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Mahabharat Ka Arth
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সাংবাঙ্গ वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर डी. डी. हर्ष
वाग्देवी प्रकाशन
सुगन निवास चदन सागर
बीकानेर 334001
। रमण हप
15 10 ननवन
चौपासनी हाउसिंग बोड जोधपुर
प्रथम सस्वरण 1989
मुल्य मत्तरपये मात्र
आवरण अमित भारती
मुक सांवला प्रिंटर्स
सुगन निवास पदन सागर
बीकानेर 334001
ISBN 818512723-9
Mababharata ha Artha
by DD Hanha
Rs 7000
महाभारत मानव की जययात्रा मानव के स्वभाव मे विजय एव विभूति प्राप्ति की आकाक्षा है। सामा य व्यक्ति बिना साधना सस्कारो के इनका परित्याग नहीं कर सकता। वैसे भी अभ्युदय एव नि श्रेयस का सदेश देने वाली संस्कृति के उपासक को अभ्युदय से घणा करने की आवश्यकता नहीं है । महाभारत जैसा पावन अथ इही दोनो तत्त्वो की मानव सुलभ व्याख्या विश्लेषण का अनुपम महाकाव्य है । महामारत को न जानने पर भारत को जाना नही जा सकता, यह विद्वानो की मा यता नितात सत्य है । जीवन के प्रत्येक प्रवाह और दिक्काल को उचित मागदशन इस महानय से प्राप्त होता है । मानवीय दुर्वलताओ वे उभार से पतन एव उन पर सपम के अकुश प्रयोग से उत्यान की गाथामो का इस प्रथ मे बारम्बार वणन किया गया है। आज के युग में महामारत की विशालकायता से मयमीत व्यक्तियो की सख्या का बहुमत बढता जा रहा है। सयम, साधना, नीति, तपश्चर्या, ज्ञान, व्यवहार शुद्धि एव भक्ति का यह पावन ग्रथ अपनी ही धरती पर यदि अपेक्षित आदर न पा सके तो समाज का प्रेरणास्रोत ही सूख जायेगा। जीवन मूल्या के प्रति आदर पर्याप्त घटा है, फिर तो और भी घट जायेगा। महाभारत पे सिद्धाता और क्यानको को नये परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करने की महती आवश्यक्ता यो जिसे विद्वान लेखक प्रो हो ही हर्ष जी ने बुशलतापूर्वक सम्पन्न किया है। उनके विचार मानव की जययात्रा के रूप मे प्रगट हो रहे हैं । इनका मननपूर्वक अध्ययन मानद की जययात्रा को मानव फो समययात्रा का रूप देने में समय है। रेखा विद्वान के साथ साथ यदि साधक और तपस्वी हो तो शब्दो मे गरिमा एव तेजस्विता की प्रमा दर्शित होती है । यह आनद की बात है कि प्रो हपं एक उच्चकोटि के साधक हैं । 'महाभारत का अथ' की भाषा प्रासादिक है। गाथा केवल गाथा नहीं है, उस के अतराल से सिद्धात मार रहा है । सिद्धात का पदे पदे परिशन कराने वाला यह अथ साहित्य की एक घरोहर के रूप मे स्वीकृत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है । जययात्रा के प्रसग दिग्भ्रमित समाज को अतीत का पुण्य स्मरण कराते हुए नूतन दिव्यालोर को सुखानुभूति कराने म समय हो, ऐसी सवसमथ परमेश्वर से जभ्यथना है। भारत माता मदिर स्वामी सत्यमित्रानद गिरी हरिद्वार निवृत्त जगदगुरु नवराचाय ज्यातिमठ शाखा
अनुक्रम
मानव का स्वरूप
मानव जीवन मे मूल्यो या सघप
मानव की जययात्रा
9
40
103
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प्रयम प्रकरण 'न हिं मानुपात् श्रेष्ठतर हि किञ्चित्' मानव का स्वरूप सावकालिक महाकाव्य अमर और आलोकप्रद का यति पराशर नदन महर्षि वेदव्यास द्वारा चिरचित 'महाभारत' एक साव कालिय महाराव्य है जिसम मानर हृद्गुहा म सन्निविष्ट असीम और अचिन्त्य शक्ति ये नानाविध विकास या साहित्य सागर वत् लहराता है । सावकालिक से अभिप्राय उसकी सनातन सप्रेरयगीलता और निर तर प्रामगियता से है। मानव मेधा जनित शायद ही ऐसी कोई पलाकृति होगी जिसका प्रभाव मानर पार्थिव और पारमाथिर जीवन एय साहित्य पर इतना व्यापक, गहरा और दीघकालीन रहा है जितना कि महाभारत का । इसम मानव मात्र को नूतन मालोर देने की सामथ्य आज भी उवर है । मूलत सीलिये महाभारत आज तव एक अमर एव आलाकप्रद याव्यति ये रूप म समाहृत रहा है और सदा स्त्रीवाय रहेगा। सस्कृत साहित्य मे ही नहीं अपितु विश्व वाह मय म मी महाभारत का सवथा अनूठा और अनुपमेय स्थान रहा है। मानव सृजनात्मवता ने इस काव्य को इतने चाव स मवारा हैं कि यह कला प्रसाद युग युगातर वी प्रतिमामा को निर तर नूतन नूतन प्रेरणाया और चितनानुभूतिया से प्रभावित, प्राणवत और रसावित करने वाला अक्षय सात सिद्ध हुआ है। प्रतिमा सम्पन्न रसिको के लिए ही नही वरन् जन-साधारण के लिए भी महामारत मानव निर्माणकारी एव चरित्रोदारी ऐस एसे मारयानमूलक और सवजन साध्य प्रेरक आदश प्रस्तुत करता है जिहे हृदयङ्गम करके मानव नयी सूझ सम्पनता भार साहसिक्ता से अपने आपको समृद्ध करके अपने स्वय के और परिवार, समाज तथा राष्ट्र के जीवन को विकासोन्मुखी पूर्णता अन त पथ पर सोत्साह आगे चलाने में उद्यमशील एव सहायर हा सस्ता है । साथ हो, पातचन को अनुकूलता और प्रतिकूलता से अप्रभावित एव अविचलित रह पर वह अपने जीवन जगत् मे जय यात्रा वा माथव एप सफन मम्पादन पर सकता है। मानव को जय याना एव भारत की यात्मा को अखिल छवि का अनसुत न थ राज। इसी उद्देश्य से भले ही इस महाकाव्य यी रचना न की गई हो, पर तु इसका प्रेरक और प्रकाश प्रद प्रभाव देश, काल और परिस्थितियो की सीमाआ को चीरता हुआ आज भी प्रवाहमान है । यह अपराजय भाव ही, महाभारत मे मानव की जय यात्रा का महामन प्रतीत होता है। कौरव पाण्डव युद्ध की समाप्ति के पश्चात् जब समूचा भारत-विशेष कर पूव मे मनीपुर से लेकर पश्चिम मे द्वारका तक-घोर विनाश और विघ्वस की भयावह चीत्वार भूमि बन चुका था तथा जनचेतना कुरुक्षेत्र युद्ध की प्रलयकारी भीषणता को स्मृति मात्र से आतक्ति और व्यथित हो उठी थी, तव महर्षि व्यास ने पूणरूपण समाहित मन, ध्यानालोक्ति निमल बुद्धि और स्वस्थ सजाशीलता मे, अतुल मानवीय महिमा से सम्पन्न, इस 'महाभारत' नाम वाले एक्लक्ष श्लोका के अद्भुत ग्रथराज वी वा यात्मक सृष्टि की। इस मीपण भ्रातृ सग्राम के पूर्वकात से लेकर उसके अतिम क्षण तक, और तदुपरात भी, पराशरात्मज व्यारा इस युद्ध के साक्षी मात्र ही न थे, कि तु उहोंने युद्ध को न हाने देने हेतु परामश मूतक भरसक वितु असफल प्रयत्न भी किया था। इतना ही नहीं, जब अश्वत्थामा और अर्जुन ने सव विनाशकारी ब्रह्मास्त्रो का प्रयोग दिया था, तय शीघ्र ही व्यास ने अपते महनीय ब्रह्मतेज से वैयक्तिक बीच बचाव कर उस शेरवीय परिणाम पा निवारण किया था। युद्ध जय भयकर ताण्डव वे वे साक्षी थे, उनके अनुसार युद्ध के मत समय मे कुल मिलावर, दोना पक्षा के, 11 वीर ही जीवित बचे थे। इस अपार धन और जन यो अत्यत असहनीय एव हृदय विदारक क्षति से उत्पन अपार ग्लानि से जन जन याचिद्गगन जब भूप और मुसरित क्रुण हाहाकार और पराजयवाद से आयात था सब तपोनिधि महामानव वेद यास न शुक्ला सरिता सरस्वती पी सग्निपि मे पूणमनोयोग को प्रना पीठ पर भारत होकर जिस साहित्योदधि पा राजन पिया, यह 'महाभारत' मात्र एक महाकाव्य या ग्रय रत्न ही नहीं है। यह एक युगातमारी और अभिनव युग वा श्री गणेश करने वाला मात्म- साधावारी गनातन साहित्य है जा मानव को गौरवमय, स्वामिमानो योर स्त जीना जीन मी प्रेरणा देता है जो माग जीवन उच्चतम और मूल्यवान वादों यो दाशनिय परातल पर साहित्यिक प्रतिष्ठा परता है, और सोमाय मात्र पोयपराजयपाद की धुन पर अदम्य पुरुषाय नादिय सगीत गुना पर रग नारायणरसी सौधम भोर सहायनियति का मानचित 10 महामारत पा अध स देश देता है। निस्स देह, महाभारत में भारतीय आत्मा की असिल छविया अद्भुत दशन सुलम है। महामारत एक अन्मुत नथ है-से' ज्ञानगगा के जटाघर वेदव्यास का यह विराट काव्य, जो मााव के नानाविध निकृष्टतम से श्रेष्ठनम रपा की विशद और विश्लेषणात्मक, पूर्ण और प्रभावकारी छबि प्रस्तुत करता है, माम इसलिए अद्भुत नहीं है कि भारतीय प्रज्ञा, सस्कृत साहित्य और विश्व वाङमय की सबसे बडी रचना है, जो जन-चेतना म 'शत साहस सहिता' के TIम से प्रतिष्ठित है, मात्र इसलिए भी नहीं कि पावतीन दन गणेश जैसे लेसब होत हुए भी वेद व्यास को 'महाभारत' के सजन में पूर तीन वप का तम्बा समय लग गया, इसलिए भी नहीं कि प्रसिद्ध इतिहासश रमेशचद्र दत्त ने इसे एशिया की कल्पनाशील मृजनात्मकता की महानतम कृति कहा है, मुन्यतया इमलिए भी नहीं कि हमारे मनीपियो ने महाभारत को इतिहास, घम, ज्ञान, विज्ञान, साहित्य, मस्कृति, क्ला, राजनीति, रण यूह रचना, सामरिय विमान, दौत्य नीति, दशन, अन्यात्म आदि अनम एव जीवनोपयोगी विविध विषया का रसोदधि एव विश्वकोश कहा है, मात्र इसलिए भी नहीं कि देशी और विदेशी विद्वद्जनो द्वारा नानाविध भालोडित एव आलोचित महाभारत एक बहुचर्चित प्रय है, परतु मूलतया इसलिए रि महामारत एक ऐसा सावकालिक और सावमीम महाकाव्य है जो जीवन के सभी स्पा की पवित्रता का सागोपायन प्रतिपादन करने के साथ साथ एक विशेप एप्टि से मानव जीवन यी श्रेप्टतमता और पवित्रता या उच्चतम दाशनिक घोप एव साहित्यिक उद्घाटन परता है। केला की यह महार वृति इसलिए भी अद्भुत है कि मानवीय विपयो की विविधता, आगार की विशालता, प्रतिपादन पी आद्यत अविति एव रसमयता, दशन की रोचव समग्रता एव गभीरता, शैली की प्रान्जलता एव साहित्यिर प्रसादमयता, मावा को अभिव्यक्ति की सपूणता, भव्य पला मयता आदि की समयित कसौटी पर इससे स्पर्धा करने वाली एव तुलनीय अय कोई कलाकृति नहीं है, अद्भुत इसलिए भी कि यह वाव्य ममी रसो की पृष्ठभूमि म नानाविध शैलियों मे मानर की इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और प्रियाक्तिी नित्य नयी पीडापा दाशनिक धरातल पर विश्लेपणात्मक- विधि एव समवयात्मर दृष्टि से इतना विपुल साहित्य प्रस्तुत करता है कि हम इसे मानव विकास तथा मााव विनाश के गमिव सोपाना या सिद्धात व एप्टात सागर यह मयत हैं । वस्तुन महाभारत मानव स्पम्प एय मानव प्रकृति से प्रसूत वैयक्तिप और सामाजिक जीवन के भद्रातिमद्र चितनपणा . माविका स्पस्प एर उत्तमोत्तम चारिमिक तक्षणो मे पर शुद्रातिशुद्र माय, सकीण मनावृत्तिया एव स्वाथपरसता की परायाप्टा या समगतया सूक्ष्म एव स्पष्ट चित्रण परने वाला विश्वसाहित्य का प्रथम और एपापी महाराय है । बदमुत इसलिए भी कि मानव नीरा ये सव-स्तरीय सरल से सरल तथा गमीर में गमीर मानस पाठ एव विचारशील व्यक्तिया पा, मगमा एय साहित्य- सजसो नित्यनूतन प्रेरणा देने वाले गह्न मानवीय ण्य सनातन ततुआ से ओतप्रोत होने के कारण 'महाभारत' परवत्ती भारतीय पारमय की नाना विधाभो के अक्षय स्रोत की गरिमा रो गौरवारित होकर याज भी भारत के अन्त करण पर छाया जा है। इस इस वारण से पी अद्भूत यहा जा सकता है कि यह भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में उच्चतम यादर्शो का रत्नावर है तथा इसमे चित्रित एव विश्लेषित तजरवी पार यहाँ ये जासमुदाय के लिए प्रेरक, पथ प्रदराव एव यमरणीय गायर माय हुए हैं। दो मूध य एव मननीय विदु और हैं जिनके कारण महामारत का अद्भुत न थ कहा जा सकता है । प्रथम तो यह कि महामारत एक अपूव और अनुपम याव्यति है, ऐसी कृति जो मारतीय साहित्य मे न ता दयास के पूव काल मे कमी सृष्ट हुई, और, न ही व्यासोत्तर वाल मै इस की जोड या कोई साहित्यिक सजन हुआ है । वस्तुत महाभारत सस्कृत वाड मय की एव निपट पूतन विधा का महाकाव्य है जा श्रुति परम्परा में सवथा विराग होते हुए भी श्रुविसार यो आत्मसात् पिये हुए है। यह उत्तर वैदिवकालीन प्रारम्भिक ब्राह्मण पट्टरता के विरुद्ध मानव घम का पातिवारी जयघोप है, परम्परा की वह कट्टरता जो बहु सग्यप शूद्रो और स्त्रियो को वेदाध्ययन का अधिकार प्रदा नहीं बरती । उन लाखो-करोडा नर नारियो के लिए, जो अनुदारवादी वेदपथियो की अवना के शिकार थे, महाभारत नया वेद वनवर आया। यह स्मृतिशास्त्रो की परम्परा का शुभारम्म था। क्या फिर ऐस मात दृष्टा की अभिनव युग निमाणकारी कृति को अद्भुत न कहा जाय दूसरा मानीय विदु यह है कि महाभारत के मीमपव मे पाण्डवशिरोमणि अर्जुन के प्रति श्रीकृष्ण ने जो समाधान गीत गाया वह विश्व साहित्य में ब्रह्मविद्या का सर्वोत्तम रथोपटेग-समन ऑन द चेरियट है, जो कुरुक्षेत्र के समराङ्गण म म टापन एव भ्रातिज य तनावग्नसित अर्जुन को दिया गया था, और जो 'श्री मद्भगवद्गीता' के नाम से जगद्विरयात है। पतिपय पाश्चात्य विद्वानो का यह मत है कि श्री मदभगवद्गीता क्षेपव है प्रक्षिप्त है, इसे महाभारत का अनिन और सहज जश नही माना जा सकता। कुछ भारतीय विद्वान भी इस पाश्चात्य मत का ममथन करते हैं। जिह अतीन्द्रिय एव अवाडमनसगोचर 12 महामारतका अथ अध्यात्मदान, या जो गुरुगम साधना द्वारा अनुभव गम्य हैं, विञ्चिगान गी बोध है, वे गीता को महामारत की प्राणेश्वरी घोषित करते है क्योति ब्रह्मविदा को इप्टि म महाभारत मूलत गीता । गायक या गौरव गान है । निस्स देह श्री मद्भगवद्गीता का महाभारत मे वही स्थान है जो मस्तिष्क और हृदय का मानपदेह म है। गीता जीवन के परमसत्य और उन शाश्वत मूल्यो या सिद्धातत प्रतिपादन करती ह जिह समूगा महागारत विविध आम्याना उपारयानो तथा ऐतिहासित घटनाआ एव हाटातो ये साहित्यिक चरित्रासन द्वारा सशक्त अभियक्ति प्रदान करता है । जत गोता तो यदि महाभारत से निकाल दें ता महामारत निष्प्राण एव निरथम याव्य गव से गधिर कुछ नहीं रहता। उस स्थिति म वह शताब्दिया पूर वाल की आलोचमाग्नि म वगी दग्ध हो गया होता । गीता क्षपर नही, महाभारत की आत्म मजीवनी है अनय और अविभाज्या प्रसगवश यह निवदन किया जा सकता है कि इस पथन पे सत्य का दशन हम भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के द्वितीय गवनर जनरल वारेन हस्टिंग्ज के उस पचन से भी होता ह जिसम उहाने हीरे मोतियो से जडित 'महाभारत' रूपी मञ्जूपा म दृश्य वाहिनूर' रूपा गीता' को ब्रिटिश साम्राज्य से भी अधिक मूल्यवान ठहराया। मर चार्ल्स पिलिन्म द्वारा भगवद्गीता के अग्रेजी में अनुवाद के 'इट्राडाशन' मे वॉरेन हेस्टिग्ज ने इन प्रसिद्ध एव भविष्य बोधक शब्दा मे लिखा 'जन ब्रिटिश साम्राज्य विस्मृति को साह मे गुम हा जायेगा, जव इसकी सम्पदा और समृद्धि के स्रोता का स्मरण तक नहीं रहेगा, तव मी यह घमनाथ और इसम लिखित उपदेश ससार के लाखो परोडो मनुष्यो को प्रेरणा प्रदान करते रहगे।' यह मानव मात्र के व्यक्तित्व का स्वरूप निर्देशन कराने वाला पाय दपण है। वस्तुत मानगगा वे भगारथ पराशरात्मज वदव्यास द्वारा प्रणीत 'महाभारत' भारतीय तिगरा प्रज्ञा का सावकालिक अथ सम्राट है जो मानन मात्र को, अपने व्यक्तित्व एव राष्ट्र व सम्यक् तथा सर्वाङ्गीण विकास हेतु नित्य नयी प्रेरणा, उमग गौर दृष्टि प्रदान करने की सामध्य से ओतप्रोत है । यह मानव मान का सौभाग्य है कि अतीत का मौति आज भी 'महाभारत' के महापुरुषो, आदश चरित्रा, दि यात्माओ एव स इप्टान्त सिद्धातो भी अमर कथाएं व चचाएं घर घर म बडी उत्सुक्ता, प्रेम व जिज्ञासा के साथ कही य सुनो जाती ह । पर पथन धवण के साथ सर्वाधिक आवश्यक्ता इस बात की है कि इस तेजामय पलाकृति की प्रेरणामा को सही अथ मे आत्मसात् करके पूणमनायोग स मानव अनुस घान मूलक, ऊनाइ और सृजनात्मा मानवपास्वरूप 13 उपयाग पर। गीम, याग रष्टि ग, भारतीय राति की उपासना, माध्याम्मिाता मिलतया शारतीय राष्ट्र में यन्मुल्य या रास्य गुम्पिा है। यतिम स्तर पर मही उपागा व गिदि गामान जीयाम, 'सत्यमेव जयत तग पसाय से उग्यरित योर समाति, वास्तविक जय पापा योपर पथ प्रशिपाया रायती पिए तास्वय येदव्यारा ? महागारत को 'मारत पा पासिंग पर सिम सत्यगपत्पजन मागवीय “याय, स्वात पापित नौरन मोर नर न नारायणत्व प अभ्युदय पी मानपात्यात पिराधी राय पूण, सातय हगी अमानुपीयता और नर म सिस पी बलिवेदी पर मानवता योग्यहा मरा पालीसिया पर अतिम विजय गीगाथा पाप्रेस यशोगा। । तता यमुभरयत महाभारत या मगलाचरण जीवन म जयाक्षिा पिस होती? पराय शिम अमीप्सित ? प्राणीमात्र म पराजय या माय हीनता और रोपमम मूर विद्रोह यो उत्पन परने वाला होता है, और जय की स्थिति म उसे स्वाभिमान एव थेप्टता के सुर बोध यी तुष्टातुभूति होती है। मानव जीपा भी जयाय पो द्विविध स्थिति में गौरव ग्नानि यो दद्वावस्था म से गुजरता है, ऐसा सामा य अनुमय प्राय सभी या है । मनुष्य की विलक्षणता इसम है कि यह जीवाम आन वाली चुनौतिया या समयाचित धय व साहस, मलिंग आस्था और आत्म विश्वारा की सनातन मामथ्य से सामना परे। विजय की मुकुट मणि एस हो उद्यमशील मनुष्या पे हाथ म हाल त्तय सारर रस देता है । इस पुरुषाथवाहिनी लक्ष्य परायणता एव उद्यमशीलता म ही अपराजेयता का भाव पथ खिलता है जो मानव के जीवन को मुदित आर सुरमित विये पिना नही रहता । इस पर म सजन की सजीवनी है, पूर्णत्व की परमता है, प्रेम की प्रवाहमयी पावनता है । मानव जीवन म इस पुण्डरीक ये सम्पय प्रस्फुटन विरसन हेतु महर्षि व्यास ने हमे मगलाचरण पे रूप म एक शास्त्र सम्मत, सुसजन सेमित, ऋपिजन पोपित एव स्वानुभव से पुष्ट और प्रमाणित महामन्त्रमय दलोप दिया है जिसके सत्याथ की परमानुभूति मानव मात्र के लिए पल्याणाथ अपेक्षित है। मगलाचरण के इस पुण्य श्लोक को व्यास जी ने महामारत के प्रत्येक पव के आरम्भ मे रखा है। व्यास जी ने ऐसा क्यो किया, मानव की यह जिज्ञासा नितात स्वाभाविक ही है ! हरेक पव का एक ही मगलाचरण है। अक्षरश पही। तनिक मान भी यही मतर नहीं ! सम्भवत वेदव्यास को यह अभिप्रेत था कि महाभारत का पारायण करते समय इस मरवा बार- 14 महाभारत का अथ बार मगल गान न येवल इस 'महामारत' के शुभारम म ही दिया जाय अपितु महामारत के प्रत्यय पर ये पूर्व भी इसी मगलाचरण पा गान एव श्रवण, श्रद्धायुक्त आदर-बुद्धि एव आत्मिर प्रेम भाव से, वेद मत्रो को तर पावा लहरी मे दिया जाय त्यापि इस महामन मे ही महाभारत के सत्याथ का उद्घाटन करन की सारभूता शक्ति पुण्डलित है। सतही स्तर पर तो यह रतोय एक पच नमस्सारमय नादेश मात्र है, परतु इसके गम मे मानव जीना की नियति (मोक्ष) एव पूणावस्था का सुदर निरूपण है। तदनतर मानव- स्वरूप का निधारण है, मनोजयी उत्तमता की स्थापना है, जीवन साधना का रम वणित है, लक्ष्य सिद्धि एव साधक का ममवोध इगित है । ऐसे महत्त्वपूर्ण श्लोक का पठन श्रवण करने के साथ साथ तदतगत अथ को हृदयगम करके ही महामारत पास्वाध्याय, पारायणादि वरना थेयस्कर है । अत यह अत्यत उपादेय है कि हम 'महाभारत' नामक विराट काव्यकलाकृति में उपलक्षित मानव को जय यात्रा के स्वरूपातुस पान म इस महिमामय मगलाचरण के सम्यक् गान के साथ ही प्रवेश करें। व्यास दृष्टि मे जय यात्रा मोक्ष याना का पयाय हैं। नारायण नमस्कृत्य नरचैव नरातमम् । देवी सरस्वती व्यास ततो जयमुदीरयेत् ॥ इम मगलाचरण म नारायण, नर, नरोत्तम, वाग्देवी सरस्वती और महर्षि वेदव्यास यो नमस्कार करके (नमस्कृत्य) 'जय' याने महाभारत को 'उदीरयेत्' पढ़ें, ऐसा मादेश है। यह मगलाचरण का सरलाथ है, एपदम साफ पर तु शोध बुद्धि वाले जिासुओ और विञ्चित् गहरी अनु स घानात्मक दृष्टि वाले विद्वद्जना को सीधे साधे शब्दाथ मात्र से सतोप नहीं होता, वे श्लोक के मम का साक्षात्कार चाहते है । अत ये अपने आपको प्रश्न करते हैं और गहा मौन की परमावस्था मे वे मगलाचरण ये सत्याथ या दशन कर लेते है । प्रश्न हैं यह 'नारायण' कौन है मिह प्रथम नमस्कार करना चाहिए? नमस्कार क्या किया जाये? इसी प्रकार, ये 'नर' और 'नरोत्तम' कान है और इह नमस्कार करने या क्या प्रयोजन है तथा प्रणाम किस भान ये साथ किया जाये? 'देवी सरस्वती' को नमस्कार करने की म प्रणा का क्या रहस्य है ? सवाघिय विचिन यात तो यह है वि इस श्लोष मे 'व्यास' को भी नमस्करणीय माना है क्या यह उचित ह कि महाभारत के रचयिता वदव्यास अपने महाकाव्य के मगलाचरण म स्वयं अपने को नमस्कार करने हेतु गावी वाचनमारा का आदेश प्रदान करें? व्यास पहे कि व्यास को नमस्त्रार परो । स्वय यो समस्यार कराने की बात में क्या 7 मानव का स्वरुप 15 युक्तिमयता है ? इस सम्बध म, यह स दह कि मगलाचरण क्षपक है कुछेक विज्ञाना का रचिकर जीर प्रासगिक लगता होगा । इन प्रश्ना के सम्बध म टीकाकारा का मत वैविध्य मननीय है । गीता प्रेस, गारसपुर द्वारा छ महानाय खण्डो में प्रकाशित, हि दी अनुनाद सहित जा 'महाभारत' आज उपलब्ध है, उसमे मगलाचरण सम्बन्धी अथ और विचार से यह पकट होता है कि नारायण' और 'नर' भारतीय अध्यात्म चितन म नित्य सखा' के रूप में माय हैं, वे प्राचीन काल म वदरिकाश्रमवासी प्रसिद्ध श्रीनारायण और श्रीनर थे और द्वापर काल मे वे ऋषि ही श्रीकृष्ण और अर्जुन के रुप म अवतरित हुए, अखिल 'महाभारत' इन दोनो मानव शिरोमणि तेजोमय सत्यकाम नायका की आत्मजयी प्रतिष्ठा का काव्य गान है। नारायण जीवन का अतिम लक्ष्य है, नर इस लक्ष्य सिद्धि की साधना का आदि बिदु । श्रीकृष्ण नारायण नर रूप मे हैं जो मानव जीवन की श्रेष्ठतम स्थिति एव परमपूणता का मिद्ध स्वरूप है, वह मानव मात्र के प्रति निस्वाथ मैत्री और वरुणा का जीवत आदर्श है, वह सब वो अपनी ही आत्मा में और जपन को प्राणी मान की आत्मा मानने और जानन वाला समदर्शी योगेश्वर है, परात्पर ब्रह्म है तदथ ही वह सवा तयामी रूप से सबक हृदया म विराजमान है। श्रीकृष्ण मानव म्प म सवजयी है जय स्वरूप है, जय की प्रतिष्ठा है । अजुन नारायण का नित्य सखा 'नर' रूप है सिमे नारायणत्व के सम्यक् प्रकटीकरण की पूण क्षमता है, इस प्रक्टी करण में नारायण (समत्व बोध) का सतत सानिध्य, साहचय और सायुज्य अपक्षित है और सच्चे अथा म 'नर' वही है जो इस सायुज्य हेतु सश्रद्ध, मममी और उद्यमशील हान व लिए कटिबद्ध हा जाये, अर्जुन, महाभारत मे, ऐसा ही नर है । अत वह मानव मात्र कापीरूपमय प्रतिनिधित्व करने की योग्यता से सम्पन एक धीर वीर नर है। वह उस साधना दशन का ज्वलत उदाहरण है जिसरा प्रतिपादन समय समय पर हमारे ऋषिजना सिद्ध आचार्यां एव गुरु जनो ने पिया है तथा जिसका सर्वोपरि लक्ष्य मानर जीवन का चतुर्दिक अभ्युदय एव मानव व्यक्तित्व म पूर्णता ये प्रकाश प्रकटीकरण सर्वजन- हिताय करना होता है । सभयत इसी दृष्टि से महर्षि व्यास ने नारायण या पूण पुरुषात्तम क रप मे तथा नर को पूर्णता के सघद्ध पथिक के स्प में नमन परापा रहा है । इा दानो का मस्कार रन + साथ साथ 'नरोतम मो भी नमस्कार परन से लिए व्यासजी न स्पष्ट कहा है । यह नरातम मौन है नरातम वह मर है जो शास्त्र और गुरु द्वारा उपदिष्ट और स्वानुभव द्वारा पुष्ट मापना ये माध्यम स जीवन म निर पर उन गुणा मास मोर श्रेष्ठ 7 6 महाभारत का अर्थ आचार विचारा का आपादन अजन करन म निरत रहता है जिसस अधमत्व या विनाश और उत्तमता का विकास सतत हाता रह । वह साधना दशा का अपने जीवन या वास्तविर मग या लता है जिससे वह समस्त मानवीय गुणो या तेजामय और प्रियाशीत पुज बन जाता है । आत्मीयता उसये व्यावहारिस जीवन म यथष्ठ मर्यादा और माधुय का सचरण परती हुई उस नरा म उत्तम 'नरातम' ये स्वयभू परतु अनुद्घोपित पद पर प्रतिष्ठित पर देती है । नरोत्तम मानवीय जीवन की उस अ यात्म भूमि म उनत हो जाता जहाँ उसका व्यक्तित्व नारायण की चि मय असण्डना म समरस हो गायी स्थिति मे प्रवेश पा जाता है। जीवन मे प्य नाना स्पा और नामो से उत्पन भेद बुद्धि इतनी शिथिल और क्षीण हो जाती है कि 'रोतम' व्यष्टि के सारे भेदो और पृथक्ताओ मे परे ममष्टिरूपा सृष्टि के साथ अपना सम्यक् तादात्म्य स्थापित कर लेता है । जब नर या व्यष्टि माय, साधना ये सातत्य से, सृष्टि ये समष्टि स्वरूप मे विगलित और घुलमिल जाता है, तब वह नर ही नरोत्तम हो जाता है। व्यष्टि समष्टि या समुच्चय रूप नरोत्तम अव नर और नारायण के बीच की दूरी को, जो अभी तक भेद-भयावस्या के वारण दिखाई दे रही थी, पाटने मे समथ हो जाता है। नर मे नारायणत्व के प्रकटीकरण की सर्वोच्च भूमि नरोत्तम भाव का मानवीय जीवन है। भारतीय अध्यात्म साधना का सार सवस्व यही है कि 'प्राय शरीर विमाक्षणात्' शरीर पे छूटने से पहले ही घर मे नारायणत्व प्रस्ट हो जाये, क्यापि मूलत नर नारायण या शाश्वत अश है, नर ही नारायण ह-'जीवा अह्म व द्वितीयो नास्ति' । नरात्तम, नर और नारायण के मध्य सेतुब प है जिसकी निर्मिति निमल मानवीय और यात्मीय जीवन द्वारा ही सम्मव है। भीष्म पितामह जोर धमराज युधिष्ठिर महाभारत के नरोत्तम हैं । अत नारायण का नमस्कार है क्यापि वह परम पुरुष परात्पर ब्रह्म मानव मात्र या साय है, नर को इसलिए नमस्कार है कि वह साध्य सिद्धि हेतु कटिबद्ध साधन एव वृत सकल्प ह । नरोत्तम मिस्रा देह नमस्मरणीय है क्योकि वह मानवोचित नारायणत्व प्राप्ति की साधना-पी-पूणता का जीता जागता उदाहरण है । अत नारायण नर मे है जैसे वृक्ष बीज म, नरोतम र वा नारायण मे उत्थान है जैसे बीज का वृक्ष मे विक्सन । इस प्रश्यिा म जसे बीज के फटने पर ही वृक्ष का उगना और वढना समर है, वैसे ही पर की अहकार व अज्ञान-जय व्यप्टिप व्यक्तित्य की परिच्छिमताओ के टूटने- बिखर जाने पर ही नारायणत्व अथात् व्यष्टि समष्टि से परे पूण अपरिच्छिन्न स्व स्वरूप का उसे सम्यग बोध होता है, परिच्छिन्नता के विगलन की सर्वोच्च . मावास्यरूप 17 मिल भूमिका या नाम ही नर म नरोत्तम है। सारत , नारायण, नर और नरोत्तम एक हो असण्ड चिमय तत्त निरप है। यर वेदातमी प्रापिप्रणीत भूमानस्था है जहाँ साध्य साधर बौर साधा एकरुप हो जाते है। यह माव जीवन की परिपूर्णता है। इसे नमसार है। प्रत्येर मनुष्य का यह वान्छनीय दायित्व है मि यह यह नमस्कार करे, जिसमा अवन नारायण द्वारा नर को दिये गये आहारा मेह-यीन की तरह पृथ्वी मां की प्राकृत गोद म पप पर नर निरदारत्व की निद और निमलावस्था प्राप्ति की आराधना द्वारा नारायण के आह्वान पी यमाग्नि म अपने स्वत्व की आहुति देकर नारायण घा जाता है। ध्यास प्रणीत इस मगलाचरण मे, नमस्कार करने के आदेश को भोट म, मानव जीवन की नियति या, मानय पे सही स्वरूप या, स्वरूप सिद्धि ये माग म आने वाले राघों एव पटकाकीण अपरोघो का और उन पर विजय प्राप्त पर लेने वाले नरोत्तम का छायदशन हमे स्पष्टतया होता है । यह दशन हम तमी हो सकता है जब व्यास को प्टि हमे मिल जाये । व्यास की दृष्टि हम तमी प्राप्त हो सकती है जब हम 'सजय' वन पर उनके समक्ष विनत हो। सजय के अत वरण मे अगाध श्रद्धा, सयम और तत्परायणता का निवास है। श्रद्धा मयम समवित सजय भाव के मानव हृदय मे अपुरन अभ्युदय हाने पर व्यास दृष्टि का उ मीलन मानव जीवन मे हो जाता है । व्यास गुरु हैं, कवि हैं, वर कवि हैं । गत व्यास को नमस्कार करना परम कवि तथा ब्रह्मविद् गुरु का नमस्कार करना हो है । गुरु वह है जो 'गु अर्थात् गुप्त 'हे' अथात् रूप का प्रफ्ट कर दे । नारायण नर मे गुप्त निवास कर रहा है, व्यास गुरु उस गुप्त रूप को नर के मिल नेत्र में प्रकट कर देन की सामथ्य से विभूपित है। नमस्कार से व्यास का प्रस न करने का भाव इस मगलाचरण मे अभिप्रेत है । ध्यास भी परिपूर्ण महामानव होने से, गारायण ही है । जोवो ब्रह्म व द्वितीयो नास्ति' की चि मय अद्वय अवस्था म विराजित होकर स्वय व्यास व्यास को नमस्कार करने के लिए कह रहे है । यह तो अद्वैत की भाषा का सौ दय है जो व्यास की पाव्य गरिमा को प्रकट करता है। काय गरिमा, पाय सत्य, और काव्य सौदय मानव हृदय मे स्थित पित्य 'शुद्ध बुद्ध मुक्त 'अहम्' का ही पाय रूपमप्रकटीकरण है । यह प्रबटी करण स्वय होता है मानव वे स्त्र स्वरूप वीच को रसमयता मे । 'रसो वै स', नारायण ही रस स्प है, रस सागर है, रस सार है। यह रस आत्म रस है जो स्वत स्व-सृष्ट पनि अय से समित वाक निझर म प्रसवित और प्रवाहित होता है । यही पार प्रवाह सरम्मती है जो रस-सर या शब्द भूति प्रदान करके 18 महाभारत या अथ 1 उस जगत मे प्रयाशित करती है, और इसीलिए 'देवी' की सजा स अगिहित की जाती है । दिव्, दिवापर, दिवरा यादि शब्द प्रकाश-वाचक शब्द है । अत व्यास पी गुरु द्वारा उत्प्रेरित और उपदिष्ट होपर रोत्तम की साधना से नर जब नारायण रूप हो जाता है तब वह रसराज स्स्य भगवती श्रुति अथात् सरस्वती वन पर काव्य रूप ग्रहण करता है। महाभारत मूलत रसराज नारायण के महारास मा लोला पाव्य है। अत देवी सरस्वती को नमसार करना भगवती श्रुति याो वेद का नमस्कार करना है, सवया समोचीन है । इस पच नमस्वार ये प्रसाद स्प से महाभारत (जय) म नर का आत्मप्रवेश सुगम हो जाता है। इस से नर-हृदय म नारायण के प्रति श्रद्धा ये जागरण का साहित्यिक आह्वान मुरारित होता है । और महाकाव्य ये गूढ अथ व प्रयोजन में पर मति सहज गति पर सस्ती है। अयथा, जैसा कि 'महामारत तात्पय निणय' वे प्रणेता महा। मध्वाचाय आन दतीथ ने लिखा है, वह प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है। वे अपने इस ग्रथम रहते हैं कि एवमध्यात्मनिष्ठ हि भारत सवमुच्यते । दुविनेयमत सर्व भरित तु सुररपि । 2149 मसा महाभारत का सब लोग अध्यात्मनिष्ठ प्रथ मानते हैं जो तदथ ही दवताआ के लिए भी 'दुर्विज्ञेय' है । अत महाभारत कै पारायण करने ये पूर्व इन पांचा यो-नारायण, नर, नरात्तम, सरस्वती देवी और वेद व्यास यो- प्रेमादर भाव से नमस्कार कर लेना चाहिए। यह है व्यास दृष्टि | इसका फल है जय (मोक्ष) प्राप्ति, पराशय या अथ है वार वार ज म यी प्राप्ति । वस्तुत रास रासेश्वररसोदधि नारायण ही महाभारत रूपी वाङ्मय मदिर की चिमय मूर्ति है जिसकी प्राण प्रतिष्ठा स्वय कृष्णद्वैपायन व्यास ने आत्मसिद्धि के महामन से की है। सदानद यति ने 'महाभारत तात्पय प्रकाश' नामक अपनी टीका में महाभारत को 'जय' नामक विद्या या समस्त अविद्यामा के नाशय ससार-जयी प्रय कहा है 'ससार जयिन अथ जमनाम' । महाभारत मे जो कुछ है, घटित और वर्णित रूप मे, वेदव्यास उस सब के न घेवल इप्टा मान रहे हैं परतु वे उसके साथ शुरू से आखिर तक जुड़े हुए भी रहे हैं। कोरवाधीश धृतराष्ट्र के प्रधान सचिव सजय व्यास के पट्ट शिप्य हैं जिह वह अतिमानवीय दृष्टि प्राप्त है जिससे वे सब देख, सुन, वह सकते है । व्यास वस्तुत दोनो पक्षा के अधिकारिया के लिए सम्माननीय एव मान्य ह, दोनो पक्षो से इनका घा मानव का स्वरूप 19 सम्पयरे परामा दाता और आय ये रूप म। इसलिए उह महामान्य म वणित छोटे से छोटे और बडे स बडे पान या अतरतम मे देखने, परसन व समयने का पूरा अवसर मिला है। कमाल तो यह ह नि महासराव्य वे अनेर पात्रा का चित्रण उहोन जिस पटुता और कोल से दिया है उमसे “यासजी मानवता के श्रेष्ठ उनायक, मनुप्यमन यी समस्त विधाआ के पारसू मार महान् मनोविद् तथा मानव यो गौरव गरिमा के प्रातिकारी प्रतिष्ठापर ये रप में प्रकट होते है। व्यास न मानन को मवश्रेष्ठ प्राणी घोषित विया है उनसी यह मा यता है कि मानव राधम बन पर समाज और स्वय के जीवन को दु सामात, तनावग्रस्त और नरवतुल्य उना सरता है तथा नरात्तम बनकर समाज, सस्कृति और स्त्रय के जीवन वो सत्यनिष्ठ, स्वाभिमानी और सुपमय बना मकता है। इतना ही नहा, वह मानवेन्द्र और महामानव बन सकता है 'सवजनहिताय सबजनसुसाय च' अत महामारत मानवीया नियति की विषमता की चिता परने वाला महत्त्व वा काव्य है, जो मानव जीवन की परिपूर्णता हेतु विरचित है । यही 'जय' का मूल अभिप्राय है । व्यास दप्टिममानव का स्वरूप महर्षि व्यास का यह लाय प्रसिद्ध और विद्वद्जन चचित वाक्य ह नि 'मनुष्य से श्रेष्ठतर भार अय काइ नही है, यह मैं एक गुह्म सत्य यह गुह्य ब्रह्म तदिद बीमि नहिं मानुपात् श्रेष्ठतर हि फिञ्चित् । शाति पव 180/12 यह एक गुह्य सत्य है-'गुह्य ब्रह्म इदम् । 'तत् ब्रवीमि उसे म कहता हूँ, प्रकट करता हूँ । 'नहिं मानुपात् श्रेष्ठतर'-~~-मनुष्य स श्रेष्ठतर नहीं है किञ्चित् हि', कुछ भी। घडे महत्व और मजे की घोषणा है यह क्याकि ऊपर मे जितनी सरल लगती है, यह अदर स उतनी ही गुह्य और गुह्यतर होती चली जाती है । 'गुह्य' में गुह्यतम' उसी तरह छुपा हुआ ह जैसे नर म नारायण, प्रथम दो दाब्दा वे अथ के बीच की अनुरा घानमूल कडी गुहतर है, जो दोनो को जोडवर एक वरती हुई सुद भी उसमे समरस होती हुई गुह्यम् की वृहद अस्मिता में उसी तरह अभिनतया लुप्त या विस्तत हो जाती है जसे नरोत्तम की साधना साधर नर और साय 'नारायण' की एकरूपता को व्यक्त वरते-करते समय नारायण की यव्यय असण्ड चिमयता म समा जाती है। 20 महामारत अब - माप्य मे जीरन वे परम सत्य को प्राट करने की अद्भुत सामथ्य है जो मानवेतर प्राणिया व पदार्थों में नहीं है । अत मनुष्य 'श्रेष्ठतर' है । थेप्ठ तो चराचर जगत् मे गगी है। जीवन की पवित्रता की दृष्टि से वनस्पति जगत् के समी वृक्ष, पौधे, लता, पता यादि असस्य जीवधारी उतने ही श्रेष्ठ हैं जितने पशु पक्षी जगत् के नानाविध रम्प रग वाले यग और धरती पर और जल में निवास करने वाले निष्पद, द्विपद, चतुष्पद, बहुपद याले जानवर । जीवा का समान आदर होना चाहिए, परन्तु चेतना की दृष्टि से मानव जीवन 'श्रेष्ठतर' है क्योकि वह 'श्रेष्ठतम' जोवन और 'श्रेष्ठ' जीवन के बीच पी अत्य त महत्त्वपूण कडी है । अन त सम्भावनामो से परिपूण, 'सत्य नमन त ग्रह्म' के साक्षात्कार मा देहली द्वार । प्रकृति के सुरम्य, बहुरगी विशाल साम्राज्य मे मनुष्य सबसे मिरला प्राणी है। चाहे स्थावर जगत् का सर्वोत्तम, तुपाराति हिमालय ही पयो न हो, मनुष्य के सामा उसमा सौ दय फीका लगता है, मनुष्य पी सृजनशीलता का गौर सर्वाधिय अनोसा और अतुलनीय है। विश्व के सम्मोहक वनस्पती साम्राज्य के उद्यान तर भी, चाहे वे बड़े से बड़े पट विटप ही यो न हो, मनुष्य की उत्तरोत्तर विकासो मुखी चेतना के समक्ष मर वैभव ही प्रतीत होते हैं । मीमकाय चट्टानें और फनप्रद गगनो मुनी वृक्ष मात्र ही क्या, पशु पक्षी जगत् के बिरल से विरल जतु जानवर भी, चेतना के विकास की अचिन्त्य सम्भावनाओ की तुलना मे, मनुष्य के बहुत पोछे हैं। तत्वहीन और अमागा है वह मनुष्य जो इन निस्सीम सम्भावनाओ का पुंज होते हुए भी अपो गौरव ग विना पनिगाने और प्रकट दिये मर जाता है। एतदृष्टया, मनुष्य सृष्टि का सिरमौड है, श्रेष्ठ सार है, क्षीर-दघि की प्रक्रिया म से मथनातर निक्ला हुआ शुद्ध नवनीत है। वेदवाणी मनुष्य को अमृत की रा तान घोषित करती है--- 'मानवा अमृतस्य पुना'। अमृत कहाँ है ? सत्य मे । सत्य कहाँ है ? ऋत मे | इस सत्य का सम्यप बोध व अनुभव मानव देह मे ही सम्मव है, अ य किही देधारियो मे नही। यदि मनुष्य स्वदेह मे-प्रत मे अर्थात् पचभूतात्मक और त्रिगुणात्ममय नरपिण्ड मे निवमित गुणातीत आरमा या दर्शन करने के दायित्व यो निभा रेता है तो यह व्यास के साथ, स्वानुभव से व्यास पे इम मथा या उत्साही समथन पर सकता है कि- अमृत चव मृत्युश्च द्वय दहे प्रतिष्ठितम् । मृत्युरापद्यते गोहात् सत्यनापद्यतेऽमृतम् ।। नाति पव 27879 7 मानवका स्वरुप 21 मृत्यु भी इस देर म है, और अमृत मी ! सत्य पो यही सही पहिचान ह । अमृत और मृत्यु दोना इमार देह मे प्रतिष्ठित है, मोह परोसे मृत्यु प्राप्त होती है और सत्य से अमृत यो उपलब्धि ! अत सत्य जय मानव चेतना मे रमण करने लगता है, उसमे समा जाता है और मनुष्य या चितन और चरित जव सत्य के प्रश्टन या उज्ज्वल माध्यम बन जाता है, तब मानय यो अमृत तत्त्व की प्राप्ति होती है । मात्मचेतनाये पूर्ण विकास यो सम्भावना और क्षमता मनुष्य मे ही है, मनुप्येतर जीवधारियो मे ही । इम विकास पथ का निर्माण मनुष्य का घरमदायित्व है। मातरमी चेतना शक्ति के विकास के तीन प्रमुस स्प हैं-ग्राह्मी, वैष्णवी और रोद्री । ब्राह्मी रप मे घेतना या अम्युदय नित्य नयी सरचना लेकर आता है, गान विधान, पला सस्कृति, घम-दशन आदि अमस्य क्षेत्र हैं जिसमे गिर तर नूतनता या प्रापट्य इस चेतना के विकास क्रम में होता रहता है। व्यारा प्रणीत सम्पूण साहित्य दमी चेतना के अभ्युत्यान यी मौतिक देन है । यह राजाशीलता वैनल मापीय चेतना या दायित्वपूण एकाधिकार है, मानवेतर उप तनाओ पा रही । तात्पय यह नहीं है पि प्रत्येक मानव सृजनशीरा होता है चोर उसका जीवन रचनात्मा कृतियो या सतत प्रवाह । प्रयोजन मान इतना ही है कि रचनात्मकता को मा त सम्भावनाओ का भागार है मानव, योगि उसे नारायण रूप में व्यक्त और विकसित होने की चैत य शक्ति वा चीन जाम से ही प्राप्त है । बौर उसका विक्सन की पोज का दायित्व है। सृजन शक्ति ये पूर्ण विकास की सम्भावनामा के साथ मनुष्य में माराव द्वारा सप्ट कृतिया पे रक्षण और पापण यीशक्ति भी याप्त है, लगन प्रेम और धैर्य के द्वारा मानव चेतना वणी शक्ति के रूप मे अमि यजित होकर युगवोप पी पीठिया म सृष्ट मृजाशीलता के लिए महास्यच का काय परती है । इस सजन और सरक्षण की प्रनिया मे तत् विरोधी तथा प्रतिगामी शक्ति तत्त्वा के समयोचित सहार की रौद्री शक्ति भी मानव चेतना के अभ्युदय घे श्रम म सहजतया प्रकट होती है । सग, स्थिति और सहार की अद्भुत सामथ्य मनुष्य मान म है, अपेक्षा केवल कालोचित विकास और उसकी अभियक्ति की है। मानवीय चेतना के विकास की अनत सम्भावनाओ के रूप तो तीन ही प्रमुख हैं पर तु इसके विकास की प्रक्रिया को मनुष्य किसी भी दिशा मे ले जा सकता है यह चाहे तो विकास का अमृत माग अपना सकता है, और चाहे तो मृत्यु माग या अनुमरण कर सकता है। कारण यह कि दोनो-मृत्यु और अमृत-मानव देह में विराजमान हैं योर माना इन दोनो मे से किसी भी माग 22 महाभारत पायथ को अपनाने में पूर्णतया स्वतत्र है । नर का पारायणय में विकसित होना ही अपने में निहित अमृतत्य पी प्राप्ति है नर । इस सम्मघ मे व्यास के जीवन की एक छोटी सी घटना ध्यातव्य है । एक बार महर्षि अपने अतेवासिन् समुदाय के साथ अपने आश्रम की समीप स्थली मे धूम रहे । सहसा उहाने देखा कि एक अत्यत लघुकाय पीडा भू तल पर ठीक उनको परणस्थली मे ा गया। पिरा के बढ़ते हुए पदा की वाट रो भयमीत वह कोटाम्पायमान हो उठा और जीवन रक्षा हेतु दौडने का प्रयास करने लगा । यह शीघ्र ही दूर हट गया । यह सब कुछ देखकर महपि व्यास ने अपने सगियो को कहा-'समस्त प्राणघारिया में जीवन के प्रति प्रेम स्तिना नैसर्गिक है । इस छोटे और महत्त्वहीन कीडे वो देसो! वह भी अपनी अस्मिता को कितना महत्त्व देता ह और अपने को जिदा रहने योग्य समझता है। यह बहते हुए व्यास कुछ झुरे और रेंगते हुए महत्त्वही। कोडे को एपटक देखने लगे। उनके दृष्टिपात से कीडे की हुनाडियो मे स्पादन हुआ, वे कुछ सुली और व्यास के हृदय का स्पद कीट हृदय मे प्रविष्ट हुमा और वे एक दूसरे से सवाद परो लगे । यह सवाद सा हो गया, एक रहस्य है, पर ऐसा हुआ यह असदिग्ध है । किसी अभद्र बबर से मिलो तो तुम्हारे मतमन की बातें सुझाव रूप मे उसमे प्रविष्ठ और प्रकाशित हाती रहगी, और तुम्हें लगेगा माना तुम्हारे विचार उसके मानस म प्रवेश कर रहे हैं, नेत्र नेत्रो से बोलते है, ठीर उसी प्रकार जरो नह मुह विगोर मोर पशु पक्षिया में परस्पर सम्बाद होता है । हृदय अपनी ममिलापाओ वो हृदय तक पहुंचा ही देता है । यद्यपि सव मनुप्या म यह योग्यता विकसित हुइ नही दिपाई देती, पर इतना क्थन अवश्य सत्य है कि यह गान भी अय अनेक सिद्ध नाना की तरह सुनिश्चित है। व्यास ने कुछ झुप कर उस कोडे से कहा, 'अरे, न-कुछ कीडे | क्या वात ह कि तुम भी अपने जीवन-रक्षा की इतनी परवाह करते हो तुम अमी मेरे पांव तले दब कर मर जाते, परतु अपनी प्राण रक्षा हेतु तुम भागे और तुमने अपने आपको झट से मेरे पाय के तले के नीचे थाने से बचा लिया। मानव प्राणियो की तरह तुममे भी क्या प्रेम और घणा, सुख और दुस, अनु यूलता-चरण और प्रतिकूलता निवारण के भाव होते हैं ? क्या सारा जीवा इस द्वद्व की मपधार मे ही प्रवाहमान है ?'कीडे ने आत्म मापा में महपि को प्रत्युत्तर में कहा, 'भो मह । आपकी दृष्टि में मैं विल्कुल छोटा और न कुछ अवश्य हूँ, परतु मैं जानता हूं कि आपकीन हैं? आप पुरातन मत्रदृष्टा नपियो की दिव्य मराशि एवं नित और सुव्यवस्थित करने वाले, ? ..
। तथा, ब्रह्मविद्या मे विद्वत्तापूर्ण दिग्गज याव्यो और पुराणो प्रयट परने वाल महार आत्मवेत्ता है। बाप वेदव्यारा हैं, पर यह वारचय की बात है कि आप जैसा प्रापूण माप शिरोमणि एप मल्पराय यीट में जीत पर एरा-सा प्रहार गरे । जीवन सवत्र है. इस से सूय युछ भी नहीं | इस ये समपरित्र भोर युछ भी नही । जीवन हर मानि मे पाया और सम्मानीय है।' पीट की यह निर्भीय, सशक्त और सत्यवाणी महर्षि व्यास ये चिद् गगन मे आश्चर्यान्वित पर देने वाली भीषण विद्युत प्रहार की तरह पौंध गई, थोर उहाने सम्हल पर पूछा, 'आ, अद्भुत प्राणी | तुम यौन हो?" • पोटी पहा, 'मैं भी थाप पो तरह एक प्रापि, और लोग मुझे नारद पहते हैं । मुझे 'प्रथम प्रापि' हाने का सौभाग्य मिला है और विद्वद् समा म मेरी प्रतिष्ठा है । यह सम्माननीय गौरव मुझे अधिकारगत सम्पदा के रुप में मिला है और मैं इसा योग्य पारी व अधिकारी भी हैं।' व्याग पूछा, 'हे, श्रदेय मुने। यदि आप नारद है तो क्या कारण है वि आप पीडे वा गय।' देवपि नारद ने कहा, 'मेरे गिवाय आर कौन पीडा बन सकता था। मनुष्य तो सर्वेसर्वा है । उत्यान और पतन तो उसी की गरिमा है । यह धेष्ठ और निकृष्ट आचार विचार वी सामर्थ्य से विभूपित है, जब वह उच्च विचार वा जीवन जीता है तो वह नरात्तम पाणी हो जाता है, पर जब वह अधर्म विचारा स नावात होरर निकृष्ट जीवन जीता है तब यह पतित कीट ही तो है । यदि वह विनयशील है तो उगे अभ्युदय और यदि यह गर्वीला है तो उसे भयोगति मिलती है । मनुष्य वसा ही हो जाता है जैसा वह सोचता है । गव विनाश वी प्राय भूमिका है। मैं ही मेरा इतिहास हूँ। जैसा मैंने सोचा वसा का गया, और जैसा चिता करंगा वैसी ही मेरी भवितव्यता बनेगी। एक बार मैंने विष्णु को उपस्थिति मे, अपने आपको उमके प्रिय और पवित्र भवता म सर्वोत्तम भक्त घोपित रिया। उसका मोघ मुझ पर टूटा और मैं यह पीडा बन गया। मात्र प्रथम बार ही वी मेरी यह अनुभूति नही है। बार बार मेरा उत्थान और पता हुला है।' पीच मे ध्यास बोल पड़े, 'मैने सप्न में भी नहीं सोचा कि आप श्रद्धेय ऋपिवर नारद हैं अयथा में इस अभद्रता से आपको सम्बोधित नहीं मरता।' नार? न सानुनय पहा, "यायोचित दण्ड ही था मेरे लिए आपका यह व्यवहार ' जो यक्ति छ' बनता है तो उसे कुछ बनना ही पता है। 24 महाभारत का मन
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ध्यास ने प्रेमपूर्ण आदर से कहा, 'या आप मुये मेरो धृष्टता के लिए
क्षमान नही दो"
नारद ने मानपूर पहा, 'इसमे थापका कोई दोप नही, Pान की कोई
वात नहीं। जो बनता है वह विगडता है । आमा तो अमृत है।'
नापि व्यास 1 एक शका प्रस्तुत की, 'आपरा क्यन मि फ्लन्याय में
अक्षरश सत्य है । फिर भी आप से एक प्रश्न है। क्या एक मामला
की के रूप में अवतरण सम्भव है ? और, क्या यह जम बोरम में
विनिर्मुक्त नहीं होता? यदि हां, तो आप जमे ब्रह्मविद् वा मम योर
पुनज म ये कालचक्र मे पुन क्यो आना पड़ा
नारद न स्पष्ट कहा, 'पूण मानव परमात्मा हीन, नर दिद
मुक्त है । ये पूण मानव ही अपने अहकार ज य मनान arr
रहता है
"
। 'यदि मैं पूर्ण होता, तो आप मुझे पीट योनि में इस प्रकार रेंगते हुए नही पाते। क्या यह स्पष्टीकरण सतोपप्रद नहीं है स्वस्थ भाव म व्यासजी ने फिर प्रश्न किया, 'आपये वचन निस्स देह स्पष्ट हैं, पर पूर्ण मानन के क्या लक्षण हाते हैं नारदजी ने कहा, 'अहवार से सवथा प्रिनिर्मुक्त एणमानव म, 'मैं, मेरा, तेरा, उसका' नहीं होता। इन मावो मे पाशविकता की पलक होती है, स्वाथ और सकीणता की दुग घ थाती है, यह अपूर्ण मानव की छवि है। अपने आपको अय पावन भक्तजनो की तुलना म थेप्टतम और पृथक् घोपित करके विष्णु की विद्यमानता मे मने मेरी अपूर्णावस्था का ही परिचय दिया था । तदथ ही मैं इस कीटयोनि में उनके द्वारा अभिशप्त होर आ गिरा।' 'तो क्या इस स्थिति से वचार सम्भव नहीं है?' व्यास ने पूछ ही लिया। 'है क्या नहीं है। यदि आप देव से प्राथना करें तो मैं पूर्ववद नारद बन सकता हूँ। आपसी कृपा से सब कुछ सम्भव है।' नारद में ये निघ्रवचन सुनते ही करणा पी मूत्ति व्यास ने परमात्मा स प्राथना की और कीट योति से तत्काल मुक्त होकर नारद अपने स्व स्वरूप में प्रकट हो गये। महर्षि व्यास और देवपि पारद परस्पर प्रगाढ प्रेम से गले लगे और मानव जीवन की पूर्णता और पावन गरिमा की छवि व्यास के अतेवासिया के मानस पर दिव्यादित हो गई। यह है मानर पा सत्य स्वरूप, जा व्यास ने अपनी काव्यकृति में सोदाहरण प्रस्तुत किया है । मानव, असीम सम्मावाओ का, नर देह में, पुन्जीत रप है जो पीट भी बन सकता है और कृष्ण भी। सम्भावनाओ को वास्तविकता म परिणित यरने की सारी सामथ्य मनुष्य के कर कमला और प्रना म प्रयोगाथ सञ्चित है । अत अपने हाथा और बुद्धि के समुचित विनियोग मे मनुष्य अपने भाग्य का स्वय निर्माण करता है। भाग्य को उज्ज्वतता और मिलता स्वय मनुष्य ये क्रिया-वलापा पर निभर वरती है । सच्चे पुरपाय गे पप्ण पद यो प्राप्ति प्रत्यय नर के लिए समय है, प्रमाद और गिया अकार से मनुष्य पीटतुल्य भी बन सकता है । सारत मनुष्य ये वम या गगग उरामे माग्य ये सम्पपा निर्णायक तत्त्व है। मनुप्पयानिमिछति सयभूतानि सवा । 1800पातिपय पशुत माय म यह राय मुछ है जो ब्रह्माण्ड गई। प्रतियापचलत्प, थामा मिसा यागु गा प्रसार अतिपात, जनया रग पृष्यी या 21 महाशTTI । अचलत्व, पेडा की फ्लमदता पुप्पो की सौरभ, पक्षिया की उहान, पशुआ वा पशुत्व, देवो की प्रकाशमयता एव प्रच्छपता, विपरो सो विच्छ आदि का जहर एव मारणशीलता, देहो यी मरणशीलता, तत्व की अनश्वरता आदि अनेकानेक शक्तियो का वीजपुज है मानन वह चाहे तो अपने मे मरण मारण शीतता के बीज का वृक्ष रप मे अपुरन विवसन कर सकता है, यह चाहे तो देवो का पान, मात्मा की अमरता, पक्षिया की उडान एव पडाी पलभदता को अपो जीवन में विकसित कर स्वय के और समाज के जीवन को उतत और समृद्ध कर सकता है। मानव मे सब विष वीज हैं । अपने व्यक्तित्व के विकास की दिशा व चरित्र के चयन गे वह स्वत नह। यह चाहे तो स्वार्थ सिद्धि एव दलगत उद्देश्या की पूर्तिका माग अपना सकता है, चाहे तो वह सवहितवारी स्व भी सर्वोपति का पथिय भी बन सकता है। स्वाथ के माग से सर्वाथ का माग अधिय हितकारी व मगलमय है, प्रथम सकीणता या माग है और दूसरा उदारता वा, विशालता वा निमकी परिणति सामान्य दृष्टि मे 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के आदश म होती है । मानव चौराहे पर सडा है । जैसे चयन वसा चरिम । जैसा कम वसा पत्र 'यपा कम तथा लाभ इति शास्त्रनिदशनम् अर्थात् जैसा कम किया जाता है वैसा ही लाभ प्राप्त होता है, यही शास्त्रा का निचोड है । अत क्मठता मनुष्य के उत्थान वा सोपान है । बम से हो मानव जीवन म 'जय' यात्रा पूर्ण होती है । 'यत म दक्षिणे हस्ते, जयो मे मव्य आहित'-याने, मेरे दाहिने हाथ मे कम है, और बाएं हाथ में जय पा निवास है । तात्पय यह है कि पुरुषाथ ही जय की अचना है, जय था परम पवित्र पाणेय है, मनुप्य के श्रेष्ठतर जीवा की जयमाल है। यह ह पुरपाथ धरातल पर व्यास प्रणीत मानव की गौरव गरिमा का नये सिरे से पुनप्रतिपादा। यह मानवीय जीवन में स्वातय दशन का शाश्वत आधार है। मनुष्य कम परने म स्वतन है, और वम ही मानवता का उपायक तत्व ह दायित्व भी सोद्यमी मनुष्य वा चिन्तन और चरित्र मानवीय गुणो का प्रतिनिधित्व परो वाला ही नहीं, अपितु प्रसवन करने वाला अविरल सात भी बा जाता है। स्वाभिमान वद्धिनी होती है उसकी सब प्रियाएँ प्रप्रियाएँ, वह प्रतिष्ठा के भाग से ही लामागन का प्रेमी और समथर होता है । अपने ही पुरुषाथ से हम्तगत जय व लाम के उपभोग मे उसका जीवन मनुष्यत्व को सुशोभित करन पाला मrय रहता है। यही मानवोचित स्वतत्रता और याय की सच्ची पसौटी', यही राही मानवताह यही पुरपाथ का प्राण स्पन्न है । मानव पा स्वरूप 27 पुरपाथ रो पराड मुग मनुष्य मानर बहलाने योग्य नहीं रहता है। जब ता मनुष्य इस जगत में जीवित है और उसके पास प्रति प्रदत्त दोपुले हाय है, उमे पुरपाथ के मार्ग पर मविवेक चनना चाहिए । पुरुषार्थी मनुष्य के जीवन में मवतोमुगी अम्युदय वा द्वार स्वत उमुक्त हो जाता है, यद्यपि वह फलप्रदा सिद्धि या मुसापेक्षी या आवापी नहीं रहता । लक्ष्य निर्धारण के बाद तमयता से, वारिढ हो जाता ही पुरुषाथ का स्वरूप है। पुरुषार्थी सी ऐसी उद्यमशीलता ही वेदव्यास का पाणिवाद है। शातिपन मे व्यास पाहत हैं कि जगत् मे जिन पाम दो हाथ है और जिनमे अपने इन हाथो से कम करने की रचि, लगन, निष्ठा और उत्साह बुद्धि है उनपे वार्यों मे सिद्धि या प्रसाद मिलकर ही रहता है। व्यास का वाह- महो सिद्धाथता तेषा येया सतीह पाणय । अतीन स्पृह्ये तेपा एपा सतीह पाणय ॥ नातिपय 180/11 इससे यह रिप्क्य निकलता है कि पुरपाय से मानव जीवन मे जय व सिद्धि का पथ प्रशस्त होता है और पुरपाय करने म मनुष्य स्वतन्त्र है। मनुष्य की स्वतत्रता मानर निर्मित सविधान या किसी प्रान्ति की देन नहीं है । यह तो सर्गिक प्रसाद है जिसके उपभोग का दायित्व एव अधिकार मनुष्य को जन्म से ही प्राप्त है। यत इस अधिकार की यत्नपूर्वक रक्षा करना मानव का धम है, परमदायित्न है । चूकि यह अधिकार मनुप्य मानगो जम मे ही प्राप्त है, अत स्वत प्रता मानर जीवन का एक ऐसा मूल्य है जिसकी पवित्रता प्रत्येक मानव को माय हानी चाहिए। जैसे दुर्योधन को अपनी म्बन नना प्रिय है वैसे ही अर्जुन और अन्य किसी मनुष्य को भी अपनी स्वत अता प्रिय है । इसलिए दुर्योधन को स्वत यता के उपमोग का उनना ही पावन अधियार है जितना अजुन को। तदथ दुर्योधन पर, अर्जुन की तरह, अपनी स्वत पता ये उपभोग मे दोहा दायित्व है समय की स्वत अता के साथ माथ अजुन मी स्वत त्रता की परिरक्षा वसा । मानव मात्र का यह अधिकारगत दायित्व तथा दायित्वगत अधिकार है कि वह अपनी स्वतता गौ रक्षा के माप माय अप मनुष्यों की म्वत त्रता की रक्षा हेतु त पर और राप्रिय रहे । स्वतंत्रता का स्वरूप मात्र वैयत्तिय नहीं, वैश्विक है। पारस्परियता की भूमिका म सजग और प्रियाशील मनुष्य ही स्त तारे मौषित और नसगिर मूल्य का महत्त्व जानता है । मनुष्य की घेप्टरारना योर गौरस गरिमा इसी महै विवह स्वतत्रता के दरा वैश्विक महाभारत का अप 28 स्वरूप का वोधयुक्त आदर करे। महर्षि व्यास के पुरुषाय समवित पाणिवाद के जगि नाग १प मे ही मानन स्वतनता के शाश्वत मूल्य की महिमा का मानवीय रुप विकसित होता है। मानव सातव्य की इस अभिव्यक्ति और अभिरक्षा म हो मनुष्य की अस्मिता का समादर है। जीवन के शाश्वत मूल्यो का आदर परना ही धम ह । घम से मानर ही नहीं, अपितु जगत् और जीवन के सारे पदाथ और प्राणी जव व्यक्ति द्वारा समाहत और रक्षित होने लगते हैं, तो मनुष्य की स्वतन्त्र अस्मिता म से प्रेम और अहिंसा के मूल्या या सहन प्रकटन होो लगता है । शाश्वत वही है जो सत्य है, सत्य का से, अबाधित होता है, यह सदा से है । सत्य 'था' और 'हागा' की क्रियाम नही व घता। वह निरतर है, उसके सनातन प्रवाह को जानने, उसम जीने वाला मनुष्य ही श्रेष्ठ है, काल से अमलक्ति है, निमल है, मुक्त है । मुक्त मानव नर देह म नारायण है । यह स्वय तो मुक्त है ही, वह उनको मी स्वतुल्य मुक्त होो की कला दे देता है जो उसकी सनिधि मे सयत अत करण से शाश्वत जीवन जीने को निमल आकाक्षा से आ बैठता है। पर तु ऐसे महत जन अत्यात विरले होते हैं । कई जन तो अपन पाणिवाद पा, अर्थात् मुक्त हस्तशक्ति या प्रयोग मात्र अपने स्वात न्योपभोग के लिए नहीं अपितु दूसरा को इसी स्यात त्र्य अधिकार से वञ्चित करन के लिए करते हैं। स्वय स्वतत्र रह कर दूसरो को अपना दास बना देते हैं । इस तथ्य का उद्घाटन मनोविद् ध्यास ने शा ितपब के 'माक्ष धम नामव' 180 वें अध्याय म बडे वलात्मक ढग से किया है-- पाणिमातो बलमतो धनव ता न राशय । मनुप्या मानुपरेव दासत्यमुपपादिता ॥ 1803 अथात्, 'जिनके दाना हाथ है, निस्स दह व हो बलवान और धनवान हैं । मनुष्या पोता मनुप्यो न ही दास बना रसा है।' मनुष्य के हाथ म अपार पल और धन-सामय्य का अचिरल सोत है। परतु जब स्व यल और धनशक्ति रूपी स्वतन सत्ता का दुरुपयोग किया जाने लगता है, ता मनुष्य अपने ही समान मनुप्या पो, जा उनसे वस और धन में तुलनात्मपतया यमजार हात है। अपने माता के प्रभाव से पराभूत कर देने है । मनुष्य मनुष्य द्वारा दास या लिया जाता है। यह मानव समाज म मत्स्य याय या चलित रप है, पशुन का परिपाया है, नराधमता या उदाहरण है। स्पष्ट र, माराव पे दा रप है उत्तम और नाम । उत्तम स्पनारायणल पासोपानर और अपम स्म पर नर पशु बना देता है। महाभारतार मानव स्परप 29 न मानर ये इन दा रपा वादा मिन मूल वारे जीवन तरलो यी उपमा दपर काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है। नर ये उत्तग स्पको धद याम ने 'घमद्रुम' की प्रतीकात्मक समारो व्यक्त किया है और नर के अधम स्प को 'म युद्रम' के प्रतीक से । घमाम के सम्म च म महाप व्यारा या वचन है-- युधिष्ठिरोधममयो महानुम म्य घाऽर्जुनो नीममेोऽस्य गासा। माद्री सुता पुष्पफले समृद्धे मूल कृष्णो ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च ।। या पव 1111 इस धममय मानव महावृक्ष के मूत म अव्यय बीज रूप से स्वय नारायण विराजमान हैं जो साक्षात् ब्रह्म ह और जिनका साक्षात्कार जाह्मणो को हाता है । ऐसे कृष्ण मूल पाले महाद्रुम की युधिष्ठिर वो सज्ञा से प्रसिद्धि है, अजुन इस वृक्ष का तना (स्वघ) है और भीमसेन इसकी शासाए हैं, इस वृक्ष पर लगने वाले फल और फूल माद्रीसुत नयुल और सहदेव हैं । अय शटी मे, परात्पर परब्रह्म के प्रति जिस मानव के अतस् मे अक्षय प्रेम, सजग विश्वास तथा अगाध श्रद्धा ह तथा ब्रह्मानिया और ब्रह्मरूप कृष्ण म, जा नर रूप में नारायण ह उतनी ही गहन प्रेममय आस्था है वह धममय महाद्रुम है । महाभारत मे युधिष्ठिर इस घमतरु का साक्षात् स्वरूप है । वृक्ष के तने के रूप गर्जुी ह । अर्जुन सरन, श्वेत और सीधे को कहते हैं । नजु भाव वाले जर्जुन का साहचय नित्य कृष्ण के साथ ही है । अर्जुन 'नर' है, और कृष्ण नारायण । नर नारायण का नाडा है। अव्यय वीज नारायण ही नर रपी तने मे विकसित हुआ है। अजुन कमी कृष्ण से भिन नही हा सकता। इस तमय रूपी अर्जुन स ध पर ही अतुल बलशाली शाखाएं फैली ह, जि ह व्यास ने भीमसेन को सज्ञा दी है । इस महाद्रुम पर जो पुष्प और फ्ला की समृद्धि हुई ह उसे व्यास न 'माद्रीसुतौ' नाम दिया है । अत इस धमवृक्ष के पाचो पाण्डव ही भग पत्यग बने हैं। वीज वृक्ष याय से कृष्ण ही पाचा पाण्डव समेत युधिष्ठिर नामर घममय महावृक्ष बने है। यह सवविदित है कि वीज म वृक्ष सोया रहता है, पर तु अनुकूल भूमि, पयाप्त जल और सूयताप मिलने पर वह जागृत और शिवसित हो जाता है। योज ही वृक्ष बना है। दो अद्वय हैं एव हैं । उसी प्रकार पर और नारायण एक ह परतु उनकी प्रतीति की पूर्णता तभी होती ह जन धममय जीवन यापन की पराकाष्ठा म र नरोत्तम से नारायण हा जाता है । नर म नारायण तत्व या साक्षात् दशन व प्रकटन ही मानव जीवन की तरुणाई तिवृत्यता है परिपूणता है । महाभारत म 30 महामारत वा अथ पणित मनुप्य पी जय यात्रा के प्रतार सार को विञ्चित हावी इस बीज वृक्ष याया तगत विष सित धममय महाद्रुम में अवलोरनीय है। मानव जीवन मे धममय तत्परमा विकास इतना सहज नहीं है जितना सामा यतया समझा जाता है। महात्मा गाधी या गुणगान परला उता पठिा नहीं है जितना महात्मा का जीरन सपप रहा था। सत्य और अहिंसा पी दुहाई देने मात्र से, चाहे वह पितन ही सुदर आर समीचीन शब्दो म समय समय पर की गई हो, कोई व्यक्ति या रास्थान सत्यनिष्ठ और महिमानिय नहीं हो जाता ह । गाधी की तरह इन उनत जीवन मूत्यो की वलिपदी पर सप जाना पड़ता है। स्व यासपी बलिवेदी पर पोछावर परते करते उस स्वमय सब को गी'तत' Tी परात्परता म होम देना पडता है । जिस मर का जीवन नरोत्तम' यन की और तदन तर 'नारायण यन की पूर्णाहुति बन गया है, यही घममय महावृक्ष डा स्वानुभव से प्रामाणिक अचन-आलाचन परने का सही अधिकारीह । उमी व्यक्ति यो अभियक्ति । महाभारत म पणित मनुष्य को जय यात्रा। पौरव पाण्डवो मा भयर विनाशकारी पुरु क्षेत्र का मीपण भ्रातृ महायुद्ध निस्स देह एक ऐतिहासिव पटना थी निरागी पाच्याभिव्यक्ति मात्र वेदव्यास या महत्त प्रयोगन नही हो सयता प्रत्येक युग म, हर देश व समाज मे, यहां तक कि प्रत्येक मनुष्य पे जीवन म 'महाभारत घटित हुआ है, होता है और होता रहेगा-इमीगभीर मानवीय सत्य की सौ दयाभिव्यक्ति महर्षि व्यास ने अपो इस महावा य मे यी है, एसा स्पष्ट प्रतीत होता है। सब मानव न सदा पुरे होत है, न सदा अच्छे । परतु मुछ मनुष्य ऐसे अवश्य होत है जिहें अच्छा पहा जा सकता है, जो वस्तुत अच्छे ही होते हैं, कुछ ऐसे भी होते है जिह बुरा कहे बिता रहा ही नहीं जा सकता क्योकि उनके जीया-चितन जोर व्यवहार में अच्छाई की झलक भी नही दिसती, परन्तु वे सग्या म, सम्पत्ति मे, शक्ति और सामथ्य आदि म इनो बली, कठोर और अमानवीय होते हैं कि उनके विरोध म अगुली उठाता दूर, चर्चा भी कराा आपति और सफ्टा को स्व जोगा में निमन्त्रण देने ये तुल्य होता है । ऐसे आततायी नृासवादी, अ यायपूण अन्य जनो के अधिकारी या अपहरण एव हान करने वाले व्यक्तियो का-चाहे वे कितने ही वली और अधिक क्यो न हो-सत्य और मानवीय याय के धरातल पर सडे होकर- विरोध करने वाले लोगो ये जीवन यो व्यास ने 'युधिष्ठिरो घममयो महाद्रुम' को सज्ञा से अभिहित करके मनुष्य के एव श्रेष्ठ रूप का चित्रण किया, परतु उन भाता और अ याय, अनाचार और अमानवीय विचार एव आचारो को मानववा स्वरूप 31 1110 पुष्ट और व्यक्त करने वाल मनुष्यो का व्यास से 'दुर्याधनो मयुमयो महाम' के विशेषण से नामाक्ति एव चित्रित किया है। 'म युमय महाद्रुम मानव या अधम म्प ह, जिसमा महपि न मना वैज्ञानिक ढग स काव्यशैली में प्रतीक्वद्ध चित्रण किया है । वे पहत है- दुर्याधना मयुमया महाद्रुम सच कण शकुनि तस्य शासा। दु शासन पुप्पफल समृद्ध मूल राजा वृतराष्ट्राऽमनोपि॥ आनि पर अयात्, दुर्योधन नामव मयुमय महावृक्ष है जिसरा तना कण है, शकुनि शाखा है, दुशासन उसका समृद्ध पुष्प फल है और अमनीपि (अविवकी) राजा धृतराष्ट्र उसका मूल है, यान जड है । 'म युमय महाद्रुम' वह है जिसम दुधिन को मायता प्रदाा करन वाली समस्त वृत्तियां विकसित होती ह और पोपण प्राप्त भरती हैं। पाम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, द्वेष, मिथ्या अहमाव आदि मावो का अविरल स्रोत है मयुमय महाविटप। इस का मूल है अविवेक जिसका प्रतिनिधित्व महाभारत मे राजा धृतराष्ट्र कर रहा है। अज्ञानमम बीज स नियासित और विससित वृक्ष, प्राधमय मनुष्य जीवा तर ही हो सकता ह-बीज वृक्ष याय से । बबूल का पैड सगान पर बब्ल ही तो बनेगा, जिसम काट अधिक और छाया क्म होगी। मन्युमय जीवन भी एसा ही हाता है। इस पड यो सनिधि में समानधर्मी पेडो का ही बाहुल्य होगा। क्ण ऐसे पैड का तना होता है, जा स्वय की अस्मिता के रक्षणाथ दुर्योधन को मयुमयता का ही सहायय सग स्वीकारता है और अपनी असलीयत को पहचानने के बाद भी, कि यह सूयन दन कु ती सुत ही ह वह अश्विक जय दुर्योधन तर वा स्वध ही बना रहता है, जय कृतज्ञता के घम को लेकर। इस तन पर जा मद मात्सय का भ युवृक्ष बढा उसकी शासाओ मे शकुनि के छलछद्म का रस प्राघाण्य रहा । इस वृक्ष पर लगने वाले फा पूना को समृद्धि को व्यास ने 'दु शासन कहा है । अथे, अविवेकी धृतराष्ट्र रूपी बीज म से पनपने वाले वृक्ष पी जीवनयात्रा दु गासन स्पी जीवन पुप्प और फ्ल व अभ्युदय म हुई। जिसके जीवन म अमनीपिपना या मूलमत्र हो अर्थात अपने मन पर ईगल कर सक्ने को दुवलता का बीज हो, उसका जीवन कणावलम्बी याने परावलम्वी होवर गवुनि रूपी छलछम से अपने थापका अथवान समझता हुआ दु शासन की भुजाआ पी तरह थर पर गोरसहीन और हतभाग्य ही हो सकता है । यदि वृतराष्ट्र अपनी मातीपा 32 महामारत वा यथ + सदुपयाग स दुर्योधादि अपने पुत्रा म आसक्ति न रराकर सत्यावलम्बा ये अबुरा से दुयाधन यो स्वशी बना रता या उसके बचपन पाल मे ही विदुर ये परामश का आदर पर उसवा सग त्याग कर देता, तो विपदान, लाक्षागृह दाह, द्रौपदी चीर हरण आदि अमापीय और न्यायपाती दुष्काय दुर्योधा समनतया न कर पाता और रवा के पुल पा क्षय भी नही होता। अपियपी जीवन गालाभिमुस हारर विनष्ट हो जाता है और विवेमागियो को जीवन यात्रा का भी सक्टापन और स्टवायोण बना देता है । यह दूसरी यात ह कि नारायण यात्रा ये पथिय राजग और सावधाा होपर अपनी जीवन यात्रा म आने वाले रिघ्नो काधेय और माहम के साथ उल्लया फरत हुए अपने लक्ष्य को पूरा कर ही लेते हैं। जयमाल उही के गले मे पडती है। महाभारतमार पहत हैं- 'यतो कृष्णस्तताधम । यतो धमस्तता जय ।' पुरुषाथवामी मनुष्य का जीवन तरु श्रीकृष्ण प्राप्ति ये मूल सकल्प ये अव्यय वीज से बढ़न वाला धममय महावृक्ष होता ह आर पदाथ और सत्ता- वामी मनुष्य का जीवन तरु अमनीपा के अघवीज से बढो वाला मयुगय महावृक्ष होता ह । दाना महाद्रुम है, छाटा वाई नहीं, परतु तनिव तुलनात्मक चितन से स्पष्ट लगता ह कि म युवृक्ष को जड कमजोर है और धममय वृक्ष की जड़ एकदम सुख और परम्परा के जलामृत से निरतर सिञ्चित रहती है । ग्रोध स्थितिमय होता है और नाधामि यति विरेक थे लोपबिदु का प्रती है। क्रोध वा माग छलछिद्र का माग है और जब तय श्रोधी व्यक्ति की अभिलापा पूण नहीं होती, यह विवेक साम्राज्य पर अचित्य चालाकी व पड्य त्रवारी मनावृत्ति से प्रहार पर प्रहार किये जाता है । श्रोधी की आयामकता धम वे परिवेश को धारण कर के मो अमियजित होती है और धम की ओट ये भी। अत दुर्योधन को व्यास ने 'म यु वृक्ष मे ही कहा है 'अघम' वृक्ष नहीं, क्यापि सवथा धमविहीन कमी कोई मनुष्य नही हाता । डाकू भी पूजा करता है देवी जगदम्पा की और शाक्त भी कल्याणाथ उसी देवी का पूजता है। लभ्य भिन्नत्व से मनुष्य का व्यक्तित्व परस्पर विरोधी गुणो वाला लगता है । दुर्योधन धम से अनमिन नही है, वह धम के मम का जानता है पर उसपे जीवन मे धम की अभिव्यक्ति होती हुई दिखाई नहीं पडती, वह अधम के स्वरूप रो भी अनभिज्ञ नहीं है, पर उसके क्रिया कलापो से, व्यक्त विचारो से अयायोचित और अधमजय व्यवहार ही की अभि- व्यक्ति का अधिक परिचय मिलता है, न कि मानवीय प्रेम और व घुत्व का। स्वय दुर्याधन निस्साच कहता है- मानव का स्वरूप 33 जानामि घम न च मे प्रवृत्ति, जानाम्यधम न च मे नित्ति । केनापि देवेन हृदि सस्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा परोमि ।। अथाव, 'मैं धमका जाता हूँ, परतु मेरी गति और प्रवृत्ति धममय जीवन मे होती ही ही, मैं अघम पो भी जानता हूँ परतु अधम से मेरा मन निवृत्त नहीं हो रहा है, छुटकारा नहीं पा रहा है । (मैं क्या करूं। ) कोई दव मेरे हृदय म बैठा हुमा है, यह जैसे मेर मा को नियुक्त करता है, वैसा मैं करता पसी छलपूण उक्ति ह दुर्योधन की जानते हुए भी वह घममय व्यवहार नहीं कर मयता, उसके आचरण मे अधम की प्रधानता है, परतु वह भी धमन की तरह वाणी का प्रयोग करता है कि वोई हृदयस्थ देव जैसे कराता है, वैसा उससे होता है । इसमे दुर्योधन का क्या दोप है | पत्ता भी तो नही हिलता परमेश्वर की इच्छा के बिना, उसकी क्यापिसात है कि वह स्ववश होकर कोई स्वतन काय कर सवे । दोष दता है तो देव का देवो, दुर्योधन को नहीं। सदापत एक निष्णात मनोविद् की तरह महर्षि व्यास ने मानव के स्पद्वय का समास शैनी मे सुदर चिन प्रस्तुत किया है । सारी मानवता इन दो वृहत् रूपो मे ही विभाज्य है मयुमय मनुष्य के अधम रूप मे, और, धम मय मनुष्य के उत्तम स्प म । मजे की बात हवि योरपीय वो मेप की आधुनिक धारा म प्रवाहमान इग्लैण्ड के तनाली साहित्य सम्राट विलियम शेक्सपियर ने भी अपने विश्व विग्यात नाटको म मानव ये दो ही भूत स्प प्रस्तुत किये हैं देवतुल्य मानव जो विकास की बात क्षमताआ और सम्मावनाआ से परिपूण ससार की सर्वोत्कृष्ट कृति है, और दूसरा वह गर्वीला मयुमरा मानव जो अपने क्षुद्र स्वार्थों की सिद्धि हेतु एस 'कुपित यपि यी मांति ऐमा पशुपत् व्यवहार कर गुजरता है जिससे मागवता पराह उठती है और सभ्य मााव जीवन के नैतिर मूल्या एव आदत या भीषण आगो लगती है। 'हेमलेट' TIमर प्रसिद्ध नाटयरति म उहान 'दयतुल्य गानय का गूल्म और सारा चित्रण किया है- "पितनी उत्कृष्ट प्रति मानव । पिता निमल पिवे उसया। क्षमता म है रितना अनन्त । पितारपटार नाघ्य र आमार गुण और गम | 34 महाभारत पाय विता प्रसादमय देवदूत-तुल्य कम बाल मे शात मे ठीक वैसा, जैसा है भगवाह । कितनी सुदर ह मानव को अवधारणा जिसके श्रेष्ठ स्वस्पमा मात्र काल्पपिप चित्र ही शेक्सपियर महोदय प्रस्तुत कर पाये है । तत्कालीन समाज मे सम्भवत ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं था जो इस देवतुल्य मनुष्य का जीव त उदाहरण दे सके । ठीप भगवान जैसा व्यक्तित्व व्यास के महाभारत म श्रीकृष्ण और कृष्ण द्वैपाया का था। परन्तु 'कुपित कपि' के समान मनुष्य की निकृष्ट छविया से तो शेक्सपियर का साहित्य मरा पड़ा है । मानर के अधम रप वा मनावज्ञानिक आलोचनात्मय विवरण उहाने स्पष्ट रूप से 'मेजर फार मेजर' (Measure for Measure) नामक नाटक म इस प्रकार से दिया है- 'परतु मानव, गर्वीला मानव अल्पकालीन सत्ता मे अनुवेप्टित, समाधिय जन ह जिसमे वह अत्यधिर आश्वस्त है, पण तुत्य सार उसका, एक पुपित पापि की तरह उनत म्वग मे अठखेलियो मयुमय करता एसी मि आँसू बहायें देवदूत भी देख उह।' यह है शेक्सपियर द्वारा प्रस्तुत मानव का पाशविक स्वरुप मनुष्य के परस्पर विरोधी गुण धम वाले देवी और दानवी स्वरप ये कारण मानव जीवन अत्यन्त रोचा, अतीय द्वद्वात्मय एव दु समय, एपदम अथपूरित और महत्त्वपूण वन जाता है । परतु इस पिपादमय वैचित्र्य की अनेकता ये पर्दो ये परे एक गह्न तथा व्याप समवय के ऐक्य का आन दमय अस्तित्व है । मनुष्य पूणस्पेण स्वत न है अपने चयन म, वह चाहे तो अनेकता के वैपम्य पथ को अपने जीवन का सुसस्रोत मान सकता है, यह चाहे तो अनेकता में एकता की शाश्वत शोध के माग का आन ददायी शात जीपन प्राप्त पर सवता 1 अनेक्ता का माग नाना नाम-रूपात्मय पदार्था या माग है, जिस पर काल का शासन है। इस शासन के नागरिव ही शन शन नियतिवाद के शिकार हाते हैं । परतु एतत्व रे सत्यागुगामी आत्मानुशासन द्वारा जीवन मे सच्ची स्वतत्रता का उपयोग करते ह और उनके इसी स्वात य दशन या व्यवहारिक रूप है समत्व को सामाजिक जीवा म प्रतिष्ठा । यह मोक्ष का माग है। दुर्योधन महावृक्ष मृत्युमयता या वापर है और युधिष्ठिर महावृक्ष मृत्युञ्जयता था। मनुष्य स्वतत्र है पो जीवन तरु यो कालमयी या सात मानवदा स्वरूप 35 जयी बनाने म । महर्षि व्यास स्पष्ट बहत है कि 'इद' वाच्य सारा प्य जगत् कालाधीन है, वह 'इद सर्व' को जड है, कात ही अपने बस मे करके उसे (इद को) हडप लेता है। कालमूलमिदसवं जगद्वीज धनन्जय । वाल एव समादत्त पुनरव यहच्या । -मौरापर 813 इद' सव का इप्टा एव माता शुद्ध अहम्' कालाधान नहीं है । यह 'अह' विश्व की आत्मा है, एक, अखण्ड, चि मय समरस, स्ववश और अकाल । समस्त शास्त्रो और वेदा मे यही जानने योग्य है, यही वेद और वेदविद् और वेदकृत् रूप मे प्रक्ट हाता है । स्वय व्यास वे परम वचन है-- सवस्य चाह हृदि सनिविप्टो मत्तो स्मृतिज्ञानम पाहा च । वेदैश्च सर्व अहमेन वेद्या पदातद्वैदवि देव चाहम् ॥ --भीष्मपद इस 'अहम्' का अपराक्षानुभव ही युधिष्ठिर नामक धममय महाद्रुम पर लगने घाला समद्ध पुष्पफ्ल है। धममय जीवन के निर्माणाथ सत्य मापण इद्रिय निग्रह और तत्परायणता अनिगाय है । यह वेदविज्ञान का रहस्य है । वदस्यापनिपत्सत्य सत्यस्योपनिपद्दम । दमस्यापनिपद्मोक्ष एतत्सर्वानुशासनम् ।। शाप 299 13 यह महाँप व्यास ना जुवाद ह । अजुन की तरह ऋजुभाव से सम्पन्न होकर ही कृष्ण की प्ररानता प्राप्त की जा सकती है । ऋजुता के आपादनाथ ही यह पाथेय है वेद का सार (उपनिपट) सत्य (मापण) है, सत्य का सार सयम (दम) है गयम का सार मोक्षह-जीवन की पूणता, स्वातन्य और समत्व या अद्भुत जीवन । यह आत्मानुगासन सवये लिए है। मानव मात्र इम अध्यात्म स्वातन्य और समता या जम से ही अधिकारी हैं। इस अधिकार के उपमोग-अनुपमाग में वह सबके समान है, पूण स्वतत्र है- चाह वह राबाट जनय हो या सुदामा, अर्जुन हा या एक्य राजा परीक्षा हो या बालमुनि यासनदा गुरदेव ! यह आत्मानुशामन ही तर म नारायणत्य के प्रकटा की भूमिरा तयार करता है, मानवीय गुणा से उसे विभूपित यरता है तत्र जीपापी श्रेष्टाम दीशित करता 36 महामारत राजध महाभारत मे इस आत्मानुगासन को ही धमद्रुम को सज्ञा से अभिहित दिया गया है । इस धमतर के मूल में समानता का उद्घोपक- 'समोऽह सवभूतेषु न मे द्वेप्योऽस्तिन प्रिय'--स्वय कृष्ण है । इस समानता के अव्यय वीज-निधान बीजम ययम्'-मे से ही स्वतत्रता वा मानवीय गुण अर्जुन रूपी स्क ध मे प्रकट होता है । समानता ही मानवीयता का नरोत्तमता वा, मूल आधार है और स्वत पता उसका प्रत्यक्ष जीवन । अत समानता और स्वतत्रता मानव के नैसगिक दायित्व हैं, और इन मानवीय दायित्वो का उल्लघन करता है--- चाहे वह उल्नधन धर्म की ओट म हो अथवा अधम- जय-यह म युमय दुर्योधन है और उसका प्रतिकार करना स्वतनता-प्रिय प्रत्येक मानव का परम दायित्व है । अर्जुन ने दुर्योधन की मयुमयता वा खुल- कर विरोध किया क्योकि कोरवा ने मिलकर छलछा और अयाय से पाण्डवो वे स्वतत्र जीवन एव उनके अस्तित्व को समाप्त पर देने के लिए नानाविध पट्य न रचे थे । स्वतनता का अपहरण उतना ही घोर अयाय है जितनाति उसे सहन करना । अत स्वत अता के मानवीय जीवन की पूर्णता हेतु दूसरो वो स्वतत्रता को मात्र मायता प्रदान ही नही करना है, अपितु उसके रक्षण और पोपण के पारन दायित्व को गिभाना महाभारतकार का स्पष्ट मतव्य रहा है जिसकी पुष्टि घमराज युधिष्ठिर का राजसूय यत करने हेतु परामश दान से होती है। स्वत बताये इसी रक्षण-पोषण के मूल में समानता ये तत्त्व एव अधि- पार वा दशन होता है । कृष्ण दृष्टि मे सब समान है, कृष्ण दृष्टि आत्मष्टि पा पर्याय है-'अहमात्मा गुडापेश सयभूताशयस्थित ' (गोप्मपय) । व्यास कहते हैं कि समानता को मानव घम वा मूत माने पर स्वतत्रता मागवता पा स्तम्भ बन जाती है । हम सबको अपने विचार, विश्वास आदि मे स्वत प्रता अतीव प्रिय है। मा दूसरा को मा यताओ और उनके चिता पणा के प्रति बादर युद्धि हमें रसनी चाहिए । स्वतता सबवे लिए है और इसमा प्राण- तत्त्व यह है कि 'जो स्यय ये प्रतिकूल हो वसा याचरण हम दूसरा पे तिये | पर'-आरमा प्रतिकूलानि परेषा 7 ममाचरेत् । इसी से मनुष्य के वैयक्तित और लोक्जीवन मे स्वत पता जय पल्याण की प्राप्ति होती है। वे रहते हैं- 'मनुष्यतोवे यत् येय पर मये युधिष्ठिर'(पनपय 183 88)हे, युधिष्ठिर? गनुप्पलोय में जो पल्याण है, उसी को मैं श्रेयस्कर, एक उत्तम मानता है। स्त त्रता हो, जो समााता ये मूल बीग से उत्यित एव प्रवटित हो, मनुष्य जीवन गौर गाायता रे पन्याण की सबसे बडी विभूति है। थत महागारतरपी प्टि में माप वही है जिसमे चिवन गौर 7 मानव रास्वरूप 37 - चरित म समताका दशा हो और स्वत अता पा सहितकारी व्यवहार विलोमत जिस व्यक्ति व समुदाय पे चितन और चरित्र म समता के दरान के स्यार पर अमनीषा जय विषमता का स्वाय परक दशन हो और स्वतत्रता के व्यवहार के स्थान पर स्वय को स्वतन्त्र समृद्धि हेतु अय व्यक्तियो य समुदाय के स्वतत्र जीवन की समृद्धि पर मयुमय प्रहार व कुठाराघात करने याला अमानुपीय एप विवेवहीन व्यवहार हो वह व्यक्ति 'भाव' नही है और यह समुदाय 'मानवीय' रही है । सारत व्यास की दृष्टि म न तो मानव या अभ्युदय समाज में अभ्युदय की पलिवदी पर समय है और न ही समाज अपने उत्थान हेतु मानव के बयक्तिक स्वातत्य एव अभ्युदय की यवना बर सकता है । दोना या परस्पर अमिनत्व है मानव के व्यक्तित्व का सर्वागीण विकास ऐसे सामाजिक सुयवस्थापन गमाव म सम्भव नहीं है जिसम समत्व दान और स्वातत्र्य जीवन की मानवीय प्रतिष्ठा न हो, पारम्परिवता ये आत्मीय विस्तार का नाम ही धर्म है, और पारस्परिकता के अनात्मीय सकोच काम अधम । घममय जीवर प्रेम से परिपूण सयहिन की कामना का पापक रहता है, अघममय जीवन मयुमयता से सिक्त स्वहितकारी गतिविधियो की पडमात्र कारी नित्य यी सरचना परता रहता है। निष्पपत , व्यासानुसार जीवन म दा मूल प्रकार के मनुष्य हैं और दो हो प्रधान जीवन-पद्धतियां है । मनुष्य या तो धममय है या 'म युमय', और मानव जीवन के मूल्य इही दा प्रकार की दृष्टिया से प्रादुर्भूत मूल्य हैं जिनमे मेल कम और सधप ज्यादा है। धममय दृष्टि से सृष्ट पुष्ट और रक्षित जीवन मूल्या म समता ज य स्वत अता की प्रधानता है, जिसके वाचित सरक्षण जोर सबद्धन हेतु सवम्व यौछावर करने के लिए पटिरद्ध मनुष्य ही वस्तुत मानव का श्रेष्ठ स्वरूप है । स्वत प्रता के रक्षण म ही मनुष्य की गौरव गरिमा है, मानवीयता है, उसके लिये कितना ही महगा मूल्य उस वया न चुकाना पड़े। मयुमय दृष्टि से पोषित और रक्षित जीवन मूत्या म जितना ध्यान अपने सुख और अपनी स्वाधीनता व समृद्धि या रहता है उता अन्य व्यक्त्यिा की यायोचित व सुग्व-स्वात य समृद्धि पर नहीं रहता, इतना ही नहीं अयजनो पो स्वतन्त्रता और समृद्धि के अपहरण से स्वय पे मुग और महकार का पोपण होता हो तो वह विसीम्न म अधम योटि के जीवनघाती पडयत्रो की व्यूह राना परने मे भी रावाचशीत नही होता। प्रमगवश, इम महत्त्वपूर्ण तथ्य साध्याागे रखना जरूरी है वि कौरवा का पक्ष अधर्म और अयाय का पक्ष है उस समधर मीम और द्रोणाचार्य जंगे मतिरपी योर महारथी हैं व सत्या मनत्यधिक और उसको रोय शक्ति मामरिय प्रहार की दृष्टि से बेजाड - 38 महाभारत पायथ है, और वे युद्ध करने पर उतार है तथा सगठित । परतु पाण्डव सरया मे अत्यत कम और सैय दृष्टि से अपेक्षाकृत अल्पवली होने के साथ साथ असग- ठित है, उनका पक्ष धर्म चौर याय का पक्ष है और वे युद्ध नही चाहते वर समस्या यो वीच वचाव एव वार्ता के माध्यम से हल पर लेना श्रेयस्कर समयते हैं। इतना अवश्य है कि सत्य और धम, मानवीय स्वत अता और याय की प्रतिष्ठा हतु तथा उत्तम जीवन के मूल्यो की परिरक्षा हेतु वे सव कुछ न्यौछावर वरना अपना परमदायित्व स्वीकारते हैं । इरा दायित्व पालन की मानवीय प्रक्रिया मे ही होने परवी द्वारा उत्तेरित और आरोपित युद्ध को, औचित्य की दृष्टि से स्वीकारा और श्रीकृष्ण के सरक्षण व निर्देशन म यह सिद्ध करने कि धम व याय के पक्ष की ही अततोगत्वा जय होती है, चाह वै एकाकी और मरपसरयक ही क्यो न हो उहान मानवीय जीवन के उच्चतम आदर्शों और नतिर जीवन के मूल्यो को मशात तो उन्नत एव प्रज्वलित रसा और उसका यह परानम युगयुगातर मे युवा-पीढी के चितन- शील, नैतिर मूल्यो के नेतागो को उस मशारा की लौ यो प्रदीप्त रसने वी प्रेरणा प्रदान करता रहा है। महामारत मे वणित कौरव पाण्डसे ये भयवर विनाशकारी युद्ध मे इन दो जीवन मूल्या के भीपण सधप या उत्कृष्ट दशा होता है, पिसम अततोगत्वा मालवीय समता जय स्वतत्रता के पक्ष की विजय होती है। पाण्डवो की जय मानव स्वात य के सत्य की जय है, धम की जय है, माायता की जय है। माविनास्वरूप 39 द्वितीय प्रकरण 'नच कश्चित् शृणोति माम्' मानव जीवन मे मूल्यो का सघर्प सतन है मानव जीवन विकास की अन त सम्भावनालो और मामथ्य के त तुओ से निर्मित एक ऐसा ऊर्जा पुन्ज है जिसके सम्यक समित सचालन से उन सम्भाव पाओ की उत्तरोत्तर पूत्ति और उस सामथ्य का प्रमश अभ्युदय और वद्धन विकासो मुखी जीवन धाराम अनुभूत और सपादित होने लगता है। इस मयमित गचालन मे ही मानव जीवन की पूर्णता व साथकता है, जीवन में जय वा उद्घाटन है नर की नरोतम मे और नरोत्तम पी नारायण में प्रमिक प्रतिपरा है। इस सचालन शक्ति वा अक्षय स्रोत मानन की अडिग घमनिष्ठा है। घम ही, व्यासानुगार, मानव और मानवता के चरम विकास का सनातन मूल्य एव माग है। विपरीतत धम पिराध एव धम की अवज्ञा का माग मानव और मानवता के विनाश पा राग युक्त मोह माग है। मनुष्य माग चयन यह दो। म स पिगी एक माग का मुसापेक्षी हो सकता है। विकास के घममय माता माग मे मयम द्वारा जीवा को मयादित करता हुआ मानव अपने वयत्तिव जीया में आत्मोदय और सामाजिव जीयन म हितयारी प्रेरणाओ और भगतमयता के सामूहिक तथा सहकारी मष्ठान वा प्रवत्तन कर सकता है। और इसके विपरीत वह वेवर वैयक्तिर अभ्युत्थान एव गौरवाजन हेतु पाम मोघ तथा सोम से निर्मित गर्थीला धमविरोधी माग का अवलम्बन पर "विविष नरपस्येद द्वार नाशनमा मन 'वारे स्व और स्व समथकों ने सवाल या सारण मी या गमता है, जैसा महपि लोमा युधिष्ठिर यो कहते हैं- उपत्यषण परस्ततो भद्राणि पश्यति । तत गपताजयति गमूगरनु विनश्यति ।। वाप944 मपाद पहले अपम सारा मनुष्य बढ़ता है फिर अपन मनो नास सुग सम्पत्ति भप अगुस्य पादान परता है, तत्पश्चात् वर मी पर विजय प्राप्त करता मोर ग म पूर सहित Tट हो । जत गहामारतवार ।
ये पश्चात् विधवा माता युती सहित पाचा पाण्डव बालयो या हस्तिनापुरम प्रथम आगमन है, भार इस चरण वा अतिम विदुपाञ्चाल नरश की पुत्री द्रौपदी के स्वयम्बर मे दृष्टव्य है, तथा इस चरण को मूल घटाओ में दुर्योधन आदि द्वारा भीम को पालकूट विष दार जल नोडा और प्रीति भोज ये बहाने गगा के प्रवाह मे हत्याथ फेंक देन या पडयत्र, द्रोणाचाय द्वारा द्रुपद राजा से प्रतिशोध, लाक्षागृह-दाह, हिडिम्व या वध, बासुर सहार और द्रौपदी स्वयम्बर आदि समाविष्ट हैं । द्वितीय चरण या श्रीगणेश द्रौपदी स्वयम्बर के पश्चात पाञ्चाल नरेश के यहां से कुती और द्रौपदा समेत पाचा पाण्डव वीरा पा धृतराष्ट्र में निमग पर पुन हस्तिनापुर में प्रवेश के साथ होता है, और इसवी इति श्री द्रौपदी गीर हरण की जघय अमानवीयता तय विवशता ग होती है, इस चरण की प्रधानतम घटनाएं ये हैं-पाण्डवो को राज्य देन ये सम्बध मे कौरवो का विचार और पिणय, अर्जुन का नियम भाग घे कारण यावारा, अजुन या वनवास काल मे उलूपी और चित्राङ्गदा ये साथ विवाह और चित्राङ्गदा से वब्रुवाहन वा जम, सुभद्रा हरण, साण्डव दाह, जरास घ वध, युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ का प्रारम्भ, शिनुपात यध, राजसूय यज्ञ यी समाप्ति, दुयाधन की जलन और शनि-सचालित द्यूत मे युधिष्ठिर की पराजय, द्रौपदी का वोरवा की सभा मे अपमानित होना, पुन द्यूतक्रीडा और पाडवा को तेरह वष का वनवास । ततीय चरण पा सूत्रपात पाण्डयो के वनवास से होता है और उसकी समाप्ति तरह वर्षों के वनवास के याद अपने स सम्मान और शान्तिपूण जीवनयापन हेतु पाण्डवो वे रामी प्रयासो की विफलता, श्रीकृष्ण का शातिदूत के रूप म घतराष्ट्र और दुर्योधन की सभा में जाना और असफल होने के साथ साथ कोरयो द्वारा पाण्डयो पर युद्धारोपण में होती है। इम चरण म अनेक घटनाएं होती हैं जिनम अत्यत महत्त्वपूर्ण घटनाएं अर्जुन पिरात युद्ध, गधमादन पवत पर दुर्योधन का गवहरण, जयद्रथ द्वारा द्रौपदी ररण, यक्ष प्रश्न, गीचा वध, गोधन-हरण, कोरयो द्वारा पिराट राज्य पर जाग्रमण और उनकी छद्मवेश मे अर्जुन द्वारा पराजय, सघि शाति वात्ताएं, और ततोगत्वा पौरव-पाण्डव महायुद्ध का आरम्म, युद्ध पी भीषणता और परिसमाप्ति । प्रथम चरण म जीवन अस्तित्व स्वय मृत्य बार प्रकट होता है। जीवन घी पवित्रता को स्वीकारना महत्त्वपूर्ण है, पर उससे भी अधिक महत्त्वपूण यह है कि उस पवित्रता की वृद्धि एव अस्तित्व के सरक्षण-रावद्धन हेतु मानव सदा तत्पर और सक्रिय रह । दुर्याधन आदि समस्त शेरव राजकुमार पाण्डव- पालका की हस्ति गापुर विद्यमानता को तनिक भी नहीं चाहते, विशेषकर मारव जीवन में मूल्या का सपर्प 45 भीम व बल और साहस स व सूब जलत है । अत उहान भीम का मार डालने का एक जटिल पडयत्र रचा, जिसका विवरण विवेचन प्रमग वश क्यिा जायेगा। भीम की हत्या करके तथा युधिष्ठिर आदि अ य पाण्डवा को कैद म डालकर निष्कण्टक राज्य करना दुर्योधन या मूल लक्ष्य रहता है । यह भूल जाता है कि पाण्डव उसी के भाई हैं, उनका भी राज्य पर उतना ही अधिकार है जितना कि इनवा (कोरवा पा), उह भी स्वतत्र और मानवोचित जीवन यापन करने का अधिकार मिलना चाहिए । दुर्योधन स्वतन्त्र जीवन की पाण्डव माग यो ठुकरा पर, उनके अस्तित्व को ही मिटा मे प्रयत्नशील होकर जीवन विरोधी पड्यत्र का रचयिता बनता है । अत प्रथम चरण मे मानव-जीवन अस्तित्व की पवित्रता सतरे म पडती है । पाण्डव बालका या प्रयत्न इस पवित्रता को, बिना किसी विज्ञापन के, अक्षुण्ण रसने म है, परतु दुर्योधन का पूरा प्रयत्न उसे नष्ट और छिप मिन कर देने म है। मानव जीवन मूल्यो के सघप का यह सदातिक धरातल है जीने का अधिकार मानव मात्र को समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए । द्वितीय चरण मे सधप सूक्ष्म स्तरीय हो जाता है। प्रथम चरण मे मूल्यो का सधप अस्तित्व प्रधान अधिक है, पर तु द्वितीय चरण म यह राधप अस्मिता प्रधान हो जाता है। अस्तित्व प्रघा सघप को प्राणदा शक्ति जीन के अधिकार से प्रादुर्भूत हाती है, अस्मिता प्रधान सघप स्वाधीनता के गौरव तथा समानता की अनिवायता से मण्डित रहता है। इस सघप में पाण्डव शारीरिक अस्तित्व की सीमाओ का अतिनमण कर मन की अस्मिता के उच्च और सूक्ष्म स्तर का स्पश करन लगते है। इसमे एक तरफ स्वत प्रता, समता, स्वाभिमान, और यायपरक मानवीय जीवन जीने और जीने देने की परम्परा का घम प्रवाह है, और दूसरी तरफ स्वाथ परक स्वत प्रता, असम व्यवहार और मनोमालिय एव मात्सय जय यायविहीन परम्परा का अमानुपाय प्रवाह है । इस चरण म सक्षेपत नराधमता और नरोत्तमता के जीवन मूत्या में भारी टकराव है । इस टकराव म मानुपी माव यी श्रेष्ठता और निकृष्टता का बहुरंगी चिनण है। लगता ह महपि व्यास जीवन मूल्या के सपप या अक्न द्वारा मानव-नवोत्थान या काव्यमय आह्वान कर रहे है। तृतीय चरण म इस सघप का स्तर और अधिक गहरा, और सूक्ष्मतर हा जाता है । इसम सघप मात्र शारीरिक या मानसिर गुणा से ही प्रादुभुत न होरर मध्यात्म प्रेरणाआ मे सम्पृक्त और सयोजित होने लगता है। प्रथम चरण के राधप म गाप्य वा नरत्व जय पथ का अनुगामी होता है, द्वितीय चरण के सपप मारोत्तमता जय-पथ गामिनी बनती है और तीसरे चरण में 46 महाभारत यायथ मानव के जीवन में नारायणत्व का द्वार उमुक्त होता है और सजय इस सत्य को प्रामाणिकता का यशोगान यह वह पर करता है- या योगेश्वर वृष्णो यत्र पार्यों धधर । तत्र थोविजया भूतिध्रुवा नीतिमतिमम ॥ भीम पव मत मानव जीवन मूल्या पे मघप या महाभारतीय इतिहास केवल कौरवो और पाण्डया के प्राची कालीन जीवन मूल्या ये सधप का ही इतिहास नहीं है, यह मानय माम के मयटमय जीवा में नित्य उठने वाले जीवन आदतों व मूल्या के सघपा सनातन क्यानर है। मानव पा जीवन सदा निष्प ण्टम, स्निग्ध धारामय और सफलतापूण ही होता। अस्तित्व विहीन हो जाने और अस्मिता पर दु सह्य अपमान पी चोटो पे लगने से मरणेच्छा के दुवल क्षण भी जीवन मे बात हैं। महाभारत ऐसी घार सपटा पन्न अवस्था मे जीने की नयी सूझ, साहसियता और कला प्रदान करने वाला काव्य सिद्ध होता है। वस्तुत विपत्ति वपम्य वे परीक्षा काल मे पाण्डवा पी भांति पम दृष्टि और अपरिमेय साहस के साथ मानध पिस प्रकार अपन स्वात य और सम्मान का रस सरता है, महाभारत इसी वा शुभ्र साहित्यिक दपणहै। प्रथम चरण एतिहासिक पृष्ठ भूमि । तत्सबधी सत्या वेपणाथ यह समीचीन हागा कि सर्वप्रथम हम महाभारत के मूल स्थानम से अपना परिचय स्थापित करें। उत्तर वदिर काल मे हस्तिनापुर मे पुरुषशियो का राज्य था। तलालीन जन पदा और गणराज्या मे वह सबसे अधिक प्रतिष्ठित राज्य माय था। जब पुरुवश स तानहीन होने के कारण दुदशा को प्राप्त हुआ, तब महाराजा शा तनु के पुत्र भीष्म ने महारानी सत्यवती एव अन्य मग्रियो आदि ये परामश से, पराशर पुन वेदव्यास से अनुरोध क्यिा कि वे दिवगत महाराजा की विषया पुर-वधु का नियोग व्यवस्था से स तान लाभ परवावें। पुत्र विहीन वैधव्य राज बामा का अवश्य खलता था, परन्तु पराशर नदन वेदव्यास का प्रचण्ड तपोमय कृष्णमाय व्यक्तित्व ह और भी अधिक असह्य था। सवथा असह्य स्थिति तो यह थी कि वश-परम्परा के विछिन होने पर युरुवश की राज्य सत्ता विनष्ट हो जायेगी। अत यह उचित था वि श्रद्धेय गागय भीष्म और राज माता सत्यवती के परामश वा आदर दिया जाये । इसी दृष्टि से अम्बिका, अम्बातिका और अम्बा ने वृष्णद्वैपायन वे साय नियोग समागम हतु स्वीकृति दी। पर तु द्वैपायन के दर्शी मार से अम्बिका ने भयभीत और विह्वल होकर मानव जीवन मे मूल्या का सघप 47 अपने नेन मून्द लिय और फलत उसकी काम म जमाघ धतराष्ट्र का जन्म हुआ, अम्बालिका के गात तो द्वंप को देयत ही शिथिल पड गये मुह पीला पड गया और परिणामत उसे पाण्डु पुनरल को प्राप्ति हुई । अपनी दाना यहिना की भीतिगाथा से आतक्ति अम्वा ने अपना निणय बदल दिया और अपनी जगह उसने अपनी दासी यो व्यास के पास भेज दिया। दासी के समपण माव की विलक्षणता के फलस्वरूप उसके विदुर नाम का प्रतिभावान और प्रज्ञा वश पुत्र उत्पन हुआ। धृतराष्ट्र पाडु से बड़े थे, पर जमाध थे, अत पाण्डु या राज्यसिंहासन पर बिठाया गया । विदुर के जन्मजात उच्च लक्षणा को देखकर भीम ने उसका लालन-पोपण भी राजकुमारो की तरह ही किया । आग चल वर यही विदुर धमनीति के प्रसिद्ध व्यारयाता हुए। समी राजकुमार बली, शस्त्र शास्त्रविद्या पटु और गुणी सिद्ध हुए। धृतराष्ट्र का विवाह गा घार नरेश को क या गाधारी से हुआ, जो बडी तपस्विनी और पतिव्रता स्त्री थी। अपने जमा घ पति की तरह उसने भी जीवन भर के लिए अपनी आसा पर पट्टी बाघ ली । व्यास के आशीवाद से घृतराष्ट्र के एक सौ पुत्र और एक क या पैदा हुई। दुर्योधन सबसे बडा पुत्र था और म या का नाम दु शला था, जिसका विवाह सिधुराज जयद्रथ रो हुना। धृतराष्ट्र को दूसरी पत्नी से युयुत्सु नामक पुन हुआ। पाण्डु का विवाह यदुवंशी राजा शूरसेन की पुत्री पृथा से हुआ जिसका नाम कु ती मी था क्यापि उसका पालन शूरसेन के फेरे माई कुतीमाज ने पिया था। कुत्ती कृष्ण की बुआ थी, साधु सतो की सेवा करने वाली सुलक्षणा थी जिसने दुर्वासा ऋपि को प्रसन्न करके एक एसा वरद मात्र प्राप्त किया जिसके जप अनुष्ठान से वह किसी भी देवता का आह्वान करके पुत्र प्राप्त कर सकती थी। ऋपि वचन की सत्यता को सिद्धि देखो के पौतूहल से कुती ने सूप का मनाह्वान किया और अच्छिा होते हुए भी कुमारावस्था म सूर्य के अनुग्रह स उसे पुत्र प्राप्ति हुई। लाक्लाजवश कुतीने नवजात शिशु यो एक पटी म बद करके गगा मे यहा दिया जिसे कोरवा क अधिरथ नामक सारथि नेतरता हुमा पाया, उसे पाला पोसा जो आगे चल कर कण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भीष्म की मात्रणा और व्यास ये परामश से पाण्डु ने हस्तिनापुर म लोय हितकारी राज्य प्रशासा की स्थापना की तथा अपनी विषेषजय विनमता, अपूब पराम और सतत विनयशीलता से वे सम्राट की उपाधि से विभूपित हुए । मृगया उनका राताचित व्यसन था। एक बार आवेट परते समय पाण्ड ये राधात स मृग और मृगी रे रूप म ऋषिकुमार विदा अपो पत्नी के 48 महाभारत अथ तथा पिण्डे'- अनुसार सारी गानयता दो प्टि वाले मनुष्यो मे ही विमाज्य है घममय प्टि वाले व्यक्ति जो मनातन धम पो विकास या सून स्वीकारते हैं, और मयुमय अघम प्टि वाले जन जो म मुखी आचरण यो ही अपनी प्रगति या सार सवस्व मानते हैं। इन दो प्टिया से व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर जिन जीवन मूल्यो यी सृष्टि होती है, उनमे परस्पर प्रतित राघष नम पी परिणति अन्तत घम की प्रतिष्ठा और अधम की पराजय मे ही होती है ऐसा महर्षि वेदव्यारा पा पुष्ट और स्पष्ट मत है। प्रसगवश यह ध्यातव्य है कि महाभारत मे वेदव्यास ने जिस पम या स्वस्प निधारण पिया है, यह अत्यात ही विशद और व्यापर है। तात्त्विर रप्टि से घम रामूचे विश्व मा थलिसित सविधान है, पूरे ब्रह्माए या नियामर तत्व है-- 'धों विश्वस्य जगत पतिष्ठा' अर्थात् धम हो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की प्रतिष्ठा है, जगत् का आधार है । पर तु व्यावहारिव प्टि रो 'मथा ब्रह्माण्डे '-याय के अनुसार धम मानव जीवन यापैयत्तिा और सामाजिय स्तर पर, आत्मसयम के आधार पर, सम्यम यवरथापन ही है । अस तत्त्वत , धम सावकालिए और सावभाग है, सनातन और अनादि है, अराण्ड और अविभाज्य है, तथा व्यावहारिक स्तर पर घम दश पालानुसार नाना रपो में व्यक्त होता है, स्थान और समय यी गयामा के समाधान एव आकाक्षाओवी पूत्ति हतु तत्कालीन विद्वद् समाज द्वारा उसया माजन, राजा, परिमाजन होता रहता है । 'बहुद्वारस्य धमस्य हास्ति विफला पिया'- घम के बहुत से द्वार हैं पिसके द्वारा घम अपनी अभिव्यक्ति करता है तथा धम की कोई भी प्रिया विफल नही होती (शाति पद 174/2) 14 द्वार युग इप्टा मनोपिया ये पुष्ट मत व आचरण मुम ही तो हैं । तदथ ही धर्माचरण राचदा तथा सवथा वाघनीय है। घम वे इन विशिन द्वारो से व्यक्त वाले घम के रूपो के पीछे और मूल मे जो सार तत्त्व छिपा रहता है वह महर्षि व्यास ये इस चिर स्मरणीय पथ म उद्घापित है- श्रयता धम सवस्व श्रुत्वाचाप्यवधायताम् । आत्ममन प्रतिकूलानि परेपा न समाचरत् ।। अथात् 'भपा लिए जो वस्तु प्रतिकूल हो वह दूसरो के लिए कभी नही परनी चाहिए'-धम मा यह मौलिक तत्त्व महाभारतकी दृष्टि भै धम का सार सवस्व है । वस्तुत मानय मात्र के लिए जगत् म सवश्रेष्ठ और प्रियतम वस्तु 'आत्मा' हो है क्योविवही सम का केद्र तत्त्व है, जीवनाधार है । 'आत्मनस्तु मामाय सर्व प्रिय माति आरमा को कामना से ही इद वाच्य यह सब कुछ प्रिय लगता माप जीवन म म्यो वा सधप 41 है, मात्मा से ही उस रायकी महत्ता, स्थत डा पदार्थों एव वस्तुमा वा कोई मूल्य नही है । युगबोध पी पीठिया म अमिध्यक्त एक ही धम पे गाना स्पा में इसी तत्व की पुष्टि होती रहती है । विश्व वे रादम में धम जगत् वा सघातर व पियामर है, राप्टि या सविधा है, व्यक्ति में सदन में घम मानव जीवन यी आचार-सहिता है जो मनुष्य को क्त्तव्य दशन य पालन में दीक्षित परती है, एक व्यष्टि जीवन योरामप्टि जीवन के सामरस्य मे नित्योप्नत एवं प्रतिष्ठित परने हेतु आहान करती है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' इसी माहा वा सत्यरा मानवीय उद्घोष है । अत घम की व्योमवद् प्रतिष्ठा है, वह सब का घारय है, वही सब में अनुस्यूत है वाप्ठ मे अग्नि की तरह, सभी उसी से आच्छादित हैं जग आकाश से पृथ्वी आदि । जिस प्रकार भाकाश मानव की रचना नही है, उसी प्रकार धम जो विश्व का सविधान है वह मानव मेधा की उपज न होवर विश्वाधिप वी आत्म सामथ्य है जिससे समूचे ब्रह्माण्ड का नियमन व शासन सचालन होता है । उस नियम मे दीक्षित व अनुशासित होना ही धम का दशन व पालन करना है, इसी से घम का सामथ्य मानव जीवन को व्यष्टि समष्टि के सामरस्य मे प्रतिष्ठित कर उसे नर से नरोत्तम भाव मे और तदनतर नारायणत्व मे याने आत्म स्थिति म सदोदित कर देता है । यह समत्व का स्वात त्र्य जीवन व मोक्ष दशन है । महर्षि व्यास के शब्दो में। वेदस्योपनिषद्रात्य सत्यस्योपनिपद्दम । दमस्योपनिषद्मोक्ष एतद्सर्वानुशासनम् ।। अत घम मूलत एक अनुशासनवद्ध जीवन की प्रेरणा है, स्वतत्र विवेक द्वारा चयनित कार्यान्वित जीवन है । आत्म सयम (दम) घम का साधन है, आत्मा नुभूति नरोत्तम भाव मे मोक्ष का द्वार है, आत्म साक्षात्कार एव नारायण प्राप्ति धम की चरम सिद्धि है । सारत घम का अभिप्राय मानव को एक ऐसे अनुशासन मे मर्यादित करना है जिससे वह ससार मे जीवन व्यापन करता हुआ जीवन के घोर सग्राम मे अपने भीतर और बाहर के अवरोधो एव अरियो पर विजय प्राप्त परता हुआ मनुष्य मात्र की, सर्वात्म भाव से, उनति मे दत्त- चित्त हो जाये और शन शन सब प्रकार की सीण मनोवृत्तिया से अपने आपको अलिप्त और मुक्त रखता हुमा वैयक्तिव' और सामाजिव जीवन में समता और स्वतत्रता का सहज और अविचल उपाजन कर सके । यही धम फा असली और वैश्विक स्प है। मनुष्य मेघा द्वारा युगयोष की भूमिका म प्रतिपादित एव परिमार्जित धार्मिक मत एव सम्प्रदाय इसी सनातन धम ये से ही समुचित स्प हैं जैसे अखण्ड आकाश मे मानव हाथो द्वारा निर्मित भव्य 42 महामारत का अथ भवन अट्टालिका प्रयोगशालाओ आदिमे आस्यूत भावाशापरतु वास्तविक घम का पालन करना लोहे के चने चबाना है । अत परिणाम कल्याणमय होने पर भी अधिकाश जन धर्म माग को नही अपनाते क्योकि उसका प्रारम्भ कठिनाइयो और पलेशो से भरा होता है । म्बय वेदव्यास मनुष्यों के इस धम विरोधी भाव का दिग्दशन कराते हुए लिखते हैं । मध्य वाहुनिरौम्येप न चपश्चिच्छृणोति मे । धर्मादयश्च वामश्च स किमर्थ न सेव्यते ।। 'मैं अपनी भुजा उठा कर उच्च स्वर से पुकार रहा हूँ, परतु कोई मेरी सुनता ही नही । घम से अथ उत्पन्न होता है, काम तृप्त होता है। फिर क्यो घर मनुष्य धम का सेवन नहीं करता महाभारत का युद्ध भी धर्म तथा अधम के वीच उग्र सधप बाकाव्योद्गार है गिमम पापडव धम के पक्षधर है और कौरवराज दुर्योधन आदि अधम के । पाण्डव पुरपाय चतुष्टय-धम, अथ, काम और मोश-की मानवीय प्रेरणा से जीवन में समत्व और स्वाधीनता की सवमगलमयी प्रतिष्ठा का प्रतिनिधित्व परते हैं, दुर्योधन के सरक्षण में कौरवगण पुरपाथ द्वय-- अथ और काम- की प्रबल प्रेरणा से जीवन में वैयक्तिक स्वात य एष सत्ता समृद्धि हतु मत्स्य “याय ये प्रवत्तन का प्रतिनिधित्व गरते हैं । सारा मानव समाज, व्यासानुसार, इन दो जीवन दर्शन एव मूल्यो व पद्धतिया वाले मनुप्यो मे ही विमाज्य है, जिसमा चित्रण व्यासजी ने 'पममय' और 'म युमय' महाद्रुमा के प्रतीक द्वारा पिया है । इतिहास में एक युग का यह सत्य जिन दा जीवन भूत्यो के मध्य भीपण एव विघ्वसकारो टपराय मा द्यातन करता है, उस सथप पी हृदय- विदारिणी गज प्रत्येक युग मे प्रगतिशील मानव व राष्ट्र को सुनाई पड़ती रही है । वतमान काल मे, जव विश्व इक्कीसवी शताब्दी म प्रवेशाथ उद्यत और उद्यमशील है, इन जीवन मूल्यो के राक्टव सघप कीटकार आज भी अव्य है, और विवेकशील मानव नेतृत्व तदथ ही भावी समर ने पूर्वाभाम मे भीत और - काकाकुल है। युद्ध के कठोर ययाय को अत्यन्त विस्तृत और मानवीय भूमिका में वेदव्यारा मानय अस्तित्व के महनीय मूल्य के प्रश्न को लेकर मानव-जीवन पी राम्रोयजनताऔर निष्प्रयोजनतामीगूड समरपायोस समाधान प्रस्तुत करने पा महत्त प्रयास किया है। यदि साहित्य जीवन को समीक्षा हे तो मानव- अस्तित्ल और स्मिता पौष्टि से यह विवेच्य है पि क्या मागव जीया बा कोई गयो है, यदि है तो यह क्या है, और यया उस प्रयोजन मिदि में मनुष्य स्वनाम है? या, मानव जीशन एक निष्प्रयोजन प्रवाह मान है रिममे उतार , चहान की पटु मधु आभूतियां हिलोरे रोती हैं, जिसमे बहाव के हर टेढ़े मेढे मोड पर निराशा के थपेडावे याग के साथ साथ अरपाशाको किञ्चित् धूमिल धवलता का भी दशन होता है और विसर जाता है, और मानव पुरजोर प्रयतो के पश्चात् भी अपने आपको विधि द्वारा नियन्त्रित, निबल और निस्सहाय इकाई मात्र अनुभव करने लगता है । क्या मनुष्य स्व जीवन निर्माण मे स्वत त्र है या परताय? मानव मेघा के उ मेप के ऊपाकाल से ही चुनौति भरा यह प्रश्न उसकी प्रज्ञा से समाधान की मानवोचित माग करता रहा है। प्रत्येक युग के दाशनिका, साहित्यकारो, वैज्ञानिको, लिाकारा जोर चितन शीत मनुष्यो के चिद्गगन में इस प्रश्न की विद्युत्-कोध का पला पडा है। वेदाचार्यों और औपनिपदिक ऋपिया ने भी इस सम्बध मे मननीय चितन प्रस्तुत किया है। भले ही वह चितन इस चुनौति के अतिम समाधान के रूप मे मा य न हो, पर जिस गहराई से मनन और म यन के उपरात उहोने सानुमवजय चितन सृष्टि की है, वह भावी विचार हतु एक ठोस घरातल और यथेष्ट दिशा TT मूत्यवार निरूपण करती है । महाभारत में भी इस प्रश्न की स्पष्ट शतक के साथ इसके समुनित समाधान हेतु वदल्यास द्वारा किये गये गम्भीर मानवीय आर साहित्यिक प्रयास का दशन होता है, जिसे भारतीय मनीपा और तुम्मरा प्रना ने शास्त्रीय गौरव और औपनिषदिक गरिमा की पावनता से मण्डित किया है । तदथ ही, महाभारत एक कुरुक्षेत्र के भीषण भग्राम मान का का याङ्कन न होकर मनुष्य जीवन को तथा जीवन मूल्याने सधप को समग्र दृष्टि से देखो परसने और उसमे अ तनिहित जीव र के गहरे और व्यापक अथ मा गयेपणात्मय उद्घाटन करने वाला सवरसमय महाकाव्य है। सारत महाभारत भारतीय सामाजिक जीवा और सस्कृति के इतिहास के साथ साथ मानव मान के जीवन मूल्यो और अतद्व द्वा का सावकालिक काव्य दपण भी है। सर्वोपरि तथ्य तो यह है कि महाभारत लक्ष्यनिष्ठ और सघप शीत मानवता के जीवन प्रवाह का कायमय गगावतरण है। जीवन मूल्यो का सघष तीन चरण महाभारत के घोर एतिहासिा महायुद्ध की पूर्वपीठिया के सम्यक भालोडन से प्रमुख घटनामा के मूल म श्यिागील मानव दृष्टि तथा रष्टि चविष्य से उत्प्रेरित विचार एव व्यवहार शृखलाओ के अनुस धान मूला समालोचा से, तथा पटना चमो को गति प्रदाा परने वाले प्रधान चरित नायका ये ज्ञानिक मोविश्लेपण से यह प्रतीत होता है कि महाकाय मे विपित मानव जीवन में मूत्या के सघप के इतिहास का तीन प्रमुख परणो म विगाविया जा रास्ता है। प्रथम चरण का आनि यिदु पाण्डुप निषा महाभारत का अध नाश्रोगिय श्रोत्रियस्य सारथि रथिन समा। नाराजा पार्थिास्यपि सपिपूर्व रिमिप्यते।।' द्रोणाचाय को इस अनपेक्षित उपेक्षा और अपमान से असह्य धक्का लगा और विदीण हृदय और वेदना से वे उल्टे पांव पौट गये। हस्तिनापुर में जापर मीम के आग्रह से उहोने पाण्डवा और वौरव राजयुमारो यो पार्वेद या सागोपाग अभ्यास कराया और जब उनके शिष्य शस्त्रास्त्रविद्या मे निपुण हो गये तब उहोने गुरु दक्षिणा की माग रखी कि पृपत ये पुत्र राजा द्रुपद को जीत कर मेरे पारा जीवित लाओ। पाण्डवों ने भीपण आक्रमण किया और मीम और अजुन । उह परास्त पर घाव पर गुरु चरणो मे शीघ्र प्रस्तुत दिया। तय द्रोण ने द्रुपद को शालीरता से, परतु प्रतिशोध भरे शब्दा म वहा-'राजन् । मैं एक वार पुन तुमसे मैत्री हेतु विनय करता है। पहले तुमने राजा न होने के कारण मुझे मित्रता के अयोग्य समझा था, अब गङ्गा के दक्षिण वा राज्य तुम करो और उत्तर या राज्य में लं। द्रुपद की स्वीनारना पडा, पर दोनोगी मैत्री मे अपमान का आरोपण था, स्वेच्छा का माधुय नहीं । द्रुपद इस प्रयास चिता और इच्छा से यात्रा त हा गये कि उनके एर एसा पुत्ररत्न पंग हो जो द्रोण का प्रतिकार कर सके। मात्र खान यराया अपर्याप्त जान पर द्रुपद ने ब्रह्मतेज यी अपेक्षा की। पल्माषपाद राजा के गर के समीप वाले बाश्रम मे याज और उपयाण ब्रह्मनिष्ठ, तपोनिधि एन अत्य त मेघावी मवेत्ता ब्राह्मण थे। उपयाज के मना कर देने पर उराये बड़े माई याज ने द्रुपद राणा के मनोरथ को पूरा करो हतु विधिवत् यज्ञ पिया। हवन ये पूर्ण होने पर याज ने रानी को बुलाया और यहा कि 'तुम शीघ्र ही यह अमिमत्रित हविप्य ग्रहण परा, एक क या मोर एव पुत्र तुम्ह प्राप्त होगा।' रानी ने कहा-'ग्राह्मण देव ! इस ममय मेरे मुह मे दिव्य गांधी वस्तुएं लगी हुई हैं । अङ्गो की अगराग से अनुरजित दिया गया है, इसलिए स्नाा किये बिना मैं यन का हविष्य कैमे ग्रहण कर सकती हैं। आप थोडी देर ठहरिये।' याज ने यहा-'तुम आआ, या न माओ, कुछ हानि नही। मैं अमित्रित हविष्य अग्नि मे छोडता है, यजमान की इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।' आहुति छोड दी गई। तत्क्षण अग्नि क समान तेजस्वी, देवताआ ये समान सुदर किरीट मुकुटधारी, उत्तम यङ्ग, पवच, वाण धारण क्येि एक कुमार घोर गजना करत हुए यज्ञ कुण्ड की अग्नि में से प्रकट हुआ। उसी समय यह आकाशवाणी भी हुई कि द्राणाचाय की मृत्यु इमी कुमार द्वारा होगी। इसका 1 सम्भयाव 13770 2 सम्भवपथ 13777 मानव जीवन म मूल्यो पर सघप 53 नाम धृष्टद्युम्न पड़ा। देखते-देखते उसी काल म यज्ञ की अग्नि से एक श्याम वर्णा, विद्युत् तुल्य काति रो समवित, रूप गुण और सोदय की मूर्ति भी प्रकट हुई। यही द्रुपद सुता होने से द्रौपदी, श्यामवर्णा होने से कृष्णा और या से प्रकट होने से याज्ञसेनी कहलाई। उसके प्रक्ट होने पर भी एक भाकाशवाणी हुई कि यह स्त्री रल क्षत्रिय कुल के नाश का कारण बनेगी, देवताओ का काय सिद्ध होगा। द्रौपदी स्वयम्बर महात्सव म क्षत्रियवश विनाश का बीजाकुरन स्पष्ट हो गया। इस उत्सव पर आने वाले महत्वपूर्ण व्यक्ति अनेक थे जिनम साम्ब, जरास घ, शिशुपाल, अनिरुद्ध, दुशासन, दुर्योधन, वण, श्री कृष्ण, वसराम, सात्यकि, सत्य, भगदत्त, रमी, उद्धव, अश्वत्थामा, भीम, शकुनि आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है । महाराजा द्रुपद ने सबका यथोचित एव भव्य स्वागत किया। पराक्रमी वीरो वे अतिरिक्त प्रतिष्ठित नागरिका और सामाय गा-समूह को विद्यमानता स्वयम्वर दी गौरव गरिमा को घरमता प्रदान पर रही थी। सुरभित और सुरम्य वस्त्रालङ्कारो से विभूषित द्रौपदी सुवर्णमयी जयमाता हाथ मे लिय रङ्गशाला मे आई। उसके भाई धृष्टद्युम्न ने घोषणा की कि जो सत्कुल सम्पन्न, रूप और बल से युक्त पुरप वहा रसे धाप को पत्यचा पर चढा कर उन पांच वाणा से, मुक्त आकाश म, धूमते हुए यत्र में स्थित मत्स्य को, नीचे ल म उसने प्रतिबिम्ब वो देश पर वीन्य देगा उसी यो द्रौपदी जयमाल पहना देगी। इस उच्च घोषणा के साथ स्वयम्बर आरम्म हुआ। दुर्यापा, शात्य, अश्वात्यामा आदि तो धनुष पर प्रत्यन्चा ही न चढ़ा सके। वे पाप के यटके से पृथ्वी पर गिर पडे । पर पण पल भर म धनुप पर डोरी चढासी, वाण भी चढा लिया और सब को लगा कि लक्ष्य पटपर धरती पर आ गिरने वाला है। इसी बीच द्रौपदी का उच्च शब्द गूज उठा--'मैं सूतपुत्र का पदापि वरण ही रहेंगी।' रापधे दमय हास्य के साथ वणने पनुप वही ररा दिया और बिना शरानुराधान विये, यह अपमान कोसी म दवाये अपने स्थान पर लोट वैटा । बहुत से राजे महाराजे भाये पर सफर न हुए। चेदिराज के रााकुमार शिशुपाल या प्रयरामी सफल गया, पृथ्वी पर उसके घुटने टिक गये, गिरत गिरते बचा। तथंच बलशाली जरासप और गाल्व भी हसी वे पान यो। जर सार क्षत्रिय वीर पक गये तो ब्राह्मणो की मण्डली म से छमशी अर्जुन उस राडे हुए। ग्राह्मण उदास बोरगारी हृदय वाले हो गय निजही बडे बडे धनुघर सफ्न न हो यहाँ एक ब्राह्मण मला मया पर लेगा। परतु दरात ही देखते क्षण भर ग मी पाप पर प्रत्यच्चा टाल पर गरानुगघात रो पुर्ती से लक्ष्य वेधा 54 गरतानथ पर दिया और वह कृत्रिम मछली पत्र यत्र पे भीतर से घरा पर आ गिरी द्रौपदी ने जयमाल विजेताये गने मे दाल दी। छावेश मे छिपे अर्जुन को कृष्ण ने पहिचान लिया। बलराम यो उमका समेत दे दिया। दोनो प्रसन्न थे, परतु यय क्षत्रिय वीरा ने द्रुपद को दडित फरने हेतु हथियार उठा लिये क्योरि ब्रह्महत्या वे ही करना चाहते थे। दुर्योधन, क्ण आदि ये आक्रामक प्रहार को भीम और अर्जुन ने पल भर म निरस्त पर दिया। शत्य भीम के प्रहार से पृथ्वी पर गिर पडा। कृष्ण के चीच वचार से स्थिति मे साम्य की प्रतिष्ठा हुई और द्रौपदी पो पर भीम और अर्जुा अपने विश्राम स्थान पर चले गये। वे एक कुम्हार के घर पर से हुए थे । कुटिया के भीतर प्रवेश करने के पूर्व अर्जुन पुवार पर कहा, 'म । देखो, आज हम कितनी अच्छी चीज लाये हैं ।' गीतर से ही मां कुती पी आवाज आई, 'बेटा, जो साये हो उसे पांचो भाई वोट लो।' पुती ये मिथ्या न होने वाले वचनी ने द्रोपदी को पाधा पाण्डवो की पत्नी बना दिया। इस बात से महाराजा द्रुपद असमजस मे पर गये, घम सक्ट या गया। महर्षि वेद यास ने इसका समाधान प्रस्तुत किया द्रौपदी के पूर्व जम के इप्टात द्वारा द्रौपदी के विवाह का समाचार सवन फैल गया । सव लोग जान गये कि कुती समेत पांचो पाण्डव लाक्षागृह की प्रचण्डाग्नि से बच निकले हैं और वे ही ब्राह्मण वेश मे द्रौपदी यो स्वयम्बर मे जीत ले गये थे। हस्तिनापुर मे इस सूचना के प्रति द्विविध प्रतिक्रिया हुई। जिसरी समीक्षा सघष के द्वितीय चरण मे की जायेगी। जीवा मूल्पो का सपप-प्रथम चरण एक विवेचन पाणु सम्राट के वन मे निधन के पश्चाद विधवा सम्राशी युती अपो पांचा पाण्डव राजकुमारो सहित जब हस्तिनापुर मे गोटी, तब से लगारर द्रौपदी स्वयम्बर तक के मध्यवर्ती काल मे अनेक ऐसी घटनाएं हुई जिनमे दो परस्पर विरोधी जीवन मूल्या का सघप स्पष्ट दिसाई देता है, परतु इस सधप की प्रसरता र मूत्यानाय देवल तीन प्रमुख घटनाओ की समीक्षा पर्याप्त प्रतीत होती है। प्रथम चरण मे तो यह सघप एक तरफा लगता है क्या दुर्योधन प्रणीत जीवन दृष्टि धौर मूल्य मामामय रपरेवर व्यक्त होते है जबपि युधिष्ठिर प्रणीत जोबा आदा और मूल्य प्रशात मानयीयता-रा रक्षात्मा स्पषी मूर अभिव्यक्तिरेफरमाते हैं । भौम, अर्जुन मादि पोपरशुरा पता ही नही है कि धृतराष्ट्र के पुत्र और उनके सहायर उनके प्रति गि मानव जीवन म मूत्या मार्ग की प्टि रराते है, उहे यह जानने की आवश्यक्ताही नही थी कि उनमे चचेरे भाई उनके प्रति क्या भाव रखते हैं । वे तो सहज पालोचित स्वभाव से सबके राग गोडा करते थे, परतु दुर्योधन आदि भीम के अदम्य साहस और अतुल बल वे प्रति द्वेप जय ईर्या और शत्रुता पीवुद्धि रखने लगे थे-'दुष्टभावमदशयन्' (सगा पद 12725)। इतना ही नही, भीम थी क्सिी प्रकार हत्या करके, गय पाण्डवो यो छल से बंद करके, "निकृत्या सनिगृह्यताम्', दुर्योधा पृथ्वी पर निकण्टक राज्य करने की महत्त्वाकाक्षा रसता था-'प्रणाशिष्ये यसुधराम्' (सगा पव, 127 29 और 30) । इस मत्सर पूण महत्त्वाकाक्षा ने ही दुर्योधन को इस महाया य वा गरा नायक बनाया है। भीम यो विप देकर मार डालने का पडयन्त्र अमानुपीय और अ यायपूण बुद्धि का निमल मानवीयता और सहज जीवन जीने की निसग पूण अस्तित्व बुद्धि पर अवैध आक्रमण था। भीम आदि को तनिष मात्र भुनकार ही नही थी कि सेल के यहान दुर्योधन वा सलत्व भीम की विप द्वारा हत्या करने पर तुला हुआ है । विप देने के पश्चाव जव भीम वी देह मे जहर रावत्र फैल गया और वह मरणासन्न सागहन निद्रा कीनचेतन अवस्था म लुढक गया तो स्वय दुर्योधा द्वारा भीम को पुरजोर वाघ पर गङ्गा के भीपण प्रवाह मे मरणाथ फेंक दिया जाना सत्ता निर्मित जीवन मूल्य का स्वतन जीवनयापन जय जीवन मूल्य पर जप य प्रहार था । सत्ता जब स्वाथपरक हाथो मे वेद्रित हो जाती है और जब वे हाथ यह मिथ्या अनुमव करने लगते हैं कि सत्ता चली जायगी, तो वे अपनी पूरी शक्ति और सामथ्य के साथ उन पर मानमण करते है जिनसे उनकी सत्ता विनष्टि या भय उत्पन्न होता है-भय चाह मन गढत और झूठा ही क्या न हो । दुर्योधन के पास सत्ता थी, राज्याधिकार था और भीम वे पराक्रम से उसके मन मे मिथ्या भीति या सचरण हुमा वि पाण्डव उसकी राज्य सत्ता का अपहरण कर लेंगे। पूरे महाभारत में एक भी स्थल ऐसा नही है जिसमे दुर्योधन या यह भीति भाव प्रमाणित हो सकता हो । परतु पात्पनिय मय जय दुर्योधन के अत रण म पर कर गया तव भीम यो विप द्वारा मारन का यह प्रसत अमानवीय पड्यन सत्ता या स्वत प्रता पर प्रथम भीपण प्रहार था । इसी पडयत्र ने जीवन मूल्या वे सघप को जम दिया। दुर्योधन इम सघप पा जनक था। एम सम्ब घ म यत्यत महत्त्वपूण और मननीय बात तो यह है पि जय रायोगवा मीम उस घालवूट शिप से मरा ही और यह गङ्गानिवासी सो गोगल नगरी स जीवित लोट बाया ता युधिष्ठिर न भीम ये मुस से दुर्योधन पीपाली परात या मडापोड सुन पर, उसे उम पडपत्र के प्रति अपामुद्र 56 महामारत पा अप साथ विहार करते समय मारे गये । मरते मरत अपिसूनु ने राजा पाण्या श्राप दे दिया कि उसकी उसी समय मृत्यु हो जायेगी जव यह अपनी पलो राग समागम करेगा । पाण्डु के उस समय तव काई सन्ताा नहीं थी, अत वह इस थाप से अत्यत ही व्यथित हा गया। अययाई उपाय न देकर युतीने पाण्दु को दुर्वासा प्रदत्त पुत्रदायी मात्र से अवगत कराया। पाण्डु पो स्वीति से युती के क्रमश तीन पुरा हुए-युधिष्ठिर, भीम और अजुा घमराज, वायु और देवराज इन्द्र से । पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री थी, पाण्टु ये अनुरोध पर कुन्ती ने पुत्रदायो मात्र माद्री को दिया और अश्विनीकुमारासे उसे पुत्रद्वय नबुल और सहदेव-की प्राप्ति हुई। तत्पथात् सयम की मर्यादामा के विच्छिन्न होने पर माद्री मग विहार के समय पाण्डु पी जीया लीला समाप्त हो गई। विहार विलाप बन गया । भाप फलित हुआ पाण्दु के निधन मे । उसया स्थान उसके पुत्र पांच पाण्डवाने लिया । इस समय तव धृतराष्ट्र में कोई स तान नहीं हुई थी। दुर्योधन आदि सभी पुत्रो या जम बाद मे हुआ था। पाण्डवा का जम उस समय हुआ था जय पाण्डु, कुतो और माद्री के साथ, वन मै मृगया विहार पर रहे थे । पाण्डु की अनुपस्थिति मे हस्तिनापुर यी शासन डोर घृतराष्ट्र सम्हाल रहे ये विदुर की सहायता से, जिह राजनीति विशारद रामझ ार, भीष्म ने मत्री बनाया था। पाण्डु पी मृत्यु के पश्चात् माद्री तो पति वे शव के साथ चिता पर सती हो गई पर तु पुती पांचो पुना सहित, बन ही म उनको सम्यक् प्रारम्मिय शिक्षा सम्पूर्ण हो जाने पर, हस्तिनापुर लौट आई। नगरवासियो मे प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। परतु दुर्योधन को यह अच्छा नहीं लगा क्योकि पाण्डु पुन युधिष्ठिर सबरो पडे थे और वयस्व होने पर उन्हें ही राज्यारोहण या अधिकार मिलने वाला था। स्थिति और अधिक असह्य हो गई पाता तर मे दुर्योधन के लिये, जर पाण्डवो की सात्विक शाली- नता, पियुमार सेवित विद्वता और अद्भुत पराक्रमशीलता उनकी अप्रतिम लोकप्रियता की भूमिका में जा कण्ठ द्वारा अभिव्यक्ति प्राप्त करने लगे। स्वमात्र से ही महत्त्वापाक्षी, मात्सयपूण भौर मदो मत्त होने से तथा घतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुन हाने के पारण दुर्योधन अपने को ही राज्य का राही अधिकारी मानता था । अत दुर्योधन के हित पिया ने यह प्रचार करना शुरू किया कि भले ही युधिष्ठिर ज म पहले हुआ हो और दुर्योधन का बाद मे, पर दुर्योधन अपनी माता के गम म पहरे ही आ गया था। यही नहीं, राज्य के वास्तविक और वैध अधिकारी तो धतराष्ट्र ही हैं, परतु उनकी जमाघता के कारण ही राज्यारोहण पाण्डु चाचा का हुआ था । अत दुर्योधन पतराष्ट्र का वरिष्ठ पुत्र हो के कारण, पाण्डु महाराज यो मृत्यु के उपरात, दुर्योधन मानव जीवन ग गल्या या संथप 49 ही राज सिंहासन और राज मुकुट का सही स्वामी है । वस्तुत दुर्योधन अपन राज्याधिकार के दौवल्य से भली भांति परिचित था, इसलिए उसे कृत्रिम भोर अमानुपीय साधनो का पाण्डवो के विरोध मे प्रयोग करना पड़ा था । बाल्यावस्था से ही उसके मानस मे राज्य सत्ता के पूर्ण स्वामिल का थारपण गहरी जड़ें ग्रह्ण कर चुका था क्यादि पाण्डव तो अपनी कुमारावस्था म अपन माता पिता के साथ वन म ही रहे थे, उनका तो जाम भी वही हुआ था और यह भी महाराजा पाण्डु से नही । परतु दुर्योधन का वाल्यकाल तो राज्य वैभव और सत्ता के प्राचुय में ही पला था । जब कुती पांचो पाण्डवा सहित मपिया द्वारा हस्तिनापुर मे पहुंचा दी गई, और भीम आदि ने उनका भव्य स्वागत लिया, तर ही से दुर्योधन के चित्त म पाण्डव विरोधी रालत्य का बीजारोपण हो गया । ज्यो ज्या वाल पाण्डवो यी तोकप्रियता वढने लगी त्या-त्यों दुर्योधन को ईप्या और द्वेप बुद्धि गीजादे प्रति प्रगाढ हाने लगी। भीम के बालोचित परामम और शोय तो उसके आसपी किरकिरी बन गया। 'विनदीवरण थार हृदिशल्यमिवापितम दुर्योधन स्वय वीर और यती था, परन्तु गीम की शक्ति के सागो माइया समेत दुर्योधन या पौरुप पीया लगता था। इस प्रकार के मनोयनानिा त तुमा से निर्मित दुर्योया के बाल मानस म भीम विरोधी द्वेष इतना बढ़ गया मि वह उसे मार डालन व पडयत्र करने पर उतारू हो गया। उगने सोचा कि भीम या मार देने के पश्चात् यह उसने अन्य सभी माइया को पैदवर निप्पण्टा राज्य परेगा । अत छल कपट से भीम की हत्या करो पृणित उद्देश्य से दुर्योधन ने गगा नदी के किनारे एक अत्य त रमणीय प्रीडा गृह यनयाया पार पाण्डया को वहाँ सान पीडा एष प्रीतिगोग हेतु निमत्रित विमा । हिनमिल पर मलने थारा स्वांग हुआ, सब सूब राले। बाद म Iो भी गत्या प्रेम भाव ये प्रदशाये साय साया सिताया गया । दुर्योपन एस रा ीम २ मिष्ठाम म 'कालकूट मय घोर निपमिला दिया था निगमे नीम ये दह म उगका प्रमाय पाप्त हो गया और यह राजोसार मस श्रीरामराम मो गया। सय गते-भूदते यह स पर की आर सीट पर, पर दुर्योपारा पताना गेजीम पो मजबूती ग यांघ पर एप स्थान गगमा प्रवाहपीनीषणताम पगिया और मिगी पो उगमीय मार HTTी। पर गशिल्या म नीम पो मृत्यु ही, जोगा लिया था। पामार पिप गेगी भीगीर पर गगा पाराम यहा या विषधर in HITTrया। Eि विषमोरयम् पाय मे मोम का या पर ATM गिराउगाटामा पाएर परमे मानेर गररिता, उनमगरिसर मार मगा। माग पपगार TIPTETीमा 10 म.Tथप भर पट अप्ठकुण्ठी अमृत पिलाया और वहां के दिव्य सलिल म स्नान कराया जिसस मोम को सहस्र हाथियो का बल सहज ही मिल गया। निस्स देह, जय मनुष्य धर्म का सही अवलम्बन लेता है तो प्रकृति की शक्तियां भी उसकी सहायता करने तगती हैं। नागा ने भीम का गगा तट पर पहुंचा दिया और हाल्लित भीम पर को लौटा। इस बीच पाण्नु भ्राताआ के राजभवन में पहुंचने पर भीम की अनुपस्थिति ने सबको दुर्योधन की पड्यन्त्रकारिता से शवाकुल और विपदा ग्रस्त कर दिया। पुती के दुख और घनीभूत वेदना का तो कोई मारापार ही नही रहा । परतु ज्याही भीम को घर सजीव लौटते देखा तो सुसाधुओ से पाण्डवोन अपना सौभाग्य मनाया। कालकूट विष और नागलोक की रहस्योद्- घाटी घटना से पाण्डव भाइयो और उनकी माता को दुर्योधन के मनोमालिय का पता चल गया।पर युधिष्ठिर ने सब यो मादेश दिया कि दुर्योधन बी छन- पूण साजिश को गोपनीयही रखा जाये। उधर अपो प्रयास मे असफल दुर्योधन ने पाण्डवो की हत्या हेतु एक अन्य पडया फिर रचा। उसने धारणावत नामक स्थान म एक भय लाक्षागृह पुराचन नामक महाशिल्पी से इस उद्देश्य से बनवाया कि उसमें कुती समेत पाचो पाण्डव निवास करते समय एक रात सदा के लिए अग्निमुख म भस्मीभूत हो जाये । दुर्योधन ने अपने पिता सम्राट धृतराष्ट्र को इस बात पर राजी पर लिया कि ये पाण्डवा को माता सहित देशाटन के लिए मनुराध परें ताकि उहे मुछ उगुक्त वातावरण की आन दानु भूति हो । विदुर को इस पड्यत्र की दुग्ध लग गई और उसन गुह्य ढग से युधिष्ठिर को सावधान ही नही कर दिया, पर तु लाक्षागृह म आग लग जाने की स्थिति म वहाँ से बच निकलने हेतु वहाँ एक सुरग या निर्माण करवा दिया जिसका पता 7 तो पुरोचन या, न दुर्योधन को, और न ही किसी अन्य को पल समा! एव रात, एक मिसारिन अपने पांच पुत्रा सहित उस लाक्षागृह म निशा निवास हतु चुपये चुपये प्रवेश कर गई, दुर्दैव से उसी रानि यो दुर्योधन ये कमचारियो ने लाक्षागृह में आग लगा दी। उस भीषण अग्नि मे मिसारिन समेत उसवे पांचो वेटे जल कर भस्म हो गये। परतु गोमवै पराक्रम से उस गुप्त सुरंग द्वारा पांचा पाण्डव और पुती माग निकले। उन दग्ध अस्थि पिंजरो को देश पर दुर्योधा, ण, दुशासन आदि सय माश्वस्त हो गये यि उनके प्रतिद्वद्वी पाण्डवा का सपथा नाश हो गया है और यव दुर्योधन शिविघ्न राज्य पर सफेगा। पाण्डवो के जल कर मर जान की बात जन शान वा कारण यन गई, सत पृतराष्दो भी राज्य सगा में अपनी भाभी और भतीजो के निधन पर शोन प्राट क्यिा। यस्तुत धृतराष्ट्र अपने मन में छप रातोप मानव जीवन म मूल्या दारापप 51 और मीतलता वा ममय पर रहाथा क्योकि यब उसवे पुम निपटा दोष कार तर राज्य परत रहगे । भीष्म और विदुर अत्यात दुसी हुए और राज्योचित विधि से मृत पाण्डगो पा पिया बाण्ड पिया। पर तु जर उह गुप्त समाचार मिरे वि पाण्डव, माता युती सहित, लाक्षागृह की मीपणाग्नि से बच निकले हैं और अभी जीवित हैं, तो उह अपार शाति की अनुभूति हुई और उनका मन निश्चित और हला हो गया। अग्नि काण्ड से वष पिपलने के पश्चात् गगा पार कर से वे वन प्रदेश मे दक्षिण सी आर बढे । माग मे दादा महपि व्यारा मिले और उनक परामश अनुसार पाण्डव ब्राह्मण वेश मे विचरण करन लग। हिटिम्ब नाम राक्षस का माग मे भीम ने बघ विया, उसपी वहिन हिडिम्वा स विवाह किया जिससे घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन हुआ। फिर एक्चत्रा ग्राम में जिस ब्राह्मण वे घर अतिथि होपर रुके उस प्राणा की रक्षा हेतु भीम ने बकासुर का वध किया । इस घटना से समूचा गांव उस असुर के मय और सात से मुक्त हो गया और पाण्डया के प्रति समस्त ग्रामवासी प्रेम और ऋण भाव रसने लग । भिक्षावृत्ति स निर्वाह करते करते वहाँ पई महीने बीत गये। एक बार उह यह समाचार मिला कि पान्चात नरेश की पुत्री द्रौपदी का स्वयम्बर होने वाला है और गांव के अनेर ब्राह्मण दान दक्षिणा प्राप्ति के उद्देश्य से स्वयम्बरोत्सव देखने पाञ्चात जा रहे हैं । 4 भी ब्राह्मण वेश म वहां पहुंचे। इस स्वयम्वर में बारव राज युगार दुर्योधन, दु शासन आदि मी पण सहित आये हुए थे। यापन द्रौपदी अनि द्य रूप लावण्य की अक्षय राशिथी। उसके अद्भुत सौ दय और याग्नि रा उत्पन होने की क्याआ से मुग्ध और आश्चया िवत अनेन युाराज एव अय जन स्वयम्बर म आये थे । द्रौपदी यज्ञ से उत्पन हुई यह वात पुरानी है। एक बार द्रुपद राजा की राज्य सभा में द्रोण नामक ब्राह्मण उपस्थित हुए, जि होने परशुराम से दिव्य अस्त्र शस्त्र और धनुर्विद्या प्राप्त की थी जार जिहोने बाल्यकाल मे महाराज पद के साथ गुरुकुत म एक साथ विद्या ययन किया था। उन दिना दोना म प्रगाढ मैत्री और धरिष्ठता थी और त्रुपद न उ ह वहा या नि राज्यारोहण के बाद यह द्रोण कायतरग साधी सम्राट रहेगा। परन्तु द्रोणाचाय की सभा में उपस्थिति पर द्रुपद ने कोई विशेष सत्तार नहीं रिया, इतना ही नहीं बात्यातीन वचनो के स्मरण कराने पर द्रुपद ने कहा कि मैत्री बराबर थाला म होती है, असमानता कभी भी मैत्री का आधार ही हो सकता-~'जा श्रानिय नहीं, वह जा रथी नहीं यह रथी का, और जो राग नहीं वह राजा या रारा नहीं हो साता अब पहले की बात याद करना व्यथ है।' यागिय बा, 52 महाभारत का अथ को सी लेने के लिये बहा- 'तूष्णो भव' (सभापव 128 34)। यदि स्वतन जीवन व्यतीत करना है, ता नीलक्ठ बनना पडेगा । युधिष्ठिर की प्रतिक्रिया शान्तिप्रियता का द्योतन करती है । हिंसा और दुष्टता, दौयल्य की खान से निमलने वाली वासनाए है, जो सत्ता का आधार पावर घातर और घिनौना प्रहार करके तृप्ति की अनुभूति करती है। यह है दुर्योधन भी रप्टि जिससे उसके बाल्यकाल से ही पड्ययारी दुव्यवहार और परपीडक जीवन मूल्यो को अमानुपीय एव अयायप्रद सृष्टि की शुरआत हो गई। वेदव्यास ने इन प्टियो को धममय और मयुमय की सशाआ से ज्ञापित किया है। भीम का जीयित लौट माना दुर्योधन के लिए दुसह्य हो गया । उसे शीघ्र मार डालने के लिए उससे भी ज्यादा खतरनार और अत्यत अमानवीय पड्यत्र पी मरचना दुर्योधा ने की। धृतराष्ट्र को भी अपने साथ मे रहा। वण आदि अ य साथिया ने दुर्योधन का समर्थन किया। लाक्षागृह दहन पी पक्ष्य त्रकारिता म दुर्योधन की रसायाधता, सत्तापरक निरपुराता एव भौतिकवादी वैयक्तिक सुखलोलुपता का दर्शन होता है । लाक्षागृह की प्रचण्डाग्नि से बच निक्लने के बाद पु ती समेत पाण्डयो का, स्वतत्र जीवन जीने की सहज अभिलापा से, किसी से बिना कुछ कहे वन प्रदेश की ओर चने जाना उनकी नात्तिप्रिय अस्तित्व-चादी जीवन प्टिाही स्पष्ट उदाहरण है। एक तरफ सत्तावादी जीवन दृष्टि और उग्रता ज य अपहरणवादी और माममणकारी जीयन मूत्या की सृष्टि है, दूसरी तरफ समत्व पोषिणी, जीवन स्वातन्य रक्षिणी जीवन दृष्टि और बत्तव्य परायणताजन्य सवहितकारी नातिप्रिय मानव यादी जीवन मूत्या की सृष्टि है । हिंसा, स्था घता, क्षुद्रता और महबार दुर्योधन बुद्धिमतरग भाव है, तथा छल धोखा, वपट आदि पे माध्यम से इनकी अमि यक्ति नित्य नय परिवेश मे हाती है। स्वत प्रता, आत्म गौरव, स मम्मान अस्तित्व और हृदय की विशालता युधिष्ठिर बुद्धि के अमिन और अविभाज्य लक्षण हैं जिनकी अभिव्यक्ति रक्षात्मय शान्तिप्रियता में होती है । वस्तुत आत्मदोवत्य और हिंसाभिव्यक्ति सहधर्मी और सजातीय भाव हैं जो परावलम्बन का पोषण और स्वतत्रता का हनन करने वाले होते है । आत्म चली, वीर और विश्वासी मानव स्वय स्वत प्रताप्रिय होते हैं और दूसरा ये स्वतत्र मार श्रेष्ठ जीवन के प्रेरक एव प्रोत्साहक व्यक्ति होते है। दुर्योधन रक्षित कौरवा और युधिष्ठिर पोषित पाण्डवो के मध्य चल रह प्रथम परण ये जीवन मूल्यो वे संघप का यही मूल सरूप था। वयासुर यी भीम द्वारा लोय हितयारी हत्या युधिष्ठिर के भानव-वादी जीरनर तय राक्ष्य की बार मयेत यग्ने वाली घटना ।मिनाह्मण वे घर मे अतिथि के रूप में ब्राह्मण वेशधारी पाण्डय रहते य, उसकी बारी वासुर के पास जाने की माई । उस राक्षस के लिए बीस सारी अगहनी चावल का भात, दो भै से और एप मनुष्य, जो वह राव समान लेवर जाता है, भोजन के रूप मे ले जाना था। घर म करुण अदन मच गया क्योविनतो उसके पास इतना धन था कि यह इतनी सामग्री एववित कर सवे, और न ही उस ब्राह्मण के चले जाने के बाद ऐसा कोई युवा था जो परिवार को भागी विनाश से बचा सके । माता कुती के आदेशानुसार भीम बकासुर के पारा सारी भोजन सामग्री लेकर पहुंचता है जिसका एकमात्र उद्देश्य है ब्राह्मण का हित सम्पादन और सम्पूण नगर या सक्टमोचन-'ब्राह्मणार्थे महत्कृत्य मोक्षाय नगरस्यच' (आदिपव 1614)। यह है पाण्डवो की सवजन हितकारी जीवन दृष्टि और उनके हृदय यो विशालता और अत करण की नि स्वाथता। अत जीवन मूल्या ये सघप के प्रथम चरण में दो जीवन दृष्टियो की पीडा का दिग्दशन वीज रूप म हमारे सामने आता है । एक ओर क्षुद्र मन की सकीणता एव सत्ताधिकार की स्वायलोलुपता जय जीवन मूल्या का मत्सर भरा मयुमय सागर है, और दूसरी ओर भद्र मन की विशालता एव सवजन हिताय सुखाय च' भाव से उज्जनित जीवन मूल्यो वा मानवीय गुणो से मरा घममय क्षीर सागर है । यद्यपि इस चरण मे कौरवो की मयुमयता और पाण्डवो की धममय मानवीयता के बीच सीधे सघप का प्रत्यक्षीकरण हमे नहा होता, तथापि दुर्योधन की मीम पर घातक आक्रामक्ता का अत्यत घिनौना और अमानुपीय स्प दिखे विना नही रहता । दुर्योधन के मन में हिंसा है, सत्ता- लोलुपता है, पाण्डवो के प्रति विद्वेप है। भीम आदि के मन में न हिंसा है न सत्ता का लोम, न किसी के प्रति द्वेष का भाव । दोनो गदाधर हैं परतु एक का गदाधारण सत्ता और शक्ति के दुरुपयोग का यत्र है जबकि दूसरे वा केवल आत्मरक्षा और समाज के मगलमय जीवन या साधन । दोनोम गहरा अतर है, यही अ तर जीवनमूल्या वे दो प्रमुख स्पो को दर्शाता है और आगे होने वाले नराधमता और नरोत्तमता के भीषण सघप को आधारशिलाएँ रख देता है। सघप का द्वितीय चरण एतिहासिक पृष्ठभूमि द्रौपदी-स्वयम्बर महामारत को अत्यत महत्त्व पूर्ण घटना है। इससे जिन कुछेक तथ्यो का उद्घाटन हुआ उनसे महाभारत के घटना चक्र को एक नयी गति मिली और जीवन मूल्यो के सघप को एक नया मोड । प्रथम धार धृतराष्ट्र, कौरव राजकुमारो और उन सभी जनो के समक्ष, जो इस बात से पूर्णतया आश्वस्त हो चुने थे कि वारणावत ने लाक्षागृह दाह म पुती समेत पांचो पाण्डव जलपर भस्म हो चुरे थे, यह सत्य उनके हृदय को 58 महामारत वा अप विदीण पर गया कि द्रोपदी स्वयम्बर मे मत्स्य भेद करने वाला अय कोई नहीं स्वय अजुन ही ब्राह्मण वेगमे था। भीष्म, द्रोण आदि ने तो पाण्डवा का श्राद्ध तक कर दिया था। पाण्डवो वे जीवित बच रहने पे सत्य का उद्घाटन कौरवो वे चरित्र और उनके जीवन मूल्यो को उजागर करने वाली कुजी सिद्ध हो गया। इस नूतन सत्य से यौरव दल मे खलबली मच गई और वे पाण्डव विनाश एव मरण हेतु तरह तरह के मतव्य करने लगे। इस प्रतिक्रिया म दुर्योधन आदि के विचारों का दपणवत् दशन होता है । शकुनि ने स्पष्ट शब्दो मे कहा पि युती पुत्रो का शीघ्रातिशीघ्र नाश कर देना चाहिए- 'उत्सादनीया पोतेया' (मादिपव, 1997), इसके पूर्व कि अय सभी राजा अर्जुन के नेतत्व में समवेत हा, पाण्डवो ये वय वी गीघ्र गुप्त व्यवस्था हमे पर लेनी चाहिए- याादत्यरता सर्वे प्राप्नुवति नराधिपा । तारदेव व्यवस्याम पाण्डवाना वध प्रति ।। आदिपय 1997 शनि की यात सुन पर सोमदत्ति ने तो इससे भी ज्यादा भयकर बात यह दी- धिक्कार है हमारे जीवन और पुरणाथ यो वि पाण्डव अभी तक जिदा हैं--- "धिगस्तु पौरप तात प्रियते यत्र पाण्डया' (आदिपव 19912)। पृतराष्ट्र मीइहीं पा हार्दिा समथन करते हुए कहा, 'भो मेरे लारले । मैं भी यही कसा पाहता हूं जिसरी तुम्ह अभिलापा है, परन्तु में मेरी वात यो विदुर ये समक्ष नहीं रग रापता। अहमध्यवर्भवतचिपीमि यया युवाम् । विषयतु नामिच्छामि त्वाकार विदुर प्रति ।। दुर्योधन ता म्पप्ट कहता है कि युती के पुत्रो और माद्री वे पुत्रो म फूट डाल पर पाण्डयो मा दुवल गौर होगात्मवान् पर देना चाहिए- 'कुन्तीपुत्रान् भेदयामो माद्रीपुत्रो प पाण्डवो' (मादि पय, 2004), तत्पश्चात् 'भीग यो गुप्त रप सहपाशीघ्र पर देनी चाहिए क्योवियही उन सवम सर्वाधिष यनी ह' (माम्पिब 20010) भीमसेनम्य या राजप्रपयाप पुशनार । मृत्युविषीयतो न स हि तेषा वनाधिर ॥ तात्पर यह पितराष्ट्र पेमा में पाण्डवो के प्रति मलिन मापना है, यह उहें हस्तिनापुर युनाना नो पागा, परतु हाल पी ग्रोहा भयन्त दुबिगेम है। पप निगे यमदेवारा पनाग गया, यापन में गामने अपना हर माप जीवन में मूल्यामामुपप 59 खोल कर रप दिया जब उसने प्रेमातुरोधपूर्वक कहा- नहि साम्ना न दानेन न भेदेन च पाण्डमा । शक्या साधयितुतस्मात विक्रमेणव ताजहि ।। भारिप 20120 'वियमेणैव पराक्रम द्वारा ही 'ताज्जाहि' याने उन्हें मार दो। संक्षेप मे, दुर्योधन के हृदय मे एक भयकर ज्वालामुखी पवत गडगडाहट घरने लगा । येन केन प्रकारेण पाण्डवो का नाश अविलम्ब होना चाहिए। चाहे पारस्परिक पूट के कारण वे विनाश पथ गामी हो जाये, चाहे सर्वाधिक बली भीम की हत्या कर शेप पाण्डवो को जेल में डाल कर उनका वैभव, कुबेर तुल्य खजाने और उनकी अस्मिता वो छिन मिन कर दिया जाये। दुर्योधन की बुद्धि मे राजकीय सत्ता का एकाधिकार उपभोग, इस तरह छा गया कि पाण्डव जो उनके चचेरे भाई ही थे एक्दम जानी दुश्मन लगने लगे, जिनका शीघ्र जीवन समाप्त किये बिना उसकी अधिनायकवादी सत्तालोलुपता और परिग्रह शीलता को सतुष्टि अलम्य रहेगी। शीघ्र ही समा जुडी और सभी जनो ने दुर्योधन समय मतव्य ही प्रस्तुत किया कि उनसरी शक्ति बढने से पहले ही पाण्डवा का सवनाश कर दिया जाय । मयुमय महाद्रुम पर छल, वपट, द्वेष रूपी शकुनी शासा वडी होकर वढने लगी। पर तु भीम और द्रोण यी जव स्व मत प्रक्ट करने की वारी आई तो उहोने यायोचित परामश ही प्रस्तुत किया, जिसने वण और दुर्योधन की रोपाग्नि मे घृताहुति का वाम किया। भीष्म ने कहा कि 'कौरव आर पाण्डव दोनो ही मेरी दृष्टि में एक समान है, इस राज्य पर उनका भी इतना ही अधिकार है जितना कि तुम्हारा । अत सधि के द्वारा उह राज्य का आधा माग दे दिया जाय- सघाय वीर दीयताम् अधभूमि '(आदि पव, 202 4)। द्रोण ने भी ऐसे ही यायपरक वचन कहे ममाप्येपा मतिस्तात या भीष्मस्य महात्मा । राविमाज्यस्तु को तेया घम एप मनातन ।। जाम्पिव 2032 अर्याद, 'हे तात! (धृतराष्ट्र को सम्बोधन) मेरा अभिमत भी वही है जो महात्मा भीम का है । पुती पुत्री को उनके हिस्से का राज्य दे दिया जाय यही रागधम की सनातन परम्परा है।' मीण और द्रोण के इस परामा 'तेपामपं प्रदीयताम्' के प्रति कण की अरपत पटु और पोषजय प्रतिश्रिया हुई । उसने पृतराष्ट्र को जो कुछ वहा उगामार यह है कि देगलिया आपने नि जिन मीम और द्रोण गोआपने 60 महागारमा अथ अपनी राजसमा मे इतना सम्मान दिया है और हर महत्त्वपूर्ण प्रश्न व समस्या पर समाधान हेतु इनके परामश का आप इतना आदर सत्कार करते हैं, ये यदि आपके भले (हित) की सलाह न दे तो इससे बढकर आश्चय की और क्या वात हो सकती है। कण ने भीष्म और द्रोण को अकृतज्ञता के जप य अपराध का दोपी घोषित किया- योजितावथमानाभ्या सवकार्येप्वन तरौ । न म त्रयेता त्वम् य किममद्भुततर तत ॥ आदिपव 203 13 पर तु धृतराष्ट्र अब क्या करे? शा तनुन दन भीम जिसने राज्य की सुरक्षा नी प्रतिना की है तथा जो त्याग शौय और व्रत की दिव्य मूत्ति माय है, उसकी यायोचित कयनी की अवज्ञा करना क्या धृतराष्ट्र के लिए उचित है ? क्या द्रोणाचाय के प्रज्ञापूण परामश को अवहेलना करने मे धृतराष्ट्र अपने पुना की दुष्टता, अयायज य सत्तालोलुपता और शकुनि की पडयत्रकारिता को खुले आम समयन और प्रोत्साहन प्रदान नहीं करेगा जो गौरव कुल और राज्य के विध्वस की प्राग्भूमिका बन जायेगी? क्या पाण्डो के जीवित बच निकलने और पाञ्चाल स्वयम्बर मे द्रौपदी के विजेता अर्जुन के प्रति तीव्र गति से हस्तिनापुर मे बढती हुई लोकप्रियता धतराष्ट्र के माये राज्यापहरण वा पलक न मढ देगी यदि पाण्डवोको राज्य मे समान अधिकार की सनातन धम परम्परा के अधिकार लाम से सवथा वन्चित कर दिया जायेगा? ऐसे अनेक प्रश्न और शकाए घतराष्ट्र के मन को उद्विग्न कर बैठी होगी और अततोगत्वा उसने भ्रातृतुल्य सूतपुत्र विदुर को बुला कर निणयात्मक स्वर मे कहा---- यथैव मम पुनाणामिद राज्य विधायते । तथैव पाण्डुपुत्राणामिद राज्य न सशय ।। आदिपव 2053 'जसे मेरे पुत्रा का यह राज्य कहा जाता है उसी प्रकार पाण्डु पुत्रा वा भी यह राज्य है-इसम लवरेश मात्र भी सशय नहीं है।' क्षत्तरानय गच्यतान् सह माया सुसत्कृतान् । तथा च देवरूपिण्या वृष्णया सह भारत ।। अर्थाद, 'भरतवशी विदुर । अब तुम्ही पांचाल जालो और उनकी माता बुती तथा उस देवरूपिणी वधू कृष्णा के साथ इन पाण्डवा यो सत्वार पूर्वक ले आओ।' -(आदिपव 2054) इस घटना से मनुष्य मनुष्य के भीतर लहाती हुइ मयुमयता और झरती हुई मानवीयता के हो दशन नही हात, कितु दोना म जा पारस्परिक मानव जीवन म मूल्यों का राघप 61 असद जीवन या सुलगाता रहता है, उसकी भी स्पष्ट झलक दिखाई देती है। जीवन के ताल पर मूया पासपण ताण्डव परो लगता है। अत वरण मे धतराष्ट्र प्रसन्न ही था वितु लारलाज य जामत ये भय मे रिया हाकर उसो भीम और जापाचाय की मात्रणा का स्वीकारत हुए, पाण्डवा का हस्तिनापुर बुलाने का निश्चय, दुर्योधन के विपरीत, घोपित किया। और उावे आओ पर उह आधा राज्य, पोरवा पी वश मयादा के अनुकूल दे दिया। यह मारत या प्रथम विमाजा था। महाराजा द्रुपद ने अनेर बहुमूल्य उपहार देव र पाण्डवो को विदा किया। महाराजा धतराष्ट्र ने भी विधिवत् युधिष्ठिर का राज्याभिपर किया और उहाने पाण्डयो को समझाया कि पौटुम्पिक शान्ति हतु वे हस्तिनापुर छोड कर साण्डवप्रस्थ जाफर अपनी यी राजधानी बनाये । प्राचीन कालीन पूजा यी राजधानी भी वही थी, परतु उस समय साण्डवप्रस्थ पार वनस्थली बना हुआ था । शातिप्रिय पाण्डवा ने अथक परिश्रम स वहा पर इद्रप्रस्थ नाम की नयी राजधानी बनायी। वहा उहाने तेरह वप तक लोककल्याणकारी प्रशासन किया और जन यश का भारी उपाजन किया। इसी काल म इन्द्रप्रस्थ मे एक्दा देवपि नारद वा आगमन हुआ। वे पाण्डवो पी पार्मिक्ता से ता बहुत प्रसन्न हुए परन्तु उहोो, एक अटपटी बात को देखकर, नि शक कहा 'द्रौपदी | तुम पांचो भाइयो की पत्नी हो, पर साथ रहने का तुमने कोई नियम नहीं बनाया। भलाई नियम बद्धता म ही है।' नियम बना वि द्रौपदी के साथ प्रत्येक एक एक मास रहगा और जो यह नियम मग करेगा उसे बारह वप वनवास दण्ड भोगना पडेगा । स्वशासन और मर्यादित जीवन के मूल्या स जीवन म पारस्परिकता के प्रेम और सहयोग का माधुय सहज ही सचरित होने लगा। जन जीवन मे भी अनुशासन और आपसी स्नेह की प्रगाढता का सूत्र रद होने लगा। एक दिन अजुन राजभवन के द्वार पर बैठे थे कि एक ब्राह्मण ने रुदन करते हुए वहां प्रवेश किया, वह शासन के प्रति कटु वचन भी बोत रहा था । अर्जुन के अनुरोध मूलक प्रश्न करने पर ब्राह्मण ने बतायाकि चोर उसकी गायें चुरा कर ले गये हैं। क्षनिय श्रेष्ठ अर्जुन गायो को तोटा लाने हेतु कटिबद्ध हो गया, परतु उस समय वह निरस्त्र था और उसके अस्त स्त्र उस भवन म थे जहा द्रौपदी एक मास के नियमानुसार युधिष्ठिर के सहवास म थी। यह धम सबट को घडी धी पदि वह शस्त्र लेने उस भवन में जाता है तो उसे नियम मगानुसार बारह वर्षा (') के वनवास वा दण्ड स्वीकारना पडता है, यदि वह नहीं जाता है तो वह ब्राह्मण की अयना और सप्रदअवहेलना की दु सह्यय और क्षत्रिय कुरा क्लय प्रदा स्थिति महाभारत वा अथ । 62 . का प्रमादवरा माहान करता है । शात मन और एकाग्रचित्त से विचार कर अर्जुन ने प्रथम विकल्प को श्रेयस्करसमयकर चुन लिया। सिर झुका कर,पृथ्वी पर दृष्टि जमाते हुए अजुन ने भवन म प्रवेश किया, अस्त्र उठाये, चोरोमा तीन वेग से पीछा किया, और गौएं छुडाकर ले आया । ब्राह्मण आनन्दित हो उठा, अत करण को पावन गहराइया से आशीवचन रहता हुआ।स्थ गृह लौट गया। नियम गग के अपरापाथ प्रायश्चित करते हतु मजुन ने द्वादशवर्षीय वनवास गमन क्यिा । यद्यपि युधिष्ठिर ने बहुत समयाने का प्रयत्न किया कि अपराध तर होता है जय वडे भाता के जीवन म विच्च मान भी विघ्न सडा होता और वह स्वय नियम भग की शिकायत करता। परतु नियम पी मर्यादा का मग मात्र अपराध की योनि है और निर्धारित दण्ड भोग ही उसका सन्चा प्रायश्चित है, ऐसे म तव्य पर मजुन की अडिगता से प्रमावित होकर माता कुती सहित सभी ने वनवास-गमनाथ अजुन का पथ निर्विन्न कर दिया। मूल्याङ्कन की रष्टि से यह एप अत्यन्त छोटी, सरस पर तु सारगमित घटना है । कहाँ तो दुर्याधन का भोगवादी, परपीडक', सत्तालोलुप अमानुपीय जीवन दशन और व्यवहार और कहाँ पाण्डव पुङ्गव अर्जुन का त्यागवादी, परहितकारी, वीरोचित, मानव सेवा-परक जीवन दृष्टि और व्यवहार राज्य गया नहीं है, पाण्डवा ने राज्य की माग भी नहीं की है, अधिकार जताने का समेत तक नहीं किया है उ होने, परतु भावी मे पाण्डव राज्य मागेंगे इस भय मात्र से दुर्योधन भीम को विप देवर मार डालने, लाक्षागृह दहन द्वारा पाण्डवो की जीवन लीला को सदा के लिए समाप्त कर डालो आदि के अनैतिक और भ्रातृ पाती पडया का रचयिता बन गया। द्रौपदी स्वयम्बरोपरात पाण्डवो के जीवित रह जाने की जानकारी से कौरव राजकुमारो म हुई प्रतिक्रिया उनकी क्रूर, अ यायप्रद और अमानवीय जीवन दृष्टि व शैली को स्पष्ट द्योतन करती है । हस्तिनापुर से दूर साण्डरप्रस्थ मे धृतराष्ट्र न पाण्डवो को इसीलिए भेजा पि वह दुर्योधन के दुष्ट स्वभाव, पडय त्रकारी प्रवृत्ति और स्वय की उसके समक्ष विवशता से भली भांति परिचित थे । एक ओर सत्ता और सम्पत्ति के अधिकार के लिए माई माई यो यमलोक पहुंचान हेतु उद्यत है, दूसरी ओर लोर संग्रह और सुरक्षाप्रद प्रशासन जन जा को सुलम हो, विशेषकर विद्वद् समुदाय के प्रतीक ब्राह्मण वो तनिय मात्र भी रप्ट न हो-एसी बल्याणकारी जीवन दृष्टि से अभिभूत पाण्डव एक ब्राह्मण को गाया को चोरी के चगुल से मुक्त कराने हेतु स्वेच्छा से बारह वप का वनवास नि सकोच ग्रहण करे। अतीव विचित्र वात है यह, पर है यह मानवीय जीवा का एक प्रेरक सत्य, एक व्यवहृत आदश पृष्ठ मानव जीवन म मूल्या का सधप 63 मयादा पालनाय आत्म चयनित वन गमन का प्रायश्चित कम यद्यपि अत्यत दुष्कर तथा मक्टापन्न रहा परतु तपापूत निष्ठायत अजुन व शोय और शालीनता के प्रभाव से उसकी वन याना फ्लप्रदा ही मिद्ध हुई। हरिद्वार मे नागराज परव्य से मैनी हुई और उसकी क्या उलूपी उसे बध के रप प्राप्त हुई, भागे तीर्थाटन करते करते पूर्व दिशा के मणिपुर की राजा या चित्रागदा से विवाह और बभ्रुवाहन नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसकी वीर गाथाएं महाभारत को नया मोड और रामाञ्चकारी मच्च प्रदान करने वाली मिद्ध हुई, मणिपुर से पचतीय होत हुए अर्जुन ने जब प्रभास क्षेत्र मे प्रवश किया तो वहाँ श्रीकृष्ण से अर्जुन की दूसरी मुलाकात हुईभार वहां उसने कृष्ण के सहयोग से 'सुभद्रा'-हरण करके यादवो की शक्ति से मैत्री सम्बध स्थापित किये। सुभद्रा के साथ कुछ काल तक पुप्पर तीथ मे अर्जुन ने निवास किया और द्वादा वर्षों की वनवास अवधि की परिसमाप्ति पर वह सुभद्रा आर कृण सहित इद्रप्रस्थ लौट आये। समी पाण्डया का पुनर्मिलन एक नयी शक्ति के सचार का प्रतीय वन गया। श्रीकृष्ण की इद्रप्रस्थ म विद्यमानता ने जीवन मूल्या के सधप को ही नहीं अपितु महाभारत के सम्पूर्ण घटनाचक्र को एक नातिकारा माड प्रदान विया, एक नूतन नतृत्व और एक नयी दिशा प्रदान की। इन्द्रप्रस्थ लौट आने के बाद खाण्डव-दाह की अप्रत्याशित आर आश्चय जनक घटना घटी जिसम अग्निदेव अजुा वे समक्ष याचक बनकर आये और सतुष्ट हो जान पर उहाने अजुन को गाण्डीव' नाम का विशाल और प्रसिद्ध धनुप 'अक्षय तूणीर' आर वरुण से प्राप्त नदिघोप' नाम दिय रप प्रदान किया इनके बदले म अजुन न अग्निदेव को खाण्डव वन को दग्ध करने की स्वीकृति दी जिससे अग्निदेव अजीण रोग स मुक्त हो सक । खाण्डव वन इन्द्र देव से रक्षित क्षत्र था अत वन मे अगि प्रज्ज्वलित हात ही उसका रक्षा हतु इन्द्रदेवाज्ञानुसार मघवपण हाने लगा। कृष्ण से सकेत पाकर जुन न अपन शीघ्र शरानुग धान से नम का इस तरह आच्छादित कर दिया कि पाये गिरन के पूर्व हा अनि के उदर म सब कुछ स्वाहा हो गया। तक्षक बन सया । इद्र अजुन के गोयप्रदशन से प्रसन्न हा गर्म आर 'दिव्यास्त्र की प्राप्ति के लिए इन्द्र न बन पा शराराधन के लिए कहा। पाण्डव दहन म वचने वाल छ प्राणिया म एक 'मय दानव था जिसने प्राण रक्षा हेतु अजुन के प्रति कृतमता प्रकट करव,सेवाथ निवदन किया। गृष्ण जानत वि मप एक महान शिल्पी था । मत उहाने कहा-'महारान युधिष्ठिर के लिए प्रस्य मे एए एस सभा भवन मानिर्माण करो, जा अनुपम महाभारत का भय 64 आर अद्वितीय हो ।' सभा मवा बना और उसको हर किसी का माश्चयक्ति कर देन वाली चमत्वारिप अनुपमतातही दुर्योधन की प्राधागि मे आहुति या नाम आगे चल कर किया। विश्व इतिहास मे विसी अद्भुत गलाति ने यदि युद्ध को कही जन्म दिया है तो वह मयदानव वृत पाण्डया का यही सगा भवन था । लगता है पाण्डव वन या अवथ थाप ही दुर्योधन गरी माघागिया मूत्त एपबन गया। यही से जीवनमूल्यो का सधप अस्तित्वको परिधि से अस्मितामोपरिधि म प्रविष्ट हो गया, श्रीकृष्ण उस सघप के सूत्रधार बन गये, और भीम तथा अजुन बन गये उस सघप के मानवीय स्वतत्रता और याय पक्ष में प्रधाा नाया। अब पाण्डर अवैल नही 4 । उनको शक्ति विकासपथगामिनी वा चुकी थी। पाञ्चालो भोर यादवो की बड़ी राज्यशक्तिया इसके साथ थी । यसमा तेजोमग और उसके जीवन के साथ उसकी आतरवादी शक्ति का सम्पूर्ण विध्यस करने वाले मयुरावासिया के हृदय सम्राट गाण भी पाण्डयो में सहायक बन चुये थ। इसका मूल कारण यह था कि कृष्ण स्याधीन और स्यारतम्बी नागरिको के गणराज्य की स्थापना द्वारा मानवता, याय और स्वतता प्रधान जन जीवन के आदश और मूल्यो का राष्ट्रीय जीवा का यथाय स्वरूप बनान हतु वृत्त सकल्प थे और घमराज युधिष्ठिर के नतृत्व मे पाण्डव भी समानता और स्वत नता के पोषण और प्रोत्साहन मे सलग्न में । अत वृष्ण और पाण्डवा की घनिष्ठना मे आत्मीयत्ता भी सुगध सहज ही व्यक्त हुई। दुर्योधन और शकुनि सहित क्ण की मैत्री मे मात्सय की मलिनता और द्वेष की दुगध थी। अत अर जीवन मूल्या के इन परस्पर विरोधी पद्धतिया म मघप न एक अभिनव स्प व्यक्त किया और उसका आधार बना अस्मिता। अव तय तापाव अस्तित्व हेतु ही सघपशील थे, वभी प्रक्ट स्पम, वमी छद्म प म । अब सधपक रूपम, शैली मे, आधार में एक नवीनता या समावेश हुआ, उसमे एक नयी सामथ्य का प्रत्यक्षा दशन होने लगा, उसी कसौटियां और अधिक उदात्त हो गई। मयदानव निर्मित उत्कृष्ट फलाति सभा भवन हो सघपकी इस तनता वे उद्घाटन का भव्य प्राङ्गण वना । देवर्षि नारद ने इद्रप्रस्थ के सिंहासन पर अभिपियत राजा युधिष्ठिर को राजसूय यश करने की विशिष्ट मात्रणा दी। इसका मूल प्रयोजन सत्य और घम पर आधारित राज्य और जीवन मादशों पी सस्थापना करना था। इस यज्ञ के सम्पादन हेतु युधिष्ठिर ने द्वारिका से महामहिम कृष्ण को निमत्रित क्यिा । कृष्ण आये, राजसूय यज्ञ के विचार की - राराहा परते हुए पहा 'घमराग्य और याप-तत्र की मानव-स्यात य ये प्रोत्साहाथ आर मानय विकास में सहयोगाय स्थापना करना एव अत्यत सुदर और महत्त्वपूर्ण विचार है । पर तु यह काम सरल नहीं है। प्रचण्ड शक्तिशाली राजामो पा सामना करना पडेगा। एस शातिमय यज्ञा म सवा घिय और प्रथम विरोप मगधराज जरास घ करेंगे, जो दिवगत कस के श्वसुर हैं और जो स्वय अधिनायक तत्र के सस्थापक ही नहीं, अपितु स्वय एक भारी रमेघ यज्ञ परो पर तुले हुए हैं । इस यज्ञ में वलि चढाने हेतु उमने अभी तक रियासी रागाआ को परास्त पर यदी बना लिया है।' मथुरा छाडकर मारिया मे कृष्ण ये जा घसने मे जरास ध वी अमानुपीय अत्याचार पूर्ण आतक भी एक कारण था । अत युधिष्ठिर राजसूय यन की सफलता के प्रति एक्दम सशकित हा उठे और यन करने के विचार तर को छाहन की स्थिति म आ गये। वे निराशानद म डूबन लगे परतु भीम आर अजुन ने हिम्मत बधाई तथा कृष्ण ने भी साहस और सूझ से यज्ञ सम्पन परने की मात्रणा दी। यदि जरास य यज्ञ विध्वस हतु आगमण परता है या युद्ध की स्थिति पाण्डवो पर थोप देता है तो पाण्डयो का नवलब्ध राज्य सकटापनावस्था से आणात हो रास्ता है और मन ही मन इनकी दुगति और मृत्यु चाहने वाले दुर्योधन आदि के नेतत्य की कौरव-सत्ता इनयी स्थिति को आर भी भयावह बना सकती है। भत भृष्ण ने इस एप्टि से रि सम्भावित युद्ध मे सहस्रा सैनिका का अनावश्यक विनाश भी न हो और न ही पाण्डव चारो ओर से शत्रुआ द्वारा घिर जाये, एक नयी युक्ति निकाली जिससे जरास घ भी मर जाय और युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ भी सफलतया सम्पादित हो जाय । इस सकल्प को पूरा करने की रढ इच्छा से मानवता के तीनो उपासक, अपनी नयी युक्ति के अनुरूप, ब्राह्मणवेश म मगध की राजधाना राजगृह पहुंचे। य तीन श्रेष्ठ मानव थे-मीम, अर्जुन और कृष्ण । पिछले द्वार से इ होन राजधानी मे प्रवेश किया, और प्राचीर लांघ कर वे सीध जरास घ की सनिधि मे पहुँच गये। क्या विस्तार के विना यहां इतना विवरण ही पयाप्त है कि जरासघ की प्रताडना को सुनकर कि तुम इस प्रवार यहाँ क्यो आय हो श्री कृष्ण ने दृढ़ता से जा कहा उसका सार इस प्रकार है 'हम यहाँ पर तेरा वध करने हेतु आये है। तू मले ही पामहायन करता हो, परतुतू घूत्त, और मानवधाती है । सम्पत्ति और सत्ता के लाभ और दम्म से तू नारसीय नरसंहारक नरमेघ करना चाहता है। उसके लिए तू ने छियासी रानाओ को अपगी जेल में इस दृष्टि से वद कर रखा है कि जब पूरे सो राजा तेरे वदी हो जायेंगे तो तू परमेघ का सफ्त सम्पादन करेगा। मैं वृष्ण हूँ, मेरे साथ महाभारत का भय अधमी 66 भीम और अजुन है । युद्ध मे तो तू माग जाता है पर तु इस मलयुद्ध या द्वन्द्व- युद्ध हेतु महारथी आये है। तेरी शक्ति और सामथ्य हो तो इन दोनो मे से क्सिी के साथ इच्छानुसार युद्ध कर।' जरासप अपने को महारली और अया को अपन सामने मच्छर समझता था । भीम के साय दद्व-युद्ध का आह्वान जरास चो स्वीकारा और तेरह दिन और तेरह रात दोनो, तरह-तरह के भीपण और घातक प्रहारो आर प्रतिप्रहारा द्वारा, लडते रहे । युद्ध की प्रचण्डता और भयवरता से अततोगत्ला जरासघ में तनिक शैथिल्य प्रकटा और चौदहवें दिन भीम के भोपण मुष्ठिका प्रहार से जरास घ घरती पर गिर पडापरतु अद्वितीय पराश्रम से वह पुन युद्ध करने लगा। समय यो देख कर कृष्ण ने भीम यो एक समेत दिया और भीम ने तुरत ही उसके दोनो पैर परड कर उसके शरीर को चीर पर फेंक दिया। सधि बिखर गई, जरासघ मर गया और फनस्वस्प छियासी वंद राजा मुक्त कर दिये गये। कृष्ण ने जरासन्ध के पुत्र सहदेव का मगध के सिंहासन पर राज्याभिषेक किया। एक जरास व के मुक्तियुक्त वध से कूर नरमेघ का अ त हुआ, सित्यासी राजाओ का युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की सफलता हेतु सहन हो म हार्दिक सहयोग मिल गया, और मानव स्वत नता, घम-सस्थापना और यायोचित जीवन के सरक्षण और सवद्धन हेतु पाण्डवो की दिगविजय का माग प्रशस्त हो गया। यह क्तिनी बड़ी उपलब्धि थी कि बिना किसी सैनिक, योद्धा आदि के रक्त पी एवनी बूद बहाय भारत के तीन चौथाई भाग में मानव-स्वातत्र्य प्रोत्साही और सत्यपोपी धमराज्य की आधार शिलाएँ रस दो गई। जीवन- मूल्या के सघपये द्वितीय चरण की यह एक महत्त्वपूर्ण मानवीय उपलब्धि सिद्ध हुई कि राज्यसत्ता की मगध मयुरा धुरी टूट गई। इन्द्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ की तैयारियां हो गई। देश देश के राजे- महाराजे अतुल धनराशि और अमूल्म रलो के असस्य उपहार लेकर या में सम्मिलित हुए। कृष्ण को राय से युधिष्ठिर ने राजाओ को योग्यतानुसार दायित्व मार सापा-भीम और द्रोण ने यज्ञकी यायविधि सम्पारन का काम सम्भाला, दुर्योधन ने मेंट, उपहार यो सम्भाल कर रसने का दायित्व स्वीपारा, कृष्ण के दायित्व म ब्राह्मणा के घरण प्रक्षालन और पूजन का काय आया, और विदुर, यश्वरयामा, कृपावाय आदि सभी जनो ने तरह तरह से अतिथिया को सुप सुविधा और या मण्डप यो सजाने व सफल बनाने या काय दिया। या म अप्र-पूजा का प्रश्न उठा तो भीम को सम्मति से युधिष्ठिर ने मानव जीवनममल्याबासपप 67 श्रीकृष्ण या अग्रपूज्य घापित किया। यह सुनकर सहदेव कृष्ण के चरण पसारा लगे । चेरिराज शिशुपाल, जा कृष्ण की युआ या लडका था, कृष्ण के अग्रपूजन को सहन न कर सका । आवेश में आकर उसने भीष्म पितामह और वृष्ण तो अटसट अपमानसूचक शब्द रहे । दिये गय वचनानुसार शिशुपाल की सो गालियां तो कृष्ण | सुनी और आगे और कुछ कहते ही कृष्ण के सुदशन ने शिशुपाल पा मस्तक छेदन पर दिया । और उसया कटा शीश धरा पर गिर पडा । वातावरण वो गम्भीरता और स्तव्यता से सहम कर युधिष्ठिर ने कृष्ण की स्तुति की। उनकी प्रसनता के फलस्वरूप राजसूय यज्ञ की पूर्णाहुति हुइ और सगी राजा महाराजा ससम्मान और प्रसनता पूर्वक अपनी अपनी राज धानिया को लौट गये । मानवीय स्वतनता का मयादा ध्वज फहराने लगा। मगध मथुरा की सत्ताधुरी की अतिम सुदृढ इकाई छिन भिन हो गई। यदि मगध धुरी या छिन मिन होना आतकवाद, अन्याय, अनीति और अमानुपीय दूरता और कुटिल-कृत्या वे सत्ता-वेन्द्र और स्रोत या सवथा नष्ट हाना था, तो कुर पाञ्चाल धुरी का निर्माण मानव वाद, जीवन-स्वातन्य और धार्मिक न्याय के विकासो मुखी प्रेरणा केद्र की सस्थापना का महत्त्वपूर्ण कदम था। यह दूसरी बात है कि कुर परिवार मे ही दुर्योधन की म युमयता ने इस नूतन मानवीय विकास पथ को छलाच्छादित कर, शाति के सारे प्रयत्ना का विफत परवे, महाभारत के कौरव पाण्डव महायुद्ध को अपरिहाय बना दिया । राजसूय यन की परिममाप्ति पर मयदानव द्वारा विरनित सभा भवन वे अनिर्वाच्य और मतिभ्रमोत्पादी शिल्प सोदय वा निरीक्षण करते समय जब दुर्योधन ने स्फटिक स्थल को जलाशय और जलाशय को पापाणस्थल समयकर अपने आप को भीम की हसी और द्रौपदी के दु सह्य पटु यग का विषय बनाया, तब से उसके मन म प्रतिशोध और प्रतिद्वद्वता की अग्नि और अधिक प्रज्ज्वलित हो गई और शकुनि को लेकर दुर्योधन शोघ्र हस्तिनापुर लौट कर पाण्डवो के सव विनाश का जाल गूथने लगा। वह पडयत्रकारी जाल शकुनि नियन्त्रित द्यूतत्रीडा व रूप में प्रस्ट हुआ । यद्यपि विदुर ने घृतराष्ट्र को, पूछन पर, यहा, 'राजन् यह जुए का राल सारे वश के माश या कारण बनेगा। तथापि दुर्योधन कण और शनि के हठ के सामन धृतराष्ट्र की कुछ न घली । द्यूत हुआ । युधिष्ठिर सब युछ हार गया! द्रौपदी को भी दाव पर लगा ठा। दुर्योपा नै घाचा विदुर को यहा कि वह द्रौपदीयो गीघ्र समा म रपर आये- वह पापाचारिणी 'अपुण्यशीला दासी शीघ्र मेर महल में आम और गाडू लगाय राम्माजतां वेश्म परंतु गोघ्र , तत्रास्तु दासीभिरपुण्य गीला (समा पर 66 1)। विदुर द्वारा फटकार दिय जाने पर विद्रोपदी युतुन महारत या अथ 68 वधू और इन्द्रप्रस्थ को रामाज्ञी है, और वह जुए में हारी ही गई है गयोकि हारे हुए युधिष्ठिर को द्रौपदी को दाव पर लगाने का अधिकार ही नही या (समापव 264) दुर्योधा ने प्रतिकामी को यह निलज्ज पाय सौंपा। प्रति- कामी की विनय को सुनकर द्रौपदी ने कहा, 'हे सूतपुत्र | तुम सभा में उन जुआरी महाराजा के पास जाओ और फिर यह पूछो कि 'भाप पहले अपने वा हारे थे या मुषे गच्छा त्व कितव गत्या समाया पृच्छ सूतज । किं नु व पराजपीरात्मानमथवा माम् ।। सभापर्व 677 अनायास ही विदुर मानो द्रौपदी की जिह्वा पर आवठा। यह प्रश्न समा के समक्ष सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न गया और भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा आदि सयाने और धम घुरघर आचार्यों समेत सभी पौरवो दी अयापपरक अमानवीयता और धमविहीन दुष्टाचारिता का प्रत्यक्षीकरण कराने वाला दपण बन गया। वलाद द्रौपदी को, जो उस समय एक वसना और रजस्वला धी, सभा मे लाया गया। (67 19) सभा म द्रौपदी ने वही प्रश्न फिर दोहराया। प्रश्न को गम्भीरता और मर्यादा को जानते हुए भी किसी ने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा । दु शासन के निलज्ज और अपमान मरे दुव्यवहार के प्रति द्रौपदी ने विनय भरे शब्दो मे कहा, 'दु शासन मेरी लज्जा न ला, मैं पुल यधू हूँ। कुल मर्यादा की रक्षा करो।' दु शासन सत्ता के आवेश मे, पाशविक वृत्ति के आधीन, मानवीय स्वतनना के अपहरण के उमाद म कुछ सुनने याता नहीं था। वह तो अट्टहास करता हुआ चीस पडा- 'द्रौपदी ! तू रजस्ला, एक वस्ता अथवा नगी क्यो न हो, हमने तुम्हें जुए मे जीता है, अत त् हमारी दासी है'-- रजस्वला वा भव यानसेशि, एकाम्बरा वाप्यथवा दिसम्बरा, द्यूते जिता चासि वृतासि दासी (सभा पर्व 67 34) दुशासा की कठोर और पूर मुद्रा को देख कर द्रौपदी गाधारी घे भवन की ओर भागने लगी। दुशासन ने दोहवर द्रौपदी ये सुले हुए घने बाल पक्ह लिए और उसे निदयता घसीटता हुआ सभा में उपस्थित सभी वयोवृद्धो मौर रागालो की दृष्टि में ला गेरा द्रौपदी ने करण भदन से सभी को धिक्कारा- धिगस्तु नप्ट सलु भारताना धमस्तथा क्षत्रविदा च वृत्तम् । या हतीता कुरुघमवेला प्रेक्षती गर्ने कुरव समायाम् ।। सभापय 6740 69 मानव जीवा म मुल्यो का सपष 'यहो ! पियार है। गरतवश के परेसा पा धम निश्चय ही गप्ट हो गया तथा क्षत्रिय पम पे जाने वाले इन महापुरुपाया सदाचार भी सुप्त हो गया, क्यापि पोरवो यी धम मर्यादा या उरलपन हो रहा है तो भी समासीन सभी पुण्यशी घुपचाप देग रहे हैं।' यह पिर यहती है, 'द्रोगस्य भीष्मस्य च नास्ति सत्त्वम्' अर्थात, जान पटता है किगीष्म पितामह ायाम प्रवर द्रोण, महात्मा विदुर, महाराजा धृतराष्ट्र नादि समी महापुरुषा का सत्त्व निकल गया है वृद्ध जन लज्जा से गड गये, परतु दुर्योधन के प्रभाव के आगे कुछ बोल राये। दुशासन ने दासी वहफर द्रौपदी को जोर से पवना दिया । वह गूठित-सी हो रही थी। कण यो बडी प्रसन्नता हुई। उसने खिलसिलावर दुशासन पे पथन और कृति को वही सराहना की- 'Tणस्तु तद्वाक्यमतीव हृप्ट सम्पूजयागारा हसन सशब्दम्' (समा पप 6745)। भीष्म बोले पर मिथित भाव म-जो स्यामी नही है यह पराय धन को दांव पर नहीं लगा सवता, परन्तु स्त्री पो सदा अपने स्वामी के अधीन दसा गया है, अत इन बाता पर विचार करने से मुझसे कुछ कहते नहीं बनता-'अस्वामी अशक्त पणितु परस्व, स्त्रियाश्चनर्तुवराता समीक्ष्य' (समा पव 6747)। निस्सहाय, निराश और आगोशपूण द्रौपदी ने विडम्बना के उस क्षण म, दुर्गा मागवत लिखती हैं, 'अनजाने, यावेग के प्रवाह मे, सत्य के उस मूस मानवीय आधार को स्पश किया जिसे समस्त कलाएं, समस्त घम सदब ढूढते हैं और ढूढने पर ही सत्वशील कहलाते हैं। वह श्लोक शत शत नाद सहित गूज उठा मेरे मन म । सीधी सादी रचना है। नही हैं अनुप्रास का अवगुण्ठन, नहीं है उपमा उत्प्रेक्षा की सजावट । परतु भरा है बुद्धिमानो, तानवाना और धमज्ञा पे अनुभव का सार सवस्व । सत्य की परिमापा करता हुआ, तीत्र स्वर मे कहा गया और निवच वर देने वाला श्लोक- सा समा यत्र न राति वृद्धा न ते बद्धा य न वदति घमम् । नासो धमी यत्र च नास्ति सत्य न तत्सत्य यच्छलैनानुविद्वम् ।। व्यासपद 67 अर्थात्, वह सभा नहीं है जहाँ वृद्ध पुरुप न हा, व वृद्ध नहीं हैं जा धम की बात न बतायें वह घम नहीं है जिसमे सत्य न हो, और वह सत्य ही है जो छल युक्त हो ।' भोप्मोक्त वचन की छलयुक्तता पर ही यह परारा प्रहार न था। पर तु सारी समा, समासद और समा के सत्य और तात्पय की इसमे तीखी दात्य चिकित्सा है। । राभापव 6752 70 महामारत वा अथ द्रुपदशुता के इस प्रदन युठार से कई समासदा के अन्तमन म सलबला मचा दी। भीम को जड समाधि मग हुई और वह गजन कर उठा, 'इद तु अतिकम मये' (ममा पव 684) अर्थात् द्रौपदी को जो दांव पर लगाया है, इसे मैं अनुचित समयता हूँ। यह धमका, मार जीयाको स्वतनता,के सत्य का घोर अनादर है, गतिश्रमण हैं । भीम ही नहीं, दुर्योधा के भाई विकण ने जो प्रस्तुतिकरण निणमाथ सिंहासनासी सगा के अनेर राजाओ के समक्ष किया, उसके लिए भीम मन ही मन उसया कृतज्ञ हो गया, और अनेक रामा- सदो ने दुर्योधन को अन्तर्मन से धिनकारना आरम्भ कर दिया। इस घटना मे जीवन मूल्यो के सधप को एक नयी वसोटी मिली, उसके लिए एक नया आयाम खुला और सघप ने आगामी चरण का द्वार उ मुक्त होने लगा। विषण ने कहा- 'कौरवो तथा माय भूपालो | आप लोग द्रौपदी के प्रश्न पर पिसी प्रकार का विचार प्रकट करें अथवा न करें, में इस विषय में जो यायसगत समझता हूँ, वह कहता हूँ (मये याय्य यदवाह तद्धि वक्ष्यामि कोरवा ) पाण्डुन दन युधिष्ठिर ने धूत जुआरिया से प्रेरित होकर द्रौपदी को दांव पर लगाया है । सती साध्वी द्रौपदी समस्त पाण्डवा की समान रूप से पत्नी है, वेवल युधिष्ठिर की ही नहीं। इसके अलाना, युधिष्ठिर पहले आपको हार चुके थे, उसके बाद उहोने द्रौपदी को दांव पर लगाया था। यह सब शकुनि की चाल है। इन सब बातो को निचार करके मैं द्रुपद कुमारी कृष्णा को जीती हुई नहीं मानता'- एतत् सर्व विचाय अह मयेन विजितामिमाम' (समा पय 68 18-24)। यह सुनकर सभी सभासद विक्ण की सराहना ओर शकुनि की निदा करने लगे। सभा मे योलाहल सा हो गया। तब राधान दन (यु तीन दन 1 ) पण ने गोधावेश मे विषण की मुजाओ को जार से पकड वर, उसे भूख आदि पहता हुआ, इस प्रकार वोला, कुरुन दन । देवतामा ने स्त्री के लिए एक ही पति वा विधान क्यिा है, पर तु यह द्रौपदी अनेक पत्तिया के अधीन है अत यह निश्चय ही वैश्या है। इसका समा मे लाया जाना कोई अनोखी बात नहीं है । एक्वस्त्रा और नगी हो तो भी यह यहाँ लाई जा सकती है। यह मेरा स्पष्ट मत है (समा पब, 68 35 36) 1 दुशासन ! यह विवण अत्यत मूढ है, तथापि विद्वानो की सी बातें बनाता है । तुम पाण्डवो वे और द्रौपदी के वस्त्र उतार लो (स प 6837)-- पाण्डयाना च वासासि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर।' फिर क्या था। द्रौपदी चीर हरण का उपक्रम शुरू हुआ। द्रौपदी नेमन ही मा महर्षि वसिप्ठ के प्रवपालीन उपटेश के अनुसार पि 'महत्यापदि ! 71 मानव जीवन मे मूल्या का सधप सम्प्राप्त स्मतव्यो भगवान् हरि' श्रीकृष्ण की मूक रुदनवत् प्राथना वी- 'हे नाथ | हे रमानाथ । हे व्रजनाथ हे सकटनाशन जनादन | मैं कौरव स्प समुद्र मे डूवी जा रही हूँ, मेरा उद्वार कीजिये।' द्रुपदनदिनी की यह वरण पुकार सुवर दयानिधि श्रीकृष्ण गद्गद् हो गये, कृष्णा की रक्षणाथ उसी क्षण दौड पडे और अव्यक्त रूप से उसके वस्न मे प्रवेश करके नानाविध सुदरातिसुदर वस्त्रो द्वारा द्रौपदी को आच्छादित कर दिया- 'वसन स्प भये श्याम'। दु शासन की भुजाएं थक गई, सभासद चक्ति हो गये, द्रौपदी उपकृत और हर्पित हो गई। सवन आश्चय भरा शोर मच गया। दु शासन को सभी कोसने लगे। अव मीमसेन से रहा न गया । समस्त राजाओ के बीच हाथ पर हाथ मलते हुए महाबली भीम ने मोघ से फ्डकते हुए ओठा द्वारा मयकर गजना में साथ यह शाप दिया (प्रतिना की) 'शाप तत्रभीमस्तु ।' उसने कहा, 'यह खोटी बुद्धि वाला दु शासन भरतवश के लिए क्लब है । मैं युद्ध में बलपूवर इम पापी की छाती फाड कर रक्त पान करूगा। यदि न पीऊँ तो मुपे अपने पूर्वजो की गति न मिले' (समा पव 68 52 53) । भीमसेन की यह प्रथम मोघाक्ति थी भीषण प्रतिज्ञा थी जिसम भावी दुघटना का गजन भरा घोप है । उधर दु शासन चीर रोंचत खेचते एक्दम थक गया। पर वह द्रौपदी को नियसमा कर सका। आसिर वह लज्जित होकर चुपचाप वठ गया । कृष्ण ने कृष्णा की लाज रख ली। दुर्योधन के लिए यह सब कुछ सह्य नही था। उसो सभा मे सडी द्रौपदी ये प्रति अभद्र सकेत करते हुए अपनी जांघ यावत्र उघाडा और उसे द्रौपदी या दिमाया । भीम या धय पुन टूट पडा और उसने दूसरी प्रतिमा सहज ही म पर डाली–अधम दुर्योधन । तिस जांघ पर बैठने पा इशारा करये द्रौपदी या अपमान पर रहा है, उम जाध को अपनी प्रचण्ड गदा ये प्रहार से तोड दगा (समा पव 71 14) । मीम ये घोर गजन से रागी सभासद गय से यापने लगे। अ घे पतराष्ट्र यो दिसाई तो कुछ भी नहीं रहा था, पर समा म समी युछ थव्य को सुनकर वे बैठे बैठे यह अनुमव पर रहे थे कि वहाँ जा घुछ हुआ यह उारे वुल पे गहार या पारण वनगा । अत. ज्या द्रौपदी या अपने पास युलाया, उमे शात्वना दी और फिर युधिष्ठिर गो बार मुडकर यहा, युधिष्ठिर ! तुम उदार हृदय हो । दुर्योधन की दुष्टता या भूरा जाना । अपना पा राज्य सवयुछ यापरा हुमा समयो। फिर द्रौपदी पो यो प्रेगादर बुद्धि रो महा-'एपमुक्तमा पतराष्ट्रो मनोपि' (पहली बार मेर यारा 1 पतराष्ट्र यो गनीपि यहा है, सम्भवत इसलिए नियत् प्रथम अगर पारिगीतिर मायनिय यत पिया पा)- 72 मरमानमा वर वृणीष्व पाञ्चालि मत्तो यदमिवान्छति । वधूना हि वशिष्ठा मे त्व धमपरमा सती।। सप 7127 हे पाञ्चालि' तुम जो चाहो वह यर माग लो। तुम सभी वधुभो मे वरिष्ठ हा, श्रेष्ठ हो, तुम सती साध्वी धमपरायणा हो।' जिसने भरी सभा मे लाज रखी है उसी दिव्य सत्ता की प्रतिमूर्ति श्रीकृष्ण न धृतराष्ट्र को वरदायक बुद्धियोग दिया है, एसा मानती हुई द्रौपदी ने बड़े विनय और विवेक से वर मागा वि 'पमप्राण युधिष्ठिर का दासत्व से विनिर्मुक्त बीजिये जिससे मेरे मनस्वी पुत्र प्रतिवि द्य को अनानवश दूसरे राजकुमार ऐसा कह समें कि यह 'दासपुर' है (समा पर्व 7129)।' 'तथास्तु' कह कर जय धृतराष्ट्र ने एक और वर मागने के लिए कहा, तव द्रुपदसुता ने कहा कि 'भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव अपन रथ और धनुपवाण सहित दास भाव से रहित और स्वत न हो जाये (समा पब 71 32)।' इस वर के दे देने पर धृतराष्ट्र न एक तीसरा और वर मागने यो वहा, पर तु द्रौपदी ने यह कर कि 'लोमो धम नाशाय भगवन् नाहमुरसहे चुप हो गई, और अपनी स्वाभिमान- जय अस्मिता आर घमपरायणता का परिचय दिया। घतराष्ट्र ने स-सम्मार युधिष्ठिर का इद्रप्रस्थ लोट जान के लिए कहा और सभी पाण्डव द्रौपदी सहित, गुरुजनो को प्रणाम करके इद्रप्रस्थ की ओर चन पडे । पुन द्यूतत्रीडा और पाण्डवों को तेरह वप का वनवास दुर्योधा पे सारे पडयत्र पर पतराष्ट्र की उदारता से भीषण तुपारापात हो गया। वह आगोश के साथ आया और घृतराष्ट्र से कहने लगा, 'हे मनु- शूदन) शत्रुओ का तो सब प्रकार के उपाया से हनन करना चाहिए'-सर्यो- पापनिहत या रात्रव शत्रुमूटन-(समा पव ), पर तु आपने मेरे सब प्रयत्ना पर पानी पर दिया है । पाण्डवो का पतन होना ही चाहिए। उहे पुन धूत में बुलाया जाये। इस बार शत मह रखी कि जा जूए में हारेगा, यह माइया सहित तेरह वर्ष वन म वितायेगा, और तेरहवा वप अज्ञातवाम का होगा। धृतराष्ट की मनीरा दुर्योधन में सामने चल न समो, विवश होकर पृतराष्ट्र ने कहा कि यमी तक पाण्डव इन्द्रप्रस्य पहुंचे ही नही होगे, अत उन्हें माग में से हो वापिस बुला ले आओ। दूत गया, व आये, धत कौशने गुनाई गई, कुनि के कमाल से पाण्डव श्रेष्ठ पुधिष्ठिर ने फिर जूआ गेता। परिणाग तो निश्चित ही था, हारे हुए पाण्यो ने गागार तरह वप मा वन गमन आरम्म रिया। जीपन मूल्या ये हा भीषण मघपमे द्वितीय चरण में 'धमराज युधिष्ठिर 73 गातप जीतम मुल्या गा सपष की प्रमादजय महान भूल के साथ महाभारत के चरिन नायको की मनस्थली मे होने वाले अतद्वद्व भी सामने आते है जिनसे यह मत सहज ही म बन जाता है कि इस चरण का सघप भौतिव' अस्तित्व के स्तर से कही अधिक ऊंचा अस्मिता और स्वातन्यजय सैद्धातिक एव नैतिक स्तर का भारी सघप था जिसके बिना जीवन मानवता के सद्गुण रूपी विकसित सुमन की सुवास से परिपूरित और अनुरजित नहीं होता, जिसके विना सत्य के प्रति जिज्ञासा जागृत और सक्रिय नहीं होती, जिसके बिना सत्य का स्पश व साक्षात्कार अलभ्य ही रह जाता है। 'सत्य ज्ञानमन त ब्रह्म' की असण्ड चि मय दृष्टि से तो अन त सत्य ही नर जीवन का परम ध्येय हैं, परतु सत्य सामा यतया तीन स्तरो पर नात य है स्थूल, सूक्ष्म और परम स्तर पर । स्थूलसत्य इद्रियगोचर होता है, यदृष्ट तनप्ट याय से स्थूल सत्य परिवत्तनमूलक चरित्र वाला है। सूक्ष्म सत्य का बोध व दशन सतत मननशीतता, गहन विचार मथन और सत्पुरुप की वावसुधा के प्रवाह मे शक्य है, परम सत्य के साक्षात्कार के मूल मे निर्विवाद रूप से सत्यानुग्रह हो होता है । सघप के इस द्वितीय चरण मे मानव के जीवन मूत्यो के सत्यस्वरूप का दान प्रथम दो स्तरा पर अधिक स्पष्ट और सुलम है बनिस्पत कि तीसरे स्तर पर। कौरव समुदाय के चरित्र नायक, इस चरण मे, प्रधानतया दुर्योधन, दु शासन, कण, विदुर, विकर्ण और धृतराष्ट्र वे अतिरिक्त भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य हैं । दुर्योधन, दुशासन और क्ण पाण्डवो को शत्रु मानते हैं, उहें मार डालने के लिए छलकपट रचते हैं पडयन्त्रकारी हैं और अघम से अधम काय करने मे भी सोच नहीं करते। नारी जाति का प्रतिनिधित्व करने वाली द्रौपदी ये प्रति, उसके चोरहरण वे समय कहे और अनकहे शब्द और सकेत तिने अपमानपूण अमानवीय अयायोचित और अधम थे, उनसे उनका मनोमालिय, चारिनिय निकृष्टता राजोमाद, और मोगलोलुपता या स्पष्ट आगास मिलता है। विदुर उत्तम विचार वाले हैं, स्वतत्र और श्रेष्ठ जीवन उनकी रहनी मे समाविष्ट है, अत वे निस्सकोच सत्य का प्रवटन कर देत हैं, दुर्योधन यो हाट भी देते हैं, धृतराष्ट्र यो सही सलाह ही देत हैं पाह दुर्योधन पेमय से ये उसे प्रियावित पमीन परें। विषण ये मनोराज्य में सत्य तडप पर उठ बैठा और जो कुछ भी उसने द्रौपदी ये गमधन मै पहा, यह सत्य को स्वतत्र अभिव्यक्ति देने और स्वीकारने की ती वेदना व उत्कण्ठामापरि- पाया है। जीया मूल्या या राषप विरण पौ नैतिश्ता, यायपरस मानयीयता और सत्यपरायणता पोस्पा मोर ध्यत पर गया। भीम दी धमोरगाय महामारत माप सम्यघी मिश्रित रक्ति दुर्योग्न के प्रभार के समक्ष उमकी क्षयो मुसी स्वतन्त्रता आर भीरता को ही पक्ट करती है। जो व्यक्ति प्रतिज्ञा-परायणता में सव- गिरोमणि और राज्य प्रशासन एव समर विज्ञान मे निष्णात और अग्रगण्य होने के नाते 'भीम' बलाया, वह धर्माधम निणय के प्रश्न पर इस प्रकार कतरा जाये, मानव जीवन मूल्यो के सघप को तनिक तीक्षणता ही प्रदान करता है । द्रोण तो वित्कुल चुप रहे, आचायत्व ही भूल गये । द्रुपदजित अजुन को प्रिया मार जीवन सगिनी को भरी सभा मे दु शामन लाज रेने पर उतारु हो जाये, और द्रोण अकृतज्ञापूण जड समाधि ले वठे 1 लगता है, जय म्व अस्तित्व को आच लगने की भीतिपूण सम्भावना होती है, तव बुद्धिमानो और वयोवृद्धा का विवेक भी इसी मे है कि वे स्व पद और स्व सम्मान रक्षाथ, घम नीति आदि वी मर्यादा से दूर, मौन वा निकण्टक सहारा ले ले। द्रोण या मौन-व्यवहार भीष्म की मिश्रितोक्ति से अधिक अनुचित लगता है । परतु धृतराष्ट्र को शीघ्र निणयात्मक प्रतिक्रिया चाहे वह महात्मा विदुर या प्रेरक प्रताडना व म प्रणा से ही हुई हो, रामासदो को गात, दोपदी को सन्तोप और पाण्डयो पोस्वात श्य जीवन पा रस प्रदान करने वाली सिद्ध हुई । यहाँ, क्या यह ध्यातव्य नहीं है कि आदि पव के आरम्म में (मप्रमणिका पव) जहाँ महपि व्यारा दो महाद्रुमो का स्पक या घते हुए धृतराष्ट्र को दुर्योधन नामक मयुमय महाद्रम का 'अमनीपि मूल रहा है-'मूल राजा धृतराष्ट्रोऽमनीपी'-~- यहाँ उही वेदव्यास उधृतराष्ट्र को पाञ्चाली को वर देन की घोषणा परत समय 'मनीपि' शटल से समिहिरा किया है। सारागत , जोरन मूल्यो के आतरिम सघप की प्रक्रिया म धृतराष्ट्र मीपायुक्त हाकर घममय और मान- यीय होता चाहता है, पर तु दुर्योधन पे यागे उसकी दाल नहीं गलती, और वह परिस्थितियो रे दास यो तरह जीवनयापन यी विवातामलुढक जाता है। जीवन मूल्या पा सघप दो मोचों पर प्रमुखतया लडा जा रहा है चयक्तिर और सामाजिक, वैयक्ति मोर्चा हृदय ये अभ्य तर में हैं, सामाजिक मोर्चा व्यक्ति के यहागत मे है । वस्तुत मन्तजगत या सघप ही बहिजगत् म व्यक्त होता है और सामाजिक जीवन या बहिसघा मनुप्य के अतमन य बुद्धि यो नो प्रभावित करता रहता है। सघप मनुष्य के विकास या साधक यन गाता है यदि वह जीवन यो सत्यता गे सहजतया स्वीकारता हुमा अपने याचार पिचार मो बहुनाहिताय और मुसाय सस्कारित करता रहे, यह माग गूम है, अपित गजगता, धैय और पुरुषाथ की अपदा वरता है । पाण्डवो ने इसी पप या अनुग पायोर अनुसरण परिस्थितियों के प्रमय प्रसग में साप- पानी, विवे और अपूर्व धीरज रे साप दिया था। पापल्य समुदाय में सभी गाव जीरा मैमुन्या पासपप 75 सदस्या का सत्यत सनिय और साहसपूर्ण योगदान रहा था सघप के इस चरण में | भीम ने स्वशक्ति का प्रयोग माता कुती के आदेशानुसार ब्राह्मण की प्राणरक्षा आर नगर यो यकासुर की हिंसा-बलि मे युक्त नशसता और मातक रो सर्वथा उगुक्त कराने मे पिया, दूसरो वो उसने स्नाथ सिद्धि हेतु कभी उत्पीडित नहीं किया, स्वय स्वत त्र जीवन व्यतीत करने वाले दूसरों के जीवन स्वातन्य की पवित्रता व रक्षा का ध्यान रखत है। समी पाण्डवा मे यह गुण समान रूप से विकसित हुआ है। अत जैसा कि पहले निवदित-विवचित हो चुका ह संघप के प्रथम चरण का मूल आधार अस्तित्व था और द्वितीय चरण का अस्मिताजय स्वतनता और स्वाभिमानजय समता य याय । इसका राम्यग् दशन इस चरण की सभी घटना मे सुलभ है पर तु द्रोपदी नीर हरण मे तो इस दशन की पराकाष्ठा है । धमराज युधिष्ठिर द्यूतनीडा मे सब कुछ हार तुके हैं पर तु प्रत्येक दांव के पीछे उनकी एक मात्र मनोमिलापा भरा हुआ पुन जीत लेबर स्वतत्र हो रहना है । स्वय यो हार जाने के बाद शकुनि के छ नवल म आकर द्रौपदी को दाव पर लगाते हैं, तो उनके मन की अनकही इच्छा अवश्य ही यह रही होगी कि यह दाव यदि मुो जीत प्रदान करती है तो हम सब पुन स्वतत्र हो सकते हैं । इसी में उनका स्वाभिमान भी रक्षित हो सकता था पर तु अतुल पराक्रमी पाण्डव अपने ज्येष्ठ भाता की चूत पराजय के फलस्वरूप अपना स्वतन अस्तित्व खो चुके हैं, उनकी अस्मिता लुट चुकी है और उनकी आँखा के सामने जब द्रौपदी को सभा मे घसीट पर लाया जाता तब वे स्वतत्र पम हेतु सूब छटपटाते हैं, परतु उनको घमपरायणता उहे कुछ करने नहीं देती। मवये सब काठ के बने से बैठे रहते हैं । भीमसेन के हृदय मे तो योघ का ज्वालामुखी गडगडाता है, परतु युधिष्ठिर ये आदेश से मर्यारित वे नतमस्तक होकर सब कुछ सह लेते हैं । यह है आतरिक विकास का प्रम-व्यष्टिगत तन मन भार बुद्धिवल की सीमामा का अतिरमण करके समष्टिगत धम नियत्रित विश्व मविधान की गतिविधिया की वलिवेटी पर अपने स्वत्व को स्वाहा पर देवा । पाण्डवा ने इस प्रक्रिया को तप की सरलता से अपनाया, इसलिए उनके चारित्रिक गठन में मानवीय स्वत ग्रता, स्वाभिमान जय स्वावलम्बन एव सत्यपरक आचरण का सदा प्राचुय रहा। उनके व्यक्तित्व म आत्मीयता, रामत्य और स्वाधीनता वे मूरया या सम वय-सुमन गिलने लग गया। इसीलिए तो म्यय घतराष्ट्र को यह पहना पडा कि हे युधिष्ठिर! तुम म धम है अजुन मे घेय है, भीमसेन में पराक्रम है और नकुल-सहदेव म श्रद्धा एव रिशुद्ध गुरु गेवा पा माय है । मजातात्रो ! तुम्हारा मता हो।' 76 महाशारत या अप 731516 । त्वपि धर्मोऽशुरो धय भीमसेने परामम । श्रद्धा च गुरगुथुपा यमयो पुरुपानययो । अजात शत्रो भद्र ते ॥ सभापर्व द्रौपदी के प्रति घृतराप्ट के उद्गार न केवल द्रौपदी के जीवन मूल्यो के प्रति धतराष्ट्र की आदर बुद्धि वा द्योतन करते हैं, परतु स्वय धृतराष्ट्र हृदय में मनीपावे नवो मेप एव धम के प्रति चेतना के अकुरन पा परिचय देते हैं । चाहे वह नवोन्मेप और चेतना वा अभ्युदय अल्पजीवी ही क्या न सिद्ध हुआ हो। द्वापदी के जीवन में जिस प्रलयकारी सधप या दशन हमे उसके चीरहरण के समय होता है वैसाजयत्र कहीं नहीं होता। सभा, वृद्ध, धम और सत्य का ममस्पर्शी अर्थाद्घाटन जिस सरा चित्त से सकटापन्न काल मे द्रौपदी बत्म त सपमित मापा और शालीनता के साथ कर सकी है, यह उसके व्यक्तित्व के आ तरिय विकास पी अनुपमता का असदिग्ध प्रमाण है। सभी सभासदो को अपने विवक जय प्रश्न से वि जूए मे पहले महाराज युधिष्ठिर हारे थे या पहले वे उसे हारे थे, सवथा निपच ही नहीं किया परतु दुश्मन के सेमे के विवण की मनस्यती वो इतना पवझोर दिया कि वह दुर्योधन के विरोध में द्रौपदी के समथन में सत्य यो प्रवट करन में अपने जापको गौरवावित और मोमाग्यगोल समझने लगा। मत्य के सहारे व जवलम्बन से निस्तेज और न कुछ व्यक्ति भी तनोमय जार महत्त्वपूर्ण बन जाता है । इसक अतिरिक्त विकण की प्रशमा म और कोई विशेष आधार भो ता नही ह समूचे महाभारत मे । द्रौपदी को समाधिय लोकप्रिय बना देन वाला क्यानब भी तो यही है कि घोर अपमान के असहा और असहाय क्षणो म उसने अपन अभ्यन्तर म जीवत्व की सभी सीमाओ या अतिग्रमण करने वाले श्रीकृष्ण का विश्वात्मा के साथ, प्राथना द्वारा, अपने को समर्पित पर जाड दिया। कृष्णा का कृष्ण भाव में भारोहण होते ही मानवे द्र और धमरक्षक कृष्ण ने वसन रूप मे अवरोहण करने द्रोपदी पी गाज ही नहीं रखी, परतु समस्त धमानुरागियो को प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा आश्वस्त कर दिया कि जिधर धम है, उधर कृष्ण है, और जिघर कृष्ण है, उधर विजय है-- 'यतो घमस्ततो कृष्ण यतो कृष्णस्ततो जय । द्रौपदी की प्रापना में वृष्ण के प्रति-सत्य के प्रति मन यता का बल था, क्षुद्र व्यक्तित्व के सभी क्लाश्रया के टूटत ही, मद्र विराट के या तय की अन यता फे प्रक्ट प्रभाव यो गरिमा को व्यक्त करन वाला यह ज्यल त उदाहरण है। द्रोपदी ये लज्जा रक्षण में 'वसन स्पमये श्याम' न घमरक्षण के साथ साथ सत्य मानव जीवा मे मूल्या वा राघप 77 को सर्वोपरिता का ही प्रक्टन नहीं किया पर तु यह भी सिद्ध किया कि मानव जीवन में श्रेष्ठ जीवन मूल्यो ये माग की यात्रा अत्य त कठिन याना है, इस याना मे बार बार पथ तिमिराच्छन्न हाता है, द्वाद की धुप से मन की नाख व द सी हो जाती ह, प्रज्ञा पर पक्षाघात हो जाता है, चारो आर घार अघार छा जाता है, कुछ नहीं सूबता । दुर्योधन को धूतसभा में द्रुपदसुता की ऐसी ही विपन एव निशीथमयी स्थिति थी। परतु उसने अपने हृदय मे नास्था का एक दिया जलाया जिससे उसे उस घनीभूत अघवार म भी सघपाथ आलोक का सम्बल मिलता रहा। इस क्षण युधिष्ठिर के अ तमन में भी इसी आलोग का वल था। अपने अनोसे और प्रज्ञाप्रदीप्त समालोचन ग्रथ 'महामारत का काव्याथ' माथी विद्यानिवास मिथ बडी क्लामयता के साथ लिखते हैं- 'महाभारत वीर गाथा नहीं है, युद्ध गाथा भी नहीं है, वह मनुष्यत्व की कठिन यात्रा काव्य है । इस याना में वार बार जरा घिरता है, कुछ नहीं सूझता है, पर एक दिया उस अघवार से निकम्प भाव से जूयता रहता है-उसकी दीवट सत्य की है, उसमे तल तप का है, बत्ती करुणा की है, तो क्षमा की है । वडे यत्न से यह दिया जलाया जाता है, क्याकि न इतना तप जादमी सचित कर पाता है, न इतना दृढ आधार सत्य का उसरे पास खड़ा हो पाता है, न इतनी करुणा उससे पूरी जाती है, न इतनी क्षमा (जविकृत क्षमा) उसमे अपने को जला कर दिपती रह सकती है। तब भी अधिकार की चुनौती ह, मनुष्य को दिया जलाना 'सत्याघारस्तपस्तैल दयावति क्षमा शिखा । अ धकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन वायताम् ॥' सारत मानव जीवन मूल्यों के संघप ने द्वितीय चरण में महर्षि यास बार बार बताते है कि मनुष्य की जीवन यात्रा और वह भी पुरुषार्थ चतुष्टय वे धर्म पथ की यात्रा-ऋजु और विपदा विहीन यात्रा नहीं है, कई टढे मेढे मार और भयावह उतार चढाव आत है पर तु सयम, श्रद्धा और सत्यपरायणता के सहार भय उपस्थित हो जाने के सकटकाल म निर्माता और धय से उस भय वा नाश करना ही नरत्व है नरोत्तमता की पहचान है-आगत तु मय इप्टवा प्रहत यम भीतयत्' (शान्तिपव 14033)। इसी म अस्मिता के सरक्षण-सबर्टन या सार सवस्व है, आत्मस्वातव्य और सुख-दुग में साम्यावस्था की प्राण प्रतिष्ठा है, श्रेष्ठ जीवन का नरोत्तम ये घरातल पर आहान और उद्घाटा है । 78 महाभारत पा अर्थ सघप पातीय धरण द्वितीय चूत मे भी सब कुछ हार पर पाण्डवो ने धमराज युधिष्ठिर वे साथ द्रापदी को लेकर तेरह वष की वनवास यात्रा का श्री गणेश विया । वृद्धा माता कुन्ती को समझा बुझा र महात्मा चाचा विदुर पे साथ रहने हेतु राजी पर लिया। तहरवा वर अज्ञातवास या यप था। इस वनवास की पूर्णावधि समाप्त होने पर पाण्डव धूत यो शर्तामार हस्तिनापुर लौटवर आये और म सम्मान स्वतन जीवन यापन हैतु, रहने योग्य, राज्य में स्थान मागा। दुर्योधन सुई की नोक जितनी खूमि भी देने के पक्ष में नहीं था, अत उसो युछ भी देना स्वीकार नहीं किया। क्षत्रियोचित युद्ध द्वारा ही दुर्योधन से कुछ प्राप्त किया जा सकता था, पर तु घमराज युधिष्ठिर युद्ध के पक्ष म नहीं थे । सन्धि- वाताएं आरम्म हुई । समय, कौरवाधिप पतराष्ट्र की ओर से, पाण्डवो के पास यह कहने के लिए आये निमज्ञजन पदाथ बुद्धि नहीं रखते, मिक्षावृत्ति से ही निवाह करने में उनका गौरव है, अत उहें कौरव राज्य छोडकर भापत्र कही उदर पूर्ति हेतु चले जाना चाहिए, पाण्डवा की और से श्रीकृष्ण शाति- दूत बनकर गय, परन्तु दुर्योधन ये असम्मानजना तथा अ याम पूर्ण व्यवहार ने कौरव पाण्डवा के बीच युद्ध अनिवाय कर दिया। पाण्डवा के सामने भारी चुनौती थी। दुर्योधन के नेतृत्व मे कोरवों ने आत्राम रूप धारण कर लिया, अधम मनुष्य को पाशविका, हिंसक और उग्रवादी बना देता है, इसमे कोई सशय नहीं, वह दूसरो को सम्पत्ति और स्वत प्रता का अपहरण बरवे स्वय की स्वाथ सिद्धि के साम्राज्य विस्तार को सवथा पापपरफ, मानवोचित और धर्मानुकूल मानने व घोपित करने में रत्ती मात्र भी सकोचातु नही होता, उल्टा, युद्ध और राजनीति मे सब कुछ उचित ही है, ऐसा डिम डिम घोप परने में वह मानवीय गरिमा की प्रतिष्ठा मानता है। ऐसी स्थिति में क्या धार्मिक चिन्तन व चरित्र वाला जन व जनसमुदाय धम को बोट म पो जाने वाली अमानवीयता को चुपचाप सहन करता रहे या यायोचित माग योर मानवीय घम की सही प्रतिष्ठा हेतु उसका डटकर प्रति- चार वर? क्या धम मनुष्य को भीर बनाता है या तेजोमय ' क्या रवधम और म्यत्तपत्ता की रक्षा हेतु यातक्यादी अधम के विरोध में मनुष्य का 'यायोचित विद्रोह करना धर्मानुएल कम नहीं है ? क्या घम, आपत्तिकाल में, उप और आगाम प धारण करके मानवीय जीवन वे भादश मूल्यों की रक्षा करने से गौरवान्वित नहीं होता? यदि धम प्राण राज्यसत्ता "यायी, मानवता प्रोत्साहिनी और सामध्यवार नहीं होगी, तो क्या प्रजा मे अनीति और आतक, अधमता और उद्दडतामा मयावह और अरस्याणकारीतय नही पल जायेगा? मानव जीवन में मूरयो का सघप 79 क्या अधम के साथ समझौता करक मानवता की रक्षा और मानव जीवन यो पावन स्वतत्रता की वृद्धि की जा सकती है ? पागवी शक्ति के पुनारिया के सामने घुटने टेक देना और कहना निघम का मम इसी म है कि हम विद्रोह न करें, शात रह क्योकि अधम के प्रतिकार म अहिंमा का हनन होता है क्या धम की अवना नही ? अघम और मयाय को सहन करना क्या मानवता विरोधी तत्त्वो को बढावा दना नहीं ह? धमप्रिय युधिष्ठिर इन प्रश्नो के समाधान का दान धमगीरता म करने लगे। ये 'शठ प्रति सत्यम्' बुरे के प्रति (विरोध म) सत्य का ध्वजारोहण करने मे इसलिए सकोच करन के पक्षधर थे वि इम ध्वजाराण म अपार जन धन का घ्यम अवश्यम्भावी था। इस भीषण परिस्थिति में 'क्या धम है-यया अधम है' प्रश्नज य जो भारी चुनौती सामने आया थी, उसका पाण्डवी ने किस विध निवारण किया यह मानव जीवन मूल्या के सघप ये इस तृतीय चरण का मूल कतेवर है जिसका विवरण विवेचन घटना म की प्रासगिक्ता म ही अपेक्षित है। प्रमुख घटनाओं की पृष्ठभूमि और मूयाङ्कन ज्याही सभी पाण्डव वनगमन करते है त्याही दुर्याधन, कण, दु शासन आदि एक साथ बैठकर यह परामश परत है कि कोई ऐसा कदम उठाया जाना चाहिए कि पाण्डवो मा वन मे ही सवनाश हो जाये और दुर्योधन के एक छम राज्य मे कौरवो का ही बाल वाला हा। दुर्योधन की दृष्टि मे पाण्डव शीघ्र मार डालने योग्य शत्रु हैं जिनय अस्तित्वो मूलन मे ही कारवा की श्रेय सिद्धि है। शनि आदि दुर्याधा के म तव्य का समर्थन करते हैं और कण बडे उत्साह में साथ कहता है वि पिसी को कानोकान सबर ही नहीं मिल और हम सब मिल पर वन प्रदेश म भ्रमण करते हुए पाण्डवो को सदा यी नीद सुला दें ताकि हम भविष्य म अमय हाकर राज्योपभाग करें- तेपु सर्वेपु शा तेपु गतेप्वविदिता गतिम् । निविवादा मवियत धातराष्ट्रस्तथा वयम् ॥ वनपर 719 इस निणय वी क्रियाविति हेतु व सव अपन अपन भव्य रथा म सशस्त्र बैठकर सेना सहित कूच वरन ही वाले थ यि मपि वेद यास वहाँ आत हैं, धृतराष्ट्र एव उनके पुत्रो से सवाद स्थापित करत हैं और उह पाण्डव इत्याथ वन म जाने से रोक रत है। यह है पाण्डव विरोधी दुर्योधन प्टि भार इसी मूल दृष्टि से दुर्योधन आदि सगी जना वे जीवन मूल्यों को सप्टि हुई है। वितनी सीण और विरानी साथ परक क्तिनी अमानवीय, जितनी जपय और क्तिनी देपयुक्त । 80 महाभारत का अथ इसके ठीक विपरीत है युधिष्ठिर को धमपरक यत्यन्त उदार और सब- हितकारी मानवीय बुद्धि जिसको उवरा भूमि में से अबुरित और पल्लवित जीयन मूल्यो यी श्रेष्ठता मानवता के तत्त्वो का, बिना भेदभार और समता ने दशनानुकूल, पोपण धरने वाली सिद्ध हुई और हो रही है। एक समय जय पाण्डवा को वनवास भोगत काफी समय व्यतीत हो गया तब दुर्योधन को लगा वि वनवास की अवधि समाप्त होन से पहले, उनकी जीवन लीला पी इति श्री पर दी जाये तो वह निरापद राज्योपभोग कर सकेगा। इस मलिन उद्देश्य से उत्प्रेरित होकर कण, दुगासन, दुर्योधन आदि अपने पूरे रनवास और बड़ी सेना सहित वन प्रदेश में पहुंचे । एक स्थान पर सुरम्य सरोयर था जहाँ इन्द्र की प्रेरणा से गधवराज चत्ररथ विहार कर रहा था। मदो मत्त, दुर्योधन, कण आदि ने उस पर आक्रमण पर दिया क्यावि कौरव श्रेष्ठ स्वय वहाँ जल श्रीडा करन का इच्छुक था। युद्ध म वण के उनके छूट गये, वहाँ से वह प्राण रक्षाथ भाग सडा हुआ, दूर निकल गया। गघवराज के अपार गंयबल और मायाबल के सामने दुर्योधन या न केवल पूण दपदलन और तेजो भग ही हुमा, अपितु सभी रानियो और कौरव पुल वधुया सहित दुर्योधन यो वैद कर के आपाश माग से उह ले उडा । कौरव दा मे सवत्र हा हा कार मच गया, 'त्राहि माम्' के शब्द नभ मण्डल से भूतल पर वनवासी वेश मे विचरण और विराम कर रहे युधिष्ठिर और सभी पाण्डवो ने सुने, इतना ही नही कौरवो के अमात्य और अय मत्रीगण जो गघवराज के प्रहार से बच गये थे, वे आतनाद करत हुए धमराज युधिष्ठिर के शरणापन्न होकर याचना करने लगे विवे शीघ्र गधवराज वा पीछा कर दुर्याधन और पुरा वधुआ को रिपु-चंद मुक्त करावें । कारव बुल की मयादा सतरे में है-- प्रियदर्शी महावाहुर्धात राष्ट्रो महावत । गहियत राजा पार्थास्तुमनुधावत ।। दुःशासनो दर्विपहोदुर्मुखो दुजयस्तथा । बद्ध्वा ह्रिय ते गघ राजदाराश्च मवश ॥ वनपद, 242 11 12 यह तनाद सुनते ही युधिष्ठिर, भीम और अजुन को उनकी रक्षाथ भेजते हैं, कहते हैं उहं शीघ्र छुडा कर लाओ। भाइयो को इस आदेश का औचित्य समझ म नहीं आता। उनके सामने भीम वो कालकूट विष देवर मार डालने, लाक्षागृह दह्न, द्रौपदी का चीर हरण के दृश्य दौड आत हैं। परतु मानव- श्रेष्ठ धमराज नरोत्तम हैं । उावी दृढ मा यता है, हमे अपने प्रति किये गये अयाय का प्रतिकार स्वय लेना उचित है, यह भीरुता ही नहीं नशसता होगी - मानव जीवन मे मूल्यों का सघप 81 पि हमारे जीवित रहते हमारे भाइयो और कुलबचुभो या अपमान और वध हो जाये, क्योकि वे हम ही तो ह-'चय पवाधिक शतम्'-पांच और सो मिलार ही तो हम होते हैं । उनका मादेश गजन- 'उत्तिष्ठत नरव्याघ्रा सज्जीमवत मा चिरम्'- सुनते ही बर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव जाते हैं, तुमुल सघष होता है- 'सुतुमुलयुद्धम्'--परतु अन्ततोगत्वा पराममी पाण्डव गधवराज चंगरथ को परास्त कर दुर्योधन सहित सभी माइया और राज दाराओ को छुडा लेते हैं। और युधिष्ठिर उहै गले लगाकर हस्तिनापुर निध्वण्टक लोट जाने के लिए अनुरोध करते हैं । युधिष्ठिर की दृष्टि में मानव अपने आप में साध्य है । मानवीय गौरव की रक्षा में हो माव की गरिमा है। पर कौरवो की दृष्टि म मानव स्वाथपूर्ति का एक यात्र मात्र हैं। इन दोनो जीवन प्टियो मे आकाश पाताल का जतर है या नहीं ? युधिष्ठिर की अस्मिता असूया की सीमाओं से बहुत परे समष्टि की आतमयी उदारता मे पलो होने के कारण सत्यधारिणी सामथ्य से अभिभूत है । परतु दुर्योधन की अस्मिता असूया की मीमाआ मे आवद्ध यष्टि की सकीण विद्वेषता म पली होने के कारण विनाशकारिणी अहताजय भय छलवादी क्षुद्रता से सनी हुई है । युधिष्ठिर चाहता तो वह पराये हाथा दुर्योधन, दु शासन, शकुनि आदि सभी को मरने देता, पर तु वह मानववादी उगरता से ओतप्रोत न केवल स्वय स्वतत्र रहना पसद करता है पर तु वह सवको स्वत नता के रक्षण वद्धा का समथक है । चतरथ ग चवपति को भी उहोने स सम्मान विदा किया है । नरोत्तम जीवन के मूल्या और नराधम जीवन के मूल्या के बीच इतनै बर्डे अ तराल का स्पष्ट और सवस्वीकाय उदाहरण अन्यत्र पहा मिलेगा। यह वहीं दुर्योधन है जिसो शकुनि के छलवल से इही युधिष्ठिर को हराया था, उनका भरी सभा में असह्य अपमान किया था, द्रुपदसुता पाञ्चाली जा इन्द्रप्रस्थ की मम्रानो और कुरुतुल वी अनिंद्य आर श्रेष्ठ वधू थी, उसे दिगम्बरा करने, दासी के रुप म महल म रखने और सब प्रकार स लाञ्छित, कलक्ति मार अपमानित मरने में कोई कसर न उठा रखी थी, उसे युधिष्ठिर न, विद्वेष वैमनस्य को मुना कर दुश्मन की कैद से तुरत छुडाया और बुलवधुआ थी मान मयादा पा धर्मोचित रक्षण दिया और अपने सहज स्वातय प्रेम, समस्य दशन तथा मानवीय सद्भाव का विलक्षण परिचय दिया। यह मव इसलिए हो सका यि घमरा को चेतना सामाय सासारिक चेतना का अतिश्रमण परके सर्वात्ममाव के उन्नत चैत य स्तर पर प्रतिष्ठित हो चुकी थी। उनको यह बदल धारणा थी कि मनुष्य दैनदिन जीवन और विशिष्ट प्रमग ये अमगत ज्ञा चितन और नावरण करता है वही सब जीवन दशनो या मूलाधार है। महाभारत याय 82 उहोन सदा यही सोचापि कैसे स्वकीय जना को धम-मानवीय गौरव गरिमा तथा मानव स्वातग्य और समता का पोपर घम-- की राह पर ले जाकर सुसानुभूति दें। तदथ ही वे क्षमा के तेजोमय पुज रहे, करुणा को प्राणवत मूति बन पर जिये, उनका धम इसी प्रेरणा का प्रकाश-पुज था। तभी तो दुर्योधन इनकी क्षमामय उदारता से अछूता न रहा सका । जब गधवराज चंगरथ से छुडा पर युधिष्ठिर ने, यह जानवर भी कि दुर्योधन यादि सब पाण्डवा के घोर अनिष्ट की इच्छा से वहां आये थे, वौरवो का आदर सहित हस्तिनापुर प्रस्थान करने हेतु कहा, तर दुर्योधन ा मानस सज्जनता रो सुवासित हुए बिना न रह सया । जीवन-मूल्य की सधप स्थली बन गया उसका मन | जिस शनु समझ कर छल बरा आदि मे मार डालने की अनेक योजनाएं बनायी, उसी युधिष्ठिर ने ही उसे राजदाराआ-सहित सक्ट से उवारा और उसके साप अतुल मैत्री, अचित्य क्षमा और मानवोचित उदारता का व्यवहार क्यिा-- इस भाव से इतना विह्वल और द्रवीभूत हो गया दुर्योधन वि वह अपने आपको धिक्कारने लगा, और स्य दोपो के प्रति तनिय जागृत होकर अतर्मुखी विचार द्वारा अपने पर ही कटाक्ष करने लगा कि 'मैं निश्चय ही मेरे दोपो के कारण भ्रष्ट हो गया हूं-- 'आत्म दोपाद परिघ्रप्ट' (वनपव 249 17)- -~-अब मैं हस्तिनापुर जाकर भीष्म, द्रोण आदि पुण्यात्मायो से कैसे कुछ बोल पाऊँगा--- 'कथ वक्ष्यामि तानहम्' । अब तो बस धरती फटे और मै उसम समा जाक- यद्यपि दुर्योधन वा यह निर्वेद हृदय की गहराई म से ही उठा था और उसकी आत्म ग्लानि का परिचायक था, परन्तु उसमस्थायित्व का रस नही था क्याकि शीघ्र उसके अन्त करण मणके वारयो का पाण्डव-विरोधी प्रभाव पुन उदित हो गया जब उसने कहा 'मृतस्य भद्राणि कुत पोरवेय यतो जय ओ, कौरव श्रेष्ठ | मरे हुए को सुख कहा, जय वहा (वनपव 252 39)। दुर्योधन को ढाडस व धाते हुए कहा कि तुम एक महान् योद्धा, वीर और अच्छे शासर हो, शत्रुआ का दलन तुम्हारा दायित्व है, तुम्हारी जीत भी निश्चित है । अपने शस्त्रा को छूकर कण ने शपथ ग्रहण की और प्रतिज्ञा की कि मैं पाण्डवो पर विजय प्राप्त करके रहूँगा-'विजेष्यामि रणे पाण्डून' (वन पर 25241/2)। युधिष्ठिर की मनुष्योद्धारिणी उदारता ने फेवल दुर्योधन के अन्तस् को ही द्रवित नहीं किया (चाहे वह श्मसान वैराग्य ही सिद्ध हुआ), शकुनि जैसे छताधिप और पडयत्रकारी के मन का मीनिमलताये रस का आस्वादन करा दिया । वह तो इतना प्रभावित हुआ युधिष्ठिर की इस कारुणिय क्षमा से,- मानव जीवन में मूत्या का सपर्प 83 जिसस दुयायन यो ग बवपद से मुक्ति ही नहीं, पूरे कुरु रणपास का भी प्राण दान मिला था-द्रवीभूत होकर उसने दुर्योधन को प्रथम चार, समवत अन्तिम घार, यह सलाह दी- प्रसीद मा त्यजारमान तुप्टन सुकृत स्मर। प्रयच्छ राज्य पार्थाना यशो धममवाप्नुहि ।। व प2518 'प्रसन्न हा, दुर्योधन ! अपने प्राणा को त्यागने का भाव छोड द । सताप रग्य, शाति से पाण्डया द्वारा किये गय उपकार (सुकृत) का स्मरण पर और उह उनका राज्य आदर पूर लौटा दे । एसा करके यश और धम वा सहण अजन कर।' क्यापि इस राज्य में उनकी पतक सत्ता वा अधिकार है, वह उहे लोटा कर सुख का जीवन व्यतीत कर--'पिग्य राज्य प्रयच्छेपा तत मुखमवाप्स्यसि (वनपर्व 25191/2)। पर तु कण को उपयुक्त प्रतिज्ञा पि 'हे राजन् । म भली भांति जानता हूं कि इस युद्ध मे तुम्हारी विजय अटल है, प्रतिज्ञा करता हूं, जपोहाय में आयुध लेकर कि मेरा क्थन सवथा सत्य है' दुर्योधन के निर्वेद पर पानी फेर देती है- अनुजानीहि मा राजन् ध्रुवो हि विजयस्तव । प्रतिजानामि ते सत्य राजनायुधमाल ने ।। वप 25323 राग वा रग जम चिना नहीं रहता । युधिष्ठिर यो प्रस्ट सज्जनता का सग अल्पकालीन ही था, इसलिए दुर्योधन आदि के मानस म उसकी छबि ज्यादा समय तव न टिक सकी, पण आदि वे सग वा सातत्य दुर्योधन के निर्वेद का निमूल करने म शीघ्र प्रभावकारी सिद्ध हुआ। पर यह निर्विवाद सत्य है कि दुष्ट से दुष्ट प्रकृति वाल मनुष्य म भी सज्जनता और सदाचारी जीवन के मूल्या वास्वागत समादर सम्भव है, उनका विकास भी सम्भावित है यदि उसके जीवन में घमावलम्बिया की आत्मीयता वा सतत साहचय उपल ध रहे । भीम और हनुमान थे मिलन म भी इस सत्य की उक्ति का स्पष्ट प्रमाण है । जब जब मीम यो दुधिन आदि पर गुस्सा आता था, तब तव युधिष्ठिर के धेय-यद्धर, सन्तोष प्रदायव और मानव धम-उद्योघर वचन भीम के बल और उत्साह को मगलमय जीवन प्रवाह म मोड दने या काम करते थे । बाल्यावस्था म जय दुर्योधन न विप देकर भीम के वध का पडयन किया सब स एकर द्रौपदी चीरहरण म दुर्योधन और दु शासन की दुसह्य निलज्जता और अप मानकारिता तर युधिष्ठिर के सतत प्रभाव सग मे रहने के कारण ही भीम का पपपती हुई प्रोधाग्नि यार यार मा त हा जातीया। वनवास काल म युधिष्ठिर महाभारत पायथ 84 ये इस सग-सातत्य का निमल प्रभाव भीमसेन की हनुमान के साथ मुगावात में सूर्योदय वे समय सिलते हुए कमल की तरह स्पष्ट दिखाई देने लगा। एक दिन जर पाण्डव गधमादन पवत शिखर पर चढ रहे थे तव परिवाथम के समीप पहुंचने पर भीषण वया और वात प्रवाह रे शात होते होते एक सहस्रदल वाला कमल द्रौपदी के पास आ गिरा। द्रौपदी के अनुरोध पर कि वैसे ही कमल पुष्प उसे चाहिए भीम उस दिशा की ओर तेजी से चल पडा जिपर से उडता हुआ यह एक पत्र आया था। रास्ते में एक वडा सा बन्दर अपनी विशाल पूछ से माग अवरुद्ध किये सोये हुए था। बाद मे पता चला कि वह महामपि तो स्वय हनुमान है और वायुपुत्र होने से मीम उनका छोटा भाई है। वनवास की पूर्व भूमिका आदि का सम्यक् बोध होने पर हनुमान ने भीम से कहा कि 'मैं तुमसे मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ, अगर तू कहे तो मैं सब कौरवा को मारकर, दुर्योधन को बदी बनावर तुम्हारे चरणो में लावर डात दू-'बद्ध्वा दुर्योधन चाघ भावयामि तवातिवाम्' (वनपव (15111) '-तब भीम रहता है कि 'नही', आपको प्रसनता ही मेरे लिए पर्याप्त है। युधिष्ठिर के हृदय की विशालता और निस्पृह माननीयता ने भीम ये हृदय मे भी तदनुकूल परिवत्तन का सहज सम्पादन कर दिया। इस से हनुमान अतीव प्रसन्न हुए और उहोने अपनी ओर से घर प्रदावाणी में कहा-- तदाह वहयिष्यामि स्वरवेण रव तव। विजयस्य ध्वजस्थश्च नादान् मोक्ष्यामि दारुणा ।। वप 151/17 अर्थात्, मैं अर्जुन के रथ की धजा पर बैठूगा और जब तुम अट्टहास करके शत्रुदल पर आक्रमण करोगे तो मैं तुम्हारे म्बर मे अपना गजन मिलाकर ऐसा भयावह हुयार करगा जो शत्रुओं के प्राण हरण वरने यानी होगी, जिसमे उनी हार और तुम्हारी विजय निश्चय ही होगी। इस यथानर से स्पष्ट है कि पाण्डव मनोजयी अन्तर्यात्रा के पथ पर आरूढ थे और जीवन मूल्यो वा सपप उत्तरोत्तर उच्चतम मनोभूमियों यो पार करता हया समष्टिगत आत्मीयता के अनात ये स्पर्शाथ गतिशील था। भीम ही क्या, यजीवो इद्रशोक की याया भी इस सभापी उद्दामता और चरमतामा द्योता करने वाली यात्रा है । घोर तपश्चर्या की त मयता में क्षणा मे परात्पर शिव पशुपति को प्रसन्नता से पशुपत भादि दिव्यास्त्रो वे प्राप्त परोपे पश्चान्द्र मिश्रण पर अर्जुन दलोर गमन परत है, वहाँ के सगीता और लाममों मे नत्य, वाद्याता, गायन कला आदि या दिध्य एक उत्कृष्ट गान प्राप्त करते हैं देशवाओ में दियास्त्र और अदा यात्रा मानव जीवन म मूल्या का सधष 8 विद्या मे परिशिक्षित और पारगत हो जाते हैं और भततागत्वा इन्द्र के परोक्षादेशानुसार इद्रलोक यी अतुल सुदरी अप्सरा उवगी जय अर्जुन के पामनरक्ष मे रात्रि में प्रवेश करती है, तब मर्जुन के वाक्मयम और सदाचार यी अनपेक्षित विद्यमानता से उसके विकसित और विवासो मुपी जीवन मूल्या ये सधप या परिपाय हमारे समाने आता है । उवशी अपने दिय सोदय और यौवन के उमाद में अर्जुन के मनोरन्जनाथ और तृप्त्यथ अपनी कामकला मयता या प्रदशन परती है पर तु अर्जुन के हृदय म उसके प्रति शिशुत्व जाग उठता है और वह उवशी मे माता कुती और माद्री के भव्य भाव रूप से दशन करता है । जसे शिशु, गुरुजनो और मातृदेवी वा, प्रेमपूरित भाव विभोरता से अभिनदन अभिवादन करता है, वैसे ही अर्जुन का उवशी के प्रति निमल व्यवहार होता है-तदामिवादन कृत्वा गुरुपूजा प्रयुक्तमान् (वनपद, 459)। उसने असदिग्य और स्पष्ट शब्दो मे आदरपूर्वक पहा- गुरुदार समाना में निश्चयेन वरानने। यथा कुती च माद्री च शची चैव ममानधे । त्व हि मातृवत्पूज्या रक्ष्योऽह पुत्रवत् त्वया ।। वप4547 इन शब्दा को सुनकर स्तव्ध और दग सी रह गई उवशी, परतु वह शीघ्र बोल पडी, 'पाथ ! ऐसे सम्बोधन से मुझे लज्जित न करो। अप्सरा कमी माता और बहन नहीं बनती। मैं तुम्हारी कामना करक ही यहां आई हूँ ।' अर्जुन ने माद स्वर मे दोहराया, 'माता आपकी यह कामना सफल नहीं हो सकती । आप हमारे वश की माता है और देवराज इद्र की अप्सरा। इद्र मेरे गुर हैं, मुझ पर आपकी कृपारष्टि बनी रहे।' उवशी की समस्त चेप्टाआ के विफल हा जाने पर उवशी आगोश से भर गई और उमन धनन्जय को शाप दिया- 'शशापाथ जयम्'-कि 'तुम एक वपतक पृथ्वी पर निर्वीय रहोगे, यह मैं कामिनी रूप से कह रही हूँ, पर चूकि तुमने मुझे माता कहा है, यह शाप तुम्हारे लिए वरदान सिद्ध होगा।' उवशी यह वह कर चली गई। देवराज इद आये और सब कुछ जानकर उ होने अर्जुन से कहा-' -'हे, अनघा तुम्हें भूतल पर तेरहवें वष मे अज्ञातवास करना है । वीर उवशी के दिये हुए पाप को तुम उसी वप पूरा कर लोगे। नतक वेश और नपुसक भाव से एक यप तक इच्छानुसार विचरण करके तुम फिर अपना पुसत्व प्राप्त कर लोगे। तेन नतन वेपेण अपुस्त्वेन तथव च । वपमेव विहत्यैव तत पम्त्वमवाप्यस्यसि ।। पेनपव 4559 86 महाभारत पा अथ अर्जुन सर्प लौट आता है तोक से सय सानो और देवविद्याओ गे निष्णात होवर, परतु भाता है, उवशी ये शाप से ग्रसित होकर भी! उर्वशी के प्रति अर्जुन के उद्दात व्यवहार म युधिष्ठिर के आदर्श जीवन यो अमिट छाप अस्ति है । श्रेष्ठ जीवा के मूल्या यी विकसित भूमि मे यही जिस भादरा भूमिका या निर्वाह गर्जुन ने दिया है, वह धमराग युधिष्ठिर के प्रभाव और गौरव या परिचायक है। निस्स देह, अर्जुन, मनोजयी की प्टि से, युधिष्ठिर के बादश के सन्निकट है । उम्पत चेतना की दृष्टि से यागेश्वर और धमराज को छोडपर अर्जुन का कोई साम्य नहीं । जीवन मूल्या के सपप मे अर्जुन ते गोमय और तीवारोही नायर है। यद्यपि यह माद्योपात घघर रूप से ही प्रत्यात है, परन्तु नर जगत् या अत्युच्च कोटि या प्रतिनिधि होने से वह मानवीय गुणा, मानव स्वात य और हृदय की पावन सरलता का प्रदीप्त पुन्ज भी है। यस्तुत यह युधिष्ठिर को वेदव्यासजी से प्राप्त, अमूल्य प्रतिस्मृतिविद्या या ही प्रताप था, जिसे स्वय अर्जुन ने अपने ज्येष्ठ भ्राता से प्राप्त किया, वि अर्जुन इन्द्र सभा मे रह कर भी अपने लक्ष्य से न विस्मृत हुआ, 7 च्युत ! अज्ञातवास के सेरहवें वप म पांचो पाण्डव माइयो और द्रौपदी ने जिस कौशल और कोमलता से विराट नगर में मत्स्यराज धी सभा मे परिचर्या की भूमिका निभाई, उससे स्पष्ट है कि मानव जीवन पे मूल्यो पा सघप मानो अपनी सफलता के शिसर पर विजय पताका फहरा रहा हो। किसी को भी मत तक पता न पड सका यि विराटराज पे साथ ब्राह्मण येप मे रहने और जूआ सेल पर उहें विनोदमय रखने वाला कट्व नहीं स्वय महाराज युधिष्ठिर थे वि विराट की महारानी के महल मे सेविया के रूप मे याम करने वाली श्यामल सुदरी सैरधीही कुरुकुलवधू इद्रप्रस्थ की सग्रानी द्रौपदी थी जो अपने पांचो पतियो सहित यज्ञातवास भुगत रही थी, वि वल्लम नाम वा रसोईया जो विराटराज की भोजन सभा मे साल भर नियुक्त रहा वह महापराक्रमी भीम था और उसी ने गायव वन कर मत्स्पराज के महासेनाध्यक्ष बोचर का चुपचाप वध किया था, कि वृहन्नला नामक नपुसक हिंजडा जिसने विराटराज की पुत्री उत्तरा और मय फुलाङ्गनाओ को सङ्गीत, वाद्य एव नृत्य क्ला की अद्भुत शिक्षा दी, तथा जिसन राजकुमार उत्तर का सारथित्व स्वीकार पर समस्त वौरव सेनाको, जो महारथियो और यतिरथियो-भीष्म पितामह द्रोणाचाय, कृपाचाय, अश्वत्थामा महावीर कण, दुर्योधन आदि-द्वारा अभिरक्षित थी, अकेले ही परास्त फर न केवल विराटराज के गो धन वो अपहरण से मुक्त कराया परतु मत्स्यराज के गौरव-स्वातश्य को अक्षुण्ण रखा और यशस्वी बनाया, वह और कोई नहीं मापनुघर गाण्डीवधारो वीर अर्जन था, कि गौओ मानव जीवन म मूल्या का सपर्ष 87 और अश्या यी ररावाली परो वारे ग्रयिर आर तत्रीपात वस्तुत नकुल और सहदेव ही थे। राप्ट है धम की रक्षा परने मे ही सच्ची वीरता है, और समझौता करने मे मीरता । अधम, अयाय और पाशविा अमानुपीय प्रहारारो धर्म की रक्षाथ राज्जारा, धमज्ञा और पराममी पुरपा का आक्रामक मुद्रा धारणी ही पड़ती है, युद्ध यदि अनिवाय हो जाये तो हट पर सघपरत होना पड़ता है, और यदि छपवेप पारण करना पड़े तो वह भी नि साच पूर्णपसात्मयता से वरना ही चाहिए । पाण्डवा या अनातवास और उस पाल म घटित भीषण युद्ध इसी मूल सत्य पा प्रत्यक्ष उदाहरण है कि जब मानवता खतरे म हो, धार्मिकता को अ याय और विधर्मियो ये युवमों को प्रचण्ड आंच लगती हो, और मनुष्य जीवन की गारय गरिमा और स्वतत्रता राकटापन्न हो जाय ता घम प्राण मनुष्या का यह पावन दायित्व हो जाता है वि व अपनी सामध्य और शक्ति को सुष्ट नेतृत्व में बटोर वर याय, मानवीयता और स्वत त्रता के रक्षणार्थ अपनी पूरी शक्ति खपा दे । पाण्डयो ने ऐसा ही पिया जब चूत पोडा को गत के अनुसार तेरह वो के अज्ञातवास सहित वनवास भुगतने के बाद युधिष्ठिर ने इद्रप्रस्थ या अपना पैतक राज्य मागा और दुर्योधन ने वह दने से वार कर दिया। दुर्योधन यो गव था कि उसके पास अथाह शक्ति है, इतना ही नहीं वह श्रीकृष्ण से उनकी सारी नारायणी सेना भी माग कर ले आया था । अत वह अपने को अजेय समयता था । छलपूण पर तु भव्य स्वागत की सामग्री से उसने पाण्डवा के मामा माद्री माई राजा शल्य को भी अपनी तरफ वर लिया था। दुर्योधन युद्ध के लिए तैयार था, वह पाण्डवो को उनका राज्याधिकार नहीं देगा, वे कुछ भी करें। पृतराष्ट्र के दूत सजय को युधिष्ठिर ने वडे आदरपूर्वक कहा- अव भी सब कुछ पहले के समान हो सस्ता है । जसा तुम कह रहे हो मैं शाति धारण पर लूगा, परतु भरतवश शिरोमणि सुयोधन मेरा राज्य लौटा दे, इद्रप्रस्थ पूववत् मेरे पास रहे'-- अद्यापि तत् तत्र तथैव तता, शाति गमिष्यामि यथा त्वमात्य । इद्रप्रस्थे मवतु ममैव राज्य मुयोधना यच्छतु भारताग्रय ॥ उद्योगपव 2629 इस पर सजय ने बडी अटपटी, अस्वीकाय और अयायोचित बात कही, और वह भी धम के आलोक की ओट मे- न चेद् भाग कुरवोऽयत्र युद्धात् प्रपच्छारस्तुभ्यमजात शत्रो। मक्षचर्याम घर वृष्णिराज्ये श्रेयो मयेन तु युद्धेन राज्यम् ॥ उद्योगपव 272 88 महाभारत का अय सार्यान, हे अजातशयो । मदि फोरम तुम्हें राप गापुछ मी भाग 1 दें, तो तुम्हारे लिए यही श्रेष्ठ और सराहनीय है रितुम अपना और एणि राज्य में मिक्षा मारा पर ही जोपायापन गे! इसी मे तुम्हारागल्याण है कि तुम युद्ध नपरो, ऐसी मेरी मापता है। सपियों पे दौर मे, मात्तिप्रिय धमराज युधिष्ठिर तोगत्वा यही ता पह दिया कि 'हे गजय । तुग महापाप हो । ऐसा बग दिसुयोधन हम पाच माझ्या पो सगम्मान जीवशाय पार गांव तो दद। हम तो इसमे भी नाति पारपरसँग- मातृणां देहि पञ्चा पा ग्रामार सुयोधन । नातिनोऽस्तु महाप्राग नातिति सह सजय ॥ उद्योगाय 3120 दुर्योयन यो यह प्रस्ताव भी स्वीरस्य नही था । मत युर यी अवश्यम्मा विता को जानकर श्रीकृष्ण मी द्वारिकापुरी में आ गये । उह पता चला कि राजा द्रुपद ने सपि का प्रस्ताव पर सपा पुरोहित हस्तिापुर भेजा पा, वितु दुर्योधन न येर यो वसा भेजा कि राग्य य गार यो बात तो दूर है, सुई वरापर भी जमीन दो मे लिए यह तैयार नही है याति तीणया गूज्या विध्येदप्रेण मेर तावदप्यपरित्याज भूमेन पाण्डा प्रति उचागपव 12725 इस पर युधिष्ठिर 7 पुन श्रीकृष्ण, पाञ्चाल नरेश, मत्स्यराज और अन्य अने रामागत नपतियो के साथ विचार विमा लिया। श्रीकृष्ण सवार मप शान्तिदून पे रूप म दुर्योधा की समा म गये। हस्तिनापुर में सपा प्रसन्नता पी लहर दाट गयी कि वृणाति या प्रस्ताव स्यय लेकर आये हैं। प्रथम दिन ये विदुर के घर रह, और दूसरे दिन य धोरखाकी रामा मे उपस्थित हुए। कौरव समा मे माये हुए कई गजाआ को यह जानवर विस्मय मामि दुर्योधन शानिये पक्ष में नहीं है, यह पाण्टया वे रावनाग पाइर है, यहाँ तक कि उस वृष्ण यो यांध कर वैद वर डालने ता वा निणय कर लिया है। 'जस इद्र ने पति को बलात् चदी बना लिया था, वैसे हम भी पियेश कृष्ण कायंद कर लें-- वयमव पाकेश निगृलीम बलादिव । प्रमह्म पुरुषव्याघमिनो वरोचनि यथा !! A उद्यागपत्र 1305 जव रण कोरव सभा मे पहुंचे तो उहें उत्तम मागन पर पिठाया गया। मानव जीवा मे मूल्यो या सघष 89 वह पितामह भीष्म, पृतराष्ट्र, फण, द्रोण, कृपाचाय, शकुनि, दुशासन, अश्वत्थामा आदि पौरव पक्ष के सगी योद्धा सिंहासनस्य थे । कृष्ण ने समा को सम्बोधित करते हुए कहा- 'कौरव और पाण्डव दोगा एक ही कुल मे पदा हुए हैं । दोनो ही हमारे मित्र है । जरा-सी बात ये लिए युद्ध परना हितकर नहीं होता इससे क्षत्रियो या ना हो जायेगा और देश से घम और सत्य का भी लोप हो जायेगा । यह युद्ध किसी प्रकार उचित नहीं है । पाण्डवा का कोई दोप भी नही, उहे छल से जुए मे हराया गया। दुर्योधन की ओर से शकुनि TT जुआ खेलना भी अन्यायपूर्ण था। फिर भी जुए मे हारने पर पाण्डयो ने वनवास तथा अज्ञातवास का कठोर क्प्ट सहा । महारानी द्रौपदी या अपमान हम सभी के लिए अपमान की बात थी । पर पाण्डवो ने कभी भी कोरवो का अहित नहीं किया। यहा तर कि चित्ररथ ने जब दुर्योधनादि समेत पौरव कुलाङ्गनाओ यो बाघ लिया था तो पाण्डवो ने उह मुक्त कराया। इसी प्रकार कौरवो ने विराट के ऊपर आक्रमण परवे पाण्डवा को सतान का घोर उपप्रम विया । इतने कष्ट सहन के उपरात भी युधिष्ठिर केरल आधा राज्य लेकर ही शातिपूर्वक रहना चाहते हैं ।' सम्मापण के उपसहार के रूप मे कृष्ण ने कहा, 'कुरुआ और पाण्डवो मे वीरा का नाश हुए विना शाति हो जाये, मै यही प्राथना करने आया हूं- कुरुणा पाण्डवाना च शम स्यादिति भारत । अप्रणाशेन वीराणामेतद्याचितुमागत ।। कृष्ण के वक्तव्य की सत्यता पा सारी सभा मे स्वागत हुआ, पर दुर्योधन को मोधाग्नि घधक उठी और वह कृष्ण को बंद कर लेने का आदेश देने लगा। दुशासन उहबदी बनाने हेतु आगे बढा परतु भीष्म की प्रताडनासे वह सहम गया। धृतराष्ट्र ने दुर्योधन के सामने अपनी विवशता ही प्रस्ट की, यद्यपि उसने कृष्ण के सधि प्रस्ताव को बहुत उचित ठहराया था-शमे शमें भवेत्तात' शाति मे ही सव का पल्याण है-(उप 124 19) पर दुर्योधन ने तो सघि प्रस्ताव को यह वह कर ठुकरा दिया कि राज्य का पूरा अधिकार केवल दुर्योधन या ही है, युधिष्ठिर का नही । पाण्डवो को यह अनधिकार चेष्टा है कि वे मुहास आधा राज्य माग रहे हैं। यह सव कुटिल कृष्ण को चाल है। मैं यह कभी नहीं . होने दूगा। कृष्ण कौरव समा से लौट आये । शाति प्रस्ताव मग हो गये । युद्ध की विषमता अपरिहाय हो गई। कुती अपने पुत्र षण से मिली । राधेयपुत्र ने यह 90 महाभारत का मम जानर र भी मि वह सूय द्वारा प्राप्त को तेय ही है, दुर्योधन ये पक्ष से लडने या निश्चय अटल रसा, परतु उसने यह प्रतिज्ञा अवश्य की पुन्ती के पांच पुत्र अवश्य जीवित रहेंगे--अजुन सहित या फिर ण सहित । यौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के महासेनाध्यक्ष भीमपितामह वो और पाण्डयो को सात अक्षौहिणी सेना का नेतृत्व सूत्र द्रुपदपुत्र पृष्टद्युम्न ने सम्माला । कण या दम्भ इस समय अपने पूर्ण ज्वार पर था। उसने प्रतिज्ञावद्ध घोषणा की कि जब ता कौरव सेना या सचालन सूत्र, महासेनाध्यक्ष पद से, भीष्म करेंगे तब तक वह अपने हाथो में युद्धाथ शस्त्र नहीं उठायेगा। परन्तु अर्जुन ने एक वीर योदा और सेनानी वी मोति पृष्टद्युम्न के सेनापतित्व मे पुरजार तहने में कोई आपत्ति नही उठाई। युद्ध की अनिवायता से अवगत होते ही महपि व्यास धृतराप्ट के पास दोडे आये । उनका सारा समझाना व्यथ हुआ । आसुरी रोप, अमानुपीय स्व- भाव और सत्ता का मद जय विवेक की सारी सीमाओका उल्लपन पर रोता है और स्वेच्छारी निरकुशता अपने विकराल यौवन के पूण उमार पर होती है तो मनुष्य यह कहे बिना नहीं रहता-- अमोमयाहत शत्रुह निप्ये पापरानपि । ईश्वरोऽहमह मागी सिद्धोऽह वलवा सुखी ।। आढ्योऽभिजनवानस्मि योऽयोऽस्ति सहगोमया । दुर्योधन ये मानस पर यह दप छाया हुआ था। व्यास ने स्वज्ञानचक्षु से बाल की महिमा का पयवलोचन किया । काल की दुधप सत्ता का इस महाकाव्य मे उन्होने कई स्थलो पर चित्रण किया है । काल सब की जड है, उत्थान, पतन, विकास, विनाश आदि का घटनाचत्र इसी मे प्रयत्तित होता रहता है । अत स्थिति की दारुण अवस्था को समझ कर, धम की वात न मनवा सक्ने पर, धृतराष्ट्र की विवशता (मोहन य) और दुर्योधन की मानव स्वात य और “यायविरोधी कट्टरता (धम्मजय) को युद्ध की अवश्यम्भावी एव कारण भूता भूमिका मापर, अपने मन की निश्चलता को विना खोये व्यास अपने आश्रम यो लौट गये । युद्ध के समय मे वे चार बार आते थे, युद्ध की विनाशकारी परिसमाप्ति के समय वे फिर आये, शोर सतप्त युधिष्ठिर को धर्मोचित मान वीय स तोप बुद्धि और सान्त्वना प्रदान की। पर तु यह इतिहास की विडम्बना रही दि व्यास को सन्तान व्यास ही के सामने विनाशग्रस्त हो गई और वे ब्रह्म- ज्ञानी, निवालश और दिव्यसत्ता से विभूपित होते हुए भी युद्ध को टाल न सके, दुर्योधन आदि को याय पथ पर लान सके। सामा यत मनुष्य इतना स्वार्थी, स्व वेद्रित और स्व चितन और मानर जीवन म मूत्या का सपप 91 व्यवहार को ही सही गौर श्रेष्ठतम मानने वाला होता है कि वह स्वय को ईश्वर तुल्य और स्व निणय याही अतिम “याय घोषित करता है। इतना ही नहीं, यदि यह राजकीय सत्ता से विभूपित हा तो वह न तो सत्पुरुषो की मानवोचित विचारधारा शो मा यता प्रदान करता है, और न ही यह अपने अर्थोपाजन और पामतृप्ति के सामने किसी माननीय आदश या स्वतत्र मानव जीवन के उन्नत मूल्यो की परवाह करता है । दुर्योधन । ऐसा ही दिया । अत दुर्योधन और उसके साथिया और समथको का काव्यगत स्थानक सत्ता के घोर दुरुपयोग, मानवीय श्रेष्ठता और उत्तम जीवन के मूल्यो पर अनक विघ अमानुपीय प्रहार, घम और याय यी मोट म सत्य और स्वतत्रता का निरतर अवमूल्यन और पाण्डवो के अनुचित विनाश पर अपने सुप और सत्ता के नशस विस्तार का यह स्थानव है जिसकी परिणति महाविध्वसपारी महाभारत युद्ध मे हुई जिसमे न तो जय को मोगो का उत्साह शेष रहा और न ही पराजय पर रदन करने वाला, घतराष्ट्र के अतिरिक्त, कोई मानव हृदय जीवित बचा । सव कुछ बर्वाद हो गया। अततोगत्वा, महाभारत पी का यथा यो पूण विराम देने के पूर्व महर्षि वेद यास को करणा उन महाप्राज्ञ के समाधि सुमेरु से विगलित होकर निम्नोक्त विश्व-विरयात श्लोक मे प्रवाहमान होती हुई याज भी मानव मात्र यो पूण स्वातव्य, पर्याप्त ऐश्वय स्वच्छ कामोपमोग, सामाजिक पद प्रतिष्ठा,क्लात्मक जीवन और वश्विक व्यक्तित्व के विकास हेतु धर्मावलम्बना का अमर सदश रही है- ऊध्वबाहु विरोम्येप न च कश्चिच्छणाति मे । धर्मादथश्चवामश्च स किमथ न सेव्यत । रवर्गारोहणपव 5 62 पूरे महाभारत म धमका ऐसा मूल्यवान सा देश कि धम ही मानव जीवन के चरम एव सर्वाङ्गीण विकास का मूल है, समूचे विश्व का नियामक तत्त्व है और वह मानव द्वारा चाहने पर, धीर वीरता द्वारा जीवन म चरित्राथ व क्रियावित किया जा सकता है केवल एक ही व्यक्ति बार बार देता है, और वह है महर्षि वेद यास, इस मूल्यवान स देश को समूचे महाकाय मे सम्यम् रूप से धारण करने वाले यक्ति पाण्डव और विदुर ही है, विदुर समय समय पर धृतराष्ट्र यो नीति और मर्यादा की बात कहते हैं पर वे बातें अग्नि से तपे तवे पर जल यि दुआ की भांति छू होकर रह जाती हैं । रावत्र घम की ग्लानि हैं । पाँचो पाण्डव वस्तुत धमप्रिय जीवन जीना पसद करते हैं, इसीलिए श्रीकृष्ण धम के पुनरोदय के लिए, जन जीवा और राज्य प्रशासा म धमकी 92 महारत वा अथ पुन प्रतिष्ठा के लिए धर्मशील युधिष्ठिर और धर्मानुरागी उनके मातागणी का, कौरवो द्वारा प्रवत्तित अधम के कुचक्र का सर्वो मूलन हेतु, साथ देते हैं । क्सवय के वाद कृष्ण वस के मसुर जरास घा वध भीम के द्वारा करवाते हैं क्योकि मीम की विजय और प्रतिष्ठा मे धम, याय आर स्वतत्रता पी अधम, अन्याय और स्वाधीनता हाती सत्तावादिता पर स्थायी विजय और स्वच्छ प्रतिप्टा है । यह सव महत्त काय बिना युद्ध, बिना जन हिंसा और विना भीषण रक्तपात के कृष्ण सम्पूण घर लेते हैं क्योकि वे स्वय घममूत्ति ह । क्स और जरास घ की सत्ता का उमूलन, जैसा कि पूर्व पृष्ठो मे विवेचित है, मथुरा- मगध की अधिनायकवादी, अमानवीय और भयायपूर्ण प्रशासन त 7 की धुरी का मानवोचित विध्वस था। युधिष्ठिर की धमध्वजारोहिणी राजसूय यज्ञाथ समवेत अनेक राजाआ को पाण्डव समा म शिशुपाल का वध उसीत को घस्त करने वाला प्रान्तिकारीतीसरा पदम सिद्ध हुआ । दुधिनाधीन पौरव सता पा अधिनायकवादी र हस्तिनापुर यद्यपि अब अवेलापा, पर उसके रक्षण पोपण म तत्कालीन प्रसिद्ध बड़ी बड़ी हस्तियां मी लगी हुई थी पितामह भीष्म जो अनेक दृष्टियो से महाभारत के आदश पानो मे गण्य है, द्रोणाचाय जो धनुर्विद्या मे परशुराम के समकक्ष कोतिमान है, ब्रह्मास्त्र प्रयोग में एक माम प्रवीण जो फौरव-पक्षी द्रोणपुम अपवत्यामा ह, सूर्यपुत्र को तय भण जिसने दुर्योधन को जीवनपय त साय देन और पाण्डवोकापरास्त और गौरवा का विजयी बनाने की कौरव दल प्रोत्साहिनी घोषणा की है, तथा कृपाचाय, विकण, समितिजय, सौमदत्ति मादि मने अतिरथी और महारथी एव युद्ध विशारद राजे महाराजे दुर्योधन के पक्ष मे अपनी-अपनी सैन्यशक्ति के साथ युद्धाथ कटिबद्ध थे। कृष्ण के समस्त शान्ति समथक स प प्रस्तावा के दुर्योधन द्वारा निममता स प रानिये जाये पश्चात् जब उस अनिवाय कौरव-पाण्डय भीपण महायुद्ध की प्रतय पारिणी अग्नि मे दाला पक्षा म से मात्र दस वीर पुरुप ही जीवित बच रह तो जिस पोरताप और दुसानल म घृतराष्ट्र का ह्दय चीत्वार पर जन उसा, उसी भयकर आर अचिन्त्य पश्चाताप और निराशा ये अग्निकुण्ड में पाण्डव- प्रेष्ठ पमराज भी जल भुन पर प्रबल निर्वेद की अवस्था मे लुट गये। इसी वेदाज म वैराग्यानल के साम्य म युपिपिटर पे चरित्र को उज्ज्वल धममयता स्पष्टतया प्रस्ट होती है। एष पिजयी सगाट भी उमी गहन निवेद और पश्चाताप को मत अग्नि से दग्य है, जिससे परागित और मृत पोरवा पे पिता भी विद य ह । इस एप विशेष टिश युधिष्ठिर इस मावा य यो महाा दुपात नायकात्मा है, जिरो अन आहे पण युत मे दुश्मस या मारनमागेपरात घोर हत्या कम माय जोवन मे मूल्या वासाप 93 करना पडता है, मार बडे भारी और अनिच्छा से बोझिल पावो या हस्तिनापुर के राज्यसिंहासन पर खीच कर ले जाना पडता है। विजेता वे हृदय की यही सहज गहरी दु खानुभूति जो युद्ध में मरे और हारे हुए वारवा के प्रति सच्चे विलाप म प्रवाहयुक्त होती है उसे दुखात शाही शोमा से अनुवेष्ठित करती है, और इम महाकाव्य के नायक की मानवोधायकी धमप्रियता, स्वतन विवेक- शीलता और मानव मात्र को गरिमा के प्रति नैसर्गिक आदर बुद्धि का साक्षातार कराती है । वनवास काल में जब भीम और द्रौपदी भी युधिष्ठिर के जीवन दशन और मूत्या पर बटु व्यग और दुसह्य कटाक्ष करते है, तब भी वे अविचल भाव से श्रेष्ठ मानवोचित विचार और व्यवहार के आवरणाथ ही निमल वचन कहते है । भीम तो विप्लवी रोप मे उह यहां तक कह उठता है कि उनका दशन तो वस्तुत एक नपुसक कादशन है, सक्ट के समय शान्त अनुवरता मात्र भीरता का लक्षण है, परमवीर योद्धा को तो यही शोभा देता है कि वह अयाय और मातक, अमानवता और अपराध या प्राणप्रण से घोर विरोध करता हुआ, आवश्यकता पड़ने पर, प्राणा का उत्सग कर दे। द्रौपदी भी कठोर वनवासी जीवन को, जो पाण्डवो को दुवलता के कारण उन पर वलात् थोपा गया है। वार बार कोसती है, अपने दुर्भाग्य पर विलाप करती हुई रोप और निराशा भरे शब्दा मे युधिष्ठिर यो दापी ठहराती है पुरुपायहीन मनुष्य देव के हाथ की कठपुतलियां हैं, विघि उह ठीक उसी तरह थपेडे मारती हुई घसीटती है जैसे सरिता की वेगमयी धारा वृक्ष को ढकेलती रहती है । पर तु युधिष्ठिर की निश्चल प्रना मे कोई तूफानी प्रतिक्रिया नहीं होती। भीम को वे सदाचार, नौति और युद्ध की मर्यादाआ राम्ब धी उपदेश करते है और द्रौपदी को वे नियति के विधान की अटल महानता का रहस्य समयाते है और उससे वे सानुनय अनुरोध करते है कि विश्व की अचूक व्यवस्था के अस्तित्व मे वह अपना सही विश्वास और श्रद्धा रखे । युधिष्ठिर की यह अडिग धारणा है कि जब तक मानव के यतकरण मे करणा, नाति और पवित्रता का अभ्युदय नहीं होता तब तक विश्व के विधान वा बोध सम्भव नहीं है, कि विश्व उस समय तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक मनुष्य शठ का प्रतिकार शठता स करता रहेगा, छल और हिंसा के प्रत्युत्तर म छल और हिंसा का ही व्यवहार करेगा। युधिष्ठिर या जीयन शाति, सहिष्णुता, मानवीय क्रुणा और स्वतत्र चितन या मूब और मुसरित स देश है । वस्तुत युधिष्ठिर की वाणी और व्यक्तित्व म महाभारत के महान मानवीय स देश को उस समय सशक्त अभियक्ति मिलती है जब पक्ष के मार्मिक गोर रहस्यराचित प्रश्ना की चुनौति स्वय उनके मोर उनवे रोप पाण्डव भाइयो के जीवन मरण की परीक्षापूण यसाटी बन जाती है, 94 महाभारत का यथ और युधिष्ठिर के अत वरण म पहले से चल रहे और इस घटना स त्यरित जीवन मूल्यो का सघप अपनी चरम सीमा यो स्पश कर रहा होता है । जिस कला ममज्ञता व कौशल से वेदव्यास ने अपने इस महाकाव्य वे प्रत्येक पर्यारम्भी मगलाचरण मनर, नरोत्तम, नारायण, व्यास और सरस्वती के अद्भुत तादात्म्य यो सवार कर मानव के स्वरूप का दिव्य, मानवीय और परिपूर्ण निधारण किया है, उसी रचना चातुर्य और प्रज्ञा पटुता से उन्होंने यक्ष युधिष्ठिर सवाद के सत्य त रोचक, प्रेरव और शिक्षामूलव माध्यम द्वारा मानय जगत् में जीवन मूल्या के सघप या अतिशय मावीय और सर्वोपरी चित्र प्रस्तुत किया है। वनवास वाल यी बात है वारह वर्ष समाप्ति पर है, तेरहवें यप ये अज्ञातवास कोचिताम मग्न एक दिन युधिष्ठिर नावृष्ण सहित सभी गाइयो वे साप तत्सम्बधी विचार विमश कर रहे थे कि उनके सामने एव रोता हुआ ब्राह्मण आ खड़ा हुआ। रन का कारण पूछने पर उसने बताया कि एक हरिण अपने सीग म अटक जाने के कारण, ब्राह्मण की अरणी लेयर जगल पी और भाग गया है और उस भरणी के बिना वह अग्नि होय के लिए भग्नि पैसे प्रज्वलित करेगा। उसका नित्य नियम मग हो जायेगा। परुणावर पाण्डवो हरिण या पीछा किया, वह हाथ न आया, धनी झाडिया मे दिसते दिखते एक्दम बोझल हो गया। सभी भाई एर बढे छायादार बरगद वृक्ष की शीतल छाया म वठवर ग्लानि मोर सज्जा की अनुभूति करने लगे कि वे एर ग्राह्मण का इतना छोटा सा पाय भी पूरा न कर सके। यवान और प्यास ने उस ग्लानि को और तीव्रतर कर दिया। वे कुछ और आग वढे, उह कुछ ही दूर स्थित एक सरोवर वे दशन हुए। वही सय बैठ गये । नकुल जलाशय म से पानी लेने गया। ज्योही यह सरोवर मे उतरा एवं आवाज न उसे ललकारा--'मो, माद्रीनन्दन । दुस्साहस न करा । यह सरोवर मेरे अधीन है। पहले मेरे प्रश्ना का उत्तर दो, फिर पानी पीओ।' कठ सूस रहा था, प्रश्नो को सुनने और उत्तर देन का समय नहीं था। उसने पानी पी लिया, पीत ही ढेर हो गया । नकुल न लौटा तो युधिष्ठिर ने सहदेव यो भेजा। फिर वही चुनौति, फिर वही अवज्ञा, फिर वही परिणाम | मजुन आये, भीम माये, और उनकी भी वही दुगति हुई, सभी निष्प्राण सरायर के तट पर मर कर गिर गये । अब युधिष्ठिर यी वारी थी। ज्याही उहोंने जल पीने हेतु तृपापूत्ति मुद्रा धारण को कि जलाशय मे से आवाज भाई-- 'सावधान | तुम्हारे माइयो ने मेरी बात न मान कर पानी पिया था। परिणाम देख लो । यह तडाग मेरे अधीन है । मेरे प्रश्नो पा उत्तर दो, फिर पानी पीवर तृपा शान्त परो और पानी ले भी जायो।' - मानव जीवन म मूल्या का सपप 95 मा तात साग वापीमम पूर परिग्रह । प्रश्नानुसत्या तु गौतेय तत पिय हरस्पच ।। आरणेयव 31330 आर मरे पूछन पर यदि तुमन मेरे प्रश्ना पा उत्तरही दिया, तो तुम भी यम लोप के पांचवें अतिथि हो जाआगे- त्व पञ्चमो भविता राजपुत्र न चेत् प्रश्नान् पृच्छतो व्यावरापि ॥ आप 31329 यह सुन र युधिष्ठिर यौतूहलवश सविस्मय पूछन तग पृच्छामि भगवस्तस्मात् का भवानिह तिष्ठति'- भगवा । मैं सानुनय पूछ रहा हूं कि आप कौन हैं और रिस स्प म यहाँ विराज रहे हैं? प्रश्न के प्रत्युत्तर म आवाज गूज उठी- यक्षोऽहमस्मि भद्र ते नास्मि पक्षी जलेचर । मयते निहता सर्वे भ्रातर ते महौजस ।। भाप 31336 तुम्हारा कल्याण हो। मैं जलचर पक्षी नहीं यक्ष हू । तुम्हारे ये सभी महान् तेजस्वी माई मेरे द्वारा ही मारे गये ह ।' तब युधिष्ठिर ने यक्ष से प्रश्न पूछने हेतु विनम्र निवेदन किया- सत्पुरुप कभी आत्म प्रश सा म नही रमते आप प्रश्न करिय, मैं स्वप्रज्ञानुसार प्रश्ना का उत्तर अवश्य दूगा- स्वमारमान प्रशसे पुरुपपम । यथाप्रनतुत प्रश्नान् प्रतियक्ष्यामि पृच्छमाम् ।। यदात्मना बाप 31344 युधिष्ठिर का यह कहना ही था कि प्रश्ना के मेघ मूसलाधार वपण करने लगे श्लोक सस्या पतालीस (45) से लगाकर नोक सख्या एक सौ तैतीस तक यक्ष और युधिष्ठिर के प्रश्नोत्तरी की झडी लगी रहती है आगामी अध्याय के सारे उनतीस (29) श्लोको मे यह सवाद अपनी पूर्णता पर आता है, जब यह रहस्य खुलता ह कि वह अरणी वाला ब्राह्मण, यह मृग, वह अदृश्य बोल, वह प्रकट यक्ष और कोई नही स्वय 'धमराज' ही थे जिनके अश से युधिष्ठिर की अ य पाण्डवो की भांति म प्रोत्पत्ति हुई थी। उन अनेक रहस्यमय प्रश्ना के समाधान मूलक उत्तर म-कि सूर्योदय क्सिके कारण होता है- स्विव आदित्य उतयति', उसे अस्त कौन करता है-स्चनमस्त नयति', वह किस अधिष्ठान पर प्रतिष्ठित है- कस्मिश्च प्रतितिष्ठति ? -युधिष्ठिर कहते हैं कि ब्रह्म ही सूर्योदय का कारण है, घम (शाश्वत नियम) उसे अस्त करता है, और सत्य म वह प्रतिष्ठित है। इन उत्तरा 96 महाभारत का यथ से स्पष्टतपा यह लमित होता है कि युधिष्ठिर यह जानत हैं और नियाम करत हैं कि समूचा ब्रह्माण्ड ऋत और सत् के अटल नियमो द्वारा व्यवस्थित और संचालित है । यक्ष के अय प्रश्न पर दि प्राह्मण को प्रतिष्ठा किरा पर आश्रित है ? युधिष्ठिर कहते हैं कि यह पतृक सम्पदा, यस परम्परा और नुगत ज्ञानाजन पर आश्रित नहीं है, परन्तु यह सवभूत हित मूलक रामाजसेवा के नेतत्व प्रदान करने वाले निमल परिन पर आधारित है। इससे युधिष्ठिर की वह मा पता व्यक्त होती है जिसमे जादा ब्राह्मतेज और ब्रह्मविद्या मे नेतत्य का स्वरूप दशन हाता है । यक्ष अव एक जटिल प्रश कर बैठता है-~मनुप्प को आत्मा क्या है--कि स्विदात्मा मनुप्यस्य १, देवता से दिया हुआ मित्र कौन है-- frस्विद् दैवकृत ससा', मनुष्य के जीवन का आतम्बन वोन है-'उपजीवन जिस्विदस्य, और मनुष्य जीवन का श्रेष्ठतम आचरण क्या "विम्विदम्य परायणम् ?' इसके समाधान मे युधिष्ठिर शीघ्र वह बैठते हैं- 'पुत्र ही मनुष्य की आत्मा है, पली ही देवता प्रदत्त सती है, मेघ ही जीवन का मालम्बन है, और दान ही मनुष्य का सवश्रेष्ठ आचार है।' (313-51) अततागत्या नानाविध प्रश्ना के पूछ लेने पर (शायद आधुनिक स्वतन भारत के जन सेवा आयोग के विशेपज्ञ भी इतने और ऐसे प्रश्न न करते होंगे)यक्षमा पटाक्षेप प्रश्न आता है-- को मोदते किमापचय र पथा का च वातिका। ममताश्चतुर प्रश्नान् कथयित्वा जल पिर ।। आप 313114 सुम्पी कौन है? आश्चय क्या है ? माग क्या है ? आर वार्ता क्या है ? मेरे इन चार प्रश्नाला उत्तर दो और जल पीओ। युधिष्ठिर चार पलाश में इन प्रश्ना वा उत्तर दिया-'जिस पुरुप पर ऋण न हो, जो परदेश म न हो, यह अपने घर में शार पात पका कर भोजन करने वाला सतोपी सुखी है', 'मसार में सदा जीव मरते है कि तुजा जीवित बचे हैं वे सोचते हैं कि वे पमी न मरे- यही सबसे बड़ा पाश्चय है', तर मान से क्या होता है, श्रुतियो भी गिन्न भिन्न हैं, एक ही ऋषि नहीं है जिसका मत प्रमाण माना जाय तथा घम पा तत्त्व गुहा म निहित है अर्थात् यत्यत निगूढ है, अत जिससे महापुरुष जाते रहे हैं, वही माग है', इस महा मोह रूपी कडाहे मे भगवान बाल समस्त प्राणिया को मास और तुस्प करछी से उलट पलट पर सूयरूप यग्नि मोर रात दिरप इधन द्वारा सप रहे हैं, यही वार्ता है। इस सवाद रा सष्ट है fr युधिष्ठिर को दष्टि म प्रकृति या अखिल साम्राज्य विश्व सरिया द्वारा सुचालित है, मानव अपने कम व पुरुषाय के मानव जीवन म मूल्या का रापप 97 आसार सुख दुस, उत्थान पतन, एश्यय दारिध्र भोगता है, साथ ही जीवन में निराशा लाने वाला मूल कारण है, काम वासना ही दुसमोर व्यथा की योनि है-इनवे (पाम और प्रोध पे) समपण से ही मनुष्य शाति के परम घन से समृद्ध होता है, और दाति ही यात्म सतोप और करुणा कौशल की पथ प्रशस्तिका है, इसी तोप और करुणा की माव भूमि मे सवभूतहित की निमल यामना या अभ्युदय होता है जो मानव जीवन का सर्वोच्च ध्येय और उत्तम मूल्य है। यहां यह ध्यान देन की बात है कि यद्यपि बौद्धिक चेतना के घरातल पर युधिष्ठिर के विचार और विश्वास सवथा सत्य भीर घम के अनुकूल है, तथापि उसके जीवन म यह सव कुछ घटित होते हुए नही दिखता। उनकी करनी उनकी क्याशी से सवदा मेल नहीं साती। यही कारण है कि युद्ध म विजय प्राप्त करने वाले युधिष्ठिर स्वय अपाहृदय दौवल्य पर पूण विजय की पताका नही फहरा सके है । इसी के फलस्वरूप अपने विरोधी दुर्योधन आदि दुश्मना के भीषण सहार और विध्वस के कारण सत्य त दुसी और विह्वल हो जाते हैं, और जब उह हस्तिनापुर के राज्य सिंहासन पर आरढ हान के लिए अनुरोध करते हैं, तो वे भारी मन और तीव्र अनिच्छा से ही वैसा कर पाते हैं । वे मली भांति जानते है कि युद्ध की दुसा त स्थिति मृत रिपुजना के लिए नहीं अपितु युद्धोपरा त जीवित नैनिक चेतना से अभिभूत व्यक्तियों के लिए है, जिनके हृदय समर ध्वसावशिष्ठानल मे अभी भी जल भुन रहे हैं, जिनके नेत्र पिनाशाग्नि में बुझती हुई लाशो मे से उठते हुए धुएं से अभी तक रुग्ण, रक्तिम और अश्रुपूरित हैं । दुर्योधन की अद्ध ऊ रोही विगाल, पर क्षत विक्षत देह के समक्ष खडे युधिष्ठिर उसे कहते है- दुखात तुम्हारा नहीं है, बल्कि हमारा है यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमे लाखा विधवाओ के अभिशप्त जीवन को देखन के लिए जीना पड रहा है- वयमेयाधुना शोच्या सर्वावस्थासु कौरव । भ्रातणा चैव पुत्राणा तथा गोक विह्वला । क्य द्रक्ष्यामि विधवा वधू शोपपरिप्नुता । पाल्यपणिगदापक 5 6 27 291 अत गुधिष्ठिर पूर्ण रूप से आश्वस्त हैं कि जत्य त महत्त्वपूर्ण मूलभूत मानव जीवन वा नैतिक मूल्य मानवता को युद्ध और दिवस से बचाता ही है-मृत्यु और महाविनाश से महामानवता की रक्षा से बघिय पायन वोई घम नही, इससे अधिक पवित्र और मूल्यवान कोई नीति नहीं, इससे अधिक मानय हित- भारी और मानशस स्वातत्र्य या पोपर प्रतिपादन योई दशा नहीं। परन्तु युद्ध जय अटस और अवश्यम्भावी हो जाय, मिना युद्ध क्येि माननीय मूत्या की 98 महामारत याय . रक्षा करना अशक्य हा जाय, और एसी विपमावस्था में युद्ध न परा धर्म- भीरता व पलायनवाद बन जाय, तो न्यायोचित युद्ध करने का दु सात निणय वस्तुत उत्तम जीवन व व्यापक धम की निकय पर अत्यन्त खरा और मानवीय निणय ही मान्य होता है। नरोत्तमता के पथ वा यह नितात अनिवाय सोपान वन पर मनुष्य को श्रेष्ठतरता का पोषण करता है। यक्ष युधिष्ठिर सम्वाद का पुन म्मरण युधिष्ठिर के इसी आनृशस भाव को अभिव्यक्ति हेतु श्रेयस्कर एव उपयोगी है । युधिष्ठिर के द्वारा दिये गये उत्तरा री जय यक्ष पूर्णतया सतुष्ट हो जाता है तो वह युधिष्ठिर यो वरप्रदा वाणी में रहता है कि यह अपने मृत चारो भाइयो में से किसी एक भाई के पुन जीवित हो उठने का वर मांग ले- 'तस्मात् त्वमेय प्रातृणा यमिच्छसि स जीवतु' (वनपद 313,122) । युधिष्ठिर ये इस निवेदन पर विह यक्ष नभुल जीवित हो जाम'---नयुलो यक्ष जीवतु (व प 313 123)- यक्ष पाश्चार्यापित मुद्रा से प्रश्न पूछता है 'हे युधिष्ठिर । तुमने सहस्र हाथिया वाले बलशाली और महापराममी भीम वा जीवन दान क्या नही मागा, वह वनवास यो दुगम यात्रा में वितना सहयोगी सिद्ध होता? न तुमने अति परा मी धनुघर योर मान को पुनर्जीवित परने की बात कही, यह हर सफ्ट के समय एक महा यवच और रक्षा पे प में तुम्हारी आज्ञा मे नित्य निरत रहता। तुमन पेपल नकुल पे पुार्जीया पो हो माग भयो धो?' या ये इस प्रश्न पे उत्तर में युधिष्ठिर ने जो सहज भाव प्रस्तुत किया उसगे जीया मूल्या पी चरा परम पेतनामा दान राता है जिसम युधिष्ठिर को अस्तित्व और अस्मिता प्रधान जीया मूल्योको सीमा रो बहुत परे, भानुदास भरा यो नैसगिर और प्रेममय अभिव्यक्ति होती है। पर यहता है कि 'हे यक्ष । मेरे पिता पी दो पनिया म स एव से हम धीन योन्तय हे भार दूसरी मादी मां क ये दो नकुल मोर राहदेव हैं । हम पाचा पाण्डुपुत्र हैं । नयूल वे पुनर्जीवन म दिवगत माद्री मां की स्मृति-नरतप ये सुसानुमय से यघिय पायन बार मेरे मन यो स तोप दापानी योर पोई बात नही हो सकती ययाकि 'मरी प्टि म माम(स्नह गिन्धिा राममा भार निप्टागुत प्रेम र पा)ही परम पम है, जीवन या सच्चा परमार है, और दगी यानास माय रे सहजोदेव से मैं कुल यो जीवित दगना पाहता वानरय परा घम परमार्याच्च म मतम् । भास्य सिमि, सुलो मा चीयतु ।। स्पष 313123 अनुराधारगे साहार निवेत है रिमेरी दानी माताएं पुत्रपती रहें-'उभे मानव जीवन में मून्या या सपा 99 रापुरे स्याताम्'-~~पया मेरे बात परण म दोनो माताआये. निष्ठा और आर माय है। गुधिष्टिर गे इस उत्तर से महाभारत प्रसन्न हा उठे अं उसो सभी मृत भाताआ ये पुनर्जीवित हो उठन या शोध पर युक्ति को गिस प्रास गिरता ये अवलम्बन से यक्ष युधिषिः दत है उसम मानव जीवन को दा प्टिया एव तज्जय दाम मूल्या तो गहरी पारस्परिक मिलता पे साथ साथ एर पो होन गीभेष्टता या स्पष्ट द्योतन होता है। एक जीवन-प्टि येवतः अर्थात् पुरुपाथद्वय को लेकर है और दूसरी घम, अथ, साम में पुरपार चतुष्टय के आधार पर निर्मित है। प्रथम दृष्टि 'इदमित्थर जीवन की नितात भौतिवादी अधम प्टि है मार दूसरी ब्रह्म और इदम् वी समवित पूणताजय आध्यात्मिक जीवन की मान सप्टि जिसरी प्रेरणात्मा अमियजना आनधासत्व को लेकर रहतह-हे भरत श्रेष्ठ । तुमने अथ और काम से भी श्रेष्ठ मान दया, समता और आत्मनिष्ठा के ततुभा स सृष्ट और इनके पोत अपने जीवन मे आदर किया है, लत तरे मर माई पुन जीवित । तम्य तऽर्थाच्च मामाश्च आनसस्य परमतम् । तस्मात ते भातरा सर्वे जीव तु भरतपम । बनपद 313132 इन वरद शब्ना उच्चारण के साथ ही युधिष्ठिर चारा: हो उठते है । स्वय यक्ष भी अपने असली रप में प्रकट हो कर वह युधिष्ठिर । मै तुम्हारा जनक धमराज हूँ-अह ते जनकस्तात धर्म और तुम्ह देखने के लिए और तुम्हारी परीक्षा करन हतु आया था। तुम्हारे इस आन्शस भाव मे ही घमका प्रवेश द्वार है। की युधिष्ठिर की धमपरायणता से अत्यात प्रसन्न होकर धमरा वरदान दिये- प्रथम कि हरिण जिस ब्राह्मण मी रणो को लेपर: अरण्य म लुप्त हो गया था और जिस हरिण पा पीछा करत हुए पाण्डव आये थे, वह मैं ही हूँ। उस ब्राह्मण को यह अरणी लोटा दोता अग्निहोत्र निवाघ चलता रहे । दूसरा यह कि तुम्हारे बारह वप के । पश्चात् बनायास का तेरहवां वप है, उम अवधिकाल म तुम्हे मर इ ये फलस्वरूप कोई भी पहिचान नहीं सकेगा- 'नामिजानीयु'। अपनी इच्छानुकूल एर भार वरदान मागना चाहते हो तो माग युधिष्ठिर ने एक असे मनुष्यत्व और नरातम भाव को बताने और दानावर मागा- जयेय लोम मोही च सोध चाह सदा विभो। दाने तपसि सत्ये च मनो मे सतत मवेत् ।। अर्थात्, हे विभो ! मैं चाहता हूँ विलोम, मोह और क्रोध पर मैं सदा विजयी रहू और मेरा मन निर तर सत्य, तप और दान मे नित्य रमणशील रहे ।' मनस्थली की सत्यमयी मोषावस्था का सवजयी साम्राज्य युधिष्ठिर ने मागा और पा लिया । जिमका मन अपने वश मे होता है सारा ससार उसके स्वामित्व म रहता है क्योकि स्व विजय ही विश्व विजय का राजमाग है, जिसका मन सत्य मे तपोपूत और रमणशील होता है वह सवन सवकाल सत्य मय जीवन यापन द्वारा विश्वप्रेम, अखण्ड अहिंसा और परम चेतना पीनारायणी अवस्था में नित्य प्रतिष्ठित होने की सामथ्य का धनी हो जाता है। जो सत्य का है और सत्यशील है, वह सब का है सबके लिए है क्योकि सत्य स्वय सव का है। सत्य ही जीवन है, जीवन का अधिष्ठान है, जीवन या वास्तविक रस है, अमृत है। इसी से और इसी में प्रेम, अहिंसा और करुणा की प्राण प्रतिष्ठा है । क्या यह युधिष्ठिर का निजी मनोखापन नहीं है कि वह इस अमृतरूप सनातन सत्य को अपने जीवन मे-विचार और व्यवहार की समरसता में--नित्य अभियक्ति के आतुर उदाहरण हैं ? महाभारतकार वस्तुत इसी आनृशस भाव वी प्रतिष्ठा मानव मात्र के जीवन मे देखना चाहते हैं। इसीलिए वे अर्जुन, भीष्म य भीम आदि को नही परन्तु केवल युधिष्ठिर को महामारत या नापा बनाते हैं, मानवीयता के घबल और शुद्ध दुग्ध से पोपित उनकी करुणा भयो सहिष्णुता, आत्मा वी परम चेतना के स्तर से, सत्याथ और धर्माय सब घुछ सरन पर लेती है । युधिष्ठिर का निश्छल और सुसस्कृत जीवन सातन सत्य का अपूव बार अनिंद्य अनुष्ठान प्रतीत होता है, और इस अनुष्ठान में एर मात्र अपार व दोष यदि है तो यह 'नरो वा कुजरो' का अमद उद्घोष है जो वस्तुा सत्यार्थी पाण्डवो के सवविनाश को द्रोणजय विवशता से उद्भूत हाो कारण केवल क्षम्य ही नहीं है, वरन् युधिष्ठिर यी सत्यपरका घममयी मानवीय धवल वौत्ति को और अधिक उजागर करने वाला मानससत्य का ही अभिनव स्प है। एतरप्टया, 'अश्वत्थामाहतो नरोगा धुजरो वा' जीवन मूल्या पे सपषमा चरम इप्टात लगता है। सारात , महाभारत में माना जीवन मूल्या वा सथप मूरात पुरुपाय- द्वय और पुरुषाय चतुष्टय गी भौतिववादी और अध्यात्मवादी दृष्टिया के बीच जिराक मध्यतामा कारव और पाण्ठप हैं-~सतत प्रवतमान सघप है जो मस्तिर, यस्मिता चौर मानसत्व की क्सोटिया पर प्रधानतया तीर धरणो - मानव जीवन मे मूल्या का सपप 101
से उमा गुरतर गौर यगा होता हुआ विप्लवी मिध्यरा यी धार वदना
जय अतद्वद्वाग्नि एय महायुद्धागि मे से अपना विजय-पथ प्रशस्त करता है।
102
महाभारत या अथ
तृतीय प्रकरण 'यतो धर्मस्ततो जय' मानव की जय यात्रा विजय युद्ध-मागिनी है । जीवन में विजय पा आलोक प्राप्त करने के लिए युद्ध पाद्वार सोतना पडता है मयोंकि युद्ध हो विगय का द्वार है। यह द्वार दो तरफ सुलता है भीतर की तरफ और बाहिर की तरफ। भीतरी द्वार को अतद्वत रहते हैं और वाह्य द्वार को युद्ध । अतई मानव की हृदय स्यत्री मेधयक्तित्र स्तर पर ही होता है, परतु वाह्य जगत् की अनुकूल और प्रतिकूल विपमताआ एव परिस्थितिजन्य घटनाओ यो ज्या ज्यो वह बात्मसाद परके पचाता चलता है, वह स्वकीय समीणताआ और भट्टर मानाय विचारो की सीमाथा या उत्तरोत्तर लापता हुआ तगाय अहता को महामानयता ये अगाथ और अछोर सागरीय अनतता मे लय कर देन वी पूर्ण तैयारी म आ जाता है। परिणामत इस प्ररिया में विवेक प्रदीप्त हा उठना है और उसके आलोक में मानवीय बुद्धि मोर मानुपीय मावशो जो बल मिलता है उसम यानृशसत्व या, जीवन म, पापण हाता है तथा हर समागत और सम्भावित समस्या के हल व समाधान हेतु मानव मन म नूतन-नूतन माग उ मुक्त होते चले जाते हैं । (हला- भाव म मनुष्य का मन टूटता नहीं, समाहित रहता है, निराशा के श्यामल मेघ आते हैं, परतु विवेय की ज्योति म राती निशीथमयता का मत हो जाता है। स्व अस्तित्व और अस्मिता की क्षुद्र सीमाओ से उजनित कूप मण्डूकता रूपी अधकार स वाहिर निकल कर वह मानशसालोक से आप्लावित होता हुआ मानव जीवन को सवहितपिणी परिपूर्णता ये महासदन में प्रवेश की सामर्थ्य अजित करता है। मानासता ही नरमे नरोत्तमता के अजस्र सोत का प्रवाह उ मुक्त करके उसे नारायण या साभावार करा देती है। इस प्रयाह के, नारा- यण म, पूण प्रिलय की समग्रता ही नर पीनशसता पर विजय नै, मानव धम का अपम पर और मानवीय याय वा अयाय पर घजारोहण है । इस विजय में मनुष्य को अपने ही दौवल्य पर, अपने भीतर के शाओं-काम, क्रोध, मद, मोह, लाभ, मत्सर आदि-पर जोन मा अनवरत घटनाद करना पड़ता है।
अपो यह के मर्दन में ही स्वातस्थ नारायण के दशन का प्रमुख द्वार है । नर से नारायण तय की आत्म मुखी यात्रा मे उत्स्ट अतद्वद्व के इस अत्य त झीणे और सूक्ष्म द्वार मे से गुजर कर मागे वढना होता है । इस अतद्व द्वाग्नि के द्वार मे प्रवेश करने से मनुष्य का वासना रूपी मल और अज्ञानरूपी अधकार का ईधन जल कर भस्मीभूत हो जाता है । ) परिणामत अत करण अत्यन्त निमन हो उठता है-- अग्नि मे तप्त हुए शुद्ध स्वण की तरह-और भज्ञान जय भय और क्षुद्रता भी तिरोहित हो जाते हैं । जन्त करण की निमलता से मातवमान के प्रति ही नहीं, अपितु सम्पूण विज्जडमय सृष्टि के प्रति प्रेम, उदारता मोर तादात्म्य का भाव उमड पडता है । इसी भाव का महर्षि व्याम ने आनृशस की सज्ञा से अभिहित कर उसे समस्त ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाले 'घम वा द्वार' कहा है । इस भाव के अभ्युदय मे नर नरोत्तम मे विकसित हो उठता है और नारायण की पूर्णता मे उसके प्रतिष्ठित होने का माग मागे उ मुक्त हो जाता है । अतद्वद्व इस प्रकार मनुष्य को आत्मजयी बनावर मागवता का प्रबुद्ध पोषक और सर्वात्ममाव का प्रेरक पुज व प्रकाशक प्रतिनिधि बना देता है। यह है जीवन मे विजय का आलोर प्राप्त करने के लिए युद्ध का भीतरी द्वार। जिस प्रकार अतद्वत पे दावानल में मनुष्य के भीतरी शत्रुओ, सघातो और भयावह दुवलताआ काधोर विध्वस, मनुष्य की नर से नारायण की दुगम यात्रा को सफल बनाने में सहायक होता है उसी प्रकार लथ लक्ष नर-वीरा या सहारस वाह्य रणक्षेत्र में दो विपक्षी सेना गुटा व राज्यो म घटित महायुद्ध की भीषण अग्नि मे सत्य, याय और मानवता के दामुओ का विवस समाज व राष्ट्र के जीवन म सत्यपरायणता, “यायशीलता और घमप्रिय मानवीय करुणा को प्रोत्साहित करने वाला सिद्ध होता है। युद्ध मृत्यु का ही विकराल रूप है जिसके सम्यक बोध हो जाने पर मनुष्य मृत्यु के भय से मुक्त हाकर मानवता के पोषक तत्वो या प्रवाह पेद्र बन जाता है। उसकी मानवीय संवेदना शन शन सारे समाज या आप्लावित कर देती है । महाभारत में पिरोपतया तीन पात्रों को मत्यु का दशन होता है--अर्जुन, धतराष्ट्र और युधिष्ठिर को अर्जुन को युद्ध ये पूर्व और शेप दोनो यो युद्ध पे पश्चात् । अजुन यो मत्यु का भयावह रूप दिपता है, घृतराष्ट्र यो मृत्यु के निर्मम रूप का दान विदुर द्वारा कराया जाता है, युधिष्ठिर मृत्यु को वरुणस्पता का दान करता है । विञ्चित् गहराई में महामारत बीमाथप महत्ता का भवेपण परने स लगता है कि यह समूचा गहावाय्य एक ओर युद्ध यो एक ही राज्याकी दो गाओ वे पथानर ये माध्यम से एक व्यापक और विश्वसनीन धागिा, सामानिस, तिा और 104 महाभारत गा अथ याध्यात्मिक सत्य की प्रतिष्ठा का निवप बनाता है और दूसरी ओर, वही युद्ध 'मृत्यु के भय, मत्यु की निममता और मृत्यु की करुणरूपता पी तीन धाराओ मे प्रवाहमान होवर मत मे मानवीय सम्वेदना की एक चरम निश्नल शान्ति म मिल जाता है। मत्यु के इन तीनो रूपो की पहचान कितनी विश्व-व्यापक और कितनी सनातन है, और इम मृत्यु के द्वारा जीवन में विस प्रवार मानवीय सपृक्तता लाई जा सकती है, यही महाभारत या मूल मम है।' (परम्परा वचन नही, पृष्ठ 21, श्रीविद्यानिवास मिश्र)। इस मम ये रहस्योद्घाटन मै मानर की विजय यात्रा का स्वरूप गुम्फित है । अत मृत्यु के रूपश्य के दशन पा सम्यक विश्लेषण विवेचन अपेक्षित है । मृत्यु के तीन रूप-विजय के भीतरी द्वार 1 अर्जुन द्वारा युद्ध पूर्व मत्यु का दशन भयावह स्प कौरव पाण्डवो के युद्ध के आरम्भ होन से पहले दोना और युद्धाथ संय सगठन यी तैयारियां होने लगती हैं । श्रीकृष्ण यो रण निम प्रण दन के लिए दुर्योधन द्वारका पहुंचते हैं, उसी दिन अर्जुन भी वहां पहुंच जाते है । वथा प्रसिद्ध है, दुर्योधन को तो कृष्ण यो आत बल शालिनी नारायणी सेना चाहिए थी भत कृष्ण दुर्योधन को मागपूर्ति सेना देकर करते हैं, परतु अर्जुन ने स्वय कृष्ण को मागा और कृष्ण उसकी सहायताथ तत्पर हो जात हैं । तदन तर कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं अर्जुन जब मैंने युद्ध स्थल पर निग्न रह कर युद्ध न करन की प्रतिज्ञा की है तव तुमने गया समय पर नारायणी सेना को छोड़ दिया और मुझनो ही अपनी सहायताथ चुना? 'अयुध्यमान सग्रामे, पस्तशस्त्रोऽहमेकत' (उद्योगपव,719) । तव अर्जुन कहते हैं- है, पुरुषोत्तम । थाप अकेले ही उन सवको विनष्ट करने में समर्थ हैं, इसमें तनिक भी सराय रही है । मैं भी अवेला ही (आपकी कृपा से ) उन सब शत्रुओ का सहार करने मे समय हूं। पर मेरे मन में बहुत दिना से पह अभिलापा थी कि आप मेरे सारथी बनें- मवान् समथस्तान् सर्वान् निह तु नात्र संशय । निह तुमहमप्येक समथ पुरुषपम ।। सारथ्य तुत्वया कार्य इति मे मानस सदा। उप735-37 इम प्रकार, कृष्ण अर्जुन के सारथी बन जात है। सारत अर्जुन की यह मा यता है कि श्रीकृष्ण हो धर्मपुरुष, और धम ही विजय रूप मे व्यत होने याला तत्त्व है । अत अजा अपनी विजय हेतु इसीलिए माश्वस्त है कि वह घमपा धनुधर - और स्वय यगविग्रह भगवान कृष्ण उसके भारथी है। माययोजय याना 105 अभी तक दुर्योधन की भांति अजुन भी विजय प्राप्त्यथ आश्वस्त है। दोना भावी विजय के दशन Tरते ह । दुर्योधन जानता है कि उसके पास ग्यारह अक्षौहिणी मेना है, 'वह मेरे लिए मरने को इसठ्ठी हुई है' मदथ त्यक्त जीविता अत उसकी जीत सुनिश्चित है, इसे कोई नही टाल सकता। विजयानाक्षी अर्जुन भी दुर्गादेवी को, कृष्ण से उपदेशानुसार, अपगी विमलमति स प्रायना द्वारा प्रसन कर चुका है, उससे वर भी प्राप्त कर चुका है कि स्वल्प काल मै ही युद्ध मे वह 'शत्रुनो पर विजय प्राप्त करेगा-'स्वल्पेनैव तु कालेन शत्रून्जेप्यमि पाण्डव' (भीम पव 23 18)। अत अर्जुन भी अपनी विजय वो अटत और निश्चित मानता है। और फिर श्री कृष्ण ने सारथित्व को पाकर तो उसका उत्साह गगनो मुखी है । सजय की वाणी भी उसके चिद्गगन म गुजायमान है- 'यतो घमस्तत कृष्णो, यतस्कृष्णस्ततो जय' (मीमपव, 23 28) । अत अर्जुन और दुर्योधन दोना विजय हेतु कटिबद्ध हैं, उद्यमशील हैं और आश्वस्त है । कुरक्षेत्र के मैदान म कौरवो और पाण्डवो की सेनाएँ युद्ध करन के लिए मोचा लेकर आमने सामो खडी है। (भीष्म पितामह कौरवो वे प्रधान सेना पति ह और पाण्डरा के धनन्जय । पाण्डर सेना के अग्रभाग म नदिघोष रथ पर बैठे महापराक्रमी धनुधर अर्जुन देख रहे हैं कि कौरव वाहिनी के सेना नायर महारथी भीष्म सबसे आगे हैं । दुर्योधन भी अपनी रण यूह रचना का निरीक्षण करते हुए अग्निम प्टि करते हैं तो देखते हैं कि स्वय कृष्ण अजुन के नदिघोप रथ का सचालन वरने सारथि के रूप मे रणोद्यत है । दुर्योधन और कौरव सैनिका के हृदय मे हर्षोल्लास का वद्धन करने हेतु भीष्म पितामह उच्च स्वरीय सिंहगजन करते हुए शखनाद रते हैं, यह युद्धारम्भ की सूचना है । इसके प्रत्युत्तर म श्रीकृष्ण पाञ्चजय नामक शव, अर्जुन देवदत्त नामक और गया नव दहाड मरने वाले भीम पाण्डनाम महारास वजात है। चारा दिनाओ मे शीघ्र ही रणभेरियो आदि का तुमुल नाद होने लगता है, रथो पर ध्यजाएँ फटा जाती है । सवत्र एक अद्भुत रोमाञ्चकारी दृप्य उपस्थित हो रहा है ।) सहसा एक घटना घटित होती है । अर्जुन अपने सारथि कृष्ण को यस्त हैं कि 'मेर रथ को दोना सेनाओवीच मे ले जाकर सहा क्रो-सेनयोरु मयामध्ये रथ स्थापय मेऽच्युत ताकि कि मैं निरीक्षण कर रायू कि कौन यौन मेरे साथ युद्ध करने आये हुए हैं'-यावदेतातिरीक्षेऽह योद्धवामानवस्थितार। वहाँ अर्जुन देखता है पि उसके ठीक सामने भीष्म पितामह हैं, द्रोणाचाय है सगे हैं, सम्य घी , साते हैं, श्वसुर हैं, द्रोणपुर अश्वत्थामा है माई दुर्योधन यानि आज स्पजन है । उन उपस्थित सम्पूण व शुआ एव गुरजना यो एकर 106 महाभारत अथ ! -- अर्जुन का मन विपाद और परणा से भर जाता है-'तासमीक्ष्य स को तेय सर्वावधनवस्थिता । कृपया परया विष्टो विपोदग्निदमग्रवीत्'-- गोर यह युद्ध करने की ठगा लेता है । वह वृष्ण से तुरत यह उठता है हे कृष्ण युद्ध क्षेत मे डट हए युद्धामिलापी इस स्वजा समुदाय यो देख कर मेरे अग शिथित हुए जा रहे हैं और मेरा मुग सूखा जा रहा है तथा मेर शरीर मे यम्प एर रोमाञ्च हो रहा है, हाथ से गाण्डीव पनुप गिर रहा है और त्वचा भी ज्वलनशील हो रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है । अत मैं राडा रहो भी असमथ हूँ। हे केशव । युद्ध मे स्वजना को गार पर मैं पल्याण नही देवता ।' युद्ध मे भयार परिणामा मोर असरय नर वीरो योर स्वजनो की मृत्यु या मजुन मन ही मन साक्षात्कार मरता है और इम मृत्यु की रोमान्चक विकरालता या देख कर वह युद्ध न परने का निश्चय पर लेता है । अर्जु। इस मावी मत्यु का दशन कृष्ण को भी कराना चाहता है। वह कह उठता है हे कृष्ण | मैं न तो विजय चाहता हूँ.-" पाड विजय कृष्ण' और न राज्य सुप यो मुझे अभिलाषा है । ऐसी विजय से या प्रयोजन जिसमे स्वजना आर गुरुजनी की निमम हत्या हात्ती हा, जिसमे पुलक्षय हाता हो तथा जिसके परिणाम सरप राज्य की स्त्रियो को पुत्रविहीन और विधवाए बनना पडे ? है वार्ष्णेय | वैधव्य रामाज म वणसङ्करता उत्पन्न करने वाला होता है, और उससे सनातन जाति घम और कुल घम ही नष्ट हो जाता है। यह तो घोर पाप है, अधम है । मैं जानता हूँ पि दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के पुमा का चित्त लोमानात है-'लोमोपहत चेतस , - और वे अधम और भयाय कर रहे है तथा विचारहीन हैं, पर तु हम तो द्रुधप युद्ध के दुष्परिणामो पर विचार कर गरते हैं।' ऐमा करते हुए बाण सहित धनुप को त्याग कर शोक्मविग्न मन से अर्जुन रथ ये पृष्ठ गाग में बैठ जाता है। शोकाकुल और करणायान्त अर्जुन के इस रण पराड मुख हप्य यो देखते हो सारयि कृष्ण समझ जाते हैं कि उसया महारपी मोह रोग से ग्रसित हो रहा है। वरतु स्थिति ये सत्य मूल्याङ्कन के कारण अजुन के तीनो शरीर- स्थूल, स्म योर कारण -~मोह स्पी बीमारी से जलने लगते है । एक अच्छे महावंद्य यो तरह कृष्ण मोह उपचाराय चिकित्सा करने लगते हैं, वे कहते हैं 'अजुन । तुम हमेशा रिता निमल और तेजस्वी थे, कायरता की विपाद मरी छाया से अब क्या घिर गये हो? तुम्हार जैसे शूरवीर को यह शोभा नहीं देता। सत्य पथ स इस प्रकार विचलित हो जाना मकोत्तिकर पवायन है । यह तो नपुसक- पना है अर्जुन इस छाड । यह विविध मोहजय Tणा, और वह भी इस युद्धा- रम्म पी पिगावस्या मे सवथा अनुचित है । अर्जुन ! तू तो परतप है, मानव कीजय यात्रा 107 दुग्मनो शो पल भर में तपाने, हराने और मारो वाला! अन शोध अपने हृदय यो दुर्वलता यो छाट कर युद्ध परन ये लिए उठ पहा हो- 'क्षुद्र हृदय दीवत्य त्यात्योत्तिष्ठ परतप। कृष्ण की यह प्रताडना अर्जुन के लिए शाम थेरेपी' सापाम करती है। क्षत्रिय योर अर्जुन पे उडे पडते हुए पून से गरम करावाली इस 'थेरेपी' के प्रेरणाप्रद प्रमान यो प्ण देग रहे है । अर्जुी प्रत्युत्तर में अपने परिवर्तित एव युद्ध न परने वाले निणय हेतु सा प्रस्तुत करते हुए प्रणिपात-परायण हो जाता है । वह कहता है 'कापण्यदोष से मेरा स्वभाव अपहत हो गया है, अत में धर्म गूढ चित्त वाला तुम्हें पूछता हूँ कि इस स्थिति में मेरे लिए क्या करना श्रेयस्कर है ? मैं आपका शिष्य है, आप मुझे उद्बोधित करें, मैं प्रपन्न हूँ, शरणागत हू, आप उपदेश दें, आदेश करें- वापण्यदोपोपहत स्वभाव पृच्छामि त्वा घम सम्मूर चेता । यत् श्रेय स्यात् निश्चित ब्रूहि त मे, शिष्यस्तेऽह शाघि मा त्वा प्रपनम् ।। मगी 27 ज्याही अर्जुन का शिष्यत्व प्रकट होता है, त्योही कृष्ण मे गुरुत्य या अभ्युदय होता है और उसी प्रवल स्फुरण मे मोहनाशी गीता ज्ञान का निझर फूट पडता है योगेश्वर गुरु के ज्ञानगिरितुग से। कितना विचित्र प्रमग है गीता के इस सहज प्रसवन या ऋषिमुनि और गुरुजन आश्रमा एव अरण्या मे ही ब्रह्मोपदेश करने की परम्परा का पालन करते आये हैं, परन्तु ना त रष्टा एव युग सचालक कृष्ण अब रणभूमि को भी ब्रह्मज्ञान ये उपदेश की पुण्यस्थली बना देते हैं । नारायण जो वह ठहरे, वह पर के सुहृद हैं । इद्रपुत्र के प्रति कृष्ण सदय मात्र इसलिए नहीं कि 'इन्द्र नरत्व, पौरप या परानम के देवता है या अतरिक्ष के देवता हैं, भीतरी उथल पुथल के देवता है 'परतु इसलिए कि नर नारायण के प्रति उस उथल पुथरा के कारण नत मस्तक है, प्रपन है, शरणागत है । अत नारायण के मुख से पर के प्रति श्रीमद्भगवद्गीता का जो मोहक्षयो उपदेश प्रवाहमान होता है वह वस्तुत युद्ध की विभीपिका मे प्रवत्तित होने के कारण विजय का सामगान कहा जा सकता है । इसे युद्धोपनिषद् कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योकि नारायण स्वय युद्ध मे जय रूप से अभिव्यक्त होते है- 'जयोऽस्मि'--कृष्ण कहते है कि 'जप में स्वय हूँ', जय मेरी विभूति है। (उपनिषद् का मूल अथ भी यही है वि गुरु शिष्य को अपने सगीप पिठा कर ब्रह्मात्माय ये उपटेल द्वारा , 108 महाभारत या अप उसके अहसार एक अज्ञानज य माहलिल का हटा घर उसके जीवा म 'तत्त्वमसि' ये सम्पर पान की पूर्ण प्रतिष्ठा कराये । अत अजुन के, युद्ध वी भीषण विषमावस्था में मृत्यु ये नास रुप दर्शन से उत्पन्न, मोह और भम को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण सारत ज्ञान मक्ति मुक्त पमयोग वा त्रिपाल मवा धित उपदेश देत है । सवप्रथम, आत्मा की अमरता और दह यो नश्वरता के मानवानुमवी उपदेश द्वारा कृष्ण अजुन के देहबुद्धिजय माह पा निवारण परते हैं । इसी माह नियारण चिकित्सा के प्रवाह मे यमयोग पी लोकप्रसिद्ध चतु सूत्री प्रतिपादित करते हुए कहते है- कमण्येवाधिकारस्ते मा परेपु पदाचन । मा पमफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्ववमणि ॥ 247 'कम करन म तरा अधिकार है,' यह प्रथम सूत्र है । यम वही है जिससे मानव मात्र के जीवन मे स्वत प्रता, मानवीय श्रेष्ठता और धम की सही प्रतिष्ठा होती है । अत दानियोचित धम और पम यही है कि वह सत्य और मानवता की घिरोधी शक्तिया द्वारा पाप हुए युद्ध का पूण मनोबल से सामना करे । इसलिए कृष्ण बलपूर्वक कहते हैं- 'युध्यस्न विगत ज्वर' मोह स्पी रोग को छाड पर युद्ध पर । कमयोग का दूसरा सूत्र है 'फल प्राप्त करने मे तेरा अधिकार नहीं है' अर्थात् स्वतन्त्र नहीं है । बम करना मनुष्य के वश म हैं, यमफल मनुष्य के हाथ मे नहीं है । इसलिए युद्ध मे तुम्हे सिद्धि रूपी जय मिले या नहीं इसकी चि ता छोडकर आरापित और समागत युद्ध से पराडमुख मत हो, युद्ध पर । यह मानवोचित क्षत्रिय धर्म है, वीरोचित कम है । तीसरे सूत्र म कृष्ण कहते हैं 'काम के फल की वासना वाला न वन'। पनाकाक्षा ही समसिद्धि में सबसे बड़ी बाधा है । आकांक्षा राग द्वेप की जननी है। इसलिए राग द्वेष से अपने मोहित मन को 'फल हेतु' भाव से मुक्त करके- 'सङ्गत्यवत्वा'-- युद्ध यमपी सिद्धि मे कौन मरेंगे और कौन जीयेंग की भावना पो समत्व म स्थापित करत हुए--सिद्धयसिद्धयो समा भूत्वा कम कुरु- युद्ध कर । कमयोग या घोषा सूत्र है म न करने म आसक्ति न रन-'मा ते सङ्ग तु अकमणि' । अर्थात्, युद्ध तुम नही करना चाहते फिर भी कोरवापिप दुर्योधन ने तुम पर युद्ध थाप दिया है, अव युद्ध न करने में आसक्ति करना कायरता है कत्तय से पलायन है। इस प्रकार स्वजा वे प्रति मोह ो कारण तुम्ह घमयुद्ध से विमुख नही होना चाहिए। धम पालन के लिए युद्ध करनाही तुम्हारे लिए श्रेयस रहै। अर्जुन के प्रश्न के उत्तर मे कृष्ण का मानयुक्त कमयाग प्रधान उद्बोधन धेयस्कर पी प्रतिष्ठा द्वारा मोहमदन या प्रथम चरण पूरा करता है । वेदव्यास मानय की जय यात्रा 109 पास है frजीयमस्य स स्मरण याम सा नयमो माश्य स्थान गाहिए पर जम मर गीतमा थपण मराती पर था जाय तो उगा पीरापिस रागा मा पाहिए। उगरा रो रो पुछ ही दाता। थाय हो य स मुहिम कासारामा निरसा स उपस्थित न प माह पा TITTी गप्पया। तर राषिपातम्य पायद य मशागतम् । आगरा युगप एटया प्रहाप्य अगीनया। rlfr140/33 जीवामी इस सही पहिचान रामाय माहग्यरमा तापमहा। लगता है। FRIT मा दीपमार है, पर यती जस गई। गण्ड बुद्धि पी लाएं शिथिल वापर टूटा लगीह पृपा अय मोपचार या दूसरा परण आरम्म परते हैं । अजुन दम म, स्य अपने प्रति पृण सश्वर या भाव जगात है, पहा हैं कि यह लोय रिय और सुगमर रहीं है, इसका नाश होता है और पृष्ण स्यय इरा ब्रह्माण्ड प राजन, स्थिति और राहार ये मूल म अक्षय सत्ता ये स्प म विराजमान है--पिताहमस्य जगता माता पाता पितामह'। 'प्रगय प्रलय स्थान निधात मीतमव्ययम् । अपा सर्वलो महेश्यय यो अजुन के हृदय म प्रतिष्ठित पर रण अजुन 'तिप्यस्तेऽह शाघि मा प्रपन्नम् गार यो भार थपिन सुटर पर रहे हैं ताकि जो युछ शानीपधि मा सेयन य अब परायेंग उसकी ग्रहणगीलता और पचनात्मकता म मदो नही आय । श्रीरण अजुा ये माह ये मूल पर गान भपज डालत ह, व माह ये मूलाच्छेन की प्रक्रिया या आरम्ग वरत हुए वहत है तू घम और अघम लय पुण्य और पाप पो अधिक महत्ता न दे, क्यापि पुण्य से मनुष्य यो जो स्वग प्राप्ति होती है वह पुण्य क्षय व साय ही विनष्ट हो जाती है और मनुष्य पुन मत्यु लोक म लौट आत ह- 'क्षीणे पुण्ये मत्यलोक विशान्ति' । इसलिए है महाबाहो । यसरता यही है कि उन सब काया पासवथा त्याग पर दना चाहिए जिनके पीछे काम, मोघ और लोभ की मूल प्रेरणा हो क्योरि यतीना नरक के द्वार है और आत्मा का नाश करने वाले है । विविध नरक्स्यद द्वार नाशनमात्मन । काम श्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्तय त्यजेत् ।। और, हे अजुन | तुम इस सत्य जाना कि अधम के पारण कौरवा का ना हा चुका है, तुम्हे विश्वास न हो तो देखो। श्रीकृष्ण तुर त अजुन का दिव्य चक्षु देते हैं और अपना विराट रूप दिसाते है जिसे देख कर अजुन काप उठता है । उसकी दृष्टि के समक्ष एक 110 महाभारत का अथ विशाल अग्नि ज्वाला प्रकट हाती है जिसम नानाविध प्राणी चारा आर से आकर गिरत हैं और भस्म हो जाते है । उसी तरह समस्त पोरव भी कृष्ण के मुन्न म गमा रहे है जसे पात सहल नदिया का प्रवाह महोदधि मे चपा ऋतु में उमड उमड कर प्रवेश करता है। पश्यामि देवास्तव देव देहे अभी च त्वा धृतराष्ट्र स्प पुना सर्वे सहैवाव निपालमधे । भीमद्रोण सूतपुत्रस्तथासी सहास्मदीयरपि योधमुरस्य ।। 1126 घरमाणित त्वरमाणा विशति दष्ट्राकरालानि यानकानि । वेचिद्विलग्ना दशना तरेषु सहप्यते चूणितक्त्तमान ॥ 1127 यथा नदीना बहवोऽम्बुवेगा समुद्रमेवाभिमुखा द्रवति। तथा तवामी नरलोक्वीरा विति वक्त्रायमिविज्वलति ।। 1128 इस विच राल विराट रूप को देखते ही अर्जुन की चेतना जाग उठती है, वह श्रीकृष्ण को नमस्यार करता है, प्राथना करता है कि कृपया वह वतायें कि उग्र- रूप वाले कृष्ण कोत हैं- 'आरयाहि मे यो भवानुग्ररूपा'- यह भी बतायें कि कृष्ण का तात्त्विक और आदि रप क्या है ?- ' वितुमिच्छामि भवात- माद्य' । इस प्रकार पूछे जाने पर भगवान श्रीकृष्ण कहते है 'हे अर्जुन | मैं लोका चा नाश करने वाला बढा हुआ महाकाल हूँ। इस समय लोको यो नष्ट करने के लिए प्रमट हुआ हूँ। अत जा प्रतिपक्षिया पी सेना में स्थित हुए योद्धा लोग है, वे सब सरे बिना भी जीवित नहीं रहग--'सते.पि त्वा भविष्यन्ति सर्वे-~अथात् सयका नाश हो जायेगा। ये मरे द्वारा पहले से ही मार दिये गय हैं-'मयत निहता पूनमेव'-~-इसलिए उठ, शत्रुओ का जीत कर समृद्ध राज्य को प्राप्त करने हेतु तू वैवल 'निमित्तमात्र भव' । इस प्रकार कृष्ण अजुन को कौरवों के नाश बा और पाण्डवा की विजय का अद्भुत दशन करा देते हैं। अजुन जा जाता ह पि रा कृष्णा धममयता हा जीवन है और कृष्ण चिमुसता मृत्यु पलत अर्जुन का मोह मग होता है और वह कृष्ण को नमस्कार करता हुआ स्पप्ट शब्दा म रहता है कि वह उनके लिए- मानव पी जय यामा 111 कर राल महामृत्यु रूपया दस कर अत्यन्त मीत, हर्पित और आश्चयचक्ति हा गया हे अत यह श्रीकृष्ण रि चतुभुज पये दशन का अभिलापी है, मीत इस लिए वि यह वास्तव म इस दशन से काँपन लगा है, हपित इसलिए कि कौरवा यानाश और उमको विजय अवश्यम्भावी एव सुनिश्चित है, उसे तो वेल निमित्त बनना है उस विनाश के लिए, आश्चर्यचक्ति इसलिए कि वह प्रथम बार जानता है कि कृष्ण काल के भी याल महाकाल है अत पद्य एव अनुसरणीय ह । अजुन के निवेदन पर पृष्ण अपना सौम्य रूप दिमात है, धीरज वघात हैं और अ ततागत्या कह देत ह रिवह सर धर्मा या छोड कर मान उनकी अथात कृष्ण की शरण ग्रहण करे। वह उसे सब पापो से छुटकारा दिला देंग- सर्व घमा परित्यज्य मामेव शरण व्रज। अह त्या सवपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच ।। आश्वस्त हो जाता है अर्जुन इस अतिम उपदामो सुन 1 उसके सार स देह मिट जाते हैं, अहवार विगलित हो जाता है, जडता झड जाती है और आत्मज्ञान हृदय म उदय हो उठता है । अजुन शीघ्र मह उठता है नप्टो मोह स्मृतिलब्धा त्वत्प्रसादामयाच्युत । स्थितोऽस्मि गत स देह करिष्ये वचन तव ।। 18 73 गीता म अजुन के ये अन्तिम शब्द है, अत्यत महत्त्वपूर्ण है, मननीय है । अजुन कहता है 'हे अच्युत, आप को प्रसादमयी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मति प्राप्त हुई है, इसलिए मैं सशय रहित हुँआ स्थित हूँ और आपके वचना का पालन करूंगा।' 'मेरा मोह विनष्ट हो गया है', ऐसा अजुन न पहले भी कहा है-मोहाऽय विगता मम-- ग्यारहवें अध्याय के प्रारम्भ म, ठीक पहल श्लोक मे । परन्तु वस्तुत उस समय अर्जुन को भले ही यह लगा होगा कि उसका मोह चला गया है परतु मोह का मूलोच्छे तो अब हाता है जब वह इस कथन के साथ तीन बातें और जोडता है स्मृति लब्धा, स्थितोऽस्मि गत सदेह और, वरिप्ये वचन तव । यह तीनो मोह के समूल नाश की प्राथमिक शते है । प्रथम शत है स्मृति प्राप्त हुई है । गुह्यतम तत्व को प्रक्ट करने वाली श्रीकृष्ण की परम हितकारिणी वाणी यो सुन कर अजुन का अपन यात्म स्वरूप की स्मृति प्राप्त हाती है । यह विस्मृति ही मोह का मूल है । स्मति की लब्धि स्वात्म योग कारक है, ससार वियोग कारक है। घमबोध कारक है, अधम मागकारक है। प्राणी मात्र की आत्मा एक अखण्ड परमात्म स्वरूप है, अमर है परम पूर्ण है। आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता वा सम्यक्बोय जुन पे हृदय म पस्तुत भव उतरता है, पहले यह विलक्षण घटना घटित नहीं 112 महाभारत या अथ होती। 'माहा य विगतो मम' की बात जो उसने पूर्व म रही थी पर वेचल ऊपर ऊपर से मोहनाश का भाव था, वास्तव मे स्वात्म स्मृति पो सही और गहरी प्राप्ति म ही मोक्ष का सर्वोमूलन है। इस प्रसग मे औपनिषदिन त केतु की कथा श्रवणीय है। ब्रह्मविद्या ये निस्पण मे सतत गुर श्वतस्तु से पहते है- 'तत्त्वमसि श्वेतकेतु' अर्थात, श्वेतकेतु तुम वही हो । श्वेतोतु यह सब जान कर जव घर आता है तब पिता उगपो गय मरी पाणी और वमृदुता को देस पर रहते हैं 'तू ने ब्रह्म को जाना या नहीं? ब्रह्म। ये निगा राय ध्यर्थ है ।' श्वेतकेतु उत्तर देते हैं 'यदि मेरे गुरु को पता होता, तो वे अवश्य ही मुझे सिसात । उहोंने मुक्त हाथ से शान दान दिया। जो उह माता है, वह सब मुझे दिया है उहो और स्वय ही मुझमे उहाने या पि श्वेतपेतु, अब मरे पास तरे सीयने यो कुछ नही बचा, अब तू घर लौट जा। पिताजी, वे कभी शूठ तो नही वालते।' तब उसके पिता उद्दालव उसे कहते हैं 'तो पिर तुझे मुझे ही सिखाना पडेगा । जा, वाहर वृक्ष मे फल लगे हैं, यह तोड ला।' फल तोड कर लाये जाते है। उद्दालय सहज ही बोलत है ' हे काट ।' फल काटे जाते हैं। बीज ही वीज भरे हैं। पिता कहत हैं 'कोई एव वीज इनमे से चुन ले । यता, क्या यह एक बीज इतना बड़ा वृक्ष हो सकता है ।" श्वेतकेतु कह पडता हे. 'पिताजी, हो सकता है नहीं, होता ही है। एक बीज को देने से इनना बडा हो जाता है।' पिता पूछते है 'तो, इस बीज म वृक्ष छिपा होगा । तू वीज पो गी याट । हम उस वृक्ष यो सोज जो इसके भीतर छिपा है ।' श्वेतवे तु वीज पाट देते हैं, पर वहाँ वृक्ष नहीं है, कुछ भी नहीं है। यहां तो शूय है । श्वेतकेतु कहत है "पितृ- देव, यहाँ तो मैं कुछ भी नहीं देखता हूँ।' उद्दालय मदु और गम्भीर हास्य से कहते हैं 'जो नहीं दिखाई पड़ रहा है, जो अदृश्य है, उसी से यह महावक्ष यह दृश्य, पैदा होता है । और हम भी उस अदृश्य सता से आये है । प्रत्येर प्राणी मे परम सत्ता पा वास है, पर अदृश्य है।' इस पर श्वेतवेतु प्रश्न पर बठता है 'क्या मैं भी उसी परम तत्त्व से आया हूँ इस प्रश्न के उत्तर मे ही उप निपदा का यह महावचन है 'तत्वमसि, श्वेतकेतु' । हाँ, श्वेतरेतु, तू भी वही से आया है, तू भी वही है।' और पहते हैं, यह अमृत वचन सुनते ही श्वेतकेतु यो स्वात्म बोध हो हो जाता है, 'स्मृति लब्धा' का यही रहस्य है । अर्जुन को श्रीकृष्ण के परम वचन सुनकर 'तत्वमसि' की स्मृति हो जाती है। सारी गीता इसी महावाक्य का दिव्योपदेश है, नानदान है जिसे गाकर दिया गया है । और, जिसे सुनकर अर्जुन मोह से सक्था विनिर्मुक्त हो जाता है । मोह निद्रा मग होते ही वह मानव कीजय याना 113 आत्मात य से अपो आपयो, पृष्ण की तरह, परिपूर्ण पाता है। दूसरी शत है "स्थितोऽस्मि गतस देह । यह मोहनाश वो साटी है, फलरूप से, 'स्मृति लब्या' मोह नाग की वारण भूमि है, ज्ञान रूप से | सारे स देर, स्मृति प्राप्ति से मानाश ये पलस्प, नष्ट हो गये हैं । अव अजुन को बुद्धि स्वस्थ रूप से स्थिर और स्थित है--स्थितप्रज्ञ यो अवस्था म आ जाता है अजुा । आत्मविस्मति पे अजाना धकार म सशय और सदेह वा प्रवरा वेग रहता . । श्रीकृष्ण के स्वरूप एवं अतुल सामथ्य की सम्यक' स्मृति ये शुभ प्रकाश मे सय सशम से खो जाते हैं जस दीपज्योति वे प्रज्वलित होते ही तिमिर का निरसन हो जाता है जसे सूर्योदय के साथ ही रात्रि विदा हो जाती है रात के तारे बिगाहा जाते हैं । सब अनायास ही हा जाता है, कुछ परना नहीं पड़ता स्थिर होन के लिए | अर्जुन पूर्णतया आश्वस्त है कि कृष्ण या सग हो विजय प्राप्ति की अटल गारण्टी है । मर्जुन महता है म स्थित हो गया है मेरी पता निरम्प दीपशिखा की भांति स्थिर है, अडिग है । तूफान आये, औधियां उठे तो मी अर मरे भीतर कोई बम्पा नहीं । मैं स्वात्म स्थिति में प्रतिष्ठित हूँ। तीसरी शत है 'वरिप्य वचन तव' । अब मैं आपके आदेश की प्रतीक्षा म अविचल सहा हूँ। आत्म योग भ स्थित रह पर आपकी आज्ञा का पालन करूगा । मैं आपके हाथ मे 'निमित्त होकर कम करूंगा, आपके वचन पालूगा गुरु पाय मे आदेशानुसार हाथ यटाऊंगा। यही है अर्जुन की--शिष्य की~ गुरु के प्रतिपूण शरणागति का शुद्ध स्वरूप । इसम सबसे रोचा रहस्य की बात तो यह है कि यह सब गुरु की प्रसमता व कृपा से घटित होता है.~-'त्वत्प्रसादात्' । यह अत्य त महत्त्वपूर्ण कथन है कि 'आपकी कृपा से, हे अच्युत । मैं स्मृतियुक्त मोहविहीन, गतस दह और स्थितप्रा हो गया हूँ।' इस निवेदन मे अहार का विगलन स्पष्ट है। एक और बहुमूल्य तथ्य यह भी है कि ग्यारहवें अध्याय म भी अर्जुन अपने मोह नाश का निवदन करता है- 'मदनुग्रहाय परम गुह्यमध्यात्मसनितम् यत्त्वयाक्त वचस्तेन मोहो य विगतो मम ।। 111।। इस प्रकार भगवान के वचन सुाकर बाला', ह भगवन् । मरे पर अनुग्रह करो लिए परम गोपनीय, मध्यात्म विषयक वचन आपने यह उससे मरा मान नष्ट हो गया है। पा तो इसमे मी अर्जुश्रीकृष्ण की मानता है पर करता है कि उससे मरा मोह नष्ट हो गया। मरा' सौर 'पराया' अहकार का ही योतन करता है । यह मोहाश 'मेरे' पायाभूपण बन कर आया है, अत इस 114 महाभारत का अय - यिनि के लोट जान को समाह। परतु यव जिस माहनाश का निवेदन है, वह 'मैं' के साथ है, जिसके मूल मे पण पाय मात्मस्मृति की प्राप्ति है- 'स्मृतिलब्धा'। साराशत , अर्जुश्री कृष्ण को कृपा और अपने पूण समपण के प्रसाद र माहाणव से पार नाम स्मृति ये नित्यत्व में प्रतिष्ठित हो जाता है । यह सय उस प्रक्रिया के प्रवाह म हाता है जिसके मूल में अर्जुन द्वारा, युद्ध की विभी पिकामे, देसा हुआ मयुवा नृशम बोर विकराल रूप है । अर्जुन पा मृत्यु दर्शी गीतापान के प्रवाह या निमित्त बन कर मानव मात्र को सबट काल मे नयी सूय और अभिनव साहस देने की सामथ्य से परिपूर्ण है। इसम मानव के जय- पय का पाथेय है, जय यात्रा को सिद्धि है । माह जय ही मनुष्य जीवन यी मूल जोर बहुमूल्य जय है । मोह हो मृत्यु है ओर माहलय ही मृत्युञ्जयता है, सत्य जीवन की सिद्ध सामग्री है । निस्स देह, विजय मृत्यु मागिनी है । 2 विदुर द्वारा धृतराष्ट्र को युद्धोपरात निसाया जाने वाला मृत्यु दशन निमम रूप महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर ज्याही धृतराष्ट्र को गौरवो के मव- नाण और अपन सौ पुत्रा में मार जान की सूचना मिलती है और वह शीघ्र ही शाक के धने मेघो से पानात, मूछित सा गिर पडता है, उसकी दशा अत्यात दयनीय हो जाती है, जैसे समस्त शासालो के क्ट जाने पर वृक्ष की होती है । वह पुत्र शोक से सतप्त बोर विहल हो जाता है, घार पश्चाताप-दाह से जलने लगता है कि उसन महात्मा विदुर, भीष्मपितामह, द्रोणाचाय और श्रीकृष्ण के युद्ध रोकन और सचि द्वारा शाति सस्थापन के गम्भीर, लोय हितयारी और न्यायोचित परामश को नहीं माना, उसे पुत्रमोह ये कारण स्वीकृति प्रदान नहीं की। सजय भरराफ प्रयत्न करता है, धृतराष्ट्र यो समझाने के लिए कि वह अब बीती हुई बात के लिए पश्चाताप न करें-'नातीत अर्थ वे पश्चातापेन युज्यत' (स्त्रीपय 135)। सात्वना देते समय सजय एक बडी वडवी वात वह देते हैं, समवत इसलिए कि कभी कभी घनीभूत मोह की, गोक यी, जडता को पाटने के लिए गहरा पडुआ सत्य ठीक वैसे ही उपयुक्त सिद्ध हो जाता है जैस पीतरोग की जड मूल सहित विनष्टि के लिए कुटक् की औपच बारगर हा जाती है । सजय कहते हैं 'जो मनुष्य स्वय आग जला कर उसे कपडे मे लपेट लेता है और जलने पर मन ही मन सताप का अनुभव करता है, वह बुद्धिमान नहीं कहा जाता । पुत्र सहित आपने ही अपने लोम रूपी घी से सींच कर और वचन रूपी वायु से प्रेरित वरचे पाथरपी अग्नि या प्रज्वलित किया था अब आप शोर छोडिये गौर बुद्धि से अपने मन को सुस्थिर कीजिये।'-(स्त्री मानव कीजय यात्रा 115 पर 1 39 43)फिर उनये नोक निवृत्ति हेतु स्वय महात्मा विदुर प्रयत्न वरने आते हैं सायना देते समय वे वाल स्पी युद्ध के अत्य त निमम और दुनिवार स्प का दर्शन घृतराष्ट्र को दिखाते हैं हे मरतन दन | क्षत्रियशिरामणे । पारा राव को पाता है शूरवीर यो, वायर का, युद्ध करने वाले को, न करने थाले यो, सुहृदा को, शगुआ को, वह किसी को नहीं छोडता । वह सब का अपनी ओर खीचता है- 'यम रपति'। तब आप व्यथ ही क्या शोर करते हो- विमथमनुशोचसि'? 'हे कुरुश्रेष्ठ । काल सभी प्राणियो को सीच लेता है, उसका न कोई प्रिय, न द्वेष्य । जैसे वायु तृण के अप्रभाग को चहुं ओर हिलाती व झुकाती रहती है, वैसे ही काल समस्त प्राणिया को अवश करके अपने अधीन कर लेता है।' विदुर का मृत्यु दशन यही है जो वह घृतराष्ट्र को कराता है- काल क्षति भूतानि सर्वाणि विविधा युत । न वालस्य प्रिय कश्चिन्न द्वेप्य कुरुसत्तम ।। यथा वायुस्तृणाग्राणि सवतयति सवश । तथा कालवश याति भूतानि भरतपम ।। स्वीपव, 289 काल किसी को पहले ले जाता है, किसी को बाद म । वह ल जाता है जरुर, फिर यय व्यथा, विलाप, शोर क्या, क्सिलिए-'तन का परिदेवना' ? काल ही प्राणियो को पकाता है और उनका सहार करता है । काल सव के सो जाने पर भी जागता है, काल का उल्लघन करना अत्यन्त कठिन है काल पचति भूतानि काल सहरते प्रजा । काल सुप्तेपु जागति कालो हि दुरतिक्रम ।। स्त्रीपद 224 यह मृत्यु के दुनिवार और निमम रूप का दशन है। अटल है मत्यु, यह विकरास स्पम आये या मदु रूप मे, आती है वह जरूर ? देहयारिया को काल के उदर म ता पहुंचना ही है-'मरणात च जीवितम्', 'सर्वेक्षयाता।' काल के समक्ष समी असहाय है, सवथा विवा। कोई इसकी चपेट से नहीं बच सकता। काल के इस दु सह दुनिवार और निमम रूप वे आगे सब के सब कितने अवा और निस्सहाय हैं, उसका धतराष्ट्र को दान बोध कराने के लिए विदुर मिट्टी के बत्तन की उपमा देते हैं और कहते हैं 'जस मिट्टी का बत्तन बनाये जाने के समय कमी चाव पर चढात ही नष्ट हो जाता है, कमी कुछ-कुछ बनने पर कभी पूरा बन जाने पर, कभी सूत से काट दने पर कमा चार से उतारते समय कभी उत्तर जाने पर, कभी गीली या मूखी अवस्या म, 116 महामारत या अथ सभी पाये जाते समय, कभी मावो से उतारते समय, समी पाक स्थान से उठा पर ले जाते समय अथवा कभी उसे उपयोग मे लाते समय फूट जाता है, वैसी ही दशा देहधारियो के शरीर की भी होती है । कोई गम मे रहते समय, कोई पैदा हो जाने पर, कोई कई दिनो का होने पर, कोई पद्रह दिन का, कोई एक मास का तथा कोई एक या दो साल का होने पर, कोई युवावस्था में, कोई मध्यावस्था मे और कोई वृद्धावस्था मे पहुंचने पर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।' यथा च मण्मय भाण्ड चारढ विपद्यत । विचित्प्रक्रियमाण या कृतमात्रमथापि वा।। छिन वाप्यवरायप्तमवतीणमथापि वा। भाद्रवाष्पयथवा शुष्क पच्यमानमथापि वा ।। उत्तापमाणमापाकादुघृत चापि भारत । अथवा परिभुज्यतमेव देहा शरीरिणाम् ।। गमस्थो वा प्रसूतो वाप्पणवा दिवसान्तर । अघमास गतो वापि मासमानगतोऽपि वा।। सवत्सरगतो वापि द्विसवत्सर एव वा। यौवनस्थोऽथ मध्यस्थो वृद्धो वापि विपद्यते ।। स्त्रीपद 31216 तात्पय यह है कि गर्भाधान के समय से ही मत्यु का विधान लागू हो जाता है, नाम के पूर्व गभपात द्वारा या ज म के पश्चात् किसी क्षण कात जीवन का भक्षण कर सकता है । आयु काल का आहार है, वह मृत्यु के द्वारा इमे ग्रहण करता है । श्रीकृष्ण की गीता का वचन है जमने वाले का मरण निश्चित है, मर हुए या जम निश्चित है, मत्यु अपरिहाय है । अत ध्रुव मत्यु के लिए शोक करना व्यथ है, यह पदापि उचित नहीं। पिदुर मीघतराष्ट्र को बार बार यही समझा रहे हैं कि 'इस प्रकार मरना तो लोक जीवन की आदि रीति है, रिस लिए फिर उसके लिए अनुताप दिया जाये- 'एव ससिद्धि लोके विमर्थ अनुतप्यसे-(स्त्री पव 3 17) वस्तुत 'जो प्रज्ञावान्, सत्त्वगुण मे नित्य स्थित मानव जो सरका हित चाहने वाले और प्राणियो के इस समागम को समझने वाले हैं, ये शोक मोह से परे निईद परम गति को पाने वाले होते हैं- ये तु माता स्थिता सत्त्वे मसारेऽस्मिन् हितैषिण समागमज्ञा भूताना ते याति परमा गतिम् ॥ स्वीपर्व 320 जन्म और मरण जीवन सरिता दे ही दो यूल हैं । यह जीवन या शाश्वत सत्य है । इसे जानवर मनुष्य को शोक और मोह से ऊपर उठ जाना चाहिए । यही थेपसरार है। मानव की जय यात्रा 117 महात्मा विदुर या यह उपदेश मोहापात और घोक्ग्रस्त धृतराष्ट्र में लिए, धृतराष्ट्र जो अरिपो दुर्योधन द्रुम ये मूल हैं, कारगर याने सात्वना प्रदायर और शातिप्रद सिद्ध होता है । वस्तुत अधम ही अपमृत्यु वा कारण होता है। महाभारत म घटित महानाश या अधर्म ही मूल कारण है । अत सौ पुत्रो सहित ग्यारह नक्षौहिणी और पाण्डवो थी शेष सात अक्षोहिणी सेना पे रावनामा प्रलमार, महापूर और निमम दर्शन घृतराष्ट्र के महामार जय घनीभूत शोक तिमिर यो दूर परोमीक्षमता व्यत्त पर सका एसा स्पष्ट प्रतीत होता है । यही सोच पर विदुर छोटे भाई होते हुए भी सात्वना के पूर्व मृत्यु के इस भयावह और दु राह्य रुप पा दशन धृतराष्ट्र यो कराते हैं । मत्यु दशन मोहताश का एक सशक्त उपचार है, शोक हरण का सिद्ध साधन है, मनोजय माग वा आध्यात्मिक पाथेय है । शोक सविग्न अर्जुन की तरह सतप्त धतराष्ट्र मी मत्यु के द्वार से स ताप-नाश और शाति के विनय माग की यात्रा को सम्परा परता है, एय श्रीकृष्णोपदेश स और दूसरा विदुरोपदेश से । 3 युधिष्ठिर का मृत्यु दशन पारणिय ओर मानरीय स्प पुरुक्षेत्र युद्ध के पश्चात् छिन्न मिन असस्य मृत नर वीरा की रुधिर सनी रिक्तुत्य शव स्थली बन चुका है अनेक अनाथ और सनाथ योद्धा मरे है। धृतराष्ट्र कु तीन दन युधिष्ठिर से उन सभी मृत वीरोपी अत्येष्टि निया हेतु विधि अनुसार दाह संस्कार और प्रेत रम करवाने क लिए कहते हैं। शास्त्रोक्त विधि से उनका दाह कम पराप जान पर युधिष्ठिर आदि सारे कुरुवराज और रकुलवधुओ के साथ अपन समी मत बधव वीरा को जलाजलिया देने के लिए पुण्यतोया मागीरथी के तट पर पहुचते हैं । जब कुलपलियां अत्यन्त दुखित होपर राते रोते अपो पुष और पतियो को जलान्जलियां द रही होती है और पुरुप जन भी अपन सुहृदजना को जलाञ्जलि देन लगते हैं, उस समय शोकायुला तुती असह्य व्यथा भरी मद वाणी से कह उठती है 'पुत्रा। जिसे अर्जुन ने परास्त किया है और जिसे तुम मूतपुत्र एव राधेय के नाम से जानते हो, जो से वे मध्यमाग म सूर्य के समान प्रकाशित होता था, उस महान एव सत्यप्रतिषण के लिए मी तुम लाग जलदान करो-पुरुध्वमुदर तस्य भातु अक्लिप्ठरमण वह तुम्हारा यहा भाई था । मगवान् सूय वे जश से वह वीर मेरे ही गम से उत्पन हुआ था।' 'म हिच पूवजा प्राता भासरामय्यजायत ।' रवापर्व 2712 वस, यही है युधिष्ठिर के मत्यु दशन की भूमिका । धरती सिसक गई पाएको ये पद तलो से, यह सुनते ही । आश्चयमिन और अश्रुपूरित, विनाप 118 महाभारत पायथ . परत हुए युधिष्ठिर वण एव अय सभी को जलदान परने के पश्चात, पश्चा ताप के दावानल मे गिर परते हैं । स्वय अपने को प्रात घात में अक्षम्य अप- राप का कारण मान वर दुसह वेदना म रो पडते है और कहते हैं 'मैं बड़ा पापी हूं, मैं रण वे शार मे डूब रहा है। इस तरह जल रहा हूँ मानो किसी ने मुपे प्रदीप्त माग मे ढकेल दिया है । मुझ इस पापी ने कुती मातृत्व के रहस्य न जानने के कारण अपने बडे भाई (पण) को मरवा दिया', ऐसा पाते हुए उहाने श्रापयुक्त शब्दो में इस मामोश या अभिव्यक्ति दी कि 'भाग से स्त्रिया के मन मे कोई गुप्त रहस्य छिपा नही रह सकेगा'- अतो मनसि यद् गुह्यम् स्त्रीणा तन भविष्यति । (स्त्रीपव, 27 29) मुझे यदि यह पहले पता लग जाता विकण मेरे अग्रज हैं तो पौरवो और भय लक्ष लक्ष धीर पुरुषो का महाविनाश रुक जाता | मैं घोर पापी हूँ, मेरे ही कारण यह युद्ध और विध्वस हुआ ह', यह कहते हुए युधिष्ठिर अपने आपको मुक्त Tठ से कोसते है, अपन दुर्भाग्य, कुलनाश और जन धन की हिंसक हानि पर दा करते हैं, और अपने क्षाम बल और बुद्धि को धिक्कारते हैं- घिगस्तु क्षात्रमाचार घिगस्तु बल पौरुषम् । घिगस्त्वमप यनमामापद गमिता वयम ।। स्त्रीपव 75 'पिक्कार हे क्षत्रियो आचार या, धिक्कार है ऐरो वल और पौरुप को, धिक्कार है इस अमप का जिसके कारण हम इस विपदा मे पडे ।' यह है धमराज युधिष्ठिर द्वारा देसा हुआ मृत्यु का तीसरा रूप, जा त्यात परुण और मानवीय है। इस रूप के माधावार से युधिष्ठिर को स्पष्ट लगा कि सही बात तो यह है कि इस युद्ध म हमारे शत्रुओं ही की जीत हुई ह, उही पा गनारथ सिद्ध हुआ है--अमित्रा न समृद्धा, कौरवो या प्रयोजन तो उनके जीवा क साप ही समाप्त हो गया-वृत्तार्या पुरष पिल । हम अमागे व घुहीन होकर बात्मीय जनो यो मार कर अभी भी जीवित हैं, इसमे हमने कौनसा धर्म माया है, कैमा पुण्य अजित किया है ? अमित्रा | समताथा वृत्तार्या बुरख दिल । आत्मानमात्मना हत्या नि धमपलमातुम ॥ स्वीपव 74 वस्तुस्थिति तो यह है कि 'हम उन कुत्ता के समान हैं जो मास के लिए जीम लपलपाते रहत हैं-'आमिपे गृध्यमानानाम् शुनामिय' । जिस दिन के लिए माता पिता जप तप, प्रत दान, पूजा पाठ करते हैं, ब्रह्मचय, सत्य भाषण, तितिभा आदि का साधन पालते हैं, देवी देवताओं की उपासना करते हैं इस मानय पीजय मात्रा 119 अमिलापा से वि स तान होगी, सुप देगी- यह दिन उनसे छिन गया, उनकी यह भासा हिम-गिम होई और यह सब हमारे कारण हुमा, यही दुनिया कहेगी, 'वयमवास्प लोक्स्य विनाशे कारण स्मता। हमने पूरवीरा मो माय, पाप frया और अपने ही देश या बिनाम पर डाला। शत्रुमओ यो मार पर भले ही हमारा पोध दूर हो गया हो, परतु यह गोर मुले निरतर मतप्त कर रहा है, रौंध रहा है। हता पूरा मृत पाए विषय स्वो पिनामित । हता नो विगतो गायु शोको मा उपयत्यम् । स्त्रीपर्व 13536 मैं ऐसा राज्य से भोगू? --7ममार्थोऽस्ति राज्येन मोग।' कितनी गहरी वेदना है युधिष्ठिर ने बत स्थल म , मानवीय स्नेह- दुग्धो माना व्याकुलता या स्प ग्रहण पर लिया हो। मानव मात्र के प्रति युधिष्ठिर यी सहा समुत्पन्न होो वाली यात्मीयता अधार बनकर फूट पड़ी है, इसलिए नहीं कि ये भयातुर है पर इसलिए कि मानवीय संवेदना योर समय वा प्रदाता धमराज विपुत हिंसा और मानव रक्तपात का सोत व सायेदार रायन गया। वे युद्ध नहीं चाहते थे, उसे टालन मा उहा हर समय प्रयत्न विमा पर युद्ध जब उपस्थित हो जाता है तो वे स्थिर रहत हैं, युद्ध में भी वै स्थिर रहे, पर युद्ध ये परिणाम से, और अपने ही अग्रजमण के जीते जीस्वय इसको गत्य वी अनभिज्ञता से वियह प्रथम को तेय था, उनकी सत्यपरक स्थिरता एर दम डगमगा जाती है। वे अधीर हा उठत हैं। उनकी यह भ्याकुलता विसी भय या स्वार्थ के कारण नहीं है, न ही वह मत्यु को निममता के कारण है, वह येवल इस कारण है कि ये इस युद्धजय विध्वस और विनाश म अपन स्त्रय में मूल दायित्व वा दशन करते हैं। अपना दायित्व मृत्यु के प्रति समझन के कारण ही वे मशत, क्षत विक्षत और शोक सतप्त हो जाते हैं। उनका आरशस्य प्रसरता की सीमा को छु जाता है और गहरे मानवीय करण भाव म बहने लगती है उनकी गवेदनशील व्याकुलता । यह तो मानव मात्र को मृत्यु भय से मुक्त करने वाली व्याकुलता का दशन ह । और, यही गहरे अथ म महाभारत का उत्तगोपदे एवं उद्देश्य है तथा आत्मीयता युक्त समय दान इसी आत्मा है- अमय सवभूतम्यो मो ददाति महीपते । स गच्छति पर स्थान विष्णो पदमनामयम। मृत्यु से अमय दान देन वाला विष्णु के अनामय एव परम पद को प्राप्त होता है। मत्युगे अगर दान का मतलब है जीवन दान, जीमन प्रवाह में मान वारे 120 महाभारत का रथ भयप्रद क्षणा म घेय, साहस और सूर्य के साथ रामुपस्थित विपत्ति से निपट लन का पान दान । चूकि जीवन से अधिक प्रिय और पावन अ य कुछ भी नहीं है, इसलिए जीवन की रक्षा ही सबसे बडा घम है, दायित्व कम है । युधिष्ठिर मृत्यु से विचलित नहीं होते, बल्कि मृत्यु ये प्रति अपने मत्तत्व के कारण व्यषित.. होते हैं । 'उनके लिए मृत्यु एक मानवीय परिस्थिति है, दुनिवार नहीं, भयावह नहीं, करुण है, क्याकि उसके आत ही क्तिनी आशाएं, स्तिनी माकाक्षाएँ टूटती हैं, लौर मनुष्य अपने भीतर टूटन लगता है। महामारतवार इसी रूप को सामने रस र महाभारत की फल शुति द्वारा इसमे दिखलाना चाहते हैं वि राज्य आदि छोटे मूल्य हैं, बडा मूत्य है जीवन और उसकी रक्षा । मृत्यु या आघात जिस फरुणा के स्रोत को उद्वेलित करता है, वह करुणा ही सबसे बडी मानवीय निधि है। ( परम्परा व घन नहीं', विद्यानिवास मिश्र, पृष्ठ 23)। मनुष्य के जीवन की पवित्रता को स्वीकार कर, जीवन की रक्षा धरना ही 'आनशस्य' है जिसकी ज्वनत अभिव्यक्ति अधिष्ठिर का करुणापूरित व्यक्तित्व है, उनमी नरोत्तमता या निवप है, मानव को नारायण मे प्रतिष्ठित होने की सिद्ध पात्रता है। युद्ध पी शिस परिस्थिति इस असण्ड सत्य के लिए 'न मानुपात परतर मिचिदस्ति पिछवाई का काम करती है। यह जीवन या विराट और सनातन सत्य है कि नर म नारायण है, नर ही नारायण है आनुशस्य मानव की नर पद से नारायण पद की यात्रा का अनिवाय द्वार है। नरोत्तमत्व विकसित करने में मनुष्य के जीवन में जो भीतरी और बाह्य विघ्न और विषमताए आती हैं, उनका सयम प्रना और पराक्रम से सफल सामना कर लेना नर की विजय याना का प्रथम चरण है, नरोत्तम से नारायण (विष्णु- पद) रूप म विकसित और प्रतिष्ठित होना, और माग मे समुपस्थित विघ्ना पर पतह प्राप्त करते हुए स्वय विजय स्प हो जाना मानव जय याना का दूसरा, महत्वपूर्ण और अन्तिम चरण है। प्रथम चरणबी याना, एर आर, गुणारोहण यो यात्रा है जिसमें मनुप्य सतोगुण मे प्रतिष्ठित रहता है, और, दूसरी ओर, विराट विश्व म निराम करने वाले प्राणियो, पिरोपकर मानय समुदाय के प्रति जानरास्य सम्मत सनातन सत्य, प्रेम और करुणा भरी दृष्टि से अपने सद्व्यवहार को 'बहुजनहिताय सुखाय' बना लेता है। दूसरे चरण को यात्रा गुणातीतारुढ होने की यात्रा है जिसमे नर नरोत्तम को सीमा से परे नारायण की अग्रण्ड, अद्वय, चि मय परावस्था में नित्य प्रतिष्ठित, महर्षि वेद यास या योगेश्वर थोरण की तरह तोर संग्रह में निलिप्त रन्ताह । नर नारायण का रूप है, इस स्थिति का साक्षासार और उसमे अविचल प्रतिष्ठा ही माना जीवन मे इम यात्रा की परा गति है । स्वत्व गेसावर सवल पाना इस यात्रा का पहला भानपको जय मागा 121 . पटार घोर गरमगार प्रसारमायाममा परम परागण व या प्रा"TITIगयन गनिम IT मादिपि। 7 frमामी गौमापा उपयुत मापना द्वारा प्रमागरमा TIRITोग्गिीमा योता, पा सेवा प्रेम से प्रमट गोगरगमसार निमामिपिहाता भीतरी और बाररी। पपा भीरपापातामण (धारम रूप) सागातार द्वारा मानव यमपूण TT, याचरा मोर एरीत हो जाता है, रावस्त नारायण (पिपरामरप) मे सासागर द्वारा मारपूर गतुष्ट, स्वस्थ और सब में एरीमतता' प्रथम अतिरमण में मनुष्य अपा यातरिय दोवत्य, यह रियोर दोग इष्टि पर बारम तप्ति और ब्रह्मरप्टि की विजय यात्रा पूरी मरा, दूसरे गितमयम पाल ग पारमा अयरोषा योर मनुाल प्रणिपूल परिस्थितिया से पीये प्रिया गीत यस्य तारायण को सता में सतत दाद द्वारा मा अपो महजय पायरय या व्यतिर को विराट प्रगति की बेदि पर स्याहा परता हुमा सर्यारम रष्टि सोसारम प्टि पर विगय को यात्रा गम्पन परता है। इस तरह रावय, सवाल पारायण रष्टि ये पनप जाने पर मतगगत् (सर) पार या च गन् (पर) पो भेद बुद्धि मा पिलय और अभेद बुखिया अगुय हो जाता है । और, मानव मनरहे शाम श्रीकृष्ण के इन वाया शी सत्यता या मधुर और दि य अनुय पर लेता है-- यो मा पश्यति रायत्र सर्व च मयि पश्यति । तस्याह न प्रणश्यामि स 7 मन प्रणश्यति । गीता 630 थत सनात सम्मावाएं हैं मानव मे विकास को, मोर नारायण सम्पूण विकास पी छोरहीन सीमा है। मानव उसमें रत और रमणशील होन वी सामथ्य या पूण घसी है। मानव जीवन की श्रेष्ठता, सिद्धि और सायकता इसी जात्मरमण मे है जिसको मन्जिल नारायण है । नर यात्री है इस मन्जिल का, मानव मात्र का अधिकार है इस स्वधाम, परम धाम, में आ रहने या । यह मतमुसी जययात्रा या तोरण द्वार है, समस्त द्व द्वो से परे। परतु उन्ही मे से होकर वहां पहुंचना पडता है । यह है मानव की जय यात्रा का मीनरी द्वार । पुरुक्षेग का महायुद्ध विजय का बाहरी द्वार जय यात्रा या नाहरी द्वार अत्यत स्यूल है, भयावह और महाविता कारी युद्ध जय द्वार | इसमे देश देशो की सयुक्त सेनाए दो पक्षो मे घंट वर परस्पर युद्ध मे भरने मारने रणागण मे पराक्रम और शौय से लड पडती हैं । 122 महामारत वा अथ युद्ध के कारण और परिस्थितिया अनक हो सकते है, परतु इनके पीछे भीषण सैद्धान्तिक मतभेद, स्वाथ पूण वमनस्य, अथ काम जय वपम्य, सीमा विस्तार आदि से उत्पन मतभेद और उग्रवादिता या प्राधाय प्राय रहा करता है। परतु हर पक्ष अपने पक्ष को ही यायोचित और बहुमङ्गलकारी मानता है। और उसी वरदे प्रचल प्रचार से अनेक राज्य रणोद्यत दो परस्पर विरोधी पक्षा मे घर जाते हैं। व्यासात महाकाव्य मे यौरव पक्ष और पाण्डव पक्ष राज्या धिकार से प्रश्न को लेकर पुद्ध में विजयाय प्रवेश करते हैं । परन्तु प्रधानत धम और अधर्म को लेकर ही यह प्रश्न व्यक्त हो रहा है। पौरवा की ओर ग्यारह अक्षाहिणी सेना इट्टी होती है, जिसमे अनेक राज्यों के राजे महाराजे कौरव नरेश दुर्योधन ये समथन मे सयुक्त होते हैं अतुल पराम्मी और अजय पितामह भीष्म पौरख सेनाध्यक्ष पद पर अमिपिर होते हैं और उनके नेतृत्व में बडे बडे रथी, महारथी, अतिरथी कौरव सेन सूचालन करते हैं- केवल सूयन दन पण को छोड कर । अप्रतिम तप औ तेज वाले प्रत्यात द्रोणाचाय, आचाय कृप, द्रोणपुर अश्वत्थामा, महारा धान्य, संघव नरेश जयद्रथ, लिङ्गराज, निषाद राज, अवतिराज, शकमा पेतुमान, भानुमान, राजा पात, दु शासन समेत दुर्योधन ये सब माई, लक्ष्म' राजा अलम्युप, कृतवमा, भगदत्त,कोशल नरेश वृहस्वल, चित्रसेन, निगरा सुशर्मा, सुशप्तकराज सुघ वा, मामा शनि और उसके पुष महाबली अम्बुर याहीप, नादि अनेक गूरवीर कौरव सना के गौरव बार मनोवल को बढ़ वाले हैं। पाण्डवो के महाराज युधिष्ठिर रापक्ष मत्य, मानवोचित न्याय गाति या प्रबल पक्ष है, वे अपो पैतृक उत्तराधिकार के मतगत राज्य प्रा में इन्दुर है, शान्ति द्वारा ही राज्य प्रात्यय दिये गये समस्त प्रयला सपथा विफल हो जाने पर ही ये मतदोगला यादव राजवश भूपण श्रीकृष्ण न्याय और नीतिप्रिय नेतृत्व में युद्ध करो पर विवश और उद्यत हो जात उनकी मार से केवल सात मभोहिणी सेना एकत्रित होती है, पाचाल द्रुपद अपने यनोत्पन पुत्र धृष्ट्रद्युम्न ये साप पाण्टो पे पक्ष मे सह, वि राम भी थपन पली एव यादापुर उत्तर, शग और शिखण्डी के साथ आये राजा सत्यपि हरायान, राजा नील, मालवराज, वैदिराज, पोरवः मुपाम र, उत्तमोगादि पाटवा की ओर से पोरवा के रिद्ध मुद्ध में ! हात है। पौरव-पाण्दवा कादेग-व्यापा 'महामारत' नाम महामुख मठारह a पलता है जिसम दो की सेवाएं मर जाती है, येवर 10 कृष्ण जिसके जीवित बचत हैं । 'महाभारत' महाराव्य म इस युद्ध का वास्तविक विशद विवरण पांच पनों में प्राप्य है भीष्मपय, द्रोणपष, मपपव, सत्यपय, और सौप्तिरपव। जीमपव में प्रथम दस दिता पोर विध्वसकारी युद्ध और मोम ये अद्भुत पराश्रम और उदारचित्तता या विवरण है। युद्धागम ये पूय यमराज युधिष्ठिर अपा रप से उतर पर भीष्म पितामह ये रथ की तरफ पैदल ही कौरव साये मध्य म से हारर जात . । नीम, अजुन आदि का यह बाचरण गच्छा नहीं लगता है पर श्रीकृष्ण इस औचित्य को यस्यान शोभनीय वतात हैं । युधिष्ठिर युद्ध पी भयावह वेला म भी गुरुजना या प्रणाम करना नहीं मूतत, यह उन धमपालन यो पराकाप्टा है । भीष्म उह आशीर्वाद देत हैं, व अपन पौत्र युधिष्ठिर ये इस शोल और शिष्टाचार या देगकर पुलकित हो जाते हैं और मह उठत ह, 'वत्स, 'तुम्हारी विजय हो ।' सहायक ह, विजय उसी की होगी।' धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु युधिष्ठिर ये इस विनम्न आचार को देस पर इतना प्रभावित और प्रसन हो जाता है कि वह कौरव-सना छोडकर उसी समय पाण्डवो स ना मिलता है । युधिष्ठिर उह गले लगाता है, यह पाण्डवो पी जय यात्रा का शुभारम्भ है । युद्ध के प्रथम दस दिन भीष्मपर्व शह्मनाद वे साथ भयानक युद्ध आरम्भ हो जाता है । सनाएँ सेनाना से टकराती हैं, हाथी से हाथो, पाडे से घाडा, पैदल से पदल । वीरो की सिंह गजना, शह्वो की तुमुल ध्वनि, रणभेरी के भैरव नाद घनुपा की टकार, हाथिया का चिंघाडना, घोडो का हिनहिनाना, रथा का घघरनाद, सब मिल कर आकाश को प्रलयकारी कोलाहल से गुज रहे है । पताकाएं फहरा रही है, गदाधर मिड रहे हैं, धनुर्धरा का हस्तलाधव देखते ही बनता है । प्रथम दिवस के युद्ध मे भीम करण कौशल और भयानक प्रहारा से पाण्डव सेना को अत्य घिर क्षति हाती है । अभिमन्यु के शस्त्र सचालनमी अद्भुत भिप्रहस्तता, भीम के पराक्रम और अजुन के शोय के उपरान्त मी कौरवो का युद्ध मे पलडा बहुत भारी रहता है। विराट कुमार उत्तर रणाङ्गण मे वीर गति पात है । युधिष्ठिर यो विपाद होता ह । परतु दूसरे दिन ये युद्ध से सातवें दिन तर पाण्डवो का परात्रम दुर्योधन के लिए हतात्साही सिद्ध होता है। वह घबरा जाता है और भीष्म पितामह पा कोसता है, पर पाण्डव पक्षी हान वा व्यगारोपण सहित आक्षेप लगाता है । वह कहता है, "पितामह | पाण्डवो के प्रति जापके मन मे स्नेह है, इसलिए आप हृदय से उही की जीत पाहत है और भाप जी लगाकर युद्ध नहीं करते।' महारथी भीष्म यो दुर्योधन के वचन अच्छे नही लगत, वे 124 महाभारत या अथ रोप मै कह देत है, 'दुर्याधन ! मैने तुमस पहले ही कहा था कि पाण्डव अजेय हैं वे विपत्तियो से विचलित नहीं होते। उनमे अपार धैर्य है। फिर भी मैं तुम्हारे लिए भीषण युद्ध करता हूं और कहगा। चिन्ता छोड़ दो।' ~बहुशोऽसि मया राजस्तथ्यमुक्ती हित वच । अजेया पाण्डवा युद्धे देवरपि सवा सर्व (भीष्म पद,5843)। भीष्म प्रवल वेग से पाण्डवा पर प्रहार करते हैं, सभी कारव वीर पुर- जोर रणवातुय बताते हैं, दोनो और सेना की अपार क्षति होती है, परन्तु युद्ध मे प्रतिदिन पाण्डवा का पक्ष उत्तरोतर प्रवल होता जाता है, लगता है विजय उही को मिलेगी। व बडे योद्धा मार डाले जाते हैं । घटोत्कच के विकराल और विश्वसकारी प्रहारा से कौरव क्षति देख कर दुर्योधन एकदम घबरा जाता है । अत्यात सतप्त और येचन होकर वह वण के पास सहयोगाथ जाता है, पर तु भीष्म के साथ विद्वेष के मारण वह युद्ध मे नाग नहीं ले रहा है। दुर्योधन कण से यहता है, 'द्रोण, भीष्म, कृप, शल्य और सौमदत्ति के होते हुए भी पाण्डवो का पराकम कम नहीं हो रहा है । उनको गति और शक्ति बढती ही जा रही है। मैं इसका कारण समझ नहीं पा रहा हूँ।' (भीमपव, 974)। 'तुम युद्ध से मुह मोडे हुए हो, इसी से मेरी पाण्डवा स पराजय हो रही है --त्वयि युद्ध विमुसे चाऽपि जितश्चास्मि हि पाण्डव (मीष्मपव, 975)1 प्रत्युत्तर में मण रहता है "मीम शान्तनवस्तूणमपयातु महारणाव से हठ जाये तो मैं अकेला ही पाण्डवो को परास्त कर दूगा--- मस्त हस्ते ततो भीष्मे निहतान् पश्य पाण्डवान् । मयकेव रणे राजन् सुसहृद्गण वापरान् ।। -भीष्म यदि युद्ध भाध्मपद 97.3 पण के इन वचनों को सुनते ही दुर्योधन द्रुत गति से भोप्म पितामह ने पास जाता है और स प्रणाम कहता है 'पितामह, आप विश्व के सवधेष्ठ योद्धा हैं। आपसे देवता भी हार मानते हैं, परतु याप पूण मनोयोग से युद्ध प्रहार नहीं कर रहे हैं पयादि आपके हृदय मे पाण्डवों के प्रति अपार स्नेह है । यदि आप भीतर ही भीतर पाण्डवा वा समभन कर रहे हैं तो आना दीजिए, मैं क्ण की सेनापति बना दू । अपनी सेना के सहार से मैं वेचैन होठा हूँ।' मीष्म स्वार्थी दुर्योधन को यह बात सुनकर दुसी होते हैं और वे उसे कहत हैं 'वत्स, तुम्हारी बुद्धि प्रष्ट हो गई है। योद्धाबत तर घेय से युद्ध करता है । पाण्डव सेना की मी अपार पाति हुई है । परन्तु उनमें धय और सहन शक्ति है जो तुम में नहीं है । तुम स्वाथ ये मोह में जान ही नहीं पा रह हो दि बया बहना चाहिए और क्या नहींत्व मोहान जानौपवाच्यावाच्य सुयोषा'--रहीपण मानव भी जययात्रा 125 - पा रोगापति समिपित करने की बात यह ता तुम जान ही चुके हो विगयर राज चित्ररथ और विराट नगर में मारमण के समय उसकी क्या गति हुई थी। यह तो प्राण रक्षाथ भाग ही गया था तुम्ह छोह पर मैं यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि वासुदेव की शक्ति मनात है, उनमे सृष्टि के सहार करन की क्षमता है। वे सर्वेश्वर देवाधिदव हैं- वासुदेवोऽनन्त शक्ति सृष्टि सहारसारव । सर्वेश्वरो देव देव परमात्मा सनातन ॥ भोप्मपद 9815 फिर भी मैं तुम्ह वहता 'जुह्वान समरे प्राणस्तवयं प्रिययाम्यया' कि तुम्हारी प्रिय कामना के लिए मैं रणाङ्गण मे प्राण होम दूगा। है गाधार | जामो रामि बढ रही है, सुरा से सो जाओ। कल मैं ऐसा मीपण युद्ध कस्गा जो पृथ्वी मे अमरता प्राप्त करेगा जिसे लोग देखेंगे और देखत ही रह जायेंगे।' (मीटम पथ, 98, 5 से 16) नवे दिन भीष्म भयवर युद्ध करते है । असस्य वाणा सी ऐसी भीषण वर्षा करते हैं कि अर्जुन का नदिघोप रथ और सारी पाण्डव सेना उनसे आच्छा दित हो जाती है, अर्जुन घायल हो गिर जाते हैं, कृष्ण के अग प्रत्यग विध जाते हैं, धाडा की गति रुक जाती है । अर्जुन की इस दुरावस्था में कौरव सेना अति उत्साह से बढती हुई हमारो पाण्डव सैनिका को यमघाट दिसा देती है। इस स्थिति वैषम्य को देख, चितातुर कृष्ण अपनी प्रतिना मूल कर आवेश से रथ मे से कूद पडत है और टूटे रथ ये एक चक्र को उठाकर भीष्म को मारा के लिए दौड पडत हैं । वृष्ण के इस रूप को देख कर आहत अजुन शीघ्र रथ से उठ, कूद पडता है और कृष्ण के परा से लिपट जाता है । शस्त्रधारी कृष्ण के तेजोमय दिव्य रूप को देख कर भीष्म भी भाव भक्ति के आवेश में उनकी स्तुति परने लगते हैं। सध्या की इस वदना के साथ नवें दिवस का चिर स्मरणीय युद्ध समाप्त हाता है। सभी पाण्डव इस रात विषण्ण हैं । युधिष्ठिर मत्रणा करते है कि युद्धा रम्भ के पूर्व भीष्म ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि 'मैं युद्ध तो पोरयो की ओर से ही करूँगा, परन्तु तुम अपने लिए मुझ से सलाह ले सक्त हो। म अयिध्ये तवाय, न तु योत्स्ये कयञ्चन ।' क्यो न फिर उही स उन पर विजय प्राप्ति का उपाय पूछ लें कृष्ण सहित पांचा पाण्डव भीष्म के पास सानुनय पहुँचते हैं और पूछत हैं-'क्ष जयेम सवन' हे सर्वन हम जय वैसे प्राप्त करें कृपया बताइये । क्यारियापको परास्त करना किसी के बस की बात नहीं है । गौरयो की विजय असत्य को विजय है । उससे देश मस 126 महामारत वा अथ - । . घम आर सत्य का लोप हो जायेगा। (मीष्मपद, 10761-70) । सुन कर भीष्म कहते हैं 'युधिष्ठिर तुम ठीक रहते हो । जब तप में जीवित हूँ, तब तर कौरव पक्ष अजेय है । पर तु ससार का यह रहस्य देखो कि मुझे वह पक्ष ग्रहण करना पडा है, जो असत्य है। मेरे लिए यह लज्जा की बात है कि मेरी आखो के सामने सत्य की मयादा अक्षुण्ण न रहे । अत में अपनी मृत्यु का रहस्य बताता हू । तुम्हारे पक्ष मे द्रुपद का बेटा शिसण्डी पूव जाम पा स्त्री है। उसने मेरे वध के लिए शिवजी पी तपस्या की थी। यद्यपि उसो एक दानव वरदान से पुरुष रूप प्राप्त कर लिया है, तथापि उमका स्त्रीत्व नहीं गया है । यदि उसे सामने करके अजुन मुझ पर तीर चलायेगा तो मैं अस्त नही चलाऊगा और मेरा गिरना अवश्यम्भावी हो जायेगा। -'अर्जुन समरे पर पुरस्कृत्य शिखण्डिनम्' (भीष्मपव, 107 82), 'मा पातयतु वीभत्सुरव तय जयोध्रुवम्' और मेरे गिरने पर तुम्हारी जय निश्चित है, ध्रुवम् है (भीम- पय, 107 87)। दमवें दिन का युद्ध इस महायुद्ध का सबसे भयकर युद्ध है । भीष्म के प्रचण्ड और असह्य आरमण और प्रहारो के सामने पाण्डव सेना तितर बितर हो जाती है । आज महामृत्यु महोत्सव मना रही है । ऐसी विनाशकारी विय रालता को देखकर युधिष्ठिर अत्यत शुब्ध एव बधीर हो उठते हैं । पर शीघ्र हो द्रुपद पुत्र शिखण्डी रथारढ होकर सेना को चीरता हुआ भीष्म पितामह ये सामने रणमुद्रा में उपस्थित हो उठता है । अर्जुन इसी रथ मे पीछे बैठा है। भीष्म ये शस्त सचालन की प्रक्रिया रुक जाती है, पर तु अजुन के तीक्ष्णतम बाण महारो से मीष्म का अग प्रत्यग एकदम छलनी हो जाता है। वे गिर पडते हैं, पर पृथ्वी पर स्पश नहीं होता, वे तीरा की शय्या पर पड़े हैं। शेषनाग की नय्या पीडाप्रद नहीं, शर शय्या अतीव कष्टदायक है, परतु भीष्म उस पर भोप्म के गिरते ही दोनो दलो में हाहाकार मच जाता है। युद्ध व द हो जाता है। कोरयराज और पाण्डर समी शोर सतप्त भीष्म की शय्या के समीप चरणा की तरफ सडे हो जाते हैं । महावीरवण भी अपणी शत्रुता को मुला कर यहाँ आ जाता है । मीम वो वह प्रणाम करता है । इस पर वे कण को आशी र्याद देते हुए कहते हैं 'यण । तुम मुझे सदा प्रिय ही लगे हो, वेवल मर्यादा पालन हेतु ही मैंन अवसर पड़ने पर कुछ तोक्ष्ण वचन रहे हैं । तुम धीर हो, तुम इस युद्ध को रोम सक्ने हो । दुर्योधन समझता है कि तुम्हारी सहायता वह विजयी होगा, लेकिन अजुन को पराजित करना सम्भव नही है मत शीघ्र सचिवरचे युद्ध योगेक तो-'सधिभवतु मा चिरम' । गण पर मानव पीजय यात्रा 127 मुझ राधेय देते है "पितामह | अव सघप बहुत दूर तक पहुंच गया है। यो दुर्योधन ने अगराज बना कर गौरवान्वित किया है। जैसे कृष्ण अर्जुन का साथ नहीं छोड़ सकता, वैसे मैं भी दुर्योधन का साथ कभी नही छोड सकता। पाण्डव तो आपके मी पौन थे, आपने उनके विरुद्ध शस्त्रास्त्र क्यो उठाये आप भी तो कौरवो को समझा सकते थे। यब मैं आपका उपदेश से मानू (भीष्म पर, 122 24-25)।' यह कह कर कण तो अपने शिविर की ओर चला जाता है। युद्ध के अगले पांच दिन, 11 से 15 द्रोणपर्व महाभारत के ग्यारहवें दिा युद्ध का सचालन कोरवा की ओर से द्रोणा चाय करने लगते हैं और पाण्डवो की ओर से धृष्टद्युम्न । कण भी अब युद्ध में प्रवेश करता है। द्रोण व्यूह रचना के दक्ष आचाय हैं । इन पाच दिनो मे विविध प्रकार के दुर्मेद्य व्यूहो की सरचना से युद्ध का स्वरूप ही बदल जाता है । दुर्योधन का एकमात्र लक्ष्य युधिष्ठिर को व दी बना कर पाण्डवा वो आत्मसमपणाथ विवश पर देना है । अत युधिष्ठिर को किसी प्रकार अर्जुन से दूर करना मनिवाय है, ऐसी मत्रणा करके यह दायित्व त्रिगतों वे सुशर्मा और ससप्तका को मौंपा जाता है कि वे अर्जुन पो युद्ध मे आकृष्ट करके युधिष्ठिर से बहुत दूर ले जायें क्योकि अर्जुन की विद्यमानता मे कोई भी युधिष्ठिर को न घेर सकता है, न परट सरता है। द्रोण के इस म त य को कृष्ण पहले से ही अनुमान से जान लेते हैं । अत उनकी दृष्टि में युधिष्ठिर की सुरक्षा ही सर्वोपरि लक्ष्य बनता भयकरता एव दुष्परता यव घनी हो जाती है, परतु द्रोण के महारथी न तो ग्यारहवें दिन और न ही वारहवें दिन युधिष्ठिर को वदी बना पात हैं । उत्टे महाभट्ट प्राग्ज्योतिपये राजा भगदत्त अजुन के हाथा यमलोग पहुंचा दिये जाते हैं । अर्जुन विगत सेना नष्ट करके लौटे, उमके पूर्व द्रोण पूण वेग से युधिष्टिर पर माममण वर देते हैं । युधिष्ठिर के अगरक्षक सत्यजित अचूक शर प्रहार से द्रोण के रथ के पहिये काट देता है, घोडे मार गिराता है और द्रोण या आश्रमण विफल हो जाता है । आक्रोश मे द्रोणाचाय अद्धचद्र वाण स सत्य जित यो मार गिरात हैं । उसी क्षण अर्जुन नोट माता है और बारहवें दिन या युद्ध मी समाप्त हो जाता है। तेरह दिन द्रोण छ महारपिया सहित एव अभेद्य व्यूह की रचना करते हैं जिस समय ससप्तकों को खदेडते हुए अर्जुन बहुत पिपल पर सेना द्वारा पारा भार मे पिर गया होता है। अजुन पुत्र अशिमाम ही एकमात्र एमावाल 123 महाभारत पाप । युद्ध की वीर है जो चक्रव्यूह भेदन तो वरना जानता है, परतु उसमे से वापस सुरक्षित लौट आना उसे नहीं आता । अगिम यु व्यूह मे प्रवेश करता है, सभी छ द्वारो को भेद कर क्रमश जयद्रथ, द्रोण वण, नश्वात्थामा, दु शासन दुर्योधन पुत्र लक्ष्मण को पराजित पर यह व्यूह के सप्तम द्वार पर जा पहुंचा है। वहाँ साता महारथी एक साथ मिल पर घमयुद्ध विरोधी नीति को अपना कर अ याय और छल से अभिम यु पो घोर युद्ध करत हुए मार गिराते हैं । बस यही से महामारत या युद्ध धम के आधार को छोड कर छल छा और स्वाथ को विजय का अनिवाय तत्त्व स्वीकार करके आगे बढ़ता है। द्रोण के सेनापतित्व में इस महायुद्ध का चरिय परिवत्तन आगे होने वाली समस्त सामरिस घटनाओ का निफ्प बन जाता है। द्रोण वध की घटना यो ही लीजिये। महाभारत मे द्रोणपव के समग्न अध्ययन से द्रोण-वध के औचित्य को कमोटी प्रकट होती है। प्रोण के कौरव सेनाध्यक्ष बनते ही पाण्डवो की सेना के अध्यक्ष पद पर धृष्टद्युम्न नियुक्त किया जाता है क्योवि द्रोणाचाय राजा द्रुपद के द्वेपो हैं और द्रोण वध हेतु ही सवाम यज्ञ द्वारा द्रुपद ने साक्षात् अग्नि देव से वरदान स्प मे, अग्नि से ही उत्पन्न, घष्टद्युम्न नाम पुत्र को प्राप्त किया है । यह तथ्य द्रोण को विदित है । अत घृष्टद्युम्न को अपने सामने पाण्डव सेनाध्यक्ष के स्प मे देखते ही द्रोण भीति और आगोश से घिर जात हैं । मोति इसलिए कि घटद्युम्न उनके लिए मत्यु रूप बन कर सड़ा हुआ है, आमाश इसलिए कि उह अब पुरजोर से पाण्डव सेना का शीघ्र सहार करना है । अत द्रोण घोरतम कम और भयकर युद्ध का प्रम उपस्थित करत है । अभिमन्यु के निमम और छनपूर्ण वध मे सब महारथी सम्मिलित थे, द्रोण भी, परतु जयद्रथ इनमे सबमे आग और प्रधान हत्यारा था। चौदहवें दिन जब जर्जुन को प्रतिज्ञा और मीपण पराम द्वारा द्रोणा चार्य की विकट व्यूह रचना के उपरात भी, जयद्रथ मार डाला जाता है तब दुर्योधन के कटाक्ष द्रोण पे लिए असह्य हो जाते हैं । फलस्वरूप, द्रोण अत्यत विकराल म्प प्रकट करते हैं, युद्ध तरह दिव्य अस्त्र शस्त्रो का प्रयोग करते है जिनका प्रयोग मानव वीरो पर करना सवथा निषिद्ध है । आज भी यूक्लियर वाम्ब के परीक्षण व प्रयोग पर मात्र इसलिए प्रतिवध लगाने के अतर्राष्ट्रीय सुबाष प्रस्तुत और स्वीकृत होते जा रह ह कि इनका पिसी भी आरोश व प्रोतेजना जाय परिस्थिति में प्रयाग महामानवता के अचित्य एव घोर महा विनाश का कारण बन सकता है । पर तु द्रोण ये भ्रात एव त्रोधावान्त चित्त मानव हित और मानवीयता की रक्षा का माव स्रोत एकदम जल सा जाता है, और यदि याम्यावा नशस गव विवेकहीन प्रयाग करना आरम्भ करते हैं जिससे मारपीजय यात्रा 129 एक ही दिन के प्रथम दो प्रहरो मे लगभग एक अक्षौहिणी पाण्डव सेना का नाश हो जाता है। आवारा मे अनेक पूर्ववर्ती ऋपि मुनि प्रक्ट हो जाते हैं और द्रोण के द्वारा दिव्यास्त्री के अमानवोचित एव निषिद्ध प्रयोग की मत्सना करते हैं-विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, वसिष्ठ, कश्यप आदि ऋषिगण ब्रह्मास्त्र एव दिव्यास्त्र के अधाधुध प्रयाग के लिए द्रोण को कहते हैं कि 'तुमने इस प्रकार अधर्म युद्ध को गति दी है, हजारो इसान, जिनके पास न तो ब्रह्मास्त्र एव दिव्यास्त्र है और न ही चलाना आता है, ततारण मौत के घाट उतर चुके हैं, इस प्रकार का आक्रोशज य मीपण नर-सहार तुम्हारे जैसे ब्राह्मण आचाय के लिए बिल्कुल ही उचित व शोमनीय नही है। त एनमब्रुवन् सर्वे द्रोणम्वाह न शोमिनम् । अघमत कृत युद्ध समयो निधनस्य ते ।। द्रो प 190 35 तव एतद् न उपपद्यते ।। द्रोप 190 37 पर द्रोण ऋषियो के वचनो की अवहेलना कर देते हैं और दिव्यास्त्रा के प्रयोग को और अधिक उग्र, आतरकारी तथा विध्वंसकारी बना देते हैं। इसी प्रक्रिया मे अजुन भी बह कर दिव्यालो का मीपण प्रयोग कर सकता था, परतु उसे अपने यायपथ से विचलित होना स्वीकाय नहीं होता। उसके भारी परामम और मोम के रण कौशल से अर्वा तराज वी सेना विनष्ट हो जाती है, अति राज का 'अश्वत्थामा' नाम या दिग्गज हाथी मार डाला गया है गौर आचाय द्रोण के कानो में इतनी ही सूचना आई है अश्वत्थामा मार डाला गया है।' द्रोण का सारा मोह व जीवा अपने पुत्र अश्वत्थामा पर ही केन्द्रित है । अत इस सूचना से द्रोण एक्दम हतोत्साहित और उदास हो उठता है । । वह युधिष्ठिर की सत्यप्रियता से पूणतया आश्वस्त है । अत द्रोण युधिष्ठिर को पूछते हैं कि अश्वत्थामा क्या सचमुच मर गया है यह है प्रसग जव कृष्ण के प्रवल अनुरोप पर युधिष्ठिर जोर स यह उठते है 'अश्वत्थामा हतो' पर साय हीमदोच्चार वर दते हैं 'नरोया वुम्जरो वा' -पिछले शब्द द्रोण सुन नहीं पाते, वे यात्मग्लानि से मर जाते हैं, पुत्रमरण की असह्य व्यथा से मोहामा त हावर वे मन को सहसा समाहित कर लेते हैं, और पद्मासन पर बैठकर रथ मे ही समाधिस्थ हा जात हैं । घृष्टद्युम्न उसी क्षण तीक्ष्ण तलवार से द्रोणाचाय या मस्तक उठा देते हैं। इस प्रकार द्रोणाचाय का वप और युधिष्ठिर वा अरास्य माषण साहित्यारा यी कटुतम आलोपनामा विषय बना है। विप वाहिनी पटुतम आलोचना ये इस प्रसग म श्रीकृष्ण में ये शन्द मननीय है द्रोण द्वारा दिव्य एव ब्रह्मास्त्रा वे जयय अमानुपीय और अधम 130 महाभारत कायम जाय पोर पिपसर एव नर-सहारी प्रयोग से उत्पन्न इस विषमावस्था मे, असम्य वीरो और मनुष्या पो जीवन रक्षा पे लिए, 'असत्य भापण सत्यवचन पी प्रतिना-बद्धता मे वही ज्यादा श्रेयस्सर है'-'सत्यात ज्याय भातवच । अनुत जीवितस्या वदन स्पृश्येऽनते' (द्रोण-पथ, 19047)--- ऐसी रठोर घडी मे बोला गया सनत (असत्य)वचन पापाजन से स्पृष्ट नहीं होता। मामय जीवन की रक्षा से वहा कोई पम नही हो सकता और यदि असत्य द्वारा एव मनुष्य ये मरण से हजारो लासा मनुष्यो यो जोवन-दान मिलता हो, तो युधिष्ठिर द्वारा उस विकट विनाश यो भयावह विभीपिका मे बोला हुमा झठ जीवन सत्य यो पावनतम अनना ही है । लक्ष-मक्ष मनुप्या ये जीवन सरक्षण के लिए-विशेषकर जब ये समस्त वीर धर्म का पक्ष रेकर युद्धरत हैं तथा जिनकी रक्षा और सम्भावित जीत से सुदर और श्रेष्ठ मानय जीवन के मूल्या यो प्रतिष्ठा व पृद्धि होगी-~~- द्रोण का मनत से वध सवथा से ही उचित है जैसे पूरे शरीर की रक्षा के लिए, आवश्यरता पडने पर, एक फेफडे या विनी यो भी गाट देना जीवनपरक और उचित होता है। पपपय युद्ध का 16 या और 17 यो दिन महारयो द्रोणाचाय और जयद्रय पे मर जाने क पश्चात् दुर्योधन अग राज महागीर पण वा सेनाध्यक्ष पद पर अभिपर परते हैं । अब अजुन और वण के मध्य मीषा युद्ध होता है । सोलहवें दिन भयपर युद्ध हाता है पर उस दिन अर्जुन प्रवल वेग रो ससप्तयो का सहार करते हैं, दुर्योधन और म य कौरव योर भाग रहे होते है, वणवी मुठभेड नकुल से होती है, घमासान युद्ध के पश्चात् नबुत पायत हो जाना है, वण उसका वध मात्र इसलिए नहीं करता वि उसने कुती को वचन दिया था कि पाच पाण्डव अवश्य जीवित रहेंगे- अर्जुन सहित या वण सहित । सोलहवें दिन के युद्ध मे पश्चात् वण ये रहने पर महाराजा गल्य उसके रथ के सारथि बनते है, क्यापि शल्य कृष्ण समान रथ राचालन विधा म अत्यत कुशल एव पटु होते हैं। वण ने पहले भारी परा प्रम दिखाया है, पर माज सग्रहवें दिन स्वय अर्जुन उसके सामने युद्धरत है। पहने युद्ध भीम से होता है। भयकर पराक्रम से भीम कौरव सेना काही नाश नहीं करता, अपितु अपने तीनगामी एव प्रवल वाण प्रक्षेपण से वण को मूच्छित पर दता है। गाय कण को मूर्छा मे देशवर रथ को भगा ले जाते हैं । कण पा रथ अदृश्य होते ही भीम कौरवो पर टूट पड़ता है। दुर्योधन दु शासन वो भीम ये वेग को रोपन के लिए भेजता है। भीम इसी क्षण के लिए आतुर है, द्रौपदी के घोर अपमान मा बदला लेने का ममय जा गया है । भीम अपनी गदा सम्हालता है और दु शासन साथ गदायुद्ध शुरू हो जाता है। प्रथम अवसर - मानवी जययात्रा 131 मे हो भीम के मीपण गदापात से दुशासन अचेत हो गिर पडता है, भीम उसके हाथ एक ही झटके से उखाड लेता है, और उसकी छाती फाड कर रक्त पीना आरम्म कर देता है। इस तरह भीम अपनी प्रथम प्रतिज्ञा पूरी करता है जो उसने धृतराष्ट्र की धूत सभा मे दु शासन द्वारा द्रौपदी को निवस्त्र करने के दु सह्य अपमान के समय की थी। भीम की विकराल मूत्ति को देख कर कौरव सेना भाग खडी होती है। उघर कण की मूर्छा टूटती है और उसे दु शासन की मत्यु का समाचार मिलता है । अभी दिन बहुत शेष है, अत कण पुन रथासीन होकर युद्धाथ आता है, युधिष्ठिर से मुठभेड होती ह, कण के भीषण और अपमानजनक प्रहार से क्षुब्ध और घायल युधिष्ठिर को उनका सारथि रणभूमि से ले भागता है। उधर अर्जुन मसप्तको की सेना का सहार करते हुए लौट आने पर, युधिष्ठिर के रथ को युद्ध क्षेत्र मे न देखकर, वह उनके शिविर मे जाता है। दोनो माइयो मे परस्पर झडप हो जाती है, अर्जुन अपने गाण्डीव धनुप का अप मान नही सह सकता और युधिष्ठिर कण के माघातो से पीडित शय्या पर पडे अर्जुन और उसके धनुप को धिक्कारने में कोई कसर नहीं उठा रखते । म त तोगत्वा, कृष्ण के बीचवचाव से अजुन स्वज्येष्ठभ्राता से क्षमायाचना करते हुए कण के साथ युद्ध करने चल पडता है। घमासान युद्ध होता है, दोनो मिन गिन्न अस्त्रा का प्रयोग करते है, दोनो महाधनुर्धारी है, महाविना का ताण्डव नत्य होन लगता है। पण क्रोधावेश मे 'माग्नेय' अस्त्र फेंकते हैं जिससे पाण्डव सेना अग्नि वर्षा से जलन व भस्म होने लगती है, तुरत ही अर्जुन 'वरण' अस्न छोडते हैं जिससे मेघो वा नीम निर्माण और जल वपण होन से अग्नि शात हो जाती है । क्ण का आरोश बढने लगता है और वह 'वाय य' अस्त्र का प्रयोग करता है, जिससे मेघ छिन विछिन्न हो जाते हैं और आकाश में आधी छाने लगती है, अर्जुन के 'नागास्त्र' द्वारा कौरव सेना भयात्रात माग होती है। वर्ण 'गरडास्त्र' द्वारा नागास्त्र के प्रभाव को समाप्त परवे पाण्डव सेना को अतुल क्षति पहुंचाने लगता है। अर्जुन के पास 'नारायणास्त्र' है जिसके प्रयाग से कण और कौरवो की रोना पातसाल ताश हो सकता है, परतु इस दिय अस्त्र का प्रयोग मनुप्य युद्ध मे वर्जित है । द्रोण ने दिव्यास्त्रों के प्रयोग से पाण्डवो की एक ही प्रहर में एक अक्षौहिणी मेना यो नष्ट प्रष्ट कर दिया था, पर तु अर्जुन इस दियास्त्र के विनाकारी प्रयोग पे लाम या सवरण करके अपने मागवीय जीवन दृष्टि का परिचय देता है। यह पण पो मानवी युद्ध से ही जीतना चाहता है । अत अवसरोपिा घेय के साप यह यचि य पौशल, हस्तलापय और तीयगति म तीण वाण वपाद्वारा 132 महाभारत या अथ कण और उसके साथिया को विचलित कर देता है । हतोत्साह से विवश कण पुन दियास्त्र का प्रयोग सीधा अर्जुन पर करता है, पर तु वाण टूटते ही कृष्ण नदिघोप के घोडा वो एक दम नीचे झुवा लेते हैं और वह दिव्यास्त्र रथ के ऊपर से अर्जुन के मुकुट को इता हुआ निकल जाता है । अर्जुन का गाम्भीय मोर धय इस समय दशनीय होता है। यह बच जाता है और तुरत पण पर अविचल गति से धरानुस धान द्वारा प्रसर प्रहार कर उठता है । कण के पांव उखड़ने लगत है, घय टूटता जाता है, और अधीरता के क्षणा मे वह परशुराम से सीखी हुई शस्त्र विद्या भूलन लगता है । अजुन वा और प्रहार होता है और हडवहाहट में यण वे रथ का पहिया युद्ध भूमि मे रक्तकीच से फिसलार घस जाता है । और कण उच्च स्वर म मजुन को सम्बोधित करके कहता है मो मा पाय महश्यास मुहूर्त परिपालय । यावच्चमिद ग्रस्तमुद्धरामि महीतलात् ।। कणपद 90108 हे महेश्वास, पाथ ! दो घडी रुषो। तब तक मैं इस फम हुए रथ चक्र याने पहिये को पृथ्वीतल से निकाल लू । 'तुम तो घम युद्ध की मर्यादा से परिचित हो, वेदात या स्वाध्याय रूपी यन करके तुम उसमे अवमथस्नान कर चुके हो–'अमिना युद्धधर्माणा वेदान्ताव मृयाप्लुत' (वणपद, 90114)। अत जब तक मैं पहिये को घरती से मुक्त कर लू तव तव प्रतीक्षा करो। घम की दुहाई देन वाले पण यो सम्बोधित करते हुए तत्क्षण कृष्ण बोल पडते ह 'क्व ते धमस्तदा गत ?'-थरे कण | उस वक्त तुम्हाराघम वहां चला गया था जब तुमने तथा दुर्योधन, दु शासन और सुवल पुत्र शकुनि ने एक वस्त्रा और रजस्वला द्रौपदी को वला सभा मे बुलवाया था, जब कौरव सभा जूए के खेल का नान न रसने वाले राजा युधिष्ठिर को शकुनि ने जान बूझकर छल- पूवक हराया था, जब वनवास का तेरहवा वप बीत जाने पर भी तुमने पाण्डवा का राज्य उहे वापम नहीं दिया था, जब राजा दुर्योधन ने तुम्हारी ही सलाह लेकर भीमसेन को जहर मिनाया हुआ अन्न खिलाया और गगा के मे हत्याथ फेंक दिया था, जय भरी सभा म दु शासन द्वारा क्लेशामात द्रौपदी वो निलज्जता से नगा करते हुए अपमान और उपहास की दृष्टि से तुमने उसे देखा था, जब तुमन युद्ध मे बहुत से महारथियो से मिलकर अधम से चक्रव्यूह भेदन कर देन वाले अजुन पुत्र वीर अभिम यु पी निममहत्या की थी (कणपव,912 12)-- उस समय तुम्हारा धम कहा गया था? 'क्व ते घमस्तदा गत ?' कृष्ण के व्यगपूण सत्य वचन सुनते ही कण या सिर लज्जा से झुक जाता भीपण प्रवाह मानव की जय यात्रा 133 है और यह सबया निरुत्तर राजाता है-'लज्जयावनता भूत्वा उत्तर बिन्चि दुराचार | उगी क्षण पृष्ण अर्जुन पोषण पर रापात हेतु उत्प्रेरित करते ह और दोना यनुघरी म घोर युद्ध होता है। अन्ततोगत्वा मजलिय नामक वाण से अजुन पण का शिरोच्छेन पर देता है। धरती पर गिरते गिरते कण मी देह से एक तेज निकल पर मावाश म फैल जाता है और हर उठार मूय मण्डल मे, सब ये दपते देसते, विलीन हो जाता है। वर्ण का मर गिरना दुर्योधन के आश्वासन-स्तम्म का टूट गिरना है। पाण्डवा पा रावस बहा भाई और बुन्ती का प्रथम पुत्र होने पर भी वह सूतपुत्र और रापानदन की सजा से मण्डित रहकर मरना ही वर्ण वो धेयस्कर लगता है। पृतनता वा मात्तण्ड अस्ताचल मे लुढक जाता है । दुर्योधन की आत्म सजीवनी विनष्ट हो जाती है। कुती की जीवन-लता प्रथम कोतेय के मर जाने की सूचना मात्र मे पश्चाताप की अग्नि में सूस सूख जाती है और पाण्डवो को, अत्येष्टि कम करने में समय पर, तपण द्वारा कण के लिए जलदान का आदेश देती है। यही कण की कारुणिक वथा का अमिपेर होता है। शल्य और सौप्तिक पब महाभारत युद्ध का अन्तिम दिवस वण के गिरते ही दुर्योधन शोक सागर मे डूब जाता है, हिम्मत हार जाता है परतु राज्य का लाभ उसके हृदय म अभी भी प्रवल है। कृपाचाय उसे सघि द्वारा युद्ध रोपने के लिए सुझाव देते हैं और कहते है कि ग्यारह अक्षौहिणी सेना में बहुत थोडी मेना जीवित बची है, उसके (दुर्योधन के) सभी भाई मार डाले गये ह सभी महारथी भी कात कालित हो गये हैं । परन्तु दुर्योधन को सन्धि स्वीकाय नहीं होती, वह यह उठता है-~~-अभी थाप है, अश्वत्थामा है, कृतवर्मा है, मामा शल्य है, मैं स्वय हूँ। मैं चाहता हूँ कि कल से महारथी मद्रराज मामा गत्य हमारे सेनापति बनें। शल्य के सेनापतित्व मै अठारह दिन का महामारतीय युद्ध शुरू होता है। महारथी शल्य से युद्ध करन स्वय धमराज युधिष्ठिर आते हैं, अजुन ससप्तकों के साथ आर भीम कृपावाय से मोर्चा लेते है। शल्य की सहायताथ अश्वत्यामा सवथा तत्पर है, युधिष्ठिर के साथ धृष्टद्युम्न, सात्यक्आिदि रहने हैं । मयवर युद्ध होता है दानो ओर से । अतताग वा युधिष्ठिर के द्वारा एक धाता शक्ति के प्रयोग द्वारा महारथी शल्य युद्ध में मार दिये जाते हैं । पाण्डद जय-यात्रा में उत्तरोत्तर आगे बढते जाते हैं। कौरव सेना भागने लगती है। उसी समय स्वय दुर्योधन के आते हो मागतो हुई से नोट पहती है। उधर सहदेव सूर पराममदिखाता है और अपनी प्रतिनानुमार शकुनि के पुत्र 'उत्तर और शकुनि को मार गिराता है, और 134 महाभारत का अय । इघर दुर्योधन अपनी सारी सेना के महार का देख कर भयभीत हो जाता है, माग कर दूर सरोवर मे एक वृहद स्तम्म के पोछे छिपने हेतु शरण लेता है। भीम पीछे पीछे आता है। बिना दुर्योधन को जीते व मारे पाण्डवो की जय यात्रा पूरी नहीं हो सकती। बलराम वहां आ पहुंचते हैं कृष्ण भीमल्लयुद्ध होता है। मीम नियम- विरद्ध दुर्योधन की जाघ पर गदाघात कर देता है । फलत दुर्योधन की जाघ टूट जाती है । भीम उसके मस्तय पर प्रहार करता है । वलराम भीम पर क्रोध करते हैं, क्योकि उसने दुर्योधन की जाप पर प्रहार वरपे धमनीति का उल्लघन किया है । 'क्वतस्य धमस्तदा गत ' कह कर कृष्ण उह समयाते है । द्रौपदी के चीरहरण के समय दुर्योधन ने अपनी जाप उघाड कर दिखाई थी और भीम ने प्रतिज्ञा की थी कि युद्ध मे जांघ पर प्रहार द्वारा ही दुर्योधन का वध करेगा। वृष्ण के इस यीच बचाव से बलराम चले जाते हैं । भीम, कृष्ण आदि समी पाण्डव भी वहां से चले जाते हैं । दुर्योधन मरणासन्न रण भूमि म पडे हैं, अश्वत्थामा आता है और प्रतिज्ञा करता है कि वह मेनकेन प्रकारेण पाण्डवो का निश्चय ही वध कर डालेगा। सूर्यास्त हो चुका है, युद्ध वाद है। अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा से प्रोत्साहित होकर दुर्योधन उसे शीघ्र नया सेनापति घोपित कर देता है। प्रतिशोध यी अग्नि मे धधक्ता हुआ अश्वत्थामा, कृपाचाय और कृतवमा रात्रि समय पाण्डवा के शिविर के पास एक वृक्ष तले पाचो पाण्डवो के वध का उपाय सोचने लगते हैं। उसी समय वह देखता है कि उल्लू सा एक पक्षी आया और पेड पर नीद मे सोये कौआ पोसटाक से एक एक पर मार डालता है। उपाय समझ में आ जाता है, तीना पाञ्चालो के शिविर मे चुपके-मे प्रवेश करते है पलग पर गहरी निद्रा मे सुप्त धष्टद्युम्न को निमम हत्या करके अश्वत्थामा अपने पिता द्रोण का बदला लेता है। फिर शीघ्र वहाँ से यह पाण्डवो के शिविर मे घुस जाता है और वहाँ सोते हुए पांच पाण्डव वीरो को मार कर उनके कटे पाचा मस्तका को हाथ मे लेकर वह खुशी मे उछलता हुआ दुर्योधन के पास पहुंचता है । पाण्डयो के वध को समाचार स मतप्राय दुर्योधन के नेत्रो मे ज्योति जगमगा उठती है । वह मीम का मस्त मागता है, देखने पर लगता है कि वे पांचो मस्तर द्रौपदी के पांचो पुत्रो के हैं न कि पांचा पाण्डवा के । सोम और ग्लानि से दुर्योधन का प्राणात हो जाता है। दुर्योधन के देहावसान के साथ ही महाभारत का युद्ध समाप्त हो जाता है। कोरयो के सवनाश और पतन के साथ ही पाण्डवो की जय तो प्रतिष्ठित हो जाती है, परतु पाण्डवो की जय यात्रा अभी पूर्णतया सम्पन्न नहीं होती। अश्वत्थामा के प्रति भीम कामाकोश नमारोहण करने लगा है, और वह । मानव कीजय यात्रा 135 उसे सोजने निकल पडता है। श्रीकृष्ण की चि ता बढ जाती है क्याकि अश्वत्थामा स्वात्म रक्षण की मोट मे उस 'ब्रह्मशिरा' महास्त्र के प्रयोग म तनिक भी धर्मा घम का सोच व मकोच नही करेगा जिससे भीम अवश्य ही काल कवलित हो सकता है। अत युधिष्ठिर और अर्जुन को साथ लेकर, रथास्ट हो, अत्यन्त तीव्र गति से वे भीम के पीछे उड पडते है । जो कुछ बाद में होता है उसमें अश्वत्थामा के अविवेकपूण 'ब्रह्मशिरास्त्र' के प्रयोग के फलस्वरूप अजुन को अपने ब्रह्मास्त्र का निश्छल प्रयोग करना पड़ता है । वद यास सवनाश से शेष सभी की रक्षा करने की वालोचित एव घममय मानवीय दृष्टि से बीच बचाव करते है । अश्वत्थामा को अपने प्राणा की रक्षा हेतु स्व मस्तक म जडित उस 'मणि' को पाण्डवो के प्रति समर्पित करना पडता है जो उसकी सारी शक्ति तेज और अजेयता का दिव्य स्रोत हाती है । मणि देते ही वह अत्यत निबल, निस्तेज और निरुत्साही हो जाता है । महा-मनस्वी व्यास के आश्रम का अते वासिन बन कर एक तपस्वी का जीवन यापन ही अश्वत्थामा का अव भाग्य बन जाता है। इस प्रकार महाभारत के मोपण समर की इति श्री के साथ ही मानव को महाकाव्यातगत वर्णित जय यात्रा का प्रथम सोपान समाप्त हो जाता है । मानव धो जय यात्रा का चरम सोपान मानव की जय यात्रा के द्वितीय एव चरम सोपान का सम्यक एव समग्र दशन 'महामारत' के 'स्वगारोहण' सनव अन्तिम पव म होता है जिसम प्रवेश 'महाप्रास्थानिक' नामक सत्रहवें पव रूपी द्वार से करना पडता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के पश्चात् धतराष्ट्र और गाधारी प द्रह वर्षों तक हस्तिनापुर म जनर राजा की तरह वीतराग होकर रहत है और फिर वे दोना विदुर और कुन्ती सहित वन म तपस्याथ प्रस्थान कर जाते है जहा उनकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है । युधिष्ठिर, वेद यास और कृष्ण की मत्रणा से, अश्वमेघ यन द्वारा भारत म घम, याय और मानवता का एक छत्र राज्य स्थापित परते ह । श्रीकृष्ण मी तदन तर द्वारिकाम जाकर यादवो के, गापारी शापानुसार, सवस्वनाश की लीला देस पर प्रभासतीय म विचार मग्न विराम परते हैं । वहाँ एक दिन 'जरा नामक व्याघ द्वारा हरिण वे प्रम म चलाये गये तीर से कृष्ण का पद तल आहत हो जाता ह ार घे अगाध शान्त भाव से व्याध को माश्वस्त करते हुए दुर्वासा ऋपि के शापानुकून, समाधिस्थ हो जाते है । उनको जीवन लीला समाप्त होने की सूचनास युधिष्ठिर समेत समीपाण्डव अभिम यु पुत्र परीक्षित यो सम्राट पे पद पर अमिपिक्त परसे, अपने आत्म सामाग्य म प्रवेशाथ द्वारिसावी तीथयात्रा परत हुए हिमालय की ओर 136 महाभारत का अप प्रस्थान करते है । जागतिर जीवन कीजय-यात्रा पूरी हो चुकी है, आध्यात्मिक जीवन की जय यात्रा मे युधिष्ठिर के साथ एक स्वामिभक्त श्वान भी है । यात्रा अत्यत दुप्पर है, कठिन और लम्बो । ज्यो ज्यो हिमालय मे वे आगे बढते जाते हैं, त्यो त्यो हिमपात भी मीपण हाता जाता है। हिमपात के वाधक्य से यात्रा दुगम और अधिक दुष्कर हो जाती है । गति मे शिथिलता बल पपड लेती है, और माग मे अनेर अवरोध आने लगते हैं । आरोहण ये काठिन्य को सहारा घर सकने के कारण द्रौपदी गिर पडती है, उसके प्राण पखेरू उड जाते हैं। भीम युधिष्ठिर को पूछते हैं कि प्रनावती, पतिव्रता, संवापरायण और कृष्णप्रिया द्रौपदी किस दोष के कारण माग म ही गिर कर मर गई है । 'पक्षपातो महा नस्या विशेपेण धनञ्जये' अथात् उसके मन मे अजुन के प्रति अपेक्षाकृत अधिक झुकाव या पक्षपात पूर्ण व्यवहार था, 'तेन दोपेण सा पतिता', इस दोप के कारण वह गिर कर मर गई है । ऐसा युधिष्ठिर उत्तर मे कहते है । सव आगे बढते रहते हैं । परतु माग को उत्तरोत्तर दुगमता एव अपन अपने दोषा के कारण रास्ते मे चलते चलते क्रमश महदेव, नकुल, अर्जुन और भीम भी गिरते जाते हैं और उनका उसी प्रम मे दहावसान होता जाता है । हरेक के गिरन व मरने पर भीम युधिष्ठिर को वही प्रश्न दोहराते हैं-'वेन दोपेण स पतित ?' और उसके प्रत्युत्तर मे युधिष्ठिर हरेक के उस दोप का उल्लेख करते हैं जिससे उसका पतन व मरण माग म ही होता है । सहदेव के गिरने का कारण यह है कि वह 'आत्मन सदृश प्राश नेपोऽमयत पञ्चन' दोष से ग्रसित है, वह अपने समान प्रज्ञावत अय किसी को नही मानता है। नकुल के मन प्रदेश में यह बात जम गई है कि उसके स्प सोदय के सदृश अन्य कोई नहीं है -'रूपेण मत्समो नास्ति इत्यस्य मनसि स्थितम् । अर्जुन एक मात्र मिथ्या मापण की पुनरा वृत्ति के दोप से गिरता है, उसने दोहराया है कि वह 'एक ही दिन में समस्त शत्रुआ को भस्म कर देगा' और वह ऐसा भी कर नहीं सका- 'एकाह्रा निदहेय व शा इत्यर्जुनाऽब्रवीत् ।' स्वय भीम के लिए युधिष्ठिर यहते हैं कि तुम 'अति मुक्त', अतिमोजी ही नहीं, अपितु अपा शोय की बात्म प्रशसा के दोप से गिरे हो। ये सभी दोष अहकार के ही मृदु वितु भिन्न रूप है, इन पच- दोषो मे पक्षपातपूणता सबसे बडा दोप है, फिर प्रज्ञाज यदप, रूप-दर्प, मिथ्या भाषण म अत्यल्पमेव रति, अतिमोजी व बलवान होन वा मात्म गौरव उत्तरी त्तर यूनता वाले दोप होने पर भी पतनयारक हैं। युधिष्ठिर इन समस्त दोपा से विनिर्मुक्त हैं और आनुगस्य भाव म पूण- तया प्रतिष्ठित होने के कारण अपनी जीवनजयी यात्रा स देह पूर्ण कर लेते हैं। हिमालय के उत्तग एव परम पावन शिसर पर देवराज इन्द्र एक दिव्य और मानव की जय यात्रा 137 - ज्योतिमय रय लेकर उपस्थित होत है और युधिष्ठिर को स देह स्वग म चलन हेतु रथासीन होने का निवदन करते हैं । युधिष्ठिर यह उठते हैं कि विना भाइयो को साथ लिए वे स्वग पी कामना ही नही कर सकते- 'न बिना भ्रातृभि स्वगमिच्छे' (1733)। इद्र के यह बतलाने पर वि द्रौपदी सहित समी पाण्डव पहले से ही स्वर्ग म पहुंच चुके हैं, युधिष्ठिर अपने साथ बिना गिरे यात्रा सम्पन करने वाले श्वान को रथासीन होने देने की देवेद्र से सानु नय विनय करते हैं कि 'हे भूत और भविष्य ये स्वामी यह श्वान सदा मेरे साथ पूर्ण विश्वास और भक्ति सहित रहा और यहा तर आया है, मेरी ऐसी मा यता है कि मेरी मानृशस्यावृत्ति के अनुकूल यह कुत्ता मी मेरे साथ रथासीन हाकर स्वग में प्रवेश परे। अयश्वा भूत भव्येश, भक्तो मा नित्यमेव ह । स गच्छेत मया साधमानशस्या हि मे मति ॥ महाप्रथानिक्पव 37 देवेन्द्र के मना करने पर युधिष्ठिर स्पष्ट कहते हैं मिशरणागत एव भक्त का मागं मध्य त्याग कर देना 'महापाप' कहा गया है-'मक्त त्याग प्राहुरत्यन्त पापम्', इतना ही नहीं, भक्त को बीच मे लटका देना लोकप्टि में वस्तुत ब्रह्महत्या' तुल्य माना गया है-- 'तुल्य लोके ब्रह्मवध्या कृतेन' (तदेव, 17311)। युधिष्ठिर द्वारा प्रस्तुत इस प्रकार की विनयगोलयुक्त आनृशस्य वाणी यो सुनते ही देय द्र प्रसन्न हो उठतेहैं और उहे कहते हैं कि हे, युधिष्ठिर । भरतश्रेष्ठ | तुम अपनी इसी शुद्ध सात्विकता के कारण दिव्य एव अति उत्तम गति को प्राप्त हुए हो- 'प्राप्तोऽसि भरतश्रेष्ठ दिव्या गतिमनुत्तमाम् ।' इन शब्दो के साथ देवराज इन युधिष्ठिर को रथारूढ होने के लिए कहते हैं, और वह श्वान, जो छप्रवेश मे साक्षात् घम ही हैं अपने असली रूप म प्रकट होकर युधिष्ठिर को साधुवाद देते हैं। अब युधिष्ठिर देवराज के साथ स्वर्गारोहण करते हैं । वहाँ उह समस्त कौरवो के ता दशन होत है, पर तु अपने पाण्डव भ्राताओ यादि के दसन नहीं हात । आश्चर्यावित भाव से वे इद्र को निवेदन करते है कि जहाँ यही शुम अथवा पापमय स्थान में उनके समी माई ह, उन्हें वहाँ ही ले जाया जाये, उहें अप कोई यामना नहीं है-- शुभ यदि वा पाप भ्रातृणा स्थानमथ मे । तदव प्राप्तुमिच्छामि लोबान याप्नकामये ।। तव 17.991 - 138 महाभारत का अप इन उह कहत है कि क्या अभी तक तुम्हारा मानुपी भाव समाप्त नही हुना है-'अद्यापिमानुपो भाव स्पृशते त्वा नराधिय' (तदेव, 17335)? मरे, यह तो स्वग है, यहा पर अब ऋपियो, स तजना और महासिद्धी आदि वा दशन करके अपने आपको दिव्य जीवन लाम से कृतकृत्य करो। परतु युधिष्ठिर के साग्रह अनुरोध पर इद्रादेशानुसार एक देवदूत उह उस ओर ले चलता है जहाँ उनके भ्राता आदि होते हैं। वह माग अत्यत दुगम, दुग पपूरित और अशुम दृश्यो से मरा हुआ होता है-'पथामशुभ दुर्ग दुर्ग धमशिव लोमहषणम्। उस वीमत्स माग के मध्य मे से बहुत प्रचार के चिता भावो से विचार करते हुए युधिष्ठिर आगे बढते हैं । उसी समय उह द्रौपदी, भीम और अजुन वा आतनाद एव वरूण मदन मुनाई पडता है । वे करण पुकार करने लगे-'भो भो धमज राजप' हे धमपुम मरत श्रेष्ठ | हम पर अनुग्रह करके आप दो घडी तो यहाँ रुप जाइये । आपके आने मात्र से हमे इस पोर परक की यातना मी सह्य और शीतल अनुभवगम्य हो रही है । कृपया आप कुछ रुप जाइये-- 'अनुग्रहाथमस्मा व तिष्ठ ताव मुहत्तम्' (तदेव, 18 2 32)। यह सुनकर क्षाम और ग्लानि से भरे युधिष्ठिर देवदूत को यहते है- 'मरे इन बाघवो ने ऐसा कौनसा पाप किया है कि उह नरक की यह दारुण यातना भोगनी पड़ रही है। तुम जाकर देवेद्र से कहा कि मैं यहा से वापस नही जाऊंगा। मैं यही रहूंगा। मेरे कारण ही तो मेरे भाई और द्रौपदी की यह दुगति हुई है । मैं इनके साथ यही रहूंगा।' कुछ क्षण युधिष्ठिर वही खडे रह जाते है । तत्काल इद्रसहित धमराज वहा आते हैं। उनके आते ही चहु ओर प्रकाश छा जाता है, वीभत्स दृश्य तिरो. हित हो जाते हैं, शोतरा सुगन्धित बयार चलने लगती है । युधिष्ठिर यो सम्बो- पित करते हुए धमराज बोल पडते हैं-एपा तृतीया जिनासा तव राजन् मया कृतम्-'हे, राजन । हमने तीसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली है। अपने वा घवो के लिए तुम नरक मे भी रहने के लिए तैयार हो। यह देखकर हमे बही प्रसनता हुई है। पृथ्वी पे राओ को नरक की यातना अवश्य देखनी चाहिए। इसी कारण तुम्ह कुछ ही क्षणो लिए यह नरक मोगना पड़ा । प्रसिद्ध वीर अजुन, भीम, दृढवती कर्ण आदि तुम्हार माइया में से कोई भी नरय नहीं पहुंचा है । यह तो तुम्हारी परीक्षा के लिए रची गई माया है।' व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीण सुत प्रति । व्याजेनैव ततो राजन् दर्शितो नरम स्तव ॥ 18315 'हे राजन् । अमन से हो तुमने द्रोण के हृदय मे उसके पुत्र के प्रति मर जान का भात भाव फ्लाया था । अत अमन और परोक्ष से ही तुम्ह इस नरक का मानव कीजय यात्रा 139 । दशन कराया गया है। वस्तुत यही देवलाक है, तुम दुखी न होना । अब तुम यही मेरे साथ विहार करो- 'विहारस्व मया साध्वं गतशोको निरामय'। यह देसो, पुण्य सलिला देवनदी आकाशगङ्गा है यहा | इसके पवित्र जल मे स्नान कर लेने पर तुम्हारा मानव स्वभाव दूर हो जायेगा- 'अत्र स्नातस्य मावस्ते मानुपो विगमप्यति' (18 3 29) । घमदेव के ऐसा कहने पर राजपि युधिष्ठिर मुनिजनवदित परमपावन पुण्य सलिला माशगङ्गा मे स्नान करते है जिससे तलाल उनका मानव शरीर छूट जाता है, उहे 'दिव्य वपु' प्राप्त होता है (18 3 42) और उनके स्वभाव में दि यता को स्थायी प्रतिष्ठा हो जाती है । तुरत वे दिव्यलोक में प्रविष्ट हो जाते हैं। इस दृष्टात से स्पष्ट है कि युधिष्ठिर की तरह पुरुषाथ माग पर चलने वाला काई भी धमनिष्ठ मानव श्रेष्ठ एव नरोत्तम भले ही बन जाये पर कही न कही कभी न कमी जीवन सघप के अति कठिन काल मे मान- वीय दुवलता वा वह त्रुटि कर सकता है। नहीं तो दिव्यलोक मे प्रवेशाथ युधिष्ठिर को आकाश गगा म निमज्झन द्वारा 'दिव्य वपु प्राप्ति की क्या आवश्यकता थी। दिव्यलो म प्रवेश करन पर युधिष्ठिर ब्रह्मरूप श्रीकृष्ण के दिव्याति- दिव्य चतुभुज रूप का दशन करत है- 'ददश तत्र गोविद ब्राह्मणव पुपावितम् (18 4 2)। वहीं अर्जुन मधुसूदन श्रीकृष्ण की आराधना मे सलग्न है, ऐसा युधिष्टिर स्पष्ट देखते हैं । यह समपण माग की महिमा है | नर नारायण रूप को तेय और कृष्ण युधिष्ठिर या दिव्यामिन दन करते हैं । वही पर द्वादश आदित्यो के साथ तेजोमय रूप धारण किये हुए कण भी विराजमान है, मरुद्गणा से घिरे हुए कान्तिमान भीम वायुदेव की दि य सग्निधि में बैठे है, स्वतेज से उद्दीप्त नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारा के समीप आसनस्थ हैं, पद्ममाला से अलडकृत दिव्य पाञ्चानी द्रौपदी भी सूययत् प्रकाशित होती हुई वहाँ की शोमा का वघन कर रही है । वहाँ भीष्म वसुओ के माथ, द्रोणा चाय, वृहस्पति के साथ विराज रहे है । इस प्रकार युधिष्ठिर समी वाचवा, कृष्णा और कृष्ण के दिय दान से मुग्ध भार प्रसन्न होत हैं। जनमेजय पी जिज्ञासा की भांति, कोई मी यह प्रश्न उठा सकता है कि 'क्या युधिष्ठिर समेत पाण्डवा और द्रौपदी को वहाँ अ यय पद एव सनातन लाक की प्राप्ति हुई थी? अथवा उस स्वम की जहां पुण्य क्षीण होने पर पुन मृत्युलोर मे थाना पडता है का ते गति प्राप्ता' ? यही स्वय महर्षि वेदव्यास का यह वचन पर्याप्त एव मननीय है । उनका म त य है-- 'रमणा मते प्रविशति त्रिका तनुम्' (18511)अयात् वे ममी यममोग से पश्चात् 7 140 महाभारत यायय अततोगत्वा अपने मूल स्वरूप मे मिल गये है। यह मानव की जय-यात्रा का पूण स्वरूप है । भीष्मपर्व को अन्त पाती श्रीमद्भगवद्गीता म श्रीकृष्ण का परम वचन है-'ममैवाशो जीवलोचे जीव भूत सनातन' (157), अयाद, यह जीव मेरा ही सनातन अश है जो इस लोक म अपने मन एव बुद्धि को फलाकाक्षी और विषयासक्त करवे जगत् के जड पदार्थों के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता हुमा जय से पराडमुस और वञ्चित रहता है। परतु जो मनुष्य अपन मन और बुद्धि से पेवल सत्य का वरण करने की दृढ धारणा से अपने जीवन मे विचार एव व्यवहार को सयोजित करता है, वह समय परने पर अपने ही अदर निहित मनात सजन शीलता और पोपण को परिपूर्णता का साक्षात्कार कर लेता है । मनुष्य की यही अद्भुत शक्ति एव विलक्षणता है कि ज्यो ज्यो वह अपने भावा की सकीणता और विचारो की क्षुद्रता यो हृदय की अयाह गहनता और विराट चितन शीलता को वलिवेदी पर यौछावर करने का सहज पौशल अर्जित करता जायेगा, त्या त्यो वह जीवन को अविचल घेय, निश्छल क्षमा, सजग विवेक एव विमल वैराग्य से अभिषिक्त करता हुआ अपनी आत्मा के अखण्ड आलोक से तादात्म्य कर लेगा, अपने स्वरुप म प्रतिष्ठित हो जायेगा, और फलत मानवता के अक्षय स्रोत के रूप मे उसकी जीवनधारा प्रस्फुटित हो जायगी। उसका जीवन 'ईश्वर जीव अश अविनाशी चेतन, अमल, सहज सुप राति' ये ज्वलत उदाहरण के रूप मे व्यजित होता रहेगा। जैसे सागर का जल उसकी लहर से अमिन और तद्रूप है, उसी तरह नर और नारायण की अमिनता सहन सिद्ध है । अपान के कारण ही नर अपने नारायणत्य का, जर्थात् अ यय, अमल, चेतन, सच्चिदान द स्वरूप को, विस्मृत किये हुए है। नर मात्र नारायण का ही रूप है । इस स्वरूप सिद्धि मे ससार का मोह ही वापर है, सत्यानुराग ही साधक तत्त्व है । यही महाभारत में मानव पीजय यात्रा का सार है। निस्स देह, नारायण प्रत्येक नर के भीतर की स्वभाव सिद्ध समावना है। इस सभावना की यथाथ परिपूत्ति हेतु मानव का 'धनुर्घर' की तरह समपण बुद्धि से एकनिष्ठ एव सततोद्यमी हापर या 'घमराज' की तरह आनशस्यता के सर्वात्मभाय को पूर्ण पुरुषार्थ द्वारा नित्य स्व जीवन म चितन और आचरण के प्रत्येक स्तर पर व्यजित और पोपित करते हुए नारायण के अनत और अव्यय भाय म प्रतिप्रित हो जाना है। यही नर का नारायण मे मानव की जय यात्रा 141
उज्जीवन है, व्यास प्रणीत 'सत्यमेव जयते' का ध्वजारोहण है, मानव की जय
यामा ती अन त इति-थी का रहस्योद्घाटन है।
यन योगेश्वरो कृष्ण या पार्थो धधर ।
तत्र श्रीविजयोभूति घुवानीतिमतिमम ।।
ओमिति
112
महारत या यथ
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