Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Jivan-sahitya

Kaka Kalelkar · 2010/12

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जीवन-साहित्य
[साशिप सति एवं पामिक रस्सयों के सम्बन्ध में प्रेरक विचार]
काका कासेसफर
१९५५
सत्साहित्य-प्रकाशन

प्रकाराक
मातप पाम्पाय,
मंत्री सस्ता साहित्य मंडल
मा रिस्सी।
तीसरीबार १९५५
मृत्य
दो रुपये ०
मुक
सुरेग प्रिर्स लि.
रिस्ती।

प्रकाशकीय
इस पुस्तक के विद्वान सेखक हमारे देश के इने गिने
पितकों में से हैं। वह दीर्घकास सक गोषोगी के साप रहे हैं
मौर उनकी विचार धारा का उन्होंने वरी गहराई से यध्ययन
किया है । मपने स्वतत्र पितन से उन्होंने जीवन के प्रति एक
नया मोर स्वस्प दृष्टिकोण बनाया है। उनके लिए जीवन
सर्वोपरि है-यह नीवन बिसे बीकर पक्सि पम्पता का मनु
भव करता है। उनकी दृष्टि में हमारा साहित्य हमारी संसति
तपा मन्म सभी पी उसी बीवन की साधना से उत्पामित
होनी चाहिए।
इस पुस्तक मेसों में काकासाहब ने जीवन के विभिन्न
पहलमों से संबधित अनेक विपर्यों पर प्रकाश राला है मौर
बहुत ही विषार-पूर्ण सामग्री पाठकों को प्रदान की है।
काकासाहब की सेसन-शैसी का तो कहना ही क्या है
कहीं-कहीं तो एसा प्रतीत होता है मानो हम कविता पा रहे
है। भाव मौर भापा का यह सौन्दर्य उनकी रचना को बहुत
ही माफक मौर प्रभावपासी बना देता है।
हमें हर्प है कि पुस्तक का यह सीसरा संस्करण प्रकाशित
हो रहा है । माशा है पाठक इसे पाग स चामे मौर दूसरों
को भी पढ़ने की प्ररेमा दमे ।
मूस सेन गुमराती में सिसे गए है मौर उनका अनुवाद
थी प्रीपाद जोशी ने किया है।
--मत्रो

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८ ३ ४ २२ २४ ७ २१ ३७ ५ विषय-सूची जीवन-साहित्य १ पुराने सेतोंमें ममी तामी २ साहित्य-सेवा साहित्योपासना साहित्यकी बायकी ओक कसौटी ५ ब्राह्मी साहित्यकार ६ सौन्दर्यमा मर्म प्रापीम साहित्य पत्रकारकी दीक्षा १ जीवनविकासी संगठन रस-समीक्षा मेरे साहित्यिक संस्कार मीवम-सस्कृति संसतिमा विस्तार २ जीबन पक्र ३ सुपारोंका मूल ४ सुभारकी सम्धी विधा ५ सयममें सस्कृति पंप महापातक मम बीर पसीमा अशियाकी साधना वीर-पर्म दो वर्ग प्रतिष्ठापी बस्पृश्यता ७२ ८२ ८ १०४ १ १०६

१२२
१२६
१२९
१
१३४
१२ अन्त्यज-सेवा
१३ मयदरोंका धर्म
१४
श्रमजीवी वनाम बुरिषीवी
धर्म-सस्करण
जोषित मितिहास
जोषित अितिहास
२ शारदाका अगोपन
३
जम्माष्टमीका मुस्सव
४ नवरापि
५ विजयादशमी
६ दीवाली
बसम्स पंचमी
हरिणोंका स्मरण
गुलामोका त्योहार
१२१
१४६
८
१६५

जीवन-सा हि त्य
१
पुराने खेतमें नमी मुताभी
बेक पूरे आदमीने अपनी मृत्युके समय अपने सार्कोसे
पहा कि उसके खेतमें कुछ गहामीपरपन गडाहा है। सहनि
साप लेव बोर गा मगर वह धन न मिरा । ऐकिन सुस
सार फया मितनी बन्छो आयी कि मुसके मामने गड़ा हमा
मास मिलता तो भी वह नगम्य मासूम होता। गहरी पोवासका
फल मिल गया।
सामान्य मोग विचारक्षेत्रमें भमतक भूपर-भूपरसे ही हर
चलाते हैं तबतक सामानिक जीवन प्राक्त मोर मीम रहता है।
चव-बधीर सोगोंने युक्त हो एमी तरह सूप गहगमी
वक सादा है सब-तब विचारको अपूर्व फमर पायी है । श्रीकृष्णने
मेरबार भैसा ही किया पा, मुसीमे भारतीय विपारसागरमें
शिवना ग्वार माया । बुट भगवामने जैसा मोमो मी प्रमाण
मान सेने से मिन्कार क्यिा बोबारमप्रतीतिस भिन्न हो, बिसन
परिणामस्वरस मार्य संसतिकी भानाम्निपर जमी हसी राम
नागपी मौरमार्य विचार राशि जगमगा मुठी । फोसके सिरो
मोर दूसरे विश्वकोप-सेवकोंने विचारक्षेत्रको सोदरसादकर यह
देप मिया कि मनुष्य-समार कौनकोनसे ठत्वोपर मापारित
है भोर तब पुरप में कान्ति होकर माम-बग स्वतन हो गया।
माटिन सुपरने यपने समयकी पर्म-म्यवस्थाको माग में मोक
दिया मिससे ममारपर्मपी गंदगी साफ होकर सामाविकता

4
बीवन साहित्य
प्रतिष्ठित हो गमी । मिस तरह जब मनुष्य अपरंपराको फेंक
देकर छोटे-मोट हरेक पदार्थ से 'कोस ? तस्मिस्त्वयि कि
बीर्यम् ? बैसा मवाल पूछमेकी हिम्मत करता है तब धर्म-सस्करण
होता है, जनतामें नया बस आ जाता है विद्वानों को नओ दृष्टि
प्राप्त होती है और मिस दृष्टिका असर चौदह मियाओं और
पौसठ कलाओंपर पडता है।
भार हिन्दुस्तानमें विसी तरहकी तत्त्वजिज्ञासा धर्मजागृति
और कर्म-विचिकित्सा भाग अठी है। प्रत्येक वस्तुका रहस्प हम
खोबसे हैं जीवनका परम रहस्य नये सिरेस बान लसे है मौर
अमे आचरण में माना चाहते हैं नयी समाजम्पवम्पा और नमी
बाधारविमियो द्वारा हम युसे समागमें दाखिल कराना चाहते
है और यह नया प्राण लेकर हम विचारकी दुनियापर शुरय
सात्विक दिग्विजय प्राप्त करना चाहते है।
बाप कम और संकराचार्य पूर्व और महावीर चैतन्य
मौर नानक मेसाया और महादी समी मये-नये अवतार लेने
माल है नये सस्प धारण करनेवाले है शायद ये करप भी
होंगे शायद ओक ही व्यक्ति मनेक स्म धारण करेगा क्यामि
हम विचार-पागरको बान्दोरित करनेकी हिम्मत और कोशिश
कर रहे हैं।
२
साहित्यसेवा
में साहित्यसेबी नहीं हूँ साहित्योपासप भी महीं है। हाँ
माहिरपप्रमी पर हूँ। मैने साहित्यका बास्वाव लिया है।
मुमका असर मुझपर हुआ है। मैंने देखा है कि मुलप्ट साहित्य
उटिको प्रगल्म बनाता है भावोंको सूक्ष्म बनाता है मनुभवको
दुमकर विवाद करता है धर्मबुरिको गागृत करता है हृदयकी
दनाको म्पत्त और मानस्वी बनाता है सहानुभूति गमि
परता है और आनन्दको स्मायो बनाता है। बिस बगहसे

2 माहिम सेवा साहित्यके प्रति मेरे मनमें बादर है। लेकिन मैंने अपनी निष्ठा साहित्यको समर्पित नहीं की है। साहित्यको में मपना विष्ट देवता नहीं मानता। साहित्यको में साधनके तौरपर ही स्वीकार करता हूँ और वह साधन तीरपर ही रहे अंसा-अगर आप मुझे माफ करें तो कहूं कि मैं चाहता भी हूँ। गोस्वामी तुलसी दासनीके मनमें हनुमानजीके प्रति आदर पा सेकिन अनकी मिष्ठा ता धीरामचन्द्रमीके प्रति ही पी। भिसी तरह म पाहता हूँ कि हमारी अपासना जीवनकी हो हो । साहित्य तो जीवनस्पी प्रकी सेवा परनेवासे अन मनिष्ठ मक्तके स्पानपर ही पोभा देता है। वह मव अपनी ही अपासना शुरू करता है सब यह अपना धर्म भूल पाता है । मनुप्प अगर अपने ही सुसमा विचार करे, अपनी ही सहूलियतोंकी भोजके पीछे अपनी बुद्धिमई कर गरे और अपने ही बानदमें स्वय मशगुल हो पाय तो जिस तरह मुसका जीवनविकास अटक जाता है और उसमें विकृति पैदा होती है असी तरह साहित्यके बारे में भी होता है । जब 'क्वल साहित्यके सिसे साहित्य का निर्माण होता है, यानी मोग पय साहित्पकी मेवल साहित्यके तौरपर ही अपासना करते हैं तब शुस्में तो यह सब सूबसूरत विद्यापी देता है विशेष माकर्पक लगता है, परतर असकी पूर्व-पुण्यामी खरम म हो उपतक अंसा भी महसूस होता है कि मुसका बहुत विकाम हो रहा है मेगिम अदरसे वह नि सरव होता माता है । साहित्यको मुसमा पोपण साहित्यमसे नहीं बल्कि जीवममेंसे मनुष्यक पुरुपामसे मिस्ना चाहिये । साहित्यमेसे ही पोषण प्राप्त करने पासा साहिरय त्रिम है वह हमें आगे नहीं से पा सकता। मिस तरह कुछ कुछ सगुपित मा तग विचार में रखता है। प्रिससिमे फेवल साहित्य के सुपासकों से में रखा है। मुनमा दबता असम है मेरा देवता भसग । सेकिन साहित्यो पासक बहुत अदार होते हैं। हालाकि मैं साहित्योपासक महार फिर भी मह मिसजा हकि H- १. बीवन-साहित्य ही क्यों न हो लेकिन मैं साहित्यका यमन करता हूँ और मैं प्रमान्वित हूँ। अत साहित्यके विषयमें अपने कुछ विचार पेश्च करने की धूप्टता कर रहा हूँ। मनुष्यके विचार, ७सकी कल्पना भावनाओं भावुकताबें अपवा भावुकताप्रपान अनुभव दूसरों के सामने परिणामकारक मरीकेसे म्मत करनेकी शक्ति जिस वस्तुमें है यह साहित्य है- यह मेरी अपनी साहित्यकी परिभाषा है। मुझे मामूम है कि तार्किक लोग कक्षपमें असको छिन्नभिन्न कर सकते है किन अपूर्ण मनुष्यकी बनायी हुषी परिभाषा अगर वपूर्म हों तो चसमें मापधर्म क्या ? जिसमें भावोंपर मनायास प्रभाव गरने की शक्ति है वह साहित्य है। सांसर्गिकता यानी पतपन साहित्य- का प्रपाम गुण है। मह प्रभाव यच्छा भी हो सकता है और दुग भी। भावनायें मनुष्य-जीवनका मगभग सर्वस्व होनेकी वजहसे मुनपर विस वस्तुमा प्रभाव परता है इस वस्तुकी तरफसे पापरवाह रहनेसे काम नहीं चलता। हवा पामी माहार वगैरा शुद्ध रखनेका बाग्रह मिस तरह हम रमते हैं या हमें रखना चाहिये अमीतरह बल्कि उससे भी ज्यादा माग्रह हमें साहित्यकी टिके सम्बन्धमें रसमा बाहिये। शीमकी तरह साहित्यकी रक्षा यहाँ की माती है यहाँ जीवन पवित्र प्रसम्न मोर पुरुपाी होगा ही। मुन्धारण सुदि हिम्मोंको शुदि म्याकरणकी शुविमादि प्रापमिन बाटोस मकर साहित्य के प्रत्येक बग प्रत्यगम शुदिना आग्रह होना पाहिये । सेकिन उसमें निमसा म माये वाधारगर न बाये दम म याये कर्मकार न आये । निर्म्याग मुग्यता शुविका बक पहमू है और सस्कारिता दूसरा पहलू । दोनों तरहसे पुरिकी रक्षा की जाती है। लेकिन मगर हम सिथिताके ही हामी बन पाय मौर हर तरहकी विकृतिको भी नजरवाण करनेको तैयार हो जाये अगर सामामिक बीवनमें सदाचारका धौर साहित्यमें शुश्किा पोड़ा ११ साहित्य-हेबा भी आग्रह रमनेका यो मोई प्रयत्न करेगा असके खिलाफ आवाज बुएन्द फरसे असे चुप करानेकी कोशिस करें तो अससे समान पा मेहद मुक्सान होने पाला है। सामाजिक जीवन में हो या साहित्यमें शुद्धि रसनेकी विम्मेदारी विशिष्ट श्रेष्ठ वर्गको ही होती है । प्रमिस या अदासताके गरिय सामाजिक सदाचारका सर्वोच्च याद नहीं टिक सकता । साहित्यकी भी यही हामत है। समारके स्वाभाविक अगुमा अब शिपिल हो जाते है रपोक मन माते हैं अपपा बुदासीन ही नावे हैं तव समानको पपानेवासी पोरी मी पाक्ति नहीं रहती। साहित्यमी प्रवृत्ति हमेशा समाजसेवाके लिये ही हावी हो सो यात महीं। मानसिब आनन्द सन्तोप, मुसलाहट या यमपा को प्रकट करनेकी शवयर करनेकी जो सहजप्रवृत्ति मनुप्पमें है ससे साहित्यका अद्गम होता है । संगीतको सरह साहित्य का मानन्द भी मनुप्प अकेले-अकेले ए सकता है फिर भी तमाम वाग्म्यापार सामामिक पीबनके लिय ही है । साहित्पनी प्रवृत्ति प्रधानतया अपने मावप्रधान मनन अपवा अद्गारो को दूसरेनें समान्त करनेकी जिम्छासे हुआ करती है। मिसरिये यह कहा जा सकता है कि साहिरप प्रधानतया सामाजिब वस्तु है। बीवनगी सभी मण्डी पीजाकी तह सम्चा साहित्य मारमनपदी भी होता है और परस्मैपदी भी। मनुष्यके सर्वोग्य सद्गुण असरे सामाजिक जीवमसे पैदा होते है। बौर तो घोर अनन्यनिरपक्ष मोक्षेन्छा भी सवॉक साप आरमौपम्य अनुभव करने सिये ही है, यानी मुसका प्रारंम मौर अन्स सामाजिक पोवनकी साताके साथ हो है । साहित्या यारेमें भी जैसा ही कहा ना सकता है। जिस तरह गायनक साथ तंदूरेसी आवार वान मिया ही करती है मुस सरह साहित्य तमाम विस्तारमें जनहितका छोरवस्याणका मुर मायम रहना ही पाहिय । यो कुछ मिसरे विसंवादी होगा वह संगीप्त नहीं बस्ति मानसिक कोसाहर है। वह माहिस्य नहीं बलि, मानसिक गहर - बीवन-साहित्य अकवार हिन्दुस्तानमे वैतिहासिक पुरुपोंकी सूचीमें मैने भीमदभगवद्गीता का नाम मी गोर दिया था। 'पिसके म्मति वकी छाप समाजपर अलग-अलग समयपर अलग-अमग तुंगसे पाती है और अिसलिये जिसके पिरजीवीपनका अनुभव हमेशा होता रहता है वह है व्यक्ति अपना पुरुप' जैसी परिभाषा की जाय तो हम यह मान सकते है कि भगवद्गीताको राष्ट्रपुष्प कहनेमें बौभिरममा कोमी भेग नहीं है । साहित्य के बारेमें भी मही याव है । लेक या अन्य प्रकारसे सामर्थे प्रकट करनेवाले पक्तिका हदयसर्वस्व होने के कारण व्यक्तिके प्रभावकी तरह बुस म्पक्तिके साहित्यका भी प्रभाव हुआ करता है । प्रम, मित्र मा कान्ताके साथ साहित्पती तुसना करनेवाले साहित्याचार्योने यही बात दूसरे गर्म नही है । 'प्रमु' की जगह बार हम 'गुरु' मामको अधिक पसन्द करते है। गुरु मिन और जीवनसहरी तीनों सबम्प पवित्र है सुदाप्त है । साहित्यका विरुद मैसा ही होना चाहिय । सामाजिक व्यवहारमें हम चाहे जिस बावमी को पग्में घुसने नहीं देते । चोर, शठ पिशुन मा मुजंगली श्रेणीके लोगोको हम देहमीना बन्दर पैर नहीं रसने देते। साहित्यक भूपर भी हमारी मैसी ही चौपी होनी चाहिये । अप वित्र मनुप्य चाहे मिसना शिष्टापारी को न हो असे मिस तरह हम अपने पासवकि साप वगैर पिसी रोपटोकके मिलने गुसन नही देते असी तरह पापाचरगको मुसजन देनेवाले साहित्यको भी हमें अपने पर में घुसने नहीं बना पाहिये । परसे वाहरके म्यवहारोंमे पहाँ सभी विस्मके मोर्गो साप सम्बन्ध आना है वही यच्छी और सराव मार्तोकोपरखनेकी कला मिस तरह हम अपने गालकाको प्रदान करते हैं और प्यावती परने बार मनुष्योंको दूर रसमेको सिनात है युसी सरह साहित्य, भी दुष्ट साहित्यके हापमामें न फैमकर असे दूर रखोकी कमा हमें अपने बासको सिपानी पाहिय । मेक्रिम में पानता हूँ कि बाकी हवा मिस सरहही नहीं है।

साहित्य-सेवा शिष्टाचारकी पुरानी वा तोड़नेका ही प्रयत्न हमने शुरू किया है। भुनके स्पानपर नये भादर्शकी नयी मर्यादाम सैयार करनेकी गाव हमें महीं सूभी है । कृत्रिम या मांत्रिक बाहोंकी हिमायत में भी नहीं करता । मेकिन समार-हत्यमें कुछ-म-कुछ पादर्श ता होना ही चाहिये और मुस आदर्श को रक्षा करनेका मागह रखनेवासे समाजधुरीण भी पाहियें। मगर अपना यह स्प मावसिव कुलवत देतो ससतिस टिक सकेगी? ससति वो अंगीठीको मागकी तरह जबतक हवा घसती है तभीतक टिमनेवासी पीन है । पुष्पार्प और जागतिकी चौकीके विना खेक मी सस्कृति नहीं बची है । संस्कृतिका प्रातिके अपर नहीं छोड़ा जा सकता । मेक्नि माज तो मैसामगता है कि मानो हम सामाबिम मरागकता ही पसन्द करते हैं । यह तो साफ बाहिर है कि पुरानी म्पवस्पा मन नही टिक सकती न टिकनी भी राहिये । एकिन पुरानेसी जगह नयी व्यवस्था रचनेके सिये बावश्यक प्राणवल हमारे समाजमें होमा चाहिये । कानूनके मकूगको बात में नहीं परवा । मैं तो जैसा ही मानता हूँ कि साहित्यपरमानूनका अकुत कमसे कम होना चाहिये । सदाचार की सर्वोच्च कोटिमा विचार करने कानून नहीं चलता । कानून मी आने स्पूर होती है ना होती है मौर अमक मुपाय असं सारी होते हैं । साहित्यपर अकुग होना चाहिये पर्णकमतका । कमतका के मानी हे मम्कारी बुदार, पारिभ्यवत्सल समान पुरीपोंका । जैसा कुछ करनेके सिमे आपका समान तैयार नहीं है यह मुम मासूम न हो सो बाप्त नहीं । सक्मि यह कहना हो पड़गा कि मिससे समाज मपना ही नुकसान कर देता है। 'नेको मुनियम्य बघ प्रमाणम्' मिम दीस की आड़ में हम सारी मर्यादामाका छव अहाना तो नहीं पाहत ? साहित्य है कमाया हो प्रक विभाग। भिमरिये कमाके नियम मिमपर भी लागू किय पास है।बमाके लिये ही करता है करा कभी भी मिमी बाह्य बस्तुके मापफोम्पीकार नहीं करेगी-भसा

पाचन-पादिश्य
कहनेवाले केवल-मसाबादी लोग नीतिके यशका हमेशा मजाक
अगते आये हैं । 'स्वास्मनि अब समाप्त महिमा' बिस तरहकी
मह कला देखते-देखते निरर्गस स्वाी बन जाती है। बौर स्वार्थ
के साप सत्त्व कम टिका है ? कसा कछाक लिये (Art for
Art's take) की परिणति कला कलाकारके लिये (Art for
the Artists rake) में हो पाती है।
मेरा यह बाग्रह नही है कि कलाको नीतिका संकुश स्वीका
रना ही चाहिये । छेक्मि जिसका कारण बठग है । साहित्यके
गास असका अपना गांभीर्य अपनी प्रसम्नता और पवित्रता पर्यो
न हो। हास्प-विमोद धिम तीनोंका विगेपी तो नही है। मितना
ही नहीं मस्किबह जिन तीनोंकोच कोटिको पहुँचाकर विखाता
है। अगर साहित्य स्वधर्मका पालन करे तो मुसे नीतिका महास
बीकारना न पडेगा । साहित्य पर हीन अभिरुपिके या कमा
मनु विलासिताम शरावसानेमें आपरता है तब मीतिको साधार
होकर भुसे पहसि अठाकर पर माना परता है । स्वराग्यमें या
राज्यमे सदाचारी और स्वयशासित नागरिकोंको नगर रक्षफोंसे
करनेका कोबी कारण नही रहता ।
मकिन कला और साहित्य बक ही वस्तु नहीं है । सुन्दरता
साहित्यका मूपम है न कि सर्वस्व । साहित्यका सर्वस्व साहि
यका प्राण मोगम्विता है विक्रमशीस्ता है सत्पति है।
बीवनके विविध क्षेत्रोंमें पौरुपकी वृद्धि करनेमें ही साहित्यकी
उन्नति रही है।
क्या विषय-सेवन समागमें लिप्तना क्षीण हो गया है कि
बलास प्रेरक साहित्यके द्वारा धुसे युत्तेजन देनेकी बावस्यकता
त्पन्न हुमी है? समाजकी सरह साहित्यको भी देहपारीफ
पोक वश होकर युन्म-नीच स्पितियाँ मुगवनी पड़ती है। पर
माजका सम्पूर्ण बुस्कर्प हो चुका हो असके कारण बानेवासी
मृति थक गई हो तव ममे ही समाज बिमासिवामें बकर
स सोनेको तैयार हो पाय, मफिन पर पतित समान

साहित्य-सेवा
मानवजातिपर आनेवाली सभी मापत्तियोंका दुर्दैवी समहुस्थान
बन गया हो करोड़ों लोग भूखसे या निराधासे तरपवे हों, पुरु-
पार्मका जहाँ-सहा भाटा ही दिसामी देसा हो और बरसातके
दिनोंपी कासी पतकी वह पारों ओर बगान फैला हुमा हो
जैसे वक्तपर तो हृदयकी दुर्वलता बदामेवाला, नामर्द वासनाओ
को पूरसूरत करके दिखानेवासा मौर मनेक हीन वृत्तियोंका
बाब या तरफदारी करनेवाला हत्यारा साहित्य हम पैदा न
करें। पढ़नेसे पहले ही पड़ने की तैयारी कैसी?
सिंहासनवत्तीसी और मेताम्पम्बीसीके वातावरणसे हम
ममीनही बाहर निफसे है तो फिर खुसी वातावरणका सुभरा हुआ
मोर मारपरपूर्ण संस्करण निकालकर क्या हम पड़ सकते हैं?
दुगुणका कलेबर भसे ही सुन्दर हो मुसकी पोशाक भले ही
प्रतिष्ठित हो बुवने भरसे वह कम पादक सावित नहीं होता
बल्कि यह म्यादा सतरमाक हो पाता है।
अपनी समाव-म्यवस्माकी सुन्दरताका हम पाहे मितना
वसान करें मगर मुसमें बान अफ त्रुटि स्पष्ट दिखाभी दवी
है । मे माना पा पव हम सग संसहसमें ही लिखते प ।
विससिप हमारे प्रोड और सरिस्त विपार सामान्य समारक
पि एप्पाप्प थे । लकिन मुस बस सत-रिमौर कपा-कीर्तन
कार वह सारा कीमती मास अपनी शक्ति के मनुसार स्वभापाकी
फुटार कानों में सस्त दाम मेमते थे। मुगलमालमें मुर्दूकी
प्रतिष्ठा बड़ी मोर मरयी फारसी भापायोंसे पबिमाको प्रेरणा
मिममे मगी। अग्रेजी जमाना शुरू हमा और अपनी सारी
मानसिक सूराक अग्रजास मनेकी हमें धावत पर गयी । असमा
अच्छा और बुरा दोनों तरहमा असर हमारी मनोरपनापर पड़ा
है साहित्यपर तो पड़ाहो है। मानालके हमारे अखबार मौर
मासिपपत्रिकामें नये षमाने विचार फुटकर भावसे बनेगा
काम करने लगे है। सेमिन बिन तीनों युगाम गरीर येणीके
मोगोंके सिम्ये देहातिमोमोर मजदूरोंगे सिप स्त्रिों और बालों

बोधन-साहित्य
के लिये विशेष प्रयास नहीं हुया है अशिक्षित समाजमें भी
सुनका सामामिक प्राण बहुत कुछ साहित्यका निर्माण करता
है। हमारे संस्कारी वध साधुसन्तोकी पासे मुसमें कुछ बुटि
ही हो तो जिससे आश्चर्यान्वित होनेका कोमी कारण नहीं ।
मेकिन म्यादातर मभ्यम मेणीका ही विचार हम हमेशा करते
आये है। हम यह भूल गये हैं कि गरीब रोगोंका जीवन सन्तोष
मम आधामय मौर संस्कारमय करमा हमारा पार्मिक कर्तम्य
है। कुछ बिनीगिनी कहानिपोंको छोड़ दें तो हमारी कहानियों
और अपन्मारोंमें गरीगोंक करुण माध्यमम जीवनका विधार
भी नहीं होता । पुरागकारोंने जिस तरह अमृत अप्सरा और
भीष्यसि मरे हुए म्वर्गकी कल्पना की मुस तरह भागकमरे
अपन्यासकार जैसेही किसी वेकार आदमीकी कल्पना करते है
को पकी-बैरिस्टर हुमा हो जिसने विलायतका सफर किया हो
मा बसीयसनामेसे जिसका मग पैसा मिस हो और असके
आस्मनि संतुष्ट' निरर्पक जीवनका सविस्तार वर्णन करते हैं।
जातिभेद हमारे मनोरोंमें भी अितना भरा हुआ है कि मध्य
येगीके बाहरकी दुनियाको हम नहीं देख सकसे । पिसकुस गरीग
लोगाका बीवन हमें दयापात्र फिन्तु रहस्यशून्य लगता है।
श्रीसपके घुस वारहसींगेकी तरह हम सिरपरक सींगोंपे गसरमें
अपने पतमे पैरोंका तिरस्कार करने लगे है या विरम्मारकरने
मितना भी ध्यान हम अमकी तरफ नही देसे । कर्म मौर पुन
बम्मने सिद्धान्तमा माषप मेकर हम अपने अनापडोहका रेक
हते हैं अनापोंकी सेवा तो दूर रही युनका स्मरण तक हम
नहीं करते। अप्रेसी कवि हमे कमीना गीत (Somg of
the Shurt) की बराबरी कर सके औमा मौलिक कास्य क्मा
क्सिीने लिखा है ? मीसपके अस वाइसीगेकी पो हामत
मन्तमें ही यही हालत हमारी हमेगा हाती यामी है । और अब
तो पिनाकी पटाने सिरपर महरा रही है। हमारा मोमाप्रिय
माहित्य हमारी सामायिक स्पितिका सूचक है। गोष्ठ

साहित्य मेवा दिकमें होगा यही हाठोंपर जामेगान ? गरीबों की मुश्किलें कौन कौनसी है अनके दर्द-दुस क्या है, अनमे सवाल कितने पेचीदा बौर विधाल है भिम सब बातों पर जिम्मेवारीके साथ विषार करपे वयाणे सवाफ हल कर सके जैसी पोत्रमा जम होगी सभी गरीबोंक दिप्तोंमें कुछ आशा पैदा होगी न जिसकी हम वैरन पुराते हैं असीको अगर दानमें छोटीसी सूमी वेसे हो वो मुसे सैसे समय मेवाके रिममें कैसी भावना उत्पन्न होगी। हमारा साहित्म अगर हमें अपना मुगधर्म न मवाये और अस पर्मका पासन रनेकी प्रेरणा हमें म दे तो वह अम्य सब प्रकारसे सरस होते हमे भी मुसे विफल ही पहना चाहिये। परीयोंको वाहर रखने के लिये जिस तरह हम शिवार वन्द करके साना माते है और पक्तिमेद का प्रपंच रखते है मुसी घरह हमने साहित्यकी निधिष्ट कठिन शैलियोंको अपनाकर भानकी मात्र में पातिमेव पैदा किया है । मुवात मुन्नत विपार माम जनताको गिस आसामीसे मिसने चाहिये यह महीं मिस सकते । हमारे सामुसोंने गरीबी का व्रत में सिमा पा जिसी लिये वे गरीबोंकी सेवा कर सके और गरीबक सिये प्राणपूर्ण साहित्य सिख सके। हिन्दुस्तानकी सबसे बड़ी साप मुसरी पन-संस्था है। सेकिन हमने गरीबोंगरा द्रोह करके मिसी वसको भारम्प बना दिया है। जबतक हम गरीयोंके जिम्मे साहित्य न लिखमे, हजारों मी तादाद में बाहर निकसरर गरीयोको हमारा मितिहास और मानकी हमारी स्थिति हमारा काव्य और हमारा धर्म तमा बुसकी मुपियान सममागे अपने पीवनपर ममी हमी राम हटापर असे प्रदीप्त करने की प्रेरणा न मे तव तक हमारा साहिरप पाइरोगी ही रहेगा। साहित्यकी मुन्नतिक लिये तैयार होनेवाली योजनाओं में पोप मोर सन मनप, भितिहाम धौर विपन, पाठ्यपुस्ठ में मोर प्रमामयन्य, परिपर्दे और ममिवियाँ-वहत यूएबात होती है । बहसव छोड़कर साहिस्पये मुमार पिये गरीब जनताकी

पौवन-पापि
सेवा करनेकी सूचना में कर रहा हूँ यह दसकर कुछ लोगोंको
मैसा मगेगा कि में साहित्य-मरलको समाजसुधार परिपट्सम
मानेकी मूछ करके बातें कर रहा हूँ। मुझपर मिसबाम भाले
ही लगाया जाय खेपिम मै ता निश्चित रूपसे मह मानता हूँ कि
पेटको मिस पर प्रधानतया षमीनर्मेसे ही पोषम मिलता है
सुम तरह साहित्यका पोपण समाबमें ही है। मानवसा और
धर्मनिष्ठामसे ही हमारा साहित्य समय होनेवाला है पिसमें
मुझे तनिक भी शक नहीं है।
युस्लिमित माणकमकी योजनाओंको में नीचा दिखाना
नहीं पाहता । मनमें यपा-शक्ति भाग भी मना चाहता हूँ।
फेकिन मसली वातको भूर पानेसे काम न घलेगा।
बहो पुष्पार्यकी कमी हो पाती है और पीवनमें शिथिलता
मा जाती है वहाँ साहित्यके बारेमें अल्पसन्तोप और रसिकताका
हिमठापन स्वाभाविक स्पसे या पासा है । बार हम महाकाम्य
नहीं रिस सकते हमारी प्रतिभा पौदह पक्तियां किसी तरह
पूरी करनेसे पहले ही सूख जाती है-विस सरहकी वालोधमा
मैं नही करना चाहता । काम्पकी सम्वाधीनौकामीपर में
अधिक पोर देना नहीं चाहता। मकिन हमारे काम्पविषय मुत्तुग
अपवा गभीर नहीं हुषा करते हमार काम्यविवेचन सर्वप और
मुस्कट नही हुआ करते जैसी आलोचना में वर करगा।
साहित्य तो पावातर व्यक्तिगत प्रयास ही है। बवता यह
मीर और दीर्घ मुद्योगके परिणामस्म न होगा तबतक सिटमा
ही रहेगा । श्रीश्वरने असाधारण प्रतिमा प्रदान की हो तो भी
वह पक्ति धीवरुप ही होगी। मनुप्यको कमसे कम मालीका काम
तो श्रीमानदारीने साप करना ही चाहिये। साहित्यमें सहयोग
क साप काम किये बिना भी म परेगा। सहयोगके सिये पो
सुप्युण यावश्यक है अन्हें अपने साये बिना अब एक कदम
भी बागे पड़ना मुश्किल है। सिद्धान्तमा आग्रह स्वभाष भेवको
नगरमन्दाग करनेकी पाक्ति, तफसीसमें अतरनेवी कुस्ता

साहित्योपासना
और मेरही समस्पसे मम्मे बरसे तक पिपरे रहनेकी दूता-
मिन सामाजिक सद्गुणों का विकास अगर हम न करेंगे तो
हमारे हामों कुछ निक्षेप साहित्यसेवा हो ही न सकेगी।
मह तो हुबी साहित्यकी सेवा । किन्तु सन्चे साहित्यका
निर्माण तो अनताके पुम्पार्षका ही फल है। कारभार (कारोबार)
में पसरू नेकी मियामत न होगी तोफरभार भी नहीं किया जा
सकता। जिस पगविख्यात सूत्रके पीछे सिर्फ मापासौष्ठय या
मनुमासकी लग्जत नहीं है । ७समें लम्जसकी अपेक्षा अमेरिकन
ममताका पुरुषार्प ही प्रमुख बस्तु है। साहित्यकी अनति मनवा
की गुम्नतिके साथ ही होती है। आपके मिसेके किसाोंने गुर
राती भापामें को बुद्धि का है वह अपनी दो चार परिप भी म
कर सकेंगी। हमने वल्लभमामीके हार्यों मपना सिर सौंपा हैम
किनार । मिस वधनपर गुजराती मनताकोहमेघा नाम रहेगा।
'हमारे ससे पन्दूक और सा रसत है मगर कभी बिसाते भी
नहीं। हमारे पासबोंको चन्द्रकों और तार्पोका मजा घलवायेंगे
तो हमारी मौलाव सो सुधरेगी। यह मे ही वाक्य गुजराती
भाषाका गीर्यघासी बनामेके लिये काफी है। साबरमतीने किनारे
गांधीजीने और वारगेमी के सेतोंमें पलभभावीने जिस मापाको
महा है यह भापा अपनी साभाविकतासे ही पीरोगस बोर
प्रोड बनी है। साहित्य पनताक पराक्रममा प्रसाद है। बड़ा
मिशनरी टेसर हमसे कह गया है, 'यपा भापकस्ततपा मापा'।
साहित्यकी मुमति करनी हो तो मपने जीवनको मुन्नत करो।
साहित्य जीवन भी छप है साहित्य जीवनकी सुगंप है।
मरत सादिप
१५-१९८
३
साहित्योपासना
सोमी परीक्षा पास होषाय किसीके पर तहका पैदा

। बौरव-साहित्य किसीका विमा हुमा भारी फिरस मिम बाय या किसीको साटरीमें भिनाम मिस गाय सो बुस सबरका तार मानेवालेका बह कुछ-न-कुछ मिनाम देता है। मारिममा तारमा महत्व जितना अधिक होगा युतनी मात्रामें तार छानेवालके विषयमें अक प्रकारकी युपकार-पुलिसी असके मनमें रहती है । मौर बिसमिये अच्छा-सा मिनाम देकर मिस सुपफारसी पूर्ति करने की कोशिस करता है। असलमें देखा जाय तो तार लानेवालेका अपकार कसा? तारका मवमून मनानेमें शुसका हिस्सा पोग ही हुबा मरता है? मनीभार या पारसर लानेगाछे गफिन्मेकी हास्त भी मसी ही है। फिर मी आनन्दमूक होना मनुप्यका स्वमान है। लेकिन मिस मनुष्यस्वभाबके कारण बिनाममें मिमा हुबा पैसा मेवमें गम्नेवासा किया यगर अपनी ही पगली महसूस करने लग जाय तो असके जैसा मूर्स कौन होगा? अध्यापककी कुर्सीपर बैठकर विद्यापियोंके सामने सुन्दर साहित्य परासनेका काम बोलोग करते है अनके प्रति मी भिसी तरकी कृतज्ञताबुद्धि विचापियोंके मनमें रहा करती ह । साहित्य क्षत्रमें मच्छे-अच्छे फस बुमनेमें मध्यापककी कुशम्सा सदभिरुचि और विधामा कल्पाम समानेकी सद्यदि जिन सव बार्ताका महत्त्व है जिसमें कोभी शक नही । लेकिन अगर अध्यापक असा गर्ष करेगा कि अन परिपक्व साहित्पफलोको मानो मुसीने जन्म दिया है सो अमका सा करना हास्यास्पद होगा। मैमा मानमा कि हमें गिस वस्तुसे आनन्द हुआ खुसी वस्तुपा हमारे कहनेस-आस्वाद सेकर दूसरा आदमी असना ही थानवित हो गाय तो वैसा करके असने हमारे आनन्दको दुगना बनानेमें मददी-यह अमीका हमारे सूपर अपकार है, शायद ठीक होगा। पोहो दुनियाकी सरफ देखनेकी दृष्टि मोर पीपनकोउन्नत पनामेका मार्ग विस साहित्यमें विश्व धौर सुमग रंगसे व्यक्त

साझिस्पोपातमा
हुमा हो बह साहित्य सिर्फ परकर हने देनेरे लिये नही है
बकि अमृतमय रसायनकी तरह भुसमा विधिपूर्वक सादर
युक्त सेवन करना परता है। परन्तुगो र वार साहित्योपनीबी
मन जाता है घुसे घी या वीरपरोसनेकी वर्षी (पमपी) पीता
सिर्फ परोसमेका भानन्द रेपर ही मैठे रहनुको आपत परमाती
है। और यह बिसी वातका विभार परता रहता है कि वह
मिठाई पिस तरह लोगों के सामने परासमेसे परोसनेमालेका
मिसनेवाली वाह-वाही अमे मिले। यह दर्वीवत निकाम हा
मा समाम जीवन को बुन्नत करनेरामा तो हरगिज नहीं है।
साहित्य-~~-अम साहित्य-अमलमें देखा जाय वाहदरमें
वाभिजात्य मुत्पन्न करनेका भौर चीवनको अम्नत बनानेमा
मेक सामन-मात्र है। साहित्यका केवल प्रचार करनेको अपमा
उसे हराम करके अपना जीवन अन्नत करके सेवाद्वारा अम
पीमन की सुधि फैलाकर समावो और मपनेको स्वाथ
बनामा चाहिये । औसी सेका करत-करते हमको भी मिसी दिन
मरस्वतीवैलरीका अपयोग करनेका मौका मिल जाता है और
हमारे हापस मा मुखसे प्रमन्न साहित्यका निर्माण होता है।
मिस बगसे होनेवाले साहित्यमा प्रचार अपरिहार्य सहज और
पुम-परिणामकारी होता है।
मटा साहित्य देखकर मनमें सिर्फ परोसनेवासेकी वृत्ति
पापूत नहीं होनी चाहिये बल्कि मिष्ट सह भुग्यतो की
प्राचीन भाशाके अनुसार मा सामाजिक मनोवृत्तिसे मुसका
सबन करके मिटमित्ररि सापमपना जीवन मुन्नत मौर परिपुष्ट
करनेकी तरफ ही हमारा मुकाम हाना चाहिए ।
पहावा किये हो विषममें कोमी मसाधारण बात कहो
हो सो पात महीं । मेकिन परोसनेकी तिरा दोप मारकसक
सम्पापक लसा प्रचारक करि मोर पत्रकार सबमें बहुरावा
मपा और नियमिये साहित्यका सेवन करके सारनारा
मुसे हरम से मोबमको मुम्नत पमानेकी मोर

बीवन-साहित्य कापरवाही होने मगी है कि अक्समद लोगोंको भी यह छोटी-सी सूचना करनेकी पसरत पैदा हो गयी है। कोसी भी प्रव पक्व वक्त पपकारकी वृत्ति और दृष्टिके साप तवाकार होकर पढ़ना चाहिये । लेकिन ग्रन्पो मारेम कभी प्रामाम्पमुखि वृत्पन्न नहीं होने देना चाहिये । ज्ञान पाहे यहाँसे बाहे जैसा मिले सो भी तारतम्य मुवि तो अपनी ही होनी चाहिये । प्रत्येक ग्रन्पका कासिक देशिक मौर वैयक्तिक (म्पक्विगत) ससरण करना ही पाता है। यह पो कर सकता है असीका पाचन सफस और कृतार्प होता है। साहित्यको माबको मके कसौटी ससारी लोगोंका पक्ष लेकर रामा भर्तृहरिने साहित्य सगीव और कलासे बिहीन लोगोको मे-सींग-और-पूंछो पशु कहा है। यह लिखते समय मत हरिक मनमें साहित्यके बारेमें किसमा भूषा पयास होगा । बाबकी प्रपाके अनुसार मगर हममे सुस साहित्य-स्वामीसे पूछा होता कि 'मापी साहित्यकी परिभाषा क्या है ? पो सुरम्त अंक वाक्यमें असने कह दिया होता 'नरपशुका यो पुश्योप्तम बना सकता है यह साहित्य है। मत हरिकाका 'कान्ततो निस्पृह' पंक्ति म मोम या कीतिसे समचायेगा म रागा से भी ररेगा जैसे ही मनुष्र्योको हम साहित्यवीर कह सकते हैं। साहित्य दैवी पक्ति है। जिस प्रक्तिके वसपर निर्भन मनुष्य मी सोकप्रभु बन सकता है और महान् सम्राट् मी रामदरसे जो कुछ नहीं कर सकते मसे सम्पत्ति बाय मासानीसे सापता है। राजाको तनस्वाह देकर अपने यहाँ 'प्राणत्राणमयम- मविदयशून्य सिपाहीं रखने पड़ते हैं। लेकिम साहित्यसम्राट्के तापिस्पछी मादडी मेकसौटी २१ पास सहवय सम्बनोंकी स्वयंसेवी फोन हमेशा तैयार रहती है। सभा साहित्यवीर यह नहीं कह सकता कि फलो बीन मरे सिय 'भप्रय है। साहित्यकी दीक्षा लेने के बाद असे तो प्रत्येक म्याय्य और धर्ना कार्य अपना ही समझना चाहिये । सुसी मोग फुरसत के गमत समय वितानेके लिये कुछ अच्छा-सा साहित्य पढ़ना चाहते है । बुसकी पूर्ति करनेसे और भापा मौन्दर्यके नये नये प्रकार मुत्पन्न करनेसे साहित्यकी सेवा हो गयी जैसा पोषी न माने । सो!में मुत्साह पैदा करना लोगोंकी शुभवृत्तिको पागृत करना मौर सरस्वतीके प्रसादसे रोगोंगा धर्मतेन प्रग्म्मलित परना साहित्यकारका काम है। सिर्फ जनरजन करना लोगोंमें जोयो वृत्तियाँ युपन्न होंगी बुन सबके लिये पर्याप्त आहार दे देना माहिस्पकारका धंधा नहीं है असे लोगों में नहीं है- महार भर्तृहरिने गाया पा 'न नटा म विटा म गायका न पोह-निवासबुरुप लिस्यादि। सौन्दर्य के साप अगर पीर हा तमी वह घोभा देता है साहित्य के साप सात्विा ते हो तभी वह भी सार्थ होता है। हमारे जमानेमें मानवताकी कसौटी करनेवाला अक बड़ा सवास हमारे सामने सग है। प्रत्यक मनुप्मको मह कसता है- रामसेवकको तपा मनसवकको ममाधिकारियोकोतया अधि कारियोंको हिन्दुमोको सपा औरोंको।गिस तरह सेतोंमें, हमारी पारणाओंमें अम्पश्यता पुस पपी है वह जबतक महमूससे निकल म मायेगी तबतक हमको धान्ति मिसनेवासी मही है। राउनैविक पुष्प कमर कसकर मुसमे पीछ परे हैं । सामा मिक हादियों के विषय में मुदासीन रहनेवाले हमारे साधुसन्तोने मिम अस्पृश्यताको बदनाम करनेके लिये मपनी प्रासादिक पाणीपरा प्रयोग किया है। महाराष्ट्रमें बस्योंमें तुकाराम और मामि गृहस्पाग्रमी अपनाय और ब्रह्मचारी रामदास अस्प स्यतापो बस्ति म कर मफते थे। गुजरातमें नानी संत भयो और भक्तशिरोमणि नरसया अस्पृश्यताको दूर करनेके सिम्ये

बीवन-साहित्य
घमवीरकी सरहको मागके यमानेमें श्रयामूर्ति परानन्दजीका
बलियान भी मिसीसिये हा है। साहित्य-वीरोंको भी याण
मपमी शक्ति सक्तिसर्वस्व-सिसी मर्मकार्यम सगानी चाहिये।
मस्पृस्पतानिवारण हमारा युगधर्म है। जिसमे पहले कि हम मर
पाय, अस्पृश्यता मर ही जानी चाहिमे परना सनातन धर्मक
भी टिकने की भाषा नहीं है।
१९२०
बाली साहित्यकार
जिस विधाम विश्वमें हमारे जीवनसे प्रेप्ठ कोबी भी
बस्तु नहीं है। हम बो कुछ देखते या सुनसे है जो कुछ हमारे
मनम या अनुभवमें पावा है वह सब जीवनक क्षेत्र मा ही
माता है । फास्पना-सृष्टि बौर आदर्श-सृष्टि भी पीबम-जगतके
दो रही है और अमात अनन्य तो जीवन जगतका क्षितिज
कहा जा सकता है।
बौर मरणको क्या हम जीवनक्षत्रके बाहरका समझेगे ?
महीं हरगिज नहीं। मरण भी पीवम हीकी सेफ युतप्ट
मिमूति है। जीवनमें जो कुछ अपूर्ण रह पाता है वह मरणमें
पूर्ण मोर हतार्थ होता है । मरण के बारेमें हम जरूर कह
मकत है--
ये माही झाली होमाची मिरास । आस्या याबकास रुपेविसी ।
(यहाँ तो चाहे मो याचा मा बाम असफो कमी मिराणा
नहीं हमा करती । सबसे भूपर मुसको सेक्सी ही पा रहती है।)
दिन और रात मिसकरजिस
तरह पूरा दिन मेक होता है
असी तरह गोयन बोर मृत्यु दोनों मिलकर सम्पूर्ण जीवन
होता है। दिनके वक्त सर्वत्र सफेद अपेरा फैला होता है मौर
सिसिम्ये हम सिर्फ मेक मूर्य मौर मैक पप्पीतक ही देख सबसे हैं।
रातक बात काम निर्मत प्रमाण चारों ओर फैस पाता है

ब्राझी साहित्यकार विससे पापा पुला हुआ दिखाई देता है विस्तृत मालम होगा है अस प्रमासमें हम अनेक मम्पियाँ मौर अनन्त सूर्य देख सकते हैं। पत्रिका मय विनके पैमवकी अपेक्षा कमी गुना मधिक होता है और इसीलिये अनन्त सूर्यो दर्शन अफ साप होते हुमे भी हमें बुनमसे किसीका मी साप सहना नहीं पड़ता। मनन्त कोटि सूर्य का भमकवे हैं फिर भी वह हमें शान्ति ही प्रवान करते है। जिस तरह मनुष्य अपने पचपनमें स्कूल में बहुत-से सबक सीखता है और बड़ा होनेपर प्यापक भीवनमें अन्हें अपयोगमें साता है या प्रयोगशालामें छोटे-छोटे प्रयोग करक वाव मार- भ्यवहारमें बुन प्रयोगोका विस्तार करता है बुसी तरह हम अपनी सारी मायुमें सो व्यक्तित्व और अम्मारम मास्मसात् करते है मुसीको मरणके द्वारा व्यापक और वृहत्तम पनाते हैं । जिसी रिम्य असा कहा जाता है कि मरण सो जीमनका नया और भुतप्ट संस्करण है। बीवन और मरण मिरकर पो प्रक पहसम पस्तु बनती है असीको ब्रह्म कहा जाता है । मुससे अलग कुछ भी नहीं मुससे अन्न कुछ भी नहीं । अनन्तसे अधिक अम्ब क्या हो सकता है ? अनन्तकी मोर देखने पहलू अनन्त होव है रेपिन्न मून वस्तु तो 'अकमेवाद्वितीयम्' ही है। झार प्रणव जिस तरह परब्रह्मका पापक है मुसी तरह साहित्य भी जीवनका सम्पूर्णजीवनका-वापर हासकता है। मितमी बड़ी प्रतिष्ठा साहित्यकी है । ऐकिन भुसभी सापना अत्यन्त सावधानीमे अषित उगसे होनी पाहिये। जिस पर मूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठा करने के बाद ही भुसे दवत्व प्राप्त होता है असी तरह साहित्यपी प्राणप्रतिष्ठा करने के बाद ही असे प्रणव पूग्यता मौरपाचापति प्राप्त होती है। प्राणप्रतिष्ठा करना पेस देवी विद्या है, अमर-कता है । यह विधा पह का विमने प्रार की है भैसा कवि शायद ही मिलता है, पसिरा नाम धारण पर मगरो वह छाती निकासपर जिपर मानेला २१ बीवन-साहित्य जीव अनेक है। बुनकी वो हम बात ही छोड़ दें। प्रतिभाशासी चित्रकार सृष्टि-सौन्दर्यको पित्रित पर असे स्पायी बनाता है। यों तो सृष्टि-सौन्दय हम मपनी आंखों देखते ही है, असे घिनगड करनेकी क्या जरूरत ? म्यादा-मे-ज्यादा अकाप छायाचित्रकार (फोटोग्राफर) की मदवस तो काफी है। लेकिन भित्रकारका कार्य तो कुछ और ही है । यह यह सिखाता है कि प्रकृतिका सौन्दर्य आँससे नहीं मपितु हृदयसे कैसे देखना चाहिये । प्रत्येक सुप्टिकी जगह वह प्रति-सृष्टिका निर्माण करता है। असकी बनायी हुश्री भिम नवीन सृष्टिका धीवनमें अन्तर्भाग होनेपर भी बह साफतौरपर पीयनसे असग ही दिखायी देती है और निस्पके अनुभूत जीवनपर कुछ और ही अलौकिक प्रकाश गळती है। पित्रकार की प्रतिमा अन्तर्वाहा विश्वको हदयस्रोतमें सराबोर कर रसस्निग्म बनाती है। मिसीमिये तो रसिका की दृष्टिमें चित्रकार तीर्थरुप बन पाता है। मिस तरहके अन्य कोटिके पित्रकार दुनियामें बहुत ही कम हुम है। नाम-मात्रके पित्रकार सोहर भरपी दीवारपर सटकते या प्रत्यक प्रकाधनके अंधेरेमें साते हुये दिखायी देते हैं सम्या साहित्यकार सबक नहीं सिखाता बस्कि दृष्टि देत है। मिसीरिये शिक्षकके पदपर बैठे बिना ही वह गुरुम्पान प्राप्त करता है। किसी बोका हाय पकाकर अगर असे हम एम कमरेमें से पाय और यहाँकी प्रत्येक बस्तुका उसे स्पर्श कराके युस मरेका परिचय दिसा दें तो यह उसमें आमानीसे रह सस्ता है और अपना नित्यका म्यबहार भी पसा सकता है। सेकिन जितना मसट करने के बजाय मगर हम अस अपका दृष्टि दम तो बेक क्षम पूर्वका मह ममा कमरेली सभी वस्तुओंका मानो स्वामी बन जायगा । फिर तो मुसे कमरेकी हर परिपय करानेकी जस्त नहीं रहती । अब तो वह हमारा बाधित नहीं साथी बन गया। साहित्यकी महिमा जैसी ही है। साहित्य पाठ नहीं पड़ावा

सोमर्पका मर्म
२७
प्टि देता है। साहित्य पोवनका सिर्फ अलीपन है रहस्योदघाटन
है, साप्तातरण है।
ह साहित्यगुरो परमारमन्, तेरे अवतारके सदृश माझी
माहित्यकार पिस दुनिया भेन दे। दुनिया पापग्रस्त है असे
शान्ति प्रदान कर मुसे पता कर ।
६
सौन्दयका मम
साहित्यकी भाषा माना मेक पतन है। साहित्यका मूल्य
मिस बातसे निर्धारित होता है कि हम मुस वतनमें किस किस्म
माल भरना चाहते हैं।
कुछ मोग समझते हैं कि साहित्यकी सारी कल्पना असके
म्प मौरसौन्दयपर रपी ही है। गोभी भी विचार या कल्पमा
अगर बार्पक रूपमें रप्पी हमी हो अमर्मेस पमसति पैा होती
हो तो यह साहित्य है। भारी से भारी मूल्यवान बिभार या
अनुभव बोर पासमानतक पुरानेवासी कल्पना अगर रोचक रूपमें
म रखी गयी हो तो असे हम साहित्य न रहेंगे। असे दर्शन
महो पमशास्त्र कहो या सन्तवाणो कहा । अस बाप साहित्य
नहीं कह सकते।
पिसो विपरीत भगर कोमी विचार विस्मुस मामूप्ती हो
कल्पना छिछसी हा मादय हमका और समाविमापक हो
सफिन मगर वह मनोरजन करता हो और मुसमा स्वस्प पिता-
पर्पक हो तो वह अन्य कोटिया माहित्य कहा जायगा । मनो-
पिनो पिताकण मौर म्पत्तावप्य ही साहित्यका प्राण है।
घिसमें कोई शक नहीं दिपोत्री बागम्यापार मगर
चित्ताकप स्पमें पेश न पिया गया होता तो हम से सरम
साहित्यक तौरपर महीं पहनानते लेकिन बगर युस साहित्यमें
माया हुमा विचार हीन हो अनुभव छिराहा, और पल्पना

२८ बीवन-साहित्य सग हबी हो सो सिर्फ़ स्पपरसे ही हम मुस मुत्तम साहित्य नहीं कहते। अब मरा स्पका स्वरूप पाँच में। कोबी भी युवक अथवा युवती घरीर और मनसे निरोग हो व्यायाम संयम तथा प्रस प्रवासे असने अपने यौमनकी अच्छी रक्षा की हो तो इसमें अपनेआप ही अमुम मात्रामें सौन्दर्य आ ही जाता है । यह सौम्दर्य सावुनसे सह-सरहने खुशगूदार तेलोका विस्तेमाल करनेसे या ममे उंगके बनेर रग बौर दवाइयाँ लगानेसे नहीं वा सकता। आरोग्य और यौमन स्पर्य ही मुम्बर होता है । सुन्दरता और वाकर्पकता मुसकी सहल सुवास होती है । लेकिन जिसके विप रीस अगर शरीर वीमार हो मन विकास हो स्वभाव स्वार्षी चिपिग या सहप्रमी हो और यह सब छिपानेके लिये कपड़ों की सगावट, शिष्टाचारकी तमीष और हासचापके नाज प मसरों द्वारा सौन्दर्य लाया गया हो तो कुछ भूसे लोग मुस चमक दमकसे भले ही आकर्षित हो जाये लेकिन जानकार स्वच्छ मभिरुचि रसनेवासे लोग यह सारा प्रयास देसकर पुसी ही होंगे सुनके मनमें ग्लानि ही पैदा होगी । साहित्यका भी वैसा ही स्म है । साहित्य जीवनका प्रतीक है। भीमन अगर निरोग प्रसम्न सेवापरायण प्रेमपूर्ण बौर पप कमी होगा तो असके सभी व्यापार मार्पक और प्रभावशाली होंगे । बिस विचारमें मार्यता है बुदात्तवा है सर्व-मगलकारी कस्याणकी मावमा है मुसका शम्दशरीर आप-ही-आप भाव गभीर, रुमित कोमम और प्रसादपर्ण होगा। अन साहित्य सुन्दर होता ही है मेकिन समपन करनेसे कोमी साहिस्प झुण्य या शिष्ट नहीं होता। बिसमिये केबस साहित्यकी अपासना करनेके बजाय अगर हम आर्य और प्रसन्न जीवनकी बुपासना करें तो साहित्यकी सुन्दरखा स्वयं ही फूट निकलगी । वृत्तिमी आर्यसा ही शिष्टा मारमा तमीयकीवात्मा है । निरा शिष्टाचार हास्पास्पद हावा प्राचीन साहित्य २८ है या दिएको अफता देता है। घोड़ती सौन्दर्योपासना जिससे अन्य पोमी असर पैदा नहीं कर सकती। जिस साहित्यमें प्रगतिपीठ पोवनकी प्रेरणा बयवा प्रति प्पमि हो वह साहित्य प्रगतिशील है। मसे साहित्यमें घोर सब कुछ हो या न हो अनुक्रम तो हरगिज नही होना पाहिये । दूसरा कुछ हो या न हा अद्देश्यका अभाव ता कभी मही होना पाहिये। ७ 7 प्राचीन साहित्य साहित्यकारोंन करिताको सुसना कान्सासे की है। शास्त्र कारोंने कुदम्पमें स्त्रीकी जिस प्रतिष्ठाकी कल्पना की है वही प्रतिष्ठा सस्कारी पोषनमें साहित्यकी भी है। गा समाज स्त्रोकी प्रतिष्ठाको भूल जाता है यह साहित्यको प्रवर भी क्या करेगा जो मनुष्य मोबन भर व्रत-नियमादि पिया करता है, मुसे यह मान मही रहवा किम कहाँ पे और कहोगा रहे हैं । अस के लिए भूत और भविष्य दोना शून्य है। क्या हमारे टीकाकारों का भी यही हाल हो गया होगा ? सात-साहित्यक रहस्यको प्रकट कर देनेवाले टीकाकार कम नहीं है । यदि माहिरका कुरक्षेत्र करना हो तो हमारे टीकाकारांकी सना मिसनो यही है कि यह रिस देशको चाहे हरा सकती है। परन्तु साहित्यको प्यापक दृष्टिसे देसमा पिसीको सूना ही नहीं । जिस तरह कारिदास पुष्पक विमानमें मठकर एडासे अयोप्या ताफे प्रदेगका निरीक्षण विहग-एप्टिस पर समे अपना पक्षपर या करप बह हिमगिरिम मलकापुरी वा मेपका मेग सक मुम सह अक भी टीकाकारको यह नहीं मूमा कि यह साहित्य- सायका समग्र भवरोपन करे । मिस सरह वोमा दस-पाष मनुप्पाना ही मनोरञ्जन कर सकती है शुमका सनोन किसी बोधन साहित्य महासभामें प्याप्त नहीं हो सकता खुसी तरह टीकाकारोंकी दृष्टि भी अक सम्पूर्ण श्लोकके बाहर नहीं पहुचती। ग्यावा-से ज्यावा यदि उन्होंने यह बता दिया कि नान्दीका इसाक सम्पूर्ण माटकसी वस्तुमोंको किस तरह सूचित करता है तो ये क्वार्य हो जाते हैं। हमारे साहित्य-मोमासक भी जितनी गहराई में बुतर सके हैं अपने विस्तारसे महीं देख सके । वे अक लोकके भीतर दस-पांच अलंकारोंकी समृष्टि सिर कर सकते है परन्तु यह बतलाना वे अपना पर्सम्म महीं समझते कि मेक सम्पूर्ण महा- भाष्य या सणकाव्य किस तरह अकराग है और असकी बारमा किसमें है? जिसका अपवाद-स्प मेक क्षेमेन्द्र माना जा सकता है। बिस काश्मीरी महाकविने अलकार और रोंके बाद सौपित्यका महत्त्व बतझा दिया है। अमने बेक ही कविके अक ही पलोषका रस निचोड़ने ववले संस्कृत-साहित्यक बसीस चिस्यात कवियोंकी भिन्न-भिन्न काष्प-कतियोंको लेकर मो गुग बार दोपोंकी विवेचना की है । यह निप्पक्ष कवि दोर्पोको बताते समय अपने दोपोंको भी प्यानमें माना नहीं भूमा । तपापि यह कल्पना सो क्षेमेन्द्रका मी नही सूमी पी कि ओक सम्पूर्ण नाटक मपया काम्य ऐकर असके रहस्यकी सोम की बाय । घिसकी दृष्टि से औचित्य था- परे वाक्ये प्रवत्या गुणेप्रकरणे रसे। मिपापा कारके सिगे बचने च विशेषने। उपसर्गे निपाते . कामे पेशे कुन प्रते। तस्ये सस्वेम्यभिप्राये स्वभावे सार-सपहे। प्रतिभायामबस्पायर्या विचारे माभ्यवाशिपि । काम्पस्थगिषुप प्रहरौनिय व्यापि बीवितम् ॥ बितनी ही जगहोंमें औचित्य-विचारकी बर्चा' करके कवि रस गया है। रवीन्द्रनापने हमें साहित्यकी बोर देखनेकी क- मयी दृष्टि दी है।

प्राचीन ताहिप से नाटक बाम्परा निष्कर्ष है अमी तरह कपि भी सामा- गिक बीमन राष्ट्रीय माकामा जातीय मावण अपदा प्रमाकी बेदनामाको सपम् मूर्ति है। जब कोई भट्टनारायण 'वेणी- संहार' मिसता तर द्रौपनीका प्रोप भीमकी प्रतिमा कर्ण- का मस्सर और यश्वत्थामाकी यानका चित्र तींपन वाद बह राष्ट्रीय मुत्पान मौर पतनको मीमांसा मी अपने उगसे परना पाहता है । बम कासिदास 'रमवंध' रिबने बैठो है तब रपुरे पुरकी ही नहीं मिल अधिए माय-मसतिकी प्राति मोर विशनिको मगित कर देना चाहते हैं। हमारे पवियाकी तिर्योको योर तिहामिक मपवा सामा रिक दृष्टिस दसनेकी ति भले ही पदिपमी छागोंने हमें सुभाई हो परन्तु रवीन्द्रनायका माप हुद वो ससति-माहित्यकी ओर बार्य-दुप्टिम ही देम सका है। जिस प्रकार एक समर्य चित्रकार कवर दस-पाप एकीरोम संपूम चित्रका पिठ कर सकता है ममी तरह रवीन्द्रनायने भिन्न-मिल प्रसगोपर मिल हुए पांच-मात म्फट निब घास ही यह सब दिखा दिया है कि संमत-साहित्य क्या है ममत-कविका हदप जैसा है हिन्दुस्तानका मितिहास किस पुस्पार्यकोहिगर वठा है मित्यादि। समत-करियोंमें जैतिहासिक दुष्टि भमे ही न हो परन्तु मनमें मैतिहासिर हत्य तो अवश्य है । सामारिक मुन्न-दुगाफी प्रति पनि मुनर हदयामे सहर मुली है। राष्ट्रके बुतपक साप में मानन्दित होते है मौर मुमकी मूरि माप मूति । रायो अपपात पर उनमा हृदय रोता है मोर जम एसा होता है तब ये प्रपमरे मोर मनोहर पचनास ममारको मुचठ करना चाहते हैं। यहाँ दाम्पायममही पता नही मीडियावर 'भूर्ण वार्षिरोम्पप म पपिन्गानि में प्रिम सरह मरम्पर्गदन रहे हैं वहा पवियन मपनी मायनामे समाजके हरयका मागृत कारण समारको उन्नति मागपर के गात है।

बीवन-वाहित्य
यामवल्प, पाराशर और मुनकी जातिके अनेक स्मृविकार
समाबपर जो असर नहीं कर सर यह असर मुटेरॉका प्रमुख
वाल्मीकि और बमर-काम्प द्वारा कर सका है। श्री शंकराचार्य
में प्रस्थानत्रयीपर भाष्य लिखकर मो दिग्विजय प्राप्त किया
उससे कहीं गड़कर दिग्विजय पट्पदीके समान सुन्दर स्तोपोंको
लिसकर उन महा-परिवारकाचार्यने प्राप्त किया है। पोराचार्य
को शास्त्रार्य करते समय सपन-ममन-शारा पिरोपियोंकी
बुद्धिपर हछ-पूर्वक विषम प्राप्त करनी पड़ी परन्तु षष के परम
हंस अपने सुन्दर स्तोर्पोका बालाप करते होंगे तब लोक-दयप
स्वेच्छासे राजी-सुपीसे पिंजरे में बागमा होगा। जैसे फपियों-
का हृद्यत भाव प्रकट करने के लिए अनके समाम हो समर्प
करियोंमी बारश्यकता थी। वारह वर्ष पाकरण रटकर, दूसरे
बारह वर्ष तर म्याय-शास्त्रके छिलके डीलमेके वाद साहित्य
पारमकी सरी' सीककर तैयार हुए टीकाकारांना यह काम
नहीं।
बाम्मीकि भगभूति मास मीर कासिवास पैसे कपिर्योने
रवीन्द्र के समान समालोचकको पापर 'मध में सफल पम
अध में सफला क्रिया' कहकर बुसी तहकी भतार्यताका
अनुभव किया होगा पो न्यूटम और फरमा जम्म होनेपर
ब्रह्मदेवको अपनी सृष्टि रचनापर ही होगी। फाम मिरवमि
है और पृथ्वी विपुला है यह हमारे कवियों की श्रवा रवीन्द्र
पसे समान-परिमाको देखकर चरितार्प मुत्री होगी।
बय पुराने टीकाकारोंने हमें बावश्यक दृष्टि नहीं दी तव
हमारे पाश्चात्य पण्डितम्मन्य अध्यापकोंने हमे अल्टी ही एप्ति
दी। उन्होंने यही पाठ पढ़ाना शुरू किया कि यूरोपियन मावर्धा
नुसार हिन्दी भितिहासमें कुछ भी नहीं पूरोपियन निम्टाचार
के अनुसार हिंदी-काम्प हमेशा तुच्छ समझे बायपे मितना ही
मही वरम् ‘ोम केनपिदिनुपाण्डुतरुणा' के समान होकका जिम
समाबमें निर्माण हुमा मिस समासने शिमोंकी दीवारोंमें

प्राचीन मानिय 2 नहीं किन्तु वन-उपवनकी गोदमें ही परवरिश पायी है असी समानके कवियोको निसर्ग निहारनेको नेत्र नहीं है असा काहनेकी भी रिठायौ करनेमें वे और अनके सिप्य नही हिप कते । हम्मी मनुष्य भवता अपना-मा रंग और अपनी-सी नाक सपा होंठ पिसीके नहीं देससे तबतक बुसे कभी सुन्दर नहीं मानते। हिन्दुस्तानका अितिहास अगम्बर है म्पापक है और रहस्य पूर्ण है। पर यह यूरोपियन अितिहाससे विल्कुफ भिन्न है। रवीन्द्र मामने हमें मतमाया है कि वह सरकारी तहखानो और तवा रीखोंमें महीं बल्कि भुस देशके साहित्य आदिमें मिल सकता है यहाँ राष्ट्रीय-भीवन सजीव रपमें विद्यमान है। हमारी रग भूमि तरह-राहके उपकरणोंसे शो-स्म' का प्रदर्शन नहीं करती मिसका कारण हमारा जगसीपन नहीं परन्तु यह सोच ममिचि है भो यूरोपियन टीकाकारोंकी कल्पना भी नही बासकती । पर हम यह समनमा मी रवीन्द्रनापसे ही नसीब में बवा पा। हम नहीं जानते कि कालिदासका मप यसके सन्देशमा अरुकापुरी से गया पा या महीं किन्तु रवीन्द्रनाप ने तो मुसीको अपना दूत मनाकर मुसके द्वारा हमें प्राचीन समयके भारतका साक्षातार पराया है। राष्ट्रीय हवय जिसे स्वीकार करता है, वह काय्य मितिहास पदको प्राप्त कर सकता है । यह अन्होंने रामायणकी मीमांसा करके सिद मिया है। जिस तरह बनेक पतियोंसे अन्होंने संसात-साहित्यका सुमाटम दिया है। परन्तु रवीन्द्रनाथकी प्रतिमा संपूर्णरुपमे प्रकट ही है अनके कुमार-सम्भव और पाकुन्तसपस निवम्पोमें। जमन कषि मटेकी मेक-लोकी टीकापो रेफर कवीन्द्र बम है और घुम्होंने मपनी मौकिक शक्तिसे यह सममाण मिद कर दिया है कि फिम तरह पारन्तल कालिदासपी सम्पूर्ण पति है। पोक्सपियरके टेम्पेस्ट के साप घान्सममी तुरना करम, बीवन-साहित्य पियरके मुकापिसेमें अन्होंने कालिदासकी अभिरुचि की श्रेष्ठता- को प्रकट करनेका मौका भी बड़ी अच्छी तरह लिया है। शाकुन्तसपर सिमा सुनका नियम एक अपूर्व योग है। कालि वास मेटे, शेक्सपियर और रवीन्द्रमाम बिन चार प्रतिभासंपन्न विश्वविस्पात-महाकपिर्योका कण्वाश्रममें सम्मिलित होना यह कुछ सामान्य वस्तु नहीं। कवियोंकी वाणीमें कस्पनाओं पाहे जितमे फम्पारे अरते हों तोमी वह वाणी साली कल्पनामप नहीं होती। यह बात तो रवीन्द्रनापने ही सबसे पहले जितनी सम्पूर्णतासे प्रकट की है । मुम्हनि बताया कि मूसमें तो व्यक्ति मत या सामाजिक जीवन रहस्यका तत्वज्ञान होता है समाज शास्त्र और मर्म-शास्त्र नीति-शास्त्र और सौन्दर्य-शास्त्र भिमके अन्तिम सिवाम्तोंको तरंकी दस्तैदानी और गरबड़से बचा कर पविजन अपनी अपूर्व प्रतिमासे बुन्नें बनुप्राणित करते है बौर बीरनक समाम अक सम्पूर्ण मौर सोग विका निर्माण परत है। 'जो यहाँ है सो बहाँ है जो वहाँ है सो यहाँ है सारी सृषि बेर-प है ऋपियोंके देने हो मिस सिद्धान्तको कगि जम हमारे सम्मुख मूर्तिमान सड़ाकर देते है। सससमे कपि' पदस को भाव मनमे अत्पम्न होते है ये अग्रेजीमें 'पोमेट' शम्पस नही होते । कपि वर्षात् द्रष्टा पो जीवन-रहस्यको दमता है जिस मिह बौर पर-सृष्टि दोनो बेक-सी प्रत्यक्ष है जो अविवादमें मुवर सकता है पो अिस ससारमें रहत हुमे भी लिस संसारका नहीं बही कवि है । गो पर्म चक्षुको दिसामी मही देसा बिसका आकलन सर्व दृष्टिसे नही होता और जिसके रिये म्यावहारिक संसारमें प्रमाण नहीं मिमता जैसे मतीन्द्रिय सूक्ष्म और स्वसंध यनुभवाफा सम्पूर्ण साक्षात्कार करके अन सब अनुभवोंगे धम्द अबया वर्मके समान मर्यादित सापों धारा दूसरोके रिये भी प्रत्यक्ष कर सकता है वही कपि है। कपि ये है पो पिस सृप्टिकी-मिस बाह्य-सृप्टि मौर मन्त मुष्टिको-आमार-स्वरुप मीश्वरी याममाका भीवरी मीसा

प्राचीन साहित्य
मौर मीपवरी आनन्दका साक्षात्कार कर सकते हैं। वैदिक ऋपि
जय श्रीपवरी-सुतिकी भूमिक शिसरपर पहुंच जाते हैं तब परमे
सरको ही कवि' कहकर पुकारते हैं, विस सप्टिको जीपवरका
काम्प कहते हैं। मिसलिये ऋषिका सीमा पर्व निश्चित होता है
सुप्टिका रहस्प बाननवाला। कासिदासने जीवनक रहस्यको
किस सरह पहनाना पा पहम तो मस्तिनापने माना और नमाना
रापषमट्टमे । मिस रहस्यको बान सके गेटे या रवीन्द्रनाप ही।
कवियोमीतियों पर टोकाकार तो बहुत हो गये हैं परन्तु
'काष्पर अपेक्षिता में रवीन्द्रनापने वो रसिमता और दाक्षिष्य
यतसामे है ये तो मपूर्व ही हैं। काम्पेर पेमिसा' मेक बसाधा
रण टीका है। पर वह मुसमा ही अप्रतिम काव्य भी है। रवीन्द्र
माप यक भी दूसरा निबन्ध न सिमते केवल यही अंक मिवप
मिस देते तो भी साहित्य रसिकाको अनकी पाप-पाक्तिका
पूरा पूरा पता ग पाता।
मामिक पाठकके लिये यह पान कनेका मिसी भारी
प्रमाणकी पावश्यकता नहीं है कि वासर बासी सपा 'नाका
गरी मुसी कविक सिस्ने हैं पिसने 'काम्पेर मुपेसिता में पत्र
सेमॉका विपन किया।
सो यह कहते हैं कि हमारे मावि मुष्टिका निरीक्षण करते ही
नहीं मुन्हीं पुरानी अपमार्जोको दोहराते परे माम है वे न तो
स्वग हो मृप्टिमा निरीक्षण करते हैं और न काम्पका परीक्षण।
यदि वयाकार रवीन्द्रनापपा बह निवग्प पड़ेगे, बिममें
मुन्हनि मादम्बरीफा दर्शन कराया है तो अवश्य अनका प्रम
दुरहो जायगा । साहित्यकार पोयाणभट्टकी कादमरीका नारि
केस-पार रहत है असका यह परिया अदाहरण है । बाणभट्टके
काम्प-नान्यारमें गटक समान मातोभय सवार सो वही कर
सकते हैं पम-पराहफे समान वहा मुम्ताक्षति भी वही कर सकत
हैं हरिपाक समान कम्पना-तणाकुरोंका मर्ष-विकी फरक
मिसस्सत वही फॅर सकते हैं मयमा अभिनयमपु-सोप प्रमर

बीवन-साहित्य समान वे ही वहां स्वेच्छा-विहार कर सकते है जिन्होंने हिमालयने समाम पषत और मेघना या पाके समान नदियाँ देसी है अपवा जिन मनुष्योने पुप्प पक्षी तारे और परकोंकि साब सेलने में बरसो व्यतीत कर दिये है । संसात-साहित्यमें अंव सृष्टि और वापसृष्टिका जो सास्प्प और तादात्म्य है बुसमा सम्पूर्ण वायित्व रपीन्द्रमापको मिषा है। मिसीसे काति- पास (मागम और वाल्मीकि समान कविषम) पुत्र-सात- ममीक पिताके समाम तार्य हो गये है। सबसे हिन्दुस्तानमें 'यूनिवर्सिटी' स्पापित हुी तबसे प्रत्येक मन्पका बहिरग-परीक्षण करमेकी प्रणाली बहुत ही यह गये है। काल-निर्गय पाठ-मेवकी मीमासा प्रक्षिप्तगाव पा करना यह तो हम पूप सीस गये है और यदि षेक सम्बकारके नाम पर अनेक ग्रन्म हों तो हम यह भी अनुमान करमे लग गये है कि मेक ही नामके मनेक मेखक हो गये होंगे और मिन ग्रन्पों के मेसर मिम्न-भिन्म होंगे । सस्याम्वेपणकी दृष्टिसे मौर पैति हासिक दृप्टिसे भी यह सभी बावश्यक बौर महत्वपूर्ण वो जरूर है। परन्तु यदि हम बगीचेकी छम्माई, पौगई, उसके भीतर के वृक्षोंकी वफसीस और गिमती बावि अपरी बातोंकी वान जारी करनेमें सम्पूर्ण समम लगा देंगे और फूलोंकी सुगम्मि और फठोंका स्वावलमा भूए जायेंगे, तो दुप्यन्तके समान रसिक हमें अवश्य कहेगा कि 'इन्द्रियै चितोऽसि' । आज हम शिक्षाका मादर्श और शिक्षाकी प्रणालीमें परिवर्तन करमा पाहते है । पाश्चात्य मापको गुरु-स्थानमें रसार भूस गुष्टिसे संसहस-साहित्यकी खोज करना हम नहीं पाहते। हम अपने प्राचीन कषिर्योके समीप शिष्य-भाष में समिपाणी होकर पाना चाहते हैं । मास्तिक विज्ञासासे मुनस प्रान करना चाहत है । जैसे अवसर पर संसास-साहिस्पके विपयमें यह जान सेना परमावस्या है, जो हमारे बुस कषि

पत्रकारकीदीमा
१.
सम्राटने, जिसके सिमे हम अभिमान है, महा है।'
पत्रकारको होला
कमी साल हमे देश-विदेशके भववार में दिलचस्पीके
साप पड़ता था । पत्रकारसे कार्य और कर्तव्यके विपयमें
सोचता माया हूँ। गर्ममय बादके राष्ट्रीय आन्दोसनमें पहले
महाराष्ट्र के मेक स्थानीय साप्ताहिक पत्रके साप और बादमें
मेष दैनिक पत्रके साप मैने बरयस्त निकटका सबध रखा था।
मिस मस्तकी जनजागृति बोर बास्मटिके आन्दोसनमें भी
'नवनीवन' से पत्रके साप मेरा अपना ही निकटका समन्म
हो गया। मौर अगर जैसा कई कि ग्रिन वो मान्योसोंक
बोधके सम्बे अरसेमें विधार मौर फरमका ब्रह्मचर्य-पासन भी
मैने दिया था, वो असमें अविायोपित न होगी । मिस तरह
कहा पा सकता है कि पत्रकार परिपत्रे समक्ष अपने विचार
रम्बनेका जितना बपिफार मैने प्राप्त किया है। सेफिन यह भी
सही है कि बाजार पसार म्यवसायका पो माद बन
रहा है भुमको दृप्टिन सामने रखते हमे मिस पपके लिये
मावश्यक योग्यता बपने सानेकी पिन्छा पिसी दिन मेरे
मनमें पैदा न हुमी । मुझे पहले से ही भैसा फगता आया है रि
पत्रकारको अपेक्षा शिक्षामाम्बीका कार्य अधिक अपयोगी है।
पिसमिये पमकारके सिये आवश्यक योग्यता ममम मायी ही
महीं । पत्रमारक रिपे बावस्यक मेक गुण ही यह मुझे निवष
मिलने की प्ररणा देता है। पत्रकार प्रधानतया विचार-प्रचारक
होता है । विषारखा प्रपारपरनेकी विचार 'गोरकॉस्ट' परने
को पुत्ति कहिये या यार कहिय-पत्रकारमें जितनी होती है
मुवमी पायद ही फिमो पूसरेमे दागी । धर्मोपदाक और
योग रवीमरे 'माबोन साहित्य गुमराती मवाली
।

बीवन-सामिप अध्यापक भी मह वृत्ति न्यूनाधिक मात्रामें जरूर होती है। वास्तवमें देखा माय तो मर्मोपदेशक पत्रकार और शिक्षा शास्त्री तीनोंका कार्य लगभग मेकसा ही है। सोयी हुधी जनता अब पागना चाहती है मुस वक्त तो पत्रकारके पदको असाधारण महत्व और खुसरदायित्व प्राप्त होता है । पत्रकार यानी लोक- शिक्षाका बापार्य ब्राह्मणोंका ब्राह्मण मोर चारगोंका बारम है ! पमता बम यमुस्म हो जाती है सब की बार पत्रकारको सैनिक मौर सेनापति भी बनना पड़ता है और अच्छी तरह मात्रधर्मकी भी तालीम सेनी परती है वहां-वहा अन्याय होता हो पहा-यहाँ दीन-पुर्षस और मूक वर्गोपर जुल्मो-सिवम वाया पासा हो वहां-वहाँ सतास्किल वाय' के अपने विस्यका स्म रण कर पत्रकार पूर्व पड़ता है। पर बैस अवसर नहीं होते तब विचार, गानकारी सस्कार अभिरुचि बौर पापोंकी प्या पराकर वह ममामसेवक धम भाता है । यमान या बदूर वृष्टिके कारण लोग यहाँ सस्ते होगे वहाँ 'शानाजनगमाया' मोगोंकी दृष्टिको सुन करनेकी यह कोशिश करता है । समाष पाके पहिये पर अपना अपराग भूलकर चीत्कार करने एगते है तब अचित स्थानपर स्नेह गमकर वह अस पर्पणको दूर करता है और सब-यय सरकार-दरबारसे मौके वाते है तबतब वह जमताका प्रतिनिधि वनकरफोकमतको कपारा बनाकर सोक- सक्तिको सचेत करता है। जिस तरह छोकसेवा लोकप्रति निषि सरोकनायक और सोकगुरकी चतुर्विष अपाघि पत्रकार प्राप्त कर सकता है। माजकसके वैश्ययुगमें पत्रकारका अक और ही बावर्न मन रहा है मौर वह शिष्टसम्मत भी हो रहा है। हमारे सामने मौनी बातें मत किया करो हम सिर्फ स्पबहार बामसे है बावकि सारम्बरमें गानेकोलोसि मत कहो मध्यम मा मन्द स्परमें जो कुछ गवाना हो वही गानेको महो हमसे साप या वीर वमनेनी अपेक्षा मत रसो बस्कि हमें वैसी ही बातें मुमायो २९ । यो नफा चौर नुकसानका हिसाब करनेवाले मुटुवीको पसन्द मायें मा अनुकूम हो । दुनिया हमारी है । वोर और साधु रोग समारके सिमे घोमास्प तो है लेकिन बह पगडी नहीं मस्कि मुसकी किमारीपर की ही पच्चीकारीकी सरह है। मिस मादर्मको स्मोकार करनेवासे लोग कहते हैं पत्रकारको अपने भावका मान पर्व ही झूचा नहीं रखना चाहिये । भोग यो कुछ चाहते हैं मुसे मुहम्पा करना ही पत्रकारका बाद होना चाहिये । होगा हम कोमी विधागुरुतो हैं महीं कि अम्हंमार पीट करपड़ा।हमतोलोगोंके विषमतगार है । पाहकोंको विस मालको स्रत होगी यह देकर मुन्हें दूर रखना ही दुकान दारका भाव है। गायकका बार तो यही है कि राजा को गग पाहे वह बुसका रमन करे । लोग हमारे शिष्य नहीं सेठ है। पो सेठको सित्वावन देने बाप बह नौकर पैसा ? प्राइक को जोधर्मशास्त्र या सयम सिसाने एगे बह दुकानदार पैसा? यहांतक मागपे तो फिर जैसी इमानदारीका मान मागे पसता है । दूकानदार मिस बातका बयास हमेशा महीं करता सिपाहकको कौनसा माल वाहिये । बल्कि वह तो भिसी बात माध्यान रखता है कि सपने पास पड़ा हुआ मास ग्राहकका से आवश्यक मालूम हो। यह अपने ग्राहकको सेठ माननेके मगाय धिकार मानता है और दुनियाको नीचे बोचता है। मुत्तर भारत में मार मा पर रहा है की पत्रकार मालिस सहाई-समरे के पास बने है । मुम्हाने निराके धारावसाने सोते हैं, राष्ट्रीय भापति तथा साम्प्रदायिक गएवफहमिर्योकी पूनीपर बह सिगा रख करना चाहते हैं। सोमपामें जिस तरह गांवका वरवादी बेक प्रपान पात्र होताहे अमी तरह यह परमार-ममायने महा पिगुन बनकर विपरते हैं। पसपियरक आयागोने प्रॉपस्लो और रसिम्मानाकीमो हामत पर रालो भी यही हामत योग मिस माते राष्ट्रपी करनेको तैयार हो गये हैं। फर्क मिनाही है फिजापागो भपने पपेरा स्वस्स मोर परिणाम भसी-नीति

बौवन-साहित्य
बामता पा मोर वानपूसकर बदमाशी करता पा । मिन सबकी
स्पिति वैसी महीं है। यह यमागे भामी स्पर्य ही विकारमत्त
हमे है मौर यादयके (पापसी प्रणामी ) यादोंका मनु-
करण कर रहे है।
पत्रकारकी वृत्ति वैसी सोपगाछी नहीं होमी पाहिये कि
जो कुछ मामूम हुआ पाहिर कर दिया । अच्छे सानदानके
मनुष्यके पेट में की थी रहती है। किम कुछ बातोंमें वह
होठ तक नहीं हिलाता । पत्रकारको कार्यामन्द सोगमा चाहिये
म कि भावानन्दा । वरना कसमकी पटेवागी मे गार सुरू हो
गयी तो फिर सारी दुनियाका सहार हो जायगा। पिसायत
तो अब आन्दोसनों बौर पर्षा-विपर्योका बकाल पर पाता है
तय पत्रकार ओक दूसरेके सिताफ अमन टीका कर मेक-दूसरे
पर भीमित रहते है। मिशुको भिक्षुक दृष्ट्वा श्वानबत्
गुर्मुरायते "
२
यमगार प्रमानसया वृत्तपत्र होता है। जनता के छामका
मिपार करके सारी दुनियाकी खबरें देना पत्रकारका प्रपम
कर्तब्य है । लेकिन मिस पारेमें और मत्यम्त महत्त्वके बारेमें
हमें बोरोंकी बाँससि देखना पड़ता है। मांक मिस पह
सरफारसे ही मिल सकते है अस त जानकारी तो 'रॉयटर'
मा बेसोसिमेटेर प्रेस से ही मिल सकती है। यह अपनी ही
दृप्टिसे महत्त्वकी पदरें हमें दे देते हैं मोर धीरे-धीरे किस
मस्तुको कितना महत्त्व देना किस सवासको किस दृष्टिसे पेक्ष
करना मादि विपर्योमें अपनी दृष्टि हमारे अपर लादते हैं।
शिक्षा भौर साहित्यकी सरह वृत्तविवेचन में (जर्मसिम्म) भी
हम विदेशियोंकि समुपापी हो गये हैं। उसके कारण पायी हुमी
पर प्रत्यय-मेय-धि (सप मेम्टैमिटी) अभी नहीं गयी है।
माग हमारे यहाँ अनेक पक्ष बम गये है मौर विचार प्रगति
महीं हो रही है। मिसमें मिस पर प्रत्ययो भवमबनका कम

पत्रकारीवीमा हाप नहीं है। मौर माश्चर्य यह है कि स्देष मेन्टलिटीके लिलाफ मावान सभी वुमन्द करते हैं । वृत्तविवेचनका मूल मापार विश्वासपात्र लबरें हैं । असका तंत्र हमने बनाया ही नहीं है। बुनियादमें ही परावलवम पब मैने अग्रेसी पढ़ना शुरू किया तव पार पानेमें 'टामिम्स आफ मिरिया' मिलता पा जिसे पड़ने की मैं कोशिपा करता पा। हिन्दुस्तानकी सभी सवरें पढ़ पानेके बाद मुझे औसा लगता कि या हिन्दुस्तानमें सिर्फ अग्रेस ही रहत हागे ? पोंकि सरकारी अधिकारियों और गोरोंक सागनिक और सामाविक बोवनकी लबरें ही अस म्यादातर माती भी। मारपीट और हादसषि निकमाते सभी मासूम पड़ता कि गोरी सड़क मोपे नेरिव सोगों का मासा समुद्र भी है। जिसमें आश्चर्यजनक या अनुमित बैसा पुछ भी महीं कि मंग्रेजी अन्नवार यही गायें दमे को गोरों की दृष्टिो महत्वकी हों । मगर हम मपना जीवन विकसित करमा पाहते हो तो हमें अपनी निमी इप्सेि जानकारी देनी चाहिए। मानम होता है कि पगारी मोगाने यह कहा कुछ-कुछ सीख अपने वृत्तविवेघनमें हम मप्रेमी पड़ी हमी दुनियाका ही सयार रखते है सरकार और अममी परसूत विदेशके साप का प्यापार अपनी शिक्षा अदालते विद्वानोका साहित्य मौर पो-ससे वर्ग सुख-दुल यही हमार वृत्तचिवपना प्रमुख विपय हासे हैं। हिन्दुस्तानकी जनता हिन्दुस्तानकी का मौर कारीगर, पिमानापा भीषन गांवोंकी स्पिति घमप्रपार, गरीबोंका गृहीवन परिगणित पातियोंगी मापने मादि राष्ट्रीय जीवन के प्रधान प्रश्नोंको मावस्यफ प्रमानता हम देते ही नहीं । स्पानोप वृत्तपत्रका धेष भी मन्टा नमूना हमारे सामने नहीं है। हमार संवाददाता देहासोम गात ही नहीं। गास्तवमें हासत तो भैमी होनी चाहिपे कि प्रत्या वृत्तपत्र माया- के निवासियों से ममभाववारे कुछ सवाददाता पोये बस ४२ पौष माझिम इसाकी धीरजके साम शिक्षा दे और ग्रामीण जीवनकी पर्चा विमचस्पी है। जिस तरह हमारी समामि शहरवासी पुच्चा सनपर बैठते हैं और बेचारे ग्रामप्रतिनिधि वपनी स्वाभानित विनम धारण कर दूर कोमेमें किसी जगह बैठ पाते हैं उस तर बसमारोंमें भी मोकजीवनको काप कोना ही मिस माता। बौर यह भी हमेशा नहीं मिलता। भब भी जन जागे तभी सवेरा' समझकर किसानों गुसाह कारीगरों मजदूरों स्त्रियों और बसोकी स्पितिका महत समझकर मुनकी पुर्वशा दूर करनेके मिये बुन्हें तैयार करमेक दृष्टिसे अनके सवालोंकी वरफ प्यान देनेका वा पत्रकारोंक लेना चाहिये । मबतक समाजसुधार और धर्मसंस्करण से महत्त्तके विपयोंका विवेचन भी हमने मध्यम श्रेणीकी दृष्टिसे ही किया है। यह दुचकी बात है। वैसे-वैसे पत्रकार प्रामीण जीवमके विषय में अधिकाधिक छिमते बायमे वैसे-वैसे प्रपारकों मुपदेशकों नेवाओं और कटनीतिक लिये गांर्वोपी मुलाकात सेना सारिमी होगा। सेकिन बैसा होनेके सिये पत्रकारोंक सेन स्पानीय रगसे रमे हमे होने चाहिमें । अममें स्थानीय सम्पयन और स्थानीय समभाष पूरी तरह होने चाहिये । 'सम्पादकमी मगरसे मिचे एजे गोसमोस सामान्य सिद्धान्तसि काम म घलेगा। अच्छी तैयारीने साष अगर बिस दिशामें प्रयत्न होने लगे वो यह व्यवहार पारेका नहीं साबित हो सकता जैसे मेमा लिखकर कि जिन्हें पढ़कर मोगोंको मजा आये और शिक्षा- शून्य मनोरमन हो, कुछ पत्रकारोंने पाठकवर्गकी अभिवपि विगार री है । बरना असे वृत्त- विपनको जिसमें पनतारे हितकी पर्यामी गयी है बावश्यक पारिममिप दिये विना अमवा न रहेगी। पिर असगार जप भरमेगा पंमा सो हरगिन नही वमना चाहिये । जिन्साफकी लातिर, भर्ममी सातिर, कोक- पम्याणपीसातिर लोकमतके खिलाफ जाना पत्रकार पत्रकारको दीक्षा लिये मुषित होता है । विदेशियोंकि बुल्मका वर्णन और मुसका निषेप लोकप्रिय हो सकता है लेकिन अगर हम सामाजिक मन्यार्यों और पुरीतियोकि मिलाफ बरे हो जाये तो लोग पिढ़ भी बाते हैं । सुशामदके बादि पाठक और ऐक्षक औसा बीसम क्यों करने पसे ? किसी महान् प्रमायके सिसाफ अभिमन्यु पैसा मोभी वीर अकाकी मसहाय लड़ता हो तो पत्रकारको असभी बगसमें सग रहना ही पहिये । प्रतिष्ठाकी गाति बहुत बार सुयोग्य किन्तु प्रतिष्ठारहित मनुष्यको दवाकर रखनेको दूर कोशिश करती है। पत्रकार अगर हिम्मतवाम होगा तो वह प्रतिष्ठाकी भातिको वोरकर भी पोग्पताका पुरस्कार करेगा। मोबात व्यक्सिमी वही संस्थार्मोकी। देशमैं काम करनेवाली संस्मामोंके स्वस्पनी मामारी प्राप्त करक मुसका परिचय फोगोंको करामा और संस्था सुम्तन बर्ने अिसलिये शुनपर पहरा देते रहना पत्रकारका सास पर्सम्य है। देष्टमें मिसना प्रत्यक्ष सार्वजनिक कार्य होता है भुसमें सहायक होना मिसीमें गुप्तविवेपनाके सभी फर्म समा जाते हैं। वृत्तिविवेचन मगर यह फर्ष मण्डी सरह भवा करे तो असकी पाक्ति मितनी या माती है कि जिस तरह सरकारें मार विद्यापीठ योम्पताके लिये अपापियाँ देते है अम तरह मसमार भी कर सकता है। फिर असी होममान्यताके आगे रायमान्यता हुन्छ हो पाती है। दोषी मी विद्यास और नया सवास हायमें सेना हो तो पहले मासिक पत्रिकासे सुसका विवेचन करें मोर यादौ साप्ताहिक पम मुसे हायमें सेस । बैंसा करनेसे विपप टे रास्ते मही बावा मौर काम भी नहीं बिगरसा । दैनिक पाकि स्पेि मिसनी मर्यादा मावश्या है कि यो माम्दोलन घस रहा होगा सके पारेमें ही पे लिखें। हमारे यहाँ दैनिक वृत्तपनोंका सपावकर्मात विद्यास महों हमा करता । बहुत बार राणा प्रधान, सेनापति सभी प्रमही होते है । रोग मुकर मेसपर मेव तो बनने ही पड़ता है। जैसी बीवन-साहित्य हाम्तमें भमर समानको कमा साना परोसा गया सो आन्दो- छनमें मार मैव निकलेगा । हमारे यहाँ विधाम्यासंगी सोर्गाने नियमित स्म से असबारोंकी मदद करनेका रिवान अभी तक ठीक ढंगसे प्रचलित महीं किया है । पर मेक यसमारके पीछे भिन्न भिन्न क्षेत्रोंमें विशेष योम्पसा रसनेगार मोगाँका अंक बड़ा माछ होगा और असकी निरपेक्ष सेवा ससत मिलती रहेगी तभी हमारा वृत्तविवेचन पुस्ता बौर समृर होगा। मिस आक्षेपके सिलाफ रेखा जैसी ववील पेश कर सकते है कि पत्रकारों में विद्वान् बोके बमनको माम देनेकी वृत्ति है ही कहा कि अन्हें हम सलाह दे ? असलमें देसा माय तो सलाहकार या परामदाता आग्रही सास बन पाय तो उससे काम म पछेगा और यह भी वस्ति नहीं किमा जा सकता कि पत्रकार परितम्मन्य वर्ने । हमारा सामाजिक जीवन सराब हो गया है और वही हाम्त हमारे सार्वजनिक भीवनकी भी हमी है। संघशक्तिसे काम करनेके नियम अभी हमारे गले महीं अवरे हैं। नीसिके बम्मन शिक्षित करनेमें अभिरुचिके अन्च आदचौको गिरानेमें बीर हर प्रकारके समय या स्वैराचारकोश करमेमें अब तक अचवारोंने कोली कसर नहीं रखी है। यहाँ देखिये नये अमबार शुरू होते है पोडासा जीवनकलह चलाते हैं और प्रेग्युबेटों (स्नातकों) के बिचाव्यासंग पी सह पोरे ही बिनामें व पाते हैं। फिर सारा मुत्साह पक्षापक्षी या गुटपदियों में ही रह जाता है । स्वतत्र मौलिक कल्पमामोंका मकाम होनेपर भी प्रतिमाका दावा करनेवाला पायरी साहित्य मिवना कुछ बढ़ गया है कि मव साहित्य-सरसक-मंजसकी स्थापना करनेका समय मा पहुँचा है। ३ पत्रकार दो प्रकारके होते हैं। कुछ तो ये है जो अपने पन द्वारा जितनी वाडमयीन सेगा होती है अतनेस सन्ताप मानकर बैठणाम है। मठीलाठमोप, रामामम्द पट्टोपाम्यायधीर नटराजन पत्रकारही दीक्षा मिस वर्गके ममूने समझे पा सकते हैं । पूसरे बह है जो मममी देशकार्य करते समय मपने विचारोंको प्रकट करनेके सापनके वारपर असवार पहाते हैं। गांधीगी देशबन्ध,सासासामपतराय सोकमान्य तिरुम मादि मिस वर्गक प्रतिनिधि है । प्रपम वर्गके पत्रकार विविधताके अपासक होते हैं। प्रत्येमा पुछ-न-कुछ प्रमुख विषय होने पर भी यह सर्वांगी विचार-प्रचारफ हिमायती हमा करते हैं। दूसरे वर्गके लोग कार्य-परायण होनेमे यहाँ तक हो सके काग्रता काना चाहते हैं। दोनोंका उपयोग तो है लेकिन भिन दो मादप्तौकी मिसावट करना उचित नहीं है। प्रथम वर्गके पत्रकार अगर पाहें तो अपने ममबारको समतिका केन्द्र बनाकर अक सम्प्रपाय या बसमान वैयार कर सकते है। पुराने जमानेमें गो फाम मन्दिर करते थे मुसी काम तक पत्रकार मपने पत्रको बढ़ा सकता है । दूसरे के पत्रकार देवसेवकोकी अगि सेना तैयार कर सकते हैं। पत्रकाका तीसरा अंक बर्य है-सनस्वाहके लातिर पाहे जिस मतका प्रभारफरजेवालाका । यमेरिकम मीपोक मक स्कूममें अक शिक्षाको मौकरी पर रखते समय विद्यापियों मावापों ने युसे पूछा मा 'क्या तुम पुप्पी गोस है असा सिखायोगे या मौकोर है जैसा ?' असने मार दिया जिसमें या दूसरी पिसी भी बातमें मेरा निजी तमिल भी मारह मही है, आपकी टाभुन कौन्सिस पहुमतसे मो कुछ निश्चित करेगी सो पढ़ाने के सिय में तैयार हूँ। वैसे मोगोंके हार्यों क्या समाजसबा होती होगी सो भयबाम ही मानें। पत्रकार मसाना मेर मया वर्ग समानमें पैदा होनेसी जरूरत है। अपने-अपने विपयर्मे या सर्व बा-चोप्रति पप्स यही हो मो साहित्य हुमा हो नये-मये आविणार इसे हो निणय पिये गये हों बाद पैदा हमे हो नये-नय नमूनाफा पम हुमा हो मुन सबका वापिप संग्रह (धम्मकोप) करमेरा काम किसीको अपने सिरपर सेना चाहिये । सामाजिक जीवनके बाबा-साहित्य कबी भुपांग पर मैसे हैं जिनके लिये साप्ताहिक सो क्या, स्वतंत्र मासिक पत्रिका भी नहीं बसायी पा सकती, मगर फिर भी पिनकी पानकारी मामुषी बसमारोंमें यदृच्या आ भाप और बिसरी हुमी पड़ी रहे यह नहीं हो सकता। यदि कोमी 'गापिकपसाता हो तो कुछ छोग अपने विषयकी सामग्री उसके पास अवश्य भेष दें। साहित्यचर्चा करमेनासी महीं किन्तु नये पुराने सभी प्रकारके प्रपोंका समिप्त परिचय करानेवाली बेकाम मासिक- पत्रिकाके सिये हमारी मापामें अवश्य स्पान है । विस तहकी मासिक पत्रिका विद्यापिर्यो और माम फोर्गो सिये बहुत ही कीमती साबित होगी और साहित्यका मितिहास मिसनेमें तो असकी सेनाका मूल्य माकना मुशिम ही है । यह तो बहुत मोग जानते है कि मेगिनीकी साहित्यसेवा जैसे प्रयत्नसे ही सुम्मी पी। जैसा कुछ नहीं है कि बैसी पत्रिकाोंमें सिर्फ अपनी भाषाके साहित्यका ही परिचय माय । हिन्दुस्तानके दूसरे साहित्पोंको भी युचित मात्रामें स्पान दिया जा सकता है। सामाम्य पाठक बगर बनवार और मासिक पत्रिका गाहर पाते है सो मुपन्यासोंमें मुतरनेके सिपे ही । जिस तरहकी हालत बपतक अपने वेसमें हेयतक सारी दुनियाको जानकारी घुसके पूर्वापर-सम्बन्धके साथ देनेका प्रवष सोकशिक्षाकी दृष्टिसे मस्यम्स मावश्यक है। दुनिया कहाँ-कहाँ फैली ही है रहो क्या-क्या पाया है प्रस्पेक देशका सदर्द क्या है, दुनिया कहाँ तक आ पहुंची है मिसका सयाल हमारे मोर्गोको होना ही पाहिय । बिसमै भी हम बरी हवतक परावरूदी रहेंगे ही। यह मपरिहार्य है। फिर भी मपनी दृष्टिसे प्रत्येक वस्तुको मात्रा मौर महत्व मिपषस कर लोकशिक्षाका काम शुरु तो करना ही चाहिप । यह मावपर्यसी ही बात है कि हमारे देश हमारा वृत्त विवेचन ग्यावावर अंग्रेजीमें ही बसता है। समर्म मेसक अप्रेमी पत्रकारकी बीमा की मोर ही दौड़ते है मौर मिनरे सिये यह सारा प्रचार बल पहा है मुस बनताको भिसके फलसे वंचित रहना पाता है यह कितनी धर्म की बात है ! मिस धर्मकी तरफ हमारा ध्यान नहीं पाता । मगर माम मीषा भी जाता है तो सन्त्री वात गसे नहीं मुतरती जिससे मपिक दयनीय स्पिति और क्या हो सकती है? प्रारेतिक भापायोंमें पो भसवार परत है खुनये पीछे वैयारियां बहुत-ही कम होती है । कहा जा सकता है कि पत्र- कारो रिपे यापेठ बावामा बानकारी समन भाये मैसे रूपमें जिनमें दी हो जैसी फिवा हमारी भापामें है ही नहीं। मिडियन मिपर मुक' 'मम्पयस रजिस्टर' इमिन ई पिमर्स सामिक्सोपीडिया' 'कमरियस बैटास' हेग्युक आफममधियक मिम्फर्मपान' यादि सर्वोपयोगी सादी किताब भी देगी भापामों- में मभी तक तैयार नहीं हुमी हैं। मिससिये तपा मुषित बप्प यमक अभाव, देशी पत्रिका अपनी पत्रिकाओंबी बल नफरू- जैसा बन गयी है। वृत्तरिवेषनपर बीनेवाला और वृत्तपिवेपनको पोषण देने का टॉप करनेवासा येक मयार रोप है विद्यापन' । सार्व- मनिक मीविको प्रप्ट करनेवाली मौर कौटुबिक मर्यशास्त्रको तो रासनेवारी यह दुराधी जितनी फेम गयी है कि 'नव- गोवन' द्वारा गोपीयने मुसका जो मिटमा सत और सत्रिम निरोप किया है असका पुछ भी असर दूसरे पखवारों पर परा हुमा दिपामी मही देवा । अब मैं अखबारोंपर मितने ही विना- पन देखता हूँ सब मनमें विचार पाता है क्या प्रमु-रोगाके सिये गोभी मुत्तम देवमन्दिर बनाकर बादमें मुसमाप घराने के लिये उसके महातेके कमरे घरापवानों मौर बेश्यार्मोको किरायेपर दमे जैसा ही यह काम नहीं है? परकारमा म्यवसाय या वृत्तविवेचन अपने माया है। जिस तरह बच्चे अपना पारिभ्य ४ बाबा-साहित्य तक मांबाप या गुस्का मनुकरण करते हैं अस सरह हमने अप सक विलायती 'जर्नकिग्म का अनुकरण किया । अमेरिकन डंग दानित करनेकी भी कोशिश शुरू हो गयी है । क्या अभीतक अनुकरणका समाना पूरा नहीं हा? क्या स्वतंत्र म्यक्तित्व लाने पैसा हमारे राष्टमें कुछ है ही नहीं ? अगर हमारे पास सांस्कारिक व्यक्तित्व है बगर हममें अस्मिता बागृत ही है तो मुसे पहषामनेका असे विकसित करनेका ओर प्रकट करने का समय क्या अब नहीं आया है हमारा सवाल सिर्फ राज नैतिक नहीं है मगर बह सिर्फ राजनैतिक होता सो वह कभीका सुरूम गया होता । जिस तरह दुनियाके सगभग सभी धर्म अिस बेशमें भिकट्ठे हो गये है घुस तर इनियाके मगभग सभी समास विस देशमें भिमटठे होने लगे है हो गये हैं। अभी कुछ बाकी के होंगे तो वह मी वा पानेवाले है। चारों तरफ से पानीपी बार बानेपर पेपन और परेशाम हुसे सोग जिस तरह डूंची-से-धूपी जगह खोजते है अशी तरह दुनियाके समी सबाल मर्म-धर्मके बीचके षावि-यातिके बीच सामा रिक मार्षिक शिक्षासबंधी सभी सवाल जिस देशमें बिक्ढे होने लगे हैं और अनकी पर्चा करनेका कर्तम्प पप्रकार के सिर पर मा पड़ा है । औसा तो है नही कि जो पत्रकार हुआ वह विचारक भी हो गया सेमिम असे हर सवालका स्वरूप और गांभीर्य ठीक-ठीक समाप्तो लेना ही चाहिये और श्रेष्ठ विचारको ने अनके लिये क्या-क्या बुपाम समाये है या प्रयुस किये है सुनको सूदमतासे अध्ययन करनेके वाय पाशक्ति यथामति, अन्हें देश के सामने पेश करमा पाहिये । हमारे जीवनमें गौर मितिहासमें धर्ममें मौर समाग रचनामें असी विद्यार्मे क्या-पा अपयोगी है मिसी पांच-पड़ताल करक खुसे दुनियाके सामने रसना सुनका काम है। यह मातमासान नहीं है। दीर्ष बम्पयनसे मनुष्य मित्ता आ पायगी, मेकिन सुर मौर भुन पीबनके विना दिव्य दृष्टि

जीवविकासी संपठन
मौर अडिग धवा महीं मानी। आजका जमाना ही असा है कि
बितना मुमकिन हो चढ़ पानेकी आवश्यकता है। पैतान रूग
भग सिरपर सवार हो चुका है। उस परास्त करनेके सिमे देव
सेनाके सग्य होनेकी मावस्यकता है। जैसे घिस अवसरपर
पत्रमारीक सामने भार क बड़ा सवास है कि कौनसा
काम करें?
महमराबार पत्रकार परिषर
नबर १९२४
सीवन विकासी सगठन
माजकलका कोसी भी मनुष्य मीनिय असे स्वाभाविक रूप
से ही मदरसे मसा लगता है कि हम सब किसी नये जमानेका
नये युगका नमे जीवनक्रमका प्रारम्भ कर रहे हैं। हम भल ही
मैसा कहते माये हो कि भारतवर्ष मेक है मौर हमारी सांस
तिक बेक्ता मुस्प-मुस्प मामि सप्ट स्पसे भसही दिसामी
देती हो फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि वाजतक हम
छोटे-बड़े गिरोहोंमें ही रहते आये हैं। विविधता बनता'
हमारी ससातिमी वासियत है। सक्नि हमने ता विविधताको
मनेरमा फैमने दिया और मेका साना लगभम भूस ही मये ।
बिसमिय समाजमें यरुने होते हु भी हम ममगार सारित
हमे । और हम सबका रहन-सहम तपा विचारप्रणाली मेम-सी
होवे हमें भी हम छिन्न-भिन्न हो गय ।
मुस्यो स मृत्युमाप्नोति प मिह नानेव पम्पति ।
हमारे पितरफ पिता यमरामने कभीकामहरिया है कि
पोक्ति मपने जीवनमें रेवस विविधतारे ही पीछ पाता है
वह जीवन के गरे बाप बेक क्षेत्रमें मृत्यु के क्षयक शिपमें
पैस जाता है। भगवान् वीरप्णने गीता भी कहा है कि वो
मानमेदभावको पोपण देता है और विधिपताको ही पहचानता
है वह समागरी प्रपतिको रोक रहता है। फिर कुछ सोग सो

मस्तुर्मोका तारतम्य न मानकर हर कांगी बस्तुर्मोको ही सर्वस्व मानकर नासमझदारी करने लगते हैं। जैसे लोग समाजको मधिकाधिक नीचे ले जाते है । बो मोगकही प्रान्तको सारा देश मामते है संस्कृतिके किसी वेक अगको ही जीवनसर्वस समझने मगते हैं वह अपनी शक्तिका बुषित मपयोग नहीं कर सकते । किसी गारीके सभी हिस्से-पुरखे साबुत है, मेकिन अगर बह अपनी-अपमी जगहोंसे सिसक गये हों या टीले पर गमे हों तो यह गाड़ी भसा से यात्रा कर सकेगी? अक जमाना पा पव वेदोपासना सस्कतमिधा भमितमार्ग बिरक्ति मादि महान् सस्पोंके बसपर हम सांस्कृतिक अकता प्रस्थापित कर सके । मकिन जैसे-जैसे युगोकर्ष होता गाता है बैसे-वैसे यह मावश्यक प्रतीत होता है कि समन्वयकारी तत्व अधिकाधिक व्यापक बनें। परशुरामके समय बाह्मण-संगठन या पात्रिय-समठम स्वाभाविक होगा बेवकासमें बार्य-संगठन महत्वका हो गया होगा छत्रपति शिवाजी महाराज या राणा प्रतापके समयमें हिन्दुसगठम अनिवार्य हुआ होगा लेकिन बाब सो विसमें दोषी भक महीं कि भारतीय संगठन ही मेक- मात्र युगमर्म है। जिस सरहका संगठन अलग-अलग क्षेत्रो कबका शुरू हो दुका है ! अखिल भारतीय संस्पार्ने तपा प्रवृत्तियाँ देशम स्पान- स्पानपर दिसाषी देवी है। शिक्षा और साहित्य के बारे में तो प्रस्पेक प्रान्त बेकाकी बन कर सिर्फ़ मपना ही विचार करता माया है। प्रान्तों सिहावसे शिक्षामा मरग अलग प्रबन्ध हुमा सरकारी विद्यापीठोंकी स्थापना हुमी। मिन युनिसिटिनि भारतीय सपा प्राम्तीय जीवन मार संस्कृतिको कितना प्रापान्य दिया है यह तो हम देखते ही है। अगर वैसा कहा माय कि साहित्यक गारे में यहाँ संगठन जैसा पुण्नहीं है ता भुसमें कोत्री गलती म होगी । साहित्यको

बीवविकाही संपठन
मेक ही रस्सीसे बांधना पासान नहीं । साहित्यका मुंह वद
करना सहम होता है लेकिन प्रौर-साहित्य रघन जैसी पीम
बर्दाश्त नहीं कर सकता। किसी भी सत्रकी वाल्यापस्थामें
ही बुसके मूपर पराया अंकुश टिक सकता है।
साहित्यमें कितनी शक्ति है जिसकी अधिकाधिक प्रतीति
मनुष्य-जातिको होसी जा रही है। साहित्य बेक प्रकारका
पैतम्य है सामाजिक सेज है संकल्पकी अमोप शक्तिकी
सहायतासे मनुप्प पाहे जो भसा-युरा परिणाम निश्चित रूपसे
ला सकता है । सकिन यह वापारी सलवार है। यह क रसायन
होनेके कारण जो गोमी मिस हमम करेगा मुसे यह अजरामर
मनायेगा सेकिन मगर मिसका दुरुपयोग किया जाय तो यह
समूह बुझ्छेद किये बिना न रहेगा। और समय था जब लोग
साहित्यका बुपयोग मोक्षसापनके लिए करते ५ ।आगे धमकर
सत्ताधारी भौर पैसेवासे लोगों मनोविनोदके लिये साहित्यका
मुपयोग होने सपा । मिस जमानेक सम्बन्धमें देशनिकालेकी
सरा पाये हमे मेक पर्मन यहूदी सेसफने कहा है-
"यह समय साहित्यकमाके लिये या साहित्यकारोंके सिपे
या कटिम पा । समाजमें यह विचार दृढ़ हो गया पाकि
साहित्यकारके मानी है भरमें पासने योग्य बेर गुणीजन ।
प्रत्यक्ष जीवनके साप मुसका कोली सम्बन्ध न रहता था।
साहित्यकार पर हो या सम्तुप्ट, दोनों गाते अकसी । मुसके
हपियार हवाम किये गये फापर या घुमाये हुआ पट्टेको वए पे।
साहित्य विनोदका मेक भुतप्ट सापन समतावातापा। मिससे
मषिक प्रतिष्ठा मुसकी न पी।
मौर साहित्यकार मो मेण्यात भूत गप किसिफ शरदको यस
या पानावैभव सुनके पपेरे लिए काफी नहीं है बुसक मिसे
पारिम्पको मावश्यकता है। साहित्यकलाधर यह भूल गया
कि मुस-सुस समय सोगोंकी जो अभिरपि हा हो गयी हो अम
का पोपन या मुसको सिदमत करना धर्म महीं बलि मुम्प

यह धर्म मेनदेन करते कमी न हिचकिचायगा।जीनेके मानी ही है लेनदेन करना। बो देता और लेता है खुसपर वह जीवन देवता प्रसन्न होता है। 'ददाति प्रतिगृह्मति नाम्यपा प्रसीवति लेकिन देके मानी गुलार्मोको तर चुगी-कर, या युममिके तौर पर देना नहीं हैं, और सेनेके मानी मी फेंके हम टुको भिसारी की तरह झुठाना नहीं है। दुनिया समानमारसे सबक साप बराबरीके पक्तिकी तर एनेकी करा मानी पाहिये । यह साम्पयोग साधनके लिये ही मापसी सहमारकी कमा हस्तगत करनेकी बावश्यकता है। हमारे देद्यमे प्रत्येक प्रास्तकी कुम्न कुछ खासियत होती ही है। प्रान्तीय भेद स्पष्ट दिखायी देते हैं मैकिन सस्कृति सो प्रान्तकि मनुसार असग-ममग महीं हुआ करती । संगीतके किसी समय और संपूर्ण रागमें मिस तरह खारोही बीर अवरोही स्वरेमि भिन्नता होती है खुसी तहकी भिन्नता हमारे विविष प्रान्तों सपा सुनके ममग-अलग वर्गों जिस समय राष्ट्रका प्रारमविश्वास बिस्कुम मुझ गया पा असमें किसी तरहकी हिम्मत नहीं बनी मी अस समय कुछ सोग विवेशियोंका केवल अनुकरण करनेका अपदेश देने सगे बोर कुछ सुना विरोध करके कहने लगे कि पुराने मुर्वोको मसाले में दककर, खुनी ममी बनाकर मुनकी पूजा करनी चाहिये । हमारे यहाँ यह भगा परसोंतक पमा मेकिन बादमें सच्ची पागृतिका अपय होते ही पुरानी पूजीपर बीनेरी या रिम्य में पैर होकर मिसनेमामी विदेशी खूराकयर गुजारा गलामेकी बिसनुस बाबश्यकता नहीं रही। अपनी जमीनको परमा तपा नाहरका साद देकर मयी फसल तैयार करमा यसरी है यह बात बात- मद मोगोंके मनमें बैठ गयी । फप्टपूर्वक बमीनको पोवार ताजी फसम सेनेसे ही राष्ट्र-जीवनक सिये मावस्यक सभी विट मिन्स मिल सकते है लिवनी सादी बात भी हमारे गसे युतरत दो पीरियो राह देखनी परी । बोर मिसीसिप अन्तरप्राम्सीय में है।

बीवन-विकातीसंपठन मगठनकी मारत हमें यामवा म महसूस हुी। स्वाधवन का प्ररत्न करते समय वापसी सरकार बस्स मारम होने मगती है। परावलवनमें केवल नाप-निष्ठा पूरी तरह हो तो काफी है। अब जब कि हम नियो बनुभवका महत्व समझकर पराक्रम पा पुष्पा करने लगे हैं मुस समय कदूसरेकी मसाह तेनेकी जरूरत हम महसूस करने लगे हैं। मनुप्य प्रयोगवीर न हों मनुभमपरायण न हा तो कुछ कर्मन सस्मात्वं पूर्व पूर्वतर मतम् मिस सरहको पूर्वानुसारी मृत्तिके वह वापी बन जाते हैं। अस जमानेमें हमने बाहरके गुर बहुवसे निमे सेफिन मारम-गुरुकी शोप नहीं की। राजनीति में पहले महस सन् १८५७ श्रीसमें हमने पुराने उंगसे मक सीधी सादी यावत कर देती । बुसके बाद राज्य कत्तानोका बिसिहास पड़ार मन्हींका मनुकरण शुरू किया। पहले हम मा करते थे कि लिबरल पक्ष के लोग भमछे हैं। अन्हीके हापों इमाप कस्माष होनवामा है। हमें पव अनुभव हुमा कि यह मासा दुराशा है तब हमने मजदूर-पक्षका दामन पा। मुसी समानेमें फांस मिटकी ममरीका माधि देशका विविहास पाकर मुससे प्रेरणा पानेकी हमने कोपिश की। जितनेमे स्सकी प्रगतिसे सारी दुनिया पकापि हो गयी बोर हमें मासूम हुआ कि अम देवा, यो भन्ति ही वह विवि हाससि धास्नकी मजदूत बुनियादपर ती ही है। मुरमंत्र पाहे जिसमें रिया पाप, मेकिन अगर यह मारम सात् न किया जा सरे तो अससे सामर्थ्य प्राणि महीं हो सकती। साहित्यपके पारेमें भी अनुकरण तपा अपार सेनेको कुए मर्या होती है। किसी प्रायका स्वभापामें अनुवाद किया जाम और मगर मोग मुमे न समझ सकें तो भुरासे क्या फायदा और समममें माये वो भी अपर सहानुभूति न पा हो पह मिमी मापक न एगे, वो भुमे स्पर्ष हो मुममना पाहिये। पर्व कीरिये कि वह मापक भी बन गया सेमिनमगर यह ।

बीवन-साहित्य मामसमें प्रवेश म करे विषारप्रपासी पर बसर न करे, लोगोंके जीवनमें या बुनकी मिनी भाषामें म बुतरे तो मुसे निप्पस ही समधना चाहिये । साहित्यकी पक्चि अद्भुत है मेकिन यह रसायम जैसी है। केवम साहित्यपठनसे या दूसरोसे वादर्स और मनुभव अपार लेनेसे ग्यादा-से-म्पादा साहित्यक्षेत्र प्रमुख हो पायगा लेकिम बुसमें पीवन-साफल्य शायद ही निष्पन्न पर जीवन समुह स्यापक और गभीर होगा तभी बूपरके गुण साहित्यमें उसरेंगे। शोप-योग पराक्रम प्रवास म्यापार हुनर कमाकोशठ निरीक्षण परीक्षण मवनिर्मिति मावि वार्ता- में पप समाज मोर्षेपर होता है जम भूसकी महत्वाकामा वृत्तुग हो जाती है और तम्पवृषि मेदक होती है तभी साहित्य बोरवार बनता है। मिस तरहका पोपण साहित्यको भय मिममे भगा है किन जीवमको भुलापर, पीवनसे द्रोह करके केवछ साहित्यका पोषण हमें नहीं करना है। बीवनके सिपे साहित्य है। बीवन मेसे साहित्यका बुद्गम है और साहित्मका फम भी सरकारी तपा समर्प पीवन ही है। विविधतासे मैक्य प्रस्थापित करनेका हमारा जो बीवनमत्र है मुसे साहित्यमें भी स्पष्ट तपा पूर्ण रूपसे म्यक्त करना है । मौर मिसलिये सर्वसमन्वय ही हमारा ध्यान कुछ लोर्गोको बैसा लगता है कि भनेक चीजोंकी सिपड़ी बमामेसे समन्बम हो पाता है जब कि दूसरे कुछ मोर्गोकासयात है कि किसी क विशेष वस्तुको स्वीकार करके वुसमा विस्तार परना मौर बाकीकी वस्तुओको तिमिति देना ही बेकताका मेकमान साधन है । लेकिन यह दोनों दृष्टियाँ भूसभरी हैं। विमा विविपताके वैक्पमें कुछ वर्ष ही नहीं। पिरिष मटकोंका बमका मपना स्वत्व सुषित मात्रामें न रसा गाय तो फिर समम्बय ही किसका करें? यह सही है कि स्वरप-रक्षा और समन्बय मेक मंगहै।

बीपलाती संगठन ro सरेके विरोधी तत्व मालूम होते है यह भासानीस मेकदूसरे, महीं मिमत, सकिन समाजको योम्म सापना करके यह समन्वय मक्सि अपनानी होती है। कभी भूमें होंगी कबी पीढ़ियोंका पसिदान देना पड़ेगा लेकिन स्वस्व-रक्षा और समन्बय दोनोंकी मक साप अपासना होगाय सो समसे पीवनक दिम्य स्फुस्लिग निकस विमा कमी नहीं रह सकते । सिसीका दूसरा नाम है बीवन रसायन । सिर्फ सिचड़ी बनानेमे कभी-भी अनिष्ट पीही पैदा होती है । पागारमें सभी रस्तुमें आपत्रित होती है, ऐचिन्त दूकानको कोभी पर महीं कहता । पुस्तकोंकी दूकानको पुस्तकालय नही कहा जा सकता। जैसा कि हम सूपर कह गये बागम ही साहित्यका क्षेत्र है। मिसरिये बीवन के सभी क्षेत्र हमारे पिन्तमके विषय है। पिन मिनक्षेत्रोंमस मे बहुत ही महत्वके और व्यापक क्षेत्रको हम फिलहाछ जान-यूमकर मभग रसनेवाले हैं। पमनीविकी बुम भूमिकापरसे पी पानेवाली राजनीतिकी हमारे कम्पित साहित्यमें कोभी बाषा महीं है। लेकिन वर्तमान परिस्थितिमें यही मिष्ट है कि हम अपनी भावनामें मोन-बारा व्यक्त करें। बार देवमें सबको येका सानेगी यह बसरत है। धर्माभिमान पाएपमिमान प्रान्ताभिमान मोर रापनतिक पसभेवमादि पार्यो से हमारी मनोवृत्तिमा बितमी प्रक्षुम्प, संकुचित मौर बुद्धिविमुख हो जाती है कि मुससे सोसतिक संगठन अधिकाधिक मुश्किल हो जाता है। यहाँ विर सोसकरवात नहीं की जा सकतीवहाँ माम रममा या है। ररते परते या किसीके दवावमें बाकर भू-सबका मियम करने में या टेव ढगसे पोसनेमें सस्पका पालन महीं है, सामप्प नहीं है रोगस्विता नहीं है बौर मामसिक सन्ताप तो हरगिन नहीं है। मौर परिणाम देख पाओ तो गुन्य ! मिन मब मारणोंसे हमने अपनी प्रवृत्तिको यमनीतिमे मसिप्प रपना ही पसन्द मिया है!

जीवन-साहित्य । पाहातक हो सके व्यक्तिगत बासोपन भी टालनेका हमारा निश्चय है। यहाँ सभी स्खलनगील हों वहाँ कौन किसका मुपहास करे । पहला परपर कौनमारे? फिर म्पक्तिगत टीका करनेसे न टीका करनेवालोंको साम होता है न सुधरता टीकाका विषय हमा म्पक्ति । वह या तो चिड़ जायगा या नामुम्मीद होकर निराश हो पायगा । परिणामस्वस्प सामाजिक मीवन बषिका भिम नीचे गिरता पाता है जैसा सार्वत्रिक अनुभव है। कुछ लोग कहते हैं कि साहित्य जीवनका समालोपन है। बात सही है लेकिन मुसमें सारा सत्य नही आ पाता । साहित्य जीवनकी पुनर्घटना है मवसर्जन है और कभी-कभी यह पीवम प्रेरणा भी होता है । यह सब बावर्ण हमारी दृष्टि के सामने है। भारतीय साहित्म-सगठनका मुस्म कार्य तो राष्ट्रभाषावाराही चलेगा । लेकिन असका सन्देश मपने-अपने प्रान्तोम अपभे-अपने उगसे पहुँचानेका काम प्रान्तीय मापाओंगो ही करना है । सब मिलकर मेक ही पपिसमें भोजन करने बैठे हों तो भी प्रस्पेक व्यक्तिको अपनी मूल स्वास्थ्य और मभिरुचिका विचार करके मह निश्चित करना पड़ता है कि क्मा साना है जितना माना है मौर किस तरह साना है। मिसी तरह प्रान्तीय मापाको करमा पडेगा। मौर सग छ देमा हो तो भी देते समय शबरीकी तरह हर और अच्छी तरह पेस भासार समर्पित करना मम्छा है। दूसरे मेक गमे भी सोचा जा सकता है । हम 'महाराष्ट्रीय साहित्य' या' भारतीम साहित्य' जैसे शब्दोंगा भिस्तेमाल करते हैं। 'महा राष्ट्रीय सम्कृति' 'मारतीय संस्कृति मे सोंका भी हम प्रयोग करते है।रेक्नि साहित्य मा संसतिको अकस्म बनानेका हमने कमी प्रयत्न किया है? 'मराठी योगनेबामे सभी महाराष्ट्री हैं यह परिभाषा तो ठीक है सकिन मराठी बोसनेवामे हम सब है अफ-दूसरे के हैं जिस प्रकारको वृत्तिषागृत करनेके सिये या शुस वृत करनेक रम-समोसा १ ? सिये क्या हमने साहित्य, कोभी प्रयत्न किया है ? मेक-दूसरे की टीकाटिप्पणी करके बक-दूसरेके दोप बाहिर करके हमने अकसरेकी सेवा की है औमा मायद हम मानते होंगे मेकिन मैमा करनेसे क्या हृदयोंका मिलन हुआ है क्या असा विश्वास ओम्-दूसरेके मनमें पैदा हुवा है कि सकटके समय अपनी मदद के लिये कोसी-न-मोमी जर दोग मायगा क्या यह अर्थ हमारे यहाँ हुआ है कि 'महाराष्ट्रका अमिमानक मानी सिफ में मौर मेगका ही अभिमान नही गति सभी महाराष्ट्रियोंके प्रति अपनापन सबके प्रति प्रेम है? भैसी भावना हो या न हो मपर यह पैदा करनेकी धुन हो तभी भारतीय साहित्यके संगठन की कम्पना यौर माम्बा हममें मुत्पन्न होनेवाली है। ब,११११ १० रस-समीक्षा विचार करनेस मासूम होगा कि माहिस्य सगीव मौर कश तीनों भाषनाके ही क्षेत्र होने तीनोंक यन्दर समानेवासी मेक ही हो सकती है बुसे हम रस कहत है । साहित्याचार्योने रसपी तो मनेक प्रकारसे दी है। सगीतमें यह देखा जाता है कि राग मोर तालके अनुसार रसमें परिवर्तन हाता जाता है । चित्रकला नवरसके भिन्न भिन्न प्रसंग पित्रित किय जाते है। रेलामोंकी सबसता द्वारा तया वर्गफि साहचर्यमे रम व्यक्त किये गाव है। मृतिषिपान म्मापत्प नुस्य मादि विविप कलाओं द्वारा भी अन्दमें रसोंकी ही मभिव्यक्ति करनी होती है। मेबिन मब तक साहिहप सगीत मौर फलाओंकी दृष्टिसे-अर्षात् भीवनासाकी समस्त यानी सार्वमाम दृष्टिसे- रमका विवचन किमोने नहीं किया है। साहित्यापायर्याने मो विस्मन किया है असे मोकार करके भोर मुमका संस्करण करके ममे म्यापक बनानेकी जरूरत है।

बीवन-साहित्य
यह मस्री नहीं है कि पूर्वाधार्मोने जिन नौ रसोंका वर्णन
किया है अनके वही नाम और अपनी ही संस्था हम मान लें।
वर जिस बातकी स्वतंत्रतापूर्वक मीमांसा होनी चाहिये कि-
सरकारी जीवनमें कलात्मक रस कौन-कौम-से है।
हमारे यहाँ शृङ्गारको रसरान कहा गया है । असे
मयमाका मान है । लेकिन वास्तवमें यह सर्वोन्म रस नहीं
कहा जा सकता । प्राणिमानमें नर-मादाका अंक दूसरेके प्रति
बाकर्षण होता है। प्रकृतिने मिस पाकर्षणको सितना अधिक
मुन्मावकारी यमा दिया है कि उसके आगे मनुष्यकी सारी
होशिमारी सारा संयम और सव विवेक नष्ट हो जाता है। हम
यह सवाल यहाँ म मेरें कि बिस आकर्षणको वृत्तेजन देमा
वापश्पक है या नहीं। पर जिस बाकर्षण मौर प्रेमके वीच पो
सम्पन्म है युसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। पहले हमें
विसका निश्चय कर लेना चाहिये कि नर-मादा मापसी
वाकर्पणमें अक-दूसरेके प्रति यथार्थमें प्रेम होता है या अहप्रेमकी
तृप्तिके साधनरूप ही वह अक-दूसरेकी तरफ़ देखते है ।
प्रकृतिकी रपना कुछ ऐसी है कि काम-वासनाफा प्रारम
महप्रेमसे होता है । मेकिन बगर यह काम पर्ममार्गसे बसे
तो वह विशूट प्रेममें परिणत हो पाता है। शिशुर प्रेममें
वारमविलोपन सेवा और बारमवलिदानकी ही प्रधानता रहती
है। कामको विकार कहा गया है प्रेमको कोभी विकार नहीं
कहता क्योंकि सके पीछे हदयधर्मकी अदात्तता होती है। यहाँ
धर्मके मानी सहिषर्म या शास्त्रमर्म नहीं किन्तु मास्माके
स्वभावके मनुसार प्रकट होनेवाला हृदय-धर्म है।
गृङ्गार मूसत भोगप्रपाम होता है। लेकिन हदय-धर्मकी
रासायनिक प्रियास वह भावना प्रपान बन जाता है। यह
रसायन और परिणति ही काम्पका, मसाका विषय हो सकती
है। प्राचीन नाट्यकारोंने जिस तरह नाटकोंमें रगर्मपर भायन
का दृश्य दिवसानेका निपेप किया है बुसी सरए मोगप्रपान

रस-सपोझा मजार पेप्टाभोंका भी मुस्लमखुल्ग बतलानेकी मुमानियत कर दी है। यह सो कोषी नहीं कह सकता कि नाटयशास्त्राको खाने-पीनेसे या रतिसुससे पृभा पी। देह मर्मक यनुसार दिन यस्तु प्रति स्वाभाविक मागता रहेगा ही पर सी पटना मौर बसे भागकताका विषय नहीं हो सकते। यह कहनेके सिय कि छातिम युस वस्तुको स्थान नहीं होना चाहिये किसी प्रकारकी वैगम्पत्तिकी आवश्यकता नहीं है । असके लिये सिर्फ़ सस्कारिता हो तो काफी है। प्रेमरसका शुद्ध वर्णन हमें भवभूतिके 'अत्तररामचरित में मिलता है। पाकुन्तसमें प्रेममा प्रापमिक मङ्गारिक स्वस्थ भी है और अन्तका परिमत विमुख रूप भी । वास्तवमें देखा भाय तो प्रेमको ही रसरामको पापि मिझनी चाहिये । पहार- को तो केवठ भुसकावागमन रमाव कहा जा सकता है। मुङ्गारके वर्षनसे मनुष्यकी चितवृत्तिको बासानीसे सुरीपित किया जा सकता है! मिसीसिये सब देशों बोर सब मानेमें कसामा गहारमो प्रधानता प्राप्त हुमी दिसामी देती है। से ऋतुमि बसन्त स रसमेिं प्रकार युन्मादकारी होता हो है । जिस तरह सोपोंकी पा म्यक्तिको खुशामर करके बाबपीठका रमड़ी आसानीस निमाया जा सकता है खुसी तह गङ्गार रसको मागृत करके बहुत पोड़ीसी पूमीपर कसा हतियों माम्र्पक बनाया जा सकता है। सने प्रेमरममें मपने म्पत्तिसको भुत्ताकर दूसरे साप सागरस्यका मनुभव करना होता है । मिसीसिप प्रेमरसमें मारम-विलोपन मौर सेबाकी प्रधानता होती है। प्रेम बामाका गुण है मिमीसिये यह हसर विजय प्राप्त करता है। प्रेम ही मारमा है। सभी प्रेमियों भक्तों और क्याम्नी दर्शनकारोंने यह बात स्पष्ट कर दी है कि अमर प्रेमम मारमा भिन्न है ही नहीं। बोररम मा मपने पद स्पर्म बारमविकासका ही मूमन परवा है । सामान्य स्वस्प म्पितिमें मनुष्य अपने मारमतत्वकी ६२ बीवनवाहित्य बुकस्ताका अनुभव नहीं करता । क्योंकि वह वेहके साम रस्म होता है । लेकिन बब बसाधारण ववसरके कारण खरी कसौटीका वक्त बा पाता है तब मनुष्य मपमे शरीरके मन्मों से मूचा पड़ता है । जिसीमें वीररसको अत्पत्ति है। प्रतिपक्षीका वेप बुसके प्रति क्रूरता ७सके विश्व बहकार- का प्रवर्धन बादिमें पीररस समायाहमा नहीं है। सोकम्पबहार में कबी पार मह सब हीन भावना वीरकर्ममें मिली हुश्री होती हैं। पैसा होना कभी-कभी अपरिहार्य भी हो जाता है। लेकिन यह पहरी महीं कि साहित्यमें मुन्हें स्पाम हो ही। साहित्य वास्तविक जीवनका कोबी संपूर्ण फोटोग्राफ नहीं हुआ करता। साहित्यमें वही पीजें लानी होती है जिनकी तरफ ध्यान पींचना मावस्यक हा । मिष्ट बस्तुको आगे माना और अनिष्ट बस्तुओंको दबा देना साहित्म और कराकी वारमा है। मिस पुरसार और तिरस्कारके बिना कलाकी संभावना ही नहीं होती। पीररसके मिम्मे जो कुछ हानिकर हो मुसे साहित्यर्मेसे मिकाम देमा पाहिये । तभी वह साहित्य कलापूर्ण होगा। सोक प्यवहारमें पीररस बमुक आर्यता चाहता ही है। पप्सुम शौर्य होता है पर वीर्य नही होता । जानवरजव मोस में आकर मापेसे बाहर हो जाते हैं सब वे आपसमें बषामुष पर पड़ते है। लेकिन अनमें ग्रमा तनिक भी प्रवेश हो वाय तो दुम दबाकर भागनेमें भुन्हें देर नहीं मगती। भयकी सग्या तो वह मानते ही नहीं। भयकी लग्मा मारमाना गुण है। पानपरोंमें वह नही हुआ करती। आवेश हो या न हो तीन कम्पि-बुटिककारण अपवा मार्यत्वके विकसित होनेसे ममुष्प भयपर विजय प्राप्त करता है। वासस्म सुखोपभोग भय स्वार्थ मिन सपको स्यागकर, पमड़ी पचामेकी इसिसे मुक्त हो बारम परिवानके निये जब मनुप्य तैयार हो जाता है तब यह जा पर-अपनी देहपर निमय प्राप्त गरके मारमगुगका अलर्प बताता है। मैसावीर-कर्म असीबीर-गृत्ति रेखमे या सुममेवाने रख-समीक्षा हृदयमें भी समान भाव-समभावको पागृत करती है यही पौर रसका भाकर्षण और सफरता है। मीरोंका वीरकर्म देखने के बाद हमारी माधुर्मे बीर या पीर-समूह खड़ा है अिसलिये हम सही-सलामत है भव भयका कोबी कारण नहीं-पिस सरहका सन्सोप भी दुर्यो तपा मवारामोंको मिठता है। जिसे वीर रसका कोषी सर्वोच्च परिणाम या फल महीं कहा पा सकता। मिस बमानेमें मनुष्य अपनी देहका मोह करनेवाग फूल- फूककर कदम रखमेवामा बीर पर-घसा बन पाता है बुस जमामेमें वह वोरोंका वसान करके मुन्हें अभापकर मा सुनकी यहादुरीकी तारीफक पुल पापकर अनके हामों अपने लिये सुरक्षा प्राप्त करता है। यदि समाव वीररसकी वीरकाध्यकी मो पाह होती है प्रतिष्ठा होती है अस परसे मह न समम सिया माय कि मस समाजमें बार्यरवका मुस्कप होने सगा है। बव पंवो में सोकमान्य तिसमपर मुकदमा पर रहा पा ठग यहाँक मिल-मस्वरनि वा दगा किया था । भुनका गह तूफान देखकर मप्यम बग पा व्यापारी वर्गके कभी रोग परेकि अम्बर छिप ठे। गा मुस भान्दोममका दमन करनेके मिपे सरकारी फोर पापी तप से देस वे सोग मारे मुक्षीके अयप्पमि करने मगे मौरमपने हापा स्माम शुधारने एगे। फोरके धुन वीरोंका स्वागत-सम्मान परसे समप सुनके मुह से जो पीर-गाम निकला भूससे यह मही पहा पा सकता कि मुस समाजो बीरस्वकी यि हुी । यह मालों दानी पटना मिसप्तिये युसका असर दिएपर कायम रह गया है। वीररसपी अगर वीर परें सो वह बात है और रक्षणया आप चाहनेवारे पर दो बह दुमरी गाव है। पोर हमेगा वीररसको गुट रममेकी पिकवा है जबकि मात्रयपारायण मोग प्राण प्राण-पेर हामेसे यार्प वृत्तिका विषेक रस पिना रक्षामन्तकि पति ६४ बीपन-साहित्य असके सभी गुणदोर्पोको बुम्मस स्पमें ही देखते हैं। पीरवृत्तिसे ही बेरपत्ति जागृत होती है । बिसका कोसी बिलाम म देसार बार्य धर्म-कारोने विसकी मर्यादा यांप दी है कि 'मरणान्तानि वैरागि' ! शत्रुके मरणानेके वाव बुसकी देहको सात मारना बुसके शरीरके टुकोटको करना उसके आश्रितोंको सप्तामा खुनकी स्त्रियोंका अपना बनाना यह सब मेक बाबीरके किये शोभा देनेवाला नहीं है । वीर पुस्पोने यह देख लिया था कि विस तरह के बर्तावसे मरे हुमे शत्रुका अपमान नहीं होता बल्कि अपने वीरत्वको ही बट्टा लगता है। बार्य साहित्याचार्यों कवियों पौर कलाकारोंने यह कह रहा है कि अगर दुश्मनी करनी हो तो वैसे बादमीके साप करो यो अपने सायक हो, वीर असे हराने वाद असकी कद्र करके असकी प्रतिष्ठाको बनाये रखो और जिस तरह वपना गौरव बड़ामो वीरवृत्तिका परिपय मनुष्पके ही विरोध नही दिया जाता बस्कि सृष्टिये कुपित होनेपर मी मनुष्य अपनी बुस वृत्तिको विकसित कर सकता है। जब मेरा शत्रु तयार निकालपर मेरे सामने ना हो तव केबस आरमरक्षाकी दृष्टिसे भी मुझे मपनी सारी शक्तिको अकत्रित करके बुसमा मुकाबसा करना पड़ता है । अस बात अगर मैं मगक पत्ति न रा तो जा— कहाँ ? सिंहगरकी दीवारपर परकर युदयभानुके साथ संग्राम करनेवाली सामामीकी फोरमच हिम्मत हारने लगी तर साना जीके मामा सूर्यागीने दीवारपरसे मीचे अतरनेकी रस्सियों काट गसी । अमरीका पबनेके वाद स्पेनिप्प पीर हनेंग्डो कॉन मे अपने पहाब पला दिये । मिस सरह पीठ फेरना ही अब असंभव हो जाता है सम मात्मरक्षाकी वृत्ति वीरवृत्तिकी मदद करने जाती है, और जिसे अपनी पान ज्यादा प्यारी होती है वही असे मौरपर अधिक शूर बन पाता है। सेकिन वव कोभी बावमी पानीमें रख रहा हो या पलते हो घरके अन्दरसे किसी असहाय सम्बकी पीस सुनामी ये रम-समीमा रही हो तव भपनी मानके सतरेका ठनिक भी समाल किये बगैर कोसी सेगस्ती पुस्प हृदय धर्मसे बफ़ागर रहकर पानी या बागमें कूद पड़ता है तब यह वीरवृत्तिका परम अकर्प प्रकट करता है। बो म्पक्ति माफी मांगकर पीनेकी मपेक्षा फसीपर फटकना ज्यादा पसन्द करता है या मरोगे रुपर्योकी कामच के पक्ष न होकर पेपम यायठिको ही पहचानता है बह भी मलौकिक पीरस्वमा ही परिचय देता है। सारी दुनियाका चाहे बोहो गाय, पर अन्तरारमाके मादसे ता में हरगिज वफ़ा न होऊँगा--मिस सरहकी भीरवृत्ति जिसके लिये स्वाभाविक होती है वह वीरेश्वर ही है। किसीकी बहू-बेटी या स्त्रीका अपहरण करते समय मो कमी गुरे बदमाध विकारके पक्ष होकर असाधारण महादुरी दिखाते । बड़े-बोगकू भी बान हपेसीपर रखकर पर्रोम सैंप लगाते या सूटमार मनाते हैं और पपडे पानेपर पुलिसके मादमी भुनपर प्रामास्तिक यमयातमा गदें तो भी अपने पश्यत्रका भेद नहीं वतासे । अनकी यह शक्ति सोगोंमें आश्चर्य और वारीफके माव पार पैदा कर सकती है छेफिन प्रामाणिक लोगों का पमहरण या परस्त्रीका अपहरण करनेकी मीचत्तिसे प्रेरित बहादुरीकी मोबी बामपुष्य कद्र नहीं कर सकता । कुछ रात गोबर के आसार प्राप्त होने वाले धनका मेक भाग बास पासके प्रदेसके गरीब फोगोंमें बांट देते हैं और मिस तरह सोकप्रिय बनकर अपमेको पाने की कोशिण परनेवारोंक छपके पसा देते हैं। कभी-कमी असे हार और सुटेरे मस्यात समान कटर सोगोंका नाप करके, भुनना सर्वस्व लूटकर गरीबोंगो भयमुक्त करते हैं । इसलिये भी पण ममता जैस छोगोंकी सामाम्प पुष्टताको भूसपर मुसो गुपोंका बसाम करने मगती है। यह सब पाह जितना स्वाभाविक क्या म हो, फिर मी बैसा नही पहा पा सकता कि मिससे समानकी होती है। श्रीरामचन्द्रजीपी यह मुक्ति कि -

श्रीप-साझिम
जमा प्रमाने गौरवको नहीं बढ़ाती । बिससे लोग दवर
सुन्मत नहीं होता औसी कृतिमेसे शुद्ध बीररस निकलता मंस
मही कहा जा सकता । सिर्फ हिम्मत मौर सरफरोशी बीररस
मही है और को अजमीसे अंगमग करने असके आमियोंकी
बेमियप्ती करनेमें परममिकी तृप्ति मले ही हो लेकिन मुसमें
म शूरखा है, न बीरता फिर मार्यता कहाँसे होगी?
मो यादमी युट करने बाये असमें मून मास और सरीरसे-
छिन-भिन्न अवययोगो देसनेकी आदत को होनी ही चाहिये।
दुम और बेपना-अपनी हो या परायी-सहम करने की शक्ति
बुसमें होनी ही चाहिये । शस्त्रक्रिमा करने वारे गटरोंमें भी
जिस शक्तिका होना आवश्यक है। ममममें नही माता कि
धनकी भारको देखकर कुछ लोगोषो कर क्यों मा नाता है।
चुद मुझे मास मटता देस या शस्त्रक्रिया देखते समय किसी
जिस्मकी येनी महसूस नहीं होनी । फिर भी परम पोररमके
वर्णमफे सिससिम में रणनदीके वर्णन पाता हूँ तब उसमेसे
मगैर मुगुप्साके दूसरा भाव पैदा नहीं होता । यह तो में समाम
ही नहीं सकता कि मनके पीपर और उसमें अतरते इसे
मरगण्डकि वर्णनसे मीररसको किस तरह पोपम मिलता है।
मकिन जुगुप्सा पैदा करनेवासे प्रसोका रसपूर्ण वर्णन करके
असीमें मानन्द माननेवासे लोगोंकी वृत्तिको विश्व ही कहना
पाहिये । मनुप्यको सभेसे पोषकर असपर सारकोमरामभिपेय
कराके असे मला देनेवाले बार बुसकी प्रामान्सिक बी सुन
कर मन्तुष्ट होमेबामे बादशाह नीराकी विरारीमें हम भरना
धीर रस मानमडेपी नहीं है। यह परम कल्याणकारी
समार हितपी मौर धर्मपरायण मार्यवृतिका घोतक है मौर
असे वैसे ही रखना चाहिम । दीररसका पोपण मौर संगोपन
भी के ही हापमें रहमा चाहिये । पीरवृत्तिको पहचाननेवासे
शुमार क्यों कराये,

रत-समीक्षा
कपि धारण और थायर अलग होते है और अपनी रक्षाकी
वसाधमें रहनेवाले कायर तपा माश्रित अलग ।
पुराने जमानेको वीररावा हम जरूर पढ़ें वापरके साप
प, मफिन सुनसे हम पुरानी प्रेरणा न लें, हीन सन्तोष हमें
स्पाग्य ही सगना चाहिये । बोगन वीर्यका नया भादर्श स्वतत्र
म्पसे विकसित करके असके लिये आवश्यक पोषक तस्व पुरानी
वीरकपार्मिसे बितने मिए सकें मुझे पुन चुनकर हम जरूर
मिस्तेमास नरें। मेकिन वीररस पुराने कर या बीवनद्रोही
वादोंमें हम फिसम म माये । हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि
मगर मीमममसे बीरता पली गयी ठो वह असी कणसे सबने
मगंगा मीर अन्तम अक भी सद्गुण न बन पायगा।
वर्तमान युग कलाकारों के अग्रणी भी रवीन्द्रनाप ठाकुरको
मेकगार पापानमें अक पैसा स्थान दिलाया गया जहाँ दो पीर
सहते-सहते कट मरे पे । अस स्पान और घटनापर अपनी
प्रतिमाका प्रयोग करके कापी कविता सिमनेरे लिये मनसे
पहा गया। फरिवरने वहाँ पो परम पिम दिये वह
भारतवर्षके मिशनवमा मानवजातिके भविष्यको घोमा देनेमामे
ये। मुनका भाव यह है-
" माली गुस्सेमें पागस होकर अपनी मनुष्यताको मूल
पये मौर मुम्होंने परती माताके वक्षस्मतपर गनसरेका
कुन बहाया। प्रकृतिने यह देखकर मोसके स्पमें आंसू बहाये
और मनुष्यजातिको मिस पारमित सम्माको हरी-हो बसे
वक रिया।"
सान्तिप्रिय, अहिमापरापम सर्योदयारी समन्वपप्रेमी
समतिका वीररस रपागफे रूपये ही प्रगट होगा। मारमरिमोपन,
मारमवरुिदान ही नीवनकी सच्ची पीरता है। उसके असम
मध्य प्रसंग कराके मष्य विषय हो सकता है। अमे प्रमग
कठाको मुमत करते हैं और जनताको जीवन-दीक्षा देते हैं।
मैंने ममो पिस पातकी पाप नहीं की है कि मात्र कलाकार

बीवन-साहित्य
मिस पहलको विशेष रूपसे विकसित करते हैं या नहीं; सेकिम
मिसना सो मैं मानता हूँ कि अगर भविष्यकी कमा युस विधामें
गयी तो निकट भविष्यमें वह असाधारग प्रगति कर सकेगी
मौर समाज सेवा मी असक हापों वपो माप होगी ।
अब मवमुतिने मह सिदान्त स्पिर किया कि 'रस बेकही
है, और वह करुणरस वह अनेक रूप धारण करता है
तम बुसमे करुण सन्दको अतना ही पापक पनामा मिसमा कि
कला सम्य है । वय कोमम पने अन्नत बने, सूक्ष्मवेदी बने या
बुदात्त बने वहाँ पास्यकी स्टा तो आयेगी ही। पारम्पकी
समभावना मा समवेदना सार्वभौम है अपके द्वारा हम विश्वा
स्मैक्य तक पहुँप सकते हैं। करमरस सपमुष रससम्राट है।
सेकिन यह मावश्यक महीं कि करुणरसमें शोककी भावना
होनी ही चाहिये । वास्सस्यरस मास्तरस और बुवात्तरस
करुगाके मुद्दे-नवे पहन है । मिस तरह नदियां सागरमें मा
मिलती हैं मुस तरह अन्य सब रस मत पाकर करुणरसमें
मिसीन हो पाते हैं। बिन सब रसकि मिये अंक मित्रने माम
सुप्ताया है 'समाहित रस' मर्पको वेसवे हमे यह माम बिमकुम
ठीक मासूम होता है। किम भाषामें यह सिमा पा सकेगा
या नहीं भिसमें सक है । वास्तवमें देना जाय तो सभी रसोंकी
परिणति योगमें ही है। याग यदि समाभि-समापान-साम्पा-
यस्मा समरिमायभान । कहार्मेसे मंत्रमें यही बात निकलेगी।
कलाका साम्य और साषन यह योग ही है। दुर्माम्मकी बात
है कि योगका यह भ्यापक अर्थ आयको भापामें स्वीकार
महीं किया जाता । माक पकाकर, पसषी मारकर, पड़ी देर
तक नींद मेना मौर भूखों मरमा ही छोगोंकी दृष्टिमें 'योग'
हमारे साहित्यकारोंने करुणरसका बहुत सुन्दर विकास
किया है। कालिदासका बाविसाप' मा भवमूर्तिका
सुप्तररामपरिव करुणरसके बुप्तम ममूने माने पाते
रह गया है!

रस समीक्षा - क्षेत्र है। है। भवभूति पर करुणरसका राग छाता है तब पत्पर भी रोने सगर्स है मौर बमकी छाती भी पिषलकर पूर चूर हो माती है । करुणरस ही मनुष्यकी मनुष्यता है। फिर भी यह बहरी नहीं कि करुणरसका झुपयोग केवल स्त्री-पुरुपके पारस्परिक विरह-वर्णनमें ही हो । मां अपने बच्चेके सिमे विलाप करे तो बुटनेसे भी करुणरम का क्षेत्र पूरा नहीं होता। मनन्त कालसे हर पमानेमें, और हर मुस्समें हर समानमें बौर हर कारमसे महान् सामाजिक मन्याय होते आये हैं। हजारों-यासों साग लिन मन्याओंके शिकार होते माये हैं। बमान, दारिद्रप यूप-मीपभार, असमानता मत्सर, टेप सोम बादि अनेक कारवासि तया विना कारण भी मनुष्य मनुष्यको सताता है गुलाम बमाता है घूसता है और अपमानित करता है। यह सब पटना करुणरसके स्वाभाविक नस रामाके हसको पकड़ने या भाष सिंहके मन्दिनी गाय गोधर पवोचने का दुस हमारे कवियोंने गाया है। कोभी निपाव कांवपक्षीके बोरेस कमो बाणसे विट करता है तो बाल्मी किकी धापवाणी सारी दुनिया के हदयको भेदकर मिस मन्याय- की तरफ सका ध्यान खींचती है। फिर भी मनमें पैसा नहीं लगता कि पशुपक्षियोंका या गायभैसका दुप अभी किसीने गाया है। मध्यम वर्ग मोग विषवाओं का कुछ पर्गन करने सगे है । सकिन मुसमें भी भवभूतिका मोसो मुग या पास्मीविका पुण्य प्रकोप प्रकट नहीं हुमा है। करुण रसका वसर जितमा होना चाहिये मतना नहीं हुआ है । बिस- सिये मुल्यकी शिक्षा भोर हरयधमकी पहचान बपूरी ही रही है। मौर मिसीसिये गांभीजी से प्यक्ति अस्पृश्यताकै कारण अपने हुपका दर्द व्यक्त नखे है तो भी सामायिक दय अधिका- में मस्पष्ट ही रहता है। करुणरससे सिर्फ हृदय पिपमे तो मुतमा काफी नहीं है । मुससे हृदय मुलम मुढना पापिये मोर ।

पीबनमें मामूसान झांति हो पानी पाहिये। भीवन के प्रत्येक
प्यपहारके किये हत्यमर्मसे मनुष्यको अक नमी कसौटी सैयार
करनी चाहिये।
अगर यह कहा पाय कि प्राचीन लोगोंको हास्य-रसकी
पपार्थ कल्पना तम महीं पी सो मुसमें ज्यादा अतिशयोस्टि
महीं है । नम पधन और सुन्दर पाक्तियां तो संत साहित्य
में महाँ-तहाँ विसरी पड़ी है हमारी संस्कारिताकी यह विशेषता
है। लेकिन अ वर्षका हास्परस युसमें बहुत ही कम पाया
माता है । अब हमारे साहित्यमें हास्यरसने अनेक सफल प्रयोग
किये है सही । फिर भी यह कहे विमा नहीं रहा माता कि
नाटकोंमें पामा पानेवाला हास्यरस पहुत ही सस्ता और साषा
रण काटिका है। हमारे पम्पत्रिमों (cartoons) और प्राइस
नॉमें पाया जानेवाला हास्प रस बार भी बहुत निम्नश्रेणीका
है। पाठशालाके प्रसि-सम्मेलोंमें हास्म और बीर दो हो रसों
को ज्यादा तरजीह दी जाती है। मिसका कारण यही है कि
विना ज्यादा मेहनत पिये अनमें सफमता मिलती है अनायास
तैयारी हो जाती है और तामिया मी ग्यावा-से-ज्यादा मिलती
है। लेकिन बिससे कहामी प्रगति महीं होती और धनसा भी
संस्कार-समर्प नहीं बनती।
मैं नहीं जानता कि हमारे कलाकारोने जमुठ रसका परि
पोप किम किन तरीकसि किया है। पर मेरे मभिप्रायमें मपभुत
रसफी मृत्पत्ति मप्पता (sublimty) में होमी वाहिये
परना मनुप्यका बमाम जिवना अधिक होगा अतनी असे
हर भीग अपिल बमृत मालूम होगी। मतमा ससरप ही
असा है कि असके बागे कमामा सामाम्प प्यारण स्तभिव
हो जाता है। विजयनगरके आसपासके पहामि पड़ी-बड़ी
विमार्योंकि वो ढेर पड़े हैं अनमें पिसी तरहमी म्पमस्या मा
समस्पसा तो तनिक भी नहीं है सकिन वहाँ तो मुसकी छ
जरूरत ही मही मासूम होसी । सरोवरका आकार, गावोंका

विस्तार, नदीका प्रवाह-पिनमें क्या कोभी किसी सास
म्यवस्थाकी अपेक्षा रख सकता है ? मम्य वस्तु अपनी मम्यतामे
ही सर्वाङ्ग परिपूर्ण हो जाती है। महरका व्याकरण नवीके
मिए लागू नहीं होता, अपवनका रचनाशास्त्र महाकाम्तारके
सिये मुपयोगी महीं होता। जो कुछ भी मम्य विस्तीर्ण मुदात्त
मौर गूर है यह अनन्तका प्रतीक है और अिसीलिये वह अपनी
सत्तास परम रमणीय है । महाकवि तुलसीदासजीने को कहा
है कि 'समरयको नहिं रोप गुसानी' बह मये अर्थमें यहाँ
कराके सूत्रके सौरपर ही अधिक सुसंगत मालूम होता है।
मद्भुत रौद्र और भयानक सीनों रसीका बुद्गम मेक
ही होता है। हृदयकी भिन्न प्रतिभूतियों (Reaponses) के
कारन ही उनके अग-अलग माम परे है। जय शक्तिके
आविर्भावसे हृदय दब जाता है ससा सो बैठठा है सब मया
नक रसकी निप्पत्ति होती है। किसी भूपी और लटकती हमी
कगारफे मोपे पद हम सड़े रहते हैं तव हम यकीनके साप
मानते हैं कि यह धिमाराशि हमारे शिरपर टूट पड़नेवाली
नहीं है अमटे मांधी-सूफानसे वह हमारी रक्षा ही करेगी।
फिर भी बगर वह कहीं गिर पड़े तो। वितना पयाम मनमें
वाते ही हम दर माते हैं। यह भी मेक शक्तिमा ही आविर्भाग
है। पर्वत-प्राय सागर-सहरोंपर सवार होकर सफर करनेवाले
बहामने बेटे-बैठे हम इसी भावना दूसरी तरहसे अनुभव
मम्य वस्तुके साप मनुष्य हमेशा अपनी तुमना करता ही
रहता है। यह तुसना करते-करखें जब वह पक पाता है तब
माप-ही-बाप रोबरस प्रगट होता है। और यहाँ भम्पताकी
नवीनता भीर अषका चमत्कार मिट नहीं गया है वही अद्भुत
रसका परिणय मिलता है। यह तीनों रस मनुष्यको समेदन
पाक्तिपर बाधारित है। हम नहीं जानते कि आकाशके ममन्त
तारों को देखार जानवरोंको कसा लगता होगा। बातकोंको

७२
बीपसाहित्य
वा वह मेक पाने के घेवोवेकी सरह मासूम होता है। लेकिन यहाँ
मेष प्रौढ़ सगोरशास्त्रीको सो निरय नूसम मौर वर्षमान बदर
रस विश्वस्म-दर्शनके समान सगता है। बद्भुत रसको पूरी
यह है कि जिस तर मेषका गमन सूनकर सिहको गर्जना
करनेकी विम्या होती है मुसी तरह वा इदयको भव्यतामा
दपन होते ही अपनी विभूति भी उतनी ही विराट अवात्त
मौर भग्य करनेकी अिच्छा हो मुटती है। बद्भुत रसमें
ममुप्यकी पारमा मपमेको अद्भुततासे भिन्न नहीं मानती बस्ति
मेवरहसे असमें वह अपना ही प्राकट्म देखती है लेकिन
रौद्र मा भयानक वह अपनेको भिन्न ही मानती है। जिसने
भिम दोनों वृत्तियोंका अनुभव किया है मैसे कसाकरने का-
मेक मोपित किया कि शिव बौर ख बेकही है शान्ता और
दुर्गा मेक ही हैं । गो महाकासी है वही महासयमी मौर महा-
सरस्वती भी है। श्रीरामचन्द्रमीका वर्णन होते ही हनुमानगी
में मक्वहदयमे स्वीकार कर मिया-
मबहसपा तु गसोशम् बीयपुरपा स्वमशकः ।
मास्मा-पुरुष स्वमेवाहम्, यपेसि तथा कुरु॥"
मिस मन्तिम चरणमें जो सन्तोप है वही कलाके क्षेत्रमें
शान्तरस है। गैह्र भयानक और बद्भुत यह तीनों रस अगर
अम्समें हमें शान्त रसमें न से पाय सम्तोप मवें तो मिन्हें पोमी
रस ही न कहेगा।
मगस्त १५१
मेरे साहिस्मिक सस्कार
पुराने जमानेमें मेदान्तकी मिसनी वर्षा मौर मोमासा
होती पी मुससे मागकी साहित्यन्बर्षा कुछ कम नहीं है।
माग साहित्यका तन बहुत सूक्ष्म मौर मटपटा हुआ है। मिम
तंभके अनुसार सिसना कोत्री आसान बात नहीं है। मिस

मेरे पाहित्यिक संस्कार सबकी सानापाहीस मूबफर यनारा भवभूति दोस झुठा पा- सर्वपा व्यवहर्तव्यम् कुतो हपवचनीयता। पमास्त्रीगो तथा वाचाम् सामुत्ये नमो जनः ।। सेक्नि माप साहित्यकारक सामने कौनसा तत्र पाहरदा सपा समानका भाव माहित्यकार मनमाने ही साहिस्मिक हुआ होगा क्योंकि साहित्य विसर प्राकृतिक प्रवृत्ति है। मवलोकन निरीक्षण विचार कस्पना या भावना पर मुस्कट हा वाती है तब मनुष्यस सिसा-योग जाता है मौर मुस्कटताका यह स्वभाव ही है कि असकी मापामें कुछ असाधारणपन कुछ मार्पण मुछपमस्कृति माही पाती है। सुत्कटता में म्वाभाविक सौन्दर्य प्रकट हुमे बिना रहता ही नहीं । यह शोमा पहले तो माप-ही आप फूट निकलती है सकिन बादमें बह पोमा ही सारा प्यान पोर मेती है और सराहनाका विषय बन जाती है। मुसमेसे पीरे-धीरे साहित्यका तत्र यप जाता है। पहसे तो सोकसाहित्यमी ही सृष्टि होवो है। इसमें धीरे धीरे प्रयत्नपूर्वक शोभा सानेम शिष्ट साहित्य तयार होने लगता है। लोकसाहित्पमें दो पक्षण हमेशा दिशाओ देसे है साहित्य मास्म मोर घमशास्त्रके मत्रिम मोर निश्चित बन्धनोंमें वह मही पता । सामाम्म मममावती स्वात प्रवृत्ति और स्वयमू प्रेरणारे वध जब तक साहित्य रहता है समी-राक वह साफ- माहित्य हाना है सदाचार बार सदभिरुचिकी जितनी रक्षा महारपसे युसमें की जाती हो अतनेमे ही वह सन्तोप मानता है। प्रयत्नपूर्वक मर्यादा पिकर मारहके साप सुनका पासन फरमे पाये तो सोकसाहित्यका लोकिन-मन मिट गाता है। शेषसाहित्यकी पड़ी फमष्ठ माना बाद मनुप्यको उसमें एलनी रमानेकी मिन्ठा होती है । मौर मुसीमसे शिप्ट समार- मा साहित्य पड़ता है। मोक्साहित्यको स्वाभाविकता जोर वावमी मुममें दो मा म हो शिष्ट-साहित्यका मसर मुप्तपर पहा हो या न हो में बीधा-साहित्य अपनेको स्वाभामिक सेसकोंकी श्रेणी में ही गिनता हूँ। बनुभव बीर चिम्तनसे पो कुछ और जैसा कुछ सूझे यही भुस-सुस वक्त सिस गलना मैने पसन्द किया है । प्रयत्नपूर्वक साहित्य सेगा तो मेरे हाथों ही ही महीं। शिष्ट समाजमें विचरता हुमा भी मैं शिष्ट समागका नहीं हो सका । जैसा कुछ मममह पासा-का-वैसा ही रह गया हूँ। मुझे मिसका दुख महीं है क्योंकि अस रास्तेसे ही मै मपन अपनेपनकी—फिर वह अपना- पन पाहे जितना स्वस्प क्यों न हो -रक्षा कर सका हूँ। बनगढ़ मनुष्यको सामाजिक म्यबहारमें कदम-कदम पर करपे बनुभयो का सामना करना ही पड़ता है। जैसे अनुभव मेरे मिये वो नतीजे साये । बेक तो यह कि मै समापसे झुकताकर कुषरतकी गोदमें जा परा और दूसरा यह कि मैं अन्तर्मुस हो गया। पहले-पहले ये दोनों पत्तियां साहित्यसृजन करमे न देती थीं। अिसलिये यानी मेममके मुद्देश्यसे नहीं बल्कि बास्म-मविश्वास, सम्पा मोर मुग्पमारके फारण मै साहित्यसे दूर ही रहा। विद्या ध्ययनक रिनोमें शो कुछ पड़ना पड़ा मौरबो कुछ मोड़ा-सा अपने असापारण आकर्पणके कारण नगरमें बंध गया भूतना ही मैंने पड़ा । अपनी साहित्य-क्तिको बढ़ामेका पो कीमती मौका था मुससे मैने कोमी फायदा नहीं अठाया । मुझमें अगर कुछ मी साहिस्पशक्ति पैदा ही हो तो बह अपने अनुभव मौर विचार व्यक्त करनेकी मुस्कटतासे ही हमी है । मोर बह स्वाभाविक ससे सभापगमे ही परिगत ली। काश मुस वक्त मुझे मासरी (गयरी) लिखने की आदत होती! अपने भेक शिक्षकको मैने मैसी वासरी लिखते देखा है । अमकी बासरी पानेकी हमें मिजाजत पी लेकिन बुसका बास्वाद सने बितनी शक्ति हममें न थी क्योंकि वे अपनी बासरी अग्रीमें रिखते थे। असे मगर वे मराठीमें स्मिते तो मेरे पैसे भनेक मुग्म वासकोंको असापारग माम पहुँचा होता । भिवना तो सही है कि चिट्ठी-पत्र और पासरी ही सामान्य मेरे साहित्यिक कार जनसमाजका साहिम है। मेरे खयालसे वही अब कोटिका साहित्य है। दूसरेसि कहने जैसा जितना कए हो अतना ही हम सत-पमि मिलता है और मपने जीवन को कुछ वर्ष करमे बसा हो, पानी खासियत रमता हो रही वासरीके पृष्ठोंमें मा पाता है। जैसी बढ़िया छलनोसे पनी हुमी कृतियां साहित्य- का दर्जा हासिल करें तो उसमें क्या पारपर्य? साहित्यकार मसे कहें कि माटकान्न करित्वम्, सुनको वातका विरोध में नहीं करता । सभी प्रकारको विविधता मोर माकर्षकता मारकर्मि स्वामाविक स्मस मिकल्टी होती है। फिर भी मैं कहूँगा कि परमून एवं वासये मूलं साहिल्पम् । दो!में वास्तविकताका बोसे बड़ा मापार एवा है । मागकरके कृत्रिम गर्ने पत्र मौर वासरी दोनों बनावटो तगसे भी सिसे पा साते हैं। अमका विचार यहाँ किसलिये कह ? दुनिया- की कौनसी पोज नित नहीं होती? सभापण मौर ममन जिस तरह मुस्कट म्यापार हे अमी तप पत्र और वासरी दोनों मा मेनन युतट व्यापार है। हमारे रमपममें साहित्य उपरनेका रिवार बहुत था। ममें तया परमें साकोसे बहुत कुछ करण्या जाता था। सकिन हमारी प्राथमिक पारामा झुग्न पभिरबिसे नयन देनेबारा कोसीन पा। परमें दो बास्पापमोर सकाम भक्तिस पुना हुमा साहित्य पा करनेका रिपार पापामको मन्दिरों में पौराणिकांश पुराण सुनने में मार रातको हरिदासाके सगीतमिषित हरिकोर्डनका मा मूटने जाय दमी साहित्यम- कामा मयूट मास्वाद मिमता या । उसमें भी अर्या कारकी मपेक्षा मालकार मौर दतपपर ही ही हमार य साहित्यापार्म दुर्वान हात पे। परमें सबसे बड़े भाषी संसतक बोरसिक पेजपपनमें मन्हें पयानो लिय मेगास्मीगीरण गप प । मानीसाहब कभी- मी मंसो भन्छ-अम्छे पिकरे पाकर मुनाते प, पूमते-यह- -

बीवन-माहित्य
मते वक्स कठ मिन्मे हुने श्लोष गुमगुनामेकी अन्हें वावत पी।
मर्थ भसे ही समझमें न आये सकिन सस्कृत पागीकी प्यनि-
के प्रति बावर मोर प्रेम तो मेरे ममम वचपनमें ही जिस तरह
जागृत एषा पा । बाम भी मुझे मैसे दो फिकरे याद है जिमका
अर्य में समा सका था। मेक है सावित्री-मास्यानका और
दूसरा है शकरभाष्यके ओक यासान यसका।
जेक तरफ माताजीके मुंहसे सुमे हुने पौराणिक लोकगीय,
दूसरी तरफ सतत सुमापित और बीच समायी हुवी पौरा
णिोंकी गरी-वह मेरा बचपनका साहित्यिक पाषेम पा।
दिलचस्पी आने सगी परिवप्रताप शिवमीलामृत भक्तिविषय
हरिविजय बावि मराठी काव्यप और 'नवनीत' मामके मराठी
काम्पसग्रहमें भाये मराठी कवियोंो गीत गानेमें । विस पुराने
मराठी साहित्यके कारण मेरा सम्दसंग्रह बढ़ा और संस्कत
सोसनेकी पूर्व तैयारी हो गयी।
'संस्कृत मी या सोकसमी? का समग याजमल प्रत्येक
प्रान्तमें चल रहा है। हमने यह सगड़ा पूरपसे मोस लिया है।
लोक-भाषा कोष साहित्य और बुनक देशव सब्दोंकी मुझे कर
है । यह मैं भी मामता हूँ कि अमके युद्धारके विना सोमनागृति
मौर सोकश्चिक्षा सभव नहीं है। फिर भी पो सोग मह कहते
है कि सततकी धुरा फेंक दो और सिर्फ सोकमापासे ही प्ररणा
मो अनसे मैं सहमत नहीं हो सकता । सस्कृत मापा बाहे
जितनी मुश्किल हो असमा पाकरण बाहे जितना पटपटा ही।
फिर भी यह हमारी भापा है हमारी समायी हुमी मापा
मुसमें हमारी बनवाका समाष मौर मुसका मानसिक गठन
प्रतिबिमित इसा है। बुसो पोपणकेशारा ही हम ससति-पुष्प
होमेवामे है । अंग्रगों के सिपे जिस तरह ग्रीष या मैटिन परायी
भापा हे अस सह संसान हमारे लिये परायी नहीं है । हम
मपर संसतसे पोपण सेना छोर सो हम समी तरहस क्षीग
हो जायग। हमारी सोसतिक मेमता मोर सासविक समृटिमें

मेरे साहित्यिक साकार
सस्कृतका हिस्सा सबसे बड़ा है। विश्वास सात साहित्यका
मपन करके बुसमेंसे पौवह नहीं बल्कि बौदह हजार रत्न अपनी
देशी भापामोंमें हमें साने चाहिये और बिस विरासतगी सुगष
हमारे तमाम लेखोंमें महकनी पाहिये।
साहित्यकी उत्तम तैयारी साहित्य-विवेचनस नहीं बल्कि
सर्वश्रेष्ठ साहित्यके गहरे अध्ययनसे हो सकती है। साहित्य
विवचन मुषित मात्राम बोर बहुत देरखे आना पाहिए, वरना
अभिप्राय मौर अमिचि असमय ही परिपक्व होते है।
मौर साहित्यकी सृष्टि सो विवेधनमेंसे हरमिज नहीं हानी
चाहिये । साहित्पके लिये जबर्दस्त सिसूक्षा और दूसर्गकि साप
गहरा विधारविनिमम करनेकी आसूरता प्रधान प्ररमा हो
सकती है। माताका सपने मासकि प्रति प्रेम, पतिपम्नीका
मम दूसरेके प्रति मनुराग भीर गुरुधियोंके बीचका भक्ति
मात्सल्म ये भावमा गितमी बुलट होती है अतनी ही साहित्य
सिसृमाफी वृत्ति मी मुस्कट मोर मदम्य है । यह सिमक्षा अगर
म परिणामी न हा तो बुसे पागलपनकी युपमा वीणा
सकती है । साहित्य बार जितना सस्ता हजा है और समक्ष
बस जितना खगर किया गया है बुतना मगर वह खराब म
कियागया होता तो साहित्यने भारी-स-मारी परिमाम दिखा
दिय होते । भुमकर साहित्य बारमाकी ममृतकता है क्यामि
बह पैतन्यसरी प्रेरणा है।
साहित्यको सिम्हा मोर भुमका केवा मास्वार सेनेकी
रसिकता यह पो पोन बिल्कुल अलग-अगत है। यह नहीं कहा
जा सकता कि केबम रसिम्तासे सिममा पैदा होगी हो ।
सिक्षा स्वतंत्र प्ररणा है । साहित्यको सिमक्षामें तमाम सिस्
साकि सदाण दिशात्री देते हैं । बिस वह बास-विवाह
खराब है उसी तरह छोटी गुममें जल्दी-उदीमें किया हुआ
साहित्य-समन लराम है। दोनों ही मुनसक बह्मचर्य पानी
वीर्यरसा भावपयर है। रोनों में तुमना करनी ही हो, सारतम्य

बीवन-साहित्प निश्चित करना हो, तो 'बीपंपावकी अपेक्षा वाकपात अधिक भुग होता है। मिस पुराने पवनको नये वर्ष साहित्यपर मी परितार्य किया जा सकता है। यह कहना मुश्किल है कि साहित्य जैसी मंगत वस्तुमें मर्यादा किस तरह रमी बाम । फिर भी बिना तो समझ ही सेना चाहिये कि बतिसेवनसे मराबी पैदा किये विमा नहीं रहवा । मतिसेवनसे शायद सस्कारिताकी चमक बा सकती है लेकिन तेस तो कमी नहीं आ सकता। कुछ साहित्पनीरोंको हम मा सूजन करते देखते है । यह मखर साहित्यसृष्टिमा भिकार जीवम पीरों तथा मिम्दा मिशनरियों का ही है। बम्पपनकालम मराठी ससत बौर मंग्रेजी साहित्यके मुतष्ट पंपोंका असर मुन्नपर पड़ा। रवीन्द्रनाप ठाकुरका साहित्य बोर गोपी-साहित्य उसके बाद माये। जिन दोनों राष्ट्र-पुरुपोंकी विभूतियाँ भिन्न-भिन्न है दोनोंकी सामनायें महग अलग है। लेकिन दोनों साहित्यका गहरा बम्पयन करनेपर यह यात साफ मुजे पिना नहीं रहती कि दोनोंका दर्षनरीवकरीब अप-सा ही है। मामुनिकोंमें मोगरफर गनरे स्वामी विमेकामद भगिनी निवेदिता साला हरदयाल मानन्यकुमार स्वामी वायू विपिनचन्द्र पास अरविन्दपोप रवीन्द्र- माप ठाकूर और गोपीगी-मितनोंगा प्रभाव मुझपर मभिक से अधिक पग है भैसा मैं मानता हूँ। आपपर्य यह है कि मैं मोकमान्य विष्कका भक्स होते ह भी और भुनक माम्दोछनमें परीक होनेपर भी सुनके साहित्यका मुझपर बहुत ही कम बसर पड़ा। असमें कुछ-न-कुछ वैसा है जिससे मैं बुनका साहित्य हजम न कर सका । अग्रेजी साहित्यके बारेमें यहां कुछ भी मिलने की भिच्छा नहीं है। मैं सिवना ही कह सकता हूँ कि अपनी साहित्यके प्रति मरे मनमें गहरा बावर हालांकि मुस साहित्यका सेवन तो मैं बहुत कम कर सका है।

मेरे साहिरियड स्वार x करि हों या गवसेसक मुन्हें जीवनका गहरा अध्ययन मा दर्शन होना पाहिये मोर आमकत तो साहित्यकारके लिये मनोविज्ञान, समान-विज्ञान मौतिक विज्ञान और धर्मशास्त्रका विस्तृत मध्ययन करना जरूरी है। सिम बादर्शवक को पहुंचे है उन्हींका साहित्य समानपर गहरा मसर कर सकता है। निकानन्द मिवेदिता रवीन्द्रनाथ मौर गोपीजी मुमपर पो मितना प्रभाव गत सके असका यही कारण है। अनके साहित्यने मुझे पीवनमें प्रेरणा दी हृदयको सास्वना दी, भोर युवा भरिप्यकी असक दिसतायी। भितिहासकारोंका भी मनपर गहरा असर होना पाहिले पा। मेकिन जैसा भितिहास में पाहता हूँ पैसा वितिहास मैंने नहीं देखा है। मेरी रायमें जो विकासम हो वही पपातम्प मितिहास सिख सकता है। x x मेरे विषारसे हमारे दसके लिये रामायण मौर महाभारत भत्यंत पौष्टिम भाहार हैं। दोनों बसग-अलग चीजें है। सिर्फ रामायणसे काम नहीं पड़ेगा। मिफ महामारतसे भी काम महीं पसेगा। यह दोनो संक्षपमें भी मही पर पा सकसे यह पूरे-के-पूरे ही पड़े जाने पाहिय । साप-ही साप अपनिपद योगसूत्र बोर मनुस्मुसि पड़ी आय तो हमारी बहुत कुछ तैयारी हो जायगी। मुसमें भी मीता पड़नेके याद ही सुप- निपामा बम्पयन होना चाहिय । अमेरिकन मोगोरे मिये यो म्पान मोनबसका है वही स्पान हमारी संस्कृतिम मुप- निपाने मारमवीरोंका है। हमारे साहित्यमें मुपनिपदमी परिवाओं मोर पासीमापार यौट सभापोको सभी तरहसे हमारा मूसधन कहा पा सकता है। मुनक मन्दर हो इमें अपनो संस्कृतिकी गगोत्री मिल जाती है । मुनम प्राप्त होनेवासे पीवनदर्णमको मयतन करनेये सिय मुसमें मौतिक- विज्ञान संपत्तिपास्त्र और सामाजिक विज्ञान इन तीनोंको ४ खीर साहित्य शहरोंकी स्पापना करनेवाले वार्योन हिन्दू-समृतिका योग-बहुत प्रसार किया तो सही मगर हिन्दू-सस्कृतिका विस्तार करनेवासा सचा प्रचारक सोमोपड़ीपर युगे हमे सुबेको ही शिक्षापात्र वमा- पर, परीरपर बोढ़ने वस्त्रोंको लाल मिट्टीसे रंगकर 'न धनेन म प्रमया त्यागेनैकेन ममृतत्वमानः कहकर धर्म सपा अमृतत्त्व का प्यासा संसारको पिसाने के लिये निकस पड़नेवालासर्वसंगपरि- त्यागी परिव्राजक है । पिस मार्मक माय परिवाणकने सो युत्तर भारतमें ही विहार किया, किन्तु असके शिष्योने पक्कोमेन मिने क्योमम्' कहते हुने सारे युरेशियाको व्याप्त कर दिया । विविधता सृप्टिका मूलमत्र है। मिविहास-विषासासी मह मिच्छा नहीं है कि बेक हो सस्कृतिका प्रसार सारे जगतमें हो। रिविपतामे अकलाको प्रम्पापित करनेमें ही प्रभुको बानन्द है। जिसे अंक साक्षात्कार हुआ है मुसफी समममें मह तत्व महीं माठा बोर मिसीसिये अपने ही तत्वका सार्यमीमत्त प्रस्थापित करनेके मिमे यह निकस पड़ता है। फिर पसा भी नहीं है कि यह प्रभारक हमेघा निःस्वार्य ही होता हो । नूसन तरपप्राप्तिमा पुभोरसबके समान आनन्द मय पेटमें म समा सका तब मुसम्मानी मर्मको सारे मालममें फंसानेकी गरजसे मिस्कामी धर्मवीर आगे बढ़े। बासपासकी अंगसी पातियाँको मुसलमानी भर्मझी अश्मता मासानीसे पसय मापी बार ने मुसमे परीक हो गये । दूसरी तरफसे मुसलमान वीरानी संस्कृतिको स्वीकार किया। किन मुसलमामी धर्मको माममगीर (सार्वमीम) बनाना हो तो हिन्दू और बीसामी सस्कृतिर्योपर, मा कि पूर्व पीर पश्चिमके छोरोंको सेंमाम रही पी, भी विजय प्राप्त करनापरीपा। दैवयोगसे हिन्दुस्तान मौर पूरोप दोनों जगह मिसी पर्समें संपत्ति मष्ट हो चुपी पी। सुरपमे छोटे-छोटे राष्ट्रक दूसरोसेसर मरते थे और हिन्दुस्ताम मैं ममेकमाविमा और मनेकछोटे-मोटे रामा'म यहा या तूबा' कहकर बापसमें भगा ऐ । माभाविक मपये ही साहसिक

संसतिका विस्तार
मुसएमानाफे रिये फुरान समपार और व्यापार प्रसार करना
मासान होगया । मुससमानोंने स्पेनके अदर मरहम्बा (सार
महस)बनाया और मागरेमें साबमम । ठाउमहस पाहे जितना
मुन्दर क्यों न हो लेकिन आखिर है सो वह अब कम हो।
ममतार मेगमफो ही नहीं बल्कि साप-माम विरामी मस्कृतिक
मिस्वारमो मी मुमो गर्भमें दफनाया गया।
युरोपमें श्रीसामी धर्मका प्रचारसो बहुत ही हुमा पालेकिन
बीसामी पर्मका नम्र नीतिशास्त्र यूरोपीय मोर्गोंके गले कदापि
सुसरा म पा। मेक गाळपर तमाचा पो ता तुरन्त दूसरा गार
घामे फरनेकी तैयारी पूरोपमें किसीमी समय म पी । जैसी
हालतमें मुसलमानी तरूवारपीमार शुरू होते ही यूरोपनी क्षात्र
वृति गोधर्म वायी और शार्लमाम राबाके समयसे एकर मार
तम मुसलमानी सत्ताको घरमादेकर यूरोपमे बाहर निकाल देने
की कोशिश चल रही है । मब तो भैसा मारम नहीं देता गि
मुसष्टमानी समतिको सिफ़ यूरोपसे निकाल बाहर करके ही
यूरोपीय राष्ट्र सन्ताप मानकर चुपचाप बैठ जापगे। ममीका
महावीपमें मीसायी और मुमरमानी दोमा धर्म अपना-अपना
विस्तार करनेकी कोशिश कर रहे है । इसमें मीसामी धर्मकी
अपेक्षा मुसममानी धर्मको अपिष सफलता मिरती है मिससे
भीसामी सोर्गोको बहुत दुम होता है । म्यादातर मुसलमान
राष्ट्रको यूरोपकी जनताने मात्र स्पाप्त कर रमा है। मिसो
परिणामस्वरूप कमी-न-मी मुससमानी राष्ट्र फिरसे सजीव
होकर मीसामी राष्ट्रपर हमला किये बिना म रहेंगे। यह तो
नही कहा जा सकता निमापात प्ररपापातके निर्दय नियमके
गिरमें फैसी ये दो सस्पतियो भिस सरह कबतक रहती ही
रहेंगी मुत्साहने प्रथम पोशर्म सारी दुमियारो बीतने के लिये
निकमी हुओ मिस्सामी समतिमो गूरोपबिम तरह सह
मिसी मोर मुसका गर्वम्बर मुतर गया मुमी तरह हिनुस्तान
में मुसरमानी सल्तनवका सिपी और पराठोकी

बीवन-साहित्य
पर्वम्त मिरोष हुआ और यहाँ भी मुसलमानी सस्कृतिका
अमिमाम पूर चूर हो गया। 'तुम मपमे धर्मका पासन करो
हम अपने धर्मका पामम करेंगे मह हिंदू धर्मका स्वधर्मरहस्य
मुसलमानोंकी समाप्तमें आने लगा है। कुरान परीफ़ भी मेक
पैसा वचन है कि सुमको तुम्हारा धर्म बौर हमको हमारा
धर्म मुबारक हो।' यह मासूम कर सेना जरूरी है कि चुस्त
मुसम्मान मिस वाक्यका क्या अर्म एगाते है।
मीसामी भर्ममें बसलमें देखा पाय तो महालीके हिम्मे
स्पान ही नहीं है । मुसलमानी धर्ममें धमप्रसारके लिये लड़ना
पुण्यप्रय माना गया है। वितमा ही महीं बल्कि उसे परम्प
समझा गया है । हिन्दू धर्म बीपके मार्गको स्वीकार करता है।
हिंदू धर्ममें धर्मानुकूल रक्षाके लिये युद्धको निहित मामा गया
है। पारमरक्षा या धर्मरमाके लिये करमेके युवको हिंदू धर्म
'मदछपा चोपपन्न स्वगहारमपावृतम्' मानता है।
That thou mayest injure none, dove lze bo
And serpent like that nonc may injurc thee.
अिस यामिनसके वचनमें हिंदू तत्वका पवास्पित वर्णम
किया गया है। हिंदू लोगोंमे अपने वयानका प्रयत्न तो किमा
है लेकिन पदका सेनेकी पुति मुन्हें कभी नहीं सूनी बार
बिसीलिये आग हिंदू मुसलमानोके आकसाप पनेकी समावमा
कल्पमा तो आ सकती है।
पश्चिमी ससससि अर्पप्रधान है। हिंदू-मुससमान संस्मतिर्योमे
जीवनो बार्षिक पहलकी मोर प्यान ही म दिया। बुसके
प्रायश्चित्तके सौरपर दोनोंको भाग पश्चिमी सत्तारे पाशमें
पकाकर रहना पड़ा है। जीवनको परिपूर्ण मनाना हो पार
मापिकके साम अहिक मस्याण साभमा हो तो पैसा कि श्री
वेदम्पासजी कह गये है
पर्षिामा सममेव तेम्पम
हमने लिसमेंसे मेक अंग प्रति सापरवाही परती । अपनी

खुशीसे हमने जिस मंगका अनुशीलन म किया सुसका
मनुशीलन पराभव और परतंत्रताकी कठोर पासा बीस्वर
ने हमसे कराया। पैनसिम्हामिक लोग पाहे नो कहे लेकिन
मिम्मामी संस्कृतिमें महांगीर बननेका मोह मब नहीं रहा है।
जिस तरह हिंपुढेने वरकी खुटि म रखकर सिर्फ़ अपने बचाव
के लिये ही विरोध किया भूस नए हिन्दू-मुसलमानोंको मेष
होकर सात्विक वृत्ति द्वारा मौर आरिमकममका प्रयोग करके
मिम अर्मपरामण पश्चिमी संसतिका विरोध करना चाहिये।
मिस मंगम सस्कतिका तीसरा ममूना हिन्दूधमर्मेसे ही
निकसे हमे पौर धर्मका है। मिस धर्मको भी सार्वभौम वममे
की पहमेसे साहसा पी। किम असके सापन सौम्य और
मारिवक ये । मिसलिय भुसके विस्तार या संकोरमें रक्तपात
की कोणी मावश्यकता दिवाभीमदी। मिस पर्ममें सरयका
जितना अंश है बुसका प्रसार वाप-ही-आप होता है मीर
प्रामक कम्पमामें या बहकार तलमें जमकर रह जाता है।
मिस तरह समुद्रमसे शुट पानीकी माप बनकर माकाशमें ए
जाती है और सारा ममक नोये रह पाता है अस तरह बीजा
पर्मपा बामसक होता आया है।
हिमुस्तान ही सब भौका ननिहाल है। पोकी म्यवस्था
करनेकी शक्ति हिन्दुस्तानमें है । हिन्दू संस्कृतिमें जगमकी
मपेक्षा स्थावर तत्व विप है । मोर असर पात तो यह है कि
हिम्मू समतिमें महकार नहीं है। मव संस्कृतियोंक समम्बयका
प्रथम प्रयोग परमेश्वर हिन्दुम्मानका छोर मौर कहाँ पाकर
करेंगे?
२
जीवन-चक्र
तपस्या भोग मोर पसयह भेक महान् जीवन-या
ममुप्प किसी कामनाम प्रेरित होकर संकम्प करता

पर पौषन-साहित्य संकल्पको सिसि के लिये मनुष्य बिन-बिन कार्मोको उठाता है में सभी उपके नामसे पहचाने जाते हैं। काम सुर-वासद अपवा स्वत प्रिय होते हों सा नहीं किन्तु संकल्पसिविकी बाशा हीक कारण मनुप्प सुनको प्रम या उत्साह-पूवक उठा मेता है । इस तपके अंतमें फस-प्राप्ति होती है । फल प्राप्तिके बादकी मिया ही मांग है । फलोपभोग हमारी पारणासे भी गूढ पस्तु है । यदि फसोपमोगहें केवल तृप्ति ही होती तो उसीमें मनुष्यको आरम-साक्षालार हो जातां पर फसोपभोगके आनम्ब हीमें विपण्णता भरी होती है। हम हरेक आनन्दमें अनवाने जारमाको प्राप्त करना पाहते हैं। पामना-पूर्तिसे मिमे हमे आनन्दके बाद अक क्षणमाप मोहनन्म सन्सोपको प्राप्त कर विस कहता है कि मैं जो चाहता पा पह यह नहीं है। जितने ही से सर्पत होकर यदि मनुष्य कामनार्मोसे विमुख हो जाय वो उसे पारम प्राप्तिका मार्ग मिल पाय । परन्तु सत्यका मुल सोमे उसकनसे ढका होता है । एक संकल्प पूरा नहीं होने पाता कि पूसरा संकल्प असीमसे अत्पन्न हो जाता है और इस तरह फिर मश्री प्रवृत्तिम नप तपमें और नये भोगमें मनुष्य बहने लगता है। विसमें यन्त्रको स्थान कहाँ है ? प्रत्येक माम और काममा से किया हुआ प्रत्यक तप प्रकृतिसे लिया हुआ ऋण है। मनुष्य मुसे चुराकर ही भूग-मुक्त होता है । मुम भन्न साना है मिसी लिप मैं ममीन मोतता असमें पीर वोमा फसम कटने तक सतमें परियम करता हूँ मौर मिस तए ममीनका सार निकासकर उसका भोग करता हूँ। मेरा धर्म यह कि मैने भूमिसे जितना सार लिया अतना ही मुसे फिर सोटा । जिस तरह भूमिका असकी पहली स्थिति प्राप्त करा देना ही यम-पर्म है। प्रवासमें मैं किसीरे यहाँ रात-मर रहा । मुक्त रसोई बनानी है, में परमाल पास गर्तन मांगकर लेता है। मब बर्तनों

पर
साना पकाना मेरा तप है मौर मागन करना मेरा भोग ।
मितना करनक बाद भरवाने वर्तन मौजकर जैसे ये वैसे ही
करके द देना मेरा यम-कर्म है।
मुझे सामाव या भपरस्नान करमा है । मैं पानी निकाल
सेता हूँ तो यह मेरा तप है स्नान करता है तो वह मेरा भोग
है। अब मन कौनसा ? बहुतेरे मनुष्य-मगमग ममी-
विषारतक नहीं करते कि पिसमें कोसी त्रिया वाकी रह गमी
है। शास्त्रोंमें हिस्सा है यदि तुम वासाबमें स्नान करो तो
जितनी तुमसे हा मक असकी कीपर निकासकर बाहर फेंक
दा। यही हमारा यश-कम है। अमें नहाते हों तो सुस
कअरे आसपासकी गवगीको दूर करना हमारा यावत्यक मम
गीता कहती है या जिस परमा यश-कर्म नहीं करता
वह पोर है। वह पापी ममप्य घरीरका तकाफ दना महों
पाहता (पपायुरिन्द्रियाराम ) समाजकी सेवा तो मे सेता
है पर असस मुपार ही ही पोज मोटाना नहीं जामता ।
यो मनुप्य भोग करता है पर पस नहीं करता उसका यह
मोक प्रष्ट होता है फिर मुसके लिये परमोक सा होम
होगा?
मिस पन-नर्मका मोप हो जातेस ही हिन्दुस्तान कमाल
मोर पामर बन गया। हम स्त्रियसि सेगा लेता है परन्तु मुसका
बासाहें नहीं देते । पिसाना परिश्रमका भोग करते हैं
पर निसस किसामोंकी मामी हो असा मश-कम नहीं करत ।
हम अमयोंको ममान-सेवाका पाठ पढ़ात है बम-बम
भी मुनमे सवा मते हैं, पर अमरे मुसार-सपी यज-कर्म
तरमा म करने जितने हामतोर हम बन गये है। हम
सार्वजनिक साम प्राप्त करनेका सा दौड़से है किंतु कर्मयों
का पासन मायद ही कभी करत । भिससे सारा समाज
दिवालिया बन गया है।
है

बीवन साहित्य मोक्ष-क्षास्त्र कहता है-'न्यायके लिये भी तुम्हें या करना चाहिये । भोगके लिये किया हुआ तप मामा कर्म हुमा यम-कर्म भुसकी पूर्ति है । तुम तप तो करते हो पर मम नही करते घिसीसे तुम्हारी वासनाः अनियन्त्रित स्पसे बहती है। यदि तुम यम करने लगो तो भोगकी मिन्छा बसर मर्यादित ऐगी तुम्हारा जीवन पापशूम्प हो पायगा । हरेक मापकके पन्मके बाद विशु-सबपके लिए स्त्री-पुरुष यदि सात वर्ष ब्रह्मचर्यमें बितानेका निश्चय कर में तो उन्हें दीन बनकर समाजकी वमा पर बापार रखनेका मौका हुनपर महीं मा सकता। या करमेके बाव-ऋण पुकानेके गाव-ममुष्य जो तप करता है को भोग भोगता है उसका वह अधिकारी होता है उससे असे किस्मिप (पाप) नहीं प्राप्त होता । बुसकी प्रवृत्ति सिप्पाप मौर मुम्मतिकारिणी होती है। पर यदि मोक्ष प्राप्त करना हो सो प्रवृत्तिको छोड़ देना चाहिमे- अति कामना तत्प्रीत्यर्प किया थानेवाला तप मार भुस तप के द्वारा मुत्पम्न फलका अपमोम मिन तीर्नोको त्याग वेमा पाहिये । परन्तु मनको तो किसी तरह ही नहीं सकते। निष्काम-ज्ञानपूर्वक मन-कार्यमेव-करना ही चाहिये। अससे पुराना ऋण पुक जाता है अपने सम्बन्मियोंका हम टल पाता है समावका सर्व-सामान्य मार कम हो जाता है पूपीका भार हल्का हो गाता है, श्रीविष्णु सतुष्ट होते हैं मौर मनुष्य मुक्त हो जाता है। हम बागी रहे हैं अिसीमें सैकड़ों स्यक्तिोंका ऋण हम मेले हैं। प्राकृतिक शक्तियोंका चोप है ही समाजका मग मी है माता-पिताका म मो है समाजको हर प्रकारसे संस्कारी बनानेवासे पूर्व अपियोंका भी प्रग है मौर परम्परा की विरासत हमारे लिये छोए पानेवाले माता-पिताओंका भी जग है। ये सब म्हण पंचमहायों द्वारा पुका देनेके बाद ही - ११ तुपाडा मृत मनुष्य मुक्ति या मुक्तिका विचार कर सकता है। मिस या-कममें पर्यायसे काम नहीं घसता । ऋण जिस तरहका हो यग भी असी तरहका होमा पाहिये। विद्या पा पर गुरुस लिया ऋण गुरुको दक्षिमा पर देनेसे नहीं पता बल्कि गुरुके दिये जानकी रक्षा कर और मुसे यहाकर मश्री पीदीको देना ही सच्चा यज्ञ-कम है। सृष्टिमें नीम कुछ भी नही होता पो-कुछ है नुसने ही काम चला ऐना चाहिये। मिसरिये हम अपनी प्यमंछि साम्यावस्पारा जितना ही मंग परते हैं अतना ही असे फिर समाम कर पना परम भावत्या यन-कर्म है । आका जितनी भाप मेता है मुतना ही पानी फिर दे देता है। समुद्र जितमा पानी लेता है भूतनी ही भाप वापस दे देता है । भिसीस सृष्टिका महान् पक्र बरोक- टोच बसता है। यह-बसको ठीक-ठीर पसाते रहना पुर प्रवृत्ति है । निष्काम हाकर त्याग-मावस कम-से-कम पहातम अपना सम्पप है जिस पक्रया वेय भटाना ही निवृत्ति पम है । कुछ भी काम न मरना निवृत्ति नहीं वह यो विश्गुरु हरामवोरी ही है। प्रगाका निर्माण से प्रजापतिने युसफ साप यनका भी निर्माण किमा मिसौलिय प्रजापतिक भूपसा योग हसका हो पपा मोर अिसीलिय प्रमााका स्वावलम्बनमी स्वतता मिमी मोक्षकी सभावना रही। सुपारोंका मूल रेसमें पली बार भीड न हानेपर भी छोग झगड़ा करते हैं। यदि हरेष मनुष्य अपने पैठने योम्म जगह रेकर बैठ जाय वा सभी मुप्पस यठ सके पर पिवन ही माग विमा पारण स्थायी भौर ममुप्प-शाम होते हैं । उनका यह हछ हाता है कि सह-भिपर जितनी जगह रोकी जा सक अधमी रोपकर ही हम मानग २२ बीवन-साहित्य फिर परवाह नहीं, यदि उन्हें इंसा करते हो परा भी माराम म हो बहिक भून्हें असष्टा दुस भी बुठाना परे । चके पर अधिक जगह रोकने के लिये यदि बिस्तर म हो तो मे पासपी ही मारकर ठगे, और युस पासपीको भी मितनी पोसी करेंगे कि पैरोकी सन्धियाँ दुसने लग पायें ! जयसक मुनकी मात दूसरे को म सग माय तबतक सुनके मनमें यह विश्वास ही नहीं होता कि हमारे स्वार्यकी पूरी रक्षा इबी है। औसा म करके भगर हरेक मनुष्य सग्मनसाके साप अक-दूसरेकी सुविधाका खयाल रखते हमे सतोप वृप्तिका विकास करे तो किसीको मी दुस म हो भौर सभी मारामसे प्रयास कर सकें। शहरों मोर देहातमें सब साग पर वनवाते है जुस बक्तमी सिसी प्रकार पड़ोसी-पड़ोसी में भगड़ा हो जाता है । मुस जगह भी लोग सुख-दुम मषवा सुविमा-असुविधा मादिका विचार छोड़कर महम स्वाप धर्मके प्रति बफादार बने रहने के मिथ्य ही कभीबार माते हैं। यदि मेरी अकबासित भर पमीन पड़ोसीको देनेम मेरी कुछ भी हानि न होती हो और मेरे पड़ोसीको वह मिस गानेसे असको मुत्तम सुमिमा हो जाती हो तो भी मुझमे पर स्मार्प नहीं छोड़ा जाता मेराणीही नही होता। कदापित् मुमा. मिस वक्त नहीं सटि वा भी पाय तो मेरे सग-सम्बभी या महोस-पड़ोस के लोग मुझे दुनियादारीगी पतुराश्री मिलाने लिये आते है-तुपागम तो नहीं होगया है जिस तरह कर्ण सा दानवीर बनकर परोपकार करने सगगा तो मोग तुझे दिम दहार बाबागी बना देंगे। कुछ वासनकि किम ससेया या नही ? अरे ! मुसका तो काम ही रह रहा है पांच-सास सौ म्पय मांग से सुससे । सेरा तो हक ही है छोरता क्यों है? म दे रपये तो सोता रहे अपने परमें! मौर हमें परवाहीक्या पड़ी है'षमीन अपनी नहीं भागे पोड़े ही जाती है। स्वार्ष-धर्मकी यह यात्रा मस्पीत हो ही नहीं सकती। स्वार्प-धर्म मागे पड़ोसी-पर्म फीका पड़सा है अपवानष्ट हो जाता है। सिसिय 7

मिस युगका नाम कलियुग पड़ा है। कलिमा म सह ।
पुटम्योंकि मीच भव बिगाइ-सम्बन्ध मोग जाता है
भी यही बया होती है। जो परापे पवे सम्बधी इमे, असभेव
वहीं तो प्रम-धमका म्मबहार पाहिम पर मही वहाँ भी म्पब
हार रीतिकी ममह मुत्पन्न होगी ही। मान-सम्मानॊम कही छोटी
से-छोटीरीवि भी पहने म पाव । मामिमके यहाँ गासिया भी
सुननी पड़ती हो तो परवाह मही, वपतरमि अफसराफी फटकारें
मीषा सिर करसे सुन सकते है परन्तु ममभीके पास सो रीतिक
मनुसार पूरी चीन जरूर ही मिलमी पाहिये नही तो दूलह
का कोटा मेजानेको संपार हो जाते हैं। विवाहका मगसा
पाण होता है मीर्ष्या और इस ! यही दशा है जातियोंकी।
पारस्परिक भविपनास मौर अमीम स्मार्प-परता। किसीम
मितनी हिम्मत ही नहीं कि अपने स्वार्थको छोरदे। यह
वापरता ! पहा देधिये वहाँ यह दुराबी क्सी हबी है ।
जब भरोंमे मोर जाति-पातिम यह रचा है र गप्ट्रों
राष्ट्रोके बीच दूसरा और हो ही क्या मकता है। यदि पकौमी
राष्ट्र निर्वस हो वो मुमपर यमर ही मात्रामण परना पाहिये।
यदि यह बसमान हो वो हमेशा असका पर मनमें रमना
पाहिये मोर मुसके खिलाफ दूसरे साकतवर राष्ट्रकि साम
मिलकर कोषी पायवरना पाहिये । यह भी नही पिसमाम
बस परोसी हो वो मोतिम रहे । क्योंकि मनुष्यको समानता
पर प्रिय हगवी है? वही मी अकस दूमय मागे बढ़ने के लिये
प्रयत्न करता रहता है मिमीमिये अन्तमें वहाँ भी अविस्वास
मौर विरोप मा पाता है। हरेक पल मही रहता है कि
मपन बचाव तपा मारम-रक्षणक सिये हमें मितना तो करना
ही पड़ता है। पा प्रवस राष्ट्रॉो बोप यदि भेक छोटा-सा
राष्ट्र हो तब मबम राष्ट्र या पिकार करते है -- परि में मिले
म वायूँ तो वह (मरा) तो बार ही रिस ना मेगा और
गाहर यहिउ बना हुमा यह मासर बार बारमण

बोधन-साहित्य
मिसलिमें क्या बुरा होगा, यदि मैं ही यह अन्याय करू?
जितने साम्राग्य बढ़ते है सब मिमी नियमानुसार यस है।
स्वार्य बोर बग्यायको यह प्रतिस्पर्मा पान यूरोपमें मर्य
म्पापी हो गयी है और मिसी सितिपर युसपी राजनीति
बहती है। किन्तु घिससे यह मान मेना भूर है कि यह तो
मनुष्म-समान ही है । भले ही मूराप बाप मुम्पपम्पित पापा
विक शक्तिको सुधार मान पर मम्मा सुधार सो प्रम-धर्म
और पड़ोसी-धर्मम ही है। हमें श्रद्धापूर्वक अपने अपर मिस
पड़ोसी-धर्मरा विकास करना पाहिये । यो सग्यमता दिस
लात हों अनके साप मैत्री मोर को दुर्गन वन गमे हों अमो
साम मसहयोग करना यही प्रम पर्मपा नियम है। प्रेम-पर्म
सहानुभूमि रखता है सहायता देता है परन्तु दोन पनकर
सहायताको अपेक्षा नहीं करता। प्रेम-धर्म निर्भय होता है
भिमीलिय वह अमर्यादित है। हम मिससे प्रम करते यदि
असपी पाक्ति पड़ती है तो हमें भय नही होता वकि हमारा
मित्र भितना ही निर्वस होमा अतने ही हम कममोर माने
जामंग।
पहा अविस्मासमा बातामरण हा पहा असर पानेक
लिये प्रेम अमापारण धैर्य और सहिप्मुवाका विकास करता
है मन वनकर बह पड़ता है मौर असीम म्यार्प-स्याग फरक
पिवयका प्राप्त करता है। प्रम-धर्ममें पाई दिन रिये गैवाना
पकर पाता है किम मतमें अमकी बक्षप पिवय होती है।
भिम प्रेम-धमका अपयोग कुटुमस पर राष्ट्रोके संबध पर्यन्त
फैला वमा मही सब मुमारीफा मूर है भौर यही फल भी है।
४
सुषारको सम्ची दिशा
मनुप्यकी स्वाभाविक पत्तियां और भुसकी सटि अफ
सरके मनुष (समरस) जय हागी तय होंगी बाग ता

1 सुपायी तो पिया बस्तुस्पिति वैसी नहीं है। याम तो मिन दोनॊमें गिरोष है। पासो पो मीठा सगता है मह पथ्यकर महीं होता। जो सुखप्रद प्रतीत होता है वह कल्याणकर नहीं होता। बा प्रय होता है वह भय नहीं होता। पतम्यन्मार्ग दुसदायी लगता है और नुसका मार्ग हितकर नहीं लगता। हमारी स्वाभाविक वास नामें हमें माप-ही-माप पपु-जीवनकी मोर स्वीचार ले पाती है । ईश्वरमे मनुष्यको वह विवेक-बुटि दी है बो पशुको नहीं दी। पराओंको कार्याकार्य-विषार नहीं होता मनुष्यको यह विचार परना पता है। पर हमारी वासमा कमी पार मितनी प्रबल हा पाती है कि विवेटिको दवाकर वे तर्क- पास्तिको मपने अधीन कर लेती है और यह तर्क-शक्ति न्याया न्यामका किसी तरह विचार न करनेवासे पट-मस फीसके ममान वासनामोंका पक्ष मेती है । जो मुसकारी है यही पस्याण मारी है जो प्रय है वही थेय भी है-जिस तरहकी दसीलोंकी पूर्ति करने में त-शक्ति वर्ष होती है । त्याग धानन्को मृत पर भोको राससा वि पाती है। तर्क-शक्ति भी मपुरबागीसे महती है मनुष्य जन्म भोग हीक लिये सा है नाना प्रकारम विपयांचा अपभोग परमा मनुष्यका हर है। जिस मधिमार का काम मुसे पर अठाना पाहिय । भोग हीमें ता मानव मन्मको सफलता है। भोग भमता ही मसति है मही मुपार है। मिस तरह अयमको धर्म समझनेस आत्मवरना होती है। मिस तरह बहुतेरे सोग वासनामों का हो गय हैं । मव तो किसे 'मु कहें और किन कहें यही नहीं मूम पड़ा। मुहरु ममका वक-शक्तिका आभार मिसनेपर बानेवारी बन परम्पराग पौन गफ सरता है? जिसम बारम-सयम नहीं हो सकता मे ममुप्प-वाति भिखना ऊँगा पा सकती है। जिसकी पल्पमा किस तरह हो सपती है। मैस साग मानव-माविका प्य कम निश्चित कर समय है मानव-वातिका म्येय गया है ? मुम्भ पृसियो मौन-सी है ' आर्य जीवन-साहित्य बीवन कैसा होता है ? अईत् पदका मार्ग कौन-सा है ? समान- का मन्तिम ध्येय क्या है ? बादि विपर्योका निर्भय जैसे मन पिकारी मनुप्म नही कर सकते । धन-सोमके कारण पगका सत्य शूम्प हो पाता है। मुससे यदि ये ही सवाल पूछेगे तो बह कहेगा-"पन ! यही तो मानव-जातिका ध्येम है। मर्पो हि कबसम्। भङ्गार-पूर्ण अपम्पासोंको पढ़नेवाले स्त्री-संपट मनुप्पसे यदि हम पूजेंगे तो वह भी तुरन्त 'रम्पा रामा मुवतनुम्ता' की पातें करने लगेगा। सिसी तरह क्रिकेट मौर टेमिसक मसनेवाम कहेंगे कि हमारे मेसों हीसे मनुप्य की उन्नति होगी। गाना-बजामा ताश या शतरंज चालना पुर्दार करना और चिड़िया पाममा अित्यावि पुनों हीमें गो मोग मस्त रहते हैं उनसे पूछा जाय कि 'भाइयो । मानव पातिका अतिम ध्यय क्या है ? मौर फिर अनर्मेसे मेक-अफके अगाय मुन सिय बायें। अस मनासक्त साम्पस्पित मनवाल महारमा ही मिन्हाने पशु-त्तिपर विजय प्राप्त की है और जिनका मन भुत स्वार्थ के वश नहीं है यह ठीक समान सकते हैं कि मनुष्यका मेय किसमें है। जिस सह पारी प्रतिवादी यह नहीं दस सकते कि मुकदमे में न्याय किसके पक्षमें है निष्पक्ष पंप ही असे देख मकवे है, मिसी तरह मामम-जातिका ध्येय गया है, यिस बात- 'को निरपेक्ष और पमम स्मृतिकार-समागम व्यवस्थापक- ही पतला सकते है। मनुष्य-जाति मपनी पशु-वृत्तिपर विजय प्राप्त करके कितनी भी पा सकती है यह बुट, मीसा मौर सुकराम जैसे अमेक महात्माओंने प्रत्यक्ष उदाहरणसे यतमा दिया है। संसारके सभी देशोंमें सभी जातियों में सभी धर्मोमें और सभी सुमि भैसे देवी पुस्प मुत्पन्न हुने है। मिसपरसे मिस है कि प्रत्येक मनुष्य प्रमरन कर मुम भूमिका वक पहुँच सकता है। कहा जाता है कि मनुष्य मपने पुस्पार्पसे क्या-क्या कर . सुपारोंकी वायोरिया सकता है महाँठक मपनी अन्नति कर सकता है मित्पादिका मपा पाठ देनेके मिये सपा मनुप्यके सिये युसमा ध्येय निश्रित कर देनेके सिय परमेश्वर अवतार मेकर मानव देह पारप करके, मानवोतियाँ करता है। मिस कपनका रहस्प भी यही है । ध्येय सो मानव-बातिकी सुन्नतिमी परि- सीमा है। मुम किमी बाम समय मास म्यक्ति मौर शुस पक्तिको शक्तिके अनुसार बदमना नहीं होता। अक भी मनप्य यदि मिस भ्ययको प्राप्त कर दिसा दे तो मममना पाहिमे कि वह मसम्भव नहीं । मिम प्टिस देने तो मनुप्पक जीवन श्रमक दो सिर होते है । भैक सिरपर विषय सोमपता आहार-निता मम मादि पापबहार-परायणता साप तथा हक होता दूसरी मोर निविपपता निर्भयता मिन्द्रिय-दमन परोपकार-परायणता मोर तिम्म हाते हैं। हरेकको मपनी भक्ति मौर परिस्पिति मनुमार मिस मुम प्मयका ममसमें सानेका प्रयत्न करना पाहिय । परन्तु सपने पोए रहनेामोको मममी या पापी कट फर मनत्री हेमो न अामा बाहिये। भिसी प्रकार अपनेसे मपिक अरमाहा म्पक्तिमाको पागस पहनेमे भी काम न पमेगा । मोर पाहपुग मी हो मुमतम समयमा किमी भी समय ममस्य या अप्राप्य परार देना तो मरामर भूम है। क्योंकि पदि हम प्येयको अक बार भी मुमरे मुम्म मासनम मीचे गिरा दम ता भुसका पतमुतसे नहीं बल्कि मान्त मुनम विनि- पात हो जामगा । बो म्पिर नही बह प्पय मा और मुस के लिये स्नेह दया मुम्ब मौर जीवन मिन सभीको विसागमि देनेको तैयार होने मोम्य निष्ठा मनुप्यमें किस तरह मुत्पन्न हो? बिमलिय म्पयको मपनी मुंपामास कमीन गिराना पाहिय । माराप्य-देवता के समान हमेगा भुमीकी मुपासना हानी चाहिये मोर मुमा साप युतरोत्तर सामोल्प, भान्निम्प सास्य मौर सायुस्य प्राप्त करनेका प्रयान हाना बाहिय । जो बीवन-साहित्य सरासर पीछे एह गये हो अन्हें वाग से जाना चाहिये । यो धागे या गये हों भुर्दे अससे भी बागे पाना चाहिए। ध्येयको पा जामे तक किसीको कमी म रुकमा पाहिये । सभी सामाजिक सुधार बिस वृश्य ध्येयकी कत्तंम्पनी मिन्द्रिय-निग्रहकी मोर सयमकी दिशा में होने पाहिये । वो नीच हो उन्हें पा मुठा देना चाहिये । पो धूप हों उन्हे नीचे गिराना पमित्र प्पेयको छोड़कर सुखप्रद देन या मानकर मपोगामी ध्येयकी उपासना करना तो कुवार अषपास है। आजकस सूधार तो सब चाहते हैं परन्तु मु' और बीपके मेटको कोत्री भी नहीं देखत । पिनकोडमे जिसे मप राध नहीं माना कल पास होकर आग हीस रोब माँठमेवात सक्टरोंने जिसे निपिर नहीं समझा बह सब करनेका हमें बपि कार है-हम वह पहर परेंग । पूर्व-परम्परा अम्प मनोवृत्ति जिसको रक्षा और विकास माजतक किपा अस पवित्रताकी भावना शास्त्र (ड़ियोंका तो पूछना ही क्या ) सपको हम पता वसा दंग यह है बागा हमारे समाज-मुपारपाकी मनो वृत्ति । यह में नहीं पहना पाहता कि धिनक मार्यक्रमकी ममी वा त्याग्प है मगर, पिन सभोको पड़ गो वृत्ति है असक प्रसि पिरोप अवश्य है । अपने सभी सामाजिक म्यवहारमें म्याय और सुदारता हामी पाहिय । रिसीपर टोका-टप्पणी करत समय- मनुष्य प्राणो म्बस्नगील है मिन्द्रिम-समूह बलवान है परि स्पिति के सामने मनपा निचय स्थिर रहना कठिन है आदि पर मान देकर यदि किसीसे कोयो भू हो गी हो सो-अस पर फोप और तिरस्कार हमें न बरना नाहिये बस्ति दया मनुकम्पा और सहानभूति हो दिखानी चाहिये । यहाँ सामाणिक अन्याय हो रहा हो यहाँ अनापोंका रक्षण-पालन परना भी हमारा कर्तव्य है। सामाजिक भावभका नीय गिरामा कापि योग्य नहीं है । और पा मुधार करत है यह बैस होने पम धि पाहिमें जिनमे सामारिक म्याय पवित्रता मोर सामर्थे भड़े। ५ सयममस स्कृति मयम मस्ताविका मूल है । पिसासिता निर्वसता मौर अनुसरणक वातावरणमें न संस्कृतिका मुभव होता है और म विकास हो। मिम तरह पम्वीम मर्प सक व ग्रह्मचर्य रसनेवारे- को सन्तान मुद्द्ध होती है, मुसी तरह संयमये मापारपर निर्माण की भी सम्मृति प्रभावशाली मार दीर्पगीपी होती है। पिर्योने तप मोर बाह्मचर्य के द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त करके आप अमर मसतिको जन्म दिया । गुराकालीन भिक्षों मौर मिणिपोंकी तपश्चकि परिणाम स्वरूप ही मनोकके सामाम्पका मोर पार्य-सस्कृतिका विस्तार हो पाया । शंकरा पार्यकी तपपवयसि हिन्दू-धर्मका सस्कार हुमा। महावीर स्वामी की तपम्पासे दी माहिसा घमका प्रचार हुआ। सादा मौर सयमी जीवन रिताकर ही सिम गुम्मन पंजायमें पाप्रतिको । स्यामके मरेके नीचे ही सीधे-मादे मराठोंने स्पराग्यकी स्थापना की। बगारके पैतन्य महाप्रभु मुम-गुटिके सिये आवश्यकतासे मपिक मेक भी हरं न रसते पे, मुन्हीसे मालकी वैष्णव-संस्कृति विकसित हुमी । संयम ही नपी संस्कृतियोंको अत्पन्न करनेका सामर्थ्य है । साहित्य म्पापत्य, संगीत कसा और विविध धर्म विपियो सपमणी मनुगामिनी है। पहले सो संयम बर्गश मौर नीरम मपता है परन्तु असीमे सम्मातिके मपुर फम हमें प्राप्त होत है। यो सोग कसारेमाप पक्षपात करफ मुयमही मप्रतिष्ठा कर देना पाहते हैं फसाको प्रष्ट कर देते है मौर संस्कृति दीबाही पर कुठारापात करते है। - पञ्चमहापातक शास्त्रोंमें अनेक तरहो पापोंका वर्णन है । मुठ बोमना हिसा करमा चोरी करना अित्यादि अनेक पाप तो है ही किन्तु पार्पोका बेफ मौर भी प्रकार है जिसका नामोन्पार और मिषेष होना जरूरी है। य पाप बिन सामाय पासि सम भमकर नहीं है। भयभीस दशामें रहना अन्याय सहना पड़ौसीके साप होने वाले अन्यायको पुपचाप बसते रहना मासस्य जीवन विताना और मशामको दूर करनेका प्रयत्न न करना-ये मी पाच महापाप है । जिनमें अपनी पारमा होके प्रति द्रोह है । ससारमें पहा-यहाँ बन्याय होता है वहाँ-वहाँ अत्याचार करनेवामा स्वयं सो पापी होता ही है पर अत्याचारको सहसनेवाला भी कम पाप मही करता । पो मनुष्य स्वयं दुर्वस या परपोक बमकर दूसरोंको अत्याचार करमेके मिये एसपाता है वह भी समाजका पम द्रोह नहीं करता । यात्री समूहमें जो मनुप्प सबसे पीरे बम्ता हो सभी समुदायको असी पाससे पलमा परता है। निर्वल सोग संपनी गतिको रोकते है। ठीक अिसी तरह जो मोग मनुष्यकी जीवन-यात्रामें गेसे धोररपोक होते हैं, वे भी मनुष्य की प्रगति को रोकते हैं। बस हम निर्यलोंका साप पसन्द नहीं करते, वैसे ही अन्नति-मार्गपर पसनेवासी पातियाँ निर्बल और अन्याय-सहिए लोगोंको पसंद नहीं करतीं। परन्तु मानव-समुदायमें चुनाव करना किसीके हाथमें मही । विस सपको तो धीश्वर हीने तैयार किया है और वही स्वयं बिसका नेता भी है। अिसमिये जितना ही हम जिम संपसे पीछे रहते हैं अवमा ही हम मुस संपके मायकका द्रोह करते हैं। बजानी रहना भी मेक महापाप है । यह भी सषद्रोह या समाज-द्रोह ही होगा यदि हम मुखमा भान भी प्राप्त म

बमापातक
करलें मि गितमा हमार सकते है अपना बितमा जीवन
यात्राके मिय मिहायत पस्री है। विशेषकर मिनके सिरपर
अनेक मनुष्योको राह बतलापर मुन्हें से पमनेका अत्तरदायित्व
पगया है जो समापक अग्रगम्य नेता समन्स बात यदि
संपारको स्पितिसे समाजरे वर्तमान मानसे मौर संसारके
सम्मुस समुपस्थित रहेका प्रश्नासे अभिज्ञ न रहे तो उन्हें
पहो पाप मगेगा जो समागमातका होता है। हिन्दू समाजमें
रामा और साधु पोनों वर्ग समाजका अगुमापन करते आये
है। मेक धीमान होता है दूसरा अकिम्चम । अाया
परिमारवाला है तो दूसरेसा परिवार ही नहीं होता । मग
ससाक बस कार्य करता है इमरा सस्पक वर । भेकमें प्रभुसा
होती है दूसरेमें होता है वैराम्य । असे परम्पर भिन्न जीवन
पाने और भिन्न मार्गवाले वर्गमे हापमें समानका अगुमापन
सौंपकर प्राचीनकाममें समाज-म्यवस्थापकोंने समाजकी चमति
का मार्ग मुरक्षित कर दिया था। किंतु दुर्भाग्यवरा बिन दोनों
याँको मपनी सम्पूर्णताके प्रमने पठारा। दोनों वर्गोते अज्ञानी
रहनेका पाप दिया भौर समावन्द्रोह सुनक सिरपर बा पर।
सागण पदुदर्शन प्रवीण भले ही हों भम हा पयग्रन्य मुम्हें
मुपाप हो किंतु अबतक पे जगत्को परिस्पितिको म समाग
समाजकी मममी परीक्षा नगर सकें और समाजको सुसकी
अपनी भाषामें यह म समना सके कि सुनकी मुमतिमा मार्ग
किस शिामें है तबतक ये मशानी ही है। स्वामी विवकार्नर
और सामी रामतीर्य जैसे सामुनोंकी मितनी प्रतिष्ठा क्यों
हमी मिसीलिप कि वे अपने सामाबिर पर्तप्पाको पह
पामते थे।
रामायाकी मी यही गात है। पुष्पारगा लक्ष्मी माती
है मिस बातको भूमकर सक्ष्मी मिन्दी फरमेकी पुनमें न
पुष्पार्यको यो बैठे है। समाजका नेतृत्व करने वाले अस
दबाने होमे मुहोंने अपनी गतिका म्पय किया है।

बीवन-साहित्य १०२ सी कड़ी सुन और पसीना हम परीरका मैस पानीसे धो सकते है कपगेंका मैस साबुनसे पो सकते हैं बर्तनांके दाग मिमसी या किसी मन्य सटामीसे मिटा सकते हैं परन्तु सामाजिक दरोप और राष्ट्रीय पाप क्सि पदार्पसे भोये पा सकते हैं ? असके लिये मादिक प्रायश्चित काफी नहीं है। नदियों या समुद्रमें जाकर म्मान पर मेनेसे काम मही पा सकता। यह वो मम्तकरणके प्रायदिवससे मार आन्तरिक परिमर्तनसे ही साफ हो सकता है। राष्ट्रीय भौर सामाजिक पापको पोनेके सिये साधारण पानी काम नहीं दे सकता वह तो हमारे सूम भोर हमारे पसीनेसे ही धोया जा सकता है। पिसीसे श्रीपवरकी योजनाके अनुसार प्रत्येक धर्मकी स्थापनाने पूर्व मनुप्पोंका गरम सून महा है। पूनकी परीक्षा हीसे हृदय पसटता है और पाप पुस जाते हैं। मन हीस मिस्माम-पर्म स्थापित हुआ सून हीसे पूराप अमीममें मीसामी धर्मकी पर मजबूत हुभी भूम हीस सिस पर्म फूसा-फमा मौर वीश्वरेच्छा यही मासूम हाती है कि सत्याग्रहमी सून हीक द्वारा विश्वमाम्य होगा। नून वीर पसीनेमें पोई भेद नहीं है। जैसे दूप मोर भी दोनों सून और मांसके निचोर है वैसे ही पसीना भी मनुप्यके मून हीका दब है। किसीपर पवरवस्ती करके गुसस सेवा सना असका पसीना बहाना मुसका बप करमेके समान ही है। फर्क यही है कि मह सुपरा हा सम्म मौर पीरे धीरे मसर करनेवाला है । मुस्का-बागमे गगोंकी मारसे सरकार जून बहावे मार हिन्दुस्तानकी पीन प्रजाको अपमे समिक सर्षको पसानेके सिये मियोड़ से तो उसमें कोई तात्विक भेद मही है। भिसी प्रकार मफ्रिकाके मंगसी मनुष्योंको मारपर माने बोर तुम मोर पसीना १.५ मेटॉक गुणामाको ममदूरीसे पैसे मानेमें मो मोमी नास्विर मेद नहीं । किसी देश को प्रभाका गणम बना अमसे जबरदस्तो मजदूरी सेफर धुस दातबन्द पुरियोंकी हारतको पहेबरा बना भी मुसना ही या मनुष्य-यप है निसना कि किमी देशपर पढ़ाओ करके असक सामों निवासियोंपो मानसे मार सपने में है। । दूसरेके सूनका बहानेक ममाम कामी महापाप नहीं। मिमी तए इम्छापूर्वक और शानपूर्वर अपने खूनका बस्दिान करनेक बराबर प्रायश्चित्त भी नहीं । जिस प्रकार पूसरेका पून लेने पदर मुसका पसीना सनेका मक नया तरीका संसारमे निकमा है असी प्रकार अपने नूनका बरिदान करने यमाय मपना पसीमा ददैमा मभिर सशास्त्र प्रापरिपत है। पापी मनुष्य जय पाह तभी पूमरेका कुन पा सकता है परन्तु दूसरका पसोना तो असके सहयाग हीम असे मिल सकता है। भिमसे विपरीत, जहाँ प्रायपिनमें हम न देनेरा तैयार हात है वहाँ हम मपना यून सभी दे सक्त है बब शामिम हमारी सहायता करे । पभार-सरसारको सहायता नहातो ता सूरवीर अमारियों को पर्मक मिपे भपना स्यून मपण माग्नेका भवार से मिलता ? परन्तु हम मरना पसीना मा गड बाई स्वेच्छासे रसिवान दे सरत हैं। मिसमें पश्यापाराको सहायताकी आवश्यकता नहीं। राष्ट्रीय प्रायश्चित्तमें मा माटि सिय, म्वत वादेबाके प्रात्यर्य बमिगनमें अपना पसीना मपना परिश्रम विधात प्रम मर्पण करके रिप अपने प्रति निर्दय बनकर काम करने होका नाम रचनारमा कार्यक्रम है। ग्पनारमा कायरी वीरता बाइरस नही गोसावी दिनु भुमम अमका महत्व कम नहीं हो पाता। बिमे स्वगग्यपी भाव यकता हा अस मग मपना मन दनेही तयारी रमनी चाहिय मौर बरसा मीना मही मिलता रपनारम कार्य में मपना पमोना पहात राना पाहिय, मोर माप ही यह निरप पर मना पाहिय कि में न

बीवन साहित्य
तो पिसीका मून बहानेका पाप करूगा और म किसोसे
अममा पसीना यहा पर अनुचित लाभ ही बुठाभुंगा ।
अशियाको साधना
क्षिगम गाह्मण-अप्राह्मणका मगग कितने ही वर्पोसे बस
रहा है । ब्राह्मणोंको तो हम जानते ही है। परम्तु अव्राह्मण
वर्ग कहाँसे सुस्पन्न हो गया? अनारण नामकी मोबी अंक
पाति तो है नही फिर भी जम मद्राह्मण-पक्ष खड़ा हो गया
है। प्राह्मण बोर अवाह्मणके प्रश्नम जरा भी पड़े बिना हम
कह सकत है कि ब्राह्मणांम ब्राह्मणत्वका अभिमान और मिस
बातका भान कि हम दूसरोंसि जुदे है मबाह्मण-पगके बो
होनेका एक कारण है । बामगोम यह बातिका अभिमान तीव
होनये कारण दूसरोंमें बिल्ल भावना पैदा हुजी है।
आमकी हमारी अशिया-पिपपर भावना भी ऐसी ही है।
जयस पूरपक लोग भौतिक शास्त्रो और बासुरी राजनीतिमे
निपुण हुए सबसे अन्हाने अपने अन्दर परम्पर मत्सर और
वैरके होत हुअ भी बामतौरपर अपनी अकतातो बन्छी तरह
कायम रम्भा है और यूरोपके बाहरी वेवापर भावा वास दिया
है। पा लोग इस बाझमगमा शिकार हो है अनमें अपने मन्दर
वैक्य कर सेनेकी भावना बाग-पीछ अवश्य हो पायगी और
यही कारण है जो हमारे अनर शियाकी सकताको कल्पना
फैसने लगी है । खेशियाकी अक्साकी कल्पमारे मूरमें यदि
यही बक करपमा हो तो भी वह अक्ता सकारण तो मानी जा
सकती है परन्तु होगी वह प्रिम ही।
परन्तु अधिमाकी अक्ता युरोपियोंकि उस्कप जिसनी आपु
मिष नहीं वह तो बहुत ही पुरानी और गहरी है। पीन और
पापान म्स और मप्पणिया तुर्किस्ताम बरवम्तान, ईराम
और हमारा हिन्दुस्तान-ये सभी देश प्राचीन कालम परसर

पेशियाको सामना
अफताके सूपमें गय हुम है । पर उस वक्त यूरोप जुदा महो
पा। मूरेशिया (यूराप+अगिया) मक मनग भूसा पा बोर
यपि बाम वह उतना असर म रह गया हो ता भी अतमें
वह असा ही होने वाला है।
मसारका आजकी स्थितिका विचार करफ भविष्यका
विचार परत समय यदि समस्त संसारक माप हमारे समन्ध
पानमें लार विचार किया जाय तभी हमें अपना माग माफ
दिनामी ५ सकता है । फिर हम बाहरा ससारसे पाहे कितन
हो ममग रहना पाहत हो तो भो ससार कहाँ औमा है जो हमे
मरम रहनेद
यहता कहना है कि युरापीय और हिम्दुस्तानी दामो
हित अक-दूसरफ विरोपा हानके कारण दोनों गाविया पाह
बितनो र परतु दोनोंका पापनक आक पिपपमें साम
तहमा मा मत है। पर दाना राजनीतिक आप मौर
मामाजिक मनापामे ग्यापन दृष्टिसे दवा पाय ता अभियाके
अम दमोंगी मपेक्षा साम्य और आदर्पण अधिक है। पानी
और भारतीय गोंमें मिनी सामायिक अकता है अपसे कही
अधिक युरोपीय और भारतीय सोगाम है। हिन्दू-धम और
मिमाश्री पम अिन दोनोंमें बितनी समानता है अतना हिन्दू
घम मौर मिस्गममें नहो । राष्ट्रीय मपया सामाभिम बारुपण
दखते हम, हम भगियाके मीर देशाको अपना पूरापके मधिन
मिकट है । मिमलिय हमें यूरोपके माप ए मगर पर भी
अपना ममाम बनाना पाहिप । अपियामी कता भोगागि
मया प्रादभिः ममता है परन्तु यूरोपो साप हमारी मकता
उप ग्मेि देसनेपर समितिर अपवा जातीय है । जम मेक
सको दा सिरे परस्सर-विरुद्ध दिशामि हावे हुने भो मिस
तरह माहो ता भक ही है असो तरह युरोपीय मोर मारतीय
मादन परम्पर-वरापो हानेर भा अंक हो मार्ग प्र
पापा है।

बीवननाशिय
यह दलीम नि सार नहीं है। यूरोपकी वतमान संस्कृति
आसुरी है (राक्षसी नहीं) और हिन्दुस्तानकी ससतिका बापार
भूत आदर्ष देवी है- यदि यही मान लिया जाय तो भी देव
और असुर वोमों भाषी मामी है यह बात हमारे पुराणामों
मे ही स्वीकार की है।
यूरोपके साप हमारा परिचय मगदरीकी हासतमें बड़ा
अिसस्मि हम यूरोपके साप पोरे-बहुत मधोंमें परिमित हो।
भिसी तरह विस्तामके साप भी हमारा परिचय अनिम्यापूर्वक
ही हवा और हम अिस्मामकी कद्र करना सीस । मब बीश्वर
का सवाल है कि क्या ससारकी बेक्ताका ममुभव करनेके
मिये बीनी संस्कृतिके साप स्वेच्छापूर्वक परिपप प्राप्त करना
है या वह भी मै पबरदस्ती करा दूं? यदि अपने-माप परिचय
बड़ामोगे तो स्ववल यहाग बबरन बढ़वाना चाहोगे ता
मुसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।
पदि मेषिया यूरोपके सर्वभक्षी पनसोम मौर सत्तालामसे
सरकार यूरोपका सामना करनेके स्यि क हो जाये तो वह
मामुरी सप होगा क्योंकि यह सप यूरोपकी तरह ही स्मार्म
मूसा होगा जिसमें क्षण-क्षण सपि मोर विग्रहो रग बदलते
रहंग और मन्समें सारा यूरोप मेक तरफ मोर सारा मधिया
दूसरी तरफ होकर मेक बैसा महापुरा मा अतिमुर पतेगा कि
मिस मन्त्रमें मनुष्य-जाति और मानवी संमतिका समय
सहार हो जायमा मौर हजारों पर्पोका मामब-पुस्पार्प मटिया
मेट हो पायगा । सर्वोदयका बावर्थ अपने सामने रखमेवासे
सोग मा भैसा क्यों होने दगे?
यूरोपका विरोध करें या न परें मनुष्पगातिको भकताका
हमरनेक सिये, दपा-धर्म या शान्तिका सामाग्य स्पापिय
करनेके सिये अपियाको अक हागाना चाहिय ।
और शिया मेक होना चाहता भी है। हमारा खिसाफत
का मान्दोछम मेरहम मधियायी भेषताकी मींग पी।

मेसियाकी साधना
मिस्लाम सापका हमारा सम्बय पुराना है।
हम सोगाने अशियाको बस्ताका प्रारम्भ जिफनसे
किया है। किन्तु यह बकवाकी कल्पना कुछ बावती मही है।
विग्गियी या राजालान बीमसे मित्रसक मोर असर पुगस
पुछ महो सो एमा भोर गालीद्वीप ता सोसतिष पता
स्थापित करके प्रयत्न किय है। और मिस मकमा आय
मामाने मपने पड़ोसियोंको मिना दिया है बुखना सुनक पाम
में नि सकोच सिया भी है ममबस्ते लिया है अपनी उप
अभिरपिर अनुसार पसन्गी करके । मैं मानता हूँ कि धर्मराज
का रास्त्रामाबनानेवामा ममासुर नोनवेमौय पा मौर मुमकी
स्वापरयकसा वृहस्पति व्या पुरावार दोनोंको फसाम निम्न
भी। यह भी मामा जाता है कि चीन देशकी विकारो और
मृत्यस्माका प्रमाव भारतीयों कठामापर हुमा हागा ।
अितिहासकारोंका रायक अनुसार अब समय मनिपाको
कसानृपासनाका मेन्द्र समरसन मौर मोवानके वासपासक
देपमें पा । नहाँसे व्यापारके अनेक माग भिन्न-भिन्न दिशामा
में पाते थे। अक रास्ता पीपी मोर गामा पा अक हिदु
स्वानकी मार माता पा अझ मिस दाम माता या मौर
मा यूरोपौ । मिस तरह वाणिग्य-म्यापारके साप मसतिका
भो मिनिमय मिस मध्यमूमिमें होता था। जनादनकी मिन्छा
हुओ रिपार निरे सिम य सिर अग-दूसरस बग हाकर
कुण्ण मिन्नताकी शिक्षा प्राण करें। बस तुरन्त ही बाण
ममुह मुएसने लग मोर अम्होंने अमू दरिया मोर सर दरियाक
देशको भुजार पर दिया। मान भी पर भारी माधी माती
है भौर बातो परत मा बात है इस प्रापीन सपतिक
मयोप यहाँ मिसने सगत है।
मार्म मोग पहरेम ही यात्रा प्रवीण । पहार देखते ही
मुन्हे मुम पार करनेकी पिया हमे बिना महीं रहना । नीरो
दपकर तो भुमो भुगम-स्पानको सोर एगाय रिमा महीं

बोधन-साहित्य रहते । मार्योपा देवता बिन्द्र भुम्युको समुद्र के पार ले गया पा । आर्य रावा हरेक रानसूप-यज्ञमें चीन और मिसके राग ओंको मामत्रित करते थे। मशोक रामाने चारों विभाओंमें पौर-धर्मका प्रचार करने तथा अभयका सन्देश सुनाने + स्पेि मार्यों और बहताको भेजा था और कुम दिम्प सन्देशको सुनने- से वार दयामय धर्मराम भगवान् मुटके देशकी यात्रा करनेको दिग्विगन्तके यात्री बाने सगे थे। अधियाकी अंकता माघमेकी सम्पूर्ण पक्ति धारण करने मामा तत्त्व तो महायान बौर-धर्म ही पा। महायान बौर-पम में भगवान मुरुका अपदेश, सम्त्रमार्गकी सोकप्रिय मिमियां और अनेक देवी-दवताओंके मृत तोपेही पर मिसके अपरान्त दुस सम्तप्त मनुष्यको दिमासा देनेवासा और परोपकारी बीर पुष्पोंको आपपित करमेवाम धाषिसत्त्वका आवर्म भी पा । अब महायान पम्पका प्रसार हुमा तब हिन्दुस्तानका चीन देशो साथ बीराम रेक्ट्रिया आदि पश्चिम पियारे साथ मौर स्वर्गीप (मादेश)क साप सम्बप पर मांगनक समान हो गया था। जिसके बाद धर्म-सामाग्यकी कल्पना बरबस्तानमें पहुँची और मुसने तीन बोंमें अकेश्वरवाद ( वड्दत ) और ममताका सन्दा पहुँचाया । मब भी यह पर्म मप्यशिया और अमिमा में नरेगये लोगोंको अस्मातामा और असके नवी साहयके परगों में मामेका काम करता है। जब मुसलमाम धर्मका गुण्य हुआ तव हिन्दुस्थान पम-धुरम्पर ग्राह्मण बोर श्रमण तिम्वत और पीनमें जा बस प। हिमासय मीर हिन्दूकुमरे मुसपार अनेक मठोंमें हिम्युम्तामक प्राचीन संस्कृतिक साक्षी भप साहित्य स्पापस्म मौर कमाये नमूने मौजूद हैं। हिम्दुमा की परमपवित्र यात्रा सास और मानसरोबरमी है। मिसरे द्वारा हिन्दू मौर पीनी सतिका सन-देन मक्षण रूपम होता रहवा पा । बाग भी बह कुछ बसों में चल ही रहा है। वहाँ यहाँ हिमामय पार करके युत्तरसी धोर जामे राम्ते हैं पोर पर्म वहाँ-वहाँ आर्य-मसतिर पाने- सीपस्थान पर है। हिन्दुस्तामका चिप्य-ममूह मिसना हम जामते ह असस कहाँ मड़ा है । पोमो मोर आपानो लोग हिन्दुस्तामको आदरकी दृप्टिमे दसत है। तिम्बत-यात्राके माग फिरम गुमने सग है। हिन्दुस्तानका महिंसाका माग सारे संसारमें विम्यात हो गया है । यूरोप और अधियारे वीपके युद्ध, यदि हम महिमा-पर्म को प्रपान पर रेंगे तो पीन देपामें असका प्रभाव पापामके भूपर पडेगा मौर मिम तरह कपल अशियाली ही नहीं बस्कि सारे ससारखी मकना करनेके लिय आवयर वायुमरस नयार हा पायगा। अशियायो अवश्य भक हो जाना भाहिम किन्तु किम मिये ? स्वार्यके लिये नहीं बल्कि पूरापमें यो म्याम-परायण मामाग्यवादी बाइ मा गभी है असका नाम परनेके लिय और पमेगा माम्राग्य स्थापित करने पिये। ६ घोर-घम हिन्दुस्तान महत्वपूर्ण प्रफ्नामें दरिद्रताका प्रश्न है। जिस जनतागो दो मार पट भर खानेका मो म मिलता हो प्रस मा पिस किमी दूसर प्रम्नको ओर पसगा सस्सा है? प्रिगकी पाकेकगीको दूर करनेपर हो जमतामा छ मूम पड़गामौर अपने जीवन में सुधार करने याग्य उस्माह असमें बाबगा। मुबहम माम तम, एम चौमामेस दूसर मोमासे तक मौर अम्मम मरण पर यही एक प्रश्न गर्गव भारसा सम्मम हममा पहा राना है गिरानीमा भैस दहातमें परम्पानो पर ममुप्य कितना हो पीमार हा जाय, बहा दिन भी दवा नही म माता न विग्रान्ति हो पोंकि यदि वा मागम ले जायाय पार्या डासा कुछ प्रेम हो वा एप दिमको अपनी पूरा काटकर घ्यिा जाय 7

पौवन-साहित्य
है। गरीबीके कारण मनुष्यका सजोवष भी होता है। यह
मन्यायको अपनी आँखों देखता है किन्तु उसका प्रतिकार नहीं
कर सकता । बह देखता है कि मैं ठगा पा रहा है किन्तु फिर
भी बह शुम ठगामीस यम नहीं सकता। गरीबीकै कारण अमे
स्वाभाविक दया माया और ममता भी छोड़ देनी पड़ती है।
पुत्र-स्नेहवद पाले हुए यसा और भैसैसे अनके बूतेके याहर असे
माम सना परता है । मिर्दय वनकर मुन्हें मारना-पीटना भी
सबसे बड़ा आश्चर्य ता यह है कि गरीब दहातीको मिसी
किम अक्सर ज्यादा सप परना पडता है कि वह गरीब है।
भिसोसिय अससे मपिक सूद सिया जाता है क्योंकि यह परीब
होता है। मुसे रिश्वत देने पर ही नई-नई मुविधाओंका काम
मिल सकता है। पाइमें या कहना चाहिये कि यह गरीब होता
है मिसीमिण असे और भी अधिक गरीब बनाना पाता है।
भिमा अपाय क्या है? कानूनक वारा घिसकी रक्षा नहीं हो
सकती। बोबो भभिकारियोंके दौरोंसे भी उनकी हामत
मही मुभर सकती। अमटे अम प्रसंपोंपर तो गरीव मगार
करते-करत अपमरे हो जाते हैं । अालन गरीबों को ही रवाने
का कामपरती ममी माग गरीब किसानोंपर अपना निर्वाह
करते है। गरीब किसाम मारी दुनियाका सिसाता है परन्तु अस
मपारेको सिमानेवासा कोबी नहीं मिलता।
सिममा मुपाय क्या है? हम तो प्रिसका बक ही अपाय
बता सक्स है मौर बह है म्यावसम्बन । किन्तु जिस मनुष्य
पर सारा समाज बबम्बित है असके मम्मुर स्वावलम्पनकी
बात करत हो हमें एग्जा मानी चाहिये । अस बारे मपने
माल-बम्पे होत हैं मां-बाप मोर मामी-बहन मावि होत है
और वह यह मव छ मिमसिय सह पता है कि मुनकी
दुग्गा न हाने पाच वरना वह भीका या तो मागी बन गया
होता या ममूत रमाकर मैरामी ही हा गपा हाता । असके दुलों
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बीर-बर्म को कौन दूर कर सकता है ? हम को मुछ भी मान्दोसन परत है वह सब शहरों में ही होता है। स्यास्पान पाहणे हीमें होते है शिक्षाके सिये व शहरों होम होता है समाचार पत्र मौ पहरों होमें पड़े बाते है दवा-दरपनको सुविधा भी सो शहरो होम होती है मुन्न और सुविधारे सभी सामन पाहरों हीमें मिल सकते है। तब जिम देहाती गरीबोका आधार क्या है? विचार करनेसे ज्ञात होगा कि गरीबकी बोपपि गरीबी ही है। मिस देशमें करोड़ों मनुष्य भूते रहते हैं मुनकी मुस मिटाने के लिए हमार मौर मामों युवोंको स्वेच्छापूर्वक पामि मसास गरीवी पारग परनी चाहिये । अप्रेसी गिक्षाके कारण मिस पिपपमें हम बहुत ही मासर बन गये है। आज वो मनुप्प मुत्युसे, पर्म-रोह मोर दस-द्रोहसे मितना ही ररता है जितना म यह गरीबीसे गरता है। जिस धर्म स्वेच्छापूर्वक भारणकी हुई गरीरीकी प्रतिष्ठा सर्वोपरि पी आर सी देशमें हरेक लिक्षित युवक कापरपी तरह गरीवीस भामता फिरता है। रूसमें बकास फैला हुमा पा । मोगोंका दुख समझ पा । मुस दसरर साघु टॉम्स्टॉप परवार छोड़कर मिझमगा धन गया। बाप दृप्टिसे देखने में असका गया माम हुमा ? गरीवोंको सस्पाम और भी भेक मापमो बढ़ा दिया बस यही म? मर्ष शास्त्री मिसका युत्तर नहीं , समन्ते क्योंकि अनये मास्नमें बारमा सिये स्पान ही नहीं। पर टॉस्टॉपने भिमारी बनकर संसारकी आत्माको जागृत किया ससारके भयोषाराममें सूब हुआ हगारों मनुप्पोका पाकेकशीका और शुसा मूर मृत कारण मन्यायका प्रत्यक्ष दर्शन करा पिया। शिक्षित लोग कहते हैं-यापकी बात सप है किन्तु हमारे गात माग गया होगा? मिम म्पितमें रहने की अनको पा गमी है मुसमें तो अम्हें रखना ही होगा मुपित है कि हमारे विचारकि कारण कष्ट . जरूर। मिसमें पछ भी वनुचित न .

बीवन-साहित्य
विभाग करके देखल पर घिस तरह संसारमें कदापि शान्तिका
माम्राज्य नहीं होगा।
युरोपमें घोड़ेस सोगोंक हायमें सारा धन है। निस्सन्देह
यह स्पिति विपम है । परन्तु यदि निर्धन लोग भूसे मड़ियमी
तरह हमशा अस सम्पत्तिको लूटने की माकमें रहेंगे सब सो
वह विपमता और भी मयकर हो जायगी। पर यह बात
निर्भोंक सयापमें नहीं पाती। अममे अितनी पवाका उदय
होना जरूरी है कि पनिकों को बिना सफ्ट मी अमकी और
धनिकों को विपमता दूर हो सकती है।
जिसने सिध्ये निर्धनोंको कुछ करना चाहिये। मगर
लोभका त्याग करके मन्तोपको अपनाव और मपनी आवश्यक
तायाको घटापर अत्यन्स स्वामाविक पारताको स्वा
वाम्यन द्वारा पूरी करना गीत में तो ये देखग किमता
धनवानों पाम अधिक धन पा रहा है और न बहां एकत्र ही
हो रहा है । परे पैमाने पर वस्तुओंको पैदा करना मोर मुन्ह
देश-देशान्तरोंमें भेजना अपया सक्षेपमें विराट सपस बम
विभाग भरना ही इस विषमता का मृस कारण है। मिस
विपमसाको दूर करने ही किय स्वदेशी धर्मका अवतार
हुआ है। स्वदेशी पाएनसे गोभी भी मनुप्य पनि म हो
मकगा और न अरास किसी मनुप्यके निर्पन होन का ही
पर है। यदि हम एक जगह गंमा टीला वनात है तो दूसरी
जगह अवश्य ही गढा बन जाता है। जहाँ सपनताका सभाष
है वहीं निर्मनताका भी मभाव हो सस्ता है। सम्पत्ति और
दारिप दोना सनातन पड़ोसी है। दानाका नारा अक साप
ही हो सकता है।
परमारमानी सपा होमी सो मयस मागके कमाने लोगों
में दो पर्ग होंगे-येग पन-परायण और दूसरा सन्तोप-परायण ।
मक हागा सामाग्यवादी और दूसरा होगा स्वराग्यवादी । मा
होगा सतावादी और दूसरा होगा सरपवादी । अक माता

प्रतिष्ठान भास्पृश्यता जमाना चाहेगा दूसरा दयाका पोसस मोत बहायेगा । अफ अहकारवादी और दूसरा संतोपी। प्रतिष्ठाको अस्पृश्यता हवा सब चलती है सभीको छूती है पौर ससारकी अस्पता सिट परती है । स्वर्गक देवता बौर करके मुर्दे हवा के बिना अपना काम बन सकते हैं। दोनों मस्पृश्य है। स्थिर मी बिन्छा है कि पृप्ती सा पृथ्वी ही बनी रहे । परन्तु कमी लोग मपने यकतरफा विचारके प्रवाहमें बहकर मिस मूसोकपर म्पर्ग और नरकमी मुष्टि बड़ी करना चाहते है। मुरदा सस्ता है मुरदेमें प्राण नहीं होता मुरदा पृथ्वीके सिय मारस्प है इस हिप म पात्री छूठा भी मही घिसना ही नहीं बल्कि दफनाकर या बागमे सराकर मोग बस मप्ट कर देता है । देवता हमें सूत्र नही। परन्तु म मिस मुमारपर विपरत भो तो महीं । पव अन्ने विचरना होता है तव व मानव-सप धारण कर लेत है, व मनुष्योंके स म्यवहार परते हैं नमो वे मनुष्योंमें हिलते-मिस्ते है । जप ये (देवता) पैसा फरनेसे अिन्कार परते हैं सय भुन्ह परपर बनकर मन्दिरोंकी कैद भुगतनी पड़ती है। हमारे समागमें मिसी वरहर दो अस्पृश्य-वर्ग दसनेमें माते हैं । अक अन्रपोंका और दूसरा अपलों (ब्राह्मणों) का । मिम प्रकार है-मेहतर सम्पृश्य है असी प्रकार मकराचार्य भी मस्पस्य हैं। हम दोनोंदी प्रणियोमें बैंकर मोसन नहीं बरते। हम दोनोंसे हाप-मर दूर एहत है। दोनोंका पदका अघि बार महीं और पिसलिये पोनोको समाजम म्मान भी मही है। सपायमें भुनकी स्थिति खतरनाक है। यदि अम्हें समाजमे पामिल करमा हो तो पहले भूनकी मिस अस्पृम्यताको दूर करना जरूरी है। यदि मम्ममा समानमें अस्पृश्यही बनाय सगता सामाजिक दुर्गन्ध एगी। मुस दूरपरने पो ही अपाय है।

बीवन-साहित्य या तो हिन्दूसमाजसे अनका निकाम दिया बाय या मुन्हें स्सस्य मान लिया जाय । बाह्मण-सस्कृतिके प्रतिमिमि किराबार्यको भी पाहिए कि वह मनुष्यकी सरह समादमें विबरें, समाय की स्पितिपर विचार कर और धर्मोपदेश द्वारा समाजकी सेवा मरें। यदि वे बैसा न करत हों तो मुन्हें चाहिये कि वे लोगों की सेवा-पूजामान ही स्वीकार करनवाली मूक-मूर्ति वम पाये । वेद-विधाको भी हमम मिसी तरह यना रखा है। वद मितने पवित्र है कि उनका वर्ष तक नहीं किया जा सकता संमत-भापाकी भी यही दशा ही है। संसस तोहरी दबया बोकी वाणी, मनुष्य युसका व्यवहार कैसे कर सकते हैं फसत या निर्जीव बीतमाम ही हो जाना पड़ा । मिस प्रतिष्ठा मी अस्पृश्यतासे देववाणीको मोर भूदेवाक समुदायको कौम मुबारेमा ? पर परीरके पैर और सिर भी समार-सेवाने लिय अयोग्य हो पाये तब मनुप्यको पेटके वर पसना पड़े तो क्या माश्चर्य? समानको पग न बनाना हो तो मकराचार्योका मपनी अस्पृश्यताका त्याग पर समागमें सम्मिसित हाना पाहिये मार अन्रयगोंकी मस्पृश्यताको दूर कर अन्ह मी शामिल कर सना पाहिये । असा करनेसे ही पार्मिक मन्त्यकार मष्ट होगा और हिन्दू-मर्मक सिरका कासा पमा मिटेगा। बस दिन-विहारे ममा यहाफर बमनेसे क्या होना-बाना है? १२ अन्स्पज-सेवा जिसमें समभाव न हो वह सेना नहीं कर सकता। मम भावक मानी दया नही परोपकार परमेकी वृप्ति महीं मुर्गी या गिप्टता नहीं। समभागका अर्थ है प्रमकी समानता समभाष पा ममाएर समभाषका मर्प है जाननेकी मिन्छा राम- IIT मर्य है भावना धौर बादराकी समानमा ।

जपा-सेषा
अन्त्यमोंकी या अन्य किसी भी बासिको सेवा तो समभाष
हो होनी चाहिय । बहहारी मनुष्य तिरसारस भी सेवा
कर सकता है अज्ञानी मनुष्य मशानवासे भी सेवा कर सकता
है परन्तु यह सच्ची सेवा नहीं। मेक पहानी है कि अंक स्त्रीने
देसा कि धुमके सोये हुमे पतिक गालपर बेक मासी बठी है
असने समा मापसे बुस मक्खीको मितने पोरसे मक पाटा
लगाया कि पविक गाससे खून निकलने लगा।
हमारा गृह-चीवन हमारा षम हमारा साहित्य पिन
समोके विषम अपने दिसमें मसीम तिरस्कार धारण करते
हमे और मुसे प्रकट करते हुब भी कितने ही गोरे हमारी सेवा
परत है। हम सभी मानते हैं और हमें मनुभव भी है कि
भुनकी यह सवा हमें किसमो प्यारो मोर हितकारिणी है। जो
कोग परदेपासे पाकर अपने पापनका सिक्का जमाना पाहत
है युनको सेवासे हमें बहिरू या बौद्धिक साम भले ही
होता हा भिन्तु मुससे हमारी मारमाका-हनन हो हावा है।
जो हममें मिस कर रहत है, हमें समानेको कोशिश करते हैं
हमारे इस काम करते हैं ये ही हमारे गुण-दोपको समान
सकते हैं। हमारे गुर्गोस वे प्रसन्न होते है बोर मुन्द्रे निक
सित करनेके सिप सहायता करते हैं। हमारे दोपासे 4
करिवत होते है मौर मुम्हें दूर करनेके हमारे प्रयत्नोंमें प्रेम
मौर सममावसे सम्मिलित होते हैं। हमारे सबक बने
रहना चाहते है, धुनको पाप्मन देनेपर भी ये शुभ ग्रहण
नहीं करते।
पो मभिमानी होते है बझामी बोर लापरवाह होते हैं
मे बच्चे परेकी अपनी मोटी साप-साप रिये पूमते है। जा
मुन्, मन्ठा म समठा हो उसे हमें छोड़ देना चाहिये फिर
चाहे यह हमें बितना ही प्रिय मोर मनुल हा । खुसी प्रकार
गिरा व प्रिय समतें यह हमें क्विना ही अनुचित एमठा हो तो
भो हमें मुसे धारण करना चाहिये। दिल्ली मिट्टी पाहको

सोड़कर हमें यदि युसका साँप या गणपति बनाना है सो पुरानी
आकृतिको तोहपर हम मुसे बिमकुल नया आकार देना पाता
है। असी प्रकार ये हमारे समाको भी समझते हैं। किन्तु
समाज पुण् भिकनी मिट्टी तो है नहीं मौर पदि हो भी तो
विदेशियोक लिये कदापि नहीं।
यो नियम हमार सिये है वे ही मन्रयोंक मिये भी हैं।
वाराम कुरसी पर बैठकर हम निश्मित करते है कि अन्स्पोंक
सरोंका अिस तरहकी पोशाक पहननी पाहिये अम्हें मितने
विपय जानने पाहिय मितने अधोग सीममे चाहिये, और
अमुक-अमुक विचारोंको छोड़ देना चाहिये मथवा पारण कर
सेना पाहिये । मन्रयगोक साकाको लेकर चिकनी मिट्टीके
समान अन्हें अपनी कल्पनाके अनुसार हम बना झेमा चाहते है।
मन्त्यमाका भौर हमारा धर्म मक ही है। हम दोनों अक
ही समारने बंग है। हम अनादि काहस मन्तपकि प्रत्यक्ष
गुरु नही तो मुनके मगुमा तो जरूर ही है। ये हमारे मामित
हम मुनके अभिभावक यह सम्बन्ध पसा माता है और मिसी
लिये मन्स्योरे अगारका मार्ग निश्चित करनेका अधिकार
और योग्यता भी हम रमते हैं। मिस तरहका यदि कोधी
दावा करे तो वह भयोम्म होगा, सो महीं । परन्तु बहुतेरे ममीर
बनकर मनरयगोगा मुवार करते-करते मपने समाजसे भी समग
हो गये हैं। हमने अपने पर्म-विपार निश्चित नहीं किये । हममे
ममी यह भी निर्णय नहीं कर लिया कि सामाजिक बीवनमें
कौन-सी म्यवस्था मन्छी है । जितना पुराना है मुस सरसतारे
तोरनेमें एगे है परन्तु हमने अभीतक मिसका विचार नई
किया कि उसकी जगहपर नया क्या मुपस्पित किया जाए
भपया क्या सुपस्पित किया गा सकता है। बीर बनस्पमा
मुम-युम में मुनके सहयोगी बनकर मुनकी जीवन-यात्रा
मासान मनानेकी बात तो हमें मभीतर सूनी भीम पी।
हम किस तरह अमके भाम्प विधाता बनेंगे।

समय-सेवा १२१ मिसका यह मर्प नहीं कि, हम मुनको सेगा नहीं कर सकते पर सेवा करनेसे पहले हमें बुनक हृदय और सुनको स्पितिको मच्छी तरह जाम सना बरी है। अनकी शक्ति मोर अक्सिकी परीक्षा करनी चाहिये । मुमकीधारणामापारमूत कारणोको सोचना चाहिये । मुनकी पारणाओं और रिमार्गोको जड़ महत्वपूर्ण कारण होते हैं। हमें मिसका पता लगाना चाहिम किये कारण कौनसे हैं जिन्होंने मस्योंमें पोड़ा-बहुत काम किया है शुनका अनुभव प्राप्त करणे अत्यन्त नमवा भीर सममावसे मन्पोंकी सवाना श्रीगणप्त करना चाहिये । मनमोंकी अस्पृश्यता दूर करते ही मुनके कितने ही दोप तो मपने-आप ही दूर हो जायंगे । स्कृप्य समाजमें मेष्टनमठाप पड़ते ही मनायास मुन्हें कितने ही सस्कार मिलने लग जायेंगे। मनका मुत्तरदायित्व वह पायगा जिसको पूरा करना लिये हमें अन्हें सममाषपूर्वक सहायता करनी चाहिये । मोर पासकर यह प्यान रखना चाहिये कि वहां-वहाँ अन्त्यग स्पृश्य समागमें सम्मिलित हो, वहाँ-वहाँ अत्यकि बमावमें मिवनी मम्रता मोर ममुरता तो जरूर बनी रह कि सभी माम मुमका प्रेमपूर्वक स्वागत करने मग जाये। मरपन मेककोंगो मिसकी सूग बिम्ता रानी चाहिये । अन्य ऑगी पाति प्रति पो गई तिरस्कार है मुसके म्पामपर यदि पढ़े-सिने अनपगारी मुरवताक कारण समागमें मया तिरस्कार मुत्पन्न हो जायगा तो मुस दूर करना पठिन होगा। कमी मोगोके मनमें मस्य भावनाका बध मान भी नहीं होता गम्दे शराब पीनेगास मेहतरेक माय भी ये बन्यु प्रेम से बातें कर सकते है रिन्तु मैसे सोगाने सिप भी कभी बार मितने ही परिज भीर मुदत मन्स्पनोंकी भाषा मौर मुमकी अपेक्षाः-पाचा परदात करना कठिन हो पाता है। यह दोप है मुस शिक्षाका को हमने मुहें दी है। हम मम्पनीको साप-समागमें स्पान दना चाहते हैं, या सुनका १२२ बीचम-साहिप हक भी है। पूर्व पाप है, पम्याम भी है परन्तु मुस मन्याय को दूर करने के लिये स्पृश्य समाजका अपमान कर सुनके साप तुम्मताका बर्ताव करके मन्त्यम अपना फस्याम नहीं कर सकते। अभीतक मिस नम्रताको भय मा अमानके कारण किया था मुसीको भय भन्ने मानपूर्वक और स्माभिमान पूर्वक धारण करना चाहिये । वहम बोर भय का त्याग करना बाहिये, नम्रताका नहीं । जिस प्रकार कील-मुअकसका पक्ष लेकर मुसे पाते हैं धुसी प्रकार यदि हम मन्रपोंका पक्ष मकर अन्हें स्पृश्यवर्गके साथ लगा देंगे तो अससे कुछ दिन वक हम मन्पोंमें मसे ही लाक-प्रिय हो जायेंगे और स्पृश्य समान भी हमसे हरने लग पायगा किन्तु यह समाज-सेवकका पवित्र कार्य कदापि न कहा जायगा । मनुष्य के लिये यदि अग्यन्त पनि मौर यस्मन्त मूक्ष्म कोसी वस्तु हो तो वह है मनुष्य-समाज । मुस समाजकी प्य बस्पामें हम अब कमी हाम लेंगे तब हमें बह अत्यन्त भटा आदर मक्ति और नम्रतापूर्वक मरना चाहिये । नहीं तो समान द्रोहका पाप हमारे सिरपर मा मैठेगा । समारोह प्रत्यक्ष मीस्वरका ही द्रोह है। यदि मिसमें मब भी हो तो भीश्वरकी दृष्टिसे प्रभु-द्रोहकी अपेक्षा समाम-ग्रोह हो अधिक खराब है। प्रभु-द्रोह पर क्षमा किया जा सकता है सदा होता रहा है। परन्तु समाजद्रोह-बन्धनोहका प्रायश्चित्त अमानों तक- ताम्दियों तक करना पड़ता है। ममदूरोंका धम कहा ना सकता है कि मभीतक हिन्दुस्तानमें वधिका मजदूरोंका वर्म ही नहीं पा । देशका बड़ा हिस्सा पिसानों ही का था । बार भी किसानोंका प्रश्न ही सबसे मधिक महत्त्वपूर्ण है। जिस प्रकार पूरोपमें मजदूरोंकी समस्या प्रमान है असी भयारोमा पर्म १२॥ x प्रकार हमारे यहाँ किसानों की समस्या है। यदि किसी दसपर सबसे अधिक सामाजिक बाय है तो वह किसाना ही पर । गुजरात के किसानोंकी स्मिसिसे बङ्गास, महाराष्ट्र या सयुक्त प्रास्तके किसानोंकी स्थिति ज्यादा खराब मारुम होती है। बाम मिमोर कारण पा मगदूर वर्ग अत्पम्न हुआ है वह बमि कोशमें किसानोंकि वर्गस ही मुत्पन्न हुआ है । बब किसार्मोको खेतोसे सफलता नहीं मिलती और मुनको दहातकी परिस्पिति मसाप हो पाती है तमी वह मजदूर यन पाता है। अर्यात् भक वरहसे मगदूर-वर्ग मेतीनो निष्फमताको निशानी है। ममुप्पकी मुख्य मावासामें दो है-अन्न मोर वस्त्र । मिसमें यह पुरामा रिवाल पा कि किसान अन्न उत्पन्न करे । मौर हरमक मनुष्य भैसे पकाकर सामे तपा हरक मनुप्य मपने-अपने परमैं मूव कावे मोर यमाहा असे बुनदे । मूत्र कातमा और बम्न पिना यह हरमेक कुटुमका निरय कर्म पा। सती मोर पस्त्र-म्यबसाय ये देशके दो सबसे का मुद्योग । सुनक बाठागा मो कुछ भी समाजका काम होता मुसे मम्य कारीगर करते थे। मजदूरोंका काम ही न पड़ता था। हरमक कुदमा वह सब काम अपने हायसे कर मता पाना अससे बन माता पा । भुससे भी अधिक माम मा पड़ता तो मपने पड़ोसी की सहायता के मिया करता था । मब भी हमारे समाजमें विवाहू आदि अवसरोंपर दूसरे पहा मे ही मावि पुष्प और स्त्रियां मिट्ठी होती है मौरमा, या पापा बना सती है। मेक मोर काम होता जाता है दूसरी मोर विनोद-वार्तासाप भी हाता रहता है या मोत माये जाते है। मिस तप हमारी भ्यबम्पा परिणम भी भेक प्रकारका उत्सव बन पाता है। x x किसानको दुदरत के ताप हिलने-मिसनेहा मानन्द मिमता हो है। हसपा मोट पहाते समय किसान सोम मानमरे मठ १२४ बोधन-साहित्य कारें सगा-सगाकर गीत गाते हैं। बुसाहा भी करषेकी वासपर अपने कण्ठकी ताने छोता रहता है। कारीगरोंको साकी अत्तम वस्तु तैयार करनेमें निर्णोप मामम्द मिलता है । मितना ही नहीं बरन् पतमें काटनेके समय या परमें छत या दीवार- पसस्तरकी टिपाई करते हुए भी मजदूर लोग संगीतका भानन्द खेते हैं। बाब मजदूर-वर्गको मिलमें विस तहका काम करना पड़ता है वैसा मारमपाती काम पहसेके मजदूरोंको कमी म करना पड़ता पा । विसपोमुद परिषमम मानन्द महीं मिस्ता असे मानन्दप्राप्ति के बाहरी सामम सोबने पड़ते है और मैसी मजदूरी फरमे वार्मोका समाज पनि सरकारी न हो तो वह स्वभा पत पाहे पहाँसे बोर पाहे पैसा मानन्द प्राप्त करनेको कम x x आमतौरपर मजदूरी या परीरिक परिमम पमित्रसे पवित्र मुधोग है । मारोम्म पीयुष्य और स्सत त्रता पे मजदूरीके भाभीर्वाद है । मगदूरका जीवन दूसरे सभी अपोगोंकी तुमना में मधिक मिष्पाप होता है । यदि मजदूर सम्तोपी हो तो वह बासानीसे बस्तेप और मपरिग्रह व्रतका पालन कर सकता है मौर मुसीमें अहिंसा भी वर्तमान है। मजदूरका पशा गितना पवित्र है मुतना ही सम्मानपूर्ण है। हाँ हरमक मजदूरको मिस बासका विचार जरूर करना पाहिये कि वह किस कारग-बग और किन प्यौपर मजदूरी कर रहा है । ममदूर वो काम करता है या जिस बस्तुको बना रहा है वह समाजरे सिम्ये आवस्यक और धर्मको स्वीकार होमी पाहिये । मजदूरको मजदूरी करते हमे अपनी स्वत जवाफो सो मठमा भाहिये। x फोगी अपवा दक्षिण अफ्रीकाके मजदूरोंको गिरमिटिया कहते थे । म अपने सेठ या अपने कामका चुनाव स्थर्य नहीं कर x x मगरोसा गर्म १२४ । सकते थे। वे शसि वम हमे होत थे। मिसीसिय उन्हें पत्तमन्द कहते थे । कुली बपमान-सनक नाम है । पमिक मजदूरी सेकर कार्य करनेवासेका मजदूर कहत है । बम्पीमें मजदूकानाम कामदार है । यह शुद मजदूरोंमें जाग हुझे मारम-सम्मानका सूचक है । अमेरिकामें मजदूरीको हत्पस' या मददगार (महा यक) कहते हैं। यो मनुप्य मजदूर रखता है यह परावल्पी है पगु है भीर मगदूर अपने कामका पारिश्रमिक सेते हुझे भी समान-सेवा करता है यह भाव मिस माममें समाविष्ट है। मराठी में मजदूरोक लिये पुराना पाम्द 'गड़ी है । गरी अर्थात् दोम्न मिा या सापी । परिश्रममें सब समान है परिश्रममें मान भाव वर्न मान है मौर को हमारा काम करता है वह हमारे ही वर्गमा हमारी बराबरीका है। यह सभी धर्म-छाया गही सम्पर्मे एफ- बम या जाती है। दूसरे मुयोगबाले मनुष्य जैसे ममासहितका दिपार परत है भीर मपना कसम्म समाप्तकर बहुतेरे सागनिक कर्सम्याका पासम करते हैं मुसी तरह मजदूरोको भी परना चाहिये । जिम मनुष्यको परिश्रम करनेका अम्याम है वह मम पूछा जाय ता समाजका गया है। वह किसीपर निर्भर नहीं, बस्कि दूमर मोम ही मुसपर निर्भर रहत हैं। हर एक मजदूर इस बातका पामता है कि पैसेवाले लोग भुसपर अपम्यित रहा है। वह इस बातको पानप्ता है मिसीस वह कई बार दूसरका अमुवि भाम देसार मपिक मगदूरी पानेका प्रयत्न करता है। यदि मगदूर सोग अपने हितको वगदर समान से तो अपियाधिक मजदूरी प्राप्त करने हीमें अपनी पाक्तिका व्यय मगरसे मपनी प्रतिष्ठा मोर अपमी स्वाधीनताको बहानका प्रयत्न करेंग 1 अक मामूली नसकी बपक्षा साधारण मगदूर षिक माता है मषिक उपयुक्त होता है और मुमकी तुसनामें मपिक म्पतत्र मी होता है। परन्तु फिर भी सर्व अपनी सामाजिक प्रतिष्ठाको रक्षा पर सकता है, किन्तु मजदूरसे मभी यह मही बीवन-साहित्य होता। सप देखा पाय सो मजदूर मासिकका बाधित नहीं बल्कि मालिक ही मजदूरोंका माथित है। मजदूरोंकी पूगी मुनके शरीरमें है और ये मुसे भपमे सापमै मेकर पूम सकते हैं। मन्हें जिसका मोल नहीं सगता । मास्मि तो पूजीके साप भा होता है और बिसीसे वह सगठिय मजदूरति सम्मुख माथितके समान ही होता है। x मजदूरोंका मुखार तो तभी होगा जब ये बिस बातको जानने सग जायेंगे कि हम समाजकी किस तरह विक्षेप सेवा करते है-समाज-म्पपस्पामे हमारा स्पान कहाँ है तमा समाजके प्रति हमारा कर्तव्य क्या है। पर मिस झानकी प्राप्तिके सिय मगदरौंको शिक्षाकी आवश्यकता है। बिस बातको मजदूर शिक्षासे ही समझेंगे कि देशकी मीर संसारकी स्पिति सी है घोर भुसमें मजदूर मपनी बिछाके अनुसार चाहे गो काम किम तरह कर सकत है। मजदूर-वर्ग समागको मागाव भी कर सकता है और बरवाद भी। भमजीवी बनाम मुलिमीवी भुवर- मिह पपया समाज-सेवा पो मनेक पेचे है मनके सामाम्यत दो भाम किये जा सकते हैं। येक ममजीपी मौर दूसरा बुद्धिजीमी । किसान अमाहा गर बाभी मुहार, मामी पोगो दुम्हार मुमाप्ता से सो घमजीवी है। मौर बस अम्पापक, सरकारी अधिकारी न्यायाधीश कीस ये सब मुठिगीमी है। पुरानी पूषीके सूदपर मपना गीगम-निर्वाह फरमेवासा मेक तीसरा पर्ग भी होता है जो बिना किसी सेवाके समानमें रहना चाहता है। पर मतो असे पेशाकार न समार-सेगम कहा जा मकता है। पेद्याफारोके तो केवम समजीपी बनाम बुद्धिजीवी दो ही वर्ग है-धमनीषी मोर मुदिनीबी। कितने ही देशोंमें मिन दो पेशामसे यमनीषी पेशेकी अपेक्षा बुद्धिजीवी पेशेको मपिक झुंचा माननेकी पूरी प्रमा हो गमी है। हमारे देश तो धममीवी पेशेको विरस मीचा मानने- की प्रपा पहुत पुराने समयम ही बसी माली है, जिस कारण हमारे समाजमो असीम हानि हुभी है। माम भी ममुष्य शिक्षा मिसी मुरक्ष्यसे प्राप्त करता है पिबह परिश्रम करनेकी समासे बप बाय । वेक दिन में मपने स्नानगृहकी सफामी कर रहा था। यह देख क पर्मों पदेशक मुझसे कहने सगे मनी मैसा काम करना पा वो मितनी बारेची क्यों पड़ी? चार मिस्म पद है फिर भी भपने हापसे काम कर रहे है। मुझे वरी शम मारम होवी है। भारतवर्षकी मतीत मस्पताके दिनों में हम सोमि मिस तरहने विचार म पे। भारतबर्पक विचाी मपमे गरके मकान पर पपुगे जैसा कठिन काम परते। पर भी ये अबते न पे और म रामसि । भुपनिपदके माषाम अपने गुरुके परपर गौओंको पराते थे। स्वर्ग प्राण गुरु-गृहपर रोम गलसे मकड़ी गोम हाते थे। विद्यापीठा पृट पगित सोम बब- काय मिलनेपर पत्ती समाते प । कामी यह नहीं सोचता पा कि शारीरिक परिश्रम करमेस बुटिका कोबी उपयोग नहीं होता या प्रतिष्ठाको हानि पहेपती है। शारीरिफ परिपम भेगमावश्यक यम समता पातापा। मिसलिये मोग सी-सौ वर्ष तक पीते रहते थे। राजा मोर सरदार होग मी कम-से-कम भपने परीरको सर्व-कार्य-क्षम बनाये रखने के लिय सभी प्रकार के परियम करनेकी याद बनाये रसते। धर्म-पास्त्रकारों मामा यो दिगर ममीमकी माही वगैरा फट पानेपर खुस पर पहला हम वो राधाको ही बनाना चाहिये । क्योंकि तब राग्यका मा पिसाम रामाही सयमा पाता था। मिम प्रपाके कारण यमगीवी और शुदिगीमी बकि पी, - - १२५ बीवन-साहित्य पूरा-पूरा सहयोग रहता था । बुद्धिमान् और पनवान् लोग भी परियमी कारीगर वर्गकी कदर करत मोर दोनों वरि बीच संसारोंका आदान-प्रदान होता रहता पा। घिसी जमानेसे यह कहावत प्रचसित पी कि किसामके शरीरपर सयी हमी मिट्टीको मार दो और मुसे राबवस्त्र पहना दो कि वह रागा बन पाता है। राजोचित संस्कारोंकी म्यूनता मुसमें कभी रहती ही नहीं पी। अिसलिय अस जमानमें प्रत्येक पातिम शूर सरदार पैदा होते पे । वेधको रक्षा कैस होगी यह कापर चिन्ता किसीके चिसको स्पर्शतक महीं कर सकती पी। बोर जाति-मासिके बीच सायद ही कभी मैमनस्य होता था। पड़े सिम बौर अपोका भेद तो पहा ही माया है। पर प्रमजीवी और गृहिणीपीक बीच भी बहुत कम माकर्पम और सम्बन्ध देखा जाता है। विणीवो ममुप्योंको शारीरिक परि थम नहीं करना पड़ता हो अपवा श्रमजीवियोंगो बुटिका प्रयोग महीं करना पड़ता हा सो वात भी नहीं। फिर भी उपर्युक्त भेद तो स्पष्ट ही है। आधुनिक सामाजिक पार्मिक अपना राजनतिक पागतिके जमाने में अकबर्गके प्रयास दूसरे वर्गतक पहुँच ही नही पात । प्रमजीबी सोरि मुख-दुग्मोंके विषयमें मुरिजीवी मापर्वाह तो होते ही है पर मुससे भी विशप बात तो यह है कि वे ७ससे बनभिम भी रहते है। बुद्धिजीवी लोग अपने आन्दोलमोंका रहस्य यमजीवी साोंको बुनकी अपनी मापा महीं समता माते। मिससिये माग मारतवर्ष में हम अपमी मक्तियोंको वका महीपर सकते। मिसका तो कही मुपाय है। प्रमजीवी लोगामें शिक्षा का प्रचार, मौर बुलिंगीयो सोगोंमें परिश्रमकी प्रतिष्ठा । यमजोषी लोगोंमें मिलाका प्रचार करमा पाहे कितना ही कठिन हो ये ता धुसो सिम संपार ही है। यदि युधिषीयी सांग श्रम परनेको तैयार हो पाय ता मुमके लिये भी कोमी काम बसम्भव नहीं रहेगा। पर अनको यह बात बड़ी बटपटी

धर्म-संस्करण
१२९
मासूम होती है। जिन दो वर्गकि वोष अबतक सहयोग महीं
होगा तमतक किसी कार्यन स्पेि राष्ट्रको सक्तिको अका
करमा दुफर है। शारीरिक परियमके प्रति तिरस्कार हामा
मुग्गिीवी लोगोंके लिय मेग सार्वत्रिक रोग-सा हो गया है ।
यह अनुमाम नहीं मनुभवको वामी है। प्रजाकी प्रतिमा
विकास और सगठम करनेका यही अकमात्र अपाय है ।
घम-संस्करण
कुछ लोग कहते हैं कि हमारा धर्म सबसे पुराना है मिम
सिये वही सबसे मच्छा है। दूसरे कहत है कि हमारा पर्म सबम
माणिरी है मत यह सबसे अधिक तारा है। कोभी कहते हैं
कि ममक पुस्तक माप पर्म-ग्रन्थ है मिमलिये युसमें सब-कुण
मा गया है। तो दूसरे कहते है कि फी किताब परमारमाका
ससारको दिया हुआ सबसे मासिरी धर्म-प्रन्य है मिसमिय
मुसका मुस्सपन नहीं कर सकते।
सनातन-धर्मी दूसरी ही तरहसे विचार करते हैं । मुष्टिका
मादि मौर अम्त हो सकता है। पर्म-ग्रम्पका भी आदि मौर
अम्त हो सकता है। पर धर्म तो मनादि-मनन्त है। भिमसिय
बह सनातन कहा जाता है। सनातनके मानी गया है? पो प्रिम
सृष्टि प्रारंमके पहले पा मोर जो युसके मन्तके बाद भी
कायम रहेगा वहीं सनातन है। मिम मर्पके मनुसार ता
मारमा मौर परमारमा ही सनातन माने जा सकते हैं।
पर सनातनका मार भी मेक अर्प है। जो नित्यनूतन
होता है यह समाबत ही सनातम है। जो पीर्ण होता है यह
मर पाता है। जो बदलता महो वह मर जाता है। बिमकी
प्रगति नहीं है मुसकी मयोगति बनी बनामी है। अभी हवा
बदबू पैदा करती है। जो पानी बहता नहीं है यह स्वच्छ नहीं
हवा । पहा! के पस्पर परमते महीं मिमसिये व पोरे पीर

बीपक साहित्य
पूर्ण हो जाते है । भास पुन भुगतो है बमकी वनस्पतियां प्रति
बप मरती है और फिर दूसरे साम भुगती है । वास बाली
होते है और फिर भरते हैं। प्रकृतिको निस्पनूतन होनेकी कला
मवगत हो गयी है बिसलिये वह हमेशा नवयौवना दीसती है।
सनातन-मर्मके व्यवस्पापक भिम सिमान्तको पानते में
मिसीसिपे पुणधर्म के अनुसार महीने मिल-मिन पौकी
रचनाकी है। कास महात्म्पको मानते पे बिसोसिये पे काम
पर विजय प्राप्त कर सके। बर्मक माध्यारिमसिवान्त अषस
बौर बटम है । पर मुनका म्यवहार देश-कासके अनुसार बव
ममा पड़ता है। मिस बासको जानकर ही धर्मकाने हिन्दू
धर्मकी रचनामें परिवर्तन-तत्व शामिल कर दिया। मिसी
कारण यह पर्म सनातन पद प्राप्त सकता है। बनेक बार
बह क्षीण प्राग असर हया पर निष्प्राण कभी नहीं हुआ।
मनुप्यकी पड़ताके कारण कमी बार असमें गन्दगी मी फस गयी,
पर बिना किसी विफबके बह फिर पुनहरगोवित हो मुठा ।
सामाजिक पदस्पा अपपा धार्मिक विषिकि पासनमै
कामानुकूल परिवर्तन होना मावस्यक है। पर जबसे हिन्दू
समागमें मबुटिने अपना अड्डा जमाया है तबसे मह(हिन्दूसमार)
जैसे परिवर्तनों को क्ति पृष्टिसे देखने म मया है। मेक जैसी
भीति मौर मास्तिकता हमारे मन्दर मुस गयी है कि हम हर
समय कहने मग पाव है कि "या पूर्वजोंगी मपेक्षा हम मषिक
होशियार हो गये? पूर्वग तो विकासमा विचार कर सकते
पे। मुनकी रपना हम कहीं कोसी परिवर्तन कर लेंगे तो
शायद हम संकटमें पर वायग ।' सच पूछा जाय तो मिस परह
परिवर्तनसे उरना सनातन धर्मके समाप ही विपरीत है।
विचार-हीम मुम्पखम परिवर्तनकी मो हिमायत ही कौन करेगा?
पर ममानक कारण परकर निष्प्राम स्पिरताको सौबना
पुस्पार्म नहीं, बस्ति मृत्यू ही है।

पर्व-साप
अपनेको छोरपर दूसरेका प्रहण परमा मेष प्रसग बात है
और अपना सपा परकीय पर्म दोनोंको नांवार सरनाकर बस
में मामश्यक परिवर्तन करना दूसरी बात है। प्रत्यक पमानेम
मवीन-नबीन संयोग हमारे सामने मुपस्थित पर परमारमा
हमारी बुटि-शक्तिको बाबमानेके लिये सामग्री मुपस्थित करता
रहता है मौर मुसके द्वारा पर्मके मूएभूत सिद्धान्तका परिपय
हममें पुम-पुन जाप्रत करता है। बाए माकारमें यदि मार
बार परिवर्तन महो तो माम्तरिक सजे स्वस्पका दर्शन
असम्भव हो पाय । यदि हमारे उमानेमें पूर्वोकी ही बुद्धि-
हीम नाम हम करते पाये कुछ भी नवीन न करें, मोमी
भाषिकार भी न करें, तब तो कहा जायगा कि हमारी तामि
प्या साबित ही।
प्रापीनकाससे ही हमारे देश मिन भिन्न धर्म मौर
पावियो मेक्त्र रहती मामी हैं। प्रत्येक बार भैसे सहवासफे
शरण हमें मिन्न-भिन्न धर्म प्रपबम करना पर है। यावश्यस्ता
मुसार मेक ही धर्म सिवान्सको भिन्नभिन्न शकाओं मौर
दोपोंको दूर करनेक सिये भिन्न-भिन्न पदोंमें जनता
सामने झुपस्थित करमा परता है। और मिसीसिप यह धम
भनेक काम वासे सेगस्वी रस्नाके ममान मषिमापिक विम्य
बनता गया।
विदेशी सप्तानी मधीमतामें रहते समय पर्मको मरयम्त
हीन मार त्रिम वाय-मगसमें दिन काटना पाता है। पिरोपी
मोप जिस समय पात्रमण करते रहते हैं तब भी धर्म-ससरप
का स्वाभाविक विकास मही होता। यही रसपारहता है कि
हम कोमी परिवर्तन करने गावं मोर मुसी समय विरोधी डाग
हमारी पममोरी देखकर मर्मापात कर बैठं वरपरकीय सत्ता
स्माबत मममाव-म्प होती है। यह सड़को पहबानती है
प्रामको नहीं 1 मिप्सलिये वह कहती है पूर्वापरम तुम्हारे पा
रिपार पसे गाय हैं, मुम्हीकी रक्षा की पायगी। नवीन प्रयाः

१२ जीवन-साहित्य तुम एक महीं कर सकते न अपने स्थानसे कहीं भी मिपर-अपर हर ही सकते हो। पुराने कछेवरको हमारा मभयदान है। तुम्हारे प्राणको राम्पमान्य करतो हमारे प्राण केसे टिके रहेंगे। मिस तरह समभाव-सूय तटस्मतामें सड़ी फदिमा मी कानूनकी निम सहायतासे टिकी रहती है। हिन्दू-सा पर अमल करत समय पद-पक्षपर यही स्पिति विप्न अपम्पित करती है। न्यायमूत्ति रंगमे विस स्पितिक सिमाफ कमी बार अपनी मप्रसन्नता और घोर बिरोष प्रकट छिया पा । प्रत्येक धर्म और ममाजको अपनी व्यवस्पाम हेर फर करनेका अधिकार होना ही पाहिये । पर यह करमेके लिये बागयक स्वाधीनसा मुक्ता मौर योगना-शक्तिका भी समाग में होमा नितान्त भावश्यक है। बड़े-बड़े त्याग करके हमें मुसका विकास अपने अन्दर अवपय ही करना चाहिये । यदि हिन्दू धर्म को प्रापमान समाये रसमा है, संसारमें मुसे अपना स्वाभारिक स्मान पुन प्राप्त करना है यदि भुसे समावस्यानकारी बना ऐना है तो धर्म-पूर्वक हमें इसकी गंदगीको पा गहना चाहिये। कितने ही ये सयामात और दिया हमारे समारके बम्बर बयमूम हो गयी हरियो पर्मके समातन सिद्धान्त विपरीत है मौर को समाजकी प्रगतिमें बुरी सहबाप हो पी है। बुन सबकी हमें अकदम होमी कर देना चाहिये। मस्सस्मता मिम्ही पुरामिॉमसे अंक है। पातिमत बहकार मौर समुचित प्रेम दूसरी पुरानी है यहाँ सदिक माम पर पया धमका नून हो पा हो नहीं मारमाडा मपमाम हो रहा हो महा धर्म-प्रीतिके बदले लात मौर भीतिको स्थान रिया या रहा हो पहा धर्मको मिन पुरामियोंक मिसाफ अपनी दुरुन्त बावार मुठानी पाहिये । सरकारी अधिकारियों को पित देकर अपना मवरब गौटनेवाले लोग मेक परमात्मा- कोजीससो छोपर मुनो पद बनेक भयानक पाक्तियाँको हासष दियामा पर्म मुमतमे लग गये। तामागह

तामसी समकी मौर मुशामद-प्रिय अषीनतामें रह कर नामर्द
बने हुमे मोग देव-दवियोंका स्वभाव भी अन्हीके जैसा
समझकर भुनके प्रति भी भय-मृत्तिका विकास करने मगे मोर
मिस तरह अपने धम, अपर्मका सामान्य स्थापित किया।
सत्यनारायमसे मगाफर कासमरख सक सभी देवताओको
हमने ग्रामने गुरे (Bullies) बना रस्सा है। माकायस्प
सारे, मह जंगल के वृक्ष भोर वनस्पतियाँ हमारे भाजी-म,
पनुमक्षी भूषा मौरस
म्या, ऋतु और संवत्सर प्रत्येक स्मानपर,
यहाँ कि हमारे ऋपि अस परम मंगमकी प्रेममय विभूतियोंका
साक्षात्कार करते पे झुमके साप यात्मीयता और मेकताका
भनुमबरसे थे, यहाँ मान हमें भय मोर भयके सिवा और
कुछ दीखता ही नहीं । धर्मका धुर भोर युदात्त सत्त्व मानने
पाले सोम हमारे विधि नोंके मन्दर रहनेवासे पाम्यको
देस सकत है। परन्तु अन-जन समुदाय काम्पका सनातम
सिसाम्त अपना वास्तविक स्पिति मानकर विपित्र मनुमान
करते हैं मोर थुन्हींको पका मैठकर पर्मका कार्य विफत कर
डामते है।
माग हिन्दू-धर्मका भुतप वाहनेवाले प्रत्येक मनुप्पका
यही प्रपम कसंग्य है कि यह बिस वातकी कोशिश करे कि
भुसके समागमें धर्मका गुर स्वरूप प्रकट हो । जिसमें सस्पकी
निर्भयता नहीं स्यागकी भक्तमन्दी नहीं मुदारताकी सुगन्प
नहीं, यहाँ पमें है ही नहीं पह हमें निश्चित स्पसे समान
सना मार गोगोंको समझाना भी पाहिये । हिन्दु धर्मके
मंस्करणका समय मा गया है क्योंकि भुसपर जमी हुई गर्द
असका म पॉट देनेको है।

जीवित अितिहास
१
जीवित अितिहास
हिन्दुस्तानका मितिहास हिन्दुस्तानियों द्वारा महीं लिप्पा
गया है। रामायण और महाभारत बायके वर्षौ बितिहास
नहीं कहे पा सकते । मानिक दृष्टिसे तो में प्रितिहास है भी
महीं । रामायम महाभारत और पुरानोंमें मी पुण् भितिहास
तो है लेकिन यह सब धर्मका निश्चय करनेके लिये पृष्टान्त
रूप है। महावय बोर वीपवंश वितिहास माने जा सकते है
पर में मंकाके है मौर अनमें मितिहासकी वर्षा महत कम
हमी है। काश्मीरकी राजतरंगिणीफे विषयमें भी यही कहमा
पड़ता है। तो फिर हमारा भितिहास क्यों नहीं है? बीवनके
पिसी भी जगको सीनिय हम मोर्गाने असमें असामारण
प्रमोमता प्राप्त की है फिर भी हमारे यहाँ भितिहास
क्यों नहीं?
जितिहासका वर्ष है, मनुष्य-जातिके सम्मुख बुपस्थित
हुने प्रश्नोंका मुस्सेखन । बिममें से कुछ प्रश्नोंका निराकरण
हुआ है भौर छ बमीतक अमिर्गीत है। जिन प्रश्नोंका
निश्चय हो सका है ये अब प्रश्न नही रहे बुनका निराकरण
हो चुका, मब वे समागमें सामाजिक जीवनमें-सस्पार
मसे प्रविष्ट हो गम है। जिस प्रकार पर हमे अम्मका रक्त
बन पाता ह मुसी प्रकार थिन प्रश्नाने राष्ट्रीय माम्यता मा
सामागिक संसारका रूप प्राप्त कर लिया है। पाना हराम
.

जोति बिलिदास
हो गानेपर मनुष्य मिस बातका विचार नहीं करता कि कल
सुसने क्या लाया था। ठीक मिसी तरह मिन प्रश्नोंका मुत्तर
मिस चुका है. बुनमे विपयमें भी बह बुदासीन रहता है।
भव रहा समास अनिर्णीत प्रश्नोंका । हम लोग
परमार्षी है। हम मनिर्मीत प्रश्नाको कागजपर सिसकर छोड
देमा मही पाहत । मनिर्भीत प्रश्नोंमें मतभेद होते हैं। जितने
मतमेव हासे है अतने ही सम्प्रदाय हम सो कर देते हैं।
दो अच्चारमम मतभेद हुआ तो हमने मिन्न-भिन्न
पासा खड़ी कर दी । ज्योतिपमें मतभेद हुआ तो वहाँ भी
हमने स्मार्त और मागवत अकादधियां असम-असम मामों ।
दर्मन नास्त्रमें तत्वमेव मालूम हुमा तो हमने दैतवादी तमा
मतमानी सप्रायोंका निर्माण किमा। आहार मा व्यवसायमें
मेरहमा तो हमने भिन्न-मिन्न जातियो बना ली। वहाँ सामा
गिक गैति-रिवाजोंमें मतभेद हुश रहो हमने सट अपमातियों
खड़ी कर दी। अगर गमलोसे कोमी मावमा रिसो रिवारका
तोरवे या गो-से-हा पाप करे, ता असके सिर भी प्रापचित्त
है सिर्फ ७सके लिये नबी जाति की नहीं या बातो । महान्
गैतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व पटनामा अितिहासका
हम सोग त्योहारों द्वारा पापत रखते हैं बिसौ तरह हरजक
सामारिक बान्दोमन जितिहासको अम माम्बोसनके केन्द्रको
तीर्पका रूप देकर हम मोमाने जीवित रपा है। जिस तह
मितिहास सिबनेकी वपेया बितिहासको जीवित रखना
अपात् पोवनमें मुस परितार्थ पर दिनाना हमारे समाकी
खूबी है। विपके पने कागापर प्रितिहास हिसार युस
मुरमित रखना मना है या जीवनमें ही मिषिहासका संग्रह
करके रखना है क्या यह कहना मुश्किल है कि प्रिन
दोनोममे मौनमा माग ममिक सुपरा हुआ है। जबतक हमारी
परम्परा दूटी नहीं पौ तब हमारा मितिहास हमारे जीवन में
पोषित पा ! आप भी पदिसोरि तिरिमारों, मुगी

जीवन-सामिय
जामो, जातीय संगठनों और स्पोदारों की खोज की माय तो
महुत-सा भितिहास मिल सकता है हाँ यह टीम है कि वह
मधिकांश राजकीय या राजनीतिक नही बल्कि सामाजिक
मौर राष्ट्रीय होगा। क्या मितिहासके संशोधक मिस दिशा में
परिमम न करगे?
२
शारपाका अयोधम
हम मही पानत कि किस नवमीको मुनि शारदाका
अनोपम किया था। मेक्नि वह अरपन्त सम सुभग बोर
कस्यानकारी मार्स होना चाहिये । समृविदायी वकि बाव
नो शान्ति पो निर्ममता बो प्रसन्नवा दृष्टिगोचर होती है
असीम देवताओंको शारदाका दर्शन हुमा । परतीने अभी हा
रग नहीं छोड़ा है परिपक्व धान्य मुवर्णवर्णकी शोमा फैमा रहे
है-असे समय पर देखोने शारदामा प्यान किया। सम्बनोके
इयों के समाम म्म पानी में बिहार करनबार प्रसन्न कमस
बौर भाकाप्चमें मनन्त काम्यके फम्बारे छेड़नेवाला रसस्वामी
चन्द्र य दोनों पर बक-दूसरेका प्यान कर रहे पे बुसी समय
देवनि पारदाका आहान किया । भारता मायी और मुससे
पप्पीके पदन-कमल पर मुहास्य फला। शारदा आभी मोर
बनीका गौरव बिम उठा। भारदा मामी और पर-पर समृद्धि
घद गमी । सारदा मामी और बीणाका कार गुरुमा
संगीत और मृत्य ठौर और प्रारम्भ हमे।
शारदाका स्वरूप सा है ? पासा ? मुग्पा ? प्रौला ? या
पुरधी ? धारा मजुतहासिनी यासा नहीं है मनमोहिनी मुग्धा
नहीं है विलासचतुरा प्रोका नहीं है । वह तोनिस्ययोबना गिन्तु
स्वन्यदायिनी माता है । यह हमार साप हंसती है सस्ती है
मगर वह हमारी मसी नहीं मावा है । हम मुसक साप पासो
चित पीड़ा कर मान्य है सबिन हम यह न भूस नि हम माताके
?

। शारदाम रबोधन सम्मुम बरे हैं। माता मर्यात् पवित्रता वस्सस्ता, कारुण्य पौर विश्रग्धता । माता अर्थात् अमृत-निपान । 'न मातु परदैवतम्। यह वचन किसी नुपदेवप्रिय स्मृतिकारका गढ़ा हुआ नहीं है। यह तो मिन्सी मातु पुत्र ध म घामकी अमृतवाणी है। चराचर सृप्टिकी मेकताका बनुभम करनेवास हम आप सम्तान बक हो शादमें अनेक मोको देखते हैं। भारदा यानी सरोवरमें विराजमान कमलोंपी गोमा। धारदा यानी शुगत् पूनो और दीवालीकी क्रान्ति धारदा यानी यौवनसहज बोड़ा। घारवायानी पिलक्ष्मी । धारदा यानी साहित्य-सरिता। पारखा पानी ब्रह्मपिया बिन्छक्ति । धारदा यानी विश्वसमापि। मुसी ही यह हमारी माता है हम मुसोवासक हैं । कितनी पम्पसा ! कितनी स्पृहणीय पवनी । कितमा अधिकार । नीर साम ही कितनी बणेदीक्षा। धारदाने स्तन्यका स्पर्श जिन होठोको हुआ हो व होठ मपविन वाणीका मुन्धारण नहीं करेंगे निवस्तार मधन मुंहसे नहीं निकालेंगे दपका मूपम सक म करेंग पापको नही सेवारेंगे पौरपती हत्या नहीं करग मोर मुग्ययनाको धोखा न वेंग । पारदा मन्दिरमें सर्वोच्च पाहो कसाके नामपर विपरमेवारी विलासिता नहीं। भारदा भवनमें प्रेमका बाहर हो देवर सौन्दर्यका माहन नहीं । पारदाके मुपवनमें पागोंका स्फुरण हो निराधाका निस्वास नहीं । शारदा सानोंमें विश्वप्रेमका सगोत हो परस्पर मनुनपका मूर्त्तता पूर्ण कमनन नहीं । शारदाके बिहारमें स्वतंत्रवाकी पीरोदात्त गति हो उद्देश्यहीन और स्वसनशील पद म महीं। पारदाके पीटमें ब्रह्मरमका प्रबाह हो विपय रसका मुग्माद नहीं। माता धारदा ! मागीर्वाद दे कि हमें तेरा स्मरण मार बना देगा हम अधिकारी बने तोतू हमें अपने दर्शन । अगर हमारा ध्यान अविस रहे हमारी भक्ति मेकार मुस्कट बने तो हमें मपनीरीक्षा है। मोर जा 1

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बन्माष्टमीका मुस्तव १५१ निश्चय एक है कि 'मरा अशेप जीवन समारसे सिये है। श्रीकृष्ण भी पुष्पोत्तम है सेकिन ममग युगके घिीप्पमें यह वृत्ति दिनाभी देती है कि अब समाव-संगठन म्पये ही आरिमक मुन्नसिमें याषक होता है तर असके बंधन सोर गिये पाय बार नवोन मियम बनाये आर्य 1 फिर मी पण भरा पक बुप्तिके नहीं पा लाकसमहका महत्व र मच्छी तरह पामते प । पीपप्णने प्रमको सेक नया ही रूप दिया । और मिसीमिप्य पीकृष्णक दीवमका हरक प्रसग रहस्यमय बना है। कोमी व्याकरणकारगिस तहमा बड़ा मर्वम्यापी नियम बनानेक माद बुमके मपवादोंको बक मूममें अपित करता है असी सरह योरप्पने मानो मपने जीवनमें मानसममो सभी यपमा सूभनय किये हैं । गोपिपासे अत्यन्त घुर पवित्र किन्तु मर्यादा-रहित प्रम रिश्तमें मामा होन हुसे मी दुराचारी रागा का बप भक्तिकी प्रतिमाको सन्चा साबित करनेके सिमे अपनी प्रतिमाका भग करण भी पुरा में पास्म-पहण यादि सब प्रममा में तत्वकी रक्षा सिये नियममग दप्टान है। पौषप्णने मायजनताको अमिक भन्तर्मुम और अधिक आरमपरायण समापा मार भपने पीवन मौर अपदेशसे यह सिर करक दिखाया कि भोम और रयाग गृहम्पाथम मौर सम्पास प्रवृत्ति मौर निवृत्ति मान मौर फर्म मिहनार और परलोक मादि मर इन्द्रांका विरोध कबल आमाम रुप है। मगाम अक ही तत्व अनुम्यूत है। मार्य-चीवनपर सबस मपिक प्रभाव दो श्रीरप्परा हो है। फिर भी यह निश्चित करमा मुश्किल है किमिम प्रभावका माप पया है। गिम प्रकार सरम मापामें रिसी हुई मगबीताक मनेा मर्प किपे मर । भूप्सी प्रकार पप्प-चोपनके रहम्पफा भी विविप प्रकारसे बणन पिन्या गया है। गिम तरह माम्मोपि-रामायणा थीरामपटगी मार तुममीरामायणक श्रीरामचन्द्रो गीच महान्दर है मुसी तरह महामारतके पीण, भागवता पीकत गीत-गोपिन्के ।

बीरन-साहित्य
जसंर सेवारे मायक बन पाम तम मितनी भिक्षा दे कि केबस
हेरी सेबाकी ही पुन हमेशा हमपर सवार रहे ! तुझे कोटिश
प्रणाम है।
पा देवी सर्वभूतेषु प्रसस्पेन सस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥
३
नम्माष्टमीका मुत्सव
देशकी राजनीतिक स्पितिके बारेमें अक पृट साधु साप
मेक बार मेरी बासपीत हुमी बी । बातचीतके सिलसिले में मैंने
राजनिष्ठाके बारे में कुछ कहा । साष महाराय बेकदम पोल
मुठे बनी हिन्दुस्ताममें सो दो ही रामा हुमे है। मर्यादा
पुष्पोत्तम श्रीगमपाद और जगद्-गुरु श्रीगण । आप भी
मिम दोनोंका ही हम लोगोंपर राज्य बम रहा है। राजनिष्ठा
तो बुन्हीके प्रति हो सकती है। जमीनपर या पंसेपर राम्म
करने वाले चाहे पो हो किन हिन्दुओंके हदयों पर राग्य
पानेवासे तो म दो ही है। मुझे यह मात विमकुम सही
मालूम हुनी । ममम पूरा परम 'रागा रामचन्द्रकी अम' या
पप्पचन की पय पुकारकर लोग वम-पयकार करते हैं मुस
समय मिस तरहकी भक्तिका भोक वाम पाता है युस तरह
की भक्ति दूसरे किसी भी मानव मस्तिके प्रसि पैदा नहीं
होती।
थीरामचन्द्रजीका बीवन जितना बुदात है बुतना ही सुगम
भी है । रामचन्द्र आर्य पुष्योंके मादर्य पुरुष-पुरुषोसम है।
सामानके नीति-नियमोंका रस्म-रिवाजोंका, यह परिपूर्ण पासन
परते हैं। मितना ही नहीं बस्कि रामचन्द्रजी मोकमतको
बिवना माम देते है कि वो किसी भी प्रजासताक राग्यम
राष्ट्राप्पक्षके हिप आवस्पि हो सकता है। रामपन्दजीमें पह

बम्माष्टमीका मुत्सब १.स निश्पय त है कि मेरा अोप बीवन समाबके सिये है। श्रीकृष्ण मी पुस्पोत्तम ई मेफिन मरग युगके । श्रीकृष्णमें यह वृत्ति विमानी देती है कि अब समाज-संगठन म्वय ही मास्मि अन्नतिमें वापक होता है सब मुसके बंधन तोर दिये पाय और नवीन नियम बनाये गार्य । फिर भी पीक्ष्ण भरा मक वृत्तिक नहीं थे। लोकमहका महत्त्व प अच्छी तरह भानसे प । श्रीकप्पने पमको येक ममा ही स्म दिया। मौर मिसीमिये पीकृष्णके पीवमका हरमा प्रसग रहस्यमय बमा है। कोशी व्याकरणकारबिस तरह मकबहा सर्वम्यापी नियम बनानेके पाद मुसके अपवादाको येक सूत्रमें अपित करता है मुसी सद योकप्मने मानो मपने जीवममें मानवधर्मके समी अपवाद मूत्रबद किये हैं । मोपियोस मत्पन्न घुर पवित्र किन्तु मर्यादा-रहित प्रेम रिप्लेमें मामा होते हुये भी दुराचारी राजा पाबप, भक्तिकी प्रतिज्ञाको सन्चा सावित करने के लिये अपनी प्रतिमाका भंग पर मो युट में पास्त्र-प्रहग आदि सव प्रसगों में 'सत्त्वकी रक्षाके मिपे नियममंग के दृष्टात है । श्रीप्यमे मार्यजनताको अपिक मन्तर्मुल मौर अधिक भारमपरायण मनाया मोर भपने जीवन और भुपदेपासे यह सिट करके दिसाया कि भोग मौर स्पाग गृहस्पायम भार सम्यास प्रवृत्ति और निवृत्ति मान और कर्म मिहमोग और परसाक मादि मव उदोका विरोध कवम आमाम स्प है। सबोंमें कही तव मनुस्यूत है। मार्य-जीवनपर सबसे अधिक प्रभाव तो श्रीप्मका ही है। फिर भी यह निश्चित करना मुश्किम है कि मिस प्रभावका स्वाप पया है। पिस प्रकार मरम मापाम सिपी हुई भगवद्गीताफ अनेक मर्ष पिये मये है मसी प्रकार पप्प-चीवनफे रहस्पफा भी विविध प्रकारसे वर्णन किया गया है। जिस तरह गात्मोकि-रामायणक श्रीरामपरागो मोर तुरमीगमायमा श्रीरामपद्रके भीष महबम्तर है, मसी तफ महामारतके श्रीकृष्ण मानवतक भीषण नीतगोबिन्द के ।

बौवन-साहित्य
मीकम चैतम्प महाप्रभु श्रीरप्पा और तुकाराम महाराज
योराण मक होते हुये भी भिन्न है। वर्तमानकाळमें मी नवीन
चन्द्र सेनके श्रीसम वायू' बकिमचन्द्र श्रीकृष्णसे बरुग है
गांधीगीके श्रीकृष्म तिकलीफे योष्णसे भिन्न है और
भरविन्द वा श्रीकृष्ण तो सबसे न्यारे हैं। मुलम और
दुर्लय अफ और अनेक रसिक और विरागी विफली और
सोकसंग्राहक प्रमल और निष्ठुर, मायावी और सरक-जैसे
मने प्रकार श्रीकप्मकी जयन्ती किस तरह मनामी पाय
मह मिश्चित करना महा कठिन काम है।
श्रीकृष्णका परिप युतना हो म्यापक है जितना कि कोसी
संपूर्ण जीवन हुआ करता है। दुनियाकी प्रत्येक स्थितिका
श्रीकृष्णने अनुभव किया है। हरक स्थितिके लिये अन्होंने
माद अपम्मित किया है। योकृष्णको बास्पावस्था अतिशय
रम्य है। गायों और वण्डों पर सुनका प्रेम बनमालाओंके
प्रति झुनको रुषि मुग्मो का मोह गलमिोंसे मुमका स्नेह
मत्सनियाकी ओर मुनमा भनुराग सभी कुछ अद्भुत और
अनुकरणीय है। छोटे झाके जरूर मिन माताका अनुसरण
कर। सुदामाके स्नेहको याद रस घन्माप्रमीके दिन हम
अपने दूर रहनेवाले मित्रोंपो चार दिन तक साप रहने के मिथ्ये
योहणका गुणगान करपे खेलमेरे लिये गुसा में तो बहुत ही
अषित होमा।
पीमणके मनमें छोटा मा पा ममीर मा गरीब मामी
मा अज्ञानी मुस्प या कुमप किसी भी प्रकारका भद म पा ।
गौमाको पराने जात समय भीकृष्ण मपने ममी सापियोस
कहत कि हरमक बालक परस मपमा-अपमा करवा ले माये।
फिर वे सयरामलेगा मक साप मिराकर प्रेमम सबके साप
बन मोषन करस से । आज भी हम मेर सन्के विद्यार्थी मक
चपतरके कमपारी मेक मिला मजदूर अब रमपमें सेतन
बार सदस्य भिट्ठा होकर अपने-अपने परस पानेमा सामान

बन्माष्टमीम मत्सब
माकर शहर या गाँवक वाहर क्सिो मुर्खेपर या मदीके निमारे
पेड़ के नीचे गपचप करते गाते सेलते या ममन करते हो
दिन वितायें तो मुसमें कैसी नमी-नजी सूवियां प्रकट होंगी।
मेकिन मिस बन भोजनमें सदा-मकोडी या चिवड़ा-वना नहीं
चलेगा। बप्पाष्टमीक दिन मुम्प माहार तो गोरसका ही
होना चाहिये । दूप, दही मक्खन और मन्द-मूल-फलका आहार
ही भिस दिनके सिध्ये अषित है। पम-मशोषक वगगुरुका
जिस दिन पम्म हुआ मुस दिन तो मरके जिस प्रकारका
सास्तिक बाहार ही करें। बड़ी मुम्रो लोग भूपयाम रक्य ।
अपवासकी पुरानी प्रपा नही छोड़नी पाहिये। असमें
काफी गहरा हस्प है । अपमासस मन अन्तमुख हो पाता है।
दृष्टि निर्मल होती है । शरीर हरा रहता है । बहुतोंका यह
मनुभव है कि समय-समय पर अपमास करनेकी बादत हो
तो मुपवास के दिन मन अभिक प्रसम्न पहना है । युपवाससे
बासना पुरा होती है संकल्प-शक्ति पड़ती है। परीरमें दोप
न हो तो अपमास करनेमे पिस काम होता है और धर्मके
गहरे मे-गहरे तत्त्व स्पष्ट होते जाते हैं । अगर युरियोग हा सो
अपवास कसे घमतस्वका चिंतन किया जाय और रिममें
मितनो पनि म हो वह पदावान लोगोंक साप पमपर्चा
करे । यह भी म हो सके ता गोताका पारायम (पाठ) पिया
जाय नामसंकीर्तन भजन मादि किया जाय मास्विम संगीत
पे साप भजन गायें जायें। अपवासरे दिन राउमरकि म्पाव
हारिक काम बहाता हा मा कम किय गाय सकिन पालो
समय मालस निद्रा या म्पसनम न बिताया जाय । बहुत बार
हमें मुमर-मुम्दर धार्मिक वपन भजन या प- मिस जाते है
मेदिन मुम्हे हिम ग्मने लिय ममय महीं मिरता ! जिस
नि मनको गिाने में समय पिताया पाप तो अच्छा होगा।
जिनमें मानमनिक मार्य परनेकी पक्सि हा अनक किये
मिससे मष्ठा और साहो गता है कि गोपारणे जमी-

बीवन-साहित्य स्मवके दिनसे गोरक्षाका बान्दोलन शुरू करें। धीकप्पके सापियोंको बितना दूध और पी मिलता पा खुवना दूध और भी जबतक हमारे गम्भोंको नहीं मिरता तवसक यह महीं कहा जा सकता कि हमने घीकृप्प-चन्मोत्सब ठीक-ठीक मनाया है। श्रीकष्म वप्रितम मल्ल पे गृहस्थाश्रममें रहार ब्रह्मपर्यका पाम्म करते । ये दीर्घाय थे। बिसरिये हरक मगाडेमें जन्मोत्सव मनाया जाना चाहिये और श्रीकप्णके जीवन के मिस भूमे हमे अंगकी साप फिरसे सामा करनी चाहिये । जो पारित्यमें ही जीवन म्यतीत करना चाहते हैं उनके सिमे सबसे अच्छा काम यह हो सकता है कि जिस तरह गीता में घीकपणने बमको उपदेश दिया है उसी तरह भुमके भिन्न मिनभवसरपर कहे हु तमाम बचन महाभारत तथा भाग पत् विष्णुपुराम भोर हरिवशर्मेसे जितने मिल सके उतने सब सग्रहीत करें। और उसके बाद मिन बचनोंका संवर्भ देखकर. श्रीफप्णपरिमये अनुसार गीलागीका म मगा। और मिस महान् बगद्गुहमा तत्वनान ( फिर्मासफी बॉम् लाइफ) या पा भुसभी राजनीति कैसी पी भादि माते निश्चित करके मोर्गो सामने रक्से। x यह बहव भाबुक सबात है कि पमाष्टमीका दिन स्त्रियाँ किस तर ममायें । मस्तिके अतिरिक्त स्वरुपमा नारदने मपने भक्तिसूबमें वर्णन किया है। घुसपरस मनोवत्तियोंको गोपी समकर परबह्म पुरपपर व कितमी मुग्म थी मिसका मणम पनी कमियोंने जितना ज्यादा मियाईकिपीएमकेबीवनके परिपूर्ण रहस्पको पनता मगमग भूम ही गमी ।। पीकृष्णको पोपीजनबाभ कहा गया है। श्रीकण मोर गोपिर्यो धोषणा प्रम स्तिमा पिपट मोर वाभ्यास्मिक बन गया पा मिसकी मम्पमा मिन हदयों को महीं पा सकी बुन्होंने या तो मीकरण- को मीचे पनीट किया है, भपका मुम प्रेमका वर्णन करनेवाले x बम्मापनोम मुत्सब पपियोंने मुनको हतको वत्तिका मौर बसत्यवाणी ठहराया है। मेरा कहना यह महीं ह किरण मोर गापिर्योक पोषके प्रमा वर्णन मरनेमें फरियाने मृम महीं की है। मैं तो यही मानता हूँ कि समानी म्पितिको देसफर कविर्योके सिये मषिक साब- पानीके साप मुस प्रमकाबर्मन करनामचित पा । मुसम्मानी पमरे सूफी सम्प्रदायके मम्त कषियों मार फीरोंको समा देते समय कट्टर मुमममान बागाह कहते थे कि य सामु गो कहते है वह गमत नहीं है सेपिम मनधिकारी समारे सामने मिस वही रहम्यमय गाते रसकर ये समारमा नम्मान पहनाते है मौर मिसमिये ये सजाके पात्र है। चूमि गोपियोंके प्रेमको हम नहीं समान सकते मिसलिम मुम प्रमका मैसा स्वम्स देने- की कापी मावस्यमा नहीं जो हमारो वर्तमान नोति-कस्पना- साको पमन्द माये । मीराबानीने सटही दिलाया है कि गोपियोंपा प्रम फैसा था। जब-जब मोगोंके मस धर्म मपरको पया मुठ जाती है तब-तब बम पटाको फिरमे स्पिर मरने कमिय मुमत पुस्प मिस मसारमें अवतार लेत. भोर म्वय मपने अनुमवमे मोर गोवनसे लोगोंमें धमो मति यदा पैदा परत।। मुसो रह गापियोंकी पार भक्तिो बारेमें जब माग िमयदा मुत्पन्न हुी तर गोपियोमेंसे मकने-मापद रापानी ही होगी-मीराका मवतार रेफर प्रेमभर्मको फिर से सम्पापना गरी। यदि हम घोपबर और भक्तो वीचमा यह मनिर्वचनीय प्रम-मम्बाप म्पप्ट पर पर चब तो गोपियोंक प्रेम और पिण्डो गीत गानेमें मुभकोत्री मापत्ति महीं दिगामी दती । भीगरे मानका रयाग हममे हो हो महीं मरता । जमाना बुरा मा गया है मिमलिये पया हम मीराबामीको भूल पार्य ? यह पाठ महीं है कि मीरम साब केबम मोपियोंका सम्बन्ध था । यगोदामी पापप्पको पूमा, पुनी पापमारपीको पूरी मुमा मौर दोपहरी नागपुरूप पूरती। धीरणा यह मम्पूण गावन हनी स्त्रियाक बीवन-शाहित्य साममे रखना चाहिये । श्रीकष्ण कितने संयमी पे किसने मीतिश पे कितने धर्मनिष्ठ 4 यादि सभी बातें स्त्रियों सामने स्पष्ट कर देनी चाहिये । बौर तभी गोपी प्रेमका मादर्श खुनके सामने रमना चाहिये । प्रेम और मोहा वोच को स्वर्ग बोर नरकके जितना भेद है असे स्पष्ट करके दिखाना चाहिये। पुरागोमें-भागवत-क बहुत सुन्दर प्रसगका वर्णन वाया है कि रासरीलामें गोपियोंकि मममें मलिन कल्पना जाते ही श्रीपप्म-असंम्प स्पपारी ग्रीकप्ण-अपामक अदृष्य हो गये और जब गोपिर्योका मन पश्चातापसे पवित्र हुआ तमी में फिरसे प्रकट हो। मिमका रहस्य हरमेकको समास मेना चाहिये । जिस रहस्मको किसी भी पक्तिसे छिमा रमने में कुगर मही । अधूरे मानसे मुत्पन्न होनेवाले दोपोको हटामेका अपाय सम्पूर्ण ज्ञान है अशान नहीं। प्रेमको बुसके मिगुट रास्तेसे हमें से पाना चाहिय । प्रम वानेसे नहीं बढ़ता गस्मि बामेके प्रयत्नमें बह विकत हो जाता है। जन्माष्टमीके दिन हम सुनमा चरिष गायें भीषण द्वारा गोपियोको दिया हुमा मुपदेन गायें गुटपके हाप प्रोपणजो का गोपिर्योको मेगा हा मम्देशा गाये गोताका रहस्प ममत से। रास मेसें और अपवास रखकर शुर वृत्तिस असक बन्दरका रहस्य समप्त लें। पमाष्टमी के दिम मगर हम गायमी पूजा कर, तो वह ठीक ही है । गायकी पूजा करनेमें हम पशुको परमेश्वर नहीं मानते विन्तु अम पूरा द्वारा गाय प्रति प्रेम और कसममा म्यान करते हैं। नदीको पूगा तुसमीको पूजा मौर गायको पूजा अगर बछी तरह साप-मममारपरवा अमम अम्त फरणको मष्ठी स-मच्छी शिक्षा मिलेगी रम वृत्तिमा विकास होगा मोर हृदय पवित्र तपा संस्कारी पनगा। प्रस्पन पूजाअपमा ही भाव नहीं रहना । पूसतमतासे हा मकतो है बफावारी के कारण हो सकती है प्रेमा कारण हो सकती है भादरधि ।

अम्माष्टमोगा मुत्सब
से हो सकती है भक्तिसे हा सकती है भास्मनिवेदन-वृत्तिस
हो सकती है या स्पस्मानुसंधान के कारण भी हो सकती है।
मिस तरह देखा जाय तो गायकी पूजा करनेमें अकेवरवादी
या अमीश्वरवादीको भी कामी मापत्ति महीं होनी पाहिम ।
निरीश्वरवादी बोगस्टस-नाष्ट क्या मानवजातिकी स्त्री प्रतिमा
बनाकर सुसमी पूजा नही करता था
भावप महीनेमें बहुव-सी गाय भ्यातो हैं । घरकी छोटी
छोटी लड़कियां अगर स्तनता माय गार्योंकी और विपर
अपर उछमने-कूदने । परनेवाले छोटे-छोटे बछड़ोंपी हल्दा
मौर रोमीसे पूजा करें, तो किसनी प्रम-वृत्ति मापत होगी !
कम्पाधामोमें अनेक तरहसे कृष्ण-जयन्ती मनाली या
सकेगी। पर अम्बरकी ममीन अच्छी तरह सीपकर सफर
परपरकी युनीसे और अबीर धादिस पौष पूरनेकी प्रतियोगिता
रासी जा सकेगी। लरपियो गीत गाय रामसपा-जीवन
के भिन्न भिम्म प्रमंगोंकापच और गप वर्णनपरें, पग्स कलेमा
पाकर सब मिसागर साये अम दिन समी सकियोका
मपनी सहेसियोंको भी साप आनेकी प्रिगाजत हो तो
मधिन बामन्द आयगा मीर अपिक एपकिया गिक्षाकी आर
थापित होंगी। धार्मिक शिक्षाका यदि प्रभावकारी बनाना है
तो हर स्योहारफे मवसरपर सूमको मन्दिरका म्याप ६ देना
चाहिये । पनि हम मुर्ति-यूमासे में हर गये हा ता जग्माण्मीये
दिन सुझमें हिंसा वैषवाकरसोरियां गायें। मिसमें एरियाकी
मातामें भी अवश्य भाग सँगी।
माजपरी कम्याशाला अभीतक ममाजका मा मग नहीं
पनी है अन्होंने समागमें अभी तक जर नहीं पकड़ी है और
जिमीसिये मिन स्पोंको चामेबाल अस्साहो दशामवकांका
पापस ग्यादा परियम बसार पाता है । मन्माष्टमी बस स्याहार
मनानेमें मषियमारपी सभी स्त्रियां भाग ने लग पायंडा
रेगत-देगते शिक्षा सफल होगायगो शिक्षामा छाम मेवा पूर

बीवन-साहित्य
में पड़नेवासी लड़कियों को ही नहीं बल्कि सारे समामको मिलेगा
मौर हम शिक्षाका मा पवित्र कार्य कर रह है मुसपर भी
श्रीरप्म परमात्माकी अमृत-वृष्टि परहेगी।
४
नवरात्रि
महिषासुर साम्राम्यवादी पा। सूर्य बिन्द्र मम्नि वायु
चन्द्र यम वरुण मादि सभी देवताओं के अधिकार मौर महकमें
बह स्वयं ही पसाता पा । स्वर्गके देवोंको मुसने भूमोककी
प्रया बना दिया था । किसी को भी अपने स्थानपर सुरक्षितताका
मनुभव नही होता था। दव परमारमा पास गये। परमात्माने
मुष्टिकी मो म्यवस्था पर रम्नी पो मुसे महिपासुरने कितना
बिगार गमा है भिम बारेमें अन्नि भगवान्को सब-कृए कह
समाया । सव हाए सुनकर विष्ण ब्रह्मा शकरमादि सबक
परीसे पुण्यप्रकाप जाग झुठा और अससे अफ वी पक्ति-
मूर्ति मुत्पन्न हबी। सब देवनि पिस सर्वदेवमयी शक्तिको
मपमे-अपने पायमोंगी शक्तिसे मंरित किया और फिर
घिस देवी पाक्ति और महिषासुरफी मासुरी भक्तिमें भीषम युर
टन गया । कौन कह सकता है कि वह पुट कितने सालों तक
पमा एकिन वैसा माना जाता है किकुमार महीनेकी पुस्मा
प्रतिपदासे मेगा दशमीतक यह युट पसता रहा मौर सके
अनुसार देवी सक्सिकी विनयका नवरात्रि-अरसर हम मानत है।
दैवी शक्ति परमा विद्या है बझविचा है बारमसस्व
विधातत्व मौर शिवतत्वका मुरूप है। यह पक्ति 'घठ प्रति
पुभकरी है महितेप साप्पी है दुश्मनके साप भी यह दया
प्रकट परती है। दुष्ट मोमो दुरे स्वभावको धाम्त करना ही
मिस वी सक्तिका घास है। 'दुईतवृत्तोममर्न तव देवि
पीलम् ।'

विवस्वामी
मसुर कोग मिस शक्तिको न समप्त सके। भक्त साग बब
देवी सक्तिकी भय बोसने सगे तोमसुर परेशान होकर घिस्सा
मुठे 'बरे यह बया' अरे यह क्या ! मासिर मसुरोंका पमा
समय ही सपने रुगा । असने बनेक तरहकी नीतियों बाबमाकर
देखी अनेक रूप धारण किये लेकिन अम्तमें निसप-देवगण
सक्ति समूहमूति' की ही पियपहनी । बासु अनुकुल बहने सगी
याने भूमिको सुनमा सुफला कर दिया दिद्यार्थ प्रसन्म हुश्री
मौर भक्तगण देवोका मगफ गाने मगे । देषीने भक्तोंगो मारवा
सन दिया कि भिसी तरह फिर बव-अव बासुरी लोगोंके कारण
मातंग फैन भायमा तय-सम में स्वय अवतार धारण करके
दुष्टवाना नाच करूगी।
यह महिषासुर प्रस्पेक मनुप्पके हृदयमें अपना साम्राग्य
प्रस्थापित करमेकी भरसक कोशिश करता है मौर मुस-अम
समय मुसके सब स्वक्ष्मोंको पहलानकर मुसमा समूम मा
करनेका कार्य देवी सक्तिको करना पड़ता है। प्रत्येक म्पति
अपने मन्त करणी पांच-परम करनेपर यह पान सकता है
कि मुसके हृदयमें यह युग कितने सालों ता पमता रहा है।
नपानके दिमोंमें अपने हृदयमें दीपको वोलपस प्रग्वस्थित
रतकर हमें देवी शक्तिकी माराधना करनी पाहिये क्योंकि
पर यह देवी पति प्रसन्न होवो है तो वही हमें मोम प्रदाम
सपा प्रसम्मा पररा नगा भवति मुसये।
विजयादशमी
मापरेमें मुगलकामकी यो भिमारवें । मुनमें भेक विण
पता यह है फिरे निचले सामास पत्थरफ है भौर पर
पाछे सफेर पत्परके । मास परपरका काम यहाँगीरसे समपका

जीवन-साहित्य
है और सफेद पत्परका पाहवहकि समयका । हर बिमारत में
भिस तरहमा कालक्रमका मितिहास वर्गभेवसे मूर्तिमान
दिखाई देता है। किसीभी पुरामे बड़े शहरमें पुरानी बस्ती
और नमी यस्ती ने दूसरेसे सटी हुषी मगर माती है या
बस्तियोंकी तहों-पर-तहें यमी हुभी दिखायी देती हैं। भाषाकी
कहावतो, मी भिन्न-भिन्न समयका वितिहास समाया हमा
होता है। हम घरमें ममीनपर फर्श बनानेके लिय यो पत्पर
विछाते है वे से मालूम पड़ते है गोया यह समूचा बेफ ही
पत्पर हो मगर अनमे मी प्रत्येक स्वरमें कमी परसोफा मंतर
होता है। नदी के किनार हर साल बो कीचकी वहों-पर-तहें
जम जाती है पन्तमुन्हीस परतीकी भट्ठीमें अंक पत्पर वन
जाता है।
दाहरेका त्योहारमी मेकही त्योहार होते हु मिन्न कालके
भिन्न भिन्न स्तरोंका बना हुआ है। वसहरेके त्योहारके साम
मसस्य युगोंके पसंस्प प्रकारके मार्य पुस्पार्थोकी विजय पुरी
हुषी है।
मनुष्य-मनुष्यका समर्प मितमा महत्वका है अतना ही
या अम भी मपिक महत्वका मेपर्प मनुष्य और प्रकृति
वीपमा है । मानयको प्रकृतिपर जो सबसे बड़ी विजय मिमी
है बह । सती। जिस दिन बुती ही अमीनमें नौ प्रकारका
अनागवोकर पिम जसका सिंचन परके मुसमेंसे अपनी मागी-
गिका समा। भविष्यके सबहके सिमे पर्याप्त अनाज मनुष्य
प्राप्त कर सका वह दिन मनुप्या सिये सबसे बड़ी जिमका
पा क्योंकि असो वाद ही स्पिरतामूसक संमृतिका मम
हमा । अस दिनकी स्मृतिमो हमेशा तागा रमना कपि परामग
मार्म मोगांना प्रपम कत्तम वा।
मीसवी सदी भौतिक सपा योनिका आविष्कारोंपरी पदी
समझी जाती है, और यह अपित भी है सकिन मानवजातिक
मस्तित्व और संम्फतिके मिय गो महान् मामिपार मारणस्प

बिजयासानी ४१ । हमें हैं ये सय आधयुगमें ही हम है। जमीनको जोतनेकी कमा सूव फाप्तनेपी पमा माग बहानेकी पहा और मिट्टीस परका मा बनाने की सा-ये पार पत्ता मानो मानवी संसतिम मापारस्सम हैं । धिन पारों कलाओंका अपयोग करके विजयनसमीक दिन हमने पूपिमहोत्सवका निर्माण किया है। यपने बचपनमे देखे हमे पहर मपराधिक पुत्सपकी यात्र मुझे बार भी बनी हुी है । मेरे मामी प्रतिपदा दिम पाहरसे वाहर जाकर सेवासे अच्छी-से-अच्छी साफ काली मिट्टी ले माये । मैं स्वयं मौ अनानायी फरिम्त बनाकर अनमेंस को मनान हमारे परमें न मिले मुन्हे मपने मानाके यहाँसे ले बापा। मेरी दादीने छोटी-सी धुनमीसे स्मी घुनकर असकी १६ मगुप्त मम्मी वत्ती मनामी । मेरी माने सूत कातकर (परमपर नहीं बल्कि लोट पर ) मुम सूसको मेक हजार छोटी-छोटी बत्तियाँ वमामी। मैं पागारमे मारिया सपा पपग्रन माया। पपरलमें सोना मोतो हीरा प्रवास मोर मोमम या माणिक थे। जिन पपररनों दगा वहुत ही छोट पे। मरी भतीजी बगीपेसे फूर मौर तरह-तरहो पाते मामी। पिताजीने समान परसे स्वगृहमें गायो गोबरस रिपी हमी भूमिपर मस पारी मिट्टोको फैसाफर अससे मेक सुन्दर पौक पमाया । यह हमा हमारा मत । मुसा बीचोंचीप या साटा रख दिया। मुस सोरमें पानी भरा हुमा पा। मुसरे कार मेक मात्त मुपारी दक्षिणा पंपरल मादि धी गरी गभी पी। भूपर मामर पाकी मेक पांच पत्तोंयारी छोटीसी हनी रपार युमपर मेप नारियर रमा पा । मुम्दर मापारके माटेमेंमे बाहर निफ्स हम मामके हरे-हर पांच पप्त और मुनपर पिपरक ममान दिशाभी नेवासे मारियमका वाकार देशपर हम यहद पुरा हमे । पूजारी तैयारी हुमी पोकार मेतमें मी मनास धोये गप । मनपर पानी छिका गया । मीपमें एपे हम पट (टे)पा पन्दन पेसर मोर कुमो । बोरक-साहित्य पूजा की गमी । यपाविधि सांग पोडशोपचार पूजा हुश्री । १६ मंगम सम्वी बत्तीवासा दीपक पलाया गया। फिर बारती ही और परमें सब कहने एगे कि आप हमारे यहाँ नवरात्रिकी मटस्थापमा ही है। अस नदादीपको नौ दिन तक वर बसमा रमना पा । भुसका बीच गुप्त पाना महा वभुम माना पाता बा। दूसरे दिन पूजा मेकके बदल दो मामा फटकामी गी, तीसरे दिन तीन चौष दिन पार-विस तरह मामा बढ़ती गमी । अपर मामाले बढ़ी और नीके सतमें मकर फट निकल । फली अपर ता अपमे दसोंके छाते बनाकर ही याहर निकरु माये या हमे हर रोज मिष्टान्न मिससा था मकिन पिता पी तो सिर्फ धक ही समय भोजन करते और सारा दिन पीसाम्पर पहनकर बुरा नम्नदीपकी देसमास करते । यस्तो म टूटे तेस कम न पड़े और दीया वुझमे न पाय-मिस बासकी बडो फिक रचनी पड़ती थी। रातको भी रो बार बार बुठकर तेम डालना मूपर जमी हुबी कासिमको बड़ी सावपानीस पटकना आदि काम बुनको करने पड़त थे। अब मो बनाया बकर पूरी तरह फूट निकसे तो अम समयकी मेतकी घोमा बहुत मवर्मनीय पी। कुछ बनाम जल्दी भुमे पुछ देरीसे । मैं यह मच्छी तरह याद रमता कि कौनमे बनान पहले मुगे हैं और कौनसे बादमें । सभी अंकुर रिसकुस सफेव प पयोगि मदराधिका यह 'सत' परके मम्दर पा और सूर्पक प्रकापके बिना इरा रग तो या नहीं सकता। फिर पितागी खतपर हस्दीका पानी छिड़कने मगे। मैंने पूछा-"यह किसलिये? मबार मिरा-"मिससिप कि सुपा हुमा बनाज सोने समान दिखाई दे! सास दिन सरस्वतीका बादाम हुमा। परमें मितनी पार्मिक और सस्तकी मिलायें भोर पोषियों पो मन मबको मेक रंगीन पटपर रहार हमने सुनकी पूजा की। हमें पानी से पट्टी मिस ममी। पिसे मनप्पाय कहते हैं। सरस्वतीका

विजयातनी
वाहान पूषन हमा । 'सर' पूजन यानी पास्त्रास्त्राका पूजन।
घिस दिन हापी पाड़ों पैसे युटोपपागी पामवरोंकी भी पूजा
की पाती है। जिस तरह मगरानि पूरी हुमी और दसवें दिम
पाहा बाया ।वहरेके दिन होम बलिदान बौर मोमोसमपन
ये तीन प्रमुख विपियों पों। बह विधारमका भी दिन था।
विनयादामीक त्योहारमें पातुर्वर्ण्य मेकर हुआ दीसठा
है । ब्राह्मो सरस्वती पूजन सपा विधार्रम क्षत्रियो पत्र
पूजन अस्वपूनम तपा सीमोल्लमम और पैश्याकी बतीय सीना
बातें मिस त्यौहारमें मेकत्रित होती हैं। बीर पहाँ बितना
बरी प्रवृत्ति पसती हो वहाँ मूद्रोंकी परिचर्या सा समाविष्ट
है ही । पर दहाती सोग मवरात्रिके सनायकी साने जैसी पीसी
पीसी कॉपर्स तोरकर अपनी पगठिोमें खोसते हैं बौर पदिया
पोशाक पहमपर गाते-बजाते मोमासपन करन जाते है तव
खेसा दृश्य मांझे सामने मा सम होता है मानो सारे दशका
पौरप अपना पराक्रम दिसामेके लिये बाहर निकर पग हो।
पग्रहरेका सुस्मय जिस तरह पिप्रधान है असी तरह
पह क्षापमहारसव भी है। मिन दिनों भासने सिपाहियों का
मुर्गेकी वरह सहानेका तरीका प्रपरित नही पा सुन दाना क्षात्र
तेजपा रामता रिसानोंमें ही परवरिसा पात पा किसान यानी
पत्रपति-पत्रिप! यो साहमर भूमि माताकी सवा परता हा
यही मौका आनेपर मुसमी रसाके सिये निकम परेगा। मरिया
मातों टारियों और पहागरे साप जिसका रासदिनका
समग्प रहता है, घोड़ा, पस-पम जानवराका मा अनुशासन
सिना सकता है और सार समागरा पा पाना विमाना।
समें सेनापति और रायस्पो सब गुम या पायं वा पापय
को गया बात है? रागा हो पिमाा । मौर विमान ही
राजा।
वैसी हासतमें पिझा स्योहार बास्योहार बन गया ।
मिसमें पूरी तरह मैतिहासिक बीपिरय । मनियोंका प्रपन

११२ बीवन-साहित्य कम्प तो स्वदेशरक्षा ही है । परन्तु गहव बार, पत्रुके स्वदेश- में घुसकर देशको बरबाद करनेसे पहले ही सके तुष्ट हेतुको पहमानकर स्वयं-सीमोरूषन करना-अपनी सीमा यानी परहदको मापना मोर सुर शत्रुके मुल्कमे मामी से पाना होशियारीकी और वीरोभित गात मानी पाती है। पोग-सा सोचमेपर मालम होगा कि मिस सीमोल्लंपनके पीछे सामाग्यपत्ति है। अपनी सरहद सापकर दूसरे वेशपर अधिकार माना और वहाँसे धन-पान्य मूर माना जिसमें मारम रक्षाफी मपेक्षा महत्वाफालाका ही अध अधिक है। मिस तए मटकर लाया हुमा सोना बगर पराक्रमी पुरप अपने ही पास रखे तोवर्तमान युगके क्षमप्रकोप (Militariump के साप बिप्रमोप (Indutrialism) के मिस जानेकी भया। मक स्पिति पैदा होगी।' पहा प्रमुख और पनिकरण मेका "भत्रकोरतमा वरकोप मिनो नये नानोमी साता गुमे सिउ करनी चाहिये । चातुर्थन सन्तुलन या सामनस्प तो तमाम परीरकी स्वाभाविक विति है। समाजले हिपे मिन चारों बनोगे मावश्यकताको स्वीकार कर किया गया है। बिप्स तपातिक परम वात पित्त और कपये तीन पातु मुक्ति मनुपात एते है तमी पर मोरोगी रहता। मुमी तपसमा परीरमें चानुवर्ष मुषित अनुपातमें होना चाहिये ।समें पित्तकी मात्रा मातीमो मुते पित्तप्रकोप कहते है। वित्तप्रकोपो सारा पर पराब हो सका है।यही हामत माताकोप और पत्रकोप विषय है। सपा मोर माय- बर्या प्रतिरेक या प्रावस्म हो बाप तो बस स्थितिको मध्यकोप बहना होषित है। पहो गत दिप्रकोप या वापरलोकी की है। पीरका नाम होनेका समय बामेपर तीमा पातुमाँग प्रकोप होता है। मिसे पहने है। पूरोप मात्र मत्रिय म मौरमा जिन तीनो- का मे मा प्रकोप माता पाना मारमा पार मौर व दामन शिलवानों पर विर बन परे है।

विबमामी मा बात नहीं घतानको असग न्योता देनेकी जरूरत नहीं रहती । असीलिये दारेके दिन सूटकर साये हुने सानेको सब रिक्तदामेिं वितरित करना अस दिनकी येक महत्वको पार्मिक विधि तय की गयी है। सुवर्ण-वितरणकी मिस प्रपाका सबंध रघुवराके राबा रपके साप मोड़ा गया है। रपुरागान विश्वमित् पज किया । समुवलयांकित पृप्पी को पोवनेरे वाद सर्पस्वका दान कर रासना विश्वामित् यश कहलाता है । यब रपुरागाने मिस तरहका विश्वमित् या पूरा किया सब मुसके पास परतन्तु ऋपिका विद्वान् और तेजस्वी शिष्य कौरस मा पहुँमा। कौत्सने गुरमे चौदहों विधा ग्रहण को यी असफो दक्षिणा सौरपर बौदह रोग सुवर्ण मुद्रायें गुको प्रदान करनेको असकी पिन्छा पी। हेक्नि सर्वस्वका दान करन वाद बचे हम मिट्टीके बर्तनोंसे ही गजाको भादरा तिप्प करत बम कौस्सने रामासे कुछ भी न मांगनेका मिपपय किया। राजाका आशीर्वाद देकर वह गाने मगा। रपुने बरे मापहा साप अस रोक रखा मोर दूसरे दिन म्वगपर पावा बोरकर मिन्द्र और परसे पाससे पन मानेका प्रपम्प किया। रपुरावा पक्रवर्ती था। बत मिन्द्र और और भी मुसके मानसिक पपारणका दान दनेक सिये अनसे कर सभेमें मगोप किस बातका था? रघुरामाकी पड़ाग्रीकी बात सुनकर रखवा रोग हर गय । मुन्हाने ामीफ मेष पेपर मुवर्ण- मुद्रामोशी दृष्टि की। रपुराजाने मुबह अठार दया ता दिखना पाहिये युसना मुबर्ण आ गया पा। मुममे बोरसको बह रद दिया । कोस पौदह पराउसे म्यादा मुद्रा मेता पा मौर गमा दान दिया हुआ धन वापम सेनेरा तैयार म पा। मापिर मुसने यह पन नगरवासियोंगो मटा दिया। वह दिन माश्विन शुक्ला दगमोगा पा मिसीसि माय भी बधहरेके नि पमीषा पूरन परके शग ममफे पस मोमा समानकर 1 बीवन-साहित्य । मूटते हैं और अक-दूसरेका देते है। कुछ लोग तो शमी मीधेकी मिट्टीको भी सुवर्ण समझकर ले पाते है। क्षमीका पूबन प्राधीन है । औसा माना जाता है कि शमी के पड़में इपिढेका तपस्तेम है। पुराने जमानेमें शमी सकारियोंको वापसमें भिसकर साग आग मुसगाते थे । शमौकी ममिपा आहुतिरे काम माती है। पागब पर अगातवास करने ममे प तप शुन्होंने अपने इपिमार समीके बेक पेड़प- छिपा रसेप बोर वहाँ कोषी माने न पाये बिसक मिम भन्होंने उस पेड़ तमेसे बेक मर-कास बाप रखा था। रामपन्द्रजीने रावगपर बो पड़ाली की सो भी विजया दशमीके मुहूर्तपर । मार्य मोनि-हिम्दुओंन मनेक बार विषयावधमारे मुहूर्तपर ही पावे वोसकर विजय प्राप्त की है। मिसस विजयादशमी राष्ट्रीय विजपमा महत्त या त्योहार बन मया है। मराठे और राजपूत बिसी महत्तपर स्वराज्यकी सीमाको बहानेके हेतु पशु-प्रदेशपरयाक्रमण करते थे । घम्त्रास्त्र- से सगार वीर हावी माहोपर पड़कर नगरके बाहर पलूस स पानेका रिवाम बार भी है। यहाँ एमीका और अपराजिता देपोका पूजन सीमोल्लमनका प्रमुख माग है। सा माना जाता है कि थमी धीर वर्मत वृक्षमें भी बानुका मापा करनेका गुण है । मुस्तरेके पेड़को परमन्तक कहते है।पही शमो नहीं मिसती बहाँ अस्तुरेक पेहमी पूजा होती है । मुस्तरेके पतेश भागार सोनेके सिक्के की तरह गोर होता है और पुरे हमे अवामी का (Reply Card) की तरह अमके १ महिपातुर मामले मे प्रबलत्पने कामात मामा बा। अपनाने की रिन तर मुतते पुर हर विसपारपीके दिन मुहका बच किया था। जिस मायकी महमहामो पुरानो मिसती है। प्रिसीलिये अपरामिता पूजन करने मौर महिप पामो भातही बलि चढ़ानेका रिवाज पहा है।

बिजयादशमी पत्ते मुझे अहाते है जिससे से ज्यादा खूबसूरत विखाभी देते हैं। दशहरेके दिन पौमामा लगभग बरम हो माता है। शिवा गोके निसान-मैमिक दशहरे तक मेतीकी पिम्तासे मुमत हो पात में । कुछ काम गाडी न रहता था । सिर्फ प्रसर काटना ही गावी रह वाता पा। पर युस तो घरकी औरतें बम्मे और पूरे मोग कर सकते थे। मिससे समा मिट्टी करके स्व गम्पकी मीमागो बनाने के लिये मयस मजदीक महर्स दशहरेका ही पा । पिसी कारण महाराष्ट्र में दशहरेका त्योहार बहुवही मोकप्रिय या भौर बाजमी है। हम यह दम्प मके हैं कि विजयादशमीक अंक स्यौहारपर अनेक संस्कारों, अनेक संस्करमो और अमेव विश्वासोंगी तहें पड़ी हुयी हैं। कपि-महात्सव माप-महारसव बन गया सीमोल्स- पनका परिणाम दिग्विषम वा पहुँमा स्व-संरक्षणके साम सामाजिक प्रेम और भनका विभाग करनेकी प्रतिमा सम्पय दशहरेके साप था । लेकिन मा बैतिहासिक पन्नाको दशहरे मसाप पोड़ना अभी हम भूल गय है जोकि मिस मामेमें मपित महत्वपूर्ण है दिम्बिग्यसे धर्मजय श्रेष्ठ है। पान पमा वप करनेकी अपेक्षा हृदयस्य पग्पुिषाको मारमे में ही महान पुग्पाप है। नवधान्यकी फमस काग्मेकी बनिस्बत पुष्प की पसम काटमा अपिक पिरम्पायी होता है। मारे ससार- को भैसा अपवा देनेवारे मारजित साकरित् भगवान् बुरुका अम्म विजयासामोरे गुम मुहर्तपर ही हुआ था।निमयागमा- के दिम युद्ध भगवाम्का जन्म हुआ, मोर वशायी पूर्णिमाके रिम भुम्ह पार पान्तिदायी मार्य स्वामा और अप्टोगिक मार्मका बाप हुमा यह बात हम भूम ही गय हैं । विष्णुका पर्समान मवतार मुस सवतार ही है। प्रिमग्यि निमयादशमी कास्पीहार हमें भगवान् पुटर माग्नमयका म्मरण करके ही मनाना चाहिये। .

बीवन-साहित्य
६
दीवाली
--
पसि राजाने दानका व्रत लिया था । जो याचक यो वस्तु
मांगता राजा असे वह वस्तु देता । मसिके राग्यमें पीव हिंसा
मद्यपान अगम्यागमन पोरी और विश्वासमात-अिन पांच
महापापोंका कहीं नामतक न था। सर्वन दया दान और
सुत्सबका मोमबाला रहवा पा। अन्तमै पलिरागाने वामन
मूर्ति धीमणको अपना सर्वस्व मर्पण किया। पमिकी लिस
दानवीरताके स्मारकके स्ममें घीविष्णुने वसि नामसे तीन दिन
रातका त्योहार निश्चित किया। यही हमारी दीवानी है । बसि-
कराग्यमें भासस्य मलिनता रोग मौर दाखिपकायभावपा।
पसिके राग्यमें या सोकि हृदयमें अंधकार न पा । सभी प्रेम
से रहते थे। रेप मत्सर या बसूयाका कारण ही न मा । बमि
का राग्य जन साधारणके लिये मिसमा मोकोपकारी पा कि
मुसके कारण प्रत्यक्ष प्रोविष्णु अमके द्वारपास वमकर दे।
बिसी कारण यह निश्चय किया गया विमिराजा स्मारक
स्वरूप मिस स्याहारसे पाहसे साग मनपरा की मौर
गंदगीका माम रे, जहाँ-जहाँ अधरा हो वहाँ दीपावमिकी
प्योभा करें सोगोंके प्राण ऐनेवासे यमराजका तर्पण करें,
पूर्वगाका स्मरण करें मिष्ठान्न भक्षण करें और सुमन्धित
धूप-दीप सपा पुष्प-पोस मुन्दरता बढ़ायें। मिन दिनों साये
कालपी घोमा भितनी मनाहारी होती है कि यह पर्व किन्नर
मोपभि पिशाप मत्र और मणि सभी मुत्सबका मृत्य करते
है। यमि-राम्पका स्मरण करक लोग सरह-तरहरे रोम
पीक पूरते है सफेद पावस गाकर भौति भौतिक सुन्दर
बिम बनाते हैं माय बैल मादि गृह-पशुओं को सजा-पगार
मुनका पुमूस निकामत है श्रेष्ठ और कनिष्ठ सब मिलकर

दीवाली
पप्टिकामपणका सेस खेलते हैं। यष्टिकाकर्षण पुरोपीय
सोगोंकि रस्सी पीचनेके 'टग बीफ पॉर-सा मेक संत है।
बिसीको हमने 'गजमाह का नया माम दिया है। पुराने
पमानेमें राजा मोग दीवाली के दिन अपनी राजधामीके सभी
महकों को सार्वजनिक स्पसे आमंत्रण देते पे मौर मुनसे सेस
ममते थे।
सुगंभित दम्योकी मामिन करके नहाना तरह-सरहके दीये
कतारमै बसाना मौर मिष्ट-मत्रोंके साथ मिष्ठान्नका भोजन
करमा दीवामीमा प्रधान कार्यक्रम है। यमिक राग्पमें प्रवेश
करना हो तो मत्सर, मसूया अपमान यादि सय भूमपर
सबके साप करिस हो पाना योर मिस तरह निप्याप होकर
मये अपमें प्रवेश करना हमारा प्राचीम रिवाज है।
सिसी दिन सरयमामाने धीरुप्मकी मददसे नरकासुरका
मात्र कसे सोमह हमार राजपन्यामोंको मुक्त किया था।
दीपावसिके श्रुत्सवमें स्त्रियों की अपेक्षा मही की गयी है।
स्त्री-मुकि सब सम्बन्पोंमें भाषो गहना सम्म पुर सत्विक
प्रेम मौर समानताके मुस्मासा होता है। पति-पत्नीका या
माता युवा सम्बध बिवना व्यापक बीर मितना मात्विक
अस्वासयुक्त नहीं होता।
पन-शेरवसे ऐकर भाभी दूर तकके पांचों दिनोंक साप
पमपरका नाम पुरा हआ है। भसा घिसका उद्दश्य क्या
होगा?
मिन्द्रप्रस्थरा रामा ईस मृगपाके मिये पूम रहा था। हम
मामा मेक छोटसे राजा मे मुसका बातिप्प किया। असीदिन
हमके यहाँ पुत्रोरमय पा । राजा मानन्दोत्सव मना हो रहा पा
कि मितने में भवितम्मतामे बापर कहा कि विवाह के बाद वोपे
ही दिन यह पुत्र सर्प-दामे मर पापमा। हंस रामाने सुस
पुत्रको पामेका निश्चय किया । असने यमुना मदीके रहमें
बैंक मुरवत पर बनयाकर हेमराजको वहाँ बापर रहनेका

बौवन-साहित्य
वोवाली
पलि राजामे दानमा प्रस लिया था। धो याचक बो बस्तु
मांगता रामा असे यह वस्तु वेठा । पलिके राम्पमें जीव-हिंसा
मद्यपान अगम्यागमन बोरी और विश्वासपात-जिन पौष
महापार्पोका कहीं मामतक न पा। सर्वत्र प्या, पान और
अत्समका बोलबाला रहता था। अन्तम बसिराबाने वामन
मूर्ति भीष्णको अपना सर्वस्व अर्पग किमा । बमिकी बिस
दानवीरताके स्मारक स्पमें श्रीविष्णुने बसिके नामसे सीन दिम
रातका त्योहार निश्चित किया । यही हमारी दीवासी है । यसि-
के राज्यमें आसस्य मसिनता रोग और दाखियका समान बा।
पसिके राग्पमें या मोगकि हृदयमें मंधकार न पा । सभी प्रेम
से रहते थे। ट्रेप मस्सर या असूयाका कारण ही म पा । यसि-
का राज्य बन साधारण के लिये मितना सोकोपकारी पा कि
मुसके कारण प्रत्यक्ष घीषिप्ण जुसके द्वारपास बनकर रहे ।
बिसी कारण यह मिपय किया गया कि यमिराजाक स्मारक
सस्प मिस स्याहारस पहले साग पूरा-कचरा कीपर बार
गंदगीका नाश करें, वहाँ-जहाँ ममेरा हो वहाँ दीपावलिकी
घोमा करें लोगोपे प्राण ऐनेवाले यमरानका तर्पण करें
पूर्वगोंका म्मरण करें मिष्ठान्न भक्षण करें और सुगन्धित
धूप-दीप तपा पुप्प-पोंसे मुन्दरता बढ़ा। भिम दिनों सार्य
कोरमी शोमा मितनी मनोहारी होती है कि यक्षा गषय किन्नर
औपभि पिशाष मंत्र मौर ममि समी मुत्सबका मृत्य करते
है । वसि-राम्पका स्मरण करस लोग तरह-तरह के रंगोसे
चौक पूरते हैं, सफेद चारस मगाकर भौति मातिक मुना
पित्र मनाते हैं गाय, मैस बादि गृह-माओंकी सजा-पाकर
मनका पुसूस निकासते हे थष्ठ और कनिष्ठ सय मिसकर

दीवाली । मप्टिकाफपमका खेल सकते है। यष्टिकापर्पन युरोपीय होगकि रस्सी मीचमेक 'टग ऑफ पार-वैसा लेक संस है। सिसीको हमने 'गनमाह का मया माम दिया है। पुराने पमानेमें रागा सोग दीवाप्तीके दिन अपनी राजधानीके समी साकोको सार्वजनिक स्पसे सामंत्रण देते पे और मुमसे लेक बसते थे। सुर्गमित प्रयोगी मानिश करके महाना तरह-तरह के दीमे कतारमें जमाना और अिष्ट-मियोंकि साप मिष्ठान्नका मोमन करना पीवालीमा प्रभाम कायक्रम है। बसिझे राज्यमें प्रवेश करमा हो तोप मत्सर असूया अपमान यादि सब भूमकर सबके साप अफदित हो पाना मौर जिस तरह निप्पाप होकर मये वपमें प्रवेश करना हमारा प्राचीम रिणाम है। मिसी दिन सरपमामाने ग्रीष्णकी मदरसे नरकासुरका माग कसे सोलह हमार राजकम्पाओंको मुक्त किया था। दीपारसिक अस्सव, स्त्रियोंकी अपेक्षा नहीं की गमी है। स्त्री-पुरुपयोंके सर सम्बन्धोंमें माथी-महनका संबंध गुट सत्तिक प्रम मोर समामसाने अस्मासका होता है। पति पस्नीमा या माता-पुत्रका सम्बन्ध मितना व्यापक मोर मितना सारिवक मुस्साययुक्त नहीं होता। धन-तरवसे ऐगर भाषी दून सबके पांचों दिमौके साय पमरावका माम पुरा हुमा है। मसा बिसका उमेय या होमा ? बिन्द्रमम्पमा रामा हस मृगया मिये पूम रहा पा । हम नामक मेक छोटेसे राजा ने मुसरा मातिम्प पिया। असीदिन हमके यहाँ पुधारमन था। राना मानन्दोत्सव मना ही रहा था छिभिवनमें भक्तिम्यताने मावरमहा कि विवाहके बार पोपे ही विम यह पुत्र सर्प-दासे मर पायगा। हंस रागाने मुस पुत्रका पाने का निभय दिया । घुसने यमुना नदीके हमें मेक मुर्रात पर बनवाकर हेमराजको वहाँ माकर एनेका बोरा-साहित्य दीवाली -- पति राजाने दानका व्रत किया था। वो मापा जो वस्तु मांगता रामा असे वह बस्तु देता । ममिके राग्यमें पीव हिंसा मद्यपान वगम्यागमन पोरी और विश्वासपात-धिन पाँच महापापोका कहीं नामता म पा। सर्वत्र दया दाम और मुसबका बोलबाला रहता पा । अम्समें पतिरामाने वामन मूति थोरुगको अपना सर्वस्व अर्पण किया । वलिकी लिस दानवीरताके स्मारकके रूममें मीविप्मुने वसिम मामसे तीन दिन रातका त्योहार निश्चित किया। यही हमारी दीवासी है। पमि- केराग्यमें बासस्म ममिनता रोग मौर वाखिपका अभाव था। पम्केि राज्यमें या लो!के हृदमअपकार न था। सभी प्रेम सेहते थे।टेप मस्सर या बसूमाका कारण ही न पा । बसि का राज्य पन सापारणके लिये जितमा लोकोपकारी भागि मुसके कारण प्रत्यम घोविष्णु असके द्वारपास बनकर रहे । जिसी कारण यह निश्चय किया गया कि बलिराजाक स्मारक- स्वस्म मिस त्योहारमे पहसे माग सा-पपरा कीपर मौर मदगीका नाश करें जहाँ-जहाँ अपरा हो महाँ दीपायमिकी धोमा करें, लोगोरे प्राण ठेनेवासे यमराजका तर्पण करें पूर्वगोंका स्मरण करें, मिष्ठान्न भमण परे और मुषित धूप-दीप तवा पुष्प-पत्रोंसे सुन्दरता बढ़ा। भिन रिनों साये कोसकी शोभा प्रितनी ममोहारी होती है मिया, गर्व किन्नर मोपभि पिचाप मन और मणि सभी मुत्सबमा मृटप करते है। पति-राग्यका स्मरण करत मोग तरह-तरह रंगामे पौक पूरते है सफेद पावस गाकर मोति मासिक मुन्दर चिप बनाते हैं गाय, बस मादि गृह-पगमोंको सगा पगाकर मुनका पुसूस निकामठे है श्रेष्ठ भौर पनिष्ठ सब मिलकर रीवाही १२० पप्टिकार्षणका मेस सप्तते हैं। यष्टिमाकर्षण युरोपीय मोगोंक रस्सी सीपनेके 'टग बॉफ पार-असा मेक खेल है। मिसीको हमने गमगाहमा नया माम दिया है। पुरामे पमामे रामा मोग दीवाली के दिन मपमी राजधानीके सभी मरकोंको सार्वजनिक स्पसे आमरण देते प और अमसे पेस वेसते थे। सुगषित द्रोंकी मारिप करके महामा तरह-तरहले दीये कतारमे जहाना बीर मिष्ट-मित्रोंन साप मिष्ठान्नमा भोनम करना दीवासीका प्रधान कायम है। परिके राज्यमें प्रवेश करना हो तोर मत्सर असूया अपमान भादि सच भूमकर सबके साप मकदिन हो पाना और मिस तरह निप्पाप होकर नये वर्षमें प्रवेश करना हमारा प्राचीन रिवान है। प्रिसी दिन सत्यमामाने धमकी मददसे मरकासुरका माध करके सासह हजार राजपन्याओंको मुक्स क्यिा पा। दीपायसिके अस्सबमें स्त्रियोंगी पेक्षा महीं की गमी है। स्त्री पुर्पोक सम समन्याम मामा-महनका संरष पुर सरिमक प्रेम मीर समानताक भस्मासा होता है। पति पत्नी या माता-पुमका सपप जिवना म्यापक और जितना सास्विक खुस्सासयुक्त नहीं होता। पम-तेरसस ऐकर मामी दून तसरे पांचों दिनोंद साप समयमा नाम गुहा हा है। मस, बिसमा उदय मया होपा? मिन्द्रप्रस्पपा राजा हेम मुगयाके लिये पूम रहा पा । हेम मामक मेक छोटस राजा मे मसफा मातिप्प किया। सीदिन मक यहाँ पुरोरसय पा । राना मानन्दोस्मय मना ही रहा पा किमिवनेमें भवितम्पतामे बाकर कहा कि विवाह के बाद पोष ही दिन यह पुत्र सर्प-देशमे मर पायगा । हंस रामाने पूषको पचानेका नि" पप पिया । भूसने यमुना न मेक मुरीमत पर बनवाकर हेमरासको यहाँ

बीवन-साहिप
निमंत्रण दिया। सोसह सास बार रामपुरका विवाह हजा।
विवाहसे ठीक पापे ही दिम जुस दुर्गम स्वाममें भी सर्प प्रकट
हमा मौर राजपुन मर गया। मानन्दको पड़ी अपार प्योकमप
बन गभी। कर यमोंको भी जिस करण अवसर पर दमा
भाभी बोर जुम्होंने यमराणसे यह बर मांग लिया कि वीवामीके
पांच दिनामें जो लोग दीपोत्सव मनायें मुनपर मिस तरहकी
भापति मवाये।
यह हुमी बनतेरसकी कहानी। मरक-चतुर्दशीके दिन
ममरानका बोर भीष्मका तर्पण विशेपम्पसे कहा गया है।
दीवाली अमावस्याका दिन । अस दिन यमसोकवासी पितयें
का पूजन और थाय तो करना ही पड़ता है। प्रतिपदाके दिन
ममराजसे सम्बन्ध रखनेवासी कोमी नया नहीं कही गयी है।
मेकिन भैसा मान सेनेमें कोसी हर्ष महीं कि यमराज भी सुस
दिन अपना नया बहीसाता सोसते होंगे। भैयादूगर विन
समय अपनी बहन ममूनाके पर भोजम परमे पाते हैं।
पावलीकी बन्छन्दताके पाय ममरागमा स्मरण रसनेम
अत्सवकारोंना भरभ्य पाहे पो रहा हो लेकिन भिसमें एक
। नहीं कि मुसका असर बहुत अच्छा होता होगा। जिसमे
मुत्सबमें भी संयमका पाठन किया होगा, बही यमराजके पाच
म मुक्त रह सोमा।
सबम,१९२१
दीवानसाने में काम सुम्बर बीग रमनेका रिवाम प्रत्येक
परमें हावा है । बाहरका कोबी म्यक्ति माता है तो सहन ही
भुसकी मगर मुख वरफ जाती है और बह पूछ पैटता -
'वाह ! सी बढ़िया चीन है ! यह मापको कहसि मिसी?'
मकिन मगायबमरमें तो नहीं देसिपे यहाँ सुन्दर-ही-सन्दर
बी दिवामी देवी है । मुन्हें ऐसार मनुष्य बहुत सुप होता
है। रेक्नि साथ ही वह उतना ही पसोपेचमें भी पर पाता

। है। यह इमो मोचमें रहता है कि क्या दम्यू हमारी दीपासो त्योहारोगा मग असा ही अगायव पर में। मिसे सब त्योहारोंका म्नेह-सम्मेरन भी माना जा सकता है। दीवालीका त्योहार पांच दिनोंका माना जाता है। किन मच पूष्ठिय ता ठेठ नवरात्रिक त्योहारमे भिमका प्राग्न हावा है और मामीजीकी मटमें प्रिमका आना भपनी पग्मिीमा तक पहुंच जाता है। पास्त्राम प्रत्येक स्योहाराका महात्म्प आर क्या की गमी है। दीवालीक बारेमें मितनी कहानियां है कि यदि 'दीवासी महारम्म' मिसा जाय तो वह अब बड़ा पोवा बन जायगा। धनतरमकी पपा बहग नरम चौमकी पहानी अलग और समावस (दीवारी)की अपनी अप कहानी मरग। मिमा बाद नपा माम पुर होता है। और दूसरे दिन बहनो पर माजी मसिपि बनकर जाता है। दीवाली गहम्पापमो त्योहार ६ जनताका त्योहार है। पावणी दिन म और पास्त्र प्रपान होते हैं बाहरेक दिन युद्ध और पास्त्राम्प प्रमुख रहा हैं दीवाली दिन सामी और भनको प्रापान्य माप्त होता है और होमी तो खेल और रंग-रागका म्याहार है। जिम मर मनुप्पाम भार वग है भुमी तरह स्याहागमें भी पार पण हो गये हैं। पुरातन कामे मोग धावणोक दिन बहानाम बैटकर समुद्र पार देश-देशान्तरमें सफर परने पात प । हरेक दिन राजा सोग मोर पोतागण अपनी सरहदाको पार करम मपर पनाभी परने निकरते पे और दीवासीरे दिन रागा मोग और म्यापारीगण म्बा वापम मारपौम्निा मुमका अपयोग करते थे। पुराणामे सपा है कि नपामुर नामका और पराश्मी रागा प्रागपातिपमें राम करता पा । भूटानरे दसिण सरप मा प्रदेश है मुम प्रारम्पोतिप महते पापाज यह ममम प्रान्त ।

बीवनवाहित्य
निमंत्रन दिया। सोलह साल बाद रायपुत्रका विवाह हुओ।
विवाहसे ठीक बाप ही दिन मुस दुर्गम स्वाममें भी सर्प प्रकट
हवा और राजपुत्र मर गया । मानन्दको घरी अपार शोकमय
बन गधी। कर यमदूतोंको भी मिस करम अवसर पर दया
बामी और उन्होंने समराबसे यह बर मांग मिमा कि दीमासीके
पांच दिनोंम पो लोग दीपोत्सव मनाय शुनपर जिस तरह की
मापति म माने।
यह हुजी मन सेरसकी कहानी । मरक-चतुर्दशीके दिन
यमराजमा और मीष्मका ठर्पण विपम्पसे कहा गया है।
दीवाली अमावस्याका दिन । अस दिन यमसोक्यासी पितरों
का पूजन और थाय तो करना ही पड़ता है। प्रतिपदाके दिन
यमराजस सम्बन्ध रसनेवाली कोभी कमा नहीं कही गयी है,
पकिन मैसा माम मेनेमें कोसी हर्ष नहीं कि यमराग भी मुस
दिन अपमा नया बहीसाठा खोसते होंगे। भैयादूबके दिन
यमराय अपनी बहन यमुनाके पर भोजम परमे पाते हैं।
पायसीकी स्वान्दताकै सास यमरायका स्मरण रसनेम
पुरसवकारोंगा मुइम पाहे पो रहा हो लेकिन मिसमें राम
। नहीं कि असका मसर बहुत अच्छा होता होगा। जिसने
मुत्सपमें भी सयमका पासन किमा होगा, बही यमरायके पाच
म मुक्त रह सकेगा।
पिम्म, १६२१
दीवानमाने में वेकाम सुम्दर बीन रसनेका रिवाम मस्पक
परमें होता है । माइपा कोमी म्पनिक पाता है, तो सहन ही
मुसकी मगर मुस तरफ पाती है और बह पूछ मैटखा है-
बाहकेसी बढ़िया पीय है। यह मापको यहाँसे मिली?
मेकिन मनापपरमें तो यहाँ देखिये वहाँ सुन्दर-ही-सुन्दर
वीरें दिखायी देती है। उन्हें देखकर मनुष्य महत सुप होता
है। सग्नि साप ही यह भूतना ही पसोपेशमें भी पा पाता

दीवाली है। यह इसी सोचमें रहता है कि मया देनू ? हमारी दीयासी त्योहारोंका मेक असा ही अभायम-बर है। पिसे सब त्योहारोंका स्नेह-सम्मेलन भी माना जा सकता है। दीवाशीमा त्योहार पांच दिनोंका माना जाता है। लेकिन सच पूष्ठिय तो ठेठ नवरात्रिने त्योहारसे सिमका प्राग्भ होता है और मामीणीकी मेंट, भिसका आनन्द अपनी परिसीमा तक पहुंच जाता है। पास्त्रामें प्रत्येक त्योहारोंका महारम्य और कपाधी गमी है। दीवारोके मारेमें सिवनी कहानियां हैं कि यदि दीवामी महारम्य' मिसा जाय तो वह कपड़ा पोषा बन जायगा। पनदरसकी कपा मसग नरक चौदसकी कहानी अग और अमावस (दीवासी) की अपनी भेक कहानी अलग। बिमो बाद नया सास सुरू होता है। मौर दूनके दिन बहमके पर भाजी मसिपि बनकर जाता है। दीवासी गृहस्पाथमी त्योहार ६ जनधापा रयोहार है। प्रायणीक नि धर्म भौर मास्त्र प्रभान होते हैं पहरेक दिन युद्ध और पास्माम्भ प्रभुल रहत हैवीवाली दिम शमी और भनको प्रापाग्य प्राप्त होता है मौर होमी तो वेस और रंग रागका स्याहार है। जिस तरह ममुप्पोंमें पार वम है, भूसी सरह त्योहार्गेमें भी पार पण हो गये है। पुरातम काम में लोग श्रावणी दिन जहागामें बैठार ममुद्र पार देम-देशाम्तरमें सफर करने मात प । बहरेप दिन राजा सोग मौर योवागण अपनी सरहाको पार कर मधुपर पड़ामी करने निकरत थे और दीवारी दिन राजा लोग मौर प्यापारीमण म्वरेग वापम आपरमोमिक मुसका मुपभोग परते । पुरामोंमें कया है कि मरकामुर नामरा अ पराक्रमी गमा माग्ग्याविपमें राम परता पा । भूटामरे दक्षिण तरफ यो प्रदेस है मुम प्रापण्योसिप करते थे। माग यह ममम प्रान्त ।

।
बीवन-साझिम
में सम्मिलित है। नरकासुरमा दूसरेराबास साना तो घरी
भरके सिये सहन कर लिया जा सकता था किन्तु उस दुष्टमे
स्त्रियोंको भी सताना शुरू किया। उसके कारागारमें सोलह
हमार रामकन्या बीं। श्रीकृष्णने विचार किया कि यह
स्पिति हमारे लिये कसकस्प है। अब तो नरकासुरका नाश
करना ही होगा । सत्यभामाने कहा- आप स्त्रियोंके मुशार
के सिप पा रहे है तो फिर में घर से रह सकती है?
मरकासूर साप मै ही मागी । बाप चाहे मेरी मदद रहे।
भीकृष्णने यह बात माम भी। अस दिन रपम सत्यभामा
मागे बैठी पी बौर पीकृष्ण मबदके लिये पीछेकी तरफ ठे
पे। चतुर्पतीके दिन नरकासुरका नाश हुआ। रेस स्वच्छ हो
गया। सोर्गोने मानम्द मनाया। मह वसानेके लिये कि सरकार
सुरका बड़ा भारी पुरूम दूर हया लोमि रातको दीपोत्सव
मनाया और ममावसकी रातमें पूर्णिमाकी शोभा दिसमाधी ।
मेकिन यह मरकामुर मेक बार मरनेसे मरनेवाला मही
है। असे ता हर साल मारना पड़ता है। पौमासेमें मब जगह
कीचा हो जाती है उसमें पेरके पत्ते गोबर कीड़े बगैरा पर
पाते है और मिस तरह पावके मास-पास मरक-गदमी-
फै पाता है। अपकि बाद जब भावोंको धूप परती है तो
मिस मरककी दुर्गन्म हवामें फैल जाती है जिससे मोग मीमार
पाते है। पिसमिये यहादुर सोर्गोकी बारोग्य-सेमा बुदाली
फायड़ा वर्गरा मेकर मिस नरको माप सहने जायं गांव
आस-पासके मरकका नागपरे, मौर पर आकर बानपर तेस
ममकर नहाये। गौद्यासा तो साफ की ही होती ही है
उसमें से मछरोंको निकाम देनेके सिये रात वहाँ दीया जमाये
भी करे और फिर प्रसन्न होकर मिप्टाम्नों मोर पक्वान्नोंका
भोजन करे।
दीवालीके पाप मपा पर्ष गुरू होता है, बोर भरमें नया

बनाज बाता है। हिन्दुर्भोके परों में वेदकाससे लेकर बातक घिस मवानकी विधिफा घयापूर्वक पारन होता है। महाराष्ट्र, प्रिय भोजन से पहले मेक की फसका रस पक्षनेकी प्रथा है। विसका मुद्देश्य यह होगा कि कड़ी मेहनत किये बिना मिष्टाम्न महीं मिझ सकता। भगवद्गीतामें शिक्षा है कि मारम्भमें पो पहरके समान है, मौर अम्नमें अमृत के समाम वही सास्तिक मुख है । गोयामें दीवाली के दिन पिमुगेका मिष्टान्न मनाते है मौर जितने भी मिष्ट-मित्र हों अन समको अस दिन निमंत्रण देते हैं। मपति प्रत्येक म्पक्तिको अपने प्रत्यक मिष्ट-मित्रके यहाँ पाना हो चाहिये । प्रत्यक मरमें फसाहार रक्षा रहता है भुसमेंसे बेकाप करा पसकर आदमी दूसरे पर पाता है म्यबहारमें कन्दुप्ता यायो हो दुश्मनी बंधी हो या पो भी कुछ हुआ हो दीवालीके दिन मनसे वह सब निकास देते है और मया प्रीति-सम्मए पोड़ते है । जिस प्रकार प्यापारी दीवासी पर सब हेनरेग चुका देते हैं और मये महोत्नामि माफी मही सीपते बुसो प्रकार प्रस्पर व्यक्ति मपे पपके प्रारम्भमें इन्यमें कुछ भी पैर या पहर वाको महीं रहने देता । जिम नि बस्तीमसे गरमा-गदगी- निस जाय इदयसे पाप निकस गाय रानिमसे बपकार निकस पाय इदयसे मौर सिरपरसे कर दूर हो नाप मुस विनसे बढ़कर दूसरा पवित्र दिन कौनसा हो सकता है? पो सोसह) भाने परमी है जिसके बारेमें तनिक भी राम मही, भैसी पीर सिन्दगीमें कौमसो है सिर्फ भैक मोर वह है मृत्यु रागा हो या रक, मूदी धरना हो या सावण्यवती बिन्दु मती पर हो या गाप बोर हो या पबूतर, मुरयुकी भेट तो हरमर से होने ही वाली है । मर सवाल यह है कि मिस निश्चित भाव-माहिय मतिपिका स्वागत हम किस तरह करें ? हम जिस प्रकार से पहचामते हों उसी प्रकार मुसका म्यागत करें । मृत्युका म्वरूप कटहरू-पैसा है। धूपर तो सम कोटे-ही-कोटे होते हैं मन्दरमा स्वाद म मासूम कैसा हो । मृत्यु अर्थात् पड़ीभरका माराम मृत्यु मर्यात् नाटकके दो धोक मम्मायकायको यवनिका मृत्यु मर्षात् वाणीके मस्सालित प्रवाहमें मानेवाले विराममिह । अंग्रेज पषि पके पादका म्यागत करते समय 'बालमन्द्रमी गोवमें पुरुषम्द्र कहकर मुसका वर्णन करते है । समावस तक पुराना पन्द्र सुन पाता है क्षीम हो पाता है। अब वह अपने पैरोंपर से सड़ा होगा? मिसलिये अससे पैदा हुआ मामचन्द्र अपनी पारीक भुगामें फैलाफर अस बूरे काले चम्द्रको मठा सेता है, और दूसरे दिन पश्चिमके रंगमब पर से बाता है मोर मों सारी दुनिया गारा तालियां बजाकर किये जामेवामे स्वागतको स्वीकार करता है। मुसम्मान मोग 'भीदमा माद' कहकर भिसीका स्वागत करते है। मुरप तो पुनर्मम्मके लिये ही है । प्रत्येक नमी पीड़ी पुरानी पीढीमा तेज सकर जबानीके पोपबामे पढ़ती रहती है मौर पुरानी पीड़ी पुकापेके परावलंबनको महसूस करती हमी सुप्त हो जाती है । यह से मुसाया जा सकता है कि युवा ठा, पाहा प्रफुल्स नवरसम्तको भमुमी पकाकर बिस वातको मुसानेसे काम न बसेगा बिहेमन्तकी पाटनेबाप्ती टेपमें ही बसम्तका प्रसर है। दीवामीके दिन बसन्तकी अपेक्षासे, बसम्तकी मार्ग प्रती तासे अगर हम दीपोरसव कर सकते हैं मिष्टान्न भोजन कर मकते है बानम्द मौर मंगमताका अनुभव कर सकते है वो हम मृत्युसे पर्यो न मुग हो? दीवासी हमें सिपाती है कि मौतका रोना मत रोवा मुत्युमें ही नवयौवन प्रदान करनेगी, नानीवन देनेकी शक्ति है दूसरोंमें नहीं। बाता

बसन्त पंचमी
दीवालीका त्यौहार मौतका मुत्सव है मृत्युका अभिनन्दन
है मृत्यु परकी पढा है। निराशासै बुत्पन्न हानेवासी बाशा
का स्वागत है।
स्ट ही शिव है मुत्युका दूसरा रूप ही जीवन है।
यह किसे मच्छा न सगेगा कि यमराम अपनी बहनक पर
पायें । मस्य नित्यनूतनताके पर अत्सब मनाय
मृत्यु मग्नि महीं बल्कि सेवस्वो रत्नमणि है मिस छुनेमें
कोमी सतरा नहीं।
मालूप, १९९२
7
यसम्त पचमी
वसन्त पपमी बर्यात्
पसका स्वागत।
माप शुक्ला पचमीको हम पसन्त पचमी कहत है सकिम
प्रत्येक पक्तिरे लिए मुसी दिम बमन्त पंचमी नहीं होती।
ठासूनवाले मनुष्य के लिये वह मितमी जल्दी नहीं पाती।
बसन्त पञ्चमी प्रकृतिका यौवन है। जिसकी रहन-मह्न
प्रातिसे अलग न पर गमी हो जो प्रतिक रंगम ग्ग गया
हो वह मनुप्य गिना कहे ही वसन्त पषमीका अनुभव करता
है। नदीके सीप प्रवाहमें अकार आयी हुमो होरकी वादा
जिस प्रकार हम अपनी प्रासास साफ देखते हैं असी प्रकार
हम बसन्तका मो माता हुआ देख सकते है। अण्वत्ता रह
अंक ही समयपर सपके हृदयॉम प्रवेश महों परता।
पर बसन्त आता है तो पौवन अम्मादम माप आढा
है। पौरनमें मुम्दरता होती है मरिन यह नहीं कहा जा सकता
कि मुसमें हमेशा सम भी होता है। यौवनमें शारीरिक और
मानसिक स्वास्प्णी रक्षा करना पड़त ही फग्नि हा माता
है। यही हान्त वसन्तमें भी होवो है। तारम्पकी सरह बसन्त
भी मनमोली मार पंचस होता है। मिन दिनों भी पाठा

११२ पतिपिका स्वामस हम किस तरह करें ? हम जिस प्रकार मुसे पहपानते हों असी प्रकार मुसका स्वागत करें । मुत्युका म्वरुप कटहरू-सा है। धूपर तो सब काँटे-ही-काँटे होते है अन्दरका स्वाद म मासूम कैसा हो ! मृत्यु मर्यात् घडीमरका माराम मृत्यु मात् नाटकके दो बकोंक मध्यामबाधकी मनिका मृत्यु मति वापीके यस्ममित प्रवाहमें मानेवारे विरामचिट। अमेज कषि के पापका स्वागत करते समय 'बालचन्द्रकी मोदमें ठपन कहकर मुसका वर्णन करते है । वमावस तक पुराना पन्द्र सूख जाता है बीन हो पाता है। अब यह अपने पैरोंपर कैसे सड़ा होगा? अिसलिये उससे पैदा हुआ यासचन्द्र अपनी पारी मुगामें फैसाकार बुस पूरे काले चन्द्रको बठा लेता है मौर दूसरे दिन पदिकमरे रंगमंच पर से आता है मौर यों सारी दुनिया तारा तामियां बजाकर किये पानेवाले स्वागतको स्वीकार करता है। मुसलमान सोग बीदना चाँद' कहकर मिसीका स्वागत करते है। मृत्यू तो पुनर्गमके लिये ही है । प्रत्येक मभी पीढ़ी पुरानी पीवीका तेस कर पानीके गोसमें बापे बढ़ती रहती है और पुरानी पीढ़ी पुडापेके परामसंबनको महसूस करती हमी मुप्त हो पाती है । मह कैसे भुमाया जा सकता है कि बुढा टूटा पागा प्रफल नवबसन्तको भारी परकर माता है, लिस पातको भूमानेसे काम म बसेगा कि हेमन्तली काटनेवासी टेस्कमें ही बसन्सका प्रसर है। दीवासीके दिन मसन्तकी अपेक्षासे, वसन्तती माग-प्रती सासे बगर हम दीपोरसव कर सकते है मिष्टान्न भोजन कर मकवे है, मामन्द मौर मंगलवाका ममुभव कर सकते हैं तो हम मुरमसे वो न सुध हों पीवासी हमें सिपाती है कि मोतका रोमा मा रोमा मुत्युमें ही नवयौवन प्रदान करनेकी, नवनीवन देनेकी प्रक्ति है दूसरों में नहीं। 7

बसन्त पंचमी
दीवालीका त्यौहार मौसका मुत्सव है मृत्युका अभिनन्दन
है मृत्यु परकी यया है। निरासासे धुत्पन्न होनेवाली पाशा
का स्वागत है।
सन ही शिप है, मृत्युका दूसरा स्प हा बीवन है।
यह किसे मच्छा म मगेगा कि यमराज अपनी महनक पर
जायें ? मृत्यू नित्यनूतमताफे पर अत्सव मनाये ?
मृत्यु अग्नि महीं, पस्कि तेमस्तो रमणि है मिस नेमें
फोभी सतरा नहीं।
मालूबर, १९२२
७
वसन्त पञ्चमी
बसम्स पपमी मपति ऋतुराबका स्वागत
माष चुक्ता पचमीको हम वसन्त पचमी कहत है प्लकिन
प्रत्येक मस्तिो सिए मुसी दिन वमन्त पपमी मही होती।
टेरे सूनवाले मनुष्य के लिये वह मिसनी पस्दी नहीं आती।
वसन्त पचमी प्रकृतिका यौवन है। जिसकी रहन-सहन
प्रातिये बसग न पा गभी हो जो प्रतिष रंगमें ग्ग गया
हो, यह मनुष्य विना कहे ही, सम्त पषमीका अनुभव करता
है। नदीके क्षीण प्रवाइमें अमाक यापी हुमी जोरको वादका
जिस प्रकार हम अपनी बाससि साफ देससे है बुसी प्रकार
हम वसन्तका मी पाता हुआ दम सकते हैं। समयता यह
बेक ही समयपर सबसे हृदयोंमें प्रवेश नहीं करता।
पय पसन्त आता है तो पौवनो अमादरे साप बाता
है। योजनमें मुम्परता होती है सकिम यह नहीं कहा जा सकता
किसमें हमेशा क्षम भी होता है। यौवनमें शारीरिक और
मानसिक स्वास्प्पकी रमा करना यहत ही कठिन हा जाता
है। यही हात पसम्तमे भी होती है। पारम्पकी तरह वमन्त
भी मनमौजी मीर वस होता है। मिम दिनों भी पाडा

११२ गोषण-पक्षिय अतिपिका स्वागत हम किस तरह करें? हम जिस प्रकार से पहनामते हो खुसी प्रकार मुसका स्वागत करें । मृत्युका स्वरूप कटहल-पैसा है। यूपर तो सब कोटे-ही-कांटे होते हैं मन्दरका स्वाप मामम फैसा हो। मुत्यु अर्थात् परीभरका माराम मृत्यु मत् नाटकके पो अर्को मप्यायकायकी यवनिका मृत्यु मर्यास् वागीये अस्मलित प्रवाहमें मानेवाले विरामचिह। प्रेम कवि दूजके पारका स्वागत करते समय 'यारचन्द्रकी गोबमै सपन कहकर मुसका मर्णन करते हैं । समापस तक पुराना पन्द्र सूप पाता है क्षीण हो पाता है। अब वह अपने पैरोंपर से सा होगा? मिसमिमे बुससे पैदा हुमा पासपम अपनी पारीक मुगाई फेलापर अस मूढ़े काले चन्द्रको मठा सेवा है और दूसरे दिन पश्चिमके रंगमच पर से माता है मौर यो सारी दुनिया द्वारा तालियां बनाकर किये जानेवाले स्वागतको स्वीकार करता है। मुसम्मान मोग भीवका पाद' कहकर मिसीका स्वागत करते है। मृत्यू तो पुनर्गग्मके मिये ही है। प्रत्येक मनी पीनी पूरानी पौड़ीका तेज सकर जबानीके पोशमें मागे बहती रहती है और पुरानी पीही पुरापेके परायसगनको महसूस करती हुभी मप्त हो जाती है । पह से मुसाया जा सकता है कि पुरा डूठा जाड़ा प्रफल्म नववसन्तको पुष्टी पकाकर से माता है? मिस गातको मुमामेसे काम म बसेगा बिहेमन्तकी काटनेवासी सकमें ही बसम्तमा प्रसर है। दीवासीके दिन बसन्तकी मपेक्षासे, वसन्तको मार्ग प्रती तासे अगर हम दीपोत्सव कर सकते हैं मिष्टान्न भोजन कर मकते हैं, मानन्द बार मेगस्ताका भमुभव कर सरते हैं, तो हम मयुसे गर्यो म मुम हो? दीवासी हमें सिपाती है कि मौतका रोमा मत रोमा मुत्यमे ही मवयौवन प्रदान करनेकी, नवजीवन देनेकी मिठ है दूसरोंमें नहीं।

बसन्त पंचमी
दीवासीका रयौहार मीतका अस्सव है मृत्युका मिनन्दन
मृत्यु परकी पता है। निराधासे श्रुत्पन्न हानेमासी बामा
का स्वागत है।
रुद ही शिव है, मृत्युका दूसरा रूप ही पीवन है।
यह किसे मम्छा म मगेगा कि यमराज अपनी बहन पर
षायें मृत्यु मिरयमूसनताने पर अस्सव मनाये ?
मृत्यु पनि नहीं, मस्कि सेजस्यो रस्नमणि है जिसे छूनेमे
कोमी सतरा नहीं।
मातूबर, १९९२
७
वसम्त पचमी
पसन्त पचमी मपति ऋतुरामका स्वागत '
माष एक्ला पपमीको हम वसन्त पचमी महत है सकिन
प्रत्येक पक्तिरे लिए बुसी दिन वसन्त पपमी नहीं होती।
ठो सूनवाले मनुष्य के लिये वह मितमी पस्ती नहीं बाती।
वसन्त पचमी प्रातिका यौवन है। जिसकी रहन-सहन
प्राविस अमग म पर गयी हो जो प्रतिरे रंगम ग्ग गया
से, यह मनुष्य बिना कहे ही बसन्त परमीका मनुभव करता
है। नदी क्षीण प्रवाहमें अकामे आयी ही चोरसो यामा
जिस प्रकार हम अपनी बांसोंसे साप देखते हैं मुसी प्रकार
हम बसन्तको भी माता हुआ दम सकत है। अपवत्ता बह
बेक ही समयपर राबरे हवयोमै प्रया महीं करता।
पर यमम्त माता है तो यौवमा अमाइने माय बाना
है । यौवममें सुन्दरता होती है मकिन यह मही महा पा सकता
किसमें हमेशा सम भी होता है। यौवनम पारीरिक और
मानसिक स्वाम्प्पनी रक्षा करना बहुत ही फठिन हो जाता
है। यही हारत पसम्तमें भी होती है। तापम्पका तफ वसन्त
भी मनमौली मार पर होता है। जिन दिनों सभी पाठा

बीवन-चाहत्व बतिपिका स्मागत हम किस तरह करें ? हम जिस प्रकार मुसे पहचानते हों युसी प्रकार मुसका म्बागत करें। मृत्युका म्वरूप कटहरू-पैसा है। पर वो सब कोटे-ही-कांटे होते हैं अन्दरका स्वाद न मालम *सा हो ! मम वर्षात् षदीमरवा मायम मुस्प अर्थात् माटकके दो अर्कोक मयाबकासको ययनिफा मृत्यु बर्षात वापीके भस्ममित प्रनामें मानेबामे विरामचित। अग्रेज पवि बके बावका स्वागत करते समय 'बालचन्द्रकी गोवर्मे बराचन कहकर सुसका बर्मन करते है। अमावस तक पुराना चन्द्र सूख जाता है सीप हो पाता है। अब यह अपने परोंपर से बड़ा होगा? मिसलिये अससे पैदा हुआ मालचन्द्र अपनी पारीक भुजा फैसाकर सुस पूरे कार बमको मठा मेसा है, और दूसरे दिन पश्चिमके रेगर्म पर हे गाया है मौर मों सारी दुनिया वारा तासिया पजाकर किये जानेवाले स्वागतको स्वीकार करता है। मुसलमान होग 'बीपका चौद' कहकर बिसीका स्वागत करते है। मुत्यू तो पुनर्जन्मके मिये ही है । प्रत्येक नजी पीढ़ी पुरानी पीमका जमकर बानीके जोशमें बागे बढ़ती रहती है । बौर पुरानी पीने सापेके परागसबनको महसूस करती हुजी मुप्त हो पाती है । यह कैसे मुसाया पा सकया है कि का टूठा जादा प्रपस्स मवसन्तको अगुती पकरार से आता है विस बातको मुसानेसे काम म पकेगा कि हेमन्तकी काटनेवाली टाक ही बसन्ता प्रसर है। दीवासीके दिन बसन्तकी मपेक्षासे, बसम्तकी मार्ग प्रती मासे मगर हम दीपोत्सव कर सकते है मिष्टान्न भोजन पर मकवे हैं मानन्द और मंगसम्ताका अनुभव र सकते हैं ता इम मृत्युसे क्यों म मुश हों? दीवामी हमें सिखाती है कि मौवमा रोना मत रोमा मृत्युमें ही मवयौवन प्रदान करनेकी, नवजीवन देनेकी सपिस दूसरामें महीं। 7

बसन्त पंचमी
दीवामीका त्यौहार मौतका मुत्सब है मृत्युका अभिनन्दन
है, मृत्यु परकी यया है। निराशासे पुत्पन्न होनेवाली बागा
का स्वागत है।
छ ही गिब है, मृत्युका दूसरा स्प हो जीवन है।
यह किस मन्छा न सगेगा कि यमराम अपनी बहनक पर
पायें ? मुरम् नित्यनूतनताके पर उत्सव मनाये।
मृत्यु मग्नि नहीं, बल्कि सेजस्यो रत्नमणि है मिस नेमें
कोपी सतरा नहीं।
सतबर १९२२
बसन्त पचमी
वसन्त पचमी मर्यात् ऋतुराजका स्वागत
माप पुक्ता पपमीको हम बसन्त पचमी कहत है सकिन
प्रत्येक पस्तिक लिए असी दिन वसन्तु पममी महीं होता।
ठी सूनवाले मनुप्पके लिये वह खितनी पस्दी नहीं माती ।
बसन्त पंचमी प्रातिका यौवन है। जिसकी रहन-सहन
प्रातिस बरग न पर गमी हो जो प्रहतिरे रंगमें ग्ग गया
हो वह मनुप्प बिना यह ही वसन्त पचमीका अनुभव करता
है। नदीके क्षीण प्रवाहमें बामग पायी हुभी जोरका वादया
जिस प्रकार हम अपनी ओसाँसे साफ देखते है खुसी प्रकार
हम बसन्तको भी माता हुमा देम सकते हैं। अमबत्ता, गह
षेक ही समयपर सबरे हदोंमें प्रवेश नहीं करता ।
पर बसन्त याता है ता यौवनर अग्मादरे साप पाता
है । मोवनमें सुम्दरता होती है मेगिन यह नहीं कहा जा सकता
कि मुसमें हमेशा सम भी होता है। पौवनम शारीरिक और
मानसिक स्वास्म्पकी रक्षा करना यहुत ही करिन हो जाता
है। यही हास्त वसम्हमें भी होती है। पारम्पकी तरफ
भी मनमोची और पंचर होता है। मिन दिनों
A

बोपन-साहित्य मालूम होता है, कभी गरमी कभी पी भूबने उगता है तो की मुस्लास मारम होने सगता है। मोमी हमी शक्तिको बारेमें फिरसे प्राप्त किया जा सकता है । मगर जामें प्राप्त की हमी शाक्तिको बसन्तमें सचित कर रखना मासान महीं है । पसन्तमें संयमका पामन किया गाय, वो सारे वर्षके लिये बारोग्यकी रक्षा हो जाती है । बसन्तऋतुमे बीवमाप्रपर मेक चित्ताकर्षक कान्तिछा पाती है पर वह मुतनी ही सतरनाक भी होती है। वसम्तके मुल्कासमें सयमकी भापा सोमा नहीं देती सहन भी नहीं होती परन्तु मिसी समय बुसकी बत्यन्त बावश्यकता होती है । मगर क्षीण मनुष्य पप्यसे रहे तो असमें कौन भामचर्य की बात है ? मुससे लाम भी क्या ? किसीनरह पीवित रहनेमें क्या स्वारस्य है ? सूरक्षित बसन्त ही नीवनका बामन्द है। बसन्त मुगाबू होता है। मिममें भी प्रकृतिका हारप्प ही प्रकट होता है। कितने ही फूल मोर फल मुरमा पाते हैं। मानो प्रकृति जाडेपी कंसीका बदसा में रही हो । वसम्वकी समृद्धि कोभी शाश्वत समुखि महीं। जितना कुछ विनामी वेवा । मतमा टिकता नहीं। राष्ट्रका पसन्स मी अक्सर अपाम होता है । मिन्टने हो फूल मौर फल बड़ी-बड़ी माशा दिखाये हैं सेकिन परि पण होनेसे पहले ही मुरझारर गिर पड़ते हैं। सम्बे नहीं है यो परद् ऋतु तक कायम रहते हैं । राष्ट्रके बसन्तमें सममकी गाणी मप्रिय मालूम होती है, परन्तु वही पप्पकर होती है। भुत्सव में विनय समृटिमें स्पिरता पौरनमें संयम यही सफल जीवनका रहस्य है । फूलोंकी सार्थकता अिसी बात है कि मुनका दर्प फाके रसमें परिमठ हो । पसन्त पंचमीफे अस्सपषी सृष्टि न तो पास्मकारों द्वारा ही है और न पर्माचार्गाने मसे स्वीकार ही किया है । मुस सो कवियों और गायकों, रमा मौर रसिषोंने पम दिया है। ।

हरिपोता स्मरप
कोयतने मुसे यामत्रण दिया है और फूहोंने उसका स्वागत
किया है। पसन्तके मानी है पक्षिर्योका गान मान-मसरियों
की सुगन्ध शुभ्र अप्रोकी विविपसा और पवनकी पथरता।
पपन तो हमेशा ही पास होता है सेमिन पसन्त में वह विधप
मायसे भी करता है। महा जाता है वहां पूरे मोश-मरोयफे
साप माता है यहाँ बहता है, महाँ पूरे वेगस बहता है पर
गाता है तब पूरी पाक्तिके माप मावा है मौर थोड़ी देरमें बदल
भी पाता है।
वसन्तसे समीतमा नया सूत्र पर होता है । गायक माठों
पहर वसन्तके माताप से सकते हैं। ये न तो पूर्व राशि देनत
है, म युत्तर रापि।
अब संपम, मौचित्य मौर रस तीनाका संयोग होता है
चमी संगीतका प्रबाह पलता है। बीवनमें भी अकेसा सयम
स्मधानबत् हो पायगा अमेसा मोपित्य भस्प हो जायगा
भीर बफसा रस क्षणजीबी विरासितामें ही सपनायगा ।
मिन सोनोंका सयाग ही पीपन है। वसम्समें प्रकृति हमें रसपी
बार प्रदान करती है । मैस समय संयम मौर औचित्य ही
हमारी पूंनी होमे पाहिये ।
पपरी, १९२५
.
हरिों का स्मरण
मक पिगात बन पा। बीस-बीस तीस-तीस कोस तकन
मोहरीका पता पा म मुसाफिरोंके पामबापू होगा।
वनमें मे रमणीय सासार था। तामायके पास कुछ हरिण
रखे प । वासावर किनारे एका अब पापा । घुम पर
नीपे पापापम्पमें महादेवनी विरासमान पे । हरिम रोज
सामागमें महाते महादेवगीरे धर्मान करते भौर परने गाते ।
दोपहरको भाफर बने पेड़ नीचे रियाम करने पामको

मिस वर बीबम-साहित्य तासापका पामी पीकर महादेवनी के दर्शन करते मौर मापाते विना मोमो शास्त्र पर ही हग्गिाको धर्मका शाम हा या जिसलिये वे सन्ताप-पूर्वक अपना मियॊप पीवन म्मतीस करते में मामका महीना पा । कृष्णपक्षकी धतुर्दशी के दिनकी बार है । अब विकराल व्याप अस बममें मुसा । शाम हुमा ही पाहत पी। म्याध बहुत ही भूखा था । व्यापारी भूल जैसी-बैसी भूम नहीं होती। अगर धुम्हें कुछ न मिझ तो में कम्मा मांस ही नामे मठ पाते हैं। मेक्नि हमारे मिस प्पाषको अपनी भूसका दूस न वा- 'परमें वास-मम्मे भूसे है बुन्हें क्या चिसा ? क्या मुह मर भर पाऊँ ? बगर शिकार न मिमा तो खासी हाम पर पानेकी अपेक्षा रात बनमें ही रह पाना बज्छा हामा-पायद कुछ हाम मग पाय । सोचता हमा बहतासाय किमारे बाया और बेमके पेपर पड़कर बैठ गया। अपने चार-प्रमाके भरम-पोपण किये स्वप बहुत कर झूठाने मोर सरोका सामना करनेको हो वह अपना धर्म समझता था। मिमसे मषिक म्पापक धमका मान बुम 1 महीं था। रात हुई। गणपक्षको पार मपरी काली रात । कुष्ठ दिसामी न पड़ता पा । म्यापने सामाबकी बार दान रकावट गानेगास असर पर्साको ठोड़-सोड़ कर नोष फेंक दिया। मितनेमें वहाँ दो पार हरिग पामी पीने खाय । पेपर बैठ ध्यापका दसर व चौक पर बोर निरागाभरे स्मरमें गौसे- हे पाप अपने घनुपपर बाण म पड़ा। हम मरनेपो सैयार है पर हमें भितना समय रेसकिहम पर जाकर अपने माल बच्चों और सग-मम्बन्धिपोस मिस याये। मूर्योदयस पहत हो हम यहाँ हाजिर हो पायमे । म्पाप सिससिसाकर हंस पड़ा। बाला-- 'श्या तुम मुम बुर समाते हो? क्या मैं मिस तरह अपने हाप बाय . हरिमाहा स्मरण गिकारका छाा ' मर बाल-ममे वो अपर मुला तप हम मा टेरीसह माम-बच्चोंका हो लयास करके जितनी पट्टी पाह रहे हैं। मेक बार भाबमाकर ता देत कि हम अपन अपनका पालन करते हैं या नहीं म्याषक मनमें भदा बार कौतुक बाग युठा । ठोक सूर्योदयस पहल मोट मानेकी ताकीद करक मुमने पुन हरिणा का पर पाने दिया मोर सुद बेसक पत्ताको सोरता हुमा गत भर गागठा रहा । पदावान् मापोहापों अपने गिरपर परे बिम्बपत्रोंमें महादवजो मतुष्ट हो । टीक सूचों पका ममय हुआ और हरिणोंका मम मरा हम यहाँ मा परेना। हरिण पर गय वार-पन्नामे मिल अपने सीगाम अक- इसरेको पुजलाया मन्हें बनाता प्रमम पाटा अन्हें प्यारी पहानी कह सुनाभी और विदा मांगी। दुष्ट ग्याषक माप यचन-पारन पैमा पाठ प्रति पाट्य फर्यात् । परोंमें पिसना हार हा अतना सब सोर सगाकर यहोम पुपपाप भाग पामो "यसा गगह देनेमाला अनमें पामा न निरसा । मग-सम्पम्पियान पा-'परो हम भी माय एम्ने है । स्वेच्छासे मस्प म्योकार करनेपर मोग मिलता है। मापक यव सारम-यमा दयार हम पुनीत होंग। पासनष्प माप हो ग्यैि । माना गप प्यायको हिस्रनामी परोगा करने ही निकले हा मूर्पोयमे पहल ही माग दर यहाँ आ पहुँपा। रातवाम परिण मागे बड़े और बोर- 'सो भाभी, हम पपके लिये पार है। इमर हरिण मा योस मुटे- हमें भी मार गा! यपर हमें मारनेम तुम्हारे मामलोंकी मुल पान्त हातीठो भन्ला हो है। प्याप दिसायप्ति ममहापमी। गारे दिनरा बुरापाव । .

बौवन-वाहित्य
से मुसको चित्तवृत्ति यन्तमग हनी पी। तिसपर
प्रतिमा-मामक हरिषों का धर्माचरम देखकर वह दंग रह गया
उसके हृदयमें मया प्रभाव फैला । असे प्रेम-शोर्यकी बी
मिसी । बह पेड़से नुतरा मोर हरिगोको घरप गया । पो पैर
बारेने पारपैरवाले पकि पैर छुथे । माकासे श्वेत पुष्प
की दृष्टि हमी । कैलाससे मेक मग विमाम अवर बाया
प्याप और हरिण असमें बैठे मोर कम्पाणकारिणी शिवरात्रि
का महात्म्य मासे हरे शिवसोक सिधारे। भाज मी वे दिम
स्पमें चमकते हैं।'
महाधिवरात्रिका दिन मानो मिन धर्मनिष्ट सत्यवाद
इरिगरि स्मरणका ही दिन है।"
मार्च, १९२२
१ ममममम और पाए।
२ असारमी मप्टमी चतुर्षी मार शिवरात्रि में सब हिन महीने
हमेपा मानेपासे त्योहार है। बोन समापसोको सबके लिये
होकप्रिय बमा रिपाई। गणपतिक नपातक बिनायकी भोर संकपा
बतुका त रखते है।बीके मुपासक मप्टमीका प्रत रमते है।
fiराशिहर महीने हम्मानकी चतुरंगी दिन मानो। रोष
शिवरारिका त रमते है। जिस तप मेधारशियाने पापा और
नातिकी कारभिया महा-पारशिया है मुसी तप माप महीनेटी
बिरामि महाभिधराति है।
मस्पेठ मासके प्रत्येक त्योहारत मपना महात्म्य और मुतकी
अपनी मेज का होती है। मनमेले महाशिवरात्रिकोणा परकी
पानी है।
महानीके मिस पुरातन रोगकी मोर बोरामोपा संण्ड करत
बाल संगोपोहा मान माना चाहिये।

सुहाना सोपार । गुलार्मोका त्योहार प्रत्येक रयोहारमें कुछ न कुछ प्रहण करने योग्य अवश्य होता है। मेकिन क्या मालकी होलीसे भी कुछ शिक्षा मिर सकती है ? पिठसे वीस-पन्नीस बरसोंमें यह त्योहार बिस रेपसे मनाया गया है, असे देखते हम तो घिसक विषयमें किसी तरहका मुस्साह अत्पन्न महीं हो सकता । म सिका पापीन मितिहास बोर न पौराणिर कपा हो मिस त्योहार पर कोत्री बन्छा प्रकाप गरती है। फिर भी यह तो स्वीकार करना ही पाहिये कि हासी बफ प्रापीमसम रयोहार है। माके समाप्त होनेपर पर भबरदस्त होली बसाकर मानन्दा- स्मक मनाने का रिवान हरसफ बदाम बोर हरक मानेमें मौजूर रहा है। जिस सुत्सबमें साग सयमको गाम का छोफर मन्छन्दताका पोड़ा बास्वाद लेमा पाहते हैं। हिन्दुओं में अकेस मनुप्योंकी ही पास नहीं हाती, बस्कि रेवताओं, पग-पक्षियों और त्योहारोंकी भो अपनी पाठियाँ होती हैं। स्वर्गके मष्टावसु भातिके वश्त्य है माग और कबूतर पालम होते है और सोमा दनिमा माना जाता है। प्रिसी तरह हाम्गेल त्योहार पोका स्योहार है। क्या बिसीरिये किसी पमानेके बिगड़े हम सूद्रों द्वारा होसौका यह कार्यक्रम बनाया गपापा और अनोहकोंको कायम रखने के लिये दूसरे यों मे मुसे स्वीकार पर सिया पा' पुराणोंमें बेक नियम है कि होली के दिन मतोंको छूना चाहिये । भला मिसमा क्या नरेस्य पाहामा ? दिन राग संस्कारी अर्थात् सपमी और पूसाहन्दी है, क्या मिसी विधारसे होलीमें मिवनी स्वच्छ- नमा एपी गमी है। होसीफ दिन राजा प्रवावेक होकर मक- दूसरे पर रंस अहाते है। मया मिसका माशय यह है कि सासमें कम-से-कम वार-पाँच मि तो सब मोग समानताके सिवान्त -

शोमा दे। अगर बसम्तोत्सब मनाना है, तो समाजमें मया
जीवन पैदा करके यह त्योहार मनाना चाहिये । बगर काम
दहन करना है तो वह्मपर्यत्रत मारण करके पवित्र मनर्मा
बाहिये । यदि होसिकात्सव गुसाफि लिये भेकमात्र स्विमा
का सामन हो, तो सराग्यकी खातिर असे सुरन्त ही मिटा
देना चाहिये । बगर मापा भगारमसे यात्रियोंकी पूजी कम
हो बाप तो बुसके लिये शोक करनेकी कोमी पसरत नहीं।
होलोके दिनों में शहरों और गायोंकी सफाश्री करनेमें हम अपमा
समय बिता सकते हैं। मफे करण करने और महापुरीके
मरदाने लेस सेठनेमें उषा शरावके म्यसनमें फसे हमे मोगोंके
मुहल्सोंमें पाकर अहें घराबखोरी छोर मेका व्यक्तिगत
अपदस एनेमें बिस विनका झुपयोग कर सकता है। स्त्रियों
स्वदेवीके गीत गा-गाकर खादीका प्रपार कर सकती है।
प्रत्येक त्योहारका अपना बेक स्वराज्म-संस्करण अबस्य
होना पाहिय, क्योंकि स्वराज्यका वर्ष है बात्म-शुवि गौर
मबीवम ।
२३२२

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Jivan-sahitya

Author
Kaka Kalelkar
Title
Jivan-sahitya
File name
Jivan-sahitya
Text
OCR done
Citation
1955
Published
2010/12
Publisher
New Delhi,sasta Sahitya Mandal
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514654
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C-DAK, Kolkata
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