण प्रति) सुभते, शीघ्र प्रवेशय । प्रतीहारी-जद्देवो ग्राणवेदित्ति । [यद्देव प्राज्ञापयति] (इति निष्क्रान्त ) (नत प्रविशति गालवेन सह श्रीदामा) श्रीदामा – (पुरोऽवलोाय । महपम्) वत्स, पश्यसि विविवनूत्न रत्नस्तम्भसक्रमदनेकप्रति- विम्बजनिजनता भ्रमे क्वचित् स्फुरदनेकपद्मरागभित्तिविसृमरमयूसविसरकृतवा- लातपण द्वाविजृम्भदम्भोजाहितदिवसनिश्चयापगतरथाङ्गनामपतत्रिविरह प्रमे,क्य- चिन् रफटिकस्य नीप्रतिफलितमयूरग्रह्णायामितलीलाकपिनि, क्वचिन्मणिमय- महीन ग्थिनरत्नपतगदशनपतदनेशकुन्ताग्धग्राम्यधर्म भासिनि, क्वनिन्नि- मुक्तमनयन्त्रनिम्म ज्जलधागगिनागत रिगादिफनवृत्तकुतूहले क्वचिन्मन्द- पपाधूननादि ननदनागरणकलप्रसृनपरिमलवहले मञ्चग्दवलामुखकमनामोद- नन्दिन्दिरमन्दिने मुक्कामलमुक्ताफ नजवनिकाजानाया मम्मुग्रीनशानाया मणिमयम वाप्रिप्टिनपक्षिविशेपसूक्ष्मगरम्परितनूनिकाया गगि नीवन्मानन्धानामीपतचूनियायामागीन मी मामाभाविा. नदुपधानाहिनचीन-

२६
शोध-प्रभा
-
विदूषक -श्रीदामान प्रति) कण्हसवधेण अह वि तुह वनस्स्से तेण प्पणमामि । [कृष्णसम्बन्धे-
नाहमपि तव वयस्य । तेन प्रणमामि
(श्रीदामा प्रणमति)
विदूषक -वग्रस्स, पज्जकोवरि उप्रवेसिदु जइ लवकुच्चोच्चो कालण भोदि ता अह
वि
कुच्च वढ्ढावइस्स । [वयस्य, पर्यकोपरि उपवेशितु यदि लम्बक]च्चय कारण
भवति तदहमपि कूर्च वर्धापयिष्ये ।]
कृष्ण -मैव मैवम् ।
विदूपक - (सहर्पम्) सुणिद मए ण एदस्स पत्तीए मम वि खडखज्जाभरिखादव्वा
हुविस्सदित्ति । [श्रुत मया नन्वतम्य पत्या ममापि खण्डखाद्यकाभरिखादव्या
भविष्यतीति ।]
कृष्ण -क कोऽत्र मो ।
प्रतीहारी-(प्रविश्य) प्राणवेदु देनो । [प्राज्ञापयतु देव ।
कृष्ण -पाहूयतामतिथिसपर्योपकरणसहित पुरोहित ।
प्रतिहारी-ज देग्रो प्राणवेदि ति । [यद्देव प्राज्ञापयतीति] (इति निष्क्रम्य पुरोहितेन सह
प्रविशति) देव, एमो ग्गहीदोवअरणो पुरो पुरोहिदो चिठ्ठदि । [देव, एप गृहीतो-
पकरण पुर पुरोहितस्तिष्ठति । ]
कृष्ण -प्राचार्य, श्रीतेन विधिना पूजयातिथिम् । अथवाऽहमेव चरणनिर्णजनविधि चरिष्ये ।
देवी तावदावर्जयतु जलधाराम् ।
पुरोहित ~य गाभिरोचते मवते ।
(कृष्णस्तथा करोति । रुक्मिणी जलधारा विसृजति मत्य मामा चेलाञ्चलेन
पादी प्रोन्छति । कृष्ण पदनिर्णेजनाम्भमा देव्यो स्वस्य च मूर्धानमभ्युदयति
पुरोहित य पावदर्चयनि।)

शोध-प्रभा
२६
विदूषक --श्रीदामान प्रति) कण्हसवधेण अह वि तुह वनस्स्से तेण प्पणमामि । [कृष्णसम्बन्धे-
नाहमपि तव वयस्य । तेन प्रणमामि
(श्रीदामा प्रणमति)
विदूषक -वअस्स, पज्जकोवरि उप्रवेसिदु जइ लबकुच्चोच्चो कालण भोदि ता अह
वि
कुच्च वढ्ढावइस्स । [वयस्य, पर्यकोपरि उपवेशितु यदि लम्बक!च्चय कारण
भवति तदहमपि कूर्च वर्धापयिष्ये ।
कृष्ण -मैव मैवम् ।
विदूषक - (सहर्पम्) सुणिद मए ण एदस्स पत्तीए मम वि खडखज्जग्राभरिखादव्वा
हुविस्सदित्ति । [श्रुत मया नन्वेतस्य पत्या ममापि खण्डखाद्यकाभरिखादच्या
भविष्यतीति ।]
कृष्ण ~क कोऽल भो ।
प्रतीहारी-(प्रविश्य) प्राणवेदु देयो । [प्राज्ञापयतु देव ।
कृष्ण -अाहूयतामतिथिसपर्योपकरणसहित पुरोहित ।
प्रतिहारी-~~ज देनो आणवेदि ति । [यद्देव प्राज्ञापयतीति] (इति निष्क्रम्य पुरोहितेन सह
प्रविणति) देव, एसो ग्गहीदोवअरणो पुरो पुरोहिदो चिठ्ठदि। [देव, एप गृहीतो-
पकरण पुर पुरोहितस्तिष्ठति । ]
कृष्ण --प्राचार्य, श्रौतेन विधिना पूजयातिथिम् । अथवाऽहमेव चरणनिर्णेजनविधि चरिप्ये ।
देवी तावदावर्जयतु जलवाराम् ।
पुरोहित यथाभिरोचते भवते ।
कृष्णम्नथा करोति । रुक्मिणी जलधारा विसृजति सत्यभामा चेलाञ्चलेन
पादी प्रोति । कृष्ण पदनिर्णेजनाम्भसा देव्यो स्वस्य च मूर्धानम म्युक्ष्यति
पुरोहित ययावदर्चयति।)

तनीयोऽडू २६. सुमिन्न -( सप्रणामम् ) इत इतो देव । ( सर्वे परिकामन्ति ) इद तत् प्रमदोद्यानद्वारम् । तत् प्रविशतु देव । ( सर्वे प्रवेश नाटयन्ति ) कृष्ण -(पवनस्पर्शमभिनीय) वने लताना कुसुमाभिमर्श कृत्वाम्बुलि सह पद्मिनीभि । भृङ्गीभिरङ्गीकृतगीतिरेति कामीव काम शतक, समीर ॥१६॥ श्रीदामा --न खलु न खलु । कृताभिषेका सरसीषु पुष्पमधूलिकाभूतिभर दधाना । भृङ्गाक्षमाला पवना प्रयान्ति द्विजा इव स्पर्श भियातिमन्दम् ॥१७॥ कृष्ण --( सस्मितम् ) स्पृशति लता पुष्पवती कीलाल सर्वतो वहति । पिवति सम मा मधुरै कथमयमास्ता सखे पवन ॥१८॥ सुमित्र विश्रामस्थानमिव मिहिकाया , कुलगृहमिव वर्षाया , उत्पत्तिम्यानमिव चन्द्रलोकम्य, निर्व तिपदमिव शीतजातस्य, आगारमिव शृङ्गारस्य, परिपन्थीव धर्मस्य, निवारकमिव रविकिरणाना, त्यक्तमिवालोक , निशामयमिव, तिमिर- मयमिव, छायामयमिव, सुखमयमिव, जनक विकाराणाम्, निर्वापकमिन्द्रिया- णाम्, अनुभावक भावानाम्, उन्मादन मदानाम्, उद्दीपकमप्यालम्बन रसाना प्रमदोद्यान पुर पश्यतु देव । यत्र च घनमार-पीतसार-त्वक्सार-सिन्दुवार-कोविदारमन्दार-सहकार- कणि कारशितिसार-जम्वीर-वानीर-करवीर-पाटीर-वीरपुर-खपुर-मालूर-खदिर- कदर-बदर-ताल-तमाल-हिन्ताल-कृतमाल-नक्तमाल-कन्दरालचलदल-दधिफल - जन्तुफल-निचुल पिचुल- चतुरड गुल-मञ्जुल-वजुल मधुप्ठील-मधुल-गुटफल- विडुल-फेनिलोद्वालकदलीलागलीलवलीशात्मली--धात्री-चित्री-शोभाञ्जनाज- न-जम्बू-सर्ज-खर्जू र-पर्जन्यार्जुन-जपा न्यग्रोध-शिग्रु-मुनिद्र -पारिभद्र- सर्वतोभद्र- भद्रपर्ण-सप्तपर्ण पर्णस्वर्णवर्ण - प्लक्षाक्षादिवृक्षलक्षलक्षितक्षणे, नोत्का कलितोद्वेगा, कलहान्तरिता इव कलिकोपक्रममाज, पुनर्मदनबाणासनातिमुक्तशिलीमुखभिन्ना स्वाधीनपतिका इव प्रियालापनसङ्गता कृतव क्षारोहा , काश्चन रूपगविता इव त्यक्तकाञ्चना , काश्चन गणिका इव स्पृष्टपृथुलकुचा , काश्चन कुलटा दव नर्तिताक्षा , काश्चन निशाचर्य इव पीतर- काश्च- इव काश्चन प्रथम कारचन स्वच्छन्द- , - शोध-प्रभा २८ कृष्ण —वयस्य, कच्चित् स्मरस्यावयोस्तत् । अम्भोवाहविमुक्तवारिनिवहे प्राप्लाविताया भुवि, न्यञ्चद्वैद्युतवह्निविभ्रमविधिन्यस्तै समस्ते जने । आदेशादथ देशिकस्य दवतो दीकरणावृता--- न्येधास्यानयतो कुतोऽपि समभूद्यत् कोऽपि कम्पक्रम ॥१५॥ श्रीदामा --सखे, तस्मिन्नहनि प्राणत्राणमेव न कृत कृपावता भवता । किमु वक्तव्य स्मर्यते इति । (नेपथ्ये शखस्वनानन्तरम्) भो भो क्रियन्ता प्रत्यग्रचन्दनद्रवादिग्धस्निग्धा सत्वरचत्वरा , तभ्यन्ता देशिकानि रवकाशकसूक्ष्माशुकगृहाणि, प्रसार्यता परिताप्यगरवीधूपधोरणी, समाहू- यन्ता भोजका , प्रक्षाल्यन्ता काञ्चनमणिमयानि पात्राणि, स्थाप्यन्ता त्रिपादिका , उपनीयन्ता शशिशिशिरसुरभिसलिलभरिता रत्नभृङ्गारा , सञ्चार्यन्ता परिवेपका परिवेप्यन्ता व्यञ्जनानि, अपसार्यन्ता नयनदूषका, तर्प्यन्ता नाकिन , हूयन्ता- मनला , पूज्यन्ता महीसुरा, दीयन्ता बलय , निरुध्यन्तामन्यजनसञ्चारा । यत अागत एव भगवानशेपजनताकृतसेवो देवो वासुदेव इति । (आकर्ण्य) वयस्य, त्वरयति परिजनोऽभ्यवहारेतिकर्तळतोपकरणेपु । तन्निवर्त्य मध्याह्निकमिमा वेला प्रमदोद्यान एव वायाम । कृष्ण श्रीदामा -यथाभिरोचते वयस्याय । विदूषक -- (अपवार्य) दिठ्ठिया परिजणसद्देहि जुण्णमक्कडमुहादो व्व मोइदो प्पिनवग्रस्सो। वग्रम्स, अदिहिप्पमादेण मह वि रसणा मिठ्ठाइ रसदु । णव्वरबह्मणी गलमि अलस्खलइ। [दिष्ट्या परिजनशब्दै जीर्णवानरमुखादिव मोचित प्रियवयस्य । वयस्य, अतिथिप्रमादेन ममापि रमना मिष्टानि रमतु । नवलब्राह्मणीगलेऽल स्यलति । ] तृतीयोऽडू २६. सुमित्र -( सप्रणामम् ) इत इतो देव । ( सर्वे परिकामन्ति ) इद तत् प्रमदोद्यानद्वारम् । तत् प्रविशतु देव । ( सर्वे प्रवेश नाटयन्ति ) कृष्ण – ( पवनम्पर्णमभिनीय) वने लताना कुसुमाभिमर्श कृत्वाम्बुलि सह पद्मिनीभि । भृङ्गीभिरङ्गीकृतगीतिरेति कामीव काम शनक, समीर ॥१६॥ C श्रीदामा --न खलु न खलु । कृताभिषेका सरसीषु पुष्पमधूलिकाभूतिभर दधाना । भृङ्गाक्षपाला पवना प्रयान्ति द्विजा इव स्पर्श भियातिमन्दम् ॥१७॥ कृष्ण ( सस्मितम् ) स्पृशति लता पुष्पवती कीलाल सर्वतो वहति । पिबति सम मा मधु कथमयमास्ता सखे पवन ॥१८॥ सुमित्र विश्रामस्थानमिव मिहिकाया , कुलगृहमिव वर्षाया , उत्पत्तिस्यानमिव चन्द्रलोकस्य, निर्व तिपदमिव शीतजातम्य, आगारमिव शृङ्गारस्य, परिपन्थीव धर्मरय, निवारकमिव रविकिरणाना, त्यक्तमिवालोक , निशामयमिव, तिमिर- मयमिव, छायामयमिव, सुखमयमिव, जनक विकाराणाम्, निर्वापकमिन्द्रिया- णाम्, अनुभावक भावानाम्, उन्मादन मदानाम्, उद्दीपकमप्यालम्बन रसाना प्रमदोद्यान पुर पश्यतु देव । यत्र च धनमार-पीतसार-त्वक्सार-सिन्दुवार-कोविदारमन्दार-सहकार- कणि कारशितिसार-जम्बीर-वानीर-करवीर-पाटीर-वीरपुर-खपुर-मालूर-खदिर- कदर-बदर-ताल तमाल--हिन्ताल-कृतमाल-नक्तमाल-कन्दरालचलदल-दधिफल-- जन्तुफल-निचुल पिचुल- चतुरड गुल-मञ्जुल-वजुल मधुप्ठील-मधुल-गुडफल- विदुल-फेनिलोद्वालकदलीलागलीलवलीशाल्मली -धात्री-चित्री-शोभाजनाज- न-जम्बू-मर्ज पर्जू र-पर्जन्यार्जुन-जपा-न्यग्रोध-शिग्रु-मुनिद्र -पारिभद्र- मर्वतोभद्र- भद्रपर्ण-सप्तपर्ण - पर्णस्वर्णवर्ण - प्लक्षाक्षादिवृक्षलक्षलक्षितक्षणे, नोत्का इव कलितोद्वेगा कलहान्तरिता इव कलिकोपक्रमभाज, पुनर्मदनबाणासनातिमुक्तशिलीमुखभिन्ना स्वाधीनपतिका इव प्रियालापनसङ्गता , कृतव क्षारोहा , काश्चन रूपगविता इव त्यक्तकाञ्चना , काश्चन गणिका इव स्पृष्टपृथुलकुचा , काश्चन कुलटा इव नर्तिताक्षा , काश्चन निशाचर्य इव पीतर- काश्च- काश्चन प्रयम काश्चन स्वच्छन्द- - ३० श्रोदामचरितम त्तपलाशाश्रिता , काश्चन गोप्य इव रक्त कृष्णा, काश्चन पाण्डवपक्षपातिन्य इव पीता ना , काश्चन नद्य इव घटितताला कृतशैलूषाश्रण विधृतप्रवाला- श्च वाश्चन गर्भिण्य इत्र धृतदोह्दा , काञ्चन प्रजाता इव सुप्रसवा , काश्चन वैद्यक्रिया इव सफला , काश्चन मुग्धा इव सलज्जा , वाश्चन चन्द्रकला इव स लक्ष्मणा , कारचन विप्रलब्धा इव रुचिरमतकमधिप्ठिता , काश्चन द्रुपद- जा अपि कृतशकुनिपक्षपाता , कारचन सुभद्रा अपि कृतभीमाश्रया , काश्चन इङ्गितज्ञा इव सूचितवर्ण वरा , कारचन भोगिभोगभाजोऽपि वियोगिन्य परितो वीरुधो दृश्यन्ते । यत्र च भासुरे अपर्णात्व गिरिया, अन केशित्व यतिविधवादिषु, भिन्नपत्रत्वमाजिपराजितरवादिषु, गतपुष्पत्त्र जरठयोपित्सु, उच्छिन्नमूलत्व भवद्रिपुप, स्थाणुत्व शङ्करे, विशाखत्व कुमारे दृश्यते न लताद्र मेषु । यत्र च निरुद्वप्रभञ्जना धृतदमना योगिन इव केदारा । यत्र च सुरभीततिदृ ष्टमात्रैव तनोति व पोल्लामाम् । यत्र च राशय इवोपान्तस्थितकुम्भा , इप्टमीनकर्कमकर- मिथुनोल्लासा कासारा, यत्र च कोकिल-कोर चकोर-कराहस कलरवकव- किकीदिवि-कलिङ्ग-वलविद्य-करेट कृवण कृतवाक क ट कालगण्टक २ क केकि- लव-नित्तिर-कीर का रण्डव कुक्कुभ-कोयस्टिक-वर्तक-चातव पुष्करालादिविविध- विविकिर - जातिनि नजित भिन्नालिपुज-मञ्जुगुञ्जितरञ्जितजलजजात- जातरण रणकाविष्करणे क्वचित् सरमि पञ्चत्करेणुभिन्नशतपत्रे पुण्डरीक्वो- कनदे, क्वचिद्देशे ललिततृण राजो मनस्तटे, क्वचिशे जल भरभृते नवोलपा- लोलहारिणे पवनाय स्पृहर्या त जना । किं बहुना सर्वगमणीयकानामाराम- भनमिदद क तर न रञ्जयति ? कृष्ण -साध मुमिन, साधूपलक्षित रक्षितञ्च । यत -इत्तो बकुलानामितोऽशोकानामितो दादिमानामितो बीजपूराणा मितो हाटहगणामितश्चम्पानामित पुन्नागाना- मिन कादम्बानामितो नाराणा प्रतोलीप तत्तदाल वालवलनान्दिमितेन मती- पटाक्षेणेव तावन्मात्रसञ्चारमामलेन पुन सारणीपु पामुलानयन भगभर गुरेणा- जिन वन्नयति चेनोजन्मानम् । श्रीदामा -मने, इन पथ्य उताम् । किनपिक्लि-मतल्लिका-मल्लिकापरिमल-पादलि- नावारमग्निगि यो गृहीतन्द्रालगाला जपन्त स लभ्यन्ते । - N लपि पि.जम्पिनाम्पिनपत्रिपाकर्म गोचरितारातरपिता- नाशिनियोरन पारियों।

तृनोयोऽङ्क ३१ विदूषक -चउक्के छिद वणवण्णण । ता अह पि पचमो हुविअ वण्णेमि । [ चतुष्के स्थित वनवर्णनम् । तदहमपि पञ्चमो भूत्वा वर्णयामि ] कृष्ण -कि पञ्चत्व प्राप्य ? विदूपक ते पावेदु मह ससुरस्म पुत्तओ । वअस्म, पेक्ख पेक्ख । इदो कु दकलिआओ कूर विअइलपसवाड दहीड मालइपुफ्फाइ कढिअदुद्दाइ कुरटआआइ ढइसुअ पुण्णाग- मजरीओ अमोअवत्तिआओ णारिगफलाइ मोदअ मरुवअकदवमणआ-पत्त-साकाइ निमुपासोआइ आमिसाइ क दुआ परिवेमअतीव्व वणदेवदाहि भु जतीए व सिरीए । [तत् प्राप्नोतु मम श्वसुरस्य पुत्रक । वयस्य, पश्य पश्य । इत कु. न्दलतिका भक्त विचकिलप्रसवानि दधीनि मालतीपुप्पाणि क्वयितदुग्धानि कुरण्टकान्याढकीमूद पुन्नागमञ्जर्य अशोकवतिका नारङ्गफलानि मोदक मरु- वककदम्बमनकापत्रशाकानि किशुकाशोकानि आमिपाणि कुतुकात् परिवेशयन्तीव वनदेवताभि भुञ्जन्ती बनश्रियम् । ] (मर्वे हमन्ति) कृष्ण -(मम्मितम्) विड मूर्ख, भोज्यातिरिक्तो न ते कस्यापि कारणस्य विपय । विपक -मह वह्म गीए प्पमाएण सबकरणाण वि विसआ भोअणिज्ना ज्जेव्व। [मम ब्राह्मणा प्रमादेन सर्व करणाना विपया भोजनीया एव ।] (सर्वे पुनह मन्ति) कृष्ण ( परितो विनोक्य ) सये, पश्च पश्य । छायापतौ समन्तात् करसञ्चार कुर्वति दिशासु । उत्सङ्गयन्ति तरवो मुग्धवधूटीमिव च्छायाम् ॥१६॥ ? सुमित्र -देव, तदेतम्मिन् अवसरे सुरेणुभूभागतो गतो रजनिकर करणतापनाशाय मृणा- लिकाना कासार सारञ्चात्र ज्वलत्म दिनमणिमणिपु वाचयमेपु कोपष्टिकेषु ताम्यत्सु पथिकेपु तप्ते पिशुनमनसीव मरमि प्रसरति चण्डमहसि धर्मक्षयादिव तरुण किमलयच्छायाधिष्ठितासु वनदेवनामु रविकिरणेष्वपि तरुपत्रान्तरालानि निजतापभियेव गाहमानेपु. तरुप्वपि नवकिसलयच्छलेन जलार्थनाय रसना प्र- सारयत्सु, चण्डोद्योतभियेव पथिकवारणार्थ कगन् प्रसार्य स्वयमपि मन्दीभवति भगवति पद्मवन्धी विहम्नस्यापि जगतो रामणीयकमाकलयतु देव । तथाहि--- कालेऽस्मिन् प्रयमानसूरकिरणव्याजम्भदम्भोजनि- स्फायकोशगलन्मरन्दमदिरापान प्रमत्तालिनि । जाने पक्षमपुटानि पक्ष्मलदृशामाश्रित्य चेतोऽजनि, श्रीदामचरितम् छायेच्छायशत कटाक्षकृपणाद् बाणान् मुहुर्मुञ्चति ॥२०॥ तदम्मिन् गुञ्जदनिपुजवजुलकुञ्जमञ्जरीरज पिञ्जरिते शिजानमजी- रराजिरुचिररणितमदकलकलहसमण्डलीरञ्जिते स्वमरीचिनिचये चमत्कार- वञ्चितचन्द्रजित्वरे स्फाटिकमयचत्वरे क्षणमुपविश्य मनोविनोदमनुभवतु देव । (सर्व परिक्रम्य यथोचितमुपविशन्ति ) कृष्ण – (विलोक्य) वयस्य, पश्य पश्य- अवतरति गगनशिखरात् चरम गिरि पद्मिनीबन्धौ । नयतीव शाखिनिवह प्राचीमुत्सङ्गत श्छायाम् ॥२१॥ विदूषक -वअस्स, पेक्ख पेक्ख । सिहरमेत्तम्मि छिदाइ रइणो जरठवाणररगाणुकरणाइ किरणाइ उव्वहता तरुणोणुहरेति तुह सिरिअ । [वयस्य, पश्य पश्य । शिखर- मात्रे स्थितानि रवे व द्धवानररगानुकरणानि किरणान्युद्वहन्त तरवोऽनुहरन्ति त्वच्छ्यिम् । (परितो विलोक्य) हीणामहे | महगसरिच्छाइ दिसामुहाइ भअत्त- मसेण किदाइ। [आश्चर्यम्, मत्तगसदृशानि दिशा मुखानि भवत्तममा कृतानि।] श्रीदामा - सखे, सत्यमुक्त मारायणेन । यत - पस्तपातुकधर्माशु किरणारुणिताञ्चलम् । वस्नेऽन्तराले तिमिरश्यामल जगदम्बरम् ॥२२॥ गालव -भगवन्, पश्य पश्य । विगलितकिरणावलीनिकाय, दिनमणिमण्डलमञ्जसा विभान्ति । प्रणयकुपितहूणसुन्दरीणा, वदनसरोरुहसञ्चितोपमानम् ॥२३॥ विदूषक -ना उ जुअ उजेब कि ण भ गीअदि माकड मुहमरिच्छो त्ति । [ नद् योग्यमेव किन भण्यते मकटमुगमदश इति । ] पीनामा यानुना जगन्नद्ध तद्धस्तरेव रश्मिभि दिष्ट्या म पात्यतेऽम्भोधी न स्वकर्म भुनपित क ॥२४॥ -भगवन, पश्य पर। दिशा निर्वामिनो दूर शत्रय महसा निधि । + तृतीयोऽड्र mr वारुणी तरसा याति, श्रीदामा .क्व त्रपा विगतांशु के ॥२५॥ विदूषक -(कणा पिधाय परिसर्पन्) मह दासीउत्तिआ झिल्लिआ तिमिरस्स झिल्लरीव वादेता कण्णाइ बहिरेति। [ मम दास्या पुत्रा झिल्ल्या तिमिरस्य झल्लरीव वादयन्त कण बधिरयन्ति । ] तप्ताय पिण्डमिव रवि क्षिपति काललौहिकोऽम्बु निधौ । धूम तमोऽस्य शङ्क सूत्कार- झिल्लिझाडारम् ॥२६॥ सुमित्र -इत पश्यतु देव गालत्र - अस्तमस्तकचरे दिवाकरे, हा कथं कुमुदिनीहृदीशितु । पास्यमस्य करवाणि सम्मुख, निमिमील नलिनीति लज्जिता ॥२७॥ कृष्ण --सखे, पश्य पश्य , तिमिरमयनीलशाटीनकलितपाटीरबिन्दुसदृशेन्दु । तिमिराभिसारिका सा विगलितहसाऽभवत् प्राची ॥२८॥ सुमित्र –देव, कमेण क्रमेल ककण्ठकडाररुचिनिचयरञ्जितसान्ध्ये रागे विरते उन्मिपत्सु दलद्दलनिवहचलदलिपटलपेपीयमानमकरन्देषु कुमुदेपु समानदु खतया नलिनी- माश्वासयितुमिव तटात् तटान्तर सञ्चरत्सु प्रियविरहखेदजन्याक्रन्दभीपितन- केषु चक्रेषु नीडोन्मुखेषु विहगेषु स्वस्ववासोत्कण्ठितेपु वनचारिषु निद्रातन्द्रालुषु प्राणिषु दरालम्बितजीवेषु जीवजीवेषु मान-प्रसादपरवशवनिताहुड्वारमुख- रेपु वलभीगृहेषु इतस्तत सञ्चरन्तीषु दूतीषु चन्द्रशालापरिष्कारपरासुपरि- चारिकासु, उरीकृतनीलपटासु कुलटासु, पिनद्धकनकमणिकासु गणिकासु, प्रव- तितासु परित प्रदीपकलिकासु अकाण्डमेव स्खलतीव नभसस्तमोगुणो देवाना, प्रसरतीव प्रसाधनविधी चिकुरोत्करो दिगङ्गनानाम्, स्फुरतीव नीलपटावगुण्ठन- विधि वाम्, पिनद्धव गरुडमणिभूपा रोदसी, प्रसृतेव कामिजनजयाय भगवतो मकरकेतो कुञ्जरराजिरिति धिय जनयन्लञ्जनादित इव, गिरिकन्दराभ्य इव, गहनादिव, असतीकटाक्षमहस्रादिव, खलजनमन सन्तानादिव, आविर्भवत्कलुप- मय इव, मोहमय इव, अज्ञानमय इव, शक्रमणिमय इव, नीलोत्पलमालामय इव, स्वर्ग इव, स्वच्छन्दसञ्चरत्कौशिक कलिकाल इव, लुप्तवर्णविवेको,

३४
श्रीदामचरितम्
दिवस इव खचितद्योतसुभगो, अनीतिभागिव तेजोरहितो, अनङ्ग इव नयनहा-
री, योगीव समीकृतोच्चावचस्थिति , रागीय कान्तारागप्रवृत्तस्तिमिरोदधि
कामपि वलामतिक्रम्य वर्पति । यस्मिश्च न मही,न द्योर्न दिशो, न रोदसी, न
तरवो, न नगा, न निम्नानि, न विहगा, न मनुजा, न पशवो नयनपथमवतरन्ति।
कृष्ण -- (परितो विलोक्य)
अनध्यायस्तादृक
निखिलमहसामुद्धवभृता,
निषेधो नेत्राणा प्रसरणविधि कौशिक दृशाम् ।
तिरोभावोऽर्थानामहह कुलटामोहनकला-
महाध्वान्तस्कन्ध शिव शिव जगद् व्याकुलयति ॥२६॥
विदूषक अम्महे बलामोडिअ तेजाइ मोडिअपफुरतेण इमिणा जोदिरिगणावद्दारेण मुह
उज्जलीयदि । [ अहो । बलादुन्मूल्य तेजामि उन्मूल्य प्रस्फुरता अनेन ज्यो-
तिरिङ्गणापद्वारेण मुखमुज्ज्वलयति ।
कृष्ण -(मम्मितम्) अपशब्दभृदेव मूर्खस्य मुखम् ।
सुमित्र -इत पश्यतु देव । प्रनृमरतिमिरमकरालयडिण्डीरपिण्डपडि करिव पुरन्दर-
हरिति दरीश्यते प्रमाद ।
कृष्ण --(विलोक्य) अहो । प्रत्यासन्नोदयो भगवान् तुपारकर ।
(विमृश्य)
--
अप्राप्तोदय एष एव तरसा जिग्ये तम सन्तति,
जीवजीवकुलस्य जाड्यमहरच्चञ्चू पुटानामपि ।
मौन करविगोणम्य विभिदे मान मिय कामिनो ,
कि उत्तयुपित'तुपारशिरणम्तन्नप जानीमहे ॥३०॥
नुमिक (जमवलोक्य)
रबिरथलाबकृप्टे तिमिरोघनमीटते नभ क्षेने ।
वापयति कालनिक. मशो नक्षत्रयीजानि ॥३१॥
भगवन, पश्य
बदानागनरा लिमु नागमिपतोवर क्षिप्ता ।
निमिनमतीतर तो निति चित्रपटीम् ॥३॥

तृतीयोऽव ३५ अपिच लेपिततमिस्रगोमयनीले गगनाजिरे रजनी । रचयति तुरङ्गमालास्ताराकपटेन पिष्टमयी ॥३३॥ श्रीदामा -वयम्य, इन पश्य दरकिरणावलिभरमच्छुरित शोण प्रगे परिनिखातम् । होतुमिवोदयमान शशिन दहन ममुद्धरति काल ॥३४॥ विदूपक -(महासम्) अबो, चदणकापूरपफम-मीअलो वि अम्मिअकिरणो दहणनणेण इमिणा वणिज्जा । ता एमो पदीविदजठराणलो हुविस्मदि । खुधिओ बह्मणो मब अग्गि च्चे न देख्खइ । अह उण अत्तणो पकिदीए एव्व जाणेमि । [अहो' चन्दन कर्पू रम्पर्ण-शीतलोऽपि अमृतकिरणो दहनत्वेनानेन वर्ण्यते । नदेप प्रदीपितजठरानलो भविष्यति । क्षुधितो ब्राह्मणो सर्वमग्निमेव पश्यति । अह पुनरात्मन प्रकृत्यैव जाने । कृष्ण - (मस्मितम्) त्व नावद् वर्णय मृगाकम् । विदूषक -परम्मा हुक्कारेमि । (मप्रणिवान स्थित्वा) वअम्म, - सुणु पुवदिमाए भालथलीए । चददिदु जिभइ इदु ॥३५॥ [ सररस्वतीमाकारयामि । ( मप्रणिधान स्थित्वा ) वयस्य, शृणु पूर्व दिशाया नालस्थले चन्दनविन्दुर्जुम्भते इन्दु । ] कृष्ण -अहो, । मरम्बनीप्रमाद । विदूषक - (मगर्वम् । बोदामान निर्दिश्य) ण हु तव वजम्मा एनारिमा ज्जेब होति । [न सनु तव वयम्या एतादशा एव भवन्ति] सुमित्र -देव, पश्य । उदयगिरि-परिमरकुरुविन्दकन्दलप्र नाजालरिव कुमुदिनी स्वपा- दस्पर्शरभिमण यतो रवे कोपरिव तिमिरकुम्भिकुम्भविपट्टनोच्छललोहित- धाराभिरिव विरहिणीनयनकोणप्रभाभिरिवालोहित पूर्वदिगगनातकर्णपू- श्रीदामचरितम् रायितै ककिरण ततो दुर्वर्णभल्लसवर्णकतिपयकरवारित-तिमिरवारण सम्प्रति प्रतिककुभ सञ्चारितमयूखनिवहबहलप्रभापटलपूरण वर्षद्भिरिव पटीरद्रव किरद्भिरिव धनसारक्षोदानुभूलयद्भिरिव पटवासधूली प्रसारयद्भिरिव मुक्ता- चूर्णानि कलयद्भिरिव वर्णान्तरशून्या विरञ्चिरचना सुधालिप्तामिव स्फ- टिकघटितामिव धौतोत्तरीयप्रावृतामिव रोदसी कुर्वन् नभस्तलमलङ्करोति मृगलाञ्छन । यस्य च प्रसरति महसि क्षीरसारिणीमिव विशिष्य प्रसूना- नीव तरव पुण्डरीकानीव सरासि दधति । कृष्ण ---(परितो विलोक्य । सहर्षम्) अहह, प्रारुण्य दधता ततो निपतिता कि चारुणी सेवना- दभ्युद्गीर्णमनेन कर्णगुरुणा प्राक् पीतमन्धन्तम । यावत्तावदुदञ्चदशुपटलीव्याजस्फुरन्मार्जनी सद्धातै प्रणयीव निह्नवपरो जैवातृको मार्जयत् ॥३६॥ गालव भगवन्, ऋक्षाकैरन्वनुगम्यमानौ, शकुन्तकोलाहलकेतवेन । मियो दिवारामिमौ रवीन्दू, तिरस्क्रिया व्योमतले रमेते ॥३७॥ कृष्ण -- वयस्य, स्वोत्कर्प सर्वमपि सुखयति । यत अपहाय रागिणीमपि सन्ध्या मामेति शिशिराशु । इति मुदितेव तमिला तारापुलकान् ममुहहति ॥३८॥ (क्षण तिवण्यं) सन्ध्यानले परिनिधाय शशाशबिम्ब, भ्राष्ट्र न भर्जयति माघवनी दिगपा । श्रोहीनभन्ददलमानविकीर्णलाजा- तारामिपंग गगने परित पतन्ति ॥४०॥ शत (जिस्यि)

तृतीयोऽङ्क
३७
सन्ध्यानले गगनभाजनग विपाक,
ताराचर तिमिरनाशनहेतुभूतम् ।
चन्द्राङ्क ( त ) स्सरमुदीक्ष्य विहङ्गराव-
कौलीनत किमनुशोचति कालमन्त्री ॥४१॥
--
विदूषक --वण्णिद वण्णिद णिअरुआणुरुव । सुणु-एव्व वणीअदि । [वर्णित वणित निज-
रूपानुरूपम् । शृणु-एव वर्ण्यते ] ( सर्वे सस्मितस्तिमितभावेन शृण्वन्ति । ]
भरिऊग रोगसीरा कुहर णूण णिजाहि जोण्हाहि ।
उवरिछिदो मिश्रको कौंदरपाएहिं पहइतो ॥४२॥
[भरित्वा रोदस्यो कुहर नून निजाभिर्योत्स्नाभि ।
उपरि स्थितो मृगाङ्क आवर्तयने पादै प्रहरन् ॥]
कृष्ण -साधु वयस्य साधु । दूर बुद्धि प्रसाद प्रापिता।
विदूषक -सुण्णतो जणो वि । [शृण्वन्त जना अपि] (पुरोऽवलोक्य) वअस्स, पेरुख पेरुख-
जोण्हाणलपक्खालिअ-गप्रणयले दिण्णदिछीए ।
पीईसपाणकज्ज हा विसुमरिय चोरीए ॥४३॥
[वयस्य, पश्य पश्य-
ज्योत्स्नानलप्रक्षालित-गगनतले दत्तदृष्ट्या ।
पीयूषपानकार्य हा विस्मृतं चकोर्या ॥]
श्रीदामा -(क्षण विमृश्य) प्रदोपरक्तन रोहिणी गच्छना ज्येष्ठामासादयता मूलमतिकमता
शशिना-
अत्रेनेत्रमलेन लाञ्छनभृता लीनेन वारानिधी,
स्वैर मन्दरपादपक्तिविकटाघाताहतीविभ्रता ।
जयेन त्रिदर्शविभज्य बहुश क्षीणेन लोको यथा,
रज्यत्वेन
पद्मपतिना-
तथा
( विमृश्य ) जयवा-
कप्टोऽनुरागक्रम ॥४४॥

३८ श्रीदामचरितम् गालव. -भगवन्, मैव मैवम् । यत राम इव लक्ष्मणाञ्चित , कृष्ण इवानुराधागामी, विलासीव कुवलयोल्लासितकर , तरुरिव रुचितचकोरकश्चक्राङ्गभिन्नशकुन्त इव मनसा जात कस्य न मदयति मनो मृगाङ्क । कृष्ण -(समन्ताद् अवलोक्य । सहर्पम्) प्रतिदिनमय नाय नाय मुधोदधित सुधा, गगनविपणि चन्द्र सान्द्री चकोरचमूरिमाम् । करनलिकया चञ्चच्चञ्चू पुटा परिलेहयन्, वणिगिव पुरो विक्रेतु नु प्रसारयति रफुटम् ॥४५॥ गालव --(विलोक्य) सम्प्रति जगति- 'विगलितपुरमिन्युस्रोतसा पूरिता नु, श्रीदामा --- प्रसृमरहरहासारोपसङ्गोपिता नु । - विदूषक --ण खुहु अमरणरवइकित्तिफारफफालियेय, [ न खलु अमरनरपतिकीर्तिस्फारस्फालिकेयम् ] सुमित्र दधिजलनिधिलीलालम्बिनी भाति सृष्टि ॥४६॥ - - विदूषक -वअस्म, ता लहु गदुअ णिअबह्मणीए सआसादो कूर लोणअ अ गेण्हिअ आ- अच्छामि । जण इमिणा दहिणा उअराणलस्म आहुदि णिब्बतेम्मि । [ वयम्य, तल्लघु गन्वा निजनाह्मण्या सकाशाद् भक्त लवणञ्च गृहीत्वा आगच्छामि । तेनानेन दध्ना उदगनलम्याहुति निर्वतयामि ।] (सर्वे हमन्ति) (प्रविश्य कञ्चुकी ) तृतीपो कृष्ण -इतर क्व नारीनिवह ? कञ्चुकी -नातिदूर एव रुक्मिणीदेवीमुख्य पुरन्ध्रीकदम्बम् । कृष्ण -(विमृश्य) सुमित्र, त्वमशून्य कुरु स्वनियोगम् । वयमपि तेनैव पथा भामामा- ननपुरस्सर सम्भावयामो भामिनीनिवहम् । ( इति निष्क्रान्ता सर्वे) तृतीयोऽङ्क । न ★ * अथ चतुर्थोऽडू । तत प्रविशति कामिनीकदम्बम् ) कृष्ण --(विलोक्य । सानन्दम्) वयस्य, पश्यसि पुर सरकञ्चुकिनिचयकलितराजता- लीदण्ड पाकसुगन्धितैलानिलनासीरचरदासीसहस्रवलितवेल निर्मलनिर्यद्रत्न- रश्मिशबलवासोरेणुना जनिततरङ्गरग सजल लावण्येन, सचन्द्र मुखेन, सामृत स्मितेन सप्रवाल दन्तच्छदेन, समौक्तिक रदमण्डलेन, सशुक्तिक कपो- लेन, सकम्बु कण्ठेन, सशैल स्तनेन, सलत भुजेन, सर्शवल रोमलतिकया, सावतं नामिना, सपुलिन जघनेन, सदीप नितम्बेन, सरम्भमूभि , सहस कटकेन, मकमल चरणेन, गरत्न नग्रे , गपन्नग वेणीवन्तन, सहानाहल कटाक्ष, मधन्वन्तरि प्रेम्णा मारणाना गमनायगदरय नागनियह गदीनग। विदूषक --अब । जस गवणदोनिरकदोहोरिणामहरगरिछाई कारवाद पसग्निपिरिणकिरणमा, गण मन IP पधणय बाम it forgetformin 1 ताण 151116ff गnि Frana 1-14, 1 (म {{familitimarst fun || 1100 - ४० श्रीदामचरितम् यस्य पवनान्दोलितोत्पलकोटि - नृत्यप्रवृत्तमधुकरसदृशा कटाक्षा प्रसारितवि- विधरत्नकिरणमीलिता गगननले कलिन्दगिरिनन्दिनीव महेन्द्रधनुरिव वृत्त- पद्मपुण्डरीकनीलोत्पलसदृशाभिरिव दिशासु तासु यक्षकर्दमाङ्गराग इव मह- त्स्वेव वक्षेषु वसन्तश्रीमिव स्थलीषु चित्रकर्मेव तव कण्ठे वैजयन्तीय मम शीर्षे परिणयसमयदीयमानमानशेख रमिव कुर्वन्ति । कृष्ण - (सस्मितम्) वयस्य, सत्यमासामपाङ्गभङ्गपरम्परया वैजयन्त्येव बद्धोऽस्मि । (किञ्चित पुरोऽभिसर्पति) रुक्मिणी - (अपवार्य) हजे माहविए, इदो दिण्णदिछी अज्जउत्तो आअच्छदि। [सखि माधविके, इतो दत्तदृष्टिरार्यपुत्र आगच्छति माधविका -णहु णहु । बहलपरिमलपडला बहुदरमहुअरझआरमुहरसिहरस्स पडतपराअपु - जपिंजरिअफडिअमणिघडिअचत्तरोव तभमदकवोदपोदचओर - परहुअरमणिज्ज म्म पारिजाअतरुस्स अहिमुह तत्तभव पचलिदो जउणाहो । [न खलु न खलु । बहलपरिमलपटलो बहुतरमचुकरझड्कारमुखर शिखरस्य पात्पराग - पुजपि- जरितस्फटिकमणिघटित - चत्वरोपान्तभ्रमत्कपोतपोतचकोर - प्रभृतिरमणी- यस्य पारिजाततरोरभिमुख तत्रभवान् प्रवलितो यदुनाथ । रुक्मिगी -ता वअपि तहिं च्चेअ गच्छेद । [ तद् वयमपि तत्रैव गच्छाम । ] ( इति सर्वास्तथा कुर्वन्ति । कृष्ण प्रणम्य यथोचितमुपविशन्ति । ) कृष्ण ---( अपवार्य । भामा प्रति सहासम्) अयि प्रोपितमाने, पाविष्करोति कर्तार दृक्कोणमरुण यदि । कथ ते तन्वि वदन चन्द्रमा इति गीयते ॥१॥ (नामा सलज्ज मगौरव सम्मितञ्चाधोमुखी तिष्ठति ) पिनोपर ) अयि प्रिये, क्षणमाविपतमाना क्षणमभिदृष्टप्रसादमाधुर्या । घन नय निफियती झवाइलेव मा हामि ॥२॥ प्रिदाय एम एव मद । गिरिगणी रेण समुः।। एतावदेव बहुमतम् । तया मीन र श्रीदामचरितम १२ तथापि षट्पदस्यक माधवी काऽपि जीवितम् ॥६॥ विदूषक -(अपवार्य) वअस्म, अण्णाओ वि तिस्खकडक्खेहि पेस्खदि । [वयस्य, अन्या अपि तीक्ष्णकटाक्ष पश्यन्ति ।] - कृष्ण -(परिक्रम्य । काञ्चिदवलोक्य ) वयस्य, अनया- पश्चान्निवद्ध सुदृशालकाली- गुच्छो न वध्नाति मनासि केषाम् । निसर्गजिह्मस्य मलीमसस्य, युक्त स्वबन्धेषु परावमर्श ॥७॥ (अन्या प्रति) तव लम्बितकुन्तकावली, दरदृष्टाननरोचिरोचित । मम नेत्रचकोरकोऽचरत्, तिमिरान्तश्चरचन्द्रिकाचयम् ॥८॥ ( अपरा सम्पृहमवलोक्य ) अव्याहत वरारोहे पद्धजत्व दृशोस्तव । पक्ष्मप्रान्तपरिवक्तकज्जलग्नेच्छपद्धयो ॥६॥ वयम्य, न कथ नयनपथ मरीसरीति मरीतिरक्षिविक्ष परनगाणुगाना परिहतमनोजनिर्वाधा राधा । विदूषक -दूराहितो दी13 माणमिणीव्व केमरर मानलम्मि ततहोदि मिश्र - पडत बा- हुधेवरी गहिआ। [ दृगद् दृश्यते मनस्विनीव केमरवृक्षाधस्तत्रभवती मृगीव पनाहुपागा गधिता] कृष्ण - (मसम्मम्) मा पब मा ? निदूपर पदुदु भर । एतु एतु भवान् ] पण -(परिणाय । योग्य न ) यवन, निममुग्या ताव मागत ययामि ? - मिन- वर्योऽङ्क ४३ चेनो निकृन्तति मयि प्रभुनिविशेष- मस्यै नम कृतवति प्रथमानुरागे । न्यग्भड्गुरीकृतवितोचनमादराव- हेलाविलं नमितमेककराञ्चोन ॥१०॥ विदूषक --तुम पेस्बिअ कुडिलावगेण रत्तपोम्मराइहिं ब्व अच्चेदि। त्वा प्रेक्ष्य कुटिला- पाङ्गन रक्तपद्मराज्येव अर्चयति ।] कृष्णः -( महसोपमृन्य ) तन्नाधिरोहत्यथ चित्तमार्ग, सम्भावना यस्य वरोरु कुर्याम् । मानञ्च पश्ये किमकारणव, कार्योद्गति शास्त्रदृशामभीप्टा ॥११॥ अपि व श्रयति नवानपराधे मयि सुतनो । कस्य वा हेतो । केरलकुरङ्गनेत्रा चिकुरावलिचातुरीनयनम् ॥१२॥ तदनमनेन लोलाप्रत्यूभूतेन मयि मानोज्जृम्भितेन । (इति पादयो पतितुमिच्छति ) राधा -(कराभ्यामवधृत्व) णब्ब उइद पुआरहेनु जणेनु अदिनद । जर भासाप्पमुहा- सु तुम्हाण चेदवुत्ती ता किमणेण मुहमेत्तराएण गहिएण। [नवमुचित पूजा- हेषु जनेप्रतिशयितम् । यदि भामाप्रमुखातु तव चेतोवृत्तित्तत् किमनेन मुख- मात्ररागेण गृहीतेन । कृष्ण - साधु वय शाखामृतुला नीत्वोपलब्धा । विटूपका-जत्तहोदीए अह वणिदो । ता तुम्हे दुवे वि गहिदहि अरामा हुजि रास पउत्तेह । तत्रनवन्याऽह वर्णित । तद्गुवाभ्या द्वाभ्यामपि गृहीतहदयरागो भूत्वा रास प्रवर्तवतम् ।] राधा -( सम्मितम् ) अज्ज पारामओण किदो विदेओ । [गर्यनारारणे कृतो विवेक ।] कृष्ण -( राधाया अधर धृत्वा ) श्रीदामचरितम् दरनमिताधरमध्यगरेखामधुराधरे तवाहरति । सारिणिरियोच्छितानामसृताना कल्पना विधिना ॥१३॥ ( इति पातुमिच्छति । राधा मुख व्यावर्तयति ।) कृष्ण -( निपुण विलोक्य ) दरलम्बितचिकुराड कुरशिखाविषक्तैगनाभितिलकस्ते । सुन्दरि | युवजनमनसा मनोजनिक्षेपणी श्रिय वहति ॥१४॥ राधा -अज्ज उत्तस्स प्पणएण कह वा सभावइज्जइ ? [आर्यपुत्रस्य प्रणयेन कथ वा सम्भाव्यते?] कृष्ण –(गाढमालिङ्ग य परिचुम्व्य च) प्रिये, सर्व युक्तमेव सम्भाव्यते । हरिताभिरिव स्निग्धश्यामाभि सुखसवित्रीभि । त्वदृष्टिभि सुनयने । रज्येऽह ग्रन्थिलाभिरपि ॥१५॥ (इति ता करे धृत्वा उत्थायाश्लिष्यन्नेव परिक्रामति) विदूषक -अह पुठ्ठीण एक्कलो ण आअमिच्छामि । गेह गदुअ बह्मणी आलिगिअ तुम व्ब रासम्मि भवामि । [अह पृष्ठत एकाकी नागमिष्यामि । गृह गत्वा ब्राह्म- णीमालिङ्गय त्वामिव रासे भवामि ।] कृष्ण -एह्य हि त्वामपि कयाचिद् भुजिष्यया योजयामि । ( इति तेन सह परिकामति ) गालव -(सकरतालमुत्प्लुत्य । साश्चर्यहासम्) भगवन्, पश्य पश्य। प्रतिकान्तमेकैक कृष्णदेव । क्वचित् स्वकचग्रहै , क्वचिदाश्लेषै, क्वचिद् दन्तपदै , क्वचिन्न- खक्षत , क्वचित् परिहाम , क्वचिच्चुम्बित , क्वचिदुच्चचुचूकाभिमर्श , क्य- चिद्भ जवल्लीवेल्लित , क्वचिन्नृत्यै , क्वचिद् वाद्यवादन , क्वचिद् गाने , क्वचित् काव्यनाटकाय्यायिकाव्यास्यान , क्वचिच्चतुरङ्ग, क्वचित् पाश , क्वचित् पुष्पावचय , क्वचिज्जलक्षेप, क्वचिद्दोलाविलास , क्वचिन्मल्लयुद्ध , क्वचिदधरसुधाग्रहै , क्वचिन्मिय श्लिप्टाड गुलि न मण, क्वचित् समस्यादान- पूरणे , क्ववित् पततिकुलनासनं , क्वचिन्नानावन्धयुतरतिमुग , क्वचित् ति- रन्निवाभि, क्वचिद् तान्लतान्तवनिनापरिचरण , क्वचिन्मानिनीचरणपात , - , श्रीदामचरितम् ४६ मनस्विन्या अग्रचरणलोठितमौलि । मनस्विन्या परमुखालिङ्गने प्रसभदत्त । वेणीतलप्रलम्बे तवोरसि धारितणितस्नेह ॥१८॥ इति खडिदाए उवलहिज्जदो ण म आलवदि । [इति खण्डिताया अभिलपन् न मामालाति ।] (पर गत्वा) एतो वि [एषोऽपि] लम्बिकुन्तलसहासिकावशा- दस्तु ते नयनयोररालिता। हा पचेलिमसुधासवर्णया, त्व गिरा क्व समशिक्षि सा गति ॥१६॥ इदि माणतो का वि अहीरहुढेल्ली ण म मणम्मि वि आणेदि । हहो सव्वे वि समाणरुअवेमा हरिणा दीसति । ता कि एद इदआलिअ अह काज- व्वूहो, उद माआ, अहुवा दासीएउत्ता भुत्ताहविअ म भीसअदि। [इति मानयन् कामप्याभीरयोषिता न मा मनस्यप्यानयति । हहो सर्वेऽपि समानरूपवेशा हरयो दृश्यन्ते । तत् किमिदमिन्द्रजालिकम्, अथ कायव्यूह , उत माया अथवा दास्या पुत्रा भूता भूत्वा मा भीषयन्ति ।] ( क्षण विमृश्य ) पिअवअस्साणुका- रिणो रत्तिचारिणो एदे च्चेअ । ता पिअवअस्स हकारिअ एदाण दाणि सति- प्पआर अण्णे सेमि । [प्रियवस्यानुकारिणो रात्रिचारिण एते एव । तत् प्रियव- यस्यमाहूय एतेषामिदानी शान्तिप्रकारमन्वेषयामि । (इति हस्तमुद्यम्य) अह- वा अह जेव्व सिह बधिअ दडकठ्ठण एदाण अवणेहस्स । [अथवाऽहमेव शि- खा वदध्वा दण्डकाप्ठेन एतानपनेष्यामि ।] [इति दण्डकाष्ठमुद्यम्य ताडयितु- मिच्छति । कृष्ण दण्डकाष्ठ करेणावष्टम्भयति । विदूषक ---अवह्मण्ण अब्रह्मण्ण । गहिदो ह्मि मह केअरिआए दासीए उत्तण भूदेण । ता परित्ताअदु परित्ताजदु प्पिअवअस्सो। अज्जाआरहिअ ण बह्मणाण गव्व उव्व- हिम्म । [अब्रह्मण्यम् अब्रह्मण्यम् । गृहीतोऽम्मि महाकेसरिणा दास्या पुत्रेण भूतेन । नत् परित्रायता परितायता प्रियवयम्य । अद्यारभ्य न ब्राह्मणाना ग- वंमुहिप्पे ।]] कृष्ण -( जश्रुतमिव दण्डकाप्ठ कर्षन् काञ्चिदङ्गना प्रति ) युवजनचित्तोज्जयिनी रुचिरमहाकालमणियुक्ता। 1

४८
श्रीदामचरितम्
( अपरा प्रति सहासम् )
श्यामा अपि कुटिला अपि फेशा काञ्चीस्पृशो मुक्ता ।
परमानन्दविधात्री कात्री कस्नान्नु मुच्यसे सुतनो । ॥२४॥
गालव -~-(विलोक्य) भगवन्नुपसहृतनानारूपस्तत्र भग्वान् वैयाकरण इव कृतैकशेपो
दृश्यते।
श्रीदामा - (स्वगतम) स्वाद्वैतविभूति स्फोरयति तत्र युज्यते सर्वम् (प्रकाशम्) औपमिकी
वेला तदुपरतो रासरसाद् वयस्य इदानोमिति मन्महे ।
विदूपक -कहि पिअव प्रस्थो ? (विलोक्य सत्वरमुपसृत्य च)वअस्स, दिट्ठिआ वअस्सेण
जीवतो अह दिछोह्मि (वयस्य, दिष्ट्या वयस्येन जीवितोऽह दृष्टोऽस्मि ।)
कृष्ण ~~-कि तव
?
विदूषक
तुए कहि पि गदम्मि दुट्ठभूदेहि तुह रूव धरिअ अह अहिहदो इमिणा बुदि-
एण रख्खिदो ह्मि । [ त्वया कुत्रापि गते दुष्टभृतैस्तव रूप वृत्वाऽहमभिहतोऽ-
नेन वृद्धेन रक्षितोऽस्मि । ]
कृष्ण -~-कि नायुवीकृतमब्रह्मण्यम् ।
विदूषक -तेणच्चेअ एदस्स सआस पाविदोह्मि देवेण । विभादकप्पाए विहावरीए ओही-
णेसु तेसु तुम दळूण ओससिद मे प्पाणेहि । [ तेनैवैतस्य सकाश प्रापितोऽस्मि
देवेन । विभातकल्पाया विभावर्या अहीनेषु तेपु त्वा दृष्ट्वा उच्छ्वसिता मे
प्राणा ।
कृष्ण ~-कथ विभातकल्पा विभावरी ? (विलोक्य)
नीत समुद्र यादोभिर्भानुमानिति चन्द्रमा ।
नक्षत्रजालसयुक्त पततीव गवेषितुम् ॥२५॥
श्रीदामा -(विभाव्य)
अनायि प्रसभ भानुरनया चरमा दशाम् ।
इत्तीय पश्चिमामाशा चन्द्र पतति लोहित ॥२६॥
गालव
अनुगम्य परापति' कथमपि तारा नभ सरस्तीरात् ।
"प्रापृच्छतीव चन्द्र शकुन्तकोलाहल प्रवसन् ॥२७॥

श्रीदामचरितम् ( पुरोऽवलोक्य ) अहह, प्रियजनावलोकाय काष्ठाकारा अपि चेतन्ते वनिता । यत यास्यत्यद्य दिवामगिर्नम गृहानित्युद्गतानन्दथु- स्तारापर्युषितप्रसूननिकर सम्मार्जयन्ती मुहु । सन्ध्यारागकुसुम्विताम्बरवती सङ्केतवेलामिन, प्रावी बासकसज्जि व वयसा कोलाहलै शसति ॥३०॥ ( विभाव्य । सस्मितम् ) आकाशाङ्गणसीस्नि शीतमहता नक्षत्रमुक्ताफला- न्याकीर्णान्यवनुप्य शान्तिविभव निर्वास्य त दूरत । शसन्तीति जरागमुद्गतमससन्ध्यानुरागच्छलात्, प्राची वारविलासिनीय पुरत्तश्चण्डाशुमुत्प्रेक्षते ॥३१॥ गालव -भगवन्, इतोऽपि रमणीय वर्तते । तथा हि-- - सिलखगकृतलेहे चकचञ्चत्समीहे, कलितदिर हिमोहे नेत्रपीयूषदोहे । विसमरम गेहे गन्धसम्भिन्नदेहे, सरसिरहसमूहे षट्पदो मोहमू है ॥३२॥ सत्यभामा ---( अपवार्य एका प्रति) सहि, पेख्ख पेस्ख । माणसिणीए व्व सोणाए पुव्वदि- साए हीरिदाइ णरखत्तमोत्ताहलाइ उवेच्छतो ससको गयणगणाहितो सपद विविहविविक्किररुदच्छलेन उवक्कोसती सेलसिहरतरिदेण रइणा दरपसर- नकरेण छित्ता खणे खणे पमण्णा होइ । [ सखि पश्य, । मनस्विन्या इव शोणया पूर्वदिशया हृतानि नक्षत्रमुक्ताफलान्युपेक्षयन् शशाङ्क गगना- गणात् साम्प्रत ता विविवविविधिकररुतच्छलेन उपक्रोगन्ती शैलशिखरान्त- रेण रविणा दग्प्रस्फुरत्करेण स्थिता क्षणे क्षणे प्रमन्ना भवति । ] एका राम्म मागमिगी कह अब रम्नि अगुज्जेड ? [ एकस्मिन् मानवती कथ- मारम्मिन् अनुरज्यते ?) मत्यभामा - वण्गिद वे अज्ज उत्तण मत्तिआ । ( ननु वणितमेवार्यपुनेण विशेषत) पश्य - ( महागम् ) मुणिद मुदिण मव्याग वि माणमिणीण एमो च्चे । (श्रुत श्रुत चतुर्थोऽवः सीमामेव मानवतीनामेप एव ।) ( इत्य|क्तो) भामा -( सस्मित ) चिठ्ठ रे दुठुबह्मण, क्दा वि पडिस्ससि गोअरेण समो तुम मह गोअरे । (तिष्ठ रे दुष्टब्राह्मण, कदापि पतिष्यमि गोचरेण समस्त्व मम गोचरे । ) कृष्ण -( विलोक्य काञ्चिन्मुग्धा प्रति ) मुन्दरि, पश्यसि । अदिवाकरमस्ततारक गलितेन्दु क्षणमीक्षते नभ । गतवाल्यमदृष्टयौवन तव चाम्भोरुहलोचने वय ॥३३॥ ( विलोक्य महर्पम् ) क्य म+कया कलया प्राचीललाटे प्राचीनपद्मरागल- लाटिकाश्रियमुद्वहन् उदयगिरिशिखरमारुरुक्षु पद्मिनीवन्धु । गालव - -भगवन् पश्य पश्य- मामन्तरा कथमिय जगती विभाती- युद्ग्रीवमन्तरितविग्रह एव भानु । ईषलन्किरणकैतवक्लुप्तहास , पश्यन्निव प्रगयत शनकैरदेति ॥३४॥ श्रीदामा प्रवृन्दारुवृन्दारकालीकदेशरखलन्मङ्घमन्दारवृन्दाञ्चितानि । नमामि त्रिलोकीकृते साक्षिभूत, तमिमातमस्तस्कर भास्कर तम् ॥३५॥ इति भानुमभिवन्द्य । कृष्ण प्रति) य स्वर्गनिर्मितविटद्धधियाऽवलम्ब्य, केलीशु का निपतिता अपि सश्रयन्ते । शर्माणि वो दिशतु धर्मपणे स कोऽपि, जालान्तरालपतित प्रथमो मयूस ॥३६॥ ( पुनविलोक्य ) कथ प्रव्यक्तमकलमण्डलो भगवान् मरीचिमाली । वयस्य, पश्य पश्य- पिष्टातकरिव विलिप्य दिशो विभाग, हैम निदाघमहस घटमादधाना । उद्यत्कराड कुरनवीनदलावृताङ्ग श्रीदामचरितम् ५२ प्राची तमोविलयशान्तिमिवाकरोति ॥३७॥ गालव -भगवन्, पश्य पश्य- मत्सङ्गादुदयमवाप्य पश्चिमाशा, यातोऽसीत्यहह रुषेव लोहितश्री । अङ्गार सपदि नु खादिर खराशु, रेभुक्षी क्षिपति हरिस्तुषारभानौ ॥३८॥ विदूषक -एण्हि गुरुसिस्साण मनीसा जालीअपोल्लिअच्चेअ प्पसरदि ण उण साहिच्च- णिरुत्तवण्णणम्मि। ( इदानी गुरुशिष्ययोर्मनीषा सरन्ध्राया पोलिकायामेव साहित्यनिरूपितवर्णने ।) प्रसरति न पुन कृष्ण -क्थ साहित्ये निरुच्यते ? विदूषक – ( सगर्वम् ) ण कहिस्स । सने वि तुह्म मह विज्ज गेण्हिदु पउत्ता । ( सस्मरणमिव ) अहवा मए अच्चुत्तमा विज्जा बह्मणीए सआसे ठाविदा थोआ मह सआसे चिठ्ठदि । त चेअ पभासइस्स । सुणोदु पिअवअस्सो - "पुवदिसादिअमडल बहुलखडअ । गअणखप्परे कुणई णिभरे ॥ [क] (३६) [ न कथयिष्ये । सर्वेऽपि यूय मम विद्या गृहीतु प्रवत्ता । (सस्मर- णमिव ) अथवा मया अत्युत्तमा विद्या ब्राह्मण्या सकाशे स्थापिता स्तोका मम सकाशे तिष्ठति । तामेव प्रकाशयिष्ये । शृणोतु प्रियवयस्य पूर्व दिशादिवसमण्डल वहुलखण्डलम् । गगनखर्प रकरोति निर्भरम् ॥३६॥] ( सर्वे हसन्ति) धोदामा --कथ हस्तयुगमारुढो भगवान् गभस्तिमाली । वयस्य, तदनुजानीहि गृहपति- शुश्रूपायै । विदूषक ----ण घरिणीए मण । [ ननु गृहिण्या भण। ] कृष्ण -सबे, ह्य एवागतो भवान् किल । गृहति शुश्रूषयितु न प्रजावत्यपि ममर्या । - विदूषक -पग्ध पद वि। (परगृहपतिमपि ) श्रीदामा ---(मप्रश्रयम् ) नथाप्यरोमो हि अयम् ।( मम्नेहम् ) सवे, चिराय भव- ततीयोऽङ्क ५३ दर्शनविधुरयोरनयोनयनयोरुत्कलिकयोपढौकितो भवदन्तिकम् । तत् सम्पन्नो- ऽनयोर्मनोरथ । परन्तु मुषितवाह्य न्द्रियप्रसर न यावन्मनसा गृह्यसे तावत् कुतो मे निव ति । तदिच्छाम्यह भवदर्शनावलोकनसुधामारवर्पस्यावग्रहायि- तुम् । कृष्ण -( आत्मगतम् ) सम्पादितचरोऽस्य मनसो भाव । तद् गच्छतु । (प्रकाश सस्मितम् ) वयस्य, यद्यस्मत्प्रजावतीवदनदर्शनलालमा तरलयति वयस्य तर्हि नोपरोद्ध मुत्सहे । ( सविमर्शम् ) अहह । स्निग्धजनविश्लेषो जन वक्तव्यमूढ करोति । तथाहि- गच्छेति पारुष्य, मा गच्छेति प्रभुताभिनयो, यथेच्छमनु- तिष्ठेति औदासीन्यम्, आगत्य साधु वय सम्भाविता इत्युपचार न किञ्चि- दस्माभिरुपकृतमिति स्वशाठ्यपौनरुक्त्य, पुनरपि दर्शनदानेन सम्भाव्योऽय जन इति व थादर , तन्न जाने प्रवत्स्यमाने त्वयि युक्त वक्तुम् । श्रीदामा किमधिक न सखे मम मानसे, विहरसे कृतहसपदस्थिति । परमुदञ्चतु मा हृदयान्तरे, तव कदापि हरे मम विस्मृति ॥४०॥ कृष्ण ( सविनय सप्रणयस्मितञ्च ) तदात्मान विस्मरिष्यामि । श्रीदामा -तदनुजानातु मा प्रियवयस्य । कस्तृप्यत्यमृताना तथाप्यतिवर्तते कापि वेला । ( कृष्ण पादयोनिपत्य श्रीदाम्ना निस्व्यमानोऽपि कतिपयपदान्यनुव्रज्य ससेद सपरिवारो निष्क्रान्त ।) श्रीदामा -( गालवेन सह परिक्रम्य सहर्पमात्मगतम् ) वित्तार्थनाप्रेरितमनसोऽपि मे यद्वयग्यो नापूपुर-मनोरथ तद्युक्तमेव रचितवान् । यत पीतया मदिरया प्रमाद्यति, स्पष्टयैव धनसम्पदा जन । तच्छमस्य परिपन्थिनोमिमा, सड्गृहीतुमपि क समुत्सहेत् ॥४१॥ -भगवन् चिरेण मिलितम्य भवद्विधस्यापि वयग्यम्य नांपावरदपसिनापा कृष्णदेव । गालव श्रीदामा --(स्वगतम् ) वटु खल्वयम् । तदेन प्रत्यवग । (प्रमाग ) बम, म.

श्रीदामचरितम श्वर्यमैरेयमत्तामजर्यपर्यवसान प्रेम । सत्यपि तस्मिन् क्वचिद् बद्धमुष्टिता प्रतिबद्धा न जरीजृम्भत्युदारता। मम च- बहुलाव्ययसमुदायादासादयत कमप्यर्थम् । तुहिनपदतुल्यरूपात् कृपणादपि वेपते काय ॥४२॥ गालव -यद्येव तहि कथमार्यया प्रेरितो भवान् ‘गमय वयस्य सभाजयितुमिति' । श्रीदामा ( सविमर्शविषादम् ) वत्स, लाघवकारण हि स्त्रियः । तथा ह्यता "हरन्ति सहसा पु सा प्रज्ञया सह गौरवम् ।" गालव -भगवन् आर्यया गृहो किरणोपयोगाय भवानप्रेरि तादृशवयस्यमनुसर्तुम् । तत्रैव विवे वृत्त वत्त कथमपराधिनी मन्वान उपालभते तपस्विनीम् श्रीदामा वत्स किमात्थ - कृत्वा ल निमान् भूय तृणवत् प्रक्षिपन्ति च ॥४३॥ तदनया नतादपेतया दशामिमा प्रापितोऽस्मि । अथवा- प्ररयति दिष्टमिष्टानिष्टे कष्ट यथा यथा रभसात् । प्रसरति मानसवृत्तिस्तथा तथा जन्मिनामवशम् ॥४४॥ गालव (किञ्चिद् गत्वा । पुरोऽवलोक्य ) कथमुटजस्थाने पुटभेदनमिव दृश्यते ? ( सचिन्तम् ) हन्त । वराकी ब्राह्मणी किमवस्था भवेत् ? -भगवन् किमैन्द्रजालिकमेतद् उत कस्यापि मायाऽथवाऽस्मन्नयनापाटवमथ मतिभ्रम उताहो तात्त्विकमिति किमाचार्येण निरधारि ? श्रीदामा - ( क्मृिश्य ) वत्म, प्राय केनापि श्रीमदमन्यरेण स्पशालिनी ब्राह्मणीमपहृत्य स्वावासपत्तनमकारि पर्णशावास्यानस्यायुकम् । गालव --कदाचित् पर्णशाला हित्वा रचित भवेत् पुटम् । तद्यावत् गवे पयाव । श्रीदामा--तथा कुर्व । (इनि परिकामत ) वत्म, इतो दीर्घ विशिखामारुढी स्व । एप जाटवगामी पन्था । इतो राजभवनम् । पुरश्च दृश्यते चन्द्रशाला । पवान पणशाला ? (विमाव्य ) न प्रमरनि मनीपा मनीपाजुपामपि तृतीयोऽ विपरीते वेधसि कार्याकार्ये। अस्माकञ्च दैवमञ्चति प्रातिकूल्य सर्वथा । अपरथा क्वास्मिन् जने दौर्गत्यगति , क्व प्रवृत्ति कृष्णदर्शनाय, क्व पर्णशा. लाविच्छेद , क्व प्रियया वियोग प्रसरेत् । ( सशोकम् ) हा प्रिये, हा माग्निहोत्रसहचारिणि, हा मन्निमित्तमनुभूताकिञ्चनत्वदु खे ? व्रतैक - तीव्र-तापसहे, क्व गतासि ? का दशा प्रपन्नासि ? केन नीतासि ? कथ वा तत्र रमसे मा विना ? देहि मे प्रतिवचनम् । हा सती- गालव. --भगवन्, किमकाण्ड एव तादृशधैर्यधारिधुरीणेन तत्र भवता भवता व क्लव्य- मालम्व्यते? श्रीदामा ---वत्स, द्वितीयाश्रमपरिपन्थी नाय धैर्य विषय । ( सहर्पम् ) अथवा अनुकूलमेव दैवेनाचरितम् । यत प्रव्रज्यावस्थामनुव त्यातिशर्मणा वाहयामि शेषमा- युप । (प्रविश्यापटीक्षेपेण कञ्चुकी) कञ्चुकी -(प्रणम्य ) आर्य, सविनयप्रणाममार्यागममाय स्पृहयति आर्या । श्रीदामा -को भवान् ? ? कञ्चुकी -आर्यपादमूलोपजीवी प्रयजन । श्रीदामा - थमस्मत्पादमूलोपजीवी । आश्चर्यकरो वच क्रम । गालव. -भगवन्, किमेतत् ? श्रीदामा-वत्स, एवमेव प्रतार्य पौरपुरन्ध्रोभिरपयिन्ते विपश्चित । गालव -अयि भो, केन प्रेषितो भवान् फञ्चुकी -अस्मत्स्वामिन्या आर्यया । श्रीदामा -वत्स, किमेन पृच्छसि । एष तावदवरोधनरोधनो वर्पधर । ताशीना कुलटाना प्रेरणया वञ्चयति पुरुषान् । कञ्चुकी -(स्वगतम् ) एप तावद् दरिद्र कुरुप आर्यया किमित्यानयेति भण्यते । वथमयमनुनेय । (प्रकाशम् ) स्वामिन् आर्यया, चिराय प्रतीक्षते । तद- नुगृल्लातु भवान् स्वदर्शनदानेन । श्रीदामा -(सकोधम् ) अपमर्प तृतीयप्रकृतिपासनपरे ते पुमासो येपा चेतासि त्वा- श्रीदामचरितम् • गालव गालव दृशचेटद्वारा पासुला वशयन्ति । भगवन्, यावत प्रवृत्तिमुपलप्स्ये । ( त प्रति ) अयि भो, किमभिधा तवार्या ? कञ्चुकी -वसुमत्यभिधाना तत्रभवती। - ( अपवार्य) कथमस्मदार्याभिधासवादिन्याह्वा ? श्रीदामा -एकाभिधा कति न सन्ति ? कञ्चुको -किमेव विचारणयैवातिपात्यते काल । प्रत्यासीदत्यार्या भवद्दर्शनतलित नयनद्वन्द्वम् । श्रीदामा ( सामर्पम् ) धिड मूर्ख, के वयम्, का तवार्या, किमर्थमवसीदन नेत्रयो- स्तदपसर शर्मणा । - गालव ---( अपवार्य) भगवन्, क्षण क्षम्यताम् । सवादिन्येव कथा दृश्यते । यावत् तत्त्वमुपलप्स्ये । ( त प्रति ) भो, पुरा एकमत्रोटजमासीत् । तत्स्थाने कथ- मय पुरस्योद्गम , किन्नामकमद , क प्रशास्ता, तस्य च तवार्यया कीदृश सम्बन्ध ? कञ्चुकी -प्रसिद्धमेवैतत् । पूर्वमत्र श्रीदाम्नो द्विजस्याश्रमपदमासीत । तस्मिश्च दौर्ग- त्याभिभूते धनप्रत्याशया द्वारकेश द्रष्टु गते तेन च सर्वान्तर्यामितया भाव- ज्ञेन तत्कालमुपहूय विश्वकर्माण तद्द्वारेण कारितम् उटजस्थाने तन्नाम्ना नगरम् । गालव -किमिद श्रीदामपुरम् ? कञ्चुकी -अथ किम् । श्रीदामा --आश्चर्यमिव । कञ्चुको -तद्वन्नभया जार्यया वसुमत्या तदागमनमुत्प्रेक्षमाणमा कतिपयरात्रमीक्ष्य- तेऽर व्यापार । तयैव युवा द्वारवतीगामिपन्यानमतीत्येद नगरमाश्रयन्ती विलोक्य मन्मुमेन ममाकारितो। भगवन्, त्वदगामिन्येव कथाप्रवृत्ति । श्रीदामा ---घिट -घिट मूर्य, बाढम् ईदृक्प्रतारसवचोनिचर्य श्रीदामा धर्मात् प्रच्युतो मवि- प्यतीति जानी। गालव -- - पञ्चमोऽङ्क गालव. -नहि नहि भगवन्, ननु ब्रवीमि विप्रकृष्टत एव दृष्टायामपि तस्या न प्रच्य- वते धर्म इति । कञ्चुकी -युक्तमाह वटु । श्रीदामा – ( सदन्तपेप परिक्रम्य ) सिद्ध यतु ते मनोरथ । इति निष्क्रान्ता सर्वे) चतुर्थोऽडू । * X अथ पञ्चमोऽङ्क ( नेपथ्ये ) भो भो चतुपचतीयो ककणचाणेण शिरिताम-णकर तट्ठ, पज्जेति ता पितूशअ शाराअण पतिअ गणनजट शज्जफामा तेपि अहग्गारेह । एप्प फण दि तुह्म । च अण्णाण पि गेरिशी आणद्दीत्ति दा हगेमि । शुणाह-गरि- णो पाचिणो बट्टिणो गूपरिणो फूमिमक्केण पच्चदु छट्टि यचा शद्दाइ शच्चा- इ गुणतु । चाप णिपेतेमि तारआणाहरशत्ति । [ भो भो यदुवशदीपो गग- नयानेन श्रीदामनगर द्रष्टु पर्येति । तद् विदूपक सारायण वन्दिन कनक- चण्ड सत्यभामा देवी आकारयति । इत्थ भणन्ति युष्मान् - यदन्येपामपि कीदृशी आज्ञेति तद् वदामि । शृण्वन्तु - करिणो वाजिनो पत्तिनो कूवरिणो भूमिमार्गेण व्रजन्तु झटिति यथा शब्दानि सत्यानि कुर्वन्तु । यावन्निवदयामि द्वारकानाथस्येति ।, ] ( तत प्रविशति विदूषक वन्दिसत्यासहित आकाशयानेन कृष्णश्च ) कृष्ण -वयस्य, चिरेण मिलित श्रीदामा निशामेकामुपितस्तथैव गत इति सोत्क- ण्ठमिव मे मानसम् ।

५८ श्रीदामचरितम् विदूषक -कि तहि चित्त जहि रमेइ पुरुसो रमेइ तहि ति विसेसदा सिरिसोहाए सरिसो तारिसो वअस्सो। [ कि तत्र चित्त यत्र रमति पुरुषो रमेति तस्मिन् इति विशेषत श्रीशोभया सहितस्तादृशो वयस्य । कृष्ण -( सस्मितम् ) सर्वत्र वक्रोक्तिप्रवणता कुटिलमते । विदूषक -( विमानवेग निरूप्य ) वअस्स, मेहमडल फालिअ पइठ्ठण इमिणा विमा- णेण विज्जूसिरिणाहिणा पफालिआ चादअमडली। [ वयस्य, मेघमण्डल- मुत्फाल्य प्रविष्टेनानेन विमानेन विद्युच्छिरोणाहिना प्रक्षालिता चातकम- ण्डली।] कृष्ण -( विलोक्य ) वयस्य, पश्य विमानम् । विभाति पावें चरता घनाना, विभिनानामचिरप्रभाभि । मध्ये द्रुतस्वर्ण विदूरक्लृप्त- विलम्बमान प्रतिसीरमेतत् ॥१॥ अपरमिह कौतुकम्- विमानपालीषु विघट्टनेन, परिच्युतान् वारिकणान् घनेभ्य । पातु प्रवृतान्यपि चातकाना, कुलानि वेगाद् विफलीभवन्ति ॥२॥ ( किञ्चिदुच्चै विमानगति निरूप्य ) वयस्य, पश्य पश्य- प्राकृप्यते तु केनापि सपर्वतवनावनी। अधरताद् सुरवाऽपि शनक सन्निधाप्यते ॥३॥ विदूषक -ही ही भो कि एद ईसाणदिसाभागम्मि पव्वइगुरुणो मालइ कुसुमसेहरो व्य दीसइ । ( महर्पम् ) आ मुणिद मुणिद हिमगिरिछिदाण रख्खसाण मम्खणाअ कूगे रइदो । [ ही ही भो किमिदमीणानदिशामागे पार्वनीगु- रोलितीकुसुमशेखर इव दृश्यते । ( महर्पम् ) आ मनित मनित ह्मिगिरिस्थिताना रक्षसा भ व भक्तो रचिन ।] कृष्ण -( मन्मितम् ) धिट, मूत्र, लामोऽयम् ।

पञ्चमोऽङ्क २४ विदूषक -कि कलासो जहिं सकरो वसइ ? [ कि कैलास यन शङ्करो वसति ? - कृष्ण --अथ किम् । यत्र च- प्रेम्णार्ध सङ्घटितयो शिवयो पुरस्तात्, स्तन्याथिनौ द्विरदनाननके किकेतुः । एकस्तनाश्रयतयाऽहमह पुरस्ता- दित्यन ताञ्चितशिव मृधमारभते ॥४॥ सत्यभामा -~-तारिरा पेम्म धण्णाओ वणिआओ अणुहोति । अम्हेहि- [ तादश प्रेम वनिता अनुभवन्ति । अस्माभि - ] ( इत्योक्तौ लज्जया मुय व्याव- तयति ।) धन्या कृष्ण -( सस्पृहमवलोक्य सस्नेहमालिङ्ग य च ) अयि, एकीकृते वपुषि देवि कथ भवेयु , कोपप्रसाद विभवानुभवा जनानाम् । यावन्न धर्ममहसो महसि प्रचार छायाभिनन्दनविधि प्रसरेत् क्व तावत् ॥५॥ माने च प्रेमाप्यतिभूमि गच्छति । स्मरसि पारिजातनिमित्त मान- वत्या भवत्या तरलियाऽरमदवस्था निवेदिता । प्रदश्चित्र चित्र श्रतिविषयवंषम्यजनक, यदाशाकाशादौ सुनु खि तव रूप फलयत । असत्यामभ्याशे त्वयि च सतताभ्यासवतो, विनाधार स्पग्रहणपटु तस्येक्षणमभूत् ॥६॥ इति । तत्सयोगापेक्षयापि विप्रतम्भे प्रेमातिशयो भवतीति मन्महे । विदूषक ~ण ण जणाइ पिअवअस्सो अद्वघटण पादु तेणा एप भणादि । मारिसो उण पादघडणम्मि वि समत्थो त विणाण सोहग्ग बहाणी च्चेअ पुरछीअदु [ ननु न जानाति प्रियवयस्योऽधंघटना कतु तेनैव मणसि । मारश पुरा पादघटनेऽपि समर्थ तद्विज्ञान समग्न बाहाणीत एव पृच्छतु । ] ( सर्वे हसन्ति ) ( सोयीव विलोय ) वयग्य, किमिद प्रभापटलतिरोहिनरोदसी-कन्दरोदर . कृष्ण श्रीदामचरितम् पुर कल्पितपुरन्दरधनुर्विभवभर समुत्सारिततिमिर दृश्यते ? विदूषक. – ( विलोक्य विमृश्य च ) ण एद अम्हाण पुरदो केणा वि गधव्वणअर वेसाणरकप्प । [ नन्विदमस्माक पुरत केनापि गन्धर्वनगर विरचित वैश्वा- नरकल्पम् ।] कनकचण्ड -गन्धरर्वनगरदर्शनमरिष्टमिति वदन्ति सूरय । विदूषक –ता उवठ्ठिदो तुह मिच्चू । [ तदुपस्थितस्तव मृत्यु ] कनकचण्ड –प्रथम गन्धर्वनगरोपस्थिति रार्यस्यैव ।( कृष्ण प्रति ) देव, देवादेशेन विश्व- कर्मणा रचित श्रीदाम्न पुरमेतत् । कृष्ण -( सहर्षम् ) कि श्रीदामपुरमेतत् । कनकचण्ड -अथ किम । विदूषक –ता सोहग्गम्मि बुइदो णिबुडओ बुढ्ढओ। [ तत्सौभाग्ये व डित क्षुल्लको वृद्ध ] कृष्ण --( विलोक्य ) अहह | रामणीयक मस्य । देव । यत्सौधसञ्चारिकपोतचञ्चू - सञ्चूणिताना बत तारणाङ्क । का नाम नासीददसीयलोक- वितीर्णबालेयकतण्डुलश्री ॥ ७ ॥ कनकचण्ड --इत पश्यतु पुरस्य विविधमणिमयसौधमरीचिनिचयकिर्मीरितरोदसीत- लमध्यवर्तितयान्तराल इव शृङ्खलदण्डरितस्योपरिचरत्सुरनिकर-भारपत- नमयेनेव स्वभवनशिखरैर्न म उत्तम्भयत । क्वचित स्फटिकघटिकुतट्टिम मि- लितेन्द्रनीलप्रभा भावित मितासितशोभस्य, क्वचिदन्त राजटितपद्मरागहीरभूमिपु गाङ्गमलिलप्ररूढकोकनदप्रभा - पतितमधुपकदम्बजनिनलोचनलोभस्य रामणी यकम् । यन च दिनकरमण्डलैरिव प्राणुभि, ऋपिफुलैरिव प्रवर्तितानेक- शार , स्मृतिवाक्यैरिव ममूल , नृपैरिव बहुपत्रावृत , ऋतुभिरिव सफल , पापद्विकरिव धृतप्रमून , मीमासान्यायरिव सपिकाधिकरण , मुनिभिरिव मशुकं , धनग्नरिव लक्षितसारीप्रचार , शोण्डिकापर्णरिव मधुपकुलसङ्कलै , पादपैम्पचितेन । अकलितम्याणुनाप्यन्त तशिवेन, उज्झितापर्णेनापि मर्व- मनलालयन, स्त्रीकदम्बनेव नवदर्शनामोदिनविचिनवयमा, धीरचरन्मधु- ञ्चमोऽड़ . तन्वद्भि, - रुदारस्पर्शजनितमनोजनिनोद्यानेन परिवृते । सीरलोकचुम्बिमिरपि धृतरन्द्र- शालै , जातसात्त्विकभावैरिव धृतस्तम्ब , सम्पतिवलैरिव समत्तवारण , रा- शिभिरिव मतुलै , वनेरिव विविधशाले , मप्ततन्तुभिरिव कृतापूर्वद्वारे , यति- भिरिव भिन्नदिनमणिमण्डलै , गिरिशैरिव चन्द्रशेखर , क्वचित् पणरागमि- त्तिप्रभाभिनित्यदशितारुणोदये , क्वचिद् वज्रकुट्टिममयूयैदिवानिश कोमुदी- विलास क्वचित् सान्द्रेन्द्रनील निकायकिरण कुरग्वध्यान्त- धोरणीमाविप्कुर्वद्भि, क्वचित् प्रतिरजनि रजनिारकरनिकर-प्रतिकर-प्ररा- रदम्बुतुन्दिलेन्दूपलगलदमलजलप्रणालिकामितितजलदपटतप्रकटितप्रावृताम्बर भवन रुपचिते, हरिवाहुलताभिरिव मचनाभि , रातीभिरिव सत्यवतीगि, प्रमु- शक्तिभिरिवावजितकुवलयाभि , सिहलद्वीपभूमिरिव पसिनीललितागि , बा- लाहृदयवृत्तिभिरिव गभीराशयाभि , प्रसादकटाक्षाच्छटाभिरिव निमंताभि , क्वचित् स्नानागतनागरीकुचक नणकालेयक करतूरिकाकलुपिततया कालिन्दी- सरस्वतीसम्भेदमिव प्रकटयन्तीभि , क्वचिद् चौतारागीकृतश्रीगः प्रदि- ग्धपय पूरपरिभावनया प्रकाशयन्तीभिरिव भागीरयोजनकावनयनिचयनिधा- नतामात्मन , क्वचिन्नियमिजनानुष्ठीयमानधर्मकर्ममनोहराभि, उत्पत्ति थनी- भिरिवामृतस्य, जनयत्रीभिरिव मधुर रसम्य, आर यानीभिरिव णिणिरताया, प्रसवित्रीभिरिव पुण्यस्य, निखिलकरणनिर्वापिकाभिर्वापिकाभिमंरिते, विडी- जसाप्यगोनभिदा, सुस्पेणापि धनदेन, महेश्वरेणाप्यनुप्रेण, जगत्प्राणेनाप्य- प्रभञ्जनेन, शशिनैव जैवातृकेणाप्या लकिना, वह्निनेव पावकेनाप्यकाणगंगा, विष्णनेवाच्युतेनाप्यजनादनेन, त्यक्त न पापै , अपपीरितेन जाया, अपरिचि- तेन क'लुष्य , अमन्निधापितेन दोर्जन्यन, अनाहतेन दुराचारेण, अजोगा- तेत योवियतया. अभयहितेन दाततया, आश्रितेन ज्ञाततया, लग्नितेन , ६२ श्रीदामचरितम् कादयो रामरामेति पठन्ति प्रयमाक्षर शून्या अपि, न केवल दान्तस्थिति- हारिण पद्मकापविद्धा आरक्षको लासिन पुष्करामृष्टशिरसो हरन्ति कु- जरा गतान्तवर्णा अपि । तदियमतिशेते शेपराजकामशेषराजकालादिनी पातालपुरी तथा मरुत्वता पालिताम् अमरावतीम् । कृष्ण -( सहर्षम् ) अहह । त्वरिततरमेव निरमायि विचित्रकर्मणा विश्वकर्मणा स्वनिर्मितिसर्वस्वमिय पू । यस्या च- क्वचिदाहिताग्नि-वितताग्निबहुलधू- मसौरभलोभभ्रमदमर विमानसम्भृते व्योम्नि मञ्चरद्भवनमणिमरीचिसव- लनया द्यावापृथिव्योर्व्यत्यय के न मन्वते जना । अभूमिरियमचिन्त्यतया मनसोऽनास्पद दुनिरीक्ष्यतया चक्षुषोरनाघ्रया, गन्धप्राचुर्यादिनास्वाद्या, रसाधिक्यादवव्या वहलकलकलेनास्पृश्याऽनेकविधस्पर्शेन वाचारम्भणीयाऽपि वाचामगोचरा, अदृश्यापि स्वप्रकागा क न नयति वेदान्तभङ्गीव निर्वृतिम् । फनकचण्ड -इत पश्यतु देवो हिन्दोलनलीलाकलना ललनाया । -- कृष्ण – ( विलोक्य ) अहह धम्मिल्लोद्वान्तमल्लीपरिमलपटलोद्भूतपुष्पन्धयाली- गुञ्जासजाततानप्रसरवितरणाभिन्नगानप्रपञ्च । भूमिन्यस्तैकपादव्यतिकरणरणन्मङ्घमजोरमस्या , । कस्यान्त पञ्चबाणप्रणयि वितनुते नव दोलाविलास ॥८॥ ( सवितम् ) पादद्वन्द्वपराहताहवदिव पडूरुहाक्षी मुहु, कारद्वारममन्ददोलनरसव्यासङ्गबद्धादरा । भूय प्रक्षणकौतुकोत्कररसादसावतसायित- व्यावल्गन्मणिकुण्डलद्यु तिरिय धत्ते किमुद्ग्रीविकाम् ॥६॥ कनकचण्ड -इतोऽपि वणिकपथे पुञ्जिताना मृगमदपनमारकेशराणा परिमलप टलमिलद- लिबलहनीलपटीप्रावृते मञ्चन्मस्तानके कुरङ्गता रम्भाप्रवीडता काश्मी- रक्षेचनाञ्च लम्भिता । इनोऽपि न कया वागुरा यत वारविलासिन्या युव- निवह्वातायुवगम्य । इनोऽपि परम्पगसक्कयो- यूनोर्जयति सराग कौतुकावागञ्चितात्मसम्भवयो ।

६८ श्रीदामचरितम् दसिद-चाउस्समहूसम्मि विविह-रअण केसरकुसुमुक्करपकडिदसुरहिरिम्मि देवगणासरिससहअरी-सहस्स-कर-अल-कालिद-विविहोवहारभाअणम्मि पो- म्मराअमडअम्मि मज्झत्थल - विलविदकणअ - सिखलावलविअ छम्मासमो तारुलिल्लपच्छद - पडच्छादिद - विविह-गुघछइसथण्णपेरत-रअणपज्जको भअ पाससठिद मोत्तिओवधाणसठविदपुछो विविहभूतणछविछुरिददाए दुरालोओ उव्वसीरूव धिक्कारणीए रमणीए सह आलवतो मुक्कतेजोरासिपुजिदो ण तेल्लोकपहावो पुरिसो दीसइ । [ वयस्य, पश्य । द्वयोर्भागयो द्विवर्णकर्णाभरणरत्नलक्ष्मीमूलावण्टम्भितम- हीतलमिव भूपणोत्करभासुरान भासुराङ्गमिव मध्यागारे प्रभासवन्त सोत्तसवलितकचाङ्ग समुल्लसितशीर्पण्यशिख द्विलित् हारलतारजित दर्शनी- यश्रि मिव विस्तारयन्त वनिताकदम्ब दृश्यते । पुरतोऽपि मरकतमणिकु- ट्टिमोच्छलितजलयन्त्रनिष्क्रमत्सीत्का सारदर्शितिप्रावृण्महोत्सवे विविधर- त्नकेसरकुसुमोत्करप्रकटितसुरभिते देवाङ्गनासदशसहचरीसहस्रकरतलकलित- विविधोपचारभाजने पद्मरागमण्डपे मध्यस्थल विलम्बिकनकशृङ्खलावलम्बि- तपण्मासकमुक्ताफलमत्प्रच्छदपटाच्छादितविविधगुच्छच्छविसच्छन्न यन्तरत्न-- पर्यकोभयपार्श्व मौक्तिकोपधानसस्थापितपृष्ठ विविधभूपणच्छविच्छुरिततया दुरालोक उर्वशीरूप धिक्कारयन्या रमण्या सहालगन् मुक्ततेजोराशिपु- जितो ननु त्रैलोक्यप्रभाव पुरुषो दृश्यते । कृष्ण --( निपुण विलोक्य ) वयस्य, ननु श्रीदामाऽयम् । विदूषक -अच्चरिअ अच्चरिअ । तस्स तरिसरूवस्त वि एरिसो पभाणिवेमो त्यि । अहवा णाद - [ आश्चर्यमाश्चर्यम् । तस्य तादृशरूपस्याप्येतादृश प्रभानिवेशोऽस्ति । अथवा ज्ञातम् ( सम्कृतमाश्रित्य ) अनया हि श्रिया यो न स्वभावदीर्व, परसयोगान्न यो गतो गुरुताम् । छन्द शास्त्र इवारिपनन्त्योऽपि, लघुगुर क्रियते ॥ १३ ॥ कृष्ण -यथात्थ वयम्य । तद्भवतु तावदुपमाम । ( इति म परिनामन्ति ) ( लन प्रविणात ययानिदिष्ट श्रीदामा वमुमती पाश्वस्थितमुवणपति- कामीना नलिनी विभक्तश्च परिवार ।)

पञ्चमोऽङ्क ६५ वसुमती - अज्ज उत्त, णलिणीए उवद्दिवस्स गोरीवदस्स केरिसो माहप्पो ज मित्तघर पत्यिदेसु वि तुम्हेसु उअकरज्जम्मि वि विमूरतेसु तिणा अरीदो उदो- वआरो सदीसइज्जेव्व । गोरीए उण तुम्हा पच्छाहिच्चिअ एरिसा रइदा सिरीए सभारो । [ आर्यपुत्र, नलिन्युपदिष्टस्य गौरीव्रतस्य कीदृश माहा- त्म्य यन्मित्रगृहप्रस्थितेष्वपि युष्मासु उपकार्येऽस्मिन् विस्मृतेषु तयाचरित उचित व्यवहार सन्दृश्यत एव । गौर्या पुन युष्मान् प्रस्थाप्य ईदृश रचिता श्रिय सम्भारा ] नलिनी - ( सगर्वम् ) हला, कह णु तत्तहोदी वणिज्जइ । जाए प्पसाएण तेलो- कक सक्को रख्ख इ, दासरहिणा वि त च्चेअ आराहइअ समण्णातिही किदो दसमुहो । अण्ण वि तीए घसाएण च्चिअ दुवेवि लोआ करअलालोआ होति । [ सखि, कथ नु तत्रभवती वर्ण्यते । यस्या प्रसादेन त्रैलोक्य शको रक्षति, दाशरथिनापि तामेवाराध्य शमनातिथि कृत' दशमुख । अन्यदपि- तस्या प्रसादेनैव द्वावपि लोको करतलालोको भवत । ] (श्रीदामा अथुतमिव 'अनन्याश्चिन्तयन्तो मा'मित्यादि पठति वसुमती –ण भवामि गोरीवदस्स केरिसो माहप्पो त्ति । [ ननु भणामि गौरीब- तस्य कीदृश माहात्म्यम् इति । ] - - - श्रीदामा - अयि मूढे, यस्य वाड मात्रनियमितचराचरजगज्जननकन्दस्योपनिषन्मागधीवि- धीयमानय श प्रशस्तेरादिपुस्पस्य पुरुपोत्तमस्य मायाया गौर्या माहात्म्याति- शयो वर्ण्यते । भवत्या न ज्ञायते तस्य माहात्म्यम् । वसुमती जइ एव तुम्हे दारअ गदा वि कह ण कण्हेण सभविहा । इह च्चेअ गी., पउत्तो हालालो । [ यद्येव भवान् द्वारका गतो ऽपि कथ न कृष्णेन स- म्भावित , इहैव प्रवृत्तो हालाहल । ] श्रीदामा --( सम्मितम् ) सर्वत्र विपरीत एव ग्रह स्त्रीपिशाचीनाम् । अयि मुग्घे, गर्जति घनो न वर्षति वर्षति नो गर्जति प्रथितम् । जल्पति न चोपकुरुते जन उपकुरुते न जल्पति कदापि ॥ १४ ॥ - तन्न जानामि तादृशाना महाशयाना चरितानुबन्धम् ( सानन्दमात्मगतम् ) अगृह्णन् पिप्पलास्वाद भाति यो भासवत्यपि । - -- श्रीदामचरितम् जगन्ति त जनो जातु कथ जानातु पामर. ॥१५॥ ( इति सरोमाञ्च ध्यायस्तिष्ठति ) नलिनी --सहि, सच्च चेअ । ज वेदसत्य सच्चवा हि पुरिसेहि भणिद [ सखि,सत्य- मेव । यद्वेदशास्त्र सत्यवाादिना पुस्पेण भणितम् । ] ( इत्यक्ष्णा वारयति ) वसुमती -अझारिसाण इत्थिआजणाण तत्थ वि असच्च च्चेअ । [ अस्मादृशाना स्त्रीजनाना तथ्यमपि असत्यमेव । ] ( इत्युभे सस्मित मियो विलोकयत ) कृष्ण - ( उपसृत्य सस्नेह श्रीदामानमवलोक्य च ) स्वाङ्ग गतस्पृहतया निगृहीतसत्त्व- मङ्ग प्रपन्नविभवात् सरजोभियोगम् । तस्मादमुष्य शुचिशान्त विनिमितेव, सलक्ष्यते हरिविरञ्विमयीव मूति ॥ १६ ॥ विदूषक -पोहेण वढ्ढावेसि । मारिसस्स वि दुल्लहम्मि ब धुमि सत्त घरिणिम्मि रअ भोअणमि तम दीसइ, ता अह वि बह्मविण्हुमहेसरमओ ज्जेव्व । [ पृथुकेन वापयसि । मादृशस्यापि दुर्लभे बन्यो सत्त्व गृहिण्या रज भोजने तम दृश्यते, तदहमपि ब्रह्मविष्णुमहेश्वरमय एव ।] -अज्ज उत्त, घरिणी गेण्डिअच्चेअ पज्ज के उवविठ्ठो एसो ता बलिअ रखु एदाण णेहो हुविस्सदित्ति तक्केमि । [ आर्यपुत्र, गृहिणी गृहीत्व व पर्य- थे उपविष्टस्तद् बलीययान् खलु स्नेह एतयोर्भविष्यतीति तर्कयामि । ] कृष्ण -निमत्र वक्तव्यम् । सत्यभामा षोडशसहस्रवनितासन्दानितमन्मथस्य मे सुतनो। तृप्तिर्न चेत् कथ स्यादेककलत्रस्य वा पु स ॥ १७ ॥ क्वचिद्वनितालाघवमपि तरलयति पुरुषम् । तच्च यथा त्वमेव तुलसी प्रत्य- न्यधा - पादे निपतसि कण्ठे विलम्बसे श्रयसि तस्य मूर्दानम् । सरम्भ एप यदि ते तुलमि कियानस्तु चेतनवतीनाम् ।। १८॥ इति । M पञ्चनोऽङ्क श्रीदामा -(विलोच्य ) अमे प्रियवयस्यो मे देवकीनु । ( इति सरमस पर्याद वती कृष्णमालिड ग्य पर्यड़ उपवेशयति ) वसुमती ---एहि बहिणिए , मन ने आरोहेमु । [ एहि भगिनिके, मञ्चमेवारोहस्व । ( इति सवा महोपविशति । इतरे यथोचितमुपविशन्ति । श्रीकृष्णश्रीदामानो मिथ कुशलानामयप्रश्न कुरुत.।) विदूषकः -अस्स, दाणि वि कि कुशल पुच्छीअदि । गलिवाइ अच्छिआइ वि पढम व पल्लवनवाइ अगाइ, ता पज्जत्थलक्खणो वि एसो दीमइ। [ वयस्य, इदानीमपि किं कुशल पृच्च्यते । पलितान्यक्षीणि प्रथम पावतामङ्गानि, तत् पर्यम्तलक्षण दव दृश्यते ।] श्रीदामा -मारायण , कि ब्रूपे । पर्यस्त दौर्गत्य पर्यस्तो मे शरीरसादश्च । कृपया कसद्विपतो भयोऽपि पर्यस्ततामेतु ॥ १६ ॥ ( वसुमती प्रति ) ब्राह्मणि, वन्दम्ब गोपीपने मन्यभामादेन्याश्च पादायजम् । ( वमुमती तथा कर्तुमिन्छति । कृष्णमन्य मामे ता निवामिनन्दामीति तस्या पादयो पतत ।) वसुमती --अहिठ्ठ लहेह । [ अभीप्ट लभम्ब ] ( नि नयोगशिपमभियोजयति ) श्रीदामा -क कोऽत्र भो । ( प्रविश्य प्रतीहारी) प्रतीहारो ----अज्ज, गाए अणुजाणादि । [ आर्य, आज्ञातुजानीहि ।) श्रीदामा -~-प्रेयचति, ममाजया बृदि गातमम् । 'अनियिमर्यागा मा गनुपाहर' । इति । प्रतीहारी ज अज्जो आण वेदी । यदार्य नाजापयनि ] (गिवान्ता ) ( नन प्रविशति पग यंवमनाभरणोऽनृजीविजनहातीपहीयमाणरापकगण गालव । ) गालव -( विनोस ) काय भगवता वासुनवरय बारवर पासका गानायणाहनान! पररणानि (विविध) किमान्य तिलाशीलला तलनलागतमा मविधानक मवत् । जयवा य योपहनगाचार्याय निवदयामि । ( 111 मनि) ६८ श्रीदामचरितम - विदूषक -- ( गालव विलोक्य ) अम्हे | एसो वि णडीण पुठ्ठवढ्ढाओ विअ पृफालिअ- -हलहलो दीसइ । [ अहो । एपोऽपि नटीना पृष्ठवाहक इव प्रस्फालित- कलकलो दृश्यते । ] ( गालव श्रीदामकर्णे एवमेव कथयति ) श्रीदामा– ( सावज्ञम् ) अलमिदानी कर्णवर्तिनर्तनेन । तदुपकलयोपाहृतम् । ( गालव कृष्णश्रीदाम्नोरन्तराले सविधानक स्थापयति ।) - । श्रीदामा - कतिपयपृथुकरवापितोऽह, त्रिभुवनवैभवपारगा विभूतिम् । इति कमलविलोचन प्रतीत , पुनरिदम घ्रियुगे तवार्पयामि ॥ २९ ॥ (इति कृष्णायानर्घ्य रत्नानि वसनानि चार्पयति । वसुमतीहस्तेन सत्यभामा- - देव्यै च ।) विदूषक (कनकचण्ड प्रति) ता फुड कह ण कहीअदि जो जस्स भरइ सो तस्स त्ति । अम्हारिसो ण पर भरइ अह ण परेण भरिज्जइ ।। तत् स्फुट कथ न कथ्यते यो यस्य भरति स तस्य इति । अस्मादृशो न पर भरति अह न परेण भर्ये । ( श्रीदामा सस्मित विदूपकाय कनकचण्डाय च वसनर्भाणान्यर्पयति ) कृष्ण -वयस्य , स्निा वैभवोत्कर-विलोकनेनाञ्चितानन्द. पूर्णशशिदर्शनधितसुधोधि हात हपय । ॥२१॥ तत् त्वद्वैभवाशविभागमावाड क्षमाणे स्थान एवास्मिन् जनेऽयमभियोग । ( इति श्रीदामहस्तादावज्य मर्व प्रतीच्छति ) श्रीदामा -( स्वगत सगद्गदम् ) श्रुतिसीमन्तसिन्दूरीकृतपादाजरेणुना । रम्यते देवदेवेन त्वयापीतरलोकवत् ॥ २२ ॥ ។ (प्रकाशम् ) युज्यते त्वयि मर्वोऽपि स्नेहकमापक्रम । प्रियमुपकरोमि । कृष्ण -किन्ते भूप पञ्चमोऽङ्क ६९ श्री -वयस्य, इत परमपि प्रियमस्ति । पश्य भवता प्राशैशवात् प्रणयभाजनता गतोऽसौ, नीत कथापथमथास्य दरिद्रभावः । पारोपितो धनवता धुरि सम्भ्रमेण, लोकद्वयी व्यरचि चास्य करस्थितव ।। २३ ।। तथापीदमस्तु भरतवाक्यम् राज्ञा द्वन्द्वपरिक्षयेण भवता राजन्वती मेदिनी, काले वारिधरावलि कलयता धाराप्रसारादरम् । धर्ये कर्मणि सम्प्रति प्रकृतयो चद्धानुरागोत्कर, शर्मोवी प्रभजन्तु यान्तु विलय वैधक्रियादूपफा. ॥ २४ ॥ . अपि च पायम्पायमिमा भजन्तु फवयो नैलिम्पत्ति भुथि, स्फीता 'दीक्षितसामराज'विदुप सूक्ती सुधारयन्दिनी। किञ्चाशावनिताकपोलफलके पाटीरपत्रावली- लोलामञ्चतु कोतिरिन्दुजयिनीमानन्दगयप्रभो ॥ २५ ॥ [ इति निष्क्रान्ता, सर्वे] इति पञ्चमोऽङ्क । रसिका रसयन्त्विमा कृति मधुपा मञ्जमिवानमञ्जरीम् । कलयन्तु न जातु दूषणग्रहिला वेदमिवान्त्यजातय. ॥ २६ ॥ ।। इति दीक्षितनरहरिसूनु- दीक्षितम्गमराजकृत श्रीदामचरित नाम नाटक समाप्नम् ॥ - or शाके १६४५ वंशावलिप्रतिपदि रधिरोद्गाग्गिवगरे ममाप्नो:- श्रीदा रितस - Tनु मरिण । [ अस्यामनुक्रमणिकाया क्रमेण प्रतिपद्य माद्यपद तदप्रेऽङ्कसख्या तथा पद्यसख्या विद्यते ] मूलम् अङ्क-पद्यसख्ये मूलम् अङ्क-पद्यमख्ये अगृह्णन् पिप्पला--- (५।६) - - - - (५।१५) अग्रे काश्यपिना निवारित- (१।२२) अज्ञातजन्ममृत्यु-- (२।६) अत्रेर्नेत्रमलेन- (३।४४) अदश्चित्र चित्र- अदिवाकरमस्ततारक (४।३३) अनध्यायम्ताहक- (३।२६) अनया हि श्रिया यो (५॥१३) अनायि प्रसभ- (४।२६) अनुगम्य परापतिषु (४।२७) अनुबन्धवशेन जन्मिना--- (२।३) अनूरुकरसकरा-- (१।२०) अपहाय रागिणीमपि (३।३८) अप्राप्तोदय एष एव- (३।३०) अफलितास्वपि चन्दन - (१।११) अभिनवकृतपरिणयन (१।१६) अम्भोवाहाविमुक्त- (३।१५) अयोध्यावृत्तिश्चेत्- (२११) अलमलमलमाक्षि ते- (३१) अवतरनि गगन- (३१२१) मचारत वगगेहे- (४१६) अन्नपातुर घर्माशु- (१२२) अहतमस्तकचरे- अहत्वा तस्णानीक- आकाशाङ्गण गम्नि- आकृष्यते तु केनापि--- आकैलासप्रथमशिखरा- आत्तरणैरलमेभि आमोदभागुदित्वर- आरुण्य दधता ततो आविष्करोति कर्तार- आशैशवात प्रणयभाजन-- आस्थानी सद्गुणाना----- इन्द्रधनाधिपकमला उत्फुल्लपद्मानि विहाय- उच्छलद्वहलोल्लोल- उपनिपद्गहने हरि- ऋक्षाकैरन्वनु एकीकृते वपुपि- एपाऽपि मनस्विन्या - कण्ठ भूमौ मानजुपा- कतिपयपृयक- कम्बुगतफुलपङ्कज- कानेऽम्मिन् प्रथमान- (३।२७) (११३) (४।३१) (५॥३) (११६) (११२१) (३।१०) (३।३६) (४१) (५।२३) (११८) (१११५) (१६) (२५) (३।६) (३१३७) (५१५) ( ०1१८) (२।६) (५।२०) (४१३) (३।२०) H श्रीदामचरितस्थ-पद्यानुक्रमणिका ७१ - - - क्रामत्पाठीनपुच्छ- किमधिक तु मखे- कुञ्चत्कल्पतरूणि- कुञ्जोदरे रासरसा- कृताभिपेका सरसीपु क्षण मध्ये स्थित्वा- क्षणमाविष्कृतमाना- गर्जति घनो न- गृहीतताराकुमुमस्य- गृहीता मन्दपानीया- गृहीतो हदये धर्म चदणगधमुहेहि- चराचरान्तरा- चित्ते नित्य चकास्ता- चिन्तयन्निव भक्ताना-- चेतो निकृन्तति मयि- छायापतौ करमञ्चार- जघनतटघटत्- जयाकृष्टकण्ठीरवा- जलधरसदृणे मुकुन्द-- जोहाणलपख्खालिअ. तय्यमकरो प्रवाद- तन्नाधिराहत्यथ- तपो दोर्गत्ययोगाभ्या- तप्नाय पिण्डमिव तव लम्बितकुन्त का- तिमिरागमशून्याना- तिमिरमयनील-~- त्वश्लिष्टकी कस- त्वत्करजन्मा स्तम्भ दन्तान्तरालिकाम्ने- दरकिरणालि भम्म--- दरनमिताधर मध्य- (३।१७) दरलम्बितचिकुरा- (४१२१) द्विजपतिपाणिम्पृष्टा- (१७) दिशानिर्वासितो दूर- (४१४०) । धम्मिल्लोद्वान्तमल्ली- (३।६) नक्षत्र शशिना- (२।११) पयस्त दौर्गत्य--- (४।२) प्रतिदिनमय नाय- (५।१४) पादद्वन्दपराहता--- (१।१६) पादे निपतसि कण्ठे--- (३।४) पायम्पायमिमा- (१।१८) पाहि दनुजसवात--- (१।१२) प्राय शकुन्तक- (३।१४) प्राय स्नेहभृता-- (१२) पिष्टातकरिव विलिप्य--- (३८) पीतया मदिरया- (८११०) पुनदिसाए भोल-~- (३।१६) पुवदिमादिअ (१।२६) पूर्वमहीधरणिखरे- (२१२) प्रेम्णार्धसङ्घटित-- (११) प्रेरयति दिष्टमिष्टा- (३।४३) बहुलाययसमुदाय- (२।५) बद्वान्तरा किमु- (४।११) भरिऊण रोअसीए---- (२।८) मत्मगादुदयमवाप्य--- (२।२६) मदनोपमर्दविग- (४८) मराली मन्दगमने (२७) मरुति धृतकदम्बे- (३१२८) मामन्तरा कथमिय- (१।२५) य स्वर्णनिमित- (५।१२) य अन्तरात्मा भूताना-- (१५) यथा यया जनो- (३1३४) (४।१३) (४।१४) (४११६) (३।२५) (५१८) (२।१३) (५।१६) (३।४५) (५६) (५।१८) (५।२५) (३७) (४।२८) (३।१२) (४।३७) (११) (३१३५) (८१३६) (१।२३) (५४) (४।४८) (४१४२) (३।३२) (३।४२) (४।३८) (४१२२) (५।११) (४।२६) (४।३४) (४१३६) (१११३) (३।१३) (४।६) - - - - यद्यप्यस्ति लतावृन्द- ७२ श्रीदामचरितम - - - - पश्चान्निबद्ध सुदृशा- नवरसरसिक कवि (१।१०) नियमितबाह्य न्द्रियतया (१।१७) नीत समुद्र यादोभि (४।२५) नीयन्ते पथिकास्यवीक्षण- (१।१४) (४१७) परागस्थगनाल्लब्ध- (३।३) परिष्वङ्गस्तवानेक (३।११) यत्सौधसञ्चारि- (५७) यस्त्राता जगता- (२।१०) यास्यत्यद्य दिवामणि (४।३०) युवजनचित्तोज्जयिनी (४।२०) यूथिनि चम्पककलिका--- (४।१७) यूनोर्जयति सराग (५।१०) यैर्भानुना जगन्नद्ध (३।२४) रविरथहलावकृष्टे-- (३।३१) रसिका रसयन्त्विमा- (५।२६) राज्ञा द्वन्द्वपरिक्षयेण- (५॥३४) लम्बि कुन्तलसहासिका (४११६) लेपिततमिलगोमय (३।३३) वने लताना- (३।१६) विगलितकल्मष- (३३२) विगलितकिरणावलो (३।२३) विगलितसुरसिन्धु (३।४६) विभाति पाश्र्वे चरता- विमानपालीषु विप-~- विवेचितगुणाभि - विशददशनरश्मि- विश्वेश वीक्ष्यते यत्- वेल्लत्कल्लोलमाला- शोणीकृत स्वकिरण श्यामा अपि कुटिला अपि- श्रयति नवानपराधे- श्रुतिसीमन्तसिन्दूरी- षोडशसहस्रवनिता-~- सन्ध्याग्निदग्धपूर्वा- सन्ध्यानले गगन-- सन्ध्यानले परिनिधाय- सवितरि ललाटतापिनि- सितखगकृतलेहे- सुचू ममाशावरण स्वाङ्ग गतस्पृहतया- स्निग्धजनवैभवो--- स्पृशति लता पुष्पवती हरन्ति सहसा- हरिताभिरिव स्निग्ध- (५।१) (५२) (१।४) (४१४) (२।४) (११५) (१।२४) (४।२४) (४।१२) (५।२२) (५।१७) (३।३६) (३।४१) (३।४०) (२।१२) (४।३२) (४१२३) (५।१६) (५।२१) (३।१८) (४१४३) (४११५) - 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Shri Damachritam Natakam

Author
Shri Lalbhadur
Title
Shri Damachritam Natakam
File name
Shri Damachritam Natakam
Text
OCR done
Citation
1955
Published
2012/04/01
Publisher
New Dehli, Ajay Book Service Chandi Dariya Ganj
Language
Sanskrit
Pages
86
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
407307
Barcode
99999990294633.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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