Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Patrimarga Pradeepika

Sharma,.mahadva · 2012/08

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विशेपसूचना- हमारे यहां निम्नलिखित ग्रयोंके अनुवाद तथा नवीन ग्रंथ तयार होरहे, सो समय २ पर मुदित होनेपर आपलोगोंके दृष्टिगोचर कराये जायेंगे. (जिनका अनुवाद होरहा है उन ग्रंथोंके नाम) जातकतत्व (ज्यौतिषफलित) इसकी विशेष प्रशंसा करनाही क्या है यह ग्रंथ समस्त फलित यंपोंका सारले सूत्रात्मक बना हुवा है इस ग्रंथकी हजारों मतियें कई आवृत्मेिं काशीम उपचुकी हैं यह फालितका आदितीय यय माना जाता है इसपथकी सरल भाषाटीका तयार होनुकी है- ताजक सुधानिधी-(ज्योतिषताजक) यह नारायणभट्टकृत प्राचीन परमोपयोगी तानिक ग्रंथ है इसमें दलीलग्रह, भावोंकी पंच- धर्ग आदि भनेक नवीन विषय हैं तानक फलका चमत्कारी ग्रंथ है इसकी भाषाटीका होरही है. विजयाकल्प-(वैद्यशास्त्र) यह विजयानुरागियोंके तथा वैद्योंके परमोपयोगी है इसमें विनया ( भंग) की उत्पत्ति तथा गुण और प्रत्येक रोगोंमे सेवनकी रीति तथा जियाकल्पके सिद्ध करनेकी मंत्रसहित विधि भलीभाँति वर्णन कीगई है इसकी भाषाका तयार है. भैरवउडीस-(तंत्रशास्त्र) यह साक्षाव भैरवकृत उट्वीस है इसमें अनेक मकारके सिद्ध मंत्र तत्र विधि विधानसहित ऐसे चमत्कारिक हैं कि निनके द्वारा साधक भलीभाँति अपना अभीष्टकार्य साधन करसके इसकी भी भापारीका तयार होरही है योडीही बाकी रही है मुक्तात्मामिलापविधि भाषा- इसमें मुक्तारमासे मिलापकरनेकी तथा उनसे बातचीत करनेका शास्त्रोक्तपमाणोंसे मंत्र तंत्र सहित विधिविधान विस्तारपूर्वक लिखा है और चक्रकी निधि चक्रके नियम दुष्ट मुक्तात्मा- चक्रमे नही आसके उसका सरल उपाय तथा मुक्तात्मामिलापसे हानि काम भी भलीभांति इसमें सरल भाषामे लिखा है जिसके द्वारा एमति स्वतः सहजमे अनुभव करसके । सर्वतो भद्र चझावलोकन विधि, संस्कृत, हिन्दी, मराठी-गुजराती भाषाटोकासमेत । ज्योतिप- समस्तदेश और माणिमात्रका शुभाशुभ और रसधान्य फलपुष्पादि समस्त वस्तुमानका समर्थ महर्ष (तेनीमंदी ) माननेका परमोपयोगी उपरोक्त संतोभद्रचफफे देखनेफी रीति विस्तारपूर्वक हम इसमें उपरोक्त चार भाषामें लिख रहे हैं जिसके द्वारा हरएक भाषा नाननेवाला प्रत्येक वस्तुकी तेनीमदी सहन में नानसकें। नवीर ग्रंथ तयार है नया होरहे हैं उनमें नाम-दशाफलदर्पण- (ज्योतिष) यह ग्रंथ समस्त फरितग्रंथों से संग्रह करके दशाफल देखनेका एक परमोपयोगी अनूठा बन रहा है इसकी श्लोकसंख्या कमसेकम १००.० दशहमार देश १० भागमें विभक्त होगी निसमे १-प्रथमविभागमें दशापयोजन ४२ बैयालीस मकारकी दशाका भेद और उनके साधनकरनकी, उदाहरणसहित रीति और उन दशाओंके नक तथा उनसे कौनसी दशा मुख्य है उस्का निर्णय कहकर आगे संपूर्णादि अनेक प्रकारकी दशाफलके भेद विस्तारपूर्वक तथा दशाफल बोधक ग्रह और शुभाशुभ मध्यदशा निश्चयपूर्वक रचनीच मूलनिकोण स्वक्षेत्र अतिमित्र मिवादि पाचो भेवसहित मस्त उदित वकमार्ग गांतस्थ फलसमेत दिग्पल स्वनवांश पळोपेत राहयुतादि विशेष २ " दशाफलका सूक्ष्म विचार । तथा देहमुख धन भातृमात्र मह माममिन पाहन विद्या बुद्धि पुत्र रोग शत्रु भायों, मरण निधिलाभ भाग्यवृद्धि तीर्थयात्रा राज्यलाभ पदमामि पितृसुस धनादि लाभ व्पयादि वाराहि भावननित फळ किस २ दशामें होगा और किस २ दशामें उपरोक्त बातोंकी हानि होगी उसका विस्तारपूर्वक दशाके ऊपरही फळ निश्चय विचार और भी विशेष मिश्रविचार तथा दशाभवेश लग्नसे दशाफलफा सूक्ष्मविचार दशावाहन फल तथा जामतादि, बालादि, दीप्तादि, गर्वितादि, शयनादि, अवस्थागत ग्रहोंका विशेषरूपसे दशाफल विचार है। २-दूसरे विभागमें सूर्यादि नवही ग्रहोंको विंशोत्तरी महादशाका पृथक् २ महादशाफल विस्तारपूर्वक ऐसी युक्तिसे संग्रह किये हैं कि जिसके द्वारा एक २ ग्रहको दशाके फलका विचार कमसेकम १०० सौ सौ श्लोकोंसे निश्चय करसके. ३-तीसरे विभागमें अंतर्दशासंबंधि समस्त सामान्य और सूक्ष्मफळ विस्तारपूर्वक पृथक् २ ग्रहोंका ऐसा लिखा है कि समस्त अंतर्दशाका सूक्ष्मफल विस्तृतरूपसे विचार अनायास होसके । ४-५-६-चौथे पांचवे उठे विभागमें कमसे उपदशा सूक्ष्मदशा माणदशाओंका विस्तार- पूर्वक निःशेष फळविचार लिखा है। ७-सातमें अष्टोत्तरीकी पांचही मकारकी दशाका विस्तारपूर्वक फळविचार । ८-आरमें विभागमें योगिनीदशाके दशांतर्दशादिकका समस्त फलविचार । ९-नवमें विभागों पर स्थिर रुद्र शल वर्णदादि नैमिन्युक समस्तदशाओंका सूक्ष्मविचार भंतर्दशादि फल विचारोंसहित है। १०-दशम विभागमें उक्तदशाओंके अतिरिक्त शेष समस्त दशाओंफा फलविचार और उपसं- हार है इसप्रकार यह ग्रंथ दस विभागोंमें समाप्त होने में आया है। वर्षपद्धति । यह वर्षफल लिखनेकी अपूर्व पुस्तक है इसमें हायनरत्न, हिल्लान, तानिक भूषण, तानिक सुधानिधी, कौस्तुम, नीलकंठी आदि अनेक तानिक अयोसे वर्षका फल संग्रह ऐसी युक्तिसे किया है कि सिर्फ यह एकही पुस्तक जिसके पास होवे तो ताभिक संबंधी दूसरे मंथकी अपेक्षा नहीं रहे और धमाकारिक फल इसके द्वारा कहके फलितको नहीं माननेवाले नास्तिकोंको आस्तिक बनानेमें कुशल होजावे । (छपने योग्य तयार है) आशुबोध ज्योतिष । यह ग्रंप ज्योतिषशास्त्रको पटना शुरूकरनेवाले बालकोंके लिये एक उपयोगी मपम पुस्तक है इसको पढ़नेसे ज्योतिषका मार्ग भलीभाँति समझ सके हैं. यह भी छपने योग्य तयार है) लघुपूजा अनुष्ठानपद्धति ( फर्मकाण्ड) यह पूजन विधि और अनुष्ठानादि अनेक कार्यके रिये अदितीय पुस्तक है। इसमें टिप्पणी भी प्रत्येक विषयपर है। दशांगदुर्गा (सप्तशति) मन्त्रशास्त्र । इसमें दुर्गा दश ग बहे भयलसे संमद को ऐसी दुर्गा आजतक कहीं नहीं छपी है मंत्र- देताके उपयोगी है (उपने योग्य ये भी तयार होचुकी है) इनके सिवाय और भी फईएफ ग्रंथोंका अनुवाद होरहा है। ज्यो श्रीनिवासशर्मा, ज्योतिषकार्यालय रतलाम,

श्रीगणेशाय नमः।
अथ पनीमार्गप्रदीपिका।
सोदाहरणा भापारीकासहिता प्रारभ्यते ।
अथ मंगलाचरण.
नत्वा श्रीशिवशारदागणपतिब्रह्माकमुख्यग्रहान
पत्रीमार्गप्रदीपिकां स्फुटतरां कुर्व महादेववित् ।। .
यत्पक्षे हि घटेति शुद्धखचराः कार्यास्तु तत्पक्षकाः
स्वव्योदययोःखरामविहृती प्राप्ताः पलादिधुवाः ॥१॥
भापाटीकाप्रारंभः।
नत्वा श्रीगुरुपङ्कजं गजमुखं साम्वं शिवं श्रीधर
पत्रीमार्गसुदीपिकाख्यविवृति कुवै सतां प्रीतये ॥
पाराशर्यकुलाभिजातगणकोऽहं श्रीनिवासाभिधो
विद्वन्मण्डितरत्नपूर्वसतिकृच्छ्रीपाठकोपाह्वयः ॥ १॥
मापापार विनपिच्छेदाय मगलाचरणरूप गुरु गणपतिको मणामपूर्वक भापारवनाका सयो-
मान सपा सपना गोम भौर निवासस्थान कहताहै-
श्री (शोभायुत ) निजगुरु (महादेवनी ) फे चरणकमल और गनमुन (गणपति) पार्वती-
सहित शहर और लक्ष्मीसहित विष्णुभगवानको नमस्कार फरक पराशरपुरमें उत्पाहुना
(पराशरगोत्र ) पाठक ऐसे सपनामसे मसिद्ध विद्वन्मडलीकरफे मुशोभित रनपुर (रतलामशहर)
में निषास फरनेपाल मे श्रीनिवासगणक (ज्योतिर्विद ) सजनोंके मसनहोनेके अर्थ पनीमार्ग
मदीपिका प्रयकी मापारीका फरताहूँ ॥ १॥
भापाटीका-निर्विवतासे मंथ समान होनेक अर्थ ग्रंथकर्ता प्रथम पुरु
गणेशादिदेयोंको नमस्काररूप मंगलाचरण शार्दूलविक्रीडितवृनके पूर्वादसे करके
पन्थारमा करते हैं-
श्रीशिवजीको सरस्वतीजीको गणपतीजीको घमाजी और सूर्यको आरिले
नवग्रहोको नमस्कार करके महादेव ज्योनि अत्यंत सरल पत्रीमार्गप्रदीपिका
(जन्मपत्रीके मार्गको प्रकाशकरने की पदायिक ) नाम अन्य फर है आर्य-
समसौरादिपोंसे भपने देश जिस पर यह वेधकरने दस्तुल्य होगहों
वे उसी पक्षले स्पष्टयह करना स्वदेशोदय नगदयोंके ३० नीसा भाग
१ गणेशदेवश , "लरोदपा विपटिरा गनभान गाविपक्षाहना मगोपसम्परा
होनापिता परदः कमगोलमपादितो घटनाममा म्यु" ॥ ॥

पत्रीमार्गप्रदीपिका। देना लब्धावे वह पलादिक ध्रुप जानना (स्वदेशोदयके ३० तीसका भाग देनेसे स्वदेशोदयका पलादि ध्रुव और लंजोदयके ३० भाग देनेसे लंकोदयका पलादि शुष होवे) | रतगमक वरदहा मे २७८मी मा१२ मी २९७ ४1 |२५८ मि ३२३म मि ३०६म फ ३४० सि २९७ [वि|३४. क/२७८ ५१ क ३२१ उदाहरण । कोदया रनास्पदमोदया रतलामशहरके मेपराशीके स्वदेशो- दयपल २२७ के ३० तीसका बाग दिया लन्ध १३४आया यह मेष राशी का संदेशोदयका पलादि ध्रुव हुवा इमीप्रकार मेपराशीके लंकोदय पल २७८ के ३० तासका भाग दिया लब्ध ९।१६ आये ये मेपराशीका लंकोदयका पलादिक ध्रुा हुया इसीतरह स्वदेशो. दय और लंकोदयकी बारहही राशियों के पलादिक भव जानना ॥ १॥ उत्तमसे प म मी ए . क ५ न ६ २ 2 . to ८ ३ ४ 1 २०२. ८ . 10 ५८ ५८ २० 10 १२ 1. ४ ३४ ६ स्वदेशोदय । पाळादिष्य सादर ४६ ४६ ५८ १६ ५८ पानिधन। - अथ लयदशमपत्रसाधनमाह । स्थापयेत्वं क्रियारंभे ततः स्वधुवकान्वितम् ॥ निरायनं भवेत्पचं लग्रस्य दशमस्य च ॥२॥ भापाटीका-अन लग्नपत्र दशमपन बनानेकी रीति कहते है. मेपराशीके आगामें ( मेपराशीके० शून्य अंशके नीचे) तीन शून्य लिखना नंतर स्वदेशोदय और लकोदयकी मेप, वृपा, मिथुन, कर्क आदिक राशियोंके पलाविक व उमसे युक्त करना सो निराधनलमपत्र दशमपत्र हो ( स्वदेशोदयकी मेपादिक राशियोंके पलादिक ध्रुवयुक्त करनेसे लमपत्र और लंफोदयकी मेपादिक राशियोंके पलादिक ध्रुवयुक्त करनेसे दशमपत्र होताहै ) ॥२॥ उदाहरण। नीचे लिबेहुवे चकमें मेराशीके आरंग में तीन शून्प लिसके रत्नपुर (रत- जापाटीकासहिता । भापाटीका-अब लम दशमसाधन कहते हैं, जिसमें प्रथम दशमका इष्ट साधन कहते हैं ॥ सूर्योदयाद-घट्यादिक इष्टमेंसे दिनाई हीन करना (निकालना) रोप रचे वह दशमभावका इष्ट होवे । दशगमाव और लममें छः राशी युक्त फरनेसे सुसमाव और सरममाव होते हैं (दशमायमें छः राशी युक्त करनेसे चतुर्थनाव और लममें छः राशि युक्त करनेसे सप्तमभाव होये) ॥ ३ ॥ भाँशजी सायनार्कस्य खागांको स्वेटयुक्तो । कलाद्यास्तद्धवनाः रयुपिलाद्यास्तु संयुताः ॥४॥ तदल्पकोष्टजो भांशी ग्राह्यौ लिप्तादिकावियत् ॥ अल्पेटविवरात्पान्तिराप्तांशादिसंयुतौ ॥५॥ अयनांशादिवियुताल्लनं मध्यं स्फुटं भवेत् भाषाटीका-सायन सूर्यकी राशी अंशके समान दशमपत्र औरै लमपत्रके कोष्टकमें अपना अपना घट्यादिक इष्ट युक्त करना ( दशमपत्रके कोष्टकमें दशमका इट, प्रपत्रके कोष्टको जन्मसमयका इष्ट मिलागा) तदनंतर सूर्यकी कलाविकलाको सायन सूर्यकी राशीके ध्रुवसे गुणन करना गुणन करके आयेहुए अंकोंको इष्टयुक्त किये हुए कोष्टककी विपलमें युक्त करना ॥४॥ उस इष्ट युक्तकिये हुए कोप्टकसे अल्प( न्यून ) कोटक जिस राशीअंशग होवे-यो राशीअंश लेना उसके नीचे कलाविकला शून्यशून्य लिखना तदनंतर इष्टयुक्त कोष्टक और अल्पकोष्टकका अंतर करना शेप अंतरमें अल्पकोष्टक और उसके आगेके (ऐष्य) कोष्टकके अंतरका भाग देना लब्ध आये वह अंश जानना शेषबचे उनको ६० साठगुणा कारना फिर अंतरका भाग देना लब्ध कला आये फिर शेषको ६० साठगुणा परके अंतरका भाग देना लब्ध विकला आवे ऐसे आये हुए अंशादि । तीन फलोंको इष्टयुक्त कोष्टकसे अल्पकोष्टकके आयेहुए राशी अंशादिकमें युद्ध करना ॥ ५ ॥ अयनांश हीन करना सो लग्न और दशमभाव स्पष्ट होवे ।। उदाहरण श्रीगणेशाय नमः ॥ स्वस्ति श्रीसंवत् १९२८ शके १७९३ प्रवर्तमाने अमात माघरुष्ण पौर्णिमांत फाल्गुन कृष्ण३ तृतीयायां भौमवासरे घ. २५।४९ १ शकमधे ४४४ चारसे नुम्मारीस हीन करनेसे भयनांश होते है । अयनाशोंको स्पसमें मिशनेमे सायन सूर्य होता है।

(६) पत्रीमार्गप्रदीपिका। परं ४ चतुझं हस्तगक्षत्रे घ. २९।९ परं चित्रानक्षत्रे गण्डयोगे. . ४४।५ बालवकरणे एवं पञ्चाङ्गशुद्धावत्र दिवसे. श्रीमन्मार्तण्डमण्डलाझेदयादिष्ट- घटी ५६ पल ४८ विपल, १८ स्पष्टार्क १०११६१५३३९ लम. २।२३ समये ज्यो श्रीनिवासशर्मणोजन्मसमयःदिनमान२८/५०अपनांशाः २२।२९।० रतलाममें तथा रतलामके समीपके ग्रामोंमें सौर पक्षके स्पष्टयह ग्रहवेधसे दृवतुल्य मिलते हैं इसवास्ते सौरपक्षके स्पष्टयह ग्रहलाघवाख्य करणग्रंथसे किये ग्रंथगताब्दाः ३५१ चक्र ३१ अधिकमास ६ मा. सगण १३६ ऊनाह ६४ अहर्गण ४०३९ अथ जम्माम्. १२म ३ ७ . w एमापाय: अथ स्मशः सेवा. क ६ २ 191|| ८० ५ "010 ९ ८ . २५/२५/१२/२३/०६/२३१६२९६ १० १२.२४/२५/२५ ३ ८४०३१३१४००1४४५३|४|४|४३२५/४८४.४० ४०/३०/४८१ ३४१४६/३१४१५४ 16 . ८२३३१३१ ५५/७४८ ३१२५१७६/४/३५.६.०५/८/०८/२४|४५३४३x ४४ २७/४/५३७) १७१८४/२६ ८२0७/19 . लग्नसाधनका उदाहरण । स्पष्टसूर्य ५०1१६१५३।३९ में अयनाश २२।२९।० युक्तकिया ११॥ ९।२२।३९ ये सायनसूर्य हुवा इसकी राशी ११ अंश ९ के समान लमपत्रका कोष्टक ५॥२१॥ ६ में जन्मसमयका घट्यादिक इष्ट ५६।४८३१८ युक्तकिया ५४।९।२४ हुए इसकी विपलके २४ अंकमें मूर्यकी कलाविकला २२ । ३९ को सायनसूर्यको ११ राशीके ध्रुव ७।३४ से गुणन करके आये हुए १७१ अंक युक्तकिये ५४।९।१९५ हुए विपल ६० साठसे अधिक हैं इसलिये साठका भाग दिया लब्ध ३ आये ये अपरकी पलके अंक में युक्तकिये ५४॥ १२।१५ये इष्टकोष्टक हुवा।इससे अल्पकोष्टकलग्नपत्रमें५४।४। दश(१०)राशी ३५ अंशके कोप्टकमें मिलता है इमवास्ते १० राशी ३५ अंशलिये इसके नीचे कलाविकला ०० "शून्य शून्य लिसनेसे १०1१५०० हुए तदनंतर अल्पकोष्टक ५४|४|० और इष्टयुक्त कोटक ५४।१२।१५ के अंतर किया ८३५ शेप रचे इस्में अन्यकोष्टक ५४१1० और इसके भागेका (ऐय भापाटीकासहिता। कोष्टक ५४।१२।३६ को अंतर ०८।३६ का भाग दिया परंतु भाज्य८१५ भाजक सा३६ हैं इसलिये इनको सवर्णित करके भाग दिया भाज्य पिंड १९५ भाजकपिंड ५१६ हुए भाज्यपिंडमें ४९५ भाजकापिंड ५१६ का भाग दिया लब्ध० अंश आया शेप ४९५ को ६० साठगुणा नित्ये २९७०० हुवे इन भाजक ५१६ का भाग दिया लध ५७ कालाआई शेप २८८ वचे इनका६० साठगुणे किये १७२८० हुवे इनमें भाजक ५१६ का भाग दिया लब्ध ३५ विकला आई ऐसे अंशादिक फल तीन ०५७।३५आये इनको १०।१५.०० में युक्त किये १०।१५।५७।३५ हुवे इसमें से अयनांशा २२।२९१० हीन किये शेष९।२३।२८।३५वचे यह स्पष्टलम हवा इसमें ६ छः राशी मिलानेसे३।२३। २८॥३५ सप्तमनाव हुवा इसीप्रकार १० दशमनावका साधन किया उसका उदाहरणाली नीचे लिखा है- प्रथम दशममायके इष्टका उदाहरण--सूर्यो- दयात् घट्यादिक इष्ट ५६।४८।१८दिनार्थ १४।२५० दिनार्दको सूर्योदयात् इष्टमेंसे हीन किया शेप ४२।२३।१८ बचे ये दशमका इष्ट आया- मदनंतर साधनसूर्य ११।९।२२।३९ की राशी 33 अंश ९ के नमान दशमपत्रका कोष्टक ५६।४५।२४ में दशमका इष्ट ४२।२३।३८ युक्त किया ३९।१४२ हुवे इसकी विपलके अंक ४२ में सूर्यकी कला २२ विकला ३१ को सूर्यकी राशी ११ के ध्रुव ९।१६ से गुणन करके आये हुवे २०९ अंकको युक्त किये ३९।८।२५१ विपलमें ६० का भाग दिया लब्ध ४ को पलके अंक में मिलाये ३९।१२।११ ये इष्टयुक्त कोष्टक हुया इससे अल्पकोष्टक ३९१७१६ राशी ७ अंश २७ के कोहकमें मिलते इसलिये ७ राशी २७ अंशलिये नीचे कला विकला शून्य लिखी ७।२७१०० हुये-तदनंतर अत्तकोष्टक ३९॥ ७६ और इष्ट कोप्टक ३९।१२।११ का अंतर किया ०।५।५ शेष बचे इनमें अल्पकोष्टक ३९।१६ और इसके आगेका ( ऐप्य ) कोष्टक ३९१५४ के अंतर ९१५८ का भाग दिया परंतु भाज्य भाजक दोनो पलादिक अंकके हैं इसलिये भाज्य भाजरुको सवर्णित करके भाज्यपिंड ३०५ में भाजक ५९८ का भाग दिपा लब्ध ० अंश आया शेष ३०५ को ६० साठ गुणा किया १८३०० हुने इनमें भाजपिड ५१८ का माग दिया लम ३० कला भाई शेप ३६० बचे इनको ६० साठ गुणे फिये २१६०० हुवे इनमें भाजक पत्रीमार्गपदीपिका। ५५.८ का भाग दिया लब्ध ३६ विकला आई ऐसे अंशादिक फल।३०।३६ आये इनको ७१२७१०१० में मिलाये ७२७३०३६ हुचे इसमेंसे अपनांश २२१२९१० घटाये ७।५।३।३६ शेष बचे यह दशमभाव स्पष्ट हुवा इसकी राशीमें ६ छः राशी युक्त करनेसे १।५।११३६ चतुर्थनाव हुवा- अथ भावसंधितञ्चक्रसाधनमाह । लग्नं तुर्यात्सप्तगात्तुर्यभावं शोध्य राशिः पञ्चभिस्ताडितोऽशाः॥ मंशाबाश्वेदिग्यताः स्युः कलाद्याः लग्ने तुर्ये पञ्चवारं प्रदद्यात् ॥६॥ तन्वायाः संधिसहिता भावाः पट्पड्युताः परे । यदत्यारंभयोः संध्योरन्तस्थस्तद्गतोग्रहः ॥७॥ भापाटीका-अब भावसंधि और चलितचक्रका साधन कहते हैं। लमको चतुर्थ जायमेंसे चतुर्थ भावको सममायमेंसे शोधना (हीन करना ) शेप राशीको ५ पांच गुणी करना अंश होवे और जो अंश कला विकलाको दशगुणा करे सो कलादिक होपे ऐते अंशादिकको लममें और चतुर्थभावमें(चतुर्थभावमेंसे लमको हीन किया हो तो लममें सप्तमभावमेंसे चतुर्थभाव हीन किया हो तो चतुर्थनावमें) पांचवार युक्त करना ॥६॥ सो लमको आदिले संधिसहित ६ छः भाव होवें इन ६ छः भावों में छः छः राशी युक्त करनेसे शेष छात्राव होवें॥जिसभावकी मंत्य (आगेकी ) और आरंग (पीछेकी ) संधियोंके मध्यमें (बीचमें ) यह होवे वह उसी भावमें स्थित जानना । अर्थात् यह जिसनावमें स्थित होवे उस भावकी भारंच (पीछेकी ) संधीसे न्यून होवे तो गतभावमें स्थित होने और अंत्य (आगेकी ) संधीसे अधिक हो तो आगेके भावमें स्थित होवेगा । यदि इन दोनों संधियों के बीचमें होवे (आरंगसंधीसे अधिक और विरामसंधिसे न्यून हो) तो उसी भायमें यह स्थित जानना ॥ ७ ॥ उदाहरणा लम ९ । २३ । २८ । ३५ 1 को चतुर्थनाव १ । ५। १ । ३६ मेंसे हीन किपा शेष ३ । १३ । ३३ । ३ वचे इसकी राशीके अंक ३ को ५ गुणे करनेसे १५ हुवे ये अंश हुवे शेष अंशादिक ११ । ३३ । १ को दशगुणे किये ११०१३३०1१०। ये कलाविकला प्रतिविकलादिक हुवे परंतु ये कला- भापाटीकासहिता। दिक ६० साठसे अधिक है इसलिये साठका भाग विकला ३३० में दिया शेप ३० विकला रही लब्ध ५ कलाके ११० अंकमे युक्त किया १३५ कला हुई इसमें भाग ६० साठका दिया शेष ५५ कला हो लब्ध १ अंश १५ में युक्त किया अंश १६ हुवे इसप्रकार राशीको ५ गुणी अंशादिकोंको १० दशगुणे करनेसे अंश १६ कला ५५ विकला ३० प्रतिविकला १० भाई इनको लग्न ९ । २३ १ २८ १३५। में युक्त किये १० । १० । २४ । ५। १० ये दूसरे भावकी आरंमसंधी हुई इसमें फिर १६ । ५५ । ३० १३० अंशादिक युक्त किये ३० । २७ । १९ ॥ ३५॥ २० यह धनभाव हुवा धन- भावमें अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १० युक्त किये ११ । १४ । १५१५ । ३० यह तृतीयमावकी आरंभसंधी हुई इसमें अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १०मिलाये । १११० । ३५१ ४० यह तृतीयभाव हुवा तृतीय भावमें १६ । ५५ । ३० । १० युक्त किये ० । १८१६।५। ५० यह चतुर्थ- भावकी आरंभसंधी हुई इस्में अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १० मिलाये १।५।।३६ ये चतुर्थभाव हुवा-इसीप्रकार चतुर्थभाव १।५।। २६ को सप्तममाव ३।२३।२८१ ३५ मेंसे हीन किया २।१८।२६।५९ शेष पचे इसकी रागी २ को ५पांचगुणी और अंशादिक १८१२६१५९ को १० दशगुणे करनेसे १३ । ४ । २९१५० अंशादिक हुए इनको चतुर्थभावमें पांच- बार युक्त किये सो चतुर्थको आदिले सप्तम भावपर्यंत संधिसहित भाव हुवे ऐसे लग्नादिक संधिसहित ६ छः माव हुवे इन संधिसहित ६ छही भागोंकी राशीमें छः छः राशी युक्त करनेसे शेप मतमधारको आदिले मंधिसहित ६ भाव हुए- . स . 1. . १८ १५ " १४ ५ १५ ५ ई ५ ८ लमय समयमाबचमाशः। ६ . . . २ १ . ६५ ५ १५ है ६ “ १. . ३५ ५ 4 ३ . 2010 19/ ६५ १ है ११ ४ ३ २॥ १४ १५ ५ ११ . 4 ३५ ३५ अचद्धिव चकम्। १ ४ ७ (१०) पत्रीमार्गप्रदीपिका। जन्मकुंडलीमें सूर्य २ द्वितीय भायमें स्थित है द्वितीयभावकी आरंभसंधि १०1१० से सूर्य १०।१६ अधिक है और द्वितीयभावकी विराम (आगेकी) संधी ११११४ से न्यून है इसलिये यह सूर्य अंत्य आरंभसंधीके बीचमें हुवा इससे द्वितीय चाव ही स्थित रहा मंगल ११।६ यह तृतीयभापकी आरंभ- संधी ११:१४ से न्यून है इससे मंगल द्वितीयभावमें स्थित जानना ऐसेही गुरु ३। ० है यह सप्तमनावकी आरंभसंधी ३ १९ से अल्प है इसकारण ६ छठे भावमें स्थित हुवा इसीप्रकार शेप सर्व ग्रह भावोद्भव ( चलित ) चक्रमें जानना। अथ क्षय-चय-फल-विश्वानयनमाह । भावतुल्ये ग्रहे रूपं संचितुल्ये तु निष्फलम् ।। भावसंध्यंतरेणाप्तं खेटसंध्यंतरं च यत् ॥८॥ भावान्यूनाधिके खेटे फलं वृद्धिक्षयाभिधम् ॥ फलस्याग्यशको विश्वा यद्वा विंशहतं फलम् ।। भापाटीका-अब क्षय चय फल विश्वा आनयनकी रीति कहते हैं-भावके अंश कला विकलाके समान ( बरोबर ) यह होवै तो पूर्णफल होता है उस महका (11०1० फल जानना ) और संघीके अंश कला विकलाके तुल्य (बरोबर) यह होवे तो निष्फल होता है ( उस ग्रहका 01010 फल जानना) न्यूनाधिक होवे तो भावसंबीके अंतरका भाग देना ग्रहसंधीके अंतरमें ( ग्रह जिस भावमें स्थित होवे उस भावसे न्यून होवे तो उस भावकी आरंभसंधिसे ग्रहभावका अंतर करना और भावसे ग्रह अधिक होये तो विराम ( आगेकी) संधीके साथ ग्रहमायका अंतर करना ) जो फल लब्ध आवे वह ८ ॥ भावसे यह न्यून होये तो वृद्धि ( चय) और मापसे ग्रह अधिक हो तो क्षयसंक्षक फल जानना फलका तृतीयांश ( फलके तीनका भाग देना) विश्वा जानना अथवा आये हुवे फलको वीस गुणा करना सो विश्वा होवे ॥ ९ ॥ उदाहरण। सूर्य १० । १६ । ५३ । ३९ यह द्वितीय भावसे न्यून है अत एक द्वितीय १ घरणीधरः ॥ "न्यूनपिग्रहादावाच्छोध्यो भावाल्पके खगे ॥ तदापिमाच संशोम्यो अहो मापस्तथापिके" ॥ इति ॥

भाषाटीकासहिता। (११) जावकी आरंभसंधि १० । १० ! २४१ ५ से अंतर किया ० १ ६ ॥ २९॥ ३४ यह ग्रहसंध्यंतर हुवा इस्में इसी आरंजसंधि १०/१०।२४।५ के साथ द्वितीयत्नाव १०२७ । १९ । ३५ का अंतर किया । १६ ५५। ३० ये भावसंध्यंतर हुवा इसका माग दिया-भाज्य ग्रहसंध्यंतर भाजक पावसंध्यंतर दोनो अंशादिक है इसलिये इनको सवर्णित किये भाज्यपिंड २३३७४ में भानक पिंड ६०९३० का भाग दिया लब्ध० शेप २३३७४ को ३० माठ मुणे किये १४०२४४० हुवे भाग६०९३०का दिया लन्ध २३ कला आई शेप १०५० बचे इनको ६० गुणे किये६३००० हुवे इन्में फिर भाजक भावसंध्यं- तर६०९३०का भाग दिया लब्ध विकला आई ऐसे फलस्तीन आये०१२३३१ ये भावसे यह न्यून है अतएव चयसंज्ञक सूर्यके फल हुए-इसीप्रकार चंद्रादि ग्रहोंके फल जानना--अब विश्वा आनयन कहते हैं सूर्यके फल २३११ के ३ वीनका भाग दिया लब्ध ७४० ये विश्वा हुवे अथवा फल २३।१ को २० वीसगुणा किया ४६०।२० साठ ६० का नाम दिया लब्ध ७ शेप ४० चचे ये विश्वा आये इसीमकार चंद्रादिकके विश्वा जानना. मम प्रयकाल विश्वावस्म य म. रा. . . . . . Y २३ . पय ५५ ३७ पथ ३४ ४५ २२ य ४८ २३ बी चप २० पथ ३ पर चय क्षपचय . १६ १३ ४. २५ २. २३ १६ १३ ४० विचा अथ महाणामवस्थानयनमाह व्यङ्टेशः। बालायवस्थाः क्रमशो ग्रहाणामोजे समे तद्विपरीतमाहुः ।। वालः कुमारोथ युवा च वृद्धो मृतोलवानामृतुभिः क्रमेणइंति॥१०॥ भापाटीका -अब ग्रहोंकी अवस्था लानेकी रीति व्यंकटेश कहते हैं।ग्रहोंकी मालादिक अवस्था कमसे विपम (एकी) राशीमें छः छः मंशोंके क्रमसे पाल (१२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। कुमार २ युवा ३ वृद्ध ४ मृत ५ कही है और सम (बेकी ) राशीमें बह वालादि अवस्था विपरीतकमसे (मृन १ बृद्ध २ युरा ३ कुमार ४ वाल ५) कही है ॥१०॥ उदाहरण। सूर्य १०।१६।५।३९ यह विपमराशीका है और छम्छःअंश- के क्रमसे तीसरे विभागमें है अतएव तीसरी युवा अवस्था हुवा इसी प्रकार शेष छ- आदि ग्रहकी अवस्था जानना ॥ दारूवरचानारणानरम, १२ 14 २४ ६० अध पास चमार पुवा मृतविवारी मृत पुस रमार थासमरा रा मप पारायवस्थाचरम स प म गु पुपाप कुमार मृत पुरा मत रा अथ दृष्टिसाधनमाह धरणीधरः। द्रष्याविहीनदृश्यस्य कमादेकादिभे दृशः ।। भागादै तिथियुग्भागाभागा नशराब्धयः ।। ११॥ भोग्यभागाद्विनिनांशाः क्रमात्पड़भाषिके ग्रहे ॥ दिग्भ्यः शुद्ध लवाई च ज्ञेया लिप्तादिकादृशः ॥१२॥ भापाटीका--अब घरणीधर दृष्टिसाधन कहते हैं, देशमहको हीन करना हश्य पहमेंसे कमसे एकको आदिले शेपराशीयोंकी दृष्टि जानना ॥ एकराशी शेप पचे तो राशी बिना अंगोंको अर्द (आधे ) करना यदि २ दो राशी शेप रहे तो राशीविना अंशोंमें १५पंदर युक्त करना और तीन राशी शेप बचे तो अंशोंको भई ( आधे ) करना और ४५ पैतालीसमें से शोपना ॥ १३॥ पार ४ राशी शेप बचे तो चोग्यांरा ( राशी विना अंशोंको ३० तीसमेंसे झीन फरना) यदि ५पांच राशी शेष बचे तो राशी विना अंशोंको द्विगुण करना गौर कमसे छः ६ सात ७ आठ ८ नव ९ राशी शेष बचे तो शेष राश्यादिकोंको १० दश राशीमसे शोधना-शेष बचे उसके अंग करके अर्ध (आधे) करना जो आये वह क्लादिक दृष्टि जाननी ॥ १२ ॥ यस्प पदम्प रायने त्रसीधा-निस प्रदशी टिहाना हान दश । २२ पद भरमानीपते असोयननम् प्रहपर दाना हो यह दृश्य होता है।

भापाटीकासहिता। अथ भौमस्थ विशेषदृष्टिमाइ । पंचेन्दयुक्ताः खलु साईभागा विभेगमे पष्टिकलास्तथैव ॥ भागोनपष्टिर्भवतीह दृष्टिस्त्रिभेऽदिभे भूमिसुतोनदृश्ये ॥ १३॥ भापाटीका--अब मंगलकी विशेष दृष्टि कहते हैं मंगलको होन करे दश्यमेसे और यदि दो २ राशी शेष बचे तो राशी विना अंशोंको डेढे (अंशादिककेरका भाग देके आवे वह उन्ही अंशादिमें युक्त करना ) करना और १५ पंदर पुक्त करना कलादिक दृष्टि होवे और ६ छः राशी शेप वचे मो६० साठकल्ला रष्टि जानना तैसेही यदि तीन राशी ७ सात राशी शेप बचे तो राशी विना अंशादिकोंको ६० साठमेंसे शोधना मो कलादिक भौमकी विशेष दृष्टी होवे उफराशियों के अतिरिक्त राशी शेष बचे उसकी श्लोक ११/१२ के अनुसार दृष्टि करना ॥ १३॥ अथ जीवस्य विशेषदृष्टिमाइ । जीवोनदृश्यस्य तु वेदभे स्यादिनांशकोना खलु पटिरेव ।। सार्दाशकोना गजभे तु पष्टिस्त्रिभेऽद्रिभेशार्द्धयुतेपु वेदाः ।। १४ ॥ भापाटीका-अब गुरुकी विशेष दृष्टि कहते हैं गुरुको हीन करे दृश्यमेंसे और यदि चार राशी शेप बचे नो राशी विना अंशादिकोंको २ द्विगुण कर्के ६० साठसे हीन करना दृष्टि होये और ८ आठ राशी शेष बचे तो अंगोंको हेदे (अंशोंको आधे कर्के उन्ही अंशोंमें मिला ) कर्के साठ ६० मेंसे शोधना (हीन करना ) शेष बचे वह दृष्टी जानना इसीप्रकार यदि तीन ३ राशी सात . रागी शेष बचे तो अंशोंको अर्थ (आधे ) क ४५ पैंतालीस युक्त करना सो फलादिक गुरुकी विशेष दृष्टि होये ॥ १४ ॥ अथ मंदस्य विशेषदृष्टिमाद्द । द्विनिम्नभागाविधुभेतरस्याईिभेतु भागार्दविहीनपतिः ।। द्विनांशकोना नवभे तु पष्टिस्त्रिंशद्युतातद्गजभेऽर्कजस्य ॥१५॥ इति भापाटीका-अंब शनिको विशेष दृष्टि कहते हैं-शनिको हीन करे दृश्यों से परि १ पक राशी शेष बचे तो राशी विना अंशादिकको द्विगुण करनेसे कलादिक १४) पत्रीमार्गप्रदीपिका। दृष्टि होती है और यदि २ दो राशी शेष बचे तो अंशोंको अर्थ,(आधे ) करके साठमेंसे हीन करना इसीप्रकार ९ नवराशी शेष बचे तो राशिविना अंशोंको द्विगुण कई साठमेंसे शोधनेसे दृष्टी होती है और ८ आठ राशी शेष बचे तो राशी विना अंशोंमें ३० तीस युग करना शनीको विशेष दृष्टी होवे ॥ १५ ॥ ८ सहपाहारसायनोटक मामविपहाट गुरुविपरीष्टकोटक ३ ५ ६७ ८ २।३।६।७ ३ भिशा भषा अशा भिशामना असा भशा भगशामक्षा . दाभश अषा भश अशा द्र भदा दिया अद्ध देवा मुक्ता ४ गुणा यु xकाx ५ x ४ म x अ पानविप ८ मिया अशा अशा अमा मद्रा दिपा २१.३ गुणयु उदाहरण। सूर्य १०।१६।५३।३९मेंसे द्रष्टा चंद्र ५।२९।१९।४९ हीन किया१1१७१ ३३१५० हुने शेप चार राशी वची हैं इसकारण इसके अंशादिक १७३३३५० को ३० तीसमेंसे हीन किये १२।२६ शेप वचे ये सूर्यपर चंद्रकी दृष्टी हुई- इनीमकार दृश्य सूर्यमसे भौम: १।६।१४।५४ को हीन किया ११।१०।३८। ४५ हुये शेप ग्यारा राशी हैं इमकी दृष्टी नहीं है इसकारण सूर्यपर भौमकी दृष्टी ०/० सूर्य दृश्योंसे दृष्टा बुध १०11०1४४।१८ को हीन किया शेप । ६।९।२३ बचे शुन्यराशीकी दृष्टी उक्त नहीं है इसलिये मूर्यपर बुधकी हष्टी ०१० हुई सूर्पमसे द्रष्टा गुरु ३१०१४३३ हीन फिया शेप ७।१६।१०1३८ वचे सातराशी शेप, इमलिये गुरुकी निरोप दृष्टी ठोकमें कहे अनुसार अगोंको आधे किये ८५ हुये इनमें ४५ युक्त किये १४५३१५ ये सूर्यपर गुरूकी विरोप दृशी हुई- महामरिमहागाईपिचर ब ग म प छ 6 . १८ ४६ सू १२ २० . . . 1८ . १८ . १३ २६ . १८ . १ . ३५ म ५ ४३ भापाटीकासहिता । (१५) दृश्य सूर्पमेंसे शुक्र९।१२।२६॥ ८ को होन किया शेप १।४। २७। ३१ वचे शेप एक राशी है इसलिये अंश ४।२७।३२ को आधे किये २। १३ ये सूर्यपर | शुक्रकी दृष्टी आई फिर दृश्य सूर्यमेसे ८१२४१४८।२३ होन किया ।२२।५।१६ शेप एकराशी बची इसवास्ते शनीकी विशेष दृष्टी श्लोक १५ में कहे अनुसार अंशा. दिक २२१५ को द्विगुण किये४४ १० ये सूर्यपर शनीकी दृष्टी हुई इमीमकार शेप ग्रहोपरग्रहोंकी दृष्टि तथा भाव दृश्यपर ग्रह दृष्टाको दृष्टी जानमा-इति। द्रष्टा शनि ३५ ३४ ५३ ४॥ ४८ ४४ . ८ १ ५४ १६ ३२ . . . - ४४ . ५. ८ ३५ ५. ५७ २ . . मावोपरिमहानाटक 7 १ २ ३ Y ५ ६ ७ " १३ . . . . . १ . ५४ . ३७ . २० . ३३ . म ५२ ३४ . १६ . १ . १६ प ३२ ५६ १८ ५ ० . ४२ . १ मैं १८ २४ ५५ १२ ४६ १७ ३२ २७ . . . ३९ ३४ Y . १७ ५१ ४ rs ए १३ ४० . गु 1४२४ ५४ • • •••••••• ३३ ३७ . . ५८१ ४५ ४९ ४ ४५ ४. ३१ (१६) पत्रीमार्गप्रदीपिका। अथ राशीनां स्वामिनः । उक्तं च व्यंकटेशेन । भौमाच्छविचन्द्ररविज्ञशुक्रवकेच्यमंदा सुत्तामरेज्याः ॥ मेपादिभानामधिपाः क्रमेण तदंशकानामपि ते भवेयुः ।। १६॥ भापाटील-अब राशियों के स्वामी व्यंकटेश कहते हैं--भौम (मंगल) अच्छ (शुम २)विव (बुध ३) चंद्र (चंद्र४) रवि ( सूर्य ५) ज्ञ (बुध ६) शुक (शुक्र ७) वक्र (भौम ८ ) ईज्य ( गुरु ९) मंद (शनि १० ) अर्कसुत (शनि ११ ) अमरेज्य (गुरु १२) कमसे मेपादिक राशियों के स्वामी जानना, और मेषादिक राशियोंके अंशादिकोंक (द्रेष्काण सप्तमांश नवमांश बादशाश आदिके भी कममे येही स्वामी होते हैं ॥ १६ ॥ अथ नैसर्गमवीमाह विश्वनाथः। इन्द्वीज्यक्षितिजारसीदुतनयो सूर्येन्दुजीवा क्रमा दम्वौ शशिसूर्यभूमितनया ज्ञार्की ज्ञशुको मताः ॥ सूर्यादेः सुद्धदः समाः शशिसुतःसर्वेऽपि मंदास्फुजि- न्मंदाचार्यकुजा शनिः कुजगुरू जीवः परे वैरिणः ॥ १७ ॥ भापाटीका-भव स्थिरमैत्री विश्वनाथ कहते हैं-चंद्र गुरु भौम १ ,सूर्य बुधर,सूर्य घंन गुरु ३, शुक्र सूर्य४,चंद्र सूर्य सौम ५, बुध शनिद,बुध शुक, क्रमसे सूर्या- रिक ग्रहोंके मित्र कहे हैं और बुध , सर्व यह २ ( म० गु० शु० श०) शनि शुक्र ३ गनि गुरु भौम ४, शनि भौम गुरु ६, गुरु ७,कमसे सूर्यादिक महोंके सम कहे हैं शप ( मित्रसमसे बाकी रहे वह ) शत्रु जानना ॥ १७ ॥ १ भ गर्भश्री म 3 गु ३ रचना सूरम प मगु व अथतात्कालिकपंचधामधीसाधनमार-सोमदेवज्ञः। गृहतोऽर्थतृतीय ३ तोय १ सय ११ व्यय १२ संस्थाः सुहृदो नभधराः । इतरालयगा दिपो मुनी न्द्रेरिति तत्कालजमिन 'शनवास्युः ।। १८॥

वारकालिकमैत्रीचत्रम् । . म. श पं. पुरम मित्र म.मं.. र...मं. भापार्यकासहित।। (१७) भापाटीका-अव नात्कालिक पंचधा मैत्रीसाधन सोमदैवज्ञ कहते हैं । जिस ग्रहसे २।३।४।१०।११।१२ वें स्थानमें जो ग्रह स्थित होवे वह मित्र जानना शेष १।५।६।७८९ स्थानमें गये हुवे ग्रह शत्रु जानना इसप्रकार मुनीलोगोंने . तात्कालिक मित्र शत्रु कहें हैं ॥ १८ ॥ उदाहरण । सूर्यसे २ भौम ११शनि १२ शुक्र स्थित हैं इसकारण ये सूर्यके मित्र हुचे और 1 बुध ६ गुरु ८ चंद्रमा स्थित हैं ये सूर्यके शत्रु हुवे इसीप्रकार चंद्रादि सर्व ग्रहोंके तात्कालिक मित्र शत्रु जानना इति । अधिमित्रसमत्वमेति मित्रं समखेटस्तु सुदिपुत्वमेति ॥ रिपुरेति समाधिशत्रुभावं खलु तत्कालजमित्रशवभावात् ॥ १९॥ भापाटीका-सर्गमैत्रीका मित्र ग्रह तात्कालिक मैत्रीमें मित्र होवे तो अधिमित्र और शत्रु होवे तो समत्वभावको प्राप्त होता है (मित्रमित्र अधिमित्र मित्रशत्रु सम होताहै) और नैसर्गमैत्रीका समग्रह तात्कालिक मैत्रीमें मित्र होये तो मित्र शत्रु होवे तो शत्रुभावको प्रामहोताहै ( समभित्र--मित्र समशत्रु-शत्रु होताहै ) एवं नैसर्ग मैत्रीका शत्रुग्रह तात्कालिकमैत्री में मित्रहोवे तो सम और शत्रु होवे तो अधिशत्रु- भावको प्राप्तहोताहै ( शत्रुमित्र-समशत्रु शत्रु-अधिशत्रु होताहै ) ॥ १९ ॥ उदाहरण। यहाँ नैसर्गमैत्री सूर्यके चंद्र गुरु मित्र हैं ये चंद्र गुरु तात्कालिक मैत्रीमें सूर्यके शत्रु हैं अतः चंद्र गुरु पंचधामैत्री में सूर्यके सम हुवे | ग. एवं नैसर्गमैत्रीमें भौम सूर्यका मित्रहै तात्कालिक मैत्रीमें भी मित्र है इस लिये भौम सूर्यके अधिमित्र हुआ पंचधामैत्रीमें; और नैसर्गमैत्रीमें सूर्यके युध सम है यह बुध तात्कालिकमैत्रीम सूर्यके शत्रु हैं अतः शत्रुतावको बुध पात 6 भ. अथ पन्ध मधीपत्रम्। में. ३. गु. पु. . अ मै. प. में . . मिष र. . म. ग. . ग. प. . त्रु वि क २ (१८) पत्रीमार्गप्रदीपिका। दुवा-इसीप्रकार नैसर्गमैत्री में सूर्यके शुक, शनि शत्रु हैं ये तात्कालिक मैत्रीमें मित्र हैं इसलिये सूर्यके शनि, शुक्र पंचधा मैत्रीमें सम हुवे ऐसेही शेप ग्रहोंके भषिमित्रादि जानना इति. अथ पगसाधनमाह केशवः । भेशो ऽथाकॅन्दुहोरे भयुजियुजि शशिननयोः स्वात्मजांक- आशारुयंशा नवांशा अजमकरतुलाफर्कितोकोशकाः स्वात् ।। भोमार्कीज्यज्ञशुक्रा भयुनि शर५ शरा५ या ८ द्रि पंचां ५ शनाथा- स्त्रिंशा युग्मे विलोमाः क्रमवलिन इमे पशुभ सयुगोर्चः॥२०॥इति। भापाटीफा--अब केशवदैवज्ञका कहाहुवा पगसाधन कहते हैं । राशियोंके स्वामी प्रथमश्लोक१६में कहेहे वे जानना. तदनंतर विषमराशीमें प्रथम विभागमें सूर्यकी, विनीयविभागमें चंद्रकी होरा जानना और सम राशीके प्रथम विभागमें पंरकी, दूसरे विशागमें सूर्यको होरा जानना, प्रथम १ पंचम ५ नवम ९ राशीके स्वामी द्रेष्काणके स्वामी होतेहैं। यह प्रथमच विभागमें १० अंशमें) होवे तो अपनी राशीका स्वामी ट्रेष्काणका स्वामी जाना-और यह दूमरे विभागमें ( १० अंशसे अधिक २० अंशपर्यंत--) होवे तो यह जिस राशीका हो उस राशीसे पांचवी राशीका स्वामी नेप्काणका सागी होताहै एवं यह तृतीय द्रेष्काणमें (२० अंशसे अधिक ३० अंशपर्यंत) होवे तो यह जिस राशीका हो उस राशीसे ९ नवमराशीका स्वामी देकाणका स्सामी भानना) मेप मकर! • तुला और कर्कट से नरांश जानना अर्थात् यह मेपका हो तो मेपराशीसे वृपमराशीका हो तो मकरसाशीसे मिथुन राशीका हो तो तुलाराशीसे कर्कराशीका होतो कर्कराशीसे इसी प्रकार सिंहादि सर्व राशीयों- में जितनी संरण्याके नवांशविभागमें यह होवे उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो पाराका एमः रिमाग १५पा भंशका होता। २एक दाना भाग १. अंशका होताद ५ति भएनपमे हिम्को नाशकार एव नांश विमाग अपराका दोता है। ५.11 च THANE भापाटीकासहिता । राशी आये उसका स्वामी नवांशका स्वामी होता है | मैप |मकर ! तुटा द्वादशांशके स्वामी अपनी राशीसे जानना(यह जिस राशी- क ८ विभागमें ग्रह होवे उतनी संख्यापर्यंत गिनने से जो राशी आवे उसका स्वामी हादशांशका स्वामी होता है) ॥ और विपमराशीमें ५। ५। ८१७१५ . इन अंशॉके मंगल, शनी, गुरु, बुध, शुक्र, कमसे त्रिंशांशके स्वामी कहेंहैं अर्थात विषम राशीमें ५ अंशपर्यंत भौम विंशांशका स्वामी मानना ऐसेही इन ५ अंशोंके आगेके ५ अंशका स्वामी शनी इसके आगे ८ अंश- - मारामानिमाग। नवाविभाग। १३.३ ७८ 1३१६२ २०४०/-४० १७२.७० का स्वामी गुरु फिर इनके आगेके ७ अंशका स्वामी बुध इसके आगेके ५ अंशका स्वामी शुक निशांशका स्वामी जानना. और समराशीमें उक्त त्रिशांराके स्वामी विलोम ( उलटे ) कहे हैं ( ५ शु० ७ यु० ८ गु० ५ श० ५० ) ये छही वर्ग कमसे उत्तरोनर बलवान् जानना ( महसे होरा बलवान होरासे द्रेष्काण द्रेष्काणसे नवांश नयांशसे द्वादशांश द्वादशांशसे त्रिंशांश अधिक बलवान् । जानना ) चार ४ से अधिक वर्ग शुभमहके आवे तो शुभ समाना ॥ २०॥ ...माझी मासमराम ५/५/५/ भष अप सप्तवर्गसाधनमा । नाशपास्त्वोजगृहे तदीशाधुग्मे ग्रहे सप्तमगशिपाच ॥ पूर्वोक्तवर्गः सहितो नांशः स्युः सप्तवर्गा मुनिभिः प्रदिष्टाः॥२३॥ भाषाटीका-अप समवर्गसाधन कहते हा विषमराशीमें अपनी राशीके सामीसे मनमांराके स्वामी मानना भऔर समराशी में अपनी राशीस सप्तमी (सातवीं 1. तीस अंशक भागा दाग करते हैं एक नरिमाण भाई अंशमा होता है।

- (२०) पत्रीमार्गप्रदीपिका। राशी) के स्वामीसे सप्तमांशके स्वामी जानना ॥ (ग्रह विपम राशीका हो तो जिस राशीका है उसी राशीसे और समराशीका हो तो जिसराशीका यह होवे उस राशीसे जो सातमी राशी है उससे जितनी संख्याके सप्तमा विभागमें ग्रह स्थित होवें उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशी आवे उस्का स्वामी सप्तमांशका स्वामी समझना ) पूर्वोत्तरडगोंमें ये सममांशयुक्त करनेसे समवर्ग होते हैं ऐसा मुनिलोकोंने कहा है ॥ २१ ॥ उदाहरण। सूर्य १०।१६।५३१३९ यह कुंधराशीका है इसका स्वामी शनि गृहका स्वामी हुवा-होरा-सूर्य, होराके दूसरे विभागमें है और विपमराशीका है इस कारण सूर्यकी होराका स्वामी चंद हुवा-द्रेष्काण--सूर्य दूसरे देष्काणविभागमें है इसलिये सूर्यकी राशी ११ कुंभसे पांचमी राशी ३ मिथुनका स्वामी बुध भाया ये द्रेष्काणका स्वामी,झुवा. सप्तमांश-सूर्य विपम राशीका है और सप्तमांश- विभागमें ये चार ४ संख्याक विभागमें हैं अतः सूर्यकी राशी ११ कुंमसे चार पर्यंत गिननेसे चौथी राशी २ वृपा आई इसका स्वामी शुक्र सप्तमांशका स्वामी हुवा-नवांश-सूर्य ६ छह संख्या के नवांशविनागमें है और कुंभराशीका है अतः तुलराशीसे ६ छह संख्यातक गिननेसे १२ मीन राशी आई इस्का स्वामी गुरु है यह सूर्यके नवांशका स्वामी हुवा-दादशांश-सूर्य ७ सानसंख्याके द्वादशांरा- विभागमें है इसलिये अपनी राशी कुंभसे गिननेसे सातमी ७ राशी ५ सिंह आई इस्का स्वामी सूर्य द्वादशांशका स्वामी हुचा त्रिंशांश-सूर्य विपमराशीका है और १६ अंशका है इसलिये विंशाश विज्ञागमें तीसरेटअंशके विभागमें है इसकारण विषमराशीके तीसरे विभागका स्वामी गुरु सूर्पके त्रिंशांशका स्वामी हुवा-इसीप्रकार शेप चंद्रारि सर्वग्रहोंके सप्तवर्ग जानना. इति. १ एक सप्तमाश विभाग ४ अंश १७ फळाका होताहै। सप्तमात्रषिमाग १२.७२५३० १४/५/५va..

भापाटीकासहिता । (२११ अय महाला समवर्गपकम। प म ह प्र घु २१४११००१मु १.4 स स स मि उभि मि ४चारच [४च ४१४५ स स थि स स व उमि स स स नि मि गु६ नगमाग स स इमि मिमि ४च मि मि धर्म म ८म मि स भ " स्व ऽमि द्वादमाश म स विशाल १.र प स प वेश ऽभि ५ ४ ३ ६ ५ ५ शुभयाग पापयोग ४ १ २ २ ४ विनापरिश्रम शीघ्र सुगमरीतिसे सप्तपर्गज्ञान होने के लिये आगे समर्म- सारणीचक मेपादि राशियोंके लिखे हैं- उनमें ग्रह जिस राशीका होवे उस राशीके कोष्टकमें जितने अंशका होवे उतने अंशके नीचे पंक्तिमें जो समवर्गके स्वामी राशीसहित लिखे हैं वे उस महके साम- वर्गके स्वामी होगे और पष्टयंशका स्वामी भी उसीके नीचे पंक्मेिं लिसाहै वह जानना ॥ उदाहरण। जैसे यहां सूर्य १०।१६।५३।३९ है इसलिये कुंभ राशीके कोष्टकमें १७ अंशके नीचे पंक्निमें लिखे सप्तवर्गके स्वामी और पष्टशका स्वामी आये। गृ. प. हो. प. दे. प. स. ए. न. प. दा. प.नि.प. प. प. ११श ४ ३ ३ २ शु १२गु ५९ ९ १८ ८ मं.

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भापादीकासहिता । भापाटीका-अव गुरुका अष्टवर्ग कहते हैं । गुरु अपने स्थानसे २।११। ८१३।३।४।७ । १० में स्थान में शुक्रसें २।९ ।१०।११। ६।५ लमसे१।४। ७ । १०।१११५।६।२। ९ भौमसे २ । ८1१।४। ७।१०।१7 चंद्ररो ७ । २।९।५।११ सूर्यसे ३।९।८।१३।। ४ । ७ । १० । २ बुधसे ९।५।२।१३।१०।१।४ । ६ शनिसे ३ ॥ १२। ५१६ स्थानमें शुभफल देताहै । इन स्थानोंम रेखादेना गुरुका अष्टवर्ग होये ॥ २६॥ भथ पुधस्याटयगांजाः ५४. भय गुरोरवर्गाकाः ५६. रचे मशर.चमबु गु शु श ल. ५६११/२०१२ ११८७६१२/४ अथ शुक्रस्याष्टवर्गमाही खास्तान्त्याऽहितपर्जितेपु-तनुतः शुको विनास्तारिखं चन्द्रात्स्वान्मदनव्ययारिरहितेष्वकर्काव्ययाप्टाप्तिषु ॥ मन्दाब्येकरिपुव्ययास्तरहितेप्वीज्यानवायाप्टधी- खेज्ञात्कोणभयत्रिपस भवधीत्र्यन्त्यारिधर्मे कुजात् ॥ २७ ॥ भापाटीका |-अय शुक्रका अष्टवर्ग कहते हैं। शुक्र-लम १० १७११२।६ स्थान विना और स्थानमें ( १ । २ । ३ । ४ । ५१८९/११) शुफल देता है-और शुक्रसे ७ । ५। १० में स्थानविना अन्य स्थानमें ( १।२।३। ४।५।८।९।११।१२) चन्द्रले ७ । १२१६ स्थान बिना अन्य स्थानमें ( 1 । २।३।४।५।१९।३०1११) सूर्य से १२॥ ८॥ ११ स्थानमें शनिले २ । १ । ६ । १२ । ७ में स्थानदिना शेप स्थानमें (३1४।५।८।९।१ । ११ ) गुरुसे १ । ११।८।५।१० ४ पत्रीमार्गप्रदीपिका। में बुधसे ९ । ५। १३ । ३।६ मंगलसे १३ । ५। ३ । १२।६१९ स्थानमें शुभफल देता है। इन शुभफलद स्थानोंमें रेखा देना शुक्रका अष्ट- पर्ग होये ॥ २७ ॥ अथ मंदस्याष्टवर्गमाह । स्वान्दस्त्रिपडायधीपु रवितोष्टायादिकेन्द्र शुभो भौमात्खायपहन्त्यधीत्रिपु तनोः खायाम्बुपट्ट्येकगः ॥ ज्ञादापारिनवांत्यखाष्टसु भृगोरन्त्यायपट्रसंस्थित- श्चन्द्रादापरिपुत्रिगःसुरगुरोरन्त्यायधीशत्रुगः ॥२८॥ भाषाटीका-अब शनिका अष्टवर्ग कहते हैं। शनि अपनी राशीस ३।६।११ ५ त्याग सुसे ८ । ११ । २ । १ । ४ । ७ । १० में भौमसे १०।११। ८1१२। ५ । ३ लनसे १० । १३ । ४।६ । ३ । १ बुधसे ११।६। ९ । १२ । १०1८ शुक्रसे १२ । ११ । ६ चन्द्रगे ११ । ६ । ३ गुरुसे ११।११।५।६ स्थानमें शुभफल देताहै । इन स्थानों में रेखा देना अन्यत्र बिंदु देना गनिका भवर्ग होये ॥ २८ ॥ शुवस्यष्टवाद' ५२ अथ शरया ९ शुचिम मुश ६ 123 0. ONFE Our ramprs १२३ शंतुह राम काशादि बन्योमें कमाष्टवर्गमी विरोप कहा है ।

भापाटीकासहिता ।
20306
.
भय लमस्याष्टकाः ४९.
शस्ट
र चम
३ ३
६
१० ६
१
३
३
३
१
३
४
६
-१
११
स्थानानि यान्युक्तानि तेषु रेखा अन्यत्र विन्दुः ॥२९॥
इति रेखाटकम् ।
भापाटीका --प्रथम जिसग्रहका अष्टवर्ग करना हो वह ग्रह जिसराशीम स्थित हो
उस राशीको आदिले जन्मकुंडली ग्रहसहित लिखना तदनंतर अपने अपने अष्ट-
वर्ग जो जो स्थान शुभफलपद कहे हैं उन उन स्थानों में रेखा लिखना अन्य
स्थानोंमें बिंदु (शून्य ) लिखना-इममकार सूर्यसे लगपर्यंत आठही ग्रहों के
अष्टवर्ग बनाना फेर बाराही राशियोंकी अब्दवर्गकी रेपाका योग पृथक् पृषक
करके अपनी अपनी रेखाका योग कुण्डलीम लिखना नो समुदायाप्टवर्ग हो
नदनंतर इस समुदायाष्टवर्गमे मीन मेप वृपा मिथुन राशीमें जितनी जिननी रेखा
होवे उन सर्व रेखाका योग करना ये योग १२० एक सौ बीससे अधिक आवे
तो प्रथम वयमें मौल्यार्थ विशेप प्राप्त होगा-एवं कर्क सिंह कन्या तुला राशीकी
सर्व रेसाका योग १२० एक सौ पीससे अधिक आये तो तरुण अवस्या सुख
मर्यपानि आदि विशेप होगा-इतीमकार वृश्चिक धन मकर कुंग राशियोंकी
सर्व रेसाला योग१२० एक सौ बीसमे अधिक आवे तो उत्तर वयमें सुस अर्थ-
प्राति आदि शुभफल विशप होगा और १२० एक सौ बीससे अल्परेखेश्य
जिस अक्त्या में आये उम अवस्था मध्यम फल होगा ऐना जानना ॥ २९ ॥
१ शंभुदोरामकाश-मोनायं मधुनांनऊ मयमा मान यपः माननः फर्यायं निनात
तरणतासाश मध्य दुधैः ॥ कुंभात स्पतिरातच पनि रही गुतं नमोपानविशेष
कटतेने विशेपासुभम् ॥ ११ ॥

(५२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। है उदाहरण। सूर्यरेखाटक करनाहै-यहाँ सूर्य कुमराशीका है अतएव कुंशराशीको आदिले जन्मकुंडली ग्रहसहित लिखके श्लोक २२ के अनुसार शुभफलपद स्थानोंमें रेसा अन्यस्थानोंमें शून्य लिखी सर्वरेसाका योग किया ४८ हुवा ये सूर्यका अष्टवर्ग हुवा इसी प्रकार शेप ग्रहोंके अष्टवर्ग जानना ॥ रेखाटकचक्रम् शधुलाम १/२३||५/६/७/८/९/१०२४१२ सूर्याष्टवर्गक्य ४८ ३२६४२१३/५/६७/३/२/५/४८ ६.५|४|५३||१६| ३४३ : ... Limel nua . A... ... गु | .. /us Bansan ५७.५४|२७|५|३/६४५६ श. ३/४/३१/३/२/३/६/५/३/२/३. ३६४/३/३/६/५/५/४६४९ ४३५ १५३10000३५४२३२२९३/३० माग समुदायाप्टवर्ग उदाहरण । जैसे मेपराशीके सूर्याष्टवर्गमें रेखा ३ चंद्राष्टवर्गमें ६ भौमाष्टवर्गमें बुधाष्टवर्गमें ५ गुरुके अष्टवर्गमें ५ शुक्राष्टवर्गमें शनिके अष्टवर्गमें २ लगाष्टवर्गमें रेखा ३ हैं इन आठही वौकी मेपराशीको रेखाका योग किया ३४ हुवे इसीप्रकार वाराही राशियोंके अष्टवर्गकी रेखाका योग किया इसको समुदायाष्टवर्ग जानमा इस समु. दायाष्टवर्गमें मीनराशीमें रेखा ३० मेपमें ३४ वृपसमें ३२ मिथुनमें ३५ रेखा है इनका योग किया १३, आये ये १२० से अधिक, अतः प्रथमवय- में सुतार्थ वृदयादिश्रेष्ठ फल होगा एवं कर्कमें ३३ सिंहमें २२ कन्यामें जापाटीकासहिता . तुलामें ३४ रेखा है इनका योग ११४ आया ये १२० से अल्प हैं इस- लिये मध्यवयमें मध्यम फल होगा-इसीप्रकार वृश्चिक ३८ धन ३९ मकर २९ कुंभ३१ राशीयोंकी रेखाका योग १४ आया ये १२० से अधिक हैं इसलिये अन्त्य क्यमें सौख्यार्थप्राप्त्यादि श्रेष्ठ फल होगा. ऐसा सर्वमें जानना। इति रेखाष्टकम् । समुदायाटवर्मकुंडली. न ३) ८ 1080 २९ १ ३४ ४ ६ २७ ३- शुभाशुभ पालकम. साधावस्था मध्यावस्था अत्यापाथा ११४ १४१ धेष्ठ. मध्यम श्रा अथ रश्मिसाधनमाह। सत्रिभ सायनार्क सूर्यस्य व्यकेंन्दुचन्द्रस्य मध्यस्पष्टयोर्यों- गाई चलोचे हानं भौमादिकानां चेप्टाकेंद्रम् ॥ तद्रसोर्ध्व- मिनभाच्छुईशेपः सैकं अंशाद्या द्विना चेप्टारश्मिः॥३०॥ भापाटीका-अब रश्मिसाधन कहते हैं।अयनांशयुक्त किये हुवे स्पष्टसूर्यमें तीन राशी युक्त करना सूर्पका चेष्टाकेंद्र होवे और सष्टचंद्रमसे स्पष्टसूर्य हीन करनेसे चंदका चेष्टाकेन्द्र होता है और भौमादिक (भौम.बुध.गुरु. शुक शनि.) मध्यम महका और स्पष्टप्रहका योग करके अर्थ (आधे) करना और अपने अपने चलो- (शीमोच्च ) मसे हीन करना ( सोधना । सो भौमादि पंचताराग्रहोंका चेष्टाके- १ सोमदेवः ॥ मध्यमार्कसहित चटर्फेद स्याटुषस्य च सितस्य चटीचमामेदिमीतनपनीरश- नानां मध्यमार्फ उदितं तु पटाचम् ॥ १॥ बुध शुरम मध्यम शाम कदमें मध्यम मुर्पको मिल मे सुप शुक्लका शाम्रोच होता है और मंगल गुरु दानीका मप्पम सूर्य शीपोच होता है।

पत्रीमार्गप्रदीपिका।
न्द्र होवे. वह चेष्टाकेन्द्र ६ छराशीसे अधिक होये नो१२वारा राशीमेंसे शोधना
( निकालना ) शेष बचे उसकी राशीमें एक मिलाना और अंशादिकको द्विगुण
करना चेष्टारश्मीहोवै ॥ ३० ॥
अथ ग्रहाणामुञ्चनीचराशीनाह ।
सूर्यात्स्युरुचाः क्रियागो २ मृग१० स्त्री काऽन्त्य१२जूका
दशभि १० हुँताशः ३॥ गजावि २८ भिर्वाणकुभिः १५ शरे ५
भैर खै २० लवैरस्तगतास्तु नीचाः ॥ ३१ ॥
भापायीका -अब ग्रहोंकी उचनीच राशिये कहते हैं । मेप-राशीके १०
अंशपर्यन्त( सूर्य)वृषभ राशीके ३अंशपर्यन्त(चंद्र) मकर९ राशीके २८ अंशपर्यन्त
(भौम ) कन्याराशीके १५ अंशपर्यन्त (बुध ) कर्क ३ राशीके ५ अंशपर्यन्त
(गुरु ) मीन ११ राशिके २७ अंशपर्यन्त (शुक्र ) तुला ६ राशिके २० अंश
पर्यन्त ( शनि ) सूर्यको आदिले यह क्रमसे उच्चराशियोंके होते हैं और अपनी
उच्चराशीसे सातमी राशीमें गये हुये नीचके होतेहैं ॥ ३१ ॥
उच्चनीचताशयकर
१
र
श
०
१०३.
९
३
२८ १५५
३ १११९
.
१०३
२७' २०
उच्चराग
परमोबअंश.
नीचराशि.
२८. १५५
परमनीचअंश.
अथ उच्चरश्मिसाधनमाह ।
ग्रहनीचांतरङ्कार्य पड्भादूनं यथातथा।।
द्विनाशादिः सरूपंभमुच्चगश्मिरयं स्मृतः ॥ ३२ ॥
भाषाटीका [-अब उच्च रश्मि करनेकी रीति कहते हैं जैसे छह राशीसे अल्परोप
रहते हो वैसे ही यह और नीचके अंतर करना ( ग्रहोंसे नीच होनकरनेसे ६ से
अल्परहे तो बहमेंसे नीच हीन करना और यदि नीचमेंसे ग्रह हीन करनेसे६ राशि
से अल्परोष रहते हो तो नीचमेसे ग्रहको हीन करना) शेप बचे राश्यादिककीं
राशीके अंकमें एक मिलाना अंशादिकको द्विगुण करना उच्चरश्मि होवे॥३२॥

भापाटीकासहिता। अथ स्पष्टरश्मिसाधनमाह। चेप्टोचरश्मियोगाई स्फुटरश्मिः प्रकीत्यते ।। नखोनक्ये दरिद्रीस्वादिशोर्वसम्पदन्वितः ॥३३॥ भाषाटीका-अब सप्टरश्मिसाधन कहते हैं । चेष्टारश्मि और उच्चरश्मि कायोम करके अर्थ ( आशा ) करना आवे वह स्पष्टरश्मि कहातीहै. उसस्पष्टरश्मिका ऐक्य २० वीससे अल्प आये तो दरिद्री होवे और २० वीससे अधिक आवे तो सम्पदावान् होवे ॥ ३३ ॥ इति रश्मिसाधनम्। उदाहरण। सूर्य स्पष्ट १० । १६ । ५३ । ३९ में अयनांश २२ । २९ । • युक्तपरते ११।९। २२ । ३९ सायन सूर्य हुवा इसकी राशि ३ तीन युक्त किये २॥ ९ । २२ । ३९ ये सूर्यका चेष्टाकेन्द्र हुचा एवं चंद्र स्पष्ट ५। २९ । १९ । ४९ मेंसे स्पष्ट सूर्य १०।१६।५३ । ३९ हीन किया ७।१२। २६ । १० ये च- द्रका चेष्टाकेंद्र हुवा. भौममध्यम ११ ।१२।३९। ४८ भौमस्पष्ट ३३।६।१४। ५४ का योग २२।१८।५४ । ४२ हुवा इसको अर्धकिया ११।९।२७। २१ हुवा इसको भौमके चलोच (मध्यमसूर्य ) ३०।१५। ३।२१ मेंसे हीन कि या शेप ११।५।३६१० जौमका चेष्टाकेंद्र हवा एवं युधके मध्यमस्सष्टके योगके अर्थ १० ११२।५३।४९ को बुधके चलोच्च (बुधशीघद ११॥२३॥ ३१॥ ९ में मध्यम सूर्य ३ ०।१५। ३१२१ को मिलाया १०1८।३४।३० ये बुध- काशीघोच्च हुवा ) १०1८।३४।३० मेंसे हीनकिया ११ १२५१४० १४१ बुधका चेष्टाकेंद्र हुवा-इसीप्रकार शेपग्रहोंका चेष्टाकेंद्र जानना सूर्यके चेष्टाकेंद्र२ ९/२२॥३९ में १ राशी युक्तकरके अंशादिकोंको द्विगुणकिये ३११८१४५१८ सूर्यकी चेष्टारश्मि आई चंद्रका चेष्टाकेंद्र ।।२।२६।३० छह राशीसे अधिक है अतएव १० घरा राशीम से शोधा शेष ४ ॥१७॥३३ १५० हुवे इसीराशी । में मिलाया अंशादिकाँको द्विगुणकिये ५। ३५१७१४० चंद्रकी चेष्टारश्मि आई एवं भौमादिक ग्रहोंकी चेष्टारश्मि समझना ॥ इति ।

पत्रीमार्गप्रदीपिका। ८ उचरश्मिसाधन उदाहरण. अथ चेष्टारहिमचक्रम् । गूर्य १० । १६। ५३ । ३९ सूर्य- सू.च.म.बु. ग...श. की नीचराशी ६ । १० । ० । ० सूर्य- १२.१५ २ १५/२२ मध्यम मेंसे नीचको हीन करनेसे ६ छहराशीसे ६९३४०३४४ महाः अल्पशेष बचता है इसवास्ते सूर्यमेंसे नी- चको हीन किया ४।६।५३ । ३९ ६१०० १२/२४ सप्ट १४२४४३/२६४८/ ग्रह. इसकी राशी ४ में एक मिलाया अंशादि .४१८१ ८२३ कोंको दोगुणे किये ५। ३३।४७१३८ २२/२०६.१९५७ १८/२५/३०७/१८ सूर्यको उदरश्मि हुई इसीपकार शेष- योग. ग्रहोंकी उच्चरश्मि जानना । ४२/३९/२/२९/९ (२०३९८ मध्य ९|१२|१/२८/२४ स्पर २७/५३४१४४१६ | योगार्ध. २१/४९:१/४४३४ मव्य स्पष्ट चलोच. "३०/२१/२२१ २ ९/१२/५/२५/१३/२२२० । २२/२६ |४०२१२१४६ केन्द्र. ३९१०.४५०११८४७ ३ ५८३५४८/८/३/१५/४१] चेष्टा १५/७५८३८११६/१७/३३रश्मि. १८४० ३८२०२४३४] .

जापाटीकासहिना । स्पष्टरश्मि उदाहरण. उच्चरीश्मचक्रम् । सूर्यकी चेष्टारश्मि ३ । १८ । ४५ । चम |बु गु शु श , १८ सूर्यको उच्चरश्मि ५। १३ । ४७ ॥ १८ का योग किया ८।३२। ३२ । ४७/२०/३०/११/२६/५२/२३ ३६ हुवे इसको आगाकिया ४ । १६ । १६ । १८ आये ये सूर्यको पटरश्मि आई इसीप्रकार शेपमहाँको सटररिम जानना. स्पष्टरश्मिका योग २० से अधिक है इसकारण संपदावान् होगा ऐसा फल ममझना ॥ इनि रश्मिसाधनम् ॥ ५२ ६ ४ ४ १३/७/४३८५१३०/५० १८017२२४० अथ स्पष्टरश्मिचक्रम् । नम गुश |ए ३ ३ १६.५१/४६ ३८/१२/५३ ४५/२३ १९/१४/१३५२१ ४ ५८ ३८ १८१ ६/१/११/५०.२५१५१ अथायुयानयनमाह। कलिकृत्यग्रहं तत्र द्विशताप्तेर्कशेपकाः॥ समाः शेपातु मासाद्याद्वादशादिहतैः क्रमात् ॥ ३४ ॥ भापाटीका--अब आयुर्दाय आनयनकी रीति कहतेहैं।ग्रहकी कैलो करके उसमें २०० दोसौका भागदेना लन्ध आवे उसके १२ बाराका भागदेना शेष बचे वह वर्प जानना.तदनतर कलाके दोसोका नाग देनसे जो शेष बचेहैं उनको कमसे १२। ३० । ६० गुणाकरके २००दोसौंका भागदेनेसे लब्ध आवे वे मासादिक जानना अर्थात् शेषको प्रथम १२ बारागुणाकरना २०० का भाग देना लब्ध आये वह मास जानना शेष बचे उनको ३० तीस गुणाकरना२०० का भागदेना लब्ध दि- न आवे फेर शेप बचे उनको६० साठगुणाकरना२०० का भागदेनां लम्भ घटी भावे शेषको फेर ६० साउगुणाकरना २०० का भागदेना लब्ध पल आये ऐसे राशिको ३०तीसगुणीकरके अशमिटाना फर उसको६०साठगुणाकरके क्यामिलाने से होता।

. पत्रीमार्गमदीपिका। कमसे आवे जो वर्षमासादिक वह यहकी वर्ष मास दिन घटी पल विपलात्मक मध्यायु समझना ॥ ३४ ॥ इसमकार लमसहित सूर्यादिग्रहोंकी मध्यायुसाधन' करके स्पष्टायुसाधनके संस्कार आगे कहते हैं। स्थिरारिभे हरेभ्यशं वक्रचारं विना ग्रहः ॥ शुकार्कजान्यस्त्वस्तस्य अई नीचसंगे दलम् ॥ ३५ ॥ भापाटीका-वक्रगति यहके विना जो ग्रह स्थिरमैत्रीमें (नैरार्ग मैत्रीमें) शत्रु- राशिका होवे उस ग्रहकी आई हुई वर्षादि आयुमेंसे तृतीयांश ( अपना तीसरा हिस्सा) हीन करगा और शुक्र शनिके विना अन्य (दुसरा) ग्रह अलका होये तो उसकी आयुको आधी करना नीच राशीका ग्रह होवे तो उसकी आई हुई आयुका दल (अर्थ) करना ॥ ३५ ॥ बक्रोचगे तत्रिगुणं द्विनिम्नं वर्गोत्तमस्वांशकभत्रिभागे ॥ द्विविघ्नतायां त्रिगुणं सकृद्ध द्विबीलवोने दिलवोनमायुः ॥ ३६ ॥ भापाटीका-वक्रगति ग्रह होवे या उच्चराशीका हो तो उस ग्रहकी वर्पादि आयुको त्रिगुण (३ तीनगुणी) करना और वर्गोत्तमी होवे वा स्वनवांशका होवे वा स्पराशीका होवे वा स्वद्रेष्काणक्षा ग्रह होये तो आईहुई वर्षादि आयुको द्विगुण (दोगुणी ) करना और यदि जिस ग्रहकी वर्षादि आयुको द्विगुण करमेका और त्रिगुण करनेका दोनुं योग आवे तो उस ग्रहकी आयुको पृथक् पृथक् २ दोगुणी और ३ तीनगुणी नहीं करना केवल १एकही वार त्रिगुण (तीनगुणी ) करना एवं यद्दकी वर्षादि आयुमेंसे द्वितीयांश और तृतीयांश दोन घटाने के योग आवे तो वर्षादिक आयुमेंसे केवल एकही चार द्वितीयांश ( अपना अर्धभाग ) हीन करना ॥ ३६॥ वामं व्ययात् सर्वदलत्रिपादं पंचाङ्गभागानशुभा हरन्ति ॥ संतोद्धमद्धे सवलम्बहूनामेकर्शगानामिति सत्यवाक्यम् ॥ ३७॥ भापाटीका-मसे बारमे १२ स्थानको आदि ले सप्तम स्थानपयन्त उलटे १ भाग शोक ३९ में कहा है-अथवा-निस राशीका ग्रह होवे उसी राशीका नवमि आवे बसे दर्गोत्तमी जानना। .

जापाटीकासहिता। (६१) स्वामीगुरुज्ञवीक्षितयुताहोरावलोत्कटा भवति ॥ ११ ॥ भापाटीका |-अब लग्नका पल कहते हैं।लन अपने स्वीमीसे अथवा बुधगुरुसे युक्त होये वा दृष्ट हो तो बलवान होता है॥४१॥लोमशोक्तसमवर्गवलसारणीच- क्रसमाप्तिम दिया है उससेमी ग्रहोंका सप्तवर्ग बल जानना ॥ इत्पायुर्दापः ॥ उदाहरण. मर्य १० । १६।५३ । ३९ । की कला १९०११३ । ३९ में २०० दो सौंका भार दिया लब्ध ९५ आये इनमें १२ वारेका नाम दिया शेप ११ रहे ये वर्ष हुये कलाके २०० का भाग देनमे शेष १३ । ३९ बचे इनको १२ बारागुणे किये १६३ । ४८ हुवे इनमें २०० भाग दिया लब्ध • शून्य मास भाये शेष १६३ । ४८ को ३० तीसगुणे ४९१४ । फेर २०० का भाग दिया लब्ध २४ दिन आये शेप ११४। बचे इनको ६० साठ. गुणे किये ५८४० । ० हुवे इन्में २०० का भाग दिया लब्ध ३४ घटी आई कन्यायो युधस्य तुङ्गांशकैः सदा चिरयम् ॥२॥ परतरित्रकोणनातं पथभिनः स्वराशिनं परतः।। दशभिर्भाग वस्प त्रिकोणं धनुषि तत्परं सगृहम् ॥ ३ ॥ शुकस्य न तिथयोशीप्रकोणमपरं स्वभं तुलायां तु ।। फुम्भे त्रिकोणं स्वगृहे रपिनस्य रव्यथा सिंह ॥ ॥ इति-सूर्य सिदराशीके २० वीस पंचपर्यंत मूलत्रिकोपका २० अंशके उपरांत शेष १५ वंशमें स्वरही होता है गन्द्र वृपभो तीन ३ अंशपर्पत उसफा ३ तीन अंशके नंतर शेष भंश मूलत्रिकोषका होता है, भीम मेपराशीफे १२ अंगपर्यंत मूत्रिकोणफा १२ से नंतर शेष अंशमें स्वराशीफा होता है, मुष कम्याराशीफे१५ पदरा अंशपर्यंत उबका १५ पंदरा अंश नंतर ५ पांच अंशपर्पत मूलनिसकोणता ५पांच अंश नंतर शेष भंश (२० अंशके नंतर) साशीका होता है,गुरु धनराशी अंश- पर्यंत मूछविकोणमा १० दश अंशके नंतर शेष अंशमें सराशीका होता है एवं शुग तुला राशीके १५ मंगपर्यंत मूलत्रिकोषका १५ पंदरा अशके नंतर शेप अंशम विरागीफा होता है शनि कुंभरा राशी २० योस भंगपर्यंत मूत्रत्रिकोणराशीका २० अंग मंतर शेष 10 अंशम स्वीका मानना-इति। ० मं E व. म पू ध. ८ रायः . १० ४ . उ.१५ १०'गा स्व०.२७/११८ अभ्या५५० ग (६०) पत्रीमार्गप्रदीपिका। हीन करनेका पूर्व कहा है वह हीन करना. शेप ग्रहोंकी आयुमसे उस स्थानका भाग हीन नहीं करना पेसा सत्याचार्यका वचन है ॥ ३७ ॥ लग्ने बलाढये सहितं च वर्पेत्तुल्यालग्नस्य गृहविधेयम् ।। भागादिना भास्करसंगुणेन युक्तं दिनायं भवति स्फुटं तत् ॥३८॥ भापाटीका-लग्न बलवान होवे तो लग्नकी वर्षादि मध्यायुके वर्षके अंकमें लनकी राशीकी संख्याके समान (लग्न राशीका होतो शून्य ९ राशीका होतो ९ नव ऐसे जिस राशीका हो उतनेही ) वर्प युक्त करना और लग्नके अंशादिक (अंशकला विकला ) को १२ वारागुणा करके उसी वर्षादि मध्यायुके दिना- दिकमें युक्त करना सो लमकी स्पष्टायु होवे ॥ ३८ ॥ और लम बलवान् नहीं होवे तो जो मध्यायु आवे वही स्पष्टायु समझना । चरभवनेष्वाचंशाः स्थिरेषु मध्या द्विस्वभावेष्वन्त्याः वर्गोत्तमाः ३९ भापाटीका-अब वर्गोत्तमराशी कहते हैं चर(१।४।१०)राशियोंमे आप (प्रथम ३।२० ) नवांशके अंश स्थिर ( २।५।८३१) राशियोंमें मध्य (पांचमां १६१४० ) नयाँशके अंश द्विस्वभाव ( ३।६।९।१२) राशियोंमें अंत्य ( नवमां ३०१०) नवमांशके अंश वर्गोत्तमांश होते हैं अर्थात् चरराशीका ग्रह प्रथम नपांशमें होवे तो वर्गोचमी होता है एवं स्थिर राशीका यह पांचमें नवांश १६।४० में हो तो वर्गोत्तमांशमें होता है और द्विस्वभाव राशीका ग्रह अंत्य नवांशमें ( २६।४० के उपरान्त ३०० पर्यंत नयम नवांशमें ) होवे वह वर्गाचमांशमें होताह ॥ ३९ ॥ स्वर्वदोत्तमांशस्थाः स्वांशमित्रांशकान्विताः ॥ परिपूर्णवलेयुक्ताः स्वोच्चमूलत्रिकोणगाः॥४०॥ भापाटीका-अब यहाँका बल कहते हैं। स्वराशीमें स्थित, केंद्र(११४।७।१०) स्थानमें स्थित शुभग्रहोंके नवांशमें स्थित, स्वनवांशमें स्थित, मित्रनवांशयुक्त और अपनी उच्चराशी (श्लोक ३१ में कही है) में स्थित और मूलत्रिकोणरा- शीमें स्थित ग्रह परिपूर्ण बलवान होता है ॥ ४० ॥ १ आगे श्लोक ४१ में कहा है। २ सारावल्याम्-विंशतिरंशाः सिंह त्रिकोणमपरे स्वभवनमस्य ॥ तचं भागत्रितयं वृष- इन्दोः स्यात्रिकोणमपरेशाः ॥ १॥ दशभागा मेघे त्रिकोणमपरे स्वभ तु भौमस्य ॥ सचमपों 1 फेर २०० भापाटीकासहिता । स्वामीगुरुज्ञवीक्षितयुताहोराबलोत्कटा भवति ॥ ११ ॥ भापार्टीका-अब लमका बल कहते हैं।लग्न अपने स्वीमीसे अथवा बुधगुरुसे युक्त होवे या दृष्ट होये तो बलवान होता है। ४१ ॥लोमशक्तिसमवर्गवलसारणीच- क्रसमाप्तिम दिया है उससे भी ग्रहोंका सतवर्ग बल जानना ॥ इत्यायुयः ॥ उदाहरण. सूर्य १० । १६।५३ १ ३९ । की कला १९०११३ । ३९ में २०० दो सौंका भाम दिया लब्ध ९५ आये इनमें १२ घारेका नाम दिया शेप ११ रहे ये वर्ष हुये कलाके २०० का भाग देनसे शेष १३ । ३९ बचे इनको १२, बारागुणे किये १६३ । ४८ हुवे इनमें २०० भाग दिया लब्ध • शून्य मास आये शेप १६३ । ४८ को ३० तीसगुणे किये ४९१४ । ० का भाग दिया लब्ध २४ दिन आये शेष ११४। बचे इनको ६० साठ- गुणे किये ५८४० । ० हुवे इन्में २०० का भाग दिया लब्ध ३४ घटी आई कन्यायां बुधस्य तुग शिकैः सदा चित्यम् ॥२॥ परतस्त्रिकोगनातं पश्चभिरंशः स्वराशिनं परतः।। दशभिर्भाग/वस्य त्रिकोणं धनुषि तत्पर सगृहम् ॥ ३ ॥ शुक्रस्य च तिथयाँशत्रिकोणमपरं स्वभं तुलायां तु ।। कुम्भे त्रिकोणं स्वगृहे रविनस्य रवेर्यथा सिंहे ॥ ४ ॥ इति-मूर्य सिंहराशीके २० नीस अंशपर्पत मूलविकोणका २० अंशके उपरांत शेष १० अंशमें स्वगृही होता है नन्द्र वृषभके तीन ३ अंशपर्यत उच्चका ३ तीन अंशके नंतर शेष अंशमे मूलनिकोमका होता है, भौम मेपराशीके १२ अंशपर्पत मूळत्रिकोणका १२ के नंतर शेष अंशमें स्वराशीका होता है, युध कम्याराशीफे १५ पंदरा अंशपर्यंत उच्चका १५ पंदरा अंशके नंतर ५ पांच अंशपर्यंत मूलत्रिकोणका ५ पांच अंशके नंतर शेष अंशमें (२० अंशके नंतर) स्वराशीका होता है,गुरु धनराशीके१० अंश- पर्यंत मूळनिकोणका १० दश अशके नंतर शेष अंशमें स्वराशीका होता है,एवं शुक्र तुला राशीके १५ मंशपर्यत मूलत्रिकोणका १५ पंदरा अशके नंतर शेष अंशमै स्वराशीका होता है शनि कुभरा' राशीले २० वीस अंशपर्यंत मूलत्रिकोणराशीका २० अशके नंतर शेष 10 अंशमे स्वराशीका मानना- इति । ० स्व१०३७ स्वयम.५/१०/ग५२० अंशाः र म मी म ध ५ ४ ८ ६ १० स्व२० स्थ१५/स्थ उ.१५ स्व१० म वा क र ३ २ ० २४ ३४ ५ १० ९ १० २७ २४ ४० १२ १९ ४४ १ ० ८ ५ २० ९ २ २४२४ म.. ० १५/य २७ ५८ दाई ० ० भन्त ध 0 . 0 ० भ (६२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। शेप ४०० बचे इनको फेर ६० साठगुणे किये २४०० १ ० हुवे इनमें २०० का भाग दिया लब्ध १२ पल आई ऐसे ऋमसे ११ । ० १२४॥३४॥ १२ वर्षादि सूर्यकी गध्यायु आई इसीप्रकार शेप चन्द्रादि ग्रहोंकी और लग्नकी वर्षादि आयु जानना-अब इसमें श्लोक ३५ के अनुसार सूर्य स्थिरमैत्रीमें शत्रु- की राशीका है इसकारण मूर्यको वर्षादि १३ 1 ० । २४ । ३४ ॥ १२ आयु. मध्यायुचक्रम् । मिसे अपना तृतीयांश ( तीन- का भाग देके ३) ८८ या-19३। २४ घटाया ७१४। १६ । २२ । ४८ सूर्यकी स्पष्टाय हुई चंद्रमा वोत्तमी है इसकारण श्लोक ३६ के अनुसार इसकी आयु ५। १५१९।१७।१०। १२ को द्विगुणकी ११ ।। ५. २०१२४ हुये इनसे सर्धही ला श्लोक ३७ के अनुसार चन्द्र ९नवम स्थान में स्थित है इसलिये ४ चतुर्थीश हीन करना परन्तु ये शुभ अह हैं इस कारण वर्षादि आधुके आठका भाग देके १।५।१५। ५ 1३ आये हुवे अष्टमांशको हीन किया १० । ११२३ । २५ । २३ 2 वर्षादि चंद्रकी स्पष्टायु आई नौसके श्लोक ३५ । ३६ । ३७ के अनुसार कोई संस्कारका योग नहीं है इसकारण जो मध्या1०।१०।१४।४९३२ है यही स्पष्टाधु जानना- बुध अस्तका है इसलिये बुधको आयु ९ । २ । १९ ४४ । २८ । को आधी करके श्लोक ३६ के अनुसार ये त्वदेष्काणका है शवास्ते दोनुगीको वि९१२॥ ३९ ॥ १४ ॥ २४.ये बुजी सटायु आई- हा प यक्र यद्र- काण वगा न् राण D ० नयमे नाम . . . . सन ६पष्ट. श ८ १ १० २७ १० ० ७ ४ ३ १३ग्प ९ एस. ५ o १५ ४२ १० . . २५ " ५८ १० . ५० भापाटीकासहिता । एवं गुरु वक्रगती है इसकी आयुको श्लोक ३६ के अनुसार ३ तीनगुणी करनेका और उच्चराशीका है इस कारण फेर ३ तीनगुणी करनेका और यही गुरु वत्तिमांशका है इसलिये फेरगुणी करनेका योग३तीन प्राप्त हुये हैं अतएव "विविन्नतायां त्रिगुण सकदै"इसके अनुसार गुरुकी वर्षादि आयु३।२।।४।२५ । ४८को एकही वार३ तीनगुणीको ९ ।।२२।१७।२४ हुई परंतु गुरु शुभयह है और ७ सप्तम स्थानमें स्थित है इसकारण इसमेंस अपना पारमा हिस्सा १९, । १९ । २१ । २७ हीन किया ८ । १० । २ । ५५ । ५७ ये गुरुकी सष्टायु हुई और शुक स्वद्रेष्काणका है इसलिये शुक्रकी आयु० ।। २३ । २ । २४ को श्लोक ३६ के अनुसार द्विगुण करनसे १।५। १६ । ४८ आये ये शुक्रकी स्पटायु हुई एवं शनि बारमें स्थानमें स्थित है और यह अशुभ ग्रह है इसलिये इसकी आयु ५।९। ५ । २४ मेंसे सर्व (पूरि } आधु हीनकी शेप ०।०1०1०१० यह शनिकी स्पष्टायु हुई-वा लग्न बलवान है इसलिये लमकी वर्षादि आयु ४१०। १५ । २७ । ० के वर्षके ४ अंकमें लगकी राशीकेतमान वर्ष ९ युक्त किये १३ वर्प हुवे. शेपमासादिक ०।१५।२७० में लमके अंगादिक २३ । २८॥ ३५ को पारागुणा करके आये हुये मासादि ९।।।।४३ । ० युक्त किये १३ । ९ । २७ । १० । ये वर्षादिक लमको स्पष्टायु हुई ॥ इत्यायुर्दायः ॥ सहायुगेग ६३ । ९ । ० । ३।३० अप स्पष्टांशायुचक्रम्। 0 ७ च म लए ७१०१०९।८ १ ४/१/१० २.१०५ ९।९ १६.२३१४५९/२/१६/०२७/० २२/२५४९/५४५५४ ४८/२१/१२/२४/५७,४८/० दशासाधनमाह. तत्रादौ विंशोत्तरी दशा। खेः६ पडिन्दोर्दश १० सप्त ७भूभुवो जाड्यो १८ गोषिपणत्य पोडश १६

(६४)
पत्रीमार्गप्रदीपिका ।
शनर्नवाजा १९ नगभूमिता १७ विदो
नगा ७ स्तुकेतोरनलान्नखाः २० कवेः ॥ ४२ ॥
भापाटीका-अब दशासधन कहते हैं । जिसमें प्रथम विंशोत्तरी कहते हैं
कृतिका नक्षत्रको आदिले कमसे प्रथम सूर्यको ६ छह वर्षकी दशा फेर चत्रकी
१० वर्षकी मंगलकी ७ वर्षकी राहुकी १८ वर्षकी गुरुको १६ वर्षकी शनिकी
१९ वर्षकी बुधकी १७ वर्षकी केतुकी ७ वर्षकी शुक्रकी २० वर्षकी दशा
जानना ॥ ४२ ॥
विंशोत्तरीदशाचक्रम् ।
म
च
१०
गु.श.
उत्तर
क'
७
म
मू.
भ
आ पुन | पुण्य
स्वावि अ
श पू उ
चि
ध
आ
उप
२०
पू
पू
भा
अष्टोत्तरीदशा।
खेः ६पडिन्दोस्तिथयो १५ ४ ८ भूभुवो
नगेन्दवो १७ ज्ञस्य शनेर्दिशो ३० गुरोः॥
नवेंदवो १९ गोरवयः १२ समा सिते
धराश्विनो २१ वेदहुताशभे शिवात् ॥४३॥
भापाटीका-अष्टोत्तरीदशाके वदि मान कहते हैं। आनिक्षत्रको आदिले
क्रमसे प्रथम चार नक्षत्र (आ०पु०पु०आ०) की मूर्यकी६ वर्षकी दशा फेर तीन
नक्षत्र (म.पू. उ.) की चंद्रकी १५ वर्षको फेर चार नक्षत्र ( ह. चि. स्वा
वि.) की मौमकी ८ वर्षकी फेर तीन नक्षत्र ( अ. ज्ये. मू.) की युधकी १७
वर्षकी फेर चार नक्षत्र (पू. उ. भि. श्र.) की शनिकी १० वर्षकी फेर तीन
नक्षत्र (प. श. पू.) की गुरुकी १९ वर्षकी तदनंतर चार नक्षत्र ( उ. रे. अ.
ज.) की राहुकी १२ वर्षकी तदनंतर तीन नक्षत्र (क. रो. मृ.) की शुरुकी
२१ वर्षकी अष्टोत्तरी दशा जानना ॥ १३ ॥

मापादीकासहिता।
अष्टोत्तरीदशा.
ग.
रा
..
आ.म
ध.
उ.
6464
स्वा.म.भि.पू.
वि.
भ.
अथ योगिनी दशा।
जनु त्रियुक्तेऽटतष्टे दशा मंगला पिंगला धान्यज्ञा भामरी च ॥
ततो भद्रिकोल्का च सिद्धा क्रमासंकटासंनिपिद्धाःसमेकेकवृद्धा॥३४॥
भापाटीका--अब योगिनी दशा कहते हैं।जन्म नक्षत्रकी संख्यामें तीन मिलाना
भाठका भाग देना एकको आदि ले शेप वचे तो कमसे १ मंगला २ पिंगला ३
धान्या ४ चामरी ५ मदिका ६ उल्मा ७ सिद्धा ८ संकटा दशा एक एक वर्ष
बढती हुई एक श्रेष्ठ एक नेष्ट इस क्रमसे जानना ॥ अर्थात् मंगला एक १ वर्षकी
श्रेष्ठ, पिंगला २ वर्षकी नेष्ट,धान्या ३ वर्षको श्रेष्ठ,नामरी ४ वर्षी नेष्ट, भाविका
५ वर्षकी भेष्ठ, उल्का ६ पर्पकी नेष्ट, सिद्धा ७ वर्षकी श्रेष्ठ, संकया ८ वर्षकी
नष्ट जानना ॥४४॥
-
योगिनीदशा.
म. सं. (घा. मा.भ. | उ.1 सि.स.
झ.
१ २
४
७ ८
आ.पु.
भ. कु. रो. म.
नि.स्वा. वि.नु. म. पू. उ.
श.प्र.भा. ज्ये.मू.पा. द.पा.
उ.भा.रे.
शुकुनेस्य होरायां दिवा विंशोत्तरी दशा ॥
कृष्णे चन्द्रस्य होरायां राजावटोत्तरी मता ॥ १५ ॥

पत्रीमार्गपदीपिका। अन्यथा योगिनी कार्या सदा कार्या महादशा॥ भापाटीका-अब दशाके योग कहते हैं।शुक्लपक्षका जन्म होवे और लगमें रायकी होरा होवे तो विंशोत्तरी दशा करना एवं कृष्णपक्षमें जन्म होवे और लममें चंद्रकी होवे रात्रिसमयमें जन्म हुया होवे तो अष्टोत्तरी दशा करना ॥ ४५ ॥ इन दोनों योगोंका संभव नहीं हो तो योगिनी दशा करना और महादशा सबा (सर्वदा) करना ॥ अथ दशाभुक्तमोग्यानयनमाह। चन्द्रस्य लिप्ता सानभै ८०० लब्धाः स्युर्शततारकाः ॥ ४६॥ शेपा हताः स्वपाकादेहोरेणाप्ताः समादिकाः ।। गता दशा सा पाकान्दे ऊनिता भोग्यसंज्ञिता ॥ १७॥ भाषाटोका-अव दशाके सुक्त भोग्य लानकी रीति कहते हैं। चंद्रमाकी कला करना भाठतौका ८०० भाग देना लब्ध आवे षह गत मात्र जानना शेप रहे पला उसको अपनी दशाके वर्षसे (विंशोनरीके हुक्त भोग्य करना होवे तो श्लोक ४२ के अनुसार कत्तिकाको आदिले गिननेसे जन्मनक्षत्र जिस ग्रहकी दशामें आया होवे उस दशामें जन्म हुवा ऐसा जानना. जिस ग्रहकी दशामें जन्म हुवा उसके दशाके वर्ष जितने होवें उतने वर्षसे और योगिनीके शुक्त भोग्य करना हो। तो श्लोक ४४ के अनुसार जिस देशामें जन्म हुघा होवे उसके वर्षसे अष्टोत्तरी करना हो तो श्लोक ४३ के अनुसार जिस महकी दशामें जन्म हो उसकी जितने वर्षकी दशा होये उतने वर्षले ) गुणी कलाहारका ८०० भार देना लम्ब आने वह वर्प जानना शेष बचे उनको १२ चारागुणे करना और ८०० आठसौका भाग देना लब्ध मास आवे शेपको३० तीसगुणे करना ८०० आठ- सौरग भाग देना लब्ध दिन आवे शेष बचे उनको६०साठगुणे करना फेर८०० आठसौका भाग देना लब्ध आवे यह घी जानना शेष बचे उसको फेर ६० साठ गुणा करना ८००का भाग देना सच आवे वह पल जानना ऐसे आये जो वर्षा- दिक यह गतदशा (क्तदशा) होवे उस मुक्तदशाको दशा वर्षमैसे हीन करना (सोपमा)शेप पचे वह भोग्य दशा समझना ॥ ४६॥ ४७ ॥ विसोत्तर और योगिनीसे युद्ध सिन राव है इसकारण अतिरीके भुक भाग्य लानको रीति अटग भागे लिखा है।

भापाटीकासहिता। विंशोत्तरी दशाका उदाहरण । स्पष्ट चन्द्रमा ५।२९।१९। ४९ इसकी कला १०७५९ । ४९ इसके आठसौका भागदिया लब्ध १३ आये ये गतनक्षन हत्त हुआ शेप कला ३५९ ॥ ४९ बची इसको श्लोक ४२ के अनुसार रुतिकाको आदि ले गिनने- से जन्मनक्षत्र चिना भौमकी दशामें आया इसलिये भौमके दशाके वर्ष ७ सातसे गुणे किये २५१८ । ४३ हुवे इनमें ८०० आठसौका भागदिया लब्ध ३ वर्ष आये शेष ११८४३ बचे इनको १२ धारागुणे किये १४२४ । ३६ हुवे इनमें ८०० आठसका नामदिया लय एक नास आया शे। ६२४ । ३६ को ३० तीसगुणे किये १८७३८ । . हुये ८०० आठस का भागदिया लब्ध २३ दिन आये शेप ३३८१० बचे इनको ६० साठगुण किये २०२८० ।। हुचे इनमें ८०० आठसौका भागदिया लब्ध २५ घटी आई शेष २८० । ० को ६० साठगुणे किये १६८०० । 0 हुवे फेर इनमें ८०० आठसीका नागदिया लब्ध २१ पल आई शेषः शून्य बची-इनफार वर्षादि ३११२३३२५।२१ "भामकी शुक्त दशा आई इसको दशाके वर्ष ७ मेसे घटाई शेष ३।१०।६।३४ ३९ बची यह भामको भोग्य दशा हुई । विंशोत्तरीदशायन्त्रम. ७ १८ २१ १० ३ . ३. १० योग ३४ २१ सात् १८-011८. ८ ८ उत्तीणोन २८ ८ ०८ ८ २८ 14 २३ २८ १८ योगिनी दशाका उदाहरण । जन्न नसकको संख्या १४ में ३ तीन मिलाये १७ हुये आठका भाग दिय पनामागप्रदीपिका। शेप १ वचा इसलिये १ पहली मंगला दशा वर्ष १ कीमें जन्म हुवा इसके वर्ष १ एकसे चंद्रमाकी कला १०७५९ । ४९ के आठसौका भाग देनेसे शेष बचे ३५९ । ४९ इनको गुणे किये ३५९ । ४९ हुये इनमें८०० आठत्तौका भाग दिया लब्ध ० शून्य वर्ष आया शेप ३५९ । ४९ को कमसे १२। ३० । ६०।६०। गुणेक८००का भाग देके विंशोचरीपद मासादिक लाये ये योगि- नी मंगलाकी भुक्त दशा हुई ०।५।११ । ५५ । ३ इसको मंगलाके वर्ष १ मेसे हीद किया शेप १६।१८।४।५७ ये भोग्य दशा आई। योगिनीदशाचक्रम्. . 553 मंभ *.भो.पि. घा. भ. ट. सि. मं. श. शु. रा. १ १ २. 을 ४ ५ ६ ८ २ ५ ९ १५ २७ ३५ ६ ६ ६ ६ ६ पयो. १८ १८ १८ 14 गत. ४ ४ ४ ४ पपी. ३ ५७ १९२८१५२९१९३५ १९३४ १९३८१९४३ १९४१ १९५६ १९६४ संपत् १७९३/१४९४/१०९६७९९ १८०३१८०८1८१९२२११८२९/ बाप.. ५ ५ ५ ४ ५ ४ ए V ४ ४ Ent- ५८५८ ५८ ५८ ८ ३१ ३६ ३६ ३६ ३६ न. ५८ गाय, . अष्टोत्तरीदशा बनानेकी रीति कहते हैं। प्रथम चंद्रमाकी कला करना उसमें ८०० आठसौका भाग देना, लब्ध आप यह गत नक्षन जानना शेप कला बचे उराको श्लो० ४३ के अनुसार, मिस महकी दशा में जन्म हुवा होवे उस ग्रहके दशाके पति गुणनकरके भारती ८०० का भाग देके विंशोत्तरी दशावत वादि भुक्त दशा लाना तद-- नंतर उस मुक्त वामें जितने नक्षत्रकी दशा हो उतनेका ( बार नक्षत्रकी हो नो ४ चारका तीन ३ की होतो ३ ताका) जाग देके वर्षादिक ५फर दाना ८००/६००/२५३/७४६ धुवखं २० . ० भापाटीकासहिता। आये वह एक नक्षयको शुक्तदशा समझना फेर जितने नक्षत्रकी दशा होवे उसमेसे जितनी संख्या नक्षन गत हो उतनी संख्यासे(१एक गत होतोसेरदो होतो२ दोसे ३ हो तोश्तीनसे ) जितने वर्षकी दशा होवे उन वर्षाको गुणे करना और उसमें चार नक्षत्रकी दशा हो तो ४ का तीनको होतो ३ तीनका भाग देना आवे जो वर्ष मास वह उपर आई हुई एक नक्षत्रकी मुक्तदशाके वर्षमातमें मिलाना सो सष्ट भुक्त दशा होये उस भुक्तदशाको दशाके वर्षमसे हीन करना भोग्य दशा होवे परंतु चंदमाकी कला १५२०० पंदरा हजार दोसौसे अधिक होने तो चंद्रमाकी कला से १५२००६दरा हजार दोसो घटा देना शेप कला बचे यानिशानक्षत्र मुवाचक | उसमें से क्रमसे नीचे लिखे हुवे कोष्टकमें जो नक्षत्रोंके पा'त. पा. भि. [भय नाब ध्रुवके खंड हैं वे शोधना ( हीन करना )जितने खंड निकले उतने निकाला जो खंड नहीं निकले वह अशु- ५० डाका द खंड समझना शेष बचे कला उसको३० तीस- मा. म. मा मा गुणी करना और अशुद्ध खण्डका भाग देके गास दिन घटा पलात्मक चार फल लाना यदि मास३२वारासे अधिक होये तो मासमें १२ बारका भाग देना लब्ध आवे वह वर्ष शेप मासादि समझना ऐसे आये हुये व- पदिकमें जितनी संख्याके खंड निकले हो उतनीही प्रत्येक संख्याके २ दो वर्ष ६ मास मिलाना ( अर्थात् एक संड निकला होतो २ वर्ष ६ मास दो खंड निकले हो तो ५ वर्ष तीन खंड निकले हो तोवर्प६ मास.) आवे वह शनिकी क्षुक्त दशा सम- झना उसको अपने दशाके वर्ष १० मेंसे घटानेसे भोग्य दशा होवेगा. यह रीति केवल चंद्रमाकी कला १५२०० पंदरा हजार दोसौसे १७६०० सतरा हजार छः सौ पर्यंत होवे वहांतकही करना शेपमें नहीं करना अष्टोत्तरीदशाके शुक्त भोग्य होव इति । अष्टोत्तरीदशा उदाहरण स्पष्टचंद्रमा ५।२९ ! १९॥ ४९ इसकी कला १०७५९ १४९ हुई इसमें ८० आठसोका भाग दिया लब्ध १३ गत नक्षत्र आया शेप ३५९ ॥ ४९ बचे इनको श्लोक ४३के अनुसार हस्तको आदिले चार नक्षत्रकी भौमकी दशामें जन्म- नक्षत्र चित्रा मिलता है इसलिये नौमकी दशाके वर्ष ८ आठसे गुणेकिये २८७८ पत्रीमार्गप्रदीपिका। ३२हुये इनमें ८००आठसौला नाग देके विंशोत्तरीदशावत् वर्षादि ३ । ७॥५॥ २५।२४लाये इनमें भौमदशाट चार नक्षत्रकी है इत्ततिये चारका शाग दिया लब्ध वर्षादि ०11०२३१५१।२१ आये ये एक नक्षत्रको शुक्त दशा हुई तदनन्तर यह चार नक्षनकी दशाहै इसमें से १एक हस्त नक्षत्र गत है इसकारण १ एकसे दशाके वर्ष ८ को गुणे किये ८ हुवे इनमें ४ चारका भाग दिया लब्ध २ वर्ष आये ये एक नक्षत्रकी ऊपर आई हुई शुक्त दशा०।३०।२३०५१।२१ के वर्ष ० में युक्त किये सो वर्षादिक २।१०।२३।५।२१ भौमकी स्पष्ट शुक्त दशा हुई इसको भौमके दशाके वर्ष ८ मेसे पटाये शेप ९॥ १।६।८।३९ भोग्यदशा हुई। शनिकी दशाका कल्पित उदाहरण. शनिकी अघोत्तरीदशासाधन आभिजिन्नक्षत्रहोने के कारण भिन्नरीतिसे किया जा- ता है उसके बनानकी युक्ति प्रथम कहीही है परंतु बालकोंके सुबोधार्थ उसक एक कल्पित उदाहरण कहते हैं. स्पष्टचंछ १६ । ४० / ० इनकी कला- १७०२००।० सतराहणार दोसौ है यह कला पंदराहजार दोसौ१५२००।० से अधिक है इसकारण चंद्रकी कला१७२०० मेसे१५२०००पंदराहाजार दोसौ घदादिये शेप२० १०००० कला चवीइसमेंसे पूर्वापाढाके ध्रुबके खंडके अंक८००० आठसौ घटाये शेष १२००१० बचे इसमेंसे फेर उत्तरापाढाके खंसके अंक ६०० छसौ पवाये शेप६ ००० बचे इसमेरो फेर अभिजितके खंडके अंक२५३३२० घटाये ३४६ । ४० शेष बचे इसमेंरो ४चतुर्थ खंड श्रवणके अंक७४६ । ४० नहीं निकलते हैं, इसलिये ये अशुद्धसंड हुवा शेप कला३४६।४०को३० तीस- गुणा करनेसे १०४०० | 0 हुवे इनमें अशुद्धसंह ७४६॥४० का भाग देके मा- सादि चार फल लानाहै परंतु ये दोनें भाज्य भाजक कलादिक हैं इसलिये मवर्णित किये भाज्य ६२४००० जाजक ४४८०० सवर्णित हुये भाज्य ६२४००० में नानक ४४८०० का भाग देके मास दिन घटी पलात्मक चार फल लाये १३१२७ । ५१ । २५ आये-- मास १३ बारासे अधिक है इस कारण १३ में १२ वाराका भाग दिया लब्ध १ वर्ष शेप १ मास हुवा ऐसे वर्षादिक १ । ११२७ ॥ ५५ ॥ २५ आपे इनमें पूर्वपाढा उत्तरापानमा भापाटीकासहिता। और अभिजित इन तीन नक्षत्रों के ध्रुवसंडे कलाम से सूर्थहै इसलिये सातवर्षदछः मास मिलाये सोवर्षादि ८॥७॥२७ १५१ । २५ शनिको सुक्तदशा आई- इसको दशाक वर्ष से होन की शेप ११४ 1 २१८ । ३५ वर्षादि भोग्य दशा हुई-इति अष्टोतरी दशा उदाहरणम् । अष्टोतरीदशाचाग. | वयोग - म.म.मे. पु. ८ ८ १. १२ २२ ३२ १० २३ ६ ६ ६ २ ८ ८ ८ ८ ८ १ ३१ ३९ १९२८/१९३३ १९१०।२६. १९७१ १९९१ १७१३ १७२८/१८१५१८२५ १८४४ १८५६ तवर्षात सात शक. २३ विनी १६ ५२ २३ २ १८ २३ २ १८१८ २३ २ १८ अथांतर्दशासाधनमाह। दशा दशाहता कार्या स्वस्वमानेन भाजिता ॥ लब्धगंतदशा ज्ञेया वर्षांचा क्रमशो बुधेः ॥४८॥ भापाटीका-अब अंतर्दशा बनानेकी युति कहते हैं, दशाके वो दशाके वर्षसे गुणन करना और अपनी अपनी दशाके मानका भागदेना लम वर्षमासादिक आवे वह कमसे अपनी अपनी दशामें पंडित लोगोंने अंतर्दशा जानना अर्थात. विशोत्तरी महादशामें जिसमहमें अंतर्दशाचक्र बनाना हो उसमहके दशाके दर्पको विशोचरीके १ नवही ग्रहों के दशाके वर्षसे कमसे गुणन करना और विंशोत्तरी महादशाके मानका ( १२० एकसौ बीसका ) भाग देना एवं अष्टोत्तरीमें जित्त ग्रहमें अंतर्दशाचक बनाना हो उसग्रहके दशाके वर्षको अठोत्तरीके ८ आठहीग्रहोंके दशाके वर्षसे मसे गुणन करना और अठोचरीके मानका ( ३०८ एकसौ आठका ) माग (७२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। देना ऐसेही योगिनी दशामें जिस दशा में अंतर्दशाचक्र बनाना होवे उसदशाके वर्षको योगिनीके आठही दशाके वर्षसे कमसे गुणन करना और योगिनी दशाके मानका (३६ छत्तीसका) भाग देना ऐसे जिशदशामें अंतर्दशा करना होवे उसका जो मान होवे उसीश भाग देके कमसे वर्प मासादि लाना आवे वह अपनी २ दशामें अपनी २ अंतर्दशा जागना॥४८॥ उदाहरण। जैसे विंशोत्तरी सूर्य महादशा में अंतर्दशाचक्र बनाना है सूर्यमहादशाके वर्ष है इस महादशाके पर्ष ६ को सूर्य दशाके वर्ष ६ से गुणन किये ३६ हुवे इनमें विंशोत्तरी दशाके मान १२०, का साग दिया लब्ध • वर्ष शेप ३६ को १२ बारागुणे किये ४३२ हुचे १२० का भाग दिया लब्ध ३ माम आये शेप ७२ बचे इनको ३० तीसगुणे किये २१६० हुवे इनमें फिर १२० का पाग दिया लब्ध १८ दिन आये शेष ० बची इसको ६० गुणी करके १२० का भाग दिया लभ 1 . घटी पल आई ऐसे पोदिक ०।३।१८। । ० सूर्य महा- दशामें सूर्यकी अंतर्दशा आई-फेर सूर्य दशाके वर्ष ६ को चंद्रमहादशाके वर्ष- १० से गुणेकिये ६० हुवे इनमें १२० एफसी वीसका भाग देके वर्षादिक कमसे लाये ।।६। । • ये सूर्य महादशामें चंद्रकी अंतर्दशा आई-एव यशाके वर्ष ६ को भौमदशाके वर्ष ७ सातसे गुणे किये ४२ हुवे १२० एकसों चीसका भाग देके पर्यादिक लाये ०1४।६। ० । ० सूर्यमें भौमकी अंतर्दशा आई ऐसेही फेर सूर्य महादशाके वर्ष ६ को राहु दशाके वर्ष १८ अठारासे गुण- न करनेसे १०८ आये इनमें दशाके मान १२० का भाग दिया लब्ध ० । १०। २४ । 0 1 0 सूर्य महादशामें राहुकी अंतर्दशा आई इसीप्रकार दशाके पर्प ६ को गुरुदशाके वर्ष १६ से गुणके १२० का भाग देनेसे ०।९।१८। • • पर्यादिक सूर्य में गुरुकी तथा शनीके वर्प १९ से दशाके वर्ष ६ को गुण- न करके दशाके मान १२० का भाग देनेसे वर्षादि ०।११।१२।०11 शनिकी अंतर्दशा तथा युधके वर्ष १७ से दशाके वर्ष ६ को गुणन करके १२० का जाग देनेसे ११०१६। 0 1 0 सूर्यमें धुत्रकी अंतर्दशा तथा दशाफे पर्प ६ को केतुको दशके वर्ष ७ गुणके १२० का भाग देनेसे । ४।६।। देवकी ऐसेही शाके वर्ष ६ को शुक महादशाके पर २० से गुणन करके भापाटीकासाहिता । दशाके मान १२० का भाग देनेसे १।।। | वर्षादिक वर्षादिक सूर्यमहा- दशामें शुक्रकी आशा आई इसीप्रकार विंशोत्तरीमें चंद्रादि शेष पहोंकी तथा अष्टोत्तरीयोगिनी आदि दशाम आदि दशामें अंतर्दशा जागना इति । (अथ विंशोत्तरीमध्ये अंतर्दशाचकाणि) सूर्यमध्यतर्दशा. चमतर्दशा. सच मरा| गु श य क ा] चागु शकार 0 . D १ ० क ० 010 १. १८१०] १.१४ ०१० ६२५/१८ १२६६ ० ० ० . . . a . . . . ० . a ० व ० o . . . . . ० . G ० . ० . ० ८ ०। भामरम्पतर्दशा. राहुमभ्यंतर्दशा. गरा INL/ काच राशके शुरचम १ २ २१२॥ १३ ४ ४ ८ V01६ |२७ २८६९/२७/२७ ६ ०२४/२४ ६.१८१८ ०२४ ०१८ . 0 . . . ० . . ७ D o . ० . 6 0 o . . . . ० ० . ० . . . . ० ० . . ० o ० . D ० o . . . ० ० . . . . . . ० a . ० ० . गुरुमध्यतर्दशा. शनिमभ्यतर्दशा. गाकर च। राश। पुकार . २ 1 २ १६३११८९ ४|१४ ८ 1101६ १८/१२ ०१८ ० ९ ९ १२ ६ ६ १२ . ० ०० . ० . बुथमध्यादेश- कतम तदंशा. बु।काश रच ममगु क शुरच माराम २ ०२.० १ ० ४११०१० ५११६३८४ ४ ४ ०/११/१२१ २७/२७ ६ ०२७/१८६९३७ . ६ ०२७/१८/६ . . . . ० . - ० . ० १ ७ ० ० . ० ८ प . . o . . . . । . . ० . ० a . . . . . ० . . शुक्रमप्येन्तदशा. सार218 ग ३ ४ . . . . . a o D . . . . . ० ० ० . . D D पत्रीमार्गप्रदीपिका। (अष्टोत्तरीमहादशामध्यतर्दशाचप्राणि) उपमपंचदशा. यद्रमध्यतर्दशा मंशारा शुरच मंयु दश साराशु ! र १ १ १ १०/५/११६ ३११ ८/११/१० मा. १०/१०/२०/२० २०२० o ० a . १ ३ १ २ . ४ . ८ १ ७ ० . . . ० . o . . . . ०१०१० |... . . . . . ० . . . घ. प. . 0 a 0 o D . . 0 भीममध्यतर्दशा. युधमध्यतर्दशा. गुरा|शुर । शगुन राशरचम १ . १ ११।१२11३1०1।। य ७ ३ ८ १/८।६।११/१०/३/११/४ ३ ३/२६२६/२०२०/१०/२०१३ (३६/२६/२०२०/१०/१० दि २०२०४०५०.. ० ०२०४०१० . २० . . प. কিয়া गुरुमध्यंतर्दशा. गुराश रच में गु सारच माश . १ ૨ १ २ व, ११/११/११६ १ ८ ६ ४१८ ० ७ ५111 भा ३ ३/२०१२०/२०१२०/२६/२६/३/१०/१०/२०/२०/२६/२६ १२०/३०० . . ०४०४०२० . . १०४०/२० ० . . ० .la राहमध्यतर्दशा शुकमध्यंतर्दशा रागारम| गुरमपुरा १२१ ३ १ ३ घ. ४ ४ ८८1१०१०१ ५ मा. २०२०१० १० ०० ०२.२०१०/१० दि. . ० घ. ०।० योगिनी महादशामध्यवदेशाचमाणि. ० ० . . a D o . . a a दि. घ. . क भंगजामतशा. पिंगलामतर्दशा मधाचा भास[ सधा भाभद(3) मम . D २ २ ३ २ ४।५ ५ . १०२० १०२. . १०1०110 २०१२0102010/२० D ० . D o . ० . . . . . . . पान्यातदंशा. धामरीमप्यतर्दशा धा। भाभ मपभ्राम टाप्ति समाप/पा ३ 4 ७ ८ २०५६८९१० ३ ४ a ०११०२० 9 १०130110 २० क o . . . . . . प. . .

भापाटीकासहिता। . (७५) ५ . . . . . o . o . . . . . ० . ० भाद्रिकामध्यतर्दशा. उल्कामध्येंतर्दशा. भ. उ. सि.मे.पि.धा.धा उ. सि.स.म.पि.घा.भा.भ. ८.१०.१५।१३। ६ ॥१४११६/२५ ६|८१०|मा, ।१० ०२०[10/२०१० . ०० दि. . ० . ० . . ० प. सिद्धामध्येतर्दशा. संकटामध्येंतर्दशा. सि.सं म.पि.धा. भा. भ. | उ.सं.म.मि. पा.धा. भ. उ. लि. १६१८२४ ११ १५२१२ ५ ८.१०/१३/१६/१८ मा, १००1१०२०/० १०/२००/१०/२०/१०. २०१०/०/२०/दि, . घ ० प. ७ . . . . . . ० ० . . ० . . ० ० 0 ० . . अधांतर्दशामध्ये विदशानयनप्रकारमाह । अन्तर्दशाया दिवसाः स्वस्ववः क्रमागताः॥ स्वमानाईता प्राप्ता विदशा दिवसादिका ॥ १९ ॥ भापाटीका-अप विंशोत्तर्यदि दशाकी अंतदशामें विदशा करनेका प्रकार कहते हैं। अंतर्दशाके दिनोंको अपने अपने वोरो (विंशोत्तरीकी अंतर्दशाके दिनोंको विशोनरीके सूर्यादि ग्रहोंके वर्षसे अष्टोत्तरीकी अंतर्दशाके दिनोंको अष्टोत्तरीके सूर्यादि ग्रहोंके वर्षसे योगिनीकी अंतर्दशाके दिनोंको योगिनीकी मंगलादि दशाके वाँसे) ममसे गुणन करना और अपने अपने दशामानके वोका (विंशोत्तरीकी अंतर्दशामें विटशासाधनमें विशोचरीके मानके १५० एकसौ बीसका एवं अष्टो- तरीम १०८ का योगिनीमें ३६ का) भागदेना लभ आये वह दियसादिक (दिनादिक) विदशा जानना ॥ ४९ ॥ - पत्रीमार्गप्रदीपिका। उदाहरण। जैसे विंशोत्तरी सूर्य महादशामें सूर्यकी अंतदशा मास ३ दिन १८ की है इसमें विदशा करना है इसलिये इसके दिन किये १०८ हुवे इनको विंशोत्तरी दशाके सूर्यके वर्ष ६ से गुणन किये ६४८ हुवे इनमें विंशोचरी दशाके मानके वर्ष १२० एकसौ बीसका भागदिया लब्ध ५ दिन आये शेष ४८ बचे इनको ६० साठगुणे किये २८८० हुवे इनमें १२० एकसौ बीसका भागदिया लब्ध २४ घटी आई शेप० वची ६० ताठ गुणा करके १२० का भाग देने से •पल आई यहं सूर्यकी अंतर्दशामें ५ दिन २४ घटीकी सूर्यकी विदशा हुई.- ऐसेही सूर्यकी अंतर्दशाके दिन १०८ को चंद्रादिकके वर्षोंसे क्रमसे गुणन करके १२० दशामानका माग देनेते दिनादिक सूर्पकी अंतर्दशामें विदशा हुई-इसी प्रकार विंशोत्तरी दशाकी शेष चंद्रादि ग्रहोंकी अंतर्दशामें तथा अटोनरी योगि- भौकी अंतर्दशामें विदशा दिनादिक जानना, ।। सूर्यमध्येसूर्यातरसन्मध्येचिदशा सूर्यमध्येचंद्रातरतन्मध्येविदशा. रायम.रा.गु.श. ||2| शु .. |-गु|श./बु./केशर ० ० ० . . ० . . |१|.मा. ९६१६१४१७३५६.१८/१५/१०/२७ २४/२८/१५१. ०१८/१२/२४] ६.१८१८००१० . . ००० . D . ० a . ० ० भापाटीकासहिता । (७७) क . ० 0 . . ० o . ० ० ० . ० . . सूर्यमध्य भौमांतरं तन्मध्ये विदशा. सूर्यमध्ये राइंतरं तन्मध्ये विदशा. मेरा गु] | युके। शुर। रा|गु शकेशरच में। ००१ ३१० ०/मा. ७.२८/१६११ १७७२१६१०/२८/१३/२०१५/१८/२५/२६ २७/१८/दि. २१/५८५८/५७५१२१ . १८.३०३६/१२/१८/५४५४०१९/०/५४/. . . . . सूपमध्य गुजरं तन्नधेविशा. गर्पनाप शनरसन्म में विदया. केशरचं! मराज के हर | में राम 1 १.१ ०२१११ ०१.पा. ८१५ २०१६/१८/१४/२४०६३१२४/१८ १२/२७/१०/२८/२१/२२/१५/द. २४/३६/४८/४८ ०२४० ४८/१२/९/२७४५७ ०।६३०४५७(१८३६. . . 01.प. स्पैम युधांतर सन्मध्ये विदशा. सर्पमध्ये केत्तरं यन्मप्ये विदशा. | | केशच में {रा सुश केशरच | मेरा गुमाए १ १३/१०/२१/१५/२५ १०१५/१०/१०७२/२०७ १८१६/१९ ०/१०/३०५१५४४८२७११ ०१८/३०/२१/५५४८५७/५३ . 01010 चयंमध्ये भाग्यंतरं तन्मध्ये घिदशा. । चंद्रमध्ये पंद्रागरं तन्मप विदशा. शा ग ग ! । मेरा के छ २ १ .. .१८/० २१.२४|१८|२७/२२२१४२५/७/1५/१०/१७/११/१७ ३० . ०३०३० 201010 a . . ० 0 10 ० . २ . ० ० ० ० . . D . . . . ० . २ . १ o a १ o . ० a . ० . o . . ०० ० . . . . . o . . पंद्रप्रय भोमारा शिका. धंद्रम राईनर वन्यप्प विपदा, गठाएके दारबरा गु.] [६ मा . ०० १ ००२ २ ३ २ ३ .पा. १२|१०८३२९ २०५०४२१/१२/२५/११ 0/२७/१५ १५/३० . १५/४५/१५.० २०३०० ०३010[90 . o ० ००० . 10 चंद्रमा गुसन्मपरिवार पं शतरं नये विदया गाड पं. शुर। राजोर भागु ३ ।३ २ ० २३ ११३२/मा ४६८२८/२०२५.१०८t" . ३ ५.८/१७३२५१६ D ० ०.०४५/४५५ ३०३०/१५००/८. pion. .... . . o . o ० है ० . . . .

(७८) पत्रीमार्गमदीपिका। चदमध्ये चुर्धातरं तन्मध्ये विदशा। चंद्रमध्ये चारवंतरंगनमध्ये विदशा। प ० ० a o ० . ० क D . . ० ० ० ० . पाचं में रागुशुर में । रागुश। २ २ १ १ १ ०१० मा. १२२९/२५/२५/१२/२१/१६/८२०१२५/१०|१७|१२।२८/३/१५ २५५५/०३०/३०/४५/३०/०४५११५.३०३०५० ०२५/५/प. a . ० . |016प. पदमध्ये शुक्रांतरं तन्मध्ये विदशा. चंगमध्ये सात तामध्ये विदशा. परामरा|गु शकार ३ १ ३ म से २ ०१मा. .२०५३५५९१५/१०/२७/२४/२८/२५/१०० दि. . ० ० . .. ३०/३००० घ. . . . . ००प. भौममध्ये भौमातरं तन्मप्ये विदशा। । भीममध्ये राइंतर तन्मध्ये विदा । शुमा गुरा। केशुचंग १ १.मा. ८१२२११७२३२०८२४७ १२ २६२०/२२२३२२३२८१२२ दि. ३४६१६४९३४३०४२११५१४२२४५१५३ . 201301010 1010 . ० 0 . 0 ० . ० D ० . ० D . D a ० . ० ० . . । चं) मराग। . o a . D . ० भीममापे गुफ्तर सन्मध्ये विदशा। भीममध्ये शन्यतरं तन्मध्ये विदशा। राश कार में कर २ ३ ० 01.मा. १४२३१७११९२६/१५/२८/१२/२०१३/२६/०६/१९/३/२३/२९/३/दि. ૪૮/૨૩૬૩૬ ૦ ४८. ३६/२४[१०४३५१६२०४५७६१५/१६५२१३/प. ० . 10 ०1१०120101. .३०/0101. भीनमध्ये पावर सन्मध्य विदशा। भीममध्ये धेरवंतरं तन्मभ्ये विदशा" गार्च मेरा गुयशच में रागभयु २ ००/मा. २.२०/२९/१७/१९110१७'२६८३५७ १२.८२२०२३२० 1३४४६/३०/५१४५/४९/३३२६ ३३/४/३०/२१११५.११३१६ ३०३. ३० ३००० भीमाप शुमार तन्मम्प पिशा भीममा सतरसपाय विकार। श गग वायु गगशशु ३ १ २ १ . 100मा. 10141५३२६] ६१३४६१०७/१८/१६/११/१७ ३०० २०३०३01१८/201२१५४१८५७५१ ० a . . 0 . . D . o ० २ . . . . ० . ० . . . . ८ भापाटीकासहिता । (७९) ० ० ० ० a ० . . . . D १ . 0 . . ० ० . ० . ० ० ४ . a o . ० o ० . . भीममधंद्रातरं तन्मध्ये विदशा। रामध्ये गवरं उन्माये विदशा। माशु यापु । के | शुर।म। गु| श। । केशरचं में। १ ०२ ० ४ ४ ५ ४ १२)मा. |१७|१२/२२८/३/२९/११/५/१० १८/१२/२६दि. ३०.८३६५४४२४२. ३६०८प. . . 0/0'.प. राहुमाये गुर्पतरं यन्मध्ये विदशा। गामापे शन्तरं तामध्ये विदशा। गुपकारच में द्वार चंग गु ४ २४ ४ ५ (२५/१६२२०/२५/११/२० ९१२२५/२९/२१/१/२५/२५/२६ डि. ૧૨| B૮૨ ૨૨ ૦ १२.३४३६/२७६३१/५१/०२८/३०/५२४८. . 01.प. राहुमध्ये पुतिर तामध्ये विदशा । रामध्ये फरवरं शमध्ये पिदशा। म || रच मेरा गुम शुर। ग राग १ ५ १ २१४४ ४ ०।२ २१|11मा. १०२३ ३१५ १६/२३ १७/२/५/१२/३१०१ २२ २६/२०१९/दि. ३३ ०१५४०1३३४.४.१३ ०५४ २०३१२३४५१३३/. 01010101. गामध्ये शुक्रांतर तन्मध्ये विदशा. राहुमाये सूर्णतर हामध्ये विदया. FREमग गुन ||में गजपा १ ० १ १२०/गा. २४. ३१३२४/१३|३६२७/८/१८/१३/१/१५१८ दि. .1१३.५४/६/१२/१८५५ ५५. . 010101. राम येचद्रमादिमा. गहमये भीमातर माप विददा. चामागु नक #TIशाच २ ३॥ १ १ ३०मा. १५५१२ १५/१६१ ०२/६/२०१९/२२२/३१८ दि. १० ०००००1०1३४२/०४५.६। ०५४३०८. . 01.प. गुममध्य गुस्सा सम्मयाद... गुरुमपान्तरं तन्मय विता. पाप T का । मा17 भाग ३ vi १.४ ४।। ८.४८ ८.१२.२४ १२१२०६ ०८:य. .प. . . . . ० . . . . . . . क . . ० ० ० . . ० . o . . . . -- n स ८ 0 (८०) पत्रीमार्गप्रदीपिका। क . ० a . . . a . . . a प a . . 6 0 . . . o ० . . . गुरुमार्य शुधर्मातर सन्मध्ये विदशा. गुरुमाप कविवरं तन्मय विदशा. पुपारचं म सगुमाक! शराच मारा। शुश १ ३ ४ .मा, २५/२०१६ १०८१७२ ८९.१९/२६/१६/२८/११/२०१४३२ दि. ३६३६/०४८.३६२४ ५८१२३६.८. |B६२५४८/२६. . . 010101. गुरुन्य भृग्यतरं मप विदशा. गुरुमभ्य रब्यंतरं सम्मपे पिता. गुर यामराश शुमारच! मेरा गु/युका ४४५४ १ १ १०१८/२०२६२४८२१६/२६.२५२४ १६.१३ ८.१५/१०/२८/14दि. ० ०२ ० १८/१२/२४३६१८४८०प, ० . 101 प. गुरुमध्ये चंद्रहरं वन्न विदशा गुरुमध्ये भीमांतर मध्ये विदशा च | मेरा गुENI | काय रामरागायुकार १ २ . १00मा. (१०/२८/१२४११/८/२८/२०/२४/१९/२०१५/२३/१७/११/२६१६ . . . ०३६/२०१८/१२/३६/३६/०८/०४. . . . . गुरुमभ्य राइंतरं तन्मध्ये विदशा शनिमप्येशम्यंतरे तन्मध्ये विदशा सगु शयुकेशु रचम श। मुकेमेराग। ५५ २।६ १३ ५/४.मा. ९२५ १६४२०/२४|१३| १२/२०१३३३ |२५ . २६/१३४८२४२४. १२.२५ १८/२५१०१३०९/१५१०२७२४ घ. . ३०१३०३० ३०००) प. शनिमध्ये अर्धातरं तन्मध्य विदशा शनिमध्ये केत्यत तन्मध्ये विदशा कार चामरा गाश केशरमरा गुशबु| १२ ४ २ || मा. १२७/२६११/१८/२०१२६/२५ १३:२३ | १६.३१/३०/२७४५/३१२१/१२/२५, १६३०/५७/१५/१६/५/१२/१०३१ 2010 10]. ०1३०३०० ३०1०1०1३०३० शनिमध्ये शुमोदरं चन्मध्ये विदशा. शानिमध्ये सूर्यावमये दिशा. |च में| रा| गु वा घु। केर। चंम! गागाश ६ १ ५ ५।६।५।२ ११ १(013मा. १०/२७/५/६/११३ ०१६/१०/२८/१९/२१११५२४ १८/१९/१७ दि. ०३०० ०३०/३०/३०.६.२०५७/१८/३६१७५७/०६. D. ... 010/04. a ० o . . o D . . 0 ० . . ० ० . o . . . २ . . ० C . ० ०० . ० .

झापाटीकासहिता। (८१) शानिमय चंद्रांना सन्माये घिदशा. | शनिमाये मीमांतरं तन्मध्ये विदशा. च मंग|| केशर में || गुदा केशु २ . . १ |१७३१३५/१६/०२०, ३ ५२८३/३११२३३२६३६ ३० १५/३० ० १५४५/१५/० १०/१६५१ १२१०३११६/३० ० . ३० ० 1010/1010 . ० ० ० . । ॥ o . 0 . o . . o २ २ ४ ० ० . . . . . . शानमध्ये राईतरं तन्मध्ये विदशा. शानिमाये सुर्यतरं तन्मध्ये विदशा. रायण के। शुरचं. म| गु | शपु केश रारा ५ ४१५ १२|| ३ २६/१२/२५/२९/२१ २२ २५.२११२५/२/२३३ १५ १६ १३/१६, ५४/८/२७/२१ ५२/० २८/३०५१/३६/२४/१२/१३.२६/०१२४८य. a | ०.६. बुधमध्ये सुधांतरं तन्मध्ये विदशा। | बुधमापे केत्वंसर सन्मम्ये विदशा। ए के रयं में गुमके | शर मेरा गुभ यु | १ ०.मा. २२०/२४१३/१२/२०१०२५ १७१२०/२९/१७/२९/१०२३/१७२६२०/दि. |४९/३५/३०/२११५.१४३३६.३६/४९/३०५१/४५/५९/३३/३४. १०३010 १० ०/३०३० 2010 ०३०३० प. चुधमप्ये शुक्रांतरं तन्मध्ये विदशा. सुधमापे सूर्यातरं तन्मापे विदशा. रागुश। उकेरा| में गुवा के १ २ ५५ ५१ |२०२५२५३१३।१६/१९२४२९/१५/२५/१७/५/१०/१०/१३/१७ .30 ३०३०/०२८/३०/५१/५४/५८/७/२११च. ... 101.प. दुधमापे गंदातरं तन्मध्ये पिशा। बुधमध्ये भौमांतर सन्मापे विदशा। | चंग गुदा के । शार मरा| गु|| शुभराचं १ २०३० ०२/० . १०.मा. १२/२९/१६/८/२०/१२/२९/२५'३५ २०२५७२६/२०/२०३९ |३०४५/३० १९३३६/३१३४५९/३०/५१५य. १० 11030/३०1० 1/4. बुधमाये राइंतरं यन्माये विदशा। ५ . . ARTA . . . . . o . ० ।० .. . गागाशकेप्रम ११]मा. १७२.२५ १०/२५३११५/११/२३ दि. १/२४१३३.५५३०/३/पं. ० . .

(८२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। . D . ० 0 व D 0 0 ० ० 0 . . . 0 . 0 a ० . . 0 . . . . . . बुधमध्ये गुर्वतरं तन्मध्ये चिदशा. दुधमध्ये शन्यतरतामध्ये विदशा. गु| | केशर चं में राशके शुरचं रागु ३४ ३ १ ४ १ २ १/४/५ ३ १/४मा. ८७९२३११७२६/११/१८/१०/२६ (९ ४८/१२/६/३६/० ५८ ३६२४/२५/१६/३१/३०/२७४५/३१ १२४ ० ० . ०१३०/३०/३०० D ३०100 केतुमध्ये केत्तरंतन्मध्ये विदशा. तुमध्ये शुक्रांतरंतन्मध्ये विदशा. | मैं रा गुश शुर चं| मैं रा गु शके ००३ ० १ २ १ ८ ३४१७ १२.८२२|१९२३ १०/२१.५ २४१३ २६६२०२४ टि. ३४२०/२१/१५३४३ a D ३०० . ३००/३० य. ३० a . ००प. केतुमध्ये रत्यंतरं तन्मध्य विदशा. कैतुमध्ये चंद्रावरंतन्मध्ये विदशा. शशु के शमगा केयर ० १ .मा. ६१०७(१८/१६१९१७७२११७/१२/१२८/३२९३/५ |१८/३०/२१५४] १८५७/५/२१/०३०] १५/३०] ०/१५/४५/१५/०३० ... केतुमाये भोतिरंतन्मध्ये विदशा. केतुमापे सतरंवन्माये विदशा, में ग। गु दु ये! शुर|रा। गुम मुके शुरन में क ०१.१ १ १ मा. ८/२३/१९/२३/२० ८२४/७ १२/२६/२०/०९/२३/२२ ३१८११/दि. ३४३२६/१६४९३४३०२१ (१५/१२/२४५१३३ ०५४३०३. ३० ० |३०|३०20. ० . . संतुमपे गुसरंतन्मध्ये विदशा. केतुमाये शत्पतरंसग्मय विदशा. गु शशु के शुर मेरा शहर में राग १ १ ०१.२] व १० १४२३१७/१२)२६/१६/२८/१९२० ३२६/२१६१९३७२० (१८/१२/३६३६०४८ ३६२४१०३१|१६.०५७/१५/१६ . 2010 . ३० केतुमा सौम्पतिस्तन्मध्ये विदशा. शुक्रमप्पे शुरुांतरतन्मा विदशा. इके शर] मेरा गुश शु। मग गु/ . २ ३।२ ६ ६/५/२मा. २०/३०१२/७३९.२०/२३/१७२६/२० ० १०/१० . १०.१०/२०/tor. २४४९३०/५१५५४३३६३. 1010 ३०० 11010 . . O . . ० . . . . o . . a २ io . . ० ० ० p . . . . ० . क व . D . . . o/ भाषाटीकासहिता। 600| . . . b . . ०० 10 . ० ० ० 0 . . . . ० ५ a . . . D शुझमध्ये रव्यतरं तन्मध्ये विदशा। ] शुममध्य चंद्रांतरं सन्मभ्ये विदगा। मैं रा गु| केशुमारागुश ! के सुर . १ १ १ २ १ २ ३ २ १८० २१|२४|१८|२७|२१२१ ० २०५ २०/५/२५/ ५.१०० ० . . . ० ० ० शुक्रमध्य भौमांतर सन्मध्ये विदशा। शुकमध्य रातरं तन्मध्ये विशा। में | राग शबु । के। शुरचरा, गु श बु | केशरच मं २ १ २ २ ५ ६ १।३२.मा. २४१३२६६२९२४.१०.२१/५१३२४२११३३ ०२४/०1दि. ३० ०३०३०३०० . ० ० ०/०प. .. शुक्रमध्ये गुर्वतरं तन्मध्ये विदशा। शुक्रमध्येशन्यंतरं तन्मध्य विद्या । शबु | केशु शकेशु र चमेराम ५ ४ १ ५ २ १ ४।६५२ २|१६/२६/१०२८/१०/२६/२४/०११/६/१०/२७५ ३०/३०1३०० ३०० ०प. प शुफमाये सौम्यांतरं दम्मध्ये विदशा। शुक्रमध्ये कत्यंतर तामध्ये विदशा। बाकेशुार चंग गश के शुरचं मरा गुराउ ४ १ ५ ४ ५ ० २ ० २ २ २४/२५/२०/२१/२५/२९/३/१६/११/२४२०/२१/५/२४३ २६/६२९ ३०३० ० ०३०३० २० ०३० ० . . . o . . . रम ० . ० ० . . . . ० o . ... a . . . ० . ० . ० D ५ य ० . . . . इति विंशोत्तरीमध्ये सर्वपांग्रहाणामतर्दशामध्ये विदशा-एवं अष्टोनर्यादीनामपिज्ञेया उषं स्थाप्यो जन्मशाकः शकायो जन्मोत्पन्नः पद्मिनीप्राणनाथः । तद्वयतर्दशाब्दादियुक्त तस्मिन्शाके स्पष्टसूर्यो दशांते॥५०॥इतिदशा भापार्टीका-अम भुक्त भोग्यदशा अंतर्दशा विदशामें जन्मका शक और स्पष्टसूर्य जोडनेकी रीती कहते हैं ऊपर जन्मका शक लिखना और शक के नीचे जन्मसमयका स्पष्टसूर्य लिखना उसमें वर्षादिक भोग्यदशा युक्त करनेसे भाग्यदशाके उन समयका शुरु और मर्य होताहै सेमेही दशाके आरंतका शक पत्रीमार्गपदीपिका। और सूर्य अंतर्दशामें युक्तकरनेसे अंतर्दशाके उत्तीर्ण समयका शक और सूर्य होताहै और अंतर्दशाके आरंमका शक और सूर्य विदशामें युक्त करनेसे विदशाके उत्तीर्ण समयका शक और सूर्य होता है उदाहरण । स्पष्ट है विंशोतरी योगिनी अष्टोत्तरी दशाके चक्रमें शक और सूर्य युक्त किया उनचक्रसे समझना। इति दशांतर्दशाविदशानयनप्रकारः। अथामाम्यब्दसाधनम् । सौरवर्षदिनायेन हतेनान्दाः कतुल्यजः ॥ जन्मोत्थयुगणेनाच्या ईज्याद्वर्षमुखे गणः ॥ ११ ॥ आपाटीका-अब आगामि वर्षसाधन कहते हैं दिनादिक सौरवर्ष ३६५ । १५.३१।३० सें गतवर्पोकोगुणन करना और उसमें जन्मसमयका ब्रहीतुल्यका सायव महर्गण युक्तकरना गुरुवारकों आदिले वर्पके आरंभसमयका सावयव (वर्षमवेशकी इष्टघटी पल चिपल सहित ) अर्गण होवे ॥ ५१ ॥ विश्वनाथः। गणोधस्त्रियुक् त्याक्षिगोंगांशयुक्तः त्रिपदभक्त आतावमयुक्त ऊर्ध्वाखरामता सैकशेपं तिथि:ल्यात्फलं मासवृन्दं ततोऽधो द्विनिन्नात् ॥५२ ।। रप्तांगान्वितस्वेभनेत्राक्ष ९२८ लब्धाविही नादगाङ्गा ५७प्तभागोन उर्वः॥ हृतो भानुभिः १२ शेपक यात मासागताब्दाः फलं सेपुसेशं ११०५ शकास्यात् ।। ५३ ॥ भापाटीका महर्गणको नीचे लिसके उसमें ३ तीन मिलाना औररदो जगे लिसना एक जगे स्थापन किये उसमें ६९२ छः सो बानयेका भाग देना लब्ध १ ममतुत्यमा अगंग बनानकी यांचा मागे शा ५५ में की है। २.भन्मयमपीटी पर विपट सहित भगक साता भाग देना शेप यो सो गुस्सा बने तो शुमार बने तो शनिवार इसरमा गुणारसों आदि शेषण उसात गिनने सपनेझारा पार होता है।

जापाटीकासहिता । आवे वह दूसरीजगे लिखे हैं उसमें युक्त करना और उसके ६३ तिरसठका भागदेना लब्ध आवे वह ऊनाह जानना-ऊनाहकों ऊपर लिखे हुवे अहर्गणमें युक्त करना और ३० तीसका भागदेना शेष बचे उनमें १ एक मिलाना सो शुक्ल प्रतिपदाकों आदिले पर्पप्रवेशकी तिथि होवें और लब्ध आये वह मास गण जानना-फेर मासगणको नीचे लिखना और उसको दोरगुणा करना५२ फेर उसमें ६६ छाछठ मिलाके दो जगे लिखना एक जगे ९२८ नोसो अहा- ईसका भागदेना लब्ध आवे वह दूसरी जगे लिखे हुवेमेसे हीन करना शेप बचे उसके ६७ सतसठका भाग देना लब्ध आये वह ऊपर लिखे हुवे मासगणमेसे निकालना और उसमें १२ बाराका भागदेना शेष बचे यह चैत्रशुक्ल प्रति पदाकों आदिले गतमास जानना और लब्ध आवे वह गताब्द समूह जानना उनगताब्द समूहमें ११०५ इग्यारासो पांच मिलाना सो वर्षप्रवेशका शालिवा- हन शक होघे ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ गणेशदेवज्ञः। विश्वेश्यरुणेर्युक्तः १२३११३ ग्रहलाघव जो गणः । चक्रघ्नं नृपखान्थ्याढ्यं ४०१६ ब्रह्मतुल्योगणोभवेत् ॥५४॥ इत्यागाम्यब्दप्रवेशः। भापाटीका--अय ग्रहलाघवके अहर्गणपर ब्रह्मतुल्यका अहर्नण साधनकर नेकी युक्ति गणेशदैवज्ञ कहते हैं ग्रहलाघवके अहर्गणमें १२३११३ मिलाके फेर उसमें चक्र ४०१६ को गुणन करके मिलाना सो ब्रह्मतुल्यका अहर्गण होवे ॥ ५४॥ उदाहरण। ग्रहलाधवका अहर्गण ४०३९ में १२३११३ मिलाये १२७१५२ हुने इनमें ४०१६ को चक्र ३१ से गुणन करनेसे १२४४९६ आये इन को युक्तकिये २५१६४८ हुवे ये ब्रह्मतुल्यका अहण हुवा इमक नीचे जन्मसमयकी इष्टघटी ५६ पल ४८ विपल.१८ लिखनमे २५१६४८५६। ४८१८सावयव ब्रह्मतुल्यका अहर्गण हुवा ऐसे प्रथम ब्रह्मनुल्यका अहर्गण साधन किया अब आगामि वर्ष ३१ मा साधन करना है उसका उदाहरण ये है दिना- पत्रीमार्गप्रदीपिका। दिक सौर वर्ष ३६५।१५॥३॥३० सें गताइसंख्या ३० को गुणन किये १०९५१४५।४५१० हुवे इनमें जन्मसमयका सावयव ब्रह्मतुल्यका अहर्गण २५१६४८१५६४८१३८ युक्त किया २६२६०६।१२।३३।१८ ये वर्षा- रंगसमयका साक्यय अहर्गण हुया अहर्गण २६२६०६ में ७ सातका भाग दिया शेप १ एक बचा गुरुवारको आदिले गिननेसें शुक्रवार आया इसलिये शुक्यार के दिन इष्ट घटी ४२ पल ३३ विपल १८ से वर्ष ३१ इकतीसमां प्रवेश होगा परंतु किस शकके कोनसे मासकी कोनतिथीमें प्रवेश होगा इसका निश्चय होनेके वास्ते आगे उदाहरण श्लोक ५२।५३ का लिखते हैं- अहर्गण २६२६०६ को नीचे लिखा २६२६०६ इसमें ३ तीन मिलाये २६२६०९ हुवे इनको दो जगे लिखे २६२६०९ इसमें ६९२ छः सो बान- वेका भाग दिया लब्ध ३७९ आये इनको दूसरी जगे लिखे हुवे २६२६०९ में युक्त किये २६२९८८ हुवे इनमें ६३ तिरसठका नागदिया लब्ध ४१७४ ऊनाह आये इनको अहर्गण २६२६०६ में युक्त किये २६६७८० हुवे इसके ३० तीसका भाग दिया शेप २० बचे इनमें १ एक युक्त किया २१ हुवे ये यर्प मवेशकी तिथी हुई अर्थात् २१ इकईसमी तिथिके दिन वर्षप्रवेश होगा २१ इकईसमी तिथी शुक्ल प्रतिपदाकों आदिले गिननेसे कृष्णपक्षकी ६ पष्टीकों आती है इसलिये कृष्णपक्षकी छठके दिन वर्षप्रवेश होगा । और ३० का भाग देनमें लभ ८८९२ आये ये मासगण हुवा इसको नीचे लिखा८८९२ दो गुणा किया १७७८४ इसमें ६६ छांछर मिलाये १७८५० हुचे इनको दो जगे लिखे १७८५० इसमें ९२८ नो सो अठाईसका भागदिया लब्ध १९आये पे दूमरी जगे लिखे १७८५० मेसे हीनकिये शेष १७८३१ बचे इनको ६७ सतसठका भागदिया लय २६६ आये इनको मासगणमें ८८९२ में से घटाये शेप ८६२६ बने इसके १२ बाराका भागदिया शेप १० बचे इसलिये चैत्र शुक्र १ प्रतिपदाको आदिले गिनने माघ शुक्ल प्रतिपदातक गत १० मास दुवे और माघशुक्ल प्रतिपदाके आगे 11 माघमास वर्षप्रदेशका मास दुवा और लय बाराका भाग देनेसे आये ७१८ इनमें १०५ युक्त किये १८२३ ये वर्ष प्रवेशका शालिवाहनशक हृदा-अर्थात-शके १८२३ में-अमांत माघ भाषाकासहिता। (८७) कृष्ण ६ पठी शुक्रवारको श्रीसूर्योदयात् इष्टघट्यादि ४२।३३।१८ में ३३ इकतीसमां वर्षप्रवेश होगा. ऐसेही आरोष्ट गतान्दक सर्व आगामिवर्ष साधन करना ॥ इत्यागायब्दप्रवेशः। विद्यालये मालबसंजदेशे रत्नावतीरम्यनिवासवासी ॥ औदुंबरः पाठकवंशजातः सुपूज्यविद्यान्वितनंदरामः ॥१५॥ तत्पोत्रमन्त्रशास्त्रज्ञरेवाशङ्करसूनुना। महादेवेन रचिता पत्रीमा प्रदीपिका ॥५६॥ मावस्य शुक्लपञ्चभ्यां शोके माझछकैमिते ।। संपूर्णा भार्गवे बारे पत्रीमार्गप्रदीपिका ॥१७॥ भापाटीका-विधाकास्थान ऐमे मालवसंज्ञकदेशमें अतिरमणीय रत्नावती नगरी (रतलाम शहर) में निवास करनेवाले औदुम्बर ज्ञातीय पाठकवंशमें उत्पन्न उत्तम विधायुक्त नन्दरामजी हुये ॥ ५५॥ उनके पौत्र मोतीरामजीके पुत्र मंत्रशास्त्रके जानने वाले रेवाशंकरजी हुये, उनके पुत्र महादेव ज्योतिर्विदने पत्रीमार्गप्रदीपिका नाम ग्रन्थ बनाया ॥ ५६ ॥ यह पत्रीमार्गप्रदीपिका शालिवाहन शके १७९५ सबससे पंचाणयमें माघ शुक्ल पंचमी गवार के दिन संपूर्ण हुई ॥५७ ॥ इति श्रीमहादेवकतपत्रीमार्गप्रदीपिका संपूर्णा ॥ मार्गशीपसिते पक्षे द्वादश्यां गुरुवामरे। कक्ष्यष्टभूमिते शाके कतेऽय विवृति मया ॥ १ ॥ इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकतपत्रीमार्गप्रदीपिकापां वदात्मज श्रीनिवास ज्योतिर्विविरचितासोदाहरण मापाटीका समाप्तिमगमत् ।। १ कटपयवर्गभवारहपिडात्यरक्षरैरकाः ॥ नात्रे च शेप शून्य तया स्वरे केनले कवितम् ॥१॥ इस माचीन कारिकाके वचनानुसार म-के ५ अ-के ९-के ७ क-को १ ऐसे मा झक के अकों का अद्वाना वामतो गति इस कपसे १७९५ सतरासे पचानये होते हैं- ८८) पत्रीमार्गप्रदीपिका। अथ लोमशोक्तं सतवर्गवलचक्रम्. स्व. मिन्न | मित्र २०१८ ५ २ ७ ४ ar -- -- ३. १ १ १ ० . हौस. . ३० . ३ १ १ . . २ ४२ २ ३ ४५ o २ ३० १ ५२ ॥ १ १५ सप्त. । 1 १ २ १५ ३. ३ २२ ॥ ३ १ ३४ 1 नयां. ॥ २ . VE ३. । . 0 D . १५ 1 दशवर्गसंज्ञा. ७ ८ .. पारिजात सम | गोपुर सिंहासन पासवांदिवलौवांश देवलोकांशीरायत विकिपा चरकारकाः। भाम समारप धावा पिता पुत्र शति वी सर्व प्रदाम मधिक मंशा से पदभारमकारक उसयपमर भी प्रकारक मानना. दलिपीमार्गप्रदीपिया।

श्रीगणेशाय मम ।
अथ
भापाटीका सहित
श्रीमन्महादेवदैवज्ञविरचितं
वपदापकम्।
नत्या शुरुपदाम्भोजहेरम्मं शिवशारदम् ॥
वर्षदीपकग्रन्थस्य नृभापाविवृति लघुम् ॥१॥
कुचे वै श्रीनिवासोऽहं वालानां सुखहेतवे ।।
यत्रोनं ममाज्ञानाद्विवुधाश्च क्षमन्तु तत् ॥ २॥
भापाकार विघ्नविनाशार्थ गुरु गणपतीको नमस्काररूप मंगलाचरण करके
भापारचनाके प्रयोजनपूर्वक क्षमापन मांगता है
श्रीगुरु ( महादेवजी ) के चरणकमलको हेरम्ब ( गजानन ) को शङ्कर और
शारदा ( सरस्पति ) को नमस्कार करके मैं श्रीनिवासशर्मा वर्षद्वीपथकी
बालकोंको सुखरो पोध होने के लिये लघु (छोटीसी ) भापाटीका करताहूं, इस्मे
यदि मेरे अज्ञानसे जो कुछ क्षति रही हो उसे पंडितलोग पारम्बार क्षमा करें,
यह प्रार्थना है ॥ १ ॥ २॥
प्रथम शिष्टाचारपरिपालनार्थ और निर्विघ्नतासे ग्रन्थपरिसमाप्त्यर्थ अन्धकर्ता
स्वेटदेवको नमस्कररूप मंगलाचरण करते हैं ।
श्रीगणेश गुरुं नत्वा शुद्धा श्रीभुवनेश्वरीम् ॥
महादेवं महादेवः कुरुते वर्षदीपकम् ॥ १ ॥
भापाटीका-श्रीगणेशजीको गुरुजीको शुद्धस्फटिकसदृश निर्मलस्वरुपा श्री-
भुवनेश्वरीजीको और शंकरको नमस्कार करके महादेव ज्योतिर्विद वर्षदीपक
(वर्षके गणितमार्गका प्रकाश करनेवाला दीपक ) नाम ग्रन्थ करे हैं ॥ ३ ॥
प्रतिवर्ष जन्मग्रहोदयात्पूर्व जानीयात् ॥२॥
भापाटीका--वर्पवर्षके प्रतिजन्मके इष्ट चार यह लगादि प्रथम जानना
(हरवर्प बनाने के समय जन्माक्षरमें लिखेहुवे जन्मका पार इष्टघटी सष्टसूर्य लग्न
आदि पहले जानके वर्षके गणितका आरम्न करना ) ॥२॥

(९०) वर्षदीपकम् । सौरवर्षारंभाच्छक प्रवृत्तिवेदितव्या ॥३॥ भापाटीका-सौरैयर्पके आरंभसे (मेपसंक्रांति जिस दिन प्रवेश होडे उस दिनसे ) शककी प्रवृत्ति जानना | तात्पर्य यह है कि चैत्रशुद्ध प्रतिपदासे " मधोः सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्तिः" इत्यादि वचनोंसे जो भि- सम्बत् शककी प्रवृत्ति होती है तथापि "वर्षायन युगपूर्वकमन सौरान " इस वचनसे जवतक मेषसंझांति प्रवेश न होवे तबतक शक्रप्रवेश नहीं होता इस कारण मेपसंक्रांतिके प्रवेशके प्रथम और चैवशुद्ध १ प्रतिपदाके अनंतरका वर्ष करना हो तो पिछाडीके शकसे करना । जैसे सम्बत् १९५५ में मेषसंक्रांति वैशाखकण ६ पष्ठी भौमवार के दिन प्रवेश हुई है उसी दिनसे १८२० का शक प्रवेश हुवा इसलिये वर्पसाधनमें वैशाखकष्ण ६ पठीक पहले शके ॥ १८१९ ॥ ही मानके वर्ष करना ॥ ३ ॥ इएशके जनुः शकहीने गताब्दाः॥४॥ भापाटीका-टिराकममे ( जिस शकका वर्ष करना हो उस शकमेसे) जन्मसमयका शक हीन करनेसे शेष बचे वह गनान्द ( गतवर्ष) होवे ॥ ४ ॥ जन्मार्कतुल्योकों यत्समये वर्षप्रवेशस्तत्रैव ॥५॥ भापाटीका-जन्मसमयके सूयके समान ( बरोबर ) सूर्य जिसदिन जिस समय आवे उसदिन उससमयही वर्षप्रवेश होता है ॥ ५॥ यातान्दाः सप्ताधिकसहलहताः खाने भासा जन्मवारादि युता वर्षप्रवेशवारादिवोधकाः ॥ ६॥ भापाटीका ताब्दीको ( गतवर्पोको ) १००७ एक हजारसात गुणे करना ८०० आठसेका भागदेना लब्ध आये हुवे चार घटी पल विपला. मक चार फलमें जन्मसमयके वारादिक ( चार इष्ट घरी पल विपल ) युक्त करना वर्षमवेशके वारादिक (पार इष्ट घटी पल विपल) का बोधहो अर्थात (गत वपोको १००७एकहजार सात गुणे करके८०० आठसेका आगदेना लपाये वह पार जानना शेप चे उनको ६० साठ गुणे करना और ८००का भाग देना लब्ध घी आवे शेष पचे उनको ६० साठ गुणे करना ८०० का भाग देगा १ सिदान्तशिरोमणी-पेमभागोऽवर्ष पदिष्टमिति ।।

आपाटीकासहितम् । १६अंशके समान अंश और वर्ष प्रवेश का वार बुध अमांत माघकृष्ण १४ के दिन मिलता है इसलिये सम्बत १९५६ शके १८२१ प्रवर्तमान्ये अमांत मावरुष्ण १४चतुर्दशी बुधवार के दिन श्री सूर्योदयात् घट्यादि इष्ट ११ १३० । १८ समयमें वर्ष २९ प्रवेश हुवा गताब्द २८ इाले श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकाख्यतानिक यंथेतदहन श्रीनिवासविरचितायांसोदाहरणभाषायाख्यायामब्दपवेशाध्यायः प्रथमः ॥ १॥ इएवारादिषुपातितगतपतिवारादिषु शेपो दिनायो धनम् ॥ १॥ भापाटीका-अपने इष्ट पारादिकमेसे पिछाडीकी गई हुई समीपकी पंक्ति (अवधी ) के वारादिक (वार इष्ट घटी पल) हीन करनेसे शेष बचे वह दिनादिक चालक होवे ॥१॥ आगामि पशिवारादिषु पातितेप्टवारादिषु शेपो दिनाचरणम् ॥ २ ॥ भापाटीका आगेकी पति के वारादिक ( वार इष्टघटी पल ) मेंसे पिछाडीके अपने इष्ट वारादिक हान करनेसे शेष बचे वह दिनादिक ऋण चालक होये ॥२॥ (अवधीके वारादिकमेंसे अपने वारादिक हीन करमेंसे ऋण और अपने वारादिकमेंसे अवध के यारादिक घटागेसे धन चालक होता है ) दिना गतिने पष्ठयातेंशादिस्तेन पटिस्थग्रहे संस्कृते स्पष्टः खगोवकेतु वैपरीत्यं संस्कृती ॥३॥ भापाटीका-दिनादिक बालकको गतीसे गुणन करना ६० साउका भाग देना आपे जो अंशांदिकफल ( अंश कला विकलात्मक ३ नीन फल ) उनका पाहे ( अवधी ) के यहमें संस्कार करनेते (चालक धन हो तो युक्त और मरण हो तो हीन करनेसे) सार यह होये. और ग्रह यऋगती होये तो उन्ही अंशादिक फलोंका विपरीत संस्कार करना अर्थात् चालक धन हो तो ऋण और रण हो तो धन करना ॥३॥ गतर्शनाड्यः पष्टिशुद्धाः प्रथक स्थाप्याः ॥ ४ ॥ भापाटीका-गत नक्षत्र (जिस नक्षत्रमें वर्ष प्रवेश हो वह इट नक्षत्र इसके पीछेका गयाहुवा गत नक्षत्राको घटी पलोंकी साठमसे शोधकर दोनो लिसना ४॥ १ साउका भाग दफ अंशादिक फट टानकी गति उदाहणमे स्पष्ट रिसाद (२) वर्पदीपकम् । अधजन्माइम. जासू १२ ग ०० जन्म पत्रिका वर्षपत्र अमीष्टशक १८२१ का करना है इसलिये शके १८२१ मेंसे जन्मशक १७९३ घटाया २८ शेष बचे गताब्द हुवे इनको १००७ से गुणे किये २८१९६ हुये इनमें ८०० आठसेका जाग दिया लब्ध ३५ पार आये शेप १९६ वचे इनको ६० साठ गुणे किये ११७६० हुने फेर इनमें ८०० आठसेका भाग दिया लब्ध १४ घटी आई शेप ५५० बचे इनको फेर ६. साठ गुणे किये ३३६० हुवे ८०० का भाग दिया लब्ध पल ४२ आई शेष ० बची इस्को ६० गुणी करनेसे ० हुई ८०० का भाग दिया लब्ध शून्य विपल आई० ऐसे आठसेंका भाग देके लब्ध वार३५ वटी १४ पल ४२ पिला त्मकचारफल आये इन्में जन्म समयके भौमवार के ३ इष्टघटी ५६ पल ४८ पिपल १८ मिलाये ३९ । ११।३०१८ हुवे वार ७ सातसें अधिक है अतः वार ३९ में सातका भाग दिया शेप ४।११।३०।१८ ये वर्ष प्रवेशके वार घटी पल विपल हुवे. तिथि साधन। गतान्द २८ को ११ गुणे किये ३०८ हुवे इनको दो जगे लिखे ३०८ एक जगे १७० का भाग दिया लब्ध १ एक आया ये ३०८ में युक्त किया ३०९ हुचे इनमें सप्णपक्षकी ४ चतुर्थीका जन्म है इससे शुक्ल प्रतिपदाले ४ पर्यंत गिननेते जन्मतिथि १९हुई ये मिलाये३२८ हुवे इनगं३०तीसका भाग दिया रोष २८ वचे ये वर्ष प्रवेशको तिथि हुई शुमतिपदाको आदि ले गिननेसे २८ मठाईसमी कृष्णपक्षको १३ त्रयोदशी आई परंतु त्रयोदशीके दिनवर्ष प्रदेशका वार बुध नहि मिलता है इस कारण इसमें . १ एक तिथि युक्त करनेसे १४ चतुर्दशी हुई एवं तिथि निभय होने के नंतर जन्म ममयके स्पष्ट मर्यकी १० राशी १ववारसे वार गिने जाते हैं। -. H ॥ भापारीकासहितम् । १६अंशके समान अंश और वर्ष प्रवेश का वार बुध अमांत मावकष्ण १४ के दिन मिलता है इसलिये सम्बत १९५६ शके १८२३ प्रवर्तमान्ये अमांत मावश्ष्ण १४चतुर्दशी बुधवार के दिन श्री गूर्योदयात् घट्यादि इट ११ ॥३० । १८समयमें वर्ष २९ प्रवेश हुवा गवान्द २८ हाते श्रीन्योतिर्विदश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकाख्यतानिस्यथेतदनन श्रीनिवासविरचितार्यासोदाहरणभाषाश्याख्यायामब्दप्रवेशाध्यायः प्रथमः ॥१॥ इटवारादिषुपातितगतपतिवारादिपु शेपो दिनायो धनम् ॥ १॥ भाषाटीका-अपने इष्ट पारादिकमेसे पिछाडीकी गई हुई समीपको पंक्ति (अयधी) के वारादिक (पार इष्ट घटी पल) हीन करनेसे शेष बचे वह दिनादिक धन चालक होवे आगामि पतिवारादिपु पातितेष्टवारादिषु शेपो दिनाधणम् ॥ २॥ भापाटीका आगेकी पति के वारादिक ( वार इष्टघटी पल ) मेंसे पिछाडीके अपने इष्ट वारादिक हीन करनेसे शेष बचे वह दिनादिक ऋण चालक होये ॥२॥ (अवर्धाके चारादिकमेंसें अपने वारादिक हीन करनेसे प्रण और अपने वारादिकमेंसे अव के धारादिक घटागेसे धन चालक होता है । दिनायेगतिने पष्टचाप्तेंशादिस्तेन पतिस्थग्रहे संस्कृते स्पष्टः खगोषकेतु वैपरीत्यं संस्कृतौ ॥३॥ भापाटीका- दिनादिक चालक को गतीसे गुणन करना ६० साठका भाग देना आवे जो अंशादिकाल ( अंश कला विकलात्मक ३ तीन फल ) उनका पाई ( अवधी ) के ग्रहमें संस्कार करनेसे (चालक धन हो तो युक्त और मरण हो तो हीन करनेसे) स्पष्ट ग्रह होवे. और यह वक्रगती होवे तो उन्ही अंशादिक फलोंका रिपरीत संस्कार करना अर्थात् चालक धन हो तो कण और ऋण हो तो धन करना ॥३॥ गतर्शनाड्यः पष्टिशुद्धाः प्रथक स्थायाः ॥ ४॥ भापाटीका-गत नक्षत्र ( जिस नक्षत्रमें वर्ष प्रवेश हो वह इष्ट नक्षत्र इसके पोछेका गयाहुवा गत नक्षत्राको घटी पलों को साठ से शोधकर दोजगे लिखना ४॥ १ साउका भाग फ अंशादिक फल लानेकी रीति उदाइनमे स्पष्ट रिखी हे (९४) वर्षपदीपकम् । एकवेष्टपट्याच्याभयातम् ॥५॥ भाषाटीका-एक जगे इष्ट घटी पलयुक्त करना जयात होवे॥ ५ ॥ इतरत्रेप्टक्षेपटयाच्याभभोगः ॥६॥ भापाटीका--दूसरी जगे इष्टनक्षत्र (इष्ट समयमें वर्तमान नक्षत्र) कीपटी पलयुक्त करना मनोग होवे ॥ ६ ॥ पष्टिघ्नं भयातं भभोगेनाप्तं स्पष्टं भयातम् ॥७॥ भापाटीका-यानको साठ ६० गुणा करना मनोगका नाग देना लब्ध घट्यादिक स्पष्ट आयात होये ( भयातको साठ गुणा. करके भोगका भाग देना लब्ध घटी आवे शेष बचे उनको ६० साठ गुणा करके फेर भमोगका भागदेना लब्ध पल आवे शेष बचे उनको साठगुणे करना फिर मभोगका भाग देना लब्ध विपल आवे ऐसे घटयादिक फल तीन आये वह स्पष्ट भयात जानना) ॥ ७ ॥ गतसिंख्या पष्टिना भयातान्विता द्विघ्ना नवाप्तोऽशादिरिंदोः ॥८॥ भापाटीका-साठगुणी कीहुई गत नक्षत्रकी संख्यामें स्पष्ट भयात युक्त करके द्विगु- ण (दोगुणी ) करना और नयका भाग देना लब्ध आर जो अंशादिक फल ३५. ह अंशादिक स्पष्ट चंद्रहोवे गत नक्षत्रकी संख्याको ६० साठ गुणी करके उसमें स्पष्ट भयात मिलाना और उसको दोगुणी करना उसको नव ९ का भांग देना लब्ध भंश आवे शेष बचे उनको साठगुणे करना नीचेको पल मिला ना फेर ९ नपका भाग देना लब्ध कला आवे शेष बचे उनकों फेर साठगुणे करना नीचे लिखी विपस मिलाना और ९ नवका भाग देना लब्ध आवे वह विकला नानना ऐसे अंश कला विकलात्मक फल तीन लावे वह स्पष्ट अंशादि चंड होवे अंशमं तीतका भाग देना लब्ध राशी शेप अंश समझना. ॥ ८॥ खखाएमभोगेन भक्ता अंशात्मिका गतिः ॥ ९ ॥ भापाटीका-आठसौद १०० जोगका भाग देना लब्ध आवे फल तीन वह अंशारिक चंद्रकी सष्ट गति होवे ( अंशको६० साठ गगे करके कला मिलानेसे कलादिकगती होवे) ॥ १ ॥ १ अधिनानसमको मादिले गत नक्षप्रायन गिनने से जो संख्या इथे उस्को- मापाटीकासहितम् । (९५) जनुरुदयभादिषु भांकमात्रे गताब्दांकयोगेऽकभक्ते मुन्था ॥१०॥ भापाटीका-राश्चादिक ( राशि अंश कला विकलात्मक ) जन्म लमकी केवल राशिक अंक मेंही गताइसंख्याका अंक युक्त करना १२ पाराका भाग देना शेष बचे वा मुन्था जानना ॥ १० ॥ सूर्येकांशभोगकाले मुन्था पंचकला भुनक्ति ॥१३॥ भापाटीका-सूर्यके एक अंशके भोगसमयमें मुन्था पांच कला भोगतो? प्रतिदिन मुन्था ५ पांच कला चलतीहै) ॥ ११ ॥ उदाहरण. अमांत माघ कृष्ण १४चतुर्दशी बुधवारके दिन इष्ट ११।३०।१८। सेवर्ष प्रवेश हुवा इसके समीपकी पंक्ति ( अवधि ) पंचांगमें उसी दिन इष्ट २२ । १की है वर्षप्रवेशसमयसे भागेकी है इसलिये सूत्रके अनुसार अवधीके वारादिक ४ । २२ । १ मेंसे वर्षप्रवेशके इष्ट पारादिक ४ । ११ । ३० घटाये शेप । १० । ३१ बचे ये दिनादिक ऋण चालक हुवा- इस दिनादिक चालक • । १० । ३१ को सूर्पकी गति . . ० ६० । १९ से गोमूत्रिका लिखके गुणन किया सो ये आये. नंबर १ ४नंबर इनमें नंबर के अंकमे६०साठका भाग देके लम्भ ९आये २६०० उनको नंबर पांचके अंकोंमें युक्त करके नंबर पांचके ३ १८६०५८९६ अंकोंको नेपर ३ तीनके अंकग और देबर ४ चारके अंकों की नंबर २ दोक नंबर . "अंकोंमें मिलाये सोये हुपे फिर नयर ३ तीनके अंकम ६० साठ का नाम दिया लब्ध ३४ आये इनको नंबर टोक अंकोमें २६०० मिलाये ६३४ हुये इनमें ६० साठका भाग दिया लब्ध १० ३२०५९ कला आई शेप ३४ विकला रही फेर कला १० में ६० साठ का भागं दिया लब्ध अंश आया ऐसे साठका भाग देनेसे अंगादिक । १० । ३४ फल आये इनको अवधीमें स्थित सूर्य १० 1 १७ ! ४ । ७ में मण किये १ ० १ १६ । १३ । ३३ शेष बचे ये स्पष्ट सूर्य हुया इमीप्रकार 3 (९६) वर्षमदीपकम् । शेष सर्व ग्रह किये परंतु राहु वक्रगती है इसकारण राहुको गति ३ । ११ से चालक । १० । ३१ को उक्त रीतिसें गुणन करके ६० साठका भाग देके • 1 0 1 ३४ अंशादिक फलोंका अवधीमें स्थित राहु ७१ २३ ॥ ४०। ४० में विपरीत संस्कार किया अर्थात् चालक ऋण हैं इसकारण धन किया ७१२३1४11१४ राहु सार हुया । आये हुये स्पष्टचन्द्र साधन ११ इष्ट. ३० घटी. २९ भयान ३९त. वर्षप्रवेशके दिन धनिष्ठावटचा दिक ३७ । ५६ है-वर्ष प्रवेश धनिटा नक्षत्र में हुवा है अतएव धनिष्ठा इष्टनक्षत्र और श्रवण गतनक्षत्र हुया--गतनक्षत्र श्रवण । की घटी ४१ पल ५१ को मूत्र ४ के अनुसार ६० साठ घटीमेंसे हीन किया १८१९ शेष बचे इनको दो जगे लिखे १८ । ९ एक जगे इष्टघटी ११।३० युक्त की २९ ! ३९ अयात हुवा दूसरी जगे इट) १८ नान धनिष्ठाकी घटी ३७पल ५६ मिलाई ५६ ५ मनोग हुवा- भयानको ६० साठ गुणा करके १८३७ इटनक्षत्र: ५६ भभो भभोगका भाग देना है परंतु यात मनोग दोनों घट्यादिक है अतःप्रथम इन को सवर्णित किये भयात १७७९ भोग ३३६५ हुचे तदनंतर यात १७७९ को ६० साठ गुणा किया १०६७४० हुवे इनमें भोग ३३६५ या भाग दिया लम्भ ३१ घटी आई शेष २४२५ बचे इनको ६० साठ गुणे किये १४५५०० हुये भोग ३३६५ का भाग दिया लब्ध ४३ पल हुई शेप ८०५ बचे उनको ६० साठ गुणे किये ४८३०० हुवे इनमें फेर ३३६५ का भाग दिया लब्ध १४ विपल आई ऐसे घट्यादिक ३१ । ४३। १४ स्पष्ट भयात हुआ तदनंतर अश्विनीसे गत नक्षत्र श्रवण पर्यंत गिननेसे २२ रुपा आई ये गत नमत्रकी संख्या आई इसको६० साठ गुणीकी १३२० हुई इसमें स्पष्ट भयात ३१ । ४३ । १४ युक्त किया १३५३ । १३ । १४ हुने इनको २ द्विगुण किये २७०३ 1 २६ ॥ २८ हुवे इनमें ९ नवका भाग दिया लब्ध ३०० अंश आये शेष ३ बचे इनका ६० साठ गुणेकिये १८० हुवे इनमें नीचेके पल के अंक २६ मिलाये २०६ हुवे इनमें नवका भाग दिया लभ २२ कला आई शेप ८ बचे इनको ६० साठमुणे किये ४८० हुये विपलके भंक २८

भापाटीकासहितम् ।
मिलाये ५०८ हुवे ९ का भाग दिया ५६ विकला आई शेष ९ का भाग देके
उत्तरीतिने अंशादिक फल ३ लाये३००।२२।१६ ये अंशादिक स्पष्ट चंद्र हुवा
अंशमें ३० तामझा भाग दिया लन्ध १० राशी शेप अंशयचे इसमकार स्पष्ट-
चंद्र १००।२२।५६ राश्यादिक हुवा ।
गतिसाधन ।
आठसौ ८००० में मभोग५६।५का भाग दिया परंतु दोनु घट्यादिक है इसलिये
दोनोंको प्रथम सवर्णित किये जाज्य ४८००० भागक ३३६५ हुवे भाज्यमें
माजकका भाग दिया लब्ध अंशादिक १४१५१५२ चंद्रको स्पष्ट गति हुई अंश
१४ को ६० साठगुणे करके १५ मिलानेसे ८५५।५२ कलादिक गति हुई.
मुंथासाधन।
जन्मलन ९।२३।२८।२९ की राशी ९ के अंकमें गताब्द संख्या २०
युक्त किये ३७।२३।२८१२१. हुये १२ बाराका भाग दिया शेप १॥२३॥२८॥
२९ युंथा हुई गती ५०
अथ स्पष्टाः ग्रहा: सलवा।
१०१७ |१०|११४७११८ १
११८/२५/१२३३२३
५३ २२ |३१/३५/५६ २५४४१४१०८
३९५६ ६८/५५/४८५११३/१३२९
६०८५५४८/७५/५७१/४/३/३४/५
१९/ ५२/५०३२/३२/३२/९/११/.
नागी गोदनास्त्रिदन्ताः क्रमोत्कमा मेपादीनां लंकोदयपलानि ॥ १२॥
भापाटीका-नाग कहिये ८ कक्ष कहिये २७ ऐसे २७८ गो पहिये १
अंक कहिये ९ दस कहिये ऐसे २५९ त्रि कहिये तीन ३ दंत कहिये ३२
पसे ३२३ ये क्रमसे और उत्कम ( उलटे) से मेपादिक राशियों के लंकोदय
पल जानना ॥ १२॥

२९भयान ३० पटी. (१६) वर्षपदीपकम् । शेप सर्व यह किये परंतु राहु वक्रगती है इसकारण राहुकी गति ३ । ११ से चालक । १० । ३१ को उग रीतिसे गुणन करके ६० साठका भाग देके आये हुये • । ० १ ३४ अंशादिक फलोंका अवधीमें स्थित राहु ५। २३ । ४०। ४० में विपरीत संस्कार किया अर्थात् चालक मण हैं इसकारण धन किया७१२३४१।१४ राशी हुवा । स्पष्टचन्द्र साधन वर्षप्रवेशके दिन धनिष्ठापट्या दिक ३७ । ५६ है-वर्ष प्रवेश पनिठा नक्षत्र में हुवा है अतएव धनिष्ठा इष्टनक्षत्र और श्रवण गतनक्षत्र हुवा-गतनक्षत्र श्रवण की घटी ४१ पल ५१ को मूत्र ४ के अनुसार ६० साठ वटीमेंसे हीन किया १८१९ शेष बचे इनको दो जगे लिखे ३८।९ एक जगे इष्टघटी ११:३० युक्त की २९ ! ३९ भन्यात हुवा दूसरी जगे इष्ट| १८, ११ इष्ट. नक्षत्र धनिष्ठाकी वटी ३७पल ५६ मिलाई ५६ ५ भोग हुवा- भयातको ६० साठ गुणा करफे ९५६ पटी. | १८ ३७ इष्टनक्षन. ५६ भभो मोगका भाग देना है परंतु अयान भोग दोनों घट्यादिक है अतःप्रथम इन को सवर्णित किये भयात १७७९ भलोग ३३६५ हुये तदनंतर अपात १७७९ को ६० साठ गुणा किया १०६७४० हुवे इनमें अमोग ३३६५ का भाग दिया लन्ध ३१ घटी आई शेप २४२५ बचे इनको ६० साठ गुणे किये १४५५०० हुचे भोंग ३३६५ का भाग विषा लन्य ४३ पल हुई शेप ८०५ बचे उनको ६० साठ गुणे किये ४८३०० हुये इनमें फेर ३३६५ का भाग दिया लब्ध १४ विपल आई ऐसे घटत्यादिक ३१ । ४३ । १४ स्पट भयात हुआ तदनंतर अश्विनीसे गत नक्षत्र श्रवण पर्यंत गिननेते २२ संस्था आई पे गत नसत्रकी संख्या भाई इसको६ ० साठ गुणीकी १३२० हुई इसमें स्पा यात ३१ । ४३ । १४ युक्त किया १३५। । ४३ । १४ हुवे इनको २ द्विगुण किये २७०३ ॥ २६ ॥ २८ हुवे इनमें ९ नवका भाग दिया लब्ध ३०० अंश आये शेप ३ बचे इनका ६० साठ गुणेकिये १८० हुने इनमें नीचे के पल के अंक २६ मिलाये २०६ हुवे इनमें नवका भाग दिया लब्ध २२ कला आई शेप ८ बचे इनको ६० साठरणे किये १८० हुये विपलके अंक २८ भापाटीकासहितम् । लंकीदयोंकी पलादिकगतिका चक्र. मे.वृ.१ मि. २ क. ३ सि फ.५ तु ६ पृ. ७.८ म.कु १०मी.११ . D ० . . . . D D १० १० १० १० १६५८१६ ४६ ५८ १६ । १६ ४६ रतलामशहरके स्वदेशोदयोको पलादिगतिका चक. मि.मि.२३सिक ५ ६ ७.८ म.कु.१०मी.११ . 0 . . . . . . o ० ८ ७ १० ५८ ११ २० ५८ २० शके वेदवेदाध्यूनेऽयनांशकला ॥ १५ ॥ भापाटीका-शकमसे४४४चार चम्मालीस हीन करना शेष बचे यहअय ला होती हैं(कलाके६०साठका माग देना लब्ध अंश शेप कला समझना) ॥१५॥ उदाहरण। जैसे शके १८२१ का अयनांश करना है अतः शके १८२१ मेंसे ४४४ चा रसे चुम्मालिस हीन किये १३७७ ये अयनांश कला हुई इसके ६० का भाग दिया लब्ध२२अंश शेप ५७ कला बची यह अंशादिक अयनांश हुवा ॥१५॥ अयनांशहीने चकांशेऽवशिष्टांशाधस्ताच्छन्यत्रयं लेख्यम् ॥१६॥ भापाटीका-अयनाशको चक्रांश (३६० अंशों) मेंमे हीन करना शेपरचे हुवे अंशके नीचे तीन शून्य लिखना ॥ १६ ॥ ततत्रिंशत्रिंशदंशकोप्टके मेपादिगतियोगे भावाङ्गपत्रे ॥ १७ ॥ भाषाटीका-नानंतर तोस२ अंशोंके कोष्टकोमें लंकोदेय और स्वदेशोदयकी मेपादिक राशियोंकी पलादिक गति ऋमसे (प्रथम मेपकी तदनंतर वृपनकी फेर मिथुन कर्क सिंह इस कमसे बारहों राशियोंकी पलादिक गती) युत करना भावपन और लमात्र हो अर्थात लंकोदयोंकी मेपादिक राशियोंकी पलादिक मति युक्त करनेसे भावपत्र और स्वदेशोदयकी मेवादिक राशिपोंकी गति कमसे युक्त करनेसे लमपत्र होता है ॥ १७ ॥ उदाहरण प्रथम तानसेसाठ ३६० कोएकके दो चक्र बनाना उनके दक्षिण तरफ मेपादि १२ बाराराशी लिखना ऊपर शुन्यको भादि ले २९ गुननीमपर्यन अंग लिखना तदनंतर अयनारा हीन करना३६० तानसेमा अंशमगे और जो गेष वचे उस कोठकके तीसका नाग देना स्व्यगारी शेष अंश बचेंगे उस राशी

(१००)
वर्षपदीपकम् ।
अंशके नीचे तीन तीन शून्य लिखना जैसे अयनांश २२।५७ हैं यह २३ तेईसके
समीप है इसरो३६ २३हीन किये३३७शेप घचे इसके तीस३०का माग दिया
लब्धपराशी शेष ७ अंश रहे इससे विना परिश्रम शीघं ज्ञात होगया कि ११
मीनराशी के ७ सातअंशके नीचे तीन शून्य लिखना ऐसे तीन शून्य लिसके फेर
कमसे मेपादिक राशियोंकी पलादिक गति मिलाई भावपत्र और लम्पत्र हुचे.
भावपत्रसर्वत्र अयनांश २३१०१०
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भानुभाशनं लग्नपत्रकोष्ठिकमिष्टान्वितं तन्न्यूनकोप्टनं भाशं
भानुकलाधन्वितं तत इटाल्पकोष्टांतरेल्पेप्यकोष्टांतरेणाप्त-
मंशादिफलं पूर्वत्र योजितं लग्नं भवेत् ॥ १८ ॥

(१०२)
वर्पप्रदीपकम् ।
भापाटीका-सूर्यकी राशी अंश प्रमाण लमपत्रके कोटकमें इस घटी पल विपल
युक्त करना ( उससे इष्ट युक्त किये हुये कोप्टकसे ) अल्पकोष्टकके राशी अंश
लेना ( जिस कोष्टकमें इष्ट युक्त किये हुवे कोष्टकसे किंचित् न्यून अंक मिले
उसके सामने जो राशी और ऊपर जो अंश होये वे अंश लेना) राशी अंशके
नीचे स्पष्ट सूर्यकी कलापिकला युक्तं करना तदनंतर इष्ट युक्त किये हुवे कोटक
और अल्प कोप्टकके अन्तर करे इष्टयुक्त कोष्टकमेंसे अल्पकोटकको हीन करे
शेष बचे उस्में अल्पकोष्टक और उसके आगेका ऐष्य कोष्टकका अंतर करके
भाग देना लब्ध आये जो अंशादिक फल ३ तीन यह प्रथम आये हुचे राश्या-
दिकमें युक्त करना लम स्पष्ट होवे ॥ १८ ॥
लग्नपत्रस्थभानुभांशजकोष्टं स्वाधःस्थितसप्तमकोप्टकादीनं
दिनमानम् ॥ १९॥
भापाटीका-सूर्यको राशी अंशममाण लमपत्र में जो कोष्टक है उसको अपने
नीचे सातमें कोटक से हीन करना शेष बचे वह दिनमान जानना ॥ १९ ॥
तच्चपटिशुद्धं रात्रिमानम् ॥ २० ॥
भापाटीका-दिनमानको ६० साठ से शोधना रात्रिमान होवे ॥२०॥
सूर्योदयादिष्टे राज्ययुते तुर्यभावेष्टम् ॥ २१ ॥
भापाटीका-सूर्योदयाव घट्यादिक इष्ट समयमें रापई ( रात्रिमानका
मर्द ) युना करना चतुर्थ भावका इष्ट होवे ॥ २१ ॥
एतदादाय भायपत्रतो लग्रक्चतुर्थभावसाधनम् ।। २२ ।।
भाषाटीका-इमप्रकार चतुर्थ भावका इष्ट लाकरके भावपत्रेपर लगसाधन-
की गतिक अनुमार ( जैसे लम लाये है उसी तरहसे) चतुर्थ भावका साधन
टनशोधिततुर्यपष्ठांशी लग्ने पञ्चवार योज्यस्ततत्सपष्टांशोरूपाच्छु-
दस्तुयें पंचवार योजितश्चेल्लमादयस्ससंधयः पइभावाः ॥ २३ ॥
भापाटीका-टम निकले हुवे चतुर्थ भारफे पठाराको(चतुर्थ भावममे लमकों
हीन करनाशेप वचे संपादिक उसकी रागीके अंकमंछका भाग देनालन्ध राशी
भाषे शेपरचे उनको नौस३० गुणे करके नीचे के अंश मिलानाइडका भाग देना
सम्पमंश मारेरोप परे उनका६० साठगुणे करके नीचेकी कला मिलाना फेरद
करना ॥२२॥

भापाटीकासहितम् । (१०३) छका भाग देना लब्ध कला आवे शेपजचे उनको ६० साठ गुणेकरके विकला मिलाना फेर६ छका भाग देना लब्ध पिकला आवेशेष बचे उनको फिरद माठ गुणेकरके ६ छका भाग देना लब्ध आवे वह प्रतिविकला जानना-ऐसे६छका भाग देनेसे राश्यादिक फल आवे वह पष्ठांश होता है उस पष्टांशको लममें पांचवार युक्त करना तदनंतर फिर उस पठांशको एकराशिमसे(310101010)शोधके चतुर्थ भावमें पांचवार मिलवि तो लमको आदिले संधीसहित ६ छ भाव होये ॥२३॥ एते पड्भोनाः शेपाः पड्भावाः ॥ २४ ॥ भापाटीका-इन छही भावोमसे छः छः राशी हीन करनेसे शेष रहे हुवे छहों भाव होवे ॥ २४ ॥ ग्रहःस्वाधिष्ठितभावारम्भसंधितो न्यूनो गतभावोत्थं तादग्विरामसंध्यधिक उत्तरभावोत्थं फलं प्रयच्छति ॥२५॥ भापाटीका-यह जिस भावमें स्थित होवे उस भावकी आरंम (पहलेकी) संधिसे न्यन (कमती ) हो तो गतभावजनित (पीछेके भावका ) फल देवे तैसे ही विराम (आगेकी ) संघिसे अधिक हो तो उत्तर ( आगेके) भावजनित हलको देवे ॥ २५॥ ग्रहसंध्यंतरं नखन्नं भावसंध्यंतरेणाप्तं फलं विंशोपकाः ॥२६॥ भापाटीका-ग्रहसंधिके अंतरको ( ग्रह जिस भावमें स्थित होवे उस भावसे कमती हो तो आरंभसंधिके साथ और भावसे ग्रह अधिक हो तो विराम (आगेकी) संधिके साथ अन्तर करके । बीसगुणा करना और भावसंधिके अन्त- रका (जिस संधीसे यहका अंतर किया है उसी संधीसे भावके साथ अंतरकरके) भाग देना फल आवे वह विंशोपका जानना और यदि यह आरंभसंधिसे न्यून हो वा विराम संधिसे अधिक हो तो जिस भाव और संधिक बीचमें मह होवे उस भाव और सधिका अंतर करके यह संधिक अंतरमें भाग दना अर्थात् आरंगासंघिसे ग्रह न्यून हो तो पहले भाय और संघिसे अंतर करना और ग्रह आगेकी संधित अधिक हो तो आगेके भावसे संधिका अंतर करके बीसगुणेकिये हुचे ग्रह संधिके अंतरमें गाग देना फल विंशोपका होदेश २६॥ इति ग्रहभावाध्यायः।

(१०४) वर्षपदीपकम् । उदाहरण। 1 पटसूर्य १०1१६१५३१३९ है इसकी राशी ३० अंश १६ के प्रमाण लमपत्र में काटफ देखा ५७।२१।६है इसमें इष्ट घट्यादि१११३०।१८ मिलाया६८१५१ २४ हुवे घटीका अंक ६० साठसे अधिक है अतः साठका भाग दिया शेप ८ ५११२४ रहे यह इष्ट युक्त किया ह्रया लमपत्रका कोष्टक हुवा इस इष्टयुक्त कोष्ट- कसे अल्पकोष्टक लगपत्र ८४५१४८ एक १ राशी ११ ग्यारा अंशके कोष्टकमें गिळताहै इस कारण १ वृपराशी ११ अंश लिये इसके नीचे सूर्यको कला ५३ विकला ३९ युक्त किया ॥११॥५३॥३९ हुवा तदनंतर इष्टयुक्त कोष्टक ८1५।२४ और अल्पकोष्टक ८।१५।४८का अंतर किया० । ५। ३६ा हुवा इस्में अल्प कोष्टक ८।४५॥४८ और ऐष्य कोटक ८ । ५६ । । के अंतर ० । १० । १२का नाग दिया परंतु भाज्य भाजक दोनों पलादिक हैं अतएव इनको सवर्णित किये माज्य ३३६ भाजक ६१२ हुवे भाज्य में भाजकका भाग दिया लब्ध शून्य अंश आया शेप बचे ३३६ को६० साठ- गुणे किये २०१६० हुवे इनमें फिर ६१२ भाजकका माग दिया लब्ध ३२ कला आई शेष ५७६ बचे इनको ६० साठगुणे किये ३४५६ ० हुवे इनमें भाजकका (६१२) भाग दिया लब्ध ५६ विकला आई ऐसे अंशादिक ०३२ ।५६ फल तीन आये इनको प्रथम आये हुवे राश्यादिक ११११५३३३९ में युक्त किये १११२।२६।३५ हुँचे ये राश्यादिक स्पष्ट लग्न हुवा । दिनमानसाधन । सूर्यको राशी १० अंश १६ प्रमाण लगपत्रिका कोष्टक ५।२१।६ को अपने नीचे के सातमें कोटक २६।९।४२ मेंसे हीन किया २८१४८१३६ दिनमान हुवा । रात्रिमानसाधन। दिनमान २८१४८३६ को ६० साठ से शोधा ३१।११।२४ रात्रिमान हुवा इसको आधा किया १५.३५.४२ राज्य हुया । चतुर्थभाव इष्टसाधन । दियाद रट 11॥३०11८ में रापई १५ । ३५ । ४२ युक्त कियाँ २७१६।० चतुर्थ भापका इष्ट हुवा ।

भापाटीकासहितम् ।
चतुर्थभावसाधन।
स्पष्टसूर्य १०।१६।५३३९ की राशी १० अंश१६ प्रमाण भावपत्रका
कोष्टक ५६।४५।२४ में चतुर्थनावका इष्ट २०१६।०मिलाया ८३।५।२४
हुवे वटी६०साठसे अधिक है६० साठका भाग दिया शेष २३३५१।२४ बचे यह
इष्टयुक्त कोष्टक हुवा इससे न्यून कोष्टक भावपन में २३।१२।२० तीन ३राशी २७
अंशमें मिलता है इसलिये राशी३अंश २७ लिये. इसके नीचे कला विकलाके
स्थानमें सूर्यको कला५३ विकला३९युक की३।२७१५३।३९हुवे नंतर इष्टयुक्त
कोष्टक २३१५३।२४भौर अल्प कोष्टक २३।४२।२० का अंतर किया०।९।
४ हवा इसमें अल्पकोष्टक२३।४२।२०और उसके आगेका ऐप्य कोष्टक२३।
५२।१८ का अंतर ०।९।५८का भाग दिया परन्तु माज्य माजक दोनों पलादिक
हैं अतएव दोनोंको प्रथम सवर्णित किये भाज्य ५४४ भाजक५५८ हुवा भाज्य
५४४ में भाजक ५९८ का भाग दिया लन्ध • अंश आया शेप ५४५ को
६० साठगुणे किये ३२५४ ० हुवे इनमें भाजक ५९८ का भाग दिया लब्ध ५४
कला आई शेप ३४८ बचे इनको ६० साठगुणे किये २०८८० हुवे इनमें
भाजक ५९८ का भाग दिया लब्ध ३४ विकला आई ऐसे अंशादिक ०५४
३४ फल तीन आये इनको प्रथम आये हुवे राश्यादिक ३।२७।५३।३९ में युक्त
किये ३१२८१४८१३ हुवे ये चतुर्थ भाव स्पष्ट हुवा.
भावसाधनका उदाहरण ।
लमसष्ट १।१२।२६।३५ को चतुर्थ भाव ३२२८१४८।१३ मेंसे शोधा२।
१६।२१।३८शेष बचे इसकी राशिकेरअंकमे६छका भागदिया लब्ध राशी शेप
२ को ३० तीसगुणेकिये ६० हुवे इनमें नीचेके १६ अंश मिलाये ७६ हुवे इनके
६ छका भाग दिया लब्ध १२ अंश आये शेप ४ बचे इनको ६० साठगुणे
किये २४०हुवे कलाके अंक २३ युक्त किये २६३ हुवे फिर ६ का भाग दिया
लब्ध ४३ कला आई शेर ३ बचे उनको ६० साठगुणे किये ३८० हुवे इनमें
विकलाके अंक ३८ मिलाये २१८ हुवे फिर ६ छका भाग दिया लब्ध ३६
विकला आई शेप२ बचे इनको फिर ६० साठगुणे किये १२० हुवे ६ छका
भाग दिया लब्ध २० प्रविविकला आई ऐसे छका भाग देके ०१२॥४३॥३६॥

(१०६) वर्षपदीपकम् । २० फल पांच लाये ये पटांश आया इसको लम १।१२।२२।३५ में युक्त किये १।२५।१०।११।२० द्वितीय भाषको आरंभ संधि हुई इसमें पठाश ० । १२॥ ४३।३६ १३५ युक्त किया२।७५३१४७।४०द्वितीय भाव हुपा द्वितीय भावमें फिर पठारा ०।१२१४३।३६।२० मिलाया२।२०१३७१२४४० तृतीय भावकी आरंश और द्वितीय भावकी विराम संधि हुई इसमें फिर पष्ठांश युक्त किया३।३। २१।०।२० तृतीय भाव हुवा इसमें फिर पटांश ०।१२।४३।३६।२० युतकिया ३ । १६ । ४ । ३६ । ४० तृतीय भावकी विराम और चतुर्थ भावकी आरंत संधि हुई ऐसे लममें पष्ठांरा पांचवार युक्त किया फिर पठांश • ।१२।४३॥ ३६।२० को एक राशी ११०010t0 मेंसे शोधा ० । १७॥ १६ ॥ २३ ॥ ४० शेष बचे इनको चतुर्थ भावमें पांचवार युक्त किया लमादिक संघिसहित ६ छः भाव हुवे इन छ: गावमिसे ६ छः छः राशी घटाई शेपके ६ भाव हुये. . ससंधयांद्वारशभावाः। २ 4. ३ स. ४ स. स ६ १ १ ३ ५ ६ २ ७ ५ २ २० ३ ३ ५ २० ४ १८४ २१ . a २४ १० ४७ ४०२० . ५.४५ vo . ५.२० . ७ स. ८ ७ ९ १०।११ . २० ८ ८ ९ १ १२२५ २० २६ १०५६ ३७६२१। २४ १६ २१ . 16 २४४७ वांगचक्रम् . सुरके) चलितचक्रम् सावमें जो जो राशी आवे ये चलित, लिखना नंतर यह लिसना वहां सूर्य रिम सर्पकुंडलिमें ० दशम भावमें स्थित मंच है दशम भावकी विरामसंघिसे १० । (गुम) ।१६।४ से सूर्ग अधिक है इसलिये ११ ग्यारहमें भावका फल देगा एवं . ५ ६ गरा, १. ६ 13 भापाटीकासहितम् । (१०७) शुक्र११ में भावमें स्थित है ११ ग्यारहमें भावकी विरामसंधि ११ १२० से शुक्र १११२५ अधिक है अतएव शुक्र १२ में शावका फल देगा ऐसे सर्वग्रह जानना। विशोपकानयन उदाहरण। सूर्य १०॥१६॥५३॥३९ और दशम भावकी विरामसंधि१०।१६।४।३६का भंतर किया ०1०1४९।३ हुवा इसको पीस २० गुणा किया १६।२३।० हुये इनमें सूर्य दशम भावकी विरामसंधि और ग्यारहमें भारके बीचमें है इस लिये दशमभावकी विरामसंघि १० । १६ । ४ । ३६ और ग्यारहमा भाव ११ । ३।२१।० के अंतर १७१६।२४ का भाग दिया-परंतु दोनों भाज्य भाजक अंशादिक हैं इसलिये इनको प्रथम सवर्णित किये भाज्य ५८८६० भाजक ६२१८४हुवे भाज्य५८८६० में भाजक६२१८४का भाग दिया लब्ध शून्य विश्वा आये शेप ५८८६० को ६० साठगुणे किये ३५३१६०० हुवे भानक भावसंध्यंतर ६२१८४ का भाग दिया लब्ध ५७ प्रतिविश्वा आये ये सूर्यके विंशोपका हुवे इसीमकार सब ग्रहोंके विंशोपका जानना ॥ विंशोपका। सू.चिं.मं. . गु. शु. | श. रा.के.मुं. १८९ ५७/१०/५४५७४६ इति श्रीज्योतिर्विदरश्रीमन्महादवनवदीप कास्यतानिक ग्रंथराइङ्गनश्रीनिवास- विरनितायां सोदाहरणभाषाव्यारूयायां ग्रहभाव साधनाध्यायो दितीयः ॥ २॥ वकाच्छज्ञचन्द्राज्ञसितारेज्यामिदेज्यामेपायधिपाः ॥१॥ भापाटीका-या कहिये मंगल अच्छ क० शुक्र ज्ञ क० बुध चंद्रक० चंद्र अर्कक० सूर्य ज्ञ क० बुध सित क शुक आरक० मंगल इज्य क गुरु अर्की क० रानि मंद क० शनि इज्य क गुरु मेपादिक राशियोंके क्रमसे स्वामी जानना ॥१॥ मेपादिराशियोंके स्वामी. मि. क. सि.क. तु .. कुमी. राशी. बु. में. ! गु.| श.श. गु. स्वामी २ . ० म. . १ ६ ८ . बु. च.

वर्षप्रदीपकम् ।
मेपगौनक्रकन्याकन्त्यितुलादिवाकरायुश्चक्षीदशमतृतीयाष्टा
विशपञ्चदशपंचमसप्तविंशविंशाःक्रमेण परमोच्चभागाः॥२॥
भापाटीका-मेप कहिये मेष गोक० वृपज नक क० मकर कन्या क-कन्या
कर्क क० कर्क अंत्य क० मीन और तुला ये सूर्यादिक ग्रहोंकी क्रमसे उच्चराशी
होवे अर्थाव मेपका सूर्य वृपाका चंद्र मकरा मंगल कन्याकका बुध कर्कका गुरु मीन
का शुक्र तुलाका शनि उच्चको जानना और दशमक० १० तृतीयक० ३ अष्टा
विंशक. २८ पञ्चदश क० १५ पंचमक०५सतविंशक० २७ विंश क०२०
कमसे परमउच्चके अंश जानना अर्थात् ऊपर कहीहुई राशी और इन अंशाके
सूर्यादि ग्रह हो तो परम उच्चके जानना जैसे सूर्य मेपके दश अंशका है ये परम
उच्चका हुवा इसी प्रकार चंद्र वृपभके तीन अंशका परम उच्चका मंगल भकरके
२८ अाईस अंशका बुध कन्याके १५ पंद्रह अंशका गुरु कके पांच ५
अंशका शुक मीनके २७ सताईस अंशका शनि तुलाके २० वीस अंशका परम
स्वोचसप्तमस्तिथांशाःक्रमशो नीचाः परमनीचभागाः ॥३॥
भापाटीका-सूर्यादिग्रहोंकी अपनी उच्चराशिसे सातमी राशी और अंश क्रमसे
नीच राशी और परमनीचके अंश होवे ॥ ३ ॥
उच्चनीचराशिचक्रम् ।
उच्चका जानना ॥२॥
र
.
१
उच्चराशपः
. ५ ३ ११.६
११०८१५'५२७२०
६७३
५ ०
२७२०
७
मोघाशयः
मेपेऽङ्गाङ्गाप्टपैचेपबो गुरुशुक्र ज्ञागर्कजानां हदांशाः ॥ ४॥
भापाटीका-मेपराशीमें अंग ६ अंग ६ अष्ट ८ पंच ५ इषु ५ इन अंशोंके
क्रमसे गुरु शुक्र युध मंगल शनी हहाके स्वामी जानना । अर्थाद मेपराशके ६
छ अंशपर्यंत हहाका स्वामी गुरु होता है उस्के आगेके ६ छह अंशका स्वामी
शुक्र उस्के आगेके ८ अंशका त्वामी बुध उस्के आगेके ५ पांच अंशका स्वामी
मंगल उस्के भागेके ५ अंशका स्वामी शनि इसीप्रकार बारहों राशियोंके हद्दां-
के स्वामी समझना ॥ ४ ॥

जापाटीकासहितम् ।
वृपेष्टांगेभशरामयः सितज्ञेज्यमन्दाराणाम् ॥५॥
भापाटीका-पाराशिमें अष्ट ८ अंग ६ इ. ८ शर ५ अमि ३ इन अ-
शोंके यथाक्रम शुक्र बुध गुरु शनि मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥ ५ ॥
इंटेङ्गङ्गाशरायगांशाज्ञशुक्रेज्यारमन्दानाम् ॥ ६॥
भापाटीका-मिथुन राशिम अंग ६ अंगदशर ५ अदि अंग६इन अंशोंके
कमसे बुध शुरु गुरु मंगल शनी हद्दाके स्वामी जानना ॥ ६ ॥
कर्कबङ्गाङ्गनगाध्यंशाभीमाच्छ ज्यार्कीणाम् ॥ ७॥
भापाटीका-कर्कराशिमें अद्रि ७ अंग६ अंग ६ नग अग्धि ४ इन अंशोंके
क्रमसे भौम शुक्र बुध गुरु शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ ७ ॥
सिंहेऽङ्गेप्वद्याजशा ईज्यसितार्कीज्ञाराणाम् ॥ ८॥
भापाटीका-सिंहराशिमें अंग ६ इपु५ अद्रि ७ अंग ६ अंग ६ इन अंशोंके
कमसे गुरु शुक्र शनि बुध मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥ ८ ॥
कन्यायां नगाशाब्भ्यगाक्ष्यंशा ज्ञाच्छेज्याराकीणाम् ॥९॥
भापाटीका-कन्याराशिमें नग ७ आशा क० १० अन्धि ४ अग ७ अ-
क्षि २ इन अंशोंके ऋमसे बुध शुक गुरु मंगल शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ ९ ॥
तुलेऽङ्गाटनगाअक्ष्यंशामन्दज्यसिताराणाम् ॥ १० ॥
भापाटीका-तुलराशिम अंग ६ अष्ट ८ नग७ अद्रि७ अक्षि २ इन अंशोंके
कमसे शनि बुध गुरु शुक्र मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥ १० ॥
कीटे सप्ताभ्यएशराङ्गांशावाच्छञज्यार्कीणाम् ॥ ११ ॥
भापाटीका-वृश्चिक राशिमें सप्त ७ अब्धि ४ अष्ट दशर ५ अंग ६ इन
अंशोंके यथाक्रम मंगल शुक्र बुध गुरु शनि हद्दाके स्वागी जानना ॥ ११ ॥
चापेम्वन्धिशराध्यंशा इज्यसितज्ञारमन्दानाम् ॥ ३२ ॥
भापाटीका-धनराशीमें अर्क १२ इषु ५ अब्धि ४ शर ५ अम्धि ४ इन
अंशोंके क्रमसे गुरु शुक्र बुर मंगल शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ १२॥
नके नगनगान्ध्यएवेदांशाज्ञेज्याच्छाविक्राणाम् ।। १३ ॥
भापाटीका-मकरराशीमें नग ७ नम ७ अब्धि४ अष्ट८ वेद ४ इन अंशों के
कमसे बुध गुरु शुक्र शनि मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥ १३ ॥

(११०) वर्षपदीपकम् । घटे नंगागाद्रिपञ्चेपवः शुकशेज्यारमन्दानाम् ॥ १४ ॥ भापाटीका-कुंभराशीमें नग ७ अंग ६ अदि ७ पंच ५ इपु५ इन अंशोंके यथाक्रम शुक्र बुध गुरु मंगल शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ १४ ॥ झपेकीम्यान्यङ्काक्ष्यंशाः सितेज्यज्ञाराकीणाम् ॥ १५ ॥ भापाटीका-मीनराशीमें अर्क १२ अब्धि ४ अग्नि ३ अंक ९ अक्षि२ इन अंशोके क्रमसे शुक गुरु बुध मंगल शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ १५ ॥ हदाचक्रम्। मा. |में. पू. सिं. पू. घ, 1 २ ४ ५ ६ ग८३६३७ में| ६ ग बुसम१२ म. ९ . ७ ८ 10 ७२ अस्वामी, भरनामी. १६ . श १८ | अंशस्वामी. ३. " ४ १४ 10 ८१८गु। ५ ६ ७५ ४गु ७८३४ २० २ 14.११ ५५ ७म ७६3 ७म ७५ग म 30 २७ २६ २४ २४ ३६ म ४६मा ११ २म | . ३. 10 ३० १० . ३. भालामा २६ २५ ४मा ५ १० . भैपरनामी. . ग्रहे प्रथमद्रेष्काणगतद्राशौ वह्रियोगे मध्यद्रेष्काणगे तद्राशी सके- न्त्यद्रेष्काणगे रसयोगे तद्राशो मुनिभक्ते शेपेऽाद्या पतयः ॥ १६॥ भापाटीका-ग्रह प्रथमद्रेष्काणमें हो तो उसकी राशीके अंक ३तीन मिलाना और मध्यद्रेष्काणमें हो तो उसकी राशीमें (१) एक युक्तकरना एवं अन्य (तीसरे ) द्रेष्काणमें हो तो उसकी राशीमें ६ छ युक्तकरना नंतर उस राशीके ७ सानका भागदेना शेप १ बचे तो सूर्य २ बचे तो चन्द्र ३ तीन वचे तो मंगल४ पचे तो बुध ५ वचे तो गुरु ६ बचे तो शुक्र ७ वचेतो शनि द्रेष्काणका स्वागी होताहै ॥ १६ ॥ द्रेष्काणचक्रम् । मे..मि.फ. सि.क. तु .. घ.म.: कुं.मी. ८ में..गु..र..मं. | यु.गु. अ./न .. ...मे.बु.1 गु.म.र....गु./2017 .....! मं.पु. ग ...... 01 अंश. टिम्पनी माग१० अशका हाता हा दश अगपयन मथमंदपाण १० से २० अंशपर्यंत मापदफाग २०३० अंशपर्यंत मंसदेकामहीना है। ३ ४ ७ भापारीकासहितम् । (१११) मेपसिंहचापेषु मेपाद्या वृपकन्यानकेषु मृगाया युग्मतुला- कुंभेषु तुलाद्याः कर्कालिमीनेषु कर्काद्या नवांशाः ॥ १७॥ भापाटीका-गेप १ सिंह ५श्न२. राशीमें मेपराशीको आदिले पर कन्या ६ मकर १० राशिमें मकरराशीको आदिले मिथुन ३ तुला कुंभ ११ राशीमें तुला राशीको आदिले कर्क ४ वृश्चिक ८ मीन १२ राशीमें कर्कराशिको आदिले नवांशविनाग की संख्यापर्यंत गिननेसे नवांश होता है-अर्थात् (जितनी संख्याके नवांशविनागमें होवे उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशी आवे उसका स्वामी नवांशका स्वामी होता है) ॥ १७ ॥ नवांशविभागचक्रम् । ५ १ ३ ४ ८ ९ नवाश वि. ३ २. ६ Y १.१३ १६/२.२३/२६/३० . ६० अश. मला . मवांशसारिणीचाम् । कला ० ० २० . में घृमि फ.सिं | क|तु वृधम. | कुमाअश १/२ ४/५/६७/८ ९ १० ११ ४ २ ११८५ २११८ ५ ३ ११८५ ६ १२१९ ६ ५/१२/९ । ६/३/१२/९ । ६ १० १०/७४/१/१०/७४/१/१०/७ १११८५ १६ ६ ३२९६ ३ ४ १ १०७ ४ ११८ ९ ३ ३ २० ४० . o गृहोचहहाद्रेष्काणनवांशाः पञ्चवर्गाः ॥ १८॥ १ एकराशीके ९ नव भागको नवाश कहते हैं एक नवांशविभाग ३ तीन अमर कलाका होता है।

(११२)
वर्षपदीपकम् ।
भापाटीका गृह (राशिकेस्वामी ) उच्च. हद्दा. द्रेष्काण और नवांश पंचवर्ग
होते हैं । अर्थात् प्रथम ग्रहोंके राशीके स्वामी नंतर उच्च तदनंबर हद्दा देष्काण:
नवांश लिखने से पंचवर्ग होता है॥ १८॥
यो ग्रहो यस्य व्यायत्रिकोणान्यतमगः समुहत् ॥ १९॥
भापाटीका-जो मह जित बहसे तीसरे ३ ग्यारहमें ११ नवमें ९ पांचमें ५
स्थानों में से किसी स्थान में स्थित होये वह उस ग्रहके मित्र होता है ॥ १९ ॥
केंद्रगस्तथा शत्रुः ॥२०॥ शेपस्थानस्थः समः ॥२१ ।।
भापाटीका-और जो यह जिसनहसे केंद्र ( १ १ ४ । ७ ११० ) स्थानों
मसे कोई भी स्थानमें स्थित होव वह उसयहके शत्रु होता है ॥ २० ॥ शेष
२।६। ८ । १२ दूसरे छठे आठमें बारमें स्थानोंमें से कोई भी स्थानमें जिस
ग्रहसे जो ग्रह स्थित होवे वह उसके सम होता है ॥ २१ ॥ इसप्रकार मैत्री
चक्र बनाके उसके (मैत्रीचक्रके ) अनुसार पंचवर्ग में आये हुवे ग्रहोंके नीचे मित्र
सम शत्रु लिखना तदनंतर बल लिखना उसकी रीति कहते हैं
स्वगृहेत्रिशल्लवाः सुहद्रे सादवाविंशतिः
समभे तिथयः शत्रुभे साईसप्तवलम् ॥ २२ ॥
भापाटीका-ग्रह स्वगृही ( स्वराशीका ) हो तो ३० तीस अंश मित्र राशीका.
हो तो २२ । ३० साढेवापीस अंश समराशीमें १५ पैदरा अंश शत्रुराशी में हो
तो ७ । ३० साढ़ेसात अंश वल ज नना ॥ २२ ॥
यथा भवेत्पड्भाल्पंतथानाचखेटांतरेतद्भागाभागस्वोचवलम् ॥२३॥
भापाटीका-ग्रह और उसके नीचका अंतर जैसे होसके वैसे छः राशीसे
अल्प करना (महमेंसे नीचको हीन करनेसे ६ छः राशीसे अल्प शेष बचे तो
यहमेंसे नीचको हीन करना और अधिक बचते होवे तो नाचमेसे
ग्रहको हीन करना) शेप राश्यक अन्तरके अंश करके ( राशीको ३०
गुणीकरके अंश मिलाके ) उसमें ९ नवका भागदेना लब्ध उच्चपल होवे॥ २३॥
स्वहदायां तिथ्यंशा मित्रहदायां सपादेका दशसमहदायां
साईसप्त शत्रुहद्दायां पादोनवेदांशा बलम् ॥ २४ ॥

भापाटीकासहितम् ।
(११३)
भापाटीका-यह स्वराशीकी हवा में हो तो १५ पंदरा अंश मित्र यही
हदामें १३१५ सवा ग्यारा अंश समयहकी हद्दामें ७।३० साडेसात अंश शत्रु
ग्रहकी हद्दामें हो तो ३।४५ (पौनेचार अंश ) बल जानना ॥ २४ ॥
स्वद्रेष्काणे दश मित्रदेष्काणे साईनगाः समद्रेष्काणे पञ्च
शद्रेष्काणे सार्द्धयमा अंशा बलम् ॥ २५ ॥
भापाटीका-यह स्वराशीके ट्रेकाममें हो तो १२ दश अंश मित्रमहके
देष्काणमें हो तो १३० साढेसात अंश समयहके द्रेष्काणमें ५ पांच अंश
शघुमहके द्रेष्काणमें हो तो २१३० अदाई अंश बल जानना ॥ २५॥
स्वनवांशे पञ्च मित्रांशे पादोनवेदाः समांशे सार्धयमा
रिप्वंशे सपादेको बलम् ॥२६॥
भापाटीका-यह-स्वराशीके नवांशमें हो तो ५ पांच अंश मिवनवांशमें ३॥
४५ पौनेचार अंश समनवांशमें हो तो २।३० ढाई अंश शत्रुनवांशमें हो तो ।
१५ (सपा) अंश वल जानना ॥ २६ ॥
पंचवर्गरलकोप्टकम् ।
स्व.( भित्र सम शत्रु
३०२११५
गृह
३०
.
a
हद
०
१०
५
द्रेष्का.
देकाण
३०
.
२
नवा.
१
नवांश
पंचवर्गवलैक्येवेदोद्धृते लब्धं विंशोपकात्मकं चलम् ॥ २७॥
भापाटीका-पंचवर्गके बलके ऐक्य ( योग ) में ४ चारका भाग देना लन्ध
भावे वह विश्वात्मक बल होवे ।। २७ ॥
पडल्पोऽल्पाली व्याधिकः पूर्णवली ॥२८॥

(११४) वर्षप्रदीपकम् । भाषाटीका-आयाहुवा विश्वात्मक बल ६ छःसे अल्प होवे तो अल्पवली और १२ वारासे अधिक हो तो पूर्णबली ६ छःसे अधिक घारासे न्यून हो तो मध्यवली होता है ॥२८॥ उदाहरण । सूर्य ३०॥३६॥५३३३९ कुंभ राशीका है इसका स्वामी शनि गृहका स्वामी आया एवं सूर्यका उच्च०।१०हदा-सूर्य कुंशराशीक रहदाशमें (प्रथम अंश फिर ६अंश मिलानेसे १३ होते हैं इससे अधिक अंश है सूर्य इसलिये दो अंश गये और तीसरे अंशमें हुवा) है इसका स्वामी गुरु है ये सूर्यकी हद्दाका स्वामी हुवा- द्रेष्काण-सूर्य मध्यद्रेष्काणमें है इसकी राशी १० में १ एक युक्त किया। हुवे सातका मागदिया ४ शेपरचे सूर्यको आदिले क्रमसे ४ बुध द्रेष्काणका स्वामी हुषा-नवांश-सूर्य कुंाराशीके ६ छठे नवांशविजागमें है ( १६:४० से अधिक है) अतएव तुलाराशीसे नवांश विभागसंख्या परत गिननेसे मीनराशी आई इस्का स्वामी गुरु सूर्यके नवांशका स्वामी आया ऐसे ही सर्वग्रहके पंचवर्ग जानना- बृहत्संचवर्गचक्रम्. ५. प गु स मि स्वगृह, मि म ध ३ ५ मि " २७ प. गु स ६ २० १ २८ १५ गु शु पु ग प स म स स म ग र श न स च श्र द्रेष्काण स स च गु स्व भ ध ना # . म. घ स गु रच मं मैत्रीचक्रम्. मैत्रीसाधन उदाहरण सूर्यसे ११स्थानमें शनि स्थित चु. मित्र. है यह सूर्पके मित्र हुवा एवं सूर्य से १ स्थानमें चन्द्र मंगल १० स्थानमें गुरु स्थित है ये सूर्यके शत्रुहुवे और२ स्थानमें बुध शुक्र स्थित है वे सम हुवे-इसीप्रकार सर्वग्रहोंके मित्र शत्रु समझना । ब उ रम च रेच मा सम. च म गु मं प्र जापाटीकासहितम् । (११५) बलसाधन उदाहरण. सूर्पके गृहका स्वामी शनी सूर्पका मित्र है इसलिये गृहमें सूर्यके नीचे २२॥ ३० अंश बल लिखा उच्चबल सूर्य १०।१६।५३।३९ नीच ६।१०1०1० सूर्य मेसे नीच हीन कियाादा५३।३९ शेष बचे इस्के अंश किये १२६।५३।३९ हवे नवका भाग दिया लब्ध १४ आये शेप • शून्य बची इस्को साठ गुणी की इसमें ५३ कला मिलाई ५३ हुए नवका भागदिया लब्ध ५ आये सूर्यका उच्चबल १४।५ हुवा-हदा-हदाका स्वामी गुरु सूर्यके शत्रु है अतः हहाका शत्रु- पल ३।४५ सूर्यके नीचे हहामें लिखा-द्रेष्काण-सूर्य के द्रेष्काणका स्वामी बुध सूर्यके सम है इसलिए देष्काणमें समका बल ५.० पाम हुवा- नवांश-सूर्यके गोशका स्वामी गुरु सूर्यके शत्रु है अतएव नवांशमें सूर्यके नीचे शत्रु नवांश बल १ । १५ लिखा ये पंचवर्ग बल हुवा इन पाचोंका योग किया ४६।३५ पंचवर्गपलैक्य हुवा इसमें ४ चारका भाग दिया लब्ध १३ ॥ ३८५४५ आये ये सूर्यका विंशोपकात्मक मल हुवा यहवल ६ से अधिक और ५२वारासे न्पून है अतः मध्यमवल जानना एवं शेष चंद्रादिसर्वग्रहोंका आया पंचवर्गवलचक्रम् । रचम युगुशुश २२/१२/२२२२/७/२२/१५ २०३०/३०/३०/३०४३०० १४.९१८७ ५] १९/१४ ५। ५२/५६२९/७ ३ ११/७ ७ ४५/३०/३०/४५१५६० ५ . २ २ दिका .. ३० १ १५.३०/१५३०० १५१५ २०३०० नर्वा योग. i૨૫ ૨૩ ૨૨૨ ) (११६) वर्पप्रदीपकम् । विंशोपकात्मकबलम् । र.चं.1 म.यु.गु.शु. श.. १११११३८ ३८४८४७११/५०० १० ४५० ३०/३०/३० म.! म.पू. म.म.प. म. चन्द्राकारज्याः परस्परं मित्राणि शेपाश्च ॥ २९ ॥ भाषाटीका-३ -अब अन्य आचार्यके मतको स्थिरमैत्री लिखते हैं ॥ चंद्र, सूर्य, मंगल, गुरु, ये परस्पर मित्र जानना और शेष रहे बुध-शुक्र-शनि ये परस्पर मित्र मानना ॥ २१ ।। इतरथा रिपकः ॥३०॥ भापाटीका-ऊपर कहेहुवे मित्रग्रहसे शेष रहे ये शत्रु होये ॥ ३० ॥ स्थिरमैत्रीचक्रम् । म. चु. श. मिन. म. श. यु.शु.पु.शु.....यु. झु.र.म./... श. श. चं.गु. मे. गु. इस स्थिरमैत्रीके मित्रशत्रुके अनुसार पंचवर्गवल लानेकी रीति कहते हैं- स्वस्वाधिकारबलादै मित्रः बलं तदधै शत्रुमे शेष प्राग्वदित्येक॥३॥ भापाटीका ग्रह ३० हद्दा १५ देष्काण १० नवांश ५ के कहेहुवे अपने अपने स्वराशीके बलको स्वराशीगत ग्रहमें यथावस्थित ( ग्रहमें ३०हवा में १५ द्रेष्काणमें १० नवांशमें ५) ही जानना और अपने अपने स्वका आधी आधा बल मित्रराशिगत महमें और मित्रराशिगत ग्रहका आधा भाषा बल शवराशिगत ग्रहमें जानना अर्थात् स्वमें पूरा मित्रमें स्वका आधा रात्रुमें मित्रका आया लिसना जैसे गृहमें स्वराशीका ३० अंश बल है उसका आधा १५ मि -- भापाटीकासहितम् । (११९) तीसरेमें गुरु चौथेमें बुध पांचवेमें शुक्र समराशीमें विपरीत ( १ शु. २ बुध. ३ गुरुः ४ शनि. ५ मंगल.) पंचमांशके स्वामी होते हैं ॥ ३८ ॥ विपमः मेपायाः समभे तुलाद्याः षष्ठांशाः ।। ३९॥ भापाटीका-विषमराशीमें अपराशीको आदिले समराशीमें तुलाराशीको आदिले गिननेसे पठशके स्वामी होतेहैं ॥ ३९ ॥ ओजभे स्वभाधा युग्मझे तत्सप्तमाद्याः सप्तमांशाः ॥ ४० ॥ भापाटीका-विषम राशीमें अपनी राशीको आदिले समराशीमें अपनी राशी- से जो सातमी राशी हो उसको आदिले सप्तमांश विनामकी संख्यापर्यंत गिनने से जो राशी आवे उस्के स्वामी सप्तमांशके स्वामी होवे ( ग्रह जितनी संख्या के सप्तमांशविभागमें हो उतनी संख्यापर्यंत विपम राशि अपनी राशीसे, सममें सातमी राशीसे गिनना सप्तमांश होवे) ॥ ४० ॥ चरभेऽजाद्याः स्थिरभे चापाया उभयभे सिंहाया अष्टमांशाः ॥४१॥ भापाटीका -घर (१।४।७।३०) राशीमें मेपराशीको आदिले स्थिर (२।५।८।११) राशीम धनराशीको आदिले द्विस्वभाव (३।६।। १२) राशीमें सिंहराशीको आदिले जितनी संख्याके अष्टमांश विभागमें ग्रह होने उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशी आवे उसका स्वामी अष्टमांशका स्वामी होवे ॥४१॥ - १ एकराशीके ६ छठे भागको कहते है-एक षष्ठांश ५ पांच अंशका होताहै- २ एक राशीके हिस्सेको कहते हैं एक सप्तमांश विभाग ४ अंश १७ कलाका होता है । ३ एकराशीके ८ आठ भागको कहते है-एक अष्टमांश सतमाशविभाग. विभाग ३ अंश ४५ कलाका होता है। ४५ ६ ४ ८/१२/१७ २१५/३० अष्टमांशविभाग, १७३४५२.८२५४२ ८.७२५/३४१४२५२ २ ७ अश १११५१८२२२६३० वला ० ७ ८ ४ ३ . ४५ .

(११८) वर्षप्रदीपकम् । भादयोऽकौशांता द्वादश वर्गाः ।। ३२ ॥ भापाटीका-स्वगृहको आदिले द्वादशांशपर्यव (स्वगृह ३ होरा २ द्रेष्काण ३ चतुर्थांश ४ पंचमांश ५ पष्ठांश६ सप्तमांश ७ अष्टमांश८ नवमांश९ दशमांश १० एकादशांश ११ द्वादशांश १२) द्वादशवर्ग होवे ॥ ३२ ॥ भाद्यधिपाः प्राग्वत् ॥३३॥ भापाटीका-राशियोंके स्वामी प्रथम कहे समान जानना ॥ ३३ ॥ विपमः सूर्यशशिनोः समः व्यत्ययेन होरा ॥ ३४ ॥ भापार्टीका--विषमराशीमें प्रथम सूर्य-दूसरी चन्द्रकी होरा होवे और सम- राशीमें विपरीत (प्रथम चन्द्र द्वितीय सूर्यकी ) होरा होवें ॥ ३४ ॥ स्वेषु नवःशा द्रेष्काणपाः ॥ ३५ ॥ भापाटीका-प्रथम द्रेष्काणमें अपनी राशिका स्वामी दूसरे ( मध्य ) देष्का- णमें अपनी राशीसे पांचमी राशीका स्वामी तृतीय (तीसरे )द्रेष्काणमें अपनी राशीसे नयमी राशीका स्वामी द्रेष्काणका स्वामी जानना ॥ ३५ ॥ केचित्प्राग्वत् ॥ ३६॥ भाषाटीका केईक आचार्य जो पंचवर्गमें प्रथम द्रेष्काण कहाहै वही करना ऐसा कहतेहैं ॥ २६ ॥ स्वसंजकेंद्रेशा वेदांशपाः ।। ३७ ॥ भापाटीका-अपनी राशीसे प्रथम चतुर्थाशमै अपनी राशीका स्वामी दूसरेमें ४ चौथी राशीका स्वामी तीसरेमें ७ मातमी राशीका स्वामी चौधे में १० दशमी राशीका स्वामी चतुर्थाशका, स्वामी होवे ॥ १७ ॥ ओजःभौमार्कीज्यज्ञसिताः समः प्रतिलोमतः शरांशपाः ।। ३८ ॥ भाषाटीका-विषम (एकी ) राशीमें प्रथम पंचमांशमें भौम दूसरेमें शनि १ पदरा १५ अंशकी १ एक होरा होती है ( • अंशसे १५ अंशतक मयम हारा १५ अंशसे ३० अंशपर्यंत दूसरी होरा होवे-)२ दशअंशका ? द्वेष्काण होता है। ३ एकराशीफे चार भागको कहते हैं एक चतुर्थाश विभाग वंश३० तीस कलाका होताहै- चतुर्थाशविभाग। ४ एकराशीके ५ पांचमें भागको कहते हैं- एक मंचमाश ६ छह अंशका होताई- १ २ ४ ७ १५ २२ अंश. कला.

भापाटीकासहितम्। (११९) तीसरेमें गुरु चौथेमें बुध पांचवेमें शुक्र समराशीमें विपरीत ( १ शु. २ बुध. ३ गुरु. ४ शनि. ५ मंगल.) पंचमांशके स्वामी होते हैं ॥ ३८॥ विषमः मेपायाः समभे तुलाद्याः पाठांशाः ॥ ३९॥ भाषाटीका-विषमराशीमें मेपराशीको आदिले समराशीमें तुलाराशीको आदिले गिननेसे पठशके स्वामी होतेहैं ॥ ३९ ॥ ओजभे स्वभाद्या युग्मझें तत्सप्तमाद्याः सप्तमांशाः ॥ ४० ॥ भापाटीका-विषम राशीमें अपनी राशीको आदिले समराशीमें अपनी राशी- से जो सातमी राशी हो उसको आदिले सप्तमांश विभागकी संख्यापर्यंत गिनने से जो राशी आवे उस्के स्वामी सप्तमांशके स्वामी होघे ( ग्रह जितनी संख्या के सप्तमांशविभागमें होये उतनी संख्यापर्यंत विषम राशिमें अपनी राशीसे, सममें सातमी राशीसे गिनना सप्तमांश होये) ॥ ४० ॥ चरभेऽजायाः स्थिरभे चापाद्या उभयभे सिंहाचा अष्टमांशाः ॥११॥ भापाटीका-चर (१।४। ७११०) राशीमें मेपराशीको आदिले स्थिर (२।५।८।११) राशीमें धनराशीको आदिले द्विस्वभाव (३।६।९॥ १२) राशीमें सिंहराशीको आदिले जितनी संख्याके अष्टमांश विभागमें ग्रह होते उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे नो राशी आवे उसका स्वामी अष्टमांशका स्वामी होवे ॥४॥ १ एकराशीफे ६ छ? भागको कहते है-एक षष्ठाश ५ पांच अशका होताहै- २ एक राशीके ७ हिस्से को कहते है एक सप्तमांश विभाग ५ अंश १७ कलाका होता है। ३ एकराशीके ८ आठ भागको कहते है-एक अष्टमाश विभाग ३ अश कलाका होता है। सप्तमांशविभाग. ६ ८१७२१२५/३० १७३५५१८३५४ ८।१७/२५/३४५२१५. . ८ २ अष्टमांशविभाग. ६ Hij८२२२६३० अश ३ ५ ३ Y १५ . क्ला ३.

वर्षप्रदीपकम् । भादयोऽकौशांता द्वादश वर्गाः ॥३२॥ भापाटीका-स्वगृहको आदिले द्वादशांशपर्यन (स्वगृह १ होरा २ द्रेष्काण ३ चतुर्थांश ४ पंचमांश ५ पठारा६ सप्तमांश ७ अष्टमांश८ नवमांश९ दशमांश १० एकादशांश ११ द्वादशांश १२) द्वादशवर्ग होवे ॥ ३२ ॥ भाद्यविपाः प्राग्वत् ॥३३॥ भापाटीका-राशियों के स्वामी प्रथम कहे समान जानना ॥ ३३ ॥ विपमः सूर्यशशिनोः समः व्यत्ययेन होरा ॥ ३४॥ भापाटीका-विषमराशीमें प्रथम सूर्य-दूसरी चन्द्रकी होरा होवे और सम- राशीम विपरीत (प्रथम चन्द्र द्वितीय सूर्यकी ) होरा होवें ॥ ३४ ॥ स्वेषु नपर्लेशा द्रेष्काणपाः ॥ ३५ ॥ भापादीका-प्रथम द्रेकाणमें अपनी राशिका स्वामी दूसरे ( मध्य ) द्रेष्का- णमें अपनी राशीसे पांचमी राशीका स्वामी तृतीय (तीसरे ) द्रेष्काणमें अपनी राशीसे नवमी राशीका स्वामी द्रेष्काणका स्वामी जानना ॥ ३५ ॥ केचित्प्राग्वत् ॥ ३६॥ भापाटीका-केईक आचार्य जो पंचवर्गमें प्रथम श्रेष्काण कहाहै वही करना ऐसा कहतेहैं ॥ २६ ॥ स्वजिकेंद्रेशा वेदांशपाः ॥३७॥ भापाटीका-अपनी राशीसे प्रथम चतुर्थाशमें अपनी राशीका स्वामी दूसरेमें ४ चौथी राशीका स्वामी तीसरेमें ७ सातमी राशीका स्वामी चौमें १० दशमी राशीका स्वामी चतुर्थाशका स्वामी होवे ॥ १७ ॥ ओजःभीमार्कीज्यज्ञसिताः समः प्रतिलोमतः शरांशपाः ॥३८॥ भापारीका-विपम (एकी ) राशीमें प्रथम पंचमांशमें भौम दुसरे शनि पदरा ३५ अंशकी १ एफ होरा होती है ( • अंशसे १५ अंशतक मपम झाप १५ भंशसे २, अशपर्यंत दूसरी होरा होवे-) २ दशभंगफा टेमाण होता है। ३ एकराशीकेचार भागो पहंत है एक चतुपाश विभाग अंशदेशीस कलाफा होताद- चतुर्थाशविभाग। ५ एकराशी ५पापमे भागको कहते हैं- एक पंचमाश ६ छह अंशका होताहै- १ ૨ ३ ७ अंशः कन्दा. . .

आपाटीकासहितम् । (११९) तीसरेमें गुरु चौथेमें बुध पांचवेमें शुक्र समराशीमें विपरीत ( १ शु. २ बुध. ३ गुरु. ४ शनि. ५ मंगल.) पंचमांशके स्वामी होते हैं ॥ ३८ ॥ विपमः मेपाद्याः समभे तुलाद्याः षष्टांशाः ॥ ३९ ॥ भापाटीका-विषमराशीमें मेपराशीको आदिले समराशीमें तुलाराशीको आदिले गिननेसे पठाशके स्वामी होतेहैं ॥ ३९ ॥ ओजभे स्वभाद्या युग्मझें तत्सप्तमर्शायाः सप्तमांशाः ॥ ४० ॥ भापाटीका-विषम राशीमें अपनी राशीको आदिले समराशीमें अपनी राशी- से जो सातमी राशी हो उसको आदिले सप्तमांश विभागकी संख्यापर्यंत गिनने से जो राशी आवे उस्के स्वामी सप्तमांशके स्वामी होवे ( ग्रह जितनी संख्या के सममांश विभागमें हो उतनी संख्यापर्यंत विषम राशिमें अपनी राशीसे, सममें सातमी राशीसे गिनना सप्तमांश होवे) ॥ ४० ॥ चरभेऽजाद्याः स्थिरभे चापाद्या उभयभे सिंहाया अष्टमांशाः ॥४१॥ भापाटीका-चर (11४।७।१०) राशीमें मेपराशीको आदिले स्थिर (२१५1८1११) राशीमें धनराशीको आदिले द्विस्वभाव (३।६।९। १२) राशीमें सिंहराशीको आदिले जितनी संख्या के अष्टमांश विभागमें ग्रह होरे उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशी आये उसका स्वामी अष्टमांशका स्वामी होये ॥४॥ १ एकराशीके ६ छठे भागको कहते है-एक पाांश ५ पांच अंशका होताहै- २ एक राशीफे ७ हिस्सेको कहते हैं एक सप्तमांश विभाग ४ अंश १७ कलाका होता है। ३ एकराशीक ८ आठ भागको कहते है-एक अष्टमांश। सप्तमांशविभाग, विभाग ३ अंश ४. कलाका होता है। ४५६ ८२१७/२६५० १७३४५१८२५४ . ८१७/२५/३४४२/५. 0 २ अष्टमांशविभाग. ३ ६ ८ १११५८२२२६० अंश ४५1३11५ ३ ७ ४५1१० .

(१२०) वर्षपदीपकम् । नवांशाः प्राग्वत् ॥ १२॥ भापाटीका-नवांशके स्वामी प्रथम कहचुके हैं उसके समान करना॥४२॥ यस्प ग्रहत्य दशांशैकादशांशी कर्तव्यौ तदीयभादौ दशैकादश- गुणिते तदशांशादि भादिस्फुटः॥४३॥ भाषाटीका-जिस महके दशांश तथा एकादशांश करना होवे उस (ग्रह) की राशी अंश कलाविकताको दशांशमें १० दशगुणी एकादशांशमें ११ इग्यारा गुणी करना कमसे कलामें ६० साठका भाग देना लब्ध ऊपरके अंशमें युक्तकरना अंशमै ३० तीसका भाग देना लब्ध राशीमें मिलाना राशीमें १२ बाराका भाग देना शेपवचे वह दशांश एकादशांगके राश्यादि स्पष्टहीये इस स्पष्टकी राशीके स्वामी दशांश एकादशांशके स्वामी होने हैं ॥ ४३ ॥ स्वभादकौशाः ॥४४॥ भापाटीका-अपनी राशीसे जितनी संख्पति द्वादशांशमें ग्रह होवे उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशी आवे उस्का स्वामी द्वादशांशका स्वामी होवे॥४४॥ स्वमित्रोच्चशुभवर्गाःशुभा अन्येऽधमाः ॥ ४५ ॥ भाषाटीका-स्व, मित्र, उच्च और शायहके वर्ग शुन अन्य ( शत्रु सम नीच और पाप आदिकके ) वर्ग अधम (नेट ) होते हैं-अर्थात् जिप्स बहके शादरावर्ग, शुभमहाँका स्वराशिस्थ मित्रराशिस्थ, उच्चराशिस्य, महाँका वर्ग अ- धिक होवे वह मह शुतफल देगा और जिसके द्वादशवर्ग में पापग्रहोंका शत्रुराशि- स्थ ग्रहोंका नीचगतग्रहाँका वर्ग अधिक आवे वह ग्रह श्रेष्ठ होवे तथापि नेष्ट फल देगा।॥ ४५ ॥ - १ एफ राशीफे १२ पारा मागको कहते हैं-एक दादाश २ अंश ३० रुला (टाई अंश) का होतादे- द्वादशांश विभाग. । ७८/१०/२१पभागसंध्या. ३१५/७/१०/१२/१५/१७/10/२९३५२७३० ३० १० 1400.00 २०१० ३० मंश का.

स्वाम. सश. २०११५/१०५ . ० 0 भापाटीकासहितम् । (१२१) वर्गेशे स्वळगे विशतिमित्रतिथयः समझें दशरिपुभे पंच बलम् ।। ४६ ॥ भापाटीका-दादशवर्गके वर्गका स्वामी स्वराशीका हो तो वीस २० अंश मित्रराशीका हो तो १५ पदरा अंश समराशीका हो तो १० दश अंश शत्रुराशीका हो तो ५ पांच अंश वल जानना ॥ ४६ ॥ द्वादशवर्गजबलेक्येऽभक्ते विंशोपकाः ॥ १७॥ भापाटीका-द्वादशवर्गके बलके योगमें बारा १२ का भाग देना लब्ध विशोपकात्मक बल होवे ॥ १७ ॥ उदाहरण। सूर्य 5०1१६०५३।३९ की राशी कुंमका स्वामी शनी सूर्यके गृहका स्वामी हुवा-होरा-सूर्य विषमराशीकी दूसरी होरामें है इस्का स्वामी चंद्र होराका स्वामी हुवा-द्रेष्काण-सूर्य मध्यद्रेष्काणमें है इस कारण अपनी राशी ११ कुंभसे पांचमी राशी ३ मिथुनका स्वामी बुध द्रेष्काणका स्वामी आया- एवं सूर्य तृतीय चतुर्थारा विज्ञाममें है इसलिये अपनी राशी ११ से सातमी राशी ५ सिंहका स्वामी सूर्य सूर्यके चतुर्थीशका स्वामी हुवा- पंचमांश- विपमराशिस्थित सूर्य तीसरे पंचमांशविभागमें है अतएव विषमराशीमें तीसरे पंचमांराका स्वामी गुरु सूर्यके पंचमांशका स्वामी हुवा-एवं सूर्य ४ चौथे पष्ठांशमें है और विषमराशीका है इसलिये मेपराशीसे पठांशविभागकी संख्या ४ चार पर्यंत गिना कर्कराशी आई इस्का स्वामी चंद्र सूर्यके पष्ठांशका स्वामी हुषा एवं सममांशविज्ञागमें सूर्य ४ चतुर्थ संख्याक विभागमें स्थित है यह विषमराशी गत है इसवास्ते अपनी राशी ११ कासे ४ चार पर्यंत गिननेसे ४ चोथी वृपा राशी आई इस्का स्वामी शुक्र सूर्यके सप्तमांराका स्वामी हुवा-एवं अष्टप्रांश- विवागमें सूर्य ५ पांचमें अष्टमांशमें स्थित है और स्थिर राशी ११ का है अतः धनराशीको आदिले ५ पांच संख्यापर्यत गिननेसे मेपराशि आई इस्का स्वामी भौम सूर्यके अष्टमांशका स्वामी हुचा-नवांशके स्वामी लानेकी युक्ती प्रथम कही है उसी रीतिके समान नवांश विभागमें ६ छठे नवांगमें मूर्य स्थित है इस कारण (१२२) वर्पमदीपकम् । तुलराशी (३१॥३३ के नवांश ७ तुलसे गिनना ) से ६ संख्यापर्यंत गिननेसे १२ मीनराशी आइ इसका स्वामी गुरु सूर्यके नवांशका स्वामी हुवा--सूर्य १० । १६ । ५३ १ ३९ को दशांश करना है इस कारण १० दसगुणा किया १०० । १६० । ५३० । ३९० हुवा--विकला कला साठसे अधिक हैं इससे विकला ( ३९० ) में साउका भाग दिया लब्ध ६ कलामें कला (५३६) के साठका भाग दे लब्ध ८ अंशमें युक्तकिये अंश तीससे अधिक है इसलिये अंश (१६८) में ३० तीसका भाग दिया लब्ध ५ पांच राशीके अंक १०० में युक्त किया १०५ हुये राशी (१०५) में १२ बाराका माग दिया शेष ९ । १८ । ५६ । ३० राश्यादिक बचा ये सूर्यका दशाश हुवा इसकी राशी १० का स्वामी शनी सूर्यके दशांशका स्वामी हुवा एवं एकादशांशमें सूर्य १० । १६ । ५३॥ ३९ को ११ ग्यारा गुणा कि- या ११० १ १७६ । ५८३ । ४२९ हुवा विकला कलामें साठका अंशमें तीसका राशीमें १२ बाराका क्रमसे नाग देनेसे शेप बचे ८।५। ५० । २ यह सूर्यका एकादशांश स्पष्टहुया इसकी राशी ९ धनका स्वामी गुरु सूर्यके एकादशांशका स्वामी ढुवा-एवं अपनी राशी ११ कुम्भसे सूर्य सातमें द्वादशां- शमें है इसलिये ७ सातसंख्यापर्यंत गिननेसे ५ सिंह राशीआई इसका स्वामी सूर्य सूर्यके द्वादशांशका स्वामी हुवा-इस प्रकार सूर्यके द्वादशवर्ग हुये ऐसेही शेप यहाँक तथा माओंके और सहमादिकोंके द्वादशवर्ग जानना-सूर्यके द्वादश- वगै स्वराशकि वर्गमित्र २शुभग्रहके ७ वर्ग है इनका योग किया ३१ ग्यारा होते हैं इसकारण सूर्य शुभफल देगा-ऐसेही सर्पग्रहोंके शुभाशुभफल समझना- द्वादशवर्गयलउदाहरण । सूर्यके-यह (राशी ) का स्वामी शनी सूर्यके मित्र है इसकारण १५। . पंधराका बलमहमें प्राप्त हुया एवं होरामें सूर्यकी होराका स्वामी चन्द्र सूर्यका शत्रु है अतः५०० पट प्राप्त हुया-एवं द्रेष्काणमें द्रेष्काणपनी बुधका समराशीका बल १.1 0 चतुर्थासमें चतुर्थीशपति सूर्यका स्वका२०।० बल पंचमांश पंचमारा के स्वामी गुरुका रानुका ५। • बल परशमें पटांगके स्वामी चन्द्रका शत्रु- राशीका बल ५। • सममांश, सप्तमाशके स्वामी शुक्रका समराशीका 1010 . भापाटीकासहितम् ।. (१२३) बल अष्टमांशमें अष्टमांशपति भौमका शत्रुराशीका ५ । • बल नवांशमें नघांशका स्वामी गुरुका शत्रुका ५। • बल-दशांशमें दशांशके स्वामी शनी- का मित्र मल १५ एकादशांशमें एकादशांशके स्वामी गुरुका शत्रुमल ५. द्वादशांश द्वादशांशका स्वामी सूर्य स्वराशीका है इसलिये स्वका२०१० बल प्राप्त हुवा-ये मूर्यके दादशवर्गका बल हुवा इसका योग किया १२० । ० आया इसमें १२ बाराका भाग दिया लब्ध १०। • सूर्यका विंशोपकात्मक दादरावर्ग बल हुवा ऐसेही शेष ग्रहोंका जानना-इति ॥ ग्रहाणांद्वादशवर्गचक्रन्. द्वादशवर्गबलचक्रम्. चि.Iम ... ग .... १५१५११५/१५ ५।१५० . "मगुगु मिमि मिमिमि ५५ १४५५२ ३. श श स पु111म समिमि मि स्व स स २मुगु गुण ५ ५ ५ १.1५1०1१५ होरा . . . 1-11५/१५/१५/२011010 देवाण. . २०१५-१५१५/१५/१. . . . ។ १५ ५१00101२० पचमास . . . . चतुर्भाव गुम २१०८मक ५ पताभ ५।१० . प. . २० १.५ ५ २०१५/५ . . सतमा 1119 . स ५ ५ १०11५/ ५ अश्मान म. . ५ . १. 1.1२० . नवमाभ न. मश.. शु २५ प स १५ ग६४ स मिश २० सामि में "शर 2"शन प मिमि शश १२गुशुगर घ ३७ स १०५ स गु कर२३२ गु" र स ग. गु| ख मिय मिामि स ५ 10 १५] देशाध. 1 ० . ५ २० १५ ५. ८म . ५ २०१५/१.१५/१५ . . 10 दाया (१२0120/1२०१४५१५५२०५११५ योग, . व ३१ शुभ १०॥ " १२८ विशेषता २०11..1..१२ . ५५५४५/१५त्मक बल. १ पाप. । ४ ५ २ १ म. पू.म.

(१२४) वर्पप्रदीपकम् । स्वमे शतं कलानां मित्रभे पंचाशत् शत्रुमे पञ्चविंशतिः ॥१८॥ 'भापाटीका-स्वराशीमें १०० सो कला मित्रराशीमें ५० पचाश कला शत्रु- राशी २५पचीस कला स्थिर मैत्रीके मित्रशत्रुवशान् द्वादशवर्ग वल जानना ४८॥ स्व मि.ग. पळा. . य तदेक्ये पष्टिभक्त विंशोपका इत्येके ॥ १९॥ भाषाटीका-स्थिरमैत्रीके मित्रशत्रुवशात् लायेहुवे द्वादशवर्गके बलके ऐक्य (योग) में ६० साठका भाग देना लब्ध आवे वह विंशोपकात्मक बल होवे ऐसा कितनेक आचार्यका मत है ।। ४९ ॥ उदाहरण। द्वादशवर्गमें सूर्यकी राशीका स्वामी शनि स्थिर मैत्रीमें सूर्पकर शत्रु है इसलिये सूर्यके नीचे गृहमें २५॥ कला वल लिखा--एवं होराका स्वामी चंद्र मित्र है सूर्यके इसकारण५०कला बल होमें लिखा- द्रेष्काणका स्वामी बुध शत्रु है सवर शत्रुका२५कला बल देकाणमें चतुर्थीसमें सूर्य स्वराशीका है अतः स्वका १००कला बल-एवं पंचमांशमें-पंचमाराका स्वामी गुरु मित्र है अतएव मित्रका ५० कला बल और पठांशका स्वामी चंद्रशी मित्र है इसलिये पष्ठाशमेंभी ५० कला वल लिखा और सप्तमाराका स्वामी शत्रु है अतः सप्तमांशमें शत्रुका २५ फला बल भष्टमांशका स्वामी मौम मित्र है इसलिये अष्टमांशमें मित्रका ५० कला बल नवांशका स्वामी गुरुमित्र है सबब नवांसमें मित्रका पल५०कला और दशाशका स्वामी शनि सूर्यके शत्रु है इसवास्ते दशांरामें शत्रुका २५ कला वल लिखा और एकादशांशका स्वामी गुरु मित्र तथा द्वादशांशका स्वामी सूर्य सका है इसलिये एकादशांशमें मित्रका ५० कला वल और द्वादशांशमै स्वका १०० कला पल लिखा ये दादरायर्ग बल हुवा इसका योग किया ६०० आये ६० साठका भाग दिया लब्ध १० 1 - विशोपकात्मक सूर्यका द्वादशवर्ग बल हुपा ऐसेही शेष चन्द्रादिग्रहोंका द्वादशवर्गवल जानना-इति ।

जापाटीकासहितम् । (१२७) अथ दृष्टिसाधनमाह । पझ्योनदृश्येदिदिग्भशेपेतद्विनांशा अर्धास्तिथिशु- दास्तथा व्यंकशेपे भोग्यांशा एव वेदाष्टशेषे च सार्दा अंशाः पञ्चवेदतः शुद्धास्तथैव तर्कानशेपेशाविनाः पटिशुद्धाः कलाबादृष्टिरन्यर्वे तदभावः ॥ ७॥ इति इप्टेरध्यायः। भापाटीका-पश्यहको हीन करना दृश्यग्रहमेंसे दो २ राशी १० दशरशी शेष बचे तो राशीके विना अंशोंको आधे करना और १५ पदरामेसे शोधना सेही तीन ३ राशी ९ नवराशी शेष बचे तो अंशोंको तीसमेंसे शोधना-एवं १ चार राशी ८ आठराशी शेष बचे तो राशी विना अंशोको डेढे ( अंशोंको आधे करके उन्ही अंशोंमें मिलाना ) करना और ४५ पैंतालीसमेंसे शोधना इसीप्रका ६ छःराशी० शून्यराशी शेष बचे लो राशीपिना अंशोंको दोगुणे करना ६० साठमेंसे शोधना कलादिक दृष्टि होवे और इन उक्तराशियोंसे अन्यराशी शेष बचे तो दृष्टिका अभाव ( दृष्टिनहीं ) जानना ॥ ३ ॥ ८ दृष्टिचक्रम्. ३ ३ ४ अंशा- मंशा-अंशा-अंशा-अंशा अशा अशा- अशा- ऽर्दा । ३० देवरा द्विगु | द्विगगा। १५.४५.६.४.६०४. १ जिस ग्रहपर दृष्टि करना हो वह दृश्य जो देखना हो वह पश्य ( पश्यतीति द्रष्टा दर्शनाहों दृश्यः)

(१२६)
वर्पप्रदीपकम् ।
हो तो द्वितीय हर्षपद होवे-(सूर्य ९ चन्द्र ३ मङ्गल ६ बुध १ गुरु ११ शुक्र
शनि १२ में स्थानमें हो तो दूसरा हर्षपद होवे ) ॥ ५१ ॥
सूर्यारेज्या नराः शेपा स्त्रियः॥५२॥
भापाटीका-सूर्य मंगल गुरु पुरुपमहशेष चन्द्र बुध शुम शनि स्त्रीमह जानना५२
दिने पुमान् रात्री स्त्री तृतीयम्॥५३॥
भापाटीका-दिनमें वर्षमवेश हो तो पुरुपयह रात्रिमें स्वीयह बलवान् जान-
ना तृतीय तीसरा हर्षपद होवे ॥ ५३ ॥
तुर्यभतस्त्रिषु निषु नृस्त्रियो तुर्यम् ॥५४॥
भापाटीका-चतुर्थशायसे तीन तीन स्थानमें पुरुपबह और स्त्रीग्रह स्थित
हो तो चतुर्थ हर्षपद होवे-(४।५।६ पुरुषग्रह ७१८१९ स्त्रीयह ३० ।
११ । १२ पुरुपग्रह ११२।३ स्त्रीयह स्थित हो तो ४ हर्षपद जानना)॥५४॥
चतुर्वेषु प्रत्येकं पंचविंशोपका वलम् ॥ ५५ ॥
भापाटीका-इन चारही हर्षपदोंमें प्रत्येक (एक एकके प्रति ) के पांच पांच
विशोपका बल जानना ॥ ५५॥
इति वटाध्यायस्तृतीयः ।
उदाहरण।
यहां शुक उमराशीका है इसलिये प्रथम हर्पपदमें ये बलवान् हुवा-
सूर्यको आदिले कोई मह द्वितीय हर्षपद त्यानाम नहीं है अतः द्वितीय हर्षपद
किसीका नहीं आया-दिनमें वर्षप्रवेश हुवा है इससे पुरुपग्रह ( सूर्य मंगल गुरु )
तृतीयहर्प बलदाना हुये एवं चतुर्थस्थानसे तीन तीनमें पुरुष स्त्री ग्रह देखनेसे ८
आठमें शनि स्त्रीमह और १०1१1 में सूर्य, मंगल, पुरुपग्रह स्थित हो ये चतुर्थ
हर्षपदमें बली हुने-इति ॥
हर्षपदचक्रम.
1
भ
प
--
.
.
.
०
५
o
.
o
.
मयम.
टिताप.
तीप.
५
५
.
G
.
.
५
क
o
.
५
to
.
१०
क
५। ५
५
पाग.
इति श्रीन्योगिदिएनीमन्महादेवकनवर्षदीपिकास्पतानिकान्य तदंगमश्रीनिवासविरवि-
साया सोसादरपमासम्याग्यायां बरसाधनाप्यापाकृतीपः ॥ ३ ॥

भापादीकासहितम् । (१२९). पहले क्षेपककी राशी नहीं आवे तो सिद्धसहमकी राशीमें एक युक्त करना शुख्याभय और शोध्यके बीचमें क्षेपक नहीं आये नो एक मिलाना ) ॥२॥ क्षेपकानुक्तौ लग्नं योज्यम् ॥ ३॥ भाषाटीका-जिस सहमसाधनमें क्षेपक नहीं कहा हो उसमें लम युक्त करना (लनको क्षेपक समझना)॥ ३ ॥ समयानुक्तौ रात्रौ शोध्यशोधको व्यस्तो कार्यों ॥४॥ भापाटीका-जिस सहमसाधनमें समय नहीं कहा हो उस सहमके साधनमें रात्री में वर्षप्रवेश हो तो शोध्यशोधकको व्यस्त ( उलटे) करना अर्थात् शोध्यको शुद्ध्याश्रय और शुद्धयाश्रयको शोध्य मानके सहन करना ॥ ४ ॥ सूर्योने चन्द्रे पुण्यसहमः ॥५॥ भापाटीका-चंद्रमेंसे सूर्यको हीन करनेसे पुण्यसहम होवे ॥ ५ ॥ चन्द्रोनार्के गुरुज्ञानज्ञातिसहमानि ॥६॥ भापाटीका-चन्द्रमा सूर्यमेंसे हीन करनेसे गुरु,ज्ञान ज्ञाति,सहम होते हैं ॥६॥ पुण्योनेज्ये यशोदेहसैन्यघातम् ॥७॥ भापाटीका-गुरुमेंसे पुण्यसहमको हीन करनेसे यश, देह, सैन्य, घात, सहम होतेहैं ॥ ७ ॥ गुण्योनज्ञाने शुक्रान्विते मित्रम् ॥ ८॥ भाषाटीका-पुण्यसहमको ज्ञानसहममेंसे हीन करके शुक्र मिलानेसे मित्र सहम होये ॥८॥ कुजानपुण्ये माहात्म्यथैर्यशौर्यम् ॥ ९॥ भापाटीका-पुण्यसहममेंसे मंगलको होन करनेसे माहात्म्य धैर्य शौर्य सहम शुक्रोनमन्दे इच्छा ॥ ३०॥ भाषाटीका-शुक्रको शनिमेंसे होन करनेसे इच्छासम होवे ॥ १० ॥ लग्नेशोनारे सामर्थ्य चेदंगेशो भीमस्तदा जीवाच्छोधनीयः ॥११॥ भापाटीका-लग्नके स्वामीको भौममेंसे होन करनेसे सामर्थ्य सहम होने यदि लगेश्वर भौमही हो तो गुरुमेंसे लमेश्वरको हीन करना ॥ १३ ॥ होते हैं ॥ ९॥ १ (१२८) वर्पप्रदीपकम् । र श ० . G ० . ११|र. १ २ ० ५ ६ . . " . ७ . ० a . १ ग्रहोपरिग्रहाणां दृष्टिचक्रम् । उदाहरण । दृश्य सूर्य १० ११६ । ५३ । ३९ मेंसे पश्य चन्द्र। 1011 २२१५६ को हीन किया शेप ३० । ४३ बचे इसके राशी विना अंशादिक १६॥ ६६२७३० ३० । ४३ को द्विगुण किये ३३॥ १।२६ हुवे इनको ६० साठमेसे सोधे २६ । ५९ कलादिक सूर्यपर चन्दको दृष्टि हुई इसीतरह क्रमसे यु. | सर्व ग्रहोंपर ग्रहोंकी दृष्टी जानना- और भावपर दृष्टि करना हो तो २७११११८१८ गु. / भावदृश्यग्रह पश्य समझके दृष्टि ५७१२७३५५९ करना भावोपरि ग्रहोंकी दृष्टि होवे। . ० '० . . . ० 0 म. ८ ४३४६ 2 ४४ . . , ७ . b . . " ० क ३० ३८ ::: . . १० . . १ . . 0 . . " . . D D n . १५. ५३ o . ६ . . 6 . . १ . . २०१३1२११८] २२ . १४२८५४।५२ . इति दृष्टि सापनाघ्यायमतुर्थः अथ सहमाऽध्यायः। सर्ववसदमसाधने शुद्धयाश्रयतः शोध्यहीने क्षेपकयुक्त सहमसिद्धिः ॥ १ ॥ भापारीका-सर्य सहमसाधनेमें शुद्धाश्रय में शोपको हीन करके क्षेपक पुना करना सहमसिद्ध होये ॥ ३ ॥ शोध्यभादेरारभ्य शुद्धयाश्रयभादितोऽकि क्षेपाभावे सिद्राहमर्भ सेकं कार्यम् ॥ २॥ भापारीका-गांपकी रागी अंगको आदि ले शुदयाश्रयकी राशी अंगके मिमहान करना पड़ादी र शुभपात्रप भोर निमका दान करने का काममोपा

।
मापाटीकासहितम् ।
(३३)
मन्दानेज्ये ज्ञान्विते शास्त्रम् ॥ २१॥
भाषाटीका-शनिको हीन करना गुरुमसे बुध मिलाना शास्त्रसहम होवे॥२३॥
सदा चन्द्रोनशे बंधुः ।। २२॥
भाषाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदाही चन्द्रको हीन करना बुधर्मेसे
बंधुसहम होये ॥ २२ ॥
ज्ञानेन्दो पराश्रयः ॥२३॥
भाषाटीका-चुधको हीन करना चन्द्रमेंसे पराश्रय सहम होवे ॥ २३ ॥
सदा चन्द्रोनाष्टमे मन्दान्विते मृतिः ॥२४॥,
भाषाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदाही चन्द्रको हीन करना अष्टम
भावमेंसे शनि युक्त करना मृत्यु सहम होवे ॥ २४ ॥
सदा धर्मेशोनधर्मे धनेशोनधने लाभेशोनलाभे देशान्तरधनलाभाः ॥२५॥
भापाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रीका सदाही नवम भावके स्वामीको हीन
करना नवम भावमेंसे धन भावके स्वामीको हीन करना धनमायमसे लाभभावके
स्वामीको हीन करना लाभावमेंसे देशान्तर १ धन लाभ३ सहम होवे॥२५॥
सदा सूर्योनभृगौ पराङ्गना ॥२६॥
भापाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रीका सदाही सूर्यको हीन करना शुक्रमेसे
परागन्ना ( परस्त्री) सहम होवे ॥ २६ ॥
मन्दोनेन्दो दास्यम् ॥२७॥
भापाटीका-शनिको हीन करना चन्द्रमेंसे दास्य सहम होवे ॥ २७ ॥
सदा बुधोनचन्द्रे वाणिज्यम् ॥ २८॥
भापाटीका-सदा (दिनरात्रमें ) बुधको हीन करना चंद्रगेसे वाणिज्य सहम
दिवाकॉनमन्दे सूर्यभपयोगे रात्री चन्द्रोनमन्दे चन्द्रःशयोग कार्य-
भापाटीका-दिनका इष्ट हो तो सूर्यको हीन करना शनिमसे और उसमें सूर्यकी
राशीका स्वामी मिलाना राघिसमयका इष्ट हो तो चन्द्रको हीन करना शनिमंसे
और उसमें चन्द्रकी राशीका स्वामी मिलाना कार्यसिद्धि सहम होवे ॥ २९ ॥
२ जिस राशिमें स्थित होवे उस राशीका स्वामी।
होवे ॥ २८॥
सिद्धिः ॥२९॥

झापाटीकासहितम् । (१३३) शवश्चन्द्रोनजीवनयोः पुत्रौ ॥४॥ भापाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रीका मुद्दा चंद्रको हीन करना गुरु और शुक्रमसे पुत्र पुत्री सहम होवे अर्थात् मुरुमेंसे चंद्रको हीन करे तो पुत्रसहम और शुक्रमेंसे चंदको घटाये तो पुत्रीसम होये ॥ ४० ॥ दिनेकोनस्वाचे रात्रौ चन्द्रोनस्वोच्चे मंडलेशः ॥११॥ भापाटीका-दिनका इष्ट हो तो सूर्यको हीन करना अपने उच्च ( ०रा०१० अं० )मेसे रात्रिसमयका इष्ट हो तो चंद्रको हीन करना अपने उच्च (१रा०३०) मेंसे मंडलेशसहम होवे ॥ ४१६ मन्दोनसाईनिभे जलपथः ॥४२॥ भापाटीका-शनीको हीन करना साढे तीन राशी ( ३ राशी १५ अंश) मेंसे जलपथसहम होवे ॥ ४२ ॥ मन्दोनपुण्ये पन्धनम् ॥ ४३॥ आपाटीका-शनिको हीन करना पुण्यसहममें से बंधन सहम होवे ॥४३॥ अर्कोनयुण्ये लाभान्वितेश्वः ॥ १४ ॥ भापाटीका-सूर्यको हीन करना पुण्यसहममेंसे और उसमें लान ११मा भार मिलाना अश्वसहम होवे ॥ ४४ ॥ सदा जीवोनेन्दी गजः॥४५॥ भापाटीका सदा (दिनका इष्ट हो वा रात्रिका) गुरुको हीन करना चन्द्रमेंसे गनसहम होवे. ॥ ४५ ॥. रिपुसहमोनांत्ये पशुः ॥४६॥ भाषाटीका-शत्रुसहमको हीन करना १२वारामें भावमेंसे पशुसहम होवे॥४६॥ शश्वत्कोणोनाहारयोर्व्यसनकृपी ॥ १७ ॥ भापाटीका-दिनका इष्ट हो या रात्रिका सदा भनिको लम और मंगलसे ही- न करनेमे व्यसन और कपि नहम होवे (लनमें से शनि होन करनेसे व्यसन और सोममेसे शनिहीन करनेसे रुपि सहम होवे) ॥१७॥ सदा पुण्योनार्क मन्दयुते बन्धमोक्षः ॥ १८॥ भापाटीका- [सा (दिनरात्रि ) पुण्य सहमको हीन कला शनिमसे और उ- में शनियुक्त करना बन्ध मोक्ष सहम होवे।। ४८ ।।

वर्षप्रदीपकम् ।
कोणोनशुक्रे विवाहभायें ॥३०॥
भाषाटीका-शनिको हीन करना शुक्रमेंसे विवाह और भार्या (स्त्री) सहम
होये ॥ ३० ॥
ज्ञोनेज्य आधानम् ॥३३॥
भाषाटीका-बुधको हीन करना गुरुमेंसे आधान (गई ) सहम होवे॥३१॥
सदा चन्द्रोनमन्दे पष्टान्विते सन्तापः॥३२
भापाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रीका सदा चंद्रको हीन करना शनिमें से
और उसमें ६ छहा भाव मिलाना संताप सहम होवे ॥ ३२॥
सदा भौमोनसिते श्रद्धा ।। ३३ ॥
भापाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा भौमको हीन करना शुक्रर्मेसे
अडा सहम होवे ॥३३॥
सदा पुण्योनज्ञाने प्रीतिः ॥३४॥
भापाटीका-सदा दिनका इष्ट हो वा रात्रीका पुण्य सहमको हीन करना ज्ञान
सहममेंसे प्रीति सहम होवे ॥ ३४ ॥
मन्दोनारे ज्ञान्विते जाड्यम् ॥ ३५॥
भापाटीका-शनीको हाँन करना मंगलमेंसे और उसमें बुधयुक्त करना जायस
हम होवे ॥३५॥
शश्वज्ञोनारे व्यापारः ॥ ३६ ॥
भापाटीका-सदा (दिनरात्रिके इष्टमें) बुधको हीन करना भौमसे व्यापारसह
म होवे ।। ३६ ॥
चन्द्रोनार्कजे जलपातः ॥३७॥
भापाटीका-चंद्रको हीन करना शनिमसे जलपान सहम होवे ॥ ३ ॥
अर्कजोनभोमे शत्रुः ॥ ३८ ॥
भापाटीका-शनिको हीन करना भीमसे शत्रु सहम होवे ॥ ३८ ॥
बुधोनपुण्ये ज्ञान्विते दारिद्यम् ॥३९॥
भापाटीका-युधको निकालना पुण्य सहममेंसे और उसमें बुध युक्त करता
रारिम सहम हो ॥३९॥

आपाटीकासहितम् । (१३५) प्रथमं जन्मकालिक समवलावलं जानीयात् ।। ५९ ।। भापाटीका-प्रथम जन्मसमयमें सहमोंका बल निर्बल जानना (जन्मसमयमै सई सहम करना नंतर जन्मकुंडली में देखना जो सहम अपने स्वामीसे लमेश्वरसे और शुभग्रहसे युक्त होवे वादृष्ट होवे।८।१२मा आदि दुष्ट स्थान के शिवाय शुभस्थानमें स्थित होवे वह बलवान जानना और इससे विपरीन होवे वह निल जागना) ५९ तत्र यानि वलीयांसि तेषामेव संभवः ॥ ६॥ भापाटीका-जन्मसमयमें जो जो राहम बलवान होवे उन्ही सहमोका संभव जानना ।। ६०॥ प्रतिवर्ष सम्भवतापन्नान्येव कार्याणि नेतराणि नैष्फल्यात् ॥ ६ ॥ भापाटीका-प्रतिवर्ष ( हव) जिन जिन सहमका जन्मसमयमें सम्भव आयर हो ही सहम करना जिनका संभव नहीं है वे रोप सहम निष्फलदाता हैं इसलिये नहीं करना । ६१ ॥ प्रश्ने पृच्छकेटकार्यसहमं कार्यम् ।। ६२ ॥ भापाटीका-प्रश्नसमयमें पूछनेवालेका जो अभीष्टकार्य हो वह सहम करना ६२ इति सहमाश्यायः पनमः। उदाहरण। यहां दिनमें वर्षप्रवेश हुवा है इस कारण मूत्रमें कहे हुवे शोध्य सूर्य ३० । १६ । ३९ । ३९ को शुद्धयाश्य चंद्र १० । १२२ १ ५६ मेसे घटाया ११११३।२९।१७ शेष बचे इसमें क्षेपक नहीं कहा है इसलिये लग्न १११२॥ २६ । ३५ युक्त किया ० । २५। ५५ । ५२ ये पुण्य सहन सिद्ध हुया शोध्य सूर्यको राशी १० अंश १६ को आदिले शुक्ष्याश्रय चंद्रकी राशी १० अंश पर्पत गिननेसे क्षेपक (लम) की राशी १ वृपा बीचमें आगई है इसलिये सिद्ध सहमको राशी १ एक युक्त नहीं किया. इसी प्रकार शेष महम जानना. अथ कतिचित्सहमाः गुरु पुराना रोग जीव ५.४ २५८.७ 10 ५५/५७१८ २७ ४५ ५२ ३५ ५२11८/४६ १४.४०/31१४९ বুনি টিখিদশনাঘবালিকগীশিং- निनायां सोदाहरणभाषाम्याग्याप सहनमायना पापः पञ्चमः । . पुण्य शान १ ।

(१३४) वर्षप्रदीपकम् । सदेज्यानपुण्ये सारे दुःखम् ॥१९॥ भापाटीका-सदा (दिनरात्रिके इष्टमें) गुरुको हीन करना पुण्यत्तहममें से भौम मिलाना दुःख सहम होवे ।। ४९ ॥ कुजोनमन्दे उष्टः ॥५०॥ भापाटीका-मंगलको निकालना शनि से उष्ट्र सहम होवे ॥५०॥ मन्दोना पितृव्यः ॥५१॥ भापाटीका-शनिको हीन करना सूर्यमेंसे पितृव्यसहम होवे ॥ ५ ॥ पष्टेशोनपप्ठे सान्त्ये आखेटः॥१२॥ भापाटीका-छठे भावके स्वामीको छनावमेंसे हीन करके बारमा भाव मिलानेसे आखेट (शिकार ) सहम होवे ॥ ५२ ॥ ज्ञोनेन्दौ भृत्यः॥५३॥ भोपाटीका-युधको चंद्रमेंसे हीन करनेमे भृत्य सहम होये ॥ १३ ॥ अर्कोनेज्ये बुद्धिः ॥५४॥ भापाटीका--सूर्यको गुरु) से हीन करनेसे बुद्धिसहम होवे ॥ ५४ ॥ सदा तुर्यशोनलग्ने निधिः ॥५५॥ भापाटीका-दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा चतुर्थ भावके स्वामीको लग- मेंसे हीन करनेसे निधि सहम होवे ॥ ५५ ॥ सदा शुक्रोनकोणे ऋणम् ॥५६॥ भापाटीका-सदा दिनरात्रके इष्टमें, शुक्रको रानीमेंसे होन करनेसे ऋण सहम होये ॥ ५६ ॥ सदा बुधोनेन्दौ सत्यम् ॥ ५७॥ भापाटीका-सदा(दिनरात्रिमें)बुधको चंद्रमसे हीन करनेसे सत्यसहम हवि५७ स्वेशेन शुभेन वाऽन्देशेन वा युतं दृष्टं वा सहम श्वेशपाके वृद्धिदमन्यथा विपरीतम् ॥२८॥ भापाटीका-अपने स्वामीसे अथवा शुभग्रहत्ते वा वर्षेश्वरसे युक्त होने वा दृष्ट होवे जो सहम वह अपने स्वामीनी दशाम फलवृद्धि करे और विपरीत होने तो विपरीत फलकी वृद्धि करे अर्थात् अपने स्वामीसे शुभयहसे या वधरसे युक्त क दृष्ट नहीं हो वह पिपरीत(उलटा)फलकी वृद्धि अपने स्वामीकी दशामें करे५८

भापाटीकासहितम् । (१३५)
प्रथमं जन्मकालिक समवलासलं जानीयात् ॥१९॥
भापाटीका-प्रथम जन्मसमयमें सहमोंका बल निर्बल जानना (जन्मसमयमै सर्व
सहम करना नंतर जन्मकुंडली में देखना जो सहम अपने स्वामीसे लमेश्वरसे और
शुभमहसे युक्त होवे वा दृष्ट होवेद।८।१२मा आदि दुष्ट स्थानके शिवाय शुभस्थानमें
स्थित होवे वह बलवान् जानना और इससे विपरीत होवे वह निर्बल जानना) ५९
तत्र यानि बलीयांसि तेपामेव संभवः ॥६॥
भापाटीका-जन्मसमयमें जो जो सहम बलवान होवे उन्ही सहमोंका संभव
जानना ॥ ६॥
प्रतिवर्ष सम्भवतापनान्येव कार्याणि नेतराणि मेष्फल्पात् ॥ ६॥
भापाटीका-प्रतिवर्ष ( हवर्ष ) जिन जिन सहमका जन्मसमयमें सम्भव
आया हो वेही सहम करना जिनका संभव नहीं है ये शेप सहम निष्फलदाता हैं
इसलिये नहीं करना ॥६१ ॥
प्रश्ने पृच्छकेटकार्यसहमं कार्यम् ॥ ६२ ।।
भापाटीका-प्रश्नसमयमें पूछनेवालेका जो अभीष्टकार्य हो वह सहम करना ६२
इति सइमाऽध्यायः पंचमः ५।
उदाहरण।
यहां दिनमें वर्षप्रवेश हुवा है इस कारण सूत्रमें कहे हुवे शोध्य सूर्य १० ।
१६ । ३९ । ३९ को शुद्धयाश्रय चंद्र १०1० । २२ । ५६ मेंसे घटाया
११।१३।२९।१७ शेपं बचे इसमें क्षेपक नहीं कहा है इसलिये लम १११२।
२६ । ३५ युक्त किया ।२५। ५५ । ५२ ये पुण्य सहम सिद्ध हुवा शोध्य
सूर्यकी राशी १० अंश १६ को आदिले शुद्धयाभय चंद्रकी राशी १० अंश.
पर्यंत गिननेसे क्षेपक (लम ) की राशी १ वृपा बीचमें आगई है इसलिये
सिद्ध सहमकी राशीम १ एक युक्त नहीं किया. इसी प्रकार शेप सहम जानना.
अथ कतिचित्तहमाः
जा पुत्र रामधन मगर रोग जीवि
पुण्य
.
२
१
२५८
१८
५२।१८४६
११
. ४ ५
१
५ १८।२७
o
४५: ५०
३y५५१४|४०
४ ४
३
५ ३
१० ४
२०१४३९
इति श्रीन्योतिविदरश्रीमन्महादेवानका मदीपकाम्यतानिक घेतामनुश्रीनिवासावर-
निनायां सोदाहरणभाषाव्या पायां सहनमायना पापः प्रथमः ॥ ५॥

अब सहमसारणीकोष्टकम् । . .. १२ 11 १४ 12 १९ २० संख्या राज नात काति दराम कर्म रोन राम काले क्षमा राख ६ गुरु बाम गुम्यबान H-4 विष पियारा सासम्म बाता | गौरव पनि पान प पुप्प नं दा म् गुन गु ग मानव में गू प प. पुण्य में श्र म.प. गु गू म मेx प प देशां- मधु पराश्रय मति सहमनाम. तर नामनुस्यालम प च २१ सोध्य चं भएम.मा बुध्याभय । च च प माध्य बु प म -- । म च मु में गु मू च दि क म.B. म बठ ठ ल पै.गा ल छ ल ल + लग्नेशचंद्र होतो सदा गुरुमेंसे हीन करना. . + कर्फलग्नहोतो सदा लग्नेशको सूर्यमेंसे हीन करना. वर्षपदीपकम् । ४. ४१ ४२ धनदार सरूया. २४।१५।२६. २० २८ स ७।३८ परा- वास्थ. राणि-कारियाह भाग- स्य.सिदिमा. जद- संताप. श्रद्धा.लि. गाळय. न. पारपात, श्यहारय. पुत्र पुषी. +. स. व. पा. च. का गु. पी. में. म. गु . मंद- लेश, बंधन. पथ. सहमनाम तुस्यालम्. ओय. अध्या- भय, म.प्य. चं. प. चं. . ए. च. रागी. . रा. ३ अ. ल. अ.प. वा. स. प. ल. स..६मा. ल. स. बुध. ले. ल. ल. ल.

भापाटीकासहितम् । अथ समसारणीकोष्टकाः सस्या उप समनाम अप गग पक्ष मित आम्द भय युधि निकश साप स्या पर्व हाव मोक्ष मा गुगसम... यूप्य ग. मा. शेण पषी दुय घ. मा.म.श.पुष्य श. सू. मा. चं.गु.... पाश्रय इम्प माप...पुण्य ग शोध एच.पघुम छ म. पुष्य म.प. पठेवा .... अध्याय माल.ल.ल.ल. लश्मा ₹ .ल.'. ल. क्षेपक सवा अथाब्देशनिर्णयः। . दिनानार्किसितेज्यचन्द्रशाराभिमन्यचन्द्रा रात्रौ ॥ जीवेन्दु- ज्ञारासितार्किशुक्रमन्दारेज्यचन्द्रा मेपादिनिराशिपाः॥१॥ अब वर्षेश्वरका निर्णय कहते हैं। आपाटीका-दिनमें सूर्य, शुक्र, शनि, शुक्र, गुरु, चंद्र, बुध, मंगल, शनि, मंगल, गुरु, चंद्र, रात्रि, गुरु, चंद्र, चुध, मंगल, सूर्य, शुक, गनि, शुक्र, शनि, मंगल, गुरु, चंद, मेपराशीको आदिले कमसे विरोशिपति जानना ॥ १ ॥ अथ निराशिपतिचक्रम्. में.. मिस.क./...घम.क.मी.) .४ गानमं जन्मावेशो वपशिस्तत्रिराशिपो मुन्थो दिनकभो निझीन्दु- भेशश्चेति पञ्चाधिकारिणः ॥२॥ भापाटोका-जन्मलमका स्वामी १ पर्पलमका स्वामी २ वर्पलमका निराशिमति ३ मुंथाका स्वामी १ दिनमें सूर्यकी राशीका स्वामी रात्री चन्द्रकी राशीका मामी ५ ये पांचही अधिकारी जानना ॥ २॥ एपांचलाधिकोऽन्द्रष्टा वशः ॥३॥ १ वटन जिस राशीका हो उस्का दिन वर्षमवेश हो तो दिनका पत्रिी राधीका विशशि पति दसना।

(१३८)
वर्षप्रदीपकम् ।
भापाटीका-इन पंचाधिकारियों में जो यह अधिक बलवान होके वर्षलग-
को देखता हो वह वर्षेश्वर होता है ॥ ३॥
बलसाम्ये तु दृष्टयाधिकः॥४॥
भापाटीका-अनेक ग्रहका बल, समान (बरोबर ) हो तो जितकी लग्नपर
दृष्टि अधिक होवे वही वर्पश्वर होगा ॥४॥
उभयसाम्येऽधिकाधिकारी ॥६॥
भापावका-अनेक ग्रहोंका वल और लमपर दृष्टि दोनूं समान (बरोबर)
होवे तो जिस ग्रहका अधिकार जादा आया हो वह वर्षश्वर होगा ॥५॥
त्रितयसाम्ये सुन्थेशः॥६॥
भापाटीका-बल दृष्टि अधिकार यह तीनों समान हो तो मुन्थेशही वपेश होगा६
पञ्चानामपि मध्ये कोपि नाङ्गं पश्येत्तदा मुन्थेशवपलग्नेशी
यश्चोक्ताधिकार्यन्तःपाती तदितरोपि जनुस्समये
वोगराशिद्रष्टा भवेत्तदैतेषां योऽधिकवलः स वपेंशः ॥ ७॥
भापाटीका-पांचों अधिकारियों से कोई भी वपलमको नहीं देखते हो तो
मुन्थेश पर्पलमेश और दोनोंसे अन्यग्रह जो वर्पमें अधिकारी होकर जन्मकुण्ड-
लीमें वपलमकी राशीको देखता हो तो इन तीनों से जो अधिकवल हो वही
वर्पश होगा ॥ ७ ॥
त्रयाणां वलसाम्ये मुन्थेशः ॥८॥
भापाटीका-तीनों अधिकारियोंका वल समान ( बरोबर ) हो तो मुन्धेशही
वश होगा ॥८॥
उक्तरीत्या चन्द्रस्यान्दपत्वप्राप्तो तदित्यशालिनोदपत्वमन्यथा त -
शस्येत्येके ॥९॥
भापाटीका-उतरीतिसे चन्द्रको वर्षशत्व प्राप्त हो तो (चंद्र वर्पश होता
हो तो) चन्द्रसे जो ग्रह इत्यशाल करता हो यही वश होगा और कोई
यह इत्यशाल नहीं करता हो तो चन्दकी राशीका स्वामी वर्पेश होगा यह
कितनेक आचार्योंका मत है ॥ ९ ॥

भाषाटीकासहितम् ।
वोगेशो राजा समयेशः सेनापतिर्मुन्थेशो मन्त्री जन्माङ्गेशः पुरेश-
स्त्रिराशिपो रससस्यधात्वधिप इत्येके ॥१०॥
भाषाटीका-वपलमेश राजा समयपति सेनाधिप मुन्थेश मंत्री जन्मलमेश
पुराधिप त्रिराशिपति रस धान्य धातु इनका अधिपति होता है यह कितनेक
आचापाका मत है ॥ १० ॥
इत्यदेशनिर्णयाऽध्यायः ६।
जन्मल.रा.प.श.
८
म.
वर्षल.स.क
..
११
पू.
मुम्था, रा.प
सूर्य | रा.प.श.
८
पू.
उदाहरण ।
पंचाधिकारी.
इन पांचों अधिकारियोंमें शुक्र अधिक बली
है और वपलमको मित्रदृष्टिसे देखता है इस
लिये वर्पश्वर शुक्र पूर्णबली हुवा-
इति श्रीज्योतिर्विटरप्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपक तदं-
| गजश्रीनिवासविरचितायां सोदाहरणभाषाव्याख्यायाम-
१ पू.ब्देशानर्णयाध्यायः ६ षष्ठः ॥
अथ दशाविचारः।
सलमखेटानां मध्ये यो न्यूनांशो भवेत्तस्यांशादयः प्रथम लेख्याः ॥१॥
अब दशाविचार कहते हैं।
भापाटीका-लनसहित सूर्यादि सातही यहोंमें जो ग्रह न्यून (अल्प)
अंशका होवे उसके अंगादि ( अंश कला विकला) प्रथम लिसना ॥ १ ॥
ततस्तदधिकांशानामंशायाः क्रमशो लेख्याः ॥२॥
पाटीका-फेर उस (अल्प अंशके ) महसे अधिक अधिक अंशके
ग्रहोंके अंशादिक क्रमसे लिखना ( अल्प अंशके ग्रहसे अधिक अंशके ग्रहके
अंशादिक लिखना तदनंतर उससे अधिक अंशके यहके अंशादिक फेर उससे अ-
पिकके अंशादिक इस कमसे सबसे अधिक अंशके ग्रहके अंशपर्यंत लिखना)॥२॥
इमे हीनांशसंज्ञकाः ॥३॥
भापाटीका-उत्तप्रकार लिखे हुवे ग्रहोंके ये अंशादिक इनको हीनांश
संजक जानना ॥३॥

(१४०)
वर्षपदीपकम् ।
द्वयोरंशादिसाम्येवलाधिकस्य पूर्वा दशा ॥ ४॥
भापाटीका-दो ग्रहोंके अंशादिक ( अंश कला विकला ) समान (बरोबर)
हो तो उनमें से जो अधिक बलवान होवे उसकी प्रथम दशा जानना ( प्रथम
उसके अंशादिक लिरगा)॥४॥
बलसाम्येऽल्पगतिकस्य ॥५॥
भापाटीका-दो ग्रहोंका बल समान हो वो जो अल्पमती ग्रह होवे उसकी
प्रथम दशा जानना ।। ५॥
उदाहरण.
यहां लमसहित सूर्यादि ग्रहोंमें सर्वसे न्यून अंश चन्द्रके हैं अतएव चन्द्रके
अंश • कला २२ विकला ५६ पहले लिखे चन्द्रसे अधिक अंशका बुध है
इसलिये चंद्रके नंतर बुधके अंशादिक १।३५। ८ लिखे एवं बुधसे अधिक
औम भौमसे अधिक अंशादि शनिक इस क्रमसे अधिक अधिक अंशके ग्रह
कमसे सर्वाधिकांश ग्रहपर्यंत लिखे ये हीनांश हुदै-
हीनांशाः।
११/७१११२१६१८२५
२९.३५३१५४/२६५३५३
पात्यकृतो प्रयमखेटस्य यथास्थितांशाः॥६॥
भापाटीका-पात्यांश करनेके समय प्रथम ग्रहके (जो सर्व ग्रहसे अल्प
अंशादिकमा मह हीनांशमें प्रथम लिखा है उसके ) अंशादिक यथा स्थित (जो
अंशादिक हो वेही) प्रथम लिखना ॥ ६ ॥
ततः प्रथम द्वितीयाद्वितीयं च तृतीयादित्यादि
क्रमेण शोधयेत् ॥७॥ इमे पात्याः ॥८॥
भाषाटीका-तदनंतर प्रथम लिखे ग्रहके अंशादिकको दूसरे ग्रहके अंशादि-
कमसे दूसरेके अंशादिकको तीसरे से तीसरेके अंशादिकको चोमेंसे इस क्रमसे
शोधते जाना ॥७॥ये पात्यांश होवे ॥ ८॥

भापाटीकासहितम् । (१४१) उदाहरण । हीनांसमें सबसे न्यून अंशका चंद्र प्रथम लिखा है उसके अंशादि प्रथम येही • । २२ । ५६ लिखे इनको आगे जो दूसरा ग्रह बुधके अंशादिक १ । ३५॥ ८ है उसमेंसे हीन किये ।। १२ । १२ शेष बचे यह बुधके अंशादि हुवे. तदनंतर बुधके अंशादिक १।३५। ८ को तीसरे भौमके अंशादिक ७ । ३१ ३६ मेसे घटाये ५। ५६ । २८ शेष बचे ये मंगलके हुवे फेर भौमके अंशादि- कको चोथे शनिके अंशादिकमेंसे घटाये ऐसे क्रमसे घटानेसे ये पात्यांश हुवे- पात्यांशका ऐक्य सबसे अधिक अंशके ग्रहके अंशके समान आता है। पत्यांशाः। चं... श. ल. र. गुइयो .१५/२/२/४/२६/२७ २५१२१६२३३२/७३/५/२ १६/१२०८२३३६/३/१६५३४८ वर्षदिनानि पात्येक्येन भजेल्लब्धं दिनाद्य ध्रुवम् ॥ ९॥ भापाटीका-वपके दिनोंको ( ३६० को वा ३६५ । १५ । ३३ । ३० को) पात्यांशाक ऐक्य (योग) का नाम देना लन्ध आवे वह दिनादिक ध्रुव जानना ॥१॥ उदाहरण। वर्षदिनादि ३६० । ० १ ० के पात्यांशयोग २५। २।४८ का भाग दिया परंतु भाज्य भाजक दोनों दिनादि कहे इसकारण इनको सवर्णित किये भाज्य १२१६००० में भाजक पात्यांश योग ५०१६८ का भाग दिय लम १४ दिन आये शेप३३६४८यचे इनको६० साठ गुणे किये२०१८८८० दुवे इनमें ९०१६८ का नाम दिया लब्ध २२ घटी आई शेप ३५२०४ बचे इनको ६० साठ गुणे किये ,२११२२४० इनमें भाग ९.१६८ का दिया लब्ध २३ पल आई शेष ३८३७६ बचे इनको ६० साठ गुणे किये २३०२५६० हुवे इनमें ९०९६८ का भाग दिया लब्ध २५ विपल आई इस प्रकार पात्पस्यका भाग देनेसे दिनादिक १४ । २२ । २३ । २५ ध्रुव आया- '(१४२) वर्षपदीपकम् । ध्रुवेण स्वत्वपात्यांशा हता दिनाचा दशाः ॥१०॥ भापाटीका-दिनादिक ध्रुवसे अपने अपने पात्यांशको गुणेन करना सो दिनादिक दशा होवे ॥ १० ॥ उदाहरण। दिनादिक ध्रुव १४ ॥ २२॥ २३ । २५ । से चंद्रकी पात्यांश ०।२२।५६ को गुणन किये ५१ २९ । ३७ हुवे ये दिनादिक चंद्रकी दशा हुई इसी प्रकार सब ग्रहोंके पात्यांशको गुणन करके लाये ये दिनादिक दशा आई इसका योग वर्षदिनके समान ३६० १ ०० बरोबर आया इसलिये दशा शुद्ध समझना । दिनादिवशाम्स्पटाः। श. . . २ मास १७ १ १ २ ६ २० १८५८ ५२ ५८ ३८ घटी ४४५४ पळ १९५६ १९५६१९५७१९५०१९५७१९५७/१९५७/१९५०१९५७ संवत ३ ४ १० २ ४१ २३ १६ ५ ४ ३४ ४३ १९५५ ४४ २८॥ २६ २१ " यस्य दशामानं पात्यांशैक्येन भक्तं तल्लब्धदिनायेन स्वस्व- पात्यांशा हताः पाकेशतोऽन्तर्दशादिनायाः ॥११॥ भापाटीका-जिस ग्रहमें अंतर्दशा करना हो उसके दशामानमें ( जितने दिन की दशा होवे उतने दिनको संख्याको दशामान कहते हैं ) पात्यांशके ऐक्यका झाग देना लम्प आये जो दिनादिक ध्रुव उससे अपने अपने पात्यांश गुणन करना दशाके स्वामीको आदिले (जिसमें अंतर्दशा करना हो उस यहकी प्रथम दशा उसके आगे जो यह हो उसकी दूसरी दशा इस रोतिसे कमसे) दिनादिक अंत- देशा होवे ॥ ११ ॥ १ मह सर करने के उदाहरणमें गोत्रिका गुणनफी रीति लिसी है दस गतिसे।

नापाटीकासहितम् ।
(१४३)
उदाहरण ।
यहां मंगलकी दशामें अंतर्दशा करना है-मंगलकी दशा ८५दिन २३ घटी
३३ पलको है यह दशाका मान है इसमें पात्यांशके ऐक्य २५। २ । १८
का भाग दिया भाज्य जाजक सणित किये भाज्य ३०७४१३ में भाजक
९०१६८ का जाग देनेसे लब्ध दिनादिक ३ । २४ । ३३ ध्रुव हुवा इससे
प्रथम मंगलकी पात्यांशगुणन की २० । ३५। १५ आये ये मंगलमें मंगलकी
दिनादिक अंतर्दशा हुई इसी प्रकार फिर क्रमसे शनि लम रवि गुरू आदिकरके
पात्यांश गुणेकिये भौममें अंतर्दशा हुई-
भोममध्येंतर्दशा।
.
म.
ल.
८
८
८
३६
१
१८
४
६
१०
.
४७
घाट
पळ
१५
१९५६/१९५६ १९५७१९५७१९५७१९५०१९५७१९५५१९५७ सयत |
१ २ २
२९
។
९
४१
४१
20
५२/५३
५८
पक्ष
५
२९ २०
०
अब मुग्धादशामाह।
जन्मभसंख्यायां गताब्दान्योजयेत् दयूना नवोद्धृताः शेपे सूर्य-
द्वारराहिज्यमन्दज्ञकेतुशुक्राणामेकादिक्रमतो दशायाः ॥ १२॥
अब मुग्धा दशा कहते हैं.
भापाटीका-जन्मनक्षत्रको संख्या में गताब्दसंरया मिलाना २ दो निकालना
नवका भाग देना एकको आदि ले शेष बचे तो कमसे १ सूर्य २ चंद्र.३ भौ-
म ४ राहु ५ गुरु दशनि थुध ८ फेतु ९शुक्रकी आय दशा जानना. (एक वचे
तो सूर्यकोरवचे तो चंद्रकी ३ तीन बचे तो भौमकी इत्यादि क्रमसे आय दशा
जानना )।॥१२॥

(१४४) वर्षपदीपकम् । धृतित्रिंशदेकविंशतिचतुःपञ्चाशदष्टचत्वारिशंन्यूनपष्टयेकपंचा- शदेकविंशतिपष्टिसंख्यातानि सूर्यादीनां सुग्धादशादिनानि ॥ १३॥ भापाटीका-धृति कहिये १८ निंशत् क०३० एकविंशति क० 1 चतुपञ्चा- शत् क०५४अष्टचत्वारिंशत् क०४८न्यूनपष्टीक०५७एकपंचाशत् क०५१ए- कविंशति क०२१पष्टि क०६०संख्यादिन सूर्यादिग्रहोंके मुग्धादशाके दिन जानना अर्थात् (सूर्यके. १८ चंद्रके ३०मंगलके २१ राहूके ५४ गुरुके ४८ शनीके ५७बुधके ५१ केतुके २१ शुक्रके६० दिन मुग्धा दशाके दिन जानना) ॥१३॥ उदाहरण. जन्मनक्षत्र चित्राकी संख्या ३४में मताब्दसंख्या २८ युक्तकिये४२हुवे इनमेसे दो हीन किये शेष ४०यचे इनमें९ नवका भाग दिया शेप४ पचे. एकको आ- दिले क्रमते गिननेसे ४ चोथी राहुकी ५४ दिनकी आय दशा हुई. (राह दशामें वर्ष प्रवेश हुवा) भगणोनजन्मेन्दुलिप्ताः खखाष्टशेपिता आद्यदशा दिनहताःखाने प्रा तादिनादिभोग्यदशा ॥ १४ ॥ भापाटीका-बारा १२ राशीमेंसे हीन किये हुवे जन्मके चंद्रकी कलाके ८००आठसे का भाग देना शेप वचे कला उसको आय दशा (सूत्र१२ के अ. नुसार आई हुई दशा) के दिनोंसे गुणन करना और ८०० आठसे का भाग देना लब्ध फल ४आवे वह दिनादिक नोग्यदशा जानना ॥ १४॥ दशा दशाहताः पश्यधिकत्रिशतेनाप्ता अन्तर्दशादिनाद्या मुग्धायाम् ॥ १५॥ भापाटीका-दशाके दिनको दशाके दिनसे गुणन करना तीनशे साठ ३६० का भाग देना लन्ध आवे वह मुग्धादशा में दिनादिक अन्तर्दशा हो ॥ १५॥ इति दयाध्यायः। रदाहरण. जन्मममयका चंद्रसष्ट. ५। २९ । १९ । ४९ । इसको मारा १२ राशी- १ राशीको३० तीसगुणी फरफे अंश मिलानाअंश हो वे अंशको साठगुणे करो फला मिछानेसे कशा होती है, आपाटीकासहितम् । (१४५) मसे हीन किया ६।०४०।११ हुवे इसकी कला १०८४०११की इसमें८. आठसेका भाग दिया शेप ४४० ! ११ बचे इनको आय दशा राहुकी आई उसके दिन ५४ से गुणे किये २३७६९ । ५४ हुये इनमें ८०० आठसेका भाग दिया लब्ध २९ दिन आये शेप ५६९ । ५४ को ६० साठ गुणे किये ३४३ ९४ हुवे फिर ८०० का भाग दिया लब्ध घटी ४२ आई शेष ५९४ को फिर साठ ६० गुणे किये ३५६४० हुवे ८०० का भाग दिया लब ४४ पल आई शेप ४४० को फेर ६० साठ गुणे किये २६४०० हुवे ८०० का भाग दिया लब्ध ३३ विपल आई ऐसे फल चार २९ । ४२।४४ । ३३ । आये ये दि- नादिक राहुकी स्पष्ट भोग्य दशा आई- . . ० . १ . . अथ मुग्धादशाचक्रम् । वा. ६. के. शु. र. म. रा.भु. मास १ ५ २ १ दिन १८] २७ १८ २९ २१ २१ घटि. ૪૨ पळ. १४ | विगल ३३ १९५६१९५६/१९५७१९५७१९५७१९५७१९५७१९५७।९५७१९१०/१९५५ ८ १० ४ १. ३ १ ४ २२ १६ . १३ २२ ३६ ३६ ३६ ५३ ३९ २३ २३ ३३ ३३ ३३ ३३ ३३ ३३ इति श्रीज्योतिर्विदर श्रीमन्महादव कृतवर्षदेपकारूप तानिकग्रन्ये तत्सूनुश्रीनिवासविर- नितायां सोदाहरण भाषा व्याख्यया दशासाधनाघ्यायः ७ सप्तमः । अथ मासादिः। गतमाससमितराशियुक्तजन्मार्कतुल्याकें मासप्रवेशः ॥ १॥ अब मासादिसाधन लिखते है। भापाटीका-गतमासको संख्याके समान राशियुक्त किये हुवे जन्मसमयके (५४६) वर्षपदीपकम् । सूर्यके समान (बरोबर ) सूर्य जिस दिन आवे उस दिन मासमवेश होवे ॥ १॥ गतदिनसम्मितांशामासार्के युतास्तत्सदृशे दिनप्रवेशः ॥२॥ भापाटीका-गतदिनकी संख्याक समान (बरोबर) अंशमासके सूर्यमें युक्तकरनेसे जो सूर्य होवे उसके समान सूर्य जिस दिन आवे उस दिन दिनप्रवेश होवे (जिस मासमें जितनी संख्याका दिन प्रवेश करना होवे उसके गतदिनकी जो संख्या होवे उतनेही अंश उसमासके सूर्यमें मिलाना. उसके समान सूर्य जिस दिन आवे उस दिन दिनप्रवेश होगा) ॥ २ ॥ उदाहरण। जैसे दूसरा मासप्रवेश करना है इसके पिछाडी गत मास १ एक हुवा इस लिये जन्मके १० । १६ । ५३ । ३९ सूर्यको राशीके अंक १ एक युक्त किया ११ । १६ । ५३ ॥ ३९ यह २ द्वितीयमासमवेशका सूर्य हुवा । इस सूर्यके बरोवर सूर्यके दिन दूसरा मास प्रवेश होगा इसीप्रकार जितने गतमास होवे उतनीही राशी जन्मार्कमें मिलति जाना और १२ बारा ही मासके सूर्य लाना। दिनप्रेषश। दूसरे मासका ११ ग्यारहमां दिन प्रवेश करना है इग्पारादिन प्रवेशमें १० दस दिन गत हुवे हैं इस लिये १० दश अंश मासके १५ । १६ । ५३ । ३९ सूर्यमें मिलाये ११ ॥ २६ ॥ ५३ । ३९ यह दिन.११ के मवेशका सूर्य हुवा, इस सूर्यके समान सूर्य आवेगा उस दिन १३ ग्यारवां दिन प्रवेश होगा । मासाकसिनपत्यकयोरंतरस्य कला कृत्वार्कभुक्तिभकातदिनादि पजियारादिमध्ये पत्यकांदधिकऽ युक्तेन्यथा हीने मासप्रवेश कालः॥३॥ भापाटीका-मासप्रवेशका सूर्य और उसके समीपकी पंक्तिका (अवधी) सूर्य इन दोनों के अंतरकी कला करना सूर्यको गनीका ( पंक्तिके मूर्यकी गतीका) भाग देना लब्ध भावे जो दिनघटी पलात्मक तीन फल उनको पनि वारादिक १ अंशको ६० पाठगुणा फरके फछा मिलाने से होती है।

नापाटीकासहितम् । (१४७)
(वार इष्ट घटी पल) में पंक्ति (अवधी ) के सूर्यसे मासप्रवेशका सूर्य अधिक
हो तो युक्त करना और अवधीके सूर्यसे मासप्रवेशका सूर्य न्यून हो तो आयेहुवे
दिनादि फलपंक्तिके वारादिकमेंसे हीन करना सो मासप्रवेशका वारादिका
समय होवे ॥ ३॥
उदाहरण ।
किये ७१७००
द्वितीय मासप्रवेशका सूर्य १३ । १६ । ५३ । ३९ इसके समीपकी पंक्ति
(अवधी ) का सूर्य ११ । १४ । ५९ । ३० इनका अतर किया ११ ५४ ।
९ हुवे इसकी कला ११४।९ के अवधीके सूर्यकी गति ५९ । २३ का भाग
दिया-भाज्यभाजक कलादिक है अतः इनको सवर्णित किये. माज्यपिंड ६८
४९ भाजकापिंड ३५६३ हुवा-भाज्यमें भाजकका भाग दिया लब्ध १ दिन
आया-शेष ३२८६ बचे इनको ६० साठ गुणे किये १९७१६० हुवे इनमें
३५६३ का भाग दिया लब्ध ५५ घटी आई शेप ११९५ को ६० साठ गुणे
हुये इनमें फिर३५६३ का भाग दिया लब्ध२० पल आये ऐसे
दिनघटी पलादिक फल ।। ५५ । २० लब्ध आये इनको पंचोके सूर्यसे मास-
प्रवेशका सूर्य अधिक है इसलिये अवधीके वार इष्टघटी पल ४ । २२ । १ में
युक्त किये ६ । १७ । २१ हुवे ये २ मातपरेशका इष्टसमय हुवा-अर्थात्
(पौर्णिमांत चैत्ररुण ३० अमावास्या शुक्रवारके दिन इष्टघी १७ पल २१
से मास द्वितीय प्रवेश होगा) ऐसेही दिन प्रदेशका उदाहरण समझना--
एवं दिनप्रवेशकालः ॥४॥
भापाटीका-मासप्रवेशकालकी जो रीती कही है इसीप्रकार दिनप्रवेशकाल
लाना-अर्थात दिनप्रवेशका सूर्य और उसकी समीपकी पंकीका सूर्य इन दोनोंके
अंतरकी कला करना पंक्तीके सूर्यकी गतीका भाग देके दिनादिक फल ३ लाना
उनको पंक्तीके वारादिकमें पंक्तीके सूर्यसे दिनप्रवेशका सूर्य अधिक हो तो
मिलाना न्यून हो तो हीन करना दिनप्रवेशकाल होवे ॥ ४ ॥
उभयत्र स्पष्टाः खगा भावादयश्च कार्याः ॥६॥

(१४८) वर्षमदीपकम् । भोपाटीका-मासप्रवेशसमयमें और दिन प्रवेशसमयमें स्पष्टयह जाप, आदि शब्दसे चलित पंचवर्गी बल द्वादशवर्ग पडेशा सोशी आदिक करना ॥ ५ ॥ पात्यैक्येन मासदिनानि भजेल्लब्धेन स्वस्वंपात्यांशा हत्ता दिनाद्या मासदशाः॥६॥ भापाटीका-पोत्यांशके ऐक्यका मासके दिन ३० में भाग देना लब्ध आधे जो ध्रुव उससे अपने अपने पात्यांश गुणे करना दिनादिक मासदशा होवे ॥ ६ ॥ मासप्रवेश सप्तयुतेऽङ्कहते एकादिशेपे आचंभो राजिशबुके शुनामाधादशा ॥७॥ भापाटीका-मासप्रवेश नक्षत्रकी (निस नक्षत्रमें मासप्रवेश होवे उसकी) संख्या सात मिलाना ९ नवका भाग देना ऐकको आदिले शेष बचे तो क्रमसे आ (सू) चं-(चंद्र) भौ (भौम ) रा ( राहु) जि-(गुरु) श (शनि) वु (बुध) के ( केतु ) शु (शुम) की आय (प्रथम ) दशा जानना ॥ ७॥ मुग्धार्कभागमिता दिनाद्या मासदशाः॥८॥ भापाटीका-मुग्धा दशाके १२ बारमें भागके समान दिनादिक भासदशा जानना-( मुग्धादशाके दिनमें १२ का भाग देनेसे जो दिनादिक आवे वह मास दशाके दिनादिक आव-) ॥८॥ उदाहरण । जैसे सूर्यकी मुग्धादशाके दिन १८ हैं इसके १२ का भाग देनेसे लब्ध दिन १ पटी ३० आई यह मासदशामें सूर्य के दिन हुवे इसीप्रकार सर्वग्रहके समझना- १ माघमवेशमें पदेशा-जन्मपति १ वर्षट मपति २ मासटमपति ३ मुंयापति निराशिपात ५ समयपति.६ दिनमवेशमें सोशा फरना-जन्मपति ! पतिमासरग्नपति ३ दिनसमपति ४ था- पति ५ त्रिराशिपति ६ समयपति ७ ३ मासग भी मथम रही रितिफे अनुसार हानांश पात्यांश करके ऐश्य करना.

भापाटीकासहितम् । (३४९) दिनादिक मुग्धा मासदशा. 4 रा के. अ. ४ ४ २ १ १. [४५ . उदाहरण। जैसे द्वितीय मासप्रवेश उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रमें हुवा है इसकी संख्या २६ में "मिलाये ३३ हुये ९ नवका भाग दिया शेप ६ बचे । ऐकको आदिले कमसे भाचं भोराजी आदी दशा गिननेसे ६ छठी शनीदशामें मासप्रवेश हुवा यह आप (प्रथमदशा ) हुई इसके आगे क्रमसे ग्रहोंकी मासदशा आई। मासदशा. च के . चे रा. गु प २५ 1 १० व ३० । १५ ४ १० १५ . दिनप्रवेशस्पष्टलमनक्षत्रे सप्तयुतेकद्धते एकादिशेपे प्रायुक्तानामाद्या दिनदशा ॥९॥ भापाटीका-दिनप्रवेशसमयके स्पष्टलम और नक्षत्रकी संख्या ७ सात मिलाना ९ नवका भाग देना एकको आदिले शेष बचे वह प्रथम कहे हुवे नाम (२१५.२ मं. ३ रा. ४ गु. ५श. ६ बु. ७ के. ८ शु. ९ की आय दिन दशा होवे)॥ मुग्धांगभागमिता घट्यादयः ॥ १० ॥ भापाटीका-मुग्धा दशाके दिनके ६ छठे भागके समान ( बरोबर ) घटपा- दिक मुग्धा दिनदशा मानना-जैसे सूर्यकी दिन १८ की दशा इसके ६ का भाग दिया लब्ध ३ पदी आई ये सूर्यकी दिनदशा ऐसेही सर्व ग्रहकी जानना 19.1.

वर्षमदीपकम् ।
मुग्धा दिनदशा घट्यादि.
,
प
में.
रा,
क.
.
५
३
८
घ.
३
.
१
a
८
३.
३०
३
२०
३०
.
प्रश्नांगत्य में विना लिप्ताः कृत्वा खतिथ्युद्धता लब्धोभादि
मध्येऽङ्गयुतामुंथार्थे स्पटं लग्नम् ॥ ११ ॥
भापाटीका प्रश्नलमकी राशीविना अंशादिक्रकी कला करना ख(०)निधी(१५)
ऐसे१५०देढसका भाग देना लब्य राश्यादि फल(राशि-अंश कला-विकला)चार
भाषे उसकी राशीफे अंमें पन्नलमकी राशीका अंक मिलाना मुंथाके वास्ते ..
सष्ट लग्न होये ॥ ११ ॥
प्रश्नांगात्त्यशो जन्मेशो ज्ञेयः ॥ १२ ॥
भापाटीका-प्रश्नलमसे चतुर्थराशीकास्वामी जन्मेश जानना-अर्थात पंचाधिकारी
जन्मलमपतिके स्थानमें प्रश्नलमसे चतुर्थराशीका स्वामी जो हो वह लिखना १२
प्रश्नपत्रतो वर्षकरणे इयान्विशेपः ॥ १३ ॥
भापाटीका प्रश्नपत्रपर वर्ष बनाने में इतनाही विशेष जानना ( और सर्व
रितिमें कुछ न्यूनाधिक नहीं है ) ॥ ३३ ॥
पाराशरकुलोत्पत्रो महादेव उदुंबरः।।
पाठकाख्यचणो रत्नललामपुटभेदने ॥१॥
रेवाशंकरसंभूतिःकृतयावर्षदीपकम् ।।
न्यवादींन्दुमितेशाके कन्यार्कप्रथमेदिने ॥२॥
भाषाटीका-रतलाम शहरमें पाठक ऐसे, उपनाम से प्रसिद्ध पराशर कुलमें
वसन (पारासरगोत्र ) उदुपरज्ञानीय रेखाशंकरजी के पुत्र महादेव ज्योतिविन्
शालिवाहन १७९३ सतरासे तिरानवेके शक कन्पासंक्रांति के प्रदेशके प्रथम
दिनमें वर्षीपक करते हुने ॥१॥२॥

भापाटीकासहितम् । इति मासाद्यध्यायः ८. इति महादेवकृतवर्षदीपकं समाप्तम् ॥ आसीदत्नपुरेपराशरकुलोत्पन्नोद्विजोदुम्बरः ख्यातःपाउकनामतोगुणनिधिःश्रीनन्दरामाभिधः ॥ तत्सूनुर्गणितागमज्ञतिलकःश्रीमोतिरामाह्वयो रेवाशङ्कर आगमे निपुणस्तस्मादधार्मिकः ॥ १ ॥ तदात्मजउदारचीगणकमौलिचूडामणि तूदरणिमण्डले गुणनिधिमहादेववित् सदङ्गजनुपा त्विदं विवरणं सता पीतये सहस्यशुचिपाती कठजटोन्मितेऽगाच्छके ॥ २ ॥ इति श्रीज्योतिर्विदरश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकाख्यतानिकप्रथे तदंगमश्रीनिवास विरचिता सोदाहरणभाषाव्याख्या समाता ॥ ॥ उच्चयलसारणीचक्रम् । ५६ 14/113059,१२ Sot ०२० 0 ११३ इ ० ६५ १ . २ 1.vale . -200000 ६." 10909.10 ३ .१०.०२ 12000 . 4320303 १३ २. 04-: MR.RRmmmm 042010 . ......... ५ यह नीचके अंतरकि राशि अंशके कोष्टको उच्चबल सष्ट जाननी. 1 (१५२) वर्पणदीपकम् । । मासप्रवेशपत्र । 0 और २२ १ २९.. २ कर . 163 ३ PAHI 334 ३ सिं. ४ क. फ. ५ ५ ६ ६ कृ. ७ ७ li घ. ८ ८ 18 . ९ भ १० ७१८२ (10101 १० मा. Arth मी. Niparn वर्षभवेशके चारादिफमें अग्रिमसूर्य रांशी शक कोष्टक वारादिक मिलाना फिर कोष्ट- फफे और अधिमफोष्टफफे साप अन्तर करफे सूर्यफी फळा विफलाफो गुणन फरना आजो फल वह वर्षप्रवेशके वारादिक मिलाये हुवे कोष्टफमें अपिम कोएक अधीक हो तो मिलाना न्यून हो तो पलमैस हीन करना द्वितीय मास मवेश वारादिक छोवे एवं उसके भागके सूर्यो राशी वंशन कोष्टमें दितीयमासके वारादि मिलाना तृतीयादिक मास होवे ।

(१५३) 11.5 ina121010112119 171.1.. 1.11.11015 12 17|AINMETHINKitabluNI" . 10 DAINitl111111 • 171 ins-12HILIT US.1711710dasti Marathi---14 Hunt INila 71A 11. 2 1-1171124213AISION ITION . ut7.Solutil12 10LS -IN Matklin... 21761 10.20AINIUnitedHATSAILatinant 27TRun121.kila101121-10-11 OMAnnuall ॥uledital httta181 AA11710101017121AUNManilanmiti INMonal 1217 01-1uttine 12 212101012-1-1.1 1011tus/211717 |ND11010111117112 017 17 DATTORNANTRA 11.111101110010112190717 435210117 12!" NARKARI 11100/Sukt 12 160710.. 17 1-110102tunia ML- 1111 4 १२।१०1८1111 . 11- COMPOR२०1-10N२१५ १२१२॥८॥ १०॥ १०11 --- ८ में र DAE. पं.मयु.गु.गु.वा.रा. 7 रा. भाषाटीकासहितम् । मेष.० वृषम.१ मिथुन.२ स्थिस्खलचक्राणि।

- वृहत्पंचवर्गी बलग्रहकी राशी अंशके समान कोष्टकमें जो हो वह लिखना पांचसे अल्प हीनवली होता है. (86b) कर्क.३ सिंह. ४ कन्या. र, चं. मे..गु. शु-श.रा. र.च.मं.पु.गु.श. रा. -12 वर्पप्रदीपकम् । S ----. पार-MAXDSAUR १२.Raman) ५१८yार.111६ प1sin R NIV.IN1j11tan६012॥ १२। Ju120 १२/६11/0001६/४०1६1/६ ५॥ १७७७in ९॥ MEAnna६.६ JI- 1910 ७० ६.६/५1111७1८|| ८11०11९1 101.120 २५ 10000100101101 S11131001 10101६11[६६ १11८111011 १०॥ ८ १२.00(10100320120401 ७ ११॥ 10201000१६२०११२७ 488 1६11000 स-110011100 १६.४०१७ ९1110115011111५ 11६1६11६110 111-14111२॥२१॥ ११.11१11८11६1 ११६.101jum२01-11/५/६/१५१९॥ १०11९॥ ६८ १.1.182100६/८/२0१५/६६॥ १५/१॥1511 1०1८11 -- स. १५ [1000000000११ ६.८11७॥२६॥२०१५11111111111110॥ ८ 1011 २४.10.1011011 (२६६६६/2010 १०॥ ८ २६1-21111१10/1२८1. ५/५॥१६॥७॥ 1.10mAMA110) 2.1-1811001010४ 1021१७६ - 12.3 120 पांचसे अधिक मध्यमवली. दशसे अधिक पूर्णवली होता है. तुला.६ वृश्चिक-७ धन.८ र. रा. 12 भापाकासहितम् । 01-1 २०४६॥६६॥401144 ३१२.40 21101001020४॥ १०.1८1८1१1८॥११॥६॥ ४६10.11८ ६१४00101 १७ Jil] ६९०८10/201010 ६) ८11141101 ४.६२touT114 ७. ८ 10411८1111010101. 211७11101 ७१२01 4111 10101 ६0mm 1000 ७ ६॥ १४९ |10|1 MI] १२१0111011 ११॥ ६१११८) १६२.४ ५/201u61111 1110Ju६umi 20 01/20/0/101511 ८11 द ६ १२॥१८441२०1८11६॥ १३101 [ २५1१६१४०11९101 1110111८111 ५६ २.|४|| ५||४|४|११||७३11६१४०८1111 ८ २००८ ८1101 ८ 106 41 २०101५1114 (10॥ १२|७६ १९/० . ५१३०/१८॥ ६.२.४२०१० 01/2011९1111107) 41 ५. २१४016 ८tent/2010/10 1१1111८४२११ SUBSCR २२.५ ४॥11101 ८ 12115२३१.101001030/४७/२३१९०८॥ 20111001 41 २११४-14182011 1४11)२४१०1७115|| ५1J511)२६.J4101६111६1) २८1. ४॥४॥130100१३॥६॥२६४०७ स14014६॥ १२.८२६४० ८७७11810111111 1.10]ril 100 4100101) ३०.1 1111 11: ५॥ 10-11७111 1111. 11 101 इति वर्षमीप माषाटीकासमेतं समाप्तम् । ट २01011811001111 .t.IN ||10|131* 21Ujal ५ १ AlataIALI Alhi 1221121712117 .10tlantri" N/Nutanka-MANT . all attenture Attatukuthainjulmi Jaaihemumta2110NINNI -- R SIL (astanal utt-ahmetunIS 7ALIATI 12 unlot MARATHL- 11ms-m utulszturalyzRAJI INISALU0110111110151 1210t0312/17lay/12101002/21HI1100102.10 11ANUmari-11001011025 1012/021312tutat21101109/06JAINT (atsASSAUL-11211010pmin 10701111010/07/10. IG P-IN . h । Ajultutto18। 12tunilausibunalodan Tulsions/o101 SHETRIK2017 (UN0-101ults 2117801 12 Post 01/21/yJ11012.10 Ple AutumALY Jinnio Salol) 21AI-SHINDICOMInst/useums IN/- nan11ASTRasulalalaatuotu2001.0 laluati 11211 वर्पप्रदीपकम् । .च.म.यु..शु.श.रा. मकर९. कुंभ १०. मीन ११. स्थिरमैत्रीतः पंचवर्गवलचक्रम् । १५६) पत्रीमार्गप्रदीपिका शुद्धाशुद्धपत्र. पृ० पं० ܩܝ शुद्ध. चाच्युत होये साशि १४ १४ १९ १९ टिप्पण्यां १९ अशुद्ध. श्रीधरं हो साशि १४। ५३ । ५ समशत्रु रचामी अंशांके भागका आनी सप्तमास भौमादौ खायं भवरेवे ५ छाया प्रकीत्यते कलो স্যাঁ पपन्त नवशामें स्वामी कला १९०।१३ भागदेके ३) नुणी १९ ४९ १५ समा शत्रु स्वामी अंशोंक भागको अपनी सप्तमांश गौमातालों खाये भवरखे ६ द्वाय प्रकीर्यते कला पेशं पर्यन्त नवांश स्व कला १९०१३ भ गदेके ) ३. गुणी १२ ४ टिप्पण्यां (२) शुद्धाशुद्धपत्र । ७० AG 6000 Gc १४ ८७ अशुद्ध. चंद्रकीहोवे दिय उसक १७०२०० सूधहै मंतदशा बुधः हतेनादाः सतसठ युक्तः पत्रीमार्ग कृतेऽय दोप श्वक्षम वर्षद्वीपक नमस्कर दयात्पून खानेमासा লা ८.०भोग ६० | १९ नंबर १० ०४ नंबर २६००१९० ५ ३ १८६०५८९६ शुद्ध चंद्रकी होराहोये दिपा उसका १७२०० सुहै ७१ मतर्दशा बुधैः हतेतादा ८४ सनसठ युक्तो पत्रीमार्ग कृतेयं दीप बँक्षम वर्षदीपक नमस्कार दयापूर्व ८९ खानेमाप्ता नवावांऽशा ८००केममोग | १९ नंबर नंबर २ ६००१९०५ ५ १३ २४ १३ ६० . . . ६. | १९ नंबर १० नबर १ ३२०५९/ ३ २०५९/ शुद्धाशुद्धपत्र । पृ० प० 66 ग्रहचके १ न १०१ १६ सलया सचराईन स्वचरा न नाच नीचे कोष्ठ कोट करना ( उससे करनाउससे) युर कोष्टकके अंतरकरे इष्टयुक्त कोष्टकमेंसे कोप्टकका अन्तर अल्पकोष्टककोहीन करना करे न्यन न्यून विशोपकाः विंशोपका मकरामंगल मकरकामंगल कन्याकका कन्याका नाङ्ग सिताकी सितार्कि জাযাঙ্ক आशा घटेनं घटेन दंष्काण अशका द्वेष्काणअंशका हाताअश | होताअंश नाच नीच राश्यंक राश्यादि शन मित्र मिन त्रिक०३ सादा सोदा जा ४ १०९ १० १४ 3. १ ११० टिप्पण्या २३ १ त्रिक०३० १२६ (४) शुद्धाशुद्धपत्र । गुद्ध देसता पृ० १२७ १३४ १३५ पं० टिप्पण्यां २४ अशुद्ध देखना सेश वर्षाम रात्रा ॥ नीचे दगाः सूप रिंग মাদ पर्पप० राघोजीरे दशा २ १ १४२ १४३ १० . 1४४ १ रिंग দানা १४२ १३ इति गुतागुसत्रम्।

Patrimarga Pradeepika

Author
Sharma,.mahadva
Title
Patrimarga Pradeepika
File name
Patrimarga Pradeepika
Text
OCR done
Citation
1825
Published
2012/08
Publisher
Bombay,.shree Venkatesware Press.
Language
Sanskrit
Pages
161
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312174
Barcode
99999990320987.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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