Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Jain Dharam Shikshavlli Bhag 3

Jain,ugrasen · 2011/03

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-यूा * पृष्ठ नाम पाठे मरीना १५ . ४ 1.३ र जिनवाणी स्तुति ५ मजीवदय () ६ मतीव दग्य (श्रा) ७ प्रार्थना ८ सचे देव, शास्त्र, गुरु श्रीमती राजुल दवी ৪০ জীবন ঘান্ত " सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यचारिय १२ सासगति १३ मालिका विनय १५ श्री महावीर भगवान् ११ धीर स्तवन (भजन) "सठ के पाँच पुत्र • घम महिमा १८ जुए से हानि 14 मासाहार का कुफ्ल २० मदिरापाव से हानि २० घरयागमन से हानि २२ शिकार से हानि २३ चोरी का बुरा फल २५ पर-खी सेवन का बुरा फल २२ सक्ष व्यसन २६ बारह भावना २० चौबीस तीर्थंकरों के नाम चिह प्रादि २८ धमवीर सम्राट सारवेल २६ यमपाल चाएकोल ५६ ७२ ७३ धमें शिक्षावली, तीसरा भाग - पाठ १ मेरी भावना जिमने राग द्वप कामादिक, जीते मय जग जान लिया, तत्र जीनों को मोक्ष मार्ग का; निम्पृह हो उपदेश दिया। पुद्ध, वीर जिन, ' हरि, नमा, या उसको म्वाधीन कहो, भक्ति भार से 'प्रोरित हो यह, चित्त उग्री में लीन रहो ॥३॥ विषयों की शाशा नहिं जिनक, माम्यभार धन रखते हैं, निज पर क हित माधन म जो, निश दिन तत्पर रहते हैं। स्वार्थ त्याग की कठिन तपम्पा, बिना खेद जो करते हैं, से जानी 'माधु जगत क, दुख-ममूह को हरते है ॥२॥ रहे सना मतसंग उन्हीं का, ज्यान उन्ही का नित्य रहे, उन ही जैसी, चर्चा में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे। नहीं सता फिमी जीवा को, कमी नहीं कहा : करू, , the + किसी से मते, लडो झगडो। परधन यनितार पर न लुभाऊ, सतोपामत पिया करू ॥३॥ अहकार का, भाव न रक्खुनहीं किमी पर क्रोध करू देख दूसरों को पढ़ती को कभी न ईपीमाय धरू । रहे भावना ऐमी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करू पने जहा तक इस जीरन म, औरों का उपकार करू ॥४॥ मैत्रीभार जगत में मेरा, सर जीवो पर नित्य रहे, दीन दुखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा श्रोत रहे । दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, चोम नहीं मुझको आचे, माम्यभाव रक्खू मैं उनपर, ऐसी परिणित हो जावे ॥५॥ गुणीजनों को देख हृदय म, मेरे प्रेम उमड श्रावे, अने जहा तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे । होऊ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे, गुण-ग्रहण को मार रहे नित, दृष्टि न दोपों पर जावे ॥६॥ कोई पुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आपे पा जावे, लाखो वषों तक जीऊ यो, मृत्यु आज हो पाजावे । अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने श्रावे, तो मी न्याय मार्ग से मेरा, कभी न पद डिगने पावे ॥७॥ होकर सुख में मग्न न फूले, दुख में कमी न घबर वे, पर्वत नदी-स्मशान भयानक, अटवी से नही भय खावे। रहे अडोल अकम्म निरन्तर, यह मन दृढ़तर बन जावे, कपालिकायें 'परवर' का पाठ पढ़े।

यज्ञ करना चाहिये, फल अवश्य मिलेगा। इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, सहन शीलता दिखलावे ॥८॥ सुग्वी रहे मय जीव जगत के, कोई भी न धराये, घर पार अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मङ्गल गावे । घर पर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जायें, ज्ञान चरित उन्नत कर अपना, मनुज जन्म फल सम पावे 18 ईति मोति ब्यापे नहिं जगमें, वृष्टि समय पर हुमा करे, धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा पर किया करे। रोग मरी दुर्मित न फैले, प्रना शान्ति से जिया करे, परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सहित किया करे ॥१०॥ फैले प्रेम परसर जग में, मोह दर पर रहा करे, अप्रिय पटुक कठोर शब्द, नहिं कोई मुख से कहा करे। बन कर सब 'युगवीर' हृदय, से देशोन्नति रत रहा कर, यस्तुस्वरूप विचार सुशी से, सब दुग्न सकट सहा करें ॥११॥ प्रश्नावली १-मेरी भावना पढ़ने से क्या लाभ है! -जगत में जीवों के प्रति कैसे भाव रखने चाहिये ? ५-इष्टवियोग और अनिष्टयोग से तुम क्या समझते हो। ४--"सुखी रहें सब जीव जगत के" यहाँ से लेकर फैल सर्व हित क्या करें" तक पदा और साथ रण भावाय मताभो। ५- ससार में सबसे यड़ा धन कौन सा है? ६-नीचे लिखों के साथ क्या थर्वाय करना चाहिये दान दुखी खीव दुर्जन और गुणीजन। -मेरी भावना के पनाने वाले कौन है ?? ETE , 7 । . -

४
आज का काम क्ल पर मत छोडो।
पाठ२
गतियाँ
वालको ! तुम देखते हो कि ससार मे जीवों की कई
विशेप अवस्थायें होती है। स्तिने ही जीन मनुष्य है और
कितने ही पशु-पक्षी कीड़े-मकौड़े आदि हैं यह तुम नित्य प्रति
देखते ही हो।
यह भी तुमने बहुत बार फिमी न किसी को कहते सुना
होगा कि-यह पुरुष वडा धर्मात्मा है, खूप दान देता है, पुण्य
कमाता है, मर कर स्वर्ग मे देव होगा, या यह पुरुष जीरों को
सतातो है, चोरी करता है, दगोपाज है, पापी है, इसकी
दुर्गति होगी, मर कर नरक जायगा । मसार में इस जीर की
सदा एक सी दशा नहीं रहती। इसके कमों के अनुसार इसकी
उच्च और नीव अपस्था होती है । इस प्रकार ममारी जीवों के
ठहरने के स्थान का अथवा जीप की अवस्थाविशेष को गति
कहते हैं।
गतियाँ चार होती है।
तियंच गति, नरक गति, मनुष्य गति और देव गति।
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जितना विश्राम अच्छा लगे, उतना ही लो। ५ तिथंच गति एफेन्द्रिय वृक्षादि से लेकर पचेन्द्रिय तिर्यच (पशु तक) तियंच गति म कहलाते हैं-अर्थात् एकेन्द्रिय जीव पशु-पक्षी कीड़े-मकौड़े मगरमच्छ इत्यादि तिर्यच हैं। जब कोई जीर मर कर इनमें जन्म लेते हैं तो उमको नियंच कहते है। इस गति में पाचों ही इन्द्रियों के जीव पाये जाते हैं । इस गति में भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी, प्रध-बन्धन, मारन-ताडन श्रादि के अनेक दुख भोगने पडते है । भूठ, दगाबाजी वगैरह करने से इस गति में जन्म लेना पड़ता है। नरक गति इम पृथ्वी के नीचे सात नरक हैं। उन नरकों में एक समय मात्र सुख नहीं मिलता । वहाँ वहा भारी दुख है। उनमें रहनेवाले जीरों को भूग्व-प्याम, छेदन मेदन आदि के अनेक दुख भोगने पड़ते हैं। इन नरकों मे जब पशु व मनुष्य मर कर जन्म लेता है तो उसे नारकी कहते हैं । इस गति में जीव पवेन्द्रिय सैनी ही होते हैं । इनके शरीर पढे बेडौल और दुर्गन्धमय होते हैं । जो जीव बड़े बड़े प्रारम्भ करते हैं, मदिरा पान करते हैं, मास भक्षण करते हैं, अथवा तीव्र हिंसादिक बहुत ज्यादा पान करते है, वे नरक में जाते हैं। .

६
जादी सोना, जश्वी उठना चाहिये।
मनुष्य गति
जब कोई जीव मर कर मनुष्य का शरीर धारण करे तो
उसे मनुष्य कहते हैं। मनुष्य गति के जीव पचेन्द्रिय सैनी
ही होते हैं । थोड़ा भारम्म और थोड़ा परिग्रह रग्वने से तथा
सन्तोष से जीवन विताने से मनुष्य गति में जन्म होता है।।
देव गति
ऊपर लिखे तीन प्रकार के जीरों के मिवाय एक प्रकार
के जीव भोर होते हैं। इनसे अच्छे अच्छे भोग न सुखदाई
पदार्थ मिलते है । ये रात दिन सुख में मग्न रहते हैं। जो
जीव मर कर देव गति म जन्म लेता उराको देव कहते हैं।
इस गति के जोर पचेन्द्रिय सी होते हैं। पूजा-दान, प्रत.
उपपास आदि शुभ कर्म करने से देर गति में जन्म होता है।
इन चारों गतियों में सर से उत्तम मनुष्य गति है।
मनुष्य गति में ही यह जीव चरित्र धारण कर मोक्ष पा
मक्ता है । इसलिये मनुष्य जन्म पाकर धर्म सेवन करके अपनी
मात्मा का कल्याण अपरप करना चाहिये ।
प्ररनावली
ति किसे कहते हैं और गति विवनी होती हैं नाम पवाओ!
२-तिर्यप गति में क्या क्या दुस देखने में पाते हैं ?
-मतामो नरक कहाँ पर है और ये कितने होते हैं। यह भी

अजीर्ण में साना विष के समान है।
वताओ कि कौन से काम करने से ये नरक गति मिलती है।
४---तुम इन सारी गतियों म से किसी गति को अच्छा समझते हो
और क्यों?
५-नरक गति और देव गनि के जीवा के कितनी कितनी इन्द्रिया
होती हैं ?
३-एक कुच्चा मर कर घोड़ा बना, पताो यह पहले कौनसी गति
में था। अब कौन सी गति में,
-निम्न लिखित जीव कौन मी गति में है-
चिउट, पन्दर, वृक्ष, तोता, लड़की, कुत्ता, दिल्ली और औरत ।
पाठ३
वीर वालक निकलंक
अाज से करीब हनार बारह सौ से पहिले की बात है।
तर दक्षिण भारत म गोद्ध धर्म का बहुत प्रचार था । बौद्ध
गुरु मर्वत्र अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे और जैन धर्म से
उप रखते थे । बौद्ध रिद्यालयों मे जैनधर्मी गलकों का शिक्षा
पाना अमम्मर था । एसे कठिन समय में दो और पालको को
अपने प्यारे जैनधर्म की मुधि पाई। उन्होंने बैनधर्म का
उद्योत करने की दृद्ध प्रतिना कर ली। इन पालकों का नाम
अकलक और निकला था। ये दोनों सगे माई थ, और एक
गजमन्त्रों के होनहार पुर थे । धर्म को प्रकाश में लाने का

होनहार होकर ही रहती है।
निश्चय करक ये अपन घर सानकल पड़े और एक चौद्ध
विद्यालय में जाकर अपने को जैना न बता कर अध्ययन करने
लगे, क्योंकि उनको चौद्ध ग्रन्थ पढ़ने थे।
दोनों भाइ यह युद्धिशाली थे। थोड़े ही दिनों म ये दोनों
सिद्धान्त और न्याय शास्त्र के धुरन्धर विद्वान् हो गये। नौरत
यहा तक पहुची कि ये अपने शिनिकों की यात काटने लगे।
उनकी युक्ति को सुन कर वे दङ्ग रह जाते । यौद गुरुओ को
संशय हुमो, हो न हो य जेन है । उन्होंने उनको जैन प्रमाणित
करने के लिये कई उपाय किये परन्तु वे असफल रहे ।
अन्त में उनकी एक युक्ति चल गई। रानी से अचानक
बड़े जोर की प्राराज की गई, जिसको सुनकर सय पालक
चौंक पड़े और युद्धदेव की याद करने लगे। अझलक और
निकलक तो जैनधर्म के परमश्रद्धानी थे। उनके मुंह से
अनायाम "अहन्" शब्द निकल पडा । ये पकड़े गये दोनों
भाई एक कोठरी में बन्द कर दिये गये।
दोनों भाइयों ने सोचा "यह बहुत बुरा हुआ दिल की
दिल ही में रह गई श्रम जैन धर्म का उप कैसे होगा"?
आखिर एक बात उनकी समझ में आगई। वे खिडकी से कूद
कर मागे । सपेरा होते होते वे बहुत दूर निकल गये। मवेरे
जब दोनों को कारागृह में न पाया तो झट चारों ओर
हथियारबन्द घुडसवारों को दौड़ा दिया गया।
।

६
ओ कार्य अपना तय नहीं उसम हाथ न लगायो।
अभी अकलङ्क और निकलङ्क क्सिी सुरक्षित स्थान पर
नहीं पहुंचे थे, वे मरपट रास्ता तय कर रहे थे कि उन्ह घोडों
को टापों का शब्द मुनाइ दिया।ये ताड गये, हो न हो चौद्ध
लोग आरहे है । उन्हें थपनी रक्षा का कोई उपाय न दिखाई
दिया। हठात् छोटे भाई निकलङ्क ने बडे भाई से तालाब में
छिप कर जान बचाने को कहा। परन्तु बड़ा भाई छोटे भाई
को सङ्कट म डालने को तैयार न था । निकलङ्क उनके पैरों
में गिर पडा पार पोला "भया! अर मेरा मोह,मत करो,
बेशक यह आपका कर्तव्य है कि मुझे कष्ट न होने दो, किन्तु
आप भूलते हैं। इससे भी बढ़कर मेरा और आप दोनों का
समान कर्तव्य है "जैन धर्म फैलाना" पर मुझ मे आपके
समान ज्ञान और तेज नहीं है। पाप धर्मोद्योत के लिये जाहये
और अपने प्राणों की रक्षा कीजिय । धर्म के लिये मेरा यह
नश्वर शरीर काम पाये इससे बढ़कर मेरा मौभाग्य ओर
क्या होगा"?
बड़े भाई ने धर्मोद्योत के लिये छोटे भाई की पात मान
ली। रे तालाब में जाकर छिप रह । उधर निकलङ्क आगे
बड़े । उनमा एक पथिक से साथ होगया। देखते ही देखते
इथियारबन्द घुडसवार उन पर आ धमके और दोनों को पस्ड
कर मार डाला । निकलङ्क धर्म के लिये शहीद हो गये।

१०
बामा कठिाता से गुणी पनती है।
चौर फल ने मुनि होते हुए धर्म को फैलाना शुरू कर
दिया। एक बार वह राजा हिमतशील क दरबार में पहुंचे।
और वहाँ बौद्धों के माथ शास्त्रार्थ रिया, निममे सरल
बिनय पाई और जैन धर्म का प्रभाव फैला । यहा के लोगों को
जैन पनाया। उन्होंने राजवातिर पानि बहुत से जैन अन्य
लिसे । ये न्याय शास्त्र क बड़े धुरन्धर विद्वान थे।
पालको ! धर्म प्रभावना के लिये प्रत्येक को अपनी शस्ति
अनुसार काम करना चाहिये । परतु यह न भूलना कि
"किसी पर अत्याचार करना धर्म नहीं है, जीरमार की
भलाई करना और सव समा मादो जोधन रिताना यही
धर्म है।"
लहरी । तुम एमा धर्म कार्य करने के लिये मदा उपत
रहो। धर्म को अपने प्राणों से भी यटर समझा। धर्म के
लिये प्राण दे देना पड़ा भारी धर्म है।
जो श्री क्लङ्क के समान अपना जीवन धर्म के लिये
अर्पण करते हैं, वे अपने जीवन को सफल बनाते हैं।
प्रश्नावली
१-योद्ध धर्म के चलाने वाले कौन थे?
२-अकलङ्क और निकलष्ट को बौद्ध धर्म का अध्यायन करते समय
क्या क्या कठिनाइयाँ उठानी पड़ी ?
३-'अईन" शब्द से तुम क्या समझने हो ? पौद्ध गुरुजनों ने वैसे-
मालूम किया कि अकलङ्क और निकल जैन थे।

कीर्ति के प्राप्त करने में बहुत समय लगता है। ११
४-निकलङ्क ने अपने प्राण क्यों तज दिये ? तुम्हारी समझ में
निकल ने अच्छा किया या बुरा ?
५ धर्म और अपने प्राणों में तुम किसको षडा समझते हो १५
1
,
-
पाठ४
P4
जिनवाणी स्तुति
सवैया २२
१
--
.
वीर हिमाचल से निकमी, गुरु गौतम के मुख ' युएड हरी' है,
मोह महाचल मेट चली जग की जहता तप दूर करी है।
ज्ञान पयोदधि माहि रली, घटु मग' तरगनि मों उछरी है,
ता शुचिशारद गगनती प्रति, मैं अजुलि निज शीम घरी है।
(२)
या जग मन्दिर म अनिवार, अज्ञान, अघेर छयो अति मोरी,
श्री जिनी धुनि दोपशिखासम जो नहिं होत प्रकाशन हारी।
तो फिह भौति पदारथ पाती, कहा लहते रहते अविचारी,
या विधि मत कह घन हैं, जिन चैन बड़े उपकारी ॥
दोहा-जा वाणी के ज्ञान तें, सझे लोकालोक ।
सो बाणी मस्तक चड़े, नित प्रति देतई घोक ॥

नष्ट होते देर नहीं लगती।
नरनारनी
१-सिनयाणी से तुम क्या सममते हो?
१-जिनवाणी के पदने से क्या लाम ?
३-जिनवाणी की स्तुति पदो?
ठाप ५
अजीव द्रव्य []
पहले माग मे तुम पढ़ चुके हो किजिमम घेतावनी अर्थात्
जानने देखने की शक्ति न हो उसे अजीर कहते हैं। अजोय
पाँच प्रकार के होते है
पुद्गलास्तिराय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आका-
शास्तिकाय और काल।
पुद्गल-निसमे म्पर्श, रम, गन्ध, और वर्ण पाये जानें
उसे पुद्गल कहते है । ये चारों गुण प्रत्येक पुद्गल में एक
साथ रहते है । जैसे पके नाम में कोमल सर्श है, मीठा रम है,
मच्छी गन्ध है और पीला वर्ष है।
यह गुण पुदकल के मिवाय और स्मिी द्रव्य में नहीं
पाये जाते।
पुद्गल के गुण
स्पर्श-उसे कहते हैं जो सर्शन इद्रिय या छूने से जाना
जाय । स्पर्शन पाठ प्रकार का होता है । ठएडा, गर्म,रूखा,
चिकना, कड़ा, नरम, इन्का, भारी ।
१

-
--
गम साओ और कम लाओ।
जैसे पानी ठण्डा, भाग गर्म, बालू रुखी, पी चिकना,
पत्थर कहा, मखमल नरम, रुई हल्की और लोहा मारी
होता है ।
रस-उसे कहते हैं जो रसना (निहा) इन्द्रिय से जाना
जाय । रस पाँच प्रकार का होता है-पट्टा,मीठा, कहुना,
चर्परा, कपायला।
जैसा नीम्बू खट्टा, पेडा मीठा, नीम कड्डवा, मिर्च चरपरी
और हरड कपायली होती है।
गन्ध उसे कहते हैं जो प्राण (नासिका) इन्द्रिय द्वारा
जाना. जाय । गघ दो प्रकार का है-मुगध (खुशबू),
दुगंध (बदबू)।
जैसे गुलान के फूल,मे सुगध सौर मिट्टी के तेल में दुर्गध
आती है।
वर्ण -उसे कहते है जो चक्षु (आँख) इन्द्रिय से जाना
जाय । वर्ण पाच प्रकार का होता है-काला, पीला, नीला,
लाल, सफेद । जैसे कोयला काला, पीला, मोर का पख
नीला, गेरू लाला और चाँदी मफेर हानी है।
इन रगों में से एक दूसरे के मिल जाने से और भी
अनेक प्रकार के रंग रनते हैं, जैसे नीला पीला मिलाने से
हरा रंग बनता है।
.
-
11
1
१

यड़े से हसीन परनी चाहिये।
इस प्रकार स्पर्श पाठ, रस पाँच, रूप पाच, गध दो, मर
मिलार पुद्गल के बीस गुण होन है।
पुद्गल के भेद-पुद्गल दो प्रकार का है-परमाणु
और स्कया
परमाणु-उस छोटे से बाटे टुकड़े को कहते हैं जिममें
-
दुमरा टुकड़ा न हो सके।
स्कर-दो या दो से अधिक मिले हुए पुद्गल के परमा-
णुमों का स्कप कहते हैं । स्कष अनेक तरह के हैं।
प्रश्नावली
१-पुद्गल ।कसे कहत हैं ? पार पुद्गल द्रव्यों के नाम लकर
बताओ कि पुद्गल में कितने व कौन कौन से गुण होते हैं।
२-गुलाब के फूल की सुगध तुम कौनसे इन्द्रियों से जानते हो?
२-वर्ण क्विने प्रकार के हैं ? किसी वस्तु का वर्ण जानने में तुम
अपनी कौनसी इन्द्रिय से काम लोगे।
४-परमाणु और स्कन्ध में क्या भेद है।
-जिम वस्तु में रूप और रस होते हैं उनम स्पर्श और गध
होंग या नहीं ? यदि होंगे तो क्यों, कारण बताओ?
-किमा ऐसी वस्तु का नाम बताओ जिसमें सर्श पाया जाय
किन्तु रस गध व वर्ष न पाये जायें ?
-स्पश और रस के भेद भिन्न भिन्न बतायो।
T

नेवी में नाम कमाओ।
६५
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---
।
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। पाठ ६
अजोव द्रव्य (प्रा)
अजीन के पांच मेदों में से पुद्गल पहिले पता चुके हैं,
शेप द्रव्यों को अब बताते हैं।
धर्मास्तिकाय-उसे कहते हैं जो स्वय चलते हुए जीर
और पुद्गलों को चलनेमें, उडाने म उदासीन रूप से मदद
दे । जैसे जल मछली को चलने में, हवा पतंग उड़ाने में सहायक
होती है यह द्रव्य एक है और वमाम लोकाकाश से पाया
जाता है, और श्ररूपी होने के कारण आँखों से दिखाई नहीं
पड़ता।
अधर्मास्तिकाय-उसे कहते हैं जो स्वयं ठहरते हुए जीव
और पद्गलों को उदासीन रूप को मदद दे। जैसे थके हुये
मुमाफिर को पेड को छाया ठहरने में सहायक डोती है। यह
पदार्थ भी एक है और तमाम लोक में पाया जाता है । अरूपी
होने के कारण आँखों से दिखाई नहीं पड़ता।
धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय-जीग्युद्गल से प्रेरणा
करके चलाते व ठहराते नहीं हैं। परन्तु जब वे चलते या
ठहरते हैं तब उनकी मदद अवश्य करते हैं। बात यह है कि
धर्मास्तिकाय न हो तो हम चल फिर नहीं ममते, और
अधर्मास्तिकाय नही हो तो हम ठहर नहीं सकते।

मुसग से मृग भा चतुर हो जात है।
(यहाँ धर्म से पुण्य और अधर्म से पाप नहीं समझना चाहिये)
भामाश-आकाश उसे कहते है जो सब चीजा को जगह
दे अर्थात् जिममें सर चोजें रह सकें। यह एक अखएड और
नन्त द्रव्य है।
श्राफाश क दो भेद है लोकाफाश और अलोमाकाश।
लोकाफाश-प्राकारा
में
जहा तक पुद्गल, धर्म, अधर्म,
काश, काल और जोर ये छह द्रव्य पायजाय उतने ग्राफर
तो लोफाफाश कहते हैं।
अनोफाफाश लोक कथाहर बचे हुए अनन्त माकाश
को यलोसाकाश कहते हैं।
फाल-जो द्रव्य की हालनों के बदलने में मदद दे उसे
काल कहते हैं।
व्यवहार में पल, घडा, दिन, महीना, वप को काल
कहते है । यह निश्चय काल की पर्याय है। निश्चय काल
कालाणु को कहते हैं जो मर्म लोक मे रत्नों की राशि के
समान भरे हुए हैं।
पुद्गल' घम, अधर्म, आकाश, काल और जीर ये छह
द्न्य हैं। इनमें काल को छोड़ कर पाच द्रव्य कायवान होने
से पंचास्तिकाय कहलाते हैं।
काल द्रव्य कापान नहीं है क्योकि उमका एक एक
-

नित्य चिन्ता करने वाला दुखी रहता है।
अणु (हिस्सा) अलग अलग है। शेष पाँच द्रव्य एक अणु
से अधिक जगे घेरते है । इन छहों द्रव्यों में से पुद्गल रूपी
है, सेप पाच अरूपी है।
प्रश्नापली
१-धर्म द्रव्य किसे कहते हैं और उसका क्या काम है ? यदि धर्म
द्रव्य नहीं होता तो तुम्हरो क्या हानी होती ?
२---अघम द्रव्य का क्या स्वरूप है ? कोई दृष्टान्त देकर समझाओ
कि जावा के लिये अधर्म द्रव्य क्या और किस प्रकार कार्य
करता है?
३-आकाश के कितने भेद हैं ? यताओ अलोमाकाश में कौन कौन
से द्रव्य पाये जाते है।
४-काल किसे कहते हैं ? और यह कितने प्रकार का है ? व्यवहार
काल से तुम क्या मममते हो ?
५--पंचास्तिमाय द्रव्यों के नाम पताश्रो और यह भी बताओ कि
इन कानाम पचस्तिमाय क्यों पडा?
६-रूपी अरूपो मे तुम क्या मममते हो ? यताओ छहों द्रव्य में से
कौन कौन से द्रव्य रूपी हैं और कौर कौन से द्रव्य अरूपी हे ?
पाठ ७
प्रार्थना
मुझे है स्वामी ! उम पल की दरार ।
प्रडा खड़ी हो अमित ग्रहो, श्राडी अटल अपार।
तो भी कमी निगश निगोर पटकन पाचे द्वार ॥१॥

गुरुजनों का अनादर न करो। सारा ही ससार करे यदि, दुर्व्यवहार प्रहार । हटे न ता भी सत्य मार्ग-गत, श्रद्धा किमी प्रकार ॥२॥ धन-वैभव की जिस ऑधी से, अस्थि र सर ससार । उससे भी न कमी डिग पावे, मन बन जाय पहार ॥३॥ असफलता की चोटों से नहिं, दिल में पड़े दरार । अधिकाधिक उत्माहित होऊँ, मान कभी न हार ॥४॥ दुख दरिद्रता-कृत अतिश्रम से, तन होवे वेकार । तो भी कभी निरुद्यम हो नहिं, वह जगदाधार ॥५॥ जिसके आगे तन-बल धन-चल, तृणवत् तुच्छ असार । महावीर जिन ! वही मनोयल, महा महिम सुखकार ॥६॥ प्रश्नावली १-कवि को किस बल की दरकार है ? २-यदि आपके रास्ते में अड़चनें आजाँय, तो आप क्या करेंगे ३-दुर्व्यवहार की दशा में भी मनुष्य को क्सि मार्ग चाहिए १ -इस कविता के रचयिता का संक्षिप्त परिचय दो। पाठ८ पर चलना सच्चे देव, शास्त्र,गुरु सच्चा देव सच्चा देव-उसे कते हैं जा पीतरागो, सर्वज्ञ श्री हिनोपतेशी हो।

कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व परिणाम सोच लो।
वीतरागी-उसे कहते हैं जो क्मिी से राग तथा दूप न
करता हा । उस म नीचे लिसे अठारह दाप नहीं होते।
टोहा-नन्म जरा तिरखा छुधा, विस्मय आरत खेद ।
राग शोफ मद मोह भय, निद्रा चिन्ता खेट ॥
राग द्वंप थरु मरण जुत, ये अष्टादश दोप ।
नाहिं होत श्ररहत के, सो छबि लायक मोप।।
अर्थ-श्रहित भगवान् को मच्चा देव रहते हैं। उनके.
जन्म, युढापा, प्याम, भूख, पाश्चर्य, दुख, खेद, रोग, शोक,
उमड, मोह, भय, नौद, चिन्ता, पमीना,गग, उप और मरस,
ये अठारह दोष नहीं होते हैं।
सर्वज्ञ-उसे कहते हैं जो मसार में जो कुछ पहले हो चुका
अब हो रहा है और आगे होनेवाला है, उम सब को
"डर ममय प्रत्यक्ष जाने । सय पदार्थ और उनसरी सर दशाओं
को हर समय जाननेगले को सर्पज्ञ कहते हैं।
हितोपदशी-उसे कहते है जो मय जीवों के हित का'
उपदेश दे।
जिम देव में मर्वनपन, वीतगगीग्न और हितोपदेशीपन
घे तीन गुण पाये जाय उसे सच्ना देव कहते है। अरहत
मिथकर, जिनेन्द्र, परमात्मा, परमेश्वर आदि उसके अनेक
नाम है।

२०
काय म उत्साह हीन न हो।
सच्चा शस्त्र
सच्चा शास्त्र, उसे कहते हैं जो सचे देव का कहा हुआ
हो। जिममें किमी प्रकार का विरोध न हो, जिसका कम
खण्डन न हो सके, जो सोटे मार्ग का नाश करने वाला हो
जिसके पढ़ने-पढ़ाने, सुनने-सुनाने से जीरों का कल्याण ह
और जो सबका हितकारक हो।
इसको जिनागम, जिनवाणी और सरसती भी कहते है
सच्चा गुरु
सच्चा गुरु-उसे कहते जो पाँचों इन्द्रिया के रिपयों
से किमी की चाह न रखता हो, कोद श्रारम्भ न रता हो।
अपने पास कोई परिग्रह न रखता हो, जान ध्यान तप म सदा,
लीन रहता हो और हिमादि पाँच पापों का मर्वथा त्यागी हो।
ऐसे गुरु को सोधु, मुनि, यति, तरस्त्री आदि भी कहते हैं।
(नोट-यहाँ गुरु शब्द से सल तथा पाठशालाओं में
पढाने वाले अध्यापक तथा शिक्षक न समझना चाहिए वे
केवल विद्या गुरु है।)
बालरो ! इस सच्चे दर, शास्त्र, गुरु के स्वरूप को जान
कर सदा उनी भक्ति पूजन सेवा करनी चाहिये।
गगी, द्वेपी, समारी दमों तथा गुस्यों का भी नहीं
पन्ना चाहिए और न श्राचरण निगाडन गले, विषय पाय

१
मनुष्य का आभूषण यज्ञ है।
२१
बढाने वाले खोटे शानों को ही पहना चाहिये । जैन मन्दिरों
में जो पद्मासन और खडगामन जैन मूर्तियाँ होती हैं ये सच्चे
देव की होती है । उन मूर्तियों के दर्शन से अरहत को स्वरूप
झलकता है।
प्रश्नावली
१-सच्चे देव में क्या २ विशेष गुण होते हैं ।
-२-अठारह दोषों के नाम बताओ। ये किममें नहीं पाये जाते हैं
-सकिने को हैं? प्रा 1 मारान सर्वश हैं या नहीं।
४--सच्चे शास्त्र का लक्षण बताओ। सच्चे शास्त्र को और किन
नामों से पुकारते हैं ? मिस शास्त्र में माँम म्याना वा शरान पीना
अच्छा बतलाया गया है, वह सच्चा शास्त्र है या नहीं?
५-सच्चे गुरु का क्या लक्षण है ? सच्चे गुरू कौन हैं ? स्कूल में
पदाने पाले शिक्षक सच्चे गुरू हैं या नहीं ?
पाठ६
श्रीमती राजुल देवी
श्रीमती राजमती या राजुलदगी जूनागढ़ के राजा उग्रसेन
की पुत्री थी । पालम्पन मे इनका लालन पालन पडी योग्यता
से हुया था। ये ग्डी मुशीला, गुणरता और रूपवती थी।
इमने थोड़े ममय में मारियायें माख ली । जैनधर्म को शिक्षा
भी उस उत्तम रीति से दी गई थी।

अपयश ही मृत्यु है।
युपती होने पर इमरा सम्वन्ध शारीपुर के यदुवंशी राजा
समुद्रारजय श्रीर रानी गिरादेवी क पर पाम तीर्थकर
श्री नेमिप्रभु क माथ निश्चित हुमा । नेमिप्रभु उस समय
भूमण्डल में मर से अठ, बलवान्, धीरवर, शान्तस्यभारी
और पराक्रमी गनकुमार 41 से गुणान् पति के प्राप्त होने
की प्राशा से राजमना के हर्ष का ठिकाना न रहा।
दोनी ओर से व्याह की तयारिया होने लगीं। नियत्
तिथि पर पागत धूमधाम क माथ जनागर पटुगी। उस समय
राजमनी अपने महल के झरोखे म बैठी दुई पति के गुणों का
रिचार कर पडी प्रसन्न हो रही था।
जन बोरात नगर में प्रवेशमरने लगी तव श्री नेमिप्रभु
ने मार्ग म पाड़े मे घिरे और चिल्लाते हुए बहुत से पशुओं को
देखा । परम दयालु भगनान् ने रथ रुक्माया । सारथी से इस
भयानक दृश्य को कारण पूया । उत्तर में मुन कर रिचारात
में आये हुए मांसाहारी राजाओं के खाने के निये यह पशु वध
किये जायेंगे, उनका हृत्य तडप उठा । भगगन को जब यह
मालूम हुआ कि उनके चचेरे भाई श्री कृष्ण ने उन्हें गग्य
पदा काने के लिये इन पशुओं को चन्द कग दिया था, तर
प्रभु विचारने लगे कि धिक्कार है ऐसे समोर को जिसमें प्राणी
गज भोग में अातुर हो कष्ट उठाते हैं। यह मोच, विषयमोगों
से विरक्त हो, ने तुरन्त रथ से उतर पड़े, और वही पर कंकण
प

०३
अपने सुखों का त्याग कर धनसंचय न करो।
आदि तोड, गिरनार पर्वत पर जा सरे परिग्रह और वस्त्राभूपण
आदि छोड मुान हो गये, और आत्मध्यान में मग्न हो तपस्या
करने लगे।
ज्याही यह खबर राज महल में पहुची वहाँ सलगली मव
गइ । म क मुह पर उसी छागई। उधर जब यह चर्चा
गनमतो ने सुनी, तो उमक हृत्य पर दुखों का पहाड टूट
पडा | कहा तो वह परम हर्प और कहा यह विपत्ति का पहाड।
रानमती को मम कुटुम्मीगण ममझाने लगे। सर ने चाहा
कि इमक मनसे श्री नेमिप्रभु क वियोग का दु स भुला दिया
जाय । माता ने माह के रा हाकर अनेक प्रकार से रानुलदेवी
का गिक्षा दी कि "हे पुनी ! श्री नेमिनाथ का माथ छुटने
की कुछ निन्ता न गे, उनके साथ तुम्हारा पाणिग्रहण तो
हुधा नहीं था, उनसे भी अधिक रूपवान और गुणवान पर,
तुम्हार लिये हूँढ लिया जायेगा" । राजुलकुमारी ने उत्तर
दिया "माता जी ऐसे बचन न कहिये" । मैं तो अन्तरङ्ग में
सम्बन्ध के समय ही थपने आप को सर्व प्रकार से श्री नेमिप्रभु
को अर्पण कर चुकी है, उनक सिवाय और कोई मेरा पति
नहीं हो सकता । मुझे भोग सामग्रियों की कुछ अमिलापा नहीं
। मैं भी यो नेमिनाथ क समान गिरनार पर्वत पर जा कर
अपना आत्म कल्याण करू गी। इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर
रानुल ममस्त कुटुम्बियों से विदा माग, ससार और गरीर का
-

दुष्ट पिसी को देख कर प्रसन्न नहीं होता।
मोह छोड़, आर्यिका यन गिरनार पर्वत को गुफा में परम नप
करने लगी।
इघर तपश्चरण करते करते श्री नेमिप्रभु को केरल प्रान
होगया। वे अरहन्त हो गये, और उनके गानम लोकप्रलोक
स्पष्ट दिखाई देने लगे। इन्द्र को प्राज्ञा मे कुचर ने भगवान
समवशरण ननाया । मर जगह के भन्य जीर समशरग में
मगरान् का उपदेश सुनने आय । मगरान की सभा में राज
मती छह हजार आर्यिायो की गुगनी हुई ।
सर्वत्र धर्मोपदेश कर कुछ काल बाटी नेमिप्रसु निवाण
पधारे। रानुल भी धरने तप के फ्ल से मर्ग में जार
इन्द्र हुई।
धन्य है श्रीमती राजुल देवी का माहम, पतिप्रेम और
धर्माचरण ।
प्रश्नावनी
१-राजुलदेवी कौन थी और इनका विवाह किनके साथ होना
निश्चित हुआ था
१-मार्ग में पशुओं को क्सिने तथा क्यों बन्द करा दिया था ?
३-नेमिप्रमु के वैराग्य का कारण यतायो।
४-नेमिप्रमु के वैराग्य लेने के बाद राजुलदेवी ने क्या किया !
५-राजुलमती का विवाह नेमिप्रभु के साथ हुआ ही नहीं था, फिर
राजुलदेवी नेमिप्रभु के साथ क्या गिरनार पषत पर चली गई।
-गिरनार पवत पर जा कर नेमिप्रभु वाथा राजुलदेवी ने क्या
किया तथा उसका क्या परिणाम हुमा ।

आमदनी देस कर खर्च का प्रबन्ध करो। २५ पाठ १० अलोचना पाठ बन्दों पांचों परमगुरु, चौबीमों जिनगज । करू शुद्ध पालोचना, शुद्ध करन के कान ॥१॥ सुनिये निन अरज हमारी, हम दोप किये अति भारी । तिनको अन निरवृति काज, तुम शरण लही जिनराज ॥२॥ इक वे ते चौ इन्द्री ना, मन रहित-सहित जे जीना। तिनकी नहिं करुणा धारी, निर्दय व्हे धात विचारी ॥३॥ ममरभ समारम, पारम, मन च तन कीने प्रारम । कत कारित मोदन करिके, क्रोधादि चतुष्टय धरिके ॥४॥ शत आठ जु इन मेदनितें, अघ कीने पर परछेदनतें । तिनको कहु कौला कहानी, तुम जानत कवल ज्ञानी ॥शा विपरीत एकांत पिनय के, सशय अज्ञान कुनय के । बम होय घोर अप कीने, बचते नहिं जात कहीने ।।६।। बुगुरुन की सेग सीनी, केरल श्रदया कर भीनी । या विधि मिथ्यात बढ़ायो, चहुगति में दोप उपायो ॥७॥ हिंमा पुनि झूठ जू चारी, पर बनिता मों जुग जोरी। परिग्रह भीने, पन पाप नु या विधि कीने ॥८॥ स्पर्शन रसना प्रानन को, दृग कान विषय सेवन को। बहु कर्म किये मन माने, कछु न्याय अन्याय न जाने || प्रारम्भ , जैसा द विचार होगा येसे ही बनोगे। फल पच उदवर खाये, मधु माम मद्य चित चाये। नहीं अष्ट मूल गुन धारे, सेये कुरिमन दुग्यकार ॥१०॥ दुई पीम अभस निन गाये, मो भी निशिदिन भु जाये। फा भेदाभेद न पायो, ज्यो त्यो कर उर मगयो ॥११॥ अनतानुषधी मो जाने, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्याने । सज्वला पोरडी गुनिये, सर मेद नु पोदश मुनिये ॥१२॥ परिहास अरति रति सोग, मय ग्लानि तिवेट मजोग । पनीम जु मे मो इम, नर पश पाप क्येि हम ।।१३।। निद्राश शयन कराया, सुमन मयि टोप लगाया। फिर जागि चिपय नन घाया, नानापिपिरिषफल ग्यायो ॥१४॥ श्राहार विहार निहारा, म नहि तन पिचारा । शि दखे धरा उठाया, निन शोधा भोजन खाया ॥१५॥ परमाद मनायो, बहु विध स्लिप पनायो। कुछ मुधि सुधि नाहिं रही है, मिथ्या मति छाय गई है ॥१६॥ मर्यादा तुम लिंग लीनी, ताह मनाप जु कीनी । मिन मिन अप कैसे पहिये, तुम ज्ञान पि मर पइये ॥१७॥ हा! हा 1 मे दृष्ट अपराधी, बस जीरन गशि निगयो । यावर की जनन न कीनी, उर में करुणा नहिं लीनी ॥१८॥ 'पृथिवी बहु खोद कराई, महलादिम जागा चिनाई । विनगाल्यो पुनि जल डोल्यो, पंखा ते पचन विलोल्यो ॥१६॥ हा ! हा !! मै अदयाचारी, यहु हरित नु काय विदारी।

=
।
दूर की यात्र अक्लेन क्रो।
यो रिधि नीरन के सता, हम खाये धरि शानदा ॥२९
हा ! हा !! परमार माई, पिन देखे अग्नि जलाई।
ता मध्य जीव जे आये, तेह परलोक मिधाये ॥२१
चौधो अन त पिमायो, ईधन विन शोघ जलायो।
मार ले जागा बुहारी, चिटि श्रादिक जीव विदारी ॥२९
जल डान निबानी कीना, मोह पनि डारि नुनीनी।
नहीं जल थानक पहुँचाइ, सिरियारिन पाप उपाइ ॥२५
जलमल मोरिन गिरवायो, मि कुल याघात रायो।
नदियन निच चोर धुशये, शेषन के जीर मगये ।।२४
अनादिर गोष
गोध कराद, ना मध्य जीव निपराई।
तिनका नहिं जतन करायो, गरियार धूप डगयो ॥२५॥
पुनि द्रव्य कमान काने, हु प्रारम्म हिंमा माजे।
क ये अघ तिमनावश भारो, कस्णा नहिं रच विचारी ॥२६॥
इत्यानिक पाप अनता, हम जाने श्री भगरता ।
सतति चिर काल उपाई, पाणी तें कही न नाइ ॥२७॥
ताको जु उदय अत्र आयो, नाना विधि मोह मतायो।
फल भुजत जिय दुख पावे, यचत कैसे करि गाये ॥२८॥
तुम जानत केरल झानी, दुख दर क्रो शिव थानी ।
हम तो तुम शरण लही है, जिन तारण पिग्द मही है|
एक ग्राम पति जो होवे, मी भी दुखिया दुस खोवे ।
तुम तीन भुगन के स्वामी, दुख मेटो सन्तरयामी ॥३०॥

मलाइ कर चलो जग में, तुम्हारा ही मला होगा द्रोपदि को चीर बढ़ायो, सीता प्रति कमल रचायो। अनन से किये कामो, दुग्व मेटा अन्तरयामी ॥३१॥ मेर अरगुन न चितारो; प्रभु अपना रिट निहारो। सब दोप रहित कर स्गमी, दुस मेटो अन्तरयामी ॥३२॥ इन्द्रादिक पद नहिं चाहूं, रिपयन में नाहि लुमाऊँ। रागादिक दोप हरीजे, पग्मातमा निज पद दोन ॥३॥ दोहा-दोप रहित जिन दर जी, निन पद टीने मोय । मर जीवन को सुग्य बढ़े, आनन्द मगल होय ॥३॥ अनुभव माणिक पारखी, जोहारि श्राप जिनन्द । ये हो घर मोहि दीनिये, चरण शरण मानद ॥३॥ प्रश्नावली १-आलोपना किसे कहते हैं ? यह पाठ क्यों पढा जाता है ? २-१०८ पाठ कौन से हैं ? भली प्रकार सममाओ। ३-मिथ्यात्व, मूल गुण, अमत्य, न्यसन व पाय कितने हैं.१ नाम भी बवाओ। ५-जल छान कर जिवानी का क्या करना चाहिये । "इत्यादिक पाप अनन्ता" यहा से तीन चन्द पदो। ६-अनाज रिस समय और निस प्रभार पीसना चाहिये ? ७-सीता, द्रोपदी और मनन चोर के विषय में तुम क्या जानते हो ? सबिप्त कहानी सुनाओ। ८-जीचे लिखे छन्द पो समरंभ अनुभव मारिएक । दोप रहित - । हाहा मैं । -

है
अहिंसा परमो धर्म ।
२६
पाठ ११
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र
सम्यग्दर्शन
सच्चे देव, सन्चे गुरु, सन्चे शास्त्र तथा दयामय धर्म का
सच्चे दिल से श्रद्धान करना सम्यग्यदर्शन कहलाता है।
सम्यग्यर्शन धर्म रूपी पेड़ की जड है। जैसे जड के बिना
पेड़ नहीं ठहरता, वैसे हो सम्यग्यदर्शन के बिना सन धर्म कर्म
व्यर्थ है, उनसे कुछ अधिक लाभ नहीं होता । इमलिये प्रात्म
कल्याण के लिये सबसे पहले मम्यग्यदर्शन का धारण करना
जरूरी है । सम्यग्यदर्शन की बढी महिमा है। जिस जीप को
सम्यग्यदर्शन हो जाता है वह मर र उत्तम देव या मनुष्य
होता है। वह मर कर स्त्री नहीं होता । वह नरक भी जाता है
तो पहले नरक से नीचे नहीं जाता और कीड़ा, मगौडा, कुत्ता,
बिन्ली वृक्षादि मे जन्म नहीं लेता है।
सम्यग्ज्ञान
पदार्थ के स्वरूप को टीर ठोय जैमा का तसा जानना
सभ्यज्ञान है।

३ . जहा धर्म है वहीं जय है। सम्यग्दर्शन होने से पहले जो ज्ञान होता है यह सम्यग्ज्ञान नहीं कहलाता है, किन्तु कुशान कहलाता है । परन्तु सम्यग्द- र्शन होने पर वही ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहलाता है। सम्यक्त्व से ही पात्मज्ञान और केरल मान होता है । इमलिये सम्परदान प्राप्त करना चाहिये । यह सम्यग्ज्ञान सच्चे शास्त्री के पढ़ने- पदाने, सुनते-सुनन तथा पार-वर विचार करने से प्राप्त होता है। सम्यग्ज्ञान की यही महिमा है । ज्ञान होने पर थोडी सी मेहतन से नम जन्म क पाप कट जाते हैं, जो अनानी जीव के करोडों जन्मों म भी नहीं कटते । सम्यक्चारित्र हिंसा, भूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पाँचीपापों तथा क्रोध, मान, माया, लोभ, चार कपाय आदि का त्याग करना सम्यक्चारित्र है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान होने पर आत्मकल्याण के लिये सम्यक्चारित्र धारण करना जरूरी है। मम्यक्चारित्र का पालेन करने से जीर को सर्ग और मोक्ष की प्राति होती है। सम्यग्दर्शन, मम्यग्सान और सम्पपचारित्र इन तीनों को रत्नत्रय कहते हैं । इन तीनों का मिलना ही मोक्षमार्ग है।

जरासी आग की चिंगारी शहरों को जला डालती है।
अथात् मोक्ष की प्राप्ति का उपाय है। सर्व कर्म के बन्धन से
छूट जाने का नाम मोच है।
प्रश्नावली
१-सम्यग्दर्शन क्सेि कहते हैं ? सम्यग्दृष्टि जीप मर कर कहाँ नहीं
भाता? बताओ सम्यग्दृष्टि जीव मर कर लड़की बन सकता है
पा नहीं?
२-सम्यग्ज्ञान का स्वरूप क्या है ? वताओ सम्यग्दर्शन के विना
सम्यग्ज्ञान हो सकता है या नहीं ? सम्यज्ञान को क्या
महिमा है?
३- सम्यक्चारित किसे कहते हैं ? सम्यक्चारित्र को धारण करना
क्यों जरूरी है।
५-'नत्रय" किसे करते हैं ? इसके पालने का क्या फल है ?
पाठ १२
सत्संगति
मगत ही गुण होत है, मगत ही गुण जान ।
चौस फास गुड़ मोमरी, एक ही मोल विकात"।
मनुप्य समार से ही एक ममाजिक प्राणी है। वह
अकना एक दिन भी नही रह सस्ता। मिल तुल कर बैठने
रहने सहने का नाम ही सगति है। सगनि दो प्रकार को

३२
सफर में भोजन भूख से कम सानो।
होती है, एक सत्सगति यानी सजनों को सगति और दूसरी
कुसगति यानी दुष्टों की सगति ।
सत्सगति जैसे सुखदायक है वैसेही कुसगति दुखदायक
सत्सगति के प्रयोग से सिद्धि होती है जब कि कुसगति
के कारण अब्जा श्रादमी भी बिगड़ जाता है ।
सगति कोजे साध की, हरै और की व्याधि ।
सगति तजिये नीच की, आठों पहर उपाधि ।।
सगति का प्रभाव मन पर अवश्य पडता है इसलिये
मनुष्य को निरालमी होकर सदा उत्तम मगति का आश्रय
लेना चाहिये । मत्सगति के लिये हमे सदाचारी स्त्री व पुरुषों
के साथ रहना चाहिये । ग्रन्छी अच्छी पुस्तकें पढ़नी चाहिये,
विद्वानों के उपदेश सुनने चाहिये, और उनको याद रसना
चारिये, महात्माओं की सेना भक्ति करनी चाहिये, पड़ों की
विनय करनी चाहिये और और छोटों के साथ अच्छा वर्ताव
करना चाहिये।
कुसगति क कारण अपयश फैल जाता है, धर्म रिगड
जाता है, धन की हानि होती है और शरीर म अनेक रोग
पैदा हो जाते है । जैमा किमी कवि न कहा है-
जुगारी से रखोगे गर दोस्ताना,
नुपारी ममम लेगा तुमरो जमाना।

।
जो मूम्ब से कन साना खाते हैं वे बीमार नहीं होते।
अगर भाग के पास बैठोगे जोकर,
तो उठोगे एक दिन कपड़े जला कर ॥
यदि कभी ऐसा समय बाजाय कि पराश होकर कुसगति
में रहना पड़े तो नहा ऐमा प्रपन्न करना चाहिये कि जितने
दुष्ट साथी हैं वे सरके सत्र सुधर जाय । यदि ऐसा न हो सके
तो कम से कम अपने आप को अपश्य बचाना चाहिये।
जहर के मिलाने से लड्डू ग्राणनाशक होते हैं, और
इलायची, पानाम भारि मेरा मिलाने से पौष्टिर हो जाते हैं।
कीचड़ की सगति से कपड़े मैले होनाते हैं, और, मापुन की
सगति से माफ होनाते हैं । इमलिये सत्मगति के गुण समझ
कर कुमगति का त्याग करना लाभदायक है।
एक बार एक शिकारी ने तोते के दो बच्ने पकड बाजार
में लाकर बेचे । एक तो किमी भले श्रादमी ने मोल ले लिया
और दूसग स्मिी बदमाश के हाथ पड़ा। दोनों ने अपने
अपने घर जासर उनका पालन पोपण किया भले भादमी
का तोता बन्दी अच्छी बातें सीख गया और नीच घर के
तोते ने गाली-गलौच श्रादि युरी बातें सीखीं।
एक दिन उम नगर का गग उस गली में से हाफर
निकला तो नीच तोता गाली-गलीच पकने लगा। राजा को

आम खून यदावा है।
तोते की ये बातें बुरी तो बहुत लगी परन्तु उसने उस समय
इब न कहा। आगे जब वह उस भले आदमी के मकान
पास से निकला तो उसके तोते ने राजा को देख कर व
आदर-सत्कार के पचन कह, जिन को सुन कर राजा बहुर
प्रसन्न हुभा । राजा ने यह मेद जान कर भले
भादमी का
पाहत भादर किया।
1
पालको ! देखो, दोनों तोते एक ही मां के पन्चे ये
परन्तु सगति के प्रभाव से एक भला हो गया और दूसरा
दुरा हो गया।
प्रश्नावली
१-सगति कैसी करनी चाहिये ? कुसगति से क्या क्या हानि
होती हैं?
२-उदाहरण द्वारा समझाओ कि मनुष्य मच्छी संगति से मच्छा
और बुरी संगति से बुरा बनता है।
५-पदि कभी परवश होकर कुसगति म रहना १६ जाय तो क्या
करना पाहिये ?

शरीर पर कम से कम सप्ताह में एक बार सेल मालिश करो। १ पाठ १३ वालिका विनय मगवान् सदा सुशीला श्रद्धास्ती पनें हम । दोनों कुलों की शोभा लज्जावती बनें हम ॥ बनवास म पति का जिसने न साथ बोड़ा। सत् शील को विधाता सीता सतो पर्ने म ||२|| अप्टी पति को पाकर सेग से मुह न मोग । वह धर्म कर्म ज्ञाता मैना सती पने हम शा. संकट मह हजारों छोड़ा न शील लेकिन । वह मनोरमा सुमद्रा भजना सती बने हम ॥४॥ अपने पति को जिसने जिन धर्म पर- लगाया । । शास्त्र ज्ञाता चेलना सती मने हम ॥२॥ "शिवराम" मेष घर कर सुन्लक करी परीक्षा । सम्यक्त्व से डिगी ना वह रेवती बनें हम ॥६॥ प्रश्नावली १. म भजन के बनाने वाले का नाम बतायो। २-सीता सती कौन थी। और ये वन में क्यों गई थी। -मैना सती का विवाह कुष्टी पति के साथ क्यों हो गया था ? यहा धर्म, ।

बीमारी का इलाज उत्तम वैध से कराभो।
पाठ १४
।
श्री महावीर भगवान्
पालको ! तुमने चौबीमवें तीर्थकर श्री भगवान् महान
का नाम सुना होगा । श्राज से करीब पहाई हजार वर्ष पहि
विहार प्रान्त के कुण्डलपुर नामके नगर में नाथवशीय सिद्ध
राजा राज्य करते थे। इनकी रानी निशला पैशाली के रा
चेटक की पुत्री थी। चैत्र शुक्ला योदशी के दिन रा
सिद्धार्थ रानी शिला के घर में राजकुमार श्री महापौर
जन्म हुआ, देश में मङ्गल छा गया।
राजकुमार महावीर इतने पुण्यशाली थे कि उनके ज
से ही अनूठी अनूठी बातें होने लगी। उन यातों को देख
लोग उन्हें एक माग्यवान पालकममझते थे। जैमी उनको बु
अनुपम थी वैसे ही उनका शरीर वडा मुन्दर मौर या
चलशाली था । कुण्डलपुर की प्रजा उनको देख कर फूने ?
न मामतो गी।
जर महावीर पूर माठ वप के हुए तो उन्हान मच बोल
चोरी न करने तथा रिसी को न सताने का प्रतिनायें करल
वे ब्रह्मचर्य से रहने लगे। उन्ह सादगा पमन थो; शौक
लिये बहुत वस्त्राभूषण रखना उन्हें पसन्द न था। वे गिने-

नीम हकीम खतरे आन।
कपड़े अपने पास रखते थे। वे ऐश्वर्यवान जरूर थे तो भी वे
अच्छे अच्छे कपड़े और जेपर पहन कर अपना स्वाग बनाना
नहीं जानते थे, गरीब और दुःखी लोगों की सेवा करना के
अपना धर्म समझते थे, यही उनका सच्चा प्राभूपण या।
एक रोज अपने माथियों के साथ वे बाग में खेल रहे थे।
दखत दखते वहाँ एक बहा भयानक काला साँप था निकला।
मव लडके घग गये। मवको अपने अपने प्राणों की पड गई।
किमी को रक्षा का कोई उपाय न सूझ पडा । पर तु महावीर
ने हिम्मत न हारी। उन्होंने निडर होकर उस माँपको भगा
दिया, अपने और साथियों को अभय यना दिया।
इसी तरह एक बार राजकुमार महावीर राजमहल में बैठे
हुए थे। नगर में अचानक कोलाहल मचने की आवाज कानों
में पड़ी। पूछने पर मालूम हुआ कि राजा का हाथी मतवाला
हो रस्मी तुहा र मागा है और लोगों को दुख दे रहा है।
इतना सुनना था कि महावीर एकदम घटनास्थल पर जा
पहुचे। उन्होने कहा "मेरे होते हुए कुण्डलपुर की प्रजा को
कष्ट नहीं हो सस्ता" और हुई भी यही बात । महावीर ने
पात की बात मे उम हाथी को पकड र महावत क हवाले
कर दिया । लोग बड़े प्रसन्न हुए और राजकुमार की प्रशसा

विया पढ़ने में शरीर की ताकत लगा दो
रानकुमार महारीर पर पूर्ण युबरु हो गये थे । राजा
मिद्धार्थ ने इनके विवाह करने का विचार किया। कलिंग दश
की राजकुमारी यशोधरा से उनका विवाह पक्का हो गया था।
परन्तु मागीर ने जर यह बात सुनी तो द्विरिघा में पड़ गये।
कर्तव्य उनके हृदय में आत्माल्याण और दुखी लोक का
कल्याण करने के लिये उत्माहित कर रहा था। पिता का
आदर गृहस्थ अास्था में रहने को कह रहा था।
पर राजकुमार महावीर सरीखे होनहार पराक्रमी युवक भला
कर्तव्य पालन से कब निमुख हो सकते थे। उन्होंने राजा
सिद्धार्थ को अपने कर्तव्य का भान राया, और विवाह
नहीं कराया।
उन्हें स्वयर कल्याण करना इष्ट था इसलिये वे अधिक
दिनों तक राज महल में नहीं रहे। उन्होंने स्वार्थ को प्रकट
करने वाला सूत को एक धागा भी अपने शरीर पर न रक्खा ।
राजकुमार महावीर तीस वर्ष की आयु में दिगम्बर मुनि हो
गये, और सिद्धि पाने के लिये कठिन तपस्या करने लगे।
उन्होंने बारह वर्ष तप किया और अन्त में समदी और सर्वज्ञ
हो गये । लोग उन्हें तीर्थकर, वीर, महावीर, अतिवीर, समति,
बर्द्धमान कह कर पुकारने लगे।
इस घटना के बाद तीर्थकर महावीर ने लोक के कल्याण
के लिये उपदश देना प्रारम्भ किमा । मनुष्यमात्र को उन्होंने

३६
'विद्या गरीब से धनवान बननी है
आत्म स्नातव्य का सन्देश सुनाया और विश्वप्रेम का झन्हा
फहराया। लोग आपसी मेद माव को भूल गये और प्रेम से
रहने लगे। श्रर कोई क्मिी जीर को नहीं सताता था । पशु
पक्षियों का मोरा जाना भी बन्द गे गया, सय ही प्राणी गई
प्रसन्न हुए।
तीम वर्ष तक जनता को धर्मामृत का पान करा कर
तीर्थकर महावीर पावापुर पहुंचे। यहां वे योग में स्थिर हो
गये। ७२ वर्ष की आयु में मुक्त हो गये । ससारके जन्म-मरव
के दुखों से छूट गये । यह कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीकी पिछली
राति थी। महावीर प्रभु को मुक्त हुआ सुनकर सेठ साकार
राजे महागजे सर पावापुर को चल पड़े । उसी वक्त उन्होंने
घी के दीपक जलाये और भगवान के गुणों का चितवन किया।
भारत के इस महापुरुष की पवित्र याद में यह "दिन राष्ट्रीय
त्यौहार नियत किया गया, और यह, दीपावली के नाम से
अमिद्ध हुआ।
लडको ! तुम भी राजकुमार महाचीर की तरह -सादगी
से रहना सीखो । सदा सर से प्रेम करो। जितनी तुमसे दूसरों
की भलाई हो सके'करो। मौन शोक और स्वार्थ को कम्प
के सामने तुच्छ समझ, दलित और प्रस्त जीवों को रक्षा अपने
प्राणों पर खेल कर करो और बानपाने के लिये जो जान से
प्रयत्न करो। यदि तुम इतना करोगे तो लोग तुम्हें प्यार

देखो दूसरे देश विद्या से किसने उन हो गए।
करेंगे और वे युग युगान्तर तक तुम्हारा नाम लेते रहेंगे।
महावीर स्वामी का जन्म दिवस चैत्र सुदी १३ है। इस
दिन उनको वीर जयन्ती मनामी, पूजा पाठ करो धर्मोपदेश
का प्रचार करो। जगत् भर में न्याय, नम्रता और आत्मा
नुमर का सुखदाई उपदेश फैला दो।
वर्तमान् के अत्यन्त प्रसिद्ध चौबीस तीर्थकर में फरीक
२५०० वर्प हुए श्री महावीर अन्तिम तीर्थकर हुए है।
प्रश्नावली
१-महावीर स्वामी का जम कब और कहाँ हुआ? महावीर
स्वामी का जन्म किस वरा में हुआ १ इनके माता पिता कौन
ये, नाम बतायो।
५-महावीर स्वामा कौन से तीर्थंकर हैं ? महावीर स्वामी को और
किन नामों से पुकारते है ?
३-महावीर स्वामी के बाक्य जीवन की घटनायें वताओ कि किस
प्रकार वे दूसरों की सहायता क्यिा करते थे?
४-क्तिनी अयु में महावीर स्वमी मुनि हो गयेये?
५-उन्होंने मितने दिन तप किया ?
६-महावीर स्वामी के निर्वाण दिन को हमलोग आन तक किस
रूप में मानते चले आ रहे है।
महावीर भगवान् का क्या सन्देश था और उनकी क्या शिक्षा
थी १ सक्षेप से अपने शब्दों में बतायो।

रदि अपनी इज्जत पाहो तो कम बोलना सीखो। १ पाठ १५ वीर स्तवन (भजन) मर मिलके आज कहो, श्री वीर प्रभु की। मस्तक मुका कर जय कहो, श्री वीर प्रभु की ॥१॥ बिन्नों का नाश होता है, लेने से नाम के । माला सदा जपते रहो, श्री वीर प्रभु की ॥२॥ ज्ञानी बनो दानी बनो, बलगन मी पनो । अकल सम पन कर कहो-नय वीर प्रभु की ॥३॥ हो र स्वतन धर्म की, रक्षा मदा करो। निर्भय चनो और जय रहो, श्री वीर प्रभु तुझको भी अगर मोक्ष की, इच्छा हुई ऐ 'दाम' । उस वाणी पे श्रद्धा करो, श्री पीर प्रभु की आशा प्रश्नावली १-इस भजन के बनानेवाले ने क्सि की जय मनाइ है ये कौन थे? २-धर्म की रक्षा किस प्रकार करनी चाहिये ? ३-इस भजन को मुयाम सुनो। की ॥४॥ 44 ।

४२ यदि तुम दूसरों की इश्वत करोगे तो तुम्हारी भी होगी।
पाठ १६
सेठ के पाँच पुत्र
किसी एक वृद्ध पुरुष के पाच पुत्र थे । वे साधारण बात
पर भी आपस में लड़त मगड़ते रहते थे। उनके पिता ने उनें
बहुत प्रकार से समझाया, परन्तु उन्होंने उस पर कुछ पान
न दिया । तर उस वृद्ध पिता ने एक युक्ति सोची।
एक दिन उसने रस्मी से मजबूत बंधा हुमा पतली
लाड़ियों का एक गहा मगाया, और प्रत्येक लड़के से उस
गढ को तोड़ने के लिये कहा, मगर उनम से कोई तोरन
सका। फिर उनके पिता ने उस गट्टे को खोल कर नुहा नुदा
लकडी को तोड़ने के लिय कहा, तो उनम से हर एक लकी
को जुदा जुदो करके उन्हों ने पड़ी आसानी से तोड़ डाला।
इस पर उनके पिता ने उन्हें समझाया और कहा "जरा
सबो कर देखो", एक्ता में कितना पल है । तुमम से हर एक
कोई भी मजबूत बंधी हुइ लकडी के गह को न तोर मका,
परन्तु उन्हीं को जुदा जुदा करके तुमने फैसी सुगमता से तो
हाला । इससे तुमको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि तुम,भापस
में मिल जुल कर प्रेम से रहोगे तो कोई भी तुम्हें -हानि न
पहुंचा सकेगा, और यदि तुम मापस में ही विरोध करोगे, तो

AW
इष्ट देवता, गुरु आदि की सदैव मत करो।
नदी नदी लकडिया की तरह तुम्हारा सहज म ही
जायेगा।
अपने पिता की यात सुन कर पॉचो भाई बड़े खुश हुए,
और पिता की मृत्यु के पश्चात् आपस म मेल से रह कर सुख
से समय व्यतीत करने लगे।
---
चलको ! ऐक्य मर्वशक्ति का मूल है । तुम सबको श्रापस
में पड़ प्रेम से मिल-जुल कर रहना चाहिये । जिस कुटुम्ब,
जाति तथा देश में फूट होती है वह निर्मल हो जाता है उसे
हर कोई दवा लेता है, यह कोई उन्नति नहीं कर सकता और
= उसका सहज ही में नाश हो जात है।
प्रश्नावली
१-सेठ के कितने पुन ये? और उनकी क्या भादत पड़ गई थी.
२-ढे पिता ने अपने लड़कों को एकता की महिमा समझाने के
लिये क्या प्रयत्न किया?
१-एकता किसे कहते है ? आपस में मिल जुल कर रहने से
क्या शाम है?
-बधेहुए गठे को लड़के क्यों नहीं सोढ़ सके ?
-इस कहानी से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है।

अपाधिदगी से अधिक सममो। पाठ १७ धर्ममहिमा धर्म पिन कौन उतार पार । धर्म करत मसार सुग्य, धर्म करत निर्वाण । धर्म पथ साधे बिना, नर तिर्यंच सामन ॥टेक।। धर्म प्रभान मिलत है मित्रो, सुरख मपति भडार | रोग रहित शुभ नर तन पारत, उत्तम कुल थरतार भोज राख फल भोगत प्यारे, ज्यो रिसान जग मा तैसे भोगो मोग उचित तुम, धर्म निमारो नाहि ॥ धन दे तन को राग्विये प्यारे तन दे रखिये लाज। धन दे सन दे लाज दे, प्यारे एक धर्म के काज । देव गुरु अनि मक्ति क्गे नित, धर्म दया चित धा दान सुपावन कोनित दीजे, कीने पर उपकार ॥४॥ जल म थल म मन में रण म, पड़े जो सस्य पान धर्म को रद होत यहा पर, धर्म करे' गिर' या प्रश्नावली १-समार में फौनती ऐसी शक्ति है जो हमें पार तार २-धर्म के बिना मनुष्य का क्या भूश्य है। ३-अपने धर्म की रक्षा किस प्रसार करनी चाहिये ?

धन अच्छा है जो इज्जत से पैदा हो।
-
पाठ १८
7
जुए से हानि
-
कुरु दश में हस्तिनापुर एफ मनोहर नगर था। उसके
-राजा का नान धृत था । राजा धृत बड़ा नीतिज्ञ और बुद्धि-
मान था। उसके धृतराष्ट्र पाण्ड और रिदुर ये तीन ,पुन हुए।
इनमें धृतराष्ट्र के दुर्योधन वगैरा सौ पुत्र और पाण्डु के युधिष्ठिर,
भीम, थर्नुन, नकुल, महदन, ये पाच पुत्र हुये । धृतराष्ट्र पाण्ड
के साथ रोज्य करते थे। जन धृतराष्ट्र और पाण्डयो को साथ
साथ राज्य का पालन करते हुये बहुत दिन हो गये तो पाण्डु
को किसी कारण से वैराग्य हो 'याया। उन्होंने उसी समय
अपने राज्य के दो विभाग करक' एक युधिष्टिर आदि पांच
माण्डयों को और दूसरा दुयाधन आदि पौरों को दे दिया
और आप मुनि हो गये।
दुर्योधन आदि कौरव प्राथै राज्य को पाकर 'सन्तुष्ट ने
इये, वै पाण्डवों से द्वेप करने लगे और हर समय इमी
चार में रहने लगे कि स्मिी प्रकार पाडवों को राज्य भ्रष्ट
करके सारे राज्य पर अपना अधिकार जमो लें। इस उद्देश्य
उन्होंने पॉडवों को कई फदों में फसाना चाहा, परन्त.
-
.

मिन्न का इम्तहान मुसीबत में होता है।
एक दिन दुद्धि दुर्योधन ने कपट से पांडवों का समा
में बुलाया और स्नेह मरे पचनों से युधिष्ठिर से कहा-'भाइये,
दिल बहलाने के लिये जुथा खेल' । इस पर युधिष्ठिर और
दुर्योधन दोनों ना खेलने लगे । यद्यपि दुर्याधन घडी चतुराई
से पासा फेंकता था पर भीम की हुंकार से उसका हाथ कार
कर उन्टा गिर जाता था। यह देख दुर्योधन ने किसी काम
के बहाने भीम को बाहर मेज दिया । भीम को बाहर गये
बड़ी देर हो गई। इधर दुर्योधन की बन पड़ी । उसकी जीत
का पासा परने लगा।
युधिष्ठिर ने पहले अपना खजाना हारा, फिर देश हारा,
फिर क्रम से हाथी, घोड़े, वाहन, गाय, भैम, आदि सन ने
हार गये । भन्त म उनऊ पाम अन्त पुर की द्रौपदी भादि-
स्त्रियों क जो कुछ प्राभूपण थे वे भी हार गये ।
इतने म हुकार करता भीम भी वहां आ पहुंचा । जन
उसने युधिष्ठिर को अपनो मारी सम्पत्ति को हारा हुआ और
उदाम देखा तो दुर्योधन की सब चालबाजो समझ गया ।
जान लिया दुर्योधन ने मुझे बड़ा भारी धोका दिया। इससे
भीम को परा दुख हुआ।
इसके बाद युधिष्ठिर दुखित होकर भीम आदि के साथ
अपने घर चला गया। वे घर पहुंच भी न पाये थे कि

४७
-
सच्चा मित्र नहीं है जो मुसीबत म काम भाये
ने उसके पास एक त मेजा । उमने श्राफर युधिष्ठरको प्रणाम
कया भोर कहा-'हे नाथ ! दुर्योधन महारान करते हैं कि
भाप बारह वर्ष के लिये यहाँ से श्राज ही रात को चले जॉप,
नहीं तो भापको कष्ट उठाना पड़ेगा । यह कह कर दूत
चला गया।
इधर दुष्ट दुरशासन द्रौपदी के आभूषण उताने के लिये
उसका वस्त्र खोचने लगा और पुरे शब्दों से उसका तिरस्कार
किया । अर्जुन और मीम द्रौपदी के इस अपमान को न सह
सके। मोम ने क्रोधित हो युधिष्ठिर से कहा-'स्वामिन् ।
आज मै शत्रुओं के कुल को जड़ मूलसे उखाड़ फेंक देता है'
पर युधिप्टिर ने अपने पवन रूपी शीतल जल से उसका क्रोध
शान्त कर दिया, और कहा-'यह निश्चय है, चाह जोहो पर
में
अपना रचन नहीं हारू गा। मेरे पराक्रमी योरो। अब यहाँ
रहने का ख्याल छोड़ कर शीघ्र चल दो और वन में जाकर
डेरा डाला । अब से हम वन ही अपनो' राजधानी'
बनानी होगी।
युधिष्ठिर के इन बचना का सुन कर द्रौपदी सहित सब
माई वन चलने से उठ खड़े हुये । राज्य सम्पदो को तय की
तरह छोड कर, पन मे कितने ही दिनों तक माग के कष्टों को
सहते हुये घूमते रहे।

प्रत्येक की सहायता करना मनुष्य का कर्तव्य है।
पालको, जुए के समान ससार म कोई पाप नहीं पाडवों
सरीखे प्रबल प्रतापी योद्धायों को भी जुआ खेलने से अपने
देश से भ्रष्ट होकर कैसी कैसी भयङ्कर आपदायें सहनी पड़ी।
नुआ नरक का मार्ग है; दुसरूपी मर्प का बिल है, धर्म का
घातक है; सम दोपो का स्थान है, ग्रापत्ति का समुद्र है,
विवेक भुलाने पता है । जुमा अन्य सर व्यमनों में मुख्य है।
इसलिये जो सुखी रहना चाहते है उन्हें चाहिये कि सर अनर्थों
के मूल जुए का दूर से ही छोड़े।
+
प्रश्नावली
१-पाएडव कोन थे? और कितने थे, यताओ इनका नाम पाएडव
क्यों पडा?
२-दुर्योधन कौन था और यह पएडवों से क्यों जलने लगा था ?
३-दुर्योधन ने पारडया को कैसे हरा दिया ?
४-जूश्रा सेलने से पाएडवा को क्या हानि हुई।
५-जूना किसे कहते हैं किसी काम में हार जीव लगाना जूमा
है या नहीं।
६-जूए के सेव से क्या क्या हानियाँ हती हैं ?
इस कहानी से तुम्हें क्या क्या शिम मिलती है !
A

दान देने से मनुष्य के ऐब भी दब जाते हैं।
पाठ १६
मांसाहार का कुफल
श्रुतपुर नगर में यक नामक राजा रहता था । वह प्रजा
का शामन करन म बड़ा चतुर था, परन्तु धर्महोन था। उसे
किा कारण से मास खाने की आदत पड़ गई। वह अपना
अधिकांश समय मान्म खाने के विचारों में ही निताता था।
उसका रमोइयाँ सदा माम पफा फको कर उसे देता था। यही
नीच निर्दयी वक के लिये पशुओं का नित्य घात करता था!,
एक दिन रमोइये को पशु का माम न मिला, तर यह
दुष्ट माम को खोन में निकला | श्मशान भूमि में से किमी
मरे हुये बच्चे को खोद कर ले आया । पापी ने उस बच्चे के
माम को मसाला मादि डाल कर बही चतुराई से पकाया
और राजा यक को खिला दिया। राजा को वह मांस बड़ा
स्वारिष्ट मालूम हुआ।
उस माम लोलुपो राना ने रसोइये से कहा-'ऐसा
स्वादिष्ट मास कहाँ से लाये हो, मैने तो कभी ऐसा उत्तम
माम खाया ही नहीं । यह सुनकर रसाइया अभयदान माग
कर डरता डरता बोला-'प्रभो, क्षमा कीजिये, यह मनुष्य का
मास है। श्राज जय कहीं से भी पशु का मास नहीं मिला,
व इसे चतुराई से पका फर आपको सिलाया है।

आहार व औषधदान भी उत्तम है।
यह सुन कर राजा बोला-'यह मांस मुझे बहुत ही
अच्छा मालूम इभा है, इस लिये अव आइन्दा तुम मुझे मनुष्य
का हो मालूम हुआ है, इसीलिये अब अइन्दा तुम मुझे मनुप्प
का ही मास खिलाया करो'। राजा की यह आज्ञा पाकर
रसोइया भर तो और भी निष्ठर हो गया । अब यह शाम को
मिठाई, फल अदि लेकर जहा बच्चे खेला करते थे वहाँ जाने
लगा। वह पापी असर पाकर उनमें से एक को पकड़ लेता,
भौर उसे मार कर उमका मास राजा को खिला देता । इस
वरह वह रोज निंद्य कर्म करने लगा।
घोरे धीरे जब नगर के यच्चे प्रतिदिन कम होने लगे तो
सारे नगर में खलबली पड़ गई। लोगों ने गुप्त रीति से बच्चों
के घातक की खोज लगाना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में
वह रसोइया पकड़ा गया। पूछने पर उसने साफ माफ कह
दिया-'मेरा कुछ भी अपराध नहीं, मैंने जो कुछ भी किया है
राजा की आज्ञानुसार पिया है। राजा की अनाति देख कर
लोगों को पड़ा विस्मय हुआ। वे विचारे लगे--'यह राजा
प्रजा का क्या मला कर सकता है, जो हमारी सन्तान को
खानेवाला है। तथा जब हमारे पाल-पच्चे ही न रहेंगे तो
हमारा जीवन स्मि काम का ? धन धान्यादि जितनी वस्तु
हम सग्रह करते हैं, सन पन्चो के लिये ही तोक्रते हैं । एमी दशा
में हम लोग यहां रहगे तो हमारा सर्वनाश होजायगा'।

r- दान भूसे और कमोर को देना उत्तम है। अन्त में सब लोगों ने विचार कर यह निश्चित किया कि यह रोजा पड़ा दुष्ट और पापी है। इसे देश से निकाल दना चाहिये । हमलोग ऐसे राजा को कैसे रख सकते हैं। और क्योंकर उमको सेरा कर सकते हैं ? अगले दिन सब लोग राज-दरवार म गय । राना मिहामन पर बैठा हुआ था। पर लोगों ने मिल स उसे राजगद्दी में उतार दिया, और उसके शिमो गोत्रीय पुरुष कोमिहामन पर बैठा दिया। इस प्रकार राजा बक राज्य से भ्रष्ट होकर दुख से दिन रिताने लगा पर उसकी पार-वासना न बुझी । लोगों ने उसका नगर में पाना बन्द कर दिया । लोग उसे राक्षस ,समझने लगे यह यहाँ तक कर हो गया कि जो जीव उसके सामने आ जाता, उसे जीता न छोडता । ठीक है वैसे खोटे मार्ग में बानेवालों को विचार कहा रहता है। एक दिन बन में घूमते हुए उसे वसुदेव ने देखा। वसुदव बड़े नीतिज्ञ और बलवान के, यद्यपि यह उम समय अकेले थे, तो भी वे निर्मय होकर पक से लड़े, और उसे मार गिराया। वक मरकर दुर्गति में गया। देखो, कहा तो यक का उत्तम राज्य और कुल भोर कहाँ मनुष्यों के मांस का खाना । इसी से उसे राज्य से पतित होना पड़ा और अत में दुर्गति को जाना पड़ा। सच है अन्यायोतया अत्याचारो का क्मिो जगह स कार

.
अपनी मलाई को जिन्दगी से ज्यादा समस्ये।
नहीं होता, चाह वह कितना ही बढ़ा क्यों न हो। उमके
माता, पिता, पुत्र, मना आदि सब उसक विरुद्ध हो शत्रु बन
जाते हैं मांस न वृक्षों से उत्पन्न होता, नए वो पर उगता है
और न पहाड से पैदा होता है। यह निरपराध पशु, पक्षा
थादि जावों क मारने से पदा होता है। माम के खाने से
अनेक रोग पैदा हो जाते है । याद्ध विगढ़ जाती है। उसका
छूना भी पाप है। साराश यह कि माग निद्य है; पाप का
सूल है । पवित्रता का सर्वनाश करने वाला है, दुःख का देने-
पाला है, दोनो लोको मं बुराइ का हतु है । इसलिये धर्मात्मा
पुरुष मास कभी नहीं खाते हैं।
प्रश्नावली
१-मास खाना क्यों बुरा है ?
२-मान्स खाने से क्या २ दानियाँ होती है.
३-मासाहारी किसे कहते हैं ? यक गजा को माँस साने के कारण
क्या कष्ट उठाना पड़ा?
४-बक राजा की कहानी सुनाओ और पताओ कि इस कहानी से
तुम्ह क्या शिक्षा मिलती है ?
--

देखा लोग देश के लिये क्या क्या त्याग करते हैं।
।
पाठ २०
मदिरापान से हानि
एक समय एक पात् नाम का विद्वान ब्राह्मण सन्यासी
अपने नगर से गगानी की यात्रा के लिये रवाना हुआ।
चलने चलते यह बिन्ध्याटवी में जा पहुचा । यहा कुछ नीच लोग
दिरा पो-पी कर नाचकूद म्ह थे, गा रहे थे और अनेक
स्कार की कुचेष्टाओ में मस्त थे। अभागा मन्यामी इम टोली.
के हाथ पड़ गया।
चाडालों ने मन्यामी का बडा आदर किया और कहने
लगे-'आइये महागज ! भान हमारे लिये वही खुशी का
दिन है, जो आप सरीखे महात्मा इम सुगी के मौके पर हमारे
यहा पधारे । आइये, मारा भक्षण कीनिये, शराब पीनिये और
हमारे माथ नाच-कूद मे शामिल होरर मजे उडाइये ।'
चाडालों की ऐसी बातें सुनकर चार सन्यासी के तो
होश उड़ गये। इन शगपियों को क्या कहें ? इन्हें कैसे
ममझायें ? बेचारा बड़े सक्ट म पड़ गया। फिर कुछ सोच
कर बोला-'भाइयो, एक तो मै बाह्मण और फिर उसमें भी
सन्यामी । भला बतायो मे मास-मटिंग से सेवन कर सकता
है ? कृपा कर मुझे जाने दीजिये।
-

जितनी पने देश की सेवा जरूर क्रो।
इस पर उन चाडालों ने कहा---'महागज, कुछ भी हो
हम तो आपको कुछ प्रसाद पाए पिना नहीं आने देंगे। यदि
आप अपनी गजी से खालं तो अच्छा है। नहीं तो जैस
बनेगा वैसे हम खिला र छोडेंगे। हमारी प्रार्थना स्वीकार
किये बिना श्राप नीत जी गगाजी नहीं जा सकते ।' अब तो
सन्यासीनी घबराये और मन ही मन में सोचने लगे-'यदि
मै मास ग्वाता है या विषय समन करता है तो बडा दोष
लगगा और उमरान्ड भी टिन भुगतना पड़ेगा। पर
साधारण जौ, गुड, श्रावने यादि से बनी शरार पोते हैं, व
शगय पीना नहीं कहा जा सकता । इमलिये जैसी शराब -
ये पिलाते हैं उमक पीने म न कुछ दोष है, न उससे
सन्याम ही बिगडता है।
यह विचार कर उस र्स ने शराब पी ली। शराब
के थोड़ी देर बाद नगा चहने लगा रिचार ने कभी शर
नहा पी थी, इसलिये उस पर शराब का और भी अधिक न
चदा । शगर के नशे म चूर होकर वह मर सुध-बुध ,
गया । उसे अपने पराये कालान न रहा, वह वेहूदा बकर
उग्न लगा। लगोरी कर ह भी उन लोगो की ,
नाइने न लगा । मच है सोटी मगति दल, धर्म, पवित्र
अारि मब राता का नाश कर देती है।

प्रत्यक काम हिम्मत से होता है, हिम्मत नहारो।
।
।
बहुत देर तक तो मन्यामी उमी तरह नाचता कूदता
महा। पर जर कुछ थोडा मा थक गया तो उसे बड़े जोर की
भूर लगी । वहाँ पर खाने के लिये माम के सिवाय क्या था ?
सन्पामी ने उसे ही खा लिया । सन्यामी नशे में तो था ही,
पेर मर खात हो उसे काम-विकार ने सताया। उसने एक
चाडाल का स्त्री को ओर बुरी दृष्टि से देग्वा और उमक प्रति
अपनी वर्ग वासना प्रकट की। चाडाल लोग अपनी स्त्री का
पह तिरस्कार न मह मके। सन्यासी को मार कर उन्होंने
उमझी खूब गत पनाई । उनम से एक ने सन्यामी की अपनी
राजाओं के बीच में पकड़ कर इतने जोर से दबाया कि वेचारे
के प्राण पम्वेरू उड़ गये। इस प्रकार यातध्यान से मर कर
यह खोटी गति में गया ।
देग्यो मन्यासी कमा विद्वान और धर्मात्मा था, लेकिन
मदिरा पीने से उसकी केमी गति हुई। उसका सब धर्म-कर्म
प्रष्ट हो गया, विवेक जाता रहा। अन्त में मदिरा के कारण
उसे अपने प्राण तक दने पढ़ ।
मदिरा पीने वाला सदाचरण को भूल जाना है, हिंमा,
अठ, चोरी, कुशील थादि पाप करने लगता है। मदिग पीने
से लाम हुछ नहीं होता, किन्तु बहुत से शारीरिक और
मानमिक कष्ट सहने पड़ते हैं, अनेक रोग हो जाते हैं। नशा

मेवकूफ का मत्र चुप रहना है।
हर प्रकार का बुरा है ! गांजा, चरस, अफीम, बीडी, चुरट,
तम्बाकू ममा मादक पदार्थ बुरे होते है । इनका भूल कर भी
सेवन नहीं करना चाहिये । जो पुरुष मदिग या अन्य नशीली
चीजों के सेवन करने वालों का साथ करते हैं उन्हें बहुत दुख
उठाने पड़ते हैं । मदिरा पडी अपवित्र होती है। वह चीन
सहा कर बनाई जाती है । हिंसा की यह खान है। दूसरे
भाग म तुम पढ़ चुके हो कि मदिरा पान से यादवों को
सर्व नाश हुश्रा और द्वारका जल गई । इसलिये मदिरा आदि
नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिये । कुलीन पुरुषों
को तो मदिरा छूना भी नहीं चाहिये।
प्रश्नावली
१-सन्यासी को शराब पीने की बुरी आदत ऐसे पड़ गह?
२-शराप पीने से सन्यासी की क्या दुगति हुइ ?
३-तुम्हारी समझ मे शराब पीनेयाला पहिमाधर्म का पालन रक
सकता है या नहीं?
४-मदिरा-पान से पया क्या हानियाँ होती हैं।
५-इस कहानी को पढ़कर फर सुन्हें क्या शिक्षा मिलती है?
६-बीड़ी, घुरट, सम्याप का सेवन अच्छा है या बुरा ?

ससार में दान व धर्म के सिवा कोई नहीं है।
पाठ २१
वेश्यागमन से हानि
चम्पापुरी में एक मानुदत्त सेठ रहता था। उसको स्त्री
का नाम सुभद्रा था । पुण्योदय से उसक एक पुग्न हुआ।
उसका नाम चारुदत्त रक्खा गया। चारुदत्त की बुद्धि पड़ी
तीक्षण थी। पढ़ने योग्य होने पर उसके पिता ने उसे गुरु के
पाम पढ़ने भेज दिया । चालत पड़ा मुशील, युद्धिमान और
परिश्रमी था। थोड़े ही दिनों में उमने अनेक शास्त्र पढ़ लिये।
चारुदत्त दयाल और परोपकारी वासक था। एक समय
वह अपने मित्रों के साथ नगीचे में खेल रहा था कि उसके
कानों में कहीं से गेने की आवाज आई । आराज सुनते ही
चारुदत्त का हृदय दयासे उमड पाया । जिस प्रोग से श्राराज
श्रा रही थी वह उस ओर चल पहा थोडी दर जा कर उसने
देखा कि कोई पुरुष कीलित होकर पधा हुआ, एक वृक्ष की
डाली में लटका हुआ है और बड़े कष्ट में है । चारुदत्त उसके
पास गया और उसी समय अपनी चतुराई से उसे रधन रहित
कर दिया । उमको धैय घाया और योग्य औषधि तथा
आहार पान देकर उसे सन्तुष्ट किया।
दोहा-निज मुख की पपा न कर, पर दुर करते दर ।
जन्म सफल करते मदा, घे दयाल वे शूर

।
यदि तुम दूसरों को दुसायोगे सो तुम भी दुख पामोगे।
जब चारुदत्त पढ़ लिख कर निपुण हो गया तो उसके
पिता ने उमका विवाह सिद्धार्थ सेठ की मित्रारती नाम की
कन्या के माथ दिया। मित्रावती पड़ी सुशिक्षिता और
चारिणी थी । यद्यपि चारुलत्त का विाह होगया था पर
चाह का रहस्य अभी तक उसकी ममम में न पाया।
के विषय-वामना छु तक नहीं पाई थी। उसे तो रात दिन
पनी पुस्तकों से प्रेम था । वह उन्हीं के अभ्यास, विचार,
नन श्रादि में सदा मग्न रहा करता था।
इमी चम्पापुरी म एक वेश्या रहती थी । उसका नाम था
सन्ततिलका । उसफ यहा, परम सुन्री और पत्र प्रकार की
ताओं में चतुर सन्तसेना नाम भी उसकी कन्या भी रहती
।। एक दिन चारुचच अपने चचा रुद्रदत्त के साथ घूमने
को गया । वे दोना वसन्ततिलका के मकान के नीचे पहुये ही
कि इतने में गजा के दो हाथी लडते लड़ते यहा आपहुचे
उनकी लड़ाई से सड़क बन्द होगई । बचने का और कोई
उपाय न देख रुद्रदत्त जल्दी से चारुदत्त का हाथ पकड
नमन्ततिलका वेश्या के मान पर जाचढ़े। वह वेश्या रुद्रदत्त
को तो पहिले से ही जानती थी । महक खुलने तक रुद्रदत्त
असन्ततिलका के माथ शतरज खेलने लगा और चारुदत्य
बठा रहा । खेल में रुद्रदत्त कईशार हारा चारुदत्त अपने चच
को हारता देख कर म्वय खेलने लगा।

आपस में झगड़े कम करो इसी में प्रशसा है।
खेलते खेलते सन्ततिलका चारुदत्त से कहने लगी-
'सेठ साह ! देखो मैं तो यूढ़ी हो चुकी है । आप अभी
थुपा है । इमलिय मेरे माथ आपका खेलना उचित नहीं
मालूम देता । मेरी एक परम सुन्दरी पुनी बसन्तसेना है;
पाप-उसक साथ खेलें । मैं उसे अमी चुलाय देती हूँ । चारुदत्त
बोला-'जैसा आप उचित मममें, मुझे कुछ इन्कार नहीं है।
बसन्तसेना भागई और चारुदत उसके साथ शतरज सेलने
लगा। सेलत खेलते वह उमपर मोहित होगया। चारुदत्त ने
अपना बहुत सा धन वेश्या को दे डाला । आखिर में रह
वेश्याक मकान पर ही रहने लगा।
चारदत्त के पिना भानुदत्त ने चारुदत्त को बुलाने के लिये
अनेक प्रयत्न किये पर उसके एक न लगी । उमने पिता के
घर जाने से मर्वया इन्कार कर दिया । पुर की यह अवस्था
देस कर भानुदत्त ने सोचा कि, यह बुध्यसन की परम मीमा
पर पहुंच चुका है, इसका छुटकारा होना कठिन है। जैमा
जिमका धर्म है यह उसक अनुमार फल भोगता है । मैं अपने
कर्तव्य से क्यों चूक ? यह विचार कर वह माधु हो गया और
अपनी प्रात्मा गारल्याण करने लगा।
इघर चाररत की हालत दिनों दिन अधिक बुरी होने
लगी। उमने अपना सर धन नष्ट कर डाला। जर पंसा पास
न रहा तो अपना मकान गिरसी रख दिया। अपनी माता

अधिक पोलना ठीक नहीं।
और स्त्री का सर जेवर नष्ट कर डाला 1 अहा ! कर्म का फल
बडा विचित्र होता है। कौन जानता था कि चारुदत्त की यह
दशा हो जायगी, और उसे एक-एक पैसे का मुहताज होना
पड़ेगा । चारुदत्त को एमा दीन, दरिद्री समझ कर, पूड़ी
गसिका ने अपनी लड़की से कहा-'पुत्री अब चादरुत
भिखारी, दरिद्री, हो चुका है। अब इसकी प्रीति छोड दो और
किमी अन्य धनि युवा के साथ प्रेम करो वेश्याओं का यही .
कर्तव्य है कि सुन्दर होने पर भी वह
करना छोड़ दें। बसन्तसेना पर इन बातों का पुल असर
निर्धन पुरुष
से प्रेम
नहुधा
एय बार रात्रि को चारदत्त और यसन्तसेना गहरी नोंद
सो रह थे । वमन्ततिलका ने भोजन के माथ कोई नशीली
उस्त खिला दी थी। निद्रा के प्राधीन देव घसन्ततिलका ने
वास्तत्त र सब वस्त्राभूपण उतार लिये और उसकी एक गठरो
मो बनाकर नीचे पाग्वाने में डाल दिया। जन प्रात काल हुआ
तो उसका मुह चाटने लगे। इस समय पुलिस का एक
मिपाही भी वहा भागया । उमने चारुदत्त को पारखाने से बाहर
निकाला । उमे पुछ सुध आई । वह वसन्ततिलका की सब
बमाशी समझ गया । सिपाही के पछने पर उसने अपना
माग वृतान्त कह सुनाया अपनी दशा देख उसे दुख हुआ

जिस विषय को न बानो, चुप रहो।
अब तो चारुदत्त की अांखें कुछ खुली । विचारने लगा,
घेश्याओं की प्रीत धन के ही साथ होती है। जिसके पास जय
तक पैसा रहता है, उससे तभी तक वे प्रेम करती हैं जहाँ
। धन नहीं यहाँ वेश्या का प्रेम नहीं । श्रर उसे जान पड़ी कि
वेश्यागमन का सा भयचर परिणाम होता है। अब वह एक
पल भर के लिए वहाँ न ठहरा और अपनी दशा सुधारने की
धुन में विदेश चलता बना । इस हालत में उसने अपना
कलङ्कित मुख अपनी माता को दिखाना भी उचित न समझा।
पालको ! विचार करो, चारुदत्त को एक समय क्या
हालत थी और उसका घराना कैसा था । परन्तु जप से वह
चेश्या क जाल म फसा उसकी वैसी दशा हो गई बड़े कष्ट
मोगने पड़े, उसे पाखाने तक में गिराना पड़ा । देखो वेश्या
धन से ही प्रेम करती है; सचा प्रेम यह किसी से नहीं
करती है।
सजन लोग इस प्राणघातिनी का सग दूर से ही त्याग
करते हैं। यह विष की बेल है, भापत्ति की भूमि है, धन,
धर्म, शरीर, यश सबको नाश करनेगाली है । वेश्या की संगति
से नियम त, तप, शील, मयम आदि सर गुण नष्ट हो
जाते है । देखो, चारुदत्त पहिले क्तिना धर्मात्मा, परोपकारी
और दयाल था । इस पापिनी वेश्या की सगति से उसकी सी
"

६२ बोलना ही मनुष्य की योग्यता पतलाता है।
दुर्दशा हुई। यह जान कर ज्ञानियो । वेश्यासेवन जैसे
व्यसन का दूर से ही त्याग कगे।
प्रश्नावली
1-चारुदत्त क्सिमा पुन या ? उसका स्वभाव कैसा था ?
२-चारुदत्त को वेश्या के घर जाने की कैसे आदत पड़ी।
५-वेरपा का प्रेम किस वस्तु में अधिक होता है ?
४-वेश्यागमन में चारुदत्त की क्या दुर्गति हुई ?
५. वेश्या सगति से क्या क्या हानिया होती हैं ?
६-बारुदत्त की क्या से तुमको क्या शिक्षा मिलती है? अपने
शब्दों में बताओ।
पाठ २२
शिकार से हानि
कल्याणकटक नगर में एक भैरव नाम का शिकारी रहता
या। यह प्रतिदिन शिकार के लिये जगल मे जाया करता था।
जिस दिन उसे शिकार मिल जाता बड़ा सुश होता, न मिलवा
तो दुखी होता । एक दिन शिकार की खोज करते करते वह
मिध्याचल क वनों में जा पहुंचा । वहर उसने कुछ दूर हिरखो
के मुएड को चरते हुए देखा। वह अपना धनुप खींच कर

सदा मीठी वाणी धारण करो। ६ ३ दबे पांव उनकी ओर चला । जर पास पहुचा तो उसने एक हिरण पर तीर चलाया। तीर लगते ही बेचारा हिरण पृथ्वी पर गिर पड़ा। भैरव इस मरे हुए हिरण को लेकर अपने घर को लौट रहा था। राह में उसने एक भयानक सूबर को देवा । सूअर को देखते ही उसके मनमें विचार पाया कि यदि इस सूअर का भी शिकार कर लिया जाय तो अच्छा हो । उसने हिरण को पृथ्वी पर रख कर सूअर पर बाण चलाया दैवयोग से उसका बाण चूक गया । इतने में सूअर ऋद्ध होकर उम शिकारी पर झपटा और बादल सी गर्जना कर उसकी कमर में एसी कर मारी कि वह कटे पेड़ के समान घडाम पृथ्वी पर गिर पड़ा, और बातम्यान से मर कर दुर्गति को गया। सच कहा ह- "जो गल काटे और का, अपने रहे कटाय।" M देवो शिकारी ने रसना इन्द्रिय की लोलुपता से निरपराध, दोन हिरण को मारा । उमसे बहुत बस पाप कमाया लो उसी समय उदय में आकर उसके प्रासों का घातक बना। पालगे! शिकार खेलने वालों का हृदय बड़ा ही कठोर और निर्दयी होता है । उनकी श्राग्वों से सटा क्रोध को चिनगा- रिया छूग करती हैं। उनकी बुद्धि क्रूर होती है, और, सदा

हमेशा परापर वले से ही प्रीति करना ठीक है।
तके दिल में पाप वासनायें जाग्रत रहती है। बहुत से लोग
कार खेलने को बड़ी वीरता कहते हैं हर यह मिथ्या है।
ज्ञा जिमम निर अपराध जोंगों के प्राणों का घात किया जाय
वीरता का काम कैसे हो सकता है। हम सब यह जानते
कि जरा सा रॉटा चुम जाने से हमें 'कितना दुःख होता है,
२ जिसके प्रारा लिये जाते है, उसे, कितना कष्ट
ता होगा।
इसलिये भाइयो ! यदि तुम अपना और दूसरों का भला
हते हो यदि तुम्हारे दिल में कुछ दया है, यदि तुम अपगे
विन को शान्तिमय बनाना चाहते हो, तो शिकार के भावों
| अपने हृदय से निकाल कर फेक दो।
प्रश्नावली
-भैरव कौन था और उसका क्या कार्य था?
-शिकार खेलना बहादुरी का कार्य है या नहीं ? यदि नहीं वोक्यों
?
-शिकार खेलने से क्या हानिया होती हैं।
-कथा को सुनाते हुये बताओ कि भैरव को शिकार खेलने का
पा पुरा पल भोगना पड़ा ?
-इस कहाना से क्या शिक्षा मिलती है।
-जो गल काटे और का अपना रहे कटाय' इसका अर्थ अपने
लों में समझायो।

दूसरे के दोप प्रगट न करा क्योंकि उसे दुस होता है।
पा,२३
चोरी का बुरा फल
कौशाम्बी नगरी में राना मिहरथ राज्य करते थे । वहा
एक चोर रहता था, जो बडा कपटी और ठग था। दिन म
वह पचाग्नि तप करता था और रवि म चोरी किया करता
था। लोगों को उसका छल मालूम नहीं था। मब उसे तप
के कारण पड़ा तपस्वा और महात्मा समझते थे।
!
जप नगर मे बहुत मी चोग्यिाँ होने लगों तो नगर
चामियों मे खलरली पड़ गई। सब इकठे हो कर राज दरवार
में पहुंचे, और हाथ जोड़ कर गजा से प्रार्थना करने लगे कि
महाराज ! हम रहे दुवो हैं, नगर में प्रति दिन चोरी होने
लगो हैं और चोर का पता नहीं चलता । इम पर राजा ने
कोतवाल को बुलाया यो क्रुद्ध हो कर हुक्म दिया कि
या ता मात दिन के भीतर चार का पता लगाओ नहीं तो
रड़ा दण्ड दिया जायेगा।
कोतवाल ने तीन चार दिन तक पहुत प्रयत्न किया
परन्तु चार का कहों पना नहीं ल। कोतवाल बडी चिन्ता
मे था। इतने में व एक भूखा नाबण मिया माँगने माया
कोतताल न महा-भाई ! तुम्हें माख की पड रही है,' यहाँ,

६६ यदि तुम दूसरा के दोष छिपाओगे तो दूसरा भी छिपायेगा।
प्राणों की चिता हो रही है। भिखारी ने कहा --यह कैसे!
कोतवाल ने मारा हाल कह सुनाया।
भिसारी ने फिर कोतवाल से पूछा-यहाँ इस नगर मे
कोई तपस्वी रहता है। उत्तर मे कोतवाल ने उसी स्पटी
तपस्वी महात्मा को बताया।
भिखारी ने कहा-'वही नि सन्देह चोर है।' यद्यपि
कोतवाल ने अपने विश्वास के अनुसार उसे पड़ा तपस्वी
महात्मा सिद्ध पिया, परन्तु भिखारी ने एक न मानी, और
इस प्रकार के साधुनों द्वारा ठगे जाने की आप चीती कथाये
सुनाकर कोतगल का भ्रम दूर कर दिया। इस पर कोतराल ने
मिकारी को चोरी का पता लगाने के लिये नियत किया।
भिखारी ब्राह्मण अन्धे का भेष बनाकर तपस्वी के आश्रम
में पहुंचा और चिल्लाने लगा कि मैं अन्ध्रा हू रात होगई
है कृपा कर मुझे यहाँ पसेरा दीजिये । यद्यपि तापस के
घेलों ने उसे भगाना चाहा पर वह वहीं गिर पड़ा।
यह ममझ कर कि अन्धा है इमारे काम मे कुछ
बाधा नहीं डाल सस्ता उसे वहा पटा रहने दिया। वह पडा
पडा उसके सर कामों को देखता रहा।
आधो गत क समय तापम और उनके चेले नगर मे
चोरी करने गये और बहुत सा धन चुरा कर लाये । चोरी
।
तापस ने
म

जाविद्वान खोट शब्द पोले यह मूर्स है।
का सर माल उन्होंने पाश्रमके एक अन्धप मे पटक दिया।
सबरा होते ही तापस तो अपका पचाग्नि तप तपने लगा
और यह अन्धा बना हुया भिकारी लाठी सटमाता हुआ
गर की ओर चला । कोतवाल से जा कर आँख देखी रात
की सारी घटना कह सुनाई । कोतकाल ने तुरन्त जाकर पाश्रम
को घेर लिया और तलाशी में चोरी का मन माल पा लिया।
तापम और उमा पेले का हथकडी लगाकर राजदरबार में
हाजिर किया गया।
राजा न जाँच पडताल के बाद अपराधियों को कारागार
का म्हा दण्ड दिया । तापस कारागार मे श्रार्तध्यान से मर
दुर्गति को गया । नगरपामियों को बुलाकर राजर्जा ने उनका
चारो गया हुआ माल सप वापिस कर दिया और मिखारी
नावण को बडा इनाम दिया।
पालको ! देखो चोरी से तापस की कैसी दुर्दशा हुई !
सारे नगर में उसकी निन्दा होने लगी और राजा ने उसे
कड़ा दण्ड दिया । युरी मौत मरकर खोटी गति में गया।
चोरी से घटकर कोई पाप नहीं है। चोरको कोई अपने
पास नहीं फटकने देता है । चोर का विश्वास जाता रहता है।
चोरी का माल ठहरता नहीं व्यर्थ ही नष्ट होजाता है। चोर
के मन गुण नष्ट हो जाते है। चोर को हर समय चिंता और
।

विद्या दान के परा वर दूसरा दान नहीं है।
मय बने रहते है । अनक शारीरिक और मानसिक कष्ट
उठान पड़त हैं। इमलिय भूलकर भी चारी की बुरी आदत
नडालो।
प्रश्नावली
१-तपस्वी कौन था और उसका क्या काय था? क्या वह एक
सरचा महात्मा था?
२-राजा ने कोतवाल को क्या हुक्म दिया ? और क्यों दिया
यह भी लियो।
३-कोतवाल ने घोर का पता पैसे लगाया ?
४-तपस्वी तथा उसके चेलों को चोरी करने का क्या क
मिला?
५--इस कहानी के पदने से क्या शिक्षा मिलती है ?
पाठ २४
परस्त्री-सेवन का बुरा फल
जुए म अाना सर रान पाट हार जाने के बाद दृढ़प्रति
पाडव द्रोपदा महित धार धार नगर से बाहर निकले । नह
दिनों तक अनेक पन, श, नगर, ग्राम पादि में घूमते घूम
विराट नगर में पहुंचे। यहां के राजा का नाम भी विराट था
ये लाग नाना भेष पना र राजा के पास गये । युधिष्ि
माज भाट रन, भीम रसोइया बनकर गये, और अर्जुन

ur
जिसका आचरण ठाक है उस आदर होता है।
कचुकी का वेष रखा। सहदेर ज्योतिपी होकर गये और
नकुल साईस बने । सती द्रोपदी मालिन के वेष में गई । राजा
इनसे बहुत प्रसम हुआ और जो जिम घेष में था उसे उमी
कार्य में नियुक्त कर दिया । इस प्रकार सब गजा के सेवक
बनकर रहने लगे।
राजा विराट के एक सुन्दर और गुणवती स्त्री थी। इसका
भाई अथात् महारान का साला, कीचक एक दिन अपनी
बहिन से मिलने पाया । उसने रनवास में मालिन के वैप में
द्रोपदी को देखा । दखते ही यह उसके आर मोहित हो गया
और प्रतिदिन द्रोपदी से अपनी पापवासना प्रगट करने लगा।
एक दिन किसी एक शून्य मकान में सोचक ने द्रोपदी
का हाथ पकड लिया । परन्तु उस बीर नारी ने अपने बल
और धैर्य से उस समय उस पापो से छुटकारा पा लिया।
द्रोपदी रोती हुई युधिष्ठिर के पास आई और यह सब वृत्तान्त
कह सुनाया। सुनते ही युधिष्ठिर क्रोध से लाल हो गये।
उन्होंने कहा जहाँ स्स्य राजा दुगचारी हो, वहां प्रजा के
दुराचार का क्या ठिकाना ? विद्वानों ने ठीक कहा है-
"जैसा गजा होता है वैमी ही प्रजा हो जाती है "यह
कह कर युधिष्ठिर ने द्रोपदी को ढाडम बघाया, और,
'सुशीले ! तुम गगे हो, जो तुमने अपने
y

पर पनी भगद मारी।
वयं ना की। भय न झग, ममार ममियों की शाम
शाल सही होता।
इम समय माम मा दादा जी दुपमर्ग पान गुन ।
था । द्रोपला इस विस्तार सेन महगका । उम
द्रोपाम का-'तुम भय मन कग, मब अच्छा होगा
देखो, नगर बाहर एक नाटागाला है, किंगा तह उ
पापी का धोका दस हा पुला लो । उगक को पार
मैं उसे वहा पाऊगा।
भीमा यासानुमार दूसरे दिन दापनी ने शंचर
कहा--'जैसे तुम मुझ नाहने हो, बेरो म भी तुम्हें चाहती है।
मानदी गन को हमारा तुम्हारा ममागम नगर के पा
नाट्यशाला म होगा' 1 द्रापदा के यह वचन मुनकर को
पहुन प्रसन्न हुया और नाना प्रभार क शृङ्गार मामना ले
माटरशाला में गया।
वहाँ भीम पहिले से ही द्रोपदी के रूप में विपर
था । कामान्ध कोचर हिताहित की बात न जानकर दोष
के प्रम से अपला ही नाट्यशाला में घुम गया । यह झट थ
घड़ा और द्रोपदी वेपी भीम का हाथ पहा । परन्तु हाथ
से उसे जान पड़ा कि यह दोपदी नहीं है किन्तु
यह सोचकर उसने अपने हाथ उड़ाने का र

ओ नपरदस्त से झगड़ा करता है, अक्लमटी नहीं करता है
क्यिा पर छुड़ा न मका | फिर क्या था दोनों में परस्पर
घोर युद्ध होने लगा।
चलनान भीम ने हाथ का एक एमा प्रहार किया कि
कीचक घडाम से पृवी पर गिर गया और उसके शरीर की
हड्डियाँ चूर चूर होगई । उमझा माँप रक गया और एक
शब्द बोलना भी उसे कठिन होगया। उमझी छाती पर पार
देर भीम ने कहा--'दृष्ट, परवान्त, नीच ! देख यह सब
परखो लपटता का फल है। यह कहकर उमझी छानी में एक
ऐमी जोर को लात नमाई फि जिमसे उसका एक क्षणभर में
ही काम तमाम होगया।
देखो लडको ! कीचक को परस्त्रीग्त होने का फैमा जुरा
फल मिला ! उसकी कातिं नष्ट होगई और पुल में कलंक
लगा । अन्त म भीम के हाथ से उमकी मृत्यु हुई । अत:
परस्त्री-सेग्न से दोनों लोक रिगड़ते है। हजारों वर्षका
उज्वल यश एक तणमात्र में नष्ट हो जाता है। परस्त्री-सेग्न
करनेगले को इस लोक में धनहानि, शारीरिक कष्ट और
परलोक में नरमादि कुगतियों के दुख मोगने पड़ते हैं। जो
परस्त्री का सेवन करते हैं वे मनुष्य नहीं, नीच है।
इमलिये हे बुद्धिमानों, पर स्त्री को सगति से-अपनी
रक्षा करो।

जो यथार्थ उपदेश नहीं मानते ने मनुष्य नहीं है।
प्रश्नावली
१-द्रोपदी कौन थी १ दापदी और पाएव निराट राजा के यहाँ
ये म क्या रहते थे।
कोचर कौन था ? उसने द्रोपदी के साथ क्सा व्यवहार
किया?
३-योचक की मृत्यु किस प्रकार हुई ? तुम्हारे विचार में भीम ने
कीचक का धोने से मार कर अन्धा किया या बुरा ?
४-परती को बुरी दृष्टि से देखने के पारण कीचक को क्या पुरा
फल उठाना पडा?
पाठ २५
सप्तव्यसन
बालको, व्यसन पुरी आदत को कहते हैं। यह पीछे
लगजाने पर बडी कठिनता से छूटता है । व्यसन आपत्ति
मी कहते हैं । इनके कारण इस लोक में दुख और अपयश
तथा परलोक में दुर्गति और निन्दा होती है । ससार में नरक
व पशुगति के तथा दुखो, दारिद्री मनुष्यगति के मर्च मस्टों
के मूल कारण ये व्यसन ही हैं । जी मानए इनसे बचकर
रहते हैं वे अपने जीवन को सफल करते हैं। वे सदा सुखी
हैं। इन सातों व्यसनों की कयायें तुम पढ़ चुके हो।

७३ 1 यदि पेट न हो तो कौन क्सिका। इन सातों व्यसनों से अपने को हमेशा पचाते रहो । नीचे लिखे दोह को एठस्थ करता। दोहा-जूबा खेलन माम मन, वेश्या व्यसन शिकार । "चोरी पर ग्मनी रमन, मातों व्यमन निशर ॥ प्रश्नावला १-व्यसन किसे कहते हैं और कितने हे ? नाम बताओ? २-मदिराशन का त्यागी और कौन कौन मो वस्तुएँ नहाँ सेवन ३-दूसरों की रक्षा करने के लिये हिंसक पशुओं या जीवों को मारना अच्छा है या चुरा ? कारण सहित यताओ। करेगा? - पाठ २६ वोरह भावना (५० भूधरदास कृत) अनित्य भावना राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार । मरना सबको एक दिन, अपनी अपनी वार ॥१॥ शरणभावना दलपन देवी देवता, मात पिता परवार । जीव को, कोई नराखन MA मस्ती भगड़ालू मनुष्य से काम करना बेवकूफी है। समार भायना दात पिना निर्धन दुखी, तृष्णारश धनरान । कह न सुखममार म, सब जग देखा छान ॥२॥ एक्त्त भावना श्राप यकला अस्तर, मरे अफला होय । या नई या जीर को, साथी मगा न कोय ॥४॥ थयत्थ भावना जहा दह अपना नहीं, तहाँ न अपना कोय । घर सपत्ति पर प्रस्ट ये, पर है पग्निन लोय ॥५॥ अशुचि भावना दिपे चाम चादर मही, हाद पोंजरा देह । भीतर या मम जगत म, योर नहीं घिन गेह ॥६॥ श्राव भावना मोन्ठा-मोह नींद क जोर, जगवामी घूम सदा । कर्म चोर चहु ओर, मरयम लूट मुध नहीं ॥७॥ सैवर भावना सत गुरु देय जगाय, मोद्द नींद जब उपशमै । तब कुछ पने उपाय, कर्म चोर आवत रुके ।।८।। पच महानत सचान, समिति पच प्रकार । प्रपल पंच इन्द्रिय विजय, धार निर्जरामार ||६|| ७५ - जो लोग काम में जल्दी करते हैं पीछे पछताते हैं। लोक भावना चौह गनु उनग नभ, लोक पुरुष मठान ! ताम जीप थनाटि ने, भरमत हैं बिन ज्ञान ॥१०॥ योधि दुर्लभ भावना आच मुरतर देय मुम्व, चिनत चितारेन । पिन साचे बिन चिंतये, धर्म सफर सुखदेन ॥११॥ धर्मभानना चन क्न रचन रान मुम्ब, मर ही मुलम कर जान । दुर्लभ है ममार में, एक जथाग्य नान ॥१२॥ प्रश्नारली १-मावना सेि कहते हैं ? और ये कितनी होती है ? नाम बताओ। २-भावना श्रा का चितवन कौन करते हैं और क्यों करते? ३-अशरण भारना न थ यत्व भावना में क्या भेद है? ४-धर्म मावना व लोक भावना के छ । यताओ। -था' व धौर मवर भागमा मे तुम क्या समझते हो। -इस गरह भावना के बनानेसराजे कौन थे। " ७६ चौवीस तीर्थकरों के नाम चिह्न आदि चिन्ह जन्मनगरी पिता निर्वाण भूमि पैल हाथी घोडा बन्दर अयोध्या अयोध्या श्रावस्ती अयोध्या चक्वा १ श्रादिनाथ २ श्रीअजितनाथ ३ कीसंभवनाथ ४ श्रीवभिनदनाथ ५ श्रीसुमतिनाथ ६ पीपद्मप्रभु कीसुपार्श्वनाथ ८ श्रीचन्द्रप्रमु ६ श्रीपुष्पदन्त १० श्रीशातलनाथ ११ भीधेयांसनाथ जा श द जवान से निकल जाता है, वापिस नहीं होता। " नाभिरामा मादेवी कैलाशपर्वत जितशत्रु विजयसेना सम्मेदशिसर जितारि मुसेना सवर सिद्धार्था मेघप्रमु मङ्गला धारण सुसीमा प्रतिष्ठित पृथ्वी महासेन सुनक्षण सुग्रीव सुनन्दा विमल शिमला " लाल कमल साथिया ७ " पद्मा कौशांबी बनारस पन्दपुरी काबन्दी महिलपुर सिंहपुरी " " " श्रीवृक्ष गैंड़ा 2 पिता " " " सुदर्शन " नं० नाम चिन्ह जन्मनगरी निवाण भूमि ९ श्रीवासुपूज्य भैसा चम्पापुरी पसुपूज्य विजया चम्पापुरजी । ३ श्रीविमलनाथ कम्पिला सुछतरमा सम्मेदशिखर १४ श्रीअनन्तनाथ सेही अयोध्या দুধ सुरजा १५ श्रीधमाद वत्र रतनपुर भानु सुबता १५ शानिधनाथ मृग हस्तिापुर विश्वसेन ऐग १७ श्रीकुन्युनाथ यकरा श्रीमती १८ श्रीअरनाथ मीन मिना १६ श्रीमल्लिनाथ मिथिला प्रजावती २. श्रीमुनिसुप्रत क्छषा राजगृही २१ श्रीनमिनाथ नीलकमल मिथिला विजयरथ पिपुला .. श्रीनमिनाथ श द्वारिका समुद्र वनय शिवा गिरनार पर्वत २३ श्रीपार्श्वनाथ सर्प बनारस अश्वसेन वामा सम्मेद शिखर २५ श्रीमहावीर सिंह पावापुर सिद्धार्थ मिथिला पावापुर चौबीस तीर्थरों में से श्रीवासुपूज्यजी, ओमल्लिनाधना, श्रीनेमिनाथजी, श्रीपार्श्वनाथ जी और भीमहावीर भगवान ये पाल ब्रह्मचारी हुए जो नदुसती कारयाल नहीं करते बीमार हो जाते हैं " सुमन " -- 'MONE नोट-इन ६

प्रश्नावली
१-ताथमा किने होते हैं ? तुम क्सिी प्रतिमा को देखकर किस
प्रकार जानोगे कि यह प्रतिमा अमुक शीर्थर की है ?
२-तीथकर भगवान के चिन्ह कौन नियत करता है ? और कब
करता है ? यतायो तीर्थकरों के चिन्ह नियत होने से क्या
लाभ है?
५-निम्नलिखित तीथक्करों के क्या चिन्ह हे.
आदिनाथ, पद्मप्रभु, कुथनाथ, शातलनाथ, नमिनाथ, और
महावीर।
४-मनाओ निम्नलिखित चिह कौन से तीर्थहरों की प्रतिमा पर
पाय जाते हैं-
भैंसा, सर्प, हरिण, सेही, घोडा, चद्रमा, साथिया ।
५-पालबहाचारी से तुम क्या समझते हो ? कौन • से तीर्थ
बालग्रझचारी हुए, उनके नाम बताओ।
६-चौबीस वार्थहरों के पृथक् पृथक् निर्वाण क्षेत्रों के नाम
-
बताओ।
पाठ २८
धर्मवीर सम्राट एल खारवेल
अयोध्या के इत्यावशी जायों का राज कलिंग
(उडीमा) तक हो गया था। गगना पल खारवेल
देश क भूपण या
इसी

रामा के नौकर मे लेन देन करना उचित नहीं।
"होनहार विग्वान क, होत चीक्ने पात।"
पाली कहावत के अनुमार उनके मुस पर वचपन ही से
एक अपूर्व तेन भलस्ता था। उनसी बहुत सुन्दर और दृढ़
शरीर मन को मोह लेता था। वे बड़ महावीर मालूम पड़ते
थे । एल खारवेल थोड़े ही दिनों में धर्मशास्त्र, राजनीति,
शासविद्या यादि सर क्लाओं में पारगत हो गये थे।
पढ़ते पढ़ते ऐल खारवेल यह सोचा करते थे कि-देखो,
इस देश में चन्द्रगुप्त, अशोक, सम्प्रति प्रादि कैसे से सम्राट
अहिंसा धर्म के प्रवर्तक थे और उनके शासनकाल में जैनमुनि
निर्वाधरूप से धर्म पालते हुए यत्र तत्र विचरते थे। पर आज
उन्हीं के सिंहासन पर मौर्य समाट का सेनापति पुष्यमित्र
पैठ कर पैसे कैसे अनर्य कर रहा है। बेचारे दीन, दुखी
पशुओं को हिमायज्ञ की वेदियों में झोंक रहा है, और इसे
धर्म बता रहा है । इन दीन, निरपराध पशुओं ने किमी का
क्या बिगाड़ा है, पर यह उनम हवन कर वैदिक यन्न बना
रहा है। क्या यह एमा अन्याय और अधर्म होता ही रहेगा ?
अभी खारवेल मतरह ही वर्ष के हो पाये थे कि इनके
पिता का देहान्त हो गया। यलिंग का गजसिंहामन सूना
हो गया। सारवल बिना पचीम वर्ष के हुये उमपर नहीं बैठ
सकने ये । अत युवराज पट से दश की रक्षा करने लगे।

जिसगे तुम्हारा विश्वास नहीं उसके पास न ठहरो।
1
एक बार उन्ह मालूम हुआ कि उनऊ पहामी कश्यप
क्षत्रियों को आततायी मूपिक लोग कष्ट पहुचा रह हैं।
दलित-अमित प्राणियों की रक्षार्थ झटपट ग्वाग्वेल ने उनपर
चढ़ाई करती और विजय ग भएडा फहराते हुये यह राजधानी
में लौट आय।
खारवेल अभी लडक ही थे, परन्तु उनका पल, पराक्रम,
रणकौशल, नीति, चातुर्य, गमोरता अनुभव को प्रकट करता
था। उन्हान देशोद्धार के साथ साथ धर्म का उन्नत बनाने
का प्रण कर लिया था । पुष्यमित्र पर खारवेल ने दो बार
आक्रमण पिया। दूसरी बार वह विजयो हुए । मगध में अब
फिर हिंसक पशुपज्ञ कठिा हो गये । इस जीत में खारवेल
बहुत सी वस्तुयें लाये उनम रनिंग का एक प्राचीन मूर्ति भी
लाये जो किसी समय नन्द राजा वहा से ले गये थे । वह
मूर्ति "अन जिन" नाम से विरयात थी और प्रथम जैन
तीर्थंकर ऋषम दर की थी। खाग्वेल ने एक सुन्दर भन्य
मन्दिर बनवाया और उममे उम मूर्ति को बड़े ठार घाट से
विराजमान किया। अब वह गज पद पर थारूद होगये थे
और कलिंग सम्राट् कहलाते थ ।
उन्होंने पुष्यमित्र के अतिरिक्त दक्षिण भारत के सभी
राजामा को अपने आधीन किया। विदेशी यवनों का सरदार
उत्तर भारत पर पाना सिका जमा रहा था,

जो चित की बात जानता है वह प्राणों से प्यारा है।
और मधुरा तक बढ़ गया था। वारवेल ने इस घटना की
उपेक्षा नहीं की। किन्तु खारवेल के प्राने स पहिले हो यह
मधुरा धाड सीमा प्रान्त की ओर चला गया । मच मुच
खारवेल के रण-कौशल को देखकर लोग चरित होते है,
ओर उन्ह भारत का नेपोलियन बताते हैं।
निस प्रकार खारवल ने राजक्षेत्र मे अपना नाम
उज्ज्रल रिया उसी प्रकार अपन धामिक कार्यों द्वारा भी
वे अपना नाम अमर कर गये हैं। उनके अनवाये हुये
सुन्दर गुफा मन्दिर और जैन मूर्तियों के लिये प्राश्रम
ग्पण्डगिरी, उदयगिरी पर्वत पर हर मौजूद हैं । इसी स्थान
पर खारवेल का एक बड़ा मारी शिलालेख खुदा हुथा है,
जिसके पड़ने से आन हम इस धर्मवीर का नाम जानने
को मिलता है।
खारवेल को वचपन से ही धर्म को लगन थी। गाना
होकर उसने उसे अमलीपाना पहना दिया, जैन धर्म की
प्रभावना हुई । वह स्वय कुमारी पर्वत पर जैन सपियों की
सगति में रहकर धर्माचरण अभ्याम करता था। रह यहा।
धीर वीर राजा या ।
बालको ! जब तुम मी बड़े हो जायो और किसी
ऊचे पट पर पहुचो तो अपने प्यारे धर्म को उन्नत करना ना
रहोगे तो तुम्हारा नाम
V
भूलना । धर्म
.

२
मरने वाले रोगी को नया चुरी लगती है।
ो जायेगा। तुम भी ग्यारवेल की तरह दृढप्रतिज्ञ, जिनधर्म
उक्त, निरग्रन्य गुरुसेगी, धर्माचरणी उनना।
प्रत्यापली
:-माहराजा ऐल सारवेर कौन से वश मे उत्पन्न हुए थे और वे
पढ़ते समय क्या सोचा करते थे।
२-युवराज पद से तुम क्या सममने हो ? ऐल सारवेल अपने
पिता की मृत्यु होने पर सिंहासन पर क्यों नहीं बैठ सके ?
३पारवेल को नपोलियन क्यों कहते हैं ?
४-सारवेल ने राजा होकर अपनी प्रजापालन के अतिरिक्ष और
क्या क्या बडे कार्य किये ? सारवेल के जीवन से तुमने
क्या सीसा?
पाठ २६
यमपाल चाण्डाल
काशी के राजा पाकशासन ने एक ममप दिडारा
पिटना दिया---'दन्दीश्वर पर्व में पाठ दिन ता किमी
जीर का वध न हो, इम राजाज्ञा का उन्लघन करने वाला
प्राणएड का भागी होगा' । राजा क एक पुत्र था जिसका
नाम तो धर्म था, पर वह था बडा अधर्मी । सप्तव्यमनों
का सेवन करने वाला था। नडा मासलोलुपी था । मांस
ग्वाये रिना उमसे एक दिन मी न रहा जाता था । एक
दिन राजाना के डर से यह गीचे म गया और राजा के
खाम में से जो फि वहीं बाधा रहता था मार डाला।

८३
दुराचार जीवन की अधोगति करता है
झरे दिन जब राजा ने मेंढ़े को न देखा, और बहुत
सोज करने पर भी पता न चला, तर गजा ने मेढ़े का पता
लगाने को बहुत से गुप्तचर निपत किये। एक गुप्तचर धाग
मे भी चला गया । पाग का माली रात को अपनी स्त्री
राजपुन द्वारा मंदा मारे जाने की पात कह रहा था।
गुप्तचर न सुन लिया और राजा से जाकर कह दिया।
को पढ़ा क्रोध आया। उसने कोतवाल को युलाफर पाना
दी कि राजपुर को ले जाकर शूली चढ़ा दो। एक तो
इसने जारहिंमा की है मर राजाजा भग की है।
कोतमाल राजपुर धर्म को श्मशान भूमि में ले गया,
और सिपाहियों को मेजकर यमण्ड का बुलाया जो हमी
काम के लिये नियत था। पर यमपाल ने एक दिन परम
निरग्रन्य जिन मुनि के पाम नियम लिया था कि मैं चतुर्दशी
को जीर बध नही कर गा! पान चतुर्दशी का दिन था।।
मिपाहियों को पाते देखकर यह 'घर में छिप गया और
अपनी स्त्री से कह गया कि-'अगर कोई मुझे बुलाने
आये तो उमसे कह देना, यहां नहीं हैं दूसरे गांव गये हैं।
मिपाहियों ने आकर जन चांडाली से पूछा तर उसने कह
दिया कि यह दूसरे गाव गया है । सिपाहियों ने बड़े खेद के
माथ कहा-'हाय ! यह पड़ा श्रमागा है उसका माग लोटा
है। आज ही
के मारने का मौका श्राया

सुख का मूल कारण सन्तोश है।
होचल दिया । अगर यह रानपुर का मारता तो उसके सत्र
गहने, कपड़े उमसे मिलते गहने काडों का नाम सुनकर
यमपाल की स्त्री मुह में पानी भर आया। उसने अपन
पति श हानि लाम कुछ न मोचकर रोने का ढोंग बना
कर-'हाय चे श्राज ही गार गे चले गये' । मुह से यह
कहकर, हाथ से घर को ओर इशारा कर दिया और छिपे
हुए स्वामी को बता दिया।
मिपाहियों ने भीतर जाकर यमपाल को घर से बाहर
निकाला । निस्लते ही निर्भय होरर उमने कहा-'आन
चतुर्दशी का दिन है और मुझे पान अहिंसानत है मेरे
प्राण मले ही चले जायें पर मे बाज जीर हिंमा नहीं करुगा
उसका यह उत्तर सुनकर सिपाही उमको गजाके पामलेगये।
राना एक तो गजपुन पर पहले ही गुस्मा हो रहे थे।
इसपर यमपाल को राजाज्ञा का उल्लघन करनेवाला और
अभिमानी देखकर कोतगल को गजा ने आज्ञा दी कि--
'जायो, इन दोनों को मगरमच्छ श्रादि क र जीवों से भरे
हुए तालार में छोड़ दो।' कोतवाल ने ऐसा ही किया
और दोना को तालान में डाल दिया।
तालाव मे डालते ही पापी धर्म को तो जल के जीवों
ने खा लिया। पर यमपाल अपने व्रत पर दृढ़ रहा था इससे
उसके उच मावों और प्रत क प्रभाव से देवों ने उसकी रक्षा
है

,
।
जो थपना प्रादश श्रेष्ठ रसता है वह स्वय श्रेष्ठ बनता
की। उन्होंने धर्मानुराग से तालार म ही एक सिंहासन पर
यमपाल चाडाल को बैठा दिया। उसरा अभिषेक क्यिा,
और बहुत आदर किया। जब राजा प्रजा को यह हाल
मालूम पहा तो उन्होने भी यमपाल को वस्त्राभूपण देकर
सम्मानित किया।
पालको, यमपाल चाटाल रा दृढ़ व्रत के प्रभाव से
देवा ने कमा सन्मान किया । पूजा गुणों की होती है,
जाति की नहीं । ब्राह्मण, क्षत्री, श्या को कमी जाति का
अभिमान नहीं करना चाहिये ।
देखो, एक चाडाल मी व्रत के महात्म्य से देशी
तथा राजा द्वारा सम्मानित हुआ, तो और मनप्य भी
जो ऐसे व्रतों को धारण करते तथा पालते हैं क्यों पूजित
नहीं होंगे ? अवश्य होंगे।
प्रश्नावली
१-काशी का राना कौन था और उसने किस बात का ढिडारा
पिटवा दिया था
२-राजा की आज्ञा उल्लघन करने वाला कौन था और उसके
लिये गजा ने क्या दण्ड दिया!
३--यमपाल कौन था ? उसने क्या न ले रक्सा था!
४-यमपाल की स्त्री ने कैसे और क्यों अपो हिप
पति को
५-राजा ने यमपाल के लिये क्या आज्ञा दी। जाति
होने पर भी यमपाल देवों द्वारा क्यों
६ इस बहानी को
७९ क्या शिक्षा
बता दिया।
.

सुम्ब का मूल कारण सन्तोश है।
हीचल दिपा । अगर यह राजपुर का मारता तो उसके सर
गहने, स्पड़े उमसे मिलते' । गहने काड़ों का नाम सुनकर
यमपाल की यो छ मुहम पानी भर आया। उसने अपने
पति का हानि लाभ कुछ न मोचकर रोने का ढोंग धना
कर-'हाय वे भान ही गार को चले गय' 1 मुह से यह
कहकर, हाथ से घर को ओर इशारा कर दिया और छिप
हुए स्वामी को बता दिया।
सिपाहियों ने भीतर जाकर यमपाल को घर से बाहर
निकाला । निम्लते ही निर्मय होरर उसने कहा-'आन
चतुर्दशी का दिन है और मुझे पान अहिंमावत है मेरे
प्राण भले ही चले जायें पर मयाज जोर हिंमा नहीं रुगा
उसका यह उत्तर सुनकर मिपाही उमको गजा पामलेगये।
राजा एक तो गजपुन पर पहले ही गुस्मा हो रहे थे।
इमपर यमपाल को रानाना का उल्लघन करनेवाला और
अमिमानी देखकर कोतपाल को राजा न आज्ञा दी कि-
'जायो, इन दोनों को मगरमच्छ आदि कर जीनों से मरे
हुए तालाब में छोड़ दो। कोतवाल ने ऐमा हो किया
और दोनो को तालार में डाल दिया।
तालाव म डालते ही पापी धर्म को तो जल के जीनों
ने खा लिया ! पर यमपाल अपने व्रत पर दृढ़ रहा था इससे
रमके उच्च मानों और व्रत क प्रभाव से देयो ने उसकी रक्षा

जोधपना मादश श्रेष्ठ रसता है वह स्वयं श्रेष्ठ बनता है। ८५
की। उन्होंने धर्मानुराग से तालार में ही एक मिहामन पर
यमपाल चाडाल को बैठा दिया। उसका अभिपेक रिया,
और बहुत अादर किया। जब राना प्रजा को यह हाल
मालूम पड़ा तो उन्होंने भी यमपाल को यन्त्राभूपण देकर
सम्मानित किया।
वालको, यमपाल चाडालरा दृढ़ नत के प्रभाव से
देवां ने कमा सन्मान किया । पूना गुणों की होती है,
जाति की नहीं । मामण, क्षनी, वैश्या को कमी जाति का
अभिमान नहीं करना चाहिये ।
दखो, एक चाडाल मी व्रत के महात्म्य से देवी
तथा राजा द्वारा मम्मानित हुश्रा, तो और मनप्य भी
जो ऐसे प्रती को धारण करते तथा पालते हैं क्यो पूजित
नहीं होंगे ? अवश्य होंगे।
प्रश्नावली
१-काशी का राजा कौन था और उसने किस बात का दिडोरा
.
पिटवा दिया था
-राना की प्राशा चलघन करने वाला कौन था और उसके
लिये राजा ने क्या दएउ दिया!
३-यमपाल कौन था उसने क्या बतले रक्सा था?
४-यमपाल की स्त्री ने पैसे और क्यों अपने छिपे हुए पति को
बता दिया!
५-राजा ने यमपाल के लिये क्या प्राज्ञा दी जाति का चाडाल
होने पर भी यमपाल देवों द्वारा क्यों सम्मानित हुआ?
६-इस कहानी को पढकर तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है।

:०२न परिषद् के परीक्षा पोर्ड द्वारा स्वीयर
धर्स शिक्षावला
AAL
TWASNASE
तीसरा भाग
ANANDANAamm
लेखक
प० उग्रसेन जैन, एम. ए, एल-एल, यो.
रोहतक
प्रकाशक
रघुवीरसिंह
ऑनरेरी मन्त्री
7
भारतवर्षीय दिगम्बर जैन परिषद्
घड़ा दरीबा, देहली
माठी यार
संशोधित जनवरी १९५१
सस्करण धीर निर्वाण सभ्यत २४७७
२०००
मूल्य
समाने

Jain Dharam Shikshavlli Bhag 3

Author
Jain,ugrasen
Title
Jain Dharam Shikshavlli Bhag 3
File name
Jain Dharam Shikshavlli Bhag 3
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/03
Publisher
Dehli,bharatvarshiya Digambar Jain Parishad Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551889
Barcode
4990010032585.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
pl3X29CfwBy
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