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Patrimargpardipika

Dutt, Newton.m. · 2010/04

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Front matter

सुद्रक और प्रकाशक- खेमराज श्रीकृष्णदास, मालिक-"श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस, बम्बई. पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार "श्रीवेटवर" क्याम्ममवापर है।

(४) भूमिका । इस ग्रंथका सभम अधिकार मैं प्रसन्नतापूर्वक श्रीमान् मान्यवर सेठ श्रीकृष्णदासात्मज-खेमराजजी "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेसाध्यक्षको देता हूं कि जिन्होंने इस भन्थको परम प्रसन्नतासे सुन्दर छापनेका आग्रह दिखाके मेरा उत्साह बढ़ानेकी उदारता दिखायी, इसका मैं उन्हें धन्यवाद भी देता हूँ। भवदीय- ज्यो. श्रीनिवास महादेवजी शर्मा : - .. - रतलाम, भूमिका । पाठक महाशयो ! जिस सर्वमान्य वेदचक्षु ज्योतिषशास्त्र के द्वारा मनुष्योंका भूत, भविष्य, वर्तमान, शुभाशुभ फलज्ञान, जन्मपत्र द्वारा होता है, उसी जन्म- 'पत्रके गणितके प्राचीन तथा अर्वाचीन अनेक ग्रंथ प्रस्तुत हैं परन्तु विशेष 'परिश्रम व परिज्ञान विना उन ग्रन्थोंसे सर्व साधारण तथा विशेषकर बालकोंसे भलीभांति सुगमवापूर्वक गणित नहीं हो सकवा, यही सोचकर मेरे परमपूज्यपाद पिताजी श्री श्री ६ श्रीदैवज्ञवर्य, श्रीमहादेवजी महाराजने अनेक प्राचीन अन्योंका सारांश लेके थोडे ही परिश्रमसे भलीभांति जन्मपत्रका गणित बनाने के योग्य हो जाय ऐसा यह “पत्रीमार्गप्रदीपिका" नामक छोटासा ग्रन्थ निर्माण कर अपने द्रव्यसे मुद्रित कराकर विना मुल्य विद्वज्जनोंकी सेवामें समर्पण किया था किंतु ईश्वरकी रूपासे थोड़े ही दिनों में इसका इवना आदर जनसमुदायमें हुआ कि कई यन्त्राधीश उपयोगो समझ छापनेके लिये आग्रह करने लगे, परन्तु मेरे पूज्यपाद पिवाजीने श्रीमान् खेमराजजी सेठसे अधिक स्नेह होनेके कारण उन्हींको छापनेका स्वत्व दिया, जिसकी आजतक कई आवृत्तियां छप चुकी हैं सो पाठकोंको विदित ही है. इस ग्रन्थको भाषाटीका करने बाबत मेरे कई मित्रोंका कितने ही दिनोंसे इस प्रकारका आग्रह था कि यदि ऐसे उपयोगी गन्थकी पूर्ण रीतिसे भाषाटीका बनायी जाकर इसमें अन्यान्य आवश्यक विष- योका समावेश भी किया जाय तो यह ग्रंथ बालकोंको विशेष उपयोगी होगा, ऐसी २ कई प्रकारकी उत्तम उत्तेजनाओंसे उत्तेजित हो आज मैं ( अल्पज्ञ) इसीका सरल हिन्दीभाषाटीका उदाहरण तथा आवश्यक आवश्यक स्थानोंकी टिप्पणी, और भी जिन उपयोगी विशेष कोष्ठकोंकी इसमें आवश्यकता थी। उनका भी समावेश करके आप लोगोंके दृष्टिगोचर कानेको उद्यत हुआ हूँ , सो, इसमें कहीं दृष्टिदोरसे वा लेख प्रमादसे किसी प्रकारकी त्रुटि रही हो तो विद्वज्जन कृपादृष्टि से सुधारके अशुद्धियोंमें हास्य न करते शुद्धार्थ से सन्तुष्ट हो मेरे परिश्रमको सफल करेंगे यही सविनय निवेदन है ।

F - (६) पत्रीमागप्रदीपिका। तीसरा भाग देना, लब्ध आवे वह पलादिक ध्रुव जानना ( स्वदेशोदयको ३० तीतका माग देने से स्वदेशोदयका पलादि ध्रुव और लंकोदयको ३० का भाग देनेसे लंबोदयका पलादि हो) उदाहरण। रनपुरस्यदेवोदयाः रतलामशहरके मेषराशिके स्वदेशो दयदल २२७ के ३० तीसका भाग दिया लब्ध ७॥ ३४ आया यह मेष सि.,३४० . राशिका स्वदेशोदयका पलादि ध्रुव हुआ इसी प्रकार मेषराशिके लंकोदयपल २७८ के ३. तीसका भाग दिया,लब्ध ९। १६ आये, यह मेराशिका लकोदयका पलादिक ध्रुव हुआ, इसीतरह स्वदेशोदय और लंकोदयकी बारह हो राशियोंके पलादिक ध्रुव जानना ॥ १ ॥ रतलामके लंकोदयाः चरखंडा: में.। २७८ मी. म.२२७ मी. यु. २९९/ कुं. पृ.२५८ कुं. मि.३२३ म. मि.३०६ म. क. ३२३ घ. १७ क.३४० ध. सि.२९९ पृ. ४१ क. २७८ तु. ५१ क.३२९ तु. कमसे उत्कमसे सिं. अ. मे० मी. मि. २ सु. ty १ bar ६ ८ ९ ११ m/m "८ ११ ८ १० ५८ ३४ - १२ २० ५८ २० २० १२ ३६ स्वदेयोदय पलादिध्रुन लेकोदय पलादित्रा ९ ९ ९ ९ ९ ५८ ४६ १६ ६ ५८ ४६ ५८ १६ ६८ अथ लग्नदशमपत्रसाधनमाह- स्थापयेत्वं क्रियारंभे ततः स्वध्रुवकान्वितम् । निरयनं भवेत्पत्रं लग्नस्य दशमस्य च ॥२॥ अब लग्नपत्र दशमपत्र बनानेकी रीति कहते हैं-मेषराशिके आरम्भमें (मेषरा शिक० शून्य अंशके नीचे) तीन शून्य लिखना, अनंतर स्वेदेशोदय और लंकोदयकी मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, आदिक राशियोंके पलादिक ध्रुव क्रमसे युक्त करना सो निरयनलमात्र पशमपन हो ( स्वदेशोदयकी मेषादिक राशियोंके पलादिक ध्रुव युक्त करनेसे लग्नपत्र और लकोदयकी मेषादिक राशियोंके पलादिक शुत्र युक्त करनेसे दशमपत्र होता है ) ॥ २ ॥ उदाहरण। नीचे लिखे चको भेषराशिके आरम्भमें तीन शून्य लिखके रत्नपुर(रका भाषाटीकासहिता। अब लम दशमसाधन कहते हैं-जिसमें प्रथम दशम का इष्टसाधन कहते हैं। सर्योदयसे-घट्यादिक इष्टमेंसे दिनाई हीन करना (निकालना ) शेष बचें वह दशमभावका इष्ट हो । दशमभाव और लममें छः राशि युक्त करनेसे सुखभाव और सप्तमभाव होते हैं ( दशम भावमें छः राशि युक्त कानेसे चतुर्थभाव और उपमें छः राशि युक्त करनेसे सप्तमभाव हो) ॥ ३ ॥ भांशजी सायनार्कस्य खागांको स्वेष्टयुक्तौ । कलाद्यास्तचैवघ्नाः स्युर्विपलाद्यास्तु संयुताः ॥४॥ तदल्पकोष्ठजी भांशी ग्राह्यौ लितादिका वियत् । अल्पेष्ट विवरात्यार्थान्तराप्तांशादिसंयुतौ ॥५॥ अयनांशादिवियुताल्लनं मध्यं स्फुटं भवेत् । सायनसूर्यकी राशिअंशके समान दशमपत्र और लमपत्रके कोष्ठकमें अपन अपना घट्यादिक इष्ट युक्त करना ( दशमपत्रके कोष्ठकमें दशमका इष्ट लमपत्रके कोष्ठको जन्मसमयका इष्ट मिलाना ) तदनन्तर सूर्यको कलाविक लाको सायन सूर्यकी राशिके ध्रुवसे गुणा करना, गुणन करके आये हुए अंकोंको इष्टयुक्त किये हुए कोष्ठकके विपलमें युक्त करना ॥ ४ ॥ उम इष्टयुक्त किये हुए कोष्ठको अन्य (न्यून) कोष्ठक जिम राशिअंशमें हो वह राशि मंश लेना, उसके नीचे कला विकला शुन्य शून्य लिवना, तदननर इष्टयुक्त कोष्ठक और अल्पकोष्ठकका अंतर करता, शेर अन्तरमै अल्प कोष्ठक और उसके आगेके (ऐप) कोष्ठक के अन्दरका भाग देता, लय आवे वह अंश जानना, शे। बचे उनको साठ गुगा करना फिर अन्तरका भाग देना, लार कला आये फिर शेषको ६. साठगुणा करके अनाका भाग देता, लम विकला आवे. ऐसे आये हुए अंशादि तीन फर्लोको इटपुत कोष्ठ कसे अचकोष्ठको आये हुर राशि अंशादिकमें युक्त करना ॥ ५॥ अपनांरा हो। काना सो लन और दरामभाव स्पष्ट हो । उदाहरण । श्रीगणेशाय नमः ॥ स्वस्ति श्रीमंवत् १९२८ शके १७९३ प्रवर्तमाने. ममांद-मावरुष्ण, पूर्णिमांव-फाल्गुनकृष्ण तृतीयायां भौमवासरे घ. २५ । ४९ शकमेसे पट चारसे चुम्मालीस हीन करनेसे अयनांश होते है । अयनाशों को स्पष्टसूर्य मनानेसे सायन सूर्य होता है। " श्रीगणेशाय नमः। अथ पत्रीमार्गप्रदीपिका । सोदाहरणभाषाटीकासहिता।. अथ मंगलाचरणम्., नत्वा श्रीशिवशारदागणपतिब्रह्मार्कमुख्यग्रहान् पत्रीमार्गप्रदीपिकां स्फुटतरां कुर्वे महादेववित् । यत्पक्ष हि घटन्ति शुद्धखचराः कार्यास्तु तत्पक्षकाः स्वव्यशोदययोः खरामविहृतौ प्राप्ताः पलादिध्रुवाः ॥ ३ ॥ नत्वा श्रीगुरुपत्कर्ज गजमुखं साम्यं शिवं चाच्युतं पत्रीमार्गप्रदीपिकासुविवृति कुर्वे सता प्रीतये । पाराशर्यकुलाभिजावगणकोऽहं श्रीनिवासाभिधो विद्वन्मंडितरत्नपूर्वसतिकृच्छ्रीपाठकोपाह्वयः ॥ १॥ निर्विघ्नत्तासे ग्रन्थ समाप्त होने के अर्थ यंयकर्ता प्रथम गुरु गणेशादिदेवोंको नमस्काररूप मङ्गलाचरण शार्दूलविक्रीडितवृत्त के पूर्वा से करके ग्रन्थारम्भ करते हैं- श्रीशिवजीको, सरस्वतीजीको, गणपतिजीको,ब्रह्माजी और सूर्य को आदिले नवग्रहोंको नमस्कार करके महादेव ज्योतिर्वित अत्यन्त सरल पत्रीमार्गप्रदीपिका (जन्मपत्रीके मार्गको प्रकाशित करनेकी प्रदीपिका ) नाम ग्रन्थको करता है, आर्यबह्मसौरादिपक्षों से अपने देशमें जिस पक्षके स्पष्ट यह वेध करनेसे हक्- तुल्य होते हों उसी पक्षके स्पष्ट यह करना, स्वदेशोदेय और लंकोदयोंके ३० १ भाषाकार विनविच्छेदार्थ मंगलाचरणरूप गुरु गणपतिको प्रणामपूर्वक भाषारचनाका भयोजन तथा अपना गोत्र और निवासस्थान कहता है- श्री ( शोभायुक्त ) निजगुरु ( महादेवजी ) के चरणकमल और गजमुख (गणपति) पार्वतीसहित शंकर और लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्को नमस्कार करके पराशरकुलमें उत्पन्न हुँमा ( पराशरगोत्र ) पाठक ऐसे उपनामसे प्रसिद्ध विद्धन्मंडलीकरके सुशोभित रत्नपुर (रतलामशहर) में निवास करनेवाला मैं श्रीनिवास गणक (ज्योतिर्विद् ) सज्जनों के प्रसन्न होनेके अर्थ पत्रीमार्गप्रदीपिका ग्रन्थकी भाषाटीका करता हूँ॥१॥ २ गणेशदेवज्ञः-"लंकोदया विघटिका गजभानि गोदनाविपक्षदहनाः क्रमगोत्क्रमस्थाः। झीनान्विताश्चरदलै क्रमगोत्क्रमस्यैर्मेषादितो घटत उत्क्रमतमित्वमे स्युः॥१॥" - सीपी सूर्यप्रध्य भामांतरं तन्मय वेदशा. सूर्यमय राहतरं तन्मध्ये विदशा. मंरा गोश श jaरा। गु दु। केशरच मं| १ मा. ७.२८/१६/१९१७ ७२१.६ /१०/१८/१२/२१५/१८/२४ २६ २७ २८ दि. २१५/१८/५७/५१ २१ १८३०३६/१२/१८/५५/५४ ० १२/०५८ घ. . . ० ० ० ० . - ० ० ० . . . . सूमर गुवरं तन्मध्ये विदशा. सूर्यमध्य यंतरं तन्मध्ये विदशा. काश र २ ०० १५/२०१६/२८/१४/२४॥ १६/१२४ १८/१९१२७ १७/२८/१९ २११५/दि. २४१३६१४८/४८ ४८/१२ ०१५/३०५७ २८३६ घ. ० O ० ० . . . a . . . ० . ० . . । . . ० ० सूर्यमध्ये त्वतरं तन्मध्ये विदशा -२ स्यमध्ये धुधातर तन्मध्य विदया. युकेशचंरा गुग के र चम १ O ० ० . ० 0 ० . . . . . १ ० . . . ० १ ० ० (१३/१७/२१/१५/२५/१०/२५/१०/१८/७/२१/६/१०/७ १८/१६/१९/१७/दि १८/३०/५१/५/४८२७१२१ .१८/३०/२१ ५४,४८/५७/५२/घ. . सयंमध्ये भावतरं तन्मध्ये विदशा. चंद्रमध्ये चंद्रांतरं सन्मध्ये विदशा, गुपूके। चं। में १ १ १० १ १/०मा १८ ०२११२५१२८१२७१२२२१२५/२७/१५/१०/२७ / १२ / १७/२०१५/दि' ३० ३०/३० घ. 01.प. चंद्रमध्ये भीमांतर तन्मध्ये विदशा. चंद्रमध्ये रातरं तन्मध्ये विदशा. . में रा गुमा रचरा गुश २ ३ १/२मा. १२।१।२८३/२९११२ ५/१०/१७२२॥ १२१२५/१६ १ १५/५५/१५ ३०३०० . . ० ० . . ०० D ० . . . . . ० ० ० . ० ० . . . . . . . . ० ० . ०० . . . . । चंद्रमध्ये गुर्वतरं तन्मध्य विदशा. चंद्रमध्ये शन्यंतरं मध्ये विश्शा. गुगबु का शुर ग| शदु के शुर चं . १ ४१६/८/२८/२०/२५/१०/२८११२०/३०/३५१२८१७ १५/१५/१५ . . . . . . ० . . . २ .

भापाटीकाराहिता - . क ०० . . . . . . . . भौममध्ये चंद्रातरं तन्मध्ये विदगा। रामध्ये गइवरं तन्मध्ये विदशा। चंम रागुश सुकेर १ १७/१२/१२८३ (२९ ११२/५१०/२५/९ ३११७/२६/१२/१८/२१२६/दि. ३० ४८ ३६५४४२४२ ०/प. गहुमध्ये गुबवरं सन्मध्ये विदशा। रामध्ये शन्यंतरं तन्मध्ये विदशा। गु चं शुर च। मंरागु ट ११५४(मा. २५/१६२१२०/२४/१३/१२/२०१९ १२.२५/१९/२११२१/२५/२९/३/१६ दि. १२१४८.३४/२४/० २४३६१२७/२११५१ . १८/३०/५१/५/४८घ. 0010.प. राहुमध्ये बुधर्मातरं तन्मध्ये विदशा। राहुमध्ये केरवंतरं तन्मध्ये विदशा। बुके चं में रा चं। मं रा गुशबु १ ४ ए १९११ मा. १०२३३ १५/१६/२३ १७/ २ /२५/२२ १८/१/२२ २६२०२९२३/दि. ५४/३०/३३/१२/२४१२१३ ५४३०३ ४२/२४/५१३३ घ. ० ० . ० ० ० . . . . . '... . . . . ० . . . . . गहुमध्ये शुक्रांतरं तन्मध्ये विदशा. | राहमध्ये सूर्यातरं तन्मध्ये विदशा. च मंरागु शकेर १ १ १ ०१मा. ३/१२/२५/२१/३२२७/२७११८ १८११३ /२१/१५/१८२४ दि. ३६/१२/१८/५४५४०/घ. ० . . . . . . . ... . . . . . राहुमाये चंद्रातरं तन्मध्ये विदशा. राष्ट्रमध्ये भौमांतरं तन्मापे विदशा. रागुशबु के शुरचं १ २०११ मा. २७/२२/१६/२०/२९/२३/२२/ ३१८१/दि. ३०/३०/३० ०५४३० घ. . . ololol. # गुरुमध्ये गुर्वतरं तम्मध्ये विदशा. गुरुमध्ये शन्यंतरं तन्मध्ये विदशा, गुशबु के शुर में राश केर मय) ३ ३ १ १ ३ १४ २५ २४ ९२३६१ १५/१६/२३/१६ दि. २४३६.४८१४८/10 ४८१२१२४ १२ १२० ३६/०२५८३६/घा ० . . . . %3 ४ ४ १ ८ 0 ० . . . ० । भाषाटीकासहिता। (७. ग्राम) के स्वदेशोदयका मेषादिक राशियोंका पलापिक ध्रुव क्रमसे युकं लिया इसलिये यह रतलामका लगपत्र हुआ, इसी प्रकार जिंस यामका लनपन करना हो बस ग्राम स्वदेशोदयके पलोदि धक्के युक्त करनेसे उस ग्रामका लग्नपत्र हो बायगा और लंकोदयका पलादिक ध्रुवयुक्त करनेसे सर्वदेशका दशमपत्र हुआ। इयं रत्नपुरे लग्नपत्रनिरयनपलभा ५१८ चरखंडा ५११४१।१७ 11५/६/१,२३,१४,१५ १११/२०२१२२२२६/३५/२८,२०६२ . ३७४५५२१० १५२१३०३४६५११६२३३१३४६५१६२४३१३४. DMC४१196 १४२०३६०१४४८२२५६०८१२४६२०,५४२८२३६१०४४/१९५२,२६३४ . १४५५५५५५५६६६६६७७७७७७७७७७ (४७५५१२२१३०३४७५५४११३२१३०३८ ७५६१४/१३२१३०९०५६/०२२३०३९०५६.. १२.३५२४८२.६२४८२०३६.२४०२५-३६२00३६.२०२५ 441010/10/200.000000१११११११११२१२/१२१२१२/2016 मि. ५,५५२५३५४५५६६/१२६३६७५७७१७२७३४०५०८१८२९३९४९५९/२०३०४०५० 0120 १२२४१६/४००१२२४३६४८०/१२,२४३६४०.१२२४३६,४८/१२,०४३६,४००/१२२४३६/१२ ३३३/१४,१४/१४१४/१५/१५१५१५/१५१६१६१६१६/०६/१६/१७१७१७१०१७/१८/22/20/- १,२२३६५६९३०/४१५३४९५२७३८४९७१२२३३५४६५५२०३१,४३५१५/७२८३ .२०४०.२०४०-२०४०/०२०/४०. ४०.1२०४०/०१०४०.२०/४०.२०/४०-२०४०२० सिं. 19८१९१९१९१७१११९२०२०२०२०२०२०२५२१,२१,२१,२२,२२,२२,२३,२२,२३,२३,२३२२३२३२४२४ २३२५३६४७५९१२१२३४४५५७१८३९४१५२१५२६३७४९/019१,२३३४४५५७८९७ ५१२००/- . ०२०/४००२०/10०/२०४०.२०४० ०२०४००१२०/४००३०/४०/-/२०४०२० २४२४२०२५२५२५२५,२५,२५२६२६६२६२६२५२०२५२५२५२५२०२८२२८२०२९/२९२९२९/२९/. । ३१,४२५४१५३॥ २० ४१५५२६३७४० ३२४३५४५१६२७३९. ४४४२४०३८ ०३९,२६२१२२/२०७०/१६७४/१२/१०८१६/१२/५० " १३.३०३१३१३१३१३१३२३२३२३ ३२५४५/१६२७३/१२२३३४/५५६१७२०३१५०/५/१२२३/३/०५५६१०. ५२१५० ४८४६४.२४०३०४३२३०,२८२६२४२२/२०१६/१४/१२/१०६८/ ६७५ ३८३८३० . ४०४०४०/४०/४०. २९,४०५१,३१४२५३७,४८,५९११,२२३३, ५६७१९३०४१ ४/११/१७ ४११२३३५४६५" २001020100२०४.'12050.२०/४०-२०४००/२०४०२०/४००/२०/४०)000४०२० ४४२४२४२४२४२४३३४३४४३३ ४०,४४४४४५४५४५64/४३४६४६४६. २०४३५१५१७१८३९५१:२१३२५३६४७ २१३३४४५५७१८२९,४१,५२३१५२६३७११ २०.l. 01/0/0/२०४००२0/0/0/२०४०/०२४/०२०४०/०२०/४०/०२०/800२०१०:२० ४६६४४८४८४८४४८४८४९४९४९,४९४९४९५०५०५०५०५०५०५१५१५१५१५/- ४९५१९१२५४०५०.१०२०३७,४१५१०११,२२३२४२५२२३३१४२४३४. •१२२४३१ci.१२,२४३६, २३६८२२४३६४१२२४३६४१२२४३६४८३ ५१५२१५२५२५२,५२५२५२५३,५३,५३,५३५३५३,५३,५१ ५५३२२०२१८६५५२/१२२७२८ .१०२,४८०२४-३६१२४०२४.५६५२४८२४. ५५५५,५५५५५५५५५५५५. १४७५५८ २२४३६११,४८२४३६ ५१,५१५९५९५५. मो .५६५६५५७५५५५ २०२८३५५०५०५४४२८३६५.५६२, .१६५०५५८० मानवाया। --- शनिमाये गंद्रांना TET विभा. निध्य मीमांतरं सन्मध्ये विदशा. কা कारचे २ ०११ मा. २ ० . । . ८ १२.१०३१११६३०५१५ ६०1३0110 . . C . व . R । शनिमाय रातरं समाये विदार शनिमय गुर्वतरं माप विदशा. ग का शर। मं/रा २ १२/२/४ मा. ३।१६/१२/२५/२१/३१२१२२५२९ श १३ १५ १६ १३/१६ दि. ५४/८/२७/२१.५. १८ ३० ५१३६ २४ १२/१२/० ०१२९४८ घ. ५ १ -- . 16101. . ० . - a . . . . - ४ . . ० 0 ३. . र धमाप पुर्धातरं तन्मध्ये विदया। पुधमध्ये कत्वंतरं तन्मध्ये विदशा। मेर चं| मराया। ४ १ ३ २२०२४/१३ /१२/२०११०२५:१०३-२९/१७/२९/२०/२३/१७२६२०/दि. ४२४३०२१११५:४ ०३०३० प. सुषमप्पे शुक्रांदर सन्मापे विदशा. बुधमध्ये सूर्यातरं तन्मध्ये विदशा मेरा गुश के शु। १ ०११मा. १६१२१२५/२९१५/२५/१७/ १५/१०/१८/१३ १७२/दि. ३०/३०/३०१२८१३०५१,५४४८/२७/२१५२.प. ०1०1०1. धमापे चंद्रांतरं यन्मग्ये विदशा। सुषमम्मे भोमासरं तन्मापे विदशा। बुकेशर रा २ 01.मा. १५/२९/११/८/२०१९/२९/१५:१५/२०/२३/१७/२६/२०/२०/२९/१७/२९/दि. ०३.४९:३३/३६/३१ ३४४९.३०/५१४५थ. .:३०/३०/३० 0/1प. . ० . . . . . .. . . . . . उपमये पईसरे बम्मने विदया। रागुशुर में ५।१२।१ मा. १७.३३५/२०१२३३१५/१६/२३ दि. १ . . . प.

---- (८) पत्रीमार्गप्रदीपिका । अंथ निरयनदशमपत्रचक्रम् । रा. . २ N A - - -. . . . क . . मे. ११,१२,१३:१४,१५,१६ 000000२२२२.२३३३/ 3.5९.२०१६ १८२०३७४६५५४११४.२३,३ ०१६३२४ ४८४२० ८२४, ५६१२ १६३२ १२,२०७४ - . . . .. . . . ४ . - . . ८ वृ. । १ ३८४०५७,७१७२०३७,४७५७,७१७२७,३७४७५७.४१७७३०४० । ४६ ४४/४२,४०३८३६ ५८५६५ ४ ० 1 : १ मि. । . . । . क. ९/९/१०,१०,१०१०१०११,११,११,११,११,११,१२,१२१२१२,१३१३:३१३ ३७,४७५८९,२०३०४१,५२,३१३,२४३५४६५६७५८९९४०,५०, १९९१ ५५.६३६२०३ ४४०२६,१२५० ०५६.४१२८20 १५,१५,१५,१५ १५.१५,१६,१६१६१६१६.१६१०,१०,१७१.१.१८१८१८,१८१८१८१९१९ १९.११.२०२ 1 । । । । 11 ०६०२१३२४३,५३ ४१५२६३६ ११५३ १६३५ °१४६,३२.१८४५०३६,२२, ८१४४०२६,१२,१८३३०६/२९४८ २६४२.२०१४ २०.२०,२०.२१११२११२१,२१२२२ . ४० 10 4- सिं . २ क. ५६५४,५२५०,४८,४६,४४४२,४० ३८३६ २६ २४६२२०५८.१६१४१२१०८ २५२५,२५२५,२५,२६२६,२६/२६,२६२६ २७ २२३१४०३९५९८१७२६३६,४५५४३/१३,२२३१४७,५०५९ ८८२' १३ ५२. २४,४०५६१२१८४४०१६ ४८,४२०३६५२८२ १२.२० । . tit- १६ - , तु. । ६ - 1 ०९/१८२७,३७४६५५४१४२३ ३२४१५१,०/९:१९८३.६५६५५०२३३३ ५१०/१०१९२८९ ०१६३२४८४२०३६५२८२४,४०५६१२२०४०१६३२४८, ४२० ५६१२२८४ ર૦ર૮૮-ર૪૩ ३८४७५७,७११७.२७ ३७.४७५७७१७२७३७८७५७७१७२७३०८७५७ ०५८५६५५ ५२ ५०४८४६,४४४२ १०३८६६३४३२ २८२६२४२२,२०,१८१६ १२१० ७७ वृ. । २७ ।। 1| ! । 1 . ध. -- । ८ . । 6 ।' . ५४४० • ३९३९३९४०४०४०४० ४०४१,४१४१४१४१,४१,४२४२४२४२,४२४३,४३,३,४३४३,४३ ३७,४७५८, ९,२०३०४१२२३ १३ २४३५४६५६७ १०२९४०५०४१२२३३३४४.५५.६/१६२०३१ ० '४६३२ १८४५०३६ ६.२२ ८ ५४४०२६१२५८४४३०.१६२४८३४६०६५२ २४१०५६,१२,२००/ ४५ ४५४५४५ ४५४५,४६४६४६.४६.४६ ४६.४७,४७ ४७४७,४७,४८४८४८४८४८८४९४९४९४९ ० १०२१३२४३५३, ४ १५२६३६४७५८ ९ १२ ३९ ४६३२१८,४५० २६ १२५८४४३०१६, २५८३४२०६५२,३८२०२०५६,१२ ५० ५०,५०,५०५१५१५१५१५१५१५२,५२,५२,५२,५२,५२,५३ ५३,५३ ५३ ५३,५५४५४,५४,५४५११४ २३३२,४२५२ २१२२२ ० ५८५६ ५४ ५२,५०४८४६४४,४२४०३८३६३०३२३० २८.२६ २४ २२/२०१८२६/१४१२ ५५५५५५,५५,५५५६५६५६५६५६,५६५७५७५७५७५७५७५७५८५०/५८५८ २२३१,४०,४९,५९,८१७२६३६,४५,५४,३१३,२२३१,४१,५०५९,१८१२७३६४५५५ १३ १६३२४८४ २०३६/५२ ८२४५०,५६१२२८४४ . २६३२४८ ४ २०३६.५२, ८.२४,४०५६.३२ अथ लग्नदशमसाधनमाह । R १० - १०.८ ६ व . मी. ११ - . तत्र दशमेष्टसाचनमाह- उदयाविष्टकालेषु युदलं हि प्रपातयेत् । दशमस्य भवेदिष्टं सारी ख गौ सुखांगने ॥३॥ --

श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमन्महादेवदेवाविरचित
वर्षदीपकम् ।
भापाटीकासहिवम् ।
नत्वा गुरुपदाम्भोज हेरम्बं शिवशारदाम् ॥
वर्षदीपकप्रन्थस्य नृभाषा विवृति लघुम् ॥ १॥
कुर्वे वै श्रीनिवासोऽहं बालानां सुखदेतवे ॥
यदवीनं ममाज्ञानाद्विवुधाश्च क्षमन्तु तत् ॥२॥
भाषाकार विघ्नविनाशार्थ गुरु गणपतिको नमस्काररूप मंगलाचरण करके
भाषारचनाके प्रयोजनपूर्वक क्षमापन मांगता है ।
श्रीगुरु ( महादेवजी ) के चरणकमलको, हेरम्ब (गजानन) को, शंकर और
शारदा ( सरस्वती ) को नमस्कार करके मैं श्रीनिवासशम्मी वर्षदीपथकी
बालकोंको सुखसे बोध होनेके लिये लघु ( छोटीसी) भाषाटीका करता हूँ इसमें
यदि मेरे अज्ञानसे जो कुछ क्षति रही हो उसे पंडितलोग वारंवार क्षमा करें
यह प्रार्थना है ॥१॥२॥
प्रथम शिष्टाचारपरिपालनार्थ और निर्विनवासे ग्रन्थपरिसमाप्त्यर्थ ग्रन्थकती
स्वेष्टदेवको नमस्काररूप मंगलाचरण करते हैं ।
श्रीगणेश गुरुं नत्वा शुद्धां श्रीभुवनेश्वरीम् ॥
महादेवं महादेवः कुरुते वर्षदीपकम् ॥१॥
श्रीगणेशजीको, गुरुजीको, शुद्धस्फटिकसदृश निर्मलस्वरूपा श्रीभुवनेश्वरी-
जीको और शंकरको नमस्कार करके महादेव ज्योतिर्विद वर्षदीपक ( वर्षके
गणिवमार्गका प्रकाश करनेवाला दीपक) नाम ग्रंथ करते है।॥१॥
प्रतिवर्षे जन्मग्रहोदयात्पूर्व जानीयात् ॥२॥
वर्षवर्षमें जन्मके इष्ट वार ग्रह लमादि प्रथम जानना ( हरवर्ष बनानेके
समय जन्माक्षरमें लिखे हुए जन्मका वार इष्टघटी स्पष्टसूर्य लम आदि पहले
जानके वर्षके माणितका आरम्भ करना) ॥२॥

भाषाटोकासहितम् । (९५) सन्ध पल आयें शेष बचे उसको ६० साठ गुणे करना और ८०० आठसोका भाग देना लब्ध विपल आवे ऐसे ८०० का भाग देके वार घटी पलविपलात्मक चार फल लाना उनमें जन्मसमयके वार इष्टपटी पल विपलादिक युक्त करना वर्ष प्रवेशके वारादिक हों)॥६॥ शिवना गताब्दाः स्वखादीन्दुलवाट्या जन्मतिथ्यन्वि- तास्तेष्ठ खाग्निशेषेऽब्दवेशतिथिः ॥ ४ ॥ ग्यारह गुणे किये हुए गताब्दोंमें अपना १७० एकसौ सत्तरवां भाग युक्त करना और जन्मतिथि मिलाना तीस ३० का भाग देना शेष बचे वह वर्षप्रवेशकी तिथि जानना (गताब्दोंको ११ गुणे करके २ जगे लिखाना एक जगे १७०का भाग देना लब्ध आवे वह दूसरी जगे युक्त करना उसमें शुक्लपति- पदाको आदि ले जन्मतिथिकी संख्या मिलाना ३० तीतका भाग देना शेष बचे वह शुक्ल प्रतिपदाको आदि ले वर्ष प्रवेशकी तिथि हो) ॥ ७ ॥ : क्वचिद्भूने भूयुते वा ॥ ८॥ कोई समय गणितसे लायी हुई वर्षश्वराकी तिथिके दिन वर्ष प्रवेशका वार नहीं मिले तो आयो हुई तिथिमें एक घटा देना वा एक युक्त कर देना (तिथिसे वर्षप्रवेशका पार पीछे हो तो १ घटा देना आगे हो तो १ मिला देना)nen जन्माकौशादियुग्बातोऽब्दप्रवेशनिर्णयः ॥ ९ ॥ इत्यन्दप्रवेशाध्यायः ॥२॥ • जन्मसमयके स्पष्टसूर्यको राशि अंशके समान राशि और अंश और वर्षम- वेशके वारसे वर्षप्रवेशका निर्णय जानना (जन्मके सूर्यके राशि अंश और वर्ष- प्रवेशका वार ये तीनों जिस दिन मिलें उस दिन वर्षप्रवेश होगा)॥९॥ " उदाहरण। स्वस्तिश्रीसंवत् १९२८ शके १७९३ प्रवर्तभाने अमांतमाघकृष्ण ३ तृतीया परं '१. चतुर्थी भौमवासरे चित्रानक्षत्रे श्रीसूर्योदमा दिष्टयठ्यादि.५६,। ४८-१८-स्पष्टार्क-३०।१६।५३ ॥३९ । ल०९।२३॥ २८ ॥ २९।

पत्रीमागप्रदीपिका। पर ४ चतुर्थी हस्तनक्षते ५. २९ । ९ परं चित्रानक्षत्रे, गण्डयोगे घ. ४४।५ बाळकरणे एवं पञ्चाङ्ग शुद्धाव. देवसे श्रीमन्मार्तण्डमण्डलाझेदयादिष्टघटी ५६ शंख ४८ विपल १८ स्पष्टाक ३० । १६॥५३॥३९ लग्न ९! २३ समये ज्यो नौनिवासशर्मणो जन्मसमयः । दिन मानम् २८१५० अयनांशाः २२।२९।। रतलाममें वथा रतलामके समीपके ग्रामोंमें सौर पक्षके स्पष्टंग्रह ग्रहवेधसे हक्तुल्य मिलते हैं इसवास्तो सार पक्षके स्पष्टग्रह ग्रहलाघवाख्य करणग्रंथ से कियो। ग्रंथगताब्दाः ३५१ चक्र ३१ अधिकमास ६-मास्य- गण १३६ ऊनाह ६४ अहर्गण ४०३९. अथ जन्माङ्गम्. सं ८ के ६ १ ३ سم ८ .. इमध्या:सद्यः अथ स्पष्टाः खेटा: ड. रा .. शु ...ई. मं. गु. शु..रो. के. २ १० ९ १ ६५ ३. २२/२५/१२/ २३ /२/६/२३ १६ ३९ ३९ | ६ | १० १२|२४|२५ ४०/३१३. ४०/ २.४४:५३. १९ ४३/२६४८/४०४० ११ ४३ /४०३/४८ २३३१३१ २९/१७६४३५ १ ६०/८०५/४८/१०८/२x ५ |३४/३x १५८, २३ १९ १।२६। ४४ २६ २. ११।११ १ ८ लग्नसाधनका उदाहरण । स्पष्टसूर्य १०१६॥५३॥३९ में अयनांश २२।२९/० युक्त किया ११ १॥२२॥३९ यह सायनसूर्य हुआ, इसकी राशि ११ अंश ९ के समानलग्नपत्रका शोष्ठक ५७।२१।६ में जन्मसमय का घटयादिक इष्ट ५६१४८।१८ युक्त किया १४।९।२४ हुए इसकी विपलके २४ अंको सूर्यकी कला विकला २२॥३९ को सायनसूर्यकी११ राशि के ध्रुव ७३४ से गुणन करके आये हुए १७३ क युक्त किये ५४।९।१९५ हुए विपल ६० साठसे अधिक हैं इसलिये साठका भाग दिया लब्ध ३ आये ये ऊपरकी पलके अंक ९ में युक्त किये ५४ ॥ १२॥ ३१ । यह राष्ट्रकोष्ठक हुआ। इसके अल्पकोष्ठक लश्नपत्र में ५४।४।० दश (9 वाशि ११ अंशले कोष्ठक में मिलता है इसवास्ते १० राशि १५ अंश लिये इसके नीचे कलाविकला १० शून्य शून्य लिखनेसे १० । १५ । ।० हुए तदनंतर अलाकोष्टक ५४।४।० और इष्टयुक्त कोष्ठक ५४। १२ । १५ के अन्तर किया al८1१५ शेष बचे इस अल्पकोष्ठक ५४॥४। और इसके आगेका ( ऐज्य) भाषाटीकासहिता । (910 कोष्ठक ५४।१२।३६ को अन्तर ०८।३६ का भाग दिया परंतु भाज्य १५ भाजक ८३६ हैं इसलिये इनको सवर्णित करके भाग दिया भाज्य पिंड ४९५ भाजकापड ५१६ हुए भाज्यपिंड ४९५ में भाजकपिंड ५१६ का भाग दिया लब्ध ० अंश आया शेष ४९५ को ६० साठगुणा किये २९७०० हुए इनमें भाजक ५१६ का भाग दिया लब्ध५७कला आयी शेष २८८ बचे इनको ६० साठ गुणे किये १७२८० हुए इनमें भाजक ५९६ का भाग दिया लब्ध ३५. विकला आयी ऐसे अंशादिक फल तीन ०५७/३५ आये इनको ११११५०१० में युक्त किये १०।१५।५७।३५ हुए इसमें से अयनांश २२।२९।० होन किये शेप९।२३।२८।३५ बचे यह स्पष्टलग्न हुआ इसमें से ६छःराशि मिलानेसे श२३॥. २८१३५ सप्तमभाव हुआ । इसीप्रकार १० दशम भावका साधन किया. उसका उदाहरण भी नीचे लिखा है--प्रथम दशमभावके इष्टका उदाहरण-सयौं- दयसे घट्यादिक इष्ट ५६।४८११८ दिनार्थ १४२५/० दिनार्धको सूर्योदयसे इंष्टमेंसे हीन किया शेप १२॥ २३॥१८ बचे, यह दशमका इष्ट आया-तदनंतर सायनसूर्य ११४९।२२।३९ की राशि ११ अंश ९ के समाम दशमपत्रका कोष्टक ५६४५।२४ में दशमका इष्ट ४२।२३।१८ युक्त किया ३९।८१४२ हुए इसकी विपलके अंक ४२ में सूर्यको कला २२ विकला ३९ को सर्यकी राशि ११ के ध्रुव ९।१६ से गुणन करके आये हुए २०९ अंकको युक्त किये ३९।८।२५१ विपलमें ६० का भाग दिया लब्ध ४ को पलके अंक में मिलाये ३९।१२।११ यह इष्टयुक्त कोष्ठक हुआ इससे अल्पकोष्ठक ३९७६ राशि ७ अंश २७ के कोष्ठकमें मिलते हैं इसलियेराशि २७ अंश लिये, नीचे कला० विकला शून्य लिखी ७२७०० हुए-तदनन्तर अल्पकोष्ठक ३९॥ ७६ और इष्ट कोष्ठक ३९।१२।११ का अन्तर किया ०१५५ शेष बचे इनसे मल्पकोष्ठक ३९।७६ और इसके आगेका (ऐष्य) कोष्ठक ३९।१७१४ के. अन्तर ९१५८ का भाग दिया परन्तु भाज्य भाजक दोनों पलादिक अंकके इसलिये भाज्य भाजकको सवर्णित करके भाज्यपिंड ३०५ में भाजक ५९८ का भाग दिया लब्ध० अंश आया शेष ३०५ को ६० साठ गुणा किया १८३०० हुए इनमें भाजकपिंड ५९८ का भाग विया लब्ध ३० कला आयो ६ नानापन५1741 । - १२ शेष १६ बचे इनको ६० साठ गुणे किये ३१६०० हुए इनमें भाजक १९८ का.भाग दिया लब्ध ३६ विकला आयी ऐसे अंशादिक फल०३०३६ आये इनको ७१ २७ १०. ० में मिलाये ७ । २७ । ३० । ३६ हुए इसमें से अयनांश २२।२९० घटाये ७।५।१।३६ शेष बचे, यह दशमभाव स्पष्ट हुआ शकी राशि ६ छः राशि युक्त करनेसे १।५।३।३६ चतुर्थभाव हुआ ॥ अथ भावसंचितचक्रसाधनमाह- लगं तुर्यात्सप्तमात्तुर्यभाव शोध्यं राशिः पञ्चभिस्ताडितोंऽशाः । अंशामाश्चेदिग्धताः स्युः कलामा लग्ने तुर्थे पञ्चवारं प्रदद्यात् ॥६॥ तन्वाधाः संधिसहिता भावाः षट्पड्युताः परे । यदत्यारंभयोः संध्योरन्तस्थस्तद्तो ग्रहः ॥ ७॥ अम भावसंधि और चलितचक्रका साधन कहते हैं-लनको चतुर्थ भावमेंसे चतुर्थ भावको सप्तमभावमेंसे शोधना ( हीन करना) शेष राशिको ५ "पांच गुणी करना अंश होवे और जो अंश कला विकलाको दशगुणा करे सो कलादिक हो, ऐसे अशादिकको लग्नमें और चतुर्थभावमें (चतुर्थमेंसे लग्नको हीन किया हो तो लग्नमें, सप्तमभाव से चतुर्थभाव हीन किया हो तो चतुर्थभावमें) पांचवार युक्त करना ॥६॥ सो लग्नको आदि ले संधिसहित ६ छः भाव हों। इन " छभावों में छः छः राशि युक्त करनेसे शेष छः भाव हों । जिस भावकी अत्य ( आगेकी) और आरम्भ ( पीछेकी ) संधियों के मध्यमें (बीचमें ) ग्रह हों वे उसी भाव में स्थित जानना । अर्थात् ग्रह जिस भावमें स्थित हो उस भावकी आरंभ ( पीछेकी ) संधिसे न्यून हो तो गतमावमें स्थित हो और अंत्य ( आगेकी ) संधिसे अधिक हो तो आगेके भावमें स्थित होगा । यदि इन दोनों संधियों के बीच में हो ( आरम्भसंधिसे अधिक और विरामसंघिसे न्यून हो) को उसी भाव में ग्रह स्थित जानना ॥ ७ ॥ उदाहरण। लम ९ । २३ । २८ । ३५ को चतुर्थभाव १ । ५। १ । ३६ मेंसे हीन किया शेष ३।११ । ६३ । १ बचे इसकी राशिके अंक ३ को ५ गुणे करनेसे १५ हुए ये अंश हुए अंशादिक ११ । ३३ । १ को दशगुणे किये ३१० ॥ ३३० ११० ये कला विकला प्रतिविकलादिक हुए परन्तु ये कला;

भाषाटीकासहिवा। दिक ६० साठसे अधिक है इसलिये साठका भाग विकला ३६० में दिया शेष ३० विकला रही, लब्ध ५ कलाके ११० अंकमें युक्त किया ११५ कला हुई इसमें भाग ६० साठका दिया शेप ५५ कला रही लब्ध १ अंश १५ में युक्त किया अश १६ हुए इस प्रकार राशिको ५ गुणी अंशादिकोंको १० दशगुणे करनेसे अंश १६ कला ५५ विकला ३० प्रतिविकला १० आयी इनको लग ९ । २३ । २८ । ३५ में युक्त किये १०।१०। २४ । ५। १० ये दूसरे भावकी आरंभसंधि हुई इसमें फिर १६ । ५५।३०।१०. अंशादिक युक्त किये १०।२७।११।३५ । २० यह धनभाव हुआ धन- भावमें अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १० युक्त किये ११ । १४ । १५५ ३० यह तृतीय भावकी आरंभ संधि हुई इसमें अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १० मिलाये। १।१०। ३५/४० यह तृतीयभाव हुआ. तृवीय भावमें १६। ५५। ३० । १० युक्त किये०।१८।६।५। ५० यह चतुर्थ भावकी आरम्भसंधि हुई. इसमें अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १० मिलाये १।५।। ३६ । • यह चतुर्थभाव हुआ-इसी प्रकार चतुर्थ भाव ११९१३ ३६ को सप्तमभाव ३ । २३२२८३५ मेंसे हीन किया २ | १८२६३५९ शेष वचे इसकी राशि २ को ५ पांचगुणी और अंशादिक १८२६१५९ को १० दशगुणे करनेसे १३ । ४ । २९ । ५० अंशादिक हुए.इनको चतुर्थ भावमें पांच बार युक्त किये सो चतुर्थको आदि ले सप्तमभावपर्यंत संधिसहित भाव हुए, ऐसे लग्नादिक संधिसहित ६ छः भाव हुए, इन संघिसहित ६ छही भावोंकी राशिम छः छः राशि युक्त करनेसे शेष सप्तमभावको आदिले संधिसहित ६ भाव हुए- अथ रामधय द्वादशभावा । स स स २ स ३ स स २ २ 122 ६ २ २७ ३ १८ २४ २४ ५ ८ १ स स १२ स ३ ४ २७ १४ १४ २७ २४ ५ ५ ५ ३५ १५ ५ - - 6-- *. अथ न्वलितम्वनन् । ९९१मं. १२ 4६ (48) पत्रीमार्गप्रदीपिका। लन्मकुण्डली सूर्य २ द्वितीयभावमें स्थित है, द्वितीय भावकी आरंभसंधि १० । १० से सूर्य १० । १६ अधिक है और द्वितीयभावकी विराम (आगेकी) १.१ । १४ से न्यून है इसलिये यह सूर्य अंत्य आरम्भसंधिके बीचमें हुआ इस द्वितीय भावमें ही स्थित रहा. मंगल ११ । ६ यह तृतीयभावकी आरंभ- संधि ११॥ १४ से न्यून है इससे मंगल द्वितीयभावमें स्थित जानना ऐसे ही गुरु ३। ० है यह सप्तमभावकी आरंभसंधि ३ । ९ से अल्प है इसकारण ६ छठे भाव स्थिव हुआ, इसीप्रकार शेष सर्व ग्रह भावोद्भव (चलित) चक्रमें जानना । अथ क्षय-चय-फल-विश्वानयनमाह- भावतुल्ये ग्रहे रूपं संधितुल्ये तु निष्फलम् । के भावसध्यंतरेणाप्तं खेटसंध्यंतरं च यत् ॥ ८॥ भावान्न्यूनाधिके खेटे फलं वृद्धिक्षयाभिधम् फलस्याग्न्यंशको विश्वा यद्वा विशहतं फलम्॥९॥ अप क्षय चंय फल विश्वाआनयनकी रीति कहते हैं-भावके अश कला विकलाके समान ( बरोबर ) ग्रह हो तो पूर्णफल होता है, उस ग्रहका (910 10 फल जानना और संधिके अश कला विकलाके तुल्य (बरोबर) महके हों तो निष्फल होता है ( उस ग्रहका ०1०1० फल जानना ) न्यूनाधिक लो भावसंधिके अंतरका भाग देना । ग्रहसंधिके अंतरमें (ग्रह जिस भावमें स्थित हो उस भावसे न्यून हो तो उस भावकी आरंभसंधिसे ग्रह भावका अंतर करना ) और भावसे मह अधिक हो तो विराम ( आगेकी संधिके साथ शहभावका अन्तर करना) जो फल लब्ध आवे वह ॥ ८॥ भावसे ग्रह न्यून हो तो वृद्धि ( प्य ) और भावसे यह अधिक हो तो क्षयसंज्ञक फल जानना एकलका तृतीयांश (फलके तीनका भाग देना) विश्वा जानना अथवा आये हुए फलको बारह गुणा करना लो विश्वा हो ॥ ९ ॥ उदाहरण । सूर्य १० । १६ । १३ । ३९ यह द्वितीय भावसे न्यून है अतएव द्वितीय १ धरणीधर:-" न्यूनसंधिग्रहादावाच्छोध्यो भावाल्पके खगे ॥ तदग्रिमाच्च संशोध्यो ग्रहो - t G इसवस्तयाधिके । " इति भाषादीनासहिता भावकी मारंभसंधि १० १७०२४ ५से अंतर किया १६॥ २९॥३४ यह ग्रहसंध्यंतर हुआ, इसमें इसी आरम्भसंधि १० १०॥ २४॥ के साथ द्वितीयभाव १०।२७ । १९ । ३४ का अन्वार किया ० ॥ १६ ॥ ५५ ॥ ३० यह भावसंध्यंतर हुआ इसका भाग दिया भाज्य ग्रहसंध्यन्वर, भाजक भावस च्यन्तर दोनों अंशादिक हैं इसलिये.इनको सवर्णित किये भाज्यपिंड १२३३७४ में भाजक पिण्ड ६०९३० का भाग दिया लब्ध० शेष २३.३७४ को ६० साठ गुणे किये १४०२४४० हुए भाग ६०९३० का दिया लब्ध २३ कला आयी शेष १०५० बचे इनको ६० गुणिव किया ६३००० हुए इनमें -फिर भाजक भावसंध्यन्वर ६०९३३० भाग दिया लब्ध १ विकला आयी ऐसे फल ३ तीन आये० १२३ । १ ये भावसे ग्रह न्यून है अतएव चयसंज्ञक सूर्यके फल हुए । इसी प्रकार चंद्रादि ग्रहोंके फल जानना । अब विश्वा-आनयन कहते हैं-सूर्यके फल २३ । १ को ३ दीनका भाग दिया लब्ध ७ । ४० ये विश्वा हुए अथवा फ़ल २३१ को २० वीसगुणा किया ४६० । २० साठ ६० का भाग दिया .लब्ध ७ शेप ४० वचे ये विश्वा आये, इसीप्रकार -चंद्रादिको विश्वा जानना. मालविचारग्रम ..1.11. 6 VC २५ . ब षय ध्य भषचप. . १३ २७॥ २३ स विश्वा. ४. अथ ग्रहाणामवस्थानपनमाह व्यंकटेशः । बालाद्यवस्था क्रमशो ग्रहाणामोजे समे तद्विपरीतमाहुः । बालः कुमारोऽथ युवा च वृद्धो मृतो लबानामृतुभिः क्रमेण ॥ १०॥ अब यहाँको अवस्था लानेको रीति व्यंकटेश कहते हैं-ग्रहोंको बालादिक - अवस्था कमसे विषम (एकी ) राशिम छःछः अंशोंके क्रमसे बाल ! कुमार २ एबीमार्गमदीपिका चुला ३ वृद्ध ४ चैत ५ ६ही है और सम्म (नेकी) राशिमें वह बालादि अवस्था विपरीतकयो ( मृत ३ वृद्ध २ युवा ३ कुमार ४ वाल ५) कही है ॥३०॥ उदाहरण। सुर्य १०॥ १६॥५३।३९ यह विषमरांशिका है और छः उ.. शादी कमी तीस विभागमें हैं अतएव तीसरी युवा अतएव तीसरी युवा अवस्थामें हुआ इसी प्रका मनादि प्रहकी अवस्था जानना। वालाचतस्थासारणीचकर ६० अंशः पाल सुभारयुवा । वृद्ध । मृत विपम राशी सुदद्ध । युवा कुमार पाल समरा राशी . चं. सू. युवा अथ पालाघवस्थाचक्रम. मं. बु. गु. . युद्ध कुमार | मृत युवा । मृत पाऊ अथ दृष्टिसाधनमाह धरणीधरः । द्रष्ट्रा विहीनदृश्यस्य क्रमादेकादिभे दृशः । भागाई तिथियुरभागा भागार्होनशराब्धयः ॥ १४॥ भोग्यभागाद्विनिनांशाः क्रमाल्षाधिके नहे। दिग्भ्यः शुद्ध लवाई च ज्ञेया लिप्तादिका दृशः ॥ १२ ॥3॥ अबू धरणीधरः दृष्टिसाधन कहते द्रष्टाग्रहको हीन करना हेश्य ग्रहों म एकको आदि ले शेष राशियोंकी दृष्टि जानना ।। एक राशि शेष बचे लो। शि दिना अंशोंको अई (आधे) करना,यदिदो राशि शेष रहें तो राशि बिलाड़ अशा १५ पन्द्रह युक्त करना और तीन - राशि शेष बचे अंशाका अर्थ (आधे) करना और ४५ पैलालीसमें से शोधना ॥ ११ ॥ चार ४ गारिक शेष बचे तो भोग्यांश (राशि विना अंशाको ३० तीसमें से हीन करना) यदि ए पांच राशि शेष बचे तो राशि विना अंशोंको द्विगुण करना और ऋमो छ इसात ७ आठ ८ नव ९ राशि शेष बचे तो शेष राश्यादिकोंको १० ला राशियो शोधना क्षेत्र को रखले कर आधी ( गाधे) मारना, जी आहे इस कलादिक धि जाननी ॥ १३ ॥ २ सल्य ग्रहस्थ दृष्टिरानीयते असौ द्रष्टा--जिस प्रहकी दृष्टि लाना हो वह द्रष्टा । ६.2 प्रस्थानीय लो इश्यः जिस ग्रहपर दृष्टि लाना हो यह दृश्य होता है।

भाषाटीकासहिता। (१७) अथ भौमस्य विशेषदृष्टिमाह- पञ्चेन्दुयुक्ताः खलु सार्द्धभागा विभेडगभे षष्टिकलास्तथैव । भागोनपष्टिर्भवतीह दृष्टिस्त्रिभेद्रिभे भूमिसुतो न दृश्ये ॥ १३ ॥ . अब मंगलकी विशेष दृष्टि कहते हैं-मंगलको हीन करे दृश्यमेंसे और यदि २ दो राशिशेष बचे तो राशि विना अंशोंको डेढे ( अंशादिकके का भाग देके जो आवे वह उन्हो अंशादिमें युक्त करना) करना और १५ पन्दर युक्त करना कलादिक दृष्टि हो और ः राशि शेष बचे तो ६० साठ कला दृष्टि जानना वैसे ही यदि तीन राशि ७ सात राशि शेष बचे तो राशि विना अंशादिकोंको ६० साठमेंसे शोधना सो कलादिक भौमकी विशेष दृष्टि होये उक्तराशियोंके अतिरिक्त राशि शेष बचे उसकी श्लोक ११ । १२ के अनुसार दृष्टि करना ॥१३॥ जीवोनदृश्यस्य तु वेदमे स्याद्विनांशकोना खलु पष्टिरेव सार्दाशकोना गजभे तु पष्टिस्त्रिभेष्टिभेशार्धयुतेषुवेदाः ।। १४ ॥ अथ जीवस्य विशेपदृष्टिमाह- अब गुरुकी विशेष दृष्टि कहते हैं-गुरुको हीन करे दृश्यमेंसे और यदि ४ चार राशि शेष बचे तो राशि विना अंशादिकोंको २ दिगुण करके ६० साठमें से हीन करना दृष्टि होवे और ८ आट राशि शेष बचे तो अंशोंको डेढे (अंशोंको आधे करके उन्ही अंशोंमें मिला) करके साठ ६० मेंसे शोधना (हीन करना ) शेष बचे वह दृष्टि जानना इसी प्रकार यदि तीन ३ राशि या ( सात ७ राशि शेष बचे तो अंशोंको अर्ध (आधे) करके ४५ पैंतालीस युक्त करना सो कलादिक गुरुकी विशेष दृष्टि होवे ॥ १४ ॥ अथ मंदस्य विशेषष्टिमाह-- द्विनिम्नभागा विधुभेन्तरे स्याद्विभे तु भागाधविहीनषष्टिः ॥ विघ्नांशकोना नवभे तु परिस्त्रिंशद्युता तद्गजभेऽत्रजस्य ॥ ५॥ अब शनिकी विशेष दृष्टि कहते हैं। शनिको हीन करे दृश्य मेंसे यदि एक शशि शेष बचे चो राशि विना अंशादिकको द्विगुण करनेसे कलादिक .

(१८) पनीमार्गप्रदीपिका। कृतिय होता है और यदि २ दो राशि शेष बचे तो अंशोंको अध ( आधे ) करके सास हीन करना इसी प्रकार ९ नव राशि शेष बचे तो राशिबिना अंशोको गुण करके साढमें शौचनेसे दृष्टि होती है और ८ आठ राशि शेष बचे दो राणी दिना अशा ३० युक्त करना शनिको विशेष दृष्टि होवे ॥१५॥ S " ८ ! १२ ६ ३ ई सर्वेषांहसिाधनकोरक. मामविषहटि. गुगरिपरकोटक १ ६ नश अंशा अशा अशा अशा मंशा अशा भंसा अंशा अंश अंशा अंशा भंशा अशा भंश भंशा मर्दा दिवा भद देता बर्द्ध १६४५१० १५ ४५ x गुणा x x *यु. x कहा x x . ऋनिविशेषाष्टि. २ शिश भाभक्षा मंशा मर्दा दिया 2 युक्ता x ८ उदाहरण । सूर्य १०।१६।५३ ॥३९ मेंसे द्रष्टा चन्द्र ५ । २९।१९।४९ हीन किया ४। १७।३३।५० हुए शेष चार राशि बची हैं इस कारण इसके अंशादिक १७ । ३३ ५० को ३० तीसमें से हीन किये १२।२६ शेष बचे ये सूर्यपर चन्द्रको दृष्टि हुई इसीप्रकार दृश्य सूर्यमेंसे भौम ११।६। १४।५४ को हीन किया ११ । १० ३८१४५ हुए शेष ग्यारा राशि हैं इसकी दृष्टि नहीं है इसकारण सूर्यपर भौम की दृष्टि १० सूर्य दृश्यमें से द्रष्टा बुध १०१०१४४।१८को होन किया शेष ०। ६।९।२१ बचे शून्यराशि दृष्टि उक्त नहीं है इसलिये सूचार बुधको दृष्टि ०१८ हुई सूईमेंसे द्रष्टा गुरु ३।०४३।१ हीन किया शेष ७/१६ । १० । ३८ बचे क्षात राशि शेष हैं इसलिये गुरुकी विशेष दृष्टि श्लोकमें कहे अनुसार अंशोंको आधे किये ८ ए हनमें ५५ युक्त किये ५३ । ५ ये सुयार गुरुकी विशेष दृष्टि हुई- हिमा म. ब . . . . . - २३ . . . . १४ १८ २७ २८ . म. ५ ४३ भाषाटीकारादिया। (१९) एश्य सूर्य से शुक्र ९ | १२॥२६॥ ८:को हीन किया शेष १।४। २७॥ ३१ वचे शेप एक राशि है इसलिये अंश ४।२७३२ को आधे किये २१ १३ ये सूर्यपर शुक्रकी दृष्टि आयी फिर दृश्य सूर्य से नटा शनि ८।२४॥४८॥२३ हीन किया ११२२।१६ शेष एक राशि बची इसवास्ते शनीको विशेष दृष्टि श्लोक गु. १५ में कहे अनुमार अंशादिक२२॥ ५को द्विगुण किये ४४।१० ये ..सर्वपर शनोको दृष्टि हुई इसीप्रकार शेष ग्रहोंपर ग्रहोंकी दृष्टि तथा भाव दृश्यपर ग्रह द्रष्टाकी ष्टि जानना-इति॥ मायोपारमहागादृष्टिचक. २४ ४८ ४४ ८ . . . ३२ . . ३१ - ३ ६ . १ १. भाषा: . . ३३ ३० ५२ . १. , . . . . ३२ २८ २ २ २. १६ १ ४ . . . . . . . . १ . ५२ १८ १२ ४६ मं. . . . १७ . . . . . ४ . १० १३ । . . १० २८ ४७ . . . . ० ० ० , ४८ : . . ४० . . . . . . . .m २० . १९ ४६ को को ४२ ४० . क 0 . 0 . . . . . . १२ ४५ उ. . १६ - (२) पंधी मार्गप्रदीपिका। अथ शशीनां स्वामिनः । उक्तं च व्यंकटेशेन भीमाच्छविचन्द्रविज्ञशुक्रवक्रेज्यादाातामरेज्याः। सेषादिसानामधिपा कमेण तदशकानामपि ते भवेयुः ॥ १६॥ अब राशियों के स्वामी. व्यंकटेश कहते हैं- भौम ( मंगल १ ) अच्छ (शुभ २) विच (बुध ३) चंद (चन्द्र ४ ) रवि ( सूर्य ५) ज्ञ (बुध ६) शुगर (शुक्र ७) वा ( औम ८) इजए (गुरु ९) मंद (शनि १०) मीन ( शनि ११) अमरेज्य (गुरु १३ ) क्रमसे मेपादिक राशियोंके स्वामी जालना, और मेषादिक राशियोंके अंशादिकोंके (द्रेष्काण सप्तमांश नवमांश द्वादशांश आदिक) भी कपसे येही स्वामी होते हैं।॥ १६ ॥ अथ नैसर्गबैत्रीमा विश्वनाथः । इन्द्वीज्यक्षितिजारवीन्दुतनयौ सूर्येन्दुजीवा क्रमाद् श्वको शशिसूर्यभूमितनया ज्ञाकी ज्ञशुक्रौ मताः ॥ सूर्यादेः सुहृदः समाः शशिसुताः सर्वेऽपि मंदास्फुजि- न्मंदाचार्यकुजाः शनिः कुजगुरू जीवः परे वैरिणः ॥ १७ ॥ अब स्थिरमैनी विश्वनाथ कहते हैं-चन्द्र गुरु भौष १, सूर्य बुध २. सू चन्द्र गुरु ३, शुक्र सूर्य ४, चन्द्र सूर्य भौम ५, बुध शनि ६, बुध शुक्र७ क्रम सूर्यादि ग्रहों के मित्र कहे हैं और बुध १, सर्व ग्रह २ (०गु शु०२०) शनि शुक्न ३, शनि गुरु भौम ४,शनि ५,भौष गुरु ६, गुरु,कमसे सूर्यादिक ग्रहों सुख कहे हैं शेष (मित्रसमसे बाकी रहे वह ) शत्रु जानना ॥ १७॥ 1 नैसगमैत्री, मं. बु. गु. शु. र.च.मु. सू. सु.र. मं. बु. स. मित्र. कु. सं.गु.सु.म. स. पु .. गु. में. बु. सु... सू. चं. (र..मं. अथ तात्कालिकपंचधामैत्रीसाधनमाह-सोमदैवज्ञः । मं गु. सम. पात्र. महतोऽर्थरतृतीय३ तोय खा१०ऽऽय व्यय १२ संस्थः सुहृदो नभश्चराः इतरालयगा द्विषो सुनीन्द्ररिति तत्कालजमित्रशत्रवः स्युः ॥ १८ ॥ .

" T मंशु 'मित्र बु.र.मं ।चं. चं. मं.प.म.पं. र. र.मं बु. चं. गु भुश.! गु भापाटीकारा हिवा (२७) अब तात्कालिक पंचचा मैत्री ज्ञान सोमदैवज्ञ कहते हैं-जिस ग्रहसे २।३५ १०१११११९३ स्थानमें जो ग्रह स्थित हो वह मित्र जानना, शेष । "५६७८९ स्थानमें गये हुए यह शत्रु जानना इसप्रकार मुनिलोगोंने तात्का- 'लिक मित्र शत्रु कहे हैं ।। १८॥ उदाहरण। तात्कालिकमैत्रीचरम । सबसे २ भौम ११ शनि १२ गु. शुक्र स्थित हैं इस कारण ये सूर्यके मित्र हुए और १ बुध ६ गुरु ८ प्रभु चन्द्रमा स्थित हैं ये सूर्यके शत्रु हुए इसीप्रकार चंद्रादि सर्व ग्रहोंके तात्कालिक मित्र शत्रु जानना इति । अधिमित्रसमत्वमेति मित्रं समखेटस्तु मुद्रिपुत्वमेति । रिपुरेति समाधिशत्रुभावं खलु तत्कालजामित्रशत्रुभावात ॥ १९ ॥ नैसर्गमैत्रीका मित्र ग्रह तात्कालिक मैत्रीमें मित्र हो तो अधिमित्र और शत्रु हो दो समत्वभावको प्राप्त होता है (मित्रमित्र-अधिमित्र, मित्रशत्रुमम होता हैं और नैसर्गमैत्रीका समग्रह तात्कालिक मैत्रीमें मित्र हो तो मित्र, शत्र हो तो शत्रुभावको प्राप्त होता है ( सममित्र-मित्र, - समशन-शत्रु होता है, एवं नैसे- गमैत्रीका शत्रुग्रह तात्कालिकमैत्रीमें मित्र हो तो सम और शत्रु हो तो अधि- शत्रुभावको प्राप्त होता है) शत्रुमित्र-सम, सम शत्रु-अधिशत्रु होता है ।। १९॥ . उदाहरण । यहाँ नैसर्गमैत्रीमें सूर्यके चन्द्र गुरु मित्र हैं ये चन्द्र गुरु.तात्कालिक ५. ..घु धि.मि मैत्रीमें संयके शत्रु हैं अतः चन्द्र गुरु पंचाधामैत्रीमें सूर्य के सम हुए गु.गु. च एवं नैसर्गमैत्रीमें भौम सूर्यका मित्र है धिनु तात्कालिक मैत्रीमें भी मित्र है इस लिये भौम सूर्यके अधिमित्र हुआ, पंचधामैत्रीमें और नैसर्गमैत्रीमें सूर्यके बुध सम है यह बुध वात्कालिक मैत्रीमें सूर्यके शत्रु है अतः शत्रुभावकों बुध प्राप्त हुआ, भय पञ्वधा मैत्रीचक्रम् ।। र. मं.. . . . में. मित्र र. अ.गु ...श.मं. धं गु. चं.गु. बु बुब.. गु. र. र. .

, ११) বৃক্ষীঘাগর্থিক্কা। हतीनहार नैसर्मिनी में सूर्यके शुरू, शनि शत्रु हैं ये तात्कालिक मैत्री में मित्र हैं हसलिये सूर्य के शनि, शुभम पंचधा क्षेत्री सम हुए ऐसेही शेष ग्रहोंको अधिमि- शादि जानना इति. अथ पवर्णसाधनमाह केशवः । भेशोऽथान्नुहोरे अयुजि पुजि शशिनध्नयोः स्वात्मजांक- झेशारुयंशा नाशा अजमकर तुलाकर्कितोकोशकः स्यात् । भौयार्कीज्यशशुका अयुजि शरशरा ५ था ८ द्रिपंचांशनाथा- :. सिंशायुम्से विलोमा कालबलिन इमे षट्शुभैः सद्युगोर्वेः ॥२०॥ अब केशरदैवज्ञका कहा हुभा षड्वर्गसाधन कहते हैं-राशियोंके स्वामी प्रथम लोक १६ में कहे हैं के जानना । तदनन्तर विषमराशिमें प्रथम विभागमें सूर्यको विभागः चंद्रकी होरा जानना और सभ राशिके प्रथम विभागमें बड़की, दूसरे विभाग, सूर्यकी होरा जानना, प्रथम १ पंचम ५ .छ. | सम नवय९राशिके स्वामी द्रेष्काणके स्वामी होते हैं ( मह प्रथम दिमागमें १० अंश हो तो भएनी राशिका स्वामी द्रेष्काणका स्वामी जालना-और वह दूसरे विभागों ( १० अंशसे अधिक २० अंशपर्यंत-) हो वो जिस महका हो उस राशिसे पांचवीं राशिका स्वामी द्रेष्काणका स्वामी होता है एवं अह तृतीय रेशाणः । २० अशले अधिक ३० अंशपर्यन्व ) हो भह जिस राशिका हो उस राशिोर नवमराशिका स्वामी श्रेष्काणका स्वामी जानना । शेष १ मकर ३० तुला और कर्कट से नहांश जानना अर्थात् यह मेपका हो तो भेषगशिक्ष, वृषभ राशिका हो तो प्रकरराशिसे, मिथुनराशिका हो वो 'तुलाराशि से, कर्कराशिका हो तो कर्क राशिसे इसी प्रकार सिंहादि सर्व राशियोंमें जितनी संख्याके नवांशविभागले ग्रह होवें उतनी संख्यापर्यन्त गिननेसे जो हा विषम १ होराका एक हिसाथ १० अंशका होता है। २ एक काशाका विभाग दशा १० अशका होता है। ३वीलाले ९ नबलें हिल्सेको नवांश कहते हैं, एक नवांश विभाग ३ मश २० जनाका दोधारे भाषाटीकासहिता। (२३) मेष (मकर तुला । कर्क ४ ५ ८ १२ राशि आवे उसका स्वामी नवांशका स्वामी होता है बादशांशके स्वामी अपनी राशिसे जानना (ग्रह जिस राशिका हो उसी राशिसे जिवनी संख्या द्वादशांश- विभागमें ग्रह हों उतनी संख्यापर्यंत गिनने से जो राशि आवे उसका स्वामी हादशांशका स्वामी होता है)॥ और विषमराशिमें ५। ५। ८१७१५ इन अंशोंके मङ्गल, शनी, गुरु, बुध, शुक्र, कमसे त्रिंशांशके स्वामी कहे हैं भोंद विषम राशिमें ५ अंशपर्यत भौम त्रिशांशका स्वामी जानना ऐसे ही इन ५ अंशोंके आगेके ५ अशका स्वामी शनी, इसके आगेके ८ अंशका नवाशविभाग दादपाशविभाग। २३४१५६.८11०1१५१२) ३/६/१०/१३/१६२०२३/२६३०२/५/२०१२/१५/१२.२२/२५/२५ २...] .२४ .... .३०. ०२.४. . . स्वामी गुरु किर इसके आगेके ८ अंशका स्वामी बुध इसके आगेके ५ अंशका स्वामी शुक त्रिशांशका स्वामी जानना,और समराशिमें उक विशांशके स्वामी विलोम ( उलटे ) कहे हैं ( ५ शु० ७ बु० ८ गु० ५ श० ५ मं०) ये छही वर्ग क्रमसे उत्तरोतर बलवान् जानना ( ग्रहसे होरा बलवान् होरासे श्रेष्काण काणसे नवांश नवांशसे द्वादशांश,बादशांशसे त्रिंशांश अधिक बलवान् मानना ) चार ४ से अधिक वर्ग शुभग्रहके आवें वो शुभ समझना ॥ २० ॥ अंशाः ५५८७.५ म. भिमराशी गुमसमराशीने ५८/५/५ भंसाः अथ सप्तवर्गसाधनमाह- नगांशपास्त्वोजगृहे तदीशायुग्मे गृहे सप्तमराशिपात्तु ॥ पूर्वोक्तवगैः सहितो नगांशः स्युः सप्तवर्गा मुनिभिः प्रदिष्टाः ॥२१ ॥ अब सप्तवर्गसाधन कहते हैं-विषमराशि अपनी राशिके स्वामीसे सप्तमारा के स्वामी जानना और समराशिमें अपनी राशिसे सप्तम राशि (सावनी H. तीस अंशके १२ भागको द्वादशांश कहते है एक दादशांशविभाग अढाई .प्रोडका होता है।

(२४) पनीमागप्रदीपिका। राशि) स्वामीसे सामाशय स्वामी जानना । ( ग्रह विषम राशिका हो तो जिस राशिका है, उसी राशि और लसराशिका हो तो जिस राशिका ग्रह हो सार राशिसे जो हातमा राशि है उससे जितनी संख्याके सप्तमांशविभागमें ग्रह स्थित हो उतनी ल्यापर्यंत गिननेसे जो राशि आवे उसका स्वामी सप्तमांशका हामी समाना) पूर्वोपदो सप्तमांश युक्त करनेसे सप्तवर्ग होते हैं ऐसा नि लोगोने कहा है ॥ २१ ॥ उदाहरण । सूर्य १०।१६१५३।३९ यह कुम्भराशिका है इसका स्वामी शनिगृहके स्वामी स्थानी हुआ--होरा, सूर्य होराके दूसरे विभागमें है . और विषमराशिका है इस कारण सूर्यकी होराका स्वामी चन्द्र हुआ. द्रेष्काण सूर्य दूसरे द्रेष्काण विभाग, है इसलिये यकी राशि ११ कुम्भसे पांचमी राशि ३ मिथुनका स्वामी बुध आया. यह काणका स्वामी हुआ.सप्तमांश सूर्य विषम राशिका है और सप्तमांश विभागले ये चार ४ संख्याक विभागमें है अतः सूर्यकी राशि २१ कुम्भसे चार पर्यन्त गिननेसे चौथी राशि२वृषभ आयो इसका स्वामी शुक्र सप्तमांशका स्वामी हुआ नवांश--सूर्य छः संख्याले नवांश विभागमें है और कुम्भराशिका है अतः तुलाराशीले ६ छह संख्यातक गिननो १२ मीन राशि आयी इसका स्वामी गुरु है यह अर्यके नवांशका ल्वामी हुआ, बादशांश-सूर्य ७ सातसंख्याके द्वादशांश विभागः है इसलिये अपनी राशि कुम्भो गिननेसे सातमी ७ राशि ५ सिंह आयी इसका स्वामी सूर्य द्वादशांशका स्वामी हुआ त्रिंशांश--सूर्य विषमराशिका है और १६ अंशका है इस लिये नितांश विभाग तो रो : शके विभागीं है इसकारण विषमराशिके तीसरे विभागका स्वामी २२१०२१२५/३० २।३/५/६० गुरू खुर्यले त्रिंशांशका स्वामी हुआ, इसीप्रकार शेष चन्दादि सर्वमहों के सातवर्ग जानना. इति, 5 सांभविभाग. १७.३४/५६ ८/५/१२/ ६ एक सप्तमांश विभाग ४ अंश १७ कलाका होता है । .

मापाटाकासाहपा। (२५) अपमानास्पा म. 5. Masमि मि ९ E 4 प्रमि ४ १२ स ट्रेप्काण ग , कि मि प अमिलिमि नराश त 17 दादगार स मि मि प्रमि ५ भोग 2 . विना परिश्रम शीश सुगमरोति मागतान होने के लिये आगे समवर्गहा- रणीचक्र मेपादिराशियोंके लिखे हैं.. उनमें ग्रह जिस राशिका हो उस गशिके कोष्ठको जिवने अंशका हो उतने अंशके नीचे पंक्ति जो सतवर्गके स्वामी राशिमाहिव लिखे हैं ये.. उस ग्रहके समवर्गके स्वामी होंगे और पष्ठवंशका स्वामी भी उसीके नीचे पंक्ति में लिखा वह जानना ॥ उदाहरण जैसे यहां सूर्य १०११६॥५३॥३९॥ है इसलिये कुम्भराशिके कोष्ठकमें १७ भराके नीचे पंक्ति में लिखे सप्तवर्गके स्वामी और पप्ठवंशका स्वामी माये । गृ. प. हो. प. दे. प.स. प. न. प. द्वा, प. त्रिं. प. प. प. १३ श ४ च ३ बु २ शु:१२ गु ५ र ९ गु ८ में. 1 .. .

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पनीमार्गदीपिका । पाचागेत वृश्चिकराशिसप्तवर्गचक्रम् । न ३ ५ a . ० . यह ८ ८ हरा भी में ८ । ल P) यु घर 100 ६ नवां, . GaG069/4/04.म. ४० . ...NET दाइ. २० १० A]]-064 Pram नियां Rig" mp4 GANA AIMLAI पष्टयं. . ८ १० फशरी शोपितविकराशिसप्तवर्गचक्रम् । ६ ९ १० १२ मंड A 0 २ ० ० म सं मा RVIV न दोरा । AR 64 2064 गु 43115410GAIN मा.म. गु 7 गुगु द्रेष्का. १२ १२ १२ BAPH V9 र र सप्त. JE. 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एनीमार्गपदीपिका । एशोर मीन राशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । H ३. ४. ५. ६ ६. LA ३० ० ५० गुः गु १२ गु १२ १२ वं चं चं गु गु. १२: १२ २२१२१२ चं चं चं च.च. च। चं. ४. गु २.स चं चं श ४ गु शुः १२. गु १२ गु १२ १.२५ । १२ ४ इ शु गु सु पु. ६ ६ गु. गु गुः गु ग. १३ १२ १२ १२ १२ १२ दुः शु. ६६८६ चं.३ र. १ र ४. ३0 ४ ५ ५ म. म शु १. ११ १॥ प्यं. ६. एम. .४ ८. ५ ४० ५ . गु- मं शु. १२ ६२ अ. २ १ M 64 Ka الي 2 २ १ २. ग २ में- ६ ६ Mirmworr ए. पर गु ९ T ११ गु १२ । . Parameramewome Honore इष्टर्यशोपेतमीनराशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । ९ ११. १२ २ १३. २३ १४। '४१५ मंत्र 6 . गु गु गु गु १२ १२ १२ १२ १२ १२: १२ चं च गु: गुगु. १२. १२१.१२ चं १.२ o होरा गु वं वं चं. चं चं. गुगु गु १२:११ १२ माम शुः में मेम ८, मं : प्राप्त ८ AAS.CE!.. 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भापाटीकासहिता।
(५३)
अब गुरुका अष्टवर्ग कहते हैं। गुरु अपने स्थानसे 1991८।३।'
॥७॥१० वें स्थानमें, शुभासे २१ ९।१०।११।६।५, लमसे ११
४।७।१०।११।५। ६.२.१.९, भौमसे २ । ८।१।४।७
१०।११, चन्द्रसे ७ ॥२॥ ९१५१११, सूर्यसे ३ । ९।८।११११॥
४।७।१०।२, बुधसे ९ । ५।२।११।१०।१।४।६, शनिसे
३।१२।५।६ स्थानमें शुभफल देता है। इन स्थानोंमें रेखा देने
मुहका अष्टवर्ग होवा है ॥ २६ ॥
भय युधस्याष्टवर्गाकाः ५४. मप गुरोरष्टाफ:५५.
रमहशुशल.चम युगु शश
६।१२।३/८/२/२/३१५/२/२/२/५/५
४१३/७४/४/३/६६
११/८/७/६/१२/४७
८९ ५1८१८ ७/११/८/६/७/१०
१२/९/१० ८1९१०८ (१०/९/८११
१०/१११ ९ ११११०/१०
१११११
60sex.
१०.१
अथ शुक्रस्पाष्टवर्गमाह।
खास्तान्त्याऽहितवर्जितेषु तनुतः शुक्रो विनास्तारिखं
चन्द्रात्स्वान्मदनव्ययारिरहितेष्वाद्ययाष्टाप्तिषु ।
मन्दावयेकरिमुव्ययास्तरहितेष्वीज्यानवायाष्टधी-
खे ज्ञात्कोणभवत्रिषट्सु भवधीच्यन्त्यारिधर्मे कुजात् ॥ २७ ॥
अब शुक्रका अष्टवर्ग कहते हैं:--शुक्र-लमसे १० । ७ । १२ । ६ स्थान
विना और स्थान (१।२।३। ४ । ५। ८।९।११।) में शुभफल देवा
है और शुक्रसे ७।६।१०। वें स्थान विना अन्य स्थानमें ( ११२ ॥३॥
१।५।८।२।११।१२।); चंद्रसे ७ । १२।६।स्थान विना अन्य
स्थानमें (.१। २।३।४।५।८।९।१०।१३),सूर्यसे १२ ॥ ८॥

पत्रीमार्गमदीपिका ११ स्थान, शनिरी २॥ १॥ ६॥ १२॥ ७ वे स्थान विना शेष स्थानमें (४॥ १॥ ८ ॥ ९ ॥ १० ॥ ११), शुरुहे ९। ११।८।५।१० में, बुधले ९ । ५।१३।३।६, मंगलसे ११।५।३। १२ । ३९ रुधानो शुभफल देता है । इन शुभफलद स्थानोई रेखा देने से शुक्रका अष्टवर्ग होता है।॥ २७ ॥ अथ मन्दस्याष्टवर्गमाह। स्वान्दविषडायधीच रक्तिोऽवाहिक हासो भोमारवायघडल्ल्यधीनि तनी लायाकुपट्न्येकया । शादायारिनवांत्यवान गोरमामघट्सस्थित- चन्द्रादायरियुशिमा सुशुशेरल्यायधीशनुमः ॥ २८ ॥ अब शनिका अष्टवर्ग कहते हैं:- शनि अपनी राशिले ३।६।११। ५ प्रधान, सूर्य ८ १ ११ १२ १३ हैं ! ७ १ १० में, भौमते १०।११। ६ ॥ १२ ॥ ५ ॥ है, लगते १६ । ६ । ३, बुधसे ११।६। ६॥ १२॥ १०८, शुक्र १६ ११६, चन्से १३।६। ३,गुरुसे १२. १ ॥ ६ स्थान शुभफल देता । इन स्थानोंसे रेखा देना गौर अन्यत्र वितु देलले शानिया अवर्ग होता है ॥ २८ ॥ Astter $মুকাদ্যুৎ ওহহহ দানা ৎ ka गुशुशल sar on us au on.6000 १२ ८ ३/४/१२.६/९/११/१२/.६ १०१०१२ ST .. १० ८/१२ ८.९८१ ८/१०/१२/१२) ११ १२ भाषाटीकासहिता। (५५) शम्भुहोराप्रकाशादिग्रन्थोंमें लगाष्टवर्ग भी विशेष कहा है। सय लग्नस्याटवाका:४९. च ३ १ mum १ ३ ४ No mau GmH0164 ( * * * * * स्थानानि यान्युक्तानि तेषु रेखा अन्यत्र बिंदुः ॥ २९ ॥ इति रेखाष्टकम् । प्रथम जिस ग्रहका अष्टवर्ग करना हो वह ग्रह जिस राशिमें स्थित हो उस राशिको आदि ले जन्मकुण्डली ग्रहसहित लिखना, तदनन्तर अपने अपने अष्ट- वर्ग जो जो स्थान शुभफलप्रद कहे हैं उन उन स्थानोंमें रेखा लिखना और अन्य' स्थानोंमें बिन्दु (शून्य) लिखना । इस प्रकार सूर्यसे लमार्यंत आठ ही यहाँके अष्टवर्ग बनाना; फिर बारहों राशियोंकी अष्टवर्गको रेखाका योग पृथक् पृथक् करके अपनी अपनी रेखाका योगकुण्डली में लिखनेसे समुदायासवर्ग होगा। तदनं- वर इस समुदायाप्टवर्गमे मीन मेप वृषभ मिथुन राशिमें जितनी जितनी रेखा उन सब रेखाओंका योग करना । योग १२० एक सौ बीससे अधिक आवे वो प्रथम वयमें सौख्यार्थ विशेष प्राप्त होगा। एवं कर्क सिंह कन्या तुला राशिकी सब रेखाका योग १२० एक सौ बीससे अधिक आवे तो तरुण अबस्थामें सुख अर्थप्राप्ति आदि विशेष होगा। इसीप्रकार वृश्चिक धन मकर कुम्भ राशियोंको सब रेखाका योग १२० एकसौ बीससे अधिक आवे तो उत्तर वयमें मुख अर्थ- प्राप्ति आदि शुभफल विशेष होगा और १२० एक मौ बीससे अल्परेखैक्य जिस अवस्थामें आवे उस अवस्थामें मध्यम फल होगा ऐमा जानना ॥ २९॥ १ शम्भहोराप्रकाशे-"मीनाय मिथुनांतकं प्रथमकं प्रोतं यः प्राक्तनैः कधि वणिजांतकं तरु- गवा संज्ञश्च मध्य उधैः । कुम्भान्तं स्थविरांतकं च बहुभिर्यत्सत्फलैः संयुतं तत्सौख्यार्थविशेष माइते नेदं विशेषाच्चुभम् ॥ ११ ॥"

(५६) पनीमार्गप्रदीपिका । उदाहरण । सूर्य रेखाटक करना है यहां सूर्य कुल्लराशिका है, अतएव कुम्भराशिको आदि के खनन कुण्डली महसहित लिखके श्लोक २२ के अनुसार शुभफलपद स्थानों- रेला, अन्यस्थानों में शून्य लिखा, हा रेखाका लिला, हा रेखाका योग किया तो ४८ हुआ गृह सूर्यका अधळ हुमा । इसी प्रकार शेष नहोंके अष्टवर्ग जानना । रेखाष्टकविम् गु चं शशुल र. २३४५६७/८/९ १० ११ १२ सूर्याष्टवर्गेश्या८ ।। i६ ४ १ २ ३ ५। ६.७.३ २.५४८ Cdi. ५ ४ में १२ ५११७ ७४ ६ 8 ००० गा ៗ बु. ०००० ५३७ ६. ६ . 2 गु. ०० NI ००० ०००००० ४|४|२} - ७/५/३/४/६/४/५६ शु. ६१५३४४५३१५/४/५/५४५३ गु ०० mo००० . १००००० ३/४/३/३/२ २३/६/५।३/४/२/३९ ल. ३४३०९:५३१२२२७३४४२३९३९३१३० योगा समुदायाष्टवर्ग-उदाहरण । जैसे मेषराशिके सूर्याष्टवर्गमें रेखा ३, चंद्राष्टवर्गमें ६, भौमाष्टवर्गमें ४ बुधाष्टवर्ग ५, गुरुके अष्टवर्गमें ५, शुक्राष्टवर्ग, ६, शनिके अष्टवर्गमें २, सन्माष्टवर्गमे रेखा ३ है। इन आठों वर्गोकी मेषराशिकी रेखाका योग किया वो ३४ हुए, इसी प्रकार बारहों राशियोंके अष्टवर्गकी रेखाका योग किया, की सखदायाष्टवर्ग जानना। इस समुदायाष्टवर्गमें मीनराशिमें रेखा तीस, खेपले १४, वृषभले ३२, मिथुनमें ३५ रेखा हैं, इनका योग किया १३१ आये। ये १२० से अधिक हैं, अतः प्रथमवयमें सुखार्थ वृद्धयादि श्रेष्ठ फल होगा। एवं कर्कौ ३१, सिंहमें २२, कन्यामें २७, तुला, ३४ रेखा, भाषाटीकासहिता। (५७) इनका योग किया तो ११४ आये, ये १२० से अल्प हैं, इसलिये मध्यप- यमें मध्यम फल होगा । इसी प्रकार वृश्चिक ३८,धन३९, मकर २९ कुम्भ ३५ राशियोंकी रेखाका योग किया तो १४१ आये ये १२० से अधिक हैं,इसलिये अन्त्य वयमें सौख्यार्थप्राप्त्यादि श्रेष्ठ फल होगा, ऐसे ही सब में जान लेना। इवि रेखाष्टम् । समुदायाष्टवर्गकुंडली। सस/\३९१ ३१ ८ म ४२ २ ३ २२ शुभाशुभफलचक्रम. अाधावस्था मध्यावस्था अत्यावस्था भेष्ठ. मध्यम अष्ठ अथ रश्मिसाधनमाह। सत्रिभं सायनार्क सूर्यस्य व्यर्केन्दु चंद्रस्य मध्यस्पष्टयोर्योगाद्ध चलोच्चे हीन भौमादिकानां चेष्टाकेंद्रम् ॥ तद्रसोर्ध्वमिनमा च्छुद्धं शेष सैकम, अंशाचा द्विघ्ना चेष्टारश्मिः ॥ ३० ॥ अब रश्मिसाधन कहते हैं:-अयनांशयुक्त किये हुए स्पष्ट सूर्यमें तीन राशि युक्त करे तो सूयका चेष्टाकेन्द्र होता है और स्पष्टचंद्र से स्पष्ट सूर्य हीन करनेसे चंद्रका चेष्टाकेन्द्र होता है और भौमादिक ( भौम,बुध,गुरु,शुक्र,शनि) मध्यम ग्रहका और स्पष्टग्रहका योग करके अर्ध (आधे) करना और अपने अपने चलोच ( शीघोच्च ) में होन काना (सोधना ), सो भौमादि पंचवाराग्रहोंका चेष्टा- ३ सोमदेवज्ञः-"मध्यमाक्सहितं चलकेन्द्र स्वाधस्य च सितस्य चलोच्चम् । मेदिनीतनय- भीमशनीनां मध्यमार्क उदितं च चलोच्चम् ॥"अर्थात बुध शुक्रले मध्यम शीघ्र केन्द्र में मध्यमसूर्य को मिलानेसे बुध शुकका शीघोच होता है और मंगळ गुरु शनिका मध्यम सूर्य शीघ्रोच्च होवाई। ।

७ शेष बचे उसकी राशिमें एक मिलाना और अंशादि- (६८) पनीमार्गप्रदीपिका। हिन्द्र होता है। वह टाकेन्द्र ६ राशिसे अधिक हो तो १२ बारा राशियों में से बाल द्विगुण, करे तो चेष्टारक्षित होती है ॥ ३० ॥ अथ ग्रहाणासुच्चनीचराशीनाह । सूर्याछुलधाः क्रियाश्योर सृग १० स्त्रीको ४ ऽन्त्य १२जुक्का दशयि १० ईताशः ३। राजाश्चि-२८ सिर्बाणकुभिः १५शरै) २७ रस्तगतास्तु नीचाः ॥ ३१ ॥ मा ग्रहोंकी उच्चनीच राशि कहते हैं। शेष १ राशिके १ • अंश पर्यन्त (सूर्य), वृषभ २ राशिके ३ अंशपर्यंत ( चन्द्र ), मकर १० राशिके २८ अंशयन्त ( भौय), कन्या ६ राशिके १५ अंशपर्यंत (बुध), कर्क ४ हाशिक ९ अंशपर्यंत (भौम); मीन १२ राशिके २७ अंशपर्यंत (शुक्र),तुला ७ शशिक २० अंशपर्यव ( शनि)। सूर्यको आदि ले ग्रह क्रमते उच्चराशियोंके होते हैं और अपनी उच्छराशिले सातवीं राशिमें गये हुए नोचके होते हैं ॥३॥ उच्चनीचराशिचक्रम्. चं । मं । वु ! गु शुश ११ उच्चराशि परमोचअंश. नीचराशि. | २७/२० परमनीचअंश. अथ उच्चरश्मिसाधनमाह । प्रहनीचांतरं कार्य पडूमादूनं यथा तथा । विप्नौशादिः सरूप मचरमिरय स्मृतः ॥ ३२ ॥ अब उच्चश्मि करनेकी रीति कहते हैं:-जैसे छह राशिसेअल्पशेषरहतेहों वैसे ही ग्रह और नीचके अंतर करना (अहमेंसे नीच हीन करनेसे ६ से अल्परहेको माह से नीच ( होन) करना और यदि नीमेंसे ग्रहहीनकरनेसे६ राशिसे अल्प शेष रहते हो तो नीचले प्रहको हीन करना) शेष बचे राश्यादिककी राशिके अमें मिलाना और अंशादिनको द्विगुण करनेपर उच्चरश्मि होती है ॥३२॥ र १ ३ ६ ११ ९ ५ ar . --~-- ३८ 40 भाटीकासहिता । (५९). अथ स्पष्टरश्मिसाधनमाह । चेष्टोचरश्मियोगा स्कुटरश्मिः प्रकीर्त्यते । नखोनैक्ये दरिदी स्यादिशो सम्पदन्वितः ॥ ३३ ॥ अब स्पष्टरश्मिसाधन कहते हैं: -चेष्टारश्मि और उच्चरश्मिका योग करके अर्ध (आधा) करना,जो आपे वह स्पष्टरश्मि कहाती है । उस स्पष्टरश्मिका ऐक्य २०बीस से अल्प आपे तो दरिद्री होता है और २०वीससे अधिक भावे वो सम्पदावान् होता है ॥ ३३॥ इति रश्मिसाधनम् । उदाहरण। सूर्य स्पष्ट १० ११६ । ५३ । ३९ में अयनांश २२ । २९ । ० युक्त करनेसे ११।९।२२।३९ सायन सूर्य हुआ । इसकी राशिमें ३ तीन युक्त किये तो २॥ ९। २२ । ३९ ये सूर्यका चेष्टाकेन्द्र हुआ । एवं चंद्रस्पष्ट ५ । २९ । १९।९ मेंसे स्पष्ट सूर्य १० ११६ । ५३ १३९ हीन किया तो ७ ११२।२६। १० ये च- न्द्रका चेष्टाकेन्द्र हुआ। भौममध्यम ११।१२।३९।४८१ भौमस्पष्ट ११॥६॥ १४॥ ५४ का योग किया तो २२११८१५४१४२हुआ,इसको अर्ध किया तो १११९१७ हुआ इसको भौमके चलोच्च (मध्यमसूर्य) १०११५१३१२१मैसे हीन किया तो शेष ११॥५॥३६॥ ० भीमका चेष्टाकेंद्र हुआ । एवं बुधके मध्यमस्पष्टके योगके अर्ध १०।१२। ५३ । ४९ को बुधके चलोच्च (बुधशीघ्रकेंद्र १११२३३१ ९ में मध्यम सूर्य १०।१५। ३।२१ कोमिलाया वो १०८।३४।३०यहबुध का शीघोच्च हुआ) १०1८। ३४।३० मेंसे हीन किया तो११।२५।४०४१ बुधका चेष्टाकेंद्र हुआ, इसी प्रकार शेपग्रहोंका चेष्टाकेंद्र जानना। सूर्यके चेष्टाकेंद्र २, ९।२२।३९ में राशि युक्तकरके अंशादिकोंको द्विगुण किये तो ३३१८१४५६१८ सूर्यकी चेष्टाराशि हुई । चंद्रका चेष्टाकेंद्र ७।१२।२६।१० छः राशिसे अधिक अतएव १२ बारह राशिमेसे शोधा शेष ।।१५१३३।५० हुए, इसी राशि ४ में १ मिलाया और अंशादिकोंको द्विगुण किये तो १॥३५॥७१४० चंद्रकी चेधारश्मि हुई । एवं भौमादिक ग्रहोंकी चेष्टारश्मि समझ लेना ॥

(६०) पत्रीमार्गप्रदीपिका । । ८ उच्चरश्मिसाधन उदाहरण. अथ लेष्टारहिमचक्रम् । सूर्य १० । १६ । ५३ । ३९ सर्व यू.सं.बु.सु. शु. श. की नीचराशि ६।१० । । १३/१५ ३ मध्यम | सूर्यमेंसे सूर्यमेंसे नीचेको हीन करनेसे ६ ३९, ३/४०३/१४ ग्रहाः छःराशिसे अल्प शेष बचता है, इस ४४/२१/१२४६ वास्ते सूर्य मेंसे नीचको हीन किया । ११.१० ३ | ९.८ ६.१० १२/२४| स्पष्ट । ५३ । ३९ इसकी राशि ४ में १४|४४४३|२६४८ग्रह. एक मिलाया और अंशादिकोंको दोगुण ५४|१८१ ८/२३ २२/२०/६/१९/१७ किये तो ५।१३।४७१८ सूर्यको उच्च मध्य १८/२५/३/०७/१८ स्पष्ट रश्मि हुई । इसी प्रकार शेषग्रहाकी उब ५४/४७/२३/२९/३३ योग, ४२३९ २९. ९ रश्मि जाननी चाहिये। ११/१०३९ सध्य ९ १२/५/२८/२४ स्पष्ट २७/५३/४१/४४१६ योगार्ध. २१/४९/३१४४३४ १०.१०/१०/७१० १५, ८११५/२१/१५ घरलोच. ८ २१/३०/२१. २६/११ १ १२ ५ २५/१३/१२/२० चेष्टा २२/२६३६१०/२१/२१/४६) केन्द्र. ४१०५०/१८/४७ १ १ १८५३५४८८३३/१५/४१] चेष्टा ४५/४८/३८/१६/१७/३३/ रश्मि. ६८/१०/०३८/२०/२४/३४ भाषाटीकासहिवा। (६) उच्चश्मिचक्रन्। स्पष्टरश्मि-उदाहरण। सूर्यकी चेष्टारश्मि ३।१८।४५॥ र .. मं..गु.शु. शि.ऐ. १८, सर्यकी उच्चरश्मि ५ । १३ । ४७ । १३ ७/१३/८/५१.३०५०) १८ का योग किया वो ८ ॥ ३२॥३२॥ ४७/२०/३०/३१/२६:५२२३ १८/२२/१२/२५४२११६/१४ ३६ हुए,इसको आधा किया तो ।। १६ ॥ १६ । १८ आये । यह सर्यकी स्पष्टरश्मि हुई । इसीप्रकार शेष ग्रहोंकी स्पष्ट- रश्मि जानना । स्पष्टरश्मिका योग २० से अधिक है इस कारण सम्पदावान् होगा ऐसा फल समझना ।। इति रश्मिमाधनम् ॥ मथ स्पष्टरश्मिचकम् । र .. मं. बु.गु.शु. श. |ऐं. ६३३२७ १६/५१/४६/३८/१२/५३/४५/२३ १९/१४/९/३५/२१/ ४५८३८ १११११५०२४१५१/ अथायुदायानयनमाह। कलीकृत्य ग्रहं तत्र द्विशताप्तेऽर्कशेषकाः । समाः शेपातु मासाद्याद्वादशादिहतैः कमात् ॥ ३४ ॥ अब आयुर्दाय आनयनकी रीति कहते हैं:-ग्रहकी कलां करके उसमें २०० दोसौका भाग देना, जो लब्ध आवे उसमें १२ बारहका भांग देना.शेष बचे. वह वर्ष जानना । वदनंतर कलाके दोसौका भाग देनेसे जो शेष बचे उनको क्रमसे १२ । ३०६० से गुणा करके २०० दोसौका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसे मासादिक जानना अर्थात् शेषको प्रथम १२ बारहगुणा करना, २०० का भाग देना जो लब्ध आवे उसे ही मास जानना और जो शेष बचे उनको ३० वीससे गुणा करना, २००का भाग देनेसे जो लब्ध आवे वही दिन होता है। फिर जो शेप बचें उनको ६० साठसे गुणा करना, २०० का भाग देने पर जो लब्ध भावे वही घटी होती हैं। फिर शेषको ६० साठसे गुणा करना और. २०० का भाग देना जो लब्ध आवे उसे पल जानना चाहिये। ऐसे क्रमसे जो वर्षमासादिक १-राशिको३०तीसगुणी करके अंश मिलाना फिर उसको६०साठ गुणा करके कला मिलानेसे होती है। १८ .

(६१) দ্বীপান্বিষ্কা। भासे वह पहली वर्ष मास दिन घटी पल विपलात्मक मध्यायु समझना ॥३४॥ इस लक्ष्यसहित सूर्या दिग्रहोंकी मध्यायुसाधन करके पटायुनानके संस्कार धागे कहते स्थिरि हरेनशं वकचारं विना ग्रहः । एकार्कजाल्यास्तस्य हाद नीचर्दागे दलम् ॥ २५ ॥ शुक्रगति ग्रहके बिना जो ग्रह स्थिरमैत्रीर्मे (नैसर्ग-पैत्री ) शत्रु राशिका हो उस महकी आयी हुई वर्षादि आयुमेंसे तृतीयांश ( अपना नारा हिस्सा ) शीन करना और शुक्र शनि विना अन्य (दूसरा) मह अस्त हो तो उसकी भायुको आधा करना, नीच राशिका मह हो तो उसकी आयी हुई आयुका दल ( अई ) करना ।। १५ । वक्रोच्चगे तत्रिणं द्विनिधन्द लोत्तमस्त्रांशकमणि मागे । द्वित्रिनवायां निपुण सदै हिशकोने दिलशोगमायुः ॥ ३६ ॥ पक्रगति नह हो वा उच्च राशिका हो तो उस महकी वर्षादि आयुको त्रिगुण (३ तीनगुणी ) करना और वर्गोत्तमी हो या कलमांशका हो वा स्वराशिका हे काणका मह हो तो आयी हुई वर्षादि आयुको द्विगुण ( दोगुणी ) करना और यदि जिस महकी वर्षादि आयुको द्विगुण करने और त्रिगुण उनका दोनों योग आवे तो उस ग्रहकी आयुको पृथक पृथक् २ दोगुणी और ३ तीनगुणी नहीं करना केवल १ एक ही बार त्रिगुण ( तीनगुणी) करना । एवं ग्रहकी वर्षादि आयुमेसे वितीयांश और तृतीयांश दोनों घटाने के योग आवें तो वर्षादिक आयुल्ले केवल एक ही बार द्वितीयांश ( अपना अर्धभाग ) हीन करना।। ३६॥ वाम व्ययाद सर्वदलत्रिपाद पंचाङ्गभागानशुभा हरन्ति । संतोऽहमई सबलम्बहूनामेकक्षगानामिति सत्यवाक्यम् ॥ ३७ ॥ लयले बारहवें ११ - स्थानको आदि ले सप्तम स्थानपर्यंत उलटे १-आगे श्लोक ३९ में है कि-जिप्त राशिका ग्रह हो उसी राशिके नवांशमें आवे तो उसे हो चोत्तमीजानना।

भापाटीकासहिता।
(६३)
( १२१११११०१९।०१७) स्थानोंमें भशुम (पाप) यह स्थित हो तो यथा-
क्रम आयी हुई आयुर्दायमेंसे १२ . ( पूरी आयु ) ११ आधी १० तृतीयांश९
चतुर्थांश ८ पंचमांश ७ पटांश हीन करना । अर्थात् लग्नसे मारहवें स्थानमें जो
अशुभ ( पाप ) ग्रह स्थित हो उत्तकी जो वर्षादिक आयु आयी है वह सर्व हीन
करना ( उस ग्रहकी आयु ०१०शून्य शून्य लिखना) और ११ एकादश स्थानमें
जो पापग्रह स्थिव हो उसकी आयु जो वर्षादिक आयी है उसको आधी करना,
एवं दशम १०स्थानमें जो पापग्रह स्थित हो उस महकी वर्षादि आयुमेंसे तृतीयांश
( अपना तीसरा भाग) होन करना और ९ नवम स्थानमें पापग्रह स्थित हो तो
उमकी वादि आयुमेंसे चतुर्थाश( सनी वर्षादि आयुको चारका भाग देके जो आवे
वह ) हीन करना, एवं ८ अष्टम स्था में जो पापग्रह स्थित हो उस महकी वर्षादि
आयुमेंसे पंचमांश ( अपनी वर्षादि आयुके पांचका भाग देनेसे आया हुआ जो
पांचवा हिस्सा वह) हीन करना । उनी प्रकार ७ सप्तम स्थानमें जो पापग्रह स्थित
हो उसकी आयुमेंसे पष्ठांश ( अपना छठा हिस्सा ) हीन करना और इन
व्ययादि १२।११।१०।९।८। ७ स्थानोंमें शुभ ग्रह स्थित हो तो
जो जो भाग अशुभ ग्रहकी आयुसे हीन करनेको कहा है उसका आधा
आधा भाग हीन करना अर्थात् बारहवें स्थानमें शुभ ग्रह स्थित हो तो उसकी
वर्षादि आयुको आधी करना और १६ ग्यारहवें स्थानमें स्थित हो तो उसकी
वर्षादि आयुमेंसे चतुर्थांश (चौथा हिस्सा) हीन करना । एवं १० दशम स्थानमें
स्थित हो तो उसकी आयुमेंसे पष्ठांश (छठा हिस्सा ) हीन करना और ९ नवम
स्थानमें स्थित हो तो उसकी आयुमसे अष्टमांश ( आठवां हिस्सा)हीन करना ।
इसीप्रकार ८ अष्टम स्थानमें जो शुभ ग्रह स्थित हो उसकी वर्षादि आयुमेंसे
दशम भाग ( वर्षादि आयुके १० दशका भाग देके जो दशांश आवे वह) हीन
करना । एवं सप्तम स्थानमें जो स्थित हो उसकी वर्षादि आयुमेंसे द्वादशांश (अपना
बारहवां हिस्सा) हीन करना और इन्हीं व्ययादिक उक्त स्थानोंमें यदि एक
राशिमें दो ग्रह स्थित हों वा बहुत यह स्थित हों तो उनमें से जो यह अधिक
बलवान् हो उसी एक ग्रहको वर्षादि आयुमेंसे जिस स्थानमें स्थितका जो माग
हीन करनेको पूर्व कहा है वह हीन करना, शेष ग्रहोंकी आयुमेंसे उस स्थानका
भाग हीन नहीं करना, ऐसा सत्याचार्यका वचन है ॥ ३७ ॥

पत्रीमार्गप्रदीपिका । हाई बलाढये सहितं च वस्तुल्यैविलग्नस्य गृहविधेयम् । थागादिना भास्करसंगुणेन युक्तं दिनाद्यं भवति स्फुटं तत् ॥ ३८ ॥ लप बलवान् हो तो लाकी वर्षादि मध्यायुके वर्षके अकमें लपकी राशिको हिस्याको समान ( लय ० राशिका हो वो • शून्य, ९ राशिका हो तो ९ नव दे जिस राशिका हो उतने ही ) वर्ष युक्त करना और लग्नके अंशादिक ( अंश कला विकला ) को १२ बारहसे गुणा करके उसी वर्षादिमध्यायुके दिनादिक युक्त करना, वह लमकी स्पष्टायु होगी और टन बलवान् नहीं हो तो जो मध्यायु आवे वही स्पष्टायु समझना ॥ ३८ ॥ बरसक्ने जनायेशाः स्थिरेषु मध्या द्विस्वभावेष्वंत्या वर्गोत्तमाः ॥ ३९ ॥ अब वर्गोत्तमराशि कहते हैं:-चर(१।४।७१०) राशियोंमें आय (प्रथम ३ । २०) नवांशके अंश स्थिर ( २।५।८।१११) राशियोंमें मध्य (पांचवां १६ । ४०) नवशिके अंश द्विस्वभाव (३।६।९।१२।) राशियोंमें अंत्य ६. नवां ) ३०१०) नवमांराके अश वोत्तभांश होते हैं, अर्थात् चरराशिका यह भक्ष्य नशमें हो तो वर्गोत्तमी होता है । एवं स्थिर राशिका यह पांचवे नवांश १६६४० में हो तो वर्गोत्तमांशमें होता है और १ द्विस्वभाव राशिका ग्रह अंत्य नवांशमें ( २६१४० के उपरांत ३०० पर्यंत नवम नवांशमें हो तो वह गोत्तमांशमें होता है ॥ ३९ ।। स्वक्षकेंद्रोत्तमांशस्थाः स्वांशमित्रांशकान्विताः। परिपूर्णबलैर्युक्ताः स्वोच्चमूलत्रिकोणगाः ॥ ४० ॥ अन नहोंका बल कहते हैं:-स्वराशिमें स्थित केन्द्र (१।४।७ । १० स्थाननें स्थित, शुभग्रहोंके नवांशमें स्थित, स्वनवांशमें स्थित मित्रनाशयुक्त और अपनी उच्चराशि (श्लोक ३१ में कही है ) स्थित और मूलत्रिकोणराशि- में स्थित ग्रह परिपूर्ण बलवान् होता है ॥ ४० ॥ १-आगे श्लोक ४१ में कहा है। ३-सारावल्याम्-"विंशतिरंशाः सिंहे त्रिकोणमपरे स्वभवनमर्कम्य । उच्च भागत्रितयं वृष इन्दोः स्थात्रिकोणमपरेशाः॥१॥ द्वादशभागा मेषे त्रिकोणमपरे-स्वभ तु भौंमस्य । उच्चमथो कन्यायां बुधरय तुंगांशकैः सदा चिन्त्यम् ॥ २॥ परतस्त्रिकोणजातं पञ्चभिरंशः स्वराशिंज परतः। A भापाटीकासहिता। (६५) स्वामिगुरुज्ञवीक्षितयुता होरा बलोत्कटा भवति ॥ ११ ॥ अब लभका बल कहते हैं-लम अपने स्वामीसे अथवा बुध गुरुसे युक्त हो वा दृष्ट हो तो बलवान होता है ॥४१॥ लोमशोक्त सप्तवर्गबलसारणी चक्र समाप्तिमें दिया हैं उससे भी ग्रहोंका सप्तवर्ग वल जानना ।। इत्यायुयः ।। उदाहरण । सूर्य १० । १६ । ५३ । ३९ की कला १ ९० १ ३१ ३९में २०० दो सौका भाग दिया लब्ध ९५ आये, इनमें १२ बारहका भाग दिया शेप ११ रहे ये वर्ष हुए कलाके । २०० का भाग देनेसे शेष १३ । ३९ बचे इनको १२ बारह गुणे किये १६३६४८ हुए इनमें २०० का भाग दिया लब्धशून्य मास आये । शेप १६३ । ४८ को तीसगणे किये ४९१४। • फिर २०० का भाग दिया लब्ध २४ दिन आये शेष । ११४। ० बचे इनको ६० साठ गुणे किये ५८४० । • हुए इनमें २०० का भाग दिया लब्ध ३४ घडीआयी च में पु शु म क. mon राशयः ४ . ८ मू २०१३ स्व १० २७ स्व१८ उ.१५ म्.५ मू १० म १५ मृ२० अंशाः स्व१० स्व २० स्व१५ स्व १० दशभिमागर्जीवस्य विकोणे धनुवि तत्परं स्वगृहम् ॥ ३॥ शुक्रस्य च तिथयोंऽशास्त्रिकोणमपरं स्वभं तुलायां तु । कुम्भ त्रिकोणं स्वगृहे रविजस्य रवेर्यथा सिहे ॥ १॥" अर्थात सूर्यतिहराशिके २० बीस अंशपर्यंत मूलत्रिकोणका २० अंशके उपरांत शेष १० अंशमें स्वगृही होता है। चन्द्र वृषभके तीन अंश पर्यंत उच्चका ३ तीन अंशके अनन्तर शेष भंशमें स्वराशिका होता है, बुध कन्याराशिके १५ पंद्रह अंशपर्यंत उच्चका १५ पद्रह अंशके अनन्तर ५ अंशपर्यंत मुलत्रिको णका और५पांच अंशकेभनन्तर शेषअंशमें (२० अंशकेअनन्तर)स्वराशिका होताहै,गुरुधनराधिके १० अंशपर्यंत मूलत्रिकोणका १० दश अंशके अनन्तर शेष अंशमें स्वराशिका होता हैं, एवं शुक्र तुला राशिके १५ अंशपर्यंत मूलत्रिकोणका १५ पंद्रह अंशके अनन्तर शेष अंशमें स्वराशिकाहोता हैं, शनि कुम्भराशिके २० बीन अंशपर्यंत मुलत्रिकोणराशिका २० अंशके अनन्तर शेष १० अंशमें सराशिका जानना । इति । UAR AVAT र स रा ७ स- ध्या- १० ori Omer ३ १९ maraBN IS/2010 १ १५ यु ३ Mad १२ Cing . म.३ मा. अर्ध आयु ५ (६६) पनीमार्गमदीपिका । शेष ४०० बचे इनको फिर ६० गुणे किये २४०० । हुए, इनमें ४-०० का भाग दिया लव्ध १२ पूल आये । ऐरे कमरे ११०।२४।३४ ६२ वर्षादि सूर्यको अध्यायु आयी । इसी प्रकार शेष चंद्रादि ग्रहकीऔर लग्नकी वर्षादि आयु जानना । अब इसमें श्लोक १५अनुसार सूर्य स्थिर मैत्रीकेशत्रुकी স্থগিত इस कारण सूर्यकी वर्षादि ११ । २४ । ६४ । १२ आयु. अध्यायुचन्नम्। मेसे अपना तृतीयांश (तीन- का भाग देके) ३1८11 ३ ११।१४। घटाया७) ४ १६ । २२ । १८ सूर्यकी स्पष्टायु हुई। । चंद्रमावर्गोत्तमी रला है इसकारण श्लोक ३६ के अनुसार इसकी श्लो ३५, ९ । १७ १ ४० ।।२ को द्विगुण की ११७ ५।२०।२४ हुए इनमेंसे ग्लो श्लोक ३७ के अनुसार सर्वही चंद्र ९ नवम स्थानमें स्थित टा- है इसलिये ४ चतुर्थाश हीन करन यह है इस कारण वर्षादि आयुके आठका भाग देके ।। ५। ११। ५५। ले आये हुए अष्टमांशको हीन किया १० ।। २३ । २५ । २१ ऐ वादि चंद्रकी स्पष्टाथु आयी । मौसके श्लोक ३५ । ३६ । ३७के अनुसार कोई संस्कारका योग नहीं है इस कारण जो मध्यायु १०।१०।१४।४९।१२ है जानना । बुध अस्वका है इसलिये बुधकी आयु ९।२। १९ । .. २ ४ को आधी करके श्लोक ३६ के अनुसार ये स्वद्रेष्काणका है सवास्ते दोगुणीकी ९॥ ३॥ १९ । ४४ । २४ ये बुधकी' स्पष्टाय आयी । वर्गोत्त ० ० स्व-द्र काण ष्काण वीत गु २ गु३ गुगु २ गु नवमे सप्तमे वाम्मे ० ० ६षष्टा ४चतु १० ९ ¿ १ २ . ९ २७ । यु. १४ ५७ १८ २३ भापाटीकासहिवा। एवं गुरु वक्रगति है इसकी आयुको श्लोक ३६ के अनुसार ३ तीनगुणी करनेका और उच्चराशिका है इस कारण फिर ३ तीनगुणी करनेका और यही गुरु वर्गोत्तमांशका है इसलिये फिर २ गुणी करने का योग ३ तीन प्राप्त हुए हैं, अतएव "द्विविघ्नवायां त्रिगुण सकदै" इसके अनुसार गुरुको वीदि आयु ३२२। १७ । २५ । ४८ को एक ही बार ३ गुणी की ३१७ ॥ २२ । १७ । २४ हुई परंतु गुरु शुभग्रह है और ७ सप्तम स्थानमें स्थित है इसकारण इसमेंसे अपना बारहवां हिस्सा ० । १९ । २१ । २७ हीन किया ८११० २।५५ । ६७ ये गुरुको स्पष्टायु हुई और शुक्र वद्रेष्काणका है इसलिये शुक्रकी आयु. ८१२३ । २।२४ । को श्लोक ३६ के अनुसार द्विगुण करनेसे १।५। १६१३१४८ आये ये शुक्रको सष्टायु हुई। एवं शनि बारहवें स्थानमें स्थित है और यह अशुभ यह है इसलिये इसको आयु ५१ ९। ५ । २४ । मेंसे सर्व पूरी) आयु हीन की शेष ० १ ० १ ० १ ० । • यह शनिकी स्पष्टायु हुई वा लम बलवान् है इसलिये लग्नकी वर्षादि आयु ४।।१५।२७।० के वर्षके ४ अंकमें लगको राशिके समान वर्ष ९ युक्त किये १३ वर्ष हुए, शेषमासादिक०।१५।२७ । ० में लगके अंशादिक -२३ । २८ । ३५॥ को बारह गुणा करके आये हुए मासादि ९ । ११ । ४३ ! ० युक्त किये १३॥ ९।२७। १०० ये वर्षादिक लग्नकी स्पष्टायु हुई ॥श्त्यायुयः ॥ स्पष्टायुयोग ६११९। ० । ३२ । ३०॥ अथ स्पष्टांशायुचक्रम् । र. चं. मं. बु.गु. शु.श.ल. ए. ७१०१० ९८ १ ४ 0 . ० . ५ १६/२०१४/१९/२११६ ० २२.२५/४९/४४५५. ४ 1४८/२१/१२/२४५७/४८ देशासाधनमाह- वत्रादौ विशोत्तरी दशा । खेः पडिन्दोदश १० सत ७ भूर्भुवो गजेंदवो-१८5 गोधिषणस्य षोडश १६ ॥

(६८) पनीमार्गप्रदीपिका। शनेनवाब्जा १९ नगभूमिता १७ विदो नगा ७ स्तु केतोरनलानवाः २० कवेः ॥ ४२ ॥ अब दशासाधन्द कहते हैं, जिसमें प्रथम विंशोत्तरी कहते हैं:-कृत्तिका नक्ष सही आदि ले यो प्रथम सूर्यको ६ छह वर्षकी दशा, फिर चंद्रकी १० वषकी' बझंलकी ७ वर्षकी, राहुकी १८ वर्षकी, गुरुकी १६ वर्षकी, शनिकी १९ वर्षकी, बुधकी १७ वर्षकी, केतुकी ७ वर्षकी, शुक्रकी २० वर्षकी दशा जानना॥४२॥ r १ विंशोत्तरीदशाचक्रम् । ४ सं. श. १९ बु. ।। २ के ७ रा pe bort has tot सा. गु. १८ १६ आ स्वा वि ग पन पुष्य उसर चि आ ज्ये % अ म मू. पू अ स अष्टोत्तरीदशा। र ६ पडिदोस्तिथयो १९ऽष्टभूभुवो नगेंदवो १७ झल्य शनेर्दिशो १० गुरोः । नवेन्दवो १९ ऽगो रक्यः १२ समा सिते धराचिनो २१ वेदताशमे शिवात् ॥ ४३ ॥ अष्टोत्तरी दशाके पूर्णादि मान कहते हैं: आर्श नक्षत्रको आदि ले कमसे प्रथम बार नक्षत्र (आ० पु० पु० आ०) की, सूयकी ६ वर्षकी दशा, फिर तीन नक्षत्र (प.पू. उ.) की चन्द्रकी १५ वर्षकी, फिर चार नक्षत्र ( ह. चि.स्वा. वि.) की भौमकी ८ वर्षकी, फिर तीन नक्षत्र ( अ. ज्ये. मू.) बुधकी १७ पूर्णकी, फिर प्यार नक्षत्र (पू. उ. मि. भ.) की शनिकी १० वर्षकी, फिर तीन नक्षत्र (५. श. पृ.) की गुरुकी १९ वर्षकी, तदनंतर चार नक्षत्र (उ. है. अ. भ.) की राहुकी १९ वर्षकी, सदनंवर तीन नक्षत्र (क. रो. म.)की शुकी ११ वर्षकी अष्टोत्तरी दशा जानना ॥ ४३ ॥ ।

ए.
भाषाटीकासहिता।
(६९)
अष्टोत्तरीदशा.
श.
रा. शु.
६
१७] १० १९, १२ २१
आ. म.ह.
घ.
कृ.
श. रे
..
पु. स्वा. मू. भि.पू.
आ. वि.
श्र.
म. मृ.
.
-
अथ योगिनी दशा।
जनुर्भे त्रियुक्तेऽष्टतष्टे दशा मंगला पिंगला धान्यका भ्रामरी च ।
ततोभद्रिकोल्का च सिद्धा क्रमासंकटासन्निपिदाः समैकैकवृद्धाः४४॥
अव योगिनी दशा कहते हैं-जन्म नक्षत्रको संख्यामें तीन · मिलाना
आठका भाग देना, एकको आदि ले जो शेष बचे सो क्रमसे १ मंगल
२ पिंगला ३ धान्या ४ भ्रामरी ५ भद्रिका ६ उल्का ७ सिद्धा ८ संकटादशारक
एकवर्ष बढ़ती हुई एकश्रेष्ठ एकनेट इस क्रमसे जानना । अर्थात् मंगला एक
१ वर्षको श्रेष्ठ, पिंगला २ वषकी नेष्ट, धान्या ३ वर्षकी श्रेष्ठ, चामरी ४ वर्षको
नेष्ट. भद्रिका ५ वर्षकी श्रेष्ठ, उल्का ६ वर्षको नेष्ट, सिद्धा ७ वर्षको श्रेष्ठ,
संकटा ८ वर्षकी नेष्ट जानना ॥ ४४ ॥
म.पि.
योगिनीदशा.
घा. भ्रा. भ. उ. सि. सं.
चं. गु. म. श.शु.रा.
२ ३
आ.पु.
भ. कृ.रो. मृ.
चि.स्वा. वि. अनु. म.
ध. श. पु.भा. ज्ये. भू. पू.पा.उ.पा
उ.भा.
१
शुक्केगेऽर्कस्य होरायां दिवा विंशोत्तरी दशा ।
कृष्णे चन्द्रस्य होरायां रात्रावष्टोत्तरी मता ॥ ४५ ॥

. (७०) पत्रीमागंप्रदीपिका अल्यथा योगिनी कार्या सदा कार्या महादशा। अथ दशाके योग कहते हैं-शुक्लपक्षका जन्म हो और उनमें सूर्यकी होरा दिनमें जन्म हो तो विंशोत्तरी दशा करना, एवं कृष्णपक्षमें जन्म और कक्षों की होरा हो रात्रिसमय में जन्म हुआ हो तो अष्टोतरी दशा ना॥ ४॥ इन दोनों योगोका संभव नहीं हो तो योगिनी दशा करना और महादशा सदा (सर्वदा ) करना । अथ दशामुक्तभोग्यानयनमाह । लिल्ला लाभ ८०० लब्धाः स्युर्गततारकाः ॥ ४६ । शेणा हताः स्वपाकाहारेणाप्ताः समादिकाः। हाला इशा सा पाकाहे इनिता भोग्यसज्ञिता ॥ १७ ॥ शव दशाके भुत भोग्य लानेकी रीति कहते हैं-बयाकी कला करना आठसौका ८०० का भाग देला, जो लब्ध आवे वह गतनक्षत्र जानना । शेष रहे हाला उसको अपनीदशाके वर्षसे (विंशोत्तरीक भुक्ता भोग्य करना हो तो श्लोक ४२ के अनुसार कत्तिकाको आदि ले गिननेर जन्मनशान जिस ग्रहकी दशामें आया हो उस दशामें जन्म हुआ ऐसा जानला. जिन ग्रहकी दशा में जन्म हुआ उसके इशाके वर्ष जितने हो उतने वर्षसे और योगिनीले भुक्त भोग्य करना हो तो श्लोक ४४ के अनुसार जिस दशा जन्म हुआ हो उसके वर्षसे अष्टोत्तरी करना हो तो श्लोक ४३ के अनुसार जिस महकी दशामें जन्म हो. उसकी जितने की दशा हो उतने वर्षसे) गुणा करना. हार ८०० का भाग देना, जो लब्ध आहे वह वर्ष जानना. शेष बचे उनको १२ बारह गुणे करना और ८०० आठसौला भाग देना लब्ध माप्त आधे शेषको ३० तोस गुणे करना ८०० आठ- लौका भाग देता लब्ध दिन आये, शेषबचे उनको६० साउगुणे करना फिर ८०० आठहोना भाग देना जो लन्ध आवे नहघटी जानना. शेष बचे उसको फिर ६०साठे गुणाकरना ८०० का भाग देना लब्ध आदे वह दल जानना । ऐसे आवे जो वर्षा- दिक वह मतदशा ( भुक्तदशा ) हो, उस भुक्तदशाको दशाके वर्षसे हीन करना (सोधना) शेष बचे वह भोग्य दशा समझना ॥ ४६॥४७॥ १ विशोतरी और योगिनीले कुछ भिन्न रीति हैं इसकारण अष्टोत्तरीके भुक्तभोग्यलानकीरीति एलगनाये लिखी है।

भाषाटीकासहिता। (७१) विंशोत्तरी दशाका उदाहरण । स्पष्ट चन्द्रमा ५। २९ । १९ । ४९ इसको कला १०७५९ । ४९ इसमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध १३ आये यह गव नक्षत्र हस्त हुआ । शेषकला ३५९॥४९॥ वची इसको श्लोक ४२ के अनुमार कत्तिकाको आदि ले गिननेसे जन्मनक्षत्र चित्रा भौमकी दशामें आया इसलिये भौमफे दशाके वर्ष ७ सातसे गुणे किये २५१८१ ४३ हुए इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध ३ वर्ष आये, शेप १३८ । ४३ वचे इनको १२ बारह गुणे किये १४२४ । ३६ हुए. आठसौका भाग दिया कब्ध एक मास आया, शेष ६२४। ३६ को ३० तीसगणे किये १८७३८१० हुए ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध २३ दिन आये शेष ३३८ ० बचे इनको ६० साठगणे किये २०२८० १ ० इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध २५ घटीआयी शेिप२०० ०को ६० साठगुणे किये १६८०० । ० । हुए, फिर इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध २१ पल आयी शेप० शून्य बची। इसमकार वर्षादि ३१११२३। २५१२१ भौमकी भुक्त दशा आयो, इसको दशाके वर्ष ७ में घटायी शेप ३।१०।६।३४ । ३९ बचे यह भौमकी भोग्य दशा हु । इनमें ८०० विंशोत्तरीदशायन्त्रम. भी भु भो भे, गु. दु ७ ७ १८ १९ ३ ३ . चयोग 20 तपदि सात् शक. ३४ २१ १९२८१९.२ (९५० ११९६६१९८५) 1१७०३/१७२७/१८१५/१८३१/१८५० ८ ८ ૨૩ २८ २८ २८ २८ १८ १८ १८ १८ m. MAuN उत्तीर्णाकं - ७२) पनीमार्गमदीपिका। योगिनी दशाका उदाहरण । हुन् नक्षत्रकी संख्या १४ में तीन मिलाये १७ हुए, आठका भाग दिया शेष १ इन्चा इसलिये १ पहली मंगला दशा वर्ष १ की में जन्म हुआ, इसके घर्ष एकसे चंद्रमाकी कला १०७५९ । ४९ के आठसौका भाग देनेसे शेष इन्चे ३५९ ॥ ४९ इनको गुणे किये ३५२ । ४९ हुए, इनमें ८०० आठसौका शाग दिया लब ० शून्य वर्ष आया, शेष ३५९ । ४९ को क्रमसे १२ । ३० । ९०६ गुणे करके ८०० का भाग देके विंशोत्तरीवत् मासादिक लाये यह योगिनी मंगलाकी भुक्त दशा हुई • । ५। ११ । ५५ । ३ इसको मंगलाके पूर्व मेंसे होन दिल्या शेष ०। ६१८।४ । ५७ यह भोग्य दशा हुई। योगिनीदशाचक्रम्. - From मे.सु. उ. श. १ १ AU ur 0 ३५ • ur w ६ ६ ६ ६ सं.भी. पि. धा. भ्रा. भ. लि. सं. चं. चं. गु. मं. बु. शु. स. २ ५ ३ ५ ९ १४ २० २७ ८५ ६ वयो. ११ १८ १८ १८ १८ १८ गतम वर्षा ५७ ५७ ५७ ५७ ५७ ५७ १९०८.१९२९/१९३१ १९३४ १९३८ १९४३ १९४९ १९५६ १९६४ संवत् १७९३ १७९४ १७९६ १७९९ १८०३ १८०८१८१४ १८२१ १८२९ ४ १७ शक. । ५३ १५८ AUG CS ५८ ५८ ا ا مر و مو SH SMS ५८ उत्ती- ५८ मार्कः ३६ श्रे. ने. mmar N श्रे. ने. श्रे. । ने. श्रे. | ने. अष्टोत्तरीदशा बनानेकी रीति । प्रथम चंद्रमाकी कला करना उसमें ८०० आठसौका भाग देना, जो लब्ध भावे वह गत नक्षत्र जानना, शेष कला बचे उसको श्लो० ४३ के अनुसार जिस ग्रहकी दशाने जन्म हुआ हो उस ग्रहके दशाके वर्षोंसे गुणन करके आठ- सौ ८०० का भाग देके वेशोत्तरी दशावत् वर्षादिभुक्त दशा लाना । तदनंतर उस मुरु दशामें जित नक्षत्रकी दशा हो उतनेका (चार नक्षत्रकी हो तो ४ चारका तीन ३ पी हो ३ तीनका ) भाग देके वर्षादिक ५ फल लाना;

- ८००१६००२५३/७४६ धुवख २० ० ० भापाटीकासहिता। जो आवे वह एक नक्षत्रकी भुक्तदशा समझना फिर जितने नक्षत्रकी दशा हो उसमें से जितनी संस्थाके नक्षत्र गत हों उतनी संख्यासें (१ एकगत हो तो १ से दो हो वो२ दोसे३होवो३तीनसे ) जिवने वर्पकी दशा हो उन वोको गुणे करना और उसमें चार नक्षत्रकी दशा हो तो ४ का, तीनकी हो ३ वीनका भाग देना जो आवे वह वर्ष मास ऊपर मायी हुई एक नक्षत्रकी भुक्तदशाके वर्पमासमें मिलाना सो सष्ट भुक्त दशा होवे । उस भुक्तदशाको दशाके वर्पमाप्तमें होन करना भोग्य दशा होवे परन्तु चन्द्रमाकी कला १५२०० पंदरा हजार दोसौसे अधिक हो तो चन्द्रमाको कलामेंसे १५२०० पंदरा हजार दोसो घटा देना. शेप जो कला बचे उसमेंसे क्रमसे नीचे लिखे हुए कोष्ठको जो नक्षत्रोंके । शनिदशानक्षबधुवखंडाचक्र. ध्रुवके खण्ड हैं वे शोधना (हीन करना) जितने खट ए.सा.द. पा. भि. श्रव. नक्षत्र, निकलें उतने निकालना, जो खण्ड नहीं निकले वह ४० डाँका अशुद्ध खण्ड समझना। शेप बचे कला उसको ३० मा.मा. मामा. मा. तीसगुणी करना और अशुद्ध खण्डका भाग देके मास दिन घडी पलात्मक चार फल लाना । यदि माम १२ बारासे अधिक हो तो मासमें १२ बाराका भाग देना लब्ध आवे वह वर्प शेप मासादि समझना। ऐसे आये हुए वर्षीदिकमें जितनी संख्याके खण्ड निकले हों उतनी ही प्रत्येक संख्याके २ वर्ष ६ मास मिलाना ( अर्थात् एक खण्ड निकला हो तो २वर्ष६मास दो खण्ड. निकला हो तो ५वर्ष,तीन खण्ड निकले हो तो ७ वर्ष ६ मास.) जो आवे वह शनिकी भुक्तदशा समझना. उसको अपने दशाके वर्ष १० मेंसे घटानेसे भोग्य- दशा होवेगी, यह रीति वेवल चन्द्रमाकी कला १५२०० पन्दरा हजार दोसौसे १७६०० सतग हजार छः सौ पर्यंत हो वहांतक ही करना; शेपमें नहीं करना, अष्टोत्तरीदशाके भुक्त भोग्य होंगे इति । अष्टोत्तरीदशा--उदाहरण। स्पष्ट चन्द्रमा ५। २९, १९ । ४९ इसकी कला १०७५९।४९ हुई इसमें ८०० आठसोका भाग दिया लब्ध १३ गत नक्षत्र आया शेप ३५९४९ बचे इनको श्लोक ४३ के अनुसार हस्तको आदि ले चार नक्षग्रको भौमकी दशामें जन्म नक्षत्र चित्रा मिलता है इसलिये भौमकी दशा वर्ष ८ आठसे गुणे किये ।

Acy (७४) पनीमार्गप्रदीपिका। २८ । ७८ ॥ ३२ हुए । इनमें ८०.० आठसौका भाग देके विंशोत्तरीदशावत् हदि ३१७१५२५।२४ लाये इनमें भौमदशा ४ नक्षत्रकी है इसलिये चारका सामादिगा लन्छ सूर्णादि ०।१०।२३ । ५१ । २१ आये यह एक नक्षत्रकी भुक्त दशा हुई, तदनंतर यह चार नक्षत्रकी दशा इसमें से 3 हस्त नक्षत्र गत है इस कारण १ एकरी दशाके वर्ष८को गुणे किये ८ हुए इनमें चारका भाग दिया लब्ध २ वर्ष आये ये एक नक्षत्रकी ऊपरकी आयी हुई शुत्ताहशा ० १ १०१२३।५१ । २१ के रूप ० में युक्त किया सो वर्षादिक २।१०।२३।५१।२३ भौमको स्पष्ट भुक्त दशा हुई । इसको भौषके दशाके वर्ष ८ में घटाये शेष ९ । १।६। ८। ३९ भोग्थदशा हुई। शनिकी दशाका कल्पित उदाहरण । शनिकी अष्टोत्तरीदशासाधन अभिजिनक्षत्र होने के कारण मिनरीतिसे किया जाता है उसके बनानेकी युक्ति प्रथम कही ही है परन्तु बालकोंके सुबोधार्थ उसका एक कल्पिब उदाहरण कहते हैं:--स्पष्ट चन्द्र ९ ॥१६। ४० । ० इसकी कला ३७२०० सतरह हजार दो सौ है यह कला पन्दरा हजार दो सौ १५२००० से अधिक है इसकारण चद्रकी कला १७२०० में से १९२०० । • पन्दरा हजार दो सौ घटा दिये शेष २००० ६ ० कला जची इससे पूर्वाषाढाके ध्रुवके रखंडके अंक ८०० १० आठसो घटाये शेष १२००० १० बचे इसमेंसे फेर उत्त- राषाढाके खंडके अंक ६०० छसौ घटाये शेष ६०० । ० बचे इसमेंसे फेर अभि- जितके खडके अंक २५३ । २० घटाये ३४६ । ४० शेष बचे । इसमेंसे ४ चतुथ इण्ड श्रवणके अंक ७४६ । ४० नहीं निकलते हैं, इसलिये ये अशुद्ध खंड हुआ। शेष कला ३४६१४० को ३० वीस गुणा करनेसे १०४०० । ० हुए इनमें अशुद्ध लण्ड ७४६ । ४० का भाग देले मासादि चार फल लाना है परन्तु से दोनू भाज्य भाजक है कलादिक हैं इसलिये सवर्णित किये भाज्य ६२४०० भाजक ४४८०० सवर्णित हुए. भाज्य ६२४०० में भाजक ४४८०० का देके पास दिन घटी पलात्मक चार फल लाये १३ । २७ । ५१ । २५ आय-पास १३ बारासे अधिक हैं, इस कारण १३ में भाग दिया लब्ध १ वर्ष शेष १ मास हुआ। ऐसे वर्षादिक ११ । २७ । ५३ ।। २५ । आये, २५ । आये, इनमें पूर्वाषाढा उत्तराषाढा आग भाषाटीकासहिता। (७५) और अभिजित इन तीन नक्षत्रोंके ध्रुवखंड कलासे सुधे हैं इसलिये साववर्ष ६ छ:मास मिलाये सो वर्षादि ८१७१२७१५१।२५। शनिकी भुक्तदशा आयी इसको दशाके वर्ष १० मेसे हीन की शेष १।४।२।८। ३५ वर्षादि भोग्य दशा हुई ॥ इति अष्टोत्तरीदशोदाहरणम् ॥ अष्टोत्तरीदशाचक्रम. म. भु.मं.भो.. ८ VI श. १० ३२ کی مکه २ २२ १ १ ययोग- ६ ८८ ८ तवर्षादि। २१ ३९ ३९ ११९२८१९२३.१९५० १९६०१९७९१९९१ (१७९३ ११७९८१८१५१८२५/१८४४ १८५६ १० । सवत् शक. २३ २३ Mm उत्तीर्णा. . २ १८ १८ १८ १८ अथान्तर्दशासाधनमाह- दशा दशाहता कार्या स्वस्वमानेन भाजिता । लब्धमतर्दशा ज्ञेया वर्षायाः क्रमशो बुधैः ॥ ४८ ॥ अब अन्तर्दशा बनानेकी युक्ति कहते हैं-दशाके वर्षको दशाके वर्षसे गुणन करना और अपनी अपनी दशाके मानका भाग देना लब्ध वर्षमासादिक आवे वह क्रमसे अपनी अपनी दशामें पंडित लोगोंने अन्तर्दशा जानना. अर्थात् विंशोत्तरी महादशामें जिस ग्रहमें अंतर्दशाचक्र बनाना हो उस ग्रहके दशाके वर्षको विंशोत्तरीके ९ नव ही ग्रहोंके दशाके वर्षसे कमसे गुणन करना और विंशोत्तरी महादशाके मानका ( १२० एकसा बीसका ) भाग देना । एवं अष्टोचरीमें जिस ग्रहमें अन्तर्दशाचक्र बनाना हो उस ग्रहके दशाके वर्षको अष्टोत्तरीके आठ ही यहाँके दशाके वर्षसे क्रमसे गुणन करना और अष्टोत्तरीके मानका (१०८ एकसौ आठका ) भाग ६ (७६) पनीमार्गप्रदीपिका। देना । ऐसे ही योगिनी दशामें जिस दशामें अंतर्दशाचक्र बनाना हो उस दशाके हर्षकी योगिनीके आठही दशाके वर्षो कमसे गुणन करना और योगिनी दशाके माका (६ छतीसा) भाग देना । ऐसे जिस दशामें अंतर्दशा करना हो उसका जो मान हो उसीका भाग देके कमसे वर्ष मासादि लाना जो आवे वह अपनी अपनी दशा अपनी अपनी अंतर्दशा जानना ।। ४८॥ उदाहरण । जैसे विंशोत्तरी सूर्यबहादशा अंतर्दशाचन बनाना हैं सूर्यमहादशाके वर्षद है हाल महादशाके वर्ष ६ को सूर्य दशाके वर्ष ६ से गुणन किये ३६ हुए, इनमें विशोतरी दशाके भान १२० का भाग दिया लभ ० वर्ष शेष ३६ को १२ बारागुणे किये ४३२ हुए ३२० का भाग दिया लब्ध ३ माह आये शेष ७२ मने इनको ३० वीस गुणे किये २१६० हुए, इनमें फिर १२० का भाग दिया लम १८ दिन आये शेष बची इसको ६७ गुणा करके १२० का भाग दिया लब्ध । ० घटी एल आये, ऐसे वर्षादिक ० । ३।१८०० सूर्य महा- शामें सूर्यकी अंतर्दशा आयी । फिर सूर्य दशाके वर्ष ६ को चंदमहादशाकेवर्ष १० से गुणे किये ६० हुए इनमें १२० एकसौ बीसका.. भाग देके वर्षादिक अमले लाये ०।६।। ये सूर्य महादशामें चंकी अंतर्दशा आयी-एवं दशाके वर्ष ६ को भौमदशाके वर्ष ७ खातसे गुणे लिये ० । २हुए ३२०एकसौ बीसका भाग देके वर्षादिक लाये ० १४ । ६ । ० । • सूर्यमें भौमकी अंत- दशा आयी। ऐसेही फिर सूर्य महादशाके वर्ष ६ को राहुदशाके वर्ष १८ अठरासे गुणन करनेसे १२८ आये इनमें दशा मान १२० का भाग दिया लब्ध ० १० । २४ । ० १ ० । सूर्य महादशा राहुको अंतर्दशा आयी । इसी प्रकार दशाके वर्ष ६ को गुरुदशाके वर्ष १६ से गुणके १२० का भागदेनेसे ० १९/०८ वर्षादिक सूयमें गुरुकी तथा शनिके वर्ष १९ से देशाके वर्ष ६ को गुणन न करके दशाके मान १२० चा भाग देनेसे वर्पादि० । ११।१२।। शनिकी अंतर्दशा तथा बुधके वर्ष १७ से दशाके वर्ष ६ को गुणन करके १२० का भाग देनेले ० । १० । ६ । ० । • सूर्यमें बुधकी अंतर्दशा तथादशाके वर्ष ६ को केतुकी दशाके वर्ष ७ खे गुणके १२२० का भाग देनेसे ०।४।६।०॥ 1. केतुकी ऐसे ही दशाके वर्ष ६ को शुक्र महादशाके वर्ष २० से गुणन करके ------- भाषाटीकासहिता। (७७) दशाके मान १२० का भाग देनेसे ११ । ० १ ० १ ० । वर्गादिक सूर्यगहा- दशामें शुक्रकी अंवर्दशा आयी। इसीप्रकार विंशोचरी चनादि शेष ग्रहोंकी तथा अष्टोत्तरीयोगिनी आदि दशामें अंतर्दशा जानना ॥ इति ॥ (अथ विंशोत्तरीमध्ये अंतर्दशाचक्राणि) सूर्यमध्येंतर्दशा. चंद्रमध्यतर्दशा. रागुश.केश चं में रागुशबु के शुर' र . ० ० ० ० १ .07 १ ६ १० ७ ४ ७ ७ ८ ०००० ४१० २५१२८१२ . .me. . . . ० . ७ ० or. . .... ० . . . ००० ..। ० ० . ० ० . ० ० . ० ० . . . भौममध्यतर्दशा. राडमध्यतर्दशा. चारागुशबु के शु म ३ र ० १ १ a या बुकेशु . ० ० १ ०१११ ५ ६ १ . 0 ४ ६ ८ ६ ०२४/२४ ६/१८/१८ . 9.०० . ०२४ . ०१८ ० ० . ० . . . . . ० . ० ० 9 ० ० . . . ० . . . गुरुमध्येंतर्दशा. शनिमध्यतर्दशा. रा गुटा । धुकशु २ चम १ . १ ३ ० १ ००० ..NANGE orm . १८/१२ ... ८ . ६।२४ AN००० ० ० . . . . . . . . . . o . . ० ० ० ० . बुधमध्यतर्दशा. केतुमध्येंतर्दशा. . दुकानचं मरागु शाक शुरचं | में |रागुशबु ૨ ० १ ० ० ० ० ० १ ২৩৬ २७/१८६ ९२७ २७ ००० . ० ० . . . . ० ० 0 . . शुक्रमभ्येन्तर्दशा. चमगाशके . . .

पनीमार्गप्रदीपिका। अष्टोत्तरीमहादशामध्यतर्दशाचक्राणे) जमध्यतर्दशा, चंद्रमध्येंतर्दशा. स d. 2 श। गु । रा 64 ०611 . १ ६. म शगु | राशु છે ८ १०१० २०२० १० २०२० o मा- दि. घ. . 0 . ० चं में १ १ १ १ ३ kisor १ ३ व. सा. दि च. 0 २० मौसमध्यतर्दशा. बुधमध्येतर्दशा. हु रा शुर श. गु रा २ ३ ४. १०६ ८६ | ११ १० ३ । ३३६/६६/२०२० १० २६/२६ । २० २०/१०/१०३ २०६०/४०४० ३०४०४० २० 10 ० शातिमध्यतर्दशा. गुरुमध्येतर्दशा. श गुमशशु र छ । राशु र वं २ । ३ २ छ । १ ११ ११] ९ ३ /१०/१०/२०/१०/२६/२६ ३/१०/१०/२०/२०२६/३६/३ १०/२० ४० १० १० ४०/४०२० 이 हामध्येतर्दशा शुक्रमध्येंतर्दशा. राशर च संतु र चं। म ह गुरा २ ४ २०२०/१०/१० २०२० १० १० १ १ or CH. ० मा. दि. घ. ० ० . ० ० १ १ १ or or १ १ 3. श ८ १ Dwaroo ला. दि. घ. ० . योगिनी महादशामध्येतर्दशाचक्राणि. मंगलामध्येंतर्दशा. पिंगलामध्येंतर्दशाः छावाभ लिखें पि धाभ्रा) म उलि म ३ ३. २०२० १०३० १०/२०१० २०६० २०१०/१० १ E 09 माः दि. घ. 0/ धान्यादातदेशा. भ्रामरीमध्येंतर्दशा. धाभ्राभ उसिव मंपिंद्रा उससं. मंपिंधा ६ ७ १०/२० १०/२०१०/२० ४ 3. ०. . दि. ,

भापाटीकासहिवा।
भद्रिकाम येतर्दशा.
उल्कामध्येंतर्दशा.
भ.उ.मि. म. म.पि.धा. भा. र. डि.सं. म. पि.धा.मा. भ.
६
८
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'सिद्धामध्येंतर्दशा.
सि.सं. म. वि.धा.भा.भ,
१६/१८२
१.२०/१०/२० १०.२०
संकटामध्येंतर्दशा.
5.सं.म.पि.धा. भ्रा. भ./3. सि.
८१०११३१२६/१८/मा.
१०.२०१०
२० दि.
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अधांतर्दशामध्ये विदशानयनप्रकारमाह ।
अन्तर्दशाया दिवसाः स्वस्ववपः क्रमाद्धताः।
स्वमानाव्दहताः प्राप्ता विदशा दिवसादिकाः॥ ४९ ॥
अब विंशोतर्यादि दशाको अंतर्दशामें विदशा करनेका प्रकार कहते हैं।
अनर्दशाके दिनोंको अपने २ वर्षांसे विंशोत्तरीकी अंदर्दशाके दिनोंकी विंशो-
तरीके सूर्यादि ग्रहोंके वर्षसे अष्टोत्तरीकी अंतर्दशाके दिनोंको अष्टोत्तरीके
सूर्यादिग्रहोंके वर्षसे योगिनीकी अंतर्दशाके दिनोंको योगिनीकी मंगलादिदशाके
वर्षोंसे) कमसे गुणन करना और अपने अपने दशमानके वोका ( विंशोत्तरीको
अंतर्दशामें विदशासाधनमें विंशोत्तरीके मानके १२०एकसौ बीसका, एवं अष्टो-
तरीमें १०८का योगिनीमें ३६का) भाग देना, जो लब्ध आवे वह दिवसादिक
(दिनादिक) विदशा जानना ॥ ४९ ॥

(८०) पत्रीमार्गप्रदीपिका। उदाहरण । बैले विंशोत्तरी सूर्यबहादशामें सूर्यकी अंतर्दशा मा ३ दिन १८ की है हा विदशा कहना है इसलिये इसके दिन किये १०८ हुए इनको विंशोत्तरी शाय सूर्यके वर्ष ६ से गुणन किये ६४८ हुए इनमें विंशोत्तरी दशाके मानके वर्ष १२० एकसौ बीसको आग दिया लब्ध ५ दिन आये शेष ४८ बचे इनको ६० साठगुणे किये २८८० हुए इनमें १२० एकसौ बीसका भाग दिया छ २४ घटी आयी शेष बची ६० साठगुणा करके १२० का भाग देनेसे १ पछ आयी यह सूर्यकी अंतर्दशामें ५ दिन २४ घटीकी सूर्यकी विदशा हुई । हरे ही सूर्यकी अर्दशाक दिन १०८ को वनादिक्के वर्षोंसे कमसे गुणन करके ३६० दशामानका भाग देनेसे दिनादिक सूर्यकी अंतर्दशा विदशा हुई। इसी प्रकार विंशोत्तरी दशाकी शेष चंद्रादिक ग्रहोंची अंतर्दशामें तथा अष्टोत्तरी योगि- भीकी अंतर्दशामें विदशा दिनादिक जानना ।। सूर्यमध्येसूर्यातस्तन्मध्येविदशा सूर्यमध्येचंद्रातरतन्मध्यावदशा. र.वं. म. रा. गु. श. बु. के. शु .. रा. गु. | श.पु. के.शु. र १० मा. ५१९ ६ १६ १६ १७ १५, ६ /१८/१५/१०/२७ १२४.२८/२५/१०० ० ९ दि. १८ . . . . ० घ. . . ० प ० .

--- एनीमार्गप्रदीपिका । MammammarA चंगमध्ये सुधांतरं तन्मध्ये विदशा। चंद्रमध्ये केत्त्वंतरं तन्मध्ये विदशा । AJAVALLA म १ . चं मं रा गु शके | शुर चं मं । रा । रागुशबु ३ २ ૨ ३ . १० मा. १३ /२९ २५.२५) १२ / २३.१६८२० १२५ २०१७/१२१/२८/३/०९/दि. १५ ३०३० १५/३० ०१५/४५घ. . प. AV १ ० चंदूमध्ये शुक्रांतरं तन्मध्ये विदशा. चंद्रमध्ये सूर्यातरं तन्मध्ये विदशा. रा| गु श | बु | केर संरा रागुश दुकेशु ०१ मा. २० २० ९ १५/१०/२७/२४ २८१२५ १०० दि. ३०/३०३०० घ. || | 1 ०.प. सोममध्ये सौमांतरं तन्मध्ये विदशा। भीममध्ये राहवरं तन्मध्ये विदशा। गगुश छ । के शु। र गुशबु । केश रचं मं ०१०मा. ८|२२|१९|२३|३०८२४७ १२ २६ २०३९/२३ /२६ १८१२२दि. १९३४ ५४०३घ. ००० . . १ १ . ० प. 62 JAR १ १ १ १ १ ३ | भीममध्ये केवंतरं तन्मध्ये विदशा। भीममध्ये गुर्वतरं तन्मध्ये विदशा। सोममध्ये शन्यंतरं तन्मध्ये विदशा। श। पु के रचं | मं शबु के शुर 5। मं रामु १ ૨ ० ११ मा. १४/२३ | १७ | १९ २६ / १५/२८/१९/२० ३ /२६/२३ ] ६:/१९/ २ २३ २९२३/ दि. ३६/२४.१०३१/१.६/३०/५७/१५/१६/५१/१२ घ. ३०।३०/३० ३०/...पि. भीममध्यो बुधांतरी तन्मध्ये विदशा। संग के शु वं मं रा गुशबु ०मा. २०१०/११/१०/२९/३०२३१७/१६८ २४ ७१२/८/२२/१९/२३/२० दि. ६४१६३०/५११५४९३३३६ ३१ ३४३०/११/१५/३४.३३६/१६४९घ. ३०/३० ३०/३० प. होमल शुमांतर तत्मध्ये विदशा । भीममध्ये सूतिर तन्मध्ये विदशा। गुशबु चं मं रा गु] श|| केशु मा. १०/७१८/१६/१९/१७/७.२ दि. ३०/३०/३०/१८/२०६१/५४,४८/५०/५१२१/० घ. 6 6 6 १ १ १ ० . . O . . 0 क + पत्रीमार्गप्रदीपिका ainik CAREERESMAAILANETSUSTAISEXI शुरुमध्ये बुद्धदर तन्मध्ये विशा. शुरूमध्ये केत्वंतरं तन्मध्ये विदशा. न्च रा| गुहा के र चं में रागुशाए ३ १।११ मा. १७/१६/ १० १७/ २ / १८ ९ १९/२६/१६/२८/११/२०१४२३१७/ दि. ४८ ०३६/२४४८/१२/३६ a १ ४ १ อุ ६ १ a ८ 0 Q रा र शु १ १ - 710 v० ० . . । १ . १ १ १ . ० ० प. के मुरूमध्ये मृन्वंतरं मध्ये विदशा. गुरुमध्ये व्यंतरं तन्मध्ये विदशा. शु | चं! म गु, श दु । के चं| मं । गु| शबु के शु। १ १ ०१ मा. ९०११८ २०३६ २४ २ | १६ २६/१४ |३४|१६ १३/८/१५/१०/१६/१० दि. ४८/१२/२४ ३६१४८४८/० घ. ० प. गुरुमध्ये चंद्रातरं तन्मध्य विदशा गुरुमध्ये भौमांतरं तन्मध्य विदशा च रा गु । श। दु| के। शु र। मंरागु के शुरचं ૨ २ ૨ १ मा. १०२८।१२।४।१६८ २८/२०२४ १९/२०१४,२३ । १७/१९/२६ १६२८ दि. ३६/२४|४८/ १२ / ३६ ३६ . ४८. घ. ००० गुरुमध्य राहतरं तन्मध्ये विदशा शनिमध्येशेन्यंतरं तन्मध्ये विदशा गु शबु. शु र। वं मं शबु के शु र, चं| मंरागु २ ५४. मा. ९ २५ १६४ २४१३१२/२०२६ ३ ३ ३१२२४ दि. ६/१२ ४८/२४२४ १२ २४ । १८/२५/१०/३० ९ / १५/१०२७२४ घ. ३०३०३० ० ०/ प. शानिमध्ये सुधारं रामध्ये विदशा शनिमध्ये केत्वत तन्मध्ये विदशा क । शुर चं| मं गु शके शकशु चं। मं रागु शबु ५ ० २ १ १२.१ मा. १७.२६/११ ९८/२०१६/२५/ ९ १९| ३ |२३|२९/२३/३२६ दि. १६/३१३०/२७/११५/३/२१/१२/२५११६/३०/५७ १५/१६/५१/१२/१०/३१ ३०/३० शनिमध्ये शुक्रांदरं तल्मध्ये विदशा. शनिमध्ये सूर्यातन्मध्ये विदशा, राग बु | के र में। रागाश केश १०.मा. १०:२७ ११६ १७/२८/११/११/१५/२४१८/१९२७ दि. ३० २०३०६३.५७/१4/३६९२७५७/० घ. ३ MO १ १ ५ ३ . ४ १ ३. ३६ १ १ Foluri०० Gitars.० is wo . ० .

হীফাকবো। बुधमध्ये गुर्वतर पन्ध्यो विदशा. पुलमाये शन्यंतरंतन्मध्ये विदशा. का | दत चं| मं रागु १ ५ १८९/२५/१७/ १६/१० ४/१०/२/३१७१२६/११/१८/२०२६२५/९ दि. १८. १३३६/३६. . ३६/२/ नः २६/११/२०.२७/५/३१ /२२/१२/ घ. ३०० प. ३ १ २ १ نم स तुमध्यो कत्वंतल्मध्ये विदशा वामध्ये शशांचरंतन्मध्ये विदशा. राशु शहर || संरा| गु|शबु के २ २१. १० मा ८ ३४७ १२८२२|१९२३/२०१०६१ २६ ६.२९/२४/दि. ३० ३०/३०/३० घ. १ Faro० ३०/३०० ० . . ० 0 १ ७ ० . तुमध्ये सध्यंतरं तन्मध्ये विदशा. कैतुमध्ये चंद्रातरंतन्मध्ये विदशा. वंसं शबु केश में शशु के शुर १ १० मा. १८/१६/१९१७ १७] ७ ७२११७/१२ १ १२८३ २९ १२५ १० दि. १८/३० ३१५४/५८/५७ [५१ २१०.३०/१५/३० १५/४५१५ ००/घ. ० प. केतुमध्ये भौमांतरंतमध्ये विदशा. केमध्ये राहूतरं तन्मध्ये विदशा. रा| गु शके! शुरचं रा| गु| श. बु १ १. २ १०मा २३/१९/१३/१०/८/२४/७ १३९२६/२०३९/१३ | २२ । ३।१८/१२२/दि. ५४/३०३ घ. ३०। ६० कमध्ये सुर्ववर तन्मध्ये विदशा. केतुमध्ये शन्यंतरंतत्मध्ये विदशा. ० ० १ १ ० १ ar १ १ 0 चं] मारा गु १ ३. ११ मा. १४/२३/१७/११/२६/१६/२८/१९ २० ३/२६/२३ ६१९ ३२३ २९/२३ दि. ३६२४.१०.३१/१६३०१ ५७/१५/१६५१/१२ घ. ०॥३०/३०।३० ३०० .पि. केतुमध्ये सोन्यापरतन्मध्ये विदशा. शुझमध्ये शुक्रांतरंतन्मध्ये विदशा. रा! गुशिशु चं| मं| रा शबुक १ २ ६/५/२/मा. ३० २०१९) १७/६९/२०/२३/१७/१६२० १०/१० १० १०/२०/१०/दि. ६४४९/३०/५१३५/४९३३ ३६/३१० घ. ० ३०० र १ १ ३ ६ 0 .. .

भापाटीकासहिता। (८७) एममध्ये रम्पवर चन्मम्मे यिदशा। रा गुग केशु शुवामध्ये चंद्रांवरं सन्मभ्ये विदशा। चं मं रा) गुशबु । के शुर . ० . . १८/०२१४२४११८१२७/२१/२१ . २०१५ २५ . ० 0 . . . ० . ० . 0 ० घ. काप. . . ० . . . . . . . ० चारा ० . १ . ० ० ० . 0 . ० . ० 0 ० ० G १ . ० . . . ० . ० . शुरुमध्य भौमांतर तन्मध्ये विदशा। शुक्रमभ्य राहतरं तन्मध्ये विदशा। म गु डा। केशरचम १ १ १ २४ २६/६।२९/२४/१०/२१/५/१०/०४/२१ ३ ३०/३०३० घ. 10 शुकमध्य गुतरं तन्मध्ये विदशा। शुक्रमध्येशन्यंतरं तन्मध्ये विटशा। ठा बुके शुर में रा| शत्रु के शु। र| चं मंग। १। ५ ४ १ ३ ५.५ मा. २/२६.२६/१०/१८१२०२६ २४ १०/२७/ ५६२१२१ दि. ३010 घ. ०प. शुक्रमध्ये सौम्यांतरं तन्मय विदशा। शुक्रमध्ये केवंतरं तन्मध्ये विदशा। ए ।कार चमं रा गु| शाकेश रागुशबु १ ४ २ १ १२/१मा. २४/२९/२०१२१/२५/२९/ ३ ११६/१२/२४२०/२११५२४/३/२६/६/२९ द. ३० ०/३०/३० घ. प. १ ८ ० . . o . . . . .. . ० . . ० . ० . -- ४ ० . . . ० ० ० ० १ . . . . . . .. . . . . . D. इति विंशोत्तरीमध्ये सर्वेषां ग्रहाणामंतर्दशामध्ये विदशा-एवमष्टोत्तयादीनामपि ज्ञेया। ऊध्र्व स्थाप्यो जन्मशाकः शकाधो जन्मोत्पन्नः पद्मिनीप्राणनाथः । तद्वधितर्दशाब्दादियुक्तं तस्मिन्शाके स्पष्टसूर्यो दशांते ॥ ५० ॥ 'अब भुक्त भोग्यदशा अंतर्दशा विदशामें जन्मका शक और स्पष्टसूर्य जोड़- नेकी रीति कहते हैं:-ऊपर जन्मका शक लिखना और शकके नीचे जन्मसम- यका स्पष्टसूर्य लिखना; उसमें वर्षादिक भोग्यदशा युक्त करनेसे भोग्यदशाके उत्तीर्ण समयका शक और सूर्य होता है। ऐसे ही दशाके आरंभका शक और सूर्य -- (८८) पनीमारीपदीपिका। अंतर्दशाले युक करनेले भतर्दशा उत्तीर्ण समयका शक और सूर्य होता है और शहदशाये भारमा श और खून विदशा युक्त करनेसे विदशाके उचीर्ण समका शक और सूर्य होता है ॥ ५ ॥ इदाहरण । स्पष्ट है, विंशोत्तरी योगिनी तरी दशाके चन्में शक और सूर्य युक्त किया है उन चक्र समझना। इति दर्शातशाविदशानएनकारः । अथागास्यबसाधनम्। सौरवर्षदिनान हतेतान्दाः कृतुल्यजः । जन्मोत्थधुगणेनाढया इज्याहर्षखे वणः ॥ ६१ ॥ अब आगामि वर्ष साधन कहते हैं:-दिनादिक सौरवर्ष ३६५।१५।३१ ॥३० हो गतवर्षोका गुणन करना और उसमें जन्ममयका बलतुल्यका सावैयव अहर्गम युक्त करना, गुरुवारको आदि ले वर्षके आरम्भसमयका सायद ( वर्षप्रवेशको इष्टवटी पल विपळ सहित) अहर्गण होगा ॥ विश्वनाथः । गणोधस्त्रियुक् स्वाक्षिगोंगाशयुक्तविषमतः आप्तावमैर्युक्त- ऊर्ध्वः ।। खरामैहर्ता सैकशेष तिथि: स्यात्फलं सासवृंदं ततोऽधो द्विनिनात् ।। ९२ ॥ रसागान्वितस्वेभनेत्रांक ९२८ लब्धा विही- नादगाणा ६७ तमागोन ऊर्ध्वः ॥ हृतो भानुभिः १२ शेषक यातमासा गताब्दाः फल सेदुखेशः ११०५ शकः स्यात् ॥५३॥ अहर्गणको नीचे लिखके उसमें ३ तीन मिलाना और २ दो जगे लिखना, एक जगे स्थापन किये उसमें ६९२ छः सौ बानवेका भाग देना, लब्ध ब्रह्मतुल्यका अहर्गण बनानेकी युक्ति आगे श्लोक ५४ में कही है। २ जन्मसमयकी इष्टघटी पल विपल सहित । ३ अहर्गरण के सातका भाग देना शेष बचे तोगुरुवार १बचेतोशुक्रवार २ बचेतोशनिवार इसक्रमसे गुरुवारको आदिले शेष बचे उसपर्यंत गिननेसे वर्षप्रवेशका वार होता हैं।

(१९) भाषाटीकासहिता। भावे वह दूसरी जगे लिखे हैं उसमें युक्त करना • और उसके ६३ तिरसता भाग देना लब्ध आवे वह अनाह जानना । ऊनाहको ऊपर लिखे हुए अहर्गणाः युक्त करना और ३० तीसका भाग देना शेष बचे उनमें १ एक सिलाना सो शुक्ल प्रतिपदाको आदि ले वर्षप्रवेशकी तिथि हो और लब्ध आवे वह मासगण जानना-फिर मासगणको नीचे लिखना । और उसको दो २ गुणा करना, फिर उसमें ६६ छासह मिलाके दो जगे लिखना । एक जगे ९२८ नौसौ अहाई- सका भाग देना, लब्ध आवे वह दूसरी जगे लिखे हुएमेंसे होन करना, शेष बच्चे उसके ६७ सतसठका भाग देना लब्ध आये वह ऊपर लिखे हुए मासगणमेसे निकालना और उसमें १२ बारहका भाग देना शेष बचे वह चैत्रशुक्लप्रतिपदाको आदि ले गतमास जानना और लन्ध आवे वह गवाद समूह जानना । उन गतान्द समूहमें ११०५ ग्यारहसौ पांच मिलानेसे वर्ष प्रवेशका शालिवाहन शक होता है ।। ५२ ॥ ५३॥ गणेशदैवज्ञः। विश्वेदग्न्यरुणयुक्तो १२३११३ ग्रहलाघवजो गणः । चक्रनं नृपखाध्याढयं ४०१६ ब्रह्मतुल्यो गणो भेवत् ॥५४॥ इत्यागाम्यन्दप्रवेशः। अब ग्रहलाघवके अहर्गणपर ब्रह्मतुल्यका अहर्गण साधन करनेकी युक्ति गणेशदैवज्ञ कहते हैं। ग्रहलाघरके अहर्गणमें १२३३१३ मिलाके फिर उसमें चनसे ४०१६ को गुणन करके मिलाना सो ब्रह्मतुल्यका अहर्गण होगा ॥५४॥ उदाहरण ग्रहलाघवका अहर्गण ४०३९ में १२३११३ मिलाये १२७१५२ हुए, इनमें ४०१६ को चक ३३ से गुणन करनेसे १२४४९६ आये इनके युक्त किये २५१६४८ हुए यह ब्रह्मतुल्यका अहर्गण हुआ । इसके नीचे जन्म- समयकी इष्टघटी ५६ पल ४८ विपल १८ लिखनेसे २५१६४८१५६।४८११८ सावयवब्रह्मतुल्यका महर्गण हुआ। ऐसे प्रथम ब्रह्मतुल्यका अहर्गण साधन किया। अब आगामि वर्ष ३१ मा मापन काना है उसका उदाहरण यह है दिनादिक .

(९०) पत्रीमार्गप्रदीपिका । सौर वर्ष १५१ १५॥३१॥३० से गताब्दसंख्या ३० को गुणन किये १०९५७। १५५४५१।० हुए इनमें जन्मसमयका सावयव ब्रह्मतुल्यका अहर्गण २५१६४८) १९६४८1१८ शुक्र किया २६ २६०६१४२॥३३॥१८ ये वारम्भसमयका साव- शम अहर्णण हुमा । अहण २६२६०६ में ७ सातका भाग दिया शेष १ एक बचा, गुरुवार को आदि ले गिननेसे शुक्रवार आया, इसलिये शुक्रवारके दिनइष्ट बदी ४२ एल ३३ विपल १८ से वर्ष ३१ इकतीसवां प्रवेश होगा, परन्तु किस शकके कौनो मारकी कौन तिथिमें प्रवेश होगा इसका निश्चय होनेके वास्ते मागे उदाहरण श्लोक ५२।१३ का लिखते हैं- अहर्गण २६२६०६ को नीचे लिखा २६२६०६ इसमें ३ तीन मिलाये २६२६०९ हुए इनको दो जगे लिखे २६२६०९ इसमें ६९२ छःसौ व्यानवेका भाग दिश लब्ध ३७९ आये इनको दूसरी जगे लिखे हुए २६२६०९ में युक्त किये २६२९८८ हुए इनमें ६३ तिरसठका भाग दिया लब्ध ४१७४ ऊनाह आये । इनको अहर्गण २६२६०६ में युक्त किये तो २६६७८० हुए इसमें ३० तीतक्षा भाग दिया शेष २० बचे इनमें १ एक युक्त किया २१ हुए यह वर्ष- प्रवेशकी तिथी हुई अर्थात् २१ इकईसमी तिथिके दिन वर्षप्रवेशहोगा। २१इक- ईसमी तिथि शुक्ल प्रतिपदाको आदिले गिननेसे कृष्णपक्षकी ६ षष्ठीको आती इसलिये कृष्णपक्षकी छठके दिन वर्षप्रवेश होगा। और तीसका भाग देनेसे 54 ८८९२ आये ये मालगण हुआ इसे नीचे लिखा ८८९२ को दो गुणा विया १७७८४ इसमें छाछठ मिलाये १७८५० हुए इनको दो जगे लिखे १७ ८५० इसमें ९२८ नौ सो अठाईस का भाग दिया लब्ध १९ आये ये दूसरी जगे लिए १७८५० से हीन किये शेष १७८३१ बचे इनको ६७ सतसठकाभाग दिया लब्ध २६६ आये इनको मासगण ८८९२ में से घटाये शेष ८६ २६ 'बचे, इसमें १२ बारहका भाग दिया शेष १० बचे इसलिये चैत्र शुक्ल १ प्रतिपदाको आदिले गिनने से माघ शुक्ल प्रतिपदातक गत १० मास हुए और माघशुक्ल १ प्रतिपदाके आगे ११ वा .माघमास वर्षप्रवेशका मास हुआ और लब्ध बारहका भाग देनेसे आये ७१८ उनमें ११०५ युक्त किये १८२३ मय वर्षप्रवेशका शालिवाहनशक हुआ-अर्थात् शक १८२३ में अमांत माघ भापाटीकासहिवा। (९१) ऊण ६ षष्ठी शुक्रवारको श्रीसूर्योदयरो इटघट्यादि ४२ । ३३ । १८ से ३१ इकवीसमा वर्षप्रवेश होगा. ऐसे ही अभीष्ट गताब्दके सर्व आगामिवर्ष साधन करना । इत्यामाम्यन्दप्रवेशः ॥ अथ लोमशोक्तं सप्तवर्गवलचक्रम्. सा सम मिना मित्र १८ शत्रु ३ २ , ४५ ४५ ५ . २ . १ हारा. . ५२ ३० . ३ २ १ २ १५ ट्रेका. . ४५ ૨ . . - ३० सप्त. ५२ । । १ ३ २२ ॥ ३४ ना. १ . . १ ५८ . 15. १ . . . प्रिंशा. ५४ ४५ 30 १५ दशवर्गसंज्ञा. ३ पारिजात उत्तम गोपुर सिंहासनापारावांश देवलोकांश देवलोकांश ऐरायव वैशियी चरकारका आरम ममात्य भ्राता मावर पिता पुत्र शाति स्त्री सर्व ग्रहोंम अधिकमंत्रकारहमात्मकारक उससे मल्पयल्प शके कमसे कारक मानना . (१२) पनीमार्गहरीपिका विद्यालये मालवसनादेश रत्नावतीभ्यनिवासवासी ॥ मोदीखरः पाठकवंशजातः सुपूज्यविधान्वितनंदशमः ॥५५ ॥ গ্ৰেীধৰহাজহারুল। महादेवेन रचिता पत्रीमागणदीपिका ।। ६६ ॥ साधल्या शुक्लपञ्चम्यां शोके माहाकर्मिते ॥ सासूसी भागने बारे पनीमार्गणदीपिका ६६६९७ ॥ इति श्रीमहादेवसपनीमार्गशदीपिका संपूर्णा । विधाका स्थान ऐसे बालबसंज्ञक देशमें अतिरमणीय रत्नावती नगरी हरवलाम शहर ) में निवास करनेवाले औदुम्मर ज्ञावीए पाठकवंशमें उत्पन्न इराम वियायुक्त नन्दरामजी हुए ॥ ५५ ॥ उनके पौत्र मोतीरामजीके पुत्र मंत्र- शासके जाननेवाले रेवाशंकरजी हुए, उनके पुन महादेव ज्योतिर्विदने पत्रीमार्ग- सदीपिका नाम अन्य बनाया ॥ ५६ ॥ वह पत्रीमार्गप्रदीपिका शालिवाहन शक २४९५ सतरासौ पंचानवे माघ शुक्ल पंचमी भृगुवार के दिन संपूर्ण हुई ॥ ५७॥ मागशीर्षसित पक्षे द्वादश्यां गुरुवासरे ॥ कक्ष्यष्टभूमिवे शाके कृतेयं विवृतिर्मया ॥१॥ इति श्रीज्योतिर्विरश्रीमन्महादेवकतपनीमार्गदीपिकायं वदात्मज. श्रीनिवासज्योतिर्विहिरचिता सोदाहरणभाषाटोका समाप्तिमगमत् ॥ इति पत्रीमार्गप्रदीपिका समाप्ता। R '. १ "कटपयवर्गभरिहपिण्डात्यैरक्षरैरंकाः ॥ नजि च ज्ञेयं शून्यं तथा स्वरे केवले कथितम् ॥१॥" इल प्राचीन कारिकाके वचनानुसार म-के ५ झ-के ९ छ- के ७ क-के १ ऐसे मा झ छ क कोंका अंकानां क्षामतो गतिः इस क्रमले १७९५ सतरासौ पश्चानवे होते हैं।

-- -- ~ ६९४) वर्षदीपकम् । सौरवर्षारंभाच्छक प्रवृत्तिवेदितव्या ॥३॥ सौदलके आरम्भले (भेषसंक्रांति जिस दिन प्रवेश हो उस दिनसे) धमकी प्रवृत्ति जानना । तात्पय यह है कि चैत्रशुद्ध प्रतिपदासे "मधोः लिचादेर्दिनमासवर्षयुगादिवानां युगपत्मवृत्तिः” इत्यादि वचनोंसे जो भी यह शककी प्रवृत्ति होती है तथापि “ वर्षायन युगपूर्वकमत्र सौरात् इस सम्मानले जस्तक मेसंक्रांति प्रवेश न हो तश्व शकप्रवेश नहीं होता. इस कारण पर्सनातिले प्रवेशके प्रथम और चैत्रशुद्ध प्रतिपदाके अनंतरका वर्ष करना हो तो पिछाडीके शकले झरना । जैसे संवत् १९५५ में मेषसंक्रांति शासग ६ षष्ठी भौमवार के दिन प्रवेश हुई है उसी दिनसे १८२० का शक प्रदेश हुमा इसलिये वर्षताधनमें वैशाखकष्ण ६ षष्ठोके पहिले शक १८१९ ही मानले वर्ष करना ॥ ३॥ इधशके जःशकहीने गताब्दाः ॥ ४ ॥ अभीष्टशको ( जिरह शकका वर्ष करना हो, उस शकमेंसे ) जन्म- समयमा शक होन करनेसे शेष बचे वह गवाब्द ( गतवर्ष ) हो ॥४॥ जन्मार्कतुल्योऽर्को यत्समये वर्षप्रवेशस्तत्रैव ॥५॥ जन्मसमयले सूर्य के समान ( बराबर ) सूर्य जिस दिन जिस समय आवे उस दिन उस समय ही वर्षप्रवेश होता है।॥ ५॥ याताब्दाः सप्ताधिकसहस्त्रहता खानेमाता जन्मबारादियुता वर्षप्रवेशारादिशोधकाः ॥६॥ गवान्दोंको ( गतवर्षोंको) १००७ एकहजार सातसे गुणे करना ८० आउखौंका माग देना लब्ध . आये हुए वार घटीपल विपलात्मक चार फलमें जन्म समयके बारादिक (वार इष्ट घटी पल विपल) युक्त करना वर्षभवेशके वारादिक ( बार इष्ट घटो पल विपल) का बोर हो अर्थात् (गत वर्षोंको १०० एकहजारसातगुणे करके ८०० आठसौका भाग देना लब्ध आवे वह वार जानना शेष बचे उनको३० साठ गुणे करना और८००का भाग दिना लब्ध घटी आवे शेषबचे उनको ६० साठ गुणे करना ८०० का भाग देना, १ सिद्धान्तशिरोमणौ-रवेश्रकभोगोऽर्कवर्ष प्रदिष्ठमिति ।। -- कर (९६) वर्षदीपकम् । 3 अथ जन्माङ्गम्. f रा११र ४ d. ६ ३ के ५ then ३ बाद २९ ॥ २९ । १९ । ४९ । समये ज्योतिर्विच्छ्री निवासशर्मणो जन्य ! इस सहभका वर्षपन्न अभीष्ट शक १८२१ का करना है इसलिये शके १८२१ मेले जन्मशक १७९३ घटाया २८ शेष बचे गताब्द हुए इनको १००७ ले गुणे किये १८१९६ हुए इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध ३५ वार आये शेष १९६ पचे इनको ६० साठ गुणे किये ११७६० हुए । फिर इसमें ८०० आठ का भाग दिया लब्ध १४ घटी आयी शेष ५५० बचे इनको फिर ६० साह शुणे किये ३३६०० हुए ८०० का भाग दिया लब्ध पल ४२ आयी शेष ० धची इसको ६० गुणी करनेसे ० ८०० का भाग दिया लब्ध ०शून्य विपल आयी। ऐसे आठसौका भाग देके लब्ध बार ३५ घटी १४ पल ४२ विपलात्मक चार फल आये इनमें जन्म समयके भौमनारके ३ इष्टघटी ५६ पल ४८ विपल १८ मिलाये ३९ ॥ ११॥३० । १८ हुए बार ७ सातसे अधिक है अतः बार ३९ में सावका भाग दिया शेष ४१११।३०। १८ ये वर्षप्रवेशके बार घटी पल बिपल हुए तिथिसाधन । गताब्द २८ को ११ गुणे किये ३०८ हुए इनको दो जगे लिखे ३०८एक जगे १७० का भाग दिया लब्ध १ एक आया यह ३०८ में युक्त किया ३०९ हुए इनमें कृष्णपक्षकी ४ चतुर्थीका जन्म है इससे शुक्ल प्रतिपदासे ४ पर्यंत गिननेसे जन्मतिथि १९ हुई ये मिलाये ३२८ हुए इनमें ३० तीसका भाग दिया शेष २८ वचे यह वर्षप्रवेशकी तिथि हुई शुकप्रतिपदाको आदि ले गिननेसे अट्ठाइसवीं कृष्णपक्षकी १३ त्रयोदशी आयी परंतु त्रयोदशीके दिन वर्षप्रवेशका वार बुध नहीं मिलता है इस कारण इसमें १ एक तिथि युक्त करनेसे १४ चतु देशी हुई।एवं तिथि निश्चय होनेसे अनंवर जन्म समयके स्पष्ट सूर्यकी १० राशि १ रविवारसे वार गिने जाते हैं।

भाषाटीकासहिता। (१७) १६ अंशके समान अंश और वर्षप्रवेशका वार बुध, अमांत मावरुष्ण १४ के दिन मिलता है, इसलिये संवत् १९५६ शके १८२१ प्रवर्तमान में अमांत माघकृष्ण १४ चतुर्दशी बुधवार के दिन सूर्योदयसे इष्ट घटयादि ११ । ३० । १८ समयमें वर्ष २९ प्रवेश हुआ, गताब्द ॥ २० ॥ इति श्रीज्योतिविंद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्पप्रदीपिकाख्यताजिकग्रन्थे तदगजश्रीनिवासविरचितायां खोदाहरणभापाव्याख्यायामन्दप्रवेशाध्यायः प्रथमः ॥ २ ॥ इष्टवारादिषु पातितगतपलिवारादिपु शेपो दिनाद्यो धनम् ॥ १॥ अपने इष्ट वारादिकमेंसे पिछाड़ीकी गयी हुई समीपकी पंक्ति ( अवधि ) के वारादिक ( वार इष्ट घटो पल , हीन करनेसे जो शेप बचे वह दिनादिक धन चालन होता है ॥ १॥ आगामिपंक्तिवारादिपु पातितेप्टवारादिपु शेपो दिनाद्यमृणम् ॥ २॥ आगेकी पंक्तिके वारादिक (वार इष्ट घटी पल) मेंसे पिछाडीके अपने इष्ट- वारादिक हीन करनेसे जो शेष बचे वह दिनादिक ऋण चालन होता अर्थात् अवधिके वारादिकमेंसे अपनेवारादिक हीनकरनेसे ऋण और अपनेवारादि- कर्मेसे अवधिके वारादिक घटानेसे धन चालन होता है ॥ २॥ दिनाये गतिघ्ने पष्टयाप्तेऽशादिस्तेन पंक्तिस्थग्रहे संस्कृते स्पष्टः खगो वक्रे तु वैपरीत्यं संस्कृतौ ॥३॥ दिनादिक चालनको गतिसे गुणन करके ६० · साठका भाग देना, जो अशादिकफल ( अंश कला विकलात्मक ३ तीन फल ) आवे उनकी पंक्ति ( अवधि ) के ग्रहमें संस्कार करनेसे ( चालक धन हो तो युक्त और ऋग हो तो हीन करनेसे ) स्पष्ट ग्रह होता है और ग्रह वक्रगवि हो तो उन्हीं अंशादिक फलोंका विपरीत संस्कार करना अर्थात् चालक धन हो तो ऋण और ऋण हो तो धन करना ॥३॥ गतक्षनाड्यः षष्टिशुद्धाः पृथक् स्थाप्याः ॥ ४ ॥ गत नक्षत्र (जिस नक्षत्र में वर्षप्रवेश हो वह इष्ट नक्षत्र, उसके पहले बीते हुए नक्षत्र ) की घटी पलोंको साठमेंसे शोधकर दो जगे लिखना ॥ ४ ॥ १साठका भाग देके अंशादिक फल लानेकी रीति उदाहरणमे स्पष्ट लिखी है। - , ७ (९८) वर्षदीपकम् । হঙ্গবন্যা। সব ॥ 1 एक जगह इष्ट घटी पल युक्त करनेसे अयाव होता है ॥ ५ ॥ इतरत्रेपक्षघश्याव्या भभोगः ॥ ६ ॥ दूसरी जगे इष्टनक्षत्र ( इष्ट समयमें वर्तमान नक्षत्र ) की घटी पल युक्त कर- नसे भयोग होता है ॥६॥ पष्टिधन भयातं भभोगेलात स्पष्ट सयातम् ॥ ७॥ भयातको साठ६० से गुणा करना और मनोगका भागदेने पर लब्ध घटयादिक स्पष्ट भयात होता है । भयातको साठ गुणा करके सभोगका भाग देने पर जो लब्ध घटी आवे, शेषबचे उसको ६० गुणाकरके फिर भभोगला भाग देना जो लब्ध पूल आवे शेष बचे उनको साठगुणे करना, फिर भभोगा भाग देना लब्ध विपल भावे ऐसे घटयादिक फल तीन आता है उसे स्पष्ट भयात जानना चाहिये ॥७॥ गतःसंख्याषष्टिया भयातान्विता विना नवाताऽशादिरिंदोः ॥ ८॥ साठगुणी की हुई गत नक्षत्रकी संख्या स्पष्ट भयात युक्त करके द्विगुण (दोगुणी ) करना और नवका भाग देना, जो अंशादिक फल ३ लब्ध आवे यह मंशादिक स्पष्टचंद्र होता है । गत नक्षत्रकी संख्याको ६० गुणी करके उसमें स्पष्ट अयात मिलाना और उसको दोगुणी करना, उसमें नव ९ का भाग देना लब्ध अश आवे शेष बचे उनको साठगुणे करना और नीचेकी पल मिलाना फिर ९ नवका भाग देना, लब्ध कला होती है और जो शेष बचे उनको फिर सवादगुणे करना, नीचे लिखी विपल मिलाना और ननका भाग देना लब्ध आवे वह विकला जानना, ऐसे अंश कला विकलात्मक फल तीन लावे वह स्पष्ट अशादि चंद्र हो अंशमें तीसका भाग देला लब्ध राशिशेष अंश समझना ॥८॥ खखाष्टमभोगेन भक्ता अंशासिका गतिः ॥ ९ ॥ आठसौ ८०० के भभोगका भाग देना जो लब्ध आवे फल तीन वह अंशा- दिक चन्द्रकी स्पष्ट गति होती है ( अंशको ६० गुणे करके कला मिलानेसे कलादिक गति होती है )॥९॥ . -- H १ अश्विनीनक्षत्रको आदिले गत नक्षत्रपर्यंत गिननेसे जो संख्या हो उसको ।

भापाटीकासहितम् । (९९) जनुरुदयभादिषु भांकमाने गताब्दांकयोगेऽभक्ते मुन्था ॥ १० ॥ राश्यादिक ( राशि अंश कला विकलात्मक ) जन्म लगकी केवल राशिके अमें ही गवान्दसंख्याका अंक युक्त करके ३२ पारहका भाग देना जो शेष बचे उसे मुन्या जानना ॥ १०॥ सूर्यकांशभोगकाले मुन्या पंचकला भुनक्ति ॥ ११ ॥ सूर्यके एक अंशके भोगसमय, मुन्था पांच फला भोगती है, अर्थात् प्रतिदिन मुन्था पांच कला चलती है ॥ ११ ॥ उदाहरण । अमांव माघ कृष्ण १४ चतुर्दशी बुधवार के दिन इष्ट ११।३०।१८ से चर्पप्रवेश हुआ, इससे समीपको पंक्ति (अवधि) पंचांगमें उसी दिन इष्ट २२१की । यह वपनवेश समयसे आगेको है, इसलिये सूत्रके अनुसार अवधि वारादिक ४।२२।१मेंसे वर्षप्रवेशके इष्ट वारादिक ४।११।३०घटाये शेप०।१०।३१५चे यह दिनादिक ऋण चालक हुआ-इस दिनादिक चालक०1१०३१ को सूर्य की गति ६० । १९ ६०१९ से गोमूत्रिका लिखके गुणन किया तो ये अंक आये नम्बर १- ० नं०-४ इनमें नम्बर ६ अंकमें६०साठका भाग देनेपर लब्ध९ माये२-६०० (१९-०.५ उनको नंबर पांचके अंकोंमें युक्त करके नम्बर पांचके ३-१८६० १५८९-६ अंकोंको नम्बर ३ तीनके अंमें और नंबर,४ चारके भकोंको नम्बर २ दो के - १९ अंकोंमें मिलाये वो इस प्रकार हुए,फिर नम्बर ३वीनके अंमें ६० १-नम्बर० साठका भाग दिया लब्ध ३४ आये, इनको नंबर दोके अंकोंमें २-६० मिलाये तो ६३४ हुए इनमें साठका भाग दिया लब्ध १० ३-२०५९ कला आयी, शेप ३४ विकला रही, फिर कला १०में ६०साठ का भाग दिया लब्ध० अंश आया, ऐसे साठका भाग देनेसे अंशादिक ।। १० । ३४ फल आये । इनको अवधि स्थित सूर्य १०।१७।४। ७ में ऋण किये १० । १६ । ५३ । ३३ शेष बचे यह पर सूर्य हुआ। इसी प्रकार शेष । १८ ११ इष्ट. ३० घटी. ३९ त. (१०० ) क सर्व मह किये परन्तु राहु वक्रगति है इस कारण राहुकी गतिः। ११ से चालक । १० [३१ को उक्त रीतिशे गुणन करके ६० साठका भाग देके आये हुए ० । । ३४ अंशादिक फलोंकी अवधिमें स्थित राहु ७ । २३ । १० । ४० । विपरीत संस्कार किया अर्थात चालक ऋण है, इस कारण धन किया ७१ २३ । ४१ । १४ । राहु पर हुआ। स्पष्ट चंद्र सावन। वर्षप्रवेश के दिन धनिष्ठा घटयादिक ३४ । १६ है, वर्षप्रवेश धनिष्ठा नक्षत्र- में हुआ है अतएव धनिष्ठा इष्ट नक्षत्र और अयण गतनक्षत्र हुआ । गतनशत्र श्रवणकी घटी ४१ पल ५१ को सूत्र ४ के अनुसार ६० साठ वटीगरो हीन किया १८॥ ९ शेष बचे, इनको दो जगे लिहे १८ । ९ एक जगे इष्टघटी १३१३० २९ भयान युक्त की २९ । ३९ भयात हुआ, दृसरी जगे इट नक्षन् धनिष्ठाकी घटी ३७पल'१६ मिलायी तो ५६ १८ ३७ इष्टनक्षत्र, ५६ भभो- ९५६ घटी, ५ सयोग हुआ । भयातको ६० साठ गुणा करके सभोगका भाग देना है, परंतु भयात भभोग दोनों घट्यादिक हैं, अतः प्रथम इनको सवर्णित किये, भयात १७७९ भभोग ३३६५ हुए, तदनंतर भयात १७७९ को आठगुणा किया. १०६७४० हुए। इनमें भयोग ३३६५ का भाग दिया लब्ध ३१ घटी आयी शेष ९४२१ बचे, इनको साठ गुणे किये १४५५०० हुए, भभोग३३६५का भाग दिया, लब्ध ४३ पल हुए,शेप ८०५ बचे उनको ६० गुणे किये तो ४८३०० हुए इनमें फिर ३३६५ का भाग दिया लन्च १४ विपल आयी । ऐसे घटयादिक ३३ । ४३ ! १४स्पष्ट भयात हुआ । तदनंतर अश्विनीले गत नक्षत्र श्रवण पर्यंत गिनने २२संख्या आयी यह गत 'नक्षत्रकी संख्या हुई,इसको ६० साठगुणी की तो १३२० हुई, इसमें स्पष्ट भयान ३१ । ४३ । १४ युक्त किया १३५१ । ४३ । १४ हुए । इनको २ द्विगुण "किये १४०३ । २६ । २८ हुए, इनमें ९ नवका भाग दिया लब्ध ३०० अंश आये, शेष है बने, इनको ६० गुणे किये १८० हुए इनमें नीचेके पलके अंक २६ पिलाये. १०६. हुए. इनमें नवका भाग दिया लब्ध २२ कल आयीं शेष ८ मचे इनको ६० साठगुणे किये तो ४८० हुए, विपलके अंक २८

भाषाटीकासहितम् ।
(१०१)
मिलाये तो ५०८ हुए, फिर ९ का भाग दिया ५६ विकला हुई, शेष ९काभाग
देकर उक्त रीतिसे अंशादिक फल ३ लाये ३००।२२ । ५६ यह अंशादिक
स्पष्ट चन्द्र हुआ । अंश, ३० तीसका भाग दिया लब्ध ३० राशि शेष अंश०
बचे, इस प्रकार स्पष्टचन्द्र १० । ० | २२ । ५६ राश्यादिक हुए ।
गतिसाधन।
आठसौ ८००० में भभोग ५६१५ का भाग दिया परन्तु दोनों घट्यादिक हैं
इस लिये दोनोंको प्रथम सवर्णित किये भाज्य४८००भाजक ३३६५हुए,भाज्यमें
भाजकका भाग दिया लब्ध अंशादिक १४१३५१५२ चन्द्रको स्पष्टगति हुई अंश
१४ को ६० साठगुणे करके १५ मिलानेसे ८५५१५२ कलादिक गति हुई।
मुंथासाधन ।
जन्मलम ९।२३ । २८ । २९ की राशि ९ के अंकमें गवान्द संख्या २८
युक्त किये तो ३७ । २३ । २८ । २९ हुर, फिर १२वारहका भाग दिया शेष
३।२३ । २८ । २९ मुन्था हुई, गति ५ । ० ॥
r
अथ स्पष्टाः ग्रहा तtil
म. चं. (म.बु.गु. शु. । श. रा. के. मु.
१०१०
५३/२२
१११८२५९ (२३२३२३
३१/३५/५६ २/५४४१/४१२८
३९/५६ ३६८५५/४८/५९/१३११/२
६०८५५४८/७५/ ५/७१ ४ ३४१३४१५
१९ ५२/५०/३२/३२/३२ ९ /११/११/०
नागार्भागोऽङ्कदनास्त्रिदन्ताक मोत्कमा मेपादीनां लंकोदयपलानि ॥१२॥
'. नाग '८ ऋक्ष २७ लिखनेसे २७८ हुए फिर गो ९ अंक९दन २ लिखनेसे
२९९ हुए, पुनः 'त्रि' तीन ३, दन्त ३२ मिलाकर ३२३ हुए । इसप्रकार कम
और उत्कम ( उलटे) करनेसे मेषादिक राशियोंके लकोदय पल जानना ॥१२॥
स्वचरादैन युताः स्वदेशोदयाः ॥ १३ ॥

२३७ २९६ म. १५ ध. २९९ tornis क. . (१०२) वर्षदीपक । अपने गामके चर खंडा उक्त लकोदय पलमें क्रमसे हीन और. युक्त करनेसे स्वदेशोदय ( अपने गामका उदय) लकोदया. बरखंढा स्वदेशोदया. होता है, जैसे रतलायके चरखंडा मे. मी. ५१ ५१ । ४३ । १७ हैं इनको वृ. कुं. ४१२५८ लंबोदयपलमें कमसे प्रथम हीन, मि. ३२३ किये, फिर युक्त किये तो नीचे क. ६२३ १७ ३४० सिं. कोष्ठको लिखे हुए स्वदेशोदय ३४७ २७८ तु. ३२९ हुए। ऐसेही प्रत्येक अभीष्ट गामके स्वदेशोदय जानना चाहिये ॥ १३ ॥ उदयात्रिंशद्धता मेषादीनां पलाया गतयः ॥ १४ ॥ उदयों ( लंकोदय और स्वदेशोदय ) की संख्या तीस ३० का भाग देनेवर जो आवे वह शेषादिक राशियादी पलादिक गति होती है, अर्थात् स्वदेशोदयकी देख्यामें ३० तीसका भाग देनेले स्वदेशके लश्नोंकी पलादिक गति, एवं लकोदएकी संख्या में ३० तीसका भाग देनेसे लंकाके उदयोंकी पलादिक गति होती है ।। १४ ॥ उदाहरण मेष राशिके स्वदेशीदय २२७ में ३० तीसका भाग दिया लब्ध ७, शेष १७ बचे, इनको ६० साठगुणे किये १०२० हुए फिर ३० का भाग दिया, लब्ध ३४ हुए यह मेष राशिके स्वदेशोदयकी पलादिक गति ७ ॥ ३४ हुई। ऐसे ही बारह राशियोंमें जानना चाहिये । शके वेदवेदाब्ध्यूनेऽयनांशकलाः ॥ १५ ॥ शकमेंसे ४४४ चारसौ चौवालिस हीन करने पर जो शेष बचे वह अयनां- शकला होती हैं ( कलाके६०साठका भाग देनालब्धअंश शेष कला समझना)१५ १ गणेशदैवज्ञः-"मेषादिगे मायनभागसूर्यदिनार्द्धजा भा पलभाभवेत्सा । विष्ठा हताःस्युर्दशभिर्भु जंगैदिग्भिश्चरार्दानि गुणोद्वतान्त्या ॥१॥" अर्थात सायन मेषार्ककेपारम्भदिनमें मध्यासमयमें शंकुकी जो छाया हो वह पलभा होती है । जिस गामके चरखण्डकरना होउसगामकी पळभाको तीन जगे लिखना, एक जगे १० दशगुणी, दुसरी जगे आठगुणी, तीसरी जगे १० दशगुणीकरना फिर तीनका भाग देनेपर उस गामका चरखण्ड होता है। - .

भाषाटाकासाहवम् । (1१२ लंफोदयोंकी पलादिकगतिका चक्र. फ.३/सिं.क. ५ तु. ६] वृ. ७.८/म. ९ कु.१०मी.११ O वृ.श मि. . D . O D . D . ९ १० १० १६ ५८ ५८ रतलामशहरके स्वदेशोदयोकी पलादिगतिका चक्र. (मे. वृ.१ मि. २ फ.३ । सिं ४फ.५ तु. ६ (वृ. ७ घ.८ म. ९ कुं.१० मी.१११ क . . ० . ० . . . ७ १० ३४१३६ १२/ २० २० २० उदाहरण । जैसे शके १८२१ का अयनांश करना है अतः शके १८२३ मेंसे ४४४ चारसो चौवालिस होन किये तो १३७७ हुए ये अयनांश कसा हुई। इसमें ६० का भाग दिया लब्ध२२अंश शेप५७कला बची यह अंशादिक अयनांश हुभा ॥ अयनांशहीने चक्रांशेऽवशिष्टांशाधस्ताच्छ्न्यत्रयं लेख्यम् ॥ १६ ॥ अयनांशको चक्रांश ( ३६० अंशों ) मेंसे हीन करना, शेष बचे हुए अंशके नीचे तीन शून्य लिखना ॥१६॥ ततस्त्रिंशत्रिंशदंशकोष्ठकेषु मेपादिगतिगेगे भावाङ्गपत्रे ॥ १७ ॥ तदनन्तर तीस तीस अंकोंके कोष्ठकोंमें लंकोदय और स्वदेशोदयकी मेगादिक राशियोंकी पलादिक गतिकमसे प्रथम मेपको,तदनन्तर वृपभकी, फिर मिथुन,कर्क सिंह इस क्रमसे बारहों राशियोंकी पलादिकगति युक्त करना,भावपत्र और लग्नपत्रहो अर्थात् लंकोदयोंकी मेपादिक राशियोंकी पलादिक गति युक्त करने से भावपत्र और स्वदेशोदयकी मेपादिक राशियोंकी गति क्रमसे युक्तकरनेसे लग्नपत्र होता है ॥१७॥ प्रथम तीन सौ साठ ३६० कोष्ठको दो चक बनाना, उनके दक्षिण तरफ मेपादि १२ बारह राशि लिखना । ऊपर ० शून्यको आदिले २९ उनतीस- पर्यंत अंश लिखना, तदनन्तर अयनांश हीन करना ३६० तीनसौ साठ अंशमेंसे और जो शेष बचे उस कोष्ठकके अंकमें तीसका भाग देना, जो लब्धराशि शेष अंश बचेगे उस राशिके अंशके नीचे तीन तीन शून्य लिखना, जसे-अय. नांश २२ । ५७ हैं यह २३ तेईसके समीप है इससे ३६० मेंसे २३ हीन उदाहरण ।

वर्षदीपक। किये ३३७ शेष बचे, इसमें तीस ३० का भाग दिया लब्ध. १३ राशि शेष ७ अंश रहे । इससे पिना परिश्रम शीन ज्ञात हो गया कि ११ मीनरा शिके ७ अंशधे नीचे तीन शून्य लिखना ऐसे तीन शून्य लिखके फिर क्रमसे मेपा- दिक गशियोंकी पलादिक गति लिलायी तो भारपत्र और लग्नपत्र हुए। शामापनसर्वन उदयनांश २३०१० ७ ८/९/२०११.१२/१३ १४१५/१६, १७, १८/१९,२०२१२२२३:२४२५/२६२७२०२९ ग. क 1 ७ ३ १ . १६ १ . ० ७ १८२२३९५ ४ ० १ २ ० . Re- . - मे ४२,५१,०/१०११/२०१८४७५७/०७०२७४३७७५७०५७,२०३५४७५७७१७२७३५३७५०७ २४९४०५६१२२८४४) ०५८ ५४५२/५०/४८४६४४४२४०३८३६३५ २८१२६/ १८१०,१६ ८/८/९/९/९/१०१०/१०/१०/20099999,११/22/05१२/७२४१२,१२,१२/१२/११929 २७३७४७५७७१७२०३०४०५८/९ २०३०४१/५२ ३ ११२४३५/४६५६७१८२९४०५०/०/१२२३ १४१२,१०८१६४२०४६३२१०४५०३६२२८५४४० २६१२५८४४३०१६/२४४८३४.२०१६ ५२५८ लि. २१३१४१४११४५४,१४१५/१५१५/१५,१५,१५,१६/१६/०६१६/१६ १६:१७४१७१७१७१७१८१८.१८७८० ५५/६/१६,२७१८४/०७०२५३२४३५३/४/०५/२६१६४७५८/९/३०/४/५२ ३ ४२४१३५/४०/५६७० २०५६४२२०१४/०४६/३२/१० ५०३६/२२/२५४४०.२६/१२५८१४४३०१६ ८३४१२०६५२४६ १९१९१९९९ १९२०२०२०२०२०२०,२१/२२१२१२१२१२२२२२२२२२२२२/२३,२३२३२३२२, क. ३९५० ११२२३३२४२५२२ १२२२१२४२५२१ ६.१२/२२३२४२५२/२/१२२२३२४२,५२२१० ३८२४१०५४ ४२२८१४ ०५०/५६५४५२५०४८/४६४४४२/४०३८३६१४३२०२८२६/२४२२२०/2019०४६ खिं. २४२४२४२४२४२५२५२५२५२५२५२५/२६२६/२६२६ २६/२६ २७२७२७२७२७२७२७२८२८२१२०२० १२,२२३२,४२५२२११२२२३१ ४९५९/८१७/२६३६,४५५४ ३ १३२२१४१५०५९/८/०८२०१६४५. १४१२१०८ ४२०३६५२८२४४०५६१२२८४४ ०/६/१२/४८/४/२०१६५२५८ २८२९,२९.२९ २९२१ क. ५५४१६२२३२४१५००९/१८२७३७४३५५/४/१४२३३२४१५१० ४६५६५१४२३९ ८२४४०५६,१२ २८/४४ ० '१६:२४८ ४२०३६५२ ८ २०४०५६/१२/२०/४४०१६:२४८४२०३०५२१५ ३३३३४३४ सु. ४२५५ ०१०१९/२८३८४७५७,७१७ ५७ go pokoju १७९ ६ २४४० ५६५२ २८४४०५८/५६५४ ५२/५०४८४६/४४४२४० ३८ ३६३४३२१०२८१२६/२४२२२०४८१६१६ ---- ३८३८३.३९९३९३९३९३९४०४०/४01801008/89/0४१४१४१ ४२ ४२/४२४२४२४३//४/ 0 वृ. २०३७४७५७.७ १०२०३७ ४०/५८/९ २०३०.४१५२३ १:२४३५.४०/५६. १८२९ ४०/५०११२२३३३९ ७ १४.१२१० २०.६१२१८ ५०२६२२. ८५५४० २६/१२५८४४३०१६/२४८३०१२०१६/५२५८ ४३.४३१४४४४४४४४४४ ४५/४६४६/४६/१६४६ १६ १७४७१४७ ४७/४७/४८/४cxcxcx ८/821४1० ११५५६३६२०१८४९०११०२१३२४३५३/०५/२६३६/४७ ५८१९ १९३० ४१५२ ३ १३।२४३५४६ ५६ १० ८ १०५६४२२८१४.०४६३२/१८ ४५०३६२२८५४० २६१:२५८,४४३०१६.२४८३४/२०१६ ५२४ १९४९५०/५०५०५०/५०५०५३/५१५१५१/५/५०/५२५२,५२५२५२५२/५३,५३/५३५३५३५३,५४० १९१९५०११२२३३२।१२५२१ १२२२३ २४२५२ १२२२३२४२५२२/१२/२२१३२४२५२२/१० १०/५६४१२८१४०५८५३५४५२५०१४८४६४४४२४०३८३६३४३२३०२८ २६२४२२१२०१८'१६४६ छ १५५५/५५/५५५५/५६/५६/५६/५६/५६,५६/५७५७५७५७५७/५७५७५८५८/५८/५८५८० १२२२३३४२,५२२१ ३११४०४९५९८१७२६,३६,४५,५४३१३२२३१४१/५० ५९८१८२०३६,४५१ ९० १४.१२१०८ २ ०१६३२४८/४/२०१६/५२,८२४ ४०,५६१२२८४४ ० १६३२,४८, ४२०३६५२५८ यी. . १११:२२२२२२२३३३० ५१३२२१२४१,५०० ૧૮ ક૪૪રરરર ૧૧૨૮ રૂકમરર १६३२४८४२० ५२ ८२४० ५६१२२८.४०१६१२४८४१२० . - 1 ७ १७२७१७ --- । - ok ४ ४५ अ. - . २ -- ० . . ९ 1८३४४८५६५२२० ।

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(१०५)
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अथ लमस्पष्टरीतिः।
भानुभाशज लग्नपत्रकोप्टकमिष्टान्वित तन्यूनकोष्ठजं भांश
भानुकलायन्वितं तत इष्टाल्पकोष्टांतरेऽल्पैष्यकोष्टांतरेणाप्त-
जित लग्नं भवेत् ॥ १८ ॥

( १०६) वर्षदीपकम् । शुपकी राशि अंश प्रमाण लग्नपत्रके कोष्ठकमें इष्ट घटी पल विपल युक्त करना, उस (इष्ट युक्त किये हुए कोष्ठक ) से अल्पकोष्ठकके राशि-अंश लेना, अर्थात् जिस कोष्ठको इष्ट युक्त किये हुए कोष्ठकसे किंचिद् न्यून अंक मिले सही सामने जो राशि और ऊपर जो अंश हो वह अंश लेना। राशि-अंश नीले स्पष्ट सूर्यको कला विकला शुक्त करना, तदनंतर इष्ट युक्त किये हुए कोष्टक और अल्प कोष्ठकका अन्तर करना, जो शेष बचे उसमें अल्पकोष्ठक और उसके आगेका ऐष्य कोष्ठकका अन्तर करके भाग देना, जो अंशादिक ल ३ तीन लब्ध आवे वह प्रथम आये हुए राश्यादिको युक्त करे तो ला साष्ट होता है ॥ १८॥ लग्नपत्रस्थभानुभांशजकोष्ट स्वाधःस्थितसप्तमकोटकाद्धीनं दिनमानम् ॥ १९ ॥ सूर्यकी राशि अंशप्रमाण लग्नाश्त्रमें जो कोष्ठ है उसको अपने नीचे सात कोष्ठकमें से हीन करे, जो शेष बचे वह दिनमान जाने ।। १९ ॥ तच्च षष्टिशुद्धं रात्रिमानम् ॥ २० ॥ दिनमानको ६० साठमेंसे शोधनेपर रात्रिमान होता है।॥ २० ॥ खुर्योदयादिष्टे रात्र्याईयुते तुर्यभावेष्टम् ॥ २१ ॥ सूर्णेदपसे घटयादिक इष्टः समयम रायई ( रात्रिमानका अई) युक्त को हो चतुर्थ भावका इष्ट होता है ॥ २१ ॥ एतदानाय भावपत्रतो लग्नाचतुर्थभावलाधनम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार चतुर्थ भावका इष्ट ले करके भावपत्रपर रमसाधनकी रीतिकेअनु- बार (जैसे लग्न लाये हैं उसी तरहसे ) चतुर्थ भावका साधन करना छाहिये ॥ २२॥ लग्नशोधिततुर्यषष्ठांशी लग्ने पञ्चवार योज्यस्ततस्स षष्ठांशो रूपाच्छु- दस्तुर्य पञ्चवारं योजितश्चेल्लनादयस्ससन्धयः षड्भावाः ॥ २३ ॥ लग्न निकले हुए चतुर्थ भावके षष्ठांशको ( चतुर्थ भावमेंसे लनको ) हीन करना, जो राश्यादिक शेष बचे उसको राशिके अंशमें ६ छका भाग देना, जो लब्ध राशि आवे और शेष बचे उनको तीस ३० गुणे करके नीचेके अंश मिलाकर छका भाग दे, फिर जो लब्ध अंश आवे और शेषबचे उनको ६० साठ

.
भाषाटीकासहिता।
(१०७)
गुण करके नीचेकी कला मिलाना, फिर ६ छका भाग देना, एवं जो लब्ध
कला आवे और शेष बचे उनके ६० गुणे करके विकला मिलाना, फिर ६ छका
भाग देना, जो लब्ध विकला आवे तथा शेष बचे उनको फिर ६० गुणे करके
६ छका भाग देनेपर जो लब्ध आवे वह प्रतिविकला जानना ऐसे ६ छका भाग
देनेसे जो राश्यादिक फल आवे वह पष्ठांश होता है, उस पष्ठांशको लग्नमें
पांचवार युक्त करना, तदनंतर फिर उस पष्ठांशको एकरराशिम ( १10101010
शोधके चतुर्थ भावमें पांच वार मिलावे तो लमको आदि ले संधिसहित ६ छठा
भाव होता है ॥ २३॥
एते षड्भोनाः शेषाः षड्भावाः ॥ २४ ॥
इन छहों भावों से छः छः राशि हीन करनेसे शेष रहे हुए छहों भाव
होते हैं ॥ २४ ॥
ग्रहः स्वाधिष्ठितभावारम्भसंधितो न्यूनो गतभावोत्थं
ताहविराममध्याधिक उत्तरभावोत्थं फलं प्रयच्छति ॥२५॥
यह जिस भावमें स्थित हो उस भावकी आरंभ (पहलेको ) संघिसे
न्यून (कमती) हो तो गतभावजनित (पीछेके भावका ) फल देता है। ऐसे
ही विराम ( आगेकी ) सन्धिसे अधिक हो तो उत्तर ( आगेके ) भावजनित
फलको देता है ॥ २५॥
ग्रहसंध्यंतरं नखध्न भावसंध्यंतरेणाप्तं फलं विंशोपकाः ॥२६॥
ग्रहसन्धिके अन्तरको ग्रह जिम भावमें स्थित हो उस भावसे कमती हो
तो आरम्भसन्धिके साथ और भावसे ग्रह अधिक हो तो विराम (आगेकी)
सन्धिके साथ अन्तर करके बीसगुणा करना और भावसन्धिके अन्तरका जिस
सन्धिके ग्रहका अन्तर किया है उसी सन्धिके भावके साथ अन्तर करके भाग
देना, जो फल आवे वह विंशोपका जानना और यदि ग्रह आरम्भसन्धिसे न्यून
हो वा विराम सन्धिसे अधिक हो तो जिस भाव और सन्धिके बीचमें ग्रह हो
उस भाव और सन्धिका अन्तर करके ग्रह सन्धिके अन्तरमें भाग देना, अर्थाव
। आरम्भ सन्धिसे ग्रह न्यन हो तो पहलेके भाव और सन्धिसे अंतर करना
और ग्रह आगेको संघिसे अधिक हो तो आगेके भावसे संधिका अंतर करके
बीसगुणे किये हुए ग्रह संधिके अंतरमें भाग देनेपर जो फल आवे वह विशो-
पका होता है ॥ २६ ॥

उदाहरण । पष्टवर्य १० । १६ । ५६ । ३९ है, इसकी राशि १० अंश १६ के प्रमाण लवपत्रमें कोष्ठक देखा ५७।२१। ६ है, इसमें इष्टघटयादि ११ । ३०।१८ मिलाया तो ६८ । ५१ ॥ २४ हुए । घटीका अंक ६० साठसे अधिक है, अतः साठका भाग दिया शेष ८ । ५१ । २४ रहे, यह इष्ट युक्त किया हुआ लशपत्रका कोष्ठक हुआ । इस इष्टयुक्त कोष्ठकले अल्पकोष्ठक लमपत्रमें ८॥ ४५ ॥ ४८ एक १ राशि ११ ग्यारह अशके कोष्ठको मिलता है इसकारण १ वृषराशि ११ अंश लिये इसके नीचे सूर्यकी कला ५३ विकला ३९ युक्त किया तो १।११। ५३ । ३९ हुआ,. तदनंतर इष्टयुक्त कोष्टक ८ । ११ । २४ और अल्पकोष्ठक ८।१५ । ४८ का अंतर किया तो ० । ५। ३६ । हुआ, इसमें अल्पकोष्ठक ८ । ४५ । ४८ । और देष्य कोष्ठक ८ । १६ । ० के अंतर । १०। १२ का भाग दिया परंतु साज्य भाजक दोनों कलादिक हैं अतएव इनको सवर्णित किये तो भाज्य ३३६ भाजक ३१२ हुए, भाज्यमें भाजकका भाग दिया लब्ध ० शून्य अंश आया शेष बचे ३३६ को ६० साठगुणे किये २०१६० हुए । इनमें फिर ६१२ भाजकका भाग दिया लब्ध ३२ कला आयी, शेष ५७६ बचे उनको ६० साठगुणे किये तो ३४५६० हुए । इनमें भाजक (६१२) का भाग दिया लब्ध ५६ विकला आयी । ऐसे अंशादिक ० । ३२ । ५६ फल तीन आये इनको प्रथम आये हुए राश्यादिक १ । ११ । १३ । ६९ में युक्त किये तो १ । १२ । २६ । ३५ । हुए यह राश्यादिक लग्न हुआ। दिनमानसाधन । सुर्यकी राशि १० अंश १६ प्रमाण लग्नपत्रिका कोष्ठक ५७। २.। ६ को अपने नीचेके सातवें कोष्ठक २६ । ९ । ४२ मेंसे हीन किया तो २८ । ४८ । ३६ इतना दिनमान हुआ । रात्रिमानसाधन । दिनमान २८ । ४८ । ३६ को ६० साठमेंसे शोधन किया तो ३१ ॥१३॥ २४ रात्रिमान हुआ, इसको आधा किया तो १५ । ३५। ४२ राज्यर्द्ध हुआ । चतुथभाव-इष्टसाधन । सूर्योदयसे इष्ट ११।३०।१८। में रात्र्यई १५ । ३५ । ४५ युक्त किया तो २७ । ६ । ० इतना चतुर्थ भावका इष्ट हुआ।

भाषाटीकासहितम् । (१०९) चतुर्थभावसाधन ।. स्पष्टसूर्य १०१६॥५३॥३९ की राशि १० अंश १६ प्रमाण भावपत्रका कोष्ठक ५६।४५।२४ में चतुर्थभावका इष्ट २७६।० मिलाया ८३।५१।२४ हुए, घटी ६० साठसे अधिक हैं ६० साठका भाग दिया शेप २३१५१।२४ बचे, यह इष्टयुक्त कोष्ठक हुआ, इससे न्यून कोष्ठक भावपत्रमें २३ । ४२।२० तीन राशि २७ अंशमें मिलता है, इसलिये राशि ३ अंश २७ लिये इसके नीचे कला विकलाके स्थानमें सूयकी कला ५३ विकला ३९ युक्त की तो ३१२७।५३।३९ हुए, फिर इष्टयुक्त कोष्ठक २३ । ५१ । २४ और अल्प कोष्ठक २३६४२।२० का अंतर किया ० । ९ । ४ हुआ, इसमें अल्पकोष्ठक २३१४२।२० और उसके आगेका ऐष्य कोष्ठक २३ । ५२। १८ का अंतर ०९।५८ का भाग दिया, परन्तु भाज्य भाजक दोनों कलादिक हैं अतएव दोनोंको प्रथम सवर्णित किये भाज्य ५४४ भाजक ५९८ हुआ, भाज्य ५४४ में भाजक ५९८ का भाग दिया तो लब्ध ० अंश आया, शेष ५४४ को ६० साठगणे किये ३२५४० हुए । इनमें भाजक ५९८ का भाग दिया, लब्ध ५४ कला आयी, शेप ३४८ बचे इनको ६० साठगुणे किये तो २०८८० हुए,इनमें भाजक ५९८ का भाग दिया, लब्ध ३४ विकला आयी ऐसे अंशादिक ०५४॥ ३४ फल तीन आये इनको प्रथम आये हुए राश्यादिक ३२७१५३।३९ में युक्त किये तो ३।२८१४८११३ हुए इस प्रकार चतुर्थ भाव स्पष्ट हुआ। भावसाधनका उदाहरण । लग्नस्पष्ट १११२।२६।३५ को चतुर्थ भाव ३२२८१४८१८ मेंसे' शोधा तो २।१६।२१।३८ हुए, शेष बचे इसकी राशिके २ अकमें ६ छका भाग दिया लब्ध ० राशि शेष २ को ३० तीस गुणे किये ६० हुए। इनमें नीचे. के १६ अंश मिलाये तो ७६ हुए । इनमें ६ छःका भाग दिया लब्ध १२ अंश आये, शेष ४ बचे । इनको ६० साठगुणे किये तो २४० हुए फिर कलाके अंक २१ युक्त किये तो २६१ हुए, फिर ६ का भाग दिया लब्ध ४३ कला आयी, शेष ३ बचे, उनको ६० साठगणे किये तो १८० हुए। इनमें विकलाके अंक ३८ मिलाये २३८ हुए फिर ६ छका भाग दिया लब्ध ३६ विकला आयी । शेष २ बचे, इनको फिर ६० साठगुणे किये तो १२० - (११०) वर्षदीपकम् । फिर ६ छका भाग दिया लब्ध २० प्रतिविकला भायी। ऐसे छला भाग देके ०१२॥४३॥३६॥२० फल पांच लाये तो षष्ठांश हुआ, इसको लश ॥१२॥ २६॥३५ में युक्त किये तो १।२५।१०।१११२० द्वितीय भावको आरंभ संधि हुई। इसमें षष्ठांश ०११२॥४३॥३६॥२० युक्त किया तो २१७५३।४७१४० द्वितीय भाव हुआ। द्वितीय भावमें फिर षष्ठांश ०१२॥४३॥३६॥२० मिलाया तो २/२०१३७१२४१० तृतीय भावकी आरम्भ और द्वितीय भावको विराम संधि हुई । इसमें फिर षष्ठीश युक्त किया तो ३ । ३ ॥२११०।२० तृतीय भाव हुआ। इसमें फिर षष्ठांश ०।१२।४३।३६।२० युक्त किया ३३६४१३६ः४० तृतीय भावको विराम और चतुर्थ भावकी आरम्भ संधि हुई, ऐसे लग्नमें षष्ठांश पांचवार युक्त किया, फिर षष्ठांश ०।१२॥४३॥३६।० को एक राशि १०० ०१० से शोधा ०१७/१६।२३।४० शेष बचे इनको चतुर्थ भाव में पांचवार युक्त किया तो लनादिक संधिसहित ६ छः भाव हुए, इन छः भावोंमेले ६ छः : राशि घटायी तो शेषके ६ भाव हुए। ससंधया द्वादशमावाः। . ow स. । २ सं. सं. सं. सं. सं. ६ ६ १ ३ ३ ३ २ ३ . १२ २५ ३ २५ १० ४ १६ २८ । २० ४८ ४ २१ १३ | १६ २४ ४७ ४० । २० . ३५ ११ - ४० ३० सं. ८ सं. ९ सं. ११ सं. १२ / मी. ७ . ८ ८ १ , ३ १६।३ २६ २८ ४ । ४० २५ " | १६ १७ 5 7 १० ५३ ३७.२१ २४ । १६! वर्षाङ्गचक्रम्. चलितचक्रम्. भावमें जो जो राशि आवे वेचलितमें लिखना फिर यह लिखना । वहांसूर्य र वर्षकुंडलीम १०दशमभावः स्थित है। दशमभावकी विरामसंधिसे १०१६।४ से सूर्य अधिक है, इसलिये यह ११ ग्यारहवें भावका फल देगा। एवं e मुंके १२ श केरमं बु. मंच C 07/ ११२ गरा 8 गुरा -- ८ श९ 1९म . भाषाटीकासहितम् । (१११) शुक्र ११ वें भावमें स्थित है, ११ ग्यारहवें भावको विरामसंधि ११॥ २० से शुक्र ११ । २५ अधिक है, अतएव शुक्र १२ वें. भावका फल देगा, ऐसे सर्व- अहोको जानने । विशोपकानयन-उदाहरण । सूर्य १० । १६५३१३९ और दशम भावको विराम संधि १०1१६॥३४॥ ३६ का अंदर किया तो ०1०४९।३हुआ ,इसको बीस गुणा किया तो १६ । २३१० हुए । इनमें सूर्य दशम भावकी विरामसंधि और ग्यारहवें भावके बीचमें है, इसलिये दशमभावको विरामसंधि १० । १६।४।३६ और ग्यारहवां भाव ११॥ ३२॥११० के अंतर १७ । १६ । २४ का भाग दिया-परंतु दोनों भाज्य भाजक अंशादिक हैं इसलिये इनको प्रथम सवर्णित किये भाज्य ५८८६० भाजक ६२१८४ हुए। भाज्य ५८८६० में भाजक ६२१८४ का भाग दिया लब्ध ० शुन्य विश्वा आये, शेप ५८८६० को ६० साठगुणे किये तो ३५३ १६० हुए, भाजक भावमध्यवर ६२१८४ का भाग दिया तो लब्ध ५७ प्रति-- विश्वा आये। यह सूर्यके विंशोपका हुए,इसी प्रकार सब ग्रहोंके विशोपका जानना। विशोपकाः। रा. के. मुं. १८ ५७१०५४/५७ ४६ इति श्रीज्योतिषिद्धरश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकाख्यताजिकग्रन्थे तदात्मनश्रीनिवासविरचिताया सोदाहरणभापाव्याख्यायां ग्रहभावसाधनाध्यायो द्वितीयः ॥ २ ॥ वक्राच्छज्ञचन्द्रार्कज्ञसितारेज्यार्किमन्देज्या मेपायधिपाः ॥ १ ॥ वक्र (मंगल), अच्छ (शुक्र), ज्ञ (बुध ),चंद्र, अर्क (सूर्य);ज्ञ (बुध सिव (शुक्र.), आर (मंगल ), इज्य (गुरु), आर्कि (शनि), मंद (शनि) इज्य (गुरु), मेषादिक राशियोंके क्रमसें स्वामी जानना ॥ १ ॥ मेषादिराशियोंके स्वामी. मि. क. सिं.! फ. तु..घ.म. पशी. ५ ६ ८ म. शु. बु. चं. सू. बु. शु. / मं. गु. । श. गु. स्वामी 0 २ ३ ४९ | १९ १९ ३९ मे. वृ . कुंमी. ७ कर्कका G स (११२) वर्षदीपकम् । ঈদলীলঙ্কাকলিন্ত ৰিাকহাঙ্গী ভুনুনীয়া- विशपञ्चदशपञ्चमसप्तविंशविंशाः क्रमेण परमोच्चभागाः ॥ २ ॥ थेष, गो ( वृषभ ), नक ( मकार ), कन्या, कर्क, अन्त्य ( मीन ) और ये सूर्यादिक ग्रहोंकी क्रमले उच्चराशि होती हैं, अर्थात् मेषका सूर्य, वृषभका इ, पकर का मंगल, कन्याका बुध, गुरु, मीनका- शुक्र, तुलाका धानि उच्चका जानना और दशम, तृतीय, अटाविंश २८, पञ्चदश १५, पंचम ९, सप्तविंश २७, विंश २० क्रमले परमउच्चके अंश जानना अर्थात ऊपर कही हुई राशि और अंशोंके सूर्यादि प्रह हों तो परम उच्चके जानना, जैसे-सूर्य के दश अंशका है ये परम उच्चका हुआ । इसी प्रकार चंद्र वृषभके तीन अंशाका परम उच्चका, मंगल प्रकरको २८ अढाईस अंशका, बुध कन्याके १५ प्रहह अंशका, गुरु कर्कके पांच ५ अंशका, शुक्र मीनके २७ सत्ताईस अंशका और शनि तुलाके २० बीस अंशका परम उच्चका जानना ॥ २ ॥ वोचसप्तमस्तिथांशाः क्रमशो नीचीः परमनीचभागाः ॥३॥ सूर्यादिग्रहोंकी अपनी उच्चराशिसे सातवीं राशि और अंश क्रमसे नीच राशि और परमनीचके अंश होते हैं ॥ ३ ॥ ܩܢ उच्चनीचराशिचक्रम् । र गुशुश ९ ३ ११६ २८/१५/५ २७/२० उन्धराशयः ६७ দ্বিাহা ३७.२० हेडलाङ्गाष्टपंचेषवो गुरुशुक्रज्ञाराजानां इदांशाः ॥ ४ ॥ भेषराशिमें अंग ६, अंग ६, अष्ट ८, पंच ५, इषु ५९, इन अंशोंके क्रमसे गुरु, शुक्र, बुध, मंगल और शनि हहाके स्वामी जानना । अर्थात् मेषराशिके ६ छः अंशपर्यंत हदाका स्वामी गुरु होता है, उसके आगेके ६ छः अंशका स्वामी शुक्र, उसके आगेके ८ अंशका स्वामी बुध, उसके आगेके ५ पांच अंशका स्वामी मङ्गल, उसके आगेले ५ अंशका स्वामी शनि, इसी प्रकार बारहों राशि- योके हद्दांशके स्वामी समझना चाहिये ॥ ४ ॥ १ भाषाटीकासहितम् । .(११३) वृषेऽष्टांगेभशराग्नयः सितज्ञेज्यमन्दाराणाम् ।। ५ ।। वृषभराशिमें अष्ट ८ अंग ६ इभ ८ शर ५ अग्नि ३ इन अंशोंमें यथाक्रम शुक्र, बुध, गुरु, शनि, मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥ ५ ॥ द्वद्वेऽङ्गांगाशराव्यङ्गांशा ज्ञशुक्रेज्यारमन्दानाम् ॥ ६ ॥ मिथुन राशिमें अंग ६ अंग ६ शर ५ अद्रि ७ अंग ६ इन अंशोंके कमसे बुध, शुक्र, गुरु, मंगल, शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ ६ ॥ ककेंऽयंगांगनगाध्यंशा भीमाच्छञज्यार्कीणाम् .॥ ७ ॥ कर्कराशिमें अद्रि ७ अग ६ अंग ६ नग ७ अब्धि ४ इन अंशोंके क्रमसे भौम, शुक्र, बुध, गुरु, शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ ७ ॥ सिं गेष्वद्यंगांगांशा इज्यसिताकिज्ञाराणाम् ॥ ८ ॥ सिंहराशिमें अंग ६ इषु ५ अद्रि ७ अंग ६ अंग ६ इन अंशोंके क्रमसे गुरु, शुक्र, शनि, बुध, मंगल दद्दाके स्वामी जानना ॥ ८॥ कन्यायां नगाशाब्ध्यंगाक्ष्यंशा ज्ञाच्छेज्याराकीणाम् ॥ ९ ॥ कन्याराशिमें नग ७ आशा १० अब्धि ४ अग ६ अक्षि २ इन अंशोंके क्रमसे बुध, शुक्र, गुरु, मंगल, शनि हद्दाके स्वामी जानना ।। ९ ।। तुलेगाटनगाव्यक्ष्यंशा मन्द ज्यसितागणाम् ॥ १० ॥ तुलाराशिमें अंग ६ अष्ट ८ नग ७ अद्रि ७ अक्षि २ इन अंशोंके क्रमसे शनि, बुध, गुरु, शुक्र, मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥ १० ॥ कीटे सप्ताध्यष्टशगंगाशा वक्राच्छ ज्याीणाम् ॥ ११ ॥ वृश्चिक राशिमें सप्त ७ अब्धि ४ अष्ट ८ शर ५ अंग ६ इन अंशोंमें यथा- क्रम मंगल, शुक्र, बुध, गुरु, शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ ११ ॥ चाफेर्केष्वब्धिशराब्ध्यंशा इज्या तज्ञारमन्दानाम् ॥ १२ ॥ धनराशिमें अर्क १२ इप ५ अब्धि ४ शर ५ अब्धि ४ इन अंशोंके कमसे गुरु, शुक्र, बुध, मंगल, शनि हाके स्वामी जानना ॥ १२ ॥ नके नगनगाध्यप्टवेदांशा शेज्याच्छ विक्राणाम् ॥ १३ ॥ मकरराशिमें नग ७ नग ७ अन्धि ४ अष्ट ८ वेद ४ इन अंशोंके क्रमसे बुध, गुरु, शुक्र, शनि, मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥ १३ ॥ घटे नगांगादिपञ्चेषवः शुक्रज्ञज्यारमन्दानाम् ॥ १४ ॥ 1 ८ 2 . (११) वर्णदीपकाए । कुस्मराशिौ नग ७ अंग ६ अद्रि ७ पंच १ इणु ५ इन अंशोंमें यथाक्रम शुभ, बुध, गुरु, मंगल, शनि हाके स्वामी जानना ॥ १४ ॥ झोऽब्ध्यिान्यकाक्ष्यशाः सितेज्यज्ञारार्कीणाम् ॥ १५ ॥ भीलराशि अर्क १२ अब्धि ४ अग्नि३ अंक ९ अक्षि २ इन अशोके हमसे शुक्र, गुरु, बुध, मंगल, शनि हाके स्वामी जानना ॥ १९ ॥ झदायकम्। १ -- । म. if s ان مم . -- शु ६ बु, ४ गु| असम्वाभी. . में. . मि. क. सिं. २ ३ ६ ग ८ ७ मं । ६ गु ६ शु ६ वु। ६ शु. ६ शु ५शु १० १२ १३ ८ बु| ८ गु। ५ गु, ६ | ७ श २० २२ । १० १८ २१ ५मं ७ गु.६ वु २७ २६ २८ ३ मं] ६ ४ ६ मं ३० ३० ३० 69 तु. वृ. ध. कुं. मी. ६ ९ ७ में | १२गु । ७ । ७ शु. १२शु। अंशस्वामी. ४ शु! ५ शु. ७गु ६४ गु १४ ११ १४ १३ १६ ७ ग ८ बु ४ । ७ गु ३ अंशस्वामी, २१. १९ २२ १८ २० । १९ ७ शु. ५ग ५मं ८ ५ मं ९ मं २८ २६ २६ २५ २८ २मा ६ ४म ५१ २२ अंशस्वामी. ३० ३० ४ वु ७ म म अंशस्वामी. . . १ हे प्रथलकाणयो तदाशौ वहियोगे मध्यद्रेष्काणगे तद्राशौ सैको- ऽन्त्यद्रेष्काणगे रखयोगे तनाशौ सुनिभक्त शेषेऽकांद्याः पतयः ॥१६॥ मह प्रथमद्रेसाणमें हो तो उसकी राशिके अंकमें ३. तीन मिलाना और अध्यद्रेष्काण में हो तो उसकी राशिम ( १ ) एक युक्त करना, एवं अन्त्य (तीसरे) साकाणमें हो तो उसकी राशिमें ६ छः युक्त करना, अनन्तर उस राशिमें ७ शेतका भाग देना, शेष बचे तो सूर्य, २ बचे तो चन्द्र, ३ तीन बचे ईबल, ४ बचे तो बुध, ५ बचे तो गुरु, ६ बचे तो शुक्र, ७ बचे तो शनि देष्काणका स्वामी होता ॥ १६ ॥ द्रेष्काणचक्रम् । मे. । कृ. । मि. क. सिं. क. तु. | वृ. ध. म. कुं.मी. १ ३ ५ ६ ७ ८ ९ मं. | बु. गु. शु. श. र. । चं. मं. बु.गु. शु. श. १० अंश. मं. बु. गु. श. श. र. सं. मं. बु. गु, २० । अंश, .... मं. अंग १ द्रका १० अंशक्षा होता है, १० अंशापर्यन्त प्रथम देष्काण, १० से २० अंशपर्यन्त मध्य नेप्लाण, २० प्रथले ३० अंशपर्यन्त पन्त्य द्रेष्काम होता है।

भाषाटीकासहितम् । (११५). मेषसिंहचापेषु मेषाद्या वृषकन्यानकेषु मृगाया युग्मतुला. कुम्भेषु तुलायाः कर्कालिमीनेषु कर्काया नवांशाः ॥ १७ ॥ मेप १ सिंह ५ धन ९ राशिमें मेषराशिको आदि ले, वृप २ कन्या ६ मकर १० राशिमें मकरराशिको आदि ले, मिथुन ३ तुला ७ कुम्भ ११ राशिमें तुला राशिको आदि ले और कर्क ४ वृश्चिक ८ मीन १२ राशिमें कर्कराशिको आदि ले नवांश विभागकी संख्यापर्यंत गिननेसे नवांश होता है, अर्थात्-जिवनी संख्या नवांश विभागमें हो उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशि आवे उसके स्वामी नवांशका स्वामी होता है ॥ १७ ॥ नवांशविभागचक्रम्। २ ३ ४ ५ ८ ९ नवांश वि. १ ३ १.३ १६/२० २३ / २६, ३० २० अंश. कला. २० . [२. . नवांशसारिणीचक्रम् । मे. वृ.मि.क. सिं.क. तु. / वृ. घ. म.कुं. मी. अंश. | कला. ० ८ १. १०७ १ S ५ ६ 3 २ १२/९६३ १२ ४।१ ६ ० ३ १ २० هم اما ما مهم صم سے १२.९ ६ . ७ ४ २० ८ २ ११८ c ११४८ १२/९ w ३ । १२ ३० ० गृहोच्चदाद्रेष्काणनवांशाः पञ्चवर्गाः ॥ १८ ॥ . १ एक गशिके ९ नव भागको नवांश कहते हैं, एक नवांशविभाग ३ तीन अंश २० कलाका होता है be (११६) वर्षदीपकम् । गृह ( राशिके ) स्वामी, उच्च, हद्दा, द्रेष्काण और नवांश पंचवर्ग होते हैं। अर्थात् प्रथम ग्रहोंकी राशिके स्वामी, फिर उच्च, तदनन्तर हद्दा, एवं द्रेष्काण सर्वाश लिखनेले पंचवर्ग होता है ॥ १८ ॥ यो महो यल्प ज्यायत्रिकोणान्यतमगः स सुहृत् ॥ १९ ॥ जो ग्रह जिस महते तीसरे ३ ग्यारहमें ११ नवमें ९ पांचौ ५ स्थानों से शिली स्थान स्थित हो वह उस ग्रहके मित्र होता है।॥ १९ ॥ केंद्रगस्तथा शत्रुः ॥ २० ॥ शेषस्थानस्थः समः ॥२१॥ और जो मह जिस ग्रहसे केंद्र (१।४। । १०) स्थानों से कोई भी स्थान स्थित हो वह उस ग्रहके शत्रु होता ॥ २० ॥ शेष २।६।८॥ १६ दूसरे छठे आठवें बारहवें स्थानों से कोई भी स्थानमें जिस ग्रहसे जो मह स्थित हो वह उसके संम होता है ॥ २१ ॥ रस्वगृहे शिल्लवाः सुहृद्रे साद्वाविंशतिः । सलमे तिथयः शत्रुभे साईसप्तबलम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार मैत्रीचक बनाके उस ( मैत्रीचक ) के अनुसार पञ्चवर्गहें आये हुए शहोंने नीचे मित्र सम शत्रु लिखना, तदनन्तर बल लिखना, उसकी रीति कहते हैं । ग्रह स्वगृही ( स्वराशिका ) हो तो २० तीस संश, मित्र राशिका हो तो २२ । ३० साडेबाईस अंश, समराशिमें १५ पन्दरह अंश, शत्रुराशिमें हो तो ७।३० साढेसात अंश बल जानना ॥ २२ ॥ यथा भवे षड्भाल्पं तथा नीचखेटांतरे तामाङ्यागस्त्वोच्चलम् ॥२३॥ और उसके नीचका अन्तर जैसे हो सके पैसे छः राशिसे अल्प करना ग्रह ( अहमें नीचको हीन करनेसे ६ छः शशिसे अल्प शेष बचे तो अहमेसे नीचको होन काना और अधिक बचते हों तो नीचसे ग्रहको हीन करना) शेष यदि अन्तरके अंश करके राशिको ३० गुणी करके अंश मिलाके उसमें ९ नवका भाग देना, लब्ध उच्चपल होता है ॥२३॥ स्वहदायाँ तिथ्यंशा मित्रहदायां सपादैकादश समहदायां साईलप्त शत्रुहदायां पादोनवेदशा बलम् ॥ २४ ॥ १ -- भाषाटीकासहितम्। (११७) ग्रह स्वराशिकी हद्दामें हो तो १५ पंद्रह अंश, मित्र ग्रहकी हद्दामें ११४१५ सवाग्यारह अंश, समग्रहकी हद्दामें ५।३० साढ़ेसात अंश, शत्र ग्रहकी हद्दामें हो तो ३६४५ (पौनेचार अंश) बल जानना ॥ २४॥ स्वद्रेष्काणे दश मित्रद्रेष्काणे साईनगाः समद्रेष्काणे पञ्च शत्रुद्रेष्काणे साईयमा अंशा बलम् ॥ २६ ॥ ग्रह-स्वराशिके द्रेष्काणमें हो तो १० अंश, मित्रग्रहके द्रेष्काणमें हो तो ७.३० साढ़ेसात अंश, समत्रहके द्रेष्काणमें ५ पांच अंश, शत्रुग्रहके द्रेष्काणः हो तो २१३० अढ़ाई अंश बल जानना ॥ २५ ॥ स्वनवांशे पञ्च मित्रांशे पादोनवेदाः समांशे साधयमा रिवंशे सपादैको बलम् ।। २६ ॥ ग्रह-स्वराशिके नवांशमें हो तो ५ पांच अंश, मित्रनवांशमें ३।४५ पौने- चार अंश, समनाशमें हो तो २॥३० ढाई अंश, शत्रुनवांशमें हो तो १ । १५ (सवा ) अंशबल जानना ॥ २६ ॥ पंचवर्गबलकोष्टकम् । स्व. मित्र सम | शत्रु D ७ . . हद्दा . १५/११ ३ १५/३०४५ १० २ द्रेष्का. द्रेष्काण . ० ५ ३ नवां. १ नवांश . पंचवर्गबलैक्ये वेदोद्धते लब्धं विंशोपकात्मकं बलम् ॥ २७ ॥ पंचवर्गके बलके ऐक्य ( योग) में ४ चारका भाग देना जो, लब्ध आवे उसे विश्वात्मक बल जानना चाहिये ।। २७ ॥ पडल्पोल्पबली व्यधिकः पूर्णबली ॥ २८ ॥ आया हुआ विश्वात्मक बल छः से अल्प हो तो अल्पबली और बारहसे (११८) वर्षदीपकम् । अधिक हो तो पूर्णबली, ६ छः से अधिक बारहसे न्युन हो तो मध्यबली होता है ॥ २८॥ सूर्य १० । १६ । ५३ । ३९ कुम्भराशिका है, इसका स्वामी शनि है, सो गृहका स्वामी हुआ। एवं सूर्यका उच्च ०।१० हद्दा-सूर्य कुम्भ राशिके ३ हद्दा- शों ( प्रथम ७ अंश फिर ६ अंश मिलानेसे १३ होते हैं इससे अधिक अंश इसलिये दो अंश गये और तीसरे ७ अंशमें हुआ ) हैं इसका स्वामी गुरु है वह सूर्यकी हद्दाका स्वामी हुआ। द्रेष्काण-सूर्य मध्यद्रेष्काणमें मध्यद्रेष्काणमें है इसकी राशिमें १० में 3 युक्त किया ११ हुए, सातका भाग दिया ४ शेष बचे, तो सूर्यको आदि ले ऋमसे ४ बुध द्रेष्काणका स्वामी हुआ । नवांश-सूर्य कुम्भराशिके छठे नवांशविभागमें है(१६ १० से अधिक है अतएव तुलाराशिसे नवांश विभागसंख्य ६ पर्यंत गिननेते पीन राशि हुई. इसका स्वामी गुरु है सो सूर्यके नवांशका दामी हुआ, ऐसे ही सर्वग्रहके पंचवर्ग जानना। वृहत्पंचवर्गचक्रम्. मं. शु. सू. | चं. श म मि मि बु. । गु. । म मि स गु स स्वगृह. ६ २० उच्च. ३ २८ २७ शु बु गु श श श बु मि गु स हृद्दा. म स कु झु र मं बु का ट्रेकाण. स श स गु चं गु का गु Gan नवांश. स श र. . मं. च . ग. धु श गु गु मित्र. मं क्षेत्रीसाधन-उदाहरण । मैत्रीचक्रम्, सूर्यले ११ स्थानमें शनि स्थित शु. श. वह सूर्यके मित्र हुआ, एवं सूर्य- से १ स्थानमें चन्द्र, मंगल १० स्थानमें गुरु स्थित है, ये. सूर्य के शु शत्रु हुए और २ स्थानमें बुध, 3 शुक्र स्थित है, वे सम हुए इसी प्रकार सर्वमहोंके मित्र शत्रु समझना । व यु रमं रचं श सम. शु 6146 च ८१ रचं dh चं मं रन गु 'बु बु शत्रु. श (११९) भाषाटीकासहितम् । बलसाधन-उदाहरण । सूर्यके गृहका स्वामी शनि सूर्यका मित्र है, इसलिये गृहमें सूर्यके नीचे २२ । ३० अंश बल लिखा, उच्चबल सूर्य १०॥१६॥५२॥३९॥ नीच ६।१००० सूर्यमेंसे नीच हीन किया ४।६।५३१३९ शेष बचे इसके अंश फिये १२६ । ५३ । ३९ हुए, नवका भाग दिया लब्ध १४ आये शेष शून्य बचा, इनको साठसे गुणा किया, हसमें ५३ कला मिलायी ५३ हुए और नवका भाग दिया, लब्ध ५ आये, सो सूर्यका उच्चबल १४, ५ हुआ। हद्दा-हद्दाका स्वामी गुरु सूर्यका शत्रु है, अतः हद्दाका शत्रु बल ३ । ४५ सूर्यके नीचे हवामें लिखा- द्रेष्काण, सूर्यके द्रेष्काणका स्वामी बुध सूर्यके सम है इसलिये द्रेष्काणर्मे समका बल ५। • प्राप्त हुआ। नवांश सूर्यके नवांशका स्वामी गुरु सूर्यके शत्र है, अतएव नवांश सूर्यके नीचे शत्रु नवांश बल १३५ लिखा, यह पंचवर्ग रल हुआ। इन पांचोंको योग किया ४६.३५ पंचवर्ग बलैक्य हुआ, इसमें ४ चारका भाग दिया, लब्ध ११ । ३८ । ४५ आये, यह सूर्यका विंशोपकात्मक बल हुआ । ग्रहबल ६ से अधिक और १२ बारहसे न्यून है, अतः मध्यमबल जानना । एवं शेष चन्द्रादि सर्वग्रहोंका किया जाता है। fea} ६/६६182128 860238 •ult . 86 I है ०४ ००० 034800 ८ 108 28 88128888 श्री ००६०६ ० ० Intee E - वर्षदीपकम् । 4 0 विशोषकात्मकबलम् । ७ ए. चं.सं.गु. शु. श. ११/११/१३, ८ १४/१० ३८१८४७११५० ५०० १० ४५] ४५० ३०३७३ म. म. पू. पू. म. म. पू. । म. चन्द्राकारज्याः परस्परं मित्राणि शेषाश्च ॥ २९ ।। मक अन्य आचार्य के मतकी स्थिरमैत्री लिखते हैं:-चन्द्र, सूर्य, मंगल, गुरु से परस्पर मित्र जानना और शेष रहे बुध, शुक्र, शनि, ये परस्पर मित्र , २९ ॥ इतरथा रिपवः ॥ ३०॥ अपर कहे हुए मित्रयहसे जो शेष रहे वे शत्रु होते हैं ॥ ३० ॥ are स्थिरमैत्रीचक्रम् । . चं. tom गु . शु. श. में. H चं.म.न.मं.. वं. गु. शु. २. चं. बु. हा. शु. . मित्र. गु. गु . श. मं. र. चं. बु. श. बु. शु. बु.श. र. चं. बु. शु.र. म. मं. गु. चं. ग. मं. गु. डा. का. का. स्वरवाधिकारबलाईमित्रः बलं तदर्ध शत्रुभे शेष प्राग्वदित्येके॥३॥ इस स्थिरमैनीके मित्रशत्रुके अनुसार पञ्चवर्गबल लानेकी रीति कहते हैं:- गृह ३० हदा १५ द्रेष्काण १० नवांश ५ के कहे हुए अपने अपने राशिके बलको स्वराशिगत ग्रहमें यथावस्थित ( गृहमें ३० हद्दामें १५ द्रेष्काणमें १० नशमें ५) ही जानना और अपने अपने स्वका आधा आधा बल मित्रराशिगत ग्रहमें और मित्रराशिगद ग्रहका आधा आधा बल शत्रुराशिगत अहमें जानना, अर्थात् स्वमें पूरा, मित्रमें स्वका आधा, शत्रुमें मित्रका आध लिखना, जैसे-गृहमें स्वराशिका ३० अंश बल है, उसका आधा १५, मित्र द्रधान मा १. १५ मित्र . .. ७ २ शत्रु ३० भाषाटीकासहितम् । (१२१) राशिगतका बल और उसका आधा ७ । ३० शत्रुराशिगतका बल हुआ है शेप रोति प्रथम कहे समान करना । ऐसा अनेक आचार्योंका मत है ॥ ३३ ॥ उदाहरण । बलचक्रम्. गृहमें-सुर्यको राशिका स्वामी शनि स्थिर मैत्रीमें सूर्यका शत्रु है इसकारण सूर्यके नीचे गृहमें स्वगृहके बल ३. के आधेका आधा लिखा॥३० उच्च बल पूर्वानीत लिखा १४ । ५ हवामें-सूर्यको हृद्दाका स्वामी गुरु स्थिर मैत्री में सूर्यके मित्र है, अतएव हद्दाके स्वराशिके बल १५ का आधा ७ ॥३० लिखा। एवं सुपके द्रेष्काण स्वामी वध स्थिरमत्रीमें सूपके शत्रु हैं इसलिये स्थिरमैत्रीमित्रशत्रुवशेन पंचवर्ग- द्रेष्काणके राशिके बल, १० का आधेका बलचक्रम्. आधा २। ३० द्रेष्काणमें सूर्यके नीचे सू.च.म. बु.गु. शु. श. लिखा। नवांश-सूर्यके नवांशका स्वामो गुरु सूर्यके मित्र है, अतएव नवांशवल, ३०, ३०३० ३० ३०३० ५। का आधा २३० नवांशम सूर्यके नीचे लिखाइन पांचोंका योग किया ३४॥ ३० ४५ ४५/३० ४५ ४५/४५ ५ आया, यहाँ ४ चारका भाग दिया, २२ २५ द्रेष्का. लब्ध ८ । ३१ १५ वशोपकात्मक नयां बल हुआ,यह ६ छहसे अधिक है,इसवास्ते ३० १५. ३०, २०३०३० मध्यममल हुआ। ऐसे ही शेप यहाँका ३४.२४१३५, २२, ३३, ३६ ३३ बलं जानना। निशोपका- ७ गृह. उच्च. ४७/२७ ३.३ 9 mrir mlr ० ३० १ २ योग. ४२ ११४४७० ८ ३२/१०,४७४।०८ १५. ३०४ . १८ त्मरूपलम् . . । . ग D १ बलका योग करना उसको चारका भाग देना आदि रीति ।

(१२२) वर्षदीपकस् । मादयोऽकाशांता द्वादश वगाः ॥ ३२ ॥ स्वगृहको आदि ले द्वादशांशपर्यंत ( स्वगृह १ होरा २ द्रेष्काण ३ चतुर्थीश पञ्चमांश ५ षष्ठांश६ सप्तमांश ७ अष्टमांश ८ नवमांश ९ दशमांश १० एकादशांश ११ वादशांश १२)वादशवर्ग होता है ॥ ३२ ॥ साघधिपाः प्राग्वत् ।। ३ ।। राशियोंके स्वामी प्रथम कहे समान जानना ।। ३३ ।। विषमझे सूर्यशशिनो समझे व्यत्ययेन होरा ॥३॥ विषषराशिमें प्रथम सूय; दूसरे चन्द्रकी होरा होती है और समराशिमें विप. रीत अर्थात् प्रथम चन्द्र द्वितीय सूर्यकी होरा होती है।। ३४ ॥ स्वेषु नवक्षशा द्रेष्काणपाः ॥ ३५ ॥ प्रथम ऐकाणमें अपनी राशिका स्वामी, दूसरे ( मध्य ) द्रेष्काणमें अपनी राशिसे पांयमी राशिका स्वामी, तृतीय ( तीसरे ) द्रेष्काणमें अपनी राशिसे नवमी राशिका स्वामी, द्रेष्काणका स्वामी जालना ॥ ३५ ॥ कोचित्पावत् ॥ ३६॥ कोई आचार्य जो पंचवर्ग में प्रथम द्रेष्काण कहा है वही करना ऐस कहते स्वजिकेन्देशा वेदांशपाः ॥ ३७॥ अपनी राशिसे प्रथम चतुर्थीशमें अपनी राशिका स्वामी, दूसरेमें ४ चौथी राशिका स्वामी, तीसरे सातवीं राशिका स्वामी, चौमें १० दशमी राशिका स्वामी चतुर्थीशका स्वामी होता है ॥ ३७ ओजः भौमार्कीज्यज्ञसिताः समर्के प्रतिलोमतः शरांशपाः ॥ ३८ ॥ विषम ( एक ) राशिमें प्रथम पञ्चमांशमें भौषका दूसरेमें शनि तीसरेमें १ पंदरह १५ अंशकी एक १ होरा होती है ( ० अंशसे १५ अंशतक प्रथम होरा १ अंशले ३० अंशपर्यंत दूसरा होरा हो)। २ दशअंशका १ द्रेष्काण होता है। चतुर्थाशविभाग। ३ एकराशिके ४ चार भागको,कहते हैं, एक चतुर्थाश विभाग ७ अंश ३० कलाका होता है। ४ एकराशिके ५ पांच में भागको कहते हैं- एक पंचमांश ६ छ' अशका होता है। ३० १ 2 २ ३ १५ २२ ३० अंश. कला.

भाषाटीकासहितम् । (१२३) गुरु, चौमें बुध, पांचवेमें शुक्र, समराशिमें विपरोत ( ३ शुक, २ बुध, ३ गुरु, ४ शनि, ५ मंगल) पंचमांशके स्वामी होते हैं ॥ ३८॥ विपमः मेपाद्याः समभे तुलायाः पष्ठांशाः ॥ ३९ ॥ विपमराशिमें मेपराशिको आदि ले, समराशिमें तुलाराशिको आदि ले गिननेसे पष्ठांशके स्वामी होते हैं ॥ ३९ ॥ ओजभे स्वभाद्या युग्मः तत्सप्तमाद्याः सप्तमांशाः ॥ ४० ॥ विषमराशिमें अपनी राशिको आदि ले, समराशि में अपनी राशिसे जो सातवीं राशि हो उसको आदि ले, सप्तमांश विभागको संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशि आवे उसके स्वामी सप्तमांशका स्वामी होता है ( ग्रह जितनी संख्याके सप्तमांशयिभागमें हो उतनी संख्यापर्यंत विपमराशिमें अपनी राशिसे, सममें सावर्षी राशिसे गिननेसे सप्तमांश होता है ) ॥ ४० ॥ चरमेऽजाद्याः स्थिरभे चापाया उभयमे सिंहाया अष्टमांशाः॥ ११ ॥ चर (१।४।७।१०) राशिम मेपराशिको आदि ले, स्थिर (२॥ ५।८।११) राशिमें धनराशिको आदि ले, द्विस्वभाव (३।६।९।१२) राशिमें सिंहराशिको आदि ले जिवनी संख्याके अष्टमांश विभागमें यह हो उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो गशि आती है उसका स्वामी अष्टमांशका स्वामी होता है ॥४१॥ १ १ एक राशि ६ छठे भागको कहते है-पक पाटांश ५ पांच अंशका होता है। २ एक राशि ७ हिस्सेको कहते है-एक सप्तमांश विभाग ४ अंश १७ कलाका होता है। ३ एक राशिके ८ भागको कहते है-एक अष्टमाश विभाग ३ अंश ४५ कलाका होता है। अष्टमांशविभाग. सप्तमांशविभाग. २ ४ ८ ६ ८।१२।१७/२१/२५/३० १७/३४/५१४२५४२ ८ १७/२५/३४४२५२ ११।१५।१८।२२२६३० अंश ३० १५ ० ३० 0 ७ (१२४) वर्षदीपकम् । नवांशाः प्राग्वत् ॥ १२॥ नाशके स्वामी प्रथम कह चुके हैं उनके समान करना ॥४२॥ यस्य अहस्य दशशिकादाशी कर्तव्यौ तदीयमादौ दशैका- दशगुणिते तदशांशादिसादिस्फुटः ॥ १६ ॥ जिस ग्रहके दशांश तथा एकादशांश करना हो उस (ग्रह) की राशि अंश कला विकलाको दशांशमें १० दशगुणा, एकादशांशर्म ११ ग्यारह गुणा करना, कम से कलामें ६० साठका भाग देना, लब्ध अपरके अंशमें युक्त करना, अंशमें ३० वीसका भाग देना और लब्ध राशि मिलाना फिर राशिः १२ बारइका भाग देना जो शेष बचे वह दशांश एकादशांशके राश्यादि स्पष्ट होता है, इस स्पष्टकी राशिके स्वामी दशांश एकादशांशके स्वामी होते हैं ॥ ४३ ॥ स्वभादकौशाः ॥४४॥ अपनी राशिसे जितनी संख्या के द्वादशांशमें ग्रह हो उतनी संख्यापर्यंत गिलनेसे जो राशि आवे उसका स्वामी द्वादशांशका स्वामी होता है ।। ४४ ॥ स्वमित्रोच्चशुभवर्गाः शुभा अन्येऽयमाः ॥ ४५ ॥ स्व, मित्र, उच्च और शुभग्रहके वर्ग शुभ अन्य ( शत्रु सम) नीच और पाप आदिकके वर्ग अधम ( नेष्ट) होते हैं-अर्थात् जिस ग्रहके द्वादशवर्गमें शुभ अहाँका स्वराशिस्थ, मित्रराशिस्थ, उच्चराशिस्थ ग्रहोंका वर्ग अधिक हो वह ग्रह शुभफल देगा और जिसके द्वादशवर्गमें पापग्रहोंका शत्रुराशिस्थ ग्रहोंका नीच- गतग्रहोंका वर्ग अधिक हो वह ग्रह श्रेष्ठ हो तो भी नेष्ट फल देगा ॥ ४५ ॥ एक राशिके १२ भागको कहते हैं-एक द्वादशांश २ अंश ३० कला (ढाई अंशका होता है)। द्वादशांशविभाग. ३ ४ ८ ९ १० ११ १२ विभागसंख्या. ३० 3. ७/१०/१२/१५ १७/२०/२२ | २५/२७/३० ३० ०.३० ३० ३० अंश. कला. .

मापाटोकासहितम् । (१२५) वर्गेशे स्वर्भगे विंशतिमिळे तिथयः समझे दश रिपुभे पंच बलम् ॥ ४६ . द्वादशवर्गके वर्गका स्वामी स्वराशिका हो तो वीस २० अंश, मित्रराशिका हो वो १५ पन्दरह अंश, समराशिका हो तो १० अंश, शत्रुराशिका हो तो ५ पांच अंश बल जानना ।। ४६ ॥ स्वाम.स ग. २०१५/१०५ ० . . द्वादशवर्गजबलैक्येऽर्कभक्ते विंशोपकाः ॥ १७ ॥ द्वादशवर्गके बटके योगमें बारह १२ का भाग देना जो लब्ध आवे वह विंशोपकात्मक बल होता है ॥ १७ ॥ उदाहरण । सूर्य १० । १६ । ५३ । ३१ । की राशि कुंभका स्वामी शनि सूर्यके गृहका स्वामी हुआ । होरा सूर्य विपमराशिकी दूसरी होरामें है, इसका स्वामी चन्द्र होराका स्वामी हुआ । द्रेष्काण-सूर्य मध्यद्रेष्काणमें है. इस कारण अपनी राशि ११ कुंभसे पांचों राशि मिथुनका स्वामी बुध द्रेष्काणका स्वामी आया । एवं सूर्य तृतीय चतुर्थीश विभागमें है, इस लिये अपनी राशि ११ से सातवीं राशि ५ सिंहका स्वामी सूर्य, सूर्यके चतुर्थांशका स्वामी हुआ। पंचमांश-विपमा राशिस्थित सूर्य तीसरे पंचमांश विभाग है, अतएव विषमराशिमें तीसरे पचमां- शका स्वामी गुरु सूर्यके पंचमांशका स्वामी हुआ। एवं सूर्य ४ चौथे पटांशमें है और विपमराशिका है, इसलिये मेराशिसे पष्ठांश विभागकी संख्या ४ चार पर्यंत गिना तो कर्कराशि हुई, इसका स्वामी चन्द्र सूर्यके पष्ठांशका स्वामी हुआ, एवं सप्तमांशविभागमें सूर्य ४ चतुर्थ संख्याक विभागमें स्थित है, यह विषम राशिगत है. इसवास्ते अपनी राशि ११ कुम्भसे ४ पर्यंत गिननेसे ४ चौथी वृपभ राशि हुई इसका स्वामी शुक सूर्यके सप्तमांशका स्वामो हुआ, ऐसे ही अष्टमांश विभागमें सूर्य ५पांचवे अष्टमांशमें स्थित है और स्थिर राशि ११ का है, अतः धनराशिको आदि ले ५ पांच संख्यापर्यन्त गिननेसे मेष राशि हुई इसका स्वामी भौम सूर्यके अष्टमांशका स्वामी हुआ । नवांशके स्वामी लानेकी युक्ति प्रथम कही है, उसी रीतिके समान नवांश विभाग ६ छठे नवांशमें सूर्य ६ १२६) वर्षदीपकार । स्थित है, इस कारण तुलाराशि (३ । ७ ११ के नवांश ७ तुलासे गिनना ) ते ६ संख्यापर्यन्त गिनले १२ मीनराशि हुई, इसका स्वामी गुरु सूर्यके नवां- शक्षा स्वामी हुआ, सूर्य १० । १६ । ५३ । ३९ को दशांश करना है, इस कारण १० दशगुणा किया १०० । १६० । ५३० । ३९० हुआ-विकला कला साबसे अधिक हैं इससे विकला ( ३९० ) में साठका भाग दिया लब्ध ६ कला मिलाके । ५३६) साठका भाग दे लब्ध आठ अंशम युक्त किये अंश तील भक्षित हैं इसलिये अंश ( १६८) में ६० तीसका भाग दिया लब्ध ९ पांच शशिले अंक २०० में युक्त किया १०१ हुए, राशि (१०५) में १२ बारहका आग दिया, शेष ९ । १८ । ५६ । ३० राश्यादिक बचा, यह सूर्यका दशांश हुआ। इसकी राशि १० का स्वामी शनि सूर्यके दशांशका स्वामी हुआ। एवं एकादशांश सूर्य १० । १६ । ५३ । ३९ को ११ ग्यारहसे गुणा किया ११० | १७६ । ५.८३ । ४२९ हुआ । विकलाकलामें साठके अंशर्म तीसदी राशि १२ बारहका क्रमसे भाग देनेसे शेष बचे ८।५। ५० । ९ बह सूर्यका एकादशांश स्पष्ट हुआ। इसकी राशि ९ धनका स्वामी गुरु सूर्यके एकादशांशका स्वामी हुआ-एवं अपनी राशि ११ कुम्भसे सूर्य ७ सातवें वाद- शांशमें है, इसलिये ७ संख्यापर्यन्त गिननेसे ५९ सिंह राशि हुई, इमका स्वामी सूर्य सूर्यके द्वादशांशका स्वामी हुआ । इस प्रकार सूर्यके द्वादशवर्ग हुए ऐसे ही शेष महोके तथा भावोंके और सहमादिकोंके बादशवर्ग जानना । सूर्यके बादश वर्णमें स्वराशिके वर्ग २ मित्रके २ शुभग्रहके ७ वर्ग, हैं इनका योग किया ११ ग्यारह हुए, इस कारण सूर्य शुभफल देगा । ऐसे ही सर्वग्रहोंका शुभाशुभफल समझना चाहिये। द्वादशवर्गवलउदाहरण। सूर्यके-गृह ( राशि) का स्वामी शनि सूर्यका मित्र है, इस कारण १५। ० पन्दरहका बल गृहमें प्राप्त हुआ । एवं होरामें सूर्यकोहोराका स्वामी चन्द्र सूर्यका शत्रु है, अतः५० बल प्राप्त हुआ एवं द्रेष्काणमें द्रेष्काणपति बुधका समराशिका बल १० । • चतुर्थाशों चतुर्थाशपति सूर्यका स्वका २०० बल पंचमांशमें पंच- भांशके स्वामी गुरुका शत्रुका १० बल पष्ठांश, षष्ठांशके स्वामी चन्द्रका शत्रु राशिका बल ५५० मतमांशमै, सहयांशके स्वामो शुक्रका लमराशिका १०० ..

Heritainstitudesi भाषाटीकासहितम् । ( १२७) बल अष्टमांशमें अष्टमांशपति भौमका शत्रुराशिका ५। ० बल नवांशका स्वामी गुरुका शत्रुका ५। • बल, दशांशके स्वामी शनिका मित्र बल १५० एकादशांशमें एकादशांशके स्वामी गुरुका शत्रुका बल ५० द्वादशांशमें दाद- शांशका स्वामी सूर्य ‘स्वराशिका है, इसलिये स्वका २० । ० बल प्राप्त हुआ, यह सूर्यके द्वादशवर्गका बल हुआ, इसका योग किया १२० । • आया इसमें १२ बारहका भाग दिया, लब्ध १०० सूर्यका विशोपकात्मक द्वादश वर्ग बल हुआ। ऐसे ही शेष ग्रहोंका जानना ॥ ग्रहाणांद्वादशवर्गचक्रम. द्वादशवर्गबलचक्रम्. र. ६. गु. शु. २. ५ . . . ५ २०१५ होरा. ० . . . . र. म. 10.११ ११ १२गुट म १२ गु९ गु मि मि मि मिय ४, ५र५४५र५र ५र स १३ २२गु गु म गुदे. सो मि मि मि स्व स स "श २ भुरगु २ श९ गुगु च, स्व मिस मिमि मि । स गुम१ सा२ शु०८म१श ५. १०।१५।१५/१५/२० द्रेष्काण. . a ० . . ० . २० १५/२०१५ १५/११० . चतुर्थाश, . 0 . . . . ५ १० १०२० पचमा p . ५ । २० १० ५ प. षष्ठाक. . . में रश १० शगु २शु स भ स मि १२ १२ ग,६ ६ १ ३ ११श म. सप्तगात्र. स का a ० . . C ग"श५र२/११ शु ५ १ अ. अष्टमाश. श - . o . १० १० २० ५ न, नवमाशं. स स स्व स ० १०५ र शु३ बु५ र १२गु, १०२० ५ दशंश. . D . . ८ गबु ५२२ शु.२ गु.११ श ८म ५ एकादशाश, ० 6 व (५रश २ २ गु.३ चुश, गु मि स। मिमिश स || दादशा. . . . . १२०१२०/१२०/१४५१५५१०५/१३५ " ८ ३ शुभ योग. . . . . . १० ११ विसापका- १ ९ १०।१२। १२ ८ ५५४५/१५त्मक एल. पाप. . . म.म. ए.पू. म.

(१२८) वर्षदीपकम् । स्को शतं कालानां मित्रभे पंचाशत् शत्रुभे पञ्चविंशतिः ॥ १८ ॥ शवाराशिमें १०० सौ कला, मित्रगशिमें ५० कला, शत्रुराशिम २५ पच्चीस ला, स्थिर-मैत्रीके मित्र शत्रुवश बादशवर्ग बल जानना ॥ ४८ ॥ स्व. मि. । श. १०० ५० ० कला. सदैवले पधिमक्ते विंशोपका इत्येके ।। १९ ।। स्थिमैत्री के मित्रशत्रुवंशसे लाये हुए बादशवर्गले बलके ऐक्य ( योग ) में • साठका भाग देना, जो लब्ध आता है वह विंशोपकात्मक बल होता है, ऐसा अनेक आचार्योंका,मत है ।। ४९ ॥ उदाहरण । , 7 १ वादशवर्ग, सूर्यकी राशिका स्वामी शनि स्थिर मैत्रीकमें सूर्यका शत्रु है, इस- लिये सूर्यके गृह नीचे २५०० कला बल लिखा, एवं होराका स्वामी इन्न मित्र है सूर्य के इस कारण ५० कला बल होरामें लिखा, द्रेष्काणका स्वामी बुध शत्रु है इससे शत्रु२५ाला बल द्रेष्काणमें, चतुर्थाशमें सूर्य स्वराशिका है, अतः स्वका १०० छाला दल, एवं पंचमांशमें पंचमांश का स्वामी गुरु मित्र है, अतएव मित्रका ५९० कला बल और षष्ठांशका स्वामी चन्द्र भी मित्र है,इसलिये षष्ठांश भी५० कला व लिखा और सप्तमांशका स्वामी शत्रु है अतः समांशमें शत्रुका भी२५ कला बल, अष्टमांशका स्वामी भौम मित्र है इसलिये अष्टमांश मिनका ५० कला बल । नवांशका स्वामी गुरु मित्र है इससे नांशों मित्रका बल५०कला और दशांशका स्वामी शनि सूर्यके शत्रु है इसवास्ते दशारामें शत्रुझा २५ कला बल लिखा और एकादशांशका स्वामी गुरु मिन तथा बादशांशका स्वामी सूर्य स्वका इसलिये एकादशांशमें मित्रका ५० कला बल और बादशांश वका १०० कला बल लिखा । यह द्वादशवर्ग बल हुआ,इसका योग सिख्या ६०० आये ६० साठका भाग दिया लब्ध १०० विंशोपकात्मक सूर्या बादशवर्ग बल हुआ ऐसे ही शेष चन्द्रादिग्रहों का द्वादशवर्गवल जानना ।। १ भापाटीकासहितम् । (१२९ स्थिरमैत्रीवशात् द्वादशवर्गबलचक्रम. . र ।चं. । मे. पु. / गु. । . ૨૬ २५ ५० २५ o . . . २५ २५ २ होरा ० . . . . २५ २५ २५ ५ देष्काण. . २५ २५ অনুযায়, . . . . . ५० १०. पंचमात्र. . . . ० . . २५ २५ पष्ठाक्ष. . a . २५ २५ १०० २५ ७ सप्तमाश . . . . . ५० २५ २५ ५० ५० ८ भटमास . O . . . . o २५ २५ १०० ९ नवमाश . . . . . २५ २५ १० दशमात्र . . . . . १०० एकादशाश. . ० . . . २५ २५ २५ द्वादशाश. . . . ६०/४२५/४.०५२५६००४५०/५२५ योग, . . . . ० . ८ ८ विशोपका. रमकपलम ४० ४५ . ३० ४५ म म. म. म. म. म. चल Am स्वभस्वोच्चान्यतरस्थितौ ग्रहस्य प्रथम हर्पपदम् ॥५०॥ स्वराशिका वा अपनी उच्चराशिमें से कोई भी राशिका जो ग्रह हो(महस्वराशिका हो वा अपनी उच्चराशिका हो) तो उस ग्रहका प्रथम हर्प-पद होता है ॥ ५० ॥ गोविषट्क्वीशबाणांत्यगेषु सूर्यादिष्ठ द्वितीयम् ॥५१॥ सूर्यको आदि ले गो ९, त्रि ३, पटू ६,कु १, ईश ११, बाण ५, अन्त्य १२ बारहवें स्थानमें यथाक्रम ग्रह स्थित हो तो द्वितीय हर्षपद होता है, अर्थात् सूर्य ९, चन्द्र ३, मङ्गल ६, बुध १, गुरु ११, शुक्र ६, शनि १२ में स्थानमें .

(१३०) वषदीपकम् । सूर्यारेज्या नराः शेषा स्त्रियः ॥ १२ ॥ सूर्य, बङ्गल, गुरु पुरुषमह, शेष ( चन्द्र, बुध, शुक्र, शनि ) स्त्रीग्रह मानना ।। १२ ।। दिने घुमान् रात्रौ स्त्री तृतीयम् ॥ ५३ ॥ दिनमें वर्ष प्रवेश हो तो पुरुषग्रह, रात्रि स्त्रीग्रह बलवान् जानना और तृतीय ( तीसरा) हर्षपद होता है ।। ५३ ।। तुर्थमतस्त्रिशु त्रिषु नृस्त्रियौ तुर्थम् ॥ १४ ॥ चतुर्थ भावले लोन तीन स्थानमें पुरुषग्रह और स्त्रीयह स्थित हो तो चतुर्थ हद होता है, अर्थात् ४ । ५ । ६ । पुरुषग्रह, ७ । ८ । ९ स्त्रीयह, १० । १११ १२ पुरुषत्रह, १ । २ । ३ खीह स्थित हो तो ४ हर्षपद जानना साहिये ।। ५४ ।। चतुर्वेषु प्रत्येक पंचविंशोपका बलम् ॥ ५५ ॥ इति वलाध्यायस्वतीयः ॥ ३ ॥ इन चार हर्षपदों में प्रत्येक ( एक एकके प्रति ) के पांच पांच विंशोपका बल जानना चाहिये ।। १५ ॥ हर्षपदचक्र- ? M र चं बु गु . S610 प्रथम. द्वितीय. तृतीय. ५ चतुर्थ. ० . २) योग. उदाहरण । यहां शुक्र उराशिका है, इसलिये प्रथम हर्षपदमें यह बलवान् हुआ । सूर्यको आदि ले कोई ग्रह द्वितीय हर्षपद स्थानों में नहीं है, अतः द्वितीय हर्षपद कितीका नहीं आया । दिन में वर्षश्वेश हुआ है इससे पुरुषग्रह ( सूर्य मंगल गुरु.) तृतीयहर्ष बलदाता हुए । एवं अतुर्थस्थानसे तीन तीनमें पुरुष स्त्री ग्रह देखनेसे ८ आह शनि श्री ग्रह और १० । १३ में सूर्य मंगल पुरुषग्रह स्थित हैं, चतुर्थ हर्षपदमें बली हुए॥ इति श्रीज्योतिर्विद्धरश्रीमन्महादेवकृतवर्षप्रदीपिकाख्यताजिकग्रंथे तदंगजश्रीनिवासविरचितायो लोदाहरणभाषाव्याख्यायां वलसाधनाध्यायस्तृतीयः ॥३॥ ये .. भाषाटीकासहितम् । (३३१). अथ दृष्टिसाधनमाह । पश्योनदृश्ये द्विदिग्भशेषे तद्विनांशा अर्धास्तिथिशुद्धा- स्तथा व्यंकशेषे भोग्यांशा एव वेदाष्टशेषे च सार्दा अंशाः पञ्च वेदतः शुद्धास्तथैव तर्काभ्रशेषेऽशा द्विघ्नाः पष्टिशुद्धा कलाद्या दृष्टिरन्यः तदभावः ॥ १॥ पश्यमहको हीन करना, दृश्यग्रहमेंसे दो २ राशि १० दशराशि शेष बचे चो राशिके विना अंशोको आधे करना और १५ पंदरहमेंसे शोधना । ऐसे ही वीन ३ राशि,९नवराशि शेष बचे तो अंशोंको तीसमें से शोधना, एवं ४ राशि, ८ आठ राशि शेष बचे तो राशि विना अंशोंको ड्योढ़ा ( अंशोंको आधे करके उन्हीं अंशोंमें मिलाना ) करना और ४५ पैंतालीसमेंसे शोधना । इसी प्रकार ६ छः राशि अथवा शून्यराशि शेष बचे तो राशि विना अंशोको दोगुणे कर ६० साठमेंसे शोधनेसे कलादिक दृष्टि होती है और इन उक्त राशियोंसे अन्य राशि शेष बचे तो दृष्टिका अभाव ( दृष्टि नहीं ) जानना ॥ ३ ॥ दृष्टिचक्रम्. २ ३ अशा- | अंशा- अंशा- | अंशा- अंशा अंशा- अंशा- अंशा- ऽ ऽर्ड्स ३० डेटा डेढा द्विगु । द्विगुणा १५शु. १५. शु. ४५ शु.४५ शु. शु. ६०शु. १ जिस ग्रहपर दृष्टि करना हो वह दृश्य, जो देखता हो वह पश्य कहलाता है।

th (१३२.) वर्षदीपकम् । उदाहरण। ग्रहोपरिग्रहाणां दृष्टिचक्रम् । दृश्य सूर्य ३० । १६ । १३ चं। मं छ । गु शु १९ में पश्य यू १०७ २६ ४१ ११ र. १२ । ५६ को चीन किया, शेष . ५९ १६ ३१ १ . G ८ मं . ५५ ४४ ७ t ct ३८ क इसके राशि शिना अंशादिक १६॥ ले ० १ ४३ को द्विगुण किये तो १३ ॥ १ ॥ २६ हुए, इनको ६ ये शोधे तो २६ । १९ पलादिक बु. २२ सूर्यपर चन्द्रकी दृष्टि हुई । इसी गु. तरह कमसे सर्व ग्रहोंपर नहीका ३७ १ ११ / १८ १८ ५७) २७ ३५। ५९ दृष्टि जानना और भावएर धि करना हो तो भावदृश्य मापश्य २५ १४ शु. ५३ सम्झके दृष्टि करे तो साधोपार १० १३, २१, १८ २२ होकी ष्टि होती है। १४ ४८ ४ । ४२ इति दृष्टिलाधनाध्यायचतुर्थः ॥ ४ ॥ ० ६ ० श . 18 अथ सहमाऽध्यायः । सर्वत्र सहमसाधने शुद्ध्याश्रयतः शोध्यहीने क्षेपक्युक्त सहमसिद्धिः ॥ १॥ सर्व सहमसाधने शुयाभयमेले शोध्यको होन करके क्षेपक युक्त करे तो सहम सिद्ध होता है ॥ १॥ गोध्यमादेशरल्या शुद्धयाश्रयमादितोऽर्वाक् क्षेपामा सिझसहमभं सैकं कार्यम् ॥ २॥ शोध्यकी राशि अंशको आदि ले शुझ्याश्रयको गशि-अंशके पहले क्षेपककी १ जिसमेंसे हीन करना कहा हो वह शुद्ध्याश्रय और जितको हीन करनेको कहा है वह शोभ्य २ भाषाटीकासहितम् । (१३३) राशि नहीं आवे तो सिद्धसहमकी राशिमें एक युक्त करना, अर्थाद शुझ्याश्रय और शोध्यके बीचमें क्षेपक नहीं आवे वो एक मिलाना ॥२॥ क्षेपकानुक्तौ लग्नं योज्यम् ॥ ३ ॥ जिस सहमसाधनमें क्षेपक नहीं कहा हो उसमें लग्न युक्त करना ( लमको क्षेपक समझना) ॥ ३॥ समयानुक्तो रात्री शोध्यशोधको व्यस्तो कार्यों ॥४॥ जिस सहमसाधनमें समय नहीं कहा हो उस सहमके साधनमें रात्रिमें वर्षप्र- वेश हो तो शोव्यशोधकको व्यस्त ( उलटे ) करना अर्थात् शोध्यको शुल्या अय और शुद्ध्याश्रयको शोध्य मानके सहम करना ॥ ४॥ सूर्योने चन्द्रे पुण्यसहमः ॥५॥ चन्द्र से सूर्यको होन करनेसे पुण्यसहम होता है ॥५॥ चन्द्रोनार्के गुरुज्ञानज्ञाति उहमानि ॥ ६ ॥ चन्द्र, सूर्यको होन करनेसे गुरु, ज्ञान, ज्ञाती सहम होते हैं ॥ ६ ॥ पुण्योनेज्ये यशोदेहसैन्यघातम् ॥ ७ ॥ गुरुमेंसे पुण्यसहमको हीन करनेसे यश, देह, सैन्य और घातसहम होता है ॥ ७॥ पुण्योनज्ञाने शुक्रान्विते मित्रम् ॥ ८॥ पुण्यसहमको ज्ञानसहममेंसे होन करके शुक्र मिलानेसे मित्र सहम होता है ॥ ८॥ कुजोनपुण्ये माहात्म्यधैर्यशौर्यम् ॥ ५ ॥ पुण्यसहममेंसे मंगलको होन करनेसे माहात्म्य, धैर्य, शौर्य सहम होते हैं ॥९॥ शुकोनमन्दे इच्छा ॥ १० ॥ शुक्रको शनिमेंसे होन करनेसे इच्छा सहम होता है ।। १०॥ लग्नेशोनारे सामर्थ्य चेदंगेशो भौमस्तदा जीवाच्छोधनीयः ॥ ११ ॥ उनके स्वामीको भौममेंसे होन करनेसे सामर्थ्य सहम होता है, यदि लग्नेश्वर भौम ही हो तो गुरुमेंसे लग्नेश्वरको हीन करना चाहिये ।। १३ ॥

(:१३४ वर्षदीपकम् । सक्षा संक्षेनजीवे माता ॥ १२ ॥ सदा अर्थात् दिनरात्रिमें गुरु ने शनिको हीन करने से माता सहम होता है ।। १२॥ दिने चन्द्रोनेज्ये सा राधावक निर्जीव सेन्दी गोत्रम् ॥ १३ ॥ दिनका इष्ट हो तो गुरुमसे चन्द्रको हीन करना और सूर्ययुक्त करना, रात्रिका इष्ट हो तो गुरुमसे सूर्य हीन दाना और चन्द्र युतः कानो गौरव- सहरू होता है ॥ १३ ॥ भावनाजे गजताती ॥ १४ ॥ शनिसले सूर्यको हीन करनेसे (निकालने ) से गज और तात (पिता) रहम होते हैं ॥ १४॥ शुक्रोलेन्दो माता कान्तिश्च ।। १६ ।। चन्द्रमेंसे शुरको निकालने से माता और कान्ति सहम होने हैं ।। १..] इज्योलमन्दे जीवितोपा! ३६ ॥ शनिमेसे गुरुको हीन करनेसे जीवित और उपाय सहम होते हैं ॥ १६ ॥ ज्ञोनारे कर्म ॥१५॥ भौमसे बुधको घटानेसे कर्मराहस होता है ।। १७ ।। सदा इन्द्रोनांगे रोगः ॥ १८ ॥ दिनका इट हो वा रात्रिका सदा ही लममेसे चन्द्रको हीन करनेसे रोग- हम होता है ॥१८॥ लोपोनेन्दौ कामः काँगे तु सदा लग्नेशोनार्के ॥ १९ ॥ चन्द्रमें से लग्नके स्वामीको हीन करनेसे कामसहम होता है और कर्क लय हो तो सदा ( दिन रात्रिमें ) सुर्यमेंसे लग्नेशको होन करनेसे कामसहम होता है ॥ १९ ॥ वकोलेज्ये कलिक्षमे ॥ २० ॥ गुरुमें से मंगलको हीन करनेसे कलि और क्षमा सहम होते हैं ॥ २० ॥ .

भापाटीकासहितम् । (१३५) मन्दोनेज्ये ज्ञान्विते शास्त्रम् ॥ २१ ॥ गुरुमें शनिको होन करना बुध मिलानेसे शास्त्रसहम होता है ॥ २१ ॥ सदा चन्द्रोनशे बंधुः ॥ २२॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा ही बुधर्मेसे चन्द्रको होन करे तो बन्धु सहम होता है ।। २२ ॥ ज्ञानेन्दौ पराश्रयः ॥२३॥ चन्द्रमेंसे बुधको हीन करनेपर पराश्रय सहम होता है ॥२३॥ सदा चन्द्रोनाष्टमे मन्दान्विते मृतिः ॥ २४ ॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा चन्द्रको हीन करना और अष्टम भावमेंसे शनियुक्त करनेपर मृत्यु सहम होता है ॥ २४ ॥ सदा धर्मेशोनधर्मे धनेशोनधने लाभेशोनलाभे देशान्तरधनलाभाः॥२९॥ दिनका दृष्ट हो वा रात्रिका सदा ही नवम भावमेंसे नवम भावके स्वामीको हीन करना, धनभावमेंसे धनभावके स्वामीको होन करना, लाभभावमेंसे लाभ- भावके स्वामीको हीन करना देशान्तर १ धन २ लाभ ३ सहम होते हैं ॥२५॥ सदा सूर्योनभृगौ परांगना ॥ २६ ॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा ही शुक्रमेंसे सूर्यको हीन करनेसे परांगना (परस्त्री) सहम होता है ।। २६ ।। मन्दोनेन्दो दास्यम् ॥ २७॥ चन्द्रमेसे शनिको हीन करना दास्य सहम होता है ॥ २७ ॥ सदा बुधोनचन्द्र वाणिज्यम् ॥ २८ ॥ मदा (दिनरात्रमें ) चन्द्रमसे वधको हीन करना वाणिज्यसहम होता है।।२८ दिवार्कोनमन्दे सूर्यभपयोगे रात्री चन्द्रोनमन्दे चन्द्रर्वेशयोगे कार्यसिद्धिः ॥ २९ दिनका इष्ट हो तो शनिमें से सूर्यको हीन करना और उसमें सूर्यको राशिका स्वामी मिलाना, रात्रिसमयका इष्ट हो तो शनिमेंसे चन्द्रको हीन करना और उसमें चन्द्रको राशिका स्वामी मिलानेपर कार्य सिद्धि सहम होता है ॥ २९ ॥ १ जिस राशिमें स्थित हो उस राशिका स्वामी।

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(१३६)
वर्षदीपकम् ।
कोणोनशुक्रे विवाहभायें ॥ ३० ॥
शुभ मेंसे शनिको हीन करने पर विवाह और मार्श ( स्त्री ) सहम
ज्ञोज्य आधान ॥ ३३ ॥
गुरुमेमे बुधको हीन करने से आधान ( गर्भ ) सहम होता है ॥ ३१ ॥
सदा चन्द्रोन मन्दे षष्टान्विते सन्तापः ॥ ३२ ॥
दिलका इष्ट हो वा रानिका सदा शनिमें से चन्द्रको हीन करना और उनमें
ए छठा भाव मिलानेसे सन्ताप सहम होता है ॥ ३२ ॥
सदा सौमोन सिते श्रदा ॥ १२ ॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा शुक्रमेंसे भौमको हीन करनेसे श्रद्धासहम
होला
सदा पुण्योनज्ञाने प्रीतिः ॥ ३४ ॥
सदा दिनका इष्ट हो वा रात्रिका ज्ञान सहमोंमेंसे पुण्य सहमको हीन करना प्रीति
सहम होता है ॥ ३४॥
मन्दोनारे ज्ञान्विते जाडयम् ॥ ३५ ॥
संगल से शनिको हीन करना और उसमें बुध शुक्र करे तो जाड्य सहम
होता है ॥ ३॥
शश्वज्ज्ञोनारे व्यापारः ॥ ३६ ॥
सदा । दिनरानिके इष्ट में ) भौम से बुधको हीन करे तो व्यापार सहम
होता
वन्द्रोनार्कजे जलपातः ॥ ३७॥
शनि से चन्द्रको हीन करे तो जलपात सहम होता है ॥ ३७॥
आर्कजोनसौमे शत्रुः ॥ ३८ ॥
भौमसे शनिको होन करे तो शत्रु सहम होता है ॥ ३८ ॥
बुधोनपुण्ये ज्ञान्विते दारिद्वयम् ॥ ३९ ॥
पुण्य सहममें से बुधको निकालने और उसमें बुध युक्त करनेपर दारिद्रय
सहम होता है ॥ ३९ ॥

भाषाटीकासहितम् ।
(१३७)
शश्वञ्चन्द्रोनजीवशुक्रयोः ॥ ४० ॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा चन्द्रको हीन करना, गुरु और शुक्रमेसे
पुत्र पुत्री सहम होते हैं अथात् गुरुमेंसे चन्द्रको हीन करे तो पुत्रसहम और
शुक्रमेंसे चन्द्रको बटावे तो पुत्रीसहम होता है ॥ ४० ॥
दिनेऽर्कोनस्वोच्चे गत्री चन्द्रोच्चे मडलेशः ॥ ११ ॥
दिनका इष्ट हो तो सूर्यको हीन करना, अपने उच्च ( ० रा० १० अ०
मेंसे रात्रिसमयका इष्ट हो तो चन्द्रको हीन करना, अपने उच्च ( रा ०३०)
मेसे मंडलेशसहम होता है ॥ ४॥
मन्दोनसाईत्रिभे जलपथः ॥ ४२ ॥
शनिको होन करना साढे तीन राशि ( ३ राशि १५ अंश ) मेंसे जल-
पथसहम होता है ॥ ४२ ॥
मन्दोनपुण्ये बन्धनम् ॥ ४३ ॥
पुण्य सहममेंसे शनिको हीन करे तो बन्धन सहम होता है ॥ ४३ ॥
अर्कोनपुण्ये लाभान्वितेवः॥४४॥
पुण्य सहममें से सूयको हीन करने और उसमें लाभ ११ वां भाव मिलाना
अश्वसम होगा ॥४४॥
सदा जीवोनेन्दौ गजः ॥ ॥ ४५ ॥
सदा (दिनका इष्ट हो वा रात्रिका ) चन्द्रमेंसे गुरुको हीन करे तो गज-
सहम होता है ॥४५॥
रिपुसहमोनांत्ये पशुः ॥१६॥
१२ बारहवें भावमेंसे शत्रुमहमको हीन करे तो पशुमहम होता है ॥ ४६ ॥
शश्वत्कोणोनाङ्गारयोर्व्यसनकृषी ॥ १७ ॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा शनिको लग्न और मंगलमेंसे होन करनेसे
व्यसन और कृषिसहम होता है अर्थात् लममेंसे शनि हीन करनेसे व्यसन और
भौमसे शनि हीन करनेसे कृषिसहम होता है ॥ ४७ ॥
सदा पुण्योनार्कजे मंदयुते बन्धमोक्षः ॥ १८ ॥
सदा ( दिनरात्रिमें ) पुण्य सहमको शनिमेंसे हीन करना और उसमें शनि
युक्त करनेसे बन्ध औ मोक्ष सहम होता है ॥ ४८ ॥

(१३८) वर्षदीपकम् । सदा (दिनरात्रिके इष्ट में ) पुण्यसहममें से गुरुको हीन करने और भौम मिलानेसे दुःख सहम होता है ।। ४९ ॥ कुंजोनमः उष्ट्रः ।। ५० शनिमें से मंगलको निकालनेसे उष्ट्र सहम होता है ।। ५० ॥ संदोनाक पितृव्यः ॥ ९ ॥ सूर्य से शनिको हीन करनेसे पितृव्यसहम होता है ।। ५१॥ अशोनषष्ठे सान्त्यो आखेटः ॥ १२ ॥ छठे भावमेंसे छठे भावके स्वामीको हीन करके बारहवां भाव मिलाने आखेट ( शिकार ) सहम होता है ॥ ५२ ॥ ज्ञानेन मृत्यः ॥ ९ ॥ बुधको चन्द्रोले हीन करनेसे भृत्य सहम होता है ॥ ५३ ।। अर्कोनेज्ये बुद्धिः ।। ६४॥ सूर्यको गुरुमेंसे हाल करने से बुद्धिसहम होबा है ॥ ५.४ ॥ सदा तुयशोनलने निधिः ।। ६६ ॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा चतुर्थ भावके स्वामीको लग्नमेंसे हीन करनेो निधि सहम होता है ॥ ५५ ॥ सदा शुक्रोनकोणे ऋणम् ।। ६६ ॥ सदा दिनरातके इष्टमें शनी से शुक्रको हीन करनेसे ऋणसहैम होता है ॥ १६ ॥ सदा बुधोनेन्दौ सत्यम् ॥ ५७ ॥ सदा (दिनरानिमें) बुधको चन्द्रमेंसे हीन करनेले सत्यलहम होता है ॥५७॥ स्वेशेन शुभेन वाऽब्देशेन वा युतं दृष्टं वा सहम स्वेशपाके वृद्धिमन्यथा विपरीतम् ।। ५८ ॥ जो सहम अपने स्वामीसे अथवा शुभग्रहसे वा वर्षेश्वरसे युक्त हो वा दृष्ट हो तो वह अपने स्वामीकी दशामें फलवृद्धि करता है और विपरीत हो तो विप- रीत फलकी वृद्धि करता है, अर्थात् अपने स्वामीसे शुभग्रहसे वा वर्षेश्वरसे युक्तका दृष्ट नहीं हो तो वह विपरीत ( उलटा ) फलकी वृद्धि अपने स्वामीकी दशामें करता है ॥ ५८॥ पुरना Tv - भाषाटीकासहितम् । (१३९) प्रथमं जन्मकालिकं सद्मबलाबलं जानीयात ॥ १९ ॥ प्रथम जन्मसमयमें सहमोंका बल निर्बल जानना (जन्मसमयमें सर्व सहम करना, अनन्तर जन्मकुंडलीमें देखना जो सहम अपने स्वामोसे, लग्नेश्वरसे और शुभग्रहसे युक्त हो वा दृष्ट हो ॥ ६।८।१२ वां आदि दुष्टस्थानके, सिवाय शुभस्थानमें स्थित हो वह बलवान् जानना और इससे विपरीत हो वह निबल जानना)॥ ५९॥ तत्र यानि बलीयांसि तेषामेव संभवाः ॥ ६० ॥ जन्मसमयमें जो जो सहम बलवान् हों उन्हीं महमोंका संभव जानना ॥६०॥ प्रतिवर्ष सम्भवतापन्नान्येव कार्याणि नेतराणि, नैष्फल्यात् ॥ ६१ ॥ प्रतिवर्ष ( हरवर्ष ) जिन जिन सहमका जन्म समयमें सम्भत्र आया हो वे ही सहम करना, जिनका सम्भव नहीं है वे सहम निष्फलदाता हैं इस- लिये नहीं करना ।। ६१ ।। प्रश्ने प्रच्छकष्टकार्यसहमं कार्यम् ।। ६२ ।। इति सहमाऽध्यायः पंचमः ॥ ५ ॥ प्रश्नसमयमें पूछनेवालेका जो अभीष्टकार्य हो वह सहम करना ॥ ६२॥ उदाहरण। यहां दिनमें वर्षपदेश हुआ है इस कारण सूत्रमें कहे हुए शोव्य सूर्य १०॥१६॥ ५३।३९ को शुद्धयाश्रय चन्द्र १००१२२।५६ मेंसे घटाया तो ११११३।२९ । १७ शेष बचे, इसमें क्षेपक नहीं कहा है इसलिये लग्न १११२।२६।३५ युक्त किया तो ०१२५१५५।५२ यह पुण्य सहम सिद्ध हुआ। शोन्य सूर्यको राशि १० अंश १६ को आदि ले शुद्ध्याश्रय चन्द्रकी राशि १० अंश० पर्यंत गिनने क्षेपक ( लम) की राशि १ वृषभ बीचमें आगयी है इसलिये सिद्ध सहमकी राशिम १ एक युक्त नहीं किया, इसो प्रकार शेष सहम जानना । अथ कतिचित्सहमाः . गुरु पुण्य इच्छा पुत्र राज्य ज्ञान २ . २८ २७ ५ १८ १८ धन लान शत्रु रोग जीवि ४ १८ ! २७ १०२४ २४ or ० Image १० १४.०) १ ७ ८ पुण्य अथ सहमसारणीकोष्टकम् । २ । ३।४ ९ १० / १? | १२ १३ । १४ १५ । १६ । १७, १८ १९ | २० | २१ संख्या गुरु यश दे- राज माता जीवित काल ज्ञान ह सैन्य मित्र म्यधैर्य, इच्छा सामर्थ्य भ्राता गौरव कर्म । रोग देशा सहमनाम. काम तात कांति | उपाय बंधु पराश्रय स्मृति ज्ञाति क्षमा तर नामतुल्याफलम् घात शाय च पुण्य पुण्य म कु श च सू गु च ल.प. मं श च च ९५ शोध्य ग ज्ञान पुण्य गु ग श श गु गु तु च अष्टम. ९ मा अध्याश्रय सू । ज्ञान पुण्य श म श सू श च च गु ग 다. च व ९प साध्य च पुण्य पुण्य गु गु सू ल.प. म श अष्टम.९माध्याश्रय स. दि. शक शनि क्षेपक दिवा मंx 11.46 myi . 64.4.64 إلا सू Ga बु ल ल ल ल ल ल ल ल ल ल बुध ल ल ভ্য वर्षदीपकम् । + लग्नेशचंद्र होतो सदा गुरुमेंसे हीन करना. + कर्कलग्नहोतो सदा लग्नेशको सूर्य से हीन करना. २ | २३ २४ २५ २६ / २७ २८ २९ ३० । ३१ ३२ । ३३ । ३४ | ३५ । ३६ । ३७ ३८ । ३९ ४० ४१ । ४२ संख्या. वाणि- कार्य विवाह आचा- व्या जल- मंड- सहमनाम पन.लाभ. दारय. संताप. श्रद्धा. प्रीति. 'जाड्य. सिद्धि भार्या. शत्रु. दारिद्य.) पुत्र. | पुत्री. चंधन. गना. ज्य. पार. पात. लेश. पथ. तुल्यफल. प. ११५. सू. बु. श. बु. चं. मं. | पुण्य. श. चं. च. स. स. स. सोध्य. चं. ० रा./३रा. भा. २१भा. शु. श. शुध्या- . श. शु. ज्ञान. में. श. मं. पुण्य. १० अं. १५ प्रय. का. सू . tra श 64 -- चं . शु. दिवा. - चं म . पुण्य. गु . गु. गु . प. १?प. सू. चं. बु. चं शु. चं. मं पुण्य. म. الم श. मं, पुप्य, चं. वं . चं. २रा. १५ अ. पुण्य. सोध्य, रात्री. भा.११भा.का. श. चं. श. ३. श. शु. ज्ञान. श. मं. चं. श. तु. गु. शु. का. श. शुध्या- अय. ३ अं. ल. ल. ल . ल ल.६ भा. ल. ल. चुध. ल. ल. सुध. ल . ल. ल ल. क्षेपक.

(१४१) भाषाटीकासहितम् । अथ सहमसारणीकोष्टकाः ४३.४४५/४६/४७/४८/४९/५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७ व्यस अव गज प. कारे बध मोक्ष दुःख उष्ट्र पितृ माख मृत्य बुद्धि निधि ऋण, सत्य ट सहमनाम तुस्यफल मा ./पुण्या गु. में श. षष्ठेश सू योध्य दिवा घ. पुण्य रात्री श मं.ल. पुण्य चं. २मा . सू ६मा. चं. गु ... च. अध्याय पुण्य .रमा प. प.पुण्य गु. प. स. ६भा. चं.गु.च... बु. शोध्य चं. अनुस ३. मं ..| पुण्य म, १.पष्ठेश बु.[ सू. ल. चं. अध्याअप समाळ.ल.ल.ल. १२माल.ल. ल. ल. क्षेपक सदा इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्षप्रदीपिकाख्यताजिकग्रन्थे तदात्मजश्रीनिवासविर- चितायां सोदाहरणभापान्याख्यायां सहमसाधनाध्यायः पञ्चमः ॥ ५ ॥ अथान्देशनिर्णयः। दिनेऽर्कशुकाफिसितेज्यचन्द्रज्ञाराविभौमेज्यचन्द्र रात्रौ जीवेन्दु- ज्ञारासितार्किशुकमन्दारेज्यचन्द्रा मेषादित्रिराशिपाः ॥ १ ॥ अब वर्षेश्वरका निर्णय कहते हैं-दिनमें सूर्य, शुक्र, शनि, शुक्र, गुरु, चन्द्र, बुध, मंगल, शनि, मंगल, गुरु, चन्द्र, रात्रिमें गुरु, चंद्र, बुध, मंगल, सूर्य, शुक्र, शनि, शुक्र, शनि, मंगल, गुरु, चंद्र, मेषराशिको आदि ले क्रमसे त्रिराशिपति जानना ॥१॥ अथ बिराशिपातेचक्रम. 1.) मि. क./सि.क./ | धम. कु. मी में वृचं दिवा गुचं राषि जन्मांगेशो वर्षीगेशस्तत्रिगशिपो मुन्थेशो दिनेऽकमेशो निशी- न्दुभेशश्चेति पंचाधिकारिणः ॥ २ ॥ जन्मलमका स्वामी १, वर्पलनका स्वामी २, वपर मका 'विराशिपति ३, मुंथाका स्वामी ४, दिनमें सूर्य की राशिका स्वामी और रात्रिम चंद्रको राशिका स्वामी ५ ये पांच अधिकारी जानना ।। २॥ १ वर्षलग्न जिस राशिका हो उसका दिनमें वर्ष-प्रवेश हो तो दिनका, रात्रि में रात्रिका . २ ३.४/५६ ८ र (१४२) वर्षदीपकम् । एषां बलाधिकोऽङ्गद्रष्टावर्षेशः ॥ ३ ॥ हन पञ्चाधिकारियोमे जो ग्रह अधिक बलवान् होके वर्षलग्नको देखता हो वह वर्षेश्वर होगा ।। ३ ।। बलसाम्ये तु दृष्टयाधिकः ॥ ४॥ अनेक ग्रहका बल लपान ( बरोबर ) हो तो जिसकी लापर वष्टि अधिक हो वही बर्वेश्वर होगा ! ४ ॥ उभयलान्येऽधिकाधिकारी ॥ ५ ॥ अनेक शहोंका बल और लग्नपर दृष्टि दोनों समान ( बरोबर ) हों तो जि महला अधिकार ज्यादा आया हो वह वर्षेश्वर होगा ॥ ५ ॥ त्रितयसाम्ये सुन्थेशः ॥६॥ बल, दृष्टि अधिकार यह तीनों समान हों तो सुत्थेश ही वपेश होगा ।। ६ ॥ पञ्चानामपि मध्ये कोऽपि नांगं पश्येत्तदा सुन्थेशवर्षलग्नेशो यथोक्ताधिकार्यतःपाती तदितरोऽपि जस्लमये वर्षागराशिदष्टा सवेत्तदैतेषां योऽधिकबलः स वर्षेशः ॥ ७ ॥ पांचों अधिकारियों से कोई भी वर्षलग्नको नहीं देखते हों तो मुन्थेरा, वर्षलग्नेश और दोनोंसे अन्यग्रह जो वर्षमें अधिकारी होकर जन्मकुंडली में वर्ष- लग्नकी राशिको देखता हो तो: इन तीनोंमेंसे जो अधिक बली हो वही वर्षेश होगा ॥७॥ ज्याणां बलसाम्ये सुन्थेशः ॥ ८॥ तीनों अधिकारियोंका बल समान ( बरोबर ) हो तो सुन्थेश ही वर्षेश होगा।॥ ८॥ उक्तरीत्या चन्द्रस्याब्दपतित्वप्राप्तौ तदित्थशालिनोऽब्द- पत्वमन्यथातद्देशस्येत्येके ।। ९ ॥ उक्त रीतिसे चन्द्रको वर्षेशत्व प्राप्त हो तो (चन्द्र वर्षेश होता हो तो ) चन्द्रसे जो ग्रह इत्यशाल करता हो तो वही वर्षेश होगा, और कोई ग्रह इत्थ- शाल नहीं करता हो तो चन्द्रकी राशि का स्वामी वर्षेश होगा, यह किन्हीं आचार्योंका मत है ॥९॥ -- - ܩܢ सन्मल. रा.प. श. ८ म. वर्षल.रा.प. शु. ११ पू. त्रि. रा.प. शु. मुन्या. राप भापाटीकासहितम् । (१४३) वोगेशो राजा समयेशः सेनापतिर्मुन्थेशो मन्त्री जन्मांगेशः पुरेशस्त्रिराशिपो रससस्य धात्वधिप इत्येके ॥ १० ॥ इत्यन्देशनिर्णयाऽध्यायः ॥ ६ ॥ वर्पलग्नेश राजा समयपति सेनाधिप मुन्थेश मन्त्री जन्मलग्नेश पुराधिप निराशिपति रस धान्य धातु इनका अधिपति होता है यह किन्ह। आचार्योंका मन है ॥१०॥ उदाहरण। पंचाधिकारी. इन पांचा अधिकारियोंमें शुक्र अधिक बली है और वर्पलनको मित्रदृष्टिसे देखता है, इसलिये वर्षेश्वर शुक्र पूर्ण बली हुआ. १२ । पू. इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेपकृतकपदीपके तदात्मज- श्रीनिवासविरचितायां सोदाहरणभापाव्याख्याया- मदेशनिणयाध्यायः पठः ॥ ६ ॥ सूर्य | रा.प अथ दशाविचारः। सलग्नकेटानां मध्ये यो न्यूनांशो भवेत्तस्यांशादयः प्रथम लेख्या:॥१॥ अब दशाविचार कहते हैं:-लग्नसहित सूर्यादि सात ही ग्रहोंमें जो ग्रह न्यून ( अल्प ) अंशका हो उसके अंशादि (अंश कला विकला ) प्रथम लिखना ॥१॥ ततस्तदधिकांशानामंशादयः क्रमशो लेख्याः ॥ २ ॥ फिर उस ( अल्प अंश) के ग्रहसे अधिक अधिक अंशके ग्रहोंके अंशा. दिक क्रमसे लिखना ( अल्प अंशके ग्रहसे अधिक अंशके ग्रहोंके अंशादिक लिखना, तदनंतर उससे अधिक अंशके ग्रहके अंशादिक, फिर उससे अधिकके अशादिक लिखना, इस क्रमसे सबके अधिक अंशके ग्रहके अंशपर्यंत लिखना चाहिये)॥२॥ इमे हीनांशसंज्ञकाः॥३॥ उक्त प्रकार लिखे हुए ग्रहोंके जो अंशादिक हैं उनको हीनांशसंज्ञक जानना चाहिये ॥ ३ ॥ -- श. ८ 1 म (१४४) वषदीपकः । द्वयोरंशादिसाम्ये बलांधिकस्य पूर्वा दशा ॥३॥ दो ग्रहोंके अंशादिक ( अंश कला विकला ) समान (बरोबर) हो तो इनमें से जो अधिक बलवान हो उसकी प्रथम दशा जाननी चाहिये ( प्रथम उसके अंशादिक लिखना) ॥ ४ ॥ बलसाम्येऽल्पगतिकस्य ॥५॥ दो ग्रहोंका बल समान हो तो जो अल्पगतिवाला ग्रह हो उसकी प्रथम शाजानन्हा ॥ ५ ॥ उदाहरण यहां लनाहित सूर्यादि ग्रहोंमें सर्वसे न्यून अंश चन्दके हैं, अतएव इन्द्रके श मला २३ विकला ५६ पहले लिखे । चन्द्रसे अधिक अंशका बुध इसलिये चन्द्रशे अनंतर बुधके अंशादिक १ ३५। ८ लिखे, एवं, बुधसे अधिक मौष, नौमसे अधिक अंशादि शनिके, इस क्रमसे अधिक अंशक्के ग्रह क्रमले सर्वाधिकांश ग्रहपर्यंत लिखने में इस प्रकार होनांश हुए। हीनांशाः। चं. बु. मं. श./ल' र.गु. शु. १७.९ १२१६/१८२५ २२६३५/३१५४/२६५३,५६/२ १६८ ३६५१३५३९५५/४०) पात्यकृती प्रथमखेटल्य यथास्थितांशाः ॥६॥ पात्यांश करनेके समय प्रहके (जो सर्व ग्रह से अल्प अशादिकका ग्रह होनाशमें प्रथम लिखा है उसके ) अंशादिक यथा स्थित (जो अंशादिक हों वे ही प्रथम) लिखना ॥ ६ ॥ ततः प्रथमं द्वितीयाद् द्वितीयं च तृतीयादित्यादिक्रमेण शोधयेद ॥ ७ ॥ इमे पात्याः ॥ ८॥ तदनंतर प्रथम लिखे ग्रहके अंशादिकको दूसरे ग्रहके अंशादिकमेंसे दूसरेके अंशादिकको तीसरे से, तीसरेके अंशादिकको चौथेमेसे इस क्रमसे शोधते जाना ॥ ७ ॥ये पात्यांश कहलाते हैं ॥ ८॥ . +

--
भाषाटीकासहितम् ।
(१४५)
उदाहरण ।
होनांशमें सबसे न्यून अंशका चन्द्र प्रथम लिखा है उसके अंशादि प्रथम
वे ही ०१२२॥५६ लिखे इनको आगे जो दूसरा ग्रह बुधके अंशादिक ११३८
हैं उनमें से हीन किये तो १११२११२ शेष बचे, यह बुधके अंशादि हुए। वद-
नन्तर बुधके अंशादिक ३५/८ को तीसरे भौमके अंशादिक ॥३१॥३६
मेंसे घटाये तो ५।५६।२८ शेष बचे, ये मंगलके हुए, फिर भौम के अंशादिकको
चौथे शनिके अंशादिकमेंसे घटाये, ऐसे कमसे
पात्यांशका ऐक्य सबसे अधिक अंशके ग्रहके अंशके समान आता है।
पत्यांशाः।
घटानेसे ये पात्यांश हुए,
.
१/५/२/२ २६२५०
२५१२५६/२३३१२७३/५/२
१/१२
वर्षदिनानि पात्येक्येन भजेल्लम्धं दिनाचं ध्रुवम् ॥ ९॥
वर्षके दिनोंको (३६० को बा ३६५।१५।३१।३० को) पात्यांशके ऐक्य
(योग) का भाग देना जो लब्ध आवे वह दिनादिक ध्रुव जानना ॥ ५ ॥
उदाहरण।
वर्षदिनादि ३६० । । ० के पात्यांशयोग २५ । २ । ४८ का भाग
दिया परन्तु भाज्य भाजक दोनों दिनादिक हैं, इस कारण इनको सवर्णित किये
भाज्य १९९६००० में भाजक पात्यांश योग ९०१६८ का भाग दिया लब्ध
११ दिन आये, शेष ३३६४८ बचे, इनको ६० साठ, गुणे किये तो २०१८
८८० हुए । इनमें ९०१६८ का भाग दिया लब्ध २२ घटी हुई, शेष ३५
२०४ बचे, इनको ६० साउ गुणे किये तो २११२२४० हुए, इनमें भाग
९०१६८ का दिया लब्ध २३ पल आये शेष ३८३७६, बचे, इनको ६०
साठ गुणे किये तो २३०२५६० हुए इनमें ९.१६८ का भाग दिया लब्ध
२५ विपल माया, इस प्रकार पात्यैक्यका भाग देनेसे दिनादिक १४ । २२ ॥
२३ । २५ ध्रुव आया।
ध्रुवेण स्वस्वपात्यांशा इता दिनाचा दशा ॥ १० ॥

(१४६) अपनी एकम् । दिनादिक धुवसे अपने अपने पात्यांशको गुणन करनेसे दिनादिक दश होती है ॥ १० ॥ उदाहरण । जैसे-दिनादिक भुन १४१२६ ! २३ । २५ से चन्द्रकी पात्यांश ०१२२॥ ९६ को गुणन किये लो ५। २९ । ३७ ॥ हुए, यह दिनादिक चन्द्रकी दशा । इसी प्रकार सन ग्रहों के पात्यांशको गुणन करके लानेपर नीचे चक्रके अनुसार दिनादिक इशां आयीं। इसका योग वर्षादेनके समान (बरोबर ) ३६० | 0 { • आया है, इसलिये दशा शुद्ध समझना । - दिनादिदशा स्पष्टाः। चं. बु. गं. श. र गु. ६ १ २ ५ ६ ३ २६ १७ । २५ १७ २३ ४५ १८ ५८ ३६ ३६ २ मास २७ दिन ३८ । घटी ५४ पळ ३७ १९५६१९५६/१९५७/१९५७१९५७ १९५७/१९५८/१९५७१९५७ संवत १० । १० ११ २ ४ ६ ३ ९ १५ १९ १० १९ १४ र ५२ कि (६/उत्ती- ५१ २५ २६ यल्य दशामान पाल्यांशैक्येला सात तल्लब्धदिनायेन स्वस्व- पात्यांशा हताः पाकेशतोऽन्त ईशा दिनाद्याः ॥ ११ ॥ जित प्रहमें अन्तर्दशा करना हो उसके दशामाल (जितने दिनको दशा हो उतने दिनकी संख्याको दशामान कहते हैं ) पात्यांशके ऐक्यका भाग देना जो दिनादिक ध्रुव लब्ध भावे उसे अपने अपने पात्यांशको गुणन करना । दशाके स्वामीको आदि ले (जिसमें अन्तर्दशा करना हो उस ग्रहकी प्रथम दशा, उसके आगे जो ग्रह हो उसकी दूसरी दशा इस रीतिसे क्रमसे) दिनादिक अन्तर्दशा जाननी चाहिये ॥ ११ ॥ १ ग्रह स्पष्ट करने के उदाहरणमें जो गोमूनिका गुणनकी रीनि लिखी है उस रीतिले।

भाषाटीकासहितम् । (१४७) उदाहरण । यहां मंगलकी दशामें अन्तर्दशा करना है-मंगलकी दशा ८५दिन २३ घटी ३३ पलकी है यह दशाका मान है, इसमें पात्यांशके ऐक्य २५ । २ । ४८ का भाग दिया, भाज्य भाजक सवर्णित किये और भाज्य ३०७४१३ में भाजक ९०१६८ का भाग देनेसे लब्ध दिनादिक ३ । २४ । ३३ ध्रुव हुआ, इससे प्रथम मंगलका पात्यांशगुणन किया तो २०१५।१५ आये, यह मंगलमें मंग- लकी दिनादिक अन्तर्दशा हुई। इसी प्रकार फिर क्रमसे शनि लग्न रवि गुरु आदिकरके पात्यांश गुणे किये भौममें अन्तर्दशा हुई । - भौममध्येऽतर्दशा। ८ . 1222 र. २० १ दिन १० ६ धटि पळ १७ | ५१ । ५० ३० १५ २६ । १२ १९५६/१९५६/१९५७१९५७/१९५७/१९५७१९५७/१९५१९५७ संवत १२ १ उत्ती २९ १ ९ ५२ । ५३ ५८ २९ १० २२ . . . ८ 25 : अथ मुग्धादशामाह। जन्मभसंख्यायां गताब्दान्योजयेत् ट्यूना नवोद्धृताः शेषे सूथ- न्द्वारराह्विज्यमन्दज्ञकेतुशुक्राणामेकादिक्रमतो दशाद्याः ॥ १२॥ अब मुग्धा दशा कहते हैं-जन्मनक्षत्रकी संख्या गताब्द संख्या मिलाना और उसमें २ दो घटाकर नवका भाग देना, जो शेष बचे सो क्रमसे १ सूर्य २ चन्द्र ३ भौप ४ राहु-५ गुरु ६ शनि ७ बुध ८ केतु ९ शुक्रको आद्य दशा जानना, अर्थात् एक बचे दो सूर्यको, २ बचे तो चन्द्रकी, ३ वीन बचे तों भौमकी, इत्यादि क्रमसे आय दशा जानना ॥ १२॥ .

१ , (१४८) दर्षदीपकम् । धृतिग्निशकविंशतिचा पक्षाशदष्टचत्वारिंशब्यूनषष्टयेकपंचा- शदेवर्विशतिषधिसंख्यातानि सूर्यादीनां झुग्धादशादिनानि ॥ १३॥ धृति कहिये १८, निशद ३०, एकविंशति २१, पतुःपञ्चाशत् ५४, अष्टा इत्यारिंशद ४८, न्यूनपष्टि ५७, एकपाशद ५१, एकविंश २१, पटि ६० ख्यादिन सूर्यादिग्रहोंके शुम्बादशाके दिन जानना अर्थात् सूर्यके १८, एन्ट्रक ३०, मंगलको २३, राहुले ५४, शुरुको ४८, शनिके ५७, बुधके ५१, तुझे २१, शुकले ६० दिन अग्धा दशा दिन जानना ॥ १३ ॥ उदाहरण जन्मनक्षण चित्राकी संख्या १४ गताब्दसंख्या ३८ युक्त किये वो १२ हुए, इनमेले २ दो हीन किये शेष ४० बच्चे इन ९ पन्जा भाग दिया शेष हचे एकको आदि ले कमसे गिनन ४ दौथी राहुकी ५४ दिनकी आप ঃ ছু, গথী হাঙ্ক অস্ত্র বা ৪৮ अगणोनजन्सेन्दुलिया वखाधशेषिता आधदशादिनहताः को भाता दिनादियोग्यहशा ॥ १४ ॥ बारह १२ राशिमेले हीन्न किये हुए जन्म पन्द्रकी कलाको ८०० आठ- लोका भाग देना, शेष बचे कलाको मार दशा ( सुत्र १२ के अनुसार आयी हुई दशा) के दिनोंले गुणन करना और ८०० आठसौका भाग देना छाप फल ४ आरे वह दिनादिक भीग्यदशा जानना ॥ १४ ॥ हशा दशाहताः षष्टयधिकनिशतेलामा अन्तर्दशा दिनाया सुग्धाया॥१९॥ इति दशाध्यायः। दशाके दिनको दशाक दिनसे गुणन करना और तीनसौ साठ ३६० का पण देना, जो लब्ध भावे वह झुग्धादशामें दिनादिक अन्तर्दशा होती है ॥१५॥ उदाहरण। जन्य समयका चन्द्रस्पष्ट ५। २९ । १९। २९ इसको बारह राशि- राशिको ३० गुणी करके अंश मिलानेसे अंश होता है और अंशको साठ गुणी करके कला मिलानेले बहला होती है। 1 - भाषाटीकासहितम् । (१४९) असे हीन किया तो ६ । ०४० । ११ हुए इसको कला १०८४० । १३ की, फिर इनमें ८०० आठसौका भाग दिया, शेप ४४० । ११ बचे । इससे माघ दशा राहुकी आयी । उसके दिन ५४ से गुणे किये तो २३७६९ । ५४ इए इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध २९ दिन आये । शेप ५६९ ! ५४ को ६० साठ गुणे किये तो ६४२९४ हुए फिर ८०० का भाग दिया, लब्ध घटी ४२ आयी, शेष ५९४ को फिर साठ ६० गुणे किये तो ३५६४० हुए ८०० का भाग दिया, लब्ध ४४ पल आया। शेष ४४० को फिर ६० साठ गुणे किये तो २६४०० हुए, ८०० का भाग दिया, लब्ध ३३ विपन मायी । ऐसे फल चार २९ ॥ ४२ ॥ ४४ । ३३ आये ये दिनादिक राहुकी स्पष्ट भोग्य दशा हुई। अथ मुग्धादशाचक्रम् । रा.भो.. श. मु. के. चं. म. रा.भु. . १ . . १८ २७ मास दिन घटि. परु. ४२ . . •.242 विपल| ३३ . १९५६/१९५६१९५७/१९५७१९५७/१९५७/१९५७१९५७/१९५७१९५७/१९५७ ९ १ २२ OM ३९।२३] २३ २३ २३ | २३ / २३ २३ १ २३ / २३ इति श्रीज्योतिर्विद्धरश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकारमताजिकपन्थे तदात्मजश्रीनिवासविरचिता खोदाहरणभाषाव्याख्यायां दशासाधनाध्यायः सप्तमः ॥७॥ अथ मासादिः। गतमाससंमितराशियुक्तजन्मार्कतुल्या मासप्रवेशः ॥ १ ॥ अब मासादिसाधन लिखते हैं-गतमासकी संख्याके समान राशियुक्त किये 4 हुआ। (१९७) हर्षदीपकम् । हुए जन्मस्थय के सूर्य के समान ( बराबर ) सूर्य जिस दिन आवे उस दिन मास- भवेश होता है ।। गतदिनसस्मिताशा मालार्के युतास्तत्सहशेऽके दिनप्रवेशः ॥२॥ गतदिनकी संख्याके समान ( बराबर ) अंशमासके धर्य में युक्त करनेसे जो सूर्य हो उहके समान सूर्य जिस दिन आये उस दिन दिनप्रवेश होता है, अर्थात् जिस भालणे जितनी संख्याका दिन प्रवेश करना हो उसले गत दिनकी जो सधा हो उतने ही अंश उरह मारके सूर्यमें मिलाना, उसके समान सूर्य जिस दिन आरे उस दिन दिनप्रवेश होगा ॥२॥ उदाहरण जैसे-दूसरा मासप्रवेश करना इसके पिछाड़ी गत सास एक हुआ। इस लिये जन्मके १० । १६ । ५३ । ९ सूर्यकी राशिके अंक 1 एक किया । १६ । १३ । ३९ यह द्वितीयमाप्रवेशका सूर्य इस सूर्य के बराबर सूर्यके दिन दूसरा मासप्रवेश होगा इसी प्रकार जिवने गतमाल हों उतनी ही राशि जन्मार्क, मिलाते जाना और १२ ही मासके समृर्य लाना। दिनप्रवेश । दूसरे मासका ११ ग्यारहवां दिन प्रवेश करना है, ग्यारह दिनप्रवेशमें १० दश दिन गत हुए हैं, इसलिये १० दश अंश मासके ११ । १६ । ५३ । ३९ सूर्यमें मिलाये ११ । २६ । ५३ । ३९ यह दिन ११ के प्रवेशका सूर्य हुआ, इस सूके समान सूर्य आवेगा उस दिन ११ ग्यारहवां दिन प्रवेश होगा ॥ मासासिन्नत्तययोरंतरस्य कलाः कृत्वाकभुक्ति भक्तातदिना- दिपंक्तिवारादिसध्यो पत्यादधिकेऽर्के युक्तेऽन्यथा हीने मास- प्रवेशकालः ॥३॥ मासप्रवेश सूर्य और उसके समीपकी पंक्तिका ( अवधि) सूर्य इन दोनोंके अन्तरकी कली करना, सूर्यको गतिका ( पंक्तिके सूर्यकी गतिका ) भाग देना, जो लब्ध आवे दिन घटी पलात्मक तीन फल, उनको पंक्तिके वारादिक ५.-अंशको ६० साठगुणा करके कला मिलानेसे होता है। . 1. .

भाषाटीकासहितम् । (१५) (वार इष्ट घटी पल) में पंक्ति ( अवधि ) के सूर्यसे .मासप्रवेशका सूर्य अधिक हो वो युक्त करना और अवधिके सूर्यसे मासप्रवेशका सूर्य न्यून हो वो आये हुए दिनादि फलपंक्तिके वारादिकमेंसे हीन करनेपर सो मासप्रवेशका वारादिक समय होता है ॥३॥ उदाहरण द्वितीय मासप्रवेका सूर्य ११ । १६। ५३ । ३९ इसके समीपकी पंक्ति ( अवधि ) का सर्य ११ । १४ । ५९ । ३० इनका अन्तर किया १ । ५४। ९ हुए इसकी कला ११४ ।९ के अवधिके सूर्यको गति ५९ । २३ का भाग दिया-भाज्यमाजक कलादिक हैं, अतः इनको सवर्णित किये भाज्यपिंड ६८४९ भाजकपिंड ३५६३ हुआ। भाज्यमें भाजकका भाग दिया लब्ध १ दिन आया-शेप ३२८६ रचे इनको ६० गुणे किये १९७१६० हुए, इनमें ३५६३ का भाग दिया लब्ध ५५ घटी आयी शेष ११९५ को ६० साठगुणे किये ७१७०० हुए, इनमें फिर ३५६३ का भाग दिया लब्ध २० पल आये । ऐसे दिन, घटी, पलादिक फल १ ॥ ५५ ॥ २० लब्ध आये, इनको पंक्तिके सूर्यसे मासप्रवेशका सूर्य अधिक है इसलिये अवधिके वार इष्टघटी पल ४ । २२ । १ में युक्त किये तो ६ । १७ । २१ हुए, यह द्वितीय मासप्रवेशका इष्टसमय हुआ-अर्थाद पूर्णिमांत चैत्रकृष्ण ३० अमावस्या शुक्रवारके दिन इष्टघटी १७ पल २१ से मास द्वितीय प्रवेश होगा । ऐसे ही दिनप्रवेशका उदा- हरण समझना। एवं दिनप्रवेशकालः ॥ ४॥ मासप्रवेशकालकी जो रीति कही है उसी प्रकार दिनप्रवेशकाल लाना अर्थात् दिनप्रवेशका सूर्य और उसको समीपकी पंक्तिका सूर्य इन दोनोंके अन्तरकी कला करना पंक्तिके सूर्यको गतिका भाग देके दिनादिक फल ३ लाना उनको पंतिके वारादिकमें पति के सूर्यसे दिनप्रवेशका सूर्य अधिक हो वो मिलाना, न्यून हो तो हीन करना, तब दिनप्रवेशकाल होगा ॥ ४ ॥ उभयत्र स्पष्टाः खगा भावादयश्च कार्याः।।५॥

। 4 (१५२) हावादी एका मासप्रवेशसमय में और दिनदेशाला पक्षमा भाव, आदि शब्दले चलिव पंचवर्गीबल द्वादश पडेशा अप्तेशा आदिक हरना ॥ ५ ॥ पात्यैक्येन मालदिनानि मजेलब्धेन वपात्यांना वृता दिलाया मासदशाः॥६॥ पात्यांशके ऐक्यका मासके दिन ३० में भाग देना, जो लम् आवे शुर, वाले अपने अपने पात्यांश गुणे करे तो दिनादिक भासदशा होती हैं ॥६ मासप्रवेशक्ष सप्तयुतेऽहते एकादिशेपे आचमौरजीशा- सानामाया दशा ॥७॥ पासप्रवेशनक्षत्र ( जिस नक्षत्र में मासप्रश्श हो उनकी ) संख्या साद मिलाकर ९ नवका भाग देना, एकको आदि के जो शेन पन्ने शो कपसे आ (सूर्य), च ( चंद्र ), भौ (भौम ), रा ( राहु), जी ( गुरु ) श (शनि) धु, (बुध) के ( केतु ), शु (शुक्र) की आय ( प्रथम ) दा जानना ॥ ७ ॥ मुग्धार्कमागमिता दिनाया. मासदशा ॥ ८ -- मुग्धा दशाके १२ बारहवें भागके समान दिनादिक मासदशा जानता- अर्थात् मुग्धादशाके दिनमें १२ का भाग देनेसे जो दिनादिक आवे उन्हें मास- दशाके नादिक जानना चाहिये ॥८॥ - उदाहरण । जसे-सूर्यको मुग्धादशाके दिन १८ हैं, इसमें १२ का भाग देनेसे लब्ध दिन १ घटी ३० आयो, यह मासदाशामें सूर्य के दिन हुए । इसी प्रकार सर्वग्रहसे समझना चाहिये १मासप्रवेशमें षडेशा-जन्म लग्नपति , वर्षलग्नपति२,मासलग्नपति३, सुथापतिध, विराशिपति ५, समयपति ६। २ दिनप्रवेशमें सप्तेशा-जन्मपति १, वर्षपति २, मासलग्नपति ३, दिनलग्नपति ४, मुंथा- बति ५, त्रिराशिपति ६, समयपति। ३ मासमें भी प्रथम कही रीतिके.अनुसार हीनांश पात्यांश करके ऐक य करना चाहिये। M भापाटीकासहितम् । (१५३) दिनादिक मुग्धा मासपशा. *. १ उदाहरण। जैसे-द्वितीय मासप्रवेश उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्रमें हुआ है इसकी संख्या २ में ७ मिलाये तो ३३ हुए, ९,नवका भाग दिया शे ६ बचे, १ एकको आदि ठे क्रमसे आचम्भौराजी आदि दशा गिननेसे ६ छठी शनि दशामें मासमवेत हुआ। यह आय ( प्रथमदशा) हुई । इसके आगे क्रमसे ग्रहोंकी मासदशा आती है। मासदशा. ई. में ५ १ ४ २ ३० २५ १५ दिनप्रवेशस्पष्टलननक्षत्रेसप्तयुतेऽकहते एकादिशेषे प्रागुक्तानामाद्या दिनदशा ॥ ९॥ । दिनप्रवेशसमयके स्पष्टलग्न और नक्षत्रकी संख्या ७ सात मिलाना नपका भाग देना, एकको आदि ले शेष बचे वह प्रथम कहे हुए नाम र. १, २, मं. ३, रा. ४, गु. ५, श.६, बु. ७, के, ८, शु, ९ की आय दिनदशा होती है ॥९॥ मुग्धांगभागमिता घत्यादयः ॥ १० ॥ मुग्धा दशाके दिनके ६ छठे भागके समान ( बराबर ) घव्यादिक मुग्धा दिनदशा जानना-जैसे सूर्पकी दिन १८ की दशा है इसमें ६ का भाग दिया छन्ध ३ घटी आयी, यह सूपेकी दिनदशा हुई । ऐसे ही सर्व, ग्रहोंकी माननी चाहिये ।। १.॥ .

(१५४) दीपक सुग्धा दिनदशा पत्यादि। र . a. म. श. भ्र. म ३ ३ ९ ३ घ. . . . * : प्रश्नांगल्या में विना लिप्ताः कृत्वा खतिथ्यता लन्धो श्रादि- मध्येऽङ्गाना सुथार्थे स्पष्टं लग्नम् ॥ १३ ॥ प्रश्नलमकी राशि विना अशादिलकी कला करना स ( ) तिथि (१५) ऐसे १५० डेसौका भाग देना, लब्ध राश्यादिफल ( राशि-अश-का- विकला) चार आवे उसकी राशिके अंको प्रश्नलनकी राशि मक मिलान मुथाके वास्ते स्पष्ट लन्न होती है ॥ ११ ॥ प्रश्नांगात्तर्यशो जन्मेशो ज्ञेयः ॥ १२ ॥ प्रश्नलमसे चतुर्थराशिका स्वामो जन्मेश जानना-अर्थात् पंचाधिकारी, जन्मलग्नपतिके स्थान प्रश्नलग्नसे चतुर्थराशिका स्वामी जो हो वह लिखना३२॥ प्रश्नपत्रतो वर्षकरणे इयान्विशेषः ॥ १३ ॥ प्रश्नपत्रपर वर्ष बनानेमें इतना ही विशेष जानना ( और सर्व रीतिमें कुछ, न्यूनाधिक नहीं है ) ॥ १३ ॥ पाराशरकुलोत्पन्नो महादेव उदुंबरः । पाठकाख्याचणो रत्नललामपुटभेदने ॥१॥ रेखाशंकरसंभूतिः कृतवान्वर्षदीपकम् । व्यङ्कादीन्दुमिते शाके कन्यार्कप्रथमे दिने ॥२॥ इति मासायध्यायः॥ ८॥ इति महादेवकृतवर्षप्रदीपकं समाप्तम् । रतलाम शहरमें पाठक ऐसे उपनामसे प्रसिद्ध पराशर कुलमें उत्पन्न ( पारा- ...गोत्र ) उदुंबरज्ञातीय रेवाशंकरजीके पुत्र महादेव ज्योतिर्विदने 'शालिवाहन १७९३ सत्रहसौ तिरानवेके शकमें कन्यासंक्रांतिके प्रवेशके प्रथम दिनमें वर्षदी पक बनाया ॥१॥२॥ स ܕ ܕ दिवीयमासके वारादिक मिलानेसे तृतीयादिक मास होगा। हीन करनेसे द्वितीय मास प्रवेश वागेदिक होगा, एवं उसके आगेके सूर्यके राशि अशज का शके वारादिक मिलाये हुए कोष्ठकमें अग्रिम कोष्ठक अधिकहो तो गिलाना, न्यून हो तो कोष्ठकके साथ अन्तर करके सूर्यकी क्ला विकलाको गुणन करना, जो फल आवे वह वर्षप्रवेशके वारादिकमें अग्रिमसूर्यके राशि अंशके कोष्टमेके वारादिक मिलाना और ... मासप्रवेशपत्रम् । ११२१३५१६०१८ 02.12.५१६000२०२१२२,२३२४२५२६/२०३८ २/२/३/२/२१२/२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२ २०२२२३२४२५/२०२१२९ ०३५३६३०१२३४५६५५१५२,५३,५५५५ मे. . . १३४१५ . ५९/२/३१५/01/2018 १७१८ २१,२२३२॥ १५,५१,५८२/२०१२२२२२२२२२२१२११५,१५०९८४२८४५५५ मि. statutoriatatakestatutattelectethaharaa nets/seristianittinenewsmorntyasan 4th ३३३३३३६३६३५४५३.३५३३२२०९/२० ३ 101010101.५४४७.०३.२२८५२३५११५१.२३.२atiad ३ सि. 0242213११०५२ ४ •२.०५८vanikamlen४०५४४५४५.५.५७०६३ २८२७,२६२५५२४२३१३२२ ४ क. . तु ६ Hoye s६५५५१२८१५०/jupiternetv ३.३.२०२९ १८३५i vojp3 ५५३.८rpite 1939,31771...,३५४२ २१२१२ २३ २ २ २२२२२२२२२२२२१२ २२२२२१ २६.२०३०५२ २३/२० १८Marne 201.५५८४०५५०५ ३२५२१.१०.२०१५/0360६/५८५०/३१६३.00001019 -1-1-1-1-1-11 ६ --- . . । 1204033000 ध | १९ २०/२८/२४ voi-५९०० + २१.१ १२०.०५० २१ २०१४ ४४.११३८१०३०.३९/t.caci... .५३ ११८ ८ .ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ ܕ0|ܕܨܕܕܕܕܕܕ ܕܕܕܕ म. ३६३३,३१३१३२३०७६२२२४ २०७०/०९/१९ १९०९dio.२० ०.०.१३३१०५०२० २३ ३२७ २५ २५/२५ २६/- .२२१०६.१ . ०५.०३९ २ २६५०२५५० ५ ३०५९०५० 10101010101001 2012 2011 २८२९ 0300233-३३३३.४३५३९२६.११०३० ३१४०.ojpuri १० २२५८३.३00/६९/१०.१०१३३६/१९९२ ४.३३,२०५:५१० ११२५४ मो. 1210180112.३ २२.२ २.२ २२२२२२२ मी. ६५०५९""""MRAGNI ५६४-३१३६३२ ३३३ ३४३७९१४५४५५३५८' x 205 ...२ trjscril 18 (१५५) | Heajtalgibite ( 6 ) a स्थिरबलचक्राणि। P- मेप,० वषम. १ मिथुन. २ अंशाः र.वं. मं.बु. गु. शु. श. रा. र..मं. शु.गु. शु. श.रा. २. चं. मं. शु. म. शु.श. ८ |12 ६ শীত্ব । 12 - . २०१२||9|| १६||४||201८॥४॥ ७] १२० ८ १७/८॥9॥ ३२० १४।। 31१०11८ १२ ११॥ १५॥४॥११॥१०॥ ४॥ ७॥६.४० ८ ८॥ १७/८॥29॥ दा ८॥६॥ १४॥ १०1,2011/७॥ १०॥ ६४. ११/१०॥ १४॥५॥८॥९॥५॥८॥ ८1० ८11८॥६॥९॥ ८१६॥ ७॥ ११॥ ६.४० ८ ८॥६॥ १२॥१०॥११॥ ७॥ २२ १.०११॥१०॥ १४॥६॥ ९ १३॥ ५॥ ८॥ १००८ ८॥1॥ ६॥1 ८1/१४॥ ७॥ ३२॥ १०.० ८11, ६ १२॥१०॥ ॥ १२/०१२॥ ११॥ १५॥ ५॥ ९॥ ११॥ ४॥ ८॥१३॥२०८111०1७॥ १० ८1। १४ २२1०1७11 ७१ टा1/1080] ९ ११॥ १३।२०१२॥11 ११ १३/७१ १/११||४||८||१४१० ८ १०1६1/201८ १५/७/11/७॥१३॥२०॥८॥ १. ७॥ १२॥११॥८18 ८ १६१४०1921 १३ ७॥ ९॥ ९॥ ५॥८॥ १६.४०/ ९१/ २२॥ ७॥ ७॥10॥१४/६३०it १३१४ ७॥ ११॥ ११0८11८ ५.२०/०१२॥११ १२॥८॥3॥ ९।। ५-10 २०१० ८१२३ १२.413001, १७.९८ १२ १२॥ ८॥ २१०१।११॥ १४॥॥ ५॥ ९॥ ९॥४॥८॥ २२/०1८।१०। 2011१३॥ ८॥ २० ८ ९ १२ अ २५]०/१॥२१॥ १५॥५५ ९॥ २१४|||| २३1०1७1॥ ९ ८१२४१ १३ १२.२३२० ९॥ ९॥ १२ । २६१४०२०॥2011 १२॥५॥ ७ ॥२६॥४०॥८॥ ४ाद ९॥ १ 3000 २०1०1१०॥ ११ १२१,३॥ १॥10॥ ७॥२ २७ ५॥ 01/७॥२४॥२१॥ २२॥ २६॥४०॥ ८॥ ८ २०१० ९/१३॥ ९ ॥ ३0101010/७॥ ५1१1/31/31/2011 Raman ५ १ 42. 24 an २ S ८ • -- "बृहत्पंचवर्गी वलग्रहकी राशी अंशके समान कोठकमें जो हो वह लिखना पांचसे अल्प हीनवली होता है. M valuin कर्क सिंह. ४ कन्या. ..म.दु.गु. शु.शि.रा. इ.गु. शु.श.म. २.च.मं. बु. भापाटीकासहिवम् । - ॥२०111४॥50311१11111८ २१२०११॥७॥1॥ ५१/८1७1) ३२.६६ ७111७॥ 10/2011/11/1/७॥ ११॥1॥६॥८॥ ६. २२११९६८11१२॥1॥६॥९॥1) ८ ६४० sỉ & B | } & } } } } } <3 1 2 1 1 ६४० १11८ ६ ८॥ ८॥ १०॥ ९॥ १०० ८ १२॥६॥१०॥११/७॥९॥ ८ ६ ९॥ ९॥८॥ 10101६14६६ १५/८॥८॥ ८ १२॥६/१०॥१९॥११८ ८॥ २१॥१७॥७॥७॥ ११२०४॥५॥ ९॥ १३२०८ १२॥६१२११०,१८८१०॥ १३॥२०॥ १२॥ ७ 4100130६९1100१६१४०/४॥ १६४० 411 १२॥102010001 १६.४० १३७ १६॥ ६॥ ६॥ ११॥ १९॥ १७१९०/411१२॥६/१२/११/७/७ ९ १०] ११॥८॥६॥ ९॥ ११॥ ६११०७ २०१० २०101 २०1०1१1८1६1169200 ११।। ६॥ ८२११०१५॥६॥६॥ ९11९1१०11८111 ७॥१३/५॥ ७॥२३१२० ११11८14/11/११ ६॥ ८॥ ७॥२२०५॥ ६॥ ८॥ १०॥ ८ २६/०1८111४ २४/०११॥८॥ ९ ८1/७॥२६१४०६६ ८॥ ८ २६४.८) १४६८10 ६॥॥१०॥८॥ २६०१२॥९॥ १२ ४॥ १६॥ २८१० ५111८1१६॥७॥ 1011८1 १.101010 (११/६/८०/१॥६॥ ९॥ ८ ६०.१२/९१ ८११॥ ४॥ ३०० ४४८/१७011६ १३ २०१६॥ (१५७)

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६ पतीपद याद স্থলাকা। - -- - ० द 4 १११२/१३/१४/१५ १६ १७ १८ १९२०२१२२,२३,२४१२५ २६,२०२८.२९ 1519/9/199210/ २२/२.२/२/२/२/२ १३२०२६३३,४०४६५३/०६/३/२०२६१३१४०६,५३१० १३२०२६,३३,४०४६ ४०/२०००/२००४०:२० 10/2010/४०२००४०२००४०२००४०२० ०/८०२ ०४०२० . ९ . --- - . com २ . - - -- ८१३,२०२६११११ २०१to/४६/५३ ०६३/०२६३३/४०४६/३/०६/७३,२०२६३३/४०४६,५३ 0/20/20/0100/२००/४०,२००/४०२००४०/२००४०२०००/२००४०२०- बना २६३/०४६/५३/०६/०३/२०२६३३६०,४६५३०६१३,२०२६३३,४०४६,५१ ०४.२०.४.२० a४०/२००४०२०/०४०२००/४०२०/०४/२००/४०२००४०/२० .. a . २ D Coor १०१०/१०/१०/१०/१०/१०/१०/१०/१०/११/११/१११११११११११११११ १२ १२/१२१२,१२,१२ १२ १२ १३३३३ 08/३/२०२६३४०४६५३) ०१६/१३२०२६३३४०/४६५३/०६/१३/२०२६३३४.४६५//६/१३३ ४०/२००/४०/२००/४०२००४०२० १४०२०/०/२०२०४०२० ०४०.२०/०४०२० .... 989F/999/१३/१४/१४५०/१४/95/95/95/98/06५/१५१५/१५,१५/१५/१५/१५१५/१६ १६,१६०६/६१६ २०२६३४०४६/५३015/३२०२६३/६/५३/०६/१२/२०२६३३/४०४६५३. ६,१३/२०२६,३३,४ • ISROID MOR० ० /१०/२०/- [Top000/२०/ . /४०२०० ४०.२० ० ४.२०.०४.२०/०४.२० ६/२६/१६/१०/१७900/1909990/90/90/90/90/90/१०/१८१८,१८१८ १९१९१९ १९१११११९१९१९ vojan/५/०६/३२०Priso४६५३/०६/१३/२०२६३३४०४६/५/०६/१३,२०२६३३४०४६५ 015०२०/०४Rel ०२०५४०२०/०१.२००४०२०/०४० ४०२० ० ४०.२० - - वह नीचले अंतरति राशि अंगके कोष्टको उच्चबल स्पष्ट जानना. आसीद्वनपुरे पराशरकुलोत्पन्नो द्विजोदुम्बरः रख्यातः पाठकलामतो गुणनिधिः श्रीनन्दरामाभिधः । तत्सूनुर्गणितागमज्ञतिलक श्रीमोतिरामाह्वयो रेवाशंकर आगमेषु निपुणस्तस्मादभूद्धामिकः ॥ १ ॥ तदात्मज उदारधीगणकमौलिचूडामणि- रभूद्धरणिमण्डले गुणनिधिर्महादेव वित् । तदंगजतुपा विदं विवरण सतां प्रीतये सहस्यशुचिपक्षतौ कठजटोन्मितोऽगाच्छके ।। २ ।। इति श्रीज्योतिर्विद्धरणीमन्महादेवकृतवर्षप्रदीपकाख्यताजिकग्रंथे खदंगजनीनिवासविरचिता सोदाहरणभाषाव्याख्या समाप्ता । समाप्तश्चायं ग्रन्थः। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खमराज भाकृष्णदास, गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, भीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्--प्रेस. 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर स्टीम-प्रेस, कल्याण-नाई १

Patrimargpardipika

Author
Dutt, Newton.m.
Title
Patrimargpardipika
File name
Patrimargpardipika
Text
OCR done
Citation
1871
Published
2010/04
Publisher
Baroda
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Central Library,university Of Rajasthan
DLI number
327732
Barcode
99999990003312.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
pRVcNQEiATg
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