Adarsh Library, Jaipur
Yaru Ke Yaar Teen Pahad
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यारा
थार
6-पहाड़
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यो काट तिन-पहाई
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यारों के यार तिन-पहाड़
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यारों के यार
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वड़े वाबू किसी पुरानी फाइल में खोए बैठे
थे कि ऐन चार-चालीस पर चपरासी ने
मा साहब को सलाम दिया।
वड़े वावू ने चपरासी के चेहरे से
हाकिम की मिजाजी हरारत भांपने की
कोशिश की, फिर हाथ का कलम कलमदान
में टिकाया, रूमाल से चश्मा पोंछा और
साहब के हुजूर में पेशी के लिए चल दिए।
बरामदे में ज़रा प्रादतन हिचकिचाए, गला
सखारा कि साहब के चपरासी ने वन्दगी
वजा चिक उठा दी।
"वैठिए भवानी वावू," साहब फ़ाइल
पर आँखें गड़ाए रहे।
यारों के यार १० भवानी वावूने कुरसी खींचते-खींचते एक छिपी नज़र फ़ाइल पर डाली, फिर तुरंत ही दीवार पर टॅगे कैलेण्डर पर टिका दी। मन-ही-मन ग्राज और कल की तारीख में साहव को पेश की फ़ाइलों के मज़मून दोहराए, एक-एक कर उनकी नाकावन्दी ताजा की और सुर्खरू हो हाकिम के हुक्म का इन्तज़ार करने लगे। साहब ने फ़ाइलों के ढेर पर दस्तखत करना जारी रखा। आखिरी फ़ाइल का फीता खोला तो वड़े वावू को मुखातिब हुए, "भवानी वावू, आपकी तो काफ़ी छुट्टी वाकी होंगी, आप छुट्टी पर जाना चाहेंगे?" साहब की आवाज़ पर भवानी वावू कुरसी पर उचक बैठे थे, मज़मून सुन सकते में आ गए। साहब ने अगले जुमले में सब साफ़ कर दिया, "अापके हक में यही अच्छा होगा भवानी वाबू ! बड़े बाबू ने किसी तरह हलक की फाँस निगली और सहमे गले से पूछा, "कुछ खता हुई हुजूर?" साहब ने खुर्दवीनी निगाह भवानी वावू के चेहरे पर गड़ा दी और अफ़सराना अन्दाज़ में बोले, "पड़ताल के लिए जाँच- कमेटी वैठने वाली है, आपको फ़ौरन मुअत्तिल न कर, छुट्टी की छूट दे महकमे ने आपके साथ रियायत ही बरती है।" उलटी हवा की मार से बड़े बाबू के दिलो-दिमाग की सव खिड़कियां एक साथ खुल गई। किसी तरह अपने को संभाल हाकिम के आगे सिर झुकाया, “महकमा जो ठीक समझे हुजूर-- इस नाचीज़ को तो आप ही का भरोसा है।" बड़े वावू की ज़मानेसाजी से साहब की पेशानी पर तेवर
यारो के यार
उभर आए। कुछ कहना ही चाहते थे किघंटीबज उठी, "कहिये,
किसे चाहते हैं ? भवानीशंकर?"भवानी बावू, नापका फोन
-
भवानी बावू कुरसी से उठे और हाथ बढ़ा साहब से फोन ले
लिया, "जी बोल रहा हूँ। कौन बन्ने, क्या कहा, मुन्ने के सिर में
चोट आई है ? होरा में नहीं ? फौरन अस्पताल ले जानो-
हाँ हाँ हाँ "पहुंचता हूँ।"
बड़े बाबू ने चोट खाई निगाह से साहब की ओर देखा और
रिसीवर नीचे रख हस्वेमामूल हाकिम का हुक्म वजा लाने के
अन्दाज में कहा, “मेरी छुट्टी का सामान तो बन गया वन्दा-
परवर, लड़के का सिर फटा है-इजाजत हो तो चलू?"
साहब ने मौके की नजाकत पहचान हमदर्दी जताने में हर्ज
न समझा, "दफ्तर के झगड़े-झमेले यहीं छोड़ वच्चे की देखभाल
कीजिए भवानी वाबू..."
भवानी वाबू चलने को हुए कि एकाएक कुछ याद हो पाया,
"सर, तिमाही स्टेटमेंट कल जाने को है, कहे तो निवटाता
जाऊं?"
साहब दिल-ही-दिल चौकस हुए। जाहिरा कहा, "स्टेटमेंट
की फाइल शर्मा को संभलवा जाइये और वाकी भारद्वाज को
सौंप दीजिये।"
सत्तरे की तेग गले पर झूलती देख भवानी बाबू ने उलझी
पेचक का सिरा निकालना मुनासिब न समझा और मन-ही-मन
अपने विगढ़ते केस की फाइल पेंडिंग में डाल दी। इजाजत के
लिए टुक कुरसी की ओर सिर झुकाया और चिक उठा बाहर हो
गए।
यारों के यार
सीट पर पहुंचे तो दर्जनों निगाहें एक साथ मेज़ की ओर
ठी और बड़े बाबू को इत्मीनान से फ़ाइलों में मसरूफ़ होते
देख हैरत में आ गई । हाकिम के रूबरू होकर भी यह ठस्सा!
भवानी बावू ने चपरासी को घंटी दी, पानी पिया और
मसरूफियत से फ़ाइलों के नाम, नम्बर और मज़मून चौकस
करते-करते कुछ ज़रूरी नोट ले लिए।
शर्मा ने एक खुफिया निगाह भारद्वाज पर डाली और होंठों
पर की कालो मुस्कराहट पर सफेद सिगरेट टूंग ली। दो-चार
कश लिए, चुटकी बजाकर राख झाड़ी और पुराने खिलाड़ियों
की तरह बड़े बाबू के पास आ कहा, "भवानी बाबू, कोई ज़रूरी
फ़ाइल खोजते हैं क्या ? मैं मदद करूँ ?"
भवानी बाबू जवाव में कुछ बोले नहीं-चश्मे वाली आँखें
पहले की तरह ही फ़ाइल पर दौड़ाते रहे।
शर्मा ने अचानक उठ आई खाँसी को रोकते-रोकते अपने
हमजोलियों को आँख मारी कि सक्सेना की कनकन्वी आँख से
बीच में ही झपट ली।
एकाएक बड़े बाबू ने अपनी मंजी हुई रौबीली आवाज़
सब इशारेवाज़ियों को खत्म कर दिया, "शर्मा, लोसँभालो,
स्टेटमैंट की फ़ाइल है, याद रहे कल आखिरी तारीख है, इ
जाने की । और हाँ, भारद्वाज, फ़र्नीचर परचेज़ की फ़ाइल
साहब को सबमिट होगी।
पेशतर कि भारद्वाज और शर्मा कोई हुज्जत करें, बड़े
ने फोन उठा लिया, “सर, आपके कहे मुताविक सब-कुछ
दिया है, हाँ टैण्डर्स की फ़ाइल आपको भिजवाए देता
ताँ...जी हाँ.. जा ही रहा हूँ साहब !"
यारो के यार मेज़ों के आर-पार लग रही अटकलों को नजर अन्दाज़ कर भवानी वादू ने मेज का सामान दराज मे बन्द किया और अप- रासी को घंटी दे दी, "जुगलाल, ये फ़ाइलें साहब के यहां जाएंगी, डाक तो कोई वाकी नहीं ?" "जी नहीं साहब !" भवानी बाबू की नजर जरा-सी देर को जुगलाल के चेहरे पर ठहरी, फिर कोने में बैठे डिस्पैचर की भेज़ पर गुम हो गई। टाइपिस्ट ने बड़े बाबू की मेज़ से लाल वस्ता उठते देखा तो फुर्ती से कुछ कागजात भवानी बाबू के आगे कर दिये। भवानी वादू ने चाहा कि इन्कार कर दें, फिर न जाने क्या सोच उचटती-सी नज़र से पन्ने पलटने लगे। किसी एक 'कान्फ़ी- डेन्शल' पर अखि अटकी ही थी कि शर्मा का ऊंचा कहकहा तीर की तरह दिल पर प्रा लगा। वड़े बाबू ने कागजों का जांचना जारी रखा, कुछ गलतियां सही की, टाइपिस्ट को पन्ने लौटाते-लौटाते एक नज़र ब्रांच पर डाली, एक घड़ी पर और कुरसी से उठ बैठे। दाएं-बाएं देखे बिना जल्दी-जल्दी वरामदा पार किया। पांव बजरी पर पड़ते ही जूते चरमराए तो घबराहट से दिल धड़कने लगा। क्या खबर, नसीया, उन्हें यहाँ बाइज्जत लौटने दे न दे ! "भवानी वायू"भवानी बावू...!" अपना नाम मुन कुछ ऐसी उलझन हुई कि दप्तर-भर की नजरों से कहीं दूर निक जाएँ। यदुवंशी को अपनी ओर पाते देखा तो जान लिया कि उनके पीछे जो चर्चा होनी थी, हो चुकी।
१४ यारों के यार "बड़े वावू, आपका फोन है।" भवानी बाबू की आँखों में बेटे का मासूम चेहरा तड़पने लगा। वच्चा अस्पताल में पड़ा है और वह दफ्तर के झमेलों में वक्त खोया किए । बदहवासी की हालत में कमरे की ओर दौड़े। लपककर फोन उठाया, "कौन, वन्ने ?...हाँ..हाँ-ऊँचे बोलो बेटे-क्या कहा जवाब में वेटे ने जो कहा, सुनकर भवानी बाबू पत्थर हो गए। टेलीफोन का चोंगा हाथ में ही लटका रहा और आँखें मेज़ पर थिर हो गईं। कुछ अनहोनी हुई जान सक्सेना ने कंधे से थाम बड़े बाबू को कुरसी पर विठा दिया तो हैरत से लोग बुत बने भवानी वावू की ओर ताकते रह गए। किसी ने यदुवंशी को टोहा, "पूछो तो सही, फोन क्या घर से था...?" शर्मा, भारद्वाज अपने चेले-चांटों के संग किसी और ही फ़िराक में थे। अजीव मसखरेपन से बड़े बाबू को घूरते रहे। बख्शी ने शर्मा के कान में फुसफुसा दिया, "नजूम के हिसाव से तो गुड्डी कटी ही समझो।" शर्मा ने सिगरेट सुलगाई और मौका मौजूं जान अपनी तुरप फेंक दी, "यार, भवानी वावू की इस हालत का क्या सबब ? कोई मुहरबन्द फ़रमान तो नहीं मिल गया इन्हें ?" चन्द भले लोगों ने हिकारत से जात-भाइयों की इस टोली भी कहना खतरे से खाली न समझ चुप बने रहे। एकाएक सूरी ने पीछे से आ शर्मा को झंझोड़ दिया, "लाल- बेगिया टुच्चा साला वाज नहीं आएगा। मालूम भी है, बड़े वाबू . को देखा, पर कुछ --
यारों के यार
..." और
का लड़का जाता रहा।"
अजहद पछतावे और शरमिन्दगी से शर्मा ने सिगरेट नीचे
फेंक पांव से मसल दी कि एक दबी-दवी दर्दनाक सिसकी भवानी
बाबू के गले से निकली और कमरे में फैल गई।
कुछ लोग खड़े-खड़े एक-दूसरे का मुंह ताकते रहे, कुछ बड़े
बाबू के साथ हुई तकदीर की इस साजिश पर हाथ मलते रहे।
माथुर ने सूरी से मशवरा किया, टैक्सी के लिए फोन
मिलाया और साथियों को बड़े वाबू के गम में शरीक होने का
इशारा दे दिया।
हॉर्न की प्रावाज़ पर माथुर भवानी बाबू के पास आए और
कंधे पर हाथ रखकर कहा, "हौसला करिए बड़े बाबू"
सहारा दे बाहर लिवा ले चले।
सूरी, शर्मा और भारद्वाज वरामदे में पीछे-पीछे चले पाते
थे कि साहब अपने कमरे से निकले और इस मातमी जुलूस को
नज़र-अन्दाज़ कर सीधे अपनी कार की ओर बढ गए।
सूरी ने एक नजर साहब की कार पर डाली और टैक्सी में
बैठते-बैठते एक फटकार फेंक दी, "चूतिया, साला, किस्तों की
कार में लटू बना घूमता है, बहनचोद । किसी दिन हराम का
चूना झड़ने पर आ गया तो सारी चिनाई धरी रह जाएगी।"
बड़े वाबू ने सिर उठा अजीब लुटी-लुटी हारी नज़र से मूरी
की पोर देखा और देखते ही आंसू टपकने लगे। जितनी वार
रूमाल से आँखें पोंछते, बेटे के लहू-लुहान सिर पर किसी मनः
फ़ाइल का पन्ना चिपका दीखता।
टैक्सी क्वार्टर के सामने रुकी। भवानी बाबू निचोर
अपने को समेट नीचे उतरे । शर्मा को भाड़ा चपा देकर
यारों के यार
हाथ से रोक दिया । खुद ही ड्राइवर को निवटा, लमहा-भर घर
की ओर मुंह कर ठिठके रहे, फिर थके-हारे कदमों से अन्दर जा
दाखिल हुए।
मुन्नन को गोद में डाले रोती-बिलखती मालती को देखा
तो कलेजा मुँह को आ गया। झुककर बेटे का मरा मुख देखा,
खून से भरा लथपथ नन्हा मासूम सिर देखा-आखिरी प्यार
देने को बच्चे के माथे पर हाथ रखा तो
फूट-फूटकर
रो दिए।
नन्हे-मुन्ने को आँखों से ओझल कर भवानी वाबू उस रात
खाली हाथ घर लौटे, तो मातम के सन्नाटे में डूवा घर, घर-सा
न लगता था। पाँव आप-ही-आप बरामदे के बाहर रुक गए।
मुन्नन अभी दौड़े आएँगे और बाबूजी से आ लिपटेंगे ।
"बाबूजी, हमें साइकिल चाहिए-ले देंगे न?"
"क्यों नहीं क्यों नहीं वेटे, अगले महीने ज़रूर दिलवाएंगे।"
किसे मालूम था, साइकिल आने से पहले बेटे की रुखसत
की घड़ी भान पहुंचेगी!
उस रात घर की मनहूस खामोशी में मुन्नन की भोली-भाली
सूरत कभी दादी की झोली में आ दुबकती, कभी मां की गोद में
और कभी बाबूजी के सिरहाने । ठुमक ठुमक चलता कोई मीठा
सपना आँखों पर झुकता और पहचान करते ही नदी की धारा
में ओझल हो जाता-छप्प "छप्प"छप्प।
जमुना की रेती में मुन्नन को ढूंढ़ते फिरते भवानी बाबू
किसी की कड़कती अावाज़ सुन सहमे, "भवानी वाबू, यहाँ-वहाँ
क्या ताकते हैं ? बेकार की बहानेबाज़ी छोड़िये औरतुरत जाकर
दफ्तर से अपना 'पर्सनल फाइल' निकाल लाइए
घबराहट में
भवानी बाबू कुछ समझ नहीं पाए, बेवसी से साहव की ओर
-
यारों के यार १७ देखा और घबराहट में जूते हाथ में ले दफ्तर की ओर दौड़ पड़े। सामने पुल पर से जाती गाड़ी को हाथ हिला-हिला रोकने की कोशिश की कि अचानक किसी ने चलती गाड़ी में से मुंह वाहर निकाला और एक फ़ाइल भवानी वावू की ओर उछाल दी, "दादा गुरु, इसमें अवस्थी का रिकार्ड संभालकर रख लो, काम आएगा." बड़े वाबू ने लपकर फ़ाइल उठा ली। चौकन्ने हो इधर- उधर देखा और फ़ाइल वगल में दवा दफ्तर की राह पकड़ ली। दफ्तर पहुँच अपनी मेज़ की दराज़ खोली और पूरी चौकसी से फ़ाइल ताले में वन्द कर दी । कुरसी पर बैठने को ही थे कि किसी की आवाज सुनकर सहम गए। "बाबूजी...बाबूजी..." आँख खुलते ही गुड़िया के हाथ में चाय का प्याला देखा तो पाया वह दफ्तर में नहीं अपने घर में हैं । हाथ बढा प्याला थामा और लिहाफ सहेज बिटिया को पास विठा लिया। गुड़िया कुछ देर बाबूजी की ओर देखती रही, फिर हौले से पूछा, "बाबूजी, मुन्नन भैये के कपड़े क्या होंगे?" भवानी वाबू परेशानी से कभी प्याले की ओर देखा किए, कभी विटिया की ओर, फिर बच्ची के सिर पर हाथ रख सम- झाया, "मुन्नन तो भगवानजी के घर गए विटिया, कपड़ों की क्या सोच...?" "बाबूजी, नन्हे तो कहते है भगवानजी एक और भैया भेजेंगे।" "जागो विटिया, जाकर अम्मां का हाथ बंटानो।"
यारों के यार वच्ची के भोलेपन से दिल भर आया। सिरहाने पर सिर' वते ही कुछ देर पहले वाला ख्वाब आँखों के आगे घिर आया । फिक्र और घबराहट से तबीयत दहल गई । 'इंक्वायरी' का क्या ठीक! किस जाल की गाँठ किस जोड़ । छिटक जाए और किसकी छुरी किसकी गर्दन पर चल जाए ! वनपुत्र हनुमान का ध्यान कर विनती की, "गरीबनवाज, आप अंगुल पर पहाड़ उठा सकते हैं, इस गरीव को भी कष्ट से उवारिए।" भवानी बाबू ने आँखें खोली तो गहरा सकून दिल में पाया। सामने से मानो अँधेरे का परदा छंट गया और जो दीख पड़ा वह विलकुल साफ़ था। "जब तक आर्डर नहीं होता उन्हें अपनी कुरसी पर टिके रहना है।" लिहाफ उतार विस्तर छोड़ दिया और घड़ी देख दफ्तर की तैयारी में जा लगे। नहाकर निकले तो अम्माँ के पास बैठी मालती उन्हें ग़मज़दा परछाई-सी दीख पड़ी। "इस पगली को समझायो अम्माँ, जिस बात पर इन्सान का बस नहीं, उसकी खातिर कितना दुःख मनायेगी ! मुझे ही देखो, इधर मुन्नन गए, उधर दफ्तर में काम का पहाड़ टूट पड़ा । तबीयत नहीं, पर क्या करूँ, छाती पर पत्थर रखे चला जा रहा हूं।' "बेटे, आज तो छुट्टी करते। भवानी बावू विना कुछ कहे कमरे की ओर बढ़ गए ठाकुरजी के आगे एक बार और माथा नवाया और हनुमान- चालीसा का पाठ कर कपड़े पहन लिए । बटुमा खोल रेजगारी अलग की और कोट की जेब में अपना कलमलगाते-लगाते मानो यारों के यार १६ जिरह-वस्तर पहन लिया। "हिम्मत से कामलो भवानी, तुम्हारी आजमाइश का वक्त है।" भाभी के कहे रमाशंकर अन्दर आए तो दादा को तैयार देख कुछ भी कहने की हिम्मत न हुई। दबी जवान से इतना ही कहा, "दादा, छुट्टी की अर्जी देनी हो तो रास्ते में पहुंचाता जाऊँ?" छुट्टी के नाम से भवानी बावू का दिल दहल गया, पर कुछ वोले नही, चुपचाप चारपाई के पैताने पांव टिका तसमे बांधने लगे। एकाएक जैसे कुछ याद हो पाया। "विट्टन, तुम्हारे सुपरिं- टेण्डेण्ट तवदील होकर किस महकमे में गए है ?" "कौन दादा! रंगबिहारी? एण्टीक्रप्शन में अण्डर-सेकेटरी हो गए हैं।" एक लपक रमाशंकर के चेहरे से उठ भवानी वाबू की आँखों में कौंध गई। ओर भरपूर "रंगबिहारी को तुम कितना जानते हो, बिट्टन ?" रमाशंकर पहले चौकन्ने हुए, फिर दादा देखा, "उसका लड़का तो अपना बड़ा यार है दादा !" रमाशंकर की प्रावाज के पुख्तापन ने भवानी बाबू के आगे जैसे किसी किले का सदर फाटक खोल दिया। "बिट्टन, मेरी हाजिरी तो आज जरूरी है दफ्तर में, तुम्हारो कोई 'कैजुअल' चाको हो तो छुट्टी कर डालो।" ठीक नौ-दस पर भवानी वावू बाहर निकले।बजरी के साथ- साथ लगी क्वार्टरों की लम्बी कतार आज उन्हें वदरंग उदासी से पुती मालूम हुई। कल तक मुन्नन इसी घास में खेला करते २० यारों के यार थे-सव-कुछ है, सिर्फ वही नहीं। वस-स्टाप पर रोज़ के जाने-पहचाने चेहरों में से कोई न दीखा तो भवानी वावू पटरी-पटरी अगले स्टाप की ओर चल दिये। आँखों के आगे नौकरी के पहले दिन से लेकर ग्राज तक का ज़माना गुज़र गया। पहली वार जव उन्हें टाइपिस्ट की सीट दी गई थी तो उन्हें नौकरी नहीं मानो कोई छोटी-मोटी रियासत ही मिल गई थी। बड़े दादा ने उन्हें एक पाकेट डिक्शनरी ला दी थी, "देखो भवानी, किसी भी लफ़्ज़ का शक हो तो डिक्शनरी से सही करने में कभी कोताही न करो। हमेशा याद रहे, सरकारी कागज़ पर दस्तखत कर देने पर उसकी ज़िम्मेदारी और जवाब- देही तुम्हारी होगी, किसी और की नहीं।" दादा की उस नसीहत को तो भवानी वाबू ने गुरु-मंत्र की तरह याद रखा। मेहनत और खबरदारी से सैकड़ों फ़ाइलें 'डील' की और कावलियत से भुगता दीं। आज इतने सालों बाद यह मुँसीवत न जाने कहाँ से बरपा हो गई। नम्वर देख भवानी वावू वस में चढ़े, कण्डक्टर से टिकट लिया और खिड़की से बाहर देखते-देखते अपने छोटे-बड़े रिश्ते- दारों की फ़हरिस्त ताज़ा करने लगे। दादा के दामाद : कुँवर नारायण-महकमा फाइनेंस के हैड- क्लर्क मौसेरे भाई : छैलबिहारी–महकमा सप्लाई में सुपरिटेंडेंट चचेरे भाई : आनन्दशंकर-पी० डब्ल्यू० डी० में प्रोवरसियर चाची के भाई :प्रेमलाल-डिप्टी मिनिस्टर के पी० ए० मालती के मौसा : अटलबिहारी-इन्डस्ट्रीज़ में अकाउंट्स- ऑफ़िसर :
, Gecta Bhawan, Adarsh Nagar, यारो के यार JAIPUR-302004, मालती के ताक : बाँकेविहारी-एक्साइज़ में सुपरिटेंडेंट वड़े बहनोई : परमात्मास्वरूप-चीफ़ सैनेटरी इन्स्पेक्टर, सिपल कारपोरेशन मंझली बूमा के देवर : युवराज बहादुर-मुन्सिफ़ जब बड़े मामा : सरदार बहादुर-स्टेट बैंक के कैशियर बड़े मामा के दामाद : आकाशलाल-होम-मिनिस्ट्री में सेक्रेटरी छोटे भाई रमाशंकर के साढू : राजनारायण-महकमा ट्रान्स- पोर्ट में इन्चार्ज अपनी बिरादरी के बाबू शिवशंकर-मेम्बर पालियामेण्ट इनके अलावा अपने यार-दोस्तों के महकमे, डैजिगनेशन, पोजीशन और रसूख के चीदा-चीदा डिटेल्स दिमाग्रो खाके में भरते चले गए कि दफ्तर के स्टाप पर कण्डक्टर ने घटी वजा दी। रोज से करीब पन्द्रह मिनट पहले भवानी बाबू दफ्तर में दाखिल हुए । हाजिरी के रजिस्टर में नाम, वक्त दर्ज किया तो ऐसे लगा जैसे किसी बहुत मुश्किल काम को सरअंजाम दिया हो । अलमारी खोल फ़ाइलों की पड़ताल शुरू की तो कई 'नोटिंग-पोरशन' पढ डाले। दिमाग पर सुवह वाले रुवाव का धुंधला-सा अक्स अब भी बाकी था। जिस किसी फ़ाइल को खोलते जमुना किनारे वाला अवस्थी का रिकार्ड आँखों में तिर जाता। दस बजते-न-बजते ब्रांच के हैड क्लर्क को हमेशा की तरह कुरसी पर तैनात पाया तो रात को हमदर्दी के बावजूद माग रह गए । वन्दगी बजा हाज़िरी भरी और अपनी :
२२ यारों के यार .. पर दफ्तर खोल दिये। सिगरेट-पान की छोटी-सी मजलिस के बाद शर्मा और बख्शी खिरामा-खिरामा कैन्टीन से लौटे तो कुरसी पर भवानी वावू को जगे देखा और हाजिरी रजिस्टर में नाम-वक्त दर्ज कर दिया। बड़े बाबू अहलकारी अन्दाज़ में आँख उठाये बिना रोज़ की-सी मुस्तैदी और मसरूफियत से डाक मार्क करते रहे। चश्मे वाली आँखें कागजों पर जमी रहीं और हैडक्लर्की की तीसरी आँख ब्रांच-भर की हरकतों को 'वाच' करती रही। ठीक ग्यारह-बीस पर फ़ाइलों का पुलिन्दा उठाया और रोज की तरह साहब को कमरे की ओर बढ़ गए। बड़े बाबू के जाते ही शर्मा और बख्शी ही-ही करके हँस दिए । 'क्या कायम-मिजाज पाया है-कल बेटा गया और आज हजरत हाजिर ! पूछिये साहब, छुट्टी कर लेने से क्या कुरसी लुटी जाती थी!" बख्शी ने बड़े बाबू के चम्मचों पर नजर मारी और चुटको वजा संजीदगी से कहा, "खिसक गई यार, अब क्या रखा है !" सक्सेना ने शरारती नजरों से देखा और सिगरेट के छल्लों मुस्कराता रहा। भारद्वाज ने मनसुखानी को आवाज दी, "डूबने का दूसरा नाम तैराकी है मेरे यार!" सूरी ने कोई पुरानी सिरदर्दी वाली फ़ाइल खोली ही थी कि भारद्वाज की आवाज सुन फट पड़ा-"बहनचोद फतूरिया साला झांसापट्टी से बाज नहीं पाता। जब देखो बैठे-बैठे लूती लगाता है। बहनचोद किसी दिन पासा पलट गया तो रोएगा में -
यारों के मार
बाप के सालों को।"
बख्शी ने जल-भुनकर हाथ की सिगरेट दूर फेंक दो और
जहरीली नजर से सूरी को तरेरा, "बड़े भाई, तुम्हारी सीनियो-
रिटी का चक्कर क्या चला साला, दिमाग ही पटरी से उतर
गया।"
सूरी ने हिकारत से बड़ी-सी थूक खिड़की से बाहर दे मारी, .
"जिस बहनचोद पटरी को तुम बात करते हो वह हराम की
पटरी है। उस पर सूरी मुंह नहीं मारता, हगता है साले हगता
जम्मनलाल ने बख्शी की इमदाद को आवाज दी, "सूरी
वादशाह, हगने की अच्छी कही लगेगी तो हगोगे ही, पटरी हो
और चाहे जो हो।"
सूरी ने बीच में ही टोक दिया, "चाहे अफ़सर की
हथेली..."
सक्सेना, यदुवंशी और मनसुखानी के कहकहे करीब आधा
दर्जन कमीज़ों पर तीर की मानिन्द जा लगे।
जोशी से बर्दाश्त नहीं हुआ तो कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
शर्मा के पास प्रा डपटकर कहा, "जिसकी फिकरेवाजी हगने-
मूतने तक महदूद हो, उसके मुंह लगने की जरूरत ही क्या?"
सूरी फिर फूहड़पन से हंस दिया कि पेट पर कसी पतलून
के बटन खुल गए। “वाह रे चिलगोजे, हगने-मूतने के नाम से
नाक सिकोड़ता है। याद रख वादर, पखाने में अफ़सर भी क्लर्को
को तरह ही टट्टी फिरते हैं।"
ब्रांच में कहकहों की होड़ लग गई तो सूरी को और शह
मिली, "यारो कोई वादाम खाए या मूंगफली, गू की बू नहीं
लती।"
शर्मा ने लपलपाती आँखों से लाल झण्डी दिखाई, "बड़े
माई, ज़रा होश से, सरकारी दफ्तर है, भाँड-भड़वों का अड्डा
नहीं।"
सूरी और मचल गया-"अड्डा नहीं लुच्चई का मदरसा
है। सुनें तो सही इसके जवाब में तुम्हारी पंडताई क्या कहती
है।"
तवीयत शर्मा की एक झापड़ देने को कुलबुला उठी, पर
सिगरेट सुलगाकर रह गया। जल्दी-जल्दी दो-चार कश खींचे
और कड़वे गले से कहा, “पंडताई कोई जुर्म है क्या ? जब देखो
यही फब्ती । तुम्हारे डर से क्या कुल-गोत्र बदल डालें?"
"बदल क्यों नहीं लेता यार, मेरी बात मान, फ़ायदे में
रहेगा। कल्लूलाल के स्पेशल कोटे में एन्टरी करवा ले, चुटकी में
अफ़सरी मिलेगी चुटकी में।"
हँसी-मजाक का फ़ायदा उठा अग्रवाल ने एक छोटी-स
पर्ची चुपके-से गुप्ता की ओर बढ़ाई ही थी कि जौहरी की आँख
ने कैद कर लिया। "क्यों यार, क्या चक्कर है ! गुप्ता को
चूनी का हिसाब दे रहे हो क्या ?"
अग्रवाल बिना तेवर चढ़ाए खिसियानी-सी हँसी हँस
"बेकार खींचते हो गुरु, किन्हीं सगेवालों का पता था।"
मनसुखानी ने चुस्त पैन्ट की जेब से कंघा निकाला
लाड़ से बालों की पट्टियाँ संवारते-सँवारते कहा,
"हर जय
वालों का ही बोलवाला है दोस्त ! आज की तारीख में
वाल, हर सगेवाल का सगेवाल है।"
माथुर हँस दिया, "क्या पहेली पेश की है यार ने
1
यारों के यार
२१
प्रांच के बुजुर्ग अकाउन्टेंट जियालाल फ़ाइल में भाया
खपाते-खपाते थक गये थे। सुनकर कलम नीचे रख दिया और
सिर हिलाकर बोले, "जीयो वैटा जीनो"तुमने तो निचोड़ ही
निकाल डाला इस धांधली और कवीलापरस्ती का। प्राज
ब्राह्मण ब्राह्मण का, वनिया वनिये का, कायस्थ कायस्थ का"
सूरी कुरसी छोड़ उठ बैठा और जियालाल बाबू के पास जा
बड़ी आजिज़ी से कहा, "हिसाव-बाबू, इन सतवचनों में एक
जुमला जोड़ने की इजाजत मुझे भी हो जाए--ब्राह्मण ब्राह्मण
का, वनिया बनिये का, कायस्थ कायस्थ का और हर हरामखोर
सुसरा साला चांदी के चिट्टे जूते का।"
ब्रांच में सन्नाटा छा गया,न किसी ने सूरी से प्रांख मिलाई,
न ठहाका लगाया, सिर्फ गोयल की मशीन टिक...टिक टिक...
करती रही।
एक तगड़ी गाली सूरी के होंठों तक पाई, मगर दरवाजे
पर बड़े वावू को देख मुहरबन्द हो गई । झुंझलाकर अपनी मेज़
की ओर बढ़ा, कुरसी सोची और कलमदान से कलम उठाते.
उठाते बुड़बुड़ा दिया, "जनसे साले मां के यार को मामा ही
करेंगे।"
भवानी वावू ने कुरसी की ओर बढ़ते-बढ़ते सक्सेना को
अावाज दी, "जरा ट्रान्सपोर्ट तक चले जानो-साहव को कुछ
'इन्फर्मेशन' आज ही चाहिए। कोई मुश्किल पेश आए तो
सुपरिन्टेंडेंट विशनदायल साहब को मेरा नाम ले देना।"
कपूर ने भेद-भरी नजर माथुर की नाक पर टिका दी।
ट्रांसपोर्ट का विशनदयाल माना हुमा फंसूगर है, जिसने उस्ताद
बना लिया तो उसे बख्शीश ही बख्शीश ।
यारों के यार
जौहरी ने
बड़े बाबू ने भारद्वाज को तलब किया, "प्रॉडिट-ऑवजे-
न्स पर फ़्लैप लगाकर साहब को भिजवा दो।"
माथुर को आँख मारी ही थी कि माथुर
को भी
आवाज़ पड़ी," 'हजारासिंह प्यारासिंह' के 'ओरिजिनल्स टैण्डर्स',
कम्पैरेटिव स्टेटमैंट' और 'इम्पारटेंट डिटेल्स' की समरी चढ़ा-
कर ले पायो।"
साहब के चहेतोंकी वाछे खिल गईं। क्या कहने हैं अवस्थी-
जैसे अफ़सर के ! केस की धुंडी ही तो दबोच ली!
माथुर और जौहरी मन-ही-मन भवानी बाबू का सिक्का
मान गये । क्या ढील दी है प्यारे ने !
'हज़ारासिंह प्यारसिंह' वाली फ़ाइल के पन्ने पलटते-
पलटते माथुर की आँखों में सरदार हज़ारासिंह का चेहरा घूम
गया। एक अवस्थी ही क्या सरदार साहब ने दर्जनों अफ़सर
और दफ्तर खींच डाले!
चौकसी से फ़ाइल स्टडी को, स्टेटमैंट चैक की और फाइल
के सभी पहलुओं पर गौर करते-करते लगा अँधेरे में जैसे किसी
ने टार्च फेंक दी हो। शुरू से आखिर तक की पेशवन्दी के सब
जोड़-पुर्जे रोशन हो गये । 'ड्राफ्ट' किया, दोहराया और लंच
पर जाने से पहले फ़ाइल भवानी वाबू की मेज़ पर पहुँचा दी
कैण्टीन की ओर मुंह किया तो कपूर ने खबर दी, "लौं
का गिरोह कैन्टोन में चिपका बैठा है यार, तबीयत हो तो
.
जाए..."
माथुर ने सिगरेट सुलगाई और कैंटीन की ओर
बढ़ते कपूर को बेफ़िक्र कर दिया, "फ़िक्र क्या है यार, इस
में नहले-दहले हों तो हों-इक्का एक नहीं।"
यारों के यार
२७
कपूर माथुर को बग़लगीर कर लिया, "तेरी इसी
'फड़नवीसी' का तो कायल हूँ यार !"
केटीन के शोर और प्लेट-प्यालियों की झनझनाहट में
शर्मा की ऊंची प्रावाज तर गई। "कलम के जोर से कब तक
अर्क निकलता पारे, हो गया केस 'विजीलेंस' को रेफर।"
माथुर और कपूर साथ वाली टेवल पर जाउंटे और ऊंची
अावाज में दो प्लेट गुलावजामुन और दो चाय आर्डर कर दिये।
जम्मनलाल ने एक संग शर्मा और माथुर को मस्का
लगाया, "प्राज गुलाबजामुन किस खुशी में दोस्त ?"
माथुर ने पेच लड़ाती नजर से सामना किया, "अाज की
तारीख में अपने को कोई गम नहीं प्यारे 'वस इसीलिए।
सुना है बड़े बाबू को छुट्टी पर जाने को कहा गया है..."
गुलाबजामुन का मजा लेते माथुर ने नपी नजर से भारद्वाज
की अोर देखा और अपने हिसाव में कुछ और जमा कर लेने की
गरज से कहा, "खाकसार को इस मामले की कोई खबर नहीं।"
गुप्ता ने हुज्जत को, "निगहबानी में तुम मशहूर हो दोस्त,
पर यह तो बतायो 'हजारासिंह प्यारासिंह' का ताबूत किसके
माहर से खोला गया है ?"
"धन्दा तो हुक्म का गुलाम है दोस्त, आवाज पड़ी तो
'हांका' भर दिया।"
"यार हांका तो पड़ता है 'शिकारगाह के करीव- मालूम
तो हो किसके शिकार की तैयारी है ?"
माथुर ने दाव पहवान टंगड़ी दी, "मचान पर चढ़ने की
बात तो दूर, अभी कोई हथियारों से लैस तक नही ।"
भारद्वाज ने डोरी धुमाई, "हजारासिंह की
यारों के यार
बड़े वाबू ने भारद्वाज को तलब किया, "प्रॉडिट-ऑवजे-
क्शन्स पर फ़्लैप लगाकर साहब को भिजवा दो।"
जौहरी ने माथुर
को आँख मारी ही थी कि माथुर
को भी
आवाज़ पड़ी," 'हजारासिंह प्यारासिंह' के 'ओरिजिनल्स टैण्डर्स',
'कम्पैरेटिव स्टेटमेंट' और 'इम्पारटैंट डिटेल्स' की समरी चढ़ा-
कर ले पायो।"
साहब के चहेतोंकी बाछे खिल गईं। क्या कहने हैं अवस्थी-
जैसे अफ़सर के ! केस की डी ही तो दबोच ली!
माथुर और जौहरी मन-ही-मन भवानी बाबू का सिक्का
मान गये। क्या ढील दी है प्यारे ने !
'हजारासिंह प्यारसिंह' वाली फ़ाइल के पन्ने पलटते-
पलटते माथुर की आँखों में सरदार हज़ारासिंह का चेहरा घूम
गया। एक अवस्थी ही क्या सरदार साहब ने दर्जनों अफ़सर
और दफ्तर खींच डाले!
चौकसी से फ़ाइल स्टडी की, स्टेटमैंट चैक की और फाइल
के सभी पहलुओं पर गौर करते-करते लगा अँधेरे में जैसे किसी
ने टार्च फेंक दी हो। शुरू से आखिर तक की पेशबन्दी के सब
जोड़-पुर्जे रोशन हो गये। 'ड्राफ्ट' किया, दोहराया और लंच
पर जाने से पहले फ़ाइल भवानी बावू की मेज़ पर पहुँचा दी।
कैण्टीन की ओर मुंह किया तो कपूर ने खबर दी, "लौंडों
का गिरोह कैन्टीन में चिपका बैठा है यार, तवीयत हो तो हो
जाए..."
माथुर ने सिगरेट सुलगाई और कैंटीन की ओर बढ़ते-
बढ़ते कपूर को बेफ़िक्र कर दिया, "फ़िक्र क्या है यार, इस टोली
में नहले-दहले हों तो हों- इक्का एक नहीं।"
यारों के यार
कपूर ने
माथुर को बगलगीर कर लिया, "तेरी इसी
'फड़नवीसी' का तो कायल हूँ यार!"
कैंटीन के शोर और प्लेट-प्यालियों को मनभनाहट में
शर्मा की ऊंची पावाज तर गई। "कलम के जोर से कव तक
प्रकं निकलता प्यारे, हो गया केस विजीलेंस' को रेफर।"
मायुर पोर कपूर साथ वाली टेबल पर जा डेटे और ऊंची
आवाज में दो प्लेट गुलावजामुन और दो चाय प्राडर कर दिये।
जम्मनलाल ने एक संग शर्मा और माथुर को मस्का
लगाया, "अाज गुलाबजामुन किस खुशी में दोस्त?"
मायुर ने पेच लड़ाती नजर से सामना किया, "अाज की
तारीख में अपने को कोई गम नहीं प्यारे "वस इसीलिए।
मुना है बड़े वावू को छुट्टी पर जाने को कहा गया है..."
गुलाबजामुन का मजा लेते माथुर ने नपी नजर से भारद्वाज
की ओर देखा और अपने हिसाब में कुछ और जमा कर लेने की
गरज से कहा, "खाकसार को इस मामले को कोई खबर नहीं।"
गुप्ता ने हुज्जत को, "निगहबानी में तुम मशहूर हो दोस्त,
पर यह तो बतायो 'हजारासिंह प्यारासिंह' का ताबूत किसके
मार्डर से खोला गया है ?"
"धन्दा तो हुक्म का गुलाम है दोस्त, आवाज पड़ी तो
'हांका' भर दिया।"
"धार हांका तो पड़ता है 'शिकारमाह के करीव मालूम
तो हो किसके शिकार की तैयारी है?"
मायुर ने दाव पहवान टंगड़ी दी, "मचान पर चढ़ने की
वात तो दूर, अभी कोई हथियारों से लैस तक नहीं।"
मादाज ने डोरी घुमाई, "हजारासिंह-प्यारासिंह की
यारों के यार २८ । फाइल फोकट में नहीं निकली यार, अवस्थी बड़ा गोताखोर अफ़सर है।" माथुर ने अनसुनी कर कैंटीन के छोकरे से छेड़छाड़ की, "दोस्त, चाय में गुड़ और अदरक क्यों नहीं मिलाते, पत्ती ही बचेगी।" कपूर हँस दिया, "तुम्हें यह ग़लतफहमी कैसे हुई कि तुम्हारे कहने के पेश्तर ही वह इस तरकोव पर अमल नहीं कर रहा। क्यों वे छोकरे-गलत कहता हूँ? "नहीं साहब !" "क्या कहने हैं इस सादगी के...!" शर्मा ने गोट खोली, "इस ऑडिट-ऑबजेक्शन के झंझट को कौन निवटाएगा यार! माथुर ने सिगरेट सुलगाकर तीली दूर फेंक दी, "वही जिसने कीचड़ में कमल उगाया होगा।" मनसुखानी ही-ही करके हँस दिया। "क्या छोटी बात करते हो यार ! इस बहते पानी में कीचड़ और कमल का क्या काम ! सच पूछो तो हर फ़ाइल समन्दर है समन्दर । जाल पड़ा नहीं कि माल मिला नहीं।" माथुर ने दरबारी आवाज़ में बँखार दिया, "अमा यार छोड़ ये चर्चे, जाल पड़ते रहेंगे, माल मिलते रहेंगे, अपने हाथ क्या लगेगा"यह कलमघसीटी और यही क्लर्की का ग्रेड।" - लंच के बाद सिर-टुंटवा घंटे मेज़ों पर लम्बे पसर गये। तीन के गए-गए बड़े बाबू साढ़े चार तक नहीं लौटे तो टकटोहनों की टोहा-टोही शुरू हो गई। बड़े साहव के मुकाम पर जो यारों के यार फोड़िया इतनी देर कैद रहे वह इस शिकंजे से निकलेगा कैसे ! अग्रवाल ने पिदकी-सी थूथड़ी उठाई, "साहवे-सदर के तिलिस्म में बड़े-बड़े शातिर नाम-पते भूल गए...।" भारद्वाज को रेलवई मूंछों ने हल्की-सी मरोड़ खाई, फिर इत्मीनान का लम्बा कश खींचा और सामने बैठे सक्सेना का कलेजा धुंखा दिया। "हर मुलाजिम का नाम-पता भयअंगूठे के सरकार सरविस- बुक में महफूज रखती है।" सक्सेना ने टाइप किए पन्ने फिर से नत्थी कर ट्रे में फेंक दिए और जौहरी को आवाज दी, "दोस्त, ककड़ी के चोर को कटारी की मार वाला मामला है शर्मा ने चोट की, "किसी ने सच ही कहा है चोर-चोर मौसरे भाई..." सूरी ने प्रागे फैली फ़ाइल सटाक से बन्द कर दी, 'साले, मां के टेंढवे, न काम न धन्या । सरकारी पंखों तले बैठ टके- टके के नगीने जड़ते रहते हैं।" गोयल ने अग्रवाल को अांख मारी, "कानी के व्याह में सौ जोखें-डोला उतरे तय की बात।" सूरी ने डपट दिया, "चुप ये हाटक लोचन, नोन-तेल से वास्ता रख । दरवारी लटकों से तेरा क्या काम । इन्हे तराशने दे इन कायस्थ के बच्चों को।" जौहरी ने रूमाल से गर्दन पोंछी और आदाब बजाकर कहा, "हम गुलामों से इतनी खफ़गी क्यो सूरी उस्ताद-हुक्म करो तो तुम्हारा भी परचम लहरा दें।" "वहन के फोटे-यह लफ्फाजो रिजर्व रख अपने वाप
यारों के यार
३०
के लिए, जिसकी ताजपोशी जल्द ही इस महकमे में होने
वाली है।"
काग़ज़-कलम छोड़ ब्रांच-की-वांच हैरत से सूरी के चेहरे
पर मानो आने वाले अफ़सर के तबादले का आर्डर पढ़ने
लगी हो।
शर्मा ने छाती कड़ी कर कहा, "सूरी उस्ताद, दूर की
हांकने से फायदा! अफ़सर तो क्या यहाँ का पत्ता तक न हिलने
देंगे विजीलैंस' वाले।"
आलपिन से दाँत कुरेदते-कुरेदते सूरी ने मैल मेज़ पर सटा
दिया, "क्या निकाला है चूनिया यार ने ठूठी का ठीकरा !
साले विजीलेंस वाले क्या गंगाजल पीकर 'इन्क्वायरी' .
करते हैं !"
ब्रांच में करारा कहकहा पड़ा तो गुप्ता ने भी अपनी अक्ल
की कन्दील जला ली, “जगतगुरू, इस मामले में हम तो तुम्हारा
तह न लेने से रहे, पर यह बताओ कि बड़े बाबू के ग्रह
कैसे हैं ?"
"तेरी माँ की बहन, मेरी मौसी, साले, मैं लोगों की
कुण्डलियाँ पढ़ता हूँ !"
अग्रवाल महीनों से सूरी के ताने-तिशने पाले हुए था।
जलकर बोला, "अगर सच सुनना चाहते हो तो पत्री पढ़ना और
जिस-तिसके कपड़े उतारना एक ही चीजें हैं, दो नहीं।"
किसी ने छींक दे मारी-मा...छी...।
सूरी ने अग्रवाल को घूरा, "तेरी घरवाली के नेफे में
तिलचट्टा, सालें हमीं से मुंहजोरी।"
अग्रवाल और गोयल ने जलती निगाह से एक-दूसरे को
यारों के यार देखा, फिर नीची नजर कर फ़ाइलों के पन्ने पलटने लगे। "वाह रे बँगुन के जोड़े...वैठे-बैठे गाली हजम । सालो गुर्दा क्या मां के जच्चाखाने में छोड़ पाए थे? कुछ तो जिगरा रखा करो । गुद्दी पकड़ दो झांपड़ रसीद करूं तो भी क्या गांधी चूंट पी जामोगे?" तवादले पर आने वाले अफसर को भूल जांच-को-बांच सिर हिला-हिला हंसने लगी। यदुवंशी ने तर जबान से हुलारा दिया, "उस्ताद, बड़ी बुरी चोट करते हो"।" सूरी कुछ कहे कि बग़ल में फ़ाइलें दवाए भवानी बाबू ब्रांच में दाखिल हुए। "जो नही चेहरे पर कुछ भी पढ़ सकना नामुमकिन था। सक्सेना को बुलाकर पूछा, "कोई दिक्कत तो नही हुई, ट्रांसपोर्ट से 'इन्फ. मशन' लेने में ?" ---आपका नाम लेने पर दयाल साहब ने डीलिंग- असिस्टेंट को बुलाकर सब इन्फर्मेशन दिलवा दी–हाँ वच्चे की सुन बड़े रंजीदा हुए।" घड़ी-भर के लिए भवानी वावू की आँखों के आगे बेटे का चेहरा ठिठया रहा और पलके नम हो गई। किसी तरह अपने को संभाल शर्मा को आवाज़ दी, "अायो यार, एक प्याला चाय तो लें"पान तो दम मारने की फुरसत नहीं मिली।" चाय की इन्तजार में कुरसी पर पीठ टिका छत की ओर देखने लगे तो ऐन मेज पर लटकती चिमनी और वल्व को देख अजय-सा खयाल दिमाग में कौंध गया-जिस लट्ट का फ्यूज उड़ेगा वही चिमनी से निकाल परे फेक दिया जाएगा।
यारों के यार
३२
।
-
भवानी वावू दरीदे के नुक्कड़ पर पहुंचे तो चाँदनी चौक
की चकाचौंध ने मुन्नन के बुझे थान की ओर भी अंधेरा कर
दिया । चलते-चलते किसी से टकराए तो पाया आँखें साइकिल
की दुकान पर टॅगी हैं। वेटे की छोटी-सी साध थी, पूरी न कर
पाए । जेब में रखे रुपयों की वात सोचकर अफ़सोस के मारे
गला रुंध गया।
सरदार वहादुर को उसके हमजोली के संग देखा तो घड़ी-
भर को बड़े बाबू समझ नहीं पाए कि उन्हें आज इधर क्यों
आना था। हड़बड़ाकर दिमाग पर सबसे ऊपर रखी फ़ाइल का
फीता खोल लिया और चौकस होकर कहा, "कहो यार सरताज
बहादुर, मिज़ाज कैसे हैं ?"
"नवाज़िश है भवानी बाबू.. इनसे मिलिये 'चन्दोक साहब
हैं जिनका ज़िक्र कल आपसे हुआ था।"
चन्दोक ने तापक से हाथ आगे बढ़ाया तो बड़े वाबू ने
दुप्रा-सलाम करते-करते पस्ता कद और छोटी पेशानी का पूरा
जायजा ले लिया।
चन्दोक ने मन-ही-मन तस्लीम किया कि आसामी खरी है
और गर्ज़मन्द।
दोनों को एक-दूसरे को जाँचते-पड़तालते देख सरताज
बहादुर ने सोचा, सौदा पट निकला तो छोटी-मोटी चौग़ान
बाज़ी बुरी न रहेगी।
चन्दोक ने वटेरी आँखों से इधर-उधर देखा, नाक से जैसे
कुछ सूंघा और सरताज के कंधे पर हाथ रख हौले से कहा-
"दरीवे की ओर बढ़ते बनो दोस्त, सामने की पटरी पर अवस्थी
की...टाँट नजर आई है।"
यारों के यार
सुनते ही भवानी वावू ऐसे छिटके कि सरताज माय घंटे
तक उन्हें दरीवे में ढूंढ पाया।
हलवाई की दुकान में घुसे ही ये कि चन्दोक आ पहुंचा।
हंसकर कहा, "यार तुम्हारे भवानी बाबू का पानी नाप रहा
था। तुम तो बड़े कुलावे बांध रहे थे, यहाँ तो हाथ-भर का भी
मामला नहीं..."
सरताज नै बेताबी से घड़ी देसी, इधर-उधर नज़र मारी
तो पाया भवानी बाबू इसी ओर चले आते हैं।
चन्दोक ने प्रास्तीन ऊपर की मोर राजदाराना अन्दाज़ में
कहा, "भवानी बाबू, आपका अवस्थी जिस पजामये के चक्कर
मे है वह इन मामलों का नम्बरी दलाल है।"
भवानी वावू ने मन के 'कॉन्फीडेन्सल-नर्क' पर कुछ नोट
कर लिया और तौवा बुलाकर कहा, "खुदा का कुफ साहब
अवस्थी-जैते अफसर से 'विजीलेस' को क्या लेना-देना!"
मजमून शुरू होते ही चन्दोक ने तीन दोने रबड़ी के आर्डर
कर दिए और तरावट की इन्तजार में भवानी बाबू की बात
सुने बगैर कहा, "विजीलैस की गिरिपत में अवस्थी की गर्दन है
कि कलम, जानना चाहें तो बन्दा इसकी 'इफमशन' हफ्ते के
अन्दर-अन्दर मुहय्या कर सकता है।"
भवानी बाबू का चेहरा एकाएक दस साल छोटा दोसने
लगा।
सरताज ने चन्दोक के इशारे पर पटरी मिलाई, "भवानी
धावू, आप जो भी डिटेल्स' चाहें वेझिझक हो चन्दोक से
कहिये-जोखिम उठाने में इनका कोई सानी नही।"
भवानी बावू ने एक बार तो रबड़ी के दोनो पर ही मामला
३४: यारों के यार + समेट लेना चाहा, फिर कुछ सोच दोनों की आँखों पर अपनी अक्ल का मोमरोगन मल दिया, "इस केस में मेरी जाती दिल- चस्पी कुछ खास नहीं, सिर्फ अपने मेहरबान अफसर के काम आना चाहता हूँ। रबड़ी का पिस्ता चन्दोक के दाँत तले प्रा सेम का बीज बन गया। झुंझलाहट से कहा, "यह भी कोई बात हुई भाप्पे ! जिसकी तुरपई उधड़ी है, उस मां के लाल का कोई अता-पता भी तो होगा।" तीर ऐन निशाने पर लगा जान भवानी ओर मुड़े और निहायत संजीदगी से वोले; "यार इस ज़माने में किसके बखिये उधड़ेगे! भलेमानुसों के ही तो... ऐसे ही बेचारे एक अवस्थी हैं। बैठे-बिठाये आ गये चपेट में।" नाम सुन दोनों हमपेशा सकते में आ गये। गुस्से के मारे चन्दोक ने एक डवल दोना रवड़ी का और आर्डर कर मारा। भवानी बाबू ने दिल-ही-दिल चोट बर्दाश्त कर सरताज को मजबूर किया, "सरताज बहादुर, एक और लो यार-हर्ज बाबू सरताज की क्या है ?" सरताज ने सौदा पटा लेने की उम्मीद अभी तक न छोड़ी थी। अाँख से कमंद फेंककर कहा, “चन्दोक यार, किसी सिल- सिले में अवस्थी का ज़िक्र तो तुमने भी किया ही था।" भवानी बावू की कट-हुज्जती से चन्दोक को अपनी ईंट वाज़ार में पड़ी दिखाई दी। रुखाई से कहा, "अवस्थी मेरी प्रासामी नहीं। जिस लापड़िये ने उससे पांच सौ खाया वही उसकी खिसकती पतलून भी संभालेगा।" आ...खाँ या.. भवानी बाबू ने चारों खूटे कराकर यारों के यार . वाग-डोर प्रसने हाथ में संभाल ली, "चन्दोक साह्व, इसी नुक्ते पर आ रहा हूँ। वह शख्स महज लिफाफिया है और कुछ नहीं। यह बात साहब को भी मालूम हो चुकी है । अव तक गुपराह हुए सो हुए, अब यह मामला अपने लेवल पर आप संभालिए।" चन्दोक का दिल-दिमाग तरोताजा और तारीख खरी ही निकली । डकार लेकर कहा, "सरताज यार, अव आया न ग्रानन्द, कोई बात तो बनी।" सरताज बहादुर ने मेज़ के नीचे से चन्दोक का पांव दाय दिया। भवानी बाबू से कहा, "भवानी बावू, प्रापको जो चुनींदा. चुनीदा डिटेल्स चाहिए हों बता दीजिए, चन्दोक अपना काम शुरू करे।" जल्द ही जेय मे अलग होने वाली इन्वेस्टमेन्ट' को भवानी बाबू ने बिलकुल सेफ़ करार दिया और लापरवाही से कहा, "जल्दी क्या है यार, अभी तो फ़ाइल एडमिनिस्ट्रेशन में चिपकी पड़ी है-जरूरत पड़ते ही तकलीफ दूंगा।" चन्दोक को प्रांखों में फतहपुरी के तन्दूरी मुगं लटक गये। "भवानी बायू, वक्त वताइएगा, चन्दोक गरजमन्दों का गुलाम है । वदले में कुछ मांगता नही, फक्त ज़रूरी खर्चा।" सरताज ने मन-ही-मन चन्दोक को इस बेहयाई पर खुग हो उसे घुड़क दिया, "दोस्त क्या हल्की बात करते हो! कद्र- दानों को कभी तो पहचान लिया करो।" चन्दोक से बचा एक खुफिया नज़र सरताज ने बड़े बाई तक भी पहुंचा दी, "ठीक किया है भवानी बाबू.. चालू एरेन्द से खवरदारी बरतना अक्लमन्दी है।" सरताज का मतलब भाप भवानी बाबू भी गौर से !
यारों के यार
बहादुर को पोर देखते रहे मानो कहते हों, "यह वाप-दादा का
इल्म है दोस्त-सिर्फ लिफाफिया हथकण्डों के जोर से इसे
हथियाया नहीं जा सकता।"
रबडी के पैसे चुका दो-एक वार एहतियातन जेब में हाथ
डाला, फिर अन्दर को जेब से लिफाफा निकाल चन्दोक की ओर
बढ़ा दिया।
बारी-बारी हाथ मिला दोनों कीमियागरों से रुखसत पाई
तो सरताज ने सुर्खरू हो सिगरेट जलाई, 'कहो दोस्त, अव
किधर .."
चन्दोक ने पीठ में मुक्का दे मारा, "हरामजादे, अब खाली
मुर्ग की टांग क्या चूसेगाव तो वहां चल प्यारे जहाँ पाबे-
हयात मिले।"
मन-ही-मन अपना हिस्सा अलग निकाल सरताज ने चन्दोक
के सरमाए का अन्दाजा लगाया तो कन्नी काट लेनी चाही,
"क्या कहें यार, अभी याद अाया, दवा लेकर मेरा घर पहुँचना
बड़ा ज़रूरी है। घर से बीमार चली पा रही हैं।"
चन्दोक ने सरताज को 'गल्लवकड़ी' डाल दी, "छोड़ भाप्पे,
तेरी अम्माँ तो
हर
मौसम में बीमार रहती है।"
"अम्माँ नहीं यार, बच्चों की मां का जिक्र है।"
"एक ही बात है दोस्त...प्यारेलाल चन्दोक तो अपनी
बीवी को अपनी अम्माँ ही मानता है।"
हँसते-हंसते सरताज को खाँसी उठ पाई, "तुम्हारा भी
जवाब नहीं दोस्त "यों तुम्हारी बात में कुछ तुक तो है।"
रुपयों की ताजी गर्मी से चन्दोक खयाली घोड़े दौड़ाता
किसी चकले की सीढ़ियों पर जा पहुंचा। मस्ती में कहा, "जो
यारों के यार जनाना हर रोज़ मैले कुचले कपड़ों में सौदाई बनी, ची-चपड़ और चूल्हे-चौके में लगी रहे, मर्द को रिझाने के नाम पर वीमारी का पचड़ा ले बैठे, तो वता यार, उसको प्यारेलाल अम्मां नहीं तो क्या मुजरे को कमसिन माने ?" . सरदार हजारासिंह प्यारासिंह ने पाला स्टील फ़र्नीचर से सजे-सजाये दफ्तर में बैठे-बैठे कम्पनी के तजर्वेकार खोजी साई- दास से पूरी तफसील सुनी, सब पहलुओं पर गौर किया और स्याह-सफेद का पूरा खाका दिमाग पर सींच लिया। साइंदास के बाहर जाते ही कीमती भीनी सेन्ट का झोंका अन्दर पाया और दारजी के दाहिने पाकर सिमट गया । दारजी ने साफा छुना, फिर हाथ बढ़ा स्टैनो के रेशमी वालों को सह- लाया और उसके लेसदार वारीक व्लाउज पर खुश होकर कहा, "तमाशा.मिस, शार्टहैण्ड टाइप के लिए इतनी महीन चोली की जरूरत क्यों?" तमाशा व्यूटी सैलून से सीखी ताजी प्रदानों से शरमाई, फिर हंस दी। हाथ से वियर घुले वाल छितराए और आँखें नचाकर कहा, "बड़े वॉस, यह छोटे वॉसका स्टैण्डिग पॉर्डर है।" दारजी ने ब्लाउज पर उभरे मॉडर का जायजा लिया और जरूरत मुताविक मजा लेकर कहा, "तमाशा मिस, हमेशा याद रहे-लिहाज छोटे बॉस का और मॉर्डर बड़े बॉस का।" तमाशा ने गर्दन झुका दिलफेंक नज़र से बड़े दारजी को देखा, फिर लाड़ से उनका साफा चूम लिया। उनके पहलू से निकल आँखें झपकाकर कहा, "बड़े दारजी का हुक्म हो तो तमाशा इम्पोरियम की टाट-पट्टी पहना करे।"
यारों के यार
दारजी ने लाड़ से चपत दी, "सिर-मुनिया, इस कम्पनी में
यह नहीं चलेगा। हाँ कुछ 'हाई-अप्स' के लिए रेशमी गाढ़े की
पोशाकें बनवा रखो।"
तमाशा ने दारजी से डिक्टेशन लेने के लिए ताज़ा वरक
निकाला और चमकते नाखूनों वाली उँगलियों में नोकदार
पेंसिल अटाए, दारजी के चुटकी से पहाड़ हिला देने वाले नुस्खों
का इन्तज़ार करने लगी।
दारजी ने टेबल-डायरी के पन्ने पलटे तो लाल-नीली
तारीखों में कई चेहरे, टैण्डर लाइसेंस और ठेके चमक उठे।
बाकायदा बड़ी कम्पनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर के ठस्से से
रोबीली आवाज़ में डिक्टेट करवाया :
पहलापूर
सोशल पिकनिक
फरीदाबाद
दो दर्जन तन्दूरी मुर्ग
दो दर्जन फिश-कटलेट
दो दर्जन शामी कबाब
एक दर्जन बाकरखानियाँ
दो दर्जन रूमाली रोटियाँ
दो दर्जन तन्दूरी पराठे
दो केट बीयर
दो क्रेट कोका, सोडा
और गुच्छा एक खानदानी लड़कियों का!
इसरों पूर
स्टार कन्टरी हाउस
के
.
पारों के यार वागीचे में सनीचर की शाम- मेजवान मशहूर समाजसेवी रईस प्रभुदयाल खर्चा पूरा-'हजारासिंह प्यारासिंह' मौजूदगी बड़े-बड़े खिलाड़ियों की: तन्दुरी और चाहीनज पक्वान वैण्ड की हाजरी दर्जन दो सस्ती जवान लड़कियां बीवियों को 'पलोर' पर उलझाए रखने के लिए दर्जन-भर किराए के लोण्डे एक मेज मंगलवारी पकवान और काउन्टर पर नीरा डिम्पल का खासा स्टाक और रुतबे के मुताविक लिफाफों में नकदी। तीसरा पूर चार डबल सूट-मेडन्स, अशोका, इम्पीरियल और कॉन्टीनेन्टल-पढ़ी-लिखी अच्छे तलक्कुज वाली अंग्रेजीदा खुशगवार लड़कियो-लिटरेचर और पार्ट की गुफ्तगू में माहिर खजुराहो कारवर्ट-पार्क उदयपुर और यारों के यार आगरा के अलग-अलग ट्रिप । महीने का खास जलसा जनसेवक कल्चरल सेण्टर का मुहूर्त मोअजिज मेहमान की अगवानी गेंदे के हार डबल साइज़, गुलाब की पंखुड़ियाँ मन-भर एक अदद चांदी की तश्तरी में सोने की कतरनी बनारस ब्रोकेड का थान बतौर निशानी और नटराज की मूति एक पैकट ताकत की गोलियाँ और मेहमान के हुजूर कुछ बातूनी अधेड़ औरतें। तमाशा ने चारों प्रोग्राम टाइप किये और दारजी से दस्तखत करवाकर 'लायसां प्रॉफिसर' भाटिया को भिजवा में दिये। तमाशा ने जरा-सी देर की, भाटिया की केविन में झांका और शीरी आवाज़ में हौले से कहा, "वन्दोवस्त साहिब, तमन्ना को एक वार 'अपग्रेड' करके तो देखो-तुम्हें पछताना नहीं पड़ेगा।" तमाशा की आवाज़ में भाटिया को अवस्थी के लहजे की कसावट सुन पड़ी तो वारीक मियाँ के पतले हालातों को मन- ही-मन दोहरा लिया। पखवारे के प्रोग्राम देखे। अलग-अलग पूरों की फहरिस्त पढ़ी और माहिर मॅजे अन्दाज़ में टेलीफोन पर सव 'फिक्स' कर दिया। सिर्फ दो छोकरियों ने नखरे दिखाए, "फीस बढ़ गई है वन्दोवस्त साहिब, अब माफी ।"
पारों के पार " भाटिया ने 'इश्कचा' ढीली की । "प्यारी दोस्तो, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि भाटिया 'हार्ट अटैक से नसिंग-होम में नही पड़ा। हमेशा की तरह अपनी ड्यूटी पर तैनात है और तुम दोनों के फन की कद्र करना जानता है । 'इम्पोरटेड मेडन्सफार्म' से लेकर गुस्ले-सेहत तक का सब खर्चा अलावा फीस के।" “भाटिया डियर, तुम शहद नहीं, खालिस गुलकन्द हो गुलकन्द ।” "शुक्रिया भाटिया ने पूरा वन्दोवस्त कर दारजी के दस्तसतों वाला कागज फाड़कर वेस्ट पेपर वास्फेट में डाल दिया और इत्मीनान से तमन्ना को फोन मिलाया, "इस ओर मनमोहन भाटिया- हैलो तमन्ना डियर...!" "तमन्ना के पास कोई वक्त नहीं हजरत, तुम रिश्वतपुरी की कोई सस्ती लडकी तलाश करो।" "उस दिन के लिए माफी चाहता हूँ।" "माफी ? उस दकियानूस सकिन्ड-ग्रेड प्रोविशियल अफ- सर को हजूरी में लगा दिया। पादाव लो और जहन्नुम में जानो।" भाटिया ने सुग हो सिगरेट जला ली और दोबारा नम्बर मिलाकर कहा, "तमन्ना डियर, मुबारिकवाद ! इस बार अपने रिस्क पर यम्बई का इन्डस्ट्रियलिस्ट दे रहा हूँ, चलेगा?" सुशी से तमन्ना का दित घड़कने लगा, पर रुखाई से कहा, "तुम्हारा क्या ठोक भाटिया-जिसे तुम इन्डस्ट्रियलिस्ट कहते हो वह धोतीवाज़ रघुपतिया ही न निकले।" भाटिया ही-ही कर हंसने लगा।
यारों के यार ४२ - 'क्या नाम दिया है तमन्ना डालिग-क्या नाम दिया है 'धोतीवाज रघुपतिया.." एकाएक छोटे वॉस की ओर से घंटी वज उठी। भाटिया ने एक चोंगा रखा, दूसरा उठाया। "भाटिया यार, स्टील के लाइसेंस का कुछ करो। अगली मीटिंग से पहले-पहले दस्तखत हो ही जाने चाहिए।" भाटिया ने बड़ी हलीमी से फटकार पाकेट में डाल ली, "मामला जरा टेढ़ा है हजूर, पर जंजीर मिलाने की पूरी कोशिश में हूँ।" बॉस प्यारासिंह ज़रा ढीले पड़े, “लंच कहाँ ले रहे हो यार?" "सरकार, इस मज़दूर का क्या ठीक! कहाँ पकाए, कहां खाए, अभी तक तो कुछ भी तय नहीं।" भाटिया से उसकी नम्बर एक माशूका और दोपहर की ड्राइव झपट लेने का मलाल प्यारासिंह के दिल से धुल गया। शावाशी के अन्दाज़ में अपने लायसाँ-प्रॉफ़िसर को बढ़ावा दिया, "यार जुटे रहो कसकर, मेहनत जरूर रंग लाएगी।" मन मसोस भाटिया ने विना आवाज़ के एक करारी गाली प्यारासिंह की पतलून पर दाग दी कि तमाशा ने फोन पर फुसफुसा दिया, "मोहन डीयर, तुम फरीदाबाद न जा पायोगे, मेरी हमदर्दी।" मामला भाँप भाटिया हँस दिया--"हमारे लिए तमाशा खानम भी खाली है कि नहीं?" तमाशा ऐसे हँसी कि रो दी हो, "क्या करूँ दोस्त- अवस्थी को तुम्हीं ने भिड़ाया है इस मासूम से।"
मारों के यार
भाटिया को खेल सूझ गया "पसन्द करो तो हम तीनों
लंच पर मिलें तो पक्का रहा एक बीस-"
लायसॉ-प्रॉफिसर ने इन्कार की कोई गुंजाइम न रखी थी।
हंसकर कहा, "कम्पनी की खिदमत में यह और सही।"
भाटिया ने अवस्थी का नम्बर मिलाया, "यार, मा रहे
हो न?"
हैडक्लर्क को पास सड़े देख अवस्थी जरा झिम.के, फिर
मुख्तसर-सा 'अच्छा' कहकर फोन रख दिया।
नवानी वाबू ने रंग-ढंग देखे तो दित-ही-दिल दो को दो से
जरव दी।
अवस्थी ने घड़ी देखी-एक दस | "भवानी बाबू. दो बजे
वाली मीटिंग में जाना है, ज़रा प्लान-प्रोजेक्ट्स की फाइल तो
ले पाइये।"
भवानी यावू चौकन्ने हुए-मुस्तैदी से साहब को फाइल
पेश की। अवस्थी ने सरसरो नजर मारी, दो-एक 'पोरशन'
चौकसी से देखे और कुर्मी से उठ खड़े हुए।
साहब के बाहर जाते ही वहे वावू ने साहब की 'इंगेजमैट'
डायरी देसी-प्लान प्रोजेक्ट्स' की मीटिंग कल शुक्र को
दो बजे।
दौड़े हुए वाहर गये। अवस्यो गाड़ी स्टॉर्ट करने को ही ये
कि भवानी वावू को देख रुक गये, "वयों वड़े बाबू ?"
"गुस्ताखी माफ-जिस मीटिंग मे हजूर तगरीफ ले जा
रहे हैं. वह कल है, भाग नहीं।"
"मुझे कुछ 'डिटेल्स' डिस्कस करने योजना भवन
नाना है।"
यारों के या
भवानी वाबू मन-ही-मन हँसे-इतने बड़े शतरंजबाज़ की
थुड़ी चाल!
.
तुफंगे दहनपुर जो छूटी तो दफ्तर-का-दफ़्तर ठंडा होकर बैठ
गया।
एक आर्डर निकला अवस्थी के तबादले का, तरक्की पाई।
एक आर्डर निकला कार्पोरेशन से सिन्हा का। ओहदा-बढ़ाई
हुई और अवस्थी की जगह पाई
ऐन दस बजे दफ्तर में हाज़िर ब्रांच अपनी-अपनी सीटों
पर सफेद-पीले कागज़ों के गट्ठों में जुट गई ।
कुर्सी वदलते सौ सुराखों की खोज-पड़ताल। अपने-अपने.
ढोके संभालने में फुरसत किसे !
भवानी वाबू ऐसे मसरूफ कि दम मारने की फुरसत
नहीं। कई फ़ाइलों पर साहब के आर्डर बाकी थे, गज़ब की
फुर्ती से फ़ाइलों पर फ्लैप लगा-लगा रखते चले।
मिनट-भर को सिर उठाया तो सबको अपनी दानिशमन
से खवरदार किया, "अपनी-अपनी फ़ाइल देखभाल लो-कि
पर भी दस्तखत या आर्डर बाकी हों तो खमियाजा आप
उठाना पड़ेगा। याद रहे फ़ाइल के पेटे में फ़रियाद का
घर नहीं..."
जियालाल हिसाव के हिन्दसों में बड़ी ज़ोर से मसरू
पर बड़े बाबू की ताईद करना ज़रूरी समझा, "वजा फ
भवानी बाबू, कुर्सी क्या बदलती है, छोटा-मोटा जल
उठ पाता है।"
जौहरी ने नये आका की तारीफ में जोड़ा, "f
यारों फे यार
४५
जमीन हिलती जरूर है, पर मजबूती से टिक जाने के
लिए।"
शर्मा और भारद्वाज इस गुफ्तगू पर मन मसोसकर रह
गए । अवस्थी की बदली के आर्डर क्या निकले, भाई-बन्दों के
दम-खम ही नार्मल से नीचे उतर गये ।
मनसुखानो ने ब्रांच के दोनों सेमों का खम तोलने की
कोशिश की, "यार कुछ भी कहो यादमी अवस्थी होशियार
हैं। हज़ार ऊंच-नीच हुए, पर बॉस आखिर गया तो तरक्की
पर ही।"
सूरी कब से जबान में हारत महमूस कर रहा था-
फ़ाइल का नोटिंग भूल वल्गमी आवाज में फूट पड़ा, "तरक्की
के जुलाव से साले परशुरामियों का पेट प्रभो साफ़ नहीं हुआ।
फफूंदी के-तरकको अाजकल काबलियत से नहीं, मुंहचुमाई
और पविचिसाई से मिलती है।"
भवानी यावू ने सख्ती से सूरी को ओर देखा, "जवान पर
कावू रखो यार, वक्त-वैवक्त कोई इधर प्रा निकला, तो जान
को प्राफत हो जाएगी।"
सूरी पसरकर कुर्सी हिलाने लगा। "बड़े बाबू इससे
बेफिक रहिये-अभीतो कोरेशनियाँ दवाकर पार्टियां साएगा।
दिन-बार पूछेगा । मुहूर्त निकलवाएगा, तब कही फित्ना
पहुंचेगा इस दफ्तर के बरामदे तक।"
शर्मा-भारद्वाज गिरोह नये साहब के बारे में
कुछ
पार
जानने को बेताब था, पर वक्त की नजाकत पहचान मुंह न
सोत पाया । अग्नवाल ने चालाकी से परदा उठाने की कोशिश
की-"मूरी उस्ताद, मालूम होता है तुम्हे इस मज़ा
.
यारों के यार काफ़ी वाक फ़ियत है। सच तो यह है कि तुम्हीं ने सबसे पहले अवस्थी की ट्रान्सफर की दागी थी। लगे हाथ कुछ और रोशनी डाल दो, मालूम तो हो इन लौण्डों को, किस हस्ती तले काम करने वाले हैं ! सूरी ने अग्रवाल को घूरा, "अवे ओ बीड़ी के बण्डल, इन पोदनों की अपनी क्या हस्ती! हस्ती है अवस्थी के विधान- सभाई ससुर की। उसकी लुगाई की यारी-दोस्ती की। सिन्हा के मास्टर बाप के रुतबेदार शागिर्दो की । इसी बूते पर शहमात का सारा खेल जारी है प्यारे...! दिल कुछ और सुनने को उछलने लगा, पर मामला खतरनाक जान सव दवे-दबे हँस दिये। शर्मा ने खीजकर कहा, "सूरी, यार असली बात पर पात्रो न ! सुना है नया बॉस बड़ा सख्त तबीयत है।" "सख्ती काहे की यारो''वह नूनगुनः तो बड़ा मुहब्बती है । बड़े-से-बड़े और छोटे-से-छोटे चम्मच की कद्र करना जानता है। घी-मक्खन के डिब्बे तैयार कर लो, काम आएंगे काम।" यदुवंशी-सक्सेना ने एक-दूसरे की ओर देखा और आँखों- ही-प्राँखों में कुछ तहैया कर लिया। "सूरी दादा, इजाज़त हो तो लंच से पहले-पहले काम निबटा लें।" "अवे ओ पेटीकोट के-मैं तेरे हाथ पकड़े बैठा हूँ ? कर ले दो-चार दिन सरकार की खैरख्वाही, फिर तो तुम्हारी बिरादरी का नौशा पाने ही वाला है। चम्मचवाजी में ही दिन निकल जाया करेगा।" मज़मून को खतरे के निशान से ऊपर आते देख माथुर ने ?
यारों के मार
४७
सूई पकड़ ली और हंसकर कहा, "दादा, दफ्तर में तो एक
विरादरी अफसरों की और एक बेचारे क्लों की । दूसरा तो
कोई हिसाव ही नहीं।"
"वाह रे चाशनीगीर, क्या निकाली है फांक मुरव्ये की !
सालो, कागज के कीड़ो, तुममें से हर एक उस कारपोरेशमिए
के तोशसाने पर अपना सब्जी-सलाम चिपका पाया है। झूठ
कहता हूं?"
दर्जनों चेहरों पर ऐसा सन्नाटा छाया कि खुशी का इजहार
करने को जोशी ने कह हो जो दिया, "गुरू, हम तो एक यात
जानते हैं, जो घर का राजी होगा वह न किसी से मकपन
धरवाएगा, न किसी से सलाम करवाएगा।"
"चुप यो चूतियानन्दन, आजकल जो उठता है रिश्वत के
समीर से नम्बर दो का पैसा जोड़ सानदानी अमीर बना
फिरता है।"
जम्मनलाल ने चुटकी भरी, "सब पर एक ही लकड़ी घुमा
दी उस्ताद !"
सूरी ने उटकर सिड़की में से नाक सिनकी और रूमाल से
पोंछकर कहा, "वेटा जम्मनलाल अरोड़ा, याद रख गुरू का
कहना-मादमी के हर पिल्ले को पेट और पतलून सताते हैं।"
एकाएक चरमराते जूतों की अावाज वाच के दरवाजे पर
ठिठक गई । पोखें उठा जो देखा तो अवस्थी के साथ नये साहब
को खड़े पाया।
भवानी वायू लपककर कुर्सी से उठे और आदाब बजा
पास जा हाजिर हुए।
अवस्थी ने मुलायम पावाज में पूछा, "बड़े वायू, क्या
४८ यारों के यार रहा है ?" बड़े बाबू ने अपनी-अपनी सीट पर तैनात स्टाफ़ पर नज़र मारी और बड़ी शायस्तगी से कहा, "रुटीन के कागज़ हैं साहब, लंच तक निकल जायेंगे।' सिर हिला अवस्थी ने गहरी अफ़सराना आवाज़ में कहा, "अब आप सव सिन्हा साहब के साथ काम करेंगे। मुझे पूरी उम्मीद है, इन्हें भी आप उसी तरह कोऑपरेशन देंगे जैसा मैं आपसे पाता रहा हूँ। सिन्हा ने जरा-सा सिर घुमाकर घुटी-धुटी नजर ब्रांच पर डाली और अवस्थी की ओर मुंह कर कुछ फुसफुसा दिया। दोनों अफ़सरों के पीठ मोड़ते ही दर्जनों सिगरेटं एक साथ सुलग उठीं। अपना नजूम गलत हुआजान सूरी ने कलई फेर देनी चाही "लो यारो, सरकारी प्रार्डर क्या हुअा, घर के ज़नाने का मनमाना खेल ही हो गया। जब चाहा लड़की निकाल मारी जब चाहा लड़का। भला पूछो जो मुअत्तल होने वाले थे वे तरक्की के हकदार बन बैठे ?" इस बात पर चुप रहना भारद्वाज की बर्दाश्त के बाहर था-"सरकार अन्धी नहीं उस्ताद, आँखें रखती है और अपने कारिन्दों को ठोक-बजाकर देखने की अक्ल भी।" सूरी ने तैश में आ कुर्सी पर ही फसक्कड़ा मार लिया, "वहनचोद सरकारी दूरबीन का इल्म मुझे भी है । पर जो टूटी और टंकी की सप्लाई के बन्दोबस्त यार लोगों ने कर रखे हैं वहां वहनचोद अक्ल का क्या काम ? वहाँ तो चालू है नकद- नारायण ।" सूरी का अगला वार पहचान शर्मा ने टोक दिया, 'बहुत यारों के यार ४४ चोर करते हो यार, कभी तो चुप रहा करो।" सूरी सिर हिला-हिलाकर हँसा, "मुझे तुमसे पूरी हमददी है यार! अवस्थी के साथ चले क्यों नहीं जाते ? मिन्नत- सगाजत कर देखो। तुम उसकी सरपरस्ती में खुश रहोगे पौर उसे भी नये दफ्तर में दो-चार जी-हुजूरियों की ज़रूरत तो होगी।" शर्मा अपनी कुर्मी से उठा और मूरी के पास था कड़ककर योगा, "हुजूरिया तुम्हारा बाप होगा-समझे...?" सूरी शर्मा को धूरता रहा जैसे मुंह पर ही थूक मारेगा, फिर शरारत से हँस दिया, "वस इतने में ही पाद मार दिया साले ! नोट कर शर्मा अदर-मेरा बाप कुछ भी था, पर मुझ- नुम जैसा कलगघसीटी कनक नही था।" इस बार ब्रांच को हैंगता देख सूरी कुछ चुपका-सा हो गया। फिर बडी मायूस प्राधाज़ में कहा, "यार, लागत तो हम सब पर है जो क्लर्क की कुर्सी पर ही पंशन पा जाएंगे। इस उम्र में हमारा-तुम्हारा छुटकारा तो होने से रहा, हाँ अपने- अपने लड़कों को अच्छे स्कूल-कालेजों में पढ़ायो, सालो नहीं तो इन्ही अफसरों के लोडे तुम्हारे बच्चों के गलों मे भी नासून देंगे । और किस्मत के मारे वे भी इन्ही कुसियों पर बूढ़े हो जायेंगे।" बुसियों पर टिको पीठों पर जैसे किसी ने कोड़े फटकार दिए हों । अग्रवाल ने मूसे गले से पूछा, "सूरी उस्ताद, तुम्हारे अपने बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं ?" जवाव में सूरी ने बड़ी हिकारत से पहले अग्रवाल को और देसा। अनमनी-सी नजर वरामदे में कुछ टटोलती रही, पिर यारों के यार खुश्क गले को खंखारकर कहा, 'वे साले अभी नीली छतरी वाले के मदरसे में ही पढ़ते हैं। सालों को वहीं का वजीफा लगा हुआ है।" सिन्हा ने पुख्तामिज़ाजी से कुर्सी पर चूतड़ क्या टिकाए, पेशीनगोई के मुताबिक जनरल चाँद-मारी शुरू हो गई। कई खोसे फटे, कई पाकेट कटे और कई ठेकेदारों की पेशानियाँ ठण्डी हुई। करीब आधा दर्जन टेलीफोन नम्बर गूंगे हो गए और दफ्तर को बहनोई का घर समझने वाले पेशेवर चेहरे बरामदों में से रफूचक्कर हो गए। नए साहब के कमरे को नई तरतीब मिली। दरी वदल गई। बाएँ हाथ को पड़ा टेलीफोन दाएँ को पा गया और भुनी गन्दम-सा चेहरा हुकूमत बनकर कुर्सी पर चिपक गया। भवानी बाबू नए साहब के हुजूर में पहली बार हाजिर हुए तो रम्ज़शनास सिन्हा ने एक ही नज़र में भाँप लिया कि वाबू उन्होंने अक्ल का तेज़ पाया है। भवानी वाबू ने सलीके से फाइलें पेश की। जो भी केस सामने रखा तैयारी के साथ । पीछे का रेफरेन्स दिया तो पुराने अफसर की शान में न कोई गैरमाकूली इशारा किया, न वेकार बयानी । सिन्हा को दिल-ही-दिल इस वज़ादारी से कुछ अँझ- लाहट हुई। बड़े बाबू जाने को उठे तो भौंहें चढ़ा, सिन्हा ने अपने रौब की पहली कील गाड़ दी, "भवानी बाबू, स्टाफ को ज़रा कसकर रखिए-पहले जैसा हल्ला-गुला मुझे पसन्द नहीं।' "जी साहब..!"
यारों के यार
..."
भवानी वायू के सीट पर पहुंचने से पहले ही लड़के बैठे-बैठे
उनकी पहली पेगी के अन्दाजे लगा रहे थे । चाहा पाज ही लगे
हाथों साहब के पैगाम का ऐलान कर दिया जाय, फिर जाने
क्या सोच अपने चेहरे को ढीला छोड़ा और ज़रा ऊंची अफसरो
के अन्दाज़ में चाय का प्रार्डर कर दिया।
मतलब साफ़ था-नये अफ़सर पर बड़े बाबू का हैडक्लर्की
सिक्का जम गया।
माथुर ने पूछा, "कहो साहब, कैसी रही मुंहदिखाई ?"
"कलम कुछ चले तो मालूम हो यार, अभी से क्या कहें"
भारद्वाज ने कसोरा वजा देने की गर्ज से कहा "मशहूर तो
सिन्हा के बारे में यह है कि कलम नहीं शमशीर है। इधर चली
तो गर्दन चाक, उधर चली तो टपकन में ही रुह निहाल !
सुनते हैं नया साहब अंग्रेजी फर्राटेदार लिखता है।"
भवानी बावू मनसुखानी की ओर मुड़े, "अांकड़े तैयार हो
रहे हैं न? कल लंच तक चाहिए होंगे।"
"उसी में जुटा हूँ बड़े बावू ! हाँ एक अर्ज है-साहब की
प्रामद में एक पार्टी हो जाए।"
सक्सेना ने खुशी-खुशी दिल की जाहिर की, "दादा, आज
तो शामी कबाब और चाय उड़े।"
अग्रवाल ने जल-भुनकर कहा, "शामी कवाब, मांस, मछली
और माता का प्रसाद, इनके सिवाय कुछ और भी भाता है इन
कायस्य के बच्चों को !"
जौहरी ने सक्सेना को आंख मारी, "बोल वे, करता है
कबूल यह जुमं?"
सक्सेना ने शरारत से बड़े बाबू की ओर देसा और कान
५२ यारों के यार पकड़ नसीहत निकाली, "कबूल, गुनाह कबूल ।" गोयल कुछ कहना ही चाहता था कि मठरी-कचौड़ियों की डकार ने रास्ता रोक दिया। सूरी ने आवाज सुन फ़ाइल पर से आँख उठाई, "सुबह- सुबह किसके यहाँ से डट के प्राया है दोस्त ! ज़रूर किसी आसामी ने तकाज़ा फेंका होगा।" गोयल ने गुस्से से देखा तो शर्मा ने उसकी ओर एक खुफिया नज़र फेंक सूरी को उलझा लिया, "सूरी यार, उस विलायती कचरेका क्या किस्सा रहा ? सुना है, कोई पहुँचे हुए हज़रत लाखों हज़म कर गए । एक बार केस खुले तो बड़े-बड़े पोशीदा राज ऊपर आएंगे।" "मोटे दिमाग पर रंदा मार साले--उस चिटफंडी की धोती भले खुल जाय, उसके खिलाफ केस नहीं खुल सकता ।" "ऐसा भी क्या अंधेर है बड़े भाई, अाखिर कानून के 'शिकंजे से कब तक बचेगा ?" "जानता भी है इस कचहरी के कट्टे को ! बीस ट्रकें, दो चिटफण्ड और काला बाजार स्मगलर सिंडीकेट का मालिक है औरतों का कोऑपरेटिव वहनचोद अलग से चलता है।" "औरतों के कोप्रॉपरेटिव से क्या मतलब है तुम्हारा दोस्त?" "वाह भोले बादशाह, रहते किस दुनिया में हो ! हर नाक- नक्शे और कद-ब्रुत की शेयर होल्डर जनानी का कार्ड तैयार रखता । सेठ और टेलीफोन के ज़रिये इज़ारवन्द-सर्विस चलाता है।" भवानी वाबू ने डपटा, "कहे देता हूँ, अव पहले जैसी बात नहीं। मुंह से उलटी-सीधी निकालने से परहेज़ किया करो।" -
पारों के यार
सूरी ने चाय-समोसे आते देखे तो अपनी सीट छोड़ भवानी
वायू के सामने वाली कुर्सी खीच लो, "सीधी और उल्टी क्या
भवानी बाबू, अपने बहनचोद तो पाला अफसर बनने मे रहे।
अक्ल मुताविक काम करते हैं और खरे को खरा और खोटे को
खोटा कहते हैं।"
किसी ने होले से फस दो, “सूरी उस्ताद, कहने वाले कुछ
और भी कहते हैं।"
सूरी ने मांखें दिखाई, "कनस्तर के कंकर फूट भी तो दे
अब, पता तो लगे वावू लोग कहते क्या हैं ?"
"बुरा न मानना यार, सुना है अवस्थी के पहले चावला के
जमाने में हरे पत्ते तुमने भी कम नही बटोरे।"
"एक-सौ-तीस के ग्रेडिये साले, एक पतलून धोता हूँ, दूसरी
लोहा कर दफ्तर हाजिर होता हूँ। हराम की कसम न होती तो
फलसूफियों का टिकट में भी कटा सकता था ।"
गोयल ने वीच-बचाव के बहाने और भड़काया, "सूरी यार,
असल में चावला से तुम्हारी जो साठ-गांठ थी, उसी से यह
नतीजा निकाला गया है।
"चुप मो पंसेरीलाल, मेरी और चावला की क्या वरावरी?
वह बारह-सी-बीस रा लट्ट मोर मैं ढाई-सौ रुपल्ली का टटू ।"
लोगों के कहकहों में भी अग्रवाल यूका नहीं। "कुछ भी
कहो यार, थे तो तुम दोनों हम-वतनी ।"
सूरी ने उठकर अग्रवाल की गर्दन पकड़ ली, "सुन यो
वेसी के टैण्डर, चावला कहाँ से लाया मेरा हमवतनी ! मैं ठेठ
मर्दान का और चूतिया चावला काला वाजार दिल्ली की पैदा-
इश, साले फिर कभी मुझे उसको कट लगाई तो सीधे पानीपत
यारों के यार
पहुंचा दूंगा।"
बख्शी ने मज़ा लिया, "गाली-गलौज में क्या रखा है
उस्ताद, असल बात बताकर इन यार लोगों का वहम खतम
कर! फिर देखें तुम पर कौन चार्ज लगाता है हमवतनी का
और इसकी आड़ में हराम की फसल काटने का ?"
"चुप बे अफले, टी ए-बिल पर ऐसा प्रॉबजैक्शन ठोकूँगा
कि बीवी के सारे अरमान धरे रह जाएंगे।"
"फिर वही टालमटोल यार, यह तो बता दो चावला तुम्हें
आये दिन किस गड्डी का सलाम भेजा करता था ?"
इस वार सूरी पेंट फुला-फुला हँसा, "सलाम की सुनोगे तो
घी में तली कलेजी भूल जाओगे।"
"कल से पहले तुम्हारी तरक्की हो उस्ताद, अब इन्तजार
न करवायो, बस कह ही डालो।"
"कनरसिये साले, तो लो सुनो । सरदियों के दिन थे। छुट्टी के
दिन शाम को सस्ती सब्जी की तलाश में जो निकला तो चलते-
चलते कहीं-का-कहीं पहुंच गया । इत्तफाक से घड़ी घर भूल गया
था। इधर-उधर देखा कहीं से वक्त पता लगे। तभी पटरी से
लगी चावला की मोटर दीख पड़ी। सोचा लगे हाथों सलाम भी
हो जाएगा और वक्त भी
पूछ लूंगा साहब से। वक्त तो क्या
पता लगता, पर इस तुम्हारे यार ने जो पता पा लिया वह टाइम
और घड़ी दोनों से बड़ा था।"
"पहेलियाँ न बुझायो यार, मोटर में था क्या ?"
" 'अलफ' से लेकर 'ये' तक के खुलासे भी मैं ही करूं !
तो लो सुनो-मोटर में हो रहा था-गुल्ली-डंडा ।"
बांच-भर की आँखों के आगे मेज, कुर्सी और फाइलें सब
,
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यारों के यार गायब हो गये । साँस रोके किसी ने पूछा, "यार बतानोतो सही, था कोन-कौन ?" सूरी की हंसी थुलथुले पेट पर या फली, "होता कौन, ठेके- दार रलियाराम की तमंचो और अपना साहब चावला ।" सूरी ने समोसा मुंह में डाला, चाय के घूट लिये और हाथ से मुंह पोंछकर कहा, "सुसरो अगले ही दिन से बस साहव के सलाम शुरू हो गये। कभी बुलाकर पूछता-सूरी इस सीट पर कितने साल से काम कर रहे हो? कभी पूछ लिया-एक्साइज में जाना चाहोगे."याद है बड़े बावू. सीनियोरिटी के चक्कर में मेरा केस भी चावला ने धकेला था ?" अब तक सक्सेना का दित-बदन कुंकने लगा था। चावला के ग्रहद मैं कुछ सौदे उसने भी पटाए थे। जलन के मारे चुप न रह सका, "अव तो फन्लेखां जो भी कहेंगे, सफेद सव वन जाएगा। "वत्ती बनाकर डाल ले इस सफेद सच को अन्दर । खुद ही सोच साले, मुझे चावला से क्या लेना-देना था! न तो वह रलियाराम की चुदक्कड़अशी और न वह ठंडे पानी का चश्मा जो ग्रेटर कैलाश में चावला ने नई कोठी में फिट करवाया था। झूठ क्यों कहूँ वादर, इतना फ़ायदा ज़रूर हुआ कि ज़माने से खराब सूरी के 'कॉन्फीडेंशल' पर किसी गलतफहमी में ही चावला जाते-जाते एक 'गुड' ठोक गया।" जौहरी ने चकोटी लो, "सूरी उस्ताद, हवाई तुमने गजब को छोड़ी है, पर यह तो बतायो दरिया चावला इस दारुल- खिलाफा से निकलकर मुड़ा किधर ? "जो एक ही हल्ले में अमरीका पहुंच जाय वाबू साहब, यारों के यार समझ लो कोई ऊँची घात है।" भारद्वाज से नहीं रहा गया, "पता तो लगे किस चार हाथ वाले बाप की छतरी है चावला के सिर पर ?" सूरी ने एक और समोसा निगला और चाय का प्याला खाली कर मुंह पोंछ लिया, "यह इन्फर्मेशन भी चाहिए तो हाज़िर है। चावला की माँ मशहूर लोडराने कौम हरिभाईजी की धर्म-बहन थी। समझे बेटा, धर्मात्मा मामा भांजे को अभी तक लड्डू खिला रहा है और वहन की पाशिकी.के सबूत दे रहा है।" सिन्हा के हाथों महकमे के अन्दरूनो पेचों के कसते ही सरदार हजारासिंह ने अपनी पुरानी हिकमत को किताब से वीमारी का अक्सीर नुस्खा निकाल मारा-पेचिश का इलाज इस्पगोल। छोटे-बड़े साले जोरावरसिंह और, जुझारसिंह और वेटे प्यारासिंह के साथ 'इमरजेन्सी लेवल' पर सलाह-मशविरा किया और कुछ अहम कदम उठाने का फैसला कर दिया : घाटे में चल रही 'सिस्टर-कनसर्न' 'न्यू इरा एन्टर प्राइज' में कुछ सरमाया डालकर नई रूह फूंक दी जाए । कम्पनी के डाइरेक्टरों में समाजसेवी गोकुलभाई को शामिल जाए। छोटे सरमाए वाले कुछ ठेकेदारों का एक पैनल बना लिया जाए और उनकी सप्लाई भुगतान में 'न्यू-इरा' सव तरह की माली और टेक्नीकल मदद करे । गोकुल भाई के दामाद तनमुखराय जैन को 'न्यू इरा एन्टर- प्राइज़' का मैनेजर मुकर्रर कर दिया जाए। प्यारासिंह की वीवी, बीवी सतवन्तकौर के नाम की गोल्फ- लिंक वाली कोठी. कम्पनी के लिए गैस्ट हाउस के मुनासिब कर लिया यारों के यार किराये पर ले ली जाए। कोठी की साज-सजावट का ठेका सतवन्तकौर के भाई सुर- जीतसिंह को दिया जाए जो डेकोरेटर' की मदद से कोठी को दर्जा अव्वल बना दे। गेस्ट हाउस में एक बॉर-काउण्टर हो और उस पर पार्क क्लब के सीनियर मावदार को मुंह-मांगी तनख्वाह पर तैनात कर लिया जाए। 'हजारासिंह प्यारासिंह के हफ्तावारी गज़ट की कापी भाटिया के पास पहुंची तो मूंछों पर गोंद ही चिपक गया। प्रालीजाह ने रिसालदारी भी दी तो किसे ! देखें 'हजारासिंह प्यारासिंह के बाड़े में कितने नये किल्ले और गड़ते हैं, कितनी भैसें रस्सा तुड़ाकर भागती हैं। जिस सियासी गुर्गे को खुद भाटिया ने 'लोकल-सरकल' का कुतुबनुमा बनाया, अब वही सब्जीखोरा मुकाबले की कुर्सी पर मैनेजरी भी करेगा। दारजी ने भाटिया को याद फरमाया तो भाटिया को बिल- कुल मालूम था उसे क्याकहा जाएगा, क्या पूछा जाएगा और क्या दिया जाएगा। सरदारजी हस्वेमामूल तमाशा को डिक्टेशन दे रहे थे। हाथ से बैठने का इशारा किया और डिक्टेशन जारी रखा : जैतपुर वाला फार्म मामूली दामों पर अवस्थी की बीवी को बेच दिया जाए। जल्द ही कुछ ऊंचे पाला अफ़सरान और गैर-मुल्की नुमा- इंदों के लिए शिकार का बन्दोबस्त किया जाए। अवस्थी के नये बॉस श्रीवास्तव के लिए हर किस्म की 'एन्टरटेनमेंट' मुहय्या की जाए।
यारों के यार
सिन्हा का रवैया ढीला करने के लिए 'मातादीन विन्दा-
प्रसाद' के ज़रिये 'तरमाल' पेश किया जाए।
ऑफीसर ऑन-स्पेशल ड्यूटी नित-नेम वाले प्रात्माप्रसादजी
की शान में सत्संग श्रीर कीर्तन करवाए जाएँ।
ढींगरा, टंडन और अवस्थी की इन्क्वायरी में उनके रोल
का पूरा-पूरा फायदा उठाया जाए।
मशहूर बहन तरंगवती की मदद से किसी पहुँचे हुए साधू-
महात्मा को प्रवचन के लिए बुलाया जाए। महात्माजी नजूमी
हों तो सोने में सुहागा।
नये इन्कमटैक्स प्रॉफ़िसर कपिलदेव को अभी दो-तीन
हपते 'वाच' किया जाए।
तमाशा के उठते ही दारजी ने भाटिया को शाबाशी की
आवाज में कहा, "तनसुखराय अभी काम में नया है, पेचीदा
मामलों में उसे गाइड करने की जरूरत होगी।"
सरदारजी ने लगाव से साफे पर हाथ फेरा, "काकाजी!
किसी-न-किसी तरह न्यू इरा को खड़ा तो करना ही हुआ न !
भाटिया ने बिना कुछ कहे होंठ सिकोड़ लिये तो दारजी की
पारखी आँख अँधेरे में निशाना टटोल गई। करीव प्राधी सदी
की ममियाई निचोड़कर कहा, "बरखुरदार, गोकुलभाई का
रसूखी कंधा खरीदने के लिए तनसुखराय को मैनेजरी देनी
जरूरी थी। सोचने वाली एक बात और भी थी । गोकुल भाई
का बहनोई साबुत सीनियर मिनिस्टर है। कोई कटपीसवाला
मामला भी नहीं था।"
दारजी ने उड़ती-उड़ती नज़र से भाटिया का सूजा हुआ
चेहरा देखा और मजाक से कहा, "तुम्हें किस बात का फिकहै-
यारों के यार ५६ तुम तो इन लोडों-लपाड़ों के मानीटर हो यार?" जवाब में भाटिया न हमेशा की तरह अदव से हंसा न मुस्कराया। मेज पर से टाइप किए कुछ कागज उठाये और चुपचाप बाहर हो गया। "मां-याव्हा." दारजी ने लाड़ से गाली दी और तमाशा को बुलाकर भाटिया के लिए एकमुश्त तीन सौ की तरक्की का आर्डर लिखवा दिया । दारजी के दस्तखत होते ही तमाशा अन्दर प्राई और भाटिया की गर्दनसे झूलकर कहा, "वड़े उस्ताद हो 'बॉस', फ़कत मुंह फुलाकर तीन सौ झाड़ लिये।" भाटिया ने आर्डर पढ़ा और तमाशा को चूम लिया। "तमाशा डालिंग, तुम्हारी उँगलियां हमेशा ऐसे खुशगवार आर्डर टाइप करती रहें।" "मोहन डियर" तमाशा की आवाज एकाएक चुलबुलाहट से उदासी में बदल गई। भाटिया ने भांपा और हाथ से घेर तमाशा को मेज पर विठा लिया। "तमाशा डियर, तुम्हें फिक्र किस बात का है ? भाटिया को अपने से ज्यादा अपने साथियों का खयाल है। मौका तो लगने दो..." तमाशा ने वेवसी की मुस्कराहट पर चमक बरसा दी और दोस्ती का हाथ लहराकर बाहर निकल गई। भाटिया ने मजे खिलाड़ी के अन्दाज में अपनी तरक्की का मॉर्डर डवलपेग की तरह हलक से नीचे उतार लिया, सरूर- यारों के यार ६० भरे हाथों टेलीफोन उठाया और रोजाना का काम शुरू कर दिया। "श्रीवास्तव साहब, भाटिया अर्ज कर रहा हूँ।" "कहो यार, क्या हुक्म है ?" "हुजूर, रात को तकलीफ कर सकें तो मशकूर हूँगा।" "तकलीफ कैसी यार, हुक्म करो।" भाटिया ने आवाज-ही-आवाज़ में श्रीवास्तव को आंखों पर विठा लिया, "हुक्म के लायक तो इस गुलाम के पास. क्या है साहब-कुछ यार-दोस्त मिल रहे हैं..." "जगह वतायो दोस्त- -पक्का तो नहीं, हाँ कोशिश ज़रूर करूंगा।" "अपने गरीवखाने पर ही।" श्रीवास्तव के पास बैठे अवस्थी ने इस गुफ्तगू कुछ अन्दाज़ लगाया और तड़पते हुए अपने कमरे में आ तमाशा का नम्बर मिलाया-"मासू, आज रात तुम भाटिया के यहाँ नहीं जायोगी?" से यारों के यार "प्रोफ"ओ"किस इन्फर्मेशन का जिक्र कर रहे हो?" फोन पर वीवी का लहजा सुनकर अवस्थी का खून खौलने लगा, पर किसी तरह अपने पर काबू पाकर कहा, "वही सब्बर- वाल सतनिवास वाला मामला..." "मोह-मौका मिला तो फोन पर बात करने की कोशिश करूंगी। मालूम नहीं धोल भाई को फुरसत भी होगी कि नहीं।" धीरू भाई के नाम से ही तमाशा की कमर अवस्थी के सीने में शोरगुल मचाने लगी। सूखे गले से कहा, "शाम को तो तुम्हें कुछ करना नहीं.-धीरू माई के यहां चली क्यों नहीं जाती !" 'मातादीन-विन्दाप्रसाद' के नाम का पहला टेण्डर मंजूर कर सिन्हा ने अपने अहद में महकमे की नई 'लाइव-वायर' और उसके मन-करेण्ट' की विस्मिल्लाह कर दी। भारद्वाज-शर्मा गिरोह ने दिल-बदन में कुछ ऐसी वशाशत पाई कि लम्बे सफर के बाद सीधै हौजखास में गुस्ल किया है । खुले आम अवस्थो के जांघिये में छेक दिखाकर 'याह-याह करने वाले ममूविये ठण्डे होकर अपनी-अपनी फ़ाइलों में गुम हो गये तो शर्मा ने बाकायदा छेड़छाड़ करने की गरज से सिन्हा की वल दियत और खानदानी शजरा ही पेश कर दिया : मुरादावाद के तम्बाकू फरोश जनाव सुखनन्दनप्रसाद के साहबाज़दे हुजूर सिन्हा साहब कुर्सी पर बैठते ही प्राला मुग- लिया खानदान से तमाल्लुक रखने वाले हो गये । पी० सी० एस० में तुक्का लग जाने के बाद दो-चार जगहों में कुछ .... यारों के यार ० - कि अफ़वाह के मुताविक सरकार जल्दी ही इन्हें आई० ए० में नामजद करने वाली है। वतन-परस्ती के सिलसिले में क्योंकि इनके दादा साहिब मौसेरे भाई कुछ दिन अन्दर की हवा खा पाए थे, इसलिए यासी हल्कों में भी काफी रसूख रखते हैं। इधर हुजूर के ननिहाल का पीढ़ियों से चला नाम 'माता- दीन-विन्दाप्रसाद' अव वढ़िया 'लेटर-हैड' पर छपकर सरकारी ठेकेदारी की फहरिस्त में शामिल हो गया है। जोशी ने इस दिलचस्प मज़मून पर मजलिस जमा देने को कहा, "मुहूर्त तो हो गया दोस्तो, अब देखें जगत माता के भण्डार से कौन-कौन प्रसादी पाता है।" बख्शी ने सिगरेट जलायी और मुखालफीन की तरफ धुआँ छोड़कर कहा, "जो लक्ष्मी के ज़ोर से इस कलजुगी देवी को रिझायेंगे, भेंट चढ़ायेंगे, वही खुश किस्मत मुरादें भी पाएँगे।" जौहरी जो सचमुच में माता का भगत था, सुनकर गुस्सा खा गया, पर बड़ी शायस्तगी से बोला, 'वख्शी यार, तुम्हारे भले के लिए कहता हूँ, तुम वाल-बच्चेदार श्रादमी हो, आपस की थुक्का-फजीहत में किसी देवी-देवता या पीर-ग्रौलिया के शान के खिलाफ कुछ कहना ठीक नहीं।" मन-ही-मन सहमकर बख्शी कुछ जवाब न दे पाया सक्सेना ने पूरा ही इलाज कर देना मुनासिव समझा । ' दो जिसके इलाही दरबार में बादशाह अकबर जैसों ने सिर दिया..." सूरी किसी ड्राफ्ट पर काफ़ी देर से काटा-पीटी कर TII सिर उठाकर कहा, "डरादे, डरा दे कनकव्वे साले व - यारों के यार बच्चे को। खाने-पीने को देवी का भगत बना फिरता है। अबे जानता भी है, आजकल घर-घर जोत जगाने वाली जिस देवी का प्रताप है वह शेर को सवारी वाली दुर्गा माता नहीं, खनकते नावे वाली काली माई है, कलजुगी माई ।" भारद्वाज जो खुद खप्परवाली से डरता था, मजमून बदल- कर बोला, "यार सक्सेना, तम्बाकू-फरोशों गद्दी लगेपे में भी कब तक दुलत्ती झाड़ती है, अब यही देखना वाकी है।" सक्सेना ने सिर झुका तीर का वार संभाल लिया, “अपना- अपना नजरिया ही तो है दोस्त ! हमसे पूछो तो अफसरान को तो लगेपे में भी लगेपा नहीं। फिर जिसका जिक्र तुम कर रहे हो वह तो खुदा के रहम से अभी हाथ-पाँव से दुरुस्त है । दोस्त लंगेपा है तो हम कम तनख्वाह पाने वालों को, जिनकी दो टाँगें भी एक के बराबर समझो। पैसे दिये दूध-राशन के तो एक टांग गई-फीस दी बच्चों को तो दूसरी भी नकारा।" मनमुखानी ने शरारत से सक्सेना की ओर देखा, "सब परेशानियों प्रौर जख्मो पर एक ही मरहम काम करता है प्यारे...!" भवानी बाबू ने बातचीत का रुख पहचान सक्सेना के बहाने मनसुखानी के मुंह पर गट्टा रख दिया, "परेशानियो का तज- किरा करने के लिए क्या लंच टाइम काफी नही ?" जोशी की एक छोटी-मोटी झड़प बडे वावू से हो के चुकी थी। ढिठाई से कहा, "बडे बाबू, जहाँ यार-दोन मिल बैठेंगे, यहाँ पर चकल्लस तो चलेगी ही।" फिर शर्मा को आंख मार दी, "दोन जहाँ तबाट !
६४ यारों के यार .. साज़िन्दे।" सुनकर सूरी को मज़ा आ गया। "जोशी यार खूब टिकाई है, पर यार, जहाँ छम्मो और उसके साज़िन्दे होंगे वह तो कोठा होगा लोलियों का और यह ठहरा खिदमते-खलक का दफ्तर ।" भवानी बाबू ने एक जहरीली नज़र फेंकी और बिना कुछ कहे-सुने बाहर हो गये। सूरी वुडबुड़ाया, "काहे का हैड-बाबू ! हैड-यतीम है हैड- यतीम । जहाँ सच कहने-सुनने का मौका आया, पकड़ा लोटा और चल दिये टट्टी फिरने।" आधे से ज्यादा लोग चुप बने रहे, सिर्फ भारद्वाज, शर्मा और जोशी के गुस्ताख कहकहे बेशर्मी से कमरे में गूंजते रहे। यदुवंशी ने फाइल रखने के बहाने पास बैठे माथुर को कानी मारी तो सूरी और भड़का, “वता तो सही आँख मारकर कहना क्या चाहता है यार को, सुलेमान ! मर्दम-शुमारी - करवाकर देख ले शाजो-नादिर कोई मर्द बच्चा, मिल जाए तो मिल जाए, नहीं तो बहनचोद कौम ही जनखों की हो गई है। मैं तेरी खुशामद, तू मेरी और वह उसकी ! मैं तुम्हारी ठुड्डी चूमू, तुम मेरी और फिर दोनों मिलकर ऐसी तिकड़म लड़ाएँ कि बहाने-बहाने किसी की मुंडी ही खसोट लें।" माथुर ने पुराना नुक्ता इस्तेमाल किया, "सूरी उस्ताद, तुम्हारे कहे मुताविक तो मालूम यह होता है कि दुनिया-की- दुनिया ही जलील है। भाईजान, ऐसे दिलजले न वनो कि लोग तुमसे सिर्फ गाली की ही उम्मीद करें।" सूरी हँसा, "यार कलमघसीटू, बाँध ले गाँठ मेरी वात. आदमी को गाली नहीं गोली लगती है। चाहे अम्ल की हो या --
यारों के यार
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जमालगोटे की। चाहे कुनैन की हो या पिस्तौल की।"
ब्रांच-की-ब्रांच ठठाकर हंसने लगी तो मापुर ने भी हार
मानने से इन्कार कर दिया। "गुरू, दुनिया की नंगई और
जलालत की बात तो तुम ऐसे करते हो जैसे इसीसे तुम्हारा
दिन-रात का वास्ता हो । आखिर हर वार लोट-पलटकर इसी
की माला जपने का कुछ सबब तो होगा।"
"बड़ा दूध का धुला बनता है. साले जैसे मालूम न हो कि
नंगई और धोखाधड़ी इस जमाने में गुनाह नहीं-हर आदमी
का निवाह है निवाह""
माथुर ने हाय का कलम नीचे रख दिया, "सूरी उस्ताद,
अमी भी दुनिया में कुछ सच्चाई और गैरत चाकी है। एक-दूसरे
की कमजोरियां उछालने से ही सब पाक साफ नहीं हो जायेंगे।"
"वाह प्यारे, दिल्ली वाले साचे महाराज, क्या गिलोरो
पेश की है ! साले हर संड-मुस्टंड, हमा-शुमा, गधा-टटू
अपना-अपना चोला बदल जरनली सडक पर मोटरें दौड़ाता
फिरता है तुम्हारे खयाल में सच्चाई और करम की वजह से।
मूत दे यार अपनी बात पर और याद रस, आज के काला
वाजार में सिर्फ काली कारस्तानियों से ही तरक्की मिलती है
और इन्हों से स्वाबों के महल हकीकत बनते हैं। चाहता है
लूटना मजे इस ज़िन्दगी में तो बादर मेरे, मोहरे रख और मोहरे
उठा। रिश्वत दे और रिश्वत ले।"
भवानी बावू एकाएक कमरे में दाखिल हुए तो कसे हुए
चेहरे की रस्सी वटी थी। माते ही सख्त आवाज में कहा, "काम
करने की बजाए दफ्तर में बैठे-बैठे गन्दे खयालातों का इज़हार
करने और दफ्तर का माहौल बिगाड़ने की इजाजत सरकार
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यारों के यार मुलाजिमों को नहीं देती।" बड़े वाबू की हैडक्लर्की आवाज़ पर लमहा-भर तो सूरी भवानी वावू को घूरता रहा, फिर हो-हो कर हँस दिया। "क्या 'रूल' निकाला है माँ के पोदनों ने! जैसे 'फन्डामेन्टल' की किताव सूरी ने न पढ़ रखी हो । वहनचोद, मेरी बातों से दफ्तर का माहौल बिगड़ता है और जो लेन-देन, ठेके-कमीशन के शाही धन्धे दफ्तर में दिन-रात चालू हैं वह तुम्हारे कहे ब्रह्मचारियों के खेल हैं न।" "सूरी उस्ताद, बड़े बावू का कतई यह मतलब न था। वेकार झगड़ा-झड़प करने से फायदा दोस्त !" सूरी ने एक मसखरा हाथ टेबल पर झटक दिया, “अबे प्रो अर्जी-नवीस, इकन्नी के लटके में सौ का फायदा उठाना चाहता है।" भवानी वावू के बर्दाश्त की इन्तहा हो गई हुक्म किया- "बकवास बन्द करो।" सूरी ने भवानी बाबू की आँखों में सचमुच लपलपाती आग-सी देखी तो आपे से बाहर हो गया, “चोर की दाढ़ी में तिनका भैये! हमीपर रौब गाँठता है । यारी, दोस्ती और गुलाव- पाशों के जोर 'इन्क्वारी' की बोलतो भले बन्द हो गई हो हैड- वावू, पर दुनिया भी यहां बैठी-बैठी झक नहीं मारती । बड़े बाप- वाला अवस्थी, अवस्थी का साहब टंडन और क्लर्क पाशा भवानी बाबू-इन सबने मिलकर सयासी गुर्गों के 'थ्र' जिस-जिसको 'गूं' के बालूशाही खिलाए हैं, यारो हुक्म करो तो उस पर भी रोशनी डाली जाए।" भवानी बाबू ने अजीव वहशियाना-सो वेवसी और तड़प - यारों के पार ६७ से कलमदान में से कलम उठाया और लिखने के लिए वर्क खींच लिया। सूरी भोंडेपन से हंस दिया, "इस कलम में स्याही-ही- स्याही है, क्लर्क-पादशाह दम-खम नही।" वात हाय से निकलती देख जियालाल बाबू अपनी कुर्सी से उठे और सूरी के पास या बड़े खुशामदाना अन्दाज़ से कहा, "सूरी उस्ताद,जो वेधड़क गुर्दा तुमने पाया है वह तो लाखों में एक को भी नसीव नहीं 'पर यार अपने साथियों की ऊंच-नीच में सुनी-सुनाई उछाल उनको खिल्ली उड़ाना कोई बहादुरी नहीं।" "सीनियर हिसावराम सूरी लोगों से वहादुरी के तमगे मांगने नहीं जाता और न ही वह तुम्हारी तरह खोपड़ियों को खाद में जहर के पौधे उगाता है । जो कहना होता है सरे बाजार कहता है।" "दोस्त, हम छोटे मोटे क्लर्कों को क्या विसात! हम सब तो किसी बड़े हजूम की रेल-पेल में फंसे हैं...।" सुनकर सूरी को भवानी वावू से कुछ ऐसी हमदर्दी हुई कि पछतावे-ही-पछतावे में खाँसी उठ पाई। एक वलगमी थूक खिड़की से बाहर दे मारी और पतलून को ऊपर करते करते बुड़बुड़ा दिया-"सच तो यह है हिसाब-वावू कि हममें से हर- एक चूतिया है और हरएक उल्लू का पट्ठा। यूं तो हमसे भी बड़े उल्लू के पट्टे मौजूद हैं जो हरामजदगी में उन गुरुघण्टालों के भी वाप हैं जो फोकट की चुसकियां खिलाकर खलक्त के महबूब वने फिरते हैं !!"
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तिन-पहाड़
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तिन-पहाड़ साँझ की उदास-उदास वाहें अंधियारे से प्रा लिपटौं। मोहभरी अलसाई आंखें झुक-झुक पाई और हरियाली के विखरे अांचल में पत्थरों के पहाड़ उभर पाए। चौंककर तपन ने बाहर झांका । परछाई का- सा सूना स्टेशन, दूर जाती रेल की पटरियां और सिर डाले पैड़ों के काले उदास साए। पीली पाटी पर काले अक्खर चमके 'तिन- पहाड़, और झटका खा गाड़ी प्लेटफार्म पर प्रारुकी। नीचे उतर पुरानी आँखों से चारों पोरदेखा । वही 'तिन-पहाड़, वहीएक-दूसरे से लगी पहाड़ियाँ, वही बह-वह पाती ७२ तिन पहाड़ - .. हवाएँ, हवाओं के भरे-पूरे पर। इंजिन की बेसाँस चीख ने फिर अपनी सीट की ओर लौटा दिया। खिड़की से आँखें वाहर गड़ाई तो रात का अँधियारा गाड़ी के साथ-साथ भागने लगा- आगे.. आगे और आगे। तपन ! तपन...! वह तन-मन को छू-छू जाती आवाज़, वह छलछलाता कण्ठ, वे भर-भर आती आँखें, तारों की पातें गाड़ी के साथ होड़ लेती रहीं। दूरी मापते गाड़ी के चक्के कोस पर कोस फलाँगते रहे और दूर अँधेरे में चमकती लौ का-सा एकाकी मुख बार-बार आँखों में झलक मारता रहा। पहचानने के पल.. वे जानने के पल.. गाड़ी संकरी गलीघाट पर आ रुकी। खोए-खोए मन नीचे उतर सामान उठवाया और किनारे लगे स्टीमर की ओर पग वढ़ा दिए। डेक के कोलाहल से बेखबर रेलिंग पर झुक पानी के भंवर देखते-देखते मन न जाने कैसा हो पाया । गहरे गहन जल में बँधे भाग्ग-सा यह स्टीमर और एक संग पार उतरने की बाट जोहते अगणित अपरिचित मुसाफिर । गलबहियों-सी उमड़ती-छल- छलाती लहरों-भरा गंगा का पाट ओझल होता गया और दूर किनारों के संग-संग तारों-टंके ग्राकाश का पर्दा झिलमिलाता चला। वही दिशा, वही राह, वही अँधेरा चीरता स्टीमर की तेज़ रोशनी। पर मणिहारी घाट के प्लेटफार्म पर खड़ी छाया आज वहाँ क्यों नहीं होगी। यहीं खड़े-खड़े उस रात बदली बरसी थी। इसी रेलिंग के सहारे सिहरते मन में बूंदें सरसी थीं। इसी पर झुके मन को व्यथा आज फिर उस रात को लौटा-लौटा , - बाती है। दरअकोन तांड-टपाएगा: मॉन राह चलने लिनाला? कांखों के माने दिड पाएगा? वारिनिर के नीले निपरेमाला बरतनी दूधियाना । बाप की पारियों पर हत्रो-पिरको हवा । कर जाना याकिनी मिलना नहीं होगा। न प्रिय प्रांतों के आगे नरना नहीं होगा। काकी उमड़नी छांह में प्रांतों को गहराहियाँ, माथे पर दिका कुछ कहता-जा सुकुमारहापौर ढोले वालों को चूम-चूम- कर गाव हवात्रों के हल्के प्रालिगन 1 वे बरसते मेंह-सी लहरें- लहरों पर घिर-पिर माते फेन के वादल और तिस्ता के वक्ष पर बंधा मन्वा एकाकी पुल । रेलिंग पर से झुके उस दिन वे दो प्रो निनाही पानी के वेग में क्या ढूंढती होंगी, क्या सोजती होंगी? गंगा के तौर मुनसान पढ़ा मणिहारी घाट स्टीमर के किनारे लगते ही कोलाहल में डूब गया। देर-का-ढेर सामान कुनियों के कन्धों पर लद गया और उतावलो से लोग बेटी की और बढ़ चले। कुली के पीछे, प्रादे तपन के भारी कदन बहना कि गए। लंच की मदिम रोशनी में उभरपाईसाले कोटको राक पर उन्हीं दो प्रांतोंवाले मुबई का चांद कम ना हो धनी पलके, मुंबग-गंबरा रंग और गाय पर नही लाल टिकुली । बालों के उनके बाल पर गंगा की नागी हाधिर- कती है पीर होलेगे कहती है। जवा! था। चौंककर देखा गामने कुछ नहीं था। वन देखने को अयि ही मन को भटकाती थीं।
तिन-पहाड़ सामान टिका कुली ने विस्तर विछाया और मजूरी ले वे उतर गया। डिब्वे के सामने खड़े-खड़े घाट की ओर देखा। पानी के अँधियारे पाट पर सँकरी गली का वह चावभरा टीमर बीत गए अतीत का-सा अकेला उदास दीखता था। इंजिन की चुनौती से चौंक ऊपर पैर रखा। चिटखनी चढ़ा देखा, गाड़ी के अपरिचित साथी विछौनों में सोने की तैयारी में थे। कपड़े बदल, बत्ती हल्की की और सिरहाने सिर डालते ही बंधा-बँधा मना छलछला आया। बीत जाने को जब सभी कुछ वीत जाता है तो क्यों दर्दीली स्मृतियाँ मन को बार-बार सिहराती हैं ? वार-बार तरसाती हैं ? यही गाड़ी उस दिन सिलुगड़ी खींच ले गई थी। यहीं किसी की व्यथा जान लेने की राह बनी थी। इसीमें लेटे-लेटे उस रात पहली बार वह विलखता स्वर सुना था। विछौने में सिमटे-सिकुड़े पड़े थे कि किसी की सिसकियों ने आ मन के द्वार पर थाप दी। मुख उघाड़ चौकन्ने हो देखा। सामने की सीट पर कोई रह-रहकर सिसकियाँ भरता था। सिरहाने पर ढुका सिर विव- शता से काँप-काँप जाता था और गाड़ी की खड़खड़ाहट में से वार-बार वही गीला स्वर इन कानों को छुए जाता था । ओढ़न उतार जाने कैसी-सी घबराहट से उठ बैठे। कुछ पूछ लें, कु. जान लें कि नीचे पड़े दो मखमली स्लीपरों ने आँखों को वा' लौटा दिया। फिर भोर वेला अकचकाकर जगे। खिड़की के उठे से तीखी हवा बह-वह आती थी। आकाश में तारे गा लालिमा में नहाई व - - रते थे और दूर तिन-पहाड़ चोटियां । एकाएक सब-का-सव ठिठक गया। खिड़की की चौखट पर झुका सिर बहुत छोटा, बहुत अकेला दीखता था। सांस रोके सोचते रहे--कौन मुख होगा! कौन आँखें होंगी ! कंगनोंवाली बाहों ने पलटकर रजाई में सिर छिपा लिया तो मन-ही-मन सोचते रह गए- इस एक ही कम्पाटमेट में संग-संग सफर करते कौन कहां भटकता है, किन गीली विदाइयों के लिए अांखें भर-भर लाता है, यह कोई दूसरा तो नहीं जान पाता। खड़खड़...खड़ गाड़ी विराने में दूरियाँ मापती रही और मुंदी आंखें छूट गई राहों पर भटकती रहीं। नींद खुली तो कांच में से पतली सुहाती धूप मुंह पर बिछी आती थी। पहाड़ों के चेहरे जाने-पहचाने दोखते थे। उतावली से ब्रश कर कपड़े पहने और अांखें खिड़की से बाहर गड़ा दी। आखिरी दौड़ लगा गाडी सिलुगडी पर ना रुकी । फिर भीड़ मची, कुली बढ़े और खिलोना-सी रेल की लगेज-वॉन से सामान उतर गया। प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े तपन मन-ही-मन पुराने क्षण दोह- राते रहे। पुराने पल लौटाते रहे। धूप में नहाई यही सुबह की वेला थी। छाँह तले विछा यही प्लेटफार्म था। साथ लगी नन्ही-सी रेल यही थी। इन्ही पांव दो डग भर तपन ग्रागे वढे थे कि खिड़की में से रातवाली दो आँखों वाला मुख झांक गया । चाह हो पाई पास जा कुछ कहें कि अपनी ही झिझक से अपने कम्पार्टमेंट की ओर लौट पाए। दूर-दूर फैले चाय-बगान, ऊँचे गम्भीर चुप्पी के पेड़, उदास- तिन-पहाड़ स दुकानों वाले पहाड़ी बाजार और गोरे-चिट्टे छोटी आँखों भोटिया बच्चे-बड़ी चौखटों में जड़े सचमुच के-से चित्रों दीखते थे। तन्दारिया पर नीचे उतर देखा। कुरसी की टेकन से सिर गाए वह आँखें मूंदे बैठी थीं। गोद में एक-दूसरे से गुंथे हाथ जैसे अपने को ही दिलासा देते थे। लम्बी चढ़ाई चढ़ गाड़ी करसियोंग आ पहुँची। दूधिय गुम्बदों की छाँह तले खुला चौड़ा रिफ्रेशमेण्ट-रूम और प्लेट- फार्म को महकाती खाने की गरम महक से बहुत-से जन एक संग छुरी-कांटों में जा उलझे । खाते-खाते दायीं ओर मुड़कर देखा तो प्लेट पर झुकी फिर वही गम्भीर मुद्रा दीख पड़ी। बाहर घंटी बजी। व्यस्त हो लोग अपने-अपने डिब्बों की ओर लोट चले । विल चुका द्वार तक आए। जिज्ञासावश फिर मुड़कर देखा । कॉफी के प्याले को हाथ से घेर वह अब भी वैसे ही बैठी थीं। टन टन टन 'घंटी फिर बजी। जल्दी में कुछ ठीक- ठीक निश्चय नहीं कर पाए । बाहर जाते-जाते पलटे और पास या विस्मय से कहा- "गाड़ी चली जा रही है। आप क्या जाएँगी नहीं ?" वह न चौंकी, न अांखें ऊपर की। ठिठकी-सी दृष्टि जे क्षण-भर अपने रूठे हाथों को मनाती रहीं। तव उठीं और झुकाए-झुकाए ही बाहर हो गई। अंबरसे बादलों की पातें फैल-फैल धुन्ध बनने व पहाड़ों की चोटियाँ धुन्ध की पोट होने लगीं। नीचे के तिन-पहाड़ खड्ड धुन्ध के असीम अांचल में खो गए। ऊपर के पहाड़ झुक धुंधलकी बांहों में सो गए। गाड़ी के पहिए वताशिया लूप से नीचे उतरने लगे। दूर- दूर फैले धुन्ध के फैलाव को मापती गाड़ी घरती पर नहीं मानो प्राकाश पर जा रुकेगी। इंजिन अपने अन्तिम पड़ाव पर पा लगा तो दार्जिलिंग का प्लेटफार्म वादलों की वनी संगमरमर की लम्बी वालकनी-सा दीख पड़ा। यात्रियों का समूह लगेज-वॉन के आगे आ जुटा। उड़ती नज़र से देखा, खम्भे के पास भारी कोट में लिपटी वह किसी गहरी सोच में खोई दीखती थी। खड़े-खड़े जांचते रहे कोई लिवाने पाया हो, पर कुली के संग जब वह अकेली ही बाहर निकल चली तो चाहने पर भी कुछ पूछ नही पाए । कई क्षण दूर जाते रिक्शा को देखते रहे, फिर कुली को रुकने के लिए कह रिफ्रेशमेण्टी रूम की सीढ़ियाँ चढ़ गए। ऊपर बैठे-बैठे चाय के प्याले में पूरे दार्जिलिंग का चित्र उतार डाला। गाइड के पन्ने पलट मन-ही-मन कई नाम दोहराए-जलपहाड़, सिंगरापोंग, टाइगर हिल्स-चौरस्ता- कालिंगपोंग.. शाम हुए होटल पहुंचे तो खूब पानी बरस रहा था। कमरे में आ चाय ली । थकन उतारी। रात को खाने के लिए 'डाइ- निंग-हॉल' पहुंचे तो असंख्य अनजान चेहरों में से वही राहवाला परिचित मुख पहचानकर ठिठक गए। प्यार की-सी मीठी अक्तूबर को धूप में कंचनजंगा की
निन-महाद
-
दोपहर की नियरी प प्राग-पीच, परमले बिछी चली जाती
थी, और नेन्द्रनेज चलन को उकसाती थी।
किमी मीठं गीत के बोल गुनगनाते अपने कमरे की और
बद्रे, । कोट दनार जसी पहनी, बालों में कांधी छुआई श्रीर
इल्य मन बाहर निकल पाए । बरामद मे हो डाइनिंग-हॉल की
पोर मुई कि हाथ में कोट लिए, वह उसी कटी चाल से उनके
सामने से निकल गढ़ । कुछ मण दूर होता माड़ी का मोतिया
आँचल निहारते रहे, फिर अनमने-मन लंच ले कमरे में लोट
पाए।
घुली बिक्री में बाहर झांका । होटल की अनक्सी गुड़िया
के सचमुच ग घर-गी मर-मरवृप में चमकती थी । ठाँह किए
धूप की रंगीन छनगियाँ रंग-बिरंगी पाँघुरियों वाले कमलों-सी
दीखती थीं और छोटी-छोटी फलों की क्यारियाँ गुड़िया के
पटोलीं-मी धर-उधर बिखर पड़ी थीं।
मन बाहर के लिए फिर मन्चल पाया। चंचल पाँव ग्रह
को कंकर उछालने गावाजवटरी हिल्स की ओर बढ़ गए। दूर
सामने पहाड़ की चोटी पर मन्दिर की श्वेत पताकाएं, पहाड़ों के
हरियाने गागर में लेग्ती पालवाली नौकामों-सी लगती है और
धूप-गनी वा रह-रह निमन्त्रण देती है यायो 'पायो... !
वाघर के पास पहुँच ठिटक गए। बेंच पर लिमटा
मोतिया नाँचल ग्रार कलाई में रह-रह उठता सिसकियों का
स्वर।
पाई क्षण असमंजस में बड़े-बड़े देखते रहे, फिर पास श्रा
नीचे लटकता माल उठाया और कांपते अनुरोध से कहा,
"उटिए..."
तिन-पहाड़
वह बैठी-बैठी रोती रहीं।
आदर से बाह छू सहारा दिया और पुचकार के से स्वर में
समझाया-
"इस राह तो बहुत जन आते-जाते हैं..."
और सयानों की तरह कन्धे पर हाथ दिए-दिए बाहर लिवा
ले आए।
दन...टन.टन...
नौ के गहर-गम्भीर घंटों की टंकार। तपन चौककर बैच
से उठ बैठे। आकाश के परकोटे-सा चौरस्ता धुन्ध के चंदोवे से
ढक चला। दोनों ओर लगी बत्तियों की झालर गीली आँखों में
अतीत के स्वप्न-सी झिलमिलाने लगी भोर सिर पर झुकी रात
पहाड़ों के मौन में थरथराती रही।
व्यग्र हो मोड़ की ओर बढ़े और जंगले पर हाथ टिकाए
देर तक माल की ओर देखते रहे । उसी सामने के किनारे से
निकल वह धुन्ध के इस सागर पर तैर पाएँगी। वही मुख" वही
बाँहें "वही पानी में चमकते नगों-सी आँखें...
किसी रिक्शा की काली परछाई घंटियां गुंजाती पास से
निकल गई तो सांझ की संजोई मन की प्रतीक्षा ने थककर पट
बढ़ा दिए।
वह लौट गई होंगी 1-अब तक लौट गई होंगी। घड़ी देख
होटल की ओर मुड़ चले। वह क्यों रोती हैं बार-बार क्यों
रोती है ?
मोड़ पर पहुंचे तो पीछे से आती किन्हीं पांवों की आहट
तन को अकारण ही झुरझुरा गई। सांस रोके पल-भर को रुके
पलटकर देखा और ठगे-से देखते रह गए।
एक हाथ जंगले की तार पर दिए वही इस ओर पा
थीं।
वह पास श्राई । क्षण-भर गहरी नजर से देखती रहीं, मानो
हले परिचय को स्वीकारती हों, फिर हाथ का रेनकोट उनकी
मोर बढ़ा दिया।
ऊपर पहुंच डेस्क से ताली ली। डाक देखी और बिना कुछ
कहे अपने कमरे की ओर पोझल हो गई।
काउण्टर पर हाथ रखे तपन कुछ देर खाली आँखों से
लटकती तालियां देखते रहे, फिर कमरे की ओर हो लिए।
वह खाने को आएँगी, नहीं पाएंगी, यही सोचते-सोचते
कपड़े बदले और डाइनिंग-हॉल की ओर बढ़ चले।
दूर कोनेवाली मेज पर निश्चल आकार-सी वह शाल में
लिपटी बैठी हैं । मन के संशय को पांवों से ठेल पास आए।
पल-भर प्रतीक्षा में खड़े रहे-बैठने को कहेंगी, फिर हारकर
स्वयं ही कुरसी खींच ली।
वह कुछ बोलीं नहीं--तनिक-सा देख आई और बस ।
वालों के बीच खिची भाग्य-सी सीधी माँग कानों पर
छितरे घूघर में से चमकती हीरकणियां और गले से लगी नेह
सी गुंथी माला । जितनी बार निहारते खाने में उलझे हाथ अटव
अटक जाते।
वह उठीं। तपन उठे। बरामदा पार कर कमरे की ,
मुड़ी तो ऐसे देख पाई जैसे उन्हें संग पाने की अनुमत देती
तपन ने आगे बढ़ द्वार खोला। पर्दा उठा राह बना
वह अन्दर आई और सोफे के पास ही अटक गई कि अपन'
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लिंग में क्यों अकेली हैं-क्यों रोती रहती हैं, पर इतना ही
"यहाँ कब तक रुकेंगी?"
अनिश्चय से सिर हिला वह छोटी-सी हँसी हँस दीं।
"सो तो नहीं जानती हूँ"
भोलेपन पर तपन निहाल हुए।
थरमस में से कॉफी उडेल जया की ओर बढ़ा दी औ
हँसकर कहा-
"रोना ही जानती हैं क्यों न !"
"रोने में तो
कुछ भी जानना नहीं होता।"
उत्तर में तपन ने झुककर दोनों हाथ चूम लिए ।
आँखें न नत हुईं, न मुख पर कोई विस्मय झलका । बाँहों
के सेतु पार से अनझपी दीठ उसी तरह मुसकराती रहीं।
कल्पना में तपन कई बार अपरिचित वह घर देखते रहे
जहाँ से रूठकर वह यहाँ आई होंगी-कई बार अदेखा वह मुख
देखते रहे जिससे मान किए वह इस क्षण यहाँ बैठी हैं।
संझाती धूप में रसी-बसी वह ऐसे बैठी रहीं कि जलपहाड़
पर सचमुच मोहित हो आई हों। दूर नीचे दीखते दार्जिलिंग को
निहारकर वोलीं-
"यह जलपहाड़ तो आकाश की ओर जाती राह का अन्ति
पड़ाव लगता है..."
सुनकर तपन ने खिले-खिले पूछा, "और यहाँ बैठे हम'
बालों को हाथ से छू वह मानो अपने से कुछ कहती
फिर लम्बी साँस ले वोली, "हम तो इस प्लेटफार्म पर
अपनी-अपनी गाड़ी की वाट जोहते हैं।"
वही पुराना उदास स्वर।
तिन-पहाड़
छांह का पूर-पूर साँझ पश्चिम की लौ जा बनी मिष्टपाल
का क्रास सुनहले में मिलमिलायांकाश पर जा टंका और ह्वानों
के संग घिर-घिर आता अंधियारा धरती पर प्रा विखरा।
किसी अदेखे प्रमंगल से घिरेतपन कुछ भी जान नहीं पाए।
क्या कहें, कैसे कहें। फिर भरसक अपने को समना, घड़ी देखी
और संकोच-भरे स्वर में कहा-
"देर हुई–अव लौटना होगा।"
और उठकर हाथ बढ़ा दिया, "माइए।"
वह उठीं। उठकर हाय लौटाया नहीं ।
खड़े-खड़े जाने कैसी-सी अांखों से उनका सामना किए रही,
तब भुकों और उनसे या लगीं।
उस रात तपन सोए नहीं । सोते तो लगता जगते हैं, जगते
तो लगता सोते हैं। बार-बार कोई आकुल गलबहियां उनके
पास घिरी पातीं, उनके साथ लगी पाती।
सुबह नींद खुली तो देर तक सिरहाने पर सिर डाले के
रहे । तन-मन पर छाई कोई कांपती सिहरन रह-रह सहलाती,
सुख देती और कम्बल से लिपटी बाहों में घुल-मिल जाती।
चाय आई जान उठे तो अांखों में समूचा कमरा नया हो
माया। जान पड़ा रात किसी मीठे निमंत्रण में विताअभी-अभी
घर लौटे हों।
हाथ बढ़ा खिड़को का पर्दा खींच लिया और चाय पीते-
पीते वरखा धुले पहाड़ों को देखते रहे । आशीर्वाद-सी भर-भर
वरसती धूप कांच में से लहराती कमरे के बीचोंबीच आ विछी।
मुग्घ-से उठ सोफे पर या लेटे और मुख पर पेपर की मोट
८६
तिन-पहाड़
किए जितनी बार कल की बात सोचते, उतनी बार अधरों पर
खिलती हँसी मन-प्राण में घुल-मिल जाती।
बैरा ने विस्तर बना बैडकवर डाला, फूल बदले और
गुसल तैयार कर खिड़कियाँ खोल दी।
सुहाते गरम पानी से स्नान कर गुसल से निकले कपड़े
बदलने को हुए, फिर आलस से सोफे पर लेट गए और आँखों में
जलपहाड़ वाली छवि देख-देख मग्न होते रहे।
“हुजूर, एक बजा चाहता है, लंच के लिए तैयार हों।"
वह किस रंग में होंगी-किस साड़ी में-
तैयार हो बाहर आए। डाइनिंग-हॉल की ओर बढ़े तो
गमलों के पास वह उन्हें नीली साड़ी और पीले कार्डीगन में दीख
पड़ी । सरककर पास जा पहुँचे। अभिवादन के उत्तर में विहँ-
सती वह चितवन देखते रहे जो रात-भर बार-बार याद आती
३ रही। दार्जिलिंग को चारों दिशाओं में छाया यही सलोना-
सांवरा मुख ।
खाने को सामने बैठीं वह उन्हें और भी सुन्दर, और भी
मीठो जान पड़ीं। लगा रात-ही-रात किसी उजियारी झील में
नहा आई हों। उन्हें एकटक निहारते देख जया सलज्ज हंसी कि
कहती हों-
'याज ही में क्या सव-कुछ पहचान लेंगे ?...'
लंच के बाद संग-संग वाहर पाए। वह कुछ कहने को
हुई."रुकी, फिर बोली-
"अब आज्ञा दीजिए। बाहर जाती हूँ-लौटकर मिलूंगी।"
कुछ कहने को तपन पहले झिझके, फिर सामना किए रहे
और अधिकारभरे कण्ठ से कहा, "मुझे कहे विना तो जाना
।
८७ तिन-पहाड़ नहीं होगा।" जया ऐसे हंसी कि तपन से बहुत बड़ी हो। "इतनी देख-रेख कब तक किया करेंगे?" "जब तक झुठला नहीं जाएंगी तभी तक ।" जया से कोई उत्तर नहीं बन पाया । खड़ी रहीं, फिर बरा- मदा पारकर धूप में जा बैठी। छतरी तले पास बैठे तपन को देखा तो धूप के दर्पण में समूचा आकार उजागर हो पाया। गौरवर्ण, ऊंचा ललाट... उमड़ककर उनकी कुरसी को बांही छू दी और आग्रह से पूछा- "घूमने चलेंगे...?" अपनों के-से स्वर में पूछा, "कहाँ जाना चाहेंगी?" बार्च-हिल, बॉटानिकल-हैपीवैली... वह मन-ही-मन कोई दूसरा नाम टटोलती रहीं, तब आग्रह से कहा- "सिंगरापोंग चल सकेंगे...?" पास झुक तपन जाने कैसे अनुराग से देखते रहे, फिर पूछ- ताछ के लिए डेस्क की अोर खो गए। जया बैठी-बैठी उनके उजरे रंग की झलक देखती रहीं कि आँखों पर कहीं से श्यामल घटा घिर आई और सांवला- सलोना चेहरा पास झुक आया-- "जया! जया!! वही कण्ठ.. वही स्वर". तपन लौटे। "सिंगरापोंग बहुत नीचे है, लौटती वार कड़ी चढ़ाई है- तिन-पहाड़ चढ सकेंगी?" वह खिलखिाकर उठ बैठीं। "न सकी तो वहीं रह जाऊँगी।" उजागरं हो-हो पाती वह दुपहरी नहीं थी, धूप में खिल- खिल पाता आकाश का कोई स्वप्न था। आकाश की चूनर रह- रह पहाड़ों पर लहरती। पतली बलखाती राहें दो जोड़ीपाँव से लिपट-लिपट जाती और दूर बैठी सयानी सखी-सी कंचन- जंगा हर मोड़ से, हर ठौर से मुसकरा जाती। झुरमुटोभरी वॉटानिकल की राह पर जया और तपन नीचे उतरते चले । ऊँचे घने पेड़ों तले बिछी मखमली कालीन पर बेल-बूटों से कड़े रंग-बिरंगे फूल ! काँचघर के सामने पहुँच दोनों मुग्ध-से देखते रहे। किसी ठिठक गए स्वपन में आकाशपरी के बसेरे-सा चमचमाता काँच- घर और कतारों में सजे-बने फूलों के खिले-खिले मुखड़े। धूप की वरखा में सरस तपन बोले, "सच, कभी इस जगह अपना घर हो तो चाव-भरा यह कण्ठ सुन जया सिर हिला हंसी। ''चाहना जो इतनी सुन्दर हो वह पूरी तो नहीं ही होती।" सुनकर तपन सहसा सहम गए। कहने को कुछ ढूंढते रहे, ढूंढते रहे, फिर हौले-से कन्धा छू लिया। "ऐसी उदास बात क्यों कहती हैं, यह क्या मुझसे नहीं कहेंगी?" वह पहले चुपचाप खड़ी रहीं, फिर सँभली और विवश वोलीं- "सभी क्या सभी-कुछ जान लेते हैं।"
तिन-पहाड़ ८६ - हाथ से अंजोर तपन ने वाल चूम लिए- "राह चलते क्या सब कोई सवको पहचान लेते हैं।" पहरुषों से खड़े राजबाड़ी के ऊँचे पेड़ों के पास हो नीचे उतरने लगे तो धूप-छांह की आँख-मिचौनी में पिछले व्यथा- सन्ताप सब भूल गए। दार्जिलिंग की लाल छतें पहाड़ की प्रोट होती रहीं और कलगी-सी वनी कंचनजंगा आंख-आंख चमकती रही। जंगले पर हाथ दिए तपन ऊपर की ओर संकेत कर पूछते हैं- "जानती हैं कहाँ से चले थे?" वह नटखट-सी सिर हिला देती हैं। "अपने होटल की छत पहचानती हैं ?" "दार्जिलिंग पर तो एक ही आकाश की छत है। उसे भी पहचानना होगा! तपन अाँखों में प्यार संजो हंस देते हैं। चायवगान की एकाकी बलखाती उत्तराई सिंगरापोंग की ओर उतर चली। जितनी बार मोड़ पाता, पीछे छूट गए पहाड़ और ऊँचे होते जाते । दार्जिलिंग की लाल छतों की थिलगियां कभी धुपेले वादलों की छांह हल्की होती, गहरी होती और पतली पगडंडी अजानी-अदेखी मंजिल की ओर भागती चली जाती। बड़े-बड़े डग भर तपन पास आते । जया और तेज़ दौड़ती। तपन धीमे हो जया को आगे बढ़ने देते, फिर दौड़कर उनसे जा " मिलते।
जंचता रहा दूर-दूर फैले पहाड़ों के असीम सागर पर वह किसी नाव- । तिरती चलीं। नीली साड़ी पर पीला कार्डीगन आकाश के कड़े पर धरती के फूल-सा और चमचम बरसती धूप में जलपहाड़ वाला सपना फिर-फिर साकार होता रहा। हर मोड़ पर मुड़ जया हाथ हिलाती हैं और कूदती-फलां- गती नीचे की ओर दौड़ने लगती हैं। मन हो पाता है दौड़कर वाँहों में भर लें कि वह पगडंडी छोड़ पाथर की संकरी पैड़ियों में खो जाती हैं। जया को तेज़-तेज़ सीढ़ियाँ उलाँघते देख तपन भयभीत हो उठे। वह गिरेंगी वह गिरेंगी. दौड़कर उन तक पहुँच जाने को हुए, तव एकाएक उठे पाँव ठिठक गए। . - खड़े-खड़े कुछ भी समझ नहीं पाए। इस निर्जन में वह कहाँ चले जाते हैं। किसके पीछे दौड़े जाते हैं। वह उनकी कौन हैं-उनकी कौन होती हैं—पूतूल-पूतू... माला-सी वनी चपटे पत्थरों की पैड़ियाँ पार कर जया साँस लेने को रुकी। पलटकर ऊपर देखा, तो हरियाले पर अंकित वह मुख कहीं भी दीखा नहीं । कुछ देर खड़ी-खड़ी उनके आ की राह ताकती रहीं, फिर उन्हीं सीढ़ियों ऊपर लौट चलीं। पगडंडी के मोड़ पर पहुँचीं, तो राह किनारे घुटनों सिर झुकाए तपन वैठे थे। पाँव की आहट सुनकर भी व हिले नहीं। खड़े-खड़े पल नहीं, जुग बीत गए । चाहा, ह से छू कुछ कहें -पुकारें, पर झिझक से हाथ नहीं उठा । तपन ने सिर उठाया तो सामने खड़ी जया को भ कटकी वाँधे देखते रहे।
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तिन-पहाड़
वह पास आई । स्नेह-सने स्वर में कहा-
"नीचे जाने का मन न हो तो यहीं से लौट चलें?
तपन कुछ बोले नहीं। वैठे-बैठे वहिं फैला अपने से लगा
लिया।
यांहों से घिरी जया खड़ी रही कि तन-मन पर कोई पुरानी
वीती लहर लौट आई-श्री"श्री..
रस में भीगी जया ने मुक अपने से लगा सिर सहला दिया
और जाने कैसे कण्ठ से बोली, "याद जो सामने आ राह रोक ले
उसे अनसुनी कर आगे जाना अच्छा नहीं।"
अस्फुट स्वर में तपन ने सिर हिला दिया।
"क्या अच्छा है, क्या अच्छा नही यही आज नहीं
जानता।"
वह हापों की अंजुरी में तपन के दोनों हाय भर पास बैठ
गई जैसे कोई पुराना ऋण लौटाती हों और सगेपन से कहा-
"जो बीत गया सी ही अच्छा है, सो ही अपना है."
"और जिसे बीत जाना है..."
सुनकर वह कुछ कहने जाती थीं कि सहसा आँखों पर हाय
रख लियापार व्याकुल-सी मर्राए कण्ठ से यही दोहराती चली.-
"जिसे सचमुच में ही बीत जाना है अाज वही दिन है-
वही दिन है-
इस वार तपन नहीं, तपन के सामने जया सिर मुकाए
बैठी थीं और किसी प्रदीखते दर्द के आगे रह-रह सिर धुनती
थीं।
चायवगान के बड़े साहब के बंगले तक पहुंचते-पहुंचते
६२
तिन-पहाड़
साँझ गहरा आई।
वाहर बरामदे में बैठे रौस सैलानी अतिथियों को देख
आनन्दित हुए।
"इस एकान्त घर में आपका आना प्रीतिकर है, निश्चित
हो थकन उतारें।"
कृतज्ञ हो तपन ने धन्यवाद किया और चाय के लिए
प्रार्थना की। रीस अतिथियों को ड्राइंग-रूम में लिवा ले आए।
खानसामा को चाय की आज्ञा दी और उनसे दार्जिलिंग-प्रवास
की बात पूछते रहे। थकी-सी साँवरी जया ने जाने क्यों उन्हें
अपनी बेटी एडना की याद दिला दी, वह साफ रंग नहीं, सीधे
सुनहरे बाल नहीं-तब भी इस अपरिचित-अजान चेहरे में
उन्हें अपनी ही बेटी का चेहरा दीखता है।
जया ने जूते निकाल पाँव कालीन पर रख लिए तो अगु-
लियों पर पड़े छाले देख रोस दुखी हुए।
"लौटने को क्या घोड़े साथ हैं ?"
चिन्तित हो तपन ने इन्कार किया।
रौस घड़ी देखने लगे। पैदल राजबाड़ी पहुँचते रात हो
आएगी और इतनी चढ़ाई यह इन पैरों से नहीं चढ़ पाएंगी।
फिर तनिक रुककर कहा-
"लौटना ज़रूरी न हो तो रात-भर यहीं रुकें.
तपन निर्णय नहीं कर पाए, क्या कहें। असमंजस में जया
से पूछा--
"चल सकेंगी?"
जया ने सिर हिला दिया, "नहीं।"
तपन मानो अब भी इसे सहमति न समझे हों। फिर
तिन-पहाड़ गम्भीर स्वर में पूछा- - - "आज यहां रुकेंगी?" गृहस्वामी की ओर देख मीठे स्वर में बोली- "ऐसे कृपा-भरे निमन्त्रण को क्यों लौटाऊँगी !" उत्तर में रोस हंस पड़े। उनके अाग्रह की स्वीकृति-भर । चाय ली। बारी-बारी से अन्दर जा मुंह धोया। नमक- घुले पानी में पांव डाल थकन उतारी और ड्राइंग रूम में पा बैठे। दीवारों पर से झांकते दो तरुण चेहरे वरवस आंखें अपनी ओर खीच लेते हैं। रीस खड़े भले-से लगते हैं और कुरसी पर बैठी उनकी संगिनी और भी सुन्दर, और भी आकर्पक । जया रोस की ओर देखती हैं-समय है जो रौस के पुराने मुख पर बीत गया । समय है जो इस एक चित्र में, इस एक फेम में ठिठका सड़ा है। रोस मानो मन की वात भांप गए हों। हंसकर कहा- "एक साथ मुझे देखेंगी,-इसे देखेंगी तो कुछ भी पहचान नहीं पाएंगी।" तब स्वयं ही बात बदलकर कहा- "टहलना चाहेंगी?" क्यारियों में कटी फांकों-सी पतली राहों वंगले के चारों और वे धूमते रहे। फाटक पर पहुंचे तो रेलिंग पर हाथ रख रोस बोले- "यहाँ से देखें-सामने खड़ी कोटेज सागर पर तैरते किसी पोत-सी दीखती है।" खिड़कियों और दरवाजों से हन-छन माती पत्तियों की
तिन-पहार
में समूची कॉटेज सचमुच किसी जहाज़-सी जान पड़ती
जया मीलों फैली चाय की क्यारियों पर विछे अँधियारे
सकती रही, फिर गम्भीर स्वर में कहा-
"इस एकान्त सुनसान में दूर-दूर फैला अँधेरा अँधेरे का
गर दीखता है।"
रोस बड़प्पन से हँस दिए।
"सच तो यह है कि ऐसा नहीं है। हाँ, मैं अपनी बेटी को
याद कर अंधेरे में इन क्यारियों को सागर बना लेता हूँ और
सोच-सोचकर याद करता रहता हूँ कि जहाज़ पर बैठी वह इस
दिशा की ओर बढ़ी आ रही है।"
"इस दुलार से जिन्हें याद करते हैं, वह भाग्यशालिनी हैं।"
"बेचारे इस पिता को तो दूसरा कोई काम नहीं । जो
आँखों में हमेशा छोटी-ही-छोटी लगती थी वही बेटी अब व्याह
कर लौटेगी।"
पिता के वात्सल्य का सत्कार कर पूछा-
"नाम क्या है, जान सकती हँ ?"
"एडना !" रौस नाम ले स्नेहित हुए।
"चंचल, नटखट ! अब कैसी लगती होगी, नहीं जानता।
हाँ, आप-सी गम्भीर और सौम्य तो कभी नहीं।"
खाने पर दो मेहमानों में बैठे रौस कलकत्ता पहुँचती अपनी
एडना और उसके अनजान पति की बात सोचते रहे। इसी मेज़
पर इसी तरह वैठे वह अपनी बेटी और दामाद के आने से अके
नहीं रहेंगे और अकेले हो जायेंगे।
खाने के बाद रौस अतिथियों को कमरे दिखाने ले आए
तिन-पहाड़
गैलरी में आमने-सामने खुसते दरवाजों पर विदा ली।
"प्रापको रात सुसद हो।"
"पापको भी..."
मुड़ने को हुए कि जया का प्राग्रह-भरा स्वर सुन पड़ा.-
"इस कमरे में एक प्याला कॉफी के लिए प्रार्थना कर
सकती हूँ?"
रोस पहले अचम्मित हुए, तब तपन की ओर देख उत्साह
से कहा-
-
"क्यों नहीं.. क्यों नही..!"
खानसामा को बुला कॉफी के लिए आज्ञा दी, हाथ से
पर्दा उठाया-
"प्राइए।"
---जया
तपन ने अंगीठी के सामने कुरसियां खींच दीं।
रौस हँसे । अपने ही घर में अतिथि हो रहा हूँ--
अंगीठी के पास झुकी लकड़ी की डांड से आग लहकाती रही।
कॉफी पाई जान उठी।प्यालों में उँडेल प्रागे की ओर कुरसी पर
वैठ पहली बार रात-भर के लिए अपने कमरे को निहारा ।
आग की कौंध में दीखा कि कमरे में सव है जो पूर्ण है, सम्पूर्ण है।
तपन की ओर मुड़ कहा-
"यह कमरा नहीं, कमरे का चित्र लगता है।"
गृहस्वामी चमत्कृत हुए। प्रशंसा-भरे स्वर में कहा--
"पाप-सी ही आपकी कल्पना भी।"
तपन हंसे नही, न जया की ओर देखा। एक अखि रोस
की ओर देखा और आंखें लौटा लीं।
गृहस्वामी बच्चों के-से इन तरुण अतिथियों को देखते रहे
तिन-पहाड़ -- और इनके छोटे-छोटे मनमुटाव और झगड़ों की वात सोच मन-ही-मन हँसते रहे । कभी वह भी ऐसे ही थे, ऐसी ही जूली थी... आज्ञा ले उठते हुए कहा- "आप लोग थके हैं, आराम करें।" तब जया का धन्यवाद किया" "एडना और आप में कुछ भी समानता नहीं, फिर भी आपको देख ठीक उसी की याद आती है।" जया सिर हिला मुसकरा-भर दी। दुविधा में तपन भी गृहस्वामी के संग उठ खड़े हुए । पाशा किए रहे कि रुकने को कुछ संकेत देंगी, कुछ पूछ लेंगी, पर वह तो रात के लिए कामना करती थीं। "रात सुखद हो..." "और आपको भी।" तपन कमरे में आए। सिर तले कुशन रख देर तक अधलेटे रहे। बार-बार सिगरेट सुलगाते और अँगुलियों में ही बुझ जाने देते। घोर सुनसान से घिरी यह कॉटेज और कॉटेज का यह नितान्त अकेला कमरा। छत पर से झूलती बत्ती का शेड दीवारों पर हल्का-सा साया विखराता है और अँगीठी में जलती सुनहली आग फर्श की सीध जगमगाती है। अँगीठी के आगे बैठीं वह अब भी उसी डाँड से लकड़ियाँ हिलाती होंगी। मस्तक पर काले बालों की रात उसी तरह लहराती होंगी। उठकर तपन द्वार की ओर बढ़े। पर्दा उठा गैलरी में
तिन-पहाड़
पाए। सामने के द्वार पर पर्दा वैसे ही झूलता था। वह खड़े रहे,
खड़े रहे-चाहा कि हाथ से हल्की-सी थाप दें, पर कोई गहरी
भिभक तन-मन में अटक गई।
लौट उसी खिड़की में आ खड़े हुए। वाहर देखा । दूर-दूर
विछा अंधेरा, अंधेरे पर जड़ा और अंधेरा, और काली स्याह
वीरानी में सांय-सांय करती तीखी सर्द हवाएँ । हाहाकार करते
सन्नाटे पर क्षण-क्षण फुकारता कोई अदेखा भय रेंग-रेंग खिड़की
की चौखट पर चढ़ता आया । कनाट लगा पर्दा खींच दिया।
फिर ठगे-से, घबराये-से कई क्षण पलग के पास खड़े रहे। तय
गृहस्वामी का ढीला जोड़ा उठा कपड़े बदलने लगे।
बत्ती बुझाई । लेटे। सपने-सी दो प्राखें कमरे में देर तक
टिमटिमाती रहीं। जो राह चलते मिली थीं वह आज उन्हीं के
संग इस अनजान घर में ठहरेंगी, यह कव सोचा था । वॉटा-
निकल से नीचे उतरते ही कव जाना था कि मीलों नीचे हरि-
याली में छिपी इस कांटेज तक पहुंच जाएंगे।
सहसा आँखों के आगे पूतूल के होस्टल का ऊंचा फाटक
धूम गया। थकन ने नीद में वेखवर कर दिया तो धीमे हल्के
पांवों कोई पास आ खड़ा हुमा । जान लिया, वही पास चली
आई है । हाथ से घेर पास कर लिया और प्यार से पुकारा--
"पूतू"पूतूल...!
वह खिलखिला दी। उनके माथे पर हाथ फेर बोली-
"मैं तो पूतूल नही..."और हाथ छुड़ा अँधेरे में विलीन
हो गई।
उठ बैठे। हाथ फैला आस-पास टटोला। यही थी---यही
थीं...
६८
तिन-पहाड़
खिड़की का पर्दा खींच काँच में से
बाहर
देखा -वही पहले
का-सा अंधेरा और अंधेरे पर अंकित वही मुख ।
हारकर फिर सिरहाने पर सिर डाल दिया। आँखें मूंदी कि
छोटी-सी गूंज कान में कांप गई।
'तपन...! तपन ..!'
'कौन पुकारता है ? ..कौन ?' सहमकर उठ खड़े हुए।
द्वार लाँघ गैलरी में आ खड़े हुए । अन्दर वत्ती जली है...
पर्दा उठाया। लैम्प की छाँह में तकिए पर सिर डाले वह
ऐसे पड़ी थीं कि सोना चाहती न हों और बैठे-बैठे नींद में बेवस
हो गई हों।
फिर वही स्वर सुन पड़ा।
वह पड़ी-पड़ी उनका नाम लेती हैं...
पास जा पूछा, "जगी हैं।"
स्थिर पलकें हिली नहीं, केवल होंठ हिलते रहे।
"नहीं"नहीं"श्री ऐसे नहीं.. ऐसे नहीं...
ऐसे विकल स्वर सुन तपन अकुला गए । व्यथा-भरे दुलार
से एक बार फिर पूछा, "किसे पुकारती हैं ?'
वह मानो बेसुधी में ही यह स्वर सुनती हों। उमड़कर
वाहें फैला कहती चली, "श्री दा ऐसा नहीं करेंगे...ऐसा नहीं
करेंगे।
एक वार चाहा, हाथ से झकझोर जगा दें, फिर विमूढ -से
अपने कमरे को लौट गए।
,
भोर हुई। तपन ने आँखें खोली, फिर मूंद लीं। आज के
बाद तो इस कमरे में जगेंगे नहीं। गई रात मन से निकल फिर
तिन-पहाड
आँखों में तैर गई. वह किसे पुकारती थी? श्री कौन है?
कौन है ?
कहीं से मीठे स्वर की लहर ने उस अधकच्ची नीद को
हिला दिया।
"अन्दर आ सकती हूँ?"
आँखें खोल तपन उठ बैठे। हाथ में ट्रे लिए वह द्वारपर खड़ी
थीं। तपन अचरज से देखते रह गए। यह कमरा क्या उनके
अपने घर का है और वह भी क्या इस घर की कुछ होती हैं।
"आइए।"
देर-से ढीले बालों में वह कल वाली साड़ी और कार्डीगन
में सुव्यवस्थित-सी पास पाई । मेज पर ट्रे रख पास खीच ली
और प्यालों में चाय उंडेलने लगी।
तपन तकिए पर कोहनी टेक अपलक उनकी पोर तकते
रहे । लगा नित्य ही वह यहां बैठी हों, उनके लिए चाय बनती
हो और नित्य ही वह यहाँ बैठे उन्हें निहारते हो। श्री · श्री ..
जया ने प्याला प्रागे किया।
तपन हिले नही । प्याला लेने को भी हाथ बढाया नही।
होले-से अधिकार-भरे स्वर में जया ने पूछा-
"कुछ भूल हुई ?"
तपन ने अब भी गाँखें नहीं झपकाई, केवल सिर-भर हिला
दिया।
हाथ का प्याला नीचे रख जया टुकुर-टुकुर उनकी और
देखती चलीं। तव एकाएक तपन को गम्भीर मौन दृष्टि के
आगे अस्थिर हुई। उठकर पास आई और अपराधी के-से स्वर
में कहान
--
तिन-पहा:
००
"मुझसे कुछ कहेंगे नहीं ?"
तपन अव भी
कुछ
बोले नहीं।
"राह चलते मिली हूँ, क्या इसी से कुछ नहीं कहेंगे ?"
चाहते रहे - रात की बात पूछ लें, जो उन्हें जानना
चाहिए वह जान लें, पर होंठों तक आ शब्द जुड़े नहीं ।
तपन की आँखों में इस मौन उलझन को जैसे वह पहली
बार पढ़ सकी हों। जया कुछ कहने जाती थी फिर, हाथ से
उनकी आँखें ढाँप दी और देर तक उनके माथे पर मुख झुकाए
बैठी रहीं।
धूप से उजियारे वरामदे में गृहस्वामी नाश्ते के लिए अति-
थियों की प्रतीक्षा में बैठे हैं। ताजे मेज़पोश पर लगा नाश्ता, मेवे
और दूध-मक्खन । दो खिले-खिले चेहरे देख रौस सुखी हुए।
"रात आराम कर सके ?"
विनम्र हो दोनों ने धन्यवाद दिया। काँच पर के महीन
पर्दो में से धूप सहज-सहज बरामदे को गरमाने लगी। खान
सामा के अभ्यस्त हाथ चुपचाप सेवा करते रहे।
नाश्ता समाप्त हुअा। रौस धूप लेने लगे । जया उठ खिड़
से वाहर देखने लगी और तपन चौखट पर झुके जया को त
रहे। आज के ये क्षण फिर लौटेंगे नहीं।
तपन उठना चाहते हैं, जाने के लिए गृहस्वामी से
लेना चाहते हैं, पर जैसे इस वरामदे में ठिठकी सुवह उनके
ही बिखर जाएगी।
उठकर जया के पास आ खड़े हुए। कई क्षण तक
देखते रहे, फिर हौले-से कन्धा छू दिया ।
"अब हमें चलना है।"
तिन-पहाट धीर गति जया रोस के पास प्राई और आदरपूर्वक भुक- कर कहा- "अापकी कृपा कभी भूल नहीं सकूँगी।" रोस ने उन भाव-भरी आंखों में बहुत-कुछ पढ़ा। लगा, वह किसी कठिन क्षण में अकेली ही जूमती हों। रोस ने सयाने कण्ठ बहुत-सा पाश्वासन दिया- "कभी भी पाने का मन हो, यहाँ का निमंत्रण सदा आपके लिए!" तपन ने कृतज्ञता जता हाथ आगे बढ़ा दिए। "मार दोनों प्रानन्दित हों!" "गुडबाई "गुडवाई...!" मोड़ से पीछे मुड़कर देखा तो हरियाली में उगी कल्पना- सी कॉटेज धूप में उजराती थी और फाटक पर सड़े रौस किन्हीं छूटते क्षणों की तरह रह-रह हाय हिलाते थे। सिंगरापोंग, राजवाड़ी, राजवाड़ी का बाजार-सव पीछे छूट गए। विक्टोरिया फाल्स के छोटे-से छाह भरे पुल पर सुस्ताने को रुके । नीचे पत्यरों की पोल पर पड़ते पानी की बूंदें उड़-उड पाती थीं। पास लगे केले के पात पानी की बौछार से कांप-कांप जाते थे। जंगले के सहारे खड़े दोनों बड़े नाम वाले विक्टोरिया फाल्स के छोटे दर्शनों पर हंसते रहे । तव नीचे बैठ जया ने तपन के हाथ से अपनी जूती ले ली। पांव में डालते हुए कहा- "जितने कोस इन्हें उठाए रहे हैं उतने जन्मों में भी इसका ऋण नहीं उतार पाऊंगी।" तपन उलाहने से देखते रहे...
तिन-पहाड़ः
जिसे अपना सौभाग्य मानता हूँ, उसे ऋण करके पुकारेंगी।"
"साख से परे जो हो उससे उऋण तो नहीं ही..."
मुख उठा तपन की ओर देखा तो देखती रह गई।
आँखों में जो था वह शब्दों से परे था।
-
होटल पहुँच जया डेस्क पर रुकी। डाक पूछी। पत्र हाथ
लिए तपन से आज्ञा मांगी।
लंच के लिए न आ पाई तो जान लें सिंगरापोंग की थकन
उतारती हूँ।
तपन ने आँखें नहीं लौटाई।
"शाम को भीन दिखीं तो..."
वह अर्थ-भरी गम्भीर आँखों से उन्हें देखती रहीं...
"जब नहीं दीखूगी, वह वाली शाम आज नहीं।"
तपन अपने कमरे में पाए । गुसल लिया और लेटे-लेटे
सुस्ताते रहे।
लंच के लिए तैयार होते न देख बैरा ने पूछ लिया...
"हुजूर, हुक्म करें तो लंच यहीं...?"
सिर हिला अनुमति दी।
नींद से उठे तो घड़ी चार बजाती थी। चाय ली, तैयार
और बाहर
चले पाए।
हुए
दूर से देखा-बरामदे में से हो वह काउन्टर की ओर चव
जाती थीं। पाटवाली साड़ी पर सफेद शाल था, और ६
झूलती वालों की गूंथ थी।
तपन पास आ खड़े हुए। पहली बार उन सलोनी अंगुति
मोती जड़ी अँगूठी देखते रह गए।
तिन-पहाड़
वह तपन की ओर मुड़ों और आग्रह से बोली-
"जाने से पहले एक वार सूर्योदय देखना चाहती हूं-चल
सकेंगे?"
उत्तर में तपन ने रिसेप्शनिस्ट से लेण्डरोवर के लिए तय
कर लिया और जया को लांज की ओर लिवा चले ।
वह बैठी और हंस दी।
"नापको तंग किया करती हूँ..."
"पूछने वाला कोई होता नहीं हूं, पर क्या जल्दी ही लौट
जानेवाली हैं ?"
लगा, आँखें वे छलछलाई हैं। संभली और सिर हिलाकर
कहा-
"बुलावा पा जाने से तो जाए बिना होगा नहीं।"
"घर में कौन-कौन हैं...?"
वह मुसकराई, "मां है जिसने दूर पारकी इस पराई लड़की
को पाल-पोस इतना बड़ा कर दिया..."
मन का कौतूहल रोक गम्भीर हो पूछा--
"कोई और भी...?"
जया लम्बी अनझपो दृष्टि से तपन को देखती चलीं, तब
सिर हिलाकर कहा"
"प्रब दूसरा कोई तो रहा नहीं..."
तपन इस क्षण में समूचे हार गए 1 जी हुप्रा-उठकर पास
खींच लें और इस एकाकी उदास कण्ठ को चूमकर कहें---
में तो हूँ.. मैं तो हूँ...!'
सुनसान ठिठुरती रात मै लेण्डरोवर को गूंज होटल के मौन
१०४ तिन-पहाड़ को कंपा गई.तो तपन चौंककर नींद से उठ बैठे । चार ड्राइवरको रुकने का संकेत दे भारी गरम कपड़े पहने । प्रोवरकोट ले जया के कमरे की ओर बढ़ गए। द्वार पर धीमी थाप दी-एक वार"दो वार। अन्दर की बत्ती जल उठी तो जान लिया जगी हैं। वह पूरे कोट में बाहर आई । सिर पर स्कार्फ था । वाँह का सहारा ले नीचे उतर चलीं। ड्राइवर ने सलाम किया और आगे का कपाट खोल दिया। "हुजूर, ऊपर सर्दी होगी.. मेम साहिब के लिए कम्बल रख लेना होगा..." तपन सीढ़ियाँ उलाँघ गैलरी पार कर गए और कम्बल ले लौट पाए। "असुविधा हो तो पीछे बैठ सकूँगा..." "नहीं, नहीं।" ड्राइवर ने गाड़ी चौरस्ते पर उतार ली और लैण्डरोवर स्टेशन की ओर मोड़ ली। सड़क पर लगी बत्तियाँ रात को आँखों-सी टिमटिमा पीछे छूटती जाती हैं। माल...लोअर- माल"तारघर और स्टेशन का तिनराहा। स्टेशन पीछे ठिठका रह गया। और गाड़ी की पतली लाइनों पर दौड़ती लैण्डरोवर वताशिया-लूप की ओर भागने लगी। आकाश पर चमचमाते ढेरों-ढेरों तारे और उनकी ओर मुख उठाए पहाड़ों के काले साए पहियों के साथ-साथ लहराते चले। बताशिया-लूप पार किया तो दार्जिलिंग का शहर पहाड़ों की अोट हो गया । लम्बी सड़क के मोड़ पर वह ऊँचा स्टेशन
१०५
तिन-पहाड़
अंधेरे में लटकी बहुत बड़ी लालटेन-सा चमकने लगा। ड्राइवर
ने गियर बदला और गाड़ी टाइगर हिल्स की ओर मोड़ ली।
ऊँचाई से फरफराती ठंडी हवाएं पास आ-या कंपाने लगों तो
जया की ओर झुक ठीक से कम्बल प्रोढ़ाया तो मन-का-मन
करुणा से भर पाया।
रात-सी अकेली यह अपने अकेलेपन की सजा अपने को ही
क्यों देती चली जाती हैं."
चक्करदार संकरे घुमावों वाली चढ़ाई पार कर ड्राइवर ने
गाड़ी सिंह-शिखर की चोटी पर रोक दी।
पलटकर नीचे देखा तो पहाड़ के अंधेरे में सरकती अगणित
लण्डरोवर की बत्तियां जुगनुओं-सी चमकती थी।
"हुजूर, ऊपर चलें, बाद में भीड़ हो जायेगी..."
खुले छत पर से चारों ओर देखा । जान पड़ा, घरती के
ऊंचे वुर्ज पर, खड़े हो आकाश का महल निहारते हों। सितारों-
जड़ी महल की मेहराब से अभी कोन झांकेगा..? कोन
झांकेगा...?
नीचे हलचल हुई । हार्न गूंजे और सिंह-शिखर का सूर्योदय
देखनेवाली भीड़ का कोलाहल गहरा हो पाया।
देखते-देखते धुंधले वादल पूरे पहाड़ पर छा गए । तारोंभरा
आकाश छिपा, दिशाएं छिपी और पास-पास खड़े चेहरों के
आकार भी छिप गए। सूयर्दोय दिख सकेगा। शब्दों में बंधे
अनुमान उसी धुन्ध पर तैरते रहे कि सहसा धुन्ध छंटो। और
कई जोड़ी आँखें पूर्व दिशा में जा अटकीं।
अभी अभी "तारों की लौ हल्की हो मानो मोतियों की
लड़ी बन पाई । सामने पूर्व में उजाले की लो फूटी और किसी
तिन-पहाड़ खे हाथ ने पहाड़ों पर रोली छिड़क दी। दिन चढ़ गया... दिय हो गया। - - - तपन ने बारी-बारी से दोनों पत्र उठाए-खोले नहीं, देखे- पर और रख दिए। पूतूल की तिरछी लिखावट और माँ के सधे-सधाए पके अक्षर। समूचा कमरा बेजान-सा दीख पड़ा। केवल मेज़ पर पड़े दो पत्र दो जोड़ी आँखों की तरह उनकी ओर तकते रहे। करने को कुछ न पा गुसल लिया। ड्रेसिंग-टेबल के सामने खड़े रहे, खड़े रहे, तव पलटे और मेज़ पर से माँ का पत्र उठा लिया। आशीर्वाद पढ़ जैसे सचमुच ही माँ की सुधि हो आई- "तपू, दार्जिलिंग जा अपनी पहुँच भी लिखी नहीं। मां की चिन्ता का ध्यान कर चिट्ठी जल्दी दे देना..." कई क्षण पत्र हाथ में लिए-लिए खड़े रहे। पास ही पूतूल के अक्षर जैसे प्रार्थना करते रहे, 'मेरा पत्र नहीं पढ़ोगे, तपू...?' तपन सिर हिला जैसे अपने से ही कहते रहे हों- 'नहीं, पूतू, आज नहीं... बैठे-बैठे सुबह की बात याद करते रहे । सूर्योदय देख लेने पर आज क्यों आँखों में कोई रूप नहीं, रंग नहीं उस सुनहले पालोक-भरे भोर के बाद कैसी यह आभाहीन फीक दुपहरी है ! आँखें मूंद जया का मुख अपनी ओर लौटाया तो भी दिखा नहीं। टाइगर-हिल्स पर छाई धुन्ध में राह टटो जया की दो बाँहें... अपने को झंझोर उठ खड़े हुए। कपड़े बदले और बन सोफे पर
१०७
तिन-पहाड़
से हो जया के कमरे की ओर बढ़ गए।
द्वार पर हौले से आहट की-टक टक् । नौव घूमी, द्वार
खुला और सलोनी बांह ने सत्कार कर कहा, "प्राइए।"
लाल ड्रेसिंग-गाउन पर प्रिय मुख उन्हें किसी संझाई उदास
शाम-सा जान पड़ा । देखते रहे, देखते रहे । तव नीचे लटकती
दोनों बाँहों को हाथों में भर लिया।
वह बिना हिले-डले ऐसी खड़ी रही कि सचमुच की
न हों।
तपन झुके और उस उदास माथे को अघरों से छू धीमे से
कहा-
"किसी से रूठकर मन-ही-मन इतना दुख पाना अच्छा
नहीं।"
वह जाने कैसी हँसी।
लगा कुछ कहना चाहती हों और कह न पाती हों।
स्नेह-भरे कण्ठ से पूछा-
"कुछ कहना है ?"
हौले से पूछा-
"सच-सच कहेंगे.
तपन ने सिर हिला दिया। जया उनकी ओर देखती रहीं,
तब रुक-रुककर पूछा-
"अव क्या अच्छी नहीं दीखती हूँ...?"
सहसा तपन कुछ कह नहीं पाए। समझे ही न हों कि
क्या पूछती हैं । तव हाथ से मुख उठा आँखों में झांककर
कहा-
"जंसी लगती हैं, वह क्या सच में ही कह सकूँगा...
१०८ तिन-पहाड़ -- - वह पहले गम्भीर बनी तकती रहीं, तव खिलखिलाकर हँसने लगीं। 'कॉफी के लिए चलेंगी?" "दूर नहीं"बस लांज में।" वह अन्दर गईं। लौटीं तो ज़री की पाटवाली गुलाबी साड़ी पर पशमीने का शाल लिए थीं। सलोने मुख पर धुले-धुले रूखे वाल किन्हीं काली किरणों के जाल-से बिखरे थे। लांज में बैठ कॉफी के लिए आर्डर किया तो मेज़ पर हाथ फैला जया चौकन्नी-सी चहुँ-ओर देखती रहीं । तब कुछ सोच पर्स खोला और छोटी-सी डायरी निकाल ली। कोई हिसाब देखती हैं, किसी का पता ढूंढती हैं या कोई दिन-तारीख देखती हैं । तपन कुछ भी जान नहीं पाए। कॉफी पाई जान पर्स की ज़िप खींच दी और मग्न-सीप्यालों में कॉफी उँडेलने लगीं। तपन की ओर देख कुछ कहने को हुई कि केतली से कॉफी नीचे गिरती चली। तपन क्या कहते थे सुना नहीं। उन्होंने हाथ से केतली ले नीचे रख दी तो भी हाथ उसी मुद्रा में अटककर रह गया। हाथ छू नीचे कर दिया और दुलार से कहा- "किस सोच में खोई हैं ?" वह सजग हुई। कवर बदल बैरा ने ताजी कॉफी ला दी थी। धन्यवाद कर प्यालों में चीनी डालने लगीं। फिर आँखें नीचे किए-किए ही कहा-- "कॉफी तक बनाना भूल गई हूँ..." लांज से उठ दोनों वाहर आए तो होटल की ढलती दुपहरी मौन हो पाई थी। छतरियों की छांह तले कुरसियाँ सभी खाली में उसी तरह हवा तिन-पहाड़ थीं । हिलो-मिली गले लगी सहेलियों-सी धूप-याएँ अठरोगियो करती थीं। आज ही "माज ही तो "दूर से दीसा नही । अव भी क्या ऐसा ही मुख होगा वही प्रोसें. यही मुराकराहट । गया"मय कौन उसे दुलार से पुकारेगा...? अव जया नहीं. पराजया हो ... किसी ने पुराने सगे फण्ठ से पुकार मान्धे पर हाथ रख दिया। "जया!" तपन "नहीं..नहीं... घबराई-सी उसने सामने देसा तो तपन पाग पुरगी पर घंटे थे और अपने पर झुकी कोई दूसरी पायति मन्धे पर हाथ रखे थी। . वही स्वर... मुख उठाया, देपा, प्रांखें मूंद नीं। श्री नहीं यह श्री की छाया है... थी ने दुलार मे पुकारा- "नहीं पहचानतीं...!" कुछ भी उत्तर नहीं पाया। कुरती खाँच पास बंट गए और हाय पूछा- "मेरा पत्र मिला था...?"न'हो',न'मा', माग्दों की महाका पत्थर की प्रान्दी मे मत्र देशा किया। श्री चिलित हुए।घर में कोई पुराना दुलार ना पहा- "मां तो बेटी की चिन्ना में ली जा रही हैं। फिर भी वह मान। याचना स्वरमदान- तिन-पहाड़ "मुझसे अपराध हो जाने से."उसकी सज़ा क्या माँ को दोगी?" जया ने इस बार भी कुछ सुना नहीं। "मुझसे राग करोगी–मैं झेलूंगा, पर माँ..." विवश-से दो हाथ उठा जया ने आँखों पर रख लिए, तो अंगुली पर वही पुरानी मोती जड़ी अंगूठी दमक गई। श्री खड़े रहे। चाहा एक वार बाँह आगे कर जया का सिर सहला दें, पर वेबस-से तपन की ओर देखते रह गए। श्री कमरे में लौटे तो एडना आराम में थी। बैठे-बैठे सिग- रेट जलायी। छोड़ दी। फिर जलायी। आँखों पर रखे जया के विवश निरीह हाथ, सम्मोहन का एक तार-एक कड़ी कहीं दूर जा पड़ी। स्नेह-सत्कार से जिसे वहुत-बहुत मानते रहे, उससे क्यों कर क्षमा पा सकेंगे। जानते थे-जानते थे-फिर भी-फिर भी सिरहाने पर बिखरे एडी के सुनहले बालों में जैसे कोई अनुराग का छोटा-सा सूरज चमकता हो । सोचा था-सभी कुछ सोचा था-बार-बार सोचा था पर मोह-भरी वाढ़ तो सब बहा ले गई । असंख्य बार मन को रोका था-नहीं-नहीं-पर मन की आँखें तन की बाँहें दोनों एक संग गलबहियों में जा घुलीं। न माँ का मुख याद रहा, न अपना वचन, न वचन से बंधी जया। चार वर्ष पहले की साँझ याद हो पाई। श्री खिड़की के सामने खड़े थे। जया के आने की आहट पा मुड़े। । -
तिन-पहाड़
"एक बात कहोगी, जया..."
"पूछिए, श्री दा..."
"दूर चला जाऊँगा तो भी क्या याद करोगी?"
जया मेज़ पर विखरी कितावें सहेजती रहीं। श्री को पास
पाया जान प्रखें ऊपर की और मोठे स्वर में कहा-
"आंखों से प्रोझल हो जाते ही कोई मन से भूल जाता
होगा, श्री दा!"
श्री ढीले बालों की छोह, चमकती दो आँखें देखते रहे।
जया हँसी।
"कुछ और पूछना है, श्री दा?"
श्री खिड़की से बाहर देखते रहे, फिर उलाहने के-से स्वर
में कहा-
"मेरे लौटने तक तो किसी को घरनी न बन जामोगी?"
जया ने इस बार न आँखें झुकाई, न लौटाई । तब पलकों
से दो बूंदे टपक गई।
हाथ से घेर श्री ने पास कर लिया और दीर्घ काल तक उस
मोठे मुख पर अखें गड़ाए रहे।
रात खाने पर श्री कुछ बोले नहीं । जया चुपचाप परसती
रहीं और माँ बैठी-बैठी दोनों को निहारती रहीं।
हर दिन की तरह श्री ने लड़की को चिढ़ाया नही, खिजाया
नहीं, तो हँसकर कहा-
"कानू, आज क्या फिर इस सिरफिरी ने लड़ाई की?"
"इससे क्या लडता ही रहूंगा -अव तो यह बड़ी हुई।"
वेटे के कथन में कोई उलाहनासा सुन पड़ा। कानू की ओर
देखा, फिर सहज बुद्धि से सिर झुकाए बैठी लड़की पर प्रांखें
११२
तिन-पहाड़
गड़ा दी।
रात मां लड़की के कमरे में आई तो वत्ती नहीं जली थी
और अँधेरे में जया विछोने पर औंधी पड़ी थीं। हाथ से हिलाया।
उठी नहीं तो लाड़ से तरेर कानू को आवाज़ दी।
"इधर तो आ, बेटा! इस वेला रोना-धोना ! तेरे गए पीछे
इस पगली का क्या करूँगी-तू ही बता !"
श्री माँ की ओर नहीं, जया की ओर ताकते रहे।
"जाने से पहले इसका घर-वर ठीक कर जा, कानू ! यह
झंझट इस बुढ़िया के वश का नहीं।'
लड़की आँचल से रुलाई रोक ढिठाई से खड़ी-खड़ी देखती
रही, तव आकर माँ की झोली में मुंह छिपा लिया।
रात सोने से पहले श्री माँ के पास आए । पैताने बैठ माँ के
पाँव छू लिए तो वह मन-ही-मन खुश हुई।
श्री मां को देखते रहे, तब अनुनय के स्वर में बोले-
"जो कहने जाता हूँ माँ, सो तो तुम पहले से ही जानती
-
हो।"
माँ लेटी-लेटी उठ वैठीं।
"इस माथे में इतनी समझ कहाँ है, कानू..."
श्री कुछ कहने से पहले जैसे माँ का मन तौलते रहे, फिर
अधिकारभरे कण्ठ में कहा, "वूया माँ के ससुराल की इस दूर
पार की लड़की को पाल-पोस बड़ा किया है तुमने, पर क्या इसी
से इसे दूसरे घर व्याह दोगी..."
वेटे ने मानो अाधा युद्ध जीत लिया ।
माँ घड़ी-भर लड़के को देखत रहों, तब बोली-
"जिसे आँचल से लगाए रही हूँ, उसे कितना चाहती हूँ...
तिन-पहाड़
यह तो कहना नहीं होगा, पर एक बात तो कह, यह यात तेरे
मन में पाई कव?"
श्री इस बार डरे नहीं । अधिकारपूर्वक कहा-
"मां, ऐसी वात क्या एक दिन में सोची जाती होगी
मां जैसे जानती ही थी कि बेटा यही कहेगा।
हंसी। हंसती चली कि आशीर्वाद बरसाती हो।
"किसी दिन किसी दूसरी पर मन हो पाने से..."
आश्वासन से उठ मां का कन्धा छू लिया और उलाहना
दे कहा, "बेटे को इतना ही जानती हो, मां!"
मां काफी देर श्री को निहारती रही कि पराए लड़के को
अपनी लड़की के लिए जाँचती हो। तव एकाएक आँखें झुका
ली। जिस मुख को पराई नजर से देखती थीं, उसी पर कानू के
बाबा की बरसों पुरानी छवि झिलमिला आई। क्या उन्होने भी
लड़की को बहू बना लेने की अनुमति दी ?
भोर हुई। घर-भर जगा तो झर-झर पानी बरसता था।
काले-कजरारे वादलों की पांत जैसे मांगन पर झुक आई
थी। नहा-धो गृहिणी पूजा-पाठ में लगीं। वाहर पाई तो नित्य
की भांति लड़की ने झुक मां को प्रणाम किया। आशीप दे मां
हंसी, फिर झूठ-मूठ गुस्सा कर कहा-
"अभी नहाई-धोई नहीं !
लड़को चुपचाप स्नान को चली गई।
स्नान कर निकली तो दासी ने सुनहरी पटवाली साड़ी
निकाल दी।
"कहीं निमन्त्रण है क्या, चारु ?" चारु मुंह-ही-मुंह
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तिन-पहाड़
"इसकी दरकार नहीं, मां... जहां से आई है, वहीं लौटा
दो।"
"हुआ-हुमा, कानू-इसे मेरे पास तो पाने दो।पा, बेटी !
देख खुकू, जिसने बचपन में ही घौल-धप्पे से तुम पर अपना
अंकुश जमाया था, उसी ने आज तुम्हारे वर का नाम भी चुरा.
लिया है।
जया के हाथ में अंगूठी पहना थी ने झुक मां के पांव छू
लिए।
आँचरा गले में डाल लड़की मां के आगे झुकी तो आँखें
डबडबा पाई।
"कानू, तेरे लिए लड़की को विदा देने के दुख से तो छुट्टी
हो गई, पर सास बनने का मेरा एकमात्र अधिकार तो सदा को
छिन गया। पाप ही पाल-पोस अव यह बुढ़िया इस बहू को
क्योंकर डांट-डपट सकेगी-यही समझ में नहीं बैठता..."
और लड़की के सिर पर हाथ फेरती रहीं।
उस रात लेटे-लेटे पुरानी स्मृतियां प्रांखो के आगे भीड़
लगा खड़ी हो गई।
एडना को वांह से थामे जेटी पर उतरे थे तो पल-भर को
हाथ कांपा और स्थिर हो गया। मां पाएगी क्या जया आएगी
और अन्य प्रिय वन्धु पर भीड़ में से तो कोई भी दीखा
नहीं।
नीचे उतर किनारे आए तो असंख्य पराए चेहरों में से
कन्हाई काका का मुख दीख पड़ा। पुरानी अावाज ने पुकारा-
"काका!"
तिन-पहाड़ "छोटे वाबू !" कन्हाई ने चाहा, आशीष दें। होंठ हिले, पर वोल नहीं सकले। वैठीं। "प्रणाम करता हूँ, काका!" सिर हिला कन्हाई ने आँखें झुका लीं। छोटे वावू का सहारा लिए पतली-ऊँची एड़ी पर खट-खट चलती विदेसन-सी दीखती को दवी-दबी नज़र देख लिया। "माँ कैसी है, काका' और अन्य प्रियजन...?" "सभी ठीक हैं, छोटे बाबू ! कपाट खोला। कार में वह छोटे वावू बैठे और हाथ पकड़े उनका आदर-सत्कार करते रहे। चार साल बाद घर की पुरानी गाड़ी और चिरपरिचित पुरानी सड़कें । हुगली के किनारे घाट-ईडन गार्डन । गाड़ी घर की ओर नहीं, डलहौज़ी की ओर मुड़ी तो पूछा- "घर की ओर नहीं जाते हो, काका...?" कन्हाई ने गला साफ किया। "माँ की ऐसी ही आज्ञा है, छोटे वावू माँ की उपेक्षा जान जी सहम गया । वरसों वाद घर आने का चाव किसी भारी बोझ तले जा दवा । एडना के संग माँ घर जाने की अनुमति नहीं दी। सोच-सोच जाने कैसी- उदासी में जी धड़कने लगा। कन्हाई ने कार ग्रेट ईस्टर्न के सामने रोक दी। दरबार कपाट खोला। सलाम किया और कन्हाई के देखते-देखते वाबू मेम साहिब को सहारा दिए आंखों से ओझल
तिन-पहाड़
गाड़ी सांझ तक खड़ी रही। कन्हाई सांझ तक बैठे रहे।
छोटे बाबू ने न उनकी खोज-खबर ली, न कार को तलब
की।
रात को छोटे बाबू नीचे उतरे तो नौ बज चुके थे। कन्हाई
ने कार संभाली तो पास बैठ श्री ने लम्बी सांस-ली और धीमे
से कहा-
"घर जाए विना होगा नहीं, काका.."
जी में आया कुछ बात कहें, फिर रुककर इतना ही कहा,
"सो तो जाना ही होगा, छोटे बाबू!"
ज्यों-ज्यों घर पास आता चला, मन में जाने कैसी दुविधा
उपजती रही। क्यों डरता हूँ-इतना क्यों डरता हूँ? जब
दूसरा और कुछ नहीं कर सका तभी तोपत्र पढ़ लेने पर भी
मां क्षमा नहीं कर पाई और जया..
गाड़ी फाटक में से हो घर के आगे पा रुकी। बरामदे में न
कोई नौकर-चाकर दीखे, न मो, न जया...
बरामदा पारकर अन्दर आए और मां के कमरे की ओर
बढ़ गए । वहीं पुराना कमरा। मां के पास चार के सिवाय कोई
और नहीं। मां क्या वीमार हैं ? जया कहाँ है ?
"माँ...!"
श्री ने झुककर मां के पांव छू लिए और सिरहाने भा
कहा-
"क्या जी अच्छा नही है, मां ?"
मां ने सिर उठाया, आंखें खोली, फिर मूंद लीं।
"माँ कब से असुखी है चारु ?"
चारु पहले झिझकी, फिर हौसला कर कहा-
-
तिन-पहाड़
'पापकी चिट्ठी आने से ही, श्री दा!"
माँ पर झुके श्री अपलक माँ को देखते रहे, फिर कोई भी
र न पा जया के कमरे की ओर बढ़ गए।
पर्दा उठा अन्दर आए। कमरे-भर का सामान क्यों सहेज
या है । पलंग है, विछौना नहीं। ऊपर उठी मसहरी है, फर्श
र कालीन नहीं और कोने में लगे टेवल पर कैलेण्डर की
प्रवदली पुरानी तारीख ।
"चारु, सामान क्या हुआ ?"
"यह सव तो दीदी माँ ही सहेज गई हैं।"
"दीदी कहां हैं ?"
"यहाँ तो नहीं है, श्री दा!"
श्री झुंझलाए।
"सो तो देखता हूँ चारु, पर कहाँ हैं यह भी कहने को क्या
मां ने मना किया है ?"
"माँजी से ही पूछना होगा। छोटे बाबू, दीदी तो उसी दिन
से घर में नहीं..."
श्री रौवीली चाल माँ के पास लौट आए और गुस्सा हो
कहा-
है
"माँ चार साल वाद देश लौटने पर क्या इसी तरह उपेक्षा
की जाती होगी ?"
माँ उठीं और सिर हिला वोलीं-
"सच ही कहता है, कानू । जिस किसी को व्याह कर
आने से वह अभागी लड़की आज तेरी आरती नहीं उतार सक
इसी लज्जा में तो मैं आज मलंगी।"
फिर बड़े कण्ठ चारु को पुकारकर कहा-
तिन-पहाड़
"वत्ती बुझा दे, चारु ! आज जो प्रांखों को दीखता है
उसके दीखते रहने से ही यह प्राण निकलेगा।"
अपराधी बने श्री अंधेरे में मां के सिरहाने खड़े रहे। सांस
रोके चार दीवार से लगी रही। न मां बोली, न वेटाही।
घड़ी ने दस बजाये तो चार ने मिन्नत के-से स्वर में कहा,
"मांजी, क्यों दादा वाबू के लिए कुछ परसना होगा ?"
माँ ने उत्तर नहीं दिया। रुलाई रोकने को आंचल मुंह के
आगे कर लिया।
श्री माँ के पास आए और हाथ से छूकर कहा-
"जया कहाँ है, यह क्या मुझसे नहीं कहोगी, माँ ?"
माँ का मौन टूटा कि नदी बह आई। सिर हिला रो-रो
वार-बार कहने लगी-
"क्यों पूछता है ? यह मुझसे अब क्यों पूछता है ?"
हाथ बढा माँ को चुप कराते रहे ।
"लक्ष्मी इस घर से मुंह मोड़ गई, कानू; और जीते-जी
मेरा मरण हो गया। अब वह लौटकर नहीं आएगी। कन्हाई
कहता है दार्जिलिंग की गाड़ी में बैठी तो व्यथा के मारे पहचान
में न पाती थी।"
जाने कितने दुःख-पश्चात्ताप से बेटे का कण्ठ भर पाया।
माँ से क्या कहें, कैसे कहें, कुछ भी समझ नहीं पाये। सड़े-राड़े
कई देर तकते रहे, तब मां के पास झुके और पांच छू कहा, "प्रव
चलता हूँ, माँ !"
मां ने जैसे पहली बार जीवन में प्राग्रह किया-
"विना जाये नहीं होगा, कानू ?"
थी ठिठके। मां के चयन को समझ फिर विवशन्से
१२०
तिन-पहाड़
"नहीं, माँ।"
द्वार तक पहुंचे तो एक बार फिर माँ का भर्राया कण्ठ सुन
पड़ा-
"कानू, क्या सच ही में उसे व्याहकर लाया है ?"
श्री मुड़े, माँ की ओर देखा और गम्भीर स्वर में वोलं---
"ऐसी बात कहने से कुछ दूसरा नहीं हो जाएगा, माँ ।"
और पीठ मोड़ ली।
--
एडना स्कूल की चंचल लड़की-सी दौड़ पापा के गले जा
लगी। रौस बेटी का माथा चूम मुख निहारते रहे, तब पहली
बार वह नया चेहरा दीख पड़ा जिसे एकमात्र बेटी के निर्णय ने
अजान अपरिचय से उठा एकदम पास खड़ा किया।
"पापा, श्री से मिले 'श्री, श्राप पापा हैं।
श्री झुके, हाथ मिलाया । कुशल पूछी और सामना कर
अपना अधिकार जता दिया।
रौस परीक्षक की दृष्टि से वेटी के चुनाव को जाँचते रहे,
परखते रहे।
एडना
ने पिता की नज़र भाँप मचलकर जैसे श्रीकी सिफा-
रिश की--
"पापा!'
रौस हँस दिए । बेटी की ओर झुके। थपथपाया मानो
अपनी ओर से निश्चिन्त हो जाने का संकेत देते हों।
"पापा! श्री के लिए जैसा लिखती थी क्या वैसा ही
आपने पाया।"
रौस श्री की ओर देख लाड़ से हँस दिए ।
१२१
तिन-पहाड़
"वैसा ही।"
एडना ने बहुत-बहुत सगी मुसकान से श्री की मोर देश
पूछा, "जैसा कहा करती थी क्या पापा वैसे ही नही ?"
गम्भीर मुख श्री मुसकरा दिए।
"वैसे ही।"
रौस मानो उस एक क्षण में जान गए हों कि जिस मुस्कान
ने उनकी बेटी को जीत लिया होगा, वह उन्होंने देख ली है।
थी ने सिगरेट भेंट की। लाइटर से जलाया तो अपनी
बेटी पर समूचा अधिकार जमाए अपरिचित को देखते रहे ।
जिसकी दृष्टि नही, तन-मन मे डूबी कोई अभी भासपिन
वार-वार एडना को अपनी ओर खीचती रही।
एकाएक बेटी के लिए रोस का स्नेहमय सम्बोधन गुन मा
का ध्यान हो पाया । पर मां नहीं वह तो जया है जिसके लिए
मां रूठी है और जया 'जया आज यही हैं। उनके पहचानने
से पहचानती नहीं, उनके बोलने मे बोलती नहीं...
जाने क्या सोच उठ बैठे। कुछ देर को रोम मे क्षमा
मांग ली और हौले से एडना का कन्या लू कहा---
"कुछ देर में लौटता हूँ।"
एडना पीछे से दूर तक श्री को निहारनी रही, नर पिना
की ओर मुड़ पूछा-
“पापा! सच-सच कहेंगे--श्री को देव धया निरामा
हुई ?"
वेटी का चिन्तित स्वर नुन प्रगंगा में कहा-
"गम्भीर हैं, अाकर्षक हैं और यहे इंजीनियर है..."
एडना ने लाड़ से हार दे बीच में रोक दिया, "पोर पासा
।
तिन-पहाड़
१२
"
एडी को बहुत-बहुत चाहते हैं..."
रौस अनुराग से छलछलाती बेटी को निहारते रहे, फिर
हँसकर कहा-
"क्या सचमुच में ही इतना बूढ़ा हो गया हूँ कि देखकर
इतनी बात नहीं जानूंगा!
"पापा...!"
श्री को कहाँ देखा, कहाँ मिलीं, कहाँ बार-बार मिलती
रहीं, रौस मानो अन्तर की आँखों से सभी कुछ देखते रहे।
समूचे एकान्त क्षण भी जिन्होंने एक-दूसरे को जीत लिया,
वाँध लिया।
मुख उठा सामने देखा तो रौस चौंक पड़े। दो दिन पहले
के उनके अतिथि चले आ रहे थे। उठकर चाव से उनका अभि-
वादन किया, अभिवादन लिया और एडना की ओर मुड़कर
कहा--
"जया से मिलो, एडी ! मेरी बेटी एडना और तपन...?
"आप कैसी हैं और आप
कॉफ़ी के लिए आग्रह कर पास ही विठा लिया और हँ
कर कहा-
"पाप दोनों के लौट जाने पर सोचता रहा कि एक
दिन के लिए आपको रोक क्यों नहीं लिया !
जया वारी-बारी से पिता-पुत्री दोनों की ओर देखती
फिर रौस की ओर मुड़कर कहा-
"पिता का सौभाग्य कभी जाना नहीं। उस एक [
ही जान सकी थी कि यही वह स्नेह है जो कभी व
--
जाता
दिन-पहाड़
तब एडना की ओर देखकर हंसी-
"आपके लिए आपके पापा का स्नेह देरा मन-ही-मन मापसे
ईयां कर पाई थी।"
एडना लाड़ से पिता की मोर तकती रही मौर रोस मन
में अंकित हो गई इस भावुक लड़की के मुरा पर मारों गड़ाए
-
तपन और एडना ने एक संग सामने से माते श्री को देखा।
पास आए तो एडना ने परिचय दिया-
"मेरे पति।"
अभिवादन कर जया ने प्रासें उठाई तो अपलग-मझपकर
देखती रही, फिर तपन का सहारा ले उठी और एजना फी पोर
हाथ बढ़ा दिया।
"मिलकर खुशी हुई, अव आज्ञा दीजिए।"
व्यस्त हो रौस कुछ कहने जाते थे कि तपन ने सिर झुगा
आँखो में ही उनसे कृपा मांग ली और जया को संग ले पले।
-
एडना और रोस संशय से दूर जाती दोनों परछाइयो देगते
रहे । अोझल हो जाने पर सिर हिला बेटी रो पहा-
"उस दिन भी देखा था पर समझ नहीं पाया हूँ कि दोनों
एक-दूसरे के क्या होते हैं । सग-मंग होते हुए भी एक-दूसरे गे
दूर पराए..."
थी एडना को पोर नहीं, रोम की पोर ताकते रहे जंगे
कुछ पूछना चाहते हों। फिर गम्भीर स्वर को गहज बनाकर
कहा-
"एडी,जिसकी वात तुमसे किया करता था यह वही पाली-
१२४ तिन-पहाड़ । -- लड़की जया है जो माँ से रूठकर यहाँ चली आई है। ओह ! एडना श्री की पुरानी माँ की बात सोच मुसकरा दी, जो बेटे का मनचाहा व्याह कर लेने पर घर आने की आज्ञा नहीं दे पाईं। वह ज़रूर लड़की से भी गुस्सा किये रहेंगी। रौस हँसे नहीं। श्री की ओर देखते रहे। विश्वास न आता हो कि क्या सचमुच में वही लड़की है जिसकी श्री वात करते हैं । उनकी बेटी को जिसने व्याहा है वह उन्हीं की कुछ लगती है । क्या अजाने में ही उनके घर पहुँच गई होगी "संशय और शंका से जी भर गया। घड़ी देखी और प्राज्ञा के स्वर में बेटी से कहा- "नीचे पहुँचने को अब चल देना होगा..." आँखों-ही-आँखों में एडना मानो श्री से कुछ पूछती हों पर उस क्षण अलग से दीखते श्री किसी सोच में खोए थे। एडना ने एक बार फिर अाग्रह से देखा तो सिर हिला विवशता से बोले-- "एडी,ग्राज मेरा जाना नहीं हो सकेगा,आप दोनों चलें..." और सिर झुका सिगरेट जला ली। पिता-पुत्री दोनों को चौरस्ते पर विदा दे श्री देर तक बेंच पर बैठे रहे। घोड़ों की टाप माल की ओर खो गई तो भी रौस का गम्भीर चेहरा और उस पर दो तीखी पारखी आँखें दीखती रहीं। एडना की राग-भरी आकृति आँखों के आगे आ-या मचलती रही। बैठे रहे । वैठे रहे। कैसा कड़वा बोझ है जो घर लौटते ही अपराध बन राह में या खड़ा हुआ है । एक वार माँ से प्रार्थना कर जया को स्वयं मांगा था। फिर एडना से व्याह कर स्वयं -- तिन-पहाड़ १२३ सब-कुछ मूठ कर लिया। जानते थे कि एक को पा सकने पर दूसरी से बिछुड़ जाएंगे। बचपन का संग टूटेगा, मांगकर लिया वचन टूटेगा" धीमी चाल ऊपर पाए । कमरा सोलातोएकवारगी एउना की अनुपस्थिति ने पांवों को किसी असह्य विवशता से जकड़ लिया। गया के पास खड़े-खड़े देर तक सोचते रहे--क्योंकर वह मां को समझा सकेंगे। कुछ हो पाता है जिसके प्रागे वचन नहीं रहते, प्राग्रह नहीं रहते-कुछ नही रहता । बस एक राग, एक प्यासा जया के लिए मां का दिया पत्र निकाल जेब में रस लिया। खाने के लिए डाइनिंग हॉल में पाए तो आंखें अनजाने में ही जया को खोजती रही, पर न वह, न परछाई से उनके सग- सग घूमते मित्र ही दिखाई दिए । याद नहीं पड़ता कभी वह चेहरा कलकत्ता में देखा हो। एकान्त अधिकार जमाए वह कौन होंगे। खाना ले बाहर आए। एक पांव बरामदे की ओर बढ़े, फिर जाते-जाते रुके और बाहर अंधेरे में टहलने लगे । चारों ओर फैले पहाड़ों के अंधेरे में एक बार नहीं अनेक वार जया की चिर-परिचित आँखें टिमटिमाती रहीं। जया"जया..! एडना से व्याह कर ही लिया है तो क्या अपनी जया से कम स्नेह करने लगेगे। पर मां ने तो जिद पकड़ ली है। "कहे देती हूं कान, घर की बहू जो यी-वही रहेगी। ले- देकर उस साहिवन को परे कर, नहीं तो जान ले अन्न-जत ग्रहण किए विना मैं ही अपनी जान दूंगी।"
तिन-पहाय
कुछ
सोच नहीं पाते--क्या करें, क्या कहें। शायद जया
के लौट जाने पर माँ सँभलेगी।
ऊपर पाए । अपने कमरे की ओर मुख किया, फिर सहसा
पलट बरामदे में से हो जया के कमरे की ओर बढ़ चले कि पुल
पर के एक किनारे से दूसरे किनारे जाते हों।
हाथ से द्वार खटखटाया, नीब घुमाई।
"या सकता हूँ?"
जया का मीठा स्वर सुन पड़ा, "पाइए।"
खुली खिड़की में खड़ी जया इधर मुड़ीं। पूरी आँखों से
पहली वार थी का सामना किया और हाथ से संकेत कर कहा,
"वैठिए, श्री दा..."
मन-प्राण में पठे संकोच में श्री मानो शब्द खोजते हों और
पाते न हों । खुली उस नि:संकोच दृष्टि के सामने श्री चूके ।
"मुझसे कुछ काम था, श्री दा..."
चाहा कहें, 'कैसी पराई बात करती हो, जया !' पर चुप
रह गए।
"मां ने तुरन्त घर लौट पाने का आग्रह किया है..."
चिट्ठी हाथों में ले जया हँसी। पत्र खोला, आँखें झुका
पहला पन्ना पढ़ा--दूसरा तव सिर हिला दिया...
"अब कहाँ लौटना होगा, श्री दा...!"
अपनी जया का ऐसा स्वर सुन जी भर पाया। मन-ही-
मन घिरकर कहा, "माँ ने कितना धिक्कारा है जया कि समझ
ही नहीं पाता हूँ कि सचमुच मैं वही हूँ जो माँ को बहुत प्रिय
था।"
जया कुछ भी बोली नहीं। गम्भीर मुख पर जड़ी दो
तिन पहाड़
अभियोग-भरी आँखों से एक बार श्री को देखा और दृष्टि लौटा
ली।
वह कठिन मौन-मुद्रा देख श्री शब्द ढूंढते रह गए, पर होंठ
हिले नहीं।
बाहर द्वार पर ग्राहट हुई। चौकन्ने हो जया ने सिर उठाया,
सिंचे-खिचे स्ले मुख पर जैसे कोई ढील तिर आई। उमगकर
कहा-
"चले आइए।"
तपन श्री को देख ठिठके।
"क्षमा करें..."
तव जया की ओर मुक कहा-
"फिर चला ग्राऊंगा..."
द्वार की ओर पलटे कि पीछे से जया का मोठा स्वर सुन
पड़ा, "आपके लौट जाने का तो कोई कारण नहीं..."
तपन ठिठके रह गए। एक बार जया को निहारा, एक बार
श्री को, तब भी झिझक से पांव उठे नही । जया उठ पास चली
आई और मुग्ध-सी हंस दी। तब तपन को लिवा ले पाने की
मुद्रा में होले से वाह छूकर कहा-
"श्री दा! मां को लिख दें मेरा लौटना नहीं होगा।"
श्री अनजाने ही कठोर हो उठे। नितान्त अपरिचित तपन
की बांह पर जया का हाय सह न सक्ने से उठ खड़े हुए और
कठोरता से वोले-
"इतना अधिकार तो रसता हूं कि पूछ सहूं।"
जया ने आगे की वात नही मुनी । सकेत से टोक दिया-
"नहीं थी दा, नही.."
तिन-पहाड़ कुछ सोच नहीं पाते--क्या करें, क्या कहें। शायद जया लौट जाने पर माँ सँभलेगी। ऊपर आए । अपने कमरे की ओर मुख किया, फिर सहसा पलट बरामदे में से हो जया के कमरे की ओर बढ़ चले कि पुल पर के एक किनारे से दूसरे किनारे जाते हों। हाथ से द्वार खटखटाया, नौव घुमाई "या सकता हूँ?" जया का मीठा स्वर सुन पड़ा, "आइए।" खुली खिड़की में खड़ी जया इधर मुड़ीं। पूरी आँखों से पहली बार श्री का सामना किया और हाथ से संकेत कर कहा, "वैठिए, श्री दा..." मन-प्राण में पैठे संकोच में श्री मानो शब्द खोजते हों और पाते न हों। खुली उस नि:संकोच दृष्टि के सामने श्री चूके "मुझसे कुछ काम था, श्री दा..." चाहा कहें, 'कैसी पराई वात करती हो, जया !' पर चुप ह गए। "माँ ने तुरन्त घर लौट पाने का आग्रह किया है..." चिट्ठी हाथों में ले जया हँसी। पत्र खोला, आँखें झुक पहला पन्ना पढ़ा--दूसरा तव सिर हिला दिया... "अव कहाँ लौटना होगा, श्री दा...!" अपनी जया का ऐसा स्वर सुन जी भर आया। मन- मन घिरकर कहा, "माँ ने कितना धिक्कारा है जया कि स ही नहीं पाता हूँ कि सचमुच मैं वही हूँ जो माँ को बहुत था।" जया कुछ भी वोली नहीं। गम्भीर मुख पर ज
तिन-पहाड़
अभियोग-भरी आँखों से एक वार श्री को देखा और दृष्टि लौटा
ली।
वह कठिन मौन-मुद्रा देख श्री शब्द ढूंढते रह गए, पर होंठ
हिले नहीं।
वाहर द्वार पर ग्राहट हुई। चौकन्ने होजया ने सिर उठाया,
खिचे-खिचे रूखे मुख पर जैसे कोई ढील तिर आई। उमगकर
कहा-
"चले आइए।"
तपन श्री को देख ठिठके।
"क्षमा करें..."
-
तव जया की ओर झुक कहा-
"फिर चला पाऊंगा..."
द्वार की ओर पलटे कि पीछे से जया का मीठा स्वर सुन
पड़ा, "अापके लौट जाने का तो कोई कारण नही..."
तपन ठिठके रह गए। एक बार जया को निहारा, एक बार
श्री को, तव भी झिझक से पांव उठे नहीं। जया उठ पास चली
आई और मुग्ध-सी हंस दी। तव तपन को लिवा ले पाने की
मुद्रा में होले से बाँह छूकर कहा-
"श्री दा! मां को लिख दें मेरा लोटना नही होगा।"
श्री अनजाने ही कठोर हो उठे। नितान्त अपरिचित तपन
की बाँह पर जया का हाथ सह न सकने से उठ खड़े हुए और
कठोरता से बोले-
"इतना अधिकार तो रखता हूं कि पूछ सकू।"
जया ने आगे की बात नहीं सुनी। सकेत मे टोक दिया--
"नही श्री दा, नही..."
तिन-पहाड़
तव जाने क्या सोचा और नीचे झुक तपन के पाँव छू
ए।
"जो आज दुर्दिन में मेरे सबसे अपने हैं, उन्हीं का अनादर
रेंगे, श्री दा...!"
श्री मानो बीच में ही रोक देना चाहते हों--
"जया !"
जया सिर हिलाती चली।
"नहीं थी दा, कुछ भी सुनूंगी नहीं। मन में'आ जाने से
ही जिस-तिस का अपमान करते चलेंगे, यह अधिकार आपको
किसने दिया, श्री दा?"
करवट ले तपन ने आँखें खोल लीं। अँधेरे में चमकती घड़ी
की सुइयाँ ‘साढ़े तीन। उठ बैठे। लगा, साँस घुट रही है ।
खिड़की खोली, पानी पिया, फिर लेट गए।
"श्री दा, आज जो मेरे सबसे अपने हैं, उन्हीं का अनादर
करेंगे!"
वोल नहीं कि फूल हों।
तपन बार-बार कई बार रोनेवाली दुबली-पतली लड़की का
ऐसा गर्वीला स्वर सुनते रहे। पाँवों पर झुके कृतज्ञताभरे वे दो
हाथ । इन्हीं पाँवों को छुना था, इन्हीं को। ऐसे आदर का क्य
सत्कार नहीं करेंगे ? सौ बार करेंगे। ऐसे चाहने वाले को
बार नहीं, सौ वार चाहेंगे। जया 'जया...!
दिन चढ़े अाँख खुली तो कांच में की धूप कम्बल पर अ
गई थी। इतनी देर। घड़ी देखी 'साढ़े तीन हाथ से हिल
पर सुई हिली नहीं । चावी उलटी-पलटी, कान से लगा
कलाई से फीता खोल दिया।
तिन-पहाड़
उठे, शेव की, गुसल लिया। कपड़े बदले और बाल बनाते
देर तक अपने को दर्पण में देखते रहे। ऐसा कि पहले अपने को
कभी देखा न हो। ऐसी रागभरी लड़की का अधिकार श्री नहीं
रख पाए। ऐसी प्यारभरी लड़की का मान नहीं रख पाए।
बाहर पाए और जया के कमरे के आगे से हो डाइनिंग हॉल
की ओर बढ गए । केवल उन्हीं के टेवल पर नाश्ता लगा था।
जगने में सचमुच बहुत देर हुई।
हाथ खाने में लगे रहे, मन कही और। वह मिलेंगी, वह
दुलरा देगे। स्नेह से समझा देंगे-जो वीत गया वह बीत गया,
अब उसकी सोच क्यों करती है."क्यो ?
नाश्ता ले बाहर पाए। लॉन में झांका। धूप में देखा।
फिर डेक्स की पोर लौट पाए । नम्बर नौ के आगे उदास शून्य
भाव से ताली लटकती है। जान लिया कमरे में नहीं है । पर
कहाँ हैं ? ' कहाँ होंगी...? कहाँ गई होंगी? लौटकर अनेक्सी
के आस-पास देखा-चौरस्ते पर उतरती सीढ़ियां एक-दूसरे
से जुड़ी-जुड़ी मौन पड़ी है। कहाँ होगी, किस पोर होंगी?
ऑवजरवेटरी की ओर ध्यान पड़ा और उसी ओर हो
चले। ज़रूर वही बैठी होंगी। शायद हवाघर की उसी बेच
पर । जंगले की तार पर हाथ दिए चढाई चढने लगे। इस ओर
पीठ होगी, नीचे लटकता साड़ी का पल्लू होगा और घुटनो पर
पड़ा शाल...
हवाधर की हरी छत दौखने लगी तो आंग्वे नीचे झुका
ली। पास पहुँच ही उनकी पोर देखेंगे, फिर बहुत प्यार से
पुकारेंगे-
"जया !"
१३० तिन-पहाड़ ऊपर पाए । हवाधर की सभी बेंचें खाली थीं। लकड़ी की चौखटों पर लिखे असंख्य नाम और तिथियाँ काले-सफ़ेद अक्षरों में चमक रहे थे। जया और उनकी तरह और भी लोग एक- दूसरे के संग दार्जिलिंग में घूमते होंगे, याद में अपने-अपने नाम लिखते होंगे-~पर क्या कभी भी किसी को बता सकेंगे---जया के संग वह कौन दिन कहाँ-कहाँ घूमते रहे । वे दिन-तारीख क्या लकड़ी की इन चौखटों पर लिख सकेंगे वे तो दूर-दूर मन में खुदे हैं। चोटी पर पहुँच मन्दिर दीखा और हवा में लहराती ऊँची श्वेत पताकाएँ । इन्हीं में कहीं लुकी-छिपी लहराती एक साड़ी भी होगी। चारों ओर घूम-फिर देखा। दक्खिन की ओर से नीचे उतरने लगे तो कई बार पीछे मुड़े। दौड़ती-भागती वह उसी उतराई पर उन्हें आ मिलेंगी। सड़क के संग-संग पाँव चौरस्ते पर लौट आए तो कोने की बेंच पर पाँव टेक चौकन्ने हो चारों ओर देखते रहे। जहाँ भी हों, जहाँ भी गई हों-लंच के लिए तो लौटकर पाएँगी ही। एक डेढ़ दो 'वह नहीं लौटीं। शायद अपने कमरे में होंगी। ज़रूर होंगी। सहसा आँखों के आगे सब साफ़ हो गया। वह कहीं और नहीं, श्री के साथ होंगी होंगी.' जी से उठ कोई अनजानी घुटन गले में घिर पाई। इतने घंटों तक जया को अपने पास अपने साथ रखने वाले श्री जया के कौन होते हैं ? कौन...? झुंझलाकर होटल की ओर मुंह मोड़ लिया। ऊपर पाए ।
तिन-पहाड़
।
नौ नम्बर के सामने ताली उसी तरह लटकती थी
लंच के लिए वह डाइनिंग-हॉल में नहीं है। होंगी-लंच
के लिए नित्य की तरह आज भी देर से पाएंगी । मन-ही-मन
पुकारते रहे-~-जया! जया! युझे मन कुछ साया, कुछ छोड़
दिया।
बाहर आए तो दुपहरी की धूप क्यारियों पर ठिठक गई
थी। कलवाली रंगीन छतरी तले जा बैठे । जहाँ रो भी लौटेगी,
लौटकर यही आएंगी।
ऊँचे-ऊँचे पेड़ों पर हवा लहराती है, सरसराती है, तपन
समूचे सिहरते है "हवा नही, जया का नरम कोमल हाथ उनके
कन्धे कोट सिहराता है। धूप हल्की हुई, दुपहर दूर हुई, तव
भी वह लौटी नहीं। प्रतीक्षा में व्याकुल मन को लगा कि जरी
आज-सा उदास और निराश दिन पहले कभी जाना ही न हो।
हारकर लांज में आ बैठे। कॉफ़ी के लिए प्रार्डर दिया।
प्याला होंठों से छुया तो घबराहट ने झकझोर दिया।
रात श्री से वह न लौटने की बात परती थी-क्या लौट
गई होगी?
क्यों वह पहले स्टेशन नहीं चले गए। दोनो गाडियां दप
पाते "तीखे चूंट भर प्याला वही रस दिया । जल्दी-जल्दी नीचे
उतरे, रिक्शा लिया और स्टेशन की ओर भाग चले।
एक के साथ एक लगी दुकानों की कतारें "प्रोसो को
कुछ भी सूझा नहीं और मन में कोई काली प्राधी उमह प्राई ।
गाड़ी जब भी छूटती होवह उनसे विना मिले नहीं जा सकेगी
नहीं जा पाएंगी।
स्टेशन पहुंचे तो प्लेटफार्म के प्रागे रेल की परियां उदाग
तिम-पहाड़
।
।
पड़ी थीं। रेलिंग पर हाथ रख खड़े रहे, फिर रिफ्रेशमेंट-रूम
की सीढ़ियाँ चढ़ गए। क्यों नहीं ढूंढ सकेंगे "सकेंगे...
मेज़-कुर्सियां सब खाली थीं। नीचे उतरे, कुछ सोचा और
स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुँच प्रार्थना की--
"छूट गई गाड़ियों के रिजर्वेशन चार्ट देख सकता हूँ ?"
स्टेशन मास्टर पलभर तपन की ओर देखते रहे, तब
प्रार्थना पर चार्ट आगे कर दिया। एक-एक कर सभी नाम पढ़े।
फिर लम्बी साँस ले स्टेशन मास्टर को धन्यवाद दिया और
होटल लौट आए। इस बार रुके नहीं। बिना संकोच-झिझक
के रिसेप्शनिस्ट से जाकर पूछा-
"नौ नम्बर से क्या वाहर गई हैं ?"
"सुबह सात बजे निकली थीं..,
"मालूम है कहाँ गई हैं ?"
रिसेप्शनिस्ट सहज बुद्धि मन-ही-मन कुछ सोचते रहे,
फिर सिर हिला विवशता जता दी।
"नहीं कह सकूँगा"उन्हें नीचे उतरते देखा-भर था।"
बरामदे से हो तपन अपने कमरे की ओर पाए तो पाँव
उठते न थे। उदास-निराश मन मानता न था कि वह अपने
कमरे में हैं और जया नहीं । जया को अकेले कहाँ जाना था.''
क्यों जाना था.
बुझे-बुझे हाथों अपने कमरे का द्वार खोला और जाने कैसे
फीके मन निढाल हो सोफे पर जा गिरे। वह कमरे में नहीं...
होटल में नहीं श्री के साथ हैं तो कहाँ हैं। बाहिल'
बताशिया'जलपहाड़"
उस दिन वहीं बैठी-बैठी हँसी थीं। मौन गम्भीर चेहरा
तिन-पहाड़ एकाएक धूप-सा उमड़ पाया था। ऐसी सुहानी लड़की का मूल्य जो नही पा सके-दिनभर क्या उन्ही के संग घूमती रही होंगी ? "क्या फिर से सिंगरापोंग गई होंगी... लेटे-लेटे जाने कितनी बार वह प्रिय मुख आँखों के सामने घिर पाया। कितनी बार वे बांहें इन बांहों के पास, जमे राग- भरी अनुरागभरी गलबहियाँ हों। प्रांख लगी तो देखा लेण्डरोवर में पास-पास बैठे वह टाइ- गर-हिल्स की ओर चले जा रहे हैं। रात है और नहीं है। ऊँचे आकाश पर दूध-सा उजाला है । चढ़ाई है। उतराई है। पर लैण्डरोवर धरती पर नहीं, पानी की-सी नीली धार पर भागती है । जया पास बैठी कभी रोती हैं, कभी हंसती हैं, कभी हाथ से छू खिलखिलाकर कहती हैं... "तपू !" - तपन हाथ में घेर वांहों में भर लेते हैं और माथा सूचकर कहते है- "जया !" वाहें इस प्रोर घिर पाती है और उनसे लिपट-लिपटकर एक बार नही, सो वारवार-बार पुकारती हैं- "तपन ! तपन !! तपू !!!" रागभरे कांपते हाथों मुंह उठा तपन कुछ कहते हैं कि उनकी बांहों से छिटक वह पानी में कूद जाती हैं। "जया"जया...!" खट-खट" घड़कते जी कांपकर उठ बैठे। हाथ माथे को मोर गया तो गीला था । खट-खट "फिर वही पाट"
सिन-पहाडं
४
डगमगाते पाँव द्वार की ओर बढ़े और हाथ हैण्डल पर रख
दया।
वहीं हैं। वहीं हैं। वहीं लौट आई हैं...
बेटी के संग रीस होटल पहुँचे तो एक नहीं, अनेक आँखें
अर्थभरे विस्मय से पिता-पुत्री को देखती रहीं। हाथ से एडना को
थामे रीस सिर नीचा किए श्री के कमरे की ओर बढ़ गए।
द्वार खटखटाया, उत्तर न मिलने पर आशंकित हो अन्दर
श्राए। घुटी-घुटी दीवारों से घिरा कमरा अशुभ कटघरे-सा
लगा।
पलंग पर श्री बैठे हैं और खिड़की के सामने हाथों में मुंह
छिपाए तपन ।
रौस न श्री की ओर बढ़े, न तपन की अोर । खड़े-खड़े वस
पत्थर हो गए और पराजित विलग आँखों से बेटी को देखा
किए । एडना विमूढ़-सी पिता की ओर देखती रहीं, फिर को
भी संकेत न पा श्री के पास जा खड़ी हुई।
वाह छू समूचे कण्ठ स्नेह भर पुकारा--
"श्री...!"
श्री ने सिर नहीं उठाया । झंझलाकर हाथ से
दिया-
"नहीं।"
पाहत आँखों से एडना ने पापा की ओर देखा।
बार फिर कोई प्राश्वासन नहीं दे पाए।
रलाई रोक एडी कुछ देर खड़ी-खड़ी सोचती
कछ भी न समझ पा तपन के पास जा बैठी।
तिन पहाट
धीमे स्वर में सहानुभूति जता भरे-भरे कण्ठ पूछा-
"कुछ भी खबर नहीं ?"
तपन सह नही पाए । वेवसी से सिर हिला प्रासें एडना के
मुख पर से लौटा ली।
श्री पलंग की पाटी पर रोती-रोती माखें रोस को देखते
हैं, एडना को देखते हैं "पर किसी को पहचानते भी हैं यह
जान नहीं पड़ा।
फोन की घंटी बजी। सहमी-सी एडना ने श्री को प्रोर
देखा। दीखा नहीं कि घंटी सुनते हों। उठी, मेज पर से फोन
उठा तपन के हाथ में दे दिया और भयभीत-सी तपन के मुस
पर नज़र गड़ाए रही।
तपन कान लगाए टूटे लड़खड़ाते स्वर में पूछते हैं-
"कोई उमीद नहीं..."
सुनते ही श्री उठे कि जैसे सपने में चलते हों। विवणं मुख
तपन के पास आ खड़े हुए। तपन ने फोन नीचे रख दिया ।
तब रक्तहीन रूखी प्रांखों से श्री को प्रोर तकते रहे, तकते रहे,
फिर विक्षिप्त-से श्री को कन्धो से झकझोर पागल-से बोले-
"तुम्ही ने तुम्हीं ने...!
रोस पहली बार हिले । उठकर हाथ से श्री को अलग कर
तपन को सोफे पर बिठा दिया। तपन विवश-से, हारे-से रोस को
और देखते रहे, फिर अस्फुट स्वर में कहा-
"एक ही दिन चूका और खो दिया..."
रोस पूरी प्रांखों तपन का सामना नहीं कर सके, नही कर
सके। अपनी ही बेटी अपराधी की नाईं प्रांखों के आगे घूमती
और किसी कड़ी चोट-सी छाती में घसती चली जाती।
"
तिन-पहाड़ न होता ऐसा अशुभ । उस एक रात उनके आश्रम में रह वह ज़रूर उनसे कुछ कहना चाहती होंगी। विदा लेती वह मुद्रा एक बार फिर आँखों के आगे घूम गई। घंटी फिर बजी। चेते। हाथ बढ़ा फोन उठा लिया। इन्सपेक्टर वागची मिलने को प्रॉखों के सामने मानो एक क्षण में सब घट गया । चाहा हाथ से ठेल एडना को कहीं इस कमरे से दूर छिपा दें कि बागची अन्दर पाए। तेज़-तर्रार आँखों से सभी ओर नज़र मारी । पुरानी पहचान और नई जिज्ञासा से रौस के अभिवादन का उत्तर दिया और श्री को सम्बोधन कर कहा- "मुझे दुख है तिस्ता के गहरे पानी से उन्हें ढूंढ निकाला नहीं जा सका । जीप में जो सामान पड़ा है, आपको संग चल उसकी पहचान करनी होगी।" द्वार की ओर चले तो रौस न वेटी की ओर बढ़े, न दामाद की ओर । सहारा दे तपन को बाहर लिवा ले चले। छोटी-सी भीड़ गाड़ी के पास जमा थी। अगली सीट पर एडना के संग वागची बैठे और पीछे तपन, रौस और श्री। वही चौरस्ता मालवताशिया 'घूम का तिरछा गहरा मोड़ और लैण्डरोवर कालिंगपोंग की सड़क पर दौड़ने लगी। दूर- दूर हरियाली-हरियाली पर खम्भों से गड़े पेड़-पेड़ों के घने झुरमुट-दूर-दूर गहरे खड्डों में बिछी चाय की वयारियाँ पर श्री की आँखों को तो कुछ भी सूझता नहीं। माँ ने बार-वार चेताया था-समझाया था-"तुमने वचन हारा है, कानू, मैंने नहीं। न तेरी दूसरा मेरा लड़का बनेगा, न उसकी जगह. बहू । सौगन्ध है मेरी कि उसे लेकर न लौटो तो..." जगह कोई ।
ठिन-पहाड़ १३० सिर झुकाए तपन बाहर देसने लगे । पहाड़ों पर मूलती 'रोप वे' की तारों और तारों को समेटे लोहे की चरसरी। फांसी की-सी दीखत्ती यही कड़ियाँ होंगी जिन्हें देख-देखकर कत नीचे उतरी होंगी। एक बार एक क्षण को "एक पल को जो जान पाते... सीधी उत्तराई पर लैण्डरोबर कई सौ फुट नीचे उतर चली। तीन और पहाड़ों से घिरी तिस्ता और रणजीत का पानी उछलता-उबलता था। पानी का विक्षुब्ध वैग पछाड़ सा-सर- कर हाहाकार करता था। नागची ने हाय से संकेत कर एडना से कहा- "वह सामने जो पुल दीसता है. वहीं।" ऊँचे पहाड़ी कगारों से टकरा-टकरा रणजीत का गहरा पानी ढेरों फेन उगलता है। तड़पती हहराती तिस्ता के भंवर लहरों से गले मिलते हैं "बिछुड़ते हैं। दुर्भाग्य के-से अटै पुल पर लण्डरोवर पा रुकी तो कोई ठंडी निर्दयी सिहरन तन-मन को कंपा गई। "कल शाम वह यहीं सामने~~यहीं खड़ी थीं।" साड़ी में लिपटी सलोनी देह पर वही सावरा मुख चमकता था। कन्धों पर जो पशमीने का शाल ओढ़े भी वह उसी तरह अब भी लेण्डरोवर में पड़ा है। इस तरह कि अभी आएंगी, कोहनी टेक क्षण-मर सड़ी रहेंगी, फिर हाथ बढ़ा उठा लेंगी। शाल तले पर्स रखा है। इसे उठाएंगी, हवा में लहराते बालों की घनी छांह वाला सिर झुका जिप खोलेंगी. पर इस क्षण कहां छिपी हैं ? किस किनारे के झुरमुट में से ऊपर चढी पाएंगी?
तिन-पहाड़ १३८ कल शाम यहीं खड़ी थीं। ग्रे रंग की साड़ी पर काला शाल था और पुल की मुंडेर पर कोहनी टेके अपलक-अबूझ अपने में ही खोई नीचे देखती रही थीं। सुबह कालिंगपोंग जाती इसी जगह रुकी थीं। ड्राइवर मन- ही-मन मेम साहिब की पारखी नज़र देख खुश होता रहा। जितना देखेंगी, उतना खुश होंगी। उतना इनाम मिलेगा। दार्जिलिंग से आ-आ कितनी ही गाड़ियाँ पुल पार कर कालिंगपोंग की ओर ओझल हो गई । ड्राइवर ने घड़ी देखी, फिर ध्यान वॅटाने को कई बार हॉर्न बजाया। वह न चौंकी, न मुंडेर पर से मुख उठाया तो पास जा अर्ज़ की- "हुजूर, कालिंगपोंग पहुँचने में देर होगी।" वह चुपचाप गाड़ी में आ वैठीं। होटल पहुंच गाड़ी छोड़ी नहीं। डेस्क पर नाम-पता वि कमरा देखा, फिर लंच ले घंटों कालिंगपोंग में घूमती रहीं। में 'वाज़ार में चन्द्रलोक "तूरपीन." चाय के लिए वापस होटल पहुँची तो गाड़ी का चुका दिया । मनचाहा इनाम पा ड्राइवर ने सलाम वि पीठ मोड़ी-गेट तक पहुँचा कि मिन्नत के-से स्वर में कहा- "ड्राइवर को रोक लो।" सन्देहभरी आँखों देख वैरा ने सिर हिला दिया। ड्राइवर ने मुस्तैदी से पूछा- "हुक्म, साहव !" वह ड्राइवर के मुख पर कुछ पढ़ती रहीं। फिर + - स्वर में कहा-
तिन-पहाड़
"हमें लौटना है।"
होटल से निकल एक बार फिर बाजार में रुकी । फल लिए,
विस्कुट, थरमस में पानी रखवाया और सुशी-खुशी दार्जिलिंग
लौटने को फिर गाड़ी में जा बैठी।
राह में दो-चार वार चावभरे पूछा-
"हम लोग कब तक दार्जिलिंग पहुँच जाएंगे?"
"हुजूर, खाने से पहले।"
केले की कतारों में छिपे छोटे-छोटे पहाड़ी पर देखकर
कहा-
"यही एक छोटा-सा घर होता तो..."
ड्राइवर ने आदरपूर्वक सिर हिलाया-
"हुजूर, चाहें तो कोई कोटी खरीद लें।"
वह हँसने लगी।
पहाड़ीप्रपात तले बने पक्के मोड़ पर से लण्डरोवर नीचे
उतरी तो वह चौकन्नी-सी इधर-उधर देखने लगी। मोई गन्ध
लती हों कि पहचान सकती हो। तव कन्धे का शाल उतार गीट
पर डाल दिया और मीठे स्वर में प्राज्ञादी-
"मुझे यहाँ उतार गाडी उस किनारे रोक लो।"
ड्राइवर ने हुक्म वजाया । उन्हें इस किनारे उतार गाड़ी
पुत के दूसरे छोर रोक दी।
वह धीमी-धीमी चाल से टहलती हुई उपर वढी-पारदली
आँखों से आगे-पीछे, पर-नीचे सभी और देखती रही, फिर
पुल की मुंडेर पर हाय दे सड़ी हो गई। सड़ी रही, मड़ी रही।
पास-पास जुटे तीनों प्रोर के पहाड़ अंधियारे हो पाए।
नीचे नीले निथरे पर सांझ के रंग कांपने लगे पोर नेत्रधरपगने
१४० तिन-पहाड पानी पर अँधेरे की कड़ी लीक-सा वना तिस्ता का पुल ढिठाई से पाँवों तले विछा रहा। गंगटोक-मेल गुज़र गई तो चिन्ता से ड्राइवर उतावला हो अाया। लौट चलने की पुकार करती हॉर्न की गूंज एक किनारे से दूसरे किनारे तक फैल गई । वह तव भी हिली नहीं तो हार- कर ड्राइवर पास चला आया। पाँव की आहट की, फिर आजिज़ हो कहा- weness Haww "देर होती है, अब लौटिए..." . वह पलटी। दोहरे अँधेरे में ड्राइवर का मुख निहार पाँव उठा लिया। फिर जाने क्या सोच प्रार्थना के-से स्वर में कहा- "एक प्याला चाय मिल सकेगी ?" "हुजूर, मागे एक छोटी हाट है-आपके लायक तो नहीं गाड़ी वहीं लिए चलता हूँ।' सुनकर ऐसे कि वहुत कष्ट हो, रुक-रुककर कहा- "वहाँ तक नहीं जा सकूँगी, जी घबराता है।" "हुजूर, लगातार पानी में न देखें. -इसी से जी घिरता है। वह पुल के सुनसान में गाड़ी की ओर जाते ड्राइवर को देखती रहीं। आकृति अँधेरे में विलीन हो गई तो आँखों को दिखा-उनकी ओर पीठ किए दूर होता ड्राइवर नहीं, कोई और है-वह श्री हैं-श्री हैं... मुंडेर पर टिकी बाँहों की अोट भरी और सिर झुका लिया। मन-ही-मन जैसे किसी की पदचाप सुनती हों-कोई पास आता है । उन्हीं हौले पाँवों-उन्हीं स्नेह-भरे हाथों आगे वढ़-तपन हैं-वहीं चले आते हैं-- तिस्ता के भयावने एकान्त में खुली बडौरी आंखों सांस दिन-पहाड़ रोके राह तकती रहीं-नहीं सही कोई और, अपने तपन पाएंगे "पाएंगे और लहराते स्नेह से बुलाएगे-जया! जया! जाने किस भावेश में कांपने लगीं। अंधियारे की जकड़ में प्राण छटपटाने लगे। गला भर आया-श्री"तपन"तपन... लैण्डरोवर की लाइट पुल के उस पार से कॉपी कि मुंडेर पर कोई कपड़ा झिलमिलाया, एक प्राण दहला देने वाली चीख- और सव समाप्त हो गया । सव शेप हो गया। मौके पर खड़े सन्तरी से सामान निकलवा वागची ने एक- एक कर चीजों की शिनाख्त की- शाल-पर्स-अटची पांवों की वैलरीना- अभी-अभी वह उन पांवों चल पास प्रा खड़ी होंगी-तपन कीमोर देखेंगी और उन्हीं नीरभरी प्रांखों देखती चलेंगी, फिर मुसकराकर कहेगी-- "जितने कोस पाप उन्हें उठाए रहे हैं, उतने जन्मों में भी इसका ऋण लौटा नही पाऊंगी।" फटी-फटी प्रांखों तपन देखते रहे-देखते चले । जी हुग्रा, लपककर पांव का जोड़ा वागची के निर्दयी हाथों से छीन लें कि प्रांखों के आगे धुघलका सा घिर पाया। फिर अंधेरा उतरा। अन्दर-वाहर पत्थर हो पाया कि जैसे स्वयं ही मर गए हों और तिस्ता के पुल पर पड़ी अपनी देह को पांच जोड़ी प्रा धूरती चली जाती हों । अावाज देनी चाही पर कोई मूक टूटा स्वर कण्ठ मैं घरघराहट बन रह गया। तव सहसा जैसे जो लिए हों । दो पागल हायों ने वागची से जोड़ाखीच लिया और प्रांसों से लगाए देसते चले- कितने पल-कितने वर्ष--कितने युग- -
तिन-पहाद
१४२
दर्दीले हाथों एक अोर से श्री ने सहारा दिया-एक पोर
रोस ने जतन से सीट पर विठा दिया तो श्री की डबडवाई आँखों
में तपन के साथ जया का मुख एकाकार हो उठा।
राह किनारे कोई अपरिचित जन लोटती इस लैण्डरोवर
को शून्य भाव से देखते रहे । जिसकी साड़ी का टुकड़ा-भर ही
बच सका, वह इन सबकी क्या होती होगी क्या होती होगी...
ऊपर जाती सीधी चढ़ाई पीछे छूट गई। पहाड़ों की अँधि-
यारी उदासी में सिर डाले चायवगान और उन पर घिर-घिर
पाते साँझ के राख-रंग साए । राह-किनारे विछे काले पेड़ों की
पांत उन्हीं निराश वालों की छाँह-सी पहियों के संग-संग भागत
गई, रात की निलाई प्राकारा के पानी पर काँपती रही श्री
डूबते सूरज की अन्तिम लौ धरती और आकाश की देह
फलांग कहीं अज्ञात हो गई।
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