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Jyamiti Ki Kahani

Gunakar Mule · 2011/03

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ज्यामिति की कहानी
गुणाकर मुले
ज्ञान-विज्ञान प्रकाशन
नई दिल्ली

मूल्य 2500
© गुणाकर मुले
प्रथम संस्करण: 1989
द्वितीय सस्करण 1990
प्रकाशक :जान-विज्ञान प्रकाशन
मी-4 ची/123. जनकपुरी.
नईदिल्ली-110058
मुद्रक : गायत्री ऑफमेट प्रेम,
ए-66, मैक्टर-2,
नोएडा (उ)
आवरण:प्रमोट गणपत्ये
.

अपनी बात
विज्ञान की शिक्षा में ज्यामितिया रेखागणित के अध्ययन
का क्या महत्त्व है, इसे सभी जानते हैं। महान
आइंस्टाइन ने तो यहाँ तक कहा है कि इस विश्व के
भौतिक गुणधर्मों को ज्यामिति के नियमों से ही भलीभाँति
समझा जा सकता है।
स्कूलों में ज्यामिति पढ़ाई जाती है। पर यह नहीं
बताया जाता कि ज्यामिति की शुरुआत कैसे हुई, किन
देशों में हुई और किन विद्वानों ने इसके विकास में योग
दिया। स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली ज्यामिति मूलतः
यूक्लिड की ज्यामिति है। अतः विद्यार्थियों को जानना
चाहिए कि यूक्लिड कौन थे और उन्होंने ज्यामिति की
रचना कैसे की । इससे ज्यामिति को समझने में आसानी
--
होगी।
।
ज्यामिति के बहुत-से नियम यूक्लिड के पहले खोजे
गए थे। यूक्लिड के पहले हमारे देश में भी ज्यामिति के
अनेक नियम खोजे गए थे। 'पाइथेगोर का प्रमेय', न
केवल भारत में, बल्कि चीन व बेबीलोन में भी खोजा

.
गया था। इस पुस्तक में इन सब बातों की रोचक
जानकारी दी गई है। साथ ही, पिछले करीब दो सौ साल
में जो नई-नई ज्यामितियाँ खोजी गई हैं, उनका भी
संक्षिप्त परिचय दिया गया है।
किसी भी विषय का इतिहास जानने से उस विषय को
समझने में आसानी होती है । मुझे विश्वास है कि स्कूलों
में ज्यामिति पढ़नेवाले विद्यार्थी इस पुस्तक को उपयोगी
पाएँगे । यह पुस्तक अध्यापकों के लिए भी उपयोगी है।
A
गुणाकर मुते
'अमरावती'
सी-210, पाडव नगर
दिल्ली-110092

क्रम ज्यामिति पढ़ने से क्या लाभ? सिकंदरिया का संग्रहालय यूक्लिड = ज्यामिति ज्यामितिमय विश्व 9 12 16 20 24 28 32 39 शुल्व-विज्ञान ज्यामितिकार थेल पाइथेगोर पाइथेगोर का प्रमेय यूक्लिड के पहले के ज्यामितिकार प्लेटो की अकादमी यूनानी गणित का मुकुट ज्यामिति की आधारशिला यूक्लिड का ज्यामिति का ग्रंथ अरिस्टार्कस और आर्किमीदिज यूनानी विज्ञान का लोप यूक्लिड की ज्यामिति का प्रचार-प्रसार यूक्लिड के अन्य ग्रंथ निर्देशांक ज्यामिति अ-यूक्लिडीय ज्यामितियाँ उपसंहार 46 52 56 59 67 74 82 85 94 98 103 114

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ज्यामिति पढ़ने से क्या लाभ ?
एक पुराना किस्सा है। लगभग तेईस सौ साल पुराना
किस्सा । एक थे अध्यापक । वह एक प्रसिद्ध विद्यालय में
ज्यामिति पढ़ाते थे। एक दिन एक विद्यार्थी ने उनसे पूछा
-गुरु जी, ज्यामिति पढ़ने से क्या लाभ ?
बडा विचित्र सवाल था। आजकल कोई भी विद्यार्थी
अपने अध्यापक से इस प्रकार का सवाल करने की
हिम्मत नहीं कर सकता। सभी जानते हैं कि ज्यामितिया
रेखागणित विज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। सभी
जानते हैं कि हमारे आसपास की बहुत-सी वस्तुएँ
ज्यामितीय आकार की हैं। आकाश के ग्रह-नक्षत्र भी
अपनी गतिविधियों में ज्यामिति के नियमों का पालन
करते हैं। इस सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन
ने तो यहाँ तक कहा है कि, इस विश्व की रचना ज्यामिति
के नियमों के आधार पर हुई है और केवल ज्यामिति के
नियमों से ही इस विश्व के गुणधर्मों को समझा जा सकता
।
लेकिन आज से लगभग ढाई हजार साल पहले
ज्यामिति की कहानी/9

।
..
अभी-अभी ज्ञान-विज्ञान की शुरुआत हुई थी। इसीलिए
उस विद्यार्थी ने सवाल पूछा था : गुरु जी ज्यामिति पढ़ने
से क्या लाभ?
वह अध्यापक कोई मामूली व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने
ज्यामिति के बारे में एक ग्रंथ लिखा था। इस ग्रंथ को
उन्होंने एक खास ढंग से लिखा था। आगे के तेईस सौ
साल तक इसी ग्रंथ से ज्यामिति की पढ़ाई हुई । आज भी
इसी ग्रंथ की ज्यामिति संसार के सारे स्कूल-कालेजों में
पढाई जाती है। ऐसे ग्रंथ के लेखक से यह पूछना कि
ज्यामिति पढ़ने से क्या लाभ, सचमुच ही एक अचरज की
बात थी।
।
यूक्लिड
10/ज्यामिति की कहानी

यह सवाल यूनान के महान गणितज्ञ यूक्लिड से पूछा
गया था।
इस पुस्तक में हमें इसी महान गणितज्ञ का परिचय
प्राप्त करना है। हमें यह भी जानना है कि पिछले लगभग
ढाई हजार सालों में ज्यामिति का विकास कैसे हुआ। हम
यह भी जानेंगे कि हमारे देश में ज्यामिति के बारे में क्या
कुछ खोजा गया था। और, हम यह भी जानेंगे कि उस
विद्यार्थी को यूक्लिड ने क्या जवाब दिया।
पहले हम उस विद्यालय के बारे में जानें जहाँ
यूक्लिड ज्यामिति पढाते थे।
.
ज्यामिति की कहानी/11

सिकंदरिया का संग्रहालय
।
बादशाह सिकंदर (अलेक्जेंडर) का नाम सभी ने सुना
होगा। वही सिकंदर जो मकदूनिया (यूनांन) के राजा
फिलिप का बेटा था और जिसका भारत की भूमि पर
राजा पुरु (पोरस) से कड़ा मुकाबला हुआ था। पुरु से
युद्ध करने के बाद सिकंदर को साम्राज्य-विस्तार के अपने
सपने त्याग देने पड़े थे। भारत आने के पहले सिकंदर ने
मिस्र, बेबीलोन, ईरान आदि देशों पर अधिकार प्राप्त
कर लिया था।
सिकंदर केवल विजय से ही संतुष्ट नहीं था। उसकी
महत्त्वाकांक्षाएँ बड़ी ऊँची थीं। वह जानता था कि
साम्राज्य मिट जाते हैं, सम्राट बदलते रहते हैं । परंतु कुछ
चीजें ऐसी होती हैं जो सदियों तक कायम रहती हैं।
उदाहरण के लिए, किसी शहर के नाम को ही ले
लो। शहर का नाम सदियों तक कायम रह सकता है।
सिकंदर इस बात को अच्छी तरह जानता था। इसीलिए
उसने जिस देश में भी विजय हासिल की, वहाँ अपने नाम
पर नगर बसाए। उसने बेबीलोन में सिकंदरिया
12/ज्यामिति की कहानी

(अलेक्जेंड्रिया) नाम से कई नगर बसाए। ईरान में भी
इसी नाम से कई नगर बसाए। उसने भारत में भी,
प्राचीन तक्षशिला नगरी के नज़दीक, अलेक्जेंडिया नाम
का एक नगर बसाया था।
लेकिन सिकंदर का सपना अधूरा ही रह गया । वह
भारत से मकदूनिया लौट रहा था। रास्ते में ही ईसा पूर्व
323 में उसकी मृत्यु हो गई। उस समय सिकंदर की आयु
केवल 33 वर्ष की थी।
उसने एक दर्जन से भी अधिक अलेक्जेंड्रिया नगरों
की नींव डाली थी। उनमें से अधिकांश सिकंदर की मृत्यु
के बाद ही मिट गए। लेकिन एक नगर की शान सदियों
तक बनी रही। सिकंदर ने मिस पर विजय प्राप्त करके
नील नदी के मुहाने पर 332 ई. पू. में अलेक्जेंड्रिया
(सिकंदरिया) नगरी की स्थापना की थी।
सिकंदर की
बाद उसका मित्र
तोलेमाइओस्-सोतेर मिस का शासक बना। उसे
तोलेमी प्रथम कहा जाता है। सिकंदर की मृत्यु के कुछ
दिनों बाद ही तोलेमी ने अपने को मिस्र का राजा घोषित
किया। उसके बाद उसका
पुत्र तोलेमी द्वितीय
(फिलाडेल्फुस्) राजा बना।
प्रथम तोलेमी ने अलेक्जेंड्रिया में एक 'म्यूज़ियम'
(संग्रहालय) की स्थापना की। परंतु अलेक्जेंड्रिया का यह
संग्रहालय आज के संग्रहालयों जैसा नहीं था। वह एक
जीवित संग्रहालय था । वह एक "विश्वविद्यालय' था।
मृत्यु के
-
।
ज्यामिति की कहानी

तोलेमी ने यूनान के प्रसिद्ध कवियों, कलाकारों,.
ज्योतिषियों और गणितज्ञों को अलेक्जेंड्रिया के इस
'संग्रहालय में आमंत्रित किया। राज्य की ओर से इनको
वेतन मिलता था। और इनका काम क्या था ?
इनका काम था स्वतंत्र रूप से अध्ययन और
अध्यापन करना। राजा की ओर से इन्हें किसी प्रकार की
कोई पाबंदी नहीं थी। इन्हें स्वतंत्र चिंतन की छूट थी।
राजा की केवल यही मनोकामना थी कि उसकी राजधानी
में महापुरुषों का निवास रहे और ज्ञान-विज्ञान की
उन्नति हो।
जब बहुत-से विद्वान एक स्थान पर जमा होते हैं तो
उनके लिए पुस्तकें भी चाहिए। कवि लोग अपने पहले
'के कवियों की रचनाएँ पढ़ना चाहेंगे। ज्योतिषी जानना
चाहेंगे कि पहले के ज्योतिषियों ने ग्रह-नक्षत्रों के बारे में
क्या लिखा है। गणितज्ञ जानना चाहेंगे कि उनके पहले
के दूसरे गणितज्ञों ने गणितशास्त्र में क्या कुछ खोजा है।
यह सब जानने के लिए पुस्तकें चाहिए। बहुत-सी
पुस्तकें । और जब वहुत-सी पुस्तकें जमा हो जाएँ तो
उन्हें ठीक से रखने के लिए एक बहुत बड़ी इमारत
चाहिए। तब जाकर 'ग्रंथालय' तैयार होता है।
अलेक्जेंड्रिया के संग्रहालय (म्यूज़ियम) में भी
धीरे-धीरे इस तरह का एक विशाल ग्रंथालय बन गया।
इस ग्रंथालय में 20,00,00 से भी अधिक पुस्तकें थीं।
कुछ विद्वानों का अनुमान है कि बाद में जाकर यह संख्या
14/ज्यामिति की कहानी

70,00,00 तक पहुंची थी। अलेक्जेंड्रिया के 'म्यूजियम'
के नज़दीक ही इस ग्रंथालय के लिए एक विशाल भवन
का निर्माण हुआ था। इस भवन के 10 बड़े कक्षों में ये
सारे ग्रंथ रखे हुए थे। उस समय दुनिया में इतना बड़ा
पुस्तकालय और कहीं नही था। यूनान की सांस्कृतिक
नगरी अथेन्स तथा एशिया माइनर के पेरगामम नगर के
पुस्तकालय प्रसिद्ध थे। परंतु अलेक्जेंड्रिया के इस
पुस्तकालय ने उन सबको पीछे डाल दिया था।
ज्यामिति की कहानी/15

यूक्लिड = ज्यामिति
.
हाँ, तो उस विद्यार्थी ने उस अध्यापक से सवाल पूछा था:
"गुरु जी, ज्यामिति पढ़ने से क्या फायदा?"
हमें जानना है कि गुरुने शिष्य को क्या उत्तर दिया।
अध्यापक ने उस विद्यार्थी को कुछ भी जवाब नहीं दिया।
उन्होंने एक नौकर को बुलाया, और उससे कहा:
"इस विद्यार्थी को एक ओबोल* दे दो, क्योंकि यह
ज्ञान से केवल धन कमाने की आशा रखता है।"
आज भी हमारे देश में बहुत-से ऐसे विद्यार्थी देखने
को मिलेंगे जो धन कमाने के लिए ही जैसे-तैसे पढ़ाई पूरी
करना चाहते हैं। बहुत-से ऐसे माता-पिता मिलेंगे जो
अपने बच्चे को ऐसे ही विषय पढ़ने-पढ़ाने पर जोर देते हैं
जिससे बाद में जाकर वह बहुत-सा धन कमा सके।
फिर, वे अध्यापक भी कोई मामूली अध्यापक नहीं
थे। वे बहुत बड़े अध्यापक थे। वह हम सब के
अध्यापक हैं।
उनका नाम था यूक्लिड!
• 'ओबोल' एक यूनानी मिक्के का नाम था।
16/ज्यामिति की कहानी

यह-नाम सब का सुना हुआ है। स्कूलों में जो
'ज्यामिति' पढ़ाई जाती है, उसकी रचना आज से लगभग
2250 वर्ष पहले यूक्लिड ने ही की थी। लेकिन हम देखेंगे
कि ज्यामिति की पुस्तक में 'लेखक' की जगह पर यूक्लिड
का नाम नहीं छपा है। वहाँ किसी दूसरे का नाम लिखा
हुआ दिखेगा। ज्यामिति की पुस्तकों पर आज हमें
लेखकों के स्थान पर दूसरे नाम दिखाई देंगे। दरअसल,
ज्यामिति की सभी पुस्तकों के असली लेखक हैं यूक्लिड !
आजकल ज्यामिति की हमारी पुस्तकों में 'लेखक' के
स्थान पर यूक्लिड का नाम क्यों नहीं छपता?
कारण यह है कि यूक्लिड ने अपनी ज्यामिति की
पुस्तक यूनानी (ग्रीक) भाषा में लिखी थी। बाद में इस
पुस्तक का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ । लैटिन भाषा में
अनुवाद हुआ। 15वीं शताब्दी से इस पुस्तक के यूरोप
की अनेक भाषाओं में अनुवाद होने लगे। आज तो संसार
में जहाँ कहीं भी ज्यामिति पढ़ाई जाती है, वह सब
यूक्लिड की ही ज्यामिति है। ज्यामिति की पुस्तकों की
विधि (ढाँचा) इसी यूक्लिड की खोज है। वास्तव में,
ज्यामिति की और यूक्लिड की पुस्तक की एक लंबी
कहानी है। बड़ी ही रोचक कहानी।
हम यह जान चुके हैं कि ज्यामिति का यह लेखक
कितना स्पष्टवादी था। हम यह भी जान चुके हैं कि
ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन मे लाभ खोजनेवाले विद्यार्थी
को यूक्लिड ने क्या जवाब दिया था !
ज्यामिति की यहानी/17

.
यूक्लिड थे ही ऐसे। यह बात नहीं कि वह एक
विद्यार्थी को ही ऐसा जवाब दे सकते थे। नहीं, वह एक
राजा को भी कड़ा जवाब देने की हिम्मत रखते थे। राजा
भी कोई मामूली नहीं। वही तोलेमी राजा जिसके
विश्वविद्यालय में यूक्लिड प्राध्यापक थे; जिससे उन्हें
वेतन मिलता था।
तोलेमी राजा विद्याप्रेमी तो था ही। वह भी यूक्लिड
की ज्यामिति की पुस्तक पढ़ने लगा। लेकिन शीघ्र ही
उसे पता लगा कि यह कठिन है और इसे पढ़ने के लिए
उसे बहुत समय लगेगा। नौकर-चाकरों से घिरे
रहनेवाले बड़े आदमियों की आदतें होती हैं कि हर काम
फौरन हो जाए। इसलिए, राजा तोलेमी ने एक दिन
यूक्लिड से पूछा :
"क्या ज्यामिति को जल्दी सीखने का कोई आसान
तरीका नहीं है ? है तो कृपा करके बताइए।"
इस सवाल का यूक्लिड ने क्या जवाब दिया, यह हम
आगे जानेंगे। पहले हमें यूक्लिड के बारे में जानना है।
सच बात यह है कि यूक्लिड की जीवनी के बारे में
हमें कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती। आज संसार का
कोई भी व्यक्ति नहीं बता सकता कि यूक्लिड का जन्म
कहाँ, किस नगर में हुआ था। उनके माता-पिता का नाम
क्या था, उनका जन्म किस साल हुआ था और मृत्युठीक
किस साल हुई। इन बातों का किसी के पास लेखा-जोखा
नहीं है।
18/ज्यामिति की कहानी

किसी समय अलेक्जेंड्रिया के विश्वविद्यालय में
यूक्लिड की जीवनी पर कोई पुस्तक रही भी हो, तो वह
नष्ट हो गई है। सच तो यह है कि अलेक्जेंड्रिया का वह
लाखों ग्रंथों का संग्रहालय ही नष्ट हो गया है ! इस दुखद
कहानी को हम आगे जानेंगे।
हाँ, एक रास्ता है। यदि यूक्लिड को ज्यामिति का
प्रतिनिधि मान लिया जाए तो बहुत-कुछ बताया जा
सकता है और यही तरीका बेहतर होगा। क्योंकि, अंत में
व्यक्ति नहीं, व्यक्ति का ज्ञान ही महत्त्व का होता है।
क्योंकि, असल चीज है वह ज्यामिति जिसकी यूक्लिड ने
रचना की । ज्यामिति ही यूक्लिड है और यूक्लिड ही
ज्यामिति !
इसके माने यह नहीं है कि यूक्लिड के बारे मेंकटमी
नहीं जाना जा सकता । अभी यूक्लिड के बारे में बहुत-सी
रोचक बातें जाननी हैं।
लेकिन पहले हम ज्यामिति की कहानीजानेंगे। इसी
ज्यामिति की कहानी के साथ-साथ मिल की कहानी
भी मालूम होती जाएगी।

ज्यामितिमय विश्व
.
ज्यामिति की कहानी!
ज्यामिति की कहानी उतनी ही प्राचीन है, जितना कि
हमारा यह विश्व!
बहुतों को इस कथन पर एकाएक विश्वास नहीं
होगा। लेकिन यदि हम अपने आसपास के संसार पर
नज़र डालें, तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी। चहुँओर की
वस्तुओं की ज्यामितीय आकृतियों पर विचार करो । देखो
कि कितनी वस्तुएँ वृत्ताकार हैं, कितनी वस्तुएँ पृष्ठाकार
हैं, कितनी वस्तुएँ गोलाकार हैं। दीर्घवृत्ताकार हैं।
परवलय-परवलयज के आकार की हैं।
यदि इन वस्तुओं को गहराई से देखें तो ये सभी
वस्तुएँ किसी-न-किसी ऐसी आकृति की दिखाई देंगी,
जिसका ज्यामिति में अध्ययन होता है। हमारी यह पृथ्वी
गोलाकार है। सौर मंडल के सभी ग्रह-उपग्रह
गोलाकार हैं। ये सारे ग्रह गोलाकार सूर्य की एक ख़ास
कक्षा (दीर्घवृत्त) में परिक्रमा करते हैं। इस विश्व मे
हमारे सूर्य की तरह करोड़ों-अरबों सूर्य हैं। हमारी अपनी
20/ज्यामिति की कहानी

A
आकाशगंगा-मंदाकिनी की तरह करोड़ों मंदाकिनियाँ
हैं। आकाश के ये सभी पिंड एक खास ज्यामितीय
आकृति के हैं और विशेष ज्यामितीय वक्रों में ही ये
एक-दूसरे की परिक्रमा करते रहते हैं।
संक्षेप में, यह संपूर्ण विश्व ज्यामितिमय है। इस
विश्व की रचना तथा गति-स्थिति का अध्ययन केवल
ज्यामितीय गणित से ही संभव है। इस सदी के महान
वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा
है कि इस विश्व के गुणधर्मो को केवल ज्यामिति से ही
जाना जा सकता है।
अब एक दिलचस्प सवाल : क्या इस विश्व कि
रचना किसी 'ईश्वर' ने की है ? यदि इस विश्व का
रचयिता कोई सर्वशक्तिमान 'ईश्वर' रहा है, तो वह
कैसा था? हम यह नहीं जानना चाहते कि उसका शरीर
कैसा था । वह आदमी था या बंदर था या मगरमच्छ था।
हम तो सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि उसका 'दिमाग'
कितना बड़ा था? एक ज्यामितिमय विश्व की रचना
करने के लिए तो उसके दिमाग में सारी ज्यामिति भरी
होनी चाहिए। वह एक बहुत बड़ा ज्यामितिकार होना
चाहिए!
दरअसल, हम यह भी नहीं जानते कि इस विश्वका
कोई 'कर्ता' भी है। लेकिन यदि कोई 'कर्ता' है, तो
उसकी. 'बुद्धि' के बारे में हमें फिर से विचार करना
होगा। हमारे सारे धर्मों के सारे देवी-देवताओं के दिमागों
.
1
ज्यामिति की कहानी/2r

को मिलाकर भी देखा जाए तो वे सारे दिमाग विश्व के
निर्माण के लिए अयोग्य साबित होते हैं । इसलिए हमारे
सारे देवी-देवता मिलकर भी विश्व के 'कर्ता' नहीं हो
सकते।
फिर भी, इस विश्व की योजनाबद्ध रचना को देखने से
हमारे मन में कभी-कभी यह खयाल आता है: कहीं इस
विश्व की रचना गणित के आधार पर तो नहीं हुई है?
कहीं इस विश्व का 'कर्ता' एक 'महान ज्यामितिकार' या
एक 'महान गणितज्ञ' तो नहीं रहा है?
आज से लगभग 2400 वर्ष पहले, यूनान के महान
दार्शनिक प्लेटो (अफलातून) ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा
था कि, "इस विश्व का निर्माता एक महान ज्यामितिकार
प्लेटो एक प्रसिद्ध विद्यालय के संस्थापक तथा
संचालक थे और उन्होंने इस विद्यालय के बाहरी दरवाजे
के ऊपर लिख रखा था:
ज्यामिति न जाननेवाले के लिए इस विद्यालय में
प्रवेश मना है।
सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि यूक्लिड की पढ़ाई
इसी विद्यालय में हुई थी। वह अपने विद्यार्थी जीवन में
इस विद्यालय के विद्यार्थी थे। रोज विद्यालय में प्रवेश
करते समय दरवाजे के ऊपर लिखे हुए इस वाक्य को वे
पढ़ लेते थे!
22/ज्यामिति की कहानी

यूक्लिड कोई साधारण विद्यार्थी नहीं थे। उन्होंने
उस समय तक ज्ञात सारी ज्यामिति का अध्ययन किया।
अब हम देखेंगे कि यूक्लिड के समय तक आदमी ने
ज्यामिति का कितना ज्ञान जमा कर लिया था।
ज्यामिति थी.

शुल्व-विज्ञान
.
-
हम अपने देश की प्राचीन ज्यामिति से ही शुरू करेंगे।
वैदिक लोग यज्ञों के लिए विशेष प्रकार की वेदियाँ
बनाते थे। प्रत्येक यज्ञ के लिए विशेष आकार-प्रकार की
वेदी होती थी। वेदी के लिए स्थान, आकृति, लंबाई,
चौड़ाई तथा ऊँचाई का विशेष ध्यान रखा जाता था।
वेदियाँ जिन ईंटों से बनती थीं वे प्रायः वर्ग, समकोण-,
त्रिभुज, समचतुर्भुज, समबाहु-समलंब, आयत, इत्यादि
आकारों की होती थीं। कभी-कभी किसी वेदी को उतने
ही क्षेत्रफल की किसी दूसरी वेदी में बदलना पड़ता था ।
इन वेदियों के निर्माण में सूक्ष्मता का बहुत ध्यान रखा.
जाता था।
यज्ञों के लिए वेदियों के निर्माण के साथ-साथ भारत
में ज्यामिति का अध्ययन शुरू हुआ।
इस विषय की जानकारी के लिए कई पुस्तकें लिखी
गई। उन सब पुस्तकों को शुल्बसूत्रों का नाम दिया गया
है। शुल्व का अर्थ होता है रस्सी। रस्सी से मापकर
ज्यामितीय आकृतियाँ बनाई जा थीं, इसलिए जिन
.
24/ज्यामिति की कहानी

पूर्व दिशा
अ
क
V
FVi.
ड
महावेदी
वेदियो में महावेदी को विशेष महत्त्व प्राप्त था। यह समद्विबाहु-समलंब
(चतुर्भुज) के आकार की होती थी (अबकड चतुर्भुज)। इसकी आधार-रेखा 30
प्रक्रम (पद या कदम) होती थी; सामने की लंबाई 24 प्रक्रम और ऊंचाई 36
प्रक्रम । अक भुजा सदैव पूर्व की ओर रहती थी।
शुल्वसूत्रकार आपस्तंब ने महावेदी के निर्माण के चार तरीके दिए हैं, जो
शुल्व-प्रेमय' (पाइथेगोर का प्रमेय) पर आधारित हैं। आज स्कूल का कोई भी
विद्यार्थी इस वेदी को आसानी से बना सकता है। इस महावेदी की रचना से कई
प्रकार के वर्गमूल भी प्राप्त किए जा सकते हैं, जिन्हे ऊपर की आकृति में दिया
गया है।
'ज्यामिति की

.. सूत्रों में वेदियों के निर्माण के लिए नियम दिए गए हैं उन्हें 'शुल्वसूत्र कहते हैं। इसलिए हमारे देश की प्राचीन ज्यामिति को शुल्व-विज्ञान कहना उचित होगा। किसी समय तो बहुत-से शुल्बसूत्रों का अस्तित्व रहा है। परंतु आज संस्कृत भाषा में जो शुल्बसूत्र मिलते हैं, उनके नाम हैं : बौधायन-शुल्वसूत्र, आपस्तंब- शुल्वसूत्र, कात्यायन-शुल्बसूत्र, मैत्रायण-शुल्वसूत्र, मानव-शुल्वसूत्र, वाराह-शुल्वसूत्र और वाधुल- शुल्वसूत्र। "इन सूत्रों के कर्ताओं के नाम पर इन ग्रंथों के ये नाम पड़े हैं। यह बताना तो संभव नहीं है कि ये ग्रंथ किस साल यां किस सदी में रचे गए थे। परंतु विद्वानों का विश्वास है कि इनकी रचना ईसा पूर्व 500 के आसपास हो चुकी थी। अर्थात्, यूक्लिड के भी लगभग 200 साल पहले। सच तो यह है कि जब हमारे देश में शुल्व-विज्ञान का अध्ययन हो रहा था, तब यूनान में ज्ञान-विज्ञान का आरंभ भी नहीं हुआ था! यहाँ हम नमूने के लिए इन शुल्बसूत्रों में से एक सूत्र पर विचार करेंगे। यह सूत्र है- दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्णयारज्जुः पाश्र्वभानी तिर्य्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति । इस सूत्र का भावार्थ है-किसी आयत के विकर्ण पर खींचा गया वर्गक्षेत्रफल में उन दोनों वर्गों केसमान होता 26/ज्यामिति पीकहानी .

है जो दोनों भुजाओं पर खींचे जाएँ।
किसी ने यदि हाईस्कूल तक भी ज्यामिति पढ़ी हो तो
उसे फौरन याद आएगा कि उसने इसी तरह का एक प्रमेय
अपनी ज्यामिति की पुस्तक में पढ़ा है। यदि संदेह हो तो
ज्यामिति की पुस्तक को खोलकर देख लिया जा सकता
है।
साथ ही, यह भी याद आएगा कि यह प्रमेय एक
विशेष नाम से जाना जाता है। इसे पाइथेगोर का प्रमेय
कहते हैं। ज्यामिति की पुस्तकों में भी इसका यही नाम
है। चूंकि ज्यामिति का मूल रचयिता यूक्लिड है, इसलिए
यूक्लिड की ज्यामिति की पुस्तक में भी यह प्रमेय मिलता
है (पुस्तक 1, प्रमेय 47)।
एक ओर यूक्लिड का कहना है कि इस प्रमेय की
खोज पाइथेगोर ने की । ज्यामिति की पुस्तकों में भी इसे
'पाइथेगोर का प्रमेय' कहा जाता है। दूसरी ओर हम
देखते हैं कि हमारे देश के प्राचीन शुल्वसूत्रों में भी यह
प्रमेय है। अजीब उलझन है!
यह उलझन तभी सुलझ सकती है जब हम जानें कि
यूनान में ज्यामिति के अध्ययन का सिलसिला कब और
कैसे शुरू हुआ।
ज्यामिति की कहानी/27

उसने जब पहले से ही घोषणा की, कि 585 (ई.पू.) में
सूर्यग्रहण होगा, और सचमुच हुआ, तो उसकी ख्याति
चहुँओर फैल गई। कहा जाता है कि यूक्लिड की
ज्यामिति के कुछ प्रमेय थेल ने खोजे थे; जैसे:
1. वृत्तका व्यास वृत्त को दो समान भागों में बाँटता
है।
2. समद्विबाहु त्रिभुज के आधार-कोण समान होते
.
3. जब दो रेखाएँ एक-दूसरे को छेदती हैं, तो
ऊर्ध्वाधर कोण समान होते हैं।
ये सभी प्रमेय यूक्लिड की 'ज्यामिति' में दिए हुए हैं,
इसलिए आज की ज्यामिति की पुस्तकों में भी मिलेंगे।
वास्तव में, आज से ढाई हजार साल पहले थेल को
ज्यामिति की इन बातों का ज्ञान था।
थेल अपने समय में यूनान के सबसे बड़े विद्वान थे।
हम जानते हैं कि बड़े विद्वान, विशेषतः गणित का
अध्ययन करनेवाले विद्वान, बडे भुलक्कड़ स्वभाव के .
हुआ करते हैं । वैज्ञानिकों के भुलक्कड़ स्वभाव के बारे में
बहुत-से किस्से प्रसिद्ध 1. थेल के बारे में भी ऐसा ही
एक किस्सा है:
रात का समय था। थेल आकाश के तारों को देखते
हुए चल रहे थे। जब आकाश की ओर देख रहे थे तो
धरती पर क्या है यह कैसे दिखाई देता । गिर पड़े एक
गहरे खड्डे में । एक लड़की पास ही खड़ी थी। उसे हैंसी
।
30/ज्यामिति कीकहानी

Pator
येस
आ गई। थेल को जब खड्डे से बाहर निकाला गया, तो
उन्होंने उस लड़की से पूछा, "तुम हँसी क्यों थी?"
लड़की ने भी साफ़ उत्तर दिया, "मुझे यही देखकर
हँसी आई कि आपको पैरों के नीचे की जमीन तो दिखाई
नहीं देती, इतने दूर के आकाश में क्या दिखाई देता
होगा!"
ऐसे थे थेल । और, उनके शिष्य के करामात को
सुनकर तो हम दंग ही रह जाते हैं। शिष्य अपने गुरु से
किसी भी माने में कम नहीं थे।
थेल के शिष्य का नाम था पाइथेगोर। वही
पाइथेगोर जिसके नाम से यूक्लिड की ज्यामिति का एक
प्रमेय प्रसिद्ध है।
ज्यामिति की कहानी/31

पाइथेगोर
।
पाइथेगोर का जन्म एशिया माइनर के सामोस द्वीप में
हुआ था-ईसा पूर्व छठी शताब्दी में । यह सामोस द्वीप
थेल के जन्म-नगर मिलेटस से काफी नजदीक था।
पाइथेगोर की आरंभिक शिक्षा थेल की देखरेख में हुई
थी। देश-विदेश में घूमकर थेल ने जितना भी ज्ञान
अर्जित किया था, वह सब उन्होंने पाइथेगोर को बता
दिया। थेल के पास जब कोई नई बात बताने के लिए
नहीं रही तो उन्होंने पाइथेगोर से कहा, "तुमने वह
सबकुछ सीख लिया है जो मुझे ज्ञात है । यदि तुम अधिक
ज्ञान अर्जित करना चाहते हो तो तुम्हें अब मेरी तरह
मिस्र, बेबीलोन आदि देशों की यात्रा करनी होगी।"
गुरु के आदेश से पाइथेगोर विदेश यात्रा पर निकल
पड़ा।
पहले वह मिस्र देश गया। वहाँ वह 22 साल तक
रहा । 22 साल का समय तो बहुत लंबा होता है। लेकिन
पाइथेगोर वहाँ निकम्मा नहीं बैठा। उसने मिस्र में
रहकर ज्ञान-विज्ञान की बहुत-सी बातों का अध्ययन
किया।
32/ज्यामिति की कहानी

मिसके बाद पाइथेगोर बेबीलोन गया । बेबीलोन में
वह 12 साल तक रहा। वहाँ उसने बेबीलोन के
पुरोहित-पंडितों से ज्योतिष और गणित की बातें सीखीं।
प्राचीन भारत, मिस तथा चीन की तरह, बेबीलोनवाले.
भी विज्ञान में बहुत उन्नति कर चुके थे। उन्हें,
पाइथेगोर के भी सैकड़ों साल पहले, उस प्रमेय का ज्ञान
था जो आज पाइथेगोर का प्रमेय' नाम से प्रसिद्ध है। हम
जान चुके हैं कि भारतीय विद्वानों को भी इस प्रेमय का
ज्ञान था। और, पाइथेगोर से भी बहुत पहले, चीनवालों
को भी इस प्रमेय का ज्ञान था ।
-
F
पाइयेगोर से कम-से-कम पांच सौ साल पहले लिखी गई चीनी पुस्तक
'चाऊ पेई सुआन्-किङ' में ठप्पों से छपा हुआ यह पाइथेगोर का प्रमेय'। यह
प्रमेय मोजाइक-फर्श पर सीचा गया है।
कुछ विद्वानों का तो यह भी कहना है कि पाइथेगोर ने
भारत की यात्रा की थी। पाइथेगोर के दार्शनिक विचार
और रहस्यमयी बातों को जानकर तो ऐसा लगता है कि
ज्यामिनि की कहानी 133

.
वह सचमुच ही भारत आया होगा।
ऐसी हालत में, किसके मन में यह बात नहीं उठेगी
कि जो प्रमेय आज पाइथेगोर के नाम से प्रसिद्ध है, उसे
पाइथेगोर ने बेबीलोन या भारतवालों से सीखा है।
मच बात जो भी रही हो, लेकिन यह एक मानी हुई
बात है कि पाइथेगोर के भी सैकड़ों साल पहले यह
तथाकथित 'पाइथेगोर का प्रमेय' बेबीलोन, चीन तथा
भारत के पडितो को ज्ञात था।
यूक्लिड ने इम प्रमेय की जानकारी पाइथेगोर के
शिष्यो में प्राप्त की थी, इसलिए उसने यदि इसे
पाइथेगोर का आविष्कार माना हो तो कोई आश्चर्य की
वात नहीं है। लेकिन हम जानते हैं कि हमारे शुल्वग्रंथों
के र यताओं को पाइथेगोर से भी बहुत पहले इस प्रमेय
का ज्ञान था। इसलिए उचित यही होगा कि हम इसे
'शुल्व-प्रमेय के नाम से जानें।
4001
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44
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खेत का मेवीलोनी नक्शा
अनियमिन सेन को त्रिभुजो और चतुर्भुजो मे बांटकर पूरे खेत या
क्षेत्रफल ज्ञात किया जाता था।
14/ज्यामिति की कहानी

.
दरअसल, गणित और ज्योतिष में ऐसी बहुत-सी
बातें हैं जिनका हमारे आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, भास्कर जैसे
आचार्यों को जान था। हमसे यूरोपवालों ने गणित की
वहुत-सी बातें सीखी हैं। परंतु आज हमें गणित के किसी
भी सिद्धांत या विधि के साथ हमारे किसी गणितज्ञ का
नाम जुडा हुआ देखने को नहीं मिलता। वर्ना, आज के
गणित में ऐसी बहुत-मी विधियाँ हैं जिन्हें हम आर्यभट
या भास्कराचार्य की विधियों कह सकते हैं।
पाइथेगोर लगातार 34 वर्षों तक विदेशों में पर्यटन
करते हुए गणित, ज्योतिष तथा धार्मिक विश्वासों के
अध्ययन में जुटे रहे। अंत में, छप्पन साल की आयु में वे
सामोस लौट आए। परंतु किन्हीं राजनीतिक कारणों से
सामोस छोड़कर उन्हें दक्षिण इटली के क्रोटोना नगर में
शरण लेनी पड़ी। एशिया माइनर की तरह दक्षिण इटली,
में भी यूनानी उपनिवेश थे।
क्रोटोना में पाइथेगोर ने एक विद्यालय की स्थापना
की। यह विद्यालय आज के विद्यालयों जैसा नहीं था।
यह हमारे देश के प्राचीन नालंदा विद्यालय की पद्धति का
था। आज से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले नालंदा के
विद्यालय में बौद्ध पंडित अध्ययन-अध्यापन करते थे।
पाइथेगोर की शिक्षाएँ इतनी आकर्षक थीं कि जल्दी
ही उनके चहुँओर शिष्य-मंडली का जमाव हो गया।
इसी शिप्य-मंडली ने एक विद्यालय का रूप धारण कर
लिया। पाइथेगोरकेविद्यालयका विद्यार्थी बनने के लिए
.
ज्यामिति की कहानी /358

विद्यार्थियों को कुछ विशेष नियमों का कड़ाई से पालन
करना पड़ता था। सबसे पहले तो उन्हें एक प्रकार की
साम्यवादी व्यवस्था को स्वीकार करना पड़ता था।
साम्यवादी व्यवस्था का अर्थ है-संपत्ति पर-किसी एक
का अधिकार नहीं, संपत्ति सारे समूह की मिलकियत है !
नियमानुसार इस विद्यालय का सदस्य बन जाने पर
'व्यक्तिगत' नाम की किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं
रह जाता था। भौतिक संपत्ति भी विद्यालय की और सारी
बौद्धिक संपत्ति भी विद्यालय की ही! इस विद्यालय का
कोई सदस्य यदि विज्ञान के किसी सिद्धांत की खोज करता
तो वह उस व्यक्ति की नहीं, बल्कि पाइथेगोर के
विद्यालय की खोज मानी जाती थी। विद्यालय की सभी
गतिविधियों को केवल सदस्यों तक सीमित रखा जाता
था। नए ज्ञान को लिपिबद्ध भी नहीं किया जाता था!
ये सभी बातें सचमुच ही बड़ी विचित्र हैं। पाइथेगोर
के बारे में तो सारी की सारी बातें ही विचित्र हैं। चूँकि इस
विद्यालय के सारे आविष्कार दो-तीन सौ साल तक केवल
'पाइथेगोर' के नाम से ही जोड़े गए, इसलिए हमारे लिए
यह जानना कठिन है कि कौन-सा आविष्कार स्वयं
पाइथेगोर की खोज है, और कौन-सा उसके शिष्यों का !
अजीब-अजीब मान्यताएँ थीं पाइथेगोर की। जिस
प्रकार थेल का विश्वास था कि यह विश्व जलमय है,
उसी प्रकार पाइथेगोर की मान्यता थी कि यह विश्व
संख्यामय है । पाइथेगोर तथा उसके शिष्यों का विश्वास
,
36/ ज्यामिति की कहानी

था कि विश्व की सभी घटनाओं को परिमेय (रंशनल)
संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है । जो संख्याएँ अ/ब
भिन्न के रूप में व्यक्त की जा सकती हैं,गणितशास्त्र में
उन्हें परिमेय संख्याएं कहते हैं। परिमेय का अर्थ है, जिसे
मापा जा सके
पाइथेगोर तथा उसके शिष्यों ने संख्याओं के अनेक
गुणधर्मों की खोज की । संक्षेप में कहें तो पाइथेगोर ने ही
संख्या सिद्धांत की स्थापना की। उसका पक्का विश्वास
.
मिय रेशश की यात्रा करता हुआ पाइथेगोर
ज्यामिति की कहानी /37.

था कि संख्या ही विश्व का मूलतत्त्व है ! भौतिक जगत
की सभी बातों को संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है!
मज़ेदार बात तो यह है कि स्वयं पाइथेगोर को ही
वाद में पता चला कि उसकी यह मान्यता खोखली है।
लेकिन उसने अपनी इस खोज को छिपाए रखा और
पुरानी मान्यता पर ही डटा रहा!
लेकिन सत्य भला कहीं छिपता है ? और सत्य भी
कैसा?
विज्ञान की एक महान खोज
38/ज्यामिति की कहानी

किन्हीं भी दो चीजों के मान ज्ञात हों तो, हम तीगील
पाइथेगोर का प्रमेय
आओ, हम पुनः पाइथेगोर के प्रमेय-शुल्व-प्रमेय-पर
विचार करें। अगले पृष्ठ की आकृति को देखो:
अ ब क एक समकोण त्रिभुज है। इस आकृति में
कर्ण अक पर एक वर्ग खींचा गया है। उसी प्रकार,
भुजाएं अब तथा ब क पर भी वर्ग खींचे गए हैं। अब
ज्यामितीय कृत्य से यह सिद्ध होता है कि वर्ग अक यर का
क्षेत्रफल, वर्ग अबत थ तथा वर्ग ब क प फ इन दोनों के
संयुक्त क्षेत्रफलों के बराबर है। अन्य शब्दो में, समकोण
त्रिभुज के कर्ण परखींचा गया वर्ग क्षेत्रफल में उन दोनो
वर्गों के योग के समान होता है जो शेष दोनों भुजाओं पर
खींचे जाएँ।
अब, मान लो कि त्रिभुज अ ब क की तीनों
भुजाएँ-अब, ब क और अ क क्रमशः य, र और ल
लंबाई की हैं: तब उपर्युक्त प्रमेय के अनुसार, इन तीनों
लंबाइयों में संबंध होगा: य. + २ = ल.। इस मुत्र गे,
.
शामि

का मान ज्ञात कर सकते हैं। जैसे:मान लो कि, य%D
और र-3, तब ल का मान होगा:
ल' = य + र,
ल' - 42 + 31,
ल' = 16 +9%D 25,
अर्थात्, ल 5;
अर्थात्, अ क लंबाई 5 है। किसी भी समकोण
त्रिभुज की दो भुजाओं की लंबाई ज्ञात हो तो तीसरी भुजा
की लंबाई ज्ञात की जा सकती है।
य
--
प
-
अ
प
त
/ज्यामिति वीरहानी

हमारे देश के शुल्बसूत्रकार इस संबंध को बहुत
अच्छी तरह जानते थे। शुल्बसूत्रग्रंथों में निम्न प्रकार के
अनेक संबंध मिलते हैं:
32+ 12 = 13,
7+24°325,
8 + 15%3D17', इत्यादि।
अब हम इसी प्रमेय से संबंधित एक विशेष
उदाहरण पर विचार करेंगे:
'नीचे की आकृति में अबलंबाई 1 इंच है और बक
लंबाई भी.1 इंच है। अव सवाल है: अक लंबाई क्या,.
होगी?
-
पीछे समझाए गए सूत्र का इस्तेमाल करके हम यहं.
लंबाई मालूम कर सकते हैं; जैसे-
अक अब बक,
=1+,
%3D1+1,
अर्थात्, अब %321
%3D
ज्यामिति की कहानी/41

,
यहाँ हमें शुल्व-नियम (पाइथेगोर के प्रमेय) से कर्ण
के वर्ग का मान प्राप्त हुआ। अब सवाल है : कर्ण के वर्ग
(अक') का मान यदि 2 है, तो कर्ण (रखा अक) का मान
क्या होगा?
उत्तर : रेखा अक की लंबाई होगी, 2 का वर्गमूल ।
लेकिन 2 का वर्गमूल क्या होगा?
यदि 9, 25, 169 या अन्य किसी वर्ग संख्या का
वर्गमूल पूछा जाता तो आसानी से उत्तर दिया जा सकता
था; क्योंकि इनका वर्गमूल क्रमशः 3,5 और 13 होगा।
गणित में वर्गमूल के लिएV चिहन का प्रयोग होता
है। इसका इस्तेमाल करके हम कह सकते हैं कि अक
3721
फिर भी, सवाल हल नहीं होता। सवाल बना ही
रहता है कि यहV2 क्यो है ? क्या यह एक परिमेय
संख्या है ? परिमेय संख्याएँ तो वे होती हैं जिनकी
लंबाई-रैखिक लंबाई-को मापना संभव हो। तो क्या
ऊपर की आकृति में अक रेखा को भी मापनी (स्केल) से
मापना संभव है?
दरअसल, V2 एक ऐसी लंबाई है जिसे स्केल से
ठीक-ठीक मापा ही नहीं जा सकता । इस विश्व की सारी
वस्तुओं को मापने योग्य संख्याओं में व्यक्त नहीं किया जा
सकता है।
पाइथेगोर की मान्यता गलत थी। पाइथेगोर का
ज्ञान परिमेय संख्याओं-अ/व के रूप में लिखी जा
।
42/ज्यामिति की कहानी

सकनेवाली संख्याओं-
दीदा।
लेकिन स्वयं पाइथेगोर या उमकिमी शिष्य को ही
बाद में पता चला कि ऐनी भी मस्याओं का अस्तित्व है
जो परिमेय नही हैं; अर्थात्, जो अ/व के रूप में व्यक्त
नहीं की जा सकतीं। 12,13,17,11,Vi3
इत्यादि इसी प्रकार की संख्याएं हैं। विचित्र बात तो यह
है कि जिस प्रकार 1, 2, 3, “संख्याओंवाले क्रम का कोई
अंत नहीं, यह अनंत हैं, उसी प्रकार, 12,13,17,
जैसी संख्याएँ भी अनंत हैं।
हमने कह तो दिया कि-2 को अ/ब (एक परिमेय
संख्या, जिसमें अ और ब पूर्णाक हैं) के रूप में व्यक्त नहीं
किया जा सकता। लेकिन गणित में किसी बात को बिना
सिद्ध किए मान लेना ठीक नहीं है। इसलिए आओ, हम
देख ही लेते हैं कि 1/2 एक परिमेय संख्या है, या नहीं:
/ब एक भिन्न है; एक ऐसा भिन्न जिसके अंशतथा
हर स्थानों की संख्याएँ पूर्णाक हैं । हमें यह भी मान लेते
हैं कि अ तथा ब को 1 के अलावा अन्य किसी संख्या से
भाग देना संभव नहीं है (यदि भाग देना संभव हो, तो
पहले भाग देकर, इस भिन्न को सरल बना लेना
चाहिए)।
अ/व =
अर्थात्,
अब, यदि अएक विषम संख्या है (जैसे, 3,9, 13)तो
हमें एक परस्पर-विरोधी कंथन प्राप्त होता है, क्योंकि
-
अब,
अ =2ब',
ज्यामिति की कहानी/43

.
2ब एक सम संख्या है!
और यदि अएक सम संख्या है, मान लो कि वह 2 त
के बराबर है, तो 4त 32ब',या 2त' = ब', । अतः,ब
एक सम संख्या है।
इससे यह सिद्ध होता है कि अतथा ब दोनों को 2 से
भागदेना संभव है। यह भी एक परस्पर-विरोधी बात है;
क्योंकि, हम पहले ही कह चुके हैं कि अतथा ब दोनो ऐसी
संख्याएँ हैं जिन्हें । को छोड़कर अन्य किसी संख्या से भाग
देना संभव नहीं है।
उपर्युक्त तर्क से यह सिद्ध होता है कि V2 को अ/ब
के रूप में व्यक्त करना संभव नहीं है 1/2एक परिमेय
संख्या नहीं है। यह एक अपरिमेय संख्या है। V2 को
किसी दशमलव अपूर्णांक में व्यक्त करना संभव ही नहीं
है। व्यवहार के लिए 1/2 का मान हम दे सकते हैं,
52 = 1.414213"। लेकिन यह सन्निकट मान ही
कहलाएगा। दशमलव स्थानों को हम चाहे जितना भी
क्यों न बढ़ाएँ, हमें /2का सही-सही मान कभी भी नहीं
मिल सकता।
इस खोज से पाइथेगोर की आँखें खुल गई। उसने
जाना कि विश्व में ऐसी भी वस्तुएँ (परिमाण) हैं जिन्हें
परिमेय संख्याओं में व्यक्त नहीं किया जा सकता !
पाइथेगोरने अपनी इस नई खोज़ को बाहर के लोगों
के सामने प्रकट नहीं होने दिया। उसने अपने शिष्यों को
आदेश दे रखा था कि जो कोई इस खोज को बाहर प्रकट
44/ज्यामिति की कहानी

करेगा उसका बड़ा अहित होगा!
लेकिन यह महान सत्य बहुत दिनों तक छिपा नहीं
रह सका । अंत में यूनान के विद्वानों को इसका पता चल
ही गया।
ज्यामिति की कहानी/45

1 यूक्लिड के पहले के ज्यामितिकार यूक्लिड एक यूनानी वैज्ञानिक था। परंतु विज्ञान के इतिहास में वैज्ञानिक की अपेक्षा वैज्ञानिक विषय का अधिक महत्त्व होता है। यूक्लिड के बारे में तो यह बात विशेष रूप से कही जा सकती है। हम बता चुके हैं कि यूक्लिड का अर्थ है ज्यामिति और ज्यामिति का अर्थ है यूक्लिड । यूक्लिड ने ज्यामिति पर जिस अमर ग्रंथ की रचना की उसके विषय-प्रमेय, कृत्य तथा सिद्धांत- केवल यूक्लिड की ही संपत्ति नहीं है। यूक्लिड की ज्यामिति के बहुत-से सिद्धांत यूक्लिड के भी बहुत पहले यूनान, बेबीलोन तथा मिस्र के विद्वानों ने खोज निकाले थे। यूक्लिड ने अपने पहले की सारी ज्ञेय ज्यामिति का गहरा अध्ययन किया था। फिर उसने इस सारीज्यामिति को एक नया रूप दिया। पाइथेगोर के नाम से प्रसिद्ध प्रमेय पाइथेगोर के शिष्यों को ज्ञात था, यह हम देख ही चुके हैं। पाइथेगोर की तरह, यूक्लिड के पहले बहुत-से ज्यामितिकारों ने ज्यामिति के सिद्धांतों की खोज की थी। इन सबका यूक्लिड ने अपनी 'ज्यामिति' में समावेश 46/ज्यामिति की कहानी

किया । इसलिए, उन वैज्ञानिकों के बारे में जानना जरूरी
है जिनके सिद्धांतों का यूक्लिड की ज्यामिति में अध्ययन
करना पड़ता है।
-
यूक्लिड के पहले भी यूनान में बड़े-बड़े वैज्ञानिक हुए हैं।
उनके बारे में हम संक्षेप में ही बता पाएंगे।
लगभग 2500 वर्ष पहले की बात है। किसी ने
अथेन्स नगर के एक विद्वान से पूछा, "इस संसार में जन्म
लेने से क्या फायदा है?" उस विद्वान ने उत्तर
दिया-"सूर्य, चंद्र तथा आकाश का अध्ययन करना ही
जीवन का परम उद्देश्य है।"
इस विद्वान का नाम था अनेरज़ागोर (लगभग
500-428 ई.पू.)। यूनान के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ परिकल
के समय में अनेक्जागोर अथेन्स नगर में रहते थे। इस
यूनानी विद्वान की मान्यता थी कि संसार की सभी वस्तुएँ
कणों से बनी हैं। अनेरजांगोर ने ज्यामिति में प्रक्षेप
(पस्पेक्टिव) तथा वृत्त को वर्गरूप देने के सवालों का
अध्ययन किया था। नाटक के अभिनय को लेकर प्रक्षेप
की समस्याओं ने जन्म लिया था और वृतको 'वर्गाकार'
देने का सवाल तो प्राचीन जगत का एक बहुत ही,
महत्त्वपूर्ण सवाल रहा । वृत्त.को वर्गरूप देने का अर्थ
है: किसी दिए हुए वृत्त के आधार पर, केवल कंपास तथा
स्केल की सहायता से, वृत्त के बराबर के क्षेत्रफलवाली
एक वर्गाकृति तैयार करना ।
.
ज्यामिति की पहानी /47

x
x
x
देमोक्रितु का नाम बहुतों ने सुना होगा। देमोक्रितु का
नहीं,तो'परमाणु' शब्द तोजरूरही सुना होगा। पदार्थ
की सबसे छोटी इकाईको परमाणु कहते हैं। परमाणु के
लिए यूनानी शब्द है, एटम। एटम अर्थात् "जिसका
विभाजनसंभव नहीं' । पाश्चात्य जगत में देमोक्रितु को
परमाणु सिद्धांत (एटमिक थ्योरी) का जन्मदाता माना
जाता है। हमारे देश में परमाणु सिद्धांत के जन्मदाता थे
कणाद । अनीश्वरवादी वैशेषिक दर्शन के प्रतिपादक
कणाद मुनि का असली नाम क्या था, यह हम नहीं
जानते। कणाद की मान्यता थीं किविश्वकेसभी पदार्थों
की रचना कणों से हुई है। उनके समकालीन जो लोग
उनके इस मत को नहीं मानते थे, उन्होंने उनका नामही
रख दिया: कणाद अर्थात् 'कणों को खानेवाला'!
देमोक्रितु का समय लगभग 460-370 ई. पू. है।
देमोक्रितुने मिस,बेबीलोन, ईरान आदिदेशों की यात्राएँ
की थीं। कुछ विद्वानों के अनुसार देमोक्रितु मारत भी
आया था।
यूँ तोदेमोक्रितुपरमाणु सिद्धांत के जन्मदाता के रूप
में अधिक प्रसिद्ध हैं, परंतु उन्होंनेज्यामिति के क्षेत्र में भी
महत्त्वपूर्ण काम किया है। आर्किमीदिज़ने लिखा है कि
देमोक्रितु ने ही सर्वप्रथम ज्यामिति के इन दो महत्त्वपूर्ण
प्रमेयों को सिद्ध किया था:
1. किसी भी शंक (कोण) का आयतन, समान
48/ज्यामिति की कहानी

आधार तथा ऊँचाईवाले सिलिंडर के आयतन
के, तृतीयांश होता है।
2. किसी भी सूचीस्तंभ (पिरामिड) का आयतन,
समान आधार तथा ऊँचाईवाले प्रिज्म के आयतन
के, तृतीयांश होता है।
देमोक्रितु द्वारा खोजे गए इन ज्यामितीय नियमों की
सिद्धियों का परिष्कार यूक्लिड ने किया था।
x
x
x
यूनान में हिप्पोक्रेत्त नाम का एक प्रसिद्ध वैद्य हुआ है।
परंतु हिप्पोक्रेत नाम का एक यूनानी गणितज्ञ भी हुआ
है। इस गणितज्ञ हिप्पोक्रेत का समय है लगभग 470-
400 ई.पू.; अर्थात्, यूक्लिड से कोई सौ साल पहले।
हिप्पोक्रेतने ज्यामिति पर एक पुस्तक लिखी थी, जिसका
नाम था 'ज्यामिति के मूलतत्त्व' ।
यूनानी लोग अनेक देवी-देवताओं को मानते थे।
इनमें एक प्रमुख देवता था एपोलो। इन देवताओं की
ओर से कुछ खास व्यक्ति भविष्यवाणी' करते थे। ई.पू.
430 में देलोस द्वीप में प्लेग फैला, तो उसके निवारण के
लिए एपोलो के भविष्यवक्ता से उपाय पूछा गया । देवता
की ओर से आदेश सुनाया गया-देवता की वेदी का
आकार दुगुना कर देने से इस महारोग का निवारण हो
सकेगा!"
भारत की प्राचीन ज्यामिति की चर्चा करते समय हम
बतला चुके हैं कि वेदियों के निर्माण के साथ ही भारत में
ज्यामिति की कहानी /49

x
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देमोक्रितु का नाम बहुतों ने सुना होगा। देमोक्रितु का
नहीं,तो 'परमाणु' शब्द तोजरूरहीसुना होगा । पदार्थ
की सबसे छोटी इकाईको परमाणुकहते हैं। परमाणु के
लिए यूनानी शब्द है, एटम । एटम अर्थात् 'जिसका
विभाजन संभव नहीं'। पाश्चात्य जगत में देमोक्रितु को
परमाणु सिद्धांत (एटमिक थ्योरी) का जन्मदाता माना
जाता है। हमारे देश में परमाणु सिद्धांत के जन्मदाता थे
कणाद । अनीश्वरवादी वैशेषिक दर्शन के प्रतिपादक
कणाद मुनि का असली नाम क्या था, यह हम नहीं
जानते । कणाद की मान्यता थी किविश्वकेसभीपदार्थों
की रचना कणों से हुई है। उनके समकालीन जो लोग
उनके इस मत को नहीं मानते थे, उन्होंने उनका नाम ही
रख दिया: कणाद अर्थात् 'कणों को खानेवाला'!
देमोक्रितु का समय लगभग 460-370 ई.पू. है।
देमोक्रितुने मिस,बेबीलोन, ईरान आदिदेशों की यात्राएं
की थीं। कुछ विद्वानों के अनुसार देमोक्रितु भारत भी
आया था।
यूँतो देमोक्रितुपरमाणु सिद्धांत के जन्मदाता के रूप
में अधिक प्रसिद्ध हैं, परंतु उन्होंनेज्यामिति के क्षेत्र में भी
महत्त्वपूर्ण काम किया है। आर्किमीदिन ने लिखा है कि
देमोक्रितु ने ही सर्वप्रथम ज्यामिति के इन दो महत्त्वपूर्ण
प्रमेयों को सिद्ध किया था:
1. किसी भी शंक (कोण) का आयतन, समान
..
48/यामिविवीपानी

आधार तथा ऊँचाईवाले सिलिडर के आयतन
के, तृतीयांश होता है।
2. किसी भी सूचीस्तंभ (पिरामिड) का आयतन,
समान आधार तथा ऊँचाईवाले प्रिज्म के आयतन
के, तृतीयांश होता है।
देमोक्रितु द्वारा खोजे गए इन ज्यामितीय नियमों की
सिद्धियों का परिष्कार यूक्लिड ने किया था।
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।
यूनान में हिप्पोक्रेत नाम का एक प्रसिद्ध वैद्य हुआ
परंतु हिप्पोक्रेत नाम का एक यूनानी गणितज्ञ भी हुआ
है। इस गणितज्ञ हिप्पोक्रेत का समय है लगभग 470-
400 ई.पू.; अर्थात्, यूक्लिड से कोई सौ साल पहले।
हिप्पोक्रेत ने ज्यामिति पर एक पुस्तक लिखी थी,जिसका
नाम था 'ज्यामिति के मूलतत्त्व' ।
यूनानी लोग अनेक देवी-देवताओं को मानते थे
इनमें एक प्रमुख देवता था एपोलो। इन देवताओं की
ओर से कुछ खास व्यक्ति भविष्यवाणी करते थे । ई.पू.
430 में देलोस द्वीप में प्लेग फैला, तो उसके निवारण के
लिए एपोलो के भविष्यवक्ता से उपाय पूछा गया । देवता
की ओर से आदेश सुनाया गया-देवता की वेदी का
आकार दुगुना कर देने से इस महारोग का निवारण हो
सकेगा!
भारत की प्राचीन ज्यामिति की चर्चा करते समय हम
बतला चुके हैं कि वेदियों के निर्माण के साथ ही भारत में
।
ज्यामिति की कहानी /49
-

ज्यामिति की स्थापना हुई है। यूनान में भी देवी-देवताओं
के लिए वेदियाँ बनती थीं। एपोलो की वेदी घनाकार
(क्यूबिक) थी। भविष्यवक्ता के अनुसार इसी घनाकार
वेदी को दुगुने आकार का बनाना था। हिप्पोक्रेत ने इस
समस्या का हल खोज निकाला।
x
x
।
सभी संख्याएँ परिमेय नहीं होतीं। हम जान चुके हैं कि
किस प्रकार पाइथेगोर ने अपरिमेय संख्याओं की खोज की
थी। दरअसल, संख्या सिद्धांत आज उच्च अंकगणित का
विषय है। पुरंतु यूनान में ज्यामिति को ही विशेष महत्त्व
दिया जाता था और संख्याशास्त्र का अध्ययन ज्यामिति
की सहायता से होता था। भारत की तरह यूनान में
बीजगणित का अधिक विकास नहीं हो पाया था।
आज तो हम सभी संख्याओं को केवल दस
अंक-संकेतों की सहायता से लिखते हैं। इस दाशमिक
स्थानमान अंक-पद्धति का आविष्कार हमारे देश में हुआ
था। आज संसार के सभी देशों में इस भारतीय
अंक-पद्धति का ही इस्तेमाल होता है। परंतु एक जमाना
ऐसा भी था, जब संसार की प्राचीन सभ्यताओं में विभिन्न
अंक-पद्धतियों का प्रचलन था। यूनानी गणितज्ञ ग्रीक .
वर्णमाला के अक्षरों से संख्याओं को लिखते थे।
साइरेन के निवासी थियोडोर ने अपरिमेय संख्याओं
का विशेष अध्ययन किया था। थियोडोर (जन्म:
लगभग 460 ई. पू.) ने 13, 15 तथा 17 तक की
50/ज्यामिति की कहानी

अवर्गीय संख्याओं की अपरिमेयता सिद्ध की थी।
थियोडोर प्लेटो के गुरु थे।
इनके अलावा, यूक्लिड के ग्रंथ में थिएटेतु, (414-
369 ई.पू.) और आर्किटस की ज्यामितीय खोजों का भी
समावेश है।
परंतु यूक्लिड के जीवन तथा कृतित्व की दृष्टि से
उस विद्यालय का विशेष महत्त्व है जिसमें उन्होंने
अध्ययन किया था। हम बता चुके हैं कि यूक्लिड जिस
विद्यालय में अध्ययन करते थे. उसके प्रवेशद्वार पर
लिखा हुओं थाः
जो व्यक्ति ज्यामिति से अनभिज्ञ है, उसे इस
विद्यालय में प्रवेश मना है।
हम यह भी जान चुके हैं कि इस विद्यालय की
स्थापना प्लेटो (अफलातून) ने की थी। प्लेटो और
उनके विद्यालय के बारे में कुछ बातें जानना जरूरी है।
इस विद्यालय में यूनान के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने अध्ययन
किया था । यूनानी ज्यामिति के विकास में इस विद्यालय
ने महत्त्वपूर्ण योग दिया है।
ज्यामिति की कहानी /1

प्लेटो की अकादमी
-
प्लेटो की 'अकादमी' एक विशेष प्रकार की शिक्षा का
केद्र थी। यूक्लिड इसी अकादमी के विद्यार्थी थे
विद्यार्थी का अर्थ भी आजकल के विद्यार्थियों जैसा नही
हैं। हम जानते हैं कि आजकल विद्यार्थियो पर कितनी
अधिक पाबंदियाँ लगाई जाती हैं। स्कूल के नियमों का
पालन करना पड़ता है, रोज हाजरी लगती है, अनेक
विषय पढ़ने पड़ते हैं। हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति का
सबसे बडा दोष तो यह है कि साल-भर पढ़े हुए एक-एक
विषय की परीक्षा केवल तीन घंटों मे देनी पड़ती है।
परंतु प्लेटो की अकादमी में आज जैसी व्यवस्था नहीं
थी। दूर-दूर से विद्यार्थी प्लेटो की अकादमी में पढने
आते थे। वे किसी प्रकार के लोभ से नहीं आते थे।
अकादमी में न तो कोई इम्तहान होता था, और न किसी
प्रकार का सर्टिफिकेट दिया जाता था। इस बात की भी
कोई गारंटी नहीं थी कि प्लेटो की अकादमी में शिक्षा
प्राप्त करने के बाद कोई बड़ी सरकारी नौकरी मिल ही
जाएगी। दरअसल, विद्यार्थी अकादमी में इसीलिए आते
१/ज्यामिति की कहानी

थे कि उन्हें असली ज्ञान प्राप्त हो।
जहाँ तक स्वयं प्लेटो की बात है, वह गणित की
शिक्षा पर अधिक जोर देते थे। उन्होंने तो यहाँ तक कहा
था कि राजनीति की शिक्षा के लिए भी गणित
परमावश्यक है, और इसके लिए ऐसा कानून बनना
चाहिए कि राजकीय व्यक्ति गणितशास्त्र का अवश्य
अध्ययन करें। आजकल के शासकों को यदि यह बात
कही जाए तो पता नहीं वे क्या सोचेंगे।
गणित दो प्रकार का होता है-विशुद्ध गणित और
उपयोगी गणित । प्लेटो की शिक्षाओं में विशुद्ध गणित
को ही अधिक महत्त्व दिया जाता था। सच तो यह है कि
यूनानी गणितज्ञ विशुद्ध गणित के अध्ययन की ओर ही
ज्यादा झुके हुए थे। प्लेटो ने तो यहाँ तक कहा था कि
ईश्वर हमेशा ज्यामिति के ही निर्माण में मग्न रहता है,
अर्थात् ईश्वर एक महान गणितज्ञ है !
प्लेटो एक महान दार्शनिक के रूप में अधिक प्रसिद्ध
हैं। परंतु उन्हें हमें एक महान गणितज्ञ-दार्शनिक ही
मानना चाहिए। प्लेटो ने स्वयं किसी गणितीय सिद्धांत
की खोज शायद नहीं की, परंतु यूनानी गणित को उन्होंने
एक मजबूत नींव पर खडा करके गणितशास्त्र को एक
नई दिशा प्रदान की।
गणित क्या है
गणित तर्कशास्त्र है। संपूर्ण गणित तार्किक सूत्रों से
बँधा हुआ है। प्लेटो ने गणित को तर्क का जामा
पहनाकर यूनानी गणित को एक निश्चित परंपरा की
ज्यामिति की कहानी /53
-

प्लेटो (अफलातून)
ओर आगे बढ़ाया । यूक्लिड इसी परंपरा में पैदा हुए थे।
यूक्लिड़ पर प्लेटो की शिक्षाओं का कितना अधिक
प्रभाव पड़ा है, इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
प्लेटो स्वयं बहुत बड़े गणितज्ञ नहीं थे, परंतु
पाश्चात्य जगत के प्राचीन गणित पर उनके दार्शनिक
विचारों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। प्रोक्लुस ने
यूक्लिड की ज्यामिति की प्रथम पुस्तक पर एक टीका
लिखी थी। उस टीका में उन्होंने लिखा है:
"प्लेटो ने गणित, विशेषतः ज्यामिति, की उन्नति में
महत्त्वपूर्ण योग दिया है। उनकी पुस्तकों में दार्शनिक
.
54/ज्यामिति कीकहानी
7

विचारों के साथ-साथ गणित. उदाहरणों की भरमार
मिलती है।"
हम बता चुके हैं कि यूक्लिड की आरंभिक शिक्षा
प्लेटो की इसी अकादमी में हुई थी। मैं तो चाहता हूँ कि
अब आगे केवल यूक्लिड के बारे में ही बताता चलूँ।
परंतु मेरे दिमाग में एक यूनानी महापुरुष का नाम मंडरा
रहा है। यूँ तो उनके बारे में बहुत कम लोगों को
जानकारी होगी, परंतु वह यूनान के, एक बहुत बड़े
गणितज्ञ थे। उनकी पढ़ाई भी प्लेटो की अकादमी में ही
हुई थी। और, गणित में उन्होंने जो चीजें खोजी हैं,
उनका समावेश यूक्लिड ने अपने ग्रंथ में किया है।
इसलिए भी उस यूनानी गणितज्ञ के बारे में कुछ बातें
जानना जरूरी है।
।
ज्यामिनि की कहानी155

यूनानी गणित का मुकुट उस यूनानी गणितज्ञ का नाम था यूदोक्सु-क्निदेस- निवासी यूदोक्सु। अत्यंत गरीब घर में पैदा होने पर भी यूदोक्सु प्लेटो की अकादमी में पढ़ने के लिए एथेन्स नगर आया था। अपनी गरीबी के कारण वह अकादमी के नज़दीक की धनी बस्ती में नहीं रह सकता था। वह एथेन्स के बदरगाह के नज़दीक की पिरेयु बस्ती में रहता था। वहाँ भोजन तथा निवास दोनों सस्ते थे। प्लेटो स्वयं बहुत बड़े गणितज्ञ नहीं थे। परंतु प्लेटो को हमें 'गणितज्ञों का निर्माता' तो मानना ही होगा। यूदोक्सु के निर्माण में भी प्लेटो का ही हाथ था। प्लेटो की अकादमी की स्थापना (387 ई.पू.) के तीन वर्ष बाद, 23 वर्ष की आयु में, यूदोक्सु अकादमी में अध्ययन करने आए थे। प्लेटो ने यूदोक्सु की प्रतिभा को पहचाना। कहा जाता है कि इन दोनों ने मिलकर मिस्र देश की यात्रा भी की थी। उस समय यूदोक्सु के साथ एक और प्रसिद्ध यूनानी गणितज्ञ आर्किटस (428-347 ई.पू.) भी प्लेटो । 56/ज्यामिति की कहानी

1
की अकादमी में अध्ययन कर रहे थे। यूदोक्सु का जन्म
408 ई.पू. में हुआ था और मृत्यु,53 वर्ष की आयु में,
355 ई. पू. में हुई।
आधुनिक युग के कुछ विद्वानों ने यूदोक्सु को यूनानी
गणित का मुकुट' कहा है। यूदोक्सु के जीवन काल में
उनकी प्रतिभा को शायद किसी ने नहीं पहचाना, परंतु
आज हम उनकी देन का सही मूल्यांकन कर सकते हैं।
हम बता चुके हैं कि पाइथेगोर ने ऐसी संख्याओं
(अपरिमेय) कीखोज की थी जिनका मापन संभव नहीं
है। इन अपरिमेय संख्याओं की खोज से गणितशास्त्र में
एक नई उथल-पुथल मची । यदि दो रेखाएँ या दो दूरियाँ
परिमेय हों तो उनके अनुपातों (रेशिओ) का गणित
आसानी से समझ में आ जाता है। परंतु ये रेखाएँ या
दूरियाँ अपरिमेय हों, तो अनुपात संबंधी परिकर्म
कठिनाई पैदा करते हैं । यूदोक्सु ने इसी कठिनाई को दूर
किया। उन्होंने अपरिमेय संख्याओं के इस्तेमाल को
बहुत आसान बना दिया। यूदोक्सु ने एक नए अनुपात
सिद्धांत' (थ्योरी आफ प्रोपोनि) को जन्म दिया।
यूक्लिड ने अपने ज्यामिति के ग्रंथ की 5वीं पुस्तक में
यूदोक्सु के इस अनुपात सिद्धांत' का इस्तेमाल किया है।
यूक्लिड की 5वीं पुस्तक को पढते समय हमें यह ध्यान में
रखना चाहिए कि इसका असली निर्माता यूक्लिड नहीं,
बल्कि यूदोक्स है।
एक सवाल है :किसी आयत का क्षेत्रफल ज्ञात करने
के लिए हम क्या करते हैं ?
.
ज्यामिति घी कहानी /57

हम आयत की दो संलग्न भुजाओं को गुणा करेंगे।
भुजाओ का मान परिमेय हो तो दो सख्याओं का गुणन
आमान है । परतु भुजाओं का मान अपरिमेय हो तो गुणन
कैसे होगा?
वक्र रेखाओं तथा वक्र सतहों को मापते समय
कठिनाई और भी अधिक बढ़ जाती है। इस प्रकार के
प्रश्नों को हल करने के लिए यूदोक्स ने एक विशेष विधि
का आविष्कार किया। इस विधि का ही यूक्लिड ने अपने
ग्रंथ में क्षेत्रफल तथा आयतन ज्ञात करने में इस्तेमाल
किया है।
यूदोक्सु अंतरिक्षयात्रा में बेहद रुचि रखते थे।
उन्होंने कहा था : "पाइथोन (जिसने एपोलो देवता के
घोड़ों को सूर्य के बहुत नज़दीक पहुँचा दिया था !) की
तरह मैं भी खुशी-खुशी जल जाने को तैयार हूँ, यदि
इससे मुझे सूर्य को नज़दीक से देखने तथा इसका परीक्षण
करने का अवसर मिल जाए।
कहा जाता है कि एक ऊंचे पहाड पर आकाश के
तारों का अवलोकन करते-करते यूदोक्सु बूढ़े हो गए !
58/ज्यामिति की कहानी

ज्यामिति की आधारशिला
अव हमें उस क्ति के बारे में जानना है जिसने यूक्लिड
को सबसे अधिक प्रभावित किया।
क्या नाम था उस व्यक्ति का?
उस यूनानी महापुरुष का नाम है अरस्तू या
अरिस्टोटल।
प्राचीन यूनान के सबसे प्रसिद्ध तीन व्यक्ति हैं-
सुकरात, अफलातून और अरस्तू। अफलातून (प्लेटो)
मुकरात के शिष्य थे और अरस्तू अफलातून के शिष्य ।
प्लेटो तथा उनकी अकादमी के बारे में हम बता ही चुके
अरिस्टोटल अर्थात् अरस्तू का जन्म, यूनान के
स्तागिरा नगर में 384 ई.पू. में हुआ था । अरस्तू के पिता
मकदूनिया के राजा के मित्र तथा चिकित्सक थे । अरस्तू
का बचपन भी मकदूनिया में बीता । बड़े होने पर अरस्तु
प्लेटो की अकादमी में अध्ययन करने एथेन्स गए । महाँ
उन्होंने 20 वर्ष तक अध्ययन किया।
अलेक्जेंडर (सिकंदर) के बारे में हम कुछ बातें बता

। चुके हैं । वही अलेक्जेंडर जिसने नील नदी के मुहाने पर अलेक्जेंड्रिया नगर की स्थापना की थी। अलेक्जेंडर के पिता का नाम था फिलिप । राजा फिलिप ने अरस्तू को तरुण अलेक्जेंडर का शिक्षक नियुक्त किया । अलेक्जेंडर कितना भाग्यशाली था कि उसे अरस्तू जैसा विद्वान गुरु मिला था ! अरस्तू बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वह एक महान दार्शनिक के रूप में प्रसिद्ध हैं। वह एक भौतिकर्वेत्ता, खगोलवेत्ता, चिकित्सक, जीववेत्ता, तर्क- . अरस्तू 50/ज्यामिति की बहानी

शास्त्री तथा गणितज्ञ थे। प्लेटो की अकादमी की तरह
अरस्तू ने भी एथेन्स नगर में एक नए विद्यालय की
स्थापना की। अरस्तू का यह विद्यालय लाइसियम के
नाम से प्रसिद्ध था।
अव हमें यह देखना है कि यूक्लिड अपनी ज्यामिति'
के लिए अरस्तू का कितना ऋणी है।
प्रारंभिक ज्यामिति की किसी भी पुस्तक में हम देखते
हैं कि यह परिभाषाओं (डेफिनिशंज) से शुरू होती है।
परिभाषाएं शुरू होती हैं:
1. बिंदु वह है जिसका न कोई अंश होता है, और न
परिमाण।
2. चौड़ाई रहित लंबाई को रेखा कहते हैं।
3. रेखा के सिरे बिंदु होते हैं; इत्यादि ।
उपर्युक्त कथनों में विदु, रेखा आदि के बारे में कुछ
ठोस बातें कही गई हैं। विदु,रेखा आदि ऐसी धारणाएं हैं
जिनसे समस्त ज्यामिति की रचना होती है।
अव मान लो कि ज्यामिति या कोई भी अन्य विज्ञान
एक विशाल भवन है। भवन के निर्माण में प्रमुख बातें
क्या हैं ? सबसे प्रमुख बात है भवन की नींव । हम सभी
जानते हैं कि नींव मजबूत हो तो भवन अधिक दिनों तक
कायम रहेगा । नींव के साथ-साथ हमें उन वस्तुओं पर
भी विचार करना पड़ेगा जिनसे भवन का निर्माण होता
आजकल भवन के निर्माण में जिन चीजों की
-
.

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निर्माण करने के पहले इसकी एक सुनियोजित योजना
तैयार करनी पड़ती है। इस भवन की 'नींव' के बारे में
गंभीरता से सोचना पडता है। नींव जितनी ही मज़बूत
होगी, भवन उतना ही अधिक दिनों तक कायम रहेगा।
यूक्लिड की ज्यामिति की परिभाषाएं,
अभिधारणाएँ (पोस्टुलेट्स) तथा स्वयंतथ्य ज्यामिति
की नींव हैं । इसी नींव पर यूक्लिड ने अपनी ज्यामिति के
ग्रंथ की भव्य इमारत खड़ी की।
परिभाषाएँ किसी विशेष विज्ञान के विषयों की
मौलिक बातों का अर्थ स्पष्ट करती हैं या इसकी सीमाएँ
निर्धारित करती । इसीलिए यूक्लिड ने सबसे पहले
बिदु, रेखा आदि ज्यामितीय धारणाओं की व्याख्या की
है। किसी भी विज्ञान के लिए पहले परिभाषाओं की
जरूरत होती है, इस बात पर अरस्तूने ही जोर दिया था ।
उसने कहा था कि ज्यामिति के लिए बिंदु, रेखा आदि
जैसी मूल धारणाओं को स्वीकार कर लेने से काम चल
सकता है। तदनंतर, इन मूल धारणाओं से निर्मित
प्रत्येक आकृति-त्रिकोण, आयत और उनके गुणधर्म-का
अस्तित्व सिद्ध करना होता है। मूल धारणाओं से
आकृतियों के निर्माण की अरस्तू की इस पद्धति का ही
यूक्लिडने अनुकरण किया है। इसके माने यह नहीं हैं कि
ज्यामिति की नींव की सभी बातें अरस्तू की देन हैं । ऊपर
जो तीन परिभाषाएँ दी गई हैं, वे अवश्य अरस्तू की देन
हैं। परंतु यूक्लिडने और भी अनेक परिभाषाएँ दी हैं और
.
1
ज्यामिति की यहानी/63

आवश्यकता होती है, उनमें प्रमुख हैं सीमेंट, लोहा, ईटें
या पत्थर, बालू इत्यादि । हम यह भी जानते हैं कि यह
सब सामग्री विभिन्न स्थानों से तैयार होकर आती है।
भवन बनाने के लिए जिन सैकड़ों लोगों से काम लिया
जाता है, वे अधिकतर साधारण मज़दूर होते हैं। उनका
काम होता है, बताया गया काम करना । आजकल
बड़े-बड़े नगरों में जिन बड़े-बड़े भवनों का निर्माण होता
है और वहाँ पर जो सैकड़ों मजदूर काम करते हैं वे उस
भवन की योजना नहीं बना सकते। भवन की योजना
बनानेवाला व्यक्ति दूसरा ही होता है।
ज्यामिति एक बहुत बड़ा भवन है। ज्यामिति के
अनेक प्रमेय, कृत्य तथा सिद्धांत इस भवन की ईटें, लोहा
तथा सीमेंट हैं। जिस प्रकार ईटें, लोहा तथा सीमेंट
विभिन्न स्थानों पर विभिन्न लोगों द्वारा तैयार होकर
भवन-निर्माण के स्थान पर पहुँचते हैं, उसी प्रकार .
ज्यामिति के विभिन्न प्रमेय तथा सिद्धांत विभिन्न देशों के
विभिन्न विद्वानों ने खोज निकाले थे।
अब जरूरत थी ज्यामिति का एक मज़बूत महल
तैयार करने की। अब जरूरत थी एक ऐसे 'दिमाग' की
जो उपलब्ध सामग्री को एकत्र करके एक महल की
योजना तैयार कर सकें।
ज्यामिति के महल की योजना तैयार की
यूक्लिड ने।
विज्ञान का हर विषय एक भवन है। इस भवन का
62/ज्यामिनि की कहानी

। निर्माण करने के पहले इसकी एक सुनियोजित योजना तैयार करनी पड़ती है। इस भवन की 'नींव' के बारे में गंभीरता से सोचना पड़ता है। नींव जितनी ही मज़बूत होगी, भवन उतना ही अधिक दिनों तक कायम रहेगा। यूक्लिड की ज्यामिति की परिभाषाएँ, अभिधारणाएँ (पोस्टुलेट्स) तथा स्वयंतथ्य ज्यामिति की नींव हैं। इसी नींव पर यूक्लिड ने अपनी ज्यामिति के ग्रंथ की भव्य इमारत खड़ी की। परिभाषाएँ किसी विशेष विज्ञान के विषयों की मौलिक बातों का अर्थ स्पष्ट करती हैं या इसकी सीमाएँ निर्धारित करती हैं। इसीलिए यूक्लिड ने सबसे पहले बिंदु, रेखा आदि ज्यामितीय धारणाओं की व्याख्या की है। किसी भी विज्ञान के लिए पहले परिभाषाओं की जरूरत होती है, इस बात पर अरस्तू ने ही जोर दिया था। उसने कहा था कि ज्यामिति के लिए बिंदु, रेखा आदि जैसी मूल धारणाओं को स्वीकार कर लेने से काम चल सकता है। तदनंतर, इन मूल धारणाओं से निर्मित प्रत्येक आकृति-त्रिकोण, आयत और उनके गुणधर्म का अस्तित्व सिद्ध करना होता है। मूल धारणाओं से आकृतियों के निर्माण की अरस्तू की इस पद्धति का ही यूक्लिडने अनुकरण किया है । इसके माने यह नहीं हैं कि ज्यामिति की नींव की सभी बातें अरस्तू की देन हैं। ऊपर जो तीन परिभाषाएँ दी गई हैं, वे अवश्य अरस्तू की देन हैं। परंतु यूक्लिड ने और भी अनेक परिभाषाएँ पोह- ज्यामिति की

.
.
उन्हें अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।
परिभाषाओं के बाद यूक्लिड ने कुछ अभिधारणाएं
(पोस्टुलेट्स) दी हैं । इन अभिधारणाओं को देने के पहले
उन्होंने कहा है:
हम इसे मान लेंगे, कि
अर्थात्, जो अभिधारणाएं दी गई हैं वे, विना किसी
सिद्धि के, हमें स्वीकार कर लेनी हैं। ये अभिधारणाएँ
केवल एक विशेष विषय से संबंधित होती हैं । ये एक ही
विषय से सीमित होती हैं। स्वयंतथ्यों की तरह
अभिधारणाएँ सार्वभौमिक कथन नहीं होती। ज्यामिति
की अभिधारणाएं रेखाओं, वृत्तों, कोणों आदि से संबंधित
होती हैं।
यूक्लिड ने अपने ग्रंथ के आरंभ में जो पांच
अभिधारणाएं दी हैं, उनमें पाँचवीं अभिधारणा अत्यंत
महत्त्व की है। आगे जाकर इसके बारे में हम बहुत-सी
बातें जानेंगे।
परिभाषाओं तथा अभिधारणाओं के बाद यूक्लिडने
कुछ स्वयंतथ्य (एक्सिओम्स) दिए हैं। यूनानी भाषा में
'एक्सिओम' का अर्थ होता है, 'सम्मान करने योग्य'।
विज्ञान में तथा ज्ञान की अन्य शाखाओं में इन
'स्वयंतथ्यों को, बिना किसी हिचक के, स्वीकार कर
लिया जाता है। ये सार्वभौमिक होते हैं । ये अपने-आप में
परिपूर्ण होते हैं । इन्हें सिद्ध करने की जरूरत नहीं होती।
कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इन्हे सुनेगा तो वह इन्हें फौरन
64/ज्यामिति की कहानी

स्वीकार कर लेगा। उदाहरण के लिए, इसे स्वयंतथ्य को.
ही लो:
यदि समान वस्तुओं में से समान वस्तुएँ निकाल ली
जाएँ, तो समान वस्तुम्ही शेष रहती हैं।
क्या हम इस कथन पर विश्वास नहीं करेंगे? यदि
पाँच-पाँच किलोग्राम तौल की दो वस्तुओं से समान रूप
से दो-दो किलोग्राम तौल की वस्तुएँ निकाल ली जाएँ, तो
दोनों समूहों में समान रूप से तीन-तीन किलोग्राम तौल
की ही वस्तुएँ शेष रहेंगी।
ऊपर जो स्वयंतथ्य दिया गया है, वह यूक्लिड की
ज्यामिति का तीसरा स्वयंतथ्य है। अरस्तू इस स्वयंतथ्य
का अक्सर इस्तेमाल किया करते थे।
बहुत संभव है कि अपनी ज्यामिति को तार्किक
आधार देने की प्रेरणा यूक्लिड को अरस्तू ही से मिली
हो। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि ज्यामिति की
निगमनिक (डिडक्टिव) विधि का प्रतिपादन स्वयं
यूक्लिड की खोज है।
अरस्तू ने जीवशास्त्र के क्षेत्र में विज्ञान की बड़ी सेवा
की है। उन्हें प्रारंभिक ज्यामिति की भी बहुत सी बातें
ज्ञात थीं। अरस्तूने गोल की परिभाषा दी है : "गोल ऐसी
आकृति है जिसकी सभी त्रिज्याएँ समान होती हैं।" परंतु
यूक्लिड ने गोल की परिभाषा दी है: "अर्धवृत्त द्वारा
इसके अपने व्यास पर परिक्रमण से निर्मित आकृति गोल
है।" यूक्लिड की यह और अन्य अनेक परिभाषाएँ
ज्यामिति की कहानी

अधिक सही हैं।
इस प्रकार, हम देखते हैं कि यूक्लिड अरस्तू
से
बेहतर ज्यामितिकार थे। यूक्लिड ने अपने समय तक
ज्ञात संपूर्ण ज्यामिति का संग्रह किया। संग्रह करने में
यूक्लिड की विशेषता नहीं है। संग्रह तो कोई भी
परिश्रमी व्यक्ति कर सकता था। यूक्लिड की सबसे बड़ी
विशेषता यह है कि उन्होंने इस ज्यामितीय ज्ञान को एक
ठोस तार्किक आधारशिला परखडा किया । ज्यामिति के
सिद्धांतों को एक विशिष्ट विधि का जामा पहनाया।
अरस्तू यूक्लिड के लगभग समकालीन ही थे।
अरस्तू की मृत्यु 322 ई. पू. में हुई। इस समय यूक्लिड
की उम्र लगभग 25 वर्ष की रही होगी। इसलिए यूक्लिड
पर अरस्तू के तार्किक चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ा है,
तो
कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
अब हम यूक्लिड की ज्यामिति के ग्रंथ के बारे में कुछ
बाते जानेंगे।
66/ज्यामिति की कहानी

'मापन'। इस प्रकार, ज्यामिति' का अर्थ होगा'भूमिका
यूक्लिड का ज्यामिति का ग्रंथ
यूक्लिड के ज्यामिति के ग्रंथ का नाम ज्यामिति नहीं है !
यूरोप की भाषाओं में यूक्लिड के ग्रंथ को 'एलिमेंट्स'
(मूलतत्त्व) नाम से जाना जाता है। परंतु यूक्लिड ने
अपने ग्रंथ को दूसरा ही नाम दिया था।
यूक्लिड ने अपना ग्रंथयूनानी (ग्रीक) भाषा में लिखा
था। इसलिए इस ग्रंथ का नाम भी कोई यूनानी शब्द ही
होना चाहिए।
यूक्लिड के ग्रंथ का असली नाम था: स्टोइकेइया ।
स्टोइकेइया यूनानी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ
होता है : 'किसी भी वस्तु की सबसे छोटी इकाई।
भाषाविद इस शब्द को 'सरलतम ध्वनि' या 'वर्णमाला
के एक अक्षर' के लिए इस्तेमाल करते थे।
यूक्लिड ने अपने ग्रंथ का नाम 'ज्यामिति' इसलिए
नहीं रखा कि इस शब्द का अर्थ बहुत सीमित है । 'ज्या
का अर्थ होता है 'भूमि' और 'मिति' का अर्थ होता है
..
-
नर
ज्यामिति की

।
अधिक सही हैं।
इस प्रकार, हम देखते हैं कि यूक्लिड अरस्तू से
बेहतर ज्यामितिकार थे। यूक्लिड ने अपने समय तक
ज्ञात संपूर्ण ज्यामिति का संग्रह किया। संग्रह करने में
यूक्लिड की विशेषता नहीं है। संग्रह तो कोई भी
परिश्रमी व्यक्ति कर सकता था। यूक्लिड की सबसे बड़ी
विशेषता यह है कि उन्होंने इस ज्यामितीय ज्ञान को एक
ठोस तार्किक आधारशिला पर खड़ा किया। ज्यामिति के
सिद्धांतों को एक विशिष्ट विधि का जामा पहनाया।
अरस्तू यूक्लिड के लगभग समकालीन ही थे।
अरस्तू की मृत्यु 322 ई. पू. में हुई। इस समय यूक्लिड
की उम्र लगभग 25 वर्ष की रही होगी। इसलिए यूक्लिड
पर अरस्तू के तार्किक चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ा है, तो
कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
अब हम यूक्लिड की ज्यामिति के ग्रंथ के बारे में कुछ
बाते जानेंगे।
66/ज्यामिति की कहानी

यूक्लिड का ज्यामिति का ग्रंथ
पिता के ज्यामिति के ग्रंथ का नाम 'ज्यामिति नहीं है!
पुरोष की भाषाओं में युक्लिड के ग्रंथको 'एलिमेंट्स'
(मनात्य) नाम से जाना जाता है। परंतु यूक्लिड ने
अपने अंप को दमग ही नाम दिया था।
परिरहने अपना ग्रंथ यूनानी (ग्रीक) भाषा में लिखा
भागलिए दग ग्रंथ का नाम भी कोई यूनानी शब्द ही
মা গান।
रिलाये ग्रंपचा असली नाम था स्टोइकेइया ।
माया पूनानी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ
Ent: किसी भी वस्तु की सबसे छोटी इकाई ।
पदम बाट यो 'गरलतम ध्वनि' या 'वर्णमाला
र' नाश्तेमाल करते थे।
ET ने अपने ग्रंप का नाम 'ज्यामिति' इसलिए
नीदमा अर्थ यहत सीमित है। ज्या'
TET efम' और 'मिति' का अर्थ होता है
'art सार, नामिति या अर्प होगा भूमिका
-
..
Airt161

..
मापन' ! अंग्रेजी का 'ज्यॉमिट्री' शब्द यूनानी शब्द
'जे-मेट्राइन' से बना है और इसका भी अर्थ होता है:जे-
भूमि और मेट्राइन = मापन।
हमारा आजकल का ज्यामिति शब्द ज्यॉमिट्री शब्द
की नकल पर बनाया गया है। पुराने जमाने मे हमारे देश
में ज्यामिति के लिए रेखागणित शब्द का इस्तेमाल
होता था।
किंतु यूक्लिड की ज्यामिति केवल 'भूमि का मापन'
नही थी। आजकल जिस विज्ञान से भूमि का मापन होता
है, उसे हम सर्वेक्षण (सर्वेइंग) कहते हैं। यूक्लिड की
ज्यामिति सर्वेक्षण-विज्ञान नहीं थी। हाँ, यूक्लिड के
पहले प्राचीन मिस्र में जिसज्यामिति का प्रचलन था, उसे
हम सर्वेक्षण जरूर मान सकते हैं। क्योंकि मिस्र की
प्राचीन ज्यामिति केवल भूमिमापन से संबंधित थी।
यूक्लिड की ज्यामिति को आज हम 'ज्यामिति के
मूलतत्त्व' या 'प्राथमिक ज्यामिति' के नाम से जानते हैं।
यह नाम इसलिए कि यूक्लिड अपनी ज्यामिति से इस
विज्ञान की कुछ प्रारंभिक अथवा मूल बातों की व्याख्या
करना चाहते थे।
यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' सिद्धि अथवा साध्य के
मूलतत्त्व हैं । मूलतत्त्व विज्ञान के आधारस्तंभ होते हैं।
मूलतत्व में उन सभी बातों का समावेश होना चाहिए जो
उस विज्ञान के लिए परमावश्यक हों। साथ ही, उनमें
ऐसी किसी बात का समावेश नहीं होना चाहिए जो
65/ज्यामिनि वीकहानी

अनावश्यक हो । इसीलिए अरस्तू ने कहा था कि सिद्धि
के बेहतर होने के लिए जरूरी है कि अभिधारणाएँ तथा
परिकल्पनाएँ कम से कम हों। यूक्लिड ने ठीक यही
किया।
-
.
यूक्लिड का संपूर्ण ग्रंथ एक सूत्र में बँधा हुआ है।
ग्रंथ का आरंभ सरलतम धारणाओं की व्याख्याओं से
होता है। जैसे, बिंदु क्या है ? रेखा क्या है ? इत्यादि।
यूक्लिड ने अपने ग्रंथ के आरंभ में ही 23 परिभाषाएँ दी
हैं। ये परिभाषाएँ हमें बताती हैं कि रेखा, आकृति आदि
क्या होती हैं। परिभाषाओं के बाद अभिधारणाएँ तथा
स्वयंतथ्य हैं। इनके बारे में हम बता ही चुके हैं।
इसके बाद यूक्लिड प्रमेयों तथा प्रश्नों को आरंभ
करते हैं। इन प्रमेयों को मूल स्वीकृत धारणाओं से सिद्ध
किया जाता है। अभिधारणाओं तथा स्वयंतथ्यों से ही
यूक्लिड इन प्रमेयों की उपपत्ति सिद्ध करते हैं। यदि यह
मान लिया जाए कि आधारवाक्य (प्रेमिसेज़) सत्य हैं, तो
प्रमेय भी सत्य सिद्ध होंगे।
अभिधारणाओं तथा स्वयंतथ्यों द्वारा प्रश्न एवं प्रमेय
सिद्ध किए जाते हैं, उसे निरूपण कहते हैं।
यूक्लिड की ज्यामिति का ग्रथ 13 पुस्तकों या खंडों में
विभाजित है।
पहली पुस्तक मुख्यतः त्रिभुजों, समांतरों, समांतर
चतुर्भुजों, और उनके निर्माण तथा गुणधर्मों से संबंधित
है।
।
जिस अनुक्रम से
-
ज्यामिति की कहानी/69

.
दूसरी पुस्तक के विषय को हम ज्यामितीय
बीजगणित' का नाम दे सकते हैं । इस पुस्तक में बताया
गया है कि किसी भी आकार का रैखिक क्षेत्र किसी भी
आकार के समांतर चतुर्भुज में किस प्रकार रूपांतरित
किया जा सकता है। वस्तुतः आजकल इस पुस्तक का
विषय बीजगणित के क्षेत्र में आता है। चूँकि, भारतीयों
की तरह, यूनानी गणितज्ञ बीजगणित की क्रियाओं में दक्ष
नहीं थे, इसलिए वे बीजगणित के सूत्रों को ज्यामितीय
कृत्यों की सहायता से ही व्यक्त करते थे।
तीसरी पुस्तक 'वृत्त की ज्यामिति' से संबंधित है।
चौथी पुस्तक में वृत्त के बाहर तथा भीतर, परिधि
को स्पर्श करती हुई, अन्य आकृतियों-किसी भी आकार
के त्रिभुज तथा बहुभुज-के निर्माण के बारे में कृत्य हैं।
यहाँ पर हमें यह जान लेना चाहिए कि यूक्लिड की
ज्यामिति की पहली, दूसरी और चौथी पुस्तक को हम
'पाइथेगोरीय ज्यामिति' कह सकते हैं। इन पुस्तकों के
विषय पाइथेगोर अथवा उसके शिष्यों को निश्चित रूप
से ज्ञात थे। तीसरी पुस्तक के विषय भी यूक्लिड के पहले
के यूनानी विद्वानों को ज्ञात । बहुत संभव है कि तीसरी
पुस्तक की बातें भी पाइथेगोर अथवा उसके शिष्यों को
ज्ञात हों।
पाँचवीं पुस्तक में एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन है।
इस पुस्तक में व्यापक रूप से 'अनुपात सिद्धांत' (थ्योरी
आफ प्रोपोर्शन) की व्याख्या है। यह सिद्धांत परिमेय
70/ज्यामिति की कहानी

छठी पुस्तक
तथा अपरिमेय दोनों ही परिमाणों पर लागू होता है। इस
सिद्धांत को जन्म दिया था यूदोक्सुने । यूदोक्स के बारे में
हम पहले बता चुके हैं। यूनानी गणित के प्रसिद्ध विद्वान
सर थॉमस हीथ का तो यहाँ तक कहना है कि, यह
सिद्धांत यूनानी गणित का मुकुट है !
में इस अनुपात सिद्धांत का समतल
ज्यामिति में इस्तेमाल किया गया है।
सातवीं, आठवीं तथा नौवीं पुस्तकों का विषय है
संख्या सिद्धांत (थ्योरी आफ नंबर्स)।
दसवीं पुस्तक में अपरिमेय परिमाणों के सिद्धांत की
विशद व्याख्या है। इस पुस्तक के विषय के लिए
यूक्लिड, थियोडोर और थिएटेतु का ऋणी है। इन दोनों
गणितज्ञों के बारे में हम पहले बता चुके हैं।
ग्यारहवीं, बारहवीं तथा तेरहवीं पुस्तकें ठोस
ज्यामिति से संबंधित हैं। समठोसों-धन, पिरामिड,
अष्टफलक, द्वादशफलक तथा विंशतिफलक की चर्चा
के साथ तेरहवीं पुस्तक अर्थात् संपूर्ण ग्रंथ समाप्त होता
है। यूक्लिड की ज्यामिति के टीकाकार प्रोक्लुस (410-
485 ई.) ने लिखा है कि यूक्लिड अपनी तेरहवीं पुस्तक
को अर्थात् समठोसों की ज्यामिति को ज्यामितीय ज्ञान की
चरमोन्नति मानते थे। प्रोक्लुस ने यह भी लिखा है कि
यूक्लिड, जहाँ तक दार्शनिक विचारों की बात है, प्लेटो
के अनुयायी थे। परंतु अधिकांश विद्वान प्रोक्लुस के इस
कथन को सही नहीं मानते।
ज्यामिति की कहानी/71

समअष्टफलक
समद्वादशफलक
समचतुष्फलक
घन
समविशतिफलक
यूक्लिड के ग्रंथ में इन तेरह पुस्तकों के साथ
कभी-कभी दो और पुस्तको का समावेश किया जाता है।
दरअसल, इन पुस्तकों को यूक्लिड ने नहीं लिखा है।
कालांतर में ये पुस्तकें उनके ग्रंथ के साथ जोड़ दी गई
थीं। चौदहवीं पुस्तक, जिसका विषय ठोस ज्यामिति है,
ईसा की दूसरी शताब्दी में हिप्सीकल्स नामक गणितज्ञ
ने लिखी थी । इसी प्रकार, पंद्रहवीं पुस्तक छठी शताब्दी
के एक गणितज्ञ ने लिखी थी।
हमने जाना कि यूक्लिड की ज्यामिति में किन-किन
वषयों की चर्चा है। हाई स्कूल की कक्षाओं में आज जो
ज्यामिति पढ़ाई जाती है, वह यूक्लिड की ज्यामिति का
केवल एक अंश मात्र है।
हमने उन सभी यूनानी गणितज्ञों के बारे में बताया है
2/ज्यामिति की कहानी

1
जिनकी ज्यामिति का यूक्लिड ने अपने ग्रंथ में समावेश
किया।
अब हम 300 ई.पू. तक पहुँच गए हैं। विद्वानों का
अनुमान है कि लगभग 300 ई. पू. में यूक्लिड ने
अलेक्जेंड्रिया के विश्वविद्यालय में अपने इस ग्रंथ की
ग्चना की थी। इसका मतलब यह हुआ कि आज से
लगभग 2300 साल पहले यूक्लिड अपनी ज्यामिति की
रचना कर चुके थे।
अब हमारे दिमाग में प्रश्न उठ सकता है : क्या
यूक्लिड के बाद यूनान में ऐसा कोई गणितज्ञ नहीं हुआ
जिसने यूक्लिड की ज्यामिति में सुधार किया हो या नए
ज्यामितीय सिद्धांतों की खोज की हो?
जिस प्रकार 19वीं सदी के अंत तक यूक्लिड की
ज्यानिति यूरोप के देशों में पाठयपुस्तक के रूप में चलती
रही; उसी प्रकार यूक्लिड के बाद के यूनानी गणितज्ञों ने
भी इस ग्रंथ को पाठयपुस्तक के रूप में इस्तेमाल किया
था। इसका यह अर्थ नहीं है कि यूक्लिड के बाद यूनानी
गणितज्ञों ने ज्यामितीय ज्ञान में वृद्धि नहीं की। दरअसल,
यूक्लिड के बाद भी यूनान में बहुत बड़े गणितज्ञ हुए और
उन्होंने कई नए ज्यामितीय सिद्धांतों को जन्म दिया।
अब हम इनमें से कुछ गणितज्ञों के बारे में कुछ
मोटी-मोटी बातें जानेंगे।
-
ज्यामिति की कहानी/73

अरिस्टार्कस और आर्किमीदिज
यूक्लिड के पहले भी कुछ यूनानी गणितज्ञों ने 'ज्यामिति
के मूलतत्त्व'लिखने का प्रयत्न किया था, परंतु यूक्लिड के
'मूलतत्त्व' इतने अधिक वैज्ञानिक एवं परिष्कृत थे कि
उन्होंने अपने पहले की ज्यामिति की सभी पुस्तकों को
पछाड़ दिया। 300 ई. पू. के बाद के सभी गणितज्ञों ने
यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' का गंभीरता से अध्ययन किया ।
यूक्लिड के बाद के गणितज्ञों ने अपने ग्रंथों की रचना के
लिए 'मूलतत्त्व' के तार्किक ढाँचे का भी अनुकरण
किया।
यूक्लिड क बाद यूक्लिडीय विधि का सबसे पहले
अनुकरण करनेवाले महान यूनानी गणितज्ञ थे
सामोस-निवासी अरिस्टार्कस (लगभग 310-230 ई.
अरिस्टार्कस ने 'सूर्य तथा चंद्र की दूरियों तथा
आकारों के बारे में एक ग्रंथ लिखा था। इस ग्रंथ को
लिखने में उन्होंने यूक्लिड की विधि का अनुकरण
किया। यह ग्रंथ छह परिकल्पनाओं पर आधारित है।
74/ज्यामिति की कहानी

इनमें से कुछ परिकल्पनाएँ गलत हैं । पर अरिस्टार्कस की
खगोल संबंधी धारणाएँ अत्यंत महत्त्व की हैं।
ज्यामिति तथा त्रिकोणमिति की सहायता से
अरिस्टार्कस ने सूर्य तथा चंद्र की दूरियाँ तथा इनके
आकार जानने का प्रयत्न किया था। उनके नतीजे आज
की तुलना मे सही नहीं हैं, परंतु आज से लगभग 2250
वर्ष पहले सूर्य तथा चंद्र की दूरियाँ जानने के प्रयास ही
अपने आप में बड़ा महत्त्व रखते हैं।
प्रसिद्ध यूनानी गणितज्ञ आर्किमीदिज़ ने बड़े आदर
के साथ अरिस्टार्कस की खोजों का उल्लेख किया है।
उन्होंने लिखा है कि अरिस्टार्कस ने एक ग्रंथ लिखकर
उसमें बताया है कि यह विश्व बहुत बड़ा है । पृथ्वी इस
विश्व के केंद्र में नहीं है, बल्कि सूर्य ही विश्व का केंद्र है।
तारे तथा सूर्य स्थिर हैं और पृथ्वी वृत्ताकार कक्षा में सूर्य
की परिक्रमा करती है।
आज अरिस्टार्कस की यह पुस्तक नहीं मिलती।
परंतु आर्किमीदिज़ जैसे वैज्ञानिक ने इस पुस्तक का
उल्लेख किया है तो हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि
शुरू में अरिस्टार्कस की यह पुस्तक मौजूद रही है।
अरिस्टार्कस के पहले, और बाद में भी लगभग
1800 वर्षों तक, लोगों की, और बहुत-से वैज्ञानिकों की
भी, यह मान्यता रही है कि पृथ्वी ही विश्व का केंद्रस्थल
है और सूर्य तथा अन्य ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं ।
कोपर्निकस' (1473-1543 ई.) पहला वैज्ञानिक था
ज्यामिति की कहानी/15

जिसने अरिस्टार्कस की इन धारणाओं को पुनः
जीवित
किया। इसीलिए अरिस्टार्कस को 'प्राचीन काल का
कोपर्निकस' कहा जाता है।
महान यूनानी गणितज्ञ आर्किमीदिज़ का नाम सभी
ने सुना होगा । आर्किमीदिज़, थे तो साइराक्यूज़ (सिसिली
द्वीप) के निवासी, परंतु उनकी शिक्षा सिकंदरिया के
विश्वविद्यालय में हुई थी। आर्किमीदिज़ का जन्म 287
ई.पू. में हुआ था और मृत्यु 212 ई.पू. में । बहुत संभव
है कि आर्किमीदिज़ के जन्म के समय यूक्लिड अभी
जीवित थे। आर्किमीदिज़ ने यूक्लिड के किसी शिप्य से
ज्यामिति पढ़ी होगी।
आर्किमीदिज़ के भुलक्कड़ स्वभाव के बारे में सभी ने
एक-दो किस्से अवश्य सुने होंगे। वह किस्सा तो अवश्य
सुना होगा जिसमें वे नंगे ही साइराक्यूज़ की सड़क पर
दौड़ पड़ते हैं, चिल्लाते हुए-'यूरेका, यूरेका', अर्थात्
'मैंने पा लिया, मैंने पा लिया!'
आर्किमीदिज़ के बारे में कहा जाता है कि वे घंटों
समुद्र के किनारे बैठकर बालू पर रेखाएं खींचकर
ज्यामिति के सवाल करने में खो जाते थे। नहाने जाते
और उनके बदन पर तेल मला जाता तो बदन पर ही
उँगली से ज्यामिति की आकृतियाँ बनाने लग जाते!
आर्किमीदिज़ ने अनेक यांत्रिक आविष्कार किए थे।
परंतु वह स्वयं अपने इन यांत्रिक आविष्कारों को महत्त्व
नहीं देते थे। वह इन यांत्रिक आविष्कारों को 'ज्यामिति
का खेल' समझते थे। रोमन सेनापति मार्सेलस ने जब
.
ज्यामिति की कहानी

साइराक्यूज़ पर आक्रमण किया तो आर्किमीदिज़ ने
युद्ध-यंत्रों का निर्माण करके काफी समय तक अपने नगर
की रक्षा की थी। रोमन सिपाही आर्किमीदिज़ से बहुत
डरने लगे थे। वे आर्किमीदिज को 'ज्यामिति का
महादानव' कहने लगे थे।
आर्किमीदिज़
आर्किमीदिज ने विज्ञान के क्षेत्र में अनेक मौलिक
आविष्कारकिए। उन्होने समतल तथा ठोस ज्यामिति में
बहुत-सी नई बातें खोजीं। उन्होंने यांत्रिकी तथा द्रव
ज्यामिति की कहानी/77

स्थितिविज्ञान के सवालों के लिए ज्यामिति का इस्तेमाल
किया था। पहले के ज्यामितिकारों ने वृत्त को वर्ग में
बदलने की कोशिश की थी। आर्किमीदिज़ ने परवलय
(पैराबोला) को वर्गाकार देने का प्रयत्न किया। यूदोक्सु
तथा यूक्लिड ने गोल तथा सिलिंडर पर जो बाते लिखी
थीं, आर्किमीदिज़ ने उन बातों को आगे बढ़ाया। यूक्लिड
के 'मूलतत्त्व' की ज्यामिति को आगे बढ़ाकर आर्किमीदिज़
ने वक्र रेखाओं से आबद्ध समतल आकृतियों के क्षेत्रफलों
को ज्ञात करने की विधि खोज निकाली। इसी विधि का
विकास न्यूटन तथा लाइग्निट्ज ने किया और
कलनशास्त्र को जन्म दिया।
सिलिंडर तथा गोल के आयतन की अपनी खोज को
आर्किमीदिज़ बड़ा महत्त्व देते थे। इसीलिए उन्होंने.
इच्छा जाहिर की थी कि मृत्यु के बाद उनकी समाधि पर
सिलिंडर से घिरे हुए गोल की आकृति बना दी जाए!
आर्किमीदिज़ की इस अंतिम इच्छा से हम अंदाज़ा
लगा सकते हैं कि वे ज्यामिति से कितना प्यार करते थे।
यह भी अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यूक्लिड तथा उनके ग्रंथ
के लिए आर्किमिदिज़ के मन में कितना अधिक
आदरभाव रहा होगा ।
x
यूक्लिड के साथ यूनानी ज्यामिति का नया युग आरंभ
होता है और पेरगा-निवासी एपोलोनियस (लगभग 262-
190 ई.पू.) के माथ समाप्त हो जाता है। एपोलोनियम
ज्यामिति पीपहानी

की पढ़ाई भी सिकंदरिया के विश्वविद्यालय में हुई थी।
उन्होंने प्रारंभिक ज्यामिति पर एक ग्रंथ लिखा था, जिसमें
नई परिभाषाएँ, नए कृत्यों तथा कुछ स्वयंतथ्यों की
उपपत्तियाँ दी हुई हैं।
परंतु एपोलोनियस अधिक प्रसिद्ध हैं शांकवों
(कॉनिक्स) पर लिखी हुई अपनी कृति के लिए।
x
x
एपोलोनियस के बाद यूनानी ज्यामिति में कोई विशेष
मौलिक कार्य नहीं हुआ। हाँ, कई यूनानी गणितज्ञों ने
यूक्लिड की ज्यामिति पर टीकाएँ अवश्य लिखीं।
सिकंदरिया के हेरोन ने यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' पर टीका
लिखी और यूक्लिड का अनुकरण करते हुए परिभाषाओं
पर भी एक पुस्तक लिखी। वैसे, विज्ञान के इतिहास में
हेरोन 'टरबाइन के जनक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने
भाप से चलनेवाला एक यंत्र भी बनाया था।
x
महान खगोलवेत्ता तोलेमी (ईसा की दूसरी सदी) ने अपने
ज्योतिष सिद्धांत के लिए यूक्लिड की ज्यामिति का
इस्तेमाल किया था। तोलेमी अलेक्जेंड्रिया के निवासी थे।
उन्होंने ज्योतिष सिद्धांतों पर एक महान ग्रंथ की रचना
की थी। यह ग्रंथ यूनानी भाषा में सिन्टेपिसस और
अरबी में अल-मजिस्ती के नाम से मशहूर है।
तोलेमी ने यूक्लिड की ज्यामिति का गहरा अध्ययन
ज्यामिति की कहानी/70

किया था। उन्होंने 'मूलतत्त्व' की 5वीं अभिधारणा को
भी सिद्ध करने का प्रयास किया था। तोलेमी पहले
यूनानी वैज्ञानिक थे जिन्होंने अपने सिद्धांतों के प्रतिपादन
में त्रिकोणमिति का उपयोग किया।
तोलेमी ने उस समय के सभ्य संसार के भूगोल के
बारे में भी एक ग्रंथ लिखा था । इस ग्रंथ में भारत के बारे
में जो जानकारी है, वह बड़े महत्त्व की है।
सिकंदरिया-निवासी पाप्पुस् (लगभग 300 ई.) के साथ
यूनानी ज्यामिति में एक नई चेतना आई। पाप्पुस्
ने
'संग्रह' नाम से एक ग्रंथ लिखा, जिससे यूनानी ज्यामिति
के इतिहास के बारे में बहुत-सी महत्त्व की बाते मालूम
होती हैं । पाप्पुसू ने बताया कि ज्यामिति को अच्छी तरह
समझने के लिए यूक्लिंड तथा एपोलोनियस के ग्रंथों का
अध्ययन करना जरूरी है। उन्होंने 'मूलतत्त्व' के अलावा
यूक्लिड की अन्य पुस्तकों की भी जानकारी दी है।
पाप्पुस् ने यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' पर टीका भी लिखी थी।
प्रोक्लुस (410-485 ई.) गणितज्ञ की अपेक्षा एक
दार्शनिक के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं। फिर भी, प्रोक्लुस
ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिसकी कृति में हमें यूक्लिड
के बारे मे थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है। इसमें
यूनानी गणित के इतिहाम की भी जानकारी मिलती है।
10/ज्यामिति की कहानी

प्रोक्लस ने यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' पर एक टीका
लिखी थी। इसी टीका के एक अंश में उन्होंने यूनानी
ज्यामिति का इतिहास दिया है। इसी में उन्होंने यूक्लिड
के बारे में जानकारी दी है।
यूक्लिड मुख्यतः अपने 'मूलतत्व के लिए ही प्रसिद्ध
थे। हम बता ही चुके हैं कि यूनानी भाषा में यूक्लिंड की
ज्यामिति का नाम था स्टोइकेइया।
यह ग्रंथ इतना अधिक प्रसिद्ध था कि आर्किमीदिज़
के बाद के सभी यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड को
स्टोइकेइओटेस के नाम से ही जानते थे। स्टोइकेइओटेस
का अर्थ होता है, 'स्टोइकेइया का रचयिता'।
एक लेखक के लिए कितने बड़े सम्मान की बात है
कि केवल उसकी कृति के नाम पर ही लोग उसे जानते
हो!
..

यूनानी विज्ञान का लोप
आदमी ने जब से पुस्तकें लिखना आरंभ किया है, तब से
आज तक संसार की सभी भाषाओं में कितनी पुस्तकें
लिखी जा चुकी होंगी?
संसार का कोई भी आदमी इस सवाल का सही-सही
जवाब नहीं दे सकता। हम केवल अनुमान ही लगा
सकते हैं।
फिर, आरंभ से लेकर अब तक जितनी पुस्तकें लिखी
गई हैं, वे सभी आज उपलब्ध भी नहीं हैं। उनमें से
अधिकतर तो इतने कम महत्त्व की थीं कि पुनः लिखी ही
नहीं गईं। बहुत-सी तो नष्ट हो गई हैं। उदाहरण के
लिए, हमारे देश के नालंदा जैसे महाविद्यालय की पुस्तकें
नष्ट हो गई हैं । सिकंदरिया (अलेक्जेंड्रिया) के पुस्तकालय
का भी यही हाल हुआ।
रोमन सम्राट सीज़र ने 48 ई.पू. में मिन देश पर
आक्रमण किया था। उस समय क्लिओपेट्रा मिस्र देश की
मलिका थी। कहा जाता है कि अलेक्जेंड्रिया को हथियाने
के लिए सीज़रने अलेक्जेंड्रिया के बंदरगाह के नज़दीक के
ज्यामितिशीकहानी

मकानों को आग लगा दी थी। ग्रंथालय भी आग की
लपेट में आ गया। काफ़ी ग्रंथ नष्ट हो गए।
सीज़र के बाद मार्कस-एंटोनियस रोम का शासक
बना। वह क्लिओपेट्रा के प्रेम में फंस गया। सीज़र के
हाथों नष्ट हुए ग्रंथों की पूर्ति करने के लिए
मार्कस-एंटोनियस ने क्लिओपेट्रा को पेरगामम के.
ग्रंथालय से 200,000 ग्रंथ भेंट किए। रोमन
शासनकाल में अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय अभी
सुरक्षित ही था।
अंत में, थियोफिलस (अलेक्जेंड्रिया के बिशप :
385-412 ई.) की आज्ञा से अलेक्जेंड्रिया के इस विशाल
ग्रंथालय में आग लगा दी गई ! प्राचीन जगत की अमूल्य
बौद्धिक संपत्ति जल कर राख हो गई। न केवल
अलेक्जेंड्रिया का विशाल पुस्तकालय जलाया गया,
बल्कि, लगभग उसी समय, अलेक्जेंडिया के एक
गणितज्ञ को भी जिंदा जला दिया गया !
वह पुरुष नहीं, वह स्त्री थी। प्राचीन जगत की
एकमात्र स्त्री-गणितज्ञा । उसका नाम थाहायपेशिया।
हायपेशिया अलेक्जोड्रया की अकादमी में अरस्तू का
दर्शन पढ़ाती थी। वह एक उच्च कोटि की गणितज्ञा
थी। ईसा की दूसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में अलेक्जेंड्रिया
में डायोफँटुस्नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए थे। वे
अपने बीजगणित के सिद्धांतों के लिए प्रसिद्ध हैं।
हायपेशिया ने डायोफॅटुस् के वीजगणित पर टीका लिखी
ज्यामिति की कहानी

थी। ऐसी विदुपी हायपेशिया को ईसाइयों ने 415 ई. में
अलेक्जेंड्रिया नगर में जिंदा ही जला दिया !
अलेक्जेंड्रिया के विशाल ग्रंथालय तथा हायपेशिया
के दहन के साथ यूनानी संस्कृति का लोप हो गया।
'बाइबल' जैसे धर्मग्रंथ की बात छोड़ दी जाए,
तो
संसार में सबसे अधिक संख्या में प्रकाशित तथा
अनुवादित हुए ग्रंथ का नाम है यूक्लिड का 'मूलतत्त्व'!
ज्ञान-विज्ञान का एकमात्र ग्रंथ, जिसकी सबसे
अधिक प्रतियाँ प्रकाशित हुई और जिसका संसार की
सबसे अधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ, वह है यूक्लिड
का ज्यामिति का ग्रंथ!
अब हम देखेंगे कि यूक्लिड के इस ग्रंथ का दूसरे देशों
में प्रचार-प्रसार किस प्रकार हुआ।
84/ज्यामिति की कहानी

यूक्लिड की ज्यामिति का प्रचार-प्रसार
।
ईसा की प्रारंभिक सदियों में रोमन साम्राज्य अपनी
चरमोन्नति पर था । यूनानी संस्कृति उन्हें धरोहर के रूप
में मिली थी। परंतु रोमन लोग ज्ञान-विज्ञान के विशुद्ध
पक्ष में उतनी रुचि नहीं लेते थे जितनी इसके उपयोगी
पक्ष में । इसलिएरोमन-काल में विज्ञान की कम उन्नति
हुई। रोमन विद्वान यूनानी भाषा में विज्ञान की पुस्तकें
पढ़ते थे। प्रसिद्ध रोमन वक्ता, राजनीतिज्ञ एवं लेखक
सिसरो (106-43 ई. पू.) ने यूक्लिड के 'मूलतत्त्व"का
उल्लेख किया है।
पश्चिमी रोमन साम्राज्य का पतन हो जाने पर भी
आगे के लगभग एक हजार साल तक पूर्वी रोमन साम्राज्य
(राजधानी कस्तुंतुनिया) जैसे-तैसे जीवित रहा । पश्चिमी
रोमन साम्राज्य में ज्ञान न-विज्ञान की धड़कन बंद हो जाने
पर पूर्वी साम्राज्य (बाइजेंटाइन साम्राज्य) में जीवन अभी
शेष था। बाइजेंटाइन साम्राज्य में सीरियाई (सीरिया
देश की भाषा) बोलनेवालों की संख्या काफी थी।
इसलिए ईसा की तीसरी शताब्दी से पश्चिमी एशिया में
ज्यामिति की कहानी/85

.
यूनानी भाषा का स्थान सीरियाई ने ले लिया था।
कुस्तुतुनिया के ग्रंथालय में प्रायः सभी यूनानी विद्वानों की
.कृतियाँ सुरक्षित थीं। ईसा की पांचवीं सदी के बाद
यूनानी से मीरियाई में इन कृतियों के अनुवाद होने लगे
थे।
ईसा की छठी सदी में यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' का
सीरियाई में अनुवाद हुआ। उस समय, न केवल
'मूलतत्त्व' का, बल्कि अरस्तू, अफलांतून, आर्किमीदिज़,
तोलेमी, गैलन तथा हिप्पोक्रेतु की कृतियों के भी
सीरियाई में अनुवाद हुए।
ईसा की मातवीं शताब्दी में इस्लाम का उदय हुआ।
750 ई. मे अब्बामी खलीफाओं का शासन आरंभ हुआ।
खलीफा अल्-मंसूर (754-775 ई.) ने बाइजेंटाइन के
सम्राट से अन्य ग्रथों के साथ यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' की
प्रति भी प्राप्त की। अरबी विद्वान अल-हज्जाज इब्न
यूसूफ ने पहली बार हारून अल्-रशीद (खलीफ़ा :
786-809 ई.) के लिए 'मूलतत्त्व' का सीरियाई से अरवी
में अनुवाद किया। इसी विद्वान ने अब्बासी खलीफा
अल्-मामून के लिए दूसरी बार 'मूलतत्त्व' का अरबी में
अनुवाद किया था।
इसके बाद तो अरवी भाषा में यूक्लिड की ज्यामिति
के अनेक अनुवाद हुए। इस पर अनेक टीकाएँ लिखी
गई। यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' से अरबी गणितज्ञ भलीभांति
परिचित थे।
86/ज्यामिति की कहानी

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।
जब अरबी भाषा में यूनानी ग्रंथों के अनुवाद हो रहे
थे, तब यूरोप के देश बौद्धिक अंधकार में डूबे हुए थे । वे
यूनानी संस्कृति को लगभग भूल गए थे। दरअसल,
यूनानी संस्कृति को जीवित रखने का श्रेय अरबी विद्वानों
को ही है!
सन् 747 ई. में अरबों ने अफ्रीका से आगे बढ़कर
स्पेन में एक नए शासन की स्थापना की थी।
ज्ञान-विज्ञान की धारा अब पूर्व की ओर से पश्चिम की
ओर बहने लगी। अन्य अरबी ग्रंथों के साथ-साथ
यूक्लिड के ग्रंथों ने पुनः पश्चिम के देशों में प्रवेश
किया । स्पेन के सेविले, कोरदोवा तथा ग्रानादा नगरों में
विद्या के केद्र खुले, पुस्तकालय स्थापित हुए और अरबी
भाषा से लैटिन भाषा में अनुवाद शुरू हुए।
'मूलतत्त्व' का अरबी से लैटिन भाषा में पहला पूर्ण
अनुवाद बाथ-निवासी एडेलार्ड (लगभग 1090-1150
ई.) ने 1120 ई. में किया। उस समय लैटिन भाषा
जाननेवालों को पहली बार अलेक्जेंड्रिया के गणित का
परिचय मिला।
गणित के इतिहास में एडेलाई का महत्त्वपूर्ण स्थान
है। एडेलार्ड इंग्लैंड के निवासी थे, परंतु गणित की सेवा
करने के लिए उन्होंने स्पेन की यात्रा की थी। यूक्लिड के
'मूलतत्त्व' के अलावा उन्होंने और एक महत्त्वपूर्ण अरबी
ग्रंथ का लैटिन भाषा में अनुवाद किया। वह ग्रंथ था
अरवी गणितज्ञ अल-ख्यारिस्मी (लगभग 830 ई.) का
.
ज्यामिति बीकहानी

अल्-जबघअल-मुकाबिलः । बीजगणित के लिए इस्तेमाल
होनेवाला यूरोप की भाषाओं का 'अल्-जब्रा' शब्द
अल्-ख्वारिज़्मी के इसी ग्रंथ के नाम से बना है।
अल्-
[-ख्वारिज़्मी की यह पुस्तक भारतीय बीजगणित पर
आधारित थी। इस पुस्तक में भारतीय अंक-पद्धति का
इस्तेमाल हुआ था। एडेलार्ड ने पहली बार इस ग्रंथ का
लैटिन भाषा में अनुवाद किया। इस प्रकार, अल्-
ख्वारिज़्मी के ग्रंथ के कारण भारतीय गणित और
अंक-पद्धति का यूरोप के देशों में प्रवेश हुआ ।
एडेलार्ड ने 'मूलतत्त्व' और 'अल्-जब्रा' का लैटिन
भाषा में अनुवाद तो किया, किंतु अभी लैटिन का
वातावरण गणित के अध्ययन के लिए अनुकूल नहीं था।
यूक्लिड की ज्यामिति तथा भारतीय अंकों का यूरोप में
प्रचार करनेवाले सबसे महत्त्व के व्यक्ति थे पीसा
निवासी लियोनार्दो 'फिबोनकी' (लगभग 1170-1245
ई,)। 'फिबोनकी' ने अपने 'लिबेर एबेकी' ग्रंथ में
अंकों का इस्तेमाल किया था।
यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' का एक और अनुवाद केमोना
के गेरार्ड (1114-1187 ई.) ने किया था।
यह जान लेना जरूरी है कि 15वीं शताब्दी के
मध्यकाल तक यूक्लिड की ज्यामिति की जितनी भी
प्रतियों का उल्लेख मिलता है, वे सभी हाथ से ही लिखी
गई थीं। अभी तक यूरोप में मुद्रणकला का आरंभ नहीं
हुआ था।
ज्यामिति की कहानी/89

।
.
ईसा की आरंभिक सदियों में चीन देश में कागज़
बनने लग गया था और उप्पों से छपाई भी होने लग गई
थी। मध्ययुग में चीन के ये आविष्कार मध्य एशिया के
मार्ग से होते हुए यूरोप के देशों में पहुँचे। पहले अक्षर
खुदे हुए ठप्पों से छपाई होने लगी। बाद में धातु के
अलग-अलग टाइप (अक्षर) भी बनने लगे।
जर्मनी के मैंट्ज़ नगर में योहान गुटेनबर्ग ने धातु के
टाइपों से 1447 ई. में पहली पुस्तक छापी। यूरोप में
मुद्रण का युग शुरू हुआ।
कांपानो द्वारा संशोधित यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' का
लैटिन अनुवाद पहली बार 1482 ई. में वेनिस नगर में
छपा । दस वर्ष के भीतर ही इस ग्रंथ के दो और संस्करण
प्रकाशित हुए। सीधे यूनानी भाषा से पहली बार लैटिन
भाषा में अनुवाद किया, 1493 ई. में बार्तोलोम्मेओ
जांबेर्टी ने । यह अनुवाद 1505 ई. में वेनिस से प्रकाशित
हुआ। इसके बाद लैटिन भाषा में अनेक अनुवाद होकर
प्रकाशित हुए।
पहला अंग्रेजी अनुवाद हेनरी बेलिंग्सले ने किया
और लंदन से 1570 में प्रकाशित हुआ। इस अनुवाद के
मुखपृष्ठ पर लिखा हुआ है : लेखक : मेगेरा निवासी,
यूक्लिड।
यहाँ यूक्लिड को मेगेरा-निवासी बतलाया गया है।
दरअसल, भेगेरा-निवासी यूक्लिड एक अन्य व्यक्ति थे,
जो एक दार्शनिक थे और अलेक्जेंड्रिया-निवासी हमारे
..
90/ज्यामिति पीकहानी

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पंद्रहयी सदी का यूरोपीय छापाखाना
ज्यामितिकार यूक्लिड के लगभग सौ साल पहले हुए थे।
चूँकि, मध्ययुग के अनुवादक ज्यामितिकार यूक्लिड के
जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते थे, इसीलिए उन्होंने
ज्यामिति की कहानी/91

भूल से ज्यामितिकार यूक्लिड को मेगेरा-निवासी यूक्लिड
मान लिया था।
इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों की भाषाओं में
'मूलतत्त्व' के अनुवाद होने लगे और संस्करण के बाद
संस्करण छपने लगे। प्रख्यात वैज्ञानिक आइज़क न्यूटन
के अध्यापक आइजेक बारो ने 1655 ई. में 'मूलतत्व'
का लैटिन अनुवाद प्रकाशित किया।
यूरोप के सभी स्कूलों में यूक्लिड की ज्यामिति
पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाने लगी। यूरोप की सभी
भाषाओं में 'मूलतत्त्व' का अनुवाद हुआ।
बाइबल के बाद यदि किसी ग्रंथ की सबसे अधिक
प्रतियाँ छपी हैं तो यूक्लिड के 'मूलतत्व' की। और यदि
केवल वैज्ञानिक ग्रंथों की ही बात की जाए तो 'मूलतत्त्व'
ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो सबसे अधिक संख्या में छपा
और पढ़ा गया।
हमारे देश में भी 'मूलतत्त्व' का अनुवाद हुआ।
जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह (1686-1743
ई.) ने जयपुर, दिल्ली, मथुरा, काशी तथा उज्जैन में
वेधशालाओं (जंतर-मंतरों) का निर्माण कराया था।
ज्योतिषशास्त्र में जयसिंह की विशेष रुचि थी। उसके
दरबार में जगन्नाथ पंडित नाम के एक विद्वान ज्योतिषी
थे। जयसिंह ने जगन्नाथ पंडित से 1731 ई. में संस्कृत
भाषा में 'सिद्धांतसम्राट' नाम से एक ज्योतिष-ग्रंथ तैयार
करवाया था।
।
92/ज्यामिति की कहानी

जगन्नाथ पंडित ने 1719 ई. में संस्कृत भाषा में
रेखागणित पर एक ग्रंथ की रचना की थी। इसमें 15
पुस्तकें हैं । यद्यपि इस अनुवाद में मूल लेखक का नाम
नहीं है, परंतु यह निस्संदेह यूक्लिड के 'मूलतत्त्व' का
अनुवाद है । 'मूलतत्त्व' में 13 पुस्तकें थीं, परंतु कालांतर
में अन्य लेखकों की दो पुस्तकें भी इसके साथ जोड़ दी गई
थीं । जगन्नाथ पंडित ने अरबी भाषा की किसी पांडुलिपि
से इस ग्रंथ का अनुवाद किया था। बाद में इस संस्कृत
अनुवाद का शशिपाल शर्मा ने हिंदी में अनुवाद किया
और यह प्रकाशित हुआ।
ज्यामिति की

यूक्लिड के अन्य ग्रंथ
.
यद्यपि यूक्लिड अपने महान ग्रंथ 'मूलतत्त्व' के लिए ही
अधिक प्रसिद्ध हैं; पर उन्होंने और ग्रंथ भी लिखे थे। ये
ग्रंथ गणित, ज्योतिष, संगीत तथा यांत्रिकी से संबंधित
हैं। प्रोक्लुस लिखता है कि यूक्लिड के ये अन्य ग्रंथ भी
बड़े महत्त्व के हैं।
परंतु बड़े खेद की बात है कि इनमें से कुछ ग्रंथ आज
अप्राप्य हैं। इन अप्राप्य ग्रंथों के केवल उल्लेख ही मिलते
यूक्लिड के उपलब्ध ग्रंथः
1. डेटा : यूक्लिड की यह कृति 'मूलतत्त्व' की प्रथम
छह पुस्तकों की ज्यामिति से संबंधित है। 'डेटा' शब्द
'डेटम्' का बहुवचन है, जिसका अर्थ होता है, 'प्रदत्त
वस्तुएँ' । इस ग्रंथ में 94 साध्य दिए गए हैं। इनका विषय
है : यदि किसी आकृति के कुछ अंग-परिमाण, स्थिति या
आकार-दिए हों, तो शेष अंग कैसे ज्ञात किए जाएँ।
2. आकृतियों के विभाजन . प कृति का प्रोक्लुस
ने उल्लेख किया है। परंतु यह ग्रंथ आज यूनानी भाषा में
/ज्यामिति की कहानी

. उपलब्ध नहीं है। हाँ, अरबी भाषा में यह मिलता है। पीसा के लियोनार्दो 'फिबोनकी' ने इस ग्रंथ का अरबी से लैटिन में अनुवाद किया था। इस ग्रंथ का विषय है : यदि कोई आकृति (त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत) दी हुई हो, तो उसे ऐसे दो भागों में बाँटा जाए जिससे दोनों भागों के क्षेत्रफल एक निर्दिष्ट अनुपात में हो। 3. फेनोमेना : इस ग्रंथ का विषय है गोलीय- ज्यामिति । गोलीय-ज्यामिति का उपयोग ज्योतिपशास्त्र में होता है। 4. ऑप्टिक्स : ऑप्टिक्स को आज हम प्रकाशिकी अर्थात् प्रकाश विज्ञान कहेंगे। प्राचीन काल में लोगों का विश्वास था कि प्रकाश का स्रोत आँख में है। आँख से ही प्रकाश-किरणें दिखाई देनेवाली वस्तु तक पहुँचती है। परंतु आज हम जानते हैं कि प्रकाश आँख से नहीं, बल्कि दिखाई देनेवाली वस्तुओं से परावर्तित होकर हमारी आँखों तक पहुँचता है। यूक्लिड ने अपने इस ग्रंथ में एक दृष्टि-सिद्धांत की स्थापना की है। 'मूलतत्त्व' की तरह इस ग्रंथ के लिए भी उन्होंने कुछ स्वयंतथ्यों की कल्पना की । पहला स्वयंतथ्य : । "इसलिए यह मान लिया है कि आँखों से उत्सर्जित दृष्टि-किरणें सीधी रेखा में जाती हैं, दूरीचाहे कितनी भी हो।" यूक्लिड के इस स्वयंतथ्य में प्रकाश के सीधी रेखा में गमन की बात तो सही है, परंतु आँखें प्रकाश का स्रोत ज्यामिति की कहानी/95

होने का अनुमान गलत है। पर इस विज्ञान से इतना लाभ
हुआ कि प्रक्षेप-ज्यामिति (प्रोजेक्टिव जॉमिट्री) का
अध्ययन आरंभ हुआ।
5. संगीत के मूलतत्त्व : प्राचीन यूनान में संगीत का
उतना ही अधिक महत्त्व था, जितना कि गणित का ।
पाइथेगोर एक महान गणितज्ञ थे। उन्होंने संगीत के बारे
में भी महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक बातों की खोज की थी। तबसे
हर यूनानी गणितज्ञ के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह
संगीत का अध्ययन करें और संगीतशास्त्र पर भी ग्रंथ की
रचना करें। इस ग्रंथ की रचना करके यूक्लिड ने उसी
परंपरा को निभाया था।
यूक्लिड के अप्राप्य ग्रंथ
1. सिउडारिया: इस ग्रंथ के खो जाने से प्रारंभिक
ज्यामिति के विद्यार्थियों का बड़ा नुकसान हुआ है।
विद्यार्थी ज्यामिति पढ़ते हैं। उन्हें प्रमेय सिद्ध करने
पड़ते हैं। सवाल हल करने होते हैं, वे भी एक खास
तरीके से-यूक्लिड के बताए हुए तरीकों से । हम जानते
हैं कि कई बार, दूसरे रास्ते पर पहुँचने के कारण,
गलतियाँ होती हैं। दूसरे ही परिणाम निकलते हैं।
इसलिए यूक्लिड ने इस ग्रंथ में बताया था कि
ज्यामिति के प्रमेयों तथा कृत्यों को हल करते समय किस
प्रकार की और कहाँ-कहाँ गलतियां होने की संभावना
हैं। उन्होंने इस ग्रंथ में इन भुलावों को दूर करने के उपाय
भी बताए थे।
96/ज्यामिति की कहानी

..
2. पोरिज्म्स : इस ग्रंथ की तीन पुस्तकें आज
उपलब्ध नहीं हैं; परंतु अलेक्जेंड्रिया के पाप्पुस् ने अपने
'संग्रह' में इस कृति का उल्लेख किया है। इस कृति का
विषय था प्रक्षेप-ज्यामिति ।
3: तल-बिदुपथ : यह ग्रंथ भी खो गया है। परंतु
पाप्पुस् ने इस कृति का उल्लेख किया है। अनुमान है कि
यह कृति शंकु, सिलिंडर तथा गोल जैसी आकृतियों से
संबंधित थी।
4. शांकव : इस अप्राप्य कृति के बारे में पाप्पुस् ने
लिखा है : "यूक्लिड के ग्रंथ शांकव (कॉनिक्स)की चार
पुस्तकों को एपोलोनियस ने पूर्ण किया। एपोलोनियस ने
चार और पुस्तकों की रचना की और इस प्रकार उसने हमें
'शांकव' की आठ पुस्तकें दी हैं।"
आर्किमीदिज़ ने जिस 'शांकवों के मूलतत्त्व' का
उल्लेख किया है, वह संभवतः यूक्लिड ने ही लिखा था ।
शांकव-ज्यामिति में परवलय, दीर्घवृत्त तथा अतिपरवलय
वक्रों का अध्ययन होता है। .
..
ज्यामिति की कहानी/97

निर्देशांक ज्यामिति
यूक्लिड के बारे में बहुत-सी बातें बताई गई हैं। यूक्लिड
के महान ग्रंथ मूलतत्त्व' के बारे में भी बताया गया है।
प्राचीन काल की ज्यामिति के बारे में भी कुछ बातें बताई
गई हैं।
लेकिन यूक्लिड के बारे में अभी हमें कुछ महत्त्व की
बातें जाननी हैं। इनका संबंध उनकी पुस्तक से नहीं,
बल्कि उनके नाम से है। यूक्लिड की ज्यामिति मिट भी
जाए, तब भी उनका नाम अमर रहेगा। क्योंकि,
'यूक्लिड' शब्द अब एक विशेषण बन गया है।
यूक्लिड की ज्यामिति क्या है ? इस ज्यामिति के बारे
में प्रमुख बात यह है कि इसकी सारी आकृतियाँ एक
समतल पर खींची जाती हैं। दूसरी बात यह है कि इस
ज्यामिति की आकृतियों के कोणों तथा रेखाओं को
'मापना' पड़ता है; अर्थात्, यूक्लिड की ज्यामिति एक
'मापीय ज्यामिति' है। इस ज्यामिति में लंबाइयाँ नहीं
बदलतीं, कोण नहीं बदलते।
परंतु ऐसी ज्यामितियाँ भी हैं जिनमें कोण तथा
.
.
98/ज्यामिति की कहानी

लंबाइयां बदल जाती हैं । यदि किसी वस्तु का चित्र तैयार
किया जाए वा फोटो उतारा जाए तो इनमें मूल वस्तु के
कोण तथा इसकी लंवाइयाँ बदल जाती हैं। इस ज्यामिति
को प्रक्षेप-ज्यामिति कहते हैं। फ्रांस के दो गणितज्ञ
देसार्ग (1593-1662) तथा पास्कल (1623-62)इस
ज्यामिति के संस्थापक माने जाते हैं । यूरोप के चित्रकारों
ने प्रक्षेप-ज्यामिति के विकास में खूब योग दिया।
रेने दकार्त
रेने दकार्त (1596-1650) फ्रांस देश के निवासी
थे। वे एक दार्शनिक के रूप में प्रसिद्ध हैं, और एक महान
गणितज्ञ के रूप में भी। दकार्त ने एक बहुत ही उपयोगी
ज्यामिति की कहानी/99

नई ज्यामिति को जन्म दिया। इस ज्यामिति को
निर्देशांक-ज्यामिति (को-ऑर्डिनेट जॉमिट्री) का नाम
दिया गया है। इस ज्यामिति की कुछ प्रमुख बातों को
आगे की आकृतियों से समझा जा सकता है।
प्रथम आकृति में समतल पर, एक-दूसरे को
समकोण में काटती हुई, दो सीधी रेखाएं हैं। इन रेखाओं
को निर्देश-रेखाएँ कहते हैं। अब मान लो कि इन
निर्देश-रेखाओं के समतल में कोईरबक्र है और इस वक्र
पर बएक बिंदु है । तब, डदरेखा से बबिंदु की दूरी होगी
क्ष और प फ रेखा से इसकी दूरी होगी य । इसलिए,
समतल में ब बिंदु की स्थिति को दो निर्देशांकों-क्ष तथा
य-से व्यक्त किया जाता है और इसे ब (क्ष, य) लिखा
जाता है। इस प्रकार, किसी भी बिदुःया वैक्र की स्थिति
को निर्देशांकों से व्यक्त किया जा सकता है।
एक उदाहरण से इस बात को और भी आसानी से
समझा जा सकता है: निम्न आकृति में निर्देश-रेखाओं के
काट-बिंदु पर एक वृत्त का केंद्र स्थित है। हम जानते हैं
कि परिधि के सभी बिंदु वृत्त के केंद्र से समान दूरी पर होते
हैं । आकृति में परिधि के किसी भी बिंदु के निर्देशांक होंगे
(क्ष, य) और परिधि पर किसी भी बिंदु की केंद्र से लंबाई
होगी ल।
अब क एक समकोण त्रिभुज है । तब,शुल्व-प्रमेय
(पाइथेगोर के प्रमेय) के अनुसार
ल'Dar+य';
100/ज्यामिति की कहानी

अ
श
य
क
स
परिधि पर कोई भी बिंदु लिया जाए तो हमें वृत्त के
लिए यही समीकरण प्राप्त होगा।
लक्ष + य क्या है ? यह तीन राशियों के बीच
ज्यामिति की कहानी/101

%3D
एक संबंध है। यदि निर्देशांक-मान संख्या में दिए जाएँ,
तो हम वृत्त के आकार को जान सकते हैं। वास्तव में,ल'
क्ष' + य व्यापक रूप से वृत्त का समीकरण है। यदि
वृत्त की आकृति न भी दी गई हो, केवल समीकरण ही
दिया गया हो, तो इससे हम वृत्त के बारे में सभी बातें जान
सकते हैं!
इसी प्रकार, सभी वक्रों के लिए समीकरण प्राप्त
किए जा सकते है और इनसे उनका अध्ययन किया जा
सकता है। इसलिए इस ज्यामिति को वैश्लेषिक
ज्यामिति (एनेलिटिकल जॉमिट्री) भी कहते हैं ।
समतल पर खींचे गए वक्रों तथा आकृतियों के लिए
केवल दो निर्देशांकों की आवश्यकता होती है। परंतु
हमारे दैनंदिन जीवन का संसार तीन आयामों (विमितियों)
का है। इसलिए ठोस वस्तुओं की ज्यामिति के लिए तीन
निर्देशांकों की जरूरत पड़ती है। इस प्रकार की ज्यामिति
भी है और यह उच्च कक्षाओ में पढाई जाती है।
परंतु, अभी ज्यामितियों का सिलसिला समाप्त नहीं
हुआ है। यूक्लिड के सिद्धांतों के विरोध में भी कई
ज्यामितियों का निर्माण हुआ है। इन्हें अ-यूक्लिडीय
ज्यामितियों का नाम दिया गया है। आधुनिक गणित
तथा भौतिक-विज्ञान में इन अ-र
-यूक्लिडीय ज्यामितियों
का बहुत महत्त्व है।
102/ज्यामिति कीकहानी

अ-यूक्लिडीय ज्यामितिया
अ-यूक्लिडीय ज्यामितियों !
यूक्लिड के विरोध में निर्मित ज्यामितियों ! एक नहीं,
अनेक!
किंतु यूक्लिड का विरोध कैसा?
यह जानने के लिए हमें पुनः यूक्लिड की ज्यामिति
की ओर लौटना होगा; यूक्लिड की ज्यामिति का गहराई
से परीक्षण करना होगा।
हम जान चुके हैं कि यूक्लिड की ज्यामिति का आरंभ
आधारशिलाओं-परिभाषाओं, अभिधारणाओं तथा
स्वयंतथ्यों से होता है। ज्यामिति की ये आधारशिलाएँ
मजबूत हों तो ज्यामिति का भवन भी मजबूत होगा।
और, यदि आधारशिलाएं ही मजबूत नहीं होंगी, तो
देर-सबेर ज्यामिति का भवन अवश्य ही ढह जाएगा ।
हम यह तो नहीं कहेंगे कि यूक्लिड की ज्यामिति का
भवन ढह गया है। परंतु इतना तो अवश्य कहा जा
सकता है कि यह भवन जर्जर हो गया है। इसका मुख्य
कारण यह है कि यूक्लिड़की ज्यामिति की आधारशिलाएँ
मजबूत नहीं थीं।
ज्यामिति की कहानी

कभी भी न मिलनेवाली रेखाएं समांतर रेखाएँ कहलाती
हैं। सैद्धांतिक रूप से केवल इतना स्वीकार कर लिया
जाता है कि दो समांतर रेखाएँ 'अनंत दूरी पर जाकर ही
मिलती हैं। रेलगाड़ी की दो पटरियाँ समांतर रेखाओं का
एक अच्छा उदाहरण है।
यूक्लिड के समय से ही इस अभिधारणा की सत्यता
के बारे में गणितज्ञों को संदेह होने लगा था। प्रसिद्ध
ज्योतिषी तोलेमी ने भी इस अभिधारणा को सिद्ध करने
का प्रयत्न किया था। तब से शताब्दियों तक चोटी के
लगभग सभी गणितज्ञ इस अभिधारणा से उलझते रहे,
किंतु किसी को भी पहली चार अभिधारणाओं से या अन्य
किसी सरल अभिधारणा के आधार पर इस 5वीं
अभिधारणा को सिद्ध करने में सफलता नहीं मिली !
सचमुच ही, ऊपरी निगाह से देखें तो इस 5वीं
अभिधारणा का कथन स्वयंसत्य जान पड़ता है। बिंदुप
से, रेखा अब के समांतर, केवल एक ही रेखा खींची जा
सकती है। यदि बिंदु प से दो या अधिक रेखाएं खींची
जाएँ, तो वे रेखाएँ अब के समांतर नहीं रहेंगी और
अंततोगत्वा रेखा अब से जाकर टकराएंगी।
लेकिन गणितशास्त्र 'दृष्टि-सत्य' को परम-सत्य
नहीं मानता । हमारी दृष्टि धोखा दे सकती है। इसलिए
इस अभिधारणा को हमें तर्क की कसौटी पर कसना ही
होगा।
किसी धारणा को सिद्ध करने का एक तरीका यह भी
104/ज्यामिति दी यहानी

यूक्लिड ने ग्रंथ के आरंभ में परिभाषाओं के बाद 5
अभिधारणाएं दी हैं। इन अभिधारणाओं के पहले ही
उसने स्पष्ट लिख दिया है कि यदि हम यह स्वीकार कर
लें
अर्थात्, यूक्लिड की ज्यामिति के लिए हमें इन
अभिधारणाओं को, बिना किसी संदेह के, स्वीकार कर
लेना है। इनकी सत्यता के लिए किसी प्रमाण की जरूरत
नहीं है, ये स्वयंसिद्ध हैं।
परंतु यूक्लिड की पाँचवीं अभिधारणा के बारे में
यह बात नहीं कही जा सकती। स्वयं यूक्लिड को भी
अपनी पाँचवीं अभिधारणा के बारे में शायद संदेह था।
यूक्लिड के बाद तो प्रायः प्रत्येक गणितज्ञ ने इस
अभिधारणा को सिद्ध करने की कोशिश की है, किंतु
किसी को भी इसमें सफलता नहीं मिली!
म
म
यूक्लिड की 5वीं अभिधारणा है :
अबएक सीधी रेखा है और इस रेखा के बाहर पएक
निर्दिष्ट बिंदु है। तव पबिंदु से अब रेखा के समांतर एक,
और केवल एक ही, सीधी रेखा खींची जा सकती है।
चूँकि, इस अभिधारणा में 'समांतर' (पैरेलेल)शब्द
महत्त्व का है, इसलिए इस अभिधारणा को समांतरण
की अभिधारणा का नाम दिया गया है। एक-दूसरे से
.
ज्यामिति की कहानी/105

।
है कि इसे गलत मान लिया जाए, और तब देखा जाए कि
क्या परिणाम निकलता है। यदि परिणाम प्रतिकूल
निकलता है तो मान्य धारणा गलत सिद्ध होती है।
यूक्लिड की यह समांतर अभिधारणा दो प्रकार से
असत्य हो सकती है। (1) एक से अधिक समांतर रेखाएँ
हो सकती हैं; या (2) एक भी समांतर रेखा नहीं हो
सकती। ये दोनों परिकल्पनाएँ 5वीं अभिधारणा के
कथन को असत्य ठहराती है।
गणितज्ञों का ध्यान सबसे पहले दो समांतरों पर
गया। गणितज्ञ साच्चेरी (1667-1733) ने दो समांतर
रेखाओं की कल्पना करके प्रतिकूल परिणामों पर पहुँचने
की कोशिश की । यदि वह प्रतिकूल परिणामों पर पहुँचते
तो एक समांतर रेखा वाली अभिधारणा को सही मान
लेते। परंतु, जब वह किसी प्रतिकूल परिणाम पर नहीं
पहुँचे तो उन्होंने समझ लिया कि उनका प्रयास असफल
रहा।
असल में, साच्छेरी ने एक नई ज्यामिति-
अ-यूक्लिडीय ज्यामिति- की नींव रख दी थी।
हंगेरी के एक तरुण गणितज्ञ योनोस पोल्याई
(1802-1860 ई.) ने यूक्लिड की इस समांतरण
अभिधारणा कोही अस्वीकार किया। उनके मतानुसार,
ज्यामिति की रचना के लिए इस अभिधारणा की
आवश्यकता ही नहीं है। उन्होंने एक नई अभिधारणा के
आधार पर एक नई ज्यामिति का निर्माण किया।
:/ज्यामिति की कहानी

a
बोल्याई की इस नई अभिधारणा के अनुसार, एक बिंदु में
से अन्य किसी रेखा के समांतर एक से अधिक समांतर
रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
लगभग उसी समय रूसी गणितज्ञ लोबाचेवस्की
(1793-1856 ई.) ने, बोल्याई की तरह, स्वतंत्र रूप से
एक नई ज्यामिति का निर्माण किया। लोबाचेवस्की की
भी यही मान्यता थी कि एक बिंदु में से अन्य किसी रेखा के
समांतर अनेक रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
ऊपर की आकृति बोल्याई तथा लोबाचेवस्की की
अभिधारणा के अनुरूप है । इन गणितज्ञों की अभिधारणा
के अनुसार, बिंदुपसे खींची गई ये सारी रेखाएँ अब रेखा
के समांतर हैं।
बोल्याई तथा लोबाचेवस्की की इस अभिधारणा पर
एकाएक विश्वास नहीं होता। क्योंकि आँखें स्पष्ट देख
रही हैं कि एक के अलावा, बिंदु प से गुजरनेवाली शेष
सभी रेखाएँ अब रेखा के समांतर नहीं हैं । ये अंततोगत्वा
अब रेखा से मिलेंगी ही।
और, अ-यूक्लिडीय ज्यामिति के अध्ययन में सबसे
बड़ी कठिनाई यही है। ज्यामितिय आकृतियों पर
.
ज्यामिति की कहानी/107

विश्वास नहीं रह जाता !
परंतु तथ्य यही है कि लोबाचेवस्की और बोल्याई की
इन नई अभिधारणाओं में कोई असंगति नहीं है।
दरअसल, प्रकृति में, समतलों के अलावा, ऐसे भी तलों
का अस्तित्व है जिन पर एक बाह्य बिंदु से, एक प्रदत्त
रेखा के समांतर, एक से अधिक रेखाएँ खींची जा सकती
हैं।
यार्न फ्रेडरिफ गौस (Im-1855 ई.)
108/ज्यामिनि पीकहानी

अ-यूक्लिडीय ज्यामिति के आरंभिक निर्माण का
श्रेय महान जर्मनगणितज्ञ कार्ल फ्रेडरिकगौस (1777-
1855 ई.) को भी दिया जाता है। 1824 ई. में एक पत्र
द्वारा गौस ने विचार व्यक्त किए थे कि, यदि यह मान
लिया जाए कि त्रिकोण के तीनों अंतर्कोणों का योग 180°
से कम है, तो यूक्लिडीय ज्यामिति से नितांत भिन्न एक
नई ज्यामिति का निर्माण किया जा सकता है।
महान जर्मन गणितज्ञरीमान (1826-1866 ई.) ने
तो एक नया ही मत व्यक्त किया। उनकी परिकल्पना के
अनुसार, किसी समांतर का अस्तित्व ही नहीं है। अपनी
इसी परिकल्पना के आधार पर उन्होंने एक नई
अ-यूक्लिडीय ज्यामिति की रचना कर डाली। रीमान की
इस ज्यामिति को एक गोल पर समझा जा सकता है । एक
समतल पर हम कल्पना कर सकते हैं कि जो रेखाएँ एक.
ही रेखा के साथ 90° का कोण बनाती हैं, वे एक-दूसरे के
समांतर होती हैं, आकृति (अ)। अब हम इसी स्थिति को
पृथ्वी की गोल सतह पर लागू करके देखते हैं, आकृति
(ब)। सभी याम्योत्तर या देशांतर रेखाएँ (मेरीडियन)
विषुवत रेखा के साथ 90° का कोण बनाती हैं । फिर भी
ये सभी याम्योत्तर उत्तर तथा दक्षिण ध्रुवों पर एक बिंदु में
मिलते हैं।
रीमानीय ज्यामिति में भी यही होता है। रीमानीय:
ज्यामिति के लिए गोल एक उचित सतह है।
अब प्रश्न उठता है : यूक्लिड की 5वीं अभिधारणा
ज्यामिति की कहानी/109

के स्थान पर ये नाना प्रकार की अभिधारणाएं स्वीकार
की जाएँ, तो ज्यामिति के प्रमेयों का क्या हाल होगा?
यूक्लिड की 5वीं अभिधारणा के बिना भी उनकी
ज्यामिति के अधिकांश प्रमेय सिद्ध किए जा सकते हैं।
इसलिए इस अभिधारणा में बदल हो जाने पर भी
यूक्लिड की ज्यामिति के बहुत-से प्रमेय ज्यों-के-त्यों बने
उ धुव
90°
विषुववृत्त
90
90°
90°
90%
अ
ब
.
रहेंगे। परंतु कुछ प्रमेय ऐसे भी हैं जो विभिन्न
अ-यूक्लिडीय ज्यामितियों में विभिन्न रूप धारण कर
लेंगे। यूक्लिड की ज्यामिति के एक प्रसिद्ध प्रमेय का ही
उदाहरण लेते हैं। यह प्रमेय है :
किसी भी त्रिभुज के तीन अंतकोंणों का
योग 180" होता है।
परंतु, जिन अ-यूक्लिडीय ज्यामितियों में अनेक

समांतरों की अभिधारणा को स्वीकार किया गया है,
उनमें यह योग 180° से कम होगा। और, जिन
ज्यामितियों में किसी भी समांतर को स्वीकार नहीं किया
गया है, उसमें यह योग सदैव 180° से अधिक रहेगा।
ऊपर की आकृतियों में दो भिन्न तलों पर दो त्रिभुज
खींचे गए हैं । बाईं ओर की आकृति में त्रिभुज के तीनों
कोणों का योग 180°से कम है; और दाईं ओर की आकृति
में त्रिभुज के तीनों कोणों का योग 180° से अधिक है।
यूक्लिडीय समतल पर, त्रिभुज का आकार चाहे जो भी
रहे, त्रिभुज के कोणों का योग सदैव 180° ही रहेगा।
परंतु ऊपर के चित्रों की सतहों पर, त्रिभुज के बदलते
आकारों के साथ, त्रिभुजों के कोणों के योग में भी बदल
होता रहेगा!
यूक्लिड की ज्यामिति में ऐसे अनेक प्रमेय हैं जो
उपर्युक्त प्रमेय (त्रिभुज के तीन कोणों का योग 180°
होता है) से सिद्ध होते हैं, इसलिए इस प्रमेय की.तरह वे
ज्यामिति की

प्रमेय भी अ-यूक्लिडीय ज्यामिति में बदल जाएंगे!
जब तक केवल एक ही ज्यामिति-यूक्लिड की
ज्यामिति-का अस्तित्व था, तब तक यही मान लिया
गया था कि यही ज्यामिति भौतिक जगत की असली
ज्यामिति है। परंतु अब, अनेक ज्यामितियाँ अस्तित्व में
आने पर, प्रश्न उठता हैं कि इनमें सही ज्यामिति
कौन-सी है? इनमें से कौन-सी ज्यामिति भौतिक जगत
पर लागू होती है ?
बीसवीं शताब्दी के महान भौतिकवेता अल्बर्ट,
आइंस्टाइन इस निर्णय पर पहुँचे थे कि अ-यूक्लिडीय
ज्यामिति ही विश्व की असली ज्यामिति है। उन्होंने
अपने 'आपेक्षिकता सिद्धांत' में अ-यूक्लिडीय ज्यामिति
का ही इस्तेमाल किया है। उन्होंने यह भी कहा था कि,
चूंकि ब्रह्मांडीय आकाश की तुलना में हमारी पृथ्वी
बहुत छोटी है, इसलिए पृथ्वी की सतह पर यूक्लिडीय
ज्यामिति ही उपयोगी है। परंतु अतिविशाल विश्व की
सीमाओं का अध्ययन केवल अ-यूक्लिडीय ज्यामिति से
हीसंभव है। आइंस्टाइनने ज्यामिति तथा गुरुत्वाकर्षण
के बीच भी संबंध स्थापित किया है।
आधुनिक वैज्ञानिक ज्यामितियों को दो भागों में
बांटते हैं-गणितीयज्यामिति और भौतिकीय ज्यामिति ।
गणितीय दृष्टि से देखा जाए तो अनेक ज्यामितियों का
अस्तित्व है; और ये सभी अपने-आप में तार्किक दृष्टि से
112/ज्यामिति की कहानी

भी उपपत्ति पर यत्किचित संदेह नहीं किया जा
सही हैं। विशुद्ध गणितज्ञ इस बात की परवाह नहीं
करता कि उसकी अभिधारणाएँ भौतिक जगत के
अनुसार सही हैं या नहीं। वह केवल अपनी योजना' के
भीतर यही देखता है, कि इसकी अभिधारणाओं तथा
प्रमेयों के बीच किसी प्रकार की कोई तार्किक असंगति
नहीं होनी चाहिए। यदि अभिधारणाएँ सही हैं, तो उन
पर आधारित प्रमेय भी सही होने चाहिए।
भौतिकीय ज्यामिति भौतिक जगत की ज्यामिति है।
हमारे सीमित भौतिक जगत में अभी तो यूक्लिडीय
ज्यामिति ही सही है। निकट भविष्य में जब मानव सुदूर
अंतरिक्ष की यात्राएँ करेगा तो शायद अन्यूक्लिडीय
ज्यामिति का भौतिक जगत में अस्तित्व सिद्ध हो जाए !
जो भी हों, विज्ञान तथा गणित के इतिहास में
पूक्लिड का स्थानचिरस्थायी बनारहेगा । अपने सिद्धांत
में अ-यूक्लिडीय ज्यामिति का उपयोग करनेवाले महान
आइंस्टाइन ने यूक्लिड की प्रतिभा के बारे में कहा है :
"उसने (यूनान ने) पहली बार एक तार्किक योजना
के बौद्धिक चमत्कार को जन्म दिया है। इस चमत्कार के
कथन एक-दूसरे से इतनी दृढ़ता से फलित होते हैं कि एक
सकता-ऐसी है यूक्लिड की ज्यामिति !"

उपसंहार
यूक्लिड के बारे में हमने बहुत-सी बातें जानी!
सिर्फ एक बात बताने की रह गई है। यही कि राजा
तोलेमी को यूक्लिड ने क्या जवाब दिया था।
राजा तोलेमी ने यूक्लिड से पूछा था :
क्या ज्यामिति सीखने का कोई आसान तरीका है?
यूक्लिड ने जवाब दिया:"राजन ज्यामिति सीखने
के लिए कोई राजमार्ग नहीं है।"
सचमुच ही, ज्यामिति सीखने के लिए कोई आसान
तरीका नहीं है । यूक्लिड की ज्यामिति में प्रमेयों के कथन
उतने महत्त्व के नहीं हैं, जितनी कि उन्हें सिद्ध करने की
तार्किक विधियाँ । दिमाग के व्यायाम के लिए यूक्लिड
की ज्यामिति से बेहतर कोई ग्रंथ नहीं!
आज ज्यामितीय विज्ञान बहुतं विकसित हो गया है।
नई-नई ज्यामितियां अस्तित्व में आई हैं। परंतु सब
ज्यामितियों की आधारशिला एक है- यूपिलर की
ज्यामिति!
.

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Jyamiti Ki Kahani

Author
Gunakar Mule
Title
Jyamiti Ki Kahani
File name
Jyamiti Ki Kahani
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2011/03
Publisher
Gyan Prakashan New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551065
Barcode
4990010031843.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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Jyamiti Ki Kahani