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Shrimad Bhagvat Gita Vakyarth Bodhini Bhasatika
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मुहमसंग सूचना. इस रीकामें प्रथम मूल लोक लिरवेजाते हे वै ऐसेकि जहांतक क्रियापदकी सं गति मिलती है यहांतक मूलसोक लिरिसके फिरि अन्य लिखते है उसके नीचे अन्वयके क्रममें भाषारीका निरपते है. कारणकि नवीन विद्यार्थियों को इसमें परिश्रम नहोयगा और पदपदके अर्थ जाननेमें भी सुगमता होयगी इस गाले दीनवत्सन्न ईर्षा रहित सज्जन लोगोको उसपर विशेष निगाह रखना चाहिये यही रीका कर्ताकी पार्थनाहै, ॥ श्रीर्जयति ॥ श्रीमद्भगवद्गीता वाक्यार्थबोधि भापा टीका. ' अथ मंगलम् ॥ ॥ शुक्लांबरधरंविष्णुंशशिवर्णचतु र्भुजम् ॥ प्रसन्नवदनंध्यायेत्सर्वविघ्नोपशांतये ॥ १ ॥ नारायणंतमस्कृत्यनरंचैवनरोतमम् ॥ देवींसरस्वतींचे वततोजयमुदीरयेत् ॥२॥ व्यासंवसिष्ठनप्तारंशक्तेःपौ त्रमकल्मपम् ॥ पराशरात्मजंवंदेशुकतातंतपोनिधिम् ॥३॥ व्यासायविष्णुरूपायव्यासरूपायविष्णवे ॥ न मोवैब्रह्मविधयेवासिष्ठायनमोनमः॥४॥ अचतुर्वदनो ब्रह्माद्विबाहुरपरोहरिः॥ अफाललोचनःशंभुर्भगवान्वा दरायणिः ॥५॥ ॥ इति मंगलम् ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ नमोभगवतेवासुदेवाय ॥ जन्माद्यस्य यतोदेवंतंनत्वावहदिस्थितम् ॥ बाक्यार्थबोधिनीरंम्यांगीता व्याख्यांकरोम्यहम् ॥१॥ श्रीश्रीनिवासतातार्यशिष्योब्रह्मकुलो द्भवः॥रघुनाथप्रसादोऽहंसुकलोहरिसेवकः ॥२॥ उपोद्घातः ॥ प्रथम श्रीमद्भगवद्गीताके प्रगट होनेका कारण कहता हौं कि, राजा पांडु औ राजा धृतराष्ट्र यै दोनौ वैमात्रभाई थे, जिनमें राजापांडुके दोस्त्रीयीं,पहिलि कुंती,दूसरी माद्री,जिनमे कुंतीके तीनपुत्र थे युधिष्ठिर,भीम औ अर्जुन औ माद्रीकेदो पुत्र नकुल औ सहदेव.औरानाधृतराष्ट्रके सौं पुत्रथे,जिनमे दुर्योधन ज्ये- ॥ ॥
२
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
४ पुत्र था, परंतु राजा धृतराष्ट्र जन्मांध थे;इसवास्ते राज्यकार्य
सर्व दुर्योधनके स्वाधीनथा,जब राजायुधिष्ठिरको चौपडखेलाई
छल करिके राज्य लैलिया औ वनवास दिया, जब ये वनवास-
से पाये औ राज्य मागा तब इन्होंने राज्य न दिया, इसलिये
युद्धके वास्ते कुरुक्षेत्रको चलनेलगे तब धृतराष्ट्रनेभी तयारीकी..
जब व्यासजीने कहा कि,तुम नेत्रविना युद्धमे क्या करौंगे? तब
धृतराष्ट्रबोले की,हम युद्धकावृत्तांतहीसुनाकरोंगे,लोसुनिकेव्या-
सजीने कहा की, यह संजय तुह्मारा सारथी हमारा शिष्य है,
इसको हमवरदान देते हैं तो इसको इहांही बैठे सर्व वृत्तांत ह-
प्टिंगोचर होयगा, सो सुनिके राजा धृतराष्ट्र हस्तिनापुरहीमेरहे
और सर्व कुरुक्षेत्रमे जायकेयुद्धका प्रारंभ किया तहाँ. अर्जुनने
देखाकि,दोनौसेनौंमेहमारेही सुहृद,मित्रो कुटुंबी हैं, इनको
हम कैसे मारें? ऐसा समुझिके धनुपवान डारि दिया औरथमेप-
श्वाद्भागमे जा बैठा, जव श्रीकृष्णने देखा कि, इस अर्जुनने अ-
पना क्षत्रियधर्म त्यागी दिया औ धर्मत्यागनेसे इसका कल्या-
णन होयगा.इसवास्ते,इसको तत्वज्ञानका उपदेश करनाचाहि
ये, जब यह स्वधर्नमें प्रवर्त होयगा, ऐसाविचारिके गीताशास्त्र
उपदेश किया,सोई गीता श्रीमन्महाभारतमे वेदव्यासजीनेयु-
त किया, तिसमे सर्व श्लोक श्रीकृष्णमुखारविंदनिर्मित हैं औ
कुछ श्लोक प्रबंध रचनाकेवास्ते व्यासजीनेभी निर्माण किय हैं,
"हां प्रथम श्लोक वृतरामके प्रश्नका है, वृतराष्ट्र संजयसे पूंछाहै-
धृतराष्ट्र उवाच॥ धर्मक्षेत्रेकुरुक्षेत्रेसमवेतायुयुत्स
वः ॥ मामकाःपांडवावकिमकुर्वतसंजय॥१॥
३
गीतावाक्यार्थवाधिनी भाषाटीका.
अन्वयः
हेसंजय, मामकाः च पांडवाः युयुत्सवः संतः धर्मक्षेत्रे
कुरुक्षेत्रे समवेताः एव किमकुर्वत ॥ १ ॥
टीका.
धृतराष्ट्र संजयको पूछते भये कि, हे संजय, धर्मभूमिकु-
रुक्षेत्रमें हमारे पुत्र औ पंडुके पुत्र युद्धकी इछा करिके येकछे
भये हैं, ये क्या करते हैं; इस श्लोकमें धर्मक्षेत्र ऐसा वाक्य
कहा, इसका तात्पर्य कि, कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र है, इसमे धर्महीसे
जय है औ हमारे पुत्र अधर्मी है इनका पराजय जरूर
होयगा, ऐसे भयसे धृतराष्ट्र संजयसे पूंछते भये. ॥१॥
मूलम्.
संजयउ०॥ दृष्ट्वातुपांडवानीकंव्यूढंदुर्योधनस्तदा
॥ आचार्यमुपसंगम्यराजावधनमब्रवीत् ॥२॥
अन्वयः
संजयःउवाच ॥ राजा दुर्योधनः व्यूढं पांडवानीकं दृष्ट्वा
तदा आश्रर्य उपसंगम्य वचनं अब्रवीत् ॥ २॥
टीका.
संजय धृतराष्ट्रको कहते भये कि, राजादुर्योधन व्यूहरच.
नायुक्त पांडवनकी सेनाको देखिके तिसकालमें द्रोणाचार्यके
नजीक जायके वचन बोले. ॥ २ ॥
मूलम्.
पश्यैतांपांडुपुत्राणामाचार्थमहतींचमूम् ॥ व्यू
ढांद्रुपदपुत्रेणतवशिष्येणधीमता ॥३॥
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. अन्वयः हे आचार्य,धीमता तव शिष्येण द्रुपदपुत्रेण व्यूढां पांड- पुत्राणां एतां महती चमूं पश्य ॥ ३॥ टीका. दुर्योधन द्रोणाचार्यसेकहतेहैं कि, हे प्राचार्य, बुद्धिमान औ आपका शिष्य ऐसा जो द्रुपदराजाका पुत्र धृष्टद्युन्न ति. नसे व्यूहरचना करिके सजी है, ऐसी जो पांडुपुत्रौंकी यह श्रेष्ठ सेना इसको तुम देखो. ॥ ३ ॥ मूलम्. अत्रशूरामहेष्वासाभीमार्जुनसमायुधि ॥ युयु धानोविराटश्चद्रुपदश्चमहारथः ॥४॥ धृष्टकेतु चेकितानःकाशिराजश्ववीर्यवान् ॥ पुरुजित्कुं तिभोजश्चशैव्यश्चनरपुंगवः ॥ ५॥ युधामन्यु श्वविक्रांतउत्तमौजाश्चवीर्यवान् ॥ सौभद्रोद्रौप देयाश्चसर्वएवमहारथाः॥६॥ अन्वयः अत्र अस्यां सेनायां युधि संग्रामे भीमार्जुनसमाः महे प्वासाः संति ते इमे युयुधानः विराटः महारथः द्रुपदः ॥४॥ धृष्टकेतुः चेकितानः च वीर्यवान काशिराजः पुरुजित कुंतिभोजः च नरपुंगवः शैव्यः॥५॥विक्रांतः द्रोपदेयाः एते सर्वे महारथाः एष ॥ ६ ॥ टीका. इस सेनामे जे शूर वीर हैं वै संग्राम करनेमेभी औ अर्जु- गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. नके समान वडे धनुपधारी हैं ते ये युयुधान, विराट औ महारथ द्रुपदे ॥४ पृष्टकेतु, चेकितान औ प्राक्रमी काशीका राजा पुरु- जित, कुंतिभोज तथा नरनमे श्रेष्ठ शैव्य॥५॥ ऐसाही शूरवीर प्राकमवालोंमे श्रेष्ठ औ बलवान ऐसा युधामन्यु औ सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु तथा द्रौपदीके पांची पुत्र ये सर्व महारथी हैं, जो दसहजारशूर वीरौंको एकही जीते औशस्त्र तथा शास्त्रमे प्रवी- ण होई उसको महारथीकहते हैं. ॥ ३ ॥ मूलम्. अस्माकंतुविशिष्टायेतान्निबोधहिजोत्तम ॥ ना यकाममसैन्यस्यसंज्ञार्थतान्द्रवीमिते ॥ ७ ॥ भवान्भीष्मश्चकर्णश्चकृपश्चसमितिजयः ॥ अ श्वत्थामाविकर्णश्चसौमदत्तिस्तथैवच ॥ ८॥ अ न्येचबहवःशूरामदर्थत्यक्तजीविताः ॥ नानाशस्त्र प्रहरणाःसर्वेयुद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ अन्वयः हेद्विजोत्तम, येतु अस्माकंसैन्यस्य नायकाः विशिष्टाः ता न निवोधतान ते संज्ञार्थ ब्रवीमि ॥७॥भवान् भीष्मःच कर्णःच समिनिंजयः कृपः अश्वत्थामा विकर्णः तथाएव सौमदत्तिः॥८॥मदर्थे त्यक्तजीविताः नानाशस्त्रप्रहरणाः अन्ये चवहवःशूराःसंति एतेसर्वे युद्धविशारदाःसंति ॥९॥ टीका दुर्योधन द्रोणाचार्यसे कहते हैं कि, हे द्विजोत्तम, जे हमारी सेनाकेशरदार श्रेष्ठ हैं तिमको तुम जानौ, मैं उनके नामजानने- ६ गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका, केवास्ते कहता हौं ॥७॥ आप भीष्म, कर्ण औ संग्रावजीतने वाले कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण, तैसाही सोमदत्तराजाका पुत्र भूरिश्रवा ॥८॥ औ मेरेवास्ते त्यागे हैं जीवन जिन्होंने ऐसे नानाशके प्रहार करनेवाले औरभी बहुत शूरवीर हैं,ये सर्व युद्ध करनेमे चतुर हैं. ॥ ९ ॥ अपर्याप्तंतदस्माकंबलंभीष्माभिरक्षितम् ॥ र्याप्तंत्विदमेतेषांवलंभीमाभिरक्षितम् ॥ १०॥ अयनेषुधसर्वेपुयथाभागमवस्थिताः ॥ भीम मेवाभिरक्षतुभवंतःसर्वएवहि ॥ ११ ॥ अन्वयः अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितं तत् अपर्याप्तं तु एतेपा इदं वलं भीमाभिरक्षितं अपर्याप्तं ॥१०॥ अतः सर्वेपुअ यनेषु यथाभागं अवस्थिताःसंतः भवंतः सर्वेहि भीष्म एव अभिरक्षतु ॥ ११॥ टीका हमारी ग्यारह अक्षौहिणी सेना भीष्मकरिके रक्षित हैतौभी, असमर्थ दीखती है औ इनौकी सेना सात अक्षौहिणी है तौभी, भीमकरिके रक्षित समर्थ दीखती है,इहां दुर्योधनके मनकायह तात्पर्य है कि, भीष्मपितामह उभयपक्षपाती हैं,कदापिउनका पक्षकिया तो हमारी सेनाका रक्षक कोईभी नही,दसवास्ते आ पविचार करो। १॥इसवास्ते जहां जहां परसेना प्रवेशकस्थान है याने नाफे हैं, उन सर्व नाके नाकेपर यथाभाग याने आपआ D गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. पके यूथ लैके सावधानखडे व्हेकेआपलोग भीष्महीकी रक्षाकरौ याने कोई परतेनाका दूतभीभीष्मके समीप न आने पा॥११॥ मूलम. तस्यसंजनयन्हर्षकुरुटद्धः पितामहः ॥ सिंहना दंविनद्योच्चैःशंखंदध्मौप्रतापवान् ॥ १२॥ अन्वयः प्रतापवान कुरुपद्धः पितामहः तस्य हर्प संजनयन् सन् उच्चैः सिंहनादं विनद्य शंखं दध्मौ ॥ १२ ॥ टीका. प्रतापी औ कुरवंशिनमे वडे तथा पितामह जो भ प्म सो दुर्योधनके हर्प उत्पन्न करते हुवे, उंचेस्वरसे सिंहसरीखे गर्जना करिके आपका शंख बजाते भये. ॥ १२ ॥ मूलम्. ततःशंखाश्चभेर्यश्चपणवानकगोसुखाः॥ सहसै वाभ्यहन्यंतसशब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३॥ अन्वयः ततः शरवाः च भेर्यः पणवानकगोमुखाः सहसा एव अ- भ्यहन्यंत सशब्दस्तुमुलोऽभवत् ।। १३ ॥ टीका. भीमने शंख बजाया तदनंतर सर्वसैनौंमे शरव, भेरी,ढोल, नगारे,रणसिंहे ये सर्व वाजे एकाएकी बजने लगे,सोशब्द बहुत भारी होता भया. ॥ १३ ॥ x गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. मूलम्. ततःश्वेतैर्हयैर्युक्तमहतिस्पंदनेस्थितौ ॥ माधवः पांडवश्चैवदिव्यौशंखौप्रदध्मतुः॥१४॥ अन्वयः -तत्तः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महत्तिस्यंदनेस्थिती माधवः च पांडवः. एव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥ टीका. सर्व बाजे बाजनेके पीछे शुक्लवर्णके घोडोंसे जुडा ऐसा जो वडा रथ तिसपर बैठेहुये श्रीकृष्ण औ अर्जुन ये दोनौ आप आपके दिव्यशंख याने अप्राकृतशंखौंको बजाते भये.॥ १४ ॥ पांचजन्यंहपीकेशोदेवदत्तंधनंजयः ॥ पौंडूंद ध्मौमहाशंखंभीमकर्माटकोदरः ॥ १५॥ अनं तविजयंराजाकैतीपुत्रोयुधिष्ठिरः॥ नकुलःसहदे वश्वसुघोपमणिपुष्पकौ ॥ १६॥ अन्वयः . .पीकेशः महाशंखं पांचजन्यं दध्मौ, धनंजयः देवदत्तं द ध्मी, भीमकर्मा तृकोदरः पौंडूं दध्मौ ॥ १५ ॥ कुंतीपुत्रः राजायुधिष्ठिरः अनंतविजयं शंखं दध्मौ, नकुलः च सह देवः एतौ सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥ टीका. हपीकेश जो श्रीकृष्ण ते आपका जो श्रेष्ठ शंख पांचजन्य उसको बजाते भये,धनंजय जो अर्जुन सो देवदत्तनामा शंख 0 गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. ९ वजाते भये औ भयंकर हैं कर्म जिनके औ उदरसे जिनके वृ क नाम अग्नि अति प्रबल है ऐसे जोभीम सो पौंडूनाम महाशं- ख वजाते भये.॥१५॥कुंतीके पुत्र राजायुधिष्ठिर अनंतविज- यनाम शंख बजातेभये, नंकुल सुघोषनाम शंख बजाते भये. सहदेव मणि पुष्पक नाम शंख बजाते भये. ॥ १६ ॥ मूलम्. काश्यश्चपरमेष्वासःशिखंडीचमहारथः ॥ धृष्ट- ग्रुन्मोविराटश्चसात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ गुपदोद्रौपदेयाश्चसर्वशःप्टथवीपते ॥ सौभद्रश्च महाबाहुःशंखान्दध्मुःष्टथक्टथक् ॥१८॥सयो पोधार्तराष्ट्राणांहृदयानिव्यदारयत् ॥ नभश्चष्ट थिवींचैवतुमुलोव्यनुनादयन् ॥ १९॥ अन्वयः परमेष्वासःकाश्यःचमहारथःशिखंडीसृष्टद्युम्नः विराटः च अपराजितःसात्यकिः।।१७॥ ॥हेटथिवीपते द्रुपदः च सर्वशःद्रौपदेयाःचमहाबाहुःसौभद्राइमेसर्वे पृथक्प्टथक् शंखानदध्मुः॥१८॥सतुमुलो धोपः नमान्य थिवाव्यनु नादयन्सन धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ॥१९॥ टीका. श्रेष्ठ है धनुष्यजिसकाऎसाकाशिराज नौ महारथीशिखंडी औघरधुम्न,विराटतथा शत्रुघ्नकरिके अजित ऐसा सात्यकि१७ हेटथिवीपतेधृतराष्ट्रराजाद्रुपदौद्रिीपदीकेसर्व पुत्रीविशालह वाहैं जिनकी ऐसा सुभद्राकापुत्र अभिमन्यु, ये सर्व न्यारे न्यारे आपापके शंख बजातेभये॥ १८ ॥ सोकोलाहलशदआका २
०
अन्वयः
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
शीटथ्वीको शब्दायमान करता करता तुह्मारे पुत्रौंका हृदय
विदीण किया. ॥ १९ ॥
मूलम.
अथव्यवस्थितान्दृष्ट्वाधार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ॥
प्रत्तेशस्त्रसंपातेधनुरुद्ययपांडवः॥२०॥ हृपी
केशंतदावाक्यमिदमाहमहीपते । सेनयोरुभयो
मध्यरथंस्थापयमेऽच्युत ॥ २१ ॥
हेमहीपते अथ शस्त्रसंपातेप्रवृत्ते सति कपिध्वजःपांडवः
धाराष्ट्रान व्यवस्थितानदृष्ट्वा तदा धनुः उद्यम्य हृपी.
केशं इदं वाक्यमाह, हेअच्युत! उभयोः सेनयोः मध्ये
मेरथं स्थापय ॥ २१ ॥
टीका.
संजय धृतराष्ट्रको कहते हैं कि, हे महीपते!वह घडा घोरशब्द
निवृत्तहुये पीछे शस्त्रों के चलनेकी तयारीभई, तब कपिनाम
वानरका चिन्ह है ध्वजामें जिनके ऐले पांडुके पुत्र जो अर्जुन
सो तुह्मारे पुत्रौंको युद्ध करनेको खडे देखिके धनुपको हाथमे
ऊँचालैके श्रीकृष्णसे ये वचन बोलते भये कि, हे अच्युत!
दोनों सेनों के मध्यमे मेरा रथ स्थापित करी ॥ २१॥
मूलम्.
यावदेतानिरीक्ष्येहंयोद्धकामानवस्थितान् ॥ कै
मयासहयोदव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥२२॥
अन्वयः
अहंयावत् एतान् योद्धकामान् अवस्थितान् निरीक्ष्ये
अस्मिन रपासमुद्यमे मयासहकैःयोदव्यं ॥ २२ ॥
अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. ११ टीका मैंप्रथम ये जो युद्धकि इच्छा कारके स्थित हैं तिनको देखौंगाकि, इस रणके प्रारंभमें मेरेको कोनकोनसे युद्ध करना योग्यहै.२२ मूलम् योत्स्यमानानवेक्ष्येऽहंयएतेऽत्रसमागताः ॥ धार्तराष्ट्रस्यदुर्बुद्धेर्युद्धप्रियचिकीर्षवः॥२३॥ य एते दुर्बुढेः धार्तराष्ट्रस्ययुद्धे प्रियचिकीर्पवः अत्र स मागताः तान् योत्स्यमानान् अहं अवेक्ष्ये ॥ २३ ॥ टीका, जे यै यतनेदुर्बुद्धि धृतराष्ट्रके पुत्रदुर्योधनके युद्धमें प्रिय करने की इच्छा करनेवालौंको में देखा चाहताहौं. ॥ २३ ॥ मूलम्. संजयउवाच ॥ एवमुक्तोषीकेशोगुडाकेशेनमार त॥सेनयोरुभयोर्मध्येस्थापयित्वारथोत्तमम् ।। ॥२४॥भीष्मद्रोणप्रमुखतःसर्वेपांचमहीक्षितां ॥ उवाचपार्थपश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥२५॥ अन्वयः संजयउवाच हे भारत गुडाकेशेन एवमुक्तः हपीकेशः उभ योः सेनयोः मध्ये रथं स्थापयित्वा भीष्मद्रोणप्रमुखतः च सर्वेपां महीक्षतां प्रमुखतः इति उवाच हे पार्थ एतान् समवेतान् कुरुन् पश्य ॥ २५ ॥ टीका. संजय धृतराष्ट्रसे कहते भये कि, हे भारत याने भरतवंशमें उत्पन्न हे धृतराष्ट्र ! गुडका जो निद्रा उसका जीतनेवाला जो गीतावाक्याबोधिनी भापाटीका. अर्जुन तिसने जब कहाकि, हे कृष्ण, हमारा स्थ दोनौ सेनाके बीचमें खडाकरो, तव श्रीकृष्णजीने दोनौ सेनौंके मध्यमे रथ खडा करिके भीष्म, द्रोणाचार्य और सर्व राजोंके सन्मुख ये- वाक्य बोलेकि, हे एथाके पुत्र! ये जो यकढे भये है कुरुवंशी इ नको तुम देखो ॥ २५॥ मूलमू. तत्राऽपश्यस्थितान्पार्थःपितृनथपितामहान् ॥ आचार्यान्मातुलान्धातृनपुत्रान्पौत्रान्सखीं स्तथा ॥२६॥ श्वशुरान्सुहृदश्चैवसेनयोरुभयोर पि॥ तान्समीक्ष्यसकौंतेयःसर्वान्वंधूनवस्थितान् ॥ कृपयापरयाविष्टोविपीदन्निदमब्रवीत् ॥२७॥ अन्वयः अथपार्थः तत्रस्थितान् पितून पितामहांन प्राचार्यान मातुलान् भ्रातन पुत्रान् पौत्रान् तथासखीन ॥ २६ ॥ श्वरानू च सुहृदःएव अपश्यत् स कौंतेयः उभयोःसेन योः अपि तान सर्वान् बंधून् अवस्थितान समीक्ष्य पर- या कृपया विष्ट विषीदन सन् इदं अब्रवीत्॥ २७॥ टीका. जब श्रीकृष्णने दोनौसेनोके मध्यमे रथ स्थापित करके क- हाकी,हे भर्जुन, ये कुरवंशी खडे हैं इनको देखो. तव टयाकापुत्र पार्थ याने अर्जन दोनौ सेनौमे देखते हैं तो पितायाने पितास दृशभूरिश्रयादिक काका,पितामह,भिष्म,सोमदत्तादिकभाचा. र्य द्रोणाचार्यादिक मातुल शल्य, शकुनि इत्यादिक भ्राता,दुर्यो- धादिक पुत्र द्रौपदीसे उत्पन्नांच पौत्र लक्ष्मादिकोंके बेटे स गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, १३ खा अश्वत्थामा जयद्रथादिक ॥२६॥ श्वशुर द्रुपद आदिक औ सुहृद वे जो प्रत्युपकार विना प्रीतिकरैते कृतंवर्मादिक इन स- वको देखता भया, इन सर्वबंधुनको युद्धकेवास्ते खडे देखि केअ ति कृपा करिके युक्त अगाडी कहेंगे वै वचन श्रीकृष्ण भगवानसे वोला; इहां कौंतेय याने कुंतिपुत्र कहनेका तात्पर्यकि, ऐसी जगह करुणा करना पुरुष बुद्धिवालेका धर्म नहीं है.॥ २७ ॥ मूलम्. अर्जुनउवाच ॥ दृष्ट्वेमंस्वजनंकृष्णयुयुत्सुसमुप स्थितं ॥सीदंतिममगात्राणिमुखंचपरिशुष्यति ॥ वेपथुश्चशरीरेमेरोमहर्पश्चजायते ॥२९॥ गांडी वस्त्रंसतेहस्तात्त्वक्वैवपरिदह्यते ॥ नचशक्नोम्यव स्थातुंभ्रमतीवचमेमनः ॥३०॥ निमित्तानिच पश्यामिविपरीतानिकेशव ॥ नचश्रेयोऽनुपश्या मिहत्वास्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥ अर्जुनउ० ॥ हेकृष्ण युयुत्तुं समुपस्थितं इमं स्वजनं ह वा मम गात्राणिसीदंतिचमुखं परिशुष्यति मेशरीरे वेप धुः च रोमहर्षः जायते॥२९॥हस्तात गांडीवं संसते च त्वक् एव परिवह्यतेअहं अवस्थातुंनशनोमि चमम मनः भ्रमतिइवा३ हेकेशवनिमित्तानचविपरीतानिपश्या- मिआहवेत्वजनं हत्वाअनुश्रेय अपि न पश्यामि ॥३१॥ टीका अर्जुन कहतेभये कि,हे श्रीकृष्ण! युद्धकिहैइच्छा जिनकेऐसे जो ये हमारे ही बंधुजन नजीक स्थित हैं इनको देखिके मेरे गा अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. त्र शिथिल होते है,और मुखभि सूखता है और मेरे शररीमेकंपा और रोमांचभी होते हैं. ॥ २९ ॥ हायसे गांडीव धनुषभी पड़ा जाता है,औ त्वचाभीजली जातीहै, मै खडे होनेकोभी नहीं सकता हौं,और मेरा मनभी भ्रमता जैसा है.॥ ३०॥हे केशव निमित्त याने शकुन वेभी विपरीत ही देखता हों औ संग्राम- में आपके बंधुजनोंका बध करिके पीछे कल्याण होयगा सो- भीनही देखता हो. ॥ ३१॥ मूलम्. नकांक्षेविजयंकृष्णनचराज्यसुखानिच ॥ किं नोराज्येनगोविंदकिंभोगै वितेनवा ॥३२॥ये पामर्थकांक्षितंनोराज्यंभोगाःसुखानिच ॥ तइमे ऽवस्थितायुद्धेप्राणांस्त्यक्त्वाधनानिच ॥ ३३ ॥ अन्वयः हे कृष्ण अहं विजयं न कांक्षेच राज्यं न कांक्षे च सु खानि न कांक्षे, हे गोविंद नःअस्माकं राज्येन किंवा भोगेः किं वा किं जीवितेन ॥ ३२॥ नः अस्माभिः येपामर्थ राज्यं कांक्षितंच भोगाः कांक्षिताः सुखानि कांक्षितानि ते इमे प्राणान् धनानि त्यक्त्वा युद्धे अवस्थिताः ॥ ३३ ॥ टीका. हे कृष्ण, मै संग्रामजीतना नही चाहता हाँ औ राज्यभी नहीं चाहता हैं। औ सुखभी नही चाहता हौं, हेगोविंद! हम- कोराज्येसे क्या प्रयोजन है?अथवाभोगसि क्या प्रयोजन है!अ धवा जीवनेसभी क्या प्रयोजन है॥३२॥हमने जिनके वास्ते राज्य चाहता और भोग चाहेथे औ सुखभी चाहेथे त यै सब १५ गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. प्राणऔर धनौको त्यागिके युद्धमे खडे हैं. ॥ ३३ ॥ मूलम्. आचार्याःपितरःपुत्रास्तथैवचपितामहाः॥ मातु लाःश्वशुराःपौत्राःश्यालाःसंबंधिनस्तथा ॥३४॥ चतानहंतुमिच्छामि नतोऽपिमधुसूदन ॥ अपि त्रैलोक्यराज्यस्यहेतोःकिंनुमहीकृते ॥ ३५॥ अन्वयः इमे प्राचार्याःपितरः पुत्राःतथा एव पितामहाःमातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः तथा संबंधिनःसंति ॥३४॥हे मधुसूदन त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः अपि एतान् नतोपि हं तुंन इच्छामि महीकते किंनु ॥ ३५ ॥ टीका. अर्जुन कहतेभये कि,जे ये सन्मुख लढनेको खडे हैं ते यैसव कोई प्राचार्य,कोई पितास दृश,कोई पुत्रतथा पितामह, मामा ससुर, पौत्र, शाले तथा औरभी संबंधीही हैं, इसवास्ते हे म- धुसूदन! तीन लोकके राज्यके वास्ते भी जो ये मेरेकोमारे तौभी मैं इनके मारने की इच्छा नहीं करताहों श्री पृथ्वी- के वास्ते तोक्या मारौं? ॥ ३५ ॥ निहत्यधार्तराष्ट्रानःकाप्रीतिःस्याजनार्दन ॥ पा पमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ ३६ ॥ तस्मान्नास्वयंहतुंधार्तराष्ट्रान्स्वबांधवान्। स्वज नंहिकथंहत्वासुखिनःस्याममाधव ।। ३७ ।। अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. हे जनार्दन धार्तराष्ट्रान निहत्यनःकाप्रीतिःस्यात् एतान् आततायिनःहत्त्वा अस्मान पापं एव आश्रयेत॥३६॥त स्मात् स्ववांधवान धाराष्ट्रान इंतुं वयं अर्हाःन हेमाध- व हि स्वजनं हत्वा वयं कथं सुखिनः स्याम् ॥ ३७॥ टीका. हेजनार्दन! धृतराष्ट्रके पुत्रोंकोमारिके हमारी क्या प्रसनता होयगी? इन आततायिनको मारिके हमको पापही होयगा.॥ ॥ ३६ ॥ तिसीवास्ते हमारे बंधु जे धृतराष्ट्र के पुत्र इनकोमारने को हम योग्य नहीं हैं. हे माधव! अपने बंधुनकोमारिके हम कै- से सुरवी होयगे? ॥६७॥ आततायि छप्रकारके होते हैं. जो आ- गिलगावे १ विपदेई २ शस्त्र लैके सन्मुख युद्ध करनेको आवे ३ धनहरै ४ पृथ्वीहरै ५ नौ स्त्रीहरण करै यहछठा ॥ ६ ॥ मूलम्. यद्यप्यतेनपश्यंतिलोभोपहतचेतसः ॥ कुलक्ष यकृतं दोपमित्रद्रोहेचपातकं ॥३८॥कथंनज्ञेय मस्माभिःपापादस्मान्निवर्तितुं ॥ कुलक्षयकृतंदो पंप्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९॥ अन्वयः हे जनार्दन लोभोपहतचेतप्तःएतकुलक्षयकृतंदोपंचमित्र द्रोहे पातकं यद्यपिनपश्यंति तथापिकुलक्षयकृतं दोपंप्र पश्यदिःअस्माभिःअस्मात्पापात् निवर्तितुं कथंनज्ञेयं॥३९ ॥ टीका. हे जनार्दन!लोभकरिके नष्ट भई हैं बुद्धि जिनकी ऐसजेयेदु योधनादिक कुलक्षयका दोप औ मित्रद्रोहका पाप यद्यपि नहीं देखते हैं तो भी कुलक्षय रुत्त दोप जानने वाले जो हम तिनक-
गातावाक्याथबााधनों भापाटीका,
रिके इस कुलक्षयकृत पापसे निवर्त्त होनेको कैसे न जानना
चाहिये, याने जाननाही चाहिये, ॥ ३९ ॥
मूलम्.
कुलक्षयेप्रणश्यंतिकुलधर्माःसनातनाः ॥ धर्मेन
प्टेकुलंकृत्स्नमधर्मोभिभवत्युत ॥४० ।।
अन्वयः
कुलक्षये सति सनातनाः कुलधर्माः प्रणश्यति उत धर्म
नष्टे सति कृत्स्नं कुलं अधर्मः अभिभवति ॥ ४० ॥
' टीका.
कुलके नाश होनेसे सनातन कुलधर्म नष्ट होते हैं, फिरि
धर्मनष्ट होनेसे समस्त कुलपर अधर्म फैलिजाता है.॥१०॥
मूलम्,
अधर्माऽभिभवात्कृष्णप्रदुष्यंतिकुलस्त्रियः ॥ स्त्री
पुदुष्टासुवार्ष्णेयजायतेवर्णसंकरः॥४१॥
अन्वयः
हे कृष्ण अधर्माभिभवात्कुलस्त्रियःप्रदुप्यंति.हे वार्णय
दुष्टासु स्त्रीपु वर्णसंकरः जायते ॥ ११ ॥
टीका,
हेकृष्ण,कुलमे अधर्म फैलनेसे कुलकी स्त्रियांव्यभिचारिणी
होती हैं। हे वाणेय,याने हे वृष्णिवंशोत्पन्न हे भगवन, उन दुष्ट
स्त्रियोंमे वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं, वाक्य कहनेसे उभयकल
शुद्धता सूचन किया; जैसे पिटकुल तौ यादव,मातृकुल वृष्णि
हैं-इसमे यह तात्पर्य है कि, आपसरीखा हमाराभी कुल शुद्ध
रहना चाहिये. ॥४१॥
१८ गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. मूलम. संकरोनरकायैवकुलमानांकुलस्यच ॥ पतंतिपि तरोह्येषांलुप्तपिंडोदकक्रियाः॥४२॥ अन्वयः संकरःकुलमानां कुलस्य नरकाप एव, हियस्मात् लुप्त- पिंडोदकक्रियाः एपां पितरः पतंति ॥ १२ ॥ टीका वह वर्णसंकर कुलपातके कुलको नरकहीके वास्ते है, स्यौकि, लुप्तभई पिंडोदकक्रिया जिनकी ऐसे उनके पितर स्व- गते पडते हैं. ॥ ४२ ॥ मूलम् दोषैरतैःकुलघ्नानांवर्णसंकरकारकैः ॥ उत्साद्यते जातिधर्माःकुलधर्माचशाश्वताः॥४३॥ वर्णसंकरकारकैः एतैःदोपैः कुलमानो जातिधर्माःच शा- श्वताः कुलधर्माः उत्साद्यते ॥ १३ ॥ टीका. वर्णसंकरके किये जो ये मतने दोप तीनौं करिके कुलधा- तियोंके जातिधर्म औ सनातन कुलधर्मसमूल नष्ट होते हैं.॥४३ मूलम्. उत्सन्नकुलधर्माणांमनुष्याणांजनार्दन ॥ नरके नियतवासोभवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥ हे जनार्दन उत्सन्नकुळधर्माणां मनुष्याणां नरके नियते वासो भवत्तिइति अनुशुश्रुम ॥ ११ ॥ अन्वयः अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. टीका. हेजनार्दन, उच्छिन्न भये हैं कुलधर्म जिनके ऐसे मनुष्यौंको नरकमे अवश्य वास होता है, ऐसेहमने धर्मशास्त्रमे सुनाहै.४४ मूलम्. अहोबतमहत्पापकर्तुव्यवसितावयम् ॥ यद्राज्य सुखलोभेनहंतुंस्वजनमुपताः॥४५॥ अन्वयः अहो बत वयं महरपापं कर्तुं व्यवसिताः यत् राज्यसु- खलोभेन स्वजनं हंतुं उद्यताः ॥ १५ ॥ टीका, अहो! बहुत पछितानेकी बात है. जोहम बडा पाप करनेका निश्चय करते हैं, जो राज्यसुखके लोभसे आपके बंधुजनौंको मारनेका उपाय करते हैं. ॥ ४५ ॥ मूलम. यदिमामप्रतीकारमशस्त्रंशस्त्रपाणयः ॥ धार्तरा ष्ट्रारणेहन्युस्तन्मक्षेमतरंभवेत् ॥४६॥ अन्वयः शस्त्रपाणयः धार्तराष्ट्राः यदिअशवंअप्रतीकारं मां रणे हन्युः तत् मे क्षेमतरं भवेत् ॥ १६ ॥ टीका. शम हायमे हैं जिनके ऐसे जो धृतराष्ट्र के पुत्र जो शस्त्र- रहित औ सन्मुख न लरतेहुये मेरेको रणमे मारेंगे तौभी मेरा अति भला होयगा. ॥ ४६॥ मूलम्. संजयउ०॥ एवमुक्त्वाऽर्जुनःसंख्येरथोपस्थउपा २० गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. विशत्॥विसृज्यसशरंचापंशोकसंविग्नमानसः॥ ४७ अन्वयः संजयउ॥शोकसंविनमानसः अर्जुनः संरच्येएवं उक्त्वा 'सशरं चापं विसृज्य रथोपस्थे उपाविशत् ॥ १७ ॥ टीका. संजय धृतराष्ट्रको कहते हैं कि, हे राजन! शोक करिके है व्याकुल मन जिसका ऐले अर्जुन संयामभूमिमें ऐसे कहिके वा- णसहित धनुपको त्यागिके रथमें पिछाडी, जा बैठा. ॥ १७ ॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायायो गशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादेअर्जुनविषादयोगो नामप्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्सनपंडितरधुनाथप्रसादकृतायां श्रीमद्भवाक्यार्थबोधिनीभापाटीकायांप्रथमोऽध्यायः॥१॥ मूलम्. संजयउवाच ॥ तंतथाकृपयाविष्टमेश्रुपूर्णाकुलेक्ष णमाविपीदंतमिदंवाक्यमुवाचमधुसूदनः ॥ १॥ अन्वयः संजयउवाच ॥ तथा रूपया आविष्टं अश्रुपूर्णाकुलेक्षणं विपीदंतं तं मधुसूदनः इदं वाक्यं उवाच ॥ ३ ॥ टीका. संजयकहते हैं कि,तेसी पूर्वोक्तकरुणाकरिके व्याप्त औ आंसु- ओंके भरनेसे व्याकुल है नत्र जिसके ऐसे अर्जुनको यह वाक्य बोलते भये. ॥ १ ॥ मूलम्. कुतस्त्वाकश्मलमिदंविपमेसमुपस्थितं ॥अनार्य अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीकाः जुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥ हे अर्जुन अनार्यजुष्टं अस्वथै अकीर्तिकर इदं कइमलं विपमे त्वा कुतः समुपस्थितं ॥ २ ॥ टीका. प्रथम श्लोकमे कहा कि,भगवान अर्जुनको यह वाक्य कहते भये,सो अव खुलासा कहते हैं.हे अर्जुन अनार्य जो अधमजन तिनोंके सेवनेयोग्य औ स्वर्गप्राप्तिका वाधक औ कीर्तिकाभी नाशक ऐसा जो यह मोह सो विपम याने ऐसे कठिन युद्धके समयमें तुमको कहांसे प्राप्त भया? ॥ २ ॥ मूलमू. क्लैव्यंमास्मगमःपार्थनैतत्त्वय्युपपद्यते ॥ क्षुद्रहृदयदौर्बल्यंत्यक्त्वोत्तिष्ठपरंतप ॥३॥ हे पार्थ कैव्यं मास्मगमः एतत्त्वयि न उपपद्यते हे परं- तप क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वा उत्तिष्ठ ॥ ३ ॥ टीका हे पार्थ, याने प्रथाके पुत्र अर्जुन! तुम कादरताको न गृहण करौ. यह कादरता तुमको न प्राप्तहोना चाहिये,कारण कि, तुम' शवनको संतापित करनेवाले हो, इसवास्ते तुच्छ अंतःकरणकी दुर्वलताको त्यागिके उठौ. ॥ ३ ॥ मूलम्. अर्जुनउवाच॥कथंभीष्ममहंसंख्येद्रोणंचमधुसूद न ।इपुभिःप्रतियोत्स्यामिपूजाविरिसूदन॥४॥ अन्वयः अन्वयः गीतावाक्यार्यबोधिनी भापाटीका. अर्जुनउ०॥हे मधुसूदन अहं संख्ये भीमं च द्रोणं प्रति इयुभिः कथंयोत्स्यामि हे अरिसूदन इमो पूजाही ॥४॥ टीका, अर्जुन बोलेकि,हे मधुसूदन,मैसंग्राममें भीष्म औ द्रोणाचा- यसे बाणों करिके कैसे युद्ध करौंगा? हेअरिसूदन, ये दोनौ पूजाके योग्य हैं. इस श्लोकमे दो संबोधनदिये, जिसमे मधुसूदनका यह तात्पर्य है कि, आप दैत्यनाशक हो; परंतु सज्जनजनासे युद्ध कैसे करातेहो? नो परिसूदन कहनेसे यह पाया कि, आप शत्रु- हताही परंतु यै हमारे बडे गंधपुष्पादिकौंकरिके पूजने योग्य. तिनपर बाणप्रहार क्यों करवाते हों? ॥१॥ मूलम्. गुरूनहत्वाहिमहानुभावांश्च्छ्रेयोभोक्तुंभक्ष्यम पीहलोके । हत्वार्थकामांस्तुगुरूनिहैवभुंजीय भोगाधिरप्रदिग्धान् ॥५॥ अन्वयः इहलोके महानुभावान गुरुन् अहत्वा भैक्ष्यं अपिमोक्तुं श्रेयः तु अर्थकामान् गुरुन् इह एव रुधिरप्रदिग्धान भोगान् भुंजीय ॥ ५॥ टीका. इस लोकमें बड़े प्रतापी गुरूनको मारे विना जो भीख मागिके, खाना वह भी श्रेष्ठहै, परंतु अर्थकामनावाले गुरू- नकोमारिके जो भोग मिले वे भोग इस लोकहीमे रक्त फेसने भये है. तात्पर्य परलोक ती विगडही जायगा.॥५॥ मूलमू. नचैतद्विद्मःकतरन्नोगरीयोयहाजयेमयदिवानोजये २३ ३ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. युआयानेवहत्वानजिजीविषामस्तेवस्थिताःप्रमुखे धार्तराष्ट्राः ।।६।।कार्पण्यदोषोपहतस्वभावःप्टच्छा मित्वांधर्मसंमूढचेताः॥ यच्छ्रेयःस्यानिश्चितंबहि तन्मशिष्मस्तेऽहंशाधिमांत्वांप्रपन्नम्॥७॥ अन्वयः जयाजययोर्मध्ये नः कतरन् गरीयःकिनामाधिकतरंय. द्वाजयेम यदिवा नः अस्मानइमेजयेयुः एतत् चन वि. पः यान हत्वा वयं नजिजीविपामः तेधार्तराष्ट्राः प्रमुखे एव अवस्थिताः॥६॥कार्पण्यदोपोपहतस्वभावः धर्म संमूढचेताः अहं त्वां पृच्छामि मे यत् निश्चितंश्रेयःस्यात् तत् ब्रूहि अहं ते शिष्यः अतः त्वां प्रपन्नं मांशाधि॥७॥ टीका. अर्जुनका अभिप्राय यह है कि, जो कदापिहम अधर्मभी अंगिकार करिके युद्ध करेंगे तौभी, जीतीहारिका निश्चय नहीं. इसी अभिप्रायकरिके श्रीकृष्णसे बोले कि, हे कृष्ण! जय औप- राजयइनदोनौमे हमको कौनसा अधिक है. क्योंकि हमइनको जीतेंगे अथवा यै हमको जीतेंगे. हम यहभी नही जानत है. और भी यह जय भी अंतमे पराजय समान है, जैसे कि जिन- कोमारिके हम जीना भी नहीं चाहते हैं: तेही धृतराष्ट्रके पुत्र- सन्मुख खडे हैं ॥६॥ इनको मारिके हम कैसे जीवंगे? यह रुपणपना और कुलक्षय करनेका दोष इन दोनो करिके परा भवको प्राप्तहुश्रा है स्वभाव जिसका ऐसा जो मै तैसेही धर्ममे मूढ है चित्तजिसका याने युद्ध छोडिके भिक्षा मागना यह क्ष- त्रियका धर्म है अथवा अधर्म है ऐसा संदिग्ध चित्तमै तुमको. पूंछता हो. जो मेरा निभय कल्याण कारक होय सोई कहाँ.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. क्योंकि मै तुह्मारा शिष्य हौं. इसवास्ते आपके शरण आयाहौं. मेरेको सिखावो.क्योंकि शिप्यको सिखानाही चाहिये.॥७॥ मूलम्. नहिप्रपश्यामिममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषण मिंद्रियाणां ॥ अवाप्यभूमावसपत्नमृद्धराज्यं सुराणामपिचाधिपत्यम् ॥ ८॥ अन्वयः भूमौ असपत्नंऋदं राज्यं अवाप्य च सुराणा अपि आ- धिपत्यं अवाप्य यत् मम इन्द्रियाणां उच्छोपणंशोक अपनुद्यात् तत् तत् उपायहि न पश्यामि ॥८॥ . टीका. अर्जुनने मनमे शंकाकिया कि, कदाचित् भगवान् कहिदेइंगे कि पापना कल्याण आपही विचारसे करो, इसवास्ते ये वचन वोले कि, हे कृष्ण,जोइहां पृथ्वीमे शत्रुरहित समस्त राज्य मि- लै औ परलोकमे देवताकाभी राज्य मिलै तौभी,जो मेरे ई- द्वियोंके सुखाने वाले शोकको दूरकरै सो उपाय, निश्चयकरिके मैं नही देखताही अर्थात् आपही उपदेश करौ यहअभिप्राय ॥८ मूलम्. संजयउवाच॥एवमुत्काहपीकेशंगुडाकेश:परंतपः॥ नयोत्स्यइतिगोविंदमुक्त्वातूप्णीवभूवह ॥९॥ अन्वयः संजयउवाच परंतपःगुडाकेशः हपीकेशं एवंउक्त्वाह प्र- सिद्धं नयोत्स्य इति गोविंदं उक्त्वा तुम्णींबभूव ॥ ९॥ टीका. संजय धृतराष्ट्रसे कहते भये कि, हे राजन्, शत्रुनको संतापित गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. करनेवाला औ निद्राके भी जीतनेवाला ऐसा जो अर्जुन सो हपीकेश याने इंद्रियों के प्रेरक ऐसे कृष्णसे पूर्वोक्त वाक्य बोलि- के औ प्रसिद्ध जैसे होय तैसे याने सबके सुनते बोला कि, मै युद्ध न करौंगा, ऐसे गोविंद याने समस्त इंद्रियों के अंतर्यामिक- प्णसे कहिके चुपहोकर बैठ रहा. इस श्लोकमें संजयने हृषीकेश पदसे तौ जनाया कि, सबकी इंद्रियों के प्रेरक कृष्ण हैं, सो अर्जु- नके पक्षपर हैं औ अर्जुनके विशेपण परंतप औ गुडाकेश कहने- में यह देखाया कि, अर्जुन शत्रुनका संतापित करनेवाला औ निद्रा जित है. तुह्मारे पुत्र प्रालसी हैं इसवास्ते अर्जुनही जान- गा. गोविंदपदसे यह जनाया कि, सबकी इंद्रियोंके अंतर्यामि कृष्णहै सो तुह्मारे पुत्रौंके मनके पापकोभी जानते है. इसवास्ते धर्मक्षेत्रमे पापीका नाशही करेंगे. ॥ ९ ॥ मूलम. तमुवाचहृषीकेशःप्रहसन्निवभारत ॥ सेनयोरु भयोर्मध्येविषीदंतमिदंवचः॥ १०॥ अन्वयः हे भारत उभयो सेनयोःमध्ये विषीदंतं तं प्रहसन्निव ह- पीकेशः इदं वक्ष्यमाणं वचः उवाच ॥ १० ॥ टीका. हे भारत, याने हे इतराष्ट्र, दोनों सेनौके मध्यमे विषादको प्राप्त हो रहे है, ऐसे अर्जुनको हसतेसरिखे याने लजित करते हुवे श्रीकृष्ण भगवान् ये जो अगाडी कहेंगे सो वाक्य बोलत भ- ये.याने आत्मा श्री परमात्माका यथार्थज्ञान और उसके प्रा- प्तिका उपायरूप जो कर्मयोग औ भक्तियोग युक्तवाक्य नत्वे वाहं जातुनासं, इहांसे लेके अहंत्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्या मि माशुच ॥ इसपर्यंत वाक्य बोलते भये. ॥ १० ॥ . . ४ २६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. श्रीभगवानुवाच॥अशोच्यानन्वशोचस्त्वंप्रज्ञावादां श्वभाषसे।गतासूनगतासुंश्चनानुशोचंतिपंडिताः॥ ११ अन्वयः श्रीभगवानुवाच ॥ त्वं अशोच्यान अन्वशोचःच प्रज्ञावादा न भापसेपंडिताः गतासून च अगतासून न अनुशोचंति११ टीका. इसश्लोकका एक प्राचार्य ऐसाअर्थ कहते हैं कि,देह औआ- स्माके विवेकसे इसको शोक है उस विवेकके देखानेके वास्तेभ गंवान् बोले कि,तुम जो नहिशोचनेयोग्य वधुतिनका शोककरते हौ कि,इनॅस्वजनोंको देखिके मेरे गात्र शिथिल होते हैं.इत्यादि करिके तहां तुमको ऐसे विषम स्थानमें शोकक्यौं उत्पन्नभयाइ- त्यादि वाक्यों करिके.ज्ञानभी दिया तौभी प्रज्ञावाद यानेहम भीष्मको कैसे मारेंगे?एसे पंडितोंके सदृश केवल बोलतें हौं परंतु पंडित नहीं हो क्योंकि मरे हुवे बंधुनको औ'जीवतेनकोभी पं. डित लोग शोच नहीं करते हैं, याने मरे हुयेनका तौ मरनेका शो कौनीवते बंधुनविना कैसे जीवैगऐसे शोक नही करते हैं, यह एक आचार्यरत अर्थ. अब दूसरे सिद्धांती कत अर्थ लिखते हैं श्रीकृष्णने देखा कि, इस अर्जुनको धर्म श्री अधर्मका ज्ञान नहीं है इसवास्ते यह धर्मको अधर्म औ अधर्मको धर्म मानिरहा हैं. औ धर्म जानने की इच्छा करता है, तो इसकामोह नाश करना चाहिये. सोमोह भात्मदर्शन विना नष्ट होनेका नही,औज्ञान विना आत्मदर्शन होनेका नहीं. औ निष्काम कर्म विना ज्ञानहो नेका नही.सोनिष्काम कर्म अध्यात्मशास्त्र विना होनेकानही. अध्यात्मशास्त्र कहते हैं देह औ भात्माके विवेकको ऐसाविचा- रिके भगवान बोले कि, हे अर्जुन.तुमशोचनेयोग्य नहीं.तिनका गीतावास्यार्थवोधिनी भाषाटीका. तौ शोक करते हो औ बातें पंडितसदृश वोलते ही जैसे कि हमारे पितर श्राद्धतर्पण न होनेके स्वर्गसे पडेंगे.सो यह स्वर्ग की प्राप्ति औ पडना श्राहादिक होने न होनेके स्वाधीन न- ही हैं क्यों कि, यकृत पुण्यपापके स्वाधीन हैं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके विशति इत्यादिक प्रमाणसे वै पुण्य पाप आत्माके स्वाधीन है,कच्छ केवल देहके स्वाधीन नहीं हैं, यद्यपि पुत्रादि कृत श्रादादिकका पुण्यभी मिलता है क्यों कि, वैभी देह औ आत्माके संयोगहीसे हैं, परंतु श्राद्ध न होनेसे स्वर्गसै पात होनेका संभव तो कोईभी कालमें नही है. यह देह नित्य नाशवान औ आत्मा नित्य एक रस है. इसी लिएगतातु देह औ अगतासुआत्मा हैं. ये दोनौशोचने योग्य नही. नासतोवि द्यतेभावोनाभावोविद्यतेऽसतःइत्यादिप्रमाणोंसे ऐसासमुझिके पंडितजन शोक नहीकरते हैं, इसवास्ते तुमको भी यह योग्य नहीं है, कि मैं इनसे युद्ध न करौंगा औ भीख मागाँगा इस कहनेसे यह जानते है कि, तुम देहका स्वभाव औ देहातिरिक्त आत्माको भी नही जानते है, यह आत्माऐसा नहीं कि जन्म- नेसे है औमरनेसे नही जन्मता औमरता यह देह है इसवास्ते इन दोनौका शोक न करना चाहिये, श्री यह युद्धादिक कर्म- निष्काम करनेसे अात्मस्वरूप देखाने वाला है. स्वे स्वे कर्म- ण्यभिरतः सिद्धिं विंदति मानवाः इत्यादि वाक्य प्रमाणसे युद्ध करौ यह अभिप्राय है. ॥ ११ ॥ • मूलम. नत्वेवाहंजातुनासंनत्यनेमेजनाधिपाः ॥ नचैवन भविष्यामःसर्वेवयमतःपरम् ॥ १२॥ अन्वयः गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका, इतः पूर्व अहं जातु न प्रासं अपितु आसं एव त्वं न आसीः अपितु आसीः एव इमे जनाधिपाः न आसन अपितु आसन एव अतः परं सर्ववयं किंन भविष्यामः अपितु भविष्याम एव ।। १२ ॥ टीका. श्रीकृष्ण कहते है कि, हे अर्जुन, प्रथम प्रात्मनका स्वभाव तुम सुनौ.मै सर्वेश्वर इस कालसे पूर्व अनादि कालमे क्या न . था ऐसा नही मै जबभी था औक्या नुमनथेयों नही तुह्मीथे ऐसेही ये सर्व राजा न थे अर्थात् थे औ इस कालसे अनंतर याने इसको वाद हमतुम भी ये सर्व क्या न होयँगे अर्थात् हो यहींगे.इहाँ यह अभिप्राय है कि जैसे मै सर्वेश्वर नित्य हौं.तैसे तुम सर्व क्षेत्रज्ञ नित्य हो इहाँएक सिद्धांती कहते हैं कि हम तुम भौ यै ऐसा कहनेमे दीखताहैकि, अत्मा औ परमात्माका भेद पारमार्थिक है इसीसे भगवानहीने कहा है क्योंकि अज्ञानसे मो. हे भये अर्जुनके मोहनिवृत्ति के लिये पारमार्थिकही उपदेशका संभव है जो कि औपादिक भेद होता ती तत्त्व उपदेशके समय- मे यह भेद न उपदेश करते इसवास्ते श्रीकृष्णने जो भेद कहा सोई सत्य है और श्रुतिभी कहती है तथाच श्रुतिः ॥ नित्यो नि त्यानां चेतनश्चेतनानामेकोबहूनां योविदधाति कामानिति श्रु- 'तिका अर्थ लोबहुतनित्यचेतन हैं तिनका जो एक नित्यचेतन है सोफामना पूरण करता है.जो कोई कहैकि भेद अज्ञान कृतहै तो यह उत्तरहै कि, परमार्य दृष्टिके अधिष्ठाताओ आत्मयाथा- म्पसे नित्यही निवृत्त है अज्ञान जिनका ऐसे जो नित्य स्वरूप परम पुरुष श्रीकृष्ण तिनके विषे अज्ञानकृतभेद दर्शनका कार्य कैसे संभव?तहाभी कोई कहै कि श्रीकृष्णभी अज्ञ है तो उत्तरहे कि,मज्ञका उपदेश भी प्रमाण नहीं जब कोई कहै कि श्रीकृष्णने गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. अभेद निश्चय कियाहै इसवास्ते बाधितानुवृत्ति यह भेदज्ञान रूप अल्पज्ञता जलेहुये वस्त्रतुल्यबंधनकारक नहीं है. तबउत्तर यह है कि, मरीचिकांजल याने मृगतृष्णाजल सो वाधितानुत्ति उसके जाननेवाला उसमेजल लेनेक्यों जायगा जो गया तो अज्ञहै ऐसेही जोभेद मिथ्या है औगीताशास्त्रमे उपदेश करते हैं तो यहशास्त्र औ उपदेशकारकभी अप्रमाण है औ भेदविना उ पदेशकाभी संभव नहीं, मौ परमेश्वरमे यहभी संभव नहीं है कि प्रथम अज्ञथे शास्त्र अध्ययनसे ज्ञान भया जिसको शास्त्रा- ध्ययनसे ज्ञान होताहै उसको कोई कोई कालमे अज्ञानभी हो- ताहै यह संभवभी श्रीकृष्णमे नहीं है,तथाच श्रुतिःयःसर्वज्ञः स- वित् पराऽस्यशक्तिर्विविधैवश्रूयतेस्वाभाविकीज्ञानवलक्रिया- च वेदाहं समतीतानि वर्तमानानिचार्जुन।भविष्याणिच भूता. निमातु वेदन कश्चन।इत्यादि करिके भेदहीप्रतीत होताहे भेद- विना उपदेश किसको करै तहां कोई कहै कि अर्जुन कृष्णका प्रतिबिंब है सोआपको आपही कहते हैं तहां समुझना चाहिये कि,मणि काच इत्यादिकौंमे श्रापका प्रतिबिंब देखिके सेवायउ न्मत्त याने दिवाने विना कोईभी न वातेकरेंगा औ जो करे सोउन्मत्त इसवास्ते उसके वाक्यौंकाभी प्रमाणनही, जिसको गुरुपरंपरासेभी अभेदज्ञान होयगा उसकोभी उपदेश करनेका संभव नहीं हो सकता. इसवास्ते शिष्यको उपदेश देनेका प्र- योजन नहीं.जो कहै कि गुरु और ज्ञान कल्पित है देनेका शिष्य और ज्ञान भी कल्पित हुपातौभी उपदेश निष्प्रयोजन है. इ- सवास्ते भेदही सिद्ध है यह निश्चय होता है. ॥ १२॥ मूलम्- देहिनोस्मिन्यथादेहेकौमारंयौवनंजरा ॥ - ३० गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका, तथादेहांतरप्राप्तिर्धारस्तत्रनमुह्यति ॥ १३॥ अन्वयः यथास्मिन् देहेदेहिनःकौमारं यौवनंजरा भवंतितधा देहांतरप्राप्तिः भवति तत्र धीरः,न मुह्यति ॥ १३ ॥ टीका. 1 . । जैसे इस देहमें जीवकी कुमारअवस्था, यौवन अवस्था औ वृद्धावस्था, होती हैं याने कुमार अवस्था नष्ट व्है के यौवन नष्ट होनेसे बद्ध ऐसेही यह देह नष्ट भया दूसरा मिलेगा; तहां स्थिर बुद्दी वाले धीर पुरुष शोक नहीं करते हैं तहां भगवान- का अभिप्राय यह है कि, शास्त्रीय स्ववर्ण के उचित युद्ध करौ. १३ मूलम्. मात्रास्पर्शास्तुकौंतेयशीतोष्णसुखदुःखदाः॥ आगमापायिनोनित्यास्तास्तितिक्षस्वभारत ॥१४॥ यहिनव्यथंत्येतेपुरुषपुरुपर्पभ । सम दुःखसुखंधीरंसोऽमृतत्वायकल्पते ॥१५॥ अन्वयः हे कौतेय मात्रास्पाः तु शीतोष्णसुखदुःखदाः संतिहे भारत ते आगमापायिनः अनित्याः तान् तितिक्षस्व ॥ ११॥ हे पुरुपर्पभ समदुःखसुखं यं धीरं पॅरुपं हि ए- ते न व्यथयति सः पुरुषः अमृतत्वाय कल्पते ॥१५॥ टीका. हे कुंतिके पुत्र!मात्रा कहिये इंद्रिय तिनके स्पर्श शब्द स्पर्श रूपादिक ये शीत उष्ण याने मृदु परुपादिक शब्द शीतोष्णश स्वादिप्रहार संयोग वियोगादिक दुःख के देनेवाले हैं, तौभी हे भारत, याने तुम भरतवंशी है. ये आगमापायी याने होते ३१ : गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका, औ नाते हैं, अर्थात् इनके किये हुये सुखदुःख होते औ जाते भी हैं, इसवास्ते यै अनित्य हैं इनको सहन करौ।। १४ ॥ हे पुरुष श्रेष्ठ सुख श्री दुःख समान हैं जिसके ऐसे जिस धीर पुरुपको ये पीडित नहीं करिसकत हैं सो मोक्षको प्राप्त होता है. ॥१५॥ मूलम्. नाऽसतोविद्यतेभावोनाऽभावोविद्यतेसतः॥ । उभयोरपिदृष्ट संस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥१६॥ अन्वयः असतःभावान विद्यते सतः अभावःनविद्यते तत्त्वदर्शिभिः अनयोः उभयोः अपि अंतः दृष्टः ॥ १६ ॥ टीका. जो आत्मनकानित्यत्व स्वाभाविक औदेहौंका नाशित्वभी अशोकनिमित्तं कहा गतासूनगतातूंश्चनानुशोचंतिपंडिताः।इ- सवाक्य करिके सो अबस्पष्ट दर्शाते हैं .नासत इत्यादि करिके असत जो शरीर है उसका सद्भाव नहीं होता है. सत् जो श्रा- त्मातिसका असद्भाव नही ऐसे देह औात्माइन दोनौंका त- त्वज्ञानी पुरुपौने निर्णय करि देखा है. देह अचिवस्तु है इसका असत् स्वरूप है आत्मा चेतन है इसका सत् स्वरूप है ऐसा नि र्णय किया है सोई यही अर्थअगाडिके श्लोकोंमे स्पष्ट करेंगे.अ. विनाशितु तद्विद्धि औ अंतवंतइमेदेहा इन श्लोकोंकरिके।॥१६॥ मूलम्. अविनाशितुतद्विद्धियेनसर्वमिदंततम् ॥ विनाश मव्ययस्यास्यनकश्चित्कर्तुमर्हसि ॥१७॥ अंत ति वंतइमेदेहानित्यस्योक्ताशरीरिणः॥ अनाशिनो ऽप्रमेयस्यतस्मायूट्यस्वभारत ॥ १८ ॥ -
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
अन्वयः
येन इदं सर्व ततं तत् अविनाशि विदि अस्य अव्यय
स्य विनाशं कर्तुं कश्चित् न अर्हति ॥ १७॥ अनाशिनः
अप्रमेयस्य नित्यस्य शरीरिणः इमेदेहाः अंतवंतः उक्ताः
हे भारत तस्मात् युधस्थ ॥१८॥
टीका
आत्मका अविनाशित्व कैसे है सो कहते हैं, जिस पात्मत्व /
करिके यह सर्व अचेतन तत्व व्याप्त है वही आत्मतत्वको अ-
विनाशि जानौ,जोव्यापफ वस्तु होता है सोअति सूक्ष्म होता
है,उसको दूसरा कोईभी नही नाश करि सकता है. और जिसमे
व्याप्त होता है उसको शस्त्र मुद्दारादिक धायु उत्पन्न कारके नाश
करिसकते हैं.इसवास्ते भात्मतत्व अविनाशि है क्यों कि अ.
व्यय है अर्थात् घटता बढता नहीं. ॥१७॥नाशरहित औ प्र.
माणरहित नित्य ऐसाजोशरीरांतर्यामि प्रात्मा तिसके जो यै
देह हैं ये ही नाशवान हैं, क्यों कि,यै देह घटते वढते हैं जो घटे
बढ़ेगा उसका नाशभी होयगा भी यह अप्रमेय हैं अर्थात् अ
चित इसका प्रमाण नहीं करिसकता और अचितका यह जान
नेवाला है-तेरहवे अध्यायमे कहेंगे,एतद्योवेत्तितं प्राहुः क्षेत्रज्ञमि
तितहिदायह आत्मा देहकेवढने घटनेसेवढता घटता नहीं औ
नानता है जैसे कि इस देहको मै जानता हो ऐसे देहसे यह मा
तमा अन्य प्रतीत होता है औएकरस है नित्य है इसवास्ते भा
त्माकोश्नविनाशीऔ देहनाशवान है.यै दोनोंशोचनेयोग्यन.
ही इसवास्ते शस्त्रपातपरुष वाक्यादिकस्पर्श आपमे अथवा दू-
सरोंमप्राप्त भयौंको धीरज करिके सहन करी औ मोक्षसाधन
फलानुसंधानरहित युदरूप आपका कर्म प्रारंभ करौ.॥१८॥
३ . गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ३३ मूलम. यएनवेत्तिहंतारंयथैनंमन्यतेहतम् ॥ उभौतौनविजानीतौनायहतिनहन्यते ॥१९॥ अन्वयः यः एनं हंतारं वेत्ति च यः एनं हतं मन्यते तो उभौ न विजानीत. अयं न हंति न हन्यते ॥ १९ ॥ टीका. जो इस आत्माको मारनेवाला करिके जानता है, औ जो इसके दूसरे कारणों करिके मरा जाता है, वै दोनों अज्ञानी है. यह आत्मा न मारता है न मरता है. जीना मरना शरीरसं- योग औ वियोगका नाम है. ब्राह्मण हिंसादिक न करनेका मतलब यह है कि, उत्तम शरीर बडे पुण्यसे मिलता है, इ- सवास्ते वियोग न करना. ॥ १९॥ मूलम्. नजायतेम्रियतेवाकदाचिन्नायंभूत्वाभवितावा नभूयः ॥ अजोनित्यःशाश्वतोऽयंपुराणोनह न्यतेसैन्यमानेशरीरे ॥२०॥ अन्वयः अयं आत्मा कदाचित् न जायते वा न म्रियते न भू- त्वा वा भूयः न भविता अयं अजःनित्यः शाश्वतः पु. राणः शरीरे हन्यमाने न हन्यते ॥ २० ॥ टीका. यह प्रात्मा कोई कालमेंभी न जन्मता है न मरता मो न भंया है न फिर होगा, इसवास्ते यह अजन्मा है, श्री नित्य नाम एकरस है. शाश्वत सदा रहने वाला हे पुरा.
S . गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, प अर्थात् पहिलेभी ऐसाही था, इन कारणों से शरीर नष्ट होनेसेभी यह मरता नहीं.॥२॥ मूलम. वेदाविनाशिनंनित्यंयएनमजमव्ययम् ।। कथंसपुरुपःपार्थकंघातयतिहतिकम् ॥२१॥ अन्वयः यः एनं अजं अव्ययं नित्यं अविनाशिनं वेद हे पार्थ सः पुरुषः ककथं घातयति के कयं हतिः ॥ २१॥ टीका, जो पुरुप इस आत्माको अजन्मा अविकारी नित्य एक- रस नाशरहित जानता है. हे अर्जुन लो पुरुष किसको औ कैसे मरवावै, तथा किसको कैसे मारता है, अर्थात इनको मै मरवाचौंगा अथवा मारौंगा, यह शौच करना अनात्मज्ञान है, इसलिये शोक त्यागिके युद्ध करौ. ॥ २१ ॥ मूलमे. वासांसिजीर्णानियथाविहायनवानिगृण्हातिन रोऽपराणि ॥ तथाशरीराणिविहायजीणीन्य न्यानिसंयातिनवानिदेही ॥२२॥ अन्वयः यथा जीर्णानि चासांसि विहाय नरः अपराणि नवा. नि गृहाति तथा जीर्णानि देहानि विहाय देही अ. न्यानि नवानि संयाति ॥२२॥ टीका, । पद्यपि शरीरनाश होनेसे आत्माका नाशनहीं तथापिशरी- र वियोगका ती शोच करनाही चाहिये, ऐसा अर्जुनका अभि- ।
. गीतांवाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ३५ प्राय समुझिके श्रीकृष्ण कहते हैं कि, जैसे जीर्णवस्त्रौंका त्याग करिके मनुष्यको नवीन वस्त्र गृहण करता है, तैसेही जीर्णदेह- को त्यागिक यह जीव और नई देहको प्राप्त होता है. अर्थात् धर्मयुद्धमे शरीर त्यागनेसे मोक्ष अथवा दिव्य देवशरीरकी प्रा- प्ति होती है. इसवास्ते शोकका कारण नहीं है. ॥ २२ ॥ मूलम्. नैनंछिंदंतिशस्त्राणिनैनंदहतिपावकः ॥ नचैनक्के दयंत्यापोनशोषयतिमारुतः ॥२३॥ अच्छेद्योऽ यमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोप्यएवच ॥ नित्यःसर्व गतःस्थाणुरचलोऽयंसनातनः॥२४॥ अव्यक्तो यमचिंत्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ॥ तस्मादेवं विदित्वैनंनानुशोचितुमर्हसि ॥२५॥ अन्वयः शस्त्राणि एनं नछिंदति च पावकः एनं न दहतिच आपः एनं न छेदयंति च मारुतःएनं न शोपयति ॥२३॥ अतः अयं अञ्छेद्यः अयं अदाह्य अयं अक्केद्यः च अयं अशो. पएव अयं नित्यः सर्वगतःस्थाणुः अंचलः सनातनः ॥ ॥२४॥ अयं अव्यक्तः अचिंत्यः अयं अविकार्यः उच्य- ते तस्मात् एनं एवं विदित्वा अनुशोचितुंन अर्हसि ॥२५.. टीका. अविनाशितुतदिद्धि येन सर्वमिदंतायह वाक्य जो प्रम कहाथा उसी अविनाशित्वको सुरवसे तमुझनेको फिरिभी दृढ़ करते हैं,शस्त्र इसको छेदन नहीं करते हैं. अग्नि जलाता नहीं.ज लभि जोता नहीं.पवनमुखाता नहीं. इस कारणसो यह छदने योग्य नहीं, जलाने योग्य नहीं. भीजने योग्य नहींऔ सुरखने
गीतांवाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका:
योग्य भी नहीं. इसीसे नित्य है सर्व देव मनुष्यादि शरीरौंमें
व्यापक है, स्थिर स्वभाव अचल औ सनातन है;अति सू.
धमत्वसे प्रगट दिखाता नहीं औ चितवन करने मेंभी आता
नहीं औ विकाररहित है, इसवास्ते. इसको ऐसा जानिके
तुम शोच करने योग्य नहीं हौं ॥ २४-५
मूलम.
अथचैनंनित्यजातंनित्यंचामन्यसेमृतम् । तथा ।
पित्वमहावाहोनैनंशोचितुमर्हसि ॥ २६॥ जा.
तस्यहिध्रुवोमृत्युध्रुवंजन्ममृतस्यच ॥ तस्माद
परिहाय्यर्थेनत्वंशोचितुमर्हसि ॥२७॥
" अन्वयः
हे महावाहो अथ एनं नित्यजातं वा नित्यं मृतं मन्यसे
तथापि त्वं एनं शोचितुंन अर्हसि ॥,२६ ॥ जातस्य हि
मृत्यःध्रुवःच मृतस्य जन्म ध्रुवं तस्मात् अपरिहाय्यर्थे
त्वं शोचितुं नअर्हसि ॥ २७॥..
'टीका.
भगवान अर्जुनको कहते भये कि, हे महाबाहो, जो तुम इस
श्रात्माको नित्य जन्मा अथवा नित्यं मराही समुझौंगे तौभी
शोच न करना चाहिये, कारण कि,जन्ममरणभी अनिवार्य हैं.
॥२६॥जैसे किंजो जन्माहै उसकामृत्यु निश्चय हैं औमरेकाज-
न्मभीनिश्चय है,इसवास्तेजिसका परिहारनहीं उसका शोचभी
न करना चाहिये,सातुमभीशोच नफरौ.॥२७॥
मूलम्.
अव्यक्तादीनिभूतानिव्यक्तमध्यानिभारतः॥ आ
व्यक्तनिधनान्येवतत्रकापरिदेवना ॥२८॥
३७ गातावाक्याथवाधेिना-भापाटाका. हे:भारत भूतानि अव्यक्तादीनि व्यक्तमध्यानि अव्य- तनिधनानिः एव तत्र परिदेवना का-॥२८॥ टीका::-.:.:. विद्यमान द्रव्यकी प्रथम अवस्थाकी विरोधी अवस्थातर प्राप्ति देखनेसे जो अति अल्प शोक है उसकाभी मनुष्यादिकों- में शोकका संभव नहीं तो कहते हैं: हे भारत, भरतवंशोत्पन्न अर्जुन!मनुष्यांदिक भूत हैं, तौभी जन्मसे प्रथम दीखते नथे श्री जन्मसे पीछे मरणके आदि ऐसेंमध्यमे दीरखते हैं. फिरी अंतमें। भी नहीं दीखते हैं, तहां शोच क्यों करना चाहिये?॥ २९ ॥ मूलम्..... :: आश्चर्यवत्पश्यतिकश्चिदेनेमाश्चर्यवद्वदतितथैव चान्यः ।। आश्चर्यवच्चैनमन्यःशृणोतिश्रुत्वाप्ये नंवेदनचैवकश्चित् ॥ २९ ॥ अंन्वयः कश्चित् एनं आश्चर्यवत् पश्यति च तथा एव अन्याया- श्वर्यवत् वदति च अन्यः एनं आश्चर्यवत् शृणोति च क. श्चित् एनं श्रुत्वा अपि एवं न वेद ॥ २९ ॥ टीका.. शरीरहीको आत्मा समुझे तौभी शोककाकारणनहीं ऐसा कहा. और शरीरसे पृथक् जो आत्मा तिसके विपे द्रष्टा,वक्ता,श्रोताऔ सुनिके जाननेवालाभी दुर्लभ है,सो कहते हैं. पूर्वकहे लक्षणयुक्त समस्तसे विलक्षण जो आत्माइसको कोई एक बडे तपसे जि- सके पाप नष्ट भये होय औ पुण्य वढा होय ऐसा मनुष्य प्रा- श्चर्य सदृश देखता है. तैसाही और मनुष्य नाश्चर्य सदृश कह- गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ता है औतैसाही और पुरुष इसको आश्चर्य सरीखा सुनता है औ कोई एक मनुष्य सुनिकभी निश्चै जानता नहीं, अर्थात् इस आत्मस्वरूपका निश्चय देखना कहना सुनना औं जाननाभी दुर्लभ है यह,कहा. ॥२९॥ मूलम. 'देहीनित्यमवध्योऽयंदेहेसर्वस्यभारत ॥ तस्मा: सर्वाणिभूतानिनत्वंशोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥... अन्वयः हे भारत सर्वस्यदेहे अयं देही नित्यं अवध्यः तस्मात् , त्वं सर्वाणि भूतानि शोचितुं न अर्हसि ॥ ३० ॥ टीका. सर्व देवादिक चराचर शरीरोंमे यह जीव अवध्य है, अर्थात् उन देहोंके नष्ट होने से इसका नाश नहीं होता है, इसवास्ते इन सर्व भीष्मादिकौंका शोच.करना तुमको योग्य नहीं है: ॥३०॥ मूलम्. स्वधर्ममपिचावेक्ष्यनविकंपितुमर्हसि ॥ धा द्वियुद्धाच्छेयोऽन्यत्क्षत्रियस्यनविद्यते ॥ ३१॥'. अंन्वयः स्वधर्म अपि अवेक्ष्य त्वं विकॅपितुं न अर्हसि क्षत्रियस्य" धात् युद्धात् अन्यत् श्रेयः ही न विद्यते ॥ ३१ ॥ टीका. जो यह वर्तमान युद्ध प्राणि हिंसायुक्त है तौभी अनिष्टोम श्रादि यज्ञ सदृश तुह्मारा स्वधर्म है; इसकोजानिकेभीतुमको द- यान करमा चाहिये.क्योंकि,क्षत्रियको धर्म युदके सेवाय दूस- राउपाय कल्याणकारक नहीं है जैसे मनिष्टोम यज्ञमें जोछाग ३९ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मारा जाताहै उसको तुच्छ छागदेह छूटिके देवशरीर मिलताहै इसीवास्ते उसयज्ञमें ब्राह्मणकोछागमारनेकादोपन देखनाचा- हिये उसमे पुण्यही है- ऐसेही युद्धमे जोशस्त्रलेके सन्मुख आय केलडै उसपर शस्त्र चलानेका दोप नहीं,क्यों कि,शास्त्रवाक्य है श्लोक ॥ द्वाविमापुरुपौलोकेसूर्यमंडलभेदिनौ । यःसन्नाड्योगयु 'क्तश्चरणेचापिमुखेहतः॥१॥ इसका अर्थदोपुरुष मूर्यमंडलभेदन करिकेश्रेष्ठपदको प्राप्त होते है, एकयोगयुक्तसंन्यासी, दूसराजो रणमें सन्मुख युद्ध करिके मरताहै,सो जवकी मनुष्य शरीरसे छूटिके दिव्यागतीको प्राप्तहुआ, तवउसकर्ममेपापनहीं, पुण्य होहै. जैसेकिसीकी फटीकमली उतारिली औ दुसाला, ओढा- या तब वह कार्य श्रेष्ठहै वा नीच है सो विचारिके युद्ध करौ३१ मूलम्.. यदृच्छयाचोपपन्नंस्वर्गद्वारमपातम्॥ सुखिनःक्षत्रियाःपार्थलभंतेयुद्धमीदृशम्॥ ३२॥ हे पार्थ यदृच्छया उपपनं च.अपावृतं स्वर्गद्वारं ईदृश युद्धं सुखिनः क्षत्रियाः लभते ॥ ३२ ॥ टीका. हे पृथापत्र, आपहीसे यत्नविना प्राप्त भया औ खुला भ. या स्वर्गका द्वार रूप ऐसा युद्ध सुखी अर्थात् पुण्यवान क्ष- त्रिय पावते है. ॥ ३२॥ मूलम. अथचेत्वमिमंधर्व्यसंग्रामनकरिष्यासि ॥ ततः स्वधर्मकीर्तिचहित्वापापमवाप्स्यसि ॥३३॥ सीर्तिचापिभतानिकथयिष्यंतितेऽव्ययाम ॥ अन्वयः - ४० गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका, संभावितस्यचाकीर्तिमरणादतिरिच्यते ॥ ३४॥ प्रन्चयः अब चेत त्वं इमध संग्रामनकरिष्यसि ततः स्वध मैच कीर्ति हित्वा पापं अवाप्स्यसि च भूतानि ते अव्य- .यां अकीर्ति कथायिप्पंति चसंभावितस्य अकीर्तिः म- रणात् अतिरिच्यते ॥ ३४ ॥ टीका. जो कदाचित् तुम यह धर्मयुद्ध न करोंगे तो स्वधर्म औ कीर्तिकाभी नाश करिके पापको प्राप्त होउगे: और लोकभी तुह्मारी अखंड अकीर्तिवर्णनकरेंगे, सो अकीर्तिश्रेष्ठ श्री यश- वाले पुरुपको भरणेसेभी अधिक है. ॥ ३४ ॥ मूलम्. भयाद्रणांदुपरमिंस्यंतेत्वांमहारथाः॥येपांचत्वं बहुमतोभूत्वायास्यसिलाघवम् ॥ ३५॥ अवा- च्यवादाश्चवहुन्वदिष्यंतितवाहिताः ॥ निंदंत- स्तवसामर्थ्यततोदुःखतरंनुकिम् ॥ ३६॥ येपा त्वं बहुमतः भूत्वा तेपां लाघवं यास्यसि तेच म- हारथाः त्वां भयात् रणात उपरत मंस्यंते अंतः तव अ- हिताः तव सामथ्र्य निंदतः संतः बटून अवाच्यवादान वदिष्यति ततः किंनु दुःखतरं अस्ति ॥ ३६ ॥ टीका. अहो! जो मै बंधुजनौंके स्नेह औ करुणासे युद्ध न करौंगा, तो मेरी अकीर्ति कैसी होयगी?ऐसा अर्जुनका अभिप्राय समुः झिके श्रीकृष्ण भगवान कहने लगे कि, जिन कर्ण; दुर्योधनादिक अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ११ महारथियौंके इस कालसे प्रथम शूर वैरी ऐसे बहु मान्यथे तिनहीके अव युद्ध नकरनेसे अपमान योग्य होउगे, वेही महा- रथी तुमको भयसे युद्ध न किया, ऐसे मानेंगे इसी कारणसे ये जो दुर्योधनादिक तुह्मारे शत्रु तुह्मारी समर्थताको निंदते भये न बोलनेके वाक्य बोलेंगे; अर्थात कहेंगे कि अर्जुनकी सामर्थ्य कुछ सूर वीरोंके सन्मुख नहीं है. केवल शोभाके वास्ते शस्त्र धा- रण करता है, जैसे स्त्रियोंके आभूपणमें सिंह औसपीदिक चि- त्रित होते हैं औ वै पहिरती हैं, परंतु साक्षात् सिंह सदिक दे- खनेसेही प्राण त्यागेंगी ऐसेही अर्जुनके धनुष्यादिक शस्त्र हैं. जब ऐसे वे बोलेंगे तब इससे अधिक दुःख कौनसा है, अर्थात् इस दुःखसे मरणाही श्रेष्ठ मानौंगे. ॥ ३६ ॥ मूलम्. हतोवाप्राप्स्यसिस्वर्गजित्वावाभोक्ष्यसेमहीं ॥ तस्मादुत्तिष्टकौंतेययुद्धायकृतनिश्चयः ॥ ३७॥ सुखदुःखेसमेकृत्वालाभालाभौजयाजयौ ॥ ततोयुद्धाययुज्यस्वनैवंपापमवाप्स्यसि ॥ ३८॥ अन्वयः हे कौंतेय हतः वा स्वर्ग प्राप्स्यसि जित्वा वा महीं भो क्ष्यसे तस्मात् युद्धाय कृतनिश्चयः सन् उत्तिष्ठ ।। ३७ ।। सुखदुःवे समेकृत्वा लाभालाभौ जयाजयो समौरुत्वा ततः युद्धाययुज्यस्व एवं पापं न अवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥ टीका. उस निंदाके दुःरयसे शूरवीरको युद्धमें अन्यसे मारना अथवा औरको मारना यही श्रेष्ठ हैं, ऐसा श्रीकृष्ण कहते हैं,कि धर्मयु- दमें जो दस के मारनेसे मरोगे तो मोक्ष मिलेगा.औ जो दू-
गीतावाक्यार्यवोधिनी भापाटीका.
सरे शत्रुनको मारोगे तो पृथ्वीका अकंटक राज्य भोगेगे.तिस
वास्ते हे कुंतीपुत्र! तुम युद्धका निश्रय करिके उठी, और सुख-
दुःख लाभ अलाम जय अजय इनको समान मानिके फिरी
युद्धका उद्योग करो, इस प्रकारसे पाप न होयगा.जो फलानुसं-
धान रहित युद्धरूपस्वधर्म करोगे तो मोक्षही होयगा. स्वेस्वेकर्म-
ण्यंभिरत सिन्दिविंदतिमानवःइस प्रमाणसे मोक्षही होयगा३०
एपातेऽभिहितासांख्येवुद्धियोगेविमांशृणु ॥
बुद्ध्यायुक्तोयथापाईकर्मवंधंप्रहास्यसि ॥३९॥
अन्वयः
हे पार्थ एपा बुद्धिाते सांरव्ये अभिहिता योगेतु इमां -
णु यया बुद्धयायुक्तः त्वं कर्मबंध प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥
टीका.
ऐसे आत्मस्वरूप उपदेश करिके अव उस आत्मस्वरूपज्ञा-
नपूर्वक मोक्ष साधनभूत कर्मयोग कहनेको प्रारंभ करते हैं. हे
प्रयापुत्र यह बुद्धि मैने तुमको सारंव्यविषयमे कही भर्थात् आ
त्म अनात्म विवेक विषयमें कही अब इसी बुद्धिको तुम यो-
T अर्थात् कर्म योग विषयमे सुनौ जिस बुद्धि करिके तुम क-
मबंध अर्थात् संसारदुःखको छोडोगे ॥ ३९ ॥
मूलम्.
नेहाभिकमनाशोस्तिप्रत्यवायोनविद्यते ॥.
स्वल्पमप्यस्यधर्मस्यत्रायतेमहतोभयात् ॥४०॥
अन्वयः
इह अभिक्रमनाशः न अस्ति प्रत्यवायः न विद्यते श्र-
स्य धर्मस्य स्वल्पं अपि महतः भयात् त्रायते ॥ १०॥
गातावाक्याथेबोधिनी भापाटीका. ४३ टीका, कहेंगे जोवुद्धियुक्त कर्मयोग तिसकामाहात्म्य कहते हैं, इसबु- द्धियुक्त कर्मयोगमे अर्थात निष्काम कर्मयोगमे प्रारंभकाभीना- श नहीं है, अर्थात् प्रारंभ करिके जो समाप्त नहोई तौभी वह निष्फल नहीं है, औन्यूनाधिकताकाभी दोपनहीं है. इस धर्मका थोडा आरंभ भी सांसारिक बडे भयसे, रक्षण करता है. पार्थ नैवेहनामुत्रविनाशस्तस्यविद्यते ऐसे अगाडी कहेंगे. ॥ १० ॥ मूलम.. व्यवसायात्मिकाबुद्धिरेकेहकुरुनंदन ॥ बहुशाखाह्यनंताश्चवुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥४१॥ अन्वयः हे कुरुनंदन व्यवसायात्मिका बुद्धिः एका च अव्यव सायिनां बुद्धयःबहुशाखाःच हि अनंताः संति ॥११॥ 'टीका. काम्य कर्म विषयिक बुद्धिसे मोक्ष साधन भूत बुद्धिको पृथक् देखाते हैं. इस शास्त्रीय स्वर्ग कर्ममे निश्चयात्मक बुद्धिएकहीं है. मुमक्षुके करने योग्य कर्ममे जो बुद्धिहै उसको व्यवसायात्मिका कहते हैं अर्थात् निश्चयात्मिकासो एकही है, इसमें आत्मस्वरूप निश्चय होताहै औ काम्य कर्म विषयिक बुद्धि अव्यवसायात्मि. का तहां कामाधिकारमें देहसे पृथक् आत्मस्वरूपका अस्तित्व- मात्र है; परंतु आत्मस्वरूपका यथार्थ निश्चय नही इस निश्चया- त्मक बुद्धिमे एक मोक्ष साधनही निमित्त सर्वकर्म हैं इसवास्ते एक है औ काम्यकर्म विपयिकमे स्वर्ग पुत्र पशु अन्न धन इत्यादिक अनेक कामना हैं इसवास्ते उन काम्य कर्मवालौकी बुद्धि अनेक हैं तहां भी एक कामना निमित्त कर्म करिके अनेक ११ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. फलौंकी इच्छा करते हैं जैसे कि पुत्र कामनासे यज्ञ करिके आ- युष्य इत्यादिकिभी इच्छा करते हैं इसवास्ते बहुशाखा अथात् उन बुद्धियोंमे भी शारखे हैं इसवास्ते मोक्षसाधन भूतही कर्मश्रे. ष्ठ है यह अभिप्राय, ॥११॥ मूलम्. यामिमांपुष्पितांवाचंप्रवदंत्यविपश्चितः ॥ वेद वादरताःपार्थनान्यदस्तीतिवादिनः॥४२॥ का' मात्मनःस्वर्गपराजन्मकर्मफलप्रदां ॥ क्रियावि शेपबहुलांभोंगैश्वर्यगतिप्रति ॥४३॥ भोगैश्वर्य प्रसक्तानांतयापहतचेतसां ॥ व्यवसायात्मिका बुद्धिःसमाधौनविधीयते ॥४४॥ अन्वयः' हेपार्थ! ये या इमांपुष्पिता वाचं प्रवदंति तेषां समाधौ व्यवसायात्मिकाबुद्धिानविधीयते किंभूतास्तेअविपश्चितः वेदवादरताः अन्यत्नअस्ति इतिवादिनः कामात्मानः स्वर्गपराः किंभूतांवाचं जन्मकर्मफलप्रदां भोगैश्वर्यगति प्रतिक्रियाविशेपबहुला कथंभूतानां तेषां भोगैश्वर्यप्रस तानां तयापत्तचेतसां ॥१३॥इतिखंडान्वयः ॥ अथ दंडान्वयः॥ ये अविपश्चिता वेदवादरताःअन्यतनअस्ति इतिवादिनः कामात्मनःस्वर्गपराः एवंभूताःयां पुष्पितां जन्मकर्मफलप्रदां भागैश्वर्यगति प्रतिक्रियाविशेषबहुला महावाचंवदंति भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापरहतचेतसा तेषां समाधौ व्यवसायात्मिकाबुद्धिःनविधीयते ॥४४॥ टीका. ने अज्ञानी केवल वेदवाद करनेवाले अर्थात् वेदमेस्वर्गा- गीताचाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. दिक फल ग्रहण करनेवाले स्वर्ग प्राप्तिके समान दूसरा पदा- र्थ नही ऐसे कहनेवाले कामनामे है चित्त जिनका औ आप- भी स्वर्ग ही को श्रेष्ठ माननेवाला ऐसे जो पुष्पमात्र रमणीय औ जन्म कर्मरूप फलदायक तथा भोग भो ऐश्वर्य निमित्त कि- या है बहुत जिसमें ऐसी इसवाणीको कहते हैं ऐसे भोग औऐ. श्वर्यमेआसक्त औ उसी वाणी करिके हरे गये हैं चित्त जिनके तिनके मनमें निश्चयात्मिक बुद्धि नहीं विधान होती है. ॥४४॥ मूलम. त्रैगुण्यविषयावेदानिस्त्रैगुण्योभवार्जुन ॥ निद्रो नित्यसत्वस्थोनिर्योगक्षेमआत्मवान् ॥४५॥ अन्वयः हे अर्जुन वेदा त्रैगुण्यविषयाःत्वं निस्वैगुण्यःनिः नि- त्यसत्वस्थः निर्योगक्षेमः आत्मवान्भव ॥ १५ ॥ टीका हजार हौ माता पितासेभी अधिक पालन करनेवाले वेद सौ वै ऐसे अत्यल्प फलदायक औ पुनःजन्मप्रद कोको क्यों कहते है औ वेदोदित कर्मका त्याग करना कैसे कहते हैं, इस पर भगवान कहते हैं कि, तीनिहूगुणजिनमें होय उनको त्रेगु- ण्य कहते हैं अर्थात् इसजगमे पुरुषवहुत्व है उनपुरुषनमे केत. नेक सत्वगुणी, केतनेक रजोगुणी औ केतनेक तमोगुणी हैं उन सौंके विषयनके बतानेवाले वेदही हैं तहा तुम निस्वैगुण्य हो अर्थात् रजोगुण तमोगुणोंको त्यागिके सात्विक होट.औ निर्दद याने सांसारिकसुख दुःखादिसे रहित होउ अर्थात् इनका सहन करौ औ नित्य सत्व गुणमें स्थित होउ, अर्थात् निष्कामकर्म करौ औ नियोगक्षेम याने अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिको योग्य कहते .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. औ प्राप्तकी रक्षाको क्षेम कहते हैं तुम उन दोनौकी इच्छा न. करौं औ आत्मस्वरूपके देखनेका उद्योग करौ दूसरा अर्थ घेदाः त्रैगुण्यविपयाः वेदतीनौ गुणों के प्रवर्त करनेवाले हैं, इसवास्ते हे अर्जुन! तुम निस्वैगुण्यहोउ याने निश्चैवैदिक कर्म करौ निस्- गुण्य शब्दके आदिमे जो निर भव्यय है उसका निश्चय अर्थभी होता है निर्निश्चय निषेधयोः ऐले अमरकोशका प्रमाण है तहां अर्जुन के शंका आईकि, वैदिक कर्मती अनेक मै कौनसे कर्म करौ तिसपर भगवान् बोले कि, निद हैके नित्य सात्विक कर्म करौ निद अर्थात् सुख दुःख लाभ अलाभ जय पराजय पाप पुण्य इत्यादिक समान मानिके सहन करते भये नित्य सत्वस्थ याने निष्काम कर्म करौ औ निर्योग क्षेमः याने योग कहते हैं सिद्धि औ असिद्धिकी समताको उसका निश्चयही रक्षण करौ सिध्य सिध्यो:समत्वं योगः ऐसा अगाडी कहेंगे आत्मवान् याने अत्मा क्या वस्तु है उसको जानौ अथवा आत्मा जो मन है इसको वश करो. ॥ ४५ ॥ मूलम्. योवानर्थउदपानेसर्वतःसंलुतोदके ॥ तावान्सर्वे पुवेदेपुव्राह्मणस्यविजानतः ॥ ४६॥ अन्वयः सर्वतः संलुतोदके उदपाने यावान् अर्थः स्यात् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषु तावान् अर्थः भवति ॥ ४६ ॥ . टीका. प्रथम जोकहा कि वेदमे त्रिगुणात्मक कर्म कहे हैं तहां तुम सात्विक कर्म करो इसका खुलासा करते है.समय वेदोक्त कर्म सर्वके ग्रहण करने योग्य नहीं है क्यों की. जैसेःकता बावडी त-
४७
३
३
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
लाव इत्यादिक जलाशयोंमे सर्वत्र पानीभरा है, तहासे मनु-
प्यको जेतना चाहिये वतनाही लेता है. ऐसेही ब्राह्मण जो
ब्रह्मपरमात्माका उपासक उसको सर्व बेदौसे सात्विक ग्रह
ण करना चाहिये ।। ४६ ॥
मूलम्.
कर्मण्येवाऽधिकारस्तेमाफलेषुकदाचन ॥ माकर्म
फलहेतुभूर्मातेसंगोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥
अन्वयः
ते तव कर्मणि एव अधिकारः अस्ति फलेपुकदाचन मा
त्वं कर्मफलहेतुःमाभूःते अकर्मणि संगःमा अस्तु॥४७॥
टीका.
अव सत्वगुणमे स्थित जो
मुमुक्षु
तिसको यतनाही गृहण
करना चाहिये तो कहते हैं. नित्य नैमित्य औ काम्य इनमे
कोई भी फल करिके युक्त जो सुननेमे आवै कर्म उसमे केवल
कर्महीमे तुमको अधिकार है. फल बंधनकारक है इसवास्ते फ-
लमे कोई कालमेभी नहीं और जो कर्म करौ उसकाकर्तृत्वभीतु-
मारे बिपे न होउ औ फलकेभी भोक्तृत्वमे तुम कारण न होउ
औ अकर्म जो कर्मकान करना जैसे कि तुमने कहा कि, मै यु-
द्ध न करौंगा; ऐसे अकर्ममेभी तुह्मारी निछा न होय. तात्पर्य'
कि कर्म करनायोग्य है कारण कि अगाडी लिखेंग नकर्मणाम-
नारंभो नैष्कर्म्यपुरुपो श्नुते ॥इसलिये कर्म करना फलकी इ-
च्छा न करना निष्काम कर्मसे मोक्ष होती है. ॥ ४७ ॥
मूलम.
योगस्थःकुरुकर्माणिसंगत्यत्काधनंजय ॥.
सिध्यसिध्योःसमोभूत्वासमत्वंयोगउच्यते ॥४८॥
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका..
तदागंतासिनिर्वेदश्रोतव्यस्यश्रुतस्यच ।। ५२॥
अन्वयः
यदा ते वुद्धिः मोहकलिलं व्यतितरिष्यति तदा श्रोत-
व्यस्यच श्रुतस्यच निर्वेदं गंतासि ॥ ५२ ॥
टीका.
कहे भये प्रकार करिके कर्ममे प्रवर्त्त औ उसी वृत्तिकरिके
नष्ट भये हैं पाप जिसके ऐसे जोतुम सो तुह्मारी बुद्धि मोहरूप-
पापको छोडिकेअतिशुद्ध होइगी,तब जो मेरेसे इस कालसे प्र.
थम जो त्यागनेको सुना औ जो अब इस कालसे अगाडी फ-
लादिक सुनौगे उसके वैराग्यको आपही प्राप्त होउगे.॥५२॥
मूलम्.
श्रुतिविप्रतिपन्नातेयदास्थास्यतिनिश्चला ।
समाधावचलावुद्धिस्तदायोगमवाप्स्यसि ॥ ५३॥
अन्वयः
कहा हुआ
जो प्रा.
ते वुद्धिः श्रुतिविप्रतिपन्ना अचला यदा समाधौ निश्चला
स्थास्यति तदा योगं अवाप्स्यसि ॥ ५३॥
टीफा.
योगमें इसको सुनौ इत्यादिक करिके
त्मयाथात्म्य ज्ञानपूर्वक बुद्विविशेप तिस करिके संस्कार कि-
या हुआ जो कर्मानुष्ठान तिसका लक्षणभूत योगसंज्ञक फल
कहते हैं: श्रुतिजो श्रवण सो मेरेसे सुनिके विशेप करिक
सूक्ष्म
तत्व विपयिक स्वयं अचल एकरूप ऐसी जो तुह्मारी बुद्धि सो
जब कर्मानपान करिके निर्मल किये भये मनमे निश्चल स्थित
होयगी, तब योग याने आत्मदर्शन पाचौंगे. ॥ ५३ ॥
५१ अन्वयः गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका, अर्जुनउवाच ॥ स्थितप्रज्ञस्यकाभापासमाधि स्थस्यकेशव ॥ स्थितधीकिंप्रभातकिमासी तव्रजेतकिम् ॥ ५४॥ अर्जुनःउवाच ॥ हेकेशवस्थितप्रज्ञस्यसमाधिस्थस्य का- भापा स्थितधीः किंप्रभाषेत किंासीत किंव्रजेत॥५४॥ टीका. जव भगवानने टथाके पुत्र अर्जुनको ऐसे उपदेश किया तब वह अर्जुन निःसंग कर्मानुष्ठानरूप कर्मयोग साध्य जो योगसा- धनभूत स्थितप्रज्ञता तिसकास्वरूप औ स्थितबुद्धिपुरुपका श्र- नुष्ठानप्रकार पूंछतेभये. हे केशव! समाधिस्थ स्थितप्रज्ञ पुरुपका स्वरूप कैसा है औ स्थितप्रज्ञ अर्थात् स्थिर बुद्धिवाला पुरुषकै सावोलता है कैसे पैठता है औ कैसे चलता है सोकहो. ॥५४॥ मूलम् श्रीभगवानुवाच ॥॥प्रजहातियदाकामान्सर्वा न्पार्थमनोगतान् ॥ आत्मन्येवात्मनातुष्टःस्थित प्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५॥ अन्वयः श्रीभगवान उवाच ॥ हे पार्थ यदा आत्मनिएवात्मना। तुएः सन् मनोगतान सर्वान् कामान् प्रजहाति तदा स्थितप्रज्ञः उच्यते ॥ ५५ ॥ टीका, अब श्रीकृष्णभगवान् स्थिरबुद्धिवालेका स्वरूप कहते हैं तव ऐसा है कि, जब किसीका चाल चलन कहा तब उसका स्वरूप कहि चुके, इसवास्ते स्थिरबुद्धिकीवृत्तिअर्थात् चाल यानेरहनी .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
हे कुंतीपुत्र! आत्मदर्शन विना विपयानुराग निवर्त होतान-
औ विषयानुसार निवर्त होने विना ज्ञानी पुरुप यत्न करता
है तौभी उसकी वलवान इंद्रिय हठिके मनको हरण करती
हैं अर्थात् मनको क्षोभायमान करती हैं. ॥ ६ ॥
मूलम.
तानिसर्वाणिसंयम्ययुक्तआसीतमत्परः॥
वशेहियस्येद्रियाणितस्यप्रज्ञाप्रतिष्ठिता ॥६१ ॥
अन्वयः
+
युक्तः योगयुक्तः पुरुषः तानि सर्वाणि संयम्य मत्परःमा
सीत इंद्रियाणि यस्य वशे संति तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ५१
टीका..
योगी पुरुप उनसव इंद्रियौंका संयम करिके मेरेही स्वा-
धीन व्है रहै ये इंद्रिय जिसके वश उसकी बुद्धि प्रतिष्ठितहै;
इस करिके जो अर्जुनने पूंछाया कि, स्थितप्रज्ञ कैसे रहे उस
का उत्तरभी भया. ॥ ६१ ॥
मूलम्.
ध्यायतोविपयान्पुंसःसंगस्तेपूपजायते ॥ संगा
संजायतेकामःकामातूक्रोधोभिजायते ॥६२॥
क्रोधाद्भवतिसंमोहःसंमोहात्स्मृतिविभ्रमः ॥ स्मृ
तिभ्रंशाद्बुद्धिनाशोवुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥६३॥
अन्वयः
विषयान् ध्यायतःपुंसःतेपु संगःउपनायते संगात् का-
मःसंजायते कामात् क्रोधः अभिजायते ॥६२॥ को-
धात् संमोहःभवति संमोहात स्मृतिविभ्रमःभवतिस्मृति-
भ्रंशात् बुद्धि नाशःभवति शुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥६३ ॥
५७ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. द्विय विषयोंसे सर्व प्रकारले रुकी भयी हैं तिसीकी बुद्धि प्र- तिष्ठित है, याने स्थिरबुद्धि है. ॥ ६८ ॥ यानिशासर्वभूतानांतस्यांजागर्तिसंयमी ॥ य स्यांजाग्रतिभूतानिसानिशापश्यतोमुनेः॥६९॥ अन्वयः सर्व भूतानां था निशा तस्यां संयमी जागर्ति यस्यां भू- तानि जाग्रति पश्यतः मुनेः सा निशा ॥ ६९ ॥ टीका. ऐसे जितेंद्रिय श्री प्रसन्नमनवालेकी सिद्धि कहते हैं. सर्व भूत प्राणीमात्रकी जो रात्री अर्थात्. रात्रिसदा अप्रकाशक जो श्रात्मविपयाधुद्धि तिसमें इंद्रियसंयमी औ प्रसन्न मनवा- ला जगता है, अर्थात् आत्माको देखता भया रहता है, प्रो जो शब्दादि विपया बुद्धि तिसमे सर्वभूत प्राणीमात्र जागते हैं.या ने प्रबुद्ध होते हैं. सोशब्दादि विषयिक वुद्धि आत्माके देखने वाले की रात्रि है, अर्थात् रात्रीतुल्य अप्रकाशक है. ॥ ६९ ॥ मूलम्.. आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमापःप्रविशंतियः द्वत् ॥ तद्वत्कामायंप्रविशतिसर्वेसशांतिमाप्नोति... नकामकामी॥७॥ अन्वयः यहत् आपूर्यमाणं अचलप्रतिष्ठं समुद्रं आपः प्रविशति तद्वत् यं सर्वे कामाः प्रविशति सःशांतिआमोतिकामकामीन॥७॥ टीका. जैसा आपही पूर्ण औ अचलप्रतिष्ठ याने एकरूप समुद्र में ८ ५२ गीताचाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका, कहते हैं हे अर्जुन!जब आपके स्वरूपही मे आपके मन करिके संतुष्ट हुआभया मनमे प्राप्तहुये सर्व कामनाऔंका त्याग करै है तब वह स्थितप्रज्ञ कहाता है. ॥ ५५ ॥ . अन्वयः दुःखेष्वनुहिग्नमनाःसुखेपुविगतस्टहः ॥ वीतरा गभयक्रोधःस्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥ यः दुःखेषु अनुविनमनाः सुखेषु विगतस्ष्टहः वीतरागभ- यक्रोधः मुनिः स्थितधीः उच्यते ॥ ५६ ॥ टीका. दुखमे जिसके मनमे उद्वेग न होय औ सुखमे इच्छा न- राखै औ व्यतीत भये होय स्नेह भय औ क्रोध जिसके ऐसे मुनियाने मननशीलको स्थितधी कहते हैं. ॥ ५६ ॥ मूलम्. यःसर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्यशुभाऽशुभम् ॥ नाभिनंदतिनदृष्टिस्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५७॥ . अन्वयः यःसर्वत्र अनभिस्नेहः सन् तत् तत् शुभाशुभं प्राप्य न अभिनंदति न देष्टि तदा सःस्थितप्रज्ञः उच्यते॥ ५७॥ टीका. जो सर्वमित्र वौँमे भी उदासीन रहा भया प्रिय वस्तुका संयोग वियोगादिक प्राप्त व्हैके न आनंद होय, औ न विपाद करे; तब वह स्थितप्रज्ञ कहिये. ॥ ५७ ॥ मूलम्. यदासंहरतेचायंकूर्माऽगानीवसर्वशः ।। , गीतावाक्याबोधिनी भापाटीका. इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्यप्रज्ञाप्रतिष्ठिता ॥ ५८॥ अन्वयः अयं यदा कूर्मः इव सर्वशः अंगानि इंद्रियार्थेभ्यः इंद्रि- याणि संहरते तदा तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥ टीका. यह पुरुप जब कूर्म जैसे सर्व अंगोंको एकदम समेटि लेता तैसे सर्व इंद्रियोंके विषयोंसे इंद्रियौंको खींचि लेवै. तव ति. सकी बुद्धि स्थिर है अर्थात् यह भी स्थितप्रज्ञ है. ॥ ५८ ॥ मूलम. विषयाविनिवर्ततेनिराहारस्यदेहिनः॥ रसवबरसोप्यस्यपरंदृष्ट्वानिवर्तते ॥ ५९॥ निराहारस्य देहिनः रसवज्यं विपयाः विनिवर्तते अ. स्य रसः अपि परं दृष्ट्वा निवर्त्तते ॥ ५९॥ टीका. इंद्रियोंके आहारविषयसो विषय न करनेसे विषयप्रीतीवि- ना विषय निवर्त होतेहैं औ इसकी विषयप्रीति भीजब परयाने विपयोंसे परेजोआत्मस्वरूपउसको देखनेसे निवर्त होती, ५९ अन्वयः . मलम. यततोह्यपिकौंतेयपुरुपस्यविपश्चितः॥ इंद्रियाणिप्रमाथीनिहरंतिप्रसभमनः॥६०॥ अन्वयः हे कौंतेय हिविपश्चितः पुरुपस्य यततः अपि प्रमाधी- नि इंद्रियाणि प्रसभं मनः हरंति ॥ ६ ॥ टीका.
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका.
नदियौंका पानी प्रवेश करता है तैसेही जिसको सर्व कामना
प्राप्त होती हैं सोशांतीको पावता है औकामनामकी इच्छा
करनेवाला शांतीको पावता नहीं. ॥ ७० ॥
मूलम.
विहायकामान्यःसर्वान्पुमांश्चरतिनिस्टहः॥
निर्ममोनिरहंकारःसशांतिमधिगच्छति ॥७१ ॥
अन्वयः
यः पुमान् सर्वान् कामान् विहाय निःस्पृहःसन् चरति
सः निर्ममः निरहंकारः शांति प्रधिगच्छति ॥ ७१ ॥
टीका.
जो पुरुप सर्व कामनाको छोडिके नौ निस्टह विचरता
लो निर्मम नौ निरहंकार शांति पावता है. ॥ ७१ ॥
.
एपाब्राह्मीस्थितिःपार्थनैनांप्राप्यविमुह्यति॥स्थि
त्वाऽस्यामंतकालेपिब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥
अन्वयः
हे पार्थ एपा ब्राह्मीस्थितिः एनां प्राप्य नरः न विमुह्यति
अस्यां अंतकाले अपि स्थित्वाब्रह्मनिर्वाणं ऋच्छति ॥७२॥
टीका,
'हेटपात्र यह जो ब्रह्मप्राप्ति करनेवाली निष्काम कर्मरूप
स्थितिसो मैंने कही इसको प्राप्त है के फिरि मनुष्य संसाररूप
मोहको प्राप्त नहीं होताह.जो इस स्थितिमे अंतिम अवस्था-
मभीस्थित होय तौभी मोक्षको प्राप्त होय औजो बाल्य अ-
वस्थासे लैके मरण पर्यंत ऐसेही कर्म करै वह ब्रह्मानंदको प्राप्त
होय इस मे तो कहनाहीक्या है? ॥ ७२ ॥
गीतावायथार्थवोधिनी भापाटीका. इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायांयो गशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादेसांख्ययोगोनामद्वि तीयोऽध्यायः॥२॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाधप्रसादकता यां श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यर्थवोधिनीभापाटीकायांद्वितीयोऽ ध्या 'यः॥ २ ॥ मूलम. अर्जुनउवाच ॥ ज्यायसीचेत्कर्मणस्तेमताबुद्धि औ जनार्दन ॥ तत्किंकर्मणिघोरेमांनियोजयसिके शव ॥१॥ व्यामिश्रेणैववाक्येनबुद्धिमोहयसी वमे॥तदेकंवदनिश्चित्ययेनश्रेयोऽहमाप्नुयां ॥२॥ अन्वयः हेजनार्दन चेत् कर्मणः बुद्धिः ते ज्यायसीमता तत् हे केशव घोरे कर्मणि मां किं नियोजयसि ॥१॥ व्यामि श्रण वाक्येन मे बुद्धिं मोहयसि इव तत् एकं निश्चित्य वद थेन अहं श्रेयः अवाप्नुयां ॥ २ ॥ मामा टीका. . अर्जुनने विचार किया कि, भगवानने मेरेको प्रथम प्रशो ध्यानन्वशोचस्त्वं इत्यादि वाक्यों करिके ज्ञानयोग उपदर्श किया, फिरि बुद्धिोंगेत्विमांशृणु इत्यादिक वाक्यों करिके कर्म योग कहा, उसमेभी श्रुतिविप्रतिपन्नातेयदास्थास्यतिनिश्चला इत्यादि करिके आत्मज्ञानकी प्राप्तिनिष्कामकर्मसेकही इसवा. स्तेनिश्चय होता हैकि,कर्मयोगसे आत्मज्ञानही श्रष्ट होयगा ऐ- सा विचारिके अर्जुन भगवानसे बोले किहे जतार्दन!जोकिक- र्मयोगसे आत्मज्ञान आपने श्रेष्ठमाना होय तोहेकेशव इसहि- ..
६० गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका.
सात्मक घोर कर्म मेरेको किसवास्ते युक्त करतेही ॥१॥ आप ऐ-
से मिश्रितवाक्योंकरिके मेरीबुद्धिको मोहतेसही इसवास्तेसोई
एक निश्चय करिके कहाकि,जिसकरिके मैकल्याणकोप्राप्तहोउ.२
मूलम्,
श्रीभगवानुवाच ॥ लोकेऽस्मिद्विविधानिष्ठापु
राप्रोक्तामयाऽनघ । ज्ञानयोगेनसांख्यानांकर्म
योगेनयोगिनां ॥३॥
अन्वयः
श्रीभगवान उवाच ॥ हे अनघ अस्मिन लोके मयापुरा
द्विविधा निष्ठाप्रोक्ता सारख्यानां ज्ञानयोगेन योगिनां क
.
मयोगेन ॥ ३॥
टीका.
ऐते अर्जुनके वाक्य सुनिके श्रीकृष्णभगयान् बोलते भये,हे
उनघ! अर्थात हे पापरहित अर्जुन! जो मैनेपूर्व अध्यायमें कहा
तो तुम अच्छीतरह समुझे नहीं विचित्र अधिकारियों करिकेप-
रेपूरित ऐसे इस लोकप्रथमभी यथाधिकारी प्रतिवोप्रकारको
निया कही. तहां आत्मज्ञानियों को ज्ञानयोग निष्ठा भी कर्म-
योगवालीको कर्मनिष्ठाकही, कारणकि जगतम सर्वही लोग
मोक्षकी इछा करनेवाले नी हैं, जब मोक्षइच्छा करै तपही ज्ञा-
नयोगका अधिकारी होता है,सो जब प्रथम ईश्वराराधन रूप
निष्काम कर्म करिके निर्मलांतःकरण होता है, तब सर्व इंद्रिय
उसकी स्थिर होती हैं.ऐसा पुरुपज्ञाननिष्ठाका अधिकारी होता
है,सोअगाडी कहेंगे॥ यतःप्रवृत्तिर्भूतानां येनसर्वमिदंततं ॥स्वक
मणातमभ्यर्च्यसिद्धिविंदतिमानवः ॥ अनेकजन्मसंसिद्धस्त
तो यातिपरागति इत्यादि ॥ ३॥
. गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मूलम्. नकर्मणामनारंभान्नैष्कयंपुरुपोऽश्नुते ॥ नच संन्यसनादेवसिद्धिंसमधिगच्छति ॥४॥ अन्वयः कर्मणां अनारंभात पुरुपः नैष्कर्म्य न प्रश्नुते च संन्यस . नात् एव सिद्धि न समधिगच्छति ॥४॥ टीका. सर्व कोई भी मनुष्योंको मोक्षकी इच्छा होय तौभी ज्ञान ए. फाएकी दुष्कर हैऐसा कहते हैं.शास्त्रोक्तकर्मके आरंभ कियेविना पुरुष निष्कर्मताको प्राप्त नही होता है,अर्थात् सर्व इंद्रियव्यापा. ररूप कर्मकी निवृत्ति पूर्वक ज्ञाननिष्ठाको प्राप्त नहीं होताहै, और कर्मकेन करनेसे भी सिदिको प्राप्त नहीं होता,क्योंकी,निष्काम कर्मकी सिद्धि परमेश्वराराधनही है. इसवास्तेउस शास्त्रीय कर्म विना उस परम पुरुषाराधन रूप सिबिको भी नहीं पाता है॥४॥ .. नहिकश्चित्क्षणमपिजातुतिष्ठत्यकर्मकृत् ॥ कार्य तेह्यवशःकर्मसर्वैःप्रकृतिजैर्गुणैः॥५॥ अन्यथा हि कश्चित् अपि जातु अकर्मक क्षणं न तिष्ठति सर्वैः प्रकृतिजैः गुणैःअवशःसन् कर्म कार्यते ॥ ५॥ टीका. प्रथम कहे वाक्यहीको स्पष्ट देखाते है. प्रसिद्ध हैकि इस- लोकमे कोई भी पुरुष कोईभी कालमे कर्म कियेविनाक्षणमात्र भी नहीं रह सकता है क्योंकि, प्रतिके जे सत्वादिक सौभा- विक गुण तिनों करिके परवश हुआ कर्म करताही है अर्थात् . गीतावाक्यार्थबोधिनी,भापाटीका. जो ऐला भी नेम करै कि मै कर्म न करौंगा तौभीवै सौभाविक गुण कर्म कराय लेतेहैं. ॥ ५ ॥ . मूलम्. कर्मेंद्रियाणिसंयम्ययआस्तेमनसास्मरन् ॥ई. द्रियानि विमूढात्मामिथ्याचारःसउच्यते॥६॥ अन्वयः यः कमद्रियाणितंयम्य इंद्रियार्थान् मनसा स्मरन् सन् प्रास्ते सः विमूढात्मा मिथ्याचारः उच्यते ॥ ६ ॥ टीका. जो कोई ज्ञानयोगार्थ प्रवर्त्त होनेके वास्ते कर्मइंद्रियौंका केवल संयम करै श्री विपयौंका मनमे स्मरण करता हुआ रहै अर्थात् विपय वासना निवर्त भये विनाहठसे कमद्रियौंकोरो कै सो मूर्ख मिथ्या प्राचार करनेवाला है ऐसे श्रेष्ठजन कह ते है ॥ ६ ॥.. मूलम. यस्त्विद्रियाणिमनसानियम्यारभतेर्जुन ॥ कर्मेंद्रिय कर्मयोगमसक्तःसविशिष्यते ॥७॥ अन्वयः हे अर्जुन पः मनसाइंद्रियाणि नियम्य तु कमैद्रियैःक मयोगं आरभते सः असक्तः सन् विशिष्यते ॥ ७ ॥ टीका. हे अर्जुन जो कोई मनसे इंद्रियों को नियमित करिके औ कमद्वियोंसे कर्मयोगका आरंभ करता है सो प्रथम कहे भये ज्ञान प्राप्तिको यत्न करनेवालेसे श्रेष्ठ है. ॥ ७॥ मूलम् गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. नियतंकुरुकर्मत्वंकर्मज्यायोह्यकर्मणः॥ शरीरयात्रापिचतेनप्रसिद्धयेदकर्मणः॥ ८॥ अन्वयः त्वं नियतं कर्म कुरु हि अकर्मणः कर्म ज्यायः च अ- कर्मणः ते शरीरयात्रा अपि न प्रसिद्धघेत् ॥ ८॥ टीका. हे अर्जुन तुम नियतकर्मकरौ नियत उसकर्मको कहते है कि जो जिसको निश्चय अधिकार है उस कर्मको कर्म करना उस देह धारीको निश्चय अधिकार है इसवास्ते कर्मकरौ क्यों कि, कर्म किये विना केवल ज्ञानी व्है के बैठनेसे कर्म करना श्रेष्ठ है भी जो तुम सर्व कर्म त्यागोगे तो ज्ञानके उपयोगी जो यह र शरीर इसका भी रहना न होयगा. ॥ ८॥ मूलम्. यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयंकर्मबंधनः ।। तदर्थकर्मकौंतेयमुक्तसंगःसमाचर ॥९॥ अन्वयः हेकौंतेय यज्ञार्थात् कर्मणः अन्यत्र अयं लोकः कर्मबंध- नःभवति त्वं मुक्तसंगः सन् तदर्थ कर्म समाचर ॥ ९ ॥ टीका हेकुंतीपुत्र जोशंका करौंगे कि कर्मसे बंधन होता है तो उत्तर सुनौ जो कर्म यज्ञके निमित्त है उस कर्मसे जो अन्य फर्म उसी- के करनेसे मनुष्य वंदनको प्राप्त होता है इसवीस्ते तुम फला- संग छोडिके यज्ञार्थ कर्म करौ. ॥ ९ ॥ मूलम्. सहयज्ञा.प्रजाःसृष्ट्वापुरोवाचप्रजापतिः ॥ अने ६४ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. नप्रसविष्यध्वमेयवोस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥ दे वान्भावयतानेनतेदेवाभावयंतुवः॥ परस्परंभ वयंतःश्रेयःपरमवाप्स्यथ ॥११॥ अन्वयः प्रजापतिः पुरासहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा उवाच यूयं अनेन प्रसविष्यध्वं एपः वाइष्टकामधुक् अस्ति ॥ १० ॥ अ- नेन यूयं देवान् भावयतः ते देवाः वःभावयतु एवं पर- स्परं भावयंतः संतः परं श्रेयः अवाप्स्यथ ॥ ११॥ टीका. प्रजापति जो जगत्कारण भगवान् सो पुरा याने पूर्वसृष्टिके उत्पत्ति समयमे यज्ञसंयुक्त प्रजाको उत्पन्न करिके प्रजासे बोले कि, इस यज्ञ करिके तुम वृद्धिके प्राप्त होउ. यह तुमको सर्व का- मना देनेवाला है ॥ १० ॥इसी यज्ञ करिके तुम देवौका आ- राधन करिके उनकी वृद्धि करौ वै देव तुह्मारा मनोर्थ पूरण कर ते भये तुह्मारी वृद्धि करेंगे ऐसे ही परस्पर वढाते भये तुम प्रो देवता सर्व घडे कल्याणको प्राप्त होउगे. ॥ ११ ॥ मूलम् इप्टानभोगानहिवोदेवादास्यंतेयज्ञभाविताः॥ तैर्दत्तानप्रदायेंयोयोभुक्तस्तेनएवसः॥ १२॥ अन्वयः यज्ञमाविताः देवाः वः इशन भोगान् दास्यंति तैः दत्ता ..न एम्पः अप्रदाय यः भुक्ते सः स्तेनएव ॥ १२॥ टीका. यज्ञ करिके पूजे भये देवता तुमको इच्छित भोग देइंगे, उन देवतीने दिये पदापों कारके उनकाआराधन किये विनाजो स्व
.
.
गीताचाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.'
येभोग भोगता है,सोई चोर है: चोरका लक्षण यही है कि दूस-
रोकि वस्तूपर उसक दियेविना आप स्टहा करै. ॥ १२ ॥
मूलम्..
यज्ञशिष्टाशिनःसंतोमुच्यतेसर्वकिल्विपैः ।।
मुंजतेतेत्वपंपापायेपचंत्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥
... अन्वयः ,....
यज्ञशिष्टाशिनःसंतः सर्वकिल्बिपैः मुच्यते तु ये प्रात्म-
कारणात् पति ते पापाः अघं भुंजते.॥१३
31. Inटीका
यज्ञ अर्थात नित्ययज्ञ देवाचाराधनरूपयज्ञकोशेष भोगनेवा-
लै पुरुप सर्व पापोंसे छूटते हैं औ जो केवल आपके वास्ते पाप
करिक भोजन करते हैं वै पापरूपही भोजन करते हैं अर्थात् पार्प'
हीके वास्ते उनके भोजन हैं.॥ १३ ॥
This... 'मूलम,
-Pजिन्नाद्भवतिभंतानिपर्जन्यादन्नसंभवः ॥ यज्ञाचं
वतिपर्जन्योयज्ञकर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ कमेन्द्र
झोद्भवविदिब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ॥ तस्मात्सवंग
कतंब्रह्मनित्ययज्ञप्रतिष्ठितम 1,38 एवं प्रवर्तिः ।
तिंचक्रनानुवर्तयतीहयः ॥ अघायुरिंद्रियारामो.
तामोपार्थसजीवति ॥ १६॥
HTTER: अन्वयः
- अन्नात् भूतानि भवंति पर्जन्यात अन्नसंभवः अस्ति सः
पर्जन्य यज्ञात् भवति सम्यज्ञकर्मसंमुद्भवःअस्ति॥१४॥
तत्कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि तत् ब्रह्म अक्षरसमुद्भवं विद्धि
तिस्मात्सर्वगतं ब्रह्म यतें नित्यं प्रतिष्ठितं अस्ति॥१५॥
- गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. एवं इह प्रवर्तितं चक्रं यःन अनुवर्त्तयति हे पार्थ,सः इंद्रि- यारामः अघायुः मोघं जीवति ॥ १६ ॥-: "B. टीका- फिरीभी लोकदृष्टि करिके औशास्त्रदृष्टि करिकेभी.सर्वकामू- ल यज्ञही है, ऐसा देखायके यज्ञकी नित्य कर्त्तव्यता श्रौ न करने- को दोप देखाते हैं अर्थात् इन श्लोकौं करिके अनसे सर्वभूतप्रा. णीमात्र होतेहैं श्रौ उस् अन्नकी उत्पत्ति पर्जन्य याने वर्षासे है. यह लोकप्रसिद्ध है, सो पर्जन्य यज्ञसे होताहै यह शास्त्रसे जाना जाता है, सो प्रमाण जैसे॥श्लोका अग्नौप्रास्ताहुतिःसम्यगादित्य मुपतिष्ठतेमादित्याज्जायतेदृष्टिटेरनंततःप्रजाः॥१॥सो यज्ञ द्रव्यार्जनादिक कर्ताके व्यापाररूप कर्मसे होता है॥१४॥सो कर्म ब्रह्मसे होता है, इहां ब्रह्मशब्दकरिके प्रकृति परिणामरूप शरीर जानना॥तदेवब्रह्मनामरूपमन्नंचजायते॥ऐसे वेदमे ब्रह्म- शब्द करिके प्रकृति कही है ममयोनिर्मह ब्रह्म ऐसे इहांभी कहेंगे इसवास्ते कर्मब्रह्मोद्भवं इस वाक्यका अर्थ यहीहकि प्रकृतिप- रिणाम रूप जो शरीर उससे कर्मकी उत्पत्ती है औ, शरीररूप ब्रह्म याने प्रकृतिविकार सो अक्षर जो जीवात्मा सो उसमेहै अर्थात् अन्नपानादि करिके तृप्त औ अक्षर जो जीव तिस क- रिक अधिष्ठित जो शरीर सो कर्ममे समर्थ होता है याने कर्म 'साधन भूत शरीर जीवसमुद्भव है इसवास्ते सर्वगत याने सर्वाधिकार योग्य शरीर नित्यही यज्ञमे प्रतिष्ठित है अर्थात् पन मूल है. ॥ १५ ॥ ऐस परम पुरुप करिके प्रवन किया भ. या यह चंक जैसे कि अन्नसेभूत भूत याने सजीव शरीर प- जन्यमे अन्न यजसे पर्जन्य सो यज्ञकर्मसे कर्म सजीव शरीरमे फिरि बद सजीय शरीर अन्नसे अन्न पर्जन्यसे इसप्रकारसे पररपा कारण कार्य भाव फारफे चक्रवत प्रवर्तमान है इसको .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका: ២ जो कर्माधिकारी अथवा ज्ञानकर्माधिकारी प्रवन नहीं करता है औ यज्ञ कियेविना शरीर पोपण करता है. सो केवल इंद्रि- याराम पुरुप अघायु अर्थात् उसकी आयुः पापहीके वास्ते हैं: हे अर्जुन! वह वृथा जीवंता है याने उसका जीवन उथा है. ता- त्पर्य जो यज्ञशेपविना देह पोपण करता है वह रजोगुण तमो- गुणरूंपपापी पुरुप आत्मदर्शनं विमुख है यहीसे केवल विष. यंभोगी होता है, इसवास्ते ज्ञानयोगादिकमें प्रवर्त है तोभी उसका जीवना स्था है. ॥ १६ ॥ मूलम: यस्त्वात्मरतिरेवस्यादात्मतृप्तश्चमानवः ॥ आ त्मन्येवचसंतुष्टस्तस्यकार्यनविद्यते ॥१७॥ नै वतस्यकृते नार्थोनाकृतेनेहकश्चन ।। नचास्यसर्व भूतेषुकश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८॥ तस्मादसक्तः सततंकार्यकर्मसमाचर ॥ असक्तोह्याचरन्कर्म परमाप्नोतिपूरुषः ॥ १९॥ अन्वयः यःमानवः आत्मरतिः एवस्यात् च श्रात्मतृप्तः एवस्यात् च आत्मनि एवसंतुष्टः स्यात् तस्य कार्य न विद्यते॥१७ इह कृतेन च अकतेन तस्य कश्चन अर्थः, एक सर्वभूते- पु कश्रित अर्थव्यपाश्रयः न विद्यते ॥, १८. त- स्मात असक्तःसन सततं कार्य कर्म समाचर हियस्मात ससक्तः कर्म आचरन् सन् पुरुषः परं आप्नोति ॥१९॥ टीका अब महा यज्ञादिक कर्म किसको.न.करना चाहिये सोक- हि जनकादयः कर्मपा एव संसिद्धि प्रास्थिता लोक गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषादीका हते हैं जिसकी आत्माहीमे प्रीति होय औ प्रात्माहीसे, तृप्त आत्म व्यतिरिक्त अन्नादिकसे प्रयोजन नहीं भी आत्महीमे संतुष्ठ दूसरे वाग महल माला चंदन इत्यादिकों काभी काम न: ही तिसको कुछभी कर्तव्यता नहीं ॥ १५ ॥ इसवास्ते जो कुछ आत्मदर्शनार्थ करै अथवा नकर तौभी उसके कुछ प्रयोजन, नही औ सर्व भूतोमे भी इसका कोई भी प्रयोजना धार नहीं ऐसे मनुष्यको कर्तव्यता नही अर्थात् मुक्तको नहीं ॥१॥ इसवास्ते कर्ममे आसक्त न भये हये निरंतर करने योग्यकार्य करी क्योंकि जो कर्ममे आसक्त नहीं हैं औ कर्म करता है तौ वह पुरुप कर्म करते करते परत्माको प्राप्त होताहै ॥१९॥ मूलम्... कर्मणेवहिसंसिद्धिमास्थिताजनकादयः॥लाक़ संग्रहमेवापिसंपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ २० ॥ अन्वयः. संयह अपिसंपश्यन् कर्म कर्ते एव अर्हसि ॥ २० ॥ टीका 'जिसवात्ते किज्ञान योगाधिकारीको भी कर्मयोगही श्रेष्ठहै इसवास्ते ज्ञानी जनमे अग्रगण्य जनकादिकभी कर्मही करिके आत्मदर्शन पावते भये ऐसे प्रथम मुमतको ज्ञानयोगमे अधि- कार नहीं इसलिये कर्मयोगीको कर्मयोग करनाकहाँ फिरज्ञानी कोभी कर्मही करना श्रेष्ठहै ऐसे कारणासहितकहा अंबदोनौंको भी कर्मही करना श्रेष्ठहै ऐसाकहते हैं कि,लोक संग्रहकोभी दे. खते भये कर्म करने कोही योग्यहो इस संग्रहका कारण अगा- टीके श्लोकमेकहते हैं. ॥ २० ॥ --- मूलम.. मलम गीतावाक्याबोधिनी, भापाटीका: यद्यदाचरतिश्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः॥सयत्प्रमा शंकरुतेलोकस्तदनुवर्तते ॥२१ ॥ अन्वयः । श्रेष्ठः यत्-यत आचरति तत् तत् एव इतरः जनः प्राचर ति स श्रेष्ठः यत् प्रमाणं कुरुते,लोकः तदनुवर्तते ॥ २ ॥ -टीका. श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करते हैं. सोई सोई आच दूसरे लोगभी करते हैं औ सो श्रेष्ठ पुरुषं जो प्रमाण, तोहैदूसरभी वही के अनुसार चलता है. ॥ २१॥ नमेपार्थास्तिकर्तव्यत्रिषुलोकेपुकिंचन नान वाप्तमवाप्तव्यंवर्त एंवचकर्मणि ॥.२२ ॥ यदि. ह्यहनवतेयंजातुकर्मण्यतद्रितः ॥ ममवत्मानुवं ततेमनुष्या पार्थसर्वशः।। २३॥ उत्सीदेयुरिमे - लोकानकुर्याकर्मचेदहं ॥ संकरस्यचकर्तास्या, मुपहन्यामिमा:प्रजाः ॥२४॥ अन्वयः, :.. हे पार्थ त्रिपुलोकेषु मेकिंचन कर्त्तव्यं न अस्तिएवं अन वाप्तं च अवाप्तव्यंनअस्ति तथापि अहं कर्मणि एव वर्ते ॥ २२॥ हेपार्थ यदि अहं अतंद्रितः सन् जात कर्मणि न व तदि हि सर्वशः मनुष्यः मम वम अनु वर्तते ॥२३॥ चैत अहं कर्म न कुर्या तदि इमे लोका उत्सी देयुः तेन संकरस्य कर्नायम् च अन डेमा प्रजा - .
है " ७२. गीतावाल्यार्थबोधिनी भाषाटीका. टीका, हे अर्जुन सबही कम प्रकृतिके सत्यादिगुणोने किये हैं, अ. - थवा गुणो करिके होते हैं तौभी अहंकार करिके मूढ भया है आत्मस्वरूप जिसका ऐसा पुरुष आपको कर्ता मानता है । ॥ २७ ॥ यो सत्वादिकगुण तथा तिनके कर्मों के विभाग जा. ननेवाला पुरुष ऐसा जानता है कि, सत्वादिकगुण प्राप:श्राप के कार्योमे वर्तमान में ऐसा मानिकै मै कर्ता हौं ऐसे आसक्त नहीं होता है..॥ २८॥ - मूलम. प्रकृतेगुणसमूढाःसज्जतेगुणकर्मसु ॥तानकृत्स्न' विदोमंदान्कृत्स्नविन्नविचालयेत् ॥ २९॥ ।। अन्वयः प्रकृतेर्गुणसंमूढाः गुणकर्मसु सज्जते तान् भकृत्स्नविदः । मंदान् कृत्स्नवित् न विचालयेत् ॥ २९॥ ठीका. प्रकृतिके जे सत्वादिकगुणतीनौ करिके सम्यक् मूढ ऐसे पुरुप तेही सत्वादिक गुणौके कर्मोमे याने कर्म फलों में आसक्त होते हैं तिन असर्वज्ञ मंदमतिन्हको सर्वज्ञ पुरुप क- 'ममार्ग से चलायमान न करै. ॥ २९ ॥ , मूलम्. मयिसर्वाणिकर्माणिसंन्यस्याध्यात्मचेतसा॥ निराशीनिर्ममोभूत्वायुधस्वविगतज्वरः॥३०॥ अंध्यात्मचेतसा मयि सर्वाणि कर्माणि 'सैन्यस्य निरा झी. निर्ममः भूत्या विगतम्घरः सन युदयस्व ॥ ३० ॥ JAN - अन्ययः . गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ७३ • अव श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि, है अर्जुन! अज्ञानीकर्मा- सक्त होते हैं.तम ज्ञानी हों इसवास्ते कर्म फलको मेरेको अर्पण करिके युद्ध करौ, जो कहोगे कैसे करौं तौ सुनौ अध्यात्मने तसा याने'क्षत्रिय स्वभावमे चित्त राखिके अध्यात्म कहते हैं। स्वभावको सो अष्टम अध्यायमे कहेंग. स्वभावोऽध्यात्ममुज्यते तौ क्षत्रियके सौभाविक कर्म अठारहे अध्यायमे कही शोय. तेजोधृतिर्दाक्ष्यं युद्धेजाप्यपलायनं ॥ दानमीश्वरभावश्चक्षाकर्म स्वभावजईसवास्ते इसवाक्यसे इहां भगवान् यही कहते हैं कि, शूरत्व प्रताप धैर्य चातुर्य युद्धमे संमुख लडना दानं औ सबको आपनेका वृमे करना इत्यादि क्षात्र स्वभावमे चित्त राखिके दै सव कर्म मेरे अर्पण करिके इनकेफलकी आशा न करो औमै करता हों ऐसाभी न समुझौ ऐसे व्हैके विगतज्वर अर्थात् क- मबंधन भयरूपज्वर छुटे भये युद्ध करौ.जो भगवानने युद्धादिक 'अर्पण करनेको कहा इसका कारण अठारहे अध्यायमे कहेंगे कि जैसे स्वेस्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभतेनरः ॥ स्वकर्म- निरतःसिद्धियथाविंदतिसच्छृणु ॥ यतःप्रवृत्तिर्भूतानांयेनसमि दंततं॥स्वकर्मणातमभ्यर्च्यसिद्धिविंदतिमानवाइत्यादि॥३०॥ मूलम. येमेंमतीमदनित्यमनुतिष्ठंतिमानवाः ॥ श्रद्धावं 'तोनसूयंतोमुच्यतेतेऽपिकर्मभिः॥३१॥ यत्वेतद झ्यसूयंतोनानुतिष्ठंतिमेमत।सर्वज्ञानविमूढांस्ता विद्धिनष्टानचेतसः ॥ ३२॥ अन्वयः इदं मे मतं मानवाः नित्यं अनुतिष्ठंति ये श्रद्धावंतः.ये अनुसूयंतः ते अपि कर्मभिः मुख्यते॥ ३१ ॥ तुपुनः ये
.
से
७०.
गीतावाक्यार्थबोधिनी.भापाटीका
टीका:
हेअर्जुन! देखो मै सर्वेश्वर अवाप्त सर्व काम सर्वज्ञ सत्यप्तक- -
प हो इसवास्ते तीनहुँ लोकमे देवमनुष्यादिक अवता मे मे-'
रेको कुछंभी कर्तव्यता नहीं है, ऐसेही कोईभी पदार्थ अप्राप्त
नहीं है औ कर्म करिके कुछ पदार्थकी प्राप्तिकी इच्छाभी नहीं
है तौभी,मै कर्मही करता हो.॥२२॥ हे अर्जुन!जो मैं निरालस्य
हैकेकंदाचित् कर्म न.करौं तौ निश्चय यह है कि, सर्व मनुष्य
मेरेको कर्म नकरतें देखिके कर्म न करेंगे कारण कि,ऐसा विचा-
रेंगे कि साक्षात् वसुदेवनंदन श्रीकृष्ण कर्म नही करते हैं तो हम
किसवास्ते करें? जो कर्म करनेमे कुछ तत्व होता तो श्रीकृष्णजी
क्योंन करते? ॥२३॥ इसवास्ते जो मै कर्मन करौं.तो मेरा:आ-
चरन देखिके कर्म न करनेसे .सर्व लोग नष्टाचारभ्रष्ट हो-
यंगे नौं इसीसे वर्णसंकर होयंगे तो उस वर्णसंकरताका कर-
नेवालांभी मै होउंगा पो इसी वास्ते इस प्रजाको मारनेवा-
ला में ही होउंगा.तात्पर्य श्रीकृष्ण अर्जुनसे यह जनातेहैं कि
तुमडं पांडुपुत्र श्रेष्ठ जनौमे 'उत्तम हौ जो केवल ज्ञानयोगात्र
य करिके कर्म न करोगे तो तुमको देखिकेदूसरे अज्ञानीभी
कर्म छोडि देइंगे तबउनके कर्म छोडनेका पाप तुमकोहोय..
'गो इसथास्ते स्वधर्म युद्धरूंप कर्म करो. ॥ २ ॥
मलम.
सक्तःकर्मण्यविद्वांसोयथाकुर्वतिभारत ॥ कर्या.
द्विद्वांस्तथाऽसक्तंश्चिकी'लोकसंग्रह।। २५॥नव
द्विभेदजनयेदज्ञानाकर्मसंगिनां ॥ जोपयेत्सर्व
कर्माणिविद्वान्युक्तःसमाचरत ॥२..॥
:
गीतावाक्याथेवोधिनी: भापोटीको,
* अन्वयः
भारत यथा विद्वांसः कर्मणि सक्ताःसंतःकर्म कति
तथा चिकीर्षुः विद्वान् असक्तः सन् लोकसंग्रह यथास्या-
तथा कर्मकुर्यात् ॥ २५ ॥ युक्त विद्वान समाचन सन्
कर्मसंगिनों अज्ञानां बुद्धिभेदं न जनयेत् किंतु सर्वक
मर्माणि जोपयेत् ॥ २६ ॥ :, ",
टीका.
हे अर्जन! जैसे अविद्वान्लोग कर्ममे आसक्त.भये हुये क-
मे करे, तसेही कर्मके जानने की इच्छा करनेवाला कर्मफली
संग-रहित भया हुआ. लोकौंकोः याने मनुष्यों को कर्मसंग्रह,
जैसे होय तैसे कर्म करै. ॥ २५ ॥ ऐसे ज्ञानयोगयुक्त विद्वान
पुरुष सम्यक् प्रकार कर्मकर्ता हुआ कर्मासक्त अज्ञानीज-:
नोंको बुद्धिभेद न करै, अर्थात् कर्मविना आत्मदर्शनका.और-
भी उपाय है ऐसा न कहना चाहिये क्योंकि, सर्वः कर्मकरना
योग, है ऐसाही उपदेश देना.
प्रकृतेःक्रियमाणानिगुणैःकर्माणिसवेशः॥ अहं
कारविमूढात्माकर्ताऽहमितिमन्यते॥२७॥त
त्ववित्तुमहावाहोगुणकर्मविभागयोः॥गुणागुः
णेपुवर्ततइतिमत्वानसज्जते ॥२८॥
अन्वयः..
हे महाबाहोसर्वशः कर्माणि प्ररुतेः गुणैः क्रियमाणानि
संति तथापिअहंकार चिमूढारमा पुरुपः अहं का इति
मन्यते ॥२७॥तु गुणकर्म विभागयोः तत्ववित् पुरुपः गु-
• पा गुणेषु वर्तते इतिमत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. एतत् मे मतं अभ्यसूयंतः संतः न अनुतिष्टंति तान् सर्व ज्ञानविमूढान् अचेतसः नष्टान विधि ॥ ३२ ॥ टीका. रा मत जे मनुष्य ग्रहण करेंगे औजे केवल ग्रहण क- रनेकी श्रद्धाही राखेंगे भो जिनौने न ग्रहण किया औन श्रद्धावा- न है परंतु निंदामात्र नहीं करते हैं यहमत श्रेष्ठ है इतना कहते ही हैं वैभी कर्मकृत परमपुण्यसे रहित होयह ॥ ३१ ॥ और जे मनुष्य इसमेरे मतकोनिंदा करते हुये इसको ग्रहण नहींकरते हैं तिनको सर्वत्र ज्ञान विपयमे मूढ अचेत नौ नष्ट जाणी॥३२॥ मूलम. सदृशंचेष्टतेस्वस्याःप्रकृतेर्ज्ञानवानपि ॥ प्रकृतियांतिभूतानिनिग्रहःकिंकरिष्यति ॥३३॥ अन्वयः ज्ञानवान् अपि पुरुपः स्वस्या प्रकृतेःसदृशं चेटते अतः भूतानि प्रकृतियांति एवंसति निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ टीका. जो कहाकि कर्मस्वभावके स्वाधीन है उसीको स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानवान् पुरुपभी आपके स्वभावके सदृश चेष्टा करता है तौ आज्ञानको कहनाही क्या है इसीवास्ते भूतप्राणी मात्र आप आपकी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं जव ऐसा नेम है तो नि. ग्रह कैसे करे? ॥ ३३ ॥ .. . इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थेरागद्वेपौव्यवस्थितौ । तयोर्नवशमागच्छेत्तोहस्थपरिपंथिनौ ॥३४॥ अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. इंद्रियस्य इंद्रियस्य अर्थ रागदेषौ व्यवस्थितौ स्तः तयोः वर्शन आगच्छेत् हि तौ अस्य परिपंथिनौ भवतः॥३४॥ टीका. जब कर्म स्वभाव ही है अो उसका निग्रह नहीं तव उपाय क्या सो कहते हैं. कर्मेंद्रियऔ ज्ञानेंद्रिय इनके निमित्त राग औ देप यस्थित हैं अर्थात् इंद्रिय सुखमे प्रीति औ उनके सुखनमि- लनेमे द्वेष होता है तो इनके वशन होना क्योंकि यै राग औ देव दोनौं इस ज्ञानीके पूर्ण शत्रु हैं ॥ ३४ ॥ मूलम्. श्रेयान्स्वधर्मोविगुणःपरधर्मात्स्वनुष्ठितात् ॥ स्वधर्मेनिधनंश्रेयःपरधर्मोभयावहः ॥३५॥ अन्वयः स्वनुष्ठितात् परधर्मात् स्वधर्मः विगुणः श्रेयान स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मः भयावहः ॥ ३५ ॥ टीका. अब रागद्देपसे स्वधर्मका त्याग औ परधर्मका ग्रहण भी, होताहै,उसको निवारण करते हैं जैसे कि नेत्रादि इद्रियों की प्री- तिसे अर्जुन स्वधर्म त्यागने लगे कि.इस स्वज.को देखिके मेरे. को दया पाती है इसबास्ते में युद्ध न करौंगाभीख मागौंगा तो निवारण करते हैं अन्यकाधर्म अच्छाभी दीखै तो भी उस श्रेष्ठ परधर्मसे न्यनभी आपकाही धर्म कल्याणकारक है जो आपके धर्ममे मृत्यु होय तौभी कल्याण होयगा औदूसरेका धर्मसदाही भयकारकहै इसवास्ते जो पराये धर्ममे इस लोकका सुख भी मिले तौभी अपना धर्मोडिके दूसरा ग्रहण न करना अर्थात् आपके वर्णधर्ममे दृढ रहना यही कल्यागकारक है इहां कोई गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. धर्मशड़से शैव शाक्त वैष्णव इत्यादिक न समुझनाये तो उपा- लना इनसेतोजिस उपासनामे चमत्कार अपनेको दीखें याने देवता सिद्धिप्राप्ति होय सोई ग्रहण करना सो देवत्ता सिद्धिक- राना गुरूके स्वाधीनहैइसवास्ते प्रथम गुरूको देखना किइनके देवसिद्धी हैयानही जो न होइ तो दूसराही गुरु करना जोगुरू- हीके देवसिद्धि न होयगी तौ शिष्यको कहांसे मिलैगी?॥३५॥ मूलम्. अर्जुनउवाच ॥ अथकेनप्रयुक्तोऽयंपापंचरतिपूरु पः॥अनिच्छन्नपिवाष्र्णेयवलादिवनियोजितः॥३६॥ प्रन्वयः अर्जुन उवाच हे वार्ष्णेय अथ अयं पुरुपः अनिच्छन् अ- पिबलानियोजितःइव केन प्रयुक्तः पापंचरति ॥ ३६ ॥ टीका. जब भगवानने कहाकि स्वधर्मही श्रेष्ठहै औ दूसरेका धर्म भयकारक है सो सुनिक अर्जुन पूंछते भये कि, हे वाष्र्णेय याने हे कृपण जिसको यह निश्चय है कि स्वधर्म श्रेष्ठ है औ वहस्व- धर्म पूर्वक ज्ञानयोगमे प्रवर्तहुआ भया विषयौंको त्याग किया है तौभी यह पुरुष विपयोंकी इच्छा नहीं करते भी जैसे कोई जोवरी करावे ऐसे तिसका प्रेरण कियाहुआ, पापाचरण करता है ॥ ३६ ॥ मूलम् श्रीभगवानुराच ॥ कामएपःक्रोधएपरजोगुणसमुद्भ वः॥महाशनोमहापाप्माविदय नमिहवैरिणम्॥३७॥ अन्वयः श्रीभगवानुवाच यः एपः कामः सः एषः रजोगुणसमुः
৩৩
गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका,
द्रवः महाशनः महापाप्मा क्रोधः एनं इह वैरिणविधि ॥३७ ॥
टीका.
श्रीकृष्ण भगवान् उत्तरदेते हैं कि, जो यह कामहै सोई यहर
जोगुणजन्यकाम अति विपय सेवन करता हुआ वडा पापी
क्रोधरूप होता हैं इसको इस ज्ञानविपयमे शत्रु जानौ. ॥ ३५ ॥
मूलम्.
धूमेनाब्रियतेवन्हियथादर्शोमलेनच ॥
यथोल्वेनाटतोगर्भस्तयातेनेदमातम् ॥ ३८॥
अन्वयः
यथावन्हिःधूमेन आब्रियते च यथा आदर्शः मलेन आ-
वियते यथा गर्भः उल्वेन आवृतः यथातेन इदं प्रा-
वृतं ॥ ३८॥
टीका.
जैसे अग्नि प्रकारके आछादित होता है. जैसे दर्पन मैल
करिके श्राछादित होताहै औ जैसे गर्भ जरायु करिके आछा-
दित होताहै तैते ही यह जंतुनका ज्ञान उस काम करिके
आछादित है. ॥ ३८ ॥
मूलम.
आटतंज्ञानमेतेनजानिनोनित्यवैरिणा ॥ काम
रूपेणकौंतेयदुःपूरेणानलेनच ॥ ३९॥ इंद्रिया
णिमनोबुद्धिरस्याऽधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोह
यत्येपज्ञानमात्यदेहिनं ॥४०॥ तस्माचमि
द्रियाण्यादौनियम्यभरतर्पा ॥ पाप्मानंप्रजाहि
ह्येनज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥११॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अन्वयः हेकौंतेयज्ञानिनः नित्यवैरिणाच दुःपूरेण च अनलेन का- मरूपेणएतेन कामेनज्ञानं श्रावृतं ॥३९॥इंद्रियाणिमनः बुद्धिःअस्याःअधिष्ठानं उच्यते एपःएतैःज्ञानंपात्त्यदेहि- नं विमोहयति ॥ ४० ॥ तस्मात त्वं श्रादौ इंद्रियाणि नियम्य हे भरतर्षभ एनं ज्ञानविज्ञाननाशनं पाप्मानं हि प्रजहि ॥ ११ ॥ टीका जो पूर्वश्लोकमे कहाकि इदंबावृतं याने यह आच्छादितहै सो अब स्पष्ट देखाते हैं हे कुंतीपुत्र ज्ञानीकानित्यवैरि औ बडे दुःखसेभी पुरनेमे न आवै ऐसे अपरिपूर्ण ऐसा इच्छारूप जोय. ह काम इसकरिके ज्ञानआच्छादित है ज्ञानीका नित्य वैरिकहने मे मूर्खका प्रथम मित्रवत् है औ परिणाममे शत्रुहै औ ज्ञानीउस के परिणामको जानता है इसवास्ते आदि औ अंतमेभी शत्रु है इसवास्ते ज्ञानीका नित्य वैरी है ॥ ३९ ॥ अब इसके रहनेका स्थान कहते हैं कारणकि शत्रुका स्थान वगैरे जानेविना वह जी- तनेमे पाता नहीं इसवास्ते स्थानभी देखाते हैं सो यहकि सर्व इंद्रिय औ मन तथा बुद्धि य इसके रहनेकी जय हैं इसवास्तेयह 'काम इन इंद्रिय औ मन बुद्धिसे ज्ञानको आच्छादित करिकेदे- हधारीको मोहि लेता है॥ ४० ॥इसीवास्ते तुम प्रथम इंद्रियों को वश करिके फिरि हे अर्जुन! यह जो ज्ञान जो भात्मज्ञान नौ विज्ञान जो परमात्मज्ञानभक्ती इनका नाश करनेवाला ओ पापी याने पाप करनेवाला ऐसे कामको जीतौ ॥११॥ मूलम्. इंद्रियाणिपराण्याहुरिंद्रियेभ्यःपरंमनः ॥ मन -
.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
सस्तुपरावुद्धिर्योबुद्धेःपरतस्तुसः ॥ ४२ ॥ एवंबु
देंःपरंबुध्वासंस्तथ्यात्माननात्मना ।। जहिशत्रुम
हाबाहोकामरूपंदुरासदम् ॥४३॥
अन्वयः
इंद्रियाणि पराणिइतिपंडिताः आहुः इंद्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसः परा बुद्धिातुयःबुद्धेःपरतःसाएवसः कामः ॥४२॥
हेमहाबाहो एवं बुद्धेः परं कामरूपं दुरासदंशचुंबुध्वापा.
त्मानं आत्मना संस्तभ्य एनं जहि ॥ ४३ ॥
टीका.
अब ज्ञानके विरोधियोंमे प्रधान कहते हैं, ज्ञानविरोधियों मे
इंद्रिय प्रबल हैं ऐसा पंडितजन कहते हैं, इंद्रियोंसे मन प्रबल
है क्यों कि इंद्रियोंका निग्रह किया औ मनको वश न किया
तौवह मन इंद्रियोंको चलायमान जरूर करेगा नौ मनसे बुद्धि
प्रबल है कारण कि, मनकोभी बुद्धि चलायमान करती है औइस
बुद्धिसभी जो प्रबल है सो काम है कारणकी कामना बुद्धिको-
भी चलायमान करै है॥४२॥ हे अर्जुन! ऐसे बुद्धिसे प्रबल इस
कामरूप अति दुःसह शत्रुको जानिके फिर मनको बुद्धिसे करिके
रोकिके इस कामरूप शत्रुको जीतौ ॥ १३ ॥
इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायांयो
गशास्त्रेश्रीकृष्णार्जनसंवादेकर्मयोगोनामती
योऽध्यायः३॥
इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादरुतायां
भगवद्गीतावाक्यार्थबोधिनीभोपाटीफायांतृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, मूलम्. श्रीभगवानुवाच ॥ इमंविवस्वतेयोगप्रोक्तवान हमव्ययं ॥ विवस्वान्मनवेप्राहमनुरिक्ष्वाकवे ऽब्रवीत् ॥ १॥ एवंपरंपराप्राप्तमिमंराजर्पयो विदुः॥सकालेनेहमहतायोगानष्टःपरंतप ॥२॥ सवार्यमयातेऽद्ययोगःप्रोक्तःपुरातनः ॥ भक्तोऽ सिमेसखाचेतिरहस्यं तदुत्तमं ॥३॥ अन्वयः श्रीभगवान उवाच अहंइमं अव्ययं योगं विवस्वतेप्रोक्त- वान विवस्वान मनवेप्राह मनुः इक्ष्वाकवे अब्रवीत् ॥१॥ एवं परंपराप्राप्त इमं राजर्पयः विदुःहे परंतप स योगाइह महता कालेन नष्टः॥ २ ॥ सएव अयं पुरातनः योगः म या अद्यप्रोक्तः यतः त्वं मे भक्तः असि च सखा असि इति हियस्मात् एतत् उत्तम रहस्यं अस्ति ॥३॥ टीका. तीसरे अध्यायमे प्रकृतीसंसर्गिक मुमुक्षुको यकवारगीताज्ञान योगमे अधिकार नही हो सकता, इसवास्ते उसको कर्मही कर- ना कहा औ ज्ञानयोगीको भी कर्तृत्व त्याग पूर्वक कर्मही श्रेष्ठ कहा औशिष्टाचारके वास्ते भी कर्म करनाही श्रेष्ठ कहा अव च- तुर्थ अध्यायमे इसी कर्म योगकी कर्तव्यता समस्त जगत जू- दारके वास्ते मन्वंतरके आदिमे कहीथी सो दृढ करते हैं औ दसीके अंतर्गत ज्ञानयोग है इसवास्ते इसकी ज्ञानयोगाकारता देखायके कर्म योगका स्वरूप औ उसके भेद औ कर्म योगमे ज्ञानहीके अंशकी प्राधान्यता कहते है औ इसी प्रसंगसे भग- चानके अवतारके निश्चयको भी कहते हैं ॥ श्रीभगवान् कह
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
तेहैं कि, मैने यह योग तुझारेसे कहा सो केवल इसी कालमे
दुद्धके उत्साह बढानेको कहा; ऐसान समझौ क्योंकि मन्वंत-
रके आदिसे इसीमोक्षसाधन अखंडित योगको मैने विवस्वा-
न याने सूर्यको उपदेश कियाथा,सो सूर्य राजा श्राद्धदेव मनुको
कहते भये औमनूने इक्ष्वाकुसे कहा,ऐसेपरंपरासे प्राप्तहै इसको
इसीतरहराजऋषी जानते भये.हेपरंतप अर्जुन सो योग इसलो-
कमे श्रोताजनोंकी बुद्धिमंदतासे बहुत काल करिके नष्टभया-
था॥२॥सोई यह पुरातन योग मैने तुह्मारेको आज कहा क्यौं-
कि, तुम मेरे भक्तहौ औ सवाभी हो इसवास्ते कहा; नही तो
यह उत्तम वेदांतोदित रहस्य याने ज्ञान है,अर्थात् दूसरेको क-
हना न चाहिये, अपना होय उसीको कहना. ॥ ३ ॥
मूलम.
अर्जुनउवाच ॥ अपरंभवतोजन्मपरंजन्मविव
स्वतः॥ कथमेतद्विजानीयांत्वमादाप्रोक्तवानि
.
ति ॥४॥
अन्वयः
अर्जुन उवाच भवतः जन्म अपरं विवस्वतः जन्म परं
त्वं आदौ विवस्वते प्रोक्तवान् इति एतत् अहं कथं वि-
जानीयां ॥ ४॥
टीका,
अब इस प्रसंगमेभगवान के अवतारका यथार्थ निश्चय जा-
ननेको अर्जुन बोले की, तुह्मारा जन्म इस कालमे भया है, औ
सूर्यका जन्म अहाइस चतुर्युगीके आदिमे भया था, जो तुम
कहते हो कि मैने मन्वंतरकी आदिमे सूर्यसे कहा है, यह ऐसे
हम कैसे जाने? ॥ १ ॥
૮૨ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. मूलमू. श्रीभगवानुवाच ॥ बहूनिमेव्यतीतानिजन्मानि तवचार्जुन ॥ तान्यहवेमिसर्वाणिनत्ववेत्थपरं तप॥ ५॥ अजोऽपिसन्नव्ययात्माभूतानामीश्व रोऽपिसन् ॥ प्रकृतिस्वामधिष्ठायसंभवाम्यात्म मायया ॥६॥ अन्वयः श्रीभगवान् उवाच हे अर्जुन हेपरंतप मे जन्मानिच त- व जन्मानि बहूनि व्यतीतानितानि सर्वाणि अहंवेनि त्वं न वेत्थ ॥५॥ अस्यकारणमाह अजोपीति निश्चय अजः सन् अव्ययात्मासन भूतानां अपि ईश्वरः सन् स्वाप्रति अधिष्ठाय आत्ममायया संभवामि ॥ ६ ॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान् अब इसी उत्तरमे आपके अवतारका प्र. कार औ देहका निश्चय औजन्मका कारण भी कहते हैं,जैसेकि, श्रीकृष्णभगवान् बोलते भये हे अर्जुन! मेरे जन्म औ तुझारेजन्म बहुत व्यतीत भये हैं,तिन सवनको मै जानता हों औतुम नहीं जानते हो ॥५॥इसका कारण कहते हैं कि,निश्चय मै अजन्मा- हुआभया औएक रसहुआ भया भूत प्राणिमात्रका ईश्वर हु. आभया अर्थात् अजन्मत्व अव्ययत्व औ ईश्वरत्वको न छोड ता भया आपहीकी प्रकृतिका आश्रय करिके याने आपहीके स्वभावको प्राधित करिकेश्रापको जानता भया, स्वरूपग्रहण करता हों आपको भूलजाना यह जीवका धर्म है,इहां मायाश- दज्ञातवाचक हे,अर्थात् आपके ज्ञानसंयुक्त अवतार लेताहों. मेरेको ज्ञान नित्य है जीवनको अनित्य है सो श्रुति प्रसिद्ध है.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. ८३ परास्यशक्तिर्विविधैवश्रूयतेस्वाभाविकीज्ञानबलक्रियाचेति.॥६ मलम. यदायदाहिधर्मस्यग्लानिर्भवतिभारत ॥ अभ्यु स्थानमधर्मस्यतदात्मानंसृजाम्यहम् ॥७॥ अन्वयः हे भारत यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि अधर्मस्य अभ्यु. त्थानभवति तदा अहं आत्मानं सृजामि ॥ ७॥ टीका. अब अवतार प्रयोजन कहते हैं, जब जब वेदोक्त वर्णा- श्रम धर्मकी मलीनता औ अधर्मकी वृद्धि होती है तब तब मै कहे भये प्रकारसे देह धारण करता हौं, कुछ कालकाभी नियम नहीं है. ॥७॥ मूलम्. परित्राणायसाधूनांविनाशायचदुष्कृताम् ॥ धर्मसंस्थापनार्थायसंभवामियुगेयुगे॥८॥ अन्वयः साधूनां परित्राणाय च दुष्कृतां विनाशाय च धर्मसंस्था पनार्थाय युगे युगे अहं संभवामि ॥ ८ ॥ टीका सो अगाडी कहेंगे 'अनन्याश्रितयंतोमा' ॥ अपिचेत्सदुरा चारो भजते मामनन्यभाक् ॥ साधुरेवसमंतव्यःसम्यग्व्यवसितो हिसः॥ इत्यादि वाक्योंके प्रमाणसे जे मेरे अनन्य भक्त साधू उनकी रक्षाकेवास्ते औ दुटोंके विनाश करनेके वास्ते ऐसेही वेदोक्त धर्म स्थापन करनेके वास्ते मै देन मनुष्यादिक रूपोंसे युग युगमें अवतार लेताहीं. ॥ ८ ॥ ..
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गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
मूलम्.
जन्मकर्मचमेदिव्यमेवंयोवेत्तितत्वतः ॥ त्यका
देहपुनर्जन्मनैतिमामेतिसोर्जुन ॥९॥
अन्वयः
हे अर्जुन मै दिव्यंजन्मचदिव्यं कर्म एवं यः तत्त्वतः वे-
त्ति सः देहं त्यत्का पुनः जन्म न एति किंतु मा एति ॥ ९ ॥
टीका.
हे अर्जुन! मेरे दिव्य याने अप्रारूत्त अलौकिक जन्म औ
साधुरक्षणरूप दिव्यकर्म इनको जो ऐसे निश्चय कारके
जानता है सो इस देहको त्यगिके फिरी जन्म नहीं लेताहै,
क्योंकि मेरेहीको प्राप्त होता है. ॥ १ ॥
मूलम.
वीतरागभयकोधामन्मयामामुपाश्रिताः ॥ वह
वोज्ञानतपसापूतामनावमागताः॥१०॥
अन्वयः
वीतरागभयकोधाः मन्मयाः मां उपाश्रिताः एवं भूता-
वहवःज्ञानतएता पूताः मद्भाचं आगताः ॥ १० ॥
टीका.
व्यतीत भये हैं संसारिके अनुराग भय श्री क्रोधजिनके औ
मेरेमे हैं चित्त जिनके तथा मेरेही आश्रित ऐसे पुरुष बहुतसेइ-
समेरे स्वरूपज्ञानरूप तपसे पवित्र हुये मेरेको प्राप्त भये हैं.॥१०॥
मूलम्.
येयथामांप्रपद्यतेतांस्तथैवभजाम्यहं ॥ मम
वर्माऽनुवर्तनमनुप्पाःपार्थसर्वशः ॥ ११ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अन्वयः हे पार्थ ये मा यथा प्रपद्यते अहं तान् तथा एव भजामि यतः सर्वशः मनुष्याः मम वर्मानु वर्तते ॥ ११ ॥ टीका. हे पृथाकेपुत्र अर्जुन जे मनुष्य मेरेको जैसे भजते हैं उनको मैभी वैसाही भजता हौं, जैसे कि सकाम है के इंद्र, अग्नि इ- त्यादिक मेरे स्वरूपोंको भजते हैं तो मै उनको उसी रूपसे का.. मना देता हौ.क्योंकि,सर्व यज्ञका भोक्ता इंद्रादिरूपसे मही हों. अहंहिसर्वयज्ञानांभोक्ताचप्रभुरेवच ॥ इत्यादि प्रमाणोंसे औ जो निष्काम हैके सर्वेश्वर जानिके मेरेहीको भजाताहै, याने जो कुछ करताहै सो सब मेरेही अर्पण करताहै उसको मैभी सर्वो- स्कृष्ट मोक्ष देताहौं,कारण बेदमे जो मार्ग है वै मेरेही कहे भये हैं तो जो जो मनुष्य सकाम अथवा निष्काम कर्म करते हैं वै मे- रेही कहे प्रमाण चलते हैं, हसवास्ते उनके भजनानुकूल मैभी उनको भजता हौं, याने वैसाही फल देताही. ॥ ११ ॥ मूलम् कांक्षतःकर्मणांसिद्धियतइहदेवताः॥ क्षिप्रंहिमानुपेलोकेसिद्धिर्भवतिकर्मजा ॥१२॥ अन्वयः कर्मणां सिद्धिं कांक्षतः संतः जनाः इह मानुपे लोके देव- ताःयते हियस्मात् कर्मजासिद्धिःक्षिप्रं भवति॥१२॥ टीका. कर्म सिद्धिकीइच्छाकरते हुएमनुष्य इस मनुप्यलोकमे इंद्रा- दिकदेवताका यज्ञ करते हैं औ मेरेको स्वतंत्रतासे नहीं पूजते हैं. क्योंकि उनके कर्मकीसिदितत्कालहोती है औनिष्काम कर्मसे C गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, तत्काल सिद्धि दीखती नहीकेवल अंतमेमोक्षप्राप्तहोतीहै।१२॥ मूलम्. चातुर्वर्ण्यमयासृष्टंगुणकर्मविभागशः॥ तस्यकर्तारमपिमांविधयकर्तारमव्ययं ॥१३॥ अन्वयः गुणकर्मविभागशः मया चातुर्वर्ण्य सृष्टं तस्य कर्तारं अपि मा प्रकारं अव्ययं विद्धि ॥ १३ ॥ टीका. गुण औ कमौके विभाग करिके चारौवर्ण संयुक्त इस संसार- को मैने उत्पन्न किया है जैसेकि, सत्त्वगुण प्रधान ब्राह्मण उनके शम दमादिक कर्म सत्त्वरज प्रधानक्षत्रिय उनके शूरत्व युद्धादि- क कर्म रज तम प्रधान वैश्य उनके कृपिवाणिज्यादिक कर्म तमा गुणप्रधान शूदउनका तीनौवर्णकी परिचर्यारूपकर्म ऐसेगुणी कर्मके विभाग करिके जो चातुर्वण्यमैने उत्पन्न किया है उसका कर्ता जो मै तिसको अव्यय जानिके अकर्ता समुझौ.॥ १३ ॥ मूलम्. नमाकर्माणिलिप्यंतिनमेकर्मफलेस्टहा ॥ इति मायोऽभिजानातिकर्मभिर्नसवयते ॥१३॥ अन्वयः मा कर्माणि न लिप्यांनि मे कर्मफलेस्पृहान अस्तिइति यः मां अभिजानाति सः कर्मभिः न बघते ॥११॥ टीका. जो प्रथम कहाकी मेरेको अकर्ताजानी उसका कारण कहते हैकि मेरेको कर्म लिप्त नहीं होते हैं.क्योंकि, मेरेको कर्म फलकी तणानहीदसवास्ते मेरेकोकर्मबंधननही ऐसे जो मेरेकोजानता अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. है सोभी कर्मबंधनको प्राप्त नहीं होता है; अर्थात् जो कर्मबंध- न रहित जानिके मेरा भजन करता है सो मुक्त होताहै.॥१४॥ मूलम्. एवंज्ञात्वाकृतंकर्मपूर्वैरपिमुमुक्षुभिः॥ कुरुकभैं। तस्मात्वंपूर्वैःपूर्वतरंकृतं ॥१५॥ पूर्वैःमुमुतुभिःअपि एवं ज्ञात्वा कर्म कृतं तस्मात् त्वं अपि पूर्वैःकृतंपूर्वतरं कर्म एव कुरु ॥ १५ ॥ टीका. पूर्वकालके मन्वादिक मुमुक्षजनौंनेभी ऐसा जानिके क- म किया इसीवास्ते तुमभी पूर्व मुमुक्षुनका किया प्राचीन क- हा हुवाकर्मही करौ. ॥ १५॥ मूलम. किंकर्मकिमकर्मेतिकवयोऽप्यत्रमोहिताः॥ तत्तेकर्मप्रवक्ष्यामियज्ज्ञात्वामोक्ष्यसेऽश्चात् ॥१६॥ शुभात कर्मकि अकमकिं इति अत्र कवयःअपि मोहिताःतत् कर्म अहं ते प्रवक्ष्यामि यत् ज्ञात्वा अशुभात् मोक्ष्यसे॥ १६ ॥ , टीका. कर्म क्याहै नौ अकर्म क्या है इस विषयमे कवी जे सारा- सार विवेकी वैभी मोहको प्राप्त होते है, याने निश्चय करिके नहीं जानते हैं सो कर्म मै तुमसे कहौंगा जिसको जानिके संसारसे मुक्त होउगे. ॥ १६ ॥ कर्मणोह्यपिबोदव्यंबोदव्यंचविकर्मणः॥ अन्वयः
८८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
अकर्मणश्चवोद्धव्यंगहनाकर्मणोगतिः॥ १७॥
अन्वयः
हि यस्मात् कर्मणः स्वरूपं बोद्धव्यं च विकर्मणः श्वरू-
पं बोद्धव्यं च अकर्मणः स्वरूपं बोद्धव्यं तस्मात् क-
मणः गतिः गहना ॥ १७ ॥
टीका.
जिसवास्ते कि कर्म जो करने योग कर्म उसका स्वरूप
जानना चाहिये औ विकर्म जिस एक कर्ममे विविध प्रकार
हैं उसकाभी स्वरूपजानना चाहिये औ अकर्म जो व्यवसाया-
त्मिकाबुद्धिकरिके एक ईश्वराराधनार्थ निष्काम कर्म है उसका-
भी स्वरूप जानना चाहिये इसवास्ते कर्मकी गति दुर्गम है॥१७॥
मूलम्.
कर्मण्यकर्मयःपश्येदकर्मणिचकर्मयः॥
सवुद्धिमान्मनुष्येपुसयुक्तःकृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८॥
अन्वयः
RELI
यः कर्मणि अकर्म पश्येत् च अकर्मणि यः कर्म पश्येत्
सःमनुप्येपु बुद्धिमान सः युक्तः सः कृत्स्नकर्मकृत् ॥१८॥
टीका.
अब कम औ अकर्मका स्वरूप ज्ञातृत्व कहते हैं, जो मनुष्य
क्रियमाण कर्ममे अकर्म याने आत्मज्ञान देखे श्री अकर्म.जो
आत्मज्ञान तिसमे कर्म देखै जैसे कि, निष्काम कर्मसे प्रारम-
ज्ञान होताहै ौ आत्मज्ञान उस कमविना होतानहीं; इस-
वास्ते जो कर्मको ज्ञानाकार औं ज्ञानको कर्माकार समुझेसो
मनुष्य सर्व मनुष्योमे बुदिमान औ सोई योगी औ सोई
सर्व कर्मका करनेवाला है. ॥ १८ ॥
. . गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मूलम्. यस्यस समारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः॥ ज्ञानाग्निदग्धकर्माणंतमाहुःपंडितंबुधाः ॥ १९॥ अन्वयः यस्य सर्वे समारंभाःकामसंकल्पवर्जिताःस्युःज्ञानानि- दग्धकर्माणं तं वुधाः पंडितं आहुः ॥ १९॥ टीका. प्रत्यक्ष क्रियमाण कर्म उसकी ज्ञानाकारता कैसे होय सो कहते हैं, जिसके समय लौकिक वैदिक प्रारंभ कामना संकल्प- से रहित होय तव ज्ञानरूप अग्नि करिके दग्ध भये है, बंधनकार- क कर्म जिसके उसको विझन लोग पंडित कहते हैं. ॥१९॥ मलम्. त्यत्काकर्मफलासंगंनित्यतृप्तोनिराश्रयः॥ कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपिनैवकिंचित्करोतिसः॥२०॥ अन्वयः यः कर्मफलासंगं त्यत्का नित्यतृप्तःनिराश्रयः कर्मणिअ- भिप्रवृत्तः अपि सः किंचित् एव न करोति ॥ २० ॥ टीका. जो कर्मकी फलासक्तिको त्यागिके नित्य आत्मामे तृप्त प्रौ अस्थिर प्रकृतिमे आश्रय बुद्धि रहित व्हैके कर्म करता है तौभी सो कुछभी कर्म नहीं करता है क्योंकि, कर्मके मिससे ज्ञानही; का अभ्यास करता है. ॥ २० ॥ निराशीर्यतचित्तात्मात्यक्तसर्वपरिग्रहः॥ शारीरंकेवलंकर्मकुर्वन्नाप्नोतिकिल्विपं ॥२१॥ १२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. अन्वयः यःनिराशीः यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः सः केवलं शारीरं कर्म कुर्वन सन् किल्बिपं न आप्नोति ॥ २१ ॥ टीका, जो कर्मफलकी इच्छा रहित औ चित्त तथा मनको स्वाधीन किये होय औं केवल आत्माहीको प्रयोजनता करिके प्रकृति संबंधी वस्तूनमेममता रहित होय सो केवल शरीर संबं धी कर्म करता हुआ कर्म बंधनको नही प्राप्त होता है.॥२१॥ मूलम्. यहच्छालाभसंतुष्टोद्वंद्वातीतोविमत्सरः॥ समः सिद्धावसिद्धौचकृत्वापिननिवदयते ॥ २२ ॥ अन्वयः यदृच्छालाभसंतुष्टःद्वंद्वातीतविमत्सरःसिद्धौ च प्रसिद्धौ समः एवंभूतःपुमान् कर्म कृत्वा अपि न निबध्यते ॥ २२ ॥ टीका. आपहीसेप्राप्त भये पदार्थसे संतुष्ट सुखदुःख लाभ अलाभ हर्प शोक इत्यादिक द्वंद्वौ करिके रहित औ ईरहित तथा सि- द्विऔ असिद्धिमे समबुद्धि ऐसा पुरुप कर्म करिकभी बंधनमे आता नही. ॥ २२ ॥ ॥ मूलम. गतसंगस्यमुक्तस्यज्ञानावस्थितचेतसः॥ यज्ञा याचरतःकर्मसमग्रंपविलीयते ॥२३॥ गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः यज्ञाय कर्मा- चरतः जनस्य समयं प्रविलीयते ॥ २३॥ अन्वयः . गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, टीका, त्यागेहेंआत्म व्यतिरिक्त संग जिसने औ छोडी हैं संसार वासना जिसने औ आत्मज्ञानमे स्थिर है चित्त जिसका ऐसा ममुल जो यज्ञ निमित्त कर्म करता है तो उसी कर्मकरिके उस- के बंधन कारक प्राचीन कर्म नष्ट होते हैं. ॥ २३ ॥ मूलम्. ब्रह्मार्पणंब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौब्रह्मणाहुतं ॥ ब्रह्मै वतेनगंतव्यंमत्रकर्मसमाधिना ॥२४॥ अन्वयः ब्रह्मार्पणां ब्रह्महविः ब्रह्मानौ ब्रह्मणा हुतं तेन ब्रह्मक- मसमाधिना ब्रह्म एव गंतव्यं ॥ २४ ॥ टीका, प्रकृतिसे भिन्न प्रात्मस्वरूपके अनुसंधान पोग करिके क मका ज्ञानकारत्वकहा अब परब्रह्मके अंनुसंधानके योग क- रिके ज्ञानाकारत्व उसी कर्मयोगका कहते हैं, जिसकरिके अर्प ण करते हैं वहसुवा इत्यादिक वस्तु ब्रह्म हैं अर्थात् ब्रह्मका कार्य औ हव्य है वहभी ब्रह्म अग्निभी ब्रह्म हवन करनेवाला भी ब्रह्म, उसीने हवन किया ऐसे सर्वकर्मब्रह्मात्मक है इसवा- स्ते उसी ब्रह्म कर्मकीधारणासे ब्रह्मही प्राप्तहोने योग्य है.॥२४. मूलम. दैवमेवापरेयशंयोगिनःपर्युपासते ॥ ब्रह्मानावं परेयशंयज्ञेनैवोपजुव्हति ॥२५॥ अन्वयः अपर योगिना देवं एव यज्ञं पर्युपासते अपरे ब्रह्मानौ यजेन यज्ञं एवउपजुव्हति ॥ २५ ॥ . + १२ अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. टीका. ऐसे कर्मकी ज्ञानाकरता कहिके अव कर्मयोगके भेद कहते हैं, और केतनेक कर्मयोगी देवाराधनरूप यज्ञ अर्थात् देव प्रति- मादिक पूजन रूपही यज्ञ करते है और केतने ब्रह्ममय अग्नि मे यज्ञ साधन सामग्री करिके हवन रूप यज्ञ करते हैं.॥२५॥ मूलम. श्रोत्रादीनींद्रियाण्यन्येसंयमाग्निषुजुव्हति ॥ शब्दादीन्विपयानन्येइंद्रियाग्निपुजुव्हति ॥२६॥ अन्ये श्रोत्रादीनि इंद्रियाणिसंयमाग्निपु जुव्हति अन्ये ' शब्दादीन् विपयान इंद्रियानिषु जुव्हति ॥ २६ ॥ टीका. और केतनेक योगी श्रवण इत्यादिक इंद्रियौंको संयमरूप आनिमे हवन करते हैं अर्थात् श्रोत्रादि इंद्रियोंको शुभकर्मही मे लगाते हैं और केतनेक योगी शब्दादिविषयोंको इंद्रियरूप अग्निमे हवन करते हैं, याने मितभापणादिक करते हैं.॥ २६ ॥ मूलम् सर्वाणींद्रियकर्माणिप्राणकर्माणिचापरे ॥ आत्मसंयमयोगाग्नौजुव्हतिज्ञानदीपिते ॥२७॥ अपरे सर्वाणि इंद्रियकर्माणि च प्राणकर्माणि ज्ञानदी- पिते आत्मसंयमयोगानो जुव्हति ॥ २७ ॥ अन्वयः टीका. और केतनेक योगीसर्च इंद्रियोंके कमाको ौ प्राणोंके क- मौकोज्ञान करिके प्रदीत जोमनके संयमरूप अग्नितिसमे हो- गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मते हैं अर्थात् मन करिके इंद्रिय औ प्राणोके कमौकी प्रवृत्ति- को निवारण करनेमे यत्न करते हैं. ॥ २७ ॥ मूलम्. द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञायोगयज्ञास्तथापरे ॥ स्वाध्यायज्ञानयज्ञाचयतयःसंशितव्रताः ॥२८॥ अन्वयः अपरे योगिनः द्रव्ययज्ञाः अपरे तपोयज्ञाः अपरे योग- यज्ञाः अपरे संशितव्रताः यतयः स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः संति ॥ २८॥ टीका. और केतनेक योगी द्रव्य करिके दान देवप्रतिष्ठार्चनादि करूप यज्ञ करनेवाले है केतने कुछ चांद्रायणादिक तपरुप यज्ञ करनेवाले हैं केतनेक पुण्य क्षेत्रादिक योगरूप यज्ञ करनेवा- ले हैं; और केतनेक दृढव्रति यत्नशील बेदाध्ययन औ वेदार्थ विचाररूप यज्ञ करनेवाले हैं ॥ २८ ॥ . अपानेजुव्हतिप्राणप्राणेऽपानंतथापरे ॥ प्राणा पानगतीरुध्वाप्राणायामपरायणाः ॥२९॥ अ परेनियताहाराःप्राणान्प्राणेपुजुव्हति ॥ सर्वेऽ प्येतेयज्ञविदोयज्ञक्षपितकल्मपाः ॥ ३०॥ यज्ञ शिष्टाऽमृतभुजोयातिब्रह्मसनातनं ॥ नायंलो कोऽस्ययज्ञस्यकुतोऽन्यःकुरुसत्तम ॥३१॥ अन्वय अपरे नियताहाराः प्राणायामपरायणाः अपाने प्राणं गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. जुव्हती तथा अपरे एवंभूताः अपानं जुव्हति तथा अ- परे एवंविधाःप्राणापानगतीरुध्वा प्राणान् प्राणेषुजव्ह- ति एते सर्वे अपि यज्ञविदः यज्ञक्षपितकल्मपाः यज्ञशि- टाऽमृतभुजः सनातनं ब्रह्म यांति हे.कुरुसत्तम अयज्ञ- स्य अयं लोकः अपि न अस्ति तर्हि अन्यः कुत्तः॥१॥ टीका और केतनेक कर्मयोगी प्राणायाममे निष्ठा करते हैं वै पूरक रेचक, कुंभक,भेद करिके तीन प्रकारके हैं वै ऐसेकि निवत याने प्रमाण है पाहार जिसका जैसेकि पेटके दो भाग अन्नसे भरना तीसरा जलसे भरना चौथा वायुके संचारकेवास्ते खाली राख- ना ऐसे प्रमाणसे आहार करनेवाले नौ प्राणायाम कर्ममे तत्पर जे कर्मयोगी वैकेतनेक तो अपानवायुमे प्राणवायुको होमतेहैं याने पूरक करते हैं तैसेही केतनेक योगी प्राणवायुमेअपानयुक्त करते हैं याने रेचक करते हैं,तैसेही और प्राण औ अपान इन दोनोंकी गतिको रोकिके प्राणोंको प्राणनहीमे युक्त करते हैं याने कुंभक करते हैं, यै सवही यज्ञके जाननेवाले जो हैं उनके उन्ही यज्ञौं करिके पापनष्ट भये हैं औ यज्ञका शेप अमृतरूप पदार्थ सेवन करते हैं वै सनातन ब्रह्मको प्राप्त होयंगे हे अर्जुन! जो यातनी यज्ञोमैसे कोईसीभी यज्ञ नहीं करता है उसको य. ही लोक सुखकारक नहीं है तो परलोक तो कहांत होयगा?॥३१ मूलम्, एवंबहुविधायज्ञावितताब्रह्मणोमुखे ॥ कर्मजात् विदितान्सर्वानेवंज्ञाचाविमोक्ष्यसे ॥ ३२॥ अन्वयः एवं बहुविधाः यज्ञाः ब्रह्मणः मुखे वितता तान् सर्वान् गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. कर्मजान् विद्धि एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यले ॥ ३२ ॥ टीका. ऐसे बहुत प्रकारके यज्ञ वेदमे विस्तारसहित कहे हैं वै स- बकर्मसे होती हैं ऐसे जानौ ऐसे जानिके कर्मानुष्ठान करिके संसारसे मुक्त होउगे. ॥ ३२ ॥ मूलम्. श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञःपरंतप ।। सर्वक माऽखिलंपार्थज्ञानेपरिसमाप्यते॥ ३३ ॥ तद्वि द्विप्रणिपातेनपरिप्रश्नेनसेवया ॥ उपदेक्ष्यंतिते ज्ञानज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४॥ यज्ज्ञात्वानपु नमोहमेवंयास्यसिपांडव ॥ येनभूतान्यशेपेणद्र क्ष्यस्यात्मन्यथोमयि ।। ३५॥ अन्वयः हे परंतप द्रव्यमयात् यज्ञात् ज्ञानयज्ञः श्रेयान हे पार्थ सर्व अखिलं कर्म ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥ तत् ज्ञानं तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः तेत्वां उपदेक्ष्यति त्वं तेपांसव- या प्रणिपातेन परिप्रश्नेन विद्धि ॥ ३१ ॥हे पांडव यत् ज्ञानं ज्ञात्वा पुनः एवं मोहं नयास्यसि येन अशेपेण भूतानि आत्मनि द्रक्ष्यसि अथो मयि द्रक्ष्यसि ॥ ३५॥ टीका. हे अर्जुन द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि, सर्व फ- लसहित कर्मका अंत ज्ञानहीमे समान होता है अर्थात कर्म- भीज्ञानहीके प्राप्ति निमित्त है ॥ ३३॥ सो ज्ञान तत्त्वके जान- नेवाले ज्ञानी तुमको उपदेश देइँगे, जो आत्मविपयिक ज्ञान गीतावाक्याबोधिनी भापाठीका.' तुमको प्रथममैने कहा अविनाशितुतहिदि इहासे लैके एपाते भिहिताप्तांख्ये इहांतक सोईज्ञान तुम उन ज्ञानी जनौकी सेवा करिके औनम्र है। प्रश्न करो तव वै कहेंगे इहां श्रीकृष्णने यह वाक्य केवल ज्ञानी जनौंकी प्रशंसा निमित्त कहा है क्योंकि उ- पदेश किया है औ फिरि कहते है कि ज्ञानी उपदेश करेंगे ॥३४॥ हे पांडुपुत्र जो ज्ञान तुम जानिक फिरि ऐसे मोहको न प्राप्त हों उगे जिस करिके आपके आत्मस्वरूपमे सर्वभूत प्राणिमात्रको देखोगे अर्थात् ज्ञानाकारतासे प्रकृति भिन्न प्रात्मा सर्वसामान हैं इसपीछे सर्वको मेरेसे देखोगे जैसेकि प्रकृतिले न्यारे होनेसे मेरि समताको प्राप्त होते हैं सो अगाडिकहौंगा । इदंज्ञानमुपा श्रित्यममसाधर्म्यमागताः॥ सूत्रभी कहै है भोगमात्रसाम्यलिं- गाच ॥ श्रुनिभीप्रमाण है तथा विधान्पुण्य पापे विधूयनिरंजनः परमंसाम्यमुपैति ॥ इत्यादि प्रमाणोंसे नाम श्री रूप करिके रहित आत्माकी औ परमात्माके स्वरूपकी समता निश्चय होतीहै इसवास्ते प्रकृति करिके रहित सर्व आत्मवस्तु परस्पर समान हैं औ परमेश्वरके भीसमान हैं. ॥ ३५ ॥ मूलम्. अपिचेदसिपापेश्यःसर्वेभ्यःपापकृत्तमः॥ सर्वज्ञानप्लवेनैवजिनंसंतरिष्यसि ॥ ३६॥ अन्वयः अपि चेत् सर्वेभ्यः पापेभ्यः पापकृत्तमः असि तथापि ज्ञानप्लवेनएतत्सर्व वृजिनं संतरिष्यसि एव ॥ ३६ ॥ टीका. जो कदाचित् सर्व पापकरनेवालोंसे भी तुम बडे पापकारक
गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका.
होउगे तौभी ज्ञानरूपी नौका करिके समस्त पापसमुद्र-
को तरोगे यह निश्चय जानौ, ॥ ३६ ॥
मूलम्.
यथैधांसिसमिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ॥
ज्ञानाग्निःसर्वकर्माणिभस्मसात्कुरुतेतथा ॥३७॥
अन्वयः
हेअर्जुन यथा समिद्धः अग्निः एधासि भस्मसात् कुरुते
तथा ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते ॥ ३७ ॥
टीका.
हेअर्जुन!जैसे प्रज्वलित अग्नि इंधनको समग्र भस्म करताहै
तैसेही ज्ञानरूप अग्नि सर्व कमौको समग्र भस्म करताहै.॥ ३७॥
मूलम्.
नहिज्ञानेनसदृशंपवित्रमिहविद्यते ॥ तस्व
यंयोगसंसिद्धःकालेनात्मनिविंदति ॥ ३८॥
अन्वयः
दह जगति ज्ञानेनसदृशंपवित्रं हि अन्यत् न विद्यते तत्
ज्ञानं कालेन योगसंसिद्धः अत्मनि स्वयंविंदति ॥३८॥
टीका.
इस जगतमे ज्ञानके सहा पवित्र करनेवाला और नहींहै
सो ज्ञान कुछ काल करिके निष्काम कर्म करते करते कर्मसि
दिको प्राप्त भया पुरुप आत्मामे आपही प्राप्त होताहै याने
आपहीमे आप पावताहै. ॥ ३८ ॥
मूलम.
श्रद्धावांल्लभतेज्ञानंतत्परःसंयतेंद्रियः ।। ज्ञानल
व्ध्वापरांशांतिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
अज्ञश्याश्रधानश्चसंशयात्माविनश्यति ॥ ना
यंलोकोऽस्तिनपरोनसुखंसंशयात्मनः ॥ ४०॥
अन्वयः
तत्परः संयतेंद्रियः श्रद्धावान ज्ञानं लभते ज्ञानं लब्ध्वा अ-
चिरेण परां शांतिं अधिगच्छति ॥ ३९ ॥ च अज्ञः च अ-
श्रद्दधानः संशयात्मा नरः विनश्यति संशयात्मनः अयं
लोकः न अस्तिन परःलोकः अस्ति न सुखं अस्ति ॥४॥
टीका.
ज्ञानप्राप्तिमे है मन जिसका औ संयम कियाहै इंद्रियोंका
जिसने ऐसा श्रद्धावान् पुरुप ज्ञानको प्राप्त होताहै औ ज्ञानप्राप्त
हैके थोडेही कालमे परम शांतिको प्राप्त होताहै. अर्थात् मोक्ष
प्राप्त होताहै ॥३९॥ औ जो अज्ञानहै श्री श्रद्धा रहित है औ
जिसके मनमे संशय है, सोविनाशको प्राप्तहोताहै;याने संसार-
में भ्रमताहै जिसके मनमे संशय है उसको यहलोक औ पर-
लोक औ सुख इनमेले एकभी प्राप्त नहीं होताहै. ॥ १० ॥
मूलम्.
योगसंन्यस्तकर्माणंज्ञानसंछिन्नसंशयं ॥ आस्म
वंतनकर्माणिनिवनतिधनंजय ॥४१॥ तस्मा
दनानसंभूतंहत्स्थंज्ञानासिनात्मनः॥ छित्वैनंसं
शयंयोगमातिष्टोत्तिष्ठभारत ॥१२॥
अन्वयः
हेधनंजय योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयं आत्म.
चंतं कर्माणि न निवनति ॥४१॥ भारत तस्मात अज्ञा-
नर्मभृतं हृत्स्य एनं आत्मनः सायं ज्ञानातिना छित्त्वा
योगं आतिष्ठ तदयच उनिष्ठ ॥ ४२ ॥
गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. टीका. धनंजय! योग जो परमेश्वराराधनरूप निष्काम कर्म तिस करिके परमात्माके अर्पण कियेहैं कर्म जिसने औ आत्मज्ञा- नकरिके छेदन किये, संशय जिसने, ऐसे स्थिर मनवाले पुरु- पको कर्मबंधन नहीं करिसकते हैं॥४१॥ हे भारत! इसीवास्ते अज्ञानसे उत्पन्न औ हृदयमे स्थिर ऐसा जो यह मनका संशय तिसको आत्मज्ञानरूप खङ्गसे छेदन करिकै कर्मयोगमे स्थित होउ,ौ उस कर्मयोगकेवास्ते उठौ,अर्थात् क्षत्रियका कर्म युद्ध है इसवास्ते उठिके युद्ध करौ. ॥ ४२ ॥ इतिश्रीमनगवद्गीता सूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यास योगोनाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ ॥ इति श्रीमत्सुकल सीतारामात्मज पंडित रघुनाथ प्रसादरू- तायां श्रीमद्भगवद्गीता वाक्यर्थबोधिनी भापा टीकायां चतुर्थों ॥५॥ ॥ ७॥ मूलम. पंचमोत्राधा अर्जुनउवाच ॥संन्यासंकर्मणांकृष्णपुनर्योगं चशंससि ॥ यच्छ्रयएतयोरेकंतन्मेब्रूहिसुनि श्चितं ॥१॥ ऽध्यायः ॥ ४॥ अन्दयः अर्जुन उवाच ॥हे कृष्ण कर्मणां संन्यासं च पुनः योग शंससि एतयोः यत् एकं श्रेयःतन् सुनिश्चितं मे बेहि ॥१॥ टीका. चौ अध्यायमेकर्मयोग का ज्ञानाकारत्व पूर्वक स्वरूप भेद - १०० गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. औ ज्ञानांशहीका प्रधानत्व कहा श्री तृतीय अध्यायमे ज्ञानयो- गाधिकारीकोभी कर्मयोगहीके अंतरगत आत्मज्ञान है औ वह कर्मयोग सुगम है इसवास्ते कर्महीका श्रेष्ठत्वकहा. अब पाचवे अध्यायमे कर्मयोगको आत्मप्राप्तिका साधनत्व श्री ज्ञानयोग- को शीघ्र आत्मप्राप्ति कारकत्व औ कर्मयोगके अंतर्गत अकर्तृ- त्वका अनुसंधान प्रतिपादन करिके औ उसका मूलजो ज्ञान उ सका निर्णे करते हैं.अर्जुन श्रीकृष्णजीको पूंछते हैं कि, हेकृष्ण! कर्मका त्यागजो ज्ञानयोगसो कहते हो. औ फिरि कर्म योगकी भीप्रशंसा करते हो जैसकि,दूसरे अध्यायमे मुमुक्षुको कहाकिप्र- थम कर्म करै फिरि कर्म करनेसे अंतःकरण शुद्ध भये,पीछे ज्ञा- नयोग करिके आत्मदर्शनका उपाय करै औ तीसरे यथा चौथे अध्यायोंमे कहाकिज्ञान योगाधिकारदशा प्राप्तभये कोभी कर्म निष्ठाही श्रेष्ठ है वही ज्ञाननिष्ठाकी निरपेक्षा करिके आत्मप्राप्ती- का साधन है ऐसे कर्म निठाकीप्रशंसा करते हो, इसवास्ते जो इन दोनौमे कल्याणकारक होयसो निश्चय हमारेको कहौ. ॥१॥ मूलमू. श्रीभगवानुवाच ॥ संन्यासःकर्मयोगश्चनिःश्रेय सकरावुभौ ॥ तयोस्तुकर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिप्यते ॥२॥ अन्वयः श्रीभगवान् उवाच संन्यासःचकर्मयोगः एतौ उभौ निः श्रेयसफरौ स्तःतु तयोः योःमध्ये कर्मसंन्यासात् कर्म योगः विशिष्यते ॥ २॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान उत्तर देते हैं कि,संन्यास जो कर्मका त्याग
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. १०१
याने ज्ञान औ कर्मयोगजो कर्मकरना यै दोनौ कल्याणकारक
है, परंतु तिन्ह दोनौके मध्यमे ज्ञानयोगसे कर्मयोगविशेप है. ॥
मूलम्.
ज्ञेयःसनित्यसंन्यासीयोनद्वेष्टिनकांक्षति ॥
निवोहिमहावाहोसुखंबंधात्प्रमुच्यत ॥३॥
अन्वयः
हे महाबाहो यः नदृष्टि न कांक्षति सः निः नित्य-
संन्यासी ज्ञेयः सहि सुखं बंधात् प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
टीका,
जोकर्मयोगी उस कर्मयोगके अंतर्गत जो आत्मानुभव उ- .
सी करिके तृप्तहुआ भया नकोई पदार्थले हेप करताह औ न
किसी पदार्थकी इच्छा करता है,सुखदुःरवादि इंदौसे रहित हैड-
सीको नित्य संन्यासी जानिये सोई पुरुष
कर्म करते करते
सुख पूर्वक कर्मबंधनसे छूटता है. ॥ ३ ॥
मूलम्.
सांख्ययोगोप्टयग्वालाःप्रवदंतिनपंडिताः ॥
एकमप्यास्थितःसम्यगुभयोर्विदतेफलम् ॥४॥
अन्वयः
ये सांख्ययोगौ
पृथक
प्रवदंति तेवालाः पंडिताः नएक
अपि सम्यक् प्रास्थितः सन उभयोः फलं विंदते ॥४॥
टीका.
जो सांरव्य औ योगको अर्थात् ज्ञान औ कर्मयोगको
न्यारा कहते हैं वै मूर्ख हैं.पंडित नहीं हैं क्योंकि,दोनौका फल
श्रात्म दर्शन है उसबास्ते जो दोनो मेसे शास्त्रनमाणसे एकमेभी
दृढ रहै तो दोनीका फल जो आत्मदर्शन है सो पावै. ॥ ४ ॥
१०२ गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका.
मूलम.
यत्सांख्यैःप्राप्यतेस्थानंतद्योगैरपिगम्यते ॥
एकंसांख्यंचयोगंचयःपश्यतिसपश्यति ॥५॥
अन्वयः
. यत् स्थानं सांस्यैःप्राप्यते तत् योगैः अपि गम्यते अ
तः यः सांरख्यं च योगं एकं पश्यति सएव पश्यति ॥५॥
टीका,
जो स्थान अर्थात् आत्मदर्शन ज्ञाननिष्ठावालौंको प्राप्त
होता है सोई कर्म योगनिष्ठावालौंको प्राप्त होता है, इसीवा-
स्ते जो पुरुप सारख्य औ योग अर्थात् ज्ञानयोग औ कर्म-
योगको एकही फल देनेवाले जानिके दोनौको एकही समु-
झता है वही पंडित है.॥५॥
मूलम्.
संन्यासस्तुमहाबाहोदुःखमाप्तुमयोगतः ॥
योगयुक्तोमुनिब्रह्मन्नचिरेणाधिगच्छति ॥६॥
अन्वयः
हे महावाहा संन्यासः अयोगतः आतुं दुःखं तु योग
युक्तः मुनिः नचिरेण ब्रह्म अधिगच्छति ॥ ६ ॥
टीका.
हे महाबाहो! यहसंन्यास कर्मयोगविना प्राप्त होनेको बडा
दुःख है औ कर्मयोगी जो आत्मा मननशील है सो पुरुप अति
अल्पकालमे परमेश्वरकी साम्यताको प्राप्त होताहै. ॥ ६ ॥
मूलम.
योगयुक्तोविशद्वात्माविजितात्मानितेद्रियः ॥
सर्वभूतात्मभूतात्माकुर्वन्नपिनलिप्यते ॥७॥
: गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १०५ प्रन्धयः यः योगयुक्तः सः विशुद्धात्मा स एव विजितात्मा स एव जितेंद्रियः सः एव सर्वभूतात्मभूतात्मा अतःकर्म कुर्वन् अपि कर्मभिः नलिप्यते ॥ ७ ॥ टीका. जो कर्मयोगयुक्त है उसीका मन शुद्ध है कारण कि परमे- श्वर अराधनरूप शुद्धकत करता है इसवास्ते शुद्ध मन है औ उसी कर्ममे मनकी वृत्ति लगीरहती है जिसते अन्यत्र भ्रमती नही इसीसे मनकोभी जीतिलिया है औ जिसने मन जीता वह इंद्रियों कोभी जीतिचुका इसते जितेंद्रियभी है औ सर्व देवादिक भूत प्राणीमात्रके आत्माको अपनेही आत्मा सह. श देखता है इसवास्ते वह कर्मकी भयाभी कर्मफलौं करिके लिप्त नहीं होताहै अर्थात् बंधनको प्राप्त नहीं होता औ अ: ल्पही कालमे ब्रह्मको प्राप्त होताहै. ॥ ७ ॥ मलम् नैवकिंचित्कारोमीतियुक्तोमन्येततत्त्ववित् ॥ पश्यन्शृण्वन्स्पृशन्जिघनश्ननगच्छन्स्वपन्श्व सन् ॥ ८॥ प्रलपन्विसृजन्गृण्हन्नुन्मिपन्निमिप नपि ॥ इंद्रियाणींद्रियार्थपुर्वर्त्ततइतिधारयन्॥९॥ अन्वयः तत्त्वचित् युक्तः पुरुषः पश्यन् शृण्वन स्टशन जिघ्रन अ- भन् गच्छन् स्वपन श्वसन ॥ प्रलपन विसृजन गृहन् उन्मिपन् निमिपन् अपिइंद्रियाणि इंद्रियार्थेषु वर्तते दति धारयन् सन् अहंकिंचित एव न करोमि दति मन्येत ॥९॥ टीका.
१०४ गीतावाक्यार्थवाधिनी भाषाटीका. तत्व का जानने वाला कर्मयोगी पुरुप देखता हुवा सुनता हुआ स्पर्श करता हुआ सुंघत हुआ खाता हुआ चलता हुआ सोता हुआ श्वास लेता हुआ बोलता हुआछोडता हुआ गृह ण करता हुआ नेत्र खोलता हुआऔ बंद करता हुआ भी ई- द्रियां आप आपके विषयमे वर्तमान होरही हैं ऐसे धारना के रता हुआ मे कुछ भी नहीं करता हौं ऐसे मानता है. ॥६॥ मूलमू. ब्रह्मण्याधायकर्माणिसंगत्यकाकरोतियः ॥ लिप्यतेनसपापेनपद्मपत्रमिवांभसा ॥१०॥ अन्वयः य ब्रह्मणि कर्माणि आधाय संगत्यत्का करोति सः अं भसा पद्मपत्रं इव पापेन न लिप्यते ॥ १० ॥ टीका. जो पुरुष इंद्रियोंमे कौका आरोपण करिके औ फलासंग त्यागिके कर्म करता है सो जैसे कमलका पत्र जल करिके लि. त नही होता है तैसे कर्मकर्तृत्व अहंकाररूप पाप करिके लिन नहीं होता है; इहां कोई आचार्य ब्रह्म शब्दसे ईश्वरके विपे क- मधारण करना ऐसा अर्थभी कहते हैं,सो नहीं इहां ब्रह्मनामप्र- कृतीका है ममयोनिमहब्रह्म इत्यादि प्रमाणौसे अर्थात् प्रस्ती विकार देह ौ देह संबंधी इंद्रियां कर्म करनेवाली हैं. ॥१॥ मूलम् कायतमनसाबुद्दयाकेवलैरिंद्रियैरपि ॥ योगिनःकर्मकुर्वतिसंगत्यत्कात्मशुद्धये॥११॥ अन्वयः योगिनःसंगत्यत्का कायेन मनसा बुद्धया केवलैःइंद्रियैः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अपि आत्मशुद्धये कर्म कुर्वति ॥ ११ ॥ टीका. कर्मयोगी पुरुप स्वर्गादि प्राप्तिरूप फलसंग त्यागिके शरीर मन बुद्धि औ केवल इंद्रियों करिकेभी आत्मशुद्धीकेवास्ते अ- र्थात् आत्मगतप्राचीन कर्मबंध छूटनेकेवास्ते कर्म करते हैं.॥ ११ मूलम्. युक्तःकर्मफलंत्यत्काशांतिमाप्नोतिनष्ठिकीं ॥ अयुक्तःकामकारेणफलेसक्तोनिवद्भयते॥१२॥ अन्वयः युक्तः कर्मफलं त्यत्का नैष्टिकी शांति आप्नोति अयुक्तः कामकारेण फले सक्तः सन् निबध्यते ॥ १२ ॥ टीका. मात्मज्ञान प्राप्तिके वास्ते कर्म करनेवाला कर्मफलको त्या- गिके मनकी स्थिरतारूप शांतिको प्राप्त होताहै.अर्थात् आत्मा- नुभवको प्राप्त होताहै औ जो आत्मदर्शन विमुख है सोकर्मफ- लकी कामना करिके फलासक्त हुआ भया बंधनको प्राप्त होताहै. ॥ १२॥ मूलम. सर्वकर्माणिमनसासंन्यस्यास्तसुखवशी ॥ नवहारेपुरेदहीनैवकुर्वन्नकारयन् ॥ १३॥ अन्वयः वशी देही नवद्वारे पुरे सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य न कुर्वन् कारयन् सन सुख एव प्रास्ते ॥ १३ ॥ टीका. अब देहाकार परिणामको प्राप्तिभई जो प्रकृति उसमे कर्तृ- गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. त्वका स्थापन कहतेहै, जिसने चित्त वश कियाहै ऐसा देही या- ने जीवसो नव द्वार जिसके ऐसा यह पुरुप अर्थात् देहसो इस औ देहमे सर्वकर्मका मन करिके स्थापन करिके नवह करता नकारवाता भया सुखपूर्वक रहता है अर्थात् कर्म प्राचीन देहसं- स्कारते हैं कुछ अात्मस्वरूप संबंधि नहीं, दसवास्ते देहसंस्का- रिक कर्म देहसंबंधी इंद्रियोंके विपे हैं ऐता मनकरिके जान- ताहै सो अकर्तृत्वसे सुरखी है. ॥ १३ ॥ मूलम. नकर्तृत्वंनकर्माणिलोकस्यसृजतिप्रभुः ॥ नकर्मफलसंयोगस्वभावस्तुप्रवर्तते ॥ १४ ॥ अन्वयः प्रभुः अकर्मवश्यः आत्माश्रयं लोकस्य कर्तृत्वं न सृज- तिन कर्माणि मृजति नकर्मफलसंयोगसृजति किंतुस्व- भावः प्रवर्तते । १४॥ टीका. अब साक्षात् आत्माया स्वरूप कहते हैं प्रभु अर्थात् कर्मकी वश्यतामे नही याने स्वाभाविक स्वरूपमे स्थित ऐसा जो यह आत्मा सोदेव पशु मनुष्य स्थावरादिरूप करिकेप्रकृतिसंसर्गसे वर्तमान जो लोक तिसका देवादिक असाधारण कर्तृत्व नहीं उत्पन्न करता है औ न उन देवादिकोंके असाधारण कौ कोउत्पन्न करता है औन उनकमाँसे उत्पन्न देवादिक फलसंयो- गको उत्पन्न करता है क्योंकि, स्वभाव याने प्रकृतिवासनाहीप्र- वत होरही है अर्थात् अनादिकालसे प्रवृत्त पूर्व पूर्वकर्म जनित देवाद्याकार प्रकृति संसर्गकृत उन उन शरीरौंके अभिमानसे उ- त्पन्न जो वासना उस वासनाका किया हुआ यह कर्तृत्वादि:
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १०७ कसर्व है कुछ शुद्धचैतन्यकत नहीं है ॥ इहां कोई एक ऐसा अ- र्थ करते हैं कि,इस जीवके करीपनको औ कौंको औकर्मफ- लसंयोगको परमात्मा नहीं उत्पन्न करता है क्योंकि, जीवन- का स्वभावही वर्तमान है परंतु प्रकरण देखिके जो उचित होइ सो ग्रहण करना. ॥ ११ ॥ मूलम्. नादत्तकस्यचित्पापंनचैवसुकृतंविभु अज्ञा नेनावृत्तंज्ञानंतेनमुह्यतितवः ॥ १५॥ अन्वयः अयं विभुः कस्यचित् पापं न आदत्ते च सुरुतं एव न श्रादत्ते अज्ञानेनज्ञानं श्रावृतं तेन जनवः मुह्यंति ॥ १५॥ टीका. यह शुद्धचैतन्य विभु याने परिपूर्ण अर्थात संपूर्ण इच्छारहि- तहै इसवास्ते कोइका पापयाने पापजनित दुःखको लेतानही औ किसीकेसुरुतयाने सुरूतजन्यसुखकोभीलेता नही अर्थात किसीकेभी सुखको अथवा दुःखको दूरन ही करता है जैसेक्सिंव- धहेतु करिके पुत्रादिकौंको अपने जानिके उनके दुःख दूर होने केवास्ते उनका पाप लेता नहीं और प्रतिकूलताके हेतु कारके किसी शत्रुके मुख नाशकरनेकेवास्ते उसका सुरूतभी लेता नही इसवास्ते यह आत्मा किसीका संबंधी अथवा प्रतिकूल भीनही है क्योंकि, यह सर्व वासनाका कियाभयाहै अहोस्वभा वकी ऐसी क्या विपरीत वासना उत्पन्न होती है सो कहैं हैं कि, अज्ञान करिके ज्ञान माच्छादित होरहा दसवास्ते जीव मोह- को प्राप्त होते हैं अर्थात् अज्ञान जो ज्ञान के विरोधीपूर्वसंचित कर्म कर्म आपके फल प्रकट करने केवास्ते इतके ज्ञानको गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. आछादनकरि लेते हैं याने ज्ञानको संकुचित् करते हैं उन्ही क- मौकरिके देवादिक देहीका संयोग होताहै औ जो जो येहैं प्रा- होतीहैं उन्ही उन्ही शरीरों के अभिमानरूप मोह प्राप्त होता है. उसी देहाभिमान वासना औ उसीकी उचित कर्मवासना औवासनासेविपरीतदेहाभिमानीकर्मकामारंभहोताहै॥१५॥ इहां दूसरेकोई प्राचार्यऐसाअर्थ करते हैं कि, परमात्मा किसी फा पाप औ किसीका सुकृतभी नही गृहण करताहै तौभक्त- जन पूजनरूप यज्ञ दान जप होम इत्यादिक सुकृत क्यौं अर्प ण करतेहैं?इसपरकहेत हैं कि उनकाज्ञान प्रज्ञान करिके आच्छा. दितहै उसवास्ते वै अज्ञानसे मोहे भये कहते हैं कि यह कर्म ह- मनकिया औ करवाया सो भगवानके अर्पण होय इस प्रकार- के अर्थमे पत्रंपुष्पं फलंतोयं योमेभक्त्याप्रयछति ॥ तदहंभक्त्यु पहृतमभामिप्रयतात्मनः ॥ यत्करोपियदनालियज्जुहोपिद दासियत्॥ यत्तपस्यसिकौंतेयतत्कुरुप्वमदर्पणं ॥ इत्यादिकवा- क्यौसे विरोध आताहै इसवास्ते प्रथम जो अर्थ किया सोई श्रेष्ठहै ऐसा निश्चयहोता है. ॥ १५ ॥ मूलम्. ज्ञानेनतुतदज्ञानंयेपांनाशितमात्मनः॥ तेपामादि त्यवज्ञानप्रकाशयतितत्परं ॥ २६ ॥ अन्वयः येां आत्मनः ज्ञानेन तत् अज्ञानंनाशितं तेषां तत् प- रं ज्ञानं आदित्यवत् प्रकाशयति ॥ १६ ॥ टीका. जिनका आत्मसंबंधी ज्ञान करिके वासना जनित अज्ञानन- टहोताहै तिनका वह सौभाविक श्रेष्ठज्ञानसूर्यतुल्य सर्वप्रकाश करता है क्योंकि प्रथमभीकहाहैसर्वज्ञानप्लवेनैववृजिनं संतरिष्य गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, १०९ सि॥ज्ञानानिःसर्वकर्माणिभस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ॥ नहिज्ञानेनस दृशंपवित्रमिहविद्यते॥ इत्यादिक इहां तेषां याने तिनौंका कह नम भगवानने जीवोंका वहुत्व स्पष्टकहा प्रथम नत्वेवाहं जातु नासंनत्यनेमेजनाधिपाःइस कारणमे जो बहुत्व कहाथा उस में कोई एक शंका करतेथे कि, वहुत्व उपाधिकृत है अब इहां मु. क्तदशामेभी बहुत्व देखाया सो मुक्तदशामेतो उपाधिका गंध- भी नहीं है जहां उपाधिहै वहां मुक्तत्वका संभव नहीं होता है इस वास्ते जीव सौभाविक अनेक हैं ऐसा निश्चय भया॥१६॥ मूलम. तदुदयस्तदात्मानस्तन्निष्टास्तत्परायणाः॥ गच्छंत्यपुनरात्तिज्ञाननिषूतकल्मपाः ॥ १७॥ . अन्वयः तहृदयः तदात्मानः तनिष्ठाः तत्परायणाः ज्ञाननिधूत कल्मपाः अपुनरावृत्तिंगच्छति ॥ १७ ॥ टीका. जो आत्मज्ञान कहा उसीमे जिनकी बुद्धिहै औ उसीमे म- न है उसीमे निष्ठा है अर्थात् उसी अभ्यासमे निरत हैं श्री उसीको श्रेष्ठ ग्रह जानते हैं ऐसे अभ्यास किये भये ज्ञान क- रिक नष्ट भये हैं पाप जिनके ऐसे पुरुप संसारसे मुक्त व्है के फिरि जन्म नहीं लेते हैं ॥ १७ ॥ मूलम्. विद्याविनयसंपन्नेब्राह्मणेगविहस्तिनि ॥ शुनिचैवश्वपाकेचपंडिताःसमदर्शिनः ॥ १८॥ विद्याविनयसंपन्नेब्राह्मणे च गवि च हस्तिनि च शुनि अन्वयः
३१० गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
च श्वपाके पंडिताः समदर्शिनः संति ॥ १८ ॥
टीका.
विद्या श्री विनय करिके संयुक्त जो ब्राह्मण औ गाइ हाथि
कुत्ता औ चांडाल इनमे पंडितलोग आत्माको समान देखते
हैं. क्योंकि यह विषमतातौ शरीरोंमे है,आत्मातौ ज्ञानाकार
से सर्व समान है. ॥ १८॥
मूलम्
इहैवतैर्जितःसर्गोयेपांसाम्येस्थितमनः॥
निर्दोपहिसमंब्रह्मतस्माद्ब्रह्मणितेस्थिताः॥ १९ ॥
अन्वयः
येपां मनः साम्ये स्थितं तैः इह एव सर्गः जितः हि-
यस्मात् ब्रह्म निर्दोपं समं अस्ति तस्मात् ते ब्रह्मणि
स्थिताः ॥ ११ ॥
टीका
जिनकामन पूर्वोक्त समतामें स्थित है तिनौने इसी लो-
कमे रहिके संसार जीता है क्योंकि, ब्रह्मप्रकृति संसर्ग रहित
सर्वमे समहै इसीवास्ते जिनकामन समतामे है वै ब्रह्मप्राप्ति
निमित्त स्थितयाने मुक्त है. ॥ १९ ॥
मूलम्.
नप्रहृष्येत्प्रियंप्राप्यनोद्विजेत्प्राप्यचाप्रियम् ॥
स्थिरबुद्धिरसंमूढोब्रह्मविब्रह्मणिस्थितः ॥२०॥
अन्वयः
प्रियंप्राप्य न प्रहृष्येत् च अप्रियं प्राप्य न उहिजेत् एवं
भूतःस्थिरबुद्धिः असंमूढः ब्रह्मवित् ब्रह्मणि स्थितः॥ २० ॥
. गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. टीका. भव जिसप्रकार करिके अवस्थित कर्मयोगको समदर्शन रूप ज्ञानका फल होता है सो कहते हैं. प्रियवस्तुपायके हर्पित होय औ अप्रिय पाइके घवडाइनही ऐसा कर्मयोगी स्थिर बुद्धि अर्थात् स्थिर जो आत्मा उसमे है बुद्धि जिसकी इसी सेवह मूढनही इसीसे ब्रह्मका ज्ञाता है औ ब्रह्म प्राप्तिकेवा- स्ते स्थित है.॥२०॥ मूलम्. वाह्यस्पर्शेष्वसत्तात्माविंदत्यात्मनियत्सुखं ।। सब्रह्मयोगयुक्तात्मासुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥ वाह्यस्पर्शेषु असक्तात्मा आत्मनियत् सुखंतत् विंदति सःब्रह्मयोगयुक्तात्मा अक्षयं सुखं अश्नुते ॥ २१ ॥ अन्वयः टीका. वाह्यस्पर्श अर्थात् आत्माके सेवाय जो और इंद्रियौंको विषय हैं उनमे जिसकामन नहीं वह आत्मामे जो सुख है सो पावता है, सोई ब्रह्मप्राप्तिके अभ्यासमे मन लगायेहुये अक्षय सुख अर्थात् मोक्षको प्राप्त होताहै. ॥ २१ ॥ मूलम्. येहिसंस्पर्शजाभोगादुःखयोनयएवते ॥ आयंतवंतःकौंतेयनतेपुरमतेबुधः ॥ २२ ।। अन्चयः हे कौंतेय ये संस्पर्शजाः भोगाः ते दुःखयोनयः आयंत वंतः एव तेषु बुधः न रमते ॥ २२ ॥ टीका हे अर्जुन जो विषय इंद्रियस्पर्शजन्य भोग है वै दुःख ११४ गातावाश्यायवाचना पाटाका. अन्वयः वाह्यान् स्पर्शान वहिः कृत्वा च चक्षुः एव भ्रुवोः अं- तरे कृत्वा नासाभ्यंतरचारिणी प्राणापानौ समौ कृ- त्वा यः मुनिः यतेंद्रियमनोवुद्धिः मोक्षपरायणः वि- गतेच्छाभयकोधः सः सदा मुक्तः एव ॥ २८ ॥ टीका. वाह्य इंद्रियोंके जो विपय तिनको त्यागिके नेत्रौंकी दृष्टी भुकुटीके मध्यभागमें करिके औ नासिकाहीमें संचार करें ऐ- से प्राणापान अर्थात् श्वासोच्छासको धीरे धीरे सम चलायक- रिके जो मननशील पुरुप इंद्रिय, मन, बुद्धि इनको वश करै मो- क्षहीमें मन लगाव औ इच्छा, भय, क्रोध इनसे रहित होय सो सर्वकालमें मुक्तही है. ॥ २७ ॥ २८ ॥ मलम्. भोक्तारंयज्ञतपसांसर्वलोकमहेश्वरम् ॥ सुहृदं सर्वभूतानाज्ञात्वामांशांतिमृच्छति ॥२९॥ अन्वयः यज्ञतपसां भोक्तारं सर्वलोकमहेश्वरं सर्वभूतानां सुख- दं मां ज्ञात्वा शांतिं ऋच्छति ॥ २९ ॥ टीका. अतिसुगम उपाय कहते हैं. यज्ञौ तपका भोक्ता सर्व लो. कोंके ईश्वरोंकाभी ईश्वर(तमीश्वराणांपरममहेश्वरं. अर्थ ईश्वरौं काभी ईश्वर होय उसको महेश्वर कहते हैं) औसर्व प्राणी मात्रनकासुहृद जैसा मेरेको जानिके शांतिको प्राप्त होताहै॥२९ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेकर्मसंन्यासयो .
D गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. ११५ गोनाम पंचमोऽध्यायः॥५॥ इति श्रीमत्सुकल सीतारामात्मज पंडित रघुनाथप्रसा- द कृतायां श्रीमद्भगवद्गीता वाक्यार्थवोधिनी भापाटी. कायां पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥ मूलम्. अनाश्रितःकर्मफलंकार्यकर्मकरोतियः॥ ससंन्यासीचयोगीचननिरग्निर्नचाक्रियः ॥१॥ अन्वयः यः कर्मफलं अनाश्रितः कार्य कर्म करोति सः संन्यासी सच योगी यःनिरग्निः च यः प्रक्रियः सः संन्यासीन- भवति च योगी न भवति ॥ १ ॥ टीका. कर्मयोगतौ कहा अब ज्ञानकर्मसाध्य आत्मदर्शनरूप यो- गाभ्यास कहते हैं, तहां कर्मयोगकी अपेक्षारहित योगसाधनत्व- को दृढ करनेको ज्ञानाकार कर्मयोगको योगशिरोमणि कहते हैं, अनाश्रितः इत्यादि करिके जो पुरुप कर्मके स्वर्गादिप्राप्तिरूप फलका आश्रय न करिके केवल ईश्वराराधनरुप करनेको योग्य कर्म अर्थात् वर्णाश्रमयोग्य कर्म करता है साई संन्यासी औसो- ई योगी है औ जो अग्निकार्यको त्यांगता है औ जो कर्म त्या- गताहै सोसंन्यासीभी नही.औ योगीभी नही. इहां एक अभि- प्राय औरभी दीखता है कि, कलियगमें संन्यासका निर्वाह होता नहीं, घर छोडिके मठ बाधते हैं स्त्री विवाहते नही तो व्यभिचा- री होते हैं छोकरोंकी जगह शिष्य करते हैं औरभी सामग्री गृह- स्थासे अधिक राखिके केवल प्रपंचनिरत होते हैं इसवास्ते भ- गवानने कर्मफल त्यागिके कर्म करनेवालेहीकी संन्यासी कहा - ११२. गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. के कारण औ पाद्यंतवान हैं अर्थात् होते जाते रहते हैं याने अल्प सुखदायक हैं इसीवास्ते तिन भोगौं मे ज्ञानीजन प्री- ति नहीं करते हैं. ॥ २२ ॥ मूलम्. शनातीहैवयःसोप्राक्शरीरविमोक्षणात् ॥ कामक्रोधोद्भवंवेगसयुक्तःससुखीनरः ॥२३॥ अन्वयः यशरीरविमोक्षणात् प्राक् कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुंश- कोति सः नरः इह एव युक्तः सन सुखी स्यात् ॥ २३ ॥ टीका. जो मनुष्य शरीर त्यागसे प्रथम काम श्री क्रोधका वेग सहनेको समर्थ होता है, सोई मनुष्य इसी लोकमे योग- युक्त भया हुआ सुखी होता है. ॥ २३ ॥ मूलम्. योऽतःसुखोतरारामस्तथांतर्योतिरेवयः॥ सयोगीब्रह्मनिर्वाणंब्रह्मभूतोऽधिगछति ॥२४॥ अन्वयः यः अंतःसुखः अंतरारामः तथा यः अंतज्योतिः सः एवयोगी ब्रह्मभूतः सन् ब्रह्म निर्वाणं अधिगच्छति ॥ २४ ॥ टीका. जो आत्माहीमे सुखी औ आत्माहीमे रमिरहा है औ आ- रमाहीका प्रकाश याने आत्माहीकाज्ञान है जिसको सोईऐसा योगिब्रह्मप्राप्तिकेउपायमेलगाहुआमोक्षको प्राप्त होताहै.॥२४॥ मूलम. लभंतेब्रह्मनिर्वाणम्पयःक्षीणकल्मपाः॥
११३
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
छिन्नद्वैधायतात्मानःसर्वभूतहितेरताः॥२५॥
अन्वयः
छिन्नधाः यतात्मानः सर्वभूतहितेरताः क्षीणकल्मपाः
ऋपयः ब्रह्मनिर्वाणं लभते ॥ २५ ॥
टीका.
शीत उष्ण सुख दुःख लाभ अलाम इत्यादिक जिनके नष्ट
भये हैं औजिनका मन आत्मविश्यमें ही लगा है औ सर्वभूत
प्राणीमात्रके हितमें निरत है इत्यादिकौंकरिके जिनके पाप
नष्ट भये हैं ऐसे ऋपी मोक्षको प्राप्त होते हैं. ॥ २५ ॥
मूलम्.
कामक्रोधवियुक्तानांयतीनांयतचेतसाम् ॥
अभितोब्रह्मनिर्वाणंवर्ततेविदितात्मनां ॥२६॥
अन्वयः
कामक्रोधवियुक्ताना यतीनां यतचेतसां विदितात्मनां
ब्रह्मनिर्वाणं अभितः वर्तते ॥ २६ ॥
टीका.
पुरुप काम औकोधकरिके रहित हैं औ ब्रह्मप्राप्तिके वा-
स्ते यत्न करिरहे हैं औ चित्तकोभी अपने वशमें राखते ऐसे .
आत्मज्ञानी पुरुषोंको मोक्ष सर्व तरहसे वर्तमानही है. ॥ २६ ॥
मूलम.
स्पर्शान्कृत्वावहिर्वाह्यांश्चक्षुश्चैवांतरेन्चुवोः ॥प्रा
णापानौसमौकृत्वानासाभ्यंतरचारिणी॥२७॥
यतेंद्रियमनोबुदिमुनिर्मोक्षपरायणः ॥ विगते
च्छाभयक्रोधोवःसदामुक्तएवसः ॥२८॥
. गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. है औ अग्निकर्म तथा नियाके त्यागनेको निपिद्ध किया है. ॥१॥ मूलम्. यंसंन्यासमितिप्राहुर्योगंतंविद्धिपांडव ॥ नह्यसंन्यस्तसंकल्पोयोगीभवतिकश्चन ॥२॥ अन्वयः हे पांडव यं संन्यासं इति प्राहुः त्वं तं योगं विद्धि हिय- स्मात असंन्यस्तसंकल्पःकश्चन योगीन भवति ॥२॥ टीका. कहा जो कर्मयोग उसमें ज्ञानभी है ऐसा कहते हैं. हे पां- डुपुत्र अर्जुन! जिसको संन्यास कहते हैं अर्थात् ज्ञानयोग याने आत्मनिश्चयज्ञान कहते हैं, तुम उसीको कर्मयोगभी जानी क्योंकि, संकल्पका त्याग अर्थात् प्रकृतिजन्यदेहके विषे आत्म भ्रांतिका त्याग कियेविना कोईभी योगी नही होताहै. तात्पर्यः कर्म करिके ईश्वरार्पण करना वही संन्यास औ वही योग है; यहीसे संन्यासी श्री योगी होता है. ॥ २ ॥ मूलम् आरुरुक्षोर्मुनेर्योगकर्मकारणमुच्यते ॥ योगारूढस्यतस्यैवशमःकारणमुच्यते ॥३॥ अन्वयः योगं आरुरुक्षोः मुनेः कर्म कारणं उच्यते तस्य एव यो. गारूढस्य शमः कारणं उच्यते ॥ ३ ॥ टीका. जो योग याने आत्मदर्शन उसकी प्राप्तिकी इच्छा करनेवा- ला हैंउसको कर्मही कारण है औ वही जब योगारूढ भया या ने आत्मदर्शनको प्राप्त भया तवतक कर्मही करना योग्यहै सो गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, ११७ अगाडी कहेंगे. प्रयाणकालेमनसाचलेनभक्त्यायुक्तोयोगवलेन चैव इत्यादि ॥ ३॥ मूलम्. यदाहिनेंद्रियार्थेपुनकर्मस्वनुपज्जते ॥ सर्वसंक ल्पसंन्यासीयोगारूढस्तदोच्यते ॥४॥ अन्वयः यदा इंद्रियार्थेषु च तत्संबंधिकर्मसु न अनुपजते तदा सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढः उच्यते ॥४॥ टीका. अब योगारूढ कब होयगा सो कहते हैं. जब इंद्रियोंके वि- पय औ उनसंबंधी कौमें न आसक्त होय तब सर्व संकल्पों का त्याग किया है जिसने याने वासनारहित योगारुढ होता है इसवास्ते जो योगारूढ होना चाहता है तो प्रथम जबलौ विषयवासना है तौलौ कर्मही करना. ॥ ४ ॥ मूलम्. उद्धरेदात्मनात्मानंनात्मानमवसादयेत् ॥ आ स्मैवद्यात्मनोवंधुरात्मैवरिपुरात्मनः॥५॥ अन्वयः प्रात्मना आत्मानं उद्धरेत् आत्मानं न अवसादयेत् हि यतःअात्मा एव प्रात्मनःवंधुःआत्मा एव आत्मनःरिपु ॥५ टीका. अब यह कहते है कि, कैसेभी करिके मुक्तिसाधन करना यो- ग्य है. मनकरिके आपका उद्धार करना औ आपका घात या ने जिसते अधोगती होय सोन करना क्योंकि, यह मनही या पना मित्र है औ यही शत्रु है. तात्पर्य कि जब विपयरहित ११८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ईश्वरपरायण भया तब मित्र है औ विषयासक्त शत्रु है ॥ ५॥ मूलम. वंधुरात्मात्मनस्तस्ययेनात्मैवात्मनाजितः॥ अनात्मनस्तुशत्रुत्वेवर्तेतात्मैवशत्रुवत् ॥ ६ ॥ अन्वयः येन आत्मना एव आत्मा जितः तस्य प्रात्मनः आत्मा बंधुः तु अनात्मनः भात्मा एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तेत॥६॥ टीका. जिसने आपके मनको आपही जीता है वह मन उसका बंधु है अर्थात् मित्र है औ जो अजितद्रिय है उसका वही म- न शत्रुसरीखा शत्रुत्वमें वर्तमान रहता है. ॥ ६ ॥ मूलम. जितात्मनःप्रशांतस्यपरमात्मासमाहितः। शी तोष्णसुखदुःखेपुतथामानापमानयोः॥७॥ अन्वयः शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः जितात्मनः प्रशांतस्य पात्मा पर समाहितः अस्ति ॥ ७॥ टीका अव योगारंभके योग्य अवस्था कहते हैं शीत उष्ण सुख दुःख मान औ अपमान इन विषयों में मन जीतनेवाले शांत का आत्मा उत्कृष्ट औ सावधान रहता है ॥ ७॥ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्माकूटस्थोविजितेंद्रियः ॥. य तइत्युच्यतेयोगीसमलोष्ठाश्मकांचनः ॥८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, ११९ अन्वयः ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थः विजितेंद्रियः समलोप्टा इमकांचनः एवं भूतः योगी युक्तः इति उच्यते ॥ ८॥ टीका, आत्मविपयिक ज्ञानको ज्ञान कहते हैं औउसआत्माको प्र- कृतिसे विलक्षण जानै उसको विज्ञान कहते हैं इन दोनौं ज्ञान विज्ञानकरिके तृप्त होय मन जिसका औ कूटस्थ याने देवादि. क शरीरों में आत्मा समान है ऐसा जानिके निर्विकार इसीसे जितेंद्रिय औ जितेंद्रियत्वेस निरपेक्ष निरपेक्षत्व समान है ठीकरा पापाण औ सुवर्ण जिसके ऐसा योग युक्त कहाता है अ- र्थात् आत्मदर्शनरूप योगाभ्यासके योग्य कहाता है.॥८॥ मूलम. सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यवंधुपु ॥ साधु प्वपिचपापेपुसमबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥ अन्वयः सुहृन्मित्रार्युवासीनमध्यस्थडेप्यबंधुपु च साधुपु च पा- पेपु प्रापि यः समधुद्धिः सः विशिष्यते ॥ ९ ॥ टीका, सुखद जो स्वभावहीसे वयस् वगैरेभी न देखें औ हित करै सो सुहृद औ जो समान वयस् देखिके परस्पर प्रीतिसे हित करें सो मित्र औप्रीतिवेरसे तथा हित अहितसे रहित होयसो उदा- सीन औजोजन्मसे प्रीति र हिताहितसे रहितसोमध्यस्थ जो जन्मस्ते अहितकारक सो द्वेष्य जो जन्मसे हितकारक सो बंधु जोधर्मशील सोसाधु पाप करनेवालासो पाप इन सबके विप समवृद्धि कारणकि जिसको आत्मव्यतिरिक्त किसीभी प्र.
१२० गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. योजन नहीं सो किसीसे वैर औ प्रीति क्यों करेगा वह तो केव- ल आत्माहीमें तृप्त है सो योगी मुक्तनमेंभी श्रेष्ठ है- ॥ ९ ॥ मूलम्. योगीयुंजीतसततमात्मानरहसिस्थितः॥ ए काकीयतचित्तात्मानिराशीरपरिग्रहः॥१०॥ अन्वयः एकाकी यतचित्तात्मा निराशी अपरिग्रहः योगी रहसि स्थितः सन सततं प्रात्मानं युंजीत ॥ १० ॥ टीका. अकेला नौ चित्त तथा मनको वश कियेहुये औ आत्मा विन औरवस्तुको प्राशारहित तैसेही आत्मध्यतिरिक्त वस्तु विपे ममतारहित ऐसा योगी याने कर्मयोगी एकांतमें बैठा हु- आनिरंतर नित्यप्रति आत्मस्वरूपचिनवन कियाकरै.॥१०॥ अन्वयः शुचौंदेशेप्रतिष्ठाप्यस्थिरमासनमात्मनः ॥ ना त्युच्छ्रितंनातिनीचंचैलाजिनकुशोत्तरं ॥ ११ ॥ तत्रैकाग्रंमनःकृत्वायतचित्तेंद्रियक्रियः ॥ उप विश्यासनेयुंज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥१२॥ शुचौ देशे न अति उच्छ्रितं न अति नीचं चैलाजिन- कुशोचरं स्थिरं पात्मनः आसनं प्रतिष्ठाप्य तत्र प्रासने उपविश्य एकायं मनः कृत्वा यतचिनेंद्रियक्रियः श्रात्म विशुद्धये योग युंज्यात् ॥ ११ ॥ १२ ॥ टीका. अब योगाभ्यासमें आसन नियम कहते हैं. जैसे कि पवित्र
गीतावास्यार्थबोधिती भापाटीका. १२१
स्थानमें न अतिउँचा न नीचा औ प्रथम कुशासन तिसपर
मृग इत्यादिका चर्भ तिसपर वस्त्र ऐता अचल आपका प्रासन
स्थापित करिके तिसपर बैठेिके एयाय मन करिके चित्त औ
इंद्रियोंकी क्रिया स्ववश कियेहुये आत्माका संसारवंध छूट
नेकेवारते योगाभ्यास करै ॥ १२. ॥
मूलम.
समंकायशिरोग्रीवंधारयनचलंस्थिरम् ॥ संप्रे
क्ष्यनासिकास्वंदिशश्चानवलोकयन् ॥१३॥
प्रशांतात्माविगतभीब्रह्मचारिव्रतेस्थितः ॥ म
नःसंयम्यमञ्चित्तोयुक्तआसीतमत्परः ॥ १४ ॥
अन्वयः
कायशिरोग्रीवं अचलं स्थिरं समं धारयन् सन् स्वं ना.
सिकायं संप्रेक्ष्य च दिशः अनवलोकयन सन् प्रशांतात्मा
विगतभीब्रह्मचारिखते स्थितः मच्चित्तःसन् मनःसंयम्य
युक्तः मत्परः भासीत ॥ १३ ॥ १४ ॥
टीका.
अब वैठनेका नेम कहते हैं. मध्यशरीर मस्तक औ ग्रीवा इ-
नको अचल स्थिर औ सम धारण कियेभये आपकी नासिका..
के अयभागपर दृष्टिको राखिके कोईभी दूसरी दिशौंको न देख.
तेभये प्रशांतचित्त भयरहित ब्रह्मचर्यव्रतयुक्त सो ब्रह्मचर्य तीन
प्रकारका है १उपकुर्वाणक जो वेदाभ्यास करनेपर्यंतही स्त्रीका
त्याग २ नैतिक जो मरणपर्यंत स्वीका त्याग औ ३ एकपत्नी-
बतरूप इनमेंसे अधिकारप्रमाण कोईसेमेंभीस्थित औचित्त में-
रेमें लगायेभये मनको संयममें राखिके वह मात्मनिष्ठ पुरुप
मेरेहीको चितवन करताभया स्थित होय. ॥ १३ ॥ १४ ॥
१२२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मूलम. युंजन्नेवंसदात्मानयोगीनियतमानसः ॥ शांति निर्वाणपरमांमत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥ अन्वयः नियतमानसः योगी सदा एवं आत्मानं युंजन सन् निर्वाणपरमां मत्संस्थां शांतिं अधिगच्छति ॥ १५ ॥ टीका. मनको नियममें किया है जिसने ऐसा योगी सर्वकाल- में ऐसे मेरेमें मन लगाता हुआ मोक्षप्रद औ मेरेमें स्थित ऐसी शांतिको प्राप्त होयगा. ॥ १५ ॥ मूलम्. नात्यश्नतस्तुयोगोऽस्तिनचैकांतमनश्नतः ॥न चातिस्वप्नशीलस्यजाग्रतोनैवचार्जुन ॥ १६ ॥ युक्ताहारविहारस्ययुक्तचेष्टस्यकर्मसु ॥ युक्तस्व नाऽवबोधस्ययोगोभवतिदुःखहा ॥ १७॥ अन्वयः हेअर्जुन अत्यनतः योगः न अस्ति च एकांतं अनश्रतः यो- गः न अस्ति च अतिस्वप्नशीलस्य योगः न अस्ति च अ- ति जायतः योगः न अस्ति किंतु युक्ताहारविहारस्य कर्मसु युक्तचेटस्य युक्तस्वप्नाऽबबोधस्य दुःखहा योगः भवति॥१६॥ टीका अब योगीके आहारादिकका नियम कहते हैं.अतिभोजन करनेवालेका योग सिद्ध नहीं होता है औ केवल भोजन न क- रनेवालेकाभी योग सिद्ध नहीं होता है औ बहुत जागनेवालेका गीतावाक्थार्थवोधिनी भाषाटीका. १२३ तथा बहुत सोवनेवालेकाभी योग सिद्ध नहीं होता है. क्योंकि, जो युक्तिप्रमाण आहार करता है जैसोक, दो भाग पेटके अनसे भरै, तीसरा भाग जलसे भरै औचवथा पवनके संचारके वास्ते खाली राखै तौ योगाभ्यास होसकताहै; ऐसेही विहार याने स्त्री प्रसंग इसकोभी युक्तिसे करे जैसेकि प्रथम कहा कि, ब्रह्मचर्य में रहना तौ[ ऋतौभार्यामुपेयात्]इसवाक्य प्रमाणसे ऋतुकालमें आपहीकी स्वासप्रसंग करना यह एक प्रकारका ब्रह्मचर्य है. जो कोई शंका करेकि योगिको स्त्रीप्रसंग वर्ण्य है इहां विहार शब्द- का दूसरा अर्थ करौ. तब उत्तर है कि प्रथमभी कहिआए है कि[ई द्रियाणींद्रियार्येपुवर्ततइतिधारयन् ॥ कर्मेंद्रियाणिमनसानिय म्यारभतेऽजुन॥कर्मेंद्रियैःकर्मयोगमसक्तःसविशिष्यते)इत्यादि औ अगाडीभी कहेंगे मि[अथवायोगिनामेवकुलेभवति धीमता] तौ जो स्त्रीप्रसंग योगी न करेगा तो उसके कुलमें जन्म लेनेका संभव कैसे होयगा? इसवास्ते इहा विहार शब्दसे स्त्रीप्रसंगही अर्थ है सो प्रमाणसे करै याते बहुत करनेसे क्षय इत्यादिक रोग होते हैं तौभी योग नहोसकैगा औ केवल न करनेसे उसकास्म रन रहैगा तौभी योग न व्हैसकैगा दप्तवास्ते युक्तिकाही करना और कौमभी युक्तिकी चेष्टा करना. जो थोडे परिश्रमसे काम होय तौ वडा परिश्रम न करना इसपर भागवतका प्रमाण देते सिद्धेऽन्यथार्थेनयतेततत्रपरिश्रमतत्रसमीक्ष्यमाणः] इतिदि- तीय स्कंध श्लोक ऐसेही प्रमाणते सेवना औजागना ऐतीरीत- से चलनेवालेका दुःखनाशक योग होता है. ॥ १६ ॥ १७ ॥ मूलम् यदाविनियतंचित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निः स्टहःसर्वकामेयोयुक्तइत्युच्यनेतदा ॥ १८ ॥ अन्यय. ..
१२१ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका, यदा आत्मनि एव विनियतं चित्तं प्रवतिष्ठते तदा सर्व कामेभ्यः निःस्टहः सन युक्तः इति उच्यते ॥ १८ ।। टीका. जब आत्महीमें अति निश्चल चित्त जिसका स्थित हो. ता है तब वह मनुष्य सर्व कामसे निस्टह भयाहुआ युक्त कहाता है. ॥ १८ ॥ मूलम. यथादीपोनिवातस्थोनेंगतेसोपमास्मृता ॥ योगिनोयतचित्तस्ययुंजतोयोगमात्मनः॥१९॥ अन्वयः यथा निवातस्थः दीपः न इंगते तथा यतचित्तस्य यो- गं युंजतः योगिनः आत्मनः सा उपमा स्मृता ॥ १९ ॥ जैसे निवातस्थानमें स्थित दीपक हालता डोलता नहीं तैसे वश है चित्त जिस्का ऐसे योग करनेवाले योगीके आ- त्मस्वरूपकी सोई उपमा कही है. ॥ १९ ॥ मूलम. यत्रोपरमतेचित्तंनिरुद्धंयोगसेवया ॥ यत्रचैवा त्मनात्मानंपश्यन्नात्मनितुष्यति ॥ २० ॥ सु खमात्यंतिकंयत्तद्बुद्विग्राह्यमतींद्रियं ॥ वेत्ति यत्रनचैवायंस्थितश्चलतितत्त्वतः ॥ २१ ॥ यं लव्ध्वाचापरंलाभमन्यतेनाधिकंततः॥ यस्मि स्थितोनदुःखेनगुरुणाऽपिविचाल्यते ॥ २२ ॥ तंविद्याहुःखसंयोगवियोगयोगसंज्ञितं ॥ सनि श्ययेनयोक्तव्योयोगोनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ टीका.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अन्वयः योगसेवया निरुदं चित्तं यत्र उपरमते च यत्र आत्म- ना आत्मानं पश्यन् सन् आत्मनि एव तुष्यति ॥२०॥ यत्र यत् अतींद्रियं बुद्धिग्राह्यं आत्यंतिकुं सुखं तत् वेत्ति च यत्र स्थितः अयं तत्त्वतः न एव चलति ॥ २१ ॥ यं लब्ध्वा अपरं लाभं ततः अधिकंन मन्यते च यस्मि- न स्थितः गुरुणा अपि दुःखेन न विचाल्यते ॥ २२ ॥ तं दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितं विद्यात् संयोगः अ. निर्विणचेतसा निश्चयेन योक्तव्यः ॥ २३ ॥ टीका योग सेवनके कारणसे सर्वत्र विपयोंसे रोकाभया चित्त जहां याने जिस योगमें विश्रामके प्राप्त होय औ जिसमें बुद्धि करिके आत्माको देखताहुआ याने निश्चयं करता भया आ- त्माही में संतोपको प्राप्त होय ॥२०॥ औ जिसमें जो सुख ई. द्रियोंके न अनुभवमें आवै केवल प्रात्मबुद्धिहीकरिके गृहण . करनेमें आवै उस सुखको जान है औ जिसमें स्थित व्हैके फिरि आत्मस्वरूपसे चलायमान न होय ॥ २१॥ जिस योगरूप लाभको प्राप्त हैके फिरि दूसरे लाभको इसते अधिक न मानै औ जिस योगमें स्थित हैके बडे भारीभी दुःखकरिके चला-. यमान न होय ॥ २२ ॥ उसीको दुःखके संयोगका वियोगका रक योगसंज्ञिक कहते हैं अर्थात् वही योग दुःखनाशक ज्ञान- रुप है उसको जान वही योगी निर्विकल्पचित्तकरिके मर्यात उत्साहहुक्त निश्चयकरिके अभ्यास करनयोग्य है. ॥ २३ ॥ संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यकासर्वानशेपतः ॥ म गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटाका. नसैवेंद्रियग्रामविनियम्यसमंततः ॥२४॥ शनैः शनैरुपरमेयाधृतिगृहीतयाआत्मसंस्थमनः, कृत्वानकिंचिदपिचिंतयेत् ॥२५॥ अन्वयः संकल्पप्रभवान् सर्वान् कामान् अशेपतः मनसा एव त्यत्का इंद्रियग्रामं समंततः विनियम्य ॥ २४ ॥धृति गृहीतया बुद्ध्या शनैः शनैः उपरमेत् मनः आत्मसंस्थं कृत्वा किंचित् अपि न चिंतयेत् ॥ २५ ॥ टीका. काम दो प्रकारके हैं एक स्पर्शजन्य दूसरे संकल्पजन्य तहां स्पर्शज शीतउष्णादिक औ संकल्पज पुत्रक्षेत्र इत्यादिक तहां संस्पर्शज कामौंका स्वरूपसे त्याग कठिण हैं, इसवास्ते जो सं कल्पसे उत्पन्न काम हैं उन सबौंके जड मूलसे मनहीं करिके त्यागिके फिरि सर्व इंद्रियों को विपयोंसे नियमित करिके ॥२४॥ विवेकविपयिक बुद्धि करिके धीरे धीरे उपरामको प्राप्त हो ना फिरि मनके आत्मामें स्थित करिके उसविना कोई प- दार्थकाभी चिंतवन न करना ॥ २५ ॥ मूलम्. यतायतोनिश्चरतिमन चंचलमस्थिरं ॥ ततस्तु तोनियम्यैतदात्मन्येववशंनयेत् ॥ २६ ॥ प्र शांतमनसंह्येनंयोगिनंसुखमुत्तमं ॥ उपैतिशांत रजसंब्रह्मभूतमकल्मपम् ॥२७॥ अन्वयः चंचलं अस्थिरं मनः यतः यतःनिश्चरति ततःततःएतत् नियम्य आत्मनि एव वशं नयेत्॥२६॥ हि प्रशांत मन-
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १२५
सं शांतरजसं अकल्मपं ब्रह्मभूतं एनं योगिनं उत्तम
सुरवं उपैति ॥ २७ ॥
टीका,
इस मनका स्वभाव चंचल है इसवास्ते आत्मामें स्थिर न-
ही रहता है इसीसे यह जिस जिस विषयमें आसक्त होय तहां
तहांसे इसको फिरायके आत्माहीमें स्थिर करना ॥ २६ ॥ का-
रण किं, जिसका मन आत्मामें स्थिर हुआ तिसीवास्ते उसका
रजोगुणभी नष्ट भया.जब वह निष्पाप भया निष्पाप होनेसे
आपके शुद्धस्वरूपमें स्थित भया ऐसे इस योगीको उत्तम
सुख यान प्रात्मानुभवरूप उत्तम सुख प्राप्त होता है. ॥ २७॥
मूलम.
युंजन्नेवंसदात्मानयोगीविगतकल्मपः ॥ सुखे
नब्रह्मसंस्पर्शमत्यंतंसुखमश्नुते ॥२८॥
अन्वयः
विगतकल्मपः योगी एवं सदा आत्मानं गुंजन सन्
ब्रह्मसंस्पर्श अत्यंत सुखं सुखेन अश्नुते ॥ २८ ॥
टीका,
ऐसा निप्पाप योगी ऐसे कहेभये प्रकारसे मनको आ.
स्मामें युक्त करते करते ब्रह्मानुभवरुप अत्यंत सुखको प्रया
सविनाहि प्राप्त होता है. ॥ २८ ॥
सर्वभूतस्थमात्मानंसर्वभूतानिचात्मनि ॥ईक्षते
योगयुक्तात्मासर्वत्रसमदर्शनः॥ २९ ॥योमांप
इयतिसर्वत्रसर्वचमयिपश्यति ॥ तस्याहंनप्रण
श्यामिसचमेनप्रणश्यति ॥३०॥
१२८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
अन्वयः
सर्वत्र समदर्शनःयोगयुक्तात्मा आत्मानं सर्वभूतस्य च
सर्वभूतानि आत्मनि ईक्षते ॥ २१ ॥ एवं यः सर्व
त्र मां पश्यति च सर्व माय पश्यति तस्य अहं न
प्रणश्यामि च सः मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
टीका,
इन दोश्लोकोंमें श्रीकृष्णभगवानने (दौसुपर्णीसयुजौसखायौ
समानंवृक्षंपरिषस्वजाते)इस श्रुतिका अभिप्राय प्रकट किया है
जैसेकि,सर्वत्र समदर्शनःजाने सर्वभूतों में समानवृक्षरूपदृष्टि है
जिसकी अथवा(समंसर्वेषभूतेषुतिष्ठंतपरमेश्वरं ॥विनश्यत्स्ववि
नश्यंतं यःपश्यतिसपश्यति )इत्यादि वाक्यप्रमाणोंसे समवर्ती
आत्मापर है दृष्टि जिसकी अथवा शत्रु औ मित्रपर समान है,
दृष्टि जिसकी, ऐसा योगयुक्तात्मा याने योग जो मेरा समत्व क
रिके मिलाप तिसमे युक्त किया है मन जिसने ऐसा योगी
आपके आकाशादिक सर्वभूतौंको आपमें स्थित देखता है ।
॥२९॥ ऐसे जो सर्वत्र मेरेको देखता है औ सर्व मेरेमें देखता
है अर्थात् जैसे मूत्रमें मणिसमूह तैसे आपमें औ मेरेमें सर्व
भूतौंको देखता है तात्पर्य, कि सर्व भूतसमूहनिर्मित देहीमें
आत्माको औ मेरेकोभी देखता है इसवास्ते शत्रुमित्रादि
भावसे रहित समदर्शी हैं तिसके मैं कधीभी अदृश्य नही होता
हौं, औ वह मेरेको अदृश्य नहीं होता है. ॥ ३० ॥
मूलम्.
सर्वभूतस्थितंयोमांभजत्येकत्वमास्थितः॥ स
र्वथावर्तमानोपिसयोगीमयिवर्तते ॥३१॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अन्वयः यःएकत्वं आस्थितः सर्वभूतस्थितं मां भजति अपिनि- श्रयेन सः योगी सर्वथावर्तमानः मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ टीका. जो पुरुप एकत्व याने सर्व भूत प्राणिमात्रके मित्रत्वमेस्थित ऐकता नाम मित्रताका है सोश्रीमद्वाल्मीकीय सुंदरकांडमें स्प- र हनुमानजीने श्रीजानकीजीसे श्रीराम औ सुग्रीवकी मित्र- ता विपेवाक्यकहा है.रामसुग्रीवयोरैक्यदेव्येवंसमजायत॥ऐसा ही इहांभी अर्थ करना चाहिये. जो स्वरूपसे एकताकहेंगे तौभजनेकोक्यों कहा इसवास्ते यही अर्थ है कि, जोसबकी मित्र- तामे स्थितहुआ सर्वभूतोंमे स्थित मेरेकोभजता है सोयोगि नि- वैकरिके सर्वप्रकार आचरन करताहुआमेरेहीसमीप मेरीसा- भ्यताको प्राप्तभया वर्तमान है तात्पर्य कि अगाडी कहेंगे सत्य चाहंढदिसन्नविष्ट।ईश्वरःसर्वभूतानां हृद्देशेर्जुनतिष्ठति।इत्यादि कप्रमाणौसेईश्वरकोसर्वके हृदयमे जानिके सर्वसे मित्रताकरता है. वही मेरा भजनहै ऐसे मेरेको भजनेवाला सदा मेरे हृदयमेव- सता है क्योंकि, अगाडी बारहें अध्यायमे वाक्य है।अद्वेष्टासर्व- भूताना॥ इहांसेलैकेयोमद्भक्तः ॥ समेप्रियः ॥ ३१ ॥ आत्मौपम्येनसर्वत्रसमंपश्यतियोर्जुन । सुखवायदिवादुःखंसयोगीपरमोमतः॥ ३२॥ अन्वयः हे अर्जुन यःसुखं यदि वा दुःखं प्रात्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति सः योगी परमःमतः ॥ ३२ ॥ टीका.
१३० गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. टीका. जो पूर्व उनन्तीसवें श्लोकमे सर्वत्र समदर्शन कहाथा उस शब्दको इहां भी स्पष्ट करते हैं; उसीके स्पष्टीकरणेमे योगी- की सर्वोत्तम दशा कहते हैं. हे अर्जुन! जो मनुष्य सुखको अ- थवा दुःखको आपहीका सरीखा सर्वत्र सम देखता है याने जैसेसुख औ दुःख मेरेको होता है तैसा सर्वको होताहै, ऐसा जाननेवाला योगी सर्वसे उत्तम है: अर्थात् ऐसे जाननेवाला सर्वसे एकता याने मित्रता करता है औं मित्रता करनेसे मे- रेको प्रिय होताहै. ॥ ३२ ॥ मूलम्. अर्जुनउवाच ॥ योऽयंयोगस्त्वयाप्रोक्तःसाम्येन मधुसूदन ॥ एतस्याहंनपश्यामिचंचलत्वा स्थितिस्थिराम् ॥३३॥ अर्जुनःउवाच हेमधुसूदन यःअयं योगः साम्येन त्वया प्रोक्तःमनसः चंचलत्वात् अहं एतस्य स्थिरी स्थिति न पश्यामि ॥ ३३ ॥ अन्वयः टीका. अर्जुन भगवानके मुखारविंदसे योगीकीमहिमा सुनिके बो- ला कि, हेमधुसूदन! जो यह योग समता करिके आपने कहासो मनकी चंचलतासे मै इसयोगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हौं. मूलम्. चंचलंहिमनःकृष्णप्रमाथिवलवदृढम् ॥ तस्याऽहंनिग्रहंमन्येवायोरिवसुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ हेकृष्ण हियस्मात् इदमनः चंचलंप्रमाथि बलवद दृढ़ अन्वयः गीसावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १३१ तस्मात् अहंतस्य निग्रहं वायोः इव सुदुष्करं मन्ये ॥३४॥ टीका. हे कृष्ण! जिसवास्ते कि यह मन चंचल औ इंद्रियौंकाक्षो- म करनेवाला वली तथा दृढ है इसीवास्ते में उसका रोकना पवनका रोकना जैसा कठिण मानता हो. ॥ ३४ ॥ मूलम. श्रीभगवानुवाच ॥ असंशयंमहाबाहोमनोदुर्नि ग्रहंचलं ॥ अभ्यासेनतु तेयवैराग्येणचगृह्य ते॥३५॥ अन्वयः श्रीभगवान् उवाच हे महावाहो मनःदुर्निग्रहं चलं इति अ- संशयं हे कौतेय इदं अभ्यासेन तु वैराग्येण गृह्यते ॥३५॥ टीका. श्रीकृष्ण भगवान अर्जुनका प्रश्न सुनिके उत्तर देते हैं कि, हे- महावाहो! मन वहे दुःखसे रोकनेसे अवै है क्योंकि यह चंचलहै ऐसा तुमने कहा उसमे संशय नहीं; परंतु हेकुंतीपुत्र! यहमन अ- भ्यास औ विषय वैराग्य करिके वशकरनेमे आता है. ॥ ३५॥ मलम. असंयतात्मनायोगोदुष्प्रापइतिमेमतिः॥ । वश्यात्मनातुयतताशक्योऽवाप्तुमुपायतः॥ ३६॥ अन्ययः अयं योगः असंयतात्मना दुष्प्रापः इति मे मतिः तु व- श्यात्मना यतता उपायतः अवाप्तुं शक्यः ॥ ३६ ॥ टीका. यह योग जिसने मन वश नहीं किया तिसको प्राप्त होना , १३२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. कठिण है क्यों कि, जिसने मन जीता है सो जो यत्न करि- के उपाय करै तौ प्राप्त होय. ॥ ३६ ॥ मूलम. अर्जुनउवाच ॥ अयतिःश्रद्धयोपेतोयोगाचलि तमानसः। अप्राप्ययोगसंसिद्धिकांगतिंकृष्णग च्छति ॥३७॥ न्वयः अर्जुनःउवाच हे कृष्ण थःश्रद्धया उपेतःप्रयतिः चेत् यो- गात् चलितमानसःयोगसंसिद्धिं अप्राप्यकां गतिं गच्छति॥३७॥ . टीका. . अर्जुनने प्रथम नेहाभिकमनाशोस्तिप्रत्यवायोनविद्यते, इ- त्यादि करिके योग माहात्म्य सुनाथा तौभी विशेष जाननेके वास्ते फिरि प्रश्न करते हैं हे कृष्ण! जो मनुष्य योग श्रद्धावान है याने दंभी नही श्रद्धासंयुक्त योगाभ्यास करने लगा श्री कदापि उसके यत्न न होनेसे योग सिद्धिको प्राप्त न भया तो वह किसगतीको प्राप्त होयगा सो कहौ. ॥ ३७ ॥ मूलम् कञ्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नानमिवनश्यति ॥ अ प्रतिष्ठोमहावाहोविमूढोब्रह्मणःपथि ॥ ३८॥ एतन्मेसंशयंकृष्णच्छेत्तुमर्हस्यशेषतः ॥ त्वद न्यःसंशयस्यास्यच्छेत्तानापपद्यते ॥ ३९॥ अन्वयः हे महाबाहो ब्रह्मणः पधि विमूढः अप्रतिष्ठः अयं उभय भ्रष्टः कचिव छिनाइव न नश्यति ॥३८॥ हे कृष्ण ए.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. तत् मे संशयं अशेषतः छेत्तुं अर्हसि हियतः अस्य संश- यस्य छेत्ता त्वदन्यः न उपपद्यते ॥ ३९ ॥ टीका. हेमहावाहो वेदमार्गमे मोहको प्राप्त भयायाने स्वर्गादि प्राप्ति निमित्त कर्म त्यागिके निष्कामकर्मरूप योगभी प्राप्त न भया इसवास्ते अप्रतिष्ठित औ उभय भ्रष्ट याने स्वर्गादि प्राप्तिकर्मको भी न प्राप्त भयान योगको प्राप्त भया इसवात्ते कदाचित् जैसे एक बडेमेघमैसे छुटा छोटा मेघका टुकडा में दूसरे मेघको भी न प्राप्त व्हैके बीचहीमे नष्ट होय है ऐसे नष्ट न व्है जाय ॥ ३८ ॥ हेकृष्ण मेरे इससंशयको आप समूलछेदन करनेयोग्य हो क्यों- कि, इससंशयका छेदनेवाला पापविना दूसरा नहीं है. ॥ ३ ॥ मलम्. श्रीभगवानुवाच ॥ पार्थनैवेहनामुत्रविनाशस्त स्यविद्यते॥नहिकल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिंतातग च्छति॥४०॥ अन्वयः श्रीभगवान् उवाच हेपार्थ तस्य इह एवाविनाशः न वि- द्यते न अमुत्र विनाशः विद्यते हियस्मात् हे तात कश्चि- इपि कल्याणरुत् दुर्गतिं न गच्छति ॥ १० ॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान् कहते भये कि हे पृथापुत्र! इस योगाभ्या. स करनेवालेकी इस लोकमे भी दुर्गति नहीं है औ परलोक मे भी नहीं है क्योंकि, हे तात कोई भी शुभकर्म करनेवाला दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता है ॥ १० ॥ मूलम.
१३४ . गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. प्राप्यपुण्यकृताल्लोकानुपित्वाशाश्वतीःसमाः॥ शुचीनांश्रीमतांगेहयोगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ११ ॥ अथवायोगिनामेवकुलेभवतिधीमताम् ॥ एत दिदुर्लभतरंलोकेजन्मयदीदृशम् ॥ ४२ ॥ तत्र तंबुद्धिसंयोगलभतेपौर्वदैहिकं ॥ यततेचततो भूयःसंसिद्धौकुरुनंदन ॥ ४३ ॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैवन्हियतेह्यवशोऽपिसः॥ जिज्ञासुरपियोग स्यशब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥ अन्वयः योगभ्रष्टः पुण्पकता लोकान प्राप्य तत्रशाश्वतीः समाः उपित्वा शुचीनां श्रीमतां गेहे अभिजायते॥११॥ अथ वा धीमतां योगिनां कुले एव भवति यत् ईदृशं जन्म त- त् एतत् लोके हिदुर्लभतरं॥१२॥हेकुरुनंदन तत्रतं पौर्व दैहिकं बुद्धिसंयोग लभते च ततः भूयः संसिद्धौ यतते। ॥४३॥अवशः अपिसः तेन पूर्वाभ्यासेन न्हियते हियस्मा- त् योगस्य जिज्ञासुः अपि शब्दब्रह्म अति वर्तते ॥ १४ ॥ टीका. कदाचित् योग पुरा नभयाऔ मृत्युको प्राप्त भया तौ स्वर्गादि. लोकौंको प्राप्त व्हेके औ वहां बहुत वर्ष भोग भोगिके फिरि प. वित्र औद्रव्यवालोंके घरमे जन्म लेताहै॥४१॥ अथवा बुद्धि- मान् योगिजनोंके कुलहीमे जन्मता है जो यह ऐसा जन्मसो यह इसलोकमे निश्चय कारके अतिदुर्लभ है ॥ १२॥हे अर्जुन! तहां वही पूर्वदेहसंबंधी वृद्धियोगको प्राप्त होता है तब फिरि भी उनकी सिद्धि मे यत्नकरता है॥४३॥ क्योंकि न करनेका- .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. १३५ हे तौभी वह पूर्वाभ्यास हठिके उसी मे लगाता है कारण कि जो योग जाननेकीभी इच्छाकरै तौभी शब्दब्रह्म अर्थात् देवमनु- प्य पृथ्वी अंतरिक्ष स्वर्ग इत्यादि शब्दसे उच्चारण योग्य जो व्र- झयाने प्रकृति उसको उल्लंघन करता है यानेप्रक तिसंबंधसे मु. कहुआ देव मनुष्यादि शब्दौसे रहित आत्मस्वरूपको प्राप्तहो ताहै शब्दब्रह्मातिवर्तते इसवाक्यका अर्थ कोई ऐसाभी करते कि वेदोक्त कर्मानुष्ठान फलको उलंघन करता है ॥ ४४ ॥ मूलम्. प्रयत्नाद्यतमानस्तुयोगीसंशुद्धकिल्बिपः॥ अनेकजन्मसंसिद्धस्ततोयातिपरांगतिम् ॥४५॥ अन्वयः प्रयत्नात् यतमानः संशुद्धकिल्विपः योगी अनेकजन्म संसिद्धःततःपरां गतिं याति ॥ १५ ॥ टीका. इसी पूर्वोक्त प्रकारकी युक्तीसे प्रयत्न करता करता पापर- हित हुआ भया योगी अनेक जन्मों करिकेसिद्दीको प्राप्त हो- ताहै औ फिरिभी मोक्षको प्राप्त होताहै. ॥ ४५ ॥ मूलम्. तपस्विभ्योऽधिकोयोगीज्ञानिभ्योऽपिमतोऽ धिकःकर्मिभ्यश्चाधिकोयोगीतस्माद्योगीभ वार्जुन ॥४६॥ हेअर्जुन योगी तपस्विभ्यः अधिकः मतःज्ञानिभ्यः अ- पिअधिकः च कर्मिभ्यः अपि योगी अधिकः तस्मात् त्वं योगी भव ॥ ४३ ॥ अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, टीका. हे अर्जुन! केवल तपस्विनसे योगी याने भगवत्प्राप्तिकी इच्छाकरिके भगवदाराधनरूप कर्म करनेवाला अधिक है औ केवल ज्ञानी जनौसभीअधिक है औकेवलयज्ञादिक सका- मकर्म करनेवालेसेभी अधिक है इसवास्त तुम योगी होउ याने आपके स्वधर्म स्वरूप कर्मसे ईश्वराराधन करिके ई- श्वरप्राप्तिको इच्छाकरौ. ॥ ४६॥ मूलम. योगिनामविसर्वेपांमद्गतेनांतरात्मना । श्रद्धावान्भजतेयोमांसमेयुक्ततमोमतः॥४७॥ अन्वयः यः श्रद्धावान् मद्तेन अंतरात्मना मां भजते सः सर्व पायोगिनां अपि युक्ततमः मे मतः ॥ १७ ॥ टीका. ओ श्रद्धायुक्त मेरेमेनिरंतर चित्त लगायके मेरी ही उपासना करता है सो योगी सब योगिनमे श्रेष्ठ है ऐसा मैने माना॥१७ ॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीता सूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रश्रीकृष्णार्जुनसंवादे योगशास्त्रेअभ्या सयोगोनामपष्ठोऽध्यायः॥६॥ इति श्रीमत्सुकलतीतारामात्मज पंडित रघुनाथप्रसाद क- तायां श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीकायां पष्ठो ऽध्यायः ॥ ६॥ ॥ ७॥ ॥५॥ इति प्रथमपटक समाप्त.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १३७
अथ द्वितीयपटकं
प्रारभ्यते.
प्रथमके पट्क याने प्रथमके छ अध्यायोंमे ईश्वर प्राप्तिका
उपाय भूतभक्ति याने ईश्वर उपासना उस उपासनाका अंग-
भूत आत्मस्वरूपज्ञान,सो आत्मज्ञान ज्ञानयोग कर्मयोग नि-
या करिके प्राप्त होता है ऐसा कहा औ अब मध्यपट्कयाने
मध्यके छ अध्यायौमे परमात्मस्वरूपका यथार्थज्ञान औ उ-
सके
माहात्म्य ज्ञान पूवर्क उनकी उपासना जिसिको भक्ति
कहते हैं सो भक्तियोग प्रतिपादन करते हैं सोई अगाडी कहैगे.
यतःप्रवृत्तिर्भूतानांयेनसर्वमिदंततं ॥ स्वकर्मणातमभ्यर्च्यसिद्धिं
विंदतिमानवः।। इहांत लैविमुच्यनिर्ममःशांतोब्रह्मभूयायक
स्पते ॥ ब्रह्मभूतोप्रसनात्मा नशोचतिनकांक्षति।समःसर्वेपुभूते
पुमद्भक्तिंलभतेपर। इहांपर्यंत कहेंगे औरभी भक्तिनिरूपणका
कारण कहेंगे ग्यारहें अध्यायमनाहंवेदैर्नतपसा, इत्यादि वा
क्यों करिके अब सातवें अध्यायमेंपरमात्माका रूप निश्चै नौ
प्रकृति करिके उसका आच्छादन औउसकी निवृत्तिके वास्ते भ
गवत् शरणागति ही उपासक ज्ञानीको श्रेष्ठ कहते हैं अथवा
छटे अध्यायमे अंतमें कहा कि जो मेरेमे चित्त लगायके भज-
ता है सो योगी श्रेष्ठ है सो सुनिके अर्जुनके मनमे आया कि,
आपका स्वरूप कैसा है ऐसा अर्जुनका अभिप्राय जानिके भग-
वान् बोलते भये ॥ मय्यासक्तइत्यादिकरिके ॥
सप्तमधामः
मूलम्.
श्रीभगवानुवाच ॥ मय्यासक्तमनाःपार्थयोगंयु
जन्मदाश्रयः ॥ असंशयंसमग्रंमांयथाज्ञास्यसि
तच्छृणु ॥१॥
. गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अन्वयः श्रीभगवान् उवाच हे पार्थ मय्यासक्तमनाः मदाश्रयः त्वं योग युंजनसन् यथा असंशयं समयं मां ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥१॥ टीका, हे अर्जुन! मेरेमे मनको पासक्त किये हुये नौ मेरेही आ- श्रित भये हुये तुम योग करते करते जैसे संदेह रहित संपूर्ण अर्थात् विभूतिबल ऐश्वर्यसहित मेरेको जानोगे सो सुनौ ॥१॥ मूलम. ज्ञानंतेहंसविज्ञानमिदंवक्ष्याम्यशेपतः॥ यज्ज्ञा त्वानेहभूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥२॥ अन्वयः अहं ते इदं सविज्ञानं ज्ञानं अशेषतः वक्ष्यामि यत् ज्ञा- त्वा इह भूयः अन्यत् ज्ञातव्यं न अवशिष्यते ॥ २ ॥ हे अर्जुन! मै तुमको यह विज्ञान करिके सहित ज्ञान समग्र कहताहै। ज्ञान जो मेरा स्वरूपज्ञान, विज्ञानजो मेरेको सर्वसे विलक्षण जानना अथवा ज्ञान शास्त्रजन्य विज्ञान अनुभवज- न्य जिसज्ञानको जानिके इसलोकमें फिरिजानने योग्य कु. छभी नहीं रहता है ॥२॥ मूलम्. मनुष्याणांसहस्रपुकश्चिद्यततिसिद्धये ॥ यत तामपिसिद्धानांकश्चिन्मांवत्तितत्त्वतः॥३॥ अन्वयः मनुष्याणांसहस्रेषु सिद्धये कश्चित् यतति यततो अपि- सिद्धानां कश्चित् मां तत्त्वतः वेति ॥ ३ ॥ टीका.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. टीका. कहेंगे जो ज्ञान तिसकी दुर्लभता कहते हैं.हजारौं सुज्ञमनु. प्यौमे कोई एकपुरुष प्रात्मज्ञानरूप सिद्धिके वास्ते यत्न करता है वैसे हजारोंमे कोई एक आत्मज्ञानरूप सिद्धिको प्राप्त होता है औ वैसे हजारोंमे कोईभी एक मेरे स्वरूप निश्चयको जानता है अर्थात् कोई भी नहीं जानता है, समहात्मासुदुर्लभः मातु वेदनकश्चन इत्यादिकहेंगे तोई ऐसा दुर्लभ परम ज्ञानमै तुम.. से कहौंगा यह अभिप्राय. ॥ ३ ॥ मूलम. भूमिरापोऽनलोवायुःखमनोवुद्धिरेवच ॥ अहंका रइतीयमभिन्नाप्रकृतिरष्टधा॥४॥ अपरेयमि तस्त्वन्यांप्रकृतिविधिमेपरां ॥ जीवभूतांमहा बाहोययेदंधार्यतेजगत् ॥५॥ अन्वयः हे महाबाहो भूमिः आपः अनलः वायुःखं मनः बुद्धिः च अहंकारः एव इति या इयं अष्टधा भिन्नाप्रतिः सा इयं मेप्रकृतिः अपरा तु यया इदं जगत् धार्यते तां इतः अन्यां जीवभूतां मे प्रकृति परां विद्धि. ॥ ४ ॥ ५ ॥ टीका. एथ्वि,जल,अग्नि,वायु,आकाश, मन,बुद्धि औ अहंकार ऐसे जो यह आठप्रकारके भेदको प्राप्त भई प्रकृतिसो यह मेरी अप- राप्रकृति है.याने अचेतन है औ जिस चेतन प्रकृति करिके यह अचेतन जगत धारण हो रहा है तिसको इस अपरासे दूसरी जीवभूत मेरी प्रकृतिको तुम परा जानौ. ॥ ५ ॥ १
१४० गीतावाक्यार्थिवोधिनी भापाटीका.
मूलम्.
एतद्योनीनिभूतातिसर्वाणीत्युपधारय ।। अहं
कृत्स्नस्यजगतःप्रभवःप्रलयस्तथा॥६॥म
त्तःपरतरंकिंचिन्नान्यदस्तिधनंजय ॥ मयिस
मिदंप्रोतंसूत्रेमणिगणाइव ॥७॥
अन्वयः
हे धनंजयसर्वाणि भूतानि एतद्योनीनि इति उपधार-
यतः अहंकृत्स्नस्यजगतः प्रभवः तथाप्रलयः॥ ६॥
मत्तः परतरं अन्यत् किंचित् नअस्ति सूत्रमणिगणाः
इव इदं सर्वं मयि प्रोतं ॥७॥
टीका.
हे धनंजय याने हे अर्जुन,सर्वभूत प्रापीमात्रके येई दोनों
प्रकृति औ पुरुप कारण हैं ऐते तुम जानों औ यै मेरे हैं
याने इनका कारण मै हौं इसवास्ते मै इस सर्व जगतका
प्रभव याने कारणहाँ नौ मही प्रलय हों अर्थात् इसजगतकी
उत्पत्ती औ प्रलयरूपमहीं हौं ॥ ६ ॥ मेरेसे परे और कुछ भी
नही है, जैसे सूत्रमे मालाकेमनिके पोहे होते हैं तैसे यहसर्व
जडचैतन्य समूह जगत् मेरेमें पोहा है. ॥ ७ ॥
मूलम्.
रसोहमप्सुकौंतेयप्रभास्मिशशिसूर्ययोः॥
प्रणवःसर्ववेदेषुशब्दःखेपौरुपनृपु॥८॥
.
अन्वयः
हे कौंतेय अप्सु रसः अहं अस्मि शशिसूर्ययोः प्रभा
अहं अस्मि सर्ववेदेषु प्रणवः अहं अस्मि खे शब्दः
अहं अस्मि नृप पौरुपं अहमस्मि ॥ ८ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १११ टीका जो सातवे श्लोकमे कहाकी मेरेमे यह जगत जैसे सूत्रमे म- णीसमूह पोहाहै सोई विस्तारसे देखातेहैं जैसे जलमे सूत्रस्था नीय रसहै यह एक आचार्यकृत अर्थ. दूसरेभी अर्थ तो ऐ- साही करते, परंतु विशेप यह है कि, जैसे जलमे रस है वह मै हौं अर्थात् मेरा शरीरभूतरसहै याने जलका सार जो रंस उसका भी अंतर्यामी मै हौं इस रीतिसे मेरेमे वह जल पोहाहै ऐसे सर्वत्र जानना.भगवान् कहते हैं कि हे कुंतीपुत्र! जलमेरस चंद्रसूर्यमे प्रकाश, सर्व 'वेदोंमे ओंकार, आकाशमे शब्द, मनुष्यों में पुरुपार्थ ये सर्वमेरेही श्रेष्ठविभूति हैं. ॥ ८॥ मूलम. पुण्योगंधःप्टथिव्यांचतेजश्चास्मिविभावसौ॥ जीवनंसर्वभूतेषुतपश्यास्मितपस्विषु ॥९॥ अन्वयः पृथिव्यां पुग्यः गंधःच विभावसौ तेजः अहं अस्मि सर्व भूतेषु जीवनं च तपस्विषु तपः अहं अस्मि ॥ ९ ॥ टीका. पृथवीमे जो पवित्र गंधहै औ अग्निमे तेज सर्व भूतप्रा णीमात्रम जीवन याने आयुष्य औ वानप्रस्थादिक तपस्वि. नमे तप रूप मै हौ. ॥ ९ ॥ मूलम. बीजंमांसर्वभूतानांविद्विपार्थसनातनं । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मितेजस्तेजस्विनामहं ॥ १०॥ हेपार्थ सर्वभूतानां सनातनं विजं मां विद्धि बुद्धिमतां अन्वयः गीतावाक्याबोधिनी भाषाटीका. बुद्धिः तेजस्विनां तेजः अहमस्मि ॥ १० ॥ टीका. हेपृथापुत्र! सर्वभूत प्राणिमात्रका सनातनवीज उत्पत्तिकार णमेरी श्रेष्ठ विभूति वा मेरा शरीर जानौ बुद्धिवालोमे बुद्धि, तेजवालोंमे तेज, मेरे शरीरभूत मेरी श्रेष्ठविभूति हैं ॥ १० ॥ मूलम् बलंवलवतांचाहंकामरागविवर्जितं ॥ धर्माऽविरुद्धोभूतेषुकामोस्मिभरतर्षभ ॥११॥ अन्वयः हेभरतर्षभ वलवतां कामरागविवर्जितं बलं अहं भूतेषु धर्माऽविरुद्धः कामः अहं अस्मि ॥ ११ ॥ टीका. जो बलवंत लोग, तिनमे अप्राप्त विपयौंकी कामना औ प्राप्त विषयों की प्रीति इन काम रागौंविना बल मै हौ औ भू. तप्राणीमात्रमे धर्मसे जो अविरुद्ध काम सो मै हौं ॥ ११ ॥ मूलम. येचैवसात्विकाभावाराजसास्तामसाश्चये॥ मत्तएवेतितान्विदिनत्वहंतेषुतेमयि ॥१२॥ अन्वयः येसात्विकाः एव भावाः च ये राजसाः च ये तामसाः तेमत्तः एव इति तान् विद्धि तु अहं तेषु न ते मयि संति ॥ १२ ॥ : टीका. इस जगतमे जे सात्विक याने शमादिक राजस देपादिकता- मत मोहादिक अथवा सात्विक भोग्यत्व करिके राजस देहपणा गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका, १४३ से तामस इंद्रियत्व करिके जे भाव हैं वै सव मेरेहीसे उत्पन्न ऐसा जानौ परंतु मै उनके स्वाधीन नहीहौं औ वै मेरे स्वा- धीन हैं. ॥ १२ ॥ मूलम्. त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिःसर्वमिदंजगत् ॥ मोहितनाभिजानातिमामेभ्यःपरमव्ययं ॥ १३ ॥ अन्वयः एभिः त्रिभिःगुणमयैःभावैः इदं सर्व जगत् मोहितं अ- तः एभ्यः परं अव्ययं मां न जानाति ॥ १३ ॥ टीका. यै जो तीनौ गुणमय भाव हैं तिनों करिके यह सर्व जग- त मोहित है, इसवास्ते इनसे पर औ अविनाशी जो मै तिसको नहीं जानता है. ॥ १३ ॥ मूलम्. दैवी पागुणमयीमममायादुरत्यया ॥ मामेवयंप्रपद्यतेमायामेतांतरंतिते ॥१४॥ अन्वयः एषा गुणमयी दैवी मम माया हियस्मात् दुरत्यया त- स्मात् ये मां एव प्रपद्यते ते एतां मायां तरंति ॥१४॥ टीका यह तीनौ गुणौ करिके युक्त दैवी याने देवसंबंधिनी अर्थात है याने दुःखसेभी तरनेमे पाती नही. इसवास्ते जे मरीशरण आते हैं वेही इस मायाको तरते हैं.॥१४ मूलम्. नमांदुष्कृतिनोमूढाःप्रपद्यतेनराऽ धमाः॥ मेरी माया दुरत्यय १४४ गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका. माययाऽपहतज्ञानाआसुरंभावमाश्रिताः ॥ १५॥ अन्चयः मायया अपहतज्ञानाः आसुरंभावं आश्रिताः दुप्कृति- नः नराऽधमाः मूढ : मां न प्रपद्यते ॥१५॥ टीका. मायाकरिके नए भयाहै ज्ञान सिसका इसीसे असुरपनेको प्राप्ति हो रहे हैं इसीले नीचकर्म करते हैं उस नीचकमही क- रनेसे वै मनुष्यौमे अधम हैं,औ इन्ही कारणोंसे वै मोहित हुये मेरी शरण नहीं आते हैं. ॥ १५ ॥ मूलम्. चतुर्विधाभजतेमांजना सुकृतिनोऽर्जुन ॥ आ तौजिज्ञासुरर्थार्थीज्ञानीचभरतर्पभ॥१६॥ तेपां ज्ञानीनित्ययुक्तएकभक्तिर्विशिष्यते ॥ प्रियो हिज्ञानिनोऽत्यर्थमहंचसचमेप्रियः॥१७॥ अन्वयः हे अर्जुन!प्रातःजिज्ञासुः अर्थार्थीचज्ञानीइति चतुर्विधाः सुरूतीनः जनाःमांभजते हे भरतर्षभ तेपांज्ञानी नित्य युक्तः सन् एकभक्तिः अतः विशिष्यते हि ज्ञानिनः अ. हं अत्यथै प्रियः च सः मे अत्यथै प्रियः ॥ १६ ॥ टीका. हे अर्जुन एकतौ संसारले दुःखी दूसरा जाननेकी इच्छा कर- नेवालातिसराधनादिकके चाहनेवाला औचौथा स्वस्वरूपपर स्वरूपकाजाननेवालाऐसेचारिप्रकारके सकृतीजन मेरेको भ. जते हैं; तिनमे ज्ञानी नित्यही योगयुक्त व्हैके एफ मेरेही भक्ति करताहै इसवास्ते वहचारोमे श्रेष्ठहै औनिश्चै करिकै जिसवास्ते गीतावाक्यार्थचोधिनी भापाटीका, कि ज्ञानीको मै अतिशय प्रिय हौं तैसेही ज्ञानी मेरेको अति प्रिय है. ॥ १६ ॥ १७॥ मूलम् उदाराःसर्वएवैतेज्ञानीत्वात्मैवमेमतं ॥ आस्थि तःसहियुक्तात्मामामेवानुत्तमांगतिं ॥ १८ ॥ अन्वयः एते सवै आर्तादयः उदारा एव ज्ञानी तु मम आत्मा इति मे मतं हियस्मात् सः युक्तात्मा अनुत्तमां गतिं मां एव आस्थितः ॥१८॥ टीका. जोये प्रार्त इत्यादिक चारि प्रकारके भक्त कहे यै यतने सर्व उदारही हैं, परंतु ज्ञानी तौ मेरा आत्मायाने अत्यंत प्रिय है ऐसा मेरा मत है क्योंकि, सो योगयुक्त उत्तमगतिदायक जो मै उसी मेरेमेही आसक्त व्है रहा है तात्पर्य जैसा वह मेरेको अतिप्यारसे भजता है, वैसे मै उसकोभीभजता हो. ॥१८॥ मलम्. बहुनांजन्मनामंतेज्ञानवान्मांप्रपद्यते॥वासु देवःसर्वमितिसमहात्मासुंदुर्लभः ॥ १९ ॥ अन्वयः बहूनां जन्मना अंते वासुदेवः सर्व इति ज्ञानवान् सन् मां प्रपद्यते सः महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥ टीका. अब ज्ञानी किसको कहते हैं मौ कैसे होताहै सो कहते हैं. बहुत जन्मर्यंत पुण्यकर्म करने करते उनके अंतमे जब ऐसा जानकिवासुदेवभगवान्ही मेरा मातापिता गति मुक्ति धन कुटुं- ११६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, बादिक सर्व है इस ज्ञान करिके युक्त अथवा सर्व चरायर जगत् वासुदेवात्मक है ऐसा जानिके, सर्व हितकारक औ वैर रहित होना इस ज्ञान करिके युक्त होई सो ज्ञानी मेरेको प्राप्त होता है, वहसबसे श्रेष्ठ औ अति दुर्लभ है. ॥ १९ ॥ मूलम्. कामैस्तेस्तैर्हतज्ञानाःप्रपद्यतेऽन्यदेवताः॥ तंतं नियममास्थायप्रकृत्यानियताःस्वया ॥२०॥ अन्वयः स्वया प्रकृत्या नियताः तैः तैः कामैः हृतज्ञानाः तं तं नियम आस्थाय अन्यदेवताः प्रपद्यते ॥ २० ॥ टीका. आपकी राजस तामस प्रकृति करिके नियमित औ पु- त्रादि प्राप्तिरूप तिन तिन कामना करिके हरा गया है भगव- प्राषिरूप ज्ञान जिनका, औ उत्ती उसीका मनाके अनुरुप नियममे स्थितहैके अन्य देवतोंकी शरण जाते हैं. ॥२०॥ मूलम. योयोयांयांतनुभक्तःश्रद्धयार्चितुमिच्छति ॥ त स्यतस्याचलाश्रद्धांतामेवविदधाम्यहं ॥२१॥ सतयाश्रयायुक्तस्तस्याराधनमीहते ॥ लभ तेचततःकामान्मयैवविहितान्हितान् ॥२२॥ अंतवत्तुफलंतेषांतद्भवत्यल्पमेधसां ॥ देवान्देव यजायांतिमद्भक्तायांतिमामपि ॥ २३ ॥ अन्वयः यः यः भातः यां यां तनुं श्रद्धया अर्चितुं इच्छति तस्य .
-- गीतावाक्यार्थबोधिनी भपाटीका, ११७ तस्य तांएव अचलां श्रद्धां अहं विदधामि ॥ २१ ॥ सः तया श्रद्धया युक्तः तस्य आराधनं ईहते च ततः मया एव विहितान हितान कामान् लभते ॥ २२ ॥ किंतु तेपां अल्पमेधसांतत् फलं अंतवत् भवति यथा देवयजः दे वान याति तथा मद्भक्ताः अपि मां यांति ॥ २३ ॥ टीका. जो अन्यदेवता करिके कहेहैं वैभी मेरेहि शरीर हैं यस्या- दित्यः शरीरं इत्यादि श्रुतिवाक्योंका जो अर्थ है सो इहांभी भगवान् प्रगट करतेहैं कि, जो जो भक्त इंद्रादि देवरूप मेरे जि- स जिस तनु याने शरीरकी श्रद्धासे अर्चन करनेकी इच्छा करै उस उस भक्तको वही अचलेश्रद्धा मै देताहौं ॥ २१॥ सो भक्त उसी श्रद्धाकरिके युक्त भया उसी इंद्रादिक देवका पारा- धन करता है औ उसी देवसे मेरेहि विधान किये हुये मनोर- थौंको प्राप्त होताहै ॥ २२ ॥ परंतु तिन बुद्धिवालौंका सोफल नाशवान होताहै जैसे अन्यदेवोंके आराधन अन्य देवतौंको प्राप्त होते हैं जो मेरे भक्त मेरहीको प्राप्त होते हैं, तहां जे अन्य देवताको प्राप्त होते हैं वै फिरिभी जन्मते मरते हैं औ मेरेको प्राप्त व्हेके मुक्तहुये फिरि जन्मते नहीं सो अष्टम केशोर हैं श्लोकमे लिखेंगे श्रीब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोर्जुन ॥ मामु पेत्यतु कौंतेय पुनर्जन्मन विद्यते इति. ॥ २३ ॥ अव्यक्तंव्यक्तिमापन्नं मन्यतेमामवुद्धयः॥ परं भावमजानंतोममाऽव्ययमनुत्तमम् ॥२४॥ अन्वयः मम अव्ययं अनुत्तमं परं भावं अजानंतः अबुद्धयः अ- १४८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. व्यक्तं मां व्यक्ति प्रापन्नं मन्यते यदा व्यक्ति आपनं वां अव्यक्तं मन्यते ॥ २४ ॥ टीका. मेरा जो एक रस सर्वोत्तम पर स्वरूप तिसको न जानने- वाले अज्ञानी जन मै सर्वोतर्यामी जिसको वसुदेव पुत्रकरिके मनुष्यरूप मानते है अथवा,सर्वस्यचाहहृदिसनिविष्टः।। ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुनतिष्ठति।इन वाक्यौं करिके सर्वके हृदय- मे जो मै मूर्तिमान हौ तिसकोअरूप मानते हैं इसवास्ते मेरेको दुष्प्राप्त मानिके दूसरे देवतोंको भजते हैं. ॥ २४ ॥ मूलम्. नाहंप्रकाशःसर्वस्ययोगमायासमादृतः॥ मूढो यंनाभिजानातिलोकोमामजमव्ययम् ॥२५॥ अन्वयः अहं योगमायासमावृतः सन सर्वस्य प्रकाशः न अतः अयं मूढःलोकःअजं अव्ययं मा न अभिजानाति ॥२५॥ टीका. किसवास्ते वै लोग आपके स्वरूपको नहीं जानते हैं इस शं- का पर कहते हैं कि,मै योगमाया करिके आच्छादित हुआ भ- या सर्वको प्रसिद्ध नहीं हो इसी कारणसे जो अजन्मा औ एक रस मै हो इसको यै मूढलोग नही जानते हैं. ॥ २५ ॥ मूलम. वेदाऽहंसमतीतानिवर्तमानानिचार्जुन ॥ भ विष्याणिचभूतानिमांतुवेदनकश्चन ॥२६॥ अन्वयः हे अर्जुन अहं समतीतानि च वर्तमानानि च भविष्या-.
टीका.
मूलम्.
गीताबाक्यार्यवोधिनी भाषाटीका. १४९
णि भूतानि वेद तु मां कश्च न वेद ॥ २६ ॥
हे अर्जुन! मै जो पूर्व भये हैं औ जो अब वर्तमान है तथा
जो आगे होयगे इन साबौंको जानता हो; परंतु मेरेको कोई भी
नहीं जानता है. ॥ २६ ॥
इच्छाउपसमुत्थेनद्वंद्वमोहेनभारत ॥ सर्वभूता
निसंमोहंस यांतिपरंतप ॥ २७॥ येषांत्वंत
गतंपापंजनानांपुण्यकर्मणां ॥ तेहंदमोहनिर्म
ताभतेमांदृढव्रताः॥२८॥
हेभारत हेपरंतप इच्छाइपसमुत्थेन वंदमोहेन सर्वभूता-
निसर्ग संमोहंयाति ॥ २७॥ तु येषा पुण्यकर्मणां जना.
नां पापं अंतगतं तेवंद मोहनिर्मुताः दृढव्रताःसंतःमाभ-
अन्वयः
जंते ॥ २८॥
टीका.
हे अर्जुन! इच्छा औ द्वेष करिके उत्पन्न भया जो सुखदुः
खादिरूप मोह उस मोह करिके सर्वभूतप्राणीमात्र जन्मका-
लमे मोहको प्राप्त होते हैं औ जिन पुण्यकर्म करनेवाले मनु-
प्योंका पाप नष्ट भया है वै सुखदुःखादिकरूप मोहसे छुटे हैं
इसीसे दृढ नियम किये भये मेरेको भजते हैं, याने मेरेविना दू.
सरेको नहीं भजते है यही जिनका व्रत दृढ हैं. ॥ २८ ॥
मूलम.
जरामरणमोक्षायमामाश्रित्ययतंतिये ॥ ते
ब्रह्मतद्विदुःकृत्स्नमध्यात्मकर्मचाखिलं ॥२९॥
१५० गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अन्वयः ये मां आश्रित्य जरामरणमोक्षाय यतंति ते तत् ब्रह्म वि. दुः च कृत्स्नं अध्यात्म विदुः च अखिलं कर्मविटुः ॥२९॥ टीका. जे मेरे आश्रित व्हके जरामरणसे मुक्त होनेकेवास्ते अर्थात् प्रकृतिसंबंधरहित आत्मस्वरूपकी प्राप्तिके वास्ते यत्न करते हैं, बैं उस ब्रह्मको जानते हैं औ संपूर्ण अध्यात्मको जानते हैं औ समस्त कर्मकोभी जानते हैं इन ब्रह्म इत्यादिक शब्दोंका' अर्थ आठवे अध्यायमें कहेंगे इसवास्ते इहां खुलासा नहीं किया. ॥ २९ ॥ मूलम्. साधिभूताऽधिदेवमांसाधियज्ञंचयेविदुः ॥ प्र याणकालेपिचमतिविदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥ अन्वयः ये मां साधिभूताधिदैवं च साधियज्ञं विदुः ते च युक्त चेतसः प्रयाणकाले अपि मां विदुः ॥ ३० ॥ टीका. पुरुष मेरेको अधिभूत करिके सहित औ अधिदेव करि- के सहित औ अधियज्ञकरिकेभी सहित जानते हैं तेई पुरुष योगयुक्त चित्तवाले मरणकालमेभी मेरेको जानते हैं. ॥ ३०॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥ इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकृतायां गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १५१ श्रीमद्भगवद्गीता वाक्यार्थवोधिनी टीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ मूलम्. अर्जुनउवाच ॥ किंतर्ब्रह्मकिमध्यात्मकिंकर्मपु रुपोत्तम ॥ अधिभूतंचकिंप्रोक्तमधिदैवंकिमु च्यते ॥१॥अधियज्ञःकथंकोऽत्रदेहेस्मिन्म धुसूदन ॥ प्रयाणकालेचकथंज्ञेयोसिनियता त्मभिः॥२॥ अन्वयः अर्जनःउवाच हे पुरुपोत्तम तत् ब्रह्म किं अध्यात्म किंक- मकिं च अधिभूतं किं प्रोक्तं च अधिदेवं किं उच्यते ॥१॥ हे मधुसूदन अत्रदेहे अधियज्ञः कथं कः च अस्मिन लोके प्रयाणकाले नियतात्मभिः कथं ज्ञेयः असि ॥२॥ टीका. सातयें अध्यायमे जो ब्रह्म इत्यादिकको जानना कहाथा उनको पूछनेको अर्जुन बोलताभया कि,हे पुरुषोत्तम!जो अप- ने ब्रह्म कहा सो क्याहै नौ अध्यात्म क्याहै औ कर्म क्याहै श्रो अधिभूत किसका कहते हैं औ अधिदैव किसको कहते हैं ॥१॥ हे मधुसूदन! इस देहमे अधियज्ञ कैसे कौन है भौ इ.. स लोकमे मरणकालमे स्थिरचित्त मनुष्यों करिके कैसे ध्यान . करने योग्य हो सो कहौ. ॥ २ ॥ मूलम्. श्रीभगवानुवाच ॥ अक्षरंब्रह्मपरमंस्वभावोऽध्या स्ममुच्यते ॥ भूतभावोद्भवकरोविसर्गःकर्मसंज्ञि तः॥३॥ अधिभूतंक्षरोभावःपुरुपश्चाधिदैवतं ।।
१५२ . गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. अधियज्ञोहमेवातदेहेदेहतांवर ॥४॥ अंत कालेचमामेवस्मरन्मत्काकलेवरं ॥ यःप्रयतिस मद्भावयातिनास्त्यत्रसंशयः॥५॥ अन्वयः श्रीभगवान् उवाच हे अर्जुन परमं अक्षरं ब्रह्म उच्यते स्व भादःअध्यात्म उच्यते यः भूतभावोद्भवकरः विसर्गः सः कर्मसंज्ञितः अस्ति ॥ ३॥ क्षरोभवः अधिभूतं च पुरुषः अधिदेवतं हे देहभृतांवर अत्र देहे अधियज्ञः अहं एव ॥ ४॥ यःअंतकाले मां एव स्मरन्सन् कलेवरं मुक्का प्रयाति सःमडावं याति अत्र संशयःन अस्ति ॥ ५॥ टीका, जो प्रश्नै अर्जुनने करी उन सबनका उत्तर श्रीकृष्णभगवान देतेभये अर्जुन परम भक्षर जो शुद्ध आत्मस्वरुपक्षेत्रज्ञ सो ब्र- म कहिये श्री कोई आचार्य परमअक्षर परमात्माको कहते हैं तहाँ प्रथम अर्थ करनेवाले कहते हैं कि, यह अर्थ श्रुति विरुद्धहै तथाच श्रुतिः अव्यक्त मक्षरे लीयते अक्षरं तमसिलीयते इत्या- दिकाः ॥ इसवास्ते अक्षर आत्मा क्षेत्रज्ञ औ परमशब्दसे प्रकृति सेमुक्त शुद्धस्वरूप आत्माही इहां ब्रह्म कहाहै औ स्वभावको अ- 'ध्यात्म कहते हैं औ जो सब भूतप्राणीमात्रकी उत्पत्तिकारक वि- सर्ग उसको कर्म कहते हैं विसर्गका अर्थ कोई कहते हैं कि, यज्ञ मे जो देवताके अर्थ पुरोडासादिक स्व द्रव्यके त्यागको नाम है. औएक कहतेहैं कि,पंचम्यामाहुताश्रापःपुरुषवचसो भवति इस- श्रुति करिके सिद्ध स्त्री संबंधते जो विसर्गहै उसको कर्म कहते हैं इन दोनौके भी अर्थमे विरुद्ध नही विसर्ग नाम सृष्टिका है सो उसका जो यज्ञसे लेई तौभी यज्ञसे वर्षावर्षासे अन्न अन्नसे वीर्य १५३ गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. नौ वीर्यका स्त्री संगसे विसर्ग याने त्याग हुवा तौ सृष्टि फिर सृष्टिमे देहभया जब उसी देहसे यज्ञ यज्ञसे वर्षाइसीतरहसे यह चक्रप्रथमही कहा है॥३॥जो क्षरभाव याने देहादिक नाशवा. न वस्तुमात्र उसको अधिभूत कहते हैं, पुरुष जो सर्व इंद्रादिक देवतनकेभी ऊपर वर्तमान सब देवतौंका अधिपति औमेराही अंश वैराज सूर्यमंडल वर्ती वह अधिदेवत है औ हे देहधारीनमें श्रेष्ठ देहमात्रमे अधियज्ञ महीहौं याने जीवकाभी अंतर्यामीउ. सीके संग संग देहमे मैभी रहताहौं उसी मेरेको अधियज्ञ कहते हैं औ श्रुतिभी कहै है श्रुतिः द्वौनुपर्णौसयुजी सखायौ समानं वृक्षं परिपस्वजाते॥ तयोरेकपिप्पलंस्वादत्यनभन्नन्योऽभिचा कसीति ॥ १॥ देहधारियों मे श्रेष्ठकहनेसे यह देखाया कितुह्मारे भी देहमे मै तुलारा अंतर्यामी हौं इसवास्तेतुमभी स्वाधीन न. ही है॥ ४ ॥ जो पुरुप अंतकालमे मेराही स्मरण करता भया देह त्यागिक जाता है सो मेरी समताको प्राप्त होता है इस- मे संशय नही. ॥ ५ ॥ मूलम. यंयंवाऽपिस्मरन्भावंत्यजत्यंतेकलेवरं ॥ तंत मेवैतिकौंतेयसदातद्भावभावितः॥६॥तस्मा त्सर्वेषुकालेषमामनुस्मरयुद्धयच ॥ मय्यर्पित मनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७॥अभ्यास योगयुक्तेनचेतसानान्यगामिना ॥ परमपुरुष दिव्यंयातिपार्थानुचिंतयन् ॥ ८॥ अन्वयः यं यंभावं वा स्मरन् सन् सदा तद्भावभावितः यः कः २० १५४ गीतावास्यार्थवोधिनी भाषाटीका. अपि अंते कलेवर त्यजति हे कौतय सः तं तं एव एति ॥ ६ ॥ तस्मात सर्वेषु कालेषु मां अनुस्मर च युदय ततः मय्यर्पितमनोबुद्धिः त्वं मां एव एष्यसि इति असंशयः ॥ ७ ॥ अत्रकारणमाह हेपार्थ अभ्यासयोगयुक्तेन ना. न्यगामिना चेतसा परमं पुरुपं दिव्यं मां अनुचिंतयन सन मा एव याति ॥८॥ टीका. प्रथम कहाकि, अंतकालमे मरने के समयमे जो मेरा स्मरन करता करता देहत्याग सो मेरेहीको प्राप्त होई याने मेरे समान स्वरूप भोगादिक पावै ऐसेही मेरेको अथवा और जो जोभावों कोयाने जिसका जिसका स्मरन करता भया सदा उसीकीभा- वनामे चित्त लगाये भये जो कोईभीअंतमे देहको त्यागता हे अर्जुन! सो उसी उसी को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ तिसीवास्ते सर्वकालमे मेरेही स्मरन करौ औ स्ववर्ण धर्मरूप युद्धादिक क- म करो तो उसी कर्म करिके मेरे किषे मन औ बुद्धि लगाये भ- ये तुम मेरेहीको प्राप्त होउगे इसमे संशय नहीं ॥ ७ ॥ इहां सदा स्मरण करनेका कारण कहते हैं, हे एथापुत्र अर्जुन!जो अ- भ्यासरूप योगमे युक्त ओ दूसरेमे न जाय ऐसे चित्त करिके परम पुरुष दिव्य जो मै तितका पुनः पुनः चितवन करता भया मेरेहीको प्राप्त होता है. ॥८॥ मूलम. कविंपुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्म रेद्यः॥सर्वस्यधातारमचिंत्यरूपमादित्यवर्ण तमसःपरस्तात्॥९॥प्रयाणकालेमनसाचले नभक्त्यायुक्तोयोगवलेनचैव ॥योर्मध्येप्रा १५५ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. णमावेश्यसम्यक्सतंपरंपुरुपमुपैतिदिव्यं ॥ १० ॥ अन्वयः यःपुरुपः भक्त्यायुक्तः सन् प्रयाणकाले अचलेन मनसा . च योगवलेन भ्रुवोः मध्ये एवसम्यक् प्राणं आवेश्य ततः कविं पुराणं अनुशासितारं भणोः अणीयांसं सर्वस्य धातारं अचिंत्यरूपं आदित्यवर्ण तमसःपरस्तात् एवंभू- तंपुरुष अनुस्मरेत् सःतं परं दिव्यं पुरुपं उपैति ॥ १० ॥ टीका. जो पुरुष भक्तिकरिकेयुक्त हुअामयामरणसमयमे स्थिर मन कारिके फिरि योगके वलसे दोनों भृकुटिनके मध्यमे सुषुम्नाना- डिद्वारा सम्यक प्रकारसे प्राणवायुको प्रवेश करिके अर्थात् कुंभ क करिके तिस पीछे कवि याने सर्वज्ञ पुराण याने पुरातन अनुशासितारं याने सर्वका शिक्षक अणोः अणीयांसं याने सूक्ष्मसे सूक्ष्म सर्वस्य धातारं याने सर्वका धारण करनेवाला अ- चिंत्यरूपं याने जिसका रूप चितवनमे न आयसकै आदित्यय गै याने सदासूर्यवत् प्रकाशमान तमसःपरस्तात् याने प्रतिसे परऐता जो पुरुप पाने परमात्मा तिसकास्मरण करै सो उसप- रकायाने सर्वोत्तमको दिव्य याने अप्राकृत अर्थात् प्रकृति संबंध रहित ऐसे पुरुपको अर्थात् परमात्माको प्राप्त होय है. ॥१०॥ मूलम्. यदक्षरंवेदविदोवदंतिविशतियद्यतयोवीतरा गाः॥ यदिच्छंतोब्रह्मचर्यचरंतितत्तेपदंसंग्रहे णप्रवक्ष्ये ॥११॥ अन्वयः वेदविदः यत् अक्षरं वदंति वीतरागाः यतयः यत् विज्ञ १५६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ति यदिच्छंतः ब्रह्मचर्य चरंति अहं तत् पदं ते संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ टीका. वेदके जाननेवाले जिसकी अक्षर कहते हैं औ वीतराग याने विगत भई हैं वासना जिसकी ऐसे यती याने ईश्वर प्राप्तिके वास्ते यत्न करनेवाले जिस पदको प्राप्त होते हैं औ जिस पदकी इच्छा करनेवाले उसके जाननेके वास्ते गुरुकुल- मे रहिके ब्रह्मचर्य करते भये वेदाभ्यास करते हैं. मै उस पद- को तुझारेको संक्षेप करिके कहौंगा. ॥ ११ ॥ मूलम्. सर्वद्वाराणिसंयम्यमनोहदिनिरुद्धयच ॥ मू भाधायात्मनःप्राणमास्थितोयोगधारणम्॥ ॥ १२॥ ओमित्येकाक्षरंब्रह्मव्याहरन्मामनु स्मरन् ॥यःप्रयातित्यजन्देहंसयातिपरमांग तिम् ॥१३॥ अन्वयः यः सर्वहाराणि संयम्य च मनः हृदिनिस्य च आत्म- नःप्राणं मूभि प्राधाय योगधारणां आस्थितः सन्॥१२॥ ओं इति एकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् चमाअनुस्मरन् सन् यः देहं त्यजन् प्रयाति सः परमां गतिं याति ॥ १३ ॥ टीका. अब जो प्रतिज्ञा करी है उस पदके प्राप्तीका उपाय कहते हैं, जैसे कि सर्व इंद्रियोंको संयममे करिके मनको हृदय स्थित ई- श्वरमे राखिके आपके प्राणवायुको मूर्द्धनीमे चढायके योग गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. १५७ धारणामे स्थित हुआभया॥ १२ ॥ औ यह जो एक अक्षररूप ब्रह्मयाने ब्रह्मका प्रतिपादन कारक ओंकारतिसको उच्चारण क. रता करता औ उसका अधिष्ठाता जो मैतिसका स्मरन क- रता करता जो देह त्यागते भये जाता है सो परमगतीको प्रा- स होता है. ॥ १३ ॥ मूलम. अनन्यचेताःसततंयोमांस्मरतिनित्यशः॥ तस्याहंसुलभःपार्थनित्ययुक्तस्ययोगिनः॥१४॥ अन्वयः हे पार्थ अनन्यचेताः यः मां नित्यशः सततं स्मरति तस्य नित्ययुक्तस्ययोगिनः अहं सुलभः ॥ ११ ॥ टीका हे भर्जुन! नहीं है दूसरेमे मेरे विना चित्त जिसका ऐसा जो मेरेको नित्य निरंतर स्मरता है उस नित्य योगयुक्त यो- गीको मै सुलभ हौं. ॥ १४ ॥ मूलम. मामुपेत्यपुनर्जन्मदुःखालयमशाश्वतम् ॥ नाप्नुवंतिमहात्मानःसंसिदिपरमांगताः॥१५॥ अन्वयः परमा संसिद्धिं गताः महात्मानः मा उपेत्य पुनः दुः- खालयं प्रशाश्वतं जन्म न श्राप्नुवंति ॥ १५॥ टीका. इसके परे याने अगाडी जो अध्यायशेष रहा है उसमे ज्ञानी जोकैवल्यार्थी है उसकी अपुनरावृत्ति याने जन्म मरणका - भाव नौ ऐश्वर्या की पुनरावृत्ति कहते हैं. परम सिद्धिको याने गीतावाक्यार्थयोधिनी भाषाटीका. मेरी उपासनारूप सिद्धिको प्राप्त भये जो महात्मा वै मेरे को प्राप्त हैके फिरि दुःखका स्थान औ अस्थिर ऐसे जन्म- को नहीं प्राप्त होते हैं. ॥ १५॥ मूलम. आब्रह्मभुवनांल्लोकाःपुनरावर्तिनोर्जुन ॥मामु पेत्यतुकौंतेयपुनर्जन्मनविद्यते॥१६॥ अन्वयः हेअर्जुन आब्रह्मभुवनात् लोकाः पुनरावर्तिनः संति तु. हे कौतेय मां उपेत्य पुनः जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ टीका. हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत जो लोक हैं उनमे जायके जी- व फिरि जन्म लेताहै औ हे कुंतीपुत्र! मेरेको प्राप्त व्हैकेफिरि यह जीव जन्मता नहीं. ॥ १६ ॥ मूलम्. सहस्रयुगपर्यंतमहर्यद्रह्मणोविदुः ॥ रात्रियुग सहस्रांतांतेहोरात्रविदोजनाः॥१७॥ अन्वयः ये सहस्त्रयुगपर्यतं यत् ब्रह्मणः अहः तत् विदुःतथा युग- सहस्रांतां रात्रि विदुःतेजनाःअहोरात्रविदासंति॥१७॥ टीका, अहोकप्प देखो! पुराणमे लिखा है कि,जो तपस्वीदानीयती औ सहनशीलहै वैतीनहू लोकके ऊपर महलोंक इत्यादिकों- मे रहते हैं तौभी विनाशपने तो मृत्युलोकवासिनहीके समान हैं तय इसमे विशेष क्याहै? वहां कहते हैं कि, उनकी स्थितीबद्भुत गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १५९ काल पर्यंत रहती है यही विशेप. इसी आशयसे कहते हैं कि, ब्रह्माके प्रमाणसे ब्रह्माकीभी आयुष्य सौ वर्षकी है उसमे ब्रह्मा की राति रातिमे सृष्टिका प्रलय औ दिन दिनमे उत्पत्ति होवे है ऐसा देखाते भये ब्रह्माकी रात्रि औ दिनका प्रमाण कहते हैंसो जैसेकि हजार युग याने हजार चतुर्युगोका ब्रह्माका एक दिनौ हजार चतुर्युगीकी एक रात्री होती है सो जो कोईन के जाननेवाले हैं वही लोग रात्रिदिनके जाननेवाले हैं याने वे- ई दीर्घदर्शीऔ सर्वज्ञ हैं. जो केवल सूर्य चंद्रकी गति प्रमाण रात्रि दिनको जानते हैं वै सर्वज्ञ नहीं. ॥ १७ ॥ मूलम. अव्यक्ताद्यक्तयःसर्वाःप्रभवंत्यहरागमे ॥राव्या गमेप्रलीयंततत्रैवाऽव्यक्तसंज्ञिके ॥ १८ ॥ भू तग्रामःसएवाऽयंभूत्वाभूत्व प्रलीयते॥ राज्याग मेऽवशःपार्थप्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ अन्वयः ब्रह्मणः अहरामे अव्यक्तात् सर्वाः व्यक्तयःप्रभवंति रा- ज्यागमे तत्र अव्यक्तसंज्ञिके एव प्रलीयते॥१८॥स एव अयं भूतयामः राज्यागमे अवशः सन् भूत्वा भूत्वा प्रली- यते हेपार्थ स अयं महरागमे प्रभवति ॥ १९॥ टीका. ब्रह्माके दिनके उदयकालमे ब्रह्माहीके शरीरसे सर्व चराच र देहउत्पन्न होते हैं औ रात्रिके आगममे उसीमे लीन होते हैं ॥१८॥सोई यह कर्म वश भूतप्राणी समूह दिनोंके आगम मे व्है है के रात्रियोंके आगममे वारंवार उसी ब्रह्माकी देहमे लीन होताहै औदिनोंके आगममे फिरिभी उत्पन्न होताहै 4 . १६० गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. ऐसे ब्रह्माकी आयुष्यपर्यंत होताहै ॥ १९ ॥ मूलम. परस्तस्मात्तुभावोऽन्योव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन ॥यःससर्वेषुभूतेषुनश्यत्स्वपिननश्यति॥२०॥ अव्यक्तोऽक्षरइत्युक्तस्तमाहुःपरमांगति ॥ यंत्रा प्यननिवर्ततेतबामपरममम ॥२१॥ अन्वयः तस्मात् अव्यक्तात् परः अन्यः यः अव्यक्तः सनातनः भावः सः सर्वेषु भूते पुनश्यत्तु अपि न नश्यति॥२१॥ सः अव्यक्तःअक्षर इतिउक्त वेदज्ञाः तं परमां गतिं आहुः यं प्राप्य जनाःन निवते तत् मम परमं धाम ॥ २१ ॥ टीका, जो कैवल्यको प्राप्त होतेहैं उनकीभी पुनरावृत्ति नहींहै ऐसा कहतेहैं कैवल्य कहते हैं स्वस्वरूपको जो कहाकी ब्रह्माकी दे- हसे उत्पत्ति औ उसीमे लय होताह तहां जो ब्रह्माका वह शरी- अचेतन प्रकतिरूपहै उसते उत्कृष्ट जो दूसरा अव्यक्त सना- तनभाव है सोसर्वश्राकाशादि भूतोंके नष्ट होनेसेभी आप नष्ट नहीं होताहै ॥२१॥सोई अव्यक्त अक्षर हैं याने अक्षरहीको अव्यक्त कहतेहैं अब अक्षर तिसको कहतेहैं सो सुनौ बार हे अ- घ्यायमे प्रथम श्रीकृष्णभगवानने मय्यावश्यमनोयेमांइस श्लोक करिके आपके उपासकौंका श्रेष्ठत्व कहा फिरि येत्वक्षरमनिर्दे- श्यमव्यक्तंपर्युपासते इस श्लोक करिके यह कहाकि,प्रत्यगात्म स्वरूपकीभी उपासनावाले मेरेहीको प्राप्त होते हैं भौ पंद्रहे अ- ध्यायमेभीक्षरःसर्वाणिभूतानिकूटस्थोऽक्षरउच्यते ।उत्तमःपुरुष स्त्वन्यःपरमात्मेत्युदाहृतः॥इन वाक्योंसे यह निश्चय भया की, गीतावास्थार्थवोधिनी भपाटीका. इहां अव्यक्त औ अक्षर ये दोनौ नामोंसे आत्माहीको कहा इ. सी आत्माको वेदज्ञजन परम गति कहतेहैं यःप्रयातित्यजन् देहं सयातिपरमांगति' इहाँभी परमगति शब्द करिके देखाया भया अक्षरही है अर्थात् प्रकृतिसंसर्गसे निर्मुक्त औ आपके शु- द स्वरूपमेस्थत जोआत्मा वही परमगतिहै याने अात्मस्वरूप- मे स्थितिहीको परमगति कहते हैं क्योंकि, जिस आत्मस्वरूप- . को प्राप्त व्हेके फिरि संसारमे नही आतेहैं, उसीसे वह मेरा- परम याने उत्तम धाम है याने वासस्थान है.मै उसकाअंतर्या- मी हो. एक मेरा वासस्थान प्रकृति, दूसरा जीवसो जीवात्मा उत्तम स्थान है. ॥ २१ ॥ मूलम् पुरुषःसपर पार्थभक्त्यालभ्यस्त्वनन्यया ॥ यस्यांतस्थानिभूतानियेनसर्वमिदंततं ॥२२॥ अन्वयः हे पार्थ भूतानि यस्य अंतस्थानि संति इदं सर्व येन ततं सः परः पुरुपः अनन्यया भक्त्या लभ्यः ॥ २२ ॥ टीका. कैवल्य प्राप्तिवालेकी मुक्ति कहे; अब ज्ञानीको जो ईश्वर. प्राप्तिरूप सुखहै उसको उपाय कहते हैं. हे अर्जुन! यै सर्व जड चेतनभूत प्राणी जिसके अंगामे है जैसे कहा है कि 'मयिसर्व मिदंप्रातं सूत्रेमणिगणाइव' औ जिस करिके यह सर्व जगत् . विस्तृत हुवा है सो पर पुरुष अनन्यभक्ति करिके प्राप्त होता है, अनन्य भक्तिका लक्षण यह 'अनन्यचेताः सततंयोमस्मर ति नित्यशः' इत्यादि. ॥ २२ ॥ २१ १६२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मूलम्. यत्रकालेवनारत्तिमावृत्तिंचैवयोगिनः॥ प्रयातायांतितंकालंवक्ष्यामिभरतर्षभ ॥२३॥ अन्वयः • यत्र काले प्रयाताः योगिनः अनावृत्ति चावृत्ति एव योति तं कालं वक्ष्यामि ॥ २३ ॥ टीका. हे अर्जुन! जिसकालमे अर्थात् जिस मार्गमे गये भये यो- गी अपुनरावृत्तिको प्राप्त होते हैं औजिसमे पुनरावृत्तिको प्राप्त होते हैं, वह काल मै कहताही अर्थात् वह मार्ग कहता हौं.॥२३॥ मूलम् अग्निोतिरहःशुक्ल षण्मासाउत्तरायणं ॥ तत्रप्रयातागच्छंतिब्रह्मब्रह्मविदोजनाः॥२४॥ अन्वयः यत्र अग्निः ज्योतिः अहः शुक्लः पण्मासः उत्तरायणं तत्र प्रयाताः ब्रह्मविदः जनाः ब्रह्म गच्छंति ॥ २४ ॥ टीका. जिस कालमे याने जिसूमार्गमे उस कालाभिमानी देव- ताअग्नि औ ज्योति है याने प्रकाशकहै मौदिन तथा शुक्लपक्ष देवतोंके मार्गमे गये याने मृत्यु प्राप्त हैके गये हुये ब्रह्मके देवतौके मार्गमे गये याने मृत्यु प्राप्त व्हैके गये हुये ब्रह्मके जाननेवाले ब्रह्मको प्राप्त होते हैं. ॥ २४ ॥ मूलम. धूमोरात्रिस्तथाकृष्णःपण्मासादक्षिणायनं ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. १६३ तत्रचांद्रमसंज्योतियोगीप्राप्यनिवर्तते ॥२५ अन्वयः धूमःरात्रि तथा कृष्णः पण्मासाः दक्षिणायनं योगी तत्र चांद्रमसं ज्योतिःप्राप्य निवर्तते ॥ २५॥ टीका. धूम औरात्रिःतथा कृष्णपक्ष छ महिना दक्षिणायन अर्थात इन सवोंके अभिमानी देवतौ कारके युक्त जो मार्ग तिसमे जा. यके योगी स्वर्गमे यज्ञादिफल भोगिके फिरिभीजन्मते हैं. ॥ २५ मूलम. शुक्लकृष्णेगती तेजगतःशाश्वतेमते ॥ एकयायात्यनावृत्तिमन्ययावर्त्ततेपुनः ॥२६॥ अन्वयः एते शुक्लकृष्णे गती जगतः शाश्वते मते एकया अना वृत्तियाति अन्यया पुनः आवर्तते ॥ २६ ॥ टीका. यै जो शुक्ल औ कृष्ण गती ते जगतमे सहाही हैं परंतु एक शु. ला गती है, जिससे मोक्ष औ दूसरीसे पुनःजन्म होताहै, ॥ २६ ॥ मूलम्.. नैतेसृतीपार्थजानन्योगीमुह्यतिकश्चन ॥ तस्मात्सर्वेषुकालेषुयोगयुक्तोभवार्जुन ॥ २७॥ अन्वयः हे पार्थ एते सती जानत् सन् कश्चन योगी न मुह्यतित- स्मात् हे अर्जुन त्वं सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भव ॥ २७॥ टीका.
१६४ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
हे पृथा पुत्र! इन शुक्ला औ कृष्णा दोनौ गती जानता हुवा-
कोई योगी मोहको प्राप्त नहीं होताहै इसते अर्जुन! तुम सर्व-
कालमे योगयुक्त होउ. ॥ २७ ॥
मलम्.
वेदेषुयज्ञेषुतपःसुचैवदानेपुयत्पुण्यफलंप्रदिष्ट
म् ॥ अत्येतितत्सर्वमिदंविदित्वायोगीपरंस्था
नमुपैतिचाद्यम् ॥२८॥
अन्वयः
नरः इदं विदित्वा ततः वेदेषु यज्ञेषु च तपस्सु च दा-
नेपुयत् पुण्यफलं प्रदिष्ठं तत्सर्व अत्येति च योगी भूत्वा
परंआयं स्थानं उपैति ॥ २८ ॥
टीका.
मनुष्य इन सप्तम औ अष्टम दोनों अध्यायोंमे कहे हुये भ.
गवान महात्मको जानिके फिरि वेदमे अध्ययनादि करिके
यज्ञमे अनुष्ठानादि करिके तपमे शरीरशोपणादि कारके दानमे
सत्पात्रके संतोप करिके जो पुण्य कहाहै उस सर्वको उल्लंघन
करिके याने उनसेभी श्रेष्ठफल पाइके फिरि योगी याने ज्ञानी
व्हैके उत्तम मादिस्थान याने विष्णुपदको प्राप्त होय है. ॥२८॥
मूलमू.
इतिश्रीमद्भगवद्गीता सूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो
नाम अष्टमोऽध्यायः॥ ८॥ ॥
इतिश्री मत्सुकल सीतारामात्मज पंडित रघुनाथप्रसाद
तायां श्रीमद्भगवद्गीता वाक्यार्थबोधिनी भाषाटीकायां अष्ट
मोऽध्यायः ॥ ८॥
१६५ गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. इदंतुतेगुह्यतमंप्रवक्ष्याम्यनसूयवे ॥ ज्ञानवि ज्ञानसहितयज्ज्ञात्वामोक्ष्यसेशुभात् ॥ १ ॥ अन्वयः . हेअर्जुन इदं तु गुह्यतमं विज्ञानसहितंज्ञानं ते अनुसूय. वे प्रवक्ष्यामि यत् ज्ञात्वा अशुभात् मोक्ष्यसे ॥ १ ॥ टीका. सप्तम औ अष्टममे कहाकि, मेरा जो परमेश्वरतत्वहै सो भ- तिहीकरिके प्राप्तिहोने योग्यहै. अवनवममे आपकाजो अचिंत्य ऐश्वर्य श्री भक्तीका श्रेष्ठ प्रभाव सो कहतेहैं अथवा पूर्व अध्याय- मे उपासक भेदोके निबंध कहे औ नवममे परम पुरुषका माहा- त्म्य श्री ज्ञानियोंकाविशेपता वरणन करिके भक्तिरूप उपासन- कास्वरूप कहते हैं. जैसोक, हे अर्जुन! यह जोअतिगोप्य भक्तिरू पत्री उपासन संज्ञक ज्ञान सोविज्ञान जो उपासनाकी गतीका विशेष ज्ञान तिस करिके संयुक्त मेरि निंदा करिकेरहित जो तुम तिनको मै कहता हो याने वारंवार मै आपना माहात्म्य अप- नेही मुखसे कहताहों तो भी, तुम मेरि निंदा नही करते हो. इस. वास्तेकहताहों जिसको जानिके तुम अशुभ संसारसे छूटोगे॥१ मूलम्. राजविद्याराजगुह्यंपवित्रमिदमुत्तमम् ॥ प्रत्यक्षावगमंधय॑सुसुखंकर्तुमव्ययम् ॥२॥ अन्वयः इदं राजविद्याराजगुह्यं पवित्रं उत्तम प्रत्यक्षावगमं ध म्यकर्तुं सुसुखं अव्ययं अस्ति ॥ २ ॥ टीका. यह भक्तिरुप ज्ञान विद्या भी गुप्त पदार्थों में भी राजा याने गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. सर्वोपरि है औ पवित्र कारक उत्तम औ प्रत्यक्ष फल धर्मयु- क्तकरनेको भी सुख सहित औ नाशरहित है, अर्थात् मेरी प्राप्तिको करायके आपभी नष्ट नहीं होताहै. ॥ २ ॥ मूलम्. अश्रद्दधानाःपुरुपाधर्मस्यास्यपरंतप ॥ अप्राप्य मांनिवर्ततेमृत्युसंसारवमनि ॥३॥ अन्वयः हे परंतप अस्य धर्मस्य अश्रधानाःपुरुषाः मां अप्रा- प्य मृत्युसंसारवर्मनि निवर्तते ॥ ३ ॥ टीका. हे शत्रुनको संतापितकारक अर्जुन! इस उपासनरूप धर्मकी श्रद्धाको नहीं धारण करनेवाले पुरुष मेरेको न- ही प्राप्त व्हैके मृत्यरूप संसारमार्गमे वर्तमान होतेहैं. ॥ ३॥ मूलम. मयाततमिदंसर्वजगदव्यक्तमूर्तिना॥ मत्स्था निसर्वभूतानिनचाहतेप्ववस्थितः॥४॥नच मत्स्थानिभूतानिपश्यमेयोगमैश्वरं ॥भूतन्न चभूतस्थोममात्माभूतभावनः॥५॥ अन्वयः इदं सर्वं जगत् अव्यक्तमूर्तिना मया ततं सर्वभूतानि मत्स्थानि च अहं तेषु अवस्थितःन ॥ ४ ॥ च भूतानि मत्स्थानि न इति मे ऐश्वरं योगं पश्य भूतभावनःमम श्रात्मभूतभृत् च भूतस्थः न ॥ ५॥ टीका. यह सर्वजगत् अव्यक्तमूर्तियाने सूक्ष्म अंतर्यामी स्वरूप मेरे
मे
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
करिके व्याप्तहै इसवास्ते सर्व चराचर भूतप्राणीमात्र मेरे स्वा-
धीन है औमै उनके स्वाधीन नहीं हौं अर्थात् मेरा उपकार उनप-
र है उनका मेरे पर नहींहै॥ ४ ॥सर्व भूत प्राणीमात्र जैसे घट-
जल तैसे मेरेमे नहीं हैं यह ऐसा मेरा ईश्वर संबंधी योगदेखो.
सर्व भूतौंका पालनेवाला ऐसा मेरा आत्मा जो मन अथवा श-
रीररूप प्रत्यगात्मासो भूतौके विपे नहीं है याने भूतौमे अहं का-
रयुक्त नहीं है अथवा मैसब भूतौंका पालकहौं भौ भूतोमे नहीं
हो क्योंकि मेरे मनोमयसंकल्प हीसे भूतौंकि रक्षा होती है ॥ ५॥
मूलम.
यथाकाशस्थितोनित्यवायुःसर्वत्रगोमहान् ॥त
थासर्वाणिभूतानिमत्स्थानीत्युपधारय ॥६॥
अन्वयः
यथा महान वायुःनित्यं आकाशस्थितः सर्वत्रगः भवति
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानि इति उपधारय ॥ ६ ॥
टीका.
जैसे महान् वायु नित्यप्रति निरालंब आकाशमे स्थित
भया हुआ सर्वत्र विचारताहै अर्थात् उसका आधार मै हाँ
मेरे अवलंबसे स्थितविचारता है तैसे ही यै सर्वभूत प्राणी मेरे.
होमे याने मेरे अवलंबमे जानौ. अर्थात् इनकोभी मेही धारण
करि रहाहों ऐसा जानौ इहांप्रमाणकेवास्ते श्रुतिलिखते, एत
स्यवाअक्षरस्यप्रशासनेगार्गिसूर्याचंद्रमसोविकृतौतिष्ठतामीपा
स्मादातः पवतेभीपोदेतिसूर्यः ॥ भीपास्मादग्निश्चंद्रश्चमृत्युर्धाव
तिपंचमः॥ औरभी वेदवादी कहते हैं जैसे कि, मेघोदयःसा
गरसन्निवृत्तिरिंदोविभागः स्फुरितानिवायोः ॥ विद्युद्विभंगोगति
रुष्णरइमेविष्णोविचित्राःप्रभवतिमायाः इति ॥ ६ ॥
. गातावाक्यायवाधिना भापाटाका. मूलम्. सर्वभूतानिकौतेयप्रकृतियांतिमामिकां ॥ कल्प क्षयेपुनस्तानिकल्पादौविसृजाम्यहम् ॥७॥ अन्वयः हेकौंतेय कल्पक्षये सर्वभूतानि मामिकां प्रकृति यांति क ल्पादौ अहं ताति पुनः विसृजामि ॥७॥ टीका. प्रथम कहाकि, भगवानने संकल्पहीसे सर्वकी स्थिति है प्रो अब यह कहते हैं कि, उत्पत्ति औ प्रलयभी उन्हीकेसंकल्पसे हैं. हेकुंतीपुत्र! कल्पक्षय याने ब्रह्माके सौवर्ष पीछे ब्रह्माकेभी प्रलय कालमे सर्वभूत प्राणीमात्र आपआपके कारणों सहित मेरी प्रकृति याने मेरा सरीरभूतसूक्ष्मरूप जिसको तमः भीकहते हैं उसमे लीन होते हैं औ कल्पकी आदिमें मै उनको फिरि उत्पन्न करता हौं इहांप्रमाण मनुवाक्य लिखते हैं |आसीदिदंतमोभूतं सोऽभिध्यायशरीरात्स्वात इति॥श्रुतिभी लिखते हैं यस्याव्यक्त शरीरं इत्यादि अव्यक्तमक्षरेलीयते अक्षरंतमसिलीयते तमःपरे देवेएकीभवति तमआसीत् तमसागूढमग्रेप्रकेतमितिचप्रमाणं ॥ मूलम. प्रकृतिस्वामवष्टभ्यविसृजामिपुनःपुनः॥ भूत ग्राममिमंकृत्स्नमवशंप्रकृतेर्वशात् ॥ ८॥ अन्वयः स्वां प्रकृति अवष्टभ्य प्रकृतेः वशात् अवशं इमं कृत्स्न भूतग्राम पुनः पुनः वितृजामि ॥ ॥ टीका. मैं अपनी प्रतिके अनुकूल हैके प्राचीन स्वभावके वशजो गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. १६९ यह सर्व भूतसमूह तिसको वारंवार रचताहौं अथवा यह समय भूतसमूह मेरी गुणमयी प्रकृतिके वशहै इसवास्ते यह स्वतः अवश है, इसको मै समय समयमे सृजताहौं. ॥ ८ ॥ मूलम. नचमांतानिकर्माणिनिबध्नतिधनंजय ॥ उदा सीनवदासीनमसक्तंतेषुकर्मसु ॥९॥ अन्वयः हेधनंजय तेषु कर्मसु असक्तं च उदासीनवत् आसी- नं मां तानि कर्माणि न निवनंति ॥ ९॥ टीका. जब आपही ऐसी विषम सृष्टिको रचतेही याने कोईको श्रेष्ठ औ कोईको नीच दुःखी उत्पन्न करतेहौ तब वैषम्य औ निर्दयत्वदोप तुझारेमें आवेंगे, जब तुमकोभी बंधन प्राप्त करेंगे तहा कहतेहै कि, हे धनंजय! मै उन कौमे आसक्त नहीं औ उदासीनयाने इच्छाद्देपादि रहित सरीखा स्थित हौं ऐसे मेरेको वै कर्म नहीं बंधन करि सकते हैं. ॥ ९ ॥ मूलम्. मयाऽध्यक्षेणप्रकृतिःसूयतेसचराचरम् ॥ हेतुनानेनौंतेयजगद्विपरिवर्त्तते ॥१०॥ अन्वयः हेकौंतेय मया अध्यक्षेण प्ररुतिः सचराचरंजगत् सूय- ते अनेन हेतुना जगत् विपरिवर्तते ॥ १० ॥ टीका. जब सर्वका द्रष्टा हैके स्थितही तब यह प्रति च: मै २२ १७० गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. राचरको उत्पन्नकर है इसी कारणसे जगत् नाना प्रकारका उत्पन्न होता है. ॥ १० ॥ मूलम्. अवजानंतिमांसूढामानुपीतनुमास्थितं ॥ परं भावमजानंतोममभूतमहेश्वरं ॥ ११॥ मोघा शामोधकर्माणोमोघज्ञानाविचेतसः॥राक्षसी मासुरींचैवप्रकृतिमोहिनींश्रिताः॥ १२॥ महा मानस्तुमांपार्थदैवीप्रकृतिमाश्रिताः। भजत्यन न्यमनसोज्ञात्वाभूतादिमव्ययं ॥ १३॥ अन्वयः राक्षसी च आसुरी एव मोहिनी प्रकृति श्रिताः अत- एव मोघाशाः मोधकर्माणः मोघज्ञानाः विचतसः भूत- महेश्वरं मम परंभावं अजानंतः मूढाः मानुषीं तनुं प्रास्थितं मांअवजानंति ॥ ११॥ १२॥ तु दैवी प्रक- तिं आश्रिताः महात्मानः हे पार्थ मां भूतादि अव्ययं ज्ञात्वा अनन्यमनसः भजति ॥ १३ ॥ टीका. जो राक्षसी औ आसुरी ही मोह करनेवाली प्रकृतिको गृह- ण करि रहे हैं इसीसे वै निष्फल आशाके करनेवाले औ नि- प्फल कर्म करनेवाले औ निष्फल ज्ञान जिनका औ इसीसे वि- क्षिप्त है चित्त जिनका इत्यादिकारणों करिके मेराभूतोंका महे- श्वरत्व नही जागते हैं याने मै ईश्वरोंका भी ईश्वर हो, इसको नजानते भये मूढ परम करुणासे मनुष्य शरीर जोमैनेजगत् रक्षा वास्ते धारण किया है ऐसा जो मै तिसकी अवज्ञा करतेहै गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १७१ याने और मनुष्योंके समान जानते है ॥११ ॥१२॥औ जो दै- वीप्रकृतीको प्राप्त भये हैं वै महात्माजन हे अर्जुन मेरेको सर्वभू तौंका आदि याने वीज औ अविनाशी जानिके अनन्यमन याने दूसरेमे मनान लगाते भये मेरेको ही भजते है. ॥ १३ ॥ मलम्. सततंकीर्तयंतोमांयतंतश्चदृढव्रताः॥ नमस्यं तश्चमांभक्त्यानित्ययुक्ताउपासते ॥१४॥ अन्वयः सततं मां कीर्तयंतःच दृढव्रतायतंतःच भक्त्या मां नम- स्यंतः एवं नित्ययुक्ताः संतः मां उपासते ॥ १४ ॥ टीका महात्मा कैसे भजते हैं तो कहैं हैं. निरंतर मेरे ही गुण नामोंका कीर्तन करते भये औ दृढ संकल्प करिके मेरे पूजना- दिकमेयत्न करते भये औ भक्ती करिके मेरेहीको साष्टांग नम- स्कारकरते भये ऐसे नित्यही मेरे समागमकी इच्छा करते भ- ये मेरीउपासना करते हैं. ॥ १४ ॥ मूलम्. ज्ञानयज्ञेनचाप्यन्येयजंतोमामुपासते ॥ एक वेनपृथत्केनबहुधाविश्वतोमुखं ॥ १५ ॥ अन्ये एकत्वेन च पृथक्केन एवं बहुधा विश्वतोमुखं मां ज्ञानयज्ञेन यजतः संतः उपासते ॥ १५॥ टीका. प्रथमजो कीर्तनादिकारके भजते हैं उनसे दूसरे महात्मालो- गएकत्व अर्थात् यह जडचेतन्य जगत् सर्व भगवानका शरीर है अन्वयः १७२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. इसवास्ते सर्व भगवानही है ऐसे एकत्व मानिके मेराहि कीर्त- न अर्चनादि करते हैं औ ष्टयक्त्वेन इंद्रादिकोंका आराधन क- रिके मेरेअर्पण करते हैं अथवा एकत्व जो मित्रभावउस मित्रभा. वरूप एकत्वकरिके सत्कारपूर्वक उपासना करते हैं जैसे सुग्रीवा- दिकप्रयत्कजोदासभाव उस करिके अाराधनकरतेभये उपास- ना करते हैं, जैसे हनुमान इत्यादिक ऐसेही वहुधा कोई वात्स- ल्य औशृंगार इत्यादिक भावनासे नानाविधसे मेरा प्यारकरते भये पूजन करिके उपासना करते हैं कोई विश्वतोमुख याने सर्व मेरेको जानिके सर्वसे मित्रता औदीनोंपर दया इत्यादि ज्ञा नरूप यज्ञसे मेरा आराधन करते भये उपासना करते हैं.॥१५॥ मूलम्. अहंक्रतुरहंयज्ञःस्वधाहमहमौपधं ॥ मंत्रोहमह मेवाज्यमहमग्निरहंहुतं ॥ १६ ॥ अन्वयः क्रतुः अहं एव यज्ञः अहं एव स्वधा अहं एव औषधं अहं एव मंत्रः अहं एव आज्य अहं एव अग्निः अहं एव हुतं अहं एव ॥ १६ ॥ टीका. अब श्रीकृष्ण भगवान श्रापको विश्वरूप कहते हैं,याने सर्व विश्व मेराही शरीर हैं यह कहते. जैसे कनुमैही हौं अर्थात् अग्नि- टोमादिक श्रौतज्ञरूपमैही हौं, यज्ञयान स्मार्च पंचमहायज्ञरू- पमैहीं हौं,स्वधा पितृनके अर्थ श्राद्धादिक औपध अन्न मंत्रा- ज्य होमसामग्री अग्नि औ होमचे सर्वरूप मैही हो. ॥ १६ ॥ मूलम्. पिताहमस्यजगतोमानाधातापितामहः ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १७३ वेद्यं पवित्रमोंकारऋक्सामयजुरेवच ॥१७॥ अन्वयः अस्य जगतः पिता माता धाता पितामहःवेद्यं पवित्रं ओंकारः ऋक् साम च यजुः अहं एव ॥ १७ ॥ टीका. इस स्थावरजंगमरूप जगतका पिता माता धारण कर- नेवाला दादा इनरूप मैहीं हों औ वेदमे पवित्र कारक अथवा जानिवेजोग औ पवित्रकारक जोवस्तु है सो मैहीं हों औ ओं- कार तथा ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद इनरूपभी मैहीं हौं ।॥ १७॥ मूलम. गतिर्भर्ताप्रभुःसाक्षीनिवासःशरणंसुहृत्॥प्र भवप्रलयस्थानंनिधानंबीजमव्ययं ॥१८॥ अन्वयः अस्य जगतः गतिः भनी प्रभुःसाक्षी निवासःशरणं सुहत् प्रभवप्रलयस्थानं निधानं अव्ययं वीजं अहं एव ॥ १८॥ टीका. इस जगतकी गति जोगमन श्री भर्ना पोपण कर्ता प्रभुस्वा- मी साक्षी शुभाशुभकर्मीका साक्षी निवास रहनेका स्थान शरण, इटकी प्राप्तिकारक औ अनिष्टका निवारक अथवा भयसे रक्षक सुद्धत् प्रत्युपकार विना हितकारक प्रभवप्रलयस्थान याने उत्पत्ति नाशका स्थान निधान धारणकरनेका स्थल औ वि- नाशरहित सर्व जगतका कारण भी मैही हो. ॥ १८ ॥ मूलम्. तपाम्यहमहंवनिग्रह म्युत्सृजामिच ॥
गीतावाक्यावधिना भापार्टीका १७४ अमृतंचैवमृत्युश्चसदसञ्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥ अन्वयः हेअर्जुन अहं तपामि अहं वर्ष निगृहामि च उत्सृजामि च अमृतं च मृत्युः च सत् च असत् अहं एव ।।१९।। टीका. हेअर्जुन! अमित्रो सूर्यरूप व्हेके मैहींतपता हौ औ ग्रीष्मा- दिक ऋतुनमे मैही वर्षाको आकर्पण करता हौ औ वर्षाकालमे वर्षाको त्यागता हों याने वर्षता हौं भी अमृत जिसकरिके जीव ते हैं मृत्यु याने जिसकरिके मरते हैं सो उनरूपभी मैही हौं अ- व बहुत कहने मे क्याहै? सत् जो वर्तमान औ असत् जो व्यतीत भया औ होयगा अथवा सत् स्थूल असत् भूक्ष्म ऐसे इस जगत- की सर्व अवस्थामे जड चेतनात्मक मैही हौं इसवास्ते बहुधा नामरूप विभागसे पृथक्त्व करिके औ सर्वांतर्यामित्वले एकत्वज्ञान करिके महात्मा मेरो उपासना करते हैं.॥ १९ ॥ मूलम्. त्रैविद्यामांसोमपाःपूतपापायज्ञैरिष्ट्वास्वर्गतिप्रार्थ यंते ॥ तेपुण्यमासाद्यसुरेंद्रलोकमश्नंतिदिव्या दिविदेवभोगान् ॥२०॥ तेतं भुत्कास्वर्गलोकं विशालंक्षीणेपुण्येमर्त्यलोकेविशंति ॥ एवंत्रयी धर्ममनुप्रपन्नागतागतंकामकामालभंते ॥२१॥ अन्वयः विद्याः सोमपाःपूतपापाः मां यज्ञैः इष्टवा स्वर्गतिं प्रार्थ- यंते ते पुण्यं सुरेंद्रलोकं मासाद्य दिवि दिव्यान् देवभो. गान् अमेति ॥२०॥ते तं विशालं स्वर्गलोकंभुत्का पुण्ये गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. क्षीणे सति मर्त्यलोकं विशति एवं त्रयीधर्म अनुप्रपनाः कामकामाः गतागतं लभते ॥ २१ ॥ टीका. ऐसे महात्माज्ञानी लोगोंकी रहनि औ व्यवहार कहा अ. व अज्ञानी जो काम्य कर्म करनेवाले तिनका रहन, चलन क- हते हैं. त्रैविद्या याने ऋक् जयःसाम एसे तीन विद्या इन ती- नौ विद्याकरिके जो प्रतिपादन किया कर्म उसको त्रिविद्य कह- से हैं नौ उसकर्महीके केवल निष्ठावालोंको त्रैविद्य कहते हैं उन कर्मनिष्ठौंमे सकामी केवल कर्मनिष्ठ औनिष्कामी त्रैव्यं- तनिष्ठ ते श्रेष्ठ तहां सकामी पुरुप केवल इंद्रादि यज्ञ शेप सो पान करिके निष्पाप हुये भये उन इंद्रादिरूप मेरा यजन करि- के मेरेको उनमे न जानतेभये स्वर्गकी प्राप्ति मांगते हैं, फिरि पुण्यरूप इंद्रलोकको प्राप्तव्हके उस स्वर्गमे दिव्य देवौके भोग भोगते हैं ॥ २० ॥ फिरिवै वह विशाल स्वर्ग लोक याने स्वर्गके सुखको भोगिके पुण्यके क्षयहोनेसे फिरि मर्त्यलोकमे प्रवेश करते हैं ऐसे केवल वेदत्रयी धर्मकोवारंवार करते भये स- कामीलोग गतागत याने स्वर्ग जाना फिरि मर्त्यलोकमे श्रा- ना फिरि जाना फिरि पाना ऐसा फल पावते हैं. ॥ २१॥ मूलम्. अनन्याश्चिंतयंतोमांयेजनाःपर्युपासते ॥ तेपांनित्याभियुक्तानांयोगक्षेमवहाम्यहं ॥२२॥ वै अन्वयः येजनाः अनन्याः मां चिंतयंतः संतः मापर्युपासते ते पांनित्याभियुक्तानां योगक्षेमं अहं वहामि ॥ २२ ॥ टीका.
१७६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. महात्मा जन तौ निरतिशय प्रियरूप मेरा चितवन करि- के मेरेको प्राप्त व्हेके, फिरि नहीं जन्मते हैं ऐसे उनका विशेष देखाते हैं. जे अनन्य याने मेरे चितवन विना दूसराप्रयोज नजिनके नही ऐसे मेरा चिंतवन करनेवाले जे लोगमेरा उ- पासन करते हैं उन् नित्य मेरा संयोग चाहने वालोंका योग जो मेरी प्राप्ति औ क्षेम जो अपुनरावृत्ति अथवा योग धना दिलाभ क्षेम धनादिककारक्षण ऐसे इह लोक औ परलोकके सुखको प्राप्तिकारकमै ही हों. ॥ २२ ॥ मूलम. येप्यन्यदेवताभक्तायजंतेश्रद्धयान्विताः ॥ तेपिमामेवातेययजंत्यविधिपूर्वकं ॥२३॥ अन्वयः ये अन्यदेवताभक्ताः अपि श्रद्धया अन्विताः यजते हे कौंतेय तेअपिमा अविधिपूर्वकं भजति ॥ २३ ॥ टीका. जेपुरुप अन्य इंद्रादिक देवतौकेभी भक्त श्रद्धायुक्त उनका यजन करते हैं वै भी, मेरेहीको भजते हैं परंतु विधिपूर्वक या- ने मेरेको मुरव्य जानिके नहि भजते है. जो उन इंद्रादिकौंका • अंतर्यामी मरेको जानिके वह यज्ञफल मेरे अर्पण करें तो मुक्तहोय परंतु मेरेको नजाननेसोफिरिजन्मताहैं. ॥ २३ ॥ मूलम्. अहंहिसर्वयज्ञानांभोक्ताचप्रमुरेवच ॥नतुमाम भिजानंतितत्त्वेनातश्च्यवंतिते ॥२४॥ अन्वयः हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुः अहं एव तु ते मां तत्त्वेन
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. १७७
न अभिजानंति अतः कारणात् व्यवंति ॥ २४ ॥
टीका.
जिसवास्ते की सर्व यज्ञौंका भोक्ता औ स्वामि मैहि हप-
रंतु वै मेरेको ऐसा निश्चय करिके जानते नही इसवास्ते जन्म
मरणको फिरिभी प्राप्त होते हैं. ॥ २१ ॥
मूलम्.
यांतिदेवव्रतादेवान्पिढन्यांतिपितृव्रताः ॥ भू
तानियांतिभूतेज्यायांतिमद्याजिनोऽपिमां ॥२६॥
अन्वयः
देवव्रताः देवान् यांति पितृव्रताः पिवन याति भूतेज्याः
भूतानि यांति मद्याजिनः अपि मां याति ॥ २५ ॥
टीका.
अहो यह बडा आश्चर्य है कि, एकही कर्ममे संकल्पमात्रसे
पुनरावृत्ति श्री पुनरावृत्तिकीभी प्राप्ति होति है, तहां कहते हैं
इहां भक्तिका कारण है जैसे कीजिसकीभक्तिकासंकल्प इसीको
प्राप्ति केवल इंद्रादिदेवतौकी भक्तिपूर्वक यजन करैतो उन्ही दे-
वतौंको प्राप्तहोय केवल पितृभक्त पितृनको प्राप्तहोय और भूत
प्राणीमात्रमे जिसजिसकी भक्तिसे सेवाकर उसीकी समताको
प्राप्तहोय औ मेरी भक्तिपूर्वक सर्व यज्ञादि कर्मफर तो मेरेको
प्राप्तहोय वै इंद्रादिक सर्व अल्पकाल स्थायी हैं औ में सदा
एकरस हों इसवास्ते उनका उपासक फिरिजन्मता है औमेरा
भक्त अपुनरावृत्तिको प्राप्त होता है. ॥ २५ ॥
मूलम.
पत्रपुष्पंफलंतोयंयोमेभक्त्याप्रयच्छति ॥त
दहभत्त्युपहतमश्नामिप्रयतात्मनः॥२६॥
८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. अन्वयः यः पत्रं पुष्पं फलं तोयं मे भक्त्या प्रयच्छति तत् पत्रा- दिकं प्रयतात्मनः भक्त्युपहतं अहं अनामि ।। २६ ॥ टीका. अब आपकी भक्ति करनेमे अतिसुलभता देखाते हैं, जो को- पत्र पुष्प फल औजल भेरेको भक्ति करिकेयुक्त समर्पणकरता है सो पत्रादिक शुद्ध चित्त भक्तका अर्पण कियाभया मै स्वीकार करताहीं यह नहींकि, क्षुद्रदेवों सरीखा जो सामग्रीमे कुछभी कमती भया तौ क्रोधकरें इसवास्ते मै अतिसुलम हो. ॥ २६ ॥ मूलम. यत्करोपियदश्नासियन्जुहोपिददासियत् ॥ यत्तपस्यसिकौंतेयतत्कुरुष्वमदर्पणं ॥२७॥ शुभाशुभफलैरेवंमोक्ष्यसेकर्मबंधनैः॥संन्यास योगयुतात्माविमुक्तोमामुपेष्यसि ॥२८॥ अन्वयः हे कौतेय यत् करोपि यत् अभासि यत् जुहोपि यत्द- दासि यत् तपस्यसि तत् मदर्पणं कुरुष्व ॥ २७ ॥ एवं कर्मबंधनैः शुभाशुभफलैः मोक्ष्यसे एवंच सन्यासयोग युक्तात्मा त्वं विमुक्तःसन मा उपैष्यसि ॥ २८ ॥ टीका. मै अतिसुलभ हौं इसवास्ते हे कुंतीपुत्र! तुम जो करौ जोखा उजाहोमकरो जो दान देऊ जो तप करीसोसर्व लौकिक वैदि- ककर्म मेरे अर्पण करौ॥२७॥ऐसे करनेसे कर्म बंधन करनेवा- ले शुभाशुभकर्मफलौंसे छूटोगे औ ऐसेही यह कर्म फलअर्पणरू पसन्यास योगमे मनको युक्त किये भये कर्मबंधनसे छूटिकेमेरे गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. को प्राप्त होउगे. ॥ २८ ॥ १७९ समोहंसर्वभूतेषुनद्वेष्योस्तिचनप्रियः॥येभ जंतितुमभित्त्यामयिततेषुचाप्यहं ॥२९॥ अन्वयः अहं सर्वभूतेषु समः अतः मे देष्यः न अस्ति न प्रि- यः अस्ति तु ये मां भक्त्या भजति ते मयि संति च तेषु अपि अहं अस्मि ॥ २१॥ टीका. मेरा सर्वलोकविलक्षण स्वभाव सुनौ कि मैसर्व भूतप्राणी मात्रमे समवर्ती हैं; इसवास्ते मेरे शत्रुभी नहीं औ मित्रभी नही तो भी जो मेरेको भक्तिकरिके भजते हैं वै मेरे हृदयमे वसते हैं औ मै उनके हृदयमे वसता हो. ॥ २९ ॥ मूलम. अपिचेत्सुदुराचारोभजतमामनन्यभाक् ॥ साधुरेवसमंतव्यःसम्यग्व्यवसितोहिसः॥३०॥ क्षिप्रभवतिधर्मात्माशश्वच्छांतिंनिगच्छति॥ कौतेयप्रतिजानीहिनमभक्तःप्रणश्यति ॥ ३१ ॥ अन्वयः वेत् यःसुदुराधारःअपि अनन्यभाक् मां भजते सःसाधुः एव मंतव्यः हि यतः सःप्तम्यक् व्यवसितः॥ ३० ॥ सः क्षिप्रं धर्मात्मा भवति च शश्वत्शांतिं निगम्छति हेकौं- तेय त्वं प्रतिजानीहि मद्भक्तः न प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ टीका. मो कि अति दुराचारीभी होय याने स्वजातीय धर्मों का .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. आचरण त्यागिके अन्यधर्म आचरण करता होय तो भी जो पुरुष मेरा अनन्यभक्त व्हेके मेरेको भजता होय तो वह साधु है,ऐसा मानना क्योंकि, उसने मेरा भली प्रकारले निश्चय किया है ॥३०॥ महो शास्त्रवाक्य है कि, नाविरतोदुश्चरितानाशांतो नासमाहितानाशांतमनसोवापिप्रज्ञानेनैवमामुयात् ।। अर्थ जो दुराचार नहीं छोड़ते हैं प्रौ न शांत है औ नसावधान है औ न जिसका मन शांत भया है सोज्ञान करिके ईश्वरको नही पाव- ता है तो दुराचारी साधु कैसे माना जायगा? तहाँ कहते हैं कि वह मेरे भजनके प्रभावसे तत्काल धर्मात्मा होता है शश्वछा- ति जो अपुनरावृत्तिरूप मेरी प्राप्ती उसको प्राप्त होय है, हे कुंती. पुत्र! तुम सभामे ऐसी भुजा उठायके प्रतिज्ञा करौकि मेरा भक्त नाशको नही प्राप्त होता है याने संसारी नहीं होता है.॥३१॥ मूलम् माहिपार्थव्यपाश्रित्ययेऽपिस्युःपापयोनयः॥ स्त्रियोवैश्यास्तथाशुद्रास्तेपियांतिपरांगति ॥ ॥ ३२॥ किंपुनर्ब्राह्मणाःपुण्याभक्ताराजर्षय स्तथा ॥अनित्यमसुखंलोकमिमंप्राप्यभन स्वमाम् ॥ ३३॥ अन्वयः हे पार्थमा व्यपाश्रित्य ये पापयोनयः अपि स्युः तथा खियः वैश्याः शूद्रात अपि परांगतिं याति ॥ ३२ ॥ ये तु पुण्याः ब्राह्मणाः च तथा राजर्पयः भक्ताःते परांगति योति इति पुनः किं अतः अनित्यं असुखं इमं लोकं प्राप्य मां भजस्व ॥ ३३ ॥ टीका,.
गीतावाक्याबोधिनी भपाटीका, १८१ हे प्रथापुत्र! मेरे प्राश्रित व्हेके जो पाप योनीभी याने अं- तिज इत्यादि भी है तैसे स्त्री वैश्य औ शूद्र वै भी परमगतीको प्राप्त होते हैं ॥३२॥ औ जो पवित्र ब्राह्मण तथा क्षत्रिय मेरे भक्त हैके मुक्त होय इसमे कहनाही क्याहै? इसवास्ते अनित्य श्री दुःखरूप इस लोकको प्राप्त हैके मेरेको भजो. ॥ ३३ ॥ मूलम. मन्मनाभवमद्भक्तोमद्याजीमांनस्कुरु ॥मा मैवैष्यसियुंकैवमात्मानंमत्परायणः॥३४॥ अन्वयः मन्मनाः भव मद्भक्तः भव मद्याजी भव मां नमः कुरु एवं प्रात्मानं युवा मत्परायणः सन मां एव एप्पसि॥ ३४ ॥ टीका. हे भर्जुन तुम मेरेमे मन लगावौ औ मेरे भक्त होउ याने. मेराही स्मरणादिक करौ मेराही यजन करी मेरेहीको नम- स्कार कगे ऐसे मनको मेरेमे लगायके परम वासस्थानकिये भये मेरेहीको गार होउगें. ॥ ३१ ॥ मूलम. इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराज गुह्ययोगोनामनवमोऽध्यायः॥९॥ इति श्रीमत्सकल सीतारामात्मज पंडित रघुनाथप्रसाद- कृतायां श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थबोधिनीभापाटीकायांनयमो ऽध्यायः ॥ ९ ॥ मूलम् श्रीभगवानुवाच ॥ भूयएवमहाबाहोशृणुमेपर गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. मंवचः॥ यत्तेऽहंप्रीयमाणायवक्ष्यामिहितका म्यया॥१॥ अन्वयः श्रीभगवान उवाच ॥ हेमहाबाहो यत् वचः प्रीयमाणा यते हितकाम्यया वक्ष्यामि तत् म परमं वचः भूयः • एवं शृणु ॥ १ ॥ टीका. सप्तम श्रादिक तीनि अध्यायोंमे श्रीकृष्ण भगवानने भ- गवत्तत्व औ आपकी विभूती वर्णनकी, तहां सप्तममे रसोहम प्सुकौंतेय इत्यादि करिके औ अष्ठममे अधियज्ञोऽहमेवात्र इत्यादि करिके नवममे अहंकतुरहंयज्ञ इत्यादि करिके विभूति संक्षेपसे कही. अव दशममे उन्ही विभूतियाँको विस्तार करते भये स्वभक्तिकी भी अवश्य कर्तव्यता वर्णन करते भये भग- यान घोले,हे महाबाहो, जो वाक्य प्रीतिवाले तेरेको मै हितकी कामना करिके कहाँगा वही मेरा परम वाक्य तुम फिरि भी- सुनो अथवावारंवार सुनौं. ॥ १ ॥ मूलम. नमेविदुःसुरगणाःप्रभवन्नमहर्षयः॥अहमादि र्हिदेवानामहर्षीणांचसर्वशः॥२॥ सुरगणः मे प्रभवं न विदुः च महर्षयः न विदुः हि यतः अहं देवानां च महर्षीणां सर्वशः आदिः ॥ २॥ टीका, समस्त देवता मेरे प्रभवको याने प्रभावको प्रर्या मेरे नाम कर्मस्वरूप औस्वभावको नहीं जानते हैं औ महर्षीभी नही जा. नतेहै क्योंकि,भे सर्वदेन औमहर्षी इनों का सर्व प्रकारसे भादि- अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. हो जैसेकि, उनका स्वरूप औ ज्ञानशक्ति इत्यादिकौंका आ. दि मै हौं याने उनका देवत्व श्री महर्षित्व उन्हीके पुण्यप्रमा- णसे महीने दिया है औ परमित ज्ञानभी मैने दिया है इस वास्ते वै नहीजानते हैं. ॥ २ ॥ मूलम. योमामजमनादिंचवेत्तिलोकमहेश्वरं ॥ असंमू ढः समत्र्येषुसर्वपापैःप्रमुच्यते ॥३॥ अन्वयः यः मां प्रजं अनादिं च लोकमहेश्वरं वेति सःमत्येषु असंमूढः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ टीका. जो मेरेको प्रजम्मा अनादि भौ सर्व लोकोंका महेश्वर ऐसे जानता है सोमनुष्यों मेमोहरहितभयासर्वपापोंसे छूटताहै॥३॥ बुद्धिर्ज्ञानमसंमाहेःक्षमासत्यंदमःशमः॥ सुखं दुःखंभवोभावोभयंचाभयमेवच ॥४॥अहिं सासमतातुष्टिस्तपोदानंयशोऽयशः॥भवति भावाभूतानांमत्तएवष्टयाग्वधाः॥५॥ अन्वयः बुद्धिः ज्ञानं असंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः सुखं. दुःखं भवः भावः भयं च अभयं एव च ॥४॥ अहिं सा समता तुष्टिस्तपः दानं यशः अयशः एवं टप ग्विधाः भूतानां भावाः मत्तः एव भवंति ॥ ५ ॥ टीका.
१८४ गीतावाक्यार्यबोधिनी भापाटीका,
अब भापकी सर्व लोक महेश्वरताको प्रसिद्ध दरशाते हैं -
द्धि इत्यादि तीन श्लोकौं करिके, बुद्धि जो सारासार विवेककी
निपुणताज्ञान प्रात्मपरपरमात्मविपयिक ज्ञान असंमोहअव्या
कुलता क्षमा समर्थकोभी सहनशीलता सत्य यथार्थ औप्रियभा.
पण दम वाह्यइंद्रियोंका वशकरना शमअंतःकरणकासंयमसुख
औ दुःखप्रसिद्ध भव उत्पत्ति अभाव नाश भय अभय प्रसिद्ध
हैं अहिंसा परपीडाकी निवृत्ति समता रागद्वेषादिकका अभाव
तुष्टि यथालाभ संतोष तप उपवासादिक दान न्यायसे उत्पन
किये धनकासत्पात्रको अर्पण करना बहा सत्ती अयश दु.
कीर्ती ऐलेबुद्धि ज्ञानादिक ऐसे अनेक प्रकारके न्यारे न्यारे स.
र्वभूतमात्रप्राणिमात्रौं के भाव ते वैसर्व मेरेसेही होतेहै.॥५॥
मूलम्.
महर्षयःसप्तर्वचत्वारोमनवस्तथा ॥मद्भावा
मानसाजातायेषांलोकइमाःप्रजाः॥६॥
अन्वयः
सप्त महर्षयः तेभ्यः पूर्वं चत्वारः महर्पयःतथा मनवः
एतेमद्भावाः मानसाः जाताः येषां इमाःप्रजाः लोके
प्रजायते ॥६॥
टीका.
सप्त मरीचि इत्यादिक महाऋपी औ उनसेभी पूर्वचारि
सनकादिक महाऋषी तथा स्वायंभुवादिकमन यै मेरे संक
ल्प सदृश करनेवाले हैं क्योंकि ब्रह्मरूप जो मै उस मेरे म;
नहीसे उत्पनयेहैं जिनकी यह प्रजा पुत्रपौत्रादि औ शिष्य
प्रशिष्यादिरूप लोकमे उत्पन्न होते हैं. ॥६॥
१८५
.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
मूलम.
एतांविभूतियोगंचममयोवेत्तितत्वतः॥ सो
ऽविकंपेनयोगेनयुज्यतेनात्रसंशयः॥७॥
अन्वयः
.
यः मम एतां विभूतिं च योगं तत्त्वतः वेत्ति सः अवि-
कंपेन योगेन युज्यते अतः संशयः न ॥ ७ ॥
टीका.
जो पुरुष यह मेरी विभूति याने मही इत्यादिकौंकि उ-
त्पत्ति औ स्वाधीनत्व रूप वैभव औ कल्याण गुणादि रूप
योग, इनको जो तत्त्वसे जानै सो अचल भक्तियोगको प्राप्त
होय, इहां इस विषयमे संशय नहीं. ॥ ७ ॥
मूलम्.
अहंसर्वस्यप्रभवोमतःसर्वप्रवर्तते ॥ इतिमत्वा
भजतेमांवुधाभावसमन्विताः॥८॥
अन्वयः
अहंसर्वस्य प्रभवः मत्तः सर्व प्रवर्तते इतिमत्वा भाव-
समन्विताः वुधा :मां भजते ॥ ८ ॥
टीका..
अब विभूतिज्ञानकी फलरूप जोभक्ति उसै देखाते हैं, मैस-
र्वका उत्पत्तिस्थान हों औ सर्व मेरेहीसे प्रवर्त्त होते हैं, ऐसे मेरे-
को जानिके प्रेमसहित ज्ञानीजन मेरेको भजते हैं. ॥८॥
मूलम्.
मच्चित्तामद्गतप्राणावोधयंतःपरस्परं । कथयं
तश्चमांनित्यंतुष्यंतिचरमंतिच ॥९॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
अन्वयः
मच्चिताः मद्गतप्राणाः जनाः परस्परं बोधयंताःसंतःनि-
त्यं मा कथयति च तुष्यति च रमंति ॥ ९ ॥
टीका.
पूर्व श्लोकमे कहाकि, ज्ञानी जन मेरेको भजते हैं सोवै जैसे
भजते हैं सो कहते है,मेरेमे लगा है चित्तौ प्राण जिनका ऐसे
लोग मेरे गुणौंको आपआपके अनुभव प्रमाण परस्पर बोध क-
रते भये मेरेही दिव्य रमणीय गुणोंको नित्य कथन करते हैं औ
संतुष्ट होते हैं श्री रमंति याने निवृत्तिको प्राप्त होते हैं अथ-
वा रमंति याने मेरे करी भई क्रीडौंको करते हैं जैसे उत्सवौं-
मे रामलीला इत्यादिक. ॥ ९ ॥
मूलम.
तेपांसततयुक्तानांभजतांप्रीतिपूर्वकं ॥ ददा
मिबुद्धियोगंतंयेनमामुपयांतिते ॥ १०॥
अन्वयः
सततयुक्तानां प्रीतिपूर्वकं भजतां तेषां तं बुद्धियोगं द-
दामि येन ते मां उपयाति ॥ १०॥
टीका.
निरंतर मेरी प्राप्तिकी इच्छा करि रहे हैं औ प्रीतिपूर्वक मेरे
हीको भजते हैं उनको मै वह बुद्धियोग देउंगा जिस बुद्वियो-
ग करिके वै मेरेको प्राप्त होयगे. ॥१॥
मूलम.
तेपामेवानुकंपार्थमहमज्ञानजंतमः॥ नाशया
म्यात्मभावस्थोज्ञानदीपेनशास्वता ॥ ११ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, १८७ अन्वयः तेपां एव अनुकंपार्थ आत्मभावस्थः अहं भास्वता ज्ञान. दीपेन अज्ञानजं तमः नाशयामि ॥ ११ ॥ टीका वै जो मेरे भक्त हैं उनहीके अनुग्रहके वास्ते उनकी मनकी वृत्तिमे स्थित भया हुवा मै प्रकाशमान जो मेरा संबंधी ज्ञान- रूपदीपक उसकरिके जो अज्ञानसे उत्पन्न भया है तम याने संसाररूप अंधकार इसका नाश करौंगा. ॥ ११ ॥ मूलम्. अर्जुनउवाच ॥ परंब्रह्मपरंधामपवित्रंपरमभवा न् ॥ पुरुपंशाश्वतंदिव्यमादिदेवमविभुम् ॥ ॥१२॥ आहुस्त्वामृपयःसर्वेदेवर्पि रदस्तथा ॥ असितोदेवलोव्यासःस्वयंचैवब्रवीपिमे ॥१३॥ अन्वयः अर्जुनः उवाच हेकृष्ण भवान् परं ब्रह्म परं धाम परमंप- वित्रं यतः त्वां शाश्वतं दिव्यं पुरुष आदिदेवं अजं विभुं आहुः ते के सर्वे ऋषयः तथा देवर्पिः नारदः असितः दे- वलः च स्वयं एव मे ब्रवीपि ॥ १२ ॥ १३ ॥ टीका. अर्जुनने संक्षेपसे विभूति मुनिके औ विस्तारसे सुननेकी इ- छा करिके अर्जन भगवानकी स्तुति करते भये बोलेकि, हेकृष्ण! तुम परब्रह्म औ उत्कृष्ट तेज औ परम पावन हौ, क्योंकि तुमको औ आदिदेव अजन्मा व्यापक ऐसे कहते हैं,जोकहोगेकि वे कौनती वैसर्वऋषी तथा देवऋपीनारद अ. सित देवल व्यास आपभीती मेरेसे कहते हो.॥१२॥१३॥ नित्य दिव्यपुरुप . १८८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मूलम्. सर्वमेतदृतंमन्येयन्मांवदसिकेशव ॥ नहितेभ गवनव्यक्तिविदुर्देवानदानवाः ॥ १४॥ अन्वयः हेकेशव यत् मां वदति तत् एतत् सर्वे ऋते मन्ये हेभगव न ते व्यक्ति देवाः न विदुः न दानवाः विदुः ।। १४ ॥ टीका. हे केशव! जो मेरेको आपने आफ्ना प्रभाव कहा सो मै त. त्य मानता हौं इसीस हे भगवन् ज्ञान शक्ति वल ऐश्वर्य वीर्य तेज इन छ भगयुक्त तुह्मारी प्रगटताको देव औ दानवभी न- हीजानतेहैं, देवोंके रक्षक औ दानवोंके शिक्षक आपही हो तो- भी वै तुह्मारी प्रकटताको नहीं जानते हैं. ॥ १४ ॥ मूलम्. स्वयमेवात्मनात्मानंवेत्थत्वंपुरुषोत्तम ॥ भूत भावनभूतेशदेवदेवजगत्पते ॥१५॥ अन्वयः हे पुरुषोत्तम हेभूतभावन हेभूतेश हेदेवदेव हेजगत्पते त्वं प्रात्मानं आत्मना स्वयं एव वेत्थ ॥ १५ ॥ टीका. हेपुरुषश्रेष्ठ! हेभूतप्राणीमात्रके उत्पत्तिकारक! हेसर्वभूतौके- ईश्वर! हे देवन के देव! हे जगतके स्वामिन! आपही आपके म नकरिके आपके स्वरूपको जानते हो! दूसरा नहीं जानता है. ॥ १८॥ मूलम् वक्तुमर्हस्यशेपेणदिव्याह्यात्मविभूतयः॥या १८९ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. भिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वंव्याप्यतिष्ठसि ॥१६॥ अन्वयः याः दिव्याः आत्मविभूतयः ताः त्वं अशेपेण वक्तुं अ- हसि याभिः विभूतिभिः त्वं इमान लोकान् व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥ टीका, जो दिव्य आपकी विभूति हैं उनको तुम अशेप करिके कहने योग हो; जिन विभूतियोंकरिके तुम इन लोकोंमे व्या. सहुये स्थित हो. ॥ १६ ॥ मूलम्. कथंविद्यामहंयोगीत्वांसदापरिचिंतयन् ॥ के पुकेषुचभावेषुचिंत्योसिभगवन्मया ॥१७॥ अन्वयः अहं योगी भक्तियोगनिष्ठः सन् च भक्त्या त्वां सदा परि चिंतयन्तन् चिंतनीयं त्वां कथं विद्या हे भगवन त्वं मया केष केपु भावेषु चिंत्यः असि ॥ १७ ॥ टीका, मै भक्तियोगमें निष्ठायुक्त हुआभया तुह्मारी भक्तिकरिकै तुह्मारा सदा चिंतन करता करता चितवन करनेयोग तुम- को कैसे जानौं? हेभगवन्! तुम मेरे करिकै कौन कौन भावमे चितवन करने योग्य हों. ॥ १७ ॥ मूलम. विस्तरेणात्मनोयोगविभूतिंचजनार्दन ॥ भूयः कथयतृप्तिर्हिशृण्वतोनास्तिमेऽमृतं ॥१८॥ अन्वयः १९० गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. हेजनार्दन प्रात्मनः योगं च विभूतिं विस्तरेण भूयः कथय हि अमृतं शृण्वतः मे तृप्तिः न अस्ति ॥१८॥ टीका. , जो आपने कहाकि, मै सबका उत्पत्तिस्थान हौं भी मे- रेले सर्व होतेहैं, यह सृष्टत्वादियोग जो तुमने संक्षेपसे कहा सो औ विभूति जो उनका प्रवर्त्तत्व सो विस्तारकरिके कहौ, क्योंकि, तुलारा माहात्म्यरूप अमृत सुनते सुनते मेरेको तृप्ति नहीं है. ॥ १८॥ मूलम्. श्रीभगवानुवाच ॥हंततेकथयिष्यामिदिव्या ह्यात्मविभूतयः॥प्राधान्यतःकुरुश्रेष्ठनात्यं तोविस्तरस्यमे ॥१९॥ अन्वयः श्रीभगवान उवाच हंत हे अर्जुन याः दिव्याः आत्म- विभूतयः ताः ते प्राधान्यतः कथयिष्यामि हेकुरुश्रेष्ठ मे विभूतिविस्तरस्य अंतः नास्ति ॥ १९ ॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान बडी अनुकंपासे अर्जुनको कहते हैं, कि हे अर्जुन! जो मेरी दिव्यविभूती है वै तुह्मारको मै श्रेष्ठ श्रेष्ठ क- होगा क्योंकि, मेरे विभूतिविस्तारका अंत नहीं है विभूतिजि- नकारी के प्रवृत्ति होतीहै वै प्राधान्यसे जैसे पुरोहितौमे मुख्य वृहस्पति ऐसे ऐसे श्रेष्ठविभूति कहता हौ. ॥ १९ ॥ मूलम. अहमात्मागुडाकेशसर्वभूताशयस्थितः॥अह मादिश्चमध्यंचभूतानामंतएवच ॥ २०॥ अन्वयः -- गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. हेगुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः अहं भूतानां प्रात्मा च अहं भूतानां आदिः च मध्यं च अंतः एव अहं अस्मि ॥ २० ॥ टीका, प्रथमजो कहि आएकी सर्वका स्रष्टा औ नियंता मै हौं उसी अर्थको अब स्पष्ट करते हैं, हे अर्जुन! सर्वभूत मेरे श- रीररूप हैं उनके आशयनाम हृदयमे आत्मारूप स्थित हौं श्रात्मा कहिये शरीरका नियंता मालक तहांप्रमाण; सर्वस्य- चाहंदिसन्निविष्टोमत्तःस्मृति निमपोहनंच ॥ ईश्वरःसर्वभूता नांदशेऽर्जुनतिष्ठति ॥ भ्रामयन्सर्वभूतानियंत्रारूढानिमायया ॥ श्रुतिश्च यः सर्वेषु श्रुतेपुतिष्टत्सर्वेभ्योभूतेभ्योंतरोयंसर्वाणिभू तानिनविदुः ॥ यस्यसर्वाणिभूतानिशरीरंयः सर्वाणिभूतान्यंत रोयमयतिएपतसर्वांतर्याम्यमृतः ॥ यात्मनितिष्ठन्आत्मनों तरोयमात्मानंनवेद ॥ यस्यआत्माशरीरंयअत्मानमंतरोयमय तिसतआत्मांतर्याम्यमृतइति ॥ इत्यादि प्रमाणों करिके सर्वभू- त प्राणिमात्र मेरे शरीररुप हैं उनका मै आत्मत्व करिके उनमें स्थित हौं भी उनका आदि मध्य औ अंतभीमहीं हों ऐसेही जहां जहां भगवान कहेंगेकि, अमुकमै हौं. तहां तहां यह अर्थ है की यैमरे श्रेष्ठ विभूतिमे हैं यै मेरे प्रति कृपा पात्र हैं; नहीतौ ए- कमे आप हैं तो दूसरों में कौन है? जो दूसरा भया तो ईश्वरभी दूसरा चाहिये इसवास्ते अहं कहनेमे श्रेष्ठत्वही गृहण करना चाहिये औ शरीरवाची शब्दौंका शरीरी जो उस शरीरका अं- तर्यामी है उसीमे प्रवृत्ति होती हैं जैसे कि, यह पुरुप प्रथम देव था अव मनुष्य भयातौ वह शरीरसे देवन भयाथा परंतु अंगु. ली शरीरकै तरफ करनेसे उस आत्माका वोध भयाइसीत- रहसे आत्मा अहं ऐसा कहनेमे अंतर्यामि अर्थ होताहै.॥२०॥ मुलम.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका, आदित्यानामहविष्णुज्योतिपारविरंशुमान् ॥ मरीचिर्मरुतामस्मिनक्षत्राणामहंशशी॥२१॥ अन्वयः आदित्यानां विष्णुः अहं ज्योतिपां अंशुमान रविः अहं मरुतां मरीचिः अहं नक्षत्राणां शशी अहं अस्मि ॥२१॥ टीका. . द्वादश सूर्योंमे जो श्रेष्ठ विष्णूनामा सूर्य है उस रूपमै हो, प्रकाश मानोंमे किरणवान रवि याने सूर्यरूपमैहीं, ऊंचासमरु- तमे याने उंचासपवनौंमे मरीचि पवन रूप मै हौं, नक्षत्रोंमे चंद्रमा रूप मै हौ. ॥ २१ ॥ मूलम्. वेदानांसामवेदोस्मिदेवानामस्मिवासवः ॥इंद्रि याणांमनश्चास्मिभूतानामस्मिचेतना॥२२॥ अन्वयः वेदानांमध्ये सामवेदः अहं अस्मि देवानां वासवः अहं आस्मि इंद्रियाणां मनः अहं अस्मि भूतानांचेतना अ- हं अस्मि ॥ २२॥ टीका. वेदौमे सामवेद, देवमे इंद्र, इंद्रियोंमे मन, भूत प्राणीमात्र मे चेतनारूप मै हौ.॥ २२ ॥ मलम्, रुद्राणांशंकरश्चास्मिवित्तेशोयक्षरक्षसां ॥ वसू नांपावकश्चास्मिमेरुःशिखरिणामहं ॥२३॥ अन्वयः रुद्राणां शंकरः अस्मि च यक्षरक्षसां वित्तेशः वसूनां पाव.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १९३ का अहं अस्मि च शिखरिणां मध्ये मेरुः अहं अस्मि ॥ २३॥ टीका एकादश रुद्रौमे शंकर यक्षराक्षसोंमे कुबेर अष्टवसुनमे अ ग्नि शिखरवालोंमे मेरुपर्वतरूप मै हौं ॥ २२ ॥ मूलम. पुरोधसांचमुख्यंमांविद्धिपार्थवहस्पतिं ॥ सेना नीनामहंस्कंदःसरसामस्मिसागरः॥२४॥ अन्वयः हेपार्थ पुरोधसां मुरव्यं वृहस्पति मां विद्धि च सेनानी नांस्कंदः अहं सरसां सागरः अहं अस्मि ॥ २४ ॥ टीका. हे अर्जुन पुरोहितोमे जो मुख्य पुरोहित बृहस्पति उन को मेरा श्रेष्ठप जानौ सेनापतिनमे कार्तिकस्वामी औ सर जो स्थिरजलवाले जलाशय हैं उनमे समुद्ररूप मै हौं॥२४॥ मूलम्. महीणांभृगुरहगिरामस्म्येकमक्षरं ॥ यज्ञानां जपयज्ञोस्मिस्थावराणांहिमालयः॥२५॥ अन्वयः अहं गिरां एक अक्षरं अहं यज्ञानां जप यज्ञः अहं स्थावराणां हिमालयः अहं अस्मि ॥ २५ ॥ टीका. महर्पिनमे भगु वाक्योंमे ओंकार यज्ञोंमे जपयज्ञ स्थाव गैंमे हिमाचल मै हौं ॥ २५ ॥ मूलम. अश्वत्थःसर्वरक्षाणांदेवीणांचनारदः ॥ गंधर्वा महर्षीणां भृगुः
१९४
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
णांचित्ररथःसिद्धानांकपिलोमुनिः ॥२६॥
अन्वयः
वर्स वृक्षाणां श्रश्वत्थः अहं देवर्षीणां नारदः अहं गंध
र्वाणां चित्ररथः अहं सिद्धानां कपिलः मुनिः अहं
अस्मि ॥ २६ ॥
टीका.
सर्व वृक्षौमे पीपर मै हौं देवऋपिनमे नारद मै हौं गंध-
चौमे चित्ररथ मै हौ सिद्धीमे कपिलमुनि मै हौं ॥ २६ ॥
मूलम.
उच्चैःश्रवसमश्वानांविदिमाममृतोद्भवं ॥ ऐराव
तंगजेंद्राणांनराणांचनराधिपं ॥२७॥
अन्वयः
अश्वानां मध्ये अमृतोद्भवं उच्चैःश्रवसमां विद्धि गजेंद्रा
णां ऐरावतं मां विद्धि नराणां मध्ये नराधिपं मा विद्धि ॥२७॥
टीका.
घोडौंमे जो अमृतमयनसमयमे समुद्रसे उत्पन्न भया है
उच्चैःश्रवा मै हौं ऐसे जानौ हस्तिनमे ऐरावत औ न मे
राजाको मेराही श्रेष्ठ अंग जानौ, ॥ २७ ॥
मूलम.
आयुधानामहंवबंधेनूनामस्मिकामधुक् ॥ प्रज
नश्चास्मिकंदर्पःसाणामस्मिवासुकिः ॥२८॥
अन्वयः
श्रायुधानां वजं अहं अस्मि धेनूनां कामधुक् अहं अ
स्मि च प्रजनः कंदर्पः अहं अस्मि सर्पाणां वासुकिः
अहं अस्मि ॥ २८ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. १९५ टीका. आयुधौंमे वज में हौं गाइनमे कामधेनु मै हौं उत्पत्तिका कारक काम मै हौं अर्थात् मै जो केवल इंद्रियसुखके वास्ते भोग भोगते हैं वह कामवासना नीच है औ श्रेष्ठ विभूति ग- नाते हैं इसवास्ते जनन हेतु कामको विभूतीमे कहा सौमे याने एकशिरवाले सौमे वासुकी मै हौं ॥ २८॥ अनंतश्चास्मिनागानांवरुणोयादसामहं ॥ पितृ णामर्यमाचास्मियमःसंयमतामहं ॥२९॥ 'अन्वयः नागानांनंतः अहं अस्मियादसांवरुणः अहं अस्मिपि तृगांअर्थमा अहं अस्मि संयमतां यमः अहं अस्मि ॥ २९ ॥ टीका. नाग जो अनेकमस्तकवाले सर्प उनमे अनंत याने शेप मै हौं जलवासिनमे वरुण मै हौं पितृनमे अर्यमा पितृनका राजा सो मै हौ दंड देनेवालोमे यम मै हौं ॥ २९ ॥ मूलम्. प्रल्हादश्चास्मिदैत्यानांकालःकलयतामहं ॥ मृ गाणांचमृगेंद्रोऽहंवैनतेयश्चपक्षिणां ॥ ३० ॥ अन्वयः दैत्यानां प्रल्हादः अहं अस्मि कलयतां कालः अहं अ स्मि च मृगाणां मृगेंद्रः अहं अस्मि पक्षिणां वैनतेयः अहं अस्मि. ॥ ३ ॥ टीका. मै हौं अनर्थ प्राप्तकारककी गनंती करने .. . दैत्योंमे प्रल्हाद गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. वालोंमे काल मै हौं अथवा वशकरनेवालोमे काल मै हौं मू- गनमे सिंह मै हौं पक्षिनमे गरुड मै हौं ॥ ३० ॥ मूलम्. पवनःपवतामस्मिरामःशस्त्रभृतामहं ॥ झषाणां मकरश्चास्मिस्रोतसामरिमजान्हवी ॥ ३१ ॥ अन्वयः पवता पवनः अहं अस्मि शस्त्रभृतां रामः अहं अस्मि झपाणां मकरः अहं अस्मि स्रोतसां जान्हवी अहं अस्मि ॥ ३१ ॥ टीका. पवित्र करनेवालौंमे अथवा वेगवालौंमे पवन मै हौं शस्त्र धारिनमे राम मै हौं इहां शस्त्र धारण मात्र विभूति जानना क्योंकि प्रादित्यादिक क्षेत्र हैं औ राम स्वयं भगवान हैं म त्स्यदत्यादिकामे मकर मै हौं जलके प्रवाहवालौंमे भागीरथी गंगाजी मै हौं ॥ ३१ ॥ मूलम्. सर्गाणामादिरंतश्चमध्यंचैवाहमर्जुन ॥ अध्यात्म विद्याविद्यानांवादःप्रवदतामहं ॥ ३२ ॥ अन्वयः हे अर्जुन सर्गाणां आदिः अंतः च मध्यः अहं एव विद्या नां मध्ये अध्यात्मविद्या अहं प्रवदतां वादः अहं ॥ ३२ ॥ टीका. हे अर्जुन सर्व जे उत्पत्ति कारक तिनका आदि याने मृष्टि करनेवालेरुप मै ही औ अंत संहार करनेवाले जे हैं वैभी मै हाँ नौ मध्य याने पालन करनेवालेभी मे ही सर्व विद्यानमे श्रा गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, ध्यात्मविद्या याने आत्मज्ञानविद्या मै हौ औ वाद ल्प वि- तंड इन तीनौंमे वाद मै हौं जहां तर्क औ प्रमाणसे अन्यके प क्षको दूषण देके आपका पक्ष स्थापित करै वह जल्प जहा अ- न्य पक्षको दूपण देई औ आपकाभी स्थापित न करै वह वितंड जहां जिज्ञासूपनेसे गुरुशिष्यका वाद होय वह वाद है ॥ ३२ ॥ मूलम. अक्षराणामकारोऽस्मिद्वंद्वःसामासिकस्यच॥अ हमेवाक्षयःकालोधाताहविश्वतोमुखः ॥ ३३॥ अन्वयः अक्षराणां अकारः अहं अस्मि सामासिकस्य मध्ये इंदः अहं अक्षयः कालः अहं विश्वतोमुखः धाता अहं अस्मि ॥३३॥ टीका. अक्षरोंमे अकार मै हौं समाससमूहमे इंद्वसमास मै हौं औ कला काष्ठादि रूप अक्षयकाल मै हौं प्रथमजो काल कहा सो मरण हेतुक जैसे शतसंवत्सर की प्रायः उसको जोगणना करै उसको कहा इहां अक्षय काल कहते हैं सर्वका धाता याने स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्मा मै हौं अथवा धारण पोपण करनेकी श- क्तिरुप मै हौं अथवा कर्म फल विधातृत्व मै हौं ॥ ३३॥ मूलम. मृत्युःसर्वहरवाहमुद्भवश्वभविष्यतां ॥ कीर्तिः श्रीकिनारीणांस्मृतिर्मेधाधृतिःक्षमा ॥ ३४ ॥ अन्वयः सर्वहरः मृत्युः अहं अस्मि च भविष्यतां उद्भवः श्रहं श्र. स्मि नारीणां कीर्तिःच श्रीःच वाक् स्मृतिः मेधा धृतिः गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. क्षमा एताः अहं अस्मि ॥ ३४ ॥ टीका. सर्वस्व हरणेवालोमे मृत्यु मै हौं जो आपके श्रेष्ठत्वकीइच्छ। करनेवाले हैं यानेअगाडी भला होयगा ऐसा चाहते हैं उनमें उद्भव मै हौ औ स्त्रियोंमे कीर्ति श्रीवाक् स्मृति मेधा धृति क्षम मैं सात देवता हैं जिनके भासमात्रसे मनुष्य श्लाघाको प्राप्त हं ता है सो इनरूपभी मै हों याने यै मेरी श्रेष्ठ विभूति हैं ॥३४॥ मूलम्. वृहत्सामतथासाम्नांगायत्रीछंदसामहं ॥ मासा नांमार्गशीर्पोऽहमृतूनांकुसुमाकरः ॥ ३५ ॥ अन्वयः सानां वृहत्साम अहं छंदसां गायत्री अहं मासानां मा र्गशीपः अहं ऋतूनां कुसुमाकरः अहं अस्मि ॥ ३५ ॥ टीका. सामवेदकी ऋचौंमे वृहत्साम मै हौं छंदोबद्ध वाक्योंमें गायत्री मंत्र मै हौं अथवा उक्तादिक छंदोंमे गायत्री छंद मै हौं महीनौंमे मार्गशीर्ष मै हौं ऋनुनमे वसंत मै हौं ॥ ३५ ॥ मूलम. द्यूतंछलयतामस्मितेजस्तेजस्विनामहं ॥ जयोऽ स्मिव्यवसायोस्मिसत्वंसत्ववतामहं ॥ ३६ ॥ अंन्वयः छलयतां यूतं अहमस्मि तेजस्विनां तेजः अहमस्मि जेवणां जयः अहं व्यवसायिनां व्यवसायः महं सत्व बता सत्यं अहं ॥ ३६ ।। .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
टीका.
छल करनेवालेमे जो पांशौसे जुवा खेलते है याने
चौपड सो मै हौं तेजस्विनमे तेज मै हौं जीतनवालौंमे जय
मै हौ व्यवसाय जो निश्चय सो निश्चयवालोमे निश्चय मै हौं
सत्वजो मनका बडापन सो सत्ववालोंमे सत्व याने महा-
मनस्त्व अर्थात् मनकी उदारता मै हौं ॥ ३६ ॥
मूलम्.
तृष्णीनांवासुदेवोऽस्मिपांडवानांधनंजयः ॥ मु
नीनामप्यहव्यासः कवीनामुशना कविः॥ ३७॥
अन्वयः
वृणीनां वासुदेवः अहं अस्मि पांडवानां धनंजयः अहं
अस्मि मुनीनां व्यासः अहं अस्मि कवीनां उशना
कविः अहं अस्मि ॥ ३७ ॥
टीका.
वृष्णीयादवनमे वासुदेव मै हौं इहां वसुदेवपुत्रत्वमात्रविभू
ति जानना पांडवनमे धनंजय याने तुमभी मेरी श्रेष्ठ विभूतिमे
हो मुनीजो मननकरिके तत्वको देखें उनमे वेदव्यास मै हौं
कवी शास्त्रदर्शी अथवा ज्ञानी उनमे शुक्राचार्य मै हौ.॥३७॥
मूलम.
दंडोदमयतामस्मिनीतिरस्मिजिगीपतां ॥ मौ
नंचैवास्मिगुह्यानांज्ञानज्ञानवतामहं ॥३८॥
अन्वयः
वमयतां दंडः अहमस्मि जिगीपता नीतिः अहं अस्मि गु-
ह्यानां मौने अहं अस्मि ज्ञानवतां ज्ञानं अहं अस्मि ॥ ३८॥
गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका.
टीका.
नियम उल्लंघन करनेवालोंको दंडदेनेवालौंमे दंड मै हौं जो
जीतनेकी इच्छा करते हैं उनमे जयका उपायरूप नीति मै हौं
गुप्तकरनेके कारनौमे मौन मैहौं क्योकि जो बोलतानही उसका
अभिप्राय जाननेमे आता नहीं ज्ञानवानोंमे ज्ञान मै हौं ॥३८॥
मूलम.
यञ्चापिसर्वभूतानांवीजंतदहमर्जुन ॥ नतदस्ति
विनायत्स्यान्मयाभूतंचराचरं ॥३९॥
अन्वयः
हेअर्जुन यत् च सर्वभूतानां बीजं तत् अपि अहं अस्मि
यत् चराचरं भूतं मया विना स्यात् तत् न अस्ति ॥ ३९ ॥
टीका.
हे अर्जुन जो सर्वभूतप्राणिमात्रका कारण है सो मै हौ औ
जो चराचरभूत मेरेविना होय सो नहीहै ऐसा जानौ क्योंकि
सर्व का अंतर्यामी मै हौं इस श्लोकमे जो मै मै करिके आपहीको
देखायाथा सो स्पष्ट किया कि अंतर्यामीरूप मै हौं॥ ३९ ॥
मूलम्.
नांतोऽस्तिममदिव्यानांविभूतीनांपरंतप ॥ एप
तूदेशतः प्रोक्तोविभूतेर्विस्तरोमया ॥४०॥
अन्वयः
हेपरंतप मम दिव्यानां विभूतीनां अंतःन अस्ति तु
एपः विभूतेः विस्तरः मया उद्देशतः प्रोक्तः ॥ ४० ॥
टीका.
हेपरंतप मेरी दिव्यविभूतियाँकाअंत नहींहै क्योंकि यह
विभूतिविस्तार मैने संक्षेपसे कहा है ॥ १० ॥
२०१ गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. मलम. यद्यविभूतिमत्सर्वश्रीमदूर्जितमेववा ॥ तत्तदे वाऽवगच्छत्वंममतेजोंशसंभवं ॥४१॥ अन्वयः . यत् यत् सत्वं विभूतिमत् यन् श्रीमत् वा यत् ऊर्जितं एव तत् तत् ममतेजशासंभवं इति त्वं अवगच्छ ॥४१॥ टीका. जो जो ऐश्वर्यवान् पदार्थमात्र याने स्थावर किंवा जंगम जो ऐश्वर्यमान है व औजो श्रीमान् याने शोभायमान अथवा कांतिमान् अथवा धनधानवान हैं वै औ ऊर्जित याने कल्याण के आरंभमे उद्युक्त अथवा कोईभी प्रभावबलादिक गुण करिके बढाहुआं सो ऐसा जो कुछ भी स्थावर जंगम है सो मेरे तेजके अंश करिके है ऐसा तुम जानौ तेज याने पराभव करनेकी साम र्य अर्थात् शक्तिसो मेरी अचिंत्य शक्तिके अंशकारके उत्पन्न है ऐसा जानौ औरभी खुलासा अर्थ यह है कि विभूतिकहते है ऐश्वर्यको सो मेरे ऐश्वर्ययुक्त जानौ ॥ ११ ॥ अथवावहुनेतेनकिंज्ञानेनतर्वाजुन ॥ विष्टभ्या ऽहमिदंकृत्स्नमेकांशेनस्थितोजगत् ॥४२॥ हे अर्जुन अथवा एतेन बहुना ज्ञानेन तव किं नकिमपि अहं इदं कृत्स्नं जगत् एकांशेन विष्टभ्य स्थितः अस्मि॥४२ टीका. अथवा इस बहुत जाननेसे तुह्माराक्या प्रयोजनह मैं इस जडचैतनरूप सर्व जगतको भापकी महिमाके एक अंश- अन्वयः हेअर्जुन २०२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. स्तंभन करिके स्थितहों इहां श्रुतिप्रमाणहै ॥ पुरुपएवेदमित्यार भ्यएतावानस्यमहिमाऽतोज्यायाश्चपुरुषाः ॥ पादोऽस्यविश्वाभू तानित्रिपादस्यामृतंदिवि॥इदं सर्व पुरुषः एवं इति एतावान् श्र स्यपुरुषस्यमहिमा अस्य महिम्नःपादः विश्वाभूतानि च दिवि अस्म त्रिपात् अतएव अमृतं अतश्च अतः अपि पुरुपाः ज्याया न ॥ अर्थ यह सर्व जगत् पुरुषात्मकही है ऐसा इतना बडा इस पुरुपका महिमाहै इसी महिमाकाएक अंशसंबंधीयै सर्व भूतप्रा णीमात्रहैं औ दिवि वैकुंठ मे याने प्रकृतिसेपरे विष्णुलोकमे इस महिमाके तीन अंश हैं इसवास्ते वह लोक मृत्युरहित है औ पु रुप तो इस महिमासेभी श्रेष्ठ है अर्थात् जिसके प्रभावसे यह स- व प्रकाशि नहै तो वह तो बडा होइहीया ॥ १२ ॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादेविभूतियोगोना मदशमोऽध्ययः॥१०॥ इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकताश्रिी मद्भगवद्गीतावाक्यार्थबोधिनीभापाटीकायांदशमोऽध्यायः॥ १. मूलम्. अर्जुनउवाच ।। मदनुग्रहायपरमंगुह्यमध्यात्मसं जितं ॥ यत्त्वयोक्तंवचस्तेनमोहोऽयविगतोमम ॥१॥ अन्वयः अर्जुनः उवाच हेभगवन् मदनुग्रहाय यत् परमं गुह्यं अध्या त्मसंज्ञितं वचः त्वया उक्तं तेन अयं मम मोहः विगतः ॥ १ ॥ टीका. पूर्वके अध्यायौमे भक्तियोगकी उत्पत्ति औ वृद्धिकेवास्ते भ.
२०३ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. गवानने जो आपका स्वरूप वैभव वर्णन किया सो अर्जुनने सु ना तहां यह कहाथा कि सर्वभूतमात्र मेरेमे हैं औ मही उनके उत्पत्ति रक्षा औ प्रलयका करनेवाला हाँ औ वै मेरे स्वाधीन हैं नही मयिसर्वमिदंप्रोतं सूत्रेमणिगणाइव अहंसर्वस्यप्रभवोमः तःसर्वप्रवर्तते इत्यादिक काक्यों करिके जो भगवानका स्वरूप सुनासो देखने की इच्छा करिके अर्जुन बोले हे भगवान मेरे अ- नुग्रहके वास्ते याने मेरेपर कृपा करने के वास्ते जो अतिगोप्य श्रात्मज्ञान विपयिक वचन आपने कहा उसकरिके यह देहा त्मज्ञानरूप मेरा मोह गया ॥ १ ॥ मूलम. भवाप्ययौहिभूतानांश्रुतौविस्तरशोमया ॥ त्व तःकमलपत्राक्षमाहात्म्यमपिचाव्ययं ॥२॥ अन्वयः हेकमलपत्राक्ष भूतानां भवाप्ययौ त्वत्तः सकाशात् भव तः इति मया विस्तरशःश्रुतौ च अव्ययं तव माहात्म्य अपि श्रुतं ॥ २ ॥ टीका. हेकमलदलनयन भूत प्राणियोंकी उत्पत्ती श्री प्रलय तुह्मारे हिसे होती असा मैने विस्तारपूर्वक वारंवार सुनाहै आपही ने कहाकि अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा इत्यादिक रिके औ अक्षय माहात्म्यभी सुना अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यं ते मामबुद्धयः॥मयाततमिदं सर्व जगदव्यक्त मूर्तिनानचमांतर नि कर्माणि निवनति धनंजय ।समोहं सर्वभूतेषु न मे देष्योस्ति नप्रियः।इत्यादि वाक्यौंकरिके विश्वकी सृष्टि करतेभी अंबिका रिपना सर्वको तियममे चलाते भये विषमतारहित शुभाशुभ २०१ गीतावाक्यार्यवोधिनी भापाटीका. कर्म करावतेभी असंगताबंध मोक्षादि विचित्र फलंदतेभी औ दासीन्य ऐसा माहात्म्य सुना ॥ २ ॥ मूलम्. एवमेतद्यथात्थत्वमात्मानंपरमेश्वर ॥द्रष्टुमि च्छामितेरूपमैश्वरंपुरुषोत्तम ॥ ३॥ अन्वयः हेपरमेश्वर त्वंयथा प्रात्मानं आत्य एवं एतत् हे पुरुषोत्त म ते ऐश्वरं रूपं द्रष्टुं इच्छामि ॥ ३ ॥ टीका. हेपरमेश्वर तुम जैसा आपका स्वरूप कहते हो तो ऐसाही यह है इसमे संशय नहीं तथापि हेपुरुषोत्तम तुह्मारा ऐश्वररूप याने ज्ञान शक्ति बल ऐश्वर्य वीर्य तेज इन पडैश्वौकरिके युक्त जो तुह्मारा रूप है उसको मै देखाचाहताहौं ॥ ३ ॥ मूलम. मन्यसेयदितच्छक्यंमयाद्रष्टुमितिप्रभो॥ यो गेश्वरततोमत्वंदर्शयात्मानमव्ययं ॥४॥ अन्वयः हेप्रभो यदि तत् रूपं मया द्रष्टुं शक्यं इति मन्यसे ततः हे योगेश्वर त्वं मे अव्ययं आत्मानं दर्शय ॥४॥ टीका. हेप्रभो जोवह रूप मेरे करिकै देखने योग्य है याने मै उस रूपको देखि सोंगा असा पाप मानते होय तो हेयोगेश्वर आपका अक्षयरूप मेरेको देखावी ॥ १ ॥ मूलम्. ॥ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ पश्यमेपार्थरूपाणि म गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, २०५ शतशोऽथसहस्रशः॥ नानाविधानिदिव्यानिना नावर्णाकृतीनिच ॥५॥ अन्वयः श्रीभगवानं उवाच हेपार्थ शतशःअथ सहस्रशःनानावि धानि दिव्यानिच नानावताकृतीनि मेरूपाणि पश्य ॥ ५॥ टीका. जब अर्जुनने अतिकौतूहलयुक्त गद्गद कंठसे प्रार्थना की तब सुनिके अर्जुनको सावधान करते भये वोले हेप्टथापुत्रसैकडौंत्री हजारौं प्रकारके तैसेही अनेक प्रकारके अप्राकृत औ अनेक प्रकारके व करिके युक्त आकार असा मेरारूपदेखौ ॥ ५ ॥ मूलम् पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौमरुतस्तथा ॥ बहून्यदृष्टपूर्वाणिपश्याश्चर्याणिभारत ॥ ६ ॥ इहैकस्थंजगत्कृत्स्नंपश्याद्यसचराचरम् ॥ मम देहेगुडाकेशयच्चान्यदृष्टुमिच्छसि ॥७॥ हेभारात ममदेहेआदित्यान्वसून रुद्रान् अश्विनौमरुतः पश्य तथा अदृष्टपूर्वाणिवहूनि आश्चर्याणि पश्य ॥६॥ गुडाकेशइह मम देहे सचराचरं कृत्स्नं जगत् एकस्थं अद्य पश्य च यत् अन्यत् अपि द्रष्टुं इञ्छसि तत् अपि पश्य ॥७॥ टीका. हे भारत मेरे देहमे द्वादश आदित्य पाठ वसू एकादश रुद्र अश्विनीकुमार उनचासपवन देखौं तैसेही जो तुमने अथवा दु सरेनभी पूर्वकालमे कभी न देखे होय वैभी आश्चर्य देखौ ॥ ६ ॥ अन्वयः * अन्वयः २०६ गीतावाक्यार्थघोधिनी भापाटीका, हे निद्राजीत इसमेरे देहमे चर औ अचर याने स्थावर जंगमस हितासर्व जगत् एकही जमह स्थित आज देखौ औ जो औरभी देखा चाहते हाउ वहभी देखौ. ॥ ७ ॥ मूलम. नतुमांशक्यसेद्रष्टुमनेनैवस्वचक्षुपा ॥ दिव्यंददा मितचक्षःपश्यमेयोगमैश्वरम् ॥ ८॥ . अनेन एव चक्षुपा मां दृष्ठं न शक्यसे तु ते दिव्यं चक्षुः ददामि तेन मे ऐश्वरंयोगंपश्य ॥ ८ ॥ टीका. मै तुह्मारेको मेरी देहमै एकही जगह सर्व जगत देखावै सो तुम इन अपने चर्मचानसेदेखि नसकौगे याने यै नेत्रपरि मित वस्तु के देखनेवाले है औ यह रूप अपरिमित है इसवा- स्ते तुमको दिव्यनेत्र मे देऊंगा तुम मेरा ऐश्वरयोग याने अ- नंत विभूति योग देखो ॥ ८ ॥ मूलम्. ॥ ॥ संजय उवाच ॥ ॥ एवमुत्काततोराजन्म हायोगेश्वरोहरिः ॥ दर्शयामासपार्थायपरमरू पमैश्वरम् ॥९॥ अन्वयः संजयः उवाच हेराजन महायोगेश्वरः हरिः एवं डक तंतः परमं ऐश्वरं रूपं पार्थाय दर्शयामास ॥ ९ ॥ टीका. संजय धृतराष्ट्रसे कहते भये देराजन महा योगेश्वर भगवान ऐसे कहिके याने मेरा स्वरूप.देखो ऐसा करिके फिरि आपका r २०७ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. विश्वरुप अर्जुनको देखाते भये ॥ ९ ॥ मूलम्. अनेकवचनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ॥अनेकदि. व्याभरणंदिव्यानेकोद्यतायुधं ॥१०॥दिव्यमा ल्यांवरधरंदिव्यगंधानुलेपनं ॥सर्वाश्चर्यमयंदेव मनंतं विश्वतोमुखं ॥११॥ अन्वयः कीदृशं तत् रूपं तत् आह अनेकवत्क्रनयनं अनेकाद्भुत दर्शनं अनेक दिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधं ॥ १ ॥ दिव्यमाल्यांवरथरंदिव्यगंधानुलेपनसभिर्यमयं देवं अ नंतं विश्वतोमुखं ॥ ११ ॥ टीका. .:-जोरूप देखाया है उसका वर्णन करते हैं कसावह रूप है सो कहते हैं अनेक मुख औ नेत्र जिसमे औ अनेक अद्भुतहें दर्शन जिसमे औ अनेक दिव्य हैं आभूपण जिसमे भी अनेक दिव्य 'आयुध उठाये भये याने ऊंचेकिये हाथोंमे लिये भये हैं जिसमे ॥१॥दिव्यमाला श्रौ कस्त्र धारन किये है औ दिव्यचंदनकाले पन किये हैं औसर्व आश्चर्यमय देदीप्यमान हैं औ जिसका अंत नही त्रौ सर्वतरफको है मुख जिसमे ऐसा रूप देखाते भये : ११ मूलम. दिविसूर्यसहस्त्रस्यभवेद्युगपदुत्थिता ॥ यदिभाः सहशीसास्यानासस्तस्यमहात्मनः॥१२॥ अन्वयः -20uमम्य यगपत्थिता भाः भवेत्सा
गातावाक्यायवाधिना भापाटाका.
भाः यस्य महात्मनःभासः सदृशी स्यात् एवं भूतं रूपं दर्श
यामास इति पूर्वेणान्वयः ॥ १२ ॥
टीका.
पूर्वश्लोकमे देव याने देदीप्यमान कहा उसीको विशेषकरि
के कहते हैं जो आकाशमे हजार सूर्य एकसंग उदय होय भी
उनका तेज यक मारगी प्रकाश होय सो प्रकाश कदापि उन
विश्वरूपके प्रकाशतुल्य होय और उपमा नहीं है अर्थात् अन
पम है ऐसा रूप अर्जुनको देखोते भये. ॥ १२ ॥
मूलम.
तत्रैकस्थंजगत्कृत्स्नंप्रविभक्तमनेकधा ।।अपश्य
देवदेवस्यशरीरपांडवस्तदा ॥१३॥
अन्वयः
तदा तत्र देवदेवस्य शरीर अनेकधा प्रविभक्तं कसं ज
गत् एफस्थं पांडवैः अपश्यत् ॥ १३ ॥
टीका.
तब वहा देदीप्यमानौमे देदीप्यमान जो भगवान उनके ।
रीरमे अनेक प्रकारका विभक्त अर्थात् ब्रह्मादि विविध विचिः
देव पशु मनुष्य स्थावर इन आदिकभोक्तौंका समूह औ पृथ्व
अंतरिक्ष स्वर्ग पाताल इत्यादिभोगस्थान औ भोग्यभोगोपक
पके,भेदों करिके भनेक प्रकारका विभाग किया भयाप्रकतिर
रुपयुक्त समस्त जगत् एक स्थानमे अर्जुन देखते भये॥१३॥
ततःसविस्मयाविष्ठोहष्टरोमाधनंजयः॥प्रणय
शिवसादेवंकतांजलिरभात ॥ १०॥
. अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. २०९ अन्वयः ततः विस्मयाविष्टः हृष्टरोमः सः धनंजयः शिरसा देवं प्रणम्य रुताजलिःसन् अभापत ।। १४॥ टीका. जब अर्जुनने ऐसा आश्चर्यमय रूप देखा नव विस्मयकरि- कै व्याप्त औ रोमांचयुक्त अर्जुन मस्तक नवाइके नमस्कार के- रिके हाथ जोडिके भगवानसे बोलते भये. ॥ १४ ॥ मूलम्. ॥ ॥ अर्जुनउवाच ॥ ॥ पश्यामिदेवांस्तवदेव देहेसर्वोस्तथाभूतविशेषसंघान् ॥ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृपीश्वसर्वानुरगांश्चदिव्यान्॥१५॥ अर्जुन उवाच हे देव तव देहे देवान तथासर्वान् भूतविशे- 'पसंघान ब्रह्माणं च कमलासनस्थं ईशं यदा एतेषा ई- शंकमलासनस्थं ब्रह्माणं च सर्वान् ऋपीन च दिव्या- न उरगान पश्यामि ॥ १५ ॥ टीका. अर्जुन जो बोले सो कहते हैं,हे देव! तुह्मारे देहमे सर्व देव त- थासर्व भूत प्राणीमात्रके समूह श्री ब्रह्मा नौ कमलासन जो ब- ह्मातिनमें स्थित ईश्वर अथवा इन देवादिकोंके ईश्वर जो ब्रह्मा उनको तुह्मारे नाभिकमलमे स्थित देखताहौ,औसर्व ऋपी औ दैदीप्यमान सर्व सर्प इनौंको आपके देहमे देखताहौ. ॥ १५ ॥ मूलम. अनेकवाहूदरवंचनेत्रंपश्यामित्वांसर्वतोऽनंतरू पं॥ नांतनमध्यनेपुनस्तवादिपश्यामिविश्वेश्वर २१० गीतावाक्यार्थबोधिनी मापाटीका, विश्वरूप ॥ १६॥ अन्वयः हे विश्वेश्वर हे विश्वरूप अनेकवाहूदरवक्रनेत्रं अनंतरू- पं त्वां सर्वतः पश्यामि तव अंतं न पश्यामि मध्यं च न पश्यामि पुनः तव आदि न पश्यामि ॥ १६ ॥ . टीका. + . हे विश्वकेईश्वर हे विश्वरूप! अनेकहैं भुजा,उदर, मुख औ. नेत्र जिसमे औ अनंत रूप जिनके ऐसे तुमको मै देखताही औ तुमारा अंत नहीं देखता हौं, मध्यभी नहीं देखता हों औ आदिभी नहीं देखता हो. ॥ १६ ॥ मूलम्. किरीटिनंगदिनंचक्रिणंचतेजोराशिंसर्वतोदीप्ति मंतं ॥ पश्यामित्वांदुर्निरीक्ष्यसमंताहीप्ताऽनलार्क द्युतिमप्रमेयं ।। १७॥ अन्वयः हेदेवदेव त्वां किरीटिनं गदिनं चक्रिणं पश्यामि च ते- जोराशिं सर्वतः दीप्तिमंतं च दीप्तानलार्कधुति अतएव 'अप्रमेयं च समंतात् दुर्निरीक्ष्यं पश्यामि ॥ १७ ॥ टीका. हेदेवदेव! तुमका किरीट, गदा औ चक्र धारण किये हुयेको देखता हौं औ तेजकी राशि चारौ औरसे प्रकाशवान औ प्रदीपअग्नि तथा सूर्यकी कांतिकी सदृश आपकी कांति इसी . वास्ते अप्रमेय याने जो प्रमाण करनेमे न आवै श्री चौतरफ- अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. २११ त्वमक्षरंपरमंवेदितव्यंत्वमस्यविश्वस्यपरंनिधा नम् ॥ त्वमव्ययःशाश्वतधर्मगोप्तासनातनत्वं पुरुपोमतोमे ॥ १८॥ हे प्रभो वेदितव्यं परमं अक्षरं त्वं अस्य विश्वस्य परं, निधानं त्वं अव्ययः त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता त्वं अतएव सनातनः पुरुषः त्वं इति मे मतः॥१८॥ टीका. हे प्रभो! मुमुक्षुनकरिके जानने योग्य परम अक्षर आप हो इस जगतका परम आधार आपही नाशरहित आप हो, नित्यधर्मके रक्षक श्राप हो, इसीसे सनातन पुरुप आप हो, ऐसा मैने जाना है. ॥ १८ ॥ मूलम. अनादिमध्यांतमनंतवीर्यमनंतवाडेशशिसूर्य नेत्रं॥ पश्यामिवांदीप्तहुताशवत्कंस्वतेजसा विश्वमिदंतपंतं ॥१९॥ अन्वयः अनादिमध्यांत अनंतवीर्य अनंतवाहुं शशिसूर्यनेत्रं दीप्तहुताशवत्त स्वतेजसा इदं विश्व तपंतं एवंभूतं स्वां पश्यामि ॥ १९ ॥ टीका. नहि हैं आदि मध्य औ अंत जिनका औ अनंत पराक्रम जिनका औं अनंत भुजा जिनके औ चंद्र तथा सूर्य हैं नेत्रोंमे जिनके, प्रदीप्त अग्नि सदृश, मुख जिनके ओ आपके तेजकरिके इस विश्वको तपायमान करिरहेहैं ऐसे श्रापको देखताहीं॥१९
२१२
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीफा.
मूलम.
द्यावापृथिव्योरिदमंतरहिव्याप्तत्वयैकेनदिशश्च
सर्वाः ॥ दृष्ट्वाद्भुतंरूपमुग्रंतवदंलोकत्रयंप्रव्य
थितंमहात्मन् ॥२०॥
अन्वयः
हेमहात्मन् यत् यत् द्यावाप्टथिव्योःअंतरंतत् त्वया एकेन
व्याप्तं च सर्वाःदिशः त्वया एकेन व्याप्ताः एवं इदं तव
अद्भुतं उग्रं रूपं दृष्ट्वालोक त्रयं प्रव्यथितं पश्यामि इति
पूर्वणान्वयः ॥ २० ॥
.
.
टीका.
हे महात्मन याने महान है देह जिनका असे हे भगवान! जो
यह ब्रह्मांडका मोल है सो सर्व आपके शरीरकरिके व्याप्त है
श्री संपूर्ण दिशाभि व्याप्त है अर्थात् आपकी उंचाई श्री चौ-
डाई करिके यह विश्व परिपूरित है ऐसा यह आपका अद्भुत
औ उग्ररूप देखिके तीनौ लोकवासी सर्व सुरासुर, मनुष्य, पशु
पक्षी इत्याहिक व्यथाको प्राप्त भये हैं ऐसा मै देखताहौ.॥ २० ॥
मूलम्.
अमीहित्यांसुरसंघाविशंतिकेचिगीताःप्रांज
लयोगृगंतिस्विस्तीत्युत्कामहर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवंतित्वांस्तुतिभिःपुष्कलाभिः ॥११॥
अन्वयः
हि अमी मुरसंघाः त्वां विशंति केचित् भीताः प्रांजलयः
संतः तव गुणनामानि गृणंति महर्पिसिद्धसंघाः स्वस्ति
इति उका पुष्कलाभिः स्तुतिभिः स्तुति ॥ २१ ॥
गीतावाक्थार्थवोधिनी भषाटीका. २१३ टीका. तीनौ लोकके वासिनको व्यथित देखिके यै महलोंकादि- कौंके वासी देवसमूह आपके अतिअद्भुत विश्वाश्रयरूपको दे- खिके अतिआनंदसे आपके समीप प्राप्त होते हैं, औ उन्हीमेसे केतनेक भयभीत भयेहुये हाथ जोडिके हेशरण्यपाल दीनबंधो दयासिंधो इत्यादिक आपके गुणनाम उच्चारणरूप स्तुति कर- ते है. औ महर्षी तथा सिद्धोंके समूह अनेक प्रकारकी स्तुतिनक- रिकै आपका स्तवन करते हैं. ॥ २१ ॥ मूलम. रुद्रादित्यावसवोयेचसाध्याविश्वेऽश्विनौमरुत वोष्मपाश्च ॥ गंधर्वयक्षाऽसुरसिद्धसंघावीक्ष्यं तत्वांविस्मिताश्चैवसर्वे ॥२२॥ अन्वयः रुद्रादित्याः वसवः च ये साध्याःविश्वे अश्विनौ मरुतः च उष्मपाः च गंधर्वयक्षाऽसुरसिद्धसंघाः एते सर्वे विस्मि- ताः संतः त्वा त्वां वीक्ष्यते ॥ २२ ॥ टीका. एकादशरुद्र १२ सूर्यबसु औ जो साध्यनामके देवता हैं. वैौ १३ विश्वदेव र अश्विनीकुमार ११वायु औ उपमप याने पितर, गंधर्व, हाहा हूहू इत्यादिक यक्ष कुबेरादिक, असुरविरांच नादिक, सिद्ध कपिलादिक, सिद्धोंके समूह यै सर्व विस्मयको प्राप्त भये हुये तुमको देखते हैं. ॥ २२ ॥ मूलम् रूपमहत्तेवहुवक्रनेत्रंमहावाहोवहुवाहूरूपादं ॥ :
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
बहूदरंबहुदंष्ट्राकरालंदृष्ट्वालोकाःप्रव्यथितास्त
थाहं ॥२३॥
अन्वयः
हेमहाबाहो बहुवक्रनेत्रं बहबाहूरूपादं बहूदरं बहदंष्ट्रा-
करालं एवंभूतं ते महत् रूपं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथिताः
तथाअहं प्रव्यथितः अस्मि ॥ २३ ॥
टीका..
हे महाबाहो बहुत हैं मुख औ नेत्र जिसमे श्री बहुत हैं भु
जाजधि औ पाय जिसमे ी बहुत हैं उदर जिसमे भी बहुत
दा करिके विकराल अता जो तुह्मारा रूप उसको देखिक
सर्वलोक श्री भी व्यथित भया हौं. ॥ २३ ॥
मूलम.
नभःस्टशंदीप्तमनेकवर्णव्यात्ताननंदीप्तविशाल.
नेत्रं ॥ दृष्ट्वाहित्यांप्रव्यथितांतरात्माधृतिनविंदा
मिशमंचविष्णो ॥ २४ ॥ दंष्ट्राकरालानिचतेमु
खानिदृष्ट्वैवकालानलसन्निभानि ॥दिशोनजाने
नलभेचशर्मप्रसीददेवेशजगन्निवास ॥ २५ ॥
अमीचत्वांधृतराष्ट्रस्यपुत्राःसर्वेसहैवाऽवनिपाल
संवैः ॥ भीष्मोद्रोणःसूतपुत्रस्तथाऽसौसहाऽस्म
दीयैरपियोधमुख्यैः ॥ २६ ॥ वक्त्राणितेत्वरमा
णाविशंतिदंष्ट्राकरालानिक्षयानकानि ॥ केचिहि
लग्नादशनांतरेपुसंदृश्यतेचूर्णितैरुत्तनांगैः॥२७॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ३१५ अन्वयः हे विष्णो नभःस्पृशं दीप्तं अनेकवर्ण व्यात्ताननं दीप्तवि- शालनेत्रं एवंभूतं त्वां दृष्ट्वा हियस्मात् प्रव्यथितांतरा- त्मा अहं तिं च शमं न विंदामि च दंष्ट्राकरालानि कालानलसन्निभानि ते मुखानि एव दृष्ट्वा दिशः न जा- ने चशर्म न लभे च एवं अमी सर्वेधृतराष्ट्रस्य पुत्राःअव- निपालसंधैःसह तथा भीष्मः द्रोणः असौ सूतपुत्रः अ- स्मदीयैःयोधमुरव्यैः अपि सह त्वां दृष्ट्वा दिशः न जानं- ति च शर्म न लभंते किंतु त्वरमाणाःसंतः दंष्ट्राकराला- नि भयानकानि ते वक्राणि विशति केचित् दशनांतरेषु विलनाः संतः चूर्णितैः उत्तमागैः संदृश्यंते तस्मात् हेदेवे- श हे जगन्निवास त्वं प्रसीद ॥ २४ ॥ २५॥२६॥ २७॥ टीका. हे विष्णो याने हे सर्वव्यापिन! नभ जो परम आकाश या- ने प्रकृतिसे पर आकाश उसमे है स्पर्श जिनका याने आपका यह शरीर प्रकृतिसे परे वैकुंठ पर्यंत देखता है औ प्रकाशमान अनेक वर्ण हैं जिनमे औ अति फैले हैं मुख जिनके औ प्रकाश मान बडे बडे हैंनेत्रजिनके ऐसे तुमको देखिके मेरा मन व्यथित भया है इसीवास्ते मेरेको धीरज नही रहता है औ सुखभी नहीं पावता हौं नौ बडी वडी दाढौंकरिके विकराल औ कालानल जो प्रलयकालमा अग्नि उस अग्निके समान देदीप्यमान ऐसे तुह्मारे मुखौंको देखिके मै दिशीकोभी नही जानता) याने कि- घर पूरव औ किधर पश्चिम इत्यादिभी ज्ञान नहीं रहा है,श्री सग्य नहीं पावता हो औ ये सर्व धृतराष्ट्र के पुत्र औरभी राजी करिके सहित तथा भीम श्री द्रोणाचार्य औ यह कर्ण य सर्व गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. राजौकरिके सहित वैसेही आपको देखिके धीरज नहीं धरते हैं औ मुखभी नही पाते हैं औ इनको दिशाभ्रम भया है,इसवा- स्ते यै सुखभी पाते नहीं क्योंकि,वडेवेगसहित विकराल है इस दा. जिसमे ऐसे भयानक तुह्मारे मुखोंमे प्रवेश करते जाते हैं,या- नेदिशौंको भूलेहुये भागते भागते अापके मुखोंमे प्रवेश करते हैं- तहाभी केतनेक दांतोंके वीच वीचमे चूर्णित मस्तकों सहित दी- खते हैं याने उनके मस्तक चूर चूर भये हैं औवै आपके दातोंके वीच वीचमे लगे दीखते है,इसवास्ते आपको हम डरते हैं इसी वास्ते हे देवनकेभी परमेश्वर हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होड याने सौम्यरूप धारण करौ. ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७॥ मूलम. यथानदीनांवहवोऽवेगाःसमुद्रमेवाऽभिमुखाद्र वंति॥तथातवामीनरलोकवीराविशंतिवत्क्रा ण्यभितोज्वलंनि ॥२८॥ अन्वयः यथा नदीनां वहवः अंबुवेगाः समुद्रं एव अभिमुखाः द्रवंति तथा अमी. नरलोकवीराः अभितःज्वलंति त- व वाणि विनि. ॥२८॥ टीका.. जैसे नदियोंके पानिके अनेक वेग समुद्रहीके संमुख जाते हैं, तैसेही यै नरलोक वीर सर्व औरसे प्रकाशमान ऐसे तुह्मा- रे मुखौंमे प्रवेश करते हैं. ॥ २८॥ मूलम्. यथाप्रदीप्तंज्वलनंपतंगाविशतिनाशायसमृद्ध २१७ गोतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका, वेगाः ॥ तथैवनाशायविशंतिलोकास्तवापिव क्राणिसमृद्धवेगाः॥२९॥ अन्वयः यथा समृद्धवेगाः पतंगाः नाशाय प्रदीप्तं ज्वलनं विशं- ति तथा एव समृद्धवेगाः लोकाः अपि नाशाय तव , वकाणि विशति ।। २९ ॥ टीका. जैसे बडे वेगयुक्त पतींगा अपने नाशके वास्ते प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करते हैं, तैसेही बडेवेगयुक्त ये लोकभी अपने नाशके वास्ते आपके मुखोंमे प्रवेश करते हैं. ॥ २९ ॥ मलम्. लेलिह्यसेग्रसमानःसमंताल्लोकान्समग्रान्वदनै वलद्भिः ॥ तेजोभिरापूर्यजगत्समग्रंभासस्तवो ग्राःप्रतपंतिविष्णो॥३०॥ हेविष्णो ज्वलद्भिः वदनैः समयान लोकान असमानः सन् ओष्ठपुटादिकं समंतात् लेलिह्यसे तव उग्राःभासः तेजोभिः समयं जगत् आपूर्य प्रतपंति ॥ ३ ॥ हेजगद्व्यापिन! प्रकाशमान जो आपके मुख उनौकरिके सर्व लोकोंको भरते करते औंठ गल फरादिक चौंतर- फसे वारंवार चाटते हो औ आपके प्रकाशहि अपने तेज करिके सर्व जगतको परिपूरण करिकै तपि रहे हैं. ॥ ३० ॥ आख्याहिमेकोभवानुग्ररूपोनमोस्तुतेदेववर अन्वयः टीका.. मूलम्. २८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. प्रसीद ॥ विज्ञातुमिच्छामिभवंतमायनहिप्रजा नामितवप्रवृत्तिं ॥३१॥ अन्वयः हेदेववर एवं उग्ररूपःभवान् कः इति मे आरव्याहि हि यतः अहं तव प्रवृत्तिं न प्रजानामि अतः भवंतं आयं विज्ञातुं इच्छामि त्वं प्रसीद ते नमः अस्तु ॥ ३ ॥ टीका. हेदेवनमे श्रेष्ठ! अर्थात् हेदेवनके ईश ऐसे उग्ररूप आपको नहो. यह मेरेसे कही क्योंकि, मै आपकी प्रवृत्ति नही जानता हौं, इसवास्ते आप जो आदिपुरुष हो उन तुमको मै जानता चाहता हौं. तुम प्रसन्न होउ अर्थात् प्रसन्न व्हैके कहीं तुमको मेरा नमस्कार होउ. ॥ ३१ ॥ मूलम. ॥ ॥श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ कालोऽस्मिलोकक्षय कृत्प्रटदोलोकान्समाहर्तुमिहप्रवृत्तः॥ ऋतेऽ पित्वांनभविष्यंतिसर्वेयवस्थिताःप्रत्यनीकेप्यो धाः॥ ३२ ॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठयशोलभस्वजित्वा शत्रून् क्ष्वराज्यंसमृद्धं ॥ मयेवैतेनिहताःपूर्वमे वनिमित्तमात्रंभवसव्यसाचिन् ॥३३॥ श्रीभगवान उवाच अहं लोकक्षयरुत् प्रवृदः कालः अ. स्मि इह लोकान् समाहा प्रवृत्तः अस्मि ये योधाः प्रत्य नीकेपु अवस्थिताः ते त्यांऋते सधैं अपि न भविष्यति ॥३२॥ हे सव्यासाचिन् तस्मात् त्वं उनिष्ठ यशःलभस्व अन्वयः
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका.
शत्रून जित्वा समृद्धं राज्यं क्षुधव एतेपूर्व एव मया निह
ताः श्रतः त्वं निमित्तमात्रंभव ॥ ३३ ॥
टीका.
जब अर्जुनने बडी प्रार्थना करिके पूछाकि, मैमापकी प्रवृत्ति
औ आपकोभी नहीं जानता हों आपकहौ तब भगवान् बोलेकि
मै लोकोंके क्षय करनेवाला अतिवडाभया काल हाँ.जोकहोंगे
मैनेतौ ईश्वररूप देखनको प्रार्थनाकीथी आपक्यौं आएतौकह-
ता हो किइस जगहमै इन मनुष्यों का संहार करनेको प्रवर्तभया
हौं जो कि यै भीष्म द्रोणादिककी सेनौं सेनोंमे याने सवसेनौंमे
अर्थात् तुह्मारे शत्रुनकीसेनोंमे युद्ध करनेको खडे हैं वैतुझारेवि
ना सर्वही न रहेंगे, याने तुमइनके मारनेवाले हौसोतुमही रहोगे
और यै सर्वमरेंगे॥ ३२ ॥ इसीवास्ते हे सव्यसाचिन् तुमयुद्ध
करनेको उठौं यशको लेउ यशक्या है तो कहते हैं, शत्रुनको
जीतौ औ अकंटक राज्य भोगी; यै सर्व प्रथमही मेरे मारे भः
ये हैं इतवास्ते तुम निमित्तमात्र होउ सव्यसाची कहते हैं
जो दोनो हाथों से बाणप्रहार करता होइ उसको सो अर्जुन
दोनों हाथोंसे चलानेवाले हैं इसवास्ते सव्यसाची कहिके
वोलाया. ॥ ३३॥
मूलम्.
द्रोणंचभीष्मंचजयद्रथंचकर्णतथान्यानपियोधवी
रान् ॥ मयाहतांस्त्वजहिमाव्यथिष्ठायुध्यस्वजे
तासिरणेसपत्नान् ॥ ३४॥
अन्वयः
द्रोणंच भीमं च जयद्रयं च कर्ण तथा अन्यात अपि
योधवीरान् मया हतान् त्वं जहि माव्यथिष्ठाःरणेसप-
त्नान जेताति अतः युध्यस्व ॥ ३४ ॥
२२० गीतावाक्याथेवोधिनी भाषाटीका.
टीका.
जो प्रथम शंका किथी कि,क्या मालूम हम जीतेंगे किये
जीतेंगे सोभी, शंका अब त्यागौ, क्यों कि, द्रोणाचार्य भीष्म
जयद्रथ औ कर्ण तया औरभी शूर वीर वैमेरे मारे भये हैं इन-
को तुम निमित्तमात्र व्है के मारौ औभयमति मानी
तुम
रणमे
शत्रुनको जीतोगे इसबास्ते युद्ध करौः ॥ ३४ ॥
मूलम.
॥ ॥संजयउवाच ॥ एतछ्त्वावचनंकेशवस्य
कृतांजलिर्वेपमानःकिरीटी ॥ नमस्कृत्वा
भूयएवाहकृष्णंसगद्गदंभीतभीतःप्रणम्य ॥३५॥
अन्वयः
संजयः उवाच किरीटी केशवस्य एतत् वचनं श्रुत्वा वे-
पमानः कृतांजलिः सन् नमस्कृत्वा भूयः एव भीतभी-
तः सगद्गदं प्रणम्य कृष्णं आह ॥ ३५ ॥
मूलम्.
संजय यह वृत्तांत कहिके फिरिभी अगाडीका कहतेहैं कि, है
राजन! किरीटीजो अर्जुन सो भगवानके यै ऐसे बचन सुनिके
कांपता कांपता हाथ जोडे हुये नमस्कार करिके फिरिभी अति
भयभीत गद्गद कंठ युक्त भये हुये नमस्कार करिके श्रीकृष्णसे
वोलता भया. ॥ ३५ ॥
मूलम्.
॥ ॥अर्जुनउवाच॥ ॥स्थानेदपीकेशतवप्रकी
ाजगत्प्रदृप्यत्यनुरज्यतेच॥ रक्षांसिभीतानि
दिशोद्रवंतिसर्वेनमस्यंतिचसिद्धसंघाः॥३६॥
औ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. २२१ अन्वयः अर्जुनः उवाच हे पीकेश तवप्रकीर्त्या जगत् प्रहष्य- ति च अनुरज्यते च रक्षांसि भीतानि दिशः द्रवंति च सर्वे सिद्धसंघाः नमस्यंति इति स्थाने योग्यं ॥ ३६ ॥ टीका. अव ११ लोकों कारकै अर्जुन स्तुति करते हैं कि, हे ह- पीकेश! आप भक्तवत्सल हो इसवास्ते आपकी कीर्तिकरिके जगत आनंदको प्राप्त होता है औ आपमे प्रीति करता है राक्षप्त भयको प्राप्त हुये दिशाविदिशाको भागते हैं औस- र्व सिद्ध लोगोंको समूह आपको नमस्कार करते हैं यह सर्व आपके योग्यही है. ॥ ३६ ॥ मूलम्. कस्माच्चतेननमेरन्महात्मनगरीयसेब्रह्मणोप्या दिकञ॥ अनंतदेवेशजगन्निवासत्वमक्षरंसदस त्परंयत् ॥ ३७॥ हेमहात्मन ब्रह्मणः अपि गरीयसे च आदिकत्रै सुभ्यं ते सिद्धसंघाः कस्मात् न नमेरन् अपितु नमेरन एवं हे अनंत हे देवेश हे जगन्निवास यत् अक्षरं तत् त्वं यत् सत् यत् असत् यत् तत्परं तत्सर्व त्वं एव ।। ३७ ॥ टीका. जो प्रथम कहाकि,जगत् हर्पता है औ अनुराग करता है तथा राक्षस भागते हैं औसिद्ध नमस्कार करते है सो सर्व योग्य है; इ सी योग्यताहीको वर्णन करते हैं हे महात्मन्!ब्रह्मासे भी आप अति वडे हो क्योकि श्रादिकर्ता हो ऐसे तुमको वै सिद्धोंके समू हक्यों ननवै अर्थात् नवहींगेहे अनंत हे देवेश हे जगन्निवास जो अन्वयः २२२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका, अक्षर याने आत्मा अर्थात् जीवतत्व नजायते म्रियतेवा कदा चित् इत्यादि प्रामाणों से अक्षर शब्द निर्दिष्ट जीवात्मा सोभि प्रापही हैं औ सदसत् जो कार्य कारणभावकरिके स्थित प्रक ति तत्व सो भी मापही हैं सत् जो स्थूल कार्य नामरूप वि भागके योग्य औ असत् सूक्ष्म जो कारण याने नामरूपके योग्य नही औ इनसे परे जो मुक्त जीव यै सर्व प्रापही हो अर्थात् यै सर्व शरीररूप हैं आप सबके अंतर्यामी हौ.॥ ३७॥ मूलम् त्वमादिदेवःपुरुपःपुराणस्त्वमस्यविश्वस्यपरं निधानं ॥वेत्तासिवेद्यंचपरंचधामत्वयाततंवि श्वमनंतरूप ॥ ३८॥ अन्वयः त्वं आदिदेवः पुरापः पुरुषः आसि अस्य विश्वस्य परं निधानं त्वं असि वेत्ताच वेद्यं च परं धाम त्वं असि हे अनंतरूप इदविश्वं त्वया ततं ॥ ३८ ॥ टीका. तुम आदिदेव याने ब्रह्मादि देवोंके आदि हौ. क्योंकि, आप पुराणपुरुप हौ औ इस विश्वके आधार आप हो औ जो इसमे जाननेवाला है .सो आप हौ औ जो जाननेयो. ग्य है सो आप हौ औ इस जगतके परम धाम याने रहने का स्थान प्राप हो. हे अनंतरूप! अर्थात् आपके रूपका अं त नही भी यह विश्व आपकरिके व्याप्तहै इस श्लोकमे मा दिदेवशब्दसे उत्पत्ति निधानसे आधार याने रक्षण परंधाम- से लय देखाया अर्थात् इस विश्वके उत्पत्ति रक्षा औ प्रलय आपहीसे हैं इसवास्ते यह आपमय है ॥ ३८ ॥ मूलम गीतावाक्यार्यवोधिनी भापाटीका. वायुर्यमोऽग्निवरुणःशशांकःपितामहस्त्वंप्रपिता महश्च ॥ नमोनमस्तेस्तुसहस्रकृत्वःपुनश्चभूयोऽ पिनमोनमस्ते ॥३९॥ अन्वयः वायुः त्वं यमः त्वं अग्निः त्वं वरुणः त्वं शशांकः त्वं पि तामहःच प्रपितामहः त्वं असि अतः ते सहस्रकत्वान मोनमः अस्तु पुनः च भूयः अपि ते नमोनमः अस्तु॥३९॥ टीका. वायु यम अग्नि वरुण चंद्र इत्यादि शब्दौकरिके कहने योग्य आपही हो, औ इस जगतके पितामह ब्रह्मा अर्थात् पिताप्र- जापती तिनके पिता ब्रह्मा उन ब्रह्माकेभी पिता आप है इसवास्ते इस जगतके प्रपितामहभी आप हैं इसीवास्ते प्रापको हजारौं वार नमस्कार होउ फिरिभी नमस्कार होउ नमस्कार होउ इस श्लोकमे हजारौंवारनमस्कार करनेमे तौं यह दरझाया कि, ईश्वर को एकवेर साष्टांग करिके न रहिजाना, अति आदरपूर्वक वारंवार नमस्कार करना चाहिये. ॥ ३९ ॥ मूलम्. नमःपुरस्तादथप्टष्ठतस्तेनमोऽस्तुतेसर्वतएवसर्व ॥ अनंतवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वसमाप्तोपिततो सिसर्वः॥४॥ अन्वयः हेसर्व ते पुरस्तात् नमः अस्तु अथ एएतानमः अस्तु ते सर्वतः नमः अस्तु अनंतवीर्यामितविक्रमः त्वं सर्वस मातोपि ततः सर्वाः असि ॥ १० ॥ टीका.
२२४ गीतावाक्याथेबोधिनी भाषाढीका.
हेसर्वरूप तुमको सन्मुख नमस्कार होउ औ पिछाडीसे हो.
उ औ सब ओरसेभी होउ आपका सामर्थ्य नौ पराक्रमका.
अंत नहीं इसवास्ते श्राप सर्वमे व्यापक हो, इसी व्यापकत्व-
से आप ही सर्व हैं इसवाक्यसे जो प्रथम समानाधिकरणसे
शब्द कहेथे उनका यह खुलासा किया कि, वायु इत्यादिकों
के अंतर्यामी रूप आप हैं. ॥ १० ॥
मूलम्.
सखेतिमत्वाप्रसभंयदुक्तंहेकृष्णहेयादवहेसखेति
॥ अजानतामहिमानंतवेदमयाप्रमादात्प्रणयेन
वापि॥४१॥ यच्चावहासार्थमसत्कृतोसिविहार
शय्यासनभोजनेषु॥एकोऽथवाप्यच्युततत्सम
संतत्क्षामयेत्वामहमप्रमेयं ॥४२॥
अन्वयः
हेअध्युत तव महिमानं च इदं विश्वरूपं अजानतामया
प्रमादात् वा प्रणयेन अपि त्वां ईश्वरं प्राकृतसखा इति
मत्वा हेकृष्ण हेयादव हेसखे इति प्रसभं यत् उक्तं च
विहारशय्यासनभोजनेयु एकःअथवातत्समक्ष अपि प्र-
वहासार्थ यत् असत्कृतः असि तत् अहं अप्रमेयं त्वां
क्षामये ॥११॥ १२ ॥
टीका,
हे अभ्युत! मापके महिमोका औ इस विश्वरूपको वहि
जानता भया जो मै तिस मैने प्रसाद किंवा स्नेहसे आप ईश्व-
रको प्राकृत सखा मानि हे कृष्ण हे यादव हे सखे असे जो
कुछ कहा होय औ क्रीडा शयनासनभोजन इन कालौंमे
अकेलेमे अथवा और सखोंके सन्मुख हसीके वास्ते जो अस:
स्कार किया होय. ॥११॥ ४२ ॥
. गीतावाक्यार्थबोधिनी भघाटीका, २२५ तो मै प्रमाणातीतसे क्षमा करता हौं. ॥ ११ ॥ मूलम् पितासिलोकस्यचराचरस्यत्वमस्यपूज्यश्चगुरु गरीयान् ॥ नत्वत्समोस्त्यायधिकःकुतोऽन्यो लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभावः॥४३॥ तस्मात्प्रण म्यप्रणिधायकायंत्रसादयेत्वामहमीशमीडयं॥ पितेवपुत्रस्यसखेवसख्युःप्रियःप्रियायाऽर्हसि देवसोढुं ॥४४॥ अन्वयः हेअप्रतिमप्रभाव अस्य चराचरस्य लोकस्य पिताअ- सि च अतः एव पूज्यःअसि च गरीयान्गुरुः आसि अतः लोकत्रये अपि त्वत्समः अन्यःन अस्ति तर्हि अभ्यधि- काकुतः॥ १३ ॥ तस्मात् अहं ईशंईड्यंत्वांभूमौ कार्यप्र- णिधाय प्रणम्य प्रसादये हेदेव पुत्रस्य प्रियाय तदपराधा- न पिता इव सरव्युःप्रियाय सखा इव एवं ममापि प्रियः त्वमेप्रियाय सोढुं अर्हसि ॥ १४ ॥ टीका. हे अप्रतिमप्रभाव याने जिसकी उपमाको दूसरा नही ऐसा. आपका प्रभाव है ऐसे जो आप सो इस चराचर लोकके पिता उत्पन्न करनेवाले हो औ इसीसे इसके पूज्य हो औ गुरु जो ब्रह्मादिक उनकेभी गुरुही इसीकारणसे तीनों लोकभी, आपके समान कोई नहीहै तो अधिक कहांसे होयगा॥४३॥ इ. सीवास्ते मेभी ईश्वर औ स्तुतिकरनेके योग्य आपकोसाटोगदंड. वतकरिगेप्रमसकराताहौं. हेदेव! पुरके पियारकेवास्ते उसकेम- २४ २२६ गीतावाक्याबोधिनी भापाटीका. पराधोंको पिता जैससहता है औ सखाके प्रियकरनेको उसके अपराधों को सखाजैसे सहताहैऐसे ही मेरेभी प्रिय आप हो सो मेरी प्रियताकेवास्ते मेरे अपराध क्षमा करौ. ॥ १४ ॥ मूलम्. अदृष्टपूर्वहषितोस्मिदृष्ट्वाभयेनचप्रव्यथितंमनो मे ॥ तदेवमेदर्शयदेवरूपंप्रसीददेवेशजगन्नि वास॥४५॥ किरीटिनंगदिनंचक्रहस्तमिच्छा मित्वांद्रष्टुमहंतथैव ॥तेनैवरूपेणचतुर्भुजेनस हस्त्रबाहोभवविश्वमूर्ते ॥ ४६॥ अन्वयः अदृष्टपूर्वतव रूपंदृष्ट्वा हृपितःअस्मिच मे मनःभयेनप्र- व्यथितं अस्ति हेदेव मेतत् एव रूपंदर्शय हे देवेश हे जग- निवास त्वं प्रसीद ॥१५॥हेसहस्रवाहो हेविश्वमूर्ते अहं तथाकिरीटिनंगदिनंचक्रहस्तं एव त्वां द्रष्टुंइच्छामि अतः तेन एव चतुर्भुजेन रूपेण भव ॥ ४६ ॥ टीका, नहीं देखता है पूर्वकालमे मैनेअथवा किसीने ऐसा आपका रूप देखिके हर्पित भया हौं भी मेरा मन भयसे व्यथित है.हेदेव मेरेको वही प्रथमका रूप देखावौ हे देवेश हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होउ ॥१५॥हे सहस्रबाहो हे विश्वमूत! याने अब जो आ. पने सहस्त्रभुजायुक्त विश्वरूप धारण किया है इसके सवायजो वैसा किरीटयुक्त गदा औ चक्र हाथमे लिये ऐसा चतुर्भुज रू. पदेखने की इच्छा करता हौं इसवास्ते उसी चतुर्भुज रूपकरि- केयुक्त होउ. ॥ ४६॥ .
गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका. मूलम्. ॥ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ मयाप्रसन्नेनत वार्जुनेदरूपंपरदर्शितमात्मयोगात् ॥ तेजोमयं विश्वमनंतमाद्ययन्मत्वदन्येननदृष्टपूर्वं ॥४७॥ अन्वयः श्रीभगवानुवाच हेअर्जुन यत् तेनोमयं विश्वं अनंत श्राद्यं त्वदन्येन केनापि नदृष्टपूर्व तत् इदं मे परं रूपं प्रसन्नेन मया आत्मयोगात् दर्शितं ॥ १७ ॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान अर्जुनके वाक्यसुनिके बोलेकि, हे अर्जुन जो तेजोमय विश्वरूप अनंत सर्वकी आदि औ तुह्मारे विना प्र- थम किसीनेभी नहीं देखा है सो यह मेरा परूप प्रसन्न व्हैके मै- ने आपके सत्यसंकल्परूप योगसे देखाया है. ॥ ४७ ॥ मूलम. नवेदयज्ञाऽध्ययनैर्नदानैर्नचक्रियाभिर्नतपोभिरु प्रैः ॥ एवंरूपःशक्यअहंनृलोकेद्रष्टुंत्वदन्येयन कुरुप्रवीर ॥४८॥ हेकुरुप्रवीर एवरूपः अहं नृलोके त्वदन्येन वेदयज्ञाध्य- पनैः द्रष्टुं न शक्यः च दानैः द्रष्टुं न शक्यः च कियाभिः द्रष्टुं न शक्यः च उग्रैः तपोभिः द्रष्टुं न शक्यः ॥ १८ ॥ हे कुरुवंशिनमे श्रेष्ठवीर ऐसा विश्वरूप मै मनुष्यलोकमे तु- मारे सेवाय कोईभी दूसरे मनुष्यको वेदाध्ययन अनिष्टोमादि अन्वयः टीका.
२२८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. यज्ञ मंत्रजप पृथ्वी इत्यादि दान औ अष्टांगयोगक्रिया औक छूचांद्रायणादिक उग्र तप इनौं साधनौंकरिकेभी नहीं देखनेयो- ग्य हो अर्थात तुम हमारे प्रिय भक्त हौ औ तुलारे सेवाय याने अभक्त जन जो वेद पढ़े यज्ञकरें मंत्र जपें दान देइं योगक्रिया करें अथवा उग्रतप करें तौभी ऐसे विश्वरूप मेरेको न देखिस केंगे. ॥ ४॥ मूलम्. मातेव्यथामाचविमूढभावोदृष्ट्वारूपंघोरमीहङ् ममेदं ॥व्यपेतभीःप्रीतमनाःपुनस्त्वंतदेवमेरू पमिदंप्रपश्य ।। ४९॥ अन्वयः ईदृग् घोरं इदं मम रूपं दृष्ट्वा ते व्यथा मा अस्तु च वि- मूढभावः मा अस्तु किंतु व्यपेतभीः प्रीतमानाःत्वं तत् एवं इदं में रूपं पुनः प्रपश्य ॥ १९ ॥ टीका. ऐसे घोर इस मेरे रूपको देखिके तुह्मारे व्यथा न होय औ मोहभावभी न होय क्योंकि, भयरहित प्रसन्नमनयुक्त तुम वहीं • प्रथमका चतुर्भुज यह मेरा रूप इसीको फिरि देखौ. ॥ १० ॥ मूलम्. ॥ संजयउवाच ॥ इत्यर्जुनंवासुदेवस्तथोक्का स्वरूपंदर्शयामासभूयः॥ आश्वासयामासच भीनमेनंभूत्वापुनःसौम्यवपुर्महात्मा ॥५०॥ . अन्वयः संजयः उगाच वासुदेवः इति अर्जुनं उत्का यथा पूर्व बोलेकी, देजनार्दन! तुह्मारा यह.सौम्य मनुप्याकार रूप देखिन गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. २२९ चतुर्भुजं रूपं आसीत् तथा स्वकं रूपं भूयः दर्शयामास च महात्मा सौम्यवपुः भूत्वा पुनः भीतं एनं आश्वास- यामास -॥ ५० ॥ टीका. संजय धृताराष्ट्रसे कहते भये कि, वासुदेव भगवान ऐसे अर्जुन नसे कहिके जैसा चतुर्भुज आपका रूप प्रथम था वैसाही मा- पका चतुर्भुज रूप फिरिभी देखाने भये औ विश्वरूप जोथे सोसौ म्य चतुर्भुज रूप हैके फिरि भयाभीत अर्जुनका आश्वासन करते भये ॥ ५० ॥ मूलम. दृष्ट्वेदमानुषंरूपंतवसौ म्यंजनार्दन ॥ इदानीमस्मिसंवृत्तःसचेताःप्रक ॥ ॥ अर्जुनउवाच ॥ ॥ तिंगतः॥५१॥ अन्वयः अर्जुनःउवाच हेजनार्दन! तव इदंसौम्यंमानुपं रूपं दृष्ट्वा इदानीं अहं सचेताः प्रकृतिं गतःसन् संवृत्तःअस्मि॥५१॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान्का सौम्य चतुर्भुज रूप देखिके अर्जुन के इसकालमे मै प्रसन्नचित्त आपके स्वभावको प्राप्त भया हुवा सावधान हों. ॥ ५१ ॥ ॥ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ सुदुर्दर्शमिदंरूपंदृष्ट वानसियन्मम ॥ देवाअप्यस्यरूपस्यनित्यंद र्शनकांक्षिणः॥५२॥ मूलम्.
. २३० गीतावाक्याथवाधना भाषाटीका. अन्वयः श्रीभवान उवाच हेअर्जुन! यत् मुदुर्दर्श इदं मम रूपं दृप्रवान् असि देवाः अपि भस्य रूपस्य नित्यं दर्शन- कांक्षिणः संति ॥ ५२ ॥ टीका. अर्जुनके वाक्यसुनिके भगवान बोले, हे अर्जुन! जो अति दुर्दर्श याने बडेपरिश्रमसे भी जप तपादिकरिके देखनेमे न आ- वै ऐसा जो मेरा रूप तुमने देखा है सोई रूपके दर्शनकी इच्छा देवताभी नित्य करते रहते हैं ॥ ५७ ॥ मूलम. नाहंवेदैर्नतपसानदानेननचेज्यया ॥ शक्यएवं विधोद्रष्टुंदृष्टवानसिमायथा ॥२३॥ भक्त्यात्व नन्ययाशक्यअहमेवंविधोर्जुन ॥ ज्ञातुंद्रष्टुंचत त्वेनप्रवेष्टुंचपरंतप ॥५४॥ अन्वयः हेअर्जुन यथा मां दृष्टवान् असिएवं विधः अहं वेदैः द्रष्टुं नशक्यः न तपसा न दानेन नच ईज्यया द्रष्टुं शक्यःतु हेपरंतप एवंविधः अहं अनन्यया भक्त्या तत्त्वेन ज्ञातुं द्रष्टुं च प्रवेष्टुं अपि शक्यः ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ टीका. हेअर्जुन! जैसा मेरेको तुमने देखा ऐसा मै वेदके पढनेसे त- पसे दानसे औ यज्ञसे भी नहीं देखनेमे माता हो क्योंकि,हेपरं तप! ऐसा मै अनन्य भक्तिहीकरिके तत्वसे जाननेके नौ देखने के औप्राप्तहोनेके भी योग्य हौं॥५३॥ अर्थात् अनम्यभक्ती ही से मेरेको मनुष्य जानि सकता है औ देखि सकता है प्रोप्रा-
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
सभी होता है और उपायसे नही.॥५४ ॥
मूलम्.
मत्कर्मकृन्मत्परमोमद्भक्तःसंगवर्जितः ॥ निरः
सर्वभूनेषुयःसमामेतिपांडव ॥ ५५ ॥
प्रन्वयः
हे पांडव यः मत्कर्मकृत् मत्परमः मद्भक्तः संगवर्जितः
सर्वभूतेषु निर्वैरः समां एति ॥ ५५ ॥
टीका.
हेपंडुतनय!जो वेदाध्यायन इत्यादि कर्म मेरेही निमित्त कर
ताहै सो औ मैही हो परमपुरुषार्थ जिसका सो औ मेराही प्रा-
राधन भजन प्रेमपूर्वक जो करता है सोऔ मेरेही स्वरूप ध्यान
विना दूसरे संगते रहित औ सर्वभूत प्राणिमात्रको मेरे जानिके
सर्वसे वैररहित ऐसा मेरा भक्त मेरेको प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥
इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायांयो
गशास्त्रश्रीकृष्णार्जुनसंवादेविश्वरूपदर्शनयो
गोनामएकादशोऽध्यायः॥ ११ ॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादक
तायांश्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थवाधिनीभापाटीकायांए
कादशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
मूलम.
अर्जुनउवाच ॥ एवंसततयुक्तायेभक्तास्त्वांपर्दा
पासवे ॥ येचाप्यक्षरमव्यक्तंतेपांकेयोगवित्त
माः॥१॥
२३३ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. युक्ताउपासते ॥ श्रद्धयापरयोपेतास्तेमेयुक्तत मामताः॥२॥ अन्वयः जे भीभगवान उवाच जनाः नित्ययुक्ताः मयि मनः आ- वेश्य परया अदया उपेताः संतः मा उपासते ते युक्त, तमा मे मताः ॥ २ ॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान् अर्जुनका प्रश्न तुनिके उत्तर देते हैं कि, मनुष्य नित्यही मेरे संयोगकी इच्छा करते हैं वै मेरेको अतिप्रिय जानिके मेरेहीमे मानको लगाये हुये मेरी उपाप्त- ना करते हैं, अर्थात् सर्व लौकिक वैदिक कर्म मेरेही प्राप्ति निमित्त करते भये मेरा स्मरण करते है, वैही योगिनमे श्रेष्ठ हैं ऐसे मैने माना है, याने वै मेरेको शीघ्रही प्राप्त होयेंगे. ॥२॥ मूलम्. येत्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तंपर्युपासते ॥ सर्वत्रग मचिंत्यंचकूटस्थमचलंध्रुवं ॥ ३ ॥ सन्नियम्ये द्रियग्रामसर्वत्रसमबुद्धयः । तेप्राप्नवीतमोमवस र्वभूतहितेरताः ॥ ४ ॥. शोऽधिकतरस्तेपा. मव्यक्तासक्तचेतसां ॥ अव्यक्ताहिगतिर्दुःखंदे हवद्भिरवाप्यते ॥५॥ अन्वयः येतु इंद्रियग्राम संनियम्य सर्वत्रसमबुद्धयः सर्वभूतहि- तेरताःसंतामनिर्देश्यं अव्यक्तं सर्वत्रगं अचिंत्यं च कूट- स्थं अचलंध्रुवं एवंभूतंअक्षरंप्रत्यगात्मतत्वं पर्युपासतेते २३१ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. अपि मां एव प्राप्नुवंति हि यस्मात् अव्यक्ता गतिःदुःखं यथा स्यात् तथा देहवद्भिः अवाप्यते तस्मात् तेषां अ- व्यक्तासक्तचेतसां क्लेशः अधिकतरः भवति ॥३॥४॥५॥ टीका, जो कोई मनुष्य सर्व इंद्रियोंको जीतिके सर्वत्र सचराचर देहामे समबुद्धि याने आत्माको एकसमान जाननेवाले इसीसे वैसर्वभूत प्राणीमात्रके हितकारकहयेभये अनिर्देश्य याने देवा- दिक शरीरोंके शब्दो करिके कहनेमे न आवै कि, यह देव है अथवा मनुष्य इत्यादिक है ऐसे कहनमे न आवै, इसीसे श्र- व्यक्त याने अदृश्य है औ सर्वत्र देवादिकशरीरोंमे प्राप्त हो ता है औ अचिंत्य याने चिंतवन करनेमेभी आता नही औ कूटस्थ याने सर्वदा एकरस अर्थात् देवादिकारी मे प्राप्त व्हेके भी, स्वयं निर्विकार औअचल याने स्वस्वरूपसे चलायमान न ही. इसीसे ध्रुव याने नित्य ऐसा जो अक्षरप्रत्यगात्मस्वरूपकी उपासना करते हैं याने प्रात्मस्वरूपका अनुसंधान करते है वैभी मेरेहीको प्राप्त होते है; परंतु अव्यक्तगति याने अप्रकटवस्तुकी प्राप्ति देहधारियों करिके दुःखसे भी प्राप्त होना कठिन है,इसवा- स्ते जिनका अव्यक्तयाने अप्रकटवस्तु प्रात्मातत्वमे चित्त लगा है उनको क्लेश वहुतही होता है. ॥ ३॥ १॥ ५ ।। मूलम. येतुसर्वाणिकर्माणिमयिसंन्यस्यमत्पराः ॥ अ नन्यनैवयोगेनमांध्यायंतउपासते॥६॥तेपा महंसमुख मृत्युसंसारसागरात् ॥ भवामिन चिरात्पार्थमय्यावेशितचेतसां ॥७॥ अन्वयः गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. हेपार्थ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः अनन्येन एव योगेन मां ध्यायंतःसंतः उपासते मयि आवेशितचेतसां तेषां अहं मृत्युसंसारसागरात् नचि रात् समुद्धा भवामि ॥ ६ ॥ ७ ॥ टीका. हेप्टयापुत्र! जो कोई मनुष्य सर्वाणि कर्माणि याने लौकि क औ वैदिक सर्व कर्म लौकिक देहधारण पोषणार्थ आहारादि- क औ वैदिक यज्ञदानादिक सर्व कर्म अध्यात्मबुद्धिसे मेरेमे रखिके याने मेरे अर्पण करिके मत्पराः याने मही हों पर प्रा- प्ति होने योग्य जिनके ऐसे जो अनन्यभक्तियोगकरिके मेरा- ही ध्यान करते भये रीही ध्यान पूजन कीर्तनरूप उपासना करते हैं, ऐसे जिनौने भेरेमे चित्त लगाया है उनका मैं मेरी प्राप्तिकी विरोधताकारक जो मृत्युरूप संसारसागर तिसते थोडेही कालमे उद्धार करोंगा. ॥६॥७॥ मूलम्. मय्येवमनआधत्स्वमयिबुद्धिंनिवेशय ॥ निवसि प्यसिमय्येवअतउर्ध्वनसंशयः॥ ८॥ अन्वयः . हेअर्जुन त्वं मयि एव मनः आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेश- यतःऊर्वमयि एव निवसिष्यसि इति संशयःन ॥८॥ टीका. हेअर्जुन! तुम मेरे ही मे मनको युक्त करौ,याने मेरेहीको प्रति परमप्रिय जानिके मेरेही मिलनेका प्रयत्न करौ. ऐसे मेरेहीको बुद्धिको प्रविष्ट करो याने बुद्धिसे यही दृढनिश्चय करौकी, श्रीम- नारायणके सेवाय दुसरा हमारे नहीं है तो इसमनके प्रवेश कर- -- २३६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. नेके अनंतर मेरे समीपहीमे तुम निवास करौंगे इसमे संशय नही है. ॥ ८ ॥ मूलम. अथचित्तंसमाधातुनशक्नोषिमयिस्थिरम्॥ अ भ्यासयोगेनततोमामिच्छाप्तधनंजय ॥९॥ अन्वयः हेधनंजय अथ मयि स्थिरं चित्तं समाधातुं न शक्नोषि ततः अभ्यासयोगेन मां आप्तुं इच्छ ॥ ९ ॥ टीका. हेधनंजय! अर्जुन जो सहसा मेरेमे चित्तके स्थिर समाधान न नहीं कर सकते हो तो अभ्यासयोग करिके मेरी प्राप्तिकी इच्छा करौ याने मेरे गुणकीर्तनश्रवणादिक करिके मेरा प्रखं इ स्मरण करते भये मेरी प्राप्तिकी उत्कंठा करो. ॥९॥ मूलम. अभ्यासेप्यसमर्थोसिमत्कर्मपरमोभव ॥ मदर्थ मपिकर्माणिकुर्वसिद्धिमवाप्स्यसि ॥१०॥ अन्वयः अभ्याले अपि असमर्थः प्रसि तर्हि मत्कर्मपरमःभवम- दर्थ कर्माणि कुर्वन्सन अपिसिद्धिं अवाप्स्यसि ॥१०॥ टीका. जो कि, तुम ऐसा स्मृतिरूप अभ्यास करनेकोभी असमर्थही तौ मेरे संबंधी काम तत्पर होह याने मेरा मंदिर करावी वाग लगावों मेरे मंदीरमे दीपक करौ,झारौ,लीपौ,छिरकाव करौ मेरे पूजननिमित्त पुप्पादिक लावौ पूजनकरौ नामकीर्तन प्रदक्षिणा स्तुति नमस्कार इत्यादिक कर्म मेरेवास्ते करी तो मेरेनिमिन अन्वयः गीतावाक्यार्थवोधिनी भाराटीका. २३७ कर्म करते मेरी प्राप्तिरूप सिद्धिको प्राप्त होउगे ॥ १० ॥ मूलम्. अथैतदप्यशक्तोऽसिकर्तुमद्योगमाश्रितः ॥ सर्व कर्मफलत्यागंततःकुरुयतात्मवान् ॥ ११ ॥ अथ एतत् अपि कर्तुमदर्थ कर्म कर्तु अपि अशक्तःअसि ततः आत्मवान् भूत्वा मद्योगं आश्रितः सन सर्वकर्म. फलत्यागं कुरु ॥ ११ ॥ टीका. जो तुम यह जो मेरे अर्थ कर्म इसकोभी करनेको न समर्थ होउ तौ, मनको मेरी प्राप्तिके यत्नमे राखिके मेरे भक्तियो- गका आश्रय करते हुवे सर्वलौकिक वैदिक कर्मके फलका त्या- गकरी ॥ ११ ॥ मूलम्. श्रेयोहिज्ञानमयासाज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ॥ ध्यानाकर्म फलत्यागस्त्यागाच्छांतिरनंतरम् ॥१२॥ अन्वयः अभ्यासात् श्रेयःज्ञानभवतिज्ञानात् ध्यानं विशिष्यते ध्या- नात कर्मफलत्यागः त्यागात् अनंतरं शांतिः स्यात् ॥ १२ ॥ टीका. अभ्यास करनेसे कल्याण कारक तत्वज्ञान होता है औज्ञा- नसे ध्यान याने विचार होता है उस ध्यानसे याने विचारसे स.. र्व कर्म याने लौकिक तथा वैदिक सर्व कर्मों के फलंका त्याग हो- ता, है औत्यागके पीछे शांति होती है, याने संसारसे वैराग्य होता है: n २ ॥
. । ९३८ गीतावास्यार्थबोधिनी भाषाटीका. मूलमं.' अद्वेष्टासर्वभूतानांमैत्रःकरुणएवच ॥ निर्ममो 'निरहंकारःसमदुःखसुखःक्षमी ॥ १३॥ संतुष्टः सततंयोगीयतात्मादृढनिश्चयः ॥ मय्यर्पितम नाबुद्धिर्योमद्भक्तःसमेप्रियः ॥१४॥ अन्वयः यः सर्वभूतानां अद्देष्टा मैत्रः च करुणः एव च निर्ममः निरहंकारः समदुःखसुरवः क्षमी संतुष्टः सततंयोगी यतात्मा दृढनिश्चयः मर्पितमनोबुद्धिः सः मद्भ मे प्रियः अस्ति ॥ १३ ॥ १४ ॥ टीका. जोसर्वभूतौंका प्रदेष्टा याने सर्व मित्र तथा शत्रु इन सौंसे द्वेप न करै सबसे मित्रता राखै सबपर करुणाकर औ निर्मम • याने देह इंद्रिय औ देहसंबंधी स्त्री पुत्र द्रव्य गृहादिकौंको अ- पना नजाने औ निरहंकार याने देहाऽभिमानरहित होय औ सुखदुःखमे सम याने सुखमे हर्पन करै दुःखमे शोक न करै औ क्षमी सहनशील होय संतुष्ट याने जो मिला उसीसे देह निर्वाह करिके संतुष्ट रहै औ निरंतर मेरे प्राप्तिरूप योगयुक्त रहे औ मनको नियममे राखै औ मेरेही गुणकीर्तनादिकों मे दृढ निश्चय राखै ऐतेही मेरेहीमे मन औ बुद्धिको लगाये होय सो मेरा भक्त मेरेको प्याराहै. ॥ १३ ॥ १४॥ मूलम्. यस्मान्नोद्विजतेलोकोलाकान्नोद्विजतेचयः॥ होमर्पभयोगैर्मुक्तोयःसंचमेप्रियः ।। १५ ।
२३९ - गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. लोकः : कस्मात् न उदिजसे च यः लोकात् न उद्विज- । ते च यः हामर्षभयोहगैः मुक्तः सः मे प्रियः अस्ति॥१५॥ टीका. लोक याने कोईभी जन प्राणीमात्र जिसते उद्वेगको न प्राप्त होय याने ऐसे कर्म करै जिसते लोगोंको पीडा न हो- यो वह आपभी लोगोंसे उद्वेगको न प्राप्त होय याने जि- सके उद्देगकारक कर्म कोईभी न करें इसीसे वह हर्प श्री प्र- मर्प याने असहनशीलता ई औ भय तथा उद्वेग इनसे वह रहित होता है सो पुरुष मेरेको प्रिय है. ॥ १५॥ मूलम् अनपेक्षःशुचिर्दक्षउदासीनोगतव्यथः ॥ सर्वार भपरित्यागीयोमद्भक्तःसमेप्रियः॥१६॥ यः पुरुप अनपेक्षः शुचिः दक्षः उदासीनः गतव्यर्थः सर्वारंभपरित्यागी सन् मद्भक्तः अस्ति सः मे प्रियःअ- अम्वयः स्ति ॥ १६ ॥ टीका. जो पुरुप अनपेक्षयाने आत्माके सेवाविना औरसर्ववस्तुमे इच्छारहित है औ शुचि याने जो शास्त्रविहित पदार्थ हैं उन्हीसे बढा है पवित्र शरीर जिनका अथवा बाहेर मृत्तिका जलादिसे श्री अंदर चित्तकी शुद्धतासे पवित्र है औ दक्ष याने शास्त्रोक्त कर्म करनेमे समर्थ औं उदासीन याने शास्त्रीव्यवहारसे अन्य त्र उदासीन अथवा शत्रुता मित्रता करिके रहित औ गतव्यों याने शास्त्रोक्त कर्म करते जो शीत उष्ण वर्ष धूपं इत्यादिक स्पर्श करते हैं उनकी व्यथासे रहित औ सरिंभपरित्यागी २४२ गीतावास्यार्थवोधिनी भाषाटीका, इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकतायो श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थवोधिनीभाषाटीकायां द्वादशोऽध्यायः ॥ इति द्वितीयषट्कं समाप्तम् ॥ ॥ अत तृतीयपट्कं प्रारभ्यते ॥ उपोद्घातः प्रथमपटूमे ईश्वरप्राप्तिका उपायभूत भक्ति जोउपासना औ उस उपासनाका अंगभूत आत्मस्वरूपज्ञान सो आत्मज्ञान ज्ञानयोग कर्मयोगनिष्ठाकरिके प्राप्त होता है, ऐसा कहा औम- ध्यपटुमेपरमात्मस्वरूपका यथार्थज्ञान औउसकेमहात्मज्ञान- पूर्वक उपासना जिसको भक्ति कहते हैं सो भक्तियोगप्रतिपादन किया. अब अंतपटूमे प्रकृति औ पुरुपका निरूपण औ प्रकृति पुरुपके संसर्गसे प्रपंचका होना कहेंगे औ प्रथमद्वितीयमे कहा जो परमात्मस्वरूपका यथार्थ निश्चय औ कर्म ज्ञान भक्ति इन- के स्वरूप औइनके उपादानके प्रकार न्यारे न्यारे कहेंगे, तहां तेरहें अध्यायमे देह ौ आत्माके स्वरूप औ देह क्या है ऐसा- निश्चय औ देहसे न्यारा जो आत्मा उससी प्राप्तिका उपाय श्री प्रकृतिसे मुक्तका स्वरूप नौ उसका प्रकृतिसंबंधका कारण औ प्रकृतिपुरुषविवेकका अनुसंधानप्रकार कहेंगे. ॥ १ ॥ मूलम्. ॥ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ इदंशरीरंकौंतेयक्षेत्र मित्यभिधीयते ॥ एतद्योवेत्तितंप्राहुःक्षेत्रज्ञइति तद्विदः॥१॥ अन्वयः गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. २४३ श्रीभगवान उवाच हे कौंतेय इदं शरीरं क्षेत्रं इति अभि धीयते यः एतत् वेत्ति तदिदः तं क्षेत्रज्ञः इति प्राहुः॥१॥ टीका. श्रीकृष्णभगवान कहते भये कि, हे कुंतिपुत्र! यह शरीर क्षे- त्र ऐसा कहा जाता है, श्री जो इसको जानता है उसको उ- सके जाननेवाले पुरुष क्षेत्रज्ञ ऐसा कहते हैं, अर्थात देह श्री प्रात्माके जाननेवाले देहको क्षेत्र श्री आत्मा जोइस देहका ज्ञाता है उसको क्षेत्रज्ञकहते हैं. ॥ १ ॥ मूलम. क्षेत्रज्ञंचापिमांविद्धिसर्वक्षेत्रेषुभारत ॥ क्षेत्रक्षे त्रज्ञयोनिंयत्तज्ज्ञानंमतंमम ॥२॥ अन्वयः हे भारत सर्वक्षेत्रेषु क्षेत्रनं च मां अपि विद्धि यत् क्षेत्रक्षे- त्रज्ञयोः ज्ञानं यत् तत् ज्ञानं मम मतं ॥ २॥ टीका. हेभारत!अर्जुन सर्व क्षेत्रोंमे क्षेत्रज्ञ जो आत्मा श्री मै जो पर- मात्मा यै दोनों रहते हैं ऐसा तुम जानौ. इसविपयमे प्रमाण श्रु. ति है. दोनुपर्णो सयुजौसखायौसमान वृक्षपरिपस्वजाते॥तयों रेकः पिप्पलंस्वादत्यननन्नयोऽभिचाकगीति अर्थ दो पक्षी सं- ' गसंग रहनेवाले परस्पर मित्र एकसरीखे वृक्षपर रहते हैं उनमें एक उस वृक्ष के स्वादुफल खाता है दुसरा फल खायविनाप्रका- श करता है अर्थात् ईश्वर पौ जीव यैदोनोंएकसंगरहते हैं.परस्प रसखा है.एकही देहमे रहते हैं उनमे जीव कर्मफलभोक्ता श्री ईश्वर साक्षिमात्र प्रकाशक है. अथवा दूसरा अर्थ कहते है ।। हेभारत सर्वक्षेत्रेमुक्षेत्रज्ञंचतत्क्षेत्रमपिमांविहिअर्थ हे अर्जुनत २४४ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. वक्षेत्रौंमे क्षेत्रज्ञऔ वह क्षेत्रभी मेरेहीको जानौ याने मेरे वैशरी रमै उनाका अंतर्यामी हौं ऐसा जानौं.जो इहां कोई शंका करै कि, जीवात्मा औ-परमात्मा न्यारे नहीं हैं, उसी परमात्माका एक भाग आत्मा है. अज्ञानसे जीव संज्ञक हुआ है औ ज्ञान प्राप्त होनेसे वही परमात्मामें मिलिकै परमात्माही होयगा.इ. स शंकाके निवारणके वास्ते वाक्य लिखते हैं कि, परमात्मा बद्ध औ मुक्त दोनौ आत्मस्वरूपोंसे न्यारा है ॥ द्वाविमौ पुरुषो लोकेक्षरश्चाक्षरएवच ॥क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षरउच्य ते ॥ उत्तमः पुरुपस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ योलोकत्रयमा " विश्यविभव्ययईश्वरः॥ यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपिचोत्त मः॥ अतोस्मिन्लोकेवेदेचप्रथितः पुरुषोत्तमः ॥इत्यादि वाक्यौं फरिके यहसिद्धहुआ कि, बद्ध मुक्त दोनौअवस्थाके जीवोंसे प- रमात्मान्यारा ओ सर्वोत्तम है ॥ योलोकत्रयमाविश्यविभर्त्य व्यय ईश्वर इस वाक्यसे अंतर्यामित्वभी सिद्ध भया. औ अंत. यामित्वप्रमाणमें श्रुतिभी हैं ॥ अस्यप्रथिवीशरीरंयः पृथिवीम तरोयमयतिसतमात्मांतर्याम्यमृतइत्यारभ्ययात्मनितिष्ठन्ना स्मनोंतरोयमात्मानवेद यस्यात्माशरीरंयमात्मनमंतरोयमयति सतआत्मांतर्याम्यमृतइत्याद्याः ॥औ इहाभी कहा है। ईश्वरःसर्व भूतानांहृदेशेर्जुनतिष्ठति ॥ नतदस्तिविनायत्स्यान्मयाभूतंच राचरं ॥ इत्यादि वाक्यौं करिके यह अर्थ सिद्ध हुआ कि, शरी र क्षेत्र औ प्रात्मा क्षेत्रज्ञ औ मै उन दोनौका अंतर्यामी हौं य- छ जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञका विवेकरूप जो ज्ञान सोई ज्ञानग्राह्य हे यह मेरा मत है. ॥ २ ॥ तत्क्षेत्रंयच्चयावयहिकारियतश्चयत् ॥ सच योयत्प्रभावश्चतत्समासेनमे शृणु ॥३॥ .
. गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. २४५ अन्वयः तत् क्षेत्रं यत् च यादृक् च यहिकारि च यतः च यत्- स्ति च तःक्षेत्रज्ञः यः च यत्प्रभावः अस्ति तत् समा- सेन मे शृणु ॥ ३॥ टीका. जो क्षेत्र कहा सो वह जो है श्री जैसा है औ जो वि. कारौं करिके युक्त है औ जिसवास्ते है औ जैसे स्वरूपयुक्त है सो औ वह क्षेत्रज्ञ जो है औ जैसे प्रभावौं करिके युक्त है सो सब संक्षेप करिके मेरेसे सुनौः ॥ ३ ॥ मूलम्, ऋपिभिर्वहुधागीतंछंदोभिर्विविधेःष्टथक ॥ व्र ह्मसूत्रपदैश्चैवहेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥४॥ अन्वयः ऋषिभिःबहुधा गीत विविधैःछंदोभिः ष्टयक् पृथक् गीत हेतुमद्भिः ब्रह्मसूत्रपदैः विनिश्चितैः एव गीतं ॥ ४ ॥ टीका. जो यह क्षेत्र औ क्षेत्रका ज्ञान है तो ज्ञान पराशरादिक ऋपियोंने अनेकप्रकारसे कहा है प्रीवेदानेभि क्षेत्र औक्षेत्रज्ञ- का स्वरुपज्ञान न्यारा न्यारा कहा है श्री ब्रह्मसूत्रके हेतुयुक्त पदौंफरिके निश्चय किया भया कहा है; परतु मै संक्षेपसे कहता हो सो सुनौ.॥ मूलम. महाभूतान्यहंकारोबुदिरव्यक्तमेवच ॥ इंद्रिया णिदशेकंचपंचचेंद्रियगोचराः ॥ ५॥ इच्छाहे ..
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. पःसुखंदुःखसंघातश्चेतनाधृतिः ॥ एतत्क्षेत्रंत मासेनसविकारमुदाढतं ॥६॥ अन्वयः ar महाभूतानि अहंकारः बुद्धिः च अव्यक्तं एव दश च एक इंद्रियाणि च पंच इंद्रियगोचराः ॥ ५ ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं अयं संघातः चेतना धृतिःभवति एतत् तविकारं क्षेत्रं समासेन उदाहृतं ॥ ६ ॥ टीका. महाभूत अहंकारबुद्धि औ अव्यक्तयै८ क्षेत्रजो शरीर तिसके आरंभके द्रव्य हैं पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु औ आकाश येपांच महाभूत एक अहंकार जो इन भूतोंका आदि है एक बुद्धि याने महत्तत्व औ एक अव्यक्त याने सूक्ष्मरूप प्रकृति ऐसे आठ अव विकार अर्थात् कार्य कहते है.श्रोत्र,त्वक,चक्षुः,जिव्हा औघ्राण यै पांच ज्ञानेंद्रिय वाक्पाणि पाद पायु उपस्थ यै पांच कमद्रिय औएक मन ऐसे एकादश ११ इंद्रिय औ शब्द, स्पर्श,रूप,रस, गंध यै पाच इंद्रियगोचर ये सोरह क्षेत्रविकार याने कार्य है ॥५॥औ इच्छा वेप सुख दुःख यै चार ४ जद्यपि इच्छा द्वेप सुख दुःरव यै आत्माके धर्म हैं तथापि क्षेत्रहीके संबंधते आ- त्मामे प्रयुक्त होते हैं इसबास्ते क्षेत्रविकारकरिके कहे गये जो य- ह अहाईत तत्वका समूह काहा सो चेतनके आधार अथवा चेतनका आधारहै प्रकृति श्रादि लैके पृथ्वीपर्यंत ८ द्रव्य श- रीरके आरंभका कारण हैं इंद्रियादिक इच्छा द्वेप सुख दुःख विकारयुक्तशरीर चेतनके सुरव दुःरव भोगनेका माधार हैं इसको क्षेत्र कहते हैं याने सरवादिकके उत्पनिका स्थान है इसवास्ते इ- सको क्षेत्र कहते हैं यह क्षेत्र मैने कार्यासहित संक्षेपसे कहा है.॥६ . गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. २४७ मूलम् आमानित्वमदंभित्वमहिंसाक्षांतिराजवं ॥ आ चार्योपासनंशौचंस्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥७॥ इं द्रियार्थेपुवैराग्यमनहंकारएवच ॥ जन्ममृत्युज राव्याधिदुःखदोपानुदर्शनं ॥ ८ ॥ असक्तिर. नभिष्वंगःपुत्रदारगृहादिपु ॥ नित्यंचसमचित्त स्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥९॥मयिचानन्ययोगे नभक्तिरव्यभिचारिणी ॥ विविक्तदेशसेवित्वम रतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥ अध्यात्मज्ञाननित्य त्वंतत्त्वज्ञानार्थदर्शनं ॥ एतज्ज्ञानमितिप्रोक्तम ज्ञानंयदतोऽन्यथा ॥११॥ अन्वयः प्रमानित्वं अदंभित्वं अहिंसाक्षांतिःआर्जवं आचार्यो- पासनं शौचं स्थैर्य आत्मविनिग्रहः॥७॥ इंद्रियार्थेषु वै- राग्यं च अनहंकारः एव जन्ममृत्युजराव्याधिदुःरवदो पाऽनुदर्शनं ॥ ८॥ असक्तिः पुत्रदारगृढादिषु अनभि- प्चंगः च इष्टाऽनिटोपपत्तिषु नित्यं समचिनत्व ॥ ९॥ च मयि अनन्ययोगेन अव्यभिचारिणी भक्तिःविविक्त देशसेवित्वं जनसंसदि अरतिः॥ १. ॥ अध्यात्मज्ञान नित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनं इति एतत् ज्ञानं प्रोक्तं यत् अतः अन्यथा तत् आज्ञानं ॥ ॥१३॥ टीका. अव क्षेत्र कार्यों के विपे पात्मज्ञान साधननिमित्त स्नेयोग्य गुण कहते हैं. अमानित्व याने गुणाधिक पुरुषसे मान गृहण क-
२१८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
न चाहै अदंभित्व याने आपको धर्मिष्ठ कहानेके वास्ते धर्मका-
र्यको न देखाव जैसे कि, मै दान पूजन इत्यादिक करौंगा तो
लोगमेरेको दानीभक्त ऐसा कहेंगे.अहिंसा जो दूसरेको पीडाका-
रककर्म न करना सो क्षांतिः याने समर्थ व्हैके दूसरेके अपराध
सहन करना.आर्जवं याने सर्वसे सीधे रहना. आचार्योपासनं
अर्थात् मन वाक्य औ शरीरकारके गुरूकी सेवा करना. शौच
दोप्रकारका है वाह्य श्री अभ्यंतर बाह्य जल मृत्तिकादिकते अ-
भ्यंतर निष्कपटपनाते ईश्वरका स्मरण स्थैर्य याने आध्यत्म.
शास्त्र करिके कहेभये अाम निश्चलता आत्मविनिग्रह अर्थात्
प्रात्मस्वरूपके सेवाय और विषयोले मनको निवारणकरना॥७
इंद्रियार्थेषुवैराग्यं याने इंद्रियों के विषयोंके गुणवुद्धि नकरना.
अनहंकार याने अनात्मा जो यह देह उसमे पात्माभिमान न
करना अर्थात् देहसंबंधी सर्व स्त्री पुत्र धनादिकोंमे हमारे हैं
ऐसा अभिमान न करना. जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोपानुद-
र्शनं याने जन्म होनेसे शरीर भया तब मृत्यु वृद्धावस्था रोग-
ये होतेही हैं औ अनिवार्य हैं ऐसा दुःखरूप दोपका देखना
॥८॥असक्ति याने आत्माके सेवाय दूसरे पदार्थमे आसक्त
न होना. पुत्र दारगृहादिषु अनभिष्वंगः याने इन पुत्रादिकौंके
नाश होनेसे हमभी मरेंगे एसी बुद्धि न करना आपका इच्छित
अथवा अनिच्छित अर्थात् प्रिय भी अप्रियके प्राप्त होनेसे सम-
चित्त रहना ॥ ९॥ औ मेरेमे अनन्य अखंडभक्ति राखना औ
एकांतमे बैठना लोकोंमे बैठनेसे नाराज रहना ॥१०॥ अध्या-
स्मज्ञानमे नित्य निष्ठा रखना भौ तत्वज्ञानका प्रयोजन दे-
रखा करना ऐसे ये आत्मज्ञानके उपयोगी गुण कहे इनका स-
मूह यही ज्ञान है औ इन गुणों के सेवाय और गुण पात्मज्ञा-
नके विरोधी हैं इसवास्ते उनका समूह भाज्ञान है.॥ ११ ॥
गोतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. २१९ मूलम्. ज्ञेयंयत्तत्प्रवक्ष्यामियज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥ अ नादिमत्परंब्रह्मनसत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥ अन्वयः यत् ज्ञेयं तत् प्रवक्ष्यामि यत् ज्ञात्वा अमृतं अश्नुते । किंभूतं अनादि मत्परं ब्रह्म तत् सत् न उच्यते न असत् उच्यते ॥ १२ ॥ टीका. जो प्रथम कहा कि,इस क्षेत्रके जाननेवालेको क्षेत्रज्ञ कहते हैं, सो उस क्षेत्रका ज्ञातृत्व याने जानपन खुलासा कहते हैं. ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि इत्यादि करिके अमानित्व इत्यादि साध- नौं करिके जो आत्मस्वरुप जानने योग्य है सो मै कहता हौं. जिसको जानिके जरामरणादिक प्राकृत धर्मोंसे रहित अमृत जो प्रात्मस्वरूप उसको प्राप्त होता है, सो आत्मस्वरूप कैसा है कि,अनादि जिसका आदि याने जन्म नहीं है जब जन्म नहीं तौ मरणभी अर्थात् नही.दहां श्रुतिभीप्रमाणहै ॥ नजायतेम्रियते वाविपश्चित् । तथा मत्परं याने मै हौं पर उत्कृष्ट अंतर्यामी जि- सका ऐसा वह आत्मा है इहां. प्रमाणाइतस्त्वन्यां प्रकृतिविद्धि मेपरांजीवभूतामिति॥इतकरिकै यह कहा कि, वह आत्मा मेरा शरीर है इस विषयमेभी श्रुतिप्रमाणलिखते हैं ।यआत्मनि ति. छन्नात्मनोतरोयमात्मानवेद ॥ यस्यात्माशरीरंभात्मानमंत रोयमयतीति । तथा ब्रह्म याने वृहत्त्वगुणयुक्त शरीरसे न्यारा. अर्थात् क्षेत्रज्ञ जीवात्माकोब्रह्म कहनेमे प्रमाण प्रथमही लिखा है । सगुणानसमतीत्यैतान्ब्रह्मभूयायकल्पते॥ ऐसे शुद्धस्वरुप जीवात्माहीको ब्रह्म कहा है इसकाभी कोई अर्थ करते हैं कि, ३२ . २५० गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. ब्रह्मभूयायकल्पते अर्थात् जैसे घटाकाश घट नष्ट होनेसे महदा-. काशमे मिलताहै ऐसे यहभी परमात्मामे मिलनेसे ब्रह्म कहता है.तहां समुझना चाहिये कि,उन विद्वद्रूपणौंकी बुद्दिमे कफवा- युकी अधिकत्तासे मैल चढगया है इसवास्ते उनको पूर्वापरका विचार नहीं रहता है क्योंकि, इसीमे प्रमाण हैं। ब्रह्मणोहिपत्ति ग्वाहममृतस्याव्ययस्यच॥ ब्रह्मभूतःप्रसन्नात्मानशोचतिगकांक्ष- ति॥समावर्षेपभूतेषुमद्भक्तिलभतेपरां ॥ इन वाक्योंमे यह खु- लासा दीखता है कि, ब्रह्म हैके मेरी परमभक्तिको पावता है जो एकमे मिलि जायगा उसको भक्ति मिलनेका संभव कैसे होयगा.इतवास्ते इहा निश्चय यही है कि, ब्रह्मप्रकतिरहित शुद्ध जीवात्माही इस प्रकरणमेकहा औरभी कारण दीखता है कि, यह अध्याय भी प्रकृति पुरुप विवेकयोगनाम है इसवास्ते इहां शुद्ध जीवात्माहीका नाम ब्रह्म कहना चाहिये, तथा सो प्रत्य- गात्मा न सत् है न असत् है याने स्थूल सूक्ष्म दोनो अवस्थोंसे रहित है अर्थात् कार्य औ कारण इन दोनोसे रहित है, कार्यअवस्थामे देवादिक नाम रूप योग्य होता है; जब सत् कहते हैं औ कारण अवस्थामे नाम रूपके योग्य नही अति- सूक्ष्म हैं तव असत् कहते हैं ये दोनों अवस्था कर्म रूप अविद्यारूत हैं औ शुद्धस्वरूपके नही इसवास्ते वह सत् औ असत् रहित है. ॥ १२ ॥ मूलम्. सर्वतःपाणिपादतत्सर्वतोक्षिशिरोमुखं ॥सर्व तःश्रुतिमल्लोकेसर्वमानृत्यतिष्ठति ॥ १६ ॥ अन्वयः तत् सर्वतः पाणिपादं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखं सर्वतःश्रुति मत् सर्च भावृत्य तिष्ठति ।। १३॥ .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. २५१ टीका. सो शुद्ध रूप जीवात्मा सर्व और हात पाचौं करिके युक्त है याने उसके सर्व और हाथ पांव है अर्थात् ल ओरसे हाथ पावों का कार्य कर सकता है औतैसाही सर्व ओरसे नत्र,मस्त- के श्री मुखौंकारके युक्त है औ वैसाही सर्व और उसके कान अर्थात् सर्व ओरसे नेत्रादिकौंका काम कर सकता है जैसे कि, परमात्माका वर्णन किया है कि ॥ अपाणिपादोजवनोगृही तापश्यत्यचक्षुःसशृणोत्यकर्णः इति। अर्थ वह परमात्मा हाथ विना गृहण करता है पायविनावडे वेगसे चलता है, नेत्रविना देखता है, कानविना सुनता है, ऐसेही जीवात्माभी मुक्तदशामे परमात्माके सदृश होता है इहां प्रमाण श्रुति औगीताजीके वाक्य है ॥तथाविद्वानपुण्यपाविध्यनिरंजनः परमंसाम्यमुपै तिश्रुतिः ॥ औ इहामी अगाडी कहेंगे । इदंज्ञानमुपाश्रित्यमम साधर्म्यमागतः इति ॥ जब प्रकृतिविमुक्त शुद्ध व्हैके परमात्मा- की समताको प्राप्त भया तब सर्व औरहाथइत्यादिक होनेमे क्या संदेह है औ लोकमे जो वस्तुमात्र है उसका व्यापक व्हेके स्थित होता है इहां प्रसिद्ध देखने पाता है कि, इंद्रादिक दे- बता प्रतियुक्तभी जीव हैं ऐतेही हनुमान औं भैरव इत्यादि- कभी जीव है इनका आराधन एकही समयमे पृथ्वी पर अनेक ठेकाने होता है सो वै सर्वका कियाहुआ आराधन स्वीकार करिके सर्वको सिद्धी देते हैं औ केतनेक पिशाचों मेंभीजबरहैं तौं वै एकही समयमे अनेक जगह व्यापक होते हैं औरभी केत.. नेक देहकोभी हाय, पाव, मुख, नेत्र इत्यादिक सर्व ओरको होते है, जैसे दुमही इत्यादिक सर्प बहुत नेत्रोंकी मनी इनमे रहने सेसर्व ओरको नेत्रादिक होते ही है इसमे शंका क्या है!॥१३॥ , .
अन्वयः . २५२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका, मूलम. सबैद्रियगणाभासंसद्रियविवर्जितम् ॥ अस कंसर्वऋञ्चैवनिर्गुणंगुणभोक्तृच ॥ १४ ॥ सर्वेद्रियगुणाभासं सर्वंद्रियविवर्जितं असक्तं च सर्वभूत एव निर्गुणं च गुणभोक्त अस्ति ॥ १४ ॥ टीका. सर्वइंद्रियोंकी वृत्तिकारकै है आभास जिसका अर्थात् सर्व इंद्रियोंकी वृत्तीकरिकै विषयौंको जाननेको समर्थ है औ स्वतः स्वभावसे सर्व इंद्रियोंकरिके रहित है अर्थात् इंद्रियोंकी वृत्ति- विनाभी आपही सर्व जानता है औ आसक्त है याने स्वभाव सेही देवादिदेहोंके संगसे रहित है औ सर्वभूत याने देवादिक सर्व देहाँके भरण पोपण करने में समर्थ है निर्गुण याने सत्वादि गुणरहित है औ गुणभोक्त याने सत्वादिगुणोंको भोगि सकता मूलम. वहिरंतश्चभूतानामचरंचरमेवच ॥ सूक्ष्मत्वात दविज्ञेयंदूरस्थंचांतिकेचतत् ॥ १५॥ तत् आत्मतत्वं भूतानो बहिः च अंतः वर्तते च अचरं चरं एव भवति सूक्ष्मत्वात् तत् अविज्ञेयं तत् दूरस्थं च अंतिके अपि अस्ति ॥ १५ ॥ टीका. वह आत्मतत्व मुक्तदशामे तो भूतोंके बाहेर ओ वृद्धावस्था- मे अंदर वर्तमान होता है औ वह स्वतः अवर है तीभी देहयोग से चर होता है सूक्ष्म है इसवास्ते जाननेमे मही आता है ऐ- अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. २५३ वह अज्ञानियोंके दूर है तथा ज्ञानियोंको नजीक भी है. ॥१५॥ मूलम् अविभक्तंचभूतेपविभक्तमिवचस्थितं ॥ भूत भर्तृचतज्ज्ञेयंगसिष्णप्रभविष्णुच ॥ १६ ॥ अन्वयः तत् आत्मतत्वं भूतप अविभक्तं च विभक्तं इव स्थितं अस्ति च तत् भूतभर्तृ ज्ञेयं च असिष्णु ज्ञेयं च प्रभवि- ष्णुज्ञेयं ॥ १६ ॥ टीका. वह आत्मतत्व प्रथिव्यादि भूतविकार देवादिक शरीरौंमे अविभक्त याने एकरस अर्थात् देवशरीरसे लैके पिपीलिकापर्य त भूतप्राणीमे एक समान है यह नहीं कि,देवारी मे देवाका- र पिपीलिकादिकौमे पिपीलिकादिक प्राकार होता है क्यों कि. वह देहसे न्यारा सदा एकरस है परंतु अज्ञानिलोगोंको दे- वादिशरीरोंमे देवादिदारीरसदृश दीखता है औ वह देवादिक भूत ताके पोपण है औ अन्नादिक भूतोका भक्षक याने शरीर रूपसे आहार करनेवाले है औ उसी अन्नादिक भूतविकारसे उत्पन्न कारकभी है ॥ १६ ॥ ज्योतिपामपितज्ज्योतिस्तमसःपरमुच्यते ॥ ज्ञानज्ञेयंज्ञानगम्यंदिसर्वस्यधिष्ठितं ॥ १७॥ अन्वयः तत् ज्योतिपां अपि ज्योतिः तमसः परं उच्यते च ज्ञा नं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं सर्वस्य हृदिऽधिष्ठितं ॥ १७ ॥ टीका.
२५४
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
वह आत्मतत्व सूर्य दीपादिक ज्योतियौंकाभी प्रकाश
प्रौ
तुम जो सूक्ष्मकारणरूप प्रकृति उसतेभी परे है याने भिन्न
है औ ज्ञानरूप है तथा जानने योग्य है नौ ज्ञानसे प्राप्त कैसक-
ता है औ सर्वदेवादिकारी के हृदयमे स्थित है. ॥ १७ ॥
मूलम.
इतिक्षेत्रतथाज्ञानंज्ञेयंचोक्तंसमासतः ॥ मद्भ
क्तएतद्विज्ञायमद्भावायोपपद्यते ॥१८॥
अन्वयः
इति क्षेत्र तथा ज्ञानं च ज्ञेयं समासतः उक्तं मद्भक्तः ए-
तत् विज्ञाय मदावाय उपपद्यते ॥ १८ ॥
टीका.
हेअर्जुन!महाभूतान्यहंकार इहांसे लैके संघातश्चेतनाधृति-
ऐसे इहांपर्यंत क्षेत्रतत्व संक्षेपसे कहा औ अमानित्वसे लेके
तत्वज्ञानार्थदर्शनं इहांतक ज्ञानसाधन कहा औ अनादिमत्परं
ब्रह्मते लैके रदिसर्वस्यधिष्ठितं इहांतक ज्ञेय याने जाननेयोग्य
प्रात्मयाथात्म्य कहा मेराभक्त यह जानिके याने क्षेत्रस्वरूप
क्षेत्रले भिन्न आत्मस्वरूप औ उसके प्राप्तिहोनेका उपाय जा-
निके मेरे भाव याने असंसारी स्वभावको प्राप्त होय अर्थात्
मोक्षप्राप्तिके योग्य होय. ॥ १८ ॥
मूलम.
प्रकृतिपुरुपंचैववियनादिउभावपि ॥ विका
रांश्चगुणांश्चैवविद्धिप्रकृतिसंभवान् ॥ १९॥
अन्वयः
प्रकृति च पुरुपं उभी अपि अनादि विद्धि विकारान
च गुणान् एव प्रकृतिसंभवान् विद्धि ॥ १९ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका,
टीका.
अब अत्यंत न्यारे न्यारे स्वभावयुक्त जो प्रकृतिपुरुष उनके
संसर्ग याने मिलापका अनादिपना औ उन दोनों संसर्गियोंका
कार्यभेद जोसंसर्गका हेतु है सो कहते हैं. जैसे कि, प्रकृति औ पु-
रुप ये दोनौ परस्पर मिलापी औ अनादी हैं ऐता जानो औ
बंधनकारणभूत जे इच्छादेशदिक विकार तथा मोक्षकार णभूत
अमानित्वादि गुण यै प्रकृतिसे उत्पन्न हैं ऐसा जानौ अर्थात्
पुरुपको मिलीभई यह प्रकृति आपके इच्छा द्वेपादिक विकारों
करिके बंधन करनेवाली होती है औ वही अमानित्वादिआप
के गुणौकरिके पुरुषके मोक्षकी कारण होती है ॥ १९ ॥
मूलम.
कार्यकारणकर्तृत्वहेतुःकृतिरुच्यते ॥ पुरुपः
सुखदुःखानाभाक्तृत्वेहेतुरुच्यते ॥ २० ॥
अन्वयः
कार्यकारणकर्तत्व हेतुः प्रकृतिः उच्यते सुखदुःखाना
भोक्तृत्वे हेतुः पुरुषः उच्यते ॥ २० ॥
टीका.
मिले भये जो प्रकृतिपुरुष हैं उनका कार्यभेद कहते हैं.जैसे
कि, कार्य शरीर औ कारण मनयुक्त इंद्रियां इनके क्रिया क.
रावनमे हेतु पुरुषाधिष्ठित प्रकृति है अर्थात भोगसाधन क्रिया
पुरुषकरिके अधिष्ठित क्षेत्राकार परिणामको प्राप्त भई जो
प्रकृति उसहोके आश्रित है औ सुखदुःखोंके भोक्तृत्वमे का-
रण पुरुप है याने प्रकृतिके संसर्गसे सुख औ दुःखके अनुभ-
वका आश्रय पुरुष है ऐसे परस्पर मिलेभये प्ररुतिपुरुपौंका
कार्यभेद कहा. ॥ २०॥
.
गीतावाक्वार्थबोधिनी भाषाटीका.
मूलम्.
पुरुपःप्रकृतिस्थोहि क्तेप्रकृतिजान्गुणान् ॥
कारणंगुणसंगोऽस्यसदसद्योनिजन्मसु॥२१॥
अन्वयः
हि यस्मात् पुरुपः प्रकृतिस्थितः सन् प्रकृतिजान् गु-
णान् भुंक्त तस्मात् अस्य सदसद्योनिजन्मसु गुणसंगः
कारणं भवति ॥ २१ ॥
टीका.
जिसवास्ते कि पुरुपप्रतिमे स्थित है के प्रकृतिजन्य गु-
ण याने प्रकृतिके मत्वादिक गुणों के कार्य जो सुखदुःखादिक
उनको भोगता है इसीवास्ते इसके ऊँच औ नीच योनिमे
जन्म लेनेमे उन गुणोंका संगही कारण है अर्थात् सत्वादि गु-
णों की आसक्तीसे पुण्यपापरूप कर्म करता है उनसे फिरि ऊँच
नीच योनिमे जन्मता है जैसे कि, पुण्यसे देवयोनि इत्यादिक
भौ पापकर्मस पशु इत्यादिकमे जन्मिके सुखदुःखादिकारक
कर्म करता है फिरिभी जन्मता है ऐसे जबतक अमानित्वादि
क गुणयुक्त नहीं होता है तबतक संसरता है. ॥ २१ ॥
मूलम.
उपद्रष्टाऽनुमंताचभर्तीभोक्तामहेश्वरः॥परमा
मंतिचाप्युक्तोदेहेस्मिन्पुरुपःपरः ।। ५२ ॥
अन्वयः
अस्मिन् देहे वर्तमानः पुरुपः अस्य देहस्य उपद्रष्टा च
अनुमंता च भर्ता च भोक्ता च महेश्वरः अस्ति अतः
सः प्रात्मा अस्मात् देहात् परः अपि तथापि प्रज्ञैः प-
रं आत्मा इति अर्थात् देहः इतिउक्तः ॥ २२ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. २५७ टीका. इस देहमे वर्तमान् पुरुप इस देहका देखनेवाला औ अ- नुमानकरनेवाला औ भरण पोपण करनेवाला औ भोगनेवा- इस देहका महेश्वर है इन्ही कारणों से यह जीवात्मा इस देहसे पर याने न्यारा अर्थात् देहसे दूसरा है तौभी,अज्ञा: नी पुरुषों करिके केवल देह याने यही देह है, अर्थात् देह औ श्रात्मा एकही है, ऐसा कहा है. ॥ २२ ॥ ला औ अन्वयः यएवंवेत्तिपुरुपंप्रकृतिंचगुणैःसह सर्वथावर्तमा- नोऽपिनसभूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ यः एवं पुरुपं च गुणैः सह प्रकृति वेति सः सर्वथा वर्तमानः भूयः न अभिजायते ॥ २३ ॥ टीका. जो ऐसे प्रकारसे पुरुषको जानता है औ स्वकीय सत्वा- दि गुणों करिके सहित प्रकृतिको जानता है, सो सर्व तरहसे संसारमे वर्तमान है तौभी, फिरि अन्मता नही. ।। २३ ।। मूलम्. ध्यानेनात्मनिपश्यंतिकेचिदात्मानमात्मना । अन्येसांख्येनयोगेनकर्मयोगेनचापरे ॥२४ ॥ अन्यत्वेवमजानंतःश्रुत्वाऽन्येभ्यउपासते ॥ ते ऽपिचातितरत्येवमृत्युंश्रुतिपरायणाः ॥२५॥ अन्वयः केचित निष्पन्नयोगाः आत्मनि स्थित आत्मानं श्रात्म-
.
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका.
ना ध्यानेन पश्यति अन्ये अनिष्पन्नयोगाः सांख्येन
योगेन पश्यति च अपरे अनिष्पन्नयोगज्ञानाः कर्मयो-
गेन पश्यति ॥ २४ ॥तु अन्ये एवं अजानंतः अन्ये.
भ्यः श्रुत्वा कर्मयोगादिभिः उपासते च ये श्रुतिपराय-
णाः ते अपि मृत्यं अतितरंति एव ॥ २५ ॥
टीका.
केतने
पुरुप
जिनको योग प्राप्त भया है, वै योगी देहमे
स्थित आत्माको मनसे ध्यान याने भक्तियोग करिके देखते
हैं, औ दूसरे जिनको योग नही प्राप्त भयाहै वै सारख्ययोग या-
ने ज्ञानयोग करिके योगके योग्य मनको करिके प्रात्माको
देखते हैं, औ दूसरे जिनको योग औ ज्ञानभी नहीं प्राप्त भया
है,फेवल प्राप्तिकी इच्छा मात्र करिके कर्मयोग करते हैं तब वै
उस कर्मयोगहीके अंतर्गत ज्ञानकरिके मनको योगके योग्य-
करिके उससे आत्माको देखते हैं ॥ २४ ॥ ौ औरभी दूसरे
ऐसेकर्मयोगकोभी नहीं जानते है वै और ज्ञानियोंसे मुनिके
कर्मयोगादिक करिकेपूर्ववत् श्रात्माकी उपासना करते हैं,
याने कर्मसे सांख्य सांरव्यसे योग प्राप्त व्हेके उस योगवलसे
आत्माको देवते नौ जो केवल श्रवणमात्रमे श्रद्धा रखते
हैं वैभी मृत्युको उल्लंघन करते है, याने आत्मदर्शन पायके
मुक्त होते हैं. ॥ २५ ॥ मूलम.
यावत्संजायतेकिंचित्मत्वंस्थावरजंगमं ॥ क्षे
त्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धिभरतर्षभ ॥२६॥
अन्वयः
पावत् स्थावरजंगमं यत्किंचित् सत्वं संजायते हेभर-
सर्पभ तत सर्व क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् विहि ॥ २६ ॥
गीताचाक्यावोधिनी भापाटीका, २५९ टीका. नेतना स्थावर पी जंगम रूपकरिके जो कुछ सत्व उत्प- ता है हे, अर्जुन! सो सर्व क्षेत्र क्षेत्रज्ञ याने जीव औ प्रक- । संयोगसे होता है, ऐसा जानौ. ॥ २६ ॥ समंसर्वेषुभूतेपुतिष्टंतपरमेश्वरं । विनश्यत्स्व विनश्यतयःपश्यतिसपश्यति ॥ २७ ।। अन्वयः यः सर्वेषु भूतेषु समं तिष्ठतं परमेश्वर तेषु विनश्यत्सु अविनश्यंतं पश्यति सः पश्यति ॥ २७ ॥ टीका. जो पुरुप सर्व भूतोंमे समस्थित औ परमेश्वर याने मन ई- यादिकों का केवल ईश्वर अथवा पर जो परमात्मा सोहैं.ई. घर जिसका ऐसे आत्माको इंद्रादिभूतोंके विनाश होनेसेभी. वेनाशरहित देखता है, सोई देखता है. ॥ २७ ॥ मूलम. समंपश्यहिसर्वत्रसमवस्थितमीश्वरं । नहिन स्त्यात्मनात्मानंततोयातिपरांगति ॥२८॥ । अन्वयः सर्वत्र समवस्थित ईश्वरं समं पश्यन सन हि प्रात्म- ना आत्मानं न हिनस्ति ततः परां गतिं याति ॥ ५८॥ टीका, सर्वत्र देवादि विपमाकार शरीरों मे स्थित जो मनइंद्रियादि- फौका ईश्वर आत्मा तिसको सम देखता भया जिसवारते कि, बुद्धिपूर्वक प्रात्माको संसारमे नहि पटकता है इसीवास्ते पर
२६०
गीतावाक्यार्यबोधिनी भाषाटीका,
गतीको याने आत्मस्वरूपको प्राप्त होता है. ॥ २८ ॥
मूलम्
प्रकृत्यैवचकर्माणिक्रियमाणानिसर्वशः ॥ यः
पश्यतितथात्मानमकर्तारंसपश्यति ॥ २९ ॥
अन्वयः
यः सर्वशः कर्माणि प्रत्या एव क्रियमाणानि इति
पश्यति च तथा आत्मानं अकर्तारं पश्यति सः एव
पश्यति ॥ २९ ॥
टीका.
जो सर्वकर्मीको प्रकृतिहीके किये भये जानता है,याने देहा-
दिरूप परिणामको प्राप्तभई प्रकृतिही करती है ऐसा देखता है,
औ प्रात्माको अकर्ता देखता है, सोई देखताहै अर्थात् और
नहीं देखता है, याने आत्मस्वरूप देखता है. ॥ २९ ॥
मूलम्.
यदाभूतप्टथग्भावमेकस्थमनुश्यति ॥ अ
तएवचविस्तारंब्रह्मसंपद्यतेतदा ॥ ३० ॥
अन्वयः
यदा भूतप्टयग्भावं एकस्थं अनुपश्यति च अतः एव
विस्तारं पश्यति तदा ब्रह्म संपद्यते ॥ ३ ॥
टीका.
जब प्रकृतिपुरुष तत्वयात्मक सर्व देवादि भूतौंका देव-
'त्व, मनुष्यत्व, इस्वत्व, दीर्घत्व, कशत्व, स्थूलत्व, इत्यादिक
प्रथऽभावीको एकप्रतिहीमे स्थित देखता है औ इसीप्रकृतिसे
पुत्रपौत्रादि रूप विस्तार देखता है, तब शुद्ध प्रात्मस्वरूपको
प्राप्त होता है. ॥ ३० ॥
M
गीतावास्यायोधिनी भाराटीका.
मूलम्.
अनादित्वानिर्गणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः ॥
शरीरस्थापिकातयनकरोतिनलिप्यते ॥ ३१ ॥
अन्ययः
हे कौंतेय अयं परमात्मा अनादित्वात अव्ययः निर्ग-
णत्वात् शरीरस्थः अपि न करोति न लिप्यते ॥३१॥
टीका.
हेकुंतीपुत्र! यह परमात्मा याने देहादिकारो पर, अर्थात्
अन्य भारमा अनादि है इसवास्ते अविनाशी है औ निर्गुण
याने सत्वादिगुणरहित है इसते न करता है, न फलौंकार लि.
त होता है.॥३१॥
मूलम.
यथासर्वतगंसोक्षम्यादाकाशंनोपलिप्यते ॥ स
वत्रावस्थितोदेहेतथात्मानोपलिप्यते ॥ ३२॥
अन्वयः
यथा सर्वगतं आकाशं सौम्यात् सर्वस्वभावः न उप-
लिप्यते तथा सर्वत्र देहे अवस्थितः प्रात्मा देहस्वभा-
वैः नउपलिप्यते ॥ ३२॥
टीका.
जैसे सर्व वस्तुमे प्राप्त भयाहुमा आकाश सूक्ष्मपणेसे
सर्वभूतोंके स्वभादौ करिके लिप्त नही होता है, तैसेही सर्वत्र
देवादिकदेहमे स्थित मात्मा सूक्ष्मत्वसे सर्व देहोंके स्वभावों
करिके लिप्त नहीं होता है. ॥ ३२ ॥
मूलम.
यथाप्रकाशयत्येक कृत्स्नंलोकमिमंरविः ।। क्षेत्रं
क्षेत्रीतथाकृत्स्नंप्रकाशयतिभारत ॥३३॥
२१२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. अन्वयः . हेभारत यथा एकः रविः इमं कृत्स्नं लोकं प्रकाशयति तथा क्षेत्री कृत्स्नं क्षेत्रं प्रकाशयति ॥ ३३ ॥ टीका. .हे अर्जुन! जैसे एक सूर्य आपके प्रकाशकारके इस सर्व लो- कको प्रकाशित करता है,तैसेही क्षेत्री याने आत्मा इस सर्व क्षेत्रं पाने सर्व शरीरको आपने ज्ञानकरिके प्रकाशित करता है.॥३३॥ मूलम्. क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमंतरंज्ञानचक्षुषा ॥ भूतप्र कृतिमोक्षचयेविदुर्योतितेपरम् ॥३४॥ अन्वयः ये क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः एवं अंतरं ज्ञानचक्षुषा पश्यंति च भूतप्रकृतिमोक्षं विदुः ते परं यांति ॥ ३४ ॥ टीका, जे कोई पुरुष क्षेत्र औ क्षेत्रज्ञका ऐसा अंतर ज्ञानदृष्टिक- रिके देखते हैं, औ भूतप्रकृतिका मोक्ष जानते हैं; वै पर जो शुद्ध आत्मस्वरूप उसको प्राप्त होते हैं. ॥ ३४ ॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिपुरुपवि वेकयोगोनामत्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकतायां श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थवोधिनीभापाटीकायां त्रयोदशो ऽध्यायः ॥ १३॥ .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भषाटीका. २६३ मूलम. श्रीभगवानुवाच ॥ परंभूयःप्रवक्ष्यामिज्ञानानां ज्ञानमुत्तमं । यज्ज्ञात्वामुनयःसर्वेपरांसिद्धिमितो गताः॥१॥इदंज्ञानमुपाश्रित्यममसाधर्म्यमाग ताः॥ सर्गेऽपिनोपजायतेप्रलयेनव्यथंतिच ॥२॥ अन्वयः श्रीभगवान उवाच अहं ज्ञानानां उत्तम परं ज्ञानं भूयः प्र. वक्ष्यामि यत् ज्ञानं ज्ञात्वा सर्वेमनुयः इतःपरां सिद्धिं ग- ताः ॥१॥ ते मुनयः इदं ज्ञानं उपाश्रित्य मम साधर्म्य आगताः संतः सगै अपिन उपजायंतं च प्रलयेऽपिन- व्य थंति ॥ २॥ टीका. तेरहे अध्यायमे यह कहाकि, परस्पर आश्रित भयेहुये प्रक- ति औ पुरुषका स्वरूपनिश्चय जानिके भगवद्भक्ति करिके प्राप्त भये अमानित्वादिगुणोंकरिके बंधनसे छूटते है तहाँ कहाकि, धनका कारण सत्वादिकगुणमयसुखादिकोंकी भासक्ती है ॥ कारणंगणसंगोस्यसदसद्योनिजन्मसु॥इसकरिके अब चौदहेमे जैते गुणधन के कारण होते हैं सो श्री गुणों से मुक्त होनेका प्र- कार कहेंगे॥ श्रीकृष्णभगवान कहतेभये कि, मै ज्ञानौंमे उत्तम पूर्वोक्तज्ञानतेदूसराऔप्रकृतिपुरुषकेहीअंतर्गत सत्वादिगुणवि पयिकज्ञान फिरिभी कहता हौं जिस ज्ञानको जानिके सर्व मुनी जन संसारसे पर सिद्धि जो मोक्ष उस मोक्षको प्राप्त भये है॥१. अब मोक्ष प्राप्त भयौंका स्वरूप कहते हैं, जो अगाडी कहाँगा इसी ज्ञानका वै मुनि अनुष्ठान करिके याने इसका अनुसंधानक रिके मेरे साधर्म्यको अर्थात् मेरे सा रूप औ सुरखको प्राप्त
२६४
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका.
भये हैं, वैउत्पत्तिकालमे जन्मतेभी नही औ प्रलमकालमे व्य-
थाकोभी नहीं प्राप्त होते हैं, याने लयमे आते नहीं. ॥ २ ॥
मूलम्.
ममयोनिर्महद्ब्रह्मतस्मिन्गर्भदधाम्यहं ॥ संभ
वःसर्वभूतानांततोभवतिभारत ॥३॥
अन्वयः
मम मदीयः योनिः मह ब्रह्म अस्ति अहं तस्मिन् गर्भद-
धामि हे भारत ततः सर्वभूतानां संभवः भवति ॥ ३ ॥
टीका.
अब यह कहते हैं कि, जो प्रकृतिपुरुषके योगसे भूतप्राणी.
मात्रकी उत्पत्ति है वहभी मेरेही स्वाधीन है.जैसेकि,मेरे गर्भ-
धारण करनेका स्थान जो महद्ब्रह्म याने प्रकृति उसमे मै चेत-
नरूप याने जीवरूप गर्भधारण करता हौ.हे अर्जुन!उसीसे स-
र्वभूतप्राणीमात्रकी उत्पत्ति होति है. ॥ ३ ॥
मूलम्.
सर्वयोनिपकौंतेयमूर्तयःसंभवंतियाः ॥ तासां
ब्रह्ममहद्योनिरहवीजप्रदापिता ॥४॥
प्रन्वयः
हेकौंतेय सर्वयोनिपु याः मूर्तयः संभवंति तासां ब्रह्मम
हत् योनिः बीजप्रदः पिता अहं अस्मि ॥ ४ ॥
टीका.
हे कुंतीपुत्र!सर्व देव,मनुष्य,पशु, पक्षी औ कीट इत्यादिक
योनियोंमे जो मूर्ती उत्पन्न होती हैं उनका उत्पत्तिकारण प्र-
कति है श्री बीज जो चेतनवर्ग जीव उसका धारण, पालन क-
रनेवाला मै ही. ॥४॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, मूलम्. सत्त्वरजस्तमइतिगुणाःप्रकृतिसंभवाः ॥ निब नंतिमहाबाहोदेहेदेहिनमव्ययं ॥ ५॥ अन्वयः हे महाबाहो सत्वं रजः तमः इति प्रतिसंभवाः गुणाः देहे अव्ययं देहिनं निवघ्नति ॥ ५ ॥ टीका. हे अर्जुन! सत्व, रज औ तम यै प्रकृतिजन्य गुण देहके विपे रहे भये जीवको बंधन प्राप्त करते हैं औ श्राप स्वरूपसे तो वह जीव अविनाशी है. ॥ ५॥ मूलम. तंत्रसत्त्वंनिर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयं । सुखसं गेनबध्नातिज्ञानसंगेनचानघ ॥६॥ अन्वयः हे अनघ तत्र निर्मलत्वात् सत्वं प्रकाशकं अनामयं श्र- स्ति तत् सुखसंगेन च ज्ञानसंगेन याति ॥ ६ ॥ टीका. दे अनघ याने हेनिप्पाप अर्जुन! तहां उन तीनौगुणोंमे . सत्वगुण मलरहित है, इसवास्ते प्रकाशक है, याने विहित अ- र्थात् करनेयोग्यकार्यका देखनेवाला भी व्याधिरहित है सो सुरव औ ज्ञानकी आसक्तीमे बंधता है;याने सुरख भी ज्ञान उत्प- नि करता है उसते फिरि देवादिशरीर प्राप्त होते हैं. ॥ ६ ॥ मूलम रजोरागात्मकंविधिकृष्णासंगसमन्वं ॥तनिय .
२६६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ध्नातिकौंतेयकर्मसंगेनदेहिनं ॥७॥ अन्वयः हेकौंतेय तृष्णासंगसमुद्भवं रजः रागात्मकं विद्धि तत् कर्मसंगेन देहिनं निवाति ॥७॥ टीका. देकुंतीपुत्र! तृण्मा औ संगकी है उत्पत्ति जिसते ऐसारजोगु- णरागका कारण है, तृष्णा याने शब्दादिविपयोंकी चाहना,संग याने स्त्री पुत्र मित्रादिकौंका मिलाप,राग याने स्त्री पुरुपकी पर- स्पर चाहना प्रीति इन सवका कारण रजोगुण है इसवास्ते वह जो जो कर्मकी इच्छा कराइके कर्म करताही है उसी कर्मके माफिक योनियोंमे यह जीव जन्मताहै. ॥७॥ मूलम्. तमस्त्वज्ञानविदिमोह सर्वदेहिनां ॥ प्रमादा लस्यनिद्राभिस्तन्निवनातिभारत ॥८॥ अन्वयः हेभारत तमः अज्ञानजं विद्धि तु सर्वदेहिनांमोहनविद्धि तत् प्रमादालस्यनिद्राभिः देहिनं निवनाति ॥ ८ ॥ टीका. हेभारत अर्जन! तमोगुण अज्ञानकी उत्पत्तिकारक है इसीसे सर्वदेहधारियौंको मोहनेवाला है याने विपरीतज्ञान उत्पादक है सो तमोगुण प्रमोद,आलस्य श्री निद्राकरिके देहधारीको बांध ताहै, प्रमाद याने करनेयोग्यकार्यको छोडना औन करनेयोग्य करना, आलस्य याने कोईभी कार्य करनेमे निरुद्यमता,निद्रा याने पुरुषके इंद्रियोंकी प्रवृत्ति शांति सो निद्रा, तहां वाह्यई- द्रियोंकी विश्रांतिस्वप्न औ मनकामी उपराम सुषुप्ति जाननाद .
'गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, २६७ मूलम् सत्त्वंसुखेसंजयतिरजःकर्मणिभारत ॥ ज्ञानमा सत्यतुतमःप्रमादेसंजयत्युत ॥९॥ अन्वयः हे भारत सत्त्वं सुरखे संजयति रजः कर्मणि संजयति त- मः ज्ञानं आवृत्य उत प्रमादे संजयति ॥ ९ ॥ टीका. अब सत्वादिकके प्राधान्यकार्य कहते हैं, सत्वगुण सुखमे लगाता है,रजोगुण कर्ममे, औतमोगुण ज्ञानको ढाकिक प्रमादमे. लगाता है. ॥ ९॥ मूलम्. रजस्तमश्चाभिभूयसत्वंभवतिभारत ॥ रजःस. स्वंतमश्चैवतमःसत्त्वरजस्तथा ॥१०॥ अन्वयः हेभारत रजःचतमःअभिभूय सत्त्वं भवति च रजः स- त्वं अभिभूय तमः भवति तथा तमः सत्त्वं अभिभूय र- जः भवति ॥ १० ॥ टीका.. . अहो सत्वादिक गुण प्रकृति संबंधी हैं वै सर्वकाल रहते है भी ऐसा विपरीत क्यों करते हैं;तहां कहते हैं कि,यद्यपि सत्वा- दिक गुण प्रतिके हैं जो देह मे सदा वर्तमान है तौभी, प्राचीन कर्मवाने औ देह के तृतिकारक आहारकी विषमताते सत्यादि- क गुण एकएकको जीतिके प्रबल होते हैं जैसेकि, रजोगुणको औ तमोगुणको जीतिके सत्वगुण प्रबल होताहै,रजोगुणसत्वगुणों को गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. जीतिके तमोगुण प्रबल होता है औ तमोगुण सत्वगुणों को जी- ति रजोगुण प्रवल होता है. ॥ १० ॥ मूलम्. सर्वहारेपुदेहेस्मिन्प्रकाशउपजायते ॥ ज्ञानंय दातदाविद्याद्विद्धसत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारंभःकर्मणामशमःस्टहा ॥ रजस्येता निजायंतेविहेभरतर्षभ ॥ १२॥ अप्रकाशो ऽप्रत्तिश्चप्रमादोमोहएवच ॥ तमस्येतानिजा पंतेविरद्धेकुरुनंदन ॥१३॥ अन्वयः हेभरतर्षभ अस्मिन् देहे सर्वद्वारेषु यदा ज्ञानं प्रकाशःउ- । पजायते तदा सत्त्वं विवृद्धं इति विद्यात् ॥ ११ ॥ उत लोभः प्रवृत्तिः कर्मणां प्रारंभः प्रामः स्टहा रजसि प्रवृ दसति एतानि जायते ॥ १२ ॥ हेकुरुनंदन अप्रकाशः च अप्रवृत्तिः च प्रमादः च मोहः एतानि तमसि विवृ- हे सति जायते एव ॥ १३ ॥ टीका. अब सत्वादिगुणों की वृद्धि के चिन्ह कहते हैं,हेभारत!याने भ- रतवंशोत्पन्न हेअर्जुन! इस देहमे सर्व कर्णनेत्रादिरूप द्वारौंमे ज- व वस्तु याथात्म्य याने यह वस्तु अमुक है ऐसे वस्तुरूप साक्षात्कार करनेवाला ज्ञान उपजै तब सत्वगुण बढा है ऐसा जानना ॥ ११ ॥ औ जब लोभ जो धनादिकके खर्च किये विना औरह धनकी इच्छा प्रवृत्ति याने प्रयोजनविना चंचलता कर्मणां आरंभः याने फलसाधनरूप कौका आरंभ अशमः याः .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका,
ने इंद्रियों की शांति नहोना स्टहा याने,विषयइच्छा यै यतनेर-
जोगुण बढनेसे होते हैं. ॥ १२ ॥ हेकुरुनंदन!अप्रकाश याने ज्ञा-
नका उदय नहोना अर्थात् विवेककी हानि,अप्रवृत्ति याने श्र-
नुद्यम अर्थात् कुछभी उद्यमका न दीखना,प्रमाद याने नकरने-
का काम करना, मोह उलटाज्ञान ये यतने तमोगुण बढनेसे
होते हैं. ॥ १३ ॥
अन्वयः
मूलम.
यदासत्वेप्रदेतुप्रलयंयातिदेहभृत् ॥ तदोत्त
मविदांल्लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४॥
यदा सत्त्वे प्रवृद्धेसति देहभृत् प्रलयं याति तदा उत्त-
मविदां श्रमलान् प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥
टीका.
जब सत्वगुणकी वृद्धिकालमे देहधारी मृत्युको प्राप्त होता है,
तब आत्मस्वरूप जाननेवालौके जो निर्मल लोक हैं याने अ-
ज्ञानरहित लोकोंको प्राप्त होता है,अर्थात् आत्मज्ञानियों के कुल-
मे जन्म लेके आत्मस्वरूप साक्षात करनेको पुण्यकर्म करता है,
लोकवस्तुभुवनेजने इहां लोक शब्द जनवाची है. ॥ ११ ॥
मूलम.
रजसिप्रलयंगत्वाकर्मसंगिपुजायते ॥ तथाप्र
लीनस्तमसिमूढयोनिपुजायते ॥ १५॥
अन्वयः
रजसि तु प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते तथा तमास
प्रलीनः मूढयोनिपु जायते ॥ १५॥
२७०
गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका.
टीका.
रजोगुणकी वृद्धिसमये मृत्यु पावै तौ कर्म संगीयाने कर्मकर-
नेवालोंके कुलमे जन्मता है अर्थात् उहाँ जन्मिके फिरि स्वर्गप्रा-
प्तिकारक कर्म करता है, तैसाही तमोगुणवृद्धिकालमे मराहुआ
मूढयोनि याने कुत्ता इत्यादिक योनियोंमे जन्मता है, जहां
कोईसाभी साधन नहीं है सकता है. ॥ १४ ॥
मूलम्.
कर्मणःसुकृतस्याहुःसात्विकंनिर्मलंफलं ॥ रज
सस्तुफलंदुःखमज्ञानंतमसःफलं ॥ १६ ॥
अन्वयः
सुकृतस्य कर्मणः फलं सात्त्विकं निर्मलं आहुः तु रजसः
फलं दुःखं आहुः तमसः फलं प्रज्ञानं आहुः ॥ १६ ॥
टीका.
ऐसे आत्मज्ञानियोंके कुलमे जन्मिके जो किया सुकतकर्म
याने फलानुसंधानरहितमेरेआराधनरूप कर्म उसकाभीफल है
सो पूर्वसात्विकसेभी अधिक सात्विक औ निर्मल याने दुःखले.
शरहित होता है ऐसे मुनिजन सात्विक औ जाननेवाले कहते
हैं औरजोगुणीकर्म याने काम्यकर्मका फल संसार है सो दुःख-
रूप है औ तमोगुणीकर्मका फल अज्ञान है,सात्विकादिफलौंके
लक्षण अठारहे अध्यायमे ॥ नियतंसंगरहित ॥ इत्यादि करिके
कहेंगे ॥ १६ ॥
मूलम.
सवात्संजायतेज्ञानरजसोलोभएवच ॥ प्रमा
दमोहौतमसोभवतोऽज्ञानमेवच ॥ १७॥
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. २७१
अन्वयः
सत्त्वात् ज्ञानं संजायते रजसःलोभः एव संजायते तम-
साप्रमादमोहौभवतःच मज्ञानंएव भवति ॥ १७॥
टीका.
अब अतिसात्विक प्रकाशरूप निर्मल फल क्या है? सो
कहते हैं, ऐसे परंपरासे उत्पन्न भया'जो अधिक सात्विकफल
उत्सते ज्ञान उत्पन्न होता है, राजफलते लोभ औ तामससे
प्रमाद, मोहऔ अज्ञान में होते हैं. ॥ १७ ।।
मूलम्.
ऊर्ध्वगच्छंतिसत्वस्थामध्येतिष्ठतिराजसाजि
घन्यगुणवृत्तिस्थाअधोगच्छंतितामसाः॥१८॥
अन्वयः
सत्वस्थाऊच गति राजसाः मध्ये तिष्ठति जघन्य
गुणवृत्तिस्था तामसाः अधः गछति ॥ १८॥
टीका.
-ऐसे कहेभये प्रकारसे सात्विक कर्म करनेनाले कर्म करिके
अर्ध्व याने मोक्षको प्राप्त होते हैं, रजोगुणी कर्मकरिके स्वर्ग,
फिरि पुण्य क्षीण होनेसे संसार, फिरि स्वर्ग, ऐसे संसारमे
रहते हैं;यह दुःस्वरूपही है श्री तमोगुणी नीचगुणकी वृत्तिम'
स्थित है इसवास्ते अधोगछति याने नीच जातिमे जन्मते
है.फिरि पशु फिरि कृमि कीट स्थावर गुल्म शिला काय कंकर
इत्यादि योनियोंमे जन्मते हैं. ॥ १८ ॥
मूलम.
नान्यंगुणेभ्यःकर्तारंयदादष्टानुपश्यति ।। गुणे
भ्यश्चपरवेत्तिमद्भावंसोऽधिगच्छति॥ १९॥
करमे त्याज्यबुद्धि मौ कंचनमे स्वीकारबुद्धि नहीं इसीसे तुल्य है २७० गीतावाक्याबोधिनी भापाटाका. ल्योमित्रारिपक्षयोः ॥ सर्वारंभपरित्यागीगुणा तीतः सउच्यते ॥२५॥ अन्वयः श्रीभगवान् उवाच हेपांडव यः प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहं एव एतानि संप्रवृत्तानि न दृष्टि च निवृत्तानि न कांक्षति ॥२२॥ चयः उदासीनवत् प्रासीनः सन् गुणैः न विचा- ल्यते गुणाः एव वत्तते इति यः तिष्ठति न इंगते ॥२३॥यः समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्ठाउमकींचनः तुल्यप्रियाऽ प्रियः धीरः तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः॥ २४॥ मानापमान. योः तुल्यः मित्रारिपक्षयोः तुल्यः सर्वारंभपरित्यागी सः गुणातीतः उच्यते ॥ २५ ॥ टीका. अब श्रीकृष्ण भगवान गुणातीतके लक्षण कहते हैं, प्रकाश शब्दसे जो सत्वगुणके सर्व कार्य अर्थात् आरोग्य सौमनस्यइ. त्यादिक प्रवृत्तिसे रजोगुणकार्य मोहसे तमोगुणके सर्व कार्य यै जो आपहासे प्रवृत्त होय तो उनमे हेपबुद्धि न करै ौ निवृत्त होय तो उनकी इच्छा न करे॥२२॥ उदासीन याने शत्रुमित्र भावसे रहित सरिरवा रहाभया जो गुणौकरिके याने गुणकार्यों मरिक याने सुखदुःखादि कारके न चलायमान होय,आपाप के कार्योंमे गुण आपहि वर्तमान होते हैं इनकरिके मेरासंबं भी नहि, ऐसा जानिके जो स्थित रहता है औ चलायमान नहीं होता है ॥ २३॥ औ समान मै औ दुःख जिसके याने जो सुख औदुःखकोसम जानता है औ आपके स्वरूपमे आनं- दस स्थित है औ कंकर तथा कंचनकोसम जानता है याने कं-
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका: २७५
प्रिय औ अप्रिय जिसके इसीसे वह धीर है औ आपकी निंदा
तथा स्तुतिकोभी सम जानता है ॥ २४. ॥ औ मान, तथा
अपमानमेभी समचित्त. तैसेही शत्रुमित्रपक्षमेभी सम औ
तैसेही शरीरपोपणसेवाय सर्व प्रारंभौंका परित्याग करनेवा:
ला पुरुप गुणातीत कहा जाता है. ॥ २५ ॥
मूलम..
मांचयोऽव्यभिचारेणभक्तियोगेनसेवते ॥ सगु
णान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयायकल्पते॥२६॥व्र
ह्मणोहिप्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्यच ॥शाश्व
तस्यचधर्मस्यसुखस्यैकांतिकस्यच ॥२७॥
अन्वयः
यः मां एव अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते सः
एतान् गुणान् समतीत्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
हियस्मात अमृतस्य च अव्ययस्य ब्रह्मणः च शाश्वत
स्य धर्मस्य च एकांतिकस्य सुखस्य अहं प्रतिष्ठा तस्मा-
त मम सेवकः ब्रह्मभूयाय.
कल्पते ॥ २७॥
टीका.
जो मेरेहीको अनन्यतासे याने तैलकी धारप्रमाण प्रखंड
भक्तियोग करिके सेवताहै सोइन गुणोंका अतिक्रमण करिके
ब्रह्मभूयाय याने ब्रह्मभूवयोग्य अर्थात् शुद्ध आत्मस्वरुपको
प्राप्त होता है ॥ २६ ॥ क्योंकी, अमृत औ अविनाशी जो ब्रह्म
याने आत्मस्वरूप उसकी नौशाश्वतधर्म जो भक्तियोग उस..
की औ एकांतिक सुख जो आत्मस्वरुपप्राप्तिरूपसुख उसकीभी
भैप्रतिमा हौं इसीवास्ते जो मेरेको अखंड भक्तियोग करिके
से है सो मात्मस्वरूपको प्राप्त होता है. ॥ २७ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. इतीश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायांयो गशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादेगुणत्रयविभागयो गोनामवतुर्दशोध्यायः॥ १४॥ इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकतायां श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थबोधिनीभापाटीकायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ ५ ॥ मूलम्. श्रीभगवानउवाच ॥ ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययं ॥ छंदासियस्यपर्णासियस्तंवेदस वेदवित् ॥१॥ प्रन्चयः श्रीभगवान उवाच यं अश्वत्थं ऊर्द्धमूलं अधःशारखं अ व्ययं श्रुतयः प्राहुः तथा छंदासि यस्य पर्णानि प्राहुः यः तं वेद सः वेदवित् अस्ति ॥ १ ॥ दीका. क्षेत्राध्यायमे क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूप प्रकृतिपुरुपका स्वरूप कहा औ परिशुद्धभी पुरुपको प्ररुतगुणसंगप्रवाह के निमित्तदेवादिका- कार करिके परिणामको प्राप्त भया जो प्रकृतिसंबंध सो अनादि है, ऐसाभी कहा. फिरि चौदहे अध्यायमे यह कहा कि, पुरुपको जो कार्य श्री कारण अवस्थारूप प्रकृतिसंबंध है सोभगवानहि का किपाभया है ऐसे कहिके फिरि विस्तारपूर्वक गुणसंगप्र- बाह प्रतिपादन कारके कहा कि, गुणसंगनिवृत्तिपूर्वक जो मा- त्मस्वरुपकी प्राप्ति है उसकाभी मूल भगवद्भक्तिही है.अब पंद्रहे अध्यायमे क्षराक्षरयाने पदमुक्त यै विभूति कहिकै क्षराक्षरसे विलक्षण भगवानका पुम्पोत्तमत्व कहेंग तहां प्रथम असंगशस्त्र . गीतावाक्वार्थबोधिनी भपाटीका. २७७ करिके छिन्न भया है बंधन जिसका ऐसी अक्षरविभूति कहनेको छेदनेयोग्य रूप जिसका ऐसा बंधन प्राकार करिके विस्मृत सो प्रकृतिविकार संसार उसको वृक्षरूप कल्पना करिके भगवान कहते भये, जिस संसाररूप अश्वत्थ याने संसाररुपी परके वृक्षको उर्ध्वमूल अधःशाख याने ऊपरको जड नौ नीचको जिसकी शायै श्री अव्यय याने नाश रहित ऐसा श्रुती काह ती है जैसे कि ॥ उर्ध्वमूलोऽक्झिारखएपोऽश्वस्थःसनातनः ॥ उर्ध्वमूलमर्वाक्शारखंवृक्षयोवेदसंप्रति ॥ इत्यादिक श्री चेदजि- सवृक्षके पत्ते हैं ऐसा श्रुति कहती हैं जो इसको जानै सोईवेदा र्थका जाननेवाला है, ऊपरको जो इसका मूल कहा तहां कोई कहते हैं कि, अपर पुरुपोत्तम परमात्मा मूल है.ब्रह्मादिकशा. खा हैं तहां एक शंका है कि, उसको अव्ययभी कहा है तो जिस- का मूल परमात्मा औ अव्यय है तब उसका छेदन करनेका क्या काम है नौ जो इसका दृढ असंगशस्त्रसे छेदन किया तो मूल सुद्धा काटनाचाहिये नहितो फिरभी होयगा पौ जब मू. लसहित छेवन किया तो परमात्माकाभी छेदन होता है परंतु परमात्माका छेदन है नही सकता इसवास्ते इहां यह अर्थ किया चाहिये कि, उर्ध्व याने सत्यलोकपर चतुर्मुख ब्रह्मा इस संसारवृक्षका आदि है वही मूल रूप है औ अधः याने नीचे, पृथ्वी निवासी सर्व मनुष्य पशु पक्षीमृग कीट पतंग स्थावर इन आदिक सबं शारखारूप औ यह प्रवाहरूपसे नाशरहित है जैसे पत्तोंसे वृक्ष बढता है ऐसैही वेदसे याने वेदोक्त कर्मसे यह संसार बढता है इसवास्ते इसके पत्ने वेद कहे. ॥ १ ॥ मूलम् अधश्चोर्ध्वप्रसृतास्तस्यशाखागुणप्ररदाविपय ૨૭૮ गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका, प्रवालाः ॥ अधश्चमूलान्यनुसंततानिकर्मानुक धीनिमनुष्यलोके ॥२॥ अन्वयः गुणप्रवद्धाः विषयप्रवालाः तस्य शाखाः अधः च ऊर्ध्व अपिप्रमृताः च तस्य वृक्षस्य अधः अपि मनुष्यःलोके 'मर्कानुबंधीनि मूलानि अनुसंततानि ॥ २ ॥ टीका. उसवृक्षकी औरभी विलक्षणता कहते हैं. गुणप्रवृद्धाल्याने सत्वादिकगुणों करिके बढी भई औ शब्दादिक विपय जिनके कोमल पत्ते हैं ऐली उस संसारक्षकी शाखें नीचे औ उपरभी फैली हैं, नीचे तो नीचकर्मसे मनुष्योंसे नीच पश्वादिकरूप औ ऊपर उत्तमकर्मसे देवादिशरीर औ इस वृक्षकी मूलैं याने अ- हैं जो कर्मके बंधनसे भई हैं वे नीचेभी मनुष्यलोकमे फैलि रही हैं याने नीच, मध्यम औ श्रेष्ठ ऐसे जो फर्म हैं वै इस मनुष्य लोकही मे है सकते हैं. वे कर्मही संसारवृक्षके मूल हैं, उनहीसे उर्ध्व श्री अधोगती होती है इसवास्त मनुष्य- लोकमेभी मूल है. ॥ २॥ मूलम. नरूपमस्येहतयोपलभ्यतेनांतोनचादिर्नचसंप्र तिष्ठा ॥ लश्वत्थमेनंसुविरूढमूलमसंगशस्त्रेण हढेनछित्वा ॥३॥ ततःपदंतत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गताननिवर्ततिभूयः॥ तमेवचाापुरुप प्रपद्येयतःप्रवृत्तिःप्रसृतापुराणि ॥४॥ अस्य संसारवृक्षस्य रूपं दह तथा न उपलभ्यते च अ अन्वयः गीतावास्यार्थबोधिनी भापाटीका. २७९ टीका. निसके मान औ मोह नही औ जीते हैं संगके दोष जिनौने औ अध्यात्मशास्त्र के नित्य अभ्यास करनेवाले इसीसे जिनकी कामनाभी निवृत्त मई है इसीसे सुखदुःखसंज्ञिक इंदौसेभी छुटे भये हैं. वै श्रात्मज्ञानी उस अविनाशी पदकोयाने स्वस्वरुप को प्राप्त होते हैं. ॥ ५॥ मूलम. नतद्भासयतेसूर्योनशशांकोनपावकः ॥ यद्गत्वा ननिवर्ततेतद्धामपरममम ॥६॥ अन्वयः तत आत्मज्योतिः सूर्यः न भासयते शशांकः न भास- यते पावकः न मासयते यत् गत्वा न निवर्तते तत्तु मम परमं धाम ॥ ६ ॥ टीका. उस आत्मज्योतिको सूर्य, चंद्र श्री अग्नि ये प्रकाशि सकते नही कारण वह ज्ञानाकार सबका प्रकाशक है जिसको प्राप्त व्हके फिरि संसारी नहीं होते है वह श्रेष्ठधाम याने श्रेष्ठ ज्योति मेरा याने मेरी श्रेष्ठ विभूति मेराअंशा है मूर्यादिकौंकाभी प्र- काश है इसते उसका श्रेष्टत्व है. ॥ ६ ॥ मूलम्. ममैवांशोजीवलोकेजीवभूतःसनातनः॥ मनःप छानींद्रियाणिप्रकृतिस्थानिकर्पति ॥७॥ अन्वयः एवं उक्तस्वरूपः सनातनःमम एव अंशःसन्जीवलोके जीवभूत प्रतिस्थानि मनः षष्ठानि इंद्रियाणि कर्षति।
२८० गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका, स्य अंतः न उपलभ्यते च आदिः न उपलभ्यते च सं- प्रतिष्ठा न उपलभ्यते सुविरूढमूलं एनं अश्वत्थं दृढेन अ- संगशस्त्रेण छित्वा ॥३॥ ततः च यतः सकाशात् पुराणि प्रवृत्तिः प्रसृता तं एव पाद्यं पुरुपं प्रपद्ये तत्पदं परिमार्गि तव्यं यस्मिन् गतः भूयः न निवर्तति ॥ ४ ॥ टीका. इस संसारवृक्षका मूल ब्रह्मा कहा औ शाखा मनुष्यादिक कहे, ऐसे ऊपर मूल नीचे शाखा कहीं औ फिरि कहा कि, मनु- ष्यलोकमे कराभया जो शुभाशुभकर्म है सोभी मूल है मो इस ते जो जो लोक प्राप्त होते हैं वेई शाखा हैं जो ऐसा यह रूप कहा सो इस लोकमे संसारी लोगों करिके जाननेमे नही आ- ताहै औ इसका अंतभी जाना नहीं जाता है ऐसेही आदि याने उत्पत्ति औसंप्रतिष्ठा याने स्थितिभीजानीनही जाती है, ऐसा जो यह मूलका संसार वृक्ष इसको असंगरूप शस्त्रसे छेइन करिके॥३ फिरि जिससे यह प्राचीन प्रवृत्ति याने गुणमय भो गरूपसंसारप्रवृत्तिविस्तृत है उसी आदिपुरुषकीशरणप्राप्त है के उसपदको ढूंढाना कि जिसको प्राप्त व्हैके फिरि जन्मता नही॥४ मूलम. निर्मानमोहाजितसंगदोपाअध्यात्मनित्याविनि रत्तकामाः॥ द्वंद्वैर्विमुक्ताःसुखदुःखसंज्ञैर्गच्छंत्य मूढाःपदमव्ययंतत् ॥५॥ अन्वयः ये निर्मानमोहाः जितसंगदोपाः अध्यात्मनित्या:विनि वृत्तकामाः सुखदुःखसंज्ञैः इंद्वैः विमुक्ताः ते अमूढा त त् मव्ययं पदं गञ्छति ॥ ५ ॥ .
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, टीका. ऐसे वर्णन कियाहुवा स्वरूप सनातन मेरा अंश याने मेरा ही संबंधी मेरा अनुचर शुद्धचैतन्य तौभी,जीवलोकमे जीवंभूत याने अति संकुचितज्ञानवान अर्थात् अल्पज्ञ व्हेके प्रकृतिसंव- धी मनुष्यादि शरीरोंमे स्थित पांच ज्ञानइंद्रिय एक छटा मन इनको खीचताभया स्वकर्मानुसार शरीरोंमे फिरता है. इहां को ई अंशका यह अर्थ करते हैं कि, अंगका एक भाग याने एक टुक- डा तौ जब जीवहीको अछेद्य, अभेद्य कहते हैं तब परमात्माका टुकडा कैसे न्यारा हैके जीवलोकमे आया इसवास्ते वैमोहसे कहते हैं. अंश नाम स्वकीयपदार्थका यही अर्थ सिद्धांत दी- खता है. ॥ ७॥ मलम्. शरीरंयदवाप्नोतियच्चाप्युक्रामतीश्वरः ॥ गृही स्वैतानिसंयातिवायुगंधानिवाशयात् ॥ ८॥ अन्वयः यत् यदा शरीरं अवाप्नोति च यत् यदा शरीरात् उत्क्रा मति तदा वायुः आशयात् गंधान इव अयं इंद्रियादिनां ईश्वरः एतानि मनः पप्टेंद्रियाणि गृहीत्वा संयाति ॥ ८॥ टीका. जब दूसरे शरीरको प्राप्त होता है औ जब वर्तमानशरीरको त्यागिक जाता है तब जैसे वायु कस्तुरी इत्यादि गंधाशय भैसे गंधको लैके अन्यत्र जाता है तैसे यह इंद्रियादिकीका ईश्वर जीवात्मा मनसंयुक्त इंद्रियौंको यान पांच ज्ञानेंद्रिय औटे मनको संग लेके जाता है. ॥ ८ ॥ मूलम्. श्रोत्रंचक्षुःस्पर्शनंचरमनंघ्राणमेवच ॥ अविष्टा .
. १८२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. यमनश्चायविषयानुपसेवते ॥९॥ अन्वयः अयं जीवात्मा श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं च घ्राणं च मनाएतानि एव अधिष्ठाय विषयान उपसेवते ॥ ९ ॥ टीका. यह जीवात्मा ओत्र, चक्षुः, स्पर्शन, रसना,घ्राण नौ मन याने कान,नेत्र, त्वचा, वापी, नासिकाऔ मन इनको अपने विषय भोगके अनुकूल करिके शब्दादिक विषयौंको भोगता है.॥ ९ ॥ मूलम् उक्कामंतंस्थितंवापि जानेवागुणान्वितं ॥ विमू ढानानुपश्यंतिपश्यंतिज्ञानचक्षुपः॥१०॥ एनं गुणान्वितं उत्कामंतं वा स्थितं वा भुंजानं अपि वि- मूढाःन अनुपश्यंति ज्ञानचक्षुपः पश्यति ।। १० ॥ टीका. गुणयुक्त इस मात्माको याने सत्वादिगुणमय प्रकृति परि णामइंद्रिययुक्त इसको देहसे निकसते वखत औ देहमे स्थित- कोनोविषयभोगते भयेकोभी अज्ञानी लोग नहीं देखते है, या- न इसके स्वरूपको निश्चय नहीं कर सकते हैं भौजिनके ज्ञान- रूप नेत्र हैं वैज्ञानी देखते हैं याने ज्ञानद्वारानिश्चय करते हैं.१ . मूलम. यतंतोयोगिनथैनंपश्यंत्यात्मन्यवस्थितं ॥ यतं तोऽप्यकृतात्मानोनैनंपश्यत्यचेतसः॥११॥ योगिनःपतंतःसंतःपात्मनि,अवस्थितं एनं पश्यति च अन्वयः अन्वयः + गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अकतात्मानःयतंतः अपि अचतेसः एनं न पश्यति ॥११॥ टीका. योगी यत्न करते करते योगबलसे आपके अंतःकरणमें स्थित इस आत्माको शरीरेंद्रियसे न्यारा देखते है याने जानते हैं औ जिनका चित्त शुद्ध नहीं है वै मंदबुद्धिवाले शास्त्र- द्वारा यत्न करतेभी नहीं निश्चय करि सकते हैं. ॥ ११॥ · मूलम्. यदादित्यगतंतेजोजगदासयतेखिलं ॥ यचंद्र 'मसियञ्चाग्नौतत्तेजोविद्धिमामकं ॥१२॥ अन्वयः यत् प्रादित्यगतं तेजः अखिलं जगत् भासयते यत् चंद्रमसि च यत् अग्नौ तत् तेजः मामकं विद्धि ॥१२॥ टीका. अब यह कहते हैं कि, सूर्यादिकौमेभी जो तेज है सोभी मेरीही विभूति है; जैसे कि, जो सूर्यमे प्राप्त भया तेज सब जगतको प्रकाशता है औ जो चंद्रमामे है, अग्निमे हैं, सो तेज मेराही है यार्ने उनौंने जब मेरा अाराधन किया तब उनको. मैनेही दिया है. ॥ १२ ॥ मूलम्. गामाविश्यचभूतानिधारयाम्यचमोजसा ॥ पु ष्णामिचौपधी सर्वाःसोमोभूत्वारसात्मकः ॥१३॥ अन्वयः अहं गां आविश्य भूतानि ओजसाधारयामि.च रसा. स्मकः सोमः भूत्वा सर्वाः औषधीः पुण्णामि ॥ १३ ॥ टीका.
२८४ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. मै एथिवीमे प्रवेश करिके अपनी अचिंत्यसामर्थ्य करिके भूतप्राणीमात्रको धारण करता हौ औ अमृतरसमय चंद्रमा व्हके सर्व औषधियोंके पोषण करता है. ॥ १३ ॥ मूलम्. अहवैश्वानरोभूत्वाप्राणिनांदेहमाश्रितः ॥ प्रा णापानसमायुक्तःपचास्यन्नंचतुर्विधम् ॥१४॥ अन्वयः अहं वैश्वानरः भूत्वा प्राणिनां देहं आश्रितः सन प्रा- णापानसमायुक्तः चतुर्विधं अन्नं पचामि ॥ १४ ॥ टीका. मै वैश्वानर व्हेके याने जठराग्नि हैके प्राणिमात्रकी देहोंमे रहा भया प्राणवायु औ अपानवायु संयुक्त चतुर्विध याने भक्ष्य, क्षोज्य.लेह्य, पेय,इन भेदी करिके चारिप्रकारका अन्न पचाता हौं. ॥ १४ ॥ मूलम्. सर्वस्यचाहहृदिसन्निविष्टोमत्तःस्मृतिर्ज्ञानमपो हनंच ॥ वेदेश्चतर्वैरहमेववेद्योवेदांतकवेदविदेव चाहं ॥ १५॥ अन्वयः अहंसर्वस्य हृदि सन्निविष्टः च मत्तःसर्वस्य स्मृतिः ज्ञानं च अपोहनं भवति च सर्वेः वेदैःवेद्यः अहं एव च वेदांतहत् च वेदवित् अहं एव ॥ १५ ॥ मै सर्वप्राणिमात्रके हृदयोंमे प्रविष्ट हौ नौ मेरेहीमे सबकी स्मृति ज्ञान नौ वितर्क हैं औसर्ववेदों करिके जानने योग्य मही अन्वयः
अन्वयः
.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
हौत्रोवेदांतकाकर्तातयावेदकाजाननेवालाभीमहीही ॥ १५॥
मूलम.
हाविमौपुरुपौलोकेक्षरश्चाक्षरएवच ॥क्षरःसर्वा
णिभूतानिकूटस्थोऽक्षरउच्यते ॥ १६ ॥
लोके क्षरः च अक्षरः एव इमो द्वौ पुरुपौ स्तः तत्र सर्वा
णिभूतानि क्षरः चकूटस्थः अक्षरः इति मुनिभिःउच्यते॥१६
टीका.
लोकमे क्षर औ अक्षरयै दो प्रकारके पुरुप याने जीव हैं तहां
सर्वभूत याने प्रकृतिसंसर्गसे बंधे भये जीव क्षर हैं औ कूटस्थ
जो मूक्त वै अक्षर हैं. ॥ १६ ॥
मूलम्.
उत्तमःपुरुपस्त्वन्यःपरमात्मेत्युदाहृतः ॥ यो
लोकत्रयमाविश्यविभर्त्यव्ययईश्वरः॥ १७ ॥
अन्वयः
उत्तमः पुरुषः तुक्षराऽक्षराभ्यां अन्यः परमात्मा इति उ-
दाहृतः यः ईश्वरः अव्ययःलोकत्रयं आविश्य विभर्ति॥१७
टीका.
उत्तमपुरुष तौ इन क्षर औ अक्षरसे अर्थात् बद्धमुक्तसे
अन्य है जिसीको परमात्मा कहते हैं जो सर्व चराचरमे औ
मुक्तमेभी प्रवेश करिके सबका भरण पोपण करता है. वह ई.
श्वर अविनाशी है. ॥ १७ ॥
मूलम्.
यस्मातक्षरमतीतोऽहमक्षरादपिचोत्तमः ॥अतो
ऽस्मिलोकवेदेचप्रथितःपुरुपोत्तमः॥१८॥
२८६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. अन्वयः यस्मात् अहं क्षरं अतीतःच अक्षरात् अपि उत्तमःअस्मि अतःलोके च वेदे पुरुषोत्तमः इति प्रथितः अस्मि ॥ १८ ॥ टीका. जिसवास्ते कि, मैक्षरसे न्यारा औ अक्षरसेभी उत्तम अर्था- त्वद्ध औ मुक्त इन दोनोंसे न्यारा औ उत्तम हौं, इसीवास्ते लो- क जोस्मृति औ वेद तिनमेभी पुरुषोत्तम करिके प्रसिद्ध हौ.१८ मूलम्. योमामेवमसंमूढोजानातिपुरुषोत्तमं ॥ ससर्व विद्भजतिमांसभावेनभारत ॥१९॥ अन्वयः हे भारत यः असंमूढः एवं पुरुषोत्तमं मां जानाति सः सर्वतित् सर्वभावेन मां भजति ॥ १९॥ टीका. हे भारत याने अर्जुन! जो ज्ञानी पुरुष ऐसे क्षराक्षर पुरुषो- से उत्तम मेरेको जानता है सो सर्वज्ञ है, इसीसे वह सर्व भा- वना करिके मेरेहीको भजता है. ॥ १९ ॥ मूलम्. इतिगुह्यतमंशास्त्रमिदमुक्तंमयाऽनघ ॥ एतदु ध्वाबुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्चभारत ॥२० ॥ अन्वयः हेअनघ इति मया उक्तं इदं शास्त्रं गुह्यतमं अस्ति हे भारत एतत् वुवा बुद्धिमान च कृतकृत्यः स्यात् ॥ २० ॥ टीका.. हे निष्पाप अर्जुन! ऐसे मैने जो कहा सो यह शास्त्र अति गोप्यहै २८७ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. भारत इसको जानिके बुद्धिमान् औ कतरुत्य होता है. ॥ २॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुपोत्तमयोगो नामपंचदशोऽध्यायः ॥१५॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपडितरघुनाथप्रसादकता श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थबोयिनीभापा टिकापिंचदशोऽध्यायः मूलम् श्रीभगवानुवाच ॥ अभयंसत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयो गव्यवस्थितिः॥दानंदमश्चयज्ञश्चस्वाध्यायस्त पआर्जवं ॥ १ ॥अहिंसासत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनं ॥दयाजूतेष्वलोलुप्त्वंमार्दवं हीर चापलं ॥२॥तेजःक्षमाधृतिःशौचमद्रोहोना तिमानिता॥भवंतिसंपदंदैवीमभिजातस्य भारत ॥३॥ अन्वयः श्रीभगवान उवाच हेभारत अभयंसत्वसंशुद्धिःज्ञानयो. गव्यवस्थितिः दानं दमः च यज्ञःच स्वाध्यायःतपः आ- जवं ॥१॥अहिंसा सत्यं अक्रोधः त्यागःशांतिः अपैशु- नं भूतेषु दया अलोलुत्त्वं मार्दवं ह्रीः अचापलं ॥२॥ ते जःक्षमाधुतिः शौचं भद्रोहः नातिमानिता एते गुणाःदै वीं संपदं अपिजातस्य भवंति ॥ ३ ॥ • टीका. तेरहेअध्यायको लैके पंद्रहेपर्यत क्षेत्र औ क्षेत्रका विवेक २८८ गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. श्रौ गुणत्रपका विभाग औ बद्धमुक्त क्षराक्षरका स्वरूप औ पर- मात्माका पुरुषोत्तमत्व तथा सामर्थ्य वर्णन किया, अब तोरहवे अध्यायमे जीवकीशास्त्रवश्यता श्री देवासुरसंपविभाग कहा तेहैं.अभयं इहांसे लैके श्रीकृष्णभगवान कहते भये फि, भरतवं शोत्पन्न हेअर्जुन! अभय औ अंतःकरणकी शुद्धि ज्ञानयोगव्यव- स्थिति याने प्रकृतिवियुक्त आत्मस्वरूपमे निष्ठा दान जोन्याय करिके संग्रह किये द्रव्यको सुपात्रके अर्पण करना, दम मनको विषयोंसे निवृत्त करना. यज्ञ फलानुसंधानरहित भगवदाराध- नरूपपंचमहायज्ञका अनुष्ठान.स्वाध्याय वेदाभ्यासमंत्रजपादि कतप रुळूचांद्रायणरूप भगवदाराधन आर्जव सरलतायानेस- बसेसीधेरहना ।। १॥ अहिंसा परपीडाको नकरना. सत्य यथार्थ भौहितवाक्य अक्रोध.चित्तमे पर पीडाका निमित्त लाइके क्रोध न करना त्याग उदारता शांतिःइंद्रियौंको विषयमे निवृत्त कर ना अपैशुनं किसीके पिछाडी उसके दोप न कहना याने चुगली न करना. भूतेषु दया दीनजनौंपर अनुकंपा अलोलुम्वं प्रलोभ तः वापियोंमे अस्टहा मार्दवं अक्रूरताहीः लज्जा चापलं व्यर्थक्रियाका न करना ॥२॥ तेजःदुर्जनौसे न हारना क्षमा सामर्थ्य होनेसेभी आपने अपकारीपर दया करना. धृति धीरज • शौच बाह्याभ्यांतरशुद्धि अद्रोह द्रोह न करना अमानिता आप- कोअतिपूज्य मानिके मनन करना यै छब्बीस गुण जिसको दै वीसंपदा प्राप्त होती है उसके होते हैं. ॥ ३ ॥ मूलम्. दंभोदोऽभिमानश्चक्रोधःपारुप्यमेवच ॥ अज्ञानंचाभिजातस्यपार्थसंपदमासरीम्॥४॥ अन्वयः
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. २८९
हे पार्थ दंभः दर्पःआभिमानः कौधः च पारुष्यं च अज्ञानं
एवं एतेगुणाः आसुरी संपदं अभिजातस्य भवंति ॥ ४ ॥
टीका.
हेपृथापुत्र! दंभ याने मनमे कपट राखिके लोकों के देखानेको
धर्म आचरण करना, दर्प याने धन विद्यादिकका गर्व,अभिमान
यान अहंकार,क्रोध याने गुस्सा, पारुष्य याने कठिनभाषण,श्री
अज्ञान याने अविवेक, यै यतने अवगुण जो आसुरी संपदा-
को प्राप्त भया है उसके होते हैं ॥ ४ ॥
मूलम्.
देवीसंपद्विमोक्षायनिबंधायासुरीमता ॥ माशुचः
संपदंदैवीमभिजातोऽसिपांडव ॥५॥
,
अन्वयः
हे पांडव दैवीसंपत् विमोक्षाय आसुरी संपत् निबंधस्य
मता त्वं दैवीं संपदं अभिजातोऽसि अतःमाशुचः॥५॥
टीका.
हेपंडुपुत्र! जो देवी संपदा है सो मोक्षके वास्ते है औ आ.
मुरी संपदा घंधनके वास्ते है. तुम देवीसंपदाको प्राप्तभये हो,
इसवास्ते शोच न करौ. ॥ ५ ॥
मूलम्.
द्वौभूतसगैलोकेऽस्मिन्दैवअसुरएवच ॥देवोवि
स्तरशःप्रोक्तअसुरंपार्थमेशृणु ॥६॥
अन्वयः
हे पार्थ अस्मिन लोके भूतसौ दो स्तः दैवः च आ
सुरः एव तत्र देवः प्रोक्तः भानुरं मे शृणु ॥ ६ ॥
4 गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. टीका. हे अर्जुन! लोकमे भूतौंकी उत्पत्ति दोप्रकारकी है, देव औ असुर तिनमे देव तो विस्तारपूर्वक कहा अब आसुर कहता हौं सो सुनौ. ॥ ६ ॥ मूलम्. प्रवृत्तिचनिवृत्तिंचजनानविदुरासुराः ॥ नौचं' नापिचाचारोनसत्यंतेषुविद्यते ॥७॥ अन्वयः आसुराः जनाः प्रवृत्तिं च निवृत्ति अपि न विदः च तेषु शौचं नविद्यतेच आचारःनविद्यते चसत्यं अपिनविद्यते॥७ टीका. आसुराः याने आसुरीसंपदाको प्राप्तभये मनुष्य वै प्रवृत्ति जो संसारसाधन भौ निवृत्ति जो मोक्षसाधन इन दोनौको नही जानते हैं औ उनमे शौचभी नही औ श्राचारभी नही आ सत्यभी नही रहता है याने वै बाहेर औ अंतःकरणमे प- वित्रभी नहीं रहते हैं औ सदाचार जो संध्यावंदनादिक जिस ते पवित्र होते हैं वह पवित्र होनेका साधन आचारभी नहीं करते हैं कहा है कि ॥ संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हःसर्वकर्मसु ॥ इति तथा सत्य भापणभी नही करते हैं. ॥ ७ ॥ मूलम्. असत्यमप्रतिष्ठतेजगदाहुरनीश्वरम् ॥अपरस्प रसंभूतंकिमन्यत्कामहेतुकम् ॥८॥ अन्वयः ते जगत् असत्यं अप्रतिष्ठं अमीश्वरं प्राहु; अपरस्परसंभू तं अन्यत किं न किमपि अतः इदं कामहेनुकं एव ॥८॥ वै - गीतावास्थार्थबोधिनी भाषाटीका. टीका. वै आसुरप्रकृतिवाले पुरुष जगतको असत्य कहते है याने यह जगत् मिथ्या है ऐसे कहते हैं औ अप्रतिष्ठित कहते हैं तथा अनीश्वर कहते हैं औ कहते हैं कि, इस जगतमे स्त्रीपुरु- पके संयोगविना क्याहै? अर्थात् कुछभी नही. सर्व मनुष्य पशु इत्यादिक स्त्रीपुरुपके संयोगहीसे होता है इसवास्ते उत्पत्तिका- रण कामही है ऐसा कहते हैं. इहां यह निश्चय होता है कि, इन आसुरीप्रकृति वालौंमेभी मतभेद है,क्यों कि जो असत्य कहि चुका सो अप्रतिष्ठित औ अनीश्वर कामहेतुसे परस्पर उत्पन्न है ऐसा क्यों कहेंगा. जो मिथ्या है उसकी प्रतिष्ठा वगैरे कहां हैं इसवास्ते यह निश्चय होता है कि, कोई आसुरीप्रकृतिवाले जगत्को मिथ्या कहते हैं औ कोई अप्रतिष्ठित कहते हैं औ कोई अनीश्वर कहते हैं तया कोई कहते हैं कि कामचेष्टासे परस्पर स्त्रीपुरुषसे उत्पन्न है. ॥ ८॥ मूलम. एतादृष्टिमवष्टायनष्टात्मानोल्पबुद्धयः॥प्रभव त्युग्रकर्माणः क्षयायजगतोहिताः॥९॥ अन्वयः ते नष्ठात्मानः अल्पबुद्धयः एतां दृष्टिं अवष्टभ्यसपअ- हिताः जगतः क्षयाय उग्रकर्माणः प्रभवति ॥ ९ ॥ टीका. वै आसुरप्रकृतिवाले नष्टात्मानःयाने देहसे भिन्न प्रात्माको न देखते भये अथवा नष्टात्मानः याने अदृश्यभई है ईश्वरविप- यिक बुद्धिजिनकि इसीसे उनकी बुद्धिभी अल्पपदार्थामेरहती है याने खानपानाहिकहि मे रहती है संध्यादिक कौमे नहीं.
२९२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. जैसेकि कहाहै। संध्यावंदनवेलायांब्रह्माहमितिमन्यते ॥ खंडमो दकवेलायदिंडमुद्यभ्यधावसि ॥ अर्थ संध्याकरनेके वखत कहते है कि, हम ब्रह्म हैं हमको कर्म करनेसे क्या प्रयोजन है औवा. डके लडुन्को सुनिके हाथमे दंडलेके भोजनको दौडते हैं,ऐसे तु- छ विषयादिकोंमेभी बुद्धिवाले इसी दृष्टिका आश्रय करिके स- बके अहित याने किसीका द्रव्य किसीकी स्त्री औ किसीके पुत्र- को भ्रमायके हरनेवाले इसीसे वै जगतके नाश करनेको उग्रक- म करनेवाले होते हैं;याने कोई स्वीको भ्रमायके आप भोगते है औ उसके पतीसे विरोध कराते हैं औ कोई दूसरेका द्रव्य अनेक पापंडकरिके हरते हैं औ कोई किसीके पुत्रको भ्रमायके उनका वियोग कराते हैं. ऐसे कृष्णभगवानने जो कहेथे सो इसकालमे बहुत देखनेभी पाते हैं. ॥ ९ ॥ मूलम. काममाश्रित्यदुप्पूरंदभमानमदान्विताः॥ मो हाद्गृहीत्वाऽसद्गाहान्प्रवर्ततेऽशुचिव्रताः ॥१०॥ अन्वयः ते दुप्पूरं कामं आश्रित्य दभमानमदान्विताः संतःमोहा त् असहान् गृहीत्वा अशुचिव्रताः अशुचौ कर्मणि प्रवर्तते ॥ १० ॥ टीका. वै पासुरीप्रकृतिवाले दुष्पूर याने दःखकरिके पुरनेमे श्रावै अर्थात् परस्त्रियोंको अनेक प्रकारसे बड़े दुःखसे जब अपने वश करें तब 'कुछ कामभोगकी प्राप्ति होय तौभी अनेक स्त्रियोंसे भी तृप्ति न होय ऐसे कामको श्राश्रय करिके दंभ करें याने अ. नेक कपट करें. जैसे कि, मै तेरे पतीको तेरे वशकरि देउंगा. तेरे गीतावाक्यर्थबोधिनी भापाटीका. २१३ पुत्र नहीं होता है सोभी मै देउँगा तू मेरेपास प्राइके मेरी आ. ज्ञा प्रमाण रहाकर ऐसे अनेक कपट करें औ मान तथा गर्व या- ने हम सिद्ध हैं, ऐसे व्है मोहसे प्रसदाहौंको गृहण करिके अ- पवित्र व्रत भये हुये अपवित्रकौमे प्रवर्स होते हैं याने मोहको प्राप्त व्हेके असदाह याने मारण, मोहन, वशीकरणादिक सिद्ध करने के वास्ते भूत प्रेत मसानोंकी सिद्धि चाहते भये उनहीके व्रतादिककरतेभये हुये अपवित्र कर्म याने भूतादिक साधनको मद्य पशु, हिंसा इत्यादि कर्म करते हैं. ॥ १० ॥ मूलम्. चिंतामपरिमेयांचप्रलयांतामुपाश्रिताः॥कामो पभोगपरमाएतावदितिनिश्चिताः॥११॥ आ शापाशशतैर्बद्धाःकामक्रोधपरायणाः ॥ ईहते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्॥१२॥ अन्वयः अपरिमेयां च प्रलयांत चिंता उपाश्रिताः संतः कामो पभोगपरमाः एतावत् इतिनिश्चिताः॥ ११ ॥ आशापा- शशतैः बद्धाः कामक्रोधपरायणाः कामभोगार्थ अन्या- येन अर्थसंचयान ईहते ॥ १२ ॥ टीका. अपरिमेया याने बेपरमान औ मरनपर्यंत जो रहै ऐसी चिंताको धारणकरि रहेहुये कामभोगही श्रेष्ठ है ऐसा मानि रहे भये औ कामभोगके सेवाय दुसरा सब तुच्छ है ऐसा मानि रहे. भये ॥११॥ आशारूपी सैकडौं पाशौंमेबँधे इधरउधर खिचि रहे भये काम औक्रोधको घर किये भये ऐसे पुरुष कामभोगके- वास्ते अन्यायसे याने धर्मविरुद्ध धनसंग्रहके वास्ते उपाय . गीतावाक्यार्थबोधिनी भपाटीका. करते हैं. ॥ १२॥ मूलम. इदमद्यमयालब्धमिर्मप्राप्स्येमनोरथं ॥ इदम स्तीदमपिमेभविष्यतिपुनईनं ॥ १३ ॥ आसौ मयाहतःशत्रुर्हनिष्येचापरानपि॥ ईश्वरोऽहम होगीसिद्धोहंवलवान्सुखी॥ १४ ॥ आढ्यो भिजनवानस्मिकोऽन्योऽस्तिसदृशोमया ॥य क्ष्येदास्यामिमोदिप्यइत्यज्ञानविमोहिताः ॥ ॥१५॥अनेकचित्तविभ्रांतामोहजालसमाटताः॥ प्रसक्ता कामभोगेषुपततिनरकेऽशुचौ ॥ १६ अन्वयः मया अद्य इदं लब्धं अहं इमं मनोरथं प्राप्स्ये इदं धनं मे अस्ति पुनः अपि मे इदं धनं मविष्यति॥१३॥ मया अतौ शत्रु हताच अहं अपरान् अपि शत्रून हनिष्ये अ हं ईश्वरः अहं भोगी अहंसिद्धः अहं बलवान अहं सुखी ॥ १४ ॥ अहं आढयः अहं अभिजनवान् अस्मि मया सदृशः अन्यः कः अस्ति अहं यक्ष्ये अहं दास्यामि अहं मोदिष्ये इति अज्ञानविमोहिताः ॥ १५॥ अनेकचित्त विभ्रांताः मोहजालसमावृताः कामभोगेषु प्रसक्ताः सं- तः अशुचौ नरके पतंति ॥ १६ ॥ टीका, मैने आज यह पाया औ मै इसमनोरथको फिरि पाचौंगा- यह धन मेरे है औ फिरिभी यह धन मेरे होयगा॥१३॥ युदामे यह शत्रु मारा औ मै औरभी शबनको मारौंगा. मै ईश्वर हौमे भोगी हौ मैसिद्ध हों मै बलवान हाँ मै मुखी हो ॥ १४ ॥ मे ध-
मै
गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका.
नाढय हौं मै उत्तमकुलमे जन्माहौ मेरे मानसा दुसरा है कौन
यश करांगामैदान देउंगामे आनंदको प्राप्त होउगा असे ई-
श्वर वश्यताकोन जानतेभये अज्ञानसे मोहित ॥१५॥ अनेक क
मौमे चित्त लगा है निजका इसवास्ते यहकरौं कि, यह करौं औ
से भ्रमकोप्राप्त भये हुये मोहरूप जामले फसेभये काम भोगमे
आसक्त से पुरुष अपवित्र नरक याने घोरनरकमे पडते है १६
मूलम्
आत्मसंभाविताःस्तब्धाधनमानमदान्विताः ॥
यजतेनामयज्ञैस्तेदभेनाऽविधिपूर्वकं ॥ १७ ॥
अहंकारंवलंदकामंक्रोधंचसंश्रिताः ॥ -मामा
त्मपरदेहेपुप्रद्विषंतोभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥तानहं
द्विषतःक्रूरान्संसारेषुनराधमान् ॥ क्षिपाम्यज
समशुभानासुरीप्वेवयोनिषु ॥ १९॥ आसुरी
योनिमापन्नामूढाजन्मनिजन्मनि ॥ मामाप्रप्यौ
वौंतेयततोयांत्यधमांगतिं ॥२०॥
अन्वयः
ये प्रात्मसंभाविताः स्तब्धाःधनमानमदान्विताःतेदं
भेन अविधिपूर्वकं नामयज्ञैःयजंते ॥ १७॥ च अहंका
रंबलंदर्प कामक्रोधं संश्रिताः संतःमां भात्मापरदेहेषु
द्विषतः अभ्यसूयकाःसंति ॥१८॥ अहं तान् द्विपतः
क्रूरान अशुभान नराधमान् संसारेषु अज संआसुरी
योनिषु एव क्षिपामि ॥ १९ ॥ हेकौंतेय तेमुढाः न
न्मनि जन्मनि आसुरी योनिं आपन्नाः संतःमा अ-
प्राप्य ततः अधमां एवं गतिं यांति ॥२०॥
२९६ गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका, टीका, जो आत्मसंभावित हैं याने आपकी प्रसंसा प्रापही करि ले ते है औ अनम्र इसीसे धन मान औ मद करिके युक्त भये हुये दंभकरिके अविधिपूर्वक नाममात्र यज्ञोको करते हैं या- ने देखने भरको करत १७॥ प्रौ अहंकार वल दर्प काम क्रोध इनके आश्रित भये हुये मेरेको आपके औ दूसरेकेभी दे हमि रहेभयोका द्वेष करतेभये मेरी निंदा करते हैं ॥ १८॥ उन द्वेषकरनेवाले क्रूर अशुभ नराधाँको संसारमे वारंवार आसुरीयोनियोंमेही डालता हौं ॥ १९ ॥ हेअर्जुन वै! मूर्ख जन्मोजन्म आसुरीयोनिमे प्राप्त भयेहुये मेरेको न प्राप्त व्है के फिरी अधमही गतीको जाते हैं ॥२०॥ मूलम्. त्रिविधंनरकस्येदंवारनाशनमात्मनः ॥ कामः क्रोधस्तथालोभस्तस्मादेतत्रयंत्यजेत् ॥२१॥ एतर्विमुक्तःकौंतेयतमोहास्त्रिभिर्नरः ॥ आचर त्यात्मनःश्रेयस्ततोयातिपरांगतिं ॥२२॥ अन्वयः कामः क्रोधः तथा लोभः इति इदं त्रिविधं नरकस्य द्वारं आत्मनः नाशनं तस्मात् एतत् त्रयं त्यजेत् ॥ ॥ २२ ॥ हे कौंतेय एतैः त्रिभिः तमोद्वारैः विमुक्तः सन् : आत्मनः श्रेयः आचरति ततः परां गतिं याति ॥२२॥ टीका. अब आसुरस्वभावमे जो मूलकारण आत्मनाशक उन्हें दे- खाते हैं काम क्रोध श्रौ लोभ ऐसे यह तीनप्रकारका नरकका द्वार याने नरकका मार्ग प्रात्मनाशन याने प्रात्माको अधोगति
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. २९७
फोले जानेवाला है इसवास्ते इनतीनों को त्यागना अर्थात्स्व-
वश करना नहीतौ जो सर्वथा त्याग कहेंगे तो अर्जुन युद्ध किस-
वास्ते करेंगे इसवास्ते इहांभी सात्विकरीतीप्रमापा त्याग कहते
हैं ॥ २१ ॥ हेकुंतीपुत्र!ये तीनों नरकप्राप्तिकारणों से छुटा भया
पुरुप याने इनको श्रेष्ठ न मानता भया जो रहता है सो आपके
कल्याणके वास्ते शुभ आचरण करता है. उस प्राचारसे परम-
गती जो मै सो मेरेको प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
मूलम्.
॥
अन्वयः
यःशास्त्रविधिमुत्सृत्यवर्ततेकाममारतः ॥ नस
सिद्धिमवाप्नोतिनसुखनपरांगतिं ॥ २३ ॥ त
स्माच्छास्त्रंप्रमाणंतेकार्याकार्यव्यवस्थिती
ज्ञात्वाशास्त्रविधानोक्तंकर्मकर्तुमिहार्हसि ॥ २४
यःशास्त्रविधि उत्सृज्य कामकारतः वर्तते सः सिद्धिं न
अवाप्नोति न सुखं अवाप्नोति न परां गतिं अवाप्नोति।
॥ २३॥तस्मात् ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ शास्त्रं प्रमाणं
स्यात् इह शास्त्रविधानोक्तं ज्ञात्या कर्मकर्तु अर्हसि ॥२४॥
टीका.
प्रथम कहे त्यागका खुलासा करते हैं जो शास्त्रविधिको
चल छोडिके आपकी इच्छासे वर्तता है सो सिद्धिको औ
सुखको औ परमगतिकोभी नही पावता है ॥ २३ ॥ इसीवास्ते
तुह्मारी कार्याकार्य व्यवस्थामे शास्त्रही प्रमाण होना चाहिये ।
याने क्या करना क्या न करना यह सब शास्त्रविधानसे
जानिके तुम कर्म करनेको योग्य हो अर्थात् शास्त्रविधिप्रमाण
तुमको कम करनाही चाहिये. ॥ २४ ॥
२९० गीतावास्थार्थवोधिनी भाषाटीका. इतिश्रीमद्भगवद्गीतासुपनिषत्सुब्रह्मविद्यायांयो गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्वि भागयोगोनामषोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इतिश्रीमत्सुकलसीतारागात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकृतायां श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्धबोधिनीभाषाटीकायांपोडशोऽध्यायः मूलम्. ॥ ॥ अर्जुन उवाच ॥ ॥ येशास्त्रविधिमुसृज्य यजतेश्रद्धयान्विताः ॥ तेपांनिष्ठातुकाकृष्णस त्वमाहोरजस्तमः ॥ १ ॥ अन्वयः अर्जुनः उवाच हे कृष्ण ये शास्त्रविधिं उत्सृज्य श्रद्धया न्विताः संतः यजते तेपातुका निष्ठा सत्वं अहोस्वित् रजः किंवातमः॥१॥ टीका. दैवासुर विभाग अध्वामे यह कहा कि, ईश्वरतत्वज्ञान औ उसकी प्राप्तिका उपाय इनका कारण मूल वेदही है औ मत मे कहा कि, जो शास्त्रविधिको छोडिके आपने मानकी इच्छा से कर्म करते हैं उनको सिद्धी औ सुख तथा परमगतीभी न. ही मिलती है सो सुनिके अशास्त्रीय कर्म करनेवालौकी निष्ठा जाननेवास्ते अर्जुन बोलते भये, हे श्रीकृष्ण ने कोई शास्त्र विधि याने वेदमे नही कहा है औलोकरीति अंधपरंपरासरी- खा प्रवते जो कोईभी देवादिकका पाराधन.उसमे श्रद्धा रखिके यजन करते हैं उनकी क्या निष्ठा है क्या स्थिति .. .
गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. २९९ याने कौन आश्रय है, क्या उनका आश्रय तत्वगुण है अथवा रजोगुण है किंवा तमोगुण है सो कहौ. ।। १ ।। मूलम. ॥ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ ॥ त्रिविधाभवति श्रद्धा देहिनांसास्वभावजा ॥ सात्विकीराजसचिव तामसीचेतितांशृणु ॥२॥ अन्वयः श्रीभगवान् उवाच सात्विकी च राजसी च तामसी इ- ति त्रिविधा एव श्रद्धा भवति सा देहिनां स्वभावजा अस्ति तां शृणु ॥ २॥ टीका. अर्जुनका प्रश्न सुनिके भगवान उत्तर देते हैं कि,सात्विकीरा जसीऔ तामसी ऐसे तीनिही प्रकारकी श्रद्धा है सो श्रद्धा देह- धारियोंकी स्वभावसे उत्पन्न है जैसे सात्विकौकी सात्विकी रा. जसौंकी राजसी औ तामसौंकी तामसी उसको तुम क्रम- से सुनौ. ॥ २ ॥ मूलम्. सत्वाऽनुरूपासर्वस्यश्रद्धाभवतिभारत ॥ श्रद्धा. मयोऽयंपुरुषोयोयच्छदःसएवसः ॥३॥ अन्वयः हेभारत सर्वस्य श्रद्धा सत्वानुरूपा भवति अयं पुरुपः- श्रद्धामयः यः यच्छ्रहः तः सएव भवति ॥ ३॥ टीका. हेभारत सर्वमनुष्यमात्रकी श्रद्धासत्वयाने अंतःकरणके श्र- नुरूपही होती है जिसका जैसा प्राचीनवासनासे अंतःकरण है ३०० गीतावाक्याथेबोधिनी भाषाटीका. उसकी श्रद्धाभी वै सिही होती है वह पुरुष श्रद्धामय है जो जि- सश्रद्धायुक्त होय सो वही है याने सात्विकी श्रद्धायुक्त सात्विक राजसीयुक्त राजस तामसीयुक्त तामस होता है. ॥ ३ ॥ मूलम्. यतेसालिकादेवान्यक्षरक्षांसिराजसाः ॥ प्रे तानुभूतगणांश्चान्येयजंतेतामसाजनाः ॥ ४ ॥ अन्वयः सात्विकाःदेवान् यते राजसाः यक्षरक्षांसि यजंते च भन्ये तामसाः जनाः प्रेतान् भूतगणान् यते ॥ ४ ॥ . टीका. सात्विकीश्रद्धावाले सात्विकी देवीको पूजते हैं राजसी- पुरुप यक्षराक्षसीको पूजते हैं औ इनसे विलक्षण औरता मसीलोग भूतप्रेतौंको पूजते हैं. ॥ ४ ॥ मूलम्. अशास्त्रविहितंबोरंतप्यंतेयेतपोजनाः॥ दंभाहं कारसंयुक्ताःकामरागवलान्विताः॥५॥कर्पयं तिशरीरस्थंभूतग्राममचेतसः ॥ मांचैवांतःशरी रस्थतानविद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥ दंभाहंकारसंयुक्ताःकामरागवलान्विताः ये जनाः श्रशा- स्व विहितं घोरं तपः तप्यते ॥ ५ ॥ तेप्रचेतसः शरी- रस्थं भूतमाम च अंतःशारीरस्थं मां एव फर्षयंति ता- न आसुरनिश्चयान् विद्धि ॥ ६ ॥ टीफा. दंभ औ अन्तारकरिके युक्त कामना औ विषयानुरागके य- अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, ३०१ लकरिके संयुक्त ऐसे से मनुष्य प्रशास्त्रविहित याने शास्त्रमे जो व्रतादिक नहीं कहा है ऐसा उपवासादिक घोरतप याने शरीर. पीडाकारक तप करते हैं ॥५॥वै अचेत पुरुपशरीरमे स्थित जो आकाशादि भूतसमूह श्रीमैभी उनका अंतर्यामी व्हेके उनके शरीरहीमे रहता हौं सो वे भूतसमूह ौ मेरेकोभी सुखा- वते याने दुःख देते हैं उनमनुष्योंको ऐसा जानना कि येई प्रासुरि संपत वाले हैं. ॥ ६ ॥ मूलम्. आहारस्त्वपिसर्वस्यत्रिविधोभवतिप्रियः॥यज्ञ स्तपस्तथादानंतेपांभेदमिमंशृणु ॥७॥ अन्वयः पाहार अपि सर्वस्य त्रिविधः प्रियः भवति तु यज्ञः तपः तथादानं अपि तेषां इमं भेदं शृणु ॥ ७ ॥ टीका. आहारभी सर्वप्राणिमात्रके तीनप्रकारका प्रिय होता है औ यज्ञ, तप तथा दानभी तीनतीन प्रकारके हैं इनका भेद- कहौंगा सो सुनौ. ॥ ७ ॥ मूलम. आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्दनाः ॥रस्या स्निग्धाःस्थिराहृद्याआहाराःसात्विकप्रियाः॥ ८॥ अन्वयः आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्याःएवं भूताः आहाराःसास्विकप्रियाःसंति ॥८॥ टीका. जो आहार आयुष्य औ सत्व याने अंतःकरण अर्थात अं . गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. तःकरणकार्य ज्ञान औ वल आरोग्य सुख औ प्रीति इनके बढा- नेवाले नौ मधुरादि स्वादुरसयुक्त स्निग्ध स्थिर याने स्थिर- तासे गुणकारक हृद्य याने अभीष्ट ऐसे आहार सात्विक स- नौको प्रिय हैं. ॥ ८॥ मूलम. कटम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः॥ आ हाराराजसस्येष्टादुःखशोकामयप्रदाः॥९॥ अन्वयः कट्वाललवणाऽत्युप्पतीक्षारक्षविदाहिनः अहारारा जसस्य इष्टाः ते दुःखशोकामयप्रदाः भवंति ॥ ९ ॥ टीका. अतिकडुए अतिखटे अतिवारे अतिगरम अतितीक्षण - ति रुक्ष औ दाहकारक ऐसे श्राहार राजसीलोगोंको प्रिय हैं नौ वै आहार दुःख शोक औ रोगके देनेवाले हैं जैसे कि, दुःस्व तौ तात्कालही कडुये इत्यादिकोंसे प्रसिद्ध है औ शोक पीछेसे शोच करना अहाँ हमने आज अमुक पदार्थ बहुत खायलिया जिसते आज हमारे शरीरमे चैन नही है औ रा- ग जैसे कटकसे वायु अम्लसे पित्त इत्यादिक. ॥ ९ ॥ मूलम्. यातयामंगतरसंपूतिपर्युपितंचयत् ।। उच्छिष्ट मपिचामेध्यंभोजनंतामसप्रियं॥ १०॥ अन्वयः यत् यातयामं गतरसं पूति च पर्युपितं च उच्छिष्टं च अमेध्यं अपि भोजनं तामसप्रियं भवति ॥ १ ॥ टीका.
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ३०३ जो पदार्थ भात इत्यादिक प्रहरका कियाभया याने दिसको करिके एकप्रहर भया होऔ वह ठंढा होगया होय औ जिस-, का रस गया हो जैसे पीना इत्यादिक औ पूति यानेदुर्गंधयु- क पर्युपित याने वासी श्री गुरुमाता पिता वडाभ्राता पीता इ. त्यादिकौंके सेवाय दुसरों जूठा ऐसा अमेध्य याने मेधा जो बुद्धि तिसद्धिका नाशक भोजनतामसीजनौको प्यारा है इस- ते फिरिभी तमोगुण बढता है इसवास्ते ऐसा भोजन श्रेष्ठ सात्विकीजनौंको नकरना चाहिये सात्विकाही आहार कर- ना जिसते सत्वगुण बढता है. ॥ १० ॥ मूलम् अफलाकांक्षिभिर्यज्ञोविधिदृष्टोयइज्यते ॥ य ष्टव्यमेवेतिमनःसमाधायससात्विकः॥११॥ अन्वयः यष्टव्यं एव इति मनः समाधाय अफलाकांक्षिभिः वि. घिदृष्टः यः यज्ञः इज्यते सः सात्विकः ॥ ११ ॥ टीका. यज्ञ करना अपनेको उचित है याने हमारा स्वधर्म है ऐ से मनको लगायके औ फलकांक्षारहित व्हेके शास्त्रविधिपूर्वक मंत्रद्रव्यक्रियादियुक्त जोयज्ञ करनेमे आता सोसात्विक है ११. मूलम. अभिसंधायतुफलंदभार्थमपिचैवयत् ॥इज्यते भरतश्रेष्ठतंयज्ञविद्धिराजसं॥१२॥ हेमरत श्रेष्ठ यत् फलं अभिसंधाय तुदंभाथै अपि च एव इज्यते तं यज्ञं राजसं विद्धि ॥ १२ ॥ अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, टीका. हे अर्जुन ! जोफलकी इच्छाकरिके अथवादभकेवास्तेही यज्ञ करते हैं उसको राजस यज्ञ जानौ. ॥ १२ ॥ मूलम. विधिहीनससृष्टान्नमंत्रहीनमदक्षिणं ॥ श्रद्धावि रहितंयज्ञतामसंपरिचक्षते॥१३॥ अन्वयः विधिहीनं असृष्टान्नं मंत्रहीनं अदक्षिणं श्रद्धाविरहितं एवं भूतं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥ टीका. जो यज्ञविधि हीन औ असृष्टान्न याने जो अन्नादिक चा हिये तिनकरिके हीन मंत्रहीन दक्षिणारहित श्रद्धारहित ऐसे यज्ञको तामस कहते हैं. ॥ १३ ॥ मूलम्. देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनंशौचमार्जवं ॥ ब्रह्मचर्यम हिंसाचशारीरंतपउच्यते॥१४॥ अन्वयः देवदिजगुरुप्राज्ञ पूजनं शौचं आर्जवं ब्रह्मचर्य च अहिं सा इदं तपः शारीरं उच्यते ॥ ११ ॥ टीका. अब तपकोभी सात्विकादि भेदकरिके तीनिप्रकारकाकह- ते हैं जैसे कि, देव ब्राह्मण गुरु विद्वान इनका पूजन शीच सरलस्वभाव ब्रह्मचर्य अहिंसा यह शरीरसंबंधी तप है॥११॥ मूलम्. अनुद्वेगकरंवाक्यंसत्यप्रियहितंचयत् ॥
३०५ गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका. स्वाध्यायाश्यसनंचैवयाड्यंतपउच्यते ॥ १५॥ अन्वयः यत् वाक्यं अनुदेगकरं च सत्यप्रियहितं च स्वाध्याया भ्यसनं एव इदं तपः वाङ्मयं उच्यते ॥ १५ ॥ टीका. जो वाक्य किसीके मनको उद्वेग न करै औ सत्यप्रिय तं- था हितकारक होय औ स्वाध्यायका अभ्यास याने वेदपाठ मंत्रजपादिक यह तप है. ॥ १५॥ मूलम. मनःप्रसादःसौम्यत्वंमौनमात्मविनिग्रहः॥भा वसंशुद्धिरित्येतत्तपोमानसमुच्यते ॥ १६ ॥ अन्वयः मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनं आत्मविनिग्रहः भावसं- शुद्धिः इति एतत् तपः मानसं उच्यते ॥ १६ ॥ टीका. मनकी प्रसन्नता सौम्यत्व याने सबसे अच्छे रहना, मौन मिथ्याभापण न करना,आत्मविनिग्रह याने मनको विपयों- से रोकना, भावसंशुद्धि याने स्वभावकी शुद्धता, यह तप मा- मस याने मनसंबंधी है. ॥ १६ ॥ मूलम्. . श्रद्धयापरयातप्तंतपस्तत्रिविधंनरैः। अफला कांक्षिभिर्युक्तैःसात्विकंपरिचक्षते ॥ १७॥ अन्वयः यत् त्रिविधं तपः अफलाकाक्षिभिः युक्तः नरैः परया श्रद्धया तप्तं तत् सात्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥ ३९ ३०६ गीतावाक्याथेवोधिनी भाषाटीका. टीका. जो कहा है तीनप्रकारका जैसे शरीर, वाणी औ मनका- तप वह तप फलानुसंधानरहित श्रेष्ठमनुष्योंने परम श्रद्धाक रिके किया. तब उसको सात्विक कहते हैं. ॥ १७ ॥ मूलम. सत्कारमानपूजार्थंतपोदंभेनचैवयत् ॥ क्रियतेत दिहप्रोक्तंराजसंचलमध्रुवम् ॥ १८॥ अन्वयः यत् तपः सत्कारमानपूजार्थं च दंभेन एव क्रियते तत् इह राजसं चलं अध्रुवं प्रोक्तं ॥ १८ ॥ टीका, जो तप सत्कार, मान औ पुजावनेकेवास्ते अथवा लोक देखावनेकेवास्ते करते हैं वह तप इस शास्त्र में राजस चला- यमान औ नाशमान कहा है. ॥१८॥ मूलम्. मूढयाहेणात्मनोयत्पीडयाक्रियतेतपः॥ परस्यो त्सादनार्थातत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥ यत् तपः मूढयाहेण आत्मनः पीडया वा परस्य उ- त्सादनार्थ क्रियते तत् तामसं उदाहृतं ॥ १९ ॥ टीका. जो तप दुराग्रहकरिके शरीरपीडाकारक अथवा दूसरेके मारनेकेवास्ते करते हैं, उसको तामस कहते हैं. ॥ १९॥ दातव्यमितियदानंदीयतेऽनुपकारिणे ॥ अन्वयः
गीतावाक्यार्थवोधिनी भापाटीका.
३०७
देशेकालेचपात्रेचतदानंसात्विकस्मृतम् ॥२०॥
अन्वयः
यत् दानं दातव्यं इति बद्धया देशे च कालेच अनुपकारि
णेच पात्रे रक्षकाय दीयते तत् दानं सात्विक स्मृतं ॥ २० ॥
टीका.
अब दानकोभी तीनिप्रकारका कहते हैं,जो दान दातव्यधु-
द्वि करिके याने दान देना सौभाविकधर्म है कुछ फलका प्रयो-
जन नहीं, ऐसा निश्चय करिके देशकुरुक्षेत्रादिक, काल ग्रहणा-
विक,इनमे जिसते फिरि आपना कुछ प्रत्युपकार न होय श्री
वह दातायाने पालनहार अर्थात तप,स्वाध्याय इत्यादिक क-
रिके रक्षक होय उसको देह वह दान सात्विक कहा है.॥२०॥
मूलम.
यत्तुप्रत्युपकारार्थफलमुद्दिश्यवापुनः ॥ दीयते
चपरिळिष्टंतद्राजसमुदाहृतं ॥२१॥
अन्वयः
यत् तु दानं प्रत्युपकारार्थ वा पुनः फलं उदिवय परि
किटं दीयते तत् राजसं उदाहृतं ॥ २१ ॥
टीका,
जो दान प्रत्युपकारके वास्ते अथवा फलप्राप्तिके निमित्त
करिके परिक्लिष्ट याने शेशयुक्तमनसे अथवा राहु इत्यादिनि-
मित्त लोहादि किष्टदान देते हैं,उसको राजसदान कहते हैं. २१
मूलम्.
अदेशकालेयदानमपात्रेभ्यश्चदीयते ॥ अस
त्कृतमवज्ञातंतत्तामसमुदाहृतं ॥२२॥
. इसलोकमे कहीभी सुखदायक नही है. ॥ २८॥ गीतावाक्याथेबोधिना भाषाटाका. यज्ञेतपसिदानेचस्थितिःसदितिचोच्यते ॥ क मचैवतदर्थीयंसदित्येवाभिधीयते॥२७॥ अन्वयः सद्भावे च साधुभावे सत् इति एतत् पदं प्रयुज्यते हेमार्थ तथा प्रशस्ते कर्मणि सच्छब्दः युज्यते ॥२६॥ यज्ञे चतप- 'सिच दाने स्थितिः सत् इति उच्यते च तदर्थीयं कर्म एव सत् इति एव अभिधीयते ॥ २७ ॥ टीका, अब सत्शब्दकी योजना कहते हैं, सद्भाव याने विद्यमान गावमे साधुभाव याने कल्याणार्थकभावमे सत् ऐसा यह पद युक्तकरते हैं,हेप्टथापुत्र!तैसेही श्रेष्ठकर्ममे सत्शब्दको युक्त करते हैं. जैसे कि, सज्जन सत्कर्म इत्यादि ॥२६॥ यज्ञ औ तप भी दान इनमेभी सतशब्द युक्त करते हैं, औ जो कर्म ईश्वरार्थ है उसकोभी सत् कहते हैं. ॥ २७ ॥ मूलम. अश्रद्धयाहुतंदत्तंतपस्तप्तंकृतंचयत् ॥ असदित्युच्यतेपार्थनचतत्प्रेत्यनोइह ॥२८॥ हेपार्थ यत् अश्रद्धया हुतं च धत्तं च तप्तं तपःचछतंतत् अ- सत् इति उच्यते तत् नप्रेत्य नो इह सुखायेत्यर्थः ॥ २८॥ टीका. हे अर्जुन! नो अश्रद्वासे याने श्रद्धाविना होम करे, दान देइ, तप करे; तथा कुच्छभी करै उसको असत् कहते हैं. वह न इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनि पत्सुब्रह्मविद्यायायो अन्वयः ..
गीतावाक्यार्थघोधिनी भापाटीका. ३११
गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयो
योनामसप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकृतायां
श्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थवोधिनीभाषाटीकायांसप्तदशोऽध्या
यः ॥ १७॥
मूलम.
अजुर्नउवाच ॥ ॥ संन्यासस्यमहावाहोतत्त्व
मिच्छामिवेदितुम् ।। त्यागस्यचहपीकेशष्टथक्के
शिनिपूदन ॥१॥
अन्वयः
अर्जुनः उवाच हेमहाबाहो हे हृषीकेश हेकेशिनिपूदनसं-
न्यासस्य च त्यागस्य तत्त्वं पृथक् वेदितुंइच्छामि.॥३॥
टीका.
इस अठारहें अध्यायमे सर्वगीताका सारांश कहेंगे तहां
अर्जुन पूंछते भये कि, हे महाबाहो हेइंद्रियोंकेप्रेरक हेकेशि-
दैत्यकेमारनेवाले भगवन्! संन्यास औ त्यागका तत्व न्यारा
न्यारा कही; मै जानना चाहता हो. ॥ १ ॥
मलम.
श्रीभगवानुवाच॥ ॥काम्यानांकर्मणांन्यासं
संन्यासंकवयोविदुः ॥ सर्वकर्मफलत्यागंप्राहु
स्त्यागंविचक्षणाः॥२॥
अन्वयः
श्रीभगवान उवाच काम्यानां कर्मणांन्यासं तं कवयःसं-
न्यासं विदुःसर्वकर्मफलत्यागंविचक्षणाः त्यागं प्राहः॥२॥
३१२ गीतावाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका. टीका. अर्जुनके वाक्य सुनिके श्रीकृष्णभगवान कहते हैं कि, का- म्य कर्मीका जोन्यास है याने त्याग, उसको कवी जो वि- बेकी हैं वै संन्यास कहते हैं, औ सर्वकमौके फलत्यागको वि- द्वानलोग त्याग कहते हैं. ॥ २ ॥ मूलमू. त्याज्यंदोषवदित्येकेकर्मप्राहुर्मनीपिणः ॥ यज्ञ दानतपःकर्मनत्याज्यमितिचापरे ॥३॥ अन्वयः येके मनीपिपाः दोषवत् कर्म त्याज्यं इति प्राहुः च अपरे मनीषिणःयज्ञदानतपःकर्मन त्याज्यं इतिप्राहुः ॥ ३ टीका. कोई एक ज्ञानी कपिलइत्यादिक कहते हैं कि, हिंसादि वोपयुक्त जो यज्ञादिक कर्म है उसको त्याग करना योग्य है, और दूसरे ज्ञानी कहते हैं कि, यज्ञ, दान, तप, इनको न त्यागना चाहिये. ॥ ३॥ मूलम. निश्चयंशृणुमेतत्रत्यागेभरतसत्तम ॥ त्यागोहिपु रुपव्याघ्रत्रिविधःसंप्रकीर्तितः ॥४॥ यज्ञदान तपःकर्मनत्याज्यंकार्यमेवतत् ॥ यज्ञोदानंतपश्ये वपावनानिमनीपिणां॥ ५ ॥ एतान्यपित्तकर्मा णिसंगत्यकाफलानिच ॥ कर्तव्यानीतिमेपार्थ निश्चितंमतमुत्तमं ॥६॥ अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. ३१३ हेभरतसत्तम तत्र त्यागे म निश्चयं शृण हे पुरुषव्याघ्र हियस्मात् त्यागः त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ तत्त स्मात यज्ञवानतपःकर्म न त्याज्यं किंतु कार्यमेव किं चयज्ञःदानं तपःमनीषिणां एवं पादनानि॥५॥ तु किंतु हेपार्थ एतानि अपि कर्माणि संगं त्यका च फलानि त्यत्का कर्तव्यानि इति मे निश्चितं उत्तम मतं अस्ति ॥६॥ टीका. हे अर्जुन! तहां उस त्यागविषयमे मेरा निश्चयसुनौ. हे पुरु- पौमश्रष्ठ जितवास्ते कि त्याग तीन प्रकारका है यानेफलत्याग कर्तृत्वत्याग औ पमतत्वत्याग ऐसे तीनप्रकारके है ॥१॥इसी वास्ते यज्ञ, दान औ तप इनकीका त्यागना न चाहिये क्योंकियै करनेयोग्य ही हैं सबव यज्ञ दान औ तपय ज्ञानी जनौं केही पवित्र करनेवाले हैं ॥५॥औरभी कहताहाँ कि,हे पार्थ!इन कमौकाभी संग याने कौमे ममता मौ फलौकात्या- गकरिके कर्म करना वहमेरा निश्चय उत्तम मत है. ॥ ६ ॥ मूलम. नियतस्यतुसंन्यासःकर्मणानोपपद्यते ॥ मोहा त्तस्यपरित्यागस्तामसःपरिकीर्तितः॥७॥ अन्वयः तु किंतु नियतस्य कर्मणः संन्यासः न उपपद्यते किंच मोहात् तस्य परित्यागः तामतः परिकीर्तितः॥ ७ ॥ टीका. औरभी कहने हैं, नियत जो करनाही चाहिये नित्य नै मितिक पंचमहायज्ञ देवाराधारूप कर्म इसका संन्यास याने
३१४
गीतांवाक्यार्थबोधिनी भपाटीका.
त्याग नही हो सकता है क्योंकि, भगवानने प्रथमही कहा
कि ॥ शरीरयात्रापिचतेनप्रसिध्येदकर्मणः ॥ अर्थ जो सर्व-
था कर्म न करेंगे तो शरीरकाभी रहना न होयगा जो कहौ
गे कि यज्ञादिक हिंसात्मकहैं इनको कियविना भोजनादिक
करते रहै तौभी शरीर रहहीगा तहांभी कहा है कि ॥ यज्ञ
शिष्टाऽमृतभुजोयांतिब्रह्मसनातनं ॥ यज्ञशिष्टाशिनःसंतोमु
च्यतेसर्वकिल्विषैः ॥ भुंजतेतेत्वघंपापायेपचंत्यात्मकारणात् ॥
इत्यादिवाक्यौंकरिके यह सिद्ध भया कि, यज्ञादिकर्मका त्याग
कोई कालमेभी न करना जो मोहसे त्याग करै तो वह त्याग
तामस है, तामसी त्यागसे अधोगति होती है. ॥ ७ ॥
मूलम.
दुःखमित्येवयत्कर्मकायक्लेशभयात्यजेत् ॥ सक
वाराजसंत्य गनैवत्यागफलंलभेत् ॥८॥
अन्वयः
यः दुःखं इति यत् यत् कायक्लेशभयात् एव कर्म त्यजेत् सः
राजसं त्यागं रुत्वा त्यागफलं न एव लभेत् ॥ ८॥
टीका,
जो ऐसा विचारे कि कर्मकरनेमे अनेक पदार्थ चाहिये
'एस दुःख होयगाइसवास्ते ज्ञानसाधनही करना. यद्यपि मोक्ष
साधन है तथापि वर्णाश्रमोचितकर्ममे शरीर दुःखहै ऐसी
बुद्धिसे जो कर्मत्यागता है वह राजसीत्याग है; उसराजसी-
.त्यागको करिके त्यागका फलजो मोक्ष सोनही पावताहै.
मूलम्
कार्यमित्येवयत्कर्मनियतंक्रियतेर्जुन ॥ संगत्य
काफलंचवसत्यागःसात्विकोमतः॥९॥
।
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
अन्वयः
हेअर्जुन संगं च फलं त्यक्ता यत् कर्म कार्य एव इदि बु-
दया कियते सः त्यागः सात्विकः मतः ॥ ९ ॥
टीका.
हे अर्जुन!कर्ममे ममता त्यागिके ो फलकोभीत्यागिके जो
कर्म करने जोग्यही है ऐसा जानिके करै तात्याग सात्विक है।९॥
मूलम.
नद्वेट्यकुशलंकर्मकुशलेनानुसज्जते ॥ त्यागीस
त्वसमाविष्टोमेधावीछिन्नसंशयः॥१०॥
अन्वयः
यःसत्वसमाविष्टः मेधाची छिन्नसंशयःसःकर्मफलासंग
त्यागी सः अकुशलं कर्म न हेष्टि कुशले न अनुसज्जते॥१०॥
टीका.
अब सात्विक त्याग करनेवाले के लक्षण कहते हैं जो सत्वगु-
एकरिके व्याप्त है औ बुद्धिमान है औ जिसके संशय नष्ट भये
है तथा कर्मके फल औ ममताकोभी त्याग किया है जिसने ऐ-
सा पुरुष अकुशल कर्म याने संसारकी प्राप्ति करनेवाले विपया-
दिक इनसे भी नहीं करता है औ कुशलजो मोक्षदायक यज्ञ-
तप दानादिक इनमे आसक्तभीनहीं होता है. ॥१॥
मूलम्.
नहिदेहभृताशक्यंत्यक्तंकर्माण्यशेषतः॥ यस्तु
कर्मफलत्यागीसत्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
अन्वयः
हियतःदेहभृता अशेषतः कर्माणि त्यतुं न शक्यं अतः तु
यःकर्मफलत्यागीसा त्यागी इति अभिधीयते ॥ ११॥
गीतावाक्याबोधिनी भापाटाका. टीका, जिसतेकिदेहधारीमात्र सर्व कर्म त्याग किया है वही त्यागी इसी वास्ते जिसने कर्मफलका त्याग किया है वही त्यागी है.॥११॥ मूलम्. अनिष्टमिष्टंमिश्रंचत्रिविधंकर्मणःफलं ॥ भवत्य त्यागिनांप्रेत्यनचसंन्यासिनांकचित् ॥१२॥ अन्वयः अनिष्टं इष्टं च मिश्रं एवं कर्मणः फलं त्रिविधं भवति तत् अत्यागिनां प्रेत्यभरति च संन्यासिनो कचित् न भवति १२ टीका. अनिष्ठ अधोगतिदायक,इट स्वर्गदायक,मिश्रपुत्रादिदायक ऐसे कर्मका फल तीनप्रकारका है सो अत्यागी जो कर्मफला- नुसंगी हैं उनको देहत्यागेपीछे होता है औ फलत्यागिनको न इसलोकमे न परलोकमे काहीभी बंधनकारक नहीं है. ॥१२॥ मूलम. पंचैतानिमहावाहोकारणानिनिबोध ॥ सांख्ये कृतांतेप्रोक्तानिसिद्धयेसर्वकर्मणां ॥१३॥ अन्वयः हेमहाबाहोसकर्मणां सिद्धये एतानि पंच कारणानि सा ख्येरुतांते प्रोक्तानि तानि मे निवोध ॥ १३ ॥ टीका. हेमहावाहो! सर्वकाँकी सिद्धिकेवारते थे पांच कारण सां रव्यशास्त्रमे कहे हैं वै मेरेसे तुम जानो याने मै जानी याने मै कहता हाँ तुम सुनौ. ॥ १३॥ मलम. अधिष्ठांनंनथाकतीकारणंचष्टयग्विधं ॥ विवि .
गीतावास्यर्थबोधिनी भापाटीया. ३१७ धाचष्टयक्चेष्टादेवथैवानपंचमं ॥ १४॥ शरीर वामनभर्यत्कर्मप्रारभतेनरः ॥ न्याय्यंवा विपरीतंवापंचैतेतस्यहेतवः ॥१५॥ अन्वया तान्येव कारणान्याह अधिष्ठान तथा कर्ता च प्याविध कारणं च विविधा पृथक् चेष्टा च अत्र पंचमं देवं एव ॥१४॥ यत् नरःशरीरवाइमनोभिः न्याय्यं वा बिपरीतं बाकर्म प्रारभते तस्य कर्मणः एते पंचहेतवः सति ॥१५॥ टीका. अब वै पांचौ कारण कहते हैं अधिष्ठान याने शरीर क- ी जीव कोई एक कर्ता अंतःकाणकोभी कहते हैं तहां भी अंतःकरणाभिमानी जीवही भया इस जीवका कापना सूत्रसिद्ध है तो ब्रह्मसूत्रभी लिखता हौं ॥ ज्ञोतएवचक शा- स्वार्थत्वात् ॥इति औन्यारान्यारा कारण याने मनसहितपंचक. मइंद्रियोंकाव्यापार औ अनेक प्रकारकी न्यारीन्यारी चेष्टा या- ने पंचप्राण वायुकी चेष्टा औ इहां पांचया देव याने अंतर्यामी परमात्मा सो इसीगीताशास्त्रहीमे कहा है.सर्वस्यचादितनि विष्टमित्तःस्मृत्तिानमपोदनंच ॥ औ कहेंगेभी। ईश्वरःसर्वभूता नादेशेऽर्जुनतिष्ठति ॥भ्रामयन्सर्वभूतानियंत्रारूढानिमायया ॥इसकरिके जीवका कापना परमात्माके स्वाधीन भया ब्रह्म सूत्रभी कहता है,परानुतच्छ्रुतेःइ हो शंका करते हैं कि,जो जीवा- त्माका कर्तृत्व परमात्माके आधीन है तो जीवात्मा शुभाशुभ कर्म क्यों भोगता है तहाँ सूत्रहीमे कहा है कि । कृतप्रयत्नापे- क्षस्तुविहितनिषिद्धावैयादिभ्यः इति ॥ अर्थ परमात्माने दिये औ परमात्माही है आधार जिनका ऐसे दंद्रिय शरीरादिक ३१८ गीतावास्याथेवोधिनी भाषाटीका. औ उनमे परमात्माहीकी शक्तिहै औ वह जीवात्माभी उसी प. रमात्माकेआधार है औ परमात्माहीकी उसमे शक्ति है ऐसाजी- वात्माअपनी इच्छाकरिके कर्म उत्पत्तिके वास्ते उनशरीरई दियौंकरिक प्रयत्न करता है औ आप परमात्मा उस जीवात्मा के अंतःकरणमे प्रवेश भयावा अनुमति देता है उसवास्तेजी वात्माकाभी स्वबुद्धिकर्तृत्व सिदभया ॥ १४ ॥ जो मनुष्य श- रीर,वाणी औ मन करिके न्याय अथवा अन्यायरूप कर्म करता है उसकर्मकैसे पांच कारण है. ॥ १५ ॥ मूलम. तत्रैवंसतिकारमात्मानंकेवलंतुयः ॥ पश्य त्यकृतबुद्धित्वान्नसपश्यतिदुर्मतिः ॥ १६ ॥ अन्वयः एवं सतितत्र यः केवलं आत्मानं कर्तारंपश्यति सःदुर्म तिः अरुतबुद्धित्वात् न पश्यति ॥ १६ ॥ टीका. जहां ऐसे पांच कारण कहे हैं तहां जो केवल आत्माको की करिके देखता है वह दुर्मती पुरुष अरुतबुद्धि याने यथार्थ वस्तुको उसकी बुद्धि निश्चय नही कर सकती है ऐला. तुष्य नहीं देखता है याने उसको मूझता नही अर्थात् अ- ज्ञानधिह. ॥ १६ ॥ मूलम्. यस्यनाहंकतोभावोबुद्धिर्यस्यनलिप्यते ॥ह त्वापिसइमाल्लोकान्नहतिननिवष्यते ॥ १७॥ अन्धयः यस्प अहंरूतः भावः न यस्य बुद्धिः न लिप्यते सः इमा ..
गीताबाक्यार्थबोधिनी भागाटीका.
न लोकान् अपि हत्वा न हंति न निवध्यते ॥ १७ ॥
टीका.
जिसके अहंकतभाव याने मै कहीं ऐसाभाव नहीं हैं श्री
जिसकी बुद्धि कर्ममे लिप्त न होय याने कर्ममे ममत्वबुद्धि न
होय सो जो इन सबलोकोंको मार तौभी न वह किसीको मा-
रता है औ न यह युद्धरूप कर्मले बंधनको प्राप्त होता है. तात्पर्य
कि
तुम भानादिकों के मारनेहीमे पापसे डन्ते हो परंतु अहंता
मनारहित पुरुषको लोक हिंसावामी भय नहीं है. ॥ १७॥
मूलमू.
ज्ञानज्ञेयंपरिज्ञातात्रिविधाकर्मचोदना ॥ करणं
कर्मकर्तेतित्रिविधःकर्मसंग्रहः ॥ १८॥
अन्वयः
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता इति त्रिविधा कर्मचोदना अस्तिक
रणं कर्म का इति त्रिविधः कर्मसंग्रहः अस्ति ॥ १८॥
टीका,
यह सर्व अकर्तृत्व इत्यादिक अनुसंधान सत्वगुण दिसे
होता है ऐसे सत्वगुणकी गृहणता जनावनेके वास्ते कर्ममे सत्व-
गुण,रजोगुण औ तमोगुण इनकी करीभई विषमताको विस्तार
कहते कहते प्रथम कर्मप्रवृत्ति कहते हैज्ञान याने करने योग्यक
मकी विधि जानना, ज्ञेय याने करने योग्य कर्मपरिज्ञाता उ-
सकर्मका जाननेवाला ऐसे तीन प्रकारका कर्मकी प्रवृत्ति है
तहां जाननेयोग्य जो कर्म सो तीनप्रकारका कहते है. कारण
याने यज्ञसाधन द्रव्यांदिक कर्म योगादिक करता उसके .
नुष्ठान करनेवाला तीन प्रकार कर्मका संग्रह याने कर्मका
आश्रय है. ॥ १८॥
३२०
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका,
ज्ञानकर्मचकतेतित्रिधैवगुणभेदतः ॥ प्रोच्यतेगु
णसंख्यानेयथावच्छृणुतान्यपि ॥ १९॥
अन्वयः
.
ज्ञानं कर्म औ कर्ता इति गुणसंख्याने गुणभेदतः त्रिधा
एव प्रोज्यते तानि अपि यथावत् शृणु ॥ १९ ॥
टीका.
ज्ञान कर्म औ कती है साख्यशास्त्र मे तीन प्रकारके कहे
है तिनकोभी तुम यथाशास्त्र सुनौ, याने उसशास्त्रमे जैसे
कहे हैं तैसे सुनौ. ॥ १९ ॥
मूलम्.
सर्वभूतपुयनैकभावमव्ययमीक्षते ॥ अविभक्तवि
भक्तपुतज्ज्ञानं विद्धिसात्विकं ॥ २० ॥
अन्वयः
येन ज्ञानेन विभक्तेषु सर्वभूतेषुएक अविभक्तं अव्ययं
भावं ईक्षते तर ज्ञान सात्विकं विद्धि ॥ २० ॥
टीका.
जिसज्ञानकरिके ब्राह्मण,क्षत्रिय,गृहस्थ, ब्रह्मचारी इत्यादि
विभागयुक्त भूतप्राणी मात्र कर्मके अधिकारियोंम एक आत्मा
नामक भाव है तहांभी विभागरहित याने ब्राह्मणादिक शरी
र पारे न्यारे हैं तौभी आत्मा सर्वत्र एकरूप है औ अविनाशी
है. ऐसा जो भाव देखता है सो ज्ञान साविक है. ॥ २ ॥
मूलम्.
पृथक्वेनतुयज्ज्ञाननानाभावान्पृथग्विधान् ॥वे
त्तिसपुभूतेपुतज्ज्ञानं विद्विराजसं ॥ २१ ॥
गीतावाक्यर्थवोधिनी भापाटीका. ३२१ अन्वयः यत् तु पृथक्वेन ज्ञानं येन ज्ञानेन सर्वेषु भूतेषु पृथग्वि धान नानाभावान वेत्ति तत् ज्ञानं राजसं विद्धि ॥२१॥ टीका. यत् पृथक्केन ज्ञानं जो जुदापनकरिके ज्ञान है जिस ज्ञा- नकरिके ब्राह्मणादिक सर्वभूतौमे न्यारेन्यारे नानाप्रकारके भाव जानता है याने यह आत्मा ब्राह्मण है,क्षत्रिय है,बडा है,छोटा है, ऐसे शरीरसंबंधसे श्रात्माकोभी अनेकप्रकारका जानता है श्री कर्माधिकारसमयमेभी अनेकप्रकारके न्यारेन्यारे फल देखता है सो ज्ञान राजस है. ॥ २१ ॥ मूलम. यत्तुत्कृस्रवदेकस्मिन्कार्येसक्तमहैतुकं ॥ अत त्वार्थवदल्पंचतत्तामसमुदाहृतं ॥२२॥ यत् तु एकस्मिन् कार्ये कृत्स्नवत् सक्तं अहैतुकं श्रत स्वार्थवत् च अल्पं तत् तामसं उदाहृतं ॥ २२ ॥ टीका, जोज्ञान एकही कार्यमे याने भूतादिक आराधनरूपकार्य- मे सर्वफलवानकी तरह आसक्त औ हेतुरहित औ तत्वज्ञान रहित अल्पफलदायक सो तामस है याने एक कोई तुच्छदे- यसाका आराधनकरिके उसीमे सर्व मोक्ष स्वर्ग औ धनादि कभी चाहते हैं वह तामस है. ॥ २२ ॥ मूलम. नियतंसंगरहितमरागद्वेपतःकृतं ॥ अफलने प्सुनाकर्मयत्तत्सात्विकमुच्यते ॥२३॥ अन्वयः . ३२२ गीतावास्यार्थबोधिनी भाषाटीका, अन्वयः यत् कर्म अफलप्रेप्सुना नियतं संगरहितं अरागद्वेषतः कृतं तत् सात्विकं उच्यते ॥ २३ ॥ टीका, जो कर्म फलइच्छा न करनेवाले पुरुषने नियत याने वि. हित औ ममतारहित औ रागद्वेषविना किया है उसको सा. त्विक कहते हैं याने जो कर्म अपनेको करनाहि उचित है उसमें ममता औ उसका फल त्यागिके रागद्वेषविना याने आसक्ती औ तिरस्कारविना स्वधर्म जानिके करता है सो कर्म सात्विक है ऐसे कहा है. ॥ २३ ॥ मूलम्. यत्तुकामेप्सुनाकर्मसाहंकारेणवापुनः ॥ क्रिय तेबहुलायासंतद्राजसमुदाहृतं ॥२४॥ अन्वयः यत् तु बहुलायासं कर्म कामेप्सुना वा पुनः साहंका- रेण क्रियते तत् राजसं उदाहृतं ॥ २४ ॥ टीका. जोधहुत परिश्रम साध्यकर्ममे कामनाकी इच्छाकरिके औ अहंकारकरिके कि, मेरेविना ऐसा कर्म कौन करिसकता है ऐती बुद्धिसे करते हैं वह राजस कर्म कहता है. ॥ २४ ॥ मूलम् अनुबंधक्षयहिंसामनवेक्ष्यचपौरुषं ॥ मोहादार भतेकर्मयत्ततामसमुच्यते ॥ २५॥ अनुबंधं क्षयं हिंसा च पौरुष अनवेक्ष्य मोहात् यत् कर्म अन्वयः गीतावास्थार्थबोधिनी भाषाठीका. श्रारभते तत् तामसं उच्यते. ॥ २५ ॥ टीका. जो अनुबंध याने कर्म कियेपीछे दुःख क्षय आपके द्रव्य- का खर्च हिंसा उसकर्ममे प्राणीमात्रको पीडा पौरुष कर्म समाप्त करनेकी समर्थता इनको देखेविना मोहसे जो कर्म का प्रारंभ करते हैं सो तामसकर्म है. ॥ २५॥ मूलम्. मुक्तसंगोऽनहंवादीधृत्युत्साहसमन्वितः॥सि यसिद्धयोनिर्विकार क सात्विकउच्यते ॥२६॥ अन्वयः यःमुक्तसंगः अनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः सिद्धय- सिद्धयोः निर्विकारः सः कर्त्ता सात्विकः उच्यते ॥ २६ ॥ टीका. जो का याने करनेवाला पुरुष फलसंगरहित औ कर्चा पनके अहंकारकरिके रहित धीरज औ उत्साहकरिके युक्त तथा सिद्धि औ असिदिमे विकाररहित होय सो का सा- त्विक कहता है. ॥ २६ ॥ मूलम. रागीकर्मफलप्सुर्लुब्धोहिंसात्मकोऽशुचिः॥ हर्यशोकान्वितःक राजसःपरिकीर्तितः ॥२७॥ यः कर्ता रागी कर्मफलप्रेप्सुः लुब्धःहिंसात्मकः पशु- चिः हर्षशोकान्वितः सः राजप्तः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥ टीका, जो कर्ता रागी याने यशकी इच्छा करनेवाला औकर्मफल अन्वयः ३२४ गीतावाक्यार्थबोधिनी भपाटीका, चाहनेवाला लोभी याने जेतना द्रव्य खर्च करना चाहिये व- तना उसकर्ममे न खर्चकरनेवाला, हिंसात्मक याने दूसरोंको पीड़ित करिके कर्मकरनेवाला, अशुचि कर्ममे कहे प्रमाण प. वित्रताको न करनेवाला औ सिद्धि तथा असिद्धिके निमित्त हर्षशोकयुक्त होय सो राजस है ऐसा कहा है. ॥ २७ ॥ मूलम. अयुक्तःप्राकृतःस्तब्धःशठोनैष्कृतिकोऽलसः ॥ विषादीदीर्घसूत्रीचकर्तातामसउच्यते ॥ २८॥ अन्वयः यः कर्ता अयुक्तः प्राकृतःस्तब्धः शठः नैष्कृतिकः अल- सः विषादी व दीर्घसूत्री सः तामतः उच्यते ॥ २८ ॥ टीका. जो का शास्त्रोक्तकर्मके अयोग्य औ विद्या न पढाभया अनम्र अभिचारादिक कौमे रुचिकरनेवाला ठग आलसी विपाद करनेवाला औ एकदिनके कामको महीनेमे करनेवाला होय उसको तामस कहते हैं. ॥ २८ ॥ मूलम्.. बुद्धेर्भेदंघृतेश्चैवगुणतस्त्रिविधंशृणु ॥ प्रोच्यमा नमशेपेणटयकेनधनंजय ॥२९॥ हेधनंजय अशेपेण मयाप्रोच्यमानं पृथक्केन गुणतः त्रि- विधं बुद्धेः च वृतेः एव भेदं शृणु ॥ २९ ॥ टीका. हेधनंजय याने हे अर्जुन! अशेष याने आदिअंतसे मेरा क- हाभया न्यारान्यारा गुपों करिके तीनप्रकारका ऐसा जो बुद्धि- अन्वयः।
अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनीभापाटीका. का औ धारणाका भेद है सो सुनौ. ॥ २९ ॥ मूलम. प्रतिंचनिवृत्तिंचकार्याकार्येभयाऽभये ॥ वंधं मोक्षचयावेत्तिबुद्धिःसापार्थसात्विकी ॥३०॥ हे पार्थ या बुद्धिः प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्य भया ऽभये बंधं च मोक्षं वेत्ति सा सात्विकीबुद्धिः ॥ ३० ॥ टीका. हेअर्जुन! जो बुद्धि प्रवृत्ति औ निवृत्ति तथा कार्य औ अ- कार्य भय श्री अभय बंध औ मोक्ष इनको जानै सो सात्वि- कीबुद्धि है. ॥ ३०॥ मूलम. ययाधर्ममधर्मचकार्यचाकार्यमेव ॥ अय थावत्प्रजानातिवुद्धिःसापार्थराजसी॥३१॥ हे पार्थ यया बुद्ध्या नरः धर्म च अधर्म कार्य च प्रकार्य एव अयथावत् प्रजानाति सा बुद्धिः राजसी ॥ ३१ ॥ टीका. हे अर्जुन! जिसबुद्धिकरिके मनुष्य धर्म औ अधर्म,कार्य औ. अकार्य,इनको निश्चय न जानिसकै सो बुद्धि राजसी है.॥३१॥ मूलम. अधर्मधर्ममितियामन्यतेतमसाटता ॥ सर्वा र्थाविपरीतांश्चवुद्धिःसापार्थतामसी ॥३२॥ अन्वयः . अन्वयः हे पार्थ या बुद्धिःतमता वृता अधर्म धर्म इति मन्यतेच
गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका.
सर्वार्थान् विपरीतान् मन्यते सावुदिः तामसी ॥ ३२॥
टीका.
.
हे अर्जुन! जो बुद्धि अज्ञानसे लपटी भईहुई अधर्मको धर्म
औ धर्मको अधर्म मानौ औ इसीतरह सर्व पदार्थों को उलटे
ही जानै सो बुद्धि तामसी है. ॥ ३२ ॥
मूलम्.
धृत्याययाधारयतेमनःप्राणेंद्रियक्रियाः ॥ यो
गेनाऽव्यभिचारिण्याधुतिःसापार्थसात्विकी ॥३३॥
अन्वयः
हे पार्थ नरः यया अभिचारिण्या धृत्या योगेन मनः प्रा-
पद्रियक्रियाः धारयते सा धृतिः सात्विकी ॥ ३३ ॥
टीका.
हे पथातनय! मनुष्य जिस अखंड मोक्षसाधनभूत धारणा
करिके योगबलसे मन, प्राण औ इंद्रिय इनकी क्रियाको धार-
ण करै सो धारणा सात्विकी ॥ ३३ ॥
मूलम्.
ययातुधर्मकामार्थान्धृत्याधारयतेनरः ॥ प्रसं
गेनफलाकांक्षीधृतिःसापार्थराजसी ॥ ३४ ॥
अन्वयः
हे पार्थ फलाकांक्षी नरः फलाकांक्षाप्रसंगेन यया धृत्या
धर्मकामार्थान् धारयते सा धृतिः राजसी ॥ ३४ ॥
टीका.
हे अर्जुन! फलकी इच्छा करनेवाला उस फलइच्छाके प्रसं
गकरिके जिस धारणाकरिके धर्म काम, औ अर्थ इनको धार-
ण करता है सो धारणा राजसी है. ॥ ३४ ॥
गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. ३२७ मूलम्. ययास्वप्नभयंशोकविपादमदमेवच ॥ नविमुं चतिदुर्मेधाधृतिःसातामसीमता ॥ ३५॥ अन्वयः दुर्मेधाः पुरुषः यया धृत्या स्वप्नं भयं शोक विपादं च मदं एव न विमुंचति सा धृतिः तामसी मता ॥ ३५॥ टीका. दुष्ट है मेधा याने बुद्धि जिकसी ऐसा पुरुष जिस धारणा करिके स्वप्न, भय, शोक विपाद, श्रीमद, याने गर्व नहीं छोडता है अर्थात् इन स्वप्नादिकोंके साधनरूप कर्म वारंवार करता है सो धारणा तामसी है. ॥ ३५ ॥ मूलम. सुखंविदानींत्रिविधंशृणुमेभरतर्षभ ॥ अ भ्यासाद्रमतेयत्रदुःखांतंचनिगच्छति ॥ ३६॥ यत्तदविपमिवपरिणामेऽमृतोपमं ॥ तत्सुखं सात्विकंप्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजं ॥ ३७॥ अन्वयः हे भरतर्पभ! इदानीं सुखं अपि त्रिविधं मे मत्तः शृणु , यत्र सुरखे अभ्यासात रमते च दुरांतं निगच्छति ।। ३६ ।। यत तदये विपं इव परिणामे अमृतं इव तत् आत्मघु- दि प्रसादनं सुखं सात्विकं प्रोक्तं ॥ ३७ ॥ टीका. हे भरतवंशमे श्रेष्ठ! अब सुखभी तीन प्रकारका मेरेसे सुनौ. जिससुखमे अभ्यास करनेसे बहुतकालमे मन रमता है औ भया जो सुख अन्वयः ३२८ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. दुःखकेभी अंतको प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥ औजो सुख प्रथम उसके साधनकालमे विषसदृश्य कारण कि मनका संयमादिक करनेमे दुःख होता है इसवास्ते प्रथम विपतुल्य प्राप्ति औपरि- पाममे अमृततुल्य अर्थात् जब अत्मस्वरूपकी प्राप्ति भई तव अमृतवत् भया सो आत्मा संबंधी बुद्धिकी प्रसन्नतासे प्राप्त सो सात्विक है. मूलम. विपयेंद्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमं । परिणा मेविषमिवतत्सुखंराजसंस्मृतं ॥ ३८॥ यत् सुखं विषयेंद्रियसंयोगात् तदने अमृतोपमं परि- णामे विपमिव तत् सुखं राजसं स्मृतं ॥ ३८ ॥ टीका. जो सुख विपय इंद्रियों के संयोगसे प्रथम अमृततुल्य औ परिणाममे उसका फल संसारदुःख इसवास्ते विषतुल्य होता है सो मुख राजस है. ॥ ३८ ॥ मूलम्. यदयेचानुबंधेचसुखमाहनमात्मनः ॥ निद्राल स्यप्रमादोत्यंततामसमुदाहृतं ॥ ३९ ॥ अन्वयः यत्सुखं प्रयच अनुबंधे अपि आत्मनः मोहनं तत् निद्रा लस्यप्रमादोत्थं सुखं तामसं उदाहतं ॥ ३९ ॥ टीका. जो सुख प्रारंभमे औ अंत परिणाममेभी मनका मोहनेवाला याने अचेत करने वाला सोनिद्रा, आलस औ प्रसाद जिसमे उसको ता. गीतापक्यार्थबोधिनी भापाटीका. कृत्याकृत्यका विवेक न रहै इसको प्रमाद कहते हैं, सो इन निद्रा, आलस औ प्रमादसे उत्पन्न भया जो सुख मस कहते हैं. ॥ ३९ ॥ मूलम. नतदस्तिष्टथिव्यांवादिविदेवेपुवापुनः॥ सत्वंप्र. कृतिजैर्मुक्तंयदेभिःस्यात्रिभिर्गुणैः ॥४०॥ अन्वयः यत् सत्वं एभिःप्रकृतिजैः त्रिभिः गुणैः मुक्तं तत् प्रथि व्यां वा दिवि चा पुनः देवेषु न अस्ति ॥ १० ॥ टीका. जो प्राणीमात्र इन प्रकृतिजन्य तीनौ गुणोकरिके छुटा है सो पृथ्वीमे अथवा स्वर्गमे अथवा ब्रह्मलोकपर्यंत देवतौं भी नही है. ॥४०॥ मूलम् ब्राह्मणक्षत्रियविशांशूद्राणांचपरंतप ॥ कर्मा णिप्रविभक्कानिस्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥४१॥ अन्वयः हे परंतप अर्जुन ब्राह्मणक्षत्रियविशां च शूद्राणां स्वभा- वप्रभवैः गुणः कर्माणि प्रविभक्तानि ॥ ११ ॥ टीका. हे परंतप अर्जुन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य प्रौ शूद इनके स्व- भावसे याने ब्राह्मणादिक जन्महेनुकस्वभावसे उत्पन्न भये जो गुण तिनकरिके कम काभी विभाग किया है- ॥ ११ ॥ मूलम. शमोदमस्तपःशीचंक्षांतिरार्जवमेवच ॥ ज्ञानवि ..
३३० गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ज्ञानमास्तिक्यंब्रह्मकर्मस्वसात्वजं ॥४२॥ अन्वयः शमः दमः तपः शौचं क्षांतिः च आर्जुवं ज्ञानं विज्ञानं आस्तिक्यं इति ब्रह्मकर्म स्वभावजं एव ॥ ४२ ॥ टीका. शम बाहेरकी इंद्रियोंको नेममे रखना, दम अंतःकरणको नियममे रखना, तप भोगौंका नेमशास्त्रप्रमाण कायक्वंश शौच शास्त्रोक्तकर्म करने की योग्यताकेवास्ते बाहेर औ अंतःकरणकी शुद्धि क्षांति, क्षमा, आर्जव सर्वसे सीधे रहना, ज्ञान परावरतस्व- निश्चयरूप विज्ञान परतत्वविपे विशेपताजानिके उसकी भक्ति करना, आस्तिक्य याने वैदिकवाक्यौमे सत्यता यह ब्राह्मणका स्वाभाविक धर्म है. ॥ १२ ॥ मूलम् शौर्यतेजोधृतिर्दाक्ष्यंयुद्धेचाप्यपलायनं ॥ दानमीश्वरभावश्चक्षाकर्मस्वभावजं ॥४३॥ शौर्य तेजः धृतिःदाक्ष्यं च युद्धे अपि अपलायनं दानं च ईश्वरभावः इति क्षात्रं कर्म स्वभावजं अस्ति ॥४३॥ टीका. शूरवीरपना याने युद्धमे निर्भय व्हेके प्रवेश करना, तेज याने जिसके सामने दूसरे डरते डरते खडे रहैं, धृति धीरज याने युद्धा दिकमे कुछ विघ्न देखिके घबडानानही,दाक्ष्यसमस्तकार्यकरने- मेचातुर्य,युद्ध अपि अपलायनं याने युद्धमे आपके मृत्युपर्यंतभी भागंना नही,दानं उदारता ईश्वरभाव सबको आपके स्वाधीन र खनेकी समर्थता, यह क्षत्रियका सौभाविक कर्महै याने जिसपूर्व अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भाषाटीका. ३३१ कमसे क्षत्रियजन्म भया उसी कर्मसे यह स्वभाव पैदा है.॥४२॥ मूलम. कृषिगोरक्ष्यवाज्यवैश्यकर्मस्वभावज ॥ परिचर्यात्मकंकर्मशूद्रस्यापिस्वभाव ४४॥ अन्वयः रुपिगोरक्ष्यवाणिज्यं इति वैदयकर्म स्वभाव अस्ति प. रिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्य अपि स्वभावअस्ति ॥४॥ टीका. कृषि खेतीकरना, गोरक्ष्य गौ पालना उनके दूध दही वैगरे- से जीविका करना, वाणिज्य याने सौदा लेना वेचना इत्या- दिक वैदयका कर्म स्वभावहीसे नौ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य इ- न तीनौ वर्णकी परिचर्या याने चाकरी करना, यह शूदका कर्म स्वभावहीसे. है. ॥ ४४ ॥ मूलम. स्वेस्वेकर्मण्यभिरतःसिदिलभतेनरः॥स्वकर्म निरतःसिद्धियथाविंदतितच्छणु॥४५॥ यतः प्रवृत्ति तानांयेनसर्वमिदंततं ॥ स्वकमणात मध्यर्च्यसिदिविंदतिमानवः॥४६॥ प्रन्यमः स्वे स्वे कर्मणि अभिरतः नरः संसिद्धि लभते स्वकर्म- निरतः यया सिद्धिं विदति तत् शृणु॥ ४५ ॥ यतः सकाशात भूतानां प्रवृत्तिः येन इदं सर्व ततं तं स्थक- मणा अभ्यर्च्य मानवः सिद्धि विंदति ॥ १६ ॥ टीका. प्रापआपके कामे लगे रहनेसे मनुष्यसिद्धिवाने परमपद ३३२ गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. मोक्षको प्राप्त होता है सोजैसे आपके कर्ममे निरत भयाहुवा सिद्धिको प्राप्त होता है सो सुनौ ॥ ४५ ॥ जिसपरमात्मासे इन भूतप्राणीमात्रौंकी प्रवृत्ति याने उत्पनि रक्षा प्रलय है औ जिसकरिके यह सर्व जगप्त व्याप्त है उसका आपके स्वकर्मस श्राराधन करिके पनुष्य परमपद पावता है अर्थात् यह परमा- स्मा मै हौ मेरेको पूजिके सिद्धि पावोगे, मेरी आज्ञामे रहो सो प्रथमही कहा है। अहंसर्वस्यजगतः प्रभवःप्रलयस्तथा ॥ मत्तः परतरंनान्यत्किचिदस्तिधनंजय ॥ मयाततमिदंसर्वजगदव्य तमूर्तिना । मयाऽध्यक्षेणप्रकृतिःसूयतेसचराचरं ॥ अहंसर्वस्य प्रभवोमनः सर्वप्रवर्तते इत्यादि ॥ १६ ॥ मूलम. श्रेयान्स्वधर्मोविगुणःपरधर्मात्स्वनुष्ठितात्॥ स्व भावनियतकर्मकुर्वन्नाप्नोतिकिल्विषं ॥४७॥ अन्वयः स्वनुष्ठितात् परधर्मात् स्वधर्मः विगुणःअपि श्रेयान स्व- भावनियतं कर्म कर्वन सन किल्पिपं न अप्नोति ॥ १७ ॥ टीका. अतिरमणीय अनुष्ठानयुक्त पराये धर्मसे अपना धर्म विगु- भी श्रेष्ठ है जैसे कि, तुमने कहा कि, यह गुरुहिंसादिकयुक्त युद्ध मैं न करौंगा मिक्षा अहिंसा धर्म है सो करौंगा सो उस भिक्षासे तुमको यह युद्धही कल्याणकारक है क्योंकि, जो कर्म जिसका जन्मस्वभावहीसे वर्णाश्रमके उचित है उसको कर- ताकरता पापको नहीं प्राप्त होता है. ॥ १७ ॥ मूलम. सहजकर्मकौंतेयसदोपमपिनत्यजेत् ॥ सर्वा ॥
'गीताचाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. रभाहिदोषेणधूमेनाग्निरिवारताः ॥१८॥ अन्वयः हेकौंतेय सोपं अपि सहज कर्म न त्यजेत् हि यस्मात् अग्निः धूमेन इव सर्वारंभाः दोपेण आवृताः ॥ १८ ॥ टीका. हेकुंतीपुत्र! दोपकरिकेभी युक्त सहजकर्म याने ब्राह्मणादि- कौंका स्वभावजनित कर्म न त्यागना क्योंकि, जैसे धुनाले अग्नि आच्छावित रहता है याने धर्वा जहां अग्नि वहां रहईगा ऐसेही ज्ञानकर्मादिक सर्व आरंभ दोषौंकरिके युक्त है इहां त- ह सिद्ध भया कि, केवल ज्ञानाभ्याससे कर्म करनाही याने निष्कामकर्म करनाही कल्याणकारक है. ॥१८॥ मूलम. असक्तबुद्धिःसर्वत्रजितात्माविगतस्टहः ॥ष्क मेसिदिपरमांसंन्यासेनाधिगच्छति ॥१९॥ अन्वयः यः सर्वत्र असक्तबुद्धिः जितात्मा विगतस्टहः सः परमा नैकसिद्धिं संन्यासेन अधिगच्छति ॥ ४२ ॥ टीका. जो सर्वत्र फलादिकोंमे असक्तबुद्धि याने फलइच्छारहित श्री जीता है मन जिसने ऐसा औ कर्तृत्वाविक परमात्माने युक्तकिये हैं इसते स्टहारहित है ऐसा पुरुप परमा निष्कामक मैसिद्धिं याने परमपद उसपदको संन्यास करिके याने कर्मफल त्याग करिके औ करनेके योग्य कर्मकरताभया परमपदको पावैगा. ॥ ४९ ॥ सिद्धिप्राप्तीयथाब्रह्मतयानोतिनिवोधमें।
३३४ गीतावाक्यावोधिनी भापाटीका. समासेनैवकोतेयनिष्ठाज्ञानस्ययापरा ॥५०॥ अन्वयः हेकौंतेय सिदिप्राप्तःनरः यथा ब्रह्म आप्नोति तथा मेम- तासमासेन निबोध या ज्ञानस्य परा निष्ठा अस्ति ॥५०॥ टीका. “हेकौंतेय अर्जुन!उससिद्धिको प्राप्त हुआ जैसे ब्रह्मको प्राप्त होता है तैसे मेरेसे संक्षेपकरिके सुनौ. जो ध्यानात्मक ज्ञानकी परनिष्ठा याने श्रेष्ठप्राप्तियोग्य है अर्थात् ज्ञानकी समाप्ति है.५० मूलम. बुद्धयाविशुद्धायुक्तोधृत्यात्मानंनियम्यच ॥ शब्दादी विषयांस्त्यत्कारागद्वेपौव्युदस्यच ॥५१॥ विविक्तसेवीलध्वाशीयतवाकायमा नसः॥ध्यानयोगपरोनित्यं वैराग्यंसमपाधि तः॥५२॥अहंकारंबलंदर्पकामक्रोधंपरिग्रह। विमुच्यनिर्ममःशांतोब्रह्मभूयायकल्पते ॥५३॥ विशुद्धया बुद्ध्या युक्तःच धृत्या आत्मानं नियम्यशब्दा- दीन विषयान त्यत्का च रागद्वेपो व्यदस्य ॥५१॥ विवि क्तलेवीलध्वाशी यतवाकायमानसःनित्यं ध्यानयोगप- रः वैराग्यसमुपाश्रितः॥ ५२ ॥ अहंकारं वलं दपै कामं को धं परिग्रह विमुख्य निर्ममः शांतःब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३॥ टीका. विशेषकरिके जोशुद्ध ऐसी बुद्धिकरिके युक्त याने सात्विकी बुद्वियुक्त औ सात्विकी धारणकरिके मनको विषय विमुखक- अन्वयः गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, रिके परमात्मामे नियमित करे, शब्दादिकविपयाँको त्यागिके याने शब्दादि विषय प्रीतिरहित हैकेउन शब्दादिकोंके नि- मित्त जो रागद्वेप हैं उनको छोडिके विविक्तसेवी याने एकांतमे रहै याने स्थावादीपुरुपोंका संग न करै लघ्वाशी युक्तीका आ- हार करै औ वापी,शरीर तथा मनको योगयत्नमे राखे नित्यही योगध्यानमे तत्पर रहै, प्रात्मव्यतिरिक्तविपयोंसे वैराग्यराखे नौ अहंकार याने अनात्मादेहमे आत्माभिमान घलयाने उस अहंकारवृद्धिका कारण अर्थात् वासना,वल, दर्प याने गर्व तथा काम क्रोध परिग्रह याने भात्मव्यतिरिक्त वस्तुका स्वीकार इन सबनकोछोडिके निर्मम याने सर्व परमात्माका है यह सर्व मे राकरिके जो प्रतीत होता है सोमेरानही इसीसे शांत केवल आ- मानुभव सुखमे आनंद ऐसा पुरुष ब्रह्मभूयायकल्पते याने ब्रह्म भावको प्राप्त होता है अर्थात् सर्व बंधनसे छुटाभया यथास्थित आत्मस्वरूपहीका अनुभव करता है. ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ मूलम. ब्रह्मभूतःप्रसन्नात्मानशोचतिनकांक्षति ॥ स मःसर्वेपुभूतेपुमद्भक्तिंलभतेपरां ॥ ५४॥ अन्वयः ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति सर्वेषु भू- तेषु समः सन् परां मद्भक्तिं लभते ॥ ५४ ॥ टीका, ब्रह्मभूतः याने स्वरूपको प्राप्त भयाहुवा इसी स्वस्वरूप प्रा. प्तिसे प्रसन्नमनवाला पुरुप न मेरेव्यतिरिक्त वस्तुको शोचता है न चाहाहै इसीसे सर्वभूतप्राणीमात्रमे सम याने नकिसीसे वेर न प्रीति ऐसा पुरुष मेरी पर याने उत्कृष्ट भक्तियाने मेरेमे अ- गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. ति प्रियतारूप भक्तिको प्राप्त होता है अर्थात् मेरेको सर्व जग त् कारण औ श्रापका प्रियस्वामी जानिके मेरेहीमे अतिप्रेम करता है यही पराभक्ति है. ॥.५४ ॥ मूलम. भक्त्यामामभिजानातियावान्यश्चास्मितत्वतः ततोमांतत्वतोज्ञात्वाविशतेतदनंतरं॥५५॥ अन्वयः अहं यावान् अस्मि च यः अस्मितं मां भक्त्या तत्वतः अभिजानाति ततः मां तत्वतः ज्ञात्वा. तदनंतरं मां विशते ॥ ५५ ॥ टीका. मै विभूति औ गुणौकरिके जेतना हौं स्वरूप तथा स्वभा- से जो हौ तिस मेरेको उस भक्तिरुप साधनसे तत्वकरिके जानता है, तिसपीछे मेरेको तत्वले जानिके फिरि मेरेको प्राप्त होताहै. ॥ ५५ ॥ सर्वकर्माण्यपिसदाकुर्वाणोमध्यपाश्रयः॥म प्रसादादवाप्नोतिशाश्वतंपदमव्ययं ॥५६ ॥ अन्वयः मद्यपाश्रयः सर्वकर्माणि अपि सदा कुर्वाणः सन्म- प्रसादानु शाश्वतं भव्ययंपदं अवाप्नोति. ॥ ५६ ॥ टीका. मध्यपाश्रयः याने मेराही आश्रयः है जिसको सो सर्वकर्म याने नित्यनैमित्तिक लौकिक वैदिकभी सर्वकालमे करता क- मेरी रूपासे सनातन श्री अविनाशीपद याने मेरेको प्राप्त होयगा अर्थात् यह मेरे शरणका प्रभाव है. ॥ ५६ ॥ मूलम्.
गीतावाक्यर्थबोधिनी. भापाटीका.
मूलम्.
चेतसासर्वकर्माणिमयिसंन्यस्यमस्परः॥ बुद्धि
योगमुपाश्रित्यमच्चित्तःसततंभव ॥ ५७॥
अन्वयः
मत्परः सन चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य बुद्धियो:
गं उपाश्रित्य सततं मञ्चित्तः भव ॥ ५७ ।।
टीका.
मत्परः याने महीं हौं पर परमेश्वर जिसका ऐसा है केचित्त-
से सर्व लौकिक वैदिक, कर्म मेरे अर्पणकरिके बुद्धियोग याने
व्यवसायात्मिका बुद्धिका आश्रय करिके अर्थात् मेरेही प्राप्ति-
की चाहना करिके निरंतर मेरेहीमे चित्त लगावौ. ॥ ५७ ॥
मूलम्.
मचित्तःसर्वदुर्गाणिमत्प्रसादात्तरिष्यसि ॥ अथ
चेत्त्वमहंकारान्नश्रोष्यसिविनक्ष्यसि ।। ५८॥.
अन्वयः
मचितः सन् मत्प्रसादात् सर्व दुर्गाणि तरिष्यसि अप
चेत्त्वं अहंकारात् मे वचःनोप्यसितहि क्ष्यसि ॥५०॥
टीका.
मेरेमे चित्तको लगाये भये मेरी कृपासे सब संसारदुर्गको
तरोगे जो कदाचित् तुम अहंकारसे मेरे वाक्य न सुनौगे तो
नष्ट होऊगे. ॥ ५८ ॥
मूलम्
यदहंकारमाश्रित्यनयोत्स्यइत्तिमन्यसे । मिथ्ये
वव्यवसायस्तेप्रतिस्त्वांनियोक्ष्यति ॥ ५९॥
गीतावाक्यार्यवोधिनी भपाटीका. अन्वधः यत् अहंकारं आश्रित्य अहं न योत्स्ये इति मन्यते तदा तेव्यवसायःमिथ्या एव त्वां याद्धदौप्ररुतिः नियोक्ष्यति५९ टीका. जो अहंकारसे तुम यह कहोगे कि, मै युद्ध न करौंगा तौ तुह्मारा यह निश्चय मिथ्या होयगा औ प्रकृती जो तुह्मारा क्षात्रस्वभाव सो तुमको युद्धमे आपहीयुक्त करोगा याने जब दूसरों के शस्त्र तुह्मारे अंगमे लगेंगे तब तुमसेभी न रहा जा- यगा, युद्धही करने लगोंगे. ॥ ५९ ॥ मूलम. स्वभावजेनकौंतेयनिवद्धःस्वेनकर्मणा ॥ कर्तुने च्छसियन्मोहात्करिण्यस्यवशोऽपितत्॥६०॥ अन्वयः हे कौंतेय यत् युद्धं मोहात् कत्तु न इञ्छसि तत् एव युद्धं त्वं स्वभावजेन स्पेनकर्मणा निबढः सन् तप्तः अवशः अपि करिष्यसि ॥ ६ ॥ टीका. हे कोतेय जिस युद्धको तुम मोहसे करनेको नही इच्छा करते हो उसही युद्धको तुम आपके क्षत्रियस्वभावके कर्म क- रिक बंधनमे प्राप्त भये हुये करोगे, याने जब दूसरे मारने ल- गैंगे तब आपही स्वभावपरवश व्हके युद्ध करोगे. ॥ ६ ॥ मूलम्. ईश्वरःसर्वभूतानांहृद्देशेऽर्जुनतिष्ठति ॥ भ्रामय सर्वभूतानियंत्रारूढानिमायया ॥६१ ॥ तमे वशरणगंच्छसर्वभावेनभारत । तत्प्रसादात्परां गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका. शांतिस्थानंप्राप्स्यसिशाश्वतं ॥२॥ अन्वयः हेअर्जुन ईश्वरः मायया यंत्रारूढानि सर्वभूतानि भ्रा- मयनसन् सर्वभूतानां हृदेशे तिष्ठति ॥६९ ॥ हेभारत सर्वभावेन तं एव शरणं गच्छ तत्प्रसादात् परां शांति च शाश्वतं स्थान प्राप्स्यसि ॥ ६२ ॥ टीका. हेअर्जुन!ईश्वर जो परमात्मा सो आपकी मायाकारके यंत्रा रूढानि याने शरीरमे रहेभये सर्वभूतोंको भ्रमावताभया सर्वभू- तौंके हृदयमे स्थित है ॥ ६१ ॥ हेभारत! सर्वभावेन याने सर्व का अंतर्यामी जानिके अथवा सर्व माता,पिता सुहबंधु, द्रव्य, विद्या इत्यादिक सर्व उसीपरमात्माको जानिके उसीकी अ र्थात् वह परमात्मा मै हौ सो तुम मेरी शरण आवी औ उ. सी मेरी.प्रसन्नतासे परांशांति याने सर्वबंधमुक्तिको पाचौगे औ शाश्वत याने सनातन स्थान जो मै उस मेरेको प्राप्त होउगे. ॥ ६२ ॥ मूलम्. इतितेज्ञानमाख्यातंगुह्माद्गुह्यतरंमया ॥ वि श्यैतदशेपेणयथेच्छसितथाकुरु ॥६३ ॥ अन्वयः मया इति गुह्यात् गुह्यतरं ज्ञानं ते आरख्यातं एतत श्र- शेषेण विमृश्य यथा इञ्छसि तथा कुरु ॥ १३ ॥ टीका. हेनर्जन! मैने यह गोप्यसेभी गोप्प ज्ञान तुह्मारेसे कहा इसको अच्छी तरहसे विचारिके फिरि नैसी इच्छा होय ते- सा करी ॥ ६३ ॥.
। ३१० गीतावाक्यार्थवोधिनी, भापाटीका, मूलम. सर्वगुह्यतमभूयःशृणुमेपरमंवचः॥ इटोसिमेह ढमितिततोवक्ष्यामितेहितं ॥६४॥ अन्वयः सर्वगुह्यतमं मे परमं वचः भूयः शृणु यत्तः त्वं मे दृढं इष्टः असि ततः ते इति हितं वक्ष्यामि ॥ ६४ ॥ टीका. अब श्रीकृष्णभगवान लोकौंपर परम दयाकरिके इन तीन श्लोकोंमे सर्वगीताका सार कहते हैं. सर्वमे गुह्यसे गुह्य भाक्त योगगर्भित मेरा वाक्य भूयः याने एकवार ॥ इदंतुतेगुह्यतमंत्र वक्ष्याम्यनसूयवे॥ऐसे कहाथा इसवास्ते कहते हैं कि, फिरिभी सुनो क्योंकि, तुममेरेदृढप्रिय याने अतिशय करिके प्रिय हो इसधास्ते यह तुह्मारा हित होनेकेवास्ते कहता हो. ॥ ६४ ॥ मूलम्. मन्मनाभवमद्भक्तोमद्याजीमांनमस्कुरु ॥ मामे वैष्यसिसत्यतेप्रतिजानेप्रियोऽसिमे ॥६५॥ अन्वयः मन्मनाः भव मदतः भव मद्याजी भव मां नमः कुरु ततः मा एव एप्यति इति ते सत्यं प्रतिजाने यात्वं मे प्रियः असि ॥ ६५ ॥ टीका. हेअर्जुन,तुम मेरेहीमे मन लगावोऔ मेरीही भक्ति करौ या- ने मेराही अखंड स्मरण करौ,मयाजी याने मेराही पूजन क- रौ, मौनमस्कुरु याने मेरेहीको नमस्कार करौ तिसते मेरेहीको प्राप्त होउगे,यह मै तुह्मारेसे सत्य प्रतिज्ञाकरता हौंक्योंकि,तुम .
.. गीताचाक्यार्थवोधिनी भाषाटीका, ३४१ मेरे प्रिय हो इसवास्ते प्रतिज्ञाकरिके तुह्मारा हित करना हौं.६५ मूलम. सर्वधर्मान्परित्यज्यमामेकंशरणंब्रज ॥ अहंत्वां सर्वपापा योमोक्षयिष्यामिमाशुचः ॥६६॥ अन्वयः त्वं सर्वधर्मान् परित्यज्य एक मांशरणं व्रज महत्वा सर्व- पापेभ्यः मोक्षयिष्यामि त्वं मा अशुचः ॥ ६६ ॥ टीका. हेअर्जुन!तुम सर्वधर्मों को त्यागिके याने कर्मयोग ज्ञानयोग भक्तियोगरूप परमकल्याणके साधन मेरे आराधनरूप मेरी प्री- तिकवास्ते यथाधिकारसे सर्व कर्मकरिके उनका कर्तापन औ उनमे ममत्व औ फलौका त्यागरूप त्यागकरिके मेरीहीको क- ती औ उन धौकरिके आराधनेयोग्य. प्राप्त होनेयोग्य औ उपायभी जानिके मेरेही एकके शरण श्रावौ तौ मै तुह्मारेको सर्व भक्ति के विरोधी पापौंसे तुमको छोडावोगा,तुमशोचनकरो इहां श्रीकृष्णभगवानने सर्वधर्मीका फलकर्तुत्व औममत्यहाका त्याग कहा है.सर्वधाँका स्वरूपहीका त्याग नहीं कहा है जैसे कि, प्रथमही जनाया है। निश्चयंशृणमेतत्रत्यागेभरतसत्तम ॥ त्यागोहिपुरुषव्याघ्रत्रिविधःपरिकीर्तितः ॥दहसिआरंभकारकेस गत्यकाफलंचैवसत्यागःसात्विकोमतः ॥ नहि देहभृताशक्य त्य कुंकर्माण्यशेषतः।यस्तुकर्मफलत्यागीतत्यागीत्यभिधीयते।यह अध्यायके आदिहीमे अतिदृढकरिकेकहा है स्वरुपसे त्यागमे औरभी विरोध श्राताह जैसेकि,धर्मसंस्थापनार्थायसंभवामिगु गेयुगे।श्रेयान्स्वधविगुणःपरधर्मात्स्यनुष्ठिताताइसवास्तेदहां फलादिकत्यागहीकोत्यागकहा है यही सिद्धांत है. जो फि,स्वर- ३४२ गीतावाक्यार्थघोधिनी भापाटीका. पसे धर्म त्यागनेको अर्थ करते है वै भगवानकी माया करिके मोहित हैके वृथा अनर्थही करते हैं. ।। ६६ ॥ मूलम्. इदंतेनातपस्कायनाभक्तायकदाचन ॥ नचा शुश्रूपवेवाच्यंनचमायोऽभ्यसूयति ॥६७ ॥ अन्वयः इदं शास्त्रं ते त्वया अतपस्काय न वाच्यं च अभक्ता- य कदाचन न वाच्यं च अशुश्रूपवे न वाच्यं च यः मां अभ्यसूयति तस्मै न वाव्यं ॥ ६७ ॥ टीका. यह जो अतिगोप्य गीताशास्त्र है इसको मैने तुमसे कहा, तुम इसशास्त्रको जिसने तप न किया होय उसकोनकहना और मेरा औ मेरे भक्तोंका जो भक्त न होय उसको कोई कालमेभी न कहना औ जो तपस्वी औ भक्तभी दरवै तौभी जो गुरू याने इसशाखके उपदेशकरनेवालेका सेवा न करै उसकोभीनकहना श्री जो मेरे रूप गुण औ वैभव सुनिके निंदा करै उसकोभी न कहना,अर्थात् इसको कोईतरहसेभी उपदेशन करना.॥६७।। मूलम्. यइदंपरमंगुह्यंमद्भक्तेष्वभिधास्यति ॥ भक्तिम यिपरांकृत्वामामेवैष्यत्यसंशयः॥ ६८ ॥ नच तस्मान्मनुष्येपुकश्चिन्मेप्रियकृतमः ॥ भवि तानचमेतस्मादन्यःप्रियतरोभुधि ।। ६९ ।। अन्वयः यः इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेषु अभिधास्पति सः मयि परी गीतावाक्यार्थबोधिनीभापाटीका, ३१३ भक्तिं कृत्वा मां एव एप्यति इति असंशयः॥ ६८ ॥ मनुष्येपु तस्मात् अन्यः कश्चित् मे प्रियरुत्तमःन अभूः व न च अस्ति न भविता च भुवि तस्मात् अन्यः कश्चि त मे प्रियतरःन अभूत अस्ति च न भवति ॥ ६९ ॥ टीका. जो यह परम गोप्य गीताशास्त्रको मेरे भक्तोंमे वर्णन करै- गासो मेरेविपे परमभक्तिकरिके मेरेहीको प्राप्त होयगा इसमे संशय नहीं॥६८॥ औ मनुष्योंमे उसते अधिक कोईभी मेरा अतिप्रिय करनेवाला नहीं होता भया औ न है न होयगा औ पृथ्वीमे मेरेभी उसते दूसरा प्यारेसे प्यारा न कोई भया न है औ न होयगा. ॥ ६९ ॥ मूलम्. अध्येष्यतेचयइमंधयंसंवादमावयोः ॥ ज्ञान यज्ञेनतेनाहमिष्टःस्यामितिमेमतिः॥ ७० ॥ अन्वयः यः च इमं आवयोः धयं संवादं अध्ये ष्यते तेन ज्ञान यज्ञेन अहं इष्टः स्यां इति मे मतिः ॥ ७० ॥ टीका. गीताशास्त्रव्यारव्या करनेवालेका माहात्म्य कहा. अब अ ध्ययन करनेवालेका कहते हैं. हेअर्जुन! जो कोई इस हमारे औ तुह्मारे संवादकोपढेगा तिसकरिके ज्ञानयज्ञसे मैपूजित हो उगा याने उसने ज्ञानयज्ञकरिके मेरा आराधन किया असा मै मानौगा ऐसा मेरा मत है. ॥ ७० ॥ मूलम. अदावाननसूयश्चशृणुयादपियोनरः ॥सोपिमु . ३१४ गीतावाक्यार्थबोधिनी मापाटीका, तःशुभांल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणां ॥ ७१ ॥ अन्वयः यः नरः श्रद्धावान् च अनसूयः सन् शृणुयात् अपि सः अपि मुक्तः सन् पुण्यकर्मणां शुभान लोकान प्राप्नुयात्।।७१॥ टीका, जो मनुष्य श्रद्धासंयुक्त औ निंदारहित हैके केवल श्रवण- ही करैगा सोभी संसारबंधसे मुक्त व्हैके जो पुण्यकर्म करनेवा- ले याने मेरे भक्तोंकेलोकौंको प्राप्त होयगा. ॥ ७२ ॥ मूलम. कच्चिदेतच्छ्रुतंपार्यत्वयैकाग्रेणचेतसा ॥ क च्चिदज्ञानसंमोहःप्रणष्टस्तेधनंजय ॥७२॥ हेपार्थ कञ्चित् एतत् एकाग्रचेतसा श्रुतं किं हेधनंजय कञ्चित् ते अज्ञानसंमोहः प्रपष्टः ॥ ७२ ॥ टीका. भगवान पूछते हैं कि, हे पार्थ! जो मैने कहा सोक्या तुमने ए- काग्रचित्तकरिके सुनाया, नहीं जो सुनाती हेधनंजय!क्या तुह्मा रा अज्ञानसे उत्पन्नभयामोह नष्ठभया कि कैसासो कही.॥७२ ॥ मूलम्. अर्जुनउवाच ॥ नष्टोमोहःस्मृतिर्लब्धात्वत्प्रसा दान्मयाऽच्युत ॥ स्थितोस्मिगतसंदेहःकरिष्ये अन्वयः वचनंतल ॥७३॥ . अन्वयः अर्जुनः उवाच हेअच्युत त्वत्प्रसादातू. मोहः नष्टः मया गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, ३४५ स्मृतिः लब्धा इदानी गतसंदेहः स्थितः अस्मि अतः तव वचनं करिष्ये ॥ ७३ ।। टीका. अर्जुन कहते हैं कि, हे अच्युत! तुह्मारी कृपासे मोह नष्ट भया औ मै स्मृतिको प्राप्त भया, अब संदेहरहित स्थित हाँ इसवास्ते आपका वचन याने स्वधर्मरूप युद्ध कराँगा. ॥७३॥ मूलम. संजयउवाच ॥ इत्यहवासुदेवस्यपार्थस्यचमहा स्मनः॥ संवादमिममौषमद्भुतंरोमहर्पणं ॥७४ ॥ अन्वयः संजयः उवाच अहं वासुदेवस्य च महात्मनः पार्थस्य इति इमं अद्भुतं रोमहर्पणम् संवादं अश्रीपं ॥ ७४ ॥ टीका. यह सब सुनिके संजय धृतराष्ट्रको कहते हैं कि, हेमहाराज! मैं वसुदेवके पुत्र कृष्णका औ महात्मा याने प्रसन्न है मन जिसका ऐसा पृथाके पुत्र अर्जुनका यतना यह अद्भुत रो- मांचकारक संवाद सुनता भया. ॥ ७४।। मूलम. व्यासप्रसादाछुतवानेतद्गुह्यमहपरं ॥ योगयो गेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतःस्वयं ।। ७५॥ अन्वयः स्वयं कथयतः साक्षात् योगेश्वरात् कृष्णात एतत् परं गुह्यं योगं व्यासप्रसादात् अहं श्रुतवान् अस्मि ॥ ७५ ॥ टीका. आपही कहि रहे ऐसे साक्षात योगेश्वर श्रीकृष्णभगवानसे गीतावाक्यार्थवोधिनीभापाटीका. इसपरमगोप्ययोगको श्रीव्यासजीके अनुग्रहसेसुनतामया.॥७५ मूलम्. राजन्संस्मृत्यसंस्मृत्यसंवादमिममद्भुतं ॥ केश वार्जुनयोःपुण्यंहष्यामिचमुहुर्मुहुः॥७६ ॥ तच्च 'संस्मृत्यसंस्मृत्यरूपमत्यद्भुतंहरेः ॥ विस्मयोमे महानाजन्हप्यामिचपुनःपुनः ।। ७७॥ अन्वयः हेराजन केशवार्जुनयोः इमं अद्भुतं पुण्यं संवादं संस्मृ- त्य संस्मृत्य मुहुः मुहुः हृप्यामि ॥ ७६ ॥ च हेराजन तत् अत्यद्भुतं हरेः रूपं संस्मृत्य संस्मृत्य मे महान् वि- स्मयःजायते च पुनः हृष्यामि ॥ ७७ ।। टीका. हेराजन्! श्रीकृष्ण औ अर्जुनके इस अद्भुत पुण्यदायक संवादको स्मरण करिकरिके वारंवार हर्पको प्राप्त होता हो. ॥ ७६ ॥ हेराजन्! वह भगवानका अतिअद्भुतरूप उसको स्मरण करिकरिके मेरेको वडा विस्मय होता है औ वारंवार हर्पित होता हो. ॥ ७७ ॥ मूलम्. यत्रयोगेश्वरःकृष्णोयत्रपार्थोधनुर्धरः ॥ तत्रश्री विजयोभूतिर्धवानीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णः यत्र धनुर्धरः पार्थः तत्र श्रीः वि- जयः भूतिः ध्रुवानीतिः इति मम भतिः ॥ ७८ ॥ टीका. जहां योगेश्वर कृष्ण औजहां धनुपके धरनेवाले अर्जुन हैं त. हांही अचलसंपत्ति नौ अचलविजय अंचलऐश्वर्य औ अचल अन्वयः C गीतावाक्यार्थबोधिनी भापाटीका, ३४७ नीति है. ऐसा मेरेको निश्चय होता है. ॥ ७८ ॥ कान्यकुब्जद्विजोत्तंसोभरद्वाजान्वयाधिजः॥ बभूवसुक लोनानाबालाशतिविश्रुतः ॥ तदंशवर्द्धनःप्राज्ञोजातो गोवईनाऽभिधः ॥ तापीरामःसुतस्तस्यतस्यासंस्तनुजा स्त्रयः॥सीतारामश्वदत्तश्चमोतीरामइतिकमात् ॥ सीता' रामात्मजेनेयंगीतावाक्यार्थबोधिनी ॥ रघुनाप्रथसादेन मयाव्याख्यारूताजनाः ॥ हरिभक्तिरसास्वादरसिका नुमोदत ॥ वसुवाकभूसंख्येविक्रमार्कगताब्दके॥मार्ग शीदलेकृष्णेयष्टम्यांगुरुवासरे । इयंसंपूर्णतायातागुरो मेंऽनुग्रहात्किल ॥ श्रीश्रीनिवासतातार्यमुनेःश्रीरंगवासि नः॥ यत्कृतेऽस्याःफलंभूयात्तन्मयापादपद्मयोः ॥गीता चार्यस्यकृष्णस्यसीतानाथस्यचार्पित ॥ इतिश्रीमद्भगव नीता सूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसं वादेमोक्षसंन्यासयोगोनामाटादशोऽध्यायः॥१८॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादकता यांश्रीमद्भगवद्गीतावाक्यार्थयोधिनीभापाटीकायामष्टा दशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ हरसेटसुतोवापूरख्यातोमंत्रालयाधिपः॥रघुनाथ थश्चवावाख्यस्तत्सुतावितिविश्रुतौ ॥१॥ व्या ख्येयंरचिताताभ्यांप्रार्थितेनमयाकिल ॥रघुना थप्रसादेनताज्यामेवविमुद्रिता ॥२॥ स्वीयेयं त्रालयेरम्यमुंबय्यांशीसकाक्षरः॥ प्राप्तानन्याऽ धिकाराभ्यांव्याख्याकर्तुःसकाशतः ॥३॥ ॥७॥ .
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