Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Naychkaradi Sanghra
Front matter
Printed by:-
Banshidhar al bis “ Shndhar" Prinling
press, Shukrawar peth 477 Sholapur.
Published by
Nalburam Preme, Secretary of Manikchari
granthamala Ilıraboy Girgaon Bombay.
संपादकीयवक्तव्यम्. प्रथमतो दोहारूपेण परवभावप्रकाशो नाम मन्य आगोद दृष्टिपथम् । तदनु अन्य एफो नयचकनामा गाधारूपेण श्रीमाहिल्ल- देवेन रचित । स न इति धीदेवमेनगुणा मन्योय पुनारचित इनि प्रशस्त्यान्तिमया प्रकटीभी। तपथा, "दम राहावपयाम दोहयवधेण भासि नदि। गाहारण पुगो एवं मारवण ।। दुमगीरणेण पोर्यपेरिय ता जहा निरंणां। सिरिदेवोणमुणिमा तद जयचा पुणो एवं ।।" भत्र समनभद्रादीना प्राधामाचार्याणो पनि पचनान्युट्टत युपलायरी तानि भय नीमकाशे समयलेकनीयानि । भत्र प्रकाशितोधिकाराणा मम पतसंस्थाममण । एवं एमा जामुनवधनाना ची भाकरापाश्किामेण दर्शिता । प्रान गुनगपकनामा प्रपो शिपिपर्यत पोजिस्ततो पानपरक मा। नएचके नोपनपान समाहरणानि सन्ति प्रातिपय गुणरयाणा सामान्यतो विशेष स्वरूपं वाण- सना पानी राणाणा प्रा मारतभपायो पारियम गत व सा दीना, मामाला पाच या Mic होनि गरियोऽविधा- . शपापा
अधिकारमची.
अधिकारनाम.
पृष्ट.
२३
२६
१ लघुनयच
१ वृदयचक्र
२ पीठिका
३ गुणाधिकारः
४ पर्यायाधिकारः
५ द्रव्याधिकारः
६ पंचारितकायाधिकारः
७ तत्त्वार्थाधिकारः
८ प्रमाणाधिकारः
• नयाधिकारः
१. निशेपाधिकारः
११ दर्शनाधिकारः
१२शानाधिकार
१३ सरागचारित्राधिकारः
१४ वीतरागचारित्राधिकारः
निप्रयचारित्राधिकारः
उपोद्धातः
६७
९२
९४
4
१०४
२.९
२१३
नयचक्र और श्री देवसेनसूरि । नयचका - . आचार्य विद्यानन्दने अपने लोकवार्तिक ( तत्वार्पमूत्र टीका) नपनिररण नामक प्रकरणके अन्त में लिखा है.- संक्षेपेण नपास्तावम्याख्याताः सूत्रचिताः। तद्विशेषाः प्रपन संचिया नयचमतः ।। अर्थान् तरवार्थपूनमें जिन नोंका उन्डेप है, उनका हमने संक्षेपमें व्याख्यान कर दिया । यदि उनका विस्तारसे और विशेष पूर्वर स्वरूप जाननेकी इच्छा हो तो नपचक्र ' से जानना । इस रोवमे माझ्म होना है कि विद्यानन्द स्तामासे पहले नपचत्र ' नामका कोई अन्य था जिसमें नपोंका समूब मिनारफे साथ दिया गया है। परन्तु यह नयचर यही देवसेन- गरिका नपचक था, ऐमा नहीं जान पडता। क्योंकि यह विक- कुल ही छोटा है । इसमें कुल ८७ गायायें हैं और माइद्ध धब रुके वृहत् नपचनमें भी नप सम्बन्धी गाथाओंकी सध्या इससे अधिक नहीं है। इन दोनों ही अन्याम नयों का स्वरूप बहुत सौ. पमें लिखा गया है। इनमें अधिक सो यामी विधानन्दने ही नय. विवरणमें लिए दिया है । नयविवरणफी लोकसंख्या ११८ है। मौर उनमें नयोका स्वरूप बन ही उसम रातिस-नयची भी अपेक्षा शतासे-लिया है। ऐमी दशा में यह संभव नहीं कि लोक- । - वार्तिकके की अपने पाठकोंसे देवसेनरिके नयचमापरसे विस्ता- रपूर्वक नयोंका स्वरूप जाननेकी सिफारिश करते । इसके सिवाय जैसा आगे चलकर बतलाया जायगा, देवसेनसूरि कुछ भी विधा- नन्द स्वामीक पीछे हैं। अतः श्लोक वार्तिकमें जिस नयचकका उल्लेख है, यह कोई दूसरा ही नयचक होगा। श्वेताम्बरसंप्रदायमें ' मल्लवादि' नामके एक बड़े भारी ता. र्किक हो गये है। आचार्य हरिभदने अपने ' भनेझात (१) जयपताका ' नामक ग्रंथमें यादिमुख्य मद शादिश्त 'मम्मति (१) टीका' के कई अवतरण दिये हैं और श्रद्धेय मुनि जिनविज- यजीने भनेकानेक प्रमाणोंसे हरिभद्रक्रिका समय (३) नि. स० ७५७ से ९२७ तक सिद्धकिया है। अतः आचार्य मक वादि विक्रककी आटवीं शतान्दिके पहले के विद्वान् है, यह नि. । और विद्यानन्दस्वामी विक्रमको ९ वी शताब्दिमें (8) हुए है, यह मी प्रायः निश्चित हो चुका है। उक्त मल्ल धादिका मी एक "ग्रंथ जिसका पूरा नाम 'द्वादशार-नयचक्र' है । जिसतरह चनमें मारे होते हैं, उसी तरह इसमें बारह भारे अर्थात् भय नयचक्र नामका - १ महमदाबादमें शेट मनमुखमाई मगूगाईके द्वारा छप चुका है। २ यह भाचार्य सिदरोनटिके सम्मतितर्क ' नामक प्रथकी टीका है । ३ देतो, जैन साहिससंशोधक अंक । १ देखो जनहितगी यर्थ ९ अंक ९।
M प्याय है । यह पंप बहुत बड़ा है । इसपर प्राचार्य सोमदनी की बनाई हुई एक टीका है जिमषी शीयामपन्या ८००० है। यह भनेफ अनाम्बर पुस्तफासयोंमें उपलब्ध । संभव है कि विद्यानन्दायामीने इमी नयचमा को सक्ष परके fire. गुपना पो हो । निमारह रिषशपुराण और भा: के फर्मा दिगंबर जैनाचार्य ने सिमसेनगरिवी प्रसा पी जो किताम्बराचार्य समझो जाते है उसी तर विधा- दागीने मी तोपराचार्य मह यादिक यो पढने पीमि- रिश हो, तो कोई भाधरंपी थारा नही। जिस तरह सिमेनारि तार्किक उसी तरह महपादि भी थे और दि पर और भेलायर समझायो ताकि सिमांतों में कोई मह- का मतभेद भी नही है । सब नपसमधी एफ. पार के धपा उहंग एक गिघराचार्य द्वारा सिला जाना हमें भषि नही मारम भनेक आने इसी तरह गिर माधयारोपी प्रासापी है और हनी ग्यो दारे रिस हैं। पर भी मार देषन सिरित पर सि. घरापात भी पाईनासे और विनाशाम उमर र पिकामा पत् मापा AT या जो थे. मी मिमोरेनामी: सविटी तो टसमे इस बात की पुति है। गा
४
-
इस प्रकार है:
दुममारमेण पोय पेरियसंत जहा ति (नि) रं नई।
गिरिदेनमेन मुणिमा तह पयवार पुणो रहयं ।।
इमका अभिप्राय यह है कि दु.पमानरूपी आंधीते ।
( गहान ) के ममान जो नया रिकालगे ना होगा
दो देयमेन मुनिने सिरमे रचा। इसमे मदम हो ?
मेरो नगरकने पहले कोई नया था जो न हो।
था भीर बतुत भारि देशलेनने यह उसी का संक्षिमा
रिया हो।
गायोंमें नायक नाम तीन RT प्रमित ।
मामि गमाग गहमें ये तीनों ही गया
for free मापादति, २ नयय रु,
थप नाम । इनमें पहला मग भालापन संशन में
in |
'प्रादापनि मग मी मरा० मत
मि... पाइपमें इस हाल,
4.nant." गाना
माम लग":
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+
किया है। पं०शिवजी टालर्जाहत दर्शनमार यवनिकामें देव- मेनकै सस्कृत नयचनका जो उल्लेख है, यह भी जान पडता, इसी आलापपद्धतिको लक्ष्य करके किया गया है। यद्यपि भाटाप. पद्धतिमें नयचनका ही गवरूप साराश और यह नयचत्रक ऊपर ही की गई है, इसलिए कुछ लोगों द्वारा दिया गया उसका यह 'नयचक्र' नाम एक सीमानक क्षम्य भी हो सकता है, परन्तु वास्तवमें इसका नाम ' अलापपद्धति 'ही है-नयचक नहीं। आलापपद्धतिके प्रारभमें ही लिया है- " आलारपद्धनिर्वच- नरचनानुगमेण नयचकम्योपरि उच्यते । " इससे मालूम होता है कि थाटापपरति नयचक्रपर ही प्रश्नोत्तरम्प संस्कृतमें लिया गई है। आलाप अर्थात् बोटचाटकी पदतिपर अथवा यचनरच. नाफे टगपर पह ' मुखबोधार्थ 'पा सरलतासे समसमें आने लिए बनाई गई है। इसी प्रत्येक प्रतिमें इसे 'देवसेनहता निसा भी मिलता है, इसमे यह निधय हो जाता है कि यह नय. परफे की देवमेनका ही रचा हुई है-अप किसी नहीं । २ लएनपरक । श्रीदेयरोनरिका यास्तविक नाचक यही है । इनके साथ जो 'गु' विशेषण लगाया गया है या इसके सागे धको बा देखकर एमा दिया गया। पद वास्तयों उसका नाम दम्पसभार प्रकार है और उसके का माइल्धवट जमा कि आगे सिर किया गया है। मारपे इसका नपचके ही नामसे देख किया जाना चाहि।
tor . - श्वेतांबराचार्य यशोविजयजी उपाध्यायने अपने 'द्रव्यगुणे य रासा' गुजराती ] में देवसेनके नयचक्रका कई जग उलेख किया है और उन रासेके आधारसे ही लिखे हुए द्रव्या नुयोगतर्कणा नामक संस्कृत अन्धमें भी उक्त उखाँका अनुया किया है। एक उल्लेख इस प्रकार है:- नयायोपनयाचवे तथा मूलनयावपि । इत्यमेव समादिष्टा नयचक्रेऽपि तत्कृता ॥८॥ एते नया उक्तलक्षणाश्च पुनरुपनयास्तथैर द्वौ मूलन यायपि निश्चयेनेन्थममुना प्रकारेणेव नयचरऽपि दिगम्बरदेव सेनकृते शाख्ने नयचपि तत्कृता तस्य नयचक्रस्य कृना रत्या दकेन समादिष्ट कथितं । एनायता दिगम्बरमतानुगतनपचन प्रत्यपाठपटितनगोपनयमूलनपादिक सर्वमपि सर्वज्ञप्रणीतसदाग मोक्तयुक्तियोजनाममानतवयमेगास्ते न किमपि विसंवादितयास्ती उक्त ' तर्कमा में जो नयाँका स्वरूप दिया है, यह वि गुट 'नयचक' का अनुवाद है और इसे स्वयं मन्यात भोजमागरने स्वीकार शिया है । इमसे निश्चय हो जाता है कि उपाध्याय यशोविजयजी और तर्फगाके का मोनसागर इसी नपचकको देयमनका रचा हुमा ममाने थे। • বা মাথায়পন্ন ম্যাগাযাগ্য समाचार १५ नसारकी चनियाके कर्ता पं. शिषजीटायजीने देवसेन- मरिक बनाये जिन सर प्रन्योके नाम दिये है उनमें प्राकृत नपरक भी है। पीत् उनके मतसे भी यह देवसेनकी ही - यह अन्य पृरत् नपचक्र (दम्यातमा प्रकाश ) में मेछा- टकर उदा निकाला हुआ नहीं है। यह बात इम प्रथको आ. दिम मसक मणी सरह वाच लेनेसे ही पानमें आ जाती है। पह मपूर्ण मान्य है । और स्वतंत्र है । यह इसकी रचना पदासिन ही मालम रो जाता है। नयोंको छोडकर इसमें अन्य विषयोंका विचार भी नहीं किया गया है । इसके अंतरी नं. ८६ और ८७पी गापासीमे (पृष्ठ १९-२०) यह मी स्पार हो जाता है कि इसका नाम नपचक्र ही है - उसके साथ कोई रघु भादि विशेषण नहीं है। ३ यूहन् नयपर इमका वास्तविक नाम 'दन्चसमापयास' (व्यापमाव-प्रकाश) या इल्पसभाव प्रकाशक मयचक्र है। अपकनि स्वयं इस नामसे प्रयके मारंभमें और अंतमें कई जगह म्यक्त किया है। नपचक तो इसका नाम हो ही नहीं सकता है, क्योंकि नोंके अतिरिक्त अन्न, गुण, पर्याय,दर्श- न, शान, चरित्र आदि अन्य अनेक विषयोंका इसमें वर्णन किया गया है। यह एक समह अन्ध है । जिमताह इसमें भगवद्- यंदाचार्य प्रत पास्तिफाप प्रपचनमार बादि की गाधामों भौर उनके भभिप्रायोको संमह किया गया है, उसीतरह , . श्वेतांबराचार्य यशोविजयजी उपाध्यायने अपने 'द्रव्यगुणा- र्यय रासा'[गुजराती ] में देवसेनके नयचक्रका कई जगह उल्लेख किया है और उक्त रासेके आधारसे ही लिखे हुए न्या नुयोगतर्कणा नामक संस्कृत ग्रन्थमें मी उक्त उद्धखोंका मनुवाद किया है। एक उलेख इस प्रकार है:- नयाचोपनयायवे तथा मूलनयावपि । इत्यमेव समादिष्टा नयचक्रऽपि वत्कृता ॥८॥ एते नया उक्तलक्षणाश्च पुनरुपनयास्तथैर द्वौ मूछन- यायपि निश्चयेनेत्यममुना प्रकारेणेय नपचकेऽमि दिगम्बरदेव- 'सेनले शास्त्रे नयचपि तत्कृता तस्म नयचक्रस्य कृता टत्पा- दकेन समादिएं कथितं । पतायता दिगम्बरमतानुगतनयचक्र- • अन्यपाठपटितनयोपनपालनपादिक सर्वमपि सर्वज्ञप्रणीतसदाग- मोतयुक्तियोजनासमानतजन्यमेवास्ते न किमपि विसंवादितयास्त्री- ति *" उक्त तर्कणा ' में जो नयों का स्वरूप दिया है, यह वि- व्युट 'नयचा ' का अनुवाद है और इमे स्वयं प्रन्यात भोजमागरने स्वीकार किया है । इससे निश्चय हो जाता है कि स्पान्याप यशोविनयजी और तर्फणाके कती मोजसागर इसी नपाको देवगनमा रचा हुआ समझते थे। • देगी गमपशाप्रमामा प्राचिन द्रमानुयोगका भाष ८र८पृट ११५ ।
तेसिं पायपसाए उपलद्धं समणवरेण ॥ पहली गाथाका भर्थ यह है कि 'दशसहारपपास' ना. मका एक अन्य था जो दोहा छदों में बनाया हुआ था । समीको माइपवरने गाधामों में रपा । मरी गाया माहुत अस्पष्ट है। फिर भी उसका अभि- माय लगभग यह है कि श्रीदेवसेन योगीके परणोंके प्रसादसे यह पंप बनाया गपा। पह गाथा पत्रको प्रतिमें नहीं है, मोरेनापी प्रतिमें है। मम्मईकी प्रतिमें इसके पहले 'दुसमीरणेग पोय पेरिपसंत 'मादि गाया है जो ऊपर एक जगह उदृत पीपा पुकी है और जि. समें यह बतलाया गया है कि देवसेनमुनिने पुराने ना हुए नय. कफो, शिरसे पनाण। मोरेनापाली प्रतिकी गाथा यदि टीक है तो उससे वेषक पही मालूम होता है कि माइल पपरका देवसेनगरिसे आम फडफा गुरुराध होगा।बईवाली प्रतिको गाथा मादल धवल. में कोई संबंध नहीं रगती है-ह मपटक भोर देवसेनरिकी प्रशंसायापक भन्य तीन पार गाधामों के समान एक ही प्र. हरित गाया है। मीचे लिखी गापामें कहा है कि दोहा में रस सभाष प्रकारको मुनकर मुरकर पा शुभंकर मामके कोई सम. म जो संभवत माल भरतके मित्र होंगे हंसकर मेरे पि. दोन- को पह.मा महीना से गायर पर दो.- भग पूरे नयचक्रको भी इसमें शामिल कर लिया गया है। यहाँतक कि मगलाचरण की और अंतकी नपचक्रकी प्रशंसा. सुचक गाथायें मी नहीं छोड़ी हैं ! जान पडता है कि नय- चकरी उक्त प्रशसासूचक गाथाओंके कारण ही लोगोंको भ्रम हो गया है और वे इमे 'बृहत् नयचक्र' कहने लगे इसके प्रारंभकी उत्थानिकामें लिया है.- "श्रीकुंदकुंदा. चार्य हतशाम्राणा सारार्थ परिगृप स्वपरोपकाराय द्रव्यस्त्र- मावसकायकं नयचा मोक्षमार्ग कुर्वन् गाथाकता (१७....इट.. देवतारिशेष नमकुचनाह -। यह| द्रव्यसमावप्रकाशक न यचकका विशेषण है । संग्रहकीका इममे यह अभिप्राय भी हो सकता है कि यह नपचक्रयुन द्रव्यममायप्रसार प्रध। अब हमें पर देगना चाहिए कि इस 'द्रव्यमापप्रकार' के कर्ता कौन है। दवसहावपयागं दोहपधण आमिजं दिई । तं गादाधेण य ह माइड घरनंग ।। दुममीर पायर्याम (नि) याय पा(या) गा(ज) मिरिदयसे । पजाई। बावामान तमे व गावातीपट, कि मोनाकीनं पारावासाने मामा होना चाहिए यही लामी परिया।
न ये गुरु आदि सोफा प्रयोग न करते और न यही कहो कि गुमटन देवसेनको और उनके नपचक्रको नमस्कार करो। इन सब पातोंसे सिद्ध है कि छोटे नपचक का ही बमेन है और माधवल उन्हीको सक्ष्य फरके उक्त प्रामा परते हैं । माइलपटने देवसेनरिक पूरे नपचक्रको अपने इम अन्ध अन्तर्गर्भित करलिया है। ऐसी दशा में उनका इतना गुणगान परना आवश्यक भी हो गया है। माइलधवटने इसके सिवाय और कोई मय भी बनाये है या नहीं और ये का कहां हुए हैं, इसका हम कोई पता नहीं गा सके। आधर्य नहीं जो ये देवसेनके ही शिष्यों में हों, जैसाफि मोरेनाशी प्रतिकी अंतिम गाथासे और देवसेनके येष्ट गुरु शन्दका प्रयोग देखनेसे जान पड़ता है। देवसेनसरि । नयचको संवधर्म इतनी मालोचना करके अय हम संक्षेप में इसके कर्ता देवसेनमूरिका परिचय देना चाहते हैं । इनका ब- नाया हुआ एक भायसंग्रह नामका प्रन्य है। उसमें वे अपने विषयमें इस प्रकार कहते हैं:- सिरिविमलसेण (१) गणहरसिस्सो गामेण देवसेणुत्ति । १-भीविमलसेनगणधरशिभ्यः नामेन देवसेन इति। अबुधजनयोधनाएं तेनेद विरचित सूत्र ।।
मुणिऊग दोहरत्यं सिग्यं इसिऊग मुहंकरो मगा।
एत्य सोहह अत्यो गाहापंधेण मगह ।।
इससे भी यही मादर होता है कि दिवसहा
पहले दोहापद था और उसे माइल धवलने गायावद्ध किया
माइट पर गाथा का ही है, इसका मुद्यासा इस प्रया
स्थानिकासे भी हो जाता है जहां लिया है कि गापाकना (F
कना नही । इष्ट देवताको नमस्कार करते र कहते है।
नीचे लिगी गायाभोसे भी यह प्रस्ट होता है कि इस
के का देयमनर्ति नहीं रितु माइत पार है:-
दारिषदम्पपदणुयं परअप्पारिवसानिरसमरपारे ।
मध्यविधि मुदंगणं गह गया।
गुपकेवल ई कहियं गुआममुअमुदमयमा ।
महमंगभंगुगरिय पिराजिय गमह पपचर।।
गियमदगुणपदणपदणदह विदारणेयर।
देयमगदेव जपपराया गुर मह ।।
इनमेमे पानी दायरामों में नामामार का
franfirsो पुर श्यप नमार को
मारने कuth नंदनी रामको रिम का
thaer) जीना 12-ना
। परम प्रयदेवोन
मिमी मधमें उन्होंने प्रय रचनाका समय नहीं दिया है। यद्यपि इनके किसी अन्यमें इस विषयका उल्लेख नहीं है कि फिम संघले आचार्य थे; परन्तु दर्शनसारके पढनेसे यह मात स्पष्ट हो जाती है कि वे मूलसंधफे आचार्य थे। दर्शनसारमें उन्होंने काष्ठासंघ, विकसप, माथुरसंघ और यापनीयसंघ आदि सभी दिगम्परसघोंकी उत्पत्ति वतलाई है और उन्हें मिथ्याती फहा है परन्तु मूलसंधफे विषयमें कुछ नहीं कहा है। अर्थात् उनके विधासके अनुसार पही मूलसे पला बापा हुआ असली संघ है। दर्शनसारफी ४३ वी गाथामें [१] लिखा है कि यदि आचार्य पमनन्दि (कुन्दकुन्द) सीमन्धर स्वामीद्वारा प्राप्त दिन्यज्ञान के द्वारा योध न देते तो मुनिजन सचे मार्गको कैसे जानते । इससे यह भी निक्षय हो जाता है कि ये श्रीकुन्दकुन्दाचार्यकी भाम्नाय " भावसंग्रह (२) (पात) में जगह जगह दर्शसारकी भनेक गाथा की गई है और उनका उपयोग उन्होंने स्वनिर्मित गाथा- भोंकी भाति किया है । इमसे इस विषयमें कोई संदेह नहीं र- १ सपउमणदिणाहो सीमवरसामिविणाणेण । विवोहर तो घमणा कर मुमम्म पयागंति ॥ २ भावसमा 'माणिकचंद प्रथमाला' में पीभ ही छपनेषाला है। प्रेसमें दिया जा सुका है।
१२ अंबुहजयोहणथं तेणय विरइयं मुत्तं ।। इससे मालूम होता है कि इनके गुरका नाम प्रविमलमेल गणधर [गणी या दर्शनसार नामक प्रत्यके अंतमें वे पर ना परिचय देते हुए लिखते हैं:- पुयायरियकयाई[२] गाहाई सचिऊ एयत्य । सिरिदेवसणगणिणा धाराए संबसंतण ॥४९॥ रहओ [२] दंसणसारो हारो भयाण गवसए नवर। मिरिपासणाहगेहे मुविमुद्दे माहमुद्धदसमीए ॥५०॥ अर्थात् पूर्वाचार्योंकी रची ईई गाथाओंको एक जगह संधि- न करके श्रीदेवसेन गणिने धारा नगरीम निवास करते हुए पा- धनाथके मंदिरमें माघ सुदी दशवीं विक्रम (३४ संवत् ९९० को यह दर्शनमार नामक ग्रन्थ रचा । इससे निश्चय हो जाता है कि ट. नका अस्तित्व काल विक्रमकी दश्वी शताब्दि है । अपने अन्य 1-पूर्वाचारकता माथाः मयित्वा एक्व । भादेवमेनोपना धारापां समता ॥४९॥ २-लिता दर्शनसारो हारी मध्यानां नयशने नयनी । भीपाश्चनायगेहे मुविगुदे मापदगम्याम् ॥५॥ दर्शनगरकी अन्य गाथाॉमे जहां बड़ा सवत्का व किया -, वहां वहां विकरायम्स मरणपत्तस्म' पद देकर विक्रम संवन ही. प्रकट किया है। इसके सिवाय पारा (मालवा ) में रिश्रम सक्त है। चालित रहा है।
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हता कि दर्शनमार और मावसंमह दोनों के कर्ता एक ही देवरेन
है।
इनके सिवाय माराधनासार (१) और सत्वसार [२] नाम
प्रय मी इन्ही देवसेनके बनाये हुए हैं।
पं. निवजीलालने इनके धर्ममंग्रह ' नामके एक और मैं-
पगलब रिया है; परंतु यह ममीतक हमारे देखनमें नही
भाषा है।
मुद्रण
নামঘৰ যোৰ বলি সীতানী ঘা মার দুধ
पगमप ममाशित करने की इस प्रकट की थी। 3.
ने माने शिप पं. शीवाजीगे इसकी यसमा प्र.
wit) प्रेम काणी मी महत छापामक्षित पार करते
भी पतु उसमें जगह जगह पाट छरेर थे और
मेह महापद भी थे।मलिए नयता गरी धन
माम न हो गई, तब तक पहन र मकामाबादमी
13 प्रतिगई और अब उसमी महारतागे पुढील
73111 गीधे प्रिनि सा
-
TRA ATHIMITTER Rat Hit
२.. म १३ मा ut।
.
१मोरेनाशी पार पं. गोपालदासजीकी कराई हुई कापी
रसे।
२साय दानवीर मेट मानिकपंदजीके चौगटी. मंदिर की
नपचरभार गरयभाष प्रकाशकी प्रतियों परसे। ये दोनों प्र.
निप एक ही सेराफके हातकी लिपी हुई है और गभग ४००
पहले की है। माय, गुम है।
३ शोटापूरके सरस्वती भण्डारकी एक प्रनिपरसे जो सात
१९३५ पोलिसाई और पर है।
एफ. बार इसपी प्रेसकापी पं० इन्द्रलाउजी साहित्य शाली
भरपुरकै पाग मेजी गई थी और उन्होंने उसयस कुछ भाग यहाँक
किसी सरस्वती भण्डारकी प्रतिपरसे पुद कर दिया था।
माटापपद्धतिका निर्णयमागरमें धी० १०पमाटावजी
भापाटीवाटके प्रयत्नसे छपी हुई प्रतिपरसे कराया गया है।
इस प्रन्थका गम्पादन और सशोधन धीयुक्त १० वंशीधरजी
हामी न्यावतीने किया है। और उन्हीके श्रीधर प्रेसमें यह
द्वितहमा है।
पूना:-
द्वितीय श्रावण बदी २
स. १९७७ वि.
निवेदक-नायराम प्रेमी
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[१७] RY www. १२ पुग्गलदचे जो पुण प्रत्यभिज्ञा पुन- प्रमाणनपनिझे पचवर्णात्मक चित्रं- ध्यपहाराश्रयायालु पवहारेणुवदिस्मदि पहिरंतपरम- पवहारादो बधो भायः स्पादम्ति भरहे दुस्समकाले मगसहि मावि २० ९५ १०५ ३ १८ २१ १० य एव नित्यक्ष ६८ १४ स्वभावतो यथा सवियप्पणिधि सर्यर्थ फातरूपेण सिद्धमत्रो पपा समयविमोहवि सा सल दुविहा सो इह भणिय स २० मूलमूत्राणामकारायनुक्रमसूची. . २१ २२ २१ " ५ ३२ हिमा अणि- भवरे परमणि- अहवा सिद्ध सद्दे अणुगुरुदेहप. मण्योति अत्त. अवरोपरं विमि. अस्थित्त वत्थुन নৱণৰ अगुरुटहुगा अणता अहह्वा वासणढोय अथिति पास्थि पिल भल्थिसहावे मत्ता अणुहवमानो चयण अस्थित्ताइसहाका अमूहमुहाण मेया अंतोमुत्त अवरा अह उनियोग्यता अपपपमा मुत्ता अहवा कारणभूदा सजीवपुष्कराने अकिहिमा अनिहगा सवरीपरमगिरोह ३८ २१ २० ३ " ११ [ १९1 महवा सिद्ध सरे भगेसि अण्णगुणो भयरोप्परसावेग अधिचिनधि दो भन्थिसहार हुन भपिचिणधि - मह गुणपजयन ९५ भवरोप्परविरमा भमुहमुहं रिय कम भगुहेण रायरहिमो अपिताइसहावा भमुदरयणेण अल्पाणापमाण १२१ भरमेको पाप- - ८४ भाहरणदेमरपणे माशा भनिभो भाहरणटेमायणे- भागमणोभागमो भासभामागे भाणारा अहिंग- भादेशिरपसारे झापा--- - ܠ ܐܙ ८ माता गगुपमाणो १२१ १८ उदगमगानो इगतीमगु महाया गीमामाग अदि पुशुता पम्मा इस एष मिण्टी इदिस पमाणविसय इदियमोवणिमित इदियमणस्म पसमन १२४ १ ? १८ १३ ७२ ४ उप्पादवयं गउणं सम्पादवयविमिस्सा उययारा उवयारं उवओमओ जीवो उप्पादवयं गडण उम्पादवयविमिस्सा स्वयारा उनयारं उहयं उहयणएण उवयारेण विजाणइ उवसमखयमि उदयादिसु.पंच " ८४ ३ ७ [२१] सरजंतो कर टप्पादोय विणासो १२८ ४ ए. २ एअंतो एअणो एयपदेसे दवं एइंदियादिदेहा एइदियादिदेहा एयते गिरवेकर एदेहि तिविहस्टोगं १२ ६ १५ २२ ५ एकेके आग ६९ एका अजुदसहावे एवं सिपपरिणामी एपपरसिमगुत्तो एपतो एपणयो एकपएगे दम दियादिदेहा एकगिरंद परो एमोवि यसको एयंते गिरवेरखे एवं उपसानिरस एवं दसपत्तो एवं भिष्णसी ८८ ८९ ~~ १०२ wr १२८ विय परमपद पदमिरतो गिम ऐटेण सयदोमा ११ १३ १ भोदइओ उवम मोरइयं सममिय ८ ४ ६ ३८ ५ कम्माणं मशगर्य फरमावपादु पत्तो कम्मरखपादु मुद्धो फम्मकटंकालीणा कम्मं दुविहविपर्ण कारणदो इह मन्चे कम्मं कारणमूदं कम्जे सयटसमत्य कम्माण मन्झगदं कम्मयादुप्पण्णो कोहो व माण माया कज पडि जह पुरिसो काऊण करणटद्धी कम्म वियालविसयं कारणकग्जमहावं. २० ७४ ९ " १२ [२३] किरिपातीदो साथी फम्मजभावाती ११ ४ एंधा बादर मुहमा उधा जे पुन्युत्ता साइयमेदा या हत्तं पएसणाम २० १ ६ २२ ܘܐܐ २ गदिठिदिवपागहणा गगणं दुविहापारं गहिओ सो मुदणाण निणद दव्यसहावं गुणगुणिपग्नयाने गुणपरजाया दवं गुणपग्नपदो दो गुणपरजायसहारा অনুমােদী गुणगुणिआइपरके गुणपरजयाण स्वसण गेहलाइ यस्थसहावं मेहजाद दवसहाय mN ८ २२ -A [२२] १२८ एदै विय परमपदं एदल्लि रदो छि एदेण सपलदोसा ९ १४ १८ ओ. २० ओदइओ स्वस ओदइयं उबसमिय ८ Do w २२ ५ कम्माणं मझगयं फम्मानयादु पत्तो फम्मक्खयादु मुद्धो कम्मकठंकालीमा कम्मं दुविहविपणं জালে ২ সন্ত্র कामं कारण फज सयटसमय करमाणं मझगदं कम्मरायादुप्पण्णो कोहो व माण माया कर परिजह पुरिमो काऊण करणलद्धी कर्म तिपालविमयं कारणकाजमहावं. ७४ १०० १ " ११३ ૨ २० २ ३ जद छह उत्तार र ज जिणेदिदि जोरालु अणाइ- जझा एकसहाव जपण भरिणामानो जह सन्ध बंगभय न्ह जीवत्तमलाई जह मणुए तहति- ज अप्पसहावादो रमण तिव- नपाणीण वि- नया पपेण विना जह ससाणमाई जज करेइ कम्म जरस भणिय जयि जीवमहावं नह सम्भूमो म- . २ * मुणदि मु- जविपि सपट- रमहजासहम- सविस गह विदालोर [२४ । पाई फम्मखयादो घाइचटकं चचा १२७ १२५ १ . चारेयं चरदि सयं चउगइ इह संसारो चउगइ इह संसारो चारि विकम्म जणिया चिरबद्धकम्मणिवहं वेदणमचेदणा तह चेदणमत्रेदणं पिट्ट धेयणरहियममुच २० २२ ५ २५ ४ ४८ १२ ज. १ १ M जंणाणीण वि- जमा ण णयेण जह सद्धाणं जह ण विमुं- ९ जं संगहेण ग- जंज फरेइ क- जह रससिद्धो माई जाइमम्मावो ण मे बइ इ उत्तरिद ه ه ه ع سره د بر بن २० २ - २ . २ छह उत्चार । जिणेदिति बलु भणाइ- सक्षा एकसदार जरण अरिणामावो जह मन्वं वंगभयं । रह जीवत्समलाई जह मणुए तह ति- अप्पसहावादो रमण तिव- डपाणीगी- নল ল ল বিলা बह सदाणमाई न करेह काम बसस भगिय जरियजीवमहार ना सम्भूमो - . २ ५ जमुपदि मु- विपि मराट- समुपपासा - काय मिरज गरा विश्व [२६] १२ १२० ११२५ १३० १ ३ ९ ११ ૨ १८ अइया तञ्चिवरीय जहवि चरष्ठयलाहो ज चिप भरायचरण ज मार मारमझ जमाव भावयित्ता जइ इच्छह उ- जाणगमायो अणु- जाणगभावो जा- जाणादो विय भि- जीवेहि पुग्गले हि य जीवाह तेवि दुविहा जीवे धम्माधम्म जीवाजीय आ- जीको मागभानो जीवाइमनतच जीवादिगि- जीगे ससहाव-- जीवो सहावाण- जीवा पुग्गटाटा जुनीमुजुत्तमागे नियमन नदिविहिमा ९ ६३ २ २० २१ .. २१ २२ २ [२७] ६ " गे पाई गंश जोगा परिपदेसा जो अमुत्तो भ- जो पद जीवसहायो २ ५१ ११ " ७७ ३ जोपजीवदिजीरिस्मति जो मंगहेण गहियं जो एयममयसी जो वरण णम- जो चिय जीवन- जो निग्मेदुरपारं जो इह मुरण भ- जो गरज जो एपसमयबटी जोपरणं चम जोयेव पीर खोजियमेव म- करणम्मास FORम माथि माजीवगायो १०. प न. मगह ३ न मुणइ क्युसarm Vor m २ ४५ ण ममुन्मवह णण- ण विणामियण पय पण दो अ- महकम्बसुना पहएयपएसत्यो. णमा दन्यसहाव ण दु णयपस्खोमि- गाण पिहिपमाप १६ سه पायव्यं दरियाण गाणं रूपा मुह २३ ११ " २८ १५ णणामहावभरिप णाम हवणा दब्यं जासतो विण पटो माणदमग चरण १६ २६ पण मगपमारं समताण नित्यधि- ११- ८ ५ [२९] " १९ २८ ३३ m विरमगाणसे- सिद्धादो गिद्धण गि दवे गमणा जिनं गुणगुणिमये गिरवेश एपने निखेषणयपमाणा ८ ३ २ ६५ शरिछत्ती वायूग १२ ६ २२ " . १५ २ लिस्टयववहार- निस्सेससहावाण निबत्तभरथरि- नियमणिसेहण- निसरणप- निवसमयं पिय सिएप माग- लिम्पदो पर लिजियसासोनि- पयं जीवनी पणाण उहय अयं जीवमजी। गो उत्पार ही ०५ १०५ १२० ८ १५ " [१०] जोआगमं पिति- णो छु भणियच णो ववहारेण विणा ५ तचं विस्मवियप्पं २ ७ १०७ १०५ नग्गुगए म परिणदं तथपारसहाण भेया ता मुयसायरमहणं तिक्काले जे सत्तं तित्ययरकंचालिसम- ते ९ति चवियपा तेचेर भावरूवा तेण चटग्गइदेहं ३ २ ३ १२ था थावर फटेमु चेदा ५३ द . दया दहमेयं दवथिए य दव्यं दव्यागनु पmmM ~~ २ दव्यगुणपरज- " दणं पडिविनं ૨ [1] . ८० पण थूल " १०. दर्ण देहटाणे . ट २६ दन्ना विस्मसहाया दिमणगाणचरिता दमाण साभूदा दिवगुणाण सहाया दिप्यास गुपएमा दिदि चिरसदि दम्ब निस्सहार्य दमण मारणं १३ २३ " ८८ । दस भएमा । दर्गका ८ २२ म.परमा दिनं दिन दुई .
[२२] ८ रंमगाणन. 4- दमपुपादो नाम दमनमरितमोई दसगकारणमर उमगमुनिषिमुदो दलमहाम- दारियदुग्नपद- ३ दिखागहणाशुभम २ १२ देविह आसवमग्गं दुक्ख जिंदा चिंता दुममीरणेण पोयं १५ देहाणं पाया " देसबई देमाथी " देसंच एजदुग्ग देहायारपएसा दहा य इंति दु- देहजुदो सो मुत्ता देवगुरुसत्यभत्तो दो चंद महिमणया २२ २ ३ .
सत्ते जो गहु मग्ण " १२ २ " मन जह सन्यग मध्येत्रिय एयंते सहज सुदाइजादं समयावलि उस्सासो सम्बासि पाजाया सम्पत्य अधिसंधा सम्बोसि यत्यित्तं सयमेव कम्गगलम सविया लिन्यिपणं सम्भूदमसम्भूदं सान्दादिचार सवाअमुक्खस्वे सहास्दो भयो सव्याय पग्जयादो सम्बाण सहावाणं सव इति भंगा सहम जाण णाम सप्णाइभेयभिण्ण सदा सधे दंसण सम्मा वा मिठा श समगा सराय इपरा ૨ १२ १६ ८२ २ १ १ " १०६ ११२ १८ १२२ २ २ ३ १२ ८५ समदा तह भन्शयं साणणाणवरणं सम्वसिं सन्मावो सम्मगु पेच्छद जम्हा सद्धाणणाणचरणं संवेयणेण गहिमओ सामण्ण विसैसा विय सामण्णुत्ता जे गुण सामी सम्मादिही सामण्ण अह बिसेसं सायार इयर ठवणा सामपणे णियबाहे सामण्णं परिणामी सामग्णं जाणार्ण सियसदेण विणा इह सियसदेणय पुश सियमावेक्खा सम्मा सियजुतो पणिवही सियसहमुणपदुष्णप मुरणरणारयतिरिया मुदो जीवसहायो ग्रहो मुहगोद ११२ " १२७ ५ " ८६ २ १३१. ५२
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४ परजाए दब्वगुणा ४ परमाणु एयदेसी " ४ परमावादो मुण्णो १२६ १२ पंचावन्यजुओ सो पंहु जीवत्तं चयण परमत्यो जो काली पजय गरण किच्चा पण्णवणभाविभूदे ५७ १२ १३ ९ " ९८ २१ पचपयंतो रागा परदो इह मुहममुह पढम मुत्तसरूवं पस्मदि तेण सम्व ७ ७ १२१ ८ १० पारद्धा जा किरिया ४ पत्ताइक्वगं ३ पुग्गलदो जो पुण पुरी जलंच २९ 5.
द समिरिपोहो पण नमार्ण १५ ९ .. ६० २ शिम्मायाशे यो गिगिरो कधि- विजावर सधे विवरीये पुटयो नीरं विसयविरत १ २ १६ पुर मुगादता निणर- भ. २ मगइ मणिधा- ३८ १३ ८ भावगुणादो भया मणियाजेसम्भाका मण पणिवामुदा भरहे दुग्ममकाले भावेमु रापयादी भावचरक चत्त माया प्रेयसहावा भावो दम्पणिमित्त भावे सरायमादी भेदे सदि समर्थ १२ ७३ १२
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ॐ ॥ श्रीवीतरागाय नमः ॥ भीदेवसेनविरचितं लघु नयचक्रम्॥ ac पीरं विसयविरतं विगयमलं पिमलणाणमंजुनं । पणविपि पीरजिजिंदं पच्छा पयलरसणं वाच्छं ।।१।। वार विषयविरक्तं विगतमलं विमलहानसंयुक्तम् । भणम्य पारजिनेन्द्र पधानपटक्षणं पश्ये ॥१॥ पाणीण वियप्पं मुयमेयं यत्धुपंससंगहणं । तं इह गयं पउत्तं पाणी पुण देहि गाणेहि ॥ २॥ यो शानिनो विकल्यः श्रुतभेदो यस्त्वंशसमहणम् ॥ स इह नपः प्रोक्तः शनी पुनस्तैनः ॥२॥ जमा ण णएण विणा होई परस्स सिययायपडिवी। तमा सो पोहब्यो एअंतं इंतुकामेण ॥ ३ ॥ परमान नयेन विना भवति नरस्य स्याद्वादप्रतिपत्तिः ॥ तस्मात्स गोभ्य एकान्तं हन्तुकामेन ॥३॥ जह सदाणमाई सम्मत्तं बह तवाइगुणणिलये।
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कम्माणं मझगयं जीवं जो गहड़ सिद्धसंकास । कपंगांमध्यगतंजीले यो गृह्णाति सिद्धसंकाशम् । उपासय माण किच्चा ना गइ कयला सभा। सम्भूयममभूयं उययरियं च दुविह मम्भूयं । निविहं पि असन्भूयं उपमग्यिं जाण निरिह पि !! सतमसद्भतमुपचरितं चैत्र विविध सद्भनं । त्रिविधमध्यसद्भतमुपचरितं जानीहि त्रिविधमपि ॥१५॥ दवथिए य दवं पज्जायं पज्जयथिए विसयं । सम्भूयासम्भूए उपयरिए च दुणवतियत्या ॥१६॥ द्रव्यायिके च द्रव्यं पर्यायः पर्यायार्थिक विषयः । मद्भता ते उपचरिते च द्विनवत्रिकाधीः ॥१६॥ पज्जय गउणं किया दवं पिय जोहु गिणए लोर सौ दव्यत्यो भपिओ विपरीयो पज्जयत्यो दु॥१५ पर्याय गाणं कृत्वा द्रव्यमपि च यो हि गृह्णाति टोके । स द्रव्यार्थो भणितः विपरीतः पर्यायार्थस्तु ॥१७॥ कोपाधिनिरपेक्षः शुद्धद्रव्यार्षिकः । माणद गो मुद्धपओ खलु कम्मोवाहिणिरवेरसो ११८६ सदनयः खलु कर्मोपाधिनिरपेशः ॥१८॥ अनोगत्येन सत्ताग्राहकः शुद्धद्रप्यार्थिकः । भन्यते ) उपाइम्पयाओ इह समागाहमो समए ॥१९॥ हत्या यो गृणाति केया सत्ताम् ।
म गुमनपः इह सचामाहकः समरे ॥१९॥ भेदकम्पनानिरपेक्षः शुरदम्यार्थिकः । गुणियाइचउ अत्थे जो जो कोई सलु मेयं । मो दबत्यो भेदवियप्पेण निरपेक्सी ॥२०॥ गुण्यादिचतुप्फे यो न फोनि खलु मदम् । सन्याओं भेदविरुस्पेन निरश. ॥२०॥ काँपाधिमाशोऽशद्रष्यार्थिकः । गु राययादी सप्षे जीमि जो दुपदि । { अगुद्धो उत्तो कम्मणोवाहिमावेपतो ॥२१॥ सन् प रागादीन् सर्वेषु जीवेषु यद जलति । इन्टु अशुद देतः फर्मणामुपापिसापेक्ष. ॥२३॥ पुत्पादस्ययसापेोऽनन्याधिक। पदययविमिस्सा सना गहिऊन मगह निदपत्र । इस एयगमये जो असुदो हो विदियो रिना परस्ययविमि सत्ता गीचा भागनि विद्वस्वन् । (पैरसम यो सारासो मद्धितीयः ॥२२॥ भेदकल्पनामापेशोदण्यार्थिः । ‘सदि संबंध गुणगुणिपाल ना दो दी। वि अशुद्धो दिछी महिओ सी मदकप्पंग ॥२॥ समि सम्पन्धं गुगगुगदर्शनों ने दी दी। पयुमो यः सहितः म भेदरसना । २३ ।
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इदमेवमुचरता भण्णा सो साइपिच्च पा ॥ २८ ॥ फर्मयाप्राप्तायिनाशी पी हि कारणाभावे । इदमेरमुमरम्मन्यते म सादिनित्यनयः ।। २८ ॥ सनागौणत्वनोत्पादप्ययमाहकः स्वमायानित्यमुद्धपर्या- यार्धिकः। मला अमुक्खरूचे उप्पादवयं हि गिड्यए जो हु । सादु सहाय अणिच्चो मण्णइ पलु सुद्धपम्जायो ।।२ मनाऽमुख्यम्पे टत्पादन्ययो हि गृह्णाति यो हि । सनु स्वभाषानियो भपते सन शुद्धपीयः ।। २९ ।। सत्तासापेवः स्वभावानिन्यः अरः पर्यायार्थिकः । जो गहइ एफसमए उपायययद्यामंजुतं । सो सम्भाव अणिच्चो अमुदओ पज्जयाओ ॥३० यो गृह्णाति एकममये उत्पादग्यपध्रुपन्यमंयुक्तम् । म मावानित्योपशुद्ध. पर्यायाधिक ॥ ३०॥ कोपाधिनिरपेधः स्वभाषानित्यः शुरः पर्यायाथिकः । दहीणं पाया मुद्धा सिद्धाण मणइ सारित्था । जो इह अणिच्च मुद्धो पन्जयगाही हवे सणा॥३१ देहिना पर्यायाः शुद्धाः सिद्धाना भणनि सहशाः । पइदानित्य. शुद्धः पर्ययमाही भवेस नयः ॥३१॥ कमाणधिसापेक्षा विभागानित्योपुरः पर्यायार्थनयः । भणइ अणिचा मुद्धा पउगइजीवाण पन्जया जोह।
दु
पिच्चिदातीरया पहणकाले समाना।
नं भूषणइगमणयं जह अड पिनुहादेश धीरे ॥३३॥
पिप्पण्णमिर पर्यपदि माविपयत्य गरी आणिप।
अपत्ये जह पत्यं भगइ सो माविणइगमोनिगोर-
अमधे यथा प्रस्थ मण्यते स भाविनैगम इति नयः ॥३५-
नई दिमाग अपिलो अगुस्नी पजपरियार,
भगनिनादधनितीन पवाग्दोलि।
मानि दिमायानियोऽदायकाको नयः ॥ ३२ ॥
भूगमाथिकामानाठभेदाभेगमाया।
निद्रव्यक्रिया बनने काठे तु यसमावरणम् ।
म भूननगमनयो यथा अव नितिदिन वीरस्य ॥ ३३ ॥
पारद्धा जा फिरिया पयणरिहाणादि कहर
लोए य पुछगाणे न मण्इ बहमागणयं ॥ ३४॥
मारला या क्रिया पचनविधानादिः कथयति यः निमाम् ।
टोके च पन्ध्यमाने स मप्यते वर्तमाननयः ॥ ३४ ॥
নিধির সলনি মাৰিব নালন্দু।
जो मिला
सामान्यमंग्रहो विशेषसंप्रति संग्रहो द्वधा ।
अपर परमविरोह सवं अत्यिति मुद्धसंगहणो!
होइ चमेव अमुद्धो इगनाइविसमगहण ।। ३६ ॥
अपरे परविरोधे सर्व अस्ति इति शुद्धसंग्रहण ।
मति स एवाशदः एकजातिविशेषग्रहणेन ॥३७॥
मामाग्यपदको दिपारो विशेष मयूरभारानि स्पष रो: पिधा- मंगहण गहिवं भपा आप असुर गुदं पा । मो पयहाग पिही अनुसुदन्यभयकरो ॥३७॥ २ ममदेणगी जिनपि अपंगुर र का। स व्यवहारो विधिोमुम्साभेदफर ॥३॥ गम मूत्र मिलर्जुम्परागपि विविध । बी एपगमयपही मिला दन्ये पुवतपरजाओ। मो रिउगुगा गामो मपं पि मदं जहा गणियं ॥३८॥ ५ एकरमयतिनं गाणानि पे भवपर्यायम । गप्रमुगल सूक्ष्म समपि सयथा क्षणिकम् ॥२८॥ मणुषाइयपरजाओ मणुगुति गहिदीम पहता। जो मण गायकाल मो धूलो होइ पिउगुगी ॥३९॥ मनुजादिशपर्यापो मनुष्य इनि स्वस्थिति वर्तमान । यो भणति तायकालं स स्थलो भवति ऋतुगूत्र. ॥१९॥ शाममभिम्देवभूताकि उता नयभेदाः । जो पट्टणं १ मपाइ एयह मिण्णलिङ्गमाई । सो गहमी भणियो पेओ पुस्साइयाण जहा ४H यो धर्तन पमन्यते एकार्थे भिन्नाटगादीनाम् । समदनपो भपित झेयः पुष्यादीनां यथा ॥४०॥ अहरा मिद सफीह किंपि अत्यववहरणं । संगल सर विसयं देवो संरण सहदेवो ।
चद् अत्यपहाणा सद्दपहाणा दु विणियरा ॥४४ (१०) मषा न गम्दै कति परिमाणम् । मसर शन्दम्य विस्यः देशदन पथा देवः ॥३१॥ सहारुदो अन्यो अत्यारूदी नव पुण महो। मगर इस सममिरुदो जहद पुरंदरी सके ॥४१॥ सन्दारदोऽयोऽयामदानव पुन. दादः । मणति इह समभिसतो यथा इन्द्रः पुरंदरः शने ॥४॥ नं जं करेह कम्म देही मणवयणकायचिहाहि । तं तं मु गामजुती एवंभूना हवं म णो ॥४३॥ यद्यन्कुरुते कर्म देही मनोवचनकायचेष्टातः । तत्तखलु नामयुक्त एवंभूनो भवेन्म नयः ॥४३॥ पढमतिया दश्वत्थी पज्जयगाही य इयर जे मनिष ते प्रथमतिका द्रव्यार्थिकाः पर्यायग्राहिणश्चतरे ये भगिता । ते चत्वारोऽर्थप्रधानाः शब्दप्रधाना हि वय इतरे ॥४४॥ पण्णवणमाविभूदे अत्ये जो सो भयपज्जाओ। अह तं एवंभूदों संभवदो मुणह अधेमु ॥४५॥ प्रज्ञापन भाविभूतेऽर्थे यः स हि भेदपर्यायः । मय स एवंभूतः सभयनो मन्यघ अर्थेषु ॥४५॥ एपनयभेदाः कध्यन्ते। गुणगुणिपजयदचे कारयमम्भावदो य दन्वेमु । सण्णाईहि य मेयं कृष्णा मम्भूयमुद्धियरो ॥४६|| गुणगुणिपर्यय से कारफायनश्च उच्य ।
दिमिरा भर परो तरिकरः ॥१६॥ दार्ण गुपएमा पहुगा पयहारदो य पेण । अण्णण य गिरपदो मणिया का सत्य राठ हवे नुनी ॥४७॥ प्रणा प्रदेशा पगा व्यवहारमा एक.पाम । अन्येन च निधनो भन्नता. का सागर भोनिः ।। तदुग्यते । प्यवहाराश्रयायतु मर-पातीतप्रधान । अभिन्नामिकदेशियाटकादशोऽपि निभयात् ॥१॥ अणुगुरुदेहपमागी उपमहारप्पमप्पदा पदा। अममुहदो परहारा णिच्चयगयदो अमंसदगो या।।४८॥ भणुगुरुदेहप्रमाण. स्पसहारप्रमत चेतविता । असमुझाना पयहारात् निभानयनोनमयदेशो या ॥४८॥ एयपदम दर णिच्छयदो भयकापणारहिदा। मंभृएणं यहुगा तम्म य ने भेयकपणामहिए ॥४९।। शुभमदनापयदारोभारसद्भतम्यवहारः इति सस्तोनिया जानीयागतम्ययागे विजातीयामद्भतम्यवहारः स्वजानीय रिजातीयमनतम्ययार इति भमद्भतोऽपि प्रिभा । अण्णामि अन गुणा भणइ अमभूय निविहभेदेषि । राम्जाइइसरमिस्मो माया तिविभेदजुदो ॥५०॥-- भन्येम गुणा भाषेला समनधिविग्रेऽपि ।
सनीय इरागे भो भाविकीरतः ।।१० माइतमानसमेहराद। दयगुणपग्जयाणं उपयार होर ताग नयर । दब गुणपग्जया गुणं दवियपग्जया पंया ।।५।। द्वन्यगुणपर्यापाणी उपचारो भवति तेगा तोर द्रम्प गुणपर्यायी गुगे हत्यार्माया याः ॥५१॥ पजाय दयगुणा उपपरियच्या हु घसंजना । संबंधे संसिलेगो गाणीणं यमादीहिं ॥१२॥ पर्याये द्रव्यगुणा उपचरितन्या दि मन्धसंयुनयः । संवन्धे संलप ज्ञानिना नेगमादिभिः ॥५२॥ विजानीयद्रव्ये विजातीयद्रव्यारोपगोसद्भतंयवहारः । एरंदियादिदेहा णिच्चचा जैवि पोग्गले काये । ते जो भणेइ जीवो क्यहारो सो विजातीओ ।। ५३ ॥ एकेन्द्रियादिदेहा निश्चिता येऽपि पौगुले कार्य । ते ये मणिता जीवा व्यवहारः स विजातीयः ।। ५३ ।। विभातीयगुणे विजातीयगुणारोपणो सद्भतम्यवहार:- मुचं इह महणाणं मुतिमदल्वेण जणियं जमा । जइ गह मुलं गाणं ता कह खलियं हि मुरोण ॥५४॥ भूमिह मतिज्ञानं मूर्तिकद्रव्येण जनितं यस्मात् । यदि नहि मूत झानं तत्कय स्खलितं हि मूर्तेन ॥ ५४॥ * - पर्यायः । पजातीपपीय पगालायपर्यायापरोपणो गतम्यवहारः । दणं पसिरिय भपदि है पर एम पग्जाओ। मजाइप्रसन्भूयो उपयरिओ जिपयजातिपग्जाओ ॥५६॥ प्रतिविम्ब मति हि सच सजायमदतोपपरितो निजजातिपयः ॥५६॥ समानिषिजातिव्ये समातिविमादिगुणारोपगोस्वप्नवहारः। यं जीपमजी - पिय गाणे शु तस्स क्सियादो। जो भपाइ एरिमत्यं पवहारी सो अमभूदो ॥५॥ पजीवमनीव तदपि च ज्ञान पलु तस्य विश्यात् । पो भणति दिसाय म्पपहारः सोऽसत. ॥५॥ सजातीयद्रव्ये स्वजातीयविभावपर्यायागेपणोऽसद्भतव्यपहारः- परमाणु एयदेमी यहुपदेमी पर्यपदे जो दु । सो पवहारी भी दप्ये पज्जायउवयारो ॥५८॥ परमाणुरेकदेशी बहुप्रदेशी प्रत्यति पस्तु । स व्यवहारो शेपः दन्ये पर्यायोपचारः ॥५८॥ स्वजातिगुणे स्वजातिदम्पारोपगोसदनस्पषहार:- रूवं पि भणइ एवं पवहारो अण्णअत्थसंभुदो । सेओ जह पासाणो गुणेसु दल्याण उवयारो ॥५॥ रुपमपि भगति मन्यं न्यवहारोऽन्यार्थसंभूतः ।
नोका Team IT Kriminarar- पाणं पिदि परजा परिणममाणं तु गिगर जोह। यहागं गनु जपः गुगंगु उपायाजानी ॥६०३ मानमारोपांगमयुगाणानि यान। भयहार मा जन्मनि गुणस्तर tol समामा मामतार:- दप थूलमंधी पुग्गलटन्यागि जंपए लोए । उवयारो पन्जाए पोन्गलदयम्म माह यहाग ॥६॥ दृष्ट्या स्थूलस्कन्धं पुद्दयभित नाति नाफे । उपचार पर्याय पुलद्रव्यस्य भनि व्यरदार ॥११॥ बजातोयपीये स्वानांचगणागपयोगहालाहार । दट्टण देहठाणं चण्णंतो होइ उचम म्यं । गुणउबयारो भणिओ पन्जाए त्यि मंदेहो ॥६॥ दृष्ट्वा देवस्थान वर्ण्यमान भवति उत्तम रूप ! गुणोपचारो मणित. पर्याय नास्ति सदेवः ॥६२॥ सहत्वपच्चयादा संतो भणिदो जिणेहि क्वहारो। जस्स ण होइ मंतो हेऊ दुर्ण पि तस्स कुदो ॥६३१ पद प्रन्ययतः सतो मणिनो जिनर्व्यवहारः । 1 न भवेन्मत् हेतु दवपि तस्य कुत ॥१३॥ -
।
(१५)
1
पउगा इहरांमारो नमा य ईऊ गुहासुई कम्मं ।
जा मिच्छा नो किह समारो संखमिव तस्सम
॥६४॥
चतुर्गनिरिह मंमारतस्य च हेतु. गुभाशुभ कर्म ।
पदि तन्मिापा सहि फर ससारः साख्य इष तसमपे ॥६॥
पदयादिदेवा जीरा ववहारदो दु जिणदिवा ।
दिमादिमु जदि पावं मचत्यो किंण यवहारी ॥६५॥
सन्नियादिदेहा जीवा म्यमहारतन्तु मिनाया ।
हिमादिषु यदि पार सर्वन किन व्यवहार ॥६५॥
बंध वि मुक्खहऊ अण्णो बहारदो ये पायया ।
गिच्छपदो पुण जीयो मणिओपल ममदरसीहि ॥६६॥
चन्ऽपि मुत्यहेतुरन्या व्यवहारतय दातव्य ।
निभयन पुनजीको भगितः पशु सर्वदर्शिमि ॥६६॥
जो चंच जीवभावो णिच्छयदो होइ सघजीवाणं ।
सो चिय भेदुपयारा जाण फुहं होइ पवहारो ॥६॥
संश्चैव जीयभाव निधयनो भवति सर्वजीशनाम् ।
सचिव भेदोपचारापुट भवति व्यवहारः ॥६७॥
भवपारो गियमा मिच्छादिहीण मिच्छरूवं खु.।
सम्म सम्मो भणिओ नेहि दुबंधी प मुक्खा वा ॥६॥
भदोपचागे नियमान्मिध्यादृष्टीनो मिथ्यारूपः रालु।
यस्ले सम्यक भणितः तस्तु बन्धो वा मोक्षो वा ॥६॥
णमुणइ वत्युसहाचे अह विवरीयं सु मुणह निस्सा
तं इह मिच्छाणाणं विवरीयं सम्मरूयं तु ॥६९)
न मिनोति वस्तुस्वमात्र अप विपरीतं खलु मिनोति निरसंचा
तदिह मिथ्याज्ञानं विपनि सम्यारूपं तु ॥६९॥
पो उपयारं कोरड गाणस्स हु दमणस्स या और।
किह णिच्छित्तीणाणं अण्पोसि होइ णियमेण ॥७॥
नो उपचारं कृत्वा झानस्य हि दर्शनस्य का वेये।
कर्य निभितिज्ञानमन्येषां मवति नियमेन ||७०॥
इति अमदभूतत्र्यवहारः।
उवयारा उपयारं सध्यामञ्चनु उहयसत्येनु ।
सजाइइयर मिस्सों उपयरिओ कुणइ यवहारो }011
उपचारादुपचारं सत्यासत्या उभवार्थे।
सजातीतरमि उपनरिन. करोति व्यवहारः ॥७२॥
মনীষীবনযাহা নিতানীষীশষ
व्यपदारः समातीपारिजातीयोरचरितामद्भतम्यादारः
पनि पर्यापनागनोरिया !
दगई देसन्यो अत्याणिनो महेव जपतो।
में देम में दर सच्चामचपि उमय ७२॥
देशनि देशा यर्थपलिये तक जलान् ।
मा देगो म प रागागसमाप उमयार्थम् ॥२॥
-- (१७) ग्यजातीयन्ये बजायथ्यारोपगमुपपीरता. मदतप्प्षदार पुपादन वग्गं अहं च मम संपयाइ पतो। उपपारामभूमो मजाइदप्येमु णायनी ॥ ७३ ।। पुत्रादियधुवा. ह च मय सम्पादि जयन् । उपचारामतः समातिदम्पर प्राप्तम्य ॥७३ ॥ विजातीयव्ये विज्ञापदन्यारोपण उपपरितासात- आहरणहमरयणं वत्यादीया ममणि संपतो। उपयारअगम्भूयो विजादिदमुपायचा ।। ७४ ।। भाभग्णहमरनानि यसादानि ममेनि उपन् । उपचाराराइतो विजातिव्येर हातम्य ॥ ७ ॥ নাযিলব্য ধনিকাল বলায় ज्यवहारः- देमं प रग्ज दुग्गं एवं जो पेव मणइ गम सर्च । उहपत्थे उपयरिओ दौड असभ्यपहारो।। ७५ ॥ देश राग्य दुर्ग एव पर भगति गम सर्यम् । उभयाथै उपचरिती भवन्यसद्भातम्यवहारः ।। ७५॥ एयते गिरवरखे णो सिम्सद विविधभावगं दयं । तं मह क्यणयंते इदि पुग्यह सियमयंत ॥७६ ।। एकाते निरपेक्षे नो सिद्धति विविधभावगं द्रव्यम् । तत्तथा बचनेऽनेकान्त इति युपत स्याइनेकान्तम् ।। ७६ ॥
तथा नयसिद्धो योगी आमानमनुमपन्नवरतन ॥920 रायाइमावकम्मा मश सहावा कम्मजा जमा। वहारादो बंधा मोबसोजमा सहावमंजुनो। नहा कर ले गठणं सहायमासहपाराले 1999 व्यबहागत् यत्रो मोसो यस्मारामानंयुक्तः । तस्माकुरु त गौण सभायमागपनाकाले || जह सतिको पाई हेमं कामण मुंजय भोग! राह णय गिलो ओई अप्पा गहरा अगवरयं । यथा रससिद्धो वैद्यो हेम कृया भुनक्ति भोगम् । मोक्खं च परमसारखं जीवे चारितमंनुदे दिई । वह तं जड़बगे अपपरयं भाषणालाणे ॥७२॥ सौमं च परमगोस्वं जीवे चारित्रमयुत दृएम् । घर्तते तद्यतिदर्गे अनवरत भायनालीने ॥७२॥ विभायावभावाभायतेन भावना- जो संयणगाही सोहं णादा हवे आदा ८०il रागादिभावकर्माणि मम स्वभागान कर्ममा यस्मात् । यः रावेदनमाही मोह दाता भवाम्यामा ८०॥ सामान्यगुणप्रधानत्वेन भायना. परमावादो गुण्गो संपुष्णो जो हु होइ गियभावे । जो संग्रयणगाही मोह जादा ये आदा ॥८॥ परभाकर शून्य. सपूर्णो यो हि भात गिनभाने । सदनप्रादी मोड झाता भवाम्यामा ८१॥ .
जिपक्षाव्य यमापाभापत्वेन भायना- उडमन्मायो पा में जातं जाग मिण्याजडदव्य । जो संवैयणगाही साई पादा हये आदा ।।२। जडस्वभावो न में एम्मा जनीहि भित्र । य संवेदनमादी गोह शाता भवाम्यात्मा ॥८२।। पिंपगुणप्रधागसंग भापता -- मा नहावं पापं दमण परणं न लिपि मारण ! जो संपणाही सोहं पादा हवे आदा ॥८३॥ मम स्वभार भान दर्शन परण ने किमपि आवरणम् । य सवेदनाही सोहाना भराशमा ।।८२॥ रखावनामधानन्येन भावना--- भावचउ च संपतो परगमारामा। जो मययणगादी सोहं पादा हो भादा ॥८॥ भावचनुकत्याग रामपास परगभावसमागम् । य. संवेदनाही सोह ज्ञाता भजाम्यामा ॥८॥ णियपरमपाणसंजपिन जोपिला चारपणाणंद। जइया सध्या कीलइ अप्पा मषियप्पभावण ॥८५॥ निजपरमहागराजनितं योगिनः चारुचेतनानन्दम् । पद सा माक्रीडति आत्मा अधिकरसभान ८५|| लवणं य एस भनियं पयर सबलात्वादियरं । सम्मारिगुपं मिच्छा जीवाणं मुगयमग्गदियान ॥८॥ लवणीव एगित नपचक्र सकटगानाटिकरम् ।
गी नाईकमा म कामानिमियां मyिtim'' जाकर उगा सम्मानमार मुनगर पE REMEDIES मी मा दुर्गरम गरे । ॥ति लपुनय र देशमनानं ममापन् ।
(२१) | 12|| জুবায়োলা না থাৎ ৰীকৰা भाषप्रसारक नपचन मोक्षमार्ग कुवन् गन्धकी नि- शाखपरिसमाप्सादिक विधाचारप्रनिपाटन पुण्यावामि ना- सापरिहारं फलमभिटापन शाखादी इएदेवगाविशेष नम- माह 'द' नि. या विस्समहावा लोपायासे सुनंठिया जेहिं । दहा सियालविसया वंदेहं ते जिणे मिद्धे ।। १ ।। इन्यागि विश्वसभावानि टोकाका सरिथतानि . । यानि त्रिकालविषयाणि पन्देऽह तान जिनान्सिद्वान् । इष्टदेवताविशेष नमस्कृत्य प्याययमातिशनिदेशार्थ- माद समिति'- अंजना सिचदयसम्मा। पुवायर ...तर मरेलदो दोन्छ ॥२॥ यो यो यथा ए सर्वदन्यसाभाव । पूर्वापराविरु . तथा क्षेसो पत्र ।। स्वभारत्पमादिनारे कल्यनिर्णीत्युपचारं प्याचष्टे जीपति' जीया पुगतकाला धमाधम्मा वय आयामं । पिपणियसहानगुपा दाज्या पपरमाणेहि ३ ॥ जीवा पुलमायौ धर्माधर्मों तथैवापाशम् । निजनिजस्वभावयुका मन्या गपप्रमाणैः ।। स्पमापर गामान्धरं मयेमित्यादि वाचं यह परम दयसदावं तहेव परमपरं । ...
चंय मुद्ध परमं पयहा हुति अगिहाणा ||.. (२२) सच तथा परमार्थ व्यस्वभावम्नयत्र परमपरन् । ग्य शुद्ध परमे एकार्थानि भरन्त्यभिधानानि || म्यमायबभाविनोगनि दर्शयनि- एदेहि तिनिहलोग णिप्पणं खलु पहेग तमलोयम् तेणेदं परमहा भणिया सम्भावदरसीहि ॥ ५ ॥ ने पुण कारगभूदा लोयं कन्जं वियाण पिच्छयदो अगों कोधिन भणियो देसि इह कारणं कन्जं ॥ पतन्त्रिवियों लोको निप्पनः राल नभसा स अलोकः । ते ते परमार्था भणिताः स्वमायदर्शिभिः ॥ ते पुनः कारणभूता लोकं कार्य विजानाहि निधयतः । अन्य: कापि न भणितस्नेपामिद कारणं कार्यम् ।। एकमंत्रनियासिन संकगदिदोपपरिहारमाह- अरोप्परं विमिम्मा तह अण्णाणायगासदो गिर्य। संगो वि एयरप परसहायहि गच्छति ॥७॥ पास रिमित्रास्तयाऽन्योऽज्याप्रकाशता नित्यम् । सन्तोम्प्यकक्षेत्र न परस्तमार्गसन्ति ।। दति पौटिशानिर्देशः।
-- अथ सग्या विषयारयानामधिकारारम्भ गुणमाया दपियं काया पंचस्थि मग तमाणि । अण्णेवि नव पयत्या पमाण णय तहय मिस ॥८ दंसणणाणचरिता कमसो उक्यारभदइदेरी । दरमहावपयास अहियारा पारमरियप्पा ॥९॥ गुणपर्याया द्रव्य काया पचास्ति सप्त तचानि । अन्येऽपि च नव पदाधीः प्रमाण नयास्तथा च निक्षपा ॥ दर्शनहानचारिवाणि प्रमश उपचारभेदेतर । द्रव्यम्वभावप्रराशे अधिकारा वादशाविकल्या ।। अथ मूनि रतमाधिफारश्याणां प्रयोजनं निर्दिशति - पाययं दपियाणं लक्सपर्ममिद्धिदउगुणपियरं । तह पज्जायसहायं एयंतविपामणहा मि ॥१०॥ ज्ञातव्य व्याणां लक्षणससिदिहेतु गुणनिकरम् । तथा पर्यापरमावः एकान्तविनाशनार्थ अधि॥ गुणस्य रयरूपं भेदंप निरूपयति दवाणं महभूदा (१) मामण्णविसेमदो(२) गुणा गया। मवेमिं मामण्णा दह भपिया मोलम धिमेसा॥११॥ द्रव्याणा सहभूताः सामान्यविशेषतो गुणा मर्वेषां सामान्या दश भणिसा: पोडश विशेश ॥ १.याणा सहभूता' इतिरदेन द्रव्यमहमारिनो गुणा 1 गुणलक्षण कथितम् । २. सामगरिसेसदो' इत्यनेन गुणानां दी मेदी मरू' हेया।
जाणं दमण मुह सत्तिवरम गंध फाम गमपाठिी अप चचारो ज्ञानदर्शनमैदाः शक्ति (२) मुखस्येहा] द्वा द्वै। तुपदेन सद पष्टीतरपुरेपहले पश्चारमुपादिपदानां समाहारः (२४) दामामान्यगुणानां नामानि आह- अश्चित्तं वत्युत्तं दबा पमेयर अगुल्लहुगुतं । देवन चेदमिटर मुत्तममुनं वियाह ॥ १२॥ अलिय वस्तुन्य द्रव्यत्र प्रमेयत्वम्गुल्टघुकत्वम् । देशवं चेतनमितरद् मूर्नममून विजानीहि । पाहणविशेषगुणानां नामान्याह- चट्टगगाहणहे मुत्तमा सु चंदणदरं च ॥ १३॥ ज्ञान दर्शनपुजगतिपरमगन्धस्पर्शगमनस्थिति । वर्तना गाहनहेतु मनमम स चेतनमितरश्च ।। मानादिविशपगुणानां संभव दानाह- अहरदु णापदमपमेया सचिमुद्दाम इह दो दो । पारस पंच गंधा दो फासा अपायया ॥ ११॥ वर्णरसाः पच गन्धी वा स्पर्श अष्ट वातव्या ॥ पडद्म्येषु प्रत्येकं मम्भवरमामान्यविशेषगुणान्प्ररूपयति- एक असा मामला इंति सबदवाण । १ पूर्व गमनस्थिनिधनावगाहनपदाना - परस्परं । ह समाहारे गएकमेकाम) इति नपुंसकारातफयचनप्रयोगः) १२ सायोजनिक समिक्षायिकी चति सतेला मेदौ । ३४न्द्रियजमान्टिचे मुष्पम्य द्वौ मेदौ ।
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. Rm Tirrit. मामय निमा यादीत पनामा परिणाम र पिा नाग रोपाजप 11 10k गा. जिला मामा गामोnirant || पांगदेशियति जीपारिकाः प भारत सम्मा रिट दयान पनि । मगि न महा शिरमा जारपुगताणं न ॥ १८॥ ममान गड विभायो प्रयाणां पायोनिभिः । मा चममाय. विनायो जयामासः ॥ द्रव्यगुणगा प्रभाविभायापेरा पयावाणां पातुर्विध्वं निरूपयनि-- दव्यगुणाण महारा पन्जायं तद विहायदा वं। जीरे जीपमहाया ने विनिहाया हुकम्मरदा ॥ १२॥ द्रव्यगुणयोः स्वभावात्पीयस्तथा विभापतो ज्ञेयः । जीवे जीववभावा: तेऽपि विमाया हि कर्मना। उन चात्यत्र अन्य सुग्गलदव्वे जो पुण विभाओ कालपेरिओ होदि। मो णिद्वरुकवसहिदो बंधो सलु होइ वस्सेव ॥२०॥ ५ पुन विभाव. कालप्रेरितो भवति । स्निग्यलक्षसहितो बन्धः खलु तस्यैव !! द्रव्यन्वभावपर्यायान्संदर्शयति- दव्वाणं खुपयेसा जे जे ससहाय सैठिया लोए ।
- (२७) ने ते पुण पज्जाया जाण तुमं दविण सम्भावे ॥२१॥ प्रयाणां खर प्रदेशा ये ये स्म्यभारसम्पिता लोके । से से पुनः पाया जानाति च दन्याणां स्वभावान् ।। गुणस्वभापपर्णपानगंदर्शयति अगुस्ल हुगा अगंता समयं समर समुन्मवा जे वि । दच्या ते भणिया सहारगुणपज्जया जाप ॥२२॥ गुरदयुका अनन्ता• समय समय समुन्द्रयन्ति येऽपि । प्रयाणा से भणिता सभायगुणपाया. जानीहि ।। जीवदयषिभायपर्यायालिदिशति- जं पदुगदिदेहीपं देहापारं पदेनपरिमाणं । अह विगहगहजीये तं दापिहावपम्जायं ॥२३॥ यधनुर्गनिदेहिनां देहाकार' प्रदेशपरिमाणः । अथ मिहगतिजीवे सदन्यविभावपपीय ॥ जीपगुणविभायपोयानिदर्शयति- मदिगुदोहीमणपज्जयं च अण्णाप तिणि जे मणिया । एवं जीवम्ग इमे विहायगुणपजया सच ॥२४॥ मनिथुताषधिमन पर्यया भज्ञानानि वीणिय य भगिताः । एव जीवस्येमे विभायगुणपर्यायाः सः ॥ जीवद्रव्यत्वभाषपर्यायान्मदर्शयति- दवायारपएसा जे पवका उहयफम्मणिमुक्का। जीवस्स मिथला सर ते गुद्धा दप्वपज्जाया दहाकारप्रदेशा ये स्थिता उभयमनिर्मक्तः ।
(२८) Higm 11 जीरगंगाली- मागं दमग गुहागिन नागि। सं गुदं जाण तुर्म जी गुणानां ॥२३॥ शानं दी माना। संगु मानद मानन ॥२०॥ गति सभामmirrita नियमिनार शुगे परिणामादो पग्गिामो निमगुरुयो। एउपरमेगादी यदि अरा, उमं ॥२७॥ म परिणामाचरिणम नि पर गुमान | एकोत्तरमेवारि पर्वत अपराद हसन २७|| पुराना परपर वरदयमार- णिदादो गिद्धेण नहेन साहेव सनि लिनमं या । पन्झदि दोगुणपहिलो परमायु जहष्णागुगरप्रिो ॥२८॥ स्निग्धतः स्निान नया स्वर गट विपने वा। बप्नाति द्विगुणाविर परभागधन्यगरहित. ॥ तथा सति- संघासागंना वावरसुद्धा य इंति दे संगा। : परिणामिदो बदमेयो मुवीमादीहि पाया ॥२९॥ संख्याऽसंच्यानंता प्रादरसूदनाय ते पानि स्कन्धाः । परिणता पदुमेदाः पृथिव्यादिभिधातन्याः !!
पुलद्रव्यस्वभावपर्यास्पदति- जो खल अगाणिहणो कारणरूपोह करजस्यो वा। परमाणु पोग्गताणं मो दबसहार पग्जामो ॥३०॥ व सम अनादिनिधनः कारणरूप हि कार्यसपो वा । परमाणुः पुराना सप्रन्ययभार पर्याय ॥ पुनरगुणग्यभावपर्यायान निदर्शयति- रूपरसगंपपासा जे थका वेमु अणुकदमु । ते पर पोग्गलागं सहापगुणपज्जया प्रेमा । ३१ ।। रूपरसगंधरपर्श ये वास्तेपणुकन्या । से पैर गना स्वभाषगणपया खेपा । पुद्रलप्ययिभावपर्यायाविरूपपति- पुढपी बतं प छापा परिदियपिसयकम्मपरमाणु । अधूनधूल भूतो मुहर्म गुहम प गइमं ॥ ३२ ॥ पृथिवी बर्ड पाया भतारेभिरविश्यः फर्मपरमाण । अतिरभूगरथल: (पूरः समः पुस्मधाम । जे संपराई संधा परिणमिशा अणुशादिसहि । ते पिय पारितारा बाप तुम पोग्गलाच ॥१२॥ संवादिषभाः परिणनिता पणुकारिकः । तेर पविभावा नारि पुरानी पारगुणविभावपर्यायासंदी- रूपाएर जे उगा दिशा मणुवाइरोमि । ते पुग्गलाप मदिरा विहारगुपामा सने २४
(३०)
मपाटिका ये उक्ता ये दृष्टा द्वयगुकादिस्कन्ध ।
ते पुदलानां ममिता विभावगुगावाः मन्चें ॥
धर्माघमांकासालानां म्यभावव्यापार्ययानाह-
गदिठिदिवट्टणगहणा धमाधम्मसु गगणकादम् ।
गुणसन्मायो पन्जय दरियमहायो दु पुयुगी ॥३५
गतिस्थितिवर्तनावगाहनानि धर्मधर्मयोगगनकटयोः ।
गुणस्वमाषः पर्ययो व्ययभावस्तु पूर्वोन. ||
इनि पयावाधिकारः।
अप द्रव्दस्य व्युत्पत्तिपूर्वकत्येन लापत्रयमाह--
दवदि दरिस्सदि दविद ममापहि विधिहपन्जार
नं पह जीवों पोग्गल घमा पन्म न कालं च ॥३॥
दवनि द्रोप्रति द्रुतं यवमा िविधायी ॥
सग्नमा जीवः पलं धर्मोधर्मन फालश्च ॥
प्रकारान्तरण दरलक्ष आचटे-
निकाले जे मनं यदि उपाययपधुवनाहि ।
गुणपग्मायमहार अगाइमिदं गुन हये दयं ॥३७
किमान वर्तन यादयपधारे।
गुगरायपना अनादिमिर दनु हाय दन्यम् ।।
महा पापग्मनाभावि भानदार
उमा पारमा नमा गिदपदोमहा ।
उना निदरमहा तमा दोएबमम्मा ॥ ३०॥
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का गगन मालपोकमा ग्रहया वामणदों यं पदिअहिणाणे पियपरिन्नान। तामा पंचह भिष्णा खंघाण वासणा पिच्च ििणञ्चमेव मष्णादि नस्मण किरिया द अल्पकान्ति तं यत् मपियं रयिं अत्यकिरियाहि ॥ xin immTET ।। 1. iraj म मागा वि सम्म गारिमायनित अह य अमंने हार मागीय किप फलाउन मादा व नस्य का पुदगी मोरनी इन्। असा असहयत हि माइत शिन्न करणम् ॥ ननु समनात. मायामन नामान पदुना र अथवा यामनान दद प्ररमिताने विरल्यदिशानन् । तहि सा पंचभ्यो मिना मन्धाना यासना नित्या । पविकं पाक्दूषण (अगिप)- यभिज्ञा पुननिफलं भोगोषितनताम् । धमोक्षादिक सर्व क्षणभगाद्विरध्यते ॥१॥" इति। निन्यपचे दूपणमा -- निन्धमत्र मन्यते तस्य न क्रिया गर्भकारिवम् ।
न हि नदस्तु भनित यदहित (१) अर्थवियामि ॥४६॥ दूषणान्तरमाह मिच्ने दब गमणद्वाणं पुह किह सुहामुहा किरिया । अह उवयारा किरिया कह उक्यारी हवे णिन्चे ॥४॥ निये टये गमन स्थान पुन कर शुभाशुभा दिया । अर उपचाराक्रिया कथमुपचारो भयनिय ।। भेदप दूपणमाह- मिमं गुणगुणिय दयाभावं (२) अणंतियं हवा । अणवन्या ममयाए किह एयन्तं पमाहंदि ॥४८॥ निय गुगगुगिदै व्याभावोऽमति कोऽश्वा । अनवस्था समाये धर्मकद प्रसाधयति । विगता मता परमात्तसिव असमियर्थ यि मा ' सन नापि म । इति १२ तमनपार १ क्षणिकवादिनो हिर, वेदना, पिशान, सरकारः, सति पञ्च रकन्धा मन्यते । २ यदि सर्वथा गुणगुणिमोदरलाई सगुगेभ्यो पनि नई किचिद् व्यमिति भावः । गुणा अरिद बिहार निगधाराग्निन्ति इति गुणाभावः। समापातपौर मममा. यो ताभ्या भिमोऽभिग्नो वाभिमकर नपोरे नगमित। कमायारादिनि चेन मोड मोऽभिग्नो बेलायनवादा मेस. घनोदण्या । सत्या तस्या कथमेशा समय सापेत् ।
मगं जा पा मणा पगामविरहिवं हि तम्मन संशावाणिग्जकजण कारणं कि पि कामेध ॥५१ येदि युझ्या गुणगुमादिक भिन्नमनुभक्तोऽपि मर ममेरः प्रतिपादित इति पर्णयन्ति तेरा सूचं मुनितिन पविद युक्तितः प्रत्यक्षादिप्रमाणन सिद्ध तन परममत्वमिति वित २ सर्व यदि सर्वत्र विद्यते तदा मकोऽपि दरिदः स्मारने रिद्रेऽपि धनादिवस्तूनां सद्भावात् । एवंच सर्वेऽपि nik प्यय सेवावाणिग्यादि कार्य कुर्वति । इदामी यदि सर्वस बुधैरिदानी तदपि न स्यात् सर्वस्य सर्वत्र विद्यमानत्वात् ।नई. Mirmir- जागा भिमा नुन पहन गर्ग परम नुन मि मानसून नाम giri सिन || नदि हिचिरिति गयो मार: पो मेयं पहिना समयं गिरयं जमा ३५' मन्य योन दि मन्ने प्रगगिभितो हि समय । नोभये मर ज्ञान नमामोनिशो यस्मात् ।। मयं मयंत्र विगने पति मगनायपणे दूरगना मन्य जर सय्यगयं(२)विग्नदिइह जाय का घते, तनरर्यक्यं स्यात् । तथैव हि कार्योत्पादाप चित्कार्य किंचिकारणमिति ।
. यं पाणं उहयं निरोहियं तं च जाणणमम । अहयाविरमावगर्य सम्बन्ध चिजाणये मया ॥ ५२ ॥ स यदि सर्वगत शिधने हारित कोऽपि न दारही। सेवावाणिपकान कारण किमपि फरक । संयमानमुभम तिरोहिम तब तुमक्या । अयपाधिभावगत मर्वत्र विमानाथ मपंग ।। ममेकमायभाषामफमिनि पसे दूपमा-~- जब म पभम तो फिह विविहासहायगंद। एकाविणासे पागा गुहागुई सन्मलोयाणं ॥५३॥ पदि का विस्थिवभागकाम् । एफरिनारो नपेत् शुभाशुभ सकानाम् ।। অধিধাযথ ধম্মং [ৰি ৰখাৰ খনি ममहापाभिण्णा जाए अधिग्मा विषपद कापा । सातमहा बह पप्पु पलायना ॥५॥ भाभिमा पदिरिया बिस्प्पते पर। ततस्प स्वमायोin विलोकय । परिगरपोपु पोपानरारा तार- पर पांगा पनि मानिरहा। पिपशासिता पर महि सगरमा ॥५५॥ पच मोला: गुमः,माज । महाशमनिममोपाम
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(३८) एका अयुतस्वभारे अनेकरूपा हि विविधभावस्था । भिन्ना हि वचनमेदे नहि सा भिन्ना अमेदान् ॥ भच्यगुणादो [१]मव्वा तन्चिवरीएण हॉति विवरीया सम्भावेण सहाया [३] सामण्णसहावदो सब्वे ॥६३१ भव्यगुणायाम्तद्विपरीतेन भवन्ति विपरीताः । म्वभावेन स्वमाया मामान्यस्वभावतः मयें । अणुहबमावा चयणमयणं होदि तस्म विवरीयं । स्याइपिंड मुग विवरीये ताण विवरीयं ॥६४॥ अनुभयभागवतनमनन भवति तस्य विपरीतम् । रूपादिविण्यो मृतं विपरीने ते विपरीतम् ।। मेनं पएमणाम एकाणकं च दव्यपज्जयदो। महजादो रूवंतरगहणं जो सो विम्मायो ॥६५il क्षेत्र प्रदशनाम पकाने च व्यपर्यपतः । महजाइमातरमण यन्म दि रिभाषः ॥ कम्मयमयाद मुदो मिम्मी पुण होड इयरजी मागे । विय दव्यमहायं उपयात पिवहारा ।। ६६ ॥ कअपारदो मित्र पुनर्मत इसानो भाव । बयानमा उपचार सोरि म्यारात् ।। , ममोपातुभयन रिया। • fनामाया । रानी मानारामयाः। r - पभावानो यथा निरर्थकाय मार्याध था तथा दयनि- पिवर एयन्ने संकरादीहि इमिया भावा । पो पिजकग्जे मरिहा विक्रीए ने विम्बलु अम्हि॥६७ निरपेक्ष एकाते संकगटिभिगपिता भावा । को निजफा विपरीत नपि बस्यही ॥ गुगपर्याययो षभाषयमनुकारभावानामसर्भाष पदयति- गुणपज्जायमहाया दबत्तमुरगया हु ते जमा । पिच्छह अंतरमा अण्णगुणाईण मावाणं ॥ ६८ ॥ गुणपर्यायस्वभावा दन्यत्वमुपगता हि ने यम्मात् । क्षयमतर्भाव अन्यगुणादीनां भावानाम् ।। प्रत्यकद्रध्यस्वभावग्यामाह- इगवीगं तु महाया जाप तह जाण पोग्गले यही। इयराणं मंभवदी गायव्या गाणवतेहि ॥ ६ ॥ एकविंशनिस्तु स्वभावा जीये तथा जानीदि पुले नयत । इमोशी सम्भवतो ज्ञातन्या ज्ञानवद्भिः ॥ सदवाद प्रत्येक--- दगीमनु महावा दोहं १तिण्हं [२] सोडमा भगिया। पंचदमा पुण फाले दब्बसहावा [३] य णागच्या ॥७०। १ जीवालयो. २ धर्माधर्माकागानाम् । (३) तथा घोर-प विंशतिभावा स्युजीरपुनलयोनता । धर्मादीना बोरा पाने पचास स्मृताः ॥१॥ धादित्रयाणा चेतनन्यनेसप्रदेशय सिमा वस्तभावस्वं मूनस्वभावधमशुदायभायमपनपेत् . काटप पसंद --AL शवमपनयेत् ।
तथा (१०) फिर्षिशनिम्तु ममाया द्वयोस्रयाणां तु षोडश भगिटा। पचःश पुनः काले व्यस्वभावाम ज्ञातव्याः ॥ स्वभाव भाविनीः म्यरूपं प्रमाणनययियं ध्याचष्टे-- रावथकानन मदपस्य न नियतार्थव्यवस्था सहरादिदोपरा पम्य सकल शून्यताप्रमंगात् [१] । निन्यस्यैकस्यामा एकापस्या क्रियाकारित्याभावः, अर्थक्रियाकारित्याभावे द्रमापार भार । अनित्यपऽपि निरन्धयत्यादर्थफियाकारित्याभावे द्रव्य भाष । एकमास्यकतिर विशेषाभाषः मधेफरूपस्यात् । विशेष (२)मामान्यरत प्यभायः। अनेकपक्षेऽपि तथान्याभायो नि स्यात् । मेपि विशेषषभायाना निगधारयादधियायः याभाय. । अर्थमियाकरित्याभावे न्यस्याप्यभाषः । अदा क्षऽपि सर्वकारूर यादकियाकारिवाभाव । अक्रिया कारिममा व्यापार । भन्यायकातन परपरिणत्या मकरादि (३) गम मय । समस्या तथा शून्यताप्रमंगः स्यरूपेणाप्यमान समापापातन मराभावः । विभापति तथा को- । पापायुक सा महानतमायाभि १.मदिन ' इत्सत भारम्प पताम वाराट म पुस्तके नास्ति। २ fatin हि गामान्य भविषाणाम् । मामा nिita ३ मरिमावियापायानमायामापानमा स्थान
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(१२) उहयं जुगरपमाणं गहइ गओ गउगमुक्तभावेन सरिनत्वादिस्वभावाः म स्वभाविनः स्वस्वभावाः । उभयं युगप्रमाण गृहणाति नयो गौणमुस्यमावेन ॥ स्यायन्दरहितत्वेन दोपमाद-- मियमद्देण विणा इह विसयं दादणं विज पिगिद्गह। मातूण अमियमोझं पिसभाझं ते विकुप्यति ॥ ७२ ।। म्याग्द्वन्देन विनेह विषयं पोरपि या गृहमति । मुस्मामृतभाष्यं विभोग्य ते नि कुर्वन्ति ।। स्याएपदमदितत्य गुणमाइ-- मियमदेण य पुहा यन्ति पयत्या यत्पुममारे। पन्धू जुगामि जुगी पुण पयपमाणादा ॥३॥ पारम्देन च पृष्टा सुन्नि नपाधी हि बानुप्रभायम् । बम पनिमिद युनिः पुन परमापन ॥ रमंदरमाह- हि पुमा पम्मा मियमायक्या नगदए जाए। गां मिछानी नापयां पश्यण मणिनी माधम यमाक्षात्र गृहसार यो नि। म. मिur ran आपने भगिन ! यामासिवाना म गाव.. भागि काम अगिया दामो माय पर पग्गिामा ! मारा जीरे मनिया गण मधिनापमाs.lt girl
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ITRIE जर गमगार कमी काला। पदमा जान मनांगिम्म नरिमने ॥ नामनाम im || मामी भारः पार गर्गमितमामात ॥ प्रगतीनां मेरा पति- मुदगर नाइपरामपा पपीत उदया। उंदो पूण पानगारि मायया ! ८.॥ भूमीनाको प्रमाना भन्नुभयो । हेतु दो पुन पृथत मागे हागन्या. ॥ मानव बन्धनार- मिठसा अविरमणे कमाय जागा य जीरमाग दव्यं मिच्छत्तार य पोग्गलदग्याण आपापा ॥ ८२ मिप्यातमविरमण कपाया योगाध जीवभाग हि । दन्यं मिथ्यात्वादि च पुलदम्याणामावरणानि । भाषद्ब्ययाग्न्यान्य कार्यकारणभावमाह- मावो दव्वणिमित दवं पिय मावकारणे मणि। अग्गोष्णं वन्झंवा कुणंति पुटी कम्मार्ग ॥ ८३ । भावा हव्यनिमित्त द्रव्यमपि च मावकारणं मणितम् ।। अन्योन्यं बननः कुर्वन्ति पुष्टि हि कर्मणाम् ।। मूलपकृतीनां नामान्याह-- दंसंगणाणाचरणं वेदामोहं तु आइ णामं च । गोदंवराय मूला पयही जीवाण गापन्या ।। ८४ ॥
दमझानावरण दो माहमु आयुर्नाम । मंत्रमन्तरायो मूलमतयो जीवाना इतम्या ।। उत्तरपताना यथाक्रम मस्यामा - पर पण दो अडी चाउ नेणउदी तहेब दो पंच। पदे उसरभेया एपाणं उत्तर्गसरा इंति ।। ८५॥ न पचदी मष्टाविंशतिभभारखिनपतिस्तव दीपच । नेतरभवा पतामा उत्सतरा भवन्ति ।। एता. सामान्यन मुभागमभाभिमा जीवानां मुम्पदु स्यफल्दा भवान्याह: अमुहगुहाणं भया मना वि य ताउ हॉति पयडीओ। काऊग परजयटिदी मुहदुःखं फलंति जीवाणं ॥८६॥ भाभशुभानो भेदा सयौ अपि च सा मवान्ति प्रकृतय । कन्या पर्यायस्थिति मुखदुव फलन्ति जवानाम् ॥ पर्यायस्थितिकारणमाह मुग्णरणारयनिरिमा पपडीओ णामकम्मणिबगा। जहाणामस्ममम्मिमाउवमेणनिया हु ठिदी ॥८॥ मुग्नरनारकतिरसय प्रकृतयो नामफर्मनिता । अचमोकरमण्यमायुधोनान्तिका हि स्थितिः ॥ चतुर्गतिजीवानां जपन्यमाभ्योतष्टायुःप्रमाणं कथयति तनावन्मनुष्याणाम्- अन्तीमुहत अवरा परा हुमणुाण होह पल्लनियं । मग्निम अधरा पढ़ी जाप वरं समयपरिहीपम् ॥८८॥ - अन्तर्मुहर्तमारा परा हि मनुनाना भवति पत्यत्रयम् । 1- . . .
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पंचायदा देहे कर्मती भवन्ति सकटनीवानाम् । उपनिर्यालय पोवन स्यं भवति तथा मरणम् ।। धनुर्विधःमाना नाम लभणानि पाह- । महर्ज सुधाइजादं पयमित्नं मीदवादमादीहिं । रोगादिशा य देहज अणिजोये तु माणसियं ॥१३॥ महन भुदादिजातं मिनिक शीतवातादिभि । रोगादिकाच देह भनिएयोगे तु मानसिकम् ।। विमावावभावफलमाह पियावादी यो मोक्खो मम्भावभावणालीणी । तंतु पराणं परचा पछा आराहओ होई ॥१.५।। विभावान्यो मोक्ष सदावभावना लीन । त खजु नराणा बाया पभाक्षराधको भवति । एवमनेकान्तं ममध्य तरफलं प दर्शयति--- एवं सिपपरिणामी पज्झदि मुंचेदि दुविहहेहि । प विरुग्झदि बंधाई बह एर्यते विरुझेई ॥१५॥ एक स्यापरिणामी बन्नानि मुंधति विविधहेतुमि ।। म विरुष्यते पधारियथैकान्ते विरुष्यते । इति ट्रम्यसामान्यलक्षणम् ।।
गयणं पोगन जीया धम्माचम्म काल दन यहि पुग्गलहि य धम्माधम्मेहि जंच काहिं ईनं नायं ससमलायं हवे णन्तम् ।। ९९॥ मानी नपगुगाना ग्वामित्वमननार्यमा सामानयनाधिकार पाननिका-- मामलगा जे गुणपण्जयदवाण ठामण मंसा। गय विसयदंमणाय ते नव रिममदा भगिनी ॥ मानान्यंका ये गुगपर्यपदयागां समग मस्या । नविषयगनायं तव विशेषनो भागधे । भणियमा अणुकममा जहडिया गयणगभमु ॥९॥ गगन पुल जीया धर्माधम गुलु काल: दृश्य च। भगितव्यानि अनुक्रमशो याम्धिनानि गगनगर्नेषु ।। गगनद्रभ्यम्य नायद्विशंपलक्षणं भेदं चाह--- यणरहियममुगं अवगाहणलक्षणं च मन्बग लोयालोयविभयं तं णहदवं जिणुदिई ॥९८ ॥ चितनारहितमम् अवगाहनलक्षण च मवगतम् । टोकालोकभिंद तन्नभादव्य जिनादिष्टम् ॥ लोकालांकयोलशणमाह- पलध धर्माधर्मेध यस कालैः । स लीक. गेशेऽलोको भवंदनन्तः॥ अनुपगिणः स्वरूपं निरूप्य पुरसमम्बन्धमा जाइमाणिणं अकिहिमं तिरिहीयसंठा।
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परिणामिनीवरवरूपमाह- चौ सर जीरसहाको गो जणित्री पो संयण संभदो। सम्माण सो जीयो भणिो ह परममावेण ॥६॥ ५ खल जीवावभावो मो जनितो नो क्षण समत. । फर्मणां स जीयो भगित इह परमभावेन ॥ अचैतन्यवादिनमा पैतन्य स्वामित्वं चाह- आदा पेदा मणिओ सा इह फलकाणाणभेदाए । तिनं पिय संसारी गाणे [१] राणाणदेहा हु ११७ भामा चेतरिता भणित सा इफल कार्यानमेवा हि तिसूणामपि संसारी ज्ञाने खलु हानदेहा हि ॥ पेतनाधामिरये विशेश्माह- पावर फलेमुदा सस उहयाणं पिहोति णायचा। अहब असुद्धे गाणे सिदा गुगु गाणेमु ॥११॥ स्थापरः फलेषु चेतपिता सा उभयोरपि भवंति बातम्या । भधवा मद्धे झाने सिमा शुगु हाने । निरूपयोगिकटाशमुनिए जीवस्योपयोगमाह उपयोगमओ जीपों उपओगी णापदंगणे मणिो॥ जाणं अपयारं परमेयं देसणं णेयं ॥ ११९ ॥ उपयोगमयो जीव उपयोगो शानदर्शने भगिता । भानमरप्रकार चतुर्भदं दर्शन शेयम् । भानचेतन, कर्मचेतना, कर्मफल चेतनेति तना विधा सर्वनासा तियणामपि स्वामी ससारी | हानचेननायो बामदेर। फेवटज्ञानसरा: सामिनो भवंति।
(५४) मूतकांननिषेधार्थ म्यादमूतत्वमाइ-. रूबसगंधफामा सहरियप्पा विपत्थि जीवस्मों पो मंठाणं किरिया तेण अमुत्तो हये जीवो ॥ १० ॥ रूपरसगंधम्पनी मन्द विकल्या अपि न मंति जीवस्य । नो मम्धानं क्रिया तेनामों भवेजीयः ॥ अमूपिलेपि नथा म्यान्मूतत्वमाह-, जी हु अमुत्तो मणिओ जीवमहायो जिणेहि परमन्यो । उपयरियसहावादी अयणो मुनिमंजुनो ॥ १२१ ॥ यधामृता मणितो जीवस्त्रभायो जिनः परमार्थः । . उपचरितस्वभावान् अचेतनो मूर्तिमयुन. ।। व्यापकत्वमणुमानत्यमपास्य देहमानंत्यमाद- गुरुलघुदहपगणी अगा चनाडु सचममुपायं । क्वहारा गिच्छयदो अमंसदेयो । सो भो ।। १२२॥ गुरुलघुदेह प्रमाण यान्मा त्यक्त्वा हि सप्तसमुदातान् । व्यवहारानिश्चयनोऽमयदेशो हि स यः ॥ प्रकरणवशारदस्य भेदमाह - देहा य हुँति दुरिहा थायरनममेददो य विष्णेया। पापर पंचपयाग यादरमुदुमा वि चद् तमा नह य । देहाथ भवनि दिपिया स्थावामभेद व भिन्नाः । स्थावरा. पंचप्रकारा यादरममा मपि चन्यारत्रमास्तथा । चौद्धमांच्या प्रति भाक्तृत्वाचाह- देहदी मो भुना भूना मी चव हो सकता। - .
कला पुण कम्म जुदो जीजी गंगारिमा मणिनी २४ दएम: : मोक्ता भोना मदर मति १९ फन' । कता पुन फयुतो जीव समगरिको भगेन ॥ सय पर्मग नयमाबधानमादि वह फम्म दुविधियापं मायमहारं पदममात्र । भाये सो णिच्छयदी कना बहा दो दये।, ' । पंधी अणाइणिदणी मनाणाहगार जा पियो । मां चंच माइणितणी जाण तु : ममयबंधेग ।।१२६।। कर्मविवि का भारत र ६ पास बग । भारे म निधपत करती हये ।। चमेनानिधन सन्तानारिजनों भागन । मचा सादिनिधनो जानाहिय ममपन्न । म पचिपश्यति किं नवनि केन तुना प्रश्णमिया. फारणदो इह भव्ये पागइ वंधो वियाण कम्मे । णतं अभविषम जमा पपीण मुंगइ ॥१२॥ फारणत इह मन्य नश्यति भो विजानीहि फरक । नहि स अभयसने यरमा प्रतिनं मुग्यते ॥ संधा जे पुन्वृत्ता हवंति कम्माणि जीवभाग । लदा पुण ठिदिकालं गलंति ते नियालंदना ॥१२८ एफन्धा ये पूर्वोता भवन्ति कौगि जीवभावेन । सम्वा पुन स्थितिकाल गलन्ति तानि निजमार दासा ॥
गंगागिरी मांगयांग गुण्यं निर्मित. मांगा जसा तापा मी मा रापमादीहि । पर पो जीरे गागापरणादिकम् ॥१२॥ मि मिामाको मम्मे सम्माहिर जीरा। का णिमियम मगपपरिणामवीपरापार ॥१३०॥ मा भने यातापास करोति रागादिभिः । प्यस्यो जोनापरणारिकर्मभिः ॥ मिपाव निप्पामार: सभ्यमि सम्पमपि भवनि जीवानान पतु निमित्तमानं मरागपरिणामतीतरागाये [१]॥ पीजांकुरल्यायन कर्मणः फरमुपदिशति गायाप्रयगीत कम्मै कारणभदं देहं कजं सु अग देहादी। अक्सादु विसपगगं गगादि निकम्मद तंपि ॥१३१ कर्म कारणभूत देहः कार्य खासक्षो देहत. ॥ भक्षात्तु विश्परागः रागादि निवप्नाति तदपि । तेण चउग्गइदेहं गेण पंचप्पयारियं जीवो । एयंत गिणतो पुणो पुणो पपदे कम्मं ॥१३॥ तेन चतुर्गतिदेह गृह्णानि पंचप्रकारकं जीवः । एकान्तं गृह्णन्पुनः पुनर्वप्नाति कर्म ॥ इह एप मिच्छदिछी कम्मं संजणइ कम्ममावहिं । जह पीयंकर गेयं तसं अवरोप्परं तह व ॥१३॥ इहैव मिथ्याष्टिः कर्म संजनयति कर्मभाः ।। [१] भयः सम्बन्धस्तस्मिन ।
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उक्तं चान्यन ग्रन्थे- एयम्मि पएसे खल्ल इयरपएसा य पंच गिदिष्टः । तापं कारणकम्ने उहय सम्वेण गायव्यं ।। एकस्मिस्पदेशे खलु इतरप्रदेशाच पंच निर्दिष्टाः । तेषां कारणकार्य उभयं स्वरूपेण ज्ञातव्यम् ।। पुग्गलमज्झत्थायं कालाण मोक्खकारगं होई । समओ अरूवि ब्रह्मा पुग्गलमुत्तोण मारखो हु ॥१३- पुलमध्यस्थो हि कालाणोक्षक रण भवति । समयोऽरूपी यस्मात्पुद्गलमुक्त न मोक्ष. स्वछ । व्यवहारकालं निम्पयति-. ममयावलि उस्मासो धोवो तय णालिया मुदत्त दिगं पक्खं च मास वरिसं जाण इमं सयल धवहारं ॥१३ गमय आवलि उरवास. स्तोको टयो नालिका मुहून. दिन पशम मापो वर्ष जानादीमं सकलं व्यवहारम् ॥ ममयकालमदेनगिदार्थ आह तय ावदेकममयग्य प्रमाणमाद्द- पहएयपएमरथी परमाण मंदगइपबहतो। पीपमणंतरखेनं जावदियं जादि तं समयकालं ॥१४८ नभएकप्रदेशस्थ, परमाणुमंदगतिपवर्तमानः । द्विवीयमनतरक्षेत्र यावनिक यानि रा समयकामः ॥: प्रदशम्य प्रमाणमाड- अंगियमन गर्न अणुणा म्दं गुपयणदलस्म ।
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चतुर्दशरग्ज सेधो टोकः शतानि प्रति विदवार विगयसिरो कटिहत्यो तारियनंपो नुवाणरी वेणायारेण ठिो तिविहो लोगो मुमेयच्ची ।। विगतशिरः कटिहस्तस्तादितनंघो युवानर वर्षः । नेनाकारेण स्थितम्रिविधो लोको मन्तन्यः ॥ द्रव्यक्षेत्रकालमावैश्व विमावा प्रश्प्या- दच्चे सेचे काले मात्र मावा फुडं य लोए जा एवं हि योवाहुगा णायचा एण मग्गेण ॥१४- द्रव्ये क्षेत्रे काले मावे भावाः स्फुटं च टोकनीयाः । एव हि स्तोकबदुका दातव्या बनेन मार्गेण ॥ इति श्री नवचकतानि पे दय्याधिकारः समाः | मपामलित्वं कायत्वं पंचानां प्रदेशमन्यां पाह- सम्येमि अरिपरी गियणियगुणपजएहि संहर्न । पंचव अस्थिकाया उवधा यहुपदेमादौ ॥ ११८ मगमस्ति व निजनिजगुणपर्यय: संयुक्तम् । पक्षवास्तिकाया उपदिष्टा बरप्रदेशतः ॥ प्रग्य प्रदेशप्रमाणमाह-- जीप धम्माषम्मे ईति पदेसाहु संसपरिहाणा! गपणे माना निरिहा पुण पोग्गले गया ॥ १॥ जीवे धर्माधर्मयोमी मंशा सायापारीगाः | गगन नतानंताधिविधा पुनः पुसे इंगः ।। दति पहातपाः T
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रुधिय छिदमहस्मे जलजाण अह जलं तु पासवाद! मपायलमा अपामा मुगा पुग्गलमगी नरारिता गया। अगोष्ण मिढना यंशी महोद गिदा ॥ ११ ॥ अमरेगा मना पुनिना । अग्योमो या गप मानि ग्निासादि. ।। नाममा कम्माटामा अगोगयोगा कमाया। मा बलियो गरिदिपवडिपमागुभागा। माना अन्योन्यप्राशन करायात् । बधानुविध. मग चिनिहानिप्रदेश नुभागात् ॥ १५ ॥ एवं चतुविधयधन्य कारणमाह. जागा पयडिपदमा ठिदिअणुमागा कमायदा होति । एवं घमरूवं णायचं जिणवरे मनियं ॥ १५ ॥ योग प्रकृतिप्रदेशी ग्थिन्मनुभागा कपायनो मरतः । एष वयम्वरूप ज्ञातव्य जिनवरभगितम् ।। सबरम्बम्पं निम्पयति. 7 मिच्छनाइअमात्र तह जीव संरी होई ॥१५६ ।। मंद सिहले जटयाने यथा जलं तु नासवति । निध्यात्वाद्यभावे तथा जीवे मंवरो भवति ।। निर्जराया लक्षण मेदो चाह. निरबद्धकम्मणिवहं जीवपदेसा हुजं च परिगलह । .
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(६१) शुभारः शुभगा गुमनाम गुमापुमययुध्यम् । तदिपगतं पापं सनीहि वंदम्पमावाभ्याम् ।। अहबा कारणम्दा दमि च वयव्ययाइह मनिया। ते मल पुष्णं पाई जाण इमं पश्य मणियं ॥१६॥ अथवा कारणभूनावशां च तात्रतादि इह मनितम् । रामव पुण्यं पापं जानाहि इदं प्रवचन मणितम् ।। अजीर पुग्णपात्र अमुटजीवे तहामरे बंधे । सामी मिच्छाइसी सम्माइट्टी हवदि मेसे ॥ १६३१ मजीवे पुष्पपार अशुद्धजीव नयास्रो बन्थे । स्वामी मिथ्याष्टिः सम्यग्धष्टिर्भवति शेरे ॥ मम्यभूतस्य विपयिणः पलं दर्शयति. सामी सम्मादिही जिय संवरण निजरा माक्सा म मुद्धो चेयणरूवा तह जाण सुणाणपच्चक्सं ॥१६॥ स्वामी सम्पष्टिः जीव संवरण निर्जरायां मोशे। शुखधेतनरूपस्तथा जानाहि मुझान प्रत्यक्षः ॥ गच्चा दव्वसहावं जो दहणगुणमंडिओ गाणी। चारिसरयणपुण्यो पच्छा सो पिबुदि लई ।।१६५ हात्रा द्रव्यस्वभाव यः यद्धानगुणमण्डिता बानी। चारित्रस्नपूर्णः पचास निति टमते ।। इति पदाषाधिकारी पायग्वामिने नमस्कृत्य युक्तियाग्याताना यामिति । बार रिमपविरगं विगयमले विमलणापगंनु । एमविवि वीरजिपिदं पमाणपसरणं वान्हे ॥११६ कर विपरित गितमा विमानसयुक्तम् । माम्य बननन्द प्रमाणनग का । आगमादय पर्यान कि युनिश्यामनि न या जन पाहु विवग्गकरणं नुम ण निपगम्म माहणं हाह। वानिएं जा रह ना निपवणं मुगट पटमं ॥१६७ पप हि त्रिवर्गकरण मम्प न विधगम्य माधन भवति । वर्गजर यदि उधहि त्रिवर्ग मन्यव प्रथमः ॥ त्रिवर्ग निम्पयनि- पिरोयलपपमाणा गुद पर जो अपा। तवं परयणणामा अज्नपं होई निपगं ॥ १६८॥ निरनयममाण पाय गुम एष य आमा । नर्क सपननामा भयाम भपति हि विनं. ॥ प्रमाणाय प्रयोजनमाह. कम्जे मयलममत् जीयो साहो परगहणेण । घरधु पमापमिदं तदा सं जाण णियण ॥ १६९ ॥ पार्य सकसमर्प जीव. साधपति वस्तुपहन । वसप्रमाणसिद्ध सणासम्जामा नियोन ॥ प्रमाणाय स्वरूपति गदगद पन्धुसहा अविरुद्ध मम्मरूव जंगा। माणेयं पमाणं पचरपरावखए ॥१७०॥ -- गृह्णाति वस्तुस्वभावे अविरुद्धं सम्यारूपं यदानन् । भणितं खल तम्प्रमाणे प्रत्यक्षपरोक्षभेदाम्याम् ।। प्रमाणस्य मेदं कथयति- महसुइ परोक्खणाणं ओहीमण हवद वियलपभवसं । केवलणाणं च तहा अणीवमं सयलपचनसं ॥ १७१ मतिश्रुती परीक्षज्ञान अवधिमनी भवति विकलप्रत्यक्षम् । केवलज्ञान च तथा अनुपम सफलप्रत्यक्षम् ॥ प्रमाणम्य विषयं निरूपयति- वधू पमाणविमयं णयविसयं हवइ वत्युएयंसं । ज दोहि पिण्णयह त मिक्सवे हवे विसयं ॥ १७२ वस्तु प्रमाणविषय नयविषयों मवति यस्यकांशः । यो दाम्यो नितार्थः म निक्षेप भवहिपयः॥ नययोजीनकाक्रममाह-- पागासहावभरियं वत्पु गहिऊण तं पमाणेण । पयंतणामणहं पच्छा णयजुंजणं कुणह ॥ १७३ ।। नानाम्यमायभरितं यस्तु गृहीत्वा तत्प्रमाणेन । एकान्तनाशनाथं पधानयपोजनं कुस्त ।। उसाच गापात्र येणान्यग्मिन्मन्द मरियप्प णियियप्पं पमाणरूर्व जिहि गिदिई । नहघिपया विमगिया सश्यिया मिबियप्पा वि। सवनिर्षिक प्रमागत जिननिर्षियम् । दया नया भरि मगिता मविकसा निस्किरसा मान (६७" और पौवम् मानसमंजु दम्बं गिना फेयलं गाणं । तन्ध पर्यण वि गिणा भूदोभूदो य घट्टमाणा वि॥२॥ काटामयुतं. अभ्य गृहणानि केवल हानम् । दया नयेनापि गृगते भृतोऽभूतथ वर्तमानोऽपि । भरि चोनम्- - मगमहिय सवियप्पं णाणचउचं जिणेहि मिति । सन्निवरीय इपर भागमचाहि णापम्ब ॥ ३ ॥ मन सहित सविकसं ज्ञानचतुष्क जिनः निर्दिष्टम् । तविपरीतमितरत् भागमचक्षुभिर्जातन्यम् ॥ इति प्रमाणाधिकार: अथ नयावरूपमाह- जे पाणीण वियप मुअमेयं परपुअंममंगहणं । तं. इह गयं पउत्तं पाणी पुण तेहि णाणेहिं ॥१७४।। यो हानिन। विकल्पः श्रुतभेदो वस्वशनप्रहणम् । । स इह नपः प्रोक्तो ज्ञानी पुनस्तानः ।। नयप्रयोजन प्रदर्शयति- जमा गयेण ण विणा होरपरस्स मियापपडियनी। तमा सो पायप्यो एपन्तं हतुकामेण ॥१७५॥ परमानयेन न पिना भवति नरस्य स्थावादप्रतिमति । तस्मात्स ज्ञातम्य एकान्त इन्तुक्रमेन ॥
(३८) पाममनाय सालमा जर मदाणमा मम्मगं र नगदगुणांगल। धागो वा एयरमा नह पयम् अयंनी ॥१७॥ या मृदानमादिः मम्मा या मादिगुनिया प्पयो बैंकरमस्ता नयनोऽनकाला ॥ नेकानन बानुग्यमायः सायंच निस्पतीयाह- नच्च विम्मवियप्पं एयवियप्पंण माहए जो हु। नम्म प मिग्झइ वन्यू किह मयन्तं पमादि । तत्व विधविकास कविकल्पन सानोति यो हि । नस्य न सिध्यति वस्तु कथकान्त प्रमाधयति ।। उन चान्यग्मिन्प्रत्ये- पचवर्णामक चित्र तत्र वर्शकग्राहकम् । क्रमाक्रमस्वरूपेण कयं गृह्णाति मो वद ॥१॥ सर्वथैकातरूपेण यदि गनाति वाम्न । भूरिधर्मात्मक वस्तु केन निश्चीयते स्फुटम् ।। स्वार्थाभिटापिणां स्वायत्य मार्गमनुमार्गच दर्शयति- झाणं झाणमासं झाणस्म नहेर मावणा मणिया मोत्तण झाणमासं चेहि पिय संजुओ समणों ॥१॥ ध्यान ध्यानान्यासो ध्यानस्य तथैव भावना भपिता । मुम्वा स्यानाम्यासं दाम्यामपिच संयुतः श्रमशः ॥ माणस्स मावणाविय हु सो आराहओ हवे मि जो प विजाणइ वरघुपमाणणयणिच्छयं किच्चा
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(७०) गिच्छयसाहणहऊ पन्जयदबत्थिय मुणह ।। १८३ निश्चयव्यवहारनयो मूलमैदौ मयानां सर्वेमाम् । निश्चयसाधनहेन पर्यायदन्यार्थिको मन्यापम् ।। दो चेवय मूलणया भणिया दव्वत्यि पज्जयत्थिगता अण्णे असंखसंसा ते तब्भया मुणेयव्वा ॥ १८॥ ही चव मननयों भाणतो द्रव्यार्थपर्ययार्थगती । अन्येऽसख्यसंख्यास्ते तद्भेदा मन्तव्याः ॥ समनयाँस्त्रीनुपनयाँश्चाह- णइगम संगह ववहा र तह य रिउसुतसअमिल्दा। एवंभूदो णय गयणेया नह उवणया तिणि ॥१८५॥ नंगमः संग्रहो व्यवहारस्तथाच अनुसूखशम्दसमभिन्दाः । एवंभूतो नय नया ज्ञेयास्तपोपनपात्रपः ॥ ठ्यार्थिफपर्यायाधिकनैगमादिसप्तनयानां च यथासम्म भेदानाह-~ दबत्या दहमयं छम्ममं पम्जयत्धियं गये । निरिई घ गइगम तह दुपिई पुण संगई सत्य ॥१८६ ववहारं रिउमुग दुषियप्पं सेममा एफेका । उपाइह पपमेया उपणपभेमा विपभणाम॥१८॥ दम्यार्षिको दशमेदः पदः पांगानिको नेपः । विविध नैगमनमा रिविधः पुन' म्याहारगयी शिविर नपमेशा - mar
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७. पिच्छयसाहणहेऊ पज्जयदबत्थिय मुगह ।। १८३। निश्चयव्ययहारनयाँ मूलमैदौ नयानो सर्वेषाम् । निश्चयसाधनहेतू पर्यायव्याधिको मन्यापम् ॥ दो चैश्य मूलणया भणिया दग्यत्यि पञ्जयत्यिगा। अण्णे असंखसंखा ते तम्मेया मुणेयम्या ।। १८४ ॥ दो चैव मूलनयो मणिती द्रन्यापर्यपार्धगती। अन्येऽसत्यतत्यारते सद्भेदा मन्तम्याः ।। सपनाँस्त्रीनुपनयाँचाह- गइगम संगह यवहा र तह य रिउसुत्तमाअभिरूदा । एवंभूदो गप गयणेया नह उवणया तिणि ॥१८५७ नेगमः समहो व्यवहारस्तथाच ऋशुसूमशम्दसमभिरुताः । पवभूतो नय नया जयारतधोपनमात्रयः । द्रव्याधिपर्यायाफिनेगमादिमानयाना प यथासाभर' भेदानाह- दव्यत्यो दहमय उम्मेयं परजयस्थिय गये । निवि व गगम मह दुषिई पण मंगई रथ ॥१८६ यवहार रिउगु पिपप्प मेगमार पोका। उत्ताह मया उपणपमेया मिपमाग१८७॥ हम्पाधिको भेदः परमेशा पर्यापार्षिको सेप यि नैगमन धिन मे || मागधी nिtine माहा नपायदानी प्रभाव
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(७२) कमेगो मप्यगतं जी यो गृह्णाति सिद्भसंकाशं । भण्यते स शुदनयः खलु कोपाधिनिरपेक्षः।। ससाग्राहकशुद्धद्रव्यार्थिकनय सशति- उत्पादवयं गउण किच्चा जो गहद केवला सत्ता। भण्णइ सो मुद्धण इह सत्तागाहिओ समये ।।१९२॥ उरगदन्यया गाणा कृत्वा यो गृह्णाति केरला सत्ताम् । भग्यते स शुद्धनपः इह सत्ताग्राहकः समये ।। भेदविकलनिरपेक्षगद्रव्यार्थिफनय लक्षयति- गुणगुणिआइचउर्फ अत्यै जो शो करेइ खल भेयं । मुझो सो दबन्यो भेयरियप्पेण गिरवेक्सो ॥१९३॥ गुणगुण्यादिचके यो न करोति खल भेदं । गुद स द्रव्यार्षिक: भंदविकल्पैन निरपेक्षः ॥ कापाधिमापनमशुद्धद्रव्याधिकनयं लभयति-- मात्र मरायमादी सव्यं जीवम्मि जो दुपदि । गोहु अमुद्वा उत्तो कम्मागोवाहिसायरसो ॥१९१।। भायारागादीन्मयी-जीयै यस्तु जस्पति । महि अशुद्ध उस कर्मणामुपाधिसापेक्ष ॥ उत्पादयंयमापधारावाण्याधिकनयं मयति- उप्पादयपविमिरमा मना गहिऊण भणइ तिदयन । दरम्म एयममये जो गा अगदी पीभो।।१९।। टपादन्यमियो सदा गृहीरा मगति तिपयम् । प्रयाकममय य: सदिसपदो रिसीयः ।। -- भेदकल्पनामाभाशुद्रव्यार्थिकनयं लश्यति-- मेए मदि सम्बन्ध गुणगुणियाइहि कुणादि जो दच । सो वि असुदो दिडो सहिओ मंदकप्पंण ।।१९६॥ मैदे मनि सम्बन्धं गुणगुण्यादिभिः करोति यो द्रव्ये । मोयगुतो यः महितः स मेदकस्यनया ।। अन्वयद्रव्याधिषनय लमर्याप्त-- निम्नसमहावार्ण अण्णयरूण मपदयहिं । विवहावणाहि जो मो अण्पपदम्पन्थिी भपिदो॥११७ निशेषरबमावाना अन्वयरूपेण सर्वदन्यः । विभावनाभिः यः मोऽन्नपद्रन्याधिको भगित.॥ ग्वदग्यादिमाहरूपरराज्यादिप्रादकद्रायाधिकनयो लभपति- महपादिचउप मंतं दर्ष मुगिमाए हो। णिपदवादिगु गाही मो इसरो होइ पिपरीओ महत्यादिचगुफ मदय पत्र गृपानि पो हि । निजामादिषु माहीस इतरो भवनि विपरीत.।। परमभाषाष्ट्रिायानयं रथयनि- गंणा दरमहावं अमुगुनोत्रयारपरिपत्त । मो परमभाषगाही पापणी मिद्धिकामेण १॥ गृहमान प्रभाव भागधाररियनन । स परमभावमाहीतन्य मिरिकामेन ॥
(७४) सम्प्रति पर्यायाथिकस्य पड्मेदान् विवृणोति वन तावदनादिनि- स्यपर्यायायिक लक्षयति- अक्किहिमा अणिहणा ससिमराईण पजपा गाही! जो सो अणाइणिहणो जिणमणियो पज्जयत्थिगओ ॥२०॥ '. मकृविमाननिधनान् शशिसूरादीनां पर्ययान् माही । यः सोऽनादिनिधनो जिनमणितः पर्ययार्थिकः ।। सादिनित्यपर्यायाकिं लशयति- कम्मसयादुप्पणो अविणासी जोर कारणामा । इदमेवमुच्चरंतो भण्णइ सो साइगिच्च णओ ॥२०११ पर्मभपात्पन्नोऽविनाशी यो हि कारणाभावे । इदमेवमुचरन् मण्यते स सादिनित्यनयः ॥ अनित्यपद्धपर्यायाधिकनयं पति- सना अमुवसरूचे उप्पादक्य हि गिणए जो हु। मोतु सहारणिच्चोगाही एल मुदपजाओ॥२०२ ममाऽमुख्यरूपे टपादम्यपौ हि गृह्णाति यो दि । महि स्वभावानियो प्राही सल शुरूपपीयम् ।। अनित्यासुद्धपर्यायाचिन सक्षपति- जो गहर एकममपे उप्पादययपुगसनु ! मो सम्माषणिचो अगरओ पन्जयधिणो - २०॥ में मध्यापकसमो उपादमधुर वर्मपुनम् ।
प ममावाऽनेन्योऽशुद्धः पर्यायाफिनयः ॥ कोपाधिनिरपंभानित्यागपर्यायाफिनयं सक्षपति देहणं परजाया मुसा मिण भणइ सारित्या । जो सो अभियमुद्रो परजयगाही हवे म पो ॥२०४ देहिना पीयान गुमान् निशानां पति महमान् । पसोऽनिराशुद्ध परंपमाही भवम नर ॥ कमपाधिमापेक्षानिग्यापर्यापार्थिकन लादि- मगर अणिच्चामुडा चउगाजीयाग पञ्जया जी होइ विमापअधिरची अमुद्धा पजन्धिणी २०१५ मजयनित्यापुचतुर्गतिजीयानां पर्यापायो । भाति विभाषानियोऽधुरः पापार्मिफनर । मामान्यनोसागमनयत्रिमदानणपुरमामुदादि तत्र भावसंगमनयमार. नियमअफिरिया याणकालं तुममायग् । न भूदमागमपयं सहज दिणे पिपार ॥२०॥ भितामिपापा दर्तमानकरी पसमापनम् । स भूतनेगमनको पाप दिने निरे । भाविनायगी- पिपजमिर पजपदि भारिपन्य पिका अपरपेशा पर्व मनामी मानिरगिरो - (७६) निष्पनमिव प्रजापति माविपदार्थ नरोऽनिधनम् । भप्रस्थे पथा प्रस्थो मण्यते स भाविनगम इति नयः॥ वर्तमाननगमनयमुदाहरति-- पारद्वा जा किरिया पयणविहाणादि कहा जो सिधा लोएमु पुन्छमाणो भण्णइ तं वट्टमाणणयं ॥२०॥ प्रारम्धी यो किया पचनरिधानादि कथयति यः मिदा । रोकेषु पृष्ठयमानो भव्यते स वर्तमाननयः ।। संग्रहनयं लशयित्वा भेदो पति- अराप्परमविरोदे मयं अथिनि मुद्भमंगहणे । दोर तमेव अमुद इगिजाइयिमेमगहणण ॥२०९॥ अपर परमपिरोये सर्वमस्तीनि मुद्रममह । भवति स एवाशुदः एकजातिविशेषहणेन ॥ व्यवहारनयं मयित्वा भेदा मूर्यात- जो मंगहण गहियं भयइ अन्य अगुद्ध मुद्धं या ।। मो वाहारो दुम्हिी अगुदगुदत्यमेदकरो ॥२१०॥ प महेश गीत भिननि अर्थममुद्ध शुष्ट या । मोतियोगुदगुदानकर ॥ सूचना समयावा भी गंगगय प्रपमरगुताहरति जो यममयवही गद्गद पुरगपजाती। मॉरिशस गुमो मयं गई जागणिय ॥ २.११॥ ५ कम गति से भावापन् । मनस सो. शम्शे पा॥ 3
(७)
द्वितीयभेदमुदाहरति..
मणुयाइयपग्माओ मणुमोति मगहिदीन बहनो।
जो मण तायकाले सो धूलो होइ रिउमुना ॥२१२॥
मनुजादिपर्याय मनुष्य इति अधिनिपु व मान ।
पो भगति तारकाल स स्थूलो भवनि अजमूत्र ॥
मदनय लक्षयनि गामापन -
जो पहप प मण्णा एयन्ध भिण्णालगरण ।
मो सरणओ भणियाणा पुंमाइआण जहा ॥२१३॥
अहा मिटे मई कीरइ किपि अन्धवहरणं ।
मा राट मरे विसओ देवामहेण जहदेवा ।। २१ ॥
यो पर्नन न मन्यते एका मिरिहादीनाम् ।
स सदनयो भगित ऐप पुसादिवाना था।
अपन
मिकिपते पकिमरिमर्थम्पारणम् ।
स
एवषय देशमन यथा देव ।।
समभिस्दना सक्षपति-
मारूदो अन्यो अग्यारूदो तर पुप मा।
भपा समभिदी जहद दरो भयो ॥२॥५॥
मारोतर पुन र ।
मागमभिः पुग्दर rr |
एवंभूतन -
जब कम्मे देसी मपरकारादो।
तर पापमोसोम पो॥१६॥
पति कर्मी मनायवनकायमंशतः। सन् मनु नामयुत गमलो भयम नय ॥ पता नेगमादिषु नयं दध्यार्षिक पाया अपघात शब्दम्यान या विभजन पठमनिया दयल्या पन्जयगाही य पर जे भमिया । नं चः अन्यपहाणा महपहाणा दुनिम्णियरा ॥२१० प्रशमत्रिका द्रव्यार्थिकाः पर्यायग्राहिणश्चतरे ये माणिताः । ने चत्वार्थप्रधानाः शन्दप्रधाना हि अय इतरे । पण्णवण माविमूद अस्य इच्छदि य घट्टणं जो सी। मधेसि च णयाणं उरि मलु संपलाइज्जा ।।२१८॥ प्रजापन भाविभूतेथें इन्छति च वर्तनं यः सः । सर्वेषां च नयानामुपरि खलु सम्प्रलोक्यः ॥ एततमयमन्तभावपात- पण्णवण भाविभूदे अत्थे जो सो हु मैदपज्जाओ! अह तं एवंभूदा समयदो मुणह अत्येसु २१९॥ प्रशपने भाविभूतेर्थे यः स हि मेदपर्यायः । स एवम्भूतः संभयतो मन्यघमर्येषु ॥ कारकसम्मावदो य दव्वेमु।: भेयं कुणयं सन्भूयसुद्धियरो ॥२२०॥ पयायव्य कारकसद्धावतच द्रव्येषु । । ज्ञात्वा भेदं क्रियते सद्भूतशुद्धिकरः ।। इनाणं सु पएसा पहुगा ववहारदों य एषेण । । T
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जह मुनं जाणं तो किं खलिओ हु मुत्तण ॥२२७१ (८०) दचे गुणपजाया गुण दवियापज्जया गया ॥२२४॥ द्रव्यगुणपर्यायाणां उपचारस्तेषां भवति तत्रैव । दव्ये गुणपर्याया गुणे द्रव्यपर्यया याः ॥ पजाए दव्यगुणा उपयरियं वा हु बंधसंजुत्ता। संबंधो संसिलसो णाणीणं णाणणेयमादीहिं ।।२२५॥ पर्याये द्रव्यगुणा उपचरितनिव हि बंधसंयुक्ताः । संबंध सलप. ज्ञानिना ज्ञान यादिभिः ।। स्वजातीवपर्याये स्वजातिपयांयारोपणोऽमद्भवन्यवहारः दण पडिरिच मवदि हुतं चैव एस पज्जायो । सज्जाद अमभूओ उवयरिशोणिययजाइपज्जाओ ।।२२६ दृष्ट्वा प्रतिक्विं भवति हिं स चैव पर्यायः । रखजात्यसबूतोपचरितो निजजातिपर्यायः ॥ विजानिगुणे विज्ञातिगुणारोपणोसतम्यवहारः मुच इह महणाणं मुत्तिमदव्येण जण्णिओ जमा । मतमिह मतिज्ञानं मूर्निमव्येण जनित यस्मात् । । पदि नहि मनं ज्ञानं तर्हि किं स्वलितं मूतेन ॥ स्वजातिविजानिद्रव्ये स्वजातिविजातिगुणारोपणं असन्त नयं जीवमनीयं तं पिय गाणं सु तस्स विसपादो। डा मणह एरिसरथं सो याहारो असम्भूदो ॥२२६१,
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उपचारः (८२) उवयारो पजाए पुग्गलदस्वस्स भगइ वहारो ॥३३० दृष्ट्या स्थूलस्कंधे पदलदम्यनिति जस्यते लोके । पर्याय पुद्रटद्रव्यस्य भणति व्यवहारः॥ स्यजातिपर्याय स्वजातिगुणारोपणोसतम्ययारः- दण देठाणे वणतो होइ उत्तमं रूवं । गुणउययारो मणिओ पज्जाए त्यि संदही ॥२३॥ दृष्ट्या देहरयानं वर्ण्यमान भवत्युचम रूपम् । गुणोपचारो भणित: पर्याये नास्ति सन्देहः ॥ सम्पत्य पम्जयादो संवा मणि जिणेहि ववहारो। जस्स प या संतो हेऊ दोगपि तस्स कुदो ॥२३२ सर्वत्र पर्यायतोऽस्ति मपितो जिनयंत्रहारः । पस्य न मवेसावं हेतुयोरपि तस्य कुतः ।। चउगह इह मारो तस्म प है मुहागुहं कम्म। जा सह मिच्छा किह सो संसारो संसमिर तस्समर •- ॥२३ पद्गनिरिह ममाग्नम्प च हेतुः गुमाशुभ कर्म । परित्या प्रिया कायम रासा: साक्ष्य सतसमये । नादियादिदेहा जीया यरहारदीय जिपदिया। हिमादिमा पार्प मायपि पियारो॥२३॥ दक्षिा पवारता बिनाया।
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(८.) कथं निभितिनं अन्येषां भपति नियमेन।। असनव्यवहारः- उबयारा उवयारं सच्चासच्चेसु उहयअत्यमु । सज्जाइइयरीमस्से उवयरिओ कुणइ ववहारी (२४०१ उपचारादपचारं मत्यासत्येपूमयार्थेषु । सजातीतरमिश्रेषु टपचरितः करोति व्यवहारः ॥ देसवई देसत्या अत्यवाणिजो तहेव जपतो । मे देस मे दब सच्चासच्चपि उमयत्य ॥२४॥ देशपतिः देशस्थः अर्थपतिर्यः तथैव जस्पन् । मम देशो मम द्रव्य सत्यासत्यमपि उभयार्थम् ॥ पुत्ताइबंधुवग्गं अहं च मम संपदादि जप्पंतो। उक्यारासम्भूओ सजाइदव्येसु णायब्बो ॥ २१२ ॥ पुत्रादिवधुवर्गोह च मम सम्पदादि जपन् । उपचारासद्भूतः स्वजातिद्रव्येषु ज्ञातव्यः । आहरणहेमरयणायच्छादीया ममेति जप्पंतो । उवयारियअसम्भूओ विजाइदव्येसु णायव्वौ ॥२४॥ आभरणहेमरत्नवस्त्रादि ममेति जल्पन । उपचरितासद्भूतो विजातिद्रव्येषु ज्ञातव्यः । देसत्थरज्जदुग्गं मिस्स अण्णं च भणइ मम दव्वं । उहपत्ये उपयरिदो होइ असम्भूयववहारो ॥ २४४ ॥ देशार्थराज्यदुर्गाणि मिश्रमन्यांच भणति मम द्रव्यम् । उभयाथै उपचरितो भवति भसंदूतव्यवहारः ।।
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ग्गभावानों यया ममानिध्याम्पं सापेभताप समाह- मियसावेवसा सम्मा मिन्छारूवातहि मिग्वेता। नमा सियसदादो विसयं दोगपि पायलं ॥२१॥ स्पात्मापेक्षाः सम्यक्षः मिष्याम्पा हित निरपेशाः । तस्मास्याप्टनाविषयो दूयोरपि हातयः ।। अवरोप्परसायकलं पयविसर्य अह पमाणविसर्ग वा। तं सावरखं व मिरखं ताण विवरीयं ॥२५० ॥ अपरापरमाक्षो नयविषयोय प्रमाणविषयो वा । तत्मापेक्ष तत्त्व निरपेशं तयोधिपरीतन् । स्थाद्वादलामधनम्य स्वरूप निरूपयति- णियमणिसेहणसीलो णिपादणादो य बाहु समिद्धो। सो सियसदो मणियो जो सावरखं पसाहदि ॥२५१ ।। नियमनिषेधनशीटो निपातनाम यः खलु सिद्धः । स स्याछन्दो भणितः यः सापेक्ष प्रसाधयति ।। उद चान्मस्भिन्मन्ये, निसज्ञिकोऽयं स्याष्ठन्दो युक्तोऽनेकान्तसाधकः । गतनात्समुद्तो विरोधष्वंसको मतः ॥१॥ mein दिल्यपनिसमुद्भवः । अत एव चिमझायं सर्व ः परिभाषितः ॥२॥ सिदमंत्रो यया टोके एकोऽनेकार्यदायकः । सामन्दोऽपि तथा झेय एकोनेकार्थसाधकः ॥३॥ ३ - . ह
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त्याने स्न्यं चाद- -- मुणयपमाणा जुनी गहु जुगिविवज्जियं तवं ॥२५॥ उच्चं पि हेयमियरं हेयं खलु मणिय ताण परदद। ना मिस पपणियान जागा दचे दुपयगी अलीन मास्युपमाकयं तर पुननियन् । मागमा ननिरपेक्ष जानातु दन्येषु दुगंयभंगी । मनमानीपियाणायां यं मनरपपाय धर्मपर्मिी र एमणिरुद्ध इसरी पडियामी अगवरह मम्भावो । सर्वमिंच महावे कायव्या होइ तह मंगी ॥ २५७ ।। एकनिर इतर प्रतिपक्षोऽनुवर्तते स्वभावः । मगच सभाये कतंत्र्या मयतया भनी ॥ घमी धम्मसहायो घम्मा पुण एकएकनागिहा । अपरोप्परं विमिण्णा गायल्या गउपमुखमावणा२५८ धनी वर्मस्व मायः धर्माः पुनरफेकतान्निष्ट्राः । भपरापरं विभिन्नाः ज्ञातव्या गौणमुस्यभावेन ॥ मापेभतासापकमम्बन्धं युक्तिस्वरूपं चाह- मियजुत्तो णयणिवही दब्बसहावं मणेइ इह तत्यं । स्यायुक्तो नपनिवहाँ द्रव्यस्वभावो भणति इह तथ्यम् । मुनपप्रमाणा युक्तिनहि युक्तिविवर्जितं तत्वन् । तत्वाय हेयोपादेयत्वमाह-
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गाणिसरीरं तिविहं चुद चर्च चाविदं चेति ॥२७॥ आगमणोआगमदो तहेव भावो वि होदि दवं वा। तगुणएई शादा फेवलणाणीह परिणदो भणिओ७ (९२) इयरा इयरा मगिया टवणा अग्हिो य पापमोर साकारतरा साना कृषिमतराहविना प्रपत्र इतरा इसरा मणिता स्थापनाऽहंश्च सातव्यः । द्रव्यनिशेपम्य भेदप्रमेदान्मांदाहरणं निरूपयति-- दव्यं सु होइ दुविहं आगमणांआगमेण जह भाग । अरहंतसत्यजाणो अणजुतो दब्ब-अरिहंतो पर द्रव्यं खलु मवति द्विविध आगमनोमागमाम्यां यथा मग अर्हग्यास्त्रज्ञायकोऽन्ययुक्तो मूल्याईन् ।। पोआगमं पि तिविहं देहं गाणिस्स भावि कम्मच नोआगमोऽपि त्रिविधः देहो ज्ञानिनो मावि कर्म च ! ज्ञानिशरीरं त्रिविधं च्युतं त्यक्त ग्यावितं चेति ।। मावनिक्षेपभेदमुदाहरति- अरहंतसत्यजाणो आगमभावो हु अरहंतो ॥२७६॥ बागमनोआगमतस्तथव मावोऽपि भवति द्रव्यमित्र ।' अर्हन्छास्त्रज्ञायकः आगममावो हि महन् ।। वग्गुणए य परिणदो गोआगममाव होइ अरहनो। तगुणैश्च परिणतो नोआगममावो भवत्यर्हन् । तगादा केवलज्ञानी हि परिणतो भणितः । -- मरममाण हाचा भाषपन्तिदेतत्वम् । मार गुणपज्जपर्वत दल मणियं खु अण्णसूरीहिं । पा विगं तस्स य तेहि पिय एरिस भणियं ॥२७८॥ अप गुणपर्ययवद् दन्यं भगितं खड भन्यसूरिभिः । पापं तस्य च तैरपि पेश भणितम् ॥ पोइस मंपियन भिण्य काण एमु णिकसेवं । हालेर दमाई मणियं काऊगमिह मुग ॥२७९॥ मोर मगितम्य मिल वा एषु निक्षेपम् । सम्मत दर्शनार्थ भणित कृलेह सूराम ॥ निपाध्ये एपान्तर्भावयति समु जाण गामं तईव ठवणा हु धूलरिउमुन । एवं रिस उवया माव पज्जायमण्यगर्य ॥२८०॥ देश जानीहि नाम तव स्थापना हि स्थल जमूत्र । सिमर पोपचारे भाष पायमध्यगतम् ।। निक्षपादिज्ञान प्रयोजनमाषष्ट- पिरमेव पर पमाणं पादर्ण भावयति जे नाच । ते वपनयमग्गे लहति लगा हु तत्पर्य तला२८१॥ सानलमा रमते माहितप साग" गुपपरवाण समय सदावलिपपेर पद पमाणे का। शादि अदि मपिरप दरमहा सुहादि॥२८२॥ जमावादी समानिस मा जागतिक सिR ERRE. ए पुद५॥ नि . r दुम्मीग्णन पोतरितं सत् यथा तीरं नष्टम् । श्रीदेवमनमुनिना तथा नयचक्रं पुनारचितम्।। इति नयचक्रं समानं श्रीमद्देवसेनविरचिता आलापपद्धतिः।। गुणानां विस्तरं वक्ष्ये समावानां वय च । पर्यायाणां विशेषग नवा वारं जिनधरम् ॥१॥ भालापपद्धतिःचनरचनानुक्रमेण नपचक्रस्पोपरि उप्यो पकिमर्थम् ! द्रव्यलक्षणतिय समावसि पयंत्र । जानि ! जीरपुष्टधर्माध काशकारदन्यानि । सद्दपला उत्पादमपीन्ययुने सत् । इति प्रसारिकारः । क्षणानि फानि ! अस्ति, यस्तु, प, प्रमे मारुटगुर्च (१), प्रदेशल (२), चेतमायमचेतनत्व, विम दन्माणां दा सामान्पगुगाः । प्रत्येकमायो सर्वे.म् । [एकदमी भयो गुणा माताजीदमे भयेशनार्ष मंघ नास्ति, पुलदारे अंतन इममूर्तच मास्ति, धर्माधर कासदमेतु जना Fin प नास्ति । ९ मिरिगुण भयै भो गुगाः प्रकटने भी 1] हनदर्शनमुवी ही रामगधना गीहनु र १वमा भागोरसमा परमार भगुरम२३ विभानि परमाणुनाम् ।। पyaks पकप्रदेशमागयात् अत एर यमोशरवस्यमायाभायेषि पंचा: नवनिरिंतु तत्र उपचरितस्यमायोमिनिकियने तदपेक्षया पंचम ५ निभाषा परिपता ध्यपहारनया पांगरिया यः(१), मूर्तस्वभावः [२], अमर्तस्वभावः, एकप्रदेशस्वभावः, भनेकप्रदेशस्तभावः, विभावस्वभावः, शुद्धस्वभावः, अशुद्धस्यभागः, उपचरितस्वभावः, एते द्रव्याणां दश विशेषस्वभावाः (३)। जीवपुद्गलयोरेकविंशतिः-चेतनस्वभावः, मूर्तस्वभारः, विभावस्य. भायः, एकप्रदेशस्त्रभ'यः, अशुद्धसभावः , एतैः पञ्चभिः स्वभावे- पिना धर्मादित्रयाणां पोडश स्वभावाः सन्ति । तत्र बहुप्रदेश विना कालस्य पादश स्वभावाः (४)। एकविंशतिभाषाः स्युजीवपुद्गलयोमताः । धर्मादीनां पोडश स्युः काले पञ्चदश स्मृताः॥३॥ से युती ज्ञेयाः ! प्रमाणनयथियक्षातः । सम्पज्ञानं प्रमाणम् । तद् द्वधा प्रत्यक्षेतरभेदात् । अवधिमनःपर्ययायेकदेशप्रसक्षौ । फाउं सफलप्रत्यक्षं । मतिश्रुते परोक्षे । प्रमाणयकं । तदययवा नपाः । नयभेदा उम्यन्ते,-- पिच्छययवहारणया (५) मूलमभेयाण ताण सव्याणं । पिच्छपसाहणदेओ दययपज्जत्थिया मुणह ॥४॥ द्रव्याधिकः, पर्यायार्थिकः, नैगम , रामहः, ध्यवहारः, 3 । जीयस्या यमनतव्ययहारेणाचेतनस्यमायः । २ जीवरमाया त्ययहोरण मनस्यभायः। ३ तःकालपयंयामात यागु भायोनिधीयरी" ram
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(१३८) अथ पर्यायाधिकस्य पद भेदा उच्यन्ते,- मनादिनित्यपर्यायार्थिको यथा-पुदररर्यायो नित्यो मेगा सादिनित्यपर्यायाधिको यथा-सिद्धपर्यायो नित्यः । सत्तागीम नोत्पादव्ययप्राहकस्वभावो नित्याशुद्धपर्यायार्थिको यपा-स समयं प्रति पर्याया विनाशिनः । सत्तासापेक्षस्वमायो नि शुद्धपर्यायार्थको यथा--एकस्मिन् सम्ये प्रयामकः (१) पीयः । कर्मोपाधिनिरपेक्षस्वभावो नित्यशुद्धपर्यायाथिको । सिद्धपर्यायसदृशाः शुद्धाः ससारिणां पर्यायाः । कर्मोणधिमा क्षस्वभावोऽनित्यागुद्रपर्यायार्थिको यथा--संसारिणामपत्तिम स्तः । इति पर्यायार्थिकस्य पद् भेदाः । नैगमस्त्रेधा मतमाविवर्तमानकालभेदात् । अतीते वर्तमाना पण या स भूतनगमो यथा-मद्य दीपोसवदिन श्रीपदमा स्वामी मोक्षं गतः । भाविनि मृतवत्कपन पत्र स भारत गमो यथा-महन् सिद्ध एव । कर्तुमारधीशनिश्पमानिए। वातु नियमाकथ्यते पत्र स वर्गमाननगमो यपा-मोदनः ५ प्यते । इति नेगमग्रेधा। मंग्रदो विविधः । सामान्यहो पा-सगियानी र रम्परमविरोधीनि । विशेषमंहो यथा-सर्व जीवाः परमी गिनः । इति संग्रहोऽपि दिया। पाहारोडीया । सामान्यपहभेदको महारो पर- कायम विनाय उचलपीनादी, Mi MRI
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(१४०) यथा-देशराज्यदुर्गादि मम । इत्युपचरितामन्तव्यवहारप्रेधा । सहमाया गुणाः (१), ऋमयर्तिनः पर्यायाः। गुज्यते पृथ: यते द्रव्यं द्रव्यान्तरायेस्ते गुगाः । अस्तीत्येतस्य भाषोस्तिवंस स्वम् । वस्तुनो मायो वस्तुगम् , मामान्यविशंपामक वस्तु । - स्वभावो दशवम् । निजनिजप्रदेशमम्हेरवण्डाया स्वभावरिमा पर्यायान् दधति (२) द्रोयनि अदुवादिति द्रव्यम् । सहयल- णम् । सीदति स्वकीयान् गुणपर्याय न न्यानोनि सत् । दम यौन्ययुक्त सत् । प्रमेयस्य माय प्रमेयम् । प्रमाणेन स्वरसम परि(३)न्छेय प्रमेयम् । अगुरुल्योगायोऽगलघु यम् । सूरमा योग चरा. प्रतिक्षा गर्नमाना आगमप्रमाणादभ्युपगम्या भगुरुदया सूक्ष्म जिनोदिनं तचं हेतुमिगर हन्यते । आगामिदं तु न ग्राम नान्यपारादिनी जिनाः॥५॥ तर मात्र प्रदेश व क्षार अविनागपुर परम पुगार (१) । चननाम भाग्यनरम् (५)चैतन्यमनुमानम् । चतन्त्रमनुभूतिः स्यान् गा किपारूतमे।। झिया मनापाकापचिता पर्तते पुरम् ॥६॥ अपेतना मात्र चिकन म मननुमानम् | Ki (६) गदिमत्रम् । अपि माय भू.raat गुमनां नि । सभावमाया पानि पानी १ भारत माता योग YARI Ania देनमारम् | : merrirt “
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(११२) दुणयकांतमारूढा भावानां स्वार्थिका हिते। स्वार्थिकाश्च विपर्यस्ताः सकलंका नया यतः"|८|| तत्कय ? तथाहि सर्वथैकातेन सद्रूपस्य न नियतार्थव्यवस्था ११) संकरादिदोषत्वात् , तथा सदृपस्य सकटशून्यताप्रसंगात् . नि. यस्यैकरूपत्वादेकरूपस्यार्थक्रियाकारित्याभावः .अर्थक्रियाकारिवा- भावे द्रव्यस्याप्यमावः । अनिसपक्षेपि अनित्यरूपत्वादर्थक्रियाका- रित्वाभावः (२), अर्थक्रियाकारित्वामावे द्रव्यस्याप्यमावः । एकस्व- रूपस्यैकान्तेन विशेषामाव. सर्वथैकरूपत्वात, विशेषाभावे सामान्य स्याप्यभावः । "निर्विशेष हि सामान्यं भवेत्सरविषाणयत् । सामान्यरहितत्वाच विशेषस्तद्वदेव हि" ॥९॥ इति क्षेपः । भनेकपक्षेपि तथा द्रव्याभावो निराधारत्वात् आधाराधेयामा- वाच । मेदपक्षेपि विशेषस्त्रमावानां निराधारत्वादर्थक्रियाकारित्या. भावः, अर्थक्रियाकारिखामावे द्रम्पस्याप्यभावः । अमेदपक्षेपि सर्वेषामेकत्वम्। सर्वेषामेकत्वे क्रिणकारित्वाभावः ।अर्थक्रियाकारि. स्वाभावे द्रव्यस्याप्यभावः । मन्यस्यैकतिन पारिणामिकत्यात् द्रभ्यस दव्यांतरवप्रसंगात् संकरादिदोषसमवात् । संकरव्यक्तिरविरो. धवैयधिकरण्यानवस्यासंशयाप्रतिपरयभायाधेति । सर्वयाऽभव्य- कान्तेऽपि तथा शून्यताप्रसङ्गात् स्वभावस्वरूपस्यैकान्त समारा- भायः । विमापऽपि मोक्षस्याप्यभावः । सर्वथा चैतन्यमयुक्त १ यथा सिंदो माणवकः (माणको मार्जारः) २ नित्ययत्वादिया . - पाद: ॥
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(१४१) वभायः । उत्पादत्र्ययगौणवेन सत्ताग्राहकण नियस्वभावः केनचिपर्यायार्थिकेनानिन्यम्बमावः । भेदकल्पनानिरपेक्षणकस्त्रमा वः । अन्वयद्रव्यार्थिनकस्थाप्यने स्वभावत्यन् | सद्भतव्यव- हारेण गुगगुण्मादिमिर्भेदस्वभावः । मैदकल्पनानिरपेक्षण गुणगु ण्यादिभिरभेदस्वभावः । परममावग्राहकेण भव्यामव्यपारिणानिक- स्वभावः । शुद्धाशुद्धपरममावग्राहकण [१] चेतनस्वभावो जीवस्य असद्धृतव्यवहारण कर्मनोकर्म गोरपि चेतनस्वभावः । परममावणा- हकेण कर्मनोकर्मणोरचेतनस्वभावः ।। जीरस्यायसनव्यवहारणाचेतनस्वभावः । परमभावप्राहकेण फर्मनोकर्मणोतररभावः । जीवस्याप्यसद्भतव्यवहारण मूर्तस्वभारः परममावग्राहकेण पद विहाय इतरेपाममूर्तस्वभाव. [२] 1 पुगस्यो- पचारादेवास्यन्ते वम् । परममावग्रहण कालपुद्गलाश्नामे क. प्रदेशस्यम, वन्यम् । मेदकल्पनानिरपेक्षेमेतरेषा धर्म,धकारीया- नां चाखण्ड कादेप्रदेशव । भेदकल्पनामापेक्षेण चीनगि नानाप्रदेश बनायव । पुद्गलागोम्पचारतो नानापदेशवं न प कालापो. निग्धरूभन्नाभावात् । अयाचागोरमूनकाला। विशतितमो भायो न स्यात् । परोक्षप्रमाण पेक्षा मद्भुतपयहा- रेगा गुराचारण.मूनिध । गलाय गुनामुदायिकन निभाय म्यगाव या (३) । गुददया िकन सायनातः । अगदम्या विनाशुद्ध-बमायः । म 'गप्पयोरेगोरचरितम्बमाः || "द्रव्यागा तु यथारूपं तल्लोकपि व्यवस्थितम् । १ नन। २ जीवामीयमाणानाम् ३ नोवद्रयाः
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एवमित्युक्त कार्य: क्रियाप्रधानन्वेनेति विशेषणम् २ दगदो। पयोग नाप्रयोजनमन्वनि मादिनिय पर्यायाधिका । मुद. पर्याय एवार्थः प्रपोजनमस्पति शुदपर्यायाधिकः । अशुद्धपर्याय एवार्यः प्रयोजनमस्यन्यगुदागंयाधिकः । होत पयायाधिकस्य प्युयनिः । न गनीति निगो विकमात्र भयो नैगमः । अं. दरूपतया वनुजातं संगृह्गातीति संग्रहः । मंग्रहेण गृहोनार्थ- स्य नेदरूपतया वन्तु येन न्यवाहियत इति व्यवहारः । ऋतु प्रांड- लं स्त्रयतौति ऋजुत्रः । शम्दात् व्याकरणान् प्रकृतिग्रन्ययाधरेग शन्दनयः । परसरणाभिमुद्राः सममिताः। शन्दमेदेऽप्यर्थभेदो नास्ति । यथा शक इंद्र: पुरंदर इत्यादयः समभिरुडाः । एत्र क्रियाप्रधानत्वेन . भूयत इत्येवभूतः । गुदा- शुद्धनिश्चया द्रव्याधिकस्य मैदौ । ममेदानुपचारतया बन निश्चीयत इति निश्चयः । मंदोपचारतया वस्तु व्यवहियत इति म्यवहारः । गुणगुगिनोः सज्ञादिमेदात् मैदक. सतय्यवहार. भन्यत्र (२) प्रसिद्धस्य धर्मस्या [३] न्यत्र ( १ ) समारोपणमस तव्यबहारः । असद्भूतव्यवहार एवोपचारः, उपचारादप्युाचारं य: करोति स उपचरितासद्भुतब्यवहारः। गुणगुणिनो: पर्यायपविणोः स्वमावस्वमाविनोः कारककारकिणोदः सद्भूतव्यवहारस्पार्थः । दव्ये द्रव्योपचारः, पर्याये पर्यायोपचारः, गण गुणोपचारः, द्रव्ये २ स्वभावस्य ४ जीवादो।
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(१४८ ) मागे यया-जीप मेनाइयो गुगाः । भगत । रोशिम उपयरिगानुमरितभेदात् । सत्र समाहितमाम HIT पधारेलाममायाहागे पया देशमाप पनमा तिनुमंगानुचरितामद्भपाहारो पथा- और भा) समिनि ॥ ति मुगभामा: भीमनगनना परिममामा॥ . सम्पति .. पाठ..
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