Government College, Kota
Samayamatrka
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THE
VIDYABHAWA SAASKRIT GRANTHAMALA
143
SAMAYAMĀTRKĀ
OF
VAHĀRAVI KȘEMENDRA
Edited with
The 'Prekisg' Han Corm.27 cty and votes
Ву
Dr. RAJĀŠLKR TRIPATHI V. A., Ph. D.
(Prcfestyce, laguztec Orestsi Philosc pev, adarna)
THE
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
VARANASI-1
1967
First Edition
1967
Price Rs. 4-00
Also can be hod of
THE CHOWKHAIBA SANSKRIT SERIES OFFICE
PubLeben & Assquinas Foot-Sellets
P. O. Chon Ihamba, Post Box &, Varanasi-1 (India)
Phone : 3145
38/85
परमश्रद्धेय विद्हरेग्य
डॉ. सिद्धेश्वर मट्टाचार्य
के
करकमलों में सादर
समर्पित
भूमिका सस्कृत का सम्पूर्ण काव्य साहित्य विषय और रचना-चैली के विकास को दृष्टि से तीन प्रेणियों अपवा युगो म विभक्त किया जा सकता है। प्रथम धेगी के काव्यों में 'रामायण' और महामारत आते हैं। ये दोना वैटिक और लौकिक सन्धिमाल के काव्य हैं। दूसरे युग का प्रतिनिधित्व अकेले कविकुलाव के कौस्तुमति महाकवि कालिदास को अमर रचनायें करती हैं। तीसरी श्रेणी म कालिदामोत्तर कवियों की रचनाओं को रखा जा सकता है। निश्चय ही वाग्मीकि और कालिदास के बीच में भी अनेका कानकारो ने सस्कृत-काव्योद्यान में अपनी रचना-वाओं का आरोप किया होगा, किन्तु बाज वे अनाउप्राय हैं। रामायण आदमी का एक पवित्र ग्रन्य है। उसमें समाज को नानाविय परिस्थितियों का एकसाय समावेदा है। महामारत तो भारतीय ज्ञानरलो का क्षीरसागर ही व्हा. महाकवि कानिास की अमर कृतियों याना स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है। सस्त बाम्याव में उनकी अमृत-कृतियों की उठती हुई तरसों के बाकपंप को देवार पद्यपि बहुत मे परवर्ती कवियों ने उनकी पदति का अनुकरण करने का पूरा प्रयन्न किया, किन्तु व उसको छाया को भी उस निपुणता मे स्मृट न कर सके । कालिदास को साहियिक प्रेक्षा एव योग्पना भावों को अभिव्यक्त करने में है। उन महाकवि का भावविधान बहुत ही सुसति, सपत, मौलिक, समापंक एवं स्थानोचित है ।उहोने वगए पर-रचना-विधान पर उतना दल नहीं दिया है। भाव के सरम-मागर में पाठक-कमलो को विकसित करने वालेर-दिनमी के पास मला क्षति पापक रचनाविधान लिये समय हो कहाँ से पा . अपवा गरीर के बाापा का टनके यहाँ कोई मूल्य न था, उस पर उनकी कोई मास्या न पी- .. में लिमो पी। गुरु एव शिज्य के बीच काल का अन्तर प्रायः २५ वर्ष होना चाहिये। इस प्रकार यह निश्चित होता है कि 'क्षेमेन्द्र' उनके समय में प्रायः २५ वर्ष बाद-~९९० ई० के सन्निहित काल में हुए होंगे। उनकी मृत्यु सभवत' १०६५ ई. के अनन्तर हुई थी। मरने जीवन के उत्तरकालान्त में वे सन्यासी होकर त्रिपुरेश' पर्वत पर मृत्युपर्यन्त रहे और वहीं उन्होंने १०६५ ई० म 'दशावतारचरित' लिखा या । यह 'कलश' का शासनकाल था। 'कविकष्ठा- भरण', 'औचियविचारचर्चा', 'मुवृत्ततिलक' और 'समयमातृका' को परिसमाप्ति पर उन्होंने 'अनन्त को प्रशस्ति की है और अपने प्रबन्ध को पूर्णता उनके राज्योदय काल में बतायी है । इन्हीं पिता पुत्र 'अनन' (१०२८-१०६३ ई.) तया 'कला' (१०६३-२०८९ ई.) के राज्यकाल में 'क्षेमेन्द्र' को जीवन लीला व्यतीत हुई । यन' उनका काल एकादश शताबनी का पूर्वाद और कुछ उत्तरार्द्ध मानना न्यायसगत होगा। २: 'भेमेन्द्र' की वंश परम्परा :- 'क्षेमेन्द्र' 'मिन्नु' के पौत्र तया "कान्द्र' के पुत्र थे। ये लोग तत्कालीन राजा के अमात्य पर पर प्रतिष्ठित पे। 'भारतपरी' में क्षेमेन्द्र ने अपने पिता की लम्बो प्रशनि लिखी है, जिसमे उनको विशाल सम्पत्ति तपा उदारागयता से मण्डित दानशीलता का परिचय प्राप्त होता है। क्षेमेन्द्र' सम्पन्न परिवार के मुमो कदि ये । इनका पुन 'मामन्द्र' योग्य पिता का योग्य पुत्र था। ३:शेमेन्द्र का प्रारम्भिक जीवन :- 'शेनेन्द्र' ने अरन प्रारम्भिक जीवन को सार्थकत मे व्यतीत करते हुए भावी पदि जीवन को मुकुट बागारगिला के रूप म उमे निर्मित किया । 'कवि- पण्ठाभरण' उनके द्वारा करिवति आशाम्प से स्वाभाविक बनायो गयी है और आशिप से अनिन । अजिंठ कवित्वानि सरस्वती की उपामना- मात्र-अन्यान के माथ ही मान के मतदान प्रयास से मुक्ति की जाती है। 'शेनेद' को पवित्यति स्वाभाविक को अपेक्षा अजित अधिक है। इसका निर्देश स्वर उन्होंने भी किया है :- (१०) कृत्वा निश्चलदेवपीरुपमयोपायं प्रसूत्यै गिराम् । क्षेमेन्द्रेण यदर्जितं गुमफ्लं ते नास्तु काव्याधिनाम् ।। --कदि०४३ उनके जीवन का अधिकार सभ्य व्यक्तियो के हो मध्य दोता था। उन्होंने नीरस ताकिक और वैयाकरण का अधिक सहवास नहीं किया था। इन लोगों को उन्होने कविता के विकास का विन कहा है।' 'कालिदास के साहिन्यामृत का उन्होंने भूरि-भूरि पान किया था। कोर, गोत, गाथा तथा देशी भाषाओ के काव्यो का उन्होने भली-भाति अध्ययन किया था। उनकी मित्रमण्डली उग्ग्सल चरित्र वीथी और स्वय वे भी बोलने तथा परिधान में भव्य थे। उनका भवशिष्ट समय सामयिक नाटक, अभिनय देखने एव संगीत-पदा मे भ्यतीत होता था । यच्छे कवियों और लेखकों के अपने यहाँ जाने पर अपवा कही भी मिल जाने पर वे उनका आदर-सम्मान तथा यायिक सहायता करते थे।" लोकाचार का उन्ढ अच्छा ज्ञान था। एकान्त में कथाओ और कहानियो को सुनने के ये अभ्यासी थे । चित्रकला की आलोचना के लिये भी उनके पास सूक्ष्म- दृष्टि थी। ददा-देशान्तर में भ्रमण कर वहाँ की प्रथामो, विशिष्टताओ एव मानव- भावनाओ का अध्ययन उनकी अपनी विशिष्टता थी। भारत का विज्ञान मानचित्र उनको दृष्टि में रहता था। 'समयमातृका' में वेश्या 'कट्टालो' के जीवन-वर्णन के समय अपने इस वैशिष्टय का पर्याप्त प्रमाण उन्होंने प्रदशित किया है । १. न ताकि केवलसादिक वा कुर्याद गुरु सूक्तिविकासविघ्नम् ।। -कवि० ११५ यस्तु प्रकृत्यश्मसमान एवं क्प्टेन दा व्याकरणेन नष्ट । तप दग्धोनल मिना याऽप्यविदार्ग. सुविप्रबन्धः ॥-वही ११२२ रखेद पुनस्तारिवगन्धमुप्रन् । -वही ११ २. परेन समस्तान दिल वालिदासातवन्धानितिहासदी। -वही ११९ ३. गौतेषु गापास्वप देशमापाकाव्येषु दद्यान् सरसे कपम् । -वही १।१७ ४. नाटसरामिनयप्रेशा गारालिङ्गिवा मति । क्वीनां सम्भवे दानं गीतेनात्माधिदासनम् । --वहो २।५ ४ : क्षेमेन्द्र का धर्म:- दोवदर्शन एवं धर्म को केन्द्रस्यली काश्मीर को पावन भूमि में रहने के कारण क्षेमेन्द्र के पिता व धर्म के कट्टर अनुयायी थे। भगवान् शङ्कर की पूजा में वे केवलानन्द की अनुभूति करते थे। हाथो से भगवान् शङ्कर के लिङ्ग अपवा प्रतिमा का गाढानिनन करते हुए उन्होंने अपने प्राणो का परित्याग रिया पा- पूजयित्वा स्वयं शत्र प्रसरद्वाष्पनिमरः । गाढ दोभ्यां ममालिङ्गय यस्तत्रैव व्यपद्यत | मारतमारी शेद पिता के सरक्षण म रहने के कारण क्षेमेन्द्र' अपने जन्म से शैव थे पिता के संरक्षण से सेमेन्द्र मे दमत का जो बीज अकुरित हुआ था, निश्चय ही वह सेव आचार्य 'अभिनव' गुप्त को शिक्षा एवं सहवसति से द्विपत्रित एवं पहवित हुआ होगा। किन्तु कालान्तर मे वे परम भागवत आचार्य "सोमपाद" के प्रभाव में आकर वैष्णव धर्म को ओर आकृष्ट हुए और सभवत वैष्णव धर्म को ही अङ्गीतार कर लिये- श्रीमद्भागवताचार्यसोमपादाजरेगुभिः । धन्यतां यः परां प्राप्तो नारायणपरायणः॥-भारतमञ्जरी "वृहकपामस्नरी" में भी उन्होंने ऐसा ही भाव व्यक्त किया है (वृहत्क- पामज्जरी १९३७)। क्षेमेन्द्र परम भागवत आचार्य "सोमपाद" को आचार्य "अभिनवगुप्त" की अपेक्षा अधिर आदर सम्मान प्रदान करते थे। भागवत धर्म को स्वीकार करने के अनन्तर वै नाजीवन इसी के अनुपापी बने रहे। परिणामस्वम्प उन्होंने माने उपस्त जीवनकाल में "दशावतारचरित" को रचना की। भागवत धर्म की स्वीकृति करने पर भी क्षेमेन्द्र उसके महर अपवा बन्ध अनुयायी न थे। वे अन्य मनोका भी अध्ययन तथा समादर करते थे। उनकी दृष्टि में सभी देवों को समान स्थान प्राप्त पा-"साम्य सर्वसुरस्तुतो"। (कवि० (१२) २.१९) । समन्वय की उनकी प्रवृत्ति विलक्षण पी। वे उदार साधय के एक सहृदय पवि थे। अपने इन्हीं सद्गुणो के कारण प्रौढावस्या में बौद्ध-मत का भी उन्होंने अनुशीलन किया था। इन सबका उनको लेखनी पर भी व्यापक प्रभाव पडा । उनको "बोधिसत्त्वावदानाल्पलता" में भगवान बुद्ध के प्राचीन नामो से सम्बद्ध पारमितासूचक धास्यानो का पद्यदद्ध वर्णन है । 'हीनयान' में जो स्थान जातको का है, यही 'महायान' में अवदानों का है । अवशन के माने है. বরি। अपनी रचना के हेड दो वर्षों के भीवर हो इछका विम्बती भाषा में गौरवपूर्ण अनुवाद हुना। एक वनय कवि को कृति होने पर भी चौद्ध समाज में इतना आदर पाना 'क्षेमेन्द्र' को प्रौढशष्यशैली एघ उक्त गुणो का पर्याप्त योतक है। ५:क्षेमेन्द्र की शिक्षा :- जैसा ऊपर निर्देश दिया गया है, "अभिनवगुप्त" इनके साहित्यिक गुरु ये । “अभिनवगुप्त" एवं 'सोमपाद' से इन्होंने आध्यात्मिक विद्या का परिशीलन किया था। यद्यपि क्षेमेन्द्र' अपने गुरु के रूप मे इन्हीं दो आवारों का निर्देश करते है, तथापि इनके अतिरिक्त और भी उनके गुरु रहे होंगे, जिनमें उन्होंने अन्य मतों एवं दर्शनों का अध्ययन किया होगा। वे प्रत्येक व्यक्ति को सविध विना प्राप्ति के लिये सब के शिष्यत्व-स्वीकृति को सम्मति देते हैं :- "युत्पत्य सर्वशिष्यता ॥" (कवि० २०१४ ) 1 कवि "गङ्गक" को उन्होंने अपने उपाध्याय के रूप में स्मरण दिया है। ६:मेन्द्र झा साहित्यिक जीवन :- अपने साहित्यि जीवन के प्रमात में क्षेमेन्द्र एव अनुवादक मात्र प्रतीत होते हैं। कविलयक्ति तो उन्हें शत-शत अन्याम के बनन्तर हो प्राप्त हुई पी। अधिक यथार्थ योर विञ्चिपटु दात तो यह है कि क्षेमेन्द्र कदि बने थे। उनम नसगिक भावोत्पन्न कवित्व शक्ति एवं नवनयोन्मेषशालिनी प्रतिमा का पहले पहल अभाव था। दिनु 'क्षेन्द्र' को बलवती इच्छा यो एक सार्वभौम (१३ ) कवि बनने को। परिणामस्वरूप उन्होंने पैशाची भाषा में लिखित " "गुणाध्य" को "दृइन्कया" का "बृहन्कयामनरी" के नाम में संस्कृत में पद्यानुवाद किया। बना वे कहते है-इव पन्य के ये प्रयम अनुवादकर्ता थे। इस अनुवाद के जनन्तर अवश्य ही उनकी लेखनी दो कविता-क्षेत्र म विचरण करने के लिये गति प्राप्त हुई होगी। बाद में उन्होंने "रामायरामभरो" "गरतमञ्जरी" एवं "वात्स्यायनसून" निदा । उनके इन अन्यों में दाल्मीकीय रामायण, महाभारत तथा कामसूत्र का मोर प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही दे अन्य विषयो का मी हानानन करते रहें। उनके मन्यों में प्रकट है कि मजित, ज्योतिष, औषविद्यान, गन्य- चिरित्ना, राजनीति, मानगाख, भैव, वैजव तथा पौद्धर्शन एवं धर्म तया मन्नान भी उन्हें मनी भानि परिमात थे। "भारतमजरी" के लिखने के अनन्नर ही संभवतः दे 'दासदास' के विरुद से विभूषित हुए होंगे। ७:क्षेमेन्द्र का शन्दमण्डार :- क्षेमेन्ट का शम्ममाडार विशाल है। उनको शन्दमकलनशक्ति को देखने से परिक्षात होता है कि अपने समय तक के उसलाब समस्त कोस ग्रन्यों का उन्होंने सम्पन गादानुगोलन किया था। अप्रसिद्ध में भी अप्रसिद्ध शब्द उनकी दृष्टि में प्रमा करते रहते थे और अवसर मिलते ही प्यास्यान निविष्ट कर दिये जाने से। मिनी भी र अपना नाव को मरने सदमण्डार की सहायता से वे नही ही मुगपदा से चित्रित कर समते थे। वस्तुतः दे दान्दकवि थे। उनकी रननावरी के अधिकार मान दुर्बोध्य हैं और संस्कृववादमय में उनका हाचिक प्रयोग हो उसका होता है। शन्काठिन्य के दुरधिगन्य विन्ध्यारम में बहुगः परम्प, मनोहारिनी टमा-पसम्पनी क्षेत्र के साहिर को अनुपम ढंग से मुरनित कर भारतिस्ताका आम बावरण प्रदान करती । तत्कालीन समाज में अपरित विभिन्न श्यिा-नालों अप व दैनन्दिन बोवन के दृश्यों से ये उपमाएं साहीत की गई है। सपना के राज्य में 'क्षेनेन्ट' को उचतर बासन दिया जा मरता है।
८:क्षेमेन्द्र के समय का वातावरण :- क्षेमेन्द्र के समय काश्मीर का वातावरण पविता जैसी कोमल कला के अनुशीलन के सर्वया अनुपयुक्त था। काश्मीर के इतिहास में वह युग यसन्तोष, पड्यन्त्र, नैराश्य तथा रक्तपात का काल था । वतालीन राजा 'अनन्त' जिसका निर्देश 'समयमातृका' को परिसमाति पर भी किया गया है, स्वय मानसिक दुर्वलता तथा बौद्धिक शिथिलता का पात्र या। तभी तो उसने १०६३ ई० म अपने ज्येष्ठ पुत्र 'कला' को राज्य दर भी थोडे हो वर्षों के अनन्तर पुन उमे ग्रहण कर लिया। इसके बाद वह १०७७ ई० में राज्य कार्य से अवश्य हो विरत हुमा और ही बों के बनन्तर १०८१ ई० में आत्महत्या कर ली। उसकी विदुषी महारानी सूर्यवती" भी अपने पति को चिता पर सनी हो गयी। कवि क्षेमन्द अपने युग के अशान्त वातावरण से इतने असन्तुष्ट तथा मर्माहत थे कि उसे सुधारन म तथा पवित्र और विशुद्ध बनाने के लिये एव दुष्टता के स्थान पर शिष्टता की भावना को दृढ करने के निमित्त अपनी द्रुतगामिनी लेपनी को कार के नाना अङ्गो की रचना म लगाया। उन्होंने मुख-दुख का विवेचन पर जीवन के साथ उसके सम्बन्धो को बडी हो समुचित रोनि से घटिन किया। औपन पी अभ्युन्नति को दृष्टि में रस र मुमा एव कुमार्ग की बुराई-भलाई का परीक्षण किया। सीपी चोट करन वाली व्यङ्गयात्मक शेरी में दैन्य, काष्य, शोषण, असमानता यादि सामाजिक प्रवृत्तियों पर समप प्रहार किया। उनके मोति विषयक उपदेशात्मर अथवा व्यङ्गयात्मक कार्यों का एकमात्र उद्देश्य या लोगो को कुमार्ग में हटावर मुमागं पर लाना । वस समान के इसी उपकार के लिये उनकी जीवनी सर्वदा सघर्षरत रही- हासेन लग्नितोऽत्यन्त न टोपेषु प्रपर्वते । जनस्तदुपकाराय ममाय स्वयमुद्यमः॥ -देयोपदेश, ११४ उनको कृतियो मे भाग्य को अवश्यम्माविता को स्वति होने पर भी पुरणार्य को सर्वोपरि स्थान दिया गया है । इस प्रकार के इनके प्रन्यों में बत मनोविज्ञान वो देखार यादवयं होता है।
. ( १५ ) ९:क्षेमेन्द्र की कृतियाँ क्षेमेन्द्र' की कृतियों को काल क्रमानुसार इस प्रकार से रखा जाता है (क ) वृहत्कथामजरी, भारतमन्जरी, रामायणमन्जरी, (ख) पवनपञ्चाशिका और मुवृततिलक (ग) विनयवल्ली, लावण्यवती, मुनिमतमीमासा, नीतिलता, अवदानक्ल्पलता, अवसरसार, ललितरत्नमाला, मुक्तापलिकाम्यम्, वाल्स्यायन- सूत्रसार और औचित्य विचारचर्चा, (५) पचकादम्बरी, सचिवशकान्यम्, देशोपदा, नमंमाला, चित्रभारत, कनकजानकी, अमृततरग, चतुर्वगंसग्रह और कविकन्छामरण, (ड) दर्पटलन, कलाविलास, समयमातृका, मेव्यसवकोपदेश () दशावतारचरित और चारुचर्या । कुछ लोग 'लोकप्रकारा' को भी उन्हों को कृति बतलाते हैं। किन्तु पह मुगलकालीन कियो अन्य व्यक्ति के द्वारा लिखित प्रतीत होती है। इसमे अनेक परसियन पद यौर मुसठमानी नाम जैसे-सलाम दन्दगी, रवाना, मोर आदि सद्धिसित हैं । इनके अतिरिक्त विकणिका, क्षेमेन्द्र प्रकाश, दानप रिजात, नीति- कल्पतरु, राजावली, लोकप्रकाश, व्यासाठक आदि ग्रन्थ मी उनके द्वारा विरचित बतलाये गये हैं । 'कविकणिका' का उल्लेख स्वय उन्होंने ही 'औचित्यविचारचर्चा' मे किया है-(कृत्यापि पाण्यालकारा क्षेमेन्द्र कविकणिकाम् । १।२)। (क) वृहस्थामञ्जरी :- 'बृहत्तधामन्जरी' 'गुणादय' को बृहत्वपा का सार है। इममे १८ लम्बक और ७५०० पर हैं। कवित्व की दृष्टि मे यह सस्सरण बड़ा पाण्डित्य- पूर्ण है । किन्तु इसको भाषा मे दुर्बोधता और वर्णनो में जटिलता है। इसकी क्या कहीं-कहीं बहुत ही सक्षिप्त कर दी गयी हैं । इन न्यूनताओ के रहते हुए भी वहाँ-जहाँ मारो सौन्दर्य और राजकुमारों के सौर्य-दलप्रदर्शन के प्रसग आये हैं वहाँ-वहाँ 'शेमेन्द्र' ने बड़े हो ममंग्राही एव सरस वर्णन दिये हैं। (प) औचित्यविचारचर्चा:- 'औचित्यविचारच' में क्षेमेन्द्र लिखते हैं कि 'यौचित्य' ही रस का जीवन- भूत है-प्राण है-यह कापास्वादन में पमताराधायक है :- औचित्यस्य चमत्कारकारिपश्चारुचणे । रमजीवितभूतस्त्र विचारं कुरुतेऽधुना !! -लौचि० ३ जो जिसके सहा हो, जिसमे मेल मिले तने उचित रहते हैं और उचित का हो भात्र 'औचित्य' है उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं फिल यस्य यन् । उचितस्य च यो मारस्वदौचित्यं प्रचक्षते ।। -वही० ७ यद्यपि 'औचिय' की सतिशापिनी महत्ता का प्रनिपादन क्षेमेन्द्र ने ही दिया है। इन्होन हो "प्रौचित्यविचारचचा' लिसकर श्रीचित्यम्प कायनत्व का व्यारकर सष्ट दिया है। औचित्य को रसमिद काव्य का जीवित कहा है -"औचित्यं रससिद्धस्य स्थिर काव्यस्य जीवितम् ।" (ोचि. ५) तपारि औचित्य के सदया नदीन उद्भादक के म क्षेन्द्र को नहीं माना जा सकता। औचिय की चर्चा नात्याचार्य 'मरत' एवं 'कानन्दवर्धन' यादि आचार्यों ने मी की है और 'अनौचित्य' को रसभङ्गका वारण माना है।' निश्चय हो टोमेन्द्र ने पूर्वाचार्यों के नौचित्यविषयक अभिमाय को देखा होगा । इतना होने पर भी ये अपने को "चित्य" के नवीन उद्भावर के रूप म ही इङ्गित करते हैं. सेमेन्द्र इत्यायकाव्यकीविश्चके नौचित्यविचारचर्चाम् ।।-औचिन ठीक है बीविय को काव्यतरप के च मे सर्वोच्च स्थान देने मे क्षेमेन्द्र व्यवश्य ही नवीन हैं। (ग) कविरुण्ठाभरण:- 'पविण्ठाभरप' में उन्होंने पावित्वप्रान्ति, शिक्षा, चमति गुपदोपदोष, परिचय प्राप्ति रा वर्णन किया है। इसमें पांच मुदिया है। एक-एक सन्धि ने १ यदेशनो हि वेषस्तु न शोभा जनपिचति । मेसन्गेमि बन्धे पहारमात्रैवोपजायते ॥ -नाट्यशाल २३१६९ बनौविचाहने नान्यद्रमभङ्गम्य सरणम् । यौचित्योपनिवन्धस्तु रसस्योर्शनपद परा ॥ आन० ॥
( १७ ) एक एक विषय का दिशा दिया गया है। इस एक अन्य में ही क्षेमेन्द्र के उनसरी कृतियों के विषय में एकसाय पर्यात सामग्री उपलब्ध .- (य) सुवृचनिलक दन अन्य म धन्दविषयक विश्लेषा दिया गया है। इन म तीन विन्दास ( अध्याय) हैं। इस एक पुनक के अभ्यास से ही कोई मौ व्यक्ति छन्दशास्त्र पा मर्मज्ञ हो सस्ता है। (ड) समयमातृका:- क्षेमेन्ट ने 'समयमातृका' की रचना १०५० ई० में की थी। इसने यह सिद्ध हा जाता है कि उन्होंने इस प्रवन्ध का निम। उस समय किया था जब कि उन कविन्दराति एवं अनुभव पूपरिपक हा चुका था। इस प्रन्य के बाद उन्होंने वर 'म यसेवकापदेश' 'दशावतारचरित' और 'चाक्चर्या' की रचना कर अपनी जीवन लीला समाप्त की थी। इस प्रकार यह प्रबन्ध कदि की ममय डि को एक्साप समट हुए पाठक के समक्ष अपनी चाटता का प्रदर्शित करता है। 'समदमातृरा' आ3 ममयों में विभक्त । सौ नोम इलोकों का एक प्रबन्ध- मान्य है। क्षेमेन्द्र ने इसके निर्माः का एकमात्र उद्देश्य वधाओं, दुट्टिनियों तथा विटा ने अमानों-निक की समति रक्षा ही बनाया है -श्रीमना मूतिर- दगद रचितोऽय ग्मिनोमयः" । बैमा पर निर्देश दिया गया है. क्षेमेन्द्र की बनी का एकमात्र उदेश्य सदर व्यक्तियो का मनोरन्जन हो न होकर समाज मप्र अन्वृत्तियों, अनाचारों, परिवारो तपा वञ्चना का उन्मूलन कर १ सरे पञ्चविगदिवासरे। ममता विणा रविकोलम्भिोनवः । समयमा ।। यहाँ पर स्थानीय मुबसर का निर्देश दिया गया है, जिगक अनुसार ११० सिस्ताद समपमातृका का काम है।
स्वस्थ वातावरण का निर्माण भी पा। उन्होंने प्राम के पटवारी से लेकर जज में यों तक की एकसमान वालोचना की है- वकोपारब्धसघट्टः फूटरचादिभिः । सादिशाभीष्टसपतिमाह जयपट्टरम् ।। २।४२ ।। फचावस्तु :- 'नवयौवना मन्दोन्मत्त देदया 'कलावती' और वृद्धा बुट्टिनी 'बहाली' के द्वारा फेंके गये जाल म-पड्यन्त्र मे-तत्तालीन वास्मीर-भूमि के प्रनिड धनी व्यवसाली "राद्ध" रा स्वल्पवयस्क दाम "पद्ध" मार पंच दाता है पहले तो ये दोनो उसबा बहुत जादर-सम्मान करती हैं। रितु कुछ समय के अनन्नर, उत्तराधिकार म प्राप्तव्य उसको सम्पूर्ण पैतृक सम्पत्ति को बधिकरणपत्र (दानावर) पर 'पसाबळी' नाम से निखका कर एवं उसके निठाम भी एक लाख मुद्राएं ठग कर, उनको फटा कम्बल का टुरडा पहना कर अपने पर से निकाल देती है।' इसरे अतिरिक्त पा की पृष्ठभूमि के रूप मे 'काली' का सम्पूर्ण परित, प्रदोषदलादन, राानेद-वर्णन आदि भी बड़ी ही विदग्यता के साप वक्ति हैं, जो स्थावस्तु को अग्रसर करने में पूर्ण सहायक बनते हैं । 'समयमानुका' की भाषा अधिकार स्थलो पर क्लिष्ट एवं दुर्योध है। इसके निर्मात में क्षेमेन्द्र' में वर्तमान पवित्वयक्ति को अपेक्षा उनका महानु कोश-तान अधिक सहाया हुआ है। वहुधा वे अप्रसिद्ध शब्दों का भी व्यवहार करते हैं, यथा:-तूस्ती, घरट्टमाला, दिदिर, अपरनिका, भाटी आदि । ग्हां एक ओर रिट. याचलित इन्दो में व्यवहार से 'समयमातृका' प्रबन्ध दुर्दोध हो गया हो, वहीं यदि क्षेमेन्द्र ने दोनों को विपर्यस्त एद विरक्षा रचनादली से उसकी दुर्योधना का जटिलता में सयोग करा दिया है। उगहरण के लिये यहाँ एष दो दलोर पर्याप्त होंगे :- (क) निम्नसितुं हृदयसंचितवीरे संदर्शिवप्रकटयूटधनोपचारे ।
(१६) लोभात्तयानपचयः पुनरावृतेव प्राप्तः किमु प्रसभमर्यवशादनर्थः ॥ १।२० ॥ (स) कैर्नित्यसंभवनिजं वणि त्यजन्त्या यान्त्या तृणज्वलनदीप्तिनियोगलक्ष्मीम् । नप्टे सुवनविभवे विरते पुराणे जातस्तव स्तपकितोभयलाभभगः ॥ १।२१ ।। अतिशय पाण्डित्य से मण्डित 'सययमातृका' को मापा से प्रारम्ध काव्य का निर्वाह भले ही हो गया हो किन्नु मापा में न तो प्रवाह है और नहीं प्रसाद ही। जिस उद्देश्य को दृष्टि में रख कर यह प्रवन्ध लिखा गया उसको भी भली-मांति पूर्ति नहीं हो पाती। इसके लिये तो 'देशोपदेश' और 'नर्ममाला' को सरल दानावली अपेक्षित पी। - इतना होने पर भी 'समयमातृका' न केवल क्षेमेन्द्र के ही अपितु समस्त उपदेशारमक हास्य-व्यङ्गय काव्यो मे अनुपम है । अटवी मे सरपु मघुर निर्झर की भौति कोमलकान्तपदावली से यह यत्र-नर-रात्र पाठको का पूर्ण मनोरंजन करती है । 'कलायती' के प्रसाधन को पवि एक ही श्लोक में कितनी मधुरता के साथ अभिव्यक्त करता है :- कपोले कस्तूरी स्फुटपुटिलपत्राङ्कुलिपि- ललाटे कापूर तिलकमलकालीपरिसरे । सनी लीना हेमद्युतिपरिचिता इकुमानिः स तस्याः कोप्यासील्ललितमधुरो मण्डनविधिः ॥१०॥ प्लोरिक उरमाओ एवं सूक्तियों के बहुधा प्रयोग तथा हास्य-व्यंग्यपूर्ण उत्तियो मे भरपूर होने के कारण यह प्रत्य पाठको को दहो यानन्द प्रदान करता है, जो घायण के महीने में अरण्य पर्यटको को । रसपेराल वर्गन पा रमिक कवि हृदय- पाहो यबसरो को हाप में जाने नहीं देता, प्रत्युत यह उमे अपने कामकौशल से एक मिल्टन मुन्दर वस्तु बना देता है।
(२०) औचित्य शृङ्गारप्रधान इस प्रदन्ध के माध्यम मे क्षेमेन्द्र ने तत्कालीन समाज म प्रमृत वश्यानो के नीषा शोषण दुर्दमनीय धूरंता, प्रदर वञ्चरना ना नग्न- नित्र प्रस्तुत कर जनता का अप्रतिम उपकार दिया था। उनको देश्यानाकी एक एक गतिविधि का सूक्ष्म ज्ञान या । उनका प्रधान उद्देश्य या देश्यायो की कटवागुरा से सामान्य अनुभवविहीन लोगे को सचेत करना। इनमें मन्दह नहीं शिक्षेमेद्र को पर्याप्त सरलता भी मिली है। किंतु वैसा करने में कहीं-नहीं उन्हें ऐसी बातों का भी वर्णन करना पड़ा है गो व्यवहार के विचिद् विपरीन प्रतीत होती हैं। पूर्वप्रौटा कामिनी 'कलावतो' के साप अत्यन्त मुग्ध, कान में वाली, पठाभरण के मध्य रक्षा-मूत्र, चूरिका म माता के हाय का सपंप, पैर मे कटक ( कहा) धारण करने वाले शिशुपी रनिकोडा का वर्णन क्पमपि यौचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता। जो बालक शय्या पर म्वय घदन असमर्थ होने के कारण पेटी के द्वारा चढाया जाता है', जो 'वाल्क रोता है" एसा विचार कर स्वय कलावती के द्वारा ओष्ठ एवं गाल पर काटा नहीं जाता' वही 'कलावती' के क्षरविम्ब को दिन रस के कारण सण्टिन करेगा किस यानन्द क कारण उसकी दनुवहरी को नस मे सत विक्षत कर देगा? दिम सामथ्र्य धौर पटुना के कारण राति भर अनवरत पुटम्पपी को भाति सम्भोग कर मतदाली कलावती को सेदवगत करेगा। ये दात व्यवहार तथा दनुभव के सर्वपा विपरीत हैं। 'प्रोचिपविचारचर्चा' में 'रसीचित्य' एक अदम्पोचिच' के प्रतिपादक कवि ना उक्त वर्णन किस भांति यौचित्य की पदवी पर आम्द हो सन्दा है ? यदि वस्याओ को समार-विध्दसर प्रवृत्ति तथा पियाओं को प्रदर्शित परना अभीष्ट या तो यह दूसरे प्रकार से भी हो सकता था। उक्त प्रमग को पढते समय मन में एक विषय रोजर भाव उत्पन्न होता है। इस एक प्रमङ्ग १ आरोपित स चेट्या स्वामत्युप्रठा गने: शि!ey) २ रोदिति पिरिति दयया यस्य न दयनक्षत मया दत्तन् । ८।। ३ सेदक्लान्तापक्रोदपनाती समारोहै 1 1 ।
(०१) को मोड़कर शेष पांन आकर्षक एवं मनोहारी हैं। अतिकृपा धनाढ्य शत्र' को कृपणता को व्यक्त करने के लिय उसके देश एव व्यवहार का वर्णन पूर्ण उचित एद अभिप्रायाभिन्यपक है। किसी कृपप्प का इतना सटीक और वरान विरल ही मिलता है। - क्षेमेन्द्र हास्य-क्या क तो अधी'वर हैं । आलोचक इनके वणन और चरित्र चित्रप पर मुग्ध हो जाता है। हास्यकया के लेखा के रूप म ये अप्रतिम हैं। शैनन्द्र की सिद्ध लेखनी पाठको पर चोट करना जानती है । हास्य का आघात बहा सपा हुभा होता है परन इतनी सुदरता मे होता है कि समाज का नग्न चित्र हमारे सामने खुल कर सदा हो आता है। यह हास्य विध्यसा न होकर समाज के पुननिर्मा को भावना मे अनप्रापित होता है। इनका प्रधान गुण व्यग एव आलोचना करन म है। इनका 'दपंदलन सस्कृत के हास्य-साहित्य को एक विशिष्ट रचना है। 'समयमातृका में भी क्षेमेन्द्र न बीच-बीच म हास्य का पुट भर पिया है। दुर व्यक्तिया और धैया को हेसो उन्होंने बडो ही उपयुक्त भाया म ली है। समाज म फैले नीम-हकीम एव आतुर व्यक्तियो से भी मोल-चाल करके धन रेने वाले वैद्य उनकी सेवनी की तीता से बचे न ये, देखिये सा मखे क्रमप्रेघा मातुर्माता स्थिरस्थिति । व्याली गृहनिधानस्य हता वैद्याधमेन मे ॥ योऽसापद्यविद्यारिद्वद्य सद्य श्योद्यत'। टोदातुररित्तन वृद्धोऽपि तम्मायते ॥ १।२७-२८ ततस्तदपचारेण शिशी जातवरे व्ययात् । वैगदत्तोपरासा सा मत्स्यसूपपरिदयम् ।। १ नमल्कलल्लासितश्कजम्पाटपिकाविकट । गवरणसम्दपनकन्चुकाश्चगालोल ॥ ५५ निजगृहदिवमारिपचयाचा तान्यक'महारोग । रनुपपितबुबु मनमा रोरादनियति ॥ ५० ( २२ ) पानीयं विनिवारणीयमहितं भक्तस्य वार्तव का द्वित्राण्येव दिनानि घात्रियया धात्रीरमः पीयताम् ।। जीवत्वेप शिशुभेजस्व विविधैरस्योत्सयैः संपर्द वंद्येनेति निवेद्यमानमफरोत् सा सर्वमेयातम् ।। २०७१-७२ किन्तु उपहाससबाट क्षेमेन्द्र कभी-कभी ऐसे भी उपहास को परते हैं, जो सर्वथा मर्यादा के विपरीत एवं उद्वेजक होता है । 'कट्वाली' अपने गतदिनों का वर्णन करती हुई कलावती मे कहती है कि-"एक बार मैंने 'शुद्धरवाहन' नामक एक कामुक ी प्रसन्नता के लिये बनावटी रूप में कहा-"आपके आलिङ्गन से मेरी गरीरपीटा न जाने वहाँ चली गयी।" मेरे इस वपन को मुनफर वह यह पह पर रोता हुआ चला गया कि "मुझे अपने मङ्गों का यह चमत्कार नही ज्ञात या, अन्यथा शूल-शरोरपीटा-मे मेरी माता मरने न पातो- विदितोऽयं प्रकारश्चेदभविष्यदमंशयः । सज्जनन्या वियोगो मे नाभविष्यद्विचेतसः ॥ ४४६४ इसी एक स्थल को छोड कर 'समयमानुवा' में उल्खिखित हाम्य-चंग उपयुक्त एवं प्रभावकारी हुआ है। परिसमाप्ति :- पन्चम समय के रागदपन के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णन अवसरोचित एवं मर्यादित है । प्रत्येक 'समय' को क्या एक दूसरे को पूरक हैं । वथा का प्रारम्भ भी दड़े ही नाटकीय ढंग से होता है। प्रपन अदु में 'कलावती' एवं वैश्यागुरु नारित 'क' का वर्णन एवं उनकी बातचीत भव्य दन पटी है। रिन्नु वषा की परिसमान्ति कुछ इतनी शोरता एव सामान्य टंग में होती है कि बागे कुछ चमत्कार एवं नवीनता को उन्मुक्ता वाले पान को प्रायःनिराशा ही हाप लगती है। अवान्तर बातों के अतिविस्तार के कारण मूकपा में ही संकोर फरना पड़ा है। रितु पिर भी एक छोटी सी बात पर उना दहा प्रदाय ( २३ ) लिखना क्न प्रसंसनीय नहीं है। सब कुछ एकसाथ मिला कर देखने पर "समयमातृका" एक रमणीय चित्ताकर्षक प्रबन्ध प्रतीत होता है। १०.क्षेमेन्द्र के द्वारा उल्लिखित कार:- क्षेमेन्द्र ने अपनी कृतियो मे, विदोपकर 'कविराभरण', 'कोचियविचार- पर्चा एव 'मुवृततितर' में, निमलिखित कवियो का नामोलेर एक उद्धरण प्रस्तुत व्यास, उत्पलराज, तुंजीर, कलश, कालिदास, भास, हर्ष, रत्नाकर, परिमल, वल्लट, गोडौनक, राजशेवर, इन्दुराज, वीरदे३. साहिल, भट्टनारायण, दोपक, मुक्ताका, चामल, मवभूति. लाटडिण्डीर, रिस्सो, यशोवर्मा, चक्र, वागभट्ट, भनुमेण्ट, अभिनन्द, माघ, परिद्राजक, गङ्गक (क्षेमेन्द्र ने इन्हें अपने उपाध्याय के नाम से लिया है ), मारवि, भर्तृहरि, चन्द्रक, शिवस्वामी, इन्द्रभानु, मयूर, मुक्तिर तरा, दामोदरगुप्त, मट्टवाचस्पति, भट्टमल्लट, विद्यानन्द, मातृगुप्त, बागा, मालयट, कापंटिक, प्रवरसेन, राजपुर मुक्तापीठ, अमरुक (अमरक भी), आनन्द- वन, भट्टरमार, धम्कोति, भट्टलट्टन, कुमारदास, मालबकुवलय, वाराहमिहिर, गन्दिनक, महउदमसिह और राजपुत्र लक्ष्मणादिस्य। 'शेमेन्द्र' ने इन कवियों मे से मर्वाधिक सम्मान व्यास के प्रति तदनु कालिदास एवं रानमेखर के प्रति अभिव्यक्त किया है। 'शेमेन्द्र' संस्कृत साहित्य के सर्या प्रकाशमान नित्य नवीन हीरक है। न केवल संस्कृत-विन्मगानी हो 'क्षेमेन्द्र' को रतियो से उपरत है अपितु सम्पूर्ण मानवसमाज उनका पिरती होकर असावनत है। विदुषामनुपर विजया दशमी संवद २०२४ वृन्दावन रमाशकर त्रिपाठी १. 'उदयसिंह' और 'सामनादिस्य' क्षेमेन्द्र के शिष्य थे।
समयमातृका
'प्रकाश' हिन्दीव्याख्योपेता
प्रथम: समय:
अनङ्गवातलाखेण जिता येन जगत्रयी।
विचित्रशक्तये तस्मै नमः कुमुमधन्वने ।। १ ।।
अशरीरी वागुरूप अत्र से निजगनी के विजेता, अद्भुत शक्ति वाले
कामदेव को नमस्कार है।॥१॥
टिप्पणी-कोई मी रपी अथवा अतिरथी श्राने दिनेतन्य को यरा में
करने के लिये कठिन कोरड एप बनमारमा प्रत्र का प्रयोग करता है।
फिर भी वह अपने प्रतिपक्ष को दा कर ही लेगा. यह मी नियित नहीं
रहता। किन्तु कामदेव की अवस्या हमरे टोक विपरीत है । बमका सायक
अपवा अन्य मनमान् नदी है और उमा धनु मा पुप का है। ऐसी भी
अवस्था में बह ऐट में समूह को नहीं अपितु दिनानी को अपने वश में कर
लेना है, यही टपी विचित्र रास्मिना है।
यम्या दुर्घग्घोसस्यहरे विचक्षय लक्ष्यते
क्षुब्धा याचिन लोलगालशर्ग कुनापि लोकनयी।
लामालरिशालालमना स्तः पुरागरपि
प्राटां देहिममूहमोहनमयी काली कराला नुमः ॥ २ ॥
.
समयमातृका
सम्पूर्ण विश्व की परिसमाप्ति पर अर्थात् महाप्रलय की अवस्था
मे यह सम्पूर्ण त्रिलोकी निसके दुर्घर्ष र भयकर मुखगहर में, क्षुभित
सागर में चपल मत्स्य शिशु की भाँति, कहीं पर अर्थात एक कपाश
मै दिसलाई पडदी है, ऐसी महाभयंकर महाकाली को नमस्कार
है । यह महाकाली परिभाषा एवं परिधिशून्य महाराल को भी
अपने वश में करने वाली है । विभिन्न पुराण इसी महाकाली,
महाशक्ति, की स्तुति करते हैं और यही विभिन्न आत्मा को मोहित
फरनेवाली भी है अर्थात यह काली ही आत्मा की स्राभाविक प्रकृति
पर अज्ञान का आवरण टानकर उसमे चेभिल्य एर सुख दुःसादि की
भावना उत्पन कर देती है, जिससे वह अपने सत्यस्वरूप कभी
नहीं पहचान पाता ॥ २ ॥
क्षेमेन्द्रेण रहस्यार्थमन्त्रतत्रोपयोगिनी ।
क्रियते वाररामाणामियं समयमारका ॥ ३॥
महाकवि 'क्षेमेन्द्र के द्वारा वेश्या सुन्दरियों के प्रन्छस प्रयोजन
को सिद्ध करनेवाले उपायों से सरलित यह 'समयमातृका' लिसी जा
रही है ॥३॥
अस्ति स्वस्तिमतां पिलासपसतिः संभोगभङ्गीमुरः
केलिप्राङ्गणमङ्गनाकुलगुरोधस्य शृङ्गारिणः ।
कश्मीरेषु पुरं परं प्रसरतालब्धाभिधारिधुनं
सौभाग्याभरणं महीपरतनोः मंफेनसम श्रियः ॥ ४ ॥
कश्मीर प्रदेश में अपने नाम को अन्वर्थक करने वाला अर्थात्
अपने नाम के अनुरूप ही विख्यात परमश्रेष्ठ 'प्रवरपुर' नामक
एक नगर है। यह नगर श्रीमानों में बिहार का स्थल, पृथिवी पी
मभोगभङ्गी, सुन्दरी-समूह पे कुलगुरु कामदेव का क्रीडाप्राङ्गण,
पृथियरी का सौभाग्यसूचक आभरण और लक्ष्मी अथवा शोभा का
संस्तस्थल है॥४॥
प्रथम समय: टिप्पणी-जिम प्रकार एक अभिमारिश को अपने प्रेमी से मिलने के लिये संकेतस्थल के जाने में तया अधिक समयनक प्रेमी के माय वहाँ रहने में प्रानन्द आता है उमी प्रकार लक्ष्मी प्रयत्रा शोमा भी वहाँ रहने में आनन्द • का अनुभव करती है। यत्र त्रिनेत्रनेत्राग्निस्तत्स्यक्त्वा जगत्रयीम् । पौरस्त्रीत्रिवलीकुले यसत्यमममायकः ॥ ५॥ जहाँ पर त्रिनेत्र अर्थात् भगवान् शङ्कर की नेत्राग्नि से भयभीत होकर, अन रिलोकी को छोडकर, कामदेव पुरवासिनी सुन्दरियों की त्रिवली ( उदर के मध्य की तीन रेखाओं) के तट पर निवास करता है ।।५।। टिप्पणी-त्रिवली के तट भाग पर कामदेव के निवास को बतलाने से रामोद्दीपक त्रिवली की प्रगाढता सूचित का गई है। तनाभूदमिभूतेन्दुद्युतिः कंदर्पदर्पभूः । फान्ता कलारतीनाम वेश्या वश्याञ्जनं शोः॥६॥ उमी नगर मे चन्द्रमा की कान्ति को भी तिरस्कृत फरनेगली, कामदेव के दर्प की प्रसरित्री, अपने नेत्रों में लगे अबन की सुन्दरता मे लोगों को अपने वश मे करनेवाली 'कलारती' नाम की अति सुन्दरी वेश्या रहती थी॥६॥ कुचयोः कठिनत्वन कुटिलवन या सुनोः । नेत्रयोः श्यामलखेन वेश्यावृत्तमदर्शयत् ॥ ७॥ कलायती अपने स्तनों की कठोरता, भ्रुटि की दुटिलता, तथा नेत्रों की श्यामलना से ही अपने वेश्याव्यापार को प्रदर्शित करती थी अर्थात् उमरे शरीर-मंस्वार से ही यह प्रतीनि होती थी कि यह सुन्दरी वेश्या व्यापार करने वाली है ।।७।। मा हयंगिसराम्टा कदाचिद्गणिकागुरुम् । कामिनां नर्ममुहृदं ददर्श पथि नापितम् ।। ८॥
४ समरमाता एक समय जब कि वह अपने प्रासाद के पृष्ट (छत) पर स्थित धी, वैश्याओं में गुरु, कामिननों का हँसी मनाक से मनोरजन करने वाले नापित को मार्ग मे जाते हुये देसा ॥८॥ श्मश्रुराशीचितमुसं काचकाचरलोचनम् । पीपरं तीरमण्टकर्मार्जारमिर शारदम् ॥ ९ ॥ उसका सुख श्मश्रुओं से परिव्यात था, उमको आँसें. काँच की तरह चमकीली थी, शरदकाल में जलाशय रे तट के मण्डों को खाकर मोटे मार्जार की भाँति वह स्थूलकाय था || || पिटानां केलिपटई तप्तताम्रपटोपमम् । दधानं रोममालान्तं स्लखल्वाटकर्परम् ।। १० ।। कवि यौँ उस नापित के शिर ( कर्पर) का वर्णन करते हुये कहता है कि उनका विस्तीर्ण एर सन्चाट (दुला) शिर कामुक जनों के लिये लिपटह (सिलगाड अथवा हँसी मनार के समय बनाया जाने वाला नगाडा) था। उसकी आरति आग में तपे दुवे तान के घट रे ममान थी। एकमात्र उसरे किनारे किनारे रोम की पक्ति अवशिष्ट र गई थी !! १०।। ताम्बूलष्टीचननामादपरि क्षिप्तचक्षुपम् । आनिनाय तमाय मा नेताञ्चलमंत्रया ॥ ११ ॥ 'हर्य के ऊपर से कोई मुझपर पान न यूक दे' इस भय से ऊपर की ओर देखने वाल उस नापित से स्नाती नामक याने नेत्र के इङ्गित से उपर अपने पास बुलाया ॥ ११ ॥ स समस्येत्य तां दृष्ट्वा चिन्तानिश्चललोचनाम् । पप्रच्छ पिस्मितः कृत्वा नर्मप्रणयमंतिम् ॥ १२ ॥ अपर पहुँचकर ग्स नापिन ने चिन्ता के कारण निश्चल नेत्र वाली कलावती को देख कर अपने हास परिहास एर प्रेमालाप को छिपाते प्रथम समय व्याम अपने हुए (अर्थात् उन्मनस्क कलानी के साथ हँसी मनाक का अवसर न ममझकर एतत्कार्योन्मुख अपने आकार एर भानों को छिपाते हुए) आश्चर्यपूर्वक उससे पूछा ।। १२ ।। ध्यानालम्बनमाननं रनले व्यालम्पमानालक लुप्तव्यञ्जनमञ्जनं नयनयोनिःश्वासतान्तोऽधरः । मानल्लीरनिलीनफेलिरिहगं निद्रापमाणं गृहे (१) पः प्रोपितयोपितां ममुचितः कस्मादकस्माचा ॥ १३ ॥ किसी बात की चिन्ता मे लीन, ऊपर लटकनेवाल केशी से मुस को तुमने करतल (येली) पर क्यों रक्सा है? तुम्हारे नेत्रो का असन क्यों मिट गया है ? उण निश्वास से तुम्हारा अधर क्यों मलिन अथवा कृश हो गया है ? कलि विग ( केलिरूपी विहग अथवा केनिरे लिये पालित पक्षी । यहाँ पर प्रथम अर्थ ही प्रसगात् प्रधान अर्थ है । ) भी गृह (देहरूपी घर अथवा घर ) में क्यों नि शन्द्र निस्क्रिय शन्त अत निद्रापरवश दिसलाई पड रहा है? क्यों अकस्मात् तुमने प्रोपितभर्तृका स्त्रियों (निन स्त्रियों के पति परदेश गरे हो) की भाँति अपना उप बना लिया है ? ॥ १३ ॥ निप्पणी हथेली पर मुख रखने से पिता को वर्तमानता, नैवामन के मिटने में अत्यधिक रुदन, अधर को मस्निता से हृदय के मतार, केलि विहग की नि स्तन्यता मे परिस्थिति को गम्भीरता एव प्रोपितमकानों के समान वेप से द्विमता एव व्यापारप्रतिपात की सूचना मिलती है। कि मेराला मदनमन्दिाधुनितम्मे सुश्रोणि नैर त गायति मङ्गलानि । अगं कृशागि फिमनद्यशःप्रमेण पूरचन्दनरसेन न लिप्तमेतत् ॥ १४ ॥ हे मुन्दर फटितट वाली कामिनी ! सेद की बात है कि तुम्हारेनितम्ब ६ समयमाहा पर कामदेव की बन्दियधू अर्थात् रामदेव के यश को गानेगाली पन्दिनी ली रूप मेखला (करधनी) क्यों नहीं मङ्गल का गान कर रही है ? हे कृशाही । नामदेव के यश की तरह कान्ति पाले अर्थात् धवल कर्पूर- मिभित चन्दन ये रस से तुम्हारे अङ्ग क्यों नहीं लिम है अर्थान् तुम्हारे अङ्गप्रमाधन के न करने का कारण क्या है ॥१४॥ प्राप्तं पुरः प्रचुरलाभमसंस्पृशन्ती भारिप्रभृतभिनाय कृनाभियोगा। कि केनचिन्सुचिरमेश्ननिष्फलेन मिथ्योपचारवचनेन न वञ्चितामि ॥ १५॥ भविषय में प्राप्त हान पाली प्रभूत सम्पत्ति के लिये प्रयतशील अन सम्मुस प्रान प्रचुर लाभ को भी न छूनी हुइ अर्थात् मामने आर हुए पर्यात धन को भी ठुकराती हुद तुम बहुत दिन तक सेवन करने के वाद भी नि'फन्न सिद्ध होने वाले रिमी के व्यर्थ चाटुकारितापूर्ण वचनों से क्या नहीं वजित की गई हो ? अर्थान् अपश्च ही तुम क्मिी चाटुकार रे द्वारा ठग ली गई हो ॥ १५ ॥ लोभाहीतमविभाव्य भयं भवत्या दर्पात्प्रदर्शितमसहितया मीभिः । दत्तं तवाप्रतिममामरणं नृपाई चौरेण किं अलपितं नगराधिपाये ॥१६॥ किमी प्रेमी के द्वारा प्रदत्त, राजाओं (घनिरों) के परनने रे येग्य, अप्रनिम, आभूषणों के विषय में, जिन्हें कि तुमने लगेम शरण विना किसी भय की चिन्ता स्पिनर दर्पवश निशर होकर अपनी ससिगे ममक्ष दिग्पताया था, स्मिी चोर ने नगर के अधिपति के समय कह दिया है क्या ? ॥१६॥ टिप्पणी-मसिना के समक्ष आनन के दिखाने में रावती गमक
७
प्रथम समय
वेश्या का दर्प यह या कि 'देखो, मेरा सौन्दर्य इतना अप्रतिम है कि बड़े बड़े
धनान्य व्यक्ति इतना बहुमूल्य वस्तुयें मुखें सन पत करते हैं । ऐमी वस्तुयें तुम
लोग दे लिये मर्वया दुर्लभ है ।
दानाद्यतेन धनिफेन विशेषमझा-
सक्तोऽयमिन्यय शनैरवसायितेन ।
लब्धान्तरसजनमित्त्रतिरोधितेन
किवनिकारकुपितेन कृतो पिनाहः ॥ १७ ।।
तुम्हारे माय विशेष ससगं के कारण “य इस वेश्या में विशेष
आमक्त है" इस यात क शने शनै निश्चित हो जाने पर अवसरोपलब्धि
(विद्रोपनधि) के अनन्तर अपन मित्राएर जनों से निरोधित और
उसी ममय सयोगवशात् तुम्हारे तिरस्कार से भी कुपित, तुम धनदान
करने में मर्यदा तत्पर रहनेवाले फिमी तुम्हारे प्रेमो धनिक ने विवाह
पर लिया है क्या ? || १७ ।।
टिप्पणी-प्रम घनिक के साय उसके मिनों भादि के विरोध का कारण
(श्रामर अयवा रिद ) एक हा बेश्या से उन सभी का प्रेम करना समझना
चाहिये।
दवा सकृत्तनुनिभूपणमंशुकं ना
यद्वानुनन्धविरलीकृतकामुकेन
यक्षेण मजनतामुसभूः प्रपेर
तीक्ष्णेन मीरु किमु केनचिदातासि ॥ १८॥
हे भीम एस धार स्वल्प आभूषण अथवा यस प्रदान करके पुन'
प्रेमव्यापार को रिल करनेगले अर्थात् प्रेम व्यापार को कम करने
तुम्हें धन दान कम करने वाले फिमी नीषण (कर्कश एव प्रमल) कामुक
व्यक्ति के द्वारा, सम्पूर्ण जनता को मुग्प देने वाली यायन प्रपा की
भाँति, आयत हो क्या ? ॥ १८ ॥
5
समयमारका
वित्तप्रदानविफलेन पलायमाना
कौटिल्यचारुचटुला शफरीव तोये ।
गूढं घशीकरणचूर्णमुचा कचेषु
कि केनचिन्न कुहकेन वशीकृतामि ॥ १९ ॥
अपनी ऋजुता के कारण सुन्दर प्रतीत होने वाली चञ्चल, जल ने
इतस्ततः पलायमान मछली की भॉनि भागनेवाली (प्रेम एव काम
व्यापार से विरत होने वाली) तुम क्या धन देने में असमर्थ अतः
तुम्हारे क्चों मे गुन अभिप्राय से सर्वालत वशीकरणचूर्ण ( वशीकरण
मन्त्र से सिद्ध ऐसा चूर्ण निसके शिर पर रखने मात्र से व्यक्ति प्रयोक्ता
के वश मे हो जाता है) को छोड़ने वाले किमी कामुक के द्वारा
घश में नहीं की गई हो ? अर्थात् अपश्य ही ऐसे व्यक्ति के द्वारा वश में
की गई हो ॥ १६ ॥
निष्कासित हृदयसंचिवतीनबरे
संदर्शितप्रकटकटधनोपचारे
लोभाचयानपचयैः पुनरावृतेर (१)
प्राप्तः किमु प्रमभमर्थशादनः ॥ २० ॥
किसी के प्रकटरूप से निफिल धनोपचार ( धन का प्रदान) के
दिसलाने पर अर्थात् तुम्हें धन प्रदान करने में असफल रहने पर
अथवा प्रक्ट रूप से कपटपूर्वक धनोपचार (धन देने का लालच
आदि) के दिसलाने पर उम व्यक्ति को अपने घर एक सम्पर्क से
निकालने के लिये उसरे प्रति अपने हदय मे तीन वैर सहित करने
वाली हे वेश्ये ! लोम का सरण न पर मक्ने के कारण अर्थात धन-
प्राप्ति की आशा से निर्धन अथवा स्वल्पधन व्यक्तियों से घिरी हुई
सी होर क्या तुम्हारे द्वारा हठपशात पुनः अनर्थ प्रात किया गया
है ? ॥ २० ॥
प्रथमः समय: कैनिंत्यसंभवनिजं वणिजं त्यजन्त्या यान्त्या तृणज्वलनदीप्तिनियोगलक्ष्मीम् । नष्टे मुवनविभवे विरते पुराणे जातस्तव स्तवकितोभयलाभमङ्गः (१) ॥ २१ ॥ किन्हीं कारणों मे, सर्वदा वर्धनशील वणिक का त्याग करनेवाली और अन्य लोगों के प्रति, जिनमे कि प्राचीन प्रेमी जन भी थे, तृणाग्नि के समान दाहकता की शोभा को धारण करने वाली अर्थात् तृण की भॉति क्षण भर के लिये प्रचलित (क्रुद्ध ) होकर उन्हें भी विरत कर देने वाली तुम्हारे द्वारा, सुन्दर वस्त्र समूह के नष्ट हो जाने पर और प्राचीन बत्र के विरत अर्थात् परिव्यक्त हो जाने पर निम प्रसार व्यक्ति दोनों लाभ से यञ्चित रह जाता है उसी प्रकार तुम्हारे ही स्तवकित अर्थात् पुष्पगुन्छ की भाँति विरसिंत एवं प्राप्त उभयविध लाभ का विनाश किया गया है क्या ?..१॥ सिद्धः प्रयल विभवः परितोपितस्य, दातुं ममुद्यतमतिः स्वयमर्थशास्त्रम् । नीतस्तव प्रचुरमत्मरयान्यया किं गेहानिधिहुधनः स्वसखीमुखेन ॥ २२ ॥ तुम्हारे द्वारा प्रदत्त धन एव यत्रादि के दान से मन्तुष्ट हुये व्यक्ति के शिविध प्रयत्नों से तुम्हारी अनुकूलता को प्रात हुआ अर्थात् तुम्हारे प्रेम-पाश में आबद्ध हुआ अतः स्ययमेव विशाल वैभव को तुम्हें देने के लिये तत्पर विचार वाला आयधिक सम्पत्तिशाली व्यक्ति, तुम्हारे माय अत्यधिक मत्मर करने वाली अन्य किसी घी अथवा बेश्या के द्वारा अपनी मसियों के माध्यम से तुम्हारे घर से अर्थात् तुम्हारे प्रेम-पाश में हड़ा फर अपने पास बुला लिया गया है क्या ? ||२२॥
समयमारका किं पापसादपदवीमतिमाह्य कष्टां लब्धानिकारविभनेन विर्जितासि । किं मृच्छितामि विरतासि सुसोझितामि ध्यानारधानपधिरामि निमीलितामि ॥ २३ ॥ अत्यधिक कष्ट देने वाले दु सपूण मागों ( उपायों ) के अवलम्बन के अनन्तर प्रात हये, असण्ट वैभवशाली. स्सिी व्यक्ति के द्वारा तुम परित्यक्त कर दी गई हो क्या ? अर्थात् निम धनी व्यक्ति को तुमने अपने प्रेम पाश में फंसान के लिये विविध कष्टपूर्ण उपायों का अनुमान किया था क्या उसन तुम्हें छोड़ दिया है ? क्या तुम मृढ़ित हा गड हो ? अथवा किमी कल्याणकारी कार्य से विरत हो गढ हो ? अथरा मुस से रित कर दी गई गे? अथवा रिमी प्रियतम गक्ति अपना वस्तु र ध्यान म अत्यधिर लीन हो जाने से बधिर हो गई हा १ अधमा जान बूझकर निमीलित (व्यापार से पिरत ) हो गइ हो ? ॥ २३ ॥ टिपणी-यहाँ यह जातय है कि वस्यायें धनिकों को पार कर अपने प्रम पाश में श्रावद करने के लिय विविध उपायों एवं कपर व्यापारों का अवलम्बन करती हैं। अप्युद्दामव्यसनमरणेः संगमे कामुकानां भद्रं भद्रे भुवनजमिनस्त्वत्कलाकौशलस्य । अप्युत्साहप्रचुरमुहदा कामरेलीनिरामाः प्रौढोत्साहास्तरमुपदने स्वस्तिमन्तोपिलामाः॥२४॥ हे भद्रे । रामु व्यक्तियों के अत्यधिक प्रनन मोग रूप व्यसन की पद्धति (तरीमा) मगम के समय अर्थान् कामुक व्यक्ति के साथ सगम से ममय प्रदर्शित, भुवन को भी वश में करने वाले तुम्हारे क्ला कौशल (हारभाव आदि) तो मद्गलपूर्वक है न? हे सुपदने । उत्साह के प्रबल महायक एष उत्माको पूर्ण प्रति प्रदान प्रथम समय ११ करने वाले काम क्रीडा के आश्रयभूत तुम्हारे विलास तो स्वस्तिमान हैन? ॥४॥ इत्यादि तेन हितसंनिहितेन पृष्टा स्पृटा भृशं रिभरमगमयोद्भवेन । मा तं जगाद सुखदुःखमहायभूनं चिन्ताविशेपरिपशा बहुशः श्वमन्नी ।। २५ ॥ हितमाधन के निचे उपस्थित म नापिन के द्वारा इस प्रकार पूछी गई. सम्पत्ति विनाश के भय से अत्यधिक विह्वल, चिन्तारिशेप से पिश, 'कलावनी' नामक वेश्या ने लम्बे लम्बे उच्छात भरते हुए सुख दु स में महाक उस नापित से कहना प्रारम्भ किया ॥२५॥ कङ्क ममानन्तां चिन्ता संतापकारिणीम् । ययाहमयमीदामि ग्रीमग्लानर मद्धरी ।। २६ ।। । अत्यधिक सन्ताप को देने वाली मेरी निरवधिक चिन्ता को सुनो। इसी चिन्ना के कारण मैं, प्रीम के मन्ताप से मलिन पुष्प-मञ्जरी की भाँति, अत्यधिक चिन्न हो रही ह ॥ २६ ॥ मा मखे करमग्रीवा मातुर्माता धिरस्थितिः। व्याली गृहनिधानस्य हता द्याधमेन मे ॥ २७ ॥ मित्र! करम की भाँति गर्दनबाली, स्थिरस्थिति अर्थात् पलने- किरने में असमर्थ, घर के समाने के समीप स्थित सपिणी की माँति हमारे पर की रक्षाकी, मेरी माँ को माँ अर्थात् मेरी नानो उपचार करनेवाले वैद्यापम के द्वारा मार डाली गई ।। २ ।। योडमारपद्यपिद्यापियः मयः पयोद्यतः। दर्यादातरविचेन वृद्धाऽपि तरुणायते ॥ २८॥ गणीय रिया का वेत्ता, मग्न व्यक्ति के रिनाश के लिये तत्काल डगत जो यह वैद्य है. यह वृद्ध होता हुआ भी दर्प के कारण गृहीन समयमाएका आतुर व्यक्तियों की सम्पत्ति के अनायास उपभोग से तरुण सा हो गया है अर्थात मरणासन्न लोगों के कुटुम्ब से यथेन्छ धन लेकर और उसका उपभोग कर खून हृष्ट-पुष्टाङ्ग हो गया है || २ || टिप्पणी कलावती के कहने का भाव यह है कि उक्त वैद्याधन ने अनुपयुक्त चिकित्सा से मेरी नानी का वध कर टाला। तेन रोगधराख्येन दत्ता रसरती मम । विभागशेपतां नीता लोल्यलोभोद्भवात्तया ॥ २९ ॥ उस रोगधर (वेद्य अथवा किसी अन्य व्यक्ति) ने मुझे रासी भोजन लाकर दिया। मेरे साने के पूर्व ही लोभ के वशीभूत होकर मेरी नानी ने उसका अधिश भाग (दो भाग)सा लिया । इस प्रकार रुग्णा उस वृद्धा की हालत अधिक चिन्ताजनक हो गई | टिप्पणी-'रसवता' रसोई घर को कहते हैं। किन्तु प्रमावरा उसका अर्थ 'उत्तम अयवा रासो मोचन' करना ही ठीक होगा। प्रपञ्चपञ्चनारात्मा तेनातुरता गता। काश्चन्या पश्चनां नीता पश्यन्ती काञ्चनं जगत् ।। ३० ।। इस कारण में अर्थात अत्यधिक भोजन सा से लेने आतुरता (मरणासन्नता) को प्रात हुई अत मम्पूर्ण जगत् को सुवर्णनिर्मिन मा देखनी हुई (बहुधा मरणामन्न व्यक्तियों की इसी प्रकार की अगम्यायें हुआ करती हैं) मेरी नानी काञ्चनी (दासीरिगेप) के द्वारा प्रपञ्च एष याचना रूपी पैर से मार डाली गई ॥ ३०॥ टिप्पणी-काबनी टम जग्गा वृद्वा की सेवा में नियुक्त एक दाना थी। उसका कार्य का की सेवा के अतिरिच उमो अनुचित वस्तुओं के खाने से रोकना भी था। दिनु अमावधानी के कारण वह ऐसा न कर सो और वृद्धा ने भोजन, जो उसके लिये उपध्य या, सा लिया। बाद में पूछने पर भय के वारण कायनी ने 'कलावता' को टगने के लिये बात बनारर बुट टनर दे दिया या। यही उसका 'प्रपञ्च एवं वचना वैर था।
प्रथमः समय: १३ हिरण्यवणों वसुधां तस्मिन्नन्तक्षणेऽपि सा। दृष्ट्वा मामब्रवीद्वत्से गृह्यतां गृह्यतामिति ॥ ३१ ॥ उमने (मेरी नानी ने ) उस अन्तक्षण में भी अर्थात् मृत्यु की वेला में भी पृथियी को सुवर्णवर्णा देसकर मुझसे कहा-"वन्से ! इसे ग्रहण क्रो, प्रदण करो" ॥ ३१॥ टिप्पणी-मुमूर्षु को मरने के समय में वे ही सब दृश्य दिखलायों पड़ते है जिनका अभ्यास उसे अपने जीवन में रहता है। ततम्तस्यामतीतायां गृहं मे शून्यतां गतम् । पराभवास्पदीभूतं कामुकः स्वेच्छया पृतम् ॥ ३२ ॥ उसके बाद, उस वृद्धा के इस ससार से विदा हो जाने पर शून्यता को प्रान हुआ अर्थान् रक्षविहीन मेरा घर तिरस्कारास्पद हो गया है । कामुक पुरुषों के द्वारा यह सर्वदा घिरा रहता है ॥ ३२ ॥ टिप्पणी-प्रायः व्यवहार में यह देखा जाता है कि कोई भी तरुणी वेश्या अपनी बिगी गम्यन्धी नी, जो कि पृद्धा होती है, से सर्वदा रक्षित रहती है। यह पता हो तरणी वेश्या में लोगों के मिलने-जुलने का कार्यक्रम आदि पनाती है। किमी रक्षिा के पिना सुन्दरी तदगी बेश्या का घर समाज के अवा- कटनीय तत्वों से सदा उपदवप्रस्त बना रहता है। रिक्तः शक्तो न निर्याति नामोत्ययमरं घनी । शून्यशालेय पथिकनिरुद्धा कामुकरहम् ।। ३३ ॥ ममर्थ अर्थान् शरीर से बलशाली निर्धन व्यक्ति मेरे घर से निका- लने पर भी नहीं निकलता है, इस प्रकार द्रव्य देने में समर्थ जो धनी व्यक्ति है, ये मेरे पास आने का अगर नहीं पाते। जिम प्रकार पधियों के द्वारा मार्ग की धर्मशाला मेन्छया परिभ्यान रहती है, उसी प्रकार में भी कामुक व्यक्तियों से मर्वदा निरुद्ध रहती हूँ ॥३॥ तस्माद्विदेशं गच्छामि नेच्छाम्युच्छ्सलां स्थितिम् । कथं रक्तविरतानां तुल्यां स्वायत्ततां सहे ।। ३४ ॥
समयमातका
अत में विदेश जाना चाहती हूँ। यॉ के उच्छं सल वातावरण
में रहना मुझे क्यमपि पसन्द नहीं है । भला बतलाइ कि मैं रक्त
(अपने प्रति वस्तुत. अनुराग रसने बान ) एव विरक्त (अनुरागविहीन
एकमात्र संभोगेन्छ) ननों के समान अधिकार स्विायत्तता को किस
प्रसार सहन कर सस्तीहूँ? ॥ ३४ ॥
इत्युद्वाप्पदृशस्तस्याः प्रलापं वृद्धनापितः ।
आकर्ण्य तां समावास्य मोन्यासं प्रत्यभापत ॥ ३५ ॥
अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली उस वैश्या के इस प्रकार के प्रलाप को सुनकर
उस वृद्ध नापित ने उसे सन्तोप ढाढस] देकर सन्ताप के साथ कहना
प्रारम्भ किया ।। ३५॥
भवत्या वित्तलोभेन निर्विचारतया परम् ।
भिपन्दुष्टभुजंगोऽमी म्यमेव प्रवेशितः ॥ ३६ ॥
पिना परिणाम के विचार के हो. एकमात्र धन की लोलुपता के
कारण आपने स्वय ही दुष्ट एव कामुर अथवा दुष्ट एवं भुजंग की
तरह कुटिल इस वैद्य को अपने घर में प्रविष्ट कराया है ।। ३६ ।।
जनन्यो हि हतास्तेन वेश्यानां पथ्ययुक्तिभिः ।
किं कुटनीकृतान्तोऽमो द्यो न रिदितस्तर ॥ ३७ ।।
इम दुष्ट बैग ने पत्र की युक्तिों से वैश्याओं को अनेर मानाओं
(वे मानायें ही उन वैश्याओं की रनिका थीं) को मार डाला है।
क्या पुट्टिनियों के यमराज इस इन वेद्य के स्वभाव को अभी तक तुमने
यथार्थरूप से नहीं जाना था ? ॥ ३७॥
म रोगिमृगार्गाणां मृगयानिर्गतः पपि ।
इत्यादिमिः स्तुतिपर्दपिटनेटः प्रणम्यते ॥ ३८ ॥
प्रथमः समयः १५ 'यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च । ववस्वताय कालाय सर्वप्राणहराय च ॥ ३९ ॥' जब वह वेद्यापम रोगिस्वरूप मृगसमूह की मृगया (शिकार) के लिये अपने घर से निकलता है, तब मार्ग में विटों एवं चेटों (व्यभिचारियों ) के द्वारा “यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वेस्वत, काल एप सबके प्राणों का हरण करने वाले । आपको नमस्कार है" इत्यादि स्तुनि वाक्यों से प्रणाम किया जाता है ।। ३८-३६ ॥ टिप्पणी-यहाँ विटों एवं चेटों के उच्च कयन में वैद्य की असफलता एवं प्रागघातिनी चिकि सा-पद्धति को सूचित किया गया है। यही कारण है कि उने यमरान के बहुत में नामों के द्वारा मंबोधित किया गया है । अधुना दुःसमुत्सृज्य मनः स्थित्यै विधीयताम् । कृत्रिमः क्रियतां गेहे रक्षाय जननीजनः ।। ४० ॥ इम समय दुःस का परित्याग कर अपने मन को स्थिर कीजिये और गृह की रक्षा के लिये 'कृत्रिम अर्थात् वेतन पर काम करने वाली किसी जननी (कुटिनी) को नियुक्ति कीजिये ॥ ४० ॥ व्याघ्रीन कुट्टनी यत्र रक्तपानामिपिणी । नास्ने तत्र प्रगल्भन्ते जम्मुका डब कामुकाः ॥ ४१ ।। निम रम्या घर में रक्त पान एप माम-मोजन की इन्द्रापाली व्यात्री को भाँति पुटिनी नहीं रहती वहाँ जम्नुरों (सियारों ) की मॉनि कामुकतन धृष्टता करते ही हैं ॥ ४२ ॥ यन तर निमग्नानां वेश्यानां जननी मिना । मंध्ययोर्दियमस्यापि मुधिस्य न क्षणः॥ ४२ ॥ जननी (बुट्टिनी )२ पिना रहने वालो अन जहाँत्तहाँ ( पाना- पार का बिना विचार चिजिस किमीजन मे )प्रेम व्यवहार करने वाली वेश्याओं का, दिन को दोनो ममाओं की भाँति अर्द्धमुहर्न का
समयमाहका
भी क्षण (दिन पे पक्ष में समय एवं वेश्या के पक्ष में विधान)
नहीं होता ॥४॥
टिप्पणी-यहाँ यह हावन
कि दोन में ने किमी मा संध्या का अर्द्धशा
भी दिन के माय नहीं परिगनित किया जाता।
न भवत्पेर धृतम्य वेश्यावश्मन्यमान्के ।
नुल्लीमुमम्य हेमन्ते मार्जारम्येच निर्गमः ॥ ४३ ।।
मातृविहीन (कुहिनीरहित ) वेश्या के घर से घून (निर्धन कामुक)
उमी प्रकार से जल्द नहीं निकलते जिस प्रकार हेमन्त ऋतु में
किञ्चिदुष्ण चुल्ली ( भोजन पाने के लिये मृत्तिकानिमित चून्हा)
में मोया हुआ मार्जार (विटाल ) भगाने पर भी शीघ्र नहीं
निवन्तता ।।४३॥
प्रमिष्टा कुटनीहीनगृहं क्षीणपटा विटाः ।
गाथाः पठन्ति गायन्ति व्ययद्रविणमर्थिताः ॥ ४४ ॥
कुट्टिनीविहीन वेश्या के घर में प्रविष्ट हुने क्षीणवखपारी (नदीन-
चम्बधारी अथरा जीवनधारी) पिट (रानुक) जब उनके द्वारा
निर्धारित धन (यह धन सनीन अयरा सभोग के पारिप्रमिक के रूप
में निर्धारित क्यिा जाता है) को देने के लिये कहे जाने हैं तब वे
गाथा (दाने के लिये गडी गई कानियाँ) कहने लगते हैं। धन-
विलीन कामुक वाग्गल से ही अपना काम निकालना चाहते हैं ।।४।।
अकण्टका पुप्पमही वेशयोपिदमातृका।
मन्त्रिहीना च राज्यश्रीर्भुज्यते विटचेटकः ॥ ४५ ॥
कण्टकविणेन पुष्पादिता, गता (रक्षिणी, दहिनी) रिरीन तरणी
केया एवं पन्मन्त्रियों में हीन राम्बलक्ष्मी रिटाएर वंटों के द्वारा मोगी
जाती है ।। ५५॥
अयं पीनम्ननामागोमाग्यविमोचितः ।
द्रविणोपार्जनम्या काला कुवलयेक्षणे ॥ ४६॥
प्रथम समय - हे कमलने ! स्थूल (मोटे एव निविह) स्तनों की सौभाग्यश्री के योग्य धनोपार्जन का तुम्हारा यही समय है ॥ ४६॥ सला झातिचपलाः कृतालिङ्गनसंगमाः। न गताः पुनरायान्ति नाले योपनासराः॥४७॥ है मुग्धे । मुरद आलिङ्गन की अनुभूति कर चुकने वाले, अत्यधिक पचल, सलों की माँति योपन के दिन चले जाने पर पुन लौट कर नहीं आया करते ॥४७॥ प्रथम नां पुष्परतीनां लतानां च ॥ ४८ ॥ पुष्परनी ( रजस्वला एव प्रसूनमती) स्त्री एर लता (सोवन के प्रारम्म में मुसदायक एप रचय हुआ करती है)।४।। तस्मान्मानिनि कापि हेमकुसुमारामोचयाय त्वया माता तापदनेस्कृटकुटिला काचित्ममन्विष्यताम् । एताः मुत्रु मान्ति यौगनमरारम्भे विजृम्भाभुगो वेश्यानां हि नियोगिनामिन शरत्काले धनाः मंपदः॥ ४९ ।। इसलिये हे मानिनि अत्यधिक धन की अभिवृद्धि के लिये अनेक प्रपञ्च एवं पट्यन्त्र में प्रवीण (प्रपञ्च एव पड्यन्त्र ने प्रवीण होना ही उसकी कुटिलता है) किसी माता (रक्षाी) का अन्वेषण तुम्हे करना चाहिए। हे मुन्दरभ्रुकुटियाली खी। जिस प्रकार शरत्काल में कृषकों को प्रचुर सम्पत्ति का लाभ होता है, नमी प्रकार पूर्ण यौवनावस्था के ममय में वेश्याओं के लिये ये मातायें पर्यात सम्पत्ति का कारण होती है ॥४॥ अस्त्येर मा बहुतरायती तुलेन कालस्य मजनपण्यपरिग्रहेषु । क्षिप्रप्रकृष्टपलस्पनया ययामा मागी वृतः परिमितत्वमुपैति मेरुः ॥ ५० ॥ सामा १८ समयमातृका - जिसे तुम माता बनाओगी यह, सम्पूर्ण प्राणिरूप पण्य (खरीदने की वस्तु) के ग्रहण करने मे विस्तीर्ण मध्यभागवाली काल की उस तुला (तराजू) की भाँति होगी। होनी चाहिये), जिस तुला (पक्षान्तर मे स्रो) के द्वारा अतिशीघ्र पलकल्पना से ( एक एक पल के रूप मे करने से अर्थात् ग्रहण करने से) भागीकृत (बाँटा या काटा गया ) यह मेरु (पक्षा० मेरुसहश धनो व्यक्ति ) भी परिमितता को प्राप्त हो जाता है अर्थात् सामान्य बन जाता है ॥ ५० ॥ यासी रामामलयजलतागाढसंरोघलीला निर्यन्त्राणां नियमजननी भोगिनां मन्त्रमुद्रा । विश्वं यस्याः फलकलनया लक्ष्यतामेति पाणी तस्या जन्मक्रमपरिगवं श्रूयतां वृत्तमेतत् ॥ ५१ ।। निसके हाथ में यह सम्पूर्ण विश्व परिणाम से ही लक्ष्यता को प्राप्त होता है अर्थात् परिणाम को देखकर ही यह जाना जाता है कि अमुक व्यक्ति इस वृद्धा की कूटयागुरा मे आ फँसा या, उसके जन्म आदि जीवन के वृत्तान्त को सुनो ।। ५१ ॥ तवृत्तमानश्रवणेन कोऽपि संजायते युद्धिविशेपलामः । तयोपदेशे स्यमेर दत्ते भरत्यसो हस्तगता त्रिलोकी ॥५२॥ इति श्राव्यासदामापरास्यतेमेन्द्र निमिठाया समयमातृका या चिन्तापरिप्रश्नो नाम प्रथम समय उस वृद्धा के जीरन वृत्तान्त के श्रवणमात्र से एक क्लिक्षण प्रकार की बुद्धि उत्पन्न हो जाती है। और यदि घर स्वयं किसी को उपदेश दे देता, उपदिष्ट व्यक्ति के लिये यह समप्र त्रिलोकी ही हस्तगता हो जाती है ।।१२॥ 'इस प्रसार 'श्री व्यामदाम', जिनरा दूसरा नाम 'नेमेन्द्र' था, के द्वारा निर्मित 'समयमात्मा' का 'चिन्ता परिप्रन' नामक प्रथम समय समात हुआ' ।
द्वितीयः समयः अथ दत्वावधानायां कलावत्यां यथाविधि । कथामकथयत्कड़ः कुट्टन्याः कपटाश्रयाम् ॥१॥ इसके अनन्तर 'कलावती' के उक्त कपट प्रवीणा वृद्धा के वृत्तान्त को प्राण करने के लिये सावधान होने पर 'क' (नापित) ने कुट्टिनी की कपट एवं बलों से परिपूर्ण कया को ययारिधान कहना प्रारम्म किया।॥१॥ मर्वमक्षां नमस्कृत्य तामेर मरमरवीम् । पदामि चरितं तस्याः कुझौ यम्या जगत्रयी ॥ २ ॥ जिसकी कुभि में सम्पूर्ण यह निनोको वर्तमान है और जो समिक्षा (सब कुछ साने वाली) हैं. उन शङ्कर की मैरवी शक्ति को नमस्कार करके मैं उस कुहिनी के चरित को कहता हूँ ॥२॥ परिहासपुरे पूर्व पान्यारमयपालिका। बभूव भूमिका नाम ॥३॥ पूर्व काल में परिहासपुर' में यात्रियों के निवास के लिये निर्मित धर्मशाला की रसगली करने याली 'भूमिका' नाम की एक ली थी ।।३।। 'कन्यका। जाना घरमालायामवर्षटिकाभिधा ॥ ४ ॥ 'कुछ ममय के अनन्तर उसे एक कन्या उत्पन्न हुई। उमरा नाम था 'घटिशा॥४॥ मा वर्धमाना मुमुनी पौरः पर्वसु पूजिता । तद्गुहेपकरोबारी पूजामाजनमक्षयम् ॥ ५ ॥ सुनुपी यह घटिका' धोरे घोर पृद्धि को प्रार होने लगी। पुरवासी पर (पूर्णिमा, अमागल्या, संचान्ति आदि) के समय उसे निनन्त्रित .... .. :
२० समयमारका कर पूजापूर्वक भोजन आदि प्रदान करते थे। किन्तुः 'पर्पटिका' चौर्यवृत्ति की लड़की थी । अवसर प्राप्तकर वह निमन्त्रणदाता के पूजा के वर्तन को ही लेकर चली जाती थी ॥५॥ सप्तवव सा लोभादास्पोडा हट्टतोरणे । जनन्या पण्यतां नीता लोके जालवधाभिधाम् ॥ ६ ॥ जप यह लड़की अभी सात वर्ष की ही थी तभी उसने वार्तालाप में अत्यधिक निपुणता प्राप्त कर ली थी। अपनी पार्ता के द्वारा वह लोगों का मनोरञ्जन क्यिा करती थी। उसकी इस प्रवीणता को देसकर लोमपरवश उमकी माता ने वाजार के बहिर मे पड़ी होकर उसे 'जालवधा' नामक एक अन्य स्त्री के हाथ बेच दिया ॥६॥ सुवृत्तशङ्खलतिका सकृटकुचकचुका। कामुकाराधनं चक्रे चुम्बनालिङ्गनेन मा ॥७॥ सुडौल बॉहों वाली, कम्युग्रीवा एवं लतिका के समान प्रलोभनीय एवं पतली शरीरवाली तथा उठनेवाले स्तनों पर कञ्चुक (बाडी) पहनने वाली उम बाला ने चुम्बनदान एवं कोमल आलिङ्गन के द्वारा कामुक जनों का मनोरञ्जन करने लगी।॥७॥ कुमार्थी वणिक्स नुरथ तेनाययौ युवा । सुन्दरः पृर्णिको नाम पूर्णवर्णमुवर्णनान् ॥ ८॥ उसके उक्त व्यापार से आष्ट होकर, कुडुम का व्यापार करने याला सुन्दर गौर आरतिगाला, धनवान, पूर्णिफ, नाम का एक यनिया का लड़का उसके पास आया अर्थान् उसमे अत्यधिक अनुरक्त हुआ 115॥ समायां नेत्रवलनालोलभ्रूलास्यविनमः। कृष्टः कौतुकवान्भेजे चपलासंगम निशि ॥९॥ सभा में नेत्रों के घुमाने फिराने से चञ्चल भ्रुटि के नृत्य-विलासों (घुमाने में प्रतीयमान सौन्दयों) से आरष्ट अतः उत्कण्ठित उस
द्वितीयः समय
२१
युवफ 'पूर्णिक' ने रात्रि में उस चपला युवती के साथ संगम
क्यिा ॥६॥
सा तस्य जैव्यमुप्तस्य निशि कण्ठावलम्बिनी ।
निगीर्य शनकैः मर्व कर्णाभरणकाञ्चनम् ।। १० ।।
अगुलीभ्यः समाकृप्य हेमरालकमालिकाः ।
चौरग्रस्तेच चुक्रोश हा हतास्मीति सस्सनम् ॥ ११ ॥
रात्रि में मभाग के अनन्तर मदिरा के नशे में चूर जब कि वह
युवक उस युपती को कण्ठ मे लगाये सो रहा था, उस समय उसके
कण्ठ मे ससक्त उस युक्ती ने धीरे धीरे उसके (युनक के) सुवर्ण के
चन हुये मम्पूर्ण कर्णाभूषणों को निकाल कर विग दिया और उसकी
अद्गुलियों से मुवर्ण निमित अंगूठिया का निकाल कर चोर से पकड़ी
गई को माँति 'हा में मारी गई, मैं ठग ली गई' कहकर बड़े जोरों से
चिल्लाने लगी।॥ १०-११ ।।
प्रतिबुद्धोऽथ महमा म तया मुपितो वणिक् ।
वाममाच्छादितशिरा ययौ स्वजनलजितः ॥ १२ ॥
इसके बाद उसके द्वारा ठग लिया गया यह वणिक् झटिति जगकर
अपने लोगों से, इष्टमित्रों से, लजित होता हुआ अपने शिर को वन से
आच्छादित फर वहाँ से चला गया ॥ १२ ॥
ततः मा योपनाती सचिराभरणाम्बरा ।
उनाम शंकरपुरे महगेति कृतामिधा ॥ १३ ॥
उसके अनन्तर योवन के मद से मवाली, मचिर आभूपण एवं
वनों को पहनने वाली यह युरतो शङ्करपुर में रहने लगी। वहाँ उसने
अपना नाम 'महणा' रस लिया था ।। १३ ।।
भूरिभाम्यमरः सक्ता मा कामिकमुमोचर्य ।
लेभे संमोगविश्रान्ति न रजन्यां न वामरे ॥ १४ ॥
२२
समयमारका
अत्यधिक माग्य (सौभाग्य-सौन्दर्य, यौवन आदि) समूहों से
सयुक्त, कामिननरूपी कुसुम समूह मे ससक्त, वह 'मह्नणा' न तो
दिन मे और न रात्रि में ही सभोग से विश्राम को प्राप्त करती थी अर्थान
उसका सभोग व्यापार दिन-रात चलता रहता था ॥ १४ ॥
निर्गच्छता प्रविशता प्रतिपालयता बहिः ।
भूव तद्गृहे संख्या न शुनामिन कामिनाम् ॥ १५ ॥
उसके पर से निकलनेवाले, घर में प्रवेश करने वाले, बाहर
प्रतीक्षा करने वाले कामी लागों की, एक कुतिया के पीछे दौडनेगले
बहुत से कुत्तों की भॉति कोइ सत्या न थी॥१५॥
कृपे प्रपायामुद्याने मूदपौष्पिकश्मसु ।
सखीगृहे च तुल्याप्तान्सा सिपेरेऽति कामुकान् ॥ १६ ॥
वह युवती 'महणा' कुयें पर, प्रपा के स्थान मे, उद्यान मे रसोई
घर मे, उद्यानशाला मे, ससी के घर पर अर्थात् मत्र समानरूप से
विश्वसनीय कामुकों के साथ दिन मे रमण किया करती थी ।। १६ ॥
क्षपारम्भ क्षीरं शिशुक्रमिर निक्षिप्य शयने
जगामान्य तस्मिन्सुरतधननिद्रापरमपि ।
निशाशेपे शूलाकुलनिजमतीनेइमगमना-
पदेशेनान्यं सा सततमगमत्स्क्रयभरे ॥ १७॥
रात्रि के प्रारम्भ मे अर्थात् सायकाल मदिरा से मत्त व्यक्ति को
शय्या पर बालक को माति सुलाकर दूसरे कामुक के पास चली
जाती थी और यहाँ भी कामुक के सभोग से श्रान्त अतएव गाढी निद्रा
मे सो जाने पर दूसरे के साथ संगम करती थी। इस प्रकार रात्रि
के अन्तिम प्रहर में पीडा से व्याकुल अपनी ससी के घर जाने के
वहाने से अन्य कामुक के पास सार सभोग करती थी। अपने
सौन्दर्य से सरीदे गये व्यक्तियों के मध्य यही उसका व्यापार था ॥१७॥
द्वितीयः समय नानावहारकृषितः सान्विष्टा सुमगैर्मृशम् । पलायमाना गुम्नेषु तम्या कामुकवेश्ममु ॥१८॥ अनेको धून व्यक्तियों के द्वारा विविध पिगुनतामरी बातों से कुपिन करारे गरे महुन से मुमग (रिवाहित अयवा सुन्दर ) व्यक्तियों के द्वारा अधिक खोजी जाने पर वह ( महणा) मागर कामुक व्यक्तियों के गुनाहों में निवास करती थी॥१८॥ ततः प्रासादपालन नन्दिमोमेन मा निशि। गौरीगर्मयहं रात्री रागान्धन प्रवेशिता ॥ १९ ॥ कुछ समय के अनन्तर एक रात्रि में वह रागान्य (प्रेम में मत वाने)'नन्टिसोन' नामक प्रासाद (नगाराविप के गृह ) के रक्षक के द्वारा संभोगार्य गौरी के मन्दिर के गर्भगृह (मध्यमाग ) में प्रविष्ट कराई गई।॥१६॥ निम्यामन्द्रिया तम्मिन्प्रयाते काष्ठभूतताम् । देवालंकरणं म मा गृहीत्वा ययौ जगात् ॥ २० ॥ संभोग के बाद उम प्रासादपाल के विश्वासपूर्वक प्रगाढ निद्रा में शयन के अनन्तर काट के समान निश्चेष्ट हो जाने पर वह युक्ती देवों के सम्पूर्ण अलंकरणों को लेकर जल्दी से यहाँ से चली गई ॥२०॥ ततः ममरसिंहम्य डामरस्यावद्धिका । भूत्वा नागरिकानाम प्रतापपुग्वामिनः ॥ २१ ॥ उनके अनन्नर प्रतापपुर के निवामी वीरचेष्टागने अर्यात् पराक्रमी 'सनरनिह' की प्रेयनी यन गई। वहाँ पर उपने नाम परिवर्तन करके अपना नाम 'नागरिका' रख लिया था ॥२२॥ प्रभूतपिशिताहारमंमारैः स्थूलतां गता। मा तम्य मीममेनस्य हिडिम्मेवामप्रिया ॥ २२॥ अत्यधिक मांसाहार के सेरन से स्थूलता को प्राप्त हुई यह
समयमातृका
कामिनी, भीमसेन की हिडिम्बा को भॉति, उस समरसिंह को प्रिया
वन गई ।। २२॥
सर्वस्वस्वामिभावं सा संप्राप्ता तस्य रागिणः ।
प्रेरणं यन्धुयुद्धेषु विदधे निधनैपिणी ॥ २३ ॥
कामासक्त उस समरसिंह को संपूर्ण वस्तुओं पर उसी का स्वामित्व
स्थापित हो गया था ! समरसिंह के निधन की इच्छा से उसने उसको
चन्धुओं के साथ युद्ध के लिये प्रेरित किया ।। २३ ।।
हते पितृनजे तस्मिन् बद्धमूला परं गृहे ।
साभूदपरपुत्रस्य श्रीसिंहस्यावरुद्धिका ॥ २४ ॥
युद्ध मे पितृममूह के (घर के बड़े लोगों के) विनष्ट हो
जाने पर, गृह मे पूर्णरूप से अपने अधिकार एवं अपनी जड़ को
जमाकर वह ममरसिंह के एक दूसरे पुत्र (जो मरत. बड़े न थे)
'श्रीसिंह' की अररुद्धिका हो गई ।।२४॥
विगलद्यौवना यूनः सा सपनीजिगोपया ।
चकार तस्य स्वीकारं वशीकरणमूलकैः ।। २५ ॥
विगलित चौरनवाली यह खो युवक 'प्रोसिंह' को त्रियों को जोतने
की इच्छा से अन्य वशीकरण आदि उपायों से उमको (प्रोसिंह को)
अपने वश में कर लिया ॥२५॥
मत्स्यवृषवृतक्षीरपलाण्डलगुनादिभिः
प्रत्यायनप्रसक्ताभ्यौवनस्य प्रियस्य मा ॥ २६ ॥
वह स्त्री अपने युगक प्रेमी 'श्रीसिंह' के आराधन (सेवन) में
प्रसत रहा करती थी। यह उसे मछली का जूम (रमा), घृत,
दुग्ध, प्याज एवं लशुन आदि बल एवं कामबर्धक पदार्य खिलाती
धी॥२६॥
२५ द्वितीयः समयः अथ भूपभयात्तस्य प्रत्यासत्तेऽथ भूतपे (१)। द्रषिणमादाय साविशन्नगरान्तरम् ॥ २७॥ "श्रीसिंह के इस प्रकार से कामासक्त होने पर और प्रज्ञा में अराजकता फैल जाने पर उनके पड़ोसी, प्रज्ञापालक एक राजा ने उन पर आक्रमण कर दिया ।" समीप में आये हुये राजा के भय से वह स्रो 'श्रीसिंह' की विपुल सम्पत्ति को लेकर दूसरे नगर में चली गई ॥७॥ ततस्तनुतरस्वच्छचमना विनतानना । रण्डा मृगवती नाम साभूत्म्पर्शस्पृहामही ।। २८ ।। यहाँ पहुँच कर उम रण्डा ने अपना नाम 'मृगवती' रस लिया। वह अति सूक्ष्म एवं स्वच्छ यन्त्रों को धारण करती और एक कुलीना स्त्री की भाँति जन समूह में निकलने पर अपना शिर नीचे करके चलती थी। अब उसे कुछ दान करने की इच्छा भी होने लगी ।।२।। सदा मुरेश्वरी गत्वा शतधारातटे चिरम् । तिलवालुकदर्भाडा सा चक्रे पितृतर्पणम् ॥ २९ ॥ यहुत दिनों तक वह निरन्तर शतधारा नाम: नदी के तट पर 'मुरेश्वरी' के पास जाकर दिलकुशादि तर्पण को ममप्र सामग्री लेकर पितृतर्पण क्यिा करती थी।॥२६॥ तत्र धन्युग्माराख्पमधारोहं महाधनम् । तीर्थस्थिता मा जग्राह मत्स्यं यस्यधृरिव ॥ ३० ॥ वहाँ तीर्य में रहती हुई उसने 'यन्पुरमार' नामक एक महाधनी अश्वारोही को जिम प्रार बम्ब (बली) मन्स्य को पकड़नी है उसी प्रकार-पकड़ा अर्यात् अपने प्रेम जाल में फैमाकर आवद्ध किया।॥३०॥ गृहं मुष्टया गृहीत्वेष चित्तग्रहणकोविदा । सोयव्ययकार्येषु सर तस्यामवद्विभुः ॥ ३१ ।।
समयमाहका पुरुषों के चित्त को वश में करने की क्ला में पण्टित 'मृगपती ने उस अश्वारोही के घर को अपनी मुट्ठी मे अर्थात् अपने अधिकार में कर लिया। उसके सम्पूर्ण आय व्यय आदि कार्यों का सञ्चालन 'मृगवती' ही करती थी ।। ३१ ।। मासेन सा गते तस्मिन्पश्चतां बहुमंचये । तस्थौ पादासष्टम्प तस्यानुगमनोद्यता ॥ ३२ ॥ अत्यधिक धन संचय करनेसले उम अश्वारोही के एक महीने में मर जाने पर उसके अनुगमन के लिये उद्यत अर्थात् सती होने के लिये तत्पर 'मृगवती' मृतक के पैर को पकड कर स्थित हो गई ॥३२॥ टिप्पणी-यहाँ यह ध्यान देना है कि 'मृगवती' का सतीत्व के लिग उद्यत होना एक नाटक्णन या। इसमें स्वल्प भी वास्तविक्ता न थी। तढान्धर्वार्यमाणा मिथ्यवारब्धम्रहा। धर्यावष्टम्भगम्भीरमुवाचार्याङ्गनेर मा ॥३३॥ उस अश्वारोही के जाति परिवार के लोगों के द्वारा मती होने से रोकी जाने पर, सती होने के लिये मिथ्या एर दिसापटी आग्रह फरनेवाली गृगवती ने कुलबधू की माँति धैर्य धारण करके गम्भीर सी वाणी बोली ॥३३॥ कुले महति वैधव्यं वैधव्ये शीलमिष्ठवः । शीलनंगे रियोगोऽयं वतिना मम यास्यति ॥ ३४ ॥ किमी महान् कुल में किपी स्री का वैधव्य धारण करना महान् अमगल एर अनर्थ का द्योतक ही है; क्योंकि वैधव्य की अवस्था में शीलभड्ग (पातिनत्य विनाश) को आशा बनी रहती है। अतः शीलभग में हेतुभूत यह मेरा पति वियोग वह्नि के साथ ही जायगा अर्थान् ने भी जल मरूँगी ।।३४॥ इत्युक्त्या तीनमंकल्पनिश्चलाश्ममयीर मा । तद्विचाराप्तहण मचव्यक्तिमिरारहत् ।। ३५ ॥
द्वितीयः समयः
ऐसा कहकर, आग में जलने के लिये तीन संकल्प के कारण
निश्चल प्रस्तरमयी सी होकर वह उस मृतक की सम्पत्ति की उपलब्धि
की प्रसन्नता से सत्त्वव्यक्ति (मानन्द एवं पुलकोद्भव आदि) को धारण
सा किया ॥३५॥
टिप्पणी-पतिवियोग के पनन्तर आग में जलने के लि उयत स्त्री
शोकाकुल न होकर रोम मित, आनन्दित श्रादि होती है । उमके रोमान आदि
सन्चम्मति के नाम से कदे जाते हैं।
ततस्तद्रविणस्वाम्यं राजादेशादवाप्य सा ।
प्रार्थिता राजपुरुपैस्तस्थौ लीलावलम्बिनी ॥ ३६ ।।
मृतक की विधवा 'मृगवती राजा के आदेश से मृतक की सम्पत्ति
के स्वामित्व को प्राप्त कर अर्थात् उसकी उत्तराधिकारिणी होकर
राजपुरुषों से प्राधित होकर अर्यात् राजा के अधिकारियों के द्वारा
आग मे जल मरने से रोकी जाकर विविध लीलाओं को करती हुई
वहाँ रहने लगी ॥ ३६॥
अथाश्चशालादिविरं स्वीकृत्य रविवाडबम् ।
मा चक्रे जीवलोकस्य स्वनामपरिवर्तनम् ।। ३७ ॥
इमके अनन्तर अश्वशालाध्यक्ष को अङ्गीकार करके उसने अश्वजाति
के समान रमण-व्यापार किया अर्थात् उसकी काम युभुक्षा एवं
काम व्यापार पशुपन् थे, अश्वजाति के समान सर्वदा प्रधालत रहते
ये। इस प्रकार प्रापिलोक के लिये उसने अपने नाम (मृगवती) का
ही परिवर्तन कर डाला ॥३७॥
टिप्पणी-ऐसी प्रसिद्धि है कि मग मादि पशु वर्ष में एक बार ही संभोग
किया करते है
।शि इसी कार्य में लिप्त रहना उनकी प्रकृति के विपरीत है।
भको कामदासत रहदी । इस प्रकाराम म्यापार में रमने
बको सरशिका मदुकरण कर अपने नाम को विपरीत मिन रिया।
तल्लामसेवया नित्यं सा तस्य स्नानकोष्टके।
विलासम्पलितालादिविरस्याहरन्मनः ॥ ३८॥
समयमाएका
मृगरती ने उस दिविर (अश्वशालाध्यक्ष) के नानघर में निय
ही उससे मिल कर सेवा एव विलास से पूर्ण वार्तालाप से उनके
मन का हरण कर लिया अर्थात् उस दिविर को अपने वश में कर
लिया ।।३।।
कृत्वा लुण्ठि दिवममखिलं भूरिभूर्जप्रयोगै-
भुक्त्या पीत्वा निशि बहुतरं कुम्भकर्णायमानः ।
प्रातः स्नानव्यतिकरकलादम्भमंभावनाभू-
र्माद्यं दाई नयति दिविरः शान्तिमन्तर्जन ॥ ३९ ॥
वह दिविर (अश्वशालाध्यक्ष ) अपने वर्णसङ्करबहुल मित्रों के माध
सुन्दर भोजन करके एवं मदिरा का पान करके सम्पूर्ण दिन सम्रा
पर इधर से उधर लोटा करता था और रात्रि में कुम्भकर्ण की भाँति
अचेत होकर प्रगाढ निद्रा में सोता था। प्रातःकाल, स्नान करने
की कला मे प्रवीणता का दम्भ मरने वाला वह दिपिर अपनी मदिरा
सम्बन्धी समप्र शारीरिक जलन को जल के मध्य में स्थित होकर दूर
करता था 11३६।।
टिप्पणी चपे मदिरा को जरन में व्या होकर हो दिविर प्रान चाल
इतुत नमर तक ल में रहता था. स्नुि पान को अधिना एवं पाररिक
कमरी व्यर न हो र एनदर्ष वह अधिक समर ना इल में रहकर
अपनी स्नान को विवश कामी चे प्रबादा का प्रदर्शन करने मार
रचता था।
प्रद्धापरपुनाथ
दिविराराघनत्रता ।
निखिलं जीरलोकं मा विक्रीय धनमाददे ।। ४० ॥
मृगपती के कई सीनेने पुत्र थे। यह पूर्णश्यक हो चुकी थी।
दिन रात दिमिर की शुश्रूपा एव आराधना ही उसका रतव्य या !
इस प्रकार शुम्रपा ने दिविर को वश में करके उसने उनके सम्पूर्ण
अश्व आदि जानवरों को बचकर सब घन अपने अधिकार में कर
लिया ॥४०॥
२ द्वितीयःसमयः सा वेश्मविक्रयादाने पुत्रराकृप्य वारिते । गत्वाधिकरणं चके मठिभट्टोपसेवनम् ॥ ४१॥ सम्पूर्ण जानवरों को बेचने के अनन्तर उसने घर भी वेचकर द्रव्य अपने अधिकार में करना चाहा, किन्तु जब उसके इस कार्य में उसके सौतेले पुत्रों ने बलपूर्वक प्रतिरोध उत्पन्न किया तब उसने न्यायालय में जाकर न्यायाधीशों, जिन्हें उस समय मठिभट्ट कहा जाता था, का आश्रयण किया ॥४१॥ उत्कोचारब्धसंघर्भट्ट कूटरथादिभिः । सादिष्टामीष्टसंपत्तिर्जग्राह जयपट्टकम् ॥ ४२॥ अपने इस मुकदमे के प्रसग में मृगरती ने न्यायाधीशों को पर्यान धूम दिया। उत्कोच ( घूस) लेने के कारण परस्पर संघटित हुये, छल-कपट के आकर उन भट्टों (न्यायाधीशों) ने, मम्पत्ति की लोभी उस स्त्री को गृहरूपी सम्पत्ति पर उसके अधिकार का आदेश दे दिया। इस प्रकार उसने विजयपत्र को ग्रहण किया ॥ ४२ ॥ गृहं विक्रीय सर्वस्वं गृहीत्वा पुत्रशदिनी । सा चित्रपप्रच्छन्ना ययो शाक्तमठाश्रयम् ॥ ४३ ।। घर को बेंच कर तथा सम्पूर्ण सम्पत्ति को लेकर, सौतेले पुत्रों के भय के कारण, यह विचित्रवेप मे छिपार अर्थात् एक अपरिचत के वेपको धारण कर शाचमठ में चली गई॥४३ ।। कृष्णीकृतश्वेतकचा रङ्गाम्यद्नेन भूयया । "जलेर सा वत्र नापण्याङ्गनामात् ॥ ४४ ॥ वहाँ पर उसने अत्यधिक रन (सिजार) लगाकर अपने शिर के बालों को पूर्णतया कृष्ण का पना डाला था। अपने इस यनावट के कारण यह वहाँ युवती वेश्या की माँति प्रतीत होती थी ॥४४॥ चलित्वाम्यागता" "वणिग्यथः इति तस्याः प्रवादन बभूवाधिकरिक्रयः॥ ४५ ॥ .....
समयमातृका
वहाँ के लोगों में यह बात अतिशीघ्र फैल गई कि 'बाहर
मुन्दरी एवं माध्वी वणिक स्त्री आई है। इस प्रकार के प्रवाद के कारण
उसकी अधिक बिक्री हुआ करती थी ।। ४५ ॥
टिप्पणी-वहाँ पहुँच कर सुगवती ने अपने को वणिग्वधू बतलाकर अपनी
एक दुवान कायम कर ली थी।
सत्यासत्यकथातचमविचार्य
धारति ।
गतानुगतिकत्वेन प्रादग्रणयी जनः ॥४६॥
संसार के व्यक्तियों को यह अबस्था है कि 'भडियाधतान' की
भाँति वे, फैननेवाली झूठी सघरों में बहुत शीघ्र विश्वास कर लेते
हैं। इस प्रकार वे सत्य एवं असत्य कथाओं के तत्व को बिना विचारे
ही किसी बात की ओर दौड़ने लगते हैं ।। ४६ ॥
क्षीणजिह्वाधरकरा कोपपानेन कामिनाम् ।
छिन्नागुलिः सा जग्राह रागवेलां पुनः पुनः ॥ ४७॥
कामी लोगों के समूह में कोपपान (मदिरापान ) के कारण
अर्थात् मत्तता की अवस्था में उन्मत्त कामुक व्यवहार के कारण उसको
जिता, उसका अधर एवं कोमल कर, दन्ताव तया नखक्षत के कारण,
परिव्याप्त हो जाते थे। इस प्रकार छिन्नाहुलि वाली वह स्नो पारम्बार
रागवेला (अनुराग अथवा रक्तिमा) को धारण करती थी।॥ ४ ॥
सा चौरद्रविणादानाद्गृहीता शुठचेटकैः ।
प्रत्यक्षापहवरती मुबद्वा बन्धने धृता ।। ४८ ॥
वह चोरी किये गये धन को ग्रहण करती थी। इसी प्रकार के
कार्य में यह एकयार दुष्ट- नौकरों अथवा दुष्ट व्यभिचारियों के द्वारा
पकड़ी गई । परड़ी जाने पर जब उसने अपने कृत्य को स्वीकृत न
करके छिपाने की चेष्टा को तब बन्धन (हथकड़ी) में पाँधकर
चन्धनागार (कारागार) में डाल दी गई।॥४॥
३१ द्वितीयः समयः तत्र वन्धनपालेन भुजंगाख्येन संगता। निर्विकल्पमुखा चके मत्स्यापूपमधुक्षयम् ॥ ४९॥ वहाँ भी उसका व्यभिचारकर्म जारी रहा। यह कारागार के रसक 'नुनङ्ग' के साथ व्यभिचार में आसक्त होकर पूर्ण आनन्द का मजा लेती हुई मत्स्य, अपूप (पुआ) एवं मधु ( मदिरा एवं शहद) का सूब उपभोग करती थी ।। ४६ ॥ माध बन्धनपालस्य गाढालिङ्गनसंगमे । क्षीरस्य चुम्बनासक्ता जिहां चिच्छेद मुक्तये ॥ ५० ॥ एक समय, जब कि गढिालिङ्गन की प्रक्रिया प्रचलित थी, चुम्बन में आसक यह स्त्री अपनी मुक्ति के लिये मदिरा के नशे में मत्त कारागार के रक्षक की जिहा को काट डाला ।।५०॥ सा जिह्वाछेदनिःसंज्ञं तमाक्रन्दविवर्जितम् । स्त्रीवेपं स्वांशुकैः कृत्वा जगामोक्षिप्तरङ्खला ॥५१॥ जिहा के कट जाने से वेहोश अतः आक्रन्दन से रहित उस रक्षक को देखकर उस स्री ने वेणी को फेंककर तथा अपने वनों से, अच्छी प्रकार से, घूघट आदि बनाकर वहाँ से निकल भागी ॥५१ ।। सा भग्ननिगडा प्राप्य रजन्यां विजयेश्वरम् । महामान्यमुनास्मीति जगादानुपमाभिधाम् ॥ ५२ ॥ वेणी रहित वह स्री रात्रि में ही विजयेश्वर के पास पहुँची। यहाँ उमने कहा कि मैं महामन्त्री की पुत्री हूँ। मेरा नाम 'अनुपमा' है।॥५२॥ सा तत्र भोगमित्रस्य प्रीत्या रनरवाफिरत् । पुराणचित्ररूपस्य यौवनस्याल्पशेपताम् ॥ ५३॥ यह यहाँ पर मोग (सुरनि) के मित्र प्राचीन अर्थात् मतिप्रौद्ध तथा प्रसाधनों के द्वारा विचित्र रूप से सनित रूप से समन्वित समयमारका यौवन की स्वल्पावशिष्ट अवधि को प्रसन्नतापूर्वक रनों से परिव्यात कर दिया अर्थात् यहाँ वहाँ पर रत्नों को धारण करके अपने सौन्दर्य को वृद्धिगत करती थी ।। ५३ ॥ यत्नोत्क्षिप्तकचा कचायततया 'करे वद्धापाटलपहकेन सरलस्थूलाञ्जनव्यञ्जना । नासानिधि वाममा च वदनं संछाद्य विद्याधरी केयं नृतननिर्गतेति निदधे मा मुग्धममोहनम् ॥ ५४ ॥ प्रयनपूर्वक स्रस्तस्तनों को ऊपर उठाकर अर्थात युवतियों के स्तनों की भाँति उन्नत, सीधा एव कठोर बनाकर, शिर के बालों की पर्यात लम्बाई के कारण एव हाथ मे चाँधे हुये रक्तवर्ण के पट्ट से द्विगुणित शोभावाली ऑसों में सीधे अर्थात् कान की ओर बढ़ने वाले एष स्थूल अञ्जन लगा हुवे यह स्त्री जब घन से अपने आधी नासिका पर्यन्त मुस यो ढक पर निकलती थी तब "यह कौन सी नवीन विद्याधरी निक्ली है ?" इस प्रकार कहने वाले भोले भाले व्यक्तियों को सम्मोहित कर लेती थी।। ५४ ॥ तामेकनारं दृष्ट्वा नग्नां प्रथमकौतुकात् । पधापि तेन वैरम्यान कश्चित्पुनराययौ ॥ ५५ ॥ यद्यपि चाह्य कृतिम प्रसाधनजन्य उसके सौन्दर्य को देखकर प्रथम वार उत्पन्न उत्कण्ठापे कारण लोग उन पाम जाते थे और यदि से एक बार भी नग्न ( यथार्थ रूप में) देख लेते थे तो उन्हें उसमे इतनी पिरमना मालूम होती थी कि वे पुन' दूसरी बार उमरे पास नहीं जाते थे। १५ ॥ टिप्पणी-नास्तियौवना ली मिरे हवे चाम वाले शरर को देखकर मला किम परि को टम साप संभोग में अानन्द हो मुके। यही रोग के रस्य का कारण होता यां द्वितीय समय ३३ शीतशालेन गिशिरे दीपमालेन वासरे । जीर्णा निर्माल्यमालेप वेश्या कस्योपयुज्यते ॥ ५६ ॥ जाई की ऋतु मे शीतल घर, दिन मे दीपमाला एव जीर्ण, निर्मान्य माला की भाँति गलितयौवना वैश्या मला किस व्यक्ति के द्वारा भोगी जा सकती है ? अर्थात् कोई भी व्यक्ति वृद्धा वश्या के समोग की ओर आकृष्ट नहीं होता ।। ५६ ।। सा तर ग्राहकामान्मृप्यन्ती पधिकांश्चलान् । मंध्यायामञ्चलाकः स्मल्पमाटीमयाचत ।। ५७॥ वह वहाँ पर ग्राहक कामुकों के अभाव में कुछ चचल अर्थात् कामुक चित्तमाल पथिकों को सोजती हुई सन्ध्या के समय अपना अञ्चल फेला फैला कर आनीविरारूप मिक्षा माँगा करती थी ।। ५७ ।। तपस्विनी शिपाख्या सा सङ्गं चक्रे तपस्विना । वत्र भैरवसोमेन भिक्षाभक्तार्घदायिना ॥ ५८॥ जीविका के अन्य साधन को न देखकर यह तपस्विनी हो गई और उसने अपना नाम 'शिसा' रस लिया। उस अवस्था में 'शिसा' ने "भैरवसोम" नामक तपस्वी का माय पकडा । भैरवसोम' अपनी मिशा भोजन में से आधा उस 'शिसा' को दिया करता था॥५॥ भस्मस्मेरशरीरसंचितरुचिर्दत्ताक्षिजीवाञ्जना बिभ्राणा स्फटिकाक्षसूत्रममलं वैचित्र्यमित्रं गले । निःसंकोचनिलीनकञ्चककचत्सुस्तब्धपाहुस्तनी साभूत्योमरिधायिनी हतधियां भिक्षाक्षणे निर्गता ॥५९॥ भम्म लेपन से शरीर के सौन्दर्य का सचय करनेवाली, आँसों में जीया (वचा) के अञ्जन को लगानेवाली, कण्ठप्रदेशमे वैचित्र्यलयुक्त, निर्मल, स्फटिर की माला पहनने वाली, शरीर में अतिमात्र चिपरे ३ सम्मा ३४ ममयमारका हुए अर्थात् बिना संकोच के कसकर पहने गरे कचुक (कृती, ब्लाउज) से कसे अत एव सुगठिन किये गरे वाहु और न्न बाली, वह स्त्री जब मिशा के लिये निकलवी थो तब निर्बुद्धि लोगों के मन में विझोम उत्पन्न कर देती थी अर्थात् उसे देखकर बहुत से निर्बुद्धि व्यक्ति कामातुर हो उठने ये जाते तबाथ दुर्मिझे मिक्षाभक्तेऽतिदुर्लभ । सा रात्री देवमात्रादि ययो हृत्त्या तपस्विनः ॥६॥ जब उसके जीवन का क्रिया कलाप इस प्रकार चल रहा या वमी वहाँ दुर्मिज्ञ पड़ा। ऐमी अवस्था में मिझा-मोजन का मिलना भी कठिन हो गया। परिस्थिति को इस विकटवा में एक रात को वह "शिसा' उम तपस्वी के देवामूषण आदि को लेकर वहाँ ने चली गई ।। ६०॥ सा कृत्याश्रमकं गत्वा विहारं हारितस्थितिः। भिक्षुकी वज्रघण्टारख्या बभूव ध्याननियला ॥ ६१ ॥ परिस्थिति की मारी यह मितुझी 'कन्याश्रमक' नामक विहार में जाकर, ध्यान तत्पर होकर, रहने लगी। वहाँ उसने अपना नान 'बजघण्टा' रस लिया था ।। ६१ ॥ पात्रं तत्र गुणोनितं करतले कुलाऽय भिनास्पदं जीणं कामुककूटरागस कापायमादाय मा । चक्रे मुण्डनमण्डनं परिणमत्कृप्माण्डखण्डोपमं पिण्डायै बिटटकनापरिचयश्रेणीविहारं गिरः ॥ ३२ वहाँ पर उनने संन्यामिनियों के योग्य, मिशालायक पात्र को हाथ में लेकर, कामुकन्यक्तियों के एटिल राग के सहरा अथरा कानुन व्यनियों के राग के महश, जो गेरा बन्न को लेकर, पिण्ड (काल, प्रास) की प्रात्रि के लि, कामुक व्यक्तिों के ठोंकने के आम्यम्थल (कामुक व्यक्ति संभोगोद्दीपन के लिये दाम-परिहान के
द्वितीयः समयः
मध्य प्रेमपूर्वक वैश्याओं के शिर में हाथ से ठोंका करते है), शिर को
मुण्डिन करा दिया ! मुण्डित किया हुआ उसका शिर ऐसा लगता था
जैसे पके हुवे माण्ड ( कोहड़े) का खण्ड हो ॥ ६२ ॥
पवी मण्डलशिक्षायै प्रणतानां सदैव सा ।
गृहे गृहे कुलस्त्रीणां ददौ दौःशील्यदेशनाम् ॥ ६३ ॥
प्रणत अर्थात् प्रद्धालु व्यक्तियों को दिव्य शिक्षा देने में प्रवीण
वह स्त्री सदा घा घर में घूमकर कुलस्त्रियों को दुःशीलता की शिक्षा
दिया करती थी।। ६३ ॥
वश्यप्रयोगःश्यानां वणिजामृद्धिवर्धनः।
मन्त्रवादेन मूर्साणां सा परं पूज्यतां ययौ ।। ६४ ॥
व्यक्ति को अपने वश में करने के उपायों को बतला कर चेश्याओं
यी, सम्पत्ति बढ़ाने के उपायों को घनला कर व्यापारियों की एवं
मन्त्रों के द्वारा कार्य सिद्धि की बात कहकर मूसरों की परं पूज्यता को
यह पान हुई ।। ६४॥
तत्रोपामकदासेन मङ्गलास्येन संगता ।
सा गर्म दम्भभोगानां मृत मिन्नमिवादथे । ६५ ।।
वहाँ पर उस स्त्री ने मठ के पुजारियों की सेवा करने वाले मङ्गल.
नामक व्यक्ति के साथ संसर्ग के परिणाम स्वरूप गर्म को धारण
किया। उनका यह गर्म उसके आडम्बरपूर्ण मोगों का मूर्तिमान
निन था।। ६५ ।।
विच्छिन्ने पिण्डपाते मा लम्बमानमहोदरी ।
प्रस्ता धर्ममुन्सृज्य जगाम नगरं पुनः ॥६६॥
इस प्रकार जीविका के साधनभूत, साटम्बर से प्राम, भोजन की
प्राति के समान हो जाने पर, गर्म के कारण लन्यमान उदर वाली
"नी या पैदा करने के अनन्तर अपने वाहन मन्यामिनी धर्म
छोड़ कर पुनः नगर में प्रविष्ट हुई ॥६६॥
१६ समयमानुका कृटकेशवती तर चित्रसेनस्य मन्त्रिणः। पुत्रजन्मनि सा पुण्येः पत्ल्या धानी प्ररेशिता ॥ ६७ ॥ कृत्रिम पेश को धारण करने वाली वह स्त्री, वहाँ नगर में, चित्रसेन नामक राजा के मन्त्री के घर मे पुत्र पैदा होने पर उनकी स्त्री के द्वारा, सौभाग्यवश धात्री (घाइ) के रूप में अपने घर में रस ली गई ।। ६७ ॥ सार्धक्षीराभिधा धात्री सिंहपादसीस्थिता । बालोत्सङ्गा गृहं सर्व ग्रासीकर्तुमिक्षत ॥ ६८ ॥ यहाँ पर उस धात्री का नाम 'अर्द्धशीरा' रक्सा गया, यन वह आधा दूध अपने बच्चे को पिलाती थी और आधा मन्त्री के शिशु को । मन्त्री के बालक को गोद में लकर दिन भर बहलाने वाली यह घानी उम सम्पूर्ण गृह को ही मास कर नाना चाहती थी अर्थात् उसकी इच्छा उस सम्पूर्ण घर का अपने अधिकार में कर लेने की थी॥६॥ क्षीरसंक्षयरक्षायै संप्राप्तसरसाशना सा मन्त्रिमवने धावा धात्री पातीवृत्ताश्रियः ॥ ६९ ॥ दूध मे कमी न हो जाय एतदर्य उस धात्री को खूब सरस (विटा. मिन पूर्ण) भोजन दिया जाता था। इस प्रकार मन्त्री के घर में रहने वाली यह यात्री विधाता के द्वारा शोमा और सम्पत्ति का भाजन चना दी गई।॥ ६॥ कण्ठं विद्रुममालिका श्रवणयोस्ताडीयुगं राजतं स्थूलस्थूलनिमक्तिमक्तपटकप्राग्भारभाजी भुजी। गुल्फास्फालविलम्बिकम्बलघनारम्भा नितम्बस्थली धा याः संभृतभोजनरमिनपीभूतं पुराणं वपुः ॥ ७० ॥ सरस, उत्तम, पर्यात मानन के द्वारा उस धानी का पुराना टोला टाला शरीर नवीन सा हो गया। उसरे फण्ठ में विद्रुममाला एर
द्वितीय समय
श्रवणों में रक्तनिनित दो कर्णाभूषण शोमा पाते थे। उसकी मोटी-
मटी नुनाएँ ऊपर की ओर निरिक्तरूप से प्रतीयमान, ससक्त मास-
पिण्टी से अपन ऊर्ध्व गुम्ना को यातित करती थीं। उसकी नितम्न
न्थली मोटी अन एव पनी थी। चमके चलने के समय गुफ (टखनी)
के बालने से हिलनमान केशपाश उसरे नितम्ब के आकर्षण को
वृद्धिगत करते थे। ७०॥
ततस्तदपचारेण शिशा जातज्वरे व्यघात् ।
वैद्यदत्तोपनामा मा मत्स्यम्पपरिक्षयम् ।। ७१ ॥
पुखममय के अनन्तर उस धात्री के सान पान एन आचरण-
मम्बन्धी गडरही के कारण, स्तन्य की विकृति से, बालक ( मन्त्री
का लडका ) बीमार पड गया। अत धैा ने उसे उपनाम करने में
आता दी। अपन इन उपवास के दिनों में यह पानी केवल मदती
का सूप (रम)ही लेती थी।
पानीयं विनिवारणीयमहितं भक्तस्य वातर का
द्विवाण्या दिनानि धाविदयया घानीरमः पीपताम् ।
जीरत्वेप शिशुर्मजस्व विविघरम्योस: मंपदं
वैद्यनेति निवेद्यमानमरोत्मा समेवाश्रुतम् ॥ ७२ ।।
वैद्य ने उम धात्री से इम प्रकार कहा -'पानीय (मदिरा अथवा
नल) अदितर है अत उमका परित्याग कर देना चाहिये अथवा
अग्तिकर पानीय नही पीना चाहिये, मात (पका चापन ) मी अहित
कर होगा अत वह भी अप्राश है। पालक पर स्वमारत वर्तमान
याची (घाइ) की दया के कारण दो-तीन दिन तक धात्री (आमला)
का रस पीओ। इस प्रकार उन यर बालक स्वस्थ हो जाय तब
तुम विविध उत्सवपूर्वक इसकी सम्पति का सेवन करो।" वद्य के
इम तरह के आदेश को सुन कर उस पात्री ने इन समी पातों का
निनको नसने कभी नहीं मुना था, पालन किया ॥७॥
समयमारका दृष्ट्वा तनातुरं वालं तृणनत्सुतरागिणी । सा ययौ निर्दया रात्री गृहीत्वा हेममतिकाम् ।। ७३ ॥ वस्तुत स धानी का बालक पर स्नेह तृणवत था। अत बालक को मरणामन्न देसकर निर्दय वह स्त्री रात्रि मे शिशु के सुवर्ण निमित आभूपण आदि को लेकर अन्यत्र चली गई ।।३।। ततः प्रत्यन्तरिपये प्रभूवच्छागगोचरा। ख्याता धननतीनाम स्फीता चक्रे गृहस्थितिम् ।। ७४ ।। यहाँ से भागने के अनन्तर वह स्त्री पर्वत के समीप से गॉव में जाकर रहने लगी और अपने पास बहुत से बकरे वारियों को रस लिया । वहाँ के लोगों मे वह धनवती के रूप में प्रसिद्ध थी। यहाँ रह कर उसने गृहस्थी को पर्याप्त समृद्ध कर लिया था ॥५४॥ साथ मेघापघातेन तस्मिन्पशुधने यने । सकाय हा सापाये यावे चर्मापशेपताम् ॥ ७५ ।। गृहीत्या पशुपालस्य स्थूलं निक्षेपकम्बलम् । गत्वावन्तिपुरं चक्रे ताराख्यापूपविक्रयम् ।। ७६ ।। कुछ समय के अनन्तर अत्यधिक प्रपल वृष्टि होने के कारण अपने शरीर की भाँति सम्पूर्ण पशुधन के जगल मे अथवा जल मे विनष्ट हो जाने पर, चमडे (चर्म) मात्र के हाथ लगने पर, यह स्त्री पशुपाल (पशुओं के रक्षक चरवाहे) के द्वारा अपने पास धरोहर रूप में रक्से बहुत से कम्बलों को लेकर वहाँ से अवन्तिपुरी को चली गई जहाँपर उसने अपूप (पूआ) बेचने का कार्य प्रारम्भ पिया || ७५-७६ ॥ क्रीला गणेशनद्यमण्डकानां करण्डकम् । पुनः पाफोप्मणा नित्यमकरोद्विक्रयं पथि ॥७॥ गणेश को नैवेद्य के रूप में समर्पित अण्डों की टोकरियों को सरीद द्वितीय समय कर और उन्हें अग्नि से सिद्ध कर अर्यान् पका कर यह पुनः उन्हें मार्ग में बचा करती थी। यही उसका दैनन्दिन कार्य या ॥७॥ टिप्पणी- यहाँ पर अग्डों से, अति मोदकपिन्ड का अर्थ समझना चाहिये। इन्ही मोदक चिन्हों को खरीद कर और उन्ह पुन ताना कर यह पंचा करती थी। मामुक्त गृहनारीणां प्रभूतोजामतण्डुलम् । प्रभूतलामलुन्धानां मूलस्यापि परिक्षयः ।। ७८ ।। अत्यधिक लाम के लोभी व्यक्तियों के भूलधन का भी परिक्षय हो जाता है। जर उस खी का यह व्यापार न चल सका और पास की मम्पत्ति भी ममात हो गई तभ यह गृहनारियों के द्वारा फेंके गये तण्डुलों को अर्थात् मोजन को ही साती थी॥ ८ ॥ पान्धकन्यांघृताम्यक्ता कृत्वा कुशलिकामिधा। मिथ्यासन्नविवाहार्थमयाचन गृहे गृहे ॥ ७९ ॥ उसने अब अपना नाम कुशलिका रस लिया था । कुशलिका मार्ग में भीख मांगनेवाली एक लड़की के शरीर में घृत पोतकर घरों मे घूम-घूम कर यह कह कर धन माँगती थी कि 'मुझे इस कन्या का विवाह अति शीघ्र करना है, अतः इसके लिये आप सहायता करें ॥७॥ ततः सा पजिका नाम यूवशालापुर स्थिता । कपटातशलाझानामझरोद् गूढविक्रयम् ॥ ८॥ इनके अनन्तर उसकी ने अपना नाम 'पक्षिका' रस कर, धूत शाला के मानने स्थित होकर गनरूप से कपटासशनाका का विक्रय किया करती थी।1८॥ टिप्पणी-पटाभरालय जुमा (न) ऐलने का यह पाया है जिसके मेरने में एक विशेष प्रभर ने थाराचे ओक्षित होती है और ऐसा करने से दूसरा उमारी भवरस ही परावित हो रहा है।
समयमारका
सा पौप्पिकी मुकुलिका कृत्वा निर्माल्पविक्रयम् ।
देवप्रासादपालानां मूल्यं भुक्त्वा ययौ निशि ॥ ८१ ॥
इसके अनन्तर अपने को 'मुकुलिका' नाम मालिन यतलाने
वाली अथवा अपने आपको पाटलिपुर से आई हुई 'मुकुलिका' बनलाने
याली यह स्त्री देवताओं के निर्माल्य कोच कर अपनी जीविका चलाती
थी। कुछ समय बीत जाने पर देव मन्दिरों के रक्षकों का रण साफर
रानि मे वह यहाँ से अन्यत्र चली गई ।। ८६ ॥
ग्रामयात्रासु मा वारिमन्त्रदात्री हिमाभिधा ।
रङ्गप्रेक्षणबालानां निनाय वलयादिकम् ॥ ८२॥
अपनी ग्राम यात्रा के प्रसङ्ग में उसने अपने आपको पौसला
(प्याऊँ) चलाने वाली 'हिमा' बनलाया। हिमा' नाटक आदि देखने
मे तल्लीन बच्चों के बलय आदि करा चुरा लाया करती थी।। ८२ ।।
मा नक्षत्रपरावृत्तिं कृत्वा पट्काप्टकेप्वपि ।
विवाहेप्नकरोयत्नं वर्णाख्या कूटवर्णनैः ।। ८३ ।।
कुछ समय के अनन्तर उसने अपना नाम 'या' रक्सा । 'पर्णा'
पट्चक्र एव अष्टपक मे नक्षत्रों का विन्यास एवं परिवर्तन करतो
आडम्बरपूर्ण असत्य वर्णनों के द्वारा लडको एर लड़कियों के विवाह का
योग बैठाने का कार्य करती थी।।३।।
गणविज्ञानिका मुग्धप्रत्ययः ख्यातिमाययों।
नामाभिज्ञानमात्रज्ञा न तु चौरान्विवेद सा ।। ८४ ॥
भोली भाली जनता का विश्वास था कि यह 'वर्णा' ज्योतिष फा
बहुत अच्छा ज्ञान रखती है। उनके इमी विश्वास के कारण उसे
पड़ी प्रसिद्धि प्राप्त हुई यह एकमात्र नाम को पहचानने वाली थी
अर्थात् चोरों का नाम निकालने वाली थी, किन्तु चोरों की सही पहचान
घह नहीं कर सकती थी।॥१॥
द्वितीयः समयः भावसिद्धयभिधाना सा देवतावेशधारिणी। उपहारान्प्रयच्छेति बदन्ती नायदत्परम् ॥ ८५ ॥ पुनः उसने देवता के वेश को धारण कर अपना नाम 'भावसिद्धि' रक्सा । 'भावसिद्धि' लोगों से यही कहा करती थी कि "उपहार समर्पित- करो' इसके अतिरिक्त वह और कुछ भी न बोलती थी॥८५ ॥ तत उन्मत्तिका भूत्वा सा नग्नालिङ्गिना थभिः । कुम्भादेवीति विख्याता प्राप पूजापरम्पराम् ।। ८६ ॥ इसके बाद यद उन्मत्त स्त्री नग्न होकर रहती तथा कुत्तों की वृत्ति अपनाने वाले अर्थात् आचार पिहीन युवकों के द्वारा आलिगित होती थी। वह 'कुम्मा देवो' के नाम से विख्यात थी। लोग सिद्ध स्त्री की बुद्धि से उसकी बहुत पूजा करते थे ।। ८६ ॥ टिप्पणी-अतीत में अवन्ति नगरी कापालिका का गढ़ थी। कापालिक मदिरा पीते, रम्मत्त एवं नग्न रहते थे। पूजा के समय श्रयदा सामान्य समय में भी उन्मत्त आचरण-दी का आलिशन एवं सम्भोग आदि-उनके प्रधान कर्म थे। उनका विश्वास था कि इसने उन्हं सिद्धि मिलेगी और नके देव (शिव) प्रमभ भी होंगे । आचार्य शहर की भी इगो प्रार के आचरण वाले फापालिक के साप भेंट का उल्लेख मिलता है। सिप्रोपदेशलुब्धेन कुलदासेन मन्त्रिणा । साचिंता प्रयया हत्या पूजाराजनभाजनम् ॥ ८७ ॥ अतिशीघ्र उसके उपदेश से गुग्ध अथवा 'भिप्रा' नदी के तट पर दिये गये उस स्त्री के उपदेश से मुग्ध मन्त्री 'कुलदास' ने उसका बड़ा आदर सम्मान और पूजन किया। अबमर मिलने पर पह मन्त्री जी के चाँदी के पने पूजा के बर्तनों को ही लेकर चली गई ।।८७ ॥ साध तक्षकयात्रापां चलहण्ठा दिनत्रयम् । कल्पपाली कला नाम विदधे मद्यविक्रयम् ।। ८८॥
४२
समयमातृका
वहाँ से भागने के बाद अनवस्थित व्यवहार वाली वह स्त्री तक्षक-
यात्रा में (तक्षरनामक स्थान की यात्रा नेतक्षक के साथ यात्रा
नं, सूत्रधारिक यात्रा में, अथवा सर्प के समान वृटिल यात्रा में)
अपना नाम 'कल्पपाली फला' रस र तीन दिन तक मदिरा बेचने
का कार्य करती रही।। ८८ ॥
कटिघण्टाभिधानस्य सा क्षीरस्य तपस्विनः ।
रात्रौ तत्र प्रसुप्तस्य घन्टाः सप्त समाददे ॥ ८९ ॥
यहाँ पर उसने रात्रि मे सोये हुए, मदिरा
मत्त, 'कदिघण्टा
नामक तपस्वी के सात घण्टों को चुरा लिया ।।८।।
ततः सा भूरिधत्तूरमधुना नष्टचंतसाम् ।
पान्धानां सर्वमादाय निशि शूरपुरं ययौ ।। ९० ॥
इसके बाद कपटपूर्वक अत्यधिक घत्तर से मिश्रित मधु को
खिलार और उसके फलस्वरूप वेहोश होने पर यात्रियों के सम्पूर्ण
सामान को लेकर यह रात्रि में ही 'शूरपुर' को चली गई ।। ६० ॥
एवं कृत्वा लवणमरणो भारिकं भर्तुमंज्ञं
तस्मिन्निद्रावशमुपगते रात्रिमन्यः क्षिपन्ती।
प्रातया पृथुकटितट संकटे दीर्घदाम्ना
मूर्ना भारं दिवममखिलं सा विलासैरुत्राह ॥९॥
ममुद्र की ओर बढ़ने वाले मार्ग पर 'भर्ता' नाम वाले भारिक
(चोमा ढोने वाले ) को इमी प्रकार घत्तूर मिश्रित मधु सिलाकर और
वेहोश हो जाने पर उसका मामान लेकर दूमरे लोगों के माय रात्रि
बिताती हुई प्रातःकाल अपने पृथु कटिवट को लम्बी रस्मी से कसकर
भाँधपर उस स्त्री ने विलासपूर्वक पूरे दिन तक अपने शिर पर चोरी
किये गये अधया ठगकर प्राप्त किये गये सामानों के गट्टर को
ढोया ॥११॥
द्वितीयःसमयः निशुप्रतटैर्महाहिमपथैरालय घोरानिगरीन् बम्नानाम दिनावसानममये मान्याङ्गनारूपिणी । हेमन्ते वसनावगुण्ठितमुसी पञ्चालघारामठे शीतार्ता घनलम्बाम्बलपती चक्रे स्पृहां कातरा ॥९॥ नितरा शुक अवघट, बड़े बड़े बर्फीले मार्गों से भयकर पतों को लाँध कर हेमन्त ऋतु के सायकाल के समय वह स्त्री 'बम्बई पहुंची। उसका स्वरूप कुलीन स्त्री की भाँति था। उसने घूघट से अपने मुस को ढंक रक्खा था। उसके शिर के बाल घने और लम्बे थे। वह शैत्य के कारण काँप रही थी। वहाँ पहुँच उसने पञ्चाल देश के राजा के द्वारा संस्थापित 'धारामठ' में रहने की स्पृहा की ॥१२॥ साथ सत्यवती नाम वृद्धा ब्राह्मण्यवादिनी । बम्राम मागरद्वीपरशनामरणां भुवम् ॥ ९३॥ अपने आपको मत्यती नामक ब्राह्मणी बतलाने वाली उस वृद्धा स्त्री ने समुद्र पर्यन्त पृथिवी पर भ्रमण क्यिा ।। ६३ ॥ क्वचिद्योगकथामिज्ञा कचिन्मासोपवामिनी । कचित्तीर्थार्थिनी मिथ्या सा परं पूज्यतां ययौ ।। ९४ ॥ कही पर योगाभ्याम के बहाने; कहीं पर मासपर्यन्त उपवास करने के बहाने से, कहीं पर तीर्थयात्री बनकर, झूठी वह स्त्री लोगों के परम प्रद्धा का भाजन होती थी॥४॥ वेघधूननधूपेन मूर्सश्रद्धाविधायिनी। महतीं प्रतिपत्तिं सा लेभे भूपतिवेश्मसु ॥ ९५ ॥ प्रच्छन्न रूप से मात यस्तु को अमातरूपसे प्रकाशित कर देने फे कारण, मूरों को अपने प्रति प्रद्धालु पनाने वाली उस म्ही ने राजाओं (पनिकों) के घर में अत्यधिक घन एवं सम्मान प्राप्त किया ॥६५॥ - ४४ 1 समयमातृका सेनास्तम्भ करिष्यामि राजा इलेति वर्णनम् । भुक्त्ता हेम ययौ रात्री प्रत्यामने रणोद्यमे ॥ ९६ ॥ वाँ ग्मने राना मे क्यापि में आपरे शत्रुपक्ष के सैन्य फा स्तम्भन कर दूंगी।" परिणाम-स्वरूप रानाने उमे प्रसून सम्पनि टी और उसरा बडा सम्मान दिया। रिन्तु मग्राम ६ उपस्थित होने पर रात्रि में ही वह चुपरे से भाग निकली ।। ६६ ।। केदाराम्गयात्राद्वगगास्नानादिवादिनी तत्फलं उन्धमाधाय मार्थेभ्यः माग्रहीद्धनम् ॥ ९७ ॥ रेदारनाथ का दर्शन, गया में श्राद्ध और गगासागर तथा गा में स्नान कर आयी हू। ऐसा कहकर क्या वहाँ के कुछ फल एवं उन्धन (रे सर यूठे होते थे) को धनिरों सामने रखकर वह रनमे घन लिया करती थी।। ६७ ॥ नष्टच्छायोपदेशार्थ सार्थिवा पथि दस्युमिः । स्ढा शिरिफया नपं प्रपलाग्य ययो ततः॥९८ ॥ मार्ग में नव वह जा रही थी तब कुछ दस्युओं ने उसकी इमलिये प्रार्थना की कि वह उन्हें विस्मृनि को अवस्था में सही मार्ग अयरा यस्तु का उपदेश करेगी 1 यह उनके द्वारा वर्षापर्यन्त शिविका (पालकी) पर चढा कर ढोई नाती थी, किन्तु अन्त में वह यहाँ से भी भाग कर चली गई ।।१८॥ चीनानानामण्डानि साथ रुद्राक्षमंत्रया। दढी मूल्येन शिष्याणां स्द्राक्षाधिस्यपादिनी ॥ ९९ ॥ वहाँ से भागने के बाद यह नी रुद्राम के माहास्य को पतला- भवलाकर मूर्स शिष्यों मै मूल्य लेकर रवान के नाम पर चीनानक- (पृक्षविशेष) के अण्ट (फन के मोवर की गुठली) को धेचा करती थी ।
४५ द्वितीयः समयः पिलसिद्धिकृतश्रद्धागृहीताभरणाम्बरान् सा चिक्षेपान्धकूपेषु पातालललनोत्सुकान् ।। १०० ॥ उसके मन्त्रों के द्वारा पाताललोकगामी बिल (सुरंग) निर्माण में श्रद्धा रसने वाले लोगों के, जो कि पाताललोक की सुन्दरियों के लिये लालायित रहते थे, वन एर आभूपण आदि को लेकर वह उन्हें अन्ध-कूपों में गिरा देती थी॥ १० ॥ अगविविपास्मीति मुस्निग्धरिपगण्डका । सा वन्ध गले मालां विपजाद्गुलिकाभिधा ॥ १०१ ।। कहीं कहीं वह यह कहा करती थी कि मेरा नाम 'विपनाङ्गुलिका' है। 'मेरे अङ्गों में विष व्याप्त है ।' वह सुन्दर, चिकने, विपलिन गण्डकों (गंडा) में गुम्फित माला को अपने गले में याँधा करती थी।। १०१॥ शुल्कस्थानेषु सर्वेषु शौकिकेभ्यः स्वभावतः । मुहर्तमोहनं पुप्पं सा दचा स्वेच्छया ययौ ।। १०२ ।। समप्र शुन्क (चुंगो) के स्थानों में अधिकारियों को 'मुहूर्तमोहन' नामक पुष्प, जो कि देसने में पहुच सुन्दर होता था, देकर वह स्वेन्छ- या, मिना किसी प्रकार के अवरोध के, एक स्थान से दूसरे स्थान को चली जाती थी॥ १०२।। वर्षाणां में महतं गतमधिकतरं वेमयहं घातबादं सिद्धो मे वाक्प्रपना करतलकलितं पुरं कामतत्त्वम् । उबयां गर्नसकृितसम्लगुरुग्रामभक्त्या तयास्या- मित्याग्यानेन नीतावरणतललिहष्टकुराः कुकुरत्वम् ॥१०३॥ वह लोगों से कहा करती थी-'मेरी आयु के फई सदन वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। मैं घातु (सोना, चांदी आदि) बनाने की पता को मारती हूं। मुझे सारी सिद्ध है। सेलो लोग कामतर मेरे हम्तगत है । गर्न के कारण सम्पूर्ण गुरुननूहों की समयमाहा भक्ति को कम करनेवाली उस स्त्री के द्वारा कथित उक्त बातों को सुनकर बड़े बड़े ठरवुर (समाज के विशिष्ट एवं धनी व्यक्ति) भी, उसरे चरणचुम्बन को करके छकुरभाव को प्राप्त होते थे॥१३॥ पूजामा भजन्ते जयनुतिषु नतिं दिक्षु काम्बोजभोजाः सेनाशुकास्तुरुप्काः परिचरणरसे किंच चीनाःप्रलीनाः। उत्कण्ठााखिगाः परिचरणविधी पीडयन्त्येव गौडा दम्भारम्भेण तस्या निदधति कुमुमोत्सङ्गतामङ्गबङ्गाः॥१०४॥ उसये. दम्मपूर्ण कार्य से पूजा के लिये तत्पर काम्बोज को प्रजा जयकार पूर्ण स्तुतियों के सन्दर्भ में उसके सामने नमन किया करती थी, तुरुक ( यवन जाति-रिशेप ) उसकी सरस सेवा किया करते थे, चीनदेश की जनता भी क्या उसी परिचर्यारूपो रस में नहीं लीन रहा करती थी ? अर्थान् चीनी लोग भी उसकी सेवा में आनन्द समझने ही थे। त्रिगर्त (त्रिगत को 'उलघर' भी करा जाता था। इसकी स्थिति दक्षिण-पश्चिम भारत में थी) की जनता भी उसके दर्शन एवं पूजन के लिये उत्कण्ठित रहा करती थी; गोट प्रदेश की प्रज्ञा भी फष्ट सहन कर भी उनकी सेग शुश्रूषा करती थी, मह एवं व देश के निवासी भी उसकी पूजा के लिये प्रसून लिये तत्पर रहा करते थे।। १०४॥ टिप्पणी-स्कन्दपुराण के अनुसार गोड देश को स्थिति बंगाल में प्रारम्भ कर ईरान दोर की ओर दवाई गई है :--"वंदेशं समारम्प भुवनेगादर शिरे । गेटदेगः समास्मात' दंगाल में प्रानुनिक भागरपुर के पास पास का प्रदेश भंग ऋदा गाता था। प्रान्ता नहीं जलनिधिप्रथितामोपां मायाचिनीतिरिदितारितोनतिः मा। प्राप्ता पुनर्निजपदं तनुपीरगपा क्षीणोऽपि देहमिन कस्त्यजतिम्बदेशम् ॥ १०५ ।।
द्वितीयःसमयः ४७ सागर पर्यन्त अरोप पृथिवी का भ्रमण कर, माया (छल-कपट) और दुर्नीति के माध्यम से निरन्तर बन्नति करने वाली वह खो शारीरिक बन और उत्साह के स्वल्पावशिष्ट हो जाने पर अपने मूल स्थान को लौट आयी । क्षीण शरीर की भाँति, ऐसा कौन है जो अपने देश का परित्याग ही कर दे ।। १५ ।। मा सर्वदेशपरिशीलितपभाषा प्रम्रटभूपतिमुताहमिति ब्रुवाणा । हिमाहुलिर्दशनखन्डितनामिकामा लालाटनीलतिलकविदिता ममैव ॥ १०६ ॥ नापित 'कलारती' से कह रहा है कि स्वदेश लौटने पर सम्पूर्ण देश के वेष एवं मापा से अमिन बह श्री मैं राज्यच्युत राजा की लड़की है" इस प्रकार लोगों से कहती थी। उसको अगुलियाँ एवं दाँत छिन हो गरे थे। नामिका मी सण्डित थी। उसके ललाट पर नीने नीने तिलक (तिल) पड़े हुये थे (वृद्धावस्था में लोगों के शरीर पर दिल पड़ जाते हैं)। उसका मैंने ही पहचाना ॥१६॥ सा चेत्प्रकीर्णधनगेहनिधानमी गृहाति लोमजननी जननोपदं ते। नकामिलोकमकलार्यममृद्धिमतां यत्नाद्विना मुतनु हस्तगतामांहि ।। १०७ ।। हे मुन्दरी : मम्पूर्ण घर में फैले हुरे धन के बनाने की रक्षा करने पाली मनीरूपा, लोम की मावा वह स्रौ यदि तुम्हारे जननी- पद को प्राप करे तब बिना प्रयन के ही कामीजनों की इम मन्पूर्ण धनतति को अपने हम्नगत ही ममौ ॥ १७ ॥ तस्मातामहर टटिलां गला स्वयं चलते मतां मकदार्थसार्थमरणः सिदध समभ्यर्थये समयनाका फिकिंवा कथयामि नैव जगतीं जानाति जेतुं घिया नान्यन्या गतिरित्युदीर्य हितकतर्ण ययौनापितः ॥१०८॥ इति श्रीव्यासदासापरात्पनेन्द्रनिमितायां नमनाहावा चरितोर- न्यासो नाम द्वितीयः समयः । इन लिये मैं स्वयं जाकर सम्पूर्ण धन की प्रानि के पाय को निद्धि के निचे कपट के कारण कृटित, सब कुछ जानने वाली, सी दी से तुम्हारी माता (रक्षाकी) माता बनने के लिये प्रार्थना करती हू। अधिक क्या क्या मैं कहू, इस जगती बुद्धि से जीउने का पार एकमात्र वदी जानती है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है।" ऐसा कटकर 'क्ताती' का तुम चिन्तक एवं हितका वह नापित अतिशीघ्र वहाँ से चला गया ॥ १८॥ इन प्रकार क्षेनेन्द्र के द्वारा निर्मित समयमाहा का परितोप- न्यास' नाम द्वितीय समय पूर्ण हुआ।
तृतीयः समयः 38185 अथ सर्यिजननी जन्नी वैशोषिताम् । मित्र समायमलिनामानेतु गन्तुमुद्यते ॥१॥ मंत्रोचक्लेशसंजातां मूरतामित्र रागिणाम् । आमन्नश्रीवियोगाना स्वापग्लानिरजायत ॥ २ ॥ इसके अन्तर मित्र नापिन के, सम्पूर्ण अयों की जननी, स्वमान' मलिन अर्थात् दुष्ट स्वभावधानी, युपती वैश्याओं की जननी (रक्षाकर्ती) को लाने के हेतु जाने के लिये उद्यत होने पर, अतिनिकट भरिन्य में सम्पत्ति पर शोमा के नाश को प्रात होने वाले कामुकों की सकोच एवं क्लेश से उत्पन्न शूरता की भाँति प्राणियों में निद्रा की अलसना नत्पन हु।। - ॥ मनस्नियने क्षीण स्वल्पशेपाम्बरः परम् । अलम्मत व रानी संध्याघाम्नि दिनेबरः॥३॥ शनै शन.दिनपी धन के क्षेप होने पर बहुत कम पशिष्ट सम्बर (किरप्पी व अया मायकाल के समय सकुचित आकाश) वाला रह सूर्य क्षण मर के लिये सध्या के तेज में आकाश से ल्टर गया।'३॥ मंम्पया विरागिन्या निम्म्तः परितापवान् । नीगगः नागडले चितप तपनम्तनुम् ॥ ४ ॥ अतिशतदा से राग (अनुराग अयवा लालिमा) को धारण करने पाली माया के द्वारा परियट अद सन्तर एक अनुराविहीन सूर्य ने अपने शरीर को मनर केरल में कनिया ॥४॥ तवन्तिमिग्नमाररिंगमापनापने कृप्यागुनमगनपथमादमायितम् समा- 10 नमयनाश तदनन्तर न्यानों के प्रमापन के नमर अन्धकार-मन् द्वारा अगुरनमूट से उन धूप के हवन के मनन्तर गत धूप भाँति आदरारिमा नरा अर्थात् जगुरु के धुयें की भांति अन्ध- शर चारों बार न गया 11 41 यामिनी शामिनीशर्मालगोपन तमः। दीपचम्परुमालाभिर्विधान्तिनिरमं ॥६॥ निशानी मुन्दरी से परीर्ण राराशी भावाला अन्दार दीपकल्पी चम्पक में नानाजों में असरद्ध एवमभायमान हो रहा या, अर्थात अंधेरे के कारण घरों में दीपक ल चुके थे ॥६॥ रिपनी-न्दरी नियों अपने वाट पुनरात को गोना के टिरे धार करता है। सो प्रार निगमदरा न म दान स्वरूप TRA" को मनाने अपार सोरालिका हो । जय सअवनितामापल्यालरुच्युतम् । शनादाय दन्तपत्रनिवाम्बरे ॥ ७ ॥ इनके बाद स्वर्ग की अराजों के नापल्यर नद (ब एक ही मुम्म में प्रेम करने गनी अनेक निवां उनके नाय नावान करने के तिरे परलर लइती गेन' उनका व लडना 'नापन्चकनी गाने अभिहित किया जाता है।) के मनय नि हुने ननपत्र (हायो के गत से निर्मित निनों के करल पर धारा करने जामुन विगेष) नानानि नामाश में नचन्द्र टीचर हुआ 11 011 नीरमपीशन्ते दिनान्ते तुहिनविपि । सहित मुदित लोके बभूव महनो नरः ॥ ८॥ सम्मा मनर में निशा नायिका केरम चन्द्रमा केकी पर प्रननग्न में मनोना मनवाया 11-11 मुक्तां महसम्मपदमपरती: वृन्वा उनम्मरणमात्रटनावशेषाम् ।
तृतीय ममयः वेश्यन काममनपेक्षितपक्षपाता क्षिप्रं शशाङ्कविमनामरणा बभूव ॥९॥ अन्वर के दिन के समय भगी गई सूयही सन्मत्ति को मनुष्यों के द्वारा एकमान स्मरण की अवस्था को पहुँचा कर अर्यात् एकमात्र स्मरण की वस्तु बनाकर, किमी भी व्यक्ति के साथ पक्षपात (प्रेम का लगाव ) को अपेक्षा न रखने वाली वेश्या की भाँति शीत ही शशाङ्क-सम्पत्तिरूपी आभरण को धारण कर लिया ।।६।। दिपणी-व्यवहार में देखा यह नाना है कि ये सारें किसी भी व्यक्ति की मम्पनि को भोगकर उसके दिनष्ट हो जाने पर किसी मा प्रकार के शोक मोह का प्रदर्शन अपवा अनुभुते किच विना झटिति दूसर व्यति म अनुरक्त ताती है। इसी प्रकार पूर्वभुत दिनमणिहया मरति के नारा के अनन्तर बार घरमा नायिका ने बिना एकक्षा के शोकानुभूति के शीत्र ही चन्द्रम्पो नीमम सलग्न दी गई। ततः स्तुं प्रवृत्तेषु वेश्यारेश्मानपमम् । विटेयु मधुलुन्धयु नि पारं गतागतम् ॥ १० ॥ तदनन्तर वैश्याओं के आवास भवनों के सन्मुस मधु के लोभी भ्रमरों की माँति विटी ( कामुको ) के नि प्रयोजन गमनागमन र में प्रवृत्त होने पर ॥१०॥ द्वाराप्रदत्तक ग्रहणग्रहणेप्मया । कुटनीषु वृपापातेऽप्पुन्मुसरी मुहुर्मुहुः ॥ ११ ॥ व्यत्रियों को दमाने की इन्द्रा में गृह के प्रशद्वार पर कान ल। थाली, एक तृप निरने पर भी नर्यात् बल्प भी सरसटाइट होने किनी क्ति के आगमन से आशरा से, अनियों के बारम्बार . की ओर उन्मुर होने पर ।। ११ ॥ दिनकामुरनिर्मान्यमाल्यताम्यूलिनी भुवम् । मंमृज्य मजयग्यानुवेश्याम्पन्यप्रतीक्षया ॥ १२ ॥ .
समयमातृका वेश्याओं के, दिन के समय कामुकों के द्वारा धारण करके फेंकी गई मालाओं एवं ताम्बूल से प्रकीर्ण पृथिवी को स्वन्च कर दूमरे व्यक्तियों की प्रतीक्षा से, शय्या के सजाने पर ॥ १२ ॥ आस्तीर्यमाणखट्वान्तः किङ्किणीवाणसंनया। पारावतेषु विरुतेर्बजत्सु स्मरवन्दिताम् ॥ १३ ॥ बिछाई गई शय्या के मध्य में लेटी वेश्या के पैर में बँधे नूपुर के मंकार को सुनकर शब्द करने वाले कबूतरों के कामदेव के यशोगान को करने वाले यन्दिभाव को प्राप्त होने पर ।। १३ ।। टिप्पणी-बूतर नपुर के शब्द को मुनकर बोलने लगते हैं। उनका बोलना कामोनेजा माना गया है । अत' द्वार के साहित्य में उन्हें कामदेव के यश को गाने वाले बन्दी जनों के रस में चित्रित करने की प्रथा है। गृहीतस्योपरि कथं गृह्यते ग्रहणं पुनः । पूर्व किं नागतोऽमीति वदन्तीप्वपरामु च ॥ १४ ॥ प्रेम पात्र के ऊपर अर्थात् स्नवश के ऊपर पुनः जिस प्रकार से म-पाश फैक्कर उसे अत्यधिक वश मे किया जाता है, इस बात के दर्शन के लिये रामुक प्रेमी के आने पर क्या आप कभी पहने यहाँ नहीं आने है ?" ऐसा कुछ वेश्याओं के कहने पर ।। १४ ॥ उदरायद्धवसनर्जटाग्रन्थिनिपीडनम् कुर्वाणरिकलहे प्रारब्धे शठदेशिकः ॥ १५ ॥ उदर ने यसन (फेंटा) बाँधने वाले, जटाओं की गाँठ को कसकर ाँधने बाल, शठ, मठाधीशों के द्वारा अथवा दुष्ट स्वमाय वाले थानीय व्यक्तियों के द्वारा वारसलह (वेश्याओं के माथ किया जाने ला कामोत्तेजक प्रेम क्लह) प्रारम्भ करने पर ॥१५॥ स्वयं मात्रा च युगपद् गृहीते ग्रहणहये । वारे प्राप्ते तृतीये च यान्तीप्वन्यास्वदर्शनम् ॥ १६ ॥ स्वयं माता के द्वारा एक साथ दो व्यक्तियों से प्रहण (निर्धारित । - तृतीयः ममयः द्रव्य अर्थात् एडवांस) ले लेने के अनन्तर तीसरे व्यक्ति की पारी आने पर कुछ वेश्याओं के अदृष्ट हा जाने पर अर्थात् संभोगार्थ गृह के भीतर चली जाने पर ॥१६॥ अनायाते परिचिते प्रत्याख्याते नवागते । उभयभ्रंगशोकेन सीदन्तीप्पपरासु च ॥ १७ ॥ परिचित व्यक्ति के न आने पर और नागत व्यक्ति के लौटा देने पर इस प्रकार उभय विधि से हुई हानि के शोक से कुछ बेश्याओं के शोक-सन्वत होने पर ।। १७ ॥ टिप्पणी-कुछ वेश्यायें प्रतिदिन थानेवाले कामुक व्यक्तियों का मार्ग देख रही थी अतः नवागत व्यक्तियों को उन लोगों ने लोटा दिया। किन्तु कार्य- कारणवश नियतकानुरों के मो न आने पर इस प्रकार उभयया हानि से- ये नवागतों के लौटा देने के विषय में पञ्चानाप करने लगी। भुक्तोज्झितानामन्यासु पुनः प्राप्तार्थसंपदाम् । जननी दुर्जनीकृत्य कुर्वाणासु प्रसादनम् ।। १८ ॥ एक बार मभोग करके छोड़े गये और पुनः धन देकर संभोग की इच्छा करने वाले व्यक्तियों के लिये बनावटी रूप से माता को दुर्जन बनाकर कुछ वेश्याओं के उनका प्रसादन करने पर ।। १८ ॥ टिप्पणी-एक बार संभोग के अनन्तर यदि कोई भी व्यक्ति पुनः धन देकर और रांभोग को इटा व्यक्त करता है तो वेश्याए उने अपने सौन्दर्य के प्रनि अत्यधिक आट जानकर माता से टम व्यक्ति के लिये प्राप्रद करती है कि एक बार इम व्यक्ति को और ममर दे दिया जाय । किन्तु वह व्यक्ति और पैगा दे एतदर्थ माताप उमे दुबारा गमय देने में मानाकानी करती है। बेश्याओं का माता मे मार देने के लिये भाप करना और मानाओं का समय न देना- दोनों ही बातें-चनावटी हुमा करती है। यदि त्वांसा मुजननी न जानीयात्सुधामयम् । अमरिष्यदुपायो मे नकोऽमी प्राणधारणे ॥ १९ ॥ जम उन कामुकों को दुपारा समय मिल जाता था वप वे वरणी समयमारका वेश्याएँ उनसे इस प्रकार कहा करती थीं-"सरल स्वमाययाली मेरी माता अमृत के ममान सरस एवं मधुर तुन को यदि पुनः समय न देती तो तुम्हारे पियोग में मरने वाली मेरे लिये प्राण धारण करने का कान सा उपाय हुआ होता ॥ १६॥ नित्यावहारकुपितं मर्याधरुपकारिणम् । ऋजुमापनयन्तीपु विदग्धासुतवैरिपु(१) ॥ २० ॥ विदग्ध वेश्याओं से सब प्रकार से धन आदि देकर उपचार करने बाल, तथापि देवाओं के द्वारा नित्य ही धन आदि के छीन लेने से कुपित, सरल व्यक्ति को प्रमन्न करने के लिये मनाने पर 1001 अन्यनाम्ना प्रविष्टानां कलहे कूटकामिनाम् । कुहनीपु रटन्तीषु घण्टारगरणोन्कटम् ॥ २१॥ कुटिल और प्रच्छन्न कामुकों के अन्य के नाम से गृह के भीतर प्रविष्ट होकर पलट करने पर घण्टा के 'रण रण' शब्द की भाँति कर्ण- क्टु शब्दों मे नियों के बड़बड़ाने पर ॥ २१ ॥ टिप्पणी-प्रसिद्ध एव उच्च न्यानों के यहाँ रोगों के लिये समय चिमत्त रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रानी पारी मे हो गृह के भीतर जाता है। किन्तु कुछ ऐने भी मुटिल एवं प्रन्टन अनुक होते है तो दूसरे का नाम बतलाकर अन्दर गने है और वहाँ पहले से ही स्थित अथवा बाद में पहुंचने वाले चार्य बनि में टना इगड़ा हो जाता है। इस बात को देख कर कुटनो निन बिगड़ने लगती है। प्रसुप्तकटकभीवनीपक्षुद्रामृते गृह। मसीमरनमन्यामु यान्तीप्वादाय कामुकम् ॥ २२ ॥ भवन के फा अयना चटाई पर नोरे हुए मत, श्रीप (रवि के कारण चिन्न ) कामुकों के द्वारा घर के मर जाने पर नरागत कामुको को लेकर अन्य श्याओं के अपनी नसी के घर पली आने पर ॥२॥ वालमारिकाहानव्याजेनान्यामु वर्मनि ।
तृतीयः समयः
कटाक्षः कलयन्तीपु दुरात्कामुरुमामिपम् ॥ २३ ॥
दूर से ही मार्ग मे आते हुये, अपने सौन्दर्य से प्रभावित कामुक
को देख कर बिल्ली पे बच्चे को बुलाने के बहाने से अन्य वेश्याओं के
अपने कटाक्ष से इशारा करने पर ।। २३ ।।
एका स्थितोऽन्तःप्राप्तोऽन्यः परस्यायेव दुर्ग्रहः ।
किं करोमीति जननी पृच्छन्तीपपरासु च ॥ २४ ॥
कुछ वेश्याओं के द्वारा अपनी माता से इस प्रकार पूछने पर-
'एक व्यक्त घर मे है, दूसरा भी आ गया है और तीसरा भी आन
के ही सभीग रे लिये दुरामा कर रहा है। ऐसी अवस्था में मैं क्या
करूँ?" ॥४॥
निगा दीर्घा नया कामी तनयेयं कनीयसी।
व्यत्यति कालहाराय वृद्वावर्गे कथोद्यते ॥ २५ ॥
रात्रि बड़ी है, यह ननागत कामी भी युवक है और मेरी तनया
अभी किशोरी अन' व्या है इस बात का ध्यान करके समय व्यतीत
कर देने के लिये वृद्धाओं (फुट्टनियों ) के क्था (समय व्यतीत करने
वाली कहानी) कहने के लिये उद्यत होने पर ॥ २५॥
नाज्ञाताद् गृह्यते माटी चरन्ति म्लेच्छगायनाः।
इत्पन्यासु बदन्ती शून्य शय्यासु लजया ॥ २६ ॥
"अमात व्यक्तियों से पुरस्कार अथवा पारिश्रमिक (शुन्क) नहीं
प्रण किया जाता, क्योंकि चारों ओर म्लेच्छों को माँति गाना गाने
याने अथवा म्लन्छों का गाना गाने वाले अर्थान् म्लेच्छों की स्तुति
करने वाले अथवा गाना गाने वाले म्लेच्छ ध्रमण किया करते हैं।
अपनी शून्य शग्या पर लन्जापूर इस प्रकार कुछ वेश्याओं के कहने
पर॥ २६॥
आयाते वार्यमाणेऽपि निर्माने क्षीणकामुके ।
च्यानक्षिशिरःशूलारन्दिनीपु परामु च ॥ २७ ॥
सनयनातृका मान-सम्मानरहिव अनः रोकने पर भी धन से झीग चनुक के अन्दर चले जाने पर इमि एव शिर को उसपोहा देवगने बन्य वेश्याओं से मदन करने पर ।। २७ !! मुन्यकामुकमित्राणां स्वच्छया व्ययज्ञारिणाम् । अन्तुने स्थिरलाभाय छनोमिगुगनवे ।। २८ ॥ अपनी इन्दानुनार, निनोच धन का यर करने वाने, मोते. भाले कामुर मित्रों के आने पर उनसे नावचानिक लाम अया प्रचुर लाम रे नि कुट्टनियों के उनका गुणगान प्रस्तुत करने पर ! - || लजामहे वयं स्वल्पनेनेति रिभाविनि । गग्यमाने दशगुगे धूतः प्रथमकामिनाम् ॥ २९ ॥ वैग्या के प्रधानागत कानो व्यक्ति के मन्मुन्द “हे भामिनि ! हम धन की कमी के कारण लन्चित हो रहे हैं" ऐसा कहकर पूर्व के द्वारा दशगुना द्रव्य दे देने पर 1 ॥ टिप्पणी-वैम्पा के यहाँ कुछ ऐने पूर्व न्दुिक रहते हैं जिनन नवीन कामो मानने इस प्रकार का नाटक रचा होता है । इमने नदा अमी गता है और अनुभव एवं दान न रहने में पहनन में रन दयपुन्छ व्य ग्नि कर चत्ताता है । प्रवाममोरधिकारिमनोः स्थितावन्दा ननमा मर्मति । काचिदन्ती विजने विन्द्य जग्राह भाटी त्रिगुणांमद्धान् ॥३०॥ 'मेरी पुत्री प्रधान में गये हुरे अधिकारी (मन्त्री अया रान का कोई उन अधिकारी) पुत्र ३ लि रेकर (नंग-बिरतकर) रक्सोनची है । तिमीने आर का उनले नगन करा दे रही हूँ' ऐमा कहती हुई कटनी एकान में दिवाकर ममृद्ध गति से निगुनित मादी (नभोगान्क)ने रही थी । ३. !! दिपणो-जान चारोह मामान्य प्राकि नौ यात्री टर होती तर टमार अपनी चरमरमर अदा कोई तृतीयः समयः राज्य का उच कर्मचारी ही करता था। यह सौभाग्य एक मात्र राज्य से संबद्ध स्थानियों के लिये ही सुरक्षित रहता था, उनके प्रथम सभोग के अनन्तर ही वेग्यायें सामान्य जनों के मंभोग के लिये मुरक्षित होती थी। अल्पं ममैतदुहितुर्न योग्यं न च क्षणोऽस्ति त्यमदृष्टपूर्वः । इति गाणापि पिटं पटान्ते गाढं गृहीत्वा न मुमोच काचित् ॥३१॥ कोई कुट्टनी इस प्रकार कहती थी-यह शुल्क अल्प है अतः तरुणी एय सुन्दरी मेरी पुत्री के योग्य नहीं है, आन समय नहीं है, तुम पहले पहल आये हो, मैंने तुम्हें इसके पूर्व नहीं देखा है। ऐसा कहती हुई भी यह वृद्धा कामुक के यस्ताचल को कमकर पडे हुई थी। वह उसे छोड नही रही थी॥ ३१ ॥ अमात्यपुत्रेण सुताद्य नीता क्षमस्व रात्रिं प्रणयान्ममकाम् । उक्न्वेति काचिजरतीचमार रिक्तम्य सक्तस्य च विप्रलम्भम् ॥३२॥ आज मेरी पुत्री अमात्यपुत्र के द्वारा ले जाई गयी है, अतः आप मेरे प्रेम के कारण आज एक रात क्षमा करें" ऐमा कह र किसी वृद्धा कुट्टनी ने रिक्त अर्थात् धन से रहित तथापि उस वैश्या पर आसक्त व्यक्ति को ठग दिया ॥ ३ ॥ दातव्यं न ददानि चारविरहे टक्कोऽद्य लन्धस्थलः क्रूरः मैन्यपतिः प्रयाति रिपुना सयर वार रिना । वृत्तिहात्कथं नु दिरि यारोशित लभ्यते पार्टीपेटकारतां गतरती प्रोपाच काचित्मसीम् ॥ ३३ ॥ "आन स्थान प्राप्त करने वाला 'टक' अपने दिन अथा पारी (म) के न रहने पर मेरे दातन्त्र (देय ) को नहीं दे रहा है। अपने दिन अथवा कामरे न रहने पर भी, समय न मिलने के कारण, मर सेनापति शीघ्र ही रिपुवा को प्रान हो रहा है अर्थात् क्रुद्ध होकर पैरमार मानने लगा है। वार के व्यनात हो जाने पर देरगृह (मन्दिर) से किम भौति वृत्ति (प्रति दिन सायकान के समय नृत्य-गान करने समयमारत वाली वेश्याओं के लिये देय थन) माम होनी ?' इम प्रसार की बातों को उद्यान-गृह किनारे सही किसी केच्या ने अपनी ससी से रहा ॥३३॥ अन्यास्ताः मखि वृटपाशनिचयरामष्टमुन्धश्रियः कुर्मः किं वयमेर अञ्चनसला जात्या न जानीमहे । साझा मनतंम्पभापरिमसः मर्गभिशाही जनो वाक्यः काचिदिति प्रकाशमकरोन्मक्तावापर्जनम् ॥३४॥ कपटजाल का विस्तार करके भाले भाले व्यक्तियों की धन सम्पत्ति को सींच लेने वाली भी अन्य कुछ वैश्याचें अपनी अपनी सस्त्रियों से कहती हैं "हे नासा क्या किया जाय | हम लोग तो प्रया वञ्चन की कला अर्थान् दुसरे को ठगने का तरीका जानती ही नहीं है। वचनों से मार के निरन्तर प्रदशित करने पर भी सब पर शङ्का करने वाला व्यक्ति स्वभावत विमुख हो जाता है । इम प्रकार रिनी वेश्या में अनुरक्त अथवा कामुक व्यक्तियों की सरलता (सिधाई ) का प्रतिपेय किया ॥ ३४।। सरल मा रसरती नीता क्षणेन क्षपा पापेन क्षपितं दिनं निगि तया शव्यारहारः कृतः । इत्युद्वेगपरिग्रहग्लपिनधीः पृष्टः महामटि- प्रष्टे कटनीटिलतामलिष्टबूटां मिटः ॥ ३५ ॥ हँसी करनेवाले अपना समुस विदों के द्वारा वेश्या के नाथ मभेग की वार्ता के पूछे जाने पर हदयस्थित उद्वेग के कारण मलिन बुद्धि: वाला कोई पिट सामान्य छल कपट से परिपूर्ण, कांश स्वभावाली घुटनी की युटिलता रा वर्णन इस प्रकार रिया:-पापा उत्सर (नार. गाना आदि मने रखन) के द्वारा सम्पूर्ण सरस रानि व्यतीत कर दी गई । दिन भी इसी प्रकार ममान हो गया। आर की रात में भी वह (वेश्या ) शम्या पर गई ही न " इन प्रकार पाय रिया लामों में फँसा कर मुझे रविजय सुखानुभूति से यश्चित रक्सा गया ||३५॥
तृतीयः समयः नास्मद्गेदप्रवेशः सगुणजनकथाकेलिमात्रोपचार- प्पाराम्ममारप्रवसदवसरे वासरे कामुकानाम् । वृत्तिकृत्तानुरोधारकथमपि विदिताद् गृहते यामवत्या. मिन्युन्ः काचिये बहुगतगणिकावर्गगर्योपशान्त्यै ॥३६॥ "सगुणजनों-गुणशाली व्यक्तियों की सरस कथा फेलिमात्र के उपन्यन (प्रस्ताव ) पूर्वक सम्भोग-क्रीडा से रहित अवसर वाले दिन के समय हमारे घर में कामुक व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता। रात्रि में कयमपि जाने गये चरित्र के प्रसङ्ग से कामुको का व्यवहार भली माँति जाना जाता है। इस प्रकार से स्वर में किमी वेश्या ने बहुत से व्यक्तियों के साथ सम्पर्क करनेवाली गणिराओं के मान मर्दन के लिये कहा ।। ३६॥ चुरु तरलिके हारं कण्ठे गृहाण मनोहरे चलययुगलं लीले लोलां विलोक्य मेखलाम् । भज मलयजं चित्रे रात्रिः प्रयाति कठोरता- मिति चतुरताचार्यस्तामां बभूव मखीजनः ॥ ३७॥ इनि व्यासदासापरास्यनेमेन्द्रनिर्मितायो समयमारकायां प्रदोपवेश्या- लापवर्णनं तृतीय. समयः। "हे तरलिक ! अपने कण्ठ में हार धारण करो, हे मनोहरे ! कटक- युगल को धारण करो। हे लीला करनेवाली ससि! चंचल अपनी नैसला को देखो। हे विचित्र स्वभाववाली । मरु यस चन्दन को धारण करो। रात्रि कठोरता (प्रौढता एवं सघन्ता) को प्रार हो रही है।" इस प्रकार कुछ युवतियों की सखियाँ चतुरना मे उनकी आचार्य हो गई अर्यात् आचार्य के समान उन्हें शिक्षा देने लगी।।३।। देनेन्द्र के द्वारा निर्मित समयमातृका में प्रदोष के समय वेश्याओं के आराप के वर्णन पूर्वक तृतीय अध्याय समान हुआ।
चतुर्थः समयः अम्मिन्नामरे धुर्तगालीना सुकुट्टनी । नापितास्येन तममा रजनीव महायया ॥१॥ मंन्ध्या की इमी वेला मेधून लोगों को वार्ता में तल्लीन अर्थात् वडी ही तन्मयता के साथ घूनों की वार्ता करती हुई एक प्रवीण कुटनी, अन्धकार के साथ रात्रि की भाँति, नाप्ति के साथ आई ॥ १ ॥ अस्थियन्त्रशिरातन्त्रीलीनान्त्रोदरकृतिका । गुप्फकायकरबाडावृतेव कटपूतना ॥ २॥ उसके शरीर में हड्डियों और नश मात्र ही अवशिष्ट थीं। उमा पेट एक्टम फंसा हुआ था। वह गोदी में सोपड़ी लिये हुये वखा न्छादित प्रेतात्मा की भॉति प्रतीत होतो थी ॥२॥ वहन्ती मुवहुच्छिद्रं शरीरं चर्मवन्धनम् । अन्तर्गतजगद्ववाजशिक्षागइनिपञ्जरम् ॥३॥ बहुत से हितों से सबलिद चर्म के बन्धनवाले, शिक्षा के लिये गृहीत अन्तर्गत ( हस्तगत ) जगन् रूपी पक्षी के परमप शरीर को घारण किये हुए थी ॥३॥ मर्यन्वग्रहणेनापि लम्बमानमुखी मदा । तुलेयाङ्कमहस्राका लोक्यतुलने कलेः ॥ ४ ॥ सब कुछ प्रण कर लेने पर भी और एक लेने के लिये वर -सर्वदा मुख फैलाये रहती थी अर्थात् मन्तोष नान की कोई भी चीज उसके पाम न घो। यह गिलो को नापने के लिये अह (मध्य) मे सहनों अङ्क (गन्मार स्थल ) बानो कलि को तुला की माँति थी॥४॥ ममा समधने पापे मपापाचमगाधमे ।
चतुर्थः समयः घात्रा कृत्रिमरागस्य स्वरमालेय निर्मिता ॥५॥ समान धनवाले पापियों एवं अधम व्यक्तियों में वह समान थी। विधाता ने उसे कृत्रिम राग (स्वर, पक्षान्तर में प्रेम) की 'स्वरमाला' के समान पनाया था॥५॥ मुस्पष्टदृष्टदीर्घोग्रदशना मीपणाकृतिः। प्रसवक्ररकोपेन संस्थितास्थिरता शुनी ॥ ६ ॥ उसके दीप एच भयङ्कर दॉत इतने बड़े बड़े थे कि वे बहुत ही स्पष्ट टंग से बाहर दिसलाई पड़ते थे। उसकी आरति भयङ्कर थी। से देसने से मालूम पड़ता था मानो प्रसव के भयङ्कर कोप से अर्थात् प्रसर की तीत वेदना के कारण कुतिया ने स्थिरता को धारण कर लिया हो ॥६॥ उलूकवटना काग्रीवा मारिलोचना। निर्मितामाणिनामहैरिव नित्यविरोधिनाम्॥ ७॥ उसका मुस उस के मुस की भांति था। उसकी पीपा की के गर्दन के समान थी। उसके नेत्र बिल्ली के लोचन को भौति थे। इस प्रकार वह सर्वदा परस्पर स्वमावतः विरोध रसने वाले प्राणियों के अगों से बनी हुई प्रतीत होती थी॥७॥ वेश्याग्नेकपालिन्या यया रागमहानते । ऋता कामुक्कोकम्य राट्याशशरणा तनु वेश्याममूह की अद्वितीय रश्क जिस वृद्धा-सी के द्वारा, रागरूपी महारत में, कामुक व्यक्तियों के समुदाय एकमात्र सट्वा की शरण देने के लिये बाह्य कर दिये गये अर्धान उस स्त्री ने न जाने कितने कामुक व्यक्तियों को अतिसंभोग के माध्यम से चिररोगी पना कर पटिया की शरण लेने पे लिये माहा कर दिया 1॥ सक्ताशुपातजननीं तां विलोक्य क्लायती। अभिचारहुतस्याग्नेः कालीं धूमशियामिव ।। ९ ।।
समयमारका ममंभ्रमोत्थिता तम्याः कृत्वाचरणरन्दनम्। दमा निजामनं चक्के स्तुति पूजापुररामराम् ॥१०॥ अनुरक व्यक्तियों के अग्रुपात का कारण, अभिचार-हवनीयाग्नि की। काली घूम शिला की भाँति उस वृद्धा को देखकर 'कलावती' ने बड़े वेग और आदर से उठकर उनका पाणचन्दन करके अपने आसन पर बैठाकर पूनापूर्वक अर्थात् मत्कारपूर्वक उमको न्नुति (प्रशंना) की18-१०॥ वेश्योपदेशपिपये चतुराननत्ता- मायानपञ्चनिचयेन जनार्दनत्वात् । रिक्तामक्तकलहरतिभैरवत्वाव- मर्गस्थितिक्षयविधावगुणा त्वमेव ॥ ११ ॥ कलावती ने उसकी स्तुति करते हुये कहा--रयाओं को उपदेश देने के विषय में चतुर्नुप भार को धारण करने के कारण (अयोत वेश्याओं को उपदेश देन के लिये मानो तुम्हारे पास चार मुस हो जाते है)। मायाप्रपञ्च (स, करट आदि) के समूह का अवलम्बन करने के शारण विशुमात्र धारण करने से (अर्थात् तुम विष्णु को भाँति माया- प्रपञ्च का विस्तार करती हो) निर्धन होने पर मो वेश्याओं पर अनुरक होने वाले व्यक्तियों के माधन करने के कारण भेरव का अवलम्बन करने से तुम हो गृष्टि, स्थिति एव विनाश करने वाले तीनों तत्व, रज एव तन-गुण हो अथवा दृष्टि, स्थिति तथा विनाश करने वानी प्रति हो ॥ ११ ॥ उद्भिनयौवनमनोहरस्पशोमा- मंभारितामिनपभोगमनोमानाम् । एणीयां त्वदुपदेशस्विर्जितानां मातान्ति नहि नाम ममोहितार्थाः ॥१२॥ --
चतुर्य सनयः
हे मात । तुम्हारे उपदेश से विनित, अङ्कुरायमाण नगीन योरन
के कारण मनाहारिणी स्वरूप की मुरता से सन्कृत है अमिनब ममग
लिने कामदेर निनमे, "मी सुन्दरिया मनोरप की मिद्धि नहीं
रोपाती ।। १७ ॥
तस्माइजस परिकल्पितपुरिका मा
मकामनन्यशरणां शरणं प्रपन्नाम् ।
आत्मार्पणप्रणयिनां ननदर्शनेऽपि
जात्यैर पेशलधियः सदया भवन्ति ॥ १३ ।।
इम निये अपनी मक्त, अन्य सहायका से रहित, शरण मे गिरी हुई,
मुझको तुम अपनी परिकत्रित पुत्री के रूप में स्वीकार कर लो। विशाल
बुद्धिचाले व्यक्ति प्रथम मासात्कार में भी आत्मसमर्पण करने वाले
व्यक्तियों के ऊपर प्रकृत्या दयालु हुआ करने ही है ।। १३ ।।
इत्यार्थिना कलामन्याः प्रन्यामन्नमुसम्थितिः ।
मनुष्यामिपरकाली रङ्गाली ताममापन ॥ १४ ॥
कलारती के द्वारा इस प्रसर प्रापित, निस्ट भगिर मे मुन
पंक निगाम करने गली, अस्थिरसरमा नापशिष्ट (मास से हीन
होने से चीनदार शरीवाली) रवानी ने उनसे ( कलायती से)
पहा॥१४॥
मंत्रान्तहदयस्नेहा निःशूलप्रमोहा।
गर्भमा विना पुनि मुनामिमता मम ॥ १५॥
हे मुझे मेरे इत्य के स्नेह से धारण करने वाली (पुत्री मी
मेना ही ममान दयानु अपना नियती है ) अया मेरे लिये
अपने दमन करनगलो (पुत्री नाना लिने अपने हृदय
मे म्नेद धारा करती है) चिना प्रनर रेटिना माग्न अपि
में धारण करके रिना भी तुम मेरो पुती अभिमा हो अर्थात् मुन मे
सा न 377 होने परम तुन मुा पुन के रूप में मान्य हो ॥१॥
समयमाता कथेन जन्ममुहृदा त्वदर्थमहमर्थिता। स्यूत्तेयं मे विच्छिन्ना नासा येन पुनः पुनः ॥ १६ ॥ यह ङ्क (नापित ) मेरा जन्मजात मित्र है। विटों के द्वारा काही गई मेरी नाक को बारम्बार जोड़नेवाले इस रङ्ग ने तुम्हारी माता बनने के लिये मुझ से प्रार्थना की है।॥ १६॥ पात्रं मदुपदेगस्य त्वमेव त्रिदशोचिता । मद्धित्तिलिग्नितंचित्रं चित्रतामेति नेत्रयोः ॥१७॥ विदशोचिता-देवताओं के योग्य अर्थात अनिमुन्दरी अथवा एक रात्रि में तीस व्यक्तियों के संभोगयोग्य यौग्नबाली एकमात्र तुम ही मेरे उपदेश के लिये योग्य पात्र हो; क्योंकि मुन्दर-समतल एवं चिकनी-मित्तिपर लिसा गया ही चित्र नेत्रों के लिये आकर्पक होता है। मेरे समान गुरु की एकमात्र तुम्ही योग्य शिक्षा होने लायक हो ।।१७।। श्रूयतां प्रथमं पुत्रि भूत्यै यत्कथयाम्यहम् । कलाकोपं तु कालेन नित्याभ्यासादवाप्स्यमि ॥ १८॥ हे पुत्रि! मैं तुम्हारे कल्याण के लिये कह रही हूँ। सर्वप्रथम तुम इस बात को सुनो-'तुम प्रतिदिन अभ्यास करके ही ममय आने पर हाव-भावादि क्ला कंप को पार करोगो ॥१०॥ न कुलेन न शीलन न रूपेण न विद्यया । जीविताम्यधिकं युद्धिलम्यं धनमवाप्यते ॥ १९ ॥ प्राण से भी अधिक प्रिय धन न तो कुल के कारण प्रात होता है, न तो शील से प्राप्त होता है, न तो रूप और विद्या से हो। यह एकमात्र, बुद्धि से ही प्राप्त किया जाता है ।। १६ ।। प्रायेण जगति प्रजा नाना" "स्ति कसचित् । इयती जगतीं वेनि पूर्णामृर्णायुभिः ॥ २० ॥ इस संसार में मायः किसी की ही बुद्धि नाना विषयों के परिशीलन चतुर्य- समयः में प्रवीण हुआ करती हैं। जडप्राय उर्णायु (मकड़ा) यही सोचता है कि "मैं इतनी सम्पूर्ण जगती को जानता हूँ" ॥ २० ॥ अज्ञातकालोचित-कर्मयोगा रोगा इवाहर्निशपच्यमानाः। जगत्त्रये देवमनुष्यनागाः प्रज्ञादरिद्राः खलु सर्व एव ॥ २१ ॥ इस त्रिजगती में प्रज्ञाविहीन देय, मनुष्य एव नाग आदि सभी अज्ञात अर्थात् अनुचित काल में कार्य करने के कारण दिन-रात रोग की भाँति पकते रहते हैं ।। २१ ॥ ज्येष्ठेन तावत्परमेष्ठिनव विचारशून्येन कृतं किमेतत् । यत्कामिनीपीनपयोधराणां विद्युद्विलोला किल यौवनश्रीः॥२२॥ सबसे प्रथम तो यही है कि-प्राणियों में सर्वप्रथम उत्पन्न होने पाले, विचारशून्य विधाता के द्वारा ही यह क्या कर दाला गया, जो कि उन्होंने कामिनी जनों के स्थूल पयोघरों की यौवन-श्री को चिरस्थायी न बनाकर विद्युत् की भाँति चपल अर्थात् क्षणिक बनाया है ।। २२ ।। का नाम बुद्धिहीनस्य विधरस्ति विदग्घता । कूष्माण्डानां न यश्चक्रे तलमांच दन्तिनाम् ।। २३ ॥ बुद्धिहीन विधाता की भला कौन सी विदग्धता मानी जाय, जबकि उन्होंने कृष्माण्ड (कोहड़ा) में तेल नहीं पनाया और न तो हाथि के शरीर में रोम ही उत्पन्न किया ॥२३॥ टिप्पणी-कोहड़ा को छोड़कर अति लघु तिल में तेल उपन्न करना विशालकाय हायी को खोदकर लघुशय मेंड के शरीर में रोम (ऊन) उप' करना विधाता की युद्धि विहीनता है । रवाधिना जलनिधी मधुमृदनेन फ्लैशः किलाद्रिवलनप्रेभयोऽनुभूतः । कि सैव पूर्वमसिलार्थविलुण्ठनाय कान्तातिः कपटकाममयी न सृष्टा ॥२४॥ रव को चाहने वाले मधुसूदन भगवान विष्णु ने सागर में मयानी भूत मन्दराचल के घुमाने से निश्चय ही उत्पन्न क्लेश का अनुभव स्थि समा० ६६ समयमातका अर्धान् कष्ट उठाया, किन्तु उन्होंने सागरमन्यन के पूर्व मन्यूर्ण अर्थों (प्रयोजनों एवं आनन्दों) के विलुण्ठन (लूटने) के लिये कपट एवं काममयी अधया कपट-नाम से परिष्यात कान्ता की आकृति का ही निर्माण क्यों न किया जिससे सारा आनन्द अनायास ही प्रान किया जा सकता था ।। २४ ।। निद्रा महीभारपरिग्रहश्च श्रीमंश्रयत्वं परयाचनं च । अत्युन्नतत्वं गुणहीनता च किं युक्तमेतत्पुरुषोत्तमस्य ।। २५ ।। शयन ( आपाढ़ शुक्ल एकादशो से कार्तिक शुक्ल एकादशीपर्यन्त लगातार चार महीने ); पृथ्वी के भार का ग्रहण; लदो का आश्रयन, दूसरे से याचना करना (वामनरूपचारी विन्गु ने बलि से माँगा था) অন্যধিক ভাষা (মিঃ ক মহানা) অথবা অধিক श्रेता गुणहीनता, क्या ये बातें पुरुषोत्तम भगवान् के योग्य है ? ॥२२॥ कृशः शशी गणा नमा भार्या पाहारिणी। संभावनपतिप्रीतिर्न निमः कोश्युज्यते ॥ २६ ॥ माधान शहर के मस्तक पर वर्तमान चन्द्रमा कृरा है, उनके गण नग्न रहते हैं आर मायर्या भो अन्त्रि पारिणो है। ऐमी अपस्या में नहीं जानती कि कुवेर के माय उनके मंत्री का क्या उसयाग है ? ॥२६॥ भस्माङ्गःप्रकटं विमति ललनां योऽङ्गे म किं युक्तक- निमङ्गः सततं गगेपु रमते यः किं न सत्यत्रवः । यः सक्तः परमेश्वरोऽपि पमृद्वगै म कि नीतिमान्- गोप्पां यः कुटिलां कलां स्फुटनयाधत्ते स किं धीधनः ॥२७॥ अपने अहों में भस्म पेनने वाले, धर्मचारी अपना वाहनरूर र को बीकार करनेगले मानरान् परमेशर स्पटम्र जा अपने अर ( अनि) में ललना का धारण कर लें, क्या उनका यह कार्य युनि-युक्त है अर्थात् क्या उनका यह कार्य ममुचित है ? निःमन हो करके भी मादा गणों में रमण करनंगले शिर को नत्याना क्या -- चतुर्थः समय निहित हो रही है। ऐसी अवस्था में क्या वे वस्तुतः सत्यात कहे जाने के योग्य है ? नि सङ्ग होकर भी अपने वर्ग में आसक्त रहनेवाले भग- यान शकर क्या नीतिमान् कहे जा सकते हैं। जो भगवान श्रीकृष्ण गोपी के माथ प्रक्टरूप से कुटिल कला को धारण करते हैं, क्या वे यथार्थत बुद्धि के धनी माने जा सकते है ।। २७ ॥ कि कामिनीग्रणयिना दिननायकेन मंशातितं भ्रमता कृतिना सतेजः । अर्थेन किं न रिहिताभिमुखा मृगाक्षी पित्तेन तीक्ष्णतरमप्यरला सहेत ॥ २८॥ त्रियों ने प्रणयो, कृवार्थ, पर्वदा भ्रमणशील सूर्य के द्वारा अपना तेर क्यों समान कर दिया जाता है ? या धन के द्वारा मृगनयनी रही अनुस्न नही की जाती ? धन एक गेसी यस्तु है जिससे त्रियाँ तीक्षण से भी तीक्ष्ण व्यक्ति अवा तेर को सहन कर लेती हैं ॥ ८ ॥ चन्द्रस्येवरसेपया कृशतनोः क्षेप्यं न निर्मलितं मानी मूर्ति जडः स्थितः कथमित्र प्रामोति संपूर्णताम् । वृद्धयर्थी यदि किं करोति चरणोपान्ते न तस्याम्पदं हन्त्येन सममोहितं गुणमदादुचः स्थितः सेवकः॥२९॥ ईश्वर शिर की सेवा करने पर भी राशरीर चन्द्रमा (कला. रमक चन्द्रमा) को क्षीणता पिनष्ट नहीं हुई। स्वाभिमानी, मूर्स चन्द्र भना शिर के मस्तक पर स्थित होरर कैसे पूर्णता को प्राप्त कर नाता है ? अपनी पृद्धि को चाहनेवाला सेपक यदि स्वामी के चरण नमीप अपनी स्थिति नगै बनाना है और अपने गुणा के मद मे करे ही स्थित रहता है तो वह अपने ही फयाण का विनाश करता है। यानः प्रतारयितुमीश्वरमगनायां मारः पुरा विमिति कार्मुम्बाणपाणिः ।
६८ समयमाटका नाग्रे ततान वनितागुणवर्णनानां यत्मौतेन नियतं विननाश मूर्खः ॥ ३० ॥ पूर्वकाल में ईश्वर भगवान शङ्कर को स्त्री में आकृष्ट कर अनुरक्त करने के लिये कामदेव ने उनके सामने वनिताओं के गुणों के वर्णनों का सौख्य न फैला कर अर्थात् कामिनियों के सौन्दर्यादि की प्रशंसा न करके अपने हाथों में घनुप एवं बाण को धारण कर उनके समक्ष क्यों गमन किया। निश्चय ही वह अपने इस अविचारित कार्य के कारण ही विनष्ट हो गया ॥ ३०॥ रक्तोऽप्यशोकविटपी परपुष्टबन्धोः प्रामोति यम्य विभवे चरणप्रहारम् । तस्मै समृद्धिमचिमधुपनिपत्य धृतैनिपीतमधवे मधवे नमोऽस्तु ॥ ३१ ॥ लाल (अनुरक्त) भी अशोक वृक्ष जिस दूसरे से पने हुए कोकिल के मिन बसन्त का वैभर आने पर चरणों का प्रहार महा करता है (सुन्दरियों के पादाघात से अशोक पुष्पित होता है-कवि समय प्रसिद्धि) तथा सम्पत्ति के समय निरस्कृत हो हो कर भी घुमकर मजा स्टनेवाले मधुपों (भौरों, पीनेवालों) से जिसका मधु (पराग, सुरा) पिया जा चुका है उत वसन्त को नमस्कार ! ॥ ३१ ॥ स्थाम्यं मर्वजगत्सु दिव्यमुनयस्तत्रोचिता मन्त्रिणो राष्ट्र स्वर्गमही महामणिगुरुः कोपः मुधाम्भोनिधिः । दुर्ग मेरुशिरः स्वमैन्यममराः श्रीमान्मुरारिः सहन मा बुद्धिविधुधाधिपस्य तु यया च्याप्तं भगाईपुः ॥ ३२ ॥ देवराज इन्द्र का संब जगन् पर आधिपत्य है, उसमें देवमुनि उनके योग्य मन्त्री हैं। स्वर्ग की पृधियी उनका राष्ट्र है । उनका कोष महामणि (चिन्तामणि) के कारण समृद्ध है। अमृत का उनका सागर है। मेरु पर्व की पोटी ही मा दुर्ग है। देवमण्डलको चतुर्थ समयः ६८ उनकी सेना है और श्रीमान् विष्णु ही माक्षात् उनके मित्र है। किन्तु उनकी ही यह चुद्धि है जिसके कारण उनका शरीर भग के चिह्नों से परियार हो गया है ॥३॥ सुन्धस्याफलकालटाटुकलोषस्य निस्तेजमः माक्रान्तिनिपीडितस्प जलधेर्दातुं प्रवृत्तस्य ते । संस्थातीतसमस्तरनरसतेोः किमेतायता मोहादेवगजाधपादपमुरामात्रेण तुष्टाः सुराः ॥ ३३ ॥ ले भी ( क्योंकि मब कुछ प्रास कर लेने पर भी समुद्र सन्तुष्ट नहीं होता), मन्यन के परिणामस्वरूप निर्गत कालकूटरूप क्रोधनाले, निस्तेन, सर देवताओं एव देत्या की आक्रान्ति से नितर पीडित अतः देने में तत्पर, अनस्य समस्त रयो के निरासभूत मागर के ऊपर मूर्य देवलो। एक गन (परास्त ), एक अश्व (उच्चे प्रवा); एक वृक्ष (कल्पनर ) एव मुरामात्र से ही-अतिस्वन्प रस्तुओं से ही-मोहरश- अज्ञानवश क्यों तुष्ट हो गये ? अर्यान् ये वस्तुयें तो अतिस्वन्प थीं उन्हें और कुल निचानना चाहिये था। इतने मान उनकी मूर्खता की निशानी है ।। ३३ ।। रामेण हेमहरिणाहरणोन्मुकेन कृटाक्षरेलिमरणेन युधिष्ठिरेण । ईत्तिा द्विजरुषा जनमेजयन दत्तः परं मनुजामनि माध्यसेतुः ॥ ३४ ॥ मुरम हरिण को पकड़ने के लिये उठिन रामचन्द्र के द्वारा रुपटगत की कोटा-पद्धति का अनुसरण करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर फे द्वारा एव जन्य क्रोध के कारण भामण पर मुद्ध हानेगाने जनमेनय के द्वारा मानर-मार्ग में अर्यात मानर के इतिहास में रफमात्र अमानना का मेनु ही मनाया गया है अर्यान् इन लोगों के उत्तन् कार्य अज्ञानता से पूर्ण हो रहे ॥ ३४!! सन्तुष्ट होना ७० समयमादका नागैस्तायसमर्पितं तदमृतं यत्नश्रमर्दुर्लभ नो पीतं न विलोकितं न पिहित मोहात्परं हारितम् । तस्मानास्ति जगत्त्रयेऽपि विमला प्रनाकणः कस्यचिद्- सर्वः प्राक्तनजन्मकर्म वशादोंद्यमे धावति ॥ ३५॥ यन्त्र करने पर भी दुष्प्राप्य अमृत को नागों ने जो कि तार्य को समपित कर दिया। उसे उन लोगों ने न तो पिया. न देसा और न ढक पर रक्सा ही। वे उसे अज्ञानतावश खो बैठे। इससे यही निश्चित होता है कि इस समय निजगती में किसी के पास भी मिल प्रक्षा का एक भी कण नहीं है। सभी अपने पूर्वनन्म के जन्य-कर्मवश धनसिद्धि के कार्यों में दौड़ते हैं ॥ ३५॥ एवं जडेषु लोकेषु स्त्रीपु मुग्धासु का कथा। बुद्धिहीनग्रमादेन जीरामः केरलं वयम् ॥ ३६ ॥ इस प्रकार मम्पूर्ण लोक के ही जड अर्थात् प्रजाविहीन सिद्ध होने पर बेचारी भोली भाती स्त्रियों की क्या कया की डाय ? हम लोग केवल बुद्धिहीनों के प्रमाद से ही जीती हैं ।। ३६ ॥ मुग्धः प्रत्ययमायाति प्रत्यक्षेऽप्यन्यथा कृते । मायाप्रपञ्चमारच वेश्यानां विभवोद्भवः ॥ ३७॥ प्रत्यक्ष में अन्यथा करने पर भी भोले-भाले व्यक्ति विश्वास कर लेने है। माया एवं प्रपञ्च से ही वेश्याओं को सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ॥२७॥ पुरा मठरकाख्यस्य मया पाणां द्विजन्मनः । ताम्यूलकल्ककलितं ष्टीवितं हास्यलीलया ॥ ३८ ॥ बहुत पहले की बात है-'मठरक' नामक ब्राह्मण के हाथ पर मैंने हँसी-मजाक में चर्षित किये गये पान के लपाव को यूंक दिया था ॥२८॥ मुग्धस्ततोऽयमानेन सोऽभिजातोऽभिमानमान् । दलसंसदि जमाल भोपादात्मययोधतः ।। ३९।
चतुर्य समयः ७१ तदनन्तर सत्कुलीन अतः अपने कुन आदि का अभिमान करने बाला भेला-माला यह ब्राह्मण उस अपमान से क्रोध के मारे लाल होकर जनसमूह के मध्य में ही आत्महत्या करने के लिये तैयार हो गया॥६॥ मायो धातुप्रकोपेन मिथ्या पश्यमि रिभ्रमम् । न मया टीपितं किंचिद्भित्ता पाणिः प्रमृज्यताम् ।। ४० ।। उस ब्राह्मण की इम अवस्था को देखकर मेने उनका प्रमादन करते हुये कहा-डे सनन ' आप धातुरन्य निति के कारण व्यर्थ में ही गल्त सेच रहे है अथवा गलत देख रहे हैं। मैंने तो बुछ यूँका ही नहीं है यदि आप के हाथ में कुछ लग ही गया हो तो मित्ति में आप अपना हाय पोलें ॥४॥ जात्या चर्ममयं चम्तस्मिन्का प्रत्ययस्ता । मम मझारशीलायाः प्रमाणं वचनं न रिम् ।। ४१ ।। अरे । नेत्र तो जानि से ही चर्ममय हुआ करते है। ऐसी अवस्था मे आप का उनने मता कैसे विश्वान हो रहा है? आपके प्रनि सद्भाव रखने की स्वभावाली मेरे पचनों पर क्या आप का विश्वास नहीं है ।। ४१॥ इत्युन्या तीनशपथैर्गलहस्तादिनादनः । म मया प्रकृति नीतस्तथति प्रत्ययं यया ॥४२॥ ऐसा कह कर मडी बड़ी सौगन्धों से दर गले में हाय टाल कर थपथपाने से यह ब्राझा मेरे द्वारा शान्त मिया गया और मेरे कथन के प्रनि पूर्णरूप से विश्वस्त हो गया अर्थान मैन उसके हाथ पर नहीं थूका है, इस बात को यह मान गया ॥४॥ पदे पदे जगन्यस्मिन्निधिवन निर्मितः । विटचारणयानां चुद्धिहीनावलम्पनम् ।। ४३ ॥ इस संमार मेरिधादा ने पग पग पर सजाने का निर्माण किया समयमाटका है। (जिसकी जितनी बुद्धि हो, वह उतना भोग करे)1 टि, चारण एवं वेश्या के अबम्बन अर्थात् जाविका के मायन बुद्धिविहीन यक्ति ही हैं ।। ४३ ॥ नवयौवनकाले मे गृहं विप्रसुतः पुरा । विवेश रात्रिभोगाय नाना शंकरवाहनः ॥ ४४ ॥ एक घटना मैं तुम्हें सुनाइ-पहले मेरी युवावस्था के उपाकाल के ममय एक रात्रि में सभोग करने के लिय शङ्करवादन' नाम वाले एक ब्राह्मग के लड़के ने मेरे घर में प्रवेश किया ।। ४४ ।। गाण्ज्यादिवातिकठिनं पीनं प्रथमावनम् । तं ब्रह्मचारि दृष्ट्वा मोडेगाहमचिन्तयम् ॥ ४५ ॥ कठिनोऽयं निशा दीर्या अपिता कामुकरहम् । तस्माद्भोगावहारोऽस्य मया कार्यः प्रयत्नतः ॥ ४६॥ अत्यधिक कसे हुये हुये अतः कठोर शरीरवाले मेटे, नवयौवन- संपन्न उस ब्रह्मण ब्रह्मचारी को देखकर कामरेग के कारण उत्कण्ठित हुई मैंने मोचा-यह अत्यधिक प्रपुष्ट शरीरवाला है। रात्रि भी बड़ी है। मैं कामुकों के द्वारा संमोग करके सिन्न कर दी गई हूं। अतः मुझे प्रयत्नपूर्वक इसके साथ भोग करने की बात टाल देनी चाहिये ॥ ४५-४६॥ इति मंचिन्त्य सुचिरं मया तस्तैः कपानमः । आमनगट्यावमरे यामः पूर्वोऽतियादितः ॥४७॥ काफी देर नक पेमा सोचकर मैंने, शय्यापर लेटने के अवमर में, विमिन्न कथाओं-वार्ताओं को कद कर रात्रि का प्रथम प्रहर व्यतीत कर दिया ॥४॥ आस्तां किमन्यद्वक्तव्यं श्रुतमेतदितस्ततः । पतिता नेत्रयोनिद्रेत्युवाच स पुनः पुनः ।। ४८ ।।
चतुर्थः समयः कथा को सुनते सुनते निद्रा से आक्रान्त वह युवक बारम्बार मुझ से कहता था-"वस, रहने दो अधिक कहना व्यर्थ है; मैंने इस प्रकार इधर उधर की काफी बातें सुनी है। मेरे नेत्रों में अब निद्रा समा चुकी है ॥ ४०॥ कथावन्ऽध पिरते तत्संगमनिवृत्तये । शूलापदेशेन मया कृतः कृतकनिःस्थनः ॥ ४९ ॥ इमक बाद कथाक्रम के समान हाने पर, उस युवक के साथ सभोग से छुटकारा पाने के लिये, मैंने शरार-व्यथा के बहाने से बनावटी चारसना शुरू किया ॥ ४६ ।। मोऽथ मुग्धः प्रकृत्यैव मत्यप्रत्ययमाहितः । चक्रे शूलोपशान्त्य मे चक्रे साङ्गमर्दनम् ।। ५० ॥ प्रकृति से ही भोला भाला, अतः मेरे बगने को भी मत्य समझ कर अज्ञानी बना हुआ उस ब्राह्मणकुमार ने पीडा की निवृत्ति के लिये मेरे सम्पूर्ण अङ्गो का मर्दन (मालिश) क्यिा ॥ ५० ॥ मादरं मृद्यमानेषु तेनाङ्गेपु शनैः शनः । प्रययौ मोपरोधेर क्षणदा क्षणपन्मम ।। ५१ ॥ इस युवक के द्वारा धीरे धीर मुम्बपूर्वक आदर के साथ सम्पूर्ण अगों के मलने पर अनुकूना को भाँति मुखदायिनी मेरी राति क्षण के समान समान हा गई।॥५१॥ ततः प्रमाते तद्भोगपश्चने चिन्तितं मया । पशुबुद्धिवराकोऽयं मया शूलेन बाहितः ।। ५२ ॥ उसके बाद उसके साथ मंभोग से यश्चित अर्यात सुरक्षित रह जाने पर प्रातःकाल मैंने सोचा-"पशु के समान निर्बुद्धि, वेचारा यह नाह्मण बुमार मेरे द्वारा शूल के यहाने मंभोग से पश्चित कर दिया गया ॥२॥ अनेन मेषमुग्धेन दत्ता भाटी चतुर्गुणा । भोगानहारन्यायेन ध्रुवं तामनुयाचते ।। ५३ ॥ 4 सममयतृकामे भेड़ के समान मूर्स इस युवक ने चारगुना संभोग शुल्क भी दिया है। संभोग से पूर्णतः अस्पृष्ट रहने पर निश्चय ही: यहा न्यायमान अपने उस द्रव्य को माँगेगा ॥५३ ॥ तस्मादेष रतिस्पृष्टीकार्यस्तावद्यधा तथा । न्यायाय सुरतोच्छिष्टं कथं ममुपमर्पति ॥ ५४ ॥ इस लिये जिस किसी भांति इसको रति का स्पर्शमात्र करा दिया जाय । सुरत से यत्किञ्चिम् स्पृष्ट होने पर उच्छिष्ट यह युवक स्मि भाँति अपने शुन्क को माँ गंगा ? अर्थात् तब यह अन्य वापस माँगने का अधिकारी नहीं रह जायगा ।। ४४ ॥ इति ध्यात्वाहमारब्धरत्तिभोगा क्षपाक्षये। प्रीत्येवाकरसं तस्य पण्यानृण्याय चुम्बनम् ॥ ५५ ।। ऐसा विचार कर मैंने रात्रि की परिसमामि पर उस युवक के साथ सभोग करना प्रारम्भ किया। मभोग के प्रसग में मैंने उसके द्रव्य से उऋण होनेके लिये बनावटी प्रेम के साथ युवक का चुम्बन किया ।।१।। आरूढरतियन्त्रो मे शूलक्लेशकृपाकुलः । अलं मत्संगमेनेति सानुरोधोऽवदत्स माम् ॥ ५६ ॥ रवियन्त्र पर आरुढ अर्थात भगारुड मेरे पीटाजन्य कष्ट के प्रति वृपालु उन युवक ने बडी ही सहानुभूति के साथ मुन से कहा-"मेरे साथ सम्भोग बन्द कर दिया जाय अर्थात् आप को पीटा है अतः सम्भोग-किया बन्द कर दी जाय" ।। ५६ ।। आवर्जनाय तस्याथ निर्याजार्जरचेतमः । मया मिथ्या प्रियालापरिहितो रञ्जनक्रमः ॥ ५७॥ निर्यात करुणचित्तवाले उस युवक को अत्यधिक सकरुण बना देने के लिये मैंने झूटे प्रिय लगनेशले आलापोंके द्वारा उसा अनुरखन किया ।। ५७ ॥ ,
चतुर्थः समयः
अहो बतामृतस्पर्शस्तवाङ्गेषु विमान्यते ।
अधुनैव मया दृष्टं यस्य प्रत्यक्षलक्षणम् ।। ५८ ॥
अहो, तुम्हारे अगों का स्पश तो आश्चर्यजनक ढग से अमृतपूर्ण
अर्थान सुखद है जिसका प्रत्यक्षलक्षण तो मैंने अभी देखा है ।। ५८ ।।
गूहाङ्गेन त्वया स्पृष्टे ममास्मिनमणस्थले ।
न जाने क गतं शूलं मत्पुण्यस्त्वमिहागतः ॥ ५९ ॥
दस रमण स्थल में तुम्हारे प्रपुष्ट अङ्गों से आलिङ्गन करने पर मेरी
(व्यथा न जाने कहाँ चली गई। मैं सोचती हूं कि तुम मेरे) पुण्यों
के प्रताप से ही यहाँ आये हो || ५ ||
इति श्रुत्वैव मद्वाक्यं सहसा साधुलोचनः ।
रत्यर्धरवितः शोकात्मोऽन्तः सानुशयः परम् ॥ ६॥
निजं वो ललाटं च ताडयित्वा म पाणिना ।
हा कष्टं हा हतोऽस्मीति वदन्मामिदमब्रवीत् ।। ६१ ॥
इस प्रकार के मेरे वचनों को सुनकर सहसा अपनी आँखों में
अश्रु भर कर बीच में ही रति मे रित, शोक के कारण भीतर
ही भीतर पश्चात्ताप से पूरित यह युरक अपने हायों में यभास्थल एवं
ललाट को पीटकर 'हा बड़ा कष्ट है, मैं तो मर गया' गेमा पहते हुये
मुफ से यह कहने लगा ।। ६०-६१ ॥
पूर्व नेतन्मया ज्ञातं यन्मदगममागमः ।
शूलं हरति नारीणां मणिमन्त्रीपशादियन् ।। ६२ ।।
"मैंने पहले यह नहीं जाना था कि मेरे अङ्गों का संयोग, मणि,
मन्त्र एवं औषध की मांति, रियों की व्यथा का हरण करने
याला है।। ६२॥
मन्दपृश्यस्य जननी वात्सल्पजननी मम ।
मुचिरस्थायिना मद्रे मूलेन निश्न मता ॥ ६३॥
७६ समयमातृका हे भद्रे ! वात्सल्य को जननी अर्थान् वात्सल्यप्रदानों मुझ जैसे मन्दभाग्य को उत्पन्न करने वाली मेरी माता बहुत दिन तक अगों को पीडित करने वाले शून (पोडा) के कारण मर गई ॥ ६३ ।। विदितोऽयं प्रकारश्वेदभविष्यदमंशयः । तजनन्या वियोगो मे नामविप्यद्विचेतसः ॥१४॥ निश्चय ही यदि यद् बात (मेरे अहों के पीडा हरण करने की बात ) मुझे ज्ञात रही होती तो निकरुण मेरा अपनी माता से वियोग न हुआ होता ॥ ३४॥ इत्युक्त्वा रञ्चितोऽस्मीति सरुदित्वाविनिर्ययो । पुरुषाकारमंदिग्धनिर्विपाणपोपमः ।। ६५ ।। ऐसा कह कर मैं ठग गया' ऐसा कह कर रुदन करके पुरुष को आकृति में अमंदिग्ध विना पूर याने बैन के तुन्य प्रतीत होनेवाला वह युवक मेरे घर से निकल कर चला गया ॥ ६५ ।। नित्यं भोजनमैनप्रणयिनस्त्यक्तान्यकार्याः परं लोकेऽस्मिन्गलगतमात्रसुखिनः सन्त्येव शून्याशयाः । ये मेपप्रतिमाः क्षयोद्यनुमतेः सर्वस्वहर्तुः क्षणा- दाप्तम्या विनिक्षिपन्ति नितरां निःशकमद्धे शिरः ॥६६॥ भोजन तथा मैथुन में ही एकमात्र प्रेम करने वाले, अन्य कार्यों से रहित, केवल चविचरणमात्र में हो सुखो, शून्यबुद्धिवाने मेप के समान बहुन से व्यक्ति इस संमार में हैं ऐसे लोग विनाश करने के लिये तत्पर, मय कुछ हरण करनेशने. क्षण भर के लिये विश्वसनीय की भॉति प्रतीत होनेवाले व्यक्तियों को गोद में निशक हो करके अपना शिर रस देते हैं । उयव व्यक्ति पर विश्वास कर लेते हैं ।। ६६ ।। इत्यबुद्धिघनाधाननिधानविविधोदयः। कूटपण्यरसामान्यस्तारुण्यमतिवाद्यते ।। ६७ ।।
ख चतुर्यः समयः इस प्रकार नासमझ व्यक्तियों के गृहीत घनरूप सजानावाले, विविध उपायों के अवलम्बन से उन्नति की ओर बढ़नेवाले, असामान्य अर्थात् परम निपुण एव कपटप्रवीण वेश्याओं की तरुणता इसी प्रकार से व्यतीत की जाती है ।। ६७ ॥ अमत्येनैव जीवन्ति वेश्याः सत्यविवर्जिताः। एताः सत्येन नश्यन्ति मद्यनेव मुलाङ्गनाः ॥ ६८॥ सत्यमार्ग का सर्वदा एव सर्वथा परित्याग करनेवाली वेश्यायें असत्य के अवलम्बन सेही जीवित रहती है। सत्यमार्ग का अवलम्बन करने पर ये उसी प्रकार से विनष्ट हो जाती हैं जैसे मद्य पान से कुलीन त्रियाँ ।। ६॥ सत्यं विनाशाय पराङ्गनानामसत्यसारा गणिकागणश्रीः । सत्येन वेश्या किल दृष्टसारा दरिद्रशालाइव कस्य सेव्याः ॥६९।। वेश्याओं के लिये सत्यता का अवलम्बन पिनाशारक सिद्ध होता है, क्योंकि गणिकासमुदाय की शोमा एव सम्पत्ति तथा अभ्युग्नति असत्यसार हुआ करती है। सत्यता का अवलम्बन करने पर अपनी यास्तविकता के प्रदर्शन के कारण वेश्यायें भला, दरिदशाला की भाँति, क्सि के लिये सेव्य हो सकती है ॥६॥ दानेन नश्यति वणिडनश्यति सत्येन सर्वधा वेश्या । नश्यति विनयेन गुरुनश्यति कृपया च कायस्थः ।। ७० ॥ सम्पत्ति-दान से वणिक् नष्ट होता है। सत्य के अवलम्बन से वेश्यायें सर्वथा पिनष्ट हुआ करती हैं। छात्रों के सामने अत्यधिक पिनय से गुरु पिनष्ट होता है और कृपा करने से कायस्थ रिनाश को प्रान होना है ॥७॥ वेश्याजनस्य कितवस्येव वशनमायया । अहो वैदग्भ्यमित्युक्त्वा परोऽपि परितुप्यति ॥७१ ॥ धूर्त व्यक्तियों की भांति, वेश्या जनों को ठगने की माया को
समयमारका
"अहो, इस वेश्या की आश्चर्यजनक विदग्धता है" ऐसा कह कर अन्य
लोग भी परितुष्टि को प्रात होते हैं। अर्यान् दुर्गुण रूप प्रबञ्चनर्म
भी वेश्या का समायण करने पर विदग्धतारूप सद्गुण के आकार
को धारण कर लेता है ।।१।।
पुराहं पृथिवीमेना प्रान्वा जलधिमेखलाम् ।
प्राप्ता वेश्यास्पदं लोभात्पुरं पाटलिपुत्रकम् ।। ७२
अपनो तरफाई के मध्याह्न में मैंने सागररूप मेखलावाली अर्थात्
सागरपर्यन्त समूची पृथिवी का भ्रमण करके लोभवश वैश्याओं के
प्रधान आश्रयस्थल पाटलिपुत्र नगर को गई ।। ७२ ॥
कुटन्यस्तत्र सर्वज्ञा दृष्ट्वा मामल्पकौशलाम् ।
जहसुः मस्वनं येन होताहं क्षमामियाविशम् ॥ ७३ ॥
बहाँ मायाशास्त्र की सर्वत्र कुट्टनियाँ कम प्रवीण-वेश्या-शास्त्र की
अपण्डित-मुम फा देखकर मेरी खूब हँसी को जिससे लत्रित होकर मैं
इथियो मे फँस भी गई ।।३।।
ततस्तेनावमानेन गणेशायवनाग्रतः।
स्थिता कृतोपवामाहमहंकारविवर्जिता ॥ ७४ ।।
उस अपमान के कारण अहंकारशून्य होकर मैंने गणेश जी के
मन्दिर के मन्मुस स्थित हो उपचास किया ।। ७४ ॥
अथ स्वप्ने गणेनाहं पृष्टा शंकरसूनुना ।
उपवासाः कियन्तस्ते प्राप्ता इति पुनः पुनः ॥ ७५ ॥
अब रात्रि में उपरान की खिन्नता से मैं सो गई वर स्वप्न में
भगवान् शङ्कर जी के पुत्र गणेश जी के द्वारा बारम्बार पूँदी गई कि
'तुम्हारे स्निने उपवाम हो चुके ? ||५||
म मयाभिहितः कृतप्राणान्तचेष्टया।
मामयमतिकान्तं प्रतादनशनस्य मे॥७६ ॥
७६ चतुर्थः समयः मैंने छलपूर्वक प्राणान्त की सी चेष्टा करते हुये भगवान गणेश से कहा-"मुझे व्रत के कारण विना कुछ साये पिये दो महीने व्यतीत हो चुके हैं" ॥७६॥ तच्छुन्या स स्मितमुखः सर्वज्ञः प्राह मां गणः । अहो तेऽपि स्वप्नेऽपि नासत्यादस्ति ते च्युतिः ।। ७७॥ मेरी आत को सुनकर सर्वत भगवान गणेश जी ने मुझ से कहा- "अहो, व्रत एवं स्वप्न में भी तुम्हारो अनन्य से च्युति ( रहितता) नहीं तुम पर परितुष्टोऽस्मि ते भद्रे निश्चलासत्यनिश्चयात् । महामायामयाला लव्धभोगा भविष्यमि ॥ ७८ ॥ "हे भद्रे तुम्हारे असन्य सभाषण के दृढ निश्चय से मैं प्रसन्न हूं। तुम्हें महामायामयो क्ला एव भोग सर्वदा उपलब्ध रहेगें। अर्थात् तुम प्रपञ्च-विस्तार में भी अद्विनीय रहोगी और इसी कारण से भोग भो तुम्हें सदा सुलभ होगा ।। ७८ || गणेशानुचरः पूर्वमिति मयं यरं ददौ । अमत्यना वेश्यानां भवन्ति धनसंपदः ।। ७९ ।। भगवान गणेश ने पहले मुझे ऐमा घर दिया था। इसीलिये में कहती हूं "असत्य के अग्नन्वन से हो वेश्याओं को धन सम्पत्ति की प्राति होती है ।।७।। धनधानं जनजीवभून लोकेषु नत्रापि विशेषयोगान् । जनाभिमारप्रतिरतिमाजां महीमुनां वेशमृगीदशां च ।। ८० ॥ प्रजावा में उनके कन्याणार्थ चारा आरधनग करने वाले राजाओं का एवं कामुक व्यक्तियों के माथ अभिमार को स्वीकार करनेशली वेश्याओ का जीवन लोक में व्यक्तियों के मध्य; उसमें भी विरोर असर एक व्यक्ति के मयोग मे; घनश्यान नया जनों का जीपभून अर्यान आनया हुआ करता है।०॥
समयमातका धनेन लभ्यते प्रज्ञा प्रज्ञया लम्यते धनम् । प्रज्ञाथो जीनलोकेऽस्मिन्परस्परनिरन्धनौ ।। ८१ ।। धन से प्रना प्राप्त होती है और प्रज्ञा से धन लाभ हुआ करता है। इस जीवलोक में प्रज्ञा एव अर्थ परस्पर एक दूसरे से आश्रित रहते हैं ॥१॥ ईथरः स जगत्पूज्यः स वाग्मी चतुराननः । यस्यास्ति द्ररिण लोके म एव पुरुस्तमः ॥ ८२ ॥ इस ससार में जिस व्यक्ति के पास धन है यही ईश्वर है अर्थात सब कुछ करने में समर्थ है, वही मसार के प्राणियों में पूज्य है, वही चतुर वक्ता है, वही चतुरानन अर्थान् ब्रह्मा के समान महान् पण्डित एव कर्ता है, वही पुरुपश्रेष्ठ है ।।६।। स एवाहृदयो राहुरलमः स शनवरः । पक्रः कुजन्मा मततं पित्तं यस्य न विद्यते ॥ ८३ ॥ निसके पाम धन नहीं है, वह हृदयहीन, राहु, आलसी, शनैश्वर के समान मन्दगति, वक्र एव पुत्सित जन्माला माना जाता है ।।३।। सुजातस्य प्रयातस्य माङ्गल्यस्पृहणीयताम् । धनिकस्य विकारोऽपि क्षीरस्ये जनप्रियः ।। ८४ ।। धनिक अत एन मागल्य का स्प्रहणीयता को प्रास तथा सुन्दर जन्माने का शिकार भी अर्थात् अनुचित कार्य मी, मत्त व्यक्ति के विकार की भाँति, जन प्रिय हुआ करता है | ८४ ॥ टिप्पणी-ससार में दिमी भी कार्य अथवा यातादि के पूर्व धनिक व्यनि का दर्शन मालिक एव निर्धन का प्रमालिक माना जाता है। घनिनयन्दनस्यैर मच्छायस्य मनोमुपः । निष्फलस्यापिलोकोऽयमंपर्क नहु मन्यते ॥ ८५॥ सुन्दर छाया से सम्पन पर मुगन्धि आदि से मन को मुग्ध करने वाले फलरहित चन्दन के सपर्क की भाँति उपकार आदि फल से चतुर्यः सगः १ रदित धनिक का संपर्क भी प्राणियों के द्वारा अभिनन्दित किया जाता है।॥८॥ निस्त्रिंशा अपि मस्नेहा मपन्ति श्रीमतः परम् । म्बकमाअपि निःस्वाना निःम्नेहा यान्ति रक्षताम् ॥ ८६ ।। श्रीमानों के सा भी अत्यधिक सस्नेह (चिक्ने, तेज) हुआ करते हैं और घनरिहीन व्यत्यिो के अपने देश मी तेल से विहीन होकर अर्थात् रिनग तेल के स्त हो जाते हैं ॥२॥ सेव्यः परिधादीनां गुतः जूररलारताम् । गनिप्रदार्थानेर व्योममार्ग झोनतः ॥ ८७ ।। यादाशचारी की माँति उन्नत-ऊपर नठा हुआ-धनगन् व्यक्ति ही फरियों पर विद्वानों आदि का गति प्रदाता ससंव्य आचार्य है और वही येद्धाओं तथा कलावेत्ताओं का शिस गुरु है ॥७॥ चित्रीय सगुण निःस्वं स्वयं मांममिन द्विजः । सद्यः पतति निःमचः पतिवः न पूज्यते ।। ८८ ॥ निम प्रचार नाम विक्रेता अत' पन्ति ब्राह्मण अपून हो जाता है, उत्ती प्रकार निर्घन व्यक्ति मी स्वय अपने गुणों को बेच कर शीन ही पतिन हो जाता है और पवित होने पर उसकी अपूनता तो मुनिधित ही है। क्योंकि पतित व्यक्ति इस संसार में किसी के द्वारा भी नहीं पूजे जाते ॥६॥ गुणिनां चित्तरन्याहुणा निर्गुणराच्या । हृदयर मीदन्ति विधयानामिन म्ननाः ॥ ८९ ।। चित्त की रिलता से (निर्धनता की समस्या मेव्यक्तियों के चित्त विकन हो जाया करते है ) गुणी व्यटियों के गुण, निर्गुण की इज्दा से, हदय में ही उनी प्रशर से सरसाटपूक नष्ट हो जाते हैं जैसे विधानि के स्ठन ॥८॥ ६सरमा समयमातका विद्भिः परिवारिताः मगुणतामायान्ति विचनराः शरत मुभः लोननतः प्रख्यातमद्वंशवाम् । तन्माद्वित्तममाश्रये गुणगणे पित्ते च नान्याये पित्तं पितमनन्यवित्तनियताः संपन्निमिचं नुमः ।। ९० ॥ नित पे कारण विद्वानों से घिरे रहने वाले धनी व्यक्ति सगुणता. गुणवत्ता को प्रान मोते हैं। सुमटों से घिरे रह कर शूरता को प्रात होते हैं। नदश में समुपन उक्तिों ने घिरे रह पर प्रसिद्ध एव पवित्र वशमार से प्राप्त हाने हैं अर्थात् सुकृतीन वया पवित्र वश में उत्पन्न कहे जाने हैं। अतगुणगणों के वित्त में ही निशान करने के कारण एर दित्त के अन्य रिती मी वस्तु का आप्रय न करने से पित्त में ही एकमात्र चित्त से निविष्ट करने वाल हम लोग सम्पत्ति के लिये वित्त को ही मुहर्नुहु प्रणाम करने हैं॥ ॥ जम्लानमाल्यामरणाम्बरस्य चरागनानन्दनमन्दिरम्य । नित्यप्रकामोन्मपवितस्य वर्गम्य विच चकोरिशेषः॥९११ कभी भी नहीं मलिन होता है मान्य, आभूपण एवं वन्न जिसका (जिनसे), वराननाओं के नृत्य गीत तथा निरामादि से आनन्दप्रद है गृ निता (जिनसे) एष नित्य चलने वाले प्रकाशपूर्ण उत्सवों सेलेवित स्वर्ग र रित्त में ज्या मना है? अर्थात् कुछ भी नहीं पन्नर है । जहाँ दित्त है नहीं स्वर्ग है ।। ११ ॥ अशेपदोपापगमप्रकाशमित्रागमोत्माहमहोन्मवाईम् । निकामशोमांजनयत्यजबंधनंजनानां दिनमम्बुजानाम् ॥१२॥ मन्पूर्ण दोष दुर्गुण पक्षा में दोपा रात्रि के समान होने से प्रकाशित मित्र (सुद्ध, पक्षा में सूर्य) के आगमन रुप मदोलन से बहणीय घन एवं दिन क्रमश व्यक्तियों तथा कमलों को विकासशोमा को नित्य ही पत्तन करते हैं।।१२।।
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था॥४॥
चतुर्थः समयः
वित्तेनाभिजनी गुणी परिजनी मानी प्रमाणीकृतः
मद्भिर्जन्तुरुपैति साघुपदवी किं वा बहु महे ।
वित्तेन बत्तीर्थमार्थमरणक्लेशाभियोगं बिना
तीर्यन्ते ततपातकव्यतिकरास्ते ब्रह्महन्यादयः ॥ ९३ ॥
चित्त से ही, नत एन तीर्य ने सप्रयोजन गमन में जो क्लेश है
उनको उठाने बिना ही ब्रह्मात्यादि रूप बड़े बड़े पातकों के ममूह पार
कर लिये जाते हैं।॥३॥
श्रूयतां यत्पुरा वृत्तं वाराणम्यां स्वयं मया ।
श्रुतं विश्रुतमचम्य चरितं गृहमैधिनः ।। ९४ ॥
बहुउ पडले बारागनी में जो एक घटना घटी उसे सुनो-स्वयं
मैंने प्ररया चरित्रवाने एक स्वपनीरवी गृहस्थ का चरित सुन रक्ता
वामनद्हषतिगतलधनाधिपः ।।
द्विजन्मा श्रीधरो नाम महाधिरिव रतवान् ॥ ९५ ॥
वहाँ पृथिवी पर के धनिरों का मुकुटमगि रनों से परिपूर्ण सागर
की भाँति सीधर नाम का एक माहाग गृहस्थ रहता था॥५॥
अर्थिकमतरोस्तम्य राजाहरभोजनः ।
अारितमभूद् गैहे मोज्यमन्त्रं सदायिनाम् ।। ९६ ॥
याचको के लिये कापत उन नाझन के पर में याचकों के लिये
यहुमूल्य मंचनों से मम्मा भोजनमा सर्वदा अविराम गति से
चला करता था ॥६६॥
तस्य विप्रमहवेषु भुजाना सदा गृहे।
लोके युधिष्टिरकथा श्लवादरकयां यया ॥ ९ ॥
उनके घर में सर्वदा सरनों जामगों के मोजन करते रहने पर लोक
में प्रा उनकी फोर्तिच्या के सामने युधिष्ठिर को कीर्तिकथा घूमिन
पड़ गई।॥१७॥
समयमाका ततः कदाचिदाचारनिधेस्तस्य ममाययो। नियतात्मा यतिब्रहंज्ञानात्मा नाम दिव्यधीः ॥ ९८॥ कुछ समय के अनन्तर आचार के नागर उम विप्र के घर पर अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाले, विलक्षण प्रतिभाशाली 'ज्ञानात्मा' नाम के एक ति आये ।।१८।। म पूज्यः पृजितस्तेन श्रद्धयोपनिमन्वितः। पाकमालां ययौ द्रष्टुं भक्ष्यरागिणतान्विताम् ।। ९९ ।। सादर उपनिमन्वित बन्ध यह महात्मा उम ब्राह्मण के द्वारा पूजित सत्कृत होकर भोजन-पस्यानों की शत-शत राशियों से समलत उसकी पाकशाला को देखने के लिये गये || तत्रापश्यत्स सन्निव्यञ्जनादिगणोपरि । सितयज्ञोपवीताई लम्बमानतनुं शवम् ।। १०० ।। रसोई घर में उस यति ने सम्पूर्ण अन्न तथा व्यञ्जन आदि समूह के ऊपर स्वच्छ धवल यज्ञोपवीतधारी, स्टक रहा है शरीर जिसका ऐसे शन को देसा ।। १०॥ स्रवद्भिस्तन्य गात्रेभ्यः सूक्ष्मशोणितविन्दुभिः । अन्नं सर्वजनादृष्टः सिच्यमानं ददर्श मः ॥ १०१ ।। उन्होंने वहाँ देसा कि किसी के द्वारा भी न देखे गये अर्थान मभी लोगों से अज्ञात, उस शव के शरीर से धीरे धीरे बढ़नेवाले, छोटे छोटे रक्त के कणों से वहाँ का सम्पूर्ण अन्न सिक्त हो रहा है ।। १०१॥ दृष्ट्वा तदतिबीभत्सं घृणासंचितारायः । संस्पृष्टकर्णः स ययौ ततम्पूर्णमलक्षितः ॥ १०२ ॥ अति दीमत्न उस शर्य को देख कर घृणा के कारण संकुचित मन वाले वे चति अपने कानों को छूते हुये शीत ही अलक्षिन हो गये अर्थात् हाँसोकसेगा चतुर्थ. समय अथ संवत्सरे याते पुनरम्पत्प कौतुकान् । मोऽपश्यन्मांसहीनं तल्लायुपद्धं कलेवरम् ॥ १०३ ॥ इसके बाद एक वर्ष के बीतने पर कुतूहलवश पुन आकर उन यति ने मामविहीन, स्नायुओं में लिपटे हुने उम कलेवर को देखा ॥ १०३ ।। शिरामुसशनम्तस्य हिन्नम्नेहरूणश्चितम् । म दृष्ट्वा भोज्यमगमजुगुप्मामीलितेक्षणः ॥ १०४ ॥ उम कनेयर की शिराओ के मेकडो मुसभागों से प्रवहमान आई स्नेहकों से भोज्य पदार्थों को परिव्यात देखकर जुगुप्सा के कारण अपनी आँसें पन्द करके वे महात्मा वहाँ ने चले गये ॥ १०४॥ वर्षेण पुनरायातः मोऽस्थिगेपशनसुतैः । अन्नव्यञ्जनमनाक्षीद्वयाप्तं दिवसाकणः ॥ १०५॥ एक वर्ष के चीतने पर पुन, आर उन महात्मा ने अस्थिमात्रा- वशिष्ट शर से चूने वाले दो तीन वसा क्यों से व्याप्त अन्न तथा व्यक्षन को देखा ।। १०५॥ कौतुसद्वत्सरे यावे सोऽपश्यत्पुनरागतः । कपालरोपालनादन्नोपरि रजश्च्युतम् ॥ १०६ ॥ पुन एक वर्ष के व्यतीत होने पर कौतुकवश आकर उन्होंने देखा कि कपालमागारशिष्ट फ्लेवर से अन्न फ ऊपर रज (मूम्बा कण) गिर रहा है ॥ १०६॥ पड्भिर्मामरथायातः शुद्धं गाविसर्जितम् । रम्यं मानमं दृष्ट्वा पुरोहितमुराच सः॥ १०७॥ इसरे याद महीने के अनन्नर पुन आकर उन्होंने देखा कि रमोई घर शर मे विति यतः रम्य है। तब उन्होंने यहाँ के पुरोहित मे पहा ॥ १०॥ अहो गृहपतेरम्य महामरेण पातरम् । क्षीणामस्पेनकालेन लीद याचरुकोटिमिः ॥ १०८ ।।
८६ समयमातृका आश्चर्य की यात है कि महासत्र के माध्यम से कोटि याचकों के द्वारा चाट लिया गया दम गृहपनि ब्राह्मण का पातक अल्प काल में ही क्षीण हो गया ॥ १८॥ बभूव पूर्वपुरुषोपार्जिताम्य गृहाश्रया । ब्रह्महत्या शतवती सान दानालयं गता ॥ १०९ ॥ इस ब्राह्मण के पूर्वजों के द्वारा उपाजित और मैकड़ों वर्ष से इसी के घर में रहनेयाली ब्रह्मरत्या मत्र-दान के द्वारा क्षय को प्रान हो गई ।। १०६ ॥ यन्तस्य भवन भुक्तं नैस्तपापं समाहृतम् । पापमन्नाश्रयं पुंमां भोक्तारमुपमर्पति ॥ ११० ॥ जिन लोगों ने इस ब्राह्मण के घर मे भोजन किया है, उन लोगों ने इम ब्रह्महत्यारूपी पातक का समाहरण किया है। क्योंकि व्यक्तियों का अन्नाश्रिन-अन्न में रट्ने वाला-पाप भोक्ता के पाम चला जाता है ॥ ११०॥ ब्रह्महत्या भवस्यापि या बभूव भयप्रदा । धनेन क्षपिता सेयमहोधनमहोधनम् ॥ १११॥ जो ब्रह्मदन्या भगवान् शङ्करावतार भैरव के लिये भी भयप्रद हुई थी वही धन के द्वारा यहाँ विनष्ट कर दी गई, एतदर्थ घन की महिमा आश्चर्यजनक है।। १११ ॥ टिप्पणी--एक वार भगवान् शङ्कर शाह ने कालभैरव ने प्रभा असन्यभाषी पचन गुत्र ने अगुलि के नस में काट दिया था। इसके परिणाम स्वस ब्राहया ने उनका पीठा रिया । भगवान् गकर जी के निर्देशानुसार र भैख डी काशीपुरा में पाये दर एकाएक उनके हाय ने मंलन ना का कपाल गिर पड़ा और नव्हत्या भी दा : हा : रती दुई पाताल में चली गई। जहाँ पर द्रमा का कपास गिरा या टम स्थान को शलमोचन करते हैं। कपालमोचन तीर्य के रूप में प्रसिद्ध है।
चतुर्थः समयः इत्युक्त्वा स शिलापट्टे लिखित्वा श्लोकगादरान् । पुरोहितेनाय॑मानः प्रययौ ज्ञानलोचनः ।। ११२ ॥ ऐसा कहर और शिलापट्ट पर ऊपर याना भोक आदरपूर्वक लिसकर पुरोहित जी के द्वारा पूनित सरल होकर 'ज्ञानलोचन' (ज्ञानात्मा) नामक उक्त यति कॉसे चले गरे ।। १५ ।। वाच्यमानः स विद्वद्भिः कस्तराद्भुनयादिभिः (१) । श्लोकार्थगौरवरसान्मया तत्र सयं श्रुतः ।। ११३ ॥ धन की महिमा को अद्भुत बतलाने वाले विद्वानों के द्वारा कहा जाता हुआ यह लोक धन के गौरवपूर्ण रस र कारण अथवा अर्थ (श्लोकार्थ) के गौरवपूर्ण रस के कारण वाँ मेरे द्वारा स्वय सुना गया ॥ ११॥ शमयति चितं पापं शापं विलुम्पति दुामह कलयति कुलं कल्याणानां कलङ्ककपोझितम् । धनमरुपं तीर्थ पुमां तदेव महतपः मुकृतनिधये श्रद्धाधाम्ने धनाय नमो नमः ॥ ११४ ।। धन पड़े हुए सैकड़ों पायों का शमन करता है। दुःमर शाप को पिनष्ट करता है। कुत को निरलक एवं कल्याणों का भाजन और तीर्थ को पापरहित आर्यान् निमल बनाता है। यह धन ही पुरुषों के लिये बहुत बड़ा तप है। पुण्य के माकर तथा श्रद्धा के धाम धन को शत शा नमस्कार है॥ ११४॥ एतदाफर्ण्य युक्तार्थमर्थस्तुतिमयं मया। नीतं दाशापदेशानां ममये मारतन्वताम् ॥ ११५ ॥ घन की प्रशंमा से परिपूर्ण इस ययार्य यात फो मुनकर मैंने अवस्था- परिवर्तन के समय इसको मूलमत्र अपया सारभूत प्रयोजन साधक उपकरण के रूप में प्रदान किया है ॥ ११५ ।।
८
समयमातृका
कुरु चित्तार्जनं तुणं
भाति योपिता।
न यौवनमहायोऽयं तनये शायरिक्रमः ।। ११६ ॥
तुम नटिति लोगों के चित्त को आकृष्ट क्रो। वेश्याओं का चौरन
पूर्ण शरीर दी द्रव्य का माधन होता है । हे पुत्रि। चौवा में लगलन
हुए शरीर राग्लघन तिरस्कार-ठाक नगें ॥ १६ ॥
तनुपल्लीरमन्तवीर्वदनेन्दुशरन्निशा ।
पयोधरोद्गमप्राट् चपला यौग्नद्यतिः।। ११७ ॥
युवती येण्याओं को शरीरलतिका वसन्न का नुपमा है । मुमचन्द्र
चन्द्रिका धरला शरद की शर्वरी है। पयोधरों की उद्भिग्नता वर्ग है
और चौवन की छटा मानो चचला विद्युन् है ।। ११७ ।।
तारण्ये तरले सुज्रमभङ्गपिभ्रमे ।
स्त्रीणा पीनस्तनाभोगा भोगा द्वित्रिदिनात्मनः ॥ ११८ ॥
हे सुलाचनी । वचन धुतु टया का यक्रता के सौन्दय से सानित
चपल तरुणाई के आने पर खियों के विशाल स्तनकलशों के परिसर-
प्रदेश बहुत कम दिनों तक ही आनन्ददायक समाग के आलम्बन हुआ
करत हैं ॥ १९८॥
अयं मुसमरोस्भ्रमररिभ्रमः मुगां
कुचस्थलहरङ्गकः पृथुनितम्मलीलाशिसी ।
न योनिमदोदयश्वरति चाकान्तिच्छटा-
कुलविरलिलिनीपुलिनराजहंमश्विरम् ।। ११९ ।।
मुप कमल पर भ्रमर की शभा को धारण करने वाला अर्यान् मुख
की प्रीवृद्धि का आघायक, एचस्थल का दान, पृथु नितम्ब का नृत्य
मन मयुर और आर्यक मौन्दर्य का इटामम् सरूप निपलरूपी
सरिता के तट पर निशान करने वाला रानहम मुनाचनी दरणियों
का यौवनमहोदय चिरकाल फरिचरण न उरता अर्थात् तरणियों
के योपनमद की पूर्णता चिरस्थायिनी नहीं हुआ करती ॥ ११६॥
........ चतुर्यः समयः आलानमुन्मूल्य मुखाभिधानं तारुण्यनागे गमनोद्यतेऽस्मिन् । पलायते कामिगणेऽङ्गनानां विमर्दभीत्येव कुचाः पतन्ति ॥१२०॥ आनन्द एवं उल्लास नामआलान (गज के बाँधने का प्रपुष्ट निखातस्तम्भ) को उखाड़कर इस तारुण्य ( योरन)रूपी मत्त गज के गमनोद्यत होने पर कामिजन माग पडे होते हैं और कुचल जाने के भय से ही मानिनियों के स्तन गिर पड़ते हैं। अर्थात् योनि के चले जाने पर कामी जन त्रियों का परित्याग कर देते है और उनका स्तन भी गिर जाता है ।। १२०॥ युवतितटिनीप्रावृष्टकालः सपीनपयोधरः कृतमदमरारम्भः कामी पिलामशिखण्डिनाम् । मदनपचनालोल ॥१२॥ युवती मरिता है। उसरा आकर्षक पीन पयोधर जल से पूर्ण अतः पीन मेघमाला से संबलित वर्पाकाल है। कामी हो मनोमुग्धकारी बिलासपूर्ण मयुरों का किया गया मद से परिपूर्ण मृत्य है। युवतियों का स्थानभ्रष्ट यर मदनरूपी पवन से चंचल दामोद्दीपक लता है। .॥ १२२॥ झोडामही कुसुमसमये रागपमाकरा दर्पोद्याने बदनशशभृत्कौमुदीकार्तिकेऽस्मिन् । यात मुग्घद्रपितुलया यौवन कामिमित्र पग्यम्बीणां अजति सहमा दुर्दशारोपतां श्रीः ॥ १२२ ॥ संमोग कोडारूपी लनिका के कुमुम-समय अर्थात् फलने की अनु; अनुरागरूकी कमन्नार के सूर्यः दर्प के उद्यान अर्थात् उत्पादक; मुखरूपी चन्द्रमा की निर्मल चाँदनी के लिये कार्तिक महीना (पार्तिक के महीने में पन्द्रमा की चाँदनी अत्यधिक मिशद एवं मुहारनी लगती है); कानिजनों मित्र इस योवन के, पश्चल धन की भाँति अथवा समयमाहका मुग्ध व्यक्ति के धन की भॉति, चले जाने पर वेश्यावनों की श्री सरसा दुर्दशा को प्रात हो जाती है ।। १२२ ।। न तु यौवनमात्रेण लभन्ते ललनाः श्रियम् । भोगार्हा वृद्धकरिणी तरुणी हरिपी वने ॥ १२३ ॥ ललनायें अपने वैभवमात्र से ही शोभा एवं लदमी को नहीं प्रात कर लेती। व्यवहार में देना यह जाता है कि वन में वृद्धा हस्विनी भोगाई होती है और रुपी हिरनी वेचारी अकेली घूमती रहती है, अथवा सुन्दर सुन्दर वस (वन) आदि धारण करने पर वृद्धा हस्विनी स्त्री ( हस्तिनी स्त्रियों का एक भेद है ) भोग के योग्य बन जादी है और वन आदि प्रसाधन के अभाव में मृगनयनी तरणी भी स्त्री प्राहकों के अभाव में भोग से वचित रह जाती है ॥ १३ ॥ रूपयत्यद्भुतास्मीति कान्ते त्याज्यस्त्वया मदः । वने मयूराः शुप्यन्ति कलिमश्नन्ति वायमाः ॥ १२४ ॥ हे सौन्दर्यशालिनी ! "में अद्भुत सौन्दर्यशालिनी हू" ऐसे मद को तुम छोड़ दो स्योंकि सौन्दर्य के धाम मोले माल गपूर प्राहकों के अभाव में वन में भूतों मरते हैं और कौए; जो कि हुन्न- कपट के साकर होते हैं, आनन्दपूर्वक बूद कूट कर दलि ( देव भाग) खाते हैं ।। १४॥ पूर्णा यकवला शीणोऽपि वृद्धिमायाति दुटिलैकमला शर्मा । १२५ ॥ पूर्ण, मौन्दर्य राशि, वगामिनी पूर्णिमा की चन्द्रकला क्षीण हो जाती है और लोग उसका अभिनन्दन भी नहीं करते किन्तु द्वितीया का एककला ( पक्षा० मे एक कौशल) वाला अतः क्षीण भीटिल शशि वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ १५॥ भ्रूयुन्मं कुसुमपुकार्मुकलतालापण्यलीलाहर वर्ग न्यस्तचन्द्रविम्बमघरो विम्बप्रभातस्करः । "ते जनाः।
चतुर्थः समयः रूपं नेत्ररसायनं किमपरं सुश्रोणि तत्रापि ते शिक्षाहीनतया मदद्विरदवत्प्रामोति नार्थाक्रियाम् ॥१२६॥ हे सुन्दर फटिवटवाली ! तुम्हारी टेढ़ी दोनों भ्रुकुटियाँ कामदेव की घनुर्लता की मौन्दर्यलीला का हरण करने वाले हैं। तुम्हारा आनन चन्द्रमण्टल का भी तिरस्कार करनेवाला है। तुम्हारे अधर--निम्बा. फ्ल की रक्तिम कान्ति को चुरा लेनेवाले-छीन लेने वाले हैं। कहाँ तक कहा जाय तुम्हारा रूप नेत्रों के लिये रसायन-जीवन- दायिनी औषध है। ऐसी अवस्था में भी उपयुक्त शिशा के अभार के कारण तुम्हारा रूप, मत्त हायो की भाँति, अर्थक्रिया ( प्रभूत सम्पत्ति पक्षा में सार्थकता ) को नहीं प्राप्त हो रहा है ॥ १६॥ तयेयं यौवनतरोग्छाया विस्मयकारिणी। यया कामुकलोकस्य स्मरतापः प्रवर्तते १२७॥ तुम्हारे यौवनम्मी वृक्ष की यह छाया विस्मय को उत्पन्न करने वाली है, क्योंकि इस छाया के सेवन से शान्ति मिलने के बदले स्मरताप ही बढ़ता है ।। १२७॥ रागमागरमंजातविद्रुमद्रुमपल्लङ्गः। तमाघरे स्मितरचिः करोति कुसुमभ्रमम् ।। १२८ ।। तुम्हारे अधरोष्ठ पर लिटकी हुई मधुर मुस्कान की छटा अनुराग- रूपी सागर से उत्पन्न विद्रुमवृक्ष के पल्लवों से रक्तपुष्प की भ्रान्ति को उत्पन्न कर रही है ।। १०८।। भाति मचन्दनतिलकं कालागुरकुटिलपल्याभरणम् । वदनं नन्दनमेत लतिकालास्यललितं ते ॥ १२९ ।। दर्शों को आनन्दित करनेवाला, भ्रलविया के मधुर मय से ललित, पन्दन एवं तिलक से अलस्कृत तथा कृष्ण अगुरु से निर्मित पुटिल पलारूप आभूषण को धारण करनेवाला तुम्हारा यह मुस अत्यधिक मुशोभित हो रहा है ।। १२६॥
६२ समयमारका यातः मुन्दरि सुतरां स्तनमारपरिश्रमः शनकः। प्रोपितशाशोफ़ादिव मध्यः कृशतरत्वं ते ॥ १३० ।। हे मुन्दरि । तुम्हारा विपुल स्तनकलश के वन करने के भार का परिश्रम धीरे धीरे घढ़ ही रहा है अर्थात् तुम्हारे स्तनकलरा अभी मत्त हाथी के गण्डयल को मॉनि वृद्धयुन्मुस ही हैं। तुम्हारी कटि मित्र शैशय के चले जाने के शोक से मानो अधिक कृशता को प्रात हो रही है अर्थात् अभी तुम्हारी कटि और अधिक पतली हो रही है ॥ १३०॥ टिप्पणी रटिश दुर्बरता से नितम्ब को गुरुना का और विसरत है। पन पयोर एव क्षामतर मघ माग शव में भी काम का मंचार कर देने वाले माने गये है। नधापुपायशून्येन रूपेणानेन सुन्दरि । न प्राप्यन्ते प्रकृप्टेन प्रयत्नेनेव संपदः ॥१३१ ॥ है सुन्दरि । तो भी उपाय से रहित तुम्हारे इस रूप ने प्रष्ट प्रयन के बिना अप्राप्य सपत्ति की भाँति, धन नहीं प्राप्त किये जा सकते ॥ १३१ ।। गुणपती ललितापि न शोभते तनुतरार्थकदर्थन पान्विता । मुरुपिशक्तिरिवार्धरती परंत्रजति वेशाधूः स्पृहणीयताम् ॥१३२॥ अलमारों से अलंकन, ललिव एवं अर्थती होती हुई भी सत्य भो अर्थ यो कदर्थना से सबलित मुकरि को सूक्ति की भाँति, मौन्दर्यादि. गुणशालिनी, ललिन अर्थात् मनोहर क्यापि स्वय मी धन का तिरस्कार करने वाली वेश्म पर स्पृहणीयता को नहीं प्रान करती ॥ १३२ ।। संसक्तेषु सुरामयी धनगुणाघानेषु लक्ष्मीमयी स्फीतार्थेषु मुघामयी विपमयी निष्क्रान्तविचेषु च । वेश्या शामयी नितान्तकृटिला सद्भालीनेषु या देवानामपि सुदृ मोहजननी क्षीरोदवेलेच मा ॥ १३३ ।।
चतुर्थ समयः हे सुभ्र । देवताओं में भी मोह (भ्रम) को उत्पन्न करने वाली, सुरामयी, लक्ष्मीमयी, सुघामयी, विपमयो एव शसमयी क्षीर समुद्र की वेला (तरग) की भाँति, आसक व्यक्तियों में मदिरा का काम करने वाली, धनी एव गुणी व्यक्तियों में लक्ष्मीमयी, प्रभूत सम्पत्तिशाली व्यक्तियों में अमृतमयी सी प्रतीत होनेवाली, धनविहीनों में पिमयी लगनेगली, सद्भावमवलित अथवा सद्भावरहित व्यक्तियों में नितान्त कुटिल शख सी मालूम पडनेवाली वेश्या, दूसरे के विषय में क्या कहना, साक्षात् देवताओं को भी मोहित करनेवाली होती है ॥ १३३ ॥ इति तया वचनामृतमर्पितं श्रवणपेयमवाप्य कलावती। जननि मै द्रविणाधिगमोचितं परिचयं कथयति जगाद ताम्॥१३॥ इति शीदेमेन्द्ररिरचिताया समयमाएफाया पूजापरोपन्यामो(?)नान चतुर्थ समय। इस प्रकार उस वृद्धा के द्वारा कहे गये, पण सुखद वचनामृत प्राप्त करके कलायती ने उससे महा-हे माव ! मेरे लिये प्रयोग मन प्रान करने के योग्य उपाय को बतलायो॥ १३४।। महाकनि न्नेन्द्र के द्वारा रिचित समसमातृका का यह 'पूनाघरोपन्यास' नामक चौथा समय समाप्त हुआ।
पनमःसमय:
अथ मन्मधमत्तानां झरिणामित्र कामिनाम् ।
उन्धाय बन्धकोशिक्षामाचले जरच्छिखा ॥१॥
कतारती की प्रार्थना को सुनकर उन जरा वेश्या ने, कान से
मनकाले हाथियों को चाँधने के लिए चरा में करने के लिये-दस्तिनी
का शिक्षा को भति. सामप दिन काना लामा का पार कर एक दम
वश में करने के लिये कुनदाखिों-बेश्या यों-को शिक्षा का उपदेश
देना प्रारम्भ किया ॥१॥
श्रूयतां पृषि मात्र विचित्रोपायवृत्तये ।
मया दुहित्वात्सल्यादयं किंचिचदुन्यने ॥२॥
हे पुति । मुनो, सर्वत्र विचित्र उपायों को प्रयुक करने के लिये,
में पुनी प्रेन के कारण, कुछ ठाम चाव को बदला रही हूं ॥२॥
पूर्व भाग्यरीनै कार्या यत्नेन कामिनाम् ।
जातरागविमागानां कर्तव्यो त्यानमग्रही ॥३॥
सर्वप्रथम कामिननों को, प्रपन्नपूर्व, मारपरोसा हो करनी
चाहिए। कामियों में बर्तमान राग (प्रेम, अनुराग) को मात्रा को
जानकर दो उनका मान अधनंग्रह करना चादित ॥३॥
कुमुम्भरागः मिन्दरागः कुमरागवान् ।
लाभारागोऽय मासिष्ठो रागः कारापरागत् ॥४॥
कैमरिया राग (रंग, कनर), मिन्दुररान, कुमराग, लामा
(लादी) राग, माचिराग (मजाठिश ग), कापायसग ( मेना.
रंग, गेरुआरंग)॥४॥
हारिद्रो नीलरागथेत्यष्टौ बगौतुकारिणः ।
मुवगरागस्तामाख्यो रातिरागस्तपारः ॥ ५ ॥
पञ्चमः समय ६५ गगः मीमामंज्ञश्च लौहाँ मणिममुइयः। काचगगम्नया शैलो घटौ धात्वनुकारिणः ॥ ६ ॥ हरदौराग, नालराग- आठ रागवण (रंग) का अनुकरण करने वाले है अर्थात आठ प्रकार के रगों के अर्थ में प्रयुक्त हाते है। सुनहला रा. वान (ताँचा ) राग, सासकराग (शीशाराग), लोहिआ- राग, ममिनमुत्सनराग, काचराग, शेनरामदे आठ प्रकार के राग घ तुओं में रहने वाले हैं ।। ५-६ ।। मांध्यरागस्तथा चान्द्रम्तयेन्द्रायुध एर च। वैद्युताङ्गारकैन्याव्यरविरागाम्तथर च ॥ ७॥ मन्ध्या के समय हानेवाला राग, चन्द्रमा का राग, इन्द्ररनुपी राग, विद्युन् समन्धी राग, मगन मन्यो राग, केतु सरन्वी राग, मूवरान ॥ ७॥ राहुरागोऽयमति रागा गगनमागिनः । ओनरागोनिरागस रमनामंत्रयस्तया ॥८॥ रादुराग-2 आठ प्रकार के राग आकाश में रहने वाले हैं। कान का राग (प्रेम) नेत्र का राग, निता में रहनेराला राग 1॥ त्वमागी वापरागय मानमो बुदिसंभाः। अहंकाराभिधानन्य टारिन्द्रियमंतकाः घर का राग, नामिका का राग, नन का राग, बुद्धि का राग और अमर नामक राग-रे आठ प्रकार के राग (अनुराग, प्रेम) इन्द्रियों में रग्ने पान है। पारगोऽयरागय कलामाहपस्तथा । मारागः धरामय पररागस्तवापराः॥१०॥ पराग, अधान, लास (दिरकती, मिराट) राग, पराग, उक्रया क्या गईमराम॥ ---
६
समयमाका
मार्जाररागो हस्न्याख्यश्चेत्यष्टी प्राणिभेदजाः।
शुकरागो हमरागन्तथा पारास्तामिधः ॥ ११ ॥
विटालरान, इस्लीराग- आव प्रचार के राग प्राणियों के भेद
से समुत्पन्न हैं। शुक्रराग, रसराग. पारावतराग ॥ १९॥
गयरबटकायव
करुवाममुद्भवः।
मोकिलो जीवजीतास्यश्वेन्यौ पक्षिजातयः ॥ १२ ॥
मयूरसंबन्धी राग. चदाराना कचाकुत्सनुवन्न गा, कोधिलराग,
चक्रवाकराग-२ आठ प्रसार राग पक्षिजाति में रनेशने है |
कारागोऽम्धिरागय नखाख्यः पाणिमंगतः।
दन्तरागस्तधा
पादगगम्तिलकरागमान् ॥ १३ ॥
केशरान, अस्थिराग नन्दराग, पाणि में रहने वाला राग, दन्तरागा
चरणराग, तिलकराग १३॥
कर्णराभिधानश्वेत्यष्टारगविभाविनः ।
छायारागस्तथा भूतरागोऽपम्मारवानपि ॥ १४ ॥
' कर्णपूर नामक राग-ये आठ मसर के राग अङ्ग में रहने वाले
हैं। छायाराग, भूतराग. अपस्मार (मृगी) राग १४ ॥
ग्रहरागोय गान्धों पक्षालः क्षोभरागमृत् ।
विमाचराग टन्यष्टी महारागाः प्रकीर्तिताः ॥१५॥
प्रहरान, गान्धर्वराग, पराग, धोमरान, पिशापरान–चे आठ
प्रकार दे राग महारान कई गरे है ॥१५॥
कौमुमः कुम्भरागय नारङ्गाझोऽय दाडिमः ।
मद्यरागः वृष्टगगो विनात्यथिताभिवः ॥ १६ ॥
मुमुमराग, पुन्मराग, नारगीरागाअनाररा, नकरान, दुष्टयन,
'विसर्प (एक प्रकार की बीमारी, छुतहा रोग) राग, चिठानाम-
राग ॥ १६॥
पवमः समय: भ्रामरोऽप्यय पातङ्गो वृधिकाख्योज्यराभिषः। भ्रमाख्या स्मृतिजन्मा च रतिरागो ग्रहामिधः ॥१७॥ भ्रमरसम्बन्धी राग, पतङ्गसंबन्धी राग, वृश्चिकनामक राग, पर- नामक राग, भ्रमनामक राग, स्मृतिजन्य रतिराग, ग्रहनामक राग ||७|| रागो रुधिरसंज्ञश्व पोडशेते प्रकीर्णकाः । मंक्षिप्तं लक्षणं तेषां क्रमेण श्रूयतामिदम् ॥ १८ ॥ रुधिरसतकरान-ये सोलह प्रकार के राग चतुदिक उपलब्ध होने वाले हैं । इन सबका सक्षेप में इस प्रकार लक्षण मुनो ॥ १८ ॥ कौसुम्भो रक्षितः स्थायी सणान्नश्यत्युपेक्षितः । स्वमानरुक्षः सैन्दः स्नेहश्लेपेग धार्यते ॥ १९ ॥ केसरिया रंग भली भाँति रक्षित रहने पर स्थायी होता है और उपेक्षित होने पर क्षण भर में नष्ट भी हो जाता है। स्वभारतः रूसा सिन्दूरी-सिन्दूरसंबन्धी-रंग स्नेह (तैल-अनुराग) के साथ मिश्रित होने पर ही धारण किया जावा है ॥ १६॥ अल्पलीनः सुसार्यव घनो दुःसाय कौडमः । तप्तः श्लिष्यति लाक्षाङ्कः दलेपं नायाति शीतलः ॥ २० ॥ कुडुमराग पतला हलका रहने पर सुखप्रदायक क्या-गाड़ा होने पर दुःसदायक होता है। लासाराग वत-उष्ण रहने पर ही जुड़ता है और शीतल हो जाने पर संशिष्टता-जोड़ को नहीं प्राप्त होता ।। २० । तप्तः शीतय माविष्टः स्थिरमोगक्षमः समः। स्थिरो रोक्ष्येण कापायः स्नेहयोगेन नश्यति ॥ २१ ॥ मासिराग चाहे तत हो और चाहे शीतल हो, समानरूप से ही, काफी समय तक मोग प्रयोग-फे योग्य रहता है। फापायराग रूस रहने पर चिरस्थायी होता है किन्तु यही नेल, पानी आदि चिकने पदार्थ के संयोग से शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥२१॥ ७०मा० समयमारका सुरक्षितोऽपि हारिद्रः क्षणेनैव विरज्यते । नीलो देहक्षयस्थायी वार्यमाणोऽपि निवलः ॥ २२ ॥ सुरक्षित रहने पर भी हरिद्वाराग क्षणमरके लिये ही अर्यात स्वप- काल के लिये ही विशिष्टरूपसे रत्रित होता है। नीलरागनीला ग] देह [ आधार रूप वर आदि के विनाश पर्यन्त रहनेवाला तथा घोने पर भी निश्चल-अमिट होता है ॥२२॥ सौवर्णश्छेदनिधतापस्तुल्यसचिः मृज्यमानस्य वैमल्यं तात्रमंजस्य नान्यथा ॥ २३ ॥ सौवर्ण (सुवर्ण सम्बन्धी) राग काटने पर घिसने पर क्या तपाने पर भी सर्वदा समानरूप से ही चमकीला बना रहता है। ताम्रसंज्ञराग की विमलता मलने-रगड़ने पर ही होती है अन्यथा वह मलिन हो जाता है ।। २३ ।। रीतिनामस्तु मालिन्यं स्नेहेनाप्युपजायते । मैसस्यादौ च मध्ये च ये च मलिना रुचिः ॥ २४ ॥ रीविनामक रग को मलिनता स्नेह (तेल आदि) से भी होती है सोसक राग आदि मध्य और अन्त में अर्थात् सर्वदा मलिन ही रहता है।॥२४॥ तीक्ष्णस्वभावाल्लोहस्य काठिन्याच न नम्रता। मणिनामा च निर्व्याजः सहजस्वच्छनियलः ॥ २५ ॥ लोह की कठिनता से भी वीण स्वभाव होने के कारण नत्रता होती है अर्थात् कठोर मी लोह जब वीक्षण करने के लिये तपाया जाता है तब उसमें नम्रता आ जाती है। मणिराग, विना कारण भी, स्वभावतः निर्मल और निश्चल होता है ॥२५॥ स्त्रमावभिदुरः काचमनरलनिरीक्षक शैलोपि गोत्वस्थरी हृदयामावनीरसः ।। २६॥ --
पञ्चमः समय:
६६
स्मावतः टूटनेला काचसंज्ञकराग छलनिरीक्षक (अन्यया देखने
चाला अथवा मसाला आदि से देसने याला) होता है। हृदयहीन
होने के कारण नौरस शेल (शैलराग) भी गौरयपूर्वक उन्नत होकर
स्थायी रहने वाला होता है ॥२६॥
सांध्यथलच नित्यश्च कल्पदोपो दशाश्रयः ।
चन्द्ररागः प्रशान्तातिशीतलः क्षयवृद्धिभार ॥ २७ ।।
सान्ध्यराग क्षणस्थायी, सईदा होनेवाला, रात्रि तथा दोपों (चोरी
आदि) का उत्पादक तथा सभ्यायो होता है। क्षय एयं पृद्धि का
भाजन चन्द्रराग प्रशान्त एवं सन्तापशाम होता है ।। २७ ।।
ऐन्द्रायुधो बहुरुचिर्यक्रमायाविलासभूः।
चैद्युतस्तरलारम्भदृष्टनष्टविकारकत ॥ २८॥
इन्द्रधनुपी राग विभिन्न कान्तिवाला, यक एवं माया के विलास का
कारण होता है। विद्युत् सम्पन्धी राग झटिति प्रारम्भ होने पाला।
देखने मात्र में ही नष्ट हो जाने वाला और विकार (मेघसंघर्प) से
प्रादुर्भूत होनेवाला होता है ॥२७॥
अजारः स्रीजनायज्ञाचलितो लोहिताननः ।
केतुसंशः स्फुटानर्थकारी बन्धपधादिभिः ॥ २९ ॥
अगार (भीम) राग खोननों की अवज्ञा से अथया खीजनों
के द्वारा विहित अयशासे प्रचलित सथा लोहितानन होता है।
पेतुसंवाफ राग पन्धन अथरा यध आदि के द्वारा स्पष्ट रूप से अनर्थ
परनेयाला होता है ।। २६ ॥
आस्तीक्ष्णतया नित्यसंतापः सततोदयः ।
मिप्रक्षयपी पिमो राहुरागो महाग्रहः ॥ ३० ॥
नित्य उदित होने याला सूर्यराग सीक्षण होने के कारण नित्य ही
सन्दापमय होता है। भयार राहुराग मित्र (सूर्य) के विनाश को
पाइनेवाला मामद ॥३०॥
समयमाहा श्रौत्रः कर्णमुखाम्यासाद् गुणाकर्णनतत्परः । अक्षिजन्मा परं रूपमात्र परिणतस्पृहः ॥३१॥ श्रोत्र राग पान के मुख के अभ्यास के कारण अर्थात् कान के सुखप्रद वस्तुओं के सुनने के अभ्यास के कारण अन्वे अन्दै गुनों के सुनने में तत्पर रहता है। नेत्रजन्मा राग अर्यान् नेत्रका रान केवल रूप मात्र में ही सहयालु हुआ करता है ।। ३१ ।। रामनो रिविधास्वादभोज्यमंहारलौल्यवान् । त्वङ्मयः सर्वमुत्सृज्य मागालिङ्गनोत्सुकः ।। ३२ ॥ रसना-सबन्धी रात विविध आस्वादवाने भोजनों के सहार करने का लालची होता है। स्वक सम्बन्धी राग सब कुछ छोड़कर प्रिय के सर्वाङ्ग कै आलिङ्गन के लिये ही उत्सुक रहता है ।।३।। घाणारस्पः पुप्पधूपादिभूरिमारमलोभभूत् । मान्मः मतताम्यस्तम्पृहामारमनोरथः ॥३३॥ प्रापराग पुर, धूर आदि को अत्यधिक मुगन्धि का लोभी होता है। मानसराग सर्वदा अन्वस्त पदार्य में ही एकमात्र स्मृदा करने वाला होता है॥३३॥ बुद्ध्याख्यो गुणवन्कान्तामक्तिव्यमनवर्जितः। अहंकाराभिषः श्लान्यनंगमोन्नतिलक्षणः ॥ ३४ ॥ वुद्धि नानक राग गुणशाली प्रिय अथवा प्रिया ( कान्त, कान्ता) विपयक छतिस्प व्यसन से वर्जित रहता है। अहंकार नामा राग प्रशसनीय व्यक्ति अया पदार्थ के संगन से उन्नति करनेवाला होता है।॥ ३४॥ पसंजय तारुण्यान्कायदर्पपलोद्भवः । अवस्तु रतुमात्रार्थी तत्सलोधतातरः ॥ ३५ ॥ पसंज्ञक राग वरमता के कारण शारीरिक दर्प तया चल से
पञ्चमः समय:
उत्पन्न होता है। सद्यः तत्पर तथा पुनः कासर होने वाला अश्वराग
रतिमात्र का इन्दुरू होता है ।। ३५ ।।
कलामाभिधानश्च वणदर्शनचञ्चलः
मेपाख्यः शप्पकालाभ्यासतुल्यरतिस्पृहः ॥३६॥
कृालास (गिरगिट अथवा दिपकलो) नामक राग खी-समूह
के दर्शन मात्र से चञ्चल हो उठने वाला होता है। मेप नामक राग
पास के पास खाने की स्पृहा के समान ही रति का भी इच्छुक
होता है ।। ३६ ॥
वाख्यो रत्यन्तरिमुसः स्वीरहस्यप्रकाशकः ।
गाईमः क्रूरसंमतृप्तिमात्रपरायणः ॥ ३७ ।।
कुकुरराग रति के अन्त में ही निमुन्य होने याला तया की के
एकान्त में होने वाले काम ( समोग) का प्रकाशक (जहाँ वहाँ गली
पाट में रति कार्य करके ) होता है ।। ३७ ॥
मार्जारजन्मा मातत्यादत्यन्तनिकटस्थितिः ।
कोखरः क्लेशन्धादिनिरपेक्षसमागमः ॥ ३८॥
निहालोसन्न राग निरन्तर के संपर्क से अत्यन्त निकट में ही
रहने वाला होता है। हस्ति-राग क्लेश, बन्धन आदि थे निरपेक्ष (भय
रहित ) होकर के स्त्री-ममागम करता है ।।३।।
शुमाभिघोऽन्तनि:स्नेदः कामं मुसमुसस्थितिः।
हमनंज्ञः मुखस्थित्या गुणदोपरिमागरम् ॥ ३९ ॥
शुक नामक राग भीतर से तो स्नेह शून्य किन्तु नुस से पयर्यान
मुबदायक होता है। मनंजक राग अपनी मुपपूर्वक स्थिति से
गुण और दोप का रिमाग कानेगला होता है ॥ ३६॥
पारापतारयः मम्नेहरतिमरवलक्षणः
मायूरः सापुःस्फीतरूपप्रमदवृत्तान् ॥१०॥
समयमातृका
१०२
पारावत (कबूतर) संजक राग प्रेम-परिपूर्ण संभोगके समग्र लक्षणों
से संयुक्त होता है। मयूरसंबन्धी राग अपने शरीर के फैलाये गये रूप
से, प्रमत्त होकर, नाचनेवाला होता है ।। ४०॥
बहुशः सुरतासङ्गमात्रार्थी चटकाभिधः ।
कृरुवाकुभवः कान्ताप्लेदालेशविभागवान् ॥ ४१॥
चटक (गौरैया) नामक राग बहुत अधिक सुरति-संयोग मात्र
को ही चाहनेवाला होता है। कृकया-समय राग प्रिया के स्वल्पाति.
स्वल्प क्लेश में भी हिस्मा बटाने वाला होता है ।। ४१॥
कोकिलो मधुरालापः प्रभूतप्रसरत्कथः ।
जीवजीवकसंजय परिचुम्बननिथलः ॥४२॥
फोकिलराग मधुरमापी चर्चा का अतिविषय हुआ करता है।
जीवजीवक ( चक्रवाक) सज्ञक राग परिचुम्बन में निश्चल हुआ
करता है।। ४२॥
केशारख्यः सप्तदिवसस्थायी कृच्ट्रानुरञ्जकः ।
अस्थिसंस्थोऽन्तरस्थय प्रच्छन्नस्नेहजीवितः ॥ ४३ ॥
केश नामक राग सप्ताहान्त तक रहनेवाला एवं बड़ी कठिनाई
से अनुरंजन करने वाला होता है। अस्थि (हड़ी) में रहनेवाला
राग अन्तरस्य तथा प्रच्छन्न स्नेह (चिकना घातुविशेष, अनुराग) से
जीवित रहने वाला होता है।॥४३॥
नखामियोमासमात्रस्थापीयाति शनैः शनैः।
प्राणिनामा प्रयुद्धोऽपि बद्धमुष्टेने लक्ष्यते ॥ ४४ ॥
नर-नामक राग, केवल एक मास तक रहने वाला होता है
और यह धीरे-धीरे जाता है। प्राणि नामक राग प्रबुद्ध (प्रस्ट ) होता
आ भी लालची व्यक्ति को दिसलायी नहीं पड़ता ॥ ४ ॥
दन्तामियो यस्ताम्बूललीलामात्ररुचिः सदा ।
पादाख्यश्वरणालीनः प्रणामेरैव केवलम् ॥ ४५ ॥
पञ्चमःसमय:
१०३
जो दन्त-नामक राग है वह सर्वदा केवल ताम्बूल-चवर्ण में ही
रचि अया ताम्बूनचरर्ण से ही रक्तिमा धारण करता है। चरण में
पूर्णतः लीन रहने वाला पाद-संतक राग केवल प्रणामों से ही सत्कृत
होता है ॥४५॥
तिलकप्रतिमो नीचस्योत्तमस्त्रीममागमः।
कर्णपूरश्च कौटिल्यारकर्णलग्नोतिकत्यनः ॥ ४६ ॥
तिलक-नामक राग तो नीच पुरुष का उत्तम स्त्री के साथ समा-
गम है । कर्णपूर-नामराग कुटिलता के कारण कान में लगने
वाला तथा अत्यधिक बोलनेवाला (वकरादी) हुआ करता है ।। ४६ ॥
मर्मत्रानुचरः शोपकारी छायाग्रहाभिघः ।
अज्ञातचित्तः स्तब्धाख्यो भूतसंज्ञो विचेतनः ॥४७॥
छायामह नामक राग अथवा छायारान सर्वत्र पीछे-पाछे चलने
बामा तया शोपण कर्ता होता है। स्तच नाममाला भुतसंज्ञक राग
अपरिचितचित्तराला तथा चेतना (विवेक) रहिव होता है ।। ४७॥
अपस्मारामिषः क्रूरकोपाक्षेपः क्षणे क्षणे ।
ग्रहो वस्वाञ्चलग्राही मजने विजने पथि ॥४८॥
अपस्मार-संज्ञक क राग प्रतिक्षग भयङ्कर कोप (प्रकोप) के कारण
आक्षेप (फेंकना-प्रक्षेपण) करनेवाला होता है। प्रहराग-जनसंकुल
अथवा जनरहित मार्ग में क्वाचन को पकड़नेगला माना गया है ।।४।।
गान्धवा गीतनृत्तादिरमसंसक्तमानसः ।
यक्षः क्षिप्तो न निर्याति गृहात्तिविचक्षणः ॥४९ n
गान्यर्प राग गीत तया नृत्त आदि के रस में मन को पूर्णतः
संसक करनेवाला होता है। यक्ष राग फेंकने पर भी नहीं निकलता
है और यह गृह मे मुहुर्मुदुः आने में पटुत विचक्षण (बुद्धिशाली)
होता है॥४॥
समयमातृका
पत्तत्प्रलापमुखरः क्षोभाज्यस्त्यक्तयन्त्रणः ।
पंचाचवाशुचिरतस्तीवक्षतविदारणः
झोम नामक राग हृदय विदारक पीड़ा का परित्याग करनेगला
तथा जोक्छ अर्थात् अनर्गल प्रलाप करनेवाला होता है। पिशाच.
संबंधी राग अपवित्र एवं तीन क्षन (नोचने-राटने से होने वाला पार)
से शरीर का विदारण करनेवाला होता है ।।५।।
कौसुमः क्षणिकोदारः पूजामात्रपरिग्रहः ।
भग्नोऽपि कौम्भः शकलश्लेपे लिए इवेश्यते ॥ ५१॥
कुसुम राग क्षणिक क्या उदार एव सम्मान मात्र को स्वीकार
करनेवाला होता है। कुम्भ राग भान हो जाने पर भी टुकड़ों के
जोड़ देने पर जुड़ा हुआ सा दीख पड़ता है ।। ५१ ।।
नारङ्गासरसोऽप्यन्तर्वहिस्तोरणः कः परम् ।
बहुगर्भवया रूटो हृदये दाडिमाभिधः ॥ ५२ ॥
नारङ्ग (नारगो-संबन्धो ) राग मातर मरस होते हुए भी बाहर
से अत्यधिक नोदण कटु होता है। दाडिम (अनार) नामक राग
अपने भीतर ही भीतर गर्भरूप बहुन से बीजों को धारण करने के कारण
प्रौढ अतः कठोर हुआ करता है ।। ५२ ।।
क्षणक्षेत्र्योपमो मायः स्वस्थो बलस्यलक्षणः।
वीमत्माचाररस्यात्कुष्टाख्योऽतिजुगुप्सितः ।। ५३ ॥
क्षण भर के लिये मत्तता को उपमा को धारण करनेगला माय
(मादक वस्तु संपन्थी ) राग स्वस्य एवं अनिर्णय लक्षण याला होता
है। धीमत्म के आचार के कारण अर्थात् बीमस्स होने से विरसता
के कारण कुट नामक राग अत्यधिक जुगुप्मापूर्ण होता है ॥ ३ ॥
रूप्यं च समायाति च्छेदेनेवाङ्गमर्मणाम् ।
चिताभिधानः सङ्गिदाही वश्यानयोगः ॥ ५४॥
पञ्चमःसमय: १०५ रिसर्प (वैरूप्य) नामक राग में अगों के मर्म स्थलों (अत्यधिक पीडादायक सन्धि, अस्थि आदि स्थलों) के काटने की सी पीडा एवं विरूपता होती है। पिता नाम से कहा जाने वाला राग समम अपयों को जलाने वाला तथा वश्यमयोग ( वशीकरण नामक प्रयोग) से उत्पन्न होता है ।। ५४ ॥ भ्रामरः कौतुकास्वादमायो नवनवोन्मुसः । पातङ्गः कामिनीदीप्तिरमिकः क्षयनिर्भरः ॥ ५५ ॥ भ्रामर राग (भ्रमरसन्बन्धी राग) कौतुकरश भास्वाद मात्र करनेवाला तया नवीन नवीन प्रिय वस्तुओं की ओर जानेवाला (उन्मुख) होता है। पावन (पतङ्गसम्बन्धी) राग विनाशोन्मुख, एर कामिनी को कान्ति का रसिक (आस्वादक ) होता है ।। ५५ ।। वृधिकाख्योव्यथादायीद्वेप्योऽप्यरपन्तनिश्चला। त्यक्ताहारोऽतिसंतापनएच्छायो चराभिधः ॥ ५६ ।। वृश्चिक (विच्लू) राग अत्यधिक पीडा देने वाला तथा अनभिमत होते हुये भी अत्यन्त निश्चल होता है। घर राग (धुखार राग) आहार का परित्याग करानेगाला एवं अति सन्ताप के कारण शारीरिक कान्नुि फा विनाशक कहा गया है ॥ ५६ ।। भ्रमनामा मतिमंशावकारूड इवाछुलः । स्मरणाख्यःप्रियस्नृत्या कृतान्यखीममागमः ॥ ५७ ॥ भ्रम नामक राग मतिभ्रंश (विस्मरण) के कारण चाक पर स्थित अतः आकुल की मॉनि होता है। स्मरण नामक राग प्रिम के स्मरण से अयया प्रिय स्मरण से अन्य स्त्री का सम्भोग करनेपाला अथवा करानेगला होता है।। ५७॥ रविग्रहः सदा स्वप्ने मंप्राप्तमुरतोत्मः। रोधिरः कलहे रक्तपात चस्य वर्धते ॥ ५८॥ रविप्रः ( रतिराग) सदा स्वप्न में प्री-सम्भोग से उत्पन्न समयमादका आनन्द को प्राप्त करनेवाला होता है। रधिर राग कलह के समय नीच के रक्तपातों से बढ़नेवाला होता है ।। ५८ ॥ इत्पशीतिः समासेन रागभेदाः प्रकीर्तिताः । विस्तरेण पुनस्तेपां कः संख्यां कर्तुमर्हति ॥ ५९॥ इस प्रसार सक्षेप में मैंने अस्सी प्रकार के राग के भेदों का वर्णन किया है। विस्तारपूर्वक राग के भेदों की संख्या मला कौन बतला सकता है ? अर्थान् राग के भेदों को विस्तृन सरमा बतलाना असन्भर है ||५|| सुहजनार्जनं कुर्यात्पूर्व वारविलासिनी । वेश्यानां पद्मिनीनां च मित्रायत्ता विभूतयः ।। ६० ।। वारविलासिनी (वेश्या ) को चाहिये कि वह पहले अपने लिये बहुत से मित्रों का अर्जन करे अर्यान् बहुत से मित्र बनावें, क्योंकि सुन्दरी वेश्याओं अथवा पद्मिनी (नियों का एकभेद) के लक्षण से सम्पन्न वेश्याओं की प्रचुर सम्पत्ति मित्रों के ही अधीन उसी प्रकार से रहती है जैसे कमलिनी की विभूतियाँ (विकास आदि शोमा) सूर्य के अधीन रहती हैं ।। ६०॥ मुहृद्भिरेव जानाति कामुकानां घनं गुणम् । हृदयग्रहणोपायं शीलं रक्तापरक्तताम् ॥ ६१ ॥ वैश्या अपने मित्रों के माध्यम से ही कामुक व्यक्तिों के धन, गुण, हृदय को वश में करने का उपाय, स्वभाव एवं अपने में अनुरकि वधा विरक्ति को जानती है। वेश्याओं के मिन उनके व्यापार में बहुत सहायक सिद्ध होते हैं ।। ६१ ॥ महाधनस्य नुदां कामिनां प्रेमशालिनाम् । प्रच्छन्नसुरतेनापि कुर्यादाराधनं सदा ॥ ६२॥ वेश्या को चाहिये कि यह अत्यधिक धनी व्यक्ति का एवं स्वभावदः -
पञ्चगःसमय:
.....
प्रेमप्रवण कामी मित्रों का सत्कार उनके साथ छिपे रूप से सम्भोग
करके भी करें ॥२॥
एको विचरतः सूनुः पितृहीनः सुयौवने ।
मुग्धेभूभुजि कायस्थः कामिस्पर्धी वणिक्मतः॥ ६३ ॥
धनी व्यक्ति का एकमात्र पुन (इकलौता बेटा), सुन्दर युवा
वस्था से सम्पन्न पिट विहीन व्यक्ति, अथवा धनी व्यक्ति का, युगा.
वस्था में पितृविहीन एकमात्र पुत्र, सौन्दर्य आदि पर मुग्ध राना,
अथवा शासक राजा के मोला भाला अत शियिल शासक होने पर,
कायस्थ, कामिजनों के साथ स्पर्धा करने वाला व्यापारी बनिये
का पुत्र ।। ६३ ॥
नित्यातुरामात्ययप्रसिदस्य गुरोः सुतः ।
"प्रच्छन्नकामो जाड्य धनः ।। ६४ ॥
सर्वदा रोगी रहनेवाले व्यक्ति, अमात्य, वैद्य तया राजगुरु का
लडझा, समान के व्यचियों की दृष्टि पचाकर चोरी चोरी वेश्यासम्भोग
करनेवाले व्यक्ति, शठधनी (कजूस) ॥ ६४ ॥
नपुंसकप्रसादस्य प्रशमार्थी फलाशनः।
मची धूर्तमहायश्च राजमूनुर्निरङ्कुशः ॥६५॥
अपने विषय में नपुंसक होने के प्रसाद का प्रशमन करने की
इच्छा वाला व्यक्ति, फलाहारी, मत्त, घूतों का मित्र, एर निरदुरा
राजपुत्र ॥६५॥
ग्राम्यो धाद्विजसुतः प्राप्तलामश्च गायनः ।
मद्यः सार्थपतिः प्राप्तः श्रीमान्दैवपरायणः ॥ ६६ ॥
प्रामीण अर्यान् असाय, पाई एक दिन का पुत्र, पर्यात लाम को
मार रिया दुआ गायक, तत्काल प्राप्त सार्यपति (गणपति), सम्पत्ति
शाली भाग्यवादी॥६॥
२०८ समयमाका गतानुगतिको मूर्सः शाखोन्मादश्च पण्डितः । नित्यक्षीवश्व वेश्यानां जगमाः कल्पपादपाः ॥ ६७ ॥ गतानुगतिक अर्थात् अन्धानुकरण करनेवाला मूर्य, शास्त्रोन्मादी (शावप्रवीण होते हुये भी व्यवहार से अनभिज्ञ ) पण्डित, मदिरा के पान से सर्वदा मत्त रहने वाला ये सभी वेश्याओं के लिये चलने- फिरने वाले कल्पतरु माने गये हैं।। ६७ ! प्रथमं प्रार्थिता वेश्या न क्षणोऽस्तीत्युदाहरेत् । जनस्यायं स्त्रमावो हि सुलभामवमन्यते ॥ ६८॥ वेश्या को चाहिये कि यह सर्वप्रथम, लोगों के द्वारा सम्भोग- याचना करने पर, "मेरे पास साली समय नहीं है" ऐमा कहे। क्योंकि लोगों का यह स्वभाव होता है कि वे सुलभ आसानी से प्राप्त स्त्री की अवमानना करते हैं ।।६।। शिरःशूलादिकं व्याधिमनित्यमजुगुप्सितम् । आहारोपयोगाय पूर्वमेव ममादिशेत् ॥ ६९॥ सम्भोग न करने के हेतु बहाना बनाने के लिये वेश्या को पहले ही शिर की पीडा जैसी सामान्यतः सबको होने वाली व्याधियों को यतलाना चाहिये; किन्तु यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि ये व्याधियाँ ऐसी न घतलाई जायँ जिनके सुनने से लोगों को घृणा हो ।। ६६ ॥ पत्नीच कुर्यादनुवृत्तिपूर्व पूर्व महार्थस्य बरोपचारम् । द्रव्यस्त्वया मन्त्रजपादिभिर्या वशीकृतास्मीति वदेचमर्थम् ॥ ७० ॥ वेश्या को चाहिये कि वह, सर्वप्रथम, महाधनी व्यक्ति का पनो की भॉति चित्त का अनुवर्तन करती हुई पर्यान स्वागत सत्कार करे और उससे कहे कि "धन अथवा घशीकरण आदि के प्रयोगों से आपने मुझे अपने वश में कर लिया है ।" इसी प्रकार की और बहुत सी बातें उसे कहनी चाहिये ।।७॥ ।
पञ्चमः समय: स्वयं प्रदत्तेऽपि नवनवे च शङ्केत तद्भक्तिपिपादशीलम् । निन्दप्रकामंजननींविरुद्धां गच्छेन्स्वयं वेदमव काकस्य ॥ ७१॥ वेश्या की त्वविविनी मचि के विषय में विवादशील (तुन हृदय से मुझे नहीं पाती, दुम्दारी मुझ मे सची मति नहीं है आदि कर कर रिवाद करने याने) अथवा अग्नी वैश्वासम्बन्धिनी मक्ति के सिर में विवाद करने याने (प्रेम पर शङ्का करने वाली वेश्या से "मैं तुन्दारा अन्यन्य भक्त है" अदि कहने वाले) धनी व्यक्ति के शरीर पर स्वय अपने द्वारा निगवे नन्वत पर मी वेश्या को शङ्का करनी चाहिये। कपटपूर्वक विन्द्र की भाँति आचरण करने वाली माता की खून निन्दा करनी चादिदे (जैसे-यह बुड़िया एकमात्र आप के ही ऊपर मेरे प्रगाढ़ प्रेम को देखकर उलती है अतः मेरे पास आने के लिये आपके समर देने में आनाचनी करती है और कमी कमी स्वय ही उस कामुक के घर वेश्या को चली जाना चाहिये। विदेशयानामपि मन्त्रयेत तेनैव साधं विहितानुसन्धा। नुमन्य कुर्यात्परिचुम्बनं च गुणस्तुति चावियोषमाः ॥ ७२ ॥ पनि कामुक के साथ अपने दृढतर सम्पर्क को कसा रखने वाली युती वेरया उमी के ही साय विदेश यात्रा की मी मन्त्रणा करे। से जाने पर उमा चुन्मन करे और जर यह अर्द्ध निद्रा की अवस्या में रहे तब उनके गुपों की प्रशंता करे ।। ७२ ।। खप्ने मर मलपेन्मरागं न च तन्नामनिाद्धमेन । न चाम्य वृप्ति नुग्वेषु गच्छेदययस्य पुर्याच मृहुनिषेधम् ।। ७३ ॥ स्वप्न में मी मर्वदा उमरे (कानुक के) नाम के साथ अर्यान् सन नान के ते ते करके अनुरागक तब कुछ प्रलाप (स्थान- राज) करे-जैसे दे गुणनिधि जी! (पनि का पान ) आर मुक्त बमागिन को मनी छोड़ कर कहा जा रहे हैं? आप के बिना मेरा जीना मनम्मत्र है। आदि आदि । इमरे (पनी कावुक के) साय सम्मंग की दृषिको कमान प्रम को सम्मोग की परिनमानि पर ११० समयमाका उससे कहे कि मैं तो आप के साथ सम्भोग में अपार आनन्द का अनुः भव करती हूँ। मेरी इच्छा सर्वदा आप के साथ रमण की होती है और जब वह उस वेश्या को द्रव्य आदि देने लगे तो उसका भी निषेध करे।।७३॥ टिप्पणी-यहाँ यह स्मरणीय है कि वैश्या उन सब काम साई के साथ न कर बनावटी रूप से ही करती है। स्नुि प्रभामा कानुन इन सब बातों ये सब मान कर अपना सब धन उसे दे देता है । तस्माच पुत्रार्थमनोरथा स्यात्प्राणात्ययं तद्विरहे वदेछ । इत्यादिभिः स्वीकरणाद्युपायैर्निवबुद्धेविणं लभेत ॥ ७४ ॥ उससे (धनी कामुक से) वह (वेश्या) पुत्रोत्पत्ति की कामना करे और उसके रिह में अपने प्राणों के परित्याग की भी बात कहे। इन्हीं सब वश में करने के उपायों से अत्यधिक आसक्त कामुक के द्रव्य को प्राप्त करे।।७४।। दावच पूर्ण धनमाहरेत यावत्स रागेण विनष्टसंत्रः । प्रशान्तरागानलशीतलस्तु स लोहपिण्डीकठिनत्वमेति ॥ ७ ॥ वेश्या को चाहिये कि वह अति शीघ्र सामान्य अतः बुद्धिभ्रष्ट कामुक के सब धन का हरण कर ले। अन्यया वह (कामुक) कान- जनित रागानल के प्रशान्त होने पर पहले अग्नि के ताप से कोमल और बाद में-अग्नि के प्रशान्त हो जाने पर कठोर लोह पिण्ड की भाँति रठिनता (अति कंजूसी) को प्राप्त हो जायगा || ७५] यात सर्व मुरताविकाले तमुरुबन्धन निरुद्धकायम् । प्रायेण नृप्ताय न रोचते हि विनम्रशाखापरिपक्षमात्रम् ॥ ७६ ॥ सुरव के समय क्रम के पड़ने पर आनन्द के काल में अपनी जंघाओं की पकड़ से कामुक के शरीर को निरुद्ध करके उमसे सब वृद्ध माँगना चाहिये । अन्यथा सुरत से परितन अतः काम-विरत व्यक्ति से यथेन्ट धन निकाल पाना कठिन होता है क्योंकि परिदम व्यक्ति
पवमःसमय:
को झुकी हुई शाखा के पर्याम पके हुये आम मी प्रायः अच्छे नहीं
लगते ॥७६ ।।
मंधारयेचं च विशेपरितं यावन्न निःशेपघनत्वमेति ।
पुनः पुनः स्नेहलवाबत्रा दीपं यथा दीपकदीपतिः ।। ७७ ।।
जिस प्रकार पुनः पुनः तैलकण से सिक्त मुम्ब चाली दीपक की
बत्ती टीपक को धारण किये रहती है--प्रकश के योग्य बनाये रसती
है, उसी प्रकार प्रेमलव से प्रमन्न मुखवाली वैश्या को मो विशिष्ट धनी
व्यक्ति को वर तक पारम्बार अङ्गीकार किरे रहना चाहिये जबतक कि
वह पूर्ण निर्घन नहीं हो जाता॥७॥
निष्पीतसारं विरतोपकारं शुष्णे शल्कप्रतिमं त्यजेचम् ।
लन्याधिवासक्षयकारिशुष्कं पुष्पं त्यजत्येव हि केशपाशः ॥ ७८ ॥
माररुप सम्पूर्ण धन के महण कर लेने से उपकार करने में असमर्थ
अतः मशीन अथवा मुख के द्वारा चूमी गयी ईस की खोई के समान
निस्तत्त्व कानुक्त का त्याग कर देना चाहिये । बियों का केशपाश
(जूडा) अपने ऊपर लगे हुए पुःप का उस समय परित्याग ही कर
देता है जब कि वह मुरमा कर शुष्क हो जाता है ॥७॥
हेमन्तमार्जार इवाविलीनः स चेन्न निर्याति निरस्यमानः ।
तदेष कार्यस्वनुमर्मभेदी प्रवर्धमानः
परुषोपचारः ॥ ७९ ॥
यदि यह कामुक तिरस्चारपूर्वक निकालने पर मी, हेमन्त काल में
घर के अन्दर चून्दी में अत्यन्त तन्मयता के साथ स्थित विडाल की
भाति, नहीं निकलता है। तम उम माय अत्यन्त तीक्ष्ण, मर्मस्थल
का विदारक, कठोर व्यवहार करना चाहिये। ये व्यवहार आगे क्रमशः
पतलाये जा रहे हैं ।।७।।
शम्यावहारर्वचनप्रहारैः कोपप्रकारर्बननीरिकार।
कौटिल्यसारविविधप्रसारपिद्विचारगणितापचारः ॥८०॥
- ११२ समयमाटा उस कामुक के साय शैया पर शयन के परित्याग से, कठोर वचनों के प्रहार से, कोप करने से, मावा (ट्टिनी) के झोघ आदि से, कुटिलतापूर्ण विविध प्रकार की विपत्तियों के विचार के अर्यात् विए- चिों को ले आकर के, अनुचित व्यवहारों को गिना करके॥८॥ याजाविवादेरधनापार्दत्तानुवादः परसाधुवादः। निन्दाप्रवाः परप्रवाटिप्रवादः कथितारमाईः ॥ ८१ ॥ याच्या के विवाद से ('मुझे अनुक वस्तु दीजिये' ऐमा करने के अनन्नर मगडा करके), निर्धन व्यक्तियों के लिये प्रयुक्त दुर्वचनों से, अन्य व्यक्ति के द्वारा प्रदत्त वस्तु के क्यन से, अन्य लोगों से लिये प्रदत्त धन्यवादों से, निन्दा पूर्ण वचनों से, हृदय को विद्ध करने वाले वाक्यों से, विटों के प्रमादों से, कष्ट के स्थनों से; ।। ८१॥ मुहुः प्रवामः कलहोपवानर्मायानिवासैः कटुकाधिवासः । सविलामळमनोपवाननिष्कासनीयः म पृथुप्रवासः ।। ८२ ॥ विदेश गमनों से, क्लहपूर्वक उपवासों से, कपटपूर्वक इतस्ततः निवास करने से, कामुक के अप्रिय व्यक्तियों को घर में जाने से भौहो को चमका चमका करके अर्थात् भौदों से इशितपूर्वक मय आदि के सेवन अथा नोटा आदितथा उपवासों से, दीर्घावधिक प्रवासी से निर्धन कामुकों को निकाल देना चाहिये ॥२२॥ स चेत्पुना रागजतुप्रमक्तस्तीबाबमानरपि न प्रयाति । तदा तमुक्षिप्तभुजान्यवक्त्रा दामी वदेद्वित्तवियोगदीनम् ॥ ८३ ।। चदि चेत् पुनः रागरूपी लाह से अचन्त आसक्त वह कामुक तीन अपमान करने पर भी नहीं जाता है, तव वित्त के अभाव से दीन उस व्यक्ति से हाय को उठा करके और दूसरी ओर मुह करके दामी कहे:-३॥ यत्राभवत्कामुकलोकयात्रा विचित्ररूपा सततं विभूतिः । गृहे चतुर्थ दिनमय तस्मिन्यस्य दृष्टस्य वत्सवस्य ।। ८४ ॥
पञ्चमःसगः ११३ जहाँ पर कामुक व्यक्तियों की विभिन्न एवं विचित्र रूपयाली, सर्वदा सम्पत्ति से परिपूर्ण लोकयात्रा (व्यवहार निर्वाह एवं आना जाना) हुआ करती थी, वेश्याओं के उन घरों में सौभाग्यसे पूर्ण वधू-सब (त्रियों के द्वारा मनाया जानेवाला एक त्योहार) का आज चौथा दिन है ।।४।। क्लीवस्य यस्यास्ति न भोगमपत्स किं भुजिष्याभवने करोति । न यस्य हस्ते तरमूल्यमस्ति स किं समारोहति नावमग्रे ।। ८५॥ जिस नपुंमक के पास सम्भोग के लिये धन नहीं है यह वेश्या के घर में भला क्या करता है ? जिस व्यक्ति के हाथ में उत्तराई का पैमा नहीं है, क्या यह नार पर, पार होने के लिए चढ़ता है ? ||८|| प्रक्षीणवित्तेन निरुद्यमेन किं रूपयुक्तेन करोति वेश्या । विच्छिन्नदुग्धा न पुनः सगर्भा सा कस्य गौशारुतयोपयुक्ता ।। ८६ ॥ सौन्दर्ययुक्त, निर्धन तथापि निरुद्यम व्यक्ति से वेश्या क्या करती है ? दुग्घरहित और पुनः गर्मरती न हुई गो भला किस व्यक्ति के लिये भले काम की उपयोगी वस्तु है ? ८६ ।। मिथ्यर रिक्तः कुरुते जडानामारजनं प्रेममयर्वचोमिः । क्षीरक्षय चुम्बनलालनेन बालस्य वृद्धि पिदधाति धात्री ।। ८७॥ धन विहीन व्यक्ति व्यय में ही प्रेम-परिपूर्ण वचनों से जडव्यक्तियों पा मारन (सिपारिस, मनोरञ्जन ) करता है। दूध के समान हो जाने पर धात्री चुम्बन एव लालन-दुलार मे ही पालक को बहलाती है- बढ़ाती है। धात्री (घाई) स्तन के दुग्ध क्षीण हो जाने पर चुम्बन एवं दुलार के द्वारा चालक की वृद्धि को करती है ।। ८७ ॥ इत्यादिभिस्तद्वचनावमानस्तस्मिनाते ग्रीष्मतुपारतुल्यै । क्षीणं निरस्तं पुनराप्तपित्तं भजेत यवाहतवित्तमन्यम् ॥ ८८ ।। इस प्रकार के अपमानपूर्ण वचनों में निरस्त, प्रीन्मनु के जाड़ा के समान अहितकर उस कामुक के चले जाने पर, वेश्या को समा ११४ समममाएका चाहिये कि वह पहले निर्धन होने के कारण निकाले गये और पुनः धनी हुने व्यक्ति को तया उद्योगपूर्वक धन इकटा करनेवाले अन्य व्यक्ति को भी अङ्गीकार करे।। प्राप्ते कान्ते कथमपि धनादानपात्र व वित्ते त्वं मे सर्व त्वमसि हृदयं जीवितं च त्वमेव । इत्युक्त्वा तं क्षपितविभवं कनुकाभं भुजंगी त्यस्त्वा गच्छेत्यधनमपरं वैगिकोऽयं ममासः ॥ ८९ ।। किसी प्रकार मे धन प्रहण करने के पात्र अर्थात् जिनसे धन लिया जा सके ऐसे कान्त पुरुपके पास होने पर "तुम ही हमारे हृदय हो, तुम ही हमारे प्राण हो और तुम ही हमारे सब कुछ हो ऐसा कहकर धन प्राप्त करके पञ्चुकाम (केचुल-सश अर्थान् निरर्यक) शक्ति को मुजगी (वेश्या) उसी प्रकार से छोड़ करके अन्य धनी व्यक्ति का मेवन करे जैसे मर्पिणी बिना चित्ती मोह के अपने केचुन को छोड़ देती है। यही वैश्याओं की पद्धति है || उद्देशलेशेन यदेतदुक्तं तत्कार्यकाले विविधप्रयोगम् । तस्मात्स्वयुझव विचार्य कार्यमुक्त्वेति तृणी जरती चकार॥ ९० ॥ इति प्रीतेमेन्द्रविरचितायां समयमातृकायां रागविभागोपन्यासो नाम पञ्चमः समय: संक्षेप में यह जो कहा गया है कार्य के ममय विविध प्रकार से प्रयोगाई है । इनलिये अग्नो बुद्धि ने विचार करके करना चाहिये ऐसा रहकर यह वृद्धा कृष्टिनी चुप हो गई ।।१०।। श्री क्षेमेन्द्र के द्वारा विरचिन समय मातृका मा रात्रिमागोपन्याम' नामर पन्नम ममय ममान हुआ।
पष्टः समय: अथ क्षणक्षीणधनायमाने शनैः शनैर्निष्प्रतिभे शशाके । चौदोपयुक्त क्लिोफनेन सर्विष्ठा मीलिततारकाभूत् ॥ १ ॥ इसके अनन्तर सपसल के लिये सामान्यरूप मे समृद्ध हुये अथवा ब्राह्म मुहूर्व की पुण्य बेला मे चन्द्रिकारूपीधन के अयगले चन्द्र के धीरे धीर कान्तिहीन हो जाने पर, परिवर्तनशीला द्यौ (आकाश) उसी प्रकार से, देखने मात्र मै ही, नक्षत्रमू य हो गई जैसे अपराध करनेवाली अत अशान्त अन्त करणवाली खी लागों के देखनेमात्र से ही अपनी आँखो को बन्द कर लेती है ॥ १ ॥ इन्दो प्रयाते कृतरानिमोगे प्रवेशकाले चिरकामुकस्य । वेश्येर मंध्या गगनाङ्गनाग्रं निर्दिष्टतारात सुमं चकार ॥ २ ॥ रात्रिरूपी नायिका का सम्भोग कर चुकनेवाले चन्द्र के अस्त हो जाने पर, रात्रिपर्यन्त वेश्या का सम्भोग करनेगले कामुक के चले जानेपर तया चिरकामुक (निसने उमण्ठा के कारण रात्रि भर अपनी पारी को प्रतीक्षा की हैं) वेश्या के घर में प्रवेश का ममय, होने पर, वेश्या की भांति सन्ध्या ने चोरूपी स्त्री के सम्मुस कुक इने गिने तारारूपी युमुमो को धारण रिया ॥२॥ अयोदित सस्थितिदानदक्षे पाले सा श्रीमति पङ्कजिन्याः। मिकामाले मधुपानफैलिरभूविटानामिर पट्पदानाम् ॥ ३ ॥ इसके बाद, अपनी स्थिति से प्राणियों के जीवनदान देने में दश, प्रभामरलित, याल सूर्य के उदित होने पर य.मलिनी के विकासकाल में, पिटा की भांति, भ्रमरों का मधुपान (मदिरापान, पुपरसपान) फा उसब हुआ।।३॥ कलाती माक्तिम्भूपणाला धम्मिलमाल्यप्रणयप्रमः । मृता दर्पणमीक्षमाणा मतारका चन्द्राती निशेष ।।४।।
११६
समयमातृका
स्मराङ्गनालिशुकायमानरस्थताम्मूलक्लिासपूर्णा ।
समाका नापितदत्तहस्ता कान्तां तनुं पण्यटशां नयन्ती ॥ ५॥
सलीलमात्रान्तिपिलोलकाञ्चीरवेण पारामतदत्तमंज्ञा ।
अर्थार्थिनी राजपथप्रकारं हम्यं प्रियोत्सङ्गमिररोह ॥ ६॥
स्तनों के नीचे तक लटकती हुई मोती का माला को धारण
परनेवाली, देशपाश (सूडा) में गुथी हुई माला की सुगन्धि ने
आकृष्ट भ्रमरों से घिरी हुइ, दर्पण को देखती हुई, भाल में बिन्दु
लगाने के कारण चन्द्रमा से उद्भासित रात्रि की शोभा को धारण करने
वाली; काम क्रीडा अथवा रवि क्रीडा मे गुरु की माँति आचरण करने
वाले अर्थात् कामोदोपक, हाथ में लिये गये पान के विलास से पूर्ण,
अपनी नवागत माता को साथ लिये, नाप्ति के हाथ मे हाथ मिलाये,
अपनी मलोनी शरीर को द्रव्य से सरीदने के योग्य अवस्था को
प्राप्त कराती हुई, पिलाम (नाज नसरा ) पूर्वक सीढी पर चढने से
हिलनेनाली करधनी के शब्द से गृह-क्यूतरों को अपने आगमन का
सक्त देती हुई, धन को चाहनेवाली, कलावती ने राजमार्ग के
किनारे स्थित अपने पक्के महल की छत पर, प्रियतम की गोदी की
माँति, चढी ।।४-६॥
वामनवीत्तत्परिभोगयोग्यं प्रातर्नमें कामुरमीक्षमाणः ।
विलोक्य का शयनोस्थितानां पण्यागनानांगणयन्विचेष्टाः।।७।।
कलारती के सम्भोग के योग्य, प्रातकाल, नवीन पामुक को देखता
हुआ, इधर उधर देखकर, शयन से घटी हुई, वारयनिताओं की विविध
चेष्टाओं का आकलन करते हुये 'पद्ध' नामक नापित ने कलावती/
से कहा ॥७॥
आसन्नमित्रागममुच्यमानममागमे जागरसहभम्य ।
निर्यान्ति टीपाभरात्रिभोन्या: पदय प्रमावे गणिकायहेभ्यः ॥८॥
पष्ठ समय
-
देसो दिनमणि सूर्य के उदित हाने पर नि प्रभ कर चुमने
पाने दीपकों की भांति, आसन गिनों के आगमन के शरण सहवास
की परिसमानि पर रात्रि में वेश्याओं क सम्भोग्य कामुकनन, प्रात •
पाल के होने पर, गणिकायों के गृहों से निकल कर जा रहे है ।। ८॥
एप प्रयुद्धः सहमा जटामृल्लीलाशिनः कुक्कुटकृजितेन ।
गृहान्नलिन्याः परिहत्य राजरथ्यां पार्गेण मठं प्रयाति ॥९॥
मुगों के बोलने से सहसा ना हुआ अथवा प्रात काल के विषय में
नरेत हुआ, सटाघारी, 'लोलाशिव' नामक मठाधिपति 'मलिनी' वेश्या
के घर से निकलकर "वश्या के घर से आते हुए मुझे लोग देख न लें"
इस विचार से रानमार्ग का छाडकर कुमार्ग से-गल की गली से-
अपने मठ को जा रहा है।
टिप्पणी-यहाँ पर कवि ने कुमार्ग शब्द का प्रयोग कर मठाधिप के प्रयत्रष्ट
गैन का और गोन किया है।
एते निधेनिग्रहमसूनोः पृष्टा पिटा रात्रिसुसं प्रभात ।
कतुं प्रवृत्ताः पृथुभोज्यभूरिव्ययाय भद्राभरने विभागम् ॥१०॥
प्रात' काल 'निमहभट्ट ने पुत्र अथवा कोतवाल के पुत्र 'निधि' के
द्वारा रात्रि में मुम्ब, आनन्द पे विषय ने पूरे गये विटजन, 'भद्रा'
वैश्य के घर म,दिव्य भोजन में पर्यान व्यय होनेवाने देण्य को परस्पर
बाँटन में मलग्न है ।।१०।।
प्रासे गृहद्वारमनगमारे महापिटे पदर यमन्तसेना ।
शून्यप्रनुमापि पुरः ममेत्य निगीधभोग कथयत्यमत्यम् ॥ ११ ।।
देखो, कान से मतमा मारिट (प्रसिद्ध पर गाली कामुक)
के घर के साने पर आने से अनन्तर अगवानी करती हुई वसन्त.
मेना (परया का नाम ) राति भर सरनी एकान्त में मई रहने
पर भा पूल पालती हुई अरन राति र सम्माग फा बन कर
रही है।॥११॥
११८ समयमातका टिप्पणी-यह मनोवैज्ञानिक वात है कि जिस स्त्री के पास बहुत से व्यक्ति आते जाते हैं, उसको अय लोग भी चाहते है और जिसके पास कोई भी नहीं नाता उसमें अन्य नवागन्तुक अथवा परिचित रोग भी प्रेम नहीं दिखराते। यही कारण है कि बम तमेना पूछे ही अपने रात्रि-सम्भोग का बात कह रही है। भमागदा नोटितकर्णपाली मतगनाना गणपाल केन । आत्मापराधं पिनिगृहमाना निरौति रामा जननीजना ॥ ११ ॥ रतिकेलि के कलह में, हाथी की भाँति मतवाले 'मत' नाम गणपाल के द्वारा अङ्गद ( वाजू धन्) भग्न हो जानेपर तथा कर्णा भूपण ( कान की बाली) के टूट जाने पर अपने अपराध को दिसानी हुई 'रामा' वेश्या अपनी माताओं (दुट्टिनियों) के सामने प्रलाप कर रही है ।। १२॥ निर्गच्छतो ग्रामनियोगिनोऽस्य ददाति गुप्तस्य समेत्य पश्चात् । इदं तथेदं च पुरः प्रहेयमित्यादि संदेशशतानि वृद्वा ॥ १३ ।। घर से निकलनेयाने ग्राम के अध्यक्ष इस 'गुन' को पीछे से आकर "यह और यह बात आगे छाड देनी चाहिये" इत्यादि मैकड़ों मदेशों को वृद्धा (हिनी) दे रही है ॥ १३ ॥ मंस्थितेयं मह माधन कोशं नुमं पातुमनङ्गलेसा । अग्रे यदस्या मघुकुम्भाही मे निकर्पन्पुरुषः प्रयाति ॥ १४ ॥ निश्चय ही यह 'अनगलेसा' मदिरा के पुरवा (कप) को पीने के लिये 'माघर रे माय जा रही है। क्योंकि इसरे आगे मदिरा के घट को लिये हुये मेंडा को सींचता हुआ एक पुरुप सेवर पल रहा है।॥ १४॥ रकस्य सा चलितस्य । विप्राय यत्स्स्न्दरदानकाले। प्रसाधनाय स्त्रयमेर गन्तुं ममुद्यता पश्य शशाइलेसा ॥१५॥ .
पष्टःसमयः
देखो, ब्राझन के लिये मुद्रा-दान करने में इन सैनिक (मेनाविपति)
के साय सम्भोग के लिये निर्धारित ममय के पूर्व 'शशाङ्कनेसा'
स्वयं ही अपना प्रमाधन (मेकअप) करने के हेतु जाने के लिये
समुद्यत है ।। १४॥
उद्यानलीलागमने निशायां मुनिश्चित मल्लिकयार्जुनस्य ।
कृतः प्रमाते नवीनवम्दानं विना पश्य मुहूर्तविनः ।। १६ ॥
देख, रात्रि में 'मन्तिका' के साय 'अर्जुन' के उद्यानविहार में
जाने के निभित हो जाने पर प्रात काल नवीन सिल्कचन के न देने
से मुहूर्त का दिन ही किया गया है ॥ १६ ॥
टिपनी-पहले नपा के अनुसार को भी व्यदि जन मा ग्या को
रदान केलि के लिये रंक करटा या टच दह उस वेश्या को प्रातःकाल ही,
क्स की शान केने का निवारक होटा था, एक सिल पत्र भेंट करता था।
इसके बाद पश्ये मानगादी यो।
मेपपदस्पन्द्रवमोजिम्य मुक्या प्रभूतं निशि कालखन्डम् ।
विचिका पिटहपहेतुर्वद्यार्थिनी वन्दति कुटनीयम् ॥ १७ ॥
रात्रि में, मेंडा देनेराने 'इन्द्रवमुद्विज के द्वारा प्रदत्त नेप (महा)
के कलेजा को यदुन अधिक मात्रा में स्वार के परिणाम स्वरूप
हजा से पीड़ित, विटों के पं का कारण (दि लोग उसे हंजा ने
पीड़ित देखकर प्रसन्न हो रहे हैं, यह हिनी वैद्य को बुलाये जाने के
लिदे पिला रही है।॥१७॥
वैद्योऽयममिन्डलगुन्मनामाप्रमातुचारी नगराजितानि।
समुयनः पगलानि दातुं रङ्गिकार्य निजमुष्टियूः ॥ १८ ॥
प्रावकात पर्यटन करनेवाला 'मण्टलगुग्न' नामक यह वैग भी
नगर में प्रातरि गये पूसरनों (सुगड़ी) को अपनी मुट्टियों में मर
भर के 'राणिका' को देने के लिदै तत्पर है।॥१८॥
समयमातृका
कक्षालनाम्ना निगि गायनेन वाराबहारान्निशमनभाण्डा।
गृङ्गाति का नो चरणस्पृशोऽस्य वरांशुकं कुण्डघटादिमूल्यात् ॥१९॥
'काल' नामक रात्रि के गायक के द्वारा भीड़ बचाते ममय
अथा हास्य मे मदिरा पीने के पात्र को चुराते समय माण्ड के फूट
जाने पर यह कौन वेश्या है, जो चरण पकड़नेवाले इस गायक के
बहुमूल्य यन को कुण्टा और घट के मूल्य के रूप में नहीं ले
रही है ? ॥ १६॥
प्राप्तस्य शंभाणिजस्तु चारे मुप्तस्य शून्ये शयने निशायाम् ।
नन्दा समेत्यापरकामिगेहात्मविप्रलम्भं शपथं करोति ।। २० ।।
मोमगार के दिन अथवा अपने लिये निर्धारित समय में आये
हुरे 'शनु' नामक वणिक् के शून्य शयन पर रात्रि में सो जाने पर
'नन्दा' वेश्या दूसरे कामुक के घर से आकर के उसके मामने कपट
पूर्वक, अन्य किसी के साथ सभोग न करने के लिये शपथ सा
रही है।॥२०॥
पितुहाभूरिविभूपणानि प्राप्तं गृहीत्वा महनं मृणाली ।
निगृह्य संदर्शयति स्वगेहं शून्यं तमन्विष्टमुपागतानाम् ॥ २१ ।।
'मृणाली' पिता के घर से बहुत से आभूषणों को लेकर आये
हये 'मदन' मे आभुपणादि लेकर और उसे (मदन को) छिपा कर
उमको (मदन को) सानने के लिये आये हुये लोगों को अपना शूना
घर दिपला रही है ॥ २१ ॥
भोज्यं विना पाटलिका प्रविष्टं मुष्टिप्रदं श्रोत्रियमविगत्रम् ।
शुष्कानदातापिनुकार्यमेतत्कि किं करोपीत्यमाद्वीति ।॥ २२ ॥
'पाटलिसा भोज्य विश्या का सभोग शुक) अथवा भोजन मामग्री
को पिना लिये ही घर में आरे हुये नया मुट्ठी भर अन्न देनेगले
यानिक 'अविरात्र मे बारम्बार पूंछ रही है कि क्या यह पितृकार्य
(पाद) है ? यह आप क्या कर रहे हैं ? ॥२॥
पाठःसमय: १२१ मार्जारजिह्वा जननी हरिण्याः पद्मस्य भोज्यं निशि लुण्ठितं यत् । तस्मिनगते तद्विजने विशङ्का पश्य प्रभाते करलीकरोति ॥ २३ ॥ देखो, 'हरिणो की, विडाल फी भाँति लम्मी एवं पटोर जीमनाली "मारि-निता' नामक माता (कुहिनी) रानि में 'पद्य' से बोने गये भोजन को उसके घने जाने पर एकान में निराश होकर, प्रातःकाल, सा रही हैं॥२३॥ ईविशेषात्कृतकोपवादसंमूछितायां मलयं रमण्याम् । विभूपणं तोपणमाशु किंचिदस्यै प्रयच्छेति वदन्ति सरुपः ॥ २४ ॥ ईर्ष्या विरोप के कारण किये गये कोप से रमणी के मूच्छित हो जाने पर "इसके शरीर पर मलय पन्दन और अतिशीम शीतलता प्रदान करने वाला कोई विभूषण (मुकामाला, चन्द्रगणि आदि) लगाओ" इस प्रकार सखियाँ कह रही हैं।॥२४॥ टिप्पणी-शरीर पर शील पदार्थ के रसने से कोथ की उगता कम हो जाती है भोर मून पलि चेतना में सट भाता है। राग कृष्णीकृत केश एप क्लीविशेषस्फुटयुद्धभावः । योगागृहं शम्घरसारनामा यागाय युग्येन गुरुः प्रयाति ।। २५ ।। राग (पिनाम आदि पाल को फाला फरनेवाले पदार्थ खी. रिपयिणी आसक्ति) से अपने श्वेत फेशों फो फाला फरनेवाले, पली. विशेष (शरीर पर पड़ी झुरियों) से स्पष्टरूप से युद्ध प्रतीत होनेवाले 'शम्मरसार' नामक गुरु याग के लिये युग्य (यागी) से यागगृह फो जा रहे हैं ॥२५॥ अयं जनस्थानविनाशहेतुः केतुः सरकतया प्रसिद्धः । आस्थानमदृचिटिवत्सनामा प्रयाति युग्पेन पिशीर्णयः ॥ २६ ॥ अपनी अत्यधिक माता के लिये प्रसिद्ध अथरा गर नामक राक्षस फे समान करता के लिये विख्यान, जनस्थान ( दण्ड सरण्या एक स्थान, पाजनराकुल स्थान ) . विनाश का कारण फेतुस्वरूप, समरमाका व्यस्तवस्त्र, 'चिटिवस्म' नामक यह राजसमा का मट्ट (अध्यक्ष) बनी से जा रहा है ।।०६॥ उच्चश्चिरात्मधिनिपक्तदृष्टिरचाधिस्टः कमलोऽधिकारी। कलावति त्वामयमीक्षमाणः शूलार्पिताारतुलां निभर्ति ।। २७ ।। हे कलायति बहुत देर से ऊँचे प्रासाद पर अपनी दृष्टि को निश्चन्त रूप से लगाये हुवे, घोडे पर सवार, 'कमल' नामक यह राज्याधिकारी तुम को देखता हुआ शूली पर लटके हुये व्यक्ति की तुलना को धारण कर रहा है अर्थात तुम्हारी ओर ऊँचे देसने के कारण शुली पर लटका हुआ सा प्रतीत हो रहा है ॥२७॥ श्रीखण्डोज्ज्वलमल्लिकातिलकवानक्षामहेमाङ्गट- शिउन्नलिष्टविनष्ट नामिकतया परयातजारचरः। एप त्वामवलोक्य मालवपते तः प्रपञ्चामिधः पश्योद्वेष्टविवेष्टनानि कुरुते भोगीव मन्त्राहतः ।। २८ ।। देसो, प्रीखण्ड (मलय पर्वत में समुत्पन चन्दन खण्ड) के समान रम्बल मलिका (चमेली, वेला का एक पुष्पभेद) की माला एव चन्दन को धारण किये हुये, सुवर्णनिर्मित मोटे अङ्गद ( वाजू-मन्ट) को पहने हुये, कटी हुई एक पुन जोडी गई नासिका के विनष्ट हो जाने के कारण प्रसिद्ध भयङ्कर जार, 'प्रपञ्च' नामवाला, मालवपति का यह दूत तुम्हें देख कर, मन्त्र से वश में किये गये सर्प की भाँति, अपने पीप के टीने बन्धन को सँभाल कर पाँघ रहा है।॥८॥ एप प्रग्यातहटा कपटविटयटानर्मकर्मप्रगल्मः श्रीगुप्तो नाम धृतः मकलकलिकलाकल्पनामृलदेवः । दृष्ट्वा दूरात्यसिद्धां तर नरजननीमञ्जलिश्लिष्टहस्तः पश्याणादत्तमंन्नास्मिनचलचियुकः स्तोतुमंतांग्रवृत्तः ॥२९॥ इघर देसो, अपनी जादरचना के लिये प्रसिद्ध, कपटी निदों को पष्ठः समय: १२३ अपार भीड़ में भी मजाक करने में प्रगल्भ, कलियुग की सफल कलाओं की कल्पना का मूल प्रवर्तक अर्यात् कलियुगी कलाओं का कालिदास, मुस्म्राट कारण चञ्चल ठोढ़ी (चिपुरु) वाला, 'श्रीगुप' नामक यह धूत दूर से ही तुम्हारी प्रसिद्ध नूतन माता को देखकर, हाथ जोड़े हुये, कुछ इगित (इशारा) फरके इनकी स्तुति करने में लगा हुआ है ॥२६॥ पातालोचालवालुप्रपिततबदनस्पष्टदृष्टोग्रदंष्ट्रा विश्वग्रासावहेलाकृलितशिपिशिसाविभ्रमोद्मान्तजिह्वा । मेषाणां चण्डमुण्डाहरणकटकटारावपिष्टास्थिसंस्था मिद्धा शुप्कातिपूर्णा जयति मगवती कुट्टनी चण्डघण्टा ॥३०॥ पाताल की भाँति विस्तृत एवं भयङ्कर तालु के कारण फैले हुये तया विस्तीर्ण मुख में स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा है उस दाँत जिसका, विश्व को प्रासरूपी क्रीडा (अवहेला-तिरस्कार-क्रोडा) में घञ्चल, लपलपाती हुई अग्नि की शिसा की भाँति भयङ्कर निकलकर फडपड़ा रही है जिहा जिसकी, मेषों (भेड़ों) के कटने से रक्तस्राय आदि के कारण भयङ्कर मुण्टों के प्रहण करने से अथवा प्रक्षण करने के समय शरीर की हड्डियों को पीस देता है--हिला देता है.-फटकटा शब्द जिसका, ऐसी, सिद्धिप्रदात्री, शुष्का अर्यान् कठोर हृदयबाली, अत्यन्त- पूर्ण, भयर घण्टावाली, मगवती फुटनी रिजयिनी हो रही है ॥३०॥ एप स्फीतधनस्य लोमवसतेः पापस्य मूर्तिस्पृशः शहाख्यस्य महाहवाणिजः पवाभिधानः सुतः । आकृष्टः प्रतिवेदमनिर्गतविटः सारङ्गमुग्धः गिः मुम्रता तुपराशिलोलचटकाकारः ममुद्वीपते ।। ३१॥ हे मुन्दर ध्रुटियाली वेश्ये महायनी, लोम के घा, पापी, मूर्ति फा स्पर्श करनेयाले अधया पाप की मूनि फा स्पर्श करनेवाले, यह मूल्यनस्तुओं में विश्वा 'र' नामक पणिक का किशोर, सारङ्ग १२४ समयमातका नामक वाद्य से मुघ अथरा हरिण की भाँति मोला भाला 'पव' नाम चारी पुत्र, प्रत्येक वेश्याओं के घरों से निकने चिटों ( कामु0) के साथ आहट हुआ अत तुप (भूसी) की ढेर को देखकर चम्बल घटक पक्षी की अवस्था का प्राप्त होकर तुम को एक टक देख रहा है, अर्थात् नैसे चटक पक्षी तुपराशि को देख देख कर पुलकित तया आरट हेता है उसी प्रकार यह विशर भी तुम्हें देख कर आकृट हो रहा है ।। ३१ ॥ टिप्पणी-महारव के द्वारा यहा पर तुप एव चक दो उपमा देने का भच यही है कि वरयात्रा का सौदर्य तुप की माँति नि सार और उनका और पाट होनेवारा व्यक्ति का माति विमान्य हुआ करता है । एप निधिविधिना तब नूनं मेयमतिविधितः प्रहितो ना। स्थूलमुखः पृथुचूलकलापः स्कन्धयुगाश्चितकर्गसुरणः ॥ ३२॥ मेषमति अर्थात् भेंड की भाँति पिवक्शून्य तथा अन्य व्यक्तियों का अन्धानुकरण करननाला, चौडा एप मोटे मोटे गालों से भरपूर मुन चाला, शिर मे बडे बडे वाले को धारण करनेवाला, कन्धों तक लटकने वाले सुवर्ण निमित कर्णाभूषणों को पहने हुये निधि स्वरूप यह कचकि नि-वय ही विधाता के द्वारा, भाग्यशान् तुम्हारे लिये नेता गया है ॥३॥ इत्यादि ककन पितर्यमाणं पणिसुतं दृक्पतितं विचार्य । मनोरथाम्यथितलाभतुष्टा सवालिका सस्मितमित्युवाच ॥ ३३ ॥ 'बई' नामक नापित के द्वारा इस प्रकार से अनुमान किये गये दृष्टिगत उम यपिपरा के विषय में विचार करके मनारय के द्वारा वान्छित लान से प्रसन होरर कह का मित्र वह उहिनी मुस्करारक ऐमा चोली ।। ३३॥ निर्यताम्बूललालालवशालपलद्रीयसत्तारलोकी रक्तोपानयुगोवत्सरमरमुखरप्रस्सलत्पादचारः पष्टःसमयः एवंरूपोऽतिमुग्धः शिगुरखिलधनावालय बन्धकीना- मल्लेशाराधनाहः स्वयमुपनमति प्रायशः पण्यपुण्यैः ॥ ३४ ॥ निकलने वाले पान के लार के कनों से चितकबरे, मुड़नेवाले प्रीया (गर्दन) एवं मुस का अवलोकन करनेवाला, लाल वर्ण के जूते की जोड़ी पहनकर 'सर सर शब्दापमान तथा लड़खड़ाने वाले डगों से चलकर आया हुआ, इस प्रकार का अत्यन्त मोला भाला, सम्पूर्ण धन की प्राप्ति के हेतु वेश्याओं के लिये रिना क्ट के ही वश में करने फे योग्य यह किशोर प्रापशः वेश्याओं के पुण्य के कारण ही स्पर्य प्रात होता है ॥३४॥ कलावति त्वन्मुखनियलोऽयं महाविटवारणचक्रचारः। निगदितोऽये तब देवतायाः शिशः पशुढेगरिभूतिकामः ॥ ३५ ॥ हे फलावति ! तुम्हारे मुरा को एकटक देखनेवाला, मोगरूपी मौख्य की कामनाओं से, चारणरूपी तुम्हारे गुमचरों के द्वारा (वैश्यायें धनिकों को बुलाने के लिये अपने दूतों को छोड़ती हैं) यह शिशुरूप पशु देवना सदश तुम्हारे सामने (बलि होने के लिये ) निदित है ।। ३५ ।। पाथें त्वमेपां व्रज कडू वर्ण दूतं करिष्यन्ति भवन्तमते । तयेति दत्तोचितसामनोऽसौ जगाम सौधादवरुद्म दृष्टः ॥ ३६ ॥ इति श्रीक्षेनेन्द्रविरचितायां समयमातृकाया षष्ठः समयः । ६ फर! तुम अतिशीम इन लोगों के पास जाओ। ये लोग वेश्या (फलायती) से मिलने के लिये तुमको दूत बनायेगें। उस पुहिनी के द्वारा, इस प्रगर से भलीभाँति निर्देश किया गया वह नापित प्रसन्नतापूर्वक उस पक्के महल से उतर कर उन लोगों के पास गया ।। ३६॥ ग्री सेमेन्द्र के द्वारा विरचित 'समयमातका' का पट समय समात हुआ।
सप्तमः समय:
अथाययौ शनैः श्रीमान्नवोद्धृतमनोभवः ।
लतालिङ्गनकुदालः कालः कुसुमलाञ्छनः ॥ १॥
इसके अनन्तर, शनैः शनैः शोभा से सम्पन्न, नवीन कामदेव का
उत्पादक, लताओं का आलिङ्गन करने वाला, बाल अर्थात् अतिशीघ्र
शही प्रारम्भ वसन्त का समय माया ॥१॥
मंभोगसुखसंपत्तिः पराधीनेव कामिनाम् ।
आललम्चे धनेशाशामितीवाकलयरविः ।। २ ।।
कामिजनों की सभोग-जनित सुख-सम्पत्ति पराधीन सी है। इस
बात का ही मानों विचार करते हुये भगवान् भास्कर धनाधिप कुबेर
की दिशा का आश्रयण किये अर्थात् उत्तरायण हुये ॥२॥
दक्षिणानिलसोच्छ्वासा लसत्कुसुपाण्डुराः ।
जातजृम्भा ययुस्तन्व्यो लताः सोत्कण्ठतामित्र ॥ ३ ॥
दक्षिण दिशा से प्रहमान वायुरूपी उच्छवास को लेनेपाली, खिले
हुये पुष्पों से श्वेत शरीरवाली, विकास को प्राप्त हुई पतली लताएँ
उत्कण्ठित स्त्री (पति, विरहिणी स्त्री) की अवस्था को प्राप्त हुई।।३।।
टिप्पणी-पतिरियोगिनो, कामपरवश खो बडे बडे उच्दासों को लेती है।
उमा शरीर देत हो जाता है और वह बारम्बार जमाई लेती है तथा उसका
शरीर भी क्षण हो जाता है ।
दग्धेऽन्धकद्विपा रोपात्पुराणे पञ्चसायके ।
नवं विनिर्ममे काममृतुराजः
प्रजापतिः॥४॥
अन्धक नामक राक्षसराज के हन्ता भगवान शङ्कर के द्वारा क्रोध-
रामशीन कामदेव के जला देने पर प्रजापति (मृष्टिकर्ता) ऋतुराज
वसन्त ने नवीन काम का निर्माण किया है॥४॥
सामःसमयः
प्रस्सलकोकिलालापागायन्त्यो मृगशिजितैः ।
वेश्या इब मधुनीया विरेजुनिराजयः ॥ ५ ॥
कोकिल के कूकों से सयुक्त भ्रनरों के गुञ्जार के माध्यम से गान
करनेवाली, पुष्परसों से भरपूर वनों की पंक्तियाँ कोकिल की मांति
आलाप लेनेवाली, भ्रमर-शब्द के समान मधुर, महीन शब्दों से गाने
याली मदिरा से मत्त वेश्याओं की भाँति मुशोमिन हुई।॥ ५॥
नाकिमलयलेखापङ्क्तिमने लतानां
नखमुखलिपिलीलालोमिनीमाकलय्य ।
मधुमदपरिरम्भे भेजिरे लोहितत्वं
स्थलकमलवनानामीjयेपाननानि ॥६॥
युवतियों को नस के अप्रभाग से ( कोमल कोमन पत्तों पर) अक्षर
लिम्बने की शौकीन जानकर, वसन्न तु की मादकता के चतुर्दिक
प्रमरित होने पर अयवा वमन्त के द्वारा उन्मत्ततापूर्वक आलिङ्गन करने
पर अयना वसन को मादकता का अङ्गीकार करने पर, नूनन किसलय
(केपन) ममूर को धारण करने के साथ ही लताओं के मुख स्थल-
कान के धन को ईर्ष्या से ही मानो लाल हो गये ।।६।।
देण्यवाम शिशिरसमयं वृद्धमुत्सृज्य रे
त्यक्त्वा शीतं तरुणममकवाटरागानुसन्धम् ।
उद्यानश्रीर्मधुमभिमतं वालमेवालिलिङ्ग
प्रायः स्रीणां वयमि नियतिर्नास्ति कार्यायिनीनाम् ॥७॥
उद्याननीने (बगीचे की शामा में भीगता के कारण दुर्बल एवं
वृद्ध शिशिर समय को दूर छोड़कर, धोरे पोरे प्रगाइ प्रेम से मंथनित
वमन शीन को भी त्याग करके मान्य अवस्था में ही वनमान अर्यात्
अगिरप्रवृत्त, अभिमत यमन सुतु का ही आलिङ्गन किया। कार्य-
साधिका (संमोगरूपी कार्य को सिद्ध करनेवाली) त्रियों की प्रायः
वस्या के बारे में कोई सीमा नहीं रहती॥७॥
सनदनादना - अय नापिनतेन स्वहिगतागता। मिथ्या वृत्तनिपेयापि ग्रहणारह मिनोः ॥८॥ चंचिदम्यर्थनया गृहीतार्या लावती । मंध्यायां मनानका यौवानरमजाम् ॥९॥(गलर) दुत का कार्य करनेवाले नापिन ने कार से दो-चीन भार घर के भोवर पालारती के पास जाना-राना किया। पापि कलावती उन रिशोर वणिक पुत्र के नमेग के लिये स्वीकार क्या नस्वीकार के विषय में निचा निषेध कर दी थी, किन्तु किसी किसी प्रकार ने वन किसर के प्रयोजन को स्वीकार करके कन्ननली ने सध्या के समय अपने शरीर के साज सजावद में सलग्न हो र बलगदि ने सन्जित हुई 15-६॥ कपोले क्रीम्फुटटिलपत्राहररिदि- लाठे का तिलकमलकालीपरिसर । तनी लीना हेनयुतिपरिचिता इमरथिः मत्याः कोऽध्यामीलितमयुरोमन्टनविविः॥१०॥ कनाती के कपोल पर कस्तूरी में बनायी गयी सद नया देखो पत्रों नया अनुरों का रचना योगदी यो । ललाट पर सिर के बान की पक्ति के सैनी ने वर का तिलक लगाया। शरीर में वर्ग के समान सन्तिवाले कुन का पहला लेप या 1 व उनकी कई मननीय रूलित, मधुर प्रगर से अपने के नाने की विधि थी॥१०॥ प्रोटकामुग्नंमोगमाक्षिणी चानमंगमे । नोचिताम्मीनि नावं जया नन्ला ॥ ११ ॥ निबनरी स्थूलका सर लिन्द्ध कत्यनाशतो, तो ने ल्झापूर्वक पनी नाना नाता से कहा-"प्रीड कनों के माय ससमः समयः १२८ सम्मोग करने वाली मैं बालक (किशोर) के साथ संयोग करने के योग्य नहीं हूँ" ॥११॥ हारिणी सा वनुलता हारिणी च कृचस्थली । दृष्टिय हारिणी तस्या भी स्मरविहारिणी ॥१२॥ कलायती की लता के समान पतली शरीर मनोहारिणी थी। उसके मोटे स्तन लुभारने थे और हरिणी के समान उसकी आँसें भी सुन्दर थी। इस प्रकार इन मनोहर अगों से संयुक्त यह कामिनी कामदेव की विहारस्थली थो ॥ १२ ॥ अत्रान्तरे वणिक्मनुविवेश गणिकागृहम् । आसमलामाभिमुसरावृतं क्षेत्रवासिभिः ॥१३॥ इसी पोच जब कि कलावती अपने को सजा चुकी थी, शीघ्र ही प्राप्त होने वाले द्रव्य के लिये तत्पर, कलावती के साथ घर में निरास करने वाले समाजियों के द्वारा घिरा हुआ यह वणिक पुत्र उस गणिका के घर में प्रविष्ट हुआ ॥ १३॥ कर्णसंसक्तमुक्ताइकनकस्थूलबालकः । बहुहेममराकान्तिसव्यथश्रेषणद्वयः ॥ १४ ॥ उपके कानों में गोलियों से जड़ी हुयी मोटी मोटी सोने की यालियाँ लटक रही थी। उसके दोनों कान अत्यधिक सुवर्ण के भार के लटकने से पीड़ा दे रहे थे अर्थात् उसके सोने के कर्णाभूषण पर्यात वजनी धे॥१४॥ कण्ठामरणमध्यस्थहमरक्षाचतुष्टयः । जननीहस्तपिन्यस्तसर्पपादितचूलिकः॥ १५ ॥ उसके गले के आभूषण के मध्य मे सोने के बने हुये चार यर या मूर्तियाँ (जिनसे याल की रक्षा की कल्पना की जाती थी) यो। उमझी शिर पर लगी फलैंगी माता के द्वारा अपने हाथ से रखे गये सरमों से अनि यो अनि उसको फलेंगो में सरसों लगे हुये स०मा०
१३०
समयमारका
टिप्पणी-किसी को बालक के पर नजर न लग जाय इस लिये मारे
घालों के बात अथवा क्रेन में सरसों लगा देती थीं।
राजावर्तमणिपूलगुलिकाम्यां विराजिवम् ।
राजतं चरणालीनं निमाणः कटकद्वयम् ॥ १६ ।।
वह राजावत नामक मणियों की बड़ी बड़ी गोलियों से मुशोभित
घाँदी के दो कडे को अपने पैरों में पहने हुये था। चे कड़े उसके पैर
को कस कर पकडे हुये थे ॥ १६ ॥
मुहुर्दीर्घाञ्चलदशा सस्ता संकलयन्पटीम् ।
बहुचूर्णकताम्बूलदग्धास्यकृतसीत्कृतः ॥ १७ ॥
चौडे किनारे वाले, बारम्बार खिसस्ते हुये उत्तरीय (दुपट्टा) को
वह सँभाल कर धारण कर रहा था। पान में चूना अधिक होने के
कारण उसके मुख के भीवर कट गया था, जिससे वह रह रह कर 'सी
सो' करता था !॥ १७ ॥
स प्रविश्य प्रकाशाशां ददर्शादर्शमादरात् ।
कलावतीं क्लाकान्तललितामिर शर्वरीम् ॥ १८॥
कलावती के घर में प्रविष्ट होकर उसने पूरब की ओर ध्यादर
पूर्वक दर्पण और उसपे सामने स्थित क्लावती को 'चन्द्रमा से
उद्भासित रात्रि की भाँति' देसा ॥ १८ ॥
कथं लालनयोग्योऽयं याला संभोगमाग्मवेत् ।
इतीव तारहारेण सस्मितस्तनमण्डलाद ॥ १९॥
दुलार करने के योग्य यह पालक किस माँति सम्भोग श पात्र,
होगा १ मानो यही बात स्थूल हार के माध्यम से स्मित करने वाले
स्तन-मण्डल से अभिव्यञ्जित हुई है ॥ १६ ॥
विशालयदीलाया चक्षण्यातक्षणाः ।
ऋत्विजः सप्त विविशुः पुरस्तस्य महाविटाः ॥ २० ॥
सनम समय
१३१
घन के विनाशल्पी दीक्षा में अपनी विचक्षणता से आनन्द करने
वाले अथवा उन्मन मनाने वाले मात ऋत्विम् (होता, उद्गाता, अध्वर्यु,
ब्रह्मा आदि यज्ञ-संचालक ) रूप महापिट उस बालक के सामने प्रवेश
किये 1000
निर्गुटः क्षीणमाराल्यो दिपिरः कमलाकरः ।
रेचको मरताचार्यः क्षुग्णपाणिस्तुलाधरः ॥ २१ ॥
गणका सिंहगुतथ तिक्तनामा भिपरसुतः।
कटिः कुटिलकथेति भागाम्भोल्हपट्पदाः ।। २२ ॥
उस मातों का नाम एक परिचय इस प्रकार है-झीणसार नामक
निर्गुट, कमलाकर नामक दिविर, मरताचार्य रेचक, हथकटा तुलाधर
(तराजू से तोलने याला ), सिंगुन नामक गणक (ज्योतिषी अथवा
लेखा-कर्मचारी), तिक्त नामाला वैद्य का लडका, कुटिलकटि-ये
सात मोगरूपी फमन के भ्रमर है । ०१-०२।।
वेश्याममागर्म शैली शिक्षितः मनिटहिः ।
प्रविश्य कामिनीपार्थे प्रौढनत्ममुपापिशव ॥ २३ ॥
पाहर उन पिटी ने उस पालक को वेश्या के माय समागम का
तरीका पतलाया | इसके याद फ्लारती के घर में प्रवेश करके वह
पालक उमके पास प्रौढ व्यक्तियों की भाँति बैठ गया ॥२३॥
याममाच्छाद्य नामार्घमप्रस्तारकट्टत्कटाम् ।
नर्मगोष्टी म विदधे शिक्षितां शुरूपाटयत् ।। २४ ॥
जिस प्रकार शिक्षित किया गया शुक विना प्रमग के भी एक ही
यान का पाठ करता है, उमी प्रकार यह पालक यन्न से फलायती
आपे नाकान्त मुख को ढक कर रिना थामर के ही कद लगने याने
उफट हमी मनार को किया ॥२५॥
बनः प्रपिदय कहाली गृहीतोषनरामना।
रखनाय पुरबके रिटानां कपटस्तुतिम् ॥ २५॥
१३२
समयमातृका
इसके अनन्तर उस कक्ष में प्रवेश करके तथा ऊँचे आसन पर
विराजमान हो क्वाली (नवागत माता) ने विटों को प्रसन्न करने
के लिये उनके सामने ही उनकी कपट-स्तुति करना प्रारम्म
किया ।। २५ ॥
धन्योऽयंचालकः श्रीमान्भवद्भिर्यस्य संगतिः।
युष्मत्परिचयः पुण्यपरिपाकेन लभ्यते ॥ २६ ॥
सम्पत्ति एवं शोभा का पात्र यह बालक धन्य है, जिसकी आप
लोगों के साथ सगति है। निश्चय ही आप लोगों की संगति (साय)
पुण्य के परिणाम स्वरूप उपलब्ध होती है ।। २६ ।।
शिशुरप्ययमस्माकं कामुकोऽमिमतः परम् ।
बाल एव सहस्रांशुः कमलिन्या विकासन् ॥ २७॥
कामुक यह चालक भी हम लोगों को बहुत अधिक प्रिय है।
सूर्य अपनी बाल्यावस्था में ही कमलिनी का विकास करने वाला होता
इत्यादिमिः स्तुतिपदैः कुट्टन्या विटमण्डले ।
स्वीकृते भूरभूरिक्षप्रं ताम्बूलावेलपाटला ॥२८॥
उपर्युक्त प्रकार से कहे गये प्रशसायचनों से टक्त वृद्धा ने टि-
मण्डल को अपना बना लिया । कहाली के बोलने के समय उसके मुग्य
से निकले हुये पान के रस से मिश्रिव थूक के कणों से यहाँ की जमीन
लाल हो गई थी॥८॥
ततः काली कलावत्या धात्री वेतालिकाभिधा ।
ताम्बूलदानायसरप्रहर्पाकलितापदद ॥ २९ ॥
तदनन्तर कलावती की 'वैतालिका' नामपाली कृष्णवर्णा घाई ने
पान देने के समय अत्यन्त हर्ष से आऊल हो कर बोली 11 २LIM
अत्यल्पः परिवारोऽयंताम्बूलप्रणयी स्थितः ।
नास्माकमन्यवेश्यानामिवासंख्यः परिग्रहः ॥ ३०॥
ममम ममय पान खाने का पानी, यह अत्यधिक अल्प परिवार याँ पर स्थित है। हम लोग अन्य वेश्याओं का मॉनि असत्य अर्थात् बहुत से व्यक्तियों का साह नहीं करती है ॥३०॥ सः प्रथमपूच्चोऽयं देवावृतिरूवारधीः । यस्यानुगेगारमुलमा दुलंमापि रलारती ॥ ३१॥ देवताओं की तरह आकति पले अर्यान टिव्यशरीरघारी उदार बुद्धि- चाल यह 'क' सर्वप्रयम स्वागत करने के पात्र है, जिनके अनुरोध के कारण दुर्नम मी कलारती मुलम हुई है।॥ ३१ ॥ जामाता गौरवार्दोऽयं पून्यः कन्यार्पणेन नः । शाविरः रमलो नाम मंमानं पूर्वमर्हति ॥ ३२ ॥ (बालक की थार मरत करके) गौरव के पात्र या जामाता (मा) कन्या ( कतारटी) का देकर हमलोगों के पूना के पेग्य है। कमल नाम र शाद्रिक (समाधिपति अथवा शह का व्यापारी) भी प्रथम मम्मान क मानन है ।। ३. ॥ जरं पितुः क्लारन्याः प्रेवकार्यप्रविग्रही। पदिरमामात शनिमहानती ।। ३३ ॥ यति मी कलानी के पिता के प्रेतका (पिण्टमन, प्राद आ) को प्रप रने वाले हैं। दयाय प्रतों को करने पाते हैं। उन्होंने अभी कल ही पदेन मानि (यटन बढी मिद्धि) को मान किया है ।। ३३॥ जम्मन्यतः मनुः पिलः कलशामिधः। गुन्माता गराः पपागं मदः ॥ ३४ ॥ rryान टिम्बरमनध्य के पुर हैं। इनका नाम (कनग)है। मदिरा न फरनं मान दे 'करनी' कलारती १३४ समचमातृका मृदगोदरनामायं कलावत्याः स्वमुः पतिः । मातुलः स्लहो नाम बिन्दुसारः सहोदरः ॥ ३५ ॥ यह 'मृदङ्गोदर' नाम व्यक्ति कलावती की बहन के पति हैं और यह 'क्ल्ह' नाम के महाशय मामा हे त्या विन्दुसार' सहोदर इयं दत्तकपुत्रस्य कलावत्याः कलायुपः । घात्री कलारती नाम रूणचन्द्रश्च तत्पतिः ।। ३६ ॥ यह क्लायती दत्तपत्र ( गोद लिया गया पुत्र) 'पलायु' की घात्री (धाई) कलाबनी है और इनका पनि सम्पचन्द्र' है ।। ३६ ।। अयं भरतभापाजः काम्बो भागवतात्मजः । गायनः स्वरदासोऽयं महामात्यभ्य बल्लमः ॥ ३७॥ यह नाट्याचार्य भरत की मापा (नाट्यशन) जाता 'मानवत' नामक व्यक्ति का पुत्र अयया परमप्र का पुन 'काम्य' है । यह राग के महामन्त्री का मित्र गायक 'स्वरदान है ।।३।। टिप्पणी-महाकवि ने विमी नायक के लिये 'स्वरदान' यह बड़ा ही सदुद नाम रक्खा है। 'स्वरदाउ' ले माने होते है-तन्मयता के साथ स्वरों की भारापना करने वाला अयवा स्वरों का बहुत बड़ा पन्दित, स्वर मित्र दास के समान अनुवर्तन करते हैं। निगिला सूपकारात्मा चुम्मकारश्च कर्परः । वकछत्रधरयायं सञ्जनो युन्याहनः ॥ ३८॥ 'सूपकार' नामर यह निगिल (सब छ साने वाला) है। यह 'कर' ( पात्र का टूटा हुआ टुन्डा ) नामक गुम्मकार है । राजा के अया रतारती के पीछे पीदेबर (छाता) पपड़ पर चल्ने वाला यह 'वर' (बकुल्ला) है और यह वग्नी पीचने याला 'सपन' है। रविशाहिजन्मायं गणिकाग्रहशान्तिकन् । आरामिका करालोऽयं कीलपतय नाविकः ।। ३९ ।।
सनमःसमयः १३५ यह रविशनो नाम के ब्राझन है। इनका कार्य है वेश्याओं के महों को शान्त फरना। यह उद्यान में रहने वाला 'करात' है और यह 'जीलपत नाविक (मलाह) है ॥ ३६॥ उद्यानपालः पन्दोऽयं मुकुलाख्यय पौप्पिकः । चर्मकार्मदत्तोऽयं मारन्छिद्रय धावकः ॥ ४० ॥ यह उद्यानरक्षक 'बन्द' है तया यह 'मुकुन' नामक पति पुनों की देखभाल करने वाला है। यह चमडे का काम करने वाला 'वर्मदत्त' है। यह भारछिद्र' नामक धावक ( एक स्थान से दूसरे स्थान में सन्देश मादि पहुँचाने वाला व्यक्ति) है ॥४॥ बहिरान्ते च चाडाली कोयन्ती घर्षराभिषा । डोम्वचाडरवाख्यथ कोष्ठागारप्रहारिकः ॥४१॥ घर के शहर 'धर्म' नामहराती चाण्डाली आक्रोशपूर्वक चिलावी हुई सड़ी है। वहीं पर गोटागार (स्टोर हाउस, स्टोर रूम) पर प्रहार रने वाला-धारा पोलने याला 'चण्डरव' नामक डोन मी वर्तमान है॥४॥ ताम्बूलं देयमेवेभ्यः प्रहेयं प्रातरन तु । मरत्यै शन्वरमालाय गुरचे दम्भभूतये ।। ४२ ।। इन सब लोगों को ताम्बून देना चाहिये और अविशीन अयत्रा प्रातःकाल सरी 'शम्बरमाला' एव गुरु 'दम्मभूति' के पास भेजना पादिये ।।४२॥ उपवेति गफलमुन्ठिनिविष्टचिचा तालिका सिविधवेशनीप्रविष्टाः । चः प्रभूतमधुपानम्पूिर्णमाना- स्ताम्बूलदानबहुमानगतागवानि ॥ ४३ ॥ मा पट फर अर्यात सा फइने के अनन्तर असा इतीप्रकार की काट कर करे शल साड़ी)सने में संचित शाले
विविध मागे के गृहों में प्रदेश करने वाले ज्यश शिविध जाये
से सुशोभित नगृह में प्ररा करके वैज्ञालिकयन जगन्न मदिरा
पान से नशतेहो परस्पर पानतिरमली सम्मान में कई बार
इघर-घर जाना-जाना नि१३॥
ततः क्षोदेरननाव्यं सत्यनानविदा पुन् ।
उचिव रजनी धूपयाजेन निर्पा ॥ ४४ ॥
नृपन्य वाहुर्युषि दक्षिणोऽहं नव राज्यं सलमान्वरस्यन् ।
मयि स्थिते तिष्ठति नाट्यशानं वे कुलावितातिभिवं ने ॥४५॥
नैं संमान में राजा का दागिना राय है र्यात् प्रदल नहायक
है। ब राज्य नेरी ही कल्न के अधिकार में है मैं को
शुद्ध लिख देता हूँ ही होता है। मेरे रने दम ही नाट्यगास डोबिन
है। मेरी तराज कुदेर की लक्ष्मी-धन-सन्मान के सा करती
है॥४५॥
त्रैलो गणिवेन वैशिनर नोवत्स वा विशिला।
भुक्षा मया भूपत्यः सतरिचिर ननदोड्वा ॥४॥
मैं त्रिलोको नमाचारों को अपनी जिद के राशनबाई !
न ही राजा ने की चिकित्सा को यी मैंने अपनी नदियों ने करने।
राजनों को प्रमन कर उनको सम्पति या अभंग किया है। इसी
प्रकार की बाद नो वा मदिरामाने इन लोगों की 11४६॥
विशन्ने उतावत्ला तान्दताणतीलया।
निर्ययुः फालयन्नोन दिनों भोज्यसंपदम् ॥ १७ ॥
सप्तमःसमय: ताम्बूल देने की लीला से कलावती ने उन लोगों को अपने यहाँ से विदा किया। वे लोग आगे (बालक से) मिलने वाली भोज्य- सम्पत्ति का परस्पर आकलन करते हुये गये॥४७॥ अथ विततवितानं हंसशुभ्रोपधानं शयनममलचीनमच्छदाच्छादिताग्रम् । अभजत हरिणाक्षी क्षीनमादाय बाल निजपरिजननर्मस्मेरवकाम्बुजश्रीः ॥ ४८॥ उसके बाद अपने परिजनों के द्वारा की गयी हंसी-मजाक पर मुस्क- राने से विकसित हो गयी है मुस-कमल की शोभा जिसकी ऐसी, हरिण फी मांति विशाल नेत्रवाली कलायती मदिरा से मत्त उस पालक को लेकर के पलंग पर लेट गयी। पलंग के ऊपर चँदोवा (वितान) फैला हुआ था । शिरहाने हम के समान धवल तकिया रक्सी हुई थी तथा उसका ऊपरी भाग स्वच्छ सिल्क वस्त्र के पदर से आच्छादित था||४८), शिशुतररमणेऽस्याः कौसुमामोदलुम्यद्- भ्रमरमरनिपातपूर्णमानाः प्रकामम् । प्रसरदगुरुधूमश्यामलामा पभूयुः वलितविरतवक्त्रा लजयेव नदीपाः ॥ १९ ॥ इति श्रीक्षेमेन्द्रविरचितायां समयमातृकायां कामुकसमागमो नाम अत्यधिक अल्पवयस्क बालक के साथ युवावस्था से मतवाली फलायती पे रमण प्रारम्भ करने पर पुष्पमाला अयया दीपक ने पड़े सुगन्धित तेल के गन्ध के लोभी भीरों के गिरनेसे-झपटनेसे अत्यधिक फाँपनेवाले (लहसड़ाती ली याले ), घर में फैलने वाले गुरु धुएँ से श्यामल अप्रमागवाले दीपक मानो इस असम सयोग को लजा से ही अपने मुख को या तो घुमा लिये अथरा बुझ गये ।। ४६ ॥ श्री क्षेमेन्द्र के द्वारा विरचित समय-मातृका या कामुकममागम नामाला यह सतम ममय समास हुआ। सप्तमः समय:
अटमः समय:
अथ मितकिरणरतिश्रमखिन्नेर रिनिद्रतारकारजनी ।
प्राभातिकमलिललपस्सेदवती क्षामतां प्रययौ ॥१॥
एतदनन्तर, चन्द्र के साथ रमण करने से थकी हुई सी, अव
प्रात कालीन जल-कण अर्थात् ओस कण रूपी पसीनेवाली तथा अस्त-
गत नक्षत्रों वाली रात्रि दुबज्ञता (समामि ) को प्राप्त हुई ॥१॥
टिप्पणी प्रबल कामुक के द्वारा भोगा गयो रमने भी खिल हो गती
है, उसके शरीर पर रतिधन के कारण पसने की वूदें उभर आती हैं,
तपा यह निद्रावश अखें मूदने लगती है और हो जाती है शिथिल भी।
कवि ने यहाँ पर रानि की अवस्था के दर्शन से कटावती को अवस्था छ
सूचना दी है।
गणिका ततः प्रभाते सकलनिशाजागरेण तानाक्षी।
रात्रिसुखप्रश्नपरां प्रोगच समेत्य कहालीम् ॥ २॥
रात्रि बीतने पर प्रात काल, रात्रिभर जागने से किनिन् लाल नेत्र
वाली गणिका कलारती ने रात्रि के सुख के विपय मै पूछनेवाली
'कहाली' से उसके पास जाकर कहा -॥२॥
वृगु मातः शिशुवयसस्तस्य स्फुटतामसलपुष्टस्य ।
यस्याल्पकस्य बहुलं मरिचकणस्यैर तीक्ष्णत्वम् ॥ ३॥
हे मात.। छोटी मरिच की मांति जिसमें अत्यधिक तीसापन है
ऐसे, असमय में हा पुष्ट (समोसम) शिशुअवस्यावाले उस बालक
की प्रवीणता को सुना ॥३॥
आरोपितः स चेटवा सवामन्युन्नतां शनैः शिशुकः ।
निचलनुर्मुहतं धूर्तः स च छवकमुप्तोऽभूत् ॥ ४ ॥
अष्टम. समयः
१३६
चेटी के द्वारा धीरे से अति ऊँची शय्या पर चढ़ाया गया वह घूर्त
पालक एक क्षण तक अपने शरीर को निश्चल करके पनावटी ढंग
से मो गया ॥४॥
ललनासुलभकुतूहलचपलतयालिङ्गितः स्वयंस मया ।
तत्क्षणनसुरतान्ते सहमा निवेष्टतां प्रययौ ॥ ५॥
ललनाओं में स्वभारत वर्तमान पुतूहल की चशलता से मैने
स्वय उस बालक का आलिङ्गन किया। उस समय, जीवन में प्रथम-
यार सम्भोग करने के अनन्तर सहसा वह निश्चेष्ट हो गया ॥४॥
गफलमस्य लग्नं ज्ञात्वैति मया स शीतसलिलार्द्रम् ।
दत्वा पक्षसि हस्तं प्रलयभयाल्लम्भितः संज्ञाम् ।। ६ ।।
इस बालक को सुपाड़ी लग गयी है। ऐसा सोचकर मैंने, मर
जाने के भय से, उमके यशस्थल पर ठण्डे जल से भीगे हुये अपने हाथ
को रसकर उसे होश में लाया ॥६॥
लब्धास्वादः स ततश्चटकरतिर्मा प्रजागरो मृतः ।
रोदक्लान्तामफरोहणनातीतैः
समारोहः ॥७॥
उसके याद, सम्भोग के आस्वाद को प्राप्त करके, घटकपक्षी
(गौरैया अथवा लाग नामक पक्षी ) की भाँति रति करनेवाला, मूनि-
मान् रानिफा जागरणभूत, यह पालक अगणित सम्भोग मुद्राओं एव
सम्भोगों से मुझे, मम्भोग में होनेवाले परिणम से उद्भूत सेद से
फ्लान्त कर दिया अर्यान् यका दिया ॥७॥
बालमुसं तरणतरं रमसरसेन प्रबोधयन्त्या तम् ।
कटं मयैर कृष्टो ज्वलिताहारः स्वहस्तेन ॥ ८॥
आनन्नपूर्ण उत्कण्टावश, मैने यालमुस अर्थात् देसने मे यालक
प्रवीत होनेवाले किन्तु वरुणतर ( पनि तरुण), अतः सम्भोग में पष्ट
पहुँचाने वाले उस पालक को जगा दिया। मेरा यह जगाना क्या था,
मानो मैंने ही अपने हाय से प्रचलिन अद्गार सींच लिया हो।॥८॥
समयमातका रोदिति शिशुरिति दयया यस्य न दशनसतं मया दत्तम् । तेन ममाघरविम्वं पश्य शकेनेव सन्डितं बहुशः ॥९॥ "बालक रोता है। ऐसा सोचकर दया के कारण मैंने जिसके मुख पर दशनक्षत (दाँत से काटना) नहीं किया, देखो, शुक की भाँति उसी बालक ने मेरे लाल लाल अघर को कई जगह काट दिया है। मुहुरारोहणहेलापरिरम्मैमिनीकृतं तेन । शिशुमंगमात्क्षणं मे लजितमिव नोन्ननाम कुचयुगलम् ॥ १० ॥ उस बालक के द्वारा बारम्बार आरोहण और कौतुकपूर्ण आतिङ्गनों से दवा कर हटा बनाये गये. शिशु के साथ सन्मोग करने से हम भर के लिये लन्नित की भाँति, मेरे दोनों स्तन उन्नत नहीं हुवे ।। १० । अहमस्थाननखक्षतविक्षतवनुवल्लरी परं देन । गुप्ति कथं करिष्ये विदग्धजनसंगमेङ्गानाम् ॥ ११ ॥ उस बालक के द्वारा अनुचित स्थानों में भी अर्थात् उहाँ जहाँ नसों से अत्यधिक क्षत-विक्षत कोमल शरीर वाली में विदग्धजनों सामाजिकों. के महबास में अपने अङ्गों को कैसे द्विपाऊँगी ? ॥११॥ उक्त्वति वाररमपी निखिलनिशीधजागरोद्विग्ना । क्षोणी निरीक्षमाणा लक्ष्यण क्षणं तस्यों ॥१२॥ सन्पूर्ण रात्रि मर जागने से उद्विग्न, वा सुन्दरी वरया ऐसा करकर लना के कारण पृथिवी को देखती हुई अर्थात् नीषी निगाह हिरे हुई एक क्षण तक खड़ी रह गई ।।१२।। तामबदककाली सस्मितवदना विटकदंष्ट्राभिः । मोगोद्भवे रिटानां मनोरयं पाठयन्तीर ॥१३॥ कवालो के मुस्काने से उसने बड़ खाबड़ एवं सादर की ओर निकले हुचे दाँत सष्ट दिखलाई पड़ते थे। कलावती को सन्दोषित
अष्टमःसमय:
१४१
करती हुणे तया सम्भोग के अनन्तर होने वाले विटों के मनोरयों को
रिनष्ट करती हुयी उसने कहा ॥ १३ ॥
एवंविघेव मुग्ध परिशीलितहट्टचेटकटुकानाम् ।
प्रौदिः कण्टकतीक्ष्णा भवति परं पण्यजीवनशिशूनाम् ॥१४॥
हे मुग्घे ! नगर के चेटों (कामुकों) के सम्पर्क के कारण कटु,
वेश्याओं की जीविका के आश्रयभूत बालकों को प्रौठा (संमोग-
निपुणता ) इसी प्रकार से कण्टक की भांति अत्यधिक तीदा हुआ
करती है।॥१४॥
पितृमचनहतं नियतं हस्तगतं विद्यते धनं तस्य ।
भवति न तद्विषमधिकं प्रागल्भ्यं रिक्तहस्तस्य ।। १५ ।।
निश्चय ही उसके पास अपने पिता के घर से लाया गया पर्यान
धन यतमान है अन्यथा खाली हाय (धनरहित ) व्यक्ति की उस
प्रकार की सीमोल्लंपिनी प्रगन्मता नहीं होती है ॥१५ ।।
बिलनिहितद्रविणकणचपलगतिपकोऽप्यलं ठवते ।
दानक्षीणस्तन्द्रीं सुपिरकरः कुञ्जरी भजते ॥१६॥
अपने दिल में अन्न के दानों को एकत्रित करके रसने वाला
भूपक भी काफी उछल-कूद करता है। दान (मदजल) से रहित अतः
साली दिद्रों में पूर्ण शुण्डादण्डवाला हस्ती भी निद्रितावस्या (अलसाई
हालत ) में रहता है अर्थात् चपलता शून्य हो जाता है ।। १६ ।।
बिटविनिवारणयुक्त्या निर्मक्षिकमाक्षिकोपमं सहसा ।
गत्वा करोमि तावत्तवोपजीव्यं वणिक-तनयम् ॥१॥
स्वप्रयम में सहसा जास्र, अन्य विटों को हटाने की युक्ति से
एकान्न में जुआरी की मांति उस वणिकपुर फो तुन्दारा उपजीव्य
(जारिसमा नायन) पनाऊँगी ॥ १७॥
अस्माकमद्गमझ पन्योपनतं महाधननिधानम् ।
दासीमुताः किमेते खादन्ति विटाः प्रमझेन ॥१८॥
१४२ समयमाएका पण्यभाव को प्राप्त अर्थात् अवक्रेतव्य (सरीदने के योग्य ) हम वेश्याओं का प्रत्येक अङ्ग बहुत बड़े धन का सताना है। दासीपुत्र (यह एक प्रकार की गाली है) ये विट प्रसङ्ग से (सभोग से) क्या साते हैं? अर्थात् अपना ही धन साते है॥१८॥ इत्युक्त्या पूर्णतरं शय्याभवनस्थितं समस्येत्य । शिशुमदत्क्वाली विजनकधाकेलितन्त्रेण ॥ १९ ॥ ऐसा कह करके बडी शीघ्रता से शय्या-भवन (सम्भोग पर) मे स्थित उस बालक के पास जाकर के कवाली ने एकान्त में बात करने के योग्य रतिविलास की पद्धति से उससे कहना प्रारम्भ किया ।। १६॥ अपि पुन रागिरखिला सुखेन ते कुमुदहासिनी याता। उन्धनयोग्योऽस्माकं फलावतीहृदयचोरस्त्वम् ।। २० ॥ हे पुत्र । कुमुदों के माध्यम से हास करने वाली अथवा कुमुद की भाँति धवल तुम्हारी यह मम्पूर्ण रात्रि सुसपूर्वक बीती है ? क्लावती के हृदय को चुराने वाले तुम हम लोगों के द्वारा वाँध कर रसने के योग्य हो। अर्थात् तुन्हें जाने देने की हम लोगों की इन्चा नहीं होती ।। २० ॥ टिप्पणी-उमदों के विकास की बात से महावि ने शरद ऋतु की सूचना ध्यानं यलनं जुम्मणमुच्छ्वसनं त्रेपनं परिस्सलनम् । त्वत्संगमेऽपि यस्याः किं कुरुते निर्गते त्वयि सा ॥२१॥ तुम्हारे साथ सयोग के समय भी जिस कलावती का ध्यान, चलन (करवट बदलना), बँमाई लेना, उच्वास लेना, कापना, लडखडाना आदि बातें हुआ करती हैं, वह तुम्हारे चले जाने पर क्या करेगी। अर्यान तुम्हारे चले जाने पर तो उसका जीना भी कठिन होगा ॥२१॥ टिप्पणी-वहाँ यह स्मरणीय है कि पदिदिदिला दिया हो भरने पति के अभाव में टमन्ना ध्यान करती है, उसके लिये उन्कन्या के कारण निद्रा के
अष्टमःसमयः
अभाव में करवा पदला करती हैं, जमाई लेती हैं, लन्यो लन्यो साँस भरती है,
काँपती तथा लड़खड़ाती है। छिन्नु वृद्धा के अनुसार बालक के संयोग के समय
ही जब कलावती की यह भवस्या है तो विरह में यह क्या करेगी, कहा नहीं
जा सकता।
लहिततरणसमुद्रा कलावती यत्पटाञ्चले लमा।
यामधयते दूतैर्दक्षिणदिवल्लभो भोजः ॥ २२ ॥
तुम्हारे वस्त्र के अश्वल में लिपटी हुई अर्थान् तुम्हारे सहयास
में मग्न कलावती ने बहुत से आये हुए युवकों को अपने साय सहयास
का अवसर न देकर उनका विरस्कार कर चुकी है। दक्षिण दिशा
का शासक मोज भी अपने दूतों के द्वारा कलारती से सम्भोग के लिये
प्रार्थना करता है ।। २२॥
जन्मान्तरेऽनुबद्धा यदि नेयं संगतिः कृता विधिना ।
कि त्वयि मम आता परलोके पुत्रकापोशाला २३॥
रिधाता ने यदि तुम्हारी और कलापती फी संगति को जन्मइन्ला-
न्तर से अनुरत न किया होता तो मेरी परलोक में भी तुम्हारे द्वारा
पुत्रकाय (पिण्डदान आदि) को मांशा क्यों जागृत होती?. अर्थात
निश्चय ही तुम्हारा और कलारनी का परस्पर प्रेम जन्म जन्मान्तर का
है। यही कारण है कि पुत्ररूप में मानती हुई में भी सुमसे मरणोपरान्त
पिण्डदान आदि की आशा करती हैं ॥ २३ ॥
विमस्तु संगमेऽस्मिन्नेकः परिचिन्तितोऽस्ति मे मपदः ।
यदयं पिटसंघावः कष्टकजालायते
परितः ॥ २४॥
किन्तु इस संगम मुझे एक ही मयदायी विप्न दिसलायी पड़
रहा है। यह विश्न यह है कि-काँटेदार जाल की भांति निटों रा
यत् यदुत या समूह चारो ओर यमान है ॥२५॥
मुस्त्या पीत्वा भरतः परधनवर्णाः स्वपित्तपरिहीगाः ।
पूर्वास्त्वामेर पितुर्वन्धनयोन्यं प्रयच्छन्ति ॥ २५ ॥
१४४ समयमातृका अपने धन से हीन, दूसरे के धन से जीने वाले, धूर्त ये विट तुम्हारे धन को सा पीकर तुम्हें पिता के बन्धन (शासन) में ले जाकर कर देंगे।॥२५॥ टिप्पणी-युद्ध निर्धन विट धनी व्यक्तियों और उनके लड़ने को बहार वेश्याओं के पास ले जाते हैं और उन देश्याओं तथा उन लड़कों एव व्यक्तियों में भी पैसा लेकर अपना कार्य चलाते हैं। पैसा समाप्त होने पर अपना अपना स्वार्य सिद्ध न होते देखकर वे शिकायत करके उन व्यरियों को उनके अभिभावकों के कठोर निदान में रखवा देते हैं। तस्माद्यदि दिनमेकं तिष्ठसि सुतरामदृश्यरूपस्त्वम् । वदयं कुटिलविटानां नैराश्याद्भिद्यते यूयः ।। २६ ।। अतः यदि तुम एक दिन तक पूर्णरूप से छिप कर यहाँ रहोगे तो निराश होकर के अपने आप कुटिल विटों का यह समूह यहाँ से चला जायगा ॥२६॥ इत्युक्ते कुट्टन्या शैशवसरलाशयो वणिन्सूनुः । तामवदत्सत्यमिदं स्नेहान्मातस्त्वया कथितम् ॥ २७ ॥ कुट्टिनी के ऐसा कहने पर शैशव के कारण सरल स्वभाव वाले उस वणिकपुत्र ने उससे कहा-"मातः! स्नेहयश जो तुमने कहा है वह पूर्ण सत्य है ॥ २७ ॥ अस्ति अधिनिबद्धं मम किंचिजनकमाण्डशालातम् । तदिदं गृहाण दुहितुर्मण्डनमोगव्यये योग्यम् ॥२८॥ पिता जी के भाण्डार-गृह अथवा यतन घर से ली गयी यह कुछ सम्पत्ति मेरी गाँठ में बँधी हुई है। अपनी पुत्री 'कलारती' को साज- सजा तथा खाने-पीने में व्यय के योग्य इसको तुम ले लो" ॥ ८ ॥ इत्युक्त्वा सारतरं दचा तस्यै शिशुगुरुद्ररिणम् । तत्संदशिवमविगच्छन्नपयं पृथुलहHतलकोष्टम् ॥ २९ ॥ ऐसा कह कर वह बालक अत्यन्त महुमूल्य उस द्रव्य को उसे देकर अष्टमः समय: १४५ उसके द्वारा चलाये गये, गुतमार्गवाले, अति ऊँचे महल के सर्वोच्च कोठे पर (ऊपरी तन्ने की कोठरी में) चला गया ॥ २६ ।। तं प्रच्छाद्य महर्या कृत्वा मिथ्या मुसं नापिपादम् । अभ्येत्य विटानवदत्कङ्काली कलकलारम्भे ॥ ३० ॥ अत्यधिक प्रसन्न हुई रवाली ने उस द्रव्य को छिपा कर और अपने मुम्ब को विपाद से परिपूर्ण अर्थात् उदास करके विटों के पास जाकर फोलाहल के मध्य उनसे कहा ।। ३०॥ आजन्ममहजमुहृदामस्मत्प्रणयोपचारतुष्टानाम् । उचितः किमयमकस्माद्भवतां निन्यःममाचारः ॥ ३१॥ जन्म से ही स्वाभाविक मिन, हमारे प्रेमपूर्ण सेवा-सन्कार से सन्तुष्ट आप लोगों का, एकाएक, यह निन्य आचरण क्या उचित है॥३१ ।। दस्युमुतस्तीक्ष्णतरः स भाद्भिः किं वणिक्सुतव्याजात् । रत्नाभरणाकीर्ण प्रवेशितोऽस्मद्गृहं रात्रौ ॥ ३२ ॥ आप लोगों ने रात्रिम, यणिक पुत्र के बहाने से क्या तीक्ष्णतर (अन्यन्त खतरनाक ). रनजटित आभूषणों को धारण करनेवाला, कोई डाकू का पुन ले आकर प्रविष्ट करा दिया था ? ॥ ३२ ॥ अन्यगणिकाप्रयुक्ता पदि यूयं प्रहमनोयताः प्रमभम् । तकि स्त्रीवघमदृशं क्रियते पृयुसाहसं पापम् ॥ ३३ ॥ यदि ठान् दूसरी वेश्या के द्वारा प्रेरित होर आप लोग हमारी सी करने के लिये तत्पर है। वो नंगध के सहश, अत्यधिक साहस से परिपूर्ण यह पाप क्यों करते हे ? ।। ३३ ॥ म परं प्रमातनिद्रालबरियायां धणं कलारत्याम् । आदाय हारमदितं केयूरयुगं गतः कामी॥ ३४ ॥ घा कामी पानऊ केरल आग मर के जिये फलायती के प्रात:- १० स० मा -
समयमातृका
कालीन तन्द्रा से विवश हो जाने पर-अलसाकर सो जाने पर-इसके
हार के साथ ही दोनों केयूर (वाजू-बन्द) को लेकर चला गया ||३||
श्रूयन्ते प्रतिनगरं भूपणलुब्धः पणाङ्गना निहताः ।
निजदेवताप्रसादात्कलावती कि तु मुक्ताय ॥ ३५ ॥
यह सुना जाता है कि प्रत्येक नगर में आभूपण के लोभी व्यक्तियों
के द्वारा वेचारी वेश्या मारी जाती हैं। किन्तु आज तो कलावती
अपने कुल देवताओं की कृपा से सुरक्षित बच गयी है ।। ३५ ।।
तेन यदेतन्नीतं राजकुले कस्य मुनि परिपतति ।
प्रतिभूर्भवद्विधानां च गृहीतः पण्यललनाभिः ॥ ३६ ॥
यदि यह मामला राजकुल (न्यायालय) में ले जाया जाय तय
किस के शिर पर पीतेगा? अर्यान् इसका परिणाम दीन भोगेगा ?
आप लोगों के समान वेश्याओं का अवरोधक (शत्रु) कहाँ देखा गया
है ? अथवा वेश्याएँ आप लोगों के समान विश्वास अन्यत्र कहाँ-किस-
पर करती हैं ? ॥३६॥
पश्यत परतत लोकाः कलिकालः कीदृशः प्रवृत्तोऽयम् ।
स्निग्धाः सुहृदः सधनाः स्त्रीवधपापं भजन्ते यत् ॥३७॥
अरे माई देखो देखो यह कैसा कलियुग प्रारम्भ हुआ है जिससे
कि धनवान् प्रेमी मित्र जन भी स्त्रीश्य के सहश पाप करते हैं ।। ३७ ॥
को वेचि गुणविभाग हस्तेन परीक्ष्यते कथं जातिः ।
दुज्ञेयं कुटिलानां चेष्टितमन्यद्वचश्चान्यत् ॥ ३८॥
किप्त व्यक्ति में कितनी मात्रा में गुण हैं, इस पात को कौन
जानता है? हाय देख जाति को परीमा भला कैसे की जा सकती
है ? कृटिल व्यक्तियों के कार्य एवं वचन दुईय तया परस्पर विरुद्ध
हुआ करते हैं।॥३८॥
इत्युक्त्वा गृहपरिजनकलकलहोदनदुःसहविकारा ।
कहाली राजपये चुकोश गतागतस्तारम् ॥ ३९॥
अष्टमःसमयः
११७
ऐसा कह कर घर के परिजनों के हो-हल्ला से वद्धित दुःसह कष्टचाली
कट्वाली ने राजमार्ग में इधर-उधर दौड़कर आ जाकर-जोरों से
चीखना-चिल्लाना प्रारम्म किया ।। ३६।।
तद्गीन्यव निटास्ते मपदि विवर्णा निरुत्तरप्रतिमाः।
निर्गन्योत्पथविवरैर्द्ररतरे संगमं चक्रुः ॥ ४०॥
उक्त बात के भय से ही एकाएक विवर्ण आकारयाने, कुछ मी
उत्तर देने में असमर्थ पिट पड़ी शीरता से मागनं जिस किसी
मार्ग से निकल कर काफी दूर पर जाकर परस्पर मिले ॥ १०॥
अव त रिचार्य मुचिरं मोगवटाः ममापतितकशः।
मिथ्यापादनष्टा विफलक्लिष्टा मियो जग्मुः॥ ४१ ।।
मंग से रहित (क्योंकि बालक अथवा वेश्या में द्रव्य नहीं मिल
सका या); मारी विपत्ति का मामना करनैशने, झूठे लाञ्छन के
कारण नष्टप्राय व्यर्थ में ही क्लेश को प्रान होनेवाने व विट काफी
देरतक परस्पर विचार करके चने गये॥४२॥
जावासपटलदीप रिख नास्माभिर्वजन्वणिग्दृष्टः ।
कदात्यैर हृतोऽमापिन्यपदनिर्गुटस्तत्र ॥ ४२ ।।
"ऑम की पलों में समुत्पन्न दापवालों की भांति हम लोगों के
द्वारा जाना हुथा यनिक पुन देखा नहीं गया। निश्चय ही 'कबाली' ने
ही उसे छिपा रखा है।" ऐमा निगुट' ने कहा ॥४२॥
राशि निग्य वणिज पश्यन भर्नेन निग्रहोऽस्माकम् ।
बुदन्यत्र लोऽयं परिशोचनी दिपिरः १३॥
"देखिये या वृद्धा राशिल्प बाला को मूत्रों से दककर अर्यान्
भूनपत्र के महश नानूली पदाने से दिपार हम लोगों को परेशान
कर ली है। निशाही पदमप इनी कुहिनी का किया हुआ है।"
मा अत्मंग करते हुरे दिगिरने का॥१३॥
समयमात्रा १४- विहिताङ्गहारयुक्तिः कुहन्या पूर्वरङ्गयोन्योऽयम् । अस्मन्नृत्तं वृत्तं किमन्यदिति नाट्यवित्माह ॥ ४४ ।। नाट्यशास्त्र के माता 'कान्य' ने कहा-'यद और दूसरा क्या है ? छुट्टिनी के द्वारा पूर्वरङ्ग के याय यह अह्नों के सवालन अयवा बहों को हार आदि से नजित करने को दाक्ष की गयी है, जिसमें हन लोगों का यह मृत हुआ है ॥४॥ कपटतुलां कालीमाताबामहं बेमि । विहिस्तया प्रमोमावित्याह तुलावर झोपान् ॥ ४५ ॥ तुलाधर ने फोप करके कहा:- सैकड़ों गड्ढों से युक्त कपडतराजू की भाँति आचरण करनेवाली इन रालो दो में मतो माँति जानता हूँ | निश्चय ही इमने यह भ्रम फैलाया है" ॥१५॥ आकृप्य मेपभोगादरतरं मित्रमण्डलं वणिजः । कालकल्येव नीतं कहाल्या गणक इत्यूचे ॥ ४६॥ ज्योतिषी सिंहगुल ने कहा-"जिन प्रकार काल की कला (नमय को गति) सूर्य मण्डल को मेष राशि के भोगने से हटा कर दूर अन्य राशियों पर ले जाती है उसी प्रकार इस 'काली' ने मो उस बनि पुत्र की मित्रमण्डली को अर्यान् . ..हम लोगों को सोंचकर दूर कर दिया है, जिनसे हम लोग आनन्द-मौत (भोग) वञ्चित हो गये है॥४६॥ पेया मद्यसमृद्धिस्तयैव सा कृतचिकिमायाम् । सहनमिदमुपदिष्टं तापादित्यवीयः ॥४७॥ 'तित' नानक वैद्य (वैद्यपुत्र होने नाते वैर) ने कहा- "काफी मात्रा में मद्यपान छरना चादि"ऐनी दिकिन्या उनके द्वारा की जाने पर पर्यात चिरिला के रूप में पर्णन भयपान को पाने पर पुनः ताप (बर) से बढ़ने देनन्वर उसने ही यह समान मतलाया हए 12॥
अधमासमयः १४४ नवमुखचरितं नष्टं कष्टं विभ्रष्टनियमहत्तानाम् । अस्माकमेतदनुपममित्याह कविःश्वसन्दिरसः ॥४८॥ लन्धी श्वास लेते हुए कपि 'विरम' ने कहा-"भ्रष्ट नियम वया वृत्त (छन्द ) वाले (पक्षा-भ्रट आचरणवाले) हम लागों का नवीन- सुखों के द्वारा निर्मित यह अनुपम कष्ट नष्ट हुआ" ॥ ४ ॥ टिप्पणी-पतः उन यन कवि "विरम' जी का है, अतः रस तथा रसो. द्वादक मुसंगत वाक्यरचना का अमाव अस्वाभाविक नहीं है। इति दुःखकोपविस्मयलबालिताः कयां मिथः कृत्वा । कुसुमारामभ्रष्टा इव मधुपास्ते विटाः प्रययुः ॥ ४९ ॥ दुःख, क्रोध, विस्मय ( आचर्य ) नया लञा से आकुन वे विट, प्रकार की बात को परस्पर करके, कुमुमित उद्यान से गिरे हुये अथवा मगाये गये भ्रमरों की माँति चले गये।॥ ४६॥ अय कङ्काली गुढं निःशुल्यां काममोगमामग्रीम् । आस्वाद्य निगामनयनिःशब्दमहोत्मत्रोत्साहा ॥५०॥ इसके बाद कहाली' ने दिपे ही रूप से कटकरहित, कामोपमोग से प्रार सामग्री का अयरा अपनी इन्दानुमार भोगमामग्री का स्वाद लेकर के आनन्दमन हो चुपचाप रात्रि को व्यतीत किया ॥५॥ प्रातर्विचिन्य युक्ति मा गत्या इट्टभाण्डशालाम् । कामिजनकस्य पणिजः स्फीतार्यसमृद्धिमद्रासीत् ॥ ५१ ।। युक्ति को सोच करके, प्रातःकाल, उन कहाली ने बाजार में भाण्डाला (पर्वन घर) क मामने जाकर कामो उत वणिक्यालक के पिता की विशाल धन-सम्पत्ति को देखा ॥१॥ सोऽपि मदायनसंचयलामविपेऽपि सदाहः । पुत्रहतहनचिन्तासंतापात्कातरतरोभून् ।। ५२ ।। प्रभूत धन मम्पत्ति के एकत्रित रहने पर मी सशा संमही घद पणिम्
मृकः ॥ ५४॥
१५०
समयमाका
अपने
पुत्र के द्वारा चुराकर ते जाये गये सुवर्ण चिन्ता से अति
दुसरी हो रहा था । १२॥
उन्नतसीनिविष्टः कोटिनयलेख्यसंपुटीहस्तः ।
अर्थिजनवदनदर्शनमीलितनयनप्रसक्तसतवान्भ्यः ॥५३॥
वह ऊँची कृषी (ऊन अथग कुरा आदि का पवित्र आसन) पर
बैठा था। उनके हाथ में तीन करोड़ का दस्तावेज अथवा चेक था।
याचकों के बोलने एवं दिखलायो पड़ने से आँस को बन्द करने के
फारण वह अन्धता का धारण किने हुये या अयश याचक की भाँति
न दिखलाई पड़ने के लिये ( याचक मास दन्द करके अन्धा बनता
है) आँस को बन्द करने के कारण अन्धना को वह प्रात या ॥ ५३ ।।
वन्धादिमोक्षणागतलामपरित्यागयाचने बधिरः ।
अत्यल्पपण्यदानप्रश्नप्रतिवचनजल्पने
जब लोग गिरवी रखी गई वस्तुओं को छुड़ाने आने थे और
लाम (सूद-व्यान) को कुन कम करने की प्रार्थना करते थे तब वह
पहरा बन जाता था। जब लोग योड़ा सा भी पायदान (यह वा दान
है जिसे प्रत्येक दुकानदार धर्मार्थ देता है) के लिये कहने थे वो वह
उनका उत्तर देने में मूंगा पन जाता था ।। ५४ ।।
. तैलमलकलललाञ्छितमृपानग्याप्पिकाविकटः ।
शीर्णोर्णाप्रावरणप्रलम्बधनकक्षुकाञ्चलालोलः ॥ ५५ ॥
तेल की मैल और उसकी जट्टी से लाञ्छित (चिहित ) त्या
मूपक के द्वारा कुतरी गयी टोपी को धारण करने से वह विष्ट प्रतीत हो
रहा था। उसने फटे ऊनी चद्दर के साथ ही काफी दूर तक लटकने
वाले मोटे कुत्ता को भी पहन रक्ला था। कुत्तों के सचल के नीचे
की ओर हिलने से वह चद्धल हो रहा था ।। ५५॥
नमोरजानुशरधृमारुणपृधुलशिपिलमोचाटः ।
रूक्षश्मथुकलापस्थूलप्रचलल्लाटुम्पयन्धिः ॥५६॥
अष्टमः समयः वह एकदम फटी हुयी, धूएँ से कुछ कत्यई रंगवाली अथवा धूम की मांति कायई गाली, बहुत मोटी तथा ढीली ढाली विनाई चाली घोती पहने हुये था। उसकी यह घोती फेवल जाँघ और घुटने भर मुश्किल से थी । सेल के अभाव मे रूखे उसके दादी के बालों में मोटी मोटी, हिलनेगली, लटें पडी हुयी थी ॥ ६ ॥ निजगृहदिवसपरिव्यययाजागतकन्यकाप्रहारोगः । रज्जुग्रथितयुक्षितमा रीरामनिर्दयप्रकृतिः ।। ५७ ॥ वह अपने घर के दिनमर के खर्च को माँगने के लिये आयी हुयो अपती ही कन्या को मारने के लिए क्रुद्ध हो रहा था। रस्सी मे घी हुयी पालतू गिनी की चिल्लाहट पर भी उसका पत्थर हृदय दयाई नहीं होता था ।। ५७ ।। दूराद्वितर्यमाणः म क्या नासाप्तिाहुलीलतया । ख्यातः म एप पणिगयमिति विदधे स निश्चितं तस्य ॥५८॥ अपनी नासिका पर अंगुली रस्सी हुयी (किसी बात को ध्यानपूर्वक विचारने की यह एक मुद्रा है) उस कवाली ने दूर से ही उस वणिक् के विषय में तर्क-वितर्क करके यह निश्चय कर लिया कि निश्चय ही अपने धन के लिये चिस्याउ यह वणिक यही है ॥ ५८ ।। साथ शनरुपमृत्य प्रचिरलजननिर्मलारसरे । तमभापत माण्डपते वक्तव्यं किंचिदस्ति मम पिजने ॥५९।। भीड के समार होने पर, जय कि योडे से व्यक्ति रह गये थे, उस कगाली ने उस पणिक के पास जाकर कहा-"माण्डपते! मुझे आप मे एकान्त में कुछ कहना है || पुरस्त मुग्धमनिगशिशुरिव लुन्यबिटः कृष्टः। हारितभूपणनमनः संध्यायां यो मपा दृष्टः ।। ६० ॥ पहेलिये के द्वारा आय किये गये मोले भाले हरिण के शिशु की मावि, सरल बुद्धिवाला आप का लड़का रिटों के द्वारा पहराकर ले
समयमातृका
जाया गया। उन लोगों ने उसके आभूपण एव वखों को छीन लिया
था। उसके बाद मैंने उसे देसा॥ ६॥
दयया
प्रवेशितोऽसौ मया सगेहं मनोहराकारः।
अविशत्क्षणं न जाने केन पथा मत्सुनाहृदयम् ।। ६१
सुन्दर आकारवाले उस लड को मैंने दया आने के कारण
अपने घर में बुला लिया था। मुझे पता नहीं कि किस माग से
अर्थात् किस भाँति वह मेरी पुत्री रे हृदय मे क्षण भर के लिये प्रविष्ट
हो गया न जाने क्यों मेरी पुत्री ने उमका बहुत प्यार किया ॥ ६१ ।।
स तया नानानन्तररचिराम्बरभूपणार्पणप्रणयः ।
राजाहविविधभोगेः काम झाम्यर्चितो भक्त्या ॥ ६२ ॥
उसने ( मेरी पुत्री ने ) उस बालक का स्नान कराकर के मुन्दर
वस्त्र एष आभूषण पहनाया तथा रानाओं के योग्य विविध प्रकार के
भोजन आदि से मतिपूर्वक, कामदेव की माँति, उसकी सेवा की ॥६॥
वंशजगौरवयोगात्लुवृत्तालाव्यरूपसंभारः ।
कण्ठे हार आसी कृतम्तया गुणगणोदारः ॥ ६३ ॥
पूर्वनों की महत्ता के कारण मुन्दर आचरण के योग अत्यधिक
प्रशसनीय स्वरूपराला, प्रशम्न गुणगणों के होने से उदार यद बालक
उसके द्वारा अपने कण्ठ का हार सा कर लिया गया है ।। ६३ ।।
कायपणाजितबहुविधराजमुतामात्यबहुधनेन सह ।
अधुना
वत्तनयोऽस्याः स्वामी प्राग्जन्ममंन्धात् ।। ६४ ।।
शरीररूपी मूल्य से बहुत से रामपुत्रों एवं अमात्यों के अनित किरे
गये अत्यधिक धन के साथ ही तुम्हारा पुत्र पूर्व जन्म के सरन्य के कारण
इस समय मेरी पुत्री का स्वामी हो गया है ॥६॥
उचिततरसङ्गसुमगां [दृष्ट्व] कलारती रागापनोन्मत्ताम् ।
तब हस्ते निक्षिप्तं स्त्रीधनमहितं मया गैहम् ॥६५॥
अष्टमः समय १५३ तुम्हारे पुत्र के अत्यधिक योग्य सङ्गम से सुभग (सौभाग्यशालिनी), अनुराग एवं यौवन से उन्मत्त फलारती को देखकर ही मैंने स्त्री (कलावती) और धन के सहित अथवा स्त्रीयन (वेश्यावृत्ति से अनित धन) के सहित घर को तुम्हारे हाथ में समर्पित कर दिया है ।। ६५॥ यातायां मयि तीर्थ कंचित्कालं त्वया कलारत्याः । मुद्रामुद्रितमखिलं सर्प पालनीयं तत् ॥ ६६ ॥ कुछ समय के लिये मुझे तीर्थयात्रा के हेतु चली जाने पर आपको कलावती की मुहर लगी हुई सम्पूर्ण सम्पत्ति की रक्षा करनी चाहिये ।।६।। अद्य तु भरता कार्यः पुत्रस्नेहास्नुपानुरोपाच्च । अस्मद्गेहे सल्पो भोज्योत्सवमङ्गलाचारः ॥ ६७ ॥ आन तो आपको अपने पुत्र के स्नेह तथा पुरधू ( कलावती) के अनुरोध से हमारे घर में थोडा मोज्योत्सा रूप मङ्गलाचार करना चाहिये ॥६॥ उक्त्वेति साश्रुनयना कझाली तस्य वजहृदयस्य । निपपात चरणयुगले सुतलाभविशेषतुष्टस्य ॥ ६८॥ ऐसा कहकर अपनी आँखों में आँसू भरी हुयी कशाली, अपने पुन के मिल जाने से अतिप्रसन्न, वन के समान हृदयाले नस वणिक के चरणों पर गिर पडी ।।६।। स च तामुगाच भद्रे मर्पमिदं हर्षकारि कुशलतरम् । किं तु त्यहमनं मे नाभिमतं सह गमिघ्यायः ॥ ६९ ।। उस वणिक ने पाली से कहा-"भद्रे । यह सब प्रसनता प्रदान करनेवाला पटुत बडा कन्याप है। रिन्तु तुम्हारा जाना मुझे अभीष्ट• नहीं, हम दोनों साय ही चलेंगे।। ६६ ॥ परभोजननियमनता भोक्तव्यं सद्गृहे कथं नु मया । संमोजनमूत्यं में गृहासि तदा गमिप्यामि ॥ ७० ॥ मेरा नियम है कि में दूसरे के पर भोजन नहीं करता। ऐसी - समयमातका अवस्था में मैं तुम्हारे पर कैसे भोजन कर सकता हूँ ? यदि तुम नुन से सुन्दर भोजन खिलाने का मृन्य ग्रहण करोगी तभी मैं चलूंगा soil इत्युक्त्वास्या हस्ते दवा हृष्टः स रूपकं सार्घम् । वामन्तः स्मितबदनां विसृज्य पश्चाद्ययो भोक्तुम् ।। ७१ ॥ ऐसा कहकर कवाली के हाथ पर, प्रसन्नतापूर्वक, टेढ़ रुपये देकर, भीतर ही भोवर प्रसन्नवदनवाली उस वृद्धा को विदा करके बाद में भोजन करने के लिये स्वयं वहाँ गया !! ०१ ।। तत्र सुतं सविलासं दृष्ट्वा कान्तासनाथसंभोगम् । निर्व्ययमोज्यसमृद्धया निश्चिन्तः प्रीतिमानमवत् ॥ ७२ ।। वह वहाँ पर वी के साथ सुन्दर-सुन्दर पदार्थों का भोग करते हुये, विलासमग्न अपने पुत्र को देखकर निश्चिन्त और बहुत प्रसन्न हुआ। उसकी प्रसन्नता इसलिये और अधिक थी कि वहाँ पर उसके पुत्र के लिये बिना कुछ व्यय किये ही भोजन के पदायों का टेर लगा हुआ था ॥७२॥ कलापरिमलरमवामितविविधभोजनं भुक्त्वा । पीत्वा च भूरि मयं जगाद लुब्धः स कङ्कालीम् ।। ७३ ॥ कर्पूर. इलायची आदि के मुगन्धित रस से वासित बहुत प्रकार के भोजन को सार और पर्यात्र मदिरा भी पीकर वह लालची वणिक कवाली के पास गया ॥७३॥ मततं दिनव्ययं वः सर्वमहं समुचितं प्रदास्यामि । एवंविधस्तु न पुनः कार्यः स्थूलव्ययारम्भः ।। ७४ ॥ "मैं मर्षदा मापलोगों के सम्पूर्ण ममुचित दिन सर्च को दूंगा। किन्तु आप लोग पुनः इतने अधिक व्यय से होनेवाले इस प्रकार के समारोह को न करें" ७ ॥ इत्युक्त्वा स गृहं निजमगमद्गगनस्थलीपिकताशः। लाभप्रदर्शन फिल लुब्धधियां वचनोपायः ॥७५ ।।
अष्टमःसमय:
ऐसा कहकर "आकाश मे सेती करने की आशा करनेवाला"
अर्थात् अमन्मत्र बात की आशा करनेवाला वह वणिक् अपने घर को
चला गया। निचय ही लोभी व्यक्तियों को उगने का सर्वोत्तम उपाय
पहले उन्हें किसी प्रकार के नाम को दिखलाना ही है ॥ ७ ॥
अन्यद्यदिवसव्ययमानेतुं कुटिलचेतसस्तस्मात् ।
चित्तग्रहणाय निजां सिम कलानती दामीम् ।। ७६ ।।
दूसरे दिन शठचित्तवाने उस व्यक्ति से दिन खर्च को लेने के लिये
तया उसके चित्त को लुमाकर वश मे करने के लिये कनावती ने
अपनी दासी का भेजा ।। ७६ ॥
मुचिरात्ममैन्य दामी शरापचश्चन्सहिगुकणभूर्जा ।
हस्तेन विस्फुटन्ती कलावती सस्मितामयदत् ।। ७७ ।।
काफी देर के बाद, एक सरार ( कसोरा) मे इधर-उधर हिलने
याने हिगु-कणों के साथ भूर्जपत्र को लिये हुयो दासी ने माकर के
हाय मटका मटका (हिला हिला) कर प्रसन्न मुसराली कलावती
से
श्वशुरेण ते महार्यः प्रहितोऽयं भूरिभोज्यनमारः।
उत्तिष्ठ कुरु विभागं निमन्त्र्यतां बन्धुरर्गय ॥ ७८ ॥
"आप के श्वसुर जी ने यह यहुमूल्य तथा पर्यात भाजन सामग्री के
मार को भेजा है। उठिए, इमझा वितरण कानिए और भाई-यन्धुओं
को निमन्त्रण दीजिए १७ ॥
तलस्य तोलकमिदं तोलमुगलं च चूर्णलपणस्य ।
दत्वा मामिदमचे ध्रुटीऋटिलाननः म परम् ॥ ७९ ॥
एक तोता भर तेल तया दो तोला नमक देकर आँस के पूरने से
अपने मुंह को कुटिल पनारर इन्दोंने मुझसे कहा ॥ ७ ॥
तैलमिदं लपणमिदं शाकाय वेविकाद्वयं दत्तम् ।
वश्यायाः किं कामी ददाति दिग्मन्यये लक्षम् ॥ ८॥
यह समयमालका मैंने तेल और नमक तथा शाफ (सम्झी) के लिये यह दो कौड़ी दी है । कोई कामी किसी वेश्या के दिन-खर्च के लिये क्या एक लाख देता है?" ||८|| इत्युक्त्वा तत्प्रहितं दासी संदर्य धृत्कृतं बहुशः । क्षिप्त्वा दूरे तन्मुखदर्शनमलिनां निनिन्द दृशम् ॥ ८१ ॥ ऐसा कहकर उस वणिक् के द्वारा भेजे गये बहुत अधिक धूत्कृत (यूँक, ससार आदि) को दिखलाकर, उसे बाहर फेंककर, दासी ने उसके मुख को देखने मात्र से मलिन अपनी आँखों को घिसारा ।।१॥ अन्येयुः कङ्काली विचिन्त्य तइञ्चने सुखोपायम् । प्रययौ कृत्वा विजने कलावतीं विदितवृतान्ताम् ॥ ८२ ॥ दूमरे दिन, उस वणिक् को आसानी से ठगने के उपाय को सोचकर तथा एकान्त में कलायती को सम्पूर्ण याजना बतलाकर यह 'काली' पणिक के पास गई ।। ८२॥ सा वर्णमानमुद्रासदृशसमुद्गद्वयं विधाय नवम् । एकस्मिन्नामरणान्यन्यस्मिन्नपलखण्डिकां विदये ।। ८३ ॥ उसने रङ्गीन (पालिमदार) अथश ठोर मुद्रा (तील की मुद्रा=पाय, सेर आदि ) के सदृश दो नवीन समुद्र (हीरा, जवाहिरात रसने का छोटा वाक्स ) वनवाया तथा एक में आभूपणों को रक्खा और दूसरे में पत्थर के टुकड़ों को ॥३॥ स्थूलतरतूलपटिकाप्रावरणं प्राप्य माण्डशालाग्रम् । कक्षाञ्चलसंतसमुद्गपुगलापदद्वणिजम् ॥ ८४ ॥ अपने कक्ष (काँस) के अञ्चल से दोनों समुद्र को ढके हुयी उस 'कङ्काली' ने भाण्डशाला के सामने अत्यन्त मोटो मई की पट्टी के वेष्टन को (रुई के पहले को) प्राप्त करके वणिक् से कहा ! ८४ ॥ टिप्पणी- यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये किरका पटो का यह वेटन हो कवाली को दोनों समुद्र को अदला-बदली करने में सहायक होगा।
अष्टमःसमयः वाराणसीप्रयाणे नक्षत्रं लिप्रकृन्ममोपनतम् । नास्ति पुनर्गमुना तय दर्शनमात्रं माय गतायाम् ॥ ८५ ॥ वाराणसी की मेरी यात्रा के लिये अतिशीन ही मुझे मुहूत प्रास हुआ है अर्थान् यात्रा का मुहूर्त बहुत शीघ्र ही आने वाला है। यदि उस नमन (मुहूर्त) को छोडकर मैं पुनर्वसु नक्षत्र में जो उसके बाद आने वाला है, यात्रा करती हूँ तो जाने के बाद लौटकर मैं आप का दर्शन न कर सकूँगी ( उस नक्षत्र में यात्रा से या तो यात्रा करनेगला मरता है अयवा उमका मिर) अयना धन लेकर यात्रा करने से मैं लौटकर आपका दर्शन न कर सकूँगी (क्योंकि धन-लोलुप व्यक्ति मुझे मार डालेंगे)|| टिप्पणी-पुनर्वयु में यात्रा करने से अनिर होने की बात पूर्व चरया को उनि होने से प्रमाा नहीं मानना चाहिये। इदमामरणं सर्व समुद्गकन्यस्तमस्ति रताकम् । स्त्रीगालधनं मरता प्राणसमं सर्वथा रक्ष्यम् ।। ८६ ।। रत्नजटित यह सम्पूर्ण आभूपण इस समुह में रक्खा हुआ है। यह नो (कलावती) और पालक (वणिकपुत्र ) का धन है, अतः श्राप इसकी प्राणों की भांति रक्षा करेंगे ॥६॥ इत्युन्या वत्मा मंदर्य पुनः सुमुद्रित कृत्या। निक्षिप्य पुरः प्रचुरं सा वमवादीत्सहेलैग ॥ ८७॥ ऐसा कहकर. इन सम्पूर्ण आभूषणों को दिखलाने के अनन्तर पुनःमली मौति उसी मनुद् में मन्द करके उम थपिक के सामने रख कर उनमे हैसी ही काली ने कहा ॥८७) पाययमतः पृष्टालामे न ममोपयुज्यते लक्षम् । त्वं दातुमर्हमि म देशलयधान्यभुक्तिमंशोध्यम् ॥ ८८ ॥ "किसी अन्य प्रकार के नाम न होने से (तीर्थयात्रा में अन्य समयमारका प्रकार के किसी भी लाभ की संमावना न होने से) मुझे देवालयों में साये गये पदार्थों के मूल्य को चुकता करके के योग्य एक लास राह सर्च (मार्गव्यय) अपेक्षित है। अतः मित्र ! मुझे एक लास मुद्रा देने की कृपा करें" ॥८॥ इति लीलया ब्रुवाणा समुद्गयुगलस्य विनिमयं कृत्वा । लक्षं क्षणाद् गृहीत्वा जगाम निजवेश्म कङ्काली ॥८९|| लीलापूर्वक इस प्रकार कहती हुई कङ्काली ने दोनों समुद्र का अदला बदली करके अर्थात् पत्थर के टुकड़ों से भरे हुये समुद्र को वणिक के सामने रखकर और भाभूपणवाला स्वयं लेकर क्षण भर में ही एक लास मुद्रा ग्रहणकर अपने घर को चली गयी.15॥ टिप्पणी-यहाँ यक ध्यान रखना चाहिये कि 'कबाली' ने पहले वणिक को केवल श्राभूषण वाला ही समुद्ग दिखलाया था। अथ निर्वतितकृत्यां ज्ञात्वा तामागतां वणिग्भवनात् । शङ्खसुतं हर्म्यगता प्रोवाच कलावती विजने ॥ ९ ॥ उस वणिक के घर से अपना कार्य पूर्ण करके कवाली को आयो हुयी जानकर कलावती ने कोठेपर-छतपर जाकर एकान्त में 'शद्ध के लड़के ( वणिक् पुत्र ) से कहा ।। ६०॥ त्वयि मे हृदयमकस्मादन्तः सक्तं बलान निर्धाति । त्वं तु धनवान्विवाहं करिष्यसीत्येव मे शङ्का ।। ९१ ॥ मेरा हृदय तुम में पूर्णरूप से लीन हो गया है, अतः बलपूर्वक निकालने पर भी नहीं निकल रहा है। किन्तु मुझे एक ही शङ्का है- तुम धनवान हो अतः विवाह कर लोगे॥ ११ ॥ दिनरमणीयः पुंसां जन्मजयन्यस्तु गहिनीमङ्गः । तदपि विवाहे मोहादविचारतरादराः पशवः ॥ ९२ ।। पुरुपों पा गृहिणी के साथ सगम जन्म से ही उपन्य एवं एक दिन तक अर्थात् स्वल्पकाल तक हो रमणीय है। नो मी ( मोहवश) अष्टमः समय: पशुओं के समान अविचारी पुरुषवर्ग विवाह के विषय में आमह करते हैं।। ६२॥ निन्यप्रतिहतसुस्थिरावनेषु वेशोपचाररहितेपु मदोज्झितेषु । गोष्टीविलासरसकेलिनिरादरेषु दारेषु का स्मरतचिः कलहाकुरेषु ।। ९३ ।। नित्य ही बच्चा पैदा करने से निष्ट यौरनवाली, वेशप्रसाधन से रहित अर्थात् वेश को भापक बनाने की कला से अनभिज्ञ, मदहीन, सामालिकों की गाष्ठी में होनेवाले विलास की रसकेलि का विरस्कार करनेवाली, क्लइ के मूल, गृहिणियों में मला पुरुषों की केसे फामरवि (सम्भोग-सबन्धी अमिलापा ) हाती है ११३॥ जात्या कामिजनरजनजीरिवातु वेशोपचारनिरवासु ममौरमासु । कामप्रमोदममका सविनमासु , वैश्यासु कस्य न रतिः सततस्मितामु ॥ ९४ ॥ जाति से ही फामिननों का मनोरञ्जन करके जीवित रहनेवाली, वेश-भूग को लुभारना मनाने में संनम रहनेगली अथवा पुरुषों को मूच्चिन करनेगाने पान व्यरहार में निरत रहनेवाली, मुगन्धित, काम प्रमोद में विदग्ध, हार मात्र आदि से परिपूर्ण, सर्वदा हंसमुस वैश्याओं में भला किन फौ रति (प्रेम) न होगी १॥१४॥ कुरु मे प्रन्ययहेतीर्घनधारणपत्रिकां विहे [त्वम् । रिहिता सैर वास्ते मचगजस्याङ्कशशिर ॥ १५ ॥ तुम रिट (अग्नि की मात निहाओं में एक का नाम) के आधार पर अर्थात् अप्ति की साझी में मेरे विश्वास के लिये धन-धारण पत्रिका (फर्ड लेने का दस्तान, नका)लिस दो। लिखी गयी यद पत्रिका 2 १६० समयमाका ही, मत्तगज को वश में करने के लिये अङ्कुश की नोक की भाँति, तुम्हें वश में करने के लिये मेरे पास साधन होगी ।। ६५ ।। इत्युक्तः म रमण्या स्थूलतरोज्जासपत्रिकामलिखत् । नाम्ना विक्रमशक्तेपमहिपीभ्रातपुत्रस्य ॥ ९६ ॥ उस रमणी के द्वारा इस प्रकार कहे गये उस वणिक-पुत्र ने राजरानी के भ्रातृपुन 'विक्रमशक्ति' के नाम से एक बहुत बड़ी उनास. पत्रिका अपने को बचाने के लिये (विनाश के लिये-ऋण-पत्रिका) लिस दी ॥ १६ ॥ अथ शय्याभवनगतं प्रातः स्वयमेत्य कङ्काली। जामातरमिदमबदन्मिथ्येव सखेदवदनेर ।। ९७ ॥ इसके अनन्तर प्रातःकाल जब कि वह वणिकपुत्र शयन करने के कमरा ( कक्ष) में स्थित था, झूठे ही अपने मुँह को लटकाये हुयी सी 'कबाली' ने उससे कहा ।। १७ ॥ आसन्नयोवनस्त्वं दुहितुर्मे यौवनं त्वया प्रायः । क्षपितमलक्ष्यं स्त्रीणां गलति हि सहसव तारुण्यम् ॥ ९८ ।। तुम्हारी जवानी अब शीघ्र ही आने वाली है। तुम्ने मेरी पुत्री की युवावस्था को प्रायः समात कर दिया है, क्योंकि त्रियों की तरुणाई सहसा इस प्रकार से समाप्त हो जाती है कि उसे कोई देस भी नहीं पाता ॥८॥ स्थिरयौवनाः प्रकृत्या पुरुषाः किल तालसालसंकाशाः । ह्यः कन्यकाद्य तरुणी प्रातद्धा भवत्येव ॥ ९९ ॥ ताल एवं साल (दोनों ही सृझ विशेप हैं) के महश पुरुष लोग निश्चय ही स्वभावतः स्थायी युवारस्थायराले होते हैं अर्थात् पुरुषों को यौवन अधिक दिन तक टिकाऊ होता है। किन्तु त्रियों के विषय में क्या कहें? जो अभी कल कन्या थी वह आज तरुणी हो जाती है और जो आज तरुणी है वही फल वृद्धा हो जाती है ।। ६६ ॥
अष्टमःसमय: १६१ मासादधिकायातं दिनद्वयं पुष्पदर्शनस्नाने । अधैव कलावत्या गर्भाशङ्काकुलं चैतः॥१०॥ रजस्वला होने के अनन्तर स्नान किये हुये कलावती को एक महीन से केवल दो दिन अधिक पोते हैं, किन्तु आज ही उसका चित्त गर्म रह जाने की आशङ्का से व्याकुल हो उठा है ।। १०० ॥ यौवनपिनमशापस्तनुनलिनीतुहिननिकरधनपातः । प्रमयदिनं नारीणां पातकमुग्रं स्तनयुगस्य ।। १०१॥ स्त्रियों के प्रसर का दिन उनके योनि के सौन्दर्य के लिये श्राप है, उनको शरीररूपी कमलिनी के लिये तुपारसमूह की धारासार वृष्टि है और उनके दोनों स्तनों का उग्र पाप है अर्थान् प्रसर त्रियों के यौग्न शरीर-सौन्दर्य एर स्तनद्वय का सहारक है ।। १०१ ।। प्रसाहलयौवनानामधोमुसे लायेर कृचयुगले । मवति न पण्यवधूनां विक्रयचर्चा तृणेनापि ।। १०२ ॥ प्रसव होने से समात योग्नवाली वेश्याओं के दोनों स्वन मानो लज्जा के कारण नीचे की ओर मुख करके लटक जाते हैं, और उन्हें कोई तृण देकर भी सरोदने की पर्चा नहीं करता ।। १०२।। स्थपिरत्वे पुरुषाणां भान्ति मुसजीविकाः परिज्ञानः । योग्ननाशे वेश्या यदि परमटति स्फुट मिक्षाम् ॥ १०३ ।। पुरुष लोग अपनी वृद्धावस्था में अपने गम्भीर शान के माध्यम से सुम्पपूर्वक जीविका प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु वेश्याएं अपनी युग- पस्या की परिसमाति पर फेल इयर-उधर भ्रमण करके मिक्षा ही माँगनी ।। १०३ ॥ तस्माज्जनकामागदविकलमापत्स्यमाननिजविभवम् । अधिकरणपत्नलिखितं प्रयच्छ सुमते कलारत्यै ॥ १०४ ।। अत. हे सुमारे ! अपने पिता के न रहने पर पास होनेवाली अपनी ११स०मा० , समयमारका सन्पूर्ण सम्पति को अधिरपपत्र ( दस्तावेज) पर लिखकर करती को समपित कर दो।॥१४॥ इत्युक्ते कुट्टन्या मोत्माहः प्रीतये वणिक्तनयः। आपत्स्यमानमखिलं प्रददी दृष्टः कलावत्यै ।। १०५ ॥ कुहिनी के द्वारा ऐसा कहने पर उन बणिपुत्र ने बड़े उत्साह और हर्ष के माय लावती की प्रसन्नता के लिये अपनी उन मन्पूर्ण सम्पत्ति को लिखकर उनको मुनर्पित कर दिया जिसका वह उत्तरा घिकारीया || १०५॥ अथ शिथिलादरया म]द्विवैदिवमः ममेत्य कझाल्या। कृतसंकेतः कङ्कः श्रुत्यै कलावतीचे ॥ १०६ ॥ अब उस बालक ने प्राप्त होने वाली अपनी सन्पूर्ण समति भी लिख दिया तब कट्टाली में उसका आदर मान कर दिया । अभी उक्त पत्र को लिखे केवल दो-चीन ही दिन पीते होंगे कि 'कबाली' के द्वारा संरेत प्रान रचे पालक को मुनाते हुए ' इने कलारती से कहा ॥१०६॥ अयि रागदग्धहृदये कलावति व्रतवतीय कस्य स्वम् । एप वानर्ययते ठक्करपुत्रो रगविलासः ॥ १०७ ॥ "अनुराग से दग्ध हृदयबाली हे कलावति ! तुम किस व्यक्ति के लिये जन-धारण करनेवाली (पतिनवा ब्रत धारण करके अन्य के माय रनण न करनेवाली)सी हो? यह ठर का पुत्र रमक्लिान' (रण में शौर्य प्रदर्शित करनेगला) उन्हें पाइ सरा है ।। १०७ ।। देवहगलादिविरस्तव मतप्रार्थनानुबन्धन । पदमुक्तिधन्यकाले गणयति चष्टं मकरगुमः ॥ १०८॥ देवगृह (मन्दिर) का ' मन' नामक कोपाध्यक्ष, नगार्य, तुम्हारी निरन्तर प्रार्थना करने से, देवदाम्पस को द्ध समन्दर अष्टमा समय: १६३ अपनी पदमुक्ति के काल को भी धन्य समझता है अथवा आनन्द के लिये (तुम्हारे साथ संमोगरूप भागन्द के लिये) पदमुक्ति से धन्यकाल में उत्कण्ठापूर्वक समय गिन रहा है |॥ १०॥ अद्यापि महामात्यः सत्यरथस्त्वत्कृते समर्षदिने । प्रहिणोति वस्त्रयुगलं न च प्रसादस्त्वयास्य कृतः ॥ १०९ ॥ आज भी इस महर्षता (महँगी) के दिन में महामन्त्री 'सत्यरथ' (सत्यपथ पर ही चलने पाले) तुम्हारे लिये दो वन-भेज रहे हैं किन्तु आज तक तुमने इन पर कभी पा नहीं की है अर्थात् अपने साथ सहवास का अवसर इन्हें नहीं प्रदान किया है ॥ १०६ ।। प्रेक्षणके त्वां दृष्ट्वा साहसराजेन राजपुत्रेण । त्वद्ग[स]रमसमनसा बासरसेनावरुद्धिका त्यक्ता ॥११० ॥ झरोखे पर बैठी हुई तुम्हें देखकर राजा के लड़के "साहसराज" (शूरता के अधिपति ) का मन तुममें आसक्त होकर फामातुर हो उठा । परिणामस्वरूप उन्होंने अपनी प्रेयसी 'वासरसेना' का परित्याग कर दिया है ।।११०॥ विरजसि वयसि नवेऽस्मिन्नेकवेदीप्सितस्तव स्वामी। तरिक यौवनभङ्गे ददाति कविद्धनं मुग्धे ॥ १११ ।। हे मुग्धे ! इस नयीन निसरी हुई अवस्था में यदि तुम्हें एक ही व्यक्ति, जिसे तुम अपना स्वामी समर्मती हो, अभीप्सित हो, अथवा एक ही स्वामी अभीप्सित है, तो क्या युगायस्था के बीत जाने पर कोई तुम्हें धन देगा? ॥ ११९ ।। यामियाननसमये रागेण धनार्जनं परित्यक्तम् । पर्यन्ते भस्माङ्गयीपरिग्यश्च ॥ ११२ ॥ जिन्होंने अपनी युवायस्था के समय में फेयल एक ही व्यक्ति में ही प्रेम करके धन फे अर्जन का परित्याग कर दिया था, येही ये १६४ समपनाका वैश्यायें तुम्हारे दान में ही शरीर में भस्म पोते तया चिथडे को धारण किये मारी-मारी धूम रही हैं ।। ११ ।। उचकाञ्चनकलतीनितम्बमिहामनाम्मितच्छत्रा। एकपुत्सोपसेव्या नूनं तं रतिरमणराज्यश्रीः ॥ ११३ ।। कुचरूपी सुकर्म के कलश को धारण करनेवाली, नितम्वरूपी राज- सिंहासनवाली, मुस्कराहटरूप रात्र को धारण करनेवाली तथा एक पुरुष के उपमोग के योग्य तुम निवर ही काम की राज्यत्री हो ।।११३ ॥ 1 भुक्तं मयास्य विचंदाक्षिग्यमिति प्रनष्टविमवेऽपि । मा त्वं कयाः नुमध्ये यो भुक्तं नाद्य तृप्तिकरम् ॥ ११४ ॥ हे सुन्दर कटितटवाली कलायनि । मैंने उका धन खापा है" ऐसा सोचकर निर्धन व्यक्ति में भी तुम उदारता न करना, क्योंकि कन का खाया हुआ पार्य आर तृनिकारक नहीं होता ।। ११४ ॥ दासी दामी तापद्यावत्पुलस्य किंचिदस्ति करे । क्षीणधनपुण्यराशे पापा स्वर्गनगरीव ॥ ११५ ॥ दासी तभी तक दामी है जब तक कि पुरुष र हाय में कृष्ध है। घन के नष्ट हो जाने पर वह (दासी) उसी प्रकार से दुर्लभ हो जाती है जैसे-क्षणपुण्य वाले व्यक्ति को स्वर्णनगरी ॥ ११ ॥ घोदचार्य कयमिरगन्छाम्यद्यति निरमते प्रायम् । का कुरुते वेश्यानां तत्सणधनदानमोग्यानाम् ॥ ११६ ॥ "कल धन देकर याज कैसे जाऊँ ऐसा सोचकर तत्काल धन अष्टमःसमय: देकर सम्मोग-पात्र वेश्याओं के पास कौन व्यक्ति निवास करने की बुद्धि करेगा ?' || ११६॥ इति कश्चदननिर्गतवचनशरदौरितो वणिक्तनयः। निश्वेटः क्षणममवलक्ष्याद्वील्यमाणः माम् ॥ ११७ ।। इस प्रकार से 'कङ्क' के मुख से निकले हुये वचनरूपी वाणों से विदीर्ण किया गया वणिपुत्र तत्रा के कारण पृथिवी को देखते हुये क्षणभर के लिये निश्चेट-किंकत्तव्यविमूह-हो गया ।। ११७ ।। अथ शूलपन्युनियनत्यमनाद्यङ्गप्रसङ्गकयनार्यः । शय्यावहारमकरोकलारती रासतनयस्य ॥ ११८ ।। इस अनन्तर "आज मेरे शरीर में मीपण पीड़ा है, आज मेरा अमुक सन्बन्धों मर गया है अतः बड़ा कष्ट है" इमी प्रकार के अनेक शारीरिक तया मानमिक कों को कह करके कलावती ने 'शद्र' के पुत्र नम बालक के माय एक शय्या पर शयन आदि कार्य का 'परित्याग कर दिया ।। ११८।। अद्य नियमो मे दुःस्वमनिरीक्षणात्परं मातुः । पष्टीप्रजागरेऽय च राजाले तर मे शय्या ॥ ११९ ।। "सराय स्वप्न देखने के कारण आज मैं माँ दुर्गा का मन कर रही हूँ। आज पटी का जागरण है अतः राजकुल ने ही मुझे रहना और मोना होगा।॥ ११ ॥ अद्य क्यस्यामूनोयुडाकरण मृगाइदत्तस्य । इत्यादिमिरपदेशः सा प्रययौ कामिनां मपनम् ।। १२० ।। आज मेरी ममी के पुत्र 'मृगदत्त' का चूडाकरण संस्कार है।" इसी प्रकार के पद से यहाने बनाकर यह ( कलावती) कानिजनों परों को शनी थी। १२॥ सरिता तनाप्रमाते कदाचिदम्पन्य कम्परिकलागी। कहाली राजमुनं जगाद मयमंत्रमानेर।। १२१॥
१६६ समयमारका उसके बाद किसी समय प्रातः काल भय के वेग से विकलो भाँति, कन्प के कारण विहल अङ्गशली 'काली' बड़ी शीघ्रता में 'शहपुत्र' उस पालक के पास जाकर बोली ॥ ११ ॥ उत्तिष्ठ पुत्र पूर्णब्रजदचा शिरमि सिंचिदविभाव्यम् । अस्मत्कृतेऽद्य यूनोः सपनलहे वयो वृत्तः ॥ १२२ ।। "हे पुत्र । उठो, अपने शिर पर कोई ऐसी चीज रस लोजिसने तुम पहचाने न जा नको और अविशघ्र यहाँ से चले जाओ। आर हमारे लिये ( कलावती के लिये ) सपत्रकलह में (एक ही पत्नी के लिये होनेवान्ने क्लब में ) दो युवकों का वध हो गया है ॥ १२२ ॥ नगरपतिर्विपमतरः कलावती मित्रमन्दिरंयाता । त्वं तु वणिक्सुत साधुर्घनगन्धे घावति मापः ॥ १२३ ।। नगर का शासक अत्यन्त भयङ्कर है। कलावती अपने मित्र के घर चली गयी है। हे वणिपुत्र ! तुम तो बडे माधु हो जो अभी तक नहीं गये। शीघ्र रने जाओ, क्योंकि राजा (शानक) धन को गन्ध पर दौडता है अर्थान् धन वसूल करने के लिये धनी ल्पनि को ही पकड़ता है ।। १२३॥ तुलपटी त्यज पृष्टाद् गृहाण त्स्ती (१)घरट्टमालातः। को जानीते वर्मनि कि कुत्ते का परिनाय !! १२४ ।। सूनी कपड़ों को छोड़ दो। छत पर रसी हुई घरट्टमाला (रहट) से लेकर के कम्बल के टुकड़ों को पहन लो। फौन जाने मागे में कोई तुम्हें पहचान कर क्या करे ।। १४॥ इत्युक्ते कवाल्या मियव विशल्यवेश्मकरणाय। कृत्वा तहतमखिलं पङ्कः प्रयया कुमार्गेण ॥ १२५ ।। अपने घर को कण्टन्य ररने के लिये 'व्वाली' के द्वारा झूले हो ऐसा करने पर 'पटू' नामक वणिकपुत्र उसके (कवाली के ) द्वारा
अष्टमःसमय
१६७
बतायी गयी सभी बातों को करके अर्थात् कम्बल आदि पहनकर कुमार्ग
(सकरी गली आदि) से चला गया ॥ १२५ ।।
टिप्पणी-यहाँ यत बात मी कवि ध्वनित करता है कि 'काली' की बातों
का अनुमरण करते हुये वह बालक कुमार्ग पर चलने के कारण विनष्ट हो गया।
वेश्यालताः मरागं पूर्व तदनु प्रलीनतनुरागम् ।
पश्चादपगतरागं पल्लामिव दर्शयन्ति निजचरितम् ॥ १२६ ॥
वैश्यारूपी लताएँ पहले लालिमा से संयुक्त (पक्षा-अनुरागपूर्ण)
और उसके बाद में कम लालिमा याले (पा-कम अनुराग वाले )
तथा बाद में लालिमा से रहित ( पक्षा-अनुराग से शून्य ) पल्लव की
भाँति अपने चरित को दिसलाती हैं। १२६ ॥
इति समयमालकायाः कवाल्या बुद्धिसंघिमागेन ।
भुक्त्वा पणिजः सकलं कलावती पूर्णविमवाभूत् ।। १२७ ।।
इस प्रकार समयमाका-आवश्यक ममय पर मात-पद को
स्वीकार करने याली-कवाली' के बुद्धि वैमन से वणिक् के सर्वस्व को
मोग कर 'कलारती' पूर्ण सम्पत्तिशालिनी हो गयी ॥१७॥
इति बहुमिरुपायैः कटनी कामुकानां
कृतमुस्तविहीना यञ्चनां मा कृतमा (१) ।
चनभुपि मृगवन्धं हन्त पश्यन्ति नित्यं
तदपि हरिणशाराः कूटपाशं विशन्ति ॥ १२८ ।।
इसी प्रकार से क्षीणपुण्याली, पृतन वद पुहिनी विविध उपायों
"में कामुक व्यक्तियों की याना करती रही। सेद की मात है कि उद्गल
में बहुत से हरिण शिशु मृगों के बन्धन को निन्य ही देखते हैं तयापि
वे स्वयं भी कपट जाल में जाकर फैल जाते हैं थर्यात वेश्याओं के
जाल में फंस कर पहुन से व्यक्तियों को मरते देखकर भी लोग उनके
(पेरयाओं के) यूटजाल में फैस हो जाते हैं।॥१८॥
१६०
समयमारका
समयन मातृका सा कृत्रिमरूपा कृता कलावत्या ।
तन्नाम्नैव निवन्धः क्षेमेन्द्रेण प्ररद्धोऽयम् ।। १२९ ।।
इति श्रीक्षेमेन्द्रहतायां समयमाकायां कामुकपाति-
नामाहम' समयः।
फलावती ने समय पर उन 'कवाली' को अपनी कृत्रिम माता
बनाया था । अत 'क्षेमेन्द्र' ने उसी नाम से ही इस निधन्य (काव्य)
को लिसा है।। १०॥
श्री क्षेमेन्द्र के द्वारा विरचित 'समय माता' का कामुकप्राप्ति-
नामक यह अष्टम समय समात हुआ।
उपसंहारः मालंकारतया विभक्तिरुचिरच्छायाविशेषाश्रया चका सादरचर्मणा रसमती मुग्धार्थलब्धा परम् । आचर्योंचितवर्णनानननवास्वादप्रमोदाचिंता वेश्यासत्करिमारतीव हरति प्रौढा कलाशालिनी॥१॥ उपमा श्रादि अलङ्कारों से अलकृत होने से (पक्षा० सुन्दर आभू- पणों को धारण करने से) सुप ति विभक्ति की सचिर विन्यस्त कान्ति. चाली (पा. पत्ररचना आदि की सुन्दर कान्तिपाली), विरोपालवार की आश्रयमूता (पक्षा० धनी व्यक्ति का आश्रय करनेवाली), वक्रोक्ति- पूर्ण (पक्षा० कुटिल ), आदरपूर्वक मनन (चर्षण ) को जानेवाली । पझा० आदरपूर्वक चुम्बन की जानेवाली), शृंगार आदि रसों से भिली-भांति पूर्ण (पक्षा पूर्ण सरस), सुन्दर अर्थ से सवलित (पक्षा० भोले-भाले व्यक्तियों के घनको प्रात करनेवाली), आश्चय से परि- पूर्ण कयानक के नवीन नवीन आस्वाद के आनन्द से समृद्ध (पक्षा० आश्चर्यपूर्ण किसी पात के कहने से होनेवाले सर्मथा नगीन आस्वाद के आनन्द के कारण कामुकों से मकृत ), चतु यष्टि कलाओं से भरपूर (पा. हाव-भाव आदि कलाओंवाली), उनकोटि फी ( पक्षा० प्रोड यबाली) सच्चे करि की कविता को माँति वेश्या किसके मन का हरण नहीं करती। संरत्मरे पञ्चविंशे पॉपशुलादिनामरे । श्रीमतां भूतिरक्षाय रचितोऽयं स्मितोत्मवः ॥२॥ पयोस संवत्सर मे, पौष मास के शुक्रपक्ष की प्रतिपद् तिथि को श्रीमानों को सम्पत्तिरक्षा के लिये यह प्रबन्ध रचा गया ॥२॥ अविच्छिद्रगिनिद्ररौद्रफणिनामनास्ति कालं बुलं मजस्या सान्ति दन्तिपापा पक्षप्रपपांनुहा।