Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Anath
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अनाथ
FREE HAIR मोगिग वासिनो TR)
{ ममानिसंग मागि)
राहुल गाात्यायन
Anath (Novel) Rahul Sankrityayan
प्रथम सस्वरण, १९४८
मतुथ सस्वरण, १६७०
प्रसार-fraार महम, १२, पानंदित रोड, माहादा।
मार- प्रागट शिगं, माहारा
अनुवादककी ओरसे अनाथ ' ऐनीका एक छोटा उपन्याम है जिम उन्हाने यालका लिए मुख्यत ताजिय और उज्वेद बालक-बालिवाआके लिए लिखा है जिनके प्रजातन्त्र अफ्गानिस्तानकी सीमा पर पडत है। १६१७ की ग्रान्ति से १३-१४ वर्ष बाद तब यह सोमाल बहुत अशान्त रहा। जव अमीर बुखाराका तम्न डगमगान लगा और सदियोके शोपित उत्पी डित अपने निष्ठुर शोपका विरुद्ध उठ खडे हुए ता धर्म डूवा का नाम लेकर देशम आग लगाई गयी, वच्चा बूढाकी निर्मम हत्यार्य यी गयो, गांव-गांव जला दिय गय धर्म-योद्धा और गाजी वनवर अत्या- चारियो ने धमके नाम पर जनता पर हर तरहह्वा जुल्म किया। इन अत्याचारोका विस्तृत वर्णन एनो न अपने बडे उपन्यासी दाखुन्दा "और "जो दास थे' ( गुलामां ) म किया है। यहाँ भी उन अत्याचारोवा मक्षिप्त वर्णन आया है। ऐनीकी पुस्तक मुख्यतया सीमान्तके तरुण तरुणियाको यह हृदयस्थ परानके लिए लिखी गयी है वि मातृभूमिकी सीमा रक्षावे लिए उन्ह कितना सजग रहढेकी आवश्यकता है । लेखकको कभी ख्याल भी नहीं आया हागा कि उसकी यह पुस्तिवा स्वतन्त्र-भारत को राष्ट्रभापा हिन्दीमे अनूदित होगी। हमारे पाठकोका इस पुस्तिवा द्वारा कितना मनोरजन होगा इस तो पाठक ही बतलायेंगे, लेकिन उनकी आँख इससे जरूर खुलेगी और वह समझेगे वि शोपर-दरा धन्धित्ताया वहां तय आश्रय ल सकता है। अमीर और उसके पिट्ठओको देश छोडकर अफगानिस्तान भागना पडा । अफगानिस्तानका एक तटस्थ देशके तौर पर कर्तव्य था कि यह अपनी भूमिको मध्य एशियाकी नयी शक्निके विग्द्ध युद्धयी तैयारी का अखाडा न बनने देता, लेकिन यह नही हुआ । सोवियत मध्य शिया पे भगाडे हथियार जमा करते थे आदमी तयार करते थे और F .
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वि ऐनो सोवियत मध्य-एशियोंक प्रेमचन्द, है। विशेप जिज्ञासा रखने वाला लिए यहां उनके बारेमे हम घुछ और देते है। मेरे. वहने पर उन्होंन अत्यन्त सक्षेपम अपनी जीवन-पटनाये निय भेजी थी जिन्ह मैं यहाँ उद्धृत करता हूं- — मैं १८७८ म बुखारा जिलेके गिजदुवान तहसीलव सावतारी गांवम एव गरीब विमानवे घर पैदा हुआ । वारह सालकी आयुम अनाथ हो गया। बडा भाई ( हाजी सिराजुद्दीन खोजा ) बुखाराम पढ़ रहा था। उसने मुझे अपने साथ पर लिया। मैं वहाँ पटवे लिए काम वरता और पढता रहा। मदरमा आलिमजानम एक माल चौवीदारीका भी काम किया। १६०५ स अध्यापकी परत समय मक्तबोके तिये पाठ्य पुस्तकें लिखता रहा। १६१५-१६ म र माल विजिल तप्पा कपासवे कारयाने वदाई आफ्सि म काम किया। “१६१६ म बुधारावे एक मदरसेमे मुरिस ( प्रधानाध्यापक ) नियुक्त हुआ । १६१७ वे राष्ट्रीय आन्दालन या फरवरी क्रान्तिम अमीरके विरुद्ध भाग लिया। १६ अप्रैलको गिरफ्तारपर मुझे ७५ कोडे मारे गये और "आवखाना' नामर जेलम डाल दिया गया । रूसी क्रान्तिकारी सेनाने मुझे जेलस निकालकर बगानक अस्पतालम रख दिया, जहाँ ५२ दिन रहकर स्वस्थ हुआ। १७ जून ( १६१७ ) का समरकन्द आया। तबस आजतव समरकन्द नगर मेरा निवास स्थान है। 'मार्च १६१८ मे कोलिसोफके सनिक आक्रमणक समय मरे छोट भाईको-जोकि मुरिस या--परडवावर अमोरन मरवा दिया। १६१८ से सोवियतवे कालेजमै पढने लगा। साथ ही १६१७-२१ तक समरकन्दये दैनिक और मासिक पत्रोम साहित्यिक सम्पादक्का भी काम करता रहा । बुखाराकी ब्रान्तिम भाग लिया और अमीर विरुद्ध जनता को भडकाया । १६२२ मे मेर बडे भाई ( सिराजुद्दीन ) यो साक्तारी गाँवमे वासमचिया ( मजहबी डाकुला ) न मार डाला । १६२१ के ६ अन्तस १६२३ तक सोवियत जन-प्रजातन्त्र बुखारावे वकील ( गवर्नर ) के नायवके तौरपर समरपन्दमे काम करता रहा । '१६२३ के अन्तसे १६२५ तर समरकन्दमे सरकारी व्यापारका डायरेक्टर ( सचालक ) रहा । फिर १६२६-३३ तक तिमिज मे साहि- त्यिक और आनुसधानिक डायरेक्टरका काम करता रहा । सितम्बर १६३३ मे ताजिक सरकारने मुझे पेन्शन देकर कामसे छुट्टी दे दी, ताकि मैं घरपर रहकर स्वतन्त्रतापूर्वक अपना साहित्य और अनुसंधान सम्बन्धी काम कर सकूँ। १६३५ से मैं उज्वेकिस्तान ऊंचे शिक्षणालयो-उज्वेक सर- कारी यूनिवर्सिटी (समरकन्द ), समरकन्द ट्रेनिंग कालेज, ताशकन्द ट्रेनिंग कालेज ताशकन्द ला-वालेज, मध्य-एशिया यूनिवर्सिटी ( ताश- कन्द ) के एम ए डाक्टर-उम्मीदवार और डाक्टरको परीक्षाओका परीक्षक तथा सलाहकार होता है। इस वक्त मध्य-एशिया यूनिवर्सिटीके डाक्टर-विद्यार्थी इब्राहीम मोमिनोफ उज्वेक यूनिवर्सिटी के डाक्टर- विद्यार्थी वाहिद अब्दुल्ला, डाक्टर उम्मीदवारके विद्यार्थी मिर्जाजादा तथा ताशकन्द ट्रेनिंग कालेजवे एम ए विद्यार्थी मरदन शरीफजादा और सदारत अयूवजानोफ मेरी देख-रेखमे अपने निवन्धाके वारेम अनुसन्धान कर रहे है। '१६२३ मे मैं ताजिक सोवियत समाजवादी प्रजातन्त्रकी केन्द्रीय समितिका मेम्बर चुना गया । १६२६-३८ तक मैं उसका मेम्बर रहा। १६३१ म ताजिक सरकारन मुझे 'लाल श्रम ध्वज" का पदक प्रदान किया। १६३५ मे ताजिक सरकारन एक मोटर और एप निवास गृह प्रदान किया। इसी समय उज्वेक सरकारने सनद और रेडियो दिया। "१६२३ मे अखिल सोवियत-लेखक-सघका मेम्बर चुना गया। १६३४-४४ तक अखिल सोवियत-लेखक सघवे प्रधान-मण्डल (प्रेसी- दियम् ) और ताजिरिस्तान तथा उज्वेक्म्निानवे लेखक-सघोवी ऊपरी समितियोका भी मेम्बर रहा। अपैल १६४१ मे सोवियत-सरकारने ७ "लेनिन-पदक" प्रदान किया। १६४३ मे उज्वेक साइन्म-अकादमो का माननीय सदस्य निर्वाचित हुआ। (युद्ध समाप्ति के बाद) "हिम्मत- के कामके लिए" पदक मिला । १६३६ मे स्तालिनवादकी तरफसे सोवि- यत पार्लियामेटका मेम्बर चुना गया। २६ अक्टूबर १६४० मे “ताजि- किस्तान-सोवियत-समाजवादीप्रजातन्त्रका मम्मानित साइन्सी नेता" की उपाधि मिली । अक्टूबर १६४६ मे उज्येक यूनिवर्सिटी (समरकन्द) की साहित्य-फेकल्टीका डीन ( अध्यक्ष ) बनाया गया।" ( समरकन्द ) २३ अप्रैल, १९४७ 'ऐनी' इस सक्षिप्त पनसे ऐनीवे जीवनवे बारेमे कितनी ही बाते मालूम हो जाती है । ऐनीका लडकपन बहुत पप्टका जीवन था। उस समय स्कूलोंके नामपर मसजिदोंमे मक्तब हुआ करते थे, जहां लडके पढते कम, और मुल्लावे उडे ज्यादा खाते । ऐनीने अपने मकतबके बारे- मे एक छोटी पुस्तक लिखी है, जिसमे एक जगह बतलाया है--"६ सालकी उम्रमे मां-बाप मुझे ममजिदये मदरसेमे ले गये-मदरसेका मकान केवल ६x६ वर्ग गजका था, जिसे लकडीके कटघरोसे ६ भागो मे बांट दिया गया था। विद्यार्थी इन्ही ६ कटघरोमे ढोरोकी तरह बैठते थे । मुल्लाका डडा सदा सिरपर तैयार रहता था। विद्यार्थी बिना-समझे कुरानकी आयतोको जोर-जोर से दुहराया करते थे। मैंने अपने जीवनमे दो स्वतन्त्रताओका अनुभव किया है, जिसमे एकको ४२ सालकी उनमे, जबकि ७५ कोडे खाकर जेलमे पड़े रहनेपर मुझे छुडाया गया, और दूसरी ३६ साल पहले ६ सालकी आयुमे, जबकि मुझे मकतब न जानेकी आज्ञा मिल गयी। मैं नहीं कह सकता, दोनोमे किसको मैंने अधिक पसन्द किया।" १२ सालकी उम्रमे ऐनी भाईके साथ बुखारा चले गये । बुखारा सातवी सदी से ही इस्लामी दुनियाका एक बहुत बडा शिक्षा केन्द्र रहता चला आया था, जबकि बनारसको यह सौभाग्य चार सदी बाद मिला। इस्लामी विद्याकी दृष्टिसे बुखाराका वही स्थान था, जो हिन्दुओके लिए वनारसा । अमीरकी राजधानी और सरदारो तथा धनियों का निवास- स्थान हानेसे जहां एक ओर विलासमे पैसा पानीकी तरह बहाया जाता था ता दूसरी ओर भारी संख्यामे लोग असह्य दरिद्रता भोग रहे थे। एक ओर सैकडो वर्षसे स्थापित बडे-बडे मदरसोंमे प्राचीन विद्यारे वितने ही धुरधर विद्वान् विद्या-दार कर रहे थे, तो दूसरी और घोर अज्ञा- नान्धकार छाया हुआ था। कुछ नौजवानोको तुर्की "नौजवान तुर्क" की हवा लगी थी और वह अमरीकी निरकुशताको हटानेकी बात सोचने लगे थे लेकिन बुखारा सिर्फ एप निरकुशताके नीचे दबकर कराह नही रहा था । उसके ऊपर सबसे बडी निरकुश जारशाहीकी छाया भी फैली हुई थी। तुर्कीवी देखा-देखी बुखारामे भी "जदीद" ( नवीनता वादी ) आन्दालन भीतर ही भीतर शुरू हुआ। ऐनी और उसके भाई आन्दोलनके सस्थापयोमे से थे, इसी कारण दो भाइयोको बलि चढना पडा। वासमची ऐनीका ता कुछ नहीं बिगाड सकत थे, क्योकि वह सोवि- यतके इलाके ( समरकन्द ) मे रहते थे। उनके बडे भाईको जब साक- तारी गांवमे बासमचियोने मारा, तो व चाहते थे कि उनके बाल- बच्चाका भी सफाया कर दे, लेकिन सातवारीके खोजा ( सैयद ) लोगोका धार्मिक दुनिया में बहुत सम्मान था। उनके खानदानने बुजुर्गों की ममाधियां पूजी जाती थी। जब गांववे खोजा लोगोको मालूम हुआ, तो वे बासमचियोके पास गये और कहा पहले हमे मार दो फिर इन बच्चो और स्त्रियोको हाथ लगाना । वासमचियोको इतनी हिम्मत न हुई । इस तरह खानदान वाल-वाल वच गया। ऐनी ग्रन्थ ही नहीं लिखते रहे है, बल्वि पच-वार्षिक याजनाओके ममय जगह-जगह घूमकर वहाँ होते निर्माण सम्बन्धमे पत्रोम लेख लिखते रहे है । इन निर्माणोंमे वक्षु-उपत्यकावी नहर और बिजलीके कारखाने भी सम्मिलित है । ताजिक नौजवानो की दूसरी पीढीवे निर्माणम ऐनीका खास हाथ रहा है । लेखर और कवि अपनी कृतियोवे हस्तलखाको उनके पास भेजते है और वह उन्हें परामर्ग देने है के चुनावमे ऐनी ताजिव पानिमिटके मेम्बर चुने गये। ऐनी उपन्यास 'दाजुन्दा' (हिन्दौचनुदाई र चुका है) के बारे लिखते हुए दयाकोफ्ने कहा है "मदरहीन ऐनीका उपन्यास 'दामृन्दा' अमीरके जमानेके पूर्वी वुजारा (नाजिक्म्निान) जीवनपर पहना मम वडा ग्रन्य है। हमने ऐनीको पहले-पहत उपन्चासारव नांग्पर 'आदीना' म देखा, लेकिन 'दासुन्दा' दूसरी चीज है। दावुन्दा' माहिन्य-बलावी एक बहुमूल्य कृति ही नहीं है, बल्कि उमका महत्त्व इन बातमं भी है गि इसमे बुखारा और ताजिकिस्तानी मदमे महन्वय ऐतिहासिक घटनाती और वर्गयुद्ध का चित्र खीचा गया है । 'दावुन्दा' में वगित घटनाएं मदा अपना राजनीतिक महत्व रखेंगी।" इम उपन्यामका लेखक जदीद-आन्दोरनका एक नामी व्यक्ति और बुखारा क्रान्तिकारी आन्दोलनमे शुम्म ही काम करनेवाला रहा है। इसलिए बुखारा-प्रान्तिकी घटनागोगा विवरण उसके मुंहम मुनना, दमयी कमसे पढना एक खाम महत्त्व रखता है। ऐनी यद्यपि उन व्यक्तियोममे हैं, जिन्होंने बुखाराम जदीद-आन्दी लनकी नीव डाली, लेकिन वह जदीदी और उनरे आदशोंका रगीन चित्र नहीं खीचना, वल्लि जदीदोंके अमनी चित्रको तिकुल तटम्यनाके साथ घटनाओंके आधारपर पाठवारे मामने रखना । ऐनीने 'दा-बुन्दा मे क्लापूर्ण विन्तु मीधी-मादी भापाम तलाया है जदीद मध्यमवर्ग सुधारक-ममुदायके प्रनिनिधि थे। कष्टोस पीडित साधारण जनतासे उनका कोई सम्बन्ध न था और न वे उनके होकी ह्यिामत करते थे । 'दाखुन्दा' मे पूर्वी बुखारा (नाजिकिस्तान) में बासमचियाका पैदा होना, अनवर पाशाका आकर उनमे मिल जाना तथा जदोदोके अनवर तथा बासमचियोंमे मम्बन्ध को बडे विस्तारवे साथ बतलाया गया है । इमलिए 'दाखुन्दा' को मिर्फ एक साहित्यिक बलायी कृति ही नही १० - समझना चाहिए, बल्कि मध्य-एशियाको एक बहुत महत्वपूर्ण ब्रान्ति की ऐतिहासिक कृतिके तौरपर देखना चाहिए।" १६ नवम्बर १६३५ को स्तालिनवाद और दूसरी जगहोमे ऐनीकी लेखक-जीवनकी तीससाला जुबली मनायी गयी। उसमे ताजिक सरकारचे एक मत्रीने भापण देते हुए कहा 'सामन्नशाही प्राचीमे रूदकी, फिरदौसो, सादी, उमर-खैयाम, हाफिज--जैसे कितने ही महान् विचारक और साहित्यकार पैदा हुए, लेकिन यद्यपि वे फाँसीपर चढ़नेसे बच पाये, तो भी हमेशा उन्हे कष्ट दिया जाता रहा या वे देश-निर्वासित रह । विश्व-ववि और दार्शनिव नासिर खुसरोकी एक जीवन-घटना इस प्रकार है। एक दिन वह नेशापुर नगरमे पहुँचे । दूरसे पैदल चलकर आये थे, इसलिये जूते फट गये थे । उन्होने उन्हे सीने लिए मोचीको दे दिया । इसी समय शहरमे हो-हल्ला मचा । मोची अपने हथियारोवे साथ उस तरफ भागा । घटा भर बाद अपने रक्त-रजित उदर-आवरवके साथ लौट आया। 'वहाँ क्या बात थी।-नासिर खुसरोने पूछा । माचीने जवाब दिया--'एव अधर्मी अनीश्वरवादी आदमी-जिसका नाम भी लेनेसे पाप होता है-वा शिप्या हमारे नगरमे आया है।' कविन आग्रहपूर्वक पूछा--जैसे भी हो, उसक नाम बताओ।' मोचीने जवाब दिया-'उस पापी का नाम नासिर खुसरो है। अभी धर्म-युद्ध घोपित हुआ और उसके शिष्यको बोटियाँ-बोटियाँ उडा दी गयी । मैं जरा देरसे पहुंचा और सिर्फ अपने उदर-आवरक्को ही उसके खूनसे तर कर पाया । इसम भी पुण्य है, मगर उतना नहीं।' 'बहुत ठीक'-वविने उत्तर दिया, किन्तु इस घटनाको सुनकर उसवा दिल कांप गया । वह सोचने लगा, यदि लोग मेरे शिप्यके साथ ऐसा कर सकते है, ता जान पानेपर मेरी क्या गत बनायेगे ? वह एका- एक अपनी जगहसे उठा और चिल्लाकर बाला, 'नहीं, मैं इस नगरमे नहीं ठहर सकता, जहाँ ऐस पतितव शिष्य रहते है। और वह बिना जूते लिये ? नगरस नग पांव चला गया। मह था सामतशाही प्राचीम महान क्लार कारोंके साथ बर्ताव। आदीना" (ऐनीका प्रथम उपन्यास) ताजिय साहित्यका यदि पहला उपन्यास है, तो सनरुद्दीनका दूसरा उपन्यास दाखुन्दा' निश्चय सवश्रेष्ठ ग्रथ है । एनीका नया उपन्यास जो दास थे' (गुलामान) इति हासक एक भागका बहुतही ज्ञानपूण चित्रण है और शुरूस लकर प्रजातन्नम कनखोजाकी स्थापना और नये जीवन निर्माणतक पाठ को ले जाता है। ऐनीकी क्या विशेषता है ? ऐनी किस तरह का श्रेष्ठ लेखक है ? सबसे पहना और बड़ा काम ऐनीका है लम्ब ऐतिहासिक काल मे भीतर आ घुसे अरबीके शब्दोसे ताजिक भाषाको शुद्ध करना । इसीलिए सव-साधारणके लिए सरल उनकी पुस्तकोसे जनताने भारी सख्याम लाभ उठाया। ताजिक सोवियत समाजवादी प्रजातन्त्रकी केन्द्रीय कायसमितिके स्थायी सदस्य तौरपर एनीने हमारे प्रजातन्त्रकी सस्कृतिके निर्माण और स्कूलोकी समस्याको हल करनके क्षेत्रमे भारी काम किया है । हमारे माननीय गुरु सदरुद्दीन ऐनी अधिक वर्षांतक हमम रहे और शत्रुआका भयभीत पर हमारी समाजवादी जन्म भूमिकी भलाईके कायम दत्तचित रह।" ऐनीके जीवन का देखनेसे मालूम हो रहा है कि सोवियत शासनम नेखका और कलाकारावे लिये कितना ऊंचा स्थान है। राहुल सांकृत्यायन द्वितीय सस्करण 'आदीना' का यह दूसरा सस्करण ८ वप वाद छप रहा है । राहुल साकृत्यायन
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प्रथम भाग १ मन् १६२१ फरवरीका महीना था। आमू (वक्षु) दरियाके किनारे- का वृक्ष-वनस्पतिहीन समतल वयावान निर्जीव-सा दिखलायी पड़ता था। सिर्फ दक्षिणसे अफगानी हवा सनसनाहट करती आ रही थी, जो इस निर्जीव भूमिमें मृत्युकालकी गति-सी जान पड़ती थी। हवाके साथ उड़ती धूलने काले बादलको तरह सूर्यको आच्छादित कर रखा था और दिन- रातकी तरह जान पड़ता था। वहां कोई चीज दिखलायी नही पड़ रही थी। अनाथकी आयु अभी बारह वर्ष भी पूरी नही हुई थी। उसने आँधीके आरम्भ होते ही हौज-जैसे बने भेड़खाने में बाय (मालिक) की भेडोंको लाकर रखा और स्वयं द्वारपर पहरा देने लगा। उस आँधीमे बाहर खड़े बच्चेकी आँख-मुंहमे वालू भर गयी। वह आँखोको हाथसे मजबूतीके साथ ढांककर मुंहको नीचेकी ओर करके जमीनपर लेट गया। अभी आंधी शान्त न हुई थी कि हिममिश्रित वर्षा पडने लगी और बच्चेके पतले और चगदा-चगदा हुई कंचुकसे होकर बूंदें उसके बदनको । बेधने लगी। वच्चा इस यातनाको न सह मका और अपने शिरको जमीनसे उठाकर सीधे बैठ गया । वयावानके एक किनारे, जहांकि वकेि कारण गर्द और धूल साफ हो गयी थी, भेड़-बकरियोके गिरोह, घोड़ों और पशुओंके गल्ले दिखलायी पड़े। जानवर उत्तरसे दक्षिणकी ओर, आमू नदीकी तरफ दौडे जा रहे थे। भेडखानेमे बद भेडॉन इन भागते मालोके खुगकी आवाज सुनी तो उनमे भी हलचल मच गयी। बच्चा डरन लगा। उसका शरीर सर्दीस मूज गया था और अब वह भयसे कांपने लगा। वह सोचने लगा “यदि मेरे हाथमे सोपी भेडें तूफानम ताबडतोड भागते इन जानवरोके साथ भाग चली, तो मालिक मुझे मारे बिना न छोडेगा।' बच्चा मदार और दूसरी झाडियोको लकर कूरा (भेडखाना) वे मुंहको मजबूतीस बांधवर हाथम चरवाहोकी लाठी लेकर रखवाली करते हुए घूमने लगा। भागकर आये जानवर कूरावे सामन आवर उमवे दोनो ओरसे निक्ले । कूरावे भीतरकी भेडे उन्ह देखकर बाहर आनेका प्रयत्न करने लगी, लेकिन लडकेन इडा मार मारकर उन्ह वाहर नहीं आने दिया। जानवराके निकल जानेपर उनके पीछे, भाला हाथोमे लिये पचीस- तीस घोडसवार आये। उनमे से एवं सवारन पूराके पास पहुँच घोडेसे उतरकर उसके मुंहपर रखी शाखाओ और झाडियोको याहर फेर दिया और भेडोके बाहर निक्लनेका रास्ता खोल दिया। यह देखकर लडकेने उस आदमीकी तरफ निगाह करके कहा-चचा । क्या कर रहे हो। क्यो हमारी भेडोको भगा रहे हो । यदि इनमे से एक भी गुम हो गयी, तो वाय मुझे मार बिना न छोडेगा । आदमी न जवार दिया--जनाव-आली (बुखारावे अमीर) वोल शेविको (के डर) से भागकर नदी पार हो गये हैं। उनके पीछे-पीछे वाय (सेठ-जमीदार) अपने घरके निर्जीव-सजीव मानको लेकर नदी (वर्ग) पार कर गये । हम वयावानमै रह गये जानवगवा नदीपार करने लिए यहाँ थे । अव तेरी भेडारो भी उन्ही प्राणियोरे साथ नदी पार करायेंगे। तू क्यों डर रहा है ? भेडोरे कुरासे निवल दूसर जानवराके साथ हो जानेके बाद आदमी अपने घोडोपर मवार होवर पोछे पीछे चनने लगा। - वह बायके --मेरी मात्रा क्या हुआ होगा' हाय मेरी मादरजान पास थी। यहां है मेरी मैया-पहार बच्चा रोने लगा। तेरी मामी नदी पार हो गयी--वहाँ पहुँचे दूसरे मवाग्ने वच्चेसे कहा। सडकेने इस सवारकी ओर देयवर उसे पहचान लिया। वह उसके मालिक का साला शाकुल था । वच्चेको निश्चय हो गया कि उमकी मां भी नदी पार हो गयो । उसके मन में भी नदी पार होकर मांगे पास पहुंचनेको इच्छा हुई और वह भी पशुओको हारकर ले जानेवाले आदमियों के पीछे पीछे चल पड़ा। २ आमू नदीचे पासवाल एव गांवमे एशानकुल नामका एक वाय रहता था। उसके पाम बहुत धरती-पानी था और उसकी खेतीमे बहुतसे मजूर काम करते थे, लेकिन उसकी आमदनीया सबसे अधिक साधन पशुपालन था । वायवे नौकरी में एक मुराद भी था, जो चरवाही करता था। वह चालीसके करीब पहुंच चुका था, लेकिन अभी तक उसने व्याह नही किया था-या कहना चाहिए, कि वह ब्याह नही पर सका था। वह वायके घरमे २५ मालसे काम करता आ रहा था, लेकिन मजूरीमे से कुछ भी बचा नही सका था। बायसे जो कुछ उस मिलता था, उससे वह कठिनाईस ही अपनो दादी फातिमा बीबी और उसकी अनाथा पोती सारावे हर रोजके खानेको जुटा पाता था । फातिमा बीवी अपने पोतेकी नेवी को नही भूली । यायो खरीदकर अपनी बीबी बनानेकी इच्छा प्रगट करने पर भी उसने अपनी पाती साराको एक कटोरा पानीवे बदले मुरादको व्याहकर उसे घर-जमाई बनाया । व्याह होनेके बाद कभी-कभी ही वह बायका काम छाडकर अपने घर जाता । जानेपर भी रात भर वहां रहकर सूर्योदयसे पहले ही स्वामाया सेवामे आ पहुंचता ।
व्याह होनके एक-आध साल बाद फातिमा वीबी मर गयी। उम वक्त मालिपकी भेडाका वह वयावानमे चरा रहा था। उसे दादीकै मरने की खबर मिली, लेकिन मुर्दे के पास वह नहीं पहुँच मका, जिसने उसे यह गुबर दी थी, उस आदमी से मालिक्के पाम किमी दूसरे आदमी भेजने के लिये कहकर वहुन विनती की, ताकि वह भेडोको सोपवर मुर्देके पास जा सके लेयिन बायकी ओरमे कोई नहीं आया। लाचार मुराद भेडोको हाँके वायरे घर की ओर चला और सूर्यास्तसे एप घटा पहले, अर्थात् प्रतिदिनके घर आने समयसे एक घण्टा पहले वह बायकी हवेतीम पहुँचा । एशानकुल वाय हवेलीमे निकलकर शामकी नमाजके लिए मस्जिद जा रहा था। उसने चरवाहेको आता देनकर पूछा-क्यो, इतने मवेरे मालोको लोटा लाया -क्या आपको नहीं मालूम कि मेरी दादी दुनियामे चल वमी ? --मुरादने वायवे जवारमे पूछा। --मालूम है, लेकिन इससे क्या हुआ ? एक बुढिया मर गयी, मर गयी क्या तेरे जल्दी आनेम वह जी जायगी? क्या उमदे मरनेरे कारण मेरी भेडोरा भी भूखा मारना चाहता है ?--बायने गम होकर कहा- मेरी एक-य भेड तरो दम-दम बुढियो से बहार है। मुरादने यायको इन वानोका जवाब नहीं दिया, लेकिन भेडोको हवेलीवे भीतर करते समय वह बुदबुदाया-नेगे भेडे तो दूर, तेरे जैसे वायोरे मा शिगो भी अपनी मृत दादीरे एय केश के बदले नही लूंगा। मुरादने भेडो उनकी जगह कर दिया और प्रतिदिन जो वायदो घर गैटी-पानी मिलना था, उमे भी माय बिना दादीरे घग्गी और दौर पड़ा। पानिमा बीबी को दफनाने के बाद दूगरे दिन मुरादने उम गाँव Tो बिलकुन छोड देनेरा निश्चय दिया, क्यावि उमरा मन नहीं पाहता पा लिवर अपनी जयान बीवीको मासिो पग्गे दूरे एक - गांवमें रख छोडे । उसे अपनी स्त्रीपर पूरा विश्वास था, लेकिन लुहेडीसे डरता था। इसलिये दादीके जमा किये कपडे सत्ते और सामानको पोटरी बाँधे, अपनी स्त्रीको लिये बायके गांजा या वहाँ गदिके एक कोनेमे एक बेमालिकका टूटा फूटा घर था । उसे कुछ ठीक-ठाक कर, मेहरियाको यहाँ रखकर फिर पहलेको तरह मुराद बायकी सेवामें जाने लगा। x X x बायको अपने मध्यमवयस्क नौकरकी तरुण स्त्रीको देखनेकी इच्छा हुई । उसने उससे कहा-तेरी स्त्री मेरी बहू-जैसी है । बहूके स्वागत के लिये मुझे कुछ करना चाहिये । मैं उसका आतिथ्य करूंगा। दूसरे दिन सबेरे मुराद अपनी स्त्रीको मालिक्के घरमे रखकर भेडोको चराने ले गया। बायकी स्त्रियोने साराको घरमे लाकर बड़ा भोज भाज किया। जिस घरमे उसे बैठाया गया, वह वायकी छोटी स्त्रीको कोठरी थी किन्तु उसके स्वागतके लिये सबसे अधिक कोशिश बायकी बडी स्त्री कर रही थी। पाहुनीके सामने तरह-तरहकी चीज रखकर उसे खिलाया गया। बायकी बडी स्त्रीने अपने हाथसे मासखडको लेकर उसके हाथमे दिया, रोटीके ऊपर मक्खन डाला, और ठडी चायको फेंककर गरम चाय भरकर प्याला उसके सामने रखा। लेकिन सारा इस सारी आवभगत और सम्मानसे अलग रही, मानो सचमुच ही वह नयी नवेली बहू हो। वह शिर नीचा किये बैठी रही। हाँ, नयो बहुओकी तरह घरके मालकिनोको हर एक बातमे अपनी जगहसे उठकर सलाम नही करती थी। उसने बहुत कम खाया। स्वामि-पत्नीके मासखडको भी सम्मान प्रदशनके लिये उसने हाथ से लेकर शिर झुकाकर धन्यवाद दिया, किन्तु उसे खाये बिना रोटीके ऊपर, रतु २ दिया । स्वामि-पलीने तीसरी बार ठही हुई पायको फेंककर प्याले फिर गरम चाय डाली, लेकिन साराने एक भी प्याला ओठसे नह लगाया और भोजनके अंतमे दस्तरखानके कोनेमे रसे पानीके कटोरे दो बूंट पिया। भोजन समाप्त होनेके बाद दस्तरखान (परोसनेकी चादर) के लिये फातिहा (कुरानका एक मन) पढा जाने लगा। इसी समय "हमदम ! की आवाज आयी। यह आवाज बायकी थी। जिस समय बीवियो छोटी बीवीको कोठरी मे साराका आतिथ्य कर रही थी, उस वक्त वाय बडी वीवीकी कोठरी बच्चे के साथ खाना खा रहा था । आवाज सुनते ही बडी बीबी "जी हाँ अभी आयी" कहकर अपनो जगहसे उठकर पतिकी ओर दौडी। हमदम वायकी बडी बीवीका नाम न था। उस समय पति अपन- स्त्रियोका नाम लेकर नही पुकारते थे, क्योकि स्त्रीके मुंहकी तरह उसके नामको भी छिपाना जरूरी समझा जाता था। यदि नाम पुकारा जाता, तो वेगाना आदमी सुन लेता। इतना ही नहीं, वह दीवार और घरको भी बेगाना समझकर वहां भी बीबीका नाम नही पुकारते थे। स्त्रीका नाम केवल दो बार लिया जाता था और वह भी दमुल्ला इमाम (पुरो- हितजी) की ओरसे एक बार निकाह (व्याह) की रातको, और दूसरी बार उसके मरनेके दिन जब कि मुल्लोको दान देकर जिन्दगी भरके पापोको बेचा जाता था। "हमदम" वायके लडकेका नाम था, जो बडी बीवीके व्याहके आनेपर पैदा हुआ और बचपन होमे मर गया था । बायइसी नामसे हमदमकी मांको पुकारा करता था । पीछे जब छोटी बीबीसे शादीकी, तो उससे अलग करनेके लिये भी वह उसे उस नामसे पुकारने लगा। छोटी मेहरियाको जब बेटवा पैदा हुआ, तो उसका नाम इस्तम् रखा और तबसे छोटी बीबीको "इस्तम्" कहकर पुकारने लगा।
7 बायको बडी बीबी हमदम पतिके हाथमे मिठाई देखकर उसे ले लौट आयी और सारासे बोली-तेरे बचाने अब तक किसीको अपनी मिठाईमे से नहीं दिया था । उन्होंने कहा है कि इसे बहूको देकर मेरे सामने ले आ कि मैं उसकी मुंहदिखाई करूं।" साराने बायकी इस अकारण कृपाके बारेमे कुछ नहीं कहा और न उसके चेहरेपर प्रसन्नता या अप्रसन्नताका कोई भाव ही दिखलाई पड़ा, किन्तु बायकी छोटी बीबीकी अवस्था दूसरी हो गयी, वह तिरछी निगाह क्थेि अपनी सौतफी और देखने लगी। बडी चीथी इसका अर्थ समझती थी, तो भी अनजान बनकर उसन मिठाई डाल दी प्यालोमे और चाय बनाकर एक प्याला सौतके सामने और दूसरा सारा सामने रखा । -मैं चाय नहीं पीती-छोटी बीवीने गर्म होकर कहा-बहूको दो --चचाने मिठाई इसके लिए भेजी है। -अच्छा, तुम पोती नही हो तो मैं पीती हूँ-कहकर बडी बीबीने सौतके सामने से मीठी चाय लेकर और भी कहा-चचाने बहूके लिये मिठाई भले ही भेजी हो, किन्तु कहावत नहीं सुनी है "शालीकी बदौलत घास भी पानी पा जाती है।" –लेकिन मैं तुम्हारी तरह घास नही हूँ, मैं धान हूँ, "फले फूले धानको तरह खडी हूँ' -कहते छोटी बीबीने गुस्सा होकर अपने मुंहको दीवारकी तरफ फेर लिया और दीवारपर लटकते दर्पणपर दृष्टि डाल अपने अश्रु पूर्ण मुखको निहारती आंखको कोरसे साराकी ओर देखने लगी, लेकिन सारा उससे अधिक अल्पवयस्का और सुन्दरी दीख पडी, इससे उसका क्रोध चिन्तामे बदल गया । वह साराकी ओरसे दृष्टि हटा- कर चिन्तित भावसे नाखूनको नोकसे घरमे विछे गिलमलकी कुरेदने । लगी। -ख्याल रखना कि फलते-फूलते मडगिल्ला न बन जाना—बडी बीबीने सोतके क्रोधपर व्यग्य करते हुए कहा।
२० दोनों सोतोका मौखिक द्वन्द बहते-बढ़ते हापापायीपर पहुंच रहा था। इसी समय "हमदम, बहूको जल्दी से आ" कहकर बापने आवाज दी और झगडा यहीं खतम हो गया। "अच्छा, आती हूँ" कहकर वही वीवीने अपनी जगहसे उठकर फिर जरा झुककर साराके सामने उडी पडी चायको एक पूंटमे पी डाला और "उठो बहू, अपने चचाको बहुत प्रतीक्षा न कराओ" कहकर साराका हाथ पकड जबदस्तो धकेलते हुए अपने पतिके सामने ले गई। उन दोनोके चले जानेके बाद "मुझे दबाना चाहती है" यहते हुए छोटी बीवीने उठकर दर्पणके पास जाकर अपने मुख, वेश, आंख और भौंहको एक बार अच्छी तरह देखा और अपनेको तसल्ली देते हुए कहा--ये नहीं कर सकती। इसी समय इस्तम्ने "आचा | दादाके पास जगा (भाभी) बैठी है" कहते हुए परमे आकर छोटी बीबोके ध्यानको दर्पणसे हटा दिया। उसने इस्तम्की ओर निगाह करके कहा-वह जगा नही है, वह भी तेरी आचा बनेगी। -वह गन्दी है, वह मेरी मां नही बनेगी-इस्तम्ने नाराज होकर कहा। अपने बेटेके मुंहसे साराके लिए "गदी" शब्द सुनकर छोटी बीबीको कुछ सतोप हुआ और इस्तम्को गोदमे लेकर मीठी चायकी चायनिकके पास बैठकर उसे प्यार करते हुए सोचने लगी "मैं व्याहता बीबी हूँ। मेरा पुत्र उसको प्रिय सतान है । चाहे वह कैसा भी कामान्ध हो, किन्तु मेरे सामने भुक्खडकी लडकोसे कैसे प्रेम कर सकता है ?" छोटो बीबीने इन बातोसे अपने दिलको तसल्ली देकर चायनिक (चायदानी) मे बची मोठी चायको दो प्यालोमे डालकर एक्को स्वयं लेकर दूसरेको इस्तम्के हाथमे दिया। बडी बीबीने साराको वायके सामने लाकर कहा- अपने चचा बायको सलाम करो। - -- " साराने अपर्ने शिरको झुकाकर, मुंहको अपनी आस्तीनसे छिपाकर शिर हिलाने के सकेतसे बायको सलाम किया। म बायने मुस्कुराते हुए साराको भोर निगाह करके कहा-विराजी, मैरी बहू R 7+ 7 बाय के इस कहनेपर भी सारा अचल रही, किन्तु वायको बीवीने उसे जोरसे दवाकर बैठा दिया । बैठते वक्त सारा, जहां तक हो सकी, बायसे दूर दीवारके पास बैठी और दाहिनी जानुको भूमिपर रखकर वायें जानुको उसके ऊपर मुकाया और दाहिने हाथको लिलारपर रखकर मुंहको दीवारवी तरफ आधा झुकाये बैठ रही । बायने बहुत देखनेकी कोशिश की, किन्तु वह साराके मुंहको ठीकसे नहीं देख सका, क्योकि उसके मुंहका, एक भाग दीवारकी तरफ था और दूसरा हाय को आस्तीन से छिपा हुआ था। मायने पास में बैठे अपने तीनसाला पुन इस्तम्को उठाकर साराकी और निगाह करके कहा, "जा जगाके पास, वह तुझे चुम्बन देगी।" बच्चा शर्माते शर्माते साराके पास गया, किन्तु उसने उसे चुम्बन न दिया, न उसे हाथमे लिया, न ही उसकी ओर ताका । बच्चा बापकी ओर निगाह करके खडा रहा, मानो वह पूछना चाहता था कि उसकी इस हरकतपर अब उसे क्या करना चाहिए। जा मेरे बच्च । अपनी मां पास । वह तुझे अपना चुम्बन देगी ---बायने कहा । बच्चा दौडकर घरसे बाहर चला गया बायने एक चौपत गुलनारी रूमालको वालिशपरसे उठाकर सारा- भी और बढ़ाते हुए कहा, "ल, बेटी, इस रूमालको। यह मेरी औरसे तेरी मुंह-दिखाई है।" साराने, मानो बापफी बात नही सुनी । वह न बोली, न हिली, न इली। बाप अपनी जगहतर जानुरे बल हुआ और अपने अध्वंकायको साराकी ओर झुकाकर हाथरे रूमालको उसरे पास ते जाकर ha - ne २२ बोला-"मेरी प्यारी विटिया, मधुर-प्राण'ले इस रुमलियाको, ले मुंह- देखाई।" अबकी बार साराने मुंहको दीवारये और भी नजदीक करके शरीर को दोवारसे चिपकाकर आँखोंसे बायको ओर देखा । वह सियारदेखे मुर्गेको तरह वैसे ही निश्चल खडा रहा। वाय किंकर्तव्यविमूढ हो गया । यदि अब भी साराके और नजदीक होकर उसके हायमे या बगलमे जबर्दस्ती रूमाल रखे और वह खडी हो- कर भाग जाय, तो क्या होगा 'बाय स्वय उसके पास जाकर और मिन्नत करनेके लिये तैयार न था, क्योकि नौकरको बीबी और किसी मुक्खडकी लडकीसे तिरस्कृत होनेको वह अपमान समझता था। लेकिन वाय-पत्नी ने इस कठिन समयमे सहायता की । उसने सारा को अपनी जगह से उठाकर कहा -जा अपने चचा वायके हाथसे रूमाल लेकर धन्यवाद दे और उसे अपने घर ले जाकर होनेवाले अपने पुत्र के लिये 'मेरा पुत्र भी वाय चचाकी तरह धनी होवे की अभिलापा कर । साराने लज्जासे लाल होकर वायके हायसे रूमाल ले लिया और घरसे निकलकर उस कोठरोम गयो, जिसमे उसकी मेहमानी की गयी थी। पहले तो वायने साराको ठीकसे नही देखा था, किन्तु हायसे रूमाल लेते वक्त उसने उसे ध्यानसे देखा उसकी आँखें और भौहे काली, पलके लम्बी और ऊपरकी ओर कुचित वाल, लम्बे काले, बारीक मोडोंमे बॅटे, और सेब जैसा लाल मुख देखकर वाय चकित रह गया । अपने पुराने वस्त्रोमे सारा उसे बालू मिटटीके भीतर पड़े सुवर्ण-खडकी तरह चमकती जान पडी । उसका प्रकाशपूर्ण मुख काले बालोके भीतर अध्रसे अर्घ-आच्छादित पूर्ण चन्द्रको तरह शोभित था । काली भौंहोके नीचे उसकी चमकीली आँखें भिनसारके अंधेरेमें चमकते शुक्र तारेकी तरह पी और देखनेवालेको मुग्ध किये बिना नहीं रह सकती यो. x X x X स्वागतकै दिनसे ही बाप साराको हायमें करनेके लिए प्रयत्न करते लगा। इस काममैग्नीवियोको प्रतिद्वंद्विताने सहायता की । जबसे बायने छोटी बीबीसे व्याह किया था, तबसे बडी बीबी उसके मनसे उतर गयी थी। अपने रूप-सौन्दर्य से आकृष्टकर छोटी बीबी अपने पति द्वारा सौतको खूब कष्ट दिलाती और स्वय भी झगडती रहती। लडने- भिडनमें बड़ी बीबी अपनी सौतसे पीछे नही थी, लेकिन छोटी बीबी पति से शिकायत करती और वह उसकी ओरसे बडी बीबीको फटकारता और कभी-कभी मारता भी। अब बडी बीबीको सोतसे बदला लेनेका मौका मिला । वह किसी दूसरी तरुणीके बीचमे पडकर बायसे सम्बन्ध कराना चाहती थी, ताकि वह स्त्री उसकी सौतको पीडा दे, अपनी तरह शन्नुके दिलको भी जलाये । बडी बीबीकी इच्छा पूतिके लिये साराका आना बहुत अच्छा था। उसने बायको दुष्ट इच्छापूर्तिका भार अपने उपर लिया और स्वागतके दिन साराके हाथमे रूमाल दिलाना उसका पहला कारनामा था। उसके बाद पतिसे सलाह करके साराको फंसानेका प्रयल उसने फिर शुरू किया। वह प्रतिदिन साराको वुलवाकर घरके कामोमे मदद लेती। बीच मे चाय पीनेको छुट्टीके समय मौका पाकर बायको प्रशसा करती- वाय शुद्ध हृदयसे स्त्रियो और लडकियोसे स्नेह रखता है। विशेषकर साराके प्रति वह पैतृक वात्सल्य रखता है । यह कहते हुए वह साराको नसीहत देती कि यह बायसे न शमपि । वह उसके हृदयको जाननेकी कोशिश करती। इसी तरह वह एक दिन नसीहत दे रही थी। -यदि बाय तेरे साथ कोई दूसरी इच्छा रखता तो क्या मैं अपने घर में तुझे आने देती? कौन ऐसी स्त्री है, जो अपने पतिसे अनुचित सम्बन्ध स्थापित करने का दूसरी स्त्रीको मौका देगी? बडी बीयी जो रास्ता तैयार कर रही थी, उसीके अनुसार बाय दोस्ती और मेहरबानी करदे बातचीत करता और यातको कभी-कभी २४ 11 हंसी-मजाक तक पहुंचा देता । बडी बीवीको बातोको सुनकर सारा बायकी ओरसे कुछ-कुछ शकारहित हो चली थी, लेकिन छोटी बीवीके व्यवहार से उसका सदेह दूर नहीं होने पाता था। वह हर समय सारा- पर व्यग्य करती और वायके घरमें आने-जानेके लिये उसे कभी-कभी सीधे-सीधे फटकारती । सचमुच छोटी बीवीको बर्ताव सारके साथ एक सौत-जैसा था। कुछ समयतक सकेतसे बातचीत करते बायने अपने : भावको सीधे खोलकर रखना चाहा । एक दिन सारा बायकै घरसे निकलकर अपने घरकी ओर जा रही थी। बाय भीतरी हवेलीके बीचमे एकाएक उससे मिला और उसने अपने एक हाथसे उसके हाथको पकडकर दूसरे हाथसे उसकी अंगुलीम एक चांदीको अंगूठी पहनानी चाही । साराने कुपित हो अपने हाथको खीचकर बायसे कहा-यह बुरी है बाय | अफसोस है । शर्म कीजिये। साराने यह बात ऊँची आवाजमे कही । वडी वीबोने यद्यपि सुनीको अनसुनी कर दिया, लेकिन छोटी बीवी सुनकर "क्या वात है, क्या बात है" कहती वहां पहुंच गयी, लेकिन मेहरियाके वहां पहुँचनेके पहले ही सारा बायके घरसे निकलकर चली गयी थी। साराने अपने परमे जाकर मुंह-देखाईके लिये यायके दिये हुए रूमालको-जिसे उसने अबतक इस्तेमाल नही क्यिा या-उठा लिया और लौटकर वायवी बाहरी हवेलीके सामने फेर मायो । उस दिन जो साराने बायके परको छोड़ा, तो फिर उसने उधर पैर नही रखा ।। x 'x यद्यपि साराने यापके घरको ओर पर रखना बिल्कुल छोड दिया था, लेकिन वायने अब भी आशा नहीं छोड़ी थी। यह अब सारा- पो सोलहो आना अपने हायमे करनेका दीव सोच रहा था, लेकिन - r x . -- २५ Fri इसके लिये मुरादको सर्तुष्ट करने और मधुर व्यवहारसे अपनी और खीचनेको जरूरत थी| FET उसादिन जब शामको मुराद भेडोको लकर लौटा तो बायने मेहमानखानेमें अपने और साराके बीच जो घटना उस दिन हुई थी उसे उसी तरह दोहराया -मैं तेरी बीवीको अपनी बेटी अपनी बहू-जैसो समझता हूँ और उसीके अनुसार व्यवहार करता हूँ। आज उसे पैतृक स्मृतिके तौरपर एक चाँदीकी अंगूठी देना चाहता था। नही जानता कि उसे क्या स देह हुआ । उसने मुझे खरी-खोटी सुनाई और तेरी भाभियोके सामने मुझे मा अपमानित किया। मुराद इस घटनाको सुनकर अपने विचारोंमे डूब गया । वायने उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हुए फिर कहा-साराकी वातोको सुनकर कही तू मुझसे नाराज न हो जाय इसीलिये मैंने तुझसे सीधे वातकी । उसको समझा दे कि वह फिर मेरी हवेलीमे न आये-जाये। मुरादको कही यह ख्याल न हो जाय कि बाय उसे नौकरीसे छुडा देगा इसलिये वाय बहुत नर्मीसे बोला-मेरी इस बातसे तू यह न समझ कि मैं तुझसे या सारास नाराज हो गया। उसके आन-जानेके लिये मना करनेका मेरा मतलब यही है कि कही औरतोके बीच बेकार कहा-सुनी न हो जाये अन्यथा मैं उसके व्यवहारको बच्चे की बात समझ- कर दिलमे नही लाता। आगे भी तेरी जो कुछ भी भलाई कर सकता हूँ उसे उठा न रखूगा । पहले जब तू एकै शिर और एक शरीर था, उस वक्त तुझे क्या पैसा-कौडी चाहिये पूछकर मैंने तेरी ठीकसे सहा- यता नही की लेकिन अब तू गृहस्थ है । एक दूसरे आदमीकी रोटी भी तरे शिरपर है ।' में अब इसका ख्याल रखूगा। घाय चुप हो गया । मुरादने समझा कि बायको बात समाप्त हो गयो और वह अपनी जगहसे उठने लगा। बायने फिर मुंह खोला । मुराद बैठकर फिर सुनने लगा। F । + २६ -जो सुना है बायने कहा-उससे जान पडता है कि जल्दी ही तुम तीन शिर होनेवाले हो । इस बातको सुनते हो, मैंने एक दुधार बकरी तेरे होनेवाले पुत्र का ख्याल करके रखली है। जिस दिन गदेला (बच्चा) प्रगट होगा, उसी दिन इस बकरीको तुझे दूंगा कि घर ले जा बच्चेको दूध पिला । मेरी नेकियां यदि सारा नहीं मानती, तो कोई बात नहीं । "वह नहीं जानती तो न सही, खुदा तो जानता है।" थोडी देर रुककर वायने फिर कहा-अच्छा, अव अपने घर जा, विश्राम कर और साराके सदेहको दूर कर । मुराद अपनें घरकी ओर चला । उसके दिल मे हजारो सदेह और विचार आ रहे थे, लेकिन घर जाकर सारे सदेह दूर हो गये । इससे पहले साराने बायकी सारी बातें मुरादसे नही कही थी। आज उसने अपने और वायके बीच हुई सारी बातोको आदिसे अततक कह सुनाया । सुनकर मुराद वायकी बुरी नीयतको अच्छी तरह समझ गया । जिसने उसकी इज्जत बर्बाद करना चाहा, उस आदमीके घरमे काम न करनेका सकल्प उसने कर लिया, लेकिन उसे जल्दी वार्यरूपमे परिणत करनेमे वह सफल न हुआ । वायका काम छोडने पर किसी दूसरी जगह काम पकडनेकी जरूरत थी, लेकिन एक बायके घरसे काम छोडनेवाले नौकरको दूसरे बाय अपने घर नौकर न रखते थे। गांवके दूसरे गरीब किसान खुद दूसरेके द्वार पर चाफरी करते थे। उनके पास काम कहाँसे मिलता । दूरके गांवमे काम ढूंढने के लिये जाना मुरादको ठीक नही लगा, क्योकि तब उसे अपनी बीबीको अकेले छोड- कर जाना पडता और यह भयावह चीज थी, क्योकि गांवका सबसे बड़ा बाय उसके ऊपर आंख गडाए हुए था । उसने सोचा, पाहे झूठही क्यो न हो, किन्तु वायने कहा था "मैं तेरी स्त्रीपर कुदृष्टि नहीं रखता, उसे अपनी बेटी और बहूकी तरह समझता हूँ।" इसी बहाने अनजान बन अभी वायके पास ही काम करना ठीक है । जब कोई दूसरा अनुकूल ।
२७ स्थान मिल जायगा तो यहाँसे चल दूंगा । इस तरह मुराद फिर पहलेकी तरह बायके घर में काम करने लगा। ३ अंगूठीवाली घटनाके चार-पांच मास वाद सारा एक पुतवाको मां चनी । नवजात पुन के पधारनेके कारण मां-बापके आनन्दका कोई 3 काना नहीं था। इसी आनन्द या शादीका ख्याल करके उन्होने बच्चे का नाम "शादी" रखा। पुत्र प्रसवके समय साराको जो कष्ट हुआ और जो कि हर माता- को प्रथम प्रसवके समय होना स्वाभाविक है, उससे तास और भय खाते हुए भी एक फूल की तरह बेटवा प्राप्तकर सारा सारे कष्ट भूल गयी। इसके साथ ही सारा एशानकुल बायके उस दुर्व्यवहार को भी करीव- -करीव भूल गयी; विशेषकर बायने जब उसके बाद फिर कोई दुश्चेष्टा नही को और कपरसे हर तरह की मदद देनेमे कोई कोर-कसर नहीं उठा रखी । इससे मुरादका भाव बायके प्रति बदल गया और उसके प्रयत्नसे साराने भी खिंचाव दूर कर दिया। दोनो समझने लगे थे, कि वाय को वह चेष्टा शैतान का क्षणिक बहकावा था, उसके बाद बायने अपने कामको नापसन्द कर तोबा कर लिया। बच्चे के जन्मको सुनकर बायने उसी दिन जनी एक बकरीको मुरादके घर भेजा, तो मुरादका विश्वास और दिलपूरी और भी दृढ हो गयी। वायकी बडी बीबी बच्चेको देखनेके लिए साराके घर आयी और रवाज के अनुसार सूफ' को सिली हुई एक कुर्ती लायी। वह बच्चे के लिये आयु और धन, साराके लिए स्वास्थ्य और बलकी कामना करके अपने घर लौट गयी 1 इस बार उसने वाय या उसकी नेकी या मेहर- बानीकी बात नहीं कही। उसने ऐसा दिखलाया जैसे कि बायके सम्बन्धमे 'मूल्यवान वस्त्र -- m २६ जो प्रशसा और दूसरी बातें सारासे की थी, उसके लिये वह-लज्जित है और शैतानके बहकावेमे पडकर ही धायने उसे साराके सामने लज्जित कराया। बाय-पत्नीके इस व्यवहारने भी वायकी दुश्चेप्टाको शैतानी बहकावा समझनेमे सहायता दी और साराने बहुत कुछ बायको क्षमा भी कर दिया। । x x - प्रसव-पीडाके उन दिनोव बीत जानेपर साराकी भूख बहुत बड़े गयी । जो चीज भी खाती माना यह सब दूध और मास धन जाता दूध उसके प्राण-प्रिय बन्चेको तृप्त और पुष्ट करता और मास उसके शरीरमे मिलकर उसे और पीवर तथा कमनीय बनाता। सारा प्रतिदिन बच्चेको कपड़ेमे लपेटकर स्वच्छ खुली ह्वामे घुमाने ले जाती । नवजात बयावानमे खिली लालो और खेतोंके, किनारेकी हरियालीको देखकर आनन्दित होता । जब साराके पास आनेपर तितलियां हरियाली और फूलासे उडाती तो शादी भी मानो उनके साथ उडने के लिए अपनी मांके गोदमे उछलने लगतान, जाने क्यो गुलाब और लालाके फूलो हरियाली और तितलियोको देखकर नवजात इतना उल्लसित होता कि अध-विकसित कसीकी भांति अधखुले अधरोसे हँसने लगता। करुणामयी मां सारा अपने प्राण-प्रिय वच्चेपर जी-जानसे न्योछावर थी और नवजातके लिलारको फूलपर बैठी मधु-मक्खीको तरह घूमते न अघाती थी, जैसे मधु-मक्खी फूलपर बैठी अपने दोनो सूंडोंसे फूलको परहकर घूसती है वैसे हो सारा भी बच्चे के मुंहकी दोनो मोर - अपनी दोनों अंगुलियोंको बही कोमलताके साथ लगाकर उसके हासको और भी मधुर, और भी लावण्यमय बना देती। " T
अपने नवजातको देख-देखकर साराका हपं इतना बढता गया कि
उसने इसे इस प्रकार पद्योमे बांध दिया
--शादी-जान मेरा मेहरबान मेरा।
तुझे न दुख हो कभी जान मेरा।
लाला बढा है हरितावली है।
गुलाव सा हँसता
शादी-जान मेरा।
बसन्ती हवाएँ जगत में चली।
है "जान मेरा शादी-जान मेरा।
जब शादी कुछ और बडा हुआ और अपने हाथ-पैरोंको स्वतन्त्रता
पूर्वक घुमा सकता था तो साराकी शादी (प्रसन्नता) और भी अधिक
हुई , कभी-कभी सारा घासके ऊपर अपने पैरोको फैलाकर बैठती और
शादीको भी अपने सामने जानुआपर बैठाती । उस वक्त सारा बच्चोके
लायक छोटे छोटे गीत अलग-अलग अक्षरोके उच्चारणके समय गाती
शादी-जान मेरा, मेहरबान मेरा।
तुझे न दुख हो, कभी जान मेरा।
शादी गीतके साथ-साथ हाथ पैर और सारे शरीरको हिलाकर उसे
गतिमे दुहराता । वह अपने पजोको फैलाए हायोको ऊपर उठाए ऐसे
ताली बजाता कि ताली स्वरके अनुरूप पडती । वह शिरको उठाकर
हिलाता मानो उठकर नाचना चाहता । सारा शादीको प्रसन्न देखकर
और भी खुश हो गाती
तेरी काली आँख काकको मां न देखे दागको।
मेरी आँख मेरी चिराग, प्रकाशित हो तेरा बाग।
“साराके गीत गाते वक्त थोडी देर सुस्ताकर शादी भी गीतके अनु
सार शरीर को चलाने लगता।
इस तरह बच्चोके सगीतके अन्तमे सारा सदा इन लोरिया का गाया
करती
1
हा दूरसी दूरसी दूरसी', जा तू ऊपर कुरसी। तेरे रूपका है गुलाम गुलाब, तेरी सुन्दरता है कमाल । कम न हो तेरा मिलन। हा दूरसी दूरसी दूरसी, जा तू ऊपर कुरसी। तेरी सुगन्ध वसन्त सी, तेरा मुह है अनार-सा । तेरे केश जैसे कस्तूरी। हा दूरसी दूरसी दूरसी, जा तू ऊपर कुरसी । तेरा मुख उल्लसित हो, शोक तेरे मनसे दूर हो। शत्रु तेरा अन्धा हो। हा दूरसी दूरसी दूरसी, जा तू ऊपर कुरसी। जिस समय सारा इन लोरियोको गा रही थी, शादी भी अपने अगोको हिलाते हुये अपने बैठने की जगह चक्कर काट रहा था, जिसमे उसका शिर और हाथ ही नहीं, बल्कि अलग-अलग सारे अग आंख-भौंह- पीठ-मास और नस-नस एक तानमे हिलते थे । साराकी प्रसन्नता और बढी और वह अपनी जगहसे उठ बच्चेको हाथमे उठाकर हवामे उछाल बढती और उसके हाथ पर-शिर-गर्दन-आँख मुंह सभी को स्नेहसे चूमती। जान पडता , शादीको भी कृपामयी माँ के इस व्यवहारसे हपं होता था। इसीलिये वह ख-खाकर हँसता । भाषासे अपरिचित होने पर भी वह अपने भावोको अङ्-उङ् करके प्रगट करता और दूसरे अज्ञात शब्दो द्वारा भी अपने अन्तरको खोलना चाहता । सारा भी अपने प्राणप्रिय शिशुवे गालो पर नरम-नरम अंगुलियोको लगाकर उसी तरहकी अप- रिचित ध्वनियोंमे जवाब देती । ध्वनियोका अर्थ चाहे माको न मालूम रहता, लेकिन वाणी-हीन शादी उसे समझता । इसीलिये ऐसी ध्वनियोंके बोलते समय शादी कान देकर सुनता । जव मां चुप हो जाती, तब वह ख-खाकर हंसता और अव्यक्त ध्वनियोंमें कृपामयी माको जवाब देता। X दूर हो। x x --- ३१ बकरी और बकरी का बच्चा भी सारा और शादीके लिये एक भारी मनोरजनके कारण थे। जब शादी सो जाता, तो सारा खेतो नहरो और मैदानसे हरी पास लाती । उसने बकरीको खिला-पिलाकर खूब मोटा-ताजा और दुधार बना दिया था । जब सारा शादीको उठाये बकरीके पास जाती तो वह बकरी, विशेषकर बच्चेको देखकर प्रसन्न होती । बच्चा सारावे इशारेपर चारो तरफ दौडता तनूरके ऊपर चढ- पर कबूतरीकी तरह ह्वामे छलाग मारता और अगले दो पैरोको उठा- कर आदमीकी तरह खडा होता। पेड पानेपर उसपर छलॉग मारता । मुरादके झोपडेकी दीवार तो मानो उसके खेलने के लिये ही बनायी गयी थी । वह एक कूदानमे ही उसके ऊपर पहुंच जाता और सांपकी तरह उसके ऊपर दौडता। कूचे एक तूतका वृक्ष था, जिसकी शाखायें दीवारके ऊपर फैली थी। वह बच्चे के लिये खेल भी थी और भोजन भी । बच्चा दीवारपरसे उस जगह पहुंचकर पिछले दोनो पैरोपर खडा होकर, अगले दोनो परोको उन शापाओपर रखकर अपन मुंहस मरक्त-जसे हरे पत्ताको चुनता और दांतसि बुतुर-कुतुर कर खाता । मां बकरीके बच्चेकी इस पेष्टासे मानो नाराज होती और नीचे खडी उसी तरह चिल्लाती, जैसे मां छत या पेडपर चढे अपने बच्चोके गिरनेके भयसे, लेकिन यह बच्चा आदमीवे बच्चेकी तरह मां की बात माननेसे इन्कार न करता । शायद इसका कारण यह भी हो सरता है कि वह इस तरहने खेल बुढ़ापे तक खेल सकता था। पोडी देरमे पेलसे ऊबकर वह अपने पारो परोको धारो तरफ फैलाकर परणे ऊपरसे गहरे पानीमे कूदता है, उसी तरह लाग मार- पर जमीनपर कूद मां के पास दौड जाता और फिर अपने दोनों अगले परोरो नीधे मोड मुंहमो मारे स्तनसे सगाता, लेकिन स्तनमें घा पैसा उसे दूध पीनेमें राधा देवा । दो-चार बार मां- ये स्तनमे पता क्षीरसे निराश हो वह माकी वगलमे लेटपर आराम करने लगता। अब शादीरो बच्चेरे साथ खेलनेका अवसर मिलता था। सारा उसे उठाकर बच्चे के सामने दोनो परोपर बैठा देतो, अपने पजोसे बच्च- ये कस्तूरी जैसे काले बालोंमे कधी करती और अपने नखोसे उसके गिर- मुंह और लिलारको पुजलाती। शादी भी मांकी नियाओका अनुकरण करता और अपने सहजात बच्चे शरीरको सहलाना चाहता। बच्चेकी इच्छा देखकर सारा उसे मेमनेके नजदीक ले जाती। शादी अपनी लाल कोमल अंगुलियोसे मेमनेके काले बालोको खीचता और अपने कोमल नखोसे उसके ओठो और दांतोको छूता । शादी का मह काम बच्चेको भी पसन्द आता । वह बदलेमे शादीको अंगुलियोको चाटता, 'उसकी हथेलीको चूमता और कभी-कभी धन्यवाद-सा देते हुए 'म" भी करता । शादी उसे सुनकर प्रसन्न होकर, झूमकर "अङ उड' कहता और अपने ओठ और हाथोको मिलाकर अपने दिलकी बात मांको सुनाता। मां मानो दोनोको बातों को समझती । वह मेमनेकी बातको सादीको सुनाते हुए कहती वह कहता है-मैं तुझे प्यार करता हूँ। मैं और तू एक समय पैदा हुए, मेरी मां भी तुझसे प्रेम करती है। वह मांकी तरह तुझे क्षीर देती है। हम दोनो सिर्फ जोडीदार और साथ खेलनेवाले ही नहीं हैं, बल्कि दोनो एक दूसरेके क्षीरपायी-भाई भी हैं। फिर शादीके मुंहसे भैमने को कहती : मैं तुझे प्यार करता हूँ, मैं तेरे मुह, तेरी गन्धको प्यार करता हूँ। मैं तेरे लोम, तेरी आँख, तेरी द्वेषरहित आंख और खुरको प्यार करता हूँ। मैं तेरे सारे काम, तेरे कारबार। तेरी गति और चाल, तेरी मस्त अखडियोको प्यार करता हूँ। x - 1 -- । x x मुरादने अपने हाथसे लकडीका एक तख्ता बताया। तख्ता बहुत सीधा-सादा था। उसने कहीसे तीन-चार मीटर लकडी पाकर उसीको काटकर ऊपरसे छोटा तस्ता कांटीसे जोड़कर उसे बच्चोके तख्तेका रूप दे दिया था। एक दिन जब मेमना दीवारपर खेल रहा था तो साराने तख्तेको घरसे लाकर बाहर रख दिया । हरी घास दिखलानेसे मेमना भी दीवारसे कूदकर चला आया। दो-तीन गाल घास खा लेनेपर साराने मेमने को उठाकर तस्तेपर रख दिया। साराने ताली बजाकर गाना शुरू किया। शादी अब बैठ सकता था। वह मौके पास बैठ गया और उसीकी तरह ताली बजाने लगा। सारा गा रही थी हा दूरसी दूरसी दूरसी, जा तू ऊपर कुरसी। मेमनेने जरा देर कान देकर सुना, फिर तालोके स्वरचे अनुसार तख्तेके ऊपर धूमने लगा, किन्तु वहाँ जगह कम थी, इसलिए अपने खुरोको जल्दी-जल्दी एक ओर रखते हुए बढने लगा । यह खेल शादीको, साराको और मेमनेको भी बहुत पसन्द आया । पहले सारा बच्चेको तख्तेपर ऊपर रखती, किन्तु पीछे उसे आदत हो गयी और जैसे ही सारा गाने लगती, वह स्वय तस्तैपर चला जाता। हा दूरसो दूरसी दूरसी, जा तू ऊपर कुरसी। मुरादने धीरे-धीरे बायके प्रति अपने पहलेके विचारोको बिलकुल भुला दिया। बाय हमेशा मुरादके साथ अच्छा बर्ताव करता । वह उसके पुन शादीको भी दिलसे नहीं भुलाता और कभी-कभी धीमे पके मास- खडको मुरादके हाथमे देकर कहता "ले इसे बेटवाको देना।" बाजार (हाट) की रात शादीके लिए कटोरा आश-पलाव (पोलाव) देना कभी नहीं भूलता। अंगूठीको घटनाको दो साल बीत गये थे । अव , उसकी स्मृति बिलकुल लुप्त हो गयी थी, यहांतक कि साराके दिलसे भी वह दूर हो गयी थी। अब बाय कभी साराका नाम तक न लेता था। ।
३४ इन बातोसे मुरादको दिन प्रतिदिन दृढ विश्वास हो गया कि वायने उस कामको शैतान के बहकावेसे किया था और उसके लिए अब वह लज्जित तथा पश्चात्तप्त है। मुरादको बायके यहां सेवा करते ३० साल हो गये थे। उसे सदा सूखी जूठी रोटीके टुकडे और रूखा सूखा बचा-खुचा खाना मिला करता था । गरम भोजनकी जगह ठडा और देगका धोवन जैसा आश (खिचडी) उसके भाग्यमे बदा था। अब बाय मुरादको गेहूंकी मुलायम रोटी और गम आशसे परितृप्त करना और कभी-कभी चरभूमिमे भी मुरादके लिये गरम रोटी या गरम आश भेजता । मुरादके लिए गरम रोटी और आश वाय का साला--बड़ी बीबीका भाई-शाकुल ले जाता। शाकुल एक वाय-बच्चा (जमोदार पुत्र) अपने पिताका एकलौता पुत्र था। शाकुलके पिता सुबहानकुलको माल मिलवियत और धरती- पानी ईशानकुल बायके बराबर न होनेपर भी वह एक गाँवका एवं बाय और मुखिया (कलो शदा) समझा जाता था। उसने अपनी ज्येष्ठ पुवो सानियाको गांवके सबसे बडे बाय एशानुकुनको देकर अपने मान- सम्मानको और बढाया था। सुबहानकुल वाय कुछ नौकरो और चरवाहा द्वारा अपना काम करवाता और अपने एक्लौते पुत्र शाकुलसे काई काम नहीं लेता था। शाकुल वापसे एक घोडपर सवार होकर भोज उहाता और तमाशे देखता फिरता । सुवहानवे मरनेपर वायकी सारी मिक्यित शाकुलको मिली। एशानकुल वायने अपनी स्त्री सानियाका दायभाग मांगा, लेकिन शाकुलने कुछ नहीं दिया। साले-बहनोईमे कुछ दिनातक याजी (मुकदमा-बाजी) रही, लेकिन एशानकुल कुछ नहीं पा सा, क्योरि एन ओर शाकुन ३५ काजी और हाकिमका दरबारी और पैसा खर्च करनेवाला था, और दूसरी तरफ असली दावादार उसकी बहन सानिया सौतवे आनेसे अपने पतिपर नाराज थी, इसलिए उसने कह दिया था कि मेरी माल- मीरास मेरे भाईके ही हाथमे रहे। इसकी वजहसे एशानकुल और शाकुलके बीच अच्छा सम्बध नही रह गया था। जब-तब शाकुल वहनको देखने आता भी, तो ऐसे समय जबकि बहनोई घरपर नहीं होता । यदि कभी भेंट भी हो जाती, तो उसे एव सूखा सलाम देकर वह वहनके घरमे चला जाता और फिर वहाँसे लौट जाता। बायके मरनेसे बाद शाकुलका कारबार और खराब हो गया, क्योकि वापके वक्त उसे काम देखने की आदत नहीं थी, जो अब भी वैसी ही चल रही थी। उसका सारा समय सर-समाशो में बीतता । वैसे कभी-कभी वह बन्दूक लेकर शिकार खेलने चला जाता। आज भी उसकी सवारीमे सदा एक घोडा रहता लेकिन वह बापके जमाने जैसा राशका पोडा नही, बल्कि मामूली टटटू होता, जो न शिकारम काम आता न कूबकारी'म तो भी जब शाकुल सैर तमाशे से लौटकर गांव आता तो अपने घोडे, अपनी बन्दूक और अपनी हुनर मन्दी चतुराई) की तारीफ करते न थकता। जिस दिन किसी कूबकारीमे शामिल होता लौटनपर गांववालोंसे डीगें मारता और दश शिर बकरी छीन निकलनकी बात कहकर अपन घोडेकी तारीफ करता । जब शिकारसे लौटता तो कहता ' मैंने आज बन्दूकसे तीन हरिन मारे और दोको घोडा दौडाकर पकड लिया। उसकी झूठी गप्पोसे गांववाले भी परिचित हो थे । उस दिन एकने उससे पूछ दिया-तो वह पांच शिर हरिन कहाँ हैं ? एक हम भी १ मध्य एशियाकी घोड-दौड जिसमे हर सवार इनाममे रखो भड- बकरी या बछडेको छीनकर भागना चाहता है । - -मेरी पात तो क्याव बनावर प्राते और दुआ देत कि तुम्हारा घोडा इससे भी ज्यादा तेज और तुम्हारी बन्दूक इससे भी ज्यादा निशानवानी हो । शाकुलको जवाब देनेम कोई दिक्कत न हुई। उसने चट से यह दिया अमुर गांवम एक दोस्तवे पर विश्राम करने लगा । वहाँ मेरे खानेके लिए एक हरिनका क्वाब बनाया गया। वाकी को मैं उसी दोस्तको इनाम देकर चला आया। वात समाप्त करते-करते उसने कहा- आदत है कि हाथम यदि कोई चीज आई तो जो कोई पहले सामने आया, उसी को दे दो लौटाकर घर लाना मुझे पसन्द नही। लेकिन असल आदत दूसरी थी। एक दिन शाकुलने अपने नौकरको हुकुम दिया कि कुदाल लेकर दरीचीके सामनेके यूनुच्याको कोड दे, लेकिन इस वातका ख्याल रख वि नये उगे यूनुच्का (घास) की जड उधर न आये, कि मुर्गियाँ उसे खाकर खराब कर दें। नौकरने कोडाई की लेकिन मौका पाकर वायकी मुगियो वहाँ पहुँचकर नए अकुराको खाने लगी। नौकरने मुगियो को भागनेके लिए सेव-बराबर पत्थर फेवा । सयोगसे पत्थर एक मुग के शिरपर लगा और वह वही फड फडाकर मर गया । शाकुनको जव यह बात मानूम हुई तो उसने नौकरको वरामदेके खम्भसे बांध दिया और कुछ कदम दूरपर खडे होकर उसी पत्थरको नौकर की ओर फेंका । नौकरने आख और शिरको बचानेके लिए हाथोसे ओडा लेकिन पत्थर जाकर उसके मुहपर नगा। इससे सामनेके दो दांत टूट गए और ओठोसे खून बहने लगा। उस नौकरका असली नाम एरगश था लेकिन इस घटना के बाद उसे एरंगश वेदांत कहा जाने लगा। x x x अतम शाकुलस मेन मिलापके लिय स्वय एशानकुन वायने कोशिश की। उसने एक दिन अपनी बीवी सानियास कहा २७ --अपने भाईसे यह कि मुझसे झगडना छोड दे । उसने मेरा जो पुछ अपमान किया, उसके लिए मैंने उसे क्षमा कर दिया । अव मुझसे बन्धुत्व स्थापित करे और मेरे घोडॉमसे एव अच्छा घोडा सवारी लिए ले जाया परें । मुझे लोगो सामने यह देखकर शर्म आती है कि मेरा साला टुटह टट्ट पर कूदकारी लिए जाय और रासपे पोडोके पीछे व्यर्थ ही इधर- उधर दौडता फिरे। सानिया वीचमें पडनेसे साले-बहनोईमे फिरसे दोस्ती हो गयी। वायने इसके उपलक्षमे शाकुलरो मित्र-भोज दिया और उसे नया जामा पहिलाया । तबसे शाकुल प्रतिदिन एक बार वायवे घर आता और यदि कूवकारी पा शिकारम जाना होता, तो वायके एक अच्छे घोडेपर सवार होकर जाता। शिकारवे लिए कभी कभी बायकी पंच-गोलियां बन्दूक भी ले जाता और उससे हरिन, भेडिया या दूसरे वन्य पशुओको मारता। अव गाँववाले उसकी आत्म-श्लाघाको लेकर उपहास नहीं करते, क्योकि वह कूवकारी की एक-दो बकरियां भी अपने घोडोपर लटकाये लाता, शिकारसे भी सूखे हाथ नहीं आता और कभी हरिन, कभी तीतर, कभी भेडिया, और कभी लोमडी भी अपनी जीनसे बांध लाता। शाकुल अपने नौकरो-चरवाहोकी देखभाल नहीं करता और वे क्या खाते-पहनते है, इसकी पूछताछ नही करता था। तो भी, एशान- कुल वायके कामोम सहायता देता था। इस तरह कूबकारी या शिकारमे जाते वक्त वह मुरादके लिए आश-रोटी देकर हाल-चाल पूछता था। ५ सारा और मुरादका जीवन हँसी-खुशीसे बीत रहा था । शादीके जन्म-समय बायने जो बकरी दी थी, उसके तीसरे साल दश शिर हो गये थे। घर क्षीर-दही-मट्ठा-मस्कासे भरा हुआ था । तीन वर्षका शादी दूध-दही-मट्ठा-मस्कामें पला था, इसलिए देखने में वह पार-पांप सालके बच्चेसे भी अधिक मालूम होता था । मुरादने भी फिरसे जवानी पंदा की थी। सुन्दर योग्य स्त्री, समझदार और स्वस्थ, पुत्र, झोपड़ा होनेपर भी अपना निजी घर, दश शिर यकरिया-जिनसे बीवी-बच्चेको काम भी मिला या-इन सबके कारण उसका मन प्रसन्न और जीवन सुखी था। मुराद हर सवेरे मालिकके घर जाता, प्रातराशके बाद भेड़ोंको हांककर पराने जाता, शामको भेड़ोंको घर लौटाकर और व्यालू खाकर अपने घर लौटता। कभी-कभी बायके घरसे बेटवाके लिए मांस या आश भी ले आता । यह चरवाहीके हकमें शामिल न था और पहले उसे मिलता भी न था। मुराद अपनी सारी सुख-समृद्धिको अपनी पत्नीके शुभ चरण और पुनके सौभाग्य के कारण समझता था, इसलिए उनसे बहुत प्रेम करता था तथा उनके आरामका बहुत ध्यान रखता था । जव मुराद अपने घर आता तो उसको दिन भरको थकावट दूर हो जाती । बीबी उसके लिए चाय, क्षीर या दधि लाती । पुन गोदमें आकर उसकी दाढीसे खेलता, उसका मुंह चूमता या अपनेको चुमाता । शादी अपने बापसे इतना हिलमिल गया था और उससे इतना प्रेम करता था कि जबतक बाप घरमें रहता, वह एक क्षण भी उसके पाससे नही हटता, नोंद आनेपर भी अपनी जगह जाकर नहीं सोता, हर रात बापकी गोदमें सो जाता और फिर उसे उठाकर बिस्तरेपर ले जाना पड़ता। सारा भी अपनेको बहुत सौभाग्यवती समझती । मुरादसे ब्याह नेके बाद उसे शरीरको चिन्तासे छुट्टी मिल गयी थी। शादीके जन्मके बाद मास्वापकी जुदाई और बन्धु-बांधवोंको मृत्युका शोक दिलसे जाता रहा था । उसके पास शादी था, इसलिए सारी चीजें उसके पास थी। उसे ।
खास तौरसे मुरादको भांति ही अपने शादीपर गर्व था क्योकि उसके जन्म लेते हो पर और परिवारका भाग्य खुल गया था। शादी तीन सालका था। इसपर भी उसका रग-ढग बडोकी तरहका था। वह एक ओर अपनेको परिवारका अग समझता तो दूसरी ओर कर्तव्यको बातें भी समझता, इसलिए अब खेल हीमे नहीं, बल्कि काम- मे भी मौका सहायक बनता । यदि वह देखता कि मां दूध दुहना चाहती है, तो बच्चोको पकडकर रखता, यदि देखता कि मां खीर पकाना चाहती है, तो चूल्हेके पास लापर ईधन रखता, यदि देखता कि माँ मस्का बिलोने जा रही है, तो वह गडवेसे पानी भरके ला देता, यदि देखता कि मां कपडा धोना चाहती है, तो वह देगसे गरम पानी ले आता। x X एक दिन सबेरे मुराद समयसे पहले उठा । अभी उसकी बीवी नही जगी थी। उसने हाथ-मुंह धोनेके वाद स्त्रीको जगाकर यहा - मैं चाहता हूँ कि आज रातको मालिकके घर खाना न खा घर आकर तुम्हारे साथ खाना खाऊँ । आज दूधको पकाकर दही न बनाना । शामको खीर अच्छी तरह पकाना । जरा समयपर तैयार करना, क्योकि आजमैं समयसे पहले आऊँगा। मुराद अपने कामपर चला गया। सारा भी उठकर अपने काम- काजमे लग गयी । शादोके जगनेसे पहले ही उसने अपने और बच्चेके लिए खाना तैयार कर रखा । शादीने जागकर अपने बिस्तरेपर खडे होकर मांको पुकारा- आचा, बकरियां दुही? -~दुही, क्या हुआ -माने जवाब देते हुए पूछा । वह हवेलीके वाहर झाड दे रही थी। ?
-- ? छोटो बकरियाको भी दुहा -उसे अगले साल दुहूंगी। अभी वह बच्चा है । मा नहीं हुई है । जब मा होगी ती तो खूव क्षीर देगी। --ने में मैने देखा वह क्षीर देती है-कहते शादी अपनी जगह से उठकर बाहर आनेके लिए तख्तेके कठघरस चिपक गया लेकिन वह निकल न सका और ठोकर खाकर काले चिरागको लिए दिए गिर पड़ा। चिरांगका तेल घरके फर्श पर फैल गया और शादी रोने लगा। सारा चिराग गिरने की आवाज और शादीके रोनेको सुनकर क्या हुआ क्या हुआ" कहती दौडकर घरवे भीतर आयी। उसन फर्श और विस्तरेपर तेल फैला देखकर कहा-रो मत मैं तुझे नही मारूंगी लकिन आगे खबरदार रहना और किसी चीजको न गिराना। --क्यो कहती है कि छोटी बकरी दूध नहा देगी ? मै तस्तसे उतरना चाहता था उसी वक्त गिर पड़ा। साराने चकित होकर शादीकी ओर देखा । उसकी विशाल काली आखोकी चमर अश्रु विन्दुओको झलका रही थी। जान पडता था ओस कणसे भरे गुलाव फूलपर तरण रविकी किरणें पड रही हैं । भय और लल्जासे उसका श्वेत आरक्त मुख ताजे गुनावको पखुडियो की तरह शोभा दे रहा था। सारा अपने प्राणासे प्रिय पुत्र के इस अनुपम सौदयको देखकर अपनेको रोक न सकी और शादीको अकमे लेकर उसने उसके मुह और आँखाको दिल भर चूमा । जव बच्चका वुर्ता सारा हाथम लगा, ता पता लगा कि वह भीगा है । उसने उसे अपनसे दूर करके कहा ' तूने आज रातको बहुत बुरा काम किया इसीलिय रोता है न ?' और शादी लिय दूसरा धुना कुर्ता ले आयी। मैंने नहीं भिगोया छोटी बरीने क्षीरने भिगो दिया--बहते हुए उसने मांगो पिर आश्चय मे डार दिया। -वहाँ यतला क्या हुआ जो बरीचे दूधन तरे पुनको ४१ - 2. 2 भिगा दिया अपने बच्ची नया वुर्ता पहनाते हुए सारीन पूछा -मैंने सपनेमे देखा-शादीन कहना शुरू किया- तस्ता हवेलीवे सामन रखा है। मैंने कहा हा दूरसी दूरसो दूरसी जा तू ऊपर कुरसी। छोटी बकरी उटवर तल्लेपर आ गई और-उसके स्तनसे क्षीर गिरन लगा। मैंने अपने कुतको उठाया वि जिसम क्षीर जमीनपर न गिरे लेकिन क्षीर वुत से पार हो पायजामा भिगोते हुए जमीनपर गिरने लगा। है . सूथन भिगाया तेरा। । साराने पुत्रके स्वप्न और क्त्तव्यको सुनकर उसके जवाबम पद कहा बकरिया ऊपर तेरे अगले साल देगी क्षीर तेरे लिये। -~-ने, छोटी वरिया मुझे इसी साल क्षीर देगी इसी समय क्षीर देगी । तू तस्ते का घरवे सामने रख तो, फिर देख वह कैसे क्षीर देती है कहते हुए शादी मां न मारनेपर ढीठ होकर बोला । साराने बेटवानी इच्छा न भग करते तरतेको ले जाकर हवेली के सामने रख दिया। शादी तख्तेके सामने खडा होकर गाने लगा हा दूरसी दूरसी दूरसी जा तू ऊपर कुरसी। गाना सुनकर सबसे पहल शादीको समवयस्का बकरी जोकि अब दो वच्चोकी मां थी, दौडकर आयी और तख्तेके ऊपर चढकर चक्कर काटने लगी। छोटी बकरी जोकि उसकी द्वितीय सतान थी भी दौडकर आयी और तख्ते ऊपर चढने लगी। मांने उसके लिये स्थान खाली करते तस्नेसे छलांग मारो । छोटी बकरी तख्तेपर खेलने लगी, लेकिन क्षीर नही दिया । शादीने ध्यान लगाकर देखा लेकिन बकरीका स्तन नहीं दिखाई पडा । शादीने उदास स्वरमे कहा-आचा | इसने क्षीर नहीं दिया। इसके पास थन भी नहीं है । ।
४२ - क्या मैंने कहा नहीं था कि यह इस साल दूध नहीं देगी। -सारा ने कहा। शादीने सपनेमे झूठा धोखा देनेवाली बकरियाको तस्तेसे नीचे ढकेल दिया और उसकी जगह दूसरी छोटी बकरियोको एक-एक करके ले आकर खेलने लगा। साराने झाडू बहारू खतमकर हाथ मुंह घोकर आवाज दी-आ खाना खायें। शादी बकरियोके खेलको छोडकर मौके पास दौडा । साराने उसका हाथ मुंह धोया और ले जाकर खानेपर बैठाया। । x x । खाना खानेके बाद सारा घरमे ताला लगाकर बकरियोको चरानेके लिए धरसे निकली। शादी भी हाथमे- -डडा लेकर बकरियोंके पीछ पीछे चला । बकरियोके आचा बच्चाको हांकते दोनो चर स्थानपर पहुंच । शादी डडको हाथमे लिए खतोके किनारे खडा हुआ जिसमे बकरियां लोगो के खेतोमे न जाएं। साथ ही वह खेतकी मेडपर उगी घासाको उखाड उखाडकर बकरियो की तरफ फेंकने लगा। सारा एक ऊँची-सी जगहपर बैठकर सूत कातने लगी। सूत कातने के लिए बहुत सीधा-सादा ढेरा (तकला) मुरादने एक नकडीमे डडी बांधकर तैयार कर दिया था। सारा अपने कुतके आंचलमे धुन बकरी के बाल रख लाई थी। उसमेसे एक एकको निकालकर सूतके सिरेको तकलीके सिरेपर लगाती, फिर बायें हाथको ऊपर उठा दाहिने हाथसे ढेरेवो घुमाती और इस तरह बालकी रस्सी बनाती जाती। जब एक बार सूतमे ऐंठन लग जाती तो सारा उसे लपेट लती और फिर कातना शुरू करती। सूय पढकर शिरपर आया। वकरियोंने अघाकर चरना बंद कर ४३ दिया । साराने बाल और मरेको संभालकर बच्चयो आवाज दी- बारियोंको हांक, पत पुडपर पर्ने । बारियोंरे आपा-बच्चा कुडपर ले जाकर पानी पिलाया । पानी पीने बाद बकरियां लेट गयी । सारा और शादीने परवी रोटीको पानीसे भिगोकर पाया और फिर अंजुलीसे मुडमा पानी निकालकर पिया। खाना खाने याद साराने फिर रस्मी यटना शुरू किया । अववी बार शादी भी काममे उसका सहायक बना । शादी रस्सीको ढेरके साथ पुमाता और सारा पालको पहलेसे समान परके उसमे लगाती । चक्कर काटनेसे रस्सी जितनी ही युनकर सम्बी होती जाती, उतना ही पीठवी ओरमे हटता शादी भी मासे दूर होता जाता । पचास पदम दूर जानेपर मो बुलाती और पली रस्मीयो ढेरे (तरले) मे लपटते हुए वह मांके पास चला आता, और फिरसे काम शुरू होता । एक पटात यारियोंने आराम दिया। इसी बीचमे साराने बेटेकी मददसे वरीये बालोवी उतनी रस्सी बांट ली, जितनी कि वह सवेरेसे दोपहरतक बांट पाई थी। दरियां लेटते वक्त जुगाली करती रही । चरते वक्त आधा चवाकर रखे भोजनको फिरसे दोबारा चबाकर उदरमे पहुँचाती रही । अब उसका पैट कुछ खाली हो गया और वह फिर आहारवे लिये अपनी जगहसे उठी । सारा भी अपना काम समेटवर बच्चेवे साथ वरियोको हांककर चरनेकी जगह गयी। x X x सारा बहुत देरतक यकरियोको चरा न सकी। धूल-गर्दा उडाती शुरू हो गयी और थोडी देर बाद पहाडोको ओर मोटे काले बादल दिखाई पडे । रसोईघरके धूम सदृश अध्र उठवर तेजीसे दौडता गाँवकी आंधी ओर आया।
४४ साराने हवाको आवाजसे समझ लिया, कि जल्दी ही आँधी पानी शुरू होनेवाला है । उसने जल्दी ही उठकर बच्चेके साथ बकरियोंकी घरकी तरफ हांका। वह अभी अपने दरवाजेतक भी नही पहुँची कि विजलीको गडगडाहट आकाशम सुनाई दी और बकरियोंको घरमे करते ही पानी भी वरसने लगा। सारा बकरियाको उनकी जगह करके वच्चेको ले घरमे आयी उसके भीगे कुरतको हटा सूखा कुरता पहनाया और खुद भी भीगे वस्त्र-वृदले । वर्षा मूसलाधार पड रही थी। साथ ही बिजलीको गडगडाहट और चमक भी थी जो भयसचार कर रही थी। सारा और शादी दोनो आचा-बच्चा घरम-बैटे सामने खुले द्वारके वर्षाकी ओर देख रहे थे । जय विजली बहुत कडकती तो शादी मौके अवमे छिपवर अपने शिर आंख मुंह-कानको उसके कचुकवे भीतर ढांक लेता । दिन बीता, प्रकृति शान्त हुई वर्षा भी बन्द हुई । साराने द्वारके पानीको उलीचा । फिर चूरहवा सुखाकर खीर पकाना शुरू किया। वह पतिकी इच्छानुसार आज कुछ जल्दी भोजन पकाना चाहती थी और चाहती थी कि सारा घर इक्ट्ठा बैठकर खाए । उसने चूल्हेम आग जलायी। मारे नही करनेपर भी शादी न लाकर चूल्हेके पास ईधन रखा, लेकिन घरके सामन रखा ईधन इतना भीग गया था कि या तो न जलता या धुंआ देकर जलता । साराने शादीसे यहा-मेरी मदद करना चाहता है। अच्छा जा, वरी-खानेसे ईंधन ले आ। वहां मूषा इंघन पड़ा है। शादी पानी और कीचड पर थपथपाता जाकर ईधन ले आया और उसमी मा आश पसान लगी । सारा क्षीर और पावन पवार आगवा धीमी गरसे परके भीतर गयो । शादीने आज नमदेपर तेल गिरा दिया था। सारान उस धार पंना दिया, जिमम दाग दियलाई न पडे । बाहर पडे भीग गए तख्नेको कपडेसे पोछार परस भीतर सा रखा । दीपारो सापकर तेल डालपर उसे दीवटपर रख दिया ।यानो ४५ समय पतिके बैठनेवी जगहपर एक गद्दा बिछा दिया । गद्देके नीचे उसी के ऊपर दस्तरखान फैला दिया और फिर उसके ऊपर एक रोटी रखकर ढांक दी। घरके भीतर खानेको व्यवस्था ठीक कर सारा चूल्हेके पास गयी। चूल्हेमे एक आन लक्डी लगा आंचको और तेज कर दिया पतीली फिर उबलने लगी। साराने खीरको अच्छी तरह चला कर, उसमे घी डाल- पर फिर चूल्हेपर रख दिया । वह बकरी दुहने गयी, जिसमे शादीने भी हाथ वटाया। X X X सूर्यास्त होगया । खीर भी तैयार हो गयी, लेकिन अभी तक मुराद- का कहो पता न था। साराने चूल्हेवी आग वुझा, घरके भीतर जा चिराग जलाया और बच्चेको लिए हुए पतिके स्वागतार्थ कूचे मे गयी । गायोके आनेको वेला थी । दूरसे आने-जानेवालोको ठीक्से देखा नहीं जा सकता था । सारा जिस किसीको भी दूरसे आते देखती, समझती उसका पति आ रहा है, लेकिन उसके दरवाजेके सामनेसे गुजरनेपर जानती कि वह उसका पति नही है । शादीको जोरकी नीद आ रही थी। वह नीदकी पिनकमे बार-बार गिरने लगता, लेकिन मां खवरदार करनेपर झुंझलाकर पूछता--दादा कब आएगा ? दो घटेको प्रतीक्षाके बाद भी मुराद नही आया । सारा बच्चेको परमे ल आयी और उसे वहाँ रखकर चूल्हेके पास गयी । खीर जमकर ईंट-सी बन गयी थी। एक थालीमे शादीके लिये खीर निकाली और चाहाकि बच्चे को जगाकर खिलाये लेकिन वह नही जागा । उसने बच्चे को बिस्तरेपर सुला दिया और फिर पतिको देखने कूचेमे गयी, लेकिन अब कूचेमे कोई आ-जा नही रहा था, रात काफी हो गयी थी।
सारा बहुत देरतक सूने कूचे बैठी रास्तेकी ओर आँख गड़ाए मुरादके आनेको प्रतीक्षा करती रही । फिर बच्चा कही हर न जाये, यह विचार- कर परके भीतर आ गयी । बच्चा गहरी नीद सो रहा था, लेकिन साराके दिलको चैन कहाँ ? वह परमे बैठ न सको। फिर कूमे गयी और फिर लौटकर घरमे आ गयी। कितनी बार कूचे और घरके वीच चक्कर काटे । अतमे वह अपने बच्चे के पास बैठकर उसके मुंहपर आंख गड़ाये चिन्ता करने लगी-उसे क्या हुआ? सारा अपने प्रश्नका जवाब नही पा सकी कि इसी समय घरके बाहर परकी आहट सुनाई दी। "आखिर आया" कहती हुई प्रसन्न सारा अपनी जगहसे उठकर पतिके स्वागतके लिये तैयार हुई । सारा खडे होकर देखा, कि सामने बायकी बडी बीवी खडी है । सारा उसे देखते ही आशकित होकर काप उठी । प्रसन्नताके बाद एकदम निराशा उसके सामने आयी । उसने अपनेको संभालकर बायकी बीबीकी ओर देखा । बाय-बीवीने पूछा- मुराद भाई कहाँ है? बाय-बीबीका यह प्रश्न साराके लिये मानो उसके शिरपर एक पतीली उबलता पानी उडेलना था। शिरसे परतक उसका शरीर जलने लगा । उसने मनपर बहुत जोर लगाकर पूछा-मैं उसकी खबर तुमसे जानना चाहती थी। बाय-बीबीने बतलाना शुरू किया-आंधी-पानी शुरू होनेके बाद तेरे चचा वायने शाकुलको वुनाकर उसे मुरादकी खबर लेनेके लिये बयावानमे भेजा और यह भी कहा कि आंधीमे यदि भेडें इधर-उधर बिखर गयी हो तो उन्हे जमा करके लानेमे मुरादकी मदद करना। मुराद भूखा होगा, यह सोचकर मैंने शाकुलके हाय दो रोटियां भी भेज दी। -शाकुलने उसे बयावानमे नही पाया? -अधीर होकर साराने बीवीको बातको काटकर पूछा ।
४७
को, किन्तु
बाफतके लिए मैं उसे दड नहीं दूंगा, और मुझसे कहा कि सारासे
देनेवाली बात सुनकर कुछ शान्त भावसे कहा।
-धीरज घर, मैं सब कुछ बतला देती हूँ-कहते हुए वायवीबीने
अपनी वात जारी की-शाकुल चरभूमिमे गया, लेकिन वहाँ न मुरादका
पता था, न भेडोका । फिर उसने चारोओर बयाबान, नहरो, शर-वनोको
ढूंढना शुरू किया । सूर्यास्त के समय भेडोमेसे कुछको उसने शर-वन
(रसकण्डा वन) के भीतर देखा...
-ददेश् भेडोके पास नही था?-साराने फिर उतावली होकर
पूछा।
--धीरज धर, बतलाती हूँ। शाकुलने एक भेडियेको देखा । वह
एक भेडके पेटको फाडकर खा रहा था। उसने बदूकसे भेडियेको मार
गिराया और फिर मुराद तथा दूसरी भेडोको ढूंढने लगा । बहुत कोशिश
पता नही लगा । अंधेरा होनेपर हाथ-आयो भेडोको हांकता
-साराने कहा । उसके शिरपर
-- कहा तो-वाय-पत्नीने जोरसे कहा-उसका कोई पता नहीं
--तुम्हारे विचारसे उसको क्या हुआ, यह पूछना चाहती हूं-
साराने भी बीबीकी तरह ऊँची आवाज मे कहा ।
- तेरे चचा बायका कहना है कि शायद बहुत अधिक भेडाके नष्ट
होनेसे डरकर वह छिप गया या किसी तरफ चला गया, लेकिन देवी
जाकर कहदे कि अगर मुराद आए तो उसे मेरे पास भेज दे, मैं उससे
--मैं उसका पता कहाँ से पाऊँ--साराने बाय-पत्नीकी तसल्ली
घर आया।
-आखिर मुरादको क्या हुआ
मानो भारी चट्टान गिर गयी ।
7
लगा।
नाराज न हूँगा।
४८ --मैं कल सबेरे ही फिर शाकुलको उसे ढूंढनेके लिए बयावानमे भेजूंगी-कहती वायकी मेहरिया चली गयी। X X X दूसरे दिन बाय-वीबी फिर साराके पास आयी और इस बार भी बेवक्त रातमे सोनेके वक्त । आज जो खबर लायी थी, वह कलसे भी बुरी थी। उसके कथनानुसार आज भी शाकुलने वयावानमे मे जाकर जांच-पड़ताल की, किन्तु मुरादका कही कुछ नही पता चला । थककर वह उसी शर-वनके पास आया, जहाँ पिछले दिन भेडें मिली थी । शर- वनको भी एक छोरसे दूसरे छोरतक देख डाला । वहाँ भी कोई पता नही चला, लेकिन जब नहरको देखकर लौट रहा था तो कुछ शरो (सरकडो) के नीचे उसे खूनके चिन्ह और फटे वस्त्रो साय आदमीकी हड्डियां दिखाई पड़ी। इस समाचारको सुनकर साराके ऊपर जो गुजरी उसका चिन्न लेखनीसे नही खीचा जा सकता । उसने "वाख" कहकर अपने हाथो- को छातीपर मारा, मानो वहाँसे अपने कलेजेको पक्डकर निकालना चाहती हो। फिर जैसे उसके नीचे वारूदकी आग लग गयी हो । एका- एक उठ खडी हुई और अपनेको न संभालकर जमीनपर गिर पडी। कुछ देर तडफनेके बाद उसका रग सफेद हो गया, हाथ-पैर फैल गए और वह लम्बी पड गयी। फिर कोई शब्द या गति उसमें दिखाई न पही। बाय-चीनीने समझ लिया वि वह मर गयी, लेकिन जब जेबसे दपंण निकालकर उसके मुंहके सामने रखा, तो दर्पण धूमिल हो गया। पता लगा कि अभी वह मरी नहीं । शादी भी मांगो चिल्लाहट मुनवर उसे जमीनपर गिरता देखर रोता हुआ उसके ऊपर आ गिरा। वाय-बीबी जिगु यक्त घरसे बाहर नियनी, बेटवाने रोनेके शब्दोरे मिया और कुछ मुनाई नहीं दे रहा था।
मुरादके गुम होनेके एक सप्ताह बाद एमानकुल वायने सारसके पास इमाम (पुरोहित) और अकसक्काल (मुखिया) को मंगनी के लिए भेजा उन्होंने मुरादके भेडिया द्वारा ख़ाये जानेपर शोक प्रगट करते हुए बायका विवाह-सदेश साराके पास पहुंचाया और कहा कि मुरादकी मृत्युपर बायको बहुत अफसोस हुआ है, मुरादकी आत्माको शान्ति देने तथा उसकी सेवाओके बदले उसके पुत्रका बाप बननेके लिए वाय चाहता है कि साराको धर्मानुसार अपनी विवाहिता बनाये । सारा उनकी इन बातोको सुनकर रो पडी और कुछ देर रोकर दिल हल्का करनेके बाद बोली -पहले तो अभी यही नही मालूम, कि मेरे पतिको भेडियाने खा ही डाला है, दूसरे, यदि मेरे पतिको भेडियाने खा ही लिया हो, तो भी अभी मैं पति करना नही चाहती। मेरे बच्चेके लिए सौतेले पिताकी आवश्यकता नहीं । यदि उसकी आयु है, तो हमारे देशमे जैसे और बहुत-से बेवापके बच्चे है उसी तरह यह भी किसी तरह सयाना हो जायगा । एशानकुल वायकी बातको सारान अस्वीकार कर दिया । वाय इसके लिए कोई दूसरा उपाय सोच रहा था। इसी समय खबर मिली कि उस गाँवसे बहुत दूर नोचेकी ओर आमूके तटपर पानीम बहकर आया एक मुर्दा मिला है। खबर लानेवालेने कहा कि मैंने मुर्देवो अपनी आँखा देखा । वह मुरादकी शकल सूरतका था। उसने यह भी बतलाया कि आदमी स्वय नदीमे गिरकर नहीं डूबा, बल्कि उसे गोली मारकर नदीमे फेंक दिया गया था। सारा इस खबरको सुनकर अपने बच्चेको क्धेपर लिये नदीक किनारे रिनारे उस गांवमें पहुँची । मुर्देवो तबतक दफ्ना दिया गया था। उसन कद्रको खुलवाकर देखा-मुका शरीर बिलकुल पूल गया या और पहचान नहीं आता था। इसलिए सारा नहीं जान सकी रि ब०-४ । यह मुर्दा मुरादवा है या किसी दूसरेका, तो भी उसको सदेह हुआ कि उसके पतिका ही मुर्दा है, इसलिए उसे देखते ही वह फिर बेहोश हो गयी । होशमे आकर फिर उसने मुदयो इधर-उधर करके देखा, किन्तु वहाँ जगह-जगह छेद थे, जिससे वह निश्चय नही कर पायी, कि उसमे गोली का कोई निशान है या नही । सारा पतिके जीने-मरनेके वारेम कोई भी निश्चय न कर आंखोसे आंसू बहाती हृदयसे जलती और तनसे कांपती अपने घर लौटी । पतिको गुम हुए देर हो गयी। वह भेडिया या गोलीका शिकार हुआ, इस खबरका कहीसे इन्कार नहीं हुआ । इसलिए वह शोक मनानेके लिए सूतकमे बैठ गयी। x अभी सूतकके दिन भी वीत न पाये थे कि एशानकुलने दोबारा मँगनी के लिए आदमी भजा और अवको वार और साफ आवाजमे । घटकने जाकर सारासे यह भी कहा--तू अपने पतिके मुर्देको अपनी आँखो देख आयी है । अब पति न करनेका कोई बहाना नही है । यदि अब भी तू पति न करनेकी बात करती है तो हम राजी नही हैं कि एक जवान स्त्री बिना पति जीवन विताये और उसके कारण गांवके जवान पापमे पडें । इसलिए पति करना आवश्यक है । बायसे बढकर कोई दूसरा पति होने लायक आदमी इस गांवमे नही है साराने भी अवको बार अपनी आवाज बदल दी, घटकोको बेशरम बताया और बायको बेइज्जत कर उसपर अपने पतिके मारनेका आरोप लगाया। साथ ही जो भी शब्द मुंहसे आया वही कह दिया । लेकिन बाय इतनेसे चुप होनेवाला नहीं था। उसने पहले गांवके बडोके कठमे घी लगाया और फिर शाकुलके अधीन गांवके कितने ही गुडो को भेजकर रातके वक्त जबर्दस्ती साराको पकड मंगवाया। अत मे इमाम- को बुलाकर निकाह पढवा लिया । इस तरह सारा उसकी व्याहता बन गयी। X X X यद्यपि सारा अब बायकी निकाही बीबी थी, लेकिन बायका वर्ताव उसके साथ पत्नी-जैसा न था। उसकी आसक्ति भी उसके प्रति वैसी नही थी, इस समय साराको अपने हाथमे करनेके वायके दो उद्देश्य थे। पहले यह कि वह साराको दिखलाना चाहता था कि बाय लोग और खास कर एशानकुल बाय जिस बातपर अड गये, उसे पूरा करके रहे। जिसने उसके रास्तेमे बाधा डाली, वही साराकी तरह हो अतमे नाक रगडनेको मजबूर हुआ। दूसरे यह कि इस तरह मुरादकी जगह बिना पैसे-कौडीके एक दासी और गुलाम-बच्चा हाथ आयेगा। इसीलिए निकाहके दूसरे दिनसे ही उसने साराको घर और बया- वानके कडे कामोमे लगा दिया। सारा पहले हीसे एशानकुलको वीवी बनना नहीं चाहती थी और अबभी वह उसे अपना पति नही मानतो थी। इसलिए निकाहको रातको जो नया कुर्ता उसे जबर्दस्ती पहना दिया गया था, अकेले होते ही उसने उसे उतारकर फेंक दिया और फिर पेवद लगे अपने उसी पुराने कुतको पहनने लगी, जिसे कि वह घरपर पहना करती थी। बायके घरमे साराकी जिदगी उस समयकी मेहनत- कश स्त्रियोके काम करते-करते मरनेवाले जीवनसे और भी अधिक क्प्टमय थो। जैसे दासता-युगको दासियाँ सिर्फ काम करनेके लिए खरीदो जाती थी, उसी तरह सारा भी सदा काम करनेके लिए मजबूर थी। वह बिना ठीकसे खाये, बिना ठीकसे सोये, और वाय और उसको बीबियोको गालियो और मारोपर "आह' भी न करते हुए काम करती।
५२ वाय शादीका बाप बना था, लेकिन उसके घरमे उसकी जिन्दगी बेबापके बच्चोंसे भी बुरी थी। जिस तरह कूर्चमे पैदा हुए वेमालिकके पिल्ले हर एकको ठोकर खाते हुए जिन्दगी बिताते हैं, उसी तरह शादी भी जिन्दगी बिताने लगा। जिस तरह मछलीका बच्चा पानीसे दूर वालूमे पडा तडपता है, उसी तरह शादी भी तडपते हुए जिन्दगी बिताने लगा। शादीको सबसे अधिक दुख बायका पुत्र इस्तम् देता था । वह शादीसे तीन साल बडा था, इसलिए अपने बलसे फायदा उठाकर उसे दिनमे कई-कई वार मारता था। यदि शादी रोता, तो इस्तम्की मां उसे और मारती। शादी जब कुछ वडा हुआ और उसमे इतना बल आगया कि इस्तम्के परमे हाथ डाल उसे उठाकर उसे चबूतरेके नीचे फेंक दे, तब इस्तम्की मां उसके इस अपराधके लिए अपने ही मारनेसे सन्तोप न कर उसे अपने पतिसे भी पिटवाने लगी। एक बार उसपर इतनी मार पड़ी कि उसका सारा बदन सूज गया और वह बीमार पडकर एक महीना मौतकी घाट जोहता रहा । आगे भी कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जब वाय और उसकी बीवियां उसे न पीटती। मार खाते-खाते शादीको उससे वचनेका एक हो उपाय सूझा, कि मालिक्के सामने न आये और इसके लिए वह पासके ढेर या ऐसी ही दूसरी जगह जाकर सोने लगा। सारा वच्चको प्राणोसे भी प्रिय समझती थी उसका जीवन उसे बंधा हुआ था। यह शादीकी इस हालतको देखती, लेकिन उसकी कोई सहायता न कर सकती, यहां तक कि खुद भूखी रह कर भी मूखी रोटीका एक टुक्डा तक उसे मुश्किल से ही दे पाती। वाय जबसे साराको अपने घरमे लाया, एक बार भी उसने शादी- को उसके नामसे नही पुकारा । वह उसे "अनथवा कहकर पुकारता, "अनपवा" यहार पाम अढाता और "अनयवा" पहपर पीटता। वायके मुंहसे सुनकर उसके परके दूसरे व्यक्ति भी उसे "अनयवा" पहने लगे । जब शादी कुछ यहा हो गया, तो "वा" निकाल दिया गय, - और अब उसे सभी लोग "अनाथ" कहने लगे । शादी उसका नाम श्रा, यह बिल्कुल ही भुला दिया गया। यहांतक कि उसने खुद भी अपना नाम बताना छोड दिया और किसी के पूछने पर अनाथ कहकर जवाब देने लगा। ७ - - फरवरी का महीना था। आकाशसे हिमकण की वर्षा हो रही थी और कभी-कभी बडी हवा भी चल पडती थी । उसी समय एक विशाल मैदानमे बहुत से आदमी नगे शिर खडे थे । नदी के किनारे कोई छाया नही थी कि वह उसके नीचे बैठते । वहाँ न कोई गाँव-गिराँव था, न कोई इमारत ही और न कोई गुफा थी। सिर्फ एक चादर (तबू) दिखलायी पडती थी, जिसके ऊपर वेल-बूटेदार आलवानो के टुकडे सिले थे। चादर के पास एक ओसारेवाला शामियाना तना हुआ था। तबू के भीतर कोई नही था, किन्तु शामियानेके नीचे दो-तीन पहरे- दार खडे थे । इनके शिरपर शलगमी आकारका सैनिक साफा, बदन- पर बुखारी जेहकलानी जामा और पैरोमे अमेरिकन बूट थे । इनकी कमर में सफेद सगीका कमरवन्द बंधा था, जिससे जान पडता था, कि वह अमीर के निम्न श्रेणी के दरबारी थे। आदमी तबूके चारो ओर निगाह डालत खडे थे और किसीको वहाँसे सौ कदम तक नजदीक नहीं आने देते थे। यदि कोई उधर ध्यान से देखने लगता तो पहरेदारोमेसे एक बोल उठता "इधर निगाह न कर, अपनी आँखोको बन्द कर ।" ऐसे मे दूर एक सवार आता दिखलायी पडा। वहाँ बैठे सभी आदमियो- को नजर आगन्तुक के ऊपर गड गयो । सवार तबूके पास पहुंच कर शामि- यानेके नीचे खडे लोगो से "श्रीदरबार कूच कर रहा है" कहकर घोडेके मुंहको पीछे फिरा कर लौट गया। दो मिनट और बीता। एक सवार घोडा दौडाता आया, "श्रीचरणो ने घोडा मांगा है" कहा और फिर घोडे का मुंह मोड कर दौडाता लौट गया। दो मिनट बाद फिर एक सवार आयो और श्री शरीरने अश्वके जीनको शोभित क्यिा' कहकर घोडा दौडाता लौट गया । इसके बाद हर दो मिनट बाद एक एक सवार घोडा दौडाता आया और बिना कुछ कहे उसी तरह पोडा दौडाता लौट गया। इस तरहकी व्यथ की घोड दौड देरतक नहीं हुई कि एक सवार आया, जिसके पोर्छ घोडको जीनके ऊपर छोटे पैरावाली मोडवर रखी चारपाई भी बंधी थी। वहां जमा हुए आदमियोंसे एक फटा-पुराना जामा पहिने आदमीने अपने पास खडे सैनिकस पूछा-यह क्या है -~-यह श्रीचरणकी अपनी चारपाई है । जब श्रीचरण सोना चाहते है तो इसी के ऊपर पौढत है-~-सनिक्ने जवाब दिया। चारपाईवाले के बाद एक दूसरा सवार आया । वह अपने आगे घोडेपर काली देग रखकर घोडा दौडाता आया। उसी आदमी ने फिर पूछा- यह क्या है ? यह ताजा पोलावसे भरी देग चूल्हेसे उतारकर लायी गयी है- सैनिकने कहा-यदि श्रीचरण दो मजिलोके वीचमे भोजन करनेकी कृपा करते हैं तो इसीमेसे निकाल लेते हैं। इसके बाद फिर एक सवार आया जिसके घोडेपर एक जोडा दो दो खानेवाला लकडी का ढांचा था। हर एक खानेमे एक-एक कूजा (सुराही) था यानी सब मिलाकर चार कूजे रखे थे। कूजोके ऊपर सवार बैठा था। उसके हाथमे एक चीनीका कटोरा भी था । सवार पैरोको घोडेकी गदन की तरफ लटकाये घोडा दौडाता आया। —यह क्या है ?---उसी आदमीने पूछा। इस आदमीका सूफी आब-कस कहते है-सनिकने जवाब दिया--इन कूजोंमे खास तौरसे पानी भरके रखा गया है कि जिस समय भी श्रीचरण पानी मांग कटोरेमे डालकर उहे दे दिया जाय।
उसके बाद फिर घोड़ा दौड़ाता एक सवार आया । इस सवारने एक प्यालेको रूमालके भीतर रखकर रूमाल के चारो छोरो को हाथ से पकड़कर ऊपर उठा रखा था। -यह क्या है ? -यह "शवंतदार" है। रूमालके भीतरके प्याले में शयंत भरा है। यदि श्रीचरण शर्वत पीनेको इच्छा प्रकट करते हैं तो शवंतदार तुरन्त इस प्यालेको श्रीचरणोंके सामने रख देता है। रास्तेके किनारे की बिलोसे ऊदबिलाव चेहरा निकाले हुए थे। कुछ तमाशबीनोने उनके ऊपर ढेले-पत्थर फेंके। एक ऊदबिलाय लोगोंसे उरकर भागा । शवंतदारका घोडा दौड़ता हुआ उसके पास आया और उसे देखते ही भड़काकर पिछले परके बल खड़ा हो गया । शवंतदार संभाल नहीं सका और उसके हाथसे प्यालेवाला रूमाल छूटकर तमाश- वीनोके सामने जा गिरा। प्याला टूटकर टूक-टूक हो गया, किन्तु उसमे शर्बत-ववंत कुछ नहीं निकला। -यह प्याला खाली था क्या ? फटे-पुराने जामेवाले आदमीने अपने पास पडे आदमीको "शर्यत भरा है" पहनेके लिये झूठा ठहराते हुए पूछा। सनिकका मुंह साजसे लाल हो गया, लेकिन उसकी ओररो एक दूसरे आदमी ने कहा-हो सकता है, अमीर उस पारपाई पर भी एक बार भी सोया न हो, यह देग भी थाली और पूजे भी बेपानी हो; लेपिन लोगोके सामने वादशाही दवदवा दिखलानेके लिए इन चीजोको इसी तरह लेकर दौड़ते हैं। अब रास्तेसे अकेले-अवेले सवार नहीं, बल्कि बहुत-से सवार भारो- से लदी घोडा-गाड़ियोके साथ, चारो ओर एक-दूसरे के ऊपर रास्तेका इन घोडा-गडियोमेसे एक घोडा-गाडी (अराबा) पर ओहार चढ़ा हुआ था । ओहारके ऊपर यहा नमदा डालकर गाडीको खूब अच्छी तरह ढक दिया गया था। वीचड़ उछालते आए ।
-यह उर्दा (अन्त पुर) का अरावा है--सैनिक पोशाक्वाले आदमीने विना किसी पूछे ही कहना शुरू किया-इसके भीतर श्री. चरणोका माननीय अन्त पुर और पास बीवियां बुठी हैं । निषिद्ध व्यक्तियोको नजर उनके ऊपर न पडे, इसलिए अरावाको चारो ओरसे खूब ढांक दिया गया है। अराबा जाकर चादर (तवू) के पास खडा हुआ । शामियानेके नीचे खडे खिदमतगारोंमेसे एफने आकर नमदेको खोल दिया और उसके भीतरसे कोईसोलह-सत्रह साला लडके एकके पीछे एक निकलकर तयूमे चले गये । लडकोकी पोशाय बहुत अच्छी थी, लेकिन उनका रग बहुत उडा हुआ था, और चेहरेसे जान पडता था कि बहुत समय जेलमे रहकर अभी-अभी बाहर निकले है या सालोकों बीमारीने बाद अभी-अभी उठे है। -ये कौन हैं ?--कहकर फिर उसे फट जामेवालेने पूछा, जो मानो हर चीजको जानना चाहता था, लेकिन इस अरावाको उर्दाका अरावा कहनेवाले आदमीने मुंहको दूसरी ओर फेर लिया था, जैसे उसने कुछ सुना ही नही, लेकिन किसी दूसरे आदमीने प्रश्नका जवाब . देते हुए कहा -यह वह लडके हैं जिन्हे अमीरने ज़ोर-जुलुमसे उनके मां-बापसे छीनकरके अलग रखा है । यह जुल्म सताये वह अभागे है जिन्हे कि अमीरने अपने दरबारी भ्रष्टाचारके कीचडमे डालकर अपनी पाशविकता- का शिकार बना रखा है । यह नवजात हरे अकुर है जिन्ह अमीर- के गन्दे जूतोंने पामाल कर रखा है। यह वह नवोत्फुल्ल कलियाँ हैं जो अन्यायी के तापके नीचे मुरझा गयी है। यह दरबारी जीवनसे घृणा रखते है, यह उत्पीडित हैं, रज और शोक सहनेवाले हैं, इसीलिए जिन्दा होने- पर भी इनके मुंहका रग मुर्दे की तरह है। सवारो और अराबोके गुजर चुवनेपर अमीरवा निजी सेनादल दिखलायी पडा । इनकी पोशाक कफकाज (कासस) वालो जैसी थी ५७ - और इन्हे "कफ़ाज" का नाम भी मिला था। कफकाज सैनिक दलके निकल जानेपर अमीरकै उदेची और शगावुल दिखलायी पडें । इनके हार्योमे सोना मढे चोव (सोटी) थे और सुनहली डोरी थी। अगाडी- पिछाडीवाले घोडोपर सवार थे और घोडोको न दौडाकर कुछ धीरे धीरे चना रहे थे । उनमेसे एक्ने ऊंची आवाजसे कहा हजरत अमीर विजयी और जयशाली हो ! फिर दूसरेने चिल्लाकर कहा--'हजरत अमीर (श्रीमहाराज) विश्व विजयी (जहाँगीर) होवें, उनका खड्ग तीक्ष्ण और उनको यात्रा निर्विघ्न हो ।' तीसरेन उनके जवावमे कहा-'इलाही । आमीन" (भगवान् एवमस्तु ।) फ्टे जामेवाला इन चिल्लाहटोको सुनकर ठठाकर हँसा । क्यो हँस रहा है ?-एकन उससे पूछा। ----अमीर अपने देशके उत्पीडित मेहनतकशो पर विजय नही प्राप्त कर सका । उन्होंने इसे देशसे नष्ट करनेके लिए हथियार उठाया है, उनपर इसने विजय न पायी और न पायेगा। यहां हम आँखा देख रहे हैं कि वह अपने देशम कैसी बेइज्जती और सवाई के साथ निकाला जा- कर दूसरे देशोभे भागा जा रहा है और भी ये लोग विजयी और जयशाली हो, उनका खड्ग तीक्ष्ण हो और वह विश्व विजयी हा' कहते हुए चिल्ला रहे हैं । क्या यह हंसी आनेकी बात नहीं है -- 'श्री महाराज फ्टे जामेवालेने कहा। -हाथमे हथियार उठाए उत्पीडित मेहनतकशोके हाथसे सलामती- के साथ भाग निकलना भी अमोरके लिए एक विजय है--एक दूसरे आदमीने कहा-चाहे जहांगीर (विश्व विजयी) न हो, किन्तु परदेश- मे जाकर दर बदर भटकते 'जहाँ गर्द' (विश्व अटक) तो हो ही - सक्ते हैं। अब एक भारी दल प्रगट हुआ, जिसे देखकर लोगोने कहना शुरू पिया-इन्हीके भीतर अमीर आ रहा है,लेकिन पारो ओर से हथि- यारवद अफगान घेरे हुए थे, इसलिए उसे कोई देख नहीं सकता था। -क्यो अमीरने अफगानोगे अपना रक्षक बनाया ?-फिर फटे जामेवाले ने पूछा। -अमीरने अपने लोगोपर बहुत जुल्म क्यिा है, इसलिए उनसे बहुत डरता है पहातक कि अपने निजी सैनिकोपर भी विश्वास नहीं रखता । इसीलिए लोगोरे लूटे मालसे इन परदेशियाको खरीदकर उहें अपना भददगार बनाकर भाग रहा है--एक दशकने पहा । अमीर तम्बूके पास जाकर घोडेसे उतर पडा और फिर तम्बूके भीतर गायब होगया । कुछ मिनट बाद एक पेशखिजमत (खिदमतगार) एक अमलदार (अफसर) को आवाज देकर अमीर के पास ले गया। पांच मिनट बाद उस अमलदारने दशकोके पास आवर स्थानीय वायो (सेठ- जमीदारो) अरवावा (चौधरियो), अक्सक्कालो (मुखियो), मुल्लो (पुरोहितो) और अमनदारोको अलगकर, एक ओर लेजाकर उन्हें अमीर का सलाम देकर कहा -श्रीचरण भाग्य नसीब और भगवान्को इच्छाके अनुसार पडोसी देशमे जा रहे हैं । श्रीचरण नहीं चाहते कि उनके सच्चे गुलाम बोलशेविकोंके हाथसे कष्ट सहें, इसलिए उन्होनें कहनेकी कृपाकी है, 'बाय लोग अपनी सभी चल सपत्ति, नगद पैसा पशुओ और अपनी बीवी-बच्चोको साथ ले मैरे पोछे नदी (आमू) पार आयें। और यह भी कृपावचन कहा है वे अपने नोक्रो चरवाहो और खिदमतगारो को साथ लिए दिए दरिया पार करें जिसमे कि उनकी सहायता से अपने पडोसीके देश---जो कि मेरा दोस्त है और अपने वतनकी तरह है-में आकर अपनी खेती पशुपालन या वाणिज्यके कामको जारी रख सकें। मुल्ला लोग मेरे लिए दुआ करते यही रह जाये और मेरे विरुद्ध तलवार 'उठानेवाले भुक्खड मेहनतकशो और वोलशेविको विरुद्ध, शराफ्तके नाम से लोगो को उभाडे । स्थानीय अमलदार हाथमे हथियार ले, देहातको बर्बाद करें, मकानो और खेतो को जलायें, लोगोको मारें और परिवारोको नष्ट करें, जिसमे कि सभी बेजार होकर मेरे शासन-कालको याद करें । अरवाव और अकसक्काल मुंहपर पर्दा डालकर बोलशेविक -सरकारके भीतर घुस जायें और जहांतक हो सके, भीतरसे ध्वस और - विनाशका काम करें। अमीरी सरवारके खैरखाह इस वातको सुनकर ऊंची आवाज में चिल्ला उठे--"हम सभी जान-माल और बीबी-बच्चोके साथ श्रीआज्ञा के बन्दे है । हमे विश्वास है कि जल्दी ही अपने देशको फिरसे अपने हाथ मे लायेगे।' इस हल्लेके जवाबमे वहां एकत्रित लोगोमेसे, जिनमे अधिकाश पटे जामेवाले थे, किसीने अपने हाथको मुंहपर रखकर सीटी बजायी और दूसरोंने ऊँची आवाजसे कहा -इसके बाद देशको तू सिर्फ अपने स्वप्नमे ही देख सकेगा। अमीर और उसके अमलदारो को इस वक्त इतना अवसर नही था कि अपना अपमान करनेवालोको पकडकर दड दें, क्योकि दूरसे तोपकी आवाज आ रही थी। अमीर और उसके अमलदार वहाँ तैयार की हुई नावोपर सवार हो गए और उनके मुंहको अफगानिस्तानकी और घुमा- कर जोरसे खेया जाने लगा। अमीरके दूर हो जानेपर वायो और वाय-बच्चोंने अपने आदमियो और सम्बन्धियोको हुकुम दिया कि बयावानमे जायें और जो कुछ भी भेड- बकरी या पशु हाथ आयें, सबको हांककर नदी पार करायें । वह स्वय अपनी चल सपति, रुपया-पैसा, बीबी-बच्चो और खिदमतगारोको लेनेके लिये अपने गांवोकी ओर चले गए। इसी समय एशानकुल बायने भी अपनी भेडो और ढोरोको लानेके लिए शाकुलको भेजा और स्वय घोडा दौडाता अपने गांवकी ओर गया ।
५७ नदी किनारे कुछ पालवाली वडी-वडी नावें तैयार थी । सवार जिन भेडो और ढोरोको हांककर लाए थे, उनमेसे अधिक से अधिक को उन्होंने नावपर चढाया लेकिन नदीके किनारे बहुत अधिक भेडें रह गयी, क्यो- कि नावम उनके लिए जगह न थी । ढोर हाँककर लानेवाले चाहते थे कि भेडाके परोको बांधकर उन्हें भी वेजान मालकी तरह नावके ऊपर डाल दै लेकिन इसके लिए मल्लाह तयार न थे वे । कहत थे- यदि परिमाण से अधिक वोझा लादा गया तो नाव डूब जायगी। अनाय भेडोके पीछे पीछे दौडता-हांफता नदी किनारे पहुंचा था। वह भी भेडोके साथ नावपर चढ गया । एक पशु हाँकनेवालेने अधिक भेडाके चढानके लिए मल्लाहोंसे झगडते समय किश्तीमे अनाथको देखा। उसने जाकर उसे उठाकर नदीके किनारेकी ओर फेंक दिया और 'तू क्सि काम आयगा, तेरी जगह यदि एक भेड पार हो, तो यह मेरे लिए अधिक लाभकी होगी' कहते हुए नावसे उतरकर एक दूसरी भेड को "नाते हुए मल्लाहसे बोला, ''अच्छा तो उस वच्चेकी जगह इस भेड को रखते है। नावसे उठाकर अनाथको फक दिया गया, किन्तु वह तुरन्त ही अपनी जगहसे उठ गया और नावके छोरको पकडे हुए मेरी मैया अपनी माईके पास जाऊँगा कहते हुए चिल्लाने लगा किन्तु उसी आदमीने फिर उसे चढने नहीं दिया। बच्चे के रोने चिल्लानेसे मल्लाहको दया आगयी और उसने उसे उठाकर अपनी बगलमे बैठाते हुए कहा -मैलश (अच्छा), नाव भारी होकर डूब जाय, बाया माल और जानवर नष्ट हो जायें, मुझे इससे क्या? यदि नाव न डूबी तो तुझे अपने साथ निकाल ले चलूंगा और तेरी मां के पास पहुंचा दूगा।
११ x X नदी पारकर अनाथ उन कैम्पोको एक-एक करके देखने लगा जिनम भगोडे ठहरे हुए थे। उसने पहाडी सानुभा, विस्तृत वयावानो, मैदानो, घरभूमियो, खड्डो और गुफाओको छान मारा, किन्तु उसे वहाँ करुणामयो माँ नही मिली । वह तो केवल मौके पानेके ही लिये नदी पार आया था। नदीके नजदीकवाले प्रदेशमे मांको न पाकर अनाथ इस पराये मुल्क- के और भीतरके स्थानोको ढूंढनेके लिए चल पडा । वह उन सभी जगहोम जाता, जहां कि सफेद भगोडे ठहरे हुए थे। दिन बीत गया और रात आ गयी। दिन भरके थके अनाथने एक भगोडेके तवूमे जाकर ठहरनेकी आज्ञा मांगी, लेकिन डेरेके स्वामीने एक टुकडा रोटी देनेकी जगह उसे पत्थर मारते हुए कहा-इस देशमे याना करके हम ही पेट भर पाए हैं कि तू ही अब चला है पेट भरने ? यद्यपि उस आइरा (डेरे) मे गेहूं-उडदके भरे हुए बोरे जगह-जगह रखे थे, भागत वक्त पकाकर लायी गयी रोटियां थी, मासमे नमक डालकर रखा हुआ था, भेडोको दुहकर जमाया गया दही रखा था, और मक्खन निकालने और पनीर सुखानेकी तैयारी हो रही थी। अनाथ रातको एक गड्ढेमे घुसकर उसी तरह भूखा-प्यासा सो गया, लेकिन उसे नीद नही आयी। वार-वार करवटें बदलते और करणामयी माको याद करते हुए शिरको गड्ढेको दीवारसे लडा-लडापर रोता रहा । लेकिन कोई नहीं था, जो उसको पुवारको सुनता, उसके रोने-सिसरने पर पसीजता । रात्रि के अतिम पहर तक स्वप्न या वेहोशोमै समय गुजारा । जब आँख खुली तो देखा कि मूर्य का प्रकाश गड्ढे के अन्दर आ रहा है । अनायने गड्ढेस निकनपर रास्ना पक्डा और फिर राती बदले पत्यर खात हुए आगे कदम बहाया । दापहरवे वक्त उगम धनने? न रह गयी और एक मूमे घामवे मैदानम् जार. लम्बा पड रहा । उसने एव भूगी, किन्तु वम भोगी यूीयो साड को शक्ति विकुल मुंह मे डाला और चबाना चाहा, लेकिन स्वाद इतना कडवा था कि निगल न सका । उसने उसे मुंहसे यूकपर वहुत थू-यूक्यिा, किन्तु मुंहकी कडु वाहट और मनकी अरुचि दूर न हुई। कुछ क्षण बाद मुंहका स्वाद फिर पहले जैसा हुआ, लेकिन भूख फिर अंतडियोको काटने लगी। उसने लकडी लेकर जमीनको खोदा और मिट्टीके नीचेसे पतली जड निकालकर चवाना शुरू किया, पर यह भी कड़वी और दुस्वादु थी, तो भी चवाते वक्त उससे रस निकला, जिसके भीतर जानेसे अनाथ का चित्त कुछ तुष्ट हुआ । वह आंखो को दबा कर चेहरेपर सिकुडन डाले हुए चबाई हुई जडको जोर लगाकर निगल गया । मन खराब नहीं हुआ और जडने जाकर पेटमे स्थान लिया । अनाथकी हिम्मत बढी और उसने और भी कितनी ही जडोको खोदकर खाया । पेटको कुछ आराम मिला । उसको भी कुछ हिम्मत हुई। इस तरह वह फिर आगे रवाना हुआ। आज अनाथने कई बार जड और पानीसे पेटको आराम दिया और शामतक मौकी खोज करता रातमे फिर एक गड्ढेमे पकडकर सो रहा। शामको आसानीसे नीद आयी, लेकिन रातको नीद उचट गयी। उसके पेटमे दर्द होने लगा। उसने के करना चाहा, लेकिन के मे कुछ निकला नही । उसने पानीसे बाहर पड़ी मछलीकी तरह रात वितायी। सूर्योदय के बाद वह फिर गड्ढे से निकला, लेकिन पेटके दर्द और परके फफोलोने उसमे चलनेको शक्ति नही रखी । फफोलोने फूटकर परको घायल बना दिया था। अब उसके सामने दो ही रास्ते थे या तो उसी जगह पडा-पडा भाग्यपर विश्वास कर मरनेकी तैयारी करे, या दिल कडा करके रास्ते-रास्ते करुणामयी माको ढूंढने की कोशिश करे । उसने अपने मनसे कहा ' चाहे मैं यहां पड़ा रहूं या भटकता रहूँ, मेरे भाग्यमे मरना बदा है, लेकिन एक जगह रह कर निराश होकर मरने- की तैयारी करने से अपने लक्ष्य की ओर बढना कही ठीक है।" वह फिर अपनी जगहसे उठा, लेकिन पांच-छ कदम जाकर रास्तेमे गिर पड़ा । पेट और परके दर्द के मारे वह सीधे खडा नही हो सकता था। वह चौपायो की तरह परके पजो, घुटनो और हथेलीको जमीनपर जमाकर आगे बढने लगा। घटा भर इस तरह पशुचारिका करते समय रास्तेके ककड-पत्थरो, कांटो और सूखी खूटियोंने उसकी हथेली और घुटनोको भी लहूलुहान कर दिया, लेकिन तब भी वह अपने रास्तेपर चलता ही रहा । x X X अनाथ चार दिनतक इसी तरह सरकता रहा । मां के मिलनेकी उसे कोई आशा नही रह गयी कि इसी समय उसने अपनी मांको देखा। एक विशाल वयावान था, जिसमे एक वडी रबात (किला- जैसी इमारत) थी। उसीके पास सारा मालोको चरा रही थी । अनाथ माँको देखते ही "मादर-जान" कहकर अपनी सारी शक्ति लगाकर चुम्बकको ओर भागते लोहेकी भांति मांकी ओर दौडा लेकिन, पांच-छ कदम दौडनेके वाद बेहोश होकर जमीनपर गिर पडा । यह बेहोशी शायद भारी हपके कारण हुई, या शायद पेट-दर्द और परकी पीडासे हुई। साराने अपने प्राणप्रिय पुनकी आवाज पहचानी और अपनी लाठीको एक तरफ फैककर दोनो हार्थोको दो तरफ फैलाया और उडनेवाले पक्षीको तरह अपने शावकको और यह कहते हुए दौडी "जानकम् (मेरे प्राणक), जानकि अज़ीज़कम् (मेरे प्राणप्रियक), जानकि शीरीनकम् (मेरे मधुर प्राणक ।" स्नेहमयी मांको गोदमे पहुंचकर उसके गरम और मधुर चुम्बनो द्वारा अनाथ होशमे आया। अपने सूखे हुए ओठो को करुणामयी मौके शर्करिल ओठो से लगाकर उसकी जीभको वह विसे ही पीने लगा, जैसे बचपन में उसके स्तनोको पिया करता था, लेकिन ज्यादा शराब पिये आदमीके एक बार मे ही बडा प्याला भर शराब पी लेने की ५ वह फिर बेहोश हो गया। जैसे ६४ साराने फिर अपने गरम क्रोड और चुम्बनोसे उसे दोबारा होशमे लाकर, उठाकर रवातके भीतर पहुँचाया। रवातके भीतर न बाय था, न उसका वेटा, न बीवियों । साराने दही-रोटीसे अनाथकी भूख दूर की। ९ मां-बेटेने पहले आप-बीती सुनायी। फिर अनाथने पूछा-यह रबात किसकी है? यह रवात एक स्थानीय वायको है । जाडोमे वह अपने गांव चला जाता है। बाय उससे मांगकर इसी जगह ठहरा हुआ है । -और बाय कहाँ है ? -बाकी बचे अपने मालोको इधर लानेके लिए नदी तटपर गया है। --उसकी स्त्रियां कहां हैं ? ----आपसमे लड पडी-कहते हुए साराने लडाईको बातें एक-एक करके कह सुनायी। साराके कथनानुसार एशानकुल वाय अपने मालो और वीबियोको लेकर नदी तटपर पहुंचा । वहां एक नाव थी। बायने अपने ढोर, व्यापार- का सामान, गल्ला-दाना और दूसरी चीजें नावपर चढायी। भार ज्यादा हो गया, इसलिए मल्लाह बाय और उसकी बीवियोको चढानेको तयार न हुआ । वाय स्वय और अपने परिवारके साथ गुपसर (मशक- वाली नाव) द्वारा नदी पार होनेके लिए वाध्य हुआ। उसने अपनी तीनो स्त्रियोको तीन गुप्सरो पर चढाया और स्वय एक गुप्सर पर चढकर अपने बेटे इस्तम् को अपने पीछे सवार करावे बोला- अपनी आंखें मूंदकर दोनो हाथोको मेरी वगलमे डालकर खूब मजबूती से पकड़ ले।" स्वय बाय आगे-आगे और उसकी वीवियाँ पीछे पीछे पानी काटत हुए आगे बढी । नदीके वीचतक गुप्सर ठीक्से आयी, पर जब नदीको तज धारमे . पहुंची, तो लहरोंमें अपनी गुपूसरोंको संभाल न सकी । पहिले बड़ी बीबी, और फिर मझली बीवी गुप्सरसे गिरी और दो-तीन बार गोता खाकर पानी की तीक्षण धारामें लुप्त हो गयौं । बाय सिर्फ सारा तथा इस्तम्के साथ नदीके दूसरे किनारे पहुंच सका। साराने बातको समाप्त करते हुए कहा-इस तरह अब बायको मैं ही अकेली बीबी, अकेली दासी, अकेली चरवाहिन और अकेली खिद- मतगार रह गयी हूँ। -इस्तम क्या हुआ?-~अनाथ ने पूछा। -इस्तम बापके साथ सलामतीसे नदी पार होकर आया, लेकिन इस समय वह यहां नहीं है। वाय उसे अपने साथ ले गया है । वह उसे मेरे पास नहीं छोड़ता । उसको मेरे ऊपर विश्वास नहीं है और डरता है कि कही दुश्मनीरो मैं उसके लड़के को हानि न पहुंचाएं । वायके चरवाहे और नौकर क्या हुए ?--अनाथने पूछा। साराने जवाब देते हुए फिर सारी कथा सुनायी : अमीरके भाग जानेपर गांवके सब बायोने, जिनमे एशानकुल वाय भी था, अपने गांवोंमें जाकर सभी माल-असवाब, गल्ला-दान जमाकर रोटियां पकाकर, भेड़ोंको मार कर कुछ दिनोंके लिए भोजन तैयार किया। फिर उन्होंने अपने चरवाहो, और नौकरोंको भी यह कहकर बहकाया कि अब हमारा देश वाफिरिस्तान हो गया, आओ हम मुसलमानाबाद (मुस्लिम देश) चलें । इसी समय गांवसे बहुत दिनोंका गया एक आदमी पहुंचा। वह वही आदमी था, जो कि मुरादव मुर्देकी खबर लाया और फिर कहीं चला गया था। वह सालमें एक-दो बार बीबी-बच्चोंको देखने गांवमें आता, लेकिन रात बिताकर फिर चला जाता । बाय जिस दिन भागनेके लिए तयार थे, उसी दिन वह आदमी गांवमें आया । उसने गांवके गरीबों, नौकरों और चरवाहोकी जमाफरके क्रान्तिकी बात कही और लोगोको वायोंके विरुद्ध भड़काते हुए कहा : - सोवियत सरकार मजूरों और किसानोंकी सरकार है। यह सरकार ५ - सदा गरीबोकी मदद करती है उन्हें बायोकी दासतासे मुक्त करती है, धरती पानी देती है, औरगरीबोंके पुत्रो, वै-मां बाप वैवस बच्चोको बाल- शालामे रखकर पालन पोषण करती और उन्हे पढाती है, काम और हुनरकी वात सिसला दुनियामें भेजती है । वाय जिनबोलशविको से डरते हैं, वे कौन है । वोलशेविक मजदूरो मे सबसे अग्रगामी व्यक्ति हैं। वह एक पार्टीमे सगठित है। उन्होंने आदमियोको वायो, अमीरो और उनके अमलदारोसे मुक्त करनेश दीडा उठाया है । उन्होंने रूसवे' मजूरोको पूरी तरहसे अपनी ओर करके वहाँ के बादशाह, अमलदारो और मुफ्तखोर बायो (पूजीपतियो) से मुक्त कर दिया है । बोल- शेविकोपी पार्टी मजूरो और किसानोको सरकारका पथ प्रदर्शन करती है । वोलशेविय पार्टीके नेता लेनिन और स्तालिन जैसे दुनियाके अद्वि- तीय बुद्धिमान हैं । वे ऐसे पुरुष हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन जांगर चलानेवाले आदमियोके सुख और सौभाग्यवे लिए अर्पण कर दिया है। उस आदमीने लोगोकी ओर ध्यानसे देखा और जान गया कि लोग उसके एव एक शब्दको अगूरके दानेरी तरह हृदयस्थ कर रहे हैं। उसने फिर कहना शुरू किया वाय लोग कह रहे है "अर हमारा देश फाफिरिस्तान हो गया है।"-वे ऐसी बातें करके तुमयो डराते है, लेविन बोसशेविको योर सोवियत-सरवारवी दृष्टिमे वाफिर और मुसलमान जैसा कोई नहीं है । बोलशेविकोको दृष्टिमे आदमी दो वर्गों में बँटे है याय और गरीय, मुफ्तखोर और मेहनतयश । सोवियत- सरवार दुनियाये सभी मेहनतक्शोको अपना प्रिय पुत्र समझती है। यही कारण है कि उसकी महान क्मवर जनता और उसकी प्रथम सोवि. यत सरवार दुपाराके मेहनतकशोंगी मदद करने आयी और उन्हें अमीरपे जुल्म और अत्याचारसे मुक्त किया, और आगे भी यह हमारी सहायता करनेको तैयार है। सबसे पल शापुलका गोवर एरगम् वेदात, जिसके दा दांत एक मुर्गेरी मृत्युर लिए पत्थर मारपर तोड़ दिए गये थे-मामे ६७ बोलनेके लिए आया और उसने उस जवानकी बातका समर्थन करते हुए कहा -मै १५ सालसे शाकुल वाय-बच्चाको खिदमत पर रहा हूँ, लेकिन कभी पेट भर रोटी नहीं पायी कभी नया कपडा नही पहना । इन सारी मुफ्तकी सेवाओके बदले उसने पत्थर मारा और मेरे अगने दोनो दांतोको तोड दिया। पहले मुझे लोग एरगश कहते थे, लेकिन पीछे बायको कृपासे मेरा नाम परगश वेदात पड गया। जवानने एरंगशके बाद फिर अपनी बात शुरू की -यदि शाकुलने तेरी खिदमतके लिए एक पत्थर देकर तेरे दो दांत तोड दिए तो उसने एशानकुनके हुकुमसे एव गोली मारकर मुरादको दुनियासे खतम कर दिया और उसकी स्त्रीको दासी और बेटेको अनाथ बना दिया। आदमी जवानकी इस वातको सुनकर चिल्लाने लगे। अभी तक लोग सदेह ही करते थे कि एशानकुल बायने मुरादको मरवाया है लेकिन किसीने इस बातको खुलकर कहते नहीं सुना था। यह खवर सारा पास भी पहुंची और उसने अपने प्रिय पति के हत्यारे खूनखर (खूखार) शाकुल और भेडिये एशानकुलको साफ तौर से जान लिया। इस सभाके बाद लोगोको इतना गुस्सा आ गया कि यदि उनो पास हथियार होते तो वे भागने के लिए तैयार बायोको मारकर उनकी सारी चीजें छीन लेते । अफसोस कि उनके पास कुदाल फावडे के सिवा और कोई हथियार नहीं था, और बायोमके हर एकके पास दो दो तीन-तीनपंचगोलिया बन्दूकें थी। गांवके मेहनतकशोंमेसे कोई बायो- की बात नहीं आया और न उनके पीछे गांव छोडनके लिए तैयार हुआ ! साराने भागनेके दिनकी बात परते हुए कहा-पही कारण हुआ कि एशानकुल बायवे नौकर और चरवाहे भी दूसरे मेहनतकशो के साथ सोवियत सरकारके पक्षपाती हो गए और बायवे पीछे नहीं आए । मैं भी आना नहीं चाहती थी, लेकिन वायने एक कदम भी मुझे अपनेसे दूर हटने नहीं दिया। गर्दनमे बन्दुक, पमरमे तलवार और हाथमे तमचा लिए मुझे आगे आगे गुप्सर पर सवार कराया और दूसरी बीवियोको स्वतन्त्र छोडकर मेरी गुप्सरकी रस्सीको अपने हाथमे पकडे रहा। -उस आदमीवा क्या नाम था, जो कि बायोके विरुद्ध खडा 7 हुआ क्या वह हमारी जान-पहिचानका नहीं है ?-अनाथने सवाल किया। -ने तू उसे नहीं पहचानता । वह गांवमे कम आया करता है। शायद तूने उसे कभी देखा भी न हो--साराने जरा दम लेकर एका- एक कहा-एय, नही जानता कुर्बान नामके बच्चेको ? - हां हां, उसे मैं जानता हूं--अनाथने मांकी बात काटकर कहा-वह बहुत अच्छा लडवा है । मैं उसे "अका पुर्बान" (कुर्बान भाई) कहता था । पर भूमिमे भेडोको संभालना जव मुश्किल हो जाता था तो वह मेरी मदद करता था । –ठीय है---साराने पहा-मैंने जिस आदमीका जिक्र किया, वह इसी कुर्वानवा का रूजीमुराद है । -अब मुझे याद आया, मैंने एप बार उसे देखा था । पुर्बान ने मुझे वतनाया था कि यह मेरा बाप है, वितु मुझे विश्वास नही हुआ था। वह लडकेकी तरह जान पडता था, यद्यपि पद लम्बा था। लेकिन दाढी नही थी और मूछ भी कम-कम थी। -उसकी उमर तीसरी ज्यादा है, लेक्नि दाढी नहीं रखता, इस. लिए लडका-जैसा मानूम होता है। --ठीय है-अनाथने पहा । साराने वात समाप्त परते हुए वहा- यदि मेरे पीछे न आया होता, तो अच्छा होता । यदि तू यहाँ रह गया होता तो जसा पि, रजी मुरादने यहा, वोलविव तुपे यालशालामे रखर लिया पढ़ापर आदमी या देते अगर जिगी रहती, सो हम फिर एक दूसरे से मिल जाते ।
मांकी इस बात के सुननेके वाद अनाथपी इच्छा होने लगी कि वह लौटकर बोलशेविकोके देश अर्थात् अपने देशमे जाये और बालशालामे रहकर भादमी बने, लेकिन उमर छोटी होनेसे इस विचारको कार्यरूपमै परिणित करना सम्भव नहीं था। १० रूजीमुरादने मुरादको हत्याके बारेमे जो-कुछ साधारण सभामे कहा था, उसके अनुसार उस दिन सबेरे ही मुराद अपने घरसे निकलकर एशानकुल बायकी हवेलीमे गया और वहाँसे भेडोयो चरानेके लिए घर हांक ले गया । अभी वे पेट भी न चर पायी थी कि उत्तरकी ओरसे ह्या हुई और थोड़ी देर बाद उत्तर-पूरब दिशासे काल मेघ छाने लगे। फिर बिजलीवी कडक हुई और मूसलाधार वर्षा होने लगी। परस्पर- विरोधी हवाएं चारो ओरसे आकर मिली और घास, तण और दूसरी चीजोको नचाते हुए बासमानकी ओर लेजाने लगी । इस बवण्डर ने हलकी जडवाली घासोको भी उखाड कर आसमानकी ओर फेंक दिया। देखनेवालोको मालूम होता था कि भूमिसे आकाश तक हवा, मिट्टी और तिनको-पत्तियोका मौनार बनाया गया है। बहुत समय नहीं बीता कि सारा बयावान ऐसे बवन्डरो से भर गया। परिस्थिति इतनी तेजीसे बदली कि मुराद अपनी भेडोको लेकर भाग न सका । वह किकर्तव्यविमूढ हो गया। उसने समझ लिया, फि भेडे भाग गयी हैं, लेकिन किधर भागी, इसका उसे ज्ञान न हो सका, क्योकि उस मांधीमे आँख खोलना मुश्किल था। एक घटा अधोकी तरह इधर- उधर धावनेके बाद, आंखोको हाथसे मूंदकर वह एक जगह बैठ गया और आँधीके थमनेकी प्रतीक्षा करने लगा । आंधी थमते-थमते उत्तर-पश्चिमी हवा-वर्षा ले आयो और वर्षाने उड़ती धूलको नीचे बैठाना शुरू कर दिया।
७० अभी भी हवा बिलकुल बद न हुई थी लेकिन आंख खोलकर चारा तरफ देखा जा सकता था। मुरादने ढंढते ढूंढते कितने ही समय बाद अधिवाश भेडो को शर वन (सरक डके घन) म पाया। भरें वहा भी आरामसे खडी नही थी, बल्कि कीचड पानीमे इधर उधर गिरती पडती दौड रही थी। मुराद को इसका कारण जल्दी ही मालूम हो गया । वहा एक भेडिया एक भडको चीरकर खा रहा था। भड वर्षासे भगा कीचडमे गिरा की बहावतके अनुसार आधीसे भागकर भडिएके चगुलमे जा पंसी थी । मुरादको कुछ समझम नहा आ रहा था कि क्या परे । उसके पास हथियार नहीं था कि भडियेसे लडता । हायम सिफ चरवाहोकी लाठी थी जो भडिएसे लडने क लिए बेवार थी । यदि वह उस हथियारसे भडियेपर आक्रमण करता तो भडिया उसे फाडवर पा जाता। इसी समय मुरादने शाकुलको गावकी ओरसे आते देखा । वह पीठ पर बदूव लटकाए घाडा दौडाए मारहा था। घोडा जब शर वनवे नजदीक पहुंचा तो उसका पैर कीचडम पडा और वह जमीनपर गिर पडा । घोडेको गिरते देखकर शाकुल उरावे ऊपरसे छलांग मारकर गड्ढ़ के दूसरी ओर पहुंच गया । शाकुलने बहुत काशिश की कि घोडको दलदलस निकाले, लेकिन असफल रहा। घोडा जितनाही अपनेको निकालनेवी कोशिश करता, उतना ही कीचडमे धंसता जाता । शाकुलने अपनी सारी शक्ति लगावर पूरी कोशिश की, पसीन-पसीने हो गया आर अतम यककर किनारे बैठ गया । मुराद देख रहा था। वह शाकुलको सहायतारे लिए दौड़ा। उसने घोडेके सामने झुककर उस परयो दलदलके किनारे रपा और फिर उसर सीनग रस्सी सगावर जोर लगाया। धाडेने अपने अगर पैरामो पीपहरा निकाल लिया। मुराद इसी समय जोर लगाकरपोडेको विनारे वी ओर यीचने लगा। जब पोडये दो पैर सूखम पड गए तो उसन यस सगावर अपनेवो दसदलसे याहर पर निया।
शाकुल यह सब देख रहा था । मुरादकी तारतको देखकर उसे अच- रज हुआ और बाहरसे शाबाश वहनेपर भी वह दिलमे सोचने लगा, मैं इस आदमीका मुकाबिला नहीं कर सकता। यदि आमने सामने मुकाविला हो तो वह पीसकर मेरा भुर्ता बना देगा।' शाकुलने घोडेको लेकर शर वनके पास आकर दा रोटियो को निकालकर मुरादको दिया और उससे आँधीके बारम पूछ । मुराद आजकी दौड धूपसे बहुत थका और भूखा था । उसने रोटीको मुंहसे काटते हुए आंधी और भडियके एक भड खानेकी बात यही । शाकुलये पूछनेपर मुरादने उस जगहको भी बतला दिया, जहाँ भेडिया भेडको खा रहा था। शाकुन बदूक हाथमे ले उस तरफ सरकने लगा और उसने भेडियेको देखकर लेटे ही लेटे बदूक दागी। इधर बदूव से धुआ निकला और उधर भेडिया अघखायी भेडके पास गिरकर छटपटाने लगा। भेडे अब भी भडियेके डरके मारे घबडाई हुई थी । वदूककी आवाज सुनकर वह और विदककर चारा ओर भागने लगी। मुरादने उन्हे शान्त कर पार वनसे निकालनेकी कोशिश की, किन्तु शाकुलने उससे कहा -व्यर्थ कोशिश न कर । अब वह अपने आप ही शान्त हो जायेंगी। इस समय उन्हें यही छोडकर मेरे साथ नदीपरा । तू वहाँ अपनी रोटीको भिगोकर खाना और मैं तीतरका शिकार करूंगा । तूने आज मेरी सेवा की है, उसके लिए मै तुझ तीतर भेंट करना चाहता हूँ । तू उसे घर ले जा कबाब बनाकर बीबी-बच्चे के साथ खाना। हमारे लौटनेतर भेडे भी शान्त हो जायेंगी। मुरादने शाकुलकी सलाह मान ली । शाकुलने अपने घोडेको शर वाके पास छानकर चरनेको छोड दिया और दोनो नदीकी ओर गए । वर्षा बहुत कम रह गयी थी, लेकिन आजकी आंधी बवडर और वा- के कारण बयाबानमे कोई प्राणी दिसलायी नहीं पड़ता था। तो भी शाकुल रास्ता चलते वक्त चारो ओर नजर डाल रहा था । मुरादने उसकी चेष्टापर आश्चर्य करते हुए पूछा .
७२ -क्या किसी आदमी या चीजकी प्रतीक्षा है, जो इधर-उधर देख रहे हो? -ने, मुझे किसी बातका ख्याल नहीं है। मैं अपने जीवनमे कभी ऐसी बातोकोरयालमे भी नही लाता । न मैं किसीसे डरा और न डरूंगा। देख रहा हूँ कि कही कोई शिकार तो नही–शाकुलने जवाब दिया । इस तरहके दिनमे बयावानमे शिकार नही दिखलायी देते । सभी आंधी-पानीसे भाग गए हैं । -शायद आंधी-पानीसे भागकर वे हमारी तरफ आ जायें । मुराद और शाकुल जाकर नदी किनारे बैठे । मुराद रोटी खाने लगा और शाकुल अपनी बदूकको इधर-उधरसे देखते हुए आवेटकी तारीफ करने लगा। -आखेट या शिकारको ग्ला बहुत ही अच्छी चीज है। शिकारी प्रतिदिन ताजा स्वादिष्ट मांस खाता है । लोमड़ी और हरिन जैसे जानवरो के चमडो के वेचनेसे उसका पीसा सदा पैसे भरा रहता है; सियार और भेड़िये-जैसे हिंस्र पशुओको मारकर वह पशुओ और आदमियो को उनके धगुलसे बचाता है। यदि मैं उस भेड़ियेको नही मारता तो अब तक वह सभी भेड़ोको फाड़ डालता और शायद तुझे भी हानि पहुंचा चुका होता। शाकुलने खड़े होकर चारो ओर नजर दौड़ाई और फिर बैठकर डीगने लगा: -मैं खुद एक अच्छा शिकारी हूँ। यदि बुलबुलको आँपपर निशाना लगाऊँ, तो भी गोली याली न जाए । शाकुल थोड़ा चुप रहकर पंदूपती नलीको देखते हुए फिर कहने लगा: लेकिन मैंने इस हुनरपर मासानीसे अधिकार नहीं पाया। यहतमम्यारा किया, बहुत-सा गोला-बारूद नष्ट रिया, तब कही जाकर अच्छा
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(सेठानी) बनकर बैठी । घरका सारा काम, पशुओको देख भाल 3 भेडो का चराना साराके ऊपर था, जिसमे अनाथ भी मौकी मदद क- था। वायने एप नयी रहस्यपूण जिंदगी शुरू की। वह शाकुल और अ लडके इस्तम्को साथ लेकर, आधी रातको घोडेपर सवार होकर रबाद निकल जाता और कुछ दिन गायव रह फिर आधी रातवो रवातमे पहुँचता । जय बाय रवातम रहता तो उसके पास रातवो बडी पागव आदमी आत । य आदमी बदूक, तमचे और कारतूसोसे भरे खलीते ला वायको देते और वह उन्ह नियोनाय (जार) के सोने चांदीके सिक और अफगानी रुपये देता। जब रबातम इस तरहके वहुत-से हथियार जमा हो जाते, तो वा शाकुल और अपने वेटेके साथ तमचो और कारतूसाको खुजियोमे रख और बदूकोको लोइयोम लपेटता। फिर उन सभी चीजोवो तीनो घोडो रखकर सवार होकर हाथमे वर्षे लिए दोना आधी रातको रबात रवाना होते और कुछ दिनोके बाद फिर लौट आते, लेकिन लौटते व उनकी खुरजियाँ खाली होती। पासम भी बदूक न होती। अनाथ सारी बातोको देखता, लेकिन भेद न समझ पानसे चकि होता। एक बार उसने इसक बारम मासे पूछा । साराने जवाब दिया- हथियार बेचना इस देशम फायदवा रोजगार है । जान पडता है या हथियारा की सौदागिरी करन लगा है। इसी बीच एक एसी बात हुई, जिससे अनाथको गुप्त रहस्यक पता लग गया। एक दिन अनाथ शाम क बाद अपनी मांके सा भेडोको चरागाहसे लोटा कर लाया था। सारा रवातके भीतर चल गयी और मनाथ भडोको हांककर भडखाने म ल गया । पिर पासम घास और तणको बराबर रखे अपने लिए सोनेकी जगह बनायी और यही पालथा मारवर वठ गया। एक घट याद वायके पुन इस्तम् एक कटोरा पानी और एष टुपडा सूयी रोटी लाकर अनापको व्यालूके लिए दी। अनाथ पानी मे भिगोबर रोटी खानेके बाद सोनेके लिए पड रहा, लेकिन उसे नीद नही आयी । गर्मी थी और घास तिनका उसके शरीरमे गड रहा था। साथ ही बडे बडे मच्छरोने भी आक्रमण कर दिया था। जहां वे काट लेत उस जगह चक्ता पड जाता। कान पडता घावमे नमक डाल दिया गया है। खुजली भी बहुत होती। खुज' लानपर और भी अधिक पीडा होती। आधी रात हो गयी, लेकिन अब भी अनाथको नीद नहीं आयी। इसी समय किसीने रवातके फाटकबा तक्तत् किया, जिसे सुनकर शाकुलने भीतरसे आकर दरवाजेको खोल दिया। दो सवार भीतर आकर घोडेसे उतरे । शाकुलने उनके घोडोको एक एक करके लेजाकर दीवारमे खूटोम बाध दिया और खुद उन्ह चबूतरेके पास जाकर बैठाया। फिर चिराग और विछीना लाने तथा वायवो खबर देनक लिए भीतर चला गया। कुछ क्षणोक बाद हाथम चिराग लिए चाय भी भीतरसे आया । शाबुलने शाल लेाकर चबूतरेके विछोन पर विछा दिया। वायने दीपकका बीचम रखकर मेहमानासे कुशल-क्षेम पूछा। सभी चिरागके चारा ओर बैठ गये । अनाथ चिरागपी रोशनीम नवागन्तुकोकी आर एव एक करके देखने लगा। पोशाक और रग रूपमे वह स्थानीय लोगो-जैसे न ध । उनके शिरोपर वैसे बडे-बडे पगगड नहीं थे, जैसे रातको प्राय मानवालोके होते थे । उनकी शक्ल सूरत नदी (वक्षु) की दूसरी तरफ्के लोगा- जैसी थी। पातचीत शुरू हुई। उनकी भाषा नदीके उस पार-जैसी थी। वही जिस लेकर अनाथ पंदा हुआ और वढा था। उनकी बातमे बारबार हिसार, रेगर, कूताश, कवादियान, देहनी और तिरमिज जैस रामनो (परगनो) और गाँववे नाम आते थे। यह सभी नदी के उस पार अवस्थित य । बातके वोचम कई नाम आते थे, जिन्हे अनायन पहले नही सुना था। नो नाम अधिक आते थे, उनम कुछ ये इशाहीम चैक, भाषा, फुजेल मखमूम, एशान सुल्तान, अनवर पाशा, जब्बार खुजाइन, दौलत- मदबी और कूर शेरमत । वातोके वीचमे वासमची' और कूरबाशी (वासमचियोके सरदार) के शब्द प्राय. आते थे । अनाथने उनके मुंहसे बोलशेविक शब्द भी सुना । उसने इस शब्दको मांके मुंहसे भी एक-दो बार सुना था। मैंने बोलशेविकोकी तारीफ रूजीमुरादका भाषण सुनाते समयकी थी, लेकिन आज रातके मेहमान बोलशेविकोको सिर्फ गालियां दे रहे थे। उनके सारे वार्तालापको सुनकर अनाथ सिर्फ इतना ही समझ सका कि नदीकी उस तरफ बोलशेविकोने मजूरो और किसानोको सरकार कायम की है । उस सरकारने मगो, भूखो, गरीबो, नौकरो, घरवाहो, कटाईनार, किसानो और खिदमतगारोको अपनी तरफ कर लिया है, उनके बीच धरती पानीको वांट दिया है, और वाय-एशान ( गुरु), मुल्ला और अमीरके अमलदारोका शामत गरीबोके ऊपरसे दूर कर दिया। बायो, सूदखोरो, एशानो (गुरुओ), अमीरके अमलदारो और मुल्लोने वोलशेविको और मजूर-किसान-सरकारके विरुद्ध सेना सगठित की है, जिसे उन्होंने बासमची नाम दिया है । इन्ही वासमचियोके सरकार बाय और सूदखोर आदि बने है । उनका उद्देश्य है मजूर-किसान-सरकार को नष्ट करना, गरीवोंको फिर वायोका गुलाम बनाना और अमीरको फरसे तख्तपर बैठाकर उसे बादशाह बनाना। एसानकुल वायने अपने मेहमानोसे बात करते हुए कहा-यास- मचियोने स्वयं अपना नाम बासमची नहीं रखा, क्योकि इसका अर्थ चोर-डाकू है और लोग चोर-डाकुओसे घृणा करते हैं। उनका सबसे अच्छा नाम अनवर पाशा ने दिया, वह है "इस्लामकी सेना" और उसने स्वय "इस्लाम सेनाका अमीर" की उपाधि धारण की है। वायके वासमचियोंके कामकी योजनाके बारेमे कहा-वासमचियोको १. क्रान्ति-विरोधी धर्म-युद्धके योद्धा डाकू।
७७ सिर्फ मजूर किसान-सरकारको रास्तेसे निकालना या बोलशेविकोको खत्म करना या बोलशेविको या मजूर-किसान-सरकारको सहायता करनेवालो को पकडकर मारना ही नहीं है, बल्कि जो कोई भी गरीब नौकर या चरवाहे हाथ लग जायें, उन्हे बिना किसी मुलाहिजेके मार डालना है, क्योंकि वोलशेविको और किसान-सरकार की जड मजबूत करनेवाले ये ही लोग हैं। यदि मजूर और गरीब न होते तो न बोलशेविक मैदानमे भाते, न मजूर किसान सरकार ही सामने आती। महमानोमसे एकने वहा–अवतर तो गरीबो और उनकी बीवी- वच्चोको मारनेम हमारा पैर कभी नहीं लडखडाया न हाथ ही कंपा। हम प्राय लालसैनाकी पोशाक पहनकर जाते, गांवोको जलाते और गरीबो को मारते हैं । इस तरह हम एय तीरसे दो शिकार करते है, एक ओर गरीबाका विनाश करत हैं और दूसरी ओर लोगोफे भीतर बोलशेविको और लालसेना विरुद्ध घृणा पैदा करते हैं।" सामने रखे भोजनको खा लेनेके बाद मेहमान चलनेको तैयार हुए । शाकुल अन्दरसे कुछ बदू, तमचे और कारतूस ले आया। तमचो को उसने मेहमानोकी खुरजीमे डाल दिया और वदूवोको लोईमे लपेटवर रस्सीसे बांध उनके हाथमे दे दिया। चलते वक्त एक मेहमानने बायकी ओर निगाह करके कहा-अपने घर-बार, धरती जमीन छोडकर दूसरे देशोंमे मारे मारे फिरने वाले बायो वा कर्तव्य है वि बासमचियोकी हर प्रकारसे सहायता करें। जो चीज भी उनके पास है, उसे और शरीरके वस्त्र तकको बैंचकर उसके पैसेसे हथियार खरीदवर बासमचियो को दें। जब हम विजय प्राप्त कर लेंगे, तो बायोको फिर धरती पानी, माल- असबाब और नौकर चाकर मिल जायेंगे, और जो वह खर्च कर रहे हैं, उसवा दशगुना-सौगुना होकर उन्हें मिलेगा। - हम इस रास्तेमे सिर्फ अपने माल असबाबको ही नहीं, बल्कि आवश्यक्ता पडनेपर अपने प्राणको भी न्यौछावर कर देंगे। इसी बीच तमचा छूटनेको आवाज आयी और वाय "हाय मरा" ७८ कहते हुए जमीनपर गिर पडा । मेहमान और शाकुल हँस पडे । पता लगा कि एक मेहमानने अपने तमचेको भरा है या पाली, यह जांचनेके लिए हवामे छोडा था। तमचा भरा था । उस मेहमानने खुरजी मेम नया कारतूस निकालवर तमचेमे भरा हुआ था। वे लोग अपने-अपने घोडेपर सवार होकर रवातसे बाहर निकल गये। वाय उसी तरह वेहोश लेटा रहा। अनाथ छिपी जगहसे इस सारे वार्तालापको सुनता रहा और अपने मनमे सोचने लगा--जिस सयम में अपने वतनको लौटूंगा, मेरा सबसे पला वाम होगा, बायोको परडकर मजूर किसान सरकारके हाथ में सौपना, क्योवि यही बासमचियोको हथियारयन्दप र गरीबो और चाकरो- को मरवाते हैं। १२ दो साल बीत गये । नदीपारसे लायी एशानदुल बायकी भेडोरी सख्या बहुत कम हो गयी। उसपी अधियाश भेडे रवात बनाओ, व्याह परने और पासवर बासमचियोवो हथियारबंद करनेमे खर्च हो गयी । बायने देखा कि वायी वची भेडोवो सारा अमेगी चरा सकती है, इम- लिए आथियो हर रोज एक नयी रोटी देना भी व्यर्थ है । यस, तो उसने एप दिन सूर्योदय होने पहले ही अनाथको रवातसे बाहर परत हुए पहा--जहाँ जाना चाहे जा, तेरे खिलाने के लिए मेरे पास पज़लयी रोटी नहीं है। साराने अनाथो गभी पटे-पुराने सत्तोको सारर उसे पहनाया और एप सतेमे एर रोटी लपेटार उसो हायम दो । फिर येरेयो अबम भरपर रो। लगो । यपने आंसुओसे उसरे गालोको भिगोनेने याद या पोटजी हुई योती : बेटा इरादेमि अधिक माग मारान पिर, जमे भी हो सरे, नदी पार हा अपने यााको पता ना, यहाँ यासवासा प्राण, को ढूंढना। वहां लोग पढ़ा-लिपाकर वडा परेंगे। दुखी मत हो, मेरे यदि मौतने छुट्टी दी, तो मैं भी तेरे पीछे आ जाऊंगी। अनाथने नगे पर पैदल रास्ता पकहा और जबतक रवात आंपोंसे ओझल न हो गयी, तबतक पग-पगपर एक्बार घूमकर रवातके पास खडी अपनी वरुणामयी मांकी और देखता रहा। फिर रोकर आंखोको पोछ- कर, न चाहते हुए भी पग आगे बढाता रहा। यह वियोग अनाथके लिए बहुत ही असह्य था। यह एष ऐमे व्यक्तिरी अलग हो रहा था, जो उससे प्रेम करता, उसके नाज उठाता और कठिनाई के वक्त उसे तसल्ली देता था। कितनी ही बार उसके दिलमे आया कि लौट जाए और मौके पास रहे, लेकिन उसने सोचा, यह संभव नही, क्योकि मालिक अपनी रलातमे जगह नहीं देगा। फिर वह कहाँ सोएगा और क्या खाएगा? माँकी अवस्था अनाथसे भी बुरी थी। यह अपनी आँपोंसे देय रही थी, कि उसका प्राणप्रिय पुन सदावे लिए उससे अलग हो रहा है, लेकिन वह उसे अपने पास रख नहीं सकती थी। वह अपनी आँखो देख रही थी कि उसका प्राण शरीर से निकल रहा है, लेकिन वह उस अपने शरीरमे रखनेयी पाक्ति नहीं रखती थी। साराकी बहुत इच्छा हुई कि बायकी रवातको छोडकर पुत्र के साथ चली जाय, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई, क्योकि वह जानती थी, कि यदि बाप देख लेगा, तो उसे जानेसे रोकेगा ही नहीं बल्बि मार-मारकर मुर्दा बना देगा । इसलिये उसने अपने संकल्पको अनुकूल अवसर के लिए ग्य छोडा। साराने अनायवी ओरसे अपने आंखोको नहीं फेरा । अनाथ जितनी ही दूर होता गया , उतना ही उसकी आँखोमे अंधेरा छाता गया । मतमे अनाथ उसकी आँखो से ओझल होगया-साराका सूर्य डूब गया और दुनिया उसे अंधेरी दिखायी देने लगी। "वदमाश ! श्यो यहाँ मुल्ली की तरह खड़ी है । दिन हो गया और अभीतक भेड़ो को चराने नहीं ले गयो ?" इन शब्दो को सुनकर सारा- - ने आँस खोतकर देखा कि बाय उसे गाली दे रहा है और सूर्य भी माला बराबर ऊपर उठ आया है । साराने डरग पिते-कांपते बायकी भेडोको चरानके लिए निविन उसका सारा ध्यान पुनरी ओर लगा रहा। वह सदा इसी विचार म रहती कि कैसे चाय के घरस नियन भागे। बायको भी साराय विचारो की गध लग गयी थी। उसने अपन पुत्रको-जो कि बर सयाना हो गया था-साराक ऊपर रखवालीये लिए छोड दिया और इसीलिये उसे घरसे दूर या साथ भी न ले जाता। इस्तमकी नजर सदा सारापर रहती। X X अनाथ चलता रहा था लेपिन कहां जा रहा है यह उसे मालूम न था । अपो दिलम उसने निश्चय कर लिया था कि नदी तटपर पहुंच वहासे जल्दी ही अपने वता चना जाऊंगा लेकिन उसे यह भी मालूम न था कि वह रास्ता नदी-तटपर जाता है कि नहीं। दी किनारेका ध्यान करके वह पहाडोके किनारे विनारे मैदानोके उपर-उपर, दरों पड्ढो और नालोसे होकर गुजरने लगा । जर थर जाता तो पातीके किनारे बैठकर आराम करता और रोटीके एक टुकडेयो भिगोकर पाता । इसके याद फिर चलना शुरु करता । दिन बीत गया। सूय डूब गया। दुनियाम अधकार छा गया। आय एक झापडे के पास पहुँचा और सोनेके विचारसे उसके अन्दर चला गया। शोपडे के मदर एक ओर बारी बंधी थी जिसवा दूध उसमा वच्चा पी रहा था। दूसरी ओर दो स्त्री पुरुप बामने सामने बैठे रोटी-दही खा रहे थे। मदने अनायसे उसके यहाँ आका कारण पूछा। - नदीके उस पारका एव मुसाफिर हूं। मां गुम हो गयी है, उसीको ढूंढता फिर रहा हूँ और आज रात बितानेके लिए यहां आया हूँ--यह कहते हुए अनाथने अपने दिलमे कहा-"यह बात झूठी नही है । यद्यपि मैं अपनी जननी-माताको नहीं ढूंढ रहा हूं, तो भी उस माँको ढूंढ रहा हूं, जिसने मुझे अपनी गोदमे पाला-पोसा जरूर है, वह मां मेरा देश है, और ऐसा देश है जो अब बस्तुत गरीबो और चाकरोका देश हो गया है।" "बहुत अच्छा" मर्दने कहा और मेहरीने दस्तरखानके पास बैठाकर उसे भी रोटी-दही खानेको दी । खाना खतम कर लेनेपर मेहरीने उसे एक तरफ सुला दिया। सवेरे तडके ही अनाथ उठकर हाथ मुंह धोकर चलने के लिए तैयार हुआ, लेकिन, स्त्रीने विना कुछ खिलाए-पिलाए नहीं जाने दिया। उसने उसे दूधमे रोटी तोडकर खिलाई और फिर एक रोटी रास्तेके लिए देकर विदा दिया। अनाथ चलनेके लिए अपनी जगहसे उठा, लेकिन कदम रखने पर मालूम हुमा कि पैरोमे कष्ट है । स्त्रीने उसे रोककर उसके परके तलवोको देखा। वहाँ फफोले पड़े हुए थे और उनमेसे कुछ फटकर रिस रहे थे। "ऐसे परोसे तू सौ पग भी नहीं चल सकता"---औरतने कहा और उसे बैठाकर पुराने लते और लोईके टुकडोको जूतेकी तरह पैरोंमे मज- बूतीसे बांध दिया। फिर, "अब जा, भगवान तेरी रक्षा करें", कहकर बिदा दिया। अनाथ अपनी यात्राके दूसरे दिन उस भली औरतकी दी हुई रोटी- को खाकर शामतक चलता रहा। उसे एक अधिक आवाद गांव मिला। गांव के भीतर घुसते ही एक वडा दरवाजा था, जिसके भीतर एक बड़ी हवेली थी । हवेलीवे सामने भेड़ें और काने माल (ढोर) भरे हुए थे। एक आदमीने अनायकी पिछली रातवाली यात को सुनकर जवाब दिया-यहाँ मुसाफिरवे लिए जगह नही है--फिर सन्देह की दृष्टिसे . देखने लगा।
८२ अनाथने उसके सदेहको दूर करते हुए कहा-इतनी बडी हवेली है। इसमे इतने अधिक पशु रह रहे है। क्या यहाँ एक चौदह साला बच्चेके लिए एक ओर सिर रखने का भी स्थान नहीं है । मैं समझता हूँ कि आप मुझे चोर समझ रहे है । यदि मैं चोर होऊँ भी, तो इस उम्र और इस हालत मे मुझसे क्या बन सकता है ? मर्दने कुछ लज्जित होकर आँखसे इशारा करके वहा-"जा, वहाँ सो जा ।" रात बीत गयी । सबेरे तडके अनाथ चलने के लिए उठ खडा हुआ। आदमीको वह कुछ अच्छे स्वभावका मालूम हुआ। उसने उससे फायदा उठाने के लिए कहा-तू थका-सा मालूम होता है, कुछ दिन मेरे घरमै ठहर । मेरा चरवाहा वीमार हो गया है । जबतक वह ठीय होकर न आ जाये तू मेरी भेडोको चराता रह । अनाथको यह बात पसन्द आयी। दो दिनकी यात्रासे वह बहुत थक गया था । सोचने जगा, कुछ दिन इस आदमीवी चरवाही करूं और खानेके लिए जो रोटी मिले, उसमे से एक भाग बचा-बचाकर रखता जाऊ । जब कुछ दिनोके लिए आहार जमा हो जाय तो चल दूंगा और इस प्रकार, घास खावर वीमार हुए विना, नदी-तटपर पहुंच जाऊँगा। नदी पार तो मेरा प्रिय देश है ही। यह सोचकर “मैलश, रहूँगा," उसने जवाब दिया। गृहपतिने भेडखानेके पास एक छोटी कोठरिया अनाथवे रहने लिए दे दी। अनाथ अब नए मालिक घर सवेरेसे शामतक चरवाही करता। मालिर उसके पानेको प्रतिदिन एक रोटी और एक टुपडा (पनीर) देता । अनाथ पनीरखो विलकुल नहीं खाता और रोटीमेसे आधा ही खासर बाकी पनीर और रोटीनी मां के लिए लतमे यांधकर योठरी में जमा करता जाता। दसवें दिन अनायने कोठरीरो जाबर देगा, तो सता पाली था और दस दिनी जमा की हुई रोटा और पनीरका कही पता न था। उसने मानिपसे पूण ता उसने कहा तभी भारी तेरी कोठरीम गयी थी। पनीर रोटी को देखकर सभया कि वह खराब हो जायगी इसलिए उठा न भायी। अनाथने कुछ नहीं कहा लेविन दिनम सोचा कि अब पनीर और रोटीको जमाकरके ऐसी जगह छिपाऊँ जहाँ वे कोई पा न सके । उस दिन मालिक्न पनीर न देकर सिप आधी रोटी देते हुए कहा तू बहुत अच्छा लडका है। भ जन कम खाता है और वारकरला कहकर प्रगासा भी की। अनाथ अब दूसरी तरहसे सोचन नगा और उसने मौका पाकर मालिककी दो नीन रोटी चुराकर भागनेका निश्चय किया । तो उपयुक्त अवसरकी आशाम अनाथ चरवाही करता रहा । बहुत दिन नहीं बीते कि उसे ऐसा अवसर मित्र भी गया। अनाथ एक दिन शामका भडोकी घर ले आया। उसन देखा कि मालिक घरपर नहीं है और उसका घोडा भी नहीं है। उसन समझा कि वह कही दूर गया है । भडोको ढोरखानेम पहुंचा कर वह घर के भीतर गया। चिराग जन रहा था बच्चे सो रहे थे लकिन मालकिन नहा थी। उसने इधर-उधर नजर दौडायी लेकिन मालक्निका पता नही लगा। पडोसिनके घरकी और खुलनेवाली खिडकीसे बात-चीत होती सुनापी दी। अनाथने कान लगा कर सुना तो देखा मालकिन पडोसिनके साथ गप लडा रही हैं। अब मौका मिल गया सोववर अनाथ घरव भीतर इधर उधर ढूढने लगा । कोठपर गददेव नीचे एक लाडीका सदुक देखा। सदूक रोटियोसे भरा हुआ था। वह पाच दिनको यात्रारे लिए पांच रोटिया लेकर कमरेसे बाहर निकता : ओसारेम छोकापर अघसूखे पनीरचे टुकड रखे देखे । उनम से दस टकह कर रोटीपर रखे अपनी कोठरीमे जाकर रोटी और पीरको लम बांधा, अपनी पुरानी पोशाक पहनी और चरवाहेकी लाठी लेकर रोटीको वगलमे दवा कर रास्ता लिया। अभी बह गांवसे बहुत दूर नहीं गया था कि एक सवार आ गया। सवार ने पूछा-हाँ, खैर यहां जा रहा है ? आवाजसे अनाथने पहचान लिया कि यह उसका नया मालिक है। उसने कांपती हुई आवाजमे उत्तर दिया-कहो नहीं, ऐसे टहलने आया था। -टहलनेके लिए ? पूरे दिन दहलकर नही अघाया-कहत हुए मालिक घोडेसे उतर पड़ा और उसकी वगलसे पोटलीको छीनकर देखा। "नही खाऊँगा, नही खाऊंगा, मेरा भोजन टोक्रोमे रख दो' कह न, खाने-न साने की बातकर पांच रोटियां और दस टुकडा पनीर एक ही साथ खाना चाहता है, क्यो? अनाथ कुछ नही वोला । मालिकने पोटलीको उसके हाथम देकर, घोडेपर सवार होकर, "आगे आगे चल" कहा । अनाथ मालिक- के आगे-आगे गांवकी और चला। दरवाजेके पास जाकर उसने घरके भीतर जाना चाहा, किन्तु मालिकने कहा-'अब मेरे घरमे तेरे लिए जगह नही, अपना रास्ता नाप ।" अनाथ चलने लगा, लेकिन मालिक भी उसके पीछे पीछे हो लिया। तीन चार मील चलनेके बाद वह एक मकानके पास पहुंचे। वहां दरवाजेपर बन्दुक लिए एक सिपाही पहरा दे रहा था। "ठहर" कहकर मालिक्ने आवाज दी । अनाथ ठहर गया। मालिक्ने उतरकर घोडा पासके पेडसे बांध दिया और अनाथ- को आगे करके हवेलीमे ले गया। घर मे चिराग जल रहा था जिसके पास कुछ मादमी बैठकर चाय पी रहे थे । उनमसे एकने पूछा- क्या बात है ----यह लडवा मेरे घर से इन चीजोंको पुराकर भागा है, इसे पकड. कर लाया हूं और सजा देनेरे लिए विनती करता हूँ-मालियने कहा और अनाय हायकी पोटलीको लेकर उन्हें सौंप दिया। ?
X X --कोतवाल (मीरशव) अभी सोए हुए हैं। तुम अपना काम करो। कल सबेरे जब वे आकर बैठेगे, तो उनसे कहकर सजा दिलवा देंगे-- उनमेसे एकने कहा। मालिक चला गया। कोतवालके आदमियोने अनाथको भुंइधरेके भीतर करके बाहरसे दरवाजा बन्द कर दिया और फिर चिरागके पास बैठकर अनाथकी रोटी-पनीर खाकर चाय पीने लगे। X भुंइधरा एक बहुत ही छोटा और अंधेरा घर था । वहाँ अनाथके अतिरिक्त पांच छ दूसरे आदमी भी लेटे हुए थे। एक दो के सिर-परपर गिरते पड़ते उनकी गाली सुनते अनाथ एक खाली जगह पाकर लेट गया । वह रात भर जागता हुआ सवेरेके वक्त सो सका। आंख खुलनेपर देखा कि धूप फैली हुई है और कोई "चोर लडका' कहकर चिल्ला रहा है । अनाथ उसके पास गया और वह उसे एक चवतूरेके पास ले गया, जिस- पर कुछ आदमी बैठे हुए थे। उनमेसे एक आदमीने अनाथको पकड- कर नगावर जमीन पर लेटाकर दावे रखा और दूसरा आदमी एक कमची लेकर उसकी नगी पीठपर जमाने लगा । अनाथ चिल्लाने लगा, लेकिन वहाँ बैठे आदमी हंसने लगे और उनमेसे एक्ने कहा-मची सहनेकी शक्ति नहीं थी, तो चोरी क्यो की ? कमची मारनेके बाद फिर उसे भुंइधरेमे बन्द कर दिया और बाहरसे ताला मार दिया । विना पूछे मारनेका कारण क्या था, इसे उसने अपने पहलेसे माए बदियोंसे पूछा । उन्होने बतलाया कि स्थानीय सरकारके कानूनके अनुसार चोर और अपराधीको कुछ समय प्रतिदिन बिना पूछे एक बार मारते हैं। उसके बाद यदि उचित समझते है तो पूछते हैं। यदि हाकिमये विचारानुसार वह अपराधी सावित होता है तो विना पूछे भी उसे दड देनेका फैसला करते है । इसी (अफगानी) कानून के अनुसार वह अनायको लगातार तीन दिन तक मारते रहे। चौथे दिन उसे ले आएर कुरसोपर बैठे एक दाढीमुढे मूंछदरके सामने खडा किया। -तुझपर सौ रुपया जुर्माना होता है । यदि तू रकम लाकर दे दे तो इसी वक्त छूट सकता है । यदि मेरे पास पैसा नहीं है, नो मां-बाप या भाई वधुवा पता दे । हम अपना आदमी भेजकर पैसा ले लेंगे और तुझे छाड देंगे। -मेरे पास न पैसा है, न मेरा कोई सगा सम्बन्धी है--अनाथने कहा--सिर्फ एक मां है । वह भी कहां है, मैं नहीं जानता और उसीकी खोजमे घूमते घूमते इस बलायमे फैसा । -ऐसा ही सही, रोज एक बार मची खाकर लेटा रह-दाढी कटे आदमोने कहा-इस बीच तू या तो मर ही जायगा या पैसा लाकर देगा। -जो कुछ है, वह मेरी तकदीरसे है--कहकर अनाथ रोने लगा। लेकिन उसके आंसुओको देखकर किसीको दया नही आयो । एक बार उसे फिर पीटा । अब अनाथके अश्रु सूख गए और उसकी जगह उसके दिल मे क्रोधकी आग भडक उठी। पीडाके बहुत होनेपर भी वह दांतोवो दांतो पर दबाकर चिल्लाया नही । पीटना खतम करके उन्होने "उठ' कहा, लेकिन अनाथने अपनी जगह से उठने का उपहास करते कहा--क्या मारने से अघा गए। इसके जवाबम एक आदमीने अनाथकी गर्दनपर ऐसा क्डा मुक्का मारा, कि वह मुंहके बल जा गिरा, किन्तु तुरन्त उठवर मारने वालेकी तरफ कडी निगाहसे देखने लगा । उस आदमीने एक थप्पड और उसके मुंहपर मारकर कहा-जा हवालातमे । अनाथने अपन साथी व दियोसे सौ रुपए जुर्मानकी कहानी कही। -तुझे हलकी सजा दी है । हममेसे हर एकपर हजार हजार जुर्माना किया है उनमेसे एक्ने वहा ।
८७ तुम्हारे पास पैसा है, लाकर दे सकते हो, लेकिन मैं कहाँ से पैसा लाकर ई?--अनाथ ने कहा । -हममेसे भी किसीवे पास पैसा नहीं है उनमेसे एकने कहा । -ऐसा ही सही । चलो यही लेटें। --या तो हम लेटेंगे या हमे खलास कर दिया जायगा-उस वदीने कहाँ। x x x हवालातमे अनाथा छठा दिन था । आधी रातको हल्ला गुल्ला सुनकर उसकी नीद खुल गयी । आंख मलपर देखने लगा । बन्दूक छूटने- की आवाज सुनायी दी। कुछ मिनट बीतते बीतते हल्ला गुल्ला बन्दी- सानेके दरवाजेपर पहुंचा। कुछ लोगोने आकर भुंइधरेके किवाडको मार- कर सोड दिया और य दियोको निकाल बाहर किया। उनके पीछे पीछे अनाथ भी बाहर निकल आया। कोतवालीके बाहर बहुत-से आदमी मशाल लिए खडे थे। मशालके प्रकाश में वहाँ तीन मुदे लेटे दिखायी पडे । हल्ला करनेवालोगे दो मुर्दोको उठा लिया। तीसरा शायद कोत- वालका आदमी था, इसलिए उसे उसी तरह छोड दिया । हल्ला-गुल्ला करनेवाले कोतवाली से बाहर निकले । अनाथ भी उनके पीछे-पीछे बाहर हो गया। फाटकके पास एक और मुर्दा खून मे नहाया जमीनपर लेटा था। यह द्वारपाल था। हल्ला करनेवाले मशाल बारे एक ओर चले गए और अनाथ उन्हे छोड दूसरी ओर चल पडा। । X X x सूर्योदय हो रहा था, अनाथ एक पहाडके किनारे पहुंचा । वह थका भी था और भूखा भी। धरतीपर पडकर उसने कुछ देर सोना चाहा, लेकिन, भूखके मारे नीद कहाँ ? धूप निकल आनेके बाद वह आहारसी खोज करने लगा, लेकिन अपने-आप उसी पासोके मूलके सिवा और कुछ ८८ न मिला । उसे खाने की हिम्मत न हुई । दो साल पहले ऐसी ही जडोको खाकर वह मरने लगा था। नयी निवली पत्तियोको खाकर देखा लेकिन उन्हे भी निगलनेसे डरकर थूक दिया, लेकिन कुछ खाना जरूर था । बहुत थका मांदा था, तो भी आहारको आशामे वह आगे चला। आगे एक मैदान मिला, जिसके किनारे बालू ही बालू था । वह सुस्तानेके लिए गरम बालूपर लेट गया। वहां उसने बालू से मढी, उभडी हुई कुछ चीजें देखी। अनाथने हाथ बढाकर उनमसे एकको जमीनसे निकाल कर देखा । दखते ही उसकी आंखें दीपककी भांति चमक उठी और मुंहमे पानी भर आया । इस चीजको उसने पहिचान लिया-यह था स्वादिष्ट खुम् (छत्रक)। अपने देशमे चरवाही करते हुए बसन्तके समय खुम्को जमीनसे चुनकर, आगम भूनकर नमक के साथ उसने पाया था और उसके स्वाद को भी वह समझता था। यहां इस वियावानम नमक कहाँ पा । आग और दियासलाई भी नही थी, जो उसे भूनता । अनाथने सोचा कोई हर्ज नही, चीज नर्म है. कच्ची-बच्ची ही पार देखता हूं।" उसने दो को खाया, कुछ पेट भरा और नीद भी भायी। जागनेपर अनाथने देखा कि दिन बीत चुका है । पेटमे भी ददं नहीं है । हो, भप लगी थी। वह नालेये मिनारे ताजा पानीकी तलाशमे ऊपरपी ओर पला। पानी पीयर फिर वह लौटकर उसी जगह आया और घुम्यो अपने पुराने कपडेयी जेवा और दूसरी जगह रख पर पिर यहाँस चल दिया। १३ अनाथ घार दिन तक चलता गया। विसीय हायम परपर पिर यदीपानेम न घसा जाय, इसलिए वह रातम चलता और दिनयो गुपाओ, पडतो या पहारये सानुओपर सो जाता । पम् उसपे लिए राहता सबसपा ८९ पांचवें दिन सूर्योदयके समय वह एक भीटेकी-सी जगहपर पहुंचा और सोनेके लिए किसी गड्ढेको ढूंढने लगा। इसी समय आंखोके सामने एक नदी दिखायी पडी । यह नदी आभू (वक्षु) नदी थी, जिसकी खोजमे अनाथ निकला था । वह सुन चुका था कि आसपास आमू नदी-जैसी बडी दूसरी नदी नहीं है, लेकिन नदीका वह स्थान नहीं था, जहाँसे दो साल पहले वह पार हुआ था। उस जगहसे यह जगह या तो कुछ ऊपर थी या नीचे । जो भी हो, यह निश्चत था कि यह नदी थी, जिसके पार उसका प्रिय देश अवस्थित था। अनाथ नदी-तटसे अपनी मातृभूमिके दिखायी देते हुए भूखडको देखकर खुशीसे आपैसे बाहर होकर ऊंची आवाजसे बोला-ऐ मेरे प्यारे वतन मेरी मां ! जल्दी मुझे अपने कृपामय अकमे खीच ! शारीरिक भाने भले ही मुझे जन्म दिया हो, किन्तु तूने मुझे पाला-पोसा है । बोलशेविकोके नेतृत्वमे आकर तू और भी अधिक कृपामयी, और भी अधिक स्नेहमयी, और भी अधिक सौन्दर्यमयी हो गयी है ! शारीरिक मा मुझे जन्म देकर आफतोमे फंसानेका कारण बनी। तू मुझे, अपने बच्चे को आफतोसे मुक्तकर शिक्षा देकर आदमी बनाएगी। जब तक मेरे शरीरमे प्राण रहेगा, मैं तेरी सेवासे मुंह न मोडगा और यदि आवश्यकता हुई तो तेरे लिए अपने सिर, अपने तन, अपने रक्त, अपने प्राणको न्यो- छावर करूँगा । अफसोस कि मुझे तैरना नहीं आता, नही तो इस तरगित महानदको पार कर तेरी पवित्र धूलिको चूमता । अफसोस मेरे पास पक्षियो- जैसे पक्ष नहीं है, नहीं तो इस गभीर नदीके ऊपरसे उड़कर तेरे पास पहुंच कर प्रात. समीरमे पेट भर सांस लेता। इस तरह कुछ देरतक वात करते हुए अपने भीतरी भावोको बाहर प्रगट करके नदी-पार होनेकी चिन्तामे अनाथ चारो ओर नजर डालने लगा, लेकिन नदी-तटपर न एक नाय, न एक गुसर (प्मशक), न वही एक आदमी दिखायी पडा। हां, तटसे थोड़ी दूरपर शर-वनके पीछे एक काला मकान जरूर दीखा।
९० अनाथ अधित्यका से उतरकर उस मवानकी तरफ बढा। मकान. के पास जाकर दरवाजेसे झांककर देखा। वहाँ एक मध्यवयस्क तुर्क- मान चूल्हेपर चायदान रखकर ईधन जला रहा था । अनाथने तुर्कमानको सलाम किया। -अलैकुम् सलाम, आ पुन |-तुर्वमानने कहा । अनाथ घरके भीतर गया । गृहपतिने हाथ फैलाकर स्वागत करके उसे बैठनके लिए जगह बतलायी। तुर्वमानने तुर्कमानी ढगसे "पूछो, पूछु” कहकर पहले कुशल-मगल पूछा, फिर उसके आने के उद्देश्य बारे- मे पूछा । अनाथने बतलाया कि मैं उस नदी पार का रहनेवाला हूँ । मांसे मिलनेके लिए इस तरफ आया और अब फिर उधर जाना चाहता हूँ। -इसके लिए कुछ देर ठहरना पडेगा-तुर्वमानने कहा-मेरा पेशा यद्यपि यहाँ खेती है, लेकिन कभी-कभी मिलनेपर लोगोको नदी- पार भी कराया करता हूँ। जो आदमी यहाँसे पार होते हैं, वह या तो भगोडे होते हैं या कानून विरोधी माल ले आने-ले जानेवाले । भगोडो या भगोडोके मालको नदी-पार पराना अपने प्राणको नदी-पार कराना है । इसलिए मै इस कामयो तव करता हूँ, जबकि मेरे सूनवे घरावर पैसा पंदा हो। तुर्वमानने वात रोक्कर, ईधनयो फूपवर आगयो तेज परते हुए पहा-अच्छा, ता तू तवता मेरे पास काम कर, घेतीके वाममे मदद दे, जबतर पि कोई पूर्व पैसेवाला आदमी न आ जाए। अनाथने तुमानकी बात मान ली और यह सोचार दिलमें पुश हुआ कि देर भले ही हो, लेकिन यहां मरा मनोरय सफ्न हागा । तुमान की चारदातो पानी उबरेल उमरते दो चायनिक चाय बनाएर पापनिा प्यारे साथ मनायो सामन रपी और दूसरी एप प्यालो साय अपने सामन । प्रोपडे कादीपारमेसे एर सतेमे बंधी पोटसी निपसारर घोली, मोर उसमें से दो लिट्टियौनिकालकर दर दर पर दोनों पाय । । पोने लगे। चाय पीनके बाद तुर्वमानने कहा -आ पुत्र । तुये खेत ल चलू और अपनी फसल दिखलाऊँ। तुमान आगे-आगे चला और अनाथ उसके पीछे पीछ । दानो काले घरसे निकलकर खेताकी ओर बढे । घरके पास एक शर वन था जिसका एक छोर मकानकी दीवारसे मिला हुआ था। इसी शर वनके वीचम होजकी तरहका एक जलाशय था, जो एक छोटी नहर द्वारा नदीस मिला हुआ था। काले घरके नजदीकवाले कोनेमे एक छोटी-नी डोगी खूटेसे बंधी थी। तुमानने नावको दिसलाकर अनाथसे कहा--तुझे नदी पार करानमे यही नाव काम आएगी। अनाथने नावको देखा । तुकमानको आशा भरी बात सुनी। मनारथ सफल होनेका विश्वास वढा । वह और भी खुश होकर तुकमानके पीछे लम्बे लम्बे डग रखने लगा। दोनो खेतपर पहुंचे । तुर्कमानकी खेती छोटे छोटे कोलाकी थी । एक कोनमे खरबूजा और तरबूजा लगा था, जिसकी राशापर लोविया और मसूर बैठायी गयी थी। दूसरे वोनेमे उडद सरसा, ज्वार-बाजार जैसी दाने तथा तेलवाली फसल थी । योये बूटोक वीच घास भरी हुई थी। तुफमानने खेतीकी ओर इशारा करके अनाथसे कहा तेरा काम है, इस घास और तिनकेको हाथसे उखाडकर बाहर करना और बैलको संभालकर खरबूजे और तरबूजकी जमीनको नर्म करना । पानी दते वक्त ख्याल रखना कि ज्वार के पौधे पानीमे डूब न - जायें। - तुकमानने एक मिनटमे तीस चालीस दिनके कामकी योजना बता- कर जाते-जाते फिर कहा --तू यह काम करता रह । इसी बीच कोई पैसेवाला भगोडा भी आ जायेगा । फिर मैं तुझे बिन पैसे लिये, खुदावे नामपर नदी पार करा दूंगा। "बहुत अच्छा" कहते हुए अनाथ तुरन्त ही घास उखाडनेके कामम लग गया, लेकिन तुर्कमान "आज दम ले ले, कलसे काम शुरू करना। - ९२ कहावत है "थके-मांदेका काम आधा ही होता है", कहकर अनाथको लिये घरकी ओर लौटा। घर पहुंचकर तुर्कमानने अनाथसे कहा-मैं इस समय उवा (गाँव) जा रहा हूँ। तू यहाँ लेटकर आराम कर, लेकिन सूर्य डूबनेके बाद होशियार रहने की आवश्यकता है, जिसमे चोर नाव न खोल ले जाय । अनाथने सिर हिलाकर बात स्वीकर की । तुर्कमानने खूटीपर टंगे अपने जामेको उतारकर पहिनते हुए कहा "तू सूर्योदयतक ऐसे ही रह । मैं सवेरे ऊवासे रोटी लाकर चाय बनाकर तुझे खिलाऊँगा और मैं भी चाय-रोटी खाऊँगा।" फिर उसने खूटीसे वंदूकको उठाली और उसी खूटीसे लटकती गुप्सर (तैरनेकी मशक) की ओर इशारा करके कहता -"होशियार रहना, कही कुत्ता आकर इसे पा न जाया।" चला गया- X X X अनाथ कुछ देर लम्बा पड़ा रहा । जव तुर्कमान नजरसे दूर हो गया तो अपनी जगहसे उठा और गुप्सरको खटीसे उतारकर कूल ( तालाब ) के किनारे ले गया । पानीमे भिगोया। जब गुप सरका चमड़ा नर्म होगया तो मुंहसे फूंककर हवा भरकर उसके मुंहको सूब मजबूतीसे बांधकर पानीके ऊपर डाला और स्वय भी कपड़ा उतार- कर उसपर सवार हुआ, लेकिन अनजान सवारकी तरह हर हरकतमे वह गुप्सरकी ओर लुढकरकर पानीमे डुबको खाता, लेकिन वह फिर उसपर सवार होकर चलनेकी कोशिश करता रहा। एक घटा कूलके विनारे अभ्यास करने के बाद उसने बैठना सोख लिया और फिर उसे कूलके भीतरकी ओर बढ़ाया। उसने देखा कि गुप्सरपर सवार होकर एक जगह पड़े रहनेसे उसे आगे बढ़ाना कही आसान है। इस तरह ९३ उसको साहस हुआ और उसने उसे और भी तेजी से चलाना शुरू किया। वह गुप्सरको जितनी ही तेजीसे चलाता, उतना ही उसके ऊपर शरीरको संभालना आसान लगता है । इसी तरह अनाय गुप्सरपर चढा नहरियासे होते नदीके किनारेतक गया और फिर वहां से लौट आया । उसने पानी से निकलार गुप्सरको बाहर किया और मुंह खोलकर उसकी हवा निकाल उसे ले जाकर फिर खूटीपर टांग दिया । फिर कूलके किनारे आ उसने नाव चलानेका अभ्यास करना चाहा । नाव- पर चढकर पतवार चलानेवी अपेक्षा गुप्सरपर चढकर हाथ से चलाना उसे आसान मालूम हुआ। उसके छोटे हाथ नाव चलानेके अभ्यरत नहीं थे, इसलिए जरा ही देर चलानेके बाद वे सुस्त पड जाते, लेकिन थोडी देर आराम करने के बाद वह पहले से अधिक समयतक पतवार चला सकता। अनाथ इसी तरह दिनमे शामतक दस वार नदीके किनारे आया- गया। सूर्य अस्त हो गया। अनाथ बहुत थक गया था, लेकिन आजके अभ्यासने उसे अधिक आशावान् बना दिया था, इसलिए वह बहुत खुश था और अपने मनमे कह रहा था "यदि कोई खूब पैसेवाला जल्दी नही आया और तुर्कमानने मुझे पार नहीं किया, तो नदी पार करनेका उपाय मुझे मिल गया।" अनाथ लम्बा पडा लेट रहा था, उसे खूब नीद आयी थी । आधी रातको घोडोके खुरोको खटखटाहटसे उसकी आंख खुल गयी । उसने सोचा कि नाव चुरानेवाले आ गये और जल्दी जल्दी घरसे बाहर गया । अब वह नाव की रखवाली सिर्फ तुर्कमानके लिए नहीं, बल्कि अपने लाभ के लिए कर रहा था, क्योकि उसीकी सहायता से वह नदी पार हो सकता था । उसने उस तरफ देखा, जिधरसे खुर की आवाज आ रही थी, और देखा कि दो टटू आ रहे हैं, लेकिन के बाद वह नावकी ओर जाकर सीधे घरको ओर - सवार वदूक और तलवारसे हथियारबंद थे। पास आनेपर उनमेसे एकने घोडे को रोककर अनाथसे कहा-कियिक्चो ( मल्लाह ) को आवाज दे --मल्लाह यहाँ नही है--अनाथने कहा । --वहां गया है? --ऊया गया है। -रोटी ओटी हो तो लाकर हमे दे। --जो भी रोटी थी सब याकर गया है। मैं भी भूषा लेटा हूँ। जनगावा" कहकर रोटी न रखनेके लिए मत्लाहको गाली देकर सवार अपने साथी साथ नदीके नीचेकी ओर रवाना हो गया । अनाथ अपने दिल मे "मैं समझता था कि ये चार हैं। ये भिसारी नहीं हो सकते, क्योकि मैंने पूरी उम्रमे हथियारवद भिखारी नहीं देखा', सोचते हुए घरके भीतर जाकर फिर लम्बा पड रहा । उस रात इन दो सवारोके आनेको छोडकर कोई दूसरी दुर्घटना नही हुई। खूब पेट भर सोनेके बाद जब वह उठा, तो धूप निवल आयी थी। आज भी वह खेतीका काम शुरू करने से पहले कितने ही समयतव गुप्सर और नाव चलाने का अभ्यास करता रहा। दो घटा अभ्यास करने के बाद तुक्मान के आनेके डरमे यह खेतमे गया और हाथसे घास उसाडने लगा। X X मध्याह्न हा गया । मूर्य अनाथ सिरये ऊपर आ गया। इसी समय तुर्वमान अपने ऊना स लोटपर आया। पहल उमने काले घरम शारर चूल्हा जला चाय उबालो, पिर येतरे पाम जा अनाघरे काममा देय. पर "आज या तेरा काम उतना अच्छा नहीं हुआ क्यो?" कहते हुए उस पटवारा, और पिर आवाज बदलत हुए थाना--पर योई हा नहीं, अभी यह याम तरे लिए नया है । धीरे धीरे सीप जायेगा । सेरा काम भी अच्छा होगा।" फिर उसने वहा.
९५ । --अच्छा आ, चाय पीएंगे। चाय पीते समय अनायने रातको आए दोनो हथियारवद भिखारी सवारोंके वारेमे बतलाया। तुर्कमानने ठठावर हंसने बाद वहा : -वे भिखारी नही थे । वे नदी-सटरे पहरेदार, हमारी सरकारके सिपाही थे, लेकिन वे सदा भूपे रहते है और भीख मांगकर अपना पेट भरते फिरते हैं। इसीलिए एक रोटीवे लिए अपने हाथ लगनेवाले हर भगोडेका सिर उडा देते है । तुर्कमान चुप होकर अपने प्यालेकी चाय पीकर, दूसरा पाला भरने के याद सामने रखकर बोला-यदि उन्हे मौका मिले तो चोरी-डकैती किए बिना न रहे, लेकिन वे यह काम ऐसे गरीबोपे सिरपर करते हैं जो उनके सामने कुछ पर नहीं सकते। वे मेरे जैसे गोलीका जवाब दो- गोली से देनेवाले आदमीकी तरफ आंख भी नहीं उठा सकते । चाय पीकर तुर्कमान फिर अपने ऊवावी ओर जाते बोला ---मेरे न रहनेपर यदि कोई आकर पूछे, तो उसे ऊबा भेज देना, लेकिन यदि ऐसा आदमी रातको वेवक्त आए तो कहना कि इसी समय आना, कल सवेरे वह आयेगा । उठने वक्त तुर्ष मानसे खाने बची हुई एक रोटीको अनाथके हायोमे देते हुए कहा- जब भूख लगे, तो इसे खा लेना । खबरदार रहना, जिसमे हथियारबंद कुत्ते तेरे हाथसे छीनकर इसे खा न जायें और काम खूब मन लगाकर करना । तुर्कमान चला गया। चाय पी लेनेके बाद भी अनाथने बहुत सा समय गुपसर और नाद चलानेमे बिताया और फिर खेतकी और गया । अनाथ सब चीजोसे ज्यादा इस ओर ध्यान देने लगा कि तुमान गांवसे कब आता है । वह प्रतिदिन ११-१२ बजेये वीच गांवसे आता, चाय पकाता, अनाथवे वामको देखता, फिर दोनो साथ चाय पीते और फिर उसके हाथोमे रातके लिए रोटी देकर और अधिक काम करनेकी ताकीद कर वह अपने गांव लौट जाता । आने-जाने का समय निश्चित हो जानेपर अनाथने अपने कामका समय भी निश्चित कर लिया । वह प्रतिदिन शाम-सवेरे कुछ घटे गुप्सर और नाव चलानेमे लगाता और वीचके चार-पांच घटे खेतीके काममै । धीरे-धीरे वह नाव और गुप्सरको नदीकी धारमे भी खेने लगा इसके अतिरिक्त वह बिना नाव तथा गुप्सरके पानीमे तैरने और डूवकर दम साधनेवा भी अभ्यास करने लगा। खेतीका काम भी काफी आगे बढा। उसने घासको निकालकर गोडकर खेत को गुलजार कर दिया। तुर्कमान भी अनाथके कामसे बहुत खश था। कभी उसे "शाबाश" और "बारकल्ला" कहता और कभी उसे "और अच्छा काम कर, तुझे बलवान करेंगे, जल्दी ही कोई पैसेवाला भगोडा आ जाएगा और मैं तुझे बिना पैसे ही नदी-पार उतार दूंगा" कहते हुए उसे अधिक आशावान बना कर काममे और अधिक तत्पर बनानेकी कोशिश करता । तुर्कमानने अनाथवे डीलडोलके अनुसार एक लोहे का बेलचा लाकर दिया, और हाथके कामके खतम होनेके बाद जमीनको नर्म करने और मिटटी चढानेके काम के लिए उसे नियुक्त किया। ४० दिनतक काम करके अनाथने गुप्सर और नाव चलानेवा खूब अभ्यास कर लिया । वह नाव और गुप्सरको धारके विरुद्ध भी ले जा सकता था। खेती का काम भी खतम हो गया था। तुर्कमान एव परती जमीन- को दिखलाकर, उसे खोदकर घास आदि निकाल कर शरदमे युनुचका (घास ) बोनेके लिए तैयार करनेको पहा और साथमे यह भी जोड दिया तब तक कोई न कोई पैसवाला भगोडा आ ही जाएगा। x X X अनायने नए काम शुरू किया, लेकिन पैसेवाले भगोडे या कही पता नही था। वह सोचने लगा, गमियाके खतम होनेतक खेतीकी पसल वट जानेतक भी वसा पैसावाला भगोडा शायद ही आए। - ९७ एक रात इसी तरहदी चिन्ता परते-करत अनाथको नीद नही आयी। आधी रातके करीब शर वनको ओरसे आदमीने आनकी आवाज सुनायो दी। वह जल्दीसे उठकर दौडा-दौडा नावरे पास गया और देखा कि दो आदमी नाव खोल रहे हैं। वह चिल्लाया-चौन हो? --न डर, मैं हूँ-एक परिचित आवाज सुनायी दी । यह आवाज तुर्वमानकी थी। अनाय प्रसन होकर उसकी तरफ दौडते बोला-हाँ, तो पैसेवाला भगोडा मिल गया ? मैं भी तैयार हो जाऊँ न ? -न, यह आदमी नदी पार नहीं जा रहा है बल्कि नदीके एक टापूमे खरबूजेके कामके लिए जा रहा है-तुर्कमानने कहा। तुकमान झूठ बोल रहा है, इसे अनाथने भी समझ लिया क्योवि खरबूजेचे कामके लिए रात म नही जाया करते। वह सोचने लगा 'कौन जानता है इन चालीस दिनोमे-जवकि मैं दरिया पार करनेकी आशामे यहां काम करता रहा हूं-रातके वक्त इस धोखेवाजने कितने पैसेवाला को नदी पार कराया होगा, और अब भी मुझे आशा दिलाए रखना चाहता है।' इसके बाद अनाथको तुर्कमानपर विश्वास नहीं रह गया और उसने स्वय नदी पार करनेको कोशिश करनेका निश्चय कर लिया। १४ मनाथ एक दिन कोई काम न करके पड रहा। तुर्कमानके आनेके समय बीमार बन गया और 'ऊ ऊ करके लेटा रहा। तुर्कमानने चाय उबाली, खुद पी और अनाथको पिलायी। अनाथने चायके साथ आज रोटी नही खायो । तुर्कमानने रोटी खानेके लिए बहुत जोर दिया, लेकिन अनाधने कहा-मेरा मन नहीं करता, शिरमे बहुत दर्द हो तुर्कमान आज अधिक देरतक नदी तटपर नही रहा और अनाथ दिन और रातके खानेके लिए दो रोटी रखकर कबा लौट गया । तुर्कमानके चले जानेके वाद अनाथने तैयारी शुरू की। गुप्सरको लेकर उसे चारो ओरसे देखा, उसकी एक एक बखिया और दराजकी जगहको खूब अच्छी तरह निहारा कि वह दराजकी जगह खूब पानी और हवाको चोटको पूरी तरह सह सकती है या नही । देखकर उसे पूरा सतोप हुआ। फिर वह नावके पास गया और उसे भी चारो ओरसे देखा और दर्जे और छेदमे अपने पुराने कुर्तेमेसे लता फाडकर अच्छी तरह भर दिया। फिर घरमे लौटकर एक रोटी गर्म चायमे भिगोकर खायी और सोनेके लिए लम्बा पडा रहा लेकिन नीद न आयी। उसका सारा ध्यान आमू नदी पार करनेकी ओर लगा था-आमू जैसी महानदीको वह तने तनहा अपने जीवनभे पहली बार पार मरने जा रहा था । इसी सोच विचारमे एक घडीमे सौ बार करवटें बदलते हुए उसने दिन बिताया। शाम हुई । अनाथ गुप्सर और रोटीको लेवर नावमे पहुंचा और रस्सी खोलवर नावको नहरसे नदीकी ओर ले चला । नदीके तटपर पहुंच लगर डाल, वह रातके अंधेरेकी प्रतीक्षा करने लगा। इसी समय दो सरखारी पहरेदार नदीमे किनारे किनारे अनाथकी और निगाह किए आते दिखाई पडे । अनाथकी दृष्टि जिस वक्त उनपर पडी, वह डर गया और मनम सोचने लगा "मनोरथ पूरा होनेका समय आ गया है और उसी समय में पकडा जा रहा हूं।" सिपाही सोधे कूलके किनारे आए और उनमेसे एक 'हां भगोडे । थक न जाना" कहते हुए घोडेसे उतरकर नावपर माया, लेकिन वहां गुप्- सर और अनाथकी फटी पोशाक और एक रोटीके सिवा और कुछ नहीं था। रोटीको अपने हाथमे लेकर सिपाहीने अनायसे वहाँ आनेका कारण पूछा। मनाथने अपनेको मल्लाह तुकंमाना नौकर वतनाते पहा-यहां नाव पलानेका मभ्मास पर रहा था। आप लोगोको देखकर बड़ा हो गया।
वह सवार अनाथको बंदी बनाकर नावसे ले जाना चाहता था, लेकिन उसके साथीने उससे कहा-छोड दे । यह लडका भागकर क्या कर सकता है ? रोटी ले, और चल रास्ता पकड । सवार रोटी लेकर, अनाथको वही छोडकर नावसे निकलकर घोडेपर सवार हो गया। दोनो सवार रोटीको दो टुकड़े कर खाते चल दिए और कूल तथा शर-वनका चक्कर काटते हुए फिर नदीके किनारे जाकर ऑष से ओझल हो गए। मनाथने सिपाहियोके सामने अपनी नावको काले घरकी तरफ बढाया। उनके चले जाने पर फिर नदीके किनारे जा वहाँ ठहर गया। कुछ समय बाद अंधेरा छा गया। आकाशके तारोके अतिरिक्त कही प्रकाश नामकी चीज़ दिखलायी नही पडती थी। पीली मिट्टी मिले आमूके जलमे तारोका प्रतिबिम्ब भी दिखलायी नहीं पड़ता था। यह अनाथके लिए अपने महान् कार्य करनेका समय था। उसने नावको नदी- के भीतर की ओर चलाया और डरके मारे हर बार पतवार चलानेके वाद एकवार नदी तटकी ओर देखता। उसने दूर किनारेपर कालिमाओको आते देखा। पहले उसने यह सोचा कि कुछ नहीं है, रात के वक्त यहाँ मादमी क्या करेगा, लेकिन देर नहीं हुई कि उसे मालूम हो गया कि वह कालिमा दो आदमी हैं। दोनो दौडे-दौडे नदीके किनारेकी ओर मा रहे थे, उनमेसे एक आगे था। उसने ऊँची आवाजसे कहा--"ठहर चोर । इधर लौट ! नहीं तो गोली मार दूंगा।" अनाथने आवाजको पहचान लिया । यह उसके अतिम मालिक तुर्क- मान मल्लाहकी थी। रातके वक्त आनेसे अनाथ समझ गया कि कोई पैसेवाला भगोडा, तुर्कमानके कथनानुसार "खरबूजेवाला" हाथ आया है और पीछे-पीछे धीरे-धीरे आनेवाला आदमी शायद वही भगोडा है। अनाथने अपने दिलमे यह भी सोचा कि यदि मैं फिर उसके हाथ पड़ा तो यह एक गोलीसे मेरा माम तमाम कर देगा। अच्छा यही है कि १०० जो भी शक्ति और समय मेरे पास है, उसका उपयोग कर यहाँसे भाग चलूं। अनाथ इसी निश्चयके अनुसार नावको दोहरी ताकतसे चलाते हुए मंझधारकी ओर खेने लगा। तुर्कमानने बन्दुकका निशाना साध गोली चलायी । गोलीको आवाज सुनकर नदीके दूसरे तट अर्थात् अनाथके प्रिय देशकी ओरसे भी गोलियोपर गोलियां छूटने लगी। तुर्कमानकी गोली नावके पास न आकर न जाने किधर चली गयी, लेकिन दूसरी ओरसे आनेवाली गोलियां नावके ऊपरसे सनसनाती हुई जाने लगी । अनाय डर गया। उसने सोचा कि पहली गोलियां शिरके अधिक ऊपर से भले ही चली गयी हो, लेकिन दूसरी गोलियां जरूर मेरे शिरपर आकर लगेंगी। खतरेको समझकर अनाथने अपनेको नावने भीतर छिपा लिया और गुप्सर मे फूंककर हवा भरने लगा। दूसरी तरफमे आती गोलियां नावके भीतरी और बाहरी कोरोपर लगने लगी। अनाथ बहुत घबडाहटमे पडा था । एक ओर गोली लगनेका डर था और दूसरी ओर छेदके मारे नाव डूबनेकी भी आशका थी। अनाथने इस खतरेसे वचनेके लिए भरी हुई गुप्सरकी रस्सीको अपने हाथमे फंसाकर खिसककर अपनेको पानीमे डाल दिया। X अनाथ नदीमे गुप्सरके ऊपर सवार नही हुआ । हाथमे बंधी गुप्- सरको पानीको धार ने बहाना शुरू किया। वह अधिक समय पानीके भीतर रहता, जव सांस फूलने लगती, तो बाहर मुंह करके एक सांस लेकर फिर पानीम डूब जाता। दूसरे दिनारेसे अब भी गोलियोकी आवाज आ रही थी। प्राय सभी गोलियां नाव मे लग रही थी। धीरे धीरे सारी नाव पानीसे भरकर दूब गयी। उसके बाद मन्द्रकोकी भावान भी गांव हो गयी। X १०१ अनाय प्रायः दो घंटा गुप्सरपर बिना सवार हुए ही कभी टूवता कभी उत्तराता घाटके साथ-साथ चलता रहा। जब वदूकी आवाज बिलकुल बंद हो गयी तो अनाप गुप्सरपर सवार हुया और पानीके सहारे किनारेको योर चलने लगा। एक घण्टा और चलनेके बाद अनाथ एक छोटे टापूके पास पहुंचा। वह बहुत थक गया था, इसलिए उसने सुस्ताने के लिए गुप्सरको उठाकर टापूपर उतरना चाहा, लेकिन टापू अभी नया-नया बना था। अभी मिट्टी-बाल फही नही हो पायी थी, इसलिए पैर रखते ही वह उसमे धंसने लगा। उसने जल्दी-जल्दी पर निकालकर टापूके मध्यमे पहुँचना चाहा । यहां मिट्टी कुछ सूखी थी। वह वहाँ ह्याभरी गुप्सरको शिरके नीचे रखकर लेट गया । वह भूखा भी था, थका भी था, ऊपरसे सर्दी भी या गया था, इसलिए जूडीवाले आदमीकी तरह कांप रहा था, और उसके दांत कटकटा रहे थे। वह कुछ मिनट लेटा रहा, लेकिन आराम होने की जगह हालत और बुरी होती जा रही थी। उसने शिर उठाकर दूसरे तटकी ओर, अपने प्रिय देशकी ओर नजर दौड़ायी । किनारा नजदीक था और वहाँके सरकडे साफ दिखलायी दे रहे थे । उसने सोचा "देर नहीं कि मेरा जीवन यही समाप्त हो जाय, लेकिन लक्ष्यके पास पहुँचकर मरना बहुत अफसोसकी बात है। जो भी हो, अच्छा यही है कि मैं अपनी यात्रा जारी रखू। यदि मरूँगा तो कृपामयी माँ, अपनी प्रिय मातृभूमिसे एक कदम नजदीक होकर मरूंगा ।" इस अभिलापाने अनाथको और शक्ति दी और वह अपनी जगहसे उठकर गुप्सरको लिये-दिये फिर नदीमे पहुंचा और उसपर सवार होकर किनारे की ओर बढ़ने लगा। पेट और छातीके नीचे गुप्सरको दबाये वह अपने हाथो और पैरोको चला रहा था। किनारा नजदीक आया। वह पानीपरबत्तखकी तरह तरता आगे बढ़ रहा था । हाँ पानी बिलकुल शान्ति कूल ( तलैया ) या होजकी तरह मालूम होता था । अनाथकी दोनो आँखें किनारेपर लगी हुई थी।
१०२ वह बडे ध्यानसे देख रहा था कि कोई आदमी तो नहीं है । वह डर रहा था कि कही बासमचियोके हाथमे न पड जाये, क्योकि वह जानता था कि गरीबका लडका होनेसे उनके हाथोमे पडकर वह जिन्दा नहीं बच सकता, लेकिन नदी-तटपर कोई नहीं था । वहाँ बिल्कुल शान्ति और नीरवता छाई थी। हल्की हवा भी नही चल रही थी कि सरकडेको पत्तियोको हिलाती। उसने निर्भय होकर गुपसरको किनारेकी ओर चलाया। निरभ्र आकाशमे चमकते तारोके प्रकाशमे अनाथ किनारे की चीजोको देख सकता था। वह अधीर होकर उसी तरह तेजीसे गुप्सरको तटकी ओर चलाने लगा, जैसे चिरवियुक्त शिशु मांकी मोर बढता है । गुप्सर किनारेपर पहुंची । अनाथने सरक्डेकी जड पडवर अपने- को किनारेपर लानेके ख्यालसे हाथको वढाया । इसी समय एक शक्ति- शाली हाथने उसके हाथको दृढतापूर्वक पकडा और दूसरे हाथको गुप्सर- पर रखा। अनाथ पकडा गया था, लेकिन नही जानता था कि किन हायोंने उन्हे पकडा है क्योकि पक्डनेवालेका सारा शरीर सरकडे के पत्ताकी आडके पीछे था।
द्वितीय भाग १ उस मजबूत हायने अनाथको पकड कर पानीके बाहर निकाल लिया और दूसरे हायने गुप्सरको भी बाहर कर दिया । अनाथ और गुपसरके बाहर भाजानेपर हाथवाला आदमी उठ खडा हुआ। इसी समय नीचेकी ओरके सरक्डोके भीतरसे भी दूसरे दो आदमी निकलकर अनाथके पास आ गये। तीनो आदमियाको शवल-सूरत और पोशाक ऐसी थी, जैसी मनाथने कभी नहीं देखी थी। सभीके वस्त्र यूरोपीय ढगके तथा एक रगके थे और तीना बदूक, तमचा और हथवमसे हथियारवद थ । जिस थादमीने अनाथको पानीसे निकाला था, उसन गुप्सरको खोलकर भीतर हाथ डाल अच्छी तरह देखा कि उसमे कोई पत्न या ऐसी ही कोई दूसरी चीज तो नहीं है । इसके बाद उसने अनाथसे कौन, कहाँसे और किस लिये नदी पार हुआ, आदिके बारेमे पूछा, लेकिन अनाथ उनकी बातको नही समय सका, चकित होकर उनका मुंह देखता रहा । वह रूसी भाषा नहीं समझता यह समझकर उनमेसे एकने वह जिस भाषाको समझता था, उसमे अनुवाद करके पूछा । अनाथने जो कुछ भी उसपर बीती थी, एक एक करके कह सुनायी। फिर नदी पार करके आनेके बारेमे कहते हुए वोला। -मै नदी पार कर अपने प्रिय देशमे आया, क्योकि मैंने सुना कि बोलशेविक हमारे देशके गरीब और अनाथ बच्चोको बालशालामे पर वरिश करके उहें लिखा पढाकर आदमी बनाते हैं। मैं इसलिए आया कि अपने देशमे सीख पढकर आदमी बनूं और खूस्वार बाय और १०४ बासमची गरीबोको मारते और हमारे देशको जलाते हैं, उन्हे पकडकर बोलशेविकोके हाथ मे दूं। -जो कुछ तूने कहा, यदि वह ठीक है, तो तेरा मनोरथ पूरा होगा-पूछनेवालेने कहा । थैलेको खोलकर एव टुक्डा मिश्री और एक चाकलेट अनाथके हाथमे देते हुये कहा-यह खा, जिसमे जोर मिले। फिर हम चलेंगे। अनाथने मिठाई को मुंहमे डालकर चूसना शुरू किया । वायके परमे मिठाइया खायी थी, लेकिन उनका स्वाद ऐसा नहीं था । मिश्री उसे स्वादिष्ट मालूम हुई । उसे कुछ ताकत मिली, दिलको आराम हुआ और सर्दीसे कांपना बन्द हो गया। अनाथने मिठाई खाते वक्त उसपर लिपटे रग बिरगे कागजोको एक- एक करवे निकालकर एक हाथम रख लिया। मिठाई मुंहमे डालकर खाते हुये वह कागजको चकित और शङ्कित दृष्टिसे देखने लगा, क्योकि पहली बार उसने ऐसी चीज़ देखी थी। जब उसे चाकलेट और उसपर लिपटे कागजोके बारेम मालूम नहीं हुआ, ता वह अनुवादक्की ओर देखने लगा। -इन्ह पा -अनुवादकने चाकलट देते हुये कहा और फिर कागजो- की ओर सकेत करके कहा-इन्हे फॅर दे। अनाथने चाकलेटको मुंहम डाली। वह मिश्रीस भी ज्यादा मीठी मालूम हुई । खात वक्त उसने फिर कागजाको एक-एक करके देखा और उसके भीतरको पतली पन्नी निकालकर अंगुलियोम लपटकर देखा, लेकिन, उन्ह फैया नहीं। -फेंक दे, इन्ह क्या करगा रखर ? ये कारके कागज है-- दुभाषियेन पहा । उसन वारी मिठाईको पात हुए वागज जमीनपर फेर दिया, लेकिन उरास नजर नहीं हटाई । व सोग जा सवाल करत, उसमा जवाब देते समय अब भी उसी दृष्टि यागजपर रही।
चापलेट खानेके बाद अब वह कुछ मजबूत हुआ, उसका कांपना बन्द हुआ और चेहरेपर सुर्सी दौडी । अब उसे लेकर वह आफिसकी ओर चले । अनाथ उनके आगे-आगे था। उसके दिलमे खुशी और पेटमे आराम था। X x X जिस समय सीमान्तपाल अनाथको कार्यालयमे ले गए, उसके शरीर- पर एव पायजामेके सिवा और कुछ न था। वहां उसे नया कपड़ा पहना- कर एक कमरेमे विसीके सामने ले गए। उस आदमीकी भी पोशाक और शफल-सूरत सीमान्तपालो-जैसी थी। इस आदमोने भी अनाथसे उसी तरहके सवाल किए और अनाथने भी उसे वे ही जवाब दिए, जो नदीके किनारे दे चुका था। दोनो जगहोके प्रश्नोत्तरमे इतना ही अतर था, कि यहां सब कुछ कागजपर लिखा जा रहा था। प्रश्नोत्तर समाप्त होनेके बाद प्रश्नकर्तान कहा-अच्छा, इसे ले जाओ, खिलाओ-सुलाओ । आराम करे, फिर देखेंगे। अनाथको लेकर वह दूसरे घरमे गए । घरमे अंधेरा था, लेकिन वह फिर एकाएक प्रकाशित हो गया। यह देखकर अनाथ एकदम कांपने लगा। उसका होश उड गया और चक्ति होकर देखने लगा। उसके रङ्गको उडा, चेहरेको सफेद योर शरीर को कांपता देखकर लानेवाले सीमान्त- पालने कहा-"डर मत, यह स्वय जलनेवाला विजलीका दीपक है।" फिर स्विचको दवाकर दो-तीन बार उसे जलाया-धुझाया और अनाथको वही छोडकर दरवाजेको बन्द करके चला गया। अनाथने अपने जीवनमे मिट्टीके तेलके चिरागो, लालटेनो और बदबूदार बत्तियोके सिवा दूसरे प्रकारके दीपक नहीं देखे थे। वह सोचने लगा, बिजलीकी रोशनी अजब चीज है, जिसे बोलशेविक हमारे देशमे लाए हैं। उसने जाकर अपने हायसे स्विचको दो-तीन बार दबाकर रोशनीको जला-युझावर देया। उसकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं था। फितने अन्धकारपूर्ण, कितनी वष्टमय दुनियारी वह ऐसी प्रकाशमान और आनन्दपूर्ण दुनियामे आया ! उसका हर्ष मनमे समा नही रहा था। वह अपने भावोंको विसीसे यहार मन हलवा करना चाहता था। इसी समय अनाथको अपनी कृपामयी मां और कुर्मान भाई याद आए । उसे लगा कि कही वह उसके पास होते तो वह बत्तीको जला-बुझाभर उस हुनरको दिखलाता, जिसे बोलशेविक देशमे लाए विजलीके चिरागके देखनेसे हुए आश्चर्य और मनके उद्वेगके कुछ नर्म पड जानेपर अनाथ कमरेकी चारो ओर नजर दौडाने लगा। कमरा छोटा था, लेकिन बहुत साफ और खुला हुआ। उसको दीवारें बगुलेके परकी तरह सफेद थी । छत और फर्शमे वानिश दिये लकडीके तख्ते लगे थे। कमरेके एक तरफ एक चारपाई थी, जिसके ऊपर नर्म बिछौना बिछा हुआ था? एक कोनेमे मेजपर सुराही और पासमे एक कुर्सी थी। अनाथने पहली बार इस तरहका कमरा देखा था। उसने सोचा, शायद बोलशेविकोको बालशाला यही है । यदि उस समय कोई कहता कि यह बन्दीखाना है। तो अनाथ क्रोधमे आकर उसकी जीभ निकालनेके लिए तैयार हो जाता । उसने डेढ़ महीने पहले पडोसी राजके बन्दीखानेको देखा था। वह बन्दीखाना भेड रखने- वाले हौजवी तरह था। अंधेरा, गन्दा और काला था। उस जेलखानेमे जिसको बद किया जाता, उसे कपडा नहीं पहनाते, देख-भाल नहीं करते, शरीरसे कपड़ोको छीनकर नगे बदनपर कमचियां मारते और फिर लाकर बन्दीखानेमे वद कर देते । अनाथ इस प्रकार अपने कमरेका बालशाला समझकर खूब खुश हो रहा था । इसी समय किसीने द्वार खोला, चाय, चीनी और रोटी लाकर मेजपर रखी और अनाथको कुर्सीकी ओर सकेत करते हुए "आ, बैठ, १०७ चाय पी बोर रोटी पा" कहकर बाहर निकल गया और दरवाजा बन्द कर दिया। मनाथने चीनीको गरम चायमे डालकर रोटी खाना शुरू किया। जब अनाथ पेट भर खाना खा चुका तो द्वार फिर खुला और उसी आदमीने आकर मेजपरसे वर्तनोको उठा लिया और चारपाईकी भोर इशारा करके कहा-यह तेरे सोनेके लिए है । फिर बाहर निकलनेसे पहले उसने विजलीको स्विचकी ओर इशारा करके कहा-सोनेके वक्त चिरागको बुझा देना। X X अनाथने अभिमानके साथ शिर हिलाते हुए बत्तीको एक-दो बार बुझा कर कहा-मैं इसे जलाना-बुझाना जानता हूँ। -मलादीयेत्स, शावाश-कहते आदमीने बाहर निकलकर दरवाजे- को बद कर दिया। अनाथ कपडा उतारकर नर्म बिस्तरेपर लेट गया । वह जिन्दगी मे कभी चारपाईपर न सोया था। यहां पहली बार नर्म विस्तरेपर लेटा था। लेटनेके साथ ही उसे नीद आ गयी । X पहरेदार लम्बा बूट पहने दरवाजेके बाहर टहल रहा था। उसकी आवाज अनाथके कानोमे आयी । खिडकीके शीशोसे कमरेके भीतर धूप पह रही थी। कमरा गर्म या और दिनके बारह बज रहे थे। । द्वाररक्षकने अनाथको कमरेसे बाहर लेजाकर शौच और हाथ-मुंह धोनेसे निवृत्त करा फिर कमरेमे लाकर बन्द दिया। कुछ मिनट बाद शामवाले आदमीने रोटी, चीनी-चाय लाकर मेजके ऊपर रखी । भोजनो- परान्त अनाथ फिर चारपाईपर लेटकर कुछ देर सोचता रहा । फिर उसका दिल उकताने लगा "कहते थे कि बालशालामे पढ़ाते हैं । पढाई कब शुरू होगी? दूसरे बच्चे कहां हैं ? मैं क्यो अकेला हूँ?" वह अपनी रोशनीको जला-बुझाकर देखा । उसपी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं था। रिता अन्धमारपूर्ण, क्तिनी क्प्टमय दुनियारो वह ऐसी प्रकाशमान और आनन्दपूर्ण दुनियामे आया ! उसवा हप मनमे समा नहीं रहा था । वह अपने भावापो किसीसे रहबर मन हलका करना चाहता था। इसी समय अनाथको अपनी कृपामयी मां और कुर्वान भाई याद आए । उसे लगा कि कही वह उसके पास होत तो वह बत्तीको जला-बुझाकर उस हुनरको दिपलाता, जिसे बोलशेविक देशमे लाए हैं । बिजलीये चिरागवे देखनेसे हुए आश्चर्य और मनके उद्वेगके कुछ नर्म पड़ जानेपर अनाथ कमरेकी चारो और नजर दौडाने लगा । कमरा छोटा था, लेशिन बहुत साफ और खुला हुआ। उसकी दीवारें बगुलेके परकी तरह सफेद थी । छत और पर्शम वानिश किये लकडीक तख्ते लगे थे। कमरेके एक तरफ एक चारपाई थी, जिसके ऊपर नर्म बिछौना बिछा एक कोनेमे मेजपर सुराही और पासम एक कुर्सी थी। अनाथने पहली बार इस तरहका कमरा देखा था। उसने सोचा, शायद बोलपोविकोकी बालशाला यही है। यदि उस समय कोई कहता कि यह बन्दीखाना है, तो अनाय क्रोधमे आकर उसकी जीभ निकालनेके लिए तैयार हो जाता । उसने डेढ महीने पहले पडोसी राजके बन्दीखानेको देखा था । वह बन्दीखाना भेड रखने- वाले होजकी तरह था। अंधरा, गन्दा और काला था। उस जेलखानेमे जिसको बद किया जाता, उसे कपडा नही पहनाते, देख भाल नहीं करते, शरीरसे कपडोको छीनकर नगे बदनपर कमचियां मारते और फिर लाकर बन्दीखानेमे वद कर देते। अनाथ इस प्रकार अपने कमरेका बालशाला समझकर खूब खुश हो रहा था। इसी समय किसीने द्वार खोला चाय, चीनी और रोटी लाकर मेजपर रखी और अनाथको कुर्सीकी और सकेत करते हुए "मा, बैंठ, 7 हुआ था १०७ चाय पी और रोटी खा" कहकर बाहर निकल गया और दरवाजा बन्द कर दिया। अनाथने चीनीको गरम चायमे डालकर रोटी खाना शुरू किया। जब अनाथ पेट भर खाना खा चुका तो द्वार फिर खुला और उसी आदमीने आकर मैजपरसे वर्तनोको उठा लिया और चारपाईकी ओर इशारा करके कहा-यह तेरे सोनेके लिए है । फिर बाहर निकलनेसे पहले उसने बिजलीको स्विचकी ओर इशारा करके कहा-सोनेके वक्त चिरागको बुझा देना। X अनाथने अभिमानके साथ शिर हिलाते हुए बत्तीको एक-दो बार बुझा कर कहा-मैं इसे जलाना-बुझाना जानता हूँ। --मलादीयेत्स, शाबाश-कहते आदमीने बाहर निकलकर दरवाजे- को बंद कर दिया। अनाथ कपडा उतारकर नर्म बिस्तरेपर लेट गया । वह जिन्दगी मे कभी चारपाईपर न सोया था। यहां पहली वार नर्म बिस्तरेपर लेटा था। लेटनेके साथ ही उसे नीद आ गयी । x x पहरेदार लम्बा बूट पहने दरवाजेके बाहर टहल रहा था। उसकी आवाज अनायके कानोमे आयी । खिडकीके शीशोसे कमरेके भीतर धूप पड रही थी। कमरा गर्म था और दिनके बारह बज रहे थे। | द्वाररक्षकने अनाथको कमरेसे बाहर लेजाकर शौच और हाथ-मुंह घोनेसे निवृत्त करा फिर कमरेमे लाकर बन्द दिया । कुछ मिनट बाद शामवाले आदमीने रोटी, चीनी-चाय लाकर मेजके ऊपर रखी । भोजनो- परान्त अनाथ फिर चारपाईपर लेटकर कुछ देर सोचता रहा । फिर उसका दिल उकताने लगा "कहते थे कि बालशालामे पढाते हैं । पढाई कब शुरू होगी ? दूसरे बच्चे कहां हैं ? मैं क्यो अकेला हूँ ?" वह अपनी १०८ जगहसे उठकर दरवाजेके पास गया। उसमे लोहेके छड लगे हुए थे। उसने इनके बीच से झांका, लेकिन लगे हुए शीशेम कोई चीज मली थी, इसलिए बाहर कुछ नहीं दिखाई पडा। फिर उसने दरवाजेको खोलना चाहा, लेपिन वह पुला नहीं। उसे और भी चिन्ता हुई और उसने अपने आपसे कहा--आश्चर्य वालशालाम क्या वच्चेको कोठरीमे अकेला बद कर देते है ? यह बात ठीक नहीं है । बडोसे कहकर इसे हटवाना चाहिए। वह फिर थोडी देर लेटा रहा और फिर उठकर कमरम टहलने लगा। उसका मन आखिरवार दुखी होने लगा । इसी समय खाना देने. वाला आदमी फिर आया। उसके हाथमे मास-सूप और रोटी थी, जिसे मेजपर रखकर वह चायके वर्तनोको लेकर चला गया। आदमीके दर- वाजा खोलकर जाते समय अनाथने टोक्कर कहा-चचा, तुम यहाँके हो ? पढाई यहां कबसे शुरू होती है ? आदमीने पहले अचरजके साथ अनाथकी ओर देखकर कहा-यहाँ पढाई नही होती। -दूसरे बच्चे कहाँ है? -~-यहाँ तेरे अलावा कोई दूसरा बच्चा नही है । आदमी चकित होकर दरवाजा बंद करके चला गया । मनाथ भी -बच्चा और वे पढाईको बालशालाके वारेमे अचरज करते हुए कुर्सीपर बैठा रहा । फिर शोरबामे रोटीके टुकडे करके डालकर खाया और फिर आलू और मासको खाते हुए उसने अपने-आपस कहा-सूप स्वादिष्ट है । एशानकुल बायके घरपर प्रतिदिन एव भेड मारकर खुद खा जाते थे और मुझे ज्वारकी सूखी रोटी दिया करते थे-वह भी पेट भर नही । सप्ताह पखवारेमे एक वार मुझे सूप देते, लेकिन वह भी खाली अघगरम पानी होता । यदि मास देते, तो छुरीसे सारे मासको निकालकर सिर्फ हड्डियाँ देते, जो बिलकुल सूखी लकडीवी तरह सामने आती । यहाँ का सूप भी
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कोठरीमे मैं सोता है, उसके दरवाजे को बुला रखना चाहिए।
स्वादिष्ट है और मास-राड मी विना हड्डी का है।
अनाथने फिर बात करना शुरू किया--"सभी चीजें ठीक हैं,
लेकिन यहां खाने-सोनेके सिवा कोई दूसरा काम नही। ऐसे काम कैसे
चलेगा? और नही तो पासमे एक बच्चा ही होता, कि मैं कभी-कभी
उसके साथ खेलता या बातचीत करता।" थोडी देर कुर्सीपर बैठने के बाद
अनाय अपनी चारपाईपर लम्बा पड रहा ।
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अनाथ पेट भर खाकर निधडक सोया हुआ था । इसी समय पहरे-
दार "आ, मेरे साथ" कहकर उसे फिर उसी घरमे ले गया जहां उससे
पूछताछ की गयी थी।
उस घरमे आज उस दिनके प्रश्नकर्ताके अतिरिक्त और भी दो
आदमी थे । आज भी उससे प्रश्नोत्तर हुए और सबको कागजपर लिखा
प्रश्नोत्तरके बाद प्रश्नकर्ताने पहरेदारसे कहा--' इसे बाहर ले जा,
में फिर बुलाऊँगा। पहरेदारने अनाथको वाहर ले जाकर एक वेंचपर
बैठाया और खुद भी वही बैठ गया । बहुत देर नहीं हुई, कि भीतरसे
बुलानेकी आवाज आयो । अफसरने भीतर आने वाद अनाथसे कहा-
तू अपने घर जाएगा?
-मेरा घर नहीं है-अनायने कहा।
-शायद तेरे भाई-बधु हो, उनके पास चला जा।
--मेरे भाई-बधु भी नही हैं ।
-~-यही सही लेकिन हम यहांसे छोड दें, तो तू कहाँ जाएगा
-मैं यहाँसे कही नही जाऊंगा, मैं यही रहकर पढ़गा । सिर्फ जिस
गया।
7 वहाँ बैठे आदमी एक दूसरेको देखकर हंस पड़े। फिर प्रश्नकत्ताने कहा---यहां पढाई नहीं होती। -क्यो ! कहते थे कि बालशालामै पढाई होती है-अनाथने पूछा। -~-यह वालशाला नहीं है-यहकर प्रश्नकर्ताने फिर पूछा- यदि बालशाला भेजें, तो तू जाएगा -जाऊँगा-अनाथने हर्प, विस्मय और संकोच के साथ कहा। वहाँ बैठे आदमी हंसते हुए आपसमे रूसीमे बात करने लगे। एकने उसमेसे कहा-इस लडकेकी उमर अधिक मालूम होती है, शायद सोलह सालकी हो । इस उमरमे बच्चे बालशालासे बाहर आते हैं, हम कैसे इसे बालशाला भेजेंगे? -~-कद लम्वा है, तो भी इसके कहनेके अनुसार उमर चौदह सालकी है। फिर इस बच्चे के घर-द्वार, भाई-वन्द नहीं हैं । इसे पढाना भी जरूरी है और बालशाला छोडकर कोई ऐसी जगह हमारे पास नही है, जहाँ खाना-पहिनना, रहना-पढना सब हो सके । इसलिए बहुत पशोपेश में न पडकर इसे वालशाला भेजना अच्छा है-प्रश्नकर्ता ने कहा। दूसरे भी सहमत हुए और प्रश्नकर्ताने अनाथसे कहा-तू बाहर बैठ, हम अभी पत्र लिखकर तुझे बालशाला भेजते हैं। अनाथ बाहर वरामदेमे आकर बैठा । कुछ ही मिनटोके बाद पहरे- दार एक कन्वेतं (लिफाफा) हायमे लिए आया और उसे बालशालाकी और ले चला। X X सिपाही अनाथको लिए बालशालाके एक कमरेमे गया और वहाँ बैठे व्यक्तिके हाथमे लिफाफा देकर मनाथको पास पडे गद्देदार दीवान- पर चंठा दिया। .
व्यक्तिने लिफाफेको खोलकर पत्र पढा, फिर शिरको ऊपर उठाकर "बहुत अच्छा" कहकर क्लमसे पत्रके ऊपर कुछ लिखा और उसे अपने पीछेकी फाइलमे टांग दिया। दूसरे क्मरेसे एक और आदमी आया, जो बालशालाका अध्यक्ष था। उसने एक पत्न लिखकर सिपाहीके हाथमे देते हुए कहा-इसे उन्हे दे देना। उस आदमीने पत्रको पढकर अनाथकी ओर निगाह करके अपने मुखिया से पूछा-यही बच्चा है । -यही है-मुखियाने कागजपरसे मुंह हटाए विना कहा । उस व्यक्तिने अनाथ और सिपाहीकी ओर देखकर कहा--"हमारे साथ आओ"--और उनको अपने पीछे-पीछे ले गया । दूसरे कमरेमे एक मेजके पास बैठकर अनाथको भी बैठने के लिए इशारा किया। यह आदमी वालशालाका सेक्रेटरी था। उसने एक रजिस्टर निकाल कर सरदारके दिए हुए पनकी कुछ पक्तियां लिखी। फिर एक सफेद कागज निकालकर उसके कोनेपर मुहर मारकर उसपर भी कुछ पक्तियाँ लिखी। फिर वह घरसे बाहर गया और एक मध्यवयस्का स्त्रीको अपने साथ लाकर उसके हाथमे पत्र देकर अनाथ और सिपाहीको ओर निगाह । करके कहा दीजिए। --इन्हें ले जाइए, बच्चेको बालशालाकी पोशाक पहनाइए, इसके कपडोको सिपाहीको दे दीजिए और इस पत्रको भी इन्हीके हाथमे दे श्वेत-वसना स्त्री अनाथ और सिपाहीको अपने साथ लिए एक कमरे मे गयी। यह कमरा बहुत बडा था। इसमे एक तरफ कपडा टांगनेकी बालमारियां थी। स्त्रीने एक आलमारी खोली। वहां भिन्न-भिन्न आकारके पहननेके कपडे थे । स्त्रीने एक आकारचे कपडेको निकालकर देखा, तो वह छोटा दिखलायो पडा । स्त्रीने उस कपड़ेको रखकर दूसरे कपड़ोको भी मिलाकर देखा भौर फिर बोली:
-इस समय इससे बडी और कोई पोशाक नहीं है। चाहे बड़ी हो या छोटी, इसे ही इस वक्त पहनना है। फिर आकारके अनुरूप दूसरी पोशाक मैंगवायेंगे और सिपाहीकी तरफ निगाह करके कहा- तुम थोडी देर ठहरो, मैं इन सरकारी कपड़ोको बच्चेके शरीरसे उतरवा. कर तुम्हें देती हूँ और वह कपडे तथा अनाथको लेकर एक कोठरीमे चली गयी। सिपाहीको बहुत देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। स्त्रीने अनाथके पहने कपडेको पुराने समाचारपत्र मे लपेटकर सिपाहोके हाथमें देते हुए उस पत्नको भी दे दिया। स्त्री फिर उसी कमरेमे आयी, जहां अनाथ था और उसे साथ लेकर बाहर निकल आयो । सिपाही चला गया था, लेकिन वह होता, तो विश्वास न करता कि यह वही बच्चा है, जिसे वह साथ लाया था। गरम पानी और साबुनसे उसे नहलाया गया था । वालोमे कधीकी गयी थी। हाथ-परके नाखून काट दिए गए थे। मनाथ कमीज सफेद, पतलून सफेद, टोपी सफेद, बूट सफेद और मोजा भी सफेद पहने था । स्त्रीने अनाथसे कहा -जा बडे दर्पणके सामने देख, तू अपनेको पहचानता है ? -मैंने इससे पहले अपनेको शीशेमे नही देखा, फिर आज कसे पहचानूंगा कि मैं दूसरा हो गया !--अनाथने दर्पणके सामने खडे होकर अपनेको देखते हुए कहा यदि मैंने पहले अपनेयो देखा होता तो इस पोशाकमे अवश्य अपनेको नही पहिचानता। जिस समय अनाथ दर्पणके सामने खड़ा था, उसी समय पुली खिडकीके बाहर आकर एक लड़या सहा हुआ। वह बड़े ध्यानसे अनापके प्रतिपिम्परी मोर देख रहा था । यह सड़का मनापसे अधिक . लम्बा और मजबूत था। उसको शकल-सूरत अनाथ-जैसी ही थी, अर्थात् उसकी आंखें अनाथकी आंखों-जंसी काली, चेहरा उसी तरह आरक्त श्वेत, बाल उसी की तरह और हाथ भी वैसे ही स्वच्छ थे। लड़का कुछ देर अनाथके प्रतिविम्बको देखकर दरवाजे के सामने गया और उसने "मौसी! भीतर आ सकता हूँ?" कहते हुए भीतर आनेकी आज्ञा मांगी। महिलाने लड़केकी तरफ देखते हुए कहा--आ सकते हो। लड़का कमरेके भीतर आया । अनाथ पैरकी आहट सुनकर दर्पण- से मुंह फेरकर उसकी तरफ देखने लगा । आगंतुक लड़केने थोड़ी देर अनाथकी ओर देखकर खड़े होकर पूछा : ~क्षमा करना, साथी ? तू कही चचा मुरादका पुन अनाथ तो नही है ! अनाथ एकाएक अपने और अपने बापके नामसे परिचित व्यक्ति- के न हसे प्रश्न सुनकर आश्चर्यमें आ गया---इतने आश्चर्यमे आ गया कि जवाब देना ही भूल गया और प्रश्नकर्ताको ओर विस्मित दृष्टिसे कुछ देर देखता रहा । फिर "एय् तू मेरा कुर्शन भाई ! क्यों, तू मेरा अकागान (बड़ा भया) क्यों" कहते हुए उसकी ओर दौड़ा। दोनों नव- तरुण एक दूसरेसे आलिंगन-चुम्बन करने और मिलनेके बाद कुशल-मङ्गल पूछने लगे। सबसे पहले कुर्बानने कहा : ~पहले बता, कहाँ रहा, तेरी मां तो स्वस्थ प्रसन्न है ? यहाँ क्या काम कर रहा है? -~-मुझपर क्या बीती, इसे मत पूछ । उसे बताने के लिए रातों की जरूरत है, या दिनोंकी, सूर्यास्त होनेता । जिस वक्त मैंने मौको छोड़ा, वह ठीक थी, जिन्दा थी, लेकिन जिन्दा होते हुए भी करके अन्दर थी । मैं इसी बालशालामें आकर ठहरा हूँ-अनापने जवाब देकर फिर पूछा- अपनी यतला, तेरा क्या हाल है ? मां-बाप सलामत ५ ११४ तो हैं ? विशलक (गांव) का क्या हाल है ' तू यहाँ क्या काम करता फिर रहा है? --मेरे शिरपर बडी बडी बलायें आयी हैं । बासमचियोने मां बाप- को मार डाला, गांवको भी जला डाला। उन घटनाओके बारे में क्या कहे अवश्य रात चाहूँ तुझसे दिल की मैं रोऊँ और तू हंसे अकेला तू और अकेला मैं होऊँ । फिर कुर्वानने आगे कहा- मैं इसी बालशालामे परवरिश पावर, लिख पढकर कम्सामोल ( तरुणसभाई ) बना हूँ। यह बालशाला सीमान्तपाल कमसोमालोवे अधीन है । मैं यहां उसीकी ओरसे कुछ कामो की जांचके लिए आया हूं-फिर कुर्वानने अपने हाथको अनाथकी ओर बढाते और उसके हाथको मजबूतीसे पक्डे हुए कहा-खैर अभी तू सतामतसे रह, यहां खातिरजमा होकर रह । अभी कम्सोमोल- सस्थाके कामसे जा रहा हूँ। फिर खूब देरतक बैठर आपबीती और अपने दिलवे दर्दकी बातें कहे-सुनेंगे। कुर्वान चला गया । अनाथ सोचने लगा-वह फंसा स्थान है यम्सोमोल लोग कैसे होते हैं, कि कुर्वान उनम शामिल हुआ है, और इस स्वतन और यडी बालशालाकी देखभाल वह कैसे करते हैं? २ कुर्बानके पिता रूजीमुरादका क्या हुआ ? रूजीमुराद धुखाराकी और मजदूरी करता था। जब भी पांच छ तवा बचा पाता, गांवमे आवर अपने बीवी-बच्चाको देवर उनके धान पोनेवा इन्तजाम करता मौर फिर वामपर चला जाता। वह इसी तरह एक बार वुमारासे अपने गांव आ रहा था कि उसे पानीस बहके आयी मुरादती सारा देखनेको मिली। उसने लागो पहचान ?
लिया और यह भी जान लिया कि मुराद नदीमे गिरकर नही मरा, बल्कि गोली मारकर उसे पानीमे डाल दिया गया, क्योकि वहां बगल- से गोलोके निकल जानेवा छेद मौजूद था । इम खबरको वह अपने गांवमे ले गया और बहुत पूछताछके बाद उसे निश्चय हो गया कि मुरादको एशानकुल बायकी आज्ञासे शावुलने मारकर नदीमे फेंक दिया, लेकिन उस समय वह अपराधियाके विरुद्ध कुछ नही कर सरा, क्योकि अरमीकी सरकार और उसके अमलदार बायोकी हिमायत परते थे और गरीबोंके उनके विरुद्ध कुछ भी कहनेपर जमीन-आसमान एक कर देते थे, लेकिन जब अमीर भाग गया और बाय भी भागनेके लिए तैयार हुए उस समय उसने गांववे गरीवोमे उनके विरुद्ध भाषण दिया और अपराधियोका नाम साफ खोलकर कह दिया। जव बुखारा और तिर्मिजके वीच रेनकी सडक बन रही थी, उस समय रूजीमुराद सडक बनानेवाले मजदूरोम काम करता था । जव रेल तैयार हो गयी और ट्रेन चलने लगी तो तिमिजके डिपामे वह शारी- रिक श्रमका काम करता था। कुछ समय इसी तरह काम करता रहा, फिर डिपोरे मिस्त्री-लोहारका अन्तेवासी वना और अतमे स्वय मिस्त्री बन गया। फरवरी और अक्तूबर (१९१७) की क्रान्तियोमे रूजीमुराद तिगिज़ के रेलवे मजदूरो और उनके साथियोके साथ हो गया। वहां उसे राज नीतिक शिक्षा मिली वर्ग चेतना जगी और वह आगे बढा । इसी समय उसने एशानकुल बाय और शाकुल द्वारा मुरादको हत्याको वर्ग स्वार्थके कारण समझा और हत्याके असली अभिप्रायको गरीबोको समझाते हुए वहा कि क्यो हम वायोके आधीन है, उनके हुकुमको बजाते हैं और बाय जो कुछ मांगते हैं यहां तक कि स्त्रीतर से भी इन्कार नहीं कर सकते । यदि बायोकी बात नहीं स्वीकार करते, तो हम दुनियाम जी नही सक्ते और हमारी दुर्दशा वही होती है, जो मुरादयी। जिस समम जीमुराद तिर्मिजके डिपोमे काम कर रहा था, उसी समय बुखारामे पोलिसोफ-काड हुआ। इस घटनामे जदीदो (नवीनता- वादियो) ने दु साहस, विश्वासपात और झूठसे काम लिया। एक तरफ हम ' क्रान्तिकारी है" कहते हुए जनान्दोलनवा नेतृत्व अपने हाथ मे ले लिया , और दूसरी ओर अमीरसे समझौता गौर मेल-जोलकी बात चला- कर जनक्रान्तिके रास्तेको रोक दिया । अमीरने इस सुलह-समझौतेकी धातसे लाभ उठाकर अपनी ताक्त बढायो, अपने विरोधी मेहनतकशो. का नाश किया और उन मेह्नत शोको घर-घरसे एक एककर पकड लिया जो अभी सगठित नहीं हो पाए थे, क्योकि वह अभीर और शोपकोंके प्रति शत्रुतावा भाव रखते थे। जव बुखाराको जनताको सहायताकेलिए महान् रूसी जाति और उसकी लालसेना आनेको हुई, तो अमीरने बान्तिाा विरोध करते हुए अपने राज्यये भीतरपी सभी रेलवे लाइनोको वर्चाद परा दिया और बडी वर्वरतासे रेलवे मजदूरो और उनके वोबी वच्चोयो मरवाया । इसी समय युवारा तिमिजके रेलवे मजूरी और उनके बीचो बच्चा खूनसे अमीरके यादमियोंने हाप रंगे । इस खूनी काडसे जीवित बचे रेलवे मजदूरोम रूजीमुराद भी था। उसने रूसी मजदूरो और वोलशेविर पार्टीसे सम्बन्ध जोडवर दुपाराके इलाये मे मेहनतकश जनताको अमोरके विरुद्ध भडकाया और आदो- समवा वाम दिया । बुखारा प्रातिमे उसने हथियार लेवर भाग लिया। पूर्वी-युपारा ( आधुनिर ताजिकिस्तान ) मे लाल-गोरिल्लोंमे होरर लालसेनाये साथ अमीर और उसमे आदमियो विरुद्ध सहता रहा। जव अमीर भाग गया, तो बायो और मुरलीये यहाासे लोगोषो सजग परते हुए गांव-गांव पूमता रहा। इस वामो यतम हो जानेपर वह अपने गांवमें गया, पांच अफ्गानिस्ताापी सीमारे पास पा और उसने यह भी मेहनतय गोंमे यायो प्रभावका हटानेरा पाम दिया। रीमुरादने मेहनतपशीको सिपं यायोरे प्रभारी मुक्त परने. पाहो पाम नही रिया, बल्कि यह गौवरी भाग गए, यापोरीधरती-पाणी और येरे सामाना गरीगो हारारमिए भी
काम करने लगा, लेकिन वह इस वामको अधिक समय ता नहा कर
सका । जल्दी ही अमीर उसके अमलदार बाय और जदीदाने ग्राम
मचीगरी (जहादी डकैती) का सगठन किया और व पाविस
विरुद्ध, गरीबोवे विरुद्ध सारे मेहनतकशाके विरुद्ध हायर सदर
बनकर गांवको आबाद करने के लिए कोशिश करनेवाला
वहाने लगे। एशानकुल वाय और शाकुल भी अफगानिस्तान
वहाँसे हथियार जमाकर बासमचियोको देते । उनि म
वासमचियोंको अपने गाँवपर- जहाँ कि रजीमृग wire
गरीव काम कर रहे थे-भगा लेकिन मजा?* प
चाप बैठा नही रहा । उसने रायन् (तहमीन) 237
(रेवोल्युश्नरी कमेटी-क्रान्तिसमिति) मम m frren
गांवके गरीब किसानो और मजूराया पद
३
गया।
सुस्तानेकी छुट्टी दे दी और स्वयं भी अपने घरमै भापर आगवे सामने
बंटवर रोयो गर्माने और पपडोको सुपाने लगा। इसके बाद यह सेट
दूरसे बन्दूक्पो आवाज आयी, जिसने रूजीमुरादयो जमा दिया।
पपहेको उतारा नहीं था, इसलिए वह जागनेये साधही यन्दूपयों हायमे
सेपर घरसे बाहर निक्लपर रिजलोरी तरह दोष्ट पटा।
धोरस्तेपर पहुँचा । गायये बाहर नियुक्त पहरेदारोमेमे एग पोरी
दोहाता रूजीमुरादके पास आपर योला-हम अपने नियत स्पानमे
पहरेदारी पर रहे थे । इगी समय बारामपियोने एमाएष आप्रमण कर
बन्दूप चलाना शुरू पर दिया । मेरा साथी पहली ही गोलीरो गिर पा
और मैं पर देनेपे लिए पहा दौर आया।
इस समय तर गाय पारी औरसे यन्दूपरी आवागे गुनायो दो
सगी । स्वपरागर। एप-एप परपे आपाज देनेगी नहर न पड़ी।
ममी यन्दूपी पहनी यावाज सुनते ही जाग उठे और पहरेदार मानी
घातकी रचीमुरादसे पूरी तरह यह भी नहीं पाया रि राय यहां नमा
हारर रजीमुरादपी यासारी प्रतीक्षामे गड़े हो गए रसीपुरानो उन्हें
पुरारियोम बोट, हर ए पीपर यहादुर नयाग। नेता यना,
मायरे एस एन रप भला और स्वय भी एर दारी मेपर मरर
गया, रियर यागपियोंी पहरेदारनो मारा था।
म्जीमुराद भभी मावगं पारर महरिमा पाfrगगमनी स्पिानी
परे। या यो पेसर नारेपार पर मान पर दे और
'माने कि मालारा सारर 'मार गिगानी बगपी, पर)
मेसा तगगली नीट मारहानगुगारोतरह मारे
र भाामा पिता भी मारे मदर भाग गरेर
भरपर सजिम न मानी मोर
एरापा
पा,irlो पान सहनही समrt.
मुगीरमा पार गया।
११९ रूजीमुरादने अपने सवारोको गांवकी दूसरी ओर यबर लेनेके लिए भेजा और स्वय अपने पियादा साथियोके साथ भागते हुए बासमचियोका पीछा किया। यासमची घोडेपर सवार थे। पियादा भला उन्हे कैसे पा सकते थे, और देरमे वे आँखोसे मोझल हो गए। रूजीमुरादने एक ऊँची सी जगहके ऊपर जाकर मोर्चा जमाया और खुद गांवको चारो ओरकी खबर आनेकी प्रतीक्षाम ठहरा रहा । अब हिम वर्य बद हो गयी थी, आकाश खल गया था, अन चले गए थे, सितारे गसकी बत्तियोकी तरह चमक रहे थे, लेकिन सर्दी बहुत अधिक न होनेपर भी काफी थी। विशेषकर ठडी हवाका झोका वफवे टुकडोकी तरह मुंहपर लगकर फडफडाहट पैदा कर रहा था। तो भी मर्दो इतनी नही थी कि कीचड जमकर बर्फ बन जाती। हाँ, पतले कपडेवालो का शरीर अवश्य काँप रहा था । बहुत समय नहीं बीता कि गाँवकी चारो ओरको खबर लानेके लिए भेजे गए स्वयरक्षक आने लगे और उनके कथनानुसार सब जगह शाति थी। बासमचियोका कही पता नहीं था। उन्होने और किसी जगह के आदमी पर आक्रमण नही किया। खबर देनेवालोने यह भी कहा -जान वि पड़ता है वासमचियोने हमे धोखा देनेके लिए हमारी शक्तिको बिखेर देनेके लिए गांवके चारो ओरसे हमला किया, नही तो उनका सारा बल इसी ओर लगा रहता। सवार दूर-दूरतक गए, लेकिन उन्होने एक भी बासमचोको नही देखा। रूजीमुरादने इस खबरको सुनकर कुछ सन्तोष प्राप्त किया, लेकिन तो भी वह निश्चिन्त नही हुआ, बल्कि उसने अवसरसे फायदा उठाकर मागेके आक्रमणका अच्छी तरह मुकाबिला करनेके लिए तैयारी शुरू कर दी। उसने गांवके चारो ओरके रक्षियोके पास आज्ञा भेजी कि महत्वपूर्ण स्थानोपर डीठा रखकर स्वय गांववे केन्द्रमे जमा हो जायें । रूजीमुरादने .
१२० अपने स्थानपर देखभाल रखनेके लिए भी आदमीको रप अपने आदमियो के साथ गांचकी ओर लौट गया। x X x रूजीमुरादने गांवकी मस्जिदके सामने बूढे-जवान, हथियारबन्द एव निहत्थे--सभी गांववासियोको जमा किया । फिर उनके सामने बोलते हुए कहा : -दुश्मन अभी जिन्दा है, सख्या और शक्तिमे भी बड़ा है । उसके एक वार हारकर भागनेसे निश्चिन्त होना धोखा और बचपना है, इसलिए जो भी हथियार उठा सकते हैं, उन्हे सैनिक शिक्षा लेनी चाहिए। -सबके लिए हथियार कहाँ हैं वि सैनिक शिक्षाया अभ्यास करें? --बीचमे टोक्कर एक आदमीने कहा। -ठहर जा, मैं स्वय बतला रहा हूँ कि हम कैसे शिक्षा ले सक्ते है-रूजीमुरादने कहा--जिन साथियोंके पास बन्दूक हैं और जिन्होंने बन्दूक चलना अच्छी तरह सीख लिया है, वे अपनी बन्दूकें उनके हाथमे दे दें, जिन्होने अभी बन्दूर चलाना सीखा नहीं है । इसके बाद वे खुद फावडा और बेलचा लेकर गांवके चारो ओर मोर्चावन्दीके लिए खदक खोदें । इसी बीच हम रायन्मे आदमी भेजकर हथियार मांगते है और सबको हथियारवन्द करते हैं । रूजीमुरादके बाद एरगश वेदांतने उसका समर्थन किया और उसके बाद एक और आदमीने भी यही यहा । अन्तमे ग्रामवासियोरे करतल- ध्वनिके साथ रूजीमुरादकी बात स्वीकार की गयी। इस निश्चयके अनु- सार जिन्होने इस लडाईमे भाग लिया था, वे खदक खोदनेमे लग गए और दूसरे बन्दूक चलाना सीखने लगे। १२ घण्टोमे काफी काम हुआ । कितनी ही खदक खोदी गयी। उनके सामने मिट्टीवा ढेर खडा हो गया।
१२१ अब बन्दूक्-न-छुए लोगोके हाथ भी बन्दूक्यो आवाजसे नही कांपते और वे कितने ही निशाने लगा लेते। रूजी इस कामसे बहुत खुश हुआ । उसने लोगोको खाना खाने और आराम करनेके लिये दो घटेकी छुट्टी दे दी, और स्वयं भी पाना खाने चला गया। X X x रूजीमुराद अभी पाना पूरी तरह खा भी नहीं पाया था कि एक पियादेने उसके पास आवर गुप्त खबर दी। मालूम हुआ कि इस गाँवसे २० मील दूर एक दूसरे गांवमे बासमची छिपकर कूच करनेवाले हैं। ये उस गांवने अव सक्कालके परमे गुप्त सभाये करने हैं-अकसक्काल मुंहपर पर्दा डालकर अपनेयो सोवियत सरकारका शुभचिंतक बतलाता था। बासमचियोने अपने आदमियोवो हथियारबन्द करके सीधी कूच करनेका निश्चय किया है? -~-यासमचियोने हपिपार कहाँ से पायेरूजीमुरादने पूछा। पियादाने उत्तरके अनुसार बासमचियोको सबसे अच्छे हथियार पडोसी देश ( अफगानिस्तान ) से मिले हैं, जो हथियार उनके पास भेजे गये, उनमेसे कुछ सीमान्तपालोवे हाथमे भी पहे, लेकिन, तब भी भगोडोके भेजे बहुत-से हथियार उन्हे मिले है। इधर उन्होने अपने आदमियोके अपने यहाँसे हथियारवन्द होनेके लिये बहुत कोशिश की। कहते हैं--"चाहे हमे पिसी चीजसे हाथरोकना पडे, लेकिन हथियार जमा करनेसे हाथ नहीं रोकना है।" पियादाने बतलाया कि उस गांवके गरीबोने वासमचियोको तयारीकी खबर पाकर पासके गाँवमे खबर भेजी और इस तरह वह उसके गांवमे पहुंची, जहाँसे आदमीने आकर रूजीमुरादयो खबर दी। रूजीमुरादने इस खबरसो सुनकर एक ओर तैयारी करनेमे शीघ्रता १२२ । कर दी और दूसरी तरफ रायन् (तहसील) की रेव्यम्क पास हथियार लानेके लिये आदमी भेजा। दूसरे दिन काम याद गांववे चारो आर खदक और मोचाव दी हा गयी। पदक बनानेम पुराने गडढोने भी काम दिया । एक लम्बा चौडा गडढा था जो कंची जमीन और सरफडासे चारो आर घिरे जन पूर्ण कूलकी तरहता था और गांवको प्राय चारो औरस घेर हुए था । इस गडढेको थोडी मेहनत से खोदकर पानी भर दिया गया। वदूक्का अभ्यास भी इच्छानुकूल हुआ। गांवके जितने लोग बदूव' उठा सकते थे सबने वारी वारीसे बदूक चलाना और निशाना लगाना सीख लिया। गांवर लागोके अपनी रक्षा करनेम यदि कोई कमी थी तो सिफ बदूक और गोलियोकी जिसकी रायन्से आनको आशा थी लेकिन रायनसे निराशाजनक खबर आयी। वहां भेजे हुये आदमी खाती हाथ लौट आये । उह रे कम (क्राति समिति ) के अध्यक्षने बत लाया गांवपर वासमचियोक एकाएक आक्रमणकी खबर निमूल और झूठी है। इस तरहकी खबरोको स्वय वासमची फैला रहे हैं । उनके ऐसा वरनेका उद्देश्य यह यह है कि गाववाल डरकर रायन्स बन्दूक मार्ग, रायन की वन्दूकें गावोम बिखर जाँय और रायन् बेथियार या कम हथि यारका हो जाय, जिसमे व आसानीसे रायन्पर अधिकार पर सकें। अध्यक्षने और भी कहा जब रायन् बासमचियोके हाथ मे चला जायगा, तो गाँव स्वय उनके अधीन हो जायेंगे । इसीलिए रायनके हथियारोको गाँवम विषैरना ठीक नहीं है। यदि किसी गांवपर सचमुच आक्रमण होनेकी सभावना हो, तो रे-वम्को खबर दें। वह सिफ हथियारसे ही मदद नहीं देगी, बल्कि हथियारबद दलोको भी भेजने के लिए तैयार मिलेगी। रूजीमुराद रेव-कम्के अध्यक्षके उत्तरको सुन सदेह मे अवश्य १२३ पड़ा, लेकिन निराश नहीं हुआ। उल्टे, गाँवके गरीबोंकी शक्तिपर भरोसा करके रक्षाको तयारी और जोरसे करने लगा। ४ मोर्चाबंदी तैयार थी । हथियारबंद जवान खाइयोमे बैठे थे। नए-नए बंदूकची अपने हाथों में कुदाल-बेलचा-फरसा आदि किसानोके हथियारोको लिए सुरक्षित दल बनाकर बैठे थे। रूजीमुरादने घोड़ेपर चढ़कर खाइयो और उनमें बैठे जवानोंको घूमकर देखा और फिर ऊंची जगहपर अवस्थित केन्द्रीय मोर्चपर जा बैठा। वह रात शान्तिसे बीत गयो। नीरवताको भग करने के लिए जब तक घोड़ोके खुरोंकी ध्वनि "और जागो, होशियार रहो" की आवाज सुनायी देती रही। लेकिन, सूर्योदयसे दो घटे पूर्व गांवके छोरोसे जगह-जगह एक्का- दुक्का दगती बंदूकोंकी आवाज सुनाई देने लगी। इसके बाद दूतोने आकर रूजीमुरादको खबर दी, कि गाँवसे दूर बासमचियोंकी कालिमा दिखायी 'पड़ रही है और वह इक्का-दुक्का बन्दूक भी चला रहे हैं । अब रूजी- मुरादके सामने भी दूर बासमची दिखलायी पड़े । वह धीरे-धीरे उसके मोर्चांकी और आ रहे थे। रूजीमुरादने अपने आदमियोंको बंदूकें साधकर दागनेके लिए तैयार रहने का हुक्म दिया । जब बासमची उचासके पास आकर गांव- की ओर घूमनेको हुए तो उसने बन्दूक चलानेकी आज्ञा दे दी। स्वयंरक्षकोंमेंसे अगली पांतीवालोने एक बार ही बंदूकें सलामी देने की तरह दाग दीं । एक घोड़ेपरसे गिरा । उसका घोड़ा गांवकी और भगा, और दूसरे घोड़ोंको मोड़कर पीछेको ओर भगे। उचासके किनारे बैठे स्वयंरक्षकोने रूजीमुरादकी आज्ञासे भागते हुए बासमचियोंपर गोली चलायी, लेकिन बासमची गोली को मारसे दूर .
१२४ हो गए थे। इसके बाद रूजीमुरादने गोली मारना बन्द करा दिया। सूर्योदयके बाद बासमचियोके एक बड़े दलने भिडेके नजदीक आकर गोली चलाना शुरू कर दिया। स्वयरक्षकोने भी जवाब देना शुरू किया, लेकिन गोलियां एक-दूसरेके पास नहीं पहुंचती थी। कारतूस कम हो रहे थे और गोली चलाते रहनेसे डर था कि कही सारे कारतूस खतम न हो जायें, इसलिए स्वयरक्षकोंको रूजीमुरादने बासचिोंके नजदीक आनेतक गोली न चलानेका हुक्म दिया। साथही उसने गांवके ऊपर आक्रमण होनेको खवर देकर हथियारबंद आदमियोको लानेके लिए एक विश्वस्त और होशियार आदमीके तौर पर एरगश् बेदांतको भेजा। सूर्योदयके बाद बासमचियोने कई बार आक्रमण किया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ । जब भी वह नजदीक पहुंचते, मैदानमे दो-तीन लोगोको मारकर भागनेके लिए मजबूर हो जाते । धीरे-धीरे रूजीमुरादके पास कारतूस बहुत कम रह गए और इसका अनुमान बासमचियोको भी होने लगा। उन्होंने कारतूसोंको और भी जल्दी खर्च करानेके लिए लगातार एकके वाद एक चढ़ाईकी और गायके दूसरे भागोंपर भी आक्रमण किया, जिसमें वहाँके रक्षी भी अपने कारतूस पर्च करें। बहुत देर नहीं हुई कि वहाँसे भी कारतूस मांगनेके लिए आदमी रूढीमुरादके पास आने लगे । रूजीमुराद रामन् से कारतूस आने- को पात फहकर विश्वास दिलाता रहा । कुछ समय बाद गांवके उस वरफके स्वयंरक्षक, जिनके कारतूस खतम हो गए थे--एकके पीछे एक याकर-रूजीमुरादके सामनं जमा हुए। उचासपर लड़नेवाले हाथ बहुत पे, लेकिन कारतूस नहीं थे, कि इन हाथोंसे फायदा उठाया जा सके। यासमचियाने वे-कारतूसवाली जमातको चारों मोरसे पर लिया और बड़े जोरसे आक्रमण करना शुरू किया। स्वयंरक्षकोयो गोलियां सुस्त पड़ने लगी । बहुतरो मोचोंपर स्वयंरक्षकाने बंदूक सुन्दों, वेलचों १२५ X और फरसोंसे दुश्मनोंको पीछे हटाया । रूजोमुरादने जल्दी कुमक आने- की बात कहकर दांत और नाखूनसे भी लड़ते रहनेकी आज्ञा भेजी। x X आशा वेकार गयी, रायन्से कोई हथियार या हथियारबंद आदमी नहीं आया। एरगश् वेदांत सरकंडोंके बीचसे होता गड्ढे के पानीके पार हो बड़ी निराशाजनक सबर लाया । एरगश्ने वतलाया कि रेव- कम्के अध्यक्षने हथियारबंद आदमीके न करनेवी बात कहते हुए जवाब दिया। -~-वासमची रायन्पर भी आक्रमण करनेकी तैयारी कर रहे हैं, इस- लिए हथियारबंद आदमीकी बात तो अलग, एक कारतूस भी गांवमें भेजना असंभव है। जिस समय एरगश् अपनी मांगको फिर दोहरा रहा था, उसी समय अध्यक्षके नौकरने आकर कहा-केन्द्रसे बुखारा-जन-पचायती-प्रजातंत्रके वकील-मुख्तार (अध्यक्ष) का आदमी आया है, वह आपसे एकांतमें बात करना चाहता है। अध्यक्षने एरगश् बेदांतको बाहर बैठनेके लिए कहा और वकील- मुख्तारके आदमीको लानेके लिए कहा । आदमी आया और दो-तीन मिनट बात करके दोनों हवेलीके बाहर आए। वहाँ अध्यक्षने अपने आदमियोंसे "सब सवार हो जाओ और हमारे साथ चलो, यहाँ निहत्थे दो स्थानीय पियादा पहरेके लिए रहेगे" कहते हुए स्वयं भी घोड़ेपर सवार हो गया। एरगश्ने उसके पास जाकर पूछा-क्या करूं? मुझे क्या जवाब देते हो? --तू यही व्हर, मैं एक घंटा वाद आ रहा हूँ, फिर तेरे कामके बारे- में वात करूंगा--कहकर घोड़ा हाकते हुए वह रेव्-कम्-खानेसे बाहर चला गया । उसके पीछे उसके आदमी भी घोड़ों पर सवार होकर रवाना हो गये । अध्यक्षके चले जानेके आध घंटे बाद पियादा, सवार, निहत्थे ।
१२६ और हथियारबंद बासमचियो एक भारी दलने आकर रेव्-नम्-खाने को घेर लिया। वासमचियोका कूरवाशी (सरदार) चबूतरेपर आया, और कालीन तथा गद्दा विछवाकर उसपर अमीरके हाकिमोकी तरह पालथी मारपर बैठ गया। उसके अनुचर चबूतरेके नीचेकी ओर उसी तरह हाथोयो छातीपर रस कर खडे हुए, जिस तरह अमीरवे हाकिमोवे नौकर रहा करते थे। - सभी चीजोको जमा करो-कहवर करवाशीने अपने आदमियो को हुक्म दिया। वासमची मानो अपनी छिपाई चीजोको ही ला रहे थे। उन्होने जावर घास फूस और लक्डीयो हटाकर उसके नीचेसे सद्को, पेटा- रियो, बंधे गट्ठरो और दूसरी चीजोको एक-एक करके लाकर कूरबाशीके सामने रखा। फूरवाशीने अपने पीसेसे कुजियो वा गुच्छा निकालकर अपने आदमीको दे गोदामके दरवाजेको सोलनेके लिए कहा-हर चाभीको तालेमे लगाना जिसमे ताले खगब न हो। कूरवाशीने अपने सामनेवे यादमीको सदूकें और दूसरे गट्ठरो- को खोलनेके लिए पहा । उनके भीतर से जो बदूकें, तमचे, कारतूस और तलवारे निक्ली, उन्हे देखते हुए उसने हाथके कागजपर नजर दौडायी। एरगश बेदांत चकित होकर देख रहा था। इसी समय कूरवाशीकी नजर उसपर पड़ी और उसने उससे पूछा-तू कौन ? यहाँ क्या काम करता है। एरगश्ने जवाब गढवर कहा-मैं रेव्-कम्वे अध्यक्षका आदमी हूँ। वह मुझसे "वेगवे आनेतक तू यही रखवाली करता रह" कहकर गये हैं। बहुत अच्छा-कूरवाशीने कहा-वेग आ गए। अब यहां रे कमरे मध्मदारे भावमीती पहरेदारीनी बिलकुल भावश्यनता नहीं है ।
१२७ अपने हायकी वदूक और कारतूसोको इधर ला और खुद अपने स्वामी पीछे सही सलामत चला जा। एरगश्न बदूव और कारतूसको सौंपवर घोडेवे पास जाकर उसे खोलना चाहा । इसपर धुरवाशीने पहा-पोडा हमें चाहिए तू पियादा, अपने अध्यक्षके पास चला जा। X X एरगश् वेदांतने रेव-वम् खानेसे निकलकर रास्ता लिया। वह जल्दी से जल्दी गांव जापर इस भयानक पपरको रूजीमुरादको देना चाहता था, लविन विना घाडा वह अपनी इच्छायो वायरूपम परिणित नही कर सकता था। तो भी सारी ताकत लगाव र वह दौडने लगा और यदि शीघ्रगामी अपरवी तरह नहीं तो राह चलत साधारण घोडेको गतिसे तो वह अवश्य ही चला । अभी वह आधा रास्ता भी नही ते पर पाया था कि थक गया और एक चश्मेके किनारे बैठकर पानी पीकर आराम करन लगा। चश्मा बह रहा था और उसके नीचेवी और हरियाली थी। एरगर वहां बैठे-वैर अपने पैरोको मल रहा था कि इसी समय न जाने कहाँ से एक स्त्री आ गयी । स्त्री जवान थी। उसकी आँखें-मोहे काली, केश लम्वे और मुंह बहुत सुन्दर था । उसके हाथमे एक कूजा ( सुराही ) था, जिससे मालूम पड़ता था कि वह पानी लेन आयी है। स्त्री चश्मेके नजदीर पहुँची तो उसकी नजर एरगश्पर पड़ी। वह जरा ठमक गयी और शिरपर बंधै रूमालको मुहके ऊपर खीचकर उसके एक कोनेसे झांकरर एरगश्की ओर जल्दी-जल्दी देखने लगी। एरगश स्त्रीवी लज्जाको देख, अपनी आंख को उधरसे हटा, अनजान बनकर अपने पैर मलने लगा । स्त्री उसवी शिष्टताको देय हिम्मत कसे चश्मेके पास भामी और कुजेको जमीनपर रखकर उसने एगणी १२८ पूछा-चचा देखा? इधर आसपास किसी वाममचीसो तो नहीं यहां नजदीक तो नही देया लक्नि रायन्को उहोंने ले लिया। -गुदा जत्दी इनयो तबाह परे और इनपे परोको जलाए । ये लोगार घरायो जाते हैं--पहर स्त्री परमेपर जाकर कूजा भरा और फिर अंजुनीसे पानी पिया। --तुम्हार गांवम वासमधियान क्या किया?–एरगशने पूछा। स्त्रीन भरे पूरी चश्मस बाहर परव किनारेपर रखा और स्वय सही होवर जवाब दिया-हमारे चल धन और चारपायाको लूटा स्त्रिया तहपियायो बआवरू किया, विरोध करनेवाले दो आदमियाको मार डाला और तीन आदमियाका वदी वनावर कूरवाशाके पास ल गए । गांवके दूसर मद पहाडकी ओर भाग गए हैं । स्त्री वात रोक्यर कूजको उठा अपन क्धेपर रखा और एक हाथसे फूजके हत्थे का पक्डरर फिर कहना शुरू किया--एक रात दिन हो गया । बच्चान पानी नहीं पिया उनके मुहको सूखा देखकर हजार तरहका भय खाती पानी लेने आयी हूँ। क्या घरमे कोई मद नहीं है कि ऐसे भयानक दिन पानी लेने आयी हो तुम-एरगशने पूछा। ----मद है लेकिन वह मुझे और बच्चाको एक गुफामे छिपाकर स्वय पहाडकी चोटीपर भाग गया है। हमारे पास एक भेडी और एक बवरी थी। उह भी भगोडे बासमचियो के हायसे बचानेके लिए अपने साथ ल गया-कहते हुए स्त्री चश्मेके किनारेसे घाटकी ओर होकर बडे रास्तपर चल पड़ी। इसी समय दूर एक सवार दिखायी पडा। वह एक प्रौढवयस्क आदमी था। उसका पेट मोटा वमरमे तलवार और पीठपर बदूक थी। उसने अपने माथे पर लत्ता बांध रखा था जोकि बासमचीपनका चिह्न था। -लेकिन वहन ?
१२९ स्त्रीने सवारको देखकर कदम तेज किया, लेकिन सवारने दो-तीन चाबुक जमाकर घोडे को दौडाते हुए उसके पास पहुंचकर कहा- 'व्हर।। । दिया-ठहर स्त्री पानी भरे कूनेको फेंककर झाडियोकी मोर भगी। बासमची भी घोडेसे उतरकर उसे एक वृक्षकी डालसे बांधकर स्त्रीके पीछे दौडा। स्त्री जगलके भीतर हवाकी तरह भागी जा रही थी। सवारके हाथ मुंह छिल गए, वर पक गए, वस्त्र फट गए तो भी वह दौडता ही गया, लेकिन वृक्षो और झाडियोके बीचसे वह बहुत दूर जा नहीं सका । बासमचीने देखा कि स्त्रीके पास नहीं पहुंच सकता और वह बदूककी मारसे दूर निकली आ रही है। उसने बन्दूकका निशाना लेकर हुकुम 1" बासमचोकी आवाज सुनकर स्त्री और जोरसे भगी । बासमवीने बन्दूक दाग दी । स्त्रीने बन्दूककी आवाज सुनकर समझा कि गोली उसे लग गयी और वह चिल्लाकर मुह के बल गिर पडी । बासमची शिकारके हाथ आनेकी आशासे इतमीनानके साथ कदम रखने लगा। एरगश्ने चश्मेसे उठकर राह चलते हुए इस दृश्यको देखा । उसे बहुत क्रोध आया, लेकिन उसके पास हथियार नहीं था कि बासमचीपर आक्रमण कर स्त्रीको छुडाता। उसके देखते-देखते बेचारी स्त्री वासमचौके पजेमे पड़ने जा रही थी, जैसे कि मुर्गा सियारके पजेमे पड़े, लेकिन सिवाय गुस्सैसे दांतोंसे मोठ चबानेके वह और कुछ कर नहीं सकता था। इसी समय एरगश्के दिलमे एक विचार आकाशवाणीकी तरह आया । उसकी आंखें चमक उठी और वह "कितना अच्छा हो कि एक जादू से दो काम बने" कहते हुए घोडेकी तरफ लपका और उसे डाली से खोल, उसपर सवार होकर, उसे कोडा लगाकर चिल्लाया-ओ दोपाए भेडिये, खयरदार ! तेरा घोडा हाथसे जा रहा है । वासमधीने एरगश्की आवाजके साथ घोडची टापोकी पटपटाहट सुनी। उसने घूमकर देखा कि सचमुच ही उसका घोडा जा रहा है। वह १ स्त्रीको वही छोड कर रास्तेको और दोहा, लेकिन जबतक काँटों और झाडियोंके बीचसे वह अपने मोटे शरीरको निकाले निकाले तबतक एरगश् बहुत दूर चला गया था। बासमची चिल्लाया "ठहर, नही तो गोली मारता हूँ।" एरगश्ने उसके जवाबमे घोडेको दो कोडे और लगाए और वह पहले से भी ज्यादा दौडने लगा। वासमचीने एकके बाद एक गोलियां छोडी, जिसने घोडेके वेगको और बढानेमे सहायता की। एरगश्ने बदूककी मारस दूर निकल जानेपर एक टकरीपर पहुंच घाडेको रोककर पीछेकी ओर देखा । बासमची अब भी बदूक चला रहा था और स्त्री झाडियोसे निकलकर पहाडकी ओर भागी जा रही थी। एरगश्ने गांवको चारो ओरसे वासमचियोसे घिरा देखा। सिर्फ सरकडेवाले कूलकी और रास्ता खुला था। उसने घोडेको वही छोडकर सरकडोके भीतर और कूलके पानीके बीच गांवका रास्ता लिया और रूजीमुरादके पास पहुंच गया । ५ एरगश् रायन् पहुँचने और रेव-कम्के अध्यक्षके साथ बातचीत करने के अलावा दूसरी बातें रूजीमुरादसे कर ही रहा था कि इसी समय कूलकी ओरसे एक दूसरा पियादा दौडता हुआ रूजीमुरादके पास आया। यह पियादा और भी बुरी खबर लेकर आया था। उसने बतलाया कि बुखारा-जनपचायती प्रजातन्त्रके वकील-मुस्तारले सोवियत-सरकारके साथ विश्वास पात क्यिा है और वह सोवियत-सरकारके सभी हथियारो, तको और अशफियो (तिल्लो) को वासमचियो, सादिर, अन्वरपाशा और इब्राहीम बेकके हायमे देकर चला गया है। रूजीमुरादको यह खबर सुनकर आग लग गयी और उसने कहा-वील-मुख्तार कौन है ? पोडी देर ठहरकर फिर उसने अपने ही प्रश्नका जवाब दिया -वकील मुख्तार तगाय-बच्चा बुखाराका करोडपति है। वह बुखाराके जदीदोका सरदार था और धोखाधडीसे उसने बुखारा जन- सरकारका अधिकार अपने हाथमे ले लिया। मालूम होता है, यह देशघाती पूर्वी बुखाराको हाथमे लेकर वहाँ बासमचियोको संगठित और शक्ति- सपन्न करने के लिए वकील मुख्तार बनकर आया था । कूजीमुराद थोड़ी देर चुप रहकर रे-कम्के अध्यक्षके बारेमे कहने लगा-हमारे रायन्के रेव् कम ( क्रान्ति समिति ) का अध्यक्ष भी बुखाराका एक बाय बच्चा तथा इही देशद्रोहियोका आज्ञाकारी अनुचर सग-बच्चा ( कुत्ते का पुत्र ) है। विशेषकर इन विश्वासघातियोके बारेम सोचते-सोचते रूजीमुरादका गुस्सा भार बढ़ा । उसने मुट्ठी बांधकर हाथको दोनो तरफ हिलाते हुए अपने-आपसे कहना शुरू किया -इन विश्वासघातियोसे इसके सिवा और किसी चीजकी आशा नही हो सकती थी। यदि भेडिया भेड का मित्र बन सकता है, सियार मुगका मित्र बन सकता है, और बिल्ली क्वूतरकी मित्र बन सकती है, तो ये भी सावियत सरकारके दोस्त बन सकते है । अफसोस कि जिन्दगीमे ऐसा होता नही। रूजीमुरादन अपने-आपसे बात करना छोडकर ऊंची आवागम लोगो- - 1 ---साथियो । हमारा क्तव्य यह है कि इन विश्वासघातियोंसे सहायताको बिलकुल आशा न रखकर महान् लेनिन और स्तालिनको पार्टी बोलशेविक पार्टी सोवियत सरकार और महान् रूसी जनता कमकरो- पर भरोसा करें, जनताके दुश्मनो यानी इन : बासमचियो और उनके सहायकोंसे लड़ें और अपने सूनको आखिरी बूंदतक लडें । यदि पियार न हो तो मुंह और नाखून से लडें । यदि हम इस रास्तमैं अपनी जान दे दें, तो हमारे बच्चे, हमारा घर्ग महान् रुसी जनताके वमकरों की सहा- यतासे अपने मनोरयमे अवश्य सफल होगा। साथियो । जब तक जान " है, लड़ते चलो, बढ़ते चलो। -लड़ेंगे, खूनको आखिरी बूंदतक लड़ेंगे, हथियार न होनेपर दांत और नाखूनसे लड़ेंगे-लोगोंने एक आवाजसे कहा । रूजीमुराद जन-साधारण बल पाकर पहलेसे भी अधिक बहादुरी और मजबूतीके साथ लड़ाईके काममें दत्तचित्त हुआ। कारतूसोंकी बहुत कमीके कारण स्वयंरक्षक-दलको हालत बहुत खराब थी। बासमचियोंने मोर्चेको चारों ओरसे घर रखा था। वे खाइयोंकी तरफ गोलियोंकी वर्षा कर रहे थे, लेकिन स्वयं-रक्षक उनकी सौ गोलीपर एक गोली चलाते और वह भी उस समय जबकि बासमची खाई के पास पहुंच जाते। हथियार या हथियारवंद आदमियोंके थानेसे निराश होकर स्वयं- रक्षकोंकी हालत और भी बुरी थी । अंतमें सारे ही कारतूस खतम हो गए और रूजीमुरादके कथनानुसार दांतों और नाखूनोंसे लड़नेको नौवत आयो । बासमचियोंमें जो नजदीक आते, उन्हें वे बंदूकके फुन्दोंसे मारते और जो कोई उनके हाथमें आता उसे पंजोंसे पकड़कर दांतोंसेचीरते या कुदाल-कुल्हाडीका इस्तेमाल करते । धीरे-धीरे रूजीमुरादके साथियोंकी संख्या भी कम हो गयी। मुट्ठीभर मादमी रह जानेपर वह और भी बहादुरीसे लड़ते रहे । अन्तमें खंदकमें रूजीमुरादके साप एरगश् बेदांत रह गया, लेकिन दोनों शेरको तरह लड़ते एक-दूसरेकी सहायता करते, जो भी बासमची सामने आता उसे जीता न छोड़ते । इसी समय बासमचियोंके सरदारने अपने यिगितों ( बहादुरों) को ललकारकर कहा- बाकी बचे आदमियोंको जिन्दा पकड़ लामो। । कूवारी (वकरी-नोच घोडदौड़ ) करेंगे। वासमची हुकुमको सुनते ही रूजीमुराद और एरगशपर चारों ओरसे तीरको तरह टूट पड़े, लेकिन स्जीमुराद "बोलशेषिक जिन्दा, दुश्मनके हायमें नहीं पड़ता" कहते एरगम्के साथ पीठ-से-पीठ मिलाए 1 w आनेवाले बासमीकी खोपडी से खोपडी लडाता और शेरकी भांति मुर्दे- को अपनेसे दूर फेक देता । बासमचियोंने देखा कि उन्हे जिन्दा नही पकड़ा जा सकता, इसलिए उन्होंने चारो ओरसे गोली चलायी । पहिली गोली एरगको छातीमे लगी और वह गिर पड़ा। अब रूजीमुराद अकेला पा और कुछ गोलियोके लगनेसे सुस्त हो मया था, लेकिन दीवारसे पीठ नगाए वह अभी खडा था और उसके शरीरसे खून निकलकर कपडेको, रंग रहा था । बासमचीकी तलवारने उसके शिरका फाड दिया। वह जमीनपर गिर पड़ा। जमीनपर गिरनेके बाद भी गोलियां चलती रही और रूजीमुरादके शरीरमे सिरसे पैरतक छेद ही छैद हो गए । खदकमे जो भी घायल सरक्षक मिला, सबको बास- मचियोने गोली मार-मारकर खतम कर दिया। x x x बासमची अस्थायी रूपसे विजयी हुए और विजयमदसे उन्मत्त होकर पागल बन गए। उन्होंने गांवमें पहरेदार रखे विना लूट शुरू की । गांवके जानदार या वेजान सारे माल लूट लिए। बीमार-बूढे, स्त्री बच्चे जो युद्धमे शामिल न होकर घरमे थे, उन्हे भी लाकर मैदानमे जमा किया और पहरा बैठा दिया। गांवमे न कोई आदमी रह गया, न कोई माल । बासमचियोने घरमे आग लगा दी। सारा गांव जलने लगा और निरपराधोकी आहके साथ आगकी ज्वाला और धुंआ आसमानतक पहुंचने लगा। बासमची गांवके कामसे छुट्टी पाकर पदियोके पास जमा हुए। उन्होंने सुन्दर स्त्रियो और लड़कियोको अलग करके एक तरफ रखा और बूढे-यूढ़ियो और अपने लिए बेकारकी औरतोको खडा करके गोली मार दी। बाकी कितने को ही बकरीकी तरह कूबकारी करनेके लिए अलग कर दिया। बासमचियोंने कूबकारी करनेके लिए एक आदमीको बीचमे रखा 1 - और उसे खीच ले जाने के लिए योड-दौड शुरू करना चाहते थे, कि दूरसे सवारोका झुड आता दिखायी पहा। बासमवियोंने आगतुकोको अपने दलका समझा और उन्हें अपनी विजयका परिचय देनेके लिए बरे शोकसे कूववारी शुरू की। अधमरे वदीके ऊपर सवार टूटे पडे । एक्ने पंर, दूसरेने हाय, तीसरेने दर्दन और पोयेने कमर पकडकर अपनी-अपनी तरफ पीचना शुरू किया । जो दूर ये वह भी घोडेको कोडा लमा कर सिरके पास आकर परहकर खीचने लगे। हर आदमी पदीने शरीरको झुण्डसे बाहर लेजाकर आनेवाले यासमचियोंके सामने भेंटके सौरपर पेश परना चाहता था। इसी समय मुर्देपर कौवोकी तरह भिडे यासमषियोको मशीनगनरी व-न-तनी आवाज सुनायी दी और भागनेसे पहले ही वे सब हाती हिलाये तूतवी तरह जमीनपर गिर पड़े। जिन्दा बचे यासमचियोसो आनेवालोरे यासमधी न होने का पता सब लगा, जबपि उनसे भागनेका कोई रास्ता न रह गया। मागन्तुकोने दौड़ा-दौडी उन्हें पारो ओरसे पेसर उनपर मगोनगनो और यौसे गोली बरमानी शुरू की । अन्समे यासमभी अपने पोओंगो Bाहकर स्नोमुराद पी बनायी यायो मे जाहिर मोर वहाँसे साने लगे, मेशिन आगन्तुर पाइयो पार न नारर दूरसे हपयम पंरने सगे। पुल और धुमा ययारसी तरह जगह-जगह उठने मगा, जिसमे नहा-सही मागमचियोंरे हाय मौर पर माफागमे उडार गिर रहे पै। एर पटेली मसाईरे बाद बहाही सम पासमपी मागरमान पानेमें गरम हुए। मसिगरो नो लिए भी समा मिली। भाग सौंमा तराप बमोमोसोम पेसब उन्हें गोपमें बाग. मगियोरे मामरा ता मया, ताई संमोन शेममोनोरिष भामर रामगोमोनो मेगावएर म बनारमाबरे गांगागी गरापामि दौरा कम्सोमोल-अधिकारियोंने बासमचियोको सफा करनेके बाद बीमारी और घायलोको सीमान्तके अस्पतालमे भेजा । बासमचियोके हाथसे सही सलामत छूटी स्त्रियो-लडकियोंके लिए सीमान्तपर गद्दा तकिया-सिलाई का एक अतेल ( सहयोगी कारखाना ) खोला और बूढो-बूढियोंके लिए रहने, खाने-पीनेका इन्तजाम किया, अल्पवयस्क बच्चोकी परवरिश और शिक्षा-दीक्षाके लिये कम्सोमोलसस्थाके आधीन एक बालशाला भी खोली। उसी दिन जो बच्चे बासमचियोके हाथसे छुडाकर नव-स्थापित बालशालामे रखे गए, इनमे रूजीमुरादका पुन कुर्बान भी था, जिसे अनाथ "अका कुर्बान' (भाई कुर्वान) कहता था। अब इसी बालशालामे अनाथ भी भरती हुआ। 1 यह बालशाला एक अन्तर्जातीय बालाशाला थी, जिसमे जहां ताजिक, उज्बेक, कजाक तुर्कमान-जैसी स्थानीय जातियोके बच्चे थे, वहीं साथ ही रूसी, उक्रइनी, पोल और लतिश जैसी यूरोपीय जानियोंके भी बच्चे रहते थे । अधिकाश बच्चे स्थानीय जातिके थे और इनमे भी अधिकतर वे बच्चे थे, जिनके मां-बापको बासमचियोने मार डाला था। स्थानीय बच्चोमे नारबीविश नामकी लडकीका अनाथके साथ विशेष स्नेह था । वह आयुमे अनाथके बरावर होते हुए भी कदमे अधिक छोटी और शरीरमे अधिक दुर्बल थी । वह अपने काले कटे घुघराले बाला, कुलचाकी भांति गोल गेहुएँ रगके मुख और चमकीली काली आँखोंसे हर किसीकी दृष्टिको अपनी तरफ आकृष्ट करती थी। उसके मुंहपर दो-तीन तिल थे, जिनमे उसकी सुन्दरताको कोई हानि नहीं हुई थी, बल्कि वह स्वच्छ सुवर्णके कपर खुदे फूलकारीके दागको तरह और भी शोभावर्द्धक थे। लड़कीके और दूसरे खास चिह्नोंमे उसके कधेके बीच, वालोंके नीचे एक मटमैले रगकी रेखा थी । गर्दनके पीछे और बालोंके नीचे होनेसे यह . रेखा हर किसीको दिखलाई नहीं पड़ती थी। अगर यह रेखा किसीको दिखलायी पडती, तो लडकीका सौन्दर्य उसकी दृष्टिमे और बढ जाता, क्योकि यह सफेद गर्दनके ऊपर खीची काली रेखा रौप्य स्तभपर अकित अजन-रेखा-सी प्रतीत होती थी। लडकी बालशालामे बडोसे छोटो, अध्यापिकाओंसे नौकरानियोतक और वहां के सभी बच्चोमे सर्वप्रिय थी। क्या खेलनेकी और क्या खाने की सभी जगह लोग उसका विशेष ध्यान रखते थे। उसने इतना सर्वप्रिय होनेका कारण केवल उसका सौन्दर्य नहीं था, बल्कि उसकी जीवन घटना थी। उस बच्चीको जीवन-घटना ऐसी मार्मिक थी कि हर सुननेवाला रोने लगता । उसी जीवन-घटनाके कारण वह बहुत मितभापिणी, विनम्र और गभीर रहा करती थी। यह किसीरों अपनी जीवन-घटना नही सुनाती, लेकिन बालशालामे उसे सभीने रूसी अध्यापिकाके मुंहसे सुना, और एक मुंहसे दूसरे मुंह होते-करते उसे सभी जान गए। नारवीविशका स्नेह सव बच्चोसे अधिक अनाथवे साथ पा । बाल. शालामे उसका कमरा अनापये पमरेसे दूर था, तो भी खेलने वक्त वह अधिकतर अनाथके साथ खेला परती, पानेकी मेजपर अनायकी बगलमै बैठा वरती और विद्या-सवधी पर्यटनोमे उसके साथ चलती। यह अनायसे कुछ साल पहले बालशालामे आयी थी, इसलिए लिखना-पउना अधिक जानती थी और अनाथको भी पड़ने में सहायता देती थी। पढाई खतम होते ही अनाप नारवीविशये पास दौडसा और न-समझे पाठीमो उससे समझता। मारवीबियो मनायी जीवनीने बहुत प्रभावित रिया पा। उसने उसीरे मुघसे सब सुना पार जिस समय अनापने मासे असग होनेये दृश्यका वर्णन रिया, मारवी. रिशने एक सम्बी माह बीपर महा-अपसोस, मेरी मां नहीं है, धौर मेरी मां कोन पी, में यह भी नहीं जाती।
-बाप तो है ? अनाथने पूछा TE: Tri.in ने, 'बाप भी नहीं है और बाप कैसा था, यह भी नहीं जानती। उसने नारबीविशंके मुहसे जो दो-चार बातें सुनी, उन्होंने भुक्तभोगी अनाथके दिलको बहुत आद्रकिर दिया । वह रोने-रोनेसा हो गया, लेकिन बालेशालामे जो सुख और सौभाग्य उसे देखनेको मिल रहा था, उसके कारण उसने अपने ऊपर संयम किया और आगे चलकर इसीने उसे पुराने दुःखपूर्ण जीवनको धीरे-धीरे 'भुलानेमें सहायता दी। - इतना होनेपर भी अनाथ नारबीबिशकी जीवन-घटनाके जाननेके लोभका संवरण न कर सका और कितनी ही बातें उसने जान ली। अनाथकी जीवन-घटनाके सुननेके बाद नारबीबिशने भी अपना मुंह खोला। ... TT x . बुखारा-तिर्मिजकी रेलवे लाइनपर तिमिजके नजदीक एक स्टेशनपर इवान इवानोविच समस्र्की नामक एक 'पहरेदार रहता था। उसके परि- वारमें बीवी, दो आठ और दस सालके लड़के और एक छः सालकी लड़की थी। इवानको जिन्दगी अच्छी चल रही थी। उसने अपने कराबुलखाने (पुलिस-चौकी) के सामने एक फुलवाड़ी लगा रखी थी, जिसमें वह आलू, करम टमाटर जैसी तरकारियां तथा मक्का और सूर्यमुखी जैसी अनाज और तेलवाली फसलें बोया करता था। इसके अतिरिक्त उसके पास एक अच्छी दुधार गाय थी, जो परिवारके खानेके लिए घी-दूध जरू- रतसे अधिक देती थी। लेकिन इवान्का सुखी जीवन बहुत दिनोंतक नहीं चल पाया । १९१८ में अमीरी प्रतिक्रियावादियोंने उसके परिवारको नष्ट कर दिया। १९१८ में कोनिसोफके नेतृत्वमें जब मुयाराको जनताको मददके लिए बोलशेविक आए, उस समय अमीर बुखाराने अपने राज्यको सभी रेल-सडकोको नष्ट कर दिया और जो भी रेलवे-फमकर हाय आया, उसीको बाल-बच्चोंके साथ मार डाला। इन्ही दिनो अमीरके बदर भादमियोने इवानके करावुलखानेपर आक्रमण किया, करावुलखानेको जला दिया, इवानको वदी बनाया और उसे बीवी-बच्चोंके साथ दूसरे करावूलखानेमे से गए। वहीं दूसरी जगहो से भी बहुतसे कमकर पकडकर लाये गए थे, जिनमें रूसी, ताजिक, उज्बेक तातार कजाक और तुर्कमान भी थे। इन कमकरोंके साथ उनके बीबी- बच्चे भी थे। अमीरके आदमियोने रेलमार्ग नष्ट करने, रेलके लोहोको दूर फेंकने और गोमटियो और चौकियोके जलानेके बाद बदियोको मारना शुरू किया। उन्होने कमकरो और उनके स्त्री-बच्चोको एक जगह जमाकर शमशीरो, खजरो, छुरो और भालोंसे मार डाला । वहाँ जो लोग मारे नहीं गए थे, उनमेसे एक इवानकी स्त्री मरिया भी थी। जिस समय इन बर्वर सैनिकोने करावुलखानेको घेरा, उस समय मरिया अपनी गायको लिए करावुलखानसे दूर चराने गयी थी। उसने एक चरवाहे लडकेसे रेल-पथके नष्ट होनेको मात दोपहरको सुनी और अपनी गायको वहां घरनेके लिए छोडकर करावुलखाने गयी, लेकिन न वहाँ करावुलखाना था, न उसका अपना घर, सभी चीजें जल चुकी थी और अब भी धुआँ और ज्वाला निकल रही थी। मरिया इस दृश्यको देखकर पागल-सी हो गयी । वह अपने पति और बच्चोको ढूंढने लगी, किन्तु उनका कोई पता नहीं लगा। उसने लकडी लेकर आगको खोदकर देखा, लेकिन उनमें से जले आदमीको हड्डी या कोई दूसरी चीज नहीं मिली। मरिया वहाँसे दूसरे करावुलखानेकी और गयी, जहाँसे धुआं और भागकी ज्वाला निकलती दिखलाई पड रही थी। करावुलखानेके पास जानेपर उसे वडा हो हृदय द्रावक दृश्य देखनेको मिला । वहां कमररो और उनके बीबी-बच्चो के ढेर के ढेर मुर्दे पडे हुए थे। यह देखकर उसका होश उह 7 गया । फिर कुछ धीरज धरकर उसने मुदोको हटाकर देखना शुरू किया कि शायद पति या बच्चोंके बारेमे कुछ मालूम हो सके। दुर्भाग्य | वहां उसने अपने पति और बच्चोके तलवारसे कटे शव देखे । मरिया यह दृश्य देखकर बेहोश हो गयी। होशमे आनेपर उसने अपने पति और बच्चोके मुर्दोको खीचकर अलग करके दफनाने के बारेमे कुछ करना चाहा । बच्चोके शवोंमे एक लडकी का शरीर मिला, जो अभी भी जिन्दा थी। लडकी की उमर तीन सालके करीब थी। उसकी गर्दनक पीछे तलवार लगी थी और अब भी घावसे खून बह रहा था। लेक्नि बच्ची जिन्दा थी, वेहोश थी, किन्तु कभी-कभी हिलती-डुलती थी। मरियाने अपने बच्चोके भीतर इस बच्चीको देखकर सोचा कि पति और बच्चोंके मुर्दोको दफनानेसे इस बच्चीके जीवनकी रक्षा अधिक आवश्यक है । वह अपने आपसे बोली --वे मर गए, और खतम हो गए। उन्हें आज या एक दिन बाद दफनानेमे कोई अन्तर नही, लेकिन यदि जल्दी कोई उपाय न किया, तो यह बच्ची मर जाएगी। यही विचार कर मरियाने बच्चीको मुर्दोके भीतरसे उठा लिया और अपने सिरके रूमालसे रसकी गर्दन पर पट्टी बांध दी, लेकिन यह तात्कालिक सहायता थी। बच्चीकी जान बचानेके लिए किसी डाक्टरको आवश्यकता थी। यदि यह भी नही तो तात्कालिक मरहम पट्टी वाले स्थान में ले जाने की जरूरत तो थी, लेकिन डाक्टर या मरहम-पट्टी करनेवाले तिमिज स्टेशनपर ही मिल सकते थे। उसे यह भी नहीं मालूम था कि तिर्मिजको अवस्था क्या है। शायद वहाँ भी अमीरी सैनिकोने अपनी राक्षसी लीला दिखायी दी। मरियाने सोचा-'तिमिज- की हालत जाने बिना वहां जाना अपने और बच्ची, दोनोके लिए अच्छा नहीं है," लेकिन वह यह भी सोचती थी कि लडकीके घावको ठीक करनेके लिए कही न कही तो जाना ही चाहिए।
१४४ । इसी समय मरियाके दिलमे किसी आदमीका ख्याल आया और वह घायल बच्चीको उठाये गांवकी ओर दौडी । वह गांव रेलसे बहुत दूर नहीं था । उस गांवमे उसकी एक परिचित स्त्री थी जिसका पति मरियाके पतिकी तरह रेलवे पुलिसमे काम करता था । वह पहले भी कई बार उस स्त्रीके पास जा चुकी थी। स्त्रीका पति दो साल पहले मर चुका था लेकिन मरियाका आना-जाना ! अभी"वद नहीं हुआ था। मरिया बच्चीको ठाए दौडी-दौडी उस स्त्रीके घर गयी। स्त्रीने स्थानीय (देशी) ढगसे बच्चीकी चिकित्सा की ओर नम्देको जलाकर उसकी राखको घावमे भरखर लत्तेसे बांध दिया। उसके बाद लई पकाकर उसे थोडा थोडा बच्चीके गलेसे नीचे उतारा । एक पडी वाद बच्चीने आंखें खोली और बात करने लगी। उसने पहला शब्द (माँ) कहा, जो कि स्थानीय (उज्वेक) भाषाका शब्द था, उससे पता लगा कि वह किसी स्थानीय कमकरकी पुत्री है । लडकीने अपन आसपास मांको न देखकर रोना शुरू किया। मरिया और उसकी परिचिताने बच्चीको बहुत चुप करनेकी कोशिश की, लक्नि सफल न हुई। बच्चीके शरीरसे बहुत खून निकल गया था, इसलिए थोडी देर रोनेके बाद कमजोरीने उसे फिर बेहोश कर दिया । रोनेके कारण पावका मुंह फिर खुल गया था इसलिए फिर खून निकलने लगा । स्त्रीने दुबारा नम्देवो जलाकर, राख भरकर पट्टी बांधी और फिर विस्तरपर सुला दिया । अवकी बच्ची आरामसे सो गयी। आचा।" x x बच्चीको गुलाकर स्त्री तिर्मिजकी यवर लेनेरे लिए गांवमे गयी और कुछ देर बाद लौटकर उसने घतलाया कि तिमिज स्टशन सही-सला मन है । आज ही अहे घेचने के लिए यहाँ गए एम पिसानसे यह पता १४१ लगा। यह किसान तिमिजमे ही था, जवकि अमीरके आदमियोंने स्टेशन बर्बाद करनेके लिए आक्रमण किया, लेकिन हथियारबद कमकरोने मुकाबिला किया और आक्रमणकारियोंको अपने कुछ आदमियोको मरवाकर भागनेके सिवा और कुछ हाथ न लगा। मरियाको यह खबर सूर्यास्तके समय मिली । उस समय जाना उसने ठीक नही समझा । रातका समय अपने पति और बच्चोंके शोकम जैसे-तैसे बिताकर प्रात काल सूर्योदयसे पहले ही वह तिर्मिजकी ओर दौडी। मरिया जब तिमिज पहुंची, उस समय वहाँ के हथियारबंद कमकर मुर्दो को दफनाने जा रहे थे । वह भी उनके साथ हो गयी और उसके पति और बच्चोकी लाशें भी दफना दी गयी। रेलवे कमकरोंकी सहायतासे मरियाको रहने का स्थान और काम भी मिल गया और वह बच्चीको लाने गांव गयी। अभी बच्ची खतरेसे बाहर नही थी लेकिन आरामसे सोती थी। उसे भूख भी लगती थी और वह धीरे धीरे चलती तथा खेलनेकी इच्छा प्रकट करती थी। जबतक बच्चीमें बल नही आ गया और वह खतरेसे बाहर नही हो गयी जबतक मरिया गांवमे रही । जब पायका मुंह बन्द हो गया और लत्ता भी हटा दिया गया, तब मरिया बच्चीको तिमिज़ ले आयी । जिस वक्त मग्यिा विदा होने लगी, उसने अपनी परिचिता स्त्रीसे बच्चीके लिए एक स्था नीय भाषाका नाम चुनने को कहा -मेरी भी एक बच्ची थी। उसके मुंहपर एक लाल दाग था। इसलिए मैंने उसका नाम नारबीविश रख दिया था। वह बच्ची बापके सामने ही मर गयो । अब मैं उसीकी स्मृतिमे इस बच्चीका नाम नार- बीबिश रखना चाहती हूँ। मरियाने उस नाम को पसन्द किया। + + + जवतक बुखारा तिमिजकी रेलवे लाइन तयार न हो गयी, तबतक १४२ मरिया तिर्मिज़मे रहकर बच्चीका पालन पोषण करती रही। बुखारा- क्रान्ति और अमीरके भागने के बाद वह उसी चौकीमे काम करने लगी, जिसमे उसका पति रहता था । नारबीबिश आठ सालकी हो गयी। पति और बच्चोका वियोग मरियाको बहुत सताने लगा और उसने अपने बन्धुओके साथ समारा (कुयविशेफ) जाना चाहा, लेकिन नारवीबिशको शिक्षा-दीक्षाकी दिक्कत समझकर उसने उसे अपने साथ ले जाना ठीक नहीं समझा और आमू-तटपर अवस्थित बालशालामे भर्ती कराकर अपना रास्ता लिया। नारवीविशकी गर्दनपर जो काली रेखा दिखलायी पडती थी, वह उसी नम्देकी राखके कारण थी, जिसे तलवारके घावमे भरा गया था। 7 ७ अनापने चार साल बालशालामे शिक्षा पायी, और लिखने-पढने- में सात वर्षकी पढायी जितनी योग्यता प्राप्त की। कक्षामे पढाये-जाने- वाले विषयोंके अतिरिक्त वह विशेष तोरसे और कुछ भी जाननेकी कोशिश करता रहा। लिखना पढना सीख जानेके बाद पाठ्य पुस्तकोके बाहरको चीजो- के पढनेमे नारबीविश उसकी सहायता करती थी। उसके ज्ञानकी सीमा और बढानेमे कुर्बानने भी मदद की। कुर्वान एक कम्सोमोल दलका नायक था-वही कम्सोमोल दल जिसने कुर्बान-जैसे बच्चोको वास- मचियोंके हाथसे मुक्त किया था। इस समय सेम्योन् सेम्योनाविच पार्टी मेम्बर होनेवाला था। वह सीमान्तपासोके भीतर कम्सोमोल सगठनका नेतृत्व परता था, और वानशालाके बच्चोको अन्तर्राष्ट्रीयता तथा साम्यवादको शिक्षा देकर यम्सोमोल बनने लायक बनाता था।
सेम्योन सेम्योनोविच एक पीले रङ्गका जवान था। उसकी आँखें सुनहली थी । वह बहुत मधुर भाषी लेकिन एकबोला था । अपनी मारी शक्ति और सहायतासे जनहितके कार्योंको करता और वैयक्तिक कामोको भी उसी दृष्टि से पूरा करता था। वह कोशिश करता था कि हर जवान सच्चे कम्युनिस्टोका उत्तराधिकारी बने । सेम्योन् सेम्योनोविचको उसके समवयस्क तथा बडे-छोटे सभी "सीना" कहते थे, स्थानीय भाषामें जिसका अर्थ छाती है। उसके बारेमे कहा करते थे, "वस्तुत यह जवान आदमीका सीना है, जिसके भीतर दिल अवस्थित है या वह स्तनाग्न है जोकि अल्प वयस्कोको "क्षीर' देकर उन्हे बढाता है।" अनाथने अपना साधारण ज्ञान और राजनीतिक शिक्षा अधिकतर बना दिया था। - - + + लिखना पढ़ना और राजनीतिक शिक्षा-जैसी बौद्धिक और आत्मिक शिक्षाओके साथ-साथ अनाथ व्यायाम और खेलोमे भी बडी रुचि रखता था। नाव चलाना और गुप्सर-सवारी उसने पहले ही सीख ली थी। उसने अब ऐसे कामोमे और भी अभ्यास बढाया, जिसमे एक था पानीके भीतर मछलीकी तरह चलना । वह नाव और,गुप्सर अक्सर नदीमे चला सकता और धारके विरुद्ध भी तैर सकता था। साथ ही बहती धाराके भीतर डूबकर हर तरफ चल सकता था। अनाथने जलक्रीडाके अतिरिक्त सैनिक शिक्षा भी प्राप्तकी और बदूक चलाना, घोडा दौडाना तलवार चलाना और हथबम फेंकना अच्छी तरह सीखा । सैनिक शिक्षा में उसे यूरी संचिकोफ नामक जवानने सहायता दो। यूरी सेंचिकोफ़ एक घोडसवार कम्पनीको कमां- डर था और साथ ही कम्पनीके कम्सोमोल-सङ्गठन का सेक्रेटरी भी उसकी बहादुरी, चतुराई और समाजवादी भूमिके प्रेमके कारण लोग उससे बहुत प्रेम करते थे। देश-रक्षा और समाजवादी निर्माणमे सगे लोगोको जीवन रक्षाके लिए वह सदा अपना जीवन अर्पण करनेके लिए तयार रहता था। वह सदा बडे लडकोको अपने साथ लेमर उन्हे सैनिक शिक्षा देता और कोशिश करता कि उसके सारे सुगुण उनके भीतर भी आ जाय। यूरो सेंचिकोफ़ बासमचियोको लडाइयोमे सदा आगे आगे रहता। जब देशमे शान्ति स्थापित हो गयी, तो वह अपना समय सीमान्तपालोमे बिताने लगा और सीमान्त रक्षाके काममे उनकी सहायता करने लगा। इसी समय वह बालशालाके सयाने लडकोको सैनिक शिक्षा भी देता। अनाथने भी उसीसे सैनिक शिक्षा पायी और व्यवहारकी कितनी ही सूक्ष्म यातें सीखी। + + अनाय अठारह सालका हुआ । उसने कम्सोमोल बननेके लिए आवेदन-पन्न दिया। उस समय सीमान्तपाल कम्सोमोल-समिति का सेनेटरी "सीना" या । अनाय का आवेदन-पन्न कम्सोमोल-समितिके घ्यूरोके सामने पेश हुआ। सीनाने उससे पूछा -तू क्यों कम्सोमोल बनना चाहता है ? -कम्सोमोल बननेका मेरा अभिप्राय यह है कि समाजवादी निर्माणम और भी दृढ़ताने साथ काम पर, देशको साम्यवादयी ओर से पसू, इस कामम बाधा डालनेवाले जनतारे शत्रुओका मुशपिसा रहे और इस तरह लेनिन-स्तालिनतरा पुत्र बनकर कम्युनिस्टॉरा सच्या उत्तराधिकारी होनेरी योग्यता प्राप्त पर अनापने पुछ और भी १४५ R कहा-मैं सबसे पहले सीमान्तपाल बनना चाहता हूँ और बाहरी गुप्त- चरों, बासमचियों—जोकि बाहरी और भीतरी दुश्मन हैं तथा इनके हामियो से हाथमे बदूक लेकर लडना चाहता हूँ। बासमचियो और जासूसोंसे लडनेकी इच्छा अनार्थकी पूरी हुई । उस समय बासमचियोंके बडे गिरोह देशके भीतर नही रह गए थे। उनकी छोटी-छोटी टोलियां थीं, जो भगोडे बासमचियो, अमीर तथा विदेशी जासूसोंसे सम्बन्ध जोडकर सोवियत भूमिमे ध्वसका काम कर रही थी। इनके नाश करने में सीमान्तपालोंने बहुत काम किया। अनाथ इस तरह कमसोमोल बना और साथ ही सीमान्त- पाल भी। १९३१ का बसन्त था । वासमचियोका कूरबाशी इनाहीम बेक अफ- गानिस्तान भाग गया था। वह फिर छिपकर सरहद पार हो सोवियत ताजिकिस्तानमे लूटपाट करने लगा। लाल सेना और लाल गोरिल्लोके साथ सम्मुख लडनेकी हिम्मत नहीं रखता था, लेकिन अकेले-दुकेले जो गरीब-किसान हाथ लगता, उसे मार डालता, स्त्रियो-लडकियोको धेमावरू करता, कलखोजोंके गोदामो और कोआपरेटिव दूकानो तथा उनके पहरे- दारोको मारता। लेकिन सारे मेहनतकश उसके विरुद्ध खडे हुए थे। तानिकिस्तान तथा पड़ोसी उपवेकिस्तानके रायनोंमे मेहनतकशो तथा कलखोजचियो ने लालभालेदार-दल कायम किए थे। वे इब्राहीम बेक्के पीछे पडे हुए थे, लेकिन इब्राहीम वेव सांप-विच्छूकी तरह सदा पवंत छिद्रो और ऊँची चोटियोंमे भागता फिर रहा था। उसका सोवियत देशके भीतर कोई सहारा नही था, लेकिन उसके विदेशस्थित मालिक छिपकर उसके पास हथियार और सहायक भेजा करते थे। इसी वजहसे उस साल सीमान्तपालोका काम ज्यादा और अधिक १० जवाबदेह बन गया था। वे हर वक्त नीद छोडकर रोम-रोमको आँख बनाए सीमान्तको देखभाल करते थे। इस, काममे अनाथ, कुर्वान, निकितिन और नवरोज भी लगे थे। उनके दलका नेता सेम्योन सेम्योनोविच था। ये लोग रात-दिन बिना सोचे एक शर-वन से दूसरे शार-वन, एक दलदलसे दूसरे दलदलको ओर, दौडते रहते और कानून- विरुद्ध सीमा पार करनेवालो तया बासमचियोसे लडते । यूरी संचिकोफ कभी-कभी रायनोंमें जाकर बासमचियोसे लड़ता और कभी सीमान्तरपर आकर अनाथ और सीमाके कामोमे मदद करता, जहाँ-कहीं भी समाजवादी मातृ-भूमिकी रक्षाकी बात आती, वहाँ पूरी मौजूद रहता। --- . - x X इधर सेम्योन्कै दलमे एक लडकी शामिल हुई। लडकीकी उम्र १८ सालको थी, लेकिन वीरता और चतुराईमे २५ साला बहादुरो- का मुकाबिला कर सकती थी। उसकी आंखें मेप-जंसी, चेहरा सफेद, याल भूरे कद, मझोला और बदन भरा हुआ था । उसके भूरे बाल काली भौंहोके ऊपर पड़े दर्शकके नेत्रों और हृदयको बांध लेते थे। हर आदमी उस लडकीसे बात और हंसी-मजाक करना चाहता था, लेकिन वह हर तरहके मजार और किसी तरहके घेलको पसन्द नहीं भरती पी। न जाने क्यो, सदा उसके दिलमे एक करुणा-वेदना दिखलायी पडती थी, जोकि किसी सोवियतजवानमे दिखलायी नहीं पहती थी। उसके साथी उसे सदा प्रसन्न रखनेकी कोशिश करते, वेदनाभिभूत होनेने समय उसके दिलबहलाव का प्रबन्ध करते और चिन्नविचित्र पहानियां यहते-सुनते, सेरिन इनका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। वह मदमस्त मादमीकी तरह हर पीवको बेपरवाहीसे देखती, लेपिन जिस वक्त सीमान्त-पासन सम्बन्धी कोई काम होता, १४७ 7 m - वह सबसे पहले मैंदानमे-कूदती और सबसे अधिक खतरेकी जगह जा- खडी होती । इस काममे वह कमाडरको आज्ञाकी भी प्रतीक्षा नही करती। उसे इसके लिए सावधान किया गया, सैनिक दह भी दिया गया, लेकिन जैसे ही वैसा अवसर फिर आया, वह फिर सारी बातोको भूस गयी 4. यह लडकी १५ अप्रैल १९३१ को ताशकन्द से विना छुट्टी लिए हो अपने स्कुलको छोडकर सीमापर चली आयी और सीमान्तपालका काम करने लगी। स्कूल छोडनेकी बात इस तरह हुई, ताशकन्दके टेक्निकल स्कूलमें पढाईके बाद १२ वजे बीस मिनटके लिए क्लाससे छुट्टी मिली । लडके जल्दी पहुंचकर चाय पीनेके लिए एक दूसरेको धक्का देते लघु भोजनशाला (फेत्) की ओर दौडे । इसी समय स्कूलकी विश्रामशालामे डाकिया आया । ताशकन्दसे दूर 'जिनके बन्धु-बांधव रहते थे, वे फेत् छोडकर डाकियेकी तरफ दौडे । विद्यार्थियोंने डाकियेको चिट्ठीका पता पढ-पढके देनेका भी मौका नहीं दिया और उसे चारो ओर घेरकर पूछने लने 'मेरा पन है ? क्या आज भी मेरे लिए पत्र नहीं लाए ? बहुत समयसे घरसे कोई पन नही मिला।" विद्यार्थियोंके बीच एक लडकी थी, जो बिना बोले-बाले कुछ सोचती हुई चुप खड़ी थी। डाकियेने चिट्ठीवा पता पढपर पूछा--नताशा सेंचिरोवा कौन है 'मैं हूँ'-कहते हुए लहकोने डाक्येिके पास जाकर अपने सुन्दर मासल हायको बढाया। मांसल और बलिष्ठ होते हुए भी लडकीका हाप तब तक पिता रहा, जबतक कि लिफाफा उसरे हाप में नहीं आ गया और उसने उसे पड़ना नहीं शुरू किया । महीने लिफाफेरो पड़ा । शरीरको पाराम हा। उसरे पलिका सदश अधर अर्धमुकुलित हो गए। उसने जरा-सी सतोषकी सांस सेकर अपने बापसे कहा: -धन्यवाद, अच्छा हुआ, पत्र अपने ही नामका बाया--और रिनारे १४८ एक बेंचपर जाकर उसने लिफाफा खोलकर पत्र पढना शुरू किया। लिफाफेके एक कोनेमें तिकोनी सैनिक मुहर थी, जिसके कारण पर बिना टिकटके आया था। लड़कीने एक बार फिर लिफाफेपर नजर दौडायी और फाहकर उसने भीतर से पन निकाला । पन पेंसिलसे जल्दी-जल्दी लिखा गया था, इसलिए पढ़नेमें दिक्कत हो रही थी। लड़कोको इस तरहके अक्षरोंको देखकर कुछ चिन्ता हुई । इसलिए उसने पहिले पनके अतिम अंशको पढकर सन्तोपके साथ कहा-"अपना ही हस्ताक्षर"-फिर उसने पन पढ़ना शुरू किया। पन रूसी भाषामे था। जिनमे लिखा था: मेरी प्यारी नताशा ! मैं जानता हूं कि इस पत्र को पढकर तुझे बड़ा दुःख और चिन्ता होगी, लेकिन मुझे आशा है, तू हर दुःख को एक बोल- शेविककी तरह सहन करेगी। मैं इस पनको ऐसे समय लिख रहा हूँ, जबकि मुझे चारो तरफसे भेड़ियोके एक बड़े झुड अर्थात् बासमचियोकी बड़ी संख्याने घेर लिया है। मेरा जीवन कुछ मिनटोसे अधिकका नही है और मैं अपने कर्तव्यका पालन करने के लिए अपने जीवनको न्यौछावर कर रहा हूँ। यदि वह सलामत रहता, तो समाजवादी मातृभूमि और समाजवादी निर्माणके काममें लगता; लेकिन मेरे विनाशसे देशरक्षा और समाज- वादी निर्माण करनेवालोंकीपक्तिमेसे सिर्फ एक व्यक्ति लुप्त होगा । जिन्दावाद समाजवादी मातृभूमि ! जिन्दावाद वोल- शेविक पार्टी! जिन्दावाद लेनिन स्तालिनको पार्टीके सच्चे उत्तराधिकारी, लेनिन-स्तालिनके कम्सोमोल ! प्रिय नताशा ! तुझसे दुवारा धर्य धरनेकी प्रार्थना करता हूँ। अपनेको संभाल ! इस समापारको मौके पास न पहुंचाना ! मेरी ओरसे पत्र लिखकर उसे तसल्ली देती रहना ।
१४९ मतिम अभिनदन और विदाके साथ तेरा प्राणप्रिय सुहृद भाई युपरी नियाजगुलोफ ८४३१। नताशा इस पन्नको पढकर बेंचपर गडी-सी निश्चल बैठी रही। उसकी आँखोंके सामने एक काला पर्दा पड गया था, और वह किसी चीजको देख नही रही थी लेकिन वह होश मे रही । इसीलिए वेचसे नही गिरी । तो भी बदहवासकी तरह किसी बातको समझ नहीं सको और न यही जान सकी कि शालामे क्या-क्या चीजें है। एक बार आँख खोलकर देखा ता शालाम कोई नही था। डाकिया चला गया था। बूफ्त भी खाली था। विद्यार्थी अपनी अपनी कक्षाओमे जाकर पढ़ने लगे था उसने खडी होकर एक बार फिर पतके ऊपर नजर दौडायो । उसका शरीर कांप उठा लेकिन यह कपन भयके कारण नहीं, बल्कि अत्यन्त क्रोध और घृणाके कारण था। उसकी मेपी आँखें अपनी नर्मीको छोड़कर नबने लिए तैयार प्रेरकी तरह ज्वाला रस रही थी। उसन अपने प्राणप्रिय माईक अपनी मानस-आंखोके सामने अकित करके कहा तूने अपने प्राणोंगी बलि उचित स्थान पर दी शापाश मेरे धीर भाई लेकिन तूने अपने पत्नम एक स्थान पर ठीक नहीं लिया । तूने लिया कि मेरे नष्ट होनेसे मातृभूमिके रक्षकोंकी पक्तिमेसे केवल एक यह ठीक नहीं है। तेरी बलि संकहो-हजारो बहादुर जवानोको देश रक्षकाकी पांतीम खीच लाएगी । तरी बलिके बाद दश रसकोकी पक्तिम सबसे पहले को तेरी जगहलो पूरा करेगी, वह मैं हूँ तेरी बहिन । इसके बाद नतासाने न विसीसे बात की न स्कूला मुख्याध्यापकरे पास जाकर छटो मांगी और न अपने सहपाठियोसे विदाई सी । प्रह स्कुलके दरवाजेसे निकलकर सीध स्टेशन पहुंची। उसने यहाँसे मौके लिए सिर्फ एक पत्र लिखा- 'माईका वार-पापर मैं उसके पास जा रही हूँ। समय नहीं था व्यक्ति त्रुप्त हो जाएगा T कि तुमसे मिलकर विदा लेती । क्षमा कर, मैया ! यहाँसे एक सविस्तार पन लिखू गो।' पत्रको डाकमे डालकर नताशा ट्रेनमें बैठी और उसी सरहदकी ओर पली, जिसके पास उसका भाई बलि हुआ था। ९ 7 ८ अप्रैल १९३१ को यूरी संचिकोफ बासमचियोसे मुकाबिला करने- के लिए अपने दलके साथ रायन्म गया हुआ था। सेंचिकोफके सभी सनिक कम्सोमोल थे और वह स्वय कम्पनीको कम्सोमोल समितिका सेक्रेटरी था। दगरा रायनके न्याजगुलोफ गांवमे अकस्मात सेंचिकोफके दलका बासमचियोके एक बड़े गिरोहसे मुकाविला हुआ। बासमची बीसगुने थे । सेचिकोफ़को समय नहीं मिला कि मोर्चावन्दी करके बासमषियोसे लडे । उसे खुले मैदानमे लडने के लिए मजबूर होना पडा । यद्यपि युद्धमे पहले वदूक और मशीनगने । चली लेकिन पासमचियोको अपने विरोधियोकी अल्प सख्याका पता चल गया । उहोने अपनी बहुसख्याका लाभ उठाकर कम्पनीके नजदीक पहुंचकर लड़ना शुरू किया । लडाईमे गोलीकी जगह बदूकके कुन्दे सगीनें और तलवारी से काम लिया जाने लगा। सेंचि- कोफ हर आक्रमणमे अपने दलसे आगे बढ़कर कुछ बासमचियोका सिर तनसे अलग करने लगा। सेंचिकोफ लड़ाई जारी रखते हुए कोशिश कर रहा था कि युद्ध क्षेत्रको किमी अनुकूल स्थानमें ले जाय, जिससे मावदी करके वास- मषियोंसे डटवर लड लेकिन घडी-पर-घडी बासमचियों के पास सहा- यता पहुंच रही थी और ज्यों ज्यो वासमचियोंको नपी सहायता मिलती, यूरीके दलकी हालत और बुरी होती जाती। सेंचिकोफ्का मनोरय सफ्स नही हुआ। अपनी नयी कुमकके साथ बासमचियोंने यूरीके दलको और लिया और मुक्तिकी कोई आशा न रह गयी। सेंचिकोफ़ अपने दलकी + मुक्तिके लिए बहुत चिंतित था । उसने हुकुम दिया कि दल उचासपर चला जाय, लेकिन वहां पहुंचनेका रास्ता न था। सचिकोफ़ने हुकुम देने के बाद खुद उघासको ओर घोडा दौडाया। रास्ता रोकनेके लिए नियुक्त बासमची सेंचिकोफ़ को पाम नहीं सके । संचिकोफ घेरेको तोडता-ताहता एक ओर पहुंच गया। बासमचियोंने संचिकोफ़को भागते देखकर उसके पीछे घोडा दौडाया, लेकिन जब भी वासमचो उसके नजदीक पहुंचने, वह अपने घोडेका मुंह फैरकर उनके रास्तेको रोक आक्रमण करके एक-दोको घोडेसे गिरा देता। बासमची लौटकर भागते । अबकी बार बासमचियाको बही जमात सेंचिकोफ़के पीछे पड़ी । इससे उसके दलका घिरावा पतला होगया और दल उसे चीरकर कमा- हरका हुकुम वजाता उचासपर पहुंच गया। दल उचासपर मोर्चाबन्दी करके वहाँसे बन्दूको और मशीनगनोंसे बासमचियोपर गोली वर्षा करने लगा। गोलियां बहुत कम वेकार जा रही यों और दासमची ढेर-के-ढेर जमीनपर लुढक रहे थे। लडाईमे बासमची बहुत मारे गए और अन्तमे भागने के लिए मजदूर हुए लेकिन भागते हुए भी उनमेंसे कितने ही जान न बचा पाए । बासमचियोपर विजय हुई, लेकिन कमाडर सेंचिको फका पता नहीं चला। सूर्य अस्त हो गया और चारा और अधकार फैल गया । सैनिकाने मुदो और घायलोंके बीच बहुत ढंढा, विन्तु संचिकोफ नहीं मिला। • दूसरे दिन सबेरा हुआ। सैनिकोंने फिर अपने कमाडरको खोजना शुरू किया। ये इंटते-ढूंढते एक मील तक निकल गए और वहाँ एक नाले विनारे उन्होंने उसके मृत शरीरको पाया। आस-पास बासमचिया- के तीन मुर्दे पड़े थे, जिनमेसे कुछ समचेसे मारे गए थे और कुछ तलवार- मारे गए थे। सेंचियोफ़ने मरनेसे पहले इन्हें मौतके घाट उतारा था। सैनिक अपने मांहरके मुर्दैको उठा लाए जाँच-पड़ताल करने पर १५२ उसको जेबमे एक पत्र निकला। इसी पनको,पाकर पाकर यूरी विको फको बहिन नताशा सेंचिकोवा देश-रक्षकोको पातीमे -सम्मिलित होने के लिए दौड पही। १९३१ के जूनका अन्त था। रातको आकाश निरभ्र था और सितारे चमक रहे थे, जिनके प्रतिबिम्ब कूलके स्वच्छ जलमे दीपककी तरह चमक रहे थे । आमू नदीका जल तरगित हो रहा था और लहरें एक- एक गजे ऊंची सीढी-सी बना रही थीं। पीली मिट्टी मिले आमूके जलमे सितारोके प्रतिविम्ब नही दीख रहे थे, किन्तु पोले पानीकी सीढियाँ सोने की तरह चमक रही थी। कूल और आम-तटके बीच एक बडा शर-वन दिखलायी पड. रहा था, जिसमे हरे संरकडे मरक्त-खड्ग-सदृश पत्ते फैलाए खडे थे । अनाथ, कुर्बान, निकितिन, नवरोज और नताशा, सेम्योन्-सम्योनो- विच्के नेतृत्वमे अपनी देख-भालमे लगे हुए थे । अनाथ और नवरोज एक जगह कुर्वान और निकितिन दूसरी जगह, और नताशा अलग खड़ी नदीकी ओर देख रही थी। कभी उनकी नजर बयावानकी तरफ जातो और कभी शर-वनकी ओर। कोई भी गतिशील चीज चाहे उडता चम- गादड़ हो, या पानीमे कूद रही मछली, उनकी नजरसे छूट नहीं सकती थी। सीना (सेम्योन्) बार-बार आदमियोके पास जाता और उन्हें होशियार करता रहता। अनाथ और नवरोज शर-वनकी उत्तर तरफ़ थे, जहाँ मे एक तरफ कूल और दूसरी तरफ नदी-तट दिखलाई पडता था। रात दो घण्टा बीत गयी थी। इसी समय कूलके किनारे अनापने कोई कालिमा देखी। कालिमा किनारे-किनारे शर-वनकी ओर आ रही थी। अनाय नवरोजको होशियार रहनेके लिये कहकर अंधेरेमे - लेटकर कूलकी और सरफने सगा। अभी वह शर-बनके किनारे फूल- तटपर पहुंचा भी नहीं था कि कालिमा कूनके उस कोनेपर पहुंच गयी, जहाँ यह शर-यनसे मिलता था और जहां जानवरों के पानी पीनेका घाट था। यहां जाकर वह अनाथ की दृष्टिसे अतर्धान हो गयी। वह अब जान गया कि कालिमा कोई आदमी है । वह आदमी पानी या शर-वनम गायब होकर कही भाग न जाये, इसलिए अनाथ उठकर तीरकी तरह पनघटको ओर दौडा। जब वह वहां पहुंचा तो आदमी पानीके किनारे बैठा हाथ मुंह धो रहा था। मादमीको सजग हुए बिना वह उस- पर टूट पड़ा और उसके दोनो हाथोको अपने हाथोंमे जोरसे कसकर अनाथने उससे पूछा -तू कौन है ? यहाँ क्या काम करता है ? एकाएक पकडे जानेसे आदमी 'वस्त और कपित था लेकिन अनाथकी आवाजको सुनते ही वह हंससर बोला-मैं चर हू और तेरे हाथम पडनेके लिए आया हू । यह स्वर सुनकर अनाथका मानसिक तनाव कुछ ढीला हुआ और अपनी ओर पीठ किये आदमीको सामने करके पानीके किनारेसे ऊपर ले गया। फिर उससे पूछा -तेरा यह काम भयकर है रातको यहां आकर तूने ठीक नही न A F किया। 4 यह आदमी नारवीबिश थी और उसने अनाथके अतिम प्रश्नका जवाब देते हुए कहा-आदमी किसीसे प्रेम करता है और उसे एक मास नही देखता तो वह उसे देखनेके लिये किसी खतरेकी परवाह नहीं करता। -अगर दिनमे माती तो उतना खतरा नहीं था। सीमान्तपालोमेसे अधिकांश लोग तुझे जानते हैं, किन्तु इस समय रातमे माना बहुत भयानक बात है । मैं भी तेरी आवाज सुननेसे पहले तुझे नहीं पहिचान पाया। 1
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यदि मागे बढ़कर तेरे पास नहीं माता और तुझे भागता समझता तो
आश्चर्य नहीं कि गोली चला मंठती
--यह हाथ और इनमे संधी बंदूम मुझपर गोली नहीं चला सकती
-नारबीविशने कहते हुए और अनायके हाथीको मलते हुए और ऑगे
'कहा-यह हाय समाजवादी जन्मभूमिके एशानकुल बाम और शाकुल
'जैसे दुश्मनोंको पकडने और गोली चलानेके लिए हैं।
-अच्छा, तू दिनमें क्यों नही बायो ?
---कामका समय है, मैं इस साल सरकारी परीक्षा देकर सेल्नीकुम
( टेक्निकल हाईस्कूल ) समाप्त करना चाहती हूँ।'
-आ ! इस साल तेनीस्कुम् समाप्त कर रही हैं?
-- निष्ठुर । यारवीविशने अनापके हाथोको हिसाते हुए कहा-
क्या तू जानदा नही कि मैं इस साल तेलीकुम् खतम कर रही हूँ।
जान करके भी अनजान बन रहा है।
---सचमुष नही जानता-हंसते हुए अनाय ने पहा, मेरिन उसके
स्वरसे मालूम होता था रि यह जानता है। इसलिए बात सुधारते
हये फिर कहा-ठीक है जानता हूँ, शिन्तु सीमान्तपर काम बहुत अधिर
है और मेरा सारा ध्यान इधर लगा है । इसलिए भूल गमा, नहीं तो
जान-यूम कर अनजान क्यो बनता।
-मूठ बोल रहा है--बान-भूम पर बनवान बननेपर मारपीविशने
कुछ गम होकर रहा।
--यों मूठमोगा । मान-यूम पर मनमाने यनने यो फायदा
मिठ योगा 1-अनापने हसते हुए कहा।
-मुशे तो तूने तेस्नीकुम समाप्त पारनेरे बाद मिए कुछ बचन
दिया था। वहीं ऐसा न हो जितू पिसी मागन्तुररो दिम १ टे मोर
"यपन भूत पारे । सिहोमसोमोती मोर बोलाविशी पथके लिए
गामास-हना होगा-नारसीविगने गहा।
मनाप सनेहए परागुन भारपीवित!at, ने भो सपन
-
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सुझे दिया है, उसे भूला नहीं हूं, लेकिन उस वक्त मैंने सोचा था, कि "जबतक तू तेस्नीकुम् -समाप्त करेगी, तबतक मैं भी अपने दिलके कुछ मिहत्वपूर्ण कामोको पूरा कर लूगा और सतोपके साथ हम दोनो रजिस्ट्री किरके सुखसे. जीवन व्यतीत करेंगे, लेकिन मेरा वह सोचना और "अनुमान ठीक नहीं उतरा । अब भी मैं अपने भनेके लायक कोई महत्व पूर्ण काम नहीं कर पाया। इसलिए मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि जबतक मैं कोई महत्वपूर्ण काम पूरा न कर ल तबतक के लिए मझे छुट्टी दे दे-अनायने नारबीविशके हाथोंमे अपने हाथको देकर बोलते हुए अपनी-निगाह नदीकी ओर डाली और फिर कहना शुरू किया--मै अपने बचनसे नही फिरा, न किसीको दिल दिया और न दूंगा। दुनियामे मेिरे दो ही दिलदार ( प्रिय ) हैं । एक तेरी भी दिलदार है, हमारी समाजवादी जन्म भूमि और दूसरी स्वय तू है बस सलाम् । अव विश वास कर और चाहे न कर । नारीविशने उत्तर देते हुए कहा- विश्वास करती हूँ लेकिन वह महत्वपूर्ण काम क्या है ? क्या मैं उसे जान सकती हूं -जान सकती है- अनाथने नदीकी ओरसे आँखको हटाए बिना कहा-मैंने प्रतिज्ञा की है कि जबतक अपने बापके हत्यारो और मांक ऊपर बाफत ढानेवालो तथा अपनी समाजवादी मातृ भूमिके दुश्मनो और अशुभचिन्तकोको गिरफ्तार या नष्ट न पर लूगा, तबतक इस काम को स्थगित रखूगा। 'नारबीविश कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन अनापने एकाएक नदीको और ओख गडाकर' ठहर" कहते हुए उसे बोलनेसे रोक दिया और उसके हायसे अपने हाथको निकालकर नदीको ओर सरकते हुए कुससातो आवाजमे कहा-तू यहीं जमीनपर लम्दी पट जा ने, अच्छा है, तू भी मेरी तरह जमोनपर सरवती पोछे-पीछे आ, लकिन ध्यान रखना कि आस पासका कोई आदमी सुम्मे न देवे-कहते हुए अनाप सरपने सगा।' ? 1 ta.. । र ११ अनाथने नारवीविशसे बात करते वक्त नंदीके किनारे एक खड़ी कालिमा देखी। वह कालिमा थोड़ी देर खड़ी रहकर फिर अन्तर्धान हो गयी। उसके थोड़ी देर बाद कितनी ही कालिमायें प्रकट होकर लुप्त हो गयी। अनाथने नारवीं विशसे बात करते यह देखा। फिर उसने पानीके भीतर एक कालिमाको देखा, जो कभी लुप्त होती और फंभी प्रकट होती तटके नजदीक आ रही थी। यही कारणं या जो अनायने जल्दी बात काटकर नदीकी और सर कना शुरू किया । जब अनाथ नवरोजके पास आया तो कालिमा बहुत नजदीका गयी और मालूम हुआ कि एक डोंगी आ रही है । वह कभी लहरके ऊपर आती दिखलायी देती और कभी ढंक जाती । डोंगी धारको काटती किनारेकी ओर शर-वनके पास आकर ठहरी और उसे एक सर्वस अभ्यस्त हायने खीचकर बाहर निकाला। अनापने देखा कि नवरोज पिनक ले रहा है। उसने जगाकर नावकी ओर इशारा किया और नदी-तटकी ओर सरकना पाहाँ । नवरोजने आँख खोलकर नावको 'ओर देखा, लेकिन सीमान्तपासलोंके नियमको भूलकर सिगरेट मुंहमे दवा कर उसने दियासलाई जसायी, जिसमें कि सिगरेटके धुऐसे नीद बिलकुल दूर हो जाय । मनीय नव- रोजकी इस चेष्टाको देखकर मुंहसे आवाज ने निकास सरकफर पीछे सौटा और भागको अपनी आइमें सेकर सिगरेटको महमेंसे डीनकर जमीनपर फेंककर उसे परोंसे मसल दिया। फिर फुसफुसाती पापाजमें "तू सीमान्तपालोंके नियमोंको कब याद करेगा कहते हुए नदीकी मोर सरपने सगा। सेफिन नाववालोंने नवरोजके दियायलाई जमानेसे गायद समझ लिपा, कि यहाँ मादमी है. इसलिए यह मावको मोड़कर दूसरे (अगा. निस्तानी) तटकी बोर करने मपे । अनाप नरोरके काम पर.बर- 17 F २ 1 १५७ सोस करके उसे गाली देता बिजलीको तरह दौडकर नदी-तटपर पहुंचा। यहाँसे वह नावके ठहरनेकी जगहकी ओर चला । सीना, निकितिन और नेताशा वहां पहुंच गये थे। उन्होंने सरकडोंके बीच खड़े होकर सलाह की। -गोली मारकर नावको डुबानेके सिवा और कोई उपाय नही- निकितिनने कहा। --अगर जिन्दा पकडते तो और अच्छा था, क्योंकि तब हम भेद लेनेमे सफल होते-सीनाने कहा। -पकडना ठीक था-निकितिनने कहा- अब जब कि पकड नहीं सके तो उन्हें मार डालना ही उचित है। पकड़ेंगे--अनाथने आकर कहा, जब कि निकितिन अपनी बात समाप्त कर रहा था। उसने शर-वनके भीतर कपडे को उतारकर सीनासे पूछा-आज्ञा? ---जा, किन्तु सावधानी से पकडना-~सोनाने कहा। अनायके शरीरपर जांघिएके सिवा और कुछ नहीं था । वह शर- वनके निकलकर नदी-तटपर गया और उसने पानीमे जरा भी आवाज किए बिना धीरेसे नदीमे इबकी मारी । उसने ५०-६० गजका फासला पानीके भीतर-भीतर मछलीकी तरह ते किया, और फिर ऊपर उठकर जरा देर तक सासें लेकर डुबकी लगायो । अनाथ इसी तरह नावके पास पहुंचा । मल्लाहने सीमान्तपालोंसे अत्यन्त डरकर भाग निकलनेके लिए वही शक्ति लगायी थी। इसके कारण उसके हाथ-पैर बहुत थक गए थे और कोशिश के बावजूद नाव धारकी ओर बढ रही थी। अनाथने नावके मांगेके पास पहुंचकर रस्सोको बडी सावधानीसे हाथ में लेकर पानीके भीतर खीचा और डूबकर रस्सीके छोरको अपनी कमरमें बांध कर पानीको तहीं बैठा , फिर नावको विनारेकी ओर खीचने लगा, लेकिन नाववालोको मालूम न होने देनेके लिए उसने दस गज किनारकी ओर खींचकर बीस गज धारके साय जाने दिया।
- १५७ मल्लाहने देखा कि-नाव सिर्फ धारकी तरफ़ नही बढ़ा रही है, बल्कि सोवियत-तटके भी नजदीक होती जा रही है। उसने इसका कारण आमू-नदीको तीक्ष्ण धारको समझा और, पूरी कोशिश करने लगा कि नावको दूसरे किनारेकी ओर ले जाय, लेकिन उसका सारा प्रयत्न व्यर्थ गया और नाव सोवियत तटके और नजदीक होती गयी। अब मल्लाहने समझा कि नावको कोई खोच रहा है । उसने "रस्सीको फाटो" कहकर नावमेवैठे लोगोको आवाज दी और स्वय घबडाकर डांड और-जोरसे चलाने लगा। -किस चीजसे काटे 7. -एक नौकारोहीने कहा। —नावमे छुरा है। उसीसे काटो ।-बहुत ढूंढ-ढांढ करनेपर छुरा मिला, लेकिन वह बहुत भोथा ओर मोर्चा खाए-हुए-था । उससे रस्सी नही कट सकी। आदमीने हताश होकर कहा--"छुरा नहीं काटता।" -ऐसा है तो रस्सी को खोल दो । नाविकने कहा । लेकिन रस्सीकी गांठ बहुत दृट थी, जो पानीसे भीगकर और मज- बूत हो गयी थी। उसे भयसे कांपती अंगुलियां नहीं खोल सकी। नाव तटके बिल्कुल नजदीक आ गयी । नाविकने "कल्तवान" (लठ) कहकर गाली देते हुए डाँड नावमे फेंक दी और स्वय रस्सी खोलने लगा लेकिन अधिक डाँड चलानेसे उसके हाथ फूलकर करे ही गए थे और वह रस्सीको खोल नही सका । "कल्तबानों' कहते नावमे बैठे आदमियोको गाली देकर बन्दूक हाथमे लेकर नावके किनारेसे अपने को छिपाकर रस्सी खीचनेवालेके ऊपर आनेकी प्रतीक्षा करने लगा। जैसे ही अनाथ सांस लेनेके लिए ऊपर माया, उसने गोली दागी, लेकिन गोली दागनेसे पहले ही अनाय पानीके भीतर पहुंच गया । गोलीको आवाज सुनते ही तीरसे भी पन्दुकको गोलियां छूटने लगीं । सीमान्त पालोको इच्छा मारनेकी नहीं, बल्कि वे डराकर उन्हें घबड़ा देना चाहते थे, इसीलिए उनकी गोलियां नावसे एक पोरसा ऊपरसे निवली। - -- - १५९ -- उधर नाव फिर पहलेकी तरह किनारेकी,तरफ,खीची जा रही थी। गुप्सरमे हवा भरो, कल्तबानो (लठो)- पागलकी तरह नाविकने कहा और फिर बन्दुकको नाव खीचनेवालेकी तरह करके उसके ऊपर आनेकी प्रतीक्षा करने लगा। नौकारोहियोमेसे एकने गुप्सरको भरकर चढकर भागनेके लिए उसे पानीमे डाला, लेकिन इसी समय किनारेसे एक गोलीने आकर गुप्सरः को फाड दिया और उसकी हवा निकल गयी। नाविकने- कल्तबान । मैंने तुझे गुप्सरको इसलिए तैयार करने के लिए नहीं कहा कि तू उसपर चढ़कर भाग जाये । मैंने तो उसे अपने लिए तैयार करने को कहा' कहते अपने सारे कपडेको उतार नगा हो उसने पानीमे कूदना चाहा । लेकिन अभी पानीमे कूद नही पाया था कि उसके हाथ-पैरोको रस्सीमे फंसाकर शक्तिशाली हाथोने किनारेकी तरफ खीचना शुरू किया। ये मजबूत हाथ कुर्बान और निकितिन के थे । अब नाव किनारेके बहुत नजदीक आ गयी थी और ऊपरसे लगातार गोलियां चल रही थी। नौकारोहियोने किनारा पास देखकर अपने कपडोको उतारकर पानीमे कूदना चाहा, लेकिन इसी समय किनारेसे आवाज़ आयी ' हिलना नही, नही तो गोलीसे मार दिये जाओगे।' वे रुक गए । यह आवाज सीनाकी थी। आवाजके साथ तीन गोलियां भी सनसनाती हुई नौकारोहियोके कानोके पाससे निकल गयी । वे मुर्दो की तरह नावके भीतर गिर गये । इन गोलियोको सोनाके हुकुमसे नवरोज, नताशा और नारबीविशने छोडा था । नाव नदी किनारेको कीचड मे फंसकर सूखी जमीनके पास पहुंचनेसे कुछ गज पहिले ही ठहर गयी। सीना, नताशा और नवरोज कीचडमे कूदते फांदते नावके पास पहुंचे। उनके हाथोंमें तमचा था जिसको उन्होंने नौकारोहियोकी तरफ तान रखा था। सीनाने नौकारोहियो से कहा- हाथ ऊपर उठाओ और नायसे बाहर आयो। .
लेकिन नौकारोहियोंने पानीमे कूदनेके लिए अपने सारे कपडोको उतार दिया था। इसलिए दोनो हाथोंको उठानेकी जगह वह एक हाथको गृह स्थानपर रखें, दूसरेको उपर उठाके नावके बाहर निकल आये । सीमा उनको इस हालतको देखकर हंसने लगा और दोनो हाथोको उठानेके लिए मजबूर न करके "आगे आगे चलो" कहते हुए उन्हे आगे बढ़ाया । उधर सूखे स्थानपर निकितिनने नाविकका भी एक हाथ आगे और एक हाथ पीछे कर पकड रखा था। सीना, नताशा और नयरोजने भी तीनो नौवारोहियोको ले जाकर नाविकके पास सहा किया। अनाप एक कोनेमे बैठा था। उसके शिरमे नारबीविश और कुर्बान पट्टी बांध रहे थे। सीनाने उसे देखकर कहा-एय, तुझे क्या हुआ और चिन्तित होकर उसके पास गया । -कुछ नहीं हुआ, नाविककी एक गोली सिरके धमडेको छूती चली गयी है । उसी जख्मको बँधवा रहा हूँ। -~गोली एक जगह नहीं, बल्कि सिरमे कई जगह लगी है और काफी घाव है-कुर्बानने कहा। -~धाव लगा है, लेकिन खतरा नहीं हैअनायने कहा--कोई भय नहीं है, यह इसीसे मालूम होता है कि पायल होनेपर भी मुझे उसका पता नहीं लगा है, जबतक कि मैंने जमीनपर आकर सिरसे खून निकलते नहीं देखा है। --कामकी गभीरतावे कारण धावकी गभीरताको जानते हुए भी तूने अनजाना कर दिया होगा-धीनाने कहा-कमसोमोली वीरोको यह एक विशेषता है? शावाश ! अनापके पावके बंध जाने पर सीनाने पुर्वानसे कहा--तू नताशाके साथ जाकर नावकी पोजें उठाकर ले मा। मैं नारबीविपके साथ अनाप की देखभाल करता हूँ--और फिर उसने किनारे विनारे जाफर अनायरे सूखे कपडे को उसके सामने रखते हुए यहा-भीगा ज़ोपिया उतार । -n 7 और सूखे कपडे पनि । तुझे बहुत सर्दी लग गयी है--कहकर वह सरफडो की आडमे चला गया। अनाथको कपडा पहनने मे नारबीविशने सहायता दी । इसी समय सीनाने वहां रखे अपने संनिक थलेको लाकर अनाथके पास बैठकर खोला और उसके भीतरसे एक लाल-लाल बोतल और एक प्याला निकाला। बोतलको खोलकर उसमेसे लाल बराडी प्यालेभे डाली। फिर उसके कार दूसरे बत्तनसे गरम काफी डालकर उसे अनाथको पिलाया । पीते हो अनापने शरीरमे गर्मी महसूस की, और कहा-'एक प्याला और दे।" सीनाने दूसरा प्याला भरकर दिया । अनाथने अपने पूरी शक्ति अनुभव की और सीनाकी ओर देखकर बोला-बदियोगी तलाशी लेनी चाहिए उनसे पूछ-ताछ करनी चाहिए। -पूछ-ताछ करेंगे सीनाने अपनी जगहपर खड़े होकर कहा-- लेकिन पूछ-ताछ करनेसे पहले देखना चाहिए कि वे साथ क्या लाए हैं। X x X नावमे दो बहुत भारी बस्ते, चार चमडेके थले, भारी भारी चीजोसे भरा एक पुराने कपडेका थैला, एक भोया छुरा, एक बदूक, एक बार तूसोंसे भारी पेटी तथा बदियो पपड़े मिले। सीनाने सबसे पहले भारी बस्तेको खोला। उसमे ग्यारह-गोलियां पचास बदूकें मिली । दूसरे थेलेम तरह-तरहकी बनावट के तमचे थे और चमडे पलोंमे बदूको और तमचो के कारतूस भरे हुए थे। एक येलेमे एक पन मिला, जिसे पुनिने टाचंकी रोशनीमे पढकर रूसी अनुवाद करके सीनाको सुनाया ! पनमे हथियारोके बारेमे लिखनेके बाद लिखा हुआ था ...."इस वक्त तुम्हारे पास इतने हपियार भेज रहा है। पीछे और भी भेज़ गा । वही सावधानीसे रही चोर 7 . T T -इस भगोड़ेने अपनेको छिपानेका अच्छा ढग निकाला है-निकि- तिनने कहा। मैं भगोड़ी नही हूँ, मैं इस आदमी (एशानकुल बायकी ओर इशारा करके) के हाथसे भागकर बोलेशेविकोंकी शरणमे आयी हूँ। आवाजको सुनते ही अनाथने-"मेरी । मैया, मादर जानम् ! तुझे देखे कितने दिन हो गए !" कहते हुए दौड़कर उसने उसे अपने अकमे भर लिया। इसी समय आकाशमे बहुत नीचेसे उड़ते विमान की घरघराहट सुनायी दी। सवकी आँखें उधर ही। गड़ गयी। विमानने लोगोके शिरके कपर आकर कुछ कागज फेंके । सीनाने एक कागज उठाकर ऊंची आवाजसे पढ़ा ! उसमे लिखा था : "बासमचियोका कूरबाशी इब्राहीम बेक जो बाबाताग- की ओर भागता फिर रहा था, कल काफिरनिहाँ नदीके किनारे लाल-भालादारोके हाथों पकड़ा गया।" सीमान्तपालोंने फिर हर्प-ध्वनि, करतल-ध्वनि और "उरी" घोप किया ।.नताशा माज तक न हंसी थी, और न उसने हंसी-मजाकमें भाग लिया था, किन्तु, इस समय, "मेरे प्यारे भाईका हत्यारा पकड़ा गया" कह कर निकितिनके हायोको पकड़कर नाचने लगी। अनाथ भी मौके बंधे शिर और चेहरेको खोलकर उसके साथ नाचने लगा । नारबीबिश भी नाचके अखाड़ेमे उतरी और अनाथ मांको छोड़ कर उसके साथ नाचने लगा। बाकी सभी साथी ताली बजाकर ताल देने लगे। चोझा ढोनेवाली लारी भी पहुंच गयी और वदियोंके साथ हथियारो को भी उसके ऊपर लाद दिया गया। भुवनभास्कर ने कचे पर्वतोंके पीछेसे अपने मुखको ऊपर उठाया और उसकी किरणें भूमि और लामनदीपर बरसने लगी। C08 त
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