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Soi Saval Ek Javab

Machev,prabhakar · 2010/12

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सौ सवाल : एक जवाब
ससार की कई समस्याग्रो का एक समाधान-गायो
डा. प्रभाकर माचवे
राजपाल एण्ड सन्ज, दिल्ली

गाधी स्मारक निधि, गजघाट, नई दिल्ली
के सहयोग से
राजपाल एण्ड सज, कश्मीरी गेट, दिल्ली-६
द्वारा प्रकाशित
© गांधी स्मारव निधि
प्रथम सस्करण मई १९६७
मूल्य एक रुपया
मदर राजर मल इलक्दिक प्रेम सम्झी मण्डी गिल्ली

वक्तव्य पकार इलाहाबादी ने उदू में कविता लिखी पी-~- "बुलू मियां भा हजरते गांधी के साय हैं । गो नाके मुश्त हैं मगर गांधी के साथ हैं ।।' इस भय है कि ग्राम प्रादमी भी महात्मा गांधी के रास्ते पर चलने मा पातुर है ययपि स्वय उसरी अपनी शक्ति सीमित है पर तु एव प्रादोलन के वामुमडल म वह भी बडे-बरे त्याग करने की सामप्य पा गया है। यह गाधी की भोधी जो भारत ने देपी और जिससे मारा ससार प्रभावित हुया यह थी सामा य यक्ति को त्याग गामध्य को यटाने वाले वातावरण की पावनता। देश की पाजादी के लिए मबक मन म तहपन पैदा हो गई थी, पर गांधीजी ने एक ऐसा रास्ता सुझाया जिसम हर नागरिक पपना यागदान दे सये। पहिसा का जो रास्ता या यह योड नेतामा को पैदा करने की बजाय प्राम जनता को कार उठाने का रास्ता था, और उसस करोडो म चेतना पाई और मासा ने उसमें अपने त्याग का उदाहरण रखा। पर माई प्राजादी। गांधी का ऐहिक जीवन समाप्त हमा । सत्ता और सपत्ति को सनातन होड म त्याग की नविन पर प्राधारित जनक्राति के राम्न से काफिला दूसरी तरफ मुड गया पौर ऐमा सगा कि गाधी पोपोरी यम गई। धाषिक, राजनीतिक, समाजिक जीवन में जो भी परिपतन लान है उनको स्वा राज्य सत्ता र माधार पर साना मम्भव नहीं-यह भुला दिया गया और लोकक्ति का जीजागरण गोषी-युग में हुपा पा पोर पो भाषा के बाद माग बढना था वह न यता । त्याग के स्थान पर सत्ता और लोक के स्थान पर राज्याक्ति के अधिक जोर देने म जो नतीजे पाय हैं वह सामने हैं। पर क्या जो सास्कृतिक चेतना के तत्त्व गाधी जी ने प्रतिपादित क्येि वह भुलाये जा सकते हैं ? भारत म उनपर एस हलका परदा छा गया है पर ससार में, सभी देशा में तत्त्ववेत्ता उत्तरोत्तर प्रगुभव कर रहे हैं कि हिंसा को पराकाष्ठा के इस युग म अहिंसा की शक्ति का विकास ही उसका शमन कर सकेगा, और इसके लिए गांधी इस युग में एक दीपस्तम्भ हैं । यह पुस्तक तथा प्रय दो पुस्ता' गांधी विचार के पोपण मे गाधी जमशताब्दी (१९६६) पे उपलक्ष्य में गांधी स्मारक निधि ने तैयार कराई हैं तथा राजपाल एण्ड सज की ओर से प्रकाशित हा रही हैं। हमे पूर्ण प्राशा है कि जान मे मादी विधारो म सहजगम्य तथा पट्टरता से पर और मौलिक तथा रोचक रूप मे लिग्वी विद्वान लेखया को ये पुस्तकें अपने उद्देश्य म सफल होगी, पौर निधि का लोक-जागरण की यह प्रागा पूरी करेंगा कि- बूद चूद से गागर भरती नदी नदी म सागर । किरन इकट्ठा हुई कि हाता मारा जगत उजागर ॥ गायो स्मारक निधि राजधाट भाई दिल्ली. (देवद्रकुमार गुप्त) मत्री sinican भारत एक है सीताचरण दीक्षित मूल्य एक रुपया । करुणा की कहानियाँ ठा. राजबहादुरमिह मूल्य एक रुपया।

पुस्तक के सम्बन्ध मे सदियो की गुलामी के बाद जर हमारा दा स्वत न हुआ तो उसके सामने कितनी ही समस्याएँ उठ खडी हुइ--एक से एक पचीदी जटिल और उलझन भरी। यक्वारगी उनका मुकाबला करना एक टेढ़ी खीर थी, पर सौभाग्यवश इन समस्यायो और उनकी उलझना को सुलझाने वाला भी हमारा वही जादूगर नता था जिसन प्राजाटी की इटें जमायी थी। यह अनोखा अगुवा न तो समस्यानो की बहुलता म घबराया और न उनकी पचीदगियो से, क्योंकि उनकी युनियादी स्वामिया से वह पूणत अवगत था। उमने विभाजन और पाजादी से उत्पन प्रत्येक समस्या का धारीवा मे अध्ययन क्यिा और साथ ही उनके सुलभाव का सहज, मुगम और सीधा रास्ता ढूढ निकाला। हमारी इन समस्यामा की चचा देश विदा में सवत्र हुइ-पक्ष विपक्ष में तप दितक उटते रहे और उनक समोचान एव समाधानकारक उत्सर भी दिये जाते रहे। प्रस्तुत पुस्तक के लेखप-डा. प्रभाकर माचवे न नजीक और दूरानो से इन समस्यामो का अध्ययन किया-विद्यार्थी-जोदन स लेकर प्राथम-यास ५ समय तफ गांधी जी के निकट रहकर मूक्ष्म अध्ययन में लग रह । दिग-प्रमेरिमा गय ना वहां भी गांधी जा सिद्धान्तों क मध्यापन-काय परत रह और वहाँ उह नीग्रो समस्या का अध्ययन निपट से करने का मौका मिला। इस सिलसिले म विद्याथियो पौर मध्यम धातामा न उन सका ही उलट-सीध प्रश्न पिये मोर व उन सबका विश्लपणपूण जवाब दएर उR! समाधान करते रहे। इस प्रकार उह गाँधी जी के मूलभूत सिदा ता का समुचित रूप म प्रस्तुत करन का मुदर योग मिला। इस प्रकार लवर यो संसारमो मवानों का एक जवाब-गाधी रूप म दना पड़ा जिसम मारन वो ही नही ससार की समस्याओं का उत्तर मा जाता है। लेसर की तद्विषयक धुनिमाणे जानकारी मोर गहन अध्ययन अनुभव एम साधिकार प्रतिपादन में इस पुस्तष को याना विवरण भौर उपन्यास पी तरह सरस मनोर तक और मानरक्षर वा दिया है जिसकी मलक पाटन सहन ही प्राप्त कर सक्त हैं। गाँधी माग -~-राजबहादुरसिंह रामधार, नई दिल्ली

क्रम
१ राष्टवाद
२ विश्व शाति
३ वणद्वैप
मय साम्य
५ प्रात्म सयम
शिक्षा सहज नीति
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अध्याय १ राष्ट्रवाद क्या कभी ऐसा दिन पायेगा जब दुनिया के अलग अलग राष्ट्र मिटकर दुनिया एक हो जायगी कुछ लोग आशावादी हैं और ऐसा सोचते रहे हैं। उहें अराजकवादी (अनाकिस्ट) कहते हैं, और मैलटेस्टा, नोपाटबिन, वाकुनिन, लाम्की, मक्तेवर और मैरितन जैसे कई विचारस और राजनीतिन ऐमा मोचते हैं। एक दिन ऐसा पायेगा कि अलग अलग छोटे-छोटे राष्ट्रो मे दुनिया बँटकर नहीं रह सकेगी। ल्या व्यापार और क्या विज्ञान, सब तेजी से दुनिया को एक बनाने थी ओर बढ़ रहे हैं । अन्तर कम हो रहे हैं, और किसी भी राष्ट्र की ऐसी कोई बात नहीं है जो दूसरे से पूरी तरह छिपी हुई हो। और इसीवे साथ-साथ यह दृश्य भी देखने को मिल रहा है, विशेषत १८वी सदी से यूरोप मे छोट-छोटे राष्ट्र-राज्यो के विकास के वाद, कि एक राष्ट्र पई छोटे राष्ट्रो मे बंटता जाता है । और छोट राष्ट्र भी प्रापरा मै चैन से बैठ नहीं सक्तै । एक ही देश के हिम्सो मे तनाव वढता जाता है। यही सीमा विवाद हैं, यही अपने राष्ट्र के विस्तार की हविस भोर महत्त्वाकाक्षा है, वही सपना ही मतवाद या जीवन-पति दूसरे राष्ट्रो पर थोपने की बात है, कही धार्मिक मात्मा एक, मखण्ड और पुरातन होते हुए भी नित्य नूतन होत जान उठाया जाता है कि भारत मे जब इतने घम, इतनी भाषाएं, डानी नस्लें और इतनी जीवन-पद्धतियां एक साथ मौजूद हैं तो यह कहा जाता रहा है कि भारत में ये सब भेद बाल है, भारत की महात्मा गांधी जिस कालखण्ड मे जीवित रहे, यानी १९६६ १६४८ तक, उसमें विश्व में कई घटनाएं घटित हुइ, मनीका म, यूरोप में और एशिया में। और गाधी जी ने अपनी प्रतिक्रियाए उनके बारे म व्यक्त की। उनका सावजनिक जीवन दक्षिण अफ्रीका से शुरू हमा। और भारत मे तो वे १६१५ के बाद माये। पर तीस वप के छोट-से कालखण्ड मे गांधी जी ने सन '२०, सन् '३० मोर सन् मसहिष्णुता है। और गई दो मदियो का इतिहाम ऐसे ही महायु से भरा है। जिनमे हासिल कुछ नहीं हुआ। अघ राष्ट्रवाद बढ़ता जाता है नाजीवाद, फासिस्तवाद, चीन जसे साम्यवाद आदि अनेक उदाहरण हैं। ग्राज इसराएल मोर जाहन के बीच कुछ तना तनी मुनते हैं। तो कल वियतनाम में नर-राहार चलता है, मौर कमो जल्दी से समस्या से छुट्टी पाने के लिए अणु वम जैसे शस्यो के प्रयोग की धमकी दी जाती है। अपने ही देश में, जहां एक घोर अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रेम गई एक हेढ सदी में पश्चिम के साथ विशेष बाद बढता गया, दूसरी भोर, एक ही देश में से दो राष्ट्र और फिर कई प्रदेश मौर सूबे मौर छोटी-छोटी इकाइयो पर आग्रह किया जाता रहा है। कभी प्रश्न एक राष्ट्र कसे माना जाम ? दूसरी मोर वार मार मह वाती है।

- । ? राष्ट्रवाद '४० के तीन बडे असहयोग, सत्याग्रह और स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए प्रादोलन चलाए। लाखो-करोडो लोगो को उन्होने प्रभावित किया। उनकी राष्ट्रीयता की क्या कल्पना थी? और वह कैसे विकसित हुई ? क्या इसमे ससार कोई सीख नही ते सकेगा? गाधो जो ने कहा था--"मानव-जाति एर है क्योकि हम सब एक ही नैतिक नियम से बंधे है। परमात्मा की दृष्टि से सन मानव समान हैं। वर्ण और सामाजिक स्थान आदि के फा अवश्य हैं, पर जितना ही ऊँचा किसी आदमी का स्थान हो, उतनी ही उसकी जिम्मेदारी भी बढती जाती है। विना सच्चे अय मे राष्ट्रीय बने कोई अतर्राष्ट्रीय नही हो सकता। जब राष्ट्रीयता एक सत्य बन जाती है, तभी अन्तर्राष्ट्रीयता सम्भव है । यानी जब अलग-अलग देशा के लोग सगठित हो जाते हैं और एक व्यक्ति की तरह काम करते हैं तभी वह सम्भव है । राष्ट्रीयता पाप नही है। उसकी सकीणता और स्वाथ-भावना बुरी है । अाज के राष्ट्रो में आपस मे जो परस्पर घृणा है, वह पाप है। प्रत्येक राष्ट्र मानो दूसरे को शोषित परके, दूसरे के ध्वस पर अपना निर्माण करना चाहता ह ।" और गांधी जी ने यह भी कहा था--"मैं भारत का विनम्र सेवक हूँ पार भारत की मेवा करने मे मैं सारी मानवता की सेवा करता है। पचास वर्षों के सावजनिक जीवन के बाद मैं आज यह कह सकता हूँ कि मेरी श्रद्धा इस बात मे बढती गई है कि एक देश की गवा सार विश्व को सेवा से विसगत नहीं है। यह सिद्धात अच्छा है। उसे मानवर ही सारी दुनिया मे स्थिति सुधरेगी और इम दुनिया के गोले पर राष्ट्रा ये वीच मे मापसी ईर्या द्वेप मिटेगा।" 4 राष्ट्रवाद दिया जाय, उसे किसी छूत की बीमारी के आदमी की तरह अपने से अलग और दूर रखा जाय । यहा तक कि वे कुष्ठ रोगो की स्वय सेवा करते थे। और इसी कारण से इन पक्तियो २ लेखक को स्मरण है कि गत महायुद्ध के प्रारम्भ मे, सन '४० मे, जब सेवाग्राम में बापू के चरणा मे बठने का उसे सौभाग्य मिला, तब वे यूरोप की इतनी दूर की घटनाओ मे किस तरह से उद्वेलित ये । एक दिन सेवा- ग्राम आश्रम से शाम को अपो एक मील ये घूमने पर वापू जा रहे थे। और साथ में ये राजा जी । 'ग्राफ स्पी नामक जहाज के प्रात्म- रामपण के बजाय जहाज के प्रमुख द्वारा अपने-आपयो डुबा लेने की सुनकर बापू टहलते हुए एक्दम रख गए। 'च, त्च' कहकर बटी देर तप सूने में देखते रहे । पई मिनिटा का मौन रहा । दूर देशो म घटित होने वाले राष्ट्रीयता के नाम पर किये जाने वाले नर सहार' से उनका मन दुखी होता था। आश्रम में तभी जापानी भिक्षु न साय प्राथना में एक-दो मिनट का प्रारम्भिक मौन शुरू चा वराया। गांधी जी ने राष्ट्रीयता का एक सूत्र-निभयता-~अपने पिता से सीखा, दसरा सूत्र-दढ निश्चय-माता से । राष्ट्र की सेवा के लिए त्याग और सहिष्णुता आवश्यक है यह भी उ हाो माता से सीखा। पर प्रारम्भिक शिक्षा म उह ऐसी कोई चीज नहीं मिली जो राष्ट्रीयता का अपनी संस्कृति, स्वधम और परम्परा के प्रेम से प्राग परिभापित करती। रामचन्द्र भाई + सम्पक से उह अवश्य क्रान्ति- कारिया का कुछ पता चला पर गांधी जी को किसी भी प्रकार की 11 सप्रेम नही था।

राष्ट्रवाद उनका राष्ट्रीयता सम्म घी पहला साक्षात्कार विदेश-यात्रा म उन्हें मिलना प्रारम्भ हुमा । पहले उहोने अगरेज साहव बनने की कोशिश की। माही पपडे पहने, फ्रेंच और नाच और वायलिन मीराने का यन रिया। पर बहुत जल्दी वे समझ गये वि 'मन ना रंगाये, रंगाये जोगी पडा' वाला हाल है । बाह्य रूप बदल लेने मे मतरण ही यदला करता । उहोने जदी मे ममम लिया कि वह राह अपनी राह नहीं है। पश्चिम की उन्दर जमी पल हमे कहीं नही ले जायेगी। नो 'स्वधर्म निधनश्रेय , परधर्मोभयावह' वाली गीता को उक्ति उनके जीवन मे ऐसे परित हुई। इग्लैण्ड मे भी गाधी शाकाहारी रहना चाहते थे~मा का उहोंने वैसा वचन दिया था~ ~और इसमे वे सदन की शाकाहारी समिति के गदस्य बने । 'डेली टलीग्राफ' के सम्पादक और भारत के 'बुद्ध- चरित' और 'गीता' जैसे ग्रयो के पद्यानुवादक सर एडविन पानील्ड गे उनकी भेंट इमो शाराहारी सभा कारण हुई । यही उह पहली गर पता चला कि पूर्व और पश्चिम वे मानव मात्र एव में हैं यह पर्ने से काम नहीं चलता। दोनो के माहार विहार के तरीके अला- प्रला है। और राष्ट्रो-राष्ट्री के बीच रहन महह्न, कपडा लत्ता, रोति रिवाज, बोलचाल और प्राचार-व्यवहार के अन्तर भी ऐसे हैं जो पूरी तरह पाट नही जा सफ्ते । राष्ट्र और राष्ट्र को ग्रह उम्मीद नहीं करनी नाहिए कि सब मास्कृतिक दृष्टि मे एकाकार हो जायेंगे। बलि कुछ मतर नो बगर बने रहगे । मस्कृति का मूल साना पौर गाना है। मो. इसा सवा एर जमा होना, या यह वाहना विमा हो गरे हो जायें, प्रसाव है। यहां मच्ची राष्ट्रीयता । - राष्ट्रवार कामथ हागा, इन भेदभावो ये वावजद इनसे ऊपर उठकर सबमे समानता खोजना और मानना। यही गाधी जी ने वाइबिल, ईसाइयो का धमग्रथ, पहली बार पहा । "यू टेस्टामेण्ट' म 'गिरि प्रवचन' (समन पान दि माउण्ट) से वे बहुत प्रभावित हुए । शायद उसमे को दस नाजाया मे उन्हे सत्य बद, चमचर' जैसे शास्त्र वचनो की प्रतिध्वनि सुनाई दी हो। बौद्ध और जैन पुराण कथामा मे पमाद न २ रने, गात्म-सयम पर और अहिंसा पर बल देने की बात की पतिगण गांधी जी को उस ग्रथ में मिली। इसीसे उन्होने व्यापक शातिवार, राष्ट्रो बीच की समस्याग्रोमा समाधान गयो से अधिक शब्दा मे तोजने वो प्रेरित लिया। यही एक मनोरजन घटना घटित हुई। एक मेडिरट पादरी जिहोने गधी जी को वाइबिल पढन को दी थी एव दिन उनसे पूछा, 'आप बाइबिल को इतना मानते हैं, तो शाप ईसाई क्यो नहीं हो जाते?" गांधी जी ने मुम्बराबर पादरी जो से पहा, माप अपनी बाइविल फिर में ध्यानपूर पढिये ।" यानी धर्मातर मे गाधी जी का विश्वास नहीं था। राष्ट्र-राष्ट्र के बीच मे भगडे और विग्रह बढ़ने का एक कारण है एक राष्ट्र द्वारा दूसर पर अपना धम लादना~यही तो इतिहास का सबक है । यदि राष्ट्रवाद मध्ययुगीन धर्माचता कास्प लेता है, तो वह उतना ही सतरनाक साबित होगा। गांधी जी ने लादन जाने से पहले भी अपवार नहीं पता था । वहा जाकर वे 'डेली टेलीग्राफ , 'डेली न्यूज,' 'पाल मात गजट' आदि पटोलगे। दश विदेश की खबरें पढ़न में उन्हे बडा मजा आता।

राष्ट्रवाद उन दिनो जे० आर० सीली की विचारधारा यह थी कि त्रिटिश साम्राज्यवाद दुनिया को सभ्य और सुमस्कृत बना रहा है। इसी विचारधारा से प्रभावित एडवड टी० बुक कई लेग लियते थे। वे जान रस्किन के भक्त थे । और रस्सिन को पुस्तक 'अण्ट दि लास्ट' वहीं उनके पढने मे आई, जिसका गुजराती अनुवाद उहोने मागे पलयर 'सर्वोदय'नामकाशित दिया। उ7 दिनो लदन मे दादा भाई नौरोजी पाये हुए थे, और वे प्रिटिश साम्राज्यवाद के पटे पालोचकाये। पौरोजी वे भापणो चलाया गाधी जी चाल्संस ग्रेडला से भी राय पभावित हुए । अंडा भारत में राजातिय गुधारो पक्षपाती थे। पर इग्लैण्ड में जो बीज स्वतत्र चिता ये तरुण गांधी के मन में पडे, उापा पल्लवन और विकास असल मे हुमा दक्षिण अफ्रीका में। दक्षिण अफ्रीया में गांधी जी को सामाज्यवाद के उस रूप के दशा हुए, जहाँ एर नस्ल दूसरी नस्ल या पोपण करती थी, जहाँ काली जातियों पर गोरो जातियो पा अत्याचार पलता था । सामाजिक याय और समता से जहाँ सेतिहर मजदूर वचित रपे जाते थे। गांधी लन्दन मे थियौसॉफी की प्रतिमा हेलेना ब्लवेट्स्पो से मिले थे, और मानव मात्र की समानता, धर्मो रे प्रति समदर्शिता के विचार गांधी जी मै तभी मे शुरु हो गये थे, यद्यपि उन्होने उस मियोसॉपिपल मासाइटी की सदस्यता छोटदी थी। पिन कारणो में छोटी यह पता नहीं चलता। पर राष्ट्रवाद बनाम मानवतावाद की समस्या धी के लिए प्रफीवा गे मोर तीन रप से सामने माई। प यहाँ १८९३ नं १८१४ तक बीस पप रहे। यानी जीवन के एक ।

मिल जाये, राष्ट्रवाद चतुर्थाश की प्रारम्भिर तयारी वप छोडकर अगला चतुर्थाश उनका अफीका म बीता। ट्रान्सपाल और नाताल मे उनले राजनैतिक दान की नीव पडी। राष्ट्रवाद मे यदि वण श्रेष्ठता का प्रकार तो फिर क्या परिणाम होता है यह गाँधी जी ने वहुत करीब से देखा। वस्तुत 'मेरी जमीन', 'मेरी भूमि , मेरा वतन' ये सब नारे मनुष्य के स्वत्वाधिकार के प्रादिम सस्वार से बंधे हुए है। यदि 'दो बीघा जमीन', 'माटीर डार जैसी रवीन्द्रनाथ की कविताए या वारन्त के कन्नड उप यास 'मरकि मणिगे' (गाँवो को ओर) या शररुच द्र के बैंगला 'पाली समाज' या मालि दीचरण पाणिग्राही के उडिया उप यास 'माटीर माणिष' का मूल प्रेरणा-वि दु यही है यदि 'नीलदपण' जैसे मिट्टी या ग्राम से सबद्ध कई नाटक लिखे गये तो उन सबका मूल उसी भूमि-प्रेम मे है । पर तु भूमि प्रेम क्या वेथल वित्तपणा जैसा है। भूमि केवल 7 उपजाती है, आश्रय दती है, मकान बनाने के लिए स्थान देती है और राजाओ सामता को अपना अधिपति बनने देती है, इतना ही उसका महत्व है ? गांधी ने देखा कि भमि केवल भौतिक 'वमु' ही नही है । वे भारत मे लौटे १६१५ मे तो गोखले ने उ ह चम्पारण भेजा। वहाँ उहे राजे द्र बाबू मिते । निलहे मजदूरो की व्यथा का उहोने लेखा जोखा लिया । वे जान गये कि प्रकृति के प्रति मनुष्य का प्रेम केवल स्वाथ से जुडा हुआ नही है। भारतीय संस्कृति मे वनस्पति, प्रोपधि समे , देवी प्राण हैं, हिमालय भी देवतात्मा है नदियां लोक-माताएँ हैं, वन की भी अपनी वाणी है जो कालिदास और रवीन्द्रनाथ ने सुनी राष्ट्रवाद थी-भूमि के कण कण मे केवल 'शम्य श्यामला, मुजला, सुफ्ला' की सुपमा नहीं विमरी है, पर मनुष्य का यह उसी तरह का ठोस प्राधार है, जैसे धर्म। वह धुरा है। वह गोल-गोल चक्कर काटती है सूय वे अासपास, और अपने आसपास भी। वह एक साथ स्थिर है, अचला है, और गतिमान है, परिवतनशीला है। इसी भूमि के प्रति प्रासक्ति या उत्कट प्रेम की भावना से राष्ट्र- वाद का उदय हुअा। पर प्रेम केवल जमीन-मिट्टी, पत्थर-यनिज, पवत नदियो जैसी भौगोलिक इकाई से ही नहीं होता, उसपर रहें वाले, वही उपजने और मिटने वाले जन साधारण मे भी होता है। पोर वही राष्ट्रवाद की बुनियाद बनता है। गाधी का अपने देश के प्रति प्रेम, यहाँ से दूर अफ्रीरा मे अधिक ममय तक रहर और भी बढा। वह 'गुलामी' शब्द के हिज्जे बखूबी जान गये । सौराष्ट्र के एक ग्रामाचल मे उठकर गाधी पोनिक्स आश्रम के सत्याग्रही वन गये। उनये मन और चितन मे भी अतर्राष्ट्रीयता की लहरो ने उद्वेलन पदा कर दिया। गांधी पर जिन विचारको का असर पडा उनमे टालम्टाय और थोरो प्रघाा है। दक्षिण अफ्रीका मे उन्होने टालस्टाय की पुस्तक 'दि किंगडम माफ हवन इज विदिन यू' (म्वर का राज्य तुम्हारे भीतर है) पढी। और उमी रूम के महर्षि टाल स्टाय ने उनके पास अमेरिका के विचार शातिवादी हेनरी डेविर यौरो को सिविल नाफरमानी' पर पुस्तक भेजी। जिसमे मे रहे सविनय प्रवना और बाद म असह्योग की वही कल्पनाएं और परियोजनाएं सूझी। यस्तुत थोरो भारतीय दान से प्रभावित २० राष्ट्रवाद पौर महायुद्ध और बाद मे अधिकाधिर नरसहार~-हिंसा मे हिंसा वो सरणी- और अन्त में दोनो पक्षा का और भी निवल बनना' उत्पन्न होना था । राष्ट्रीयता की भावना देश मे जगाने या गांधी, सबसे बडे अतर्राष्ट्रीय शातिवादी बन गए। यह वात देखने में परस्पर-विरोधी, पर वस्तुत बहुत अथपूण थी। यदि में अपने राष्ट पर रिसीका प्रारमण नहीं चाहता तो मुझे भी विमी राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करना चाहिए'- '~~यह नतिक सूर इस भावना के पोछे राष्ट्रीयता के लिए युद्ध और उमवे सायनो के प्रति गांधी का स्म इस तरह बदलते रहे । १८०६ म जुल विद्रोह के समय वे 'स्ट्रेचर साजण्ट थे। पर जोहानसबग मे शातिपूण जन मा दोलन छेडने पर उनका रुस बदलता गया। पहले वे रजिस्ट्रेशन कानून का विरोध करने इग्लैण्ड गये। बाद में भी वे भारत के कई प्रश्न पर गउण्ड टेबल का फ्रेस या गोलमेज परिपद और तत्कालीन वाइसराय से सीधी बातचीत में विश्वास करते थे। पर तु वे धीरे धीरे इस नतीजे पर पहुचे कि लिवरलो की तरह सिफ प्रावेदन पत्र भेजने स. या प्राथनापत्रो पर हस्ताक्षर कराने से एक विदेशी हुकूमत स 'स्वराज्य पाना अमभव है । पर राष्ट्रीयता का यह माग~शन से बातचीत का माग-उ हाने भी बद नहीं रखा। दूसरी मोर, गाधी जी के हो जीवन-मान में, पुराने कात्ति कारिया, म बनाने वाला और मात्र विद्रोह मे हुकूमत का तन्ता उलट देने म विश्वास करो पालोका वडा दल था जो बातावादी कहलाते थे। बगाल, महाराष्ट पार घोर उत्तर प्रदेश से कई बडे । राष्ट्रवाद राष्ट्रभक्त खुदीराम बोस, वारीन दे, रासबिहारी घोप, चाफेकर सावरकर, भगतसिंह, च द्रशेखर आजाद आदि इस प्रकार की विचार- धारा में विश्वास करते थे। उन्ह शक्ति-पूजा के दशन से अनुप्राणित करने वाले अरविंद और तिलव जैसे दारानिक भी थे। गीता का अब उनके लिए क्मयोग था। गाधी उस प्रकार की 'शठ प्रति शाठ्यम्' नीति मे विश्वास नहीं करते थे। वरिक कहते थे कि 'शठ प्रति अपि सत्यम्' । वे वुरे माधनो से अच्छे माध्य की पूर्ति अमभव मानते थे । कुछ समय के लिए तो लगा कि गाधी भारत मे पुरान नरम दल और नये गरम दल दोनो का विश्वास खो चुके है। और उ है अपना रास्ता खुद बनाना है । राष्ट्रीयता के सम्बध मे विदेशा मे जो प्रयोग हुए थे-फास की राज्य नाति से उस की राज्य क्राति तक-वे सब उनके सामने थे। वया रक्तपात मे राष्ट्र सचमुच अधिक ऊर्जस्वल और तेजस्वी बनता है? क्या मार्क्स और लेनिन कहते थे उस प्रकार से किया की प्रतिनिया ही इतिहास का अपरिहाय और अकाट्य तक है ? क्या लुई चौदहवें या जार के समय यूरोप के राजाओ-सामन्तो के अत्याचारो मे वटकर भारत मे निटिश राज्य के मीठे जहर की तरह छिपे हुए शापण के और भारतीया वे धीमे परतु निश्चित चरित्र वध के प्रयत्न नहीं थे? फिर भी गांधी ने राष्ट्रीयता के आन्दोलन को केवल वहस-मुनाहमे या वकीलाना, ठडा, मसद-सदनवाला प्रादोलन नहीं माना। वे लोपतष और ग्राम चुनार और दरिद्रनारायण और जन- साधारण तब उस आदोलन को ले गए। मार दूसरी पार वे राष्ट्रीय मादोलन को एक रामाण्टिर प्राति का, गुप्त और अधेरा, तमवार २२ पदनाद और बम से बना विस्मय रोमाचकारी विप्लव माग भो कभी नहीं मानते थे। उनका विश्वास था कि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का, जसे एक समूह दूसरे समूह को, त्याग मोर वहिप्कार में भुका सकता है, उसका हृदय परिवतन परा सकता है । यहाँ गाँधी जी के राजनतिक दशन ये बुध सिद्धान्तो को जानना जरूरी है। पॉल पावर ने गांधी की राष्ट्र सम्बधी विचारधारा का विश्लेपण इन शब्दो मे किया है "पम या श्रम, पृथ्वी और जीवन पानारी-पक्ष गांधी जी के समाल-दशन के तीन प्रधान प्रतीक है, (एस० स० नेहरू के जमन लेप डाई सोजियालिडी इन स्टाटे गांधीज) यहाँ जारी तत्व में तात्पय है करुणा या समन्वय से। कभी- कभी गांधी राष्ट्र शर का प्रयोग समाज-व्यस्था के अथ म करते थे। वे कभी कभी एक समाा इतिहास गौर नियति वाली जनता की इकाई को राष्ट्र रहते । विन्स्टा चचिल जसे प्रिटिश भारत में अनेर भापानी, धर्मों, पन्यो के कारण कई राष्ट्र देवते थे, पर गांची सब भारतीयो वा एही गष्ट्र का प्रग मानते थे। उनमे निपट राष्ट्रीयता केवल राजनैतिर विचारधारा नहीं, बल्कि भौगोलिक मास्कृतिक अभिध्यजना थी।" एक मोर उदारमतवादी यूरोपीय राजनीतिज्ञ है जो फ्रेंच राज्य- मान्ति के बाद जन-जन : 'स्वतत्रता, समता, बधुना' को नारे का प्रधान माने थे, दूसरी ओर इटली के ज्युसेप मजिनी का मान- राष्ट्रीयता पर माधारित उत्तरदायित्व का सिद्धात या पायरलैण्ड के डी वैलेरा के या जापानी राज मक्तिपूण राष्ट्रप्रेम से गाँधी का सिद्धान्त भिन्न था। एक ही देश में अनेक सास्कृतिर इसाइयो हाने राष्ट्रवाद पर भी उसका एक राष्ट्र बन सकता है, यह वीसवी सदी को राष्ट्री- यता की क्ल्पना गाधीजी को पसद थी । 'माडन रिव्यू' के अक्टूबर १९५३ के अक मे एण्टनी एलेनजिट्टम ने 'ग्युमेपे मैजिनी और महात्मा गाधी' के बीच मे तुलना और समानता की चर्चा की है। गांवी ने 'इण्डियन ओपीनियन' के जून २७, १६०८ के अक मे अमेरिका का उदाहरण देकर लिसा था कि वहा भी तो कई तरह के लोग, कई धम, वण, भाषाएँ बोलने वाले हैं, जो सयुक्त राष्ट्र बन गये हैं। भारत के लिए वह क्यो सम्भव नही ? जव लाड वकनहेड ने कहा कि भारत राष्ट्र नहीं है, तव 'यग इण्डिया' मे जुलाई २३, १९२५ वे अक में गांधी जी ने साग्रह लिसा-"हमारी दृढ धारणा है कि सारे व्यावहारिक मामलो मे भारत एक राष्ट्र है।" सच्ची बात यह थी यि गांधी जो कभी भी केवल भौतिक जगत् गौर उसवे से य, शस्त्र, सत्ता पर माधारित शक्तिशाली राष्ट्र-तत्र मे विश्वास नहीं करते थे। उनके विचार से ऐसे राष्ट्र का कोई प्रय रही था, जिसका प्राधार आध्यात्मिक न हो, जिसके पीछे परमात्मा का अधिष्ठान न हो। प्रत उपके विचार से पादरा राज्य राम-राज्य ही हो सकता था। वे विभेद्रीकरण वाले ग्राम-राज्य में विश्वास करते थे। वे पूणत गराजक्वाद मे विश्वास नही करते थे। टाल- स्टाय की तरह वे राष्ट्र-हीन अवस्था दुनिया में हो जायगी, ऐसा नहीं मानते थे। कम्युनिस्टो की तरह वे जन जातिया पर प्राधारित छोट. छोटे राष्ट्रो की आत्म स्दत प्रता वाली बात भी सही नहीं मानते थे। पी० सी० जोशी से उनका इम सम्बध में विचार विनिमय प्यारे लाल की 'महात्मा गांधी पूर्णाहुति' अथ मे विस्तार से दिया राष्ट्रवाद है । वे प्राचीन धमराज्य के बदले प्रजाराज्य चाहते थे। वे राजा जैसे किसी एक व्यक्ति सस्था में विश्वास नहीं करते थे। बनारस हिद् विश्वविद्यालय में १९१६ मे उनके राजापो की वेशभूषा पर कडा भाषण इसका प्रमाण है कि वे उन तरह के ऐश्वय प्रदशन और सामती वैभव विलास को गलत मानते थे। गाधी धम सस्था और राष्ट्र मन्था के एकीकरण के विरोधी थे। पोप हो या दलाई लामा, गाधी यह मानने से इनकार परत ये कि राष्ट्र का सूप क्सिी धम प्रचारक के हाथो मे है । या गांधी महा- भारत के इस वचा मे विश्वास करते थे--' असाधुश्वव पुरुपो लभते शीलम एक्दा।" (१२ २५६ ११) हर पापी का भविष्य मे सत बनने की प्राशा है। इस कारण से वे ईसाइया के इस मत के बहुत निकट थे कि "पाप से घृणा करो, न कि पापी से।' उनके लेसे राष्ट्र जैसी सस्था मे अपने-आप कोई सदगुण या दुगुण नही छिपे है। पर तु उसके उपयोग पर यह निभर करता है कि क्या परिणाम निरलता है। या राष्ट्र भी एक उपकरण मात्र है। मैक्स वेबर के क्थन के बहुत करीब गाधी जी का यह मत-विश्वास था कि "राष्ट्र एक ताविक साधन मात्र है वह अपने आप मे कोई मूल्य या साध्य नहीं।" टी० एच० ग्रीन प्रादि पाश्चात्य नीतिशास्त्रज्ञ राष्ट्र की नतिर जिम्मेदारी की बात करत है। पर गांधी जी राष्ट सस्था को ऐसी कोई इयत्ता या महत्ता नही देते । गांधी जी जन-साधारण में विश्वास करते हैं जनतत्र में विश्वास करते हैं। और इस कारण से प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे होने पर जोर देते है। वे नहीं मानते कि राष्ट्र जैसी कोई सत्ता दण्ड के सहारे मनुष्य मात्र को सुधार सकती राष्ट्रवाद है। वे इसी कारण से ग्राम पंचायत में शुरू करना चाहते हैं। छोटी- छोटी इकाइयो से वे अपना आदर्श राज्य बनाते हैं। उनके लेने मत्य पोर अहिमा व्यक्तिमात्र का कतव्य और धर्म है। इसीमे मे पागे चलवर राष्ट्र बनते हैं, जो अन्छे और बुरे भागों का और नीतियो का अनुसरण करते हैं। इसलिए राष्ट्र सुधर सकते हैं, अच्छे या बुरे हो सकते हैं । और यह सब व्यक्ति के मुघार पर निभर करता है। इसी कारण से गाधी जी पश्चिम के पार्टी-सिस्टम पर आधारित सवैधानिक प्रजातन्त्रवाद में बहुत अधिक विश्वास नही करते थे। इग्लैण्ड में रहने के लिए सविधान था, वोट थे, पार्टिया यो पर फिर भी भारत के प्रति प्रयाय वरार चल रहा था भाषण के नय नये तरीको को नये-नये मधुर नाम दिये जाते थे। गयी जी प्रारम्भ में मिटिश कानून और न्यायप्रियता पर बहुत विश्वास करते थे। पर धीरे-धीरे उनका यह विश्वास कम होता गया। उनका मन-मग गुरू हुआ जलियावाला बा काण्ड से । सर स्टेफोर्ड विप्स के मिशन तक वह प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। उन्होंने ब्रिटिश पालियामेट को हिंद स्वराज्य' में एक वेश्या कहा है और मसत्सदस्या को ढागी और यार्थी । इसीलिए स्वराज्य प्राप्ति के बाद काग्रेस पक्ष के विलयन की सलाह उन्होंने दी भी। गांधी जी मनुष्य के अन्दर सत्ता के केद्रित होते ही शुरू होने बाली बुराई मे बहुत अच्छी तरह परिचित थे। मनुष्य या धन के लिए गव, पद के लिए अहकार, गस्य शक्ति के कारण मिथ्या अभिमान-धीरे-धीरे अपना प्रभाव फैलाने, जमाने और दूसरी पर रौब गालिब करने को मनुष्य को महज प्रवृत्ति प्रादि ने उ अच्छो 7 राष्ट्रवाद तरह वाकिफ थे। इसलिए जब एच० जी० वेल्स ने उन्हें मानवा- धिकारो की सहिता के बारे में पूछा तो गांधी जी का उत्तर बहुत भिन था-"भाई, अधिकारो की बात मैं क्या जानू , मैंने अपने कतव्य पूरे किये हैं ? क्या अपनी पत्नी के प्रति मैंने अपने कतव्य पूरे किए है भारम्भ मे मैं उसपर अपना स्वामित्व जमाना चाहता था। धीरे-धीरे मेरी समझ मे मा गया कि मैं गलती कर रहा था । स्वामिनी तो वह थी।" स्वामित्व, गार, दूसरो पर अपने विचार लादना प्रादि बातें वही लोग करते है, जिनमे कुछ कमी होती है। या वह जो हीन- ग्रथि से पीडित हाते है। गाँधी जी के हिसार से ऐसे लोग दयनीय हैं। हिटलर और मुसोलिनी जैसे विकृत सत्ता-लोभी, साम्राज्य तृष्णा पीडितो के प्रति गाधीजो का भाव ठीक वैसा ही था, जैसा किसी मनो- वज्ञानिक चिकित्सक का अपराधी के प्रति होता है। जो सत्ता के लिए उन्मत्त हैं उन पागला से लडने या उनपर गुस्सा करने से क्या फायदा । उनका उपचार यदि कर म तो करना चाहिए। यदि वह नहीं कर सके तो उनपर सिर खपाने भौर शक्ति नष्ट करने से क्या लाभ । गाँधी जी के निकट हिंसा का प्रदशन करने वाले ऐसे ही रुग्ण मन वाले तानाशाह या एकछत्र सत्तावाद के पोषक व्यक्ति थे। उनके प्रादश राज्य और उसके नागरिका की अहिंसावृत्ति का ऐसी 'राष्ट्रीयता' से कोई मेल नहीं हो सकता था। राष्ट्र सस्था का अधिक से भधिक उपयोग जनकल्याण विभाग की तरह हो, यही गांधी जी को मा यता थी। इसलिए वे जब कभी मन्तर्राष्ट्रीय मामलो मे मालोचना भी करते तो उमके पीछे यही राष्ट्रवाद नैतिक आग्रह होता कि क्तिने अशो मे कोई राष्ट्र अपनी जनता प्रति क्तव्यो मे चूक गया है, या क्तिने प्रशो मे वह कतव्य-तत्पर और सेवा-परायण है। गाधी को यदि इतिहास के क्सिी कालखण्ड को चुनने के लिए कहा जाता तो शायद वे अशोक या अश्वर का ममय चुनते जब सब प्रकार के धमों को पूरी स्वतन्त्रता थी, भोर जब कोई बाधा किसी व्यक्ति के विश्वास और पूजा-म्वात श्य के अधिकार पर नहीं थी। गाधी जी की राष्ट्रीयता व्यक्ति-म्वत प्रता और मानवता के विकास के विरुद्ध नहीं थी। बल्कि दोतो परस्पर- पोपक और परस्पर-गहायक थे। गांधी जी राष्ट्रीयता को अपनी शिया-पद्धति का मूलाधार नहीं बनाना चाहते थे । उनये चौदह-स्त्रा रचनात्मक कायक्रम में, या प्रार्थना सभा मे नित्यपाठ पिए जाने वाले ग्यारह सत्रो मे 'स्वदेशी' को भी स्थान था, 'स्वभाषा' को भी स्थान था, 'स्वावलवन' पर जोर पा-पर उन्होने यह कभी नहीं कहा कि मेरा ही राप्ट सबसे श्रेष्ठतर है, मौर बाकी सब राष्ट्र पिछडे हुए या बुरे हैं । 'हिंद म्व- राज्य' में उनकी पश्चिम की मालोचना तीव्र है, यहा पे इतिहास- पारो को दोग पी पोल उहोने सोती है। भारत की प्राचीन महा- नता का भी वखान किया है। पर १९०४ वी उस रचना के बाद उनके पतिम दिनो के लेखो से तुलना करने पर पता चलता है कि राष्ट्रीयता के विषय म उनको धारणा बगवर बदलती और मुधरती गई। वे अनुभव से प्रौर सयाने होते गए। इसी कारण से प्रिटिश साम्राज्यवाद से इतनी वही लहाई लडने पर भी प्रिटिका जनसाधा- रण के प्रति उनके मन में कोई कटुता रही थी।

राष्ट्रवाद १६४८ मे ग्रिटिशो के भारत छोडने के कई वर्षों बाद जब रानी एलिज़ाबेथ भारत मे माई, तो गाधी के एक प्रधान शिप्य प्रथम राष्ट्राध्यक्ष राजे द्रप्रसाद ने कहा, "विटिशो ने हम जा ती चीजें दी उनके लिए हम उनके पामारी हैं उहोने हमे अग्रेजी भाषा दी, जिसके कारण हमारा विश्व के ज्ञान-विज्ञान से सम्पक बढा। वह भाषा हमारी अन्तर्राष्ट्रीय खिडकी बनी। उन्होंने हमे एक-सा कानून दिया, न्याय पर आधारिन राज्य-शासन दिया। भोर होने सबसे बडी चीज़ ससद-प्रणाली का प्रजातन्त्र दिया।" गांधी ने एक दूसरे पट्ट शिष्य प्राचाय विनोबा भावे ने अपनी एक प्राथना-सभा मे चार वय पूर्व वहा, विटिशो से तीन चीज़ सोखने लायक थी एक तो समयसारिता। जब उ होने निश्चय कर लिया कि १५ अगस्त १६४७ को भारत छोडना है। तो फिर वह तारीख उन्होने नहीं बदली। दूसरी चीज़, गत महायुद्ध मे यूरोप के और सब देशो में भाव बढ गए पर इग्लैण्ड मे भाव जरा भी नहीं बढे । बराबर बने रह- बहुत थोडी मूल्य वृद्धि कुछ ही चीज़ो मे हुई। तीसरी चीज़, वे व्यावहारिक लोग हैं, व्यथ की व्यक्तिपूजा मे नही पडते । महापुरुषो के पुतले बनाकर वे खडे कर देते हैं। और छुट्टी हुई। जैसे चचिल की युद्धमत्री के नाते उ ह जब तक जरूरत थी उन्हाने उसे रखा। बाद में छुट्टी कर दी। और फिर उसका दुख नही मनाते रहे ।" यह गाधी जी का ही प्रताप था कि इतने जद्दो जहद और सघप के बाद प्रिटन के बारे मेदा महान गाधीवादी इतनी मधुर बातें, इतने वर्षों बाद कह सके। मकीण राष्ट्रवाद प्रादमी मो अधा बना डालता है। इसके कई राष्ट्रवाद २१ उदाहरण वीमवी मदी के विश्वइतिहास मे हैं। गाधी जी के राष्ट्र-प्रेम मे मव राष्ट्रो का प्रेम निहित या। उनके 'जय हिन्द' में 'जय जगत्' छिपा था। वे एरिक फ्राम के इस मत मे मानो सहमत ये, "राष्ट्रवाद एक तरह की बुतपरस्ती है, पागलपन है। उसका पप है देशभक्ति । अपने ही देश को सारी मानवता से वटा-चढाकर बताना, सत्य और न्याय मे भी बढा-चढाकर बताना वहां की देश- भक्ति है ? जैसे एक व्यक्ति के प्रति ऐसा प्रेम जो और व्यक्तियो के प्रति अप्रेम पदावरे मच्चा प्रेम नहीं, उसी प्रकार मे एव राष्ट्र के प्रति ऐसा प्रेम जो सारी मानवजाति के प्रति प्रेम का भाग नहीं हो, राष्ट्र-प्रेम नहीं है, पर केवल अधश्रद्धा है।" इसीलिए गांधी के राष्ट्रवाद को समझने मे पश्चिमी राष्ट्रवाद को परिमापाएँ ना-पाफी और अपर्याप्त हैं। वह उनका अपना नया, उदार और व्यापक मानवतावाद था, जिसने गष्ट्रवाद की पुरानी पल्पना में एक नया आयाम जोड दिया था, उहोने उस पुराने सामू- हिर अभिमान में अनुपम्पा और सहानुभूति का ऐसा जोड लगाया कि उसका मूलस्प ही बदल गया । हमारा राष्ट्रगान येवल एक भापा, एक नेता, एव गुरु का गुणगान नहीं करता, पर वह 'पजाब, मिघु, गुजरात, मराठा, द्राविड, उल्ल, वग प्रादि की स्तुति गाता है । 'एकोहम बहु स्याम्' और भेद में अभेद के प्रचित्य तत्त्व का सामावार यहाँ है । वह राष्ट्रवाद याधिक, जड एकरूपता या हामा नहीं, वह अनेक विचारपारापो, नानामतो और वह भापियो का एक सम वय है। एक सामासिप सस्कृति का, एक विविधता मे मदिति वा, एक 'ऐई भारतेर महामानवैर सागरतीरे तीर्थयात्रा

राष्ट्रवाद
है, जिसमे रयीद्र के शब्दा मे.
"एगो हे प्राय, एशो माय, हिंदू, मुसलमान ।
एशो एशो प्राज तुमि इगराज, एशो एशो खिप्टान ॥"
गाधी का जीवन और उनका काय इस तीययात्रा का उत्तम
उदाहरण था।

अध्याय २ विश्व-शान्ति । दुनिया के प्रागे एक सबसे बडा सवाल है-तीसरे महायुद्ध वा पतरा 5 गांधी युद्ध-माय के विरोधी थे। जो लोग जमन दाशनिक नीट्शे की तरह मानते हैं कि मनुष्य जन्म से ही हिंसक प्राणी है और युद्ध कभी समाप्त नहीं हो सकते, उनकी बात गांधी जी सही नहीं मानते थे। यदि शॉ ने ही पहा था कि यदि दुनिया मे पूरा नि शास्तीकरण भी हो जाय तो भी लोग नग और दातो से एक दूसरे से लड़ेंगे। मारवत्ता का ऐसा निराशावादी भविष्य गांधी जी नहीं मानते थे। परतु इस विषय मे भी गांधी जी पश्चिम के गीति- वादियों से कुछ मात्रा मे मिल थे। गांधी जी पान्ति से भी बढकर सत्य को मानते थे, जबकि पश्चिम शातिवादी किसी भी शर्त पर शान्ति चाहते हैं। बर्टेण्ड रसेल 'मर जाने की अपेक्षा साम्यवादी बनना अच्छा है' (इट इज बटर टु पी रेउ देन टु वो डेड) मानते हैं। गांधी जी ऐमे ममझौतो में भी विश्वास नहीं करते थे। संसार में युद्ध क्यो होते हैं । एक विचारधारा को ऊपर लक्षित की है, मनुष्य को जमना सटा प्राणी मानती है । हिंसा जैसे ३२ विश्व-शाति उसमे कूट कूटकर भरी है, और उसका सुधार आमरण असभव है । ऐमी विचारधारायो से गांधी का मतभेद है । गांधी मनुष्य के हिंसक स्वभाव को एक प्रकार का ऊपर से थोपा गया या बुखार की तरह क्षणिक विकार माग मानते हैं। और उससे मनुष्य की पूण मुक्ति की सम्भावना भी देखते हैं। इसलिए युद्ध एक अनिवाय बुराई है ऐसा गाधी जी नही मानते । युद्ध का दूसरा कारण प्राचीनकाल मे और हिटलर के 'लेवे सराउम' (अधिक भूमि) तक, जमीन को हविस है । साम्राज्य विस्तार या अधिक मडिया और माटो वो प्राप्त करना भी युद्धा पा एर उद्देश्य रहा है। कुछ अथशास्त्रियो का मत रहा है कि मनुष्य की भौतिक तष्णा का अत नही है । और इस लोभी प्राणी का कभी सुधार नहीं हो सकता। गाधी जी मनुष्य को केवल आवश्यकतामो वी गठरी नहीं मानते । भौतिक एपणानो के समान मनुष्य मे एक सत्प्रवृत्ति या श्रेय की ओर बढने की इच्छा भी सदा विद्यमान है, ऐसा ये मानते हैं। प्रत्येक मनुष्य मे परमात्मा का अश होता है, इस श्रद्धा में से ही यह वात उपजती है कि मनुष्य मनुष्यजाति को पूर्णत विनष्ट करना नहीं चाहता। । युद्ध का मूल कारण ही दूर कर देने से विश्व मे शाति हो येिगी ऐसा नहीं माना जा सकता, यह तीसरा तक प्रस्तुत किया जाता है। हम चाहे वहुत शातिवादी और अहिंसक हो, पर हमारे पडोसी न हो तो? पर्ड राष्ट्री सनिक तयारी का असर शातिप्रिय राष्ट्रो पर भी पड सक्ना है। और सुरक्षा के लिए उसे मनिक तैयारी और शस्त्र-मिद्धता अपनानी पड़ सकती है। इस विश्व शाति सम्पध में गाधी जी के नीति शास्त्र में स्वकतन्य पर अधिक जोर है, दूसरो के अच्छे या बुरे होने का या उसकी प्रतिक्रिया से प्रभावित होने का प्रश्न हो नहीं उठता। दाशनिक वाण्ट को 'कैटेगोरिकल इम्परेटिव (निरपेक्ष श्रादेश) की तरह गाधी मनुष्य मात्र मे सद- सद्विवेक का ऐसा एक अकुश अपरिहाय मानते हैं। और उसीपर विश्व शाति की सारी मफलता निभर है, ऐसा मानते हैं। "फिर भी राष्ट्रो मे तनाव वढते हैं। विग्रह और सधप होते हैं, छोटे बडे युद्ध होते ही रहते हैं, इह वसे मिटाया जाय? गांधी का विश्वास था कि हर झगडे का समाधान शस्त्र बल से ही हो, यह जरूरी ही। दो पक्षो के बीच मतभेद एक तीसरे पच को भी सौंपा जा सकता है। बड़े राजनीतियों के बीच म बातचीत हो सकती है। कुछ ऐसी मस्थाएँ और साधन प्रयोग मे लाये जा सकते हैं जिनसे यह मतभेद कम हानि शस्त्रीकरण, अतर्राष्ट्रीय शाति दल, विश्व के लिए एक राज्य प्रादि वातो में गांधी जी विश्वास रखते थे। मनिय कारवाई के बदले वे सत्याग्रह की महत्ता मानते थे । सत्याग्रह को ये सर्वव्यापी सिद्धान्त मानते थे। घर मे लगाकर जीवन में प्रत्यक क्षेत्र तक वे उमकी महत्ता मानते थे।। युद्ध के सम्बन्ध में गांधी जी के विचार तीन स्तरों पर मिलते हैं एक तो सम्पूण नातिवाद (युद्धमान का निपेघ), दूसरे कुछ शतों ये साय यान्तिवाद (यानी पहीमही अपवाद म्प में अनिवाय हिंसा भी समथनीय) पोर तीसरे, राष्ट्रभक्ति के ययाय को देखते हुए जनता मे विक्षोभ या अशान्ति पंदा करने की उपयोगिता कातक । जहाँ सफ सम्पूर्ण और पिताशत्त शानियाद का सम्बध है, गांधी जी विश्य पति १६०६ मे १९१४ तक पश्चिम मे युद्धो माद का घोर विरोध परत रहे । उनका विश्वास था कि युद्ध का मूल भौतिकवादी पश्चिमी राष्ट्रो की साम्राज्य तृष्णा और माथिक हविस मात्र है। यही बात पहले महायुद्ध के बाद पश्चिम ये जनत यात्मक राज्यो की निदा म और दूसरे महायुद्ध ो प्रारम्भ मे गाधी जी के युद्ध-विरोधी लेखो मे दिखाई देती है। अणु युद्ध का विरोध भी गाधी जी इसी हेतु से करते थे। इस प्रकार का उनका परम दातिवाद व्यापक मादशवाद पर आधारित है। । परतु कुछ प्रसगो और घटनामो मे गांधी जी ने हिंसा की माशिव उपयोगिता पो जीवन मे और विचारो में स्वीकाय माना। साबरमती आश्रम मे बीमार बछडे को गोली मारने के प्रसग मे, या अपने पेट की शल्यक्रिया के अवसर पर या १९०४-१९०५ मे रूस के विरुद्ध जापान के समथन मे या फासिस्तवाद के विरोध मे जनता के विद्रोह के पक्ष मे इत्यादि पुछ उदाहरण दिये जा सकते है। यानी गांधी जी यह मानते थे कि ऐसा कभी हो सकता है वि कापरता को अपेक्षा हिंसा अधिक समय तय हो । शाति का प्रथ उनके निपट नपुसकता नही था। निभय की सहिसा ही घुछ मानी रख सकती है । इसलिए शाति का 'वाद' बनाने मे वे मनुष्य-स्वभाव की दूसरी मापेक्षिक सम्भावनामो से पासे मूदकर नही चलना चाहते थे। इसी बात मे से राष्ट्रीय अावश्यकतानुसार प्रात्मरक्षाय युद्ध का गांतिक समथन गाधी जी ये लेसो मे मिलता ह प्रथम महायुद्ध में द्रटिश सेनामो की सहायता १६२० में भारत की सुरक्षा या प्रश्न, १९४२ मे फासिज्म का विरोध, कश्मीर में सेनामो पे भेजने को विश्व-दाति आशीर्वाद प्रादि कुछ उदाहरण हैं। यानी वे शातिवाद को कोई पूर्वाग्रह या वट्टर मतवाद नही बना देना चाहते थे। वे उसमे यह सम्भावना देखते थे कि मनुष्य-स्वभाव के अनुमार कुछ परिवतन उस सैद्धान्तिक या ऐकातिक स्थिति मे घटित हो सकता है। गाधी जी का शान्ति सम्बधी यह विचार-परिवतन कालनमा- नुसार देखें तो १६०४-१९०५ मे उहोने अपने पत्र मे आक्रामक रूस के विरोध मे न्यायसगत जापान को पूरी सहायता देने की बात लिथी। उनके अनुसार जापान ने अपने चरित्र बल से ससार में इतना बडा स्थान बनाया था। पश्चिम के विरोध मे नये एशिया या जापान प्रतीक बना // यह 'इण्डियन प्रोपीनियन' मे गांधी जी पे विचार उस समय ब्रिटेन के जापान समयक विचारो से सुसगत थे कुछ लोगो का यह मत है कि गाधी के उन विचारो पर उस पन के प्रकाशक के मत और नीति का भी प्रभाव था। उसी 'इण्डियन प्रोपोनियन' ने १९०६ मे जुलू विद्रोह को दवाने मे ब्रिटिश सेना वा साथ देने के लिए भारतीयो को अपील की। इस प्रकार वह भारतीयो के प्रति त्रिटिशो के विचार बदलने की भी माना करते थे। परतु यह यात मधिक दिन नही टिकी। १९०६ मे उ होने लिखा कि "भारत में निटिश सरकार प्राचीन सभ्यता, जो परमात्मा का राज्य है, उसके विरुद्ध आधुनिक सभ्यता या शैतान । राज्य की प्रतिनिधि है । एक प्रेम का भगवान है, दूसरा युद्ध का देवता।" १९१४ मे लदन मे पाने पर ग्रिटिशो को गाघी ने अपनी सेवाएँ पपित की । भारतवासियों को उहोने बताया कि इस युद्ध मे ग्रिटन का साथ देना भारतीयो के हक मे है। रगट भरतो में भी विश्व शाति उन्होंने मदद दी। पर १९१८ मे प्रयम युद्ध की समाप्ति और १६१६ ये माण्टेग्यू-चेम्सफोड सुधारों के बाद, रोलट विल आदि के द्वारा जनता के नागरिक अधिकारी पर जो ब्रिटिशो ने नियत्रण लगाए, उनके कारण गाधी जी का रुस बदला। अब वे अपने पाशिक युद्ध समयन के पुराने काय को केवल एक राजनैतिक साधन कहते हैं । वे अब मानने लगे कि मनुष्य को अहिंमावादी और शाति यादी होना ही चाहिए, पर तु कभी-कभी अनिवाय हिंसा से वह वच नहीं पाता। "ऐसा भी हो सकता है कि मनुष्य को युद्ध मे भाग लेना पडे और साथ ही माय यह युद्ध की व्यथता मे, अपने राष्ट्र और दुनिया को युद्ध से बचाने मे भी विश्वास करे।" 'हरिजन' मे १५-१०-१९३८ को उ होन लिखा कि, 'युद्ध का शास्त्र विशुद्ध तानाशाही की ओर हमे ले जाता है। अहिंसा का शास्त्र ही शुद्ध लोक्तत्र की ओर हमे ले जा सकता है । इग्लड, फ्रास और अमेरिका को अपना चुनाव करना है। दो तानाशाह की चुनौती सामने है। अभी रस चित्र मे नहीं है। इस में एक ऐसा तानाशाह है जो समझता है कि रक्त के समुद्र मे से जापर अपन शान्ति के प्रादश तक पहुंचा जा सकेगा। कोई नहीं कह सकता कि भविष्य मे रूमी तानाशाही का दुनिया के लिए क्या पथ होगा हरिजन' मे एडगर स्नो के साथ एक मेंट वार्ता मे गाधी जी ने १९७-१९४२ को कहा था क्या आप भारत की स्वतत्रता इसलिए चाहते हैं वि मित्र शक्तियो की महायता करें। भारत स्वतन्त्र होने पर मार देश मे मैनिक भर्ती शुरु करा देगा और क्या सपूर्ण युद्ध की पद्धतियो को अपनायेगा?" १॥ . प्रश्न ३७ विश्व-गाति गांधी जी का उत्तर "प्रश्न स्वाभाविक है पर मेरे पास उसका पूरा जवाब नही। मैं सिफ इतना ही कह सकता हूं कि स्वतय भारत मित्र राष्ट्रो के साथ समान नीति रखेगा। मैं नहीं कह सकता कि स्वतत्र भारत फौजीशाही में भाग लेगा या अपने अहिंसक माग मे जायेगा। पर मैं बिना किसी झिमक के रह सकता है कि यदि में भारत को अहिंमा की अोर मोड सका तो जरूर ऐसा क्रगा। यदि में चालीस करोड लोगो को अहिंसक बना सका तो यह एक जबर- दस्त वडो बात होगी, एक प्राश्चर्यजनक हृदय-परिवतन होगा।" श्री स्नो ने त परते हुए पूछा, "फौजी प्रयत्नो का विरोध प्राप सविनय अवज्ञा मा दोलन से तो नहीं करेंगे ?" "मेरी वैसी कोई इच्छा नही। मैं स्वतत्र भारत की इच्छा का विरोध सविनय अवज्ञा प्रादोलन से नहीं करूंगा। वह गलत होगा।" " और इसी तरह युद्ध-सम्बधी गाधी जी के विचार 'हिन्दुस्तान स्टैण्ड'ले २० जुलाई, १९४४ के अर मे व्यक्त हुए हैं, "मैं अपने पालोचको से कहूंगा कि वे मेरे साथ दुम्ब सहन करें। सिफ भारत- वासी ही नहीं, सारी दुनिया के लोग, जो युद्ध मे गरीक हो या न हो, वे मेरे साथ रहें, सोचें । दुनिया मे यह नर-सहार जो चल रहा है, उमको मोर उपेक्षा मे में क्व तक देखू ? मेरे भीतर एक अपरि- वतनीय अदा है कि एक-दूसरे को मारना, हत्या करना यह मनुप्य के सम्मान मे नीचे की, हलकी बात है। मुझे पूरा विश्वास है कि कोई न कोई राह इसमें से जरूर निगल सकती है।' न इमार मे, गांधी जी का विश्वशान्ति का विश्वास विश्व शांति अहिंसा से शुरू होता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति शान्ति चाहे, तो विग्रह क्या हो? . - परतु समाज मे सब व्यक्ति ऐसे स त या शान्तिप्रिय महिंसक रही हो तो? तो, समाज को बदलना होगा। और उसका यही उपाय है कि उस प्रशाति मचाने वाले व्यक्ति, समूह, जाति या राष्ट्र के प्रति असह्योग और बहिष्कार का अस्त्र काम मे लाना होगा। प्रशाति मे से युद्ध इसलिए पनपते हैं कि उहे जनसाधारण की भयभावना से पोषण मिलता है । गाधी जी जनसाधारण को निभय बनाना चाहते थे। जो निभय होगा, उसके मा मे किसीके शक्ति प्रदशन से विच- लित होने का प्रश्न ही नहीं उठेगा। यह निभयता पुन उनकी मास्तिक्ता या असण्ड ईश्वरीय सत्ता के विश्वास म से उपजती है। अत रवीन्द्रनाथ ठाकुर का 'एकला चलो रे ।' और 'निबल के बल गम ।' उनके प्रिय भजन थे, जिनका प्राथा-सभा मे पाठ होता था।। गांधी जी के विश्व शाति के आदश की परीक्षा गत महायुद्ध पे प्रारम्भ मे हुई। एक योर उहे लगता था कि तानाशाही मौर फासिस्तवाद का विरोध तो होना चाहिए, दूसरी ओर वे प्रिटिशो से युद्ध-प्रयलो की सहायता भी नही करना चाहते थे। 'युद्ध हमारे धम-विरुद्ध' कहने को स्वतत्रता वे हर भारतीय के लिए प्रावश्यक समझते थे। यही वाय स्वातश्य उन्होने कसौटी पर लगाया । और वयक्तिक सत्याग्रह मे हतारो पदयात्रियो ने स्वेच्छा से जेल जा स्वीकार किया। यह प्रादोलन जब शुरू हुआ था, तब इन पक्तियो विश्वगाति के लेखक को सेवाग्राम मे उनकी कुटी के बहुत निकट रहने का, प्राश्रम जीवन का एक अग बनकर सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला था। माश्रम मे उन दिनो देश-देश के पत्रकार और सवाद- दाता पाते भौर गांधी जी को कई तरह के प्रश्न पूछते । विशेषत अमरीकी पत्रकार। उहे लगता था कि गांधी जी की सम्पूर्ण महिंसा और उस समय ब्रिटिशो के सकटकाल में उनकी मदद 7 करने में कोई मूलभूत विरोध था। उसी समय भारत के साम्य. वादी दल, मानवेन्द्रनाथ राय में रैडिकल डेमौत्रटिक (वाद मे रैडि कम ह्य मनिस्ट) दल प्रादि ने फास्सितवाद विरोधी रुख अपनाया। मोर पक्षपर बनने का, प्रतिबद्ध होने का माक्सवादी नारा लोगो को दिया कि यह युद्ध जनयुद्ध है । गाँधी ने कहा कि युद्ध-मात्र ही जन- विरोधी होता है । अत यह एवं ददतो व्याघात' का उदाहरण है। गांधी ने कारावास ग्रहण किया, 'करो या मरो' पी पुपार की गई। अगस्त शान्ति हुई । नेता विहीन देश ने हिंसा से परहेज नहीं किया। यह सर यहानी सर्वविदित है । पर युद्ध के प्रारम्भ में गाँधी को र 'हरिजन' में की हुई भविष्यवाणी सच निक्लो युद्ध से विश्वशान्ति बढ़ी नहीं, बलि मानयता कुछ पीछे ही हट गई । नैतिक दृष्टि से उसका विकास नहीं हुमा। यरिक 'अणुवम' जैसे सहारक पास्त्र को निमिति मौर व्यापक नरसहार में उसके उपयोग ने मानवता के नाम पर एक क्लर ही लगाया । । PME४६ मै दिल्ली के पुराने पिले मे थुलाये गये एशियाई सास्कृतिक सम्मेलन में गांधी जी ने कहा कि "पश्चिम हमसे मुछ पाने के लिए तरस रहा है । उसका भौतिमवाद मौर विज्ञान की खोज उसे विश्व शांति अण्वग तक ले गया है। पर एशिया, जहां से सारे धम निक्ले, उसे शान्ति का सदेश नहीं देगा तो क्या देगा?" गांधी जी जानते थे कि विश्व की भनसुल भी समस्यामो मे युद्ध एक प्रधान समस्या है। वे सीधे और अप्रत्यक्ष माक्रमण के अन्याय को जानते थे । 'क्रिश्चियन सेंचुरी' पत्र ने गाधी को विश्वशाति का नोबल पुरस्कार देने का सुझाव १६३४ मे रखा था। पर लगता है वि तब पश्चिमी दुनिया के शातिवादियो ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया। नवम्बर २१, १९५५ के 'क्रिश्चियन सेंचरी' पत्र में गांधी जी का एक मत दिया गया है कि दुनिया में सोवियत-अमरीकी विचार-विरोधो के दो ध्रुवा मे यदि विकेन्द्रीकरण को अपनाया जाय, तो तीसरा रास्ता निकल सकता है । सत्ता, वित्त और कानून जैसी शक्तियां विश्व के राष्ट्रो के बीच मे जैसे विग्रह पैदा करती है, वैसे ही उन राष्ट्रो को निकटतम लाने मे भी बहुत सहायक हो सकती है, उनका स्वरूप अव इतना उलझा हुमा मोर परस्पराव- लम्बित है कि इसका विचार गांधी जी ने नहीं किया था। उनकी मनुष्य की मोर राष्ट्रीय हितो मी परपना काफी हद तक अधिय पादावादी थी। उसमे मनुष्य से प्रत्यधिक प्राशा को जाती रही। आज भी विश्व शाति के लिए एक बहुत बड़ा खतरा म तर्रा प्ट्रीय साम्यवाद है। जो शस्त्र-स नद्ध होकर चीन जैसी विस्तार- वादी मुद्रा ग्रहण करता है। गाधी जी का साम्यवाद के सम्ब ध मे क्या रुख था और साम्यवादो उ है क्या-क्या समझते रहे, यह दशी है। गांधी जी ने गत महायुद्ध के समय जेल-यात्रा मे काल माक्स के 'डास क्पीटल' और एगेल्स, लेनिन, स्तालिन प्रादि की कुछ किताबें सौ-२ ४१ विश्वशाति पड़ीं। परतु माक्सवादी पार्टियो के भारत मे और भारत के बाहर के कारनामो से वे बिल्कुल अनभिन रहे हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। भारत को कम्युनिस्ट पार्टी भी कभी उहे ग्रामीण प्रतिक्रिया- वादी, कभी पूजीवादियो का एजेण्ट और बाद मे महान राष्ट्रीय नेता कहती रही। गाघोजी १६१७ वालो रूम को अक्टूबर शान्ति के बाद कम्यु- निस्ट विचारधारा के प्रति दो-तीन तरह के रुस रमते रहे एक तो उस माम्यवाद से भारत को कोई खतरा नहीं है । दूसरे, सोवियत कम्युनिश्म के बारे में हम बहुत कम जानते हैं, तीसरे, कम्युनिज्म में निहित हिंसा, नास्तिकता और वग युद्ध के सिद्धा का विरोध। १९२४ मे गांधी जी को मोवियत दम से निमत्रण मिला था, वे यहा के स्वतंत्रता प्रादोलन को सहायता करना चाहते थे। परन्तु गाधोजी ने उसे प्रम्वीकार कर दिया। 'यग इण्डिया' मे उहाने लिबा "मुझ किसी भी प्रकार के हिंसक उद्देश्य लिए उपयोग में लाना असफल होगा।" १९२८ में गांधी जी ने कहा, 'मैं स्वीकार करता है कि मुझे बोरोविषम या पूरा अथ समझने में नहीं पाया है। मुझे बताया गया है कि यह वाद वैयक्तिर सम्पत्ति का नारा चाहता है। प्रपरि- ग्रह में नैनिय मादा का प्रयनीति व क्षेत्र में प्रयोग ही शायद यह विचारधारा थी। यदि यही काम शातिपूर्ण तरीकों मे किया जाए तो यह मादा वात होगी, परतु जहां तक मैं जानता हूँ वोलोविक विचारधारा हिसा-शक्ति मे परहेज नही करती। उलटे वैयक्ति सम्पत्ति के विनाश को पूरी अनुमति देती है। यदि यह सच है तो ऐमा वोरोविर राज मधिर ममय तर नहीं चल सकेगा। मेरा विश्व शांति दृढ विश्वास है कि हिंसा पर आधारित कोई भी चीज चिरस्थायी नही हो सकती। पर तु इस विचारधारा के पीछे लेनिन जैसी महान् मात्मामा और अनेक नर-नारिया का त्याग और बलिदान है और वह व्यथ नही जाता।" एक वप वाद गाँधी पर यह आरोप लगाया गया कि वे उस माम्राज्यवाद विरोधी सघ के सदस्य हैं, जिसका कम्युनिस्टो ने नेतृत्व किया था। रोम्या रोला, जाज ल सवेरी, मलवट प्राइस्टाइन, मादाम सुयातसन आदि इस सघ के विरोधी थे और उन्होने गाधी जी पर यह प्रारोप लगाया। गाधी जी नही जानते थे कि इस सघ का मूल सूत्र मचालन मास्को से चलता है। नेहरू भी इस सघ के सदस्य थे, १९३० तक । बाद मै उहे इस 'लीग एग स्ट इम्पीरिय- लिज्म' ने अपनी सदस्यता से वचित कर दिया (नेहरू जी की 'बच आफ प्रोल्ड लेटस 'पृ० ११४ तथा बेचेर की जीवनी के पृष्ठ ११३ ११५) । १६३० के बाद तक गाधी जी साम्यवाद की ओर एक अद्- भुत रम्य दृष्टि में देखते थे। अपने आपको वे अहिंसक साम्यवादी मानत थे। दूसरे महायुद्ध के प्रारम्भ मे गाधी जी कम्युनिस्ट कटनीतिज्ञता से आगाह हुए। १९३८ मे हिटलर और पश्चिम के जनतत्रो के बीच म्युनिख समझौते पर लिखते हुए गाधी ने सोवियत रूस के बारे में लिखा कि "यहा का तानाशाह रक्त के ममुद्र मे चलकर गाति का सपना देखता है।" युद्ध शुरू होने पर एक वष बाद अगस्त २३, १६३६ को जमन सोवियत मधि को और पोलण्ड या दोना राष्ट्री आत्रमणो को उन्होने 'दुग्वद' वतनाया। फिर भी उह कुछ भाशा विश्व शाति ४३ थी। जून १९४१ के बाद सोवियत जमा सधि टूटने पर गाधी को अतर्राष्ट्रीय साम्यवाद उतना ही आक्षेपाह लगा जितना नाजीवाद । १९४४ मे गाँधी जी ने भारतीय साम्यवादी दल के मत्री के साथ हुई चर्चा में रूस के अवसरवाद और प्रिटिश सम्राज्यवाद विरोध विस्मरण प्रश्न पर गांधी जी को लगी ठेस उ होने व्यक्त की है। "भारत जव गुलाम है तब गुलाम जनता का कसा युद्ध ?" गाधी ने पूछा। गाधी जो भारतीय साम्यवादी दल से, इस प्रकार से, दूर हटते गये। और अपने जीवन के प्रत तक वे उसे क्षमा न कर सरे । १९४८ मे उन्होने यहा तक लिखा कि भारतीय साम्यवादी "अच्छे-बुरे, सत्य प्रसत्य पे बीच मे कोई भेद-भाव नहीं करते।" फिर भी व्यक्तिगत रूप से उहोने साम्यवादिया के हृदय परिवतन में विश्वास नहीं छोड़ा। गाधी जी ने इटली की फासिस्टवाद और जमनी के नाजीवाद की जिन कारणो से दुराई की, ठीक वही दोष उन्ह साम्यवाद में भी दिखाई दिये। V विश्वशाति के लिए गांघो जो जिन उपायो को मानते थे वे- (१) व्यक्तिगत हृदय-परिवतन और सत्याग्रह, (२) पच फैमले से निणय, (३) कानूनी उपायो से सधियाँ मादि, (४) लीग माफ नेश स या सयुक्त राष्ट्र मघ जसो सम्पाए, (५) विश्व के एक राज्य की कल्पना, (६) नि शस्त्रीकरण (७) शाति दल को स्थापना । मटलाटिर चाटर के बाद जव विस्टन चचिल 7 विश्य गति पलियामेट में सितम्बर १९४१ में कहा कि यह सन्धि-पत्र भारत पर नागू नहीं होता, तो गाधी जी ने कहा कि "रूजवेल्ट और चचिल में हस्ताक्षर के बाद ही यह घोषणा समुद्र मे डूब गई।' १६३८ और १९४२ मे गाधी जी ने विश्व के एक राज्य की कल्पना को अपना समर्थन दिया। काग्रेस को भी उसके समर्थन के लिए कहा। पर तु म तर्राष्ट्रीय सघो के प्रति वे शवालु ये, अत गांधी भी बहुत समय तक यही मानते थे विशक्ति में उन्मत्त 'राष्ट्र' कभी सुधर ही नही सकेंगे। और उनका कमा सघ सभव है ? इसी कारण से १९२५ म मीरिया से लौटते हुए भारतीयो ने जब गांधी जी से कहा कि फास की फौजी कारवाई के खिलाफ लीग आफ नेश स में अपील करें तो गाँधी ने मना कर दिया। वे ऐसी अपील को पर्याप्त नैतिक बल-भरी नहीं मानते थे। १९३१ मे जोवा में लोग के के द्र मे जाकर गांधी ने मत्याग्रह को अपनाने का उह उपदेश दिया। चार वष बाद इटली इथियापिया सघष म लीग से गांधी जी ने अपील की कि इटली के विरुद्ध विशेष कारवाई वह न कर। गाधी जो लोग के वायकाट को नहीं समझ सके। संयुक्त राष्ट्र संघ ये निर्माण की सामासिम्कोकी सभा के समय भी गांधी जी ने निराशा हो व्यक्त की। उनके विचार से विश्व सुरक्षा न वहाो राष्ट्र प्रपने परस्पर विश्वास मोर युद्ध के भय को व्यक्त कर रहे थे। 'गाधी विश्वशाति के पहले एक प्रकार की परस्पर आस्था वातावरण को महत्त्वपूर्ण शत पी तरह मानते थे। इसलिए छोटे-छोटे तटस्थ और निष्पक्ष राष्ट्रा मे उ ह बहुत प्राशा थी। १९४६ म जाज कालिन मे यातचीत के सिलसिले में विश्व ये श्रद्धा विश्व नाति या सभी राप्टो की एवं सम्मिलित पारक्षी-टुकडी (बई पुलिस फार्स) में गांधी जी का विश्वास व्यक्त हुआ है । वे मूतत पूर्व और पश्चिम के युद्ध और शाति-सम्बधी विचारो मे वडा अतर देखते थे । और दोनो के बीच एक भावी मम वय से प्राय भी करते थे। ) गांधी जी सम्पूर्ण नि शस्त्रीकरण में विश्वास करते थे। उनये विचार में शास्त्रों के बदले और मारव गत्रा का प्रयोग और अणु- वम का उत्तर उद्रजन बम कभी नहीं हो सनता था। इस प्रकार मे हिंसा की सरणी अनत बनी रहती है। और समाधान गोई नहीं निकलता। युद्ध का पर्याय गांधी जी के लेये वेदल सयाग्रह है। धीरे-धीरे विश्व इस बात को मानने लगा है। जैसे कि अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग ने बम सत्याग्रह में अपनी मागे मनवाने में, अयम भी कई मामात नीमरे पक्ष में अपीय मग्ये या उमरे निणय को मानने पर राजी होकर दिया गया। रात में नारद ममझोता इसी प्रकार का ए यत्न था। इतिहास या मान्य है कि बुद्ध और अगुलिमार, अशोर ये कलिंग-विजय के बाद हृदयपरिवर्तन, टेलीमास रे रोमन सक्मो में पशुमो द्वारा मानव-वध का बाद करने के वैयक्तिक सत्याग्रह और ईमा द्वारा समस्त अनुपायियो के पापो को अपने ऊपर लेना-ये और ऐमे उदाहण न्याग और बलिदान द्वारा प्रतिपक्ष के हदय- परिवतन को उजागर करते हैं । मध्ययुग मे रोमे कई ममूर मली चढ गये, और ऐसे पई सताने प्रयाय सहन किये। पर गाधी की विशेषता इस बात में है कि जो वर्या आधार पर महिला विजय के प्रयोग पहले हुए, उह गांधी ने सामूहिक प दिया। एक नी विश्व-साति मच्चाई को भनेको की सच्चाई म परणित कर दिया। " होरेस ने कहा था, "संसार की माताएँ युद्ध मान से घृणा करती हैं।' गांधी ने उसी करुणा और मागव मानव के वीच स्नेह सहानु भूति के प्राथमिम सहज पर इस युग मे विस्मृत गुण पर बल दिया। यदि विश्व में भविष्य मे कभी युद्ध समाप्त होकर सम्पूर्ण शाति निर्मित होगी तो उसके निर्मातामो की श्रेय नामावलि मे गाधी का नाम रावप्रथम होगा। सुख प्रचण्ड परिमाण पर मानवी शक्तिया का ध्वस-मान है-- द्रव्य या, सभ्यता का, मानवीय गुणा का। हिंसा पर साधारित सारे दशन मनुष्य को सामान्य, स्वाभाविक, सहज रूप म नहीं देसते। वे उसमे अमप, क्रोध असूया, द्वेष, घृणा गौर तिरस्कार को क्षुद्र भाव नामो को ही उभाडो में व्यस्त रहते है। ससार वे युद्धा से कितना नुकसाा हुआ है इसका एक छोटा मा मानचित्र नीचे दिया जा रहा है। गत महायुद्ध के प्रारम्भ मे, १६३० मे मैंने एक लेख पिसी पत्रिा मे लिया था, उसमें मैंने ये याकटे जमा किये थे। उसमे ससा ये महायुद्धो से होने वाले नुव सान की कहानी या दी थी ईसापूर्व १४६६ से १६३० ईग्यो तब यानी दरीब साढे तीन हजार बरसा म केवल २८७ वष शान्ति दे चौने, ३११२ वप युद्ध से अभिशप्त रहे । बुरपारेस्ट युनिवसिटी ये प्रो० पेला के अनुसार १५०० ईसापूर्व से १८६० ईस्वी तक करीव आठ हजार ऐसी सा धया हुइ जो जब वे की जाती तब अक्षय और अपरिवतनीय मानी जाती थी, 'मगर सचमुच मे उन सबको पोसत शायु दा वप से अधिक न थी। १६१८ मे अब तक यूरोप में १७०० वडी-पही लडाइयो हुइ, जिनमें ४७ विश्व शाति सर्वाधिक मास में, फिर ग्रास्ट्रिया और हगरी में और फिर ग्रेटविटन और प्रशिया इस क्रम से युद्धमान राष्ट्र रहे। इस काल के बीच पास अकेला तिहत्तर वर्षों तक ग्रेटब्रिटेन में लडता रहा, अस्सी बरस तक प्रशिया और जमनी के माम्राज्य मे और स्पन से बासठ वप। सबसे लम्बी लडाई यूरोप और इग्लैंड के बीच १३३७ मे सौ वर्षों का युद्ध नाम से प्रसिद्ध है, सबसे छोटी लडाई १८४६ मे आस्ट्रिया और सार्जीनिया के बीच छह दिन का था। बारहवी-तेरहवी सदी मे क्स, १४वी सदी में इग्लड, १५यी से १८वी सदी तक प्रास्ट्रिया (होली रोमा एम्पायर), १९वी सदी में फास और २०वों मे जमनी सवाधिय लडता रहा । और ये हैं कुछ तथ्य केवल यूरोप । १६१८-४८ मे लडी गई तीस बरस की पढाई मे सिफ १५००० यादमी थे। १८वी सदी मे ४०,००० पादमी लडाई मे निमग्न थे। नेपोलियन मे किये गये युद्धो मे ८०,००० और रस-जापान युद्ध में एक लाय । १८१३ की लाइजिग की लडाई मे पाच लाज लोग थे और वीसवी सदी के दो महायुद्धा का तो बना क्या? यह तो पूरी दुनिया को अपने साथ समेटने पाला भूगोल युद्ध या सकुल युद्ध (टोटल वार) ठहरा। मन् १९१४ ये पहले महायुद्ध में इटली के मोचों पर ४० मोल तब फैकी ४८४० तोपो ने मोलह दिन में ३,००,००,००० फायर पिये, जिनकी कुल कीमत तीन करोड रपयो मे आर थी। घुग्रा मोर माग दुश्मा पर फेंचने का सबसे पहला प्रयोग ग्यारवी सदी में गोलिया ने किया। सुगता द्वारा १२ वी सदी मे यह माधन तुर्को - ४८ विश्व नाति की मारफत यूरोप पहुचा । पर तु रासायनिक युद्ध का सच्चा पारा गत महायुद्ध मे ही हुआ। तीन हजार ढग में रसायन प्रयोग में लाए गये~प्रयोगशालाओं में मोर सुद्ध भूमि पर-जिनमें से सिफ बारह मफल हुए। १९३५-३७ ये इटली-प्रचौसिनिया युद्ध में इटली में विपली वायु का मवप्रथम प्रयाग पिमा गया । जापानियों ने चीन म ३८ ३६ मे विषली वायु का प्रयोग किया। १२३० ईस्वी में मुगल नेता दुबला खान ने हथगोले जसे बम सबसे पहले प्रयुक्त किये। १३४६ मे सबसे पहले युद्ध मे बारूद का उपयोग किया गया । १८८२ तब बिना धुएँ की बारूद का अवेषण नही हुमा था। जमन दूरमार तोपा का उपयोग सन् १९१४ की लड़ाई से शुरू हो गया था। अमरीकी गृह युद्ध (१८६१-६५) में ४० लाख फौजें निमग्न थी, जिनमे उत्तरी अमरीका के करीब तीन लास और दक्षिण में पाच लाख सिपाही काम भाये। इस युद्ध का सच था परीबन ७४ करोड पौड । क्रोमियन युद्ध (१८५४ ५६) का खर्च ३० वरोड ५० लाल पौंड था। १८५७ वा गदर और १८६० की चीनी लड़ाई में प्रत्येक मे ५२ हजार की प्राणहानि हुई। १८७०-७१ युद्ध में पचास करोड साठ लाख पौंड यच हुए । स्पेन अमरीकी युद्ध (१८९८) में प्रतिदिन अमरीका का ५ करोड पोड पोर स्पेन का ३५००० पौड व्यय हुआ। १६१४१८ के गत महायुद्ध की कीमत करीबन ८०० करोड पोड कूती गई है। यह हिसाब डा० निकालस बटलर ने लगाया है । एक करोड सिपाही मारे गये, दो करोड जस्मी हुए भोर युद्ध के बाद फली हुई इपलुएजा को महामारी मे एक करोड मरे । इस युद्ध में सात करोड लोग निमग्न थे। मास प्रशिया ४६ विश्व गाति गये महायुद्ध के पारडे तो इसमे भी और भयानक है-मानव- प्राणो का, मानव द्वारा निमित और उत्पादित वस्तुओं का कितना विशाल परिमाण पर यह सहार है ? और आखिर क्या हाथ आया? गत महायद ये प्रारम्भ मे हो 'हरिजन' में गाधी जी ने लिखा था कि इससे वेवल परस्पर दुवलता बढ़ेगी। और ठीक वैसा ही हुआ । इन युद्धो को उकसाने वाले, दुनिया में युद्धो माद फैलाने वाले जो नारे काम मे लिये जाते हैं उनमे धमग्रयो में प्रयुक्त शब्दों का भी उपयोग किया जाता रहा है, यह कैसे प्राश्चय की बात है। धर्म, जो कि मनुष्य को शाति और परस्पर प्रेम का पाठ देने के लिए थे, वे ही नर-सहार के अस्त्र वनें, इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है। पर दुनिया के इनिहास में ऐसा सव हुआ है। इसी परिपाव में गांधी जी के काम की महता हमारी नजरो में और भी बढ़ जाती है। अमेरिका में पढाते समय हमें वाशिंगटन से मास्को पदयात्रा करने वाले अणु बम विरोधी शातिवादी जत्ये से मिलने या सौभाग्य मिला था। उनमे जेरी सेहमान ने हमे बताया कि वे गांधी जी की रचनामो मे कैसे प्रभावित हुए। और उनके निजी सग्रहालय में गांधी जी की 'नान वायलेस एण्ड पीस' पुस्तक की प्रतिया मुझे उनके घर पर उनकी मा ने बतलाई थी। धम्मपद' में यमक वग्गो में बुद्ध ने कहा था प्रफोच्छिम अवधि म जिनि म प्रहाति मे। ये च त उपनिभ्राति देर तेस न सम्मति । भकोच्छि म अवधि म मजिनि म महाति में। येत तन उपनयहाति देर तेसूपसम्मति ।

प्रध्याम३ वर्ण-द्वप । जापान में एक कहानी प्रचलित है जो प्रादश मनुष्य के बारे में है। यह एक किस्म की लोक्क्या है। दुनिया बनाने वाले परमात्मा ने कुछ मिट्टी ली और उसमे पानी मिलाया और उस गारे से एक प्रादमी का आकार बनाया। और उसे पकने के लिए भट्टो में रख दिया। पहले दिन उगे बरावर पता नहीं था कि भट्ठी कितनी देर रहनी चाहिए। सो उम गुडडे को उसने पक्या बनाने के लिए खूब पक्ने दिया। जब उसने खोला तो देखा कि भगवान या वह पूण पुरुष एक्दम काला हो गया है। उसने माचा कि यह तो जैसा में चाहता था वैसा नही बना, सो उसने उसे जिस प्रदेश मे फेंक दिया उसका नाम अफीका सड और दक्षिण अमेरिका आदि हुमा । वे लोग हवशी और नीग्रो और काले लोग कहलाये। दूसरे दिन उसने कुछ अधीरता से काम लिया और जल्दबाजी में उमने भट्ठो पोल ली। तो जो प्रादमी म्पी गुडिण उसने बनाई थी, वह अधपकी रह गई- सफेद-सफेद । उहे उमने पश्चिम में फेंक दिया। वह यूरोप और अमरीका पहुंच गई। प्रतिम दिन उसने ठोक समय देखकर भट्ठी को उचित नाप तौल से खोला । तो वह न एक्दम काला, न एकरम - पण-देष सफेद, पर पीला, ठीक जापानी जैसा, पूणगुणयुक्त मानव बना। फेवल जापान में ही नहीं, हर देश मे, और हर जाति मे और हर छोट-छोटे प्रात में, और भाषा भापी में अपने पापको औरो से किसी न किसी गुण म अधिक उत्तम, अधिक श्रेष्ठ मानने की भावना रहती है । इसके उदाहरण लोकाथानो, लोकगीता, और वाक- प्रचारो मे, सारी दुनिया मे, इतने मिलते हैं कि इस मामले म किसी भी एक समूह को दूसरे मानव समूह को बुरा-भला रहना व्यय है। इतनो महिष्णु और उदार भारतीय सम्वृति मे भी अाखिर दास, भूद, मच्छ, यवर आदि शन्द कसे अय-परिवतन पाते रहे हैं । एक घम वाले दूसरे घम मानन वाले को काफिर और 'इन्फिडल' और निगट (निग्रंथ) और पता नहीं किन क्ति विशेषणो से याद करते रहे हैं। गव के लिए वैष्णव और वैष्णव के लिए शव, जैन के लिए वौद्ध और बौद्ध के लिए जैन, ब्राह्मण के लिए अ-ब्राह्मण और इसमे उलट-अपने ही देश मे नाना जाति पथ-मत-अनुयापियो में क्तिना विद्वेप और परस्पर सदेह का वातावरण मरा रहा है । गांधी को इस चीज़ का अहसास वचपन में कम हुआ था। माता वैष्णव सस्कारी वाली थी। बाद म वे जैनिया और पारसियो, मोमिना मुसलमानो पे पार ईसाइया के समय में भारत में भाय । परतु उह कही यह गवाल इतना भवरा नही, जितना इग्लड जाने पर मौर उसमे भी मधिर मफ्रीका जाने पर यह प्रश्न बहुत चोट देने वाला बनकर मामने भाया । 'प्रात्मक्या' में वे लिखते हैं "मेरे वहां पहुंचने के सातवें-पाठवें दिन की बात है, मैं डरवन से जा रहा था (प्रोटोरिया)। मेरा पटलाम का टिक्टि पहले से .

वण-देप रिजव कर लिया गया था गाडी मारित्जवग, नाताल की राज धानी, पहुंची, रात के नौ बजे के करीव । स्टेशन पर विस्तरे भी दिये जाते थे । एक रेल क्मचारी पाया और उसने पूण 'आपको विस्तरा चाहिये ।' मैंने कहा, 'नही, मेरे पास है।' वह चला गया। एव और प्रवासी वाद मे आया, और उसने मुझे सिर से पैर तक निहारा। उसने यह देसा वि मैं 'काला आदमी हूँ, इससे यह वहुत विचलित हुआ। वह बाहर गया और एक दो अफसरो को लेकर भीतर पाया। वे सब चुप रहे, जबकि एक-दूसरा अफसर आया और उसने कहा, 'गाइय, आपको वन सम्पाटमेट मे (दूसरे साधारण डिव्वे मे) जाना पडेगा।' "मैंने कहा-'पर मेरे पास तो फस्टक्लास वा टिक्टि है।' "उसने उत्तर दिया-'वह जो भी हो, मैं कह रहा हूँ और तुम्ह उसी डिब्बे में जाना पडेगा।' " 'मैं भी कहता हूँ कि डरवन से मुझ इस डिब्बे म सफर करा की अनुमति मिल चुकी है और मैं तो इसी डिवे मे जाऊँगा। अफसर ने कहा 'नहीं, तुम नहीं जा सकते । तुम्हे यह डिया खाली करना ही होगा। नहीं तो मैं एक पुलिस कास्टिपल का बुलाता है, जो तुम्हे बाहर धक्यिा देगा।' 'हा, तुम जो चाहो मो करा । मैं अपनी खुशी से इस डिवे से बाहर नही जाऊँगा।' "का स्टैबल पाया। उसने मुझे हाथ पकडकर सोचा और बाहर या। मेरा मामा7 भी बाहर लाया गया। मैंने दूसरे डिब्बे में ने से इंकार कर दिया और ट्रन भाप छोडती हुई चपी गई । मैं " वण-दूप जाकर वेटिंग रूम (प्रतीक्षालय) मे वठा रहा । मेरो हैंड-बग मेरे हाथ मे थी, और सारा सामान जहा था वहीं फेंका हुआ पड़ा था। रेल के अधिकारियो ने उस सामान को अपने कब्जे में ले लिया था। ' जाडे के दिन थे। दक्षिण अफ्रीका के ऊंचे इलाका मे जाडा भयानक ठडा होता है। मारित्ज़वग ऊँचाई पर था, और जाडा दात किटविटाने वाला था। मेरा ओवरकोट सामान में रह गया था, परतु मैंने उसकी माग नही की, वे कही मेरा अपमान फिर से न पर वठे। मैं बैठा रहा और सिहरता रहा । कमरे मे प्रकाश नही था। माधी रात के समय एक पैसेन्जर आया और वह मुझसे बोलना चाहता था। पर में बोलने के मूड में नही था। " में अपने क्तव्य का विचार करने लगा। मैं अपने हको के लिए लडू या भारत वापिस लौट जाऊँ ? या इन अपमानो की परवाह न करते हुए मैं प्रीटोरिया चला जाऊँ, और केस पूरी होने पर मैं भारत वापिस जाऊँ ? अपना क्तव्य पूरा क्येि बिना लौट जाना कायरता होगी। जिस पप्ट का मुझे सामना करना पड़ा, वह सतही था- यह तो वण द्वेष को गहरी बीमारी का एक वाह्य लक्षण मात्र था। इसलिए, यदि सम्भव हो ता मुझे इस रोग को जड-मूल से दूर परने मे जुट जाना चाहिए। और इस प्रक्रिया म चाहे जो कठिनाइयां हो सहनी चाहिए। यण-द्वेप को दूर करने के लिए जितनी हद तक जरूरी है उतना ही प्रयाय या प्रतिकार मुझे करना चाहिए। " इसलिए मैंने अगली गाडी में प्रीटोरिया जाने का निश्चय लिया।" गांधी जी के जीवन मे 'पाने गोरे' भेट या यह पहला साक्षा- वणन्दप स्कार और उसके प्रति उनको प्रतिक्रिया का हम अहिंसा की दृष्टि से तीन स्तरा मे बाट सक्ते है (१) काले का गोरे द्वारा अपमान और उसके प्रति शोध । 'शठ प्रति शाठ्यम्' या लात का जवाब घूसे से देने की इच्छा । यह निरा अविचार है। (२) जब काला निहत्या हो, नि शस्म हो और गोरा जो उससे विद्वेष करता हा अधिक हिंसक साधनो से सनद्ध हो, ? या तो बदला लेने के विचार से उही साधनो से या उनसे अधिक कारगर सशस्त्र साधनो के लिए गुप्त या हर प्रकार के उपाय से तैयारी करना । और हिंसा पर उतारू होना। (३) या काले को गोरे वे विरुद्ध असह्योग, सत्याग्रह या इस प्रकार से अहिंसक प्रतिकार के लिए तैयार करना, कि जिसमे 'शठ प्रति मपि सत्यम्' का सिद्धात अपनाया जाय । इस उपाय म यह श्रद्धा निहित है कि हर मनुष्य में अच्छाई है और उसका हृदय परि वतन हो सकता है। हिंसा या अपमान या द्वैप केवल क्षणिक या मौसमी बुसार की तरह विकार है। और वह उतर सकता है-- चाहे दवा से चाहे प्राकृतिक चिकित्सा से । विकार पर विचार की पशु प्रवत्तिया पर देवत्व की, मसत् पर सत की विजय की यह अपार निष्ठा अपार धेय और सहिष्णुता की मांग करती है। काले और गोरे ये वीन जो परस्पर द्वेष या सराय छिपा है, क्या वह समूल दूर हो सकता है ? या यह अहि नकुलवत या गरुड-सप की तरह चिरतन और चिर-कालिक है ? क्या वाघ और बकरी एक घाट पानी पी सकते हैं ? 'अहि-मयूर, मृग बाध' वण देष ५७ ? अपना परपरागत वैर तज सकते हैं तो इस बैर का और गहराई से अध्ययन करना होगा? क्या यह ज मना, त्वचा के रग से सम्बन्धित-मात्र है ? या और कोई सामा- जिक, आर्थिक, राजनैतिक, मानव-निमित वारण हैं, जिनसे इस वर को बढ़ावा मिलता है? विज्ञान और दगा म उनीमवी शताब्दी के यूरोप मे कुछ चितको ने इस सारे वण द्वेप को जैसे एक सैद्धातिक पीठिया देवर समथन देने का भी यत्न किया। चारस डार्विन ने विकासवाद का सिद्धात प्रतिपादित किया और 'वेवल योग्यतम ही अत मे इस जीवन सघप में जीवित रह पाते हैं। यह प्राणी-शास्त्रीय विचार प्रस्तुत किया। कमजोर नस्लें या खत्म हो जाती हैं, शक्ति. मान प्रजातिया विजयिनी होती हैं। इमी सिद्धात को जमन दाश- निक नीटजशे ने और भी सुदरता से प्रस्तुत किया 'कुछ प्रजातियाँ ज मना श्रेष्ठ होती हैं, बुद्धि और गावित म और इह ही स्वेच्छा जीवित रहने का अधिकार है अधिवारा लोग तो सदा शूद्र या दास रहेगे ही। मनुष्य दो इस दुदम वलेच्छा को ही इम आधुनिक शक्ति ने महत्ता दी। कहना नहीं होगा कि मनुष्य की इस दुर्दम शक्ति- वधन की पिपासा मे मे ही 'माय' घेष्ठना और 'स्वस्ति' चिह्न का पुनरुद्धार कर परोडा नि शस्त्र यहदिया को जिंदा जला देने वाला हिटलर और उमका वित नाजीवाद ऐसे ही याये दर्शन को उपज था। एक और जमन यहूदी बाल माक्स ने इतिहास की भौतिक व्याख्या पर डालो। और मनुष्य को पशु प्रवृत्तियों में क्षुधा को सवापिए महत्व को बताकर सारे इतिहास को वर्ग विग्रह या ।

वग-द्वेष लिहास बताया । यूरोप मे जो प्रौद्यो नाति हुई, उसमे मजदूरा के अतिरिक्त श्रम के आधार पर गापादी वग के मुनाफ से माटे होते जाने की बात को मुख्य बताया। और मनुप्य मे ही अच्छाई प्रामाणिकता, देवत्व प्रादि को उसने पण्य-वस्तु घोपित किया। 'धम गरीबो को गरीय बनाये रखने वाली प्रफयून है' यह कहकर उसने सारे प्रादशवादी मध्ययुगीन दशन को 'सामाती' घोपित किया। माक्स का जादू सिर पर चढकर बोला, और सन '१८ की रसी नाति के बाद लेनिन का स स्टालिन वास्स बन गया और तीस- चालीस साल के भीतर ही वहाँ स्तालिनशाही ने ऐसे ऐसे कारनामे दिखलाये जो साम तो और पूजीवादी जमाने में जारशाही या लुई चौदहवें के कायकाल को भी लज्जित करें। चीन में मानो स्म-तुग की टिप्पणियो ने मोर वृतियो ने यह सिद्ध कर दिया कि सिद्धान्त कितना हो सम्माहक क्यो न हो, उसे नाम चाहे जैसा मानवतावादी और उदार समाजवादी दिया जाय, यदि किसी राज्यशासन या सत्ता के हाथा अनियनित शक्ति सचित हो जाती है, तो पुन वही विस्तारवाद, वही हिंसक हथकडे, वही सनिक तानाशाही पनपने लगती है। हमने अपने ही देश म हाल के इतिहास मे देखा है कि यदि किसी मल्प-सस्य जमात के मन में यह सिखात बूट कटकर भर दिया जाप कि 'खुदी को कर बुलद इतना कि तू सुद को खुदा समझ (इक्याल) तो एक राष्ट्र के कुछ लोगों को द्विराष्ट्रवाद के नशे से प्रेरित करखे धर्माध और मुनाहिद बना दिया जा सकता है। फिरकापरस्ती और तपस्सुब, साम्प्रदायिकता और धमद्वेप को पूर्ण वण-द्वेष सैद्धातिक पीठिका दी जा सकती है। और अग्रेजी की कहावत साथ होती है कि 'दि डविल कोट्स दि स्त्रिप्चस' (यानी शैतान भी धमग्रथ का प्राधार देने लगता है।) अत गाधी ने देखा कि मानव को मूलत शक्ति-सचायक, बलेच्छा-लोलुप, क्षुधा काम का पुतला, निरा भौतिक ढाचा मानकर चलना ही सारी गडवडी की जड है । जाति-भेद, वण-द्वेष, धर्मों की परस्पर असहिष्णुता इसी वीज मे से निकलती है । हमारी मनुष्य के वारे मे क्या कल्पना है ? क्या वह निरा पचभूतो का पुतला है। क्या वह केवल वनस्पति या कोट पक्षी पशु योनि का ही एक मुधरा तुपा रूप है ? या उसमे और भी कुछ है जिसे सदमद्विवेक, प्रात्मा, चिदश प्रादि महा जाता है ? यह चत य अश ही यदि मनुष्य है, तो उसस प्रतिकार करना होगा-अयया मनुष्य तो प्रणु-वमो की एक मनविच्छिन परम्परा के गत में खो जायेगा । प्रात्महता बन जायगा। गांधी के जीवन मे दक्षिण अफ्रीका मे हो फिर एक घटना घटित हुई, जिसने उनकी इस श्रद्धा दो और दृढ बनाया । 'प्रात्मकथा' में वे लिसते हैं, "हमारा जहाज बम्बई से २३वें दिन के सफर में 'क्वारेंटाइन' में डाल दिया गया। केवल स्वास्थ्य के कारणो से ऐसा नहीं किया गया था। मूल उद्देश्य था इस प्रकार स प्रवासियो को वापिस जाने के लिए वाध्य सरता। हम लोगा को नई-नई धमकियां दी जाने लगी, 'अगर तुम वापिस नहीं लौट गये तो तुम्हे समुद्र में फेंक देंगे। पर यदि तुम लोटने को राजी हा गए तो वापिस जाने का किराया भी हम तुम्ह दे देंगे।' मैंने कहा कि हमे नाताल वदरगाह ६० वण-द्वेष मे उत्तरने का अधिकार है । और हम तो नाताल म किसी भी हालत मे उतरेंगे हो । तेईसवें दिन जहाज़ बदरगाह मे पाया। जहाज से उतरते ही, कुछ नौजवानो ने मुझे पहचाना और चिल्लाना शुरू किया- गांधी, गाधो', प्राधा दजन भादमी जमा हो गए और चिल्लाने लगे थोडी देर बाद भीड बढती ही गई। मुह पर पत्थर, इटो के टुक्डे, सडे अडे फेंकना उहोने शुरू किया। किसी- ने मेरी पगडी छीन ली। औरो ने मुझे लगा और लाता से चलना चाहा। मैं बेहोश होकर गिर पडा और एक मकान के सामने की रेलिंग का सहारा लेकर सास लेना चाहता था। पुलिस सुपरिटैडेट की पत्नी ने मुझे बचाया। भीड के लिए अब मुझपर धूसे बरसाना सम्भव नहीं था, श्रीमती अलक्जडर को भी नुकसान पहुँचाये बिना।" जब मुकदमा चलाने की बात आई, मि० चेम्बरलेन न मि. एसकाम्बे का लिसा और गाधी जी से पूछा गया तो उन्होन कहा, 'मैं किसीको पकडवाना नहीं चाहता। भीड मे से एक-दो के सिवा सबको पहचान पाना भी मम्भव नही। मैं उह क्यो दोष दू? उह यह गलत सबर दी गई थी कि नाताल के गोरो के प्रत्या- चारा के खिलाफ मैंने भारत मे अतिरजित समाचार दिय थे। इन लोगो को भडकाने वाले नेता और, आप बुरा न मानें तो, आप खुद इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। रायटर के समाचारो पर सबने भरोसा कर लिया और मुझे पूछा तक नहीं। सत्य का जव पता लगेगा तो धीरे धीरे उह अपने दुव्यहार पर लज्जा पाएगी।" इस तरह से गाधी जी के जीवन मे काले-गोरे के भेद की समस्या वा द्वेष ने बहुत तीव्र स्प से प्रवेश किया। और इसका अहिंसक समाधान उन्होने खोज निकाला । इसी प्रश्न से जुड़ा हुआ था भारत मे सवर्णों का प्रवर्गों के साथ दुव्यवहार । भारत की जाति-प्रथा, गाधी जी के शब्दो में, हिदू धम के लिए कलर' थी। यह बात नहीं कि जाति- भेद, किसी न किसी रूप में, अन्य देशो और सभ्यतामो मे भी किसी न किसी रूप में नही था। ब्रिटेन मे रोमन राज्य के समय पुत्र को पिता का पेशा करना और एक ही पेशे मे विवाह का नियम था, जमनी मे 'जेनोस्सेनशाफ्टन या जिसके अनुसार सरदार या ठाकुर, सिपाही या सेवक को अपनी वशपरम्परा उसी काम मे सिद्ध करनी पडती थी । 'ट्यू,रस्टाण्ड' व्यापारी वग था 'बीउएनस्टाण्ड' देहाती सामाय प्रजा थी। पेरू में और मिस्र मे भी व्यवसायो की वशपरम्परा होती थी। फिजी द्वीप मे सुनारो को एक अलग जाति थी। टागा द्वीप पर गोदना गोदने वाले, नाई और लाठी काटने वाले छोडकर सब काम वश-परम्परा से होते थे। यहां तक कि प्राचीन म में 'चिन' या १४ वर्ग थे, जिनकी सामाजिक प्रतिष्ठा मे ऊंच-नीच तय थी। रोम मे पट्रीशियन, प्लेवियन थे । और मैडागास्कर मे चार वण थे-सामत, होवा, जाराहोवा और प्रादेवो (दास)-जिनमे प्रापस मे शादिया नही हाने दी जाती थी। यूरोप के राजवशो मे भी 'एवेन व्यूरदिग्वीट' (वश समानता) का सिद्धात था- राजसी रक्त के लोग अपने से नीचे लोगो के साथ शादी नहीं कर उक्ते थे। एसवड अष्टम को सम्प्सन के माय शादी करने पर अभी हाल मे सिंहासन छोड देना पड़ा था। पर भारत का वण-द्वेप और जाति परम्परा का इतिहास तो पण-द्वेष और भी भयानक रहा है । इसमें न केवल जमना ऊंच नीचपन, पर व्यवसायो का एकाधिकार और प्रतिलाम अनुलोम और मकडों उप-उप-उपजातियों ने सारी समस्या का और कठिन बना दिया था। विशेषत छुआछूत ने तो सारे प्रश्न को एक श्रादिवासी ढग क अविचारपूण अधविश्वास में बदल दिया था। शास्त्रो ने कई तरह में समथन भी पेश किए थे। ऋग्वेद के दशम महल का 'ब्राह्मण मुह मे, राज य वाहा से, वश्य उरु से और शूद्र चरणो से पैदा हुए यह समाज-पुरुष का यज्ञ सम्बवी वह चित्र लाग भूल गए कि आखिर ये मव एक ही गरीर के अङ्ग तो थे। पर याद म मनुस्मृति ने तो जैसे माग मे पा डाल दिया और मानव मानव के बीच परस्पर सम्बन्धी को एकदम विजडित कर दिया । महाभारत काल में सब जातियाम आपस मे विवाहादि मुक्त भाव मे होते थे। पर हम दखते हैं बुद्ध को इस जकडबन्दी के विरुद्ध बहुत प्रान्दोलन करना पड़ा। चाडाल भिक्षुको का प्रसग और कई ऐसे जातीय प्रसग हैं जिनसे स्पष्ट है कि बाद में उच्च वण को 'मोनोपोली' (तानाशाही) का विरोध बहुत जोगे से हुभा। बुद्ध ने समुद्र में मिलने वाली नदियों का उदा- हरण देकर कहा कि बुद्धत्व के मानने वाले वण-भेद मे नही रह सकते। जन मुनि कुदबुदाचाय को यही उपदेश देना पड़ा। जातिदेहाश्रिता दृष्टा देह एवात्मनो भव न मुच्यते भवात्तस्मात ये जातिकृताग्रहा ।। जातिलिंगविकरपेन येषा च समयाग्रह । तऽपि न प्राप्नुवत्येव परम पदमात्मन ॥

. - वण द्वैप (अथ-जानि देहाधित है और देह ही ससार है। प्रत जिनका आग्रह जाति-ब्राह्मणत्वादि परहै वे ससार से नही छूट मक्ते । जाति और देश के विकल्प से जो मताह करते हैं वे भी आत्मा का परम- पद नही पा मक्ते) अल-सिकन्दर (अलेक्जहर) जब भारत में पाया तो पजार में उसने कोई जाति नही देखी। मेगास्थनीम नामक ग्रीक यात्री ने लिखा है कि रेयत, व्यापारी, सिपाही और जिम्नोसोफीस्ट' और बौद्ध 'जर्मन' (यानी जैन, साविक और बौद्ध श्रमण) यहा थे मावो नामक इतिहासकार सद्रकोट्टम (चन्द्रगुप्त) के समय का वणन देने हुए लिखता है, "कोई भी हिदू ब्राह्मण सक्ता था।" बाद मे पीरियन प्रादि यूनानी इतिहासकारो ने सात जानिया गिलाई है-पण्डित, किमान, गडरिए रस्तवारी करने वाले, सिपाही, अफगर। पाईने अपवरो मजा १५५. मे १६०५ के बीच लिखी गई, क्षत्रियो और दूसरा जानिया को ५०० उप-जानिया हैं ऐमा पहा गया है। भारत मे पारमो मुम्लिम, ईसाई प्रादि बाहर में पाने वाले धर्मों के प्रवेश के बाद जातिभेद का यह चम यूह और जटिल होता गया। ज्यों-ज्यों धर्मातर होते गए और दो धमों में परस्पर-विवाह प्रादि हुए तो उनसे उत्पन मतान एक और जाति बन गई। फिर हमारे यहा मातमत्ताप और पितृसत्तार पद्धतिया भी थी। 'हिन्दू ला' बना। और वर्षों तक कई तरह के उसमे हरफेर होते रहे। ममलन १८६८ मे बहा गया कि प्रवध सतानो को माता-पिता को सम्पत्ति मिल सकेगी। १८१७ में दूसरा कानून बना दि अवध धण-द्रप सन्तानो को ऐसो सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं डा० टी० के ० एन० उन्नोत्तन ने 'गाधी एण्ड फ्री इण्डिया' नामक उप्रेस्ट से छपे शोध-ग्रन्थ (थोसिस) मे एक पूरा अध्याय 'जाति और अछूतपन' पर दिया है और उममें बताया है कि आर्थिक मारणा से यह वण-भेद क्तिना भयानक बन गया। गाधी जी ने कहा था कि "यह जातिभेद हि दूधम को लगा हुआ कोढ है । अस्पृश्यता हि दूधम का पाप है। अस्पृश्यना स हि दूधम चौपट हा रहा है ।" मध्य युग मे हो कई साता ने जिनमे कबीर, दादू, नामदेव, नानक, तुकाराम, वेमना, नम्मालवार, पेरियालबार, शङ्करदेव, भीम भाई आदि ने इस प्रकार के निम मानव मानव-भेद के विरुद्ध आवाज उठाई थी। "जात पात पूछे नहीं कोई। हरि का भज सो हरि का हाई ।।" प्राचाय शितिमोहन सेन की हिदी मे अनुवादित बँगला पुस्तक 'भारतवर्षे जातिभेद' में बहुत अच्छा वणन इस सारे इतिहास का दिया है। कई सुधारक प्राचीन काल से आधुनिक युग तक हुए राजा राममाहन राय, केशवषद्र सैन, दयानन्द, रामवृक्षण-विवेका रानडे-गोखले-आगरकर, लाला लाजपतराम प्रादि-आदि जि होने जातिभेद की व्यथता पर बहुत बल दिया। गाधी जी की महानता और विशेषता इसमे थी कि उ हाने इम समस्या के भारतीय धार्मिक चातुवण्यमिश्रित रूप को, अतर्राष्ट्रीय वणद्वेप के प्रश्न मिलाया। और इस बात पर प्राग्रह किया कि हिद्द हो या ईमाई, मुस्लिम हो या अय मतावलम्बी-इन सबको इस वश परम्परागत उच्च नीचता या चमडी के रग से अपने पाप श्रेष्ठतर समझने के मिथ्याभिमान को छोडना होगा। नतिकता , वण-प ने मामले मे दुहरी नीति के मानदण्ड काम में नहीं लाए जा सकते। यही कारण है कि दक्षिण अमेरिका के नीग्रो सत्याग्रहियो न अपने अधिकारो को मनवाने मे गाधी जी के सत्याग्रह के साधनो का उपयोग किया। और वस बहिष्कार और स्कूलो मे, कालिजो में प्रवेश प्रादि मामला मवे मफल भी हुए। डा० मार्टिन लूथर किंग जैसे मातिवादी नेता न अपने ग्रय मे गाधी जी के लेखो से और ग्रयो से प्रेरणा प्राप्त करने की वान लिखी है। शुरू शुरू मे अमेरिका में भी इम अहिंसक पद्धति दे मग्राम के विपय मे स देह और उपहास का वातावरण रहा। परन्तु धीरे धीरे इस पद्धति को महत्ता और श्रेष्ठता समझ मे पाने लगी। एव पोर अधे वण विद्वेप से प्रेरित कू- कस-क्लैन जैसी भयानक हिंसक गुप्त जमातें थी जो काले मादमी को जिदा जलाने (लिचिंग) में विश्वास करती थी, और दूसरी ओर कानून भी 'कालो' के बहुन अनुकूल नही था। ऐसी स्थिति में वर्ण-द्वेप की इम अति कठिन गुयी को सुलझाने में गाधीजी का समझौता, वात- चौत, हृदय-परिवतन, पच फैमले वानामाग ही मर्वोत्तम माना गया। भारत में भी यरवदा जेल मे गाधी जी के उपदाम और प्रतत डा० भीमराव अम्बेडकर और गांधोनी के बीच मे समन्वय मे जोहन दलितो और हरिजना के विषय में निकाला गया वह इसी बात वा द्योतक है कि ऐसे प्रश्न जो कई सदियो में प्रादतो के रुप मे रक्त में रचे रहते हैं, उनका समाधान यात्रिय टग मे रातोरात नहीं पाया जा मक्ता। उमरे लिए दोनो पक्षो को कुछ झवने और एक-दूमरे वा मममन के लिए तैयार होना पडता है। हमारे देश में भी लियो- पान्डविल या मनीका में घटित हिंसाधित घटनामो की तरह वण- दणदूप द्वेप के अन्याय और अत्याचार के विरोध में हिंसा का आश्रय लेकर गुत्थी को सुलझाने के वदो गाठ को काट फेंकने के उपाय मुझाने वाले कुछ अधीर और युद्ध नेताजन हैं ! परतु इतिहास का गभीर अध्ययन जिसने किया होगा वह जानेगा कि वर्षों के सस्कार, ऐसे जातिकारी उपायो से जो मिटा देना चाहते हैं, वहीं दूसरे देशा में मी प्रजाति के सस्कार फिर स उभी है और पुनर्नाजीवाद की तरह या 'जायनिम की तरह रस और चीन जमे प्रजातिवाद म विश्वास न करने वाले माम्यवादी देश में भी यहदियो पर अत्याचार के स्मारक 'यावी यार' में क्या नही निर्मित किए गए एसो शिकायत नए वधि करने लग है। और मात्रा के राजनतिक विचारा मे पुराने माम तवादी और उच्च वर्णीय सस्कारा की बू कुछ मालाचको ने पाई है। इसका अथ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य में यह ऊँच नीच क पीढियो और सहस्रको से चले आ रहे मस्कार भी पूरी तरह मिट हो नहीं सकेंगे। ऐमा मानना भूल से भरा होगा। मनुष्य जाति के भविष्य के प्रति ऐसा निराशावाद गाधी म नहीं था। उन्होन बण- द्वेष के बारे में अपने पत्र में लिखा था (१) 'यग इण्डिया' में १२-११-१९३१ को 'मोद्योगीकरण' के बारे में लिखते हुए गांधी जी ने कहा था, 'क्या तुम सारी स्थिति को ट्रजेडी नही देखते ? हम ता तीस करोड बेकारा के लिए काम जुटा लें, पर इग्लड का अपने तीस लास वेकारो लिए काम न मिले, और वहा वेवारी की समस्या ऐमी विकट हो जाय कि इग्लर के अच्छे अच्छे बुद्धिमानों को भी हल न मिल सके । औद्योगीकरण का भविष्य अधकारपूर्ण है।

६७ दाटेप इग्लड के साथ सपन स्पर्धा करने वाले देश हैं अमेरिका, जापान, फास, जमनी। भारत की मुट्ठीभर मिलो में उमे होड लेने वाले नजर पात है, और अब जैसे भारत मे जागृति पाई है दक्षिण अफ्रीका में भी जागनि पायेगी और उसके पास तो प्राकृतिक खनिज और मानवी तीना प्रसार के कही अधिक समृद्ध उपकरण हैं, अफ्रीका की वमान प्रजातियों के प्रागे शक्तिशाली अग्रेज यान-म लगते हैं। अमोकियो के लिए शायद प्राप वह व पडे सद्गुणी जगली लोग हैं। मदगुणो वे अवश्य हैं, पर जगली नहीं हैं । कुछ वर्षों के बाद पश्चिम के राष्ट्रा को पता चल जायगा कि मीका को वे अपना हर तरह का मान जमा करने का गोदाम नहीं बना सकेंगे।" इस प्रकार मापी जा वन-देप और उमपर आधारित माम्राज्य विस्तारवाद का मून पार्थिव गोषण मानते थे, जिसपर कुछ विचार प्राने अध्याय मे होगा। (0) हरिजन' म २३-२-१६४७ को एक प्रश्न के उत्तर म 'ट्रस्टीगिप' मिदात पर लिखते हुए उन्हनि कहा था, "परमात्मा सवाक्तिमान है और वह चीजें बटारवर नहीं रखता। यही वात पादमी भी मोमे पोर इस तरह मे ट्रन्टी (विश्वस्त) का सिदान्त माम कानून वन जाय । यह सिद्धात दुनिया को भारत में मिले। ऐसा होने पर कोई शापण नहीं होगा। आस्ट्रेलिया और अन्य देशों मदेवल गारे लागा के लिए सुरक्षित प्रदेश' नहीं रही। इन रग- भेदी के कारण ऐम युद्ध हांगे जो सम्पनि के उत्तरापिकारिया के बीच होने वाली लडाइयो से अधिक भयानक हाग । मान-मानव की समानता का सिदान, जैसा कि कुछ पश्चिम वण द्वेष के विचारक हमे बताना चाहते हैं, १८वी मदी की मास की शान्ति 'बाद या बीमवी शती को रूसी कानि के बाद ही दुनिया में नही प्रचलित हुा । बहुत पहले से प्राय सभी धर्मा में सब मनुष्यो को परमात्मा के एक मे पुत्र माना गया है । महाभारत मे लिखा है कि 'मनुष्य से बढकर काई धम नही' और वही ची ठाकुर नामक बगाली सत कवि ने गाया था, "सवार अपर मानुष सत्य ताहार ऊपर नेइ।" सार सेवा और त्याग प्रादश जो प्राचीन और मध्य- युगीन महापुरुपो ने कृति वचन और विचारो द्वारा उपस्थित विये, उनके पीछे रही मानवतावादी सिद्धात था। इसी सिद्धात के पारण असीसी के ईसाई सत झामिस ने काहियो की सेवा की। और गाधी जी ने सेवाग्राम में परचुरे शास्त्री को सेवा अपने हाथो से की। मानवतावाद एक प्राचीन सिद्धात है। मानवतावाद ने धामिन मागवतावाद से सामाजिक मानवता वाद का रूम मध्य युग मे ग्रहण किया, जर दुनिया के कृषि प्रधान ममाज नगर प्रधान होने लगे। सारी यूनानी चित्ताधारा इसी 'सिविटास' (नागरिकता ) के पास पास चक्कर काटती है। नैतिकता की धुरी नागरिक या मामाजिक द्वारा मायना बन गई। जिसमें प्रतिष्ठा और अप्रतिष्ठा के मान निवते । भारत में मामत काल मे राजा, सामत सरदार मेनाधिकारी प्रादि राजन्य को महत्व दिया जाने लगा। भूमि की रक्षा प्रधान हो गई। और ब्राह्मण, पुरोहित, पडित आदि गम परामसदातानो की वाणी ही काफी नहीं मानी गई। गापादपि शरादपि का विधान प्राया, परन्तु मानव को हेयता देवल युद्ध में पराजित जातियो, या यदियो और गुलामो वण द्वेष ६६ के व्यापारो मे पथ्य-वस्तुओ की तरह मानने से ही नहीं मिली। स्त्री और शूद्र के लिए वेदाध्ययन की मनाई कर दी गई। धीरे धीरे समाज पई सण्डो मे विच्छिन और विजडित होने लगा। परिणाम यह हुआ कि मानव-मानव की जन्मना समानता के औपनिपदिक- सत्यकाम जावाल की कथा वाले-सिद्धात की अवमानता होने, लगो। प्रौद्योगिक परिवतनो के बाद यह समस्या और भी तीव्रतर हो गई। अथ-साम्य की समस्या दुनिया के लिए एक विपम रोग वन गई । उसका विचार अगले अध्याय मै विस्तार से होगा। परतु भारत मे श्रोद्योगीकरण एक वरदान सिद्ध हुआ। उससे जातिभेद की जकडन कम हुई 1 "जाति मारिलो तीन सेने। स्टेशने, विल्सन, केशवसेने ।।" यह कहावत वगाल मे आम प्रचलित हुई। महानगरी में पीर उद्योग-के द्रो में श्रमिक आर जुटने लगे। उनकी जात पात का प्रश्न गोण हो गया। निर्माण-वाय मे दूर-दराज से मजदूर न केवल चाय या काफी बागान म, पर सड और भवनो के बनाने मे और सदानो में मोर कारखानो में जुटने लगे। परतु इसमे से एक और प्रकार की विषमता निर्मित हो गई जमीदार और विसान वाली विषमता तो ज़मीदारी-उमूलन नियम ने नष्ट कर दी, महाराजामो का भी विलयन हो गया, पर बडे-बडे उद्योगपति- पूजोपति और सामाय मजदूर-वसकर के वीव की प्राय की बाई बढती गई। इस वर्ग विग्रह ने नई जातियां पैदा कर दी। स्वराज्य के बाद जातिभेद मिटाने के बहुत पत्न, सरखारी और गैर-सरकारी तरीके पर किये गय । मतोहार के लिए शिक्षा के क्षेत्र में वा-ट्रेप के क्षेत्र म, बहुत कुछ किया गया। फिर भी यह साहसपूवन नही कहा जा सकता कि यह सब प्रश्न मिट गए हैं। शहा मे कुछ हालत मुघरी है, पर गाँव देहात म अप भी सबों और हरिजनों के कुए अलग अलग है। जब अपनी ही दशा ऐसी हो, तब ससार को उपदेश देने की बात पहने जाना बडवोल मात्र है। 'परोपदेशे पाडिन्यम।" 'पर उपदेश सुसल बहुतेरे' (तुलसीदास), 'लाका सागे ब्रह्मनान । स्वत कार पापाण ॥' (तुकाराम) ऐसी बातो का असर कम पडता है जहा हम जो कहते हैं वह खुद करते नहीं। वणद्वेष को माग अफ्रीका में, दक्षिण अमेरिका में गौरी दुनिया में बहुत जगह वरावर जल रही है। भारत में उसका रूप वर्णाधित यानी दाले और गारे रग-भेद पर निभर नही है । महा उप जातियां उप जातियो से लडती हैं। और एशिया के कुछ देशा में और दक्षिण अफ्रीका मे भी भारतीयों को पुन भारत वापिस भेजने के आदोलन हो रहे हैं। ऐसी विचलनशील स्थिति मे, ममार म, यदि प्रजातियो प्रजातियों के बीच शान्ति प्रस्थापित करनी हो तो पुन वही माग उचित जान पड़ता है, जो गांधी जी ने सुझाया यह मार्ग इसलिए सही है कि वह वैनानिक मानवतावाद और धार्मिक मानवतावाद का समन्वय है। उसम मानवी विभेद जी जमना है.जैसे चमडी का रग या अय कई शारीरिक लक्षण- उह मानकर चलने की बात है। उनके माधार पर किसीको श्रेष्ठतर या हीनतर कसे माना जा सकता है --क्या हरी या भूरी भासे काली माता से कम या अधिक देखती दूप-वण 7 हैं ? -क्या सुनहरे या भूरे बाल काले बालो से कम या अधिक सुदर हाते हैं -क्या चिपटी नाक या लम्बी नाक के कारण घ्राण शक्ति मे कोई कमी या अधिक्ता होती है ? -क्या ऊँचे या ठिगने कद के कारण मनुष्य को अच्छी बुरी प्रवृत्तियो मे फक आ जाता है ? -क्या अोठ पतले या मोट होने से या वाल सीधे या घुघराले होने से मनुष्य को मानवता में कोई अतर होता है ? यह सव शारीरिक अतर जो जम ने अनविच्छिन्न रूप से मनुष्य के साथ लगे रहते हैं, उनका कोई इलाज नहीं है। और चमही का रा बदल जाने से मनुष्य के विचार विचार नहीं बदल जाते। प्रत गायो जो ने इस समस्या को जड को पक्डा। उहोने उसीपर प्रहार किया। जाम से विसो भी व्यक्ति को दूसरे से अपने आपको थेष्ठ मानने का कोई अधिकार नही । इसी बात को उहोन दुहरा- कर कहा और उसके लिए जीवन मे बहुत सहन भी किया। पूना में सनातनियों ने उनकी मोटर पर पत्थर फेंके, विनोगा को देवघर मे लाठी खानी पड़ी और ऐसे मय कई उदाहरण हैं। वण-द्वैप का सिद्धात आज की दुनिया मे किसी भी विना पर टिक नहीं सकता। न माध्यात्मिक, न भौतिव, न ऐतिहासिक, न सामाजिक क्सिी तक से उमका समथन मसभव है। १० माच, १६१५ को दक्षिण अफ्रीका से लौटकर घीजी जाति- निपेतन पहुचे । उहोंने रवीद्रनाय वै शातिनिवेतन मे और तो सर वण-द्वप बातों को खूब सराहा, पर भोजन के लिए बैठे हुए लोगा की अलग अलग पक्तियां उनकी समझ में नहीं पाई। रवी द्रनाथ ने कहा, 'हम उच्च वर्णीयो पर कोई वाध्यता नही डालना चाहते।" पर महात्मा जी को वह अच्छा नहीं लगा। अब १० माच को गाधी-पुण्य नाम से वह दिन शातिनिकेतन मे पाज भी मनाया जाता है, जब सब सफाई करने वाले, झाडू वाले, वतन वाले आदि छुट्टी पर जाते है। और माधम के विद्यार्थी सब मिलकर अपना काम खुद करते है। केवल एक दिन का प्रतीकात्मक गाँधी-स्मरण अपने-अापम चाह अच्छा हो, बहुत व्यापक परिमाण पर इस देश मे स्वावलवन और श्रम को प्रतिष्ठा का आ दोलन जरूरी है। गाधी शताब्दी मे हम इस देश में सचमुच भगी-मुक्ति पा जाएं तो बडी बात होगी। सो प्रध्याय अर्थ-साम्य प्राज यदि कोई समारव्यापी विषम समस्या विराट रूप मे उलमी हुई बन गई है तो वह है राष्ट्रो और राष्ट्रो के बीच में पार्थिव प्रसतुलन । कुछ राष्ट्र दाता हैं, कुछ याचक । और फिर राष्ट्री-राष्ट्रो की व्यापार-उद्यागादि क्षेत्रो में प्रार्थिक समस्याएं हल परने के टग और तरी भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। कुछ मुक्त व्यापार में विश्वास करते हैं कुछ राज्य नियत्रित व्यापार म । कही व्यापार राजनीति से अनुशासित है कही नहीं। फिर एक ही राष्ट्र के भीतर भी अनेक प्रार्थिक पद्धतियां हैं कहीं सोवरपोज (सामूहिक कृषि के काम) हैं, वही 'पम्यून', दही 'वियुन्म' । यही सहकारिता पर जोर है तो वही परपरा पर । कही कृपि-प्रधानता पर, वही उद्योग-प्रधानता पर । ऐसी स्थिति में यह पाशा करना कि सार देश एक ही प्रादा का पालन करेंगे, 'गूलर के फूल' की तरह वध की माशा और तलाश है। फिर भी यह जब हम देखते हैं कि गाची जी ने जिम ग्राम दिनम्बराज्य का म्वप्न देखा था, और जिन मादा अय-नीतियो पी वा उन्होंने बार बार कही, उनमे कहीं बहुत गहरी मौर गारवल मचाई है। ममार को कई विषमतामो के लिए वह ७४ अथ-साम्य भादश और वह दिशा-दशन बहुत काम का है। इसी दृष्टि से नीचे कुछ बातें उनके जीवन और विचारो से देने का यत्न किया जा रहा पचगणी में जुलाई १६४६ अतिम सप्ताह में लुई फिशर की गाधो जी से जो बातचीत हुई, जिसका व्यौरा प्यारेलाल जी ने ४८ १६४६ वे 'हरिजन में दिया था, उससे यह चर्चा शुरू करना चाहता हूँ गांधी जी ने कहा-'हमारे समाजवादी भाइयो को त्याग और सेवा की भावना के लिए मेरे मन मे बहुत प्रासा भावना है, फिर भी मैंन उनके और मेरे तरीका में जा तीसरा अतर है उसे कभी नही छिपाया है। वे तो स्पष्टत सुले आम हिंसा म विश्वास करते हैं और उसके साथ जो कुछ भी उसमे छिपा है उसम भी। मैं अहिंसा में पूरी तरह विश्वास करता हूँ।' इससे चर्चा समाजवाद की ओर मुडी। फिशर न बीच मे बात कारत हुए कहा, 'तो वे भी समाजवादी हैं और आप भी हैं ?' · गाधी जी ने उत्तर दिया, 'मैं हूँ, वे नहीं हैं । उनमे से बहुत-से नही जनमे थे तव का में समाजवादी हूँ। जाहा नसवग मे एक कट्टर समाजवादी की नजर में भी समाजवादी था। पर वह वात तो प्रब न यहा की है न वहा की। मेरी बात ता तव भी रहगी जव ममाज- बाद भी नही रहेगा। आपने समाजवाद का क्या मतलब है ?" "मेरे समाजवाद का अथ है 'अतिम व्यक्ति तक भी' या सर्वोदय । मैं अधा, पहरो और गूगो की राख पर नहीं खडा होना ७५ अयम्माम्म चाहता । उनले समाजवाद मे, शायद इन लोगो के लिए कोई स्थान नही है। उनका एकमात्र उद्देश्य है भौतिक पगति । उदाहरणार्य अमेरिका चाहता है कि हर नागरिक के पास एक कार हो जाये । में नहीं चाहता। मैं तो अपने व्यक्ति व के पूरे विकास के साधन चाहता हूं। अगर मैं चाद तक सीढिया बनाना चाहूँ तो उसकी मुझे म्वतत्रता होनी चाहिए । इसका मतलब यह नहीं है कि मैं ऐसा कुछ करना चाहता हूँ। उम तरह के समाजवाद में कोई व्यक्तिगत स्वतनता नही है। वहा तो तुम्हारे पास किसी चीज़ पर अधिकार नही । अपने गरीर पर नी नहीं।' 'मेरे और उनके ममाजवाद मे यह फ्क है । मेरे समाजवाद में यह हागा कि सरकार किसी चीन पर कोई अधिकार या सत्ता नहीं रमेगी। रूम मे तो राज्य हो सवसत्ताधारी है। वहा तो आप कोई गुमराह न करें तो भी सुनता है, किसी भी समय आप गिरफ्तार हो जा मक्त हो। वहा पापको चाहे जहा भेज दे सकते हैं।' क्या प्रापवे पादा समाजवाद में, राज्य वच्चो को शिक्षित परने का यत्न नही करेगा?" "सभी राज्य करते हैं। अमेरिका भी।' " तो ममेरिया स्म मे बहुत मिन नहीं है।' असल में माप तानाशाही के विरुद्ध हैं।' " 'ममानवाद तो तानाशाही है या फिर पारामकुर्मी का दर्शन- मान है।" ऐसी यह बातचीत चलती रहो जिसमे गांधी जी ने समाजवाद मौर साम्यवाद के मिश्रण को भी बात की । लुई पिशर ने स्वीकार " प्रध-चाम्प किया कि माक्स वे मूल सिद्धातो का पहले लेनिन ने काति द्वारा जमीन पर उतारा, और बाद मे स्तालिन ने और भी उह विकृत कर दिया। और इस प्रतिया मे मूल उद्देश्य से समाजवाद दूर-दूर होता चला गया-ठीक जैसे धम अपने मूल स्थान से बदलकर सढियो मे जकड जाता है। मानव समता की बात सभी घरते है। पर क्या वह सभव है ? और सभव भी हो तो कहां तक ? गाधी जी यमो के विरुद्ध थे, ऐसा भी एक प्रवाद फैलाया गया है पर वे मोटर, रेल, घडी, टेलीफोन, माइप्रोफान, मीन की मशीन श्रादि का उपयोग करते थे। बाइसिकल के भी वे विरुद्ध नहीं थे। वस्तुत वे मशीन के गलत उपयोग के विरुद्ध थे। वे यायिक्तावे विरुद्ध थे। मक्म वैवर ने अपने समाजशास्त्र के ग्रथो में लिखा है कि काल माक्स अपने वग-विग्रह मिटाने के लिए व्यापक प्रोद्योगीकरण के सिद्धात के प्रचार के जाश मे भूल गया कि यत्रा के साथ जो फुरसत आयेगी, जो इफरात से उत्पादन होगा उसमें मनुष्य कसे अकेला पडता चला जायेगा ? यह प्रात्म-निवासन उसके लिए शाप की तरह सिद्ध होगा। गाधी जी ने इसी बात को माप लिया था । और इसीलिए उहोने 'मनुष्य और मगीन' के सिलसिले में - पहा था मैं तो बिना किसी हिचकिचाहट से ददनापूवर कहूँगा कि दुनिया म 'मास प्रोडक्शन' (विशाल परिमाण पर उत्पादन) का पागलपन ही भाजबी दुनिया के सारे सक्टो का मूल है। यह भी मैं क्षण भर मान लू कि मशीन से सारी मानव जाति की सब जहरतें पूरी को ७७ प्रय-माम्ब जा सकेंगी, फिर भी उससे उत्पादन कुछ ही क्षेत्रो मे केन्द्रित हो जायगा । और फिर वितरण को नियन्त्रित करने के लिए उलटे और व्यवस्था करनी पडेगी। यदि उत्पादन और वितरण, अपने-अपने क्षेत्रो म आवश्यक्तानुमार स्वय नियत्रित होते चलें तो फिर अप्रामाणिक्ता को और सट्टेबाजी को प्रश्रय नहीं मिल सकेगा।" वस्तुत मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोपण न हो यह सिद्धात अस्तेय व्रत पर निभर है । वेदा में कहा गया है- मोधमत्र विदते अग्रता सत्य ब्रवीमि वघउत् त तस्य । न अर्थमण पुप्पति तो मग्वाय देवलापो भवति केवलादी । (अय-मकुचित दृष्टि वाले मनुष्य को मिली हुई धनराशि व्यथ है। उसके घर मे वह राशि नहीं सचित है, बल्कि उमका मरण सचित है। जो भाई-बहन को नहीं देता, सुपात को नहीं देता और केवल अपने तक ही देख पाता है, ऐमा आदमी पापम्प मम्पदा के दो पक्ष हाते हैं। वह व्यक्ति जो बिना परिथम क्येि जमा करता है और केवल जमा ही करता जाता है, क्सिीको नहीं देता, वह एक प्रकार में चोरी करता है, ऐसी चोरी मे वचना चाहिए। अम्नेय का मतलर है चोरी न करना। मम्पदा का दूसरा पक्ष लोम है। अर्यात् जितना आवश्यक हो उससे अधिक की कामना करना। लालची पादमी का कभी भला नहीं हाता। ईशावास्योपनिषद् का यह मत्र गांधी जी ने 0 प्रय-माम्य मन फासिस्को मे १६०३ मे व्याख्यान देते हुए स्वामी विवकानद ने एक दृष्टान दिया था "एक बार तालाव और नदी में एक बहस हिड गयी थी। तालाव ने नदी से कहा-'यो नदी, त् अपनी जल रूपी सपत्ति समुद्र को क्यो जारर देती है ? यह क्तिनी मुर्सता को बात है कि अपनी सम्पदा को तू समुद्र को इस तरह तुटा देती है। जबपि से तेरी सम्पत्ति की वित्वुल प्रावश्यक्ता नहीं है । समुद्र से अधिन कृतघ्न कौन होगा? इष्ट से सगृहीत अपने मीठे जल का कोप तू उसके मुंह में उँडेल भी दे तो क्या होगा? इसका खारापन जरा भी कम नहीं होगा। इसलिए अपनी सम्पत्ति का अपव्यय न कर तू उसका सचय कर।' नदी ने उत्तर दिया, 'मैं पल को या परिणाम की बात ही नहीं सोचती। मुझे या अपयक्ष की भी चिता नहीं। मुझे केवल कम करते रहना अभीष्ट है। यम के लिए कम मेरा वादा है। सतत उद्योग मेरा ध्येय है। मेरी मात्मा भूतिम त क्तृत्व से भरी है।' " इस प्रकार में नदी अपना काम करती रही । मैकडा हजारो, लाखो क्लश जल उसने समुद्र को दिया । तीन-चार महीने तक यही म चलता रहा। इस बीच उस बजूस तालाब का पानी सूख गया। तले का कीचड सड़ गया और उससे दुर्गाघ भाने लगी। उसके पास लोगो ने ग्राना तक ब द कर दिया । परतु नदी का पानी अनवरत बहता रहा । क्योकि उसमे बारह मास बहने वाली धाराएँ अपना काम कर रही थी। समुद्र तल मे माप के रूप में पानी पीचने का पाम सूर्य की किरणे करती जा रही थी और उह मेघ मे परिणत रने वर्षा मे बरसाती जा रही थी। इस प्रकार नदी का रिक्त ८१ मथ-साम्य स्थान बरावर भरता गया और नदी अपना काम करती रही।" दान का ऐसा ही क्रम सम्पत्ति के बारे मे भी मच है । समाज में यदि अथ-चक का चकनेमिनम इस तरह से न चलता रहे तो समाज की भी दशा उमी सडे तालाव की तरह हो जाएगी। अथ के जो विवित्र उपकरण हैं उनमे उनका रमण, निर तर अभिसरण, बहुत आवश्यक है। यदि वह केवल जमा होता गया तो उतना ही बेकार होगा जितना कि भूस्तर मे दवा हुआ धन, जो कोयले मे परिणत हो जाता है। जैसे मानव शरीर में रक्त बराबर धमनियो मे न दौडता रहे और एक जगह कहीं रुक जाये तो रोग होने की सम्भावना होती है, ठीक वही बात अथ के बारे मे सही है। अर्थोत्पादन की प्रत्येक सीढी के बारे मे गाधी जी के विचार उपयोगी हो सकते हैं उत्पादन, वितरण, विनियम, उपभोग-सभी क्षेत्रा मे । पैता मे उपज की ही वात लें तो गाधी जी जीवनोपयोगी पावश्यक वस्तुओ की कृपि के पक्ष मे थे, केवल नगद मुनाफा दिलाने वाली पैदाइश या 'कश प्रॉप' के पक्ष मे नही थे । तमाखू या अफीम की खेती से ज्यादा मुनाफा होता है तो उसीको बो रहे है, चावल या गेहे के लिये विदेशो के आगे हाथ पसार रहे है, यह बात गाची जी पसद नहीं करते थे। गाने या कपास की उपज में भी ध्यान विदशी मुद्राजन पर रसने की बात उनकी समझ में नहीं प्राती थी। कृषि म वे प्रात्म-निभरता को प्राथमिकता देना चाहते थे। घन और वस्त्र में स्वावलम्बन पर जोर देने से गाधी जी दस्त- कारी या हस्तोद्योग को महत्त्व देते थे। वे तन्तु-मिस व्यव.

प्रय साम्य दूसरा तक यह पश किया जाता है कि कानून से भी कोई दृस्टी यदि नियुक्त हो, जैसे नाबालिग की सम्पनि को दख-भान करने के लिए कोई व्यक्ति तो क्या गारण्टी है कि यह विश्वस्त' या टम्टी कोई गोलमाल न कर बैठे ऐसे प्राक्षेपक-जिनमे सोवियत रूस पीएनसाइक्लोपीडिया के प्रथम खण्ड के लेखक या उनके भारतीय परामरादाता भी थे-~~यह मानते है कि गाधी जी महाराजा, जमी दार पूजीपति वग के प्रच्छन्न सक्थक थे। और उन्होने एक प्रकार से उन पिका' का ममथन दिया। यह भी कहा जाता रहा है कि गाधी जी वर्गाधिष्ठित व्यक्ति के वर्गीय स्वार्थों को नहीं देख पात ये या महत्त्व नही देत थे, और उसकी वैयक्तिक सादगी या सद्भा- वना आदि को ही महत्त्व दत ये। ये सब नर क्तिन निराधार है, यह गाधी जी के लखन को जिसन गौर से पढ़ा है, वह जानता है। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना के अवसर पर गाधी जी का वह ऐतिहासिक भाषण, जिम एनी बेसेंट को रोकना पडा, महा- राजामा की स्तुति म नहीं था, पार न अहमदाबाद की प्रसिद्ध हडताल के समय उनका भाषण और उपवास पूजीपतियो या मिला मालिका के अनुकूल था। जमीदागे के अत्याचारो के खिलाफ ता पूरा दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह अभियान और चपारन म और सैडा म और पारडोली म किय गए क्सिान-सत्याग्रह थे। १९३६ मे किशोरीलाल ५० मश्रूवाला ने गांधीवाद से समाज. चाद' नामक एक समाला लिसी थी, जिसे स्वय गाधी जी ने समोर धित किया था। इसमे का प्रस'ट्रस्टी' मिडात को स्पष्ट करेगा। 'गाधीवाद समाजवाद के बीच सारे विरोध वितडावाद के भूल म निजी संपत्ति पर अधिकार की समस्या है। गाधी जो निजी मपत्ति के अधिकार की स्वतयता रखने के पक्ष में नहीं थे । उन्हे अभी तक उमे पूरी तरह नष्ट करने का कोई अहिंसर उपाय समझ में नहीं पाया। मारे समाजवादी मानते है कि मपत्ति का अधिकार समाज और मनुष्यजाति को सुसी बनाने के लिए आवश्यक है । गाँधी जी इस स्थिति को नही मानते । ये ऐसा मोचते हैं कि एक ऐमी पादश स्थिति भी पा सकती है जव मनुष्य मे से यह 'मम्पत्ति पर अधिकार' चाली विस पूरी तरह नष्ट हो जाए। परतु व्यावहारिक स्तर पर, उहे लगता है कि ग्राज तो सारी मानव जाति इस बात को जल्दा से पूरी तरह छोड देने वाली नहीं है । तो ऐसी स्थिति में देग्वना यही है कि यह सपत्ति पर अधिकार तो रहे पर वह वाधक न हो, इसके लिए क्या किया जाए ? जो भी व्यक्ति सपत्ति रखे वह इस भावना से रखे कि वह समाज के लिए वेवल एक 'ट्रम्टो के नाते उमे रख रहा है। इससे भिन कोई समाधान अभी तो नजर नहीं पाता।" गाधी जी के प्रथं साम्य के सिद्धातो मे दम्तवारी या हस्तोद्योगा के स्थान पर भी पश्चिम मे बहुत बल चलनी रहती है। विमकासिन युनिवर्सिटी म जव में गाधी-दान पर एक कोस दो साल तक पढाता था, तब अमेरिकी छात्र छात्रामा की ओर से बार-बार यह तक उठाया जाता था वि प्रौद्योगिर सभ्यतामो वे विकास में 'अनिवार्य चुराई' के रूप में हिंसा का कुछ अदा तो मानना ही होगा। जैसे मकान बनाते समझ, कुछ यत्रो की आवाज उठेगी और धूल तो उडेगी ही। भारत प्रोद्योगीकरण कर रहा है और उसमे वह उन सब बाजी मे से बच पायेगा, जिनमें पश्चिम रे महानगर ग्रस्त हैं?

CE मय-साम्य इस मामले में गांधी ने अपने मन को मुक्त रखा था। चाह मय शास्त्र हो या राजनीति, धम अध्यात्म हो या नास्तिकता बम विरोध, गाधी जी ने इन सब प्रश्नो पर रहुत गहाई स विचार और मनन क्यिा था, एक निपुण भारतीय किसान या मजदूर की दृष्टि को अपना कर । क्तिना कुछ विदशा विचारधारमा म स हम गाह्म है, कितना हमारे अनुकूल है इन सब वाता पर उन्हान काफी ध्यान दिया था, ऐसा लगता है। इसलिए उनकी बात न कवल भारत में कई वर्षों ता सही रहेगी पर दुनिया में अय दशा का भी उनसे बहुत कुछ सीखने और यहण करने योग्य मिलगा, ऐमा भी कहा जा सकता है अथात् उतनी ही मात्रा में जितना भारत के और अय देशो के बीच मानवी परपरा और प्रगति के बीच समा यताएं साम्य या समता शब्द एक्स्पना का पर्यायवाचो नहीं मान लेना चाहिए। जो बात अमेरिको के लिए उचित होगी, वह ज्या की त्यो हर भारतीय के लिए भी होगी, यह मानना उतना ही भ्रमपूण है जितना कि जो वात हर उसी के लिए उचित होगी वह ज्या की त्यो हर भारतीय के लिए भी उचित होगी यह मानना । यह दाना मान्यताएँ मनुष्य स्वभाव के यात्रिय और जडमनोविज्ञान पर आधारित हैं। मनुष्य अपने स्थल-काल परिवेश की भौतिक उपज होता है, उतना ही उसका चितन-भावन सस्कारो की उपज के साथ साथ, उसके अपने परिवेश से जुडे सम्बधो और उसे बदल सक्न की क्षमतामो पर निभर रहता है। एक आदिवासी या दुनिया की वैज्ञानिक प्रगति से कटा हुमा एक तिब्बती या अफ्रीकी वही अधिर ।

८E मत्तामानुस या सत्प्रवृत इनसान हो सकता है, और एक सारी सुख सुविधामा मे पलने वाला प्राधुनिकतम व्यक्ति भी अत्यत स्वार्थी और प्रसत प्रयोजनो से कम करने वाला हो सकता है। मनुष्य की अच्छाई-बुराई का मानदण्ड केवल उसके आसपास के भौतिक साधना को सख्या या गुण मान लेना, मनुष्य के साथ अयाय करना है। गाधी जी ने इस बात को अपने जीवन में घटित किया और प्रत्येक कम और वचन मे उसे सिद्ध किया। वस्तुत सारी लडाई मनुष्य के बाह्य से उसके प्रान्तर जीवन को जाचने से शुरू होती है। मनुष्य के वाह्य का उसके प्रान्तर जीवन पर परिणाम इतना सहज, गणितीय ढग से नहीं हो जाता। जिन एशियाई छोटे देशों में अमेरिका ने बहुत डालर-वर्षा 'एड' (सहायता) के रूप मे की, वे सबवे सब अमेरिका के अनुयायी या अमेरिकी विचारो मे प्रभावित हो ही गए, यह वात हाल की घटनामो से तो सिद्ध नहीं होती। कम्युनिस्ट होने से पहले चीन या नाटो का सदस्य पाकिस्तान इसने उत्तम उदाहरण हैं । लामोस के बारे में यह मजाक अमेरिकी पत्र 'टाइम' ने ही छापा था कि वहा को वापिर मामदनी से अधिक इमदाद अमेरिका ने दी। परिणाम यह नहीं हुमा मि लामोसी लोग अधिष प्रात्मनिभर हो गए या मधिर परिश्रमी होकर राड बनाने लगे या धान की खेती में उन्होंने कोई सुधार दिए । वल्कि हुमा पह कि लामोसी सोग अधिक अपोम लेने लगे। मनुष्य मे यह स्वाभाविक है कि वह परिथम से वचता है, परिवतन से बचता है, और पधिकाधिक पाराम चाहना है। क्या यह प्रवृत्ति अमेरिका या इस मामले में गांधी ने अपने मन को मुक्त रसा था। चाह अय शास्त्र हो या राजनीति, धर्म अध्यात्म हो या नास्तिकता बम विरोध, गांधी जी ने इन सब प्रश्ना पर बहुत गहराई से विचार और मनन किया था, एक निपुण भारतीय किसान या मजदूर की दृष्टि को अपना कर । कितना कुछ विदेशो विचारधारा मै स हम ग्राह्य है, कितना हमारे अनुकूल है इन सब बाता पर उहान काफी ध्यान दिया था, ऐसा लगता है। इसलिए उनकी बाते न केवल भारत मे कई वर्षों तक मही रहगी पर दुनिया के अय दशा का भी उनसे बहुत कुछ सीखने और ग्रहण करने योग्य मिलगा, एसा भी कहा जा सकता है अर्थात् उतनी ही मात्रा म जितना भारत के और अन्य देशो के बीच मानवी परपरा और प्रगति के बीच समायताएँ माम्य या समता शब्द एकरूपता का पयायवाची नही मान लेना चाहिए। जो बात अमेरिकी के लिए उचित होगी वह ज्या की त्यो हर भारतीय के लिए भी होगी, यह मानना उतना ही भ्रमपूण है जितना कि जो बात हर स्सी के लिए उचित होगी, वह ज्या की त्या हर भारतीय के लिए नी उचित होगी, यह मानना । यह दानों मा यताएँ मनुष्य-स्वभाव के यात्रिक और जडमनोविज्ञान पर आधारित हैं। मनुष्य अपने स्थल-बाल परिवेश को भौतिक उपज होता है, उतना ही उसका चितन-भावन सस्कार की उपज के साथ साथ, उसने अपने परिवेश से जुड़े सम्बचो और उसे बदल सकने की क्षमतामा पर निभर रहता है। एक आदिवामी या दुनिया की वज्ञानिय प्रगति से बटा हुआ एक तिब्बती या अझीको वही अधिष ..

८६ भलामानुस या मत्प्रवृत इनसान हो सकता है, और एक सारी सुख सुविधामो मे पलने वाला प्राधुनिक्तम व्यक्ति भी अत्यत म्वार्थी पौर असत प्रयोजनो से कम करने वाला हो सकता है। मनुष्य की अच्छाई-बुराई का मानदण्ड केवल उसके आसपास के भौतिक सायना को सख्या या गुण मान लेना, मनुष्य के साथ अयाय करना है। गांधी जी ने इस बात को अपने जीवन में घटित किया और प्रत्येक कमनौर वचन मे उसे सिद्ध किया । वस्तुत सारी लहाई मनुष्य के बाह्य से उसके प्रान्तर जीवन को नाचने से शुरू होती है। मनुष्य के बाह्य का उसके प्रान्तर जीवन पर परिणाम इतना सहज, गणितीय ढग से नहीं हो जाता। जिन एशियाई छोटे देशो में अमेरिका ने बहुत डालर वर्षा 'एड' (सहायता) के रूप में को, वे सबके सब अमेरिका के अनुपायी या अमेरिकी विचारो मे प्रभावित हो ही गए, यह वात हाल की घटनामों से तो सिद्ध नहीं होती। कम्युनिस्ट होने से पहले चीन या नाटो का सदस्य पाकिस्तान इसवे उत्तम उदाहरण हैं । लामोस के बारे मे यह मजाक अमेरिकी पत्र 'टाइम' ने ही छापा था कि वहा को वापिस आमदनी से अधिर इमदाद अमेरिका ने दी। परिणाम यह नहीं हुमा कि तामोसी लोग अधिक प्रात्मनिभर हो गए मा भधिक परिश्रमी होकर राह बनाने लगे या धान की खेती में उहोंने कोई सुधार किए। वलि हुग्रा यह कि लामोसी लोग अधिक अपोम लेने लगे। मनुष्य में यह स्वाभाविक है कि वह परिधम से वचता है, परिवतन से बचता है, और मधिकाधिक पाराम चाहता है। क्या यह प्रवृत्ति अमेरिका या भय-साम् रूस द्वारा जादू को लकडो घुमाने से, सहसा बदल जाती है ? यूगो स्लाविया, हगरी, पोलण्ड, रूमानिया, मलवानिया भादि क्या रूस के अन्धभक्त है? क्या वहा रूस को सारी प्रय-नीतियो की पूरी पूरी समाराधना की जाती है ? तो कहने का तात्पय यह है कि प्राज को दुनिया मे कोई भी राष्ट्र, चाहे साम्राज्यवादी हो, पूजीवादी हो या साम्यवादी, यह सोचे कि वह अपनी अधिक शक्ति से-मणबम निर्मायक शस्त्र-बल, या अधिक सम्पत्ति दान की क्षमता, या भूखे नगो को रुचने वाले चटपट नारी और प्रचारतत्र से पूरी तरह किसी कमजोर राष्ट्र का 'धम परिवर्तन करा सकेगा, तो वह उसकी भूल है। साढे तीन सौ वर्षों तक पुतगाली गोमा पर कब्जा किए रहे। गोमा पुतगाल नही बन सका। डेढ सौ वर्षों से भारत पर ब्रिटेन का शासन रहा, पर भारत ब्रिटिश माचार पद्धतियोमा मजार ही उडाता रहा। दा सौ वरसो से अमेरिका क्यूबा पर रोब गालिब करता रहा, पर क्या हाम माया ठीक वहीं जो चीन का बहा मुख्य राष्ट्र, फारमोसा और ताइपेह के साथ करने पर तुला है। मानवी सम्बन्धो मे छोटे-बडे, ऊंच नीच की समस्या केवल भौतिक बल भोर सख्या से नही सुलझ सकती। माकस का सिद्धान्त नि 'सख्या से गुण बदल जाता है इतिहास न झुठला दिया है। इस प्रपार रो, मथ साम्य क्षेत्र में गांधी जी भी देन एक बहुत मसी चीज भविष्य में साबित होगी। यद्यपि अभी तक कुछ लोग उसे केवल एक प्रादशवादी को माध्यात्मिक सना कहकर टालना चाहते हैं, फिर भी धीरे-धीरे ज्या ही सतुलन विश्व के विचारो में स्थापित होगा, गांधी के विचारो का महत्त्व सबकी समझ मे प्रय-माम्य आएगा। दुनिया को यदि जोवित रहना है तो-'जियो और जीने दो' वाली गांधी-नीति हो अतन सर प्रश्नो का एकमान उत्तर होगी, जिसमे व्यक्ति को व्यक्ति के नाते पूर्ण स्वत पता होगी, जहा सामाजिक बुराइयो का समाधान या उपचार व्यक्ति से हो शुरू होगा। मूल वीज वही है आदमी नहीं सुधरेगा, तो सा वडे. वड शब्द और विशेपणो वाले 'वाद' और तन व्यथ पड रह जाएंगे। पछी ही उह गया तो पिंजरे को क्या कर लीजिएगा? चैतन्य-तत्व प्रधान है यह विदेशा मे हरोक्लाइटस से वेगमा तक, एक्वाइनस से हाइडेग्गर तक सभी मानते रहे हैं, जैसे भौतिकता के महत्व को सुलझाने का यत्न न पूर्व मे चार्वाक ने किया न क्न् फूत्सू ने, न पिल ने, न बुद्ध ने । ईशावास्योपनिषद् की बात म बहुत सचाई है कि 'सम्भूति' और 'असम्भूति' दोनो का एकान्त अनुसरण हमे पेवल अधिकार की ओर ले जाता है। आवश्यक्ता है ममन्वय की, सतुलन को, जो विवेक गोपी ने न घेवल हमे दिया, पर सारी निया को भी दिया।

अध्याय ५ आत्म-संथम स्त्री पुरुप सम्बन्धो में गांधी जी पात्म सयम को प्रधानता देते थे। बाह्य नियत्रण या सन्तति-निरोध के साधनों की अपेक्षा वे चाहते थे कि काम के प्रति मनुष्य के मूलभूत विचारो मे ही परि वतन घटित हो तो अधिक अच्छा हो। गाधी जी का सारा प्रयत्न हृदय परिवर्तन पर अाधारित था। उनसे पहले भी कई सात और सुधारक हुए, पर उन्होने स्त्री के पुरुष के साथ समानाधिकार के बारे मे उस रूप में विचार नहीं किया, जैसे गांधी जी ने किया। पुराने सन्त तो नारी को 'नरक की खान' कहकर उससे बचने का ही उपदेश देते रहे। घोर निवृत्ति-माग का उहोने प्रचार किया और पश्चिम के सम्पक के बाद राजा राम मोहन राय पडिता रमाबाई, दयान द या रानडे, गोखल, पागरकर जसे सुधारखा ने स्त्री पुरुष सम्बधा म केवल पश्चिम से लाई गई विचारधारा शिक्षा, बानूनी अधिकार, आर्थिक स्वतन्त्रता, वोट देने का हक प्रादि वातो में पुरुष के साथ सब प्रकार से तुल्य बल होने पर ही जोर दिया। परि णाम यह हुआ कि प्रवृत्ति पर ही जोर देने से नारी की मुक्ति का प्रादोलन प्रारम्भ मे यूरोप इग्लैण्ड के 'सजेट' मान्दोलन जसा भारम सयम और बाद में रस की प्रान्ति के बाद-मा बहुत कुछ अराजकवाद और स्वच्छन्दवाद में परिणत हो गया। गांधी जी ने देखा कि इन दोनो ऐकानिक मार्गों में कैसे खतरे हैं । नारी से मुह मोडने वाले विश्वा- मित्र जैसे भूपि मेनका से शकुतला की उपलब्धि पर चक्ति और शुद्ध होते हैं, शुभ रम्भा के प्रागे पराजित होते हैं । और बौद्ध मधो मे तीन सौ वर्षों के भीतर बहुत कुछ गिरावट का एक कारण, किमा गौतमी के कहने पर बुद्ध द्वारा अपने शिष्यों मे उपासिकामो को प्रवेश देना भी माना जाता है। यूरोप में कैथोलिक धम में उपासक उपालिकामा का आजम ब्रह्मचय मत से जुड़ा रहना, एक बही घटना है, पर उसे लेकर समाजशास्त्रियो ने और साहित्यिकों ने क्या-क्या नहीं लिवा-इसके लिए फास के और इटली के क्या-उप- न्यास और नाटक फिल्म साक्षी हैं। दूसरी ओर स्त्री-पुरप-मम्य यो को ये वल जीवशास्त्रीय स्तर पर गावर पूण मुक्ति या स्वच्छ र भोगाचार बाला चाक से डी० एच० लारेंस तक या समर्थन मान लेने पर भी समस्या सुलमती नहीं नजर पाती। पर अमेरिखा, यूरोप, जापान प्रादि देशो में जहा सब प्रकार पी माम तृप्ति और यौनाचार को सामाजिक नहीं तो भी वौद्धिक समयन प्राप्त है, जहा गभ निरोध भौर भवध गभधारण को भी छूट है (जमे जापान में गमपात पानूनी ढग से वप है) यहा भी मनुप्य अधिक सुखी बन गया हो ऐमो यात नहीं है। समाजशास्त्रियो की जाच से पापडे पाए जाते हैं जो डरावने हैं यौन रोगो की वृद्धि जीवन में अस्थिरता पे, भय कारण यहते यात-बियाह 'पे, प्राकृतिक सम्म घोरे, विवाह-विच्छेद के मार मारन हत्यारों के भो। .

मात्म-सयम मत 'इन दोउन राह न पाई वाली बात गांधी जी ने ठीक ठोर समझी थी। पहले भारतीय पारम्परिक दष्टिकोण नारी के प्रति लें और उसपर विचार करें। इस दृष्टि से साहित्य और शिक्षा के इतिहास से बहुत कुछ साक्ष्य मिल सकता है। वेद और उपनिषदो के समय स्त्रिया पुरुपो से किसी भी प्रकार से कम नही मानी जाती थी। शतपय ब्राह्मण में बताया गया है कि स्त्रियां पुरुषो के बराबर किस प्रकार से थी 'अयज्ञियो वा एव योऽपत्नीक ।' 'पर्यो ह वा एप प्रात्मनो यज्जाया। ऋग्वेद में भी होता' या यज्ञ करने वाला और उसकी पत्नी एक साथ यज्ञकर्म करते थे ऐसा उल्लेख है 'यस्य दम्पती 'सुनुत प्रावधानि । देवासो नित्य- पाशिरा" अथववेद मे ऐसा भी उल्लेख है वि स्त्रियो का उपनयन और जनेक होता था और बहुत-सा समय वे वेदाध्ययन में बिताती थी। पोपा, लोपामुद्रा, गार्गी, वाचक्नवी आदि महिलाए मत्रद्रष्टा अपिया की समकक्षिणी थी। ग्रासूनो मे उल्लेख है कि गृह्याग्नि के रक्षण में रात और दिन जो होम किया जाये वह पत्नी ही करे। जय नवान्न पाता, तव फसल के उत्सव में सीता-यज्ञ स्त्रिया ही करती थी। वैदिक काल में ही भारतीय साहित्य को स्त्रियो को भनुपम देन मिलती रही है। यद्यपि मंत्रायणी सहिता (४-७४) के अनुसार स्मिया सभा-समाज मे नही पाती थी, केवल पुरुष ही राज-मभानो मे भाग लेते थे, फिर भी उपनिषद काल में याज्ञवल को प्रश्नी से निरुत्तर करने वाली गार्गी जैसी विदुपिया मिलती हैं, जिनका स्पान दगन के इतिहास में बहुत बड़ा है। कात्यायन यौतसूत्र भारम सयम ६५ (१.१७) में कहा गया है कि 'श्रुति स्त्री और पुरुष मे कोई भेद नही मानती है। उस जमाने में भी घर मे स्त्री की सत्ता प्रधान थी, इसमे सन्देह नहीं । तत्तरीय सहिता (७२-१) और शतपय ब्राह्मण (५-२-१-१०) का साक्ष्य यही है । ऋग्वेद मे अदिति, इन्द्रापी, सरमा उर्वशी, रात्रि और सूर्या देवी अथवा पदवी या पौराणिक भी मान लें तो भी सत्ताईस महान स्त्रियो मे श्री, मेघा, दक्षिणा, श्रद्धा अमूत प्रादों की मूत कल्पनाएं मान सी जाएं और उन्ह छोड भी दें फिर भी नौ या दरा ब्रह्मचारिणिया अवश्य काव्य रचती थी। उनमे विश्ववारा, अपाला, घोषा, गोधा, वसुव की पत्नी, भगस्त्य पी बहन, लोपामुद्रा, शाश्वती और रोमशा पमुस थी। अमृण ऋषि की पुत्री याच की ऋचाएं, जो ऋग्वेद में दाम मण्डन मे १२४ सस्पा में हैं, बाद में शाक्तों का देवी सूक्त बनी। पाच रहती है, "जिसे मैं प्रेम करती हूं, उसी को शक्तिमान बना देती हूँ। वार- दाक्ति म्वग और पृथ्वी से परे तीनो भुवनो यो अपने में समेटे हुए है। विश्ववारा पा मग्निस्तोत्र उसकी भक्ति दिखलाता है। मपाला का ऋग्वेद के मष्टम मण्डल मे ६१वा इद्रस्तोग नारो के उ मुक्त प्रणय-निवेदन का एक प्राचीनतम लेखा है। ऋग्वेद में ३९वें और ४०. दो पूरे स्तोत्र घोषा ये रचे हुए है जिनमे बचाहिर जीवन की पान दमय अपेक्षामो का वणन है । मापात्री घोर गोधा को सम्पूर्ण ऋचाएं उपलब्ध नहीं हैं । लोपामुद्रा रचित दो रचनाएँ (१-१७१. १.२) नारी-मन के उस दुख को व्यक्त करती है जिसमे पति संयम कठोर होने पर व्यग है । शाश्वती नारी पी ऋचाए (१-१७९. ६) शृगार-भरी है। यहद्देवता मे जिसे भावमय की पली कहा भारम-सायम - वह रोमशा अपनी यौवन-प्राप्ति पर हप व्यक्त करती है। सक्षेप में वैदिक काल में नारी पुरुष मे किसी भी तरह पीछे नहीं थी-अपने विधार-विकारा की अभिव्यजना भी वह उतने ही मुक्त रूप से करती थी। उपनिषदो की मयी और गार्गी कवयिनिया से अधिक ग्रहावा- दिनिया थी। वे विदुषी थी और जीवन और मरण के गह्न प्रश्नो पर वे तक करती थी। यदि तब स्त्री पुरुषो को समान भाव से शिक्षा न दी जाती तो यह कैसे सम्भव था? वाल्मीकि रामायण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जब राम कौशल्या मे पूछकर बन-गमन को प्रस्तुत हुए, तब कौसल्या होमकाय मे निमग्न थी। बलि की पत्नी तारा भी मनायी थी। सुदर काण्ड मे उल्लेख है वि हनुमान सायकाल थक्कर सीता के शोधाथ सरोवर किनारे गए, क्योकि उस समय स्त्रियां शाम को सरोवर पर जावर सध्याय दन मादि करती थी। जनेऊ के बाद जिन लडकियो की थोडी बहुत पढाई होते ही गादी हो जाती थी उन्हें 'मद्योद्वाहा' कहते थे, जो जल्दी शादी न करके वेद-वेदात का अध्ययन करती थी वे 'ग्रह्म- वादिनी मानी जाती थी। याज्ञवल्क की पत्नी मंत्रेयी ऐसी ही स्त्री थी। "काशकृतना उन स्त्रिया को उपाधि थी जो पूर्व मीमासा पढती थी। बुद्धकाल मे हमे चुल्लबग्ग मे ऐसा ही उल्लेस मिलता है कि पहली तीन बार भगवान तथागत ने भिक्षुणियो को प्रवज्या ('पबज्जा) या दीक्षा लेने से इनकार कर दिया। अन्त मे महाप्रजापति गौतमी भाग्रह पर बुद्ध ने स्रोत भापत्ति फल, सकृदागामिफ्त, ३ भाम-मयम अनगामिफ्ल, अहत्फल प्राप्त कर लेने वाली स्त्रियो को सघ मे पाने की अनुमति दी। 'अट्ठ गरुधम्म' या पाठ उत्तरदायित्वो का पालन उहे करना पड़ता था। थेरीगाथा में जिन दशनशास्त्र की अध्येता महिलायो का वणन है उनमे यत्तीस कुमारियां और अट्ठा- रह परिणीताएं हैं । अविवाहितो मे शुका, अनोपमा, सुमेघा अमीर घर की यों। फिर भी पाजाम कौमाय व्रत पालन करके वे दर्शन के अध्ययन में लग गई। अश्वलायन सूत्रो से सुलभा, बडवा, प्रातिथेयी आदि उपाध्यायाथ अध्यापिपात्रो का उल्लेख मिलता है। जैनो में भी स्त्रियो के पर्याप्त अधिकार प्राचीन काल मे थे। भगवान महावीर की माता प्रियकारिणी राजसभा में जाकर सम्मानपूवव वाद-विवाद करती थी। हरिवश पुराण सग १२ मे उल्लेख है कि जयकुमार भगवान पा द्वादागधारी गणधर हुअा और सुलोचना ग्यारह प्रा की पारप प्रायिका। आदिपुराण के १६वें पव मे भग- वान आदिनाथ ने अपनी पुत्रियो ग्राह्मी और सुदरी यो पढाया और यह उपदेश दिया था कि 'अगर नारी पढ़ी लिखी विद्यावती हो तो वह स्त्रियो मे प्रधान गिनी जाती है।' तो प्रश्न यह उठना है कि 'स्त्रीगूनाधीयताम् वाला जो शास्त्र-वचन उठा, वह फय से और क्या शुरु हुमा बादरायण, जमिनी प्रादि स्त्रियो के वेदाध्ययन के विरोधी नहीं थे। परतु मेगास्थनीज लिखता है, 'ग्राह्मण अपने दान स्त्रियो को नही पढाते हैं। मत पतजमि स पूर्व, परीव ईसा से पूर्व ढाई सौ साल के समय- मनुस्मृति के रचनाकाल में-माफर शूद्रा तथा स्त्रिया का विद्या धिकार समाप्त हुमा था। कुछ लोग इसका कारण पापियन, सम- भारम-सयम कुछ सामग्री जमा की थी और अपना टम-पेपर (मत्र का निध) भी लिखा था। मैं इस दृष्टि से डा. राधाकृष्णन द्वारा सम्पादित १६३६ म २ अक्टूबर को गांधी जी की सत्तरवी वषगांठ को अर्पित ग्रप मे स्त्रियो द्वारा दी गई श्रद्धाजलिया पढ रहा था। उसमे कुछ विचार सूक्त इस प्रकार से है १ पल बक-गांधी का नाम एक व्यक्ति का नही, एप जीवन- पद्धति का हो गया है। इस जीरन-पद्धति मे अन्याय का प्रतिकार दृढता और अस्वीकार से करने की सीख और प्रेरणा मेरी ही तरह विश्व के करोडो नागरिको ने पाई। २ एथेल मैनिन-मैंने उनके जीवन मे आज तक दशन नहीं किये। पर मैं शातिवादी हूँ, और मैं उन्हें सावे वाद सत्य के लिए लड़ने वाला सबसे बड़ा अहिंसक मारती हूँ। उन्हाने निहत्थी और निशस्त्र जनता के मन में ऐसो वीरता पैदा की जो इतिहाग में अभूतपूर्व है। उनका दान नकारात्मर नहीं है जीवन विरोधी नहीं, बल्कि जीवन की सवश्रेष्ठ प्राध्यात्मिय परिपूर्ति का निदशक ३ डा० मारिया माण्टिस्मेरी हम पश्चिम बालो को गांधी एक दूर के, चमकीले, छोटे से सितारोजैसा लगता है। पर जो उनके नजदीक हैं उनके लिए वह बहुत बडी हस्ती हैं। पश्चिम के शाति वादी हमेशा जसे अधीर होते हैं, जल्दी में होते हैं, सभाएँ सम्मेलन करने की उहे पड़ी रहती है, पर गांधी सचमुच शान्तिवादी हैं । उहे कोई जल्दी नही। वे महीनो तक थेला में किसीसे वोले बिना प्रारम-संयम रहते हैं। उहोंने भारत मे वालक को एक नई प्रतिष्ठा दी। ४ कुमारी मॉड यिडेन-यह विचित्र वात है कि प्राज ईसाई यह अनुभव करते हैं कि दुनिया का सबसे अच्छा ईसाई एक हिन्दू है । ईसा के शिष्यो में सबसे बडा में महात्मा गाधी को मानती हूँ। सब स्त्रियों को प्रोर से हम गाधी जो को नमस्कार करते हैं कि उन्होंने सिद्ध किया कि स्त्री की इज्जत या मावरू को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई नहीं छीन सकता ! स्त्री पर अनिच्छा से किया जाने वाला विनय-भग उसको विनय का नाश नहीं करता, यह बात गाँधी जी ने प्राग्रहपूवक पही। यह बहुत बड़ी बात है। सिफ यूरोप में ही नहीं, दो अमेरिका जैसे बडे भू-खण्डों वाले पश्चिम मे हो नही, परन्तु पूर्व में भी, जापान मे, क फ्यूशस के चीन मे भी- हिंसा वदती जानी है। ऐसे समय भारत अहिंसा मे अपनी श्रद्धा अपण्ड रख सकेगा? क्या इस युद्ध-जजर ससार में भारत हमे माग नहीं दिखाएगा? ५ श्रीमती पर शेरिडन-इग्लण्ड के समाचारपत्री ने गांधी जी को जान-बूभार गलत पेश किया। बजाय उन ताना- माहा में बस भाषण सुनन ये अगर हमारे रेडियो से कभी नग्न महा मा गांधी की कातिपूर्ण वाणो यदि हम सुन पाते तो। लाह लण्डनडेरी ने कहा--"गांधी हमारा (त्रिटिशो का) तिरस्कार करता 1"मैं वहती हूँ दि गांधी भोर तिरस्कार ये दो शब्द साप- साप जा हो नहीं सरते। मैंने लेनिन का भी शिल्प बनाया पा, गांधी या भो । दोनों के उत्तर समान थे, यह पूछने पर वि-"माप पो यह पलायति सी लगती है " वे बोले-~"मैं नहीं जानता, 1 - प्रारम संयम ? मर्यादामो के उदाहरण कक्षा में प्रस्तुत किये। हेस्टिाश की 'एनसा इक्लोपीडिया माफ एथिक्स एण्ड रेलीजन' में 'काण्टिने स पर बहुत अच्छी सामग्री है। उन सब ऐतिहासिक तथ्यो वे बाद भी अमरीकी छाम यही सवाल करते गि-“गाँधी का माग मध्ययुगीन ननिकता (मिडीवियल मोरेलिटी) का माग है।" मैंन उ हें बताया कि अकेले अमेरिका मे तीस हजार से ऊपर कैथोलिक 'इन' या उपासि काएँ हैं। तो क्या उनके आजीवन अविवाहित रहने के वन का अप्राकृतिर या अनैतिक कहा जाए असल मे पुरुष और प्रकृति के सम्बन्ध क्या हो, इसीपर यह समस्या आधारित है। पूर्व और पश्चिम को इस बारे मे धारणाओं में अन्तर है। पूर्व मे सास्य जैसे दानो में प्रकृति का मध और पुरुष को जड रहा है और दोनो के सयोग से ही मन, बुद्धि, ग्रह- कार जैसी तन्मायो की उत्पत्ति को माना है। वेदात आदि दशन सो माया बहकर सृष्टि के मिथ्यापन को ही महत्त्व देते हैं। फिर भी भक्ति का अधिकार मध्ययुग म दोनो वर्गों को था। ब्रहाचारी और गृहस्थ दोनो प्राथम मुक्ति के समार अधिकारी थे। पश्चिम मे जीवशास्त्र अध्ययन के बाद, नये मनोविज्ञान ने काम को धम से उसी तरह विच्छिा पर दिया, जैसे प्रथ को धम से । उपनिषद्- काल से हमार यहाँ सत्य प्रौर धम को पर्यायवाची माना गया । पर पश्चिम वाले खुदा और शैतान, सत्य और असत्य दोना की समान सत्ता पर कई द्वतवादी दशनी की बौद्धिय और तार्किक दृष्टि से सृष्टि करते रहे। परिणाम यह हुआ कि उनके धम-चिन्तन मे शरीर और आत्मा के द्वत को बड़ा महत्व दिया गया। उसीधा प्रभाव पारम-सयम उनीसवी शती के मनोविज्ञान पर भी पडा । बीसवी सदी में भाकर युग जैसे मनोविनानवेता इस दुई को तोड़ने के लिए अधीर जान नडे । सक्षेप मे, स्त्री-पुरुष-सम्ब घो मे मर्यादा के विधान को अव नये नृवशशास्त्री भी, जैसे मागरेट मीड, या समाजशास्त्री भी जसे पोपीनको आदि पश्चिम में मानने लगे हैं। स्त्री और पुरुष के व्यक्तित्व को समान स्वत अता देने की बात मान लेने पर, देश-काल-भेद से, प्रत्येक समाज में उसकी परिणति भि न होगी। यह कहना कठिन है वि आज की दुनिया में भारत का, या गांधी का प्रादश-जैसे विवाहोत्तर ब्रह्मचय पालन आदि-सब लाग मान ही लेंगे। भारत मे ही उसे नहीं मानने वाले करोडो हैं। प्रत इस प्रश्न को केवल पार्थिव स्वावलम्बन के लिए सतति- नियमन या प्रजा-निरोध, मा उसके लिए सब प्रकार के बाह्य उपायो को सोचने के बजाय जसा गांधी जी कहते थे, "सति-निरोप से मधिक उपयोगी आत्म-निराध है।" यह बात पश्चिम के संचालित मादि मई मत पय भी मानते हैं । पाम विपयफ मात्म-सयम का एक दूसरा पहल है पर धीर पारम-सयम तुमि हे नारी | अपेक स्वप्न तुमि अर्धक कल्पना' (रवोद्रनाप) प्रादि काव्यमय पुष्पाजलिया मर्पित की जाती हैं । पर प्रत्यक्ष में उसी हिंदी-प्रदेश में नारी का यथाथ रूप जनेद्र कुमार की 'त्यागपत्र' की मृणाल बुना जैसा या बगाल में शरच्चन्द्र की अनेक दुखियारी नायि- कामो जैसा रहा है। आज तक हमारा साहित्य और हमारी क्ला पुरुप-प्रधान रही है। ज्यो-ज्यो नारी का विकास होगा और उसे समानाधिकार मिलेंगे, यह चित्र बदलेगा। नारी के प्रति भतिरिक्त करुणा और सदा 'विशेपाधिकार' देने की बात कम होती जाएगी। नारी और हरिजन को समान रूप से पिछडे वग और अल्पसख्या मानते रहने की मजबूरी कम हो जायगी। यह गांधी जी को श्रेय है कि हमारे राष्ट्रीय भादोलनो मे जेल जाने, लाठियां खाने, सत्याग्रह के मोचों पर और सब स्थानो पर वे भारतीय नारी को समान माव से सामने लाये। उनके पहले के नरम दलीय प्राथनापत्र वाले राजवारण मे शायद ही कोई स्त्री मागे पाई, न पातकवादियों में मादाम कामा या कल्पना दत्त जैसे अपवाद छोड़ दें तो कोई स्थान स्त्रियों को था। बल्कि प्रातकवादी दली है और साम्यवादी पक्ष के भी~इतिहास साक्षी हैं कि बहुत कुछ फूट उनमे स्त्री प्रसग को लेकर ही पडी। गांधी-प्रणीत मार्ग मे ऐसी कोई गुह्यता नहीं थी, ऐसी कोई शस्त्रास्त्र चलाने की जरूरत नहीं थी। और इस- लिए हमे धारास्ना मे अवैध नमक को ढेरी मे धुडसवार ब्रिटिश साजण्टो से घिरी सरोजिनी नायड आराम से अपने छोटे भाईने में देखते हुए नाक को पाउडर लगाती हुई मिलती है, या इलाहाबाद की कोलतार की सड़क पर कडाके को सर्दी मे मोतीलाल नेहरू की मात्म-सयम बहू कमला पालथी मारे हुए धरना देती हुई दिखाई देती है। यह गांधी का ही चमत्कार था कि उसने फिर से भारतीय नारी को सुप्रतिष्ठित किया। परम्पराबद्ध नारी को पश्चिम से जा मिलाया। गांधी जी के बताये हुए मार्ग मे इद्रियो पर वश बहुत बडा मानी रखता है। सत्य को जानवर, किसी भी तरह की प्रासक्ति न रख- पर, सयम से अहिंसा या प्रेम के सहारे जोगा, कहने मे प्रासान पर करने मे अत्यन्त कठिन वात है । जोवनरूपी रथ को अपनी गति है। उसके इद्रियरूपी घोडो को विना लगाम या सयम के चौकडी नही मारने देना चाहिए, वर्ना रथ जल्दी टूट जायगा या दोड ही खत्म हो जायेगी। इन्द्रिय-सपम का ही दूसरा नाम ब्रह्म मे स्थित होकर उसी तरह जीना या 'चर्या करना है। गांधी जी कहते थे कि जो जीभ पर विजय न पा सका वह स्वराज्य केसे टिका पायेगा? यह वात बहुत सही है। अपने हाथो मपने ऊपर व घन लगा लेने से, समझ-बूझकर अनासक्त होने से, जीवन को गति बढती है वह श्रेय की मोर तभी बढता है, जब प्रेय हाय से न छूटे। वृक्ष जड घरती से बंधा है, नदी अपने किनारे से बंधी है, सितार को सूटियां उसके तारो को कसे रखती हैं। काई चित्र नहीं है जो चौखट से बाहर निफला हो। मनुष्य को भी मर्यादाएं हैं, यम को धम का पिनारा है । दृष्टि को क्षितिज-सीमा है । माप व धन में बंधकर बहुत बड़ी ताक्त बन जाती है, उससे इजन चलते हैं । पानी पर बिजली पैदा कर सकता है। इसलिए एक भवेले मादमी की इच्छा ही सब कुछ नहीं है । यो तो भराजकता की भोर हम बढेगे । समाज की इच्छा भी है, वह देवल एक भोर एक ऐसे सख्यावद, अनेकों भारम-सयम को इन्छा या समवाय मात्र नहीं है। वह उससे कुछ अधिक है। 'धम्मपद' मे बुद्ध ने कहा था-- अत्ता हवे जित सेच्यो या चाय इतरा पजा। अत्तद तस्न पोसस्य निच्च सम्मत चारिनो। अर्थात दुमगे को जीतने को अपेक्षा अपने को ही जीतना श्रेष्ठ है। जिस प्रादमी ने अपने-आपको जीत लिया, जो अपने आपको सयम मे रखता है, उसको जीत को न देवा, न गधव, न मनुष्य ही हरा सकते हैं। गीता के 'युक्ताहारविहारस्य युक्त चेप्टस्य कमसु' का यही पथ था। गांधी जी के ग्यारह प्रतो मे इसी कारण से आत्म निग्रह और ब्रह्मचय पर विशेष बल दिया गया था। उहोने कहा था कि जैसे वैज्ञानिक प्रयोग के लिए कुछ शत प्रावश्यक होती हैं, वसे ही जीवन मे कुछ कर गुजरने के लिए अध्यात्म के क्षेत्र में भी कुछ प्रावश्यक समम नियमादि शर्ते जरूरी हैं। अपने जीवन को इसलिए उन्होने 'सत्य का प्रयोग' कहा। इसी प्रयोग मे उहें एक बहुत बड़ा कारगर उपाय हाथ लगा-- वाणी का सयम या मौन । वे लिखने, बोलने म कभी भी शब्दा का अपव्यय पसद नहीं करते थे। वे लिखते है कि, 'सत्याग्रही के लिए माध्यात्मिक अनुशासा की दृष्टि से मौन व्रत बडा ही उपयोगी है। भतिशयोक्ति करना, सत्य को बढ़ा-चढावर फहना जाने अनजाने मनुष्य की कमजोरी होती है। इसपर विजय प्राप्त करने के लिए मौन बहुत जरूरी है। जो आदमी कम बोलता है वह अपने भाषण में विचारो नहीं होगा। यह हर शब्द को तौल-तोलकर मात्म-मयम धाम में सायेगा।" शुरु-गुरू में गांधी जी ने समय बचाने के लिए, सामाजिर व्यस्तता के जीवन में से कुछ क्षण प्रात्म-चिन्तन के लिए निकालने दे लिए सोमवार के मान वो अपनाया । बाद में तो वह उनकी जीवन पद्धति का एक प्रा बन गया। जो वात डीन या वाणी के सम्बप में सही है, वही अप इद्रियों के लिए भी और उनसे उत्पन पाम्वाद या ग्रामवित के मध्य प में भी विन्वन मही है। गांधी जी ने अपने जीवन में उसे उपनिषदों की इस बात की सायंक पर सिद्ध कर दिया, भाषरण और उदाहरण में, "जो त्याग करता है, वही मच्चा मोरना है।" मानन्द बैदर पाने में नहीं, देने में भी है। सुख दारने में बहता है, उमा बखे रणने में यह दुख में परिणत हो जाता है, उसमें पानी में ठहराव में पंदा होने वाली पाई सिवार या अगूरो को जमा करने मे पदा होने वाली विकृत पाराव की मात्रा जैसी बात है। मनुष्य की विशेषता मीम है कि वह अपनी पशु प्रवृत्तियों पर विवेप और प्रजा मे प्रदुमा राव सकता है। वह चाहे तो ममृतमय अ म अन्ये माग की पोर का सकता है, चाहे तो मा महया या मृत्यु हो और घट सकता है। जीवन सा धर्म प्रात्म हनन नहीं है। प्रति विलास, अनि मुपोषमांग, पति ममपम एक प्रकार का धीमे धीमे जहर पीने जमा ही है। गांधी ने बताया कि 'मृत्योर्माऽमृतगमय' वाला मार्ग मे मनुष्य में अपने हाथो में है। संसार के नीतिशास्त्र के विकास में इतिहास में प्ययित पे सपाप पर यह प्राग्रह जो पश्चिम मे नुपरात, ग्रीन पाकोट जैसे दारानियो में पाया जाता है, गांधी ने एन प्रतिष्ठित भारम-सयम और इसीमे उनकी 'पात्मा' को 'महत्ता' समाई हुई है। प्रान द कुमार स्वामी ने लिखा है कि महात्मा शब्द बौद्ध दशन मे पाता है जहां क्षुद्र आत्मा और श्रेष्ठ मात्मा का भेद बताया गया है । जो आत्मा प्रात्म-सयमित है, वही महान हो सकती है। जो अपने काबू में नहीं, वह कैसी प्रात्मा? और गाधी ने यम-नियम प्रत्याहार का कोई 'पथ' या जकड- बदी नहीं बनायो। मोरो पर जबर्दस्ती से कोई चीज नही लादी। खुद झेला, खुद किया। खुदी को बलद इतना किया विखुद को खुदा समझने की ज़रूरत नहीं पड़ी। स्मयम् नर में का नारायण प्रकट हो गया। वह नारायण खोजने उन्हे 'रद्धद्वारे देवालयेर अध कोणे नही जाना पड़ा, वह हर दरिद्रनारायण में ही मिल गया।

अध्याय ६ शिक्षा : सहज नीति सारे भादश और सिद्धात सुनने मे मीठे लगते हैं, कितावों में पढते समय बहुत सुदर जान पडते हैं, परतु सच्ची समस्या उन्हें प्राचरण में लाने की है। यहा हमारे बचपन मे प्राप्त होने वाले सस्कार पोर शिक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण है। भारत जैसे साठ प्रतिशत निरक्षर देश में ही नहीं, परतु सारक्षता सौ फी सदी है ऐसे पश्चिम रे देशों में भी बार-बार यह प्रश्न उठता है कि क्या माज को शिक्षा जीवनानुकूल है ? गोडमे और प्रोसवाल्ड (कैनेडी का हत्यारा दोनों शिक्षित व्यक्ति थे। प्राइकमान या हिटलर, स्तालिन या मागो-जे- दुग ये पढ़े-लिखे लोग नहीं । मौर वीसवी सदी के इतिहास को हिलाने वाले सहसा सारी मानवता के जमीर को झकझोर देने वाले में कुछ नाम, चाहे भारत के हो या विदेश के, क्या हमें यह सोचने पर मजबूर नही परते कि हमारी शिक्षा पद्धति मोर शिक्षा नीति के यारे में हम दुवारा सोचना चाहिए। पौर दूसरी पोर एफ यहुत बहो परपरा उन महापुरपा की है जिनसी कालेजी या स्कूसो शिक्षा प्राय नही के वरावर पी, पोर जा न केवल महापुरुषो मे गिने जाते हैं पर मुशिक्षिता को भी माग.

शिक्षा सहज नीति दर्शन कराने वाले सिद्ध हुए हैं अकबर और शिवाजी, रामकृष्ण परमहस और रवीद्रनाथ ठाकुर केशवसुत और गालिब, महजूर और मैथिलीशरण गुप्त, विनोबा और कामराज और ऐसे कई नाम सहज याद पा सकते है। पुराने सतो की तो बात ही छोडिए। 'और कहैं कागद की लेखी। कबिरा कहै माख की देखी।' गाँधी जी ने भी अपनी स्वयम् की शिक्षा के बारे में लिखा है- "मैं अपनी सीमाए जानता हूं। मुझे कोई नाम लेने लायक युनिवसिटी की शिक्षा नही मिली। हाई स्कूल मे नी औसत से ऊपर कभी मेरा दर्जा नहीं रहा। में किसी तरह परीक्षा पास हो गया, इसी. का मुझे धयवाद मानना चाहिए। स्कूल में किसी तरह कोई विशेष योग्यता पाना मेरी भाकाक्षामो से परे था। फिर भी शिक्षा के मामले में में सामान्यत बहुत सस्त विचार रखता हू-उच्च शिक्षा के बारे में भी। और यह देश के प्रति मेरा प्रण है कि उन विचारो को स्पष्ट रूप से रखू, बाह उससे कोई लाभ हो या न हो, या उसका उपयोग कोई करना चाहे मा न चाहे । मैं सब सकोष छोलवर चाहे लोग मेरी हंसी ही क्यो न उडायें अपने विचार सामने रखता हूँ '१ में शिक्षा के विरुद्ध नही हू । दुनिया मे मिलने पालो ऊचा से कैची शिक्षा के भी विरुस नहीं है। "२ जब उस शिक्षा का निश्चित उपयोग हा तो राज्य उसमे लिए खच परे। "३ में सामाय राजस्व म से सारो उच्च शिक्षा का सच चलाने के विरुद्ध हूँ लिसा सहज नीति "४ यह मेरा दृढ विश्वास है कि हमारे कॉलेजो मे दिया जाने वाला तथाकथित कला कहलाने वाला शिक्षण, निरा पैसे का दुरु- पयोग है। और उससे पढ-लिसे वग मे बेकारी बढी है। इतना ही नही, उससे उन प्रभागे लडके-लड़कियो का, जिन्ह हमारे कालेजो की इस सारी पिसाई मे से गुजरना पड़ता है, मानसिक और शारी- रिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है। "५ भारत मे जिन विदेशी भाषा के माध्यम से उच्च शिक्षा दी जाती है, उसने देश को अपरिमित बौद्धिक और नैतिक नुकसान पहुंचाया है। हम अपने जमाने के बहुत करीव हैं, इसलिए कितना नुकसान हुमा है इसकी भयकरता पूरी तरह जांच नही सक्ते । मौर हम, जिहोने ऐसी शिक्षा पाई है एक साथ शिकार और निर्णायक दोनो होते हैं। यह प्राय असभव चमत्कार है कि एक ही व्यक्ति दोनो हो।" मागे चलकर गांधी जी ने इसी लेप में बताया है कि कैसे शुरू म १२ वर्ष की उम्र तक वे गुजराती मे पढते रहे। हाई स्कूल में पहले तीन साल तर मातभाषा हो माध्यम था। फिर भी स्कूल मास्टर अग्रेजी ही विद्यार्थी के दिमाग मे भरने में लगे रहते । भाषा समय प्रग्रेजी की वतनी पौर उच्चारण रटने में जाता। चौथे साल से सच्ची मुसीयत शुरू हुई-सारे विषय भग्रेजी मे पढ़ाये जाने लगे । सस्कृत पोर फारसी भी मग्रेजी माध्यम से पढाई जाती थी। घमास म गुजराती मे बोलने पर मनाही थी। गलत-सलत अग्रेजी घल सकती थी। खुद मास्टर साहब की अग्रेसी कौन-सी निर्दोष पो www

शिक्षा सहज नीति
इस लम्बे उद्धरण से हमारा अभिप्राय इतना ही है कि भारत के
सन्दर्भ में विशेष रूप से और भारत और विश्व के मय देशो की
कई समस्याएँ एक-सी हैं इसलिए विश्व की दृष्टि से भी-शिक्षा
नीति के विषय मे विचारणीय प्रश्न मुख्यत ये हैं
१ शिक्षा नगरो मुखी हो या ग्रामोन्मुखी'
२ शिक्षा यत्राश्रित हो या हस्त शिल्पाथित?
३ शिक्षा धम-निरपेक्ष हो या सवधम-समभावी हो?
४ शिक्षा में नैतिक शिक्षा का स्थान अनिवाय हो या न हो?
५ शिक्षा अहिंसक हो या सैनिकीकरण के हेतु हो
६ शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो या विदेशी भाषा
७ शिक्षा का व्यय राज्माश्रित हो या व्यक्ति की प्रायवे प्राधार
पर
?
. शिक्षा काल में विद्यार्थी कमायें, स्वावलवी बनें या न बनें?
६ शिक्षा मे मनोरजन या लतित कलामो का स्थान हो या न
हो? यानी क्या शिक्षा केवल समाजोपयोगी (फक्शनल)
?
.
१. सहशिक्षा हो या न हो? यौन शिक्षण दिया जाम या
नहीं?
ये प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हैं, और इनका विचार पांच स्तरो
पर हो सकता है नागरिक पिता माता या अभिभावक, विद्यार्थी-
विद्यायिनियां, गुरु या अध्यापक, शिक्षा पति या पाठपत्रमादि
सस्था-व्यवस्था,
भौर इन सबसे ऊपर हा शिक्षालया के व्यय के
लिए जहाँ से पथ माना है वह सूत्र राज्य, मठ, मन्दिर, गुरुकुल

frक्षा सहज नीति मादि, सहकारी सामाजिक सस्थाएं या व्यक्तिगत दान । इन पांचो दृष्टियो से ऊपर के ग्यारह प्रश्नो का विचार, गांधी जी की नीति का मुख्य सूत्र मानकर, हम करने जा रहे हैं। सवसामाय नागरिक मा माता-पिता अभिभावक को साधारण- तया इच्छा यही होती है कि उनका बालक पढे, वढे, परिवार चलाये, प्रार्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बने, राष्ट्र का प्रतिष्ठित नाग- रिक बने । गाँवो मे जहाँ सयुक्त परिवार अभी भी हैं, वहां 'कमाऊ पूत' पर ही जोर होता है। इसलिए उसी पढाई को अच्छा माना जाता है, जो वाप के वानिजच्योपार, खेती बाडी, व्यवसाय-उद्योग को मागे बढा सके । जमींदारी प्रया के हटने के बाद, बडे सेतो पर एकाधिकार टूटने के बाद गांवो मे गांव वालो का रस पम होता जा रहा है । स्वत प्रता के बाद गांव से शहर की ओर सनमण जोरो से बढ गया है। १७ से १६ प्रतिशत तक मावादी महानगरो की पोर खिचती जा रही है। नतीजा यह है कि यह शहर भी देहात धनते पा रहे हैं। जहां जात पात का चक्कर टूटा, किसी भी व्यवसाय- विशेष पर पुत्र का एकाधिकारत्व जाता रहा । पौर ग्राह्मण भी जूतों की दूकानें पलाते हैं पोर मास मोर शराव वेचते नजर पाते है। क्षत्रिय अपना पुश्तैनी लडने-भिष्ठने का पेशा छोडकर नाचते- गाते मौर करुणारस की कविता करते नजर प्राते हैं। वैश्यो ने तो सय क्षेत्रो पर छाने की जैसे ठान ली है-'सर्व गुणा माचनाम- अति'। पौर चूद्र को शूट कहना प्रबंध है, उनमें बडे-बडे नेता पोर विद्वान पैदा होने लगे हैं। तात्पय पुरानी वर्णाश्रममर्यादाएँ भी से टूटने लगो पी--पहले महायुद्ध के समय से हो । सो 7 शिक्षा सहज पोति शहरो मे वे प्राय टूट-सी गई हैं। नतीजा यह है कि जनतंत्र मे सबको समान भाव से सब तरह की शिक्षा सुलभ रूप से मिले इसको माग जोरो पर है। इसका एक अनिवाय बुरा पहलू यह है कि सब 'बाबू' बनना चाहते हैं, 'सफेद कालर' वाली 'पाढरपेशा' क्लकिया सबको माकर्षित कर रही हैं। नौकरशाही के सुरसा की तरह बढने से गांधी जी ने जो बात उठाई थी-'गावो की भोर। उसका महत्त्व भव समझ मे पाता है। अगर सब ही शहरी हो जायेंगे, तो खेती कौन करेगा? उत्तर मिलता है या यत्रो में अत्यधिक उपयोग से मानव भो यन्त्रीकृत होता जाता है, इससे बचने का क्या उपाय है गांधी जी ने कहा कि जितने जीवनोपयोगी, पावश्यक यन्त्र हैं, वे काम मे लाये जायें, पर मनुष्य यन्त्र का स्वामी रहे, दास न बने । जब बुनियादी शिक्षा के बार मे वहस चला और सन् चालीस के करीब जब कम्यूनिस्ट भी वैयक्तिक सत्याग्रह मे शामिल हो रहे थे, श्री प्र० आगे ने सुझाव दिया था कि क्ताई बुनियादी शिल्प रहे, पर उसे पताई बुनाई की बिजली की मशीन से सिखाया जाय । गाव- गांव में 'डाइनमो' लगाए जायें। किसीने जापान का भी उदाहरण दिया । यह ठीक है कि मनुष्य के श्रम का अत्यधिक मूत्य ग्रहण किया जाय, पर जैसे हम 'अर्थ साम्य' वाले अध्याय मे कह चुके हैं भारत, अफीका या अय कई दक्षिण पूर्वी एशियाई देशो की समस्या जन- सख्या को पर्याप्त काम देने की, मानवी धम के उपयोग की है न कि उसे यूरोप-अमेरिका या रूस की तरह यशो द्वारा सपूत करने को। इसलिए गांधी जी ने कहा कि शिक्षा न केवल मोमुखी हो, पिरा सहर नीति पर यह हस्तशिल्प पर प्राश्रित भी हो । अब ससार के सव शिक्षा गामी, ड्युई हो या पेस्टेलोजी, मानने लग गये हैं कि शिक्षा का प्राधार ऐसा प्राकृतिक और सहन होना चाहिए कि वह मनुष्य के भीतर की सृजनात्मकता को अधिकाधिक प्रोत्साहन दे सके। गाँधी जी ने, अपनो अन्तदृष्टि से उस बात को माप लिया। और पत्र द्वारा निर्मित कृत्रिम और वस्तु-प्रधान दूरी को टालने की बात कही। मेरे अल्प मत में गांधी को शिक्षा क्षेत्र को सबसे बडी देन यही सहज धर्म की प्रस्थापना यो। अल्डस हक्सले जब सन् १९६१ मे बोन्द्राय शवसावत्सरिम उत्सव में पधारे थे, तब उनकी सेवा में कई घण्टे बिताने का मुझे सौभाग्य मिला। उनसे बहुव-सी वावें भी हुई। उन्होंने अपने मुभ्य भाषण में रवीन्द्रनाथ की शिक्षा को बहुत बढी देन यह बताई कि उहोंने 'शरीर से बलशाली और मन में मुसभ्य मानव पैदा पले का माद सामने रखा। "यह मानव का समय विकास, हसले ने कहा, "पश्चिम में ग्रीक लोग करता चाहते थे, पर बाद मे यह न हो सका।"शरीर से बलशाली बनते हो मानव दूसरे पर विजय प्राप्त पराा, दूसरे के प्रदेश को मपटकर छोनना, हिमा करना चाहता है। भोर यहीं उसमें गिरावट पैदा होती है। राम या पय विशाल साम्राज्यों के उत्थान-पतन का यही सा है। गांधी जी को बुनियादी साता मे, सेवाग्राम में जब सन् ३७३८ के बरीच यह सुझाव पाया कि एक असाहा भी बनाया पाय मोर 'तालीम को मराठी प्रथ में व्यायाम से भी नियमित रूप में जोर दिया जाय, तो गांधी जी ने, जो भनिवार्य संनिक शिक्षा के ? शिक्षा सहज नौति विरुद्ध थे, इस बात को पसद नही किया। गांधी मनुष्य के शरीर या मन को अतिरिक्त मासलता या पेशलता से मण्डित नही करना चाहते थे। उनके लेखे शिक्षा का उद्देश्य ही मनुष्य को अधिक सहज मानव बनाना था। वे लिखते हैं "मे बच्चे के हाथ दिमाग, प्रात्मा- सबका विकास चाहता हूँ। आज हाथ तो जैसे लुज पड गये हैं प्रात्मा को तो जैसे हमने भुला ही दिया है ।" गांधी जी कोरी किताबी शिक्षा के विरुद्ध थे। वे साथ ही साथ आत्मा का विकास भी चाहते थे। और इसी से प्रश्न शिक्षा मे घम और नतिकता की अनि- वायता का उठ खडा होता है। क्या शिक्षा एकदम धम निरपेक्ष हो या धम-विरोधी हो, जैसे साम्यवादी देशो मे? या धर्माश्रित हो-जैसे वटिकन, बौद्ध विहारो मे या मकतबा मे होती थी? आज भी बडे-बडे देशो मे इस समस्या को लेकर बहुत बहस होती है। सन् ६० मे ब्लूमिंगटन इण्डियाना (अमेरिका) मे मैं एक फुल- प्राइट काफ्रेंस मे गया था, जिसमे एक सवेरे चार घण्टे इसीपर बहस होती रही कि यूनिवर्सिटी पी शिक्षा मे तीस प्रतिशत तक अमेरिका मे जो गिरजाघरो से पैसा माता है (और उसके साथ उनकी रातें भी) उस परोकोयल' (धार्मिक या साप्रदायिक) शिक्षा का क्या हो एक तरुण उग्र विचारो के प्रोफेसर ने कहा कि विद्याथियो मे हमे सदेह और गया करने की वृति बढानी चाहिए। वहीं 'शका की स्वतत्रता' बहुत महत्त्वपूण देन है, दवात के वाद के सारे यूरोप की। सारे विज्ञान उसीसे निकले इत्यादि-इत्यादि। मैंने एक प्रश्न पूछ लिया कि 'शका की स्वतत्रता' (फ्रीडम टु डाउट) तो ठीक है, 7 ITB सहज नीति पर एक और स्वतन्त्रता श्रद्धा की भी तो हो सकती है (यानी 'फ्रीडम माफ बिलीफ') । और इसके बाद चर्चा का रुस बदल गया। मैंने पूछा कि यदि किसी विश्वविद्यालय के दातागो मे शराब बनाने वालो की संख्या विशेष हो, और वे शराव की 'गुण' वृद्धि पर ही शोध वृत्तियां देते हो, तो यह कौन-सी वैज्ञानिक 'स्वतन्त्रता है ? उस सम्मेलन में मेरी बातो को लोगो ने गौर से सुना, बाद मे पता लगा कि शायद कुछ लोगो ने बहुत बुरा भी माना । पर नैतिकता का प्रश्न कम से कम शिक्षा के क्षेत्र मे हवा मे राल देना गांधी जी कभी नहीं चाहते थे। उनके लिए धर्म और नीति समानार्थी थे। इसलिए उन्होने अपनी प्राथनामो मे, जो उनके शिक्षालयीन जीवन फा एक मवश्यक प्रग पी~'सवधम समभाव' को महत्त्व दिया था। वे शिक्षा का प्राधार वल भौतिक नही मानते थे। वह वैसे हो भी नहीं सकता। उसको अवश्यमभावी प्रतिक्रियाएँ पश्चिम ये देशों में भी होने लगी हैं। इसी समस्या से जुड़ी हुई समस्या है शिक्षा मे मातृभाषा को माध्यम के रूप मे किस इयत्ता तक या दर्जे तक काम में लाया जाय? गांधी जी ने वार- बार मातृभाषा दे महत्त्व को दुहराया है। प्राय दुनिया के सभी देशो में शिक्षा का माध्यम उस देश की भाषा होती है, जो वहाँ के बहुसभ्य गरिको की मातृभाषा होती है। रूस मे, जापान जमनी में, यहां तक कि नवोदित छोटे-से इसराएल में भी विमान मादि की उच्चतम शिक्षा मातृभाषा के द्वारा दी जाती है। ससार ये नवीनतम पोर उच्चतम ज्ञान-विधान को अपनी भाषा में जल्दी पौर सोधे दूसरी भाषामों से अनुवाद परने 2

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माध्यम है ही, १५ में अधिक मे पढाइ भोहिमें त्रि में इस राउनतिर महत्त्व वाले भाषा में प्रदन ने बहुत स्ता पदारदी है। दिसा गज्यॉग म्बायत विषय प्रपन हाय में मर विविद्यालयों राया तो का मरना । रिन थोडे ने विश्वविद्यालयों, कालेजों या उमन मोष अनुदान मिलता है, उनसी म्पिनि मौर मतग है। प्रवदा १५७ दिश्वविद्यालयों में ऐसे दिन है रही कमा माद दिपयों में हिन्दी परोक्षाका भाजन हुा । वम्बई को लेकर दंगे हुए। प्रासाम में साथ बुरा सलूक हुमा ! मद्रास से तेलु मौर तमिल- हुए। और गोगा मे कोक्पी हो या नहीं ममूर सीमारेखा रहा होगादि समस्याएं मन् ६६ तक चलती थिली भाषी हिंदी भापी प्राल में प्रना नापिक दाय- है, पौर इस प्रगर मे पता नहीं कितनी और दसाइयों देगा। और इस मारी प्रक्रिया में केन्द्र को मापा अग्रेजी रहती है। राष्ट्रनापा या राजनापा स्प में हिन्दी वमि अमजी हटाने के पहले कदम पर २६ जनवरी, दक्षिण में भीषण दगे हुए और इस प्रकार में यह समस्या झने के उत्तमती ही जाती है। दोष दोनों तरफ है, और दोनों घोर से हुई है हिन्दी-नापी और अहिन्दी-मापी की ओर से 1 इसलिए एक-दूसरे पर दापारोपण भरते सारा पुरानो घटनामों को दुहराने में कोई लान नहीं। से - विरोधक १२४ गिक्षा सहज नीति जीवन में कोई उपयोग नहीं होता । यदि यह तक किया जाय कि इन विपयो को पढाने से विद्यार्थियो की स्मृति, तक शक्ति, कल्पना पाक्ति आदि का विकास होता है, तो वह भी सच नहीं है । इस दिशा मे किसी ऐसे साहसपूण शिक्षाशास्नी की पावश्यकता है, जो हमारे पाठयक्रमो को देशानुकूल बनाये, विशेषत यहा की आर्थिक स्थिति ध्यान में रखकर मितव्ययिता पर जोर दे। मतिम दो प्रश्न है शिक्षा मे मनोरजन या ललितकलामो का स्थान, और सहशिक्षा या यौन विनान की शिक्षा के विषय मे। गांधी जी ने शिक्षा में प्रारम्भिक कक्षामो से ही सगीत को अनिवाय बनाने पर जोर दिया था। प० खरे शास्त्री की यह सिफारिश उन्होंने मानी थी। और लिया था कि मेरा बस चले तो स्वतता के बाद मैं सब बच्चो को सगीत सिसा द । भय कलाप्रो के विषय मे उनये मत कही स्पष्ट रूप से नहीं मिलते । पर चिन, शिल्प स्थापत्य को वे उपयोगिता से सम्बद्ध मानते थे। छात्र जीवन में खेल कूद के महत्त्व को वे जानते थे पर उसके लिए विशेष समय और धन व्यय करने के पक्ष मे वे नही जान पडते । बुनियादो सालाम के पाठ्ययम मे उन्होने प्रवृति निरीक्षण का महत्त्व दिया है, परतु महंगे विदेशी खेलो या नही। गाधी जी ने सहशिक्षा वो माना था। परन्तु धे बच्चो के मा में छोटी उम्र मे कुतूहल वढा के पक्ष में नहीं थे। योन-विपयो पर खुली चर्चा हो, जिज्ञासा का समाधान किया जाय । पर अमुक वय तक अमुव बातो को बच्चो को बताना जरूरी न माना जाम, यही वरावर उ होने कहा है । पुस्तक 'सयानी क्या से' 7 महादेव देसाई को भूमिका इस दृष्टि से पठनीय है । चूकि शिया सहज नाति स्त्री-पुरुष सबध का वे ब्रह्मचय को उच्च नतिकता की दृष्टि से देखते थे, वे उसका खिलवाड बना देना नहीं चाहते थे। इस प्रकार म गाधी जी ने शिक्षा के क्षेत्र मनी मौलिक अवदान दिया है। उनके दिए कई प्रश्ना के उत्तर ऐसे हैं, जिनसे न केवल हम पर सारी दुनिया प्राज भी बहुत कुछ सीख सकती है। क्या हमारे सोचने वाले भाई बहना का गम्भीरतापूर्वक उन बातोका फिर से मनन नहीं करना चाहिए?

Soi Saval Ek Javab

Author
Machev,prabhakar
Title
Soi Saval Ek Javab
File name
Soi Saval Ek Javab
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2010/12
Publisher
Delhi,rajpal And Sanj
Language
Sanskrit
Pages
112
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
515070
Barcode
4990010022725.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
pPeJ3ndsAIb
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