Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mukhya Tatva Chintamani

Chand,shri Shukal · 2011/02

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जैनधर्म
मुख्यतत्त्वचिन्तामणि
म
लेखक
श्री श्री श्री १००८ श्रीमनाचार्य पूज्य श्रीकाशीरामजी
महाराज के मुशिष्य प्रसिद्धवक्ता श्रीशुक्लचन्द्रजी
महाराज
प्रकाशक
श्रीलाला नरातामल जी के सुपुन
लाला वासुदेव बनारसीदास ओसवाल जैन
अम्बाला, शह
प्रथमावृत्ति]
विक्रमी स. १६६४
[मूल्य ॥.)
नोट- इस पुस्तर का मूल्य धर्मसार्य में ही लगाया जायगा।

Printed by
I R Jain at the Manobar Electric Press
Sud Mitha Bazar, Lahore
-

. प्राकथन ससार में प्रत्येक प्राणीको यह जानना अति आवश्यक है कि मैं क्या , मेरी दुखित सुसित अवस्थाका क्या कारण है, जिस वस्तुका आज सयोग है उसीका कल वियोग होता है इसका प्रधान कारण क्या है, जीव किसे कहते हैं, अजीन क्या वस्तु है, पुण्य पाप के कितने भेद हे धर्म के नियम कितने हैं, आदि तत्त्वों के मर्मको जानकर उन नियमो का पालन करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है यह न्याय सर्वमान्य है मानो इसी लिए तीर्थकर भगवान महावीर प्रभुने मूलशास्त्र दशवैकालिक के चतुर्थ अध्ययन की ११ वीं गाथा में कहा है- जो जीवेवीनयाई अजीवेवीनयाणई। जीवाजीवे आयाणतो कह सो नाहीए सजम ॥ अर्थात् जो प्राणी जीव अजीर तत्त्वों को नहीं जानता है वह साधु धर्म या गृहस्थ धर्मादि का पालन नहीं कर सकता है। ससार के दु सों से छूटने का उपाय राग द्वेप मोह का त्याग करते हुए साधु या श्रापक के चारित्र का पालन करना जरूरी है । स्वतन्त्र का मार्ग रत्नत्रय है। अर्थात् सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र इन्हीं में दत्तचित्त होकर शुद्धात्मा का ध्यान करने से सर्व कर्म कर जाते हैं और यह आत्मा शुद्ध सिद्धनिर्वाण पद का अधिकारी हो जाता है। निर्माण के मार्ग को MERA (२) जानने के लिए इस अपूर्व प्रथ का मनन करना जरूरी है। पहले भी इसमें से पच्चीस बोल का थोकड़ा, नवतत्त्व, छब्बीस द्वार का थोकडा यह प्रय प्राचीन अर्वाचीन मुनिराजों ने छपवाए है। उनके पृथक् पृथक् होने के कारण व आधुनिक स्पष्ट हिन्दी भाषा में प्रचलित न होने के कारण विद्यार्थियों को बहुत असु- विधा मालूम होती थी। उस कठिनाई को ध्यान में रखकर इस अथ में पच्चीस चोल का थोकड़ा,नवतत्त्व, छन्नीस द्वार, देवलोक का छब्बीस द्वार, गुण स्थानों का वर्णन, जेन धर्म के दस नियम आदि ऐसा विस्तार किया है कि जिससे छात्रों को च स्वाध्याय करने वालों को विशेष ज्ञान प्राप्त हो और बहुत कठिन विषय भी सामने न आवे जिससे साधारण बुद्धि वालों का मन न धवराए और धर्म का मर्म समझ सकें । इस प्रथ का पूर्णतया सशोधन न हो सकने के कारण बहुत सी त्रुटिया भी रही होंगी, उन्हें पाठक स्वय सुधार कर पढ़ेंगे। आत्मोन्नति इच्छुक जैनमुनि शुलचन्द्र

समर्पण
अपने पूज्य पतिदेव
स्वर्गीय लाला नरातामल जी जैन
की
पुण्य स्मृति में सादर भेंट ।
कृपी देवी जैन

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पच्चीस बोल का थोकड़ा

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पच्चीस वोल का थोकड़ा १. गति-चार १. नरक गति २ तिर्यश्च गति ३ मनुष्य गति ४ देव गति । २. जाति-पांच १ एकेन्द्रिय जाति २ द्वीन्द्रिय जाति ३ त्रीन्द्रिय जाति ४ चतुरिन्द्रिय जाति ५ पचेन्द्रिय जाति । ३. काय-पद् १ पृथिवीकाय • अप्काय ३ तेजोकाय ४ वायुकाय ५ वनस्पति काय ६ और सकाय । ४. इन्द्रिय-पाच १ श्रुतेन्द्रिय २ चक्षुरिन्द्रिय ३ प्राणेन्द्रिय ४ रसे- न्द्रिय ५ स्पर्शेन्द्रिय । ५. पर्याप्त-पट् १ आहार पर्याप्त २ शरीर पर्याप्त ३ इन्द्रिय पर्याप्त ४ श्वासोश्वास पर्याप्त ५ भापा पर्याप्त ६ मन.पर्याप्त । ६.प्राण-दश १ श्रुतेन्द्रिय बलप्राण २ चक्षुरिन्द्रिय बलप्राण ३ नाणेन्द्रियवलप्राण ४ रसेन्द्रिय नलप्राण ५ स्पर्शेन्द्रिय बल- पञ्चीस चोल का थोकडा प्राण ६ मनः बलमाण ७ वचन घलप्राण ८ काय बलमाण ९ श्वामोश्वास बलमाण १० आयुष्फर्म बलप्राण । ७. तनु अर्थात् शरीर-पाच १ औदारिक शरीर २ वैक्रिय शरीर ३ आहारिक शरीर ४ तेजस शरीर ५ कार्मण शरीर। ८ योग-पंचदश (४ मन के) १ सत्यमनोयोग २ असत्य मनोयोग ३. मिश्रित मनोयोग ४ व्यवहार मनोयोग (४ वचन के) १ सत्य वचन • असत्य वचन ३. मिश्रित वचन ४. व्यवहार वचन (७ काय के) १ औदारिक काययोग २ औदारिक मिश्रकाय योग ३ वैक्रिय काय योग ४ वैक्रिय मिश्रकाय योग ५ आहारिक काय योग ६ आहारिक मिश्र काय योग ७ कार्मण काय योग । ९. उपयोग-द्वादश (५ ज्ञान) १ मति ज्ञान २ श्रुत ज्ञान ३ अवधि ज्ञान ४ मन.पर्यव ज्ञान ५ केवल ज्ञान (३ अज्ञान) १ मति अज्ञान २ श्रुत अज्ञान ३ विभंग ज्ञान (४ दर्शन) १ चक्षुर्दर्शन २ अचक्षुर्दर्शन ३ अवधि दर्शन ४. केवल दर्शन। १०. कर्म-आठ १ ज्ञानावरणीय कर्म २ दर्शनावरणीय कर्म ३ वेद- नीय कर्म ४ मोहनीय कर्म ५ आयुष्कर्म ६ नामकर्म ७ गोत्र कर्म १ अन्तराय' कर्म ।

पचीस योल का थोक्टा . . ११. गुणस्थान-चतुर्दश १ मिश्यात्व गुणस्थान • शास्नादन गुणस्थान ३ मिश्र गुणस्थान ४ अनति सम्यग् दृष्टि गुणस्थान ५ देश पिरति गुणस्थान ६ प्रमादी सयति गुणस्थान ७ अप्रमादी सयति गुणस्थान ८ नियट्टि (निवर्सि) बादर गुणस्थान ९ अनि- यट्टि ( अनिर्वनि) चार गुणस्थान १० सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान ११ उपशान्तमोहनीय गुणस्थान १२ क्षीणमोह- नीय गुणस्थान १३ सयोगी फेनी गुणस्थान १४ अयोगी केवली गुणस्थान । १२ पाच इन्द्रियों के पिपय-तेईस (श्रुतेन्द्रिय के विपय ३) १ जीव शब्द • अजीव शब्द ३ मिन श (चक्षुरिन्द्रिय के विषय ५) १ कृष्ण २ नील ३ पीत ४ रक्त ५ श्वेत (घाणेन्द्रिय के विषय ) १ सुगन्ध २ दुर्गन्ध (रसेन्द्रिय के विषय ५) १ कटुक २ कपाय ३ सट्टा ४ मृदु (मीठा) ५ तीक्ष्ण (स्पर्शेन्द्रिय के विपय ८) १ कर्कश • सकोमल ३ लघु ४ गुर ५ उप्ण ६ शीत ७ रूक्ष ८ स्निग्ध । १३. मिथ्यात्व के भेद-दश १ जीव को अजीव कहे तो मिथ्यात्व २ अजीव को जीव कहे तो मिथ्यात्व ३ धर्म को अधर्म कहे तो मिथ्यात्व ४ अधर्म को धर्म कहे तो मिथ्यात्व ५ साधु को असाधु कहे तो मिथ्यात्व ६ असाधु को साधु कहे तो मिथ्यात्व

पञ्चीस बोल का थोकडा
७ मोक्ष के मार्ग को समार का मार्ग कहे तो मिथ्यात्व ८
ससार के मार्ग को मोक्ष का मार्ग कहे तो मिथ्यात्व ९ कर्म
रहित को कर्म सहित कहे तो मिथ्यात्व १० कर्म सहित को
कर्म रहित कहे तो मिथ्यात्व ।
१४. तच-नौ
१ जीव तत्त्व २ अजीव तत्त्व ३ पुण्य तत्व ४.
पाप तत्त्व ५ आभव तत्त्व ६. सवर तत्त्व ७ निर्जरा तत्त्व
८ बन्ध तन ९ मोक्ष तत्त्व ।
लघु नर तत्व के ११५ भेद
प्रथम जीन तच के १४ भेद-(एकेन्द्रिय के ४ भेद)
१ सूक्ष्म २ बादर ३ पर्याप्त ४ अपर्याप्त (द्वीन्द्रिय के
२ भेद) १ पर्याप्त • अपर्याप्त (त्रीन्द्रिय के २ भेद)
१ पर्याप्त २ अपर्याप्त (चतुरिन्द्रिय के भेद) १ पर्याप्त
२ अपर्याप्त (पश्चेन्द्रिय के ४ भेट ) १ सन्नि पश्चेन्द्रिय २
अमनि (असज्ञि) पञ्चेन्द्रिय ३ पर्याप्त ४ अपर्याप्त ।
दुसरे अजीर तच के १४ भेद-(धर्मास्तिकाय के ३
भेद) १ स्कन्ध २ देश ३ प्रदेश (अधर्मास्तिकाय के ३
भेद) १ स्कन्ध २ देश ३ प्रदेश (आकाशास्तिकाय के ३
भेद) १ स्मन्ध २ देश ३ प्रदेश (काल का एक ही भेद)
एक काल द्रव्य एर १० (पुद्गल द्रव्य के ४ भेद)
१ स्कन्ध २ देश ३ प्रदेश ४ परमाणु पुल ।
तृतीय ण्य तच के ९ भेद-१ अन्न पुण्य - (पान)

पञ्चीस बोलका थोकड पाणी पुण्य ३ लयण पुण्य ४ शयन पुण्य ५ वख पुण्य ६ मन पुण्य ७ वचन पुण्य ८ काय पुण्य ९ नमस्कार पुण्य (नम्रता)। चतुर्थ पाप तत्व के १८ भेद-१ प्राणातिपात २ मृपावाद ३ अदत्तादान ४ मैथुन ५ परिग्रह ६ क्रोध ७ मान ८. माया ९ लोभ १० राग ११ द्वेष १२ कलह (केश) १३ अभ्याख्यान १४ पैशुन्य १५ परपरिवाद १६ रति अरति १७ माया मृपा १८ मिथ्या दर्शन शल्य । पाच आश्रय तच के २० भेद-१ मिथ्यात्वाश्रय २ अव्रताश्रव ३ प्रमादाश्रव ४ कपायाश्रव ५ योगाश्रव ६ प्राणातिपाताश्रव ७ मृपावादाश्रव ८ अदत्तादानाभव ९ मैथुनाव १० परिग्रहाश्रव ११ श्रुतेन्द्रियाश्रव १२ चक्षु- रिन्द्रियाश्रव १३ प्राणेन्द्रियाश्रव १४ रसनेन्द्रियाश्रव १५ स्पर्शेन्द्रियाव (यह पाच इन्द्रिय चश न करने से आश्रय होते हैं ।) १६ मनोयोगाश्रव १७ वचनयोगाश्रव १८ काययोगाश्रव १९ भाण्डोपकरण वस पात्र अयना से ग्रहण करे, अयना से रक्खे तो आश्रय २० सूची कुशाप्रमान भी पदार्थ अयना से लेवे तथा देवे तो आश्व । छठे सवर तच के २० भेद-१ सम्यक्त्व सवर २ व्रत सपर ३ अप्रमाद सवर ४ अकपाय सवर ५ अयोग सबर ६ प्राणातिपात विरमण सवर ७ मृपावाद विरमण सबर ८ अदत्तादान विरमण सबर ९ मेथुन विर- 5 पञ्चीस घोल का थोकडा गण सवर १०. परिग्रह विरमण सबर ११-१५ पाचों इन्द्रिय वश करे तो सवर १६ गन वश करे तो सवर १७ वचन वश करे तो सबर १८ काय वश करे तो सवर १९ भाण्डो- पकरण यन से लेवे तथा देवे, रक्खे तो सवर २० सूची कुशाग्र मात्र भी पदार्थ यन से लेवे तथा देवे तो सवर । सातवें निर्जग तच के १२ भेद-१. अनशन तप २ अनोदरी तप ३ भिक्षाचरी तप ४ रस परित्याग तप ५. कायक्लेप तप ६ प्रतिसलीनता तप ७ प्रायश्चित्त तप ८. विनय तप ९ वैयावृत्य (वेयावत्र) तप १० स्वाध्याय तप ११ ध्यान तप १२ कायोत्मर्ग तप । आठौ धन्धतच के ४ भेद-१ प्रकृतिवन्ध २ स्थितिबन्ध ३ अनुभाग बन्ध ४ प्रदेश बन्ध । ननमें मोक्ष तच के ४ भेद-१ ज्ञान २ दर्शन ३ चारित्र ४ तप । इसी प्रकार छोटी (लघु) तवतत्व के ११५ भेद १५. आत्मा-आठ १ द्रव्यात्मा २ कपायात्मा ३ योगात्मा ४ उपयो- गात्मा ५ ज्ञानात्मा ६ दर्शनात्मा ७ चारित्रात्मा ८ वल. वीर्यात्मा। १६. दण्डक-चौबीस १ दश भवनपति देवों के १० दण्डक ११ सात नार- कियों का एक दण्डक १२-१६ पाच स्थावरों के पाच दण्डक

पच्चीस घोल का थोकडा
६
१७-१९ तीनों विकलेन्द्रियों के ३ दण्डक २० पञ्चेन्द्रिय
तियंचों का एक दण्डक २१ मनुष्य का एक दण्डक २२
व्यन्तर देवों का एक दण्डक २३ ज्योतिषी देवों का एक दण्डक
२४ वैमानिक देवों का एक दण्डक ।
१७. लेश्याए-पट्
१ कृष्ण लेश्या २ नील लेश्या ३ कापोत लेश्या ४
तेजो लेश्या ५. पद्म लेश्या ६ शुक्ल लेश्या ।
१८. दृष्टि-तीन
१ सम्यग् दृष्टि २ मिथ्या दृष्टि ३ मिश्र दृष्टि ।
१९. ध्यान-चार
१ आर्त ध्यान २ रौद्र ध्यान ३ धर्म ध्यान ४ शुल
ध्यान ।
२०. द्रव्य--
१ धर्मास्तिकाय २ अधर्मास्तिकाय ३ आकाशास्तिकाय
४ पुद्गलास्तिकाय ५ जीनास्तिकाय ६ काल द्रव्य ।'
पट् द्रव्यो के तीस भेद
(धर्मास्तिकाय के पाच भेद ) १ द्रव्य से एक २ क्षेत्र
से लोक प्रमाण ३ काल से अनादि अनन्त ४ भाव से
अरूप ५ गुण से गति लक्षण, चलन गुण सहाय ।
(अधर्मास्तिकाय के ५ भेद) १ द्रव्य से एक २ क्षेत्र
से लोक प्रमाण ३ काल से अनादि अनन्त ४
भाव से
अरूप ५ गुण से स्थिर गुण सहाय (स्थिति लक्षण)।

१०
पच्चीस बोल का थोकडा
आकाशास्तिकाय के ५ भेद-१ द्रव्य से एक २ क्षेत्र
से लोकालोक प्रमाण ३ काल से अनादि अनन्त ४ भाव
से अरूप ५ गुण से आकाश को अवकाश देने का स्वभाव ।
काल के ५ भेद-१ द्रव्य से अनन्त २ क्षेत्र से अढाई
द्वीप प्रमाण ३ काल से अनादि अनन्त ४ भाव से अरूप
५ गुण से वर्तना लक्षण ।
जीवास्तिकाय के ५ भेद-१ द्रव्य से जीव द्रव्य
अनन्त २ क्षेत्र से चतुर्दश रज्जु प्रमाण ३ काल से अनादि
अनन्त ४ भान से अरूपी ५ गुण से चेतना लक्षण ।
पुद्गलास्तिकाय के ५ भेद-१ द्रव्य से अनन्त २
क्षेत्र से लोक प्रमाण ३ काल से अनादि अनन्त ४ भाव से
रूपी ५ गुण से सडना, पडना, मिलना, गलना, विश्वसन
होना ही लक्षण है।
२१. राशि-दो
१ जीन राशि २ अजीव राशि ।
२२. धारक के नारह व्रत
१ निरपराधी स्यूल जीन हिंसा का त्याग करे २
स्थूल मृपावाद का त्याग करे ३ स्थूल अदत्तादान का
त्याग करे ४ स्सदारा सन्तोष व्रत को धारण करके वेश्या,
परस्त्री आदि का त्याग करे ५ परिग्रह का परिमाण करे
यह पाच ही व्रत यदि गृहस्थी सर्वथा प्रकार से धारण न
कर सकता हो तो यथाशक्ति प्रमाणपूर्वक धारण करे ६

पञ्चीस योल का थोकडा
पदिशाओं में गमन करने का प्रमाण करे ७ पदिशति
वोल वा पचदश कर्मादानों का त्याग करे ८ अनर्धादण्ड का
त्याग करे ९ काल के पाल सामायिक करे १० सबर करे
११ पर्व में पोषधोपवास करे १२ मुनि महाराज को
निर्दोप आहार देवे, अतिथि सविभाग फरे ।
२३. साधु के पाच महानत
(प्रथम महानत) १ प्राणातिपात, जीरहिंसा करे नहीं।
२ करावे नहीं। ३ करते की अनुमोग्ना करे नहीं । मन,
वचन और काया से। (द्वितीय महानत) १ मृपानाद,
असत्य बोले नहीं २ गोलावे नहीं ३ बोलते की अनुमोदना
फरे नहीं । मन, वचन और काय से । (तृतीय महाप्रत)
१ अत्तादान, चोरी करे नहीं। २ करावे नहीं ३ करते
की अनुमोदना करे नहीं । मन, वचन और फाय से ।
(चतुर्थ महानत) १ मैथुन, कुशील सेवे नहीं । २ सेवावे
नहीं ३ आसेपन करते की अनुमोदना करे नहीं । मन,
और काया से । (पञ्चम महाव्रत) १ परिग्रह, धन आदि
रसे नहीं, २ रसाये नहीं, ३ रसते की अनुमोदना करे
नहीं। मन, वचन और काया से।
२४. भग-४९
-अक एक ११ (ग्यारह) का-भाङ्गे ९ १ (एक) करण
१ (एक) योग से कहना । जैसे कि
१ करू नहीं मनसा २ करू नहीं चयसा ३ करू नहीं
গণন
१

१२
पच्चीस बोल का थोकडा
कायसा ४ कराऊ नहीं मनसा ५ कराऊ नहीं वयसा ६.
कराऊ नहीं कायसा ७ अनुमोदू नहीं मनसा ८ अनुमोद
नहीं वयसा ९ अनुमोदू नहीं कायसा ।
२-अक एक १२ (बारह) का-भाने ९।१ करण २ योग
से कहना।
१ कम्य नहीं मनमा वयसा २ करू नहीं मनसा
कायसा ३ करू नहीं वयसा कायसा ४ करा नहीं मनमा
वयसा ५ कराऊ नही मनसा कायमा ६ कराऊ नहीं बयसा
कायमा ७ अनुमोदू नहीं मनमा वयमा ८ अनुमोदू नहीं
मनसा कायसा ९ अनुमोदू नहीं वयसा कायसा ।
३-अङ्क एक १३ का-भाओं ३१ करण ३ योग से कहना।
१ करू नहीं मनसा वयमा कायसा २ कराऊ नहीं
मनसा वयसा फायसा ३ अनुमोदू नहीं मनमा वयसा
कायसा।
४.:-अङ्क एक २१ का-भाङ्गे ९ । दो करण एक योग से
कहना । जैसे कि-
१ करू नहीं कराऊ नहीं मनसा २ करू नहीं कराऊ
नहीं वयसा ३ करू नहीं कराऊ नहीं कायसा ४ करू नहीं
अनुमोदू नहीं मनसा ५ करू नहीं अनुमोदू नहीं वयसा ६
करू नहीं अनुमोदू नहीं कायसा ७ कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं
मनसा ८ कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं वयसा ९ कराऊ नहीं
अनुमोदू नहीं कायसा ।

पञ्चीस बोल का थोकडा
-अङ्क एक २२ का-भाङ्गे ९। दो करण दो योग से
कहना चाहिये।
१ करू नहीं कराऊनहीं मनसा वयसा २ करू नहीं कराऊ
नहीं मनसा कायसा ३ करू नहीं कराऊ नहीं वयसा कायसा
४ करू नहीं अनुमोदू नहीं मनसा वयसा ५ करू नहीं
अनुमोदू नहीं मनसा कायसा ६ कर नहीं अनुमोदू नहीं
वयसा कायसा ७ कगऊ नहीं अनुमोदू नहीं मनसा वयसा
८ कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं मनसा कायसा । ९ कराऊ
नहीं अनुमोदू नही वयसा कायसा ।
६. -अस एक २३ का-भाने ३१२ करण ३ योग से कहना।
१ करू नहीं कराऊ नहीं मनसा वयसा कायसा २
करू नहीं अनुमोदू नहीं मनसा वयसा कायसा ३ कराऊ
नहीं अनुमोदू नहीं मनसा वयसा कायसा ।
७-अङ्क एक ३१ का-भारे ३ । तीन करण एक योग से
कहना।
१ करू नहीं कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं मनमा । २.
करू नहीं कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं वयसा ३ करू नहीं
कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं कायसा ।
-अङ्क एक ३२ का-भाग ३। तीन करण दो योग से कहना।
१ करू नहीं कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं मनमा चयसा।
२ करू नहीं कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं मनसा कायसा।३
करूँ नहीं कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं वयसा कायसा ।

पच्चीस घोल का थोकड़ा
९-अङ्क एक ३३ का-भागे १ । तीन करण तीन योग से
कहना।
१ करू नहीं कराऊ नहीं अनुमोदू नहीं मनसा वयसा
कायसा।
२५. चारित्र-पंच
१. सामायिक चारित्र २ छेदोपस्थापनीय चारित्र ३
परिहार विशुद्धि चारित्र ४ सूक्ष्म सम्पराय चारित्र ५ यथा-
ख्यात चारित्र।

नव तत्त्व वर्णन

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अथ नवतत्त्व वर्णन गाथा जीपाजीव पुण्ण पावासव्व सगरो यनिजरणा । बध मोक्खो अ तहा ननतत्ताहुत्ति नायव्या ॥१॥ धम्मा धम्मागासा तिय तिय भेया तहेब अद्धाय । खद देस पयेसा परमाणु अजीव चउद्दसा ॥२॥ धम्मा चम्मागासातिय तिय भेया तहेव अद्धाय । एए चउमूनि दव्वे खित्ते काले भाव गुणे ॥३॥ इन्दिय कमाय अपय जोगा पच चउ पचति तिण्णिकम्मा। फिरियाउ पणवीस इमाओ तायो अनुकम्मसो ॥४॥ समड गुत्ति परिमह जर धम्मो भानना चरित्ताणि । पनत्ति दुनीस दसनार पचभेएहिं समापना ।।५।। आहा कम्मे उद्देमिय पुडफम्मेय मिस्मीजाये । ठपणा पाहूडियाए पाओअरकिय पामिचे ॥६॥ परिहिय अभिहडेउदभिन्ने मालोहडेडय अच्छिने । अतिसिहे अज्झोयरो ये सोलस्स पिंडगम्मे दोस्सा ॥७॥ धाइ दूइ निमित्ते अजीवे वणिमग्गे तिगिच्छाये कोहे- माणे मायालोमे ये हान्ति दम दोसा । पूनिपच्छा संथनागि- जामते चुण्ण जोगे उपायनाये दोमा सोलमम्मे मूलकम्मे ।

नरतत्व वर्णन संकिय मक्खिय निक्खितपिहिय साहरिय दाय । गुम्मिसे | अपरिणाये लित्त छट्टिय एमण दोमा दस हान्ति। अणसण मुणोयरिया पित्ती संसेवण रस चाऊ। काय फिलेसो सलीनाए वज्झो तमो होड । पायच्छितं निणयो यावच्चं तहेब सज्झाओझार्थ निउसग्गोनिय अभितरो तवो हो । पयइ सहापया धुत्तो ठिय कालोविहारिणं अणुभागोर- सोणेउ पएसोदलसचउ। संतपय परुवणयादवप्पमाणं च खित्त फुमणाय । कालोय अतरभावो भाविअप्पा बहु चेन । नरगड परिणन्दिय तस्म भन्न सन्नी अहक्खाय खयइ- समत्तेमुक्खोणहार केवल दसण नाणेण सेसेसु । नवतत्त्व नाम १ जीवतत्व • अजीवतत्व ३ पुण्यतत्व ४ पापतत्व ५ आश्रमतत्व ६ सवरतत्व ७ निर्जरातत्व ८ वधतत्व ९ मोक्षतत्व । इम प्रकार सर्वजदेव ने नवतत्व प्रतिपादन किए हैं, जिन में-जीव, अजीव, पुण्यतत्व, यह तीन ज्ञेय (जानने योग्य) हैं । पाप, आश्रव, वध, यह तीन त्यागने योग्य हैं। मवर, निर्जरा, मोक्ष यह तीन उपादेय (ग्रहण करने योग्य) हैं। f-चार रूपी, चार अरूपी, एक मिश्रित है। नवतत्व ।

२६
नयतत्व वर्णन
जैसे-पुण्य, पाप, आश्रव, वन्ध, यह चार रूपी हैं । जीव,
सार, निर्जरा, मोक्ष यह चार अरूपी हैं । अजीव रूपी,
अरूपी दोनों प्रकार का होता है।
१. जीवतत्त्व
जीन किसे कहते हैं ? पुण्य पाप का कर्ता, सुस दु स का
भोक्ता, चेतना लक्षण महित प्राणों का धरता, अग्निाशी
इत्यादि लक्षणों वाले को जीव कहते है।
जीव का जघन्य एक भेद चेतना रक्षण, मध्यम १४
(चौदह ) भेद, उत्कृष्ट ५६३ भेद हैं ।
मध्यम चौदह भेद इस प्रकार है-
जीन का १ भेद-चेतना लक्षण ।
जीव के २ भेद-१ बस स्थार।
जीत के ३ भेद-१ स्त्री वेद २ पुरुप वेद ३ नपु-
सक वेद ।
जीव के ४ भेद-१ नारकी २ तिर्यश्च ३ मनुष्य ४ देवता।
जीर के ५ भेद-पाचों जातियाँ-१ एकेन्द्रिय २ द्वीन्द्रिय
३ त्रीन्द्रिय ४ चतुरिन्द्रिय ५ पचेन्द्रिय ।
जीव के ६ भेद-१ पृथ्वी २ अप् ३ तेउ ४ घायु
५ वनस्पति, ६ सपाय ।
जीव के ७ भेद-१ नारकीय २ देव ३ देवी ४ मनुष्य
५ मानुषी ६ तिर्यग् ७ तिर्यञ्ची ।

-
२०
नवतत्व वर्णन
जीव के ८ भेद-चार गति का, पर्याप्त अपर्याप्त ।
। जीव के ९ भेद-पाच स्थावर, चार प्रस।
जीन के १० भेद -पाच जाति का पर्याप्त, अपर्याप्त ।
जीव के ११ भेद -पाच सूक्ष्म, पृथ्वीकाय से लेकर
वनस्पति पर्यन्त । छ वादर पृथ्वीकाय से लेकर बस तक ।
जीव के १२ भेद-छ काया के जीन पर्याप्त, अपर्याप्त ।
जीव के १३ भेद-१ पृथ्वीकाय २ अपकाय ३ तेउकाय
४ वनस्पतिकाय के दो भेद हैं ५ प्रत्येक ६ साधारण ७
द्वीन्द्रिय ८ त्रीन्द्रिय ९ चतुरिन्द्रिय । पचेन्द्रिय के चार भेद ।
१० नारकी ११ तिर्यश्च १२ मनुष्य १३ देनता।
जीन के १४ भेद-एकेन्द्रिय के ४ भेद-सूक्ष्म, चादर
का पर्याप्त और अपर्याप्त । द्वीन्द्रिय के दो भेद-पर्याप्त, अपर्याप्त ।
त्रीन्द्रिय के २ भेद-पर्याप्त और अपर्याप्त । चतुरिन्द्रिय के
दो भेद-पर्याप्त, अपर्याप्त । पचेन्द्रिय के ४ भेद-सन्नी, असन्नी
का पर्याप्त, अपर्याप्त ।
जीव के उत्कृष्ट ५६३ भेद
नेरिय तिरियनरदेवा चउदस अडयाल तिनीसयतिन्नेय
अठाणू सयमेगं पणसय मेयायतेसट्ठी ।
नरक के १४ भेद
१ धम्मा, २ वशा, ३ शीला, ४ अञ्जना, ५ रिहा,
६ मघा, ७ माघवई, इन सातों का पर्याम और सानों का
अपर्याप्त न १४ चौदह ।

नरतच घर्णन
मात नारका के गोत्र
१ रन प्रभा ० दशर्कर प्रभा ३ बालु प्रभा १ पक प्रभा
५ धूम प्रभा ६ तम प्रभा ७ तमतमा प्रभा एप १४ ।
तिर्यञ्च के ४८ भेद
एकेन्द्रिय के २२
पृथ्वीकाय के ४ भेद-सूक्ष्म चादर का पर्याप्त और
अपर्याप्त ।
अप्काय के ४ भेद-सूक्ष्म चादर का पर्याप्त और अपर्याप्त ।
तेउकाय के ४ भेद-सूक्ष्म सादर का पर्याप्त और
अपर्याप्त ।
चायुकाय के ? भेद-मूक्ष्म बादर का पर्याप्त और
अपर्याप्त ।
1
वनस्पति काय के ६ भेद
सूक्ष्म, प्रत्येक, माधारण । इन तीनो का पर्याप्त और
अपर्याप्त । एव एकेन्द्रिय के कुल २२ भेद हुए।
विकलेन्द्रिय के ६ भेद
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय इन तीनों का पर्याप्त
और अपर्याप्त ।
तिर्यञ्च पचेन्द्रिय के २० भेद
जलचर १ स्थलचर २ स्वेचर ३ उरपुर,४ भुजपुर ५
यह पाच सन्नी और पाच असन्नी । इन दस का पर्याप्त और
अपर्याप्त एव २० । सर्व मिलकर तिर्यन के
८
४८ भेद

२०
नयतत्व वर्णन
जीव के ८ भेद-चार गति का, पर्याप्त अपर्याप्त ।
जीव के ९ भेट-पाच स्थापर, चार पस।
जीव के १० भेद-पाच जाति का पर्याप्त, अपर्याप्त ।
जीव के ११ भेद-पाच सूक्ष्म, पृथ्वीकाय से लेकर
वनस्पति पर्यन्त । उ. वादर पृथ्वीकाय से लेकर त्रस तक।
जीव के १० भेद-3 काया के जीर पर्याप्त, अपर्याप्त ।
जीव के १३ भेद-१ पृवीकाय • अप्काय ३ तेउमाय
४ वनस्पतिकाय
दो भेद हैं ५ प्रत्येक ६ साधारण ७
द्वीन्द्रिय ८ वीन्द्रिय ९ चतुरिन्द्रिय । पचेन्द्रिय के चार भेद ।
१० नारकी ११ तिर्यश्च १२ गनुप्य १३ देवता ।
जीव के १४ भेट-केन्द्रिय के ४ भेद-सूक्ष्म, चादर
का पर्याप्त और अपर्याप्त । द्वीन्द्रिय के दो भेद-पर्याप्त, अपर्याप्त ।
श्रीन्द्रिय के २ भेद-पर्याप्त और अपर्याप्त । चतुरिन्द्रिय के
दो भेद-पर्याप्त, अपर्याप्त । पचेन्द्रिय के ४ भेद-सन्नी, असन्नी
का पर्याप्त, अपर्याप्त ।
जीव के उत्कृष्ट ५६३ भेद
नेरिय तिरियनरदेवा चउदस अध्याल तिन्नीसयतिन्नेव
अठाणू सयमेग पणसय भेयायतेसट्टी।
नरक के १४ भेद
१ धम्मा, २ वशा, ३ शीला, ४ अञ्जना, ५ रिट्ठा,
६ मघा, ७ माधवई, इन सातों का पर्यास और सातों का
अपर्याप्त एव १४ चौदह ।

नपतरायण
मात नाग्या गोम
१ रन प्रभा २ र प्रभा ३ मालु प्रभा ४ पम प्रभा
५ धूम प्रभा ६ तम प्रभा ७ तमनमा प्रभा पर १४ ।
तियश्च के ४८ मेद
एकन्द्रिय के २०
पृथ्वीराय रे " भेद-सूक्ष्म चार या पर्याप्त और
अपर्याप्त ।
अप्पाय
पे ४ भेन-मूत्म यादर का पर्याप्त और अपर्याप्त ।
ते उफाय के ४ भेट-मूक्ष्म अादर का पर्याप्त और
अपर्याप्त ।
वायुकाय के " भेट-सूक्ष्म पादर का पर्याप्त और
अपर्याप्त ।
यनम्पति काय क६ भेद
सूक्ष्म, प्रत्येक, साधारण । डा तीना का पर्याप्त और
अपर्याप्त । एव एपेन्द्रिय के कुल २२ भेद हुए।
यिकलेन्द्रिय के ६ भेद
द्वीन्द्रिय, जीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय इन तीनो का पर्याप्त
और अपर्याप्त ।
तियञ्च पचेन्द्रिय के २० भेट
जरचर १ स्थलचर २ पेचर ३ उरपुर ४ भुजपुर ५
यह पाच सन्नी और पाच असन्नी । इन दस का पर्याप्त और
अपर्याप्त एव २० 1 सर्व मिलकर तिर्यञ्च के ४८ भेद हुए।

२२
नक्तत्व वर्णन
जो जल में चले उसे जलचर कहते है। जैसे---- मच्छ,
कच्छ, मगर, गाहा, सुममारादि, इनका कुल २२॥ लाख
करोड का है।
-
,
०
--
जो पृथ्वी पर चले उसे स्थलचर कहते है । जैसे-
एक खुरा-गधा, घोडा, सच्चर आदि । दो खुरा-गाय,
भैंस, बकरी आदि । गडीपया-हाथी, गैंडा आदि ।
सन्नीपया-शेर, विल्ली, कुत्ता, आदि । इनका कुल १
करोड का है।
जो आकाश में उडने वाले जीव है उन्हें खेचर कहते
है । जैसे-चरम पखी-चमडे के पच वाले । चामचिडी,
(चमगीदड) आदि । रोम पखी-जैसे, तोताचिडी, कबूतर
आदि । समुद्र पखी-जिमके पख डव्वे के आकार के हैं, यह
अढाई द्वीप के बाहर होते हैं । वितत पखी-जिनके परम
कमलदान के आकार के होते हैं । यह भी अढाई द्वीप के बाहर
होते हैं । इनका कुल दो लाख करोड का होता है।
जो छाती के बल से चलें उनको उरपुर कहते हैं ।
जैसे-अहि, अजगर, महोरग, आसालिया आदि । इनका
कुल २० करोड़ का होता है।
जो भुजाओं के बल से चलें उनको भुजपुर कहते है।
जैसे-नेवल, चूहा, गलहरी, आदि । इनका कुल ९ करोड
का होता है।
इस प्रकार तिर्यच्च के ४८
हुए।
भेट

२३
नयनत्य वर्णी
३०३ नीन मी तीन प्रकार के मनुष्य
१५ (पन्द्रा) पर्मभूमि ये मग, ३० (भीम) अगभूमि
ये मनुष्य, ५६ (छापा) अन्नरद्वीपों के मनुष्य, यह मय एक
मौ प हुन एक मौकया पर्यात और अपर्याप्त दो मौ
दो हु । एक सौ क्षेत्रों में ममूर्णिम मनुष्य अपर्याप्त ।
कुल तीन मी ती हुए।
२५ फर्मभूमि के मनुष्य-कर्मभूमि रिसे कहते हैं ?
जहा अमि-यगरिधि, ममी-लेम्यनविधि, कृपि-सेती कर्ग,
गज्यनीति-माधु, माची, धर्म न्याहार, ७२ ला मनुप्यों
की, ६५ कला सियों की १०० एक मौ प्रकार का शिल्पकर्म।
जहा पर यह मर्व कार्य विद्यमान हो उमे कर्मभूमि कहते हैं।
५ भरत, ५ इरावत, ५ महाविदेह, यह १५ पर्मभूमि
मनुप्पों के क्षे हैं। एक लाख योजन का तम्यूद्वीप है ।
इममें एक भगत, एप इगवर्त, एक महानिदेह यह तीन
क्षेत्र हैं।
जम्यूद्वीप के चारों ओर दो लास योजन का लपण
हे । लवण ममुद्र के चारों ओर ४ लाय योजन का
धातकी यण्ड है। धातकी सण्ड में • भरत, २ इगवर्त,
• महानिदेह, यह छ क्षेत्र में । धातकी बण्ड के चारों
ओर आठ लास योजन का कालोदधि समुद्र है । कालोदधि के
चारों ओर १६ लाम योजन का पुष्करद्वीप है। इसके
मध्य चारो ओर मानुष्योत्तर पर्वत है, उसके आभ्यन्तर अर्ध-१. 2
।

नवतत्व पर्यन 1 . पुष्कर द्वीप में मनुष्य रहते हैं । उसमें २ भरत, २ इरावर्त, २ महाविदेह, यह छ. क्षेत्र हैं । ३० अकर्मभूमि के भनुष्य । अर्मभूमि किसे कहते हैं ? असि-सड्गविधि, मसी-लेखनविधि, कृषि-सेतीकर्म, राजनीति-साधु, साध्वी, धर्म-व्यवहार नहीं, ७२ कला पुरुषों की ६४ कला स्त्रियों की नहीं । १०० प्रकार का शिल्पकर्म नहीं, जहां इत्यादि कार्य नहीं, उन्हें अकर्म-भूमि-क्षेत्र कहते हैं। ५ देवकुरु, ५ उत्तरकुर, ५ हरिवाम, ५ रम्यकवास, ५ हेमवय, ५ हिरण्यवय, यह तीस हुए। इनमे से १ देव- कुरु, १ उत्तरकुरु, १ हरिवास, १ रम्यकवास, १ हेमवय, १ हिरण्यवय यह छ क्षेत्र जम्बूद्वीप में हैं २ देवकुरु, • उत्तरकुरु, २ हरिवास, २ रम्यकचास, २ हेमवय, २ हिरण्यवय, यह १२ वारह क्षेत्र धातकी खण्ड में हैं। २ देवकुरु, २ उत्तरकुरु, २ हरिवास, २ रम्यकवास, २ हेमवय, २ हिरण्यवय, यह १२ क्षेत्र अर्धपुष्कर द्वीप में हैं । एव सर्व ३० हुए । १० प्रकार के कल्पवृक्षों से अकर्म- भूमि के मनुष्यों की इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। १० प्रकार के करपवृक्षों के नाम १ मतयग-मधु रस, सुगन्धित फलो का दाता । २ भयगा अनेक प्रकार के वर्तनों का दाता । ३ तुडियग-४९ प्रकार के वाद्ययन्त्रों का दाता जिनसे स्वर निकलते हैं -- -

नवतत्त्व धर्णन
२५
४ दीनी जिससे रोशनी निकलती है।
५ जोई-सूर्यवत् तेज क्रान्ति वाले।
६ चित्रगा=चिनाम सहित फूलों की माला-गुच्छे है
जिसमे ।
७ चितरसा-मनोगम भोजन सामग्री के दाता ।
८ अनयगा जिनमें अनेक प्रकार के वस्त्रों का काम देने
वाले गुण हैं।
९ मनयगा=जिनमे अनेक प्रकार के आभूपणों के देने
जैसे गुण हैं।
१० गेह कारा–शोभन घरों के आकार पाले मनोगम
शयनादि विश्राम का दाता ।
५६ अन्तरद्वीपे मनुप्य कहा है ?
जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र की मर्यादा करने वाला चूलहेमवन्त
पर्वत है। पीला स्वर्णमयी १०० योजन का ऊचा, २५ योजन
का भूमि में १०५२ योजन १२ कला का चौडा २४९३२
योजन का लम्बा, इमकी चाह ५३५० योजन २५ कला की
एक एक है, इमकी जिह्वा २४९३२ योजन, पोण कला की
है । इसकी धनुप पिष्टिका २५२३० योजन ४ कला की है
पर्वत के पूर्व पश्चिम मे ४ दाढा हैं । एक एक चौरासी
सौ योजन से कुछ अधिक लपण समुद्र में लम्बी हैं ।
एक एक दाढ पर सात सात अन्तरद्वीप (मुलक ) हैं । सो
इस प्रकार हैं-
-

पपप - - जम्बूद्वीप की जगती के कोट से लवण समुद्र मे ३०० योजन जावे तो पहिला अन्तरद्वीप है। अर्थात- ३०० योजन का अन्तर ३०० योजन का द्वीप । आगे ४०० योजन का अन्तर ४०० योजन का द्वीप । आगे ५०० योजन का अन्तर ५०० योजन का द्वीप । आगे ६०० योजन का अन्तर ६०० योजन का द्वीप । आगे ७०० योजन का अन्तर ७०० योजन का द्वीप । आगे ८०० योजन का अन्तर ८०० योजन का द्वीप । आगे ९०० योजन का अन्तर ९०० योजन का द्वीप । इसी तरह एक एक दाढ पर सात सात द्वीप हैं। चारों दाढों के सात चौक २८ अन्तरद्वीप हुए । इसी प्रकार इरावर्त क्षेत्र की मर्यादा करने वाला सिखरी पर्वत है । चूलहेमपर्वत की तरह ही वर्णन है । उमका रग सफेद है। सात चौक २८ अन्तरद्वीपे सिसरी पर्वत की दाढों पर हैं। इस प्रकार अट्ठाईस के द्विगुण ५६ अन्तरद्वीप हुए। अन्तद्वीपों क नाम गरूपा १ अभामिया • साणिया ३ नगोलिया ४ हयकन्ने ५ गयवन्ने ६ गोकन्ने ७ सकुलीकन्ने ८ आयसमुहे ९ मिट्टमुहे १० अयोमुहे ११ गोमुहे १. आसमुद्दे १३ हत्थी मुहे १४ सिंहमुहे १५ बग्धमुहे १६ आसकन्ने १७ हत्थी- कन्ने १८ अकन्ने १९ कन्न पाउरण २० उक्कामुद्दे २१ नक्तत्व वर्णन २७ मेहमुहे २० विजुमुहे २३ विज्जुदन्ते २४ घणदन्ते २५ लठदन्ते ०६ गुठदन्ते २७ सुधदन्ते २८ । अट्ठाईस चुलहेमवन्त पर्वत के अट्ठाईस सिसरी पर्वत के। इति ५६ अन्तरद्वीपे मनुष्य वर्णन। १५ कर्मभूमि ३० अकर्मभूमि ५६ अन्तरद्वीप यह १०१ हुए ! इनका पर्याप्त और अपर्याप्त २०० हुए । इन्हीं के १०१ क्षेत्रों के समूर्छिम मनुष्य अपर्याप्त सर्व मिलकर मनुष्यों के ३०३ भेद हुए । समूर्छिम मनुष्य १४ स्थानों में उत्पन्न होते हैं । १४ स्थानों के नाम-चारेसु वा १ पासवणेसु वा २ मेलेसु वा ३ सघाणेसु वा ४ वतेसु वा ५ पित्तेसु वा ६ पूयेसु वा ७ सोणि- येसु वा ८ मुकेमु वा ९ सुफपुद्गलपरिसाडेसु वा १० मृतक- जीवकलेवरेसु वा ११ स्त्रीपुरपसयोगेसु वा १२ नगरनिद्धव- नेसु वा १३ मर्वअसुचीस्थानेसु वा १४ । १९८ प्रकार के देवता १० प्रकार के भवनपति देव-असुर कुमार १ नाग कुमार • सुवर्ण कुमार ३ विद्युत् कुमार ४ अग्नि कुमार ५ द्वीप कुमार ६ उदधि कुमार ७ दिशा कुमार ८ पवन कुमार ९ स्थणित कुमार १०। १५ प्रकार के परमाधर्मी देव-अवे १ अमरसे - सामे ३ सवले ४ रुद्दे ५ विरुद्दे ६ काले ७ महाकाले ८ असीपत्ते

३६
नवतत्त्व पणन
भ्रम नाम की १० प्रकृति
१ बम नाम २ वाटर नाम ३ प्रत्येक नाम ४ पर्याप्त
नाम ५ स्थिर नाम ६ शुभ नाम ७ सौभाग्य नाम ८ सुरवर
नाम ९ आदेय नाम २० यशोकीर्ति नाम ।
इति पुण्यनत्व समाप्त।
४ पापतत्त्व
पापतत्त्व किसे कहते हैं ? पाप वाधना सुलभ, भोगना
कठिन । पाप प्राणी को दुय देता है, आत्मा को भारी करता
है, अशुभ गतियों में रुलाता है, अशुभ कमों के बाधने में
सहायक होता है, इत्यादि रोग शोक कष्ट देने वाले को पाप
सत्त्व कहते हैं।
पाप १८प्रकार से याधा जाता है
१.प्राणातिपात २ मृपावाद ३ अदत्तादान ४ मैथुन ५
परिग्रह ६ क्रोध ७ मान ८ माया ९ लोभ १० राग ११ द्वेप
१२ कलह १३ अभ्याख्यान १४ पैशुन्य १५ परपरिवाद
१६ रति अरति १७ मायामृपा, १८ मिथ्यादर्शन शल्य ।
पाप ८२ प्रकार से भोगा जाता है
आठ कर्मों के उदय
१ ज्ञानावरणीय कर्म की ५ प्रकृति-१ मतिज्ञानावरणीय २
श्रुतज्ञानावरणीय ३ अवधिज्ञानावरणीय ४ मन पर्यवज्ञाना-
वरणीय ५ केवलज्ञानावरणीय ।
२ दर्शनावरणीय कर्म की ९प्रकृतिये-१ चक्षुर्दर्शनावरणीय

नवतत्त्व वर्णन २ अचक्षुर्दर्शनावरणीय ३ अवधिदर्शनावरणीय ४ केवलदर्श- नावरणीय ५ निद्रा ६ निद्रा निद्रा ७ प्रचला ८ प्रचला प्रचला ९ स्तनोधि । ३ वेदनीय कर्म की एक प्रकृति-असातावेदनीय'। ४ मोहनीय कर्म की २६ प्रकृति-जिसमें १६ कपाय नव नोकपाय। १६ कपाय अनन्तानुबधी का चौक-अनन्तानुबधी का क्रोध जैसे पत्थर की रेमा । मान जैसे वस्र का स्तम्भ । माया जैसे वॉस की जड़ का बल । लोभ जैसे क्रिमचि मजीठ का रंग। इन चारों की स्थिति आयु पर्यन्त की, पात करें सम्यक्त्व की, गति नरक की। अप्रत्याख्यानी का चौक-अप्रत्याख्यानी का क्रोध जैसे सूखे तालाब (जलाशय) की रेसा, मान जैसे हाड का स्तम्भ, माया जैसे मेंढे के सींगों का बल, लोभ जैसे नगर की मोरी के कीचड का रग, इन चारों की स्थिति एक वर्ष की, धात करे देशवृत्त की (श्रावक व्रत की) गृहस्थ व्रत - की, गति तिर्यश्च की। प्रत्यारयानी का चौक-प्रत्याख्यानी का मोघ जैसे गाडी के पहिये की रेखा (लकीर) मान जैसे काष्ठ का स्तम्भ, माया जैसे चलते बैल के पेशाब का बल, लोभ जैसे गाडी के सजन फा रग । इन चारों की स्थिति चार मांस की, घात करे

नयतत्व वर्णन
.
भय
.
साधुव्रत की (सर्व व्रत की) गति मनुष्य की ।
सज्जलन का चौक-सज्वलन का क्रोध जैसे पानी की
रेया (लकीर), मान जैसे तृण का स्तम्भ, माया जैसे ऊन
के धागे का बल, लोभ जैसे हलदी के पत्ते का रग। स्थिति
क्रोध की २ मास की, मान की १ मास की, माया की १५
दिन की । लोभ की अन्तर्मुहूर्त की, घात करे चीतरागपद की,
गति देवलोक की।
नव नोकपाय-१ हास २ रति ३ अरति
शोक ६ दुर्गडा ७ स्त्रीवेद ८ पुरुपवेद ९ नपुसकवेद ९ ।
मोहनीय कर्म की एक प्रकृति-एक मिथ्यात्व मोहनीय ।
इस प्रकार कुल २६ हुई।
५ आयु कर्म की एक प्रकृति-नरक की आयु ।
६ नाम कर्म की ३४ प्रकृति ।
गति दो-१ नरक गति २ तिर्यश्च गति।
जाति चार-एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय ।
सहनन पाच-ऋपम नाराच १ नाराच २ अर्द्धनाराच ३
कीलक ४ सेवार्त्तक सहनन ५।
सस्थान पाच-१ न्यग्रोधपरिमण्डल सस्थान २ सादि
सस्थान ३ वामन सस्थान ४ कुब्ज सस्थान ५ हुण्डक सस्थान ।
अशुभ चार-१ अशुभ वर्ण २ अशुभ गन्ध ३ अशुभ
रस ४ अशुभ
स्पर्श
.

नयतत्त्व वर्णन अनापूर्वी दो-१ नरक की अनापूर्वी २ तिर्यश्च की अनापूर्ती । चाल एक-अशुभ चाल । घात एक-अपघात नाम । स्थावर नाम की १० प्रकृति-१ स्थावर नाम २ सूक्ष्म नाम ३ अपर्याप्त नाम ४ माधारण नाम ५ अस्थिर नाम ६ अशुभ नाम ७ दुर्भाग्य नाम ८ दुसर नाम ९ अनादेय नाम १० अयशोकीर्ति नाम । गोत्र कर्म की एक प्रकृति-नीच गोन । अन्तराय कर्म की ५ प्रकृति-१ दानान्तराय २ लाभा- न्तराय ३ भोगान्तराय ४ उपभोगान्तराय ५ अलवीर्य अन्त- राय । एव ८२ । इति पापतत्व समाप्त। ५आश्रव तत्त्व आश्रयतत्व किसे कहते हैं ? जीव रूपी तालाब में आश्रवरूपी नाला से पाप रूपी पानी आवे जिससे आत्मा मलिन और भारी होकर समार में जन्म, मरण, जरा, रोग, शोक आधिव्याधि अशुभ कर्म बन्ध भोगता फिरे उसको आश्रव तत्त्व कहते हैं। आश्रयतच के जघन्य वीस भेद १ मिथ्यास आश्रव २ अव्रत आश्रव ३ प्रमाद आश्रय

नवतत्व वर्णन
४ अशुभ योग आश्रव ५ कपाय आश्रव ६ प्राणातिपात-जीव
की हिंमा करे तो आश्रव ७ मृपावाद-झूठ बोले तो आश्रव
८ अदत्तादान-चोरी करे तो आश्रव ९ मैथुन सेवे तो आश्रय
१० परिग्रह रखे तो आश्रव ११ श्रोत्रेन्द्रिय को राग में वर्तावे
तो आश्रव १२ चक्षुरिन्द्रिय को राग मे वर्ताव तो आश्रय १३
घ्राणेन्द्रिय को राग मे वर्तावे तो आश्रव १४ रमनेन्द्रिय को
राग में वर्ताये तो आश्रय १५ स्पर्शेन्द्रिय को राग में वर्तावे
तो आश्रव १६ मन अशुभ वर्तावे तो आश्रव १७ वचन
अशुभ वर्तावे तो आश्रब १८ काया को अशुभ वर्तावे तो
आश्रव १९ भण्डोपगरण वस्त्र पात्र अयत्न से लेवे तो आश्रय
२० सुई कुशाम मात्र अयन से लेवे, देवे, रक्खे तो आश्रय।
उत्कृष्ट ४२ भेद
जिसमें २५ क्रिया-
१ काईया-अयना से शरीर को वर्तने में।
२ अहिगरणिया-शस्त्रादि से जीवघात करने से ।
३ पाउसिया-जीर अजीव यह द्वेप करने से ।
४ पारियावणिया-दूसरे को दु स देने से ।
५ पाणाइवाय-हिंसा करने से ।
६ आरभिया-अनार्य व्यापार-बहुत जीव हिंसा का
काम करने से।
७ परिग्गहिया-ममता करने से ।
८ मायावत्तिया-कपट करके अन्य को ठगने से ।

नवतत्त्व वर्णन
९ अपचक्साणिया-व्रत पचगाण न करने से,अव्रत मे ।
१० मिच्छादशन वत्तिया-जिन पचनों पर श्रद्धा न
करके विपरीत प्ररूपण करने से ।
११ दिद्विया-कौतुक-तमाशा मेला आदि अधार्मिक
उत्सवों मे राग करने से ।
१० पुट्टिया-रागभाव से स्त्री, पुरुष, पशु, वस्त्रादि को
स्पर्श करने से
१३ पाडुच्चिया-जीन, अनीन पर हर्प, राग, द्वेष, ऐश्वर्य
दिखलाने से।
१४ सामतोणिवाइया-अपने या अन्य के द्विपद चौपद
वस्तुओं की राग से प्रशमा करने से।
१५ नेमत्थिया-लकडी, ककर, पत्थर आदि पुद्गल को
अयत्न से इधर उधर फैंकने से।
१६ साहत्थिया-अपने हाथ से किसी को सताना ।
१७ आणवणिया-पापकारी आज्ञा देना।
१८ विदारणीया-जीव अजीन को विदारण करने से।
१९ अणाभोगपत्तिया-अज्ञानपने शून्य उपयोग से लगे।
२० अणवकसवत्तिया-मिथ्या अन्य धर्म की वाछा
करने से
२१ अनुपयोगी-विना उपयोग कार्य करने से।
२० समुदाणकिरिया-अशुभ-पाप कार्य में मनुष्यों है
साथ कर्म बाधने से।

४२ नपतत्त्व वर्णन २३ पेजवत्तिया-राग से। २४ द्वेपवत्तिया-द्वेप करने से । २५ इरियावहिया किरिया-शुभ योगों के चलने से । केवल ज्ञानी को लगती है पहले समय लगती है, दूमरे समय वेदते हैं। तीसरे समय निर्जग देते हैं १७ प्रकार का असंयम जैसे -~-५ इन्द्रिय ५ आश्रव ४ कपाय ३ अशुभ योग एच ४२ । है इति श्राश्रवतत्व समाप्त । ६ संवर तत्त्व सवर तत्त्व किसे कहते हैं ? जीर रूपी तालाब में आश्नव रूपी नाला के द्वारा पापरूपी पानी आते हुए को सवर रूपी पट्टों से रोका जाय उसको सवर तत्व कहते सवरतच के जघन्य २० भेद १ सम्यक सम्बर २ व्रतपचसाण मम्वर ३ अप्रमाद सम्बर ४ अकपाय सम्बर ५ शुभयोग सम्बर प्राणातिपात- जीव की हिंसा न करे तो सम्बर ७ मृपावाद-झूठ न बोले तो सम्बर ८ अदत्तादान-चोरी न करे तो सम्बर ९ मैथुन न सेवे तो सम्बर १० परिग्रह न रसे तो सम्बर ११ श्रोत्रेन्द्रिय वश में करे तो मम्बर १२ चक्षु इन्द्रिय वश मे करे तो मम्बर १३ घ्राणेन्द्रिय वश में करे तो मम्बर १४ रसेन्द्रिय वश में करे तो

विवत्त्व वर्णन
मम्बर १५ स्पर्श इन्द्रिय वश में करे तो मम्बर १६ मन वश में
करे तो मम्वर १७ वचन वश में करे तो मम्बर १८ काय
वश में करे तो सम्बर १९ वस्त्रादि यतना से लेवे, देवे, रसे
तो मम्बर २० सुई फुशाममान यतना से लेये, रसे तो सम्पर ।
एव २०॥
उत्कृष्ट ५७ भेद
जिसमें २२ परिसह-१ क्षुधा परिसह २ पियाम परि-
सह ३ शीत परिसह ४ उष्ण परिसह ५ दसमसग परिसह ६
अचेल परिसह ७ अरति परिमह ८ स्त्री परिसह ९ चरिया
परिमह १० निसिहिया परिसह ११ शय्या परिसह १२
अक्रोश परिसह १३ वध परिसह १४ याचना परिसह १५
अलाभ परिमह १६ रोग परिसह १७ तणफास परिमह १८
जल परिसह १९ सधार पुरधार २० पना परिसह २१
अज्ञान परिसह २२ दर्शन परिसह ।
आठ प्रवचन-पाच समित और तीन गुप्ति । पाच समित
जैसे-१ ईयर्या समित २ भाषा समित ३ एपणा समित
४ आदान भड मत्त निक्षेपण ममित ५ उच्चार पासवण सेल
जल्ल मल सिंघाण परिठावणिया समित।
१ ईर्या समित के चार भेद-१ आलपण २ काल ३
मार्ग ४ यत्ना।
आलवण के तीन भेद-१ ज्ञान २ दर्शन ३ चारिन ।
काल का एक भेद-ईयों का काल दिवस का ।

४४
नरतच वरन
मार्ग का एक भेद-सयम मार्ग चले, असयम
मार्ग
वरजे।
यना के चार भेद-द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव । द्रव्य
से
ईर्या शोधता हुआ दश वोल वर्ज के चले।
१ शब्द २ रूप ३ गन्ध ४ रम ५ स्पर्श ६ पायणा
७ पूछना ८ परिवर्तना ९ अनुप्पेहा १० धर्मकथा ।
क्षेत्र से-साढे ३॥ हाथ प्रमाण देनकर चले।
काल से-दिन को देखकर रात्रि को पूज कर चले,
भाव से उपयोग सहित, गुण से निर्जरा के हेतु ।
२ भाषा ममित के चार भेद-१ द्रव्य २ क्षेत्र ३ काल
४ भाव।
द्रव्य से आठ बोल वर्ज के भाषा बोले-१ क्रोध
मान ३ माया ४ लोभ ५ हास ६ भय ७ मुगरि वचन
८ विकथा।
क्षेत्र से-जहा विचरे सब को साताकारी-प्रिय भापा
बोले।
-
काल से-पहर रात्रि वाद ऊचे स्वर से न बोले ।
भाव से-उपयोग सहित । गुण से निर्जरा के हेतु ।
४ एपणा समित के चार भेद-१ द्रव्य २ क्षेत्र ३ काल
४ भाव।
द्रव्य से-साधु अपनी वृत्ति अनुसार ४२ दोप टाल कर
आहार पानी ग्रहण करे। गृहस्थी अपनी वृत्ति अनुमार निर्दोष

नपतत्व घर्णन
अपने हका या प्रहण करे । अन्य पेपा पर अधिकार न फरे।
क्षेत्र मे-माधु अर्थ योजन उपगन्न आहार पानी ले जावे
नहीं, रावे नहीं। शौच वास्ते जल उपरान्त भी ले जा मरता
है । गृहस्थ-राष्ट्र धर्म को हानि 7 पहुंचे वहा तक व्यायहा-
रिक कार्य करता हुआ गष्ट्रदेश को हानि न पहुचावे ।
फाल से-माधु पहरे पहर का आहार पानी चौथे पहर
न रक्से । गृहस्थी बिगड़ जाने वाले अन्य (दूसरी) फो
हानिकारक या जिमसे पाप की वृद्धि हो एमे द्रव्यों का सचय
चिरकाल तक न करे।
भार से-साधु पाच माडले के दोष टालकर आहार
पानी भोगे।
गाथा
मयोजनाप्पमाणे-हगाल धूम कारणे पढमा, घसहि
बहरतरेवा रसहे उव्वस योगा।
गृहस्थ भी रमनेन्द्रिय के वश न होवे ।
आदाण भड मत्त निक्षेपण समित के चार भेद-१ द्रव्य
२॥क्षेत्र ३ काल ४ भाव ।
न्य से-भडोवगरण वन पान आदि मर्यादा से अधिक
व रक्से।
क्षेन से-खुल्ले विसरे न रक्खे ।
काल से-समय पर प्रतिलेसणा करे।

नवतत्व वर्णन
भाव से-उपयोग सहित ! गुण से-निर्जरा के हेतु ।
५ उधारपासवण खेल जलमहसिंघाण परिठावणिया
समित के चार भेद ।
१ द्रव्य • क्षेत्र ३ काल ४ भाव ।
द्रव्य से-दश बोल वर्ज के परठे।
प्रथम चौमा
१ जहा कोई आता है, देखता है, वहा नहीं परठे।
२ जहा कोई आता है, देखता नहीं, वहा नहीं परठे।
३ जहा कोई आता नहीं, देखता है, वहा नहीं परठे।
४ जहा कोई आता नहीं, देसता नहीं, वहा परठे।
दूसरे-स्व आत्मा, पर आत्मा की विराधना न हो वहा
परठे।
।
तीसरे-ऊची नीची भूमिका ना हो वहा परठे
चौथे-पोली भूमि, घास, अन्न, पत्र आदि न हो वहा
,
परटे।
पाचवे-थोड़े काल की अचित्त हो, वहा
परठे
छठे-सचित्त भूमि पर न जाय, परठने वाली वस्तु ऐसी
विस्तारवाली भूमि पर
परठे
सातवे-चार अगुल प्रमाण नीचे तक अचित्त भूमि पर
परठे।
आठव-ग्राम के पास (दृष्टिगोचर स्थान पर ) न परठे।
नौन-चूहे आदिक के विलों पर न परठे ।

४७
नवतत्त्व वर्णन
दशवें -त्रस प्राणी बीज हरी पर न परठे । परठ के
बोसरे वोसरे करे।
क्षेत्र से-जहा विचरे।
काल से-दिन को देखकर रात्रि को परिमार्जन करके
परठे।
भाव से-उपयोग सहित, गुण से निर्जरा के हेतु ।
तीन गुप्ति-१ मनोगुप्ति २ वचन गुप्ति ३ काय गुप्ति ।
मनोगुप्ति के चार भेद-१ द्रव्य २ क्षेत्र ३ काल ४ भाव।
द्रव्य से-सरभ, समारभ, आरभ मे मन प्रवर्ताये नहीं।
यदि प्रवर्ते तो फल न लगने देवे । यदि फल भी लगे तो
निष्फल करने का प्रयत्न करे।
क्षेत्र से-जहा विचरे।
काल से-आयु पर्यन्त ।
भाव से-उपयोग सहित ।
गुण से-निर्जरा के हेतु।
वचन गुप्ति के चार भेद-१ द्रव्य २ क्षेत्र ३ फाल
भाषा
द्रव्य से-सरभ, ममारभ, आरभ में पचन प्रवावे नहीं।
यदि प्रवर्ताये तो फल न लगने देवे, यदि फल भी लग जावे
तो निफल करने का प्रयत्न करे।
क्षेत्र से-जहा विचरे।
फाल से-आयु पर्यन्त ।

नयतत्व वर्णन
भाव से-उपयोग महित ।
गुण से-निर्जरा के हेतु।
काय गुनि के ४ भेद-१ द्रव्य २ क्षेत्र ३ काल ४ भाव ।
द्रव्य से-मरभ समारभ, आरभ मे काया प्रवर्ताव नहीं।
यदि प्रपन जावे तो फल न लगने दे, यदि फल लग जावे तो
निष्फल करने का प्रयन करे ।
क्षेत्र से-जहा विचरे।
काल से-आयु
पर्यन्त
भाव से-उपयोग सहित ।
गुण से-निर्जरा के हेतु।
१० प्रकार का यतिधर्म
१ सति • मुत्ति ३ अजये ४ महवे ५ लाघवे ६ सच्चे
७ सयमे ८ तवे ९ चियाये १० वभचेरनासे ।
१२ प्रकार की भानना
१ अनित्य भावना भरत चक्रवर्ती ने भावी । २ अशरण
भावना अनाथी मुनि ने भावी । ३ ससार असार भावना
शालिभद्र जी ने भावी। ४ एकान्त भावना नेमिराज ऋपीश्वर
ने भावी। ५ अन्य भावना मृगापुत्र जी ने भावी । ६ अशुचि-
भावना सनतकुमार चक्री ने भावी । ७ आश्रव भावना समुद्र
पाली ने भावी। ८ सनर भावना केशी गौतम जी ने भावी ।
९ निर्जरा भावना अर्जुन माली ने भावी । १० धर्म दुर्लभ
भानना धर्म रुचि अणगार ने भावी। ११ लोक स्वरूप भावना

नवतत्त्व वर्णन शिवराज ऋषि ने भावी । १२ बोध दुर्लभ भावना आदिनाथ जी के ९८ पुत्रों ने भावी । चारित्र पाच १ सामायिक चारिन • छेदोपस्थापनीय चारिन ३ परिहार विशुद्धि चारित्र ४ सूक्ष्म सपराय चारित्र ५ यथा- ख्यात चारित्र । इति सचरतत्त्व समाप्त । ७ निर्जरातत्त्व निर्जरातच किसे कहते है ? जीवरूपी वस्त्र पापरूपी मैल से जो मलिन हो रहा है उसको ज्ञान रूपी जल और तप सयम रूपी सागुन से धोकर जीव आत्मा को निर्मल करे उमको निर्जरा तत्त कहते है। जघन्य निर्जरा तत्त्व के मुरय २० भेद हैं जैसे १२ प्रकारका तप- १ अनशन २ उणोदरी ३ भिक्षाचरी ४ रस परित्याग ५ कायक्लेश ६ प्रतिसलीनता यह छ प्रकार का आभ्यन्तर ( अन्दर का) तप ७ प्रायश्चित्त ८ विनय ९ यावृत्य १० स्वाध्याय ११ ध्यान १२ विउसग्ग। यह छ प्रकार का बाहर का तप है। अनशन के दो भेद-१ इतकाल-थोडे समय का २ आयुकाल-आयुपर्यन्त का।

नवतत्त्व वर्णन
इतकाल के छ• भेद-१ श्रेणि तप २ प्रतर तप ३
घन तप ४ वर्ग तप ५ वर्गार्ग तप ६ आकीर्ण तप ।
अणि तप के १४ भेद-१ व्रत २ वेला ३ तेला ४ चौला
५ पचौला ६ छोला ७ सतौला ८ अर्धमास ९ मास १०
दो मास ११ तीन मास १२, चार मास १३ पाच मास
१४ छ. मास तप करें।
प्रतर तप के १६ भेद-व्रत, वेला, तेला, चौला
वेला, तेला, चौला, व्रत।
तेला, चौला, व्रत, वेला।
चौला, व्रत, वेला, तेला।
११२३४
३ १४ १/२
घण तप
३
६४ भेद-१६ व्रत, १६ बेले, १६ तेले,
१६ चौले तप करे ।
वर्ग तप के ४०९६ चार हजार छयाणवें भेद । जैसे-
एक हजार चौतीस १०२४ व्रत, एक हजार चौनीम १०२४
बेले, एक हजार चौतीस १०२४ तेले, एक हजार चौवीस
चौले तप कर । एच ४०९६ हुए ।
-
.

नवतत्व वर्णन वर्गावर्ग तप के एक करोड सतसठ लास सतत्तर हजार दो सौ सोलह भेट । (१,६७,७७,२१६) अर्थात्- ४१ एकतालीम लास चौरानवे हजार तीन सौ चार ४१९४३०४ व्रत, ४१९४३०४ वेले, ४१९४३०४ तेले, ४१९४३०४ चौले । एन १६७७७२१६ भेद । वर्ग तप और वर्गावर्ग तप चौथे आरे मे किया जाता है । आज कल पचम काल मे, आयुसहनन की कमी होने से नहीं हो सकते। आकीर्ण तप के १० भेद-१ नफारसी २ पोरसी ३ दो पोरसी ४ एकामणा ५ एक्लठाण ६ निविग्गई ७ आमिल ८ अभिग्रह ९ चरम पञ्चसाण १० गठीमुठी छल्ला आदि अनेक प्रकार का समावेश है जिसमे आयु काल के ३ भेद-१ भत्त पञ्चसाण सथाग, २ इगित मरण सयारा, ३ पादोप- गमन सथारा। भत्तपञ्चसाण के ६ भेद-१ नगर के अन्दर करे । २ नगर के चाहिर करे । ३ कारण से करे । ४ बिना कारण से करे । ५ पराक्रम सहित करे । ६ पराक्रम रहित करे। इगितमरण के ७ भेद-१ नगर में करे २ नगर से थाहर करे ३ कारण से करे ४ बिना कारण से करे ५ परा- क्रम सहित करे ६ पराक्रम रहित करे ७ भूमि की मर्यादा करे। पादोपगमन के ५ भेद-१ नगर मे करे २ नगर से बाहर

,
नवतत्त्व वर्णन
करे ३ कारण से करें ४ गिना कारण से करे ५ हिलन चल.
नादि चेष्टा से रहित करे, काष्ठ शिलारन एक स्थान में ही
स्थित रहे।
उनोदरी के दो भद-१ द्रव्य उनोदरी २ भाव उनोदरी।
द्रव्य उनोदरी के तीन भेद-१ आहार उनोदरी २
उपधी उनोदरी ३ सिज्जा उनोदरी ।
आहार उनोदरी के तीन भेद-पुरुप के ३२ कॅवल,
स्त्री के २८ कॅवल, नपुंमक के २४ कॅवल ।
पुरुप एक केवल लोड और एक तीस का आहार करे
तो जघन्य उनोदरी, एक तीम छोड़े एक का आहार करे तो
उत्कृष्ट उनोदरी । वाकी मध्यम उनोदरी।
स्त्री एक कवल छोडे और २७ का आहार करे तो
जघन्य उनोदरी और २७ छोडे और एक का आहार करे तो
उत्कृष्ट उनोदरी । चाकी मध्यम उनोदरी ।
नपुसक एक कँवल छोडे, २३ का आहार करे तो जघन्य
उनोदरी और २३ कॅवल छोडे एक का आहार करे तो उत्कृष्ट
उनोदरी। बाकी मध्यम उनोदरी ।
उपाधि उनोदरी-भण्डोवगरण-वखपान आदि अल्प
रक्खे।
सिजा उनोदरी-सिजा सकोच के करे, सोना, बैठना,
फिरना आदि।
भाव उनोदरी के भेद-१ अल्प क्रोध २ अल्प मान ३
।

नवतत्त्व वर्णन अल्प माया ४ अल्प लोभ ५ अल्प शब्द (भापी) ६ अल्प सिजना ७ अल्प कलह ८ अल्प तुम सुभाट । भिक्षाचरी के ४ भेद १ द्रव्य २ क्षेत्र ३ काल ४ भार । द्रव्य भिक्षाचरी के २६ भेद-१ उकिमतचरी २ णिक्यि- त्तचरी ३ उक्सित निक्सितचरी ४ निस्पित उक्सित चरी ५ चट्टिजमानचरी ६ साहरिजमानचरी ७ उपनीतचरी ८ अव- नीतचरी ९ उपनीत अवनीतचरी १० अपनीत उपनीतचरी ११ समटुचरी १२ अससट्टचरी १३ तनातममट्टचरी १४ अण्णाय चरी १५ मोणचरी १६ दिट्ठलाभे १७ अदिट्ठलाभे १८ पुट्ठ- लाभे १९ अपुट्ठलाभे २० भिक्सलाभे २१ अभिक्सलाभे २२ अनगिलाय २३ आरणिहिए २४ परिमित पिंडवाइ २५ सुद्धे- पणाय २६ मगायत्तिये । क्षेन भिक्षाचरी के ८ भेट-१ पेडे के आकार २ अर्ध पेडे के आकार ३ सिंघाडे के आकार ४ शस के आकार ५ गायमूत्र के आसार ६ पतग के आकार ७ आते फरसे जाते हुग न फरसे ८ जते हुए फरसे आते हुए न फरसे । कालभिक्षाचरी के चार भेद-१ पहले पहर लावे पहले पहर भोगे वाकी तीन पहर का त्याग करे । २ दूमरे पहर लारे दूसरे पहर भोगे बाकी तीन पहर त्यागे ३ तीसरे पहर लाने तीसरे पहर भोगे वासी तीन पहर का त्याग करे ४ चौथे पहर लावे चौथे पहर भोगे वाकी तीन पहर का त्याग करे। 1

नरतत्व वर्णन
भार भिक्षाचरी के भेद-तीन प्रकार की आयु की स्त्री-
१ बालक २ युरा ३ वृद्ध ।
तीन प्रकार की आयु का पुरप-१ नाला २ युवा ३
वृद्ध।
तीन प्रकार की आयु का नपुसक-१ वालक २ युना
३ वृद्धा
१० अमुक वर्ण ११ अमुक सस्थान १२ अमुक वस्त्र
१३ बेठे हो, सडे हों १४ मिर सुले हों, ढके हो १५ आभू-
पण सहित हो, आभूषण रहित हों।
रस परित्याग के १६ भेद-१ प्रणीत रस का त्याग करे
२ आमिल करे ३ नीभी करे ४ अरम आहार करे ५ विरम
आहारे ६ अन्त आहारे ७ पत आहारे ८ लह आहारे ९
तुच्छ आहार १० अरम जीवी ११ विरमजीवी १२ अन्त
जीवी १३ पन्तजीनी १४ लह जीवी १५ तुन्छ जीनी १६
आयाम सित्थभोये।
काया क्लेश के १६ भेद-१ ठाण आसन करे. २ निस्महि
आसन
करे
३ उस्कुडु आमन करे ४ पद्म आसन करे ५ वीर
आसन करे ६ लबाड आसन करे ७ दण्ड आसन करे ८
गोदुह आसन करे ९ धनुप आसन करे १० यूक थूके नहीं
११ साज फरे नहीं १२ मैल की बत्ती उतारे नही १३ शरीर
की शुश्रपा करे नहीं १४ शीत की वेदना सहे १५ धूप की
तापना सहे १६ लोच आदिक की वेदना सहे ।

नपतत्व वर्णन
प्रतिसलीनता तप ४ भेद-१ इन्दिर प्रतिसरीनता २
कपाय प्रतिसलीनता ३ योग प्रतिसलीनता ४ विवित्त सयणा-
सनप्रतिमलीनता।
इन्द्रिय प्रतिसलीनता के ४ भेद-पाचों इन्द्रियों के २३
विपय २४० निकार इनको गोप के रसे, उदीरे नहीं, उदय
आगे तो निष्फल करे।
फपाय प्रतिमलीनता के ४ भेद-मोध, मान, माया, लोभ
इनको गोप (उपशान्त) करके रये, उदीरे नहीं, उदय आवे
तो निष्फल करें।
योग प्रतिसलीनता के ३ भेन-मन, वचन, काया का योग,
अशुभ प्रपा नहीं, अशुभ प्रपत जारे तो निष्फल करे।
विवित्त मयणामण प्रतिसलीनता के ३ भेद-स्त्री पशु नपु-
सक रहित स्थान भोगे सेवे । उद्यानेसुना १ आरामेमुना २
सुसानेसुगा ३ सुनागारेसुना ४ गृहेमुगा ५ गिरिवादसेसचा
६ इत्यादि अठारह प्रकार का निर्दोप स्थान सेवन करे
प्रायश्चित्त के ५० भेद-१० र प्रकार से आत्मा दोप
लगाता है। १ कदर्प से पीडित होकर दोप लगावे • प्रमाद
से दोष लगाये ३ अन्नानपने से दोप लगाये ४ क्षुधा तृपा से
पीडित होकर दोप लगाये ५ आपत्ति पड़ने पर दोप लगाये
६ भय से दोप लगारे ७ शका से दोप लगाने ८ अकस्मात्
दोप लगाव ९ राग द्वेप के वश दोष लगावे १० परीक्षा के
कारण दोष लगाये।

नवतत्व वर्णन, १० प्रकार से आलोचना करता हुआ दोप लगावे-१ कापता कापता आलोचे तो दोप लगाये २ अनुमान प्रमाण से आलोचे तो दोप लगावे ३ देसा हुआ आलोचे अनदेसा हुआ न आलोचे तो दोप लगावे ४ सूदम सूक्ष्म आलोचे बादर वादर न आलोचे तो दोप लगाये । ५ बादर बादर आलोचे सूदम सूक्ष्म न आलोचे तो दोप लगाये ६ गुण गणाट अव्यक्त शब्दों से आलोचे तो दोष लगावे ७ ऊचे स्वर से आलोचे तो दोप लगाये ८ अनजान के आगे आलोचे तो दोप लगावे । ९ बहुतों के आगे आलोचे तो दोप लगावे १० प्रायश्चित्त के पास आलोचे तो दोप लगावे । १० गुणों का धारक आलोचना करता है-१ जातिवान २ कुलवान् ३ विनयवान् ४ ज्ञानवान् ५ दर्शनवान ६ चारित्र- वान् ७ क्षमावान् ८ वैराग्यवान् ९ पाचों इन्द्रियों को दमने वाला १० अमाई अपच्छाताई प्रायश्चित्त लेकर पश्चात्तापन करने वाला। १० दश गुणों के धारक के पास आलोचना करनी चाहिये-१ आचारवन्त हो २ धारणारन्त हो ३ पाच व्यव- हारों का ज्ञाता हो जैसे-आगमव्यवहार, सूत्रव्यवहार, आज्ञा व्यवहार, धारणाव्यवहार, जीतव्यबहार । ४ प्राय- श्चित्त देकर शुद्ध करने की सामर्थ्य हो ५ लजा हटाने की सामर्थ्य रसता हो ६ सण्ड सण्ड करके प्रायश्चित्त देवे७ इस लोक और परलोक का भय दिसावे ८ आलोचा हुआ दोप

नवतच वर्णन
प्रगट न करे ९ प्रियधर्मा होवे १० बढधर्मी होवे ।
१० प्रकार का प्रायश्चित्त-१ आलोचना प्रायश्चित्त २ प्रति-
कमण प्रायश्चित्त ३ तदुभय प्रायश्चित्त ४ निवेक प्रायश्चित्त ५
व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त ६ तप प्रायश्चित्त ७ छेद प्रायश्चित्त ८
मूलप्रायश्चित्त ९ अनुठप्पा प्रायश्चित्त १० पादुधिया प्रायश्चित्त ।
विनय के सात भेद-१ ज्ञान विनय २ दर्शन विनय ३
चारित्र विनय ४ मन विनय ५ वचन विनय ६ फायविनय
७ लोकोपचार विनय ।
जान विनय के ५ भेट-१ मति ज्ञानी की विनय करे
२ श्रुत ज्ञानी की विनय करे ३ अवधिज्ञानी की पिनय करे
४ मन पर्यव ज्ञानी की विनय करे ५ केवल ज्ञानी की विनय
करे।
दर्शन विनय के दो भेद-१ शुश्रूपा विनय २ अणचा-
मायणा विनय ।
शुश्रूषा विनय के १० भेद-१ गुरु आवे तो खडा होवे
२ आमन विछावे ३ चार प्रकार का निर्दोष आहार पानी
लाकर देवे ४ गुरु की आज्ञानुसार वरते ५ वन्दना करे
(गुणग्राम करे) ६ नमस्कार कर ७ मम्मान देवे ८ आने
तो स्वागत करे ९ रहे तो सेवा भक्ति करे १० जाये तो
छोडने जाये।
अणधासायणाविनय के ४५ भेद-धर्मावतार अरिहन्त
देव की विनय करे २ अरिहन्त प्ररूपित धर्म की विनय करे

नमतत्त्व वर्णन ३ आचार्य की विनय करे ४ उपाध्याय की विनय करे ५ स्थविर की विनय करे ६ कुल की विनय करे ७ गण की विनय कर ८ सघ की विनय करे ९ क्रियापात्र की विनय करे १० स्वधर्मी की विनय करे ११ मतिज्ञानी की विनय करे १२ शुत ज्ञानी की विनय करे १३ अवधिज्ञानी की विनय करे १४ केवल ज्ञानी की विनय करे १५ मनपर्यन ज्ञानी की विनय करे। इन १५ को नमस्कार करे, वन्दना गुण ग्राम करे, इन १५ की आसातना टाले, इन १५ की सेना भक्ति करे । इन ४५ की कोई आसातना करता होवे, अपगुणवाद बोलता हो, गौरव को हानि पहुचाता हो तो ऐसों को मुह तोड उत्तर देवे, विष्ट करे, नरमाई मे समझने वाले हों तो नरमाई से उनके अज्ञान को दूर करे, नहीं तो शक्ति से सिष्ट करे । यदि अपनी सामर्थ्य न हो तो सुने नहीं एकान्त में चला जावे और मामर्थ्य पैदा करने का प्रयत्न करे । चारित्र विनय के ५ भेद-१ सामान्य चारित्री की विनय २ छेदोपस्थापनीय चारित्र की विनय करे ३ परिहार विशुद्धि चारित्री की विनय करे ४ सूक्ष्म सपराय चारित्री की विनय करे ५ यथाक्षायिक चारित्री की विनय करे। मन विनय के दो भेद-१ प्रशस्त मन विनय २ अप्र- शस्त मन विनय । प्रशस्त मन विनय के १२ भेद-१ जेमने असावजे २ नयतव या २ अपिरि ३ आपमे १ आउने ५ शिटुरे ६ अफरमे ७ न्यायपारी ८ अन्उयारी अभेदपारी १० अपरितारणपारी ११ अनुझेरी १० अभूओवचादर । अप्रशस्त मा १२ भेद-अमन मापन २ मपिरिये ३ माप ५ मा ५ ट्ठिर ६ फरसे ७ अन्यायकारी ८ उरी भेगकारी१. परितावणकारी ११ उगरारी १२ भूआपराइये । या विाय फे दो भेद-१ प्रशस्त पचन विनय २ अप्रशस्न पचन विनय । प्रास्न पचा विनय ये १२ भेद-१ जे पचने असावजे २ अपिरिये ३ अपमे ४ अकडुये ५ अपिठुरे ६ अफरमे ७ न्यायकारी ८ अछेटफारी ९ अभेटकारी १० पग्तिावण- पारी ११ अनुद्वेगपारी १२ अभूओवपाइये । अप्रगत वा विाय के १२ भेद-१ जेवचने सावजे २ सकिरिये ३ मकपमं ४ माडुये ५ मनिछरे ६ मफरुमे ७ अन्यायकारी ८ रेकारी ९भेदकारी १० अपरितावणकारी ११ उद्वेगकारी १२ भुओवघाइये । काया विनय के दो भेट-१ प्रशस्त काया विनय २ अप्रशस्त काया विनय । प्रशस्त कायाविनय ये ७ भेद-१ उपयोग से चलना २ उपयोग मे पडे होना ३ उपयोग में यैठना ४ उपयोग में सोना ५ उपयोग मे किमी चीज को उलघना ६ उपयोग मे ६० नवतत्त वर्णन पलधना (पीछे आना) ७ उपयोग से पाचों इन्द्रियो को रागादि से बचा कर वश में करना । अग्रशस्त काया विनय के ७ भेद-१ बिना उपयोग चलना २ विना उपयोग सडे होना ३ विना उपयोग वैठना ४ बिना उपयोग सोना ५ विना उपयोग किमी चीज को उलघना ६ विना उपयोग पीछे हटना ७ विना उपयोग इन्द्रियों को खुले रूप से रागादि मे वर्तना। वियावच्च के १० भेद-१ आचार्य की वियावच्च करे २ उपाध्याय की वियावच करे ३ स्थविर की रियायञ्च करे ४ कुल की वियागच्च करे ५ गण की वियावच करे ६ मम की वियावच करे ७ नये दीक्षित की वियावच करे ८ रोगी की वियावञ्च करे ९ तपस्वी की वियागच्च करे १० स्नधर्मी की वियावञ्च करे। स्वाध्याय के ५ भेद-१ वाचना २ पृछना ३ पर्यटना ४ अनुपेहा ५ धर्मकथा ध्यान के ४ भेद-१ आर्तध्यान २ रौद्रध्यान ३ धर्म- ध्यान ४ शुकृध्यान । भात ध्यान के ८ भेद-४ पाए ४ लक्षण । चार पाये-१ अमनोगम शब्द रूप गन्ध रस स्पर्श का वियोग वाछे तो आर्तध्यान १ । मनोगम शब्द, रूप, गध, रस, स्पर्श का सयोग पाछे तो आर्तध्यान २ । रोगादिक कष्टों में आकुल व्याकुल अधीर होकर कष्टों का वियोग वाडे तो नवतत्व वर्णन आर्तध्यान ३ । काम भोग का सयोग वाछे तो आर्तध्यान ४ । ४ लक्षण-१ कदणिया-आक्रान्त शब्ट से रोना । २ सोयणिया-सोच फिकर में लीन होना । ३ तीयनिया- आसुओं का गिरना । ४ पीटनिया-रोने के साथ मस्तक सिर छाती आदि पीटना। रौद्रध्यान के ८ भेद । ४ पाये ४ लक्षण । चार पाये-१ हिंसानवन्धी-हिंमा करने मे प्रसन्न रहे। २ मोहानुगन्धी-झूठ बोलने में प्रसन्न रहे। ३ लेशानुवन्धी- चोरी करने मे सुश रहे । ४ सारक्सणाणुरन्धी-दूमरे को कट मे फमा कर प्रमन्न हो । चार लक्षण- १ उष्णदोपे-थोड़ी सी यात पर बहुत रोप करना । २ बाहुल्यदोपे-थोडी सी बात पर बहुत दु म मनावे ३ अनाण दोपे-अज्ञान के वश में होकर द्वेप करे। ४ आम- रणान्तदोपे-आयुपर्यन्त द्वेप न छोडे । धर्मध्यान के १६ भेद ४ पाये लक्षण ४ श्रालेरण गुप्पेहा। चार पाये-१ आणाविजए-वीतराग देव की आज्ञानुसार चलने का उपयोग रक्से । २ अवायविजए-कर्म आने के स्थान और कारणों को जाने ३ विपाक विजए--कर्मविपाक फल चिन्ते विचारे । ४ सस्थान विजए-लोक स्वरूप पिचारे। चार लक्षण-१ आणारुचि-आज्ञा पालन से रचि रक्से २ निसर्ग रुचि-जाति स्मरण आदि ज्ञान से धर्म की रुचि

नरतत्त्व बन
४ सूत्र
हैं
होचे । ३ उपदेश रुचि-उपदेश सुनने मे धर्म की रुचि बढे ।
रुचि -शान पढने मे धर्म की मचि होवे ।
चार आलेषण-१ वायणा-शास्त्र पढना पढाना । २
पूछना-प्रश्नादि पृटना । ३ परियट्टना-आवृत्ति (बार वार
पढना)। ४ धर्मक्या-धर्म व्यारयान आदि करना।
चार अनुपेहा-१ एकमाणुपेहा-जीव अकेला आया
अकेला जाएगा । ऐसा विचार करना । २ अणिचाणुपेहा-
सर्व पदार्थ अनित्य
अधुर । ३ असरणानुपेहा-धर्म बिना
ओर कोई शरण नहीं। ४ ससारानुपेहा-सकर्मानुसार सब
जीव ससार मे परिभ्रमण करते हैं।
शुलध्यान के १६ भेद-४ पाये ४ लक्षण ४ालवण ४ अनुपेहा ।
चार पाये-१ पुहुत्त वियके सपियारी-जीर आत्मा को
अनेक जगह चिन्ते । उत्पात, व्यय, ध्रुव, काल, स्थिति आदि।
२ एकान्त पियके अवियारी -एक आत्मस्वरूप को ही विचारना।
३ सुहुम किरिए अपडिवाई-सूक्ष्म क्रिया से बचना । ४
समूर्छिमकिरिए अनियट्टी-तीनों योगों का रुधन करना ।
चार लक्षण-१ अभय भयसन्ना जीते । २ असमोहे-
दीक्षादि शुभ चारित्र न मुरझावे, रागमोह का परित्याग । ३
विवेगे--विवेक रसे, कर्मबन्ध से बचे । ४ विउमग्गे-त्याग
तप जप के द्वारा कर्म मल से आत्मा को निर्मल करे।
चार आलरण-१ सति-क्षमा करे । २ मुत्ति-निर्लोभी
-

फल अशुभ
नवतत्त्व वर्णन
६३
बने । ३ अज-सरल बने, माया कपट त्यागे । ४ मदवे-
मद को त्याग कर कोमल प्रणामी (विनयी) धने ।
चार अणुप्पेहा (विचार)-१ अणिवाणुप्पेहा-ससार की
अनित्यता चिन्ते (विचारे) । २ विप्परिणामाणुप्पहा-पुनल
(प्रकृति) अनित्य परिवर्तनशील हैं। ३ अशुभाणुप्मेहा-कर्मों का
है । ४ अपरायाणुप्पेहा-जीवात्मा अपण्डित है,
अर्थात् छेदन भेदन नहीं हो सकती।
व्युत्मर्ग के २ भेद
१ द्रव्य व्युत्सर्ग २ भाव व्युत्सर्ग ।
द्रव्य व्युत्सर्ग के ५ भेद-१ शरीर व्युत्मर्ग २ उपाधि
व्युत्मर्ग ३ गुण व्युत्सर्ग ४ भत्तपाण व्युत्मर्ग ।
भारव्युत्मर्ग के तीन भेद-१ ससार व्युत्सर्ग २ कर्म
व्युत्सर्ग ३ कपाय व्युत्मग ।
इति निर्जरातत्त्व समाप्त ।
८वन्धतत्त्व
पन्ध तच किसे कहते है?
शुभाशुभ योगों से कर्मरूपी लेश्याओ द्वारा आत्मप्रदेशो
के ऊपर आठ कमों को अवरक की तकोही की तरह या इलायची.
दानों पर साण्ड की चामनी चढाने की तरह, कर्म वर्गणा
जमाती है । अर्थात्-आत्मा जिन भानों से कर्म वर्गणाओं को
मैंचती है, यह कर्म पुग़ल पूर्व बान्धे हुए आत्मा के कर्मों के साथ

६४
नवतच वर्णन
-
मिलकर आत्मप्रदेशो पर ठहर जाते है उन्हें भापकर्म कहते हैं।
और कर्मों का गाढ बन्धरूप होकर आत्मप्रदेशों पर जम
जाने को द्रव्य वन्ध कहते हैं। इसलिए इसको बन्धतत्त्व कहते हैं।
बन्धतत्व के मुख्य ४ भेद है-१ प्रकृतिवन्ध-जो कर्म
धनते हैं उनमे अपने काम करने का स्वभाव पडना । २
प्रदेशवन्य-जो कर्म जिस प्रकृति में बाधे उनमें वर्गणाओं की
मख्या होना । ३ तिथिवन्ध-कमों का बन्ध समय की अवधि
(मर्यादा) के लिये होना। ४ अनुभागवन्ध-फल देते समय
कर्मों का तीव्र या मन्द फल होना।
मन वचन काया के योगों के निमित्त से आत्मा पहले
दो बन्ध करती है और क्रोधादि कपायों की तीव्र या मन्दता
अनुसार
पिछले दो बन्ध पडते हैं।
१ प्रकृतिवन्ध १ मूल आठ कमों की १४८ प्रकृति ।
ज्ञानावरणीय की ५प्रकृति-१ मति ज्ञानावरणीय २ श्रुत
ज्ञानावरणीय ३ अवधि ज्ञानावरणीय ४ मनपर्यवज्ञानागरणीय
५ केवलज्ञानावरणीय ।
दर्शनावरणीय कर्म की ९ प्रकृति-१ चक्षु दर्शनावरणीय
२ अचक्षु दर्शनावरणीय ३ केवलदर्शनावरणीय ४ अवधिदर्शना-
वरणीय ५ निद्रा ६ निद्रा निद्रा ७ प्रचला ८ प्रचला प्रचला
९ स्तिणोधि।
वेदनीय कर्म की दो प्रकृति-१ सातावेदनीय २ असा.
तावेदनीय।

नयतत्व पर्गन
६५
मोहनीयफर्म पी २८ प्रति-शिमफे दो भेद-१ पारित
मोहनीय २ मम्यपत्र मोहनीग।
पारिनमोहनीय पी २५ प्रति जो कि पापनत्व में आ
चुपी है।
और मम्यफ्त मोहनीय की ३ प्रकृति-२ मिध्यात्व
मोदनीय २ सम्यक्त्यमोहनीय ३ मिनमोहनीय ।
आयुर्म यी ४ प्रति-१ नरक की आयुप २ तिर्यश्व
की आयुष ३ मनुष्य की आयुष ४ देवता की आयुप ।
नाम फर्म की ९३ प्रानि जिसमें ३७ प्रति पुण्यतत्त्व में
हैं और ३४ प्रकृति पापतत्व में। यह ७१ हुई। यापी २२ प्रकृति
इस प्रकार
५ बन्धन ५ मघातन २० बोल वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श
के । इनमें से ८ योर पुण्य और पापतत्त्य में से छोड़ देते।
यानी रही पाईस । ३७, ३४ और २२ सब मिलकर नाम
फर्म यी ९३ प्रकृति हुई।
गोन कर्म मी २ प्रकृति-१ नीचगोन २ उपगोन ।
अन्तराय कम की ५ प्रकृति-१ दानान्तगय २ लाभा-
न्तराय ३ भोग अतराय १ उपभोग अन्तराय ५ पलवीर्य
अन्तराय । आठों कमों की मर्प मिलकर १४८ प्रकृति हुई।
१ प्रदेशगन्ध
आठों कमों के दल का समूह तथा आत्मा के प्रदेशों
के ऊपर आठों फों की अनन्त वर्गणा, अर्थात् एक एक
।

नवतत्व वर्णन
आत्म प्रदेश के अपर अनन्त कर्मों की वर्गणा ।
उदाहरण-मोतीचूर का लड्ड् । सपूर्ण लट्ट को स्कन्ध
कहते हैं। लड्डू का एक भाग (टुकडे) को देश कहते हैं। और
दाणों को प्रदेश कहते हैं । इमी तरह कर्मम्प १ पुद्गल (प्रकृति)
आत्म प्रदेशों के ऊपर स्कन्ध देश प्रदश से आवर्णरूप है।
२ स्थितिबन्ध
आठों कमों की स्थिति, समय, अवधि । १ज्ञानानपणीय
२ दर्शनावरणीय ३ वेदनीय ४ अन्तराय इन चारों कों की
स्थिति जघन्य अन्तर्मुहूर्त की उत्कृष्टि ३० कोडाक्रोड सागर
की, घाधाकाल तीन हजार वर्ष का।
मोहनीय कर्म की स्थिति-जघन्य अन्तर्मुहर्त की उत्कृष्टि
७० कोडाकोड मागर की, वाधामाल मात हजार वर्ष का ।
। नामकर्म गोत्रकर्म की स्थिति-जघन्य ८ मुहूर्त की,
उत्कृष्टि २० कोडाकोड सागर की, बाबाकाल २ हजार
वर्ष का।
आयुकर्म की स्थिति-जघन्य अन्तर्मुहूर्त की, उत्कृष्टि
३३ सागर की, बाधाकाल नही ।
३ अनुभागवन्ध
आठों प्रकार के कमों का रस ८५ प्रकार से आत्मा
चावती है. और ९३ प्रकार से भोगती है।
ज्ञानावरणीय कर्म का बन्ध
६ प्रकार से पडता है-१ ज्ञानपडिनियाए २ जान निह

नवतच वर्णन
चणियाये ३ ज्ञान अन्तराण्ण ४ ज्ञान प्रदोपेण ५ ज्ञान अशा-
सायणाये ६ ज्ञानविमवाद योगेण ।
ज्ञानावरणीय कर्म १० प्रकार से भोगा जाता है-१ सोया-
वन्ने २ मोयापिनानापन्ने ३ नेतावन्ने ४ नेताविनानावन्ने
५ घाणापन्ने ६ घाणानिनानावने ७ रमाग्ने ८ रसावि-
नानावन्ने ९ फामावन्ने १० फामाविनानावन्ने ।
दर्शनावरणीय कर्म का प्रकार से पन्ध पडता है-१ दर्शन
पडिनियाये २ दर्शननिहानियाये ३ र्शन अन्तराएण ४ दर्शन
प्रदोपेण ५ दर्शन अशामायणाए ६ दर्शनविसवादयोगेण ।
२ दर्शनावरणीयकर्म ९ प्रकार से भोगा जाता है-१ चक्षु-
दर्शनावरणीय २ अचक्षु दर्शनावरणीय ३ अवधि दर्शनावरणीय
४ केवलदर्शनापरणीय ५ निद्रा ६ निद्रा निद्रा ७ प्रचला ८
प्रचला प्रचला ९ स्त्यानद्धि निद्रा ।
सातावेदनीय कर्म जीय १० प्रकार से रायत है-
१ पाणानुकपनीयाय • भूयानुकम्पनीयाय ३ जीवानु-
कम्पनीयाय ४ सत्रानुकम्पनीयाय ५ अदु मनियाये ६ असो-
यणियाय ७ अझूरणियाय ८ अतिपनियाए ९ अपिट्ठनियाय
१० अपरितापणियाय ।
सातादनीय कर्म जीर ८ प्रकार से भोगते हैं-
१ मनोगमशद २ मनोगम रूप ३ मनोगम गन्ध ४
मनोगम रस ५ मनोगम स्पर्श ६ मन को सुसदाई
को मुरबदाई ८ काया को मुसदाई ।
७चचन

दर नरतत वर्णन असातावेदनीय कर्म जीव १२ प्रकार से गघते है- १ प्राणभूतजीव सतावे इनको दुस नियाय २ मोयणि- याय ३ झुरणियाय ४ तिप्प नियाय ५ विहनियाय ६ परिता- पनियाय ७ बहु दु मनियाय ८ बहुसोयनियाय ९ बहुझुरणि- याय १० बहुतिप्पनियाय ११ बहुपिहणनियाय १२ बहुपरिता- पनियाय । श्रमातावेदनीय कर्म ८ प्रकार से भोगते है- १ अमनोगम शब्द २ अमनोगम रूप ३ अमनोगम गन्ध ४ अमनोगम रस ५ अमनोगम स्पर्श ६ मन को दुस- दाई ७ वचन को दु सदाई ८ काया को दु सदाई। मोहनीय कर्म ६ प्रकार से गधता है- १ तिव्वकोहे २ तिव्यमाने ३ तिव्यमाया ४ तिव्वलोमे ५ तिव्वदर्शनमोहनीय ६ तिव्वचारित्रमोहनी । मोहनीय कर्म जीव ५ प्रकार से भोगते है- १ मिथ्यात्व मोहनीय २ मिश्र मोहनीय ३ सम्यक्त्व मोहनीय ४ कपाय मोहनीय ५ नोकपाय मोहनीय । आयु कर्म १६ प्रकार से वाधा जाता है। चार प्रकार से नरक की श्रायुष्य याधी जाती है- १ महा आरमिया २ महापरिग्रहिया ३ कुणय आहारे ४ पचेन्द्रिय वध । चार प्रकार से तिर्यञ्च की श्रायुष्य बाधी जाती है- १ माया करने से २ माया मे माया करने से ३ सोटा

-
.
नरतत्व वर्णन
तोल सोटा माप करने से ४ अलिय वयण-अपना दोष दूमरों
के सिर पर लगाने से अर्थात् झूठ बोलने से।
चार प्रकार से मनुष्य की भायु याधी जाती है-
१ प्रकृति भदियाए २ प्रकृति विनियाए ३ साणुकोसाए
४ अमच्छरियाए।
चार प्रकार से देवता को श्रायु गाधी जाती है-
१ सराग सयम पालने से ० सयमासयम से ३ बाल
तप से ४ अकाम निर्जरा से।
श्रायु'कर्म जीव ४ प्रकार से भोगता है-
१ नरक गति में २ तिर्यश्च गति मे ३ मनुष्य गति में
४ देवता गति में।
नाम कर्म पाठ प्रकार से बाधा जाना है।
चार प्रकार,से शुभ नाम कर्म वाधा जाता है-
१ काय उज्जु २ भार उजुए ३ भासा उजुए ४
४ अविपमनाद जोगेण ।
१४ प्रकार मे शुभ नाम कर्म भोगा जाता है-
१ इष्ट शब्द २ इष्ट रूप ३ इष्ट गन्ध ४ इष्ट रस ५
इष्ट स्पर्श ६ इष्ट गति ७ इष्ट स्थिति ८ इष्ट लावण्य ९ इष्ट
यशोकीर्ति १० इष्ट उट्टाण कर्म चलवीर्य पुरपाकार ११ इष्ट
स्वर १२ कान्त स्वर १३ प्रिय म्वर १४ मनोगम स्वर ।
अशुभ नाम कर्म ४ प्रकार से बाधा जाता है
१ काया अनउजुए २ भाव अनउज्जुए ३ भासा
अनइज्जुए ४ विपमवादयोगेण ।

नमतत्त्व वर्णन अशुभ नाम जीर १४ प्रकार स भोगते है- १ अनिष्ट शन्द २ अनिष्ट रूप ३ अनिष्ट गन्ध ४ अनिष्ट रस ५ अनिष्ट स्पर्श ६ अनिष्ट गति ७ अनिष्ट स्थिति ८ अनिष्ट- लावण्य ९ अयशोकीर्ति १० अनिष्ट उट्ठाण कर्म बल वीर्य पुरुपाकार पराक्रमेण ११ अनिष्ट स्वर १२ अकत सर १३ दीन हीन स्वर १४ अमनोज्ञ सर । गोन कर्म सोलह प्रकार से बाधा जाता है । याठ प्रकार का मद करने से नीच गोत्र वाधा जाता है- १ जातिमद २ कुलमद ३ बलमद ४ रूपमद ५ तप- मद ६ लाभमद ७ सूत्र (शास्त्र) विद्यामद ८ ऐश्वर्य मद यह आठ मद करने से जीव नीच गोत्र मे पैदा होता है। आठ प्रकार से भोगता है- १ जाति हीन २ कुल हीन ३ बल हीन ४ रूप हीन ५ तप हीन ६ लाभ हीन ७ सूत्र शास्त्र हीन ८ ऐश्वर्य हीन । पाठ मद न करे तो जीव ऊच गोत्र याधता है- १ जाति मद न करे २ कुल मद न करे ३ बल मद न करे ४ रूप मद न करे ५ तप मद न करे ६ लाभ मद न करे ७ सूत्र शास्त्र भद न करे ८ ऐश्वर्य मद न करे । श्राठ प्रकार से भोगा जाता है- १ जाति श्रेष्ठ २ कुल श्रेष्ठ ३ बल श्रेष्ठ ४ रूप श्रेष्ठ ५ तप श्रेष्ठ ६ लाभ श्रेष्ठ ७ शास्त्र श्रेष्ठ ८ ऐश्वर्य श्रेष्ठ । अन्तराय कर्म ५ प्रकार से जीय वाधते है- १ दान अन्तराय २ लाभ अन्तराय ३ भोग अन्तराय -

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४ उपभोग अन्तराय ५ परवीर्य अन्तगय । यह ५ प्रकार
की अन्तगय किमी को देने नो अन्तराय कर्म भोगना पड़े।
यदि किमी को अन्तराय न देवे तो नहीं भोगना पडे ।
इति यन्धतत्व समाप्त।
९ मोक्षतत्त्व
मोक्षतच किसे कहते है ?
जव मिथ्याज्ञान मिथ्यादर्शन मिथ्याचाग्नि के निगकरण
करने का अर्थात् छोडने का कारण मिलता है और अवृत्ति
कपाय प्रमाद अशुभ योग कर्म वन्ध के कारण रुक जाते हैं,
और पूर्व वन्वे हुए कर्मा की निर्नग हो जानी है, तन जीना मा
मुक्ष्म और स्थूल शरीर से छुटकारा पाकर कर्ममल से रहित
पूर्ण शुद्ध होकर, अन्तिम गरीर की अवगाहना से कुछ
कम (तीसरा भाग कम ) आत्म प्रदेशों की अवगाहनायुक्त
उर्घ लोकाकाग के अन्त मे सिद्ध क्षेत्र पर सञ्चिदानन स्वरूप
परमात्मा सिद्व स्वरूप अनन्त सुग्वयुक्त अनन्त शक्तिवान्
अतीन्द्रिय ध्रुब आनन्ट मे सदा मग्न रहते हैं जन्म मरण
जग आधि व्यावि शारीरिक मानसिक सर्व प्रकार के कष्टों से
रहित निर्वाण अवस्था मे मदा के लिये निगकुल वा परम
कृतकृन्य हो जाते हैं उसे मोक्ष तत्त्व कहते हैं ।
१५ प्रकार से सिद्ध होते हैं
१ नीर्थ मिद्धा २ अतीर्थ सिद्धा ३ तीर्थकर सिद्धा ४

७२ नरतत्व वर्णन अतीथंकर सिद्धा ५ गृहस्थलिंगसिद्धा ६ अन्यलिंगसिद्धा ७ सलिंगसिद्धा ८ स्त्रीलिंगसिद्धा ९ पुरुपलिंगसिद्धा १० नपु- सकलिंगमिद्धा ११ स्वयबुद्धि मिद्धा १२ प्रत्येक बुद्धि सिद्धा १३ बुद्धचोहि सिद्धा १४ एकसिद्धा १५ अनेक मिद्धा एवं सिद्ध १५ । चार प्रकार से जीव मोक्ष में जाते है- १ सम्यक् ज्ञान २ सम्यक् दर्शन ३ सम्पर चारित्र ४ सम्यक् निर्वासना तप करने से । ज्ञानदर्शन चारित्र तप ॥४॥ नौ द्वार १ छतापदपरूपणाद्वार २ द्रव्य प्रमाणद्वार ३ क्षेत्रप्रमाण- द्वार ४ स्पर्शनाद्वार ५ कालद्वार ६ भागद्वार ७ भावद्वार ८ अतराद्वार ९ अल्प बहुतद्वार । छत्ता पदपरूपणा के १० भेद-१ चार गति में से मनुष्य को मोक्ष है, तीन को नहीं २ पाच जाति में से पचेन्द्रिय को मोक्ष, चार को नहीं ३ छ काया में त्रस को मोक्ष, पाच को नहीं ४ सझी को मोक्ष, असजी को नहीं ५ भव्य को मोक्ष, अभव्य को नहीं ६ अनाहारी को मोक्ष, आहारी को नहीं ७ पाच सम्यक्त में से क्षायिक सम्यक को मोक्ष, चार को नहीं। ५ सम्यक्त्वों के नाम १ उपशम सम्यक्त्व २ सहस्वादन सम्यक्त्क ३ क्षयोपशम सम्यक ४ वेदकसम्यक्त ५ क्षायिक सम्यक्त्र । - नवतच वर्णन ८ पाच ज्ञानो में से केवल ज्ञानी को मोक्ष, चार को नहीं ९ चार दर्शन में से केवल दर्शनी को मोक्ष, तीन को नहीं १० पाच चारित्र में से यथाक्षायिक चारित्री को मोक्ष, चार को नहीं। द्रव्य से २-सिद्ध अनन्ते। क्षेत्र से ३-लोक के असख्यात भाग में सिद्ध भग- वान् सच्चिदानन्द स्वरूप विराजमान है। स्पर्शना ४-लोक का असख्यातवा भाग । स्पर्शना ५-लोक का असरयातला भाग स्पर्शते हैं। काल से ६- एक एक सिद्ध की अपेक्षा आदि है अन्त नहीं। बहुत व अनन्त सिद्धों की अपेक्षा आदि अन्त नहीं। भागद्वार ७-तेईम दण्डक के जीवों से मिद्ध अनन्त गुण अधिक है । और वनस्पति की अपेक्षा से सिद्ध अनन्त गुण न्यून थोडे हैं। भावद्वार ८-मिद्धों में क्षायिक भाव केवल ज्ञान केवल दर्शन क्षायिक सम्यक पारिणामिक भाव होते हैं । अन्तरा द्वार ९-केवल ज्ञान केवल दर्शन का अन्तरा नहीं सिद्धों ने फिर ससार के चक्र मे आना नहीं । जहा एक सिद्ध है वहा अनन्त मिद्ध हैं । जहा आन्त सिद्ध हैं वहा एक सिद्ध है । सिद्धों सिद्धों में अन्तर नहीं । अल्पाबहुत द्वार-१ सव से गोडे नपम लिंग सिद्धा।

७४ नवनव वर्णन २ स्त्रीलिंगसिद्धा मख्यात गुणा ३ पुरुपलिंग मिद्धा सख्यात गुणा । एक ममय म नपुसक १० सीझे । स्त्री २० सीझे । पुरुप १०८ सीझे। ३२-३२ आठ समय तक मीझे। उपरान्त विरह पडे तो जपन्य १ समय का उत्कृष्ट ६ माम का। ३२ से ४८ तक मात ममय सीझं । उपरान्त चिरह पडे तो जघन्य १ समय उत्कृष्ट ६ मास का । ४९ से ६० तक छ समय सीझे। उपरान्त सिरह पडे तो जघन्य १ ममय उत्कृष्ट ६ माम का । ६१ से ७० तक ५ ममय मीझे । उपरान्त चिरह पडे तो जघन्य १ समय उत्कृष्ट ६ माम का । ७३ से ८४ तक ४ समय सीझे उपरान्त विरह पडे तो जघन्य १ समय उत्कृष्ट ६ माम का । ८५ से ९६ तक ३ समय सीझे । उपरान्त रिह पडे तो जघन्य १ ममय उत्कृष्ट ६ माम का। ९७ से १०२ तक २ समय सीझे । उपरान्त विरह पडे जघन्य १ समय उत्कृष्ट ६ मास का । १०३ से १०८ तक १ समय मीझे । उपरान्त विरह पडे तो जघन्य १ ममय उत्कृष्ट ६ माम का । इसी तरह सर्व बोलो में ममझ लेना। १ वमपणे २ नरपणे ३ मन्नीपणे ४ वन ऋपभ- चतत्व वणी नाराच सघयण याला ५ शुलध्यानी ६ मनुष्य गति ७ क्षायिक - सम्यक्त्वी ९ यथाक्षायिक चारित्रमाला पडित वीर्य १० कंवलज्ञानी ११ केवलदर्शनी १२ भव्यसिद्धक १३ परम- ललेशी १४ चरम शरीरी । इन चौदह गुणो नाले मोक्ष मे नाते हैं। जघन्य दो हाथ की अवगाहना वाला १ उत्कृष्टी ५०० अनुप की अवगाहना वाला जघन्य ९ वर्ष की आयु वाला सृष्ट पूर्व क्रोड की आयु वाला कर्मभूमि के मनुष्य मोक्ष में आते हैं और नहीं । इति नवतच समाप्त। आहार पाणी के ४२ दोष । १६ सोलह उदगम के दोप । आहाफम्मे उद्देसिय-पुई कम्मेमिस्सी जाये । ठपणा राहुडियाये-पाओ अरफियपामिच्चे । परियट्टे अभिहडे- भिन्नमालोहडे अच्छिज्जे अणिसिट्टे अज्झोयरेणे सोलस्स- नंडगम्मे दोमा ॥२॥ इति । १ आहाकम्मे (आधाकर्मी) साधु के निमित्त बना हुआ चे तो दोप। • उद्देसिय ( उदेसिक) जिस साधु के निमित्त वना हो ही माधु लेवे तो आधाकर्मी । अन्य -और साधु लेचे तो देसिक दोष लगे।

नरतत्व वर्णन
३ पूइकम्मे (पूति कर्म) निर्दोष आहार में आधाकर्मी
की मिलारट होये यह आहार लेवे तो पूतिकर्म ढोप लगे।
४ मिस्सीजाय (मिश्रित) जो गृहस्थ अपने और माधु,
दोनों के लिये बनावे यह आहार लेवे तो मिश्रित दोप लगे।
५ ठवणा (स्थापना) साधु के ही निमित्त स्थापन
करके रखे और को ना देवे वह आहार लेवे तो स्थापना दोप
लगता है।
६ पाहुडियाय (प्राकृतिक) अतिथि के निमित्त जो भोजन
हो और थोडा होवे उसे अतिथि को देने से पहले लेवे तो दोप।
७ पाओर (प्रादुरकरण ) अधेरे मे दीना, बैटरी, बिजली
आदि का प्रकाश करके देवे ऐमा आहार लेवे तो दोप ।
८ कीय (फ्रीत) साधु के निमित्त मोल लिया हुआ
आहार लेवे तो दोप।
९ पामिचे (अपमित्य ) साधु के निमित्त उधारा लिया
हो, वह आहार लेवे तो दोप ।
१० परिपटिय (परिवर्तित ) साधु के निमित्त अपना
आहार देकर अन्य से और किसी प्रकार का आहार लेवे
। उसी आहार को साधु लेवे तो दोप ।
११ अभिहडे ( अभिहत) माधु के निमित्त मम्मुस
रास्ते में या उपाश्रय में आहार लावे उसे लेवे तो दोप ।
१२ उदभिन्ने ( उदभिन्न ) लेपन करके बध किया हुआ
फुडवा कर लेवे तो दोप।

तत्त्व वर्णन १३ मालोहडे ( गालापहत) ऊची, नीची, तिर्थी विषम हि में रक्या हुआ आहार लेचे तो दोप क्योंकि दाता को ! का कारण है। १४ अन्छिन्ने (आच्छेद्य) निर्बल से सोस कर दिलाये { आहार लेवे तो दोप। १५ अनिसिढे (अनिसृष्ट) दो मनुष्यों का माझे फा हार उन दोनों की मरजी के बिना लेवे तो दोप। १६ अझोयरे (अध्यवपूर्वक) आहार थोड़ा होने के रण साधु के निमित्त उममें और आरभ करके मिला कर वे जैसे-थोडी छाछ है और उसमें पानी मिला कर अधिक ना दी ऐसे भोजन को लेगे तो दोप। इति १६ उद्गम दोप समाप्त । १६ उत्पातन के दोप धाइदुई-निमित्तै-अजीवे वणीमगे तिगिन्छाय । कोहे माणे माया लोभे ये हवति दम दोसा ॥२॥ पुव्य पच्छासथुवा, निजामते अण्ण जोगे। उपायनाए दोसा, सोलसम्मेमूल कम्मे ॥४॥ १ धाई (धात्री) धाय माता की तरह किसी के बचों को खिला करके आहार लेचे तो दोप। २ दूई (दूती) दूतपने का काम करके आहार लेवे तो दोप। ३ निमित्ते (निमित्त) भूत भविष्यत् वर्तमान आदि निमित्त ज्योतिप बता करके आहार लेवे तो दोप ।

नवतच वर्णन
४ आजीवे (आजीविरा) जाति बता करके आहार
लेने तो दोप।
५ वणीमग्गे (वनीपक) रक भिग्नारी की तरह दीन
बन कर आहार लेवे तो दोप।
६ निगिन्छाय (चिकित्सा) वैद्य की तरह चिकित्सा
करके आहार लेवे तो दोष ।
७ कोहे (क्रोध) क्रोध करके आहार लेवे तो दोष ।
८ माणे (मान) करके आहार लेवे तो दोप।
९ माया (दगाबाजी) कपट से आहार लेवे तो दोप |
१० लोभे (लोभ) लोभ से अधिक आहार लेवे तो
दोप।
११ पुब्धि पच्छामथुया (पूर्व पश्चात सस्तव) आहार के
निमित्त, आहार लेने से पहले या आहार लेने के बाद दानी
की स्तुति करे तो दोप
१० निजा (विद्या) जिमसे देनी सिद्व की जाय ऐसी
विन्या बता के लेवे तो दोष ।
१३ मते (मत्र ) जिससे देवता सिद्ध किया जाय ऐसे
मन यता के आहार लेवे तो दोष ।
१४ चुण्णा (चूर्ण) चुग्ण तत्र आदि ता के आहार
लेवे तो दोप।
१५ जागे (योग) विपय आदि कुसयोग दुगत्माओं
का सयोग मिलाकर आहार लेवे तो दोप

नवतस्य वर्णन ७६ १६ मूलाम्मे (मूलकर्म) गर्भपात कगने की ओपधि आदि ढग बताकर आहार लेवे तो दोप । १६ उत्पातन के दोप समाप्त । १० एपणा के दोप संफियमक्खियनिस्वित्ते, पिहिय महारिय टायगुम्मिस्मे । अपरिणायेलित छड्डुये, एमणा दोमा दम हरति ॥५॥ १ मकिये (मफित्त ) गृहस्थी तथा माधु को शका हो जावे फिर भी वही आहार लेवे तो दोप । २ मरिपये (माक्षित्त) मचित्त पानी से हाथ या शरीर का कोई अग भीगा हो उसके हाथ से आहार लेवे तो दोप। ३ निम्सित्ते (निक्षिप्त) सचित्त रस्तु पर अचित्त वस्तु पडी होवे उसे हटा के लेवे तो दोष । ४ पिहिये (पिहिते) अचित्त वस्तु सचित्त से ढकी होवे उसे हटा कर लेवे तो दोप। ५ सहारिये (सहृत) निदोप वस्तु सचित्त के साथ लगी हुई हो उसे अलग करके देवे तो दोप । ६ दायग (दायक) देने वाला गेगी, अगहीन, लगडा या अनजान हो यदि उसे वस्तु देन से इष्ट की आशा होरे तो उससे नहीं लेना यदि लेने तो दोष । ७ उम्मिरसे ( उन्मित्र ) अचित्त सचित्त मिली हुई वस्तु ले तो दोष । .

नवतत्त्व वर्णन ८ अपरिणाये (अपरिणत) पूर्ण शस्त्र परिगम्या विना अर्थात् अचित्त हुए विना लेवे तो दोष । ९ लित्त (लिप्त ) थोडे समय की (तत्काल की) लेपन की हुई भूमि पर जा करके आहारादि लेवे तो दोप । १० छडिय (छर्दित) गिरता पडता हुआ आहार तो दोप। १० एपणा के दोष समाप्त । ५ मॉडले के दोप सजोयणापमाणे, इगालधूम कारणे पडमारसियं पाहिरं तरेवा ॥६॥ ६ कारण से आहार का सेवन करे यणा चेयानच्चे इरिय द्वाये संजमहाय । तहपाणवतियाए छहपुणधम्मचिंताए ॥७॥ ६ कारण से आहार का परित्याग करे आयके उपसग्गो तितिक्खयानभरगुत्तिय । पाणीदया तनहेउ शरीरवोच्छेयणटाए ॥८॥ इति आहार पाणी के ४२ दोप समाप्त ।

छब्बीस द्वार

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re- है । छब्बीस हार - गाथा सरीर ओग्गाहणा सघयणे, महाण कमायते हुन्ति मण्णाए । लेस्मा इदिय समुग्धाय, सप्णीचेद पञ्जनेय ॥१॥ दिट्टि दमण नाणे, अण्णाणजोगउन श्रोगतहाकिमाहारे । उपयाय ठिर्ड समोहिया, चरण गई आगई चेवपाण जोगेया॥२॥ भानार्थ-इन दो गाथाओ में पविंशति २६ द्वारों की गणना की गई है। जैसे कि १ शरीर द्वार • अवगाहना द्वार ३ सहनन द्वार ४ सस्थान द्वार ५ कपाय द्वार ६ सज्ञा द्वार ७ लेझ्या द्वार ८ इन्द्रिय द्वार ९ समुद्घात द्वार १० मज्ञा द्वार ११ वेद द्वार १२ पर्याप्त द्वार १३ हष्टि द्वार १४ दर्शन द्वार १५ ज्ञान द्वार १६ अज्ञान द्वार १७ योग द्वार १८ उपयोग द्वार १९ आहार द्वार २० उत्पत्ति द्वार २१ स्थिति द्वार २२ समोहिता द्वार २३ च्यवन द्वार २४ गति अगति द्वार २५ प्राण द्वार २६ योग द्वार। अब यथासख्या इन द्वारों की व्यारया लिसी जाती है। १शरीर द्वार शरीर पाच जो कि पचीम बोल में आ चुके हैं। नार- ४ छम्चीस द्वार कीय वा देवताओं में तीन शरीर होते हैं- १ वैक्रिय २ तेजम ३ कार्मण । वायुकाय को छोडकर चार स्थापर, तीन विकलेन्द्रिय, असजी तिर्यञ्च और अमज्ञी मनुष्य में तीन शरीर-१ औदा- रिक २ तेजस ३ कार्मण । वायुकाय सज्ञी तिर्यश्च मानुषी मे चार अरीर-१ औदा- रिक २ वैक्रिय ३ तेजस ४ कार्मण सज्ञी मनुष्य में पाचों शरीर । २ अरगाहना द्वार सातों नरकों के नारक्यिों की अवगाहना । जघन्य अगुल के असस्यात भाग मात्र है। (१) उत्कृष्टि पहली नरक में ७॥ धनुप छ अगुल की (२) दूमरे नरक में १५|| धनुप १० अगुल की (३) तीसरे नरक में ३१। धनुष की (४) चौथे नरक में ६०॥ धनुष की (५) पाचवें नरक मे १२५ धनुष की (६) छठे नरक में २५० धनुप की (७) सातवे नरक में ५०० धनुष की । उत्तर वैक्रिय करें तो मूल अवगा- हना से दुगुनी कर सकते हैं। देवताओं की अवगाहना जघन्य तो सब की अगुल के असख्यातवे भाग मात्र की । उत्कृष्टि भवनपति व्यन्तर ज्योतिषी पहले दूमरे देव- लोक में सात हाथ की। तीसरे और चौथे देवलोक में छ

चवीस द्वार
हाथ की। पाचव और छठे में ५ हाथ पी। मातचे ३
मे ४ हाय की। नवर्य दमयें ग्यारह बारहवे मे ३ हाथ
उत्तर वैनिय करें तो लाम योजन की कर सकते
नव नौ ग्रेवेयक में दो हाथ की। पाच अनुत्तर वि
में एक हाथ की।
उत्तर चैनिय यहा पर नहीं करते । शक्ति तो है।
स्थान सूदम माधारण रनस्पति असही मनुष्य की ज
उत्कृष्ट अगुल के असख्यात भाग मान ।
उत्कृष्टि माधिक १००० योजन, कवल नाल की अपे
द्वीन्द्रिय जीवों की १२ योजन की। श्रीन्द्रिय
तीन कोम की। चतुरिन्द्रिय की ४ कोस की। पञ्चे
जलचर सनी असज्ञी की १००० योजन की । स्थल
असज्ञी की पृथक् कोम की । स्थलचर सज्ञी की छ कोम
खेचर सज्ञी असज्ञी की पृथक् धनुप की । उरपुर सही
१००० योजन की । उरपुर असझी की पृथक् योजन :
भुजपुर सज्ञी की पृथक् कोस की । भुजपुर अमजी की पृ
धनुष की।
मनुष्यों की अवगाहना
५ देवकुर ५ उत्तरकुरु की तीन कोस की। ५ ।
वर्ष ५ रम्यकवर्ष की २ कोम की। ५ हेमवय ५ हैरण्य
एक कोस की । ५६ अन्तरद्वीपों के युगलियों की ८
धनुप की 1 पाच महाविदेह के मनुष्यों की ५०० धनुए।

६६ छम्पीस द्वार । - पाच भरत पाच गवर्त की आरी के प्रमाण । पहला आरा लगते तीन कोम की। पहला उतरते दूमरा लगते दो कोस की। दूमग उतरते तीसरा लगते एक कोम की। तीमग उतरते चौथा लगते ५०० धनुप की। चौथा उतरते पाचना लगते ७ हाथ की । पाचगा उतरते उठा लगते १ हाथ की। छठा उत्तरते पहला लगते एक हाथ से न्यून की। पहला उतरते दूमग लगते ७ हाथ की । दूमरा उतरते तीसरा लगते ५०० धनुष की । तीमग उतरते चौथा लगते एक कोम की। चौथा उतरते पाचवा लगते दो कोम की । पाचवा उतरते छठा लगते तीन कोम की। तीर्थरो की अनगाहना १ श्री ऋपभदेन भगवान की २ श्री अजितनाथ ४५० ३ श्री सम्भवनाय श्री अभिनन्दन ३५० ५ श्री सुमतिनाथ ३०० धनुप की " ४०० ४ श्री पा " २५० ७ ००० " श्री सुपार्श्वनाथ चन्द्रप्रभु सुविधिनाथ श्री शीतलनाय 1,श्री श्रेयासनाथ " " १५० १०० - " घाबीर दार " . " " " 1 " " १० " १. श्री यामुग १३ श्री शिमलनाथ ६० २१ भी अन्नाथ १५ श्री धर्माय १६ श्री शान्निाम १७ भी फ्भुनाथ १८ श्री अरनाथ १९ भी महिनाव २५ २. श्री मुनत मामी २१ श्री नेमिनाथ २२ श्री अरिष्टनेमि २३ श्री पार्श्वनाथ २४ श्री पर्द्धमान चक्रातियों की अवगाहना १ भरत चक्रपती पी ५०० मगर ४५० ३ गघव ४२ सनत्कुमार मान्तिनाथ ६ कुथुनाथ अरनाथ ८ सम्भूम २८ हाथ की ७ " घनुप की . " " , " ४० " " ७ " चचीस द्वार २० " ७ महापद्म १० हरिपेण १५ ११ जयनाम १२ ब्रह्मदत्त वासुदेवों की अपगाहना १ त्रिपृष्ठ की २ द्विपृष्ठ ३ सम्भव पुरुषोत्तम ५ पुरुपसिंह ४५ ६ पुरुप पुण्डरीक २९ धनुष की " " " , " " " ८ लक्ष्मण कृष्ण ९ " १० बलदेनों की अवगाहना की १ धनुष की अमल २ विजय ३ भद्र ४ सुपर्व ५ सुनन्दन आनन्दन " " " ७ नन्दन २९ २६ " ६ छाशीमबार गमपन्द ५ परमद " प्रतिसामुदयों की अपगाहना १ ঔষধ ३ " " " " " तारक 3 मेग्म ४ गधुगेटक ५ निमम्भ ६ पल पाराद ८ राण " २५ " २ जरासन्य ३ सहनन द्वार सहनन छ है, जो कि पशीम योलों में वर्णित है। देवता नारकीय ये उ सहनन मे रहित होते हैं। पाच स्थायर तीन विक्लेन्द्रिय असक्षी तिर्यच अमझी मनुष्य इनमें एक सेवार्तक ही सहनन होता है। मनी तिर्यञ्च सजी मनुष्य में छ सहनन होते हैं । त्रेमठ शलाका पुरुष और युगलियों में और केवली भगवान में एक यऋपम नाराच ही सह- मन होता है। P

१०
छन्नीस द्वार
४मस्थान द्वार
मन्थान पट हैं-१ ममचतुरस्र • न्यग्रोधपरिमण्डल
३ मादि ४ वामन ५ कुज ६ हुड । नारकीय पाच स्थावर
तीन विकलेन्द्रिय अमज्ञी तिर्यश्च अमजी मनुष्य पन्नेन्द्रिय म
एक हुड भरमान होता है। पृथिवीकाय का मसूर की दाल
के समान सस्थान । अपनाय का पानी के बुदबुद
के समान
तेजोकाय का सुइयों की गशि के अग्र भाग के समान !
वायु काय ना पत्ते के आकार । वनस्पति काय का नाना प्रकार
का मस्थान है । सज्ञी तियन और सही मनुष्य मे छ ही
सम्थान होते हैं, किन्तु वेमठ गलाका महापुरुप, युगलिये
और देवताओं में एक समचतुरन ही मम्थान होता है ।
५ रुपाय द्वार
कपाय चार है-१ मोध २ मान ३ माया ४ लोभ
त्रयोविंशति दण्डकों में यह ४ कपाग नियम से ही हो सकते
हैं। किन्तु सज्ञी मनुष्यों में इन चारों कपायो की भजना है
तथा (१) नारकियों मे को व विशेष (२) मनुष्यों में मान विशेष
(३) तिर्यश्च मे माया विशेप (2) देवताओं में रोभ विशेष ।
६ मज्ञा द्वार
मक्षा चार है-~-१ आहार २ भय ३ मैथुन ४ परिग्रह
नयोविंशति दण्डकों में ग्रह चारों ही सज्ञा नियम से होत
है, किन्तु मज्ञी मनुष्यों में इनकी भजना है। १ तथा आहार
सज्ञा तिर्यश्च में विशेष २ भय सज्ञा नारकियों में विशेष में
-

छपीस द्वार मैथुन सज्ञा मनुष्यों में विशेष ४ परिग्रह मज्ञा देवताआ में विशेष । ७ लेश्या द्वार विषय लेश्या छ हैं.-१ कृष्ण २ नील ३ कापोत ४ तेनो ५ पद्म ६ शुध । पहले और दूसरे कि में पोत लेश्या है । तीसरे नरक में कापोत लेउया नारकी बहुन हैं, और नील लेझ्या थोडे हैं। चतुर्थ नरक में नील लेड्या होती है। पाच नरक में नील लेशी नारकी बहुत और कृष्ण लेशी थोडे हैं। छठे नरक में कृष्ण लेगी नारकी हैं। मात नरक में महाकृष्ण लेशी नागकी हैं। भवनपति वानव्यन्तर देनी मे कृष्ण, नील, कापोत और तेजो यह चारों लश्यायें होती हैं। ज्योतिषियों और पहले दूमरे देवलोर मे एक तेजो लेश्या होती है। तीमरे देवलोक से लेकर पाच देवलोक पर्यन्त एक पद्म लेश्या होती है। छठे स्वर्ग से लेकर २६- देव- लोक पर्यन्न एक शुक्ल लेश्या होती है । बादर, पृथिवी, पानी, वनस्पति, अपर्याप्त मे चार लेश्याए (कृष्ण, नील, कापोत, तेजो) होती है। पाच स्थावर सूक्ष्म पर्याप्त और पाच स्थानर बार पर्याप्त तेजोकाय और चायुसय पर्याप्त वा अपर्याप्त इनमे तीन लेश्याय (कृष्ण, नील, कापोत) होती है। तीन विकलेन्द्रिय असज्ञी तिर्यञ्च मनुष्य पञ्चेन्द्रिय मे तीन लेश्याये कृष्ण नील सपोत होती है। सनी तिर्यश्व सज्ञी मनुष्यों मै छ लेश्याय होती हैं। किन्तु युगलियों में कृष्ण नील कापोत तेजो यह चारों लेझ्याय होती हैं।

१२ छन्थी द्वार ८ इन्द्रिय द्वार रिपय इन्द्रिय पाच हैं, जो कि पचीम वोलों में आ चुकी हैं नारकी और देवताओ में पाचों इन्द्रिया होती हैं । पाच स्थावरों में एक स्पर्शेन्द्रिय होती है। द्वीन्द्रिय जीवों में दो इन्द्रिया (रस और स्पर्श) होती हैं। त्रीन्द्रिय जीवों में तीनों इन्द्रिया होती हैं (जैसे-१ घाण • ग्म ३ स्पर्श)। चतुरिन्द्रिय जीवों में चारों इन्द्रिय (१ चक्षु २ घ्राण ३ रस ४ स्पर्श) होती हैं। अमनी तिर्यश्च और मजी मनुष्यों में पाचों इन्द्रिया होती हैं । मज्ञी तिर्यश्च और मन्त्री मनुष्यों में पाचों इन्द्रिया होती हैं ९ समुद्धात द्वार विषय ममुद्धात मात प्रकार की हैं-१ वेदनीय २ कपाय ३ मारणान्तिक ४ चैक्रिय ५ तैजस ६ आहारिक ७ केरली । नारकियों में चार समुद्धात हैं--(१ वेदनीय २ कषाय ३ बैंक्रिय ४ मारणान्तिक) भरनपति,व्यन्तर, ज्योतिषी, वैमानिक । पहले देवलोक से लेकर धारहवे देवलोक पर्यन्त ५ ममुद्भात- (१ वेदनीय २ कपाय ३ मारणान्तिक ४ क्रिय ५ तेजम) हैं। १३३ देवलोक से लेकर २६ ३ देवलोक पर्य्यन्त और पृथिवी पानी वनस्पति तीन विकलेन्द्रिय असज्ञी तिर्यश्च, असक्षी मनुष्य पचेन्द्रिय में ३ समुद्भात--(१ वेदनीय २ कपाय ३ मारणान्तिक) होते हैं। वायु काय में चार (१ वेदनीय २ कपाय ३ मारणान्तिक ४ चैक्रिय) होते हैं । सज्ञी तिर्यश्च में A छम्मोस द्वार - पाच-(१ वेदनीय २ फपाय ३ मारणान्तिक ४ वैफिय ५ तेनम ) मानुषी म छ एक केपली की अधिक हुई। किन्तु मज्ञी मनुष्य में सात ही ममुद्धात पडते हैं १० मंजी अमजी द्वार पिपय पहले नरक मे सजी और असनी दोनों उत्पन्न होते हैं । किन्तु पहले नरक से आगे दूसरे नरक से लेकर सातवें नरक पर्यन्त मनी जीर ही उत्पन्न होते हैं । भरनपत्ति वान- व्यन्तर देवताओं में सही और असझी दोनों ही उत्पन्न होते हैं । ज्योतिपियो से लेकर वैमानिकों पर्य्यन्त केवल एक सही जीव ही उत्पन्न होता है । ५ स्थावर ३ विकलेन्द्रिय कुल ८, अमज्ञी तिर्यञ्च ९ अमज्ञी मनुष्य १०, यह सर्व असञी जीव होते हैं । किन्तु १ सज्ञी तिर्यञ्च २ सज्ञी मनुष्य यह सज्ञी , ११ वेद द्वार विषय १ स्त्री वेद २ पुरुप वेद ३ नपुसक वेद, नारकीय, पाच स्थावर, तीन विकलेन्द्रिय असक्षी निर्यकच असक्षी मनुष्य मे एक नपुमक वेद ही होता है। भवनपति, चानव्यन्तर, ज्योतिपी, वैमानिक पहले और दूमरे देवलोक पर्यन्त दो वेद होते हैं- १ स्त्री २ पुरुष । तीमरे देव से लेफर २६ देवलोक पर्यत केवल एक पुरष वेद ही होता है। सझी तिर्यञ्च और सही मनुप्या में तीन वेद ही होते हैं।

५ छपीस द्वार 1 १२ पर्याप्त द्वार पर्याप्त उ हैं, जो कि पचीम बोलों में आ चुके हैं। एकेन्द्रिय मे ४ पर्याप्त होते हैं। जैसे कि १ आहार २ शरीर ३ इन्द्रिय ४ श्वासोश्वास । तीन किलेन्द्रियों, सज्ञी तिर्यच पचेन्द्रिय मे ५ पर्याप्त हैं। किन्तु मन पर्याप्त नहीं। और असज्ञी मनुष्य में चार पर्याप्त होते है । अपितु मन पर्याप्त और पचन पर्याप्त नहीं होते। सनी तिर्यञ्च और सज्ञी मनुष्य नारकी और देवताओं में छ पर्याप्त होते है। १३ दृष्टि द्वार विपय दृष्टि तीन है.--१ सम्यग् २ मिथ्या ३ मिश्र । नारकी, भवनपति, पाणव्यन्तर, ज्योतिषी, वैमानिक १२ वे देवलोक पर्यन्त दष्टि तीनों होती हैं। नव अवेयक विमानी में सम्यग् दृष्टि ओर मिथ्यादृष्टि यही दोनों होती हैं। अपितु पाच अनुत्तर निगानों में एक ही सम्यग् दृष्टि होती है। पाच स्थावर पर्याप्त और अपर्याप्त, नीनों विक्लेन्द्रिय, असन्जी तिर्यच, पचेन्द्रिय पर्याप्त में एक मिथ्याटष्टि होती है। असज्ञी मनुप्य ५६ अन्तरद्वीपों के युगलियों में भी एक मिग्यारष्टि होती है। तीन विश्लेन्द्रिय असज्ञी तिर्यञ्च अपर्याप्त ३० प्रकार के युगलियों मे २ दृष्टि होती हैं । जैसे कि मम्यग् दृष्टि और मिथ्या दृष्टि ! सझी तिर्यकच पचेन्द्रिय और सक्षी मनुष्यों में तीन दृष्टि होती हैं। जैसे कि १ सम्यग् २ मिथ्या ३ मिश्र। .

दयाममा
-
१४ दगन द्वार रिपय
दर्श ४ हैं, जो कि पहले आ चुके हैं। नारयी और
ताओ में ३ दान होते हैं-- अग्नु ३ अयधि ।
IT न्यावर द्वीन्द्रिय ख्रीन्द्रिग और असक्षी गनुष्य में एक
मच देशाता है। चतुरिन्द्रिय और असशी पञ्चेन्द्रिय में
दर्शन होते हैं-१ चक्षु • अचक्षु । मभी निर्यघ्र मे १
क्षु २ अचभु ३ अवधि यह ती दर्शी होते है। सनी
नु'य में १ पशु २ अचक्षु ३ अवधि ४ फेवल यह चारों
र्शन होते हैं।
१५ ज्ञान द्वार
HIT पाच है। देवता नारकी मनि तिर्यच में ३ मा
१ गति २ श्रुति ३ अनधि ) हैं। पाच स्थार अमन्नि
नुष्य मिल्मुग्वी परमाधर्मी देय ५६ अन्तरद्वीपे मनुष्य
नमें ज्ञान नहीं। तीत विकलेन्द्रिय असनि तिर्यश्च अपर्याप्त
२ ज्ञान (१ मति २ श्रुति ) हे । पर्याप्त में नहीं। सनि
नुष्य में पाचों ज्ञान।
१६ अज्ञान द्वार
अज्ञान तीन (१ मति २ श्रुति ३ विभङ्ग) हैं। सात
रकी भवनपति वाणव्यन्तर ज्योतिषी २१ वे देवलोक
य॑न्त ३ अज्ञान । पाच अनुत्तर विमानों में अक्षान नहीं ।
च स्थावर तीन विक्लेन्द्रिय अमनि तिर्यन असन्नि मनुष्य
।

छुप्यास द्वार । ५६ अन्तरद्वीपे युगलिये इनमें २ अज्ञान (१ मति २ श्रुति) हैं । सन्नि तिर्यश्च सन्नि मनुष्य में तीनों अज्ञान । १७ योग द्वार निपय योग १५ हैं। चार मन के-१मत्य मनोयोग • असत्य मनोयोग ३ मिश्र मनोयोग ४ व्यवहार मनोयोग । चार वचन के- ५ मत्य वचनयोग ६ अमत्य वचनयोग ७ मिश्र वचनयोग ८ व्यवहार वचनयोग । सात काया के योग- औदारिक १० औदारिक का मिश्र ११ क्रिय १२ क्रिय का मिश्न १३ आहारिक ११ आहारिक का मिश्र १५ कार्मण योग। नारकी और देवताओं में ११ योग होते हैं। जैसे कि- ४ मन के ४ वचन के यह आठ ९ वैक्रिय १० चक्रिय का मिश्र ११ और कार्मण योग । पृथ्वी, पानी, अग्नि, वनस्पति और अमज्ञी मनुष्यों में तीन योग होते हैं। जैसे कि-१ औदारिक २ औदारिक का मिन ३ कार्मण योग । वायु काय मे ५ योग होते हैं । जैसे कि-१ औदारिक २ औदारिक का मिश्र ३ वैक्रिय ४ वैक्रिय का मिश्न ५ कार्मण योग । तीन विकले- न्द्रिय असज्ञी तिर्यञ्च पञ्चेन्द्रिय मै ४ योग होते हैं । १ १२ औदारिक का मिश्र ३ कार्मण ४ व्यवहार। और मानुपी मे १३ योग होते है । जैसे कि- '४ वचन के एव आठ ९ औदारिक, औदारिक का १० चैक्रिय ११ वैक्रिय का मिश्न १२ कार्मण योग १३ । । सही मनुष्य में १५ ही योग होते हैं। । H , साथीम द्वार + 7 असान, , १८ उपयोगमार विषय उपयोग १२ है। जैसे कि- पाच शान, चार दर्शनाण्य १२ रफी, भयनपनि, याणगन्तर,ज्योतिषी और थैमा २१ये देवलोप पश्यंत ६ उपयोग होते है। तीन मान (मति, श्रुत, अधि), ती अज्ञा, तीन दर्शा (चभु, अचा, अधि), र ५५ पाच अनर विमानों में ६ उपयोग होते है। तीन ज्ञान ( मी, श्रुन, अवधि ), ती दर्शन (चक्षु, अचतु, अवधि), ण्य ६ । पाच स्थानर-अमझी गनुप्य, पायाम, अपरयास, द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिग, पर्याप्त इमै ३ उपयोग होते हैं। जैसे कि-१ मति अज्ञान २ श्रुत अज्ञात ३ अचक्षुर्दशा। द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय अपर्याप्त में ५ उपयोग होते हैं। १ मतिज्ञान २ श्रुतज्ञान ३ मतिअज्ञान ४ श्रुतअज्ञान ५ अचतुर्दर्शन । एव ५ । चतुरिन्द्रिय और असज्ञी तिर्यश्च पर्चन्द्रिय पर्याप्त मे ४ उपयोग होते हैं। जैसे कि-१ मत्ति अज्ञान २ श्रुत अज्ञान ३ चक्षुर्दर्शन ४ अचक्षुर्दर्श प ४ । समुश्चय पर्याप्त, अपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय, असज्ञी तिर्यश्च । पचे- न्द्रिग में ६ उपयोग होते हैं। जैसे कि-१ मति शान २ शुत झार ३ मति अन्नान ४ श्रुत अज्ञान ५ चक्षुर्दर्शन ६ अचक्षुर्दर्शन । सझी तिर्यश्च पश्चेन्द्रिय में ९ उपयोग होते है। ती ज्ञान, तीन अज्ञान, तीन दर्शन (चक्षु ,अचाधु, अवधि) | एप ९ सज्ञी मनुष्य में १२ उपयोग होते है। 4 १६ छपीस द्वार । ५६ अन्तरद्वीपे युगलिये इनमे २ अन्नान (१ मति २ श्रुति) हैं । सनि तिर्यश्च मनि मनुष्य में तीनों अज्ञान । १७ योग द्वार विषय योग १५ हैं। चार मन के-१मत्य मनोयोग • अमत्य मनोयोग ३ मिश्र मनोयोग ४ व्यवहार मनोयोग । चार पचन के-५ मत्य वचनयोग ६ असत्य वचनयोग ७ मिश्र वचनयोग ८ व्यवहार वचनयोग । सात काया के योग- ९ ओदारिक १० औदारिक का मिश्र ११ वैक्रिय १२ वैक्रिय का मिश्र १३ आहारिक १४ आहारिक का मिश्र १५ कार्मण- योग। नारकी और देवताओं मे ११ योग होते हैं। जैसे कि- ४ मन के ४ पचन के यह आठ ९ वैक्रिय १० पैकिय का मिश्र ११ और कार्मण योग । पृथ्वी, पानी, अग्नि, वनस्पति और अमझी मनुष्यों में तीन योग होते हैं। जैसे कि-१ औदारिक २ औदारिक का मिश्र ३ कार्मण योग । वायु काय मे ५ योग होते हैं । जैसे कि-१ औदारिक २ औदारिक का मित्र ३ वक्रिय १ चैक्रिय का मिश्र ५ कार्मण योग। तीन विकले- न्द्रिय असझी तिर्यञ्च पञ्चेन्द्रिय मे ४ योग होते हैं । १ औदारिक २ औदारिक का मिश्र ३ कार्मण ४ व्यवहार । सझी तिर्यञ्च और मानुपी मे १३ योग होते है । जैसे कि- ४ मन के ४ वचन के एव आठ ९ औदारिक, औदारिक का मिश्र १० वैविय ११ वैक्रिय का मिश्र १२ कार्मण योग १३। किन्तु सझी मनुष्य में १५ ही योग होते हैं - छुपीस द्वार - मनुष्य पञ्चेन्द्रिय । असबी तिर्यञ्च पञ्चेन्द्रिय मे जीन पूर्णोक्त १० दण्टको से आकर उत्पन्न होते हैं । अमज्ञी निर्यच पञ्चेन्द्रिय में जीर २४ दण्डकों से आकर उत्पन्न होते हैं। असझी मनुष्य में जीव ८ दण्डकों से आकर उत्पन्न होते है जैसे कि-पृथ्वी, पानी, वनस्पति, तीनों इन्द्रिय, तिर्यञ्च पञ्चे- न्द्रिय, मनुष्य पञ्चेन्द्रिय । सज्ञी मनुष्य में जीवते जो, वायु, काय वर्ज के शेष २२ दण्डकों से आ उत्पन्न हाता है। २१ आयु द्वार विपय पहले नरक के नारकियों की आयु जयन्य १० हजार वर्ष की उत्कृष्टि स्थिति एक सागर की, उसके प्रस्तर (पाथडे) १३ हैं। पहले प्रस्तर की जघन्य १० हजार की, उत्कृष्ट १० हजार वर्ष की, दूसरे प्रस्तर की जघन्य ९० हजार वर्ष की उत्कृष्टि स्थिति ९० लास वर्प की, तीसरे प्रस्तर की जघन्य १० लास की, उत्पृष्टि स्थिति करोड़ पूर्व की ३ । इसके आगे १० प्रस्तर और है। किन्तु एक सागर के दश भाग करके अति प्रस्तर एक २ भाग बढा लेना चाहिए । जैसे कि- चौथे भस्तर की जघन्य स्थिति १ पूर्व की, उत्कृष्टि दश भाग के एक भाग की ४ पाचवे प्रस्तर की जघन्य एक भाग की उत्कृष्टि भाग की छठे ૨ ३ सातवे ३ आठवें । - " " ४ " " " १०० छन्चीस द्वार T " ६ " ७ ८ ८ ९ १ " " ९ " १० नौ दश एकादशवे द्वादशन त्रयोदान अर्थात एक सागर की १३॥ दुसरे नरक के नारक्रियों की स्थिति जघन्य १ सागर की उत्कृष्टि ३ मागर की मो जघन्य से दो सागर और वढे अपितु दूसरे नरक में ११ प्रस्तर हैं। सो एक सागर के ११ भाग करने चाहिए । इस प्रकार करने से दो सागरों के द्वाविंशति २० भाग हुए । फिर प्रति प्रस्तर १ सागर दो भाग वृद्धि कर लेने चाहिए । जैसे कि- पहले प्रस्तर की जघन्य १ सागर की उस्कृष्टि १ सागर दो भाग की दूसरे १ सागर दो भाग उत्कृष्टि १ सागर ४ भाग की तीसरे १ १ चोथे ४ " " १ " ८ १ " १ २ 1 २ सागर १ की १ ३ " २ ५ " " अभील द्वार १ " " ८ " " " दा उस्कृष्टि . ९, एकादशने २ ३ सागर की दतीय नरक की स्थिति-जघन्य ३ मागर की, उत्कृष्टि ७ सागर की। तीसरे नरक के ९ प्रस्तर हैं । जिसमे सागर बढ ४ फिर एक २ मागर के नौ नौ भाग कर लेने चाहिये । सो (९x४) ३६ भाग हुए 1 फिर प्रति प्रस्तर के चार चार भाग वृद्धि कर लेने चाहिए। जैसे कि- पहले प्रस्तर की जघन्य ३ सागर, उत्कृष्टि ३ सागर ४ भाग की दूसरे ३ ४ भाग की उत्कृष्ट ३ मागर ८ भाग की तीसरे ३ चौथे पाचवे प्रस्तर की जघन्य ४ सागर ७ भाग की, उत्कृष्टि ५ सागर दो भाग की ६ सातचे आठवे ५ जपने मागर की चौथे नरक में नारकियों की स्थिति [-जघन्य सात मागर की, उत्कृष्टि १० मागर की, अपितु चौथे नरक के सात प्रस्तर हैं। किन्तु तीन मागर पढे । फिर एर एक मागर के सात सात भाग करने चाहिये । सो (७४३) २१ हुए। फिर प्रति स्तर ३ भागों की वृद्धि कर लेनी चाहिये । जैसे कि- ३ " " . " " १ " " " ar " " us ५ " " सुचीम द्वार १० पहले प्रस्तर की जगन्य मात मागर की, उत्कृष्टि ७ मागर ३ भाग की " ८ . ८ " " " " १ " ४ १० सागरोपम की दुसरे ७ सागर ३ भाग उत्कृष्टि ७ ६ ॥ तीसरे २॥ चोय पाचवे ९ छठे ५ मात ९ पाच नरक के नारकियों की स्थिति-नधन्य १० मागरोपम की, उत्कृष्टि १७ मागगेपम की, पाचवे नरक के ५ प्रस्तर हैं। जिम में मागर बढे । फिर प्रति प्रस्नर एक एक सागर वढा लेना चाहिये। फिर २ सागर ओर बढे। फिर एक मागर के पाच भाग कर लेने चाहिये। इस प्रकार करने से दो मागरों के १० भाग हुए, फिर एक सागर २ भाग प्रति प्रस्तर वढा लेना चाहिये । जैसे कि-पहले प्रस्तर की जघन्य १० सागरोपम की, उत्कृष्टि ११ सागर २ भाग की २ भाग १२ ४ दूमरे ११ सागर तीसरे, १२ चौथे १ १ ३ " " पाचवे, ३ १७ सागरोपम की छठे नरक के नारकियों की स्थिति-जघन्य १७ मागरोपम की, उत्कृष्टि २० मागरोपम की, छठे नरक के तीन प्रस्तर है

छरीम द्वार
"
१
जिमम मागर यढे पाच फिर पाची मागगे मे मे २
मागगें के ६ भाग कर लेने चाहिये। फिर प्रनिप्रस्तर १
मागर २ भाग की प्रद्धि कर लेनी चाहिये । जैसे कि-
पहले प्रस्तर की जघन्य १७ मागर की, उत्कृष्ट १८ सागर २
भाग की
दूसरे
१८ सागर २ भाग उत्साप्टि २० मागर १ ॥
तीसरे
२० मागर की
मातवेंरक का एक ही प्रस्तर है। विन्तु नरकानास
पाच हैं। जैसे कि-१ काले २ महाकाले ३ रौप ४ महारोस
५ अस्पईल अपितु इपाचो रिरुवामों में जो पहले
चार मरकाम हैं। उनम नारकियों की जघन्य स्थिनि
२२ मागरोपम प्रमाण है। उत्कृष्टि स्थिनि ३३ सागरोषम
प्रमाण की है। किन्तु 'अपईठाण' नरकवास की जघन्य
था उकृष्टि स्थिति ३३ सागगेपम प्रमाण की है । भरनपति
असुरकुमारों के दो इन्द्र-१ चरगइन्द्र २ बलइन्द्र । चमरइन्द्र
की राजधानी दक्षिण की आग, बलइन्द्र की राजधानी
उत्तर की ओर।
भपनपतिया की स्थिति
दक्षिण दिग् के असुरकुमारों की स्थिति- -जपन्य दस हनार
वर्ष की। उकृष्टि एक सागर की। उनकी देवियों की
जपन्य दम हजार वर्ष की, उत्कृष्ट साढे तीन पल्यापम की।
क्षिण दिग के नवनिकाय की जघन्य दस हजार वर्ष की,
।

१०४
ज
छुचीस द्वार
उत्कृष्टि डेढ (१॥) पल्योपम की । उनकी देपियों की जघन्य
दम हजार वर्ष की, उत्कृष्टि अर्द्ध पल्योपम की।
उत्तर दिग् के असुरकुमारो की स्थिति-जघन्य दस हजार
वर्ष से कुछ अविक, उत्कृष्टि कुछ अधिक एक सागरोपम
की। उनकी देवियों की स्थिति--जघन्य दस हजार वर्ष
की, उत्कृष्टि साढे चार पल्योपम की । उत्तर दिग् के नर
निकाय की स्थिति-जघन्य दस हजार वर्प की, उत्कृष्टि दो
परयोपम से कुछ न्यून । उनकी देवियों की जघन्य दम
हजार वर्ष से कुछ अधिक, उत्कृप्टि एक पल्योपम से कुछ
न्यून ।
चाणव्यन्तरों की स्थिति
जघन्य दस हजार वर्ष की, उत्कृष्टि एक पल्योपम की।
उन की देवियों की जघन्य दम हजार वर्ष की, उत्कृष्टि एक
,
पल्योपमें से कुछ न्यून ।
ज्योतिपियो की स्थिति
चन्द्रमा के विमाननासी देवों की स्थिति-जघन्य पल्यो-
पम के चतुर्थ भाग की, उत्कृष्टि एक पल्योपम और लक्ष वर्ष
की। उनकी देवियों की जघन्य पल्योपम के चतुर्थ भाग की,
उन्कृष्टि अर्ध पल्योपम और पचास हजार वर्ष की ।
सूर्य के विमानघासी देनों की स्थिति-जघन्य पल्योपम के
चतुर्थ भाग की, उकृष्टि एक पल्योपम और एक हजार
वर्ष
फी। उनकी देपियों की स्थिति-जघन्य पल्योपम का चतुर्य

छुचीस हार भाग, उत्कृप्टि अर्द्ध पल्योपम ५०० वर्ष की। ग्रह विमान- वासी देवों की स्थिति-जघन्य पल्योपम का चतुर्थ भाग, उत्कृप्टि एक पल्योपम की। उनकी देवियों की नधन्य पल्यो- पम का चतुर्थ भाग, उन्कृष्टि अर्ध पल्योपम की। नक्षत्र विमान. वासी देवों की स्थिनि-जघन्य पल्योपम का चतुर्थ भाग, उत्कृष्टि अर्ध पल्योपम की। उनकी देवियों की जघन्य पल्यो- पम का चतुर्थ भाग, उत्कृष्टि अर्द्ध पल्योपम से कुछ अधिक। तारा रिमागासी देवों की स्थिति-जघन्य पल्योपम का आठवा भाग, उन्कृष्टि पल्योपम के चतुर्थ भाग की । उनकी देवियो की जघन्य पल्योपम का आठवा भाग, उत्कृष्टि आठवें भाग से कुछ अधिक । वैमानिक देवों की स्थिति पहले देवलोक के देश की स्थिति-जघन्य एक पल्योपम की, उत्कृप्टि तो सागगेपम की । उनकी देवियों की जघन्य एक पल्योपम की, उस्कृप्टि मात पल्योपमनी। अपरिगृहीत देवियों की जघन्य एक पल्योपम की, उत्कृष्टि ५० पल्योपम की। दूसरे देवलोक के देवों की जघन्य एक पल्योपम से कुछ अधिक, उन्कृष्टि दो सागरोपम से घुछ अधिक। उनकी देवियो की जघन्य एफ पल्योपम से कुछ अधिक । उत्कृष्ट नव पल्योपम से कुछ अधिक । अपरिगृहीत देवियों की जघन्य एक पल्योपम से कुछ अधिक, उत्कृष्टि ५५ पल्योपग की। ।

छयीम द्वार तीमरे देवलोक के देवों की स्थिति जघन्य दो मागगेपम की, उत्कृष्टि मात मागरोपम । चतुर्थ देवलोक के देवों की स्थिति जघन्य दो मागरोपम से कुछ अधिक, उत्कृष्टि मात सागरोपम से कुछ अधिक । पाचा देवलोक के देचो की स्थिति जपन्य ७ मागरोपम, उत्कृष्टि १० मागर की । छठे देवलोक के देवो की स्थिति १० सागर की, उत्कृष्ट १४ मागर की। सातवें १४ आठ १७ नव- दाने एकादराने २१ द्वादशवे देवलोक के देवों की जघन्य २१ मागर की, उत्कृष्ट २२ सागर की। २२ २३ २३ जघन्य " २० " 1 " " " " " २४ २५ २५ " " " २७ । . ~ " २८ -

103
म्यीम हार
पसरविशतिरे,
"
.
.
"
"
"
२१
चार अनुत्तर बिगानमामी देगों की नपन्ग स्थिति ३१
मागरोपम पी, कृष्टि ३३ मागगेपम पी। मर्यायमिन्द्र
निमायामी देनों की स्थिनि उपन्ग और प्टि ३३
मागरोपग की।
पाच म्यारों की स्थिति
पाच स्थानरी यी जघन्य स्थिति अनार की होती है।
उत्कृप्टि या वियरण निम्नप्रसार में है। पीयायः
भेट है। १ महा २ सुधा ३ याला ४ गणामिरा ५
मपरा ६ परपुढची । इनकी यधाम में स्थितिम प्रभार
है-१०,१२, १५, १६, १८, २२rजार यर्प पी। अपनाग
की सात हजार वर्ष पी। तेजोगाय पी ३ मिन और ३॥त्रि
की । वायुसराय की तीन हजार वर्ष थी। पापतिपाय पी
इम हजार वर्ष की।
पाच स्थावर सूक्ष्म और अमजी मनुष्य की स्थिति
जघन्य और उप्टि अन्तर्मुहर्त थी। ती विषलेन्द्रियाँ।
पश्चेन्द्रिय । किन्तु युगरिये वर्ज के शेप मनुष्य
की जघन्य अन्तर्मुहूर्त फी, उत्कृष्टि इम प्रभार
.
-

छम्चीस द्वार " ur मास " । त्रीन्द्रिय ४९ ग्निों चतुरिन्द्रिय पञ्चेन्द्रिय के ५ भेद है। १ जलचर २ स्थलचर ३ खेचर ४ उरपुर ५ भुजपुर । (१) जलचर सजी और असजी की करोड पूर्व की । (२) स्थलचर सजी की तीन पल्योपम की । (३) स्थलचर असज्ञी की ८४००० वर्ष की । (४) सेचर सजी की पल्योपम के असख्या- तो भाग प्रमाण । (५) खेचर असज्ञी की ७२ वर्ष की । (६) उरपुर सज्ञी की क्रोड पूर्व की । (७) उरपुर असजी की ५३००० चर्प की। (८) भुनपुर सन्नी की एक करोड पूर्व की । (९) मुज- पुर असनी की ४२ हजार वर्ष की । सज्ञी मनुष्य का विवरण ५ भरत ५ऐरावत के पहले आरे लगते और ५ देवकुरु ५ उत्तरकुरु के युगलिये मनुष्यों की स्थिति-जघन्य तीन पल्योपम से कुछ न्यून | उत्कृप्टि तीन पल्योपम की । ५ भरत ५ ऐरावत के पहले आरे के उतरते हुए दूमरे आरे के लगते हुए, ५ हरिचर्प, ५ रम्यक वर्ष के युगलिये मनुष्यों की जघन्य दो पल्योपम से कुछ न्यून । उत्कृष्टि दो पल्योपम की। ५ भरत ५ ऐरापर्त दूसरे आरे उतरते हुए तीसरे आरे के लगते हुए और ५ हैमवय ५ हैरण्यय युगलिये मनुष्यों की जघन्य एक पल्योपम की ।

ध्यास द्वार . ५ भरत, ५ गवर्त के तीसरे आरे उतरते हुए चौथे आरे के लगते हुए और ५ महाविदेह के मनुष्यों की पायु, जघन्य अन्तर्मुहर्त की उकृष्टि करोड पूर्ण की। ५ भगत, ५ ऐगपत के चतुर्थ आरे फे उतरते हुए पाचवे आरे के लगते हुए मनुष्यों की जघन्य अन्तर्मुहूर्त की उत्कृप्टि १२० वर्ष की। पाचवे आरे उतरते हुए छठे आरे के लगते हुए ५ भरत, ५ ऐरावर्त के मनुष्यों की स्थिति जघन्य अन्तर्मुहर्त की, उत्कृप्टि १० वर्ष की, छठे आरे उतरते हुए १६ वर्ष की। इसी प्रकार उत्सर्पिणी काल की स्थिति जाननी चाहिये । ५६ अन्नरद्वीपों के युगलिये गनुष्यों की जघन्य परयोपम के असर यातवें भाग से कुछ न्यून, उत्कृप्टि पल्योपम के अस- रयानवे भाग प्रमाण । तीर्थकरी की स्थिति विपय श्री प्रापभदेर भगवान की ८४ लक्ष पूर्व की श्री अजितनाथ ३ श्री सम्भवनाथ अभिनन्दन सुमतिनाथ ६ सुपार्श्वनाथ २० १ " " ४ " ५ " " पद्मप्रभु ७ ८ " " " चन्द्रप्रभु छनीम द्वार ११२ सुनन्द आनन्द ६ ८५ हजार वर्ष की " ७ वर्ष की or or नन्दन रामचन्द्र १५ बलभद्र १२०० प्रतिनासुदेवो की स्थिति विषय अश्वग्रीन प्रतिवासुदेव की ८५ लक्ष वर्ष की तारक मेरक मधुकेटक निसुम्भ २ ३ " " " ६ बल ८५ हजार वर्ष की रानण or जरासध प्रहाद १५ १२०० वर्ष की २२ समोहिया द्वार चारो गतियों के जीव दो प्रकार से मारणान्तिक समु- द्वात से मृत्यु होते है । एक तो तन्तुवाय के ताने के समान, द्वितीय बन्दूक की गोली के समान । अर्थात् एक जीव के प्रदेश तन्तुगाय के ताने के समान आवागमनपूर्वक निकलने है। दूमरे वन्दूक की गोली के समान एक ही बार प्रदेश निकल जाते हैं।

ध्यास द्वार
२३ च्यवन द्वार
जिस प्रकार उत्पात द्वार का वर्णन किया गया है, उसी
प्रकार च्यवन द्वार का भी स्वरुप जानना चाहिये ।
२४ गतागति द्वार पिय
पहले नरक की २५ आगति-१५ कर्मभूमि के मनुष्य
५ सज्ञी तिर्यश्च ५ असज्ञी तिर्यश्च । एव २५ [२० की गति
कर्मभूमि के मनुष्य ५ सशी तिर्यश्च ] दूसरे नरक की २०
आगति-१५ फर्मभूमि के मनुष्य ५ सज्ञी तिर्यब्ध २० की
२० गति १५ कर्मभूमि के मनुष्य ५सशी तिर्यश्च । तीसरे नरक
की २० आगति और गति १९ की है। किन्तु एफ भुजपुर
दल गया। चौथे नरक की १८ की आगति (उरपुर टल
गया) गति यही २० की। पाचवे नरक की १७ की आगति
(स्थलचर टल गया) गति २० की। छठे नरक की १६ की
आगति (उरपुर टल गया) गति वही २० की। सातवे
नरक की १६ की आगति १५ कर्मभूमि के मनुष्य एक
जलचर पुरुष-स्त्री नहीं जाति । गति ५ सज्ञी तिर्यञ्च की।
भवनपति वाणव्यन्तर की आगति १११ की ५६ अन्तर
द्वीपों के युगलिये १५ कर्मभूमिये मनुष्य ३० अकर्मभूमिये
मनुष्य, ५ सज्ञी तिर्यश्च, ५ असज्ञी तिर्यश्च एव मर्व १११ ।
गति २३ की, १५ कर्मभूमियें मनुष्य, ५ सज्ञी तिर्यञ्च,
१ पृथ्वी २ पानी ३ वनस्पति एव २३ । ज्योतिषी तथा

छब्बीस द्वार जैसे कि-आठवे देवलोक से ऊपर चार देवलोक और नव- प्रैवेयक रिमान पाच अनुत्तर विमान एव १८ अपर्याप्त और १८ पर्याप्त एव ३६ वोल टल गये । ५६३ में से शेष ५२७ रहे सो इन स्थानों मे काल करके जा सकता है । असनी मनुष्य की आगति १७१ के थोकडे की । १७९ के थोकडे मे से ८ पोल टल गए । जैसे कि-(१) तेजोकाय (२) वायुकाय (३) सूक्ष्म (४) वादर । चारों ही अपर्याप्त चारों ही पर्याप्त एन ८ टले बाकी १७१ रहे। असज्ञी मनुष्य की गति १७९ के थोकडे की । सज्ञी मनुष्य की आगति २७६ की ९९ प्रकार के देवता ६ नरक १७१ का थोकडा एव २७६ हुए। गति ५६३ की। ५६ अन्तरद्वीपों के युगलियों की आगति २५ की, १५ कर्मभूमिथे मनुष्य, ५ सज्ञी तिर्यन ५ असञी तिर्यब्च एव ०५ हुए। गति १०२ की । १० भवनपति १५ परमाधर्मी १६ याणव्यन्तर १० तिर्यञ्चजृम्भक एव । ५१ अपर्याप्त ५१ पर्याप्त । एप १०२ हुए । पाच हैमवय-पाच हैरण्यवय के युगलियो की आगति २० फी, १५ कर्मभूमिये मनुष्य ५ सझी तिर्यश्च एव २० । गति २१४ की-५१ पिछले १० ज्योतिपी १ पहला देव- रोक यह मर्व ६२ अपात, ६२ पर्याप्त एव सर्व १२४ हुए।

।
छब्बीस द्वार
पाच हरिवर्ष पाच रम्यक वर्ष के युगलियों की आगति
पूर्वोक्त २० की। गति १२६ की । जैसे कि १२४ तो
पिछले और एक दूसरे देवलोक का देवता अपर्याप्त और
पर्याप्त एवं १२६ हुए ।
५ देवकुरु ५ उत्तरकुरु के युगलियों की आगति पूर्वोक्त
२० की। गति १२८ की-१२६ पिछले एक किल्लिपिक,
तीन पल्योपम वाले अपर्याप्त और पर्याप्त एव १२८ हुए ।
तीर्थंकरदेव की आगति ३८ की, जैसे कि-२६ देवलोक
९ लौमान्तिक देर ३ नरक एर मर्व ३८ हुए ।
गति एक मुक्ति की-केरली भगान की आगति १०८
की, ८१ प्रकार के देवता ९९ प्रकार के देवों में से १८ टल
गए । जैसे कि-१५ परमाधर्मी तीन किल्बिपिकदेव एव
१८ शेप ८१ भेद हुए। १५ कर्मभूमिये मनुष्य ५ सझी
तिर्यञ्च और पृथ्वी, पानी, वनस्पति तथा चार नरक एव
गति १ मुक्ति की-माधु की आगति २७५ की ९९
प्रकार के देवता ५ नरक, १७१ का थोकडा एर २७५ हुए।
गति ७० की-~२६ देवलोक ९ लौमान्तिकदेव एव
३५ अपर्याप्त ३५ पर्याप्त एव ७१ हुए।
मूल गुण के विराधक साधु की आगति पूर्वोक्त २७५
की, गति १२६ की, जैसे कि-१० भवनपतिदेव १५ परमा-
.

उनीम द्वार
धर्मी १६ पाणव्यन्तर १० तिर्यञ्चजम्भक १० ज्योतिषी
१ पहला देवलोक एक तीन पल्योपम वाला किल्लिपिकदेव ण्व
६३ अपर्याप्त ६३ पर्याप्त पय १२६ हुए ।
उत्तर गुण के विगधक माधु की आगति पूर्वोक्त १७५
की, गति १४८ की-१०६ पिठले ११ देवलोक अपर्याप्त
और पर्याप्त एव २२ यह मर्व १४८ हुए ।
श्रापक की २७६ की आगति ९९ , प्रकार के देवता ।
६ नरक १७१ का योकडा व सन २७६ हुए।
गति ४२ की-१२ देवलोक ९ लौकान्तित एव २१
अपर्याप्त और २१ पय्याप्त सर्व ४२ भेद
चक्रवर्ती की आगति ८२ की-८१ प्रकार के देवता ९९
प्रकार के देवों में से १८ टल गये । जैसे कि-१५ परमाधर्मी,
३ किल्लिपिक, शेप रहे ८१ एक प्रथम नरक एन ८२ ।
गति नरक की, बलदेव की आगति ८३ की। ८१ प्रकार
के देन पूर्वोक्त कथन किए हुए और २ नरक एन सर्व ८३ ।
गति देवलोक की वा मोष की वासुदेव की आगति
३२ की, १२ कल्प देवलोक नरवेयक विमान ९ लौकान्तिक
देव २ नरक ए ३२ हुए ।
गति नरक की-मण्डलीक गजा की आगति २७६ की
पूर्वोक्त मनुष्य की आगति के अङ्क जानने चाहिये ।
गति नरक की-सम्यग्दृष्टि की आगति ३६३ की ९९
-

छब्बीस द्वार ११६ प्रकार के देवता ७ नरक, ८३ प्रकार के युगलिये १७१ का थोक्डा एव सर्व ३६३ हुए । गति २५८ की-९९ प्रमार के देवता ६ नरक १५ कर्म- भूमिये मनुष्य ५ सज्ञी तिर्यञ्च यह सर्व १२५ वोल हुए। १२५ अपर्याप्त और १०५ पर्याप्त एव २५० हुए । तीनों विकलेन्द्रियों का अपर्याप्त ५ असनी तिर्यञ्च का अपर्याप्त एव ८ यह सर्व २५८ हुए। मिध्यादृष्टि की-आगति ३६६ की ९४ प्रकार के देवता ५ अनुत्तर विमानों के देवता टल गए । ७ नरक ८६ प्रकार के युगलिये। ५ हेमवय ५ हैरण्य ५ हरिवर्प ५ रम्यकवर्ष ५ देव- कुरु ५ उत्तरकुर ५६ अन्तरद्वीपों के युगलिये एव ८६ । १७९ का थोकडा एव सर्व ३६६ हुए । गति ५५३ कीजीय के ५६३ भेदों में से ५ अनुत्तर विमान दल गए । ५ पास, ५ अपर्याप्त एव १० टले । शेप ५५३ रहे। इतने स्थानों मे मिथ्यादृष्टि काल करके जाता है। प्रतिवासुदेव की आगति २७१ की, १७१ का थोकड जैसे कि-९४ प्रकार के देवता ६ नरक | गति अधोलोन की, पुरुपवेद की आगति ३७१ की, ९९ प्रकार के देवत ७ नरक, ८६ प्रकार के युगलिये १७९ का थोकड़ा। गति ५६३ की, स्त्री वेद की आगति ३७१ की ९९, प्रकार E

१२०
छीस द्वार
देवता ७ नरक, ८६ प्रकार के युगलिये १७९ का योकडा
गति ५६१ की, मातवीं नरक का पर्याप्त और अपर्याप्त टल
गया । नपुमक चेत की आगति २८० की, १७९ का थोकडा
९४ प्रकार के देवता ७ नरक, गति ५६३ की।
२५ प्राण द्वार विषय
प्राण दस है-१ श्रुतेन्द्रिय बल प्राण, २ चक्षुरिन्द्रिय
पल प्राण, ३ नाणेन्द्रिय उल प्राण, ४ रसेन्द्रिय बल प्राण,
५ स्पर्श बल प्राण, ६ मनोयोग बल प्राण, ७ वचनयोग बल
प्राण, ८ काययोग बल प्राण, ९ श्वासोच्छ्वास बल प्राण, १०
आयुष्य बल प्राण । नारकियों और देवों में १० प्राण होते
। पाच स्थावरों में ४ प्राण होते है । जैसे कि-१स्पर्शे-
न्द्रिय, २ काययोग, ३ श्वासोश्वाम, ४ आयु । द्वीन्द्रिय में
६ प्राण होते है । जैसे कि-१ स्पर्शेन्द्रिय, २ रमेन्द्रिय, ३
वचनयोग, ४ काययोग, ५ श्वासोश्वास, ६ आयुष्य ।
त्रीन्द्रिय जीवों में ७ प्राण होते है । ६ पूर्वोक्त ही
हैं किन्तु एक घाणेन्द्रिय बढ गया है । चतुरिन्द्रिय जीवों
में ८ प्राण होते हैं -७ पिछले, १ चक्षुरिन्द्रिय एव ८ ।
असनी तिर्यञ्च पचेन्द्रिय जीरों मे ९ प्राण होते हैं-
८ पिछले १ श्रुतेन्द्रिय एव ९ । असज्ञी मनुष्य में ८
प्राण होते हैं-५ इन्द्रिये, १ काय का योग, श्वासोश्वास
और आयु एन ८ । असजी तिर्यच और सजी मनुष्यो में
१० ही प्राण होते हैं।
.
--

१२१
छम्पीस द्वार
।
२६ योग द्वार विपय
योग तीन हैं-१ मन, • वचन, ३ काय । नारकीय और
देवताओं में ३ योग होते हैं । परन्तु विशेष इतना ही है कि
देवता के मन और वचन के योग एक ही समय उत्पन्न
होते हैं
५ स्थानरों में एक ही काय का योग होता है और तीनों
विकलेन्द्रिय और अमज्ञी तिर्यञ्च पञ्चेन्द्रिय में • योग [१
वचन २ काय ] होते हैं।
असज्ञी मनुष्य में एक काय का ही योग होता है किन्तु
सज्ञी तिर्यञ्च और सज्ञी मनुष्यों में तीनों योग ही होते हैं ।
इति पट्दिशति द्वार समाप्त ।

छब्बीस द्वार ६ " " " " "१०७ " " मात हजार विमान हैं आठवे नववें सौ दहाव सौ ग्यारहवें वारहवे ३ नवगैवेयक में ३ त्रिक, पहली त्रिक मे १११ विमान । दूसरी तीसरी १०० पाच अनुत्तर विमानों में ५ विमान । सर्व मरया ८४९७०२३ विमान हुए । ५ पंक्तिवन्ध द्वार पहले देवलोक मे ३८३ (पौने उनतालीस ) पक्ति बन्ध । दूसरे " ३९ (मा ) तीमरे चौथे " २१०० पाचने छठे सातवें आठवें " ३३२ " २६८ " " ८३४ " ५८५ नौवे नशा ग्यारह बारहवं, २०४ नववेयक पहली निक म १११ पत्तियन्ध। दूसरी ७५ छब्बीस द्वार १२५ " तीसरी त्रिक में पाच अनुत्तर विमानों में ५ पक्ति बन्ध । ६ सख्यातासस्याता द्वार सर्व विमानों को ५ भाग में बाटा गया है जिसमें ४ भाग तो अमख्याते योजनों के विमान असख्याते देवता रहते है। एक भाग में सख्याते योजनों के विमान सख्याते देवता रहते हैं। ७ राजु द्वार सुमेरु गिरि के पास समभूमि से ७९० योजन ऊपर तारा मण्डल है । तारा मण्डल से १० योजन ऊपर सूर्य विमान है । सूर्य विमान से ८० योजन ऊपर चन्द्रमा का विमान है । चन्द्रमा के विमान से ४ योजन ऊपर २८ नक्षत्रों के विमान हैं। नक्षत्रों से ४ योजन उपर बुद्ध का विमान है । बुद्ध से ३ योजन ऊपर शुक्र का विमान है। शुक्र से ३ योजन ऊपर बृहस्पति का विमान है। मगल शनैश्वर ममभूमि से ऊपर 1 (डेढ ) राजु पहला दूमरा देव लोक है । नीसरा चौथा ३ (पौना) पाचवा छठा " " बृहस्पति से मगल से " " उस १ " " " "" (पाव) सातवा आठवा "" " १ " नववा, दसपा, ग्यारहवा, बारहवा छब्बीस द्वार उमसे ऊपर १ राजु नर नवप्रैवेयक का विमान है। १ (कुछ कम) ५ अनुत्तर विमान हैं। स्वार्थ मिद्ध महा विमान से १२ योजन ऊपर मुक्त- शिला पृथ्वी है [ इसी पभारा] राजु का प्रमाण राजु का प्रमाण असत्य कल्पना से कोई देवता पहले दूसरे देवलोक से नीचे को १८११२९७० मन का एक ठोस लोहे का गोला बनाया जावे । उस गोले को ऊपर से छोडा जारे । तो छ मास छ दिन छ पहर छः घडी छ समय इतने काल में जितनी दूर जावे, उसको एक राजु । का प्रमाण कहते हैं । अथवा असख्याते योजनों का एक राजु है। नोट--ज्योतिपी चक ११० योजन मे है । ८ आधार द्वार पहला दूसरा देवलोक घनोदवि के आधार का है । ३, ४, ५ दोनो ९वे से २६वे तक जितने विमान है, सव मे हल्के भारे परमाणुओं की परस्पर की कशिश से आकाश पर ही सडे है। ९ महलात द्वार पहले दूसरे देवलोक में योजन ऊचे महल हैं। घनवाय " " ६, ७, " " " " " ७०० " " छन्वीस द्वार " " " " , " " - " - ७,८ ८०० ९, १०, ११, १२ नर नवगैरेयक में १ हजार योजन ऊचा । ५ अनुत्तर विमानों में ११०० ग्यारह सौ ऊँचे महल हैं। १० अगनाई द्वार पहले दूसरे देवलोक में २७०० योजन की अगनाई। २६०० २५०० २४०० ९, १०, ११, १२ २३०० नर नौवेयक २२०० ५ अनुत्तर विमानों २१०० ११ वर्ण द्वार पहले दूसरे देवलोक में पाचों वर्गों के विमान जवाहरात के होते है। [काला नहीं ] ३ [नीला नहीं ] २ [लाल नहीं] ९ से लेकर स्वार्थ सिद्ध तक एक ही वर्ण श्वेत । १२ चिह्न द्वार मुकुटों के चिह्न। पहले देवलोक के इन्द्र के मुर्गे का चिह्न । दूमरे मैंसे " + " " 1 " " " .

छपीस द्वार " " " " " . " हजार मामानिक देवते। तीमरे सूअर " चौथे बकरे पाचवे मेंडे छठे देवलोक के इन्द्र के हाथी का चिह्न । सात घोडे आठवें सर्प नौवे, दशवे गेंडे ग्यारहवे, बारहवें वृपभ १३ सामानिक द्वार पहले देवलोक के इन्द्र के ८४ दूसरे तीसरे ७२ चौथे पाचवें छठे सातवें आठवे नौवें दशवें ग्यारहवे यारहवे १४ आत्मरक्षक द्वार पहले देवलोक के इन्द्र के ३३६००० देवते आत्मरक्षक हैं। दूसरे ३२०००० " " " " " " " " " " " " " " " " " छब्बीस द्वार १२६ " " " तीमरे चौथे पाचवे " " " " " " आठवे " " " " " ०८८००० २८०००० २४०००० २००००० सातव १६०००० १२०००० नौवे दशवे देवलोक के इन्द्र के ८०००० आत्मरक्षक देवता ग्यारहवें बारहवे ४०००० १५ लोकपाल द्वार पहले देवलोक के इन्द्र के लोकपाल । दूसरे से लेकर आठवें तक चार चार ही लोकपाल है। ९ये १०वे के ४ लोकपाल हैं ११वें बारहवे १६ तेतीस द्वार एक एक इन्द्र के ३३-३३ देवता माता पिता तुल्य गुर स्थान हैं। इन पर इन्द्र का हुक्म नहीं । १७ अनिका द्वार पहले देवलोक के इन्द्र के ७ अनिका । [ हाथी, घोडे, रथ, पैदल, नाटक, गन्धर्व, वृपम की एच सात २ अनिका] पहले देवलोक के इन्द्र के १ करोड ६ लास ६८ हजार । ४ " छन्त्रीस द्वार - दूमरे देवलोक के इन्द्र के १ करोड १ लास ६० हजार तीमरे देवलोक के इन्द्र के ९१ लाख ४४ हजार चौथे देवलोक के ८८ लास ९ हजार पाचवे देवलोक के ७६ लास ३० हजार उठे देवलोक के ६३ लास ५० हजार सात देवलोक के ५० लाख ८० हजार आठवे देवलोक के ३८ लास १ हजार नौवें दसवें देवलोक के २५ लाख ४० हजार ११वे १२वें देवलोक के १२ लास ७० हजार १८ परिपद् द्वार पहले देवलोक के इन्द्र के ३ परिपद् । १२००० अन्दर की परिपद् के, १४००० मध्य की परिपद् के, १६००० वाहिर की परिपद् के । दूसरे इन्द्रके १० हजार की १२ हजार की १४ हजार की परिपद् तीसरे १० १२ चौथे १० पाचवं ६ छठे २ ६ सातवे २ आठवे १००० २००० नावें, दसवे.२५० . ८ " " " " ६ " " " " "'८ १ " " " १ " " ० ०० " " ५०० " छब्बीस द्वार १३१ " ५०० " ग्यारहवे,बारहवे १२५, २५० १९ अग्रमहिपी द्वार पहले इन्द्र की ८ अममहिपियाँ । एक अप्रमहिपी का १६ हजार देवियों का परिवार है। तो कुल परिवार आठों का १२८००० है । यह एक देवी वैक्रिय करे तो १६००० देवी हुई। इस प्रकार इन्द्र का सर्व परिवार २०४८०००००० देवियों का है। दूसरे इन्द्र का भी ऐसे समझ लेना। २० परिचारना द्वार पहिले दूसरे देवलोक मे मनुष्यवत् सहनास । तीसरे चौथे स्पर्श मात्र पाचवे छठे रूप अवलोकन से तृप्ति। ७वें, ८वे ९,१०,११,१२,, २१ विमाननाम द्वार पहिले देवलोक में पालक नामक विमान । दूमरे पुष्पक तीसरे सोमानस चौथे नन्दीवर्धन पाचवे " " " " वचन मात्र मन " " " " काम छयोस हार " छठे सातवे विह आठवे,९,१०५ सुविमल ११व,१२वे, सर्वतोभद्र २२ जावन आरन अर्थात् जाने आने का द्वार पहिली नरक तक चारों प्रकार के देवता जा सकते हैं। दूमरी ३ (ज्योतिपी टले ) तीसरी २ (वाणक्यन्तर टले) चौथी से मानवीं तक केवल वैमानिक देनता जा सकते हैं। " " . " -- । २३ ज्ञान द्वार १६ वाणव्यन्नर, ९ नवनिकाय, ज्योतिपी यह ऊपर को २५ योजन और नीचे २५ योजन तक देख सकते है और तिळ सख्याते द्वीप समुद्र देग सकते है । भवनपतियों के चमरेन्द्र, वलेन्द्र ऊपर को पहले दूसरे देवलोक तक देसते हैं । नीचे पहले नरक का चरमान्त तिर्छा असल्याते द्वीप समुद्र देस सकता है । पहले दूसरे देवलोक वाले देवते ऊपर अपने विमान की ध्वजा पताका तक । नीचे पहली नरक चरमान्त तक, तिळ असरयाते द्वीप समुद्र तक देस मकते हैं । तीसरे चौथे देवलोक के देवते उपर ध्वजा पताका तक, नीचे दूमरी नरक का चरमान्त, तिच्र्छा असख्याते द्वीप समुद्र तक देख सकते हैं।

छुच्यीस द्वार १३३ " " " ५- ६ठे वाला उपर अपनी पजा पताका तक नीचे तीसरी नरक का चरमान्त ति असख्याते द्वीप ममुद्र तक। ७८ चौथी नरक का चरमान्त तिन्हें असख्याते द्वीप समुद्र तक २, १०, ११, १२, पारची नर मेरेयफ वेग में पहले दूसरे निक वाले उपर ध्वजापताका नीचे उठी नरक या चरमान्त तिच्छे असरयात द्वीप समुद्र तप । नव नरवेयक में तीसरी कियाले ऊपर ध्वजापताका तक नीचे सातवी नरक का चरमान्त तिर्खे असख्याते द्वीप समुद्र तक। पाच अनुत्तर विमानों के देवते कुछ न्यून मम्पूर्ण लोक देख सकते हैं। २४ शक्ति द्वार चाणव्यन्तर, नवनिकाय, ज्योतिपी, इनकी शक्ति चैनिय परने की थोडी। चमरेन्द्र की शक्ति एक जम्बूद्वीप भर देने की । घलेन्द्र साधिक एक जम्बूद्वीप पहले देवलोक के इन्द्र की २ जम्बूद्वीप भर देने की शक्ति । दूसरे [कुछ अधिक] तीसरे 5 " ४ " " " . ४ ८ " " " . " " १३४ छब्बीस हार चौथे , [कुछ अधिक] पाचवे ८ [कुछ अधिक मातवे टवे [कुछ अधिक] ९वें १०वें ३२ ११वे १२ ३२ , [कुछ अधिक] वैक्रिय की शक्ति से भर देने की इतनी शक्ति होती है। " " " " " २५ पुण्य द्वार वाणव्यन्तर १०० वर्ष में जितना पुण्य भोगते है। ज्योतिपी २०० वर्ष पीछे उतना भोगते है। इनका इन्द्र ३०० वर्प पीछे उतना पुण्य भोगता है। भवनपति ४०० वर्ष में इतना पुण्य भोगते है। उनके इन्द्र ५०० वर्ष में जितना पुण्य भोगते हैं। पहले, दूसरे देवलोक चाले १००० वर्प तीसरे, चौथे २००० पाच, छठे ३००० ७वे, टवे ९, १०, ११वे, १२वे, ५००० नवप्रैवेयकम पहली त्रिकवाले १००००० दूसरी २००००० " " " " ४००० " " . " 1 छब्बीस द्वार " " " . तीसरी ३००००० ४ अनुत्तर विमानो वाले ४००००० मर्वार्थसिद्ध चाले ५००००० २६ परिगृहीत अपरिगृहीत द्वार पहले देवलोक वाले देवता जघन्य एक पल की आयुवाली देवी भोगते हैं। उत्कृष्ट ७ पल की देवी दूमरे एक पलसे अधिक उत्कृष्ट पल की नेवी तीमरे उत्कृष्ट १० पल देवी चौथे उत्कृष्ट १५ पल की देवी पाचवे उत्कृष्ट २० पल की देवी " " " " " " " " " १५ " " " * " उत्कृष्ट २५ पल की देवी सातवें वाले जघन्य २५ पल की । उत्कृष्ट ३० पल की । आठव नौवे ३५ ४० दशवें १० " " " " "

छब्बीस हार
४५
५०
ग्यारहवे
बारहवे
इति देवलोक द्वार समाप्त ।
अधोलोक का वर्णन
पहली पृथ्वी का १८०००० योजन मोटा दल है ।
जिसमे १ हजार नीचे ओर एक हजार ऊपर छोड दे तो मध्य
१७८००० योजन की पोलाद मे १३ पाथडे हैं । और तीस
लास नरक के वाम हैं जिनमें तीन तीन हजार योजन का
अन्तर है । एक हजार ऊपर एक हजार योजन नीचे छोड़कर
मध्य एक हजार योजन की पोलाड़ मे नरक के वाम है।
नोट-मेरु पर्वत के पास सम भूमि मे नीचे जो पृची
दल में से एक हजार योजन ऊपर छोडा है उसमे ओर
पहली नरक
ऊपर पोलाड़ है । उस पोलाड में ८ प्रकार के
व्यतर और ८ प्रकार के वाणव्यतर, १६ प्रकार के "देवता
रहते है । तिच्छे लोक में उनका आना जाना बहुत होता है
और शासते वासधर पर्वतों पर उनके रमणीय स्थान भी हैं।
नोट-१३ पायडों के १० अन्तर, ऊपर नीचे का एक
एक अन्तर छोडकर मध्य १० अन्तरों में १० जाति के
भवनपति देवता रहते हैं। जिनको "यम" भी कहते हैं।

छच्चीस द्वार
नरक
वास
दूसरी पृथ्वी का १३२००० योजन मोटा दल है । उसमे
एक हजार नीचे एक हजार ऊपर छोडकर मध्य १३००००
योजन की पोलाड मे ११ पायडे ( गजलें) और २५ लास
नरक के वास हैं।
तीसरी पृथ्वी का १२८००० योजन मोटा दल है । जिसमे
एक हजार योजन नीचे, एक हजार ऊपर छोडकर मध्य
१०६००० योजन की पोलाड मे ९ पाथडे और १५ लाय
के
चौथी पृथ्वी का १२०००० योजन मोटा दल है।
एक हजार योजा नीचे, एक हजार उपर छोडकर मध्य
११८००० योजन की पोलाड में ७ पाथडे ओर १० लास
नरक के पास हैं।
पाचवीं पृथ्वी का ११८००० योजन मोटा दल है।
एक हजार ऊपर एक हजार नीचे छोडकर मध्य ११६०००
योजन की पोलाद में ५ पाथडे और ३ लान नरक के वास हैं।
एक पाथडा तीन २ हजार योजन का मोटा है।
नोट -पहली पृथ्वी के ३ भाग हैं।
१ सर (कठिन) भाग। १६००० योजन मोटा।
२ पद भाग । ८४०००
३ अयबहुल (जलबहुल) भाग । ८००००
एव सर्व १८०००० योजन हुए।
"

- । १३८ छब्बीस द्वार छठी पृथ्वी का ११६००० योजन मोटा दल है । जिसमे एक हजार नीचे एक हजार ऊपर छोडकर मध्य ११४००० योजन की पोलाड मे ३ पाथडे और ५ कम एक लास नरक के वास हैं। मातवीं पृथ्वी का १०८००० योजन मोटा ल है। जिसमे ५२३ हजार नीचे, ५२३ हजार योजन उपर छोडकर मध्यम ३००० योजन का एक पाथडा है । जिसमें ५ नरक के वाम हैं। अलोक पहली नरक से १२ योजन की दूरी पर अलोक है। [ति ] दूमरी नरक से १२ योजन २ भाग की दूरी पर अलोक है। तीसरी चौथी पाचवीं ॥१४ २ भाग छठी १ सातवी १६ आधार प्रत्येक पृथ्वी के नीचे २० हजार योजन मोटी घनोदधि है। उसके नीचे असय्यात योजन की भारी हवा और उसके नीचे असख्यात योजन की हल्की हवा है । इनकी कशिश पर पृथ्वी टिकी (ठहरी) हुई है। १ " " " " " " " " " " " " " " " धीम ८ " " " " ५ " " " " . " पापों का अन्तर पहनी नरफ से १३ पाग और १२ अन्नर ११५५३ गोजार भाग पारे। दूरी ११ पाथ १० अनार । प प पा ५७०० गोगनपा अन्तर। नीमरी चौधी ,, १६१६६ ॥" पाची २५.५० ५२५०० माती अन्नर नहीं। श्रेणी बन्ध पानी फ में २५९५५६७ पुष्पायर्ण धाम । और १५३३ पति पन्ध । दुमरी " २४९७३०५ और २६९५ पक्ति बन्ध । तीसरी १४९८५१५ और १५८५ पक्षि बन्ध । चौथी १९०२९३ और ७०७ पक्ति बन्ध । 7 " " " पाचवीं २९९७३५ और २६७ पक्ति बन्ध ।

२४० छब्बीस द्वार छठी ९९९३२ और ६३ पक्ति बन्ध । सातवीं --- अवधि ज्ञान पहली नरक के नारकीय जघन्य ३५ कोस उत्कृष्ट ४ कोम देख सकते हैं। दूसरी तीसरी २३ m " उत्कृष्ट ३३ कोस ३ कोस " चौथी " २ " पाचवीं १३ २ कोम " - छठी सातवी देस सकते हैं १५ कोस " १ ३ १ कोस

है।
जैन धर्म के मुरय नियम
१ लोक अनादि, अनन्त, अकृत्रिम है । चेतन अचेतन
आदि इन छ द्रव्यों से भरा हुआ है।
जीव द्रव्य अनन्तामन्त भिन्न है (१) अजीव द्रव्य रूपी
नथा अरूपी रूपी द्रव्य अनन्त (२) चाकी चार अरूपी-धर्मास्ति-
काय (३) अधर्मास्ति (४) आकाशास्ति (५) काल द्रव्य (६) २
(७) क्रम से चलन, स्थिर, अवकाश और परिवर्तन स्वभाव
। इन गुणों से युक्त है। विशेष विवरण नवतत्व में देने ।
२. परमात्मा सश्चिदानन्द, अनन्तज्ञानी, अरूपी, जिसका
ज्ञान सर्वव्यापक है, अयोनि, अजर, अमर, निराकार,
निष्कलङ्क, निरिच्छ, निष्प्रयोजन, निफर्म, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी,
अनन्त शक्तिमान्, शिव, अचल, अरज, अनन्त, अक्षय,
अव्यय, सिद्ध, बुद्ध, मुक्त, इत्यादि गुणों के धारक परमात्मपद्
को अनादि मानते हैं।
३. मसारी जीर-पाप पुण्यमय प्रवाह रूप कमों
से शरीर से सयोग पाए हुए अनादि से भिन्न २ शरीर,
कर्मों के धारक अशुद्ध और अनन्त हैं। चार गतियों में
विभक्त हैं। हर एक ससारी जीव सतन्त्रता से अपने अशुद्ध
योगों द्वारा कर्म बाधते हैं। फिर कर्मों के वश नीच गतियों में
,
,
,

छलीस द्वार हो । वर्तमान समय में ३२ शास्त्रों को प्रामाणिक माना जाता है । सो चार भागों में विभक्त है। १. प्रथमानुयोग-जिसमें भरत क्षेत्र के ६३ महापुरुप जिसमें ऋपभदेव, महावीर, चक्रवर्ति, और रामचन्द्र, रावण, कृष्ण, जरासन्ध आदि के चरित्र का वर्णन है । २. करणानुयोग-इममे तीनों लोक (अयो, मध्य, ऊर्च) का नकशा है 1 जम्बूद्वीप, प्रज्ञप्ति आदि शास्त्रों में वर्णन है। नोट-इमलिए जैन धर्म को महान ऋपि, चक्रवर्ती, सेठ, रङ्क, दरिद्री सब ही पाल सकते हैं। विशेप १४ गुण- स्थानो से पता लगता है ३. चरणानुयोग-जिममें त्यागी और गृहस्थों के चारित्र पालने की विधि है । आचाराग, उपासक दशाङ्ग आदि शास्त्रों में वर्णन है। ४. द्रव्यानुयोग-इसमे तत्त्व ज्ञान, अध्यात्म, कथन, लोक का ढाचा, जीव और प्रकृति का वर्णन, नर तत्व पदार्थ अनेक शङ्का समाधान कर्म सिद्धान्त आदि का वर्णन है । गणित, ज्योतिप-भगरती, अनुयोग द्वार आदि शास्त्रों मे वर्णन है। ८. धर्म यात्रा-द्रव्य, क्षेत्र, कालानुसार मिथ्यात्व में फसे हुए प्राणियों को इस ससार में सम्यग् ज्ञान, दर्शन, चारित्र का बोध कराने के लिए सदुपदेश देना। जीवाजीव पुण्य, पाप, आश्रव, वन्ध, मोक्ष, नव तत्व का बोध कराना,

चम्चीम द्वार
.
श्रावक,
-
कुगुम, पुदेव, कुधर्म, कुशास्त्र, फुरुढि आदि से हटा कर
मुगुर, सुदेव, मुधर्म, सुशास्त्र, सम्यक्त्व, तप, नियम, सयम,
स्वाध्याय, मुभध्यान, मत्स, सतोप आनि शुभ गुणों मे प्रवृत्ति
कराना । प्राणिमान से मैत्री भान, गुण प्रहण, करणा,
मध्यस्थ भार, अन्याय को तोडना, न्याय, मे प्रवृत्त होना,
आदि गुणों में लगाना । और माधु, माध्वी, श्रावि-
काए, चार तीर्थ पी मन का परम्पर मेल करा कर धर्म
प्रीति और प्रेम में वृद्धि कगना । कुमङ्गत त्यागना सुमगत
में प्रवृत्त होना, मर्यज प्रणीत मिद्धान्त को प्राणिमात्र के
गानों तक पहुंचाना । नान, शील, तप, भावना आदि मे
प्रवृत्त होने को धर्म यात्रा कहते है, जिसमे मात कुख्यमनों
का त्यागना भी है।
९ परोपकार
म्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या विना मेद जो महते हैं।
से परोपकारी जग के दुःव समूह को दहते है ।।
अपने स्वार्थ से त्याग कर दुग्गियों के हित माधन में
लग जाने का नाम परोपकार है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावानु-
मार अनाथों की रक्षा, निराश्रितों को आश्रय देना, धर्म से
गिरते हुओं को स्थिर करना, जानदान देना, बीमार, अपाहज,
अतिथि इत्यादिको के लिए भोजन ओषधि आदि का प्रबन्ध
करना । इत्यादि मनुष्य ममूह में कृपा का पात्र हो । उसकी
'तन, मन, धन से सेवा करना । जिन पशुओं से मनुष्य वर्ग
--
.
।

छम्चीस द्वार 1 का विशेप हित होता है ऐमों की रक्षा में विशेष ध्यान रक्सा जावे । और माथ ही दुसी, अपाहज, रुग्ण, आदि पशुओं के लिए तन, मन, धन से रक्षा का प्रवन्ध करना । और जो देवी, देवतों की यतों या अज्ञानता से गजगद्दी की रक्षा के लिए हिंसा करते हों, उनको प्रयन से हटाना स्वय कष्ट उठाकर दूसरों के लिए हित करना परोपकार कहलाता है। १० मोक्ष-सम्यग् ज्ञान, दर्शन, चारित्र यह मोक्ष मार्ग हैं । अनादि काल से प्रवाह रूप कमों से अशुद्ध आत्मा को शुद्ध करने के लिए मर्वज्ञ द्वारा प्रणीत शास्त्रों का सम्यग झान और मची श्रद्धा और सम्यक् चारित्र की आवश्यकता है । क्योंकि ज्ञान से आत्मा तथा प्रमों का सम्बन्ध जाना जाता है । दर्शन से दृढ विश्वास किया जाता है । चारित्र से आते हुए कर्मों को रोका जाता है। और चौथा तप जिमसे पूर्वमश्चित कर्मों का अय किया जाता है । ऐसे ज्ञान, दर्शन, चारित्र तथा तप द्वाग आत्मा के निर्मल होते ही अर्थात आठ कर्मों के क्षय होते ही ब्रह्मज्ञान (केवलज्ञान) प्रकट होता है। १. ज्ञानाचरणीय कर्म के भय से अनन्त अक्षय ज्ञान गुण । २ दर्शनावरणीय ३ अन्तराय आत्मिक शक्ति। ४ मोहनीय क्षायिक सम्यक्त्व। .. दर्शन गुण । " । " " १

पप्यास द्वार
.
,
সানা বৰ, গহিন
frन निराशरपना।
" अगुगलगुन्य रानीपना रहितत्य
शल्ये भागपा का अभाव ।
अरनिगराध सुम।
अचल स्थिति।
इन आठ गुणो के प्राप्त होते ff कर्म रेप से रहित
निर्गल आत्मा अक्षय, आन्त मोक्ष में जाकर सचिदानन्द
स्वरूप होर जोत में जोत समा फर अनन्त मुग्न मे लीन
हो जाती है। फिर जन्म, मरण रूपी यन्मनों में कभी नहीं आती।
सोय-दग्धे चीजे ययात्यन्त प्रादुर्भनति नाकुर' ।
कर्मवीज तया दग्धे न रोहति भपाकुरः ।।
गुणस्थान
मम्पूर्ण लोक के शरीरधारी मर्व (अनन्त ) जीव १४
जगह विभक्त है । अर्थात् आत्मा के गुणों का जिम २ जगह
स्थान हो, उन्हें गुणस्थान कहते हैं ।
१ मिथ्यात्व गुणस्थान-अधर्म को धर्म समझना ।
धर्म को अधर्म समझना । मिथ्यापिचार घाला ८४ लाख योनि
में अनन्त काल परिभ्रमण करता रहता है।
२. सास्वादन गुणस्थान-बहुत म्यल्प ममय के लिये
मिथ्या को मिथ्या सम को सम समझ फर फिर मिध्या
ख्याल हो जाए। वह आत्मा अर्थ पुद्गल समय तक ससार

- १५० छबीस द्वार १२ क्षीणमोह गु०-२८ क्षय करे तव ११ वा गुण- स्थान उलय कर १२वे क्षीणमोहनीय गुणस्थान में आवे । पिछले समय मे बाकी तीन घन घातिये कर्म ज्ञानावरणीय, दर्शनावर- णीय, अन्तराय, क्षय करके १३वे सजोगी केवली गुणस्थान में आता है । यहा १० वोल की प्राप्ति होती है । १ अनन्तदानलब्धि २ लाभ ल. ३ भोग ल० १ उपभोग ल० ५ वीर्य ल० ६.केवलज्ञान ल० केवलदर्शन ल० ८ क्षपक सम्यक्त्व ९ शुक्ल ध्यान तीसरा १० यथा- भायिक चारित्र। १४ अयोगी केली गु०-मन, वचन, काया के योगो को स्न्धन करके ४ अघातिये कर्म ( वेदनीय, नाम, 'गोत्र ) को क्षय करके पाच लघु अक्षर उच्चारण जितने ममय मे औदा- रिक तेजस, कार्मण, शरीर को छोडकर एक समय में मोक्ष पद को प्राप्त हो जाते हैं। सच्चिदानन्द स्वरूप होकर अनन्त मुसों में सदा के लिए लीन हो जाते हैं। फिर यह सिद्ध परमात्मा कहलाते हैं। गुणस्थान स्थिति पहले गुणस्थान की स्थिति-अनादि अनन्त, (अभव्य) अनादि मान्त, (भव्य ) सादि सान्त (पडिवाई) पडिवाई आश्रय मिथ्यात्व की स्थिति जघन्य अन्तर्मुहूर्त की उत्कृष्टि देश उपी न्यून अर्द्ध पुद्गल की।

- छन्वीस द्वार २ गु० की स्थिति-- -जघन्य १ समय उत्कृष्ट ६ आव- लिका ७ समय की। ३ गु० की स्थिति जघन्य उत्कृष्टि अन्तर्मुहर्त की। ४ गु० की स्थिति-जघन्य अन्तर्मुर्त की उत्कृष्टि साधिक ६६ सागर की। तीन भव १२ देवलोक के २२-२२ मागर के अथवा ३३-३३ मागर के २ भव अनुत्तर विमानों के । मनुष्य भर में अधिक । ५गु० की स्थिति-५, ६, १३ गुणस्थान की स्थिति जघन्य अन्तर्मुहूर्त की उत्कृष्टि देशन्यून पूर्व प्रोड की। ७ में से ११वें गुणस्थान तक की स्थिति-जघन्य एक ममय उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त की। १२वें गु० की स्थिति--जघन्य उत्कृष्ट अन्तर्मुहर्त की। १४ गु० की स्थिति-५ लघु अक्षर उच्चारण काल की। क्रिया १, ३ गु० में २४ किया इरियावहि नहीं। २३ इरिया मिथ्या नहीं। अवृत्ति नहीं। ६ २ आरम्भिया मायावत्तिया । ७ मे १० तक १ किया मायावत्तिया । ११, १२, १३ मे १ किया इरियारहि । १४ वे गुणस्थान से-क्रिया नहीं।

छब्बीम द्वार
.
"
गोत्र।
,
पहले से लेकर ११वे गु० पर्यन्त ८ कर्म की मत्ता ।
१२ गु० मे ७ कर्म की मत्ता । मोहनीय नहीं।
१३वे १४
। वेदनीय, आयु, नाम,
बन्ध
१, २, ४, ५, ६, ७ गु० में आठों माँ का बन्ध ।
यदि मात धर्म बान्धे तो आयु कर्म टले ।
३, ८, ९ गु० में ७ कमों का वन्य । आयु नहीं।
१०
६
। आयु, मोहनीय नहीं।
११, १२, १३,
मातावेदनीय का बन्ध ।
में कमों का वन्य नहीं ।
इनि गुणस्थान ममाप्त ।
"
"
-

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Mukhya Tatva Chintamani

Author
Chand,shri Shukal
Title
Mukhya Tatva Chintamani
File name
Mukhya Tatva Chintamani
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2011/02
Publisher
The Manohar Electric Press Lahore
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548693
Barcode
99999990028737.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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