Adarsh Library, Jaipur
Suzan & Willaim
Front matter
No text on this page.
सुजान (ऐतिहासिक उपन्यास)
No text on this page.
सुजान
(ऐतिहासिक उपन्यास)
मिथिलेश कुमारी मिश्र
वाणी वाटिका प्रकाशन
संयदपुर, पटना-४
No text on this page.
सुजान
इतिहास की एक विस्मृति !
एक ऐसी विभूति जो यदि न होती
तो 'पन आनन्द' न होते
और यदि वे न होते
तो प्रेम का अर्थ न घुसता
और यदि अर्थ न खुतता
तो
रीतिकाल का शृङ्गार अपूर्ण
रह जाता
अस्तु, उस चिरउपेक्षिता नर्तकी
को ही
यह
कृति
अपित..
No text on this page.
सुजान
No text on this page.
'धन आनन्द प्यारे सुजान सुनो, इत एक ते दूसरो आंक नहीं' आनन्द के सुरीले कण्ठ से निकली हुई यह पक्ति सुजान के अन्तःकरण में रस भर देती थी । उस पर प्रीति का उन्माद छा जाता, यद्यपि वह भली-भांति समझती थी कि प्रीति से उसका कोई सम्बन्ध नहीं, वह वाराङ्गना है। राजनर्तकी है तो क्या हुआ ? आखिर वेश्या हो है न ! अन्य पेशेवर रण्डियो के मुहल्ले में नहीं रहती, तो भी फोई अन्तर नहीं पडना पयोकि उसके भवन से निकलते पुरुषो को देखकर सभी अनुमान लगा लेते थे कि सुजान वेश्या है। कभी-कभी उसका मन भारी हो जाता, बडी निराशा हो उठती, मारे वितृष्णा के वह पुरषों से विद्रोह की इच्छा कर बैठती । वह वातायन के सहारे खडी हो जातो और व्योम में रतनारे नयन फेलाकर प्रश्न करती-चोलो ! अम्बर ! तुम्ही बताओ ! मुझे वेश्या किसने बनाया ? उतर मिलता-पुरुषों ने । सुजान को पुरुष जाति से घृणा होने लगी थी परन्तु इनसे वह पिण्ड भी तो नहीं जुटा पाती थी। जैसे पुरुष ही संसार पर राज्य करते हो जैसे उन्हे ही सर्वोपरि बनने का एकाधि- कार मिला हो, यह घोर वैषम्य है, विडम्बना है। नारी के लिए पुरुप अभिशाप है, पुरुष पाप है। एक क्षण दुःखी मुजान चीख उठनी दूमरे ही क्षण लोल कपोलों पर अयुकण झलकने लगे। 'पुरुप नारी का पूरक है' पीछे से स्वर माधुरी मुखर हुई । मुहकर सुजान ने देगा धन आनन्द ! घन मानन्द सुजान के लिए अपरिचित नहीं तो भी पूर्ण परिचित भी नहीं कहा जा सकता । जिस मुगल साम्राज्य के वे मोरमुंशी हैं मुजान उसी की राजनर्तकी है। शाहंशाह 'रंगोले शाह' दोनो पर समान रूप से श्रदालु हैं । यदि वे मुजान के नृत्य पर नाच उउने पे तो पन - १० सुजान की स्वर माधुरी पर भी निछावर थे। उनके लिए ये दोनों मांखों की पुतलियों की भांति लगते थे जिनमें सुरा की लहर के डोर निरन्तर खिचे रहते थे। मुगल साम्राज्य का सूर्य अस्ताचल गामी था । रंगीले शाह संगीत नृत्य के हाथों विक चुके थे। घन आनन्द की पीढ़ियां मुगल- साम्राज्य की सेवा में खप चुकी थी। वे दिन और थे। आज उसे न राजसेवा अच्छी लग रही थी और न रंगोले शाह की शाबाशी ! आगरा के उस ऐतिहासिक राजप्रासाद की कलात्मकता अथवा लटकते हुए सत- रंगी झाड़-फानूस भी उसका मन अपनी ओर नहीं खींच पाते थे । उसका अधीर चित्त केवल सुजान को देखते रहने के लिए व्याकुल रहता था। कई वार सोचता कि सुजान को लेकर कहीं दूर निकल जाए, परन्तु उसने अपनी इच्छा कभी व्यक्त नहीं की। कल सुजान ने गणेश ताल पर बड़ा मोहक नृत्य प्रस्तुत किया था। ग्वालियर नरेश ने अपनी मोतियों माला सुजान को कण्ठ में पहना दी। रंगीले शाह ने सुजान को एक हीरा भेंट करने की घोषणा की और उसे अपने अंतःपुर में बुलाया। धन ... मानन्द शाह के निकट ही बैठा सब कुछ देख रहा था। वह प्रशासन नीति में कुशल था यह और बात थी, किन्तु कवि होने के नाते वह जो कुछ था उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता था। वह आसन पर भी स्थिर न रह सका । यद्यपि शाह के हरम में सुजान का जाना कोई नई बात नहीं थी तथापि सुजान में शील के देवी का रूप देखने वाले आनन्द को आज सर्ष उसके चरणों को बढ़ते देख क्रमशः क्रोध, घृणा एवं जुगुप्ता की अनुभूति हो रही थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या फर डाले? उस समय आनन्द की मुखमुद्रा देखते ही बनती थी जैसे जुआड़ी सर्वस्व हारकर भी किसी और आशा से वैठा रहता है । जब घण्टों बाद सुजान हरम से न निकली तो मानन्द का धैर्य टूट गया। सेवकों को झाड़-फटकार बताकर वह सीधा अपनी वग्घी में बैठा । अपने घर पहुँचते ही शयन कक्ष में जा विराजा लेटे-लेटे सवैया की पंक्ति उमरी- सुमान ११ 'कछु नेह निवाहनो जानत ना, तो सनेह की धार में काहे धसे ।' मुजान को वह प्यार करता था। वह जानता था कि मुजान वार- नारी है, समाज के मनोरञ्जन की सामग्री है । मुगल शाहंशाह रंगीले शाह की चहेती है । सम्राट का उस पर एकाधिकार है, उसके इशारे पर वह पिरकती है, मनोविनोद करती है ऐसी मुजान आनन्द के लिए क्या हो सकती है? परन्तु उसके मन में मुनान के लिए आदर का स्थान है । मुजान उसके लिए सर्वस्व है । ईश्वर जानता है कि आज तक किसी भी रमणी को उसके मानस में कल्पना नहीं थी। बस, जवसे उसने सुजान को देखा, वह जैसे उसके हापों विक गया। यह अधिक देर तक अपने भवन में भी न बैठा रह सका । बग्धी पर बैठकर सुजान के भवन में पहुँच गया। उसने देया-सुजान ने अभी तक अपने वस्त्र भी नहीं बदले । उसका गौर वर्ण, अरविन्द सरीखे नैन, कनक यष्टि सो काया पर रेशमी वस्त्र, कण्ठ मे हीरकहार, नागिन-सी वेणी- सब कुछ आनन्द के नयनो मे समा गया। वह कुछ क्षण स्तब्ध-सा उसे निहारता रहा । 'आनन्द ! तुम स्वस्य नहीं दिख रहे हो । बैठो।' कहते हुए सुजान ने उसके निकट आकर दाहिना हाप कन्धे पर रख दिया। आनन्द रोमाञ्चित हो उठा। 'सुजान' कहकर चुपचाप निहारने लगा। 'बोलो न?' सुजान मुस्कान बिखेरती हुई बोली-'आनन्द ! मैं समझ गई हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो। तुम्हारे अन्तर का मन्यन मुझसे नही छिप सकता । तुम अवस्था, अनुभव, पद-गौरव, ज्ञान तपा मान में मुझसे बहुत ऊँचे हो, यों समझो कि तुम अम्बर हो तो मैं एर धूलिकण हूँ। फिर भी ध्यान रखना-मैं नारी हूँ, जवान है, नाचने वा वेश्या हूँ, इसलिए मुझसे कुछ अज्ञात नहीं । आओ बैठो ।' कहकर नकार ने नेह भरी दृष्टि से आनन्द की ओर निहारा । आनन्द पर पैन - १२ सुजान 'सुगान ! कौन कहता है कि तुम वेश्या हो । नृत्य एक ललित कला है, तुम नाचती हो तो इसका यह अर्थ नहीं कि तुम"." 'हां आनन्द ! मैं वेश्या हूँ।' सुजान ने बात काटकर कहा । 'देखो, मेरी ओर देखो, मैं क्या दिखती हूँ ?' 'तुम एक ऐसी पवित्र देवी हो जिसकी चरणधूलि मस्तक पर लगाई जा सकती है। तुम एक सती-साध्वी ललना हो जिसकी तुलना सीता- सावित्री से...." 'ऐसा न कहो आनन्द !' सुजान का कण्ठ भर आया । 'तुम भावुक हो, कवि हो, सौन्दर्य के उपासक हो इसीलिए ऐसा सोच रहे हो । जो सच है उसे स्वीकारो, सती सीता-सावित्री से मुझ जैसी तुच्छ" 'सुजान ! स्वयं को गहित न करो। तुम्हारी ऊँचाई का पता मुझे है । जिसके पास ऐसी अलौकिक रूप-राशि हो, ऐसी दिव्य कला हो यह.." - 'आनन्द ! तुम जिसे रूप-राशि समझते हो, उसे लूटने के लिए मनुष्य । भेड़िये फी भांति टूट पड़ते हैं, तुम जिस कला पर आसक्त हो, मेरे जीवन की वही बला है । आनन्द ! मैं इन्हीं दोनों से छली गई है। हां ! तुम्हें में सावधान करना चाहती हूँ कि तुम इस मृग-मरीचिका में मत पड़ना। तुम कला मर्मज्ञ हो, भाव जगत् के चतुर चितेरे हो, मेरे प्रति तुम्हारा व्यामोह असंगत है। यों समझो मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है जो तुम्हारे जैसे पावन, निश्छल और आत्मबली को भेंट हो सके । मैं जहाँ हूँ जिस फीचड़ में पड़ी है वहीं रहने दो।' कहते-कहते सुजान हॉफने सी लगी। धन आनन्द को उसकी यह तर्कना बड़ी अटपटी लगी। उसे लगा सुजान किसी दर्द से कराह रही है, उसफा मनोवल जैसे स्खलित-सा हो गया है। उसके शुफापर सुजान के चरणों में मस्तक रख दिया। सुजान चौंककर एक कदम पीछे हट गयी। fE:-Eि: आनन्द ! तुमने मुझे जीवित ही नरक में डाल दिया। लगता है, औरों की भांति तुम भी वासना के घेरे में घिर गये । तुम्हारे जैसा उदात्त व्यक्तित्व आज एका वारनारी के घरणो में झुका ? मैं भर क्यो न गयो ?' 'तुम और चाहे जो भी कहो, सुजान ! अपने और मेरे मध्य वासना का नाम कभी न लेना । लगता है तुमने ही मुझे नरक में ढकेल दिया।' इतना कहते-कहते उसे लगा कि अधिक देर वह रुका तो विक्षिप्त हो जाएगा। वह पीछे की ओर मुड़ा- "जाओ मुजान ! मैं यही समझकर वापस जा रहा हूँ कि कभी-कभी देवता भी चौपट पर सर रगड़ने भक्त को ठुकरा देते हैं।' आनन्द का कण्ठ रंध गया और वह वागे बोल न सका । सुजान की सूझ पैनी थी। उसने तत्काल भांप लिया है, कवि हैं साधारण मानव नही। भयभीत-सी सुजान उसके आगे लपक फर घड़ी हो गई। 'आनन्द ! मुझमे इतनी शक्ति अपदा सामर्थ्य नहीं कि तुम्हारे इन विशेषशो को धारण कर सकू और सुनो तुमने राग छेडा है तो मुनो, यह भी ध्यान रहे कि इस भवन से तो जाने के लिए ही लोग आते हैं परन्तु तुम 'सांग' नहीं हो । मेरे आनन्द हो, तुम जा कैसे सकते हो? को, में तुम्हारे लिए मधु रस लाती हूँ।' सुजान विद्युत् गति से पार्व के कक्ष में घुसी । मानन्द का मुंह कुछ बोलने के लिए खुला किन्तु किससे बोले ? पोड़ी देर तक मानन्द अपने मे खोया रहा। सुजान क्या है ? वह समझ नहीं पा रहा था। रूपयौवन-सम्पन्ना नर्तकी अथवा ज्ञान-गरिमा से परिपूर्ण विदुषी ! उसकी दृष्टि में सुजान सर्वश्रेष्ठ पी। शाही दरवार में उसके पलित नृत्य पर निछावर होते तो उसने अच्छे-अच्छे कुलीन राजाओ, सामन्ती और दरवारियो को देखा था। रंगोले शाह की तो वह इच्छा ही थी । एकाध दो बार जब अर्थ-व्यवस्था पर विचार-विमर्श करने वह शाहंशाह के हरम में बुलाया गया तो वहाँ यही सुजान अपने कोमल करों से शाह को मदिरा पिला रही थी 1 आश्चर्यममो सलने ! तेरे रूप-वैविध्य से तो विधाता को भी दंग होना पडेगा। केसी विकट संगति है । ऐमी विशुद्ध कान्ति को ऐसा जघन्य जीवन देकर ब्रह्मा भी पश्चात्ताप कर रहा होगा । आनन्द ने मन ही मन इस देवी का धन्दन किया । उसको आयें १२ सुजान 'सुजान ! कौन कहता है कि तुम वेश्या हो । नृत्य एक ललित कला है, तुम नाचती हो तो इसका यह अर्थ नहीं कि तुम...' 'हाँ आनन्द ! मैं वेश्या हूँ।' सुजान ने वात काटकर कहा । 'देखो, मेरी ओर देखो, मैं क्या दिखती हूँ?' 'तुम एक ऐसी पवित्र देवी हो जिसकी चरणधूलि मस्तक पर लगाई जा सकती है। सुम एक सती-साध्वी ललना हो जिसकी तुलना सीता- सावित्री से.... 'ऐसा न कहो आनन्द !' सुजान का कण्ठ भर आया । 'तुम भावुक हो, कवि हो, सौन्दर्य के उपासक हो इसीलिए ऐसा सोच रहे हो । जो सच है उसे स्वीकारो, सती सीता-सावित्री से मुझ जैसी तुच्छ"" 'सुजान ! स्वयं को गहित न करो। तुम्हारी ऊँचाई का पता मुझे है। जिसके पास ऐसी अलौकिक रूप-राशि हो, ऐसी दिव्य कला हो वह"" 'आनन्द ! तुम जिसे रूप-राशि समझते हो, उसे लूटने के लिए मनुष्य । भेहिये की भांति टूट पड़ते हैं, तुम जिस कला पर आसक्त हो, मेरे जीवन की वही बला है । आनन्द ! मैं इन्हीं दोनों से ली गई हूँ। हाँ ! तुम्हें में सावधान करना चाहती हूं कि तुम इस मृग-मरीचिका में मत पड़ना। तुम कला-मर्मज्ञ हो, भाव जगत् के चतुर चितेरे हो, मेरे प्रति तुम्हारा व्यामोह असंगत है। यों समझो मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है जो तुम्हारे जैसे पावन, निश्छल और आत्मवली को भेंट हो सके । मैं जहाँ हूँ जिस कीचड़ में पड़ी है वहीं रहने दो।' कहते-कहते सुजान हॉफने सी लगी। धन आनन्द को उसकी यह तर्कना बड़ी अटपटी लगी। उसे लगा सुजान किसी दर्द से कराह रही है, उसफा मनोवल जैसे स्खलित-सा हो गया है। उसके कपार सुजान के चरणों में मस्तक रख दिया। सुजान चौंककर एक कदम पीछे हट गयी । 'छि:-छिः आनन्द ! तुमने मुझे जीवित ही नरक में डाल दिया। लगता है, औरों की भांति तुम भी वासना के घेरे में घिर गये । तुम्हारे - जैसा उदात व्यक्तित्व आज एक बारनारी के चरणो में झुका ? मैं मर क्यों न गयी ?' 'तुम और चाहे जो भी कहो, मुजान ! अपने और मेरे मध्य वासना का नाम कभी न लेना। नगता है सुमने हो मुसे नरक में ढकेल दिया ।' इतना कहते-कहते उसे लगा कि अधिक देर वह रुका तो विक्षिप्त हो जाएगा। वह पीछे की ओर मुडा- 'जाओ सुजान ! मैं यही समझकर वापस जा रहा हूँ कि कभी-कभी देवता भी चौखट पर सर रगड़ते भक्त को ठुकरा देते हैं ।' आनन्द का कण्ठ रंघ गया और वह आगे बोल न सका। मुजान की सूझ पैनी पो। उसने तत्काल भांप लिया है, कवि हैं साधारण मानव नहीं। भयभीत-सी सुजान उसके आगे लपक कर खड़ी हो गई । 'आनन्द ! मुझमे इतनी शक्ति अथवा सामर्थ्य नहीं कि तुम्हारे इन विशेषज्ञों को धारण कर सकें और सुनो तुमने राग छेडा है तो सुनो, यह भी ध्यान रहे कि इस भवन से तो जाने के लिए ही लोग आते हैं परन्तु तुम 'लोग' नही हो । मेरे आनन्द हो, तुम जा कैसे सकते हो ? रुको, मैं तुम्हारे लिए मधु रस लाती हूँ।' सुजान विद्युत् गति से पार्श्व के कक्ष मे घुसी । आनन्द का मुंह कुछ बोलने के लिए खुला किन्तु किससे वोले ? पोड़ी देर तक आनन्द अपने मे खोया रहा। सुजान क्या है ? वह समा नहीं पा रहा था। रूपयौवन-सम्पन्ना नर्तकी अथवा ज्ञान-गरिमा से परिपूर्ण विदुषी ! उसको दृष्टि मे सुजान सर्वश्रेष्ठ पी। शाही दरवार में उसके मलित नृत्य पर निछावर होते तो उसने अच्छे-अच्छे कुलीन राजाओ, सामन्तो और दरबारियो को देखा था। रंगोले शाह की तो वह इच्छा ही थी । एकाध दो बार जब अर्थ-व्यवस्था पर विचार-विमर्श करने वह माहंशाह के हरम में बुलाया गया तो वहाँ यही सुजान अपने कोमल करो से शाह को मदिरा पिला रही थी । आश्चर्यमयी ललने ! तेरे रूप-वैविध्य से तो विधाता को भी दंग होना पडेगा। कैसी विकट संगति है ! ऐसी विशुद्ध कान्ति को ऐसा जघन्य जीवन देकर ब्रह्मा भी पश्चात्ताप कर रहा होगा । मानन्द ने मन ही मन इस देवी का वन्दन किया । उसको आय १४ सुजान अपने आप मूंद गई और उसके रोम-रोम में सुजान का नाम गूंजने इतने में रस कलश लिए हुए सुजान कक्ष में आ गई और आनन्द ध्यानावस्थित देख अचरज में पड़ गई । बोली-'कहां विचर रहे हो ?' अमृतमय शब्दों से आनन्द ने तुरन्त आँखें खोली तभी सुजान से उसे रस- कलश पकड़ा दिया। आनन्द रसपान तो कर रहा था लेकिन मन अतीत में ही था वह बोला-'सुजान तुमने मुझे वासना का संकेत देकर बड़ा अन्याय किया।' 'तो मुझे दण्ड दो, कही हुई बात तो वापस होने से रही।' 'नहीं ! दण्ड में भोगूंगा।' 'ऐसा क्यों ? अपराध मुझसे हुआ और दण्ड तुम"" 'हां मुजान ! जब तक ऐसा नहीं होगा, मेरे चित्त में अयान्ति ही रहेगी । जब सारे समाज का दण्ड तुम अकेले ही भोग रही हो तो तुम अपराधिनी कैसे कही जा सकती हो ? अच्छा, इतना बता दो, क्या मेरी किसी चेष्टा से तुम्हें वासना की गन्ध मिली अथवा..." 'आनन्द ! वासना मनुष्य स्वभाव का अंग है। वासना न हो तो सप्टि का क्रम रुक जाये। तुमने आज अचानक मेरे चरणों का स्पर्श किया, इसीलिए मुझे ऐसी शंका...' 'देखो सुजान यह चरण मेरे लिए पूज्य बन चुके हैं । आज तो क्या अब मेरा अभिवादन इन्हीं चरणों को मिलेगा।' 'नहीं मानन्द ! यह बड़ी घिनौनी वात होगी। जो किसी लोक या युग में न हुआ हो, उसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। और सुनो मैंने अनेक वासना के कीटाणुओं को इन्हीं चरणों पर लोटते देखा है, इस- लिए, तुम्हें मैं ऐसा कदापि नहीं करने दूंगी।' आनन्द ने उसकी मनःस्थिति को समझते हुए कहा-'देखो सुजान ! मन्दिर की चौखट पर सभी मत्या टेकते हैं, परन्तु भगवान की मर्यादा को मांच तक नहीं आती। !
'तुम्हारा यह तर्क में स्वीकार करती हूँ आनन्द ! परन्तु एक वेश्या को वह पद नहीं दिया जा सकता जो भगवान् को सहज ही प्राप्त है । मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम काव्यधारा में गोते लगाते-लगाते स्वाभाविक औचित्य को भुला वैठे हो । तुमने मेरे अतीत को नहीं देया, न कभी मनु- भव ही किया, इसीलिए तुम बहक रहे हो।' सुजान हैस पड़ी और आनन्द मन्त्रमुग्ध-सा उसकी छवि निहार रहा था। 'अच्छा, तो मैं भी सुनें, वह अतीत पया है और उसके जान लेने पर कौन-सा परिवर्तन होता है ।' आनन्द ने आग्रह मरे शब्दों में सुजान से प्रार्थना की। 'आनन्द ! तुम बहे भोले हो। में तो यही सोचकर हैरान हो जाती हूँ कि तुम जैसे सीधे आदमी को मुगल सम्राट ने अर्थ मन्त्री का पद कैसे दे रखा है। अरे भई ! मेरा अतीत सुनो तभी अच्छा है। तुम पके से लग रहे हो विधाम करो। तब तक में कपड़े बदल." 'नही सुजान ! तुम मेरे पास ही बैठो। मैं तुम्हारे विगत जीवन को जाने बिना यहाँ से उठ नहीं सकता।' 'देखो आनन्द ! यह वाल हठ तुम्हें शोभा नहीं देता। एक वेश्या का जीवन कैसा रहा होगा? यह तो सहज अनुमेय है और फिर तुम मेरा अतीत जानकर करोगे भी क्या?' कहकर सुजान खिलखिलाकर हंस पड़ी। आनन्द के समक्ष जैसे अनन्त रूप-राशि बिखर गयी हो। उसने सुजान का हाथ पकड़कर पास हो वैठा लिया और कहा-'देखो सुजान ! लोग मुझे बड़ा सम्मान देते हैं, कवि समझते हैं और मुगल सम्राट का मोर- मुंशी मानकर मेरा मुंह देखते रहते हैं किन्तु मैं केवल उतना ही है जितना मेरी सुजान मुझे समझती है । वही मेरे लिए ईश्वर है और" 'और आनन्द उसकी पूजा करना अपना कर्तव्य समसता है, यही न? वह हंसती रही। 'सुजान ! पूज्य वही होता है जिसे मनुष्य की अन्तरात्मा स्वीकार कर ले । क्या तुम्हें मेरे ऊपर किसी प्रकार का सदेह है ?'
मुजान । 'मानन्द ! तुम एक उत्तरदायी नागरिक हो और मैं एक साधारण नर्तकी जो अन्य नागरिकों का मनोरंजन करके पेट पालती है । मला, मुझे क्या अधिकार है कि मैं किसी पर संदेह करूं? ईश्वर के लिए इस तुच्छ वारनारी को इतने ऊँचे न उठाओ कि गिरने पर चकनाचूर हो जाए । लगता है, तुम अभी नारी के चक्र में नहीं पड़े, अन्यथा." 'नारी का चक्र ! क्या अभिप्राय है तुम्हारा?' 'मानन्द ! नारी यदि सुन्दर है, नवयौवना है तो वह पुरुष के लिए विनोद की सामग्री है और यदि अधेड़ है तो सौन्दर्य रहते हुए भी दूध की मक्खी । मेरे विचार से पुरुष वर्ग की ओर से नारी का यही मूल्यांकन है ? क्यों ? 'सुजान ! तुम्हारे हृदय में विप्लव की आग है । कुण्ठा ने तुम्हारा मानस विष्टत कर दिया है।' 'ऐसा नहीं आनन्द ! मेरे हृदय का विद्रोह अव शान्त है, कुण्ठा तो फव को लुप्त हो गयी। और फिर तुम्हारे जैसा सहृदय जिस पर कृपालु हो उसे भला ये दोनों कैसे पीड़ित कर सकते हैं ?' कहकर सुजान ने आनन्द अपने हाय में ले लिया। 'अच्छा आनन्द ! एक बात बताओ कि...' कहते-पाहते वह रुक गई। 'क्या बात है ? बोलो न । रुक क्यों गई ?' 'नहीं, रहने दो। ऐसी बात पूछना उचित नहीं। लगता है तुम्हारी भायुपाता का प्रभाव मेरे ऊपर भी क्योंकि संसर्गजा दोष गुणा भवन्ति ।' सुजान हंसने लगी। 'मुझे पागल न बनाओ सुजान । मुंह तक आई बात रोकी नहीं जाती। जल्दी योलो।' कहकर मानन्द सुजान का मुंह ताकने लगा। 'अच्छा, सच-सच बताओ, तुम""मुझ""से प्रेम"" कहकर लजा गई। यह सुनते ही आनन्द को अजीव-सा लगा । उसने सुजान की आँखों में अपनी आं हुवा दो। बढ़ी गहराई थी उनमें ! सुजान जैसे प्रपन-चिह्न सी बनी थी। मानन्द ने पूछा--- । का हाय ।
T७ "सुजान ! तुम्हें कैसा लगता है ?' 'कोई नई बात तो नहीं प्रतीत होती। हाँ ! मुझ जैसी वारनारी से तो सभी प्रेम करना चाहते हैं, परन्तु मुझे तो किसी से प्रेम करने का अधिकार नही । वेश्या जो हूँ।' सुजान की मधुर मुस्कान बिखर गई। 'देखी सुजान ! तुम अधिकार को दुहाई मत दो। अच्छा हुआ जो बात-बात में तुमने अपने हृदय का उद्गार स्पष्ट कर दिया। मैं सुन्दर नही हूं इसलिए यदि तुम मुझसे घृणा भी करो तो मेरे ऊपर कोई दुष्प्रभाव पड़ने से रहा । मैंने तुम्हारा बहुत समय नष्ट किया, इसनिए पलता हूँ।' कहकर वह उठने लगता है। 'कहाँ चले? चल देना इतना आसान नहीं जितना तुम समा रहे. हो । देखो, प्रेम एक पवित्र तत्त्व है। जिसका सुन्दर प्रमाण द्वापर को राधा है। कृष्ण ने राधा के दिव्य समर्पण से जो शक्ति अजित की उसका दर्शन महाभारत-विजय में स्पष्ट हुआ । ऐसे समझो कि कृष्ण की सफ. लता के पीछे राधा का ही वलिदान था। इसलिए 'प्रेम' शब्द का उच्चा- रण भले ही सरल हो, व्यवहार असम्भव नही तो कठिन अवश्य है । तुम मुझसे जो प्रेम करते हो वह मुझे आसक्ति लगती है, वह तुम्हारा मोह है, जो प्रायः एक सुन्दरी ओर वेश्या के प्रति सभी प्रदशित करते हैं। इसी लिए कहती हूँ कि यदि तुम मेरा अतीत जानते तो शायद..." कहते-कहते सुजान गम्भीर हो गई। घन आनन्द ने अभी तक उसका ऐसा रूप देखा ही नहीं था। वह सोचने लगा-सुजान में ज्ञान का सागर लहरा रहा है । सुजान कहती है कि कृष्ण की शक्ति के पीछे राधा का त्याग था, ठीक ही तो है। कैसा दिव्य समर्पण या वह । प्रेम व्यक्ति को महान् वना देता है। 'अच्छा सुजान ! मेरी भी सुनो । मैंने अब तक अपने जीवन में रिसो भी नारी की कामना नहीं की। मेरे पिता सम्राट के कृपापात्र पे उनकी महतो अभिनापा थी कि मेरा पाणिग्राम संस्कार हो पाए रिन्तु मैं। । ।
१५ सुजान - में नहीं रहे तो विधवा मां की सेवा ही मेरा व्रत बन गया। इसलिए मुझे गृहस्थ बनने का अवसर ही नहीं मिल पाया। एक शुभ दिन मेरे जीवन में आया जव तुम्हें शाही दरवार में देखा। मेरा सौभाग्य था कि मैं तुम्हारी गरिमा को छू पाया । और आज ? आज तुम मेरी आत्मा हो । तुम प्रेम का जो भी पर्याय स्थिर करो, मेरा अन्तर उसी में कृतार्थ हो जाएगा।' मानन्द जैसे हल्का-सा हो गया। सच है, आत्माभिव्यक्ति मनुष्य को निर्मल बनाकर आत्मा में संवल का संचार कर देती है । सुजान अन्दर ही अन्दर गद्गद हो रही थी, परन्तु कुछ टटोलने के लिए उसने जिज्ञासा व्यक्त की। 'अच्छा ! तो सचमुच तुम्हारे जीवन में कोई नारी नहीं आई जिसने तुमसे प्रेम किया हो ?' 'सुजान ! आती तो अवश्य कोई न कोई, परन्तु 'परन्तु क्या? 'परन्तु मुझमें ऐसा आकर्षण ही नहीं था. जिससे प्रभावित होकर कोई मुझ अकिञ्चन पर आत्मसमर्पण कर देती।' 'यह तुम कैसे कह सकते हो कि तुम आकर्पक नहीं । तुम्हारी कविता में पशु-पक्षियों तक को रिझाने की शक्ति है फिर नारी तो...' 'लेकिन यह क्यों भूलती हो सुजान ! कि मेरी स्वर-माधुरी को माफर्पक बनाने वाली भो तो तुम्ही हो। तुम्हारी पायल की झनकार से मेरे पदों के स्वर संकृत होते हैं। सच तो यह है कि तुम्हीं मेरे स्वर में बोलती हो । तुम मेरे मन में, ध्यान में तथा आत्मा में साकार बनी हो, मेरी प्रेरणा हो या यों कहो मेरे जड़त्व की तुम्ही चेतना हो ।' 'आनन्द ! तुम व्यामोह में पड़कर ऐसा सोचा करते हो और शायद प्रत्येक कवि के साथ यही होता है । परन्तु सोचने की बात तो यह है कि तुम भाव जगत् के व्यावहारिक जगत् को झुठला नहीं पाओगे । मैं वार-- बार तुम्हें सतर्क करेगी कि मुझ जैसी अभागिनी में अपना निप्पालंक मन मत उलझाओ मुझसे ऐसी कोई आशा न करो जो आगे चलकर तुम्हें ..- जान १८ पीड़ा ही पीड़ा दे सके। भूमि पर रहते हुए भूमि के नियमों का पालन ही श्रेयष्कर है ।' सुजान ने उठना चाहा किन्तु आनन्द ने पुनः बैठा लिया । और कुछ कहोगी या बस 1 मैंने तो एक ही बात गांठ बाँध ली कि जीवन भर तुम्हें ही अपनी आराध्या मानकर पूजा करूगा मोर मरते समय भी मेरो जिह्वा पर तुम्हारा ही पवित्र नाम होगा । तुम्हारा अतीत क्या था? यह जानना मेरा कार्य नही । मैं तो मात्र इतना ही जानता हूँ-मुजान मेरी हर सांस मे है, सुजान के चरण मेरे लिए पूग्प हैं, सुजान मेरो सर्वस्व है, बस ।' कहकर आनन्द उठ खड़ा हुआ । अभी द्वार की ओर बढ़ा ही था कि सुजान आगे खड़ी हो गई। वह आनन्द की और बड़े अनुराग से निहारते हुए बोली--'आनन्द ! इस प्रकार तुम मुझे सुख से नही बैठने दोगे। अच्छा ! आज जाओ। कल शाही दरवार से मैं सीधे तुम्हारे भवन में पहुँचूंगी और सारी स्थिति स्पष्ट करूंगी तव तुम्हारी आँखें खुलेंगी। 'मेरा अहोभाग्य' कहकर आनन्द जल्दी से बाहर हो गया। सुजान का सिर भारी लग रहा था अतः पर्यक पर मेट गई।...
- . सुजान शान्तिपूर्वक लेटी भो न रह सकी । आनन्द की निर्मल मुखा- कृति आंखों के आगे थी। उसे स्वयं पर लज्जा आ रही थी । निःसन्देह आनन्द हृदय से उसे चाहता है। उसके प्रेम में शुद्धता, पवित्रता एवं सरलता का पुट है । सुजान मन ही मन आनन्द को अपना आराध्य मान वैठी । आनन्द अपने प्रत्येक पद में 'प्यारे सुजान सुनौ' अवश्य जोड़ता है। कुछ भी हो-मैं उसकी इच्छा अवश्य पूरी करूंगी। आश्चर्य है, जब से में मुगल सम्राट् के दरबार में आई आनन्द तभी से मुझ पर न जाने क्यों मुग्ध है । वह निष्कपट प्रेम करता है, मेरी एक-एक चेष्टा पर निछावर है, उसका समर्पण में स्पष्ट रूप से अनुभव कर चुकी हूँ। उसके प्रेम को प्रतिदान अवश्य मिलना चाहिए। उसका शरीर आकर्षक न सही मन सुन्दर है, अन्तर आफ्र्पक है, स्वर मधुर है, उसकी भावाभिव्यक्ति चरम फा स्पर्श करती है, एक सामान्य पुरुप में इन सभी गुणों का होना प्रायः दुप्फर है । और मेरा आनन्द इन्हीं गुणों का आगार है । मुझ जैसी वारां- गना को यह प्यार करता है इसे दैवी विधान ही कहा जा सकता है। . अथवा प्यार ऐसा हो रोग होता होगा। लेकिन धन्य है आनन्द, धन्य है उसकी निष्ठा । नानन्द ! मैं तो तुम्हारे हाथों विक गई । सोचते-सोचते गुजान की आंखों में आंसू विर आए । उसने आनन्दविभोर होकर आनन्द पी वही पंक्ति दुहरा दी- 'धन आनन्द प्यारे सुजान सुनी इत एक ते दूसरो आंक नहीं।' वह शव्या से तेजी के साथ उठी और दासी को पुकारा-'निर्मला! गया कर रही है रे ?' निर्मला पाकशाला में थो, धुएं से आंखें मलती हुई - LIS दौड़कर भाई-'बीवी जी । भोजन तैयार है, अरे आपने तो अभी तक कपड़े भी नहीं बदले।' कहती हुई एक ओर पड़ी हो गई। सुजान ने उसे गले लगा लिया । वह चौंक पड़ी तपा उसे संकोच भी हुआ । वह सोच नही पा रही थी कि आज स्वामिनी को क्या हो गया है ? तब तक मुजान बोली- 'निर्मला | सच बता, तूने कभी किसी से दिन लगाया है ?' 'दिल ! आज आप यह क्या" 'हां निर्मल ! जिसने किसी से प्यार न किया हो, वह भी कोई नारी है।' सुजान हंस पड़ी। 'बीबी जी ! प्यार वडी बुरी चीज है । मैं कुतिया के पिल्ले को बहुत प्यार करती थी और समय पाकर वह कहीं गायब हो गया तो मेरी नीद हराम हो गई। 'धत्तेरे को ! मैं कुत्ते को नही, किसी पुरुष से प्यार की बात कह रही थी। 'आप भी क्या कह रही हैं ? मालकिन ! प्यार में पुरुष का क्या भरोसा ? कही आप ही का मन तो..." 'निर्मल ! तू जन्म भर नहीं समझ पाएगी कि प्यार क्या होता है ? जा, चौके में पाल लगा। मैं कपडे बदल कर आ रही हूँ।' मुजान का अन्तर एक अद्भुत कल्पना से ओत-प्रोत हो रहा था। उसके मन की मुराद पूरी हो गई थी। आनन्द उसके रोम-रोम मे वस दुका था । आज उसे जीवन को सार्थकता की अनुभूति हो रही थी। वह खाने बैठी, क्या खाया ? क्या पिया ? उसे कुछ भी ज्ञात नहीं । पारो ओर आनन्द ही आनन्द । निर्मला सेज सगा गई । थकी तो पो ही मुजान पैया पर पड़ते ही निद्रामग्न हो गई । स्वप्नो मे ससार वसने लगा । उसने देखा उसकी सहेलियाँ उसे दुल्हन बना रही है । महावर रचित धरण, मेहदी मे गत माफर्पक हाथ, बाभूपणो से लदी सपियो के मधुर व्यंग्य सुन २२ सुजान । - । पालकी पर बैठी । पाहार लम्बे ग भरने लगे। उसने पालकी पर पढ़े पर्दे से सामने की और देवा आनन्द ! अत्यन्त सुन्दर, सुडौल, लुभावना, घोटे यो ऐट लगाता हुआ आगे-आगे चल रहा था। सुजान की कामना लता पुष्पित-पल्लवित हो रही थी । पालकी से उतारी गई सुजान गीत- पाए के मध्य भवन के अन्तःपुर में लाई गई। अब सुजान शैय्या पर पूंघट गाळे, नीने शिर किए, शान्त बैठी थी। राहता पक्ष के तार का पर्दा उठा । सुजान ने उधर टि डालो उसने अपने प्राणनाथ को वटी श्रद्धा से नमन किया और चुपचाप बैठी रही। आनन्द वे पाय शैया तक आया, उसने धीरे से बूंघट उठाया और नीचे ही जमीन पर बैठकर सुजान को चरणों में सिर रख दिया। सुजान चौक पड़ी। बोली 'आनन्द ! उठो, आओ, पारा बैठो । देखो मैं तुम्हें कैसी लग रही हूँ ? उठो देपो है न तुम्हारो राधा ।' आनन्द शान्त भाप से बैठ गया और उसे निहार रहा था । सुजान प्रेम विभोर हो रही थी। उसने लोगों गी गुहागरातों का बहुत विवरण सुन रखा था। उसको जीवन में भी अनेक युवा-पुरुष आये सभी प्रकार के मोद-विनोदी सुयोग सुअवसर आये परन्तु गुहागरात का यह स्वरूप अनोपा ही था । आज ही उसे अपने राज्ये प्रियतम मिसे थे । यह हातिरेग में बोल उठी-~-'मेरे स्वामिन् ! मेरे अन्तर गो देवता, मेरे आनन्द !' पाह पायी थो कि सहसा आँख सुल गई। देवा तो सामने जलपान लिए निर्गला पड़ी मुस्करा रही थी। सुजान ने थोड़ा-सा जल पीकर फरवट बदली। थोड़ी देर पहले यह जिरा संसार में भ्रमण कर रही थी, उसे ही फिर से वापस लाने का प्रयत्न गरने लगी । गुजान उसी स्निग्ध पाल्पना में खो जाना चाहती थी। निर्मला वहीं पड़ी रही। गुजान गे पुनः गारवट वदनी । निर्मला ने अपनी स्वा- मिनी के प्रसन मुप को ध्यान से देखकर नहा-'मालकिन ! आज तो आप पुरुदन-सी लग रही हैं क्या कोई सपना । 'धत !' वात पाटकर मुजान बोली-'सपने में ऐसा पया ? जल- पान रखकर तू घाटपट मेरे यस्माभूपण ठीक कर।'
सुजान 'यया कहीं जाना है ? निर्मला ने प्रश्न किया । 'हाँ ! आज दरवार में नृत्य का विशेष आयोजन है । तू जल्दी से नाश्ता तैयार कर दे । भोजन वापसी में होगा।' 'अच्छी बात है। कहकर निर्मला तैयारी में लग गई। स्नान-ध्यान के पश्चात् मुजान ने जल्दी-जल्दी कुछ खाया और शृङ्गार कक्षा में जा बैठी । अनुरूप शृङ्गार क्यिा । आज ही तो शृङ्गार में उसका मन लगा। बग्घी बाहर लगी और निर्मला के साथ वह शाही दरवार की ओर चली । उसका अन्तर्मन रात के अद्भुत स्वप्न में उलझा हुआ था । बड़ी उत्कंठा से चारों ओर दृष्टि डालती रही कि अकस्मात् कही से मानन्द दिखाई पड जाये । माज आनन्द को देखने के लिए उसका अन्तर व्याकुल हो रहा था। उसे ऐसा लग रहा पा कि वह अब वेश्या नहीं एक सौभाग्यवती गृहिणी बन गई है। उसने मन ही मन निश्चय किया कि आज का नृत्य उसका अन्तिम नृत्य होगा। आखिर वह पेट के लिए हो तो ऐसा करती है। वह भली-भांति समझ गई कि उसके नृत्य पर 'बाह- पाह' करने वाले सभी वासना के भूखे थे। उसे सब याद आया शाह मे हरम में बेगमो की कतार लगी हुई थी फिर भी शाहंशाह उसे अपनी बाहों में समेटने के लिए उन्मत्त हो उठते थे। यह तो सुजान हो यो कि उनके वासनाजाल से बाल-बाल बचती यो। इन सब में एक ही ऐसा परित्रवली मनस्वी था जिसने मुजान को आत्मा से निष्कपट अनुराग रखा । वह है मेरा आनन्द । जैसा नाम वैसा ही गुण । माज तो मैं केवल अपने आनन्द के लिए नाचूंगी। फिर यदि आनन्द चाहेगा तभी मेरा नृत्य होगा अन्यथा नहीं । मानन्द वासना के कितनी दूर है। बग्यो शाही दरवाजे पर रुकी। प्रहरी ने अन्दर शाक कर देखा और आगे बढ़ने का संकेत दिया । निर्मला ने स्वामिनी को उतारा । मुशान को देखते ही सबके मुखमण्डल चमक उठे। दरवार पचाखच भरा था। शूर-सामन्तों के अतिरिक्त विशिष्ट नगर निवासी थेठी आदि भी नृत्य का आनन्द लूटने के लिए बैठे थे। सुजान महफिल में पहुंची । माहंशाह 1 २४ सुजान को आदाव तो उसने जरूर बजाया क्योंकि आदत बन चुकी थी, परन्तु आज उसे ऐसा करना अच्छा न लगा। चारों ओर दृष्टि डाली। किसे रही थी, यह केवल वही जानती थी। आनन्द आज दरवार में न था। उसका आसन खाली था । सुजान का कमल की भांति खिला हुआ मुखमण्डल क्षण मान में उतर गया। उसके पांच आगे न बढ़ पा रहे थे। सारा उत्साह जैसे हवा उड़ गया। कुछ और सोचने-समझने का उसे अवसर न दिखाई पड़ा। पीड़ित-सी साजिन्दों के दल में बैठ गई। आज मृदंगाचार्य हेमचन्द्र भी उपस्थित थे। वे सुजान के गुरु रह सुके थे। गणेशताल पर नृत्य की अभिनव कलाएं उन्होंने ही सुजान को समझायी थीं। बड़ी निष्ठा से सुजान ने यह नृत्य सीखा था और इसके लिए जब उसने दक्षिणा प्रस्ताव रखा तो हेम ने जो इच्छा प्रकट की उसे सुनकर सुजान लज्जा से जैसे गड़-सी गई थी। सुजान समझ नहीं पा रही थी कि गुरु शिप्य में वासना का सम्बन्ध कैसा? क्या इससे भारत की पवित्र परम्परा को ठेस नहीं पहुँचेगी। बड़ी कठिनाई से हेम से उसने पीछा छुड़ाया था । आज महीनों के बाद दिखाई पड़े गुरुदेव को सुजान ने हाथ जोड़कर वन्दन किया। सदाशिव सारंगी के तार कस रहा था । टियां ऐंठते-ऐंठते उसने सुजान को अपने पास बैठने का संकेत दिया। सदाशिव सुजान को उस समय से जानता था जब वह एक साधारण नर्तकी के रूप में शाही दरवार में आई थी। सदाशिव ने ही रंगीले शाह से सुजान की सिफारिश की थी। बड़ा उपकार था उसका जिसकी उसने नाज तक कभी चर्चा भी नहीं की। सुजान ने घुघुरू तो बांधे, परन्तु उसके चरण नाचने के विरुद्ध जैसे विद्रोह कर रहे थे । सबका आँखें सुजान पर लगी थीं और सुजान के हिरणी-से चकित नयन केवल आनन्द को ढूंढ़ रहे थे। मन मारकर रह गई । सहसा साज ण्डेि, ठुमरी! शास्त्रीय संगीत ! सुजान ने मन ही मन आनन्द का स्मरण किया और थिरक उठो! उसके पैर सारंगी के तारों पर फिसल रहे थे। वह भ्रमित तो हो जाती, परन्तु सदाशिव ने उसे ! - मुजान २५ बार-बार संभाला । लगभग एक घण्टे तक नृत्य चलता रहा । गुगान फो लगा कि सदाशिव की सारगी उसे नचा रही है क्योकि हेमचन्द्र बीप. बीच में बेतुका ताल दे देता था रि उसके पाँव उप-उपड़ा थप पाते थे। संगीत ही एक ऐसी कला है, जहाँ विद्रोह को पलने का शपसर ही नहीं मिलता है। सब ले दे कर यही कहा जा सकता है कि नरम भाग जमा नहीं। 'सुजान ! गुदा की कसम, आज तुमने दिल से नाप नहीं किया। गाहगाह ने येस्सी से कहा और साथ ही बोले-'अन्ठा, छोड़ो से, आओ हमारे साथ ।' कहते हुए वे गुजान को साथ सार हरम की भोर चले । सुजान को आज हरम मे प्रवेश करना भारी पड़ रहा था । यह जैगे फोटों पर पांव रख रही थी। 'जहाँपनाह ! आज इरा दासो को रुखसत करें, तधियत कुच" मुजान ने विनती की। 'इंशा अल्लाह ! तुम्हारी तबियत का नामार होना हमारे लिए बेमौत की मौत है। हम अभी हकीम गफूर मियों को तलव करते हैं। बात यह है मेरी जान ! बिना मुम्हारे पाप मे जाम वा प्याना पिये हमारी सवियत भी दुरुस्त नहीं रह सकती। आयो, आयो।' 'शाहंशाह ! परवरदिगार ! रहम फरमाइए । इस वक्त मुझे वरिगए, मैं याद करती हूँ कि शाम से पहले जरूर हाजिर होगी।' मुगान ने बड़ी पतुराई से रंगोले शाह मे एट्टी पाई। बाहर आकर मुजान बग्घी पर बैठी । लेकिन मानस में उसके बाद ही पूम रहा था। यह सोन नही पा रही थी कि आनन्द बाज दरबार में पयों नहीं आया? नमाम आशकाएं मन आ रही पों। जो भी हो मानन्द को दरवार में न देयकर गुजान को वही निराशा हुई । एक मन के लिए उसके मन मे आया कि उसने आनन्द के यहां पहुंचने का वचन दे रखा है फिर विचार बदला। यह मे निकलता तो साय ही उसके भवन को ओर चल देतो । सोधेन भरना उनिर २ २६ सुजान - . नहीं। बग्धी थोड़ी ही देर में सुजान के मुख्यद्वार पर लगी। उतर कर सुजान अपने शयन कक्ष में पहुंची और घड़ाम से शैया पर गिर पड़ी। कैसी विडम्बना है। यह भी कोई जीवन है। जहां जाओ वहीं नोचने- खसोटने की क्रिया। ऐसा लगता है कि वह कोई जीव नहीं, उसका अपना कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व नहीं। जैसे, उसे अपने आप कुछ सोचने-विचारने अथवा कोई कदम उठाने का रंचमात्र अधिकार नहीं। अच्छा, अधिकार भी छोड़ो, जीने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए। जब इस संसार में अगणित जीव-जन्तु-पशु-पक्षी-पेड़-पौधे अपना जीवन-यापन कर ही रहे हैं, तो मनुष्य के लिए ऐसी आपा-धापी क्यों ? क्यों एक को खाकर ही दूसरा जीवित रहना चाहता है । आज मुझमें यौवन है, कल नहीं रहेगा । जिन पांवों में आज धुंघुरू झनक कर असंख्य रसिकों का अन्तर संकृत कर देते हैं, हो सकता है कल इन अभागे पैरों में थिरकने की शक्ति ही न रह जाए। यह सब कुछ सम्भव है। फिर तो आनन्द ही ठीक कहता है। इसलिए, समय रहते क्यों न उसकी बात मान ली जाए उसका मन गृहिणी बनने के लिए बड़े वेग से ललचाया। कुछ समय तक वह दिवा- स्वप्नों में ही खोई रही। अचानक उसने निर्मला को पुकारा और वह दौड़ती हुई आकर बोली -~~~-'क्या बात है ? बीवी जी ! मैं भोजन तैयार करने में लगी हूँ। आप फो भूख भी लगी होगी। सुबह से खाया ही क्या है ?' 'निर्मल ! खाना-पीना छोड़ो। यह वताओ तुमने आनन्द का भवन देखा है ? 'हां मालकिन ! उनका भवन इस शहर में कौन नहीं जानता ? उसी मुहल्ले में मेरा ननिहाल है बीबी जी ! उनकी हवेली के सामने ही एक विशाल बरगद का वृक्ष है जहां वट-सावित्री अमावस्या को बहुत बड़ा मेला लगता है । फिन्तु, आप उनका घर क्यों पूछ रही हैं ?' 'निर्मला ! बग्घी तैयार कराओ, इसी समय वहां चलना है।' ।
सुजान 'जैसी इच्छा' कहकर निर्मला कुछ दूर चलो पुनः लोटकर-'लेशिन स्वामिनी ! भोजन आदि से निवृत्त होकर चलना उचित होगा। बिना खाए-पिए किसी के घर पहुँचना"मुजान ने बात काटकर-निर्मल ! तू वहीं मे अपनी ननिहाल चली जाना और चा-पोकर आ जाना।' "किन्तु आप ? मुझे अपनी चिन्ता नहीं मालकिन, आपकी है । यहाँ आधा भोजन वन सुका है अब इस प्रकार यहाँ से चल देना-'तू जा जल्दी बग्घी वैयार कराके द्वार पर सगवा, वस।' कहकर मुजान शृङ्गार- कक्ष में पहुंची । बडी देर तक विचारतो रहो, कैसा शृङ्गार करे, उसके समस यह एक भारी समस्या आ खड़ी हुई । साधारण रात तो नही, आखिर उसे अपने आनन्द के पर जाना है। मन में सुनहली कल्पना के आते ही उसने ढाका की धानी रग की साडी निकाली आंचल डाला ही पा कि विचार बदल गया। यहां तो शुद्ध-सात्विक वेप की आवश्यरता है । उसने झटपट श्वेत रंग की धोती पहन ली। सूडा बांधा और गले में एक साधारण-सा हार डाल कर वह कक्ष के वाहर आ गयो । यद्यपि सुजान ने कोई शृङ्गार नहीं किया था तथापि आज वह सर्वाधिक सौंदर्य मयी लग रही थी। जब यह बग्घी में बैठी स्वय निर्मला को ही विचित्र सालगा। बग्घी बीच बाजार से होकर निकली। सुजान भावी कल्पनाओ मे खोयी थी। न जाने कितने समय बाद आज वह किसी सम्प्रान्त नाग- रिक के भवन मे जा रही थी। उसे रात का स्वप्न भी अक्षरशः पाद आ रहा था । यह कभी तो अपने मौभाग्य पर मन ही मन इटला उठतो तो कभी शान्त हो जाती। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था उसकी सांसें तीय होती जा रही थी । उत्कण्ठा वह रही थी। इतने मे बग्घी एक आलीशान हवेली के सामने रुकी। मुजान का जी धक से हुआ। उसे लगा, आनन्द ही उसे उतारने आ रह परन्तु यह तो कोई और है। एक अधेड़ व्यक्ति ने पूछा-'वीयो कहाँ जाएंगी?' सुजान मौन थी। "हम धन मानन्द से मिलने आए २८ सुजान निर्मला ने तपाक से उत्तर दिया । परन्तु वेटी! आनन्द तो कुछ पहले शाही दरवार की ओर गए हैं । आइए मां जी हैं । मैं उन्हें खबर देता हूँ' कहते हुए वह व्यक्ति हवेली के अन्दर बढ़ा। मुजान को काटो तो खून नहीं । धोखा हुआ । हाय रे मनुष्य के मनोरथ । तेरे अस्तित्व में रंच- मान भी स्थायित्व नहीं। अभी तक वह नाना प्रकार की कल्पनाओं में विचर रही थी लेकिन क्षण में सव छु मन्तर । सुजान की इच्छा हुई कि वह लौट चले। तभी मानन्द की मां गोमती देवी द्वार पर आई। उन्हें देखकर श्रद्धा से सुजान की आंखें भर आई। उसने आगे बढ़कर गोमती के चरण हुए । गोमती के लिए वह अपरिचित थी किन्तु शुभ्र वेष पर वह मोहित हो गयीं। उन्होंने सुजान को गले से गला लिया। 'वेटी ! युग-युग जिओ। चलो, अन्दर चलो।' सुजान मंत्रमुग्धा-सी गोमती के पीछे-पीछे चली। भवन के मुख्य द्वार से अतिथिशाला लगी हुई थी। सुजान की दृष्टि पड़ी तो वह आश्चर्य चकित हो गई। वह वहीं पर रुक गई, सामने दीवार पर एक चित्र अंकित था जिसमें राजा जड़भरत के वाण से विद्ध हिरणी नदी के दूसरे तट तक उछल कर गई परञ्च हिरणशावक को जन्म देकर मर चुकी थी। कलाकार ने मृगी की अधखुली आंखों में ऐसा जादू दिखाया था कि उसे देखते ही सहज प्रतीति हो रही थी कि अपने सद्यः उत्पन्न शावक को चिरजीवी होने का आशीर्वाद दे रही थी। उसकी ममता चित्र में साकार हो उठी थी इसीलिए मुजान उसे देखते ही सारा- फचानक आत्मसात् कर गई थी । जैसे उससे रहा नहीं गया, वाणी मुख- रित हुई.--'मां जी!' 'कहो बेटी ! इस चित्र के बारे में....' 'हां मां ! यह चित्र बड़ा करुण है। कितना दिव्य हृदय होगा उनका जो नित्यप्रति..... । ! 'वटी ! आनन्द के पिता जी इन चित्रों के बड़े शौकीन थे। इस सुभान २८ - चित्र को तो वे घण्टो देखते और रो उठने थे। इसे एक बंग चित्रकार ने उरहा था। बेटी ! इसे बनाने में वह दो महीने जुटा रहा और उसके नपरे से हम सब तंग आ गए थे। उसे रंग पसन्द करने में दो-दो घण्टे लग जाते । और सबसे बड़ी परेशानी तो यह थी कि वह मांसाहारी था, भापा-बानी वही अटपटी। तुम जानो, हम सोग ठहरे शुर वैष्णव ! लगता है, बेटी तुम भी 'हो मा जी ! हम वैष्णव हैं।' सुजान ने निर्मला की उंगली दयाकर उसे अलग हटने का संरेत किया। 'मा जी | उस चित्रकार मे कहीं अधिक सहृदय तो आनन्द के पिता ये जिन्होंने चित्र के लिए ऐसा कथानक धुना। यह चित्र तो मां जी! भागवत महापुराण के राजा जहमरत की कथा से सम्बन्धित है।' 'तो तुम्हें कथा भागवत् से काफी रुचि है। आओ बेटी, यहाँ बैठे अरे, मैंने तो तुम्हारा परिचय तक नहीं पूछा।' 'माजी ! सबसे बड़ा मेरा परिचय तो यही है कि मैं आपकी बेटी जो हूँ। पैसे तो इस समय अपना कहने को मेरा कोई भी नहीं है।' कहते-कहते सुजान का मुख उतर गया। 'बेटी! दुःपी मत हो । तुम्हारा वेष देखकर ही लगता है कि शायद सुम विधवा हो चुकी हो लेकिन तुम कभी-कभी मेरे पास आ जाया करो।' "हो मा ! आपसे मिलने की बड़ी इच्छा थी आनन्द के मुख से बाप- की प्रशसा सुनी थी। आज मेरी मेविका ननिहाल आने लगी मैं भी उसके साथ आप से मिलने आ गई।' 'बड़ा अच्छा किया बेटो ! देखो, मैं भी आनन्द के पिता जी के न रहने पर दुःखी जीवन बिता रही हूं। लाख आग्रह करने पर भी आनन्द विवाह के लिए तैयार नहीं हो रहा ! मेरी भी अवस्था हो चली । सोचो- यदि मेरी भी आंखें मुंद गई तो वह ओला रह जाएगा। इतनी बड़ी हवेली, ये नौकर-चाकर एक कुलवधू के बिना समो कुछ मूना रहता है।'
३० सुजान 'लेकिन मां जी! आनन्द ने अभी तक विवाह क्यों नहीं किया ? पया कोई लड़की ही उन्हें पसन्द नहीं आई ?' 'क्या बताऊँ ? बेटी ! लड़कियां तो एक से एक हैं -सुन्दरी और गुणवान् । एक-दो के घरवाले तो बहुत दिन से मेरे पीछे पड़े हुए हैं परन्तु आनन्द का मन तो एक नाचने वाली में लगा है। उस कलमुंही ने न जाने कौन-सा जादू कर दिया है कि रात-दिन उसी का नाम जपता है ।' सुनते ही सुजान का चेहरा फीका पड़ गया। समझ तो वह सब कुछ गई फिर भी सत्य को जानने के लिए वोली-'मा जी ! वह नाचने वाली कौन है ? 'ना जाने वेटी ! कौन है ? उसे सुजान कहते हैं । शाही दरबार में नाचती है । वेटी ! वह रण्डी है। एक प्रकार से उसने तो मेरा घर बरवाद कर दिया। आनन्द उसके चक्कर में ऐसा उलझा है, कि जो भी गीत-भजन लिखता है सब में उसी का नाम आगे रहता है । मुझे तो वह कभी दिखी नहीं। आनन्द ने कल बताया कि वह आज यहां आने वाली थी। अभी तक तो वह नहीं आई, शायद उसी की खोज में आनन्द कहीं पागल बना घूम रहा होगा।' गोमती के मुख पर घोर निराशा थी। भावों का भभका लगते ही उस वृद्धा के नयन से दो बूंद छलक पड़े। सुजान का मन जैसे विपाक्त हो उठा। अब उसके लिए यहां एक क्षण भी बैठना दूभर हो रहा था । बांसू पोंछते हुए गोमती ने पुनः आह भर कर कहा-'बेटी ! मेरी तो समझ में नहीं आता है कि मैंने सुजान का क्या विगाड़ा है जो वह इस प्रकार का प्रतिकार कर रही है। सच तो यह है कि यदि वह मुझे मिल जाती तो मैं आंचल पसार कर उससे इतनी ही भीय मांगती कि मेरा आनन्द मुझे वापस कर दो। वह वेश्या भले हो लेकिन मुझे विश्वास है बेटी ! वह मेरी प्रार्थना अवश्य मानेगी क्योंकि उसके पास भी नारी हृदय तो होगा ही। इस भवन के बुझते दीपक को संभाल लेगी । सुना है बेश्याएं भी कभी-कभी त्याग-मूर्ति बन जाती हैं। आज बानन्द ने कुछ खाया-पिया तक नहीं उसी के पीछे जाने कहां-वहाँ मुमान भटक रहा होगा। कुल की मर्यादा तो घुल ही गई साथ ही वंश का दीपक भी बुझा ही समझो। क्या बताऊँ वेटो ! मुजान ने सो हमें यहीं का नहीं रखा । क्या तुमने कभी सुजान को देखा है ? यह प्रश्न ऐसा आघात-सा लगा कि सुजान को अपने लिए संभालना ही कठिन हो गया। उसे सगा किसी ने उसके सिर पर शिला पटक दी हो । वह आँप बचाकर चित्र देखने लगी। इतने में पीछे से आनन्द की पदचाप सुनाई पड़ी । वह बहे वेग से कक्ष मे आया और सामने मुजान ही पड़ गई–'सुजान ! तुम यहाँ आ गई हो ! और मैं तुम्हें दूदने दरवार गया, तुम्हारे घर गया ।' मा की ओर मुडकर-'मा जी ! यही यह सुजान हैं जिनके शान-गुण-शील की मैं पर्चा किया करता था।' सुजान ने तो जैसे कुछ मुना ही न हो । झटके से उठकर निर्मला के साप बग्घी पर जा बैठी। मां जी के चरण छूना तक भूल गई। 'सुजान ! क्या हो गया तुम्हें ?' कहते हुए मानन्द दोहा पर यम्पी आंख से ओझल हो चुकी थी। वह लौटकर मां के पास वाया और बोला--"मो ! अवश्य ही तुमने मुजान का अपमान किया होगा। भला घर आए हुए को... गोमती ने अपनी भूत स्वीकार को और आदि से अन्त तक सब कुछ बता दिया । आनन्द कटे वृक्ष-सा वहीं फर्श पर गिर पड़ा। मां को तो जैसे काठ मार गया।
1 सुजान सारे रास्ते बग्घी में रोती रही। यद्यपि राजपथ पर वग्धी की खड़खड़ाहट होती रही और तीन गति के कारण हिचकोले भी कम नहीं थे तथापि सुजान की सिसकियां निर्मला स्पष्ट रूप से सुन रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर हुआ क्या ? आनन्द की माँ के साथ स्वामिनी का बड़ा मधुर वार्तालाप चल रहा था, वह दूर बैठी थी तो भी उसका अनुमान था, जैसे मां-बेटी वर्षों के वाद मिली हों और जैसे ही आनन्द आया मुजान झटके से उठ खड़ी हुई और तीर की भांति बग्घी में जा बैठी। जिस आनन्द से मिलने के लिए वह आतुर होकर विना खाये-पिये ही घर से भाग आई थी वही आनन्द जब मालकिन के सामने पढ़ा तो तेवर ही बदल गये ! निर्मला जैसे किसी पहेली में उलझ गई। उसने बग्घी में बैठी सुजान को देखा तो उसके नेत्र सूज गये थे। आमू तो रुकते ही न थे । बार-बार पोंछने पर भी आंचल तक भीग गया था। निर्मला का भी कण्ठ भर माया । मधु वेग रोककर रुंधे कण्ठ से पोल पड़ो-'मालकिन ! क्या बात है ? मैंने आपको कभी ऐसी स्थिति में नहीं देखा। माज ऐसा क्या हो गया जो आप सारे रास्ते इस प्रकार..' कहते-पाहते निर्मला फफक पड़ी। निर्मला के रुंधे कण्ठ ने जैसे भावों का सेतु तोड़ दिया । नुजान खुलकर रो पड़ी। जितना ही निर्मला डांढस बंधाती उतना ही सुजान का रुदन तीन होता और निर्मला स्वयं लाचार होकर रो पड़ती। जैसे विधाता ने पीड़ा के लिए ही नारियों का निर्माण किया । मानो संसार की लाचारी, वेवसी और दर्द नारियों के ही हिस्से में पड़ा हो । मार्ग पर दोनों ओर माते-जाते जनवर्ग को क्या पता कि इस बालीशान बग्यो में करुणा स्वयं विलाप कर रही है । जिस सुजान नाति के अस्तित्व ने ब्रह्माण्ड को गढ़ा किया, जिसकी ममता से अगणित जीवो को जीने का सहारा मिला, जिसने बड़े-बडे शूरवीरों को जन्म दया वही आज ऐसी हो गयी कि कही तिनके का भी महारा मिलने नी मुंजाइश नही। जिन नयनों की कोर के साय पुरुषों के हृदय में गुदगुदी हो उठती थी, आज उसी में अघु का मागर! यह वैमा अन्याय? बग्घी जब बाजार से आगे बढ़ी और राजमार्ग अपैशात शान्त हो बला तो सुजान के अन्तर का द्वन्द्व भी कुछ हल्का हुआ । शायद पीहा के मामू निकल जाने पर कुछ शालि-मी लग रही थी । वह मोचने लगी- इसमे आनन्द को ही मां का क्या दोष ? समार को सभी माताएं अपने प्र का हरा-भरा संसार देखना चाहती हैं । दोपी आनन्द है, अना मानन्द ! आज जिस अपमान का विष-धूंट उसे गले के नीचे उतारना उसके लिए आनन्द ही उत्तरदायी है, जिसे वह मावावेश में अपना तब कुछ मान बैठी थी। आखिर वह उमी से छली गई जिस पर अपनी रक्षा का भार डालकर वह निश्चिन्त होना चाहती थी। उसने अपने उन्मत्त मन को धिकारा, हृदय में कुडी । डूब मर जान । एक साधारण वेश्या होकर भी तू किमी गृहस्य वी हृदय म्वामिनी बनने चलो थी, इसीलिए मह-तोड उत्तर भी मिला । एक धूल कण का इतना साहम कि गन के चन्द्र को चूमने के लिए उडे । ठीक ही है मभी तो पैरों तले शेर दिया जाता है। हाय रे दुगो । तूने मुजान को कहीं का न रया । तू रण्डी है, नाचने वाली है, लोगो का मन बहलाने का साधन मात्र है, यस ! तरी यही मीमा है । सकल्प कर ले, अब ऐसा दुस्साहम कभी न करना। इसी में कुशल है । यह स्वयं का समझाने लगी। मन ही मन धिक्कार के स्वर भो फूट रहे थे। सिर उसका चकराने लगा और निमंता के देखते-देखते वह वग्मो के अन्दर ही विक्षिप्त होकर गिर पड़ी। उसका मुख-मण्डल ढलते सूर्य की भांति पीला पड़ गया। निर्मला के मुख में बीप निकल गयी । बग्घी एक गई। चालक ने उतर कर पूटना पाहा, परतु वडा. ।
ला बोली-'रमजान चाचा ! वग्घी आगे बढ़ाओ नहीं खामखा भीड़ जाएगी।' 'अच्छा बेटी !' कहकर रमजान ने घोड़ों को आगे बढ़ाया । सुजान भवन निकट ही आ गया था। थोड़ी देर बाद वग्घी द्वार पर रुको । मला सहारे से भवन में लाई। भवन की वारादरी में सदाशिव जाने व का बैठा था। जिस समय सुजान को इस प्रकार से अन्दर ले जाया या उसका हृदय धक् से रह गया । 'क्या बात हो गई ?' सोचता हुआ वह वाहर ही बैठा रहा। उसके लिए एक-एक क्षण एक वर्ष की भांति लग रहा था। इतने में निर्मला बाहर आई तो सदाशिव वोले-'क्यों निर्मल ! मेरी विटिया कैसी है ?' आप अन्दर चलिये वावा, कहकर निर्मल फिर अन्दर की ओर मुड़ी। पीछे-पीछे भारी पांवों से सदाशिव भी शयन कक्ष में पहुंचा। सुजान अब होश में थी। सदाशिव ने 'हरि ॐ' कहकर हृदय को सांत्वना दी। वह पयंक के सामने पड़ी चौकी पर बैठ तो गया, परन्तु उसका मन किसी आशंका से बार-बार भयभीत-सा होता जा रहा था। वह सुजान को अपनी धर्म बेटी मानता था। निस्सन्तान अवश्य था, किन्तु सुजान ने उसे सन्तान का ही सुख दे रखा था। सुजान ने आंखें खोली तो सामने सदाशिव को देखा और उसी प्रकार लज्जावनत हो गई जैसे अनजानी चूक पर वेटी अपने बाप से लजाती है । निर्मला पालश में गुलाब जल लाई और पर्यंक पर बैठकर सुजान का मुंह धोने को हुई ही थी कि सुजान वेग से उठ बैठी और हंसती हुई बोली 'चल हट, जल मुझे दे । मुझे हुआ क्या है ? भली-चंगी हूँ तू तो अपना प्यार दिखाफर अच्छे-भले को भी मरीज बना देना चाहती है ।' सुजान अपने स्वभाव के अनुसार हंसती हुई उठी और मुंह-हाथ धोकर वापस आते ही बोली--'वावा नाप कब आये ? मैं तो मापसे पूछना ही भूल गई । निर्मल ! तू पाकशाला में जा बढ़ी भूख लगी है । वावा भी साथ ही भोजन फरेंगे क्यों बाबा ?'
गुजान ३५ 'हाँ बेटी ! आज तो मुझे भी भोजन नसीव न हो सका । राज-दर- बार से मैं सीधे घर जाना चाहता था कि शाही फरमान आ गया- सायंकाल रंगीले शाह के हरम मे नृत्य होगा । शायद तुमने शाह को ऐसा ही वचन दिया।' 'यावा ! शाह तो एक पल भी मेरे बिना नहीं रह पाते । मैं उनसे जितना ही पोटा छुडाती हूँ वे उतना ही अपने पास की चिन्ता में रहते हैं। मैं तो तंग आ गयो।' 'मेरी रानी बेटी के पास मला ही ऐमी है कि शाह क्या भगवान् को भी इच्छा 'तो भगवान अपने पास क्यो नही बुला लेते ? इस नारकीय जीवन मे मुक्ति तो मिल जाती।' To: बेटो! ऐसा नहीं सोचा करते। बात यह है कि जीवन हंसी घेल नहीं । इसी जीवन की रक्षा हेतु राजपि विश्वामित्र ने कुत्ते का अप- पका मास घाया या । न जाने जीवन जीने के लिए लोगों को क्या-क्या करना पड़ता है। फिर तुम तो प्रतिभावान हो । तुम्हारी कला की जो शोहरत है, ऐसा सौभाग्य शायद ही किसी को मिला हो। मैंने तो ईरानी नर्तक गौहरजान के नृत्य में भी सारगो बजाई, सौराष्ट्र की परी चित्रा- बाई के साथ भी साज साधे, बगाल की सुनयना के भी बढे रसीले हाव- भाव देये, परन्तु अपनी बिटिया मुजान इन सब के परे है ।' सदाशिव मद्यपि ठीक हो कह रहा था, परन्तु सुजान को यह सब चल रहा था। यह कुछ बोलना ही चाहती थी कि निर्मला बीच में टपक पडी--'पहले आप सब भोजन पाइये । आज तो जैसे निर्जला एकादशी का व्रत ही हो गया । चलिये, झटपट ।' सभी निर्मला के साथ भोजन कदा में पहुंचे। मुजान चौके मे बैठी लेकिन एकाध फोर से अधिक गले के नीचे न उतार सको । आज उसे अच्छा नहीं लग रहा था। पाकशाला से लौटकर सदाशिव तो चला गया और मुजान पर्यक पर गिर पड़ी। ताम्बूल एक और रखा रहा वह सोच में डूबी यह .
सुजान बाबा का कहना है-हरम में वेगमों को नृत्य दिखाया जाय। उसे अव याद आया । उसने शाह से सायंकाल आने का वादा भी किया है। उसने सोचा ठीक है। उसका तो काम ही नाचना गाना है। यदि घोड़ा घास से वैर कर ले तो खाएगा क्या? शाह की कृपा से ही तो वह सुविधा पूर्ण जीवन बिता रही है। इतनी बड़ी हवेली, नौकर-चाकर ! रंगीले शाह के नृत्य-प्रेम को धन्यवाद दो अन्यथा कहीं किसी गली-कूचे में कोठे की रण्डी होती। फिर, लगभग पांच वर्प हो गये, शाह ने आज तक उससे कोई जोर-जवरदस्ती नहीं की। शाह ने वैसा कोई कदम नहीं उठाया। तव उसे शाह की इच्छा ठुकराने का रंचमान अधिकार नहीं। शाह मनुष्य के रूप में देवता है। सदाशिव हाय-मुंह धोकर जव पुनः आया तो सुजान पर उन्माद- सा छा रहा था । उसने पूछा-'यावा मृदंग पर कौन ताल देगा ?' 'चिन्ता न करो बेटी ।' सदाशिव पूरे विश्वास के साथ बोला-'ताल तो हेम ही देगा किन्तु मैंने उसे ठीक से समझा दिया है।' 'न वावा' सुजान ने असहमति व्यक्त करते हुए कहा--'वावा ! हेम पर मुझे तनिक भी विश्वास नहीं । हेम के स्थान पर व्रजवासी को ही बैठाइये।' बेटी ! तू तो बाप्त नहीं समझती। इसमें अपने बाबा की ही मान लिया कर । वनवासी तुम्हारे नृत्य लायक न वजा सकेगा । हेम ने इस कला की बहुत अच्छी शिक्षा पाई है । जैसे-जैसे तुम्हारे चरण भूमि पर नृत्य की कलाएं देते हैं वैसे ही उसकी मंगुलियां मृदंग पर नाचती हैं। आजकल तो वह धन मानन्द के पदों पर पागल-सा बना रहता है। बेटी ! आज तो आनन्द दरवार में दिये नहीं । शायद सायंकाल के आयोजन में पधारें।' सुजान का मुग उतर गया । वह जैसे चोरी करते हुए पकड़ी गई । उसने बात का रुख बदलते हुए कहा- 'वावा ! रंगीले शाह के हरम में मैं कभी नहीं नाची, इसलिए मेरा मन रह-रहकर फिर रहा है।' 'धेटी ! शाह की बड़ी बेगम हसीना बानो के भाई गुलाम हुसैन ईरान से पधारे है । वे भी शाही वंश के ही हैं और नृत्य-कला के प्रेमी
No text on this page.
३८ सुजान - हेम सतर्क हो गये । हेम मयूर ताल का संकेत देकर मृदंग का मधुर नाद देने लगा। सुजान थिरक उठी। मयूर ताल हेम ने सुजान के बड़े आग्रह पर सिखाया था। आज इस ताल का प्रथम प्रदर्शन था। फिर भी सुजान में आत्मवल की साफ दृढ़ता थी। जैसे घनी मेघमाला को देखकर उन्मत्त मयूर अपनी प्रिया की खोज में नाद करता हुआ इधर-उधर चक्कर काटता है और उसे पाते ही बड़ी रसिकता से उसे रिझाता है, पंख फैलाकर बड़ी आकर्षक मुद्राओं में नाचना है ठीक उसी प्रकार सुजान ने नाचना प्रारम्भ किया । उसने ऐसी नृत्य मुद्रा वनायी कि अपने कौशल से सारी महफिल में नाचते हुए मयूर के दृश्य का साक्षात्कार करा दिया उसके चरण भर दिख रहे से । वेणी मयूर शिखा की भांति ऊपर उठ गई थी साथ ही लंहगा पंखों की तरह छितरा गया था । शाह गद्दी से उछल पड़े ।'सुभान अल्लाह ! सुजान ! आज तुमने कमाल कर दिया।' शाह पर जाम का प्रभाव खूब था शाही मेहमान तो यह नृत्य देखकर दंग हो गया, उसने जैसे प्रथम बार आज नाचता हुआ मोर देखा । उसके गले में मणियों की तीन लढ़ वाली माला थी जिसके निम्न भाग में एक बहुमूल्य हीरा जग- मगा रहा था। देखते ही देखते वह माला सुजान के गले में विराजने लगी । सारी महफिल इससे ओत-प्रोत हो रही थी। हेमचन्द्र ने आज सचमुच सुजान के नृत्य में चेतना फूंक दी। जिस समय मुजान पंख फुलाकर मयूर को रस भरी नृत्य मुद्रा प्रस्तुत कर रही थी उस समय हेम मृदंग पर अपने प्राणों की बाजी लगा चुका था । कभी मद्र, कामी मध्य और कभी मन्द स्वर सप्तकों को उसने जिस यथार्थता के के साथ ताल-बद्ध किया, उस पर आज सुजान बहुत खुश थी। नृत्य समाप्त होते ही वह सर्वप्रथम हेम के पास पहुंची। हेभ की आंखें नीचे थी, नुजान को विश्वास नहीं हो रहा था कि क्या यही वह हेमचन्द्र है जिसने अपनी शिष्या से प्रेम का प्रतिदान मांगा था ? आज उसे हेम बड़ा पवित्र दिप रहा था। उसको अन्तरात्मा ने हेम को नमन किया। वह सुजान रन ही मन हेम के विषय में सोच रही थी क्योकि उसे गणेश नृत्य और यूर नृत्य सिखाने वाला यही हेम या जिसके कारण आज वह इतना उन्दर प्रदर्शन कर सकी थी । वह यह सोच ही रही थी कि कर्ण पट पर प्रानन्द की मधुर ध्वनि टकराई। घन-आनन्द के गीतों में बाज उसे बड़ी वेदना-पीडा तथा करुणा की झलक मिली। उससे सुना नहीं जा रहा पा । उसके मानस मे गत घटनाओ के दुःखद दृश्य पुनः उभर आए । वह सबके सामने ही उठ कर अन्तःपुर की ओर चली गई। जाते-जाते उसे एक पक्ति सुनाई दी- 'कछ नेह निवाहनो जानत ना तो सनेह की धार में काहे धंसे ।' जो सुजान के हृदय मे तुभ गई। वह लौटकर पुनः उसी स्थान पर बैठ गई । हाय रे नारी हृदय ! कितना विरोधाभास पलता है ? कैसे कैसे विपर्यय बनते बिगडते हैं ? सुजान का अन्तर धनी पीड़ा से कराह उठा । जैसे-जैसे आनन्द के पद सभा मण्डप में गूंज रहे थे, वैसे-वैसे सुजान के अन्तर में कचोट हो रही थी। उसे लग रहा था कि जैसे कोई उसका मन निरन्तर अपनी ओर खीचता जा रहा था। उसने सिर ऊपर उठाया। देखा, शाही घराने की वेगमे शाहनादियां चिलमन उठाकर आनन्द की और एकटक देख रही थी। जिन पर पर्दा पडा था, वे उस पर्दे को दूर हटाकर आनन्द के गीतो पर मर-मिट रही थीं, लोक-लज्जा को तिलां- जलि दे रहीं थी। और सुजान ! जिसका पर्दा फाश हो चुका है, वह अपने ऊपर बार-बार पर्दा डाल रही थी। जिन वेगमो की लज्जा और मर्यादा से लीक लज्जा स्वय लजाती है वे आनन्द की पीयूप-लहरी का पानकर रही हैं और सुजान ! जो सरे दरदार नाचा करती थी आज वही आनन्द को स्वर माधुरी का पान करने में असमर्थ हो रही है। उसमें ईप्या का भाव उभरा । मन विपाक्त हो गया। सारे तन बदन से अग्नि के स्फुलिंग-से निकलने लगे। स्वाभाविक हो है । नारी सब कुछ राहन कर सकती है लेकिन अपने समक्ष अपने प्रिय पर किसी और नारी सुजान की ललचाई दृष्टि भी पड़ते नहीं देख सकती। उसे पंडितराज जगन्नाथ के जीवन की वह ऐतिहासिक घटना स्मरण हो आई । यही शाही दरवार था जहाँ संस्कृत के उस प्रकाण्ड पंडित की शिखरिणी गूंजती थी और यही मुगल सम्राट् शाहजहां की वहिन रुखसाना सुल्ताना उस स्वर- माधुरी पर निछावर हो गई थी। अभी ४०-५० वर्षों की ही तो बात है । सोचते-सोचते सुजान के शरीर में जहर-सा फैल गया । सुजान ने सभा की मर्यादा का भी ध्यान न रखा । उठी और आनन्द के सामने एक क्षण के लिए रुकी जैसे सबको बता देना चाहती हो कि उसके सिवा आनन्द पर किसी का अधिकार नहीं लेकिन दूसरे ही क्षण उसका भाव बदला और वह बाहर निकल गई। यह दृश्य सवने देखा पर कोई कुछ न बोला । आनन्द अपने आसन से उठा और धोरे से बाहर निकला। उसने देखा-~मुजान हेमचन्द्र से घुल-मिलकर बातें कर रही है। आनन्द ने पास जाकर कहा-'सुजान ! तुम मुझसे कुछ कहना चाहती थी ?' 'जी नहीं ।' सुजान ने कुछ विचित्र से कहा और दीवाने-खास से बाहर हो गई। आनन्द का भग्न हृदय पुनः आघात पाकर तड़प उठा। चोट लगे मंग पर बार-बार चोट लगना प्राकृतिक नियम है परन्तु हृदय की काम- लता इसे सहन नहीं कर पाती । आनन्द की आंखों के सामने जैसे अंधेरा छा गया । आज सारा दिन वह व्याकुल रहा । शाही दरवार में भी न आता किन्तु सुजान का नृत्यायोजन सुनकर उसे आना पड़ा था। जिस सुजान की एक झलक पाने के लिए वह दरवार में बेचैन-सा बैठा रहा, मन में रह-रहार टीस उठती थी और वह चेदर्दी से उसे दबाता रहा, वही सुजान जब मयूर-मुद्रा में नाच रही थी तो उसने मानन्द की ओर ताका भी नहीं। अपराधी को दण्ड की व्यवस्था तो स्वाभाविक है, परन्तु विना अपराध के नुजान ने उसके प्रति इतनी उपेक्षा दर्शायी जिससे आनन्द का अन्तर विलय उग । उसकी आंखों में मां नहीं आए फिर भी भारी अशान्ति व्याप गई। उसमें दो भाव एक साथ उभरे, दया-भाय ४१ और आक्रोश । मन कमी दया से भर जाता तो कभी याक्रोश से । उसे मपने ऊपर इसलिए दया आ रही थी कि आज उसे क्या कमी है। वह अर्थ मन्त्री है, कुलीन वंश मे उत्पन्न हुआ है। मान-सम्मान यश-गौरव और प्रतिष्ठा उसके चरण चूम रहे हैं और वह मारा-मारा फिर रहा है । मातोश इसलिए हो रहा था कि सुजान ने उसे बिना अपराध क्यो लुक- राया? यद्यपि मां कुछ कह गयो तयापि सुजान को भी तो सोचना चाहिए कि क्या मा जानती थी कि यही सुजान है ? सुजान ने अपना परिचय ही कहाँ दिया? फिर मां से भूल हुई, वे पुराने विचारों की है मादि आदि । कुछ दूर तक यही सोचता हुआ आनन्द पैदल ही चला और बाहर जाकर बग्घी में बैठ गया। विचार तभी जगते हैं जब मानव मन का संझावात सीमा को छूकर शान्त हो जाता है । बग्घी पर बैठते ही आनन्द के हृदय में श्रद्धा का उदय हुआ । मोचने लगा-आखिर मुजान वैचारी ही क्या करे ? मान-प्रतिष्ठा तो दूर उसे शान्त जीवन विताना भी दुष्कर हो रहा है । किसी भले घर में घुसने का उसे अधिकार मिलना तो दूर रहा, लोग उसै यो हो कोसा करते हैं । जव वह नाचती है तो उस पर बहुमूल्य पुरस्कारों की वर्षा होती है और जब वह समाज से केवल जीने का अर्थ पूछती है तो गालियों की बौछार । यह कैमा न्याय है ? उसके शरीर से सभी प्यार करना चाहते हैं लेकिन उसकी यात्मा, हृदय और मन सबकी पहचान से परे है। वह निश्चय कर बैठा--'सुजान ! पवराओ नहीं। आनन्द मे अभी भी वह शक्ति है कि तुम्हें बचा ले। अभी तुम्हारा कुछ नही बिगड़ा है।' उसने मन ही मन निश्चय किया कि सुजान को उसका सामाजिक अधिकार दिलाकर रहेगा। यह सोची हो उसका मन अदम्य साहस और माशा से भर गया। उसने तत्काल चालक को सुजान के भवन की ओर चलने का आदेश दिया । बग्धी मुद गयी और तीवगति से भागती हुई सुजान की हवेली के सामने की । एक बापी अभी आई ही हुई थी सुजान घर आ चुकी है इससे आनन्द ३ - आत्मसन्तोप मिला । गाड़ी से उतर कर रात के उस अंधेरे में जो गों से जगमगा रहा था सुजान के कक्ष के सामने पहुंच वाहर ही रुक । । सुजान पर्यक पर तकिया के सहारे बैठी थी और पास हेम बैठा ।। लगता था बड़ी गुप्त वार्ता चल रही थी। आनन्द को चौखट पर के देख निर्मला बोली-'आनन्द जी अन्दर जाइए, यहाँ कैसे रुक गए।' नर्मला का स्वर सुनकर सुजान चौंकी । उसने द्वार की ओर देखा आनन्द ! परन्तु वह कुछ नहीं बोली। इतने में हेम उठकर वोला- 'आनन्द जी ! आइए । आज ता आप के पदों में बढ़ा दर्द दिखा ।' कहते हुए मानन्द को अन्दर ले जाकर आसन पर बैठा दिया लेकिन सुजान न उठी और न कुछ बोली ही। आनन्द को सुजान का यह उपेक्षा-भाव बहुत खला, परन्तु उसने अपनी गम्भीरता तोड़ी नहीं । वह केवल सुजान को देखता रहा । उसकी दृष्टि में सुजान अभी भी दिव्य लग रही थी। उसे सौन्दर्य ही सौंदर्य दिखा । आनन्द समझ रहा था-सुजान नाराज है, यह क्षणिक है। उसकी निष्ठा सुजान को अवश्य पिघला देगी ऐसा उसका विश्वास था। जैसे ही हेम कक्ष से बाहर गया आनन्द आगे बढ़कर सुजान के पास आया । सुजान ने दूसरी ओर मुंह फेर लिया। इससे आनन्द के मन में मधुर गुदगुदी हुई । उसने सुजान को ध्यान से देखा और धीरे से उसके चरण स्पर्श किए । सुजान खीझकर बोली--'मुझे यह नाटक विल्कुल पसन्द नहीं, कान खोलकर सुन लीजिए-मैं किसी की रखैल नहीं । घर आइए तो सभ्यता की सीमा में रहिए ।' सुजान के शब्दों में बड़ी वेरुखी थो, यो समझिए, ऐसी नीरसवाणी शायद ही वह कभी किसी से बोली हो । आनन्द भी ऐसी वाणी सुनने का अभ्यासी नहीं था, परन्तु उसने हंसकर कहा,-'सुजान ! तुम्हें रखैल समझने वाले मेरे सामने पढ़ जाएं तो मैं उनकी हत्या कर दूं। रही सभ्यता, वह तो तुम्हारे और मेरे मध्य वाधक नहीं। तुम डाट लो। मैं तो तुमसे क्षमा मांगने आया है। वर मुझे आज्ञा दो रात काफी बढ़ गई है । मैं फिर प्रातः आऊंगा।' सुजा सुभान ४३ ने तेवर बदले-'आएँ चाहे जाएँ मुझे कुछ सेना-देना नही । हो, में हाप जोड़कर विनती करती हूँ मैं जहाँ है वहीं पड़ी रहने दो। यदि दुवारा मुझे परेशान किया तो आत्म-हत्या कर सूंगी।' कहते-कहते सुजान मुंह ढाप कर रो पड़ी । अव तक तो आनन्द ने धैर्य रया था अब टूट गया। उसे पहले तो अपने से ही घृणा हुई फिर सुजान का एदन ! सहन करना आनन्द के लिए कठिन हो गया। 'ठीक है, सुमसे पहले आत्म-हत्या मुझे ही करनी है।' कहते हुए वह करा से बाहर चला गया। सुजान का रुदन तो रुक गया किन्तु वह दौड़ कर न तो उसे मुला पाई और न कक्ष में बैठी रह सकी । उठी तो अवश्य परन्तु पक्कर खाकर फर्श पर गिर पड़ी।
आनन्द जैसे ही सुजान के भवन से चला गया। वैसे ही निर्मला रसोईघर से हेम के साथ शयन कक्ष में आई। सामने जो दृश्य दिखा, उससे दोनों आश्चर्य में पड़ गए। सुजान फर्श पर वेहोश पड़ी थी। उसका जूड़ा खुल गया था और केशराशि विखरी हुई थी। आंचल हट जाने से सुजान विवस्त्रा-सी लग रही थी। निर्मला दौड़कर सुजान के पास आई। उसका आंचल ठीक किया । हेम जल ले आया। जल के स्पर्श से सुजान में चेतना आई । वह वस्त्र संभालती हुई उठ बैठी। निर्मला उसे गोद में संभालना चाहती थी, परन्तु वह खड़ी हो गई। उसे कमजोरी-सी लग : रही थी। अस्तु, सुजान पयंक की पाटी का सहारा लेकर तकिया संभा- लती हुई बैठ गई। 'निर्मल ! हेम ने भोजन कर लिया ?' 'अभी-अभी तो भोजन तैयार हुआ, मेरे यहाँ कक्ष में आते ही...' सुजान हंस पड़ी । 'निर्मल ! जा हेम को भोजन करा दे, तू भी खा ले। मुझे दूध ला दे मैं यहीं पी लूंगी । जा, जल्दी कर ।' 'किन्तु मालकिन ! आप कुछ तो खा-लें। इतनी बड़ी रात बिना गाए-पिए फैले कटेगी?' 'निर्मल ! इतना बड़ा जीवन खा-पीकर ही तो कट गया और विना पाए एक रात पी चिन्ता क्यों कर रही है ? तू जा, हेम हमारा अतिथि है, उसे खिला-पिला कर आसन दे दे।' 'स्वामिनी! आप नहीं खायेंगी तो मैं भी प्रत कर जाऊँगी। आचार्य को खिला कर में भी निराहार ही सो जाऊंगी। उसका कण्ठ गर माया। 'निर्मल ! मेरी प्यारी बहिन ! हठ न करो । मेरा चित स्वस्थ नहीं - सुमान ४५ है । जा! मैं जो कह रही हूँ वही कर कहार मुजान उसे कम से बाहर पहुँचा कर अपनी शैया के पास भाई, बैठी नहीं, बड़ी-बड़ी कुछ सोचती वस्तुत: मानव-मन बड़ा संवेदनशील होता है। आनन्द के प्रति सुजान के अन्तर में जो आन्दोलन व्याप्त था, निर्मला के स्नेह से बहुत कुछ शान्त हो गया । सुजान की भाति निर्मला भी मनापिनी ही थी। उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया था जिसमे उम शुशात्मा को बड़ी ठेस लगी थी और तब से वह सुजान की सेविका, सखी या बहिन के रूप में सुख से जी रही है। सुजान यहाँ से हटकर कक्ष के वातायन के समीप आई । आकाश स्वच्छ था । अन्धेरा पक्ष था, इसीलिए असंख्य नक्षत्र-दीप टिमटिमा रहे पे । कुछ समय तक सुजान उन्हें हो टकटको मगाए देखती रही । उसके हृदय मे शान्ति पो । अब उसे आनन्द को याद आई । बड़ी निराशा से वह कक्ष के बाहर निकला था। इसमें सदेह नहीं, सुजान ने आज उसके साय अन्याय किया। ऐसी घेरुखी भी किस काम को ? माना कि वेश्या का जीवन बितात-बिताते वह निष्ठुर बन चुकी है फिर भी इसका उपयोग अपने ही आनन्द के लिए । अनुचित हुआ। सुजान में मोचा-आनन्द मेरी आत्महत्या की बात सुनकर धैर्यहीन हो गया था। केसी विडम्वना है ? आखिर तुम्हारा अपना कहने वाला भी कोई नहीं, तो जो तुम्हारी उदासी पर विह्वल हो जाता हो, क्या उससे भी बढ़कर तुम्हारा कोई और है ? उसे आनन्द को अन्तिम वाणो याद आ गई–'आस्महत्या तो मुझे ही करनी है' मुजान बिलख उठी। सूद जी भरकर रोने की इच्छा हुई लेकिन रोई नही । उसमें एक अद्भुत संकल्प जागा । वह आनन्द को मनाएगी । आनन्द ने आज उसे मनाने की ही चेष्टा को थो, यह रूठी रही परन्तु आनन्द ने उसका तिरस्कार नहीं दिया वह शाही दरबार में सोधे यहाँ तक आया और हाय रे अभागिनी सजान । तूने आनन्द को भाष भर देखा तक नहीं। मच है प्रेम की यही पहचान है । आनन्द ठीक सुजान आसन ग्रहण करें । लास्य नृत्य ! वह भी सुजान नाचेगी और महा- कालेश्वर के ऐतिहासिक मन्दिर में ? स्वप्न तो बहुत बढ़िया है परन्तु हेम ने वात काट दी-'सुजान ! संगीत क्षेत्र में 'परन्तु' शब्द को प्रश्रय नहीं दिया जाता । ईश्वर ने इस सृष्टि में संगीत के कण-कण को पिरोया है । वायु के संघात से तरु-पल्लवों में जो गति लहराती है, हरी- हरी दूर्वा जैसे-जैसे सिर हिलाती है, वांस के छिद्र से जो ध्वनि निस्सरित होती है, वह सभी मिलकर नृत्य का अत्यन्त मोहक दृश्य उपस्थित करते हैं और मनुष्य इतना व्यस्त है कि उसे इस नैसर्गिक संगीत का आनन्द लेने का समय ही नहीं मिलता । सुजान तुम मेरा साथ दो । मैं सारे विश्व को चौंका दूंगा। मेरा विश्वास करो, मैं तुमसे यही दक्षिणा लूंगा, बस?' सुजान की मांखें खुली की खुली ही रह गई । क्या""क्या, यह वही हेम है जिसे उस समय डाटना पड़ा था, तिरस्कृत करना पड़ा था। सुजान जैसे एक विकट पहेली में उलझ गई। हेम उसका गुरु न होता तो उस रात की बातों के लिए सुजान न जाने क्या-क्या कर डालती। आश्चर्य है, हेम सचमुच गुरु-पद के योग्य है । लगता है, हेम उस रात परीक्षा ले रहा था क्योंकि उसके पश्चात् तो उसने कभी ऐसा अवसर नहीं माने दिया । सुजान जैसे दुविधा में पड़ गई । वह क्या कहे ? उसके लिए तो जैसे कोई स्थान ही नहीं बचा जहां उसका एकाधिकार न दिख रहा हो। साधारण बात नहीं है, हेम उसे लास्य नृत्य में प्रवीण बना देगा और दक्षिणावर्त के गोपुर में उसे इस नृत्य प्रदर्शनहेतु आमंत्रित किया जाएगा। उसका पद मेनका उर्वशी से कम नहीं होगा। फिर वह वेश्या कहां रही। हेम उसे वेश्या से देवनर्तकी का पद देने पर तुला है । उसे मानना ही पड़ेगा। सुजान का मन जाने क्या-क्या सोच रहा था । वह हेम को वहीं छोड़ कर अपने शयन कक्ष में आई । निर्मला विस्तर लगा पार पास की सुमार ४८ पौको पर लेटी हुई थी। सुजान ने उसे देखा वह सो गई यो। सुजान अपनी शैया पर लेटी तो, परन्तु नीद का नाम-निशान नही । विचारों को शृङ्खलाएं मानस-पटल पर उभरने लगी। यानन्द ! मुगल सम्राट का परमप्रिय, सम्भ्रान्त ऐतिहासिक-पुरुष-कवि श्रेष्ठ । वह मुजान को अपनी आराध्या मानता है । उसका वश चले तो सुजान को किसी देवा- लय मे स्थापित कर दे । उसे सुजान के शरीर से नही वरन् हृदय से प्यार है । प्रेम ! एक वेश्या, नतंकी के लिए अनहोनी बात है । फिर भी आनन्द यसंभव को सभव बनाने पर तुना है। लगता है सुजान के जीवन का यही परम बिन्दु है। कुछ देर बाद उसने करवट बदली। तभी मृदंग की मन्द-मन्द याप कर्णपट पर टकराई। हेम लास्य-नृत्य को ताल-बद्ध करने की तैयारी में लगा है । आधी रात से ऊपर ! और हेम की स्वर-साधना ! कोई अच- रज नहीं क्योकि रागोत-ससार के दिन-रात में अन्तर नही माना जाता । जो मूर्य अपने प्रभाव से जगत् को वशीभूत किए है और जिनके अस्त हो जाने पर सारा जीव जगत् निद्रा की गोद मे लिपट जाता है, वही सगीत के ममक्ष पराजय स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि अधिकांश राग-रागनियां मूर्यास्त के पश्चात् ही अलापी जाती हैं । जैसे-जैसे रात गहराती है, वैसे- वैसे रागी की अनुरागता को माधुर्य का स्पर्श करने लगती है । सुजान के कानो मे जैसे अमृतविन्दु टपकने लगे। लेटे-लेटे सोचने लगी । यह हेम है, मृदगाचार्य, रसिक हृदय और सुजान का साजिन्दा ! अर्थात् विना उसके संकेत के वह पग उठाने में भी असमर्थ है। उसने कई तालो पर उसे नचाया और अब ! अब तो वह असंभव को भी संभव करने पर लगा है। रात भर मृदग पर अभ्यास करेगा और दिन में सदाशिव को भी पास बैठाएगा, फिर मुझे भी धुंघरू बांधने ही पड़ेंगे । लास्य नृत्य ! सुजान ने इस नृत्य की बड़ी चर्चा सुनी पी। भगवती पार्वती अपने प्राणपति महा- देव को इसी नृत्य से रिझाती थी । यही नहीं, जब भी भोलानाय अन्य- मनस्क होने, पार्वती इसी नृत्य की मुद्राओ से उन्हें प्रसन्न करती थी।
सुजान पुराणों में तो यहां तक वर्णन किया है कि जव शिवजी महाप्रलय के लिए तांव प्रारम्भ कर देते थे, उस समय पार्वती को लास्य नृत्य पर ही उन नटराज के ताटय गा विराम हो पाता था । बड़ा जादू है इस नृत्य में और यह हेग धुन का पका है। यह मुझे विना सिखाए दम नहीं लेगा। राजान, लास्य नृत्य गी नर्तकी ! एकमात्र नर्तकी !! उसगा शरीर रोमां- चित होने लगा । उसने पुनः करवट बदली । हेम मृदंग पर तालों को दुहराता रहा । गुजान ने आंखें मूंद लीं। स्वर का माधुर्य उसके कर्णपट पर टकराता रहा और वह सो गई। सुजान पी जब नींद खुली तो उसे बग्घी की परपलाहट सुनाई दे रही थी। वह गमल गई-निर्गला जा रही है । आज उसे आनन्द का समाचार मिल जाएगा। गल तो शटयो-से निकल गए थे, आज निर्मला गो ऐगते ही उल्टे पाच आयेगे। सुजान सोचने लगी यह भी लास्य नृत्य द्वारा अपने आनन्द को रिक्षाएगी। राजान ने आज के प्रभात को बहुत । बहुत धन्यवाद दिया और शेया त्याग दी। वस्तुतः पुरुप ने विना नारी अपूरो है, सुजान अनुभव कर रही थी। उसने अपनी इस अल्पायरथा में ही बहुत अनुभव फर लिए थे । आज वह नवीन गल्पनाओं में ग्रो-पो जाती थी। आज यह लास्य नृत्य का अभ्यास प्रारम्भ गरेगी । आनन्द सामने होगा। यह गल्पना सुजान के अंग-अंग में अद्भुत रफूति गा संचार कर रही थी । स्नान-ध्यान के पश्चात् कुछ साधारण-सा जलपान पारक सुजान अपने संगीत पाक्ष में पहुंची। सदाशिव सुजान गो निगाट आकर बोला-'बेटी ! यह हेम तुझे विश्व की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी बनाकर ही दम लेगा। वह तुम्हें लास्य नृत्य सिवाएगा, सुना है ।' 'बाबा ! हेग गो माया हेम ही जाने । यह संगीत- नृत्य होगही आप सब का है । मुझे तो हेम जैसे नचाएगा, नाचूंगी।' हेग गृपंग गो मुग पर आटा लगाकर ताल-गेल धैठा रहा था । सुजान फा अन्तिम यापम उसनेः कानों में मधुरस के समान टपका । उसका मस्तय सुजान ५१ ऊँचा हो गया। सुजान ने समीप जाकर यदापूर्वक प्रणाम किया और चुपचाप खड़ी हो गई। हेम ने सुजान को दो-चार मामान्य बातें समझाकर मृत्प के लिए इशारा किया। सुजान ने साड़ी का आँचल कटि में कसकर बांधा । हेम ने सदाशिव को सारंगी से साज मिलाया। सुजान के घरण पिरकते लगे। थोड़ी देर तक ताल-लय-सुर घला, परन्तु सुजान आगे साप न है सकी। हेम समझ गया। उसने मृदंग एक किनारे रखी भौर सदाशिव को सारगी साधे रहने का संकेत देकर सुजान को साथ-साप नापने को कहा। सुजान उसके संकेतो का अनुसरण करने लगी । हैम नृत्य-कला में परम प्रवीण था, यह तो सुजान को पूर्वविदित या ही क्योकि इसी कक्षा में हेम के साथ उसने गणेश-ताल, मयूर-ताल तया अन्य तालो पर मृत्प सीया था, परन्तु हेम लास्य-नृत्य में भी इतना कुशल होगा, यह उसे अविदित था । जव सुजान बडी हुई देख रही थी, उस समय हेम सारगी को सय पर इतनी मनमोहक रोति से परिक्रमा करता हुआ नाचा कि नृत्यकला पारखी सुजान लद हो गई । अपना भाग्य सराहा । किसी ज्योतिषी ने उसका हाथ देखकर भविष्यवाणी की थी कि एक कलाकार उसे विश्व को श्रेष्ठ विभूति बनाएगा, लगता है ज्योतिपी की वाणी सत्प निकली। वह कलाकार है के अतिरिक्त और कोन हो सकता है ? हेम पूरे नृत्य-प्रदर्शन के बाद पसीने-पसीने हो गया तो सुजान उस पर हवा करने लगी। अब तो हेम के हर्ष का ठिकाना न पा। वह न जाने क्या-क्या मधुर-मधुर कुछ सोचता रहा। योड़ी देर के बाद हेम ने पुनः सदाशिव को उसो पूर्व राग पर सारंगी साधने का सकेत दिया और सारंगी के तार जैसे ही मुखरित हुए, हेम ने सुजान को नाचने का संकेत किया । सुजान यद्यपि नृत्य-पता की बारी- कियां भली-भांति समझती यो ओर चार-छ: नृत्य तो उसने रिना सिखाए. ही साध निए थे तो भी लास्य नृत्य के इस पूर्वाभ्याच में उसे बार-ना हेम का सहारा लेना पड़ा लेकिन उसने बिल्कुल उसी प्रकार वार ५२ सुजान जैसा हेम ने बताया। सदाशिव की सारंगी ने भी अपना चमत्कार दिख- ताया । हेम की ताल, सदाशिव की सारंगी की लय तथा सुजान की घिरकन तीनों मिलकर गजब ढा रही थीं। सुजान इस पूर्वाभ्यास में पूर्ण सफल रही । आज वह थकान का भी अनुभव नहीं कर रही थी । हेम की दृष्टि में वह सफलता की सीढ़ियां तेजी से लांघ रही थी। वह लगातार सुजान पर दृष्टि लगाए रहा, और सुजान उसी के संकेत पर नाचती रही । नृत्य के अन्तिम प्रदर्शन पर तो हेम मुग्ध हो गया। सुजान को दिल में बैठा लेना चाहा और आखिर भावावेश रोके न रुका जैसे ही सुजान रुकी वैसे ही' हेम ने एक चुम्वन धीरे से ले लिया""सुजान चौंक पड़ी। पहले उसने सदाशिव को और देखा तो वह सारंगी ठीक कर रहा था और द्वार की ओर दृष्टि जाते ही घबराई हुई निर्मला को देखा। सुजान कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध-सी हो गई। मारे लज्जा और क्रोध के मुंह भी न उठा सकी। हेम विजयो की भांति अपने स्थान पर बैठा था। उसे क्या पता-जिसको बहुत कुछ बनाने के लिये वह दृढ़ संकल्प हो रहा था, वह कुछ बनने के पूर्व, जो कुछ थी, उससे भी कहीं दूर जा चुकी थी। सुजान मुंह ढांपकर जी भर कर रो लेना चाहती थी वह देर तक खड़ी न रह सकी। धीरे-धीरे चली। द्वार पर निर्मला उदास खड़ी थी। सुजान ने जैसे उसे देखा ही नहीं । वह अपने शयनकक्ष में जाकर शैया पर गिर पड़ी । आज उसके हृदय को भयंकर ठेस लगी। आंसुओं का वेग रोके न रुका। वह विलख उठी। निर्मला दवे पांव कक्ष में आयी। उसने अपने ही भवन में अपनी स्वामिनी को इस स्थिति में आज प्रथम बार देवा । धीरे-से सुजान के धुंघरू खोल कर एक ओर रख दिये और मांचल से सुजान का मुंह पोंछा। मुजान जोर से रो पड़ी । निर्मला भी रोने लगी। यह स्वयं की दृष्टि में ही पतिता लग रही थी । नृत्य के प्रति उसकी सहल आसक्ति उसे अपना ग्रास वना बैठी थी। निर्मला ने आंखें पोंछते हुए कहा---'बीवी जी ! मानन्द..' सुजान कुछ जानना या मुजान ५३ मुनना नहीं चाहती थी उसने निर्मला के मुख पर हाय रख दिया और उमे बाहर जाने का संकेत लिया। निर्मला बाहर निकल गयो । सुजान पडे-पड़े सोचती रही । मास्य नृत्य ! हेम ने उसे सास्य नृत्य मिखाने का संकल्प लिया है और इस नृत्य के पूर्वाम्पास का आज प्रथम अनुभव ! अन्तिम अभ्यास तक क्या होगा? मला, अब बह पौन-या मुंह लेकर अपने आनन्द के सामने उपस्थित होगी। हेम ! उस पर तो जैसे वासना का उन्माद-सा चढा है। पुरुषों को समझना भगवान् को भी समझने से कठिन है । यही धृणा हुई सुजान को । उसका अन्तर पनी पीड़ा से कराह उठा, यद्यपि आंसू थम चुके थे नथापि मन में विद्रोही भाव उभर रहे थे। उसके सारे शरीर में विष व्याप्त हो रहा था। वह उठना ही पाहती थी कि हेम आ गया । सुजान तेज आवाज में बोली-'घिकार है उस विधाता को जिसने तुम्हें सगोत को ओर प्रेरित किया, धिकार है मुझ जैसी अभागिनी को जिसने तुम्हे अपना गुरु बनाया और सुम्ई..." तुम्हें मैं क्या कहूँ? मुजान ! मुझसे अपराध हुआ और भावावेश मे....... 'तुम जिसे आवेश समझते हो, वह तुम्हारा स्वभाव है। तुम इतने सस्ते हो, इसकी तो मैंने स्वप्न में भो कल्पना नहीं की पौ।' सुजान ने अपना मुंह दूसरी ओर फेर लिया। हेम लज्जित था। 'जाओ हेम' सुभान ने जैसे बडे इत्मीनान का अनुभव करते हुए कहा-'भूल भेरी थो, इसीलिए दण्ड भी मुझे हो मिला । मैं वेश्या भने हूँ किन्तु कम से कम तुम्हारे भोग की सामग्री नहीं। तुम मेरे गुरु ही रहते जो तुम्हारी परण रज मस्तक से लगाती । परन्तु तुमने जो चाहा वह इतना"| अच्छा 1 जाओ मैं सास्य सीख चुकी और तुम" 'ऐसा न कहो सुजान । इतना बड़ा तिरस्कार मैं सह न पाऊँगा। तुमने एक ही दिन मे ऐसा जटिल नृत्य आत्मसात कर सि यही मेरे भावावेश का कारण बन गया। हेम के स्वरों में आत्मस्वाति, सहज पुट था, परन्तु इससे सुजान पर कोई प्रभाव न पड़ा । वह !
सुजान तो -'हेम मुझे भुलावा देने का प्रयत्न मत करो। देखो, मैं भी कोई बच्ची नहीं। मैंने भी कुछ जीवन जिया है। तुमने जो कुछ भी किया उसके पीछे तुम्हारी लम्बी योजना है। तुमने जो जाल बिछाया, उससे बचने के लिए मुझे पलायन का ही सहारा लेना पड़ेगा। मैं नहीं चाहती कि जिस शील-रक्षा के लिए आज तक मैं जुझती रही, सब कुछ गंवाकर मैंने जिसे बचाए रखा और जिसको मैं आज तक संजोये रही, तुम उसका सहज ही अपहरण करके मेरा अस्तित्व मिटा दो। तुम्हारी संगीत-साधना तुम्हें मुबारक हो, भगवान् के लिए तुम मेरी आंखों के सामने से हट जाओ। कहीं ऐसा न हो...' सुजान में क्रोध के भाव स्पष्ट थे । हेम ने सुजान का यह रूप आज पहली बार देखा । नृत्य की मुद्राओं पर वह लट्टू था ही, सुजान की यह कोप-मुद्रा उसे कहीं अधिक लुभावनी लगी। हार रे नारी ! तेरे बचने का कोई उपाय नहीं । हास से भरा मुखमण्डल तो माकर्पक ही होना चाहिए । क्रोध से युत्त मुखमण्डल पर भी पुरुष की आसक्ति कम नहीं। लगता है, नारी होना ही अभिशाप है। उस पर सुन्दर होना तो एक विडम्बना हो । हेम वहीं फर्श पर बैठ गया। सुजान ! मुझे जी भर कर कोस लो, जो चाहे दण्ड दो मैं प्रतिवाद न करूँगा परन्तु इस प्रकार दुत्कारो मत । कहते-कहते हेम रो पड़ा। उसने आंसू पोंछ कर कहा-'सुजान ! मैं अपनी संगीत-साधना की सौगन्ध खाकर कहता हूँ-अव कभी ऐसा न होगा।' कहते-कहते वह व रोने लगा। सुजान से यह दृश्य देखा न गया। उसकी सबसे बड़ी दुर्वलता यही थी कि स्वयं तो जरा-जरा सी बात पर रो पड़ती थी, परन्तु किसी और के आंसू वह नहीं देख सकती थी, उसका दिल दहल जाता। आज भी वह विह्वल तो हो उठी परन्तु बोली कुछ नहीं। वह अपने को संभालते हुए कुछ बोलने वाली थी कि सदाशिव के साथ एक अल्पवयस्का युवती ने कक्ष में प्रवेश किया। हेम जैसे का तैसा बैठा रहा । सुजान ने आगे बढ़कर पूछा-'वावा ! यह कौन है ? और उसे बड़े गौर से देखने लगी। बड़ी आकर्षक मुद्रा थी उस बाला की । कर्णपट तक खिचे ।
, - मुजान ५५ नेत्र, शुक नासिका, लोल कपोल, विम्बाफल से रंगे अधर, नागिन-सी छितराई लटें अलकों की छवि तथा गठीला शरीर सब मिसाकर यह रूप- वती लग रही थी। 'बेटी !' सदाशिव ने उसको योर समेत करके कहा -'यही लीला जिस पर रगीले शाह परम कृपालु हैं। इन्हें कलकत्ता के एक फिरंगी नर्तक ने अंग्रेजी नृत्य कला में प्रवीण कर दिया है अव शाह- शाह की इच्छा है कि सुजान की देख-रेख में इन्हें भारतीय नृत्यकला में दक्ष किया जाए। ये बातें हो रही थी कि हेम सुपचाप कदा के बाहर उठ कर चला गया । 'आओ बहिन ! मेरे पास बैठो ।' कहते हुए सुजान ने सीला को बडे प्यार से बैठाया । 'वावा ! तुम खडे क्यो हो, चौकी पर बैठो न ।' सुजान मुस्करा रही थी और लीला उसे ध्यान से देख रही थी। उसने सुना था-सुजान उत्तर भारत को सर्वश्रेष्ठ नर्तको है। उसके नृत्य पर देश-देशान्तर के राजा और राजकुमार रोक्षे हुए थे। अवध के नवाब सुजान की एक झलक पाने के लिए आतुर रहते थे। सुजान की ख्याति बगाल तक फैली हुई थी। सनमुच, जैसा सुना पा पैसा हो पाया । लीला उसके पास शैया पर ही बैठी धो । सुजान ने पूछा--'याहन ! तुम अग्रेजी नृत्य सीखकर भी हिन्दुस्तान का देहाती नृत्य देखकर क्या करोगी?' 'सखी ! अंग्रेजी नृत्य मे बही भती होती है। मेरा सौभाग्य है जो आप जैसी देवी के दर्शन हुए। अब मुझे विश्वास हो रहा है कि मेरा जीवन भी सफल हो जाएगा।' 'परन्तु तुम रह कहाँ रही हो? सुजान पूछा 'शाही हरम में।' लीला ने उत्तर दिया । शाही हरम सुनकर सुजान चौंक पड़ी । वह हरम का अर्थ भलीमोति जानती थी। यह हरम ही रगीले शाह की रंगरेलियों का पसा महा या। जहाँ प्रति रात्रि एक न एक ललना रगीले शाह को सामाग्निी आहुति बनती थी। उसने लीला को एक बार फिर ध्यान से देखा, सब समझ गई। उसे लोला पर बड़ी दया आई । ऐसा अबोध सौन्दर्य, ऐ” ने ।
५६ सुजान मधुर रूप राशि ! लगता है, सब कुछ शाह पर अर्पित हो चुका । सुजान का मन एक असह्य पीड़ा से कराह उठा । उसे लगा लीला सब कुछ गंवा- कर हाय पसार रही है। उस सुजान से जो बहुत कुछ प्राप्त करने के लिए अब तक संघर्ष करती रही। उसे लीला की स्थिति समझते देर नहीं लगी। कहां कलकत्ता ? कहां फिरंगियों का नाचघर ! और कहां अब किले की प्राचीरों की गोद में सोया हुआ रंगीले शाह का हरम । विलास का अड्डा । लोला में सौन्दर्य है, अल्पावस्था और नवयौवन का आभार है । शाह को चाहिए भी यही सब ! इसीलिए जो कुछ कमी है उसकी पूर्ति हेतु सुजान का सहयोग आवश्यक है। सुजान के मन में एक साथ घृणा, ईर्ष्या, दया और करुणा के भाव जागे। उसने सबको दबाते हुए कहा-"बावा ! हेम अभी-अभी वाहर गया है। वह रात का थका है। उसे विश्राम करने दीजिए । कल से लीला का नृत्याभ्यास यहीं चलेगा । उसने हंसकर लीला को गले लगाया और निर्मला को पुकारा। निर्मला दौड़ कर कक्ष में आयी । 'मरे' ! सुजान उसे देखते ही चौंक पड़ी। निर्मला की आँखें रोते- रोते सूज गयी थीं। उसके मुखमण्डल का सहज हास लुप्त हो चुका था। भर्राए हुए गले से स्वर फूटे-'मालकिन ! किसलिए बुलाया ?' सुजान बोली तो कुछ नहीं, कुछ क्षण फेवल उसे देखती हो रही । यह शैया से उठकर वातायन की ओर चली। निर्मला भी साथ-साथ गयी। "निर्मल ! तू आनन्द के भवन हो आई ?' 'कब की, मालकिन ! मैं आपसे वहां का समाचार ही तो बताने जा रही थी कि आप..." आगे वह वोल नहीं सकी। 'निर्मल ! तो तूने अभी तक नहीं बताया और यदि मैं न पूछती तो शायद तुम बताती ही नहीं।' 'ऐसी बात नहीं वीवी जी!' निर्मला सहमती हुई बोली। 'तो बोल न, क्या बात हुई और तू इस प्रकार आंसुओं से मुंह क्यों धोये जा रही है ?
सुगान 'स्वामिनी ! आनन्द सनिपात ज्वर में तड़प रहे हैं और यार-बार यापका नाम लेकर। 'निर्मला । क्या तूने अपनी मांगों से देण? कस तो दे महा से सकुशल गए थे। रात मर मे ही सन्निपात । असमय है।' सुजान डाटने हुए बोली । उसे निर्मला की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। 'मातकिन ! सभी वैद्य-हकीम उनके भवन पर मासद हैं। मामलों और नागरिकों को वहां भीड लगी है । भाज संध्या के पूर्व माहगाह भी उन्हें देखने के लिए आएंगे। मुझे देखते ही उनकी मां ने इशारे से पार बुलाया और रोती हुई।' निर्मला रोने लगी । शद अटक गए। 'निर्मला । तू तो मेरे सुख-दुःण के साथ लगी है परन्तु इननी बड़ी बात जानकर भी तू अभी तक चुप रही। अच्छा किया। जब सभी सता रहे हैं तो तू ही क्यों पीछे रहे। क्या आनन्द को माता जी ने तुममे दूध कहा भी ?' मुजान हताश होकर बोली। उसे सगा उसका साहम हट रहा है। उसके चरणो मे कम्पन हो रहा था। 'स्वामिनी ! आनन्द को मां बहुत दुखी होकर रहने मगी निर्ममा एक बार अपनी मालकिन को यहां से माओ ! मैं उम देवी के परणों में सिर रखकर क्षमा मागूंगी। मानन्द ने आपके बारे में अपनी माको मन कुछ स्पष्ट बता दिया है और इस समय हो वे केवल बाप नाम का ही उच्चारण कर रहे हैं ।' निर्मला एक सांस मे योलती चली गई। | मुजान के भाव बदले । वह धोरे से बोली-'निर्मल ! तू आनन्द के पाग गई थी?' 'हा मालकिन ! मैं दूर खडी पी। उन्होंने देखा मो, परन्तु भगता है, ये मुझे पहचान नही सके । मुझसे भी उनका कष्ट देना नहीं गया कटते ही निर्मला पुनः हासी हो गई। सुजान निर्मता को समझाकर कमरे में आई और मानव बोली, 'वावा ! आज लीला को ले जाइए, कम इसी समय 'हए वह सापन कदा से बाहर हो गयी। भवन के बाहर द्वार पर पहले रमजान ही मित गया । उसे बम्धी वैमार करने का आदेश देर मुबान मन में ४ सुजान । । आयी । वस्त्र वदले । निर्मला समझ गयी कि कहां की तैयारी है। जैसे ही सुजान आंगन में आयी निर्मला भी साथ चलने के लिए तैयार थी। 'निर्मल ! मुझे अकेली ही जाने दो । संगीत कक्ष में हेम बैठा है उसे भोज- नादि करा देना।' कहते हुए सुजान तीव्र गति से बाहर निकलकर बग्धी में बैठ गयी। वस्तुतः सुजान बड़ी ही गम्भीर प्रकृति की थी। लोग कहते हैं कि वेश्या हृदयहीना होती हैं उनका मर्म कुण्ठित हो जाता है किन्तु सुजान ऐसी नहीं थी । उसके अन्तर में ममता, दया, करुणा के भावानुभाव हिलोरें लिया करते थे। रमजान तेजी से बग्घी बढ़ाए जा रहा था और अन्दर बैठी सुजान गुम-सुम-सी बनी हुई बग्घी के पर्दे पर खिची हुई धारियां देख रही थी। घोड़ों के ठिठकने का आभास मिला तो सुजान ने पर्दा हटाया । वह आनन्द की हवेली के द्वार पर थी। विना किसी प्रतीक्षा के वह बग्घी से उतरी, आगे-पीछे देवे विना वह भवन में घुस गयी । आंगन में न जाकर वह उसी अतिथिशाला की नोर मुड़ी जहाँ से विरक्त होकर वह पिछली बार भागी थी। यह कक्ष उसे बड़ा मोहक लगता था। विशेष सजावट नहीं थी तो भी इसकी बनावट ऐसी थो कि सहज ही मन मुग्ध हो जाता था। जैसे सुजान की दृष्टि आंगन की दीवार पर पड़ी तो उस पर कलात्मक ढंग से गीतोपदेश दिखाई दिया.... 'अनन्यश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां सततयुक्तानां योग क्षेमं वहाम्यहम् ।। इतने में आनन्द की मां गोमती देवी सामने ही दिखीं । सुजान ने लपक कर उनके चरण की ओर झुकना ही चाहा कि गोमती ने सुजान को उठा कर गले लगा लिया और फफक पड़ी, हिचकी बंध गयी उस वृद्धात्मा की करणा ने अब तक स्थिर मुजान को दिगा दिया। सुजान की आंखों से सुजान ५६ । अश्रुधारा बह चली । गोमती ने अपने आंचल से उसको आये पोते हुए कहा-'लगता है तुमने मुझे माफ कर दिया।' 'मा' कहती हुई मुजान पुनः गोमती के अक से लिपट गयो । 'आओ बेटी ! आनन्द तुम्हारी बाट जोहते-जोहते सो गया है ।' मुजान गोमती के पीछे-पीछे मंत्र-मुग्धा-सी चलने लगो। कितना विशाल हृदय होता है मां का ! सच है, यह मा हो है जो संसार को मिटने से रोक लेती है, निस्सन्देह यह मा हो है जो बुझते हुए दीप को प्रकाशित कर देती है। धन्य है मां, यही सोचती- विचारती सुजान आँगन पार करके आनन्द के कक्षा में पहुंची । विशाल कदा ! ताखो पर पंप रखे हुए । सुजान सीधे आनन्द के दौया के समीप पहुँची । आनन्द खवर सो रहा था । उसका दाहिना हाप चादर के पाहर था। सुजान ने उसे चादर के यन्दर कर दिया और धीरे से आनन्द के मस्तक पर हाथ रखा । ज्वर का वेग शान्त था फिर भी मस्तक मे उष्णता थी। सुजान नीचे ही बैठ गयो । गोमतो ने सासन लेने के लिए कहा किन्तु वह नीचे ही बैठी रही। जीवन मे भाग प्रथम बार सुजान का एक नूतन अनुभव हो रहा था। उसे लगा कि वह अपनी ससुराल में है । गोमती दूसरे कक्षा में किसी काम से चली गई थी। सुजान आनन्द के कक्ष में अकेली ही थी । उमने उठकर मानन्द के चरणों मे सिर रख दिया। बडो सुखद अनुभूति जागी और सुजान के नेत्र अपने आप मुंद गए । अन्तर के वीणा को तार बज उठे- 'आनन्द ! मेरे जन्म-जन्म के साथी, मैं तुम्हारे चरणो की छाया में मुय से बैठी है।' सुजान का मन कमल को भांति मिल गया। वह पुनः अपने स्थान पर बैठकर आनंद का मुख कमल देखती रही । मुजान चैया को पाटी पर सिर रये आनन्दमग्ना हो रही थी। आज उसे जीवन की सफलता का भाभास हो रहा था।
सुजान । । आयी ! वस्त्र वदले । निर्मला समझ गयी कि कहां की तैयारी है। जैसे ही सुजान आंगन में आयी निर्मला भी साथ चलने के लिए तैयार थी। 'निर्मल ! मुझे अकेली ही जाने दो । संगीत कक्ष में हेम बैठा है उसे भोज- नादि करा देना।' कहते हुए सुजान तीव्र गति से बाहर निकलकर बग्घी में बैठ गयी। वस्तुत: सुजान बड़ी ही गम्भीर प्रकृति की थी। लोग कहते हैं कि वेश्या हृदयहीना होती हैं उनका मर्म कुण्ठित हो जाता है किन्तु सुजान ऐसी नहीं थी । उसके अन्तर में ममता, दया, करुणा के भावानुभाव हिलोरें लिया करते थे। रमजान तेजी से बग्घी बढ़ाए जा रहा था और अन्दर बैठी सुजान गुम-सुम-सी बनी हुई बग्घी के पर्दे पर खिची हुई धारियां देख रही थी। घोड़ों के ठिठकने का आभास मिला तो सुजान ने पर्दा हटाया । वह आनन्द की हवेली के द्वार पर थी। बिना किसी प्रतीक्षा के वह बग्घी से उतरी, आगे-पीछे देवे विना वह भवन में घुस गयी । आँगन में न जाकर वह उसी अतिविशाला की ओर मुड़ी जहाँ से विरक्त होकर वह पिछली बार भागी थी। यह कक्ष उसे बड़ा मोहक लगता था । विशेष सजावट नहीं थी तो भी इसकी वनावट ऐसी थी कि सहज ही मन मुग्ध हो जाता था। जैसे सुजान को दृष्टि आंगन की दीवार पर पड़ी तो उस पर कलात्मक ढंग से गीतोपदेश दिखाई दिया.... 'अनन्यश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेपां सततयुक्तानां योग क्षेमं वहाम्यहम् ।' इतने में आनन्द की मां गोमती देवी सामने हो दिखीं। सुजान ने लपक कर उनके चरण की मोर झुकना ही चाहा कि गोमती ने सुजान को उठा कर गले लगा लिया और फफक पड़ी, हिचकी बंध गयी उस वृद्धात्मा की करणा ने अब तक स्थिर मुजान को दिगा दिया। सुजान को मांखों से - सुजान प अश्रुधारा वह पती । गोमती ने अपने आंचल से उसको आयें पौने हए कहा-'लगता है तुमने मुझे माफ कर दिया।' 'मा' रहती हुई सुजान पुनः गोमती के अक से लिपट गयो । 'आओ बेटी ! आनन्द तुम्हारी बाट जोहते-जोहते सो गया है। मुजान गोमती के पीछे-पीछे मंत्र-मुग्धा-सी चलने लगी। कितना विशाल हृदय होता है मौका ! सच है, यह मां ही है जो संसार को मिटने से रोक लेती है, निस्सन्देह यह मां ही है जो बुझते हुए दीप को प्रकाशित कर देती है । धन्य है मां, यही सोचती- विचारती सुजान मांगन पार करके आनन्द के कक्ष में पहुंची। विशाल कदा ! ताघों पर ग्रंथ रखे हुए । मुजान सोधे आनन्द के दौया के समीप पहुँची । आनन्द बेधयर सो रहा था । उसका दाहिना हाप चादर के बाहर था। सुजान ने उसे पादर के अन्दर कर दिया और धीरे से आनन्द के मस्तक पर हाथ रखा । ज्वर का वेग शान्त था फिर भी मस्तक में उष्णता पी। सुजान नीचे ही बैठ गयो । गोमती ने आसन लेने के लिए कहा किन्तु वह नीचे ही बैठी रही। जीवन में आज प्रथम बार सुजान का एक नूतन अनुभव हो रहा पा। उसे लगा कि वह अपनी ससुराल मे है । गोमती दूसरे कक्ष मे किसी काम से चली गई थी। सुजान आनन्द के कक्ष में अकेली ही थी । उमने उठकर आनन्द के चरणो मे सिर रख दिया। बड़ी सुखद अनुभूति जागी और सुजान के नेत्र अपने आप मुंद गए । अन्तर के वोगा की वार बज उठे- 'आनन्द ! मेरे जन्म-जन्म के साथी, मैं तुम्हारे चरणों की छाया से बैठी हूँ।' सुजान का मन कमल को भांति खिल गया। वह पुनः अपने स्था पर बैठकर आनद का मुख कमल देवती रही । सुजान या यो पार्टी सिर रये आनन्दमग्ना हो रही थी। आज उसे जीवन की सफलता भाभास हो रहा था।
- 'सुजान वेटी!' गोमती ने अन्तःकक्ष से पुकारा और 'आई मां' कह कर सुजान अन्दर चली गयी । आनन्द के पास वहादुर सिंह बैठ गया । गोमती भोजन कक्ष में थीं । सुजान सीधे कक्ष के अन्दर न जाकर देहलीज के बाहर खड़ी हो गई। गोमती ने उसे देखते ही बड़े दुलार से कहा- 'आओ, अन्दर आ जाओ। बाहर क्यों खड़ी हो अपनी वृद्धा मां का कुछ हाथ बंटाओ।" 'मां ! आपकी पवित्र रसोई में मैं ? अशुद्ध हो जाएगी, मुझे आदेश दो, मैं बाहर से ही आपकी...' सुजान पूरा वाक्य बोल भी नहीं पाई थी कि गोमती चौके से बाहर आकर उसका दायां हाथ थामे उसे अन्दर ले गई और जिस पीढ़े पर स्वयं वैठकर रसोई घना रही थीं उस पर सुजान को बैठा दिया। सुजान भौचक्की-सी गोमती को निहारती रह गई । संकेत पाकर उसने पास रखे जल-कलश से हाथ- पांव धोया और कलछो लेकर शाक चलाने लगी। आज उसे लगा जैसे उसका शुद्धीकरण हो गया हा । वह जानती थी-आनन्द का परिवार परमवैष्णव परिवार है और छुआछूत का बोलवाला है, इसीलिए सहसा उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी । गोमती ने सुजान के सिर से खिसकते बांचल को ठीक करते हुए कहना प्रारम्भ किया-'बेटी! तुम क्या हो, मुझसे आनन्द ने सब कुछ बता दिया। तुम्हारा खान-पान, रहन-सहन, कथा-वार्ता-ज्ञान सब सुनकर मन में बड़ी श्रद्धा हुई। आज तो तुम्हारे हाय का पका भोजन पाकर धन्य होऊंगी।' गोमती के मुख से निकलते हुए शब्द मुजान के कानों में अमृत-बूंद की भांति टपक रहे थे। इतने बड़े सम्मान के तो वह किसी प्रकार योग्य नहीं थी, सुजान परन्तु क्या करें ! मां से तो कुछ कहना भी कठिन है । जो शुजान मह- फिल में नाचकर सबका मन बहलाया करती थी वही आज इस परम- माध्वी देवी की श्रद्धा का पात्र बनी हुई थी, कोन विश्वास करे ? सुजान स्वयं जैसे स्वप्न देख रही थी। सचमुच, कभी-कभी कुछ क्षणों के लिए सत्य में भी धोखा हो जाता है। कोई भी बाहरी यदि इस समय मा जाता तो सास-बहू ही समझता । शाक पक मुका था, मुजान ने उसे उतारा और चावल घोकर चढ़ापा | लकड़ी ठीक से जन नहीं रही पो। मुजान ने फूंक मारकर उसे प्रज्वलित किया। धुओ आँशों में भर गया पर सुजान इस समय इतनी प्रफुल्लित हो रही पी कि उसे धुएं की कर- आहट का भी आभास नहीं हो रहा था। गोमतो भी सुनान के सामने एक चौकी पर बैठी सुजान की ओर ध्यान से देख रही थीं। उन्हें बड़ा अच्छा सग रहा था। इतने में दरवाजे पर बाकर बहादुर सिंह बोला-'मां की ! आनन्द जग गये हैं और पानी मांग रहे हैं।' बहादुर सिंह इतना कहकर पुनः लोट पड़ा । गोमती ने सुजान से कहा-'बेटी ! उधर, उस पात्र में गर्म- जल है, अब ठण्डा हो गया होगा। तुम से जाकर उसे दवा के साप दे आओ । मैं तब तक चावल देख लूंगी।' सुजान को मा को यह आशा अटपटी लगी । यद्यपि इच्छा उसकी भी नहीं थी तयापि अपने भावों को दबाकर बोली-'मा ! अच्छा होता, आप ही उन्हें दवा पिता देतीं । मां के हाप से औषधि अमृत"।' इतना ही बोल पाई थी कि गोमती ने प्रतिवाद किया-'वेटी ! दोपहर में इसी औषधि के लिए पूरा महाभारत मचा। बड़ी कठिनाई से उसके एक बाल-सबा ने यह औषधि उमऊ गसे से उतारी । तभी से सोया है और पर भी शान्त है। जा बेटी ! तू ही खिला आ ।' गोमती ने उसे चौके से उठाकर ही दम ती । वह उठो हाय धोया, जलपात्र और औषधि तो ले लिया, परन्तु चरण का की ओर बने में उत्साह नहीं दिखा रहे थे। हदय को धड़कन बढ़ रही थी।
सुजान - में कम्पन भी था, परन्तु उसने जलपान को बड़ी हढ़ता से पकड़ रखा था। एक-एक पग ऐसे घर रही थी जैसे बर्फ पर चल रही हो आनन्द शेया पर बैठा था। उसका मुंह बाहर की ओर था। वहादुर सिंह बाहर निकल रहा था । पीछे से सुजान मन्द गति से शैया के पास आई । घर से चलते समय उसे अपनी करधनी उतारने का ध्यान न रहा, वह उसकी कमर में थी और प्रतीति तब हुई जब उसका धुंधरू वजा । आनन्द ने मुंह घुमाकर देखा-सुजान ! आनन्द का मुख-मण्डल कमल की भांति खिल उठा । रोम-रोम में गुदगुदी होने लगी। ज्वर का वेग शान्त घा, शरीर हल्का हो चुका था, मन स्वच्छ था उसने मोहक मुस्कान विखे- रते हुए सुजान का स्वागत किया। साथ ही पास आने का संकेत भी किया । सुजान लजा गई । आज आनन्द उसे बड़ा आकर्षक लग रहा था। मन-ही-मन गद्गद हो उठी किन्तु वह जहां की तहां खड़ी रही । तब आनंद यद्यपि दुर्वलता का अनुभव कर रहा था, उठने की शक्ति नहीं थी फिर भी पाटी पकड़ कर स्वयं ही उठना चाहा कि जलपान चौकी पर रखकर सुजान ने अपने हाथों से उसे पुनः शैया पर बिठा दिया । वह अपने को कृतकृत्य अनुभव कर रही थी। गृह-स्वामिनी की भांति उसने आनन्द को औपधि खिलाई, शैया पर लिटाकर चादर उढ़ाई और विश्राम करने का आदेश देकर जैसे ही पीछे मुड़ी-'सुजान' आनन्द के मुख से पहला शब्द सुना मुजान ने और घूम पड़ी-~~'तुम न आतीं तो मैं बच न' लपक कर सुजान ने मानन्द के अधरों पर उंगलियां रख दीं। अत्यन्त मुखद स्पर्श था, आनन्द मारे हर्प के उन्मत्त हो उठा। 'मैं कैसे न आती ?' सुजान ने धीरे से कहा-'तुम बुलाओ और तुम्हारी सुजान न बाए, यह कैसे संभव है ? अच्छा ! दवा खा चुके हो, अब शान्तिपूर्वक लेटे रहो । मैं रसोई में चावल चढ़ा कर आई हूँ, मां जी अकेले परेशान हो रही होंगी।' मुजान को वाणी में आत्मविश्वास तो था ही साथ ही बढ़ा भारी अधिकार भरा था। इसी अधिकार को प्राप्त करने के लिए नारी सब कुछ अर्पित कर देती है और सुजान का सौभाग्य देखिए कि उसे आज बिना याचना के ही प्राप्त हो गया। वह बस में चलने ही वाली थी कि आनन्द ने उसकी साड़ी का एक छोर परड़ लिया। मुड़कर सुजान ने देखा, मुस्कराई-'देयो, उतावली मत करो, अब तक मेरे मन को चली, अब तुम जो चाहोगे वही होगा। बस न ! छोरी आंचल, माजी न जाने क्या सोचती होगी।' आनन्द धीरे से बोला- 'सुजान ! अब मैं मर भी जाऊँ तो मुझे पछतावा नहीं होगा क्योंकि मेरे मन की मुराद पूरी हो गई। मुजान उसकी मोर मोहक दृष्टि के देवठी हुई कक्ष से बाहर हो गई। भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ करके उहेलता है, यही सोचकर आनन्द मन-ही-मन मुस्कराया। सुजान रसोई में ! आनन्द के लिए यह अनहोनी खबर पी। उसकी मां परम पैष्णव ! स्पर्श दोप मां के लिए बहुत बड़ा विधान था, आज मां को क्या हो गया। मुजान उनकी रसोई में ! गजव का जादू है सुजान के स्वभाव में । मां रीझ गई होगी। सुजान धन्य हो तुम युग-युग जिओ । यही सव उधेड़ता चुनता आनन्द फिर सो गया। सुजान ने रसोईघर मे पहुंचते ही हाप-पाव धोया और आग्रह के साथ स्वयं ही पावल उतार कर दाल चढाई। गोमती सुजान से बहुत प्रसन्न यों। मानन्द से उन्होंने यह जाना था कि सुजान संस्कृत और पौराणिक गाथाओं में भी रुचि रखती है । अतः उन्होंने सुजान से कहा- 'बेटी ! तुमने तो भागवत पढ़ी होगी मुझे यह बताओ कि कृष्ण गोपियों और ग्वाल-बालों को अपनी सीला मे रिक्षाकर भी जब गोकुल से गए तो कभी भी लौटकर नही आये क्यो और यह भी बताओ कि जब नन्द के घर धी-दूध की नदियां बहती थी तो वे अन्य बालो के घर चोरी से मक्खन के लिए क्यों ललचाते घे? सुजान ने मां का प्रश्न बडे ध्यान से सुना और यह भी अनुमान लगाया कि उनकी शंका निर्मूल नही है । वह कृष्ण कुछ सोचती रही। उसने कई विद्वानों से भागवत एव अन्य पुराणों को कपाएं सुन रखी थी परन्तु आज जो समस्या मां ने उसके सामने एहज भाव में रख दी थी, उसका समाधान कहीं भी नही मुना सुजान - था। वह सोच में पड़ गई। उसने मां की ओर देखा और धीरे से बोली 'मा जी ! कृष्ण ब्रह्म थे, उनका अवतार भारतभूमि के लिए वरदान था। वे जानते थे जब तक कंस का एकाधिकार तथा निरंकुश शासन रहेगा, तब तक नन्द-गांव, गोकुल, गोवर्धन तथा वरसाना के पिछड़े लोग पनप नहीं पाएंगे। मां जी! पुराणों का कथन है कि कंस की ३०० रानियां थीं और वे प्रति-दिन दुग्ध कुण्ड में स्नान करती थीं जो इन गांवों की गायों के दूध से भरा जाता था । स्नान के बाद वह दूध फेंक दिया जाता था और दूसरे दिन फिर भरा जाता था। यही मथुरा नरेश कंस की आजा थी । कृष्ण इसका विरोध कर रहे थे। वालक का विरोध सुनता कौन ? इसलिए, उन्होंने इस युक्ति से काम लिया जिससे दूध का दुरुपयोग रुका और वही दूध-घी खा-पीकर यहां के लोग इतने बलिष्ठ हो गये कि मल्लयुद्ध में कंस को मुंह की खानी पड़ी। कृष्ण जाने के बाद इसलिए नहीं लौटे कि जिस मोह-जाल में पड़कर उन गांवों के लोग काम-काज , छोड़कर अकर्मण्य होते जा रहे थे, श्रीकृष्ण ने अपने हृदय पर पत्यर रख कर उन्हें उससे मुक्त कर दिया। यह उस महामना का त्याग-भाव था जिसने ब्रजवासियों का भविष्य उज्ज्वल बनाया। एक बात और है माँ जी कृष्ण जो कहना चाहते थे पहले उसे करके दिखा दिया करते थे ।' 'यह कैसे बेटी ?' गोमतो जिज्ञासु बन गयौं । 'मां जी ! कृष्ण जीवन पर्यन्त स्वयं संघपों से जूझते रहे। वे मानवमात्र के कल्याण में लगे रहे। उन्होंने जो भी किया वह भारत के इतिहास में वेजोड़ है । सब कुछ करने के पश्चात् उन्होंने गीता के माध्यम से स्पष्ट किया। इसीलिए कहा गया "गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यः शास्त्रसंग्रहः ।" सुजान का ध्यान चूल्हे पर चढ़ी दाल पर गया । वह लपक कर चूल्हे के सामने पहुंची। गोमती मन-ही-मन श्रद्धा से उसको निहारतो रहीं।
No text on this page.
६६ सुमान मधुरस तैयार हुआ और लीला ने मुस्कान बियेरते हुए रंगोलेशाह को पिलाया । शाह ने आनन्द का समाचार पूछा और समवेदना के दो-चार चाय कहकर दल के साथ विदा हो गए। बहादुर सिंह बग्घी तक पहुँ- 'पाने गया । गोमती की जान में जान आई । सुजान शाह के सामने नहीं पड़ी, उसने भी भगवान् को धन्यवाद दिया । माह के जाने के बाद वह भी घर जाने को तैयार हुई परन्तु मां के आंसुओं ने उसके पैरों में बेड़ी डाल दी । आज पहली बार सुजान ने मां के साथ भोजन किया । मानन्द अभी नींद में था। उसे परहेज से रहना था। केवल गर्म दुग्धपान का ही विधान वैद्यों ने बताया था । गोमती की आंखें नींद से अलसाई हुई थीं। वे रात भर जागी थी और दिन में भी लेट नहीं पाई। नौकर-चाकरों के खा-पी लेने के पश्चात् वे अपनी दशैया पर पड़ी और सुजान ने चरण दवाना प्रारम्भ किया ही था कि वे सो गई। चादर उढ़ाकर सुजान दुग्ध-पार लेकर आनन्द के कक्ष में पहुंची। आनन्द जाग गया था । सुजान के आते ही, जो दो सेवक वहाँ बैठे थे बाहर चले गए । सारा कक्ष मगर- धूप से महक रहा था । झाड़-फानूस प्रकाश में छवि विघर रहे थे । सुजान दूध का पार लिए खड़ी थी। आनन्द धीरे से उठ बैठा और सुजान से भी गया पर बैठने का आग्रह किया । वह चौकी पर ही बैठना चाहती थी यह अपने में नहीं थी। वह अपने रोम-रोम में आनन्द का अधिकार समक्ष रही थी। आनन्द प्यार भरे नेत्रों से सुजान की रूप- माधुरी का पान कर रहा था । 'दूध पी लो ।' सुजान बोली। 'दूध ? दूध तो कल से ही पी रहा हूँ। आज तुमने जो भोजन बनाया है उसी में से दो कौर खिला दो न !' यह विनती के स्वर में बोला । 'भोजन ? पता है वैद्य जी ने सक्त मनाही की है। यदि एक अन्न भी मुंह में गया तो जो ज्वर अभी छोड़कर गया है, पुनः लौट आएगा। समाने, यहाँ गुजान है, तुम्हारी मनमानी नहीं चलने पायेगी।' सुजान फरिम निष्ठुरता से बोली। 'तो फिर यह मेरा दुर्भाग्य ही है, वर्षों से परन्तु आज जैसे सुजान जिसके हाथो का बना पाने को तारा रहा था और भाम houना मता पुष्पित हुई तो पैप-हकीग माल मग है। मेरी भी गुगल एक ही कोर पिसा दोग।' भागद गिनिने गगा। मान मार पड़ गई। उसने मारी ह तो गुना पा वितु INThe आज ही किया। यद्यपि रसोई में दाम-पाषष समाग hti रोगी का यह इच्छा पूरी करना पगभग पिने गुमान यह नहीं कर पाएगी। अपने को सभापकर योगी-यो भाना मत करी । तुम सच्चे नहीं हो और परिगुरो बाधिक विषमतो मैं यहादुर सिंह को साथ लेकर पर पली भारतुग urit जाकर स्वयं ही जो पाहना पालेगा।' आगाद गर को पगा। सुजान चली जाएगी, यह मानन्द गहा महीना itain. की भांति पाडयी औषधि की तरह दूध पिया । गुमामीनी 4m उत्साह से उसका मुंह घुमाया पौर मोगा--'अप fasi ME चौकी पर लेट जाऊंगी फिी पीराभापश्यनमा गईमोजागा बुला लेना।' आनन्द ने गुशाग के पे या ampitition मुजान को गैया पर मे उटनं नहीं दिया airmani लेकर बोना--'गुजान ! कम गण 2-424TAfty, 'इसलिए अब यमुना नट पर सामान ठहाका मार कर इंग पो। गाय घाना यह हाग बड़ा ही दपिका पगा। गुमान मी नाना पान स्नेह रिमौर होकर गो गारमे गया। प्रधान माग नेकिन मने मानिया रिया। शासन मगी । यानन्द प्रा डा देगा I मुबान की पायम गणिया पानाहा ratiya यादव ने की। पुरान अगष्टमा । का माम मोपादन ६८ सुजान 'सोच रही हूँ, तुम जीते और मैं हार गई।' सुजान इतना ही बोल कर चुप हो गई । मानन्द ने जैसे स्वर्ग पा लिया था। 'इसे में अपनी जीत नहीं मानता सुजान ! सच तो यह है कि यह तुम्हारे आत्म विश्वास की विजय है । देखो ! मेरी मां पुराने विचारों की हैं और अपने चौके में किसी को भी प्रवेश नहीं करने देतीं। परन्तु आज तुम्हारे हाय का बना हुआ भोजन पाकर वे तृप्ति का अनुभव कर रही हैं । यह साधारण वात नहीं । मैं जो चाहता था उसे तुमने कर दिखाया, यह मेरी तृप्ति है । इससे अधिक मुझे और कुछ नहीं चाहिए सुजान ! कुछ नहीं चाहिए ।' आनन्द की आंखों में प्रेमाश्रु आ गए । सुजान ने स्नेह से देखा और आनन्द को वक्ष से लगा लिया। मानन्द बहुत साफ सुजान के हृदय की धड़कनें सुन रहा था। विचित्र संयोग था । वासना दूर खड़ी पछता रही थी और दो कामना रहित हृदय प्रेम-रस में डूव-उतरा रहे थे। सुजान का अन्तर भर आया । 'देखो ! आनन्द में पूर्ण रूप से तुम्हारी हो चुकी है, केवल तुम्हारी । इसीलिए कभी भी अपनी सुजान को ठुकराना मत, बस इतना याद रखना ।' यह स्पष्ट आत्मसमर्पण था जिसके लिए वह कभी तैयार नहीं हुई । ग्वालियर नरेश आधा राज्य देने को तैयार थे, रंगीले शाह अपनी प्रधान वेगम बनाने की शपथें लेते थे परन्तु सुजान ने इसी प्रकार के अन्यान्य प्रलोभनों को त्याग दिया था परन्तु आज ! आज तो वह स्वयं वाग्दत्ता बन गई। वह इस समय भाव विभोर थी। आनन्द तो स्वर्ग सुख का अनुभव कर रहा था। वह बोला-'प्रिये ! और कुछ होने के पहले यह शरीर ही त्याग दूंगा। जो सुजान मेरे रोम-रोम में, सांस- सांस में बसी है, उसे तो परमात्मा भी मुझसे अलग नहीं कर सकते । सुजान ! प्रेम को परिभाषा भासान है लेकिन निर्वाह कठिन । यह सब समझ-बूझकर ही मैंने इस प्रेम पत्य पर चलने का संकल्प किया है।' आनन्द ने गुजान को अपने वाहुओं में जकड़ लिया। सुजान समझ गयी यहाँ धोखा नहीं है । जो भी है सत्य है इसीलिए सरल है और विश्वास- J । योग्य है।
सुभान कुछ समय तक पो इसी प्रकार प्रेमालाप चलता रहा । मुरान ने स्पष्ट देखा--आनन्द की प्रीति में कामना या वासना कारंपमात्र स्थान नहीं । वह इतनी मगन यी कि वेषटके आधी रात तर यानन्द बी या पर लेटी रही । आनद ने कई पद सुनाये वह मानन्द-विभोर होती रही। उसे आनन्द की अनाशक्ति पर माश्वर्म भी हो रहा था और गर्व हो । सचमुच, पुरुष वर्ग में यह वृत्ति अपवाद ही थी। एक ही पोपा पर, वह भी एक पुरुष के साप ! मुजान के जीवन को यह पहली घटना थी । जैसे ही वह उठने की कोशिश करती छानन्द से फिर बैठा लेता । आपिर इसी तरह रात बीत गमी ब्राह्म मुहूर्त में मानन्द को झपकी-सी माने सगी तो सुजान उसे मुताकर तथा चादर उताकर बाहर आई। अभी कोई उठा नहीं था। सुजान ने मां को जगाया। मो ने मुगान को गले लगाकर युग-युग जीने का आशीर्वाद दिया। कुछ समय तक सुजान मां को कथा-वार्ता सुनाती रही और प्रभात के पूर्व ही स्नान- ध्यान सम्पन्न करके मुजान आनन्द के कक्ष में आई। आनन्द जगकर बैठा था। मुजान को देखकर मुस्कराया, वह भी मुस्करा दी। धागे वाकर सुजान ने आनन्द के मस्तक पर हाथ रखा तो ज्वर का नाम-निशान नहीं था। आनन्द दो ही दिन में दुर्बल हो गया था। वह ऐया से उटा पर चल नही पाया। सुजान ने बहादुर सिंह को आवाज दी। बहादुर के कन्धे पर हाथ रखे आनन्द बाहर निकला। मुजान मे बानन्द का बिस्तर बदला। आज उसे यह कार्य इतना प्रिय मग रहा पाकिवह इसी मे तल्लीन रहना चाहती थी। आनन्द के पाते ही उसे गर्म दूध तथा औषधि पिलाकर मुजान बस से बाहर पा रही थी कि बहादुर सिंह घबहाता हुआ पुनः कदा में घुसा- 'सरकार ! शाहंशाह के सिपाही बग्घी लेकर आये हैं।' 'क्या बात है ? उनसे पूणे क्या चाहते हैं ?' आनन्द रोबीली आवाज मे बोला।
सुजान सुजान पुनः कक्ष में आ गई। 'सरकार सिपाहियों के प्रधान का कथन है कि शाहंशाह ने इसी समय सुजान को तलब किया है।' इतना कहते-कहते बहादुर घबरा-सा गया। , 'तुम जाकर उनसे कह दो सुजान नहीं आएगी, किसी कीमत पर नहीं आयगी। समझे।' मानन्द को क्रोध आ रहा था, सुजान समझ गयी। 'जैसी आज्ञा सरकार !' कह कर बहादुर चलने ही वाला था कि सुजान वोल पड़ी- 'यहादुर ! उनसे कह दो, सुजान तैयार होकर आ रही है।' 'सुजान ! यह क्या कह रही हो ? मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा।' आनन्द खीम उठा था। 'आनन्द ! तुम नाराम करो ! मैं रंगीलेशाह को भली-भांति जानती हूँ। उसे पता लग गया होगा कि मैं यहां हूँ तभी बुलवाया होगा । देखो! जलती भाग में हाथ नहीं डालना चाहिए।' 'परन्तु सुजान यह तुम्हारा अपमान है।' 'हां आनन्द ! यह अपमान तो है ही परन्तु यह भी सोचो कि बहुत वड़ा सम्मान पाने के लिए ऐसे अपमान सहन करने में कोई हानि नहीं।' सुजान निशंक बोलो। 'नहीं सुजान ! तुम रुको । मैं एक पत्र भेज कर शाह को समझा सकता हूँ।' आनन्द अड़ गया । 'ऐसा नहीं होगा, इसमें तुम्हारा अपमान होगा, जिसे मैं कदापि सहन नहीं कर सकती ।' कहती हुई सुजान निकल गयी और मां के चरण बग्घी में बैठ गयी। पयोंकि वह न जाने का परिणाम समझ रही थी। स्वयं को तो कोई बात नहीं-वह अपने आनन्द को किसी कष्ट में नहीं देखना चाहती थी पुद भले आजीवन कष्टों में पड़ी रहे । आनन्द सुजान का जाना किंकर्तव्य विमूढ़-सा होकर देखता रहा ।
क्या?" सुजान लम्बे डग भरती हुई हवेली के विशाल प्रांगण को तीर की तरह पार कर गई। वह न कही रुकी और न किसी ओर देखा। इस समय उसने जो निश्चय कर रखा था उसका सीधा सम्बन्ध रंगीले शाह से था । इसीलिए जब वह मुख्य द्वार पर पहुंची और उसे बन्द देखा तो खीझ उठी । बहादुर सिंह ने अभिवादन किया-"मैं आपके साथ चलूँ, 'सुजान की त्योरी बदल गयी। उसे लगा जैसे द्वार पा न सुता होना उसका अपमान है लेकिन दूसरे ही क्षण सुजान मुस्करा उठी- 'ठाकुर ! मुझे अबला नारी ही समझ रहे हो ?' 'नही देवी जी!' वहादुर वडे उत्साह से बोला-'बात यह है कि शाह से अभी मेरी काफी बातचीत हो चुकी है और उस वार्तालाप से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि शांहशाह भापके कपर बहुत क्रोधित हैं और आपको दण्डित करने का निर्णय ले चुके हैं इसलिए आपको अकेले जाना उचित नहीं।' सुजान ने बूढ़े ठाकुर को गभीर बातो का अर्थ लगाया । घृणा से मुंह विचकाकर कहा-'ठाकुर ! इस समय न जा सकूँगी मैं पर जाऊँगी।' 'जैसी इच्छा ।' यहादुर सिंह बोसा । सुजान आंगन की ओर न जाकर अतिथि-कदा की ओर मुडी । उसके मानस-पटल से शाह के आदेश को आंधी उतर पुकी थी। इस समय उसका मन भाव सोक में विचरण कर रहा था। वह कस के मध्य फर्श पर बिछे कालीन पर पलथी मार कर बैठ गई। उसकी कला-पारपी दृष्टि दीवाल पर भक्ति चित्रों पर दौडने सगी । एक कलात्मक चित्र पर उसकी दृष्टि रुक गयी। यह अभिज्ञान शाकुन्तलम् को यह की पी जव ७२ सुजान दुप्यन्त ने शकुन्तला को प्रथम वार आश्रम में देखा था । वल्कल से अध- के मल्हढ़ योवन का अद्भुत आकर्षण दुष्यन्त के हृदय में हाहाकार मचा रहा था । नीचे वह पंक्ति अंकित थी जो उस समय दुष्यन्त ने कही थी- 'इयमधिक मनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।' सुजान उससे तादाम्य स्थिर कर बैठी। उसे रात का साहचर्य गुद- गुदाने लगा । स्मृतियां तो बड़ी मोहक होती हैं। यथार्थ से कहीं अधिक लुभावनी होती हैं। सुजान का रोम-रोम सिहर उठा। वह काफी देर तक उस चित्र को देखती रही । कलाकार ने चित्र को इतना सजीव रूप दे रखा था कि इसे देखते हो मन मुग्ध हो जाना नितान्त स्वाभाविक या । सुजान न जाने किन-किन विचारों में खोई रही-नारी और पुरुप यौवन और सौन्दर्य !! प्रणय और वासना !! क्या यह सब दुर्वलता के ५ प्रतीक हैं । दुष्यन्त जैसे धर्मात्मा चन्द्रवंशी सम्राट् एक आश्रम कन्या पर रोझ और खो बैठे स्वयं को, अपनी सत्ता एवं गरिमा को। चित्रकार ने अपनी तूलिका के चमत्कार एवं आकर्षक रंगों के प्रदर्शन से जो दृश्य उरेहा था वह सामान्य, असामान्य दोनों प्रकार के दृश्यों को आन्दोलित करने में समर्थ था । सुजान अपने हृदय की गहराई से पूर्ण परिचित थी भोर अन्तःकरण पर उभरने वाले प्रभावों के प्रति पूर्णतया सतर्क भी थी। उसे इस बात पर गर्व था कि वह जो कुछ सोचती थी वही करती थी। अतः पश्चात्ताप का प्रश्न ही नहीं। उसका आनन्द उसका चिर सखा है। उसके अधर बुदबुदाए-'आनन्द ! मेरा अपना आनन्द ।' उसने आनन्द को जैसे नयन पट में चन्द कर लिया। उसे विश्वास हो चला था कि आनन्द एकमात्र सुजान के हृदय का आनन्द है। सुजान भाव- विभोर तो थी ही, ऐसा रोमाञ्च हुआ कि नेत्रों से प्रेमाशु छलक आए तभी पीछे से आकर किसी ने अपनी हथेलियों से उसकी आंखें टॉप ली। मुजान का शरीर सिहर उठा । कोई और नहीं आनन्द ही था ।
सुजान 1 'प्रिये ! मैंने बहादुर सिंह को गाह के पास भेज दिया है तुम निश्चिन्त होकर यहीं विश्राम करो।' आनद ने महा मुस्कान बिग्रेरते हुए उसके कपोल पपयपा दिए । वडा मधुर पा वह स्पर्श । मुशान और समीप हो गई। 'देखो, आनन्द ! प्रत्येक सुख के पीछे विपाद को छाया प्राय-मी चलती रहती है । वहादुर गया है, ठीक है परनु रंगीने शाह को बाय तो मुजान को पिरवते देखने के लिए बेचैन होगी । देखो, लौटकर वहादुर सिंह या आदेश लाता है। मुजान ने अपना मिर आनन्द की गोद में रख दिया। 'भुजान ! हमारे मध्य में कोई शाह नही, इमे निश्चित समझो। विश्वास करो अब इन कोमल चरणों में पुरू नहीं बंधेगे ।' मुजान अनु- राग से भर उठी उसने आनन्द के मुख को अपनी हपनियों में nि लिया। "आनन्द ! इस दिन की प्रतीक्षा करते-करते तो मैं प्रायः थक चुकी थी। मैं निराश थी और इसी धुन मे जीवन कट रहा था कि जब धूपुरू पाव से संबध तोडेंगे तो सुजान भी कही अदृश्य हो जाएगी। जितु नहीं, भाग्य के पट खुलते हैं, चाहे देर से, पाहे मवेर से । आधिर मुशे मेरा इप्ट प्राप्त हो ही गया । कहती हुई सुजान उठ पड़ी हुई और आनन्द को साथ लिए कक्ष के अन्त.पक्ष में प्रवेश कर गई । आनन्द अब स्वस्थ था। वह जो कुछ अनुभव कर रहा था उसे उसके अतिरिक्त फेवत मुशान हो समझ रही थी। अन्तःकदा मै सुगन्धित अगर धूप की महक फेन रही पो । मुमान वेधड़क पर्यक पर गिर पडौ। आनन्द समीप पड़ा था। उमर पाय जैसे कोप रहे थे। मुजान ने आनन का हाथ पका निटाना चाहा मनु यह बैठ गया सो वैठा ही रहा। सुजान हर समय कुछ न कुछ मोना करती पी और अपने आप ही तर्क-विता औचित्य इंदा करती यो । म समय उसके मन मे क्या-क्या भाव ये केवन वही समा रही थी उसने ७४ सुजान ?' आनन्द को स्थिर से बैठे नहीं रहने दिया । उसने उसे आलिंगन में आवद्ध कर लिया । आनन्द चौंका । सुजान की केशराशि में उँगलियां डाले बुद- बुदाया---'सुजान ! क्या इतना ही पर्याप्त नहीं 'नहीं आनन्द ! हर राग की एक सीमा होती है और जब तक उस सीमा का स्पर्श न हो तब तक' कहते हुए सुजान ने आनन्द को पुनः बाहुपाश में बांध लिया 'मैं तुम्हारा आशय समझ रही हूँ आनन्द ! अब मैं लाचार हूँ। मैं जो भी चाहूँ, मुझे प्राप्त करने दो, आखिर तो विपपान करना ही पड़ेगा।' कहती हुई सुजान हंस पड़ी। आनन्द ने सुजान के अधरों पर उंगलियां रख दीं-'प्रिये ! तुम और विपपान ? असम्भव है ।' कहकर आनन्द ने मुजान के चरणों पर सिर रख दिया- 'देखो मुजान प्रेम को प्रभजन नहीं उड़ा सकता और न परिस्थितियां ही कोई खिलवाड़ कर सकती हैं । मेरी जन्म-जन्मान्तर की साधनाएं पूर्ण हो रही हैं । हमें अब कोई भी शक्ति अलग नहीं कर सकती।' आनन्द सुजान को भली प्रकार समझता था। उसने मुजान को समर्पण अवश्य किया था लेकिन उसके शरीर की भूख उसे कभी नहीं रही । वह जाना ही चाहता था कि सुजान ने रोककर कहा-~~'आनन्द ! मुझे हर्ष है कि तुम इस परीक्षा में खरे उतरे। मैं बार-बार तुम्हें केवल इसलिए उकसाती रही कि तुम्हारे शरीर में विकार उत्पन्न हो- तुम्हें निगल ले परन्तु तुमने मेरी आशा के अनुकूल आचरण किया। मैं समान गई कि तुम्हीं मेरे एफमाग पुरुप हो जो मुझे इस मझधार से भी उधार समते हो । मेरी सारी चेष्टाएं तुम्हें डिगाने के लिए थीं पर तुम जहाँ मेरी अपेक्षा करते रहे वहीं अपने को भी स्थिर रखा । मुझे तुम जैसे पुरुष पर गर्व है। सुजान एक झटके से उठ खड़ी हुई जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मानन्द सुजान को निनिमेप दृष्टि से ताफता रहा । यह केवल नारी नहीं, नारी के रूप में देवो आकृति है । 'मुजान ! परीक्षा के लिए यही आचरण चुना। देखो, मैं पुरुप हूँ, - सुजान दुर्वलता मेरी परिभाषा के अन्तर्गत आती है । ईश्वर के लिए ऐमो पटिन परीक्षा यव और कभी""।' 'आनन्द ! मेरी ओर देयो, ध्यान में देगी। नया में पहने जैसी ही नहीं दिख रही है । मेरो पेन्टाएँ स्वाभाविकता मे दूर थीं, फिर भी मैंने वह सब किया जो एक धैर्यवान् को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त था परन्तु आज इस परीक्षण से तुम्हारा जो रूप मैंने देखा है यह म्याद भगवान में ही सुलभ हो। हाड़-मांस-रुधिर से निर्मित काया यह तूफान नही शेत सकती जो मैंने अभी-अभी उत्पान किया था। मेरे लिए, मेरे बारे आनन्द ! यह नहीं बात नहीं। याद है, मैंने तुमसे किमी समय अपने अतीत की चर्चा की थी?' ‘पर तुमने कहा ही क्पा पा?' आनन्द ने प्रश्न किया। 'यानन्द ! वह अवसर उपयुक्त नहीं था, आज बता रही है । आओ यहाँ कक्षा में फर्श पर बैठें।' आनन्द सुम्बक की भांति धिनता हुआ मुजान के पीछे-पीछे पला । कक्षा के मध्य में मुजान वैठ गई। पास ही मानन्द भी बैठा। 'आनन्द । में एक स्वर्णकार को बेटी 'मुबन्या' यो । बहा दुनार था मेरा । मुझे साहित्य-संगीत से साथ-साप धामिक शिक्षा प्राप्त हुई । धना- माव की स्थिति में मेरा ब्याह हुआ परिणाम-स्वरूप मेरे पतिदेत इतने स्मूलकाय जोर रुग्ण पे कि किमी तरह एक वर्ष उनकी सेवा में बीता और वे परलोकवासी हो गए। बाद में मुझे पता चला कि ये वेश्यावृत्ति के शिकार पे । मैं पाठ-पूजा मे शेष जीवन बिताना चाहती थी परन्तु मेरे देवर मुझ पर ऐसे पागल बने कि मुझे आगरा की विख्यात अप्सरा विन्य- मोहिनी के यहाँ ही शरण मिस पाई। विश्वमोहिनी मुझे यमुना तट पर उस समय मिली जब में आत्महत्या के लिए जा रही थी। उस समय मुझे उसमें देवी का रूप दिया । मैं उसकी बातों में आ गई। उस समय सदा- शिव ने मुझे नृत्य-कला मे प्रवीण बनाया। फिर मैंने नाचना प्रारम्भ कर दिया किन्तु विश्वमोहिनी को मात्र इसो से सन्तोप न हुआ उसने मुझसे सुजान । रात में भी कुछ कराना चाहा तभी मैंने सदाशिव से प्रार्थना की क्योंकि में वह सब सह नहीं सकती थी। हालांकि तुम न जाने..." 'मुजान ! अभी भी आनन्द की परीक्षा ही चल रही है क्या ?' आनन्द उदास हो उठा था। 'आनन्द ! मेरे आनन्द ! अव तो तुम्हें समझ ही गयी हूँ इसीलिए तो ऐसा कह रही । 'आगे क्या हुआ ?' आनन्द ने प्रश्न किया। 'आगे तो वही हुआ जो आज तुम देख रहे हो । सदाशिव मुझे दिल्ली ले आया और कुछ हेम के साथ शास्त्रीय संगीत पर नृत्याभ्यास चला। हेम ने जी-जान लड़ाकर ऐसे-ऐसे जटिल राग तैयार कराए जो मेरे लिए मुश्किल ये, परन्तु" 'परन्तु क्या सुजान ?' 'परन्तु हेम भी किसी लालसा से ही यह सब कर रहा था।' 'क्या द्रव्य का लोभी....।' 'आनन्द तुम भोले हो, बिल्कुल भोले । अरे, सोचो सुजान की लालसा ? वह मुझे उसी नर्क में घसीटना चाहता था जिससे मैं भागी थी।' सुजान एक क्षण रुकी। उसकी मांखें डवडवा आयीं। वह भावावेश रोक न पायी और आनन्द के चरणस्पर्श हेतु झुकी आनन्द पीछे की ओर चिसक गया, वह बोली, 'आनन्द ! अब मत भागो मैंने तुम्हें जिस रूप में उसे में इस जन्म की तो क्या जन्म-जन्मान्तर की तपस्या का फल ही समसूंगी।' 'मुजान ! तुम सचमुच देवी हो तुमने अपने इसी अल्पकाल में जीवन की जिस विभीपिका से लोहा लिया वह पुरुपों के भी वश की वात नहीं। तुमने इस संघर्प से जो सिद्धि प्राप्त की है और नृत्यकला में तुम्हारी जो दक्षता है वह भारत के इतिहास में सदा अमर रहेगी।' मानन्द ने मोल्लास कहा और बड़ी तन्मयता से सुजान की ओर देखता रहा। 'नहीं आनन्द ऐसा नहीं। जिसे तुम मेरी कला समझ रहे हो वह से द्रव्य पाया, सुजान मात्र मेरो जिजीविषा है । आखिर जीने के लिए कुछ तो करना ही पाया है। मैंने यह कता भी किसी को साधना से प्राप्त की और उसने जो कामना मन में रखकर यह कला सिखाई मह भी पवित्र नहीं इसीलिए वह भी मेरे लिए विडम्बना मात्र है। छोड़ो, इन बातों का कहीं अन्त हो है नहीं। अब दैनिक कार्यों में विलम्ब हो रहा है अतः तुम शीघ्र वस्त्र बदल कर पथ्य प्रहण कर नो। दो दिन से कुछ माया भी तो नहीं है । चलो।' कहकर मुजान आंगन में आ गई । नहा धोकर सुजान पूजागृह में गयी उस समय आनन्द को मा श्याम- सविरे के ध्यान में मग्न थी। मुजान ने पुप्पार्पण किया तथा मधुर स्वर में बोलने लगी- वशी विभूषित करान्नव नीर दामात् पीताम्बरादरण बिम्ब फनाधरोष्टात् । पूर्णेन्दु सुन्दर भुयारविन्दनेवाद कृष्णात्परं किमपि तत्वमह न जाने । गोमती ने मुजान की और आंख उठाार देशा और भक्ति भाव में गद्गद हो उठी । 'बेटो ! तुम्हारी वाणी में साक्षात् सरस्वती विराजमान है। यह तो बताओ बेटो ! जो कृष्ण इतने शान्तिप्रिय और मृदुल स्व. भाव के थे तया जिनकी सहृदयता पर किसी समय सारा अंगार मुग्ध था, उन्होंने अपनी आँखों के सामने इतना भपकर संपाम कैसे होने दिया ? मुझे विश्वास है बेटी ! यदि ये पाहते तो यह मोपण नर सेहार न होता।' 'हां मां ! यह आप ठीक कहती है कि यदि यौन चाहते तो महाभारत का युद्ध अवश्म एक जाता किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया जिसका कारण यह रहा कि वे प्रत्यक्ष देख रहे थे कि पाणवों को अपना अधिकार मिलना तो दूर रहा जीवन विताना भी दूभर हो गया पा उनका अधिकार दिलाने के लिए ही उस महामानव को ऐमा करना पा। इस युद्ध का एक मात्र कारण या दुर्गेशन उसका हर दया पव- सुजान राष्ट्र का पुत्र मोह। मां जी ! जहाँ ऐसे दुर्योग एकत्र हो जाते हैं वहाँ इसी प्रकार की परिणति होती है। इसमें इन श्याम सांवरे का क्या दोप? इन्होंने तो कर्मयोग का सूत्रपात किया । वे भारत को एक शक्ति- शाली गणराज्य बनाना चाहते थे और बनाया भी, किन्तु उस भयंकर युद्ध के बाद। वे स्वयं कर्तव्यनिष्ठ थे और इस मार्ग को प्रशस्त बनाने में उनका श्रम, त्याग और परमार्थ भाव किसी भी युग में भुलाया नहीं जा सकता । अच्छा ! अब एक भजन सुनिए ।' 'हां वेटी ! मैं यही कहने वाली थी।' सुजान गाने लगी-- -- १ 'श्याम मोरे नयनन बीच गड़े। मोहिनी मूरति सांवरी सूरति कुंजनि बीच पड़े ।' अन्तरा का आलाप सीधा अन्तःकरण का स्पर्श करता था। गोमती को वन्द आँखों से दो मासू ढुढक गए । विना साज-वाज सुजान का कल कण्ठ सकल साज साजे था। टेक पर शब्दों में मिठास देते-देते सुजान की दृष्टि आनन्द पर पढ़ गयी। 'श्याम मेरे नयनन' कहते कहते वह आनन्द की ओर एकटक देखती रही । आनन्द आत्मविस्मृत-सा खड़ा था इतने में गोमती ने आंखें खोली। आनन्द झेंप गया। गोमती ने सुजान की प्रशंसा में स्वभावानुसार कुछ कहा भी नहीं। सुजान समझ गयी मां को क्या बुरा लगा। आनन्द ने स्पष्ट अनुमान लगा लिया कि उसका और सुजान का सम्बन्ध परस्पर को कलाप्रियता तक ही सीमित रहे, मां यही चाहती हैं । मुजान के प्रति मां को उत्तरोत्तर स्नेह-वृद्धि देखकर आनन्द जो सोच लेता था बात वह नहीं। मां माथुर वंश की संभ्रान्त महिला थीं । कुल की शान तया वंश मर्यादा की सीमा मां कदापि नहीं लांघ पायेंगी। पूजा-पाठ से ही नहीं मां विचारों की रूढ़ि में जकड़ी हुई धी । सुजान उनके रसोईघर में प्रवेश पा गयी, इसे मां को स्वार्थ भावना ने ही स्वीकारा था। पूजा-गृह में यह विचित्र स्थिति ! आनन्द वहां से हटने को ही हुआ सुजान ७५ कि गोमती ने पुकार लिया--'आनन्द बेटा ! प्रसाद नही सोगे ?' 'नाओ माँ !' कहकर प्रसाद सेकर बाहर चला गया। मां ने मुमान को भी घटा से प्रसाद दिया । सुजान ने चरण हए । 'जोती रहो बेटी ! मैं तुमसे कुछ मांगना चाहती हूँ।' गोमती ने कहा । मुजान को शंका बाने सगी फिर भो उसमे स्वाभिमान का भाव उभरा-'मा जी! याचना बों आप आदेश दें क्योंकि मां अपनी बेटी से मांगती नहीं, उसे बहुत कुछ देती है । जल्दी कहो मां, आपकी इच्छा मेरे लिए आमा तुल्य है।' 'बेटी ! मेरे वंश को उत्तराधिकारी दे दो, बस । इसके लिए आदेश नहीं याचना को आवश्यकता है।' सुजान धम्म से बैठ गयो। उसका ज्ञान मुखर हुआ बोली-'मा ! उत्तराधिकार के योग्य...।' 'तो सच-सच बताओ तुमने मेरे आनन्द को अपने मोहपाश मे क्यों जकड रक्या है। मुझे विश्वास है यदि तुम इसे जरा-सा ढीला कर दो तो अल्पकाल मे ही मायुर कुल का दीप प्रज्वलित हो सकता है।' 'पर माता जी ! मैंने कभी बाधा तो नहीं हाली?' 'याधा ? बाधा होती तो टन मी जाती। बेटो ! तुम पाहो कुछ हो सकता है। तुम समर्प हो । मेरा रोम-रोम तुम्हें आशीर्वाद देगा।' गोमती को आशा बंधी वपोकि मुजान गम्भीर हो गयी। उल्टे- सीधे कई विचार सूत्र उसके मानस पर वियरे । उसको मुहा बदली। प्रेम पुजारिन का निश्चय स्फुट हुआ- 'मा जी ! आनन्द मुझसे अलग नहीं रह सकते, पपपि मै पाई तो""।' 'तो तुम उससे अलग रह सकती हो, बम बन गया काम धन्य हो श्याम सांवरे -।' गोमती एक धन के लिए पूर्ण मनोरया बन गयी, परन्तु जैसे ही सुजान के शन्द उनके फर्णपट पर टकराए, वे विस्मय में पड़ गयीं. माजी ! यह बच्चों का ऐन नहीं। ऐसा होना आनन्द के ।
सुजान विल्कुल वश की बात नहीं और मेरे लिए भी आत्महत्या जैसा ही होगा। वैसे इतने पर भी आपकी इच्छा पूरी हो जाए, निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता।' 'बेटी ! फिर भी तू चाहे तो सब कुछ संभव है ।' 'मां जी ! आनन्द अभी पूर्ण स्वस्थ नहीं हैं। उन्हें स्वास्थ्य लाभ करने दीजिए । मेरी और से आप निश्चिन्त रहें। मेरे और आपके मध्य कोई रहस्य नहीं। आप जानती हैं-मैं क्या हूँ ? कौन हूँ ? जो वात मेरे बस को नहीं उसके लिए वचनबद्ध नहीं हो सकती, हा प्रयत्न करके देचूंगी।" 'तो मैं आशा रखवू ?' गोमती के मुख पर प्रसन्नता का भाव स्पष्ट झलक रहा था । सुजान बोली-'मां जी! आप तो जानती ही हैं।' सहसा घबढ़ाए हुए-से बहादुर सिंह ने आकर सबको चौंका दिया-'मां जी ! सुजान को बन्दी बनाकर यहां से ले जाने का शाही फरमान लेफर मुगल सेनाधीश गुलाम हुसैन सिपाहियों सहित आंगन में खड़े हैं । इन्हें बुलाया जा रहा है।' 'मुजान को बन्दी बनाकर ले जायेंगे? इसका अपराध ?' गोमती शोधावेश में बोल पड़ीं-'उनसे बोल दो सुजान यहां से नहीं जाएगी, कादापि नहीं जाएगी समझे !' मुजान परिस्थितियों से अवगत हो चुकी थी, साहस बटोरकर बोली 'ठाकुर, उनसे कहो में तैयार हूँ।' सुजान ने मां के चरण एये और आंगन को और तेजी से बढ़ी । सामने आनन्द पड़ गया- 'मुजान ! चलो अन्दर बैठो। मैं पथ्य लेकर स्वयं जाऊंगा। विना मेरे गये शाह का भ्रम दूर नहीं होगा।' 'ऐसा नहीं होगा, नानन्द ! मैं इस समय बन्दी बन चुकी है। शाह की आजाधीना है, तुम इसमें हस्तक्षेप मत करो।' सुजान जैसे दृढ़ हो चुकी थी। परन्तु आनन्द भी तुला था। उसने साधिकार हाय पकड़कर गन्दर चलने पो पहा । यद्यपि मां ने सुजान के अन्तर में अशांति का - !
सुजान ६१ , वातावरण उत्पन कर दिया था और उसको बहुत कुछ सोचने पर दान कर दिया था किन्तु आनन्द के सहज अनुपग में सारा मालिन्य जैसे धुन गया । उसने धीरे से कहा, 'आनन्द ! तुम तो अपनी परीक्षा में घरे नवरे अब मेरी बारी आई है। देखो, माजी का कहना है मैं तुम्हारे मार्ग से बिल्कुल हट जाऊं ताकि तुम विवाह करके वंश चलाओ । बह ठीक ही कहती हैं । कुल-वृद्धा के नाते यही उनका कर्तव्य भी है । उधर रंगोले- शाह मुझे बन्दी बनाकर अपनो इन्टा पूरी करना चाहता है। मानन्द ! मैंने अपने जीवन में इससे भी दुर्दान्त दृश्य देश है, बड़ी-बड़ो आंधियों ने पूरी शक्ति लगाकर शामोरा है परन्तु सुजान जो भी है तुम्हारे समदा ।' सुजान ने धीरे से हाप हुड़ा लिया । 'मुजान ! इस तरह अपनी आंखों के समक्ष ही में स्स्य को सुटते देख नहीं पाऊंगा । माँ जो चाहती है यह उनकी मृग-मरीचिका है, उन्हें मैं सहज समझा लूंगा। शाह जो चाहता है, वह कभी नहीं होने पायेगा। मैं सारे साम्राज्य में उथल-पुथल पैदा कर दूंगा । मेरे प्यारे भुजान ! एक जाओ । इस गुलाम हुसैन के साथ तुम्हें लाल किले में किसी भी कीमत पर नहीं जाने दूंगा।' आनन्द की मुद्रा बिगुल बास गमो यो। आगे वदती हुई सुजान बचानक रुक गयी। उसमे आनन्द के प्रति अपनत्व जागा । उसने धीरे से कहा, प्यारे आनन्द मैं कहीं नही जा रही। मुझे बन्दी बनाने का यह नाटक नया नहीं है । तुम बन्दी बनाने पर ही प्रापे से वाहर हो रहे हो, और मैं अपने वध तक की कल्पना कर पुकी हूँ। यही जीवन के यथार्थ है आनन्द इनसे मुंह मोटन वाले कायर होते हैं। रगीले शाह भी भगवान् को ही इन्दा पूरी कर रहा है । जो हाना होता है, वही होता है । तुम फदि हो, सहृदय हो, इसलिए व्यग्र हो रहे हो। वादा करो कि मेरे विषय में किसी से अनायास नही उलगोगे, मुदो वचन दो।' 'सुजान तुम उलझने की सोच रही हो, मैं किले में आग लगा दूंगा। मेरो आँखों क मामन मेरा हरा-भरा मसार उह जाए और एम ।
५२ सुजान साधारण दर्शक की भांति देखता रहूँ । सुजान तुम यही आराम से बैठो। मैं गुलाम हुसैन के साथ जाकर शाह को वस्तु स्थिति से परिचित करा देता ।' आनन्द चलने लगा। 'मानन्द ! तुम्हें मेरी सौगन्ध है जो एक पग भी आगे बढ़े ।' आनन्द जहां का तहां खड़ा रह गया । सुजान ने आनन्द को कुछ और समझाना व्यर्थ समझा और वह झटके से आंगन में आ गयी । उसे तैयार होते देख गुलाम हुसैन उसके पीछे चलने लगा। सहसा पीछे से एक उच्च स्वर गूंजा-'ठहरो गुलाम हुसैन ! तुम जाकर शाह से कह दो कि सुजान इस हवेली से गिरफ्तार नहीं हो सकती। उसे बन्दी बनाना है तो उसके भवन से उसे ले जाएँ।' 'मां जी !' गुलाम डर गया । वह जानता था, आनन्द जितना सीधा है, उसकी मां उतनी ही कठोर हैं, 'शाही फरमान है मां जी ! मैं तो गिरफ्तार करके ही ले जाऊंगा।' 'गुलाम हुसैन ! मैं जो कहती हूँ, वही करो। देखो, शाह पत्थर नहीं हैं । उन्हें जब मालूम हो जाएगा कि सुजान मेरो फुलवघ्न है तो वह अपना निर्णय बदल देगा। गुलाम हुसैन ! यह शाही दरवार की शोभा बढ़ाने वाली नर्तकी नहीं, मेरे आनन्द की बहू है। मेरे कुल के सम्मान का प्रश्न है। तुम सेनापति हो साथ ही आनन्द के पिता को बड़े भाई का सा सम्मान देते रहे हो। मैं तुम्हारे सामने अपनी कुल-लक्ष्मी की भीख मांग रही है, आशा ही नहीं यकीन है, मुझे निराश नहीं होना पड़ेगा।' आनन्द फी मां क्या कह गई, एक साथ बोल गई, किसी और को कुछ सोचने- कहने का कोई अवसर नहीं दिया । वे जैसे आवेश में थी बड़ी ही तत्परता से मुजान के पास पहुंची और उसे वाहुओं में लपेटे हुए आंगन के कक्ष की ओर चलने लगीं । गुलाम हुसैन अपने सिपाहियों के साथ हवेली से बाहर निमल गया। मानन्द को जैसे मुंह मांगा वरदान मिल गया था। वह मां के कक्ष की ओर चला । उधर मां की ममता तया उदारता देखकर सुजान पानो- ।
मुनान . पानी हो रही थी। कुछ समय पूर्व इसी मां से वह कोरा उत्तर पा चुकी यो और इस समय उन्होंने उसे बन्दी बनाने से रोक लिया। इतना ही नहीं। वह कुलवधू बन गई। वाह रे जीवन के अद्भुत नाटक! मुजान न ईस पा रही थी और न रो पा रही थी । सुजान के मन में अशांति की आंधी यह उठी । अन्दर ही अन्दर स्वर गूंजे-'अधे के हाथ इस प्रकार बटेर नहीं लग सकती।' उसने गोमतो के घरण हुये और बोली, 'मी जी आप सचमुच महान हैं । हिमालय की ऊंचाई का स्पर्श हो सकता है आपका नहीं । आपने जो कुछ निर्णय दिया, यह रंगमंच के तो अनुकूल है पर पयार्य जीवन के सर्वथा प्रतिकूल है। आपने मेरा सम्मान किया, इससे मेरा भी कर्तव्य है कि मैं आपका ध्यान रखू। म ! मैं आपको वा नहीं बन सकती वधू तो ले आनी है । अब मैं आनन्द को इस कार्य के लिए अपश्प तमार कर लूंगी।' कहती हुई मुजान कक्ष के बाहर निकली । चौपट के पार्य मे आनन्द भी पड़ा सब मुन रहा था। सुजान ने मानन्द की और दया तक नहीं। वह आंगन पार करके मुख्य द्वार पर आई । बहादुर सिंह सम्मान में धार खोलने लगा। सुजान बोली, 'ठाकुर ! मेरे साथ सात किले चलो।' 'जैसी आशा मालकिन ।' बहादुर का मालदिन शन्द मुजान को प्रिय लगा। वह भी वही शब्द दुहरा रही थी मा"""""फि"न । बग्घी मान किले को और बढ़ रही थी और मुजान के मानस पर कई चित्र उभरे और धुंधले पडे।
। वग्घी में सुजान जैसे ही लाल किले के लाहौरी दरवाजे पर पहुंची, अचानक घोड़े ठमक गए । सुजान ने परदा उठाकर देखा बग्घी के चारों और खड्गधारी सैनिक घेरा डाले हुए हैं। सुजान बन्दी बना ली गई। धीरे-धीरे सकेत के सहारे बग्घी लाल किले के अन्दर दाखिल हुई । सुजान का मन भारी हो गया । भय से नहीं वितृष्णा से, लज्जा से नहीं जुगुप्सा से । घृणा का भाव उसके मन में कभी नहीं जगा । रुग्ण पति की पूरे एक वर्ष तक बिना किसी झिझक-हिचक के सेवा-रत रही । उसका खिलता • हुआ यौवन उस जघन्य काया की छाया में, बारहमासा के राग की भांति 'मस्त पड़ा रहा, उसके मुखमंडल पर विपाद या घृणा की एक क्षीण रेखा भी न खिचने पाई। यहां तक कि उसने भाग्य को भी कोसना उचित न समझा । वह जानती थी कि भाग्य को वही दोप लगाते हैं जिनमें सहि- प्णुता नहीं होती। अपनी मांखों के सामने ही सुजान ने अपने उस पति को दम तोड़ते देखा था, जिससे यह कुछ भी न पा सकी थी, परन्तु रोई थी। रोई, इसलिए नहीं कि वह किसी आशा में थी और अब नैराश्य सागर में डूब गई, वरन् इसलिए कि लोग आजीवन पति का साहचर्य पाते हैं और मुजान को ऐसा पति भी इतने अल्पकाल तक ही मिल पाया । इसे विडम्बना कहें या कुछ और ? वग्घी मन्दगति से दीवाने खास की ओर सरक रही थी। सुजान ने पर्दा उठाकर देवा-गुलाव के पुप्प पराग लुटा रहे थे। उसकी आंखों के सामने विश्वमोहिनी का भवनमश के दृश्य की भांति विच गया । विश्व- मोहनी स्वर्ण मोहरों को गिन-गिनकर मंजूपा में रखती और पान पर पान पवाती, परन्तु सुजान ने उस विचिन नारी को कभी प्रसन्न नहीं देखा।
सुजान उसकी त्योरी में सदा यस पडे रहले । हमेशा घोशनी-पिन्नाती । मुजान मे उसने बार-बार कहा था-'वेटो देश्या बनना मबरे वश की बात नहीं । हाँ एक बार इस घाट पर उतर जाने के बाद स्वर्ग ही स्वर्ग है स्नुि यहाँ से छोड़कर जाना नरक में गिरने के समान है ।' विश्वमोहिनी छंटी हुई वारनारी पो। मुजान के लक्षणों से भाप गई थी कि यह पोठे पर रुकने वाली नहीं । आज मुजान को विश्वमोहिनी की बात याद आने लगी । आज पहली बार सुजान के मन में यह गहित जीवन अच्छा सगा । सोचने सगी-'सुजान तूने भाग कर अच्छा नहीं किया । जैसा थागरा वैसा दिल्ली। वासना के भूखे भेड़िये मव जगह हैं। उसे लाल किले की प्राचीरों में घिरे सोग जैसे काटने को दौडने लगे। वह फफक पड़ी। आंसू वेमाव वह उठे । सहसा उसे बानन्द की याद आई। हृदय ने दादर चांपा, मनोबल बढ़ा और मा जी के द्वारा गुलाम हुसैन को दिया गया दोटूक उत्तर याद आ गया। श्या ? मां जो सचमुच उमे अपने पवित्र ऐतिहासिक मापुर वंश की कुनवां बना लेंगो ? एक क्षण के लिए उमर मानस में मां जी का उदात चरित्र पौराणिक कथानक-मा गूंज गया । उमे दृढ विश्वास हो गया कि अब तक वह चाहे जो रही हो किनु अब जब मा जी ने उसे अपने मुंह से कुलवधू स्योकार कर लिया तो वह वही पविन फुलाङ्गना ही है जो आनन्द के उत्तम वंश की शोमा बडाएगी। मुजान में स्वाभिमान का संचार होने लगा ! उसको ग्रीवा अचानर तन गयो । उसने बग्घी मे बैठे-बैठे साहम बटोरा और पिसी भी परिस्पित का सामना करने के लिए कटिवद हो उगे। सहसा पो पीटाप ठमकी, बग्घी रुक गपी । तीन-चार सिपाही उसको दोच मे करके दीवाने सास की ओर से चले। यही वह दीवाने यास है जहाँ प्रथम बार सदाशिव सारंगी के साथ मुजान बड़ी उसण्ठा लिए तथा भावी जीवन की उम्म्यन आशा बांधे आयी थी और आज? इसी स्थान पर यह बन्दी है । उसने दूर से देखा-रंगोले शाह अघलेटा हुआ हमका गुरुगुग रहा है । उसके बिल्कुल समीप अधनगो-सो नीना बैठो है। दो सिपी दो भोर से पंया सुजान सल रही हैं । शेप समूचा दीवान खाली पड़ा है। भालाधारी सिपाही दीवान की देहलीज तक आये, उसके पश्चात् सुजान सिर झुकाये मन्द गति से शाह की ओर बढ़ी। उसे रंगीले शाह के प्रति श्रद्धा थी। शाह ने उसे बड़ा प्यार दुलार दिया। एक प्रकार से उसे पाला। शाह से शिकायत न थी। इसी भाव में डूबती-उतराती वह शाह के सामने पहुंची। सम्मान से शाही आदाव बजाया और एक किनारे सिर झुकाये खड़ी रही । रंगीले शाह ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए उसे ऊपर से नीचे तक देखा। वे समझ गए सुजान दण्ड के भय से भयभीत हो रही है परन्तु उनके लिए इतना ही पर्याप्त नहीं था। सुजान को वेष-भूपा स्पष्ट बता रही थी कि अब वह नर्तकी नहीं अपितु एक सम्भ्रान्त परिवार की नारी है। रंगीले शाह इसे बिल्कुल नहीं वरदाश्त कर सकते थे। हुक्के को नली एक ओर सटक कर वे जैसे तड़प उठे-'क्यों री! तू अव तक कहाँ थी? सिपह. सालार गुलाम हुसैन के साथ क्यों नहीं आई ? तू ऐसी नमक हराम निक- लेगी यह मैंने स्वाव मैंने ख्वाब में भी नहीं सोचा था ! बदजात !! 'अलीजाह !' सुजान जैसे रो पड़ी थी-'मैंने आने से इनकार नहीं किया था। भला इस दासी की इतनी जुर्रत कैसे हो सकती है कि जहां- पनाह याद करें और यह न आये। कुसूर माफ हो परवरदिगार !' अब सुजान सचमुच डर गयो । वह जानती थी कि शाह की आज्ञा का उल्ल- धन बड़ा महंगा पड़ेगा। शाह ने जैसे सुना ही नहीं । 'माबदौलत की शान में बट्टा लगा है तू मामूली-सी तवायफ थी। हमने तुझे आज इस लायक बनाया तो तू हम्हीं से ऐसा सलूक कर बैठी । जानती है. -इसका नतीजा ? तुझे जंगली कुत्तों के आगे डाल दिया जायेगा और वे तुम्हारी चोटियां नोच-नोचकर खा जायेगें।' शाह जैसे आपे से बाहर हो रहे थे। लीला कनखियों में मुजान को निहार रही थी। सुजान का तो जैसे सर्वस्व तुट गया हो । वह जितना ऊँचे चढ़ी थी, इस समय उतना ही नीचे पड़ी हुई थी। जैसे दलदल में पड़ा व्यक्ति निकलने के लिए छटपटाता हो, लगभग उसी दशा को मुजान प्राप्त हो रही थी। कुछ समय में नहीं आ मुजान रहा था कि क्या उत्तर दे। शाह का क्रोध भयंकरता को सीमा रहा या । ये इस समय पीछे हाय बौधे टहल रहे थे। मुबान ने मौन भंग करते हुए निवेदन किया-'हसर ! गुलामों से कुदरतन गलती हो ही जाती है और अलीजाह वायूची समझते हैं कि खादिमा से यह पहनी पूरा हुई है ! जहाँ हजारो हुजूर की दरियादित्ती से पल रहे हैं, यहाँ इस नाघोत्र को अपने कदमों की साया में इनायत बरुण देगे, तो अल्लाहताता हुनर का इकबाल बुनन्द करेंगे। कहकर मुजान शाह के पास तक गयी और मिर झुकाते हुए बोली, 'वैसे तो अलीजाह ! जो कुसूर इस पासी से हुआ है उसकी सजा जरूरी है। परवरदिगार ! आप चाहें तो अपने हायो यह सिर कलम कर दें।' कह कर सुजान रो पड़ी। रंगोले शाह जिस रूप में बोल गये थे, वह उनका असती रूप नहीं था। वे मुगान को दण्डित करना चाहते थे। परन्तु इम नर्तकी पर वे इस कार का घे कि उसके आसू वे सहन न कर सके। वे अपने भासन पर आकर बैठ गए। मीला ने बड़ी तत्परता से मुराही से जाम उडेसकर शाह को पिनामा । बाम पीकर शाह में उन्माद की सहरें नहराने लगीं। उन्होंने मुजान को इशारे मे अपने पास दुनाया मुजान भयभीत हिरनी-सी धीरे-धीरे गाह के सामने आयी । माह ने उसकी ओर देखा । मुजान ने कृतिम मुस्कान से शाह को पानी-पानी कर दिया। प्रोध का ज्वर अब उतर चुका था। शाह ने हुको को नसी हाप में ली और बोले-'देखो मुजान ! मावदौलतगर पाहते वो कब से तुम साल किले को इन्हीं मजबूत दीवारों में देर होती और अगर हमने ऐसा नहीं किया तो इसको एक खास वजह है । वह यह कि हम तुम्हारे हाव- भाव पर दिलोजान से फिदा है। हम यह बरदाश्त नहीं कर सकते कि तुम किसी और के चंगुल में पड़ो, घास करके मीरमशी पन आनन्द के पास देखकर हमारा पून बोलने लगता है । आनन्द का हमारे कार बहुत एहसान है, तो इसका यह मतलब नहीं कि वह मारशेतठ पीशान को मिट्टी में मिला दे । हम उसके एहसानों का बदला और लंग से पुकायेंगे।' । !
सुजान 'जहाँपनाह ! इस दासी को क्या मजाल जो खानदाने मुगलिया की शान से खिलवाड़ करे। मैं वादा करती हूँ, आगे हुजूर के सामने ऐसी कोई गुस्ताखी नहीं होगी जिससे अलीजाह को कुछ और महसूस करना पड़े। सुजान फिर मुस्कराकर शाह पर जाम का उन्माद दूना कर बैठी। वस्तुतः यह कला उसने विश्वमोहिनी से सीखी थी। यद्यपि उसे ऐसा कृत्रिम सम्मोहन अरुचिकर प्रतीत होता था तयापि आज तो इसी के बल पर वह जैसे बाल-बाल बच गयी । 'सुजान ! शाबाश मेरी जान !' शाह जैसे किसी और लोक में विच- रण कर रहे थे । 'लीला ! तुम आज से सुजान को अपना उस्ताद बना लो और नाच की सारी अदायें इससे सीख लो । देखो! यह हमारे दरवार की हीरा है हीरा ! जाओ सुजान हम तुम्हें बख्शते हैं। कहते हुए रंगीले शाह हरम की ओर चल दिया। सुजान आदाव वजाकर लोला के साथ ही बाहर आयी तो देखा निर्मला आंचल से मुंह ढांपे रोये जा रही और सदाशिव उसे ढाढ़स रहा है। सुजान को देखते ही सबकी जान में जान आई । निर्मला दौड़कर सुजान के वक्ष से लिपट गई । एक दासी की पवित्र निःस्वार्थ स्नेह भावना देखकर सुजान की भी आंखें प्रेमाश्रु पूरित हो गई। उसकी इच्छा रो लेने को हुई। इसलिए नहीं कि उसे अकारण अपमानित किया गया था, अपितु इनलिए कि स्वामिनी के संकट का अनुभव मात्र उसके सेविका को विफल बनाए जा रहा था । वस्तुतः सुजान नर्तकी बाद में यी धर्म- भीर पहले। उसके मानस में जिस पवित्र आस्था ने घर बना रखा था उसे सहनशाह भी डिगाने में सर्वथा असमर्थ हैं। उसे स्पष्ट प्रतीत हो गया कि शाह भी उसे पुछ और ही समझ रहा है, वह उसके आनन्द से ईयां भी करने लगा है। वे सभी दीवाने पास से बाहर आते ही दो बग्घियों में बैठ गये और कुछ ही देर में लाल किले की प्राचीर के बाहर आ गए। आगे की अपनी बग्घी में मुजान निर्मला के साथ बैठी यो और पीछे - सुमान पद सदाशिव अकेला । बाधी जैसे ही पांदनी चौक में पहुँचौ, मुबान ने दया -~-कलाराशि घोहे पर वहादुर सिंह के साय आनन्द मान रिकी पोर बढ़ रहा है। मुजान कुछ क्षण उसी को और निनिमेष दृष्टि से देखती रही । अधि से ओझल होते ही उसको इन्टा वापस लाल किले की ओर चलने की हुई। कोचवान को आदेश दिया। बग्पो कर गयो । निर्मता चौकी । उसके चौकने का कारण भी पा । सारे शहर में शाह के मागियों का युफिया दल घूमा करता है । सात किले में आने-जाने वालों पर कड़ी निगाह रखी जाती है। अफवाहें भी वह रही है कि ईरान का ताला पलटने के बाद नये शाहंशाह नादिरशाह को दृष्टि दिल्ली पर सगी है। मुजान ने गाड़ी मोड़ने की इच्छा प्रकट की। 'क्यों ?' निर्मला सहमी-सी बोली। 'देखा नहीं आनन्द किले को और घोड़े से जा रहे हैं। इस समय शाह के पास जाना धतरे से याली नहीं ।' भुजान थीमती हुई धोती । बग्यो मुड़ तो गयो, पर घोडे आगे बढ़ने से जैसे विद्रोह कर । भूवे-प्यासे तो ये हो, अहे तो अह हो गए। कोचवान गद्दी से उतरा, घोड़ों को पुचकारा दुनारा और गद्दी पर बैठकर जैसे ही रास पौंरी, घोहे विदक गए और घग्घी को मोड़कर घर की ओर चल पडे। कोचवान साचार हो गया। मुजान हताशा मे हुब गयी । उसे पानद का शाह पास जाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा । जिस माह के पास से साया फैना कर वह अपमान का पूंट पीकर मोटी पी, आनन्द आवेश में उगसे उत्तप्त जायेगा ! बनी दाद विगह जाएगी। फिर क्या होगा । कसह मढ़ेगा। उसे अपनी चिन्ता कम पी, मानन्द को अधिक । वह स्वाभिमानी है, जायगा, सुकेगा नहीं और उसके हित में हानि ही है। मापी वी गति से मागी जा रही थी और मुजान के मन में भी नाना मासंकाओं के विचार बन-विगड रहे थे। कुछ भी हो, मुझान इस बात से आग्रस्त पी ही कि उसने जिसे अपने हृदय का सम्राट स्वीकारा है, वह सचमुच मौह पुरुष है और इस पद के पूर्णतः योग्य है। उसकी मांय आनन्द के ६ सुजान . चिन्तन में मुंद गयीं। लोग कहते हैं-प्रेम पंगु होता है उसे चलते रहने की चिन्ता तो रहती है परन्तु चले तो कैसे चले । उसे दो के पांवों का सहारा चाहिए और यह तभी संभव है जब दोनों एकरस हो जाएं, तो असंभव नहीं तो सहज भी नहीं है। जहां भापा मूक हो, भाव मचल रहे हों, मन की समाधि लगी हो, अन्तः वाह्य का अन्तर लुप्त हो गया हो, वहां कोई दैवी शक्ति ही हाथ लगाए तो सिद्धि की संभावना है, अन्यथा इस छल-प्रपंचपूर्ण जगत् में अर्थ के अनर्थ भी देखे गए हैं। पुरुरवा ने उर्वशी के लिए क्या नहीं किया, समर्पण की किस सीमा को उस भोले राजा ने नहीं शुआ, सर्वस्व देकर भी उसे जो मिला वह उसके जीवन में अभिशाप बनकर छाया रहा। उर में बसी उर्वशी को खोकर उसने तो पश्चाताप किया उसे सहज नहीं भुलाया जा सकता। सुजान को उर्वशी पर बड़ी खीस आई । यद्यपि इन्द्रलोक का सुख उसे मिला तथापि क्या पुरुरवा को उस सुख से तोलना उचित है ? सुजान ने नकारात्मक संकेत में गर्दन हिलाई निर्मला बड़े गौर से देख रही थी। उसने स्वामिनी फो कई बार ऐसी स्थितियों में देखा था । जलपात्र लिए खड़ी रहती थी और सुजान किसी अन्य लोक में विचरण करती रहती । नारी के स्वभाव में यही विलक्षणता है । वह बोलेगी तो संसार के पुरुषों को चुप कर देगी और चुप रहेगी तो स्वभावत. उथल-पुथल मच जायगी। 'मालकिन ! आपने तो यह पूछा ही नहीं कि इन दो दिनों में हवेली पर कौन-कौन आए थे ?' निर्मला इस प्रकार मुस्करा उठी जैसे ब्रह्माण्ड का रहस्य खोलने जा रही थी। 'तेरे दूल्हे राजा आये होंगे, यही कहना चाहती थी न ? देख मेरा ज्योतिष सही है न ? असत्य मत बोलना । सुजान हंस दी। निर्मला लज्जावनत हो गयी । यात भो सच थी। निर्मला के पति ने सुजान की हवेली में पांच वर्ष बाद कदम रखा था। 'भापका अनुमान सत्य है, लेकिन एक और महात्मा भी आये थे ।' निर्मला प्रसन्नमुख बोली। 'महात्मा ! उन्हें तू बाद में वताना, पहले यह बता कि तेरे दूल्हे ने ।
सुजान १ 1 कैसे पदार्पण किया । उमने अपनी मूल स्वीकार ी या नही अपवा तू पों ही उसकी चिकनी सुपड़ी बातों में आ गयी।' मुजान ने रहस्य जानना चाहा। निर्मला ने सारी घटना का विवरण दिया। इस बार उमरे पति ने वड़ा पश्चाताप किया, रोया और जीवन भर साप निभाने की सौगन्ध खाई । निर्मला ने सब कुछ विधिवत् मुनाया । मुनगर मुजान गम्भीर हो गई । वह पुरुष जाति से भलीभांति परिचित थी। यह जानती थी कि निर्मला का पति सुरा-मुन्दरी का शौकीन है । वेश्यावृत्ति में उसने निर्मना के सारे आभूषण गंवा दिए । वह यह भी जानती थी कि जर-जब ट्रम्प की आवश्यकता पडी, उसने निर्मला के सम्मुघ घोंचले दियाए और कुछ मान ऐंठकर बनता बना, फिर महीनों पया वर्षों नहीं दियायी परा। फिर भी निर्मला इतनी भोली थी कि हर बार उसके कमे में या जाती थी। उसे नारी जाति पर वही दया आई। विधाता ने उसे मुबोमन, कमनीय और आकर्षक तो बनाया, परन्तु पुरुष ने उसे अपने बामोद- प्रमोद का साधन बना लिया और वह भी कब तक? जब तक उसमे यौवन है । फिर जैसे ही यौवन टना पुरुष उसको अपेक्षा नहीं करता । 'निर्मला ! लगता है तू फिर उसकी बातो में आ गई।' मुगान ने धीरे से कहा और निर्मला को आंखों में कुछ टटोलने लगी। निर्ममा स्वामिनी का स्वभाव मनीमाति समझती थी। वह बोल पही-'मान. किन ! इस बार वह सोने की एफ मोहन माला भी दे गया है।' 'अच्छा ! तमी फूली नहीं समा रही है, आगे रता, यह सब कर आयेगा?' 'आज फिर आने को कहा है।' 'औक! तो चलकर तेरी विदाई की तैयारी कर । अन्धा यह महात्मा कहाँ से आए ये ?' 'यह अभी गए पोहे ही हैं। संगीतशाना में आसन सगाए बैठे हैं और हेम के साप किसो तास की साधना कर रहे हैं। सब रता मातरिन !
सुजान भूल गयी। सारी रात ऐसे अनोखे राग अलापते रहे कि मैं आंगन में बैठी-वैठी ही मो गयी । आंख खुली तो देखा हेम की मृदङ्ग और स्वामी जी के कण्ठ की बाजी लगी हुई है । वड़ा मधुर स्वर है । 'पर वह हैं कौन ?' 'यह तो मुझे ठीक से नहीं मालूम है, हां, हेम जी ने कुछ बताया था, में 'क्यों नहीं, तू अपने बांके बिहारी के चक्कर में थी न ?' मुजान ने चुटकी ली । निर्मला लजा गई। वग्धी सुजान की हवेली के सामने रुकी। निर्मला ने उतर कर स्वा- मिनी को उतारा और पीछे-पीछे चली। बारादरी में सुजान ने पैर रखा ही था कि उसे मृदंग पर सुमधुर ताल और सुरीला कण्ठ सुनाई पड़ा। मुजान यद्यपि यकी-मांदी थी तथापि संगीत की ध्वनि सुनते ही उसके ही पांव घिरमा उठे । वह सीधे संगीत कक्ष में घुसी । सामने का दृश्य देवकर आश्चर्य में पड़ गयी। जिन्हें निर्मला महात्मा समझ रही थी, वह उसके बालपन के संगीत गुरु केशवानन्द ये जिनके स्वरों पर हेम मृदंग से ताल दे रहा था । सुजान ने मन ही मन गुरुदेव का नमन किया और एक कोने में सुपचाप बैठ गई । जिस राग की साधना चल रही थी मुजान के लिए वह नूतन था । केमावानन्द की वृद्धावस्था में भी जो स्वर माधुरी उनके मुरीले कण्ठ से निःसत हो रही थी, सुजान उसी में जैसे वो गई । हेम का मृदंग ऐसी अनोखी संगत दे रहा था कि मंत्र-मुग्ध हो जाना स्वाभाविक था। भूखी-प्यासी धकी सुजान भी फूली नहीं समा रही थी। गीत की पंक्तियों के साथ-साथ स्वर सप्तकों के बोल जैसे अद्भुत रस घोल रहे थे । मुछ समय के पश्चात् संगीत रुका । हेम ने सुजान को पोपहा-बाबा जी ! यही राजनर्तकी सुजान हैं जिन्हें लास्यनृत्य । दिल्ली के दीवाने-आम में इन चरण के का हृदय घक- सुमान । धकाने लगा। वादा को लगा जैसे मुजान को कहीं देखा हो । पर ठोक- ठीक याद न आया। कितने ही लोग उनसे संगीत सोग पुरे थे। ये पहने गृहस्थ थे, अब संन्यासी और उनके जीवन का एकमा मसन पा संगीत। सितार पर मूर के पदों के गायन को उनको दाता पो। जब पर्यात समम तक स्मृति सागर में डूबने उतराने पर भी केशवानन्द मुगान को पहचान न सके तो सुजान ने राहत की सांस ली। हैम ने मौन भङ्ग करते हुए कहा-'हम लोग कल से यहीं पर सास्य के तास-सय की स्वर साधना में लगे हैं और लगभग भूमिका तो बघ पुकी है अब रेवत देर है तो आपकी ।' सुजान ने सिर नीचा किए हुए उत्तर दिया--'हेम जी! मास्म में यौगिक साधना अनिवार्य है और कम से कम मैं तो." केशवानन्द ने वात काटकर कहा-'बेटी ! हेम से तुम्हारी योग्यता और क्षमता का परिचय प्राप्त कर चुका हूँ। सबसे बड़ी बात तो यह है बेटी ! कि मैं महाकालेश्वर के प्रधान पुजारी को पचन दे चुका है कि अब की बार महाकुम्भ के अवसर पर सास्य नृत्य का आयोजन अवश्य होगा । मेरे ऊपर विश्वास रखो चेटी 1 मैं तुम्हें पार कर मूंगा।' गुगान कुछ बोले कि इसी बीच निर्मला बोल पड़ी~'वाया जी ! मालकिन सबेरे से केवल जल पीकर अभी तक बात रही हैं । अव आशा हो तो इन्हें कुछ.." 'हां, हाँ बेटी ! जाओ, खा-पोकर विधाम करो। हम दोनों स्वर साधना कर रहे हैं, सायकाल तक तुम्हें भी चुना मेंगे ।' कैमय बड़ी आत्मीयता से बोले और सितार उठाकर उसको ऍटिया ऐठने मगे । हेम ने मृदंग छोड़कर तबला साधना प्रारम्भ किया। मुजान अन्तःपक्ष मे वती गयी। वह केशवानन्द के विषय में सोचने मगी। सुगान के पिता मंगीत के प्रेमी थे, इसीलिए अपनी एकमात्र साड़ली बेटी के लिए मेराया- न्दि जैसे कुशल संगीत साधक को उनके परिवार का पूरा पप भार बहन करके भी अपनी हवेली के घर रया था। ग्रिमा सुजान से खाया नही गया परन्तु निर्मता ने पोस-बहुत दिया । अपनी स्वामिनी को पान घिसाकर परण दराने मगी। गुन सुजान . - सोचे जा रही थी-केशव के सितार की मन्द ध्वनि तथा हेम के तबला की थाप उसे स्पष्ट सुनायी दे रही थी। क्या सुजान लास्य सीख लेगी? यद्यपि उसकी वर्षों पहले की ऐसी अभिलापा थी तथापि बिनु गुरु होड़ कि ज्ञान ? कोई मिला नहीं अब तक और आज जव मिला तो उसके पिता की स्मृति भी ताजी हो आई । कहा जाता है वेश्या का कोई घर नहीं होता, सगे-सम्बन्धी-भाई-बंधु नहीं होते, परन्तु इस परिभाषा के अनुसार सुजान इस समय वेश्या नहीं कही जा सकती । आनन्द की मां उसकी मां हैं, सदाशिव ने उसे पिता से कहीं अधिक दुलार दिया है, सेविका होते हुए भी निर्मला उसकी बहन जैसी है। पर है, द्वार है, धन है, वैभव है, मान-सम्मान है, सब कुछ तो है । एक दिव्य जीवन के लिए जो भी अपेक्षित होता है, वह सब तो सुजान को सहज उपलब्ध है । मानन्द जैसा सखा, दुःख-सुख का साधी, उसकी मान मर्यादा सभी कुछ मुजान पर अर्पित है। वस्तुतः सुजान इस समय राज रानी से किसी भी अर्थ में कम नहीं है । राज्य नहीं, पर राज सुख तो है। निर्मला चरण दवाए जा रही थी और सुजान के विचार अबाध गति से पंख फैलाए अन्तरिक्ष में उड़ रहे थे। वह गर्विता नारी का रूप धारण कर चुकी थी। मन ही मन मुस्कराई तो उसके मुख-मण्डल पर मुस्कान की रेखाएं उभ- रने लगीं। विचारों की सरणि का अन्त नहीं दिखा । वह सोचने लगी आनन्द की मां उसे आज इस अवस्था में भी अपनी कुलवयू बनाने को तैयार है जवकि आज वह फुलवधुओं के सारे लक्षण गवां चुकी है । वह न सधवा रही न विधवा, न नारी रह सकी न वारनारी ! वह इस समय क्या है ? उसका संसार में क्या स्थान हो सकता है ? समाज उसे किस रूप में देखें, कानून अथवा राज्य उसका क्या स्वरूप स्थिर करे, इदमित्य कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। उच्च कोटि के गायक केशवानन्द, प्रसिद्ध मृदंगाचार्य हेमचन्द्र तथा नामी सारंगी वादक सदाशिव उसे सर्व. समर्या समझ रहे हैं, आनन्द उसे अपने हृदय प्रदेश की महारानी बना देठा है, उसकी मां उसे परमविदुषी मान रही हैं और उधर रंगोले शाह अपने -- -
No text on this page.
सुजान कि ज्ञान? । केशव के चरण एए-'स्वामी जी ! इतना मार्मिक राग सोचे जा रही ज प्रथम बार सुन पाया हूँ, कोटिशः धन्यवाद के पात्र हैं की वाप उसे पुण्य भूमि की शोभा बढ़ा रहे हैं ?' यद्यपि उसर्व इस समय संन्यास जीवन चल रहा है। वैसे उज्जयिनी के र मन्दिर में कुछ समय शिव जी को रिझाता हूँ।' केशवानन्द पिता की पर लगा विपुण्ड जैसे उनका यथार्थ परिचय दे रहा था । 'वैसे नहीं होत बक क्या संन्यासी बन पायेगे । क्योंकि वे जहां होंगे उन्हें संसार अनुसार तः घेरे रहेगा, यो समझिए वे अपने साथ ही संसार लिए हुए उसको हैं।' केशव के गेरुए वसन से आनन्द के मन में भक्ति भाव पेठ सेविट । मां गोमती का संस्कार तो था ही उसकी स्वयं को निष्ठा बेजोड़ 1 ठ जो 'आपके दर्शन से कृतार्थ हो गया भगवन् ! कभी मेरे निवास पर धार कर हमें पुण्यभागी वनावें, अति कृपा होगी।' केशव कुछ कहने ही गले थे कि हेम बोल पड़ा-'श्रीमन् ! आज सायं लास्य नृत्य के प्रथम का प्रारम्भ आपके ही भवन से किया जाए।' फिर स्वामी जी की और बड़े गर्व से बोला-'गुरु जी ! ये श्रीमान जी मुगल सम्राट के मीर मुंशी धनआनन्द हैं।' नाम सुनते ही केशव चौंका । उसने घनानंद को स्वर लहरी के विषय में सुना था। वोला-'मन लेहु पै देहु छटांक नहीं।' के चिन्तक आप ही हैं । वेटा ! में भी धन्य हूँ जो तुम्हारे दर्शन कर पाया। तुम्हारे पिता श्री देवकीनन्दन!' नामोच्चारण मात्र से ही आनन्द विस्मित हो गया-'स्वामी जी आप उन्हें कैसे' 'वेटा ! उन अमर विभूति को कौन नहीं जानता । महाकालेश्वर मन्दिर के मुखद्वार पर शिव के विषपान का चित्रांकन माथुर जी की ही कल्पना थी। लगभग पांच छोटे-बड़े चित्रकार पे, परन्तु शिव जी के मुखमण्डल पर विपपान फरते समय जो वेदान्त भाव दिखता है उसकी सीमा को उन्हीं की तूलिका ने स्पर्श किया । बेटा ! ऐसा लगता है नन्दन चित्रकार के अलोकिक चित्र आनन्द के पदों में शब्द चित्र वनकर आज भी सहृदयों को रिक्षा मुजान ७ रहे हैं । केशव भाव में आ गया था। उसे सगा देवकीनन्दन में उसके सामने ही हैं। बड़ी जिमासा से दोसा, 'यानन्द तुम्हारे पतिपि इसका यह चित्र, जिसमें मेनका गोद में सद्यःजात बालिका लिए विश्वामित्र से कन्या को स्वीकार करने को याचना करती है, ऋषि मुंह फेर कर पने जाते हैं। मैंने उस समय देखा या जव में संन्यास लेने का निश्चय कर चुका था ! मुझे चित्रकार का वह संदेश मूरमा दिया वहाँ स्वर्ग गुय की कामना में मां ने अपने वात्सल्य को भी ठुारा दिया। मेनका के मुखमण्डल पर खिचे भाव सारी गापा का प्रत्यक्षा दर्शन करा रहे थे। वह चित्र देखे मुझे ३० वर्ष हो गए।' 'भगवन् चित्र तो अभी भी है और रंगों के फीका पड़ जाने से कुछ अस्पप्टः सा दिखता है। आपका स्वागत है, यह कक्ष ही आपका है।' आनन्द ने बड़े अनुराग से केशव को देया 'बेटा ! तुम कुनोन हो, संसार- वान् हो और योग्य पिता के योग्य पुत्र हो । लगता है कला जिसे प्रकार न कर पाई, संगीत जिसे प्रत्यक्ष करके भी पकड़ न पाया, उसे तुम्हारे पदों ने हठात् शब्दजाल मे बांधकर सारे जगत् को कृतार्य कर दिया। बेटा ! मैं सितार साध रहा हूँ तुम तनिक वही पर मुना दो ।' केशप ने याचना के स्वर में कहा । 'स्वामी जी ! आप के साथ में क्या कह पाऊँगा?' 'वत्स ! मैं सब जानता हूँ। तुम प्रारम्भ करो।' 'कोन सा पद ? भगवन् ।' 'मन लेह पे देह छटाक नही, आनन्द का हृदय इस समय प्रफुल्लित पा, इसीलिए जैसे ही पहनी पक्ति होठों पर आई और केशव ने सितार पर सहर देना प्रारम्भ किया वैसे ही सारा कक्ष तादात्म्य भाव में आ गया। स्वर से स्वर मिने, तार से तार और सर्वत्र एकरसता हा गई। हेम से नहीं रहा गया । दंग पहको और बूढ़े सदाशिव को कनिष्ठा एव सर्जनो का भेद अमेरमा गया। कण्ठ स्वर को वाव स्वर निहार रहे थे और इन दोनों को सुजान उस ठाकुर कोने में बैठा बहादुर सिंह तथा अभी-अभी आयी निर्मला निहार रही थी। आनन्द पूरे मनोयोग से पद की पंक्तियों को राग पर उतार रहा था । तृतीया पंक्ति के ""घन आनन्द प्यारे सुजान सुनो""को तीन-चार बार दुहराता गया, केशव जैसे इस लोक में ही नहीं था, हेम की उंगलियां तबले पर नाच रही थीं और सदाशिव ! जितनी मार्मिकता उसकी सारंगी से ध्वनित हो रही थी उससे कहीं अधिक उसके नेत्रों से वहते अश्रु अभि- व्यसित कर रहे थे। वहादुर सिंह का पूरा ध्यान आनन्द पर टिका था, सदाशिव के भावभरे आंसू की आंखों से निकल पड़े और निर्मला मांचल में मुंह ढांप ही रो पड़ी। जैसे ही पांचवीं बार आनन्द ने 'धन आनन्द प्यारे सुजान' कहा कक्ष द्वार पर सुजान आ खड़ी हुई । वह जैसे नाटक देख रही थी । भाव में डूबते-उतराते सभीजन लथपथ होकर विश्राम पर पहुंचे और एक-एक कर स्वर मूक बने ही थे कि सबकी दृष्टि सुजान पर गई। 'माओ बेटी ! रस की धारा वह में जादू है। तू चूक गयी, लगता है अभी आयी है।' केशव हर्षातिरेक में बोला। 'हां बाबा !' कहती हुई सुजान कक्ष में आकर बैठ गयी । 'आनन्द के स्वर में बढ़ा दर्द है बेटी ! ऐसा लगता है कि इन पदों की तह तक पहुंचना साधारण आदमी के बस की बात नहीं। मुझे तो माज पता चला कि श्रीमान जी प्रसिद्ध चित्रकार देवकीनन्दन माधुर के सुपुत्र हैं । ये शायद तुम्हीं से मिलने आये हैं। चलो हेम हम लोग थोड़ा विधाम कर लें।' केशव उठने लगा। 'स्वामी जी ! वैठिए, आपकी वाणी में महानन्द का रस है । ऐसा सत्संग भी तो भाग्य से ही मिलता है।' आनन्द ने टोका । 'नहीं आनन्द जी ! अभी हमें आपके यहाँ संगत की तैयारी करनी है। अधिक देर बैठ जाने से वहां का कार्यक्रम जम नहीं पावेगा। हो, सायंकाल वहां के लिए आग्रह कर दीजिए।' कहते हुए हंग उठ पड़ा हुआ। 'यदि ऐसा है तो भाई हेमचन्द्र ! स्वामी जी फो लेकर मेरी बधी में बैठकर मेरे भवन पर ही पहुंच कर आतिथ्य चली है, आनन्द के पद सुजान ८८ स्वीकार करें। हम भी थोड़ी देर में या जायगे ।' कहकर आनद ने बहादुर सिंह को पुकारा और उसके आने पर बोता, 'वहादुर ! इन पति- पियो को लेकर घर पहुँचो और इनके स्वागत-सत्कार का पयोचित प्रबन्ध करो।' 'जैसी आजा', कहकर वहादुर सिंह स्वामी जी, हेम और सरा- शिव को लेकर बाहर निकल गया । सबके चले जाने पर कस अचानक मूना हो गया। सुजान धीरे से उठी और अपने अन्तःका की ओर पती । पक्ष में आनन्द को बिठाकर उसने निर्मला को आवाज दो-'निर्मला! आनन्द के लिए भोजन का प्रबन्ध करो, देखो, कुछ फन भी मंगा मो और हा पहले इन्हें जलपान ..। अच्छा तुम महराजिन से कहकर भोजन का प्रबन्ध कराओ, जलपान में स्वयं लाती है। कहकार मुजान का के बाहर जाने लगी, तभी आनन्द बोल पड़ा-'मुजान ! में पका है, कुछ था-पी नही पाऊँगा वैसे भी पम्प चल रहा है और वैद्य जी को बाजा बिना... मुजान ने बात काट दी-'मैं कुछ वैसा ही खिलाऊँगी, इसको चिन्ता तुम्हे नही करनी है ।' और एक मुस्कान बियर कर अन्तर्धान हो गयी। आनन्द के मन मे गुदगुदी-सी हुई । वह आधे मुंदै किसी मधुर स्मृति में घो गया। सुजान ने आनन्द को जलपान कराया और वही पास में बैठ गयी। सहमा सुजान पूछ बैठी-'अच्छा यह बताओ, मेरे पीछे-पीछे साम रिम क्यो दोहे गए ?' 'प्रिये । तुम्हारा अनार न हो, इसलिए मैं गया था और वहाँ काफी देर तक प्रतीक्षा करने पर भी शाह से मिल न सरा। जब सोला ने तुम्हारे जाने की बात कही तो मेरी जान में जान आपी । हो, जिस अपमान का मुझे भय था वह होकर ही रहा।' 'तुम्हें कैसे मालूम ?' सुजान ने प्रश्न क्रिया। 'सोला ने बई संकोच से बताया। 'तुम लीला से कहाँ मिल?' 'वह दीवाने वास के बाहर उद्यान में बैठी थी। वही निनन्धर १०० सुजान दिखी मुझे। उसने स्वयं ही बताया और में खून का बूंट पीकर रह गया ।' 'अच्छा हुआ शाह से तुम्हारी भेट नहीं हुई।' सुजान इतना ही कह पायी कि निर्मला भोजन की थाली लेकर आ गई। आनन्द ने भोजन करना प्रारम्भ किया, सुजान पंखा झलने लगी तो आनन्द ने कहा-'यह क्या कर रही हो?' 'मैं जो कर रही हूँ, करने दो।' कहकर सुजान अपना कार्य करती रही। उसे असीम सुख की अनुभूति हो रही थी। भोजन के उपरान्त पान खाकर जैसे ही आनन्द लेटा, सो गया। दिन भर बहुत थक चुका घा । सुजान भी वहीं फर्श पर लेट गयी उसके मानस में शान्ति थी । वह आनन्द को पाफर सब कुछ भूल जाती थी। वह यही सोच रही थी वह आनन्द की एकमात्र नारी और आनन्द उसका एकमात्र पुरुप था । वही बीच-बीच में मानन्द की ओर देख लेती । सुख का संसार और चिरवैभव फा भण्डार उसके सामने बिखरा पड़ा था और वह दोनों हाथ से उस अनन्त राशि को बटोर रही थी। लगता-मानो प्रेम-रस छलक रहा था, अनन्य भाव अभिनय कर रहे थे और घोर हताशा में डूबी वासना दूर चड़ी दम तोड़ रही थी।
संध्या के पूर्व आनन्द की हवेली में संगीत प्रहरी महरा उठो । प्रारम्भ में आनन्द ने अपना दर्द भरा पद-'कर नेह निवाहनो आनत ना तो मनेह को धार मे काहे धसे'-गाया । केशव सितार के तारों में वैसे यो गया । हेम ने मृदंग पर अधिकार जमाया और सदाशिव को सारंगी जैने हृदय को झकझोर रही थी। मुजान जगज्जननी पार्वती के वेप में बैठी झूम रही थी। मां गोमती आज हर्ष से फूली नहीं समा रही यो । उनी आर्ये हवहवा आई थीं। अपने पुत्र की इस पता पर तो रीमो ही को साथ ही यह भी विचारे जा रही थीं कि आज आनन्द के पिता होते तो फूले न समाते । कारण मी स्पष्ट या-वस्तुतः वे कला पारखी ये । चित्र और संगीत उनका स्वभाव बन चुके थे और इसके विपरीत गोमतो नारी होते हुए भी इन सबसे दूर ही रहना पसन्द करती थीं। उनकी दृष्टि में ये सब निठल्लों के व्यसन हैं । परन्तु वान वास्तविकता उनके समझ थी, उनको आयो से अय-प्रवाह हो रहा था। रह-रहकर पार्वती की मुद्रा में बैठी सुजान को निहारे जा रही थीं। आंगन में नृत्यायोजन पा और बरामदे में सगत तगी पी। सेवक-सेविकाओं के अतिरिक्त दो-एक विशिष्ट येष्ठी वहाँ विराजमान थे। निर्मता का पति भी सेवा-कार्य में लगा पा । 'लास्य' को भूमिका मे वाद्य-यंत्र संकृत हुए । संकेत पाकर मुमान उठो । सर्वप्रथम उसने गोमती के चरण छए, आशीर्वाद प्राप्त किया, पुनः क्रम से केशव, सदाशिव, हेम तपा आनन्द का अभिनन्दन पर प्राङ्गण में मन्द गति से उतरी । ऋपि कन्या-सो वेष-भूषा, बंधे हुए पूढे में समर पुष्प मानिका, मुधमण्डत पर चित्र-विचित्र कलाकारी, निम्बाफन-से रंग ओष्ठ, सनी हुई सुघर प्रोदा, उभरे हुए उरोज, कटि में मुंब-मेना , १०२ सुजान घुटनों तक चुनरी, चरणों में महावर, सब मिलकर सुजान को साक्षात् पार्वती की प्रतिमा सिद्ध कर रहे थे। आज सुजान अपने जीवन की बहुत बड़ी साध पूरी करने जा रही थी। उसने मन ही मन मां पार्वती का स्मरण किया और अंग-संचालन में तत्पर हुई। वह सहसा थिरक उठने का नृत्य नहीं था । इसमें बड़ी सावधानी बरतनी थी । वाद्य-यंत्र पहले से सधे थे । सुजान ने आनन्द को निहारा मानो अपने शङ्कर के दर्शन कर रही हो। उसने नृत्य-मुद्रा में सबसे पहले पूरे आंगन की परिक्रमा की और मध्य में केन्द्र स्थिर करके चरण के धूपरुओं को सतर्क किया । मन्द- मन्द ध्वनि में धुंघरू बजे और सुजान ऐसे टटोल-टटोल कर पांव रखती गई कि आंगन भी झूम उठा। उसका ध्यान सारंगी पर लगा था और आज तो सचमुच सदाशिव जैसे गन्धर्वलोक से उतरा हो । इतनी मार्मि- कता से रागिनी फूटती थी मानो अन्तर को छू-शुकर ही रह जाती हो । मृदंग भी मानो हेम के इशारे पर नाद दे रहा था। हेम की उंगली का स्पर्श कोई नहीं देख रहा था, केवल नाद ही सवको विस्मय में डाल रहा था। आचार्य केशव सितार के तारों में तैर रहे थे। 'नी' और 'सा पर तो वह ऐसे उंगलियां दौड़ाते थे, जैसे कोई आनन्द की सरस सीमा को छू रहा हो । सभी मंत्र-मुग्ध-से अद्भुत राग-रस का पान कर रहे थे । सहसा नाद का दूसरा दौर प्रारम्भ हुआ। सुजान की पदचाप धीरे-धीरे बढ़ी और वह इस प्रकार अंगों को मुखर कर रही मानो स्वर्ग से मेनका उतर आयी हो। फेशवानन्द लास्य का पटु वादक था। वह बीच-बीच में ताण्डव ध्वनि का भी मामास देता था और उस समय सुजान का चौंककर थिरकना इतना आकर्षक तथा स्वाभाविक लगता था कि लोग विना मूल्य विक उठे थे । गोमती की सुजान के प्रति श्रद्धा जागी वे मन ही मन अपने सौभाग्य पर इतराने लगी। आनन्द अपलक देखता रहा । वाद्य-यन्त्र पूर्ण सजग हो उठे । सुजान यंत्र बन गयी । घुघरुओं को प्रतिध्वनि रस-संचार कर रही पी। नृत्य को गति बढ़ी। वाद्यों में उसने स्वयं को एकाकार कर लिया ।
मुजान बहते हैं तान से तान, भाव से भाव एवं स्वर में स्वर मिनार जिम तादात्म्य का प्रत्यक्ष पराते हैं वहीं तो जीव और ब्रह्म का मिलन है । आचार्य केशव इसे कई बार साथ धुके थे किन्तु आज तो सुजान ने मानो इस साधना को पूर्णाहुति ही दे दी । केशव ने ताण्डवी मुद्रा का एक गंभीर झटका दिया जिसकी प्रतिक्रिया सुजान पर बड़ी विचित्र हुई। वह स्त- म्भिता, भयभीता-सी एक बार मन्द-मन्द, दवे परणों से पेन्द्र की परि- क्रमा करने लगी। तदनन्तर केशव ने यथार्थ सास्य का मुकेत देकर सितार के तानें को-रे गम' पर ध्वनित किया। स्वर में डूबे स्वर ब्रह्मनाद बनकर आंगन में थिरक उठे। इस प्रकार लगभग ढाई घण्टे लास्य का यह क्रम चला । धीरे-धीरे स्वर थमे और केशव ने दौड़कर सुजान को गोद में उठा लिया और कान में बोले, 'बेटी ! सच बता, क्या तू स्वर्णकार मदनमोहन की नाइसी मुवन्या तो नहीं है ? सुजान कुछ कहे कि इसके पूर्व ही केशव ने कहा- "बिटिया ! तुम्हारे ऊपर महाकालेश्वर दयालु हैं। तू इस भारत देश की एक मात्र लास्य नर्तकी बनेगी, यह मेरा दावा है ।' सुजान के नेत्र सग्गा से झुक गये । उसे विश्वास नहीं था कि वह इस नृत्य पर पिरक पायेगी परन्तु जब एक-एक करके सबने उसकी प्रशंसा की तो वह जैसे किसी बोझ से दब गयी। गोमती ने उसे अपनी गोद में बैठाया और दो स्नेह से उसका हाय अपने हाथ में लेकर पोनी-'बेटी ! आर जो कुछ मेने अपनी भावों से देखा है वह साक्षात् होकर भी स्वप्नवत ही सग रहा है । ऐसा दृश्य मैंने आज तक नहीं देखा। बेटी ! तू अब मेरी आगों से ओशत न हो, यही कामना है।' मा जी ! यह सब तो आपकी ममता का ही प्रसाद है अन्यथा मैं इसके योग्य कहाँ ? सुजान अपार स्नेह पाकर धन्य हो गई थी। उसकी आपे अपने मानन्द को ढूंढ़ने में मग गई । मानन्द यहाँ से उठकर केशव आदि को अतिपि पक्ष में से आया और सेवरों को भावश्यक निर्देश देकर अपने शयनकक्ष में जा लेटा। उमे गुबान से चिन्ता व्याप उठी।
१०४ सुजान आनन्द के मानस-पटल पर कई प्रकार के विचार उमरे । वह सोचता रहा-मुजान एक अमर विभूति है । अभी तक उसने सुजान को दादरा, तुमरी, यमन केदारा असावरी पर थिरकते देखा था और आज लास्य का मात्र आभास देखकर वह दंग रह गया। सुजान उसकी दृष्टि में उर्वशी है, उसे लगा वह देवांगना किसी क्षण भी पंख लगा कर उड़ सकती है । वह आनन्द के पास रुकी रहे सर्वथा असम्भव है। उज्जयिनी में लास्य-नृत्य होगा, वहां अनेकानेक नरेश उसका नृत्य देखेंगे, फिर"। इस प्रकार आनन्द के मनोरथ पर पानी फिर सकता है। क्या वह सुजान को बचा सकता है ? कदापि नहीं। उसमें रूप नाम की कोई वस्तु नहीं केवल काव्य-कला मात्र कब तक सुजान को रिझा पायेगी । सुजान में सब कुछ है, नाकर्षण यौवन, नृत्य कला, विद्वत्ता, यों समझिए, एक व्यक्ति को जो कुछ चाहिए सभी कुछ । बस यह ध्यान आते ही आनन्द ईया से भर गया। लगा, जैसे उसके विमल मानस-सरोवर में किसी ने पत्थर फेंक कर घुटने भर नीचे जो कीचड़ था, उसे ऊपर के सतह पर ला दिया । उसके चित्त में हीन भावना घर कर गई। यह सुजान के योग्य नहीं । वस्तु, सुजान उस पर तो लट्ट होने से रही । रहा, उसके प्रति वह जो भी स्नेहिल भाव दिखा रही है, उसमें भी कोई रहस्य ही है और जहाँ रहस्य हो वहाँ यथार्थ टिक ही नहीं सकता। सच है, पुरुष कभी संदेह-भाव से कपर उठ ही नहीं पाता। किसी प्रकार एक भ्रम दूर हुआ नहीं कि अनेक मानस-क्षितिज पर मण्डराने लगते हैं आनन्द भी आखिर पुरप ही था। सह्या मुजान की पद-चाप सुनाई पड़ी। आनन्द मुंह फेरे लेटा रहा। सुजान इस समय वस्त्र-परिवर्तन करके एक गृहिणी के रूप में मानन्द के सामने पड़ी थी और आनन्द जैसे विरक्त ! सुजान शैय्या के समीप पहुंची। 'भानन्द ! लगता है तुम्हें यह नृत्य जंचा नहीं अन्यया तुम्हारे मुख से दो शब्द सुनने को लिए सुजान वेचैन न होती।' सुजान का उत्साह 17. मन्द हो गया। यह वही कठिनाई से बड़ी हि मी, परन्तु मानद ने उसको ओर मुंह ही नहीं घुमाया । मुजान को एक-एक पन यनने मगा। पहा-~-'आनन्द ! तुम बोलोगे ही नहीं, देयो तुम्हारे सामने कौन है ?' इतने पर भी जब आनन्द ने करवट न ददती तो मुजान का धैर्य टूट गया । वह दूसरी ओर जाकर झुककर देखने लगी कि चोक उठी। भानन्द रो रहा था। उसकी आँखों से अजस अयुधारा बह रही पौ । मुगान बैठ गयी। आनन्द का सिर अपनी गोद में लेकर बोली- प्रियतम! यह रुदत किस लिए? क्या मुझसे कोई अपराध ?' आनन्द फफक कर रो पड़ा । सुमान के लिए यह मनःस्थिति बही विलक्षण पो। जे हो बोलो 'आनन्द मुझसे क्या भूल ?" वैसे ही स्वयं विलय उठी । इसलिए नहीं कि वह अबला थी वरन् इसलिए कि उसमें सारी विशेषताओं के रहो हुए भी नारी-भाव उसका साथ नहीं छोड़ पाया था। आज स्थिति ही कुछ पैसो पो। भाष जब वह रोई तो रेवल इस- लिए कि माज उसने अपना पयार्य प्राप्त कर लिया। अभीष्ट की सिद्धि मे सुधा है । सुजान को रोते देख आनन्द उठ बैठा और उसके प्रान पौने लगा। सुजान बोली-~-'तुम रोए क्यों ?' आनन्द गम्भर हो गया- 'देखो सुजान ! मैं नहीं चाहता कि तुम किसी और की आराध्या बनी। मेरे मन में भगवान के स्थान पर तुम्ही हो और यदि तुम न रहीं तो"तो मुझे आत्महत्या।' सुजान ने आनन्द के मुंह पर अपनी होमी रया दी। यह जानती थी आनन्द भावुक है, कुछ भी सोचने अपना कर मने में उसे देर न होगी। यह धीरे से बोली-'पर आनन्द ! यह अदभुत धारणा तुमने कैसे बना ली? पया मेरे व्यवहार से ऐसा कुछ स्पष्ट हुमा भपग मेरे प्रति किसी और के...। 'सुजान ! मेरी हृदयेश्वरी ! हुम्हारी पाश्चर्यमपी मनोरिक मा हो मेरे इस सदेहं की पुष्टि कर रही है ।' 'कला?' 'है। नृत्यकला ।' ७ १०६ सुजान 'पर वह कैसे ?' 'मुनो सुजान ! तुम्हारी इस कला पर रोझे बिना कोई रह नहीं सकता, वही मेरे लिए घातक सिद्ध होगा 1 में यही सोच-सोच कर पीड़ित हो रहा हूँ। आज जो छवि मैंने देखी है उससे मैं स्वयं से इर्ष्यालु हो चला हूँ।' सुजान हंस पड़ी, हंसती रही। उसे आनन्द के कवि हृदय में बड़ा आकर्षण दिखा । वह पुनः हंसी और बोली, 'मेरे भोले आनन्द ! सुजान पर संसार मरता रहा,पर सुजान अपने आनन्द पर मर मिटी, फिर भो उसे विश्वास नहीं । शायद उसे वेश्या समझकर...' सुजान का चेहरा उतर गया। जैसे चढ़ी हुई घटा गगनाङ्गन से अकस्मात लुप्त हो जाती है अथवा जैसे वादलों में चन्द्र छिप जाए ठीक वैसे ही सुजान का सारा उत्साह भंग हो गया । आनन्द को उसकी मनःस्थिति का ध्यान हो आया, उसने भीत स्वर में कहा---'सुजान ! मेरी भावनाओं का अन्यथा अर्थ न लगाओ। तथ्य यह है कि हम दोनों इतने समीप मा गये हैं कि इसमें रशमान का भी व्यवधान असह्य होगा। रहा विश्वास ! मैं तुम्हारी सौगन्ध खाफर कहता हूं कि मैं तुम्हें कभी भी वह नहीं समझा, जिसकी और तुम बार-बार संकेत करती रहती हो । तुम महान् हो, तुम्हारी ऊंचाई का स्पर्श मुझ जैसे अकिञ्चन के वश का नहीं । यही मेरी लाचारी, दुर्वलता तथा हीनता है और पुरुष होने के नाते मैं इससे तभी मुक्त हो सकता हूँ जव..." 'हां हां बोलो, रुक क्यों गए ?' सुजान चौंककर बोलो। वह समझ गयो कि अगले वारय में आनन्द अपने अन्तर्मावों को व्यक्त करने वाला है। 'जब मुझे यह विश्वास हो जाएगा कि तुम आमूल-चूल मेरी हो, मेवल मेरी और वह भी तभी हो सकता है जब..." आनन्द पुनः एका परन्तु सुजान सजग थी-'जब मैं आनन्द के पुत्र की जननी वन जाऊँ? यही न?' आनन्द चौका नहीं, केवल इस बात पर हपित हो उठा कि मुजान उसो बन्नर की कामना बारीकी से समझ गयी है । यह भी सुभान १०७ सम्भव है आनन्द ! मुबान उठ पड़ो हुई। 'मेगार में सब कुछ मम्भर हैं। कहते हुए उसने भानन्द का हाप पका कर उसे उठाया और बस से बाहर आती हुई गेली, 'देखो ! आनन्द ! तुम्हारे अविपि का में देवयानी का दाहिना हाथ थामे यमाति का बड़ा ही मन मोहा चित्र है। तुम्हारे बलिष्ठ हायों में भी मेरा दाहिना हाप है । इसे प्रागोवन निभाना होगा । में अब नाचरुर जीविकोपार्जन करने से रही। अब तो तुम्ही मेरे आधार हो, स्वामी हो, सब कुछ हो । इसका किसान प्राप्त करने के लिए तुम जो भी विधि-निर्देश करोगे तुम्हारी मुरान उसका प्रायः पालन करेगी। आनन्द ! समर्पण कोई गस्तो वस्तु नहीं।' दोनों भोजन कक्ष में पहुंच गये। मानन्द भोजन करने मगा। मुगान पंचा हार रही पी। वह अपने निश्चय पर अटस, अगि यो और तसरे अभर में रिली प्रकार का प्रम-संदेह नहीं पैठ पाया था। उसने संसल्प कर निया- आनन्द के मन का भी प्रम दूर करना पड़ेगा। उसे यह मो माउ पा कि यह संदेह कैसे मिटेगा। मुशान तो नतंकी, उस पर विश्वास ! बरी कठिन पहेली यो, समाधान ढूंदना अनिवार्य हो गया । भोजनोपरान्त आनन्द अपनी शेम्पा पर लेटा हो पा शिनाना विचारों में खो गया । कब नीर आ गयी, वह स्वयं भी नहीं जान पाया। इधर भोजनादि के बाद मुजान गोमती के पक्ष में गयी और उन परण दबाने लगी। गोमती उठ बैठी-'अरे ! परी तू है और परण मेरे दार रही है। छोड दो। 'नहीं माँ ! सेवा करने में श्रम कम मुद्य अधिक मिलता है । मुशे उससे वंचित न करो।' महकर मुजान ने धीरे से माँ को लिटा दिया और परण दवाने मगी। स्नेह का स्पर्श पावर गोमती निममम हो गयीं। मुबान ने उन्हें पार उड़ा कर ठीक से मुलापा और वे पार आंगन, आंगन से बरामदा और बरामदे से आनन्द के शरन सी पोर . मुरी। आज प्रथम बार मुबान को प्रतीत हमामे वह अमिमारिका १०६ सुजान 'पर यह कैसे ?' 'सुनो सुजान ! तुम्हारी इस कला पर रीझे बिना कोई रह नहीं सफता, वही मेरे लिए घातक सिद्ध होगा । मैं यही सोच-सोच कर पीड़ित हो रहा हूँ। आज जो छवि मैंने देखी है उससे में स्वयं से इर्ष्यालु हो चला हूँ।' मुजान हंस पड़ी, हंसती रही। उसे आनन्द के कवि हृदय में बड़ा आकर्षण दिखा । वह पुनः हंसी और बोली, 'मेरे भोले आनन्द ! सुजान पर संसार मरता रहा,पर सुजान अपने आनन्द पर मर मिटी, फिर भी उसे विश्वास नहीं । शायद उसे वेश्या समझकर..." सुजान का चेहरा उतर गया । जैसे चढ़ी हुई घटा गगनाङ्गन से अकस्मात् लुप्त हो जाती है अथवा जेसे वादलों में चन्द्र छिप जाए ठीक वैसे ही सुजान का सारा उत्साह भंग हो गया । नानन्द को उसकी मनःस्थिति का ध्यान हो आया, उसने भीत स्वर में कहा-'सुजान ! मेरी भावनाओं का अन्यथा अर्थ न लगाओ। तथ्य यह है कि हम दोनों इतने समीप मा गये हैं कि इसमें रममाय का भी व्यवधान असह्य होगा। रहा विश्वास ! मैं तुम्हारी सौगन्ध खाकर कहता हूं कि मैं तुम्हें कभी भी वह नहीं समझा, जिसकी और तुम बार-बार संकेत करती रहती हो । तुम महान् हो, तुम्हारी ऊंचाई का स्पर्श मुक्ष जैसे अकिञ्चन के वश का नहीं। यही मेरी लाचारी, दुर्वलता तथा हीनता है और पुरुष होने के नाते में इससे तभी मुक्त हो सकता हूँ जव".." 'हा-हाँ बोलो, रुक क्यों गए ?' सुजान चौंककर बोली। वह समझ गयो कि अगले वाक्य में आनन्द अपने अन्तर्भावों को व्यक्त करने वाला 'जव मुझे यह विश्वास हो जाएगा कि तुम आमूल-चूल मेरी हो, फेवल मेरी और वह भी तभी हो सकता है जव...' आनन्द पुनः एका परन्तु सुजान सजग थी-'जब मैं मानन्द के पुत्र की जननी बन जाऊँ ? यही न ?' आनन्द चौंका नहीं, केवल इस बात पर हर्पित हो उठा कि सुजान उसके अन्तर की कामना बारीकी से समझ गयी है । 'यह भी सुभान सम्भव है आनन्द !' मुबान वठ पड़ो हुई । मसार में सब कुछ गम्भव हैं ।' कहते हुए उसने आनन्द का हाथ पकड़ कर उगे उठाया और कस से बाहर आती हुई गेली, 'देखो ! आनन्द ! तुम्हारे अतिपिस में देवयानी का दाहिना हाथ थामे ययाति का बड़ा ही मन-मोहम पित्र है। तुम्हारे बलिष्ठ हापों में भी मेरा दाहिना हाप है। इसे प्राजीवन निभाना होगा। में अब नाचकर जीविकोपार्जन करने से रही। अर तो तुम्ही मेरे आधार हो, स्वामी हो, सब कुछ हो । इसका विश्वास प्राप्त करने के लिए तुम जो भी विधि-निर्देश करोगे तुम्हारी मुगान उसका असरयः पालन करेगी । आनन्द ! समर्पण कोई मस्ती वस्तु नहीं।' दोनों भोजन कदा में पहुँच गये। आनन्द भोजन करने लगा। मुजान पंचामन रही पी। वह अपने निश्चय पर अटत, महिंग पी और उमो अन्तर में किसी प्रकार का प्रम-संदेह नहीं पैठ पाया था। उसने सरल्प कर लिया- आनन्द के मन का भी प्रम दूर करना पड़ेगा। उसे यह भो माउ पा कि यह संदेह कैसे मिटेगा। मुजान सो नर्तकी, उस पर विश्वास ! बडी कठिन पहेनी पी, समाधान ढूंढना अनिवार्य हो गया । भोजनोपरान्त आनन्द अपनी शैय्या पर लेटा ही था कि नाना विचारों में खो गया । कद नीद आ गयी, वह स्वयं भी नहीं जान पाया। इघर भोजनादि के बाद मुजान गोमती के कक्ष में गयी और उनके चरण दबाने लगी। गोमती उठ बैठो-'अरे ! पकी तू है और चरण मेरे दाव रही है । छोड़ दो।' 'नहीं मा ! सेवा करने में श्रम कम सुख अधिक मिलता है । मुझे उससे वंचित न करो।' कहकर मुजान ने धीरे मे मा को लिटा दिया और परण दबाने लगी। स्नेह का स्पर्श पाकर गोमती निद्रामग्न हो गयों। मुजान ने उन्हें चादर उड़ा कर ठोक से मुलाया और दबे पांव आंगन, आंगन से बरामदा और बरामदे से धानन्द के शयन कक्ष की ओर मुरी। भाज प्रथम बार मुजान को प्रतीत हुआ जैसे वह अभिसारिका - सुजान और अपने नायक से मिलने वेत स्थल की ओर जा रही हो । बतीत उसकी आंखों के सामने चित्रपट की कोर घूम गया। फिर वर्तमान स्थिति को सोच अंग-अंग में स्फुरण होने लगा। यह जानती थी यह क्या है, इसका परिणाम क्या होगा? वह समाज जिसकी दृष्टि में वह पहले से गिरी हुई है, इसके बनन्तर किस इतिहास की सृष्टि करेगा ? पीढ़ियां क्या मूल्यांकन करेंगी ? यह सुजान को अज्ञात नहीं था, फिर भी उसके चरण आनन्द के परम एकान्त कक्ष की ओर बढ़ते ही गए। देहली पर सुजान रुकी~-आनन्द घोर निद्रा में था । सुजान दूर से मानन्द में अपना शिव देखने लगी। सचमुच वह शिव है कामजयी। अचानक सुजान की इच्छा जुगुप्सा में बदल गयी वह इटके के साथ अतिथि कक्ष की कोर मुड़ गयो। अतिथि कक्ष उस दिन ऐतिहासिक ढंग से सजाया गया था। पर टंगे हुए झाड़ फानूस चारों ओर प्रकाश फैला रहे थे जिनमें भित्ति चित्र शुभ्र-ज्योत्स्ना में एकाकी मेघ की भांति झिलमिला रहे थे। सुजान अब अन्धकार से प्रकाश में आ गयी । चित्रों पर दृष्टि जाते ही वह एक चित्र पर केन्द्रित हो गयी। यहां शिव ध्यानावस्थित हैं और उनके बगल में पार्वती बैठी हैं। पार्वती के मुख पर खिंचे भाव यही व्यक्त कर रहे थे कि नारी के लिए पुरुष का ध्यानयोग बसा है वह भी परम एकान्त में और भी खलता है । यह चित्र अन्य चित्रों से भिन्न थानाकर्पक भी। सुजान निनिमेष देख रही थी तब तक किसी को पदचाप सुनाई पड़ी, मुड़ कर देखा केशवानन्द ! वह भी पास आकर वही चित्र देखने लगा- कुछ स्मरण करके बोला-'बेटी! यह चित्र उत्कल नरेश के प्रधान चित्रकार विधुभूपग पाणिग्रही ने बनाया था। विधु मेरे पास सितार सीपता था । यहां इस चित्र में इसका अर्थ अस्पष्ट है परन्तु विधु ने मुझे विधिवत् समझाया था। इसे आनन्द के जन्मोत्सव के उपलक्ष में मापुरजी ने बरिस्त कराया था।
सुमान 'यावा !" मुमान जिज्ञासा से बोली-'दा पिश में पौन-सामर्ष अस्पष्ट हैं ?' 'बेटी 1 जो वात तू स्वय समा रही है, उसे पाया के मुग गेसों मुनना चाहती है ?' 'नही याबा, ऐसा नहीं । मैं पूरी तरह पित्रकार के भागय से पप- गत नही हो पायी है, कृपा कर." 'बेटी! पार्यती जननी पनने के लिए महादेव रे..." रेगरपीमा मोची हो गई। यह एक ऐसे सरय यो और इङ्गित करने जा रहा पा जिसको सुनकर मुवान के पित्त को टेग पहुंचती । 'बाया ! पा जननी बनना अनिवार्य था।' 'हाँ बेटी ! कुमार कार्तिकेय के जन्म से विश्य स्याण होना था और भारी को पूर्णता भी तो सभी है जब यह ममतामयी मां बन जाती है । वेटी! मी में विश्व का आधार अन्तनिहित है । सष्टि मो अप्रिन्टिनता मा पर ही टिकी है ।' कहते हुए केशाय त्रिधर में या पे उपर ही बसे गये। मुजान की दृष्टि पुनः उसो चित्र पर गर गई। पपगुष रिघु ने पार्वती की मुद्रा मे अन्तर्दन्द के ऐसे-ऐसे सोये भार उरहे पे कि गुमान की पाखें भर आई, गदगद कण्ठ से घोसो-'गप है, मातही सरप है।' सुजान को कालिदास का 'कुमार-राम्भव' याद पाया और भोर- 'तथा समावहता मनोभवं पिनाकिना मान मनोग्पा गयो, निनिन्दम्प हृदयेन पार्वती प्रियेपु सौभाग्यफसा हि पाता ।' यह न्द मन ही मन दुहराती हुई सुजान कदा के याहर पाई। जैसे प्रकाश से भन्धरारी ओर जा रही हो, सुजान को वही स्पिति हो पमी पी शरारी में यहादुर सिंह बैठा हुक्का गुहगुहा रहा पा। मुगान को देय ही उठ पड़ा हुआ । 'यहूरानो ! अभी तक यही वह पापा पाकिम माण्ठ में ही अटक गए । 'बहुगनो' सम्बोधन गुजान को बड़ा रिय मगा 'हा ठाकुर !में अतिथि पर के चित्र या दर्शन कर रही पी।पहली ।
गुलाम १० Intो श्रीर मा गयी । बागी मांग if y; HTAR AE में नर्ममा श्रीरममा पनि योभीप प्रमागधीगर गालों पर रंग Pार श्रीगों का मन आप Rai Prनसा था । नाम का कर्णपट पर भी या ना गया | Party भी मांग मी घर आँगन गामी अगदी ग RTET था। - पार गर्भगा गुरकीरी थी | jar Aur tumर गयी 1 पद पग लगी थी, परम, प, दिली नगी । मामा जारी बिजली सदी । गुगाम मा श्री यमाधि में गर्यो । र, या ग. पाक्ष की ओर भागी । यतीम पार गार भी थी गि: धिनी तकी । गुमान धगयर धम्म में आनन्द की ग्या पर जा गिरी। आनन्द जग पहा । लकिन गुजान पर 'मास्य' या प्रभाव न रहा था जननी बनने का संकल्प अपना अभिप्राय पूरा कर रहा था और सपाष जो होना था यह शोफर श्री रहा। प्रातः नया सूर्योदय हुआ। बादल छंट गए थे और पिरमिंगयां के आंगन का अभिनन्दन पारने लगी थीं । माग गुणाम भुग अन्धेरे. उठी थी । नहा-धोकार, पूजागृह से गोरोचन, प्रसाद तथा पुष्पगार वह बोगन में आई तो सामने से मानन्द चला आ रहा था। जैसे ही परस्पर दृष्टि मिली कि आंखें लज्जावनत हो गई। गुजान सहजभाव यो बोली-'मेरे साथ आमो' और तेजी से थानन्द के पक्ष की ओर बढ़ी । आनन्द भी पीछे-पीछे चल पड़ा । यक्षा में पहुंचते ही गुजान ने आनन्द यो एक चौकी पर बिठायर गोरोचन लगाया, माला पहनायी और उससे बोली-'इस सिन्दूर से सात चुटकी मेरी मांग में भर दो।' आनन्द चौक पड़ा-'सिन्दूर!' 'हाँ आनन्द ! सिन्दूर हो भावी सन्तान की पहचान है और नारी की मांग गा अर्थ ही सिन्दूर है। अब मैं जो हूँ उसके लिए यह अनिवार्य भी है । सिन्दूरदान का सबसे पवित्र और समीचीन समय यही है। गुजान नेपाल मागे बदागर अपना सिर झुका दिया। आनन्द ने पुटकी मुमान १११ सिन्दूर लेकर जैसे ही गुजान की मांग की ओर बढ़ाया कि बस के बाहर से ही ठाकुर बहादुर सिंह ने निवेदन किया-'सरकार, गाहंशाह बालम शाह रंगीलेशाह मुगले आजम पधारे हैं । आपको शीघ्र तलब किया है।' बहादुर के शब्दो ने जैसे उल्कापात कर दिया। रंग में भंग हो गया । आनन्द अपना उत्तरीय कन्धे पर डालकर तेजी से कहा के बाहर आ गया । मुजान को यह स्थिति धल गयी । उसे थानन्द का तेजी से निक्स जाना भी रास न आया। परन्तु वह उदाम नहीं हुई। दवे पार अतिथि का की ओर चत्ती । कक्षा के बाहर कपाट की आड मे गोमती भी बड़ी दियो । सुजान को उन्होंने अपने पास ही रोक लिया। दोनों का का उप वातावरण निहारने लगी। बक्ष में शाह आसन पर विराजमान था । पालियर नरेग महामो पार्व में बैठे थे और सेनाधीश गुलाम हुसैन के साथ ही लाहौर के सूरे- दार उस्मान अली सामने बहे थे। मुजान गौर से देख रही थी। 'कहाँ है गुजान ? मेरे सामने इसी वक्त हाजिर करो।' शाह ने तड़प भरी वाणी में आनन्द को जैसे हॉट बतायो । अपने भवन का अतिरिक्ष-- इसी कदा में रगीले शाह के अन्दा हुजूर आनन्द के पिता के साप घोगर येले थे। आनन्द ने अपनी आँखी दोनों परिवारों का स्नेह भाव देखा पा । अतः आनन्द ने अपने को स्थिर रिया, विचार किया कि यह भवन अपना है और शाह इस भवन के अतिपि कक्ष में बैठा है । आनन्द ने एक चार क्रमशः सवको देखा। वह कुछ बोले कि शाह पुनः तड़प-'फौरन से पेश्तर मावदौलत के हुक्म की तासीम होनी चाहिए वर्ना.' 'दनों की परवाह आनन्द ने कभी नहीं की। अपना भवन है सी- लिए सुप रह गया । आप शाह माल किले में है यहाँ तो रेवत मेरे मेहमान हैं ।' आनन्द पुनः बोला, 'शाहंशाह ! मुजान आपकी राजनर्तको नहीं रही, वह मेरी धर्मपली है । अब आप हुक्म दीजिए। 'बेशर्मी की हद हो गयी। सुन रहे हो पनीरे बातम ! एक यफ हमारे मोरमुंशी को औरत बने, यह मावदोसत का ११४ सुजान सांवरे की अभ्यर्थना की- 'सांवरे ! तुम तो जानते ही हो कि मुझ जैसी अभागिन दूसरी शायद ही हो । जाति और समाज विहीन इस अनायिनी को तुमने इतना ऊँचा स्थान दे दिया कि जैसे रंकिनी से साम्राज्ञी वना दिया। अब इतनी दया और करो कि मेरे आनन्द का वाल भी बांका न होने पाए ।' सुजान की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। इन प्रेमा- शुओं में बड़ी निर्मलता थी। सहसा मन्दिर के इर्द-गिर्द बड़ी हलचल मची । सुजान ने झरोखे से देखा-दश बारह घुड़सवार वेतहाशा मन्दिर के प्रांगण में घुसे और एक-एक से पूछ-ताछ करने लगे। उनके सामने निर्मला का पति नन्दलाल पड़ गया। सुजान के प्राण कण्ठ में समा गए । निर्मला उसे सहारा न देती हो शायद वह धड़ाम से फर्श पर गिर पड़ती। 'कहां से आ रहे हो ? यह बुढ़िया कौन है ? किसकी वग्धी खड़ी है ? कहां जाना है ? प्रश्नों की झड़ी लग गई । बग्घी अवश्य खड़ी थी, परन्तु फोचवान घोड़ों को लेकर थोड़ी दूर पर एक बावली में पानी पिलाने-धोने चला गया था। नन्दलाल भी घुटा हुआ, अनुभवी व्यक्ति था। कई बार राजपुरुषों, सिपाहियों के चंगुल में पड़ चुका था। वह घबड़ाया नहीं, संयतवाणी में बोला-'सरकार ! यह मेरी विधवा, रुग्णा मां है, इसकी इच्छा थी कि मरने के पहले एक बार वृन्दावन का दर्शन कर लें, इसीलिए लेकर श्याम-सांवरे की लीलाभूमि में जा रहा हूँ। हुज़र आज तीन दिन से यहीं टिका हूँ। यह बग्घी टूट गई है, बनवाने की कोई युक्ति नहीं सूझ रही है । बड़ी ही परेशानी में पड़ा हूँ कि मां की यह इच्छा कैसे पूरी करू ? वह अभी कुछ और बोलने ही जा रहा था कि एक सैनिक तड़प उठा-'सच-सच वता, इधर से कोई बग्घी सुजान और मीरमुंशी धन-आनन्द की मां को लेकर अभी-अभी निकली है ?' 'हां सरकार, थोड़ी देर हुई, मैं जलपान कर रहा था तो एक बग्घी तीर की तरह आई और इस सीधी सड़क के सामने वाले मोड़ से मुड़ गयी तथा आंघों से मोझल हो गयी।
मुमान ११५ 'क्या ? इस मधुरा जाने वाले राजमार्ग पर नहीं गई?' 'नहीं सरकार, उसे मुडते हुए मैंने देखा था। अब तक तो वह नग- भग चार कोस पार कर गई होगी।' 'यह ठीक कहता है । हम मथुरा के राजमार्ग पर न जाकर सीकरी का राजमार्ग पकड़ में । चतो। देखते ही देखते सभी अश्वार ही मयुरा का मार्ग छोड़ सीकरी के मार्ग की और मुह गये। दड़ी भारी विपत्ति टनी। सुजान की जान में जान आयी। नन्दलाल को बुद्धि ने सबको जान बचा लो । सुजान को नन्दू प्रिय नगा । कभी-कभी छोटे सिक्के भी काम आ जाते हैं । कोचदान के आते ही बग्घी वैयार हुई और मपुरा राजमार्ग पर तीव्र गति से दौड गयो । सन्ध्या होते-होते वे सबके सब काफी दूर निकल गए। कोपवान सतर्क हो गया या । उसने एक कुएं पर सबको कुछ या- पी लेने का मुझाव देकर घोडे की सेवा की और पुनः बाधी जोत दी गई। गोमती बहुत यकी थी, निद्रा मग्न हो गई। कमी-कभी हिचकोले लगने पर जाग जाती थी। परन्तु सुजान की आँखों में नोर कहाँ, वह तो विचारों में खोयी यो। कस को रात का उसे ध्यान आया । वह उसके जीवन की ऐतिहासिक रात्रि यी। परम सुखद । वह समझ गयो-प्रत्येक मुख के पोछे दुःख की काली छाया रहती है । गत रात उसने जीवन का वह सुख और शान्ति प्राप्त की थी जो इस जन्म में उसे दुर्लम पी और याज यह रात्रि ! मार्ग में कट रही थी। बेचारी सुजान की बायें मूज आई थों, यांसुओं का वेग रोके नहीं रुक रहा या और उधर गगन मे चाँद हंस रहा था। कोषवान की तत्परता तया कर्तव्यपरायणता बेजोड पी। वह नन्दू के साप गपाप्टक करता सारी रात घोडे का उत्साह बढ़ाता रहा । पोडा भी जैसे आनन्द का सया होने के नाते सब कुछ समझ रहा था। उसके घरण ऐपित्य से आगे बढ़ने के लिए विद्रोह कर रहे थे परन्तु कही भड़ा नहीं । कोचवान के जीवन की भी यह ऐतिहासिक यात्रा यो। निधि ने ११६ सुजान साथ दिया और प्रभात के पूर्व बग्घी वृन्दावन जा विराजी। बड़ा भारी भय, आतंक, खतरा शेलकर पार तो सभी हो गए, परन्तु ऐसी थकान आ गई थी कि मजिल पर पहुंच कर भी किसी में बग्घी से उतरने की हिम्मत शेप नहीं थी। नन्दलाल ने क्रम से सबको नीचे उतारा; सामान यथास्थान रखा और हवेली में प्रवेश किया । चौकीदार ने सबका अभि- वादन किया और नपे-तुले धके पांव भूमि पर घरते सभी भवन में प्रविष्ट हुए। बाबू देवकीनन्दन ने अपने अन्तिम प्रवास हेतु यह रम्य हवेली बनवायी थी और आज तो यह शरण-स्थली सिद्ध हो गई।
सगभग चार मास बीत गए। आनन्द अभी तक न लौटा, यही चिन्ता सुजान को व्याकुल बनाये हुए यो। मा बाते हो वोमार पड़ीं, उपचार चला, भोजनादि पर अकुश लगा, तो वह प्रायः कृश हो चलीं । उन्हें अव सहारा देकर उठाना-बैठाना पडता था। वे भी अब जीवन से पक गयी थी। आनन्द का पास न होना, उन्हें विशेष घलने लगा। वे उठते-बैठते ऊंची सांस लेकर पूछा करतीं-'हाय, मेरा आनन्द कब आएगा ?' उनके स्वभाव में चिडचिड़ापन आ गया था । सुजान के किसी आग्रह पर वे उसे झिड़क बैठती थीं और कभी घडियो तक उसके सिर पर हाय फेरती और क्षमा याचना करती हुई रो-रो पड़ती । मुजान न रोपाती और न स्वयं को संभाल पाती। उसे इस समय विचित्र अनुभव हो रहे थे। मां उसे हठ करके खाने-पीने पर वाध्य करती। वे कभी-कमी विनोद भी कर बैठती-'बहूरानी ! तुम क्या जानो । मेरा मानन्द जव उदर में पा मैं नाना प्रकार के मिष्ठान्न खाती थी। तुझे तो अब दूनी खुराक चाहिए, अपनी और बच्चे की सुन-मुन कर मुजान फूली नहीं समाती लेकिन कपर से शरमा जातो । निर्मला भी सरस व्यंग्य करती । सुजान के सामने भविष्य का चित्र अत्यन्त धुंधला-सा दिख रहा था। मो घाट पकड़े हैं, तीन बार समरजीत और नन्द दिल्ली गए और आए, पर मैदल इतना पता लगा पाए कि आनन्द का निवास इस समय सात किले में ही है। जिस शाह ने कभी बानन्द को तगमग दुसार ही दिया था, अब उसी पर सारी आशा सगाए बैठा था। सुजान की तो उसने पर्चा हो छोड़ दी पो। उसे तो अब केवल मालमहीरा तया शाही पनाने की चिन्ता सगी थी जिसको रसा पर शेषनाग की भांति आनन्द को बैठा ११८ सुजान रखा था। नादिरगाह इस समय दिल्ली को घेरे बैठा था। छपर मदिरापान और रंगीले शाह द्वारा अर्पिता लीला का उभरता यौवन उसे तराल्ली दिए हुए था। होश में आने पर आलमहीरा और खजाने की गांग पुहराता था। उसको सैनिक नगर में घुसफर नागरिकों, श्रेष्ठियों को लूटते थे और उनकी ललनाओं के साथ बलात्कार करते थे साथ ही प्रतिरोध पर उन्हें तलवार के घाट उतार देते थे । सारा नगर जैसे किसी पुर्धान्त राक्षस को पछे में फंसा कराह रहा था । सुन-सुनकर सुजान बड़ी चिन्ता में पड़ी। उराका गनोवल अब धीरे-धीरे गिरने लगा और गर्भ- भार से भी यह प्रायः खिप्नवदना रहा करती थी। उसने खाने-पीने में उदासीनता दिखाई और शनैः शनैः उसका स्वास्थ्य भी क्षीण होने लगा। गनगायष्टि सी काया अब पिझर सी दिखने लगी । आँखें जैसे गड्ढे में पुरा गई। रूखे बाल, शिथिल देह और उतरा हुआ मुख-मण्डल, सब गिलाफर ऐसा प्रतीत होता था मानो कमल दल पर गीपण तुपार पड़ गया हो । स्वामिनी की इस दशा को देखकर निर्मला एकान्त में बैठकर रोया गरती। सगर और नन्दू पुनः दिल्ली भागे । अब यहाँ केवल भरोसे पोषीदार का ही सहारा रह गया था । अचानक एक दिन मां की तबि- यत खराब हुई । धैयराज आए और उन्होंने नकारात्मक मुद्रा दर्शायी। सुजान जैरो आसमान से गिर पड़ी। रात गहरा रही थी। आकाश में वर्षा के मेघ घिर रहे थे । हवा भी तेज थी। गा के पास बैठी सुजान आंसू बहा रही थी। निर्मला मा के परणों को सहला रही थी। आग तीन दिन से गोमती के मुंह में अन्न फा पाना भी नहीं गया था । फेवल जल पीकर थी और आज तो दोपहर से उन्होंने आँख तक नहीं खोली । औषधि खिलाई गई परन्तु वह गले के नीचे न उतर सकी । सुजान की चिन्ता बढ़ गयी। भरोसे को जगाया गया । बड़ा स्वामिभक्त था । आधीरात में वैधराज के पास गया और लोट कर जो बताया उसे सुनकर सुजान और निर्मला दोनों लग- सुमान ११६ भग विदित हो गई। पैद्य जी के कपनानुसार गोमती के जीवन की यह अन्तिम रात थी। सहसा मां ने बायें घोलकर निहारा । मुजान फफक-फफक कर रो रही थी। गोमती में बडा साहस या । जीवन में उन्होंने बटे उतार- पड़ाव देये थे। मुजान की बाहु और कन्य का सहारा लेकर वे बड़ी हिम्मत करके तक्रिया के सहारे बैठ गई । 'बहूरानो दुछ बिनाओगी नहीं ?' इतना कहकर उन्होंने सुजान के अयुसिक्त कपोलो को सहलाया। मुजान रोती रही । 'मत रो बहू, भला यह में केमे सहन कर सकती है कि मेरी गृह-सक्षमी रुदन करे । अपनी सहज मुस्कान मुझे एक बार फिर से दिदा दो।' सुजान ने बड़ी मुश्किल से कृत्रिम ढंग से मुस्कराने की चेप्टा की। निर्मला को संकेत से मधु माने को कहा। मधु घाटकर गोमती ने मन भर जल ग्रहण किया। उनकी अब तक की क्षीण शक्ति जैसे पुनः वापस हो आई। बोलीं-'देश, बहू ! घबड़ाने की कोई यात नही । मैं मरी थोडे जा रही हूँ। अभी तो मेरा आनन्द आयेगा और आनन्द का नन्हा राजकुमार। हाँ येटो ! उसका नाम क्या रखोगी?' मा इस समय पूर्ण स्वस्य सी दियो। 'मा जी ! आप आराम करें। वे आने वाले ही हैं । मन्दू इस बार उनसे मिलकर आपका सन्देश देगा और निःसन्देह आपकी अस्वस्थता पा संवाद पाकर ये दोड पटेंगे। आप ठीक हो जाएंगी, मां जी।' मुगान इतना बोलते-बोलते जैसे हाफ उठी। गोमती कुछ सोचने लगीं। उनका ध्यान अपने अतीत की और चला गया । वे क्रमशः अपना विवाह, फिर पति-प्रेम सदुपरान्त मन्हा सा मानन्द तथा उन दिनों को मानो चित्रपट की भांति देख रही थीं। थोड़ी देर बाद जब उनका ध्यान टूटा तो बोसों-'बह उसका नाम 'भरत' रखना। शकुन्तलानन्दन भरत । भूनना नही, मोर आनन्द ।' तक उनकी पाणी पल पायी। मुजान ने देखा मा तकिया में महर्षि लुइस गई हैं । निर्मला चीय पड़ो । भरोमे दौरा-दौड़ा आया । मुमान १२० सुजान मां के सिर पर हाथ फेरने लगी। मां ने आंखें खोल दीं-'बहू ! तू अभी तक बैठी है ? मैं तो सपना देख रही थी। तू धवड़ा नहीं । मेरा आनन्द आएगा । तेरी गोद में नन्हा भरत होगा। बेटी ! मेरी किसी बात का बुरा""न...' कहते-कहते गोमती का वाग रुद्ध हो गया। दो-तीन हिचकी'"बस""शान्त । निर्मला चिल्ला पड़ी। भरोसे फफक पड़ा। सुजान स्तब्ध । बाहर बूंदें पड़ने लगी थीं। रह-रहकर बादल गड़गड़ा उठते थे । नितान्त भयावनी कालरात्रि । गोद में माँ का सिर लिए हुए सुजान ने गीता की पंक्तियां दुहराई- अशोच्यानन्वशोच्यस्त्वम् नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि"....... उसके नयनों से अश्रु की बूंदें ढुलकने लगीं। उसे माँ की ममता ने वशीभूत कर रखा था। बड़ा भारी पद इस मां ने उसे दे डाला था। जिसे समाज के विलासियों ने केवल भोग की सामग्री समझा, शाह ने इच्छा की दासी बनाना चाहा, और कला प्रेमी कला पर ही रोझे रहे, उसके लिए कुछ न कर सके। उसी अनाथिनी को इस देवी ने ऐसे अप- नाया जैसे वह युग-युग की गृह-लक्ष्मी थी। सुजान का सिर श्रद्धावनत हो गया। उसके नयनों से गिरे अश्रु मां की धवल केशराशि में खो गए । मां को शैया से नीचे आसन पर लिटाकर सुजान चरणों के पास बैठ गई। निर्मला भी स्वामिनी के पास शेष रात्रि बैठी रही। सबेरा हुआ । वर्षा रुकी । सुजान नहीं उठी । पास-पड़ोस के नर-नारी एकत्रित हुए । कुहराम मच गया । एक वृद्धा ने सुजान के पास जाकर उठाया। वह उठी किन्तु अपने को संभाल न सको। निर्मला ने सहारा दिया । वृद्धा वोली-'बिटिया ! जो होना था सो तो हो गया । अव यह बताओ इनका दाह-संस्कार होगा या इनके पति की समाधि के पास ही इन्हें भी समाधि देनी है। यदि आनन्द की प्रतीक्षा करोगी तो शव की दुर्दशा हो जाएगी। 'जैसा आप सब उचित समझें। वैसे माता जी ने मरने के पूर्व अपनी मुमान १२१ . कोई भी इच्छा नही व्यक्त की पो।' मुजान मुंह फेरकर फफक पड़ी। पद्धा ने मुजान को सान्त्वना देते हुए कहा-'बहू, तुम इस प्रकार व्याकुस न बनो । गर्भ के बच्चे पर इसका बुरा असर पड़ता है।' इस प्रकार मध्यान्ह तक सहानुभूति प्रकट करने वालों का तांता लगा रहा । मध्यान्ह के पश्चात् समाधि का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। सायं के पूर्व गोमती अपने प्रिय पति के पार्श्व मे ही समाधिस्थ हो गई। सुजान के पास द्रव्य का प्रभाव नहीं था। मां ने भी कुछ पोड़ा धन नहीं छोड़ा पा। इसलिए देवकीनन्दन की समाधि की ही भांति गोमती की भी समाधि संगमरमर को ही बनाई गई । सुजान में इस समय जैसे दूना उत्साह था गया था। बडे तडके उठती, स्नानोपरान्त दोनो समाधियों पर दीप-धूप-नैवेद्य घढ़ाती । गीता का पाठ करती। गोमती का पुपोत्सर्ग सस्कार आनन्द की अनुपस्थिति में नहीं हो सका फिर भी एक मुयोग्य आचार्य को बुनाकर मुजान ने तेरहवें दिवस के बाह्मण भोज आदि की व्यवस्था कर हासी । आज गोमती को मरे बारह दिन हो गए थे, परन्तु मुजान ने किसी को यह प्रतीत ही नहीं होने दिया कि उनका कोई नही है । भरोसे प्रातः से ही चार छः आदमी साप लेकर शाक आदि की व्यवस्था में सगा रहा । दोपहर के पश्चात् क्रम से मधुरा, वृन्दापन, गोवर्धन, परसाना के कुलीन ब्राह्मण पधारने लगे। सुजान गर्भ-भार से दबी थी फिर भी उनमे अदम्य उत्साह समाया पा। उसने सभी बाह्मणों के चरण अपने हाप से घोए । बडी श्रद्धा से भोज- स्थल पर आसन सगवाकर विठाया । जब सभी बैठ गए तो वह किनारे घडी होकर परसने वाले व्यानो की व्यवस्था बड़ी तत्परता से देखने मगी। अभी सारे व्यञ्जन परोसे भी नहीं गए थे कि अचानक विप्रवृन्द में हलचल प्रारम्भ हुई। पहले परस्पर कानाफूली हुई फिर वा कुछ स्पष्ट कुछ अस्पष्ट । सुजान ने इशा' से निर्मला को पास बुलाया-'निर्मल ! नया बातें हो रही हैं ? क्या हमसे कोई त्रुटि रह गयो ?' निर्मला कुछ बोले कि एक अधेड़ प्राह्मण पक्ति मे उठ खड़ा हुआ और सोये स्वर में १२२ सुजान -- बोला-'विप्रबन्धुगों ! हमें यहाँ निमंत्रण देकर हमारा घोर अपमान किया गया। हम वा० देवकीनन्दन का सम्मान करते थे। उनकी धर्म- पत्नी की क्रिया एक वेश्या द्वारा सम्पन्न की जा रही है । यहां का अन्न ग्रहण करना हमारे लिए सोधे नरक-प्रवेश के समान है।' स्वर उभरे- 'अरे ! यह तो रंगीले शाह की रखैल सुजान है । भगवान् कृष्ण ने हमारा धर्म बचा लिया ।' दूसरा स्वर गूंजा--'यह रण्डी है । इसके यहां भोजन करके हम अपनी सात पीढ़ियों को नरकगामी बना देंगे।' इसी प्रकार नाना टिप्पणियाँ मुखर होती गई और सुजान के देखते- देखते सारा ब्राह्मण-समुदाय भोज-स्थल से उठ गया। सुजान यह देख न सकी। वह कुछ वोल भी न सकी । अन्दर जाकर श्याम-सांवरे के चरणों पर धड़ाम से गिर पड़ी। बाहर यही स्वर तीन से तीव्रतर हो रहा था--- 'सुजान वेश्या है । आनन्द जीवन भर कुंवारा रहा और अन्त में इस रण्डी के चंगुल में फंसा ।' सुजान वेहोश थी और निर्मला पानी के छींटे देकर होश में लाने का प्रयत्न कर रही थी। सुजान चेती किन्तु देर से । सारा खेल खत्म हो चुका था । सैकड़ों जन का भोजन धरा का धरा रह गया। सुजान के अन्तर में टीस हुई । पहले बीड़ा, फिर वितृष्णा और उसके वाद जुगुप्सा के भाव उसके चित्त में आये । मां ने उसे स्वीकारा परन्तु उनके न रहने पर वह स्वीकृति स्वतः निरस्त हो गई । आनन्द के वंश को वह समाज समझे बैठी थी परन्तु आज प्रमाण मिल गया कि समाज किसी भी स्थिति-परिस्थिति में परम्पराओं से विचलन कदापि नहीं सहन कर सकता । तो फिर, इसका सीधा अर्थ यह निकला कि स्नेह-भक्ति- निष्ठा को कहीं मुंह छिपाने को भी स्थान नहीं । वाह रे समाज ! स्वयं अपराध करे और दण्ड निरपराधी को। आखिर वेश्या भी तो उसे समाज ने ही बनाया। सुजान को भगवान् पर पूर्ण विश्वास था, इसीलिए उसने किसी को दोषी नहीं ठहराया। उसकी दृष्टि में समाज ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व कर रहा है। आखिर, समाज भी शिव की भांति कब तक विषपान सुहान १२३ करता रहे । किसी भी वस्तु या विषय को कोई न कोई सीमा होती है। यह वेश्या बनी, चाहे जीवित रहने के लिए उमने ऐसा किया, पर यह तो घर सत्य है कि उसके लिए ही कितनो ने अपनी कुलवधुओं को सिसकने पर वाध्य किया होगा । कितने पर वर्वाद करके उसने अपने जीवन प्रभात को बनाये रखने की कोशिश की। रंगोले माह के दीवाने पास में उसकी अदा पर हीरे-मोती न्योछावर हुए, उस समय का यह मुख प्राप्त किया तो दुःध के लिए भी तो वैयार रहना ही पाहिए पा । उस आनन्द मिला, ठीक पा परन्तु वहाँ भी एक सीमा यी । या उसने उस सीमा का उल्लंघन नहीं किया ? किया, गर्भवती बनी । पली पी जननी बनने । यह सोचते ही उसमे अचानक शक्ति जागी। भरोसे को सुनापा-'देख भरोरो ! सारा व्यञ्जन गरीब-दुषियों को बांट दो।' 'जैसी मालकिन की इच्छा ।' कहकर भरोसे दौड़ गया। थोड़ी ही देर में सैकड़ों मंगे-भूये जैसे भगवान् दीनबन्धु का रूप धारण किए जय-जयकार करते हवेसी के द्वार पर एकत्रित हो गए। सुजान गद्गद हो गई। उसने सर को आदर से बैठापा, अपने हाथ से दौड़-दौड़ कर पचन परोसे । उन्हें भर पेट पिलाया और चलते समय एक-एक स्वर्ण मुद्रा दी । सरने 'बहू- को जय हो' का आशीर्वाद दिया और पोड़ी देर में पुनः सर शान्त ! मुजान ने निर्मला को भी सामने बैठाकर घटे प्रेम से खिलाया और स्वय मात्र जस ग्रहण करके अपने कदा में जाकर रोया पर मह पि न जाने कर सक विलयती रही। वह रात भर करवटें बदलती रही। रिसो निश्चय पर आना पाहती पो परन्तु सब तरफ से माचार हो रही यो । गर्भ-शिशु उपल-गुपत मपा रहा था। उसने आज कुछ भी सो नहीं ग्रहण किया। बाह्य मुई में अचानक उसने एक निर्णय से ही लिपा । वह बरे वेग से उठी । श्याम- साँवरे के भरणों का पर्श किया । आंगन से बरामदे में आ रही थी कि फर्श पर सेटी निर्मला को देषा । मुघ-दु. की सगिनी ! उसने निर्मम के सिर पर हाप फेरा और भटके से बाहर मा गई । उद्यान में मार १२४ सुजान समाधि के पास पहुंची-'मा ! तूने सुजान को वेश्या समझते हुए भी गले लगाया था । तू नहीं रही तो सुजान कैसे रह सकती है ? मत्था टेककर उसने श्रद्धा से वन्दन किया और लम्बे डग भरती वह हवेली के मुखद्वार से बाहर हो गई। प्रभात हो चला था। सुजान में न जाने कहाँ का साहस आ गया था कि वह जैसे दौड़ रही थी। उसने कहीं विश्राम नहीं किया । उसे यह भी पता नहीं कि कहां जा रही थी ? अपने जीवन में सुजान को इस दशा में भागने का यह दूसरा अवसर था। एक बार वह अपनी इज्जत बचाने के लिए भागी थी। उस बार उसने निश्चय कर लिया था कि प्राण दे देगी और सतीत्व नहीं छोड़ेगी। किन्तु आज परिस्थिति कुछ और थी। आज तो शील रक्षा का भी संकट नहीं है। फिर वह क्यों भाग रही है ? ऐसा विचार मन में आते ही कदम रुक गये। वह मार्ग के किनारे एक वृक्ष की जड़ के सहारे बैठ गई। सामने कालिन्दी का कल-कल निनाद ! सुजान जैसे हताशा में डूब गई । वह क्यों भागी ? दो-तीन बार ये प्रश्न उसके अन्तर से उदय हुए । उसकी निर्मला उसे खोज रही होगी। कुछ समय पश्चात् आनन्द भी आएगा, वह अपने मन में क्या सोचेगा ? आनन्द का ध्यान आते ही सुजान जैसे हार गई । उसकी इच्छा वापस लौटने की हुई। वह उठकर दो-चार कदम ही बढ़ पायी थी कि पीछे से किसी नारी ने पुकारा । सुजान ने मुड़कर देखा--विश्वमोहिनी ! गेरुए वसन में तपस्विनी-सी दिख रही थी। मस्तक पर श्री वैष्णव तिलक, कण्ठ में तुलसी को माला, हाथ में कमण्डल, अचला डाले विश्वमोहिनी तेजस्विनी दिख रही थी। सुजान ने विश्वमोहिनी को आगरे में यौवन की ढलान पर देखा था और उस समय वह वस्त्राभूषणों से लदी रहती थी, फिर भी उस कान्ति में और इसमें बड़ा अन्तर था। सुजान कुछ बोले कि विश्वमोहिनी ही कह उठी-'वेटो सुजान ! देखो, तुम मुझे सामने देखकर भी नहीं पहचान रही हो और मैंने तुम्हें पीछे से चीह्न लिया । बेटी ! किसी समय मैं घोर पतित, घृणा की पात्रा थी। उस समय तुम्हारा व्यवहार मेरे प्रति ठीक , शुमान १२५ । पा । परन्तु, बेटी ! क्या तू अभी भी मुशये नाराज है। पहने हुए विश्व- मोहिनी ने मुजान को कण्ठ से लगा लिया। ऐमो सौहाई पाकर मुनान फफा कर रो पड़ी । 'पैटी मुजान !' विश्वमोहिनी ने घोरे से मुबान के सिर पर हाप फेरते हुए कहा-'यह रोने का समय नहीं। मुझे देयो, मेरी इम काया पर षया-नया नहीं होती, परन्तु मुन जैसी दूपिता को भी भगवान के पाग-कमल की छाया प्राप्त हो गई, तू तो बभी जैसे धरती पर धरण ही रप रही है । चल मेरे साप । मुजान कुछ न बोल सकी। विश्वमोहिनी के पीछे-पीछे पनने लगी। विश्वमोहिनी भी सुजान को पाकर फूली नहीं समा रही थी। सारे रास्ते बोलती रही-बेटी 1 व भैरा नाम पुरषोतम दासी रखा गया है। स्रामो चिन्मयानन्द को मेरे कार अपार कृपा रहती है ।स्वामीजी पैष्णव सम्प्रदाय के सर्वोच्च प्रति- निधि माने जाते हैं । उनको वाणी में अमृत है। मुजान ने देखा विश्य- मोहिनी मचमुच पदम गई है। मार्ग मे ही मुजान ने भी संक्षेप में अपनी दुःख भरी कहानी सुनाई। जैसे ही वह ब्राह्मण-भोज की गाथा कहने सगी, रो परी। विश्वमोहिनी में उसे सान्त्वना दी-'मुजान ! यह संसार दोमुंहा सार है। यहाँ सनिक-सी गूफ पर भी विष-पीना पडता है। जिन ब्राह्मणो ने अन्न को मात्र इसलिए ठुकराया कि उसका प्रबध एक ऐसी नारी को योर से किया गया पा, जिसको जीविका से समाज को चिड है, यही रात में मपुरा की गलियों के पकर काटी हैं । बेटी ! ऐसे सकीर्ण विचार के ब्राह्मण परि उस भोर में अन्न ग्रहण कर सेठे तो तुम्हारी अक्षा सा भी हनन हो जाता । इससे अच्छा तो था फितू गरोब-दु:थियों को युनाकर उन्हें प्रेम से भोज दे देती और उनके कण्ठ से जो बाशीर्वचन निकलते उससे उस यश की सात-पीढियाँ स्वर्ग-मुख भोगतीं।' 'भो ! मैंने यही किया। मुजान का मनोवल बा । बोमने-बहलाठे दोनो ममुना तट पर स्पित वल्लभाचार्य के पावन पाश्रम में पहुंची। विश्वमोहिनी को भी एक छोटी-सी बुटिया में भरत मिली थी।
१२६ सुजान कुटी में पहुंचकर सुजान ने जैसे चैन की सांस ली। दिव्य वाता- वरण | चारों ओर भजन-कीर्तन, सत्संग-उपदेश का प्रभाव था। सुजान जैसे किसी पुनीत तीर्थ में शरण पा गयी थी। विश्वमोहिनी ने उसे एक धवल साड़ी लाकर दी। सुजान यमुना तट पर स्नानार्थ गई, दूर से ही यमुना मैया को वन्दन किया। स्नान करके सीढ़ियों पर चढ़ रही थी एक संगमरमर की पटिया पर पड़ा अपना पांव हटा लिया । उस पर अंकित था-'यह घाट वा० देवकीनन्दन माथुर द्वारा अपने पिता श्री वा० कौशल किशोर की पुण्य-स्मृति में विनिर्मित ।' सुजान के मन में श्रद्धा के भाव जगे। उसने उस पटिया पर मत्था टेका और लम्बे डग भरती आश्रम की ओर चल पड़ी। वहां प्रसाद मिला । आज तीसरे दिन मुंह में अन्न पड़ा । खा-पीकर फर्श पर लेटी ही थी कि घोर निद्रा में डूब गई । विश्वमोहिनी सत्संग में कथा सुनने गई थीं । दिन ढलते वापस हुई और कुटिया के बाहर से ही पुकारा-~'बेटी सुजान ! उठकर देखो, कौन आए हैं ?' सुजान रो रही थी । विश्वमोहिनी अन्दर गईं हाथ का स्पर्श होते ही सुजान चौंक कर उठ बैठी'मां, कल रात में विल्कुल ही नहीं सो पाई थी। नींद लग गयी।' जैसे ही बाहर दृष्टि गई, वह दंग हो गई । बाहर सदाशिव और केशवानन्द खड़े थे। सुजान के मन का अन्तर्द्वन्द्व बढ़ा। उसने वहीं से पुकारा-'बाबा ! आप दिल्ली से कव आए ? काका ! आपने उन्हें कहाँ छोड़ा ? क्या-क्या-क्या वे अभी तक... नहीं"आए ?' कहते-कहते सुजान की आंखें छलक उठीं। कण्ठ भर आया। वाह रे नारी हुदय ! विधाता यदि तुम्हें न रचता तो जगत् में ममता-दया का अस्तित्व ही न होता । सदाशिव और केशव कुटिया में प्रविष्ट हुआ। देखा सुजान का स्वास्थ्य विल्कुल गिर गया है। वह पहचानी नहीं जा रही है। सदा- शिव को बड़ी भयावनी लगी । बोला-'बेटी तुम्हारे चले जाने के वाद आनन्द पर क्या-क्या बीती ? इसे कह पाना आसान नहीं। रंगीले शाह ने उन पर बड़े-बड़े आरोप लगाए । और रस्सी से बांधकर हम लोगों के मुमान १२७ मामने ही उन्हें मान रिये से जाया गया। सैनिकों ने हम लोगों को यातना देनी प्रारम्भ कर दी 'यताओ मुबान कहाँ है ? यही प्रश्न ये हम मवसे बराबर पूछते रहे । बेटी ! मानन्द को बांधते देय हेम या पून सोन उठा । उसने पहले तो माह से मापना की, फिर योग वैग में माकर बोसा ही पा किशाह के संरेत से एक सैनिक ने उसका सिर भुट्टे की तरह उड़ा दिया।' इतना सुनते ही मुजान पिसमोहिनी की गोद मे संज्ञा शून्य-सी मुद्रक गई। विश्वमोहिनी ने पानी से मुंह पोंछा और सदाशिव को आगे कुछ बताने से रोक दिया । मुजान होश में आई तो मानस मे हेम का चेहरा याद आया मृदगापार्य हेम । उसमी भी ऐहिक प्लीमा समाप्त हो गयी। विधाता भी पैसा पापाण-हृदय है ? 'बाबा ! हेम की ऐसी निर्मम हत्या आप कैसे सहन कर गए ?" गुजान बडे विस्मय मे बोली । 'बेटी ! इसे सहन करना थेगे कह सकते हैं ? यह मात्र हेम को हत्या नहीं अपितु मृदङ्ग संगीत की हत्या पी। हेम के याद इस कला का उत्तराधिकारी पीडियो तक नहीं दिगा। उसके साथ एक मोहक कला सुप्त हो गयी। मुजान को मृदंग पर पडे अपने घरण की पापें अभी भी स्मरण है। हेम का बलिदान उसे पला । यह रो भी नहीं पा रही थी क्योकि अय सफ की विडम्बनाएं सेलते-होलते उसके आंसुओ का स्रोत जैसे गूय गया पा । 'वावा ! उनको भी कोई खबर यही से मिली ? 'बेटी ! आनन्द सकुशल है और शाह के जाने की रक्षा का भार उन्हीं पर सौंपा गया है। इसके आगे हमे कोई जानकारी नहीं।' केशव मागे कुछ योन न सका । धीरे-धीरे उन्हें मुजान पर पड़ी विपत्तियों का संवाद भी मिला। केशव का मन विप्न हो उठा। वे तीन-चार दिन यहाँ रुककर उरमयिनी के लिए प्रस्थान कर गये। केवल सदाशिव रुका। उसने आहे दिनों में सुजान का साथ दिया था, इसलिए वह छोडकर नहीं जा सका। विश्व मोहिनी को तो पूजा-पाठ-सरसग से ही समय नहीं मिलता था, अस्तु मुजान सदाशिव काका से ही बातचीत में समय गुजारती ।
१२० सुजान सुजान नित्य प्रातः उठकर यमुना-स्नान हेतु निकल पड़ती। साथ में सदाशिव रहता था। एक दिन सदाशिव सीढ़ियों से फिसलकर गिर पड़ा। लोगों ने दौड़कर उठाया, पर वह खड़ा नहीं हो सका। बड़ी भीड़ एकत्र हो गई। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। अब वह जीवन भर के लिए वेकाम हो गया। सुजान ने ऊपर देखा कि उसकी नजर नन्दू पर पड़ी । वह निश्चल भाव से उसे ताकती रही । जैसे ही नन्दू ने सुजान को देखा, 'मालकिन' कहता हुआ चरणों पर गिर पड़ा । 'मालिक आ गए हैं मालकिन ! आपके वियोग में अन्न-जल त्याग केवल लिखते और गुनगुनाते रहते हैं । वहादुर सिंह, समरजीत आदि आपको चारों ओर ढूंढ़ रहे हैं । मालकिन आपकी दासी निर्मला'"''वह इतना ही कह पाया था कि सुजान चिल्ला उठी-~-'क्या हुआ निर्मला को, वह मेरी दासी नहीं छोटी बहन है।' 'निर्मला पागल हो गई मालकिन ! एक दिन तो गला दबाकर मुझे सोते में मार ही डालती, कुशल तो यह हुमा कि मालिक जाग रहे थे और मेरी घिघियाती आवाज सुनकर दौड़े। निर्मला उन्हें देखकर दूर हट गयी और बोली--'मालिक ! इससे पूछिए, यह मालकिन को क्यों नहीं ढूंढ़ लाता? और मुझे ढूंढ़ने के लिए क्यों नहीं जाने देता ? मैं-मैं-इसे मार नहीं रही थी मालिक । मैं तो यही पूछ रही थी-मेरी मालकिन का पता बता दे । मालिक ! यह जानता है, पर मुझे नहीं बता रहा ।' निर्मला का प्रमाद देखकर मालिक रात भर सोए नहीं, और मैं उसी समय से सभी जगह पागलों की तरह आपको खोज रहा हूँ। अब देर न करिए, मैं बग्धी लाता हूँ, कहकर नन्दू तीव्र गति से भागा और थोड़ी ही देर में कोचवान को साथ ही ऊपर से ही पुकारा । सुजान ने इशारे से नन्दू और कोचवान को बुलाया और सहारे से बैठे सदाशिव को दिखाया । सदाशिव को देखते ही नन्दू चिल्ला उठा---'काका तुम्हें क्या हो गया?' सुजान ने सारी घटना सुनाकर सदाशिव को बग्घी में लिटाया और नन्दू से बोली-'नन्दू ! काका को शीन ले जाओ और निर्मला से .
१२ कह दो में याश्रम के स्वामी जो से आज्ञा सेकर दोपहर के पूर्व आ रही हूँ। नन्दू कुछ बोलने के लिए मुंह घोल हो रहा था कि देवा, भुजान बम्पी में लेटे सदाशिव से कह रही थीं-'काका! वे मा गए हैं । यहाँ सुम्हारा उपचार भी हो जाएगा ! काका! किसी से कहना मत, मुजान अब उस हवेसी में नहीं..." कहती हुई स्नानाथियों की भीड़ में पो गई । 'मोको- तराणां पुरुषाणां को हि विज्ञातुमर्हसि' यहाँ लोकोत्तर केवल पुरष के लिए ही नहीं नारी के लिए भी गतार्य है। आनन्द को झलक के लिए मुजान उसके मश का भार लिए अभी तक जी रही है योर अब जब आनन्द उसके लिए विक्षिप्त है तो उस सहज अपेक्षा भाव इस समय क्यों हवेली को और नहीं दौड़ा पा रहा है ? वह दौड़ तो रही है, यानन्द की ओर हो तो अब तक दोडी, उसे छोड अब वह जा हो कहाँ सकती है ? बहुत कुछ सोचतो-विचारती मुजान अपनी कुटिया की ओर चली। मार्ग में एक कृष्ण मन्दिर था, उसके पाव उधर मुडे । स्वभावतः पह सीधी भगवान के चरणों में नत मस्तक हो जाती पो परन्तु आज तो जैसे वह बारादरी में आई उसे आनन्द का मधुर स्वर सुनाई पड़ा । वही काम गयी। एक स्तम्भ की आड से दर्द का रहस्य मुनकर मार्मिक पीड़ा से छटपटाती रही । आनन्द पावस के मेघ से अनुनय कर रहा पा- 'पर कारज देह को धारे फिरी पर्यन्य यथारय ह दरसो। निधि नीर सुधा के समान करो सवहीं विधि सजनता सरसो । 'पन मानन्द' जीवन दायक हो फा मेरियो पोर हिये परसौ ॥ कबहूँ का विसासी मुजान के आंगन मो अमुवान को ले बरसो॥ 'विसासी' सुजान धम्म से बैठ गई । सम्मे को बार में पी। फिर भो आनन्द को देख रही यो। आनन्द स्वस्प नहीं पा, चित शि..
१३४ सुजान सुगन्धित किया गया । बड़ी भीड़ एकत्र हो गयी। सुजान सज-धज कर आंगन में आई तो सभी चौंक उठे। बहादुर सिंह कुछ न समझ सका । नन्दू से तो दृश्य देखा ही न गया। इतनी भीड़ में सभी सजल नयन । सुजान आनन्द के समीप आई। हाथ में सिन्दूर को डिब्बी थी। उसने आनन्द का कटा दाहिना हाथ उठाकर उँगली में सिन्दूर डुबोकर अपनी मांग में लगाया और चरणों पर मस्तक रख दिया। उसके अनन्तर अविरल अश्रुधारा के साथ पुनः हवेली में वापस गई और कुछ देर पश्चात् लौटी तो विल्कुल बदल गयी थी। मांग का सिंदूर पुछ गया था । धवल साड़ो । ठाकुर चीख पड़ा-'मालकिन !' 'ठाकुर ! भारतीय विधवा का यही शुभ्रवेश है । अब देर न करो।' उद्यान में ही संगमरमर की समाधि बनी । सुजान ने भी अपने हाथों का सहारा दिया। कई दिनों तक गीता का पाठ हुआ। सभी ब्राह्मणों ने आनन्द की तेरही में भोजन किया। दीन-दुखियों को भी दान किया गया । जैसे एक लम्बी कहानी खत्म हो गई। दूसरे दिन ठाकुर ने वे सारे कागज-पत्रादि लाकर स्वामिनी के समक्ष रखे जो आनन्द ने दिये थे । सुजान लेटी थी, उठ बैठी, ध्यान से देखने लगी । सुजान के वियोग में आनन्द का लिखा बृहत् काव्य । सारे पत्रादि उसने एकत्रित किये । तब तक उसकी दृष्टि कुछ दस्तावेजों पर पड़ी। वह चौंकी। 'मालकिन ! सरकार ने वृन्दावन, वरसाना और गोवर्धन की जागीर, दिल्ली की दो हवेलियां और मथुरा के चार भवनों को आप के ही नाम कर दिया है । इन सब पर सरकारी अमलों की मुहरें लगी हैं।' ठाकुर ने बड़ी शालीनता से सुजान को आश्वस्त किया। 'परन्तु, ये सब मैं क्या करूंगी?' 'मालकिन ! सरकार ने मुझे बुलाकर एकान्त में कहा था कि आप कभी न कभी अवश्य आएंगी और आनन्द अपने होने वाले राजकुमार का नाम 'भरत' रख गए हैं ।' ठाकुर बोला।
स्वामिनी को बैठाया। सबके सब जर हवेली में पहुँचे तो ठा० बहादुर समरजीत के साप बरामदे में ही प्रतीक्षा कर रहे थे। नन्दू ने बपी से उतर कर सारा वृत्तान्त बताया। ठाकुर की रगों का गून घोल उठा। पह रोया । विसाप किया। सुजान ने उसे सान्त्वना पी- -'ठाकुर तुम राजपूत हो । हंस-हंसकर मृत्यु से खेलना ही तुम्हारा स्वभाव है। अब पति तुम इस प्रकार में छोड़ दोगे तो हम सब"..' ठाकुर को बाय कोष से जल रही थी । 'मासकिन ! हम उन हत्यारों का अस्तित्व मिटा- कर ही दम लेंगे।' 'ठाकुर यह समय बड़ा भयंकर है। इसमे टकराने से हमारा ही अस्तित्व मिट जाएगा । तुम्हारे मालिक ने अपनी स्वामिभक्ति का मूल्य पुकाया है । यह इनका बलिदान है । और सुनो, इनके इस बलिदान से भारत की अनन्त धनराशि लुटेरे नादिरशाह के चंगुल से मुक्त हो गई। इनका नाम भारत के इतिहास में अमर हो गया " 'हो बहूरानी ! हमारा मानन्द अव इतिहास पुरुष बन गया है।' कहते-कहते ठाकुर की आंखें भर आयीं। मुंह फेर कर आंसू पोछे । 'तुम रो रहे हो ठाकुर ! मुझे देखो, मेरा सर्वस्व सुट पुका है फिर भी मैं नहीं रो पा रही हूँ क्योकि जीवन भर रोई तब भी वैसी हो रही । अब मेरा संकल्प है कि उनकी शेप अभिसापामो को पूर्ति करू'। सुजान जल्दी से हवेनी में गई। इधर भानन्द का शव बग्यो से उतार कर हवेसी के आंगन मे रखा गया । सुजान ने निर्मता को अपने कक्ष में बुलाया । 'निर्मस ! आज तू मेरा श्रृंगार कर दे उन्हें अन्तिम बार दुल्हिन के रूप में दिएं, यह उनकी अभिलाषा पो । सुजान जैसे पागस हो। 'मानकिन ! यह आप क्या यह रही हैं ?' निर्मना जैसे पबहा गई। "ठीक ही कह रही हूँ निर्मस ! आज ये समाधि मेंगे, उसके पूर्व मेरी छवि देखने को अन्तरारमा विकल हो रही है।' निर्मत ने सारे रेशमी वस्त्र, भाभूषण आदि पहनाये । इयर मानन्द का शव नहसाया गया, प्रमादिमे १३२ सुजान - . पर पड़ी तीन मुट्ठी धूल उस सैनिक पर फेंक दी। सभी सैनिक आनन्द के इस व्यवहार से तिलमिला उठे और एक ने आगे बढ़कर आनन्द का दाहिना हाथ काट दिया । रक्त की धारा बह चली। सभी भयानान्त हो वहां से भागे । भगदड़ देखकर सुजान आंगन में आई। आनन्द भूमि पर पड़ा रक्त में सना था और बाएं हाथ को रक्त में डुबा-डुवा कर भूमि पर लिख रहा था- 'प्यारे सुजान सुनी" 'चाहत चलन अव संदेशों ले सुजान को।' सुजान ने दौड़ कर गोद में लिटा लिया। अपने आंचल से बाहु का रक्तस्राव रोकने का प्रयत्न करने लगी। आनन्द मन्द स्वर में बुदबुदाया- 'सुजान से भेंट न हुई, न हुई ।' अब वह बिल्कुल चैतन्य था। सुजान ने आनन्द का सिर अपने वक्ष से लगाकर बोली-'प्रियतम ! ध्यान से देखो, तुम्हारी सुजान तुम्हारे पास है ।' आनन्द की आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था। सुजान के स्वर सुनते ही विह्वल हो उठा । सुजान उसका सिर सहलाने लगी। आनन्द जैसे जीत गया हो~'सुजान ! घबड़ाओ नहीं। मैं मरूँगा नहीं क्योंकि तुम जो आ गई। मैं""मैं..." वह रुक गया । सुजान आज घबराई। बड़ी-बड़ी आपदायें झेलकर भी मानव-मन कहीं न कहीं पराजित हो ही जाता है । वह चीख पड़ी- 'आनन्द ! आनन्द ! कुछ तो बोलो ।' आनन्द सुजान के कान के पास कुछ बुदबुदाया लेकिन स्वर स्पष्ट और इतने मन्द थे कि सुजान समझ न पाई । इतने में आनन्द के जीवन-नाटक का पटाक्षेप हो गया । सुजान धाड़ मार कर गिर पड़ी। पुजारी, देवालय के सेवक आदि दौड़ पड़े। तभी हांफते-हांफते नन्दू अपनी अर्द्ध-विक्षिप्ता पत्नी निर्मला को लिए आंगन में पहुंचा । बाहर जैसा सुना था, वही देखा । निर्मला ने ध्यान से स्वामिनी को देखा। उसकी विक्षिप्ति लुप्त हो चली थी। पहचानते ही सुजान से लिपट कर रोने लगी। नन्दू व्याकुल हो उठा। वाहर वग्धी खड़ी थी। सबने आनन्द का शव बग्घी में रखा । निर्मला ने सहारा देकर - ।
No text on this page.
१३० सुजान खान-पान का ठिकाना नहीं । सुजान यह सोचकर कांप उठी कि यही समय था जब वह उसकी देख भाल करती। वाह री नियति ! तू खिझाती भी है और हँसाती भी । सुजान के सामने ही उसका अनन्त सुख बिखरा पड़ा है और वह प्रत्यक्ष देख रही है-आनन्द प्रेम विभोर हो गा रहा tic 'धन आनन्द प्यारे सुजान सुनी" 'कछू नेह निवाहनो जानत ना........ 'कबहूँ वा विसासी सुजान के आंगन........ अन्तिम पद सुनते ही सुजान भीड़ को चीरती हुई आंगन में आ गई। सबने देखा । टिप्पणियां प्रकट हुई.---'देखा पुजारी जी, आप समझ रहे थे आनन्द वावू श्याम-सांवरे को रिझा रहे थे और हम समझ रहे थे कि यह उसी रण्डी को ढूंढ़ रहा है जो कहीं कोठा तलाश रही होगी' सब हँस पड़े। 'अरे ! यह तो वही है जो हमें अपना अन्न धोखे से खिलाकर हमारा धर्म भ्रष्ट करना चाहती थी।' 'मक्कार है, बद्जात है' सारे विशेषण समाज की ओर से अकेले सुजान पर थोपे गए । घोर अन्याय । सुजान की आंखें क्रोध से चिनगा- रियां बरसाने लगीं। यह देवालय है । यहाँ सभी समान थे । सुजान ने एक दृष्टि आनन्द पर डाली । वह अभी भी आंगन में 'प्यारे सुजान सुनो' की रट लगाए था। सुजान समझ गई। आनन्द इतना विक्षिप्त है कि वह पहचान भी न पाये शायद । 'हां ये उसी सुजान को ढूंढ़ रहे हैं जिसे तुम सब सामने देख रहे हो । अन्तर यही है कि ये अपनी सुजान को श्याम-सांवरे की छवि में सहज ही पा रहे हैं ।' सुजान मुखरा हो चली। एक नर्तकी का सहज चाञ्चल्य उसमें वीरभाव में व्यक्त हुआ-'अपनी ही अन्तरात्मा से पूछो, तुम ने सुजान को क्यों पाला? क्यों उसके कटाक्ष पर रीझे, क्यों उसकी नृत्य-मुद्रा पर आहें भरते रहे । सुजान को उस गहित दशा में ले जाने वाले तुम हो, और तुम्हारा समाज अकेली सुजान मुबान १३१ - ही इम अवस्या के लिए जिम्मेदार नहीं । तुम सब हो, सभी हो ।' कहते- कहते सुजान आनन्द की ओर चली । मन्दिर मे उपस्थित नारी समुदाय हिचकियां भरने लगा। पुजारी के नयन भी सजल हो गए । भीड़ में नादिरगाह के गुप्तचर भी खड़े थे। वे आनन्द की खोज मे थे माही खजाने का पता रंगोले शाह का मीरमुंशी आनन्द ही जानता था एक महीने से चारों ओर की खोज इस देवालय में पाई । खबर हुई और पलक मारते ही देवालय का प्रांगण खड्गधारी सैनिकों से घिर गया। मन्दिर में खलबली मची । एक बलिष्ठ सैनिक आनन्द के पास आया । हाप के झटके से सुजान को किनारे करते हुए आनन्द को डॉट बताई- 'सच-सच बोलो, शाही खजाना लाल किले में कहाँ है ? आलमहीरा कहाँ है ? चलो हमारे साथ ।' सैनिक ने आनन्द का हाप पकडा ही या कि मटके से उसने सैनिक को अगिन में पटक दिया और छाती पर चरण रखते हुए गरजा-' 1-'पहले तुम बताओ मेरी सुजान कहाँ है, फिर मैं तुम्हें गाही खजाने का पता बता दूंगा।' दूसरे कई सैनिको ने तलवारें निकाल मी, किन्तु वह सैनिक लेटे-लेटे ही सबको रोकते हुए बोला, 'तुम पांव हटा लो, मुझे उठने दो। मैं यहीं तुम्हारी सुजान को दिया दूंगा।' कानन्द ने उसके वक्ष से परण हटा लिया सुजान कांप उठी । हाय भग- वान् ! अब क्या होगा? पहले तो वह आनन्द के इस पराक्रम पर मन ही मन विस्मित हुई थी और अब यह सैनिक उसकी पहचान भी करा. एगा। बड़ा भयंकर दृश्य होगा। वह नहीं देख सकेगी। धीरे-धीरे नारियों की भीड़ मे से खिसक कर मन्दिर के प्रकोष्ठ में आ घड़ी हुई। हृदय धर-धक् कर रहा था। सैनिक ने इधर-उधर नजर दृष्टि दौड़ाई। मुजान न दियो । मानन्द हंस पड़ा-'अरे बावरे ! जिसे मेरा अन्तर नहीं दे पा रहा है चमे म्लेच्छ क्या दूंढ़ेगा ?' एक अधेड़ दाढी वाले सैनिक ने प्रोध मे महा-- 'हमे किसी को सुजान से क्या मतलब हमें तो उर पर पर बाहिर । जानन्द बड़ी जोर से हंसा--'रज रज रज' महा।
१३४ सुजान सुगन्धित किया गया । बड़ी भीड़ एकत्र हो गयी। सुजान सज-धज कर आँगन में आई तो सभी चौंक उठे। बहादुर सिंह कुछ न समझ सका । नन्दू से तो दृश्य देखा ही न गया। इतनी भीड़ में सभी सजल नयन । सुजान आनन्द के समीप आई। हाथ में सिन्दूर की डिब्बी थी। उसने आनन्द का कटा दाहिना हाथ उठाकर उँगली में सिन्दूर डुबोकर अपनी मांग में लगाया और चरणों पर मस्तक रख दिया। उसके अनन्तर अविरल अश्रुधारा के साथ पुनः हवेली में वापस गई और कुछ देर पश्चात् लौटी तो विल्कुल बदल गयी थी। मांग का सिंदूर पुछ गया था । धवल साड़ी। ठाकुर चीख पड़ा-'मालकिन !' 'ठाकुर ! भारतीय विधवा का यही शुभ्रवेश है । अब देर न करो।' उद्यान में ही संगमरमर की समाधि बनी । सुजान ने भी अपने हाथों का सहारा दिया । कई दिनों तक गीता का पाठ हुआ। सभी ब्राह्मणों ने आनन्द की तेरही में भोजन किया। दीन-दुखियों को भी दान किया गया । जैसे एक लम्बी कहानी खत्म हो गई। दूसरे दिन ठाकुर ने वे सारे कागज-पत्रादि लाकर स्वामिनी के समक्ष रखे जो आनन्द ने दिये थे । सुजान लेटी थी, उठ बैठी, ध्यान से देखने लगी । सुजान के वियोग में आनन्द का लिखा बृहत् काव्य । सारे पत्रादि उसने एकत्रित किये । तब तक उसकी दृष्टि कुछ दस्तावेजों पर पड़ी। वह चौंकी। 'मालकिन ! सरकार ने वृन्दावन, वरसाना और गोवर्धन की जागीर, दिल्ली की दो हवेलियां और मथुरा के चार भवनों को आप के ही नाम कर दिया है । इन सब पर सरकारी अमलों की मुहरें लगी हैं।' ठाकुर ने बड़ी शालीनता से सुजान को आश्वस्त किया । 'परन्तु, ये सब मैं क्या कहेंगी?' 'मालकिन ! सरकार ने मुझे बुलाकर एकान्त में कहा था कि आप कभी न कभी अवश्य आएंगी और आनन्द अपने होने वाले राजकुमार का नाम 'भरत' रख गए हैं ।' ठाकुर बोला ।