Sanmati Library, Jaipur

Mallinath Puran

Sakal Kirti · 2010/05

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श्री परमात्मने नमः। श्रीमल्लिनाथ पुराण । - 一关的 भाषाकारका मंगलाचरण । सर्व विघ्नहर्ता प्रभू मल्लिनाथ जिनराज । निज मंगल कारण नमू धारि माथ पद आज || Tr ज्ञान योग तप लीन नित रहितपरिग्रह धीर । विषयवासनाविमुख गुरु मैटो मम भवपीर ॥२॥ बंदू वाणी भगवतो स्याद्वादमय शुद्ध । जा प्रसादतें होत हैं भव्यजीव परिखुद्ध ॥३॥ ग्रन्थकारका मंगलाचरण । नम श्रोमल्लिनाथाय कर्ममल्लविनाशिने । अनन्तमहिमाप्ताय त्रिजगत्स्वामिनेऽनिशं ॥१॥ शेषान् सर्वान् जिनान्बंदे धर्मचक्रप्रवर्तकान् । विश्वभव्यहितोद्यु तान् पंचकल्याणनायकान् ॥ २॥ गुणाष्टकमयान सिद्धास्त्रलोक्यान- जिनका जीतना बड़े क्लेशसे हो सकता है ऐसे ज्ञानावरण आदि कर्मरूपी मल्लोंको जड़से नष्ट करने वाले, अनन्तविज्ञान, अनन्तवीर्य, अनन्त सौख्य और अनन्तदर्शन स्वरूप अनन्त चतुष्टय महिमाके धारक, एवं तीन लोकके स्वामी भगवान मल्लिनाथको में ग्रन्थकार (श्रीसकलकीर्ति भद्दारक ) सदा मस्तक झुका- कर नमस्कार करता हूं ॥१॥ भगवान मल्लिनाथसे अन्य जो ऋषभ आदि तीर्थंकर हैं उन्हें भी में ग्रन्थकी आदिमें मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं क्योंकि वे समस्त तीर्थंकर भी भगवान मल्लिनाथके ही समान धर्मचक्र प्रवर्तानेवाले हैं। मोक्षाभिलाषी समस्त जीवोंको हितकारी मार्ग मोक्षमार्गमें लगानेवाले हैं एवं गर्भ जन्म तप ज्ञान और निर्वाण इन पांचों कल्याणोंके नायक हैं ॥ २॥ ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि घा- ति अघाति कर्मोके नाशसे प्राप्त सम्यक्त्व आदि आठो गुणोंके स्वामी, तीन लोकके अग्रभागमें विराजने- -:

पुराण निवासिनः। ध्येयान् मुन्यादिभव्यौधै स्मरामि हृदये सदा ॥ ३ ॥ आहे तो भारती पूज्या लोकालोकप्रदीपिका रजोविधूयने नित्यं तनोतु विपुला मति ॥ ४ ॥ आचार्यान पाठकान् साधून् गुरूनाचारतत्परान् । श्रुतान्धीन शिरसा वदे सर्वाश्च योगसाधकान् ॥ ५ ॥ रत्नत्रय नमस्कृत्य कर्मघ्नं शर्मसागर । रत्नत्रयविधानस्य फलसूचनहेतवे ॥ ६॥ मल्लिनाथजिनेन्द्रस्य चरित्र पावन पर | समासेन प्रब क्ष्यामि स्वान्ययोहि तसिद्धये ॥ ७ ॥ अथ जवूमति द्वीपे विदेहे पूर्वनामनि । विषय कच्छकावत्यमियोऽस्ति धर्मवारिधिः ॥ ८॥ यत्र ग्रामाणि खेटानि पत्तनानि पुराणि च । मटवादोनि राजन्ते जिनागारैश्च धार्मिके ॥ ६॥ यत्रारण्ये वने रम्येऽचले तुंगे फलाकिते । सर्वत्र मुनयो धीरा दृश्यन्ते ध्यानतत्परा. ॥१०॥ 'वाले एवं मोक्षाभिलाषी भव्यजीव सदा जिनको आनन्दमयी मूर्तिका ध्यान करते हैं उन सिद्ध भगवानको । भी मैं अपने हृदयमें स्मरण करता हूं ॥३॥ लोक और अलोकको स्पष्ट रूपसे प्रकाश करनेवाली एवं भगवान अरहंतको दिव्यध्वनिसे प्रकाशमान भगवती सरस्वतीको भी मैं ग्रन्थकी आदिमें अभिवंदना करता हूं और उससे विनयपूर्वक यह प्रार्थना करता हूं कि वह विघ्नोंके नाश करनेमें सदा मेरी बुद्धिको प्रबल और निर्मल बनावे ॥ ४ ॥ ग्रन्थकी आदिमें आचार्य उपाध्याय और सर्व साधुओंको भी मेरा मस्तक झुकाकर नमस्कार है क्योंकि ये पवित्रात्मा ज्ञानाचार आदि आचारोंके आचरण करनेवाले हैं । आगमके समद्र हैं और ध्यानके करनेमें प्रवीण हैं ॥ ५॥ समस्त कर्मोको नाश करनेवाले और अनेक प्रकारके कल्या- णोंके समुद्र उस सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकचारित्र स्वरूप रत्नत्रयको भी मैं प्रणाम करता है और हृदयमें यह पूरी अभिलाषा रखता हूं कि वह कल्याणकारी रत्नत्रय मुझे भी प्राप्त हो ॥ ६ ॥इस प्रकार कल्याणके कर्ता समस्त इष्ट देवोंको भक्तिपूर्वक नमस्कारकर में उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथके चरित्रको संक्षेपसे वर्णन करता हूं जो कि अत्यन्त पवित्र है और अपना पराया हित सिद्ध करनेवाला है ।७॥ इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेहक्षेत्रमें धर्मका समुद्र अर्थात् जहांपर सदा वास्तविक धर्मको प्रवृत्ति रहती है ऐसा कच्छकावती नामका प्रसिद्ध देश है ॥ ८॥ इस कच्छकावती देशके गांव, खेट, पत्तन, पुर, मटम्ब आदिमें जगह जगह जिनमन्दिर शोभायमान हैं एवं मोक्षाभिलाषी धर्मात्मा लोगोंके निवास स्थान बने हुए है। उनसे यह देश अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है ॥ ६ ॥ इसी कच्छकावती देशके महामनोहर अवि- मल्लो ३ पुराण का सख्यातीता जिनाधीशाश्चक्रिणश्चार्धचक्रिण तद्विपः कामदेवाश्च जायन्ते सुरपूजिताः ॥ ११॥ यत्र प्रवर्तते धर्मों जैनोट को दयामय । शाश्वतो यतिभिः श्रावकैश्च सारो न चापरं ॥ १२ ॥ विहरन्ति मुनीशा गणेशा केवलिन सदा । यत्र धर्मोपदेशाय सता न च कुलिगिन ॥१३॥ सर्वत्र जिनचैत्याला विलोक्यन्ते महोन्नता । ग्रामारण्यपुरादौ च नान्यदेवमठा क्वचित् ॥ १४ ॥ यत्र वर्णत्रयोपेता जिनधमपरा. प्रजा । विनीता जिनगुर्मादौ सदाचारा वसत्यहो ॥ १५ ॥ अङ्गपूर्वाणि यत्रोच्चर्जिनोक्तानि निरतः । भूयते च प्रपठ्य ते न कुशास्त्राणि सजने. ॥ १६ ॥ यत्रोत्पन्नेरहो स्वर्गों मोक्षश्च यदि साध्यते । तपसा नाशो ऊंचे और नाना प्रकारके फलोसे शोभायमान जंगल और वनोंमे जगह जगह मुनिराज दीख पड़ते हैं जो कि घोर परीषहोंके सहनेमें परम धीर वीर हैं और सदा ध्यानमें लवलीन हैं ॥ १०॥ इसी कच्छका- वती देशमें असंख्याते भगवान जिनेन्द्र उत्पन्न होते हैं । असख्याते ही चक्रवर्ती नारायण प्रतिनारायण और कामदेव उत्पन्न होते हैं जिनकी कि बड़े २ देव पूजा और सत्कार करते हैं ॥ ११॥ इस कच्छकावती देशमें केवल एक जैन धर्मको ही प्रवृत्ति रहती है जो धर्म सदा दयास्वरूप है । यति और श्रावकोंकी विद्य- मानतासे जो शाश्वत है- सदाकाल विद्यमान रहता है और सारभूत है किन्तु जैनधर्मके सिवाय अन्य किसी धर्मकी उस देशमें प्रवृत्ति नहीं रहती ॥ १२ ॥ इस कच्छकावती देशमें मोक्षाभिलाषी जीवोंको धर्म- उपदेश सुनानेके लिये सदा मुनिगण गणधर और केवलियोंका विहार होता रहता है । कुलिगी-मि- थ्यात्वी साधुओका वहांपर विहार नहीं होता ॥ १३ ॥ इस देशमें जहां देखो वहां ग्राम और नगर आदिमें ऊंचे ऊचे जिनमन्दिर ही दोख पड़ते हैं मिथ्यादृष्टी देवोंके मन्दिर कहीं भी नजर नहीं पड़ते॥ १४ ॥ इस देशमें भगवान जिनेन्द्रके धर्ममें सदा लवलीन क्षत्रिय वैश्य और शूद्र तीनों वर्गों की प्रजा निवास कर- ती है यह प्रजा भगवान जिनेन्द्र एवं गुरुओंमें सदा विनयालु है और सदा उत्तम आचरणकी आचरने- वाली है ॥ १५ ॥ इस देशमें जहां सुनो वहांपर भगवान जिनेन्द्रद्वारा प्रतिपादित बारह अङ्ग और चौदह पूर्वही सत्पुरुषोके द्वारा सुननेमें आते और पढ़े जाते हैं मिथ्या शास्त्रोंका वहांपर सुनना और पढ़ना नजर नहीं आता ॥ १६ ॥ विशेष क्या ? इस देशमें उत्पन्न होने वाले महानुभाव, जप, तप, व्रत, और दान पुराण - ' व्रतदानाद्यस्तत्र का वर्णना परा ॥ १७ ॥ इत्यादि-वर्णनोपेते देशे धर्मकुलालये । चीतशोकाभिधं भाति पुरं देवपुरोपमं ॥ १८॥, दीर्घखातिकया तुंग- शालगोपुरतोरणैः । मनोशैर्यदभाज्जवूद्वीपवेद्यधिवत्तरां ॥ १६ ॥ पुण्यवद्धामकूटाग्रध्वजहस्तैमरुद्वशैः। नाकिनामाइयंतीव मुक्तये यद्भुवस्तरां ॥२०॥ केचित्पश्याति दानाय गृहद्वारं च दानिनः । केचित्प्राप्य महापागं सुदानं ददते मुदा ॥ २१ ॥ केचिदानजपुण्येन रत्नवृष्टि भजत्यहो । केचिदप्राप्य सत्पात्र खेदं चापि प्रयात्यहो ॥ २२ ॥ दिव्यरूपाणि युग्मानि भतृस्त्रीणा जिनालये । देवा- नामिव राजते यत्र पूजापराणि च ॥ २३ ॥ तुंग। है ममया यत्र जिनप्रासादपक्कय । धर्माकरा श्वात्यर्थं भ्राजते मणितौरणैः ॥ २४ ॥ मणिबिंवोच्छ्र- आदिके द्वारा सुलभरूपसे न प्राप्त होनेवाले स्वग और मोक्षको भी प्राप्त कर लेते हैं तब इससे अधिक उसकी कीर्तिका क्या वर्णन हो सकता है ॥ १७॥ इस प्रकारके उत्तम वर्णनके धारक एवं समीचीन धर्म और उमोत्तम कुलोंके स्थान उस कच्छकावती देशमें एक वीतशोका नामकी नगरो है जो कि अपनी शोभासे देवपुरी-स्वर्गके समान जान पड़ती है ॥ १८ ॥ विस्तीर्ण खाइयां मनोहर ऊंचे २ परकोट सदर दरवाजे और तोरणों (वंदनमालाओ) से वह नगर अत्यंत शोभित होता है सो ऐसा जान पड़ता है मानो वेदो और समुद्रसे बेष्टित यह जम्ब द्वीप हो है ॥ १६ ॥ उत्तमोत्तम धनिकोंकी अटारियोंके अग्रभागमें लगी हुई और पवनके झकोरोंसे हिलनेवाली जो ध्वजायें वे ही हुए हाथ, उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो उस नगरकी भूमियां देवोंको यह जतलाकर खुला रही है कि भाई देवा । यदि तुम्हें अपने निजस्थान स्वर्गसे मोक्ष नहीं प्राप्त होती है तो तुम यहांसे उसे प्राप्त करो। अतएव वह नगर अत्यन्त शोभायमान जान पड़ता था ॥ २० ॥ उस नगरमें यह बड़ी आनन्दकी बात थी कि वहुतसे दानीपुरुष आहारके वेलाके समय मुनियोंको आहारदान देनेकेलिये अपने अपने घरोंके द्वार देखते थे अर्थात् द्वारापेक्षण करते थे और कोई २ मुनिरूप महापात्र-उत्तमपात्रको भक्ति- पूर्वक उत्तमदान देते थे॥२१॥ किन्ही किन्ही पुण्यात्माओंके घर दानसे जायमान पुण्यसे रत्नोंकी वर्षा होती थी और कोई २ पुरुष सत्पात्रको न पाकर दुःखित हो पश्चात्ताप भी करते थे ॥२२॥ उस वीतशोका नगरमें दिव्यरूपके धारक स्त्री पुरुषोंके जोड़े जिस समयमें जिनमन्दिरोंमें भगवान जिनेन्द्रकी पूजामें संलग्न होते थे उस समय वे देव देविओंके जोड़े सरीखे जान पड़ते थे॥ २३ ॥ धर्मकी खानियोंके समान उस ४ मल्ली० ५ जैदी रत्नोपकरणे. परैः । गीतेनतननाद्यश्च स्तवै. स्त्रीभिर्नरोत्तमे ॥ २५॥ योहंते अहो जन्म सुरेशा मुक्तिसिद्धये । पुरे धर्माकरे तत्र वर्णना का परा घना ॥२६॥ इत्यादिवर्णिते तस्मिन् पुरे धर्मककारणे । नपो वैश्रवणो ह्यासीत्प्रतापी धर्मभूषितः ॥ २७ ॥ अभात्स रूपलावण्यवस्त्रालकारसद्गुणैः । दान- शीलवतायश्च सुरेश इव नीतिवित् ॥ २८ ॥ प्रजाना क्षेमकर्ता सन्यायमार्गरतो महान् । स्वराज्य पालयत्येव जितारातिर्विचक्षण ॥ २६ ॥ धर्मादर्थ- स्तथा काम क्रमान्मोक्षश्च धीमता । इति मत्वा स भुनायो धय॑ध्यानपरोऽभवत् ॥ ३० ॥ प्रत्यहं दानपूजादि प्रोपधान् सर्वपर्वसु । श्रावकवतसंपूर्ण करोति शीलपान्नृपः ॥ ३१ ॥ पुण्योदयेन त्रयासीद्राज्यलक्ष्मी सुखप्रदा । पुण्यकर्मकरा सारा दासीव वशवर्तिनी ॥ ३२ ॥ अर्थकदा लसद्भाल भूपालं नगरकी ऊंची ऊंची और सुवर्णमयी जिनमन्दिरोंकी श्रेणियां मणिमयी तोरणोंसे ऊचे ऊंचे मणिमयी प्रतिविम्बोंसे, देदीप्यमान रत्नमयी उपकरणोंसे गीत नृत्य वाजे और स्तवोंसे स्त्रियां और उत्तमोत्तम पुरुषोंसे अत्यन्त शोभामान जान पड़ती थी ॥२४-२५ ॥ विशेष क्या धर्मकी खानि स्वरूप उस नगरमें मोक्षकी प्राप्तिकेलिये बड़े २ ऋद्धिके धारक इंद्र भो जन्म धारण करनेको अभिलाषा करते थे इसलिये इस नगरका जितना भी अधिक वर्णन किया जाय थोड़ा है ॥ २६ ॥ इस प्रकार उत्तम वर्णनके धारक और धर्मके प्रधान कारण उस वीतशोक नगरमें एक वैश्रवण नामका राजा था जो कि अत्यन्त प्रतापी होनेपर भी परम धर्मात्मा था। कमनीयरूप और लावण्यसे महामनोहर वस्त्र और भूषणोंसे एवं दान शील और व्रत आदिसे वह राजा अत्यन्त शोभायमान था तथा इंद्रके समान परम नीतिवान था।प्रधानरूपसे वह प्रजाओंके कल्याणका करनेवाला था। सदा त्यायमार्गका अनुसरण करनेवाला था महान् था। समस्त शत्र ओंका विजेता और चतुर था एवं अपने राज्यका सुचारु रूपसे पालन करता था। उस वैश्रवण राजाका यह सदा ध्यान रहता था कि धर्मसे धनकी प्राप्ति होती है। धनसे काम पुरुषार्थ सिद्ध होता है एवं क्रमसे मोक्ष पुरुषार्थको सिद्धि होती है ऐसा मानकर वह सदा धर्मध्यानमें लीन रहता था। वह शीलवान नरपाल प्रतिदिन दान पूजा आदिको करता था। समस्त अष्टमी और चतुर्दशी पर्वो में उपवासोंको आचरता था एवं समस्त श्रावकोंके व्रतोंका वह अच्छी तरह पालन करता था ॥ २७-३१ ॥ पुण्यकर्मके उदयसे राजा वैश्रवणको अत्यन्त सुख देनेवाली राज्यलक्ष्मीकी प्राप्ति थी जो कि पुराण वसद स्थितं । पुष्पहस्तो मुदागत्य वनपालो व्यजिशपत् ॥ ३३ ॥ श्रीचन्दनवने देव : मनोश मुनिपुंगवः । आजगाम त्रिगुप्तात्मा सुगुप्ताख्योऽवधीक्षण. ॥ ३४ ॥ कृत्स्नसगपरित्यक्तः मयुक्तो गुणसम्पदा । भव्य- संवोधनायव नानाध्ययनतत्परः ॥ ३५ ॥ नत पीठात्समुत्याय परमानन्दनिर्भर । गत्वा सप्तपदान्युनीस्ता दिश प्रानाम सः ॥ ३६॥ दापयित्वा महानन्दभेरी स साजनेत । वर्मसिद्धय मुने पाटो नंतुं तहनमासदत् ॥ ३७ ॥ शिलापट्टे निविष्टस्य मुनींद्रस्य हितात्मन । नि सगस्य गुणाधर्म- इत क्रमसरोरहौ ॥ ३ ॥ पवित्र कामोंमें खच हानेवाली थी सारभूत थी और दासीके समान राजा वैश्रवणको लदा आज्ञाकारिणी थी॥३२॥ कदाचित् देदीप्यमान मुकुटसे जिनका मस्तक चमचमा रहा था ऐसे राजा वैश्रवण अपनी राजसभामें राजसिंहासनपर विराजमान थे कि उसी समय पुप्पोंको हाथमें लेकर अत्यन्त हर्पका भरा वनपाल राजस- भामें आया और इसप्रकार निवेदन करने लगा ॥ ३३ ॥ हे देव । महामनोहर चन्दनवनमें मुनिराज सुगुप्त आकर विराजे हैं वे मुनिराज साधारण मनिराज नहीं समस्त मुनियोंमें श्रेष्ठ है । मनोगुप्ति वचनगुप्ति और कायगुप्ति इन तीनों गुप्तियोंसे उनकी आत्मा विभू- पित है। अवधिज्ञानरूप नेत्रके धारक हैं । समस्त परिग्रहके त्यागी हैं । गुणरूप सम्पत्तिके धारक हैं तथा "मोक्ष प्राप्त करनेवाले भव्यप्राणी समीचीन ज्ञान प्राप्त करें” अर्थात्-संसारमें जो पदार्थसारभूत है उसकी ओर झुके, यही समझानेके लिए वे विशेषरूपसे ध्यान और अध्ययनमें अत्यन्त लीन हैं ॥३४-३५ ॥वन- पालके मुखसे परमानन्द देनेवाला समाचार सुन राजा वेश्रवणको आत्मा मारे आनन्दके गदगद होगई। वह आनन्दसे पुलकित हो शीघ्र ही राजसिंहासनसे उठा। जिस पवित्र दिशाके अन्दर मनिराज सुगुप्त विरा- जमान थे, सात पैड़ उस दिशाकी ओर गया और बड़ी भक्तिके साथ उस दिशाको साष्टांग नमस्कार किया ॥ ३६॥ मनिराजके दर्शनोंकी शीघ्र उत्कंठासे उसने शीघ्र ही नगग्में आनन्द भेरी दिवाई । अपने सर्व कुटुम्बी जन भेले किये एवं धर्मोपदेशको अभिलापासे मुनिराज सुगुप्तके पूजनार्थ वह शीघ्र ही चन्दन वनमें पहुंच गया ॥ ३७ ॥ हितकारो मार्गके उपदेश देनेवाले, समस्त परिग्रहके त्यागी, गुणोंके Vik 1 - को. पुराण त्रि परीत्य प्रपूज्यातिभक्त्या दिव्यार्जनोत्कर. । साधं स्वपरिवारेण ननाम शिरसा नृप ॥ ३६॥ विश्वशर्मसनीराजन् ! स धर्मवृद्धिरस्तु ते। मुक्तिश्रीदायिनीत्याशीवादमस्मै ददौ मुनि. ॥४६॥ श्रुत्वा तद्वचनं राजा धर्मवृद्धिप्रसूचकं । जिज्ञासुर्धर्मयाथात्म्य नत्वाऽवोचन्मुनि प्रति ॥४१॥ भगवन् । कोशो धम केन साध्योऽस्य कि फल । तत्सर्व श्रोतुमिच्छामि भवत श्रीमुसादह ॥४५॥ यथा नेश तमोजातु विना सौर्य न नश्यति। तथा भवद्ववोभानु विना मे धर्मसशय ॥४३॥ ततो जगौ मुनीद्रोऽसौ नदभिप्रेतसिद्धये। एकाग्रचेतसा धीमन् । कथ्यमान वृप शृणु ।। ४४ ॥ धरत्यपारससारदु खादुद्धृष्य योगिनः । समद्र और पूज्य मनिराज सुगुप्त एक विस्तीर्ण शिला पर विराजमान थे । राजा वैश्रवण शीघ्र ही उनके पास ण्हुंचा । तीन प्रदक्षिणा दों। अपने परिवारके साथ उत्तमोत्तम सामग्रीसे मुनिराजके चरण कमलोंको भक्तिपूर्वक पूजा को एवं पूजाके अन्तमें उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥ ३८-३६ ॥ मुनिराज लौकिक शिष्टाचारके अत्यन्त जानकार थे इसलिये उन्होंने हे समस्त कल्याण- के स्थान राजन् । मोक्षलच्मोको प्रदान करनेवाली, तुम्हारी निरन्तर धर्मवृद्धि हो, यह आशीर्वाद दिया। ॥ ४० ॥ राजा वैश्रवणको इसप्रकार अपनेलिये धर्मवृद्धिका सूचक मुनिराजका वचन सुनकर यथार्थ धर्मके जाननेकी इच्छा प्रगट होगई इसलिये प्रणामपूर्वक उसने मुनिराजसे यह निवेदन किया ॥ ४१ ॥ भगवन् ! आपने जो मुझे धर्म वृद्धिस्वरूप आशीर्वाद दिया है मैं नहीं समझता कि वह धर्म क्या है, कौन उसे प्राप्त कर सकता है और क्यो उसका फल है ? इसलिये आपके हो श्रीमुखसे मुझे उस धर्मकी प्राप्तिके उपायोंकी और उसके फलके जाननेकी इच्छा हुई है ॥ ४२ ॥ कृपानाथ । जिसप्रकार रात्रिका प्रवल अंधकार बिना सूर्यके प्रकाशके नष्ट नहीं होता उसीप्रकार मुझे भी धर्मके अन्दर जो संशय है अज्ञान अन्धकार है, वह भी आपके वचनरूपी सूर्यके विना मिट नहीं सकता ॥ ४३ ॥ राजा वैश्रवणकी इसप्रकार उत्कट धर्मजिज्ञासा सुन मुनिराजने कहा-राजन् ! तुम्हारे अभीष्ट पदार्थकी सिद्धि हो इसलिये मैं संक्षे- पसे धर्मका व्याख्यान करता हूं तुम चित्तको एकाग्र कर ध्यानपूर्वक सुनो- यह संसार अपार है और इसमें अगणित अनेक प्रकारका दुःख है। इस अगणित संसारके दुःखसे छुटाकर जो योगियोंको अनन्त सुख स्वरूप मोक्षमें लेजाकर रक्खे अर्थात् परमानन्दमय सुखका रसास्वा- .

- मल्ली० पुराण ८ मोक्षेऽनन्तसुसे राजस्तं धर्म चिद्धि तावत ॥ ४५ ॥ नेन धर्मेण जायन्ते विविधा भोगसपदः । चक्रवादिसंसेच्या अन वाद्भुतसौख्यदाः ॥ ४६॥ परत्रेद्रपद दिव्यं सर्वदेवनमस्कृत । अहमिद्रपदं चान्यदुर्लभ लभ्यते वृपात् ॥४७॥ धर्मेण धार्मिका. सर्वाभ्युदयादिपरम्परा । प्राप्य लोकत्रये याति हनन्तसुखदं शिवं ॥४८॥ सम्यक्त्वज्ञानवारित्रत्रयेण साध्यतेऽत्र स । व्यवहाराभिधेनैव निश्चयेन च संयते. ॥४६॥ श्रद्वानं सप्ततावाना जिनतद्वाक्ययोगिनः । दन करावे उसीको हे राजन् ! वास्तविक धर्म कहा गया है ॥ ४४–४५ ॥ इस धर्मकी कृपासे जिनकी सेवा करने में बड़े बड़े चक्रवर्ती आदि भी खड़े रहते हैं और जो इसी संसारमें आश्चर्यकारी उत्तमोत्तम सुखोंको प्रदान करते हैं ऐसे उत्तमोत्तम भोग और भांति भांतिकी संपदायें प्राप्त होती हैं परभवमें जिसे समस्त देव मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हैं और जो दिव्यपद माना जाता है ऐसा वह इन्द्रपद भी धर्मकी कृपा- प्राप्त होता है एवं अहमिंद्र पद भी जो अन्यदुर्लभ है-दूसरे उपायसे नहीं प्राप्त किया जा सकता वह भी इस पवित्र धर्मकी कृपासे सुलभरूपसे प्राप्त हो जाता है ॥ ४६॥ धर्मात्मा लोग धर्मके द्वारा तीनों लो- कके समस्त ऐश्वर्योको पाकर परम्परासे मोक्षको प्राप्त करते हैं जिसमें कि अविनाशी सुखकी प्राप्ति हो- ती है । व्यवहार और निश्चयके भेदसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र दो दो प्रकारके है। गृहस्थोंके व्यवहार सम्यग्दर्शन आदि होते हैं और निश्चय सम्यदग्दर्शन आदि संयमी मनियोंके ही होते हैं। जिस धर्मका ऊपर उल्लेख किया गया है वह धर्म व्यवहार सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र से भी प्राप्त होता है और संयमी पुरुषोंको निश्चय सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्रसे प्राप्त होता है अर्थात् व्यवहार सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र भी धर्म माना जाता है और निश्चय सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र भी धम माना जाता है ॥ ४८-४६ ॥ व्यवहार सम्यग्दर्शना- दिका स्वरूप इसप्रकार है:- जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन सात तत्वोंका, भगवान जिनेन्द्रका उनके आगम का और उत्तमतपके भंडार गुरुओंका जो यथार्थरूपसे श्रद्धान करना है उसे व्यवहार सम्यग्दर्शन माना है h । । पुराण मल्लि. निस्सदेहबुधा प्रादुर्व्यवहाराख्यदर्शनं ॥५०॥ तत्राद्य त्यक्तसदेहमग नि शकिताभिधा । भोगाकाक्षादिनिकात निकाक्षितागमेव हि ॥५१॥ मुनिकाये घृणाभावमगनिर्विचिकित्सितं। मूढत्वभावलोकाचारहीनोऽमूढताभिध ॥ ५२॥ सन्मार्गागतदोपस्याच्छादनं ह्यु पगृहन । धर्मादे- श्चलता स्थापन स्थितीकरण गिरा ॥ ५३ ॥ सधर्माणि महास्नेहवात्सत्यागं सुनिर्मल । जिनशासनमाहात्म्यप्रकाशनं प्रभावना ॥ ५४॥ इस सम्यग्दर्शनके निःशकितादि आठ अंग हैं और उनका स्वरूप यह है-जिनवचनमें किसी प्रकारकी शंका न करना निःशंकित अंग है । भोगोंके अन्दर आकांक्षा न रखना निःकांक्षित अंग है। मुनि आदिके शरीरमें रोगादिके कारण दुगंधि उत्पन्न हो जानेपर भी किसी प्रकारकी घृणाका न करना निर्विचिकित्सत अङ्ग है । लोकाचारके अन्दर जो भी मिथ्यादृष्टियोंके साथ मूढ़ताका व्यवहार है उसका न होना अमूह- ष्टि नामका अंग है। असमर्थ अज्ञानी मनुष्य भगवान जिनेन्द्रद्वारा प्रतिपादित सन्मार्गमें यदि किसी प्रकारके दोष लगावें तो उन दोषोंको आच्छादित कर देना-ढक देना, उपगूहन अङ्ग है। किसी कारण- वश कोई धर्मात्मा धर्मसे चलायमान होजाय तो उन्हें कोमल बाणीसे समझा बुझाकर वा अन्य किसी उपाय से पुनः ज्योंका त्यों धर्ममें स्थिर कर देना स्थितीकरण अंग है। जैनधर्मके धारकोंमें अत्यन्त प्रेमका रख- ना वात्सल्य अंग है और किसी भी उत्तम उपायसे भगवान जिनेन्द्रके शासनका माहात्म्य प्रगट करना आठवां अंग प्रभावना कहा जाता है ॥ ५०-५४ ॥ भगवान समन्त भद्राचार्यने इन अंगोंका स्वरूप इसप्रकार कहा है- 'भगवान जिनेन्द्रने वस्तुका जो स्वरूप कहा है वह वही है और उसी प्रकारका है अन्य नही है और न अन्य प्रकारका है इसप्रकार निश्चल तीक्ष्ण खङगको धाराके समान जो सन्मार्ग-श्रेष्ठमार्गमें संशयरहित निश्चलरूपसे रुचिका होना है वह सम्यग्दर्शनका पहिला अङ्ग निःशंकित नामका है। कर्मों की क्षायोपश- मिक आदि अवस्थाओंके आधीन होनेके कारण जो सुख कर्माधीन है, विनाशीक है और सदा जिसका १ इदमेवेदशमेव तावं नान्यन्न नान्यथा। इत्यकपायसाभोवत् सन्मार्गेऽसशया रुचि ॥११॥ कर्मपरवशे सान्ते दु औरतरितोदये । माप- वीजे सुखेऽनास्था श्रद्धानाकाक्षणा स्मृता ॥ १२ ॥ स्वभावतोशुजौ काये रत्नत्रयपवित्रिते । निर्गुप्सा गुणप्रीतिर्मता निर्विनिकित्सिता ॥ १३ ॥ कापथे पथि दुःखाना कापयस्थेऽप्यसम्मतिः । असंपृक्तिरनुत्कीर्तिरमूढा दृष्टिरुच्यते ॥१॥ - - ।। मल्लि० पुराण उदय दुःखसे मिश्रित है ऐसे पापके कारण सुखमें जो किसी प्रकारके विश्वासका न रखना है अर्थात् .ऐहिक विषयवासना जनित सुखमें जो किसी प्रकार लालसा नहीं रखना है वह दूसरा निःकांक्षित अंग है । रक्त मांस आदि निंदित धातु उपधातुओंका स्थान होनेसे स्वभावसे अपवित्र भो रत्नत्रय सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रसे पवित्र अर्थात स्वभावसे निंदित भी सम्यग्दर्शन आदिसे पवित्र मुनियों के शरीरमें किसी प्रकारकी घृणा न कर जो उनके गुणोंमें प्रीति करना है वह तीसरा निर्विचिकित्सत अंग है। मिथ्यामार्ग दुःखोंका देनेवाला है तथा उसके अनुगामी किसी प्रकारके उत्तम मार्गपर चलनेवाले नहीं इसलिये जब कभी उस मिथ्यामार्ग और मिथ्यामार्गपर चलनेवालोंकी प्रशंसाका अवसर प्राप्त हो उस समय अपनी ओरसे किसी प्रकारसे सम्मति नहीं देना न संम्बन्ध रखना और न उनके चकमामें आकर किसी प्रकारकी प्रशंसा करना चौथा अमूढदृष्टि अंग है । यदपि भगवान जिनेद्रद्वारा बताया गया मार्ग स्वयं शुद्ध है तथापि अत्यन्त कठिन होनेसे धारण न कर सकनेके कारण यदि कोई अज्ञानी और असमर्थ पुरुष उसकी निंदा कर बैठे तो किसी भी उपायसे उस निन्दाको दूर करना-निन्दा न होने देना, पांचवा उपगहन अंग है किसी भी तीव दुःख आदि कारणोंसे धर्मात्मा मनुष्योंकी परिणति सम्यग्दर्शन वा सम्यकचारित्रसे चल विचल हो उठी हो और वे उनसे विमुख रहना चाहते हों तो वास्तविक जैन शास्त्रके ज्ञानियोंका जो फिर से उन धर्मात्माओंको सम्यग्दर्शन और सम्यक चारित्रके अन्दर दृढ कर देना है वह छठा स्थितीकरण अंग है। अपने साधर्मी भाइयोंका जो हृदयमें उत्तम भाव रखकर निश्चलरूपसे यथायोग्य आदर सत्कार करना है वह सातवां वात्सल्य अंग है तथा संसारमें जो बहुलरूपसे अज्ञान अन्धकार फेल रहा है उसे यथायोग्य किसी न किसी उपायसे दूरकर जो भगवान जिनेंद्रके शासनका माहात्म्य प्रगट करना है वह स्वय शुद्धस्थ मार्गस्य वालाशक्तजनाश्रया । वाच्यता यत्प्रमार्जति तद्वदत्युग्गूहन ॥१५॥ दर्शनाचरणाद्वापि चलता धर्मवत्सलै । प्रत्यवस्थापन प्राज्ञे स्थितीकरणमुच्यते ॥ १६ ॥ स्वयूध्यान् प्रति सद्भावसनाथापेनकेतवा ।प्रतिपत्तिर्यथायोग्य वात्सल्यमभिलप्यते ।। १७ ।। अज्ञानतिमिरव्याप्ति- . । मपाकृत्य यथायथ ! जिनशासनमाहात्म्यप्रकारा स्यात्प्रभावना ॥ १८ ॥ १ --- 4- मलि. + सता॥५६॥ एते. सार. पराष्ट्रागै सबलीभूतदर्शने । इति कर्मारिसन्तान यथा भूपो बलान्वित ॥ ५५ ।। शानचारित्रयोर्मूल दर्शनं भाषितं जिनः ।सोपानं प्रथम मुक्तिधाम्नो वीज वृषस्य च ॥५६॥ मुक्तिमार्गस्थमेवाह त मन्ये पुरुषोत्तम । भोक्तार त्रिगजलक्ष्म्या स्वीकृत येन दर्शनं ॥२७॥ महाधनी स एवात्र मतो दक्षौ परत्र च । अनर्थ्यदृष्टिसरल हृदि यस्य विराजते ॥ ५८ ॥ केवल धनमत्र व सुसे दु ख ददात्यहो। सम्यजिताभणिर्विश्वसुरा लोकत्रये पुराण प्रभावना अंग कहा जाता है। इन आठ अंगोंके पालक अंजन चोर आदि महापुरुषोंने अनुपम फल प्राप्त किया है और इन अंगोंका माहात्म्य वर्णन करते करते यहां तक कहा गया है कि जिसप्रकार एक भी अक्षरको कमी रखनेवाला मंत्र विषकी वेदनाको दूर नहीं कर सकता उस प्रकार इन आठों अंगों में एक भी अङ्गसे रहित सम्यग्दर्शन भो जन्मको संततिको नष्ट नहीं कर सकता।" ग्रन्थकार सम्यग्दर्शनकी महिमा दिखाते हुए कहते हैं कि जिसप्रकार वलवानराजा शत्रुओं के समूहको भी देखते २ ही तितर वितरकर नष्ट कर देता है उसप्रकार सारभूत और उत्कृष्ट जिन आठ अंगोंका ऊपर वर्णन किया गया है उनसे युक्त सम्यग्दर्शन जिस समय बलवान हो जाता है उस समय वह क्षण भरमें वह कर्मरूप वेरियोंको जड़से उखाड़कर दूर फेंक देता है ॥ ५५ ॥ भगवान जिनेन्द्रने सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्रका मूल कारण सम्यग्दर्शन हो कहा जाता है क्योंकि बिना सम्यग्दर्शनके वे मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र माने जाते हैं तथा सम्यग्दर्शनको हो मोक्षरूपी अनुपम महलको पहिली सीढ़ी और धर्मका वीज बतलाया है । ग्रन्थकार सम्यग्दर्शनके लिए यहां तक अपने पवित्र भाव प्रगट करते है कि जिस महा- नुभाव पुरुषने सम्यग्दर्शनको प्राप्त कर लिया है वही पुरुष मोक्षमार्गमें स्थित है और वही तोन लोककी लक्ष्मी का भोगनेवाला है ऐसा मैं मानता हूं तथा जिस महापुरुषके हृदयमें अमल्य सम्यग्दर्शनरूपी रत्न विराज- मान हे वही महानुभाव इसलोक और परलोकमें विद्वानोंको दृष्टिमें महा धनवान है। उससे बढकर अन्य कोई धनवान नहीं ॥ ५६-५८ ॥धन तो केवल इसी लोकमें सुख और दु,खका देनेवाला है परन्तु सम्य- ग्दर्शनरूपी चिंतामणि रत्न ऐसा है जिससे तीनों लोकमें सुख ही सुख मिलता है। सम्यग्दर्शनसे भिन्न न 1 - पुराण १२ 1 'सम्यक्त्वान्नापरो बन्धुः स्वामी श्वद्धितंकरः। स्वर्गमुक्तिकरपुसा पापन्नश्च वृषप्रद ॥६०॥ मत्वेत्यादौ तदादेग मुक्तिरामावशीकर । हत्वा मलिक | मिथ्यारिसतान तीर्थे शादिविभूतिदं ॥६१m. याथातथ्यपरिज्ञान तत्त्वार्थागमयोंगिना । देवादेव च तज्ज्ञान व्यवहारसमाह्वय ॥ ६२ ॥ व्यजनोजितनामा स शुद्धाक्षरनिरूपक । द्वितीयोऽ- तो कोई संसारमें बन्ध है और न सदा हित करनेवाला स्वामी है क्योंकि यह सम्यग्दर्शत जीवोंको स्वर्ग और मोक्षके सुखोंका प्रदान करनेवाला है समस्त पापोंका जड़से नाश करनेवाला और धर्मको प्राप्त कराने- वाला है ॥ ५६-६०॥ इसलिये ग्रन्थकार इस वातपर जोर देते हैं कि जीवोंको चाहिये कि ऐसे परम उप- कारो और सर्वदा हितकारी सम्यग्दर्शन की सबसे पहिले प्राप्ति करै क्योंकि इस सम्यग्दर्शनकी सामर्थसे मुक्तिरूपी लक्ष्मी वश हो जाती है तथा मिथ्यात्वकी संतानको जड़से उखाड़कर यही सम्यग्दर्शन तीर्थंकर आदिकी अनुपम विभूतिको प्रदान करता है ॥ जिस ज्ञानके द्वारा जीव आदि पदार्थ आगम और गुरुओंका यथार्थ रूपसे जानना होता है तथा यह देव है और यह कुदेव है इस बातकी भी अच्छी तरह पहिचान होती है वह व्यवहार नामका सम्यग्ज्ञान है तथा ७ व्यंजनोर्जित १ अर्थसमग्र २ शब्दार्थोभयपूर्ण ३ कालाध्ययन ४ उपध्यानसमृद्धक ५ विनय ६ गुर्वाद्य- बहुमानसमृद्धक ८ ये आठ प्रकारके आचार माने हैं। जहांपर शुद्ध अक्षरोंका निरूपण वह व्यंजनोर्जित नामका आचार माना है। जहांपर शुद्ध अर्थका प्रतिपादन हो वह अर्थसमग्र नामका आचार है जहांपर शब्द और अर्थ दोनोंका सूचन हो वह शब्दार्थो भयपूर्ण नामका आचार है। जहांपर समस्त काल अध्ययनकी मनाई हो, अर्थात-जहांपर नियत समयमें अध्ययनका प्रतिपादन हो वह कालाध्ययन नामका आचार है। जहांपर तप आचरणके साथ साथ अध्ययनका विधान हो वह उपाध्यानसमृद्धक नामका आ- चार है । जहांपर विनयपर्वक पाठका पढ़ना हो वह विनय नामका आचार है। जहांपर अपने गुरु आदिकी नपह्नव ७ और ६ १ सम्यज्ञान पूजामें इन आठों आंचारोंका भिन्न २ रूपसे अर्थ कहा गया है वर्तमानमें यह पूजा प्रचलित है इसलिये यहा वह उद्धृत नही की गई है।

मल्लिक . ८ + पुरा - र्थसमग्राख्य शुद्धार्थप्रतिपादक ॥ ६३॥ शब्दार्थोभयपूर्णाख्यः शब्दार्थोभयसूचकः । कालाध्ययनसशोऽखिलकालाध्ययनातिग m६४ ॥ पठनं तपसा यत्स उपाध्यानसमृद्धक । विनयेनात्र य. पाठो चिनयो मुद्रितो हि स ॥६५॥ ख्यापन य स्मगुर्वादे स गुर्वायनपत्र । बहुमानसमृद्धाख्यो नुतिपूजा- दिसयुत ॥६६॥ एतश्चाष्ट विधाचार्यज्ज्ञना पठ्यते युध । ज्ञानाचार स निर्दिष्टो विश्वदोप शिवप्रद ॥ ६७ ।। शानेन ज्ञायते विश्व सर्व तत्त्व हिताहित । हेयाहेयौ व बंधो मोक्षो धर्मों दुरित परं॥६८॥ कृत्यारत्यं स्वरूपञ्च गुरुदेवश्रु तात्मनां । पात्रापानादिसहान कुदान स्वचिदात्मक ॥६६॥ शान नेत्र जिनः प्रोक्त लोकालोकविलोकने । वाह्याभ्यन्तरतत्त्वादौ तद्वीनोऽत्राध एव हि ॥ ७० ॥ ज्ञानजाल पर ज्ञेय पचाक्षमत्स्यवधने । शानसिंहो भवत्येव कामदंतिविघातने ॥ ७१ ॥ शानपासो दृढो नृणां मनोमर्कटरुधने । शान- कीर्तिका गान किया जाय वह गुर्वाद्यनपह्नव नामका आचार है और जहांपर गुरु आदिको स्तुति और पूजा आदिका समारोह हो वह बहुमानसमृद्धक नामका आठवां आचार भेद है । विद्वानोंके द्वारा इन आठ प्र- कारके आचारोंके साथ जो ज्ञान पढा जाय वह ज्ञानाचार कहा जाता है यह ज्ञानाचार समस्त संसारको प्रकाश करनेवाला दीपक है और मोक्षका प्रदान करनेवाला है ॥ ६२-६७ ।। इस सम्यग्ज्ञानके द्वारा ही समस्त संसारका ज्ञान होता है। कौन तत्व हितकारी है और कौन अहितकारी है यह भी पता इसी ज्ञानसे लगता है। यह पदार्थ त्यागने योग्य है और यह पदार्थ नही त्यागने योग्य है यह बात भी ज्ञान ही वतलाता है तथा यह बन्ध तत्त्व है यह मोन तत्त्व है यह धर्म है यह पाप है यह कृत्य है यह अकृत्य है। देव गुरु और शास्त्रका स्वरूप यह है । पात्रको दान देना सम्यग्ज्ञान कहा जाता और कुपात्रको दान देना कुदान कहलाता है तथा आत्माका स्वरूप चैतन्य है यह सब बात भी सम्यग्ज्ञानके द्वारा ही प्रगट होती है ॥ ६८-६९ ॥ भगवान जिनेन्द्रने लोक और अलोकके देखने में और बाह्य अन्तरंग तत्वोंके पर- खनेके लिये ज्ञानको ही नेत्र कहा है जिसके यह ज्ञानरूपी नेत्र नहीं है वह इस संसारमें सर्वथा अन्धा ही है-केवल आंखोंके रहते वह सूझता नहीं कहा जा सकता ॥ ७० ॥ मछलियोंके बांधनेकेलिए जिसप्रकार जाल रहता है उसीप्रकार स्पर्शन आदि पांचों इन्द्रियां मछलियां हैं और उनके बांधनेकेलिए यह सम्यग्ज्ञा- न जाल है अर्थात् पांचों इन्द्रियोंका दमन सिवाय सम्यग्ज्ञानके दूसरेसे नहीं हो सकता तथा जिसप्रकार हाथियोंके विघात करनेके लिए सिंह समर्थ होता है उसीप्रकार कामरूपी मदोन्मत्त हाथीको सर्वथा नष्ट

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मलि०
२४
॥
पुराम
मादित्य एवासिलाज्ञानधातनाशने ॥७२॥
यत्कर्म भुज्यते विदिरशस्तञ्च शुभाशुभं । वध्यते कर्मणात्राज्ञो विद स्यात् कर्मनिर्जरा ॥ ७३ ॥ यत्कर्म क्षपयत्यजस्तपसा भवकोटिभि !
ज्ञानी नञ्च क्षणार्धेन त्रिगुप्तात्मा स सवरः ॥ ३४॥ ज्ञानमत्रसमाकृष्टा ददात्यालिगन सता । स्वयमागत्य मुक्तिस्त्री का कथा देवयोपिता
॥ ७५ ।। मत्वेवं ज्ञानमाराध्यं प्रत्यहं जिनभापितं । नि प्रमादेन यात्रेण विनयादिमु मुक्षिभि ॥ ७६ ॥ हिसादिकृत्स्नसावध मनोवा कायकर्मभिः
त्यज्यते यत्सुचारित्रव्यवहाराख्यमंजसा ॥ ७ ॥
करनेवाला यह सम्यग्ज्ञान ही बलवान सिंह है॥७१॥ यह संसारी जीवोंका मन बंदरके समान अत्यन्त
चंचल है अर्थात् बंदरकी जिसप्रकार प्रतिक्षण क्रिया होती रहती है उसीप्रकार इस मनकी भी प्रतिक्षण
क्रिया होती रहती है और उससे निरन्तर कर्मबंध होता रहता है उस मनरूपी बंदरके बांधनेके लिये यह
सम्यग्ज्ञान पास है तथा जिसप्रकार सूर्य समस्त अन्धकारको नष्ट कर देता है उसीप्रकार समस्त अज्ञान-
रूप अन्धकारको नष्ट करनेके लिये यह सम्यग्ज्ञान भी प्रखर सूर्य है ॥ ७२ ॥ मूलमें शुभ और अशुभके
भेदसे कर्म दो प्रकारका माना है उसके फलका भोग ज्ञानी भी करते हैं और अज्ञानी भी करते है परन्तु
आश्चर्य इस वातका है कि समानरूपसे भोग करनेपर भी अज्ञानोके तो कर्मोका बंध होता है और ज्ञानी-
के कर्मोकी निर्जरा होती है तथा और भी विलक्षण वात यह है कि तीन तप तपनेपर भी जिस कर्मको
अज्ञानी जीव करोड़ों भवमें खपा सकता है उसे मनोगुप्ति वचनगुप्ति और कायगुप्तिरूप तीनों गुप्तियोंका
धारक एवं संवरसे भूषित ज्ञानी जीव आधे ही क्षणमें मूलसे उखाड़कर फेंक देता है ॥ ७३–७४ ॥ ग्रन्थ-
कार सम्यग्ज्ञानकी सर्वोच्च प्रशंसा करते हुये कहते हैं कि यह सम्यग्ज्ञान ऐसा अनुपम मंत्र है कि इसके
द्वारा खींची गई मोक्षस्त्री भी आपसे आप आकर प्राप्त हो जाती है फिर अन्य देवांगनाओंकी प्राप्ति हो
जाना यह तो बहुत ही सुलभ वात है इसलिये सम्यग्ज्ञान तत्व हमारा परम कल्याणकारी है ऐसा अच्छीत-
रह जानकर जो महानुभाव मुमत हैं-मोक्ष प्राप्त करनेकी पूरी पूरी अभिलाषा रखते हैं, उन्हें चाहिये कि
वे निःप्रमादरूप यंत्रसे अर्थात् किसी प्रकारका मनमें प्रमाद न रखकर भगवान जिनेन्द्रद्वारा प्रतिपादित
विनय आदि रूप ज्ञानका प्रतिदिन आराधन करें, कभी भी उसे चित्त से न विसारे ॥७६ ॥

ܝ ܟܢܐ मल्लि. पुराण विश्वागिरक्षक ह्याद्यमहिंसाख्यमहाव्रत। निवृत्तिरनृतादेर्यात तत्सत्याख्यमहाव्रतं॥८॥ विरतिर्यत्रचौर्यादेस्तदस्तेयमहाव्रत । सर्वनारी निरा- काक्ष ब्रह्मचर्यमहाव्रतं ॥ ६ ॥ सर्वसंगपरित्यागमाकिंचन्यमहावतं । विश्वसंकल्पहीनाद्याऽत्र मनोगुप्तिरभुता ॥ ८०॥ शश्वन्मौनकरा सारा वाग्गु- प्ति स वरप्रदा । शरीरविक्रियाहीना कायगुप्तिरातिका ।। ८१ ।। पथान्वेषणसं जाता होर्यासमितिरभुता । निरवद्यगिरोद्भूना भाषा समितिरेवहि ॥ ८२ ॥ एपनासमिति सर्वकृतायाहारवर्जिता । अन्तरायातिगो पट्चत्वारिंशदोपनिर्गता ॥ ८३ ॥ क्रियते यच्छ भादाननिक्षेप प्रतिलेख्य सा। दययो दाननिक्षेपणारया समितिजसा ॥४४॥ निरोक्ष्य नयनाम्भा यन्मलमूत्रादिकोझन । विधी- मन वचन कायकी क्रियाओंके द्वारा जो हिंसादि समस्त पापोंका त्याग कर देना है वह व्यवहार चारि- त्र कहा जाता है। हिंसा झठ चोरी कुशील और परिग्रह ये पांच पाप है और इन पांचों पापोंका त्याग अहिंसा आदि व्रत कहे जाते हैं। उन अहिंसा आदि ब्रतोंका स्वरूप इसप्रकार है- समस्त जीवोंकी रक्षा करना अहिंसा महाव्रत कहा जाता है। मठ आदिका त्याग करना सत्यमहाव्रत है। चोरी आदिका सर्वथा त्याग अचौर्यव्रत है। स्वस्त्रो परस्त्री आदि समस्त स्त्रियोंका सर्वथा त्याग करदेना ब्रह्मचर्य महाव्रत है और वाह्य अभ्यंतर समस्त प्रकारके परिग्रहका सर्वथा नाश कर देना आकिंचन्य-निष्प- रिग्रह महाव्रत हैं। गुप्तिका अर्थ रक्षा करना है और वह मनोगुप्ति वचनगुप्ति और कायगुप्तिके भेदसे तीन प्रकारकी है। किसी भी पदार्थमें अच्छे बुरे संकल्पोंका होना मनका विषय है जहांपर समस्त संकल्प विकल्पों का त्याग हो वह मनोगुप्ति है। सदा मौन रखना वचनगुप्ति है इसको पालन करनेसे संवरकी प्राप्ति होती है तथा शरीरको समस्त क्रियाओंका अभाव हो जाना अन्तकी कायगुप्ति है ॥ ७७-८१॥ जरा प्रमाण जमीनको शोधकर चलना ईर्यासमिति है निर्दोष हितकारी और परमित वचन बोलना भाषासमिति है। जहांपर कृत कारित और अनुमोदनासे किए गए आहारका त्याग है आहारमें आनेवाले अन्तरायोंका टालना है और उद्गम आदि छयालीस ४६ दोषोंका रहितपना है वह एषणा समिति है । पुस्तक पोछी कमंडलु आदिका दयापर्वक अच्छोतरह देख भालकर ग्रहण करना और रखना आदान निक्षेपण समिति है और नेत्रोंसे अच्छीतरह देख भालकर जमीनपर मल मूत्र आदिका क्षेपण करना प्रतिष्ठापन नामकी मलि. पुराण २६ यते प्रतिष्ठापनाख्या सा समितिर्वरा । ८५।। त्रयोदशविधं होदं चारित्रं भुक्तिमुक्तिदं । महाधर्माकरं निश्चयरलत्रयकारणं ॥ ८६ ॥ सयमेन विनो. त्यष्टो (प्टे) सम्यग्ज्ञानौ [ने] क्षमो [ मे] सती । प्रदातुं नैव मुक्तिश्री कयं न श्लाध्यतेऽत्र स. ॥ ८७ ॥ वरं मुहर्तमेकं हि जीवितं चरणान्वित । तद्धोनं च वृथा वर्षकोटीकोट्यादिजीवित ॥ ८८ ।। दृढव्रताराना कर्म प्रणश्यति पुरातनं । प्रतिक्षणं नवं नैव यात्यतो मुक्तिसंगम ॥ ८६ || वृतसिंहासनासीनं महो शकदयो यदि । नमति सेवका वाऽतो माहात्म्य वर्णतेऽत्र किं॥ १० ॥ सनद्वंद्वपरित्यक्त निश्चितवृत्तरत्नमान् । यथेह समिति है इसका दूसरा नाम उत्सर्ग भी है। पांच महाव्रत तीन गुप्ति और पांच समिति इसप्रकार यद तेरह प्रकारका चारित्र संसारके समस्त भोगोंको प्रदान कर अन्तमें मोक्ष सुख प्रदान करनेवाला है। परम धर्मका कारण है और निश्चय सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्ररूप रत्नत्रयका साधक है। इस सम्यक- चारित्रके विना सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानके अन्दर यह सामथ्र्य नहीं कि वे मोक्षको प्राप्त करा सकें इस- लिये सम्यकचारित्रकी जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी है ॥ ८२-८७॥ ग्रन्थकार सम्यक्चारित्रकी वास्तविक प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि सम्यकचारित्रसे युक्त हो एक मुहूर्त ही जीवित रहना अच्छा, परन्तु उसके बिना करोडों वर्षपर्यंत भी जीवित रहना अच्छा नहीं । अथात सम्यकचारित्रकेद्वाराही जीवनकी सफ- लता नहीं हो सकती इसलिये जीवनकी सफलता बनानेके लिये सम्यकचारित्रसहित मुहूर्तमात्र भो जीवन अच्छा परन्तु उसके विना करोडों वर्ष तक भी जीता रहना अच्छा नहीं ॥ ८८ ॥ जो महात्मा दृढव्रतात्मा अर्थात् जिनकी आत्मा सम्यकचारित्रके अन्दर दृढ़ है उन महानुभावोंका जो कर्म पुरातन है अर्थात् पहिले से आत्माके साथ बन्धको प्राप्त है वह हर एक क्षणमें नष्ट होता चला जाता है और उस महापुरुपकी आत्माके साथ नवीन कर्मों का वंध भी नही होता इसलिये धीरे धीरे समस्त कर्मों के नष्ट हो जानेसे उन्हें बहुत जल्दी मोक्षलक्ष्मीका समागम प्राप्त हो जाता है ॥८६॥ जो महानुभाव चारित्ररूपी सिंहासनपर विराजमान है आर्थात् दृढ़रूपसे सम्यकचारित्रको पालता है उसे बड़े २ इन्द्र आदि भी सेवककी तरह आकर नमस्कार करते है फिर इस सम्यकचारित्रका जितना भी वर्णन - " किया जाय थोड़ा है ॥६० ॥ जो पुरुष निश्चितरूपसे चारित्ररूपी रत्नका धारण करनेवाला है वह इसी संसार में सर्वप्रकारके द्वद्रोंसे रहित, अपनी आत्मासे जायमान अगणित सुखका लाभ करता है ऊर्ध्व मध्य और है 1 ܝܐ १ मलि. - लभते सौख्यं स्वात्मजं संख्यवर्जितं ॥ ३१॥ नमस्कारं व पूजा व सन्मान लोकत्रये । तथाऽमुत्र महाशर्म स्वर्गमुक्तयादिकं धु,व ॥ ३२॥ द रत्नत्रयं पुसा विश्वाभ्युदयवारिद । अनन्तपुण्यसन्तानकारण सुखसागरं ॥ १३॥ सार्थसिद्धिपर्यन्त सुखं वाचामगोचर । भुक्त्वा मोक्ष प्रयात्येव रत्नत्रितयभूपिता ॥ १४ ॥ ज्ञात्वेति सविधेहि त्व दृष्टिहारं हृदि द्रुत। ज्ञानकुण्डलयुग्म च कर्णयो स्वस्य हे सुहृत् ! ॥ ६५५ वृत्तशेसरमुत्तुगंमुक्तिस्त्रीवशहेतवे । संचय च तपोलक्ष्म्या निर्मलत्वं निजात्मन ॥६६ यतोऽत्रतेमहान् योऽलतो मुक्तय गना स्वय । अत्यासका वृणोत्येव तं बुध स्त्रोव नान्यथा ॥ १७ ॥ गता मोक्ष च ये केचिद्याति यास्यन्ति पाताल लोकके लोग आकर उसे नमस्कार करते हैं उसकी पूजा अभ्यर्थना करते है और अत्यंत सन्मानकी दृष्टिसे देखते हैं । तथा उस सम्यकचारित्रको पालन करनेवाले पुरुपोंको परभवमें भी महा कल्याणका कर्ता स्वर्ग मोक्ष आदिका सुख निश्चयसे प्राप्त होता है ॥६१-६२ ॥ इसप्रकार भिन्न भिन्न रूपसे सम्यग्दर्शन आदिका स्वरूप और प्रयोजन वतलाकर ग्रन्थकार अब सामान्यरूपसे रत्नत्रयको प्रशंसा करते हैं कि यह पर- मपावन रत्नत्रय जोवोंको समस्त प्रकारके कल्याणरूपी जलोंका प्रदान करनेवाला है। अंतातीत पुरायकी परं- पराका कारण है और इस रत्नत्रयको पालन करनेवाले पुरुषोंको अविनाशी सुखसागरमें मग्न होनेका अब- सर प्राप्त होता है। इसी अनुपम चमत्कारके धारक रत्नत्रयसे जिनकी आत्मा विभूषित है वे वचनसे न कहे जानेवाले सर्वार्थसिद्धि पर्यंत सुखका अच्छीतरह रसास्वादन कर अन्तमें अचिंत्य अविनाशी मोन सुखको प्राप्त करते हैं इसलिये ग्रन्थकार यह तात्विक उपदेश देते हैं कि भाई मोनाभिलापो जीयो ! इसप्रकार रत्नत्र- यकी सर्वोच्च महिमा जान कर तुम्हें चाहिये कि तुम सम्यग्दर्शनरूपी हारको शीघ्र ही अपने हृदयमें धा- ग्ण करो, ज्ञानरूपी कुण्डलोंको अपने दोनो कानोंमें पहिनों और चारित्ररूपी मुकुटको अपने मस्तकपर धा- रण करो क्योंकि ये सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्ररूप तीनों रत्न ही मोक्षरूपी स्त्रीके वश कर- नेमें कारण हे अर्थात् इसी अदभुत रत्नत्रयकी कृपासे मोक्षरूपी लक्ष्मी वश होती है इसी रत्नत्रयकी कृपासे तपरूप लक्ष्मोका भी संचय होता है एवं नानाप्रकारके कर्ममलोंसे मलिन आत्माका निर्मलपना भी इसी रत्नत्रयके द्वारा होता है । जिस महानुभाव पुरुषके पास सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकचारित्ररूपी निर्मल अलंकार मौजूद है उसी ज्ञानवान महानुभावपर मोक्षरूपी स्त्री स्वयं आकर रीझती है एवं जिसप्रकार कोई मल्लि. - भूतले । आराध्य केवल तेऽत्र भन्या रत्नत्रयं तपः ॥ १८ ॥ तुच्छवीयर्योऽपि लोकेऽङ्गी रत्नत्रितयमंडित । यास्यत्येव क्रमान्मोक्षं तद्धीनः सवलोऽपि न ॥ ६६ ॥ एतत् समयसर्वस्वमेतत् सिद्धातजी- वितं । एतन्मोक्षतरोव:ज ह्य तन्मार्ग. शिवालये ॥ १०० ।। मत्वेत्यादौ नराधीश ! गृहाण धर्मसिद्धये । इद रत्नत्रय सारं पश्चान्निश्चयसंश- पुरा कम् ॥ १०१ ।। णु भूप ! प्रवक्ष्येऽहं साक्षान्मुक्तिनिवधन । कृत्स्नकर्मादिनिर्मुक्त दृगादित्रयमुत्तम् ।। १०२ ॥ खास स्त्री खास पुरुषको वरती है उसीप्रकार मुक्ति स्त्री भो उसे स्वयं आकर वरती है। किंतु जिनके पास यह अनुपम रत्नत्रय नहीं वे कितना भी प्रयत्न करें मोक्षरूपी स्त्री उनकी ओर ताककर भी नहीं देखती ॥१७॥ आजतक जिन महानुभावोंने मोक्षरूपी लक्ष्मीको प्राप्त किया है और अनादि अनन्त संसारमें आगे जाकर उसे प्राप्त करेंगे वह केवल इसो रत्नत्रयरूपी तपकी आराधनाका फल है-रत्नत्रयरूप तपके आचरणसे ही मोक्षलक्ष्मी प्राप्त हो सकती है ॥ ६८ ॥ आश्चर्य इस वातका है कि जिसप्रकार निर्बल भी धनवान पुरुषपर स्त्री आसक्त हो जाती है उसप्रकार वलवान होनेपर भी निर्धन पुरुपपर वह नही रीझती ! उसी प्रकार कोई जोव कितना भी निर्बल क्यों न हो यदि वह सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रयसे विभूपित है- सम्यग्दर्शन आदि रत्न उसके पास हैं तो वह नियमसे क्रमसे मोक्षको प्राप्त करता है किंतु जो पुरुष उक्त रत्नोंसे रहित है वह कितना भी विशिष्ट वलवान क्यो न हो मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ६ ॥ समय शब्दका अर्थ आत्मा भी है और शास्त्र भी है और ग्रन्थकार रत्नत्रयकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि यह रत्नत्रय ही आत्मा वा शास्त्रका सर्वस्व है अर्थात् आत्माका सारभाग रत्नत्रय ही है क्योंकि कर्मरहित अव- स्थामें स्वस्वरूपमें लीन होता हुआ आत्मा रत्नत्रयके अन्दर ही आकर लीन होता है तथा शास्त्रका सारभाग भी रत्नत्रय है क्योंकि जिस शास्त्रमें रत्नत्रयका वर्णन है यही शास्त्र सुशास्त्र है किंतु जिसमें रनवयका वर्णन नहीं वह शास्त्र नही कुशास्त्र है तथा यही रत्नत्रय सिद्धान्तका प्राण है क्योकि सिद्धान्तका अर्थ शास्त्राका निचोड़ भाग है जो निचोड़ भाग रत्नत्रयस्वरूप न हो वह सिद्धान्त नहीं हो सकता । तथा यह रत्नत्रय ही मोक्षरूपी वृक्षका उत्पन्न करनेवाला वीज है और मोक्षस्थानमें ले जानेवाला रत्नत्रय ही उत्तम मल्लि. पुराण एव लोकत्रयींनाथो हनन्तगुणसागर । ध्यानगम्यो निजात्मास्ति सिद्धसादृश्व एव हि ॥ १०३॥ एवं या क्रियते ध्रद्धाऽभ्यन्तरे परमात्- मनि । दर्शन निश्चयाक्यं तत् परं मुक्तिवशीकरम् ॥ १०४ ॥ शानमूर्ति परात्मानं लोकालोकविभासकम् । मुक्त्या न विद्यते शोनमन्यन्मत्वेति धोधन ॥ १०५ ॥ क्रियते यत्परिज्ञान स्ववेदनविदात्मन । केवलज्ञानसकर्तृ तज्ज्ञान निश्चयाभिधा ।। १०६ ॥ वृत्तरूपोऽयमात्मास्ति निष्कियोऽनिरिरिजन । कर्माखनपरित्यक्तो विदितताऽति निश्चयात् ॥ १०७ ॥ अतरगे स्वयं स्वस्य यदाचरणमजसा । च्या- मार्ग है । इसप्रकार व्यवहार रत्नत्रयका संक्षेपसे स्वरूप वर्णन कर राजा येश्रवणसे मुनिराज सुगुप्तने कहा- हे राजन् ! ऊपर कही गई रीतिके अनुसार व्यवहार रत्नत्रयका स्वरूप अच्छी तरह समझ कर तुम्हें परम धर्मकी सिद्धिकेलिये अवश्य इस रत्ननयको धारण करना चाहिये क्योंकि यह व्यवहार रत्नत्रय भी संसारमें सार पदार्थ है तथा इस व्यवहार रत्ननायकी पूर्णताके बाद निश्चय रत्नत्रय धारण करना चाहिये । अब नरनाथ ! मैं निश्चय रत्नत्रयका भी स्वरूप वर्णन करता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो-क्योंकि यह सम्यग्दर्शन आदि निश्चय रत्नत्रय साक्षात् मोक्षका कारण है। समस्त कर्म आदिको मूलसे उखाड़कर नष्ट करनेवाला हे और परम उत्तम है ॥ १००-१०२ ॥ अपना निजी आत्मा हो तोनलोकका नाम है। अनन्त अविनाशो गुणोंका समद्र हैं। ध्यान मार्गसे उसका स्वरूप जाना जाता है एवं जिसप्रकार समस्त कर्मों से रहित सिद्धोंका स्वरूप शुद्ध है उसीप्रकार हमारी आत्मा भी शुद्ध है इसप्रकारका अपने अन्तरंग परमात्मामे जो श्रद्धान होना है वह निश्चय सम्यग्दर्शन है । यह निश्चय सम्यग्दर्शन परम उत्कृष्ट है और मोक्षलक्ष्मोका संगम करनेवाला है ॥ १०३-१०४ ॥ परमात्मा उत्कृष्ट आत्मा क्षानस्वरूप है और वह लोक एवं अलोकके समस्त पदार्थोका प्रकाश करने- वाला है इस उत्कृष्ट आत्माको छोड़कर ज्ञान कोई पदार्थ नहो किंतु वह उत्कृष्ट आत्मा ही ज्ञान है ऐसा विचार कर जो स्वसंवेदन स्वरूप आत्माका ज्ञान करना है वही निश्चय सम्यग्ज्ञान है एवं यह निश्चय सम्यग्ज्ञान केवलज्ञानको प्राप्त करानेवाला है ॥ १०५-१०६ ॥ यह निजात्मा सम्यक चारित्रस्वरूप है। हलन चलन आदि क्रियासे रहित होनेके कारण स्वभावसे ही निष्क्रिय है। कर्मजनित का- - पल्लि ૨૦ नेन क्रियते तन्निश्चयचारित्रमद्भुतं ॥ १०८ ॥ इदं रतत्रयं वायक्रियाचिंतातिदूरगं । सर्वरागादिद्दीनं तद् भवनिर्वाणकारण ॥ १०६ ॥ वीतराग मुनी- द्राणा जायतेऽनतशर्मदं । ध्यानगम्य महानध्य रागिणा न कदाचन ॥ ११० ॥ अस्यात्राराधनेनैव घातिकर्माणि धीमता । प्रणश्यति क्षणार्धन तमां- सि भानुना यथा ॥ १११ ॥ परात्मध्यानयोगेनेदं सपूर्णेषु लभ्यते । तस्मात्तदथिनो ध्यायंतु चिदात्मानमंजसा ॥ ११२ ॥ यतो ध्यानाग्निना शीघ्रमनतफर्मराशय । भस्मीभान प्रयात्याशु काप्ठानि च यथाग्निना ॥ ११३ ॥ तस्माद् भूप। धा चेद सुरत्नत्रयसेवन। स्वीकुरु ध्यानयुक्तं त्व हत्या मोहमहामट ॥ २१४ ॥ इति निरुपमधर्माराममूलं सुखागि दुरिततिमिरभानु दु खदावाग्निमेध। रहितसकलदोष भव्यसेव्या सुरत्न. लिमासे रहित होनेसे निरंजन है और कोकेआगमनसे रहित है ऐसा वास्तविक रूपसे जानकर अंतरंगमें ध्यानके द्वारा जो स्वयं अपना आचरण करना है वह परमाश्चर्यकारी निश्चय चारित्र माना गया है॥ १०७- १०८ ॥ ग्रन्थकार रत्नत्रयकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि जिस रत्नत्रयका ऊपर वर्णन किया गया है वह रत्नत्रय बाह्य क्रियाओंकी चिंता आदिसे रहित है अर्थात् जबतक चित्त में वाह्य क्रियाओं की चिंताका समा- वेश रहेगा तबतक कभी भी रत्नत्रयका पालन नहीं हो सकता। समस्त प्रकारके राग आदि भावोंसे रहित है और जिस भवौ रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई उसी भवसे वह मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ १०६ ॥ यह निश्चय रत्नत्रय अनंत कल्याणका प्रदान करनेवाला है । ध्यानके द्वारा जाना जाता है । महान् अमूल्य हे और वी- तरागी मुनियोंके ही होता है रागियोंके कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता ॥११०॥ जिस प्रकार सूर्यके उदयसे गाढ़ भी अन्धकार छनभरमें तितर वितर होकर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार इस संसारमें रत्नत्रयके आराध- न करनेसे योगियोंके ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीय और अंतराय नामक चार घातिया कर्म भी क्षण- मात्रमैं नष्ट हो जाते हैं ॥ १११ ॥ जो महानुभाव उत्कृष्ट आत्मा परमात्माका ध्यान धरते हैं उन सबको यह पवित्र रत्नत्रय प्राप्त होता है इसलिये जो पुरुष इस परम हितकारी रत्नत्रयके वांछक हैं उन्हें चाहिये कि अवश्य चेतन्यस्वरूप परमात्माका ध्यान करें । क्यों कि जिस प्रकार अग्निकी तीन ज्वालासे अगणित भी काष्ठ देखते देखते राख हो जाता है उसी प्रकार ध्यानरूपी अग्निसे अनन्ते भी कर्मपिंड देखते देखते भस्म हो जाते हैं इसलिये हे राजन् ! तुम्हारे लिए यह उपदेश है कि तुम मोहरूपी महायोधाको नष्टकर चैतन्य स्वरूप आत्माके ध्यानके साथ व्यवहार और निश्चयके भेदसे जो दो प्रकारका रत्नत्रय ऊपर बतलाया २० मल्लि० त्रितयमसममार्या आवरंतु प्रयत्नात् ॥ ११५ ॥ सर्वानहरं परार्यजनक स्वमुक्तिहेतु परमंतातीतगुणार्णव भवभयप्रध्नसक प्रत्यह । विश्वासकनि- नधन जिनपतिश्रीमल्लिनाथ भजे गदे तद्गतिहतवे च परभ मूर्जा सुरतत्रयं ॥ ११६ ॥ उसका अवश्य सेवन करो, विना उसका सेवन किए कभी भी संसारसे उद्धार नहीं हो सकता है ॥११३-११४॥ इसप्रकार परिच्छेदके अन्तमें ग्रन्थकार प्रेरणा करते हैं कि हे आर्यो। मोक्षाभिलापी सज्जनो! तुम्हें || अवश्य प्रयत्नपूर्वक रत्नत्रयका आराधन करना चाहिये क्योंकि यह रत्नत्रय निरुपम पदार्थ है कोई भी पदार्थ संसारमें इसकी तुलना नहीं कर सकता। धर्मरूपो मनोहर बगीचेका उत्पादक कारण है क्योंकि रत्न- त्रयके सेवनसे ही धर्मरूपी आराम फलता फूलता है जिसप्रकार अन्धकारका मेंटनेवाला सूर्य है उसी प्रकार यह रत्नत्रय भी पापरूपी अन्धकारके नाश करनेकेलिए सूर्यके समान है। दावानलको जिसप्रकार मेघ शांत कर देता है उसी प्रकार यह रत्नत्रय दुःखरूपी दावानलको बुझानेवाला है। समस्त प्रकारके दोषोंसे रहित निर्दोष है । मोनाभिलाषी भव्यजीव सदा इसको सेवा करते हैं एवं असाधारण है हर एकको प्राप्त नहीं हो सक्ता ।मैं भगवान मल्लिनाथको मस्तक झ काकर नमस्कार करता हूं क्योंकि भगवान मल्लिनाथ समस्त प्रकारके अनर्थों को जड़से उखाड़कर फेंकनेवाले है। उत्कृष्ट प्रयोजनको पदान करनेवाले हैं स्वर्ग और मोक्षको देनेवाले हैं । उत्कृष्ट है । अनंत गुणों के समुद्र हैं संसारके समस्त भयोंको सर्वथा नष्ट करनेवाले हैं। विश्वासके प्रधान कारण हैं और आठों कर्मोके जीतनेवालोंमें पधान हैं। तथा भगवान मल्लिनाथ ने जिस मार्गका अनुसरण किया है उसी मार्ग और उसी स्वरूप को प्रदान करनेवाले सर्वोत्कृष्ट रत्नत्रय को भी मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं क्योंकि यह रत्नतय भी समस्त प्रकार के अनर्थों का सर्वथा नाश करने- वाला है । उत्कृष्ट प्रयोजनका उत्पादक हे । स्वर्ग और मोक्षका प्रदान करनेवाला है उत्कृष्ट है अनन्त गुणोंका भंडार है समस्त संसारके भयको नष्ट करनेवाला है और विश्वासका एक पधान कारण है ॥११५-११६॥ इसप्रकार भट्टाकर सकलकीर्ति द्वारा विरचित मल्लिनाथ पुराणमें रत्नत्रयका वर्णन करनेवाला पहिला परिच्छेद समाप्त हुआ॥१॥ -- ।

मलिक पुराण २२ ॥ । द्वितीय परिच्छेद । मोहमल्लारिहंतारं कामाक्षारातिघातिन। श्रीमल्लिनाथ तीर्थेशं स्तौमि सच्छक्तिसिद्धये ॥ १ ॥ अथ श्रुत्वा मुनेचं रत्नत्रितयसूचिका । पैराग्यमातरं राजा प्राह तच्चरणेऽक्षम ॥२॥ आध्यानपानष्टबुद्धिभिर्मादृशैनिभो। मोहि भिर्विपयासक्तहव्यापारभारितैः ॥ ३॥ यत्र तद्- व्यवहाराख्यमनुष्ठातुं न शक्यते। तत्र शक्यं का याथातथ्येन निश्चयाभिधं ॥ ४ ॥ गजेन्द्रभारमुद्धतुं यथा न शक्यते वृणैः । तथा मुनीद्रभारं च निःशक्तादृशै. प्रभो ॥ ५॥ अत. स्वामिन् ! कृपा कृत्वा मदनुग्रहहेतवे । क्रमाद्रत्नत्रयप्राप्त्यै तादृक्पक्षोपदेशन ॥ ६ ॥ पूजोपवाससंभूतं येन मादृग्विधेर्जनैः। विभूत्या क्रियते तस्योपासन पूजनादिभिः ॥ ७॥ निशम्येति यमी प्राह यथोक्त तदुपासनं। यदि कतु' समर्थो न तर्हि संसारमें मोहनीयकर्म अत्यन्त बलवान है जिन्होंने बलवान बैरी मोहनीयकर्मरूपी मल्लको सर्वथा नष्ट कर दिया है । जो भयंकर शत्र कामदेव और इन्द्रियोंका पूर्णरूपसे घात करने वाले हैं और तीर्थकर हैं ऐसे श्रीमल्लिनाथ भगवानको उन्हींकी समस्त शक्ति प्राप्त करनेके लिये मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं ॥ १॥ सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्ररूपो रत्नत्रयके स्वरूपको जतलानेवाले वैराग्यके उत्पा- दक मुनिराज सुगुप्लके वचन सुन राजा वैश्रवणने उक्त प्रकारके रत्नत्रयके पालन करने में अपनेको अस- मर्थ समझा इसलिये विनयपूर्वक वह यह कहने लगा-कृपानाथ ! मुझ सरीखे मनुष्य सदा आर्तध्यानमें लीन रहनेवाले हैं सदा हम लोगोको बुद्धियां विनष्ट सरीखी रहती हैं । धन कुटुम्ब आदिमें सदा मोही रहते हैं। पांचों इन्द्रियोंके विषयों की ओर सदा हमारी परिणिति झुकी रहती है और घरके व्यापारोंमें हम सदा संलग्न बने रहते हैं इसलिये भगवन् ! जब व्यवहार रत्नत्रयके पालन करनेके लिये भी हमारी सामर्थ्य नहीं तब हम अत्यन्त कठिन निश्चय रत्नत्रयका पालन तो कर ही नहीं सकते क्योंकि यह एक सुनिश्चित बात है कि जिस महा भारको गजेंद्र उठा सकता है उसे कितना भी प्रयत्न क्यों न किया जाय बैल नहीं उठा सकता। उसो प्रकार जिस चारित्रके महाभारको बड़े २ मुनीन्द्र उठा सकते हैं उसे मेरे समान असमर्थ पुरुष नही उठा सकते । अर्थात निश्चय रत्नत्रयका पालन करना बड़े बड़े मुनियोंका काम है मुझ सरीखा असमर्थ पुरुष उस निश्चय रत्नत्रयका पालन नहीं कर सकता। इस लिये हे कृपा नाथ ! मेरे कल्याणके निमित्त मुझे २२ जरा गुरु मलि. २३ पुराण तद्विधिमाचर ॥ ८॥ समाकर्णय भूपाल यथाम्नाय यथागर्म। तत्पूजादिक्रम सर्व देशयामि प्रताप्तये ॥ ६ ॥ भद्रे भाद्रपदे मालि शुक्लपक्षे वृपाकरे। द्वादशीदिवसे सारे भवेदव्यो व्रतोद्यत ॥ १०॥ धौतापरधरो धीमान जिनध्यानपरायण. । पूजोपलक्षितो भक्त्या यायाच्छोमज्जिनालय ॥ ११ ॥ तत्र तीर्थेशसिद्धान्तगुरून्नत्या प्रपूज्य च । पुन. स्वगृहमागत्य दान दद्यान्मुनीशिने ॥ १२॥ निर्दोषं प्रासुक शुद्ध मधुरं तृप्तिकारण ततो भुजीत चाहार शेण स सपरिच्छद ॥ १३॥ प्रत्याख्यानोयतो भूत्वा ततो गत्वा जिनालय । गुम्मन्नत्या त्रिरावानशन मुदा दभाति सः ॥ १४ ॥ उस रत्नत्रयकी प्राप्तिका कृपाकर ऐसा उपदेश दीजिये जिससे पूजा और उपवास आदिके द्वारा मुझे क्रम से प्राप्त होजाय क्योंकि मेरे समान पुरुष पूजन आदिके द्वारा ही बड़ी भक्तिपूर्वक ओर ठाट वाटसे उस रत्नत्रयकी उपासना कर सकता है ॥२-७॥ राजा वैश्रवणके ऐसे भक्तिसे गदगद वचन सुनकर परम संयमी मुनिराज सुगुप्तने कहा- राजन् ! यदि तुम ऊपर कहे गये व्यवहार और निश्चय रत्नत्रयका पालन नहीं कर सक्त तो आम्नाय परिपाटीमें प्रचलित है और शास्त्रोंके अन्दर कहा गया है उस रत्नत्रयको जो कुछ विधि है उस विधिको ही तुम करो। सुनो उस रत्नत्रयको पूजा आदिके क्रमका विधान जिस तरहका है मै उसे बतलाता हूं । उस विधिके आचरण करनेसे ही तुम्हें नियमसे व्रतोंकी प्राप्ति होगी। वह विधि इसप्रकार है- कल्याणकारो भादों मासके धर्मके स्थान स्वरूप शुक्ल पक्षकी द्वादशीके पवित्र दिनसे मोक्षाभिलाषी भव्यको रत्नत्रय व्रतका पालन करना चाहिये । जो महानुभाव रत्नत्रय व्रतका आचरण कर उसे चाहिये कि वह उस दिन पवित्र स्वच्छ वस्त्र धारण करे । अपने चित्तमें प्रतिक्षण भगवान जिनेन्द्रका ही ध्यान रक्खे एवं पूजाको महामनोहर सामग्री लेकर भक्तिपूर्वक भगवान जिनेंद्रके मन्दिरमें जाय ॥८-११॥ मन्दिरमें जाकर भगवान जिनेंद्र आगम और गुरुओं को उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करना चाहिये और पूजा करनी चाहिये वहांसे अपने घर आकर मुनियोंके लिये निर्दोष प्रासुक शुद्ध मधुर और तृप्तिका करने वाला पवित्रा आहा- रदान देना चाहिये उसके बाद जो आहार वचे वह अपने भाई बन्धु आदि कुटुम्बियोंके साथ सानन्द खाना चाहिये ॥ १२-१३॥ आहार आदिके आरम्भमें अनेक दोषोंका होना सम्भव है इसलिए उन २३ २४ पुराण नयेन्निशामसौ तत्र स्मरन् रत्नत्रय हृदे । प्रातः सामायिकं कुर्याज्जिनादीना च पूजनं ॥ १५ ॥ गुरो पुरस्सरो भूत्वा स्वामिन् ! रत्नत्रयार्चनं । वितनोमोति भक्तया यतीशं पृच्छेद्बती स्फुट ॥ १६ ॥ ततस्तेनाप्यनुज्ञाते गुरुणा हितमिच्छुना ! आरभेन प्रमोदेन नत्सपर्या परामिति ॥ १७ ॥ आ. दौ सपूज्य तीर्थे शान भक्तया तत्पुरत पुन । लिखेट्दल पद्म स्थालादौ वा शिलातले ॥ १८॥ कर्णिकाया लिखेत्स्वर्णलेखिन्या चदनद्रवे. । लस- दोकारहीकाराढ्यं सम्यग्दर्शन प॥ १६॥ पो स्वस्य लिखेनि शकिताद्य गानि धीधन । वीजाक्षरयुतान्यष्ठौ प्रागुक्तान्यर्चनाय स ॥ २० ॥ ततः सू. दोषोंके प्रत्याख्यानकी अभिलाषासे आहार करके बाद पुनः जिनमन्दिरमें जाना चाहिए । वहां जाकर भले प्रकार गुरुओंको नमस्कार करना चाहिए और तोन दिन रात्रि पर्यत बड़े हर्षके साथ अनशन व्रतका पालन करना चाहिए। उस रात्रिको उसे मन्दिरमें ही रहना चाहिए और सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रयका हृदयमें चिन्तवन करना चाहिए। प्रातःकाल उठकर सामायिक करना चाहिए और पीछे भगवान जिनेन्द्र आदिकी पूजाके समारोहमें लगजाना चाहिए। जिस समय भगवान् जिनेन्द्र आदिकी पूजन करना समाप्त हो चुके उसके बाद गुरुके पास आना चाहिए और भक्तिपूर्वक उनके सामने खड़ा हो कर व्रतीको उनसे यह पूछना चाहिये कि हेभगवन् ! मैं रत्नत्रय व्रतकी पूजाका आचरण करना चाहता हूं आप आज्ञा दीजिये । जव सर्वथा हितकारी मार्गका उपदेश देनेवाले गुरुकी रत्नत्रय व्रतकी पूजाके लिये आज्ञा मिल जाय उस समय व्रतीको चाहिये कि वह बड़े आनन्दके साथ रत्नत्रय ब्रतकी परमोत्कृष्ट पूजा का आरम्भ कर दे॥१४-१७॥ जो महानुभाव रत्नत्रायव्रतको पूजाका प्रारम्भ करना चाहें उन्हें चाहिये कि वे सबसे पहिले तीर्थंकर भगवान जिनेन्द्रकी पूजाका प्रारंभ करें और उन्हीं के सामने भक्तिपूर्वक बैठकर किसी थाल आदिमें वा लाके मध्यमें आठ दल (पांखडी) का कमल लिखें। चंदनका द्रय बनाकर सुवर्णमयी लेखनीसे उस क- की कलीके मध्यभागमें ॐ हो वीजाक्षरोंके साथ सम्यग्दर्शन शब्द लिखें तथा उस कमलकी आठों पां- खुडियोंमें पहिले विस्तारसे कहे गए निश्शांकित आदि आठों अंगोंको बीजाक्षरोंके साथ पूजा केलिये लि- ए लिखें। जिस समय यह कमलाकार यंत्र तैयार हो चुके उस समय ॐ हां ही हं हौं हः अष्टांग संयग्द- २४ २५ वोदितं धीमान् मत्रमुच्चारयन्मुदा । पूजन विधिपदद्दष्टेर्विदध्यावहुसपदा ॥ २१ ॥ प्रपूज्याथ श्रुतं भक्तया भूत्या चाष्टविधाने. । सम्य- ग्शानमथोद्धृत्य पकजस्य दलेष्वला ॥ २२ ॥ पश्चात्तदर्चनं भूत्या कुर्यात्सविधिपूर्वक । नीरादिफलपयंतद्रव्योर्धेनिमलौ कर. ॥ २३ ॥ ततः मल्लि० || सद्गुरुपादाब्जौ पूजयित्वा महाचेनै । त्रयोदशप्रकारस्य चारित्रस्यातिभक्तित. ॥ २४ ॥ प्रागुक्तस्य समालिग्व्य यंश पश्चान्मुदार्चयेत् । रत्नत्रय- र्शन । अत्रावतार, अवतर स्वाहा । ओं हां ही हूँ ह्रौं हूः अष्टांगसंम्यग्दर्शन ! अब मम सन्निहितो भव भव वपट् । इस प्रकार आगममें कहे गएमंत्रोंका सानंद उच्चारण कर विपुल संपत्तिके साथ विधिपूर्वक सम्यग्द- र्शन कीपूजा करना प्रारंभ करदे ॥ १८-२१॥ इस प्रकार सम्यग्दर्शनकी पूजाके वाद व्रताको श्रुतज्ञानकी आठों द्रव्योंसे भक्तिपूर्वक पूजाका प्रारंभ करना चाहिए । सम्यग्दर्शनके समान किसी थाल आदिमें आठ पांखुडियोंका कमल लिखना चाहिए । चंदनका द्रव बनाकर सुवर्णकी कलीके मध्यभागमें ॐ और ही वी- जाक्षरोंके साथ सम्यग्ज्ञान शब्द लिखना चाहिए । और उसकी आठो पांखुडियोंमें बीजाक्षर मंत्रोंके साथ व्यंजनोर्जित आदि आठो आचारोंको लिखना चाहिए। इसप्रकार जिस समय सम्यग्ज्ञानका मंत्र तयार हो जाय उस समय जलसे लेकर फल पर्यंत निर्मल और उत्कृष्ट अष्ट द्रव्योंसे विधिपूर्वक उस मंत्रकी पूजाक- रनी चाहिए ॥ २२-२३ ॥ जिस समय सम्यग्ज्ञानके यंत्रकी पूजा समाप्त हो चुके उस भक्तिपूर्वक उत्तम तपके स्थान परम गुरुओंका उत्तमोत्तम पूजाकी सामग्रीसे पूजाकर ऊपर विस्तारसे बतलाए गए तेरह प्रकार चारित्र का भक्तिपूर्वक यंत्र लिखना चाहिए और जब वह यंत्र लिखकर समाप्त हो जाय उस समय र- लत्रय पूजाके विधान में जो भी उस सम्यकचारित्रके यंत्र की पूजा की विधि कही गई है उसके अनु- सार भक्तिपूर्वाक विपुल आयोजनके साथ उस यंत्रकी पूजाकरनी चाहिए ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकार रत्नत्रय विधानके बाद अंतमें भांति भांतिके फल और पक्व अन्नोसे शोभित अर्घ-आरती उतारना चाहिए और रत्नत्रय यंत्रोका तोन बार प्रदक्षिणा देकर रत्नत्रय विधानमें जो १ । मिथ्या दुष्कृताभिधानामभिव्यक्तप्रतिक्रिया प्रतिक्रमण ॥ ३ ॥ कमेवशप्रमादोदयजनित मिथ्या मे दुष्कृतमित्येवमाद्यभिव्यक्त प्रतीकार प्रतिक्रम- णमित्युच्यते अर्थात् कर्मोके आधीन प्रमादके उदयसे जायमान जो भी मेरे अशुभ कर्मका उदय हुआ हो वह मिथ्या हो इसप्रकार उस दोपके प्रती- कारका चितवन प्रतिक्रमण है। राजवार्तिकालकार पृष्ट संख्या २७४। २५ मल्लिक २६ पुराण विधानोक्तविधिना बहुसंपदा ॥२५॥ अर्धमंते समुत्तार्य फलपक्वान्नशोभित । त्रिः परीत्य ततः कार्यास्तद्विध्युक्तजपोत्कराः ॥ २६ ॥ पूजा रत्न- वयस्येति कृत्वा भकया मुदा गुरोः। मुखात्कथानक रम्यं श्रोतला व्रतधारिभिः ॥ २७ ॥ एवं दिनत्रयेत्युच्चैर्विधेय पूजनं परं । यंत्राणा व जिना- दीनां बुधैः कालत्रये शुभं ॥ २८ ॥ महाभिषेकमप्युच्चैर्जिनागारे व्रतान्विते.। कर्तव्यं सह सधेन महोत्सवपुरस्सरं ॥ २६ ॥ गृहारंभासितां त्यक्त्वा पूजावश्यकतत्पर । धर्म्यध्यानेन तत्रासौ तिष्ठेत्त्रयमहर्निशं ॥ २०॥ पर्वण्यस्मिन् विधातव्याश्वशक्तया विनिधोत्सवः। सर्वा ग्यभयदानादिगोतनृत्यादि- भिक्षुधैः ॥ ३१ ॥मौक्तिकत्रितय रत्लत्रितयस्मरणहेतवे व्रती तदा प्रभृत्येव वारयदक्षिणे करे ॥ ३२ ॥ अथ यंत्रजिनादीना कृत्वार्ता प्रतिपदिने । जप शास्त्रमें कहे गये हैं उन जापोंको जपना चाहिये ॥ २६ ॥ इस प्रकार भक्तिपूर्वक वड़े समारोहसे रत्नत्रय की पूजाकर रत्नत्रय व्रतको धारण करनेवाले महापुरुषको गुस्के पास जाना चाहिये और उनके श्रीमुखसे आत्माका कल्याण करने वाला आगमका स्वरूप आनन्दपूर्वक सुनना चाहिए। इस रीतिसे जो पुरुप रत्न- त्रयव्रतके पालन करनेवाला है उसे तीनों दिन अर्थात् त्रयोदशी चतुर्दशी और पूर्णमासीके दिन प्रातःकाल मध्हान्हकाल और सांयकाल रत्नत्रयके यंत्रों और जिन आदिको बड़े समारोहसे शुभ और उत्कृष्ट पजन करनी चाहिए। तथा इसप्रकार पूजाके वाद व्रतधारियोंको जिन मन्दिरके अन्दर अपने संघको साथ ले महान् उत्सबके साथ महा अभिषेक भी करना चाहिए ॥ २७--२६ ॥ रत्नत्रय व्रत धारण करनेवालोंका यह खास कर्तव्य है कि वे तीन दिन तक समस्त गृहसम्बन्धी प्रारम्भोंका त्याग कर बरावर जिन मन्दिरके अंदर रहें और वहां पजा और आवश्यक कृत्योंमें दत्तचित्त हो धर्मध्यानसे काल व्यतीत करें ॥३०॥ समस्त प्राणियों को अभयदान आदि देकर और गीत नृत्य आदि कराकर व्रतीको इस महान् पर्वमें अपनी शक्तिके अनुसार नाना प्रकारका उत्सव करना चाहिए ॥ ३१॥ जो पुरुष रत्नत्रय व्रतका आचरण करनेवाला है उसे चाहिए कि वह रत्नत्रयव्रतके वाद उस रत्नत्रयके स्मरणके लिए अपने दक्षिण हाथमें तीन मोतियों को धारण करे ॥३२॥ इसप्रकार रत्नत्रयके यंत्र और जिनेन्द्र आदिको प्रयोदशी चतुदशी और पूर्णिमा इन तीन दिन पर्यंत भक्तिपूर्वक पूजाकर प्रतिपदाके दिन भी पेतीस (छत्तोस ) प्रकारके व्यञ्जनोसे आनन्द- १ रत्नत्रयके यन्त्र ताम्रपत्रपर सिंचे हुए मन्दिरमें पाये जाते हैं अत वहा उनके लिपनको आवश्यकता नहीं। १ सस्थत रत्नत्रयपूजामें रत्नत्रय " की जापोंका विस्तारसे उलनेस है।

मल्लि.
२७
.
पुराण
पचत्रिशति (?) भेदोरुपक्वान्नरर्चयेन्मुदा ॥ ३३॥ ततस्त्रिविधपात्रेभ्यो दानं दत्त्वा यथाविधि । प्रासुकं मधुरं भक्तया पारण तनुयात्ततः ॥ ३४ ॥
शुद्धरत्नत्रयस्फारभक्तिरागवशीकृतः । पारणे सोऽप्यहोरात्र देवगेहेऽनिवर्तयेत ॥ ३५ ॥ विस्तरेण मयोक्तं पा पूजायुक्ति परस्य च । प्रोच्यमाना
समासेनाऽधुना सा श्रूयता नृप ॥ २६ ॥ अरनाथलसन्मल्लिसुव्रताना जिनेशिना । भक्तया विधत्रयं दक्षः स्नपयेत्स्नायुक्तिभिः ॥ ३७॥ तत्पुर पूर्व-
वदत्लत्रयमुद्धृत्य भक्तिन । पूजयाशु यथाशक्त्या युगपत्पूजयेत्ततः ॥ ३८ ॥ अहो भाद्रपदाख्योय मासोऽनेक्रवताकर । धर्महेतुपरो मध्येऽन्यमा-
साना नरेंद्रवत् ॥ १६ ॥ तस्मात्त्यक्त्वा गृहारभमस्मिन् मासि विधीयते । पूजाव्रतोपनासाद्यः सुधर्माच्चाधनाशनं ॥ ४० ॥ अनेन विधिना माघे
पूर्वक उनको पूजा करे ॥३३॥ उसके बाद वह व्रती घर आवे और उत्तम मध्यम जघन्य तीनों प्रकारके पात्रों
को यथायोग्य दान देकर प्रसन्नतासे प्रासुक और मधुर भोजनसे पारणा करे। उसके बाद शुद्ध रत्नत्रय
को तीव्र भक्ति और प्रेमसे जिसकी आत्मा गद्गद है ऐसा वह रत्नत्रय व्रतका पाचारण करनेवाला व्रती
पारणाके दिनके अवशिष्ट समयको और समस्त रात्रिको जिनमंदिरमें हो जाकर व्यतीत करै ॥ ३४-३५ ॥
इस प्रकार हे राजन् ! तुम्हारे सामने यह रत्नत्रयकी पूजाका विधान विस्तारसे कहा है। तुम्हारे से भिन्न
दूसरे पुरुपके लिये वह संक्षेपसे कहा जा सकता है । वह संक्षेपसे कहा जानेवाला रत्नत्रय का विधान इस
प्रकार है। तुम सुनो-
जो पुरुष रत्नत्रय व्रतका पालन करने वाला है उसे भगवान अरहनाथ मल्लिनाथ और मुनिसुव्रतनाथ इन
तीनों भगवानों की प्रतिमाओं का जिसरूपसे शास्त्रमें अभिषेकका विधान लिखा हुआ है उस विधानसे
भक्तिपूर्वक अभिषेक करना चाहिये । तथा इन तीनों प्रतिमाओं के सामने पहिलेके समान भक्तिपूर्वक रत्न-
त्रय यंत्रों का लिखकर रख देना चाहिए और एक साथ सवका पूजन करना चाहिए इसरूपसे भी रत्नत्रय
का विधान सक्षेपसे माना गया है। रत्नत्रयका विधान भाद्रपद मासमें बताया गया है इसलिए ग्रन्थकार
भाद्रपद मासकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि जिसप्रकार मनुष्यों में श्रेष्टराजा माना जाता है उसी प्रकार
समस्त मासों के अन्दर भाद्रपद मास भी श्रष्ट है क्योंकि वह अनेक प्रकारके ब्रतों का स्थान स्वरूप है
और धर्म प्रधान कारण है ॥ ३६-३६ ॥ इसीलिए समस्त गृहारंभका परित्याग कर इस भाद्रपद मासमें
व्रती पुरुष पूजा व्रत और उपवास आदिके द्वारा तथा धर्मके आचरणसे पापों के नाशमें प्रवृत होते हैं ॥४०॥

२८ मासि चैत्राभिधे पुन । व्रत रत्नत्रयस्येद कर्तव्यं भुक्तिमोक्षदं ॥ ४१॥ उपचासत्रयं कतुं येऽशक्ता भक्तिनत्पराः। ते कुर्वति यथाशक्त्येहेकसत्प्रोप- मल्लि, धादिभिः ॥ ४२ ॥ शक्तिन क्रियमाणेऽप्यत्र त्यागतपसी सतो । स्याता समीहितानेकफलसंप्राप्तिहेनवे ॥ ४३ ॥ श्रावकै. श्राविकाभिश्च मुनिभिश्चा- पुरा र्यिकादिभि । व्रतमेतद्विधातव्य पापहंतु सुसाकरं ॥ ४४ ॥ वर्षत्रितयपर्यंतं विधायेदं वनोत्तमं । सपूर्ण धनुर्तव्य स्वशक्तयोद्यपन बुधैः ॥ ४५ ॥ जिसरूपसे भाद्रपद मासमें रत्नत्रय व्रतका विधान बतलाया है उसी विधिसे वह माघ मास और चैत मास में भी आचरण करना चाहिए। क्योंकि यह अनुपम रत्नत्रय व्रत संसारके उत्तमात्तम भोग प्रदान कर अंतमें मोक्षमुखका प्रदान करनेवाला है ॥ ४१ ॥ जा महानुभाव तीन दिन पर्यन्त उपवास करनेके लिए असमर्थ हैं किन्तु रत्नत्रय व्रतके पालन करनेमें पूरी २ भक्ति और श्रद्धा रखते हैं वे शक्तिके अनुसार एक पोषध आदिसे ही रत्नत्रयव्रतके पालक माने जाते हैं । अर्थात उनके लिए त्रयोदशी चतुर्दशीऔर पूर्णिमा इन तीनों दिनतक उपवास करनेकी कोई आवश्यकता नहीं। वे ऐसा भी कर सकते हैं कि त्रयोदशीके दिन एक वार भोजन कर सारा दिन और रात्रिका समय मदिरमें ध्यान आदि कार्यों में व्यतीत करें। चतुर्दशोके दिन प्रा उपवास करें और मंदिरके अन्दर ही स्वाध्याय आदिमें दत्तचित्त होकर अपना समय व्यतीत करें। पूर्णमासीके दिन पूजा आदि आवश्यक कमों के समाप्त होजाने पर एक बार भोजन करें और फिर मंदिरमें ही जाकर दिनका और रात्रिका समस्त समय स्वाध्याय आदिमें लगावें, प्रतिपदाके दिन घर आवें और जो भी ऊपर विधि कही गई है उसे करें। यहांपर यह शंका न करनी चाहिए कि व्रतकी जो पूरी विधि बतलाई है उसीसे अभीष्ट फलकी सिद्धि हो सकती है और न्यूनता होनेसे बह फल प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि शक्तिके अनुसार किए जानेवाले दान और तप भो संसारमें अनेक अभीष्ट फलोके पदान करनेमें कारण माने गए हैं-उनसे भी संसारमें अनेक प्रकारके अभीष्ट और उत्तमोत्तम फलोंकी पाप्ति होती है ॥ ४२-४३ ॥ जिस रत्नत्रयव्रतका ऊपर खुलासा रूपसे वर्णन किया गया है वह बत आवक श्राविका मनि और आर्यिका सवोंको पालन करना चाहिए क्योकि वह पवित्र व्रत पापोंका सर्वथा नाश करनेवाला है और नानाप्रकारके सुखोंकी इससे पाप्ति होती है ॥ ४४ ॥ यह परमोत्तम रत्नत्रयव्रत तीन वर्ष २८ मलि. २६ निमाप्य जिनचैत्यालानुत्तुंगान् सुभासुरान् । अरनाथादिविंवाना प्रतिष्ठा कारयेत्तत ॥४६॥ कर्तब्यहि जिनागारे महाभिषेकमद्भुत । सगैश्चतुविधै सार्ध महापूजादिकोत्सवं ॥ ४॥ घटाचामरचंद्रोपकभृगारार्तिकादय. धर्मोपकरणानि त्रिसंख्यानिविविधानि च ॥४८॥ पूजाद्रव्याणि पक्वान्नादीनि भक्त्या स्वशक्तितः । नालिकेरकदल्यादिमनोहरफलानि च ॥ ४६ ॥ विस्तार्यते जिनागारे पूजाशोभादिहेतवे । महोत्सव विधेयं सुवाद्यगीतादिन तेने. ॥५०॥ पुस्तकादिमहादानं भक्त्यादेय वृषाकरं । आचार्येभ्यो यथायोग्य रत्नत्रयव्रतान्वित. ॥ ५१ ॥ चतुर्विधाय सघायाहारदानादिकं पर्यंत बराबर पालना चाहिए जिस समय तीन वर्ष समाप्त हो जाय और व्रत भी पूरा हो जाय उस समय जिसकी जैसी शक्ति हो भक्तिपूर्वक उद्यापन करना चाहिए ॥४५॥ उद्यापनकी विधि इसप्रकार है खूब ऊंचे २ विशाल और रत्नों को दीप्तिसे देदीप्यमान जिन चैत्यालय वनावे और उनमें अरनाथ मल्लिनाथ आदिकी पतिमाओं की ठाट वाटसे प्रतिष्ठा कराकर उन्हें उन चैत्यालयों में विराजमान करें। पश्चात् श्रावक श्राविका एवं मुनि और आर्यिका इस चार प्रकारके संघको साथ लेकर जिन मदिरों में सवों को चमत्कारका करने- वाला महा अभिषेक करावे और बड़े समारोहके साथ महा पूजा आदिका उत्सव करना पारम्भ करै। घंटा चमर चांदनी झाड़ी और आरती आदि जितने भी धर्मके अनेक प्रकारके उपकरण है उनमें हर एकको तीन तीन कर दे॥ ४६-४८ ॥ पक्क अन्न लाड घेवर फेनी आदि जो भी पूजाके द्रव्य हैं अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक उन्हें प्रदान करे और महा मनोहर नारियल केला आदिके उत्तमोत्तम फलोंको दे ॥ ४६॥ इसप्रकार पक्व अन्न और नारियलके फल आदि पूजाके कारणोंको और घटा चमर चांदनी आदि शोभाके कारणोंको जिनमंदिरमें प्रदान कर उत्तमोत्तम बाजे गीत और नृत्य आदिके अत्यन्त आयोजनसे जिन मंदिरमें 'महान् उत्सव भी करे ॥५०॥ तथा जा महानुभाव रत्नत्रयव्रतसे विभूषित हैं उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार यथायोग्य धर्मके प्रधान कारण ग्रय भी आचार्यों को भक्तिपूर्वक भेंट करने चाहिए। श्रावक श्राविका और मुनि आर्यिकाके भेदसे जो ऊपर चार प्रकारका संघ कहा गया है उन्हें विशिष्ट सन्मानके साथ भक्तिपूर्वक बुलाकर अत्यंत प्रमोदसे आहार औषध आदि दान देने चाहिए ॥ ५१-५२ ॥ प्रभावना अंगका स्वरूप ऊपर जहांपर सम्यग्दर्शनके आठ अंगोका स्वरूप कहा .

- मुदा । आमञ्य परया मक्त्या देयं सन्मानपूर्वक ॥५२ ॥ प्रभावना जितेंद्राणा शासने चैत्यधामनि । विधानव्या प्रयत्नेनानेकोत्सवशतेवुधैः ॥५३॥ लि. येषामेतावती शक्तिर्नास्त्यत्रोद्यापने सता । ने कुवंतु यथाशक्तधा स्तोक चोद्यापनां मुदा ॥ ५४॥ सर्वथा येऽप्यशक्का द्वि व्रतोद्यापनसद्विधौ । ते पुरा कुर्वतु विधानं तद्विगुण भावपूर्वकं ॥ ५५ ॥ अनेकपुण्यसंतानकारण स्वनिवधन पापन च क्रमादेतचत मुक्तिवशीकरं ॥ ५६ ॥ यो विधचे व्रत सारमेतत्सर्वसुखावहं । प्राप्य पोड राम (क) नाक स गच्छेत्क्रमत शिवं ॥ ५७ ॥ इत्यादि व्रतमाहात्म्य श्रुत्वा राजातिभक्तित । तदादाय मुनि है वहां विस्तारसे कह दिया है इसलिए जो महानुभाव रत्नत्रायव्रतके पालक है उन्हें भगवान जिनेन्द्रके शासनका माहात्म्य प्रकटकर और मंदिरोंके अंदर भी अनेक प्रकारके सैकड़ों उत्सव कराकर सम्यग्दर्शन के प्रधान अंग प्रभावनाका पालन करना चाहिये ॥ ५३॥ यह तो हुई अत्यन्त व्ययसाध्य उद्यापनकी वात, किंतु जो महानुभाव इतना महान खर्चकर उद्यापन करनेमें असमर्थ है - उद्यापनकेलिये इतना अधिक खर्च नहीं उठा सकते उन्हें चाहिये कि वे अपनी शक्तिके अनुसार भक्ति और हर्पके साथ थोड़ा ही उद्यापन करें उन्हें उतनेही उद्यापनसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होगी परंतु जो महानुभाव इतने भी असमर्थ हैं कि थोडासा भी उद्यापनका विधान नहीं कर सकते उन्हें चाहिए कि वे रत्नत्रय व्रतका जो विधान बताया गया है विशुद्ध भावोंसे उसका दूना विधान करें अर्थात् तीन वर्षकी जगह वे छह वर्ष तक रत्नत्रयका विधान बरावर करें ऐसा होनेसे उन्हें उद्यापन करनेकी फिर आवश्यकता नहीं ॥ ५४-५५ ॥ यह रत्नत्रय व्रत अनेक पुण्यकी संतानका कारण है। स्वर्गका कारण है । संसारके समस्त पापोंका सर्वथा नाश करनेवाला है एवं मुक्तिरूपी महादुर्लभ लक्ष्मीको वश करनेवाला है ॥ ५६॥ रत्नत्रय व्रत की प्रशंसा करते हुये ग्रंथकार कहते हैं कि परम सुखका स्थान स्वरूप और समस्त ब्रतों में सार इस रत्नत्रय व्रतको जो महानुभाव धारण करते हैं वे सोलहवें स्वर्गके सुखका लाभ करते हैं एवं धीरे धीरे अनुक्रमसे वे अविनाशी मोक्ष सुखका भी रसास्वादन करते हैं ॥५॥ इस प्रकार मुनिराज सुगुप्तके मुखसे रत्नत्रयका माहात्म्य सुन राजा वेश्रवण को परमानंद हुआ। भक्तिपूर्वक उसने रत्नत्रय व्रत धारण किया और विनयपूर्वक मनिराज को नमस्कारकर वह अपने राज. . + पुराण ३१ नत्वा जगाम निजमदिरं ॥५८॥विभूत्या पायाभक्त्या राज्ञा मुक्त्यगनाप्तये । एतद्ब्रतं च सपूर्ण याथातथ्येन सत्कृत ॥५६॥ पश्चादस्य प्रतस्यातेs. नेकतीर्थशमदिरान् । उद्यापनविधौ भूपश्च्के परमोत्सव महत् ॥ ६० ॥ जिनागारे जिनेद्राणा स्वगृहे चमहामह । करोति प्रत्यह राजा सर्वाभ्युदय- साधन ॥६१ ॥ नित्य सत्पात्रदानानि ददाति स्म स मुक्तये उपकारं च जनाना वात्सल्य भजते सुधी ॥६२ ॥ विधत्ते प्रोपधान् सर्वैपु पर्वसु धरा- धिप । भूत्वा यतिसमो हत्या गृहव्यपारमंजसा ॥ ६३ ॥ सर्वाण्यणुव्रतान्येव गुणशिक्षाव्रतानि च । त्रिशुद्धया त्यक्तदोपाणि स पालयति यत्नत. मंदिरमें आगया ॥ ५८ ॥ राजमदिरमें आकर राजा वैश्रवणने परम भक्ति और श्रद्धाके साथ मोक्ष- लक्ष्मोको प्राप्तिके लिये रत्नत्रय व्रतका प्रारंभ किया एवं वास्तविक रीतिसे उसे पूरा किया ॥ ५६ ॥ व्रतके अंतमें उद्यापनके समय राजा वैश्रवणने भगवान जिनेन्द्रके अनेक मंदिरोंका निर्माण कराया और महान् उत्सवका समारंभ किया ॥६० ॥ तवसे राजा वैश्रवणने अन्य जिनमंदिरोंमें और राजमंदिरके जिनमंदिरोंमें समस्त प्रकारके ऐश्वर्योको प्रदान करनेवाली महापूजाका प्रतिदिन करना पारंभ कर दिया वह नरपाल मोक्षलक्ष्मोको पचुर लालसासे प्रतिदिन उत्तम पात्रोंको आहार औषध आदि चारों प्रकार का दान देने लगा किसी भी दीन हालतमें जैनधर्म पालन करनेवालोंको सुनकर निरीह और निर्मल बृत्तिसे बड़े हर्षसे उनका उपकार करने लगा एवं साधर्मी भाइयोंमें गाय बच्छाके समानप्रम दर्शाकर परि- पर्ण वात्सल्य अंगका उसने पालन करना आरंभ कर दिया ॥ ६१-६२ ॥ वह महानुभाव वैश्रवण राजा अष्टमी चतुर्दशी आदि समस्त पर्वोमें ऊपर कही गई विधिके धारक प्रोषध ब्रतका आचरण करने लगा और निर्मल भावोंसे घरके कार्योसे सर्वथा विमुख हो वह पवित्र आचरणकर आचरण करनेवाले यतिके स- मान हो गया॥ ६३॥ अहिंसा अचौर्य सत्य स्वदारसंतोष और परिग्रह परिमाण ये पांच अणुव्रत, दिग्नत भोगोपभोग परिमाणबृत और अनर्थ दंडवत ये तीन गुणत्रत एवं देशावकाशिक सामायिक प्रोशधोपवास और वैयावृत्य ये चार शिक्षात इसप्रकार श्रावकोंके बारह व्रत हैं । राजा वैश्रवण मन वचन कायकी शुद्धि- पूर्वक पांचों अणुव्रत तीनो गुणव्रत और चारों प्रकारके शिक्षाबूतोंको निर्दोषरूपसे बड़े यत्नके साथ पालन रत्नकरंड श्रावकाचारमें इन बारह व्रतोंका विस्तारसे वर्णन है। उसी के अनुसार नामोंका उल्लेख किया गया है।

मल्लि.
पुर
३२
करने लगा
॥६४॥ शृणोति जैनशास्त्राणि शानायाज्ञानहानये । श्रीजिनेंद्रमुखोत्पन्नान्यसौ नित्यं च मुक्तये ॥६५॥ धर्मोपदेशमादत्ते स्वसभास्थाखिलागिना।
वाग्मी तदुपकाराय दिव्येर्वाक्यैर्मनोहरैः ॥ ६ ॥ यात्रापूजानमस्कारटानशीलव्रतादिभिः । सदैव धर्ममेक स विधत्ते पुण्यकर्मभिः ॥ ७॥ वित्ते
धृत्वा निजे धर्म वक्ति नाचा च देहिना । तमाचरति कामेनेतिस धर्ममयोऽ भवत् । धर्माप्तिान् परान् भोगान् यथाकाल भुनकि सः । सर्वाक्षवृप्ति-
दान भूप कुर्वन् धर्ममनरतम् ।। अर्थकदानृपो द्रष्टुं जूभमाणां बनावलीं । प्रवृद्ध प्रावृडारभे वेष्टितो भूमिपेरयात् ॥७०॥ मार्गस्य निकटे दृष्टवा वटं तुंगं
६४ ॥ वह महानुभाव उस दिनले अज्ञानको सर्वथा निवृतके लिये और ज्ञान संपादन करनेके
लिये भगवान अहंत ( जिनेन्द्र ) के मुखसे उत्पन्न जैन शास्त्रोंका श्रवण और मनन करने लगा और उससे
मुक्ति प्राप्तिकी अभिलाषा चित्तमें करने लगा ॥६५॥ हितकारी और परिमित वचनों का बोलनेवाला वह वा-
ग्मी राजा वेश्रवण, सभामें रहनेवाले समस्त प्राणियोंको उनका उपकार हो इस पवित्र अभिलाषासे प्रति
दिन दिव्य और मनोहर वचनोंमें धर्मोपदेश देने लगा ॥ ६६ ॥ जहांसे अगणित पवित्र आत्माओंने मोक्ष
प्राप्त की है ऐसे तीर्थोकी यात्रा करना, जिनेन्द्र आदिको पूजा करना , उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करना उ-
त्तम पात्रोंको आहार आदि दान देना एवं भक्तिपूर्वक शीलवत आदिका पालन करनाइसप्रकार के प ण्यको उ-
त्पन्न करनेवाले पवित्र कार्योसे वह राजा सदा ही धर्मका आचरण करने लगा ॥ ६७ ॥ वह राजा चित्तमें जिस
किसी भी पदार्थ का विचार करता था उस समय केवल धर्मका ही विचार करता , धर्मके विचारके सिवाय
अन्य किसी विचारको उसके हृदयमें जगह नहीं मिलती थी। जब कभी मनुष्योंके सामने कुछ वचन बो-
लता था उस समय धर्मसे संबंध रखनेवाला ही वचन बोलता था उसके मुखसे सिवाय धर्म संबंधी वचनके
अन्य वचन नहीं निकलता था शरीरसे भी वह धर्म क्रियाओं को ही आचरण करता था अन्न किसी प्रकार
की क्रियाओंका उसके शरीरसे आचरण नहीं होता था इसलिये वह राजा साक्षात् धर्मस्वरूप था॥ ६ ॥
वह राजा वैश्रवण सर्वदा धर्मका आचरण करता था इसलिये यद्यपि वह समस्त इन्द्रियोंको तृप्त करनेवाले
भोगोंका भोग करता था परन्तु धर्मानुकूल उत्कृष्ट भोगोंका ही भोग करता था धर्म विरुद्ध मर्यादासे अति-
क्रान्त भोगोंका भोग नही करता था ॥ ६ ॥

कान्त भाग . नोहरं । शाखोपशाखसकीर्ण बृत्तं पक्षिशताकुलम् ॥ १॥ बजता भूभुजेत्युक्त पश्य पश्यास्य विस्तृति । तुंगत्वं बद्धमूलत्वं सुंदरत्वं घनात्मक॥२ त्याकर्ण्य व्रजन्मार्ग पुरतः पार्श्ववर्तिना। साश्चर्य वहृदयो गजा वनोतरं क्रमादगात् ॥ ७३ ॥ नानाक्रीडादिभिस्तत्र चिक्रीड पृथिवीपतिः। स्वेच्छ- पामा च रामाभियथाकाल नृपात्मजः ॥ ७४ ॥ ततस्तेनैव मार्गेण प्रत्यागच्छन्मुदा नृप । विद्यु त्प्रपातघातेन वीक्ष्य त भस्मितं क्षणात् ॥ ७५ ॥ इति चिता विधत्तेऽहो बद्धमुलत्वमेव च । कस्यात्र विस्तृतिनित्या तुंगत्वं कस्य वाभुवि ॥ ७६.॥ यथात्रायं वट प्राप्तो ह्यवस्थामीदृशीं महान् । क्षणार्धन कदाचित् वर्षा ऋतुका पूर्ण प्रारंभ हो चुका था और उसके निमित्तसे वनको बृक्षावली फल फूलोंसे युक्त हरी भरी शौभित हो रही थी। उस समय राजा वैश्रवणको वनकी वृक्षावली देखनेका कौतूहल हुआ इसलिये वह अनेक अपने वशव” राजाओंके साथ वनकी शोभा निरखने चल दिया ॥७० ॥ मार्गके समी- पमें ही एक वडका वृक्ष था जो कि अत्यन्त ऊंचा था महामनोहर था गोदे और डालियोंसे व्याप्त था, गोला कार था और सैकड़ो पक्षियोंसे व्याप्त था॥७१ ॥ मार्गमें जाते हुए राजाने वह बड़का वृक्ष देखा और आ- श्चर्यसे युक्त हो इस प्रकार कहने लगा-देखो ! देखो !! यह वृक्ष कितना चौड़ा है कितनाऊंचा है। इस का मूलभाग कैसा जिकड़ा हुआ है एवं कैसा सुन्दर और सघन है तथा ऐसा कह कर और साथमें रहने वाले लोगों के सामने उस वृक्षके विषयमें अत्यन्त अश्चर्य कर वह मार्गमें और भी आगे को चल दिया ए- वं क्रमसे चलता चलता बनके मध्यभागमें जा पहुंचा ॥७२-७३॥ बनमें जाकर वहा राजा वैश्रवण उत्तमो- त्तम स्त्रियों के साथ एवं राजपुत्रोंके साथ अपनी इच्छासे अनेक प्रकार की क्रीडा करने लगा। जब क्रीडा स- माप्त हो गई और नगर को लौटने लगा तो जिस मार्गसे गया था उसी मार्गसे नगरको बड़े आनन्दसे लौटा रास्तामें देखता क्या है कि जिस बड़के वृक्षको वह आश्चर्यकारी लंबाई चौड़ाईवाला छोड़ गया था वही क्ष- णभरमें विजलीके गिरनेसे खाख हुआ पड़ा है ॥ ७४–७५ ॥ वस ! कुछ ही क्षणोंमें वृक्षकी यह अचरज करनेवाली अवस्था देख उसे संसारसे एकदम वैराग्य होगया और वह मनमें इस प्रकारकी चिंता करने लगा। संसारमें बद्धमूलता—मजबूत जड़ सदा किसीकी भी नहीं रहती। न किसीका विस्तृति-फलना फलना सदा रहता है और न तुंगत्व-अभिमान किसीका सदा स्थिर रहता है ॥७६ ॥ बड़े आश्चर्यकी बात है कि . मल्लि० पुराण ततः कस्य स्थिरत्व जीवितादिषु ॥७॥ भस्मोभावमगाधवदामूलात क्षणाद्वरः । विद्यु ताऽखिलजीवास्तद्वद्यास्यंति यमाग्निना ॥ ७८॥ राज्यं रजोनिभ निद्यदु खचिन्तादिसागरं । महारंभाघदुध्यानाद्याढ्य कः पोलयेत्सुधीः ॥ ७ ॥ छायेव चपला लक्ष्मी कृत्स्नचिन्ताखनि खला रागढ पम- दोन्मादमाता कि रजयेत्सती ॥ ८० ॥ वान्धवा बन्धनान्येव भार्या हि निगडोपमा । गलटसलामा पुत्रा. कुटुम्बा पाशसन्निभ ॥ ८॥ कारागारनिभे देखो! कुछ देर पहिले यह वृक्ष कितना विशाल और विस्तृत था सो जब आधे ही क्षणमें ऐसी विलक्षण अवस्थाको प्राप्त होगया अर्थात् खाखामें मिल गया तब किसीके जीवन जवानी सुंदरता आदि स्थिर रहेंगे यह क्या निश्चय है ? मेरा तो यह निश्चय है कि जिस प्रकार यह बड़का वृक्ष मूलसे लेकर चोटी पर्यंत विजलीकी तीव्र ज्वालासे जलकर खाख होगया है उसी प्रकार यमराजरूपी अग्निसे ये समस्त जीव-जीवोंके शरीर खाख में मिल जायगे अर्थात् किसी जीबकी पर्याय सदा काल स्थिर नहीं रह सकती ॥ ७७–७८ ॥ जिस राज्यको पाकर लोग मदमें मत्त होजाते हैं वह राज्य लके समान है। महा निंद्य है दुःख और चिंता आदिका समुद्र है । अनेक प्रकारके इसके निमित्तसे आरंभ करने पड़ते हैं और उनसे जयमान पापोंकी उत्पत्ति होती है तथा सदा इसकेलिए निन्दत ध्यान ही बना रहता है इसलिये ऐसे निन्दित राज्यका कोई बुद्धिमान पालन नहीं कर सकता ॥ ७॥ लक्ष्मीका घमड लोगोंको पागल कर देता है सो यह लक्ष्मी छायाके समान चंचल है। अर्थात् जिसप्रकार वृनकी छाया कभी पश्चि- मकी ओर तो कभी पूर्वकी ओर हो जाती है उसीप्रकार यह लच्मो आज किसीके है तो कल किसीके है तथा यह समस्त चिन्ताओं को उत्पन्न करनेवाली है अर्थात् लक्ष्मीके सम्बन्धसे हो अनेक प्रकारकी चिन्ता लगी रहती है निर्धनको विशेष चिन्ता नहीं व्यापती । तथा यह लक्ष्मी महा दुष्ट है एवं रागद्वेग अहंकार और उन्माद सबको उत्पन्न करनेवाली है इसलिये जो पुरुष सज्जन हैं वास्तविक रूपसे हित अहितके जान- कार हैं उन्हें यह लक्ष्मी कभी भी रंजयमान नही कर सकती ॥८०॥ मोहके तीव्र जालमे जिकड़कर लोग भाई पिता पुत्र स्त्री आदि बांधवों को अपना मानते हैं परन्तु वे बांधव सर्वथा बंधन स्वरूप ही हैं क्योंकि स्त्रो तो वेडीके समान है अर्थात् जिस पुरुषके पेरमें वेडी पड़ी हुई है वह पुरुष जिसप्रकार कही नहीं जा मलि. पुराण घोरे चिन्तादु खादिसकुले। सर्वपामाकरीभूते धर्मविध्वंसकारणे ॥ ८२ ॥ कामक्रोधमहामोहरागाद्यब्धौ गृहाश्रमे। मतिमान् को रति धत्ते घनन्त- भवदायिने ॥ ८३॥ उरगाभान् खलान् दुष्टान् सद्य प्राणापहारिण । दु सोद्भवान् महादु खहेतूनत्यंतचंचलान् ॥ ८४॥ अतृप्तिजनकान् क्रूरान् क्रूरकर्मविधायिनः । वपु कदर्थनोत्पन्नान् भोगान् क सेवते बुध ॥ ८५ ॥ शुक्रशोणितसभूते सप्तधातुमयेऽशुमे। क्षुत्तृट् कामजराक्रोधरोगाग्नि सकता और जाता है वहां बेड़ी सहित जाता है उसीप्रकार जिस पुरुपकी स्त्री मोजद हे वह पुरुप भी कही नहीं जा सकता और जहां जाता है वहां स्त्रीको भी साथ ही रखना पड़ता है इसलिये दीना आदि शुभ कर्मों में उसकी प्रवृत्ति नहीं होती। तथा गलेमें जिसप्रकार श्रृंखला ( तोक ) पड़ी रहती है उसके समान पुन है और समस्त कुटुम्ब पाशके समान है ॥८१॥ यह गृहाश्रम कारागार-कैदखानेके समान है महा घोर है । नानाप्रकारकी चिन्तायें और उनसे जाय मान दुःख शोक आदिसे व्याप्त है। समस्त पापा का स्थान है। वास्तविक धर्मको जड़से उखाड़कर फेंक देनेवाला है एवं काम क्रोध तीन मोह रागद्वप आदि का समुद्र है तथा अनंते भवों का प्रदान करनेवाला है अर्थात् गृहस्थाश्रमका सम्बन्ध रहना अनन्त काल पर्यंत मोक्ष सुखका वाधक है इसलिये ऐसे महादुःखदायो पापो गृहस्थाश्रममें कोई बुद्धिमान प्रेम नही कर सकता ॥ ८२-८३॥ जिनके जालामें निरतर यह जोव फंसा रहता है ऐसे ये भाग काले भजंगके समान है क्योंकि जिस प्रकार भुजंग ऊपरसे अच्छा पर भीतरसे महादुष्ट जान पड़ता है उसीप्रकार ये भोग भो भागते तमय तो मधुर जान पड़ते है परन्तु अन्तमें ये महादुःखदायी होते हैं । भुजंग जिसप्रकार महादुष्ट होता है उसी प्रकार ये भोग भी महा दुष्ट हैं । भुजंग जिसप्रकार काटते हो शीघ्र प्राणा का नाश करनेवाला है उसी प्रकार ये भाग भी प्राणों का नाश करनेवाले हैं । भुजंगका उत्पत्ति जिसप्रकार महत्न कष्टपूर्वक होती है उसी प्रकार विषय भोगों की पाप्ति भी अनेक पकारके दुःखों का झल कर ही होती है। भुजंगका काटना जिस प्रकार अनेक प्रकारके दुःखों का कारण होता है उसीप्रकार ये विषय भोग भी अनन्ते दुःखों के कारण है । सर्प जिसप्रकार अत्यन्त चंचल होता है उसीप्रकार ये भोग मी अत्यन्त चंचल हे क्षणभरमें आने जाने पुराण ज्वालसंकुले ॥ ८६ ॥ विष्ठादिनिचिते निये पूतिगंधे यमाश्रमे। अनित्ये कः सुधीः स्थातुमिच्छत्कायकुटीरके ॥ ८७ ॥ श्वम्रवाडवगंभीरे कृत्स्ना- मल्लि० शर्माम्बूपुरिते। रोगमत्स्यादिसंकीर्णे पचाक्षतस्करान्विते ॥ ८८ ॥ जन्ममृत्युजरावायुसफुलेऽतिभयानके। चचले विषमे घोरेऽसारे पारातिगेऽशुभे ॥ ८६ ॥ अनन्तेऽनादिससारे पाराारे निरन्तरं। मजनोन्मजने कुर्युर्धर्मपोतादृतेऽगिन. ॥ ३० ॥ प्रातर्दर्भदलाग्रस्थविद्वाभ जीवित नृणा । बलकायाक्ष वाले हैं। भजंग जिसप्रकार किसीको संतोष प्रदान नही कर सकता उसीप्रकार ये भोग भी किसी प्रकार का संतोष उत्पन्न नहीं कर सकते। जितने जितने अधिक भोगे २ जाते है उतनी २ ही अशांति वढती चली जाती है ।भुजंग जिस प्रकार क्रूर होता है और सटा कर कर्मोंका करनेवाला होता है उसीप्र- कार ये विषय भोग भी अत्यन्त कर हैं और इनको भोगनेसे सर्वदा महा क्रू र कर्मोका प्रास्त्रव होता रहता है । भुजंग जिसप्रकार शरीरके कदर्थनसे उत्पन्न होते हैं उसीप्रकार ये विषय भोग भी शरीरके कुत्सित आचरणसे पैदा होते हैं । इनके भोगनेसे शरीरका सर्वनाश होता है इसलिए ऐसे महा दुःखदायी भोगों का बुद्धिमान कभी सेवन नहीं कर सकता ॥८४-८५ ॥ यह शरीररूपी झोपडा माताके रज और पुरुषके वीर्यस उत्पन्न हुआ है । हड्डी मज्जा आदि सात धातु स्वरूप है । महा अशुभ है। भूख प्यास काम वृद्धावस्था क्रोध और अनेक प्रकारके रोगों को ज्वालाओंसे व्याप्त है तथा विष्टादि महा अपवित्र पदार्थों का घर है। अत्यन्त निंदनीय है । पीव सरीखी सड़ी इससे दुर्गधि छूटती रहती है। यमराजका आश्रम है-जिस समय यमराजका प्रकोप होता है तत्काल इसे खाखमें मिल जाना होता है और क्षणभरमें विनाशीक है ऐसे इस शरीररूपो झोपड़ेमें विद्वान कभी ठहरनेकी लालसा नहीं कर सकता और न वह शरीरको ही सर्वास्व मानकर इत्र तेल आदिसे उसकी सेवाकर सकता है ॥८६-८७ ॥ यह संसार जिसकी आदि है न अन्त है ऐसा विशाल समुद्र है क्योंकि जिस प्रकार समुद्रमें बड़वानल होती है उसीप्रकार इस संसारमें भी घोर नर्क- रूपी बड़वानल मौजूद है-नकोंमें जाकर नारकी सदा अग्निके भयानक कुण्डोंने जलते पजलते रहते अतएव यह संसार समुद्रके समान गम्भीर है । तथा जिसप्रकार समुद्रमें अनगिणित जल होता है उसी प्रकार यह संसार भी समस्त प्रकारके अकल्याणरूपीजलसे भरा हुआ है । जिस प्रकार समुद्रमे बड़े २ मत्स्य ३६ सामग्री शंपेव चचलाऽशुभा ॥ ११ ॥ प्रतिक्षण सतामायुहीयते समयादिभि । न्यस्त जल यथा हस्ते छिद्र व यौवनादिकं ॥ १२॥ क्षीयते यावदायुन शक्तिश्च यौवनोद्यम. । पटूनि यावदक्षाणि यावन्न दौकतेजरा ॥ १३ ॥ तावत्कार्य तपोघोर मुक्तिश्रीचितरंजनं। दीक्षामादाय सछिद्य मोहपाशं मलिक मुमुक्षुमि ॥४॥ इत्यादिवितनात्प्राप्य सवेग द्विगुण हृदि । भागमोगगेहादौ दोक्षादानमना नृप ॥ १५ ॥ निराकाक्षी स्वराज्यादौ साकाक्षो मुक्ति होते हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी भयंकर रोगरूपी मत्स्योंसे खचाखच भरा हुआ है। जिस प्रकार जहाजों | पुराण को ल्टनेके लिए समुद्र में चोर डाकुओंका जमघट्ट रहता है उसी प्रकार इस संसारमें भी समस्त जीवोंको लूटनेवाले पांच इन्द्रियरूपी पांच चोर है इनके जालमें फंसकर निरंतर जीव ठगे जाते हैं । जिसप्रकार समुद्र भयंकर पवनसे व्याप्त रहता है उसी प्रकार यह संसार भी जन्म मरण और बुढ़ापारूपी तीव्र पवनके झकों- रोसे व्याप्त है। समुद्र जिस प्रकार महाभयानक होता है उसी प्रकार यह संसार भी महाभयानक है। समुद्र जिसप्रकार महा चंचल महा विषम महा घोर और असार होता है उसीप्रकार यह संसार भी महाचंचल महाविषम महा घोर और निस्सार है । जिसप्रकार समुद्रका पार पाना कठिन है उसी प्रकार इस संसार समुद्रका भी जल्दी पार नहीं पाया जा सकता। एवं समुद्र जिसप्रकार अशुभ है उसोप्रकार यह संसार भी महा अशुभ है । संसारमें रुलनेवाले जीव कभी शुभ-गतिकी प्राप्ति नहीं कर सकते। ऐसे इस महाभयानक संसारम धर्मरूपी जहाजमें न बैठनेवाले ये दीन जोव निरन्तर ड्वते और उछलते रहते हैं ॥८८-६० ॥ प्रातःकालमें दर्भ-दाभकी अनोपर लगी हुई जलकी बूंद जिसप्रकार चंचल है थोड़ी ही देरमे विनश जानेवाली है उसी प्रकार यह मनुष्यों का जोवन भी विनाशोक है. जल्द नष्ट हो जानेवाला है जिसप्रकार बिजलो अत्यन्त चंचल पदार्थ है क्षणभरमें विनस जानेवाला है उसोपकार मनुष्यों की सामर्थ्य शरीर इंद्रि- यों की सामग्री अत्यंत चंचल है-देखते २ विनष्ट हो जानेवाली है तथा अशुभ कर्मका कारण होनेसे यह अशुभ है ॥ ६१ ॥ समय आदि कालक भेदोंसे प्रतिक्षण मनुष्योंकी आयु क्षीण होती रहती है तथा जिस प्रकार छिद्रयुक्त हाथमें रक्खा हुआ जल प्रतिक्षण गिरता रहता है उसी प्रकार मनुष्योंके यौवन आदि भी प्रतिक्षण नष्ट होते रहते हैं ॥४२॥ इसलिये जो पुरुष मोक्षाभिलाषी हैं- मोक्षके अविनाशी सुखका अनु- मलिक पुराण जब साधने । अगाद् गृहमनुप्रेक्षा. संचितयन्मुहुर्मुहु ॥ १६ ॥ प्रदाय विधिना राज्य सतां त्याज्यं स्वसनवे । स्वभूतिं तृणव ययौ त्यक्त्वा श्रीनागपर्वतं ॥६७ ॥ नृपोत्तमे सम राजा तत्र श्रीनागयोगिनं । नागपाशोपमं सर्वकषायाक्षारिबंधने ॥ ६८ ॥ त्रिःपरीत्य प्रणम्योच्यैर्ना पीत्वा वृषामृतं । यत्यास्यदुभव हित्वा मोहाग्नि सोऽभवत्सुखी ॥ ६६ ॥ ततो वाह्यातरं संगं त्रिशुद्धया परित्यज्य स.। राजभिर्वहुगि साधं प्रवव्राज महीपतिः भव करना चाहते हैं उन्हें जब तक आयु क्षीण न होजाय, बराबर कार्य करनेकी सामर्थ भी रहै, यौवन अ- वस्था भी शरीरमें जाज्वल्यमान रहै, अपने अपने विषयोंके ज्ञान करानेमें इन्द्रियां भी सबल रहैं और तक वृद्धावस्था शरीरपर अपना भाव न डाले उसके पहिले हो गृहरूपी पाशका सर्वथा त्याग कर देना चा- हिये एवं दिगम्बर जैनेंद्री दोक्षा धारण कर मोक्षरूपी लक्ष्मीके चित्तको आनन्द पदान करनेवाला घोर तप तपना चाहिये ॥ ६३-६४ ॥ राजा वैश्रवणको वटवक्षके अकस्मात् जल जानेसे संसार शरीर भोग और गृह आदिसे वैराग्य तो हो ही गया था परन्तु सूक्ष्म दृष्टिसे उनके स्वरूपका विचार करनेसे और भी उसे दूना वैराग्य हो गया। सं- सार शरीर आदि पदार्थोंसे उसका सर्वथा ममत्व छूट गया एवं दिगम्बरी दीक्षा धारण करनेके लिये उसने पूर्णरूपसे चित्तमें ठान ली ॥ ६५ ॥वह राजा अपने राज्य आदिसे निराकांच-विमुख हो गया और मुक्ति लक्ष्मीके सिद्ध करनेकेलिये उसकी पूरी २ अभिलाषा होगई । बड़के वृक्ष के पाससे प्रतिक्षण अनित्य अशर- णआदि बारह भावनाओंका ही वारंवार चितवन करताहुआ राजमहलतक पहुंचा ॥ ६६ ॥राजमहल में पहुच कर राजा वेश्रवणने सज्जनों को सर्वथा छोड़ने योग्य ऐसे राज्यको अपने पुत्र के लिये प्रदान किया एवं जी- र्ण तृणके समान अपने समस्त ऐश्वर्यका सवथा परित्यागकर वह श्रीनागपर्वतकी ओर चल दिया। श्रीना- गपर्वतपर समस्त कषाय और इन्द्रियों के बांधनेमें सर्वथा नाग पाशके समान अर्थात् जिनके पास कपाय- और इन्द्रियोके विपयकी लोलुपता फटकने तक नहीं पाती थी ऐसे श्रोनाग नामके मुनिराज विराजमान थे। अनेक बड़े बड़े राजाओं के साथ राजा वैश्रवण उनके पास गया भक्तिपूर्वक तीन प्रदक्षिणा देकर मस्तक झुकाकर नमस्कार किया। मुनिराजके मुखरूपी चंद्रमासे झरनेवाला धर्मरूपी अमृत पीया जिससे उसकी पुराण ।। १०० ॥ इति सुकृतविपाकाचर्मकर्मार्थसारान्निखिलवरसुखाब्धीन् संभजित्या मुमुक्षु । पुनरपि शिवसिद्धये स्त्रीचकाराशु दीक्षा सकलसुसखनि य सोऽत्र नद्यान्मुनोश ॥ ११ ॥ येनोच्चौ. प्रविधाय सव्रतमहो रत्नत्रयाख्य पुरा भुक्त्वा सौख्यमहर्निश नृजनित दिव्याहमिद्रोद्भव । तीर्थेशत्व- मवाप्य घोरतपसा मुक्त्यंगना स्वीकृता वालत्वेऽपि स मल्लिनाथजितनपो दद्यात्स्वशक्ति यम ॥ १०२ ॥ इति श्रीमल्लिनाथचरित्रे भट्टारकश्रीसकलकीर्तिविरचिते वैश्रणवनृपदीक्षावर्णनो नाम द्वितीय परिच्छेद ॥२॥ मोहरूपी अग्नि शांत हो गई और वह अपने को सुखी अनुभव करनेलगा। उसी समय उसने मन वचन कायकी शुद्धिपूर्वक वाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहका त्याग कर दिया एवं अनेक राजाओंके साथ उ- सने जैनेश्वरी दीक्षा धारण करलो ॥६७-१०० ।। जिन मुनिराज वैश्रवणने पहिले तो तीव्र पुण्यके उदयसे समस्त उत्तम सुखके समुद्रस्वरूप सार- भूत धर्मकार्यों को किया पीछेसे "अविनाशी अनुपम मोक्ष सुख प्राप्त हो जाय, इस अभिलाषासे समस्त सुखोंकी स्थान स्वरूप जैनेश्वरी दीक्षा धारण की वे म नियोंके शिरोमणि म निराज ठौश्रवण चिरकाल इस संसार में जयकांते हो कर वृद्धिको प्राप्त हों ॥ १०१ ॥ जिन पवित्र भगवान मल्लिनाथने पहिले तो रत्नत्रय नामका परम पावन व्रत पालन किया पीछे रात दिन मनुष्यलाकके उत्तमोत्तम भोग भागे। तीर्थंकर पद प्राप्त किया एवं बाल अवस्थामें ही घोर तपके द्वारा मोक्षरूपी स्त्रीको स्वीकार किया वे मल्लिनाथ जिनेन्द्र हम अपनी दिव्य शक्ति प्रदान करें ॥ १०२ ॥ भट्टारक सकलकीर्ति कृत सस्कृत मल्लिनाथ चरित्रकी प० गजाधरलालजी न्यायतीर्थ विरचित वनिका रत्नत्रयका दूसरा परिच्छेद सपूर्ण हुवा। -*-*- .

तृतीयः परिच्छेदः। मलिक पुरा । - घातिकारिहंतारमनंतगुणमारिधिं । त्रिजगत्सेषित नौमि श्रीमल्लित दणाप्तये ॥१॥ अथासौ नि प्रमादेन.विनयेन स सद्धिया। एकादशाग- सिद्धाताब्धे पारमगमन्नुनि ॥२॥ अनाच्छाय स्वसामय द्विरभेद तपोऽनघ । दुष्कर्मारामदावानल कुर्यात्प्रत्यहं यति ॥ ३ ॥ शून्यागारे श्मशाने वा गुहाद्रौ वा वनादिषु । सिहवञ्च वसेन्नित्य निर्जने तरुकोटरे ॥ ४॥ ध्यानाध्ययनकर्माणि नि प्रमादो जितेन्द्रिय । विधत्तेऽत्रानिशं नैव स्वप्नेऽपि ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीय और अंतराय नामक चार घातिया कर्मरूपी वेरियोंको जड़से उखाड कर फक देनेवाले, अनंत गुणोंके समुद्र एवं तीनोंलोकके जीव भक्तिपूर्वक जिनकी सेवा और पजा करते हे ऐसे भगवान श्रीमल्लिनाथको मैं उनके अनुपम गुणोंको प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूं ॥ १॥ समस्त प्रकारके प्रमादोंको छोड़कर विनय पर्वक म निराज वैश्रवणने अगोंका अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया और थोड़े ही दिनोंमें वे म निराज अपनी श्रेष्ठ बुद्धिसे ग्यारह अंगस्वरूप सिद्धांत समुद्र के पारको प्राप्त हागए अर्थात् उन्हें ग्यारह अंगोंका परिपूर्ण ज्ञान हो गया ॥ २ ॥ वे परम धीर वीर मु निराज अपनी सामर्थको न छिपाकर प्रतिदिन बारह प्रकारके तपोंको तपने लगे जो तप निर्दोष थे और दुष्कर्मरूपी वनको भस्म करनेकेलिये दावानलके समान थे ॥३॥ वे मुनिराज शून्य खंड हरोंमें श्मशान भूमियोंमें पर्वतकी गुफाओं में और जनशून्य वृक्षोंको खोलारों में सिंहके समान निर्भय होकर निवास करते थे॥ ४॥ स्पर्शन आदि इन्द्रियोंपर परिपूर्णरूपसे विजय पाने वाले और प्रमादरहित वे मुनिराज सदा उत्तम ध्यान और अध्ययनमें प्रवृत रहते थे ओर स्वप्न के अंदर भो वे राजकथा आदि विकथाओंका उल्लेख १ । छह प्रकारका वाह्य और छह प्रकारका अभ्यन्तर इसप्रकार तपके बारह भेद हैं अनशन अपमोदर्य वृत्तिसख्यान रसपरित्याग विविक्तशय्या- सन और कायक्लेश ये छह भेद वाह्य तपके हे और प्रायश्चित्त विनय वेयावृत्य स्वाध्याय और व्युत्सर्ग ये छह भेद अभ्यन्तर तपके हैं मिलकर तप यारह प्रकारका है। तत्त्वार्थ सूत्र अ०६ सू०१६-२० ॥ ४० मलि ४१ १ ३ विकथादिकान् ॥५॥ स्थिरचित्तेन नित्य स धर्म्यशुक्लानि मुक्तये - सद्धयानानि करोत्येव नासद्धयानानि जातुचित् ॥ ६॥ ग्रामखेट मटंवारण्य- देशाद्रि वनादिषु । एकाको वायुवन्नित्यं विहरत्येव धीरधी ॥ ७॥ शकादिदोषनिमुका निःशकादिगुणांकिता । तत्त्वार्थश्रद्धया सोऽचादर्शनस्य- नहीं करते थे॥५॥ आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्लके भेदसे ध्यानके चार भेद माने जाते हैं, इनमें आदिके ध्यान निंदित हैं क्योंकि उनसे निंदित गतियोंकी प्राप्ति होती है और अंतके धर्म्य और शुक्ल ये दो ध्यान प्रशस्त हैं क्योंकि उनसे स्वर्ग मोक्षके सुख प्राप्त होते हैं । वे मुनिराज वैश्रवण मोक्ष प्राप्तिको अभिलाषासे सदा चित्तको स्थिरकर उत्तम ध्यान-धर्म्य ध्यान और शुक्ल ध्यानका ही चिंतवन करते थे, आर्त ध्यान और रौद्र ध्यानरूप अशुभ ध्यानोका कभी भी अपने चित्तमें विचार न लाते थे ॥ ६॥ वे धीर बुद्धिके धारक मुनिराज जिसप्रकार पवन सर्वत्र अकेला विचरता रहता है उसी प्रकार गांव खेद मटंव जंगलके प्रदेश पर्वत और वन आदिमें अकेले ही विहार करते फिरते थे, निर्भयवृत्तिके कारण किसीका भी संग नहीं चाहते थे॥७॥ दर्शनविशुद्धि १ विनयसंपन्नता २ अतीचार रहित शीलवतोंका पालना ३ सर्वदा ज्ञानाभ्यास करना ४ संवेग रखना ५ शक्तिके अनुसार दान करना ६ शक्तिके अनुसार तप तपना । ७ साधुसमाधि ८ वैयावृत्य करना अहंत भगवानको भक्ति करना १० आचार्य भगवानकी भक्ति करना ११ शास्त्रोंके बहुत जानकार उपाध्योंकी भक्ति करना १२ प्रवचनकी भक्ति करना १३ छह आवश्यकों का पालन करना १४ मोच मार्ग को प्रभावना करना १५ और वात्सल्यभाव रखना १६ ये सोलह भावना हैं। इन सोलह प्रकारको भाव- नाओंके भानेसे तीर्थकर पदकी प्राप्ति होती है मुनिराज वैश्रवणने भी इसप्रकार सोलह भावनाओंका भाना प्रारंभ कर दिया- मुनिराज वैश्रवणका जीवादिपदार्थोंको श्रद्धान, शंका कांक्षा आदि दोषोंसे रहित था एवं निःशंककि- तत्व और निकांक्षितत्व आदि गुणोंसे भूषित था इसलिए सदा सम्यग्दर्शनके अंदर विशुद्धता रहने के १ । दर्शनविशुद्धिविनयसंपन्नताशीलवतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी , साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमहदा. चार्यवहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावनाप्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥ २४ ॥ ०६ । तस्वार्थसूत्र । . om मल्लिक ४२ पुराण विशुद्धिता ॥ ८॥ दर्शनशानचारित्रतपसां तद्वतां सदा। हृदा च वपुषा वाचा मुक्त्यै स विनयं भजेत् ॥ ६ ॥ शीलव्रतसमूह निरतिचार स पालयेत् । निरंतरं श्र तज्ञान पठेत्सपाठयेत्सता ॥ १०॥ देहभोगभवादौ स सवेग चितयेदूधृदि । सिद्धातादिमहादान दत्तेऽ ग्यनुग्रहाय सः ॥ ११ ॥ शक्त्या खिलतपास्येव करोति कर्महानये । साधूना स समाधिं च प्रत्यूहपीडितात्मना ॥ १२ ॥ सूर्यादियोगिना वैयावृत्त्यं स दशधा भजेत् । अर्हदाचार्य कारण उनके दर्शन विशुद्धि भावना थी॥ ८॥ सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र और तप इन चारों आराधनाओंका तथा इन चारों प्रकारकी आराधनाओंको पालन करनेवालोंका वे अच्छी तरह विनय करते थे इसलिये उनके विनय भावनाका पालन था॥ ६॥ किसी प्रकार शीलवतोंमें अतोचार न लग जाय इस रूपसे वे शीलब्रतोंका पालन करते थे इसलिये उनके अतीचाररहित शीलव्रतोंका पालनारूप भावना थी वें श्रुतज्ञानका निरंतर अध्ययन करते थे और दूसरोंको अध्ययन कराते थे इस लिये उनके सर्वदा ज्ञानाभ्यास करनारूप भावना थी॥ १०॥शरीर भोग और स्त्री पुत्र आदि समस्त संसारके पदार्थोसे उन्हें प्रति समय संवेग रहता था। इसलिये वे संग भावनाका पालन करते थे अन्य मुनियों को सिद्धान्तका रहस्य प्रदान करते थे इसलिये शक्तिके अनुसार दान देना रूप उनके भावना थी। ज्ञानावरण आदि समस्त कमों को जड़से नष्ट करनेकेलिये वे शक्तिको न छिपाकर समस्त तप तपते थे इसलिये उनके शक्तिके अनुसार तप भावनाका पालन था। मुनियोंके तपमें किसी प्रकार का विघ्न आकर उपस्थित हो जाय और उससे उनके आवश्यक कर्ममें किसी प्रकारकी रुकावट उपस्थित हो जाय तो उनका समाधान कर देना समाधि हैं मनिराज वैश्रवण अच्छी तरह साधुओंको समाधि करते थे इसलिये वे पूर्णरूपसे साधुसमाधि नामक भावनाके पालक थे॥११-१२॥ आचार्य १ उपाध्याय २ तपस्वी ३ शैक्ष्य ४ ग्लान ५ गण ६ कुल ७ संघ ८ साधु ६ और मनोज्ञ १० इसप्रकार ये दश भेद साधुओंकेहोते हैं । इन दश प्रकारके साधुओंको दुःख १ मुनिगणतप सधारण समाधिः भाडागाराग्निप्रशमनवत् ॥ ८॥ जिसप्रकार अन्न आदिसे परिपूर्ण कोठारमें किसी कारण से आग लग जाय तो उसका युझना अत्यन्त उपकारका करनेवाला है इस युद्धिसे वह बुझा दी जाती है उसीप्रकार अनेक प्रकार के व्रत और शीलोंके पालन करनेवाले साधुओंके तपमें यदि किसीरूपसे विन उपस्थित हो जाय तो उसे दूरकर साधुओंका समाधान कर देना साधुसमाधि है 1 रा०या० २६६। કર पुरा वर्याणां सोऽधाक्तिवियोगतः ॥ ६ ॥ बहुश्रु तपता भावेः प्रवचनस्य श्रुताप्तये। मनोवाकाययोगकामति मुकिसी व्याधात् ॥१७॥ प्रमादेन विना यागी पडावश्यकपूर्णता। काले काले करोत्येव तदानि नाच जातुचित्'॥ १५॥ जिनशासनमाहात्म्या व्यकोकुर्यात्तपश्चिदा- वत्सलत्य उपस्थित होनेपर उस दुखके दूर करनेकी इच्छासे जो टहल चाकरी करना है यावृत्य करना रूप भावना मुनियोंकी बड़े प्रेम से टहल चाकरी करते थे इसलिये वैयावृत्यकरण नामकी भावनाका भी उनके अखंड- रूपसे पालन था। वे मुनिराज मन वचन और कायकी शुद्धि रखकर अर्हत और आचार्यों की पूर्णभक्ति करते थे इसलिये उनके अहंत भगवानकी भक्ति और आचार्य भगवानकी भक्ति ये दोनों भावनायें भी अखंडरूपसे थी। वे मुनिराज श्रुतज्ञानकी प्राप्तिकेलिये बहुत शास्त्रोंके जानकार उपाध्यायोंकी और शास्त्रों की भी मन वचन कायरूप योगोंकी शुद्धतासे मोक्षरूप स्त्रीको सखीस्वरूप अखंड भक्ति करते थे इसलिये उनके वह श्रुतभक्ति और प्रवचनभक्ति नामको भी दोनों भावनाओंका अखंडरूपसे पालन था॥ १४ ॥ सामायिक १ चतुर्विंशतिस्तव २ बंदना ३ प्रतिक्रमण ४ प्रत्याख्यान ५ और कायोत्सर्ग ६ ये छह भेद आवश्यक क्रियाओंके माने है। जहांपर हिंसादि समस्त पापयोगोंकी निवृत्ति है वह सामायिक नामका आवश्यक है। चोवोसों तीर्थकरोंके गुणोंका कीर्तन करना चतुर्विंशति स्तव नामका आवश्यक है। मन वचन कायकी शुद्धि रखना दोनों प्रकारकेआसनोका उपयोगमें लाना, चारों दिशाओं में चार वार मस्तक का झुकाना और प्रत्येक दिशामें तीन तीनके भेदसे वारह आवर्त करना बंदना है, भूतकालमें लगे हुए दोषोंका परिहार करना प्रति क्रमण, भविष्यतमें लगनेवाले दाषोंका परिहार करना प्रत्याख्यान एवं कुछ परिमित कालका संकल्पकर "यह मेरा है" इस रूपसे शरीरसे ममत्ववुद्धिका त्याग करदेना कायोत्सर्ग है। वे मुनिराज परमादको सर्वथा दूर कर जिस आवश्यक क्रियाका जिस समयमे विधान था उसी समयमें परिपूर्ण रूपसे करते थे किंतु किसो आवश्यक क्रियाको हानि वे कभी नहीं करते थे इस रूपसे छहो आवश्यकोंका पालन होनेसे वे 'छह आवश्यकोंका नियमसे पालना, नामकी भावनाको, अच्छीतरह पालते. थे ॥ १५॥ वे मुनिराज नाना प्रकारके उग्रतपोंको तपकर भगवान जिनेन्द्रके शासनका माहात्म्य भी 1 लि. पुरा - विधत्तै प्रवचनस्य चं दूग्जुपा ॥ १६ ॥ एतानि कारणान्येव तीर्थकृन्नामकर्मणः । भावयामास 'सिद्धय त्रिशुद्धया हृदि स पोडश ॥ १७ ॥ तेषां माहात्म्ययोगेन तीर्थकृत्कर्म सोऽद्भुत । ववंधानतशर्माब्धिं प्रैलोक्यक्षोभकारण ॥ १८ ॥ पालयन्निरतीचारान् सर्वान् मलगुणान्मुनि । अनेकर्द्धि- समूह स प्रापोग्रतपसा चिदा ॥ १६ ॥ तपस्यन् सुचिर ज्ञात्वा स्वल्पायुरतिदुर्लभ । नतोऽते स समाध्यादिसिद्धये सन्यासमाददो ॥ २० ॥ सम्यक्त्वज्ञानचात्ररितपसा मुक्तिदायिना । आराधना. परा आराधयत्येवाघहानये ॥ २१ ॥ सर्वान् परोपहान् जित्वा सच्चोत्साहवलाद् बली अच्छोतरह प्रदर्शन करते थे इसलिये मार्ग प्रभावना नामकी भावनाका भी उन के अच्छोतरह पालन होता था तथा सम्यग्दृष्टि पुरुषोंमें गाय बच्छाके समान प्रेम रखना प्रवचनवत्सलत्व नामकी भावना है । वे मुनिराज साधर्मी भाइयोंमें गौ बच्छाके समान अत्यन्त प्रेम रखते थे इसलिये प्रवच- नवत्सलत्व नामकी भावना भी उनके अखंडरूपसे पालन था ॥ १६॥ इसप्रकार वे मुनिराज वैश्रवण तीर्थंकर नाम प्रकृतिके असाधारण कारण दर्शन विशुद्धि आदि सोलह भावनाओं के मन वचन कायकी शुद्धिपूर्वक सदा अपने मनमें भाते रहते थे ॥ दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओंके भाने से उनके अनंते कल्याणोंका करनेवाला और तीनों लाकको खलवला डालनेवाला तोथंकर प्रकृति का बंध बंध गया ॥ १८ ॥ सर्वथा अतीचारोंसे रहित समस्त मूलगुणोंको पालन करनेवाले उन मुनिराज वैश्रवणके सम्यग्ज्ञानपूर्वक उत्तम तप तपनेसे अनेक प्रकारकी ऋद्धियोंका समूह प्रकट हो गया । इस प्रकार बहुत काल तक तप करते करते मुनिराज वैश्रवणको यह ज्ञान हो गया कि मेरी आयु वहुत ही कम रह गई है और इसप्रकारकी उत्तम आयुका पाना दुर्लभ है उन्होंने अन्तकालमें समाधि आदिको सिद्धिके लिये निर्मल परिणामोंसे सन्यास धारण कर लिया ॥ १६-२०॥ उन मुनिराजने समस्त पापोंके नाशके लिये साक्षात् मोक्ष प्रदान करनेवाली, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान । १ राजवार्तिक पृष्ठ संख्या २६६ । २ वत्से धेनुवत्सधर्मणि स्नेह प्रवचनवत्सलत्व ॥ १३ ॥ पृष्ट संख्या २६७ । ३ अहिसा आदि पाच महावता ईर्या आदि पाच समिति, पाँचों इन्द्रियोंका दमन, ऊपर कहें छह आवश्यक २. यावाजोव, स्नानका त्याग २२ भुमिपर शयन २३ वस्नत्याग २४ केशलोंच २५ एक बार लघु भोजन २६ दतधावन नही करना २७ और खडे होकर ओहार २८ ये अट्ठाईस मूलगुण हैं।

- मल्लि. पुराण ४५ कृशदेहोऽपि धत्ते न मानक् क्लेशा क्षुधादिभिः ॥२२॥ आतरौद्रद्वयं हत्वा धर्म्यशुक्लात्तमानस । स्थिरचित्तेन योगी स महाध्यान सदा भजेत् ॥ २३ ॥ ध्यानमादौ करोट्येव पवाना परमेष्ठिना । मन शुद्धयै च तत्वानामानुप्रक्षादिचिनकः ॥ २४ ॥ ततः स्थिरमना ध्यानी चिदानदमयं परं । अन्तगुण, कर्तारं ध्यायेत्स्वात्मानमजसा ॥ २५ ॥ तेन ध्यानेन योगीद्रः प्रसन्नमनसा दश । प्राणान्विश्वहितानते विससर्ज समाधिना ॥ २६ ॥ रत्नत्रयतपो- योगमहापुण्योदयात्तत. । सोऽनुत्तरविमानेषु ह्यपराजितनामनि ॥ २७ ॥ शिलासपुटमध्यस्थे दिव्ये पल्यककोमले । शुक्लरत्नहतध्वात्ते अहमिंद्रों सम्यकचारित्र और तप इन चारों आराधनाओं का भक्तिपूर्वक बड़े उत्साहसे भावन किया ॥ २१ ॥ क्षुधा तृषा शीत उष्ण आदि समस्त परिषहो को उत्साह और वलसे जीतनेके कारण यद्यपि उन मुनिराजका शरीर नितांत कृश हो गया था तथापि भूख प्यास आदिके कारण उनके चित्तमें रचमात्र भी क्लेश न था, पर- मात्मपदकी प्राप्तिकी अभिलाषासे सदा उनका चित्त प्रसन्न रहता था ॥ २२ ॥ मनिराज वैश्रवणके चित्तसे आर्त और रौद्र ध्यान सर्वथा नष्ट हो चुके थे सदा धर्मध्यान और शुक्लध्यानका ही चितवन था इसलिये चित्तको स्थिरकर वे सदा इन्हीं दोनों प्रशस्त ध्यानों का चिंतवन करते रहते थे निंदित ध्यानको ओर स्वप्नमें भी उनकी दृष्टि नहीं जाती थी ॥ २३ ॥ अनित्य अशरण आदि वारह भावनाओं के चितवन करनेवाले वे मुनिराज मनकी विशुद्धताके लिये सबसे पहिले अर्हत सिद्ध आचार्य उपाध्याय और सर्व साधु इन पाचों परमेष्ठियों का ध्यान करते थे, पश्चात् जीव अजीव आदि तत्वों का ध्यान करते थे ॥ २४ ॥ पांचों परमेष्ठि और तत्वों के चितवनके बाद वे मुनिराज मनको सर्वथा निश्चल कर चिदानंद चैतन्य स्वरूप और अनंत गुणोंके स्थान अपनी आत्माका भले प्रकार ध्यान करते थे॥ २५ ॥ स्पर्शन रसना घाण चक्षु और श्रोत्र ये पांच इंद्रियां मनोवल वचनवल और कायवल ये तीन बल एवं श्वा- सोच्छ्वास और आयु ये दश प्राण हैं । इसप्रकार ध्यान करनेवाले योगियोंके इद्र मुनिराज वैश्रवणने प्रसन्न चित्त होकर अंतमें समाधिके द्वारा समस्त लोगोंका हितकारी इन दश प्राणोंका परित्याग किया ॥ २६ ॥ सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चा- रित्र और तपके संबंधसे मुनिराज वैश्रवणके महा पुण्यका उदय हो चुका था इसलिये उस तीव्र पुण्यके उद- यसे उन्होंने विजय वैजयत जयंत अपराजित् और सर्वार्थसिद्धि ये जो पांच अनुत्तर विमान हैं उनमें चौथे । - ४५ पुरा वभूव हि ॥ २८ ॥ घटिकाद्वयकालेन प्राप्य संपूर्णयौवनं । दिव्यस्रग्वस्त्रभूषाढ्य दिव्यं त्यक्तोपमं महत् ॥ २६ ॥ उत्थाय शयनाहे वो वीक्षते स्म मलिदिशोऽखिला । चाहमिंद्रविमानानि । महीन विस्मिताशय ॥३०॥ ततोऽप्यनतरं प्राप्यावधिज्ञानं स तत्क्षण । तेनाज्ञासीद्धि सर्व प्राग्जन्मवततप.. फल ॥ ३१ ॥ अहो पश्य व्रतस्येद माहात्म्यमद्भुतोदय । अत्रेति हृदि सचित्य धर्मे दव्यात्परा मति ॥ ३२ ॥ ततोप्यादी जिनागारे गत्वानेकधि. ४६ सकुलै । अहमिंद्र सम दिव्यसामग् या श्रीजिनेशिना ॥ ३३ ॥ महामह चकारोचे सकल्पोत्पन्नवस्तुभि । निरोपम्य महानीरादिफलातैमनोहरे. ॥ अपराजित विमानमें जन्म लिया एवं वहां पर शिलाके मध्यभागमें एक अत्यंत दिव्य कोमल सेज बनी हुई है जो कि अपने महा उज्वल सफेद रत्नोंकी प्रभासे समस्त अंधकारको नष्टकरनेवाली है उस कोमल सेज पर उत्पन्न हो अहमिंद्र पदका लाभ किया॥२७-२८॥ अपनी उत्पत्ति कालके दो घड़ी वाद उस अहमिंद्रने भूषित, दिव्य, अनुपम और महान ऐसी पूर्ण दिव्यमाला वस्त्र और यौवन अवस्थाको प्राप्त भूपणोंसेकिया हो । इसके बाद महान ऋद्धिका धारी वह अहमिंद्र देव उस अनुपम सेजसे उठा औरआश्चर्य से विस्मित उसने समस्त दिशा और अहमिंद्रोंके विमानोंका बड़े ध्यानसे देखा। उसके बाद उसे क्षणभरमें अवधिज्ञान प्राप्त हो गया एवं “पहिले जन्ममें मैने रत्नत्रय व्रत और उत्तम तपका आचरण किया था उसका यह फल है।" ऐसा अवधिज्ञानके बलसे जान लिया जिससे इसका समस्त आश्चर्य दूर हो गया ॥ ॥२६-३१ ग्रंथकार उपदेश देते हैं कि व्रतका महात्म्य बड़ा ही आश्चर्यकारी है देखो ! कहां तो राजा वैश्रवणका जीव मुनि अवस्थामें था और कहां जाकर अपराजित नामके अनुत्तर विमानमें महान् ऋद्धिका धारक अहमिंद्र हो गया इसलिये सत्पुरुषोंको चाहिये कि वे यह परम आश्चर्यकारी व्रतका माहात्म्य अच्छीतरह विचारकर सदा अपनी उत्कृष्ट वृद्धिको धर्मके अंदर ही लगावें-किसी भी अवस्थामें धर्मके स्वरूपको न विसारे ॥ ३२ ॥ जिस समय उस अहमिंद्रको अपने स्वरूपका पूर्णरूपसे ज्ञान हो गया वह सबसे पहिले भगवान जिनेंद्रके मंदिरमे गया और वहां स्मरण करते ही सामने आनेवाली अनुपम मनोहर ऐसी जल चंदन अक्षत पुष्प नैवेद्य दीप धूप १ पचवि इदियपाणा मनरचकायेण तिपिण बलपाणा । आणप्पाणप्पाणा आउगपाणेव हुति दहपाणा ॥ यह गाथा मूल प्रतिकी टिप्पणीमें है इसका अर्थ ऊपर लिखा है । - 7 पुर ॥ ३४॥ भक्तत्या नुनिस्तवाद्यश्च विधायोत्सवमद्भुतं ।उपाय बहुधा पुण्य निजस्थानमगात्ततः ॥३५॥ विशुद्ध स्फाटिके रम्य विमानेऽत्यत. सुंदरे । विश्वर्द्धि संकुले सारे संख्ययोजनविस्तरे ॥ २६ ॥ सद्वनोपवनादौ च क्रोडाद्री तुंगधामनि । अहमिंद्र सम सोऽत्र रमतेस्म क्वचिन्मुदा ॥ ३७॥ अहमिद्रनाहतमिलितः सार्धमात्मवान् । क्वचित्स कुरुते गोष्ठी महाधर्मभवा परा ॥ ३ ॥ निसर्गसुन्दरे तत्रास्थानेऽतीव मनोहरे । या रतिर्जायते तेषा सा नोऽन्यत्र काचिद्भुवि ॥ ३६॥ अहमिद्रोऽहमिंद्रोऽस्मि मत्तो नान्यो हरिर्महान् । वितौति हृदा ते लभते स्वोन्नतिजं सुखं ॥४०॥ समभोगोपभोगाढ्या सादृश्या दिव्यमूर्चय संमज्ञानकलातेज.कातिकल्पाणसद्गणा ॥४१॥ समप्रेममहद्धीशा समधर्मपरायणाः । और फलरूप दिव्य सामग्रीसे बड़ी बड़ी ऋद्धियों के धारक अहमिंद्रोंके साथ भगवान जिनेंद्रको भक्तिपूर्वक महापूजा की ॥ ३३-३४॥महापूजाके बाद बड़ो भक्तिसे भगवानको नमस्कार किया । ललित शब्दोमें स्तुति की। अत्यत आश्चर्य करनेवाला उत्सव किया। जिससे उसे बहुत प्रकारके पुण्यको प्राप्ति हुई पश्चात् वह अपने स्थानस्वरूप विमानमें आगया ॥ ३५ ॥ वह अहमिद्रका जीव निर्मल स्फटिकमयी रिझानेवाले अत्यंत सुन्दर, समस्त प्रकारकी ऋद्धियोंसे व्याप्त उत्कृष्ट और संख्यात योजन चौड़े अपने विमानमें उत्तमोत्तम वन और उपवन आदिमें क्रीडा पर्वतोंमें और ऊंचे ऊचे महलोंमें अहमिंद्रोंके साथ मन मानी आनंद क्रीडा करता था, कभी कभी बिना बुलाये अपने आप आए हुए अहमिंद्रोंके साथ महाधर्म-जैनधर्मपर विचार करने वाली गोष्ठी करता था ॥ ३६-३८ ॥ स्वभावसे ही सुंदर अतएव अत्यन्त मनोहर उस विमानमें जितना उन अहमिंद्रोका घनिष्ठ प्रेम था उतना पृथिवीके अन्य किसी स्थानपर उनका प्रेम न था ॥ ३९ ॥ वहांपर अहमिंद्रः, अहर्मिद्रः, अर्थात् मैं इन्द्र हूं मुझसे बढ़कर कोई भी इन्द्र नहीं, सदा ऐसा विचार हृदयमें उछलता रहता है इसलिये सर्वदा ऐसा मनके अंदर विचार रखनेसे वे अपनी उन्नतिसे उत्पन्न स्वाधीन सुखका भोग करते हैं ॥ ४० ॥समस्त इन्द्रोंके भोग उपभोग समान रूपसे होते हैं-रंचमान कमी वेशी नहीं होती। उनकी दिव्य मूर्ति भी समान होती है जो एककी मूर्ति होगी वहो दूसरेकी होगी, रंचमात्र भी उसमें भेद नहीं होसकता । समस्त अहमिंद्रोंका ज्ञान भी समान रहता है। कला पताप कीर्ति कल्याण और उत्तम गुण भी सवोंके समान ही होते हैं । सवोंका प्रेम भी समान ही , होता है। महान् मल्लि० ४८ पुराण - . समानोत्कृष्टसच्छुक्ललेश्या. शुद्धाशयान्विताः ॥ ४२ ॥ समाचरणपुण्योत्थविपाकेनातिसुंदराः । सादृश्या अहमिंद्रास्ते भवंति मुक्तिगामिन ॥ ३ ॥ यत्सुखं जायते स्वर्गे शक्राणां देवतोद्भव । तस्मत्तेपामसंख्यातं निःप्रवीचारमेव तत् ॥४४॥ सर्वोत्कृष्टं सुसं यच्च संसारे पुण्यसंभवं । ऋद्धियोंका स्वामीपन भी सवोंका एकसा है। धर्ममें तत्परपना भी सवोंका समान है । सदा शुद्ध आशय रखनेवाले उन अहमिंद्रोंके उत्कृष्ट शुक्ल लेश्या भी समान है तथा समानरूपसे चारित्रके पालनेसे जायमान पुण्यके विपाकसे, समस्त अहमिंद्र अत्यन्त सुन्दर होते हैं इसरूपसे समस्त अहमिंद्र सब वातोंमें समान हैं किसीमें किसी पकारकी हीनाधिकता नहीं तथा वे समस्त अहमिंद्र मोक्षगामी हैं अधिकसे अधिक दो वार मनुष्य भव धारण कर वे नियमसे मोक्ष चले जाते हैं ॥ ४१-४३॥ स्वोंके अंदर जो सुख देवरूप इन्द्रोंको पाप्त हैं उस सुखकी अपेक्षा अपराजित विमानवासी अहमिंद्रोंका सुख असंख्यात गुणा अधिक है और वह सुख पूवीचार--मैथुनकी अभिलाषासे रहित है अर्थात् सोलह स्वर्ग पर्यंत देवोंका सुख तो पूवींचारजनित हैं। उनमें सौधर्म और ऐशानं स्वर्गनिवासी देव मनुष्योंके समान शरीरसे मैथुन सेवन करते हैं आगेके स्वर्गों के देवोंमें कोई कोई अपनी देवांगनाओंके स्पर्शमात्रसे हो तृप्त हो जाते हैं कोई कोई रूप देख कर तो कोई कोई भूषणोंका शब्द सुनकर एवं कोई कोई अपनी देवांगनाओंका मनमें स्मरण करनेसे ही तृप्त हो जाते हैं किंतु सोलह स्वर्गों के आगेके देवोंमें पविचारका कोई संबंध नहीं वे पूविचाररहित हैं इसलिये अपराजित विमानवासी, देव भी पूवीचाररहित दिव्य सुखके भोगने । वाले हैं ॥४४॥ पुण्यसे जायमान संसारमें जो भी उत्कृष्ट सुख माना गया है वह समस्त शांतिस्वरूप और १ "विजयादिपु द्विचरमा " ॥२६॥ अर्थात् विजय आदि चार विमानवासी. देव द्विचरम हैं, अधिकसे अधिक दो वार मनुष्य भवे ,ण कर नियमसे मोक्ष चले जाते हैं सर्वार्थसिद्धि विमानवासी एक भवावतारी ही है । अ० ४ तत्वार्थसूत्र ॥ २,कायप्रवीचारा आऐशानात् ।। ७ ॥ अर्थात् सौधर्म ऐशान स्वर्गनिवासी देवोंमें कायजनित प्रवीचार-मैथुन सेवन है । "शेषा. स्पर्श- पशब्दमन प्रपीचारा" ॥ ८॥अर्थात् पहिले और दूसरे स्वगो के देवोंके सिवाय अन्य स्वों के देवोंमें स्पर्श-आदि जनित प्रविचार है । तथा 'परेऽप्रनीचारा" ॥ ६ ॥ अर्थात् सोलह स्वर्गों के ऊपरके देव प्रवीचाररहित हैं - उनके प्रवीचार जनित किसी प्रकारका सुख नहीं । तत्त्वार्थ mar अध्याय ४॥ ४८ - .

पुराण - तत्सर्व विद्यते तेषां तत्र शातातरगजं ॥ ४५ ॥ तेज. पुंजनिभं दिव्या शरीरं तस्य विद्यते। निसर्गसुदर विश्वस्नग्भूपावरशोभित ॥ ४६ ॥ मलिः || हस्तोच्छितिधरं रम्य कातिद्योतितदिङ्गुखं । पुण्यमूर्तिरिवात्य तसुभगं बिक्रियातिगं ॥ ४७ ॥ त्रयस्त्रिशत्समुद्रायु. स शुभध्यानतत्पर । अस्पद- नयनो रेजे ज्यानारूढो मुनिर्यथा ॥४८॥ यस्त्रिंशत्सहस्त्रोकवत्सराणा व्यतिक्रमे मनसा दिव्यमाहारमादत्तेऽतिसुखप्रदं ॥ ४६ ॥ अतिकाते त्रय- स्त्रि शत्पक्षाणा लभते मनाक्।उच्छ्वासं सोऽहमिद्रोऽतिसुगधीकृतदिग्वज ॥५०॥ लोकनाड्य'तरालस्थमूर्ति वस्तु चरावर सर्वजानाति शक्राऽसौ सामाधिज्ञानयक्षुपा ॥ ५१ ॥ समर्थ. स्वावधिज्ञानसमक्षेणे सुरोत्तम । विक्रियर्दिवलात्कतुं गमनाद्यखिलक्रिया ॥५२॥ निसर्गस्थिरचित्तोऽसौ अंतरंगसे जायमान सुख अहमिद्रोंके मौजूद है॥४५॥ मुनिराज वैश्रवणके जीव अहमिद्रका शरीर साक्षात् तेजका पुंज ही है क्या ऐसा था। स्वभावसे ही सुन्दर था एवं सब प्रकारकी माला उत्तमोत्तम मूषण और वस्त्रोंसे अत्यंत शोभित था। तथा वह एक हाथ ऊंचा था। महामनोहर था।अपनी अनुपम कांतिसे समस्त दिशाओंके मुखोंको जगमगानेवाला था, पुण्यकी साक्षत् मूर्तिके समान-अत्यंत सुभग था और विक्रियासे रहित था ॥ ४६-४७ ॥ उस अहमि'द्रकी तेतीस सागरकी आयु थी। सदा वह शुभ ध्यानमें लीन लगा रहता था और उसके नेत्र स्पंदन क्रियासे रहित निर्निमेष थे इसलिए वह ऐसा जान पड़ता था मानो ध्यान क्रियामें तल्लीन यह साक्षात् मनी है॥४८॥ जिस समय तीस हजार वर्ष व्यतीत हो जातों थीं उस समय वह मनसे संकल्पित दिव्य आहार ग्रहण करता था जो कि अत्यंत सुख प्रदान करनेवाला होता था ॥ ४६॥ वह पुण्यात्मा अहमिद्र जब तेतीस पक्ष वीत जाते थे तब थोड़ासा उच्छ्वास लेता था और वह इतना उत्कट सुगंधित होता था कि उसकी सुगंधिसे समस्त दिशाओंके समूह महक निकलते थे-समस्त दिशाओंमें सुगंध हो सुगंध फैल जाती थी॥ ५० ॥ वह महापतापी अहमिद्र तीनसौ तेतालीस योजन घनाकार लोक नाड़ीके अंदर जितने स्थावर जंगम मूर्तिकपदार्थ भरे हुए हैं अपने दिव्य अवधिज्ञानरूपी नेत्रसे भले लोकनाडोके अंदर का ऐसा कोई भी मूर्तिक पदार्थ वाकी नहीं बचा था जिसे वह अपने अवधिज्ञानसे न जानता हो ॥ ५१ ॥ उस अहमिंद्रके अवधिज्ञानका विषय लोकनाडी बतलाया है इसलिये जितना क्षेत्र उसके अवधिज्ञानका विषय है उतने क्षेत्र तक वह अपनी विक्रिया ऋद्धिके वलसे गमन आगमन आदि ४६ पुराण ५० सर्वकार्यादिवर्जित । न कुर्याद्रिक्रिया जातु निराशो गमनादि च ॥५३॥ स्थानस्थोऽपि जिनेशाना कृत्रिमाकृत्रिमाणि स । ज्ञात्वा ज्ञानेन विवानि नमति स्म निरंतरं॥५४॥ पचकल्याणकालेऽपि जिनेद्राणा वृपाप्तये । प्रणाम विनय भक्त्या कुर्यात्तत्रस्थ एव हि ॥ ५५ ॥ मुनीना ज्ञाननिर्वाणकाल मल्लि० ज्ञात्वावधेर्वलात् । नमस्कार सदा कुर्यान्मूर्धा भक्तिभराङ्कित ॥५६॥ इत्यादि वहुधा धम भजमानस्तथा सुख। निमग्नस्तत्र शान्धौ सोऽस्था- चिंतातिगो महान् ।। ५७ ॥ अथात्र भारते क्षेत्रे महापुरुपसभृते । वगदेशेऽतिविख्यातो भवेद्धर्माकरो महान् ॥ ५८ ॥ यत्र पत्तनसत्खेरपुरग्रामादयो समस्त क्रियाओंके करनेमें समर्थ था तथापि वह स्वभावले ही स्थिर चित्तका धारक था समस्त कार्य आदि से रहित था कोई भी उसे कार्य करना न था इसलिये कभी भी विक्रिया शक्तिको काममें नहीं लाता था एवं कहीं भी जाने आनेकी उसकी इच्छा न होती थी इसलिये वह कहीं पर भी जाना आना नहीं करता था अपने निजी स्थानमें हो अनेक प्रकारको क्रीडाओंको करता हुआ आनंदसे रहता था ॥ ५२-५३ ॥ अपने स्थान पर रहकर केवल क्रीडा कौतूहलोंमें ही वह दिन नहीं विताता था किंतु अपने अवधिज्ञानके वलसे कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयोंको अच्छी तरह जानकर उनमें विराजमान भगवान जिनेंद्रके प्रति- विंवोंको सदा भक्तिपूर्वक नमस्कार करता था ॥ ५४॥ जिस समय तीर्थंकरोंके गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाणरूप पांचों कल्याणोंका समारोह होता था उस समय भो वह पुण्यात्मा अहमिंद्र धर्मकी पाप्तिकी अभिलापासे तीर्थंकरोंको भक्तिपूर्वक नमस्कार करता था और उनके गुणोंमें चित्तके अंदर बड़ी भारी विनय करता था ॥ ५५ ॥ जिस समय उसे अवधिज्ञानके बलसे सामान्य मुनियोंके ज्ञान कल्याणका भी पता लगता था उस समय उन्हें भी वह शक्तिके भारसे नम्रीभूत हो गया सदा मस्तक झुकाकर नमस्कार करता था ॥ ५६ ॥ इसप्रकार अनेक प्रकारसे धर्मका आराधन करता हुआ वह महान् ऋद्धिका धारी अहमिंद्र कल्याणके समुद्रस्वरूप उस अहमिंद्र पदके सुखमें सदा निमग्न रहता था एवं उस समय उसे किसी प्रकारकी चिन्ता नही करनी पड़ी थी—वह वहां निश्चिन्त हो सुखसे काल व्यतीत करता था॥५७॥ अनेक महा पुरुषोंके स्थान स्वरूप इसो भरत नेत्रमें अत्यन्त मनोहर एक वंग ( बङ्गाल ) देश है जो कि पृथ्वीपर अत्यन्त विख्यात है धर्मका परम स्थान है और धन धान्य आदिसे समृद्ध होनेके कारण अत्यंत महान् है ॥ ५८ ॥ उस समय उसे देशके पत्तन खेट पुर और गांव आदिमें धर्मात्मा लोग निवास करते थे। ५० -- २० पुराण बुधैः । धार्मिकैश्च जिनागारंभौति धर्माकरा इव ॥५६॥ वनानि तृप्तिकणि रग्यानि सफलानि च । भ्राजते यत्र तुंगानि यतेराचरणानि वा ॥६० ॥तृष्णाशर्मापनोदाश्च सवोवाप्यादयः परा । गंभोराः शीतला स्वच्छा मुन्यावया इवावभु ॥६१॥ विहरति यतीशाश्च भव्यानुग्रह कारिण । साधं सघाटकेनात्र धर्मवर्तनहेतवे ॥६२॥ तीर्थयात्रादिसभूतो धर्मप्रभावनोद्भव । जिनपूजादिजो यत्रोत्सवो नित्यं प्रवर्तते ॥६३ । जगह जगह भगवान जिनेंद्रके मन्दिर जगमगाते थे इसलिये वह देश उससमय धर्मकी खानि सरीखा जान पड़ता था। इस बंग देशके स्वभाव सिद्ध वन मुनियोंसे आचार सरीखे जान पड़ते थे क्योकि जिसप्रकार मुनियोंके आचार मनोहर आनन्दको प्रदान करने वाले होते हैं उसी प्रकार ये वन भी अत्यन्त मनोहर थे। जिसप्रकार मुनियोंके आचार फलविशिष्ट होते हैं अर्थात् स्वर्ग मोक्ष आदि फलोंके प्रदान करनेवाले होते हैं उसी प्रकार वे बन भी फलविशिष्ट थे नारंगी संतरा अनार अंगूर आदि उत्तमोत्तम फलोंसे सदालदे रहते थे एवं जिसप्रकार मुनियोंके आचार सुंग-उच्च, होते हैं उसीप्रकार वे वन भी महा ऊंचे ऊंचे और विशाल थे॥६० ॥ उस बंग देशको वापियां भी मुनिराजके चित्तोंके समान पवित्र थीं क्योंकि जिसप्रकार मनियोंके चित्त तृष्णा और उससे जायमान क्लेशसे रहित हैं उसीप्रकार वे वापियां भो तृष्णा और उससे जायमान क्लेशसे रहित थीं अथात् उन्हें देखते ही लोगोकी तृष्णा और उससे जायमान क्लेश दूर भाग जाता था। मुनियोंके चित्त जिसप्रकार गंभीर रहते हैं उसी प्रकार वे वापियां भी निर्मलजलसे गंभीर थी। जिसप्रकार मनियोंके चित्त परम शीतल और स्वरूपमें लीन रहते है उसी प्रकार वे वापिया परम शोतल और अपने परिमित स्वरूपमें विराजमान थों ॥६१ ॥ संसारमें वास्तविक धर्मको प्रवृत्ति है इस अभिलापासे मोक्षाभि- लाषी भव्यो पर उपकार व द्धिसे प्रेरित हो सदा वहां अपने संघके साथ मु निगण विहार करते थे॥ ६२ ॥ वहां कोई २ पवित्र तीर्थों की यात्राको तयारियां करते थे। कोई २ धर्मकी प्रभावना करनेवाले कार्य करते १ ये वैमानिक देवोमें विशिष्ट जातिके देव है । इनका निवासस्थान ब्रह्मस्वर्गके अन्तमें है। इन देवोंमें पड़े छोटेका विभाग इसलिये नही स्वतंत्र हैं। विषयवासनासे रहित ब्रह्मधारी हैं इसलिये इन्हें देवर्षि [देवोंमें ऋपि] कहा जाता है तथा इसी कारण अन्य देव इनकी पूजा सत्कार करते हैं । ये चौदह पूर्वके धारी सदा ज्ञानकी भावना भानेवाले, संसारसे भयभीत, अनित्य आदि भावनाओंके सदा चितवन करनेवाले, परम सम्यग्दृष्टि, भगवान तथिकरके तप कल्याणके समय आकर बोधनेवाले होते हैं और एक भव धारणकर मोक्ष चले जाते है।

५२ यत्रोत्पन्ना विदः केचित्तपसा याति निर्वृति । केचिच्च गृहिधर्मेण नाकं लौकांतिकास्पदं ॥६४ ॥ केचित्सत्पात्रदानेन भोगभूमि सुखाकरा । मल्लि० || भजतींद्रपन केचिच्छोजिनेद्रादिपूजया ॥ ६५ ॥ योहते स्वजन्माहो धर्मसिये सुधाभुजः । तस्य स्वमुक्तिहेतोर्हिदेशस्य का वणना परा॥ ६६ ॥ इत्यादिवर्णनोपेतदेशस्य नाभिवत्तरा । मिथिलाख्या पुरी भाति स्व पुरोव सुधागर्भिक. ॥ ६७ ॥ तुंगशालप्रतोलोभिर्दीर्घखातिकया च सा । और कोई २ भगवान जिनेंद्रकी पूजा आदिका बड़े ठाटवाटसे समारोह करते थे इसलिये उस देशमें तीर्थ- यात्रा धर्म प्रभावना ओर भगवान जिनेंद्रकी पूजा आदिका उत्सव सदा होता रहता था ॥ ६३ ॥ उस बंग देशमें उत्पन्न होनेवाले कोई २ विद्वान पुरुष घोर तपोंको तपकर मोक्ष प्राप्त करते थे और कोई वास्तविक रूपसे गृहस्थ धर्मके पालन करनेवाले पुरुष, उस गृहस्थ धर्मको कृपासे जहांपर लोकांतिक देवोंका निवासस्थान है ऐसे पांचवें स्वर्गमें जाकर जन्म धारण करते थे॥ ६४ ॥ कोई कोई महानुभाव उत्तम पात्रोंमें आहार आदि दानोंके देनेसे सदा सुखस्वरूप भोगभूमिके सुखका रसास्वादन करते थे और कोई २ पुण्यात्मा भक्तिपूर्वक भगवान जिनेंद्र आदिको पूजाकर दिव्य इन्द्रपद प्राप्त करते थे॥६५॥ गंगदेशमें उससमय जैन धर्मका ही सर्वत्र प्रचार था और उसके द्वारा लोग सदा स्वर्ग और मोक्ष पदोंको प्राप्त करते थे इस लिये परम धर्मके स्थान और स्वर्ग मोक्षके कारण उस देशमें सदा अमृत खानेवाले देवगण भी जन्म धारण करनेकी अभिलाषा करते थे॥६६॥ इसप्रकार उत्तम वर्णनके धारक वंग देशमें एक मिथिला नामकी नगरी है जो कि मनुष्यके शरीरमें नाभि (टुढो) के समान ठीक उस देशके मध्यभागमें है। अपनी अनुपम शोभासे स्वर्गपुरीके समान है एवं सर्वत्र धर्मात्मा लोगोंसे भरी रहनेके कारण अत्यन्त शोभायमान जान पड़ती है॥ ६७॥ जिसप्रकार ऊचे ऊचे परकोटे विस्तीर्ण गलियां और विशाल खाइयोंसे भूषित अयोध्याकी शोभा शास्त्रमें वर्णित है उसीप्रकार मिथिलापुरीमें भी उस समय बड़े ऊंचे ऊंचे परकोटे थे। विस्तीर्ण गलियां थी और चारों ओर विशाल खाई थी इसलिये वह साक्षात् अयोध्या सरीखी जान पड़ती थी तथा उसमें अयोध्याके समान बड़े बड़े वीर पुरुषोंका निवास स्थान था इसलिए वह शत्रुओंके अगम्य थी कोई भी शत्रु उससमय उसकी ओर ५२ पुराण अयोध्येवाभाच्छणामगम्या व भटोत्तमे ॥ ६॥ आयंतीय देवेशां सानेकद्धियुता वमौ । प्रासादाप्रध्वजाबाते. समोरांदोलितांशुकैः ॥ ६६ ॥ उत्तुंगतोरणोपेता यत्र प्रासादपक्तय. । सशाला श्रीजिनेद्राणा शोभते वा वृषाब्धयः ॥ ७ ॥ हेमरत्नादिविबौद्यो गीतनृत्यस्तवादिमि' ! दिव्योप- मलिक || करणाद्यर्यातायातैश्च धार्मिक ॥७॥ कचित्सुपात्रदानोद्वसदनादिवृष्टिमि । नित्यमन्ये सुमागल्यवर्ततेऽस्यां महोत्सवः ॥७२॥ जिनेंद्रगुरुभक्ताश्च आंख उठाकर भी नहीं देख सकता था॥ ६८ ॥ उस मिथिलापुरीके बड़े बड़े महलोंके अग्रभागोंमें रंग विरंगी अनेक ध्वजायें लगी हुई थीं और उनके वस्त्र पवनके झकोरों से फरहरा रहे थे उससे ऐसा जान पड़ता था कि अनेक प्रकारको द्धियोंसे शोभायमान मिथिलापुरी अपनी ऋद्धियोंका भोग करानेके लिये देवोंको बुला रही है ॥ ६६ ॥ बड़े बड़े ऊंचे तोरणोंसे भूषित और अटारियोंसे शोभायमान भगवान जिनेंद्रके मंदिरोंकी पंक्तियां ऐसी जान पड़तो थीं मानो वे साक्षात् धर्मकी समुद्र हैं—कोई भी आकर उनमें धर्म- लाभ कर सकता है इसलिये जिन मंदिरोंकी पंक्तियोंसे वह मिथिलापुरो उस समय अत्यन्त शोभायमान थी। मिथिलापुरोके जिनमंदिरों में सुवर्णमयी और रत्नमयी प्रतिविम्ब विराजमान थे। सदा उनमें गोत नृत्य और स्तुतियां आदि हुआ करते थे। छत्र चमर आदि दिव्य उपकरण भी जगह जगह मंदिरोंकी शोभा बढ़ाते थे। नौवत घुरा करती थी और धर्मात्मा लोगों का सदा आवागमन बना रहता था इसलिये वे मंदिर महारमणीक जान पड़ते थे॥७०-७१ ॥ उस समय मिथिलापुरीमें उत्तम पात्रोंको दान देनेसे तीव्र पुण्यका बंध होता था इसलिए उसके फल स्वरूप रत्न पुष्प और गंधोदक आदिकी वर्षा होती रहती थी तथा अन्य भी नानाप्रकारके मांगलिक कार्य हुआ करते थे इसलिये वह मिथिलापुरी अनेक महोत्सवोंसे सदाजगमगाती रहती थी ॥७२ ॥ उस मिथि- लापुरीके रहने वाले पुरुष भगवान जिनेंद्र और गुरुओंके परम भक्त थे। अनेक प्रकार के ज्ञान विज्ञान- कला-कौशलोंके जानकार थे। सदा आहार आदि दानोंके देनेसे परम दानी थे, धर्मात्मा और शीलवान थे। उत्तमोत्तम व्रतोंके आचरण करने वाले थे। जो मार्ग पुण्य प्राप्ति करानेवाला था उसीके अनुयायी, थे, पापवर्धक मार्गका कभी अनुगमन नहीं करते थे । परम सम्यग्दृष्टि थे। जैनधर्मके परम श्रद्धानी थे। ----- मल्लि. पुरा' ५४ ज्ञान विज्ञानवेदिन । दानिनो धर्मशीला ' सद्व त्ता पुण्यानुगामिन ॥ ७३ ॥ सदृष्टयोऽतिर्जेना सविनयाः शुद्धचेतसः । भोगिनो धार्मिकाः शूरा विचारचतुरा नराः ॥ ७३ ॥ नार्यस्तादृग्गुणोपेता. प्राग्जन्मार्जितपुण्यतः । तस्यामुत्तुगलौधेषु निवसति महाकुलाः ॥ ७५ ॥ इत्यादिवर्णनात्याया नगयां भूपतिर्महान् । कुभनामातिविख्यातो बभूगाद्भुनपुण्यमान् ॥ ७६ ॥ त्रिज्ञानलोचनो वाग्मी इक्ष्वाकुकुलखांशुमान् न्यायमार्गरतः काश्यपगोत्रतिलकोपम. ॥ ७७ ॥ विश्वाभरणदिव्यांवरमालादीप्तिकांतिभि । भूपितोगोऽतिधर्मात्मा सदाचारपदार्थवित् ॥ ७८ ॥ अत्यन्त विनयालु और सदा शुद्धचित्तके धारक थे, धर्मानुकूल भोगोंको भोगनेवाले थे, धर्मको ही सब कुछ माननेवाले थे, शूरवीरथे एवं अच्छे बुरे विचारोंके करने में अत्यन्त प्रवीण थे। जिस प्रकार पुरुषोंके अंदर गुण थे उसी प्रकार स्त्रियों के अंदर गुण थे अर्थात् वे भी पुरुषोंके ही समान भगवान जिनेंद्र और गुरुओंकी भक्त थीं एवं अनेक प्रकारके कलाकौशलोंकी जानकार आदि थीं । इसप्रकार पहले जन्ममें कमाए गए पुण्य के उदयसे महान् कुलोंमें उत्पन्न वे स्त्रीपुरुष उस मिथिलापुरोके ऊंचे ऊंचे महलोंमें बड़े आनंदसे निवास करते थे॥७३-७५ ॥ इस प्रकार उत्तम वर्णनकी धारक उस मिथिलापुरीका राजा कुंभ था जो कि अनेक राजाओंका शिरो- मणि था। पृथ्वोपर प्रसिद्ध था और अत्यन्त पुण्यवान था ॥७६ ॥ वह राजा कुभ मति श्रुत अवधि इन तीन ज्ञानोंका धारक था। हितकारी और परमित वचनों के बोलनेके कारण वाग्मी था। इक्ष्वाकु वंशरूपी आकाशके लिए दैदीप्यमान सूर्य था। सदा न्यायमार्गका अनुसरण करनेवाला था एवं काश्यप गोत्रका तिलक स्वरूप था ॥७७॥ समस्त लोकके आभूषण, दिव्य और मनोहर वस्त्र, माला, तेज और मनोहरता से उसका शरीर शोभायमान था। अत्यन्त धर्मात्मा था। उत्तम आचरणका आचरनेवाला और पदार्थों के स्वरूपका भले प्रकार जानकार था॥७८॥ उत्तम आदि पात्रोंको आहार आदि दान देनेके कारण दाता था। धर्मानुकूल भोगोंका भोगनेवाला होनेके कारण भोक्ता था । राजकार्यमें अत्यन्त प्रवीण था। अहिंसादि पांच अणुव्रत एवं तीन गुणवत और चार शिक्षाबत इसप्रकार सातप्रकारका शीलवत एवं अन्यान्य व्रतोंका भी भलेप्रकार आचरण करनेवाला था। भगवान जिनेंद्रका परमभक्त था। विवेकी और -- । -- पुराण ५५ दाता भोक्ता महादक्षो व्रतशीलादिमंडित । जिनरक्तो विवेकी सदृष्टिलॊकप्रियोमहान् ॥ ७ ॥ विश्वईिसकुलो मान्यो राजते न्यायवर्मना। चाक्रोव सोऽतिपुण्यात्मा जिनधर्म प्रवधक ॥८० ॥ प्रजावती महादेवी तस्यासीत्प्राणवल्लभा। पुण्यलक्षणपूर्णा गा सत्प्रभाभरणाकिता ॥ ८१ ॥ मल्लि. || द्विपचनखचद्राशुदासिदिव्यक्रमानुजा । कदलीगर्भसागुम्यचारुजघा मनोहरा ॥ ८२ ॥ काचिदामाशुकै सारैर्विभूपितकटीतटा । कृशोदा सुवृततर्नाभिश्चारुपयोधरा ॥ ८३ ॥ अनयंहारसयुक्तदिव्यवक्ष स्थला सती । मुद्रिकाकंकणाढ्यातीवकोमललसत्करा ॥ ८४ ॥ सम्यग्दृष्टि था। समस्त लोकका प्यारा था और महान था ॥ ७६ ॥ वह महानुभाव कुंभ नामका राजा चक्रवर्ती राजाके समान था क्योंकि चक्रवर्ती जिसप्रकार समस्त प्रकारकी ऋद्धियोंसे व्याप्त रहता है उसी प्रकार यह राजा भी अनेक प्रकारकी ऋद्धि-विभूतियोंसे व्याप्त था, चक्रवर्तीका जिसप्रकार सब लोग आदर सत्कार करते है उसी प्रकार राजा कुभका भी सब लोग आदर सत्कार करते और मानते थे। चक्रवर्ती जिस प्रकार नीतिमार्गसे प्रजाकी रक्षा करता है उसीप्रकार राजा कुंभ भी नीतिमार्गसे प्रजा का पालन करता था तथा वह राजा चक्रवर्ती के समान अत्यन्त पुण्यवान और जेन धर्मका संसारमें प्रवर्ताने- वाला था॥८०॥ महानुभाव राजा कुंभको प्राणों को अतिशय प्यारी प्रजावती नामको पहरानी थी जो कि समस्त शुभ- लक्षणोंके धारक शरीरसे युक्त थी एवं देदीप्यमान प्रभाके धारक अनेक प्रकारके आभूषणोंसे भूषित थी । महादेवी प्रजावतीके दशो नखरूपी चन्द्रमाकी किरणोंसे शोभित और दिव्य दोनो चरण कमल थे। केला के थंभोंके समान अत्यन्त मनोहर दोनों जंघायें थीं॥८१-८२॥ करधनीकी महामनोहर और सारभूत किरणोंसे उसका कटिभाग अत्यन्त जाज्वाल्यमान था। उसका उदर अत्यन्त पतला होनेसे वह कृशोदरी थी। उसकी नाभि भीतरमें चक्करदार और गोल थी और दोनों स्तन अत्यन्त मनोहर थे ॥८३॥ उसका उदर वक्षःस्थल महामूल्यवान हारोंसे युक्त होनेके कारण जगमगाता था और उसके अत्यन्त कोमल महा मनोहर दोनों हाथ मुद्रिका और कड़ोंसे अत्यन्त शोभायमान जान पड़ते थे॥८४॥ संसारके समस्त उत्तमोत्तम आभूषणों की कांतिसे उसका सारा अंग अत्यंत देदीप्यमान था। कंठ अत्यन्त मनोहर था इस- पुरार विम्वाभरणदीप्तागा दिव्यकंठातिसुस्वरा । महातेज:कलाकातिकपोलांकितसन्मुखा ॥ ८५ ॥ चारुनेत्रोत्पला तुंगनासा भ्रूक्षेपशोभिता । न्यस्ताभरणसत्कर्णा अलिकेशी सुमस्तका ॥ ८६ ॥ दिव्याशुकसुनेपथ्यस्रग्भिः सर्वैर्विमंडिता (१)। दिव्यलक्षणसंम्पूर्णा महारूपा जनप्रिया nasa मल्लि० || कलाविज्ञानवातुर्यशानसौभाग्यभागिनी । जिनभक्ता सदाचारा यिनयाढ्या महासती ॥ ८८ ॥ दिव्यभोगोपभोगादिसंप्राप्तस्वमनोरया । पुण्यकर्मकरा दक्षा व्रतशीलादिभूपिता ॥ ८ ॥ मान्या सर्वजनः सा भावारतीव प्रजावती । रूपलावण्यसौभाग्यसुखवारिधिपारगा ॥ १० ॥ तया साधं नुपोऽत्यतप्रेम्णा भोगाग्निरंतरं । भुनक्ति स्म यथाकाले तृप्तिकर्तृ स्वपुण्यजान् ॥ ११ ॥ अथ तस्याहमिद्रस्य शेष पण्मासजीवितं । लिये उसका बहुत ही मीठा और मनोहर स्वर था एवं उसका महा मनोहर मुख तेजोमयी लावण्यसे देदी- प्यमान कांतिके घर कपोलोंसे भूषित था ॥८५ ॥ उसके नेत्ररूपी कमल महा मनोहर थे, ऊंची नाक थी सुन्दर भृकुटियें थीं उसके दोनों कान पहिने हुए आभूषणोंसे जाज्वल्यमान थे, भौरोंके समान काले केश थे और सुन्दर ललाटसे वह शोभायमान थी॥८६॥ वह महारानो प्रजावती महामनोहर वस्त्रोंकी पोशाक पहिनती थी। माला आदिका मंडन करती थी समस्त दिव्य गुणोंसे परिपूर्ण थी अतएव महारूपवती और समस्त लोककी प्यारी थी॥८७ ॥ अनेक प्रकारकी कलांए विज्ञान ज्ञान और सौभाग्यसे शोभायमान थी भगवान जिनेंद्रके गुणोंमें अत्यन्त भक्ति करती थी। सदाचारका आचरण करती थी। अत्यन्त विनय करने वाली और महासती थी। पुण्यके उदयसे उसे भांति भांतिके दिव्य भोग और उपभोग आदि प्राप्त थे इसलिये उसके समस्त मनोरथों की सिद्धि होती थी। वह महारानी प्रजावतो समस्त पवित्र कार्यो की ही करनेवाली थी, हर एक बातमें अत्यंत चतुर थी और व्रतशील आदिको भले प्रकार पालन करनेवाली थी ॥८८-८६ ॥ जिसप्रकार सरस्वती देवीका सब लोग आदर सत्कार करते और उसे मानते हैं उसीप्रकार महारानी प्रजावतीको भो सब लोग अति आदरकी दृष्टिसे देखते थे। तथा रूप लावण्य सौभाग्य और सुखरूपी समुद्रके पारको प्राप्त थी अर्थात् परम रूपवती थी, परम लावण्यवती थी और परम सुखको भोग- नेवाली थी॥६०॥ इसप्रकार उत्तमोत्तम गुणों की स्थान उस महारानी प्रजावतोके साथ वह राजा कुंभ तृप्तिके करनेवाले और निज पुण्यके प्राप्त नाना प्रकारके भोगों को यथाकाल बड़े स्नेहके साथ निरंतर भोग ने लगा ॥११॥ ५६ मल्लिक पुराण ज्ञात्वा शक्राशया 'रैद आगतो मिथिलापुरी ॥ ६ ॥ अनानेकधारत्नस्वर्णधाराव्रजः परे । स्थूलगंजकराकार पुष्पावुकणसकुलै ॥ १३ ॥ मणिरश्मिहतध्यात कुरुते सधनाधिप । रत्नवृष्टिं मुदा नित्य तयोर्धामनि मन्दिरे ॥ ६४ ॥ तदा नृपांगण सर्व हेमरत्नादिपूरितं । धर्मस्येव फल दृष्ट्वा मति धर्मे व्यधाजन. ॥ १५ ॥ प्रत्यहे रत्नवृष्टया स पुरयामास यक्षराट् । स्वर्णरत्ने पागारं पण्मासातं शुभाप्तये ॥ ६६ ॥ अथ सुप्त कदा देवी सा सौधे मृदुतल्पके । निशाया पश्चिमे भागेऽपश्वत् स्वप्नाश्च पोडश ॥ १७ ॥ ऐद्र गजेंद्रमुत्तुंग गवेंद्र पाडुरा ति । राजा वैश्रवणका जीव जोकि अपराजित विमानमें जाकर अहमिंद्र हुआ था जब उसकी आयुकी समा- तिमें केवल छह मासका समय बाकी रह गया—उस समय वह भगवान मल्लिनाथ तीर्थकर होनेवाला था और भगवान तीर्थंकरके जन्मसे पन्द्रह माम पहिले उनकी जन्मभूमिमें कुबेर द्वारा रत्नों को वर्षा होने लगती है यह नियम है इसलिए इंद्रने मिथिलापुरी जानेकेलिए कुवेरको आज्ञा दी और इन्द्रकी 'आज्ञानुसार वह शीघ्र ही मिथिलापुरी आकर उपस्थित हो गया ॥६२॥ मिथिपुरीमें आकर उसने मोटी मोटी हाथींके सूढकी आकारकी, पुष्प और जलकणोंसे व्याप्त अमूल्य अनेक प्रकारके रत्नोंकी धारो वर्षानी प्रारंभ कर दी जिनमें कि वर्षनेवाली मणियोंकी प्रभासे समस्त अन्धकार नष्ट होता था इसप्रकार उस दिनसे वह कुवेर राजा और रानीके मनोहर महलमें बड़े आनन्दसे रत्नोंकी वर्षा करने लगा ॥६३-६४ ॥ उस समय राजा कुभके समस्त आंगनको रत्न और सुवर्ण आदिसे परिपूर्ण देख मनुष्योंने उसे साक्षात् धर्मका फल समझा एवं उस दिनसे उन्होंने धर्मके अन्दर विशेषरूपसे चित्त लगाया ॥ ६५ ॥ वह कुवेर पुण्यफलकी प्राप्तिकी अभिलाषासे प्रतिदिन रत्नवृष्टि करता था इसलिये छहमास पर्यंत वह राजा कुम्भके मकानको सुवर्ण और रत्नोंसे प्रतिदिन भर दिया करता था ॥ ६६ ॥ कदाचित् महारानो प्रजावती अपने शयनागारमें अत्यन्त कोमल मनोहर सजपर सो रही थी कि अक- स्मात जब रात्रिका कुछ ही भाग शेष रह गया उस समय उसने महा मनोहर सोलह स्वप्ने देखे। सबसे पहिले स्वप्नमें उसने इन्द्रका ऐरावत (१) हाथी देखा जोकि महामनोहर अत्यंत विशाल था। उसके बाद अत्यंत ८

ht
मल्लिक
पुराण
मृगेंद्रमिंद्रुसच्छायं साप्या मा, हरिविष्टरे ॥ ६८ ॥ सुगधपुष्पमाले च पूर्णचन्द्र सतारक । हतध्वातं च भास्वतं पद्मास्यौ हिरण्यघटौ ॥ ६ ॥
मत्स्यौ सरसि पद्माढ्ये चाजपूर्ण सरोवर। क्षुभ्यंतमब्धिमुलिं हेमं सिहासनं परं ॥ १०० ॥ नाकालय स्फुरहीम फणींद्रभवनं महत् ।
रत्नराशिं हतध्वातं निर्धूम विषमार्चिप ॥ १०१ ॥ दृष्ट वेमान् पोडश स्वप्नास्तदते सा ददर्श च । प्रविशतं स्वष्ट्वेक्त्राब्जे गजेंद्र तुंगविग्रह ॥१०॥
इति सुकृतविपाकात्प्राप्य रत्नादिवृष्टि स्वजननृसुरमान्या प्राप्तसौभाग्यसारा जिनपातेसुनकी स्वप्नराशीश्व दृष्ट्वा सकलसुयुवतिमध्येऽप्पभूत्सा
उन्नत, २ बैल देखा जो कि अत्यंत सफेद कांतिकाधारक था। उसके बाद अत्यंत पराक्रमी,३ सिंह देखा जो
कि चंद्रमाकी कांतिके समान कांतिका धारक था। उसके बाद,४ लक्ष्मी देखी जोकि महामनोहर सिंहासनपर
दुग्धके घड़ोंसे स्नान कराई जा रही थी। उसके बाद, ५ दो पुष्प मालायें देखी जिनकी सुगंधिसे समस्त दि-
शायें सुगंधित थीं। उसके बाद आकाशमें महा मनोहर अखंड, ६ चंद्रमा देखा जोकि अपने परिकर ताराओं
के समूहसे व्याप्त था। उसके बाद अत्यंत देदीप्यमान,७ सूर्य देखा जिसको प्रभासे समस्त अंधकार विनष्ट
हो रहा था। उसके बाद,८ दो सुवर्णमयी घर देखे जिनका कि मुख कमलोंसे ढका हुआ था। उसके बाद
कमलोंसे परिपूर्ण सरोवरमें किलोल करता हुआ.६ मीनोंका जोड़ा देखा उसके बाद विशाल स्थिर, १० सरोवर
देखा जोकि सर्वत्र कमलोंसे व्याप्त था। उसके बाद खलवलाता हुआ, ११ समुद्र देखा जिसका जल तीरसेभी
ऊपर बहता था। उसके बाद एक सुवर्णमयी महामनोहर,१२ सिंहासन देखा।उसके बाद देवौंका स्थान १३स्वग
देखा जोकि अपनी जगमगाती हुई कांतिसे अत्यंत शोभायमान था उसके बाद १४ नागेंद्रका भवन देखा जो
कि कांतिसे जगमगा हुआ अत्यंत विशाल था। उसके बाद जगमगाती हुई रत्नोंकी राशि देखी जिसकी उप-
प्रभासे अंधकार दीख तक नही पड़ता था उसके बाद जलती हुई १५. अग्निकी शिखा देखी जिसमें धृवांका
नाम निशान तक भी न था ॥६७-१०१ ॥ जिस नमय वह महादेवी उपयुक्त सोलह स्वप्न देख चुकी
उस समय अंतमें उसने क्या देखा कि एक अत्यंत सुन्दर शरीरसे शोभायमान विशाल हाथी उसके मुख
कमलमें प्रवेश कर रहा है ॥ १०२ ॥

पुराण प्रभूता ॥ १०३ ॥ स्वर्मोक्षकर्ताऽखिलविग्रहर्ता मुमुक्तिभर्ता वरधर्मनेता । कर्मारिहंताऽखिलविद्वधाता दाता बिजेता मम सोऽस्तु सिद्धय ॥१०४॥ इति भट्टारकश्रीसकलकीर्तिविरचिते श्रीमल्लिनाथवरिगे अहमिंद्रभववर्णनो नाम तृतीय. परिच्छेद. ॥३॥ -*--- रानी प्रजावतीके तीव्र पुण्यके उदयसे पहिले तो रत्नसुवर्ण आदि पदार्थों की वर्षा हुई जिससे उसके कुटुम्बी जन अन्य मनुष्य ओर बड़े बड़े देव उसका आदर सत्कार करते थे और समस्त सौभाग्यका सार प्राप्त किया था उसके बाद उस महारानी प्रजावतीने भगवान जिनेंद्रकी उत्पत्तिको सूचन करनेवाले उपयुक्त सोलह स्वप्न देखे जिससे रनबासके अंदर अनेक रानियोंके रहते भी उनकी शिरोमणि पटरानी वही ॥ १०३ ॥ स्वर्ग और मोक्षको प्रदान करनेवाले, समस्त विघ्नोंके नाशक, मोक्षलक्ष्मीके स्वामी, जीवोंको धर्ममागेपर ले चलनेवाले, ज्ञानावरण आदि समस्त कर्मरूपी वैरियों को मूलसे नष्ट करनेवाले अखंड ज्ञानके विधाता एवं जयशील वे भगवान मल्लिनाथ हमारे लिये सिद्धि प्रदान करें ॥ १०४ ॥ इसप्रकार भट्टारक सकलकीर्ति द्वारा विरचित सस्कृत मल्लिनाथ चरित्रकी पं० गजाधरलालजी न्यायतीर्थविरचित हिन्दी वचनिकामे अहमिद्रका भव वर्णन करनेवाला तीसरा परिच्छेद समाप्त हुआ ॥३॥ -*:- मल्लिक । न ६० पुराण चतुर्थः परिच्छेदः। इन्द्रनीललसत्काय मुक्तिकाताप्रियंकरं । त्रिजगत्स्वामिनं बंदे पार्श्वनाथं जगद्धितं ॥ १॥ अथ प्रबोधकास्तूर्यान् ध्वनत सुस्वरान्परान् । वंदिनां च सुगीतानि मगलान्यप्यनेकशः ॥ २॥ प्रातमरीरवं श्रुत्वा दरनिद्रान्विता सती । प्रवोयमगमद्देवी विश्वमागल्यधारिणी ॥ ३ ॥ अनुत्थाय स्वपल्यंकाद्विश्वमागल्यसिद्धये । सामायिकादिं च देवी धमध्यान चकार सा ॥ ४ ॥ स्नात्वालंकृत्य भूपाद्य स्वत्मानं हर्पितानना । जनै कतिपय - अथ चौथा परिच्छद। ------ he जिनके शरीरकी कांति इन्द्रनील मणिके रंगके समान महामनोहर है जो मोक्षरूपी लक्ष्मीके परम प्यारे । तीनों लोकके स्वामी हैं एवं समस्त जगतका हित करनेवाले हैं ऐसे श्रीपार्श्वनाथ भगवानको मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं ॥ १ ॥ यह प्राचीन प्रथा है कि महाराज और महारानियोंका जो समय उठने का होता है उस समय मधुर शब्द करनेवाले वजे बजाए जाते हैं और बंदीगण स्तुति बखानते हैं उनके शब्दसे महाराज और महारानीकी निद्रा भंग होती है और उस समय वे उठकर अपनी प्रातः कालकी नित्य क्रियामे प्रवृत्त होते हैं प्रातःकालमें जिस समय महारानी प्रजावतोके उठने का समय उपस्थित हुआ उस समय उसे जगानेवाले उत्कृष्ट एवं महामनोहर शब्द करनेवाले तूर्य जाति के वाजे बजने लगे तथा वंदीगणोंके द्वारा अत्यन्त मंगलको सूचन करनेवाली महामनोहर अनेक प्रकार की स्तुतियां बखानी जाने लगी। महारानी प्रजावती उस समय सूक्ष्म निद्रासे निद्रित पलंगपर लेटी हुई थीं ज्यों ही प्रातःकालमें उसने महामनोहर भेरीका शब्द सुना समस्त जगतका मंगल करनेवाली वह पलंगसे उठकर बैठ गई ॥ २-३॥ कुछ समय बाद शांतिपूर्वक उसने पलंगका परित्याग किया और, वह देवी समस्त जगतके मंगलसिद्धिकी कामनासे सामायिक आदि क्रियाओंके द्वारा धर्म्यध्यानका आचरण करने लगी ॥४॥ सामायिक आदि नित्य क्रियाओंके बाद उसने प्रसन्न चित्तसे स्नान किया उत्तमोत्तम' भनेको ६० पा पुराण ६१ साधं नृपास्थान ययौ मुदा ॥५॥ आगच्छती स्वकाता ता दृष्ट्वा वाक्यैर्यथोचितै । संतोष्य प्रददौ तस्मै सोऽद्धं सिहासनं मुदा ॥६॥ सुखासीन ततो राज्ञी विधाय स्वमुखे मुदं । भर्ने दिव्यासनोत्थाय दिव्यवाण्या व्यजिशपत् ॥ ७॥ देवाद्य यामिनीभागे पश्चिमे, सुखनिद्रिता। अद्राक्ष पोडश स्वप्नान् गजेंद्रादीन शुभोदयान् ॥ ८॥ स्वामिस्तेपा फलं सर्व कृपा कृत्वा ममादिश । शृणु प्रिये फलं तेषा वक्ष्ये कृत्वा वशेमनः ॥ ६ ॥ गजेक्षणा: शरीरको अलंकृत किया एवं कुछ खास मनुष्योंके साथ हृदयमें अत्यन्त प्रमोद रख वह राजसभाकी ओर चल दी ॥५॥ इसप्रकार ठाटबाटसे राजसभामें आनेवाली,अपनी परम प्यारी महारानी प्रजावतीको देखकर राजा कुंभ बड़ा प्रसन्न हुआ। महामनोहर वचनोंसे उसका शिष्टाचारकर उसे अत्यन्त संतुष्ट किया एवं बड़े आनन्दसे आधा सिंहासन उसके बैठनेके लिये प्रदान किया ॥ अपने स्वामी महाराज द्वारा इस प्रकारका सम्मान पा रानी प्रजावतीका मुख अनन्दसे पुलकित होगया वह सुखपूर्वक आसनपर बैठ गई एवं दिव्य आसनसे कुछ उठकर अपनो दिव्य वाणीसे आनन्दसे गद्गद होकर इसप्रकार अपने स्वामीसे निवेदन करने लगी-हे देव ! आज प्रातःकाल जब कि रात्रिका कुछही भाग शेष रह गया था उस समय मैं पलंगपर सुखपूर्वक सोरही थी, अचानक ही अत्यन्त शुभ फलके प्रदान करनेवाले गजेंद्र आदिके सोलह स्वप्न मुझे दीख पड़े हैं। स्वमिन् ! उन पवित्र स्वप्नोंका फल क्या है कृपाकर उन समस्त फलको मुझे बतलाइए- मुझे उन फलोंके जाननेकी बड़ी भारी अभिलाषा,और उत्कंठा है। फलोंको जाननेके लिए रानीको इसप्रकार उत्कंठित देख राजा कुभ बडा प्रसन्न हुआ और प्रियवचनो से वह इसप्रकार कहनेलगा-प्राणप्यारी ! तुम चित्तको स्थिरकर सुनो-मैं उन स्वप्नों का विस्तारसे फल कहता हूं ॥७-६॥ देवि ! स्वप्नमें जो तुमने विशाल गजराज देखा है उसका फल यह है कि तुम्हरे एक महान् पुत्र होगा जिसे बड़े बड़े ऋद्धिधारी देव आकर पूजेंगे और अपनेको धन्य समझेगे। विशाल चैलके देखने का यह फल है कि तुम्हारा पुत्र ज्येष्ठ होगा-समस्त लोक उसे बड़ा मानेगा और उसकी आज्ञाका णलन करेगा धर्मकी धुराका धारण करनेवाला अर्थात् धर्मका स्वामी होगा स्वप्नमें जो सिंह देखा है उसका एवं वह - मल्लिक હર न्महान् पुत्रो भविष्यति सुरार्चित । देवि ! ते वृषभालोकाज्ज्येष्ठो धर्मधुरंधरः ॥ १०॥ सिहेनानंतवीर्यश्व दामभ्या धर्मतीर्थकृत् । लक्ष्म्याभिषेक- माप्तासौ सुरै भैरुमस्तके ॥ ११॥ पूर्णेदुना जनालादी मोहध्वातविनाशकृत् ।भास्वता चाखिला ज्ञानतमोहंता स्फुरद्धु ति ॥ १२ ॥ कुंभाभ्या निधिभागी च मत्स्याभ्या स्यान्महासुखी । सरसा लक्षण पूर्ण. सोऽन्धिना केवलेक्षण. ॥ १३॥ सिंहासनेन साम्राज्यपदयोग्यो जगन्नुत फल यह है कि वह पुत्र जिस प्रकार सिंह बलशाली होता है उसी प्रकार अनंत बलका धारक होगा दो मालायें जो देखो हैं उनका फल यह है वह धर्म तीर्थका प्रवर्तक होगा। दुग्ध के घड़ोंसे स्नान करती हुई जो लक्ष्मो देखो है उसका फल यह है कि बड़े बड़े देव आकर तुम्हारे पुत्र को मेरु पर्वतके मस्तक पर लेजाकर स्नान करावेंगे। स्वप्नमें जो पूर्ण चंद्रमा देखा है उसका फल यह है कि जिस प्रकार चंद्रमा जीवों को आनन्द प्रदान करनेवाला है और अंधकारका नाशक है उसी प्रकार तुम्हारा पुत्र भो संसारको आनन्द का प्रदान करनेवाला और मोह रूपी अंधकारका सर्वथा नाश करनेवाला होगा। सूर्य जो देखा है उसका फल यह है कि जिस प्रकार सूर्य अंधकारका नाशक है अर्थात् उसके उदय होते ही संसारके घट पट ओदि पदार्थ स्फुट रूपसे दोख पडते हैं एवं सर्वत्र उसको कांति देदीप्यमान रहती है उसी प्रकार तुम्हारा पुत्र भी समस्त अज्ञानरूपी अंधकारका नाश करनेवाला होगा एवं सर्वत्र संसारमें उसका प्रताप फैलेगा। दो सुवर्ण मयी घड़े जो देखे हैं उनका फल यह है कि तुम्हारा पुत्र निधियोंका स्वामो होगा। किलोल करतो दो मीन देखो हैं उसका फल यह है कि वह पुत्र परम सुखका स्थान होगा। जलसे लबालब भरा हुआ जो सरोवर देखा है उसका फल यह है कि वह पुत्र समस्त मनोहर लक्षणोंसे पूर्ण होगा। तीरको भेदकर बहनेवाले जलसे युक्त जो समुद्र देखा है उसका फल यह है कि तुम्हारा पुत्र लोकालोकको प्रकाश करने वाले केवल ज्ञानका स्वामी होगा। सिंहासनके देखनेका फल यह है कि वह साम्राज्य पदके योग्य होगा और समस्त जगत उसे नमस्कार करेगा। स्वप्नमें जो विमान देखा है उसका फल यह होगा कि वह कल्पातोत विमानसे तुम्हारे गर्भ में आवेगा । जगमगाता हुआ जो नागेंद्रका भवन देखा है उसका फल यह ६२ मल्लि. ६३ - विमानदर्शनात्कल्पातीतादवतरिष्यति ॥ १४ ॥ फणींद्रभवनालोकादवधिज्ञाननेत्रभक् । भवेद् दक्विदावृत्तानामाकरो रत्नराशित ॥ १५॥ अग्निना कर्मकाष्ठानां भस्मराशिं करिष्यति । तव पुत्रो जगन्नाथ शुक्लध्यानोरुयहिना ॥ १६ ॥ गजंद्रास्यप्रवेशेन द्रत्व, निर्मले परे। मल्लिनाथो जिनाधीश स्वमाधास्यति निश्चित ॥१७॥ अवधिज्ञानिना तेनेत्युकं राज्ञा तदा सती । श्रुत्वानंदं पर सागात्पुत्र प्राप्तव तत्क्षणं ॥ १८॥ सौधर्मेंद्रोपदेशेनाथा गत्यात्र हृदालया । श्याद्या षट् देव्य एवाशु भक्त्या सद्धर्मवासिता ॥ १६ ॥ गर्भ सशोध्य तीर्थेशमातुई व्ये सुनिर्मले. । कुयु सेवा' च शुश्रूषा तत्कालोचितकर्मभिः ॥ २० ॥ श्री श्रिय हो सुलजा च धृतिर्धेर्य किलादधु । कोर्ति स्तुति च बोधिं च बुद्धिलक्ष्मीश्च वैभवं ॥२१॥ नस्या होगा कि वह अवधिज्ञानरूपी नेत्रका धारक होगा, रत्नराशिके देखने का यह फल है कि वह अखंड सम्य- ग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्रका खजाना होगा। जाज्वल्यमान निधूम अग्नि जो देखी है उसका फल यह है समस्त जगतका स्वामी तुम्हारा पुत्र शुक्लध्यानरूपी तीब अग्निसे कर्मरूपी काष्ठको खाख कर डालेगा तथा सोलह स्वप्नोंके अंतमें मुखमें गजेंद्र प्रवेश करता हुआ देखा है उसका फल यह है कि तुम्हारे निर्मल गर्भ में उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जिनेंद्र स्वयं अवतीर्ण होकर निश्चयसे जन्म धारण करेंगे॥६-१७॥ राजा कुंभ अवधिज्ञानके धारक थे इसलिये उनके मुखसे स्वप्नोंका इसप्रकार उत्तम फल सुनकर महारानी प्रजावतीको परमानंद हुआ एवं मारे आनन्दके उसको यह उस समय मालूम पड़ने लगा मानो साक्षात् पुत्र ही प्राप्त कर लिया है ॥ १८॥ अथानंतर माता प्रजावतीकी सेवाके लिये सौधर्म स्वर्गके इन्द्रकी आज्ञासे श्री ही धृति कीर्ति बुद्धि और लक्ष्मी ये छह देवियाँ बड़ी भक्तिसे शोघ्र हो मिथिलापुरी आगई। ये समस्त देवियां भरतक्षेत्रके पद्म आदि सरोवरोंके कमलोंमें रहनेवाली हैं एवं परमधर्मकी सदा सेवन करनेवाली हैं ॥ १६ ॥ मिथिलापुरीमें आकर समस्त देवियोंने अत्यंत निर्मल पदार्थोसे माता प्रजावतीके गर्भका संशोधन किया। एवं जिस समयमें जिस कार्यके करनेकी आवश्यकता होती थी उसे कर वे भक्तिपूर्वक माताको सेवा और आज्ञाका पालन करती थीं ॥ २०॥ श्री देवी माताके शरीरके अंदर अनेक प्रकारको शोभा उत्पन्न करती थी ही देवीकी सेवासे माताके हृदयके अंदर विशेषरूपसे लज्जाका प्रचार था। धृति देवीकी कृपासे विशेषरूपसे धीर वीरता ६३ मलि गुमानिनन् त्वांश्च ताप्रानन्दरा ! पुनः तुलना जानोरेलामा नेपालिले पो हुनेले काम नन्ति भने शुनपोगादिने सति ५२३॥ लोऽहनिइस्ततालावा लोधो मुनिहोरे तस्या गरजा मेरे ॥ २५२ : बंटादिनादितिहातनचादितुलनः। शलो दावतारं हि तुमिका निज १२.१ ला माझा मोती उत्पन्न हो गई थी। कोर्ति देवोको सेवाले यह गुण प्रगट हुभा था कि सर्वत्र उसको कोति फैल गई थी इसलिये सब लोग बड़ी भक्तिसे उसकी स्तुति करते थे। बुद्धिदेवीको सेवासे माता सम्यगदर्शन सभ्यता और सम्यकचारित्रके अंदर विशेष निर्मलता होने लगी थी एवं लक्ष्मी देशकी से शसे साताको अन प्रकारके ऐश्वयों का लाभ था। यद्यपि वह माता प्रजावती अपने तीन पुण्यके उदयसे समारो थी तथापि स्वभावसे निर्मल भी मणिपर जिसप्रकार संस्कार कर देनेसे और भी अधिक नमक भाजाती है उसीप्रकार श्री आदि देवियोंके द्वारा शोभा पादि गुणोंसे संस्कार युक्त को गई वह माता और भी विशेषरूपसे सुन्दर जान पड़ने लगी ॥ २१-२२॥ कदाचित् चैत्रमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाके दिन जब कि शुभ लग्न यो भशिनी नामका शुग REET था और योग आदि भो शुभ थे वह अहमिंद्र भगवान मलिनाथका जीव अपराजित नागके निमारो चया एवं मति श्रुत और अवधिरूप तीन ज्ञानका धारक वह मोक्षमार्गको प्रगद करने लिए प्रम स्फुटे- पाषाणके समान माता प्रजावतीके गर्भमें पाकर अवतीर्ण हो गया ॥ २३- -२४ ॥ समान ते ही भवनवासी आदि चारों निकायोंके देवोंके घरोंमें पंट आदि गजने लगे ये । वस ! घंटा आदिका बजना एवं सिंहासनका कपना 'पादिशु साक्षरो सन् थके गभमें आनेका निश्चय हो गया । वे अपने २ निकायोंके इन्द्र और रानी माती शीघही अपने अपने वाहनोंपर सवार हो गये एवं पपनी देदीप्यमान प्रभारी रागरा ज्योतिषी ४ और वैमानिफ ये ऐवोंकी चार निकाय ।

मलिक पुराण स्वदीप्त्याद्यस्तत्राजग्मुः शिवाप्तये ॥ २६ ॥ तत प्रथमकल्याणे स्मृत्वा गभगतं जिन । गर्भवत्या प्रजावत्या पादावुरुहयोच्दा ॥२७॥ प्रणाम शिरसा चक्र मणिशेखरशालिना। सौधर्मेंद्रोऽखिलवे साधं भक्त्या वृपाप्तये ॥ २८ ॥ तत प्रपूज्य तीर्थेशपितरौ भूपणादिभिः । प्रशस्य कृत- कार्यास्ते स्व स्व स्थानमगु सुरा ॥ २६ ॥ नित्य शक्राशया दिक्कुमार्यस्तद्योग्यकर्मभि । कुर्वति परमा सेवा जिनमातुः स्वशर्मणे ॥३०॥ आकाशको प्रकाशमान करते हुए वे मोक्ष प्राप्तिकी अभिलाषासे शीघही मिथिलापुरो आकर उपस्थित हो गये ॥ २५–२६॥ गर्भावतार नामक पहिले कल्याणमें आए हुए सौधर्म स्वर्गके इौंद्रने समस्त देवोंके साथ धर्मकी प्राप्तिकी अभिलाषासे गर्भमें आए हुए भगवान जिनेंद्रके गुणोंका भक्तिभावसे स्मरण किया एवं गर्भवती माता प्रजावतीके दोनों चरण कमलोंको मणिमयी मुकुटोंसे चमचमाते अपने मस्तकोंसे हर्षपूर्वक नमस्कार किया ॥ २७–२६ ॥ उसके बाद इन्द्र आदि देवोंने भगवान मल्लिनाथके दोनों माता पिताओंकी पूजा की। भषण आदि प्रदान कर सन्मान किया एवं इस प्रकार पवित्र कार्यको पराकर वे समस्त देव अपने २ स्थानोंपर चले गये ॥ २६ ॥ उस दिनसे छप्पन दिककुमारियां इन्द्रकी आज्ञासे सदा माताके पास रहने लगी एवं जिसे जो कार्य करनेकेलिए सोंपा जाता था उसे आनंदपूर्वक पूरा कर अपने को कल्याणको प्राप्ति हो इस अभिलाषासे वे माता प्रजावती की बड़ी भक्तिसे सेवा करनेलगी ॥३०॥ बहुत सी कुमारियां माताके चित्तको प्रसन्न करनेके लिये मंगलीक पदार्थ हाथ में लेकर खड़ी रहती थीं । बहुतसी माताको भांति भांतिके भषण पहिनाती थी। कोई कोई उसे रेशमी वस्त्र पहिनाती थीं और मालायें प्रदान करती थीं बहुत माताका । श्रृंगार करतीं थीं। कोई कोई कुमारियां माताकेलिए स्नानकी तयारियां करती। वहुतसो उपटन आदि लगाकर उसके शरीरकी रक्षा करती थीं। बहुतसी कुमारियां "माताको सुख मिले" ऐसे उपायोंको रचा करती थी। कोई कोई देवांगना माताके रहनेके मकानको झाड़ बुहार कर साफ करतीं थीं बहुत सो कुमारियां माताकी इच्छानुसार महा स्वादिष्ट रसोई करतीं। कोई २ देवांगनायें माताके मकानमें मणिमयो दीपक जलाती थीं। कोई २ वालकके जन्मकालमें जो गीत गाये जाते हैं उन गीतों को गाती थीं। कोई २ महा मनोहर शब्द करनेवाले बाजे बजातीं थीं। कोई २ महा- उनमें मल्लि. पुराण ६६ । काश्चिन्मागल्पधारिण्य काश्चिद्भूपणदायिका । काश्चित्क्षौमाशुक स्रग्दायिन्य काश्चित्प्रसाधिका ॥३१॥ काश्चिन्मजनपालित्यः काश्चिचागसुर- क्षिका । तस्या शर्मविधायिन्यो बभूवुस्ताः सुरागनाः ॥ ३२ ॥ काश्चित्सम्माजन कुर्युः काश्चिद्रसवती परां : काश्चिन्मणिप्रदीपांश्चास्या गेहेऽमर- योपित ॥३३॥ काश्चित्तत्सुतजेगीते काश्चिद्वाद्यश्च नर्तन । काश्चित्क्रोडानिनोदाद्य स्तन्मनोरंजयत्यलं ॥३४॥धनदोऽपि मुदा नित्यं प्रतिचक्रे तदा- लये । हेमरत्नमयीं वृष्टि नवमासान्महर्घिका ॥३५॥ अंतर्वत्नीमथाभ्यर्णे नवमे मासि तामिति । रजयति च ता. श्लोकै ढाथै प्रश्नराशिमि ॥३६॥ मनोहर नृत्य करती एवं कोई २ कुमारियां नाना प्रकारकी क्रीड़ायें एवं मनको प्रसन्न करनेवाली गप्पे लड़ाती थी इसप्रकार वे समस्त कुमारियां भांति २ को मनोहर क्रियायें कर माताका चित्त अत्यन्त प्रसन्न रखती थीं ॥ ३१-३४ ॥ भगवान मल्लिनाथ गर्भमें आते ही कुवेरको भी परमानंद हुआ था इसलिये नौ मास पर्यंत बड़ी रिद्धिके साथ वह प्रतिदिन वरावर उनके महलमें सुवण और भांति भांतिके रत्नोंकी वार्षा करता रहता था ॥ ३५ ॥ आठ महिनोंके बीत जानेपर जब नवमें मासका आरंभ हुआ उस समय गर्भवती माता प्रजावतीके समीपमें बैठकर वे देवांगनायें गूढार्थक अर्थात् जिनका अर्थ गूढ़ होता था हर एक नहीं समझ सकता था ऐसे श्लोकोंसे एवं नाना प्रकारके उत्तमोत्तम प्रश्नोंसे माताके मनको रिझाती थी॥ ३६॥ कोई २ कहती थीं अच्छा माता । इस पहेलीका अर्थ बताओ कि- ऐसा त्रिनेत्र–तीन नेत्रोंका धारण करनेवाला संसारके अन्दर महादेव कौन है जो “नित्यकांताविरक्तः" अर्थात् सदा स्त्रियोंसे विरक्त हो अथवा नित्यकांता-मोक्षरूपो स्त्रोमें विशेषरूपसे रक्त हो। प्रारम्भमें काम सहित हो परन्तु पीछेसे सर्वथा कामका विजय करनेवाला हो, अत्यन्त महान हो । तथा प्रारम्भमें कुछ परि- ग्रहसे आकांक्षा रखनेवाला हो परन्तु पीछेसे जो सर्वथा उनकी आकांक्षासे विमुख हो गया हो यदि कहा जायगा कि संसारके अन्दर जो महादेव प्रसिद्ध है वही इन गुणोका धारक महादेव हो सकता है सो ठीक नही क्योंकि वह पार्वती नामकी स्त्रीको अपना आधा अंग बनाए हुए है इसलिये स्त्रीमें अत्यन्त रक्त रहनेके कारण वह सदा स्त्रियोंसे विरक्त नहीं माना जा सकता तथा अत्यन्त विषयलोलुपी होनेके कारण वह मोक्ष- रूपी स्त्रीमें भी विशेषरूपसे रक्त नहीं हो सकता क्योंकि इसप्रकारको विषयवासनामें लिप्त पुरुषोंसे मोक्ष स्त्री ६ मल्लि. पुराण नित्य काताविरक्तो य सकाम कामजिन्महान् । साकाक्षी च निराकाक्षी त्रिनेत्रो वर्तते स क ॥ ३७॥ (प्रहेलिका) मनोहरादिहर्वादीनां (१)च अत्यन्त दूर रहती है। तथा वह आदिमें काम सहित हो पोछेसे कामका जीतनेवाला हो यह भी वात उसके अन्दर नहीं बन सकती क्योंकि जो कामके अत्यन्त वशीभूत होकर पार्वतो नामको स्त्रीको सदा वगलमें दवाये रहता है वह कभी कामका जीतनेवाला नहीं कहा जा सकता इसलिये संसारमें जो प्रसिद्ध महादेव को कामका वैरी माना जाता है वह सर्वथा मिथ्या है तथा वह पहिले परिग्रहोंसे आकांक्षा रखनेवाला हा और पीछेसे उनकी आकांक्षासे विमुख हो यह भी वात नहीं क्योंकि वह स्त्रीरूप परिग्रहको एक क्षण भी अपनेसे दूर नहीं कर सकता प्रत्युत-उनमें ऐसा लिप्त है कि स्त्रीको ही अपना आधा अंग मानता है और उसोमें अपनी शोभा समझता है। माता प्रजावती इस प्रश्नका यह उत्तर देती थी कि ऐसा महादेव भग- वान तीर्थकर ही हो सकता है क्योकि भगवान तोर्थ कर ही भावोंकी अपेक्षा सदा स्त्रियोंसे विरक्त रहते हैं अगवा सदा विद्यमान रहनेवाली मोक्ष स्त्रोमें वे हो अत्यन्त रक्त रहते हैं। पारम्भमें कामदंवके जालमें फस जानेपर भी अन्तमें वे कामदेवको सर्वथा नष्ट करनेवाले होते हैं। प्रारम्भमें परिग्रहमें कुछ आकांक्षा रखने पर भी पीछे वे उससे सर्वथा रहित हो जाते है एवं जन्मते ही नियमसे मति श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानरूपो नेत्रों के धारक होते हैं ॥ ३७॥ कोई २ जिसमें क्रिया गुप्त है ऐसा श्लाक कहकर इसप्रकार माता की प्रशंसा करती थी- हे देवी । हे मंगलमयी। माता तुम्हारे गर्भमें भगवान मल्लिनाथने जन्म धारण किया है इसलिये उस विशिष्ट गर्भके द्वारा आदिहर्यादीनां मनः अहारि अर्थात् प्रथमस्वर्गके इन्द्रको आदि लेकर समस्त देवोंका मन हरा गया है वे भी तुम्हारे सेवक हो गए है अतः तुम मनुष्य लोकके उत्तमोत्तम पदार्थो के भोगके साथ स्वर्ग लोकके समस्त मंगलीक-उत्तमोत्तम पदार्थों का भी भोग करो। यहांपर "अहारि" यह क्रिया पद गुप्त है। कोई २ देवांगना जिनके उच्चारण करने में अोठ आपसमें न लगे ऐसे अक्षरोंका श्लोक बना १ मनोहार्यादिहर्यादीत्यादि पाठ ठीक जान पड़ता है । । ६७ मल्लि० पुराण ६८ त्वद्गर्भसभवात् । भजस्वर्जसुमांगल्यान्विश्वान् देवि सुमगले ॥ ३८॥ (झियागोपित ) अन्तातीतगुणाधारो जगन्नायो जगग्दुरु । नित्यस्त्रीरक्तचित्तो यो जयतात्सखि ते सुत ॥ ३९ ॥ (नैरोष्ट्य ) कात्र त्वत्सदृशी रामा? या सूते धर्मनायकान् । को गुयं सुतत्त्वज्ञो निग्रंथ स्वान्यतारक ॥४०॥ कुगुरु कोऽक्षससक्त सत्रन्योऽतिप्रमादवान् । क. पुरुषोत्तमो यस् त्यक्तमोह शिवोयत ॥ ४२ ॥ कोऽधमो यस्तप स्थोऽप्यक्षमोऽक्षाद्यरिघातने । कर इसप्रकार माताकी प्रशंसा करने लगी हे सखी ! अनन्ते गुणों का धारण करनेवाला, तीनों लोकका नाथ, सकल संसारका गुरु और नित्य स्त्री अर्थात शिवरूपी स्त्रीके गुणोंविषे सदा अनुराग करनेवाला तेरा पुत्र चिरकाल तक जयवन्त रहो। इस श्लोकमें ओष्ठस्थानीय अर्थात् जिसका उच्चारण ओठोंकी सहायतासे हो ऐसा कोई भी वर्ण नहीं है ॥ ३८-३६ ॥ बहुतसी देवांगनायें माताके पास बैठकर अनेक प्रकारके उत्तमोत्तम प्रश्न करती थी और माता प्रजावती बुद्धिपूर्वक उसका स्पष्ट उत्तर देती थी उनमे कुछ पश्नोत्तर इसप्रकारके थे- प्रश्न-माता ! इस संसारमें तुम्हारे समान परम सौभाग्यवती अन्य कोन स्त्री हो सकती है उत्तर- जो स्त्री धर्मके स्वामी तीर्थंकरोंको उत्पन्न करनेवाली हो । प्रश्न-संसारके अन्दर अज्ञानको दूर करनेवाला उत्तम गुरु कौन हो सकता है। उत्तर-जो गुरु वास्तविक रूपसे तच्चोंका जानकार हो, वाह्य अभ्यन्तर दोनों प्रकारके परिग्रहोंसे रहित हों एवं अपनेको ओर संसार समुद्रमें डूबते हुए प्राणियोंको पार तारने- वाला हो। प्रश्न-संसारमें कुगुरु-मिथ्या गुरु कौन है ? उत्तर-जो स्पर्शन रसना आदि पांचों इन्द्रियोंके विषय में आसक्त हो, वाह्य अभ्यन्तर दोनों प्रकारके परिग्रहमें ममत्व रखनेवाला हो एवं क्रोधी मानी आदि होने अत्यन्त पमादी हो । प्रश्न—संसारमें समस्त पुरुषों में उत्तम पुरुष कौन है ? उत्तर-जो मोहसे रहित १ ऋकारका अर्थ स्वर्ग भी है इसलिये 'जसुर्मागल्यान् भजस्त्र' अर्थात् स्वर्ग सम्बन्धी अत्यन्त मांगलिक पदार्थों को प्राप्त करो, यहापर 'भजस्व, यह भी एक गुप्त किया है परन्तु यह स्पष्ट जान पडती हे एवं इस क्रियाको गुप्त माननेपर अर्थका अच्छी तरह सघटन नहि होता अत 'अहारि' यही क्रियापद चमत्कार परिपूर्ण है अथवा 'मनोहरद्युर्यादीना' ऐसा मी पाठ हो सकता है और उस पाठमें 'अहरत' यह क्रियापद गुप्त है । 'अहारि' और 'अहरत्' का अर्थ एक समान है। से 1 मल्लि. - को विद्वान् यो विचारको हेयादेयागमादिवित् ॥ ४२ ॥ को मूर्यो य. श्रुतज्ञोऽपि समद. पापमाचरेत् । त्वरित कि युबै कार्यं साधन स्वर्गमोक्षयो ॥ ४३ ॥ किं पथ्य यत्तपो दान वृत्त शीलदृगादि च । कि साल वृप यत्सत्तपोदानादिभिः कृत ॥ ४४ ॥ कीदृश वचन श्लाध्यं हित तथ्य मिंत शुभ । को जागर्ति निजात्मशो मोहनिद्रातिगोऽत्र य. ॥ ४५ ॥ कि प्रशस्य कृत यच्च तपोदानं सुदुर्वलैः । के वैरिण• कपायाश्च दुर्ध्यानविपयादयः ॥ ४६ ॥ हो और मोक्षके लिए सदा प्रयत्न करनेवाला हो ॥ ४०-४१ ॥ पश्न-संसारके अन्दर सबसे नीच पुरुप कौन है ? उत्तर-जो अनेक प्रकारसे तपों को आचरण करनेवाला ता हो परन्तु इन्द्रियरूपी शत्रुओं के घात- नेमें असमर्थ हो अर्थात् विषयों का लंपटी हानेके कारण इन्द्रियों का वश करनेवाला न हो। प्रश्न-संसारमें विद्वान पुरुष कौन है ? उत्तर-जो हर एक पदार्थका वास्तविक रूपसे विचार करनेवाला हो, यह पदार्थ छोड़ने योग्य है और यह पदार्थ ग्रहण करने योग्य है इस प्रकारका अच्छीतरह जानकार हो तथा आगम का भी जानकार हो ॥ ४२ ॥ प्रश्न-संसारके अंदर मूर्ख कौन है ? उत्तर -जो अनेक प्रकारके शास्त्रोंको जानकर भी अत्यन्त अहंकारीहो और सदा पापोंका आचरण करनेवाला हो । प्रश्न-संसारमें सबसे जल्दो मनुष्योंको क्या कार्य करना चाहिये ? उत्तर--स्वर्ग और मोक्षका साधन ॥ ४३॥ प्रश्न-इस संसारमें पथ्य-हितकारी पदार्थ क्या है ? उत्तर-तप दान ब्रतोंका पालन और सम्यग्दर्शन आदिका धारण । प्रश्न-संसारमें सबसे बलवान पदाथ क्या है ? उत्तर-उत्तम तप और दान आदिके द्वारा प्राप्त किया उत्कृष्ट धर्म । प्रश्न-संसारमें कैसा वचन बोलना अच्छा माना जाता है ? उत्तर-हितकारी सत्य परिमित और शुभ । प्रश्न-संसारमें जागनेवाला कौन है ? उत्तर-जो महापुरुष सदा अपनी आत्माके स्वरूपका चितवन करनेवाला हो एवं मोह और निद्रासे रहित हो । प्रश्न—संसारमें उत्तम कार्य क्या माना जाता है? उत्तर-जो पुरुप अत्यन्त दुर्बल है तप और दानके करनेमें असमर्थ है उनके द्वारा किया गया तप और दान । प्रश्न-संसारमें सामान्यरूपसे जीवोंके बैरी कौन हैं ? उत्तर-क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषाय, निंदित ध्यान और इंद्रियोंके विषय ॥ ४४-४६॥ प्रश्न-संसारमें वह पुरुष कौन है जो मित्र हो ? उत्तर—जो धर्मका पालन करनेवाला चरित्रका आचरण करनेवाला और पूजा आदि उत्तम कार्यों में सहाय हुधा मल्लिक •पुराण -- को मित्रः (१) साधका यो धर्मे वृत्तानादिषु । क शपुर्यम्तपोदान धर्मको दानि न ॥ ४ ॥ पीयूपमिर कि पेवं जिद्रवचनामृतं । क, सुमी योऽन मतोपी को दुगो योऽशनपट ॥४८॥ को 'पनी योगायोऽपि यदानादिकारक । को रिटी धनारोऽपि उमेद्देशान् धनाशय ॥४६॥ सपाटोऽन को य मन्पवल्याणगर्म भार । फिकरा कम्पदा मनुस्य न नान्यथा ॥ १० ॥ फि का पेन जान ! यशोधर्मापितं सुप। किमकार्य च येनोत्पपने पायोऽमग ॥ ५ ॥ इत्यादि प्रनानि प्रयुक्तानि गुमानि च। कुराप्यपि देवोभिर्तिने. करनेवाला हो । प्रश्न-शत्र पुरुप कान है ? उत्तर-जो धर्म करनेवालेका न तपका उपदेश देता है और न दान आदि देता है ॥ १७ ॥ प्रश्न-ससारमे अमृत के समान पीने योग्य पदार्थ क्या है ? उत्तर-भगवान जिनेंद्रका वचनरूपी अमत । प्रश्न-संसारमें सुखी पुरुष कोन है ? उत्तर--जो संतोष रखनेवाला है। प्रश्न-संसारमें दुःखी पुरुप कौन है ? उत्तर-जो स्पर्शन आदि पांचो इन्द्रियोंके विपयमें लंपट है॥४॥ प्रश्न-संसारमें अत्यन्त धनवान पुरुप कान माना जाता है ? उत्तर ----धन तो जिसके पास कम हो परन्तु दान आदि उत्तम कार्योंको अधिकतासे करनेवाला हो । प्रश्न-संसारमें निधनी पुरुप कौन है ? उत्तर-जो अत्यन्त धनवान हान पर भो धनकी आशासे परदेशोंमें घमता फिरता हो एवं दान आदि उत्तन कायम धन खर्च करनेवाला न हो ॥ ४६॥ प्रश्न-संसारमें सबसे उत्कृष्ट पुरुष कौन है ? उत्तर-जिसके गन जन्म आदि पांचों कल्याण हां । प्रश्न-इस संसारमै ऐसा पुरुष कोन है जिसके नौकर बड़े बड़े देवेंद्र भी होते हैं ? उत्तर-मेरे पुत्रके अर्थात् तीर्थकर भगवानके देवेंद्र आदि नोकर रहते हैं। अन्य किसीके वे नोकर नहीं हो सकते ॥ ५० ॥ प्रश्न-संसाग्मं उत्तम कार्य क्या माना जाता है ? उत्तर-जिसके करनेसे ! सर्वत्र यश विस्तरे, धर्मका लाभ हो और समस्त प्रकारके सुखोंकी प्राप्ति हो । प्रश्न-संसारमें अकार्य-- निदित कार्य क्या है ? उत्तर-जिससे पापकी उत्पत्ति हो। सर्वत्र निंदा फैले एवं अनेक प्रकारके दुःश्वों की प्राप्ति हो ॥५१॥ भगवान मल्लिनाथकी माता पूजावतीके पूति देवियोंने ऊपर कहे गए प्रश्नोको आदि लेकर और भी शुभ अत्यन्त कठिन कठिन पश्न किए थे जिनका ति उत्तर देना साधारण न था तथापि उस माताके गर्भ में तीन ज्ञानरूपी नेत्रोके धारक स्वय भगवान तीर्थकर विराजमान थे इसलिये उनके - --- - --- + मल्लि. ७१ पुर शमातर प्रति ॥ ५२ ॥ तेषा प्रत्युत्तरं राशी ददौ व्यक्त सुयुक्तिभि । त्रिज्ञाननेत्रतीर्थेशतद्गर्भस्थप्रभावत. ॥ ५३ ॥ जगन्लायेन तेनासो गर्भस्थेन परां श्रियं । बभार रत्नगर्भेव मही चाकरगोचरा ॥ ५३ ।। तीयशोऽवोंदस्थोपि न स्नामातुरजीजनत् । मनाक् पीडा तथा मुक्ताफल (1) शुक्ति पटास्थित (न)॥ ५५ ॥ त्रिवलीभगुरेऽस्या नोदरेऽभूत्कापि विक्रिया । तथापि ववृधे गर्भ प्रभावात्तजिनेशिन ॥५६॥ पूर्णेऽय नवमे मासि प्रभावसे कठिनातिकठिनरूपसे किये गये भी देवियोंके पश्नोंका उत्तर माताने वड़ी युक्ति और गम्भीरता साथ स्पष्ट रूपसे दिया था। गर्भमें विराजमान भगवान तीर्थ करके माहात्म्यने ऐसा कोई भी देवियोंका पश्न नही वचा था जिसका उत्तर मातासे न बना हो ॥ ५२-५३॥ यदपि वे तीन लोकके नाश भगवान मल्लिनाथ गर्भके अन्दर विराजमान थे, गर्भसे बाहिर उनका कोई भी शरीरका अवयव प्रकट न था तथापि जिसपूकार रत्नोंको प्रभासे देदोप्यमान खानियोंकी धारक पृथिवी अत्यन्त शोभायमान जान पड़ती है उसी पकार उस माताके शरीरमें भी अलौकिक शोभाकी छटा छटकने लगी थी ॥ ५४॥ यद्यपि वे तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ अपनी माता पूजावतीके उदर में विराजमान थे तथापि जिस प्रकार सीपके मध्य भागमें मोती रहता है-वह रंचमात्र भी सीपको क्लेशका करनेवाला नहीं होता उसीपकार माता प्रजावतीको भी उनके गर्भमें रहनेपर किसी प्रकारका क्लेश न था अर्थात् गर्भके भारसे जैसा अन्य स्त्रियोंको क्लेश उठाना पड़ता है वैसा भगवान मल्लिनाथको गर्भ धारण करनेसे माता पूजावतीको रंचमान भी क्लश न था ॥५५॥ गर्भसे पहिले माता पूजावतीका उदर त्रिवलीसे शोभायमान था भगवान मल्लिनाथके गर्भ में आनेपर त्रिवली नष्ट होकर उदरको बढ़ना चाहिये था परन्तु उन जिनेंद्रके अनुपम प्रभासे वह त्रिवली जैसी थी वैसीकी वैसी ही विद्यमान रही रंचमात्र भी उदरके अन्दर किसी प्रकारका विकार नहीं हुआ परन्तु ऐसा होने पर भी गर्भ-गर्भके अन्दर बालक भगवानका शरीर निरंतर बढ़ ही रहा था किंतु उदरके न बढ़नेसे गर्भ न बढ़ता था यह बात न थी ॥ ५२ ॥ जब ठीक नवमा मास पूर्ण होगया उस समय अगहन मासकी शुक्लपक्षकी एकादशीके दिन जब कि अश्विनी नामका शुभ नक्षत्र था लग्न भी अत्यन्त सुन्दर था, योग भी शुभ था माता प्रजावतीने मति श्रुत th 321 मल्लिक ७२ । पुरा 23302 मार्गशीर्पसमाह्वये । अश्चिन्याख्ये सुनक्षत्रे धोकादशीदिने ॥ ५७ ॥ सुलग्ने शुनयोगे तं पुत्र माननयाभिन । सुपेन रिजगत्म्मामिनं प्रासून प्रजा- वती ॥ ५८ ॥ तदा तजन्ममाहात्म्यात्स्वलोकेऽसुरभूरुहा । मुमुच कुसुमान्युच्च बौ च शिशिरो मरन् ॥ ५६ ॥ अनाहता महानादा दध्वनुर्निर्ज- रानका ।आसनानि सुरेशानामकस्मात्प्रचक पिरे । ६० ॥ भूवुमौ लयो नम्रा घटाध्यानोऽभवत्म्ययं । इनि चिन देवेशास्तदुत्पत्तिमजानन ॥६॥ ज्योतिर्लोकालये सिहनादोऽभृद्भावनालये। शंखशब्दोऽतिगभीसे व्यतराणा च धामनि ॥६२॥ मेरीरवस्तथाऽशेषमाश्चर्यमभवत्तरां । इनि चिन्हेन तच्छकास्तत्कल्याणे मतिं व्यधु ॥ ६३ ॥ ततोऽसिलस्वसामाग्व्या स्वस्ववाहनमास्थिता । जय जीयेऽय नंदा]ति कोहाहलकारिण अवधिरूप तीन ज्ञानके धारक एवं तीन लोकके स्वामी पुत्र-भगवान मल्लिनाथको जना ॥ ५७--५८ ॥ परम पावन भगवान मल्लिनाथके जन्मके माहात्म्यसे आकाशसे देवोंके द्वारा कल्प वृक्षोंके पुष्पोंकी विपुल वर्षा होने लगी। मंद मंद शीतल सुगंधित पवन बहने लगी, विना बजाये एवं गंभीर शब्द करनेवाले देवोंके वाजे बजने लगे। अकस्मात् ही देवोंके आसन कंपायमान होगये। उनके मुकुट नम्रीभूत होगये एवं घंटोंका गंभीर शब्द होने लगा इसलिये इन शुभ चिन्होंसे देवों के स्पष्टरूपसे मालूम पड़ गया कि भगवान मल्लि- नाथका जन्म हो गया ॥ ५६--६१ ॥ उस समय भगवान मल्लिनाथके जन्मकालमें ज्योतिथी देवोंके घरों में आपसे आप सिंहनाद नामका वाजेका विपुल शब्द हो निकला। भवनवासा देवों के भवनों में अत्यन्त गंभीर शंखका शब्द होने लगा था। व्यंतर देवोंके घरोंमें भेरी नगाड़ेका शब्द होने लगा था। वैमानिक देवोंके आसन कंपायमान हो निकले थे। इनके सिवाय भगवान मल्लिनाथके जन्मकालमें और भी अनेक प्रकारके आश्चर्य होने लगे थे जिनसे हर एक निकायके इन्द्रोंने उनके जन्मकल्याणमें सम्मिलित कर लिया ॥६२---६३ ॥ उसके बाद सैकडों प्रकारके महोत्सवोंके करनेमे लालायित सौधर्म स्वर्गके इन्द्रको आदि लेकर चारों निकायों के समस्त इन्द्रों ने अपनी अपनी आवश्यक चीजें अपने अपने साथ ले ली। अपने अपने वाहनों पर वे सवार होगये "हे रतुति करने योग्य भगवान । आप जयवंत रहें और जीवें । हे पूज्य ! आप फले फूलें वृद्धिको प्राप्त हो” इस पूकार उस समय बड़े जारसे कोलाहल होने लगा। अपने अपने शरीरों के उत्तमोत्तम भूपणों की किरणों से उन्होंने समस्त दिशायें और आकाश जगमगा दिया। सैकड़ों पूकारके वाजों के शब्दों से एवं मनोहर गीत नृत्य और उत्साह परिपूर्ण कार्योंसे समस्त दिशायें और आकाश - मल्लि० पुराण ॥ ६४ ॥ द्योतयतो दिशो व्योम स्वागभूषणरश्मिभिः । पूरयतो दिशः पे च सुवाद्यध्वनिकोटिभि ॥६५॥ सुगीतनर्तनोत्साहमहोत्सवशतोत्सुका सामरा. सकलत्राश्च चतुर्णिकायवासवा ॥ ६६ ॥ महाभूत्या समस्ता सोधर्मेन्द्रप्रमुखा मुदा । पित्रोरास्थानमाजग्मुस्तजन्मोत्सहेतवे ॥६७ ॥ तदा राजागण सर्व स्वर्गलोकमिवावभौ अप्सरोदेवसेनाद्य पुरीमार्गचनादि च ॥ ६८॥ तत शची प्रविश्याशु प्रसवागारमूर्जित । कुमारण सहापश्यजिनेंद्रमातर मुदा ॥ ६६ ॥ मुहुः प्रदिक्षिणीकृत्य प्रणम्य त्रिगद्गरु । जिनावाया पुर स्थित्वा श्लाध्यते स्मेति ता शची ॥ ७० ॥ त्वमव ! भुननाचासि जगद्गुरुप्रसूतित.। महादेवी त्वमेवाद्य महादेवसुतोद्भवात् ॥७॥ त्व जगत्त्रयनारीणा शिरोमणिः परासि च । स्वामिनी जगता देवी। पूर दिया इस प्रकार अपने अपने आज्ञाकारी देव और अपनी अपनी देवांगनाओं के साथ वे भगवान मल्लि- नाथका जन्मकल्याण मनानेकेलिए विशाल विभूति और हर्षके साथ मिथिलापुरी आकर उपस्थित हो गये ॥ ६४---६७॥ जिस समय सौधर्म आदि इन्द्र और देवगण मिथिलापुरीमें आगये उस समय राजा कुभके महलका ऑगन, समस्त मिथिलापुरो मार्ग वन आदिमें जहां देखो वहां देवांगना देव और वाहन आदि सेना ही सर्वत्र नजर पड़ती थी इसलिये उस समय मिथिलापुरीमें स्वर्गलोकका दृश्य दीख पड़ता था- मिथिलापुरी ही लोगों की दृष्टि में स्वर्गभूमि जान पड़ती थी॥ ६८ ॥ जिस महलके अंदर भगवान मल्लिनाथ का जन्म हुआ था वह महल अपनी प्रभासे जगमगा रहा था। देवों के राजमहलके आंगनमें पहुंचते ही सौधर्म स्वर्गके इन्द्रकी इन्द्राणीने शोघ्र ही उस मनोहर महलके अंदर प्रवेश किया एवं वहांपर कुमार भगवान मल्लिनाथके साथ अत्यन्त कोमल सेजपर शयन करती हुई माता प्रजावतीको बड़े हर्ष के साथ निरखा ॥ ६६ ॥ आनंदसे पुलकित हो इन्द्राणीने तीन लोकके गुरु भगवान जिनेंद्रकी चार २ प्रदक्षिणा दी पश्चात् अत्यन्त भक्तिसे नमस्कार किया। वह भगवान जिनेंद्रकी माताके सामने विनय पूर्वक बैठ गई एवं मनोहर शब्दोंमें इस प्रकार उसकी स्तुति करने लगी- हे माता ! तीनों लोकोंके गुरु भगवान मल्लिनाथको तुमने जन्म दिया है इसलिये तुम समस्त लोककी माता हो। तुम्हींने देवोंके देव महादेव पुत्रको उत्पन्न किया है इसलिये हे.माता! तुम्हीं संसार के अंदर महादेवी हो ॥ ७०----७१॥ माता ! तुम्हारे समान तीनों लोकके अंदर कोई भाग्यवती स्त्री नहीं इसलिये ७८ मल्लि ७४ तद्र पुराण त्वं कल्याणी सुमंगला ॥ ७२ ॥ इत्यभिष्टुत्य गूढागी तां मायानिद्रयाऽयुजत् । तस्याः पुरो निधायाशु मायाशिशुमथापरं ॥ ७३ ॥ जगन्नाथं स्वपाणिभ्यामादाय सागमन्मुदं । तन्महारूपसौंदर्य पश्यती कृतकौतुका ॥ ७४ ॥ तदा मगलधारिण्यो दिक्कुमार्य पुरो ययुः। विश्वमगलकर्तुश्छ- त्राद्यारोपितपाणय ॥ ७५॥ आनीय स करे देवी सौधर्मेन्द्रस्य त व्यधात् । सोऽपि पमालोक्य दिव्यां प्रीति परामगात् ॥ ७६ देव! त्व वाल- चद्रोद्गतोऽस्माक परम मुद । कतुं त्वमेव मोहाधतमोहंता भविष्यति ॥ ७७ ॥ त्वं नाथ | केवलज्ञानभानोः किलोदयाचलं । आमनति विदो मिथ्या- तुम्हीं तीनों लोककी स्त्रियोंकी शिरोमणि हो । तुम्हीं समस्त जगतमें उत्कृष्ट हो। तुम्हीं तीनों लोककी स्वमिनी हो एवं तुम्हीं कल्याणरूपिणी और मंगलमयी हो ॥७२॥ इसप्रकार महामनोहर शब्दों से स्तुति कर इन्द्राणीने अपनी मायासे माता प्रजावतीको सुख नींदसे निद्रित कर दिया। भगवानके ही ठीक आकार प्रकारके एक मायामयो पुत्रका निर्माण कर उसे माताकी गोदमें सुलादिया तीन लोकके गुरु भगवान जिनेंद्र माताकी सेजसे अपने हाथोंसे उठा लिये एवं बड़े आश्चर्यसे उनके महा मनोहर रूप और सौंदर्यको देखकर मारे आनंदके गदगद हो गई ॥ ७३–७४ ॥ जहां पर सौ धर्म स्वर्ग का इन्द्र खड़ा प्राथा भगवान जिनेंद्रको लेकर इन्द्राणो उसी ओर चली। समस्त जगतके मंगलके कर्ता भगवान मल्लिनाथ के आगे आगे जिनके हाथोंमें छत्र चमर आदि लगे हुए हैं ऐसे मंगलीक द्रव्योंको धारण करनेवाली दिक्- कुमारियां चलने लगी ॥७५ ॥ पासमें आकर इन्द्राणीने सौधर्मस्वर्गके इन्द्रके शुभ हाथोंमें भगवान जिनेद्र को सौंप दिया। वह भी भगवान जिनेंदूका अद्वितीयरूप देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। एवं आनंदसे गद्गद हो इसप्रकार भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगा- हे भगवन्, हे बालचंदू ! हम लोगोंको परमानंद प्रदान करनेकेलिए संसारमें तुम्हारा उदय हुआ है क्योंकि चंदमाके उदयसे लोगोंको हर्ष होता है यह प्रत्यक्षसिद्ध है तथा जिस प्रकार चंदूमा अंधकार का नाश करनेवाला होता है उसी प्रकार मोहरूपो गाढ़ अंधकारके तुम भी नियमसे नाश करनेवाले होगे ॥७॥ जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेका स्थान उदयाचल है उसोप्रकार हे नाथ ! केवल ज्ञानरूपी सूर्यके उदय होनेके लिये आप उदयाचल हो तथा हे भगवान् विद्वान् लोग तुम्हें हो मिथ्याज्ञान और निदारूपी अंधकार ७४ अलि. पुराण ज्ञाननिद्रातमोहः ॥ ३८॥ मोहाधकूपपातात्व धर्महस्तावलंबनात् । नि कारणजगद् धुरुधरिष्यसि नान्यथा ॥ ६ ॥ अतस्तुभ्य नमो नाथ ! विश्वा- नदविधायिने । नमस्ते वालचंद्राय नमस्तेऽद्भुतमूर्तये ॥ ८० ॥ नमस्ते मुक्तिकातामनोहराय सुखात्मने । नमस्ते विश्वनाथाय विश्वकल्याण भागिने ॥ ८१ ॥ स्तुत्येति स तमारोप्य स्वाकमेरावताश्रितं । हस्तुसुच्चालयामास (?) मेरू प्रति सुरावृतः ॥ ८२ ॥ जयेश नद वर्धस्व त्वमिति बनिकोटिभि । तदा कलफलं चक्र हूं ष्टा देवा प्रमोदत ॥ ८३॥ सौवर्मकल्पनाथस्याकासोन त्रिजगद्गुरु । ऐशानेंद्रस्तदा भेजे सितच्छोण सादरं ॥ ८४|| सनत्कुमारमाहेंद्रस्वामिनो धर्मचक्रिण ।चामरेस्त व्यबुन्धाता क्षोराध्यूमिनिभे सित. ॥८५॥ दृष्ट्वा तदातनों भूति केचित्कुदृष्टिनिर्जराः। के नाश करनेवाले मानते हैं ॥ ७६-७८ ॥ हे भगवन्, संसारके समस्त प्राणो मोह रूपी अंधकारसे परिपूर्ण कूपमें पड़े हुये हैं उनको धर्मरूपो हाथका अवलंबन देकर आप ही उद्धार करेंगे दूसरे किसी व्यक्ति में सामर्थ नही जो उद्धार कर सके इसलिये संसारमें विना प्रयोजनके यदि बंध हैं तो आप ही हैं अन्य कोई आपके समान निष्प्रयोजन बंधु नही हो सकता ॥ ७६ ॥ इसलिये हे नाथ ! आप समस्त लोकको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं अतः आपके लिये नमस्कार है। आप संसारमें सबको प्रसन्न करनेवाले बाल चंदूमा हैं इसलिये आपके लिये नमस्कार है। तुम आश्चर्यकारी मूर्तिके धारक हो इसलिये तुम्हारे लिये नमस्कार है । हे प्रभो! मोक्षरूपी स्त्रीके चित्तको हरण करनेवाले आप ही हो और आप सुख हीस्वरूप हो इसलिए आपके लिए नमस्कार है। हे देव ! तम्हीं समस्त लोकके स्वामी हो और तुम्ही समस्त प्रकारके कल्याणोंको प्राप्त करनेवाले हो इसलिए तुम्हारे लिए भक्तिपूर्वक नमस्कार है ॥८०-८१ ॥ इसप्रकार भक्तिपूर्वक मनोहर शब्दोंसे स्तुतिकर इन्दूने भगवान मल्लिनाथको ऐरावत हाथीपर बैठे ही बैठे अपनी गोदमें ले लिया एवं उनका अभिषेक करनेकेलिए अनेक देवोंसे वेष्टित वह मेरु पर्वतकी ओर चल दिया ॥८२॥ भगवान मल्लिनाथको इन्दकी गोंद में विराजमान देख समस्त देव मारे आनंदके पुलकित होगये एवं मनके अंदर अत्यन्त प्रमोद धारण कर वे हे स्वामी ! तुम चिरकाल तक जीवो, नादो, विरदो इस प्रकार गंभीर शब्दोंमें उन्नत कोलाहल करने लगे॥८३॥ तीन जगतके गुरु भगवान मल्लिनाथको सौधर्म इन्द्रकी गोदीमें विराजमान देख ऐशान स्वर्गके इन्दूको बड़ा भारी संतोष हुआ ग - । पुराणा इन्द्रप्रामाण्यमाधाय चक्र जैनमते मति ॥ ८६ ॥ तस्मान्नभोंगण व्याप्य विभूत्या परया समं। स्वस्ववाहनमारकै कल्पनाथमहोत्सवै ॥ ८७॥ मल्लि. वीणामृदगवशाय नद्भिर्वाद्यकोटिमि । गधर्वकिन्नरीभिश्च गायंतीभिस्तदुत्सव ॥ ८८ ॥ कुवंतीभि पर नृत्यमप्सरोभिर्मनोहर । छादयतीभिरा- काश ध्वजछत्रादिपक्तिभिः ॥ ८६ ॥ सौधर्मेंद्रोऽतिधर्मात्मा चासंख्यसुरवेष्टित । मेरुंपरीत्य सानदो जगन्नाथ व्यधान्मुदा ।। ६० ॥ जन्मस्नानाय आनंदसे गदगद हो बड़े आदरसे उसने भगवानपर छत्र लगा लिया ॥८४ ॥ सनत्कुमार और माहेंद्र स्वर्गो के इन्द्र भी धर्मके चक्रवर्ती भगवान मल्लिनाथपर चमर ढोरने लगे जो चमर क्षोर समुद्रकी तरंगों के समान महामनोहर और सफेद थे ॥८५ ॥ भगवानके पांचों कल्याणोंमें समस्त देव सम्यग्दृष्टि ही आवं यह नियम नहीं बहुतसे मिथ्यादृष्टि देव भी आते हैं क्योंकि वे इन्द्रके आज्ञाकारी होते हैं इसलिये इन्द्रको आज्ञानुसार अवश्य उन्हें वहांपर आना पड़ता है। भगवान मल्लिनाथके जन्मकालमें जो भी मिथ्यादृष्टि देव आये थे वे भी यह निश्चय कर कि “ जब स्वयं सौधर्म स्वर्गका स्वामो भगवान मल्लिनाथकी सेवामें भक्ति- पूर्वक लगा हुआ है तब यही ठीक जान पड़ता है कि समस्त मतोंमें जैन मत ही पवित्र और कल्याणका करनेवाला है अन्य मत नहीं” उनका जैन धर्म पर गाढ श्रद्धान हो गया ॥८६॥ उस समय मेरुपर्वतपर जानेका अवसर था इसलिये समस्त देव, मय अपने अपने इन्द्रोंके अपने अपने वाहनोंपर सवार थे। भगवान जिनेंद्रके नाना प्रकारके महोत्सदोंके कग्नेमें व्यग्र थे । वीन मृदंग बॉसुरो आदि कराड़ों प्रकारके बाजे बजते थे। भगवान जिनेंद्र के उत्सवका गान गंधर्व जातिके देव और किन्नर जातिको देवांगनायें महामनोहर ललित शब्दोंसे करता चली जाती थी। उस समय अप्सरायें नेत्रोको परमानद प्रदान करनेवाला महाम- नोहर नृत्य करती चली जाती थी। ध्वजा और छत्र आदि चोजोंकी भरमारसे उस समय सारा आकाश ढका सरीखा जान पड़ता था। इस प्रकार उत्कृष्ट और विपुल विभूतिसे उस समय सारा आकाश व्याप्त था।॥८७-८६ ॥ जो अपने पीछे और आगे चलनेवाले असंख्याते देवोंसे व्याप्त था और परम धर्मात्मा था ऐसा सौधर्म स्वर्गका इन्द्र जिस समय मेरु पर्वत पर आया भक्तिभावसे उसकी तीन प्रदक्षिणाएं दी एवं अत्यन्त हर्षके साथ तीन लोकके स्वामी भगवान मल्लिनाथको मेरु पर्वतपर ले आया ॥६०॥ मेरु पर्वत । 46 मल्लि. ७७ पुरा तीर्थशं शचीचक्रादिवेष्टित । तन्मु शानदिक्पाडुकशिलाहरिविष्टरे ॥ ६१॥ शुद्धस्फाटिकरत्नरश्मिकलिता प्रक्षालितानेकशो वारान् क्षीरसमुद्र तोयनिवहेर्मुक्तात्मना वा शिला । सायामा शतयोजनेश्व निमला तुंगाष्टभिविस्तृता पचाशत्प्रमितैर्विभाति निनरा छत्रादिसन्मगलैः ॥ १२ ॥ तत्रानत्यपराव्यरत्ननिचिते हेमे सुसिहासने देवो दिव्यशरीरकातिनिचर्यरुयोतिताशाचय । य शकादिगणेजिनेंद्रपदभृत्सावेष्ठित सवभौ तं लोकत्रयतारणकचतुर स्तोष्ये गुणस्तञ्चिदे ॥ ३ ॥ इति श्रीमल्लिनाथरिने भट्टारकश्रीसकलकोर्तिविरचिते गर्भकल्याणवर्णनो नाम चतुर्थ परिच्छेद ॥ ४॥ के मस्तकपर ईशान कोणमें एक पांडक नामको शिला है और उसके मध्यभागमें सिंहासन विद्यमान है। इन्द्राणी और अनेक इन्द्र आदिसे वेष्टित सौधर्म स्वर्गका इन्2 उस स्थानपर आया एवं तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथका जन्माभिषेक करनेकी उत्कृष्ट अभिलाषासे उन्हें वहांपर विराजमान कर दिया ॥११॥ जिस पांडक शिलापर लेजाकर इन्द्रने भगवान मल्लिनाथको विराजमान किया था उस शिलाकी प्रशंसा करते हुए ग्रंथकार कहते हैं-कि वह पांडुक शिला अत्यन्त शुद्ध स्फटिकमयी पापाणकी है और स्फटिक मणिसे निकलनेवाली रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त है। उस शिलापर अनंते तीर्थंकरोंका अभि षेक किया जा चुका है इस लिये क्षीर समुद्रके विपुल जलोंसे वह अनेक बार प्रक्षालित की जा चुकी है अर्थात् जब जब तीर्थंकरोंका अभिषेक हुआ है तब तब क्षीर समुद्रके विपुल जलसे ही हुआ हैं इसलिये उस पांडुक शिलापर जिन जिन महापुरुष तीर्थंकरोंका अभिषेक हुआ है उसके अभिषेकोंके साथ उस शिला- का भी अनेक वार अभिषेक हो चुका है अतएव पवित्रतासे वह सिद्ध शिलाके समान महापवित्र और उत्तम है। वह निर्मल शिला सौ योजनकी लम्बी है। आठ योजन प्रमाण ऊंची है एवं पचास योजन प्र माण उसकी चौड़ाई है तथा सदा उसके ऊपर छत्र चंदोवे आदि मंगलीक द्रव्य तयार रहते है इसलिए उनकी प्रभासे सदा जगमगाती हुई अत्यंत शोभायमान जान पड़ती है ॥ ६२ ॥ उस महामनोहर शिला के मध्यभागमें एक महामनोज्ञ सिंहासन है जो अगणित उत्तमोत्तम रत्नोंसे व्याप्त है और सुवर्णमयी है। भगवान जिनेंद्र उसपर जाकर विराजमान कर दिये। उस समय भगवानके दिव्य शरीरकी प्रभाओंसे मल्लिक ७८ ॥ समस्त दिशायें शोभायमान थीं और इन्द्र आदि देवोंसे चारों ओरसे वेष्टित वे भगवान मल्लिनाथ उस समय महामनोहर जान पड़ते थे इसलिये ऐसे तीनों लोकके जीवोंको तारनेवाले भगवानको मैं उनकी पुराण गुण संपदाको प्राप्तिकी अभिलाषासे भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूं और उनके गुणानुवाद करता हूं॥६३ इसप्रकार भट्टारक सकलकीर्ति द्वारा विरचित सस्कृत मल्लिनाथ चरित्रकी पं० गजाधरलालजो न्यायतीर्थविरचित हिंदी वचनिकामें उनके गर्भ और जन्म इन दो कल्याणोका वर्णन करनेवाला चौथा परिच्छेद समाप्त हुआ ॥ ४॥ ----- पंचमः परिच्छेदः। वदे जगत्त्रयानंदकर्तारं ज्ञानभास्करं । जिनचद्र महामोहतमोहतारमद्भुत ॥ १ ॥ तामावेष्ट्याथ गीर्वाणास्तत्स्थु दिक्पालकामरा । यथायोग्य अथ पांचवां परिच्छेद । 1 जो भगवान तीनों लोकके जीवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं तथा जो सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्यस्वरूप भी हैं और महामोहरूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाले चन्द्रमा स्वरूप भी हैं अर्थात् जो चन्द्रमा है वह सूर्य नहीं हो सकता और जो सूर्य है वह चंद्रमा नहीं हो सकता क्योंकि दोनोंका स्वरूप परस्पर विरोधी और भिन्न है इसलिए एक ही भगवान जिनेन्द्र सूर्य औरचंद्रमा दोनों स्वरूपमें नहीं हो सक्त परंतु ऐसा होने पर भी सूर्यके समान अपने ज्ञानसे पदार्थोंके प्रकाश करनेवाले होनेके कारण जो सूर्य स्वरूप भी हैं एवं चंद्रमा जिसप्रकार अंधकार का नाशक है उसी प्रकार जो महामोहरूपी अंधकारको नाश करनेवाले हैं इसलिये चंद्रमास्वरूप भी हैं ऐसी अद्भुत गतिके धारक भगवान जिनेन्द्रको मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ॥ १॥ जिस पांडक शिलाका वर्णन ऊपर किया जा चुका है भगवान जिनेन्द्रके अभिषेकका उत्सव देखनेकेलिये देवगण चारों ओरसे उसे घेरकर बैठ गये तथा दिशाओंके पालन करनेवाले दिकपाला देव भी उत्सवका ठाट मल्लिक ७६ पुरा स्वदिग्भागे दृष्ट कामा जिनोत्सवं ॥ २॥ महामडपविन्यासश्चक्र देवेर्महोत्सव । कुर्दू सुराश्च तह व्यो गीतवाद्यादिनर्तने ॥ ३॥ ततः स्वर्णमयैः कुंभमुंखे योजनविस्तृतै. । अप्ठयोजनगभोरेर्मु कामालादिभूपिते ॥ ४॥ अनेकैह्य स्वच्छाभ..शुचिक्षीरवारिधे । सुरा श्रेणीकृतास्तोपादानेतुं प्रसृतास्तदा ॥ ५॥ विनिर्मिमे मुदा वाहन सहस्रप्रमितान् परान् । तत्स्नानायादिकल्पेशो दिव्याभरणमडितान् ॥ ६॥ कुंभोवृतेर्लसद्धस्तैर्जिनमूर्ध्नि सुरेश्वर । जयेत्युक्ता परा धारा प्रथमां स न्यपातयत् ॥ ७॥ तदा कलकलो भूयान् चक्रऽसख्यसुरासुरै । तत फल्पाधिपः सर्व समं धारा वाट देखनेके लिये यथायोग्य अपनी अपनी दिशाओं में स्थित होगये ॥२॥ पांडुकशिलापर देवों ने भगवान जिनेंद्र के अभिषेक के समय एक विशाल मंडपका निर्माण किया था। देवियोंने महामनोहर गीत उत्तमोत्तम बाजोंके शब्द और नृत्योंके साथ भगवान जिनेंद्रके अभिषेकका महान उत्सव करना प्रारंभ कर दिया ॥३॥ भगवानके अभिषेक के समय देवगण सुवर्णमयी कुभोसे क्षीरोदधि समुद्रका अत्यन्त स्वच्छ और पवित्र जल लाते हैं उससे भगवानका अभिषेक किया जाता है। जिन सुवर्णमयी कलशोंसे भगवान जिनेंद्रके अभिषेकका जल लाया गया था उन कलशोंका मुख एक एक योजन चौड़ा था। आठ योजन प्रमाण वे गहरे थे । मोतियोंकी माला आदिसे भूषित थे और अनेक अर्थात् संख्यामें एक हजार आठ थे। क्षीर समुद्रसे जल लाते समय देवोंके चित्त आनंदसे आनंदायमान थे इसलिये वे फेल कर उस समय लडीबद्ध खड़े थे॥४-५॥ भगवान मल्लिनाथके अभिषेक समय सौधर्म स्वर्गके इन्द्रके हर्ष का भी पारावार न था। अभिषेकके समय उसे दो भुजाओंसे भगवान जिनेंद्रका अभिषेक करना पसंद न आया इसलिए अनेक दिव्य आभूषणोंसे मंडित शीघ्र ही उसने हजार भुजायें वना लीं ॥६॥ सौधर्म स्वर्गके इन्द्रने "हे भगवान जयवंते रहो" ऐसा भक्तिपूर्वक उच्चारण कर जिनमें सुवर्णमयी कलश विद्यमान, हे ऐसे अपने मनोहर हाथोंसे सबसे पहिले जलधारा भगवानके मस्तकपर छोड़ी। उस प्रथम जल धारा देते ही वहां पर विद्यमान असंख्याते सुर और असुरों को परमानंद हुआ इसलिए उनका अत्यन्त कोलाहल होने लगा एवं उसके बाद समस्त इन्द्रोंने मिलकर भगवान जिनेंद्रके मस्तक पर अगणित जल धारायें छोड़ी॥६-८॥ जिस समय इन्द्रगण उनके मस्तकपर जल धारा छोड़ते थे उस समय वे धारायें - - मल्लि. प्रारत ८० - - निपातिता ॥ ८॥ महान उपनागंरागम्य मम्मो महिनामा प्रमादिना रो मोना गाउामा (मि) नकुलं । नन्गागा पिर झीरपूर्ण दयानर, पोसगी गायोटिगि । मोगानि रने ॥ ११ ॥ गुदागमन पूणमिति गम, मुग पिशूपा पनगारिभो नि । नतों गंगोgram माधिते । अभ्यनिरिधानो गितार माघर. (?) 173 || गोदाम पायो मानौ मुपा गाम्ग निमानुग्मी वरे ॥ १४ ॥ इत्युत्मागनेग घोटकम्मापनमाभुतं । परोपाइप गाने || मरा गुरमयागारमा म महान नदियों के समान उनके मम्नकपर गिरती थीं परंतु जिस प्रकार विशाल पर्वतपर पड़नेवाली नदियों की धागो से वह रंचमात्र भी हिलता डुलता नहीं उसी प्रकार अचिंत्य शक्तिके धारक भगवान मलिनाथ भी अपने अनुपम प्रभावसे उन्हें कोडापूर्वक झनने थे. घबड़ा कर जग भी वे हिलने दुलने न थे ॥६॥ उस समय रंग विरंगी रनों की भूमियों पर पड़ने के कारण रंग बिरंगी जनकी बंदों में व्याप्त आकाश इन्द्र- धनुपकी शोभासे व्याप्त जान पड़ता था नया पांडक वन में नपत्र बोर नमुद्रका जल हो जन डोलना नजर पड़ता था इसलिए पांडुक वन उस समय माक्षात् क्षीर समुद्र सरीया जान पड़ता था ॥ १० ॥ इसप्रकार जिनमें अनेक प्रकारके गीत और नृत्य आदि कार्य हो गर हैं। अनेक प्रकारके करोड़ों बाजे बज रहे हैं एवं जिनका निर्माण अनेक देवी देवों के द्वाग किया गया मे संकडों महान उत्सरों के साथ नीर समुद्रके जलसे जब भगवानका अभिषेक ममाप्त हो चुका नो उन बाद धारा गिरने समय जिन से जय जय शब्द निकन्नता है ऐसे मुगंधित जनमे भरे सन्नशो ले देवेद्रने भक्तिपूर्वक बडे ठाट बाटसे भगवान जिनेंद्रके अभिषेकका आयोजन किया । नाना प्रकारकी महामनोहर सुगंधित द्रव्यों से मिश्रित सुगंधित जलके भरे हुए कलश यावे गये एवं उनसे समन्न प्रकारके विधानोंके जानकर इन्द्रने तीन जगतके जीवोंको मोक्ष मागका विधान मुझानेवाले भगवान जिनेंद्र का भक्तिपूर्वक अभिषेक किया ११-१३ ॥ भग- वान जिनेंद्रका शरीर स्वाभावसे ही अत्यंत सुगंधित था इसलिये उनके शरीरपर वह गिरनी हुई सुगधिन जनकी धारा अमृतको धागके समान महा शोभायमान जान पडनी थी ॥ १४ ॥ इसप्रकार सेकड़ो उत्सवों- - . I - ८० - २ न * पवित्रा पुण्यधारेव सा पवित्रीकरोतु न ॥ १६॥ इत्युक्त्वा मस्तके चा सर्वागे च सुरोत्तमा । स्वर्गसोपायन भक्त्या तद्गंधावु स्वशुद्धये ॥१७॥ मलिक | गधांबुस्नपनस्याते जिनेद्रागे महोत्सवै । व्यात्युक्षीममराश्चक्र, सच्चूणैर्गधवारिभि ॥ १८ ॥ निवृत्तावभिपेकस्य तं परीत्य दिवौकसः आनचु: परया भक्त्या दिव्यार्जनसुवस्तुभिः ॥ १६ ॥ सकलत्रा सुराः कृत्वेतोप्टिशांतिसुपौष्टिकान् । प्रणेमुरुत्तमागेन परीत्येन जगद्गुरु ॥२०॥ अथाभिषेक संपूर्णे इंद्राणी कौतुकोत्सुका । प्रसामनविधौ यनमकरोद्धर्मदेशिन ॥ २१ ॥ तस्याभिषिक्तदेहस्य निसर्गसुन्दरस्य सा । अगलग्नान मामार्जाभ कणान् सूक्ष्मामलाशुकै ॥ २२ ॥ स्वभावेनातिसौरभ्यं विभोग च्युतोपमं । अन्वलिप्यत सा भक्त्या द्रव्ये. साद्र. सुगधिभि ॥ २३ ॥ के साथ सवोंको आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला वह सुगंधित जलसे किया गया अभिषेक भी समाप्त हो गया एवं भक्तिपूर्वक अभिषेक कर उन देवोंने महान पुण्यका संचयकर अपने को पवित्र बनाया ॥ १५ ॥ गंधोद- कके सुगंधित जलसे उस समय समस्त दिशायें व्याप्त थीं और वह गंधोदकको धारा महापवित्र सज्जनोंके पुण्योंको धारा सरीखी जान पड़ती थी “वह पवित्रा धारा हमें भी पवित्र करे ऐसा उच्चारण कर देवोंने अपनी अपनी विशुद्धिकी कामनासे स्वर्गकी पैडियोस्वरूप वह गंधो- दकका पवित्र जल अपने अपने मस्तकोंसे ल- गाया पीछे भक्तिपूर्वक समस्त शरीर से लगा डाला ॥ १६-१७ ॥ सुगंधित जलसे जिस समय भगवानका अभिषेक समाप्त हो गया उस समय अनेक प्रकारके महोत्सवोंके साथ दवोंने अगर तगर आदिके उत्तमो- त्तम सुगंधित चूर्णो से ओर सुगंधित जलोंसे भगवान जिनेंद्रके शरीरका उपटन किया ॥ १८ ॥ जब अभिषे- कका काय और उपटनका समस्त कार्य समाप्त हो च का उस समय दिव्य और सुगंधित उत्तम पूजनकी सामग्रीसे भगवान जिनेंद्रको चारों ओर से वेष्टित कर देवों के बड़ी भक्तिसे उनकी पूजा की ॥१६॥ इसप्रकार देवोंने पूजा शांतिविधान और पुष्टिविधानका कार्य समाप्त कर तीनों लोकके गुरु भगवान मल्लिनाथकी तीन प्रदक्षिणा दी और मस्तक झुकाकर उन्हें भक्तिपूर्वक नमस्कार किया तथा अभिषेक आदि कार्यों के स- माप्त हो जानेपर उनकी परम धीर वीरता देखकर आश्चर्यसे उत्सुक हो इद्राणीने श्रृंगारके लिये आयोजन करना प्रारंभ कर दिया ॥ २०-२१॥ जलसे प्रक्षालित शरीरके धारक और स्वभावसे हो सुन्दर भगवानके शरीरपर जो जलाकी बूद विद्यमान थीं इंद्राणीने सूक्ष्म और निर्मल वस्त्रोंसे उन्हे पोंछकर साफ कर दि या ॥२२॥ जिसकी उपमा किसीभी शरीर से नहीं दी जा सकती ऐसा भगवानका शरीर यद्यपि स्वभावसे ही ११ । पुराप -- ललाटे तिलकीभूते जगतामीणतुर्दधे । तिलक, मुकुट, मूर्ध्नि मंदारस्रग्युतं च सा ॥२४॥ शाननेत्रप्रमोर्विष्ववेत्तु परमचक्षुयो । चक्र स्वाजनसंस्कार स्वाचाराप्त्येह केवल ॥ २५ ॥ कर्णावविद्धसच्छिद्रौ कुंडलाभ्यामलंकृतौ । चकार मणिहारेण कठे शोभा परा विभोः ॥ २६ ॥ वाहुयुग्म व केयूर- मल्लि. मुद्रिका कणाकित । चक्र सास्य कटोभाग मणिदामविभूषित ॥ २७॥ पादौ गोमुखनिर्भासमणिभिस्तस्य रेजतु । वाचालितो सरस्वत्या कृतसेवाविवाद्भुतौ ॥ २८ ॥ परब्रह्मस्वरूपो वा ज्ञानमूर्तिरिवोत्थितः । रत्नाकर इवात्यतसुदरो धर्ममूर्तियत् ॥ २॥ लक्ष्म्या पुंज वो नो महा सुगंधित था इसलिये अन्य सुगंधित द्रव्योंसे उसका लेप करना निरर्थक था तथापि अपनी भक्ति प्र- गट करनेकेलिये इंद्राणीने अत्यंत सुगंधित द्रव्योंका उनके अंगपर लेप कियाथा ॥२३॥ तीनजगतके स्वामी भगवान जिनेंद्रका ललाट समस्त अङ्गोंमें तिलकस्वरूप था-अथवा संसारमें जितने भी ललाटधारी पुरुष हैं उन सबोंके ललाटोंमें तिलकभत था इसलिये उस ललाटपर तो इंद्राणीने तिलक लगाया तथा मस्तकपर मंदार जातिके कल्पवृक्षकी मालासे शोभायमान मुकुट पहिनाया ॥ २४ ॥ नेत्रेमें जो काजललगाया जाता है वह नेत्रोंकी दीप्ति बढ़ानेके लिये लगाया जाता है। भगवान मल्लिनाथ समस्त लोकके जानकार थे और ज्ञानरूपी नेत्रके स्वामी थे इसलिये उनके नेत्रोंमें अंजन लगानेकी कोई भी आवश्यकता न थी तथापि उनके उत्तम नेत्रोंमें जो इन्द्राणीने अंजन लगाया था वह केवल शिष्टाचार द्योतन करनेके लिये ही था अर्थात् उसने अपना कर्तव्य कर्म पूरा किया था॥ २५ ॥ वेधे न जानेपर भी स्वभावसे ही उत्तम छिद्रोंसे शोभित भगवान मल्लिनाथके दोनों कानोंको इन्द्राणीने मनोहर कुंडलोंसे भूपित किया एवं मणिमयी महामनोहर हार पहिनाकर उनका कंठ शोभायमान किया था ॥ २६ ॥ उनकी दानों भुजाओंमें महामनोज्ञ अनंत मुद्रिका और कड़े पहिनाए थे। कटिभागपर महामनोहर मणिमयी करधनी वांधी थी, दोनों पैरों में मणिमयी घुघुरू पहिनाए थे जो कि अनुपम थे एवं घनुनु घुनुनु शब्द करनेवाले थे सो ऐसे जान पड़ते थे मानो साक्षात् सरस्वती देवी उन दाना घुघुरुओं की सेवा कर रही है ॥ २७-२८ ॥ उत्तमोत्तम वस्त्र भूषण और माला आदिसे सजाए गए एवं अपने शरीरकी मनोहर कांतिसे देदीप्यान वे भगवान मल्लि- नाथ ऐसे जान पड़ते थे मानो साक्षात् परम ब्रह्मस्वरूप हे अथवा उदयको प्राप्त साक्षात् ज्ञानकी मूर्ति है 4 मल्लि. निधिर्वा तेजसा महान् । राशिर्वा यशसा पुण्याना वा परमाकरः ॥ ३० ॥ आध्रयो वा गुणानां स तदा देवो वभौ तरा । परमा शुकनेपथ्य- मालाय स्वागकांतिभिः ॥ ३१ ॥ दटवा तदातनी शोभा तृप्तिप्राप्य देवराट् । त द्रष्टुं सहसा चक्र सहस्रनयनान्यहो ॥ ३२ ॥ निमेषविमुलैर्द्धि फव्य लोचनेश्च सुरासुरा । साश्चर्यहृदया देख्यो ददर्शस्त च्युतोपम ॥३३॥ पुनस्तोपातिरेकेण शक्रास्त स्तोतुमुद्ययुः । प्रकटीकृत्य तीर्थेशमाहात्म्यतद्गु- णाप्तये ॥ ३४ ॥ त्व देव ! परमानद कतुमस्माकमुद्गत । प्रवर्धयितुमेवात्र धर्माधि यालचंद्रवत् ॥ ३५ ॥ मिथ्याशानाधकूपेऽत्र पतता मोहिना वा अत्यंत सुंदर होनेके कारण साक्षात् रत्नाकर--समुद्रस्वरूप हैं वा साक्षात् धर्मकी मूर्ति हैं। अथवा लक्ष्मी के पुंज स्वरूप हैं वा तेजों के अद्भुत खजाने हैं। अथवा यशों की राशि हैं वा जितनीभर भी संसारके अंदर पुण्य परमाणुयें हैं उनके सर्वोत्कृष्ट स्थान है अथवा संसारमें जितने गुण माने जाते और कहे जाते हैं उन सबके आधार ये हो हैं इस रूपसे भगवान मल्लिनाथको उस समयको शोभा अपरमित थी ॥ २६-३१॥ भगवान मल्लिनाथको उस समयको अलौकिक शोभा देखकर सौधर्म स्वर्गके इन्द्रकी तृप्ति न हो सकी इस लिये उनके महामनोज्ञ रूपके देखनेको उत्कट लालसासे उसी समय उसने हजार नेत्र वना लिए एवं हजार नेत्रो से उन का स्वरूप निरखने लगा ॥ ३२ ॥ भगवानके उस समयके अनुपम रूपको सुर असुर और उनकी देवियां अपने पलक रहित दिव्यनेत्रों से टकटकी लगाकर देखने लगे एवं उनके उस प्रकारके अलौ- किक रूपको देखकर अत्यन्त आश्चर्य करने लगे ॥ ३३॥ तथा तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथका माहात्म्य प्रगटकर उनके गुणों को प्राप्तिकी अभिलाषासे इन्द्रगण अत्यंत सतापके साथ उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे- जिस प्रकार वाल चंदमाके उदयसे लोगों को आनंद होता है और समुद्र बृद्धिको प्राप्त होता है उसी प्रकार हे भगवान! हम लोगों को परमानंद प्रदान करनेके लिये ओर धर्मरूपी विशाल समुद्रके बढ़ानेके लिए बाल चंद्रमा समान आपका उदय हुआ है ॥ ३४---३५ ॥ रतोध आदिके द्वारा अंधे कूपमें पड़ा हुआ प्राणी थोडासा सहारा पाकर हो ऊपर आजाता है । हे देव ! मोहसे मूढ़ ये प्राणी संसार के अंदर मिथ्या- ज्ञानरूपी अंधेरे कूवेमें पड़े हुए हैं। इस समय इन्हें उस कूवेसे निकालनेके लिए कोई भी समर्थ नहीं। ।

मल्लिक पुराण - स्फुटं। त्वं कारुण्यात्प्रभो हस्तावलंयं च प्रदास्यसि ॥ ३६ ॥ त्वं नाथ ! जगतांभर्ता त्वामिच्छति शिनात्मजा। त्वं धर्मात्मा जगन्नाथस्त्वं धर्मतीर्य कारक. ॥ ३७॥ अस्नात पूतगात्रस्त्व न. पवित्रीकर सता । त्व जगन्मडनोभूनो निरावरणभास्वर ॥ ३८ ॥ त्वं च लोकत्रयोनायो विश्वसत्त्व। हितंकर । मोहपाश सता छेत्ता त्व वाल्येऽपि भविष्यसि ॥ ३६ ॥ त्वत्तो गुणाम्बुधे सर्वे वृद्धि यास्यति सद्गुणा । दृगाद्या धीमता दोपा क्षयं रागादयोऽपि च ॥ ४० ॥ न भवत्सदृशो देव ! जगद्वं'धुर्जगद्गुरु । स्वान्ययोर्डितकर्ता च परो जातु परात्मक ॥ ४१ ॥ नि स्वेदाय नमस्तुभ्यं नमो हे करुणासागर भगवान ? आपही दयासे गद्गद हो अपने हाथका सहारा दे उन्हें निकालेंगे और उनका उद्धार करेंगे॥ ३६॥ हे नाथ ! तुम समस्त जगतके भर्ता-पोषण करनेवाले हो । अचिंत्य और अनुपम क्तिके धारक आपहीको हे देव ! मोक्षरूपी कन्या वर बनानेकी इच्छा रखती है। हे तीन लोकके नाथ भगवान ! तुम ही धर्मस्वरूप हो और तुम ही धर्मतीर्थ की प्रवृत्तिके करनेवाले हो ॥ ३७॥ हे भगवान ! स्नानके न किये जाने पर भी तुम पवित्र शरीरके धारक हो और सज्जनोंको पवित्र करनेवाले हो । हे नाथ ! तुम्हीं समस्त लोकके अलौकिक भूपण हो और तुम्ही जिसपर कभी भी आवरण नही आसकता ऐसे दैदीप्यमान सूर्य हो ॥ ३८ ॥ हे प्रभा। संसारमें तीनों लोकके नाथ आप ही हैं। समस्त जीवोंके हित और कल्याणके कर्ता भी आप ही हैं क्योंकि हे भगवान ! वालक (१) अवस्थामें ही समस्त मोक्षाभिलाषी, जीवोंके मोहरूपी पाशको नष्ट करनेवाले आप ही होगे ॥ ३६॥ हे समस्त गुणों के समुद्र भगवान ! सम्य- ग्दर्शन आदि जितने भी संसारके अंदर अनुपम और प्रशस्त गुण हैं आपकी कृपा से हो वे वृद्धिको प्राप्त होंगे-अर्थात् आप अपने अनुपम ज्ञानसे उनका स्वरूप समझावेंगे तब सज्जन पुरुष उन्हें अखंडरूपसे प्राप्त करनेको अभिलाषा करेंगे तथा संसारमें डुवानेवाले जो राग आदि दोप हैं आपकी कृपासे ही वे सजनोंके नष्ट होंगे॥ ४०॥ हे देव ? संसारमें न तो कोई आपके समान समस्त जगतका बंधु है। न आपके समान कोई समस्त जगतका गुरु है । अपना और पराया हित करनेवाला भी आपके समान और कोई नही, हे नाथ ! आपके समान पवित्र आत्माका धारक भी कोई संसारके अंदर दृष्टिगोचर नहीं (१) विवाहके समय ही ये भगवान मल्लिनाथ विरक्त होकर दोक्षा ग्रहण करेंगे इसलिये वालब्रह्मचारी हैं। ८४ मल्लिक निर्मलमूर्तये । क्षीरामशोणितांगाय ते चाद्याकृतये नमः ॥४२॥ आदिसंहननायेव दिव्यरूपाय ते नमः । सौरभ्याय नमस्तुभ्य सौलक्षण्याय ते नम ॥ ४३ ॥ अप्रमाणसुवीर्याय नमस्ते हितवादिने । मितवको सहोत्पन्नदशातिशयशालिने । ४४ ॥ अन्यामितगुणायास्तु नमस्ते ज्ञानचक्षुषे । नमस्ते जगदानटकले मुक्तिप्रियाय च ॥ ४५ ॥ त्वाममिष्टुत्य देवेश प्रार्थयामो प्रगच्छिय । न वयं किंतु नो देहि भववैभवमंजसा ॥ ६ ॥ इति स्तुत्वा ॥४१॥ हे भगवान! आपका शरीर स्वेद [ पसेव ] रहित है इस लिये पसेव रहित उत्तम शरीरके धारक आपके लिए नमस्कार है । आपका शरीर मल मूत्ररहित-निर्मल है इस लिये आपके लिये नमस्कार है। आपके शरीरके अंदर निंदित रक्त नहीं किंतु महामनोहर क्षीर समुद्र के जलके समान महास्वच्छ रक्त है इसलिए क्षीर समुद्रके जलके समान रक्तसे परिपूर्ण अंग के धारक आप केलिए नमस्कार है। हे नाथ ! आप समचतुरस् संस्थानके धारक हैं इस लिये आपके लिए नमस्कार है । हे भग- वान ! आप आदि संहननन-वज्रवृपभनाराच संहननके धारक हैं और आपका रूप दिव्यरूप है इसलिए आपके लिए नमस्कार है। आपका शरीर अत्यन्त सुगंधिका धारक है और १००८ शुभलक्षणों से शोभायमान है इसलिए आपकेलिए नमस्कार है ॥ ४२-४३॥ हे देव ! जिसका किसी प्रकारका परिमाण नहीं किया जा सकता ऐसे अनुपम पराक्रमके आप धारक हैं एवं सर्वदा हितकारी मार्ग सुझानेवाले हैं इस लिए आपके लिए नमस्कार है। हे प्रभो। आप परिमित और समीचीन बोलनेवाले हैं इसप्रकार साथ साथ ही उत्पन्न होनेवाले दश अतिशयों से अत्यन्त शोभायमान हैं अर्थात् उत्पत्ति के समय दश आपके अतिशय होते हैं वे अन्यके नहीं हो सकते इसलिये आपके लिये नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे भग- वान ! ऊपर जितने गुणोंका उल्लेख किया गया है उनसे भिन्न भी अपरिमित गुणों के आप भंडार हैं और महादीप्तिमान ज्ञानरूपी नेत्रके धारक हैं इसलिए आपके लिये नमस्कार है। हे प्रभो आप समस्त जगत- को अलौकिक आनन्द प्रदान करनेवाले हैं और अत्यन्त दुर्लभ मोक्षरूपी लक्ष्मीके प्यारे आप ही हैं इस- लिए आपके लिए नमस्कार है ॥ ४५ ॥ हे जगन्नाथ ! आपकी स्तुति कर हम आप से यह प्रार्थना करना * वज्रर्पभनाराच १ वज्रनाराच २ नाराच ३ अर्धनाराच ४ कीलित ५और स्फाटिक ६ ये छह सहनन हैं। तद्भव मोक्षगामियोंके पहिला ही संहनन होता है।

मलि. जगन्नाथ परमानंदनिर्भराः। प्रणेमुः. शिरसा रामाः सफलवान्न सामरा ॥ ४॥ मटिकाधिकगंधौघटिव्यांगधारणः प्रमो। जेतु कमांदिश- Jणा मल्लिनाम सुरा व्यगुः ॥ ४८ ॥ घोपकार्याप्तये नम्मात्तनादाय जगदगुरु । देवाः परया भूत्या पूर्ववत्तत्पुरं ययुः ॥ ४६॥ तर गजागगे ग्न्ये नुगे सिंहासने मुदा । सांगभूपिन देवं सौधमेंद्रो न्यशीविशन् ॥ ५० ॥ शच्या प्रयोगिता माता यमि मद मराट् । नेज न मिशग्भूनं मुदा- ऽपश्यन्निजयुत ॥ निवेद्य नफलं मेग्यत्त नदिनरो मुरा। प्रपूज्य म्यर्गान्या रम्गामरणदायभिः ॥ ५० ॥ धन्यो पनी परी मान्यो स्तुत्यौ मौ नहीं चाहते कि आप हमें समस्त जगतकी लनमी प्रदान करे परंतु प्रभो! प्राथना यही है कि जिस अन्ना- किक ऐश्वर्यको आपने प्राप्त किया है जिसके कि सामने सारा संसारकी विभतियां तुच्छ हैं कृपाकर इस परमोत्तम ऐश्वर्यको हमें भी प्रदान करिये ॥ ४६॥ इसप्रकार तीन जगतके नाथ भगवान मल्लिनाथकी स्तुतिकर परमानन्दसे गदगद हो 'इन्द्रोंने अपने प्राज्ञाकारी देव और देवांगनाओं के माथ उन्हें मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक नमस्कार किया ॥ १७॥ कर्म आदि शत्रुओंके जोतनवाले भगवान मल्लिनाथ मल्लिका पुष्पकी सुगंविसे भी उत्कट मुगंधिवाले दिव्य शरीरके धारक थे इसलिये देवोंने उनका अन्वर्ग नाम मल्लि- नाथ रकात्रा था ॥४८॥ देवगण मेम्पर्वातपर जिस समय समस्त कार्य समाप्त कर चके उस समय जो कुछ उनके जन्मकल्याणक सम्बन्धी कार्य वाकी बचा था उसे पूरा करनेके लिए तीन जगतके गुरु भगवान मल्लिनाथको लेकर पाहेलेके ही समान बड़े ठाट वाटसे पुनः मिथिलापुरी लोट आए ॥ १६ ॥ राजा कुम्भके आंगनमें एक महामनाहर विशाल सिंहासन विद्यमान था। समस्त अहोमें पहिने हुए. भूपणांसे भूपित भगवान मल्लिनाथ को इन्द्रने बड़े आनन्दसे उसपर विराजमान किया ॥ ५० ॥ इन्द्राणी भगवानके गर्भगृह- में गई और माताको जगाया तथा बंधु बाबयोके साथ राजा कुम्भकी भी मायामयी निद्रा दूर की। जहांपर भगवान मल्लिनाथको विराजमान किया गया था वहां पर वे आग एवं आनंदमे गद्गट हा उदय को प्राप्त तेज पुन्जके समान अपने पुत्रको देवा ॥५१॥ मेरु पर्वतपर जो भी अभिषेकके समय कार्य किया गया था वह सब भगवानके माता पितासे इंदूने सानंद निवेदन किया। उत्तमोत्तम वस्त्र आभूषण और माला आदिसे समस्त देवोंके साथ भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की तथा आप समस्त लोकमें धन्य हैं पूज्य हे उत्कृष्ट हे मान्य -- -- मल्लि. भाग्यपारगौ । युवा गुरू च लोकेऽस्मिन शशंसेत्यादि करपराट् ॥ ५३॥ इद्रादेशेन पोरेश्व बंधुभिः सह तित्पता। महापूजाभिषेका र्जिनागारे महोत्सव ॥ ५४ ॥ कृत्वा वकार नानाविभूत्या तोरणकेतुभिः । गीतनर्तनवाद्याये । पुर्या जातं महोत्सवं ।। ५५ ।। तदा नाना विधैर्दाने पूरयामास भूपति । आशा च निज वधूना दीनानाथादिवदिना ॥५६॥ प्रमोदनिर्भरं दृष्ट्वा समस्तं नगरीजन । व्यक्तीकुर्वन् प्रमोदस्वं पित्रादीन्प्रति देव- राट् ॥ ५७ ॥ आनदनाटक रम्या ननाटातिमनोहरं । स्वदेवीभिः सहोत्कृष्ट जगदाश्चर्यकत्वादा ॥ ५८॥ अणुस्थलादिनानायेणैः सन्निकटदूरगे . । वीणावशमृदगादिवाद्यः सगीतनर्तन. ॥५२॥ ततोऽस्य सवयोरूपनानावेषविधायिनः । वहून् सुरकुमारांश्च धात्रीदेवीर्जिनशिन ६०॥ निरू- । ८७ हैं , स्तुति करने योग्य हैं, सौभाग्य के पारको प्राप्त हैं। अर्थात् आपसे बढ़कर कोई भाग्यवान नहीं। विशे प क्या ! जब आप स्वयं तीर्थकर भगवानके माता पिता हैं तब समस्त लोकके आप माता पिता हैं। इसप्र- कार मनोहर शब्दोंमें भक्तिपूर्वक इंदने उनको स्तुति की ॥ ५२-५३॥ पश्चात् इंद्रके कहे अनुसार भग वान मल्लिनाथके पिता राजा कुम्भने पुरवासी और अपने बंधु वाधवोंके साथ भगवान जिनेन्दुके मंदिरमें महापूजा और अभिषेक आदिका महान उत्सव किया॥ ५४॥ महोत्सवके वाद अनेक प्रकारको नंदनवारें ध्वजायें एवं गीत नृत्य और वाजे आदिसे मिथिलापुरीमें भी बड़ा उत्सव मनाया गया ॥ ५५ ॥ भगवानके पिता राना कुभने अनेक प्रकारके दान देकर अपने बंधुओंकी और दीन अनाथ आदि बंदियों की भी इ- च्छा अच्छी तरह पूरण कर दी थी॥५६॥ जिससमय समस्त नगर निवासी जन आनन्दमें मग्न थे उस- समय भगवानके माता पिता आदिके साथ विशिष्ट सहानुभूति प्रदर्शित करनेकेलिये इंदूने अपनी देवियों के साथ अत्यन्त आनन्दमयी नत्य किया जोकि सुहावना लगनेवाला अत्यंत मनोहर था। नृत्य करते समय कभी छोटा आकार तो कभी बड़ा आकार इस प्रकार अनेक आकार मालूम पड़ते थे। कभी अत्यंत निकटमें जान पड़ता था और कभी अत्यन्त दूर जान पड़ता था। बोन बांसुरी मृदंग आदि अनेक प्रकारके वाजे बजते थे एवं अनेक प्रकारके गाने और अनेक प्रकारसे शरीरका हिलाना डुलाना होता था इसलिये इस विशिष्ट वातोंसे वह नत्य समस्त जगतको आश्चर्य करनेवाला महामनोहर जान पड़ता था ॥५७-५६॥ जब नृत्यका कार्य समाप्त हो चुका उस समय धात्रोके वेषवाली देवियों को और भगवान जिनेन्द्रको ही अवस्था- प्य परिचर्याय । मल्लिक । ८८ शुश्रू पाक्रीडनाय च । उपाय बहुधा पुण्य दिवा जग्मुद्यु नायकाः ॥ ६१ ॥ हस्तश्चमटादीनां रूपमादाय ते सुराः । कीड़यती क्वचि द्वेवा' कचिद्द व्यश्च सादरं ॥ ६२ ॥ मंडयति जिनं काश्चिन्वानामंडनवस्तुभिः । स्नपयन्त्यपरा देव्यः काश्चित्सभूपयन्ति च ॥६॥मुखेऽसौ स्मित- मातन्वन् प्रसन्मणिभूमिषु । पित्रोमुदं ततानाद्यवयःकीडास्मितादिभि · ॥ ६४ ॥ तस्यासीच्छेशवं दिव्यं चन्द्रवञ्च कलोज्वलं । बंधुदेवादिनेत्राणा' पुराण परानंदोत्सवप्रदं ॥६५॥ दिव्ये मुखाम्बुजेऽस्यासीत्क्रमान्मन्मनभारती। सोनुस्खलन् पकन्यासै संचरेन्मणिभूतले ॥ ६६ ॥ तद्योग्यामृतपाना- वाले उनके ही समान रूपके धारक और अनेक प्रकारके वेषोंके धारण करनेवाले बहुतसे देव कुमारोंको उ- नकी सेवा शभूषा और साथ साथ खेलनेके लिये नियुक्त कर दिया इसलिये वे बराबर उसकी सेवा যুসুম্বা करने लगे और साथ साथ खेलने लगे इसप्रकार भगवान जिनेन्द्रके प्रति अनेक प्रकारकी भक्ति प्रदर्शित कर और उससे जायमान अनेक प्रकारका पुण्य उपार्जन कर समस्त देव स्वर्गको वा अपने अपने स्थानोंको चले गये ॥ ६०-६१ ॥ जिन देव कूमारोंकों भगवान जिनेन्द्रकी सेवा शुश्रूषा और उनके साथ खेलनेके लिये नियुक्त किया गया था वे देव कभी हाथीका रूप बना कर तो कभी घोड़ाका रूप बनाकर तो कभी बंदर आदिका रूप बनाकर भगवान जिनेंद्रके साथ क्रीड़ा करतेथे तथा उनकी सेवाके लिये जो देवियां नियुक्त थीं वे भी बड़ी भक्तिसे उनका आदर सत्कार करती थीं उनमें कोई कोई देवियां तो भगवानको अनेक प्रकार- मंडन वस्तुओंसे मंडित करती थीं बहुतसी सुगंधित जलसे उन्हें स्नान कराती थीं और बहुतसो अनेक प्रकारके भूषण उन्हें पहिनाती थीं ॥ ६२-६३ ॥ वे भगवान मल्लिनाथ मंद मंद हास्य हंसते अर्थात् मुलकते. थे मणिमयी भूमिपररिंगते थे इसलिये वाल्य अवस्था, अनेक प्रकारको कोड़ा और मुलकन आदिसे वे माता पि- ताको परमानंद प्रदान करते थे॥ ६४॥ जिस प्रकार चंद्रमा नानाप्रकारकी कलाओंसे उज्ज्वल रहता है और देखनेवालोंके नेत्रों को आनन्द और उत्सव प्रदान करता है उसीप्रकार उन भगवान मल्लिनाथका भी शैशव काल दिव्य था चन्द्रमाके समान अनेक प्रकार कला कौशलोंसे दैदीप्यमान था एवं बंधु बांधव औ- र देव आदिके नेत्रोंको अत्यन्त आनन्द और उत्सवका प्रदान करनेवाला था॥६५॥उन भगवानके मुखकमल से मन्मन् स्वरूप अस्पष्ट भाषा निकलतो थी। एवं मणिमयी भूमिपर खेलते हुए ने पद पद पर गिरते + ८८ मल्लि. ८६ द्यवृधेऽस्य क्रमाद्वपुः सार्धं चावयवै रम्यैः प्रज्ञाशानगुणादिभिः ॥६७॥ कौमारत्वं तत प्राप्य स्वयं परिणतिं ययुः । ज्ञानविज्ञान विद्या गुणास्त्रिज्ञानचक्षुपः ॥ ३८ ॥ ततोऽसौ परमानंद पित्रादीना प्रवर्धयन् । विमले स्वगुणे प्राप क्रमात्सद्यौवनं शुभ ॥६६॥ क्वचिद्वीणादिवाद्यौधे- नर्तकीनर्तनै क्वचित् । क्वचित्काल्यादिगोष्ठीभिर्नानारूपादिधारिभि ॥ ७० ॥ क्वचिच चेटकैर्दिव्यै. सौधर्मेद्रो व्यधात्तरा। स्वशर्मणे विभो शर्म विनोदादिकुतूहले ॥ ७१ ॥ सक्षोमभूषणैर्दिव्यैर्वयोयोग्यसुरार्पिते । भूषितागोऽतिकात्या स जित्वा चे (त्वे. ) न्दं व्यभात्तरीं ॥ ७२ ॥ अष्टोत्तरसहस्रण लक्षणानामलकृत । दिव्यमौदारिक देहं निरौपम्यं विभौर्वभौ ॥ ७३ ॥ मुकुटालकृतं तस्य शिरोनीलशिरोरुहं । दिल्यमालाधर पड़ते थे॥६६॥ अपने योग्य महामनोज्ञ अन्न पान आदिके खाने से उनका शरीर क्रमसे दिनों दिन बढ़- ता जाता था। एवं जिस प्रकार शरीर बढ़ता चला जाता था उसी प्रकार उनके महा मनोहर अवयव भी फैलते चले जाते थे एवं निरंतर बुद्धि [ चतुरता ] ज्ञान और गुण आदिकी भी वृद्धि होती चली जाती थी ॥ ६७ ॥ मति श्रुत और अवधिरूप तीन ज्ञानके धारक भगवान जिनेंद्रकी बाल्य अवस्थाके बीत जानेपर जिस समय कुमार अवस्था प्रकट हुई थी उस समय ज्ञान विज्ञान और बुद्धि आदि गुण आपसे आप वृद्धिको प्राप्त होने लगे थे॥ ६८॥ कुमार अवस्थामें पिता माताको परमानन्द प्रदान करनेवाले भगवान जिनेंद्रने अनेक निर्मल गुणोंके साथ धीरे धीरे क्रमसे अत्यन्त शुभ यौवन अवस्थाको भी प्राप्त कर लिया था ॥६६॥ उस समय सौधर्म स्वर्गका इन्द्र अपनेको कल्याण प्राप्तिकी अभिलाषासे कभी कभी वीन आदि बाजोंसे, कभी कभी नृत्य करनेवाली देवांगनाओंके नृत्योंसे, कभी कभी काव्य आदिकी गोष्ठियों से, कभी कभी अनेक रूप हाव भाव आदिको धारण करनेवाली चेटक विद्याओंसे एवं कभी कभी अन्य प्रकारके विनोद और कुतूहलों से भगवान जिनेंद्रको अत्यन्त प्रसन्न रखता था ॥७०-७१ ॥ देवगण अवस्था और समयके योग्य माला वस्त्र और भूषण भगवानको पहिनाया करते थे इसलिये अवस्थाके योग्य देवों द्वारा पहिनाए गए माला वस्त्र ओर भूषणों से अलंकृत शरीरके धारक भगवान जिनेंद्र अपनी उग्र कांतिसे चंद्रमाको जीतनेवाले थे इसलिये उस समय वे अत्यन्त शोभायमान जान पड़ते थे॥७२॥ भगवान जिनेंद्रका शरीर एक हजार आठ लक्षणोंसे शोभायमान था, परम औदारिक था एवं उपमोरहित था इसलिये वह अत्यन्त शोभायमान जान पड़त था ॥ ७३ ॥ नीले नीले घुघुरूले बालों से शोभायमान १२ मल्लि. पुर प्टिवेतो नृपदेवायै विवाहार्थं बुजन् पथि ॥ ८८ ॥ विलोक्य महतीं शोभा नगर्याः केतुपक्तिभिः । तोरणैर्नृत्यवाद्याद्य महोत्सवशतादिभिः ॥ ८ ॥ स्मृत्वाऽपराजितं रम्यविमान पूर्वजन्मनि । तत्क्षण प्राप्य सवेग सावधिरिति चितयेत् ॥ १०॥ तत्रत्ययेद्यहो भोगै परैस्तृप्तिकरैरै । नागातृप्ति मनाग्र्योऽगी निरोपम्यै सुखोद्भवे ॥ ३१ ॥ स किं यास्यसि दुप्राप्यरनत्यैर्दु खसंभवैः । वपुर्विडवनोत्पन्न स्तुच्छ गयथार्णवै ॥२॥ जानकार भगवान मल्लिनाथने अपने पिताके आग्रहसे जगदरतिके साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया एवं वे अनेक नृप और देवोंसे वेष्टित हो बड़ी विभूतिके साथ विवाहके लिये चल दिये। मिथिलापुरी उस समय रंग विरंगी ध्वजाओंकी पक्तियोंसे भांति भांतिके नृत्य और वाजे आदिसे जायमान सैकड़ों प्रकारके महोत्सवोंसे व्याप्त थी। राजद्वारसे निकलकर भगवान पृथ्वीपुरकी ओर जाने लगे। अपने पहिले जन्ममें उन्होंने अपराजित विमानकी विभूतिका उपभोग किया था इसलिये मिथिलापुरीकी अद्वितीय शोभा देखकर उन्हें अपराजित विमानका स्मरण उठ आया। उन्हें उसी समय संसार शरीर भोगोसे वैराग्य हो गया एवं अवधिज्ञानके धारक वे भगवान मल्लिनाथ अपने चित्तमें इस प्रकारका विचार करने लगे ॥८५-६०।- अपराजित विमानके अंदर जिन भोगोंका भोग किया गया वे भोग महामनोज्ञ थे तृप्तिको करनेवाले उत्कृष्ट थे, अनुपम थे और सुखके कारण थे जब यह जीव उन विपुल भोगोंसे भी तृप्त नहीं हुआ तब क्या यह इस लोकके ऐसे भोगोंसे तृप्त हो सकता है ? जो भोग बड़े दुःखसे प्राप्त होते है, अनेक प्रकारके दुखोंको देनेवाले हैं, शरीरको नष्ट भ्रष्ठ करनेवाले हैं, अत्यन्त तुच्छ हैं और आधि व्याधि आदि अनेक व्यथाओंके समुद्र है ॥६१-६२॥ई धनके विपुल भी ढेरसे अग्निकी तृप्ति नहीं होसकती परन्तु कदाचित् दैवयोगसे उस ईधनसे अग्निकी तृप्ति हो जाय। अनेक नदियोंके प्रवाहोंसे समुद्रकी तृप्ति नहीं होती परन्तु कदाचित् दैवयोगसे उसकी भी तृप्ति हो जाय । अनेक प्रकारके धनके संग्रहसे लोभी पुरुषको तृप्ति नहीं हो सकती परन्तु दैवयोगसे कदाचित् उसकी भो तृप्ति हो जाय परन्तु जो पुरुष विषयोंमें आसक्त कामी है उसकी भले प्रकार भोगे जानेवाले अनंते भवोंसे प्राप्त होनेवाले जिनका मिलना बड़ी कठिनता १ वनस्तृणकाष्ठसवयैरपि तुप्येदुधिर्नदीशत.। न तु कामसुखै पुमानहो वलवत्ता खलु कापि कर्मण ॥ चन्द्रप्रभ काव्य । ६२ मल्लिक ས तृप्तिमेति क्वचिहवादग्निरिधनराशिमि. । सरित्पूरै. समुद्रो वा लोभी च धनसंग्रहात् ॥ १३॥ कामी न जातु संभुतश्चानतमवगोचरे। दुर्लभैविषयासक्तो मोगरत्यतदुस्त्यजै ॥ १४ ॥ इयंत कालमेवाय भोगासक्तमना जनः । भुजानो विविधं दुखं भ्रमितो दुर्भवाटवीं ॥ ५ ॥ भोगशा वर्तते यावधिते सर्वाशुभाकरा। तावत्कुत सता मोक्षस्त विना च कुतः सुख ॥ ६ ॥ ज्ञात्वेति प्रथमं त्याज्या सर्वे भोगा इबोरगा. । हालाहलनिभा दू शत्रवो वा मुमुक्षुभि ॥ ६७ ॥ मुमुक्षणामतश्चेदं महालजानिरन्धन । विवाहादिकर कम शिवन्न भवकारणं ॥ १८ ॥ से है एवं जिनको छोड़ते समय भी महा कष्ट जान पड़ता है ऐसे भोगोंसे कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती ॥६३-६४॥ मनमें अत्यन्त भोगोंकी लालसा रखनेके कारण ही यह जीव इतने विपुल काल पर्यंत अनेक प्रकारके दुखोंको भोगता २ इस दुष्ट संसाररूपी महाभयानक वनीके अंदर चक्कर लगाता फिरता है एवं भोगोंमें अत्यन्त आसक्त होनेके कारण इसे वास्तविक मार्गका ज्ञान नहीं होता ॥ ६५ ॥ यह भो- गोंकी तीव्र अभिलाषा संसारमें अनेक प्रकारके अशुभोंको उत्पन्न करनेवाली है जबतक यह चित्तके अंदर विद्यमान है तबतक कभी भी जीवोंको मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सक्ती और जवतक मोक्षकी प्राप्ति नही तबतक वास्तविक सुख भी प्राप्त नहीं हो सकता इसलिये यह भोगोंकी अभिलाषा ही वास्तविक सुखकी बाधक है॥६६॥ इसलिये जो पुरुष भोगोंके स्वरूपके वास्तविक रूपसे जानकार हैं और मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें चाहिये कि वे भोगोंका स्वरूप अच्छीतरह जान कर सबसे पहिले इन भोगोंको से ही छोड़ें क्योंकि ये भोग साक्षात् सर्पके समान हैं अर्थात सर्प जिसे डस लेता है फिर वह जल्दी उछं- गता नहीं उसीप्रकार भोगरूपी सर्पो का डसा हुआ भी जल्दी नही उछंगता तथा ये भोग हलाहल विषके समान है अर्थात् जिसप्रकार हलाहल विषको पीनेवाला बचता नहीं उसीप्रकार भोगोंका काटा हुआ भी नही बचता इसीलिये ये विषय शत्रु स्वरूप हैं क्योंकि इनसे किसी प्रकारको भलाईकी आशा नहीं ॥ ७॥ इसलिये जो महानुभाव मुमक्षु हैं संसारके समस्त प्रकारके बंधनोंको तोड़कर केवल मोक्ष ही चाहनेवाले हैं उन्हें विवाह आदिका कार्य सर्वथा छोड़ देना चाहिए क्योंकि यह विवाह आदिका कार्य अत्यन्त लज्जा का कारण है मोक्ष सुखका घात करनेवाला है और संसारमें घुमानेवाला है ॥६॥और भी यह बात है कि यह विवाह मिथ्या मंगलोंसे युक्त है अर्थात् विवाहमें जितने भी मंगलाचार किये जाते हैं वे सब मल्लि० पुराण अलीकमगलोपेत. कृत्स्नदुःखादिसागर । चिंतादिशतकृन्नृणा विवाह शर्मणे कुत. ॥ ६६ ॥ विना खलया नारी वाह्यातबंधकारिणी । दु'फला भववल्ली वा सता नरकपद्धतिः ॥ १०॥ शत्रु तुल्याः सुता विश्वधनधान्यादिभक्षकाः । इन्द्रजालनिभा लक्ष्मी' कुटुम्वं पाशसन्निभं ॥१०॥ जीवित चपल पुंसा प्रातर्दर्भजलोपम । चाक्षार्थाः स्वजना विश्वे कामार्था क्षणभगुरा. ॥ १०२ अतो वृत्तं समादाय वालत्वेऽपि विचक्षणे । मिथ्या है समस्त दुख आदि विपत्तियोंका समुद्र है एवं विवाह होते ही सैकड़ों प्रकारकी चिंता पीछे लग जाती हैं इसलिये यह सैकड़ों प्रकारकी चिंताओंका कारण है इसलिये यह विवाह कभी भो कल्याणका करनेवाला नहीं हो सकता—जो महानुभाव इसे कल्याणका करनेवाला समझते हैं वह केवल भ्रम ही है ॥ ६६ ॥ मनुष्य आदिका शरीर सॉकलसे ही जिकड़ कर वांधा जाता है परन्तु यह स्त्री सांकलके बिना ही भीतर बाहर दोनों प्रकारसे बांधनेवाली है अर्थात् अन्तरंगमें मोहकी तीव्रतासे मनुष्य स्त्रीको छोड़- कर नहीं जा सकता और वाहिरमें जब छोड़कर चलता है तब वह उसके पीछे पड़ती है इसलिये भी छोड़कर नहो जा सकता तथा यह स्त्री खोटे फलोंको धारण करनेवाली संसाररूपी वेल है अर्थात बेलपर अच्छे बुरे सब प्रकारके फल आते हैं परन्तु स्त्रीरूपी संसार वेलसे सदा दुष्ट फलोंकी ही प्राप्ति होती है। . विशेष क्या ? यह स्त्रो साक्षात् नरकका मार्ग है ॥ १०० ॥ पुत्र जिनको कि संसारमें उत्कृष्ट पदार्थ माना जाता है वे महा शत्रु है एवं संसारके समस्त धन धान्योंको भक्षण करनेवाले हैं। लक्ष्मी जो कि संसारमें बहुत बड़ी चीज मानी जाती हैं वह इन्द्रजालके समान निस्सार है क्योंकि जिसप्रकार इन्द्रजालका ठाट वाट देखते २ विलीन हो जाता है उसीप्रकार लक्ष्मीका वैभव भी देखते देखते विलीन हो जाता है तथा यह कुटुम्ब साक्षात् पाशके समान है ॥ १०१ ॥ प्रातःकालमें जिस प्रकार दर्भकी अनीपर लगो हुई जलकी अत्यन्त चंचल क्षण विनाशीक होती है उसीप्रकार मनुष्यों का जीवन भी अत्यन्त चंचल और विनाशीक है तथा इन्द्रियोंके विषय बंध बांधव आदि स्वजन एवं संसारके समस्त काम भोग क्षणभंगुर हैं ॥ १०२ ॥ इसलिये जो पुरुष विचक्षण हैं वास्तविक रूपसे संसारके स्वरूपके जानकार हैं उन्हें बाल अवस्थामें ही सम्यकचारित्रको ग्रहण कर लेना चाहिये एवं प्रतिक्षण अपनी मौतकी आशंका कर उन्हें बहुत जल्दी मोक्षकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ १०३ ॥ जबसे जीव उत्पन्न होता है तभीसे यह यमराज। - -- 1. पुराण - साधनीयो द्रुत मोक्षो मृत्युमाशक्य चात्मन ॥ १०३ ।। आजन्मतो यम स्वातं जीवान्नयति प्रत्यहं । दिनाये यद्यहो कात्र धर्म कालविलंबना ॥१०॥ अक्षायुगृहराज्यभोगपरिवारश्र.यादयश्चचला शपामाश्च न विद्यतेऽत्र शरणं मृत्यो सुधर्म विना। ससारोऽति भयंकरोऽतिचपलो दुर्घणवोऽशर्म- मल्लि० भृदेकोऽशप्यघपातक प्रतिदिन दुसी भ्रमेत्ससृति ॥१०५॥ आत्मान्योंऽगकुटुम्ब कर्म सकलोऽज्ञानी प्रकृत्या महान् । कायोऽयं यमधामदु सजलधिः सर्वाशुचीना निधि । मिथ्यात्वादिभवोऽप्यनतभवकृत कर्मास्त्रको दुखद., साधादिनिरोधनोऽसुखहरो मोक्षप्रद. सवर. ॥ १०६ ॥ दु कर्मक्षय. दिन पक्ष मास आदिके हिसाब से जीवको मृत्युके मखमें प्रविष्ट ' करानेका प्रयत्न करता है इसलिये धर्मके अन्दर इसप्रकार कालका विलंब नही करना चाहिये कि हम आज न धर्म सेवन करेंगे तो कल करलेंगे वा यह समय विषय भोग भोगनेका है वृद्धावस्थामें जाकर धर्म करलेंगे क्योंकि मृत्युका कोई निश्चय नही ॥१०॥ संसारके अंदर इन्द्रियां आयु घर राज्य भोगोपभोग परिवार और लक्ष्मी आदि जितने भी पदार्थ है वे सब जिस प्रकार विजली चमक कर शीघ्र नष्ट हो जानेवाली है उस प्रकार नष्ट हो जानेवाले हैं यदि संसारमें शरण है तो एक समीचीन धर्म ही है। धर्मके सिवाय मृत्युके मुखसे वचानेवाला कोई भी शरण नहीं । यह संसार अत्यन्त भयानक है अतिशय चंचल है। अनेक प्रकारके दुखों का समुद्र है एवं अनेक प्रकारके कल्याणोंका करनेवाला है। ऐसे महा भयानक संसारमें यह विचारा दीन जीव अकेला ही अपने पाप कर्मों के फलसे महा दुखित हो भ्रमण करता फिरता है इसे रंचमात्र भी शांति नहीं मिलती ॥१०५ ॥ आत्मा पदार्थ ज्ञानी है। आत्मासे भिन्न शरीर कुटुम्ब और समस्त कर्म स्वभावसे ही महा अज्ञानी हैं। यह शरीर जिसका कि लोगोंको घमण्ड है वह यमराजके रहनेका स्थान है। अनेक प्रकारके दुःखोंका समुद्र है एवं रक्त मांस आदि जितने भी अपवित्र पदार्थ हैं उन सबका खजाना है। तथा कर्मो का आस्रव मिथ्यात्व अविरति आदि कारणोंसे जायमान है। अनंतकाल पर्यंत संसारमें घुमाने वाला है एवं नाना प्रकारके दुःखोंका देनेवाला है तथा संदर समस्त पाप कर्मों का रोकनेवाला है। दुःखका हरण करनेवाला है और मोक्षको प्रदान करता है ॥ १०६॥ संवरके बाद निर्जरा होती है वह निर्जरा समस्त अशुभ कर्मों की क्षय करनेवाली है उत्कृष्ट तपसे जायमान है और मोक्षको प्रदान करनेवाली है तथा यह लोक दुख और सुख का स्थान है, अत्यन्त विषम है, अनादि है एवं ऊर्ध्वलोक मध्य लोक पाताललोकके भेदसे तीन प्रकारका

मल्लिक
कारिणी वरतपोजा निर्जरा मुक्तिदा लोको दुःखसुखाकरोऽतिविषयोऽनादिस्त्रिधा शाश्वत । मानुष्य सकलद्रियं च सुकुलं बोध्यादिकं दुर्लभ, धर्मों
विश्वसुसाकरो दशविधो दुःखाखिलाघातक ॥ १०७॥ इति कुम (मा) रजिनेशो भावना द्वादशैव विरजसि हृदयेऽनुचिंत्य संवेगसर्व। शिवसु.
चरणहेतु प्राप य काललब्ध्या भववपुपि सुखादौ सोऽस्तु मे तद्गुणाप्त्ये ॥ १०८॥
इति श्रीमल्लिनाथचरिने भट्टारक श्रीसकलकीतिविरचिते मल्लिनाथवैराग्योत्पत्तिवर्णनो नाम पंचम परिच्छेदः ॥५॥
६
पुरा
N
१
सदा रहनेवाला है। संसारहै मनुष्य भवका पाना, समस्त इन्द्रियोंका पूरा होना उत्तम कुलका मिलना एवं
सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र स्वरूप बोधिका होना महा दुर्लभ है-बड़ी कठिनतासे इनकी प्राप्ति
होती है। धर्म समस्त संसारके सुखों का स्थान है। उत्तम क्षमा १ उत्तम मार्दव २ उत्तम आर्जव ३ उत्तम
शौच ४ उत्तम सत्य ५ उत्तम संयम ६ उत्तम तप ७ उत्तम त्याग ८ उत्तम आकिंचन्य है और उत्तम ब्रह्म-
चर्य १० के भेदसे दश प्रकारका है एवं संसारके अन्दर जितने भो दुःख हैं उन सबका सर्वथा नाश करने
वाला है ॥ १०७॥ इसप्रकार अनित्य १ अशरणत्व २ संसार ३ एकत्व ४ अन्यत्व ५ अशुचित्व ६ आत्रव
७ संवर ८ निर्जरा ६ लोक १० वोधिदुर्लभ ११ और धर्म १२ इन बारह भावनाओंका अपने निर्मल
चित्त में विचार करनेसे उन कुमार भगवान मल्लिनाथको संसार शरीर और विषय सुख आदिसे मोक्ष
प्राप्तिका प्रधान कारण संवेग हो गया। उस समय सिवाय आत्मस्वरूपके कोई भी उन्हें अपना न
सूझने लगा ॥ १०८ ॥
इसप्रकार भट्टारक सकलकीर्ति द्वारा विरचित सस्कृत मल्लिनाथ चरित्रकी पं० गजाधरलालजी न्यायतीर्थविरचित हिन्दी वचनिकामें
भगवान मल्लिनाथकी वैराग्य उत्पत्तिका वर्णन करनेवाला पाचवां परिच्छेद समाप्त हुआ ॥५॥

मल्लि. . षष्ठः परिच्छेदः। निदग्ध येन वाल्येऽपि विषयारण्यमजसा । साध दुष्कर्मवृक्षौघेस्तपोऽग्निनात्र त स्तुवे ॥१॥ अथ देवर्पयो दक्षा निसर्गब्रह्मचारिणा । एकावतारिण, पूज्या द्विसप्तपूर्ववेदिन. ॥ २॥ लोकातिकास्तदागत्य सारस्वतादयोऽष्ट्या । मूर्ना नत्याऽतिभक्त्या तं स्तोतु प्रारेभिरे जिनं ॥३॥ त्व देव त्रिजगत्स्वामी त्व त्रातासि भवार्णवात् । कर्ता त्वमेव लोकेऽस्मिन् धर्मतीर्थस्य तीर्थराट् ॥४॥ नि कारणो जगद्वन्धु कृपानाथस्त्वमेव हि। त्वमेव मुक्तिकापाया भर्ता सभवसि स्वय॥५॥ न सबोधयिताऽसि त्व न योध्योऽस्माभिरेव च । दीयते किं प्रकाशाय दीपो दिनकरस्य च अथ छठा परिच्छेद। --- जिन भगवान मल्लिनाथने तपरूपो जाज्वल्यमान अग्निके द्वारा विषयरूपी विस्तीर्ण वन मय दुष्कर्मरूपी वृक्षों की श्रेणोके बाल अवस्थामें ही देखते देखते भस्म कर डाला। उन वाल ब्रह्मचारी जिनेंद्रको मैं भक्ति भावसे प्रणाम करता हूं ॥१॥ संसार शरीर भोगोंसे विरक्त होकर जिस समय भगवान मल्लिनाथ बारह भावनाओंका चिन्तवन कर रहे थे उसी समय लौकांतिक देव जो कि अपने परम पवित्र भावोंसे देवोंमें ऋषि कहे जाते हैं, महा चतुर होते हैं, स्वभावसे ही ब्रह्मचारी होते हैं, एक भवावतारी होते हैं अर्थात् मनुष्यभव धारण कर ही मोक्ष चले जाते हैं अतएव पूज्य होते हैं चौदह पूर्वो के धारक होते हैं एवं सार- स्वत आदित्य आठःजिनके भेद हैं, शीघ्र ही भगवानके समीप आये मस्तक झुकाकर नमस्कार किया एवं भक्तिसे गद्गद् हो वे भगवान जिनेन्द्रकी इसरूपसे स्तुति करने लगे- हे देव ! तुम तीन जगतके स्वामी हो, संसाररूपी अगाध समुद्रमें डूबते हुये प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले आप ही हैं । हे तीर्थोके राजा ! इसलेोकमें इस समय धर्मतीर्थके प्रवर्तक आप हो हैं ॥ २-४॥ हे प्रभो! आप समस्त जगतके अकारण बंधु हैं कृपानाथ हैं एवं आप ही स्वयं मुक्तिरूपी स्त्रीके स्वामी होनेवाले हैं ॥ ५॥ लोग ऐसा समझते हैं कि जिस समय भगवान तीर्थंकरको वैराग्य होता है उस समय लौकॉतिक -- पुर ॥६॥ त्व स्वयंभू स्वयंबुद्धो विश्वज्ञो ज्ञाननेत्रवान् । स्वान्ययोहितकद्द व त्वयाऽत्रेदमनुष्ठितं ॥७॥ यतो वाल्येऽपि तीर्थेश ! मोहारि मदनादिभिः । साधं हत्वा विरागासिना चारित्रे मतिः कृता॥ ८॥ भुक्त्वा ये विविधान् भोगान् रुच्यते त्यति न। तदाश्च (स्व ) र्यमिदं चित्रं त्वयिनाथ मलि० देव उन्हें आकर संबोधते और उनके वैराग्यको दृढ़ करते हैं परन्तु हे भगवान! यह कहना कल्पनामात्र है क्योंकि जिस प्रकार अखंड दीप्तिका भंडार सूर्य स्वयं प्रकाशमान है उसे प्रकाश करनेकेलिये दीपककी आव- श्यकता नहीं पड़ती उसी प्रकार हे नाथ! उत्तम ज्ञानके धारक आप हम सबोंके सम्बोधनेवाले हैं हमें समीचीन मार्गके सुझानेवाले हैं हमारे द्वारा कभी भी आप सम्बोधे नहीं जा सकते अर्थात् हमें आपको सम्बोधन करनेवाला बतलाना सूर्यको दीपक दिखाना है ॥ ६॥ हे भगवान ! आप स्वयं उत्पन्न होनेवाले हैं इसलिये स्वयंभू हैं। आपको सम्बोधन करनेवाला कोई अन्य नहीं अपने सम्बोधन करनेवाले आप ही हैं इसलिये आप स्वयंबुद्ध में समस्त लोक अलोकको जाननेके कारण आप सर्वज्ञ हैं। ज्ञानरूपी नैत्रके धारक हैं। हे देव ! आपने जो विचार किया है वह अपना पराया हित करनेवाला है इसलिये वह सर्वथा उपयुक्त है क्योंकि हे दयासागर भगवान ! वाल्य अवस्थाओंमें ही आपने वैराग्यरूपी तीक्ष्ण खङगके द्वारा अत्यन्त भयङ्कर कामदेव आदिके साथ मोहरूपी शत्रु को नष्टकर महा तीक्ष्ण सम्यक चारित्रके धारण करनेका साहस किया है ॥७-८॥ अनेक प्रकारके भोगोंको भोगकर जो पुरुष तृप्ति होनेपर भी उनसे विरक्त नहीं होते यह आश्चर्य है अर्थात् तृप्ति होनेपर भोगोंका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये किन्तु जो ऐसा नहीं करते वे बड़ा अचरजका काम करते हैं परन्तु मोक्ष प्राप्तिके लिए सर्वथा उद्यत आप ने विना ही भोगे उनका सर्वथा त्याग कर दिया यह सबसे बढ़कर आश्चर्यको बात है इसलिये हे नाथ ! इस संसारमें सबसे धन्यवाद के पात्र आप ही हैं । हे भगवान ! बाल्य अवस्था हो में आप रागके जीतने वाले हैं अर्थात् किसी भी पदार्थमें आपका राग नहीं सबसे अधिक राग की कारण स्त्री है सो उसका वंधन भी आपने नष्ट कर दिया--विवाहसे ही विरक्त हो गये, इसलिए मुखमें पहुंचते हुये ग्रासके त्यागके कारण अर्थात् रागके तोत्र वन्धन विवाहसे सर्वथा मुह मोड़ने और सम्यक चारित्रमें प्रवृत्त होनेके कारण ६८ मलि. पुराण शिवोद्यते ॥ ६ ॥ अतो नाथ ! त्वमेवात्र धन्यो वात्येऽपि रागजित् । मुखग्रासागतत्यागान्नान्यस्त्वत्सदशो भुवि ॥ १०॥ त्योदिनमहाशानपोत- मासाद्य धीधनाः ! भवाब्धिमुत्तरिष्यति स्वामिन्नत्र न संशय ॥ ११ ॥ भवद्वाक्यामृत पूर्ण धर्मतीय विदो महत् । आप्य प्रक्षालयिष्यति दुष्कर्म मलस वा ॥ १२ ॥ त्वं ज्ञानज्योत्स्नया देव ! मोहादिध्यातमजसा। हत्वा सलोकयिष्याति भव्या मुक्तिपयं भुवि ॥ १३ ॥ भवंत पोतसादृश्य सहायीकृत्य योगिनः । केचिद्यास्यति निर्वाण रत्नत्रयधनेश्वराः ॥ १४ ॥ भवद्धर्मोपदेशेनोपाान्यपरम वृण । भव्या सर्वार्थसिद्धिं च नाक वा त्वत्सम श्रिय ॥ १५ ॥ केचिद् चेयक दिव्यं केनिश्चक्रयादिगोचरा। लक्ष्मी केचिन्महाभोगान् वै भोक्ष्यन्ति न चन्यथा ॥ १६ ॥ आप एक अद्वितीय व्यक्ति हैं आपके समान कोई भी नररत्न संसारके अंदर नहीं ॥६-१०॥ हे प्रभो! आपके अन्दर महाज्ञान केवलज्ञानका उदय होगा उस केवलज्ञानरूपी जहाजका आश्रय कर अर्थात् उस केवलज्ञानको कृपासे यथार्थ उपदेश पाकर ये विद्वान भव्य प्राणी ससाररूपो महागंभोर समुद्रको तर जावेंगे इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ ११ ॥ गंभीर जलसे भरा हुआ गंगा आदिका तार्थ जिस प्रकार मेलका काटने वाला माना जाता है- उसी प्रकार तुम्हारी वचनरूपी अमृतसे परिपूर्ण विशाल धर्मरूपी तीर्थको पाकर भव्य जीवोंके दुष्कर्मरूपी मैलका समूह नियमसे धुलेगा ॥ १२ ॥ हे देव ! तुम्हारे ज्ञानरूपी चांदनीकी ही कृपासे मोह आदि रूप विपुल अन्धकारको नष्ट कर ये भव्यजीव इस संसारमें मोनके मार्गको भले प्रकार देखेंगे॥ १३ ॥ जिसप्रकार रत्नोंके व्यापारी सेठ जहाजकी सहायतासे अपने अभीष्ट स्थानपर पहुंच जाते हैं उसी प्रकार जो योगी रत्नत्रयरूपी विशिष्ट धनके स्वामो हैं वे जहाजके समान आपकी सहायता पाकर मोक्ष को प्राप्त होंगे॥ १४ ॥ हे भगवन् ! तुम्हारे द्वारा समीचीन धर्मका उपदेश सुन उत्तम धर्मका उपार्जनकर कोई कोई भव्य सर्वार्थसिद्धि प्राप्त करेंगे। बहुतसे स्वर्ग जांयगे और बहुतसे तुम्हारे समान लक्ष्मी प्राप्त करेंगे अर्थात आपके समान तीर्थकर होकर अनन्त विभूति प्राप्त करेंगे॥ १५॥ कोई कोई दिव्य वेयक में जन्म धारण करेंगे कोई २ अत्यन्त पुण्यशाली चक्रवर्तीके होनेवाली लक्ष्मी प्राप्त करेंगे और कोई २ महानुभाव नियमसे मोक्ष प्राप्त करेंगे किन्तु उपदेशके विना सर्वार्थसिद्ध आदि विशिष्ट अभ्युदयके कारण स्थानोंकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ १६॥ इसलिये हे देव । हमारी यह विनम्र प्रार्थना है कि आप कालका अल्प भी बिलम्ब न कर शीघ्र ही संयम धारण करें जिससे अपना पराया अलौकिक हित हो क्योंकि जब पुट अतो देव । त्वमेवाशु मुक्त्या कालविलवितं । गृहाण सयम येन स्वान्ययोहि तमद्भुत ॥ १७ ॥ इत्यभिष्टुत्य तोंर्थशं संप्रार्थ्य यद्गता थियौं । मल्लि० मुहुर्नत्वा प्रशस्यौच्चैर्दिव्यवाक्य मनोहर ॥१८॥ कृत्वात्मीय नियोगं ते दीक्षाकल्याणशंसिनः। उपाय बहुधा पुण्यं ब्रह्मलोकं मुदा ययु ॥ १६ ॥ अथ दिव्यविभूत्यामा जगदाश्चर्यकारिण । गीतनर्तनवाद्याद्य. स्वस्ववाहनमाश्रिता ॥ २०॥ चतुर्णिकायजा. शका. सकलत्रा सुरावृताः । धर्मात्तमानसास्तत्राजग्मु कल्याणसिद्धये ॥ २१ ।। ततस्त परिनिष्कातिकल्याणाय सुरै सम । अभिपिच्य महाभूत्या कुंभ क्षीरावुसभृतै ॥ २२ ॥ देवेंद्रा भूपयामासुरारोप्य हरिविष्टरं । भूपर्णः परमाल्यर्वस्त्रश्च मलयोद्भवै ॥२३॥ दिव्यवाण्या प्रबोध्यानु महाकप्टेन मोहिन । पित्रादींश्च श्रिय त्यक्त्वा तृणवत्सयमोद्यतः ॥ २४ ॥ इन्द्रहस्तं समालव्यारुरोह भूपणान्वित. । यान जयतसंज्ञस पराद्धर्यमणिनिर्मितं ॥२५॥ देवोऽसौ शिविकारूढ़ो तक आप संयम न धारण करेंगे तब तक न तो आप अपना हित कर सकते हैं और न किसी दूसरेका ही ॥१७॥इसप्रकार भगवानके दीक्षा कल्याणको प्रशसा करनेवाले लौकांतिक देवोंने, पूर्वोक्त प्रकारसे भगवान मल्लि- नाथकी स्तुतिकर, 'आपको जो कुछ विभूति प्राप्त है वह विभूति हमें भी प्राप्त हो' ऐसी प्रार्थनाकर वार बार नमस्कारकर एवं मनोहर दिव्य वाक्योंसे प्रशंसा कर अपना नियोग समाप्त किया तथा इन शुभ चेष्टाओंके द्वारा बहुत प्रकारसे पुण्य उपार्जनकर वे अपने निवास स्थान ब्रह्मलोकको सानंद चले गये ॥ १८-१६ ॥ लोकांतिक देवोंके चले जानेके बाद चारो निकायके इन्द्रगण उनके तप कल्याणकी पूजाके लिये मिथि- लापुरी आए वे देव उस समय बड़ी विशाल विभूतिसे मंडित थे। गीत नृत्य और बोजे आदिसे समस्त जगतको आश्चर्य करनेवामै थे, अपनी २ देवांगना और आज्ञाकारी देवोंसे व्याप्त थे और अत्यंत धर्मात्मा थे॥ २०-२१ ॥ मिथिलापुरीमें आकर चारो निकायके इन्द्रोंने अपने साथमें आए हुए देवोंके साथ दीक्षा कल्याणके उपलक्षमें क्षीरोदधिसे भरे हुए मनोहर कलशोंसे भगवान जिनेंद्रका बड़े ठाट बाटके साथ अभिषेक किया। सिंहासनपर विराजमानकर उत्तमोत्तम भूषण मालायें और मलयागिरिके वस्त्रोंसे उनका श्रृंगार किया ॥ २२-२३॥ भगवान जिनेंद्रका इसप्रकार जिनदीक्षाके लिये उत्साह देखकर परम मोही उनके माता पिता महाशोक और महा दुःख करने लगे। भगवान जिनेंद्रने बड़े कष्टसे उन्हें मनोहर वाणीसे समझाया और दिलासा दी। जीर्ण तृणके समान समस्त लक्ष्मीका परित्याग कर दिया एवं संयम धारण करनेके लिये सर्वथा तैयार होगए ॥ २५ ॥ १०० चीज्यमानः सुचामरे. । सितैर्देवकराजस्थैर्वरो वाभात्तप.श्रिय ॥ सप्तपदानि तामूह स्कंधेन प्रथमं नृपा. । ततो विद्याधरानिन्युयॉन्लि सप्तपदावली तत स्वकंधमारोप्य शिविका ता सुरासुरा । खमुत्पेतुः प्रमोदाढ्या जनानां दृष्टिगोचरं ॥ मोहारिविजयोद्भूतगीतप्रस्थानमंगले.। ध्वनद्विर्विवि- माल || धर्वाधर्तनोत्सवकोटिभि ॥ मोहारिविजयोद्योगं घोषयतो जगद्गुरो । जयकोलाहल चक्र ईष्टा अग्ने मुदा सुरा ॥३०॥ इत्यादिकृतमाहात्म्यकरपेशे १०१ परितो वृतं. । देव. पुराद्विनिष्कामन् पौर रित्यभिनदित ॥ ३१ ॥ व्रज सिद्धये हतारीश्च शिव पन्या विभोस्तु ते जय नदेश देव त्व विश्वकल्याण- भूषणोंसे शोभायमान वे भगवान जितेंद्र इन्द्रके हाथका सहारा लेकर उत्तमोत्तम मणियोंसे निर्मित जयंती ® नामकी पालकीमें शोघही सवार होगये ॥ २६ ॥ जिस समय वे पालकीमें बैठ गए उससमय दवगण अपने हाथोंमें धारणकर सफेद चमर उनपर ढोरने लगे इसलिए उससमय वे ऐसे जान पड़ने लगे मानो तपरूपी लक्ष्मीके ये साक्षात् दूल्हा हैं ॥ २६ ॥ सबसे पहिले सात तेड़ तक तो राजा लोग अपने कंधोंपर रखकर उनकी पालकी ले चलने लगे। उनके बाद आकाशमें सात पैंड तक उनकी पालकी विद्या- धरगण ले चले। उनके पीछे सुर और असुरोंने उनकी पालकी अपने अपने कंधोंपर रक्खी। एवं आनंदसे गद्गद वे मनुष्योंको दृष्टिके गोचर होकर आकाशमें चलने लगे ॥ २७ ॥ उससमय मोहरूपी शत्रुके विजय संबंधी गीत, प्रस्थानं मंगल, नानाप्रकारके वजनेवाले बाजे और नृत्य इस प्रकार करोड़ों उत्सवों के साथ तीन जगतके गुरु भगवान जिनेंद्रके मोहरूपी शत्रुके विजयकी घोपणा करते हुये वे देव उससमय आनन्दसे पुलकित थे एवं बड़े हर्षसे “ हे देव ! आपकी जय हो, जय हो,” इसप्रकार उनके आगे आगे जय जय शब्दका कोलाहल करते चले जाते थे॥ २६-३०॥ चारों ओरसे घेरकर खड़े रहनेवाले देवेंद्रोंद्वारा जिनका उपयुक्त रूपसे माहात्म्य प्रकट किया गया है ऐसे वे भगवान जिनेंद्र जिससमय मिथिलापुरीसे वाहर निकले थे उस समय पुरवासो लोगोंने उनका इस रूपसे अभिनन्दन किया था। हे स्वामिन् । हे देव ! आप मोनलक्ष्मी प्राप्त करनेके लिये सिधारें। कर्मरूपी शत्रुओंके नाश करने में आप समर्थ हों। हे प्रभो ! तुम्हारा मार्ग कल्याणका करनेवाला हो। आप जयवंते रहें, नार्दै विरदें एवं * हरिवंशपुराणर्मे मलिल्लिनाथ भगवानकी पालको का नाम जयंती लिखा है ।

पुराण १०२ भाग भव ॥३२॥ तपोऽयं तं व्रज तं विलोक्य केचिद्विवक्षणा । जगुः परम्पर' हीति परमाश्चर्य कारणं ॥ ३३ ॥ अहो परय महौंदं चित्र मल्लि. देवोऽयमद्भुतः । त्यक्त्वा बाल्येऽपि कन्यादीन् यतो गृदाति संयमं ॥ ३४ ॥ अन्ये प्राहुरहो नेद चियं किन्तु जिनोप्यय। हत्वा बानीन् जगद्राज्य स्वयशे सकरिष्यति ॥ ३५ ॥ परे प्राहुरहो केविजायते पुरुषोत्तमा. । अन हतु अमा' कोमारत्वेऽप्यिक्षस्मरापरीन् ॥ ३६॥ इत्यादिविविधालाप: श्लाघ्यमान पुरैर्जने । सयमश्रीराभोऽसौ पुरोपातं ( ? ) न्यनीथियान् ।। ३७ ॥ जय मप्रस्थिते सूनो जिनागगन पुरावृता। धुमि सह शोकादया स्वपुत्रमनु निर्ययो ॥ ३८ ॥प्रस्पलत्पदपिन्यासमुक्तकेशा गतप्रमा। हा पुत्र निन्दनी प्रताउयती निजोदर ॥ ३६॥ नहियोगानिदग्धागा बांध. समस्त प्रकारके कल्याणोंके प्राप्त करनेवाले हों॥ ३२ ॥ जिस समय भगवान तपके लिये जा रहे थे उस समय उन्हें देखकर बहुतसे चतुर पुरुष आपसमें यह कहकर अत्यन्त आश्चर्य करते थे कि देखो ! यह वात बड़ी ही अचरज करनेवाली है कि महान शिद्धिके धारी. अद्भुत पराक्रमशाली ये भगवान जिनेन्द्र बाल अवस्थामें ही कन्या आदि लुभानेवाले पदार्थासे ममत्व तोड़कर संयम धारण करनेके लिये चल दिए हैं ॥ ३३-३४॥ अन्य बहुतसे मनुष्य यह कहते थे कि इसमें आश्चर्य करनेकी कोई बात नहीं है। ये भग- वान जिनेंद्र कम चतुर नहीं हैं क्यों कि ये नियमसे समस्त घातिया कोका नण्टकर तीन लोकके राज्यको अपने वशमें करना चाहते हैं और नियमसे उसे अपने आधीन करेंगे ॥ ३५ ॥ बहुतसे चतुर पुरुष यह विचार प्रदर्शित करते थे कि इस संसारमें विरले ही ऐसे पुरुष उत्पन्न होते हैं जो कुमार अवस्थामें ही इंद्रिय ओर कामदेवरूपी बेरीके जीतनेमें पूरी पूरी सामर्थ्य रखते हैं ॥ ३६॥ इस प्रकार अनेक प्रकारके वचन कह कह कर पुरवासी जनोंसे प्रशंसा किये गये और संयमरूपी लक्ष्मीके वरसरोखे जान पड़नेवाले वे भगवान जिनेंद्र पुरवासी जनोंके अदृश्य हो गये थे॥ ३७॥ जिससमय भगवान जिनेंद्र दीक्षाके लिए चले गए उनकी माता प्रजावतीको बड़ा दुःख हुआ शोकसे विह्वल हो वह अपनी अंतः पुरकी रानियों ओर बन्धु बांधवोंके साथ भगवान जिनेंद्रके पीछे पीछे चलने लगीं ॥ ३८ ॥ रानी प्रजावतीको दशा उस समय बड़ी दयाह थो दुःखकी तीव्रतासे उसके दोनों पैर लड़ते २ जमीन पर गिरते थे। शिरके बाल बुरी तरह बीखर रहे थे, शरीरको सारी कांति फीका पड़ गई थी। हाय प्यारे पुत्र । तू मुझ अभागिनीको क्यो छोड़कर दीक्षाके लिए चल दिया। इसप्रकार वार वार रोती १०२ मल्लिक पुराण यस्तदा। निपेतुभूतले केचिन्मू मीलितलोचना ।। ४ ।। मत्स्वामिन् ! क्व गतोसि त्वं कदा मेलापकस्तव'। धरिप्याम. कयं प्राणांस्त्वड़ियो. गार्तचेतस.॥४१॥ इत्यादि शोचनैर्वाक्य त्याश्च वन्धर स्त्रिय । कुर्वतो रोदन देव्यामा मार्गेऽनुव्रजति तं ॥ ४२ ॥ महत्तरैस्तदागत्य तो निरुद्धय निरूपित । मात्रज त्व न कि वेत्सि देवि ! वृत्त जगत्पते ॥४३॥ मृगवद्ग हपाशे तिष्ठेत्क्य सिंह, कथ तव । वीतरागो मुमुक्षु. किं भोगान् भुनक्ति थी और अपनी छाती कूटती थी ॥ ३६ ॥ भगवान जिनेन्द्रके बहुतसे बंधुगण उनके वियोगरूपी अग्निसे अत्यंत दग्ध हो मूर्छासे वेहोश हो जमीनपर गिर गए एवं उन्हें उस समय इतना कष्ट हुआ था कि उन्हें अपने शरीरकी रंचमात्र भी सुध बुध न थी॥ ४० ॥ उनके वियोगसे अत्यन्त दुःखित चित्त, बहुतसे वन्ध- गण यह कह कहकर रुदन करते थे कि हे स्वामी भगवान जिनेंद्र! आप हमें छोड़कर कहां चले गये। अव कव हमें आपके दर्शन होंगे एवं आपके वियोगसे महा दुःखित हम कैसे संसारमें जीवित रह सकेंगे ॥४१॥ इसप्रकार अत्यन्त शोक परिपूर्ण वाक्योंसे भगवान जिनेंद्रके भृत्य बंधु बांधव और उनकी माता आदि स्त्रियां बड़े ऊंचे ऊंचे स्वरोंसे रोते चिल्लाते थे और भगवान जिनेंद्र जिस मार्गसे दीक्षावनको गये थे उसी मार्गपर शोकसे विह्वल हो दौड़ते चले जाते थे॥ ४२ ॥ वैमानिक देवोंमें एक महत्तर जातिके देव हे शोकसे विह्वल माता प्रजावतीको इसप्रकार जाती देख महत्तर लोग इनके पास आए और उन्हे रोक कर इसरूपसे नम्र निवेदन करने लगे- हे देवी! तुम जो इस तरह शोकसे विह्वल हो जा रही हो सो तुम्हारा जाना शोभा नहीं देता। भग- वान जिनेंद्र तीनो लोकके स्वामी है। समस्त हित अहितके जानकार हैं क्या तुम उनके हालको बिलकुल नही समझती हो ॥ ४३॥ मृग जिस प्रकार पाशके अंदर फंसकर बंध जाता है उसी प्रकार सिंह पाशके अंदर जिकड़कर नहीं रह सकता। हे माता! आपके पुत्र भगवान जिनेंद्र वीतराग हैं-समस्त संसारकी संपत्तिसे उनका राग छट चुका है और मुमुक्षु हैं-मोक्ष प्राप्तिके लिये पूरी अभिलाषा चित्तमें ठान ली है इसलिए भोगोंकी रमणीयता देखकर जिसप्रकार मूर्ख मनुष्य उनमें उलझ जाता है और उन्हें रात दिन भोगता है उस प्रकार वे भगवान जिनेन्द्र नहीं भोग सकते। उनके कार्यपर किसी प्रकार का शोक करना १०३ - - मल्लिक १०४ मूर्खवत् ॥ ४४ ॥ इत्यादि मधुरक्यिोंधिता सा सती समं। बंधुभिर्दा ति कष्टेन जगाम निजमन्दिरं ॥ ४५ ॥ अथ श्वेतवनोद्याने रम्ये पुष्पफला- दिभिः । सुरैः प्राग्निर्मितां शुद्धां मणिमण्डपभूषितां ॥४६॥ मङ्गलद्रव्यपार्श्वस्थां, स्फाटिकी सुवृत्तां शिलां। यानादवातरह वो निर्जरैरवतारितात ॥ ४७ ॥ झेत्रादिदशधाग्रन्थान् वाह्यान् स्रग्वस्त्रभूपणान् । द्विसप्ताभ्यतरं ग्रन्थास्त्रिशुद्धया व्युत्सृजेत्तदा ॥ ४८ ॥ तत. पूर्वमुख स्थित्वा नत्वा सिद्धान् पुराप परान् जिनः । केशानलुचत वद्धपल्य'क' पञ्चमुष्टिभिः ॥ ४६ ॥ मार्गशीर्षसितैकादशीदिनेऽतिशुभे-मुदा। अविन्याख्ये सुनक्षत्रे उच्चार्य सिद्धसा- बृथा है ॥४४॥ जब महत्तर जातिके देवोंने इसप्रकार मधुर वचनोंमें माता प्रजावतीको समझाया तो उनकी समझमें आगया एवं वह सती माता अपने वन्धुओंके साथ बड़े कष्टसे राज मन्दिरकी ओर लौट गई ॥ ४५ ॥ भगवान जिनेंद्रने जिस वनमें जिनदीक्षा धारण की थी उस वनका नाम श्वेतवन था। श्वेतवनका उद्यान उस समय बड़ा ही मनोहर था एवं जगह २ भांति भांतिके पुष्प और फल उनकी शोभा बढ़ाते थे देवोंने वहांपर पहिले ही एक शिलाका निर्माण कर रखा था। वह शिला अत्यंत शुद्ध थी मणिमयी मंडप से अत्यंत शोभायमान थो। उसके पसवाडोमें कलश झाड़ो आदि मंगलीक द्रव्य विद्यमान थे। स्फटिक- मणिकी बनी थी और- गोलाकार थी। शिलाके पास आते हो जिस पालकीको देवगण लाए थे भगवान जिनेंद्र उससे उतर पड़े। उसी समय भगवान जिनेंद्रने क्षेत्र १ वास्तु २ हिरण्य ३ सुवर्ण ४ धन ५ धान्य ६ दासी ७ दास ८ कुप्य ६ भांड १० इसप्रकार दश प्रकारका बाह्य परिग्रह और मिथ्यात्व १ स्त्रीवेद २ पुरुषवेद ३ नपुंसक वेद ४ हास्य ५ रति ६ अरति ७ शोक ८ भय ६ जुगुप्सा १० क्रोध ११ मान १२ माया १३ और लोभ १४ इसप्रकार यह चौदह-प्रकारका अंतरंग परिग्रह इसप्रकार चौवीस प्रकारके वाह्य और अभ्यंतर परिग्रहका मन वचन और कायकी विशुद्धतासे सर्वथा त्याग कर दिया । वे भगवान् मल्लिनाथ उसी समय पूर्व दिशाको ओर मुख कर बैठ गए। आठों कर्मों के सम्बन्धसे रहित भगवान् सिद्धिपरमेष्ठोको नमस्कार किया ऐवं पल्यंक आसन ( पलोती , माढ़कर पांच मुष्टियोंसे शीघ्र हो केश लूंचकर फैंक दिए ॥ ४६–४६॥ उन भगवान मल्लिनाथने अत्यंत शुभ अगहन सुदी १ समिथ्यात्वस्त्रयो वेदा हास्यप्रभृतयोऽपि षट् । चत्वारः कषाया. स्यु रत्वातथाश्चतुर्दश । यशस्तिलकचम्पू । - १०४ --- मल्लि. पुराण १०५ क्षिक ॥ ५० ॥ मोक्षमूलान् गुणान् मूलाख्यानटाविशतिप्रमान् । मुक्त्यै मुक्तिसपी जैनों दीक्षा देव उपाददौ ॥ ५१ ॥ सायाहूने भूमिप साधं त्यक्तरागै शतत्रिके । मुमुक्षुभिर्महादरुपवासद्रयान्वित. ॥५२॥ निरुद्धयाय जिनो योग सकरपाश्च परात्मनि । दध्यायानं विरस्याशु सावद्यान् सकलाश्चिदे ॥५३॥ केशान् रत्नपटल्या तानिधायाशुकसवृतान् । भक्त्या नीत्वा विभूत्या सुगः क्षीरोदे निचिक्षिपु॥५४॥ ईपन्नम्रानना भक्त्यो शकास्तग्दुणरजिताः। तत्कालोचितसद्वाक्य स्तोतुं प्रारेभिरे प्रभु ॥ ५५॥ त्व देव ! भुवनाधीशो गुरुत्स्व गुरुयोगिना धर्मवित्तोर्यकर्ता त्वं कृपानाथस्त्वमेव हि ॥५६॥ अतर्वाहामलापायादद्य ते निर्मला गुणा । विभ्राजतेऽप्रमाणा देव ! चितामणयो यथा ॥ ५७॥ स्वमुखे निस्पृहोऽसि एकादशीके दिन जब कि अत्यंत कल्याणकारी अश्विनी नामका नक्षत्र था “ओं नमःसिद्धभ्यः।" सिद्ध भगवानको नमस्कार हो" ऐसा उच्चारण किया एवं सिद्धोंकी साक्षी पूर्वक मोक्षलक्ष्मीकी प्राप्ति की अभि- लाषासे उन्होंने अट्ठाईस प्रकारके मूलगुणोंको धारण किया एवं सायंकाल के समय वीतरागी मोक्षाभिलाषी और महादक्ष तीनसौ राजाओंके साथ शीघ्र ही मोक्षरूपी लक्ष्मीको सखीस्वरूप दिगम्बर जैन दीक्षा धारण करली। उन भगवान जिनेंद्र ने दो उपवासोंका नियम लिया। मन वचन कायकी क्रियारूप योग और संकल्पोंका निरोध किया। वास्तविक आत्मस्वरूपकी प्राप्तिके लिये समस्त सावध योगोंका परिहार कर दिया एवं परमात्मा के स्वरूपमें उन्होंने ध्यान लगाया ॥५०-५३ ॥ भगवान जिनेन्द्र जो केश उखाड़ कर फेंके थे इन्द्रने उन्हें बड़ी भक्ति और आदरसे रत्नमयी पिटारीमें रक्खा। अतिशय उत्तम वस्त्रसे ढक लिये एवं बड़े ठाट वाटके साथ क्षीरोदधि समुद्रके जलमें जाकर क्षेपण कर दिये ॥ ५४॥ जिनके मुख- मस्तक नम्रीभूत हैं और भगवानके गुणोंपर जिनका पूरा पूरा अनुराग है ऐसे वे इन्द्र उस समयके अनुकूल उत्तमोत्तम वाक्योसे भगवान जिनेन्द्रकी इसप्रकार भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे- हे देव ! आप तीनों लोकके स्वामो हो । जो योगी लोग बड़े बड़े लोगोंके भी गुरु हैं उन पूज्य योगियों के भी आप गुरू हैं। समीचीन धर्मके स्वरूपके भले प्रकार जानकार हैं। जिनके पूजन करनेसे सैकड़ों भव्य जीव तर जाते हैं—संसारसे छूटकर मोक्षलक्ष्मोकी प्राप्ति कर लेते हैं उन पवित्र तीर्थो के आप प्रवर्तक हैं || १०५ एवं समस्त जीवों पर कृपा करनेवाले कृपानाथ आप है ॥ ५६॥ हे भगवान ? अंतरंग और वाह्य मैलके । हरिवशपुराणमें छहसो छह राजा बतलाये हैं। ?

पुराण त्वं सस्पृहोऽनंतशर्मणि । निग्रंथोऽपि महानय॑रत्नत्रयेधनेश्वर ॥ ५८ ॥ निरीहोऽप्यत्र नार्यादौ चाकाक्षी मुक्तिसंगमे । देव ! त्वं त्यक्तराज्योऽपि त्रिजगद्राज्यलोलुपः ॥५६॥ उपोषितोऽरि नाय ! त्वं सद्धयानामृतपानवान् । धीरोऽक्षोम्योऽपि दक्षस्त्वं कातर. कर्मवंधने ॥ ६० ॥ रागादी मल्लि० वीतरागोऽपि सरागो मुक्तिसाधने । क्षमावानऽपि लोके त्वं कोपी फर्मारिघातने ॥६१॥ निर्लोभस्तुच्छलक्ष्म्यादी महालोभस्तपोधने १०६ हो जानेपर जिस प्रकार चिंतामणि रत्न चमचमा उठते हैं उसी प्रकार अंतरंग और वाह्य मलके नाश हो जानेसे आज आपक निर्मल और अपरिमित गुण चमचमा रहे हैं ॥ ५७ ॥प्रभो ? यद्यपि आप स्वर्गों के सुखों में सर्वथा अभिलाषारहित हैं परंतु अनंत कल्याण स्वरूप मोक्षके सुखों में आप पूरी पूरी अभिलाषा रखने वाले हैं। वाह्य अभ्यंतर समस्त प्रकारके परिग्रहसे रहित हैं परंतु रत्नत्रयरूपी अचिंत्य धनके आप स्वामी हैं। संसारकी समस्त स्त्रियोंमें यद्यपि आप अभिलाया रहित हैं तथापि मोनरूपी स्त्रीके साथ संगम करनेकेलिये आपकी पूरी पूरी इच्छा है। हे देव । यद्यपि आपने यहांकी राज्यविभूतिका सर्वथा त्याग कर दिया है परंतु तीन लोकके राज्यके प्राप्त करनेमें आपकी लोलुपता परी है। आपने दो उपवासोंका नियम ले रक्खा है इसलिये यद्यपि आप उपवासयुक्त हैं तथापि निरंतर समीचीन ध्यानरूपी अमृतका आप पान करते रहते हैं। यद्यपि सब वातोंमें आप धीर वीर हैं किसी आपत्तिके आजानेपर जल्दी क्षोभको प्राप्त नहीं होते इस लिये अक्षोभ्य हैं और अत्यन्त चतुर हैं परंतु कर्मों के बंध करनेमें कातर-डरनेवाले हैं, अर्थात् यह आप- को सदा भय लगा रहता है कि कहीं मेरे कर्मों का बंध न हो जाय इसलिये उनके बंध न होनेकेलिये आप परी परी चेष्ठा रखते हैं उस समय कर्मों के बांधनेमें आपकी धीर वीरता एक ओर किनारा कर जाती है एवं कर्मों के बंधसे चित्त उथलपुथल हो निकलता है ॥ ५७-६० ॥ हे भगवान ! अन्य राग द्वेष आदि के अंदर वीतराग हैं उन्हें अपनाना नहीं चाहते परंतु मोक्षके सिद्ध करनेमें अत्यंत रागी हैं-सदा मोक्षकी प्राप्तिके कारणोंकी आप चेप्टा करते रहते हैं। यद्यपि शत्रु और मित्रोंको समान माननेके कारण आप क्षमावान हैं तथापि कर्मरूपी वैरियोंको आप अपने पास तक नहीं फटकने देना चाहते सदा उनके नाश करनेके लिये प्रवृत्त रहते हैं ॥ ६१ ॥ हे भववान ! यद्यपि संसारकी तुच्छ लक्ष्मीमें आपका किसी १०६

मलि.
पुराण
निर्माहोऽपि स्कार्यादो मुक्तिस्त्रस्नेहतत्परः ॥ ६२ कौमारत्वेऽपि कामारिमा हाक्षारातिमि सम । हतः स्वामित्वया शीघ्रमतो न त्वत्सऽमोपः
॥ ६३ ॥ अतो देर ! नमस्तुभ्यं सदालप्रम्हनारिणे । निर्मोहायानिशांताय तप, अयर स्नाय ते ॥ ६४ ॥ नमस्ते दिव्यरूपाय नमो मुक्तिस्दालये।
नमो हितात्मने नाथ । नमस्ते गुणसिधरे ॥ ६५ ॥ दे।। देहि त्वमस्माकं स्तुतिभक्तिफलेन हि । मरे भने भद्वोय वाटत्वे संयमाप्तरे ॥१६॥
इति स्तुत्वा मुगुर्नत्वा कृतकार्या सुरेश्वरा । तत्तपोनार्तयाऽसक्का ययुः म्बस्वमुदाय ॥ ६३ ॥ नहर ध्यानसामानतुर्यभानभास्कर
प्रकारका लाभ नहीं इसीलिए उसे छोडकर आपने पवित्र जिनदीक्षा धारण की है तथापि तपरूपी लक्ष्मीक
लिये आप बड़े लोभी हैं-एक क्षणके लिये भी तपरूप लक्ष्मीसे विमुग्व होना नहीं चाहते। आप अपने
शरीर आदिमें सर्वथा ममत्वरहित निर्माहो हैं परंतु माक्षरूपी स्त्रीपर आपका पूरा पूरा स्नेह है। उसकी
प्राप्तिके लिए आप कोई भी बात उठा रखनेवाले नहीं हैं॥६२॥ हे स्वामी! कुमार अवस्थामें कामदेवका जीनना
अत्यंत कठिन है परंतु आपने कुमार अवस्थामे ही मोह और इंद्रियरूपी बरियोंके साथ कामदेवरूपी
बलवान शत्रुको देखते देखते नष्ट कर डाला इसलिये आपके समान अन्य कोई महापुरुष नहीं अतएव
हे देव ! आप उत्तमकोटिके वाल ब्रह्मचारी है इसलिए आपके लिए नमस्कार है। आप मोहके विकारोंसे
रहित निर्मोह हैं अत्यंत शांत हैं और तपरूपी लक्ष्मीसे शोभित हैं इसलिए आपके लिये नमस्कार है।
॥ ६३-६४ ॥ आप दिव्यरूपके धारक हे इसलिए आपके लिये नमस्कार है। मोक्ष सुख प्राप्त करनेके
लिए आपकी पूरी इच्छा है इसलिये आपके लिये नमस्कार है। आप हितात्मा है-दूसरे जीवोंका ओर अपना
भी हित करनेवाले हैं इसलिये आपके लिए नमस्कार है एव आप समस्त गुणोके समुद्र हैं इसलिए आप
नमस्कार करनेके योग्य हैं। ॥६५॥ हे देव ! यह विनयपूर्वक प्रार्थना है कि यह जो हमने आपको भक्ति
और स्तुति की है उसका फल हम यहो चाहते हैं कि बाल अवस्थामें भी संयमकी प्राप्तिके लिये जिस
प्रकार आपके अंदर अचिंत्य शक्ति विद्यमान है वह शक्ति आपकी कृपासे हमें भी प्राप्त हो
॥६६॥ इस प्रकार भक्तिप वक भगवान मल्लिनाथकी स्तुतिकर देवेद्रोंने बार बार उन्हें नमस्कार
किया एवं उनकी महिमाको प्रशंसा करते हुए वे लोग अत्यंत प्रसन्नताके साथ अपने अपने स्थान
लौट गये ॥ ६७॥

मल्लि. पुराण १०८ पारणानेऽय मार्गोऽयमिति सचित्य सयमे ॥६८॥ भावयन् हृदि निवेद स्वेयापथविलोचनः । प्रकुर्वन् दानिना तोपं प्राविशन्मिथिला जिन ॥६॥ महापाग तमालोक्य निधानमिव दुभं । नदिपेणनृपो हेमद्युत प्राप्य परं मुदं ॥ ७० ॥ स्वहस्तो कुड्मलीकृत्य नत्वा नञ्चरणाम्बुजौ। तिष्ठ तिष्ठति सप्रोक्त्या स्थापयामास तत्क्षणं ॥ ७१ ॥ श्रद्धादिगुणसप्राप्तस्तस्मे पात्रोत्तमाय स । प्रतिगृहादिपुण्यार्जनहेतुनक्सयुत्त ॥ ७२ ॥ दीनाके समय परिणामोंकी इतनी उज्ज्वलता रहती है कि उस समय सातवें गुणस्थानके परिणाम हो जाते हैं एवं सातवें गुणस्थानका काल अंतरमहर्तमात्र होनेसे पीछे वे छठे गुणस्थानमें आते जाते रहते है। समस्त वाह्य अभ्यंतर परिग्रहोंका त्यागकर जिस समय भगवान मल्लिनाथ ध्यानके अंदर निश्चल हुए थे उस समय उस उत्कट ध्यानकी सामर्थ्यसे उनके मनःपर्ययज्ञान नामका चौथा ज्ञानरूपी सूर्य प्रकट हो गया था एवं उस समय वे मतिज्ञान श्रुतज्ञान अवधिज्ञान और मनःपर्यायज्ञान इसप्रकार चार ज्ञानोंके धारक बन गए थे। जो दिन उनके पारणाका था उस दिन उन्होंने संयम करते करते ही यह विचारा कि शरीरको स्थितिके लिए आहार लेना भी सुनिश्चित मार्ग हे अर्थात् संयमका साधक है, इसलिये आहारका लेना उन्होंने निश्चित कर लिया। वे भगवान जिनेंद्र, हृदयमें संसार शरीर भोगोंसे वैराग्यकी भावनाका चिंतवन करते करते जूरा प्रमाण जमोनकों देखते देखते आहारके लिये चल दिये एवं दानियों को संतोप प्रदान करनेके लिये मिथिलापुरीमें प्रवेश कर गए ॥ ६८-६६ ॥ मिथिलापुरीमें सुवर्णके समान महामनोज्ञ कांतिका धारक एक नंदिपेण नामका राजा भी रहताथा आहारकी अभिलापासे घूमते हुए भगवान जिनेंद्रको देखकर एवं हृदयमें यह विचारकर कि जिस प्रकार खजानेका मिलना अत्यन्त दुर्लभ है—सामान्य भाग्यवालोंको वह नहीं प्राप्त होसकता उसीप्रकार जव उत्तम पात्र मुनिका मिलना भी कठिन है तब महापात्र भगवान तीर्थंकरका मिलना तो अत्यन्त कठिन है -हर एक समय हर एकको उनका मिलना नहीं प्राप्त हो सकता, भगवानको देखकर उसे बड़ा हर्ष हुआ। दोनों हाथ जोड़ उनके चरण कमलोंको भक्तिपूर्वक नमस्कार किया एवं हे प्रभो! तिष्ठ तिष्ठ ऐसा कह- कर उसी क्षण उन्हें ठहराया ॥७०--७१॥श्रद्धा तुष्टि भक्ति आदि दाताके सात गुणोंसे भूषित एवं पुण्यकी उत्पत्तिके कारण पडिगाहन उच्चासन प्रदान करना प्रक्षाल पूजा आदि नवधा भक्तिसे विभूषित १०८ मलि० १०६ क्षीरान्त मधुरं रम्यं ददौ तृप्तिकर परं। कृतादिरहित भक्त्या प्रासुकं स्वानयशर्मद ॥ ७३ ॥ तहानेन स पुण्य प्रोपाज्यं स्य स्य गृहाग्रम । सफल मन्यते राजा धन च जीवित परं ।। ७४ । देवोऽथ भारयन्नित्यं सयम च विरागता। ध्यानाध्यनमाकुन्निर्जन स्थानमाश्रयन् ॥ ७९ ॥ निग्रंथो विहरन् भूमि स विक्रम्य दिनानि पट । छाास्थ्येनागमत्प्राक्तनं दीक्षाग्रहण वन ॥ ७६ ॥ तत्र ध्यान समाराव्य सोऽशोकस्य तरोरध । तदर्थी चितयेदादौ सिद्धाना सद्गुणाष्ठक ।। ७७ ॥ ततश्चित्त स्थिरीकृत्य नि प्रमादो जितेंद्रिय. । धर्माध्यान समुत्कष्ट चतुर्धा ध्यायति स्फुट ||८|| राजा नंदिराने उत्तम पात्र भगवान जिनेंद्रके लिये क्षीरान्न [ खोर ] का भक्तिपर्वक आहार दिया जो कि दोषरहित, मधुर था, मनोहर था, तृप्तिका करनेवाला था, उत्कृष्ट था, प्रासुक था और अपना पराया कल्याण करनेवाला था ॥ ७२--७३ ॥ महापात्र भगवान तीर्थकरको दान देनेसे उत्पन्न हुए पुण्यकोउपार्ज- नकर राजा नंदिपेणने स्वयं भगवान तीर्थंकरको आहारदान देनेसे अपने गृहाश्रमको सफल समझा एवं अपना धन और जीवन भी उसने सफल और उत्कृष्ट समझा॥ ७४ ॥ वे भगवान तीर्थकर सदा संयम और वैराग्यकी भावनाका चिंतवन करते थे, ध्यान और अध्ययन में सदा प्रवृत्त रहते थे, जंगल खंडहर आदि निर्जन स्थानोंमें सदा उनका निवास स्थान रहता था एवं परा- क्रमके साथ निग्रंथ हो भूमिपर विहार करते फिरते थे। इसप्रकार छह दिनतक विहारकर वे भगवान जहां- पर दीक्षा धारण की थी उसी दीक्षावन-श्वेतवनमें आगये ॥७६ ॥ श्वेतवनमें आकर अशोक वृक्षके नीचे उन्होंने अच्छीतरह ध्यानका अवलम्बन किया। सम्यक्त्व ज्ञान वीर्य आदि जो सिद्धोंके आठ गुण कहे गये हैं उन्हे प्राप्त करनेकी अभिलापासे सबसे पहिले उन्होंने सिद्धोंके आठ गुणाका ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया ॥७७॥ उसके बाद परम जितेन्द्रिय और प्रमादिरहित वे भगवान जिनेंद्र चित्त को स्थिरकर उत्कृष्ठ ध्यान धर्म्यध्यानके आज्ञाविचय आदि चारों पायोंका स्फुटरूपसे ध्यान करने लगे॥७८ ॥ स्थिर चित्तके धारक वीतराग भगवान जिनेन्द्रने उस धर्म्यध्यानके वलसे बहुतसे कर्मों को शिथिल कर १-आज्ञाविचय १ अपायपिचय २ विपाकविचय ३ सस्यानविवय ४ इसप्रकार ये चार धर्म्यध्यानके पाये हैं। बुद्धिको मदतासे एवं यथा- र्थ उपदेश देनेवाला न होनेसे सर्वज्ञ .भगवान द्वारा प्रणीत मार्ग से इस रूपसे श्रद्धान कर लेना कि भगवान जिनेन्द्रने जो कहा है वह यथार्थ और गैसाही है भगवान जिनेन्द्र अन्यथा प्रेरूपण करनेवाले नहीं हो सकते इसप्रकारके रिचारका नाम आशाविचय है। मिथ्यादर्शनकी कपासे पुरापा विचार शिथिलीकृत्य कर्माणि क्षपयित्वा च कानिचित् । तेन ध्यानेन चारुह्य श्रेणि क्षपकसंशिका ॥ ७६ ॥ शिवधामनि निश्रेणी वीतराग. स्थिराशयः । मल्लि० आद्यशुक्लासिना शोघ्र जघान माद्यशात्रा ॥ ८० ॥ रणरागे तदा देवो महाभट इवावभौ । चारित्रसगरे ध्यानतीक्ष्णखड्गो महातापा. ॥ ८१ ॥ पूर्वाह्न पौपिके मासि कृष्णपक्षे मनोहरे । द्वितीयाया सुनक्षत्रे पुनर्वसुसुनामनि ॥ ८२ ॥ ततो द्वादशकं (म) प्राप्य गुणस्थान जिनाग्रणी ११० डाला वौर बहुतसे कौंको क्षय भी कर डाला एवं उस ध्यानके सम्बन्धसे मोक्षरूपी महल में जानेके लिये सीधी सीढ़ी स्वरूप क्षपकश्रेणीमें पदार्पणकर दिया एवं पृथक्त्ववितर्क नामक प्रथम शुक्लध्यानके द्वारा मोहनीय कर्मको इक्कीस प्रकृनितों का सर्वथा क्षयकर उसे सर्वथा उखाड़कर फेंक दिया ॥७६-८०॥ महायुद्धमें शत्रूको मारकर तीक्ष्ण खड्गका धारक महाभट जिसप्रकार शोभित होता है उसीप्रकार चारित्ररूपी संग्राममें ध्यानरूपी तीक्ष्ण खड़गके धारक महातपस्वी भगवान जिनेंद्र भी मोहरूपी मल्लको मारकर महाभट के समान अत्यन्त शोभित होने लगे॥८१ ॥ पौषवदी द्वितीयाके दिन पूर्वाह्नके समय जब कि पुनर्वसू नामके शुभ नक्षत्रका उदय था उन भगवान जिनेंद्रने बारहों गणस्थान में पदापण किया बारहवें गुणस्थानका काल अंतर्मुहर्त है और वहांपर एकत्ववितर्क नामका दूसरा शुक्लध्यान प्रगट होता है इसलिये बारहवें गुणस्थानमें एकत्ववितर्कविचार नामक दूसरे शुक्लध्यानकी कृपासे मोहनीय कर्मके सिवाय वाकीके कर्म–अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अंतराय इन तीन लोगोकी प्रवृत्तिमें स्वेच्छाचारका प्रचार हो गया है सन्मार्ग से मिलकुल हो वे दूरभागते हैं इस प्रकार सन्मार्ग के (विनाश ) का विचार करना अपायविचय हे। ज्ञानाचरण दर्शना वरण आदि कर्मों के फलो का द्रव्य क्षेत्र काल भावके अनुसार विचार करना विपाकविचय नामका तीसरा धर्मध्यान है एको लोकके सस्थानका विचार करना सस्थानविचय नामका धाध्यान हैं ॥ १॥ सातो गुण- स्थानकी अप्रमत्त सज्ञा है। निरतिशय अप्रमत्त और सातिशय अप्रमत्तके भेदसे वह दो प्रकार का है। जो हजारोबार छठेसे सातोंमें और सातवेसे छठेमें आवे वह निरतिशय अप्रमत्त गुणस्थानवर्ती कहा जाता है और जो क्षपक वा उपशम कोई भी श्रेणी चढनेके सन्मुख हो वह सातिशय अप्रमत्त गुणस्थानवर्ती कहा जाता है इस रूप से सातवें गुणम्यानवाला क्षपकश्रेणी माढ़ता है। क्षपकश्रेणीमें अनन्तानुबन्धीके चार कपायोंके सिवाय वारह कपाय और नो नोकपायोका क्षय किया जाता है । क्षपकश्रेणीके गुणस्थान आठवा नववा दशमा और वारहवा इस प्रकार चार हैं। क्षपकश्रेणीवाला फिर नही गिरता वह प्रथम और द्वितीय शुक्लध्यानसे चारों घातिया कर्मोको नष्टकर केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है। २-पृथक्त्ववितर्कवीचार १ एकत्व वितर्कविचार २ सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाती ३ और व्युपरतक्रियानिवृत्ति ४ शुक्लध्यानके ये चार भेद हैं। अपाय ११० मलि. पुराण शेषवातित्रयं हत्या द्वितीयशुरूयोगतः ॥ ८३ ॥ केवलावगर्म प्राप्य लोकालोकविलोकन | जगदाश्चर्यकर्तार तत्क्षण मुक्तिदर्पण |॥ ८४ ॥ स्वर्ग पदारचोज्योतिलोंके सिंहध्वनिस्तदा । फणींद्रभवने शस्त्रनादों व्यातरधामसु ॥ ८५ ॥ भेरीशब्द पृथुध्वानश्चाभूत्तज्मानसूचकः । अम्नानकुसुम श्चक्र पुष्पवृष्टि सुरद्रुमा ॥ ८६ ॥ ययौ मरुसुगध सबभूवुनिर्मला दिश । विष्टराणि सुरेशानामासमै प्रचक्रपिरे ॥ ८७ ॥ इत्यलोक्य तदाश्चयं ज्ञात्वा तत्कवलोदम । उत्थाय स्वासनसनादिंद्रा प्रणेमुस्त जगन्दु रु॥ ८ ॥ तत सौधर्मकल्पेशस्तत्कैवल्तमहोत्सव ॥ कतुं व्यवान्मति तद्वत्सर्वे चंद्रा व्यधुस्तरा ॥ ८६ ॥ तदा वलाहको देवो विमानं काम काय । लक्षयोजनविस्तीणं मुक्ताम्यम्भूपिततं व्यधात् ॥ ६० । घातिया कमों का भी सर्वाथा नाश कर दिया। बस! चारों घातिया कमों के साथा नाशसे उन तीन जगतके स्वामी भगवान जिनेंद्रके समस्त लोक और अलोकके चर अचर पदार्थो के साक्षात् प्रकाश करने- चाला केवलज्ञान प्रगट होगया जो कि अपने स्वरूपसे समस्त जगतको आश्चर्य करनेवाला था और जिस क्षणमें उत्पन्न हुआ था उसी क्षणमें मुक्तिके लिये दर्पणस्वरूप था अर्थात् जिसप्रकार दर्पणमें मुक्ति का स्वरूप साक्षात् प्रतिभाषित होता है उसी तरह वस्तुका स्वरूप साक्षात् उसके अंदर प्रतिभापित होता था ॥८२-८४ ॥ भगवान जिनेन्द्रको केवलज्ञानकी प्राप्ति होतेही उसके माहात्म्यसे स्वगों के अंदर घंटे अपने आप वजने लगे। ज्योतिषी देवोंके भवनोंमें रांखध्वनि होनेलगी, भवनवासी देवोंके भवनोंके अंदर शंखनाद होनेलगा एवं व्यंतरनिकायके देवोंके भवनोंमें भेरियोंका उन्नत शब्द होने लगा जिससे भगवानके केवलज्ञानकी सूचना होगई । उससमय कल्पवृक्षोंसे नवीन ताजे फलों की वृष्टि हो लगी । शीतल मंद सुगंध पवन बहने लगी। समस्त दिशायें निर्मल होगई एवं वैमानिक देवोंके आसन चल विचल हो उठे॥८५-८७॥ इसप्रकारके अनेक आश्चर्योंको देखकर इन्द्रोंने यह निश्चयकर लिया कि भगवान जिनेंद्रको केवलज्ञान प्राप्त हो गया है। वे शीघ्र ही अपने अपने आसनोंसे उठे । एवं तीन जगतके गुरु भगवान जिनेंद्रको भक्तिपूर्वक नमस्कार किया ॥८॥ सौधर्म स्वर्गके इन्द्रने भगवान मल्लिनाथ का केवतज्ञान महोत्सव करनेकेलिये तैयारियां की एवं जिसप्रकार सौधर्म स्वर्गके इन्द्रने तयारियां की उसी प्रकार जितने भी इन्द्र भगवान मल्लिनाथके केवलज्ञान महोत्सवमें आने वाले थे सवोंने तयारियां करनी प्रारम्भ कर दीं॥६॥ भगवानके केवलज्ञानमहोत्सवमें जाते समय वलाहक नामके देवने कामक नामके पलि. पुराण -- ११२ - लक्षयोजनसद्वृत्तकाय घटारखांकितं । किंकणीचामरोपेत कामग बहुभूपित ॥६१ श्वेतमेरावतारयं सद्जं दक्षं प्रभास्वरं । नागदत्ताभियोग्येशश्चक्रड प्यत्यतन्सुन्दर ॥ १२॥ द्वात्रिंशत्सन्मुसान्यस्य मुप प्रति रदाटक । प्रनिदन्त सरोह्य कमन्जिन्येका सर प्रति ॥६॥ अजिनीप्रति सादृश्याद् द्भा- त्रिशत्कमला' पृथक । कमल प्रति पत्राणि द्वात्रि शत्प्रमितान्यपि ॥ १४ ॥ एककस्मिन् सुपत्रे नर्तक्यो द्वात्रिंशदेव हि । नृत्यति लीलया हावै- र्भावै शृंगारखानय ॥६५॥ इत्यादिवर्णनोपेत तमारुह्य गजाधिप । निश्चकामादिकल्पेशो जिनेंद्रपूजनाय सः ॥ ६ ॥ स्वस्ववाहनमारूढा देवा' सामानिकादय. । स्वस्वभूत्यामुदा शक दशधा परिवत्रिरे ॥ १७ ॥ ऐशानेंद्रादयः सर्वे इन्द्रः स्ववाहनाश्रिता । शेपा निकायजा शका' स्वस्वभूत्या च निययुः ॥ १८ ॥ पूरयंतो दिश सर्वा जयनंदाधिोपणे । वाद्यौधैर्योतयंतश्च नभोंऽगभूपणाशुभि ॥ ६६ ॥ खांगण छादयतः सद्विमानवाहनादिभिः विमानकी रचना की । जो विमान एक लाख योजन चौड़ाथा और महा मनोज्ञ मोतियोंकी मालाओं से शो भायमान था ॥६० ॥ अत्यंत चतुर नागदत्त नामके आभियोग्य जातिके देवने उस समय ऐरावत हाथीकी रचना की जो कि लाख योजन प्रमाण अत्यंत सुडौल शरीरका धारक- था। बजते हुए घंटाके शब्दसे अत्यं त शोभायमान था। छोटी छोटी घटियां और चामरोंसे अलंकृत था। विक्रियासे इच्छापूर्वक रचा गया था। बड़े ठाट वाटसे सजाया गया था। महा मनोहर और श्वेतवर्णका था ॥६१-६२॥ इस ऐरावत हाथीके मुख बत्तीस थे, हर एक मुखमें आठ आठ दांत थे, हर एक दांतपर एक एक सरोवर विद्यमान था। हर एक स रोवरमें एक एक कमलिनी थी (कमलोंकी वेल थी।) प्रत्येक कमलिनीमें वत्तीस बत्तीस कमल थे। हर एक कमलके बत्तीस वत्तीम पत्ते थे। प्रत्येक पत्तेमें नाचनेवाली बत्तीस बत्तीस देवियां थी जो कि पूर्ण शृंगारसे शोभायमान थीं और लीलापूर्वक बड़े हाव भावों के साथ नृत्य करती थीं ॥६३-६५ ॥ इसप्रकारके उत्तम वर्णनोंके धारक उस ऐरावत हाथी पर सौधर्म स्वर्गका इन्द्र सवार हो गया एवं भगवान जिनेंद्रकी पूजाके लिये चल दिया ॥६६॥ भगवान जिनेन्द्रकी पूजाके लिये इन्द्रको इसप्रकार तयार देखकर सामानिक आदि देव भी अपने अपने बहनोंपर सवार होगए एवं अपनी अपनी विभूतिके साथ चारो ओरसे इंद्रको वेष्टित कर बड़े हर्षसे खड़े होगये ॥ १७॥ ऐशान इन्द्रको आदि लेकरअन्य स्वर्गों के इन्द्र अपने अपने वाहनोंपर सवार होगए तथा अपनो अपनी विभूतिके साथ ज्योतिषो आदि निकायोंके इन्द्र भी अपने अपने भवनोंसे निकल पड़े ॥६८ जिससमय चारों निकायोंके देवेंद्र भगवान जिनेंद्रकी पूजाकेलिये निकल पड़े उससमय हे देव !. ११२ महोत्सवशतै सार्धमाजग्मुर्भूतल सुरा. ॥ १०० ॥ ददृशुर्नाकिनो हृष्टा' विभोरास्थानमडलं । तेज पुंजनिम दूराद्यराट् शिल्पिनिर्मित ॥१०॥ मलिक ! करोमि वर्णन किचिदस्य प्रीत्यै सता मुदा । निरौपम्यस्य विश्वर्द्धिसकुलस्य समासत ॥ १०२ ॥ योजनत्रिकविस्तीर्णमिद्रनीलमणिप्रभं । वृत्त पीठ व्यधादादावस्थानस्य जिनेशिन ॥ १०३ ॥ तस्य पयंतभूभागमलं चक्र महाधु ति । धलोशालपरिक्षेपो रजचूर्णमयो महान् ॥ १०४ ॥ चतुर्विश्वस्य विस्तीर्णा हेमस्तमानलंयिताः । तोरणा मकरा (१) स्फोटरत्नमाला विरेजिरे ॥ १०५ ।। ततोऽतरातर किचिद्गत्वा हेममयोन्नताः । आप जयवंते रहें नादें और विरद इत्यादि उनके कोलाहलों से और अनेक प्रकारके बाजोंके शब्दों से समस्त दिशायें व्याप्त हो गई थी। शरीरोंपर पहिने हुए भषणोंकी कांतिसे समस्त आकाश जगमगा उठा था एवं उत्तमोत्तम विमान और बाहन आदिसे सारा आकाश ढका सरीखा जान पड़ता था। इस प्रकार सैकड़ों महोत्सवोंके साथ वे देव जिस वनमें भगवान मल्लिनाथको केवलज्ञान हुआ था उस वन की भूमिपर आकर पहुच गए ॥ ६६-१०० ॥ शिल्पकलामें पूर्ण चातुर्य रखनेवाला कुवेर पहिले ही इन्द्र की आज्ञासे वहाँ पहुंच चुका था और उसने बड़ी सुदरताके साथ समवसरणकी रचना कर रक्खी थी जिस समय देवेंद्रगण भूमि- पर उतरे साक्षात् तेजोंका पुंज स्वरूप दूरसे हो उन्होंने भगवान जिनेंद्रका शमवसरण देखा और वे अत्यंत हर्ष प्रकट करने लगे॥१०१॥ समवसरणकी रचना सज्जनोंको परमानन्द प्रदान करनेवाली होती है अनुपम और समस्त प्रकारकी ऋद्धियोंसे व्याप्त रहती है इसलिये सजन पुरुषोंको आनंदित करनेके लिये उस अनुपम और समस्त प्रकारकी ऋद्धिसे व्यात समवसरणका मैं (प्रथकार) संक्षेप वर्णन करता हूं- जिस भूमिपर भगवान जिनेन्द्रका समवसरण रचागया था उस भूमिका विस्तार तीन योजन प्रमा- ण था वह इन्द्रनील मणिके समान कांतिकी धारक और गोलाकार थी॥१०२-१०३॥ कांतिसे जाज्वल्य- मान उस पृथ्वीका पर्यंत भाग धूलीशाल [ परकोट ] से चारों ओरसे वेष्टित था जो धूलीशाल रत्नमयी था और विशाल था ॥ १०४ ॥ धूलीशालकी चारों दिशाओंमें सुवर्णमयी स्तंभोंके अग्रभागमें बहुत बड़े मनोहर तोरण मीनाकारी और रत्नोंकी मालाएं लटक रही थीं जिनसे उन स्तंभों की अद्वितीय शोभा दीख पड़- ती थी॥१०५ ॥ कुछ फासलापर उस भूमिके भीतर जाकर गलियों के मध्यभाग में मानस्तंभ विद्यमान थे श्री ! १५ मलि. पुराण १२४ अधोमध्यजिनार्ध्या गा ध्वजछत्रादिभूपिता ॥ १०६ ॥ चतुर्गोपुरसंवद्धशालत्रितयवेष्टिता । रेजुमध्येषु बोथीना मानस्तंभा मनोहरा ॥ १०७ ॥ स्तभपर्यंतभूभागमलंचक दिश प्रति । चतस्नो मणिसोपाना वाप्यो नन्दोत्तरादिका. ॥ १०८ ॥ तन स्तोकातरं गत्वा परिवत्रेऽवुखातिका । ता महीं स्वच्छनीराढया चातोत्पन्नोर्मिसंकुला ॥ १०६ ॥ तदभ्यंतरभूभाग प्रष्ट्याभूलतावनं । सत्क्रीडाद्विलतागेहं सर्वर्तु कुसुमांचित ॥ ११० ॥ स्तोकातर ततोऽतीत्य मुक्तादामादिमंडितः । प्राकार प्रथमो वने महातु गो हिरण्मय ॥ १११ ॥ महाति गोपुराण्यस्य संरभुर्दिक्चतुष्टये । राजतानि त्रिभूगानि शृंगाणीव महागिरे ॥ ११२ ॥ प्रत्येक गोपुरेष्वेव मंगलद्रव्यभूतय । शतमष्टोत्तरं भाति भृगारकलशादिका. ॥११३ ।। प्रेत्येकतोरणास्तेषु शतसल्या विभासिरे । रत्नाभरणयुक्ताश्च तद्द्वारे निधयो नव ॥ ११४ ॥ तेषामतर्महावीयेरुभयो पार्श्वयोरभूत । जो कि सुवर्णमयो थे। नीचे भाग और वीच भागमें भगवान जिनेन्द्रकी प्रतिमाओं के रहनेके कारण पूज्य और पवित्र थे, ध्वजा और छत्र आदिसे शोभायमान थे जिनके अन्दर चार चार विशाल गोपुर [सदर दर- वाजे] विद्यमान हैं ऐसे तीन प्रकारों से वेष्टित थे और महामनोहर जान पड़ते थे ॥ १०६-१०७॥ स्तंभों के पर्यंतके भूमि भागोंपर प्रत्येक दिशामें चार वापियां थी जो कि मणिमयी सीढ़ियोंसे शोभायमान थीं और नंदा नन्दोत्तरा आदि उनके शुभ नाम थे॥ १०८ ॥ मानस्तंभों की जगहसे थाडा दूर जाकर मानस्तंभोंकी भूमिको चारों ओरसे वेढकर रखनेवाली एक विस्तीर्ण खाई थी जो कि अत्यंत निर्मल जलसे भरी हुई थी एवं पवन वेगसे उत्पन्न होनेवाली चंचल तरंगोंसे व्याप्त थी॥१०१॥ खाईके मध्यभागकी भमिको वेढकर रखनेवाला एक आम्रवन था जो कि महा मनोहर कीड़ा पर्वत और लता मंडपोंसे युक्त था और समस्त ऋ- तुओंमें होनेवाले महामनोहर पुष्पोंसे शोभायमान था॥१०६-११०॥आम्रबनसे कुछ फासलापर सबसे पहि- ला विशाल प्राकार था जो कि मुक्तमाला आदिसे भूषित था, अत्यंत उन्नत था और सुवर्णमयी था ॥१११॥ इस प्रकारको चारों दिशाओं में चार सदर दरवाजे थे जोकि चांदोके बने हुए थे। तीन तीन खनोंके थे एवं विशाल पर्वतकीशिखर सरीखेजान पड़ते थे ॥११२॥ हर एक सदर दरवाजेके अंदर झाड़ी कलश आदि मंगलीक द्रव्य एकसोआठ आठ शोभायमान थे॥११३॥ हर एक दरवाजेपर सौ सौ तोरण लटक रहे थे जो कि अत्यन्त शोभायमान जान पड़ते थे। उन द्वारोंके भीतर रत्नमयी आभरणोंसे युक्त नो निधियें जगमगा रही थीं ॥ ११४ ॥ गोपुरोंके भातर जाकर एक विशाल गली थी और उस गलीके दोनों पसवाड़ोंमें दो नाव्य- परा' । मलि. पु - नाट्यशालाद्वयं रत्नस्तमभूमित्रयान्वितं ॥ ११५ ॥ ततो धूपघटौ दो दो वीथीनामुभयोर्दिशो । तत्र वीथ्यतरेष्वासीद्रभ्यं यनचतेष्ट्रय ॥ ११६ ॥ सर्वतु फलपुष्पाढययं गृहवाप्यादिशोभित । अशोकं सप्तपर्णाख्य चापकानयनद्वर ॥ ११७ ॥ अशोकादिवनेषु स्युरशोकाद्या द्रमा त्रिमेखलानि पीठानि हैमानि समधिष्ठिता ॥ ११८ ॥ मालावस्त्रमयूराजहसपीनमृगेशिना । वृषहस्तींद्रचक्राणा दशधा स्युजा. परा ॥ ११६ ॥ अष्टोत्तरशतं शेया प्रत्येक पालिकेतव । एकैकस्या दिशि प्रोक्ता मोहमल्लजयोर्जिता. ॥ १२० ॥ दिश्येकस्या ध्वजा सर्वाः सहस्र स्युरशीतियुक। चतुश्क्षुि व शून्यद्वित्रिचतु:संख्यका ध्वजा. ॥१२१॥ अन्तर्भागे तत शालोऽभूद्रोपुरादिमडित । तोरणादियुतः प्राग्यद्वितीयो योऽजुनो महान् १२२ शालये थी जो कि रत्नमयी स्तंभोसे शोभायमान थीं और तिखनी बनी हुई थीं ॥ ११५ ॥ उन महा वीथि- योंकी दोनों दिशाओंमें दो दो धपघट विद्यमान थे तथा उनसे आगे गलियोंमें चार मनोहर वन थे कि सब तुओंमें होनेवाले फल और पुष्पोंसे शोभायमान थे। लता गृह वापी आदिसे महामनोहर जान पड़ते थे एवं अशोकवन १ सप्तपर्णवन २ चम्पकवन ३ और आम्रवन ४ ये उन वनोंके चार मनोहर नाम थे॥ ११६-११७ ॥ अशोक आदि चारोंवनोंमेंसे अशोकवनके अंदर बहुतायतसे अशोकवृक्ष थे। सप्तपर्ण- वनमें सप्तपर्णा जातिके वृक्ष थे। चम्पकवनमें चम्पाके वृक्ष और आम्रवनमें महामनोहर आम्र वृक्ष विद्यमान थे और ये समस्त वृक्ष, सुवर्णमयी तीन कटनीवाले पीठों [ थामरों] से शोभायमान थे ॥ ११८ ॥ माला १ मगर २ मयूर ३ कमल ४ हंस ५ वीन-गरुड़ ६ सिंह ७ बैल ८ गज और चक्र १० इसप्रकार उत्कृष्ट ध्वजायें दश प्रकारकी मानी हैं ॥ ११६ ॥ मोहरूपी मल्लके जीतनेसे उन्नत पालि ध्वजायें [प्रधान ध्वजायें] एक एक दिशामें एक एकसौ आठ थीं तथा सामान्य रूपसे एक एक दिशामें समस्त ध्वजायें एक हजार अस्सी अस्सो थीं एवं मिलकर चार हजार तीन सौ बीस ४३२० थीं ॥ १२०-१२१ ॥ चारों वनोंके भीतर जाकर पुनः एक दूसरा प्राकार था जोकि पहिले प्राकारके समान ही चार सदर दरवाजोंसे युक्त था। जिसप्रकार पहिले प्राकारमें तोरण आदिकी विभूति बतलाई गई है उसी प्रकारकी विभूतिसे युक्त था चांदीके वर्णका और विशाल था। इस प्रकारके भी दोनों पसवाड़ोंमें पहिले प्राकार के पसवाड़ोंके समान दो नाट्यशालायें थीं एवं धूपसे जायमान धूवांसे समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाले दो धूप घड़े विद्यमान थे। धूप घड़ोके आगे दूसरी बीथीमें कल्पवृक्षोंका एक विशाल वन था जोकि फैली अत्रापि पूर्ववज्ज्ञयं नाट्यशालाद्वय महत् । तद्वद्रू पघटद्वन्द्वं धूपधूमात्तदिड्गुखं ॥ १२३ ॥ ततो वीथ्यातरेष्वासीद्वन कल्पमहीरुहां। मल्लि. || नानारत्नप्रभोत्सर्पद्धध्वात मनोहरं ॥ १२४ ॥ चतुश्चैत्यद्रु मास्तत्राशोकाढ्याः स्युः प्रभाखराः । अधोभागे जिनााढ्या सपोठाश्छत्रशोभिताः ॥ ततौ वभौ वनानां हि पयंते वनवेदिका । मंगलद्रव्यभूषाढ्य श्चतुर्भिगोंपुरै परै. ॥ १२६ ॥ ततः परा महीं रत्नपीठस्तंभाप्रलंविताः । अलचक्रः शुभास्तुगा विविधा ध्वजपंक्तय. ॥ १२७ ॥ प्राकाराश्चैत्यवृक्षाश्च केतवो वनवेदिका.। स्तूपा सतोरणा. स्तंभा मानस्तंभाश्च तेऽखिलाः ॥ १२८ ॥ प्रोक्तास्तीर्थकरोत्सेधादुत्सेधेन द्विपड्गुणा । दैानुरूपमेतेषा रौड्यमाहुर्गणाधिपाः ॥ १२६ ॥ (१) क्रीडाद्रीणा व गेहानां हुई उग्ररत्नोंकी प्रभासे समस्त अन्धकारका नाश करनेवाला और मनोहर था ॥ १२२-१२४ ॥ उस कल्पवृक्षोंके वनके अंदर अशोक आदि चार चैत्यवृक्ष थे जो कि अपनी महामनोहर कांतिसे अत्यंत देदोप्यमान थे। उनके नोचेके भागमें भगवान जिनेंद्रकी प्रतिमायें थी एवं वे वृक्ष मय सिंहासन और छत्रोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त शोभायमान थे॥ १२५ ॥ उन अशोक आदि वृक्षोंसे परिपूर्ण वनोंके पर्यंत भागमें एक वनवेदी थी जो कि कलश झाड़ी आदि मंगलीक द्रव्योंसे परिपूर्ण परमोत्तम चार सदर दरवाजोंसे शोभायमान थी॥ १२६ ॥ उससे आगेकी भूमिमें नाना प्रकारके रत्नमयो चबूतरोंके धारक स्तंभोंके अग्रभागमें नाना प्रकारको ध्वजायें फहरा रही थीं जो कि अत्यन्त शुभ थीं और बहुत ऊंची २ थीं जिनसे कि वह भूमि अत्यन्त शोभायमान जान पड़ती थी॥ १२७ ॥ समोशरणके अन्दर रहनेवाले प्राकार चैत्रवृक्ष, धजायें, वन वेदियां, स्तुप, तोरणोंसे अलंकित स्तंभ और मानस्तंभ इन सबकी ऊंचाई तीर्थ करों की ऊंचाईसे बारह गुणी अधिक होती है अर्थात् जिस तीर्थंकरका समोवसरण होगा उस तीर्थंकरके शरीरकी जितनी उंचाई होगी उस ऊंचाईसे समवसरणके अंदर रहनेवाले परकोट आदिकी उंचाई नियमसे बारहगुणी होगी। तथा जितनी ऊंचाई होती है उसीके अनुकूल उनकी चौड़ाई होती है। यह समवसरणके उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथका था इसलिये उनके शरीरको जितनी उचाई थी उससे बारह गुणी इस समवसरणके प्राकार आदिकी उंचाई थी और उचाईके अनुकूल चौड़ाई थी ॥१२६॥ क्रीड़ा पर्वत लतागृह और वनोंकी उंचाई आगमके जानकार पुरुषों ने आगममें एकसी ही बनाई है।१३०॥ ११६ पुराणोंके जानकर समस्त आगमके पारगामियोंने पर्वतोंकी चौड़ाई अपनी अपनी उंचाईकी अपेक्षा आठ । - -- बनाना च जिनागमे । तुंगत्वं ह्य कमे दे वोक्त दौरागमवेदिभिः ॥ १३० ॥ अचलाना भवेद्रोड्य स्त्रोत्सेधादष्टसंगुण । स्तूपाना फिल विस्तार मुच्छायात्साधिक मतं ॥ १३१ ॥ उशति वेदिकादीना स्त्रौत्सेधस्य चतुर्थक । विस्तारं सुपुराणाज्ञा. सागमाब्धिपारगा. ॥ ३२ ॥ ततोऽ भ्यंतरभूभागे नानाप्रासादपक्तय । द्विचितुस्तला रम्यास्तु गा रत्नमया वभुः ॥ १३३ ॥ वीथीना मध्यभागे तु नवस्तूपाः समुद्ययुः । पद्मरागमया: सिद्धजिनबिबाघलझताः ॥ १३४ ॥ स्तूपानामतरेष्वेषा रत्नतोरणमालिका. । बभुरिद्रधनुमय्य इवोद्योतितखागणाः ॥ १३५ ।। ततः प्रोल्ल्ध्य ता भूमि शुद्धस्फाटिकरत्नजः । नभः स्फाटिक शालोऽस्ति श्वेतिताखिलदिक्चयः ।। १३६ ॥ अस्यापि पूर्वदिक्षु गोपुराणि विभाति पुराण च । पद्मरागमयान्येव निधिमगलसंपदा ॥ १३७ ॥ गदादिपाणयस्तेपु गोपुरेष्वभवन सुरा । शालत्रये क्रमाद्धस्था भौमभावननाकजाः ॥ २३८ ॥ आठ गुणी मानी है । स्तूपोंकी जो उचाई कही गई है उससे कुछ अधिक उनकी चौड़ाई मानो है तथा वनवेदी आदिका विस्तार उनकी उचाईसे चौथा भाग माना है ॥ १३१-~-१३२ ॥ वनवेदियोंके भीतरकी भूमिमें प्रासादोंकी पंक्तियां थीं जो कि दोखन तीन खन और चार खनवाली थीं। महा मनोहर ऊंची २ और रत्नमयी थीं ॥ १३३ ॥ गलियोंके मध्यभागमें नौ स्तूप थे जो कि पदम- राग मणिमयी थे एवं सिद्ध भगवानकी प्रतिमाओंसे अलंकृत थे ॥ १३४ ॥ स्तूपोंके मध्यभागोंमें रत्नमयी तोरण और मालिका थीं जिन्होंने कि अपनी कांतिसे समस्त आकाशको व्याप्त कर रक्खा था अतएव जो इन्द्र धनुषमयी सरीखी जान पड़ती थीं ।। १३५ ॥ स्तूपोंकी भूमिके बाद एक स्फटिकमयी परकोटा था जो कि शुद्ध स्फटिक रत्नका बना हुआ था एवं अपनी प्रभासे समस्त दिशाओंको सफेद करनेवाला था अत- एव जो आकाशका बना हुआ सरीखा जान पड़ता था ॥ १३६ ॥ इस स्फटिकमयी परकोटकी भी चारों दिशाओंमें पहिलेके समान चार सदर दरवाजे थे जोकि अत्यंत शोभायमान थे। वे दरवाजे पदमराग मणियोंसे बने हुए थे एवं पहिले प्राकारोंके दरवाजोंके समान ही निधियें और कलश झाड़ी आदि मंग- लीक द्रव्योंसे युक्त थे ॥ १३७ ॥ सदर दरवाजोंपर गदा आदि शस्त्रोंको हाथोंमें लिये हुए देव थे उनमें भी पहिले परकोटके दरवाजोंपर हाथोंमें शस्त्रलिये ब्यंतर देव खड़े थे। दूसरे परकोटके दरवाजोंपर भवन- वासी देव थे एवं तीसरे परकोटके सदर दरवाजोंपर वैमानिक देव हाथमें हथियारोंको लिये द्वारपालोंका कार्य कर रहे थे ॥१३८ ॥ समवसरणको भूमिके मध्य और आदिके भागसे सटी हुई परकोटोंके अंततक M मल्लिक - मध्याद्यपोठसंलग्नाः शालाता स्फाटिकोदना. । भित्तय पोशा भाति महापीयनराश्रिताः ॥ १३६ ॥ तासामुगरि बिस्तीणों महान् श्रीमंडपोऽ- भवत् । रत्नस्तंभोवृत शुद्धनम स्फाटिकनिर्मित ॥४०॥ तद् दक्षेत्रमध्येऽभात्प्रयमा पीठिका शुमा । बेड र्यरत्ननिर्माणा मगलद्रव्यभूनिमिः ॥१४१॥ पुराणे धर्मचक्राणि बोढानि दीप्राणि यक्षमस्त । सहनराणि तस्यां या भानुविनानि रैजिरे ॥ १४२ ॥ तत्र पोडश सोपानपथ्या म्यु पोडशातरा । चतुर्दिक्षु सभाकोप्ठप्रवेशेषु च निर्मला ॥ १४३॥ तस्योपरि भवेत्पीठं द्वितीयं सुदिरण्मय । भूपित दिक्षु, अष्टामु चोभायट्याध्वजैः ।। १५४ । स्फुरन्मणिमय पीठ तस्योपरि तृतीयक । त्रिमेखलं व्यभातु ग तेजमा व्याप्तदिगुख ॥ १४॥ तन गघाटीपृथ्वी मुगघीयतदिमुगा। दिव्यामोदा परा भाति पुष्पप्रकरचर्चिता ॥ १४६ ॥ तस्या मध्ये पुरन्नानारत्नाभायोतिनांगरं । तुग सिहासनं दिव्य मेरा गमिवारमो॥ ३४७ म सोलह भीतियां थीं जो कि स्फटिक रत्नोंकी बनी थीं और विशाल गलियोंके अंतरालोंमें विद्यमान थीं ॥ १३६ ॥ उन स्फटिक मणिमयो भीतीके ऊपर विशाल श्रीमंडप बना हुआ था जो कि विस्तुत था। रत्नमयी स्तंभोंसे वेष्टित था और निर्मल स्फटिक पापाणका बना हुआ था अतएव साक्षात् आकाशका बना हुआ जान पड़ता था ॥ १४० ॥ श्रीमंडपसे जितना क्षेत्र रुका हुआ था उस क्षेत्रके ठीक मध्यभागमें पहिली पीठिका [ पीठ ] थी जोकि वैद्यजातिकी हरी मणियोसे बनी थी, अत्यन्त शुभ थी एव मंगलीक द्रव्य और अन्य विभूतियोंसे शोभायमान थी॥ १४१ ॥ इस पीठिकाके अंदर धर्मचक्र विद्यमान थे जिन्हें यक्षगण अपने मस्तकोंपर रक्खे थे. महा देदीप्यमान थे हजार हजार अराओंके धारक थे एवं सूर्यके प्रतिक्विों सरीखे जान पड़ते थे॥ १४२ ॥ उसी जगहपर सोलह फासलोंसे व्याप्त सोलह सोपान मार्ग [ जीने ] थे जिनसे कि चारों दिशाओमें विद्यमान कोठोंके अंदर प्रवेश किया जाता था ॥ १४३ ॥ उस प्रथम पीठके ऊपर दूसरा पीठ था जो कि सुवर्णमयी था एवं ओठो दिशाओं में चक्र और हाथी आदिके चिह्नों की धारक आठ ध्वजाओंसे शोभायमान था ॥ १४४ ॥ इस दूसरे पीठके ऊपर तोसरा पीठ था जो कि देदीप्यान मणियोंका बना हुआ था, तीन कटिनियोंसे शोभायमान था, उन्नत था और उसकी प्रचंड कांतिसे समस्त दिशायें जगमगाती थीं ॥ १४५ ॥ इस तृतीय पीठ पर गंधकुटी थी जो कि अपनी उत्कट सुगंधिसे समस्त दिशाओंको सुगंधित करनेवाली थी, दिव्य सुगंधि की धारक थी, उत्कृष्ट थी एवं भॉति भांतिके पुष्पोंके समूह से व्याप्त थी॥ १४६॥ इस गंधकुटीके मध्य भागमें महाम- मलि. विष्टर तदलचक्र दिव्यरूपी जगद्गुरु चतुर्भिरंगुले स्वन महिम्नाऽस्पृष्टतत्तल ॥ १४८ ॥ आद्य कोप्ठे मुनींद्रौघा द्वितीये करपयोपितः। तृतीये क्षातिका स्त्रियस्तुर्य ज्योतिषां स्त्रिय ॥१४॥ पचमेऽसिलज्य तर्यः पष्ठिऽथ भावनागना । सप्तमे भावना देवा अष्टमे व्यतरामरा १५० नवमे सर्वज्योतिष्का दशमे कल्पवासिन । तथैकादशके (मे) मा अतिमे पशयोऽसिला ॥ १५१ ॥ एते द्विपड्गुणास्तीर्थनाथ परीत्य भक्तिका। तत्सन्मुखाः स्थिति चक्रधर्मामृतपिपासिता ॥ १५२ ॥ इत्युक्त श्च गर्णविभूतिविविधे. सत्प्रानिहार्याप्टके दिव्यै, केवललब्धिभिश्च नवमि. सभूषित | पुराण कामदं । तीर्थेशं गुणसागर निरुपम दिव्यासने सस्थितं देवास्त ददृशु. प्रविश्य सुसभा भक्त्या स्फुरञ्चक्षुप ॥१५॥ भूयस्त त्रिजगद्गुरु' गुणनिधि नोहर सिंहासन विद्यमान था जो कि देदीप्यमान नाना प्रकारके रत्नोंकी प्रभासे समस्त आकाशको व्याप्त करनेवाला था, दिव्य था एवं मेरुका शिखर सरीखा जान पड़ता था अतएव वह अत्यन्त शोभायमान जान पड़ता था ॥ १४७॥ इसी पवित्र सिंहासनको दिव्य रूप के धारक तीन जगत के गुरु भगवान जिनेंद्र ने सुशोभित कर रखा था और वे अपने अलौकिक माहात्म्यसे उसके तल भाग का स्पर्श न कर चार अंगुल प्रमाण आकाशमें विराजते थे ॥ १४८ ॥ इस दिव्य सिंहासनके चारों ओर देव आदिके बैठनेके वारह कोठे थे उनमें से पहिले कोठेमें मुनिगण विराजते थे, दूसरेमें कल्पवासी स्त्रियां, तीसरेमें आर्यिकायें, चौथे में ज्योतिषी देवोंकी देवांगनायें, पांचवेंमें व्यंतर देवोकी देवियां, छठेमें भवनवासी देवोंकी देवॉगनायें, सातवेंमें भवनवासी देव, आठवेंमें व्यंतर देव, नौवेमें समस्त ज्योतिषी देव, दशमें वैमानिक देव, ग्यारह बेमें मनुष्य और बारहवेंमें तिथंच बैठे थे ॥ १४६-५१॥ इस प्रकार भगवान मल्लिनाथको चारों ओरसे घेरकर ये बारह कोठोंमें ठनेवाले अतिशय भक्ति रखनेवाले जोव धर्मरूपी अमृतके पीनेकी इच्छासे उनके सम्मुख स्थित होगए ॥ १५२ ॥ आनंदसे फुरफुराते हुए नेत्रोंके धारक देवोंने जिस समय समवसरणके मंडपमें प्रवेश किया उस समय भगवान जिनेंद्रको देखा। वे भगवान उस समय बारह कोठोंमें वैठनेवाले प्राणीगणोंसे शोभायमान थे अनेक प्रकारकी विभूतियोंसे व्याप्त थे, अशोकवृक्षका होना १ रत्नमयी सिंहासन २ भगवान के शिरपर * समवसरणका वर्णन हरिवशपुराणमें भगवान नेमिनाथके समवसरणको रचनाके समय विस्तारसे किया गया है । * अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टिर्दिव्यध्वनिश्चामरमासन च भामडलं कुंदुभिरातपन सत्मातिहार्याणि जिनेश्वराणा। [ पूजापाठ ] - मल्लि० १२० पुराण विश्वद्धिधाकरं भक्त्या देवगणे. परीत्य सकला वारत्रय वासना । देवीमि सह कुइमलोकतकराश्च्डामणियोतिना मूना तन्द णराजनाश्च परमा भूत्या प्रणेमुस्तरां ॥ १५४ ॥ असमगुणसमुद्रो विश्वतत्यप्रदीपो रहितसकलदोषो घानिकर्मारिहना। बिभुवनपतिभन्य सेवितो वदितश्च तदसमविभवाप्त्यं सोऽस्तु मे मल्लिनाथ ॥ १५५ ।। इति श्रीमल्लिनाथचरित्रे भट्टारकश्रीसफलकीर्तिविरचिते मल्लिनाथनिष्क्रमणकेवलोत्पत्तिवर्णनो नाम पष्ठ परिच्छेदः ॥६॥ तीन छत्रोंका फिरना ३ भगवानके पोछे भामंडलका होना ४ भगवानके मुखसे निरक्षरी दिव्यध्वनिका खिरना ५ देवोंके द्वारा पुष्पवृष्टिका होना ६ यक्ष देवोंके द्वारा चौंसठ चमरोंका दुरना ७ ओर = दुदुभी वाजोंका वजना इसप्रकार आठ प्रातिहार्योसे शोभायमान थे। नायिकज्ञान १ नायिकदर्शन २ क्षायिक- दान ३ क्षायिकलाभ ४ क्षायिकभोग५ क्षायिकउपभोग ६ क्षायिकवीर्य ७ नायिकसम्यक्त्व और नायि- कचारित्र : इस प्रकार नौ केवललब्धियोंसे भूपित थे, समस्त प्रकारकी वांछाओं को पूरण करनेवाले थे, संसारके दुःखोंसे तारनेवाले तीर्थके स्वामी थे, सम्यक्त्व आदि गुणोंके समुद्र थे, उपमातीत थे, एवं दिव्य आसनपर विराजमान थे॥ १५३ ॥ उसके बाद तीनों लोकके गुरु, गुणोंके खजाने समस्त प्रकारकी ऋद्धियां और धर्मके स्थान भगवान जिनेंद्रको समस्त इन्द्रोंने भक्तिपूर्वक अपने सहचारी देव और देवांगनाांके साथ तीन प्रदक्षिणा दी एवं गुणोंमें अनुरक्त हो सवोंने अपने अपने हाथोंको जोड़कर चूड़ामणियोंसे जगमगानेवाले मस्तकों से भक्तिपूर्वक नमस्कार किया ॥ १५४ ॥ इसप्रकार समस्त अनुपम गुणोंके समुद्र समस्त तत्वोंके प्रकाश करनेवाले, समस्त दोपोंसे रहित, ज्ञानावरण आदि घातियां कर्मरूपी वैरियोंके नाशक, मोक्षाभिलाषी तीनों लोकके इन्द्रोंसे सेवित और वंदित वे भगवान अपने समान असाधारण ऐश्वर्य हमें भी प्रदान करें॥ १५५ ॥ इस प्रकार भट्टारक सकलकीति द्वारा निरचित सस्कृत मल्लिनाथ चरित्रकी प० गजाधरलालजी न्यायतीर्थविरचित,-हिंदी- अनिकामेभगवान मल्लिनाथका दीक्षा कल्याण और केवल ज्ञान कल्याणका वर्णन करनेवालाउठा परिच्छेद समाप्त हुआ। ----- '' शानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीयाणि च । ४। तचयार्थसूत्र अ० २ १२० मलि० सप्तमः परिच्छेदः। धर्मापदेशनोद्युक्त श्रीमत त्रिजगद्गुरुं । स्थित सदसि भव्याना स्तुवे देव गुणार्णव ॥१॥ अथ शका मुदोत्थाय पूजा तस्य क्रमाब्जयोः। परया दिव्यसामग्रया भक्त्या चक: सहामरैः ॥२॥ स्वच्छनीरः पवितैश्च दिव्यगधैर्विलेपन. । मुक्ताफलाक्षते कल्पवृक्षपुष्पजदामभि. ॥३॥ सुधापिंडसु- नैवेद्य रत्नदीपैश्च नाकजै. । धूपै. फलोत्तमै पुष्पाजलिभिगोतनर्तन. ॥४॥ भतुरने शची भक्त्या विचित्र' चलिमूर्जित। नानावणे. सुशोभाढ्य रत्न चूर्णैश्चकार सा ॥५॥ ततो हृष्टा सुराधीशा भक्तिभार वशीकृता । तुति प्रारेभिरे कर्तुं तस्यासाधारणगुणै ॥६॥ अद्य नाथ ! वयं धन्या. सफल अथ सातवां परिच्छेद। भव्योंकी सभा-समवसरणके अन्दर विराजमान, समीचीन धर्मके उपदेश देनेके लिये उद्यत, बाह्य अन्तरंग दोनों प्रकारकी लक्ष्मीके स्वामी, तीन जगतके गुरु एवं अगणित गुणोंके समुद्र देव भगवान मल्लिनाथको मैं ग्रन्थकार मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूं ॥१॥ इन्द्रगण जिससमय नमस्कार कर उठे उस समय उन्होंने देवोंके साथ पवित्र स्वच्छ जल, दिव्य चन्दन, मुक्ताफलोंके अक्षत, कल्पवृक्षोंके पुष्पोंकी मालायें, अमृतके पिंडस्वरूप नैवेद्य, स्वर्गलोक सम्बंधी रत्नमयी दीपक, धूप, उत्तम फल, पुष्पोंकी अंजली, गीत और नृत्यरूप उत्कृष्ट दिव्य सामग्रीसे भगवान जिनेन्द्रके चरण कमलोंकी भक्तिभावसे सानन्द पूजा की ॥ २-४॥ सौधर्म स्वर्गके इन्द्रकी इन्द्राणीने भगवान जिनेंद्रके सामने नाना प्रकारके वर्णवाले अत्यंत शोभासे शोभायमान रत्नमयी चूर्णो से देदीप्यमान वलि [ माढना ] माड़ा ॥५॥ जिससमय यह कार्य समाप्त हो चुका उस समय भक्तिके भारसे वशीभूत और प्रसन्न चित्त देवेंद्रोंने भगवान जिनेंद्रके असाधारण गुणोंकी इसप्रकार स्तुति करनी प्रारम्भ कर दी- तीव्र पुण्यके उदयसे आपके चरण कमलोंका आज हमें दर्शन हुआ है इसलिये आज हम धन्य हैं और हमारा जीवन सफल है ॥ ५-६॥हे देव ! आप तीन जगतके नाथ हो । गरुओंके महागुरू हो। तीन जगतके स्वामियोंके अर्थात् देवेंद्र नरेंद्र और नागेंद्रों के आप स्वामी हो एवं जिन योगियों को बड़े १२१ मल्लि० १२२ पुराण नोऽद्य जीवित । यतोऽस्माभिर्महापुण्याद् दृष्टौ ते चरणानुजौ ॥ ७॥ त्व देव । जगता नाथस्त्व गुरुणा महागुरु । त्रिजगत्स्वामिनां प्राच्य- स्त्व प्रा योगिनी ॥ ८ ॥ ज्ञानिना त्व च सशस्तपस्विना महातपा । योगिना त्व महायोगी जिनाना त्वं परो जिन || वियोद्धतुंमना दुसा निरीहस्त्व जगद्धित. द्विधा यलकृतोपि त्वं महानिग्रंथराड् भुवि ॥ १० ॥ शच्याये सेव्यपादोपि महास्तवं ब्रह्मचारिणा । ज्ञानविश्वासर्वोऽपि त्वमक्षशानदूरगः ॥ ११ ॥ त्वदर्शनाशुभिर्देवाज्ञानध्यातचय दू त । एनसामा क्षयनोऽगाद्ययात्र भानुना तमः ॥ १२ ॥ नित्यं स्वामिन् ! नमस्तुभ्यं स्वमुक्त्य गुणसिंधवे । नमस्ते दिव्यदेहाय नमस्ते घातिघातिने ॥१३॥ भवद्भुतिं समया त्व देहि न कृपयात । रुपानायो यतस्त्वं हि याचका. ना सुरद्रुम ॥१४॥ इति भक्त्या स्तव कृत्या प्राथ्येप्टप्रार्थना परा । नत्वा स्वं स्व प्रकोष्ठ तेऽभजस्तत्सम्मुसाश्चिदे ॥१५॥ अथ दृष्ट्वागणाधीशो बड़े पदवीधारी भी पूजते हैं वे पज्य योगी भी आपकी सेवा करते हैं। हे भगवान ! ज्ञानियों में आप सर्वज्ञ हैं प्रचंड तप तपनेवाले तपस्वियों में आप महा तपस्वी हैं, योगियों के अन्दर महायोगी ओर कर्मों के जी- तनेवाले जिनों में आप उत्कृष्ट जिन हैं ॥७-६॥ हे भगवान ! आपका चित्त संसारके दुखों से समस्त जगत्को उद्धार करनेका है, आपकी संसारके किसी भी पदार्थमें इच्छा नहीं इसलिये आप निरीह है, समस्त जगतका हित करनेवाले हैं, बहिरङ्ग और अन्तरंग दोनों प्रकारकी लक्ष्मीसे शोभायमान हैं और संसारमें समस्त निग्रंथों के आप राजा हैं ॥ १० ॥ हे भगवान ! यह बड़े अचरजकी बात है कि इन्द्राणी आदि आपके चरण कमलों की सेवा करती हैं तब भी आप ब्रह्मचारी हैं, यद्यपि आप समस्त संसारके पदार्थों के जानकार हैं तथापि इन्द्रियों के ज्ञानसे आप दूर हैं अर्थात् इंद्रियजन्य ज्ञान आपके अंदर नहीं ॥ ११॥ हे भगवान ! जिसप्रकार सूर्यके द्वारा अंधकारका नाश होता है उसीप्रकार आपके दर्शनरूपी किरणोंसे हमारा अज्ञानरूपी अंधकार और पापोंका क्षय हो गया ॥ १२ ॥ हे भगवान! आप गुणोंके समुद्र हैं इसलिये स्वगे और मोक्ष की अभिलाषासे आपके लिये नमस्कार है, आप दिव्य शरीरके धारक हैं और घातिया कोके नाश करनेवाले हैं इसलिये आपके लिये नमस्कार है ॥ १३ ॥ विशेष क्या ? वस ! सविनय प्रार्थना यही है कि आपने जिस अलौकिक विभूतिको प्राप्त किया है वह कृपाकर बहुत शीघ्र हमें भी प्रदान करें क्योंकि आप संसारके अंदर कृपानाथ हैं और याचकों के लिये कल्पवृक्ष हैं ॥ १४ ॥ इसप्रकार देवेंद्रों १२२ मल्लि. १२३ विशाखाख्य समनधी. 1 मइद्धि को गणान् सर्वान् सद्धमश्रवणोत्सुकान् ॥१६॥ उत्थाय कुड्मलीकृत्य करौ नत्वा जगद्गुरु स्तुत्वा स्तुतिशतर्भू- योऽकरोत्पृच्छामितिस्वय ॥ १७ ॥ देव ! लो विश्वतत्त्वानि समग्न धर्मलक्षण । द्वादशागभया सर्व न सर्वज्ञ ! निरूपय ॥ १८ ॥ ततोऽवादोजग नाथो गभीरध्वनिना चिदे । विश्वसत्त्वहितार्थाय मुक्तिमार्गप्रवृत्तये ॥ १६ ॥ मुयाम्बुजेऽस्य वक्त निकृतिनाभून्मनाग् न च । नाल्बोष्ठाना परिस्पदो निर्ययो भारतो मुखात् ॥ २० ॥णु त्वं हे गणाधीश धीमन्ने काग्रचेतसा । सर्व गणैः सम सर्व वक्ष्ये वः श्रू तविस्तर ॥२१॥ जीवाजीवाम्रया ने भक्तिपूर्वक भगवान जिनेंद्रकी स्तुति की। जिस अभीष्ट वस्तुको उन्हें प्रार्थना करनी थी वह प्राथनाकी पुराण एवं वास्तविक ज्ञान प्राप्त करनेके लिये वे भगवान जिनेंद्रके सन्मख अपने अपने कोठों में जाकर बैठ गए ॥ १५ ॥ भगवान मल्लिनाथके सबसे प्रधान गणधर विशाख थे जो कि पूर्ण बुद्धिके धारक थे, नाना प्रकार की ऋद्धियों को प्राप्त थे, जिस समय उन्होंने देखा कि कोठो में वैठनेवाले समस्त भव्य जीव धर्मका स्वरूप जाननेके लिये उत्सुक हैं वे उठे, हाथों को जोड़कर उन्होंने तीन जगतके गुरु भगवान जिनेंद्रको भक्तिभावसे नमस्कार किया। सैकड़ों प्रकारके स्तुति परिपूर्ण वचनों से स्तुति की एवं स्वयं इसपकार भगवान जिनेंद्रसे पूछने लगे- हे देव । आप सर्वज्ञ हैं इसलिये तत्वों का स्वरूप, धर्मका अखंड लक्षण और बारह अंगोके अंदर जो जो बातें वतलाई गई हैं उन सब बातों के जानकार हैं कृपाकर उन सब बातों का हमारे जाननेके लिये स्वरूप वर्णन करिये ॥ १६-१८॥ गणधर विशाखकी इस प्रकारकी पवित्र धर्मजिज्ञासा सुनकर समस्त प्राणियों का हित संपादन करनेके लिये और मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति प्रकट करनेके लिये “जीवों को वास्तविक ज्ञान हो" इस कृपासे प्रेरित वे भगवान जिनेंद्र धर्मोपदेशके लिये प्रवृत्त होगये ॥ १६ ॥ यह नियम है कि वक्ता जिससमय बोलता है उसके मुखपर कुछ विकार और ताल ओठों का हलन चलन होने लगता है परंतु जिस समय भगवान धर्मोपदेशके लिये प्रवृत्त हुए थे उस समय उनके मुखपर किसी प्रकारका विकार नही प्रतीत होता था एवं ताल ओंठ आदिका हलन चलन भी किसी प्रकारसे नहीं होता था इसलिये इस आश्चर्यकारी रूपसे भगवान जिनेन्द्रके मखसे वचन भंगो निकलती थी। वे भगवान जिनेन्द्र, गणधर वि- शाखको उत्तरमें इस प्रकार कहने लगे हे बुद्धिमान समस्त गण-सभासदों के स्वामी! मैं आगमके १२३ पल्लि० १२४ पुरा वध, संवरो निर्जरा शिव. । इति सप्तव तत्त्वानि प्रोक्तानि श्रीजिनेशिना ॥ २२ ॥ तेपा भेदं च विस्तारं हेयाहेयं च लक्षण । द्रव्यपर्याय भेदाश्व रचयामास तॊऽजसा ॥ २३ ॥अपारसंसृत व्यान् यदुधृत्य शिवालये , धरत्येव स धर्मोऽत्र शेयोऽनतसुखार्णव. ॥ २४ ॥ समग्रेतरभेदेन द्विधा धर्मो दयामय । यतिश्रावकदक्षाणा स्वर्गमोक्षप्रदोमत. ॥२५॥ आदौ सदर्शन धार्य धर्ममूल गुणेयुत । त्यक्तदोपं गृहस्थश्ने संयतेमुक्तिबल्लभं स्वरूपका विस्तारसे वर्णन करता हूं वह तुम्हें और समस्त गणको चित्त एकाग्रकर ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए जीव अजीव आस्रव बंध संवर निर्जरा और मोक्ष ये तच्च सात है । इन जीव अजोव आदि तत्वों के भेद, उनका विस्तार, कौन तत्व हेय है और कौन उपादेय है यह बात, जीव अजीव आदिका लक्षण और द्रव्य पर्यायोंके भेद, इन सब बातोंको उन्होंने कहा और बोले कि ॥२०-२३॥ यह संसाररूपी समुद्र अपार है इस अपार संसाररूपी समुद्रसे उठाकर जो जीवोंको मोक्षमें लेजाकर रक्खे वह धर्म कहा जाता है और वह अनंते सुखोंका समुद्र स्वरूप है ॥२४॥ वह दयामय धर्म, सकल और विकलके भेदसे दो प्रकार का है। सकल धर्मको धारण करनेवाले मुनि होते हैं और विकल धर्मको धारण करनेवाले श्रावक होते हैं एवं वह स्वर्ग और मोक्षके सुखोंका प्रदान करनेवाला है ॥२५॥ गृहस्थोंकी ग्यारह प्रतिमाओंको वर्णन करते हुए वे जिनेन्द्र कहने लगे—धर्मका मूलकारण समस्त दोषोंसे रहित सम्यग्दर्शन है और वह मोक्षकी परम प्यारी वस्तु है । जो महानुभाव धर्मको धारण कर मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं वे चाहे गृहस्थ वा मुनि कोई हों उ- न्हें सबसे पहिले सम्यग्दर्शन धारण करना चाहिये । मद्य मांस मधु और पांच उदंवर अर्थात् ऊमर कठूमर कटहर पीपर और पाकर इन आठोंका त्याग गृहस्थोंके आठ मूलगुण है । जो महानुभाव अणुव्रत वा महात्र- तोंके धारण करनेके अभिलाषी हैं उन्हें पहिले इनआठ मूलगुणोंको धारण करना चाहिये ना खेलना १ शराब पीना २ मांस खाना ३ वेश्यासेवन करना ४ परनारी सेवनकरना ५ चोरी करना ६ और शिकार खे- १। सम्यग्दर्शनशुद्ध. ससारशरीरभोगनिर्विष्ण' । पचगुरुचरणशरणो दर्शनिस्तत्त्व पथगृह्य ॥ १३७ ॥ जो महानुभाव सम्यग्दर्शनसे शुद्ध हो, ससार शरीर और भोगोंमें विरक्त हो, पाचों परमेष्ठियोंके चरणोंको शरण समझे और समीचीन मार्गका ग्रहण करनेवाला हो वह महानुभाव पहिली प्रतिमा दर्शन प्रतिमाका धारण करनेवाला है । रत्नकरडधावकाचार । मद्यमासमधुत्यागे. सहाणुव्रतपंचक । अष्टौ मूलगुणानाहु हिणा श्रवणोत्तमा ॥ ६६ ॥ रत्नकरंडश्रावकाचार। १२४ मल्लिक १२५ १ ॥२६॥मद्यमासमधून्येव सहोदुम्बरपंचके । त्यक्त्वा मूलगुणा अष्टौ धार्या आदौ व्रताप्तये ॥ २७ ॥ य सप्तव्यसनं त्यक्त्वा धत्ते मूलगुणाष्टक सम्यग्दर्शनसशुद्धस्तस्याद्या प्रतिमा मता ॥ २८ ॥ अणु व्रतानि प'चेव त्रिप्रकारं गुणव्रत । शिक्षावतानि चत्वारि द्वादशे ति व्रतान्यपि ॥ २६ ॥ मनो. वाकाययोगेन कृताद्य स्त्रसघातन । यो न कुर्यात्सुधीस्तस्य भवेदाद्यगुण व्रत ॥ ३०॥ सर्वव्रत समूहानामहिसा जननी मता । खानिर्विश्वगुणाना च धरा धर्मतरो. परा ॥ ३१ ॥ परपीडाकर स्थूलमसत्य यः कृतादिभि । न वक्ति जातु धीमान् स भजेत्सत्यमणुव्रतं ॥ ३२ ॥ सन्यं हितं मितं तथ्यं वधवधादिदूरगं । वक्तव्य व्रतिभिर्नित्यं मधुरं धर्मसूचक ॥ ३३ ॥ नष्ट' वा पतितं स्थूलपरवस्त्यादि विस्मृत । पथ्यादौ गृह्यते यन्न तत्तृतीयं व्रतं लना ७ ये सात व्यासन माने हैं इन सातों प्रकारके व्यसनोंका सर्वथा त्यागकर जो पुरुष आठ मूलगुणों- को धारण करता है वह सम्यग्दर्शनसे शुद्ध कहा जाता है एवं जो महानुभाव इसप्रकार सात व्यसनोंका त्याग कर आठ मूलगुणों को धारण करता है वह दर्शन नामक पहिली प्रतिमाका धारक माना जाता है ॥२५–२८॥ हिंसा १ चोरी २ झूठ ३ कुशील ४और परिग्रह ५ स्थूलरूपसे इन पांचों पापों का त्याग करना- पांच प्रकारका अणुव्रत है । दिग्नत अनर्थदंडवत और भोगोपभोग परिमाणवत इस प्रकार ये तीन गुणवत हैं एवं देशावकाशिक १ सामायिक २ प्रोषधोपवास ३ और अतिथिसंविभागवत ४ ये चार शिक्षाव्रत हैं इस प्रकार ये वारहवत श्रावकों के हैं ॥२६॥ मनसे करना कराना और करनेकी अनुमोदना करना, वचनसे कर- ना कराना और अनुमोदना करना एवं शरीर से करना कराना और अनुमोदना करना इसप्रकार मनवचन काय और कृत कारित अनुमोदनासे जो दोइंद्रिय आदि स जीवों का घात नहीं करना है वह पहिला अ- हिंसा अणुव्रत कहा जाता हैं ॥ ३० ॥ यह अहिंसा समस्त व्रतों की जननी है अर्थात् जबतक हृदयमें अहिं- साकी सत्ता नहीं है तबतक किसी भी व्रतका पलन नहीं हो सकता। यह समस्त गुणों की खानि है। अहिंसाके पालन करनेसे हो आत्मामें समस्त गुणोंकी प्राति होती है एवं धर्नरूपी वृक्षोंको उत्पन्न करने- वाली उत्तमभूमि है-अहिंसाके पालन से ही वास्तविक धर्मकी उत्पत्ति होती है ॥ ३१॥ मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदनासे दूसरे को पीड़ा करनेवाले स्थूल झूठका न बोलना सत्य अणुव्रत कहा जाता है जो महानुभाव सत्य अणुव्रतके पालन करनेवाले हैं उन्हें चाहिये कि जब बोलें उससमय सत्य मल्लिक पुराण १२६ स्मृतं ॥ ३४ ॥ मात्रादिसरा सर्ना ये पश्यन्ति परखियः । न कुर्वति मनानागं तेपा तुर्यमणुव्रतं ॥ ५ ॥ क्षेत्रादिदशसंगाना प्रमाणं यद्विधीयते। सतोपाल्लोभमाहत्य तत्पंचममणुरतं ॥ ३६ ॥ पोडशस्वर्गपर्यत फल पुण्य पर सतां । पापाटिसवरं पचाणुनतानि फलति च ॥ ३० ॥ संग्च्या या क्रियते दक्षोर्जीनघानादिहानरे। दिग्देशाना प्रणीत तजिनेदिग्विरतित ।। ३८ ॥ वृया पापान्नर सरोऽापच्यानादिहापर्ने । यो निरानियते भव्य. ही वोलें। हितकारी बोलें । बहुत थोड़ा परिमित बोलें। पक्षपात रहित निदोप बोलें । "मारो बाधो” इत्यादि शब्द कभी न बोलें एवं बहुत मीठा और धर्मके स्वरूपका सूचन करनेवाला वचन बोलें ॥ ३२-३३ ॥ जो सोना चांदी आदि वस्तुयें नष्ट, हों अर्थात् जमीन आदिके अंदर गड़ी आदि हों वा मार्ग आदिमें गिरी पड़ी हों या किसी कारण वश भूली हुई हों उन्हें मन वचन काय ओर कृत कारित अनुमोदनासे जो ग्रहण नहीं करना है वह तीसरा अचोर्य नामका अणुवत है ॥ परस्त्रियोको जो माता आदिके समान समझता है अर्थात अपने से छोटो स्त्रीमें पुत्रीके भाव, बरावर वालीमें वहन सरीखे भाव और बड़ीमें माता सरीखे भाव होना है एवं उन्हें देखकर जरा भी राग भावका न होना है वह चौथा ब्रह्मचर्य (स्वदारसंतोप नाम का अणुवत है ॥ ३५ ॥ तथा संतोपको हृदयमें धारणकर ओर लोभका सर्वथा त्यागकर ऊपर जो क्षेत्र वस्तु आदि दशप्रकारके परिग्रह कहे गये हैं उनका परिणाम करलेना है अर्थात् हम अमुक चीज इतनी ही रक्खेंगे इसप्रकारको मर्याद बांध लेना है वह पांचवां परिग्रह परिणाम नामका अणुव्रत है ॥ ३६ ॥ इन पांचों अणुव्रतोंके पालन करनेका फल यह है कि पंचाणवती महानुभाव पवित्र पुण्य उपार्जन कर सोल- हवें स्वगतक के सुखोंको भोगते हैं एवं पापके आगमनको रोकते हैं ॥ ३७॥ दिशाओंकी मर्यादाकर उनसे आगे न जाना दिग्विरति कहो जाती है। जीवोंके घात आदि न हों, इस पवित्र अभिलापासे जो दिशाओंके अन्दर यह परिणाम करलेना कि अमुक दिशामें में इतने कोस- तक जाऊगा उससे आगे न जाऊंगा वह दिग्विरति नामका गुणवत है ॥ ३८॥ जिन जिन कार्यों से व्यर्थ ही पापका आस्रव होता हो उन कार्यों का जहांपर त्याग हो एवं अपव्यान-खोटे व्यान आदिको भी त्याग हो वह अनर्थदण्ड व्रत है। इसका विशेष तात्पर्य यह है - १२६ न मल्लिक १२७ १ स्तद्वितीयं गुणवत ॥३६॥ ताबूलान्नादिभोगानां प्रमाण क्रियते च यत् । रत्रोभूषाधु पभोगाना तृतीयं तद्गुणवतं ॥४०॥ ऋगवेरादिकान् कंदारच. विना प्रयोजन ही जीवोंको दंड देना अनर्थदण्ड कहा जाता है एवं उसका त्याग कर देना अनर्थदंड- व्रत नामका गुणवत है। अनर्थदण्डके पापोपदश १ हिंसादान २ अपध्यान ३ दुःश्रुति ४ और प्रमादचर्या ५ ये पांच भेद हैं। मारना बांधना बहुत बोझा लादना आदि रूपसे तिर्यचोंको क्लेश करनेवाला उपदेश देना, व्यापारका उपदेश देना, जिसकार्यके करनेमें छह कायके जीवोंकी हिंसा होती हो ऐसा हिंसापरिपूर्ण उपदेश देना, वा महल आदिका बनावनारूप आरम्भका उपदेश देना एवं छल कपट धोखेवाजीका उपदेश देना इस प्रकार पापका कारण उपदेश देना पापोपदेश नामका अनर्थ दंड है। फरसा तलवार फावड़ा अग्नि आयुध और वेडी आदि हिंसाके उपकरणोंका दूसरे को प्रदान करना हिंसादान नामका अनर्थदण्ड है। तीब्र द्वष वा तीव्र रागसे पराये स्त्री पुत्र आदिके विषयमें यह चिंतवन करना कि यह बंध जाय वा मर जाय वा छिद जाय आदि तो अच्छा ऐसे खोटे चितवनका नाम अपध्यान नामका अनर्थदंड है। जो शास्त्र असि, मषि, कृषि आदि आरम्भ, धन धान्य आदिक परिग्रह, रौद्र कामोंका साहस मिथ्यात्व द्वध राग अहंकार और कामके विकारोंको उत्पन्न करनेवाले हों ऐसे खोटे शास्त्रोंका सुनना विचारना दुःश्रुति नाम का अनर्थदंड है। पृथिवी खोदना जल वहाना अग्निका जलाना और पवनका फूकना व्यर्थ रम्भ करना, विना कारण वनस्पतिका छेदना स्वयं चलना और दूसरों को चलाना यह सव प्रमादचर्या नामका अनर्थदंड है। इन पांचों प्रकारके अनर्थदंडों का त्यागना अनर्थदण्डव्रत कहा जाता है। तथा तांबूल अन्न आदि भोगरूप पदार्थोंका और स्त्री भूषण वस्त्र आदि उपभोगस्वरूप पदार्थों का जो प्रमाण करना है वह भोगोपभोग परिमाण नामका गुणव्रत है। जो वस्तु एक बार भोगकर पुनः भोगने में न आवे वह भोग और जो बार-बार भोगनेमें आवे वह उपभोग स्वरूप कहलाती है। पान इलायची भोजन आदि पदार्थ एकही वार भोगनेमें आते है इसलिये ये भोगस्वरूप है एवं स्त्री भषण आदि पदार्थ ||१२ बार २ भोगनेमें आते हैं इसलिये ये उपभोग स्वरूप हैं। इन तीनों दिग्ब्रतोंके साथ साथ अनंते जीवोंसे फंकना इसप्रकार मल्लि. पुराण १२८ नंतजीवसंकुलान् । मूलकीटफलान्निद्यान् पुष्पादीन् विपवत्त्यजेत् ॥ १ ॥ दिशा या गमने सख्या दिन प्रति विधीयते । क्षेत्रादिसीमया मुक्त्यै तत्स्याइशारकाशिकं ॥ ४२ ॥ त्रिकाल क्रियते यद्धि नित्यं सामायिक बुधै. । त्रिशुद्धया मुक्तये शिक्षाबत स्यात्तद्वितीयकं ॥ ४३ ॥ अष्टम्या च चतुर्दश्या निरारम्भो विधीयते । नियमेनोपवासो यस्तत्प्रोपधवत मतं ॥ ४४ ॥ पात्रदानाय नित्यं यद् गृहद्वार विलोक्यते । चतुर्धा दीयते दान तत्स्याच्छिशाव्रतातिमं ॥ ४५ ॥ प्रतिपालयतीमानि यो द्वादशप्रतान्यपि। अतीचारान् विना सोऽयायतिः पोडशमं दिवं ॥ ४६॥ यावज्जीवं व्याप्त अदरख आदि कंदमूलोंको, जिनके मलभागमें कीड़े हों ऐसे फलोंको और निंद्य पुष्प आदि चीजोंको भो विषके समान अहितकारी जान छोड़ देना चाहिये ॥ ३६-४१ ॥ पूर्व दिशामें मैं सौ कोशतक जा- ऊंगा वा उत्तर दिशामें मैं पचास आदि कोश तक जाऊंगा ऐसा परिमाण करना तो दिग्बतका विषय है परन्तु इसी परिमाणमेंसे क्षेत्रकी मर्यादा बांधकर जो प्रतिदिन यह परिमाण कर लेना है कि आज मैं अ- मुक घर तक जाऊंगा वा मन्दिर तक जाऊंगा मंदिरसे बाहर नहीं जाऊंगा वह देशावकाशिक नामका शिक्षावत कहलाता है यह देशावकाशिक शिक्षाबत विशेषरूपसे जीवकी हिंसाका निरोधक होनेसे निर्मलता का कारण है इसलिये मोक्षको प्राप्त करानेवाला माना जाता है ॥ ४२ ॥ सामायिकका विधान तीनों काल माना जाता है जो महानुभाव मोक्षप्राप्तिकी अभिलाषासे मन वचन कायकी शुद्धतासे तीनों काल सोमा- यिक करते हैं उनके सामायिक नामका दूसरा शिक्षाबत होता है ॥ ४३॥ प्रत्येक मासकी अष्टमी चतुर्दशी के दिन किसी प्रकारके आरंभको न कर नियमसे उपवास करना है वह प्रोषधोपवास नामका तीसरा शिक्षाबत है ॥ ४४ ॥ उत्तम ओदि पात्रोंको दान देनेकेलिये जो प्रतिदिन अपने घरका द्वार देखते हैं द्वारा- प्रेक्षण करते हैं तथा पात्रोंके प्राप्त होनेपर उन्हें आहार औपधि आदि चारों प्रकारका दान करते हैं वे महा- नुभाव अतिथिसंविभाग नामके चौथे शिक्षाबतके धारक हैं जिसकी कोई निश्चित तिथि न हो वह अतिथि कहलाता है और संविभागका अर्थ निर्दोष वस्तुका देना है अर्थात् मुनि आदि अतिथियोंके लिये जो आहार औषधि आदिका प्रदान करना है वह अतिथिसंविभागका अन्वर्थ है ॥ ४५ ॥ ग्रन्थकार फल प्रदर्शन करते हुए कहते है कि जो महानुभाव उपर्युक्त व्रतोंका अतीचार रहित पालन करते हैं उन्हें सोलहवें स्वर्ग के दिव्य सुख भोगनेके लिये प्राप्त होते हैं ॥ ४६ ॥ ॥ १२८ मल्लिक पुराण १२६ प्रपाल्योच्चतानि सकलान्ययि । अन्से सल्लेखना कार्या विधिना तत्फलाप्तये ॥४७॥ द्वादशव्रतसर्वाणि यो विधत्ते वुधोत्तम. । द्वितीया प्रतिमा तस्य भवेत्स्वर्गश्रिय. सखी ॥ १८॥ सामायिकाभिधा शे या तृतीया प्रतिमा परा। सत्प्रोषधोपवासाख्या चतुर्थो कर्मनाशिनी ॥ ४६॥ पत्रवीज. फलादीनि सवित्तानि त्यजेत्रिधा । चाप्रासुकजलीदीनि पचमी प्रतिमाप्तये ॥ ५० ॥ अशन पानकं खाद्य स्वाद्य च त्यज्यते निशि । अखाद्यवदयाय व्रतोंको पालन करनेवालोंके लिये अन्त समयमें सल्लेखनाका भी विधान है। सल्लेखनाका लक्षण यह बतलाया गया है कि तीव्र उपसर्ग आनेपर वा दुर्भिक्ष उपस्थित होनेपर वा अत्यन्त वृद्धावस्था होनेपर अथवा तीव्र रोगके उपस्थित होनेपर जिसका कि किसी प्रकारसे प्रतीकार न हो सके–मृत्युका ही समय आकर उपस्थित हो जाय उससमय किसी कषाय आदिसे प्रेरित न होकर धर्मके लिये जो सन्यासपूर्वक शरीरका त्याग करना है वह सल्लेखना व्रत है। जो महानुभाव बारह व्रतोंके पालन करनेवाले हैं उन्हें उपयुक्त व्रतोंका यावज्जीव पालनकर अंतमें मृत्युके समय उन समस्त व्रतोंके पवित्र फलकी प्राप्तिके लिये शुद्ध भावों से सल्लेखना करनी चाहिये ॥ ४७ ॥ इसप्रकार जो महानुभाव इन बारह व्रतों का अतीचाररहित विशुद्ध भावों से पालन करता है उसके दूसरी प्रतिमा होती है जो कि स्वर्गरूपी लक्ष्मीकी सखी स्वरूप मानी गई है ॥ ४८ ॥ तीसरी सामायिक प्रतिमा है जो पुरुष प्रत्येक दिशामें तोन तोन आवर्त इसप्रकार वारह आवत्र्तों को कर एवं चारों दिशाओंमें चार प्रणामकर स्थिति होनेवाला हो यथाजात रूपका धारक हो दोनों प्रकारके आसनोंसे युक्त हो मन वचन कायकी शुद्ध रखनेवाला हो और तोनों काल सामायिक करनेवाला हो वह सामायिक प्रतिमाका धारक है। चौथी प्रतिमाका नाम सत्प्रोषधोपवास है । जो महा- नुभाव प्रत्येक मासको अष्टमी और चतुर्दशीको शक्तिको न छिपाकर प्रोषधोका करनेवाला है वह कमों को नाश करनेवाली सत्प्रोषधोपवास प्रतिमाका धारक है। पांचवी प्रतिमाका नाम सचित्तविरत है जो महा- नुभाव इस पांचवीं प्रतिमाकापालन करना चाहैं उन्हें मन बचन और कायसे सचित्त पत्र बीज और फल आदिका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये एवं उन्हें अप्रासुक जल भी ग्रहण न करना चाहिये ॥४६-५०॥ छठी प्रतिमा रात्रिभुक्तिविरत है। जो महानुभाव रात्रिभुक्तिविरत प्रतिमाके धारक हैं उन्हें दया धर्मकी || १२६ प्राप्तिके लिये जिस प्रकार अखाद्य-नही खाने योग्य, वस्तुका सर्वथा त्याग कर दिया जाता है उसीप्रकार रात्रिमें U" पुराण पत् पष्ठी च प्रतिमा हि सा ॥५१॥ यो विधते इमा: पटू प्रतिमा दोपतिगा दुध । जघन्यः श्रावक प्रोक्त सदृग्शुद्धो जिनागमे ॥५२॥ स्वावा मिव सर्वनारी मत्वावामध्यखातिका । पाल्यते ब्रह्मचयं यत्सप्तमी प्रतिमात्र सा ॥ ५३॥ पापाकरो गृहारम्भस्त्यज्यते सकलो हि य । मनोवा- काययोगै स्यादष्टमी प्रतिमात्र सा ॥ ५४॥ वस्त्रपात्र विना शोषस्त्यज्यते य परिग्रह. । सर्वानर्थकरोभूतो नवमी प्रतिमा हि सा ॥ ५५ ॥ नवैता प्रतिमा धत्ते य सदृष्टिविरागवान् । मध्यमः श्रावकः सोऽत्र मतो धर्मपरायणः ॥ ५६ ॥ मनाम् नानुमति धत्ते यो गेहाद्यादिकर्मणि। आहारादौ अन्न पान खाद्य और स्वाद्य इन चारों प्रकारके आहारोंका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये । अन्नसे यहांपर भोजन लिया गया है। पानसे जल दूधशरबत आदि पीने योग्य पदार्थका ग्रहण है। खाद्यसे खाने योग्य पदार्थ पेड़ा लाडू आदि लिये हैं और स्वाद्यसे इलाची पान सुपारी आदि पदार्थोंका ग्रहण है ॥५१॥ इस- प्रकार जो महानुभाव पहिली प्रतिमासे छठी प्रतिमापर्यंत यह प्रतिमाओंका निर्दोषरूपसे पालन करनेवाला है वह सम्यग्दर्शनसे महानुभाव जघन्य श्रावक माना गया है ॥५२॥ सातवीं ब्रह्मचर्य प्रतिमा है जो महा- नुभाव अपनी पराई समस्त स्त्रियोंको अपनी माताके समान मानता है एवं उनसे रंचमात्र भी रागका स्पर्श नहीं रखता वह महानुभाव ब्रह्मचर्य प्रतिमाका पालन करनेवाला ब्रह्मचारी है ॥ ५३॥ घरका समस्त आरम्भ अनेक प्रकारके पापोंका कारण है अर्थात् सेवा खेती व्यापार आदि कोई भी आरम्भ किया जाय नियमसे उससे पापोंकी उत्पति होती है । जो महानुभाव इसप्रकार पापके कारण स्वरूप घरके आरम्भका मन वचन और कायकी शुद्धतापूर्वक त्याग करनेवाले हैं उन महानुभावोंके आरम्भ त्याग नामक आठवी प्रतिमा होती है ॥ ५४॥ नवमी प्रतिमाका नाम परिचित परिग्रह त्याग है। परिग्रह समस्त अनर्थोंका मूल कारण है। जो महानुभाव वस्त्र और पात्रके सिवाय शेष समस्त प्रकारके परिग्रहका त्यागी है अर्थात् क्षेत्र वस्तु आदि ऊपर कहे गए दश प्रकारके परिग्रहसे ममत्व हठाकर जो महानुभाव निर्ममत्व परिणाममें लीन है और अपने आत्मस्वरूपके अन्दर विराजमान है और संतोषी है वह पुरुष परिचित परिग्रह त्याग नामक नवमी प्रतिमा का धारक है ॥ ५५ ॥ इसप्रकार जो सम्यग्दृष्टि रागरहित और धर्ममे लीन होकर इन नौही प्रतिमाओका निर्दोष रूपसे पालन करनेवाला है वह मध्यम श्रावक कहा जाता है ॥ ५६॥ दशवी प्रतिमाका नाम अनु- मति त्याग है जो महानुभाव घर आदिके कार्योंमें और आहार आदिमें रंचमात्र भी अपनी अनुमति ( सलाह ) नही देता अर्थात् सदा मध्यस्थभाव रखता है वह महानुभाव अनुमति त्याग नामक दशवीं प्रति- मल्लि. पुराण । चतस्यैव प्रतिमा दशमी भवेत् ॥ ५७॥ अखाद्यमिव विज्ञाय सदोषाहार मंजसा। योऽत्ति सद्भिक्षयाहारं तस्य स्या प्रतिमातिमा ॥५८॥ एना य प्रतिमा धत्ते सम्यग्दष्टिः शिवाप्तये। उत्तमः श्रावक प्रोतः स जिन स्वर्गमुक्तिभाग् ॥ ५६ ॥ गृहिणा मुदमुत्पाद्य गृहिधर्मोपदेशने । यतिधर्ममतो ब्रूते जिनो यतिसुसाप्तये ॥ ६० ॥ महावतानि पचव तथा समितयः परा । पचेन्द्रियनिरोधाश्च लोच आवश्यकानि षट् ॥ ६१ ॥ अचेलत्व तथा स्नानं क्षितौ हि शयन परं । अदंतघर्षण रागदूरच स्थितिभोजन ॥६२॥ एकभक्त गुणा पते मूलाच्या द्विचतुदश । मूलभूता मुनीना सद्धर्मस्य मोक्षकारिण ॥ ६३॥ प्राणातेऽपि न मोक्तव्या धर्ममूला इमे गुणा । मूलभूता यमादीना जातूत्तरगुणाप्तये ॥ ६४ ॥ सर्वमूलगुणा- माका धारक कहा जाता है ॥ ५७ ॥ तथा ग्यारहवी प्रतिमाका उत्कृष्ट श्रावक है। जो महानुभाव अपने निमित्तसे होनेवाले सदोष आहारको अखाद्यके समान निंदनीक जान कर उसे ग्रहण नहीं करता एवं क्षोभि वृत्तिसे आहार ग्रहण करता है अर्थात्- घरवारसे विरक्त हो जहां मुनिराज विराजमान हों उस वनमें जाकर एवं गुरुके समीपमें व्रतोंको धारणकर तपका आचरण करता है, भिक्षाचर्यासे आहार ग्रहण करता है एवं चेलखंड-कोपीनमात्र परिग्रहका धारक है वह पुरुष उत्कृष्ट श्रावक नामक ग्यारहवीं प्रतिमाका धारक है ॥५८ ॥ इसप्रकार जो सम्यग्दृष्टि मोक्ष प्राप्तिकी अभिलाषासे इन ग्यारह प्रतिमाओंका निर्दोष रूपसे पालन करता है वह उत्कृष्ट श्रावक है और वह स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्तिका पात्र है ।।५६ ॥ इसप्रकार गृहस्थ धर्मका उपदेश देकर भगवान जिनेन्द्रने कहा कि गृहस्थोंको आनन्द प्रदान करनेके लिये गृहस्थ धर्मका वर्णन कर दिया गया अब यतियोंको आनन्द प्रदान करनेके लिये यति धर्मका व्याख्यान किया जाता है- अहिंसा आदि पांच महाव्रत, ईर्या आदि पांच समितियां, पांचों इन्द्रियोंका निरोध १५ केशोंकालोंच करना १६ समता आदि छह आवश्यक २२ समस्त वस्त्रका त्याग २३यावज्जीव स्नानका न करना २४ भूमि- पर शयन २५ दंतधावन नही करना २६ रागरहित खड़े खड़े आहार लेना २७ और एकवार लघु भोजनका करना ये २८ अट्ठाईस मुनियोंके मूल गुण हैं। समोचीन धर्मके मूलकारण होनेसे इनकी मूलगुण संज्ञा है एवं ये मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं ॥ ६०–६३॥ मूलगुणोंकी प्रशंसा करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि-ये मूल गुण वास्तविक धर्मके मूल कारण हैं एवं यम नियम आदिकी उत्पत्तिके भो प्रधान कारण हैं एवं मुलगुणोंके पूर्णरूपसे पालन करनेसे ही चौरासी लाख उत्तर गुणोंकी सिद्धि होता है इसलिए जो पुरुष उत्तर गुणोंकी प्राप्तिके अभिलाषी हैं उन्हें प्राणोंके जानेपर भी कभी भी इन मूलगुणोंका परित्याग नहीं करना चाहिये।

१३२ --- - । चारात्परो धर्मश्च जायते । धर्माल्लोकत्रये शर्म महन्मोक्ष क्रमात्सतां ॥ ६५ ॥ इति मत्या सदाराध्या विश्वे मूलगुणास्त्रिधा। जिनमुद्रा समादाय मल्लि० धर्मार्थिभिमुक्षुभिः ॥ ६६ ॥ उत्तमाद्या क्षमा मार्दवं तथार्जवमुत्तम । सत्य शौच पर संयमस्तपस्त्याग उत्तम ॥ ६७ ॥ आफिचन्यं महद्ब्रह्मचर्य वीजसमान्य हो । लक्षणानि दशेमानि स्युर्धर्मकल्प साखिन. ॥ ६८॥ अतो धर्मार्थिमिझे तानि लक्षणानि मुक्तये। धर्महेतूनि सेव्यानि न मोक्तव्यानि जातुचित् ॥ ६६ ॥ नि पापो जायते धर्मस्तपोमिनिसिलोऽनौ । उत्तमाचरणे. सर्वानाध्ययनकर्मभि. ॥ ७० ॥ वैराग्यभावनाद्यश्च मनोवा- वाक्कायकर्मभिः । शुद्ध साम्यश्च निष्पापै धर्मसवेगवासितै ॥ ७१ ॥ तस्माद्धर्मार्थिभि कार्य तप सब द्वि पड विधं ध्यानाध्ययनयोगाचारादिक तथा इन समस्त मूलगुणोंके आचरण करनेसे वास्तविक धर्मकी प्राप्ति होती है उस धर्मकी कृपासे तीनो लोकका महान कल्याण प्राप्त होता है एवं कर्मसे मोन भी मिलती है इसलिए जो महानुभाव धर्मको प्राप्त करना चाहते है और अनंतसुखमय मोक्ष प्राप्तको पूरो २ अभिलाषा रखते हैं उन्हें दिगम्बर जैन दीक्षा धारण कर मन वचन कायकी शुद्धिपूर्वक समस्त मूलगुणोंका अच्छो तरह आराधन करना चाहिये। उनके पालन करने में किसी प्रकारकी विराधना न हो यह प्रति समय ध्यान रखना चाहिये ॥ ६४-६६ ॥ उत्तम क्षमा मर्दव आर्जव सत्य सौच संयम तप त्याग आकिचन्य और ब्रह्मचर्य ये दश लक्षण वास्तविक धर्मरूपी कल्पवृक्षके वीज स्वरूप हैं-इनको धारण करनेसे वास्तविक धर्मकी नियमसे उत्पत्ति होती है। इसलिये जो पुरुष धर्म प्राप्त करना चाहते हैं और मोक्ष प्राप्तिकी हृदयमें पूरी पूरो अभिलाया रखते हैं उन्हें वास्तविक धर्मके कारण स्वरूप उत्तमक्षमा आदि लक्षणोंका नियमसे सेवन करना चाहिये और कभी भी उनसे विमुख नहीं रहना चाहिये ॥ ६७-६६ ॥ जिस उत्तम क्षमा आदि धर्मका ऊपर उल्लखकिया गया है वह निर्दोष समस्त धर्म निर्दोष तपोंके द्वारा होता है उत्तम आचरण ध्यान अध्ययन वैराग्य भावना शुद्ध मन वचन कायकी क्रियायें, निर्दोष समता भाव एवं धर्मानुकूल संवेगकी वासनावोंसे होता है इसलिये जो महानुभाव धर्मके अभिलाषी हैं उन्हें धर्मकी वृद्धिके लिये बारह प्रकारका तप ध्यान अध्ययन शुभयोग और आचार आदिका सदा ध्यान रखना चाहिये ॥ ७०-७२ ॥ इस परम पावन धर्मकी कृपासे ही पुत्र पौत्र आदिकी प्राप्ति होती है । इष्ट भोगोंका मिलना भी धर्मसे ही होता है। सज्जन और मित्रके समान सेवक भी धमकी कृपासे प्राप्त होते हैं। पिता माता आदि बॉधवोंकी प्राप्ति भी धर्मकी ही कृपासे होती है। शृंगारकी खानियाँ एवं धर्मकार्यों में पूरी सहायता पहुचानेवाली स्त्रियां, पतके १३२ मल्लि. पुराप । धर्मवृद्धये ॥ ७२ ॥ धर्मेण पुत्रपौत्रादयः कामाभाश्च सजना । सेक्का मित्रतुत्या पितृमात्रायाश्च बांधवा ॥७३॥ श्रृंगारखानयो नार्य' सहाया धर्मकर्मणि । पर्वताभा गजास्तु गा रथा अश्या सुवेदिन ॥ १४ ॥ छत्रचामरराज्याधलकरणानि पराणि च । तुगधाम सुरस्तूनि जायते धर्मिणा स्य ॥ ७५ ॥ सता श्रोहदासीव धर्ममत्रवशीकृता । विश्वशर्मकरा धर्ममूला कुर्यात्स्थितिं गृहे ॥ ७६ ॥ अहमिंद्रपदं धर्माच्छकराजपदं बुध.। सर्वार्थसिद्धिभूतिश्च लभ्यते स्वर्ग उत्तम ॥ ७७ ॥ पटूखंडनिधिरनादिपूर्णा सर्वा विभूतय । चकाका धर्मिणा धर्मादुत्पद्य ते परश्रियः ॥ ७८ ॥ प्राप्यंत धार्मिकैर्धमोत्तीर्थनायश्रियो वरा । गणेशादिपदान्याशु विद्या ऋद्धयादमोऽखिला. ॥ ७६ ॥ यदूर दुर्लभ सर्व चानस्य भुवनत्रये । तद्वन्तु स्वयमायाति धर्मात्करतले सतां ।। ८० ॥ मुक्तिश्री स्वयमासक्ता चैत्य-धर्मधनेश्वरान् । दत्ते साल्गिन नून का कथा करपयोपिता ॥ ८१ ॥ इतिमत्वा सदा कार्यों धर्मो यत्नात्सुधार्मिक । सुखिमिर्धवृद्ध्यर्थं सुखवृद्धयौ शिवाय च ॥ ८२ ॥ दु सिभिर्दु सघाताय विधेयो धर्म उत्तम । पापिभि समान विशाल हाथी, ऊचे ऊचे रथ और अच्छीतरह शिक्षित घोड़े भी धर्मकी कृपासे प्राप्त होते हैं छत्र चमर राज्य आदि पदार्थ, उत्तमोत्तम भूषण, ऊंचे ऊचे मकान और भो उत्तमोत्तम पदार्थ धर्मात्माओंके स्वतः सिद्ध प्राप्त होते हैं। जो पुरुष धर्मात्मा हैं उनके समस्त प्रकारके कल्याणोंको प्रदान करनेवाली लक्ष्मी धर्मरूपी मंत्रसे वश की गई गृहदासीके समान रहती है । अहमिंद्रपद इन्द्रपद सर्वार्थ सिद्धि विमा- नकी विभूति उत्तम स्वर्गका सुख भी धर्मकी कृपासे प्राप्त होता है । जो मनुष्य धर्मात्मा हैं धर्मकी कृपासे उनके छह खंडकी विभूति नौ निधि चौदह रत्न सुदर्शन चक्र आदि समस्त चक्रवर्तीकी विभूति प्राप्त होती है और भी अनेक प्रकारको लक्ष्मी प्राप्त होती है । सबसे पवित्र और प्रधान तीर्थंकर की विभूति है परंतु धर्मात्माओंको धर्मकी कृपासे वह भी प्राप्त हो जाती है। गणधर पद और ऋद्धि आदि अनेक पकारकी विद्यायें भी धर्मकी कृपासे पाप्त होती हैं । विशेष क्या ! तीनों लोकमें जो चीज बहुत दूर है, अत्यन्त दुर्लभ है और अमूल्य है वह चीज भी धर्मकी कृपासे अपने आप हाथपर आकर विराज जाती हैं। मोन लक्ष्मी की प्राप्ति संसारमें अत्यंत कष्टसाध्य है परंतु जो महानुभाव धर्मरूपी धनके ईश्वर हैं वह मुक्ति लक्ष्मी भी उनपर रीझ जातो है और पास आकर प्राप्त हो जाती है फिर अन्य देवांगनाओंकी तो वात ही क्या है अर्थात् धर्मकी कृपासे उनका प्राप्त होना अत्यन्त सुलभ है । इसलिये ग्रन्थकार उपदेश देते हैं कि जो महानुभाव धार्मिक हैं—परम धर्मात्मा हैं उन्हें यत्नपूर्वाक सदा धर्मका सेवन करना चाहिये । जो महानुभाव पूर्व पुण्यके उदयसे संसारमें सुखी है उन्हें भी धर्मवृद्धि सुखवृद्धि और मोक्षके लिये धर्म धारण करना मल्लि. पुराण - १३४ पापहान्यै च मोक्षाय भवभीरुभिः ॥ ८३ ॥ अतो बुधैर्न नेतव्या हा का कालकला क्वचित् । विना धर्मेण चानित्ये नुजन्मन्यतिदुर्लभे ॥ ८४ ॥ निरूप्येत्यादि सद्धर्म फलभेदादिविस्तरात् । भावमुत्पादयामास सभ्याना धर्मकर्मसु ॥ ८५॥ मोक्ष मोक्षफल मोक्षमागं च मोक्षकारण । संसार. भ्रमण पचधा संसारनिबंधनं ॥ ८६ ॥ अधोमध्योविभेदेन विधा लोकस्थितिं जिन. | अलोक सफल निस्सदेह दिन्यगिराम्यधात् ॥ ८७ ॥ उत्स- चाहिये । जो दुःखी हैं उन्हें दुःख दूर करनेकेलिये सदा उत्तम धर्म धारण करना चाहिये । पापी जीवोंको पापकी हानिके लिये धर्म धारण करना परमावश्यक है एवं जो संसारकी दुष्ट दशासे भयभीत हैं उन्हें मोक्ष की प्रप्तिके लिये धर्मका सेवन करना चाहिये । संसारमें मनुष्य जन्मका पाना अत्यन्त दुलभ है-बड़ी कठि नतासे प्राप्त होता है इसलिये जो मनुष्य विद्वान हैं-संसारकी परस्थितिके वास्तविकरूपसे जानकार हैं उन्हें कालका एक टुकड़ा भी धर्मके विना न विताना चाहिये ॥७३-८४॥ इसप्रकार जिससमय भगवान जिनेन्द्रने समीचीन धर्म उसका फल और उसके भेद आदिका विस्तार से वर्णन किया उस समय समवसरणके अंदर जितने भी सभ्य बैठे थे सबकी परिणति धर्म कार्योंकी ओर झुक गई ॥८५॥ धर्मोपदेशके साथ २ भगवान जिनेन्द्रने मोक्ष, मोनका फल, मोक्षका मार्ग, और मोनके कारणोंका भी विस्तारसे निरूपण किया । द्रव्य क्षेत्र काल भव और भाव इसप्रकार पांचों परावर्तनोंका भी खुलासारूपसे प्रतिपादन किया ॥८६॥ अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्व लोकके भेदसे लोक तीन प्रकार का है। भगवान जिनेंद्रने तोनों प्रकारके लोकका भी विस्तारसे वर्णन किया। लोकके वाद अलोक है। सिवाय आकाश द्रव्यके उसके अंदर कोई भी द्रव्य नहीं रहता, भगवान जिनेंद्रने अपनी दिव्य वाणीसे उसका भी निस्संदेहरूपसे वर्णन किया ॥८॥ उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके भेदसे काल दो प्रकारका माना है। जिस कालमें मनुष्यों के वल वीर्य आदिकी निरंतर वृद्धि होती जाय उस कालका नाम उत्स- र्पिणी है एवं जिस कालमें उनकी हीनता होती जाय उस कालको अवसर्पिणी माना गया है। उत्सर्पिणो और अवसर्पिणी दोनों कालो मेंसे प्रत्येक कालके छह छह भेद मान है और वे सुपमा सुपमा १ सुपमा २ सुष- मादुःपमा ३ दुःपमासुषमा ४ दुःषमा ५ ओर दुःपमादुःषमा ६ इसरूपसे है। भगवान जिनेद्रने किसरूपसे किस कालकी हानि होती है और किसरूपसे किस कालको वृद्धि होती है, विस्तारसे यह वात वतलाई १३४ मल्लि. पुराण पिण्यवसर्पिण्या: पट् काला हानिवृद्धिजा । आयु.कायादिभेदेन सः प्रोका जिनेशिना ॥ ८८ ॥ तीर्थशवलवक्रशार्धचक्रितद्विषां विभुः । व्याजहार पुराणान्यगद्धिशमवलादिभिः ॥ ८६ ॥ त्रिकालगोवरं देवो द्वादशागश्रुताद्न । यत्तत्सर्व पदार्थादि गणान् प्रत्यबूबधत् ॥ १० ॥ तद्वा ग्धर्मामृत मिष्टं पीत्वा सर्वे गणास्तदा । जन्मदाहविमुक्ता वा बभूवुः सुखिनो मुदा ॥ ११ ॥ तद्वाण्याप्य बुधा केचित् सवेगं धर्मकर्मसु । वैराग्य पविना हत्वा मोहाद्रिमाददुस्तप. ॥ १२॥ केचिच पशवो मा श्रावकत्रतमजसा। स्वीचकुर्भावना केचित्तपोदानार्चनादिषु ॥ ३ ॥ काललब्ध्या सुरा केचित्तद्ध्वन्यभृतपानतः । मिथ्याविप वमित्वाशु जगृहुर्दर्शन परं ॥ १४ ॥ गणाधोशोऽपि भव्यानो चोपकाराय मुक्तये । निरौपम्यधियाऽ- तथा कौन कौन कालमें कितना कितना आयु काय आदिका परिमाण होता है यह बात भी भगवान जिनेंद्रने अच्छी तरह प्रतिपादन की ॥८८ ॥ तीर्थंकर, बलभद्र, चक्रवर्ती नारायण और प्रतिनारायणों के चरित्रों का भी वर्णन किया एवं उनके कैसे शरीर थे, कैसी कैसी ऋद्धियां थीं, कैसे कैसे उन्हें सुख प्राप्त थे एवं कैसी कैसो उनके शरीर आदिकी सामर्थ्य थी यह बात भी अच्छी तरह वर्णन की ॥८६॥ द्वादशांग श्रुतज्ञानके अंदर तीनों कालसंबंधी पदार्थोंका जो भी वर्णन था वह भी भगवान जिनेंद्रने गणधरोंके लिये व्यक्त कर बतलाया ॥६०॥ महामिष्ट भगवान जिनेंद्रके मुखसे निकले हुए वचनरूपी धर्मामृतका पानकर समस्त गण-संघने उस समय अपनेको जन्मरूपी दोहसे रहित समझा एवं वे अपने को परमसुखी अनुभव करने लगे॥६१ ॥ भगवान जिनेंद्रका उपदेश सुनकर बहुतसे धर्मात्मा भव्य जीवोंको संसारसे उदासीनता हो गई। उन्होंने धर्मसंबंधी कार्योंके अंदर मन लगाया एवं बैराग्यरूपी वजूसे मोहरूपी पर्वतके खंड खंड कर पवित्र तप धारण करलिया ॥२॥ भगवान जिनेंद्रके मुखसे धर्मोपदेश पाकर बहुतसे पशु और मनुष्योंने श्रावकब्रत अर्थात् अणुव्रतोंको धारण कर लिया एवं तप दान पूजन आदि पवित्र कार्योंमें उन्होंने अपने भावोंकी दृढ़ किया ॥ ६३ ॥ बहुतसे देवोंने काल लब्धिकी कृपासे भगवान जिनेंद्रके मखसे धर्मामृतका पानकर मिथ्यादर्शनरूपी विषको वमन करदिया और सम्यग्दर्शनको धारण कर लिया ॥६४ ॥ गणधरोंमें प्रधान गणधर विशाखने भी समस्त भव्य जीवोंका उपकार हो, मोक्ष मार्गकी प्राप्ति हो एवं अहिंसारूपी धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति हो, इस अभिलाशासे अपनी निरुपम प्रखर बुद्धिसे भगवान जनेंद्रके मुखसे तत्स्वरूप प्राप्त कर उसे करोंड़ों नयोंकी भंगियोंके साथ द्वादशांग महा समुद्ररूप रचदिया ॥६४-६५ ॥ भगवानकी दिव्यध्वनिका खिरना जिस समय समाप्त हुआ और ॥ .

पुराप हिंसाधमैतीर्थप्रवृत्तये ॥ १५॥ जिनेंद्रादर्थमादाय द्वादशागमहोदधेः । चकार रचना नानानयभंगार्थकोटिभिः॥ १६ ॥ प्रशातेऽथ जनक्षोभे दिव्य- भापोपसंहृते धर्मतीर्थविहारे सद्मनाः सौधर्मकल्पराट् ॥ १७ ॥ प्रणम्य तत्क्रमानौ प्रचांछन्विश्वहितं मुदा। प्रारंभे तत्स्तवनं कर्तुं धर्मोपदेश- जैगुणे ॥ ६८ ॥ त्वं देव | त्रिजगभर्ता भव्यबंधुस्त्वमेव हि । मोहाज्ञानतमो यात्यद्य क्षय तत्वचोंऽशुभिः ॥ ६६ ॥ भवाब्धौ दुस्तरे भन्यांस्त्वं सुना मल्लिक रयितु क्षम. । धर्मोपदेशपोतेन नेतुं च मुक्तिपत्तने ॥ १०॥ ताराकदांगिवायू र्मिखप्रदेशशरीरिणा। संख्या न ज्ञायते यद्वत्तथा ते गुणवारिचे. १३६ मनुष्यों का कोलाहल शांत होगया उससमय धर्मतीर्थोंमें भगवान जिनेंद्रका विहार हो, इस पवित्र अभि- लाषाको हृदयमें धारण कर समस्त प्राणियों के हितके इच्छुक सौधर्म स्वर्गके इन्द्रने बड़े आनंदसे भगवान जिनेंद्रके दोनों चरण कमलों को प्रणाम किया एवं धर्मोपदेशसे जायमान जो गुण हैं उन्हें लक्ष्यकर वह भगवान जिनेंद्रकी इसप्रकार स्तुति करने लगा- हे भगवान ! आपके वचनरूपी किरणोंसे मोह और अज्ञानरूपी अंधकार आज सर्वथा नष्ट हो रहा है जिससे भव्य जीवोंको वास्तविक मार्गका ज्ञान हो रहा है इस लिये तीनों लोकके भरण पोषण करनेवाले आपही हैं और आपही समस्त भव्य जीवोंके बंधुस्वरूप हैं ॥ ६५--६६ ॥ गंभीर समुद्रके अंदर पड़नेवाले जीव जिसप्रकार जहाजके सहारे अपने अभीष्ट स्थानपर पहुंच जाते हैं उसीप्रकार हे स्वामी! यह संसार रूपी समुद्र दुस्तर है-जल्दी तिरा नहीं जासकता, इसमें गोता मारते हुए प्राणियों को धर्मोपदेशरूपी जहाजकी सहायतासे आप ही तार सकते हो एवं उन प्राणियों की अभिलाषा मोक्षरूपी पत्तनको प्राप्त करनेकी है सो उस पत्तनमें आपही उन्हें पहुंचा सकते हो, अन्य किसीकी इससमय वैसी सामर्थ नहीं ॥ १००॥ संसारमें तारागण, कंदमूलके अंदर रहनेवाले जीव, समुद्रकी लहरें, आकाशके प्रदेश और एके- न्द्रिय आदि जीवोंकी गणना नहीं की जा सकती-कितना भी कोई प्रयत्न क्यों न करे उन्हें गिन नही सकता उसी प्रकार हे भगवान ! आप गुणसमद्र हैं इसलिये आपके अगणित गुणों को भी गिना नहीं जा सकता अर्थात् आप अनंते गुणोंके पिंड स्वरूप हैं ॥ १०१॥ इसलिये हे नाथ! आपके गुण अनंते हैं और हमारे सरीखे हीनशक्तिके पुरुष उन्हें वर्णन करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते अतः आपके गुणों के वर्णन करनेके लिये हम किसी प्रकारका परिश्रम नही उठाना चाहते ॥ १०१-१०२॥ हे तीनों लोकके स्वामी भगवन ! जिसप्रकार सूर्यके उग्रतापसे मुरझाये हुये धान्यों के वृक्षों को जलके सेकसे सीचा जाता है उस समय वे उत्तम फलों को प्रदान करते हैं उसीप्रकार ये भव्यरूपी धान्य पापके आताप आदिसे मुरझाये १३६ . मलि. पुण ॥ १०१ ॥ अतो नाथ ! गुणास्तेऽनता अशक्या' किलोदितुं। शात्वेति न कृतोऽस्माभिः श्रमस्त्वद्गुणभाषणे ॥ १०२॥ लोकेश ! भव्यसस्याना पापातापादिशोषिणा । धर्मामृतपसेकेन यिधोहि फलमूर्जित ॥ १०३ ॥ निय मोहसेना हि विश्वानर्थविधायिनी । सन्मार्गमुपदेष्टुं ते कालोऽय समुपस्थित. ।। १०४ ॥ किमत्र यहुनोक्तन जनानां शरण भव । त्वमेव नापरो लोके इत्युश्याऽस्थात्सुराधिप ॥ १०५ ॥ शकप्रार्थनयेत्याशु देवो विश्वहितोद्यत । भव्याजानुग्रह कर्तुत्तस्थे धर्मभानुमान् ॥१०६॥ साधं विश्वमहाभूत्या धर्मचक्रपुरस्सर प्रचक्र विजयोद्योग सवेश्च धर्म राट् ॥ १० ॥ पटहादिमहाध्यनिर्जयनदादिसत्स्वनै । पूरयतो दिशो देवा. पचेलु प्रमुदा तदा ॥ १०८ ॥ सुभिक्षता तदास्थानात्परित. शतयो- हुये हैं-पापकी तीव्रतासे इनकी आत्मा शक्तिहीन होचुकी है आप धर्मामृत प्रदान कर इन्हें सवल बनावें जिससे ये उत्तम फलों को प्राप्त करलें ॥ १०३ ॥ हे प्रभो ! समस्त प्रकारके अनर्थो को करनेवाली बलवान शत्र मोहनीय कर्मकी सेनाको आपने सर्वथा नष्ट कर दिया है और सन्मार्गके उपदेश करनेकी आपको परिपूर्ण योग्यता प्रगट होगई है। अब यह समय उस वास्तविक मार्गके उपदेशका आकर उपस्थित हो गया- आप भव्यजीवोंको धर्मोपदेश प्रदान करें। विशेष कहना व्यर्थ है। पभो। प्रार्थना यही है कि भव्यजीवों के आप शरण वनें उन्हें वास्तविक मार्गका उपदेश प्रदान करें क्योंकि इस संसारमें भव्यजी- वों के शरण आप ही हैं-आपके सिवाय और कोई शरण नही हो सकता । वस ? इस प्रकार विनयपूर्वक निवेदन कर वह धर्मात्मा सौधम वर्गका इन्द्र अपनी जगहपर जाकर बैठ गया ॥ १०४-१०५ ॥ जिसप्रकार सूर्य खिलानारूप कमलोका उपकार 'करनेवाला है और समस्त जीवोंके हितमें उद्यत रहता है अर्थात् सूर्यके उदय कालमें ही समस्त प्राणी अपने अपने हितकारी कार्योंमें उद्यत होते है उसी प्रकार धर्मके सूर्य स्वरूप वे भगवान जिनेंद्र समस्त जीवोंके हितमें उद्यत हो समस्त भव्यजीव रूपी कमलों के उपकारकी अभिलाषासे इंद्रको प्रार्थनाके अनुसार शोधू ही अपने आसनसे उठ खडे हुए एवं चक्रवर्ती जिस प्रकार विशाल विभूति और सेना आदिके साथ दिग्विजय करनेके लिये जाता है और चक्र उसकेआगे आगे चलता है उसी प्रकार धर्मके चक्रवर्ती वे भगवान जिनेंद्र मुनि आर्यिका आदिका संघ और अनेक देवोके साथ विशाल विभूतिसे मंडित हो दिग्विजय करनेकेलिए अर्थात् समस्त आर्यक्षेत्रमें धर्मोपदेश करनेकेलिए चल दिये एवं धर्मचक्र उनके आगे आगे चलने लगा॥१०६-१०७॥ उस समय भगवानके प्रस्थान करनेपर पटह आदि अगणित वाजोंके उन्नत शब्दोंसे एवं "हे देव ! जीवे नादें विरदें" इत्यादि मनोहर शब्दोंसे समस्त पुराण लि० २३८ OM जनं । आकाशगमनं चासीद्विभोरतेऽगिना वधः ॥ १०६ ॥ व्याघ्रादित रसत्यैर्न स्याइ भुक्तिर्नातिशक्षण | नोपसर्गश्चतुर्गक्त्रो दृश्यते दिक्षु सजन स्वामित्व सर्वविद्याना चाच्छायत्व पूजापतेः। अस्पंदो नेत्रयोरस्य चावृद्धिर्नखकेशयोः ॥ १११ ॥ घातिक्षयभवा एते दशैवातिशया प्रभो । निरौपम्या भवत्येव शेषा देवकृता इति ॥ ११२ ॥ अर्धमागधिकाकारमापा विश्वार्थसूचिनी। विभोरासी द्विविक्ता हि पशुदेवनृणा परा ॥ ११३ ॥ देहिना परमा मैत्री जातिहेतुविरोधिना । सर्वतु फलपुष्पाढ्या भूस्तरुजातय ॥ ११४ ॥ आदर्श मंडलाकारा मही रतमयी व्यभात् । तामवेति मरुद् वातकुमारकृत्सुशीतल ॥ ११५ ॥ जिनातेऽभूच सर्वपा परमानदमजसा। तृणकोटकसंत्यक्त मरुत् कुर्यान्महीतल॥ ११६ ॥ शतयोजनपर्यंत आकाशको व्याप्त करते हुए देवगण अत्यंत आनंदित हो उनके साथ साथ चलने लगे॥ १०८ ॥ भगवान अहंतके चौंतीस ३४ अतिशय माने हैं उनमें दश जन्मके अतिशय हैं उनका वर्णन तो उनके जन्मके समय कह दिया गया।। केवल ज्ञानके समय दश अतिशय होते हैं और वे इस प्रकार हैं- जिस स्थानपर भगवान जिनेंद्रका समवसरण है उसके चारों ओर एकसौ योजन पर्यंत मुभिक्षता का होना १ आकशामें गमन २ व्याघ्र आदि कर जीवोंके द्वारा अन्य निर्वल प्राणियोंका न मारा जाना अर्थात् अदयाका अभाव ३ अलौकिक कल्याणके धारक केवलीके भोजनका न होना अर्थात् कवला- हार रहितपना ४ उपसर्गका अभाव ५ चारों दिशाओंमें चार मुखोंका दोखना ६ समस्त विद्याओंका स्वामीपना ७ छायासे रहित शरीरका होना ८ नेत्रोंके पलकोंका न लगना ६ एवं नख केशोंका न बढना १० इसप्रकार ज्ञानावरण आदि चार घातिया कर्मों के नाशसे ये दश अतिशय केवली भगवानके प्रगट होते हैं जो कि निरौपम्य होते हैं उनकी उपमा नहीं दी जा सकती। इनके सिवाय शेष चौदह अतिशय देव कृत होते हैं और वे इसप्रकार हैं- भगवानकी भाषा अर्धमागधी थी जो कि पशु देव और मनुष्योंको भिन्न भिन्नरूपसे समस्त अर्थों को सूचित करती थी १ स्वभावसे ही वध्यघातक नामका विरोध रखनेवाले सर्प नौला आदि जीवोंकी परस्पर मित्रता थी २ वृत्तोंकी पंक्तियां समस्त ऋतुओंके फल फूलोंसे युक्त थीं ३ दर्पणके मध्यभागके समान अत्यंत निर्मल मणिमयी पृथिवी थी ४ वातकुमार देवोंके द्वारा शीतल मंद सुगंध पवन बहती थी ५ भगवान जिनेंद्रके समीपमें रहनेवाले समस्त जीवोंको परमानंद था ६ पवनकुमार देवोंने जमीन को तण कंटक आदिसे रहित कर दिया था ७ स्तनितकुमार जातिके भवनवासी देवोंने भगवानके समीप की सौ योजन प्रमाण पृथिवी सुगंधित जलकी वर्षासे सुगंधि कर रक्खी थी ८ चलते समय भगवान १ .

मलि. १३६ - विमोनिकटभूतले । गंधोदकमयी वृष्टि विधत्तेस्तनितामर ॥ ११७ ॥ हेमान्जानि पदन्यासे संचारयति नाकिनः। शाल्यादिसर्वधान्यौधा कल भारनता वभुः ॥ ११८ ॥ जिनेन्द्रनिकटे खेन साधं स्युनिर्मला दिशः । देवा इन्द्राशया कुर्युराहाननं परस्परं ॥ ११६ ॥ धर्मचक्र सहस्रार रत्नश्म्या- त्तदिक्तरं । बजत्येव प्रभोर हतध्वातं सुरैत १२० ॥ आदर्शाद्या विभात्यष्टमंगलद्रव्यसंपदः । एतेऽत्रातिशया भर्तुश्चतुर्दश सुरोद्भवाः ॥ १२१ ॥ शोकहना स्फुरद्रत्नमयोऽशोकतरुव्यभात् । कल्पाध्रिपजपुष्पौधेः पुष्पवृष्टियंधु, सुराः ॥ १२२ ॥ गभीरो मधुरो दिव्यध्वनिर्विश्वहितंकरः । अज्ञान- ध्यातहतास्य भवेद्विश्वार्थदीपकः ॥ १२३ ॥ उत्क्षिपति सुरा यस्य चतु'पष्टिप्रकीर्णकान् । नानामणिमय हैमं दिव्यं सिहासन विभोः ॥ १२४ ।। भामडल विभोरेजे भानुकोट्यधिकप्रभं । साद्ध द्वादशकोटीवारभूदु'दुभिध्वनि ॥१२५॥ इदुत्रयसमं छत्रत्रय मुक्तास्रगकित । इत्यष्टप्रातिहार्याणि कुर्वतेऽस्य परा श्रिय ॥ १२६ ॥ अनंत केवलज्ञान दर्शन वीर्यामूर्जितं । सुख चास्य गुणा ख्यातः षट्चत्वारिंशदित्यहो ॥ १२७ ॥ विजहार महीं जिनेंद्रके चरण कमलों तले देवगण सुवर्णमयी कमलोंकी रचना करते चले जाते थे॥६॥ शालि आदि धान्योंके वृक्ष फलोंके भारसे नम्रोभूत थे १० भगवान जिनेन्द्रके समीपमें आकाश और दिशायें निर्मल थीं ११ इन्द्रकी आज्ञासे देवगण आपसमें एक दूसरेको बुलाते थे १२ भगवानके आगे २ धर्मचक्र चलता था जोकि हजार अरोंका धारक था अपनी देदीप्यमान किरणोंसे समस्त दिशाओंको चम चमाता था अंधका- रका नाशक था और चारों ओरसे देवोंसे वेष्टित था १३ तथा भगवानके चारो ओर दर्पण कलश झारो आदि आठ मंगलीक द्रव्य शोभायमान थे १४ इसप्रकार भगवानके ये चौदह अतिशय देवकृत थे ॥१०६-१२१ ॥ भगवान जिनेन्द्रके समीपमें आठ प्रातिहार्योकी भी अपूर्व शोभा थी और वे प्रातिहार्य इस प्रकार थे- भगवान जिनेन्द्रके समीपमें अशोकवृक्ष विद्यमान था जोकि शोकका नाश करनेवाला था एवं देदीप्य- मान रत्नमयी था १ कल्पवृक्षोंसे जायमान पुष्पोंके समूहोंसे देवगण पुष्पवृष्टि करते थे २ भगवानकी दिव्य ध्वनि खिरती थी जोकि मेघकी गर्जनाके समान गंभीर थी, मधुर थी, समस्त लोकका हित करनेवाली थी, अज्ञानरूप अंधकारको नाश करनेवाली थी एवं समस्त पदार्थोके प्रकाश करने में दीपकके समान थी ३ देवगण भगवानके ऊपर चौसठ चमर ढोरते थे ४ प्रभूका भांति भांतिको मणियोंसे जड़ा हुआ सुवर्णमयी दिव्य सिंहासन था ५ भगवानके पीछे भामंडल विद्यमान था जो कि करोड़ सूर्योकी प्रभासे अधिक प्रभाका धारक था ६ साढ़े बारह करोड़ बाजोंके साथ साथ दुदुभीकी ध्वनि होती थी ७ तथा शिरपर तीन छत्र थे जो कि तोन चंद्रमा सरोखे जान पड़ते थे और मोतियोंकी मालाओंसे शोभायमान थे ८ इसप्रकार ये आठ प्रातिहार्य भगवान जिनेन्द्रकी अपूर्व शोभा बढ़ा रहे थे॥ १२२–१२६ ॥ भगवानके १३९ १४० । कृत्स्ना भव्याना प्राणयन् जिन । दिव्यैर्नचोऽमृतै. कुर्वन् प्रीति च जलदोपम ॥१२८ ॥ मिथ्यामोहाधकारादीन् - विघटय्य वचोऽशुभिः ।। मल्लि० | जगदुद्योतयामास जिनार्कस्तयमजसा । विश्वद्धि भूपिता सर्वेविशाखाद्या गणाधिपा. । प्रणमत्यस्य पादाजौ मष्टाविशतिसख्यका । पूर्वधारिण एवास्य सार्ध पचशतप्रमा.। शिक्षकाश्च किलैकौननिशत्सहस्रशसिता । अवधिज्ञानिनोऽस्व स्युनिशतिशतप्रमा तोवतः केवलज्ञाना लोका- लोक्तविलोकिन । वादिनो हतमिथ्यात्वाश्चतुर्दशशतप्रभा । भवत्येकोननिशच्छतसख्या विक्रियर्द्धय ॥ १३३ ॥ (२६००) कुर्वत्यस्यपरा भक्ति मन पर्यायभूषिता. । साधं सप्तदशैत्र स्यु. शतानि सूक्ष्मदर्शिन । १३४ । ( १७५० ) चत्वारिशत्सहस्राणि सर्वं पिंडोकृता अनंतज्ञान-केवलज्ञान १ अनंतदर्शन—केवलदर्शन २ अनंतवीर्य ३ और अनंतसुख ४ ये चार अनंत चतुष्टय शोभायमान थे इस प्रकार चौतीस अतिशय आठ प्रातिहार्य और चार अनंत चतुष्टय इसप्रकार छियालीस गुणोंके धारक वे भगवान मल्लिनाथ अत्यंत शोभायमान जान पड़ते थे। वे भगवान जिनेन्द्र समस्त भव्य जीवोंको संतोष उपजाते एवं मेघके समान अपने दिव्य वचनरूपी अमृतोंसे सवोंको आनंदित करते समस्त पृथ्वीपर विहार करने लगे ॥ १२७–१२८ ॥ जिसप्रकार सूर्य अपनी उग्र किरणोंसे अंधकारको नष्ट करता है और समस्त जगतको प्रकाशमान करता है उसीप्रकार वे भगवान जिनेन्द्ररूपी सूर्य भी अपने वचनरूपी किरणोंसे मिथ्या मोहरूपी अंधकारका सर्वथा नाशकर संसारमें तत्वों के स्वरूपका प्रकाश करने लगे॥ १२६ ॥ भगवान मल्लिनाथ के विशाख आदि अट्ठाईस गणधर थे जो कि समस्त प्रकारको ऋद्धियों से शोभायमान थे और भगवानके चरण कमलों को प्रणाम करते थे॥ १३० ॥ भगवान जिनेन्द्र साथमें ग्यारह अंग चौदह पूर्वके धारी साड़े पांचसौ ५५० मुनि थे। शिक्षक जातिके मुनि उनतीसहजार थे। जो मुनि अवधिज्ञानके धारक थे वे बाईस सौ २२०० प्रमाण थे। जितने प्रमाण ये अवधिज्ञानी थे उतने ही प्रमाण अर्थात् बावीस सौ ही केवलज्ञानी मुनि थे जोकि अपने केवलज्ञानसे समस्त लोक अलोकको स्पष्ट रूपसे देखते थे। मिथ्यात्वको सर्वाथा नष्ट करनेवाले परमसम्य- ग्दृष्टि वादी मुनि चौदहसौ १४०० थे। विक्रिया ऋद्धिके धारक उनतीस सौ २६०० थे। मनःपर्ययज्ञानी मुनि भगवान जिनेन्द्रके समवसरणमें साढ़े सत्रहसौ १७५० थे जो कि भगवान जिनेन्द्रके परम भक्त थे और सूक्ष्मरूपसे पदार्थोके देखनेवाले थे। इस प्रकार ये समस्त विद्वान मुनिः मिलकर चालीस हजार ४०००० १४० । मल्लि. पुरा १४१ । विद । यतयो हिहताशीना भपंति भूतये भुवि ॥ १३५॥ (४००००) आर्गिका बंधुपेणाद्या दृष्टिमूलगुणान्विता । नमतिपचपंचाश- सहस्रण्यस्य सत्क्रमौ ॥ १३६ ॥ (५५००० ) लक्षकं १००००० श्रापका. प्रोक्ता श्राविकास्त्रिगुणां विभोः। दृग्वतालंकृता दानपूजामकिपरायणा' ॥ १३७ ॥ ( ३००००० ) देव देव्यस्त्वसख्याता संख्याताः पशवोऽसिला । दृक्श्रावकव्रतोपेताः सेवतेऽस्य क्रमाम्बुजौ ॥ १३८॥ एवं द्वादशमिर्देवो गण रभिपरिष्कृत । नयन् मुक्तिपयं भव्यान् धर्ममार्ग पुकाशयन् ॥ १६ ॥ विहरन्नार्याग्वडस्थान् सर्वान् देशपुरादिकान् । सहस्रपचपचाशद्वर्णकाल स केवलो॥ १४०॥ द्वानिशहिवसरूनं संवत्सरशतेन च । अते माताऽवशेपायु सम्मेदाचलमागत• ॥ १४१ ॥ स्वध्वनि चोपसहृत्य स्पयोगं च स निष्क्रियः । प्रतिमायोगमाधायघातिक्षयाय मुक्तये ॥ १४२ ॥ संयतै सह तत्रैव सहस्रपंचसंख्यकः। ध्यानेन तृतीयेनाण्याद्यावदायु परिक्षयः प्रमाण थे। ये मुनिगण मोहांधकारके सर्वथा नाश करनेवाले थे और संसारकी शोभा थे॥१३५॥ भगवान जिनेन्द्रकी सभामें बंधुषेणा आर्यिकाको आदि लेकर पचपन.हजार ५५००० आयिकायें थीं जो कि सम्यग्दृष्टि और मूलगुणोंकीधारण करनेवाली थीं और भगवान जिनेन्द्रके चरण कमलोंको प्रणाम करनेवाली थी ॥ १३६॥ एकलाख १००००० श्रावक थे और तीन लाख श्राविकायें थीं जो कि सम्यग्दृष्टि थे, श्रावकोंके व्रतोंके धारक थे और भगवान जिनेन्द्रकी पूजा और भक्तिमें सदा तत्पर थे ॥ १३७ ॥ तथा भगवान मल्लिनाथकी सभामें देव और उनकी देवियां असंख्याते थे, संख्याते पशु थे। ये समस्त सम्यग्दृष्टि और श्रावकोंके व्रतोंसे युक्त थे और भगवान जिनेन्द्रके चरणोंको पूजा करनेवाले थे ॥ १३८ ॥ इस रूपसे वे भगवान मल्लिनाथ केवली उपर्युक्त बारह गणोंसे परिवेष्टित थे, भव्योंको मोक्ष स्थानमें ले जानेवाले,थे, वास्तविक धर्मका मार्ग.प्रकाशन करते थे इस प्रकार आर्यखंडमें रहनेवाले समस्त देश और पुर आदिमें उन्होंने छत्तीस दिन सौ वर्ष कम पचपन हजारवर्ष पर्यंत विहार किया था। जबआयु के अंतमें केवल एक मासका समय वाको रह गया उस समय वे भगवान जिनेन्द्र सम्मेद शिखर पहाइपर जाकर विराजमान होगये ॥ १४१॥ वहांपर आकर भगवान जिनेन्द्रने अपनी दिव्य ध्वनि और योगको संकुचित कर दिया, निष्क्रिय हो गये एवं शेष चार अघातिया कर्म अर्थात् वेदनीय आयु नाम और गोत्र इन चारों कर्मोको नष्ट करनेके लिये प्रतिमायोग धारण कर लिया। तथा जब तक आयुका अंत न हुआ तब तक उसी स्थानपर पांच हजार मुनियोंके साथ अपना आत्मामें सुक्ष्म क्रियाप्रतिपाती नामक .

- पुराण ॥ १४३ ॥ चतुर्थध्यानयोगेन मणिधीपसमेन स । शेषाघातीनि कर्माणि प्रहत्यैरण्डवीजवत् ॥ १४४ ॥ गुणस्थानातिम मुक्त्वा शरीरत्रयनाशतः लोकाशिखरं सार जगाम ज्ञानमूर्त्तिमान् ॥ १-५॥ फाल्गुनोज्वलपंचम्या पूर्वरात्रौ जिनाग्रणी. । भरण्याख्ये सुनछने चोर्ध्वगतिस्वभावतः ॥ १४६ ॥ अनन्तकालमासाद्य सम्यक्त्वादिगुणाष्टकं । सिद्धो भूत्वा स तत्रास्थाद् भुजानोऽप्यतवर्जितं ॥ १४७ ॥ निरौपभ्यं सुख दिव्यं बु सातीत निजात्मज अक्षय परम ह्यक्षातीत वाघातिग महत् ॥ १४८ ॥ तस्य निर्वाण जाये तदा जग्मुर्दिवौकसः । सेंद्रा हि सपरीवारास्तद्भक्तिकरयोद्यता ॥ १४६ ॥ मत्वातिपावनं देह विभोनिर्वाणसाधन । कृत्वा महोत्सवेनाशु परादि शिवकापित ॥ १५० ॥ स्वर्गजैः परमैद्रव्यैर्महा सुगंधिकारिभिः । अभ्यर्च्य परया भक्त्या प्रणेमुः शिरसामरा ॥ १५१ ॥ अग्नीद्रमुकुटोद्भूतवहिना तद्वपुस्तदा। पर्यायातरमेवाप सुगधीकृतदिक्चय ॥ १५२ ॥ तीसरे शुक्लध्यानको धारणकर विराजमान हो गये ॥ १४२–१४३ ॥ वहां विराजमान होकर मणिमयीदीपक के समान व्युपरतक्रियानिवृत्ति नामक चौथे शुक्लध्यानसे भगवान जिनेंद्रने चारों अघातिया कर्मों का सर्वथा नाश कर दिया। अयोग केवली नामके चौदहवें गुणस्थानमें उन्होंने औदारिक तैजस और कार्माण इन तीनों शरीरोंका सर्वथा नाश कर दिया एवं जिसप्रकार एरंडके वीजका स्वभाव बंधके नष्ट हो जानेपर ऊपरको हो जानेका है उसीप्रकार समस्त कर्मों से रहित आत्माका भी ऊर्ध्वगमन स्वभाव होनेसे वे ज्ञानमूर्ति भगवान जिनेन्द्र फागुन सुदी पंचमीके दिन जब कि भरणी नामका शुभ नक्षत्रं था पूर्व रात्रिके समय लोकके अग्र- भागमें जाकर विराजमान हो गये ॥१४४-१४६॥ सम्यक्त्व आदि आठों गुणोंको प्राप्त कर और सिद्ध होकर अनन्तकाल पर्यन्त वहांपर विराज गये एवं उस अलौकिक सुखका अनुभव करने लगे जो कि अन्तरहित अनन्त है, उपमारहित है, दिव्य है, समस्त प्रकारके क्लेशोंसे रहित है, स्वाधीन है, विनाशरहित अविनाशी है, उत्कृष्ट है, इंद्रियों से जायमान नहीं है। समस्त प्रकारकी बाधाओंसे रहित है और महान है ॥ १४७–१४८ ॥ जिससमय भगवान मुक्त हो गये देवोंको पता लग गया। भगवानकी भक्तिके करनेमें दत्तचित्त वे समस्त देव अपने इन्द्र और परिवारके देवोंके साथ शीघ्र ही उनकी निर्वाणभूमि सम्मेदाचल पर आगये। भगवान जिनेन्द्र उसी शरीरसे मोक्ष गये थे इसलिए उनका वह शरोर साक्षात् मोक्षका कारण होनेसे परम पवित्र था अतः देवोंने बड़ी भक्तिसे उनका शरीर अनेक प्रकारके रत्नोंसे शोभायमान पालकीमें विराजमान कर दिया। महासुगंधित उत्तमोत्तम द्रव्योंसे उसे पूजा एवं अन्तमें देवोंने शिर झुकाकर बड़े विनयसे उसे - १४२ १४३ एवमस्त्वत्र नः शीघ्रमित्युक्त्वादाय भस्म तत् । स्वस्य भालेऽखिलागे च चक्र स्तद्गतये सुरा. ॥ १५३ ॥ पुन संभूय नाकेशा. विधायानंदनाटक । कृतकार्या अगु- स्वं स्वं स्थानं तद्गुणशसिनः ॥ १५४ ॥ इति सुकृतविपाकात्प्राप्य सौख्य परं यो नरसुरगतिजातं मल्लिनाथोऽनुभूत्वा । त्रिभुवनपतिसेव्यस्तीर्थराट् कर्म हत्या निखिलचरणयोगै पाप मुक्ति स नोऽव्यात् ॥ १५५ ॥ यः पाग्वैश्रवणाभिधो नृपवरो रनत्रयाख्यं व्रतं, कृत्वादाय च सयमं सुतपसा जातोऽहमिंद्रो महान् । दिव्यानुत्तरपचकेषु परमे सारे विमाने चतुर्थेऽतो मल्लिजिनोऽभवच्चिववधूभर्ता स योऽस्तु || पुरा श्रिये ॥१५६ ॥ यो मोहारिविधीन्निहत्य सुतपः खड्गन याल्येऽप्यहो प्राप्तो मुक्तिधूमनतसुखदा श्रीमल्लिनाथो जिन. । तद्भूत्यै स मया स्तुतश्व नमस्कार किया॥ १४६–१५१ ॥ अग्निकुमार जातिके भवनवासी देवोंके मुकुटसे जायमान अग्निसे भगवा- नका शरीर दूसरी पर्यायको प्राप्त हो गया अर्थात् भस्म हो गया। जिस समय वह दूसरी पर्यायको प्राप्त हो रहा था उस समय उसकी उत्कट सुगंधिसे समस्त दिशायें सुगंधित हो गई थीं। उनके शरीरकी जो भस्म हुई थी देवोंने यह कह कर कि “जिसप्रकार यह अवस्था भगवान मल्लिनाथकी हुई है उसी प्रकार हमारी भी हो" उसे भगवान मल्लिनाथके स्वरूपकी प्राप्तिकी अभिलाषासे अपने अपने मस्तक और समस्त शरीरसे लगा लिया पुनः समस्त इन्द्रों ने मिलकर आनन्द नाटक किया अन्तमें अपना समस्त कार्य समाप्त कर वे भगवान जिनेंद्रके गुणोंकी प्रशंसा करते हुए अपने अपने स्थानोंपर चले गये॥ १५२-१५४ ॥ जिन मल्लिनाथ भगवानने पुण्यके तीव्र विपाकसे पहिले तो मनुष्य और देवगतिके अन्दर होनेवाले उत्तम सुखका सानन्द भोग किया। उसके बाद तीन लोकके इन्द्रों द्वारा वन्दनीक परम पावन तोथ- कर पदवी प्राप्त की पश्चात् समस्त चारित्रको धारण कर ज्ञानावरण आदि समस्त कर्मोको नष्ट कर मोक्ष पद पाया वे श्रीमल्लिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें ॥ १५५ ॥ जो भगवान मल्लिनाथ पहिले तो वैश्रवण नामके राजा हुए वहांपर रत्नत्रय नामका पवित्र व्रत आचरण:कर पीछे संयम ले उत्तम तपोंकी कृपासे दिव्य पांच अनुत्तर विमानोंमेंसे चौथे अपराजित नामके विमानमें महान ऋद्धिके धारक अहमिंद्र देव हुए फिर वहांसे चयकर मोक्षरूपी लक्ष्मीके भर्ता हुए वे भगवान मल्लिनाथ सदा तुम्हारा कल्याण करें॥ १५६॥ बाल अवस्थामें ही जिन भगवान मल्लिनाथने उत्तम तपरूपी तीक्ष्ण खड़गसे मोह आदि समस्त कर्मों का सर्वथा नाश कर अनंत सुख प्रदान करनेवाली मोक्षरूपी लक्ष्मीको प्राप्त किया उन भगवान मल्लिनाथका इस मल्लिनाथपुराणमें जो मैने स्तवन और विनय किया है. वह उनकी १ ४ पुराण विनुतो छ तच्चरित्र मुहु शीघ्र मे कृपयाखिलानिजगुणान् दद्यात्क्षयं कर्मणां ॥ १५७ ॥ सर्वे तीर्थकरास्त्रिलोकमहहिता सिद्धः शरीरातिगा., आचार्या सुविदोऽपरार्थनिपुणा दक्षा पराः पाठकाः। धोरा योगधराश्च घोरतपसो मोक्षोद्यता साधवः स्तुत्याः विश्वजनैर्मया व विनुता कुवंतु वो मंगल ॥ १५८ ॥ रहितनिखिलरागं धर्मसंवेगपूर्ण ह्यसमवरचरित्रं मल्लिनाथस्य यद्धि । सफलविमलकीर्ते प्रादुरासीद्धरित्र्यां तदिह जयतु मल्लि० | भव्यैर्यावदास्ते सुधर्म. ॥ १५६ ॥ स्वर्मोक्षेकनिवंधन व्यघहरं धर्मामृतेकार्णव विश्वानर्थनिवारकं सुखनिधि भव्यौकचूडामणिं । अन्तातीतगुणाकर' सुपरम कर्मारिनाशकरं बंदे तद्गणसिद्धयेऽहमहनिशं मुर्नात्र रत्नत्रयं ॥ १६०॥ ये रतत्रयसद्विधिं वुधजना. कुवंति भक्त्या मुदा ते संप्राप्य सुख विभूतिकी प्राप्तिकी अभिलाषासे किया है । अव प्रार्थना यही है कि वे भगवान शीघ्र ही मुझे अपने समस्त गुणोंको प्रदान करें एवं उन गुणोंके विरोधी जितने भी ; कर्म हैं वे मेरे सर्वथा क्षीण हो जाय ॥ १५७ ॥ ग्रंथकार श्रीसकलकीर्ति भट्टारक अंत मंगलकी कामना करते हुए कहते हैं कि- तीन लोकद्वारा पूज्य, समस्त तीर्थंकर शरीरके संबंधसे रहित अशरीरी सिद्ध, दूसरोंके प्रयोजन सिद्ध करनेवाले परम विद्वान आचार्य, शास्त्रोंके अर्थ निरूपण करनेमें चतुर और उत्कृष्ट उपाध्याय एवं धीर वीर, पूर्ण ध्यानके धरनेवाले घोर तपांके तपनेवाले और मोक्ष प्राप्तिकेलिये संदा प्रयत्नशील साधुगण जिनकी कि समस्तलोक स्तुति और विनय करता है और मैंने भी इस ग्रन्थमें जिनको स्तुति और विनय की है वे तुम्हारे मंगलके कर्ता हों, तुम्हें सर्व प्रकारसे मंगल प्रदान करें ॥ १५८ ॥ समस्त प्रकारके रागभा- वोंसे रहित, धर्मका स्वरूप और संवेग भावनासे परिपूर्ण अनुपम और उत्कृष्ट जो भगवान मल्लिनाथका । चरित्र मुझ भट्टारक सकलकीर्तिके मुखसे इस पृथिवीपर प्रगट हुआ है वह जबतक संसारमें श्रेष्ठधर्म-जैन धर्मकी सत्ता विद्यमान रहे तबतक भव्य जीवोंके साथ जयदंता रहे ॥ १५ ॥ इस संसारमें सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकचारित्र स्वरूप जो रत्नत्रय है वह स्वर्ग और मोक्षका प्रधान कारण है, समस्त पापोंको सर्वथा नाश करनेवाला है, धर्मरूपी अमृतका एक अद्वितीय समुद्र है, संसारके समस्त अनर्थों का निवारण करनेवाला है, समस्त सुखका निधि है, भव्य लोगोंके लिये मस्तकपर धारण करनेके लिए एक अद्वितीय चूडामणि है, अनन्त गुणोंका आकर है और समस्त कर्मोंका नाश करनेवाला है वह रत्नत्रय मुझे भी प्राप्त हो और उसके फलस्वरूप सारे गुण मेरे अन्दर आकर प्रगट हों इस अभिलाषासे .NMUI LIBRARY मल्लि० १४५ नदेवगतिजं त्यकोपम तत्फलात् । हत्या कर्मचयं महोग्रतपसा श्रीमल्लितीर्थेशवल्लवाचा त्रिजगजनैः शिवगति सयाति सिद्धर्भूता ॥ १६१ असमगुणकर डो वदितो विश्वनाथर्भवभुजगसुमत्रो दिव्यरत्नत्रयोऽस्तु। सकलदुरितहान्य पूर्णरत्नत्रयाय मम परमसुमत्यै बदित. सस्तुतश्न ॥ १६२ ॥ अस्य मल्लिचरित्रस्य सारा श्लोका भव त्यपि । साधं ह्यष्टशतै सर्वेश्चतु सप्ततिसम्मिता •॥ १६३ ॥ मे उस रत्नत्रयको रात दिन मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं ॥ १६०॥ इस पुराणके अन्दर जो रत्नत्रय व्रतकी विधि बतलाई गई है उस उत्तम विधिको जो विद्वान महानुभाब भक्तिपूर्वक करते हैं वे उसके फल- स्वरूप मनुष्य देवलोक सम्बन्धी अनुपम सुखको प्रात करते हैं। उग्र तपसे समस्त कर्मोको खिपाकर भग- वान मल्लिनाथके समान तीनों लोकके जीवोंसे पूजित होते हैं पश्चात् सिद्धोंसे चारों ओरसे भरी हुई मोन गतिको प्राप्त करते हैं ॥ १६१ ॥ संसारमे यह दिव्य रत्नत्रय असोधारण गुणोंका पिटारा है, तीनों लोकके नाथों से बन्दनीक है, संसाररूपी महाभयंकर भुजंगको वश करनेवाला उत्तम मन्त्र है, उस परम पावन रत्नत्रयकी मैंने जो इस प्रथमें बंदना और स्तुति की है वहसमस्त पापकर्मों के नाशके लिये, पर्ण रत्नत्रयर्क प्राप्तिके लिये और मुझे परम सुमतिकी प्राप्ति हो इस अभिलापासे की है इसलिये मेरी यह सविनय प्रार्थन है कि रत्नत्रयकी स्तुति और वन्दनासे मेरे समस्त दुष्कर्मों का सर्वथा नाश हो । मुझे पूर्ण रत्नत्रयका लाभ हं और मुझे परम सुमतिकी प्राप्ति हो ॥ १६२ ॥ इस मल्लिनाथ पुराणके अन्दर समस्त श्लोक आठसौ चौहत्तर हैं जो कि भगवान मल्लिनाथका चरित्र वर्णन करनेके कारण सारभूत हैं ॥ १६३ ॥ इति श्रीमल्लिनाथपुराणे भट्टारक श्रीसकलकीर्तिविरचिते मल्लिनाथधर्मोपदेशनिर्वाणगमनवर्णनो नाम सप्तम परिच्छेद, ॥ ७ ॥ ईसप्रकार भदारक सकलकीर्ति द्वारा विरचित सस्कृत मल्लिनाथ चरित्रकी प० गजावरलालजी न्यायतीर्थचिरचित हिंदी बचनिकामे भगव मलिनाथका धर्मोपदेश और निर्वाण गमन वर्णन करनेवाला सातवा परिच्छेद समाप्त हुआ ॥ ७ ॥ --

Mallinath Puran

Author
Sakal Kirti
Title
Mallinath Puran
File name
Mallinath Puran
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2010/05
Publisher
Jinvani Press, Calcutta
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
325748
Barcode
99999990003644.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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