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Prabodhchndrodayanatak

Kavigulabsingh · 2011/08

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नाटकपात्र. सूत्रधार नाटफआचार्य. महामाद विकण. नटी तिसकोपत्री. चार्वाक मोहकामिन. विवेक प्रधाननायक. काम, क्रोध, लोभ, मति तिसकीपनी. ये महामोह वीर हैं दम्भ, अहंकार. । वस्तुविचार विवेककिंकर. मन संकल्पात्मक सन्तोष तिसकासहचर. दिगंबर, भिक्षु, पुरुष उपनिषद्स्वामी. प्रबोधउदय पुरुषपुत्र. | क्षपणक, कपालिकम श्रद्धा साविकी,रानसी, तामसी३भ. मिथ्यादृष्टि मोहपत्री. शांति विवेकभगिनी. विभ्रमावती तिसकीसर्स करुणा शांतिकीससी. कामपनी. मैत्री श्रद्धासखी. | हिंसा कोधपत्री. विष्णुभक्ति उपनिषत्सखी. तृष्णा लोभपत्री. उपनिषद् वेदांतशास्त्र. सरस्वती विष्णुभक्तिकीसखी क्षमा विवेकदासी. वैराग्य, निदिध्यासन, संकल्प परिपार्भक, पुरुष, | बटु ,शिष्य, पुरुष दोबारक. ये दूसो मनके पुत्र.

CLICAREECE
॥ श्रीः॥
प्रबोधचन्द्रोदयनाटक।
कविगुलायसिंहकृत.
-rigनित नागरी
रीमनेर
जिसको
9820
पं० गुरुप्रसादउदासीनने गुरुमुखी अक्षरोंसे
देवनागरी में टिप्पणीसहित बनाया।
तथा
मुमुक्षनों के हितार्ग,
श्रीमान् १०८ स्वामी परमानन्दजीने
खेमराज श्रीकृष्णदासके
वंबई
"श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम) यवालयमें
(प्रथमावृत्ति)
उपाकर मासद्ध किया।
संवत् १९६२, शके १८२७.
गस्टा मिर्गने सीन रवाद.

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॥ श्रीः॥
प्रबोधचन्द्रोदयनाटक।
कविगुलामसिंहकृत.
Misी पुगिज नागरी
धीमनेर
98120
पं० गुरुमसादउदासीनने गुरुमुखी अक्षरोंसे
जिसको
ENTERNSARESSANA
देवनागरीमें टिप्पणीसहित बनाया ।
तथा
मुमुक्षजनक हिताप,
श्रीमान् १०८ स्वामी परमानन्दजीने
खमराज श्रीकृष्णदासके.
बंबई
"श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम) यन्त्रालयमें
(प्रथमानि)
छपाकर मासद्ध किया।
संवत् १९६२, शके १८२७.
गैरस्टार अमिट कने रमान राई

२११
माध्य
श्री १०८ स्वामी परमानन्दजी
उदासीन द्वारकावाले.

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विज्ञापन। विदित हो कि शान्तरसमधान गौणतया शृंगारादि अखिलरसोंसे संयुक्त अध्यात्मविद्या विरोधि नानापाखण्डमके सिद्धांतोंको उच्छिन्न करताहुआ संस्कृतमें मबोधचन्द्रोदय नामा नाटक इस धरामण्डलमें सर्वोपरि वर्तमानहै सो संस्कृतमें अतिकठिन होनसे भाषाके अभिज्ञननोंको दुर्विज्ञेय जानकर कवि गुलाबसिंहनीने तिसका भाषामें दोहा सवैया कवित्त सोरठों करके अनुवाद कियाहै- इस नाटकमें मायः वेदांतका सर्वस्व सन्निविष्टहै और इसमें ऐसी सुगमरीतिसे ब्रह्मात्म्पैक्यत्वका मतिपादन कियाहै कि, मन्दवैराग्यवाले पुरुषभी इस ग्रन्यके विचारसे अध्यात्मतत्त्वका लाभ करसकतेह-यद्यपि उक्त कविनीकी भाषा बहुत सुगम और साधारण पुरुषोंकोभी समुझन योग्यहै-तथापि-कहीं कहीं स्थलविषे विषयको अतिकठिन होनेसे गुरोंके बिना स्वयं समुझना अशस्यहै ऐसा नानकर और अधि- कारीननोंको विचारपूर्वक इसयन्यके अवलोकनसे बोधोत्पत्तिक अर्थ श्रीसाधुंवलाके निगसी परमदयालु पण्डित गुरुमसादनीने इसग्रन्थको शुद्ध करके तथा इसके नीच बडे परिश्रमसे श्रुति स्मृति पुराण वचनोंको उद्धृत करके तथा तिनका अर्थ अतिसुगम रीतिसे दर्शायकर संस्कृत मबोधचन्द्रोदयनाटकके अनुसार संक्षिमाक्षरी टिप्पणीरूपसे प्रगट करक तथा पण्डितनीने इसटिप्पणीसहित ग्रन्थको तयार करके निन श्रीगुरुश्री १०८ मान् परमहंस- परमानन्दनीक परणपहनोंमें समर्पणकिया आगे दयार्णव श्रीगुरुंदवनीने अपने अनुग्रहसे अधिकारीजनों के कल्याणार्थ और धर्मार्थ वाटनेक अर्थ मुद्रित करवायाहै-अब आशाहै कि इस मन्मपतिपाद्यविषयक मनन करनेसे अधिकारी जन आवरण शनिविशिष्ट अज्ञाननिवृत्ति- पूर्वक परमानन्दको मानिरूप नीवन्मुक्तिक मुसका अनुभव करतेहुए पण्डितनीके परिश्रम- को सफलफरेंगे इति शम्- श्रीगणेशाय नमः । ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः। अथ श्रीमत्कवि गुलावसिंह कृत- 'प्रबोधचन्द्रोदय नाटक भापा प्रारम्भः । दोहा। गौरीपुत्र गणेशपद, वन्दों वारंवार ।। कार्य कीजिये सिद्ध मम, देह सुबुद्धि उदार ॥१॥ जाके नाम प्रतापते, जलपर शैल तराहिं। वह रघुनायक दासके, सदा वसे मनमाहिं ॥२॥ गुरुनानक गोविन्द गुरु, जासम और न कोइ ॥ अभिवन्दन पदकमल तिन, जोर सदा कर दोइ ॥३॥ भारत भूमिपुनीत पद, तपोज्ञान अवतार ॥ मानसिंह गुरुको नमो, तारण करुणासार ॥४॥ नराज छन्द। प्रबोधचन्द्र नाटकं, मुबोध ग्रन्थ मैं करों। अलंव साधु संगको, विचार चित्तमें धरों। मुने पढे सु जे जना, निवार मोह वन्धना ।। लहे अपार मोक्षको, टुटे समस्त फन्धना ॥५॥ संवैया। भूपन वोध सुवोध नहीं अति कौतुक माहि रहें लपटाए ।। बोध विना जगमोक्ष कहां इम संतसमें मुखवेद अलाए। (१) पन्यही निर्विन रुमानि रूप। (२) मादि मन्तो मा पा पार यादवमान करना । (२)मतेसानप मनिःमानादेखीजतना हमादि।

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; ܫܪ सापि विज्ञापन । विदित हो कि शान्तरसमधान गौणतया शृंगारादि अखिलरसोंसे संयुक्त अध्यात्मविद्या विरोधि नानापाखण्डमोके सिद्धांतोंको उच्छिन्न करताहुआ संस्कृतमें प्रबोधचन्द्रोदय नामा नाटक इस धरामण्डलमें सर्वोपरि वर्तमानहै सो संस्कृतमें अतिकठिन होनेसे भाषाके | अभिजनोंको दुर्विज्ञेय जानकर कवि गुलाबसिंहनीने तिसका भाषामें दोहा सवैया कवित्त | सोरठों करके अनुवाद कियाहै- इस नाटकमें प्रायः वेदांतका सर्वस्व सन्निविष्टहै और इसमें ऐसी सुगमरीतिसे ब्रह्मात्म्यैक्यत्वका प्रतिपादन कियाहै कि, मन्दवैराग्यवाले पुरुषभी इस अन्धके विचारसे अध्यात्मतत्त्वका लाभ फरसकहें-यद्यपि उक्त कविनीकी भाषा बहुत सुगम और साधारण पुरुषाकोभी समुझने योग्यहै-तथापि-कहीं कहीं स्थलविषे विषयको अतिकठिन होनेसे गुरोंके बिना स्वयं समुझना अशक्यहै ऐसा जानकर और अधि- फारीननोंको विचारपूर्वक इसग्रन्यके अवलोकनसे बोधोत्पत्तिक अर्थ श्रीसाधुबेलाके निवासी परमदयालु पण्डित गुस्मसादनीने इसग्रन्थको शुद्ध करके तथा इसके नीचे बडे परिश्रमसे श्रुति स्मृति पुराण वचनोंको उद्धृत करके तया तिनका अर्थ अतिसुगम रीतिसें दर्शायकर | संस्कृत प्रबोधचन्द्रोदयनाटकके अनुसार सक्षिताक्षरी टिप्पणीरूपसे प्रगट करके तथा पण्डितनीने इसटिप्पणीसहित ग्रन्थको तयार करके निन श्रीगुरुश्री १०८ मान् परमहंस- परमानन्दनीक चरणपङ्कलोंमें समर्पणकिया आगे दयार्णव श्रीगुरुदेवनाने अपने अनुग्रहसे अधिकारीनोंके फल्याणार्थ और धर्मार्थ वाटने के अर्थ मुदित करवायाहै-अब आशाहै कि इस मन्यमनिपाद्यविषयके मनन करनेसे अधिकारी नन आवरण शक्निविशिष्ट अजाननिवृत्ति- पूर्वक परमानन्दको पानिरूप नीयन्मुक्तिक मालका अनुभव करतेहुए पण्डितनीके परिश्रम- को सफर करेंग इति शम्- प्रवलारिसमूहमहीपनके उरपाटनको नरसिंहमई ॥ वलभूपतिसिंधुधसीधरनी इन फेरवराहउधारलई ॥१२॥ दिगनारविलासनिकाननमें जिहकीरतिके श्रुतिटंक वनाए । सभदिग्गजंकानसुतालबडेविधताहिंसफालनपौनउपाए ।। तिसंगमिले अतिनाचत है भवताहिप्रताप सुज्वालवढाए। तिन आपगुपाल सुएहकह्यो वहुनाटक भूपति देहु दिखाए१३ दोहा। सहज सुहृदस्वभाव यह, कीरतिवरमा भूप॥ ताहित उदम थोकियो, दिग्जयपरमअनूप ॥१४॥ ताव्यापारअंत्रतभयो, परमानन्दहमार ।। विविधविपयरसपरसकर, भये मनोजविकार ॥ १५॥ ताव्यापारदूपितमनो, वासर दये विताय । कृतकृत्यभये सुआजहम, भूपतिराजदिवाय॥१६॥ सवैया। प्रसिद्ध अमातनभूपतिकै विपक्षवलीनृप मारगिराए । रक्षपालकरी सगलीधरणी पुनियाहि किसीसहछत्र फिराये।। सुपयोनिधिमेखलयाहधराशिर भूपनके इनराज ठराए ॥ रसशांत प्रयोग निवेदनक जगआपविनोदकरे इमभाए।॥१७॥ (१) दिग्गजोंके कानोंरूपातालोंकर उत्पन्नभया जो बहुत पवन । (२) तिसपवनके साथ घृद्धिको प्राप्तहोयकर संसारमें मवृत्तहोरहाहै मतापरूपअनिनिसका। (३) गोपाल । (५)शत्रु । (५) शांतरसहै मंधाननिसमें ऐसानोनाव्यानुकरण तिसके निवेदन कहिये । मनावनेतरकै ॥

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प्रवलारिसमूहमहीपनके उरपाटनको नरसिंहमई ॥ वलभूपतिसिंधुधसीधरनी इन फेर वराहउधारलई ॥१२॥ दिगनारविलासनिकाननमें जिहकीरतिके श्रुतिटंक वनाए । सभदिग्गजेकानसुतालवडेविधताहिंसफालनपौनउपाए । तिहसंगमिले अतिनाचत है भवताहिप्रताप सुज्वालवढाए। तिनआप गुपाल सुएहकह्यो वहुनाटक भूपति देहु दिखाए१३ दोहा। सहज सुहृदस्वभाव यह, कीरतिवरमा भूप ॥ ताहित उदम थोकियो, दिग्जयपरमअनूप॥१४॥ ताव्यापारअंवतभयो, परमानन्दहमार ।। विविधविपयरसपरसकर, भये मनोजविकार ॥१५॥ ताव्यापारदूपितमनो, वासर दये विताय ।। कृतकृत्यभये सुआजहम, भूपतिराजदिवाय॥१६॥ सवैया। प्रसिद्ध अमातनभूपतिकेतुविपक्षवलीनृप मारगिराए । रक्षपालकरीसगलीधरणी पुनियाहि किसीसहछन फिराये।। सुपयोनिधिमेखलयाहधराशिर भूपनके इनराज ठराए ॥ रस शांत प्रयोग निवेदनक जगआपविनोदकरे इमभाए।।१७॥ (१) दिग्गनोंके फानोरूपोतालोंकर उत्पन्नभया जो बहुत पवन । (२) तिसपवनके साथ वृद्धिको मातहोयकर संसारमें प्रवृत्तहोरहाहै मतापरूपमिनिसका! (३) गोपाल । (४)शत्रु । (५) शांतरसहे मंधाननिसमें एसानोनाव्यानुकरण तिसके निवेदन कहिये मनावनेकरकै ॥ " [अं.१ प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (११) याके वलकल ऐसे सोहै । तडितपुंज जनमें मनमोहै ॥ वनफलमिष्टमधुररधुनिवेदा मनकोनिखिलमिटावैखेदा॥१९॥ सुंदर शीशजटा अतिकारी। मनोविरंचि स्वहाथसँवारी ॥ तपको तेज भालमें दमकै । किरणासहितमनोशशिचमकै६० हेमजनेऊ याके अंगा। स्वर्गफूल सोभे सरवंगा ॥ अहोपिताफलहित बनगए । याके दरशन ताहि न भए।।६१॥ पिआगमनऔसरकोजान । वारवधू तह कियो पयान ॥ वहुआईनौकाकेपाही मुनिवर आयोआश्रममाही॥२॥ शृङ्गीऋपि सुतआइ निहारा । रंचककरे न वेद उचारा ॥ अग्निहोत्रकी अग्नि सुजोई। नाहि जगाई निशिकोसोई।।६।। वारवधू जिहपंथ पधारी। दृष्टि तहाँ शृङ्गीऋपि धारी॥ पूछयो पिता कहां मति गई । पढे नवेद नहीं कृतकई ॥ ६॥ | शृङ्गीऋपि तव वैन उचारे । पिताहुते कछु भाग हमारे ॥ ब्रह्मलोकते मुनिवर आए । नाहिसमथ्रमुख निरमाए ॥६५॥ ताको रूप निहायो जोई । अवलौ चीत चितारों सोई॥ कोमल वलकल तनमेंसोहैं। दोदो शृंग उरन मन मोहैं ६६ ॥ शीशजदाकोमलअतिश्यामा। भाल तिलक हाटकढिगदामा। नाककरणमें छिद्र सुकीने । स्वर्गफूल तामें गुहिदीने ॥६॥ नयनसरोज दयारसभीने । सच सुधा श्रम करे सुखीने ॥ मेरीओर कृपाकर निरखे ।प्रेमडोर मानो मनकरखे ॥६८॥ याविधि वेद सुकीन उचारा। सुनिकर हो सुचीत्त हमारा॥ ऐसे शृङ्गीऋपिहिअलायो । पितालख्योअवलाभरमायो.६९ (१) मुखके वाल ॥

अंतसमे यम दीनकरे तिन हेर महा करुणारस आए। .वोध उपावन हे. मनोनरनाहनके इह ग्रन्थ वनाए॥ ६॥ भानुमरीचि सुनीर सम पुनि जा अज्ञान जगत्त बनायो । पायुअकाश सुपावक नीर मही पुनि लोक सुतीन उपायो॥ जाहिं पिखेरजुसापजिमें जगफेरसभोतिनमाहि विलायो । उज्वलआतमवोधमहाहमआनंदसों उरमाहिं धियायो॥७॥ प्रत्यज्योति सनातन जोग व्यापरही सभमाहि सुहाई॥ रिदशांतविपअतिभासतहै कृतसंयमकोजिहआनन्दताई ॥ विधुचूडनिरोधसुवायुभलेब्रह्मरन्ध्रहतेअतिऊँचचलाई ॥ दृगतीसरव्याजसुभालविपेशिवसंयमवंतसुआपदिखाई॥८॥ दोहा। कीरतिवरमा नाम जिह, भूपति वडो रसाल ॥ ताहिसभामें विमलमति, आहि प्रधानगुपाल ॥९॥ वर्ष एक नाटक तहां, भयो सुसभामंझार ।। जाको हेरसुज्ञानलहि, भये भूप भवपार ॥१०॥ याकों सुने जु कानमें, नीके चीत्तलगाइ ॥ आसुरसंपति दूर तज, वेगज्ञान वहु पाइ ॥११॥ सूत्रधार उवाच स्वपनी प्रति ॥ सवैया। बहुवातनको कछु कामनहीं अव आयसुमोहिंगुपालदई । सभभूपति जांमुकुटामणि पदपंकज आरती आनिकई ॥ (१) अविद्या तत्कार्यमलरहितस्वकाशरूप। (२) सेवते हैं अर्यादउपासते हैं । ३) अनत नह दसरूपअहंकारादिकोंसे मतिकलहोयकर अर्थात् सत्यज्ञानानन्दादिपार हेसुत ऋपि नाहं राशन गीत मुनी नहिं काना । नातर तेरे हर प्राना। याविधि मुनिवर वहुत डराए । पर शृङ्गी वहुरूप । मुनिवर भये प्रातपुनिकाला गयो जवेवहुविपिनविशान तवपुनिगणिकाझुंडसुआयो । शृङ्गीकपिपिखमोलझुकाय तुम अपने तप विपिनमझारी। मोहि लेचालोकरुणाधारी तव संगचल्यो मुनिवर ऐसे । प्राणनसंग जीव जग जैसे नैनकटाक्ष मुछविहिकपोला ।निरखभयोऋपिकोमनलोला ताकी मंदगती झुनकारा । सुनिसुनिऋपिमनभजेविकारा नौकाभीतर बैठो जवही । पहुँतो लोमपादपुरतवही।।७४। मुनिवर नगर जवे पगधारा । वरपा भई सुतहाँ अपारा ॥ यहविधितपको जाहि प्रभाऊ । अबलाऽधीनभयो मुनिराऊ७५ शांता भूपतिदुहिता जोई। ताहि वरी पुर भीतर सोई ॥ याकी कथा वहुतविस्तारा । कहांलगे मम करोंउचारा॥७॥ दोहा। मानवकी गनती कहां, देवनमें प्रधान ।। त्यागे धर्म क्षणेकमें, रंच लगायो वान ॥७॥ सबैया। मनारि सुनारसुरेश्वरजाइ भयो सर मोहिचलायो । रानन जो रतिके हितसो दुहिता प्रति धायो । टाति। (.) आमततामा १] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (३) लारिसमूहमहीपनके उरपाटनको नरसिंहमई ॥ भूपतिसिंधुधसीधरनी इन फेर वराहउधारलई ॥१२॥ नारविलासनिकाननमें जिहकीरतिके श्रुतिटंक बनाए । दिग्गजकानसुतालवडेविधताहिंसफालनपौनउपाए ॥ संगमिले अतिनाचत है भवतादिप्रताप सुज्वालवढाए। आपगुपाल सुएहकह्यो बहुनाटक भूपति देहु दिखाए१३ दोहा। सहज सुहृदस्वभाव यह, कीरतिवरमा भूप ।। ताहित उदम थोकियो, दिग्जयपरमअनूप॥१४॥ ताव्यापारअंत्रतभयो, परमानन्दहमार ।। विविधविपयरसपरसकर, भये मनोजविकार ॥१५॥ ताव्यापारदूपितमनो, वासर दये विताय ॥ कृतकृत्यभये सुआजहम, भूपतिराजदिवाय॥ १६॥ सवैया। सिद्ध अमातनभूपतिविपक्षवलीनृप मारगिराए । पालकरीसगलीधरणी पुनियाहि किसीसहछन फिराय।। पयोनिधिमेखलयाहधराशिर भूपनके इनराज ठराए । सशांत प्रयोग निवेदनक जगआपविनोदकरे इमभाए।।१७॥ " .

अं०१] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१३) इंदु भेजीगुरुकी अबला बुद्धसो सुतताहिके वीच उपायो। कौन अपंथन पांउधरे जगमोसरजाहिको चीतभ्रमायो७८॥ दोहा। याविधिके अवलाहने, तपी वडे वलवान ॥ गुलावसिंह वैरागको, करें मूढ अभिमान ॥७९॥ रति रुवाच ॥ सवैया। सत आर्य यद्यपि तूंभुजमैं जगजीतनको वल आपधरें ॥ जग होइसहायक जाहिवली पुनितां अरिते वलवंत डरें। सुनिये यमंआदिक आठ वजीरविवेकसहायक वेदररें ॥ बहु जंग उपाय करें सुनियो इहते उरमैं हम नीतडरें।।८०॥ काम उवाच ॥ सवैया। भामिनिरायविवेकहिकेयमआदिक आठ अमात सुनाये ॥ तेरणरंगमहीपहिले हमने सवठौरनठोर दवाए दवाए ॥ कौन अहे जगभीतरसो हम जीवत ताहिको नाम अलाये ॥ वामउरू तज चिंतसदा तुमक्योंमनमे अरिते डरपाये॥८॥ दोहा। कोपे आगारीरहे जो, कौन हिंसानोंर ।। ब्रह्मचर्यको मैं सुनो, क्षणमहि डारों मार ॥ ८२॥ (१).गुरु हस्पतिकी सोको पन्द्रमा सेतामया। (२) यमनियमासन माणापानमत्याहार धारणा पानसमाधि। (३) कोष । (५) पर भागियो- गानुएल प्यारासा नाम हिंसा तास अभाव महिना.। (५) भामकारके मेनका स्पाग मदनपह॥

. । कवित्त। प्रबोधचन्द्रनाटकं मुआहिनटतोहिढिग, कृष्णमिश्रआपजोईपूरववनायोहे ॥ कीरतिवरमके समीप सोई नाटकरो, हेरनको भूपतिको मन उमगायोहै। सुनो सूत्रधार तुमप्रगटविचारकरो, सभाहूसमेतरिदेकौतकसुहायोहै ॥ सुनिकै गुपालवाक सूत्रधारचारवाक, नाटककेहेत निजनारिको बुलायोहै ॥१८॥ नेपथ्यकीओर तिनहेरके पुकारकह्यो, आर्येसुआउ इत तवी नटी आईहै ॥ आर्य सुकौन काज मोहिको बुलायो आज, कीजिये सुकाज अब वेर क्योंलगाईहै। सूत्रधार ताहिको उचार पुनिएहु कह्यो, आर्ये अजान नाहि जाहितबुलाईहै ॥ १९॥ नाटकप्रवोधचन्द्र चन्द्रमासमानजग, दीजिये दिखाइ यों गुपालमन आयोहै ॥ भूपति विपुलवल सोईतू अरण्यजान, पावक प्रतापवनसंगते वढायोहै। ताहिकी सुज्वाल तीन भौनमें विसाल वढी, कीरतिको पुंज लोकतीनहूं में गायोहै ॥ (१) नाटककाभाचार्य । (२) नेपथ्यनामकनाता है ।

कपि वहुभाँति डराए । हेसुत ऋपि नहिं राक्षसआए.॥ गीत मुनी नहिं काना । नातर तेरे हर0 पाना ॥ ७० ॥ वेषि मुनिवर बहुत डराए । पर शृङ्गी वहुरूप ध्याए । वर भये प्रातपुनिकाला ।गयो जवैवहुविपिनविशाला७१ निगणिकाझुंडसुआयो । शृङ्गीकपिपिखमोलझुकायो । अपने तप विपिनमझारी। मोहि लेचालोकरुणाधारी७२॥ संगचल्यो मुनिवर ऐसे । प्राणनसंग जीव जग जैसे ॥ कटाक्ष सुछविहिकपोला निरखभयोऋपिकोमनलोला७३ 1. मंदगती झुनकारा । सुनिसुनिऋपिमनभजेविकारा॥ भीतर बैठो जवही । पहुँतो लोमपादपुरतवहीं।।७४॥ वर नगर जवै पगधारा । वरपा भई सुतहाँ अपारा ॥ धितपको जाहि प्रभाऊ । अवलाऽधीनभयो मुनिराऊ ७५ 5 भूपतिदुहिता जोई। ताहि वरी पुर भीतर सोई ॥ । कथा बहुतविस्तारा । कहांलगे मम करोंउचारा।।७६॥ दोहा। मानवकी गनती कहां, देवनमैं प्रधान ॥ त्यागे धर्म क्षणेकमें, रंच लगावो वान ॥७७॥ सवैया। मनारि सुजोरसुरेश्वरजाइ भयो सर मोहिचलायो । बठेच पुरानन जो रतिके हितसो दुहिता प्रति धायो ।

१] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। लीनेचन्द्रहास प्रतिकूलनृपनासकर, जीतिके गुपालसुनरेशढिगआयोहै ॥ सामराज राजकोभिषेक जिन फेर जग॥ कीरति वरमदेवभालमें करायोहै ॥२०॥ 'सवैया। गमहीपिसताशनिआ अवलौं नरमुंडनताल बजावें ॥ कैकचपिंगकपोललटीसुपिशाचनियांतिहनृत्यदिखावें ॥ कुंभमृदंगनपीन वली धसि नाद अनेक सुपीठ सुनावें।। ति मुनो नटनीजगमें रणरंगमही अवलौं यशगावें२१॥ शांत प्रसन्न विनोदनके हित हेनटनी सुगुपाल बुलाये। यांहि सभा बहुनाटकजो धर स्वांग भले हम देहिदिखाये मी तव एह कह्योभरताहित स्त्रांगन मानवलेहु मगाये ॥ पाहि अचंभ वड़ोमनमें, सुन आर्य एहुगुपालसुभाये २२ प्राक्रमक रणरंगमही जिन मंडल भूपनके सुभगाए। कानलौंतानकठोरधनुंरणमंडलमें शरओषचलाए । वाणनके अरिखेतविपे सुतुरंगनके बहु पुंज गिराये। आयुधधारमहीधरसे गजकोटिनकोटि सुभूमिरुलाए२३ सैन सुक्षीरनिधी भुजमंदरघात सुव्याकुलकीनी ।। सैनपयोनिधिको मथिकेवलभार्वविजयलक्ष्मीजिनलीनी।। के रणकी मुनिवृंदसमै अवलौं जसकीरतिगाहि नवीनी। शांतविपतिनकीमतिआय्यमोहिकहोकिहभाँतिसुभीनी२४ भरुवतारान। (२) गण्टस्यला (कर्षसेनाना

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पनपाराष१पमामात- दोहा। ब्रह्मणज्योतिस्वभावते, समस्वरूप जगआहि ॥ कारणपाइ विकारभज, पुनि निज रूप समाहि ॥२५॥ नृपकुल प्रलय कृशानुसम, चेदिपती जगआहि ॥ चन्द्रवंशनृपरांजको, दूरकियोपुनिताहि ॥२६॥ चन्द्रवंशनृपराजहित, उद्यम कियो गुपाल । मार विरोधी थिरकियो, राज गुपाल रसाल ॥२७॥ सवैया। कल्पांतप्रभंजनक्षोभभयोसरितापतिज्यों सवशैलवाए । कृतकार्य फेर गहे थिरता निजवेलकी भीतरआय ठराए । भगवंतके अंशजयेनरजे सभ भूतनकेहित प्रेम बढाए ॥ नरमंडन ले अवतार मही कृतकार्यते रस शांति लगाए।॥२८॥ भृगुनन्दनरामकोभामनीपेखसुवाहुजवारइकीसखपाए । ॥ नृपशोणितनीर सुमांसर्वसाबहु पंकमई तटनी भटनाए । नृपनारि कुमार सुबूढनलों करुणाविन धारकुठार चलाए । धरभार उतार उखार कुलं नृपशांति भये तपमाहि लगाए२९ दोहा। परशुराम जिम आदि यह, कृतफायं गोपाल । परम शांतिनिष्टा भजी, रसमें बडो रसाल ॥३०॥ (१) पापिति गन्दा मेन । (२) हातिम गम्हरे रालो। (३) मातार सन। (५) अम्बिगतमाम ।

लोभ जवै करमै धरे, चन सत्ये असतेय अपरिग्रह, भामनि मुएनिहार ॥ ८३ सवैया। मनमसुआसनप्राणयमं प्रत्याहारवलीजगध्यानअलाये ॥ चारणा और समाधिसुनो चितहोइ इकाग्रती उपजाये ॥ चितभीतर रंच विकारकरों इनको जडमूल सुदहु उठाये॥ इनजीतनहेतु रची अवला यमनेम तवे हमरे वशआए॥८॥ दूरविलोकन नारिनिको अरु ताहि संभापन दूर रहे ॥ हास विलास सकेल अलिंगन नाहि इकंत सुवात कहे ॥ जन संयमवत कहावतजे तजसोधतपोवन जाइवहे ।। चित्तमाहि चितारत जो युवती क्षणमैं मनताहि विकारगहे८५॥ मोह अमातसुमात्सरंमद दंभ तथा पुन लोभ अलाए । फारयमादि वजीर लय वहिकान इकंत सुमंत्रदिढाए । मोहमहीप अधर्म वजीर यमादिक गोप लग तिनपाए । जोयमनेम करे जगम, हरिके हित नादिसुलोक दिखाए ८६|| रति वाच॥ दोहा। शमदम और विवंकली, कामकोयमदमान ।। में मुनियो निजकानमं, एको जनम अस्थान ॥८. (१) पर दो हजार का नाम टोन है। (२) पपई जानन गप है। (३) गोममा नाम प्रम। (५) बना नाम आगा। (५) दिशा (1) मन्ना। ( पुरमा रामना। - -- १] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (७) जीत विवेक सुमोह जिम, वोधउदै जगकीन । जीत करण वलराज तिम, कीरति वरमा दीन ॥३३॥ अथ नेपथ्ये कलकला शब्द । सवया। व कनातकेवात सुनीसुमनोजवलीयह काननमाहीं ॥ पभरे मुख एहुकही नटनीचसुवोलतयोमुखमाहीं ॥ वतही हमरे जगमें तुम मोहकि हार कहें जनमाहीं । पि शिलूपविवेकहिकी जड मूल उखारदयो भवमाहीं॥३२॥ वातशिलूपडरयो मनमें पुनि संभ्रमहेर सुनारि अलायो। नेकंठभुजा धनपीनकुचालहि संगरोमांच अनंगमुआयो।। गमादन सोभ अपार वनी मदघूमतनयनचले अलसायो।। व भागचले इह ठौरहिते मुनिक ममवाकमनोपुनशायो ३३ उभाख तजीरंगभूमितिनो तव आय मनोज प्रवेशकयो ।। लिके कच नील कपोल लटी रतिकंठविपे हँस हाथदयो। गकंज चढाइ उठाइभुजा रतिनाथ महा उर क्रोध छयो । त्ताऽधम पापि सुजीवतमें राति नाहि विवेक सुकीनभयो ३४ वलौं मनमाहिं विवेक रहे सभ आगमते उपजा इह जोई।। वलौं नहिं नीलसरोरुहिसें हगनारिकदाक्षलगे सरकोई ॥ प जीत तजे नवखंडमही घरनारि भनें कर जोर सुदोई।। पतराननली जगमाहिं पिखे हगनारि अजीत नहीं भटहोई३५

। अ०11
प्रवाधचद्रादय नाटका
(१५)
काम उवाच ।।.
,
सवैया।
उत्पत्तिकोस्थानसएकअहे मनसोजगभीतर तातअलाया।
हम हैं पुन भ्रात विमात सुनो बहुगोप प्रकार वने अवगाया।
सन पूर्व ईश्वर संग कीयो, निजनारिवखानत ताहि सुमाया
जिनते उत्पत्ति भई हमरीमननाम वही सुत ताहि उपाया८८
मन तीनहु लोकसुआपरचे पुन ताहि विप कुल दोइ उपाई।
मन एक प्रवृत्ति कहे पतिनी सुनिवृत्ति तथाजग दूसरि गाई॥
मोह प्रधान प्रवृत्ति रची कुल तीनहु लोकनमाहिं फिलाई ।।
मुविवेकप्रधान निवृत्तिजनीकुलसो विरलीजगमाहि चलाई८९
रति रुवाच ॥
सवैया।
सुत आय जो इहभांति अहे जगभीतर एक सुताततुमारा॥
किह कारण वैरभयो तुमरो धुजमीनकरो ममएहु उचारा ॥
तिह भ्रातनमें इहभात सुवैरन मोहि सुन्यो यह कानमझारा॥
कविसिंहगुलाब कहे रति नाहसुनो रतिवैरको कारणभारा९०॥
काम उवाच ॥
सवैया।
जेइक आमिपत निपजे तिन वरं प्रसिद्ध कन्यो जगमाही।
भूमिनिमित्त लरे कुरुपांडव, भूप खपे जिनके. रणमाही।
(१) दूसरो माता ॥

पाल जहा गृह ऊचवन गजदतनमच सुसजसवारा ॥
मध्यविराजत चंद्रकलासम - वारिजनन सुनूतननारी ॥
भूपन चंपकहार घने तनुचन्दन कुंकुमगंध उदारी ॥
चंदउँदै तम दूरभये निशिमाहिं खिरीसुमनोजकी वारी॥३६॥
इह आयुध मोहि जयंत सदा इन धारमलेजगआहिवलीको॥
इन होवत कीन विवेक अहे पुनि बोघउदै नहहोत कलीको।।
जनऔरनकीजगकीन कथा धृतसंयम जोजन जाइ गलीको।
दृगकंज फिराय पिखे युवती चितयोंतरफैजन मीनथलीको३७
रति स्वाय।
दोहा।
आर्यपुत्र सुअतिवली, भापं मुनी अनेक ॥
महामोहभूपालको, याजग शर विवेक ॥ ३८ ॥
-
कामटयाच।
सवैया।
तवनारि सुभावते संकभई प्रतिपक्षनते हमनाहिंडरें।
। पिखयद्यपिफलशरासन आसरमै करभीतरआपधरें ॥
जन तदपि आयसुमोदि उलंघ मुहरत धीरज नाहि धेरै ॥
सुनवामउरू मुरदैत्यसमै जगभीतरह वस मोदि करें।॥३९॥
दोहा।
जानत काम ननारि कछ, गृङ्गीऋपिवन मादि ।
मोमरचीत्तभ्रमाइयो, गयोभूपगृहमादि ॥१०॥

71111वान नाटक।
[अ०.
भारत खंडकी नूतन नारि भई विधवा जिन संगरमाही ।।
होवतही यह बात आई कछु नाहिं भई सुनई भवमाहीं॥९॥
हमरे मनतात सुपूर्वएरतितीनहुलोकसुआप वनाए ।
हम अतिवल्लभ तात हिके इहते हम तीन लोक दवाए।
शमी दम और विवेक पिता बलहीन पिखे वनवास पठाए।
अवते अपवंत उपायका पितभ्रातनमूलमु देहु उठाए॥९२॥
रति रुवाच ॥
सवैया।
सुतआर्यक्यों पुनि पापइसो मति हीनकरेंबहुसंगतुमारे ॥
उर द्वेप वध्यो तिनके अतिहीं इहभांति चहें जगपापकरारे।।
अथवा इह कौनउपाय सुनोधुजमीन तुम मनमाहि विचारे॥
इहभांति सुनेरतिवाकजवै तब वोलउठे रतिप्राणपियारे॥९३
काम उवाच ॥
दोहा।
भामिनि गूढ सुवीजइक, है पुन कह्यो नजाइ ॥
रति रुवाच ॥
आर्यसुतस्यों नाकहें, मोको तूं प्रगटाइ ॥ ९ ॥
काम उवाच ॥
दोहा ।
रति तूं नारिसुभावते, भीरू अतिडरपाई ॥
लोकनाट॥२५॥

ताकी कथा संक्षेपते, कहाँसुनो चितलाइ । वामउरू संसामिटे, तोहिं निखल डरजाइ॥४१॥ चौपाई। लोमपाद इक भूपति भारा । जाकोयश सवभीन मॅझारा॥ दशरथको बहु मीत कहीजे । जाको हेर अमंगल छीजे ॥४२॥ ताके देशकोबहु विस्तारा । वर्षा होइ न ताहि मझारा ॥ ताकी प्रजा दुखी सभऐसी । तपत अल्पजल मछलीजैसी४३॥ विप्रजोतिकी भूप बुलाए । वर्षा होइ सुकीन उपाए ॥ विपन बहुविधिकीनविचारा । भूपतिको इह भाँति उचारा ॥४४॥ शृङ्गीकपिवन भीतर जोई। आइ इहाँ तव वर्षा होई ॥ वहनिरपेक्ष महामुनिज्ञानी । आवे किहप्रकार रजधानी॥१५॥ लेन न ताको कोई जावे । शापअग्मिते सभ डर पनि ॥ तब तिन वारवधू सबुलाई। दानमानकर पास विठाई ॥१६॥ शृङ्गीऋपिवनजाहि अगारा। ताको लियावो नगर मझारा ।। सुनकर वारवधू अकुलानी शाप अग्मिते अति डरपानी॥४७॥ पर भूपतिकी आयम जोई। मेटि न सके कदाचित सोई॥ तव तिन एक उपायमुकीनो। नौकायांध स्थंडलकानो॥१८॥ तामे रंभापुंज जराए। लाडूकरणेपूरफललाए ॥ कहूं जलेबी कहूं अपूपा । कहूं सुबूंदी रची अनूपा ॥ १९॥ (१)ति। (२) मनिपटा । (३) पर [अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१७) रति रुवाच ॥ दोहा। आर्यसुत सोकौन बहु, कैसोकरम कमाइ ॥ विनभाखे थल मीनसम, मेरो चित्त तरफाइ ॥ ९६॥ सवैया। भामनि नाहिडरें उरमैं हते आशविवेक सुआश ठराई। याकुलमैं निसकालसमाविद्योजिह नाम सुराक्षसी काई ॥ लेवहिगी अवतार सही उरभीतर नाहिं दया कळ गर्ट ॥ काम उवाच॥

दोहा। क्रितम वेल तामे रची, फूल पात बहु' लाचीदाणेकी तहां, रची सुदाख वनाइ ।। चौपाई। याविधधारअडवर वाला गइ तहांजहँ विपिन मुनिआश्रमते किंचित दूरा । नाका थापी नार गरून पोडशवरसनकी वहु वाला। गई तहाँ जह मना लाडू करणपूर फल जेते । पात पलाश धरे सभतेते शृङ्गीऋपि तह नैन मिलाए। ध्याननिष्ठ मुखवद 3 पगनूपुरधुनि सनी सुजवहीं । नैन उघारे मुनिवर तवहीं मुनि उर जानवन्दना धारी । अरघपादहित लियायो व गणिकातव मख एह वखाने । हम ऋपिवर नहिं छुहेसआने थाफो नीर नचरण पखारो। हमरे तपवनफल मख डा करणपूर अरु लाडूखाए। शृङ्गीऋपिके मनविगसाए। खाइ जिलेवी लाचीदाण । अहोस्वाद मनिमखोवखाने मिलकर गणिकागायन करें। मुनिवर जाने वेद उच्चरें॥५६॥ तुमरे मुखसरोज मकरंदा । वेदधुनी उर जने अनदा ।। पद क्रम जंटाअपूर्वथारी । आप पढाई जोमुखचारी ॥१७॥ याविधिनिरखतामुखओरा ।ज्योंनिशचिते सुचन्दचकोरा ॥ अहो हमारे भाग सुनए। यह मुनि ब्रह्मलोकते अए।।५८॥ (१)करीहुई। (२) पदकमना वैदिक मन्मोंके उच्चारण विशेष महै।

भारत खंडकी नूतन नारि भई विधवा जिन संगरमाही ॥ होवतहीं यह बात आई कछु नाहिं भई सुनई भवमाहीं।।९१॥ हमरे मनतात सुपूर्वएरतितीनहुलोकसुआप बनाए । हम अतिवल्लभ तात हिके इहते हम तीनहुलोक दवाए। शमी दम और विवेक पितावलहीन पिखे वनवास पठाए।। अवते.अघवंत उपायकरें पितभ्रातनमूलमु देहु उठाए॥१२॥ रति रुवाच ॥ सवैया। सुतआर्यक्यों पुनि पापइसो मति हीनकरेंवहुसंगतुमारे ॥ उर रेप वध्यो तिनके अतिहीं इहभांति चहें जगपापकरारे।। अथवा इह कौनउपाय सुनोधुजमीन तुमे मनमाहि विचारे॥ इहभांति सुने रतिवाकजवै तब वोलउठे रतिप्राणपियारे॥९॥ काम उवाच ॥ दोहा। भामिनि गूढ सुवीजइक, है पुन कह्यो नजाइ ॥ रति रुवाच ॥ आर्यसुतक्यों नाकहें, मोको तूं प्रगटाइ ॥ ९४ ॥ काम उवाच ॥ दोहा। रति तूं नारिसुभावते, भीरू अतिडरपाइ ॥ वैपापी दारुणकर्म, तोपे कह्यो नजाइ ।। ९५॥

काम उवाच ॥ रति रुवाच ॥ दोहा। आर्यसुत सोकौन बहु, कैसोकरम कमाइ । विनभाखे थल मीनसम, मेरो चित्त तरफाइ ॥ ९६॥ सवैया। भामनि नाहिडरें उरमैं हते आशविवेक सुआश ठराई ॥ याकुलमैं निसकालसमाविद्यौजिह नाम सुराक्षसी काई ॥ लेवहिगी अवतार सही उरभीतर नाहिं दया कछु राई ॥ होवतसत्य भविष्यकथा जनकी श्रुति याजग एहु अलाई९७ रति रुवाच ॥ दोहा। हा धिग हमरे कुलविपे, पिसताशीसुमहान॥ उपजेगी उर कंपहै, चलदलपत्रसमान ॥९८॥ काम उवाच ॥ दोहा। भामनि.क्यों उर कंपहै, लोककहें यह वात ॥ जनमु राक्षसी होइगो, निश्चनाहं विख्यत ॥ ९९ ॥ रति रुवाव। दोहा। नाथ वखानो एहु तुम, जो उपजे पुन सोइ ।। याजगमैं अवतारले, कामकरेगीकोइ ॥ १० ॥ (१) नष्ट होवे आशा निसफी. (२) बसाक्षात्कार भी कर कर्मके करणेते राक्षसी कहाँहै (३) पुरुषोंकी वाताहै निश्चय नहीं ।

पादक दोहा। उपजतही प्रवोधसुत, करे वन्ध सभहान ॥ वन्धनसुक्ति विराजही, परमात्म भगवान ॥ १४१॥ सवैया। सुत आर्यजो प्रभको दृढवंधनहें दृढग्रन्थि महादुःखदाई ॥ ताअवला तव संगमते सुतबोधभये बहु वन्ध मिटाई ॥ पति नीतभजो तिनसंगमको अब वेगिमिलो किमवेर लगाई।। सुतआर्यनीतरमोतिनसोममचीतप्रसन्नभयोहुलसाई॥१४२॥ राजोवाच ॥ सवैया। भोमनि जो यह वातिभई तव सिद्धमनोरथआज हमारे॥ हैजगआदि सुएक विभू परमात्मजा श्रुतिपुंज उचारे । ताहि करे वहुखंडजिनोपुरदेहनमै वहु वन्धन डारे- ॥ चिदईशदयोमृतकोपदहाअवतेईवनेजगभीतरमारे ॥१४३॥ कवित्त। ब्रह्मकेजोंभेदकहखेदकअनेकविधि, प्राणअंतप्राश्चित ताहि करवाइये ॥ विद्यासरूप पाश्चितयों अनूपहोइ, जीवब्रह्म एकतासु तवी मोक्ष गाइये। कार्यके सिद्धहित शांति औ दमादिजेई, ताहताह तीरथमे वेगसु पाइये ।। (१) भागोर नागरूप। (२) प्रमादिनाक्षात्मरम() मनोपरी पत्तिम

काम उवाच॥
सवैया।
भामिनियों सुनिये जगमैं इहवाकअहे विधिब्रह्म अलाया
पुस असैगकहें जिहको तिहनारि अहे जगभीतर माया॥
नाहिं छुहे तिह संग कवी मने वल्लभ ताहिविपे सुत जाया॥
तां उपरंत मुनो गजगामनि नाथइहे पुनलोक वनाया१०१॥
दोहा।
कन्या ताते होइगी, विद्यानाम कहाइ ।
तातमात पुन भातकुल, लए सकल बहुखाइ ॥ १०२
कवि रुवाच ॥
दोहा।
त्रास कंप रतिको,भयो, वोली अतिभय आहि ॥
भरताके गलसों मिली, आर्यसुत परिपाहि ॥ १०८
सवैया।
रतिसंगमकोसुखआहिजोईमुखस्वागतिकपुनकामदिखाए
तनमाहि मनोजरुमंचभये युगतारेक नेननकै तरलाए
घनपीनपयोधर नारि मिले शिवके रिपुती मनमें हरपाय
मणिगुंजत कंकण हाथाविपरतिकंठभुजामनमें विगसाए
(१) असहोद्यं पुरः । इतिश्रुतेः। (२) मंकाः-पुस्तके साथ संन्धर
माया मनको कैसे उत्पन्न करेगी । समाधान:-गुरुत माय संबंध सहित दुई
मनको उत्पन्न कर है यन्त:-नमे सम्मापासाप सोशियसमा मेर
है तो भी नम्बरको मिपार पीछे किया कर यह टोको ममिद मे .
संबन्ध रहित हुई भी माया इच्यामात्र, मनो उपम पोर-मादल (भर
freमाता) है याने मायामें सभा यत है। (३) मत। (
imमारत पंट एप दी।

(२८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक! [अं॰]
ऐसेमतिमान मति पति तीवखानकर,
गएभीनओरपिखजाहिसुखपाइये ॥ १४४॥
'सवैया ।
मतिसंग विवेक विचारकियो जगभीतरजोजनकोसुखदाई ॥
जिहसों समजीवकी वन्धमिटे परमात्मसंगसुवेग मिलाई।
तपसातटतीरथजोगमजे उपजे सुतवोध बडो जसदाई ॥
कविसिंहगुलावसु एहकथा प्रथमै यह अंक निरंतरगाई१४५॥
दोहा।
गुलावसिंह मतिपति मतो, जानमोहभूपाल ॥
दंभकलादिक पठेगो, तीरथहनन विसाल ॥ १४६॥
इति श्रीमन्मानसिंहभरणशिक्षितगुलाबसिंहविरचिते मबोधचन्दोदपनाटके
मयमोऽकः समातः ॥ १॥
इति श्रीमदुदासीनवर्य परमानंद शिष्य गुरुप्रसादविरचिता प्रबोधचंद्रोदय नाटक
मर्थमांऽकटिप्पणिका समाप्ता ॥ १ ॥

काम उवाच ॥ सवैया। तव संगममोद जने मनमैं, अरुमोहमहा उरमैं उपजाए ॥ इमभाप मनोज प्रमोदवढे रतिको दृढ कंठ मुफेर लगाए । हम जीवत कोन वली जगमें पुन आत्मविद्याजो उपजाए। जग कीन विवेककोनाउलएरतिभीरुकहोतुमक्योंडरपाए १०८ रति रुवाच ॥ दोहा। विद्याकन्या राक्षसी, ताउत्पत्ति जोइ ।। तुमरे वैरी जगतमें, किहविधि चाहै सोइ ।। १०६॥ काम टपाच ॥ सवैया। सार्दुहिता श्रुतिनारिविपे,खलराय विवेकप्रिये उपजाए । संगप्रवोध शशी पुन भ्रात, सुहंसगते तिहमाहि उपाए । तांउत्पत्तिविपे पतिनी सुशमादिक आपसंहाइक आए । ते उपवासकरें तपसाधृत उद्यमतीरथ देव मनाए ॥ १०७॥ रति रुवाच ॥ दोहा। आत्मनाशक विद्या, ता उत्पत्ति जोइ ॥ काहिसराहे दुएमति, शंका पापन होइ ॥ १०८॥ (१)शिपांतरके विस्मरपको उत्पवररलाई। (२) अनाहत ब्रह्मायरात- पापानिमाकन्मानान पिया। (३) अनामनागपन्तःकरणामुहितचेतन्यम्र- सोधपदमा पाता।

ॐ श्रीगणेशाय नमः। श्रीगुरुभ्यो नमः। अथ द्वितीयोङ्कप्रारंभः ॥२॥ दोहा। असुर विदारे जाहि जग, देवनकियो उधार॥ तारघुनायक विमल पद, वन्दों वारंवार ॥१॥ सवैया। तव दंभको स्वांग भयो अतिसुंदरजादिपिखेजगशीशनिवाए। करसेननहीं समुझावतहे सभपेखत राजसभा महिआए ॥ मुख एटुकही महा मोहवली सिरहाथधरे जगमाहि पठाए । सुत दंभ अमातन संगविचार विवेक कियो बहु होननपाए२॥ महामोह उवाच ॥ सवैया। इह विवेक विचारकियो सुप्रवोध वलीसुतलेहि उपाए। ताहिनिमित्त सुतीरथम, शम ओदम आप विवेक पठाए । है हमरे कुलनाशनिमत्त इहै जगमाहि विरंचिवनाए । तुम होइ सुचेत उपायकरो जिहते इह नाशनिमत्त मिटाए॥३॥ तिन तीरथमाहि वनारसजो वहुँ मोशनिमित्त विरंचिबनाई। शिवकी नगरी सुतदंभवरो सुकरो तुम जाइके एहरपाई॥ (१) सिमे भयंत मानिस हेतु नो मानन मभिमान है नाम नाम महामोरई ।।

[अं०१j प्रबोधचंद्रोदय नाटक। .) काम उवाच ॥ सवैया । रतिजे कुलनाश प्रवृत्तिभये, बहुपापकरें नहिं पापडराए । मुख नीतं मलीन रहेतिनको, उपजे निजतात सुआतमघाए॥ वलि पावकधूम सुमेघभयो फिर धूमधुजेहन आपखपाए। कुलकंटक आहिविवेक सुनोनितपापकरेनहिं रंच लजाए १०९ (अथ नेपथ्ये कलकलाशब्द) विवेक उवाच॥ सवैया। आहिदुरातमकामकलंक सुवूधरमातम आप अलाए ॥ तेअघवंत सुपापकरें इम भाप अघी हमको सुठराए। नाहिलयो मन तातमतो जिम मूढ मनोज सुनो चितलाए ॥ तातभयो सुतमोह अधीन सुमारग वेदको दूर भुलाए॥११०॥ कार्य औ अकार्यको गुरु जोन पिखे उरमें गरवाए । वेदविरुद्ध सुपंथविपे मनके मदकै जब पांउ टिकाए । ताहि त्याग सुवेद कहे मनुस्मृतिमें पुन एहुवताए । वीच पुरानन व्यासकहे ऋपि पूर्वले पुनएंडुअलाए।।१११॥ दोहा। पिता गुरू मत त्यागकर, वडभागी प्रहलाद ।। मुक्तिपाइ वन्धनतजे, हरिकेसेवसुपाद ।। ११२॥ (२) मत। (३) शोर-गुरोरप्याटिमम्य कापा मानतः । टसर मतिरामम्प परल्यागो विधीपते । अपह-गोगर मांगदिदी- करके उन्मदभार मानपाई तपा नो पारयोग्य अर्थरतामापनिरिक आरणेयोन्य भय मानतानी नपा पनिरिदमार्गमें मानांतर मे मुताजित (१) अमि।

वस मोहि बनारस एहुकही
जाहि निवास सुमैक
मनमथके उत्सवभनें
क
वारवधू भीननिसवस
कामके कलोलानसों
चाँदिनीसुरात मनमर
नारिनके संगसु अनं
नाइ प्रातकाल मले।
धूरत सुबडो सबलोग
दीपत सर्वज्ञ पुन तार
हव्यवाहहोमहम कदी
योंदिनमें वंचत जगत
महामोद भूपालको
कवि
धाम वनारस गंगतट,
कोइक आरत देखिक
(१)अले मादी मिया

[9091 प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (२१) कवित्त। तात जो हमारो सुहंकारके अधीन भयो, कार्य अकार्य नरंचक विचारियो । जगतको पतिजो परमात्मासु तात निज, ताहिको सुवाध जगशृंखलमें डारियो॥ मोहमदमान निसदिन सनमानकर, छोडिनो सुदूरबंध दृढ विसतारियो । ऐसो मन तात जोईहतएनदोपकोई, कन्योहमत्यागनहिं ताहिमतो धारियो । ११३॥ सवैया। इहओसर कामविलोकनके रतिकेप्रतिएहु सुवाकअलायो॥ हमरे कुलमें सुप्रधानवडो मति संगिमिल्योसुविवेक हिआयो। गजगामनि आवतह इतऔर चले मृगके पतिज्योंहुलसायो । शिवज्योतुहिनाचलकीतन्या, मतिसंगमिले इहभांतिसुहायो। दोहा। रागादिक जिन वसकिये, कीरतिवंत उदार।। उर अतिकोप्यो मानधन, मनोनिरादर धार ॥ ११५॥ सवैया। तन दूवर एहुविवेक पिखोरतिचित्त कठोरमहादुःखदाई॥ कलपीमतिमाहि सुयोंलसके तुहिनाचलज्योंशशिदेतदिखाई इहकारणते हम योग्यनहीं इहीर निवासचले सुपलाई ॥ रतिसंग मनोज सुभागगए, मतिसंग विवेक वरे तिहआई११६ (१)मादिसाटम ॥

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। दम्भउयाच ॥ सवैया।। कौन उलंघ भगीरथिको इत आवतहै सरितातटमाही। ज्वाल मनोअभिमानहकी जन तीनहु लोक असे मुखमाही ॥ वाक कहे इहभांति मनो सुदवावतहै सभको जगमाही ॥ बुद्धि बडी दमकै उरमैं सभको उपहास करे मनमाही॥९॥ कवित्त। राढा जो प्रसिद्ध देश दक्षणकलेश हर, तिन होते आयो यह ऐसे मनआइहै ॥ आर्यअहंकार सुहमारो तहां नीतबसे, समाचार लेहु कछु मोहिको सुनाइहै। ऐसे मन दंभ सुविचार नीके करे तव, आयो सुहंकार चाल हंससी सुहाइहै ॥ अहोवहुमूरख जगत यह छायो सभ, ऐसे सुहंकार मुख वैनन अलाइहै ॥ १० ॥ भटपोद मतको नजानत अजानलोक, नाहि प्रभाकरको मरम पछानई ॥ तोतांतिकगंभीर मत धीरनहीं पारलैहे, सालेकको ततज्ञान कोई नहीं जानई ।। (१) मीमांसकभपाद-देहादिकोंसे भिन्न जडचेतनरूप आत्मा मानेहै । (२) पूर्वमीमांसाका एकदेशी प्रभाकर-देहादिकोंसे भिन्न ज्ञानगुण विशिष्ट हुआ आत्मा चेतन मानेहै । (३) कौमारिल शास्त्र के तत्वको नहीं जानते । (४) शारिकनामग्रन्थक तत्त्वज्ञान पहिये सिद्धांतको अर्थात् शांतत मुनिके मतमें वासुदेवही प्रथम प्रतिरूपही तत्त्व है ताके शानसे शून्य है ॥

विवेकभूपति रुवाच ॥ दोहा। सुनेप्यारी कानतव, कामवडेमदवेन ॥ इमेवखाने पापकृत, दुष्टात्मयहमैन ।। ११७॥ मति रुवाच ॥ दोहा। आर्यसुतनिजदोपको, जानतनाहिं सुकोइ ॥ दोपवखाने औरको, मूढ जगतके लोइ ॥ ११८॥ रानोवाच ॥ सवैया। चितआनंदनीतनिरजनजो जगनायकजाहिसुआगमगाए मदकामहंकारपरायणने तिनको जगभीतर वन्धन पाए ॥ अतिदीनदशा तिनकी सुकरीपुन सुकृतवंतसु आप कहाए॥ हमताहि छुडावनमाहिलगेअववंत अहोखल मोहि अलाए। मति स्थान ॥ सवैया। सुत आयं जो परमात्मह सहजानंद मुंदग्वेद उचारे ॥ पहुनित्यप्रकाश महाराविसों मुभीननमाहिमुजाहि प्रचारे॥ इहभांति सुनोपग्मेश्वग्में किहभांति इने तिनवन्धन डारे॥ दुःसमिधुपगन्मडान्दयो किम ताहितजे गुण आपउदार१२० गनावार संवेया। अतिधवंत उदारवडो उग्मत्य मदा गुणमिधु मुगाप! स्वाच्छमदा उग्नीतरी ममहालक्ष्मी सिर व इलाए ।

वेदव्यास वाकपति कपिलकणादमत, और जो महोदधिको मत कवि भानई॥ महोवृत्तिना निहारे पुन ब्रह्मकोविचार, · : कहा नाम नरपशु सभ ऐसे हमजानई ॥११॥ एहे जो पेखये महानमान वोझभरे अति, महापशु बुद्धिकछु अरथकी नाइहै ॥ कटिमैं पीतांवर अडंवतोखूबकरै, सामवेद धुनि पुन ऊँचे सुर गाइहै ॥ पूछिये जु वात तु रिसात मन क्रोधभये, फेरफेर मूढ वेदपाठन सुनाइहै ।। वेमुख आचार श्रुतिचारको विचारकहा, जीव काके हेत मूढ वेदन वहाइहै ॥ १२॥ औरठौर गयो पुन कौतुक सुनयो पिख, वोलियो हंकार सुगुलाव पहिचानिये ॥. नामतो सन्यास माग-भिक्षा विलास करें। यही जतीनाम लोक माहितो वखानिये ॥ " (१) वेदव्यासका वेदांतमत तथा वाचस्पतिका मत, औ: कपिलकृत सांख्य शास्त्र फा मत तथा कणादकृत (न्यायशास्त्र) का मत तथा महोदधि फहिये. शेषमणीत भाष्यकामत । (२) पाशुपत शास्त्र संहिता नहीं देखी तो प्रमका विचार सूक्ष्म होनेते अति फठिन है । (३) सर्व मनुष्यरूप पशु है सो शास्त्र में भी कहा है:- लोक-आहारनिदाभयमथुनानि, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ॥ ज्ञानं नराणामधिको विशेषो, मानेन हीनाः पशुभि समानाः ॥ इति । इन सर्वमतोंका अर्थ विस्तारभयसे लिसा नहीं (५) शुद वेदपाठी प्राह्मण । (५) भिक्षामात्रवास्ते यतीपणको महण किया नहीं मुक्तिके वास्ते ॥

[अ० प्रवायचायनाटक। पटनागरी मति धैर्यशील तजेक्षणमें सुनभामिनि नारि नजाहिभ्रमायो।। अव औरकी वात कहाकहिये निजनारिपरात्म आप भुलायो॥ मति रुवाच ॥ सवैया। सतआर्य जो तमहोइ वडोरविकोनहि छादसकै पुन:सोई ।। तिम आत्म नित्यप्रकाशमहा जिनकैसम दूसर और न कोई।। सुखसागर नीत उजागरहै अज्ञान कहो किहभांति महोई॥ अव दूरकरो करुणाकरकै इहशंक बडी उरअंतर पोई ॥१२२॥ राजोवाच ॥ अनंगशेखरछन्द। विनाविचार सिद्धए प्रसिद्धवारयोपिता, समान नाममायाविलासिनीवखानिए । मंणिसफाटकंयथासुदेवऊजलोमपा, सुहावभावकैतथाप्रवंचनासुठानिए॥ ताहिके सुसंगते असंगताजु देवकी, स्वरूपसिद्ध नित्यहे मनाक नाहि हानिए । तथापि गाढसंगके प्रसंगविक्रिया भई, छुटीसुधीरता तवे अधीरता सुजानिए ।। १२३ ॥ मति रुवाच ॥ दोहा। कारण कौन सुभापिए, जाकर करे विकार ॥ पुरुपपुरातनसोंवधू, 'जाको चरित अपार ।। १२४ ॥ (१) नाम अनिर्वचनीयहै । (२) मोडादिविलासोकेकरनेवाली । (३) मिप्पाहाव- भाषकरके असत्यपदार्थोको सत्यरूपदिसावतीहुयी पुगेको वंचनफरती ( उगती) है। (५) भत्यंत संगसे विकार मारभया । 1 MrM.

[अ०.२३ प्रवाधचद्रादय नाटक । मुंडे तो मुडाए नाम पंडित कहाए कछु, ज्ञानहूं न पाए करवेदभाष्यठानिये ॥ कीने व्याकुल विदांतके प्रकरणसभ, आवतहै हास मुहि यहि सुनि वानिये ॥ १३ ॥ प्रत्यक्षते विरुध अरथ भापत वेदांत सभ, एकही अखंड ब्रह्म दूसरो नगायोहै । ऐसे जो विदांतशास्त्र मानतप्रमाण मूढ, वौद्धनके ग्रन्थनमैं प्राध कौन आयोहै ।। सेवरा सन्यास वौद्ध ग्रन्थ औ विदांत एक, भिन्नभिन्न नामइक छलके चलायोहै। तिनहूंके संग पुन वोले महापाप चढ़े, ऐसे मुख भाप पांउआगे सुउठायोहै ।। १४ ।। एही.शैवं पाशुपत आगम सुशैव रति, रासभसमानतन भसम लगाइहै ।। पशुहै अदंड लोकमाहिं सुपखंड करें, इनसों प्रभाप नर नरक सुजाइहै ॥ शेव पाशुपतके निहारे होइ पाप अति, पेखिये सुनाहि इन ऐसे चुदि गाइहै। गुलाब सिंह देखिकै हंकारकी विसाल छवि, लोगनिके पुंज पुन आगेही पलाइहै ।। १५॥ (१) नहीं मनको मुण्डाया-पण्डित कहाते हैं परन्तु पण्डित नहीं है । (२) मत्यक्षादिममा सिद्ध जो अर्थ हैं तिससे विरुद्ध अर्थके कहनेवाले वेदांत शास्त्र यादप्रमाणरूपकर मानते तो बोधके ग्रन्थों में क्या अपराध है अर्थात् तिनोंकोभी प्रमाणरूप मान्या चाहिये यह तापर्य है। (३) शैव प्रधान पाशुपत व्रत है निन उपासकोंको तिनका नाम र पाशुपत है ।। .

५१ नाटक [अ०:१] - राजी वाच॥ दोहा । माया कारण कार्जको, चाहितनाहिंसुकोइ॥ नारी जान पिशाचनी, यही सुभाव सुहोइ ॥ १२५॥ सवैया। मोहतहै कवहूं अवला मदसोंसु विडंवन फेरकरे । कवहूं पुन ताडत है अवला कंवहूं हँसके पुन अंकभरे ॥ सुविखादकरे कवहूं कवहूं अतिदीन मनोरिद माहिवरे ॥ दृगवामकटाक्षनकै अवला कहुकौनहकौननचीतहरे ॥१२६॥ दोहा। है कछुकारण कौन पति, कहों सुनों अब सोइ ॥ दुरांचार इन चित वियो, कन्यो विचार सुकोइ॥१२७॥ मायोवाच ॥ सवैया। अव जोवन मोहि विलाइगयोपुन देव पुरातनहे जरठायो॥ अव मोहि विपेरस आहिकहारस वेमुखजोवनमैं नरसायो। अव और उपाय वने नकछू मन पूत वने अव राज दिवायो। इहमातमतो सुविचारमनेमन पूत तवैनिजतात मिलायो१२८ नवद्वारनके पुर ताहि रचे मन आपसुनो तिनवीच वसाए॥ इकरूपहुतो परमात्मजो बहुभांतिनकै पुरमाहि फसाए ॥ सुकरे मनकार्य आपजितेपरमात्मके पुनमाहि ठराए ॥ सुजपाकुसममणिमाहियथाइनश्वेतगुणगुणलालदिखाए १२९ (१) कार्य । (२) इस प्रकार मनने माताके मतो विचारकर तथा मनम्न तात परमेश्वरक साथ अभेद संवन्धवाला होकर ॥

प्रवाषचंद्रोदय नाटक। [अं०२ औरठौर गयो पुन पेखिमुछकानो अति, अहो वकध्यान पटऊजल सुहाईहै ॥ गंगनीर धारतट शीतलसिलासबार, प्रोक्ष प्रोक्ष आप कुश आसन विछाइहै ।। लए असमाल मुख मंत्रतो विसाल जपें, अंगुलकेमाहिं कुशमुद्रे सुवनाइहै । एही दंभवंत धनवंतनिके वित्त हरें, वीच मंत्र न्यासकर अंगुली हलाइहै ॥ १६॥ सवैया। इंकार तवै पुन पांइ उठाइ चल्योमछकाय पिखेजनआना ।। है कर माहि त्रिदंडधरे मख छूत व सुलदे अभिमाना॥ द्वैतसुनाहि गहै उरमैं पुन नाहि अद्वैतको रंच पछाना ॥ पंथे उभैइह भ्रष्ट भये भनिआश्रम और पिखे मठकाना१७॥ किहको इह आश्रम पावनहै ढिग द्वारन ऊच सुवंस गडाए । सुमनो तिन ऊपर नाचत, सित अंवर पुंज हजार तनाए। इतहै कृष्णाजिन यूप शिला इतते चमसा वहुभांति सुहाए। इत मूसल और सऊपलहै इत केसरकुंभ सुचीत वनाए॥१८॥ घृतहोम सुगंध सुधूम वडो तिन श्यामसभोनभमंडलकीनो॥ यह गंगसमीपसुआश्रमहै पिखमोहि सभो श्रम होवत खीनो ग्रहमध्य बडोधरमात्मको तिनको यह आश्रम आहिनवीनो मुभलोयह आश्रमपावनहैदिनदोइ मुतीननिवास मुखीनो। (१) रुदाक्ष माला । (२) दैतादेत उभै । (३) काले मृगको खचा-यूप धमा-चमसा ॥ ।

[अं०.१] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (२५) --- मतिरुवाच ॥ 'दोहा। आर्यसुत यालोकमैं, जैसी मात प्रवीन ॥ ताको सुत तेसो भयो, कहो देव कतकीन ॥१३०॥ राजोवाच ॥ सवैया। तवचीतको पूत हंकार बडोनेपिता परमात्मकोजगगायो। अतितोतलवैनगयो ढिगजो हसके परमात्म कंठ लगायो॥ तव भूलगयो परमात्म आप भवमोहभयोइम आपअलायो॥ इह तात इहै मममात अहै इहखेत इहे सुकलित्र सुहायो१३१॥ यहपुत्र सुमित्र अरात वडो पुन याव सुधा वलं आहि हमारे।। गज अश्वपशू यह कोर्श अहे पुनएहसुहृदसुवन्धु पियारे । चितको फुरणों जिहभांति भयो तिमदेव परात्म आपन धारे। अज्ञान मई वहु नींद भई स्वप्ना वहु भांतिन भांति निहारे १३२ मति रुवाच ॥ दोहा । आर्यसुत परमेश्वर, दीरघनींद विकार।। वोध जनम किह भांति पुन, होवे मोहि उचार ॥१३॥ कवि रुवाच ॥ दोहा।। , 'सुनत विवेकमहीपको, लाज भई उरभार ॥ कीन अधोमुख तासम, धरणीओर निहार ॥ १३ ॥ (२) मन । (२) पौत्रा । (३) सेना । (५) खनाना । (५) मबोध ॥

दोहा। ऐसे धार हँकार उर, वन्योचहै तिहमाहि ॥ पुरुप निहायो एक तिह, रूप सुनीजे ताहि॥२०॥ सवैया। मुंदलांछततां तनु सुंदरहै, पुन भाल विपे घसि चन्दनलाए॥ भुज ी उदरे उर कंठ उरू पुन ओठन चन्दनटीक वनाए॥ हग जानु कपोल सुपीठविपे चिविकेवहु चन्दनटीक सुहाए। कुशचंडकटे कर काननमैं सुमनो यह दंभइ सोचमकाए२१ मुभले अव याहिसमीप चलो इमधार चले मन सूप घनेरे।। ढिगजाइ उठाइ भलेकरको मुख पहुकही कल्याण सुतेरे । । पुन दंभ हूँकार कीयो मुखते इमवारतह नहि आउ सुनेरे ॥ इतनेमहि आइगए बदैवालक वामन वाकमनो तुममेरे॥२२॥ दूरहि ठाढरहो द्विज जू इह आश्रमकी गति तोहि नजानी ॥ पादपछालन आप करो करभीतरऊ जल लेहु सुपानी ।। तो इमआश्रम पांउधरो इम कोन वरो बटु एहवखानी ॥ क्रोधभयो सुहकारवड़ोइहभांति सुनी वटुकी जववानी॥२३॥ इंकार उवाच ॥ सवैया। हाविधिकौन कुदेशअए जिहदेशन याविध लोक सहै। कोविदलोक प्रसिद्ध बडे हमसे जिनदेशन आतिथऐहै (१) मृत्तिकाके तिंदुकर पिडित है शरीर निसका । (२)शिखा । (३) दम्भका शिष्य। (५) भापणे अनिष्टकरणे विष तथा परके अनिष्ट करणे विस प्रवृत्ति करावगेहारा मो भभिन्दलनरूप अंतःकरणको वृत्ति विशेष है ताफा नाम महंकार है ।

२६) प्रवाधचदादय नाटका [अ०१ 1 . मति रुवाच ॥ दोहा । आर्यसुत किहहेतते, गुरुतरलजातोहि ॥ नम्रसुकंधर तेभई, भापो कारण मोहि ॥ १३५॥ राजोवाच ॥ दोहा। नारिनको बहु ई, होवत जगतमझार ॥ साउपरोधजन आप पिख, कहों न तोहि उचार ॥१३६॥ मति रुवाच ॥ दोहा। रसप्रवृत्तिकै धर्महित, करे कछू पति प्राण ॥ बहुआरे जगयोपिता, करे काज तिहहान ॥१३७॥ रागोवाच ॥ दोहा। मति प्यारी इक औरहे, मानेन मेरी नार ॥ उपनिपत सुनामवखानिए, सुंदररूपउदार ॥ १३८॥ चौपाई। वइदिनकी विधगह प्याग । मोदि अमृया दुःख उर भारी॥ शमदम जो अनुकुलह होई । तोउपनिपत मंगमम होई॥१३९॥ हेमति तूं जगविप निवारे । एक मटूरत मोन सुधारे ॥ जामत स्वम सुखोपनाविलाई। में प्रबोधसुन लेडरपाई ॥१०॥ (1) दुर्गम गारो लदेसर (क) मा। (३)रिकांना नाम लिगमा नाम मागे।

गद जलं अर्गा तिनके हित नाग्रहा जल मंडलको हम और मुदेशहि जाइ वसह|२|| कवि रुवाच ॥ दोहा। करकी सैनी दंभकर, कीनो ताअस्वास। इह जनावत थिररहो, काहेभये उदास ॥२५॥ सवैया। वोलमुखोवटु एहकही गुर याविधिते द्विज कीनवखाना॥ सोतव आगम दूरहिते हम ना कुलशीलमुतोहि पछाना॥ नि यह वात इंकार वली मुखभापत है उरमैं सुनसाना॥ मरोकुल शील परीक्षनकैअवलायकमूढ सुतोहि प्रमाना २६ दोहा। सुन मूर्ख अवतैं कहों, गौड प्रसिद्ध सुदेश । राढापुरी प्रसिद्धहै, पेखत हरे कलेश ॥२७॥ कवित्त। भूरश्रेष्ठनाम पुन ताहिमै प्रसिद्धधाम, ताहिपति तात मम लोकमैं वखानेहै । ताहिके जुपूतहैं सुपूतऔ कुलीन वडे, देशनप्रसिद्ध लोकलोकमाहि जानेहै ।। तिनमे विवेक विनय धैर्य अचार शील, प्रगट उदार मम कोविद.प्रभानेहे ॥ - (1) धीरन ॥

(३७) [अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। सोई हमआए विधिलोककिधोनएभये, भयोसु अचंभ जनमोहि नपछानेहै ॥२८॥ दोहा। सुनत वात पुन दंभयह, बटुकी ओर निहार ॥ सैननहीं समुझाइयो, देहु पाद हितवार ॥२९ ।। सवैया। ताम्रघटी वटुले करमैं पुन उज्जलवारि सुपूर लियायो । ताम्रघटी करले भगवंत करो पदक्षालन एहुअलायो । हंकार कहो हम रोंवकरें, जगकाहूंको नाहिवने सुदुखायो॥ धोइकिपांउ सुआश्रममें वरनेहितताहि सुपांउ उठायो॥३०॥ दंभे तवे पुन दंतचवाइ चढ़ाइ-धुंए मुख एहु अलाए ॥ दूरहि पांइ गडायरहो द्विजमूढकहाढिग आवत धाए । तेतन स्वेतकी विंदुसुनो पसरें इतते उत वायुचलाए ॥ ब्रह्मण्य अपूर्व एहु पिसी सुहंकार कह्यो मनमै सुनसाए॥३१॥ दोहा। वहुर वट्टमुख वोलियो, ब्रह्मण्यइ सोही होहि ॥ उत्तम द्विजयालोकम, कवकव पेखे तोहि ॥ ३२॥ सवैया। भवभारतखंड महीप जिते पदपंकजं नाहि छुहें डरपाए । पदकंजसिंहासन भूतलकेढिगआनसभेनिजमोल झुकाए । (१) दम्भने दन्तोंको दवाय भूको चढ़ाकर बटु वाटकके प्रति देखा तर चहुने अह- कारफे मति कहा । (२)दम्भके चरणकमलको ॥ " चारवाक उवाच ॥ सोरठा। धूरत कीन प्रलाप, आगमनाम सुताघरे ॥ आशामोदक थाप, मूर्ख तृप्तसुहोवई ॥६६॥ सवैया। दृग दीरघ अंजनशाम खिरेजन नील सरोरुह हैविगसाए । नवनागयनवनाग कलाअलिकै अलिसीसुकपोलसुहाए। कह ताहि अलंगनसे जनमैं कह पावक पंच सुदेहतपाए ॥ कह विजन भीप अहार कहां उपवासनकै सठ देह सुकाए६७॥ शिष्य उवाच ॥ चौपाई। हे गुरुग्रंथकार हैं जेते । ऐसे वचन वखाने तेते ॥ दुःखविमिश्रत सुख संसारा । ताते ताको करोप्रहारा ॥ ६८ ॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। सुनत शिष्यकी बातको, हसे सुवालक जान ।। चारवाक पुन युक्तिसों, आगे करे वखान ॥ ६९ ॥ सवैया। दुःखसंग मिले जगके सुख जेवहि दूरतजो इहभांति वखाने । ते निखुद्धि महापशु हैं हम जीवन के परतारक जाने ॥ सितेतंदुल जे, तुखसंग मिले तिह नाहि तजेजनजेंसुरज्ञाने । इहभांति लोकायत बाकसुने महामोहवली मनमें विगसाने७० (१) वरु। (२)श्वत । (३) देवतानी ॥ चारवाक उवाच ॥

(३८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२ मुकटामणिकी सुमरीचिनके पद वारजआरती दीपजगाए। इनके ढिगजाइ निशंक सुनो मतिभूलगई द्विऋतूं सुनसाए३३।। दोहा। सुन हंकार सुमनविपे, कीनो इहै विचार ॥ मनो सुयाही देशमें, दंभ लयो अवतार॥ ३४ ॥ भवतु तथा इह आसने, मैं अव करों निवास ॥ उरूनिवावेताहिने, आसनवैठनआस ।। ३५ ॥ मैवं मैवं वोलवटु, उचे कीन प्रकाश ॥ आराधपाद आसनइहै, और नकरे निवास ॥३६॥ सवैया । तब वोल हंकार सुएहुकही मनभीतरकोप भयो अतिगाढा। दक्षिणदेश प्रसिद्ध वडो तिह भीतर शुद्धपुरी इक राढा ॥ सुनहोतिनमाहि प्रसिद्धबध्योगुरुके कुलबासकोअतिपाढा हमजो नहिं आसन लायकहें कहु तेगुरु कौन ब्रह्मडते काढा३७ सुन मूर्ख कान भले धरियो इक औरप्रसिद्ध कहाँ तब वाता॥ द्विजकोविद लोकप्रसिद्धवडेसुवरीतिनकी दुहिताविप्याता॥ । कुलउजलजानिमरालनकी,तिनके सम नाहिं अहे मममाता तिसते हम लोकनमांहि बडे हमरे सम नाहि अहे मम ताता३८ ममसालेकमित्र सुमातुलको दुहिता इक और भलीजगगाई। तिनकेव्यभिचारकीझटकथा शटलोकननेजगमादि अलाई। तिनके निजमाहिसंबंधपिखे मतिताहिसमे अतिमे सुनसाई।। निज नारि मनोगत जापिणमें सुमृढवट्ट घर नादि टिकाई ३९, (.) गरिमकाक (0)गुर।(१)कया। (१)पटा (गाय)॥

महामोह उवाच स्वपन्नीप्रति । सवैया। . माननि काननमाहि सुनो यह वाक प्रमाण महासुखदाई। माहि निदाघमनों बरपा तिमकाननको सुख शीतलताई। सानंद ताहि विलोकनकै नृपमोह वली इह वात अलाई ॥ आहि लोकायतसज्जनमें इन वाकनकै उरमें हरपाई ॥७॥ दोहा। तिह औसर आयो तवै, चारवाक प्रधान ॥ पेखि समीप सुजाइकै, कीनो एहु वखान ॥७२॥ चारवाक उवाच ॥ चौपाई। यजय महाराजजगकारण । तुम त्रिभुवनके हो प्रतिपारण ॥ मारवाकपद करे प्रणाम । मेवक सदा पछानो नाम ॥७३॥ महामोह उवाच । चौपाई। रवाक सुखसों तुम आए। बहुत कालके दरसन पाए । तयुग त्रेता भये वितीत । तुमरी सारन पाई मीत ॥७॥ पर अंतभई कछु सारे । कीटभदेस वसतहैं प्यारे ॥ ठो ईहा समीप हमारे । समाचार कछु करो उचारे ॥७॥ १) ग्रीनसनु । (२) पृथ्वो अ तेन वायु इन चारोंग गो मान निमशानाम वाकद ।। ।

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। सुनिक यह बात सुदंभ वली मनभीतरसों अतिसै सुनसाने॥ द्विजतूं निजऊजलता अपनीजगभीतरयाविधिमोहिवखाने। सुन मोहि महात्मलोकनमैं द्विजरायसु तोहि नरंच पछाने । कछुआहि अपूर्ष उजलता ममभीतर सोचतुरानन जाने॥४०॥ हम एकसमेविधलोक गए मुनि मो पिख आसनते सुउठाये। इहठौर वसो मुनिवृंद कहें बहु आसन नाहमरे मनभाए॥ विधि आपसुंगंदकरी मुखते पुन गोवरसोंनिजजानुलिपाए॥ करजोर भलीविधि आदरकै तिनऊपर मोहिविरंचि बैठाये ४१ दोहा। बहुर हंकार मुबोलिया, दांभिक ब्राह्मणजान॥ कह विरंच पुन नर कहां, कीनो झूठबखान ॥४२॥ अथवा यह द्विजदंभहै, ताहीकीन उचार ।। ऐसे मने विचारकर, भयो क्रोध इंकार ।। ४३॥ सवैया। कौन सुरेश्वरको विधिहै, ऋपिकौन सुनो किहते उपजाए॥ मेतपको फल जानत नासुन बामन तूं मनमे गरवाए । कोटिमुरेश्वर विरंचिमुनीपद पंकज मोहि परे डरपाए । रिपिकी उत्पत्तिकी भूमिकही सुपुराननमाहि सुनो मनलाए४४ (१) शपथकरी (२) इंद्र अहिल्यागामिहोनेते कछु नहीं तथा ब्रह्मा स्वकन्यागामी होनेते सोभि कछु नहीं (३) यद्यपि पुराणोंमें ऋषियोंकी जन्मभूमि उत्तरीतिसे कही है। तथापि अहंकारको आमुरी संपतमें होनेकर गर्वसें तथा अपनी सामर्थ्यके जनादने अर्थ सर्व ऋषियोंको नीचत्रीयोंसे जन्मरूप हेतुकर निकृष्टता (न्यूनता) सूचन करीहै ताको सुनके आस्तिकपुरुषने कुतर्क नहींकरना काहेत, जसें मपंचकी उत्पत्तिसेंलेकर मलयपर्यंत इंदादि देवता परमेश्वरने संसारमर्यादार्थ स्थापन कन्येहँ तैसें व्यास वसिष्टादि महान्कपिभी- चारवाक उपाचा चौपाई। समाचार सुनिए सभदेव । प्रभुकोउनिखिल वतावो भेव ॥ पश्चिम देश वसे सुखधाम । सोप्टांग कलि कीन प्रणाम ॥७६॥ महामोह उवाच । चौपाई। चारवाक मम करो वखान । सवविधि है कलिको कल्यान । मम प्रतापमै अति अनुरागी। कलियुग है जगमैं बड़भागी ७७॥ चारपाक उवाच । चौपाई। तव प्रसाद सवविध कल्यान । तेजवंत जैसे भगवान ॥ कीनेकाज करन नाहं रहै । तव पदमूल दरसको चहै ॥७८॥ तुमरे वाक सु सिरपर धारे। दुएनके तिनमूल उखारे ॥ | तुम प्रसाद मुदित अति भयो। दरसन सुंदर अतिहरपयो ॥७९॥ दोहा। धन्य कलि तव दासहै, करे तुमारे काज ॥ तव पद पंकज वंदना, करे जगतके राज ॥ ८॥ महामोह उवाच । दोहा। चारवाक अतिमित्र मम, मोको करो उचार ॥ कौन कौन कार्यकरे, कलियुग जगतमझार ॥८॥ (१) दोपाद । दोनानु । दोहस्त । हृदय । शिर ॥ ।

४०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] ऋपिशृंग मृगी कुशकौशिकऔगजनीहस्तामल उपजाए।। वारवधू सुवासिष्ट जए दुहिता पुन झोवरव्यास उपाए ॥ शशिनारिवि रिपिगोतमजे पुनमांडवमें डकिते निकसाए। तन्या मुचंडाल पराशर जंरिपिऔर मतंग मतंग निजाए ४५॥ तब दंभ विलोक अनंद भयो, यह आर्य मोहि पितामहआए। नाम हंकार कहें जिनको, इन पेखनते मनमे विगसाए ॥ आयं लोभकोमै सुतहों, मम दंभकहें तब लागतपाए ॥ इंकारधरियो सिर हाथ तये, सुतदीरघआयुवडेमुखपाए॥१६॥ सवैया। झापरअंत मुमोहि पिखेतव यालहुते तय अंग मलाने । काल बितीत भयो बहुना मुन याजगमें हम हैं मयुटाने ।। नन मंद मुडीट भई इदिकारणते मुत नाहिं पछाने॥ भाज अनंद भयो पिन्वते मम अंगनमो नुम हो निलकाने १७॥ पने समरमपमा मापायी अंश नमामी भोगी निमें गिना ना आनी आमाण को पानु तिन नमामि मगरानीमा मसी संवा यात्रभिषापाता गामनगपाता। निराध (कानमामिति) भी गाः-शा. दयाहार मान पाममा पालना गट दामादक अविनाती तपाई : Fat .....तपत्र प्रदान ATM arge. - Enagi (TRN. ter मंत्रया। दनं पट्टा व मुक्य नमः। नाज गगी श्रीन च्या निलंबननवरे, नाटिना इनकार, प्रनुके प्रकार ये जानने । जो धनवंत महंत नवानगीनाइnिel दिगिटन श्री पुनपविमर्म यह वेल्लई जलनिवर्ग। दिशि दहिग पर्व वेदत्रयी ननपालनगडित दिनकारी। मम आदमकीतहकीनच्या निहवचनाननईनारी॥ अवकाज मंपूर्ण सिद्धमये, मुविवाहिती जानकारी चौपाई। अग्निहोत्र पुन वेद विसाला । औरत्रिदं भवन पुननाला ॥ बलमतिहीनजीवकाकारण । घरे बृहस्पतिजन चारना४॥ जीवनहित जन वेदविचारे । ताते कारज भये हमारे ॥ कुमक्षेत्रादि तीरथके माही। प्रबोध उदे स्वमेहूं नाहीं ॥ ५॥ महामोह टवाच ॥ चौपाई। घारवाक कलिमहा प्रवीन । मम हित भुजवल धरे नवीन तामुजदंडकाज मम सरे । तीरथवडे व्यर्थ तिनकरे ॥ ८६ अब मोको निह चिंतामई । तीरथवोध संक उर गई ग्रहमहिनारि सुतनके संगा। कहाहोइ तह बोधप्रसंगा॥ ८७ (१) पत्रीगमन गद्यपागादिरूप अविहित पेष्टामें नर मानहै। (२)म काय पाणिरूप ॥

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(४३)
तव आहि कुमारसुजूठ वडो कहु आनंदसों जगभीतर सोई॥
तव दम्भ कह्यो इह ठौर वसें विन ताहि नमें जगजीवन होई॥
तव मात पिता तृष्णा पुन लोभ कहो सुखसोंजगभीतर दोई।
पुन दम्भ कह्यो महामोहकी आयसु पाइ बसें इह ठौरसुओई४८
आपकहो किहकारणते इह ठौर प्रसाद कियो तुम आए।।
हंकार कह्यो सुतमोह महीपको गोप संदेश सुहै हम ल्याए ।
चाहत ताहि विवेक हते निज कान सुने सभ लोक अलाए॥
ताविरतांत सुनावनके हित आवनमोहि भयो समुझाए॥१९॥
तव दम्भ कह्यो सुखसंग अए तव पेखनते मम देह सिरानी।
मोह महीप सुआइ इहाँ सुरलोकहिते जन एहु वखानी॥
मोह महीप शिरोमणि जूं शिवकी नगरी सुठई रजधानी ॥
सभलोक कहें मुखपंकजमें मम आप सुनी यह वातसुकानी५०
हंकार कह्यो किहकारण वहु लोकपती इह ठौर वसाए ॥
दम्भ कह्यो इहि कारण है सुविवेक कहूं जग होन न पाए ।
बोध उदे यह भूमि वनारस वेदं पुराण इहै मुखगाए ॥
कुलनाशकवोध निवारणको इह ठौर निवाससुमोहिठहराए५१
हंकार डरे सुनि वात इहै शिवके पुर वोध सुकीन मिटाए।
तिन ठौर बसेंसव जीव जितेसुखसोंशिव ताहिके बन्धछुड़ाए
(१) तथाचाथर्वणश्रुतिः-मुमूर्दिक्षणे कर्ण यस्य कस्यापि वा स्वयम् । उपदेक्ष्यसि
तं मंत्रं स मुनो भविता शिव। (२) तच ज्ञानं भवेत्युंसां सम्यकाशीनिषेत्रणात् ॥
| अर्थ यहः-श्रीरामचन्दनी कहतेहे:-हे शिव निसकिसी भरणइच्छु पुरुषके कर्णमें स्वयं
(आपही) तिस मंत्र (तारक) का उपदेश करोगे सो पुरुष तारकमंत्रोपदेशनन्य ज्ञानदारा
मुक्त होगा ॥ १ ॥ ब्रह्मात्म्पैश्यलक्षण जो ज्ञान सो पुरुषोंको सम्यक् काशीके सेवनसे
होगा ॥२॥

[अ०२ प्रवाधचद्रादय नाटक। चारवाक उवाच ॥ दोहा। तव पदपंकजको लिखी, कलियुग पातीआप ॥ याको आप बचाइये, राजन रविप्रताप ॥८८॥ चौपाई। याविधिसुन्योभूपति जवही। पातीलगो वचावन तवही ॥ वाचक कहे सुनो जगभूपा । कलियुगपाती लिखी अनूपा ८९॥ कलियुग उवाच ॥ दोहा। तव वसकीनो निखलजग, सुरनरमुनीमहान ॥ कलियुग पद वन्दनकरे, महामोह भगवान ॥९॥ समाचार सभदेशको, सुनो जगतसिरताज ॥ तव प्रताप तव दासजग, एहु करे सभकाज ॥९॥ छप्पयछन्द ॥ जग तजेनमायामोहनाम अतीत कहावै ॥ घरमैं लेहिकुसीद भीप पुन मागन जावें ॥ रैनकरें रसभोग दिने तन भसमलगावें ॥ आपकरें सभपाप और को धर्म वतावें॥ इहभांतिअतीतसुमै करे नखशिपलौअभिमानअति- उर निसवासर दमडाचहैं कबहुंन होवैरामरति ॥ ९२॥ हरिकोपंथ सुदूर पंथ, वहु आपचलावें॥ रही फकीरी दूर मांगपुर पेटअपा३॥ (१)म्यान ॥ .

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[५१नाटक। अ० कह इकंत वनवास संगबहु दुंदभवा । सबैं निरंतर रातिदिने पुन ध्यानलगा३॥ पुनधनमद मसीमलानमुख भूपसौध पुरपौलपर ॥ धनलिपसों व्याकुलमहा शरमापतिसभरहेपर ॥१३॥ नीतिनिपुण नहिभूपन्याय मन उक्तविचारें ॥ निजप्रजापर दंडकाज भवभीतर सारें। राजधर्मकी स्मृतिभूपननैन निहारें। पॉनाशक्त निरंतरधर्म न चीत सुधारें। जग प्राडवाक पुराणविन, वैठन्यायभूपतिकरें ।। राजाधिराजमहामोह प्रभुभद्र सदापश्चमधरें॥९॥ भयो उपद्रव एक सुनो नीके मनलाई । वहुनाम नारायणमांहि प्रतीत सुजनकोआई ।। कहूंकहूं मनलाइ महाजन प्रेमलगाई। प्रातिभनें हरिनाम नैनते नीद मिटाई ॥ यह हरिभक्ति सुवीज प्रभुजनखोटे उरपरधरें। यहभूपआवाचनकहिसकोतवमूलगुप्तक्रिौनकरें ॥९|| चारवाकसभ और वातप्रभु मुखो वखाने । महाराज नहिठगहें उरसत्य पछाने । एक पापिनी नारि भई बहु मंत्र सुजाने ॥ यह नाम नारायण दुए ताहिके संग मिलाने ॥ (१) इंदीवाना । (२) इपादो। (३) देहली। (५) मपात । .) पर कहिप पुरातन तथा न्याय देना नो मालिक कहिय बानिय कर पापकानों पर माव। (नाम " [अं०२]. प्रबोधचंद्रोदय नाटक। जिनकेकर पाद मनोवस है, तपकीरतिसोंजगह उजियारा।। वहुतीरथको फलपावतहै, यह भारत और पुरानउचारा॥५३॥ दोहा। वेत्रपाणि आए तवै, कंचुक पाग अनूप ॥ नागरजन आए सुनो, महामोह जगभूप ॥५४॥ सवैया। चन्दनके छिणकावकरोमणि फाटक हेम सुवेद वनावो ॥ जलयंत्र सभै ग्रहखोलिदिजे तिनभीतर कुंकुमगंध मिलावो।। सभ द्वारन वन्धनवारकरो गजमोतिनहारलडी लटकायो। शक सरासन चित्रधुजा समसौधनकेसिरमाहि झुलावो ॥५५॥ कवित्त। फेर दंभको महाराज हेसमीप आए, चलिये अगारी सनमान अति कीजिए। कह्यो है हंकार तुम भलोही उचारकियो, हूंजीए तयार सुउपायनकोदीजिए। जाइके उपायन सुपायनके माहि धरी, जोरकर करो यों वनारस पिखीजिए। आए महामोह भूप पुरमै प्रवेशकियो, · विविध विभूति प्रबारसो सुहीजिए ॥५६॥ -यह है:-कोशीमें मोहुए पुनको भैरवीयातनासे पापका फल थोडेकाटमें भोगाया नावह औ फाशीसे राहरमरे पुरुषायमपातनांसें पापका फल चिरकाल में भोगाया नावहै यह विश- पता है औ (नाविमुत्तोमृतः) इस लोक (ममानुग्रहमामाघ) इस पदकरभी भानपदान रूपानुपहफा महण है, याने (जानादेवनुकैवल्यम्) इत्यादिश्रुतियोनिमा विरोध हो नहीं इति । (१) मोला। (२)भेट।

प्रभुअपराधनीतें डरें महायोगिनी प्रवलअति ॥
जगचारवाकके वचन सुनि, करो उपाय सुयथामति९६
महामोह उवाच॥
छप्पयछन्द।
अव कलिकी मतिवौरानीयों हम जानिओ॥
लघु नाम नारायणमात्र जिन डरमानिओ ॥
इह राजसूयकोकरणो याजग भानिओ॥
अश्वमेध मख मौलको जगहानिओ।
इह ब्रह्महत्या मातवध परपतिनी गुरुदाररति ॥
अवकरेंनिडरजगमांहिजनडरनाम नारायणभयोकत
कुबुद्धिमंत्रि रुवाच ॥
छप्पया
नाम नारायण महादुष्ट भूपति जगगायो॥
अजामेल इकवार लयो तिन बंध मिटायो॥
गनिकातें पददासीतां मनतें मतलायो।
नामदुष्ट तिह मिल्यो सुतिह धैकुंठ पठायो॥
सुगजपति व्याकुल वारइक नाम नारायण लयोजव॥
राजाधिराज महामोह प्रभुताहि छडायो विष्णुतव।।९८॥
महामोह उवाच ॥
नाम कुबुद्धि तेरो वडो सुबुद्धि पछाने ॥
जननी नाम कुबुद्धि धयो मृतते डरमाने।
तेयह निखल सुवचनमोहि प्रति सत्यवखाने ।
नाम नारायण नीच चहे जगमेरोहाने ।
(१) गाटी मदानहै ॥

(४४)
महामोह भूपसु अनून
अहोजडबुद्धि सभले
लोक परलोकमाहि
देहते विभिन्न मृढ
आकाश तरुफूल
करें कहो नभफल
भयेखोटे पंडित
वोलसुकपोलले
जोई जग नाहि
भयेहै बचालन
चारवाकनके
भये मूढलोग
अहो तत्व
काटे तनर्श
तनते न्यान
तवी तनु
लोगनिक
शीतजल
नाक मुन
मनमः
आपनी
नाहि

अवताहि विनासनहेत कछु होइ उपाय सुप्रगटकार॥ कुत्सत विपारप्रभुनिखलजन पठोभनें कहनाम हरिए धनी धर्म धन दान न रंचक मनमैं आने ॥ निरधन भजे नं नाम दानहित उद्यम ठाने । धार फकीरीभेस मृढ़ कृतार्थ माने ॥ विनुसंतोपं श्वानवृत्ति आप उत्तमकर जाने । इह तरुणअवस्थामाहि जनतजे विपे सुउपरति अति पुनि उभैभ्रष्ट जरठापने धनसुतदारा विपेरंति ॥३०० कवि रुवाच ॥ दोहा । याअवसर इकाइयो, पत्रहस्त नरआन ॥ महामोहभूपालको, जयजयकीन वखान ॥ १० ॥ उत्तर दिशाते आइयो, अनाचार प्रतिहार ॥ यह प्रभुपत्रपठाइयो, लीजे आपविचार ॥ १०२॥ सुनकर पत्र सुपठनहित, प्रेन्योताहि सुआन ॥ वहुपातीपठनलगो, सुनो प्रभु देकान ।। १०३ ।। अनाचार उवाच ॥ छप्पय छन्द । उत्तरके सम लोक करे, मशिलापरायण ॥ 'समुझे ईशनतत्ववके, मुखसैल नारायण नारिधमंतेदीनभई बहुधा गिरडाइण ॥ कद्दधिरमकीकथारसें, व्यभिचार रसाइण ।। १) या (२) मनामाग्रता दूत । .

अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (४५) नारि धन भोग पुन पापकोविभाग यह, आपनो परायो वलहीन मुख गाई है ॥ ५९॥ आत्मा शरीर यह धीर चारवाक कहै, आगम प्रमाण एकताहिको सुलेखिये ।। भूमि जल तेज वायु तत्वसो वताइदए, जादि मे प्रमाणसु प्रत्यक्ष एकपेखिये ॥ नारिनको भोग और द्रव्यको संयोग जोई, यही पुरुपोर्थन और कछू देखिये ॥ चेतन सुभूत होई नाहि परलोक कोई, मोक्षविनमृत और दूसरो नपेखिये ॥६॥ कवित्त। यही मनधार मुख बुद्धनेवचारकीयो, उत्तमसिद्धांत चारवाकको पढायोहे ।। चारवाक शिप्यनपर शिप्यन पढाइ सभ, यही सुसिद्धांत लोकभीतर चलायो है। ऐसे सुन चारवाक चारवाकशिप्यलिये, पेखत समाज राजसभामाहि आयो है। शिप्यको बुलाय समुझाय वात एटुकही, दंडनीति विद्या और कछु गायोंहे ।। ६१॥ (१) पुन महतो। (२) मगरको रममा नप नाशिः। परेनन ने दिए सरकारमा न परेन मेरा (Part । (५) itter अ०२J प्रवाधचद्रादय नाटका ५५" प्रभइत उत्तरदेशते, अनाचार बन्दनकरें । यम अचौरता विनाप्रभ, भद्र सदामनमें धरे।।१०४॥ चारवाक उवाच ॥ चौपाई। और सुएक वेनती अहे। चारखाक संकत नहिकहे ॥ तुम भवपतिसभकेसिरदारा । तुमरेरचे निखल संसारा॥१०॥ महामोह उवाच ॥ कोनवेनती नहींसंकायो । चारवाक तुम प्रगट सुनावो॥ तुम मेरे अतिसे हितकारी । तुमको कहाभयो डर भारी १०६ चारवाक उवाच ॥ चौपाई। विष्णुभक्ति नाम इकये। महाप्रभाव योगिनी पैये ॥ कलियुगविरणप्रचारसुकीनी। तदपि अहे वलबुद्धि प्रवीनी१०७ ताऽनुग्रह नर वंस उदारे। हमसेंकीटनासकेनिहारे देव सदा रहीयो सवधाना। विष्णुभक्तिहै येवलवाना ॥१०८ एकवार जहँ पाद टिकावे । मरे न मूलन बहुरपलावे ॥ ताहि विराग तहां सुविवेका । सनेसने दिढवाँधे टेका।।१०९॥ कवि रुवाच ॥ महामोह यह सुनियोजवही । अतिभय भयो सुमनमे तवही । मनहींम यह गटीसुहोई । महाप्रभाव योगिनी सोई ११०॥ (१) तिसविष्णभक्तिकर अनुग्रीतहै रंस निसरा में उदारपुरुषको हमारनसगंट | देसिनहींसने तो साक्षादभिनिभनको देखनानी दूरह यह भावहै ॥

प्रबोधचंद्राद (४६) शिष्य उवाच। दोहा। वेदत्रयी गुरुईशकृत, विद्या कहें उदार ॥ वेदनसों को जजन, पाए स्वरग अपार ॥ ६२॥ चारवाक उवाच । सवैया। -- ●रतको परलाप सुनो यह वेदत्रयीजगमाहि वखानी याचक यग सुद्रव्य विनाशक ए स्वरलोक जिवावत पानी तो वहु दाह दहे दुमजे फल भूरलहैं वहुरीति समानी है नकछू सुकपोलकही धनवंचनके हित एह कहानी॥६३ कृतश्राद्ध ईहा मृतजीवनको पुनजो परलोकविपे तृप्ताये जलगंगदए तवही जगमें कुरुजांगलखेतनको विगसाप मृतदीपशिपा बहुतेलदीये विनपावक सोमहमेनिकस कृतवियो तनकेजगलोगठगेमुखएडुकहे विधिवेदवताए शिष्य उपाय सवैया। गुरुखान सुपान हिप्राणप्रिया सुखसो पुरुषार्थ आप इहतो पुन तीरंथकार जिते किहकारण भोगनते डर जग सूखतजे बनजाइ बसे, तप दीरवसो निनदेह जगभोगनत्याग सुयोगभजेसुखहेत इंदविधिआगम (१) पयामा मनवननंपादनना है। (२) मालग-या, पुरोगादि-गि परमात । (३)नित (1) मालेगा पाई। (५)मन्पर।

- दोहा। सदा द्वेप हमसों करे, मारी मरेन सोइ ।। सनेसने हमको हने, महापापिनी जोइ ॥ १११ ॥ दोहा। महामोह यों मन डरयो, प्रगट कहे कछु औरः॥ गुलावसिंह योंहीभने, मान तजे सिरमौर ।। ११२॥ महामोह उवाच ॥ कावत्ता कहां भई संक निसंक चारखाककहो कामक्रोधआदिवीर ताहिको निवारहैं। कामके भयेविकार भक्तिको विचार कहां होइगीनउदेकहं वेदयों उचारहैं। वैरीहोइ छोटोतो मोटोकर जाने बुद्धिजामत बबूलकोसुमूलते उपारहैं। जीवनकेहेत वलवुद्धिके निकेतजेई भूपति सचेतसु उपाइको विचार0 ॥११३॥ दोहा। लघुअरिअवसर पाइक, दुःखदाइक अवनीस ।। अहिकंटक पगमे गडे, पीडादे नखसीस ॥ ११॥ (१) सर्पकाकांटा॥ - [अं०२ प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६७) कवि रुवाच ॥ चौपाई। महामोह तव ऊच पुकारा । हैरेको मम भवन द्वारा ॥ द्वारपाल इतने चलि आया। आज्ञाकरो देव जगराया॥११॥ महामोह उवाच॥ चौपाई। काम क्रोध लोभमद मतसर । सूर नही जिनके को समसर ॥ तिनको आयसुयों ममदीजे । विष्णुभक्तिको हिंसनकीजे११६॥ द्वारपाल तव शीश निवाए । ज्योंप्रभुकहो करोतिमजाए ॥ इमकहि द्वारपाल जवगयो । पत्रहस्त नरआवत भयो॥११७॥ पत्रीहार उवाच ॥ चौपाई। उतैकल देशहिते हम आए । प्रभुपदपंकजपास पठाए ॥ तहपुरुपोत्तैमको अस्थाना । सागरतट अँहहै ममाना११८॥ यहहै वनारस जह जगराया । जाफोकुल बहु भांति सुहाया। कीन प्रवेशन लाइ सवेरा । दूरहिते तिन भूपति हेरा ११९॥ यह भूपति कछु मंत्र विचारे । चारवाकसो वैठ किनारे ॥ चलों समीप सुपत्र दिखाऊ । कारज वेगनवेर लगाऊ॥१२०॥ गयो समीप सुपत्र दिखायो । जयजय शब्द सुमुखो अलायो। | मदमानपद चंद चकोरे । पत्रलिख्यो पढियो प्रभुमोरे१२१ सुनिकरमोहभयोनिजलीनो । है कछु दुःकर भयो मलीना ॥ चारवाकप्रति एहु अलाई । अव नहिवने सुवेरलगाई१२२॥ (१) उडीआदेश। (२) जगन्नाथस्वामी । (३) अपनेस्वरूपमेमूसा होयगया ॥

युवती मुख चंद निहारतहीं नरचित्तचकोर महा हरपाए ॥ हगकंज फिराइ पिखे युवती कहितांगतिजो नरतासुनसाए।। दोहा। इम भापत दोनों चली, आवत मोह निहार ।। देवी मिथ्यादृष्टियहि, ऐसे कीन उचार ॥ १७ ॥ सवैया। कदलीसमजंघ विरंचि रची, पुनफूलनमाल सुकंठसुहाए। कर चंचलचीर उभारत है, कुचमंडल चन्दन लेपलगाए। जनु नीलसरोज वनीअँखियाँ, पिख दीर्घमें मनको तृप्ताए। कर डोलत कंकण वोलतहैं, धुनि नूपरकामसिखीहरपाए१७ मुख चन्दसरोजमनो अँखियाँ दुतिदाडमदंतनहेर लजाई॥ जग कामनिदाघतपे जनजे गसिंचसुधातिनताप मिटाई॥ नभचन्द कलाजनभूमिआई इन पेखनते मनमें विगसाई॥ सुगुलावपिखेमधुमूरतिसी मलमूत्रता नहिदेत दिखाई॥१७६ विभ्रमवत्युषाच ॥ दोहा। यहमहामोह सुप्राणपति, तूं अति प्यारी नारि॥ चलो समीप प्रसन्नकर, भाष्यो मान हमार || १७७ सुनिकै मिथ्यादृष्टितब, जाइ समीप निहार ॥ महामोह मदाराजप्रति, जयजय कीनउचार ।। १७८ (१) उठावतीहै। (२) मोमस्तु । - [अं०२ प्रवाधचंद्रोदय नाटक। जाते कारजहोइ नहांनी । चारवाक रहियो सवधानी ॥ चारवाकमुख तथा अलाई । गयो वेग भूपति सिरनाई,१२३ ॥ दोहा। महामोह तव पत्रको, बैठ पढ़ावे आप ॥ गुलावसिंह याजगतमैं, जिहछायो प्रताप ॥ १२४ ॥ मदमान उवाच॥ छपप्य छन्द। स्वस्ति वनारसधाम विपे पदपंकज सुहाए। जीत सदा ब्रह्मंडपरे सुरनरमुनिपाए । सदाऽधीन धनवंत वेपिगनवनहिपठाए । अडिग सिंहासनवैठ शीसपर छत्र फिराए । राजाधिराज महामोहपद मदमान वंदनकरें। प्रभु इत पुरुपोत्तम आयतनभद्र सदामनमें धरें।।१२६॥ और वेनती नाथ सुनो नीके मनलाई ॥ श्रद्धामातसमेत शांतिदूति सुबुलाई॥ दयोविवेक सुमान श्रुतिके पासपठाई॥ ज्योंत्योंकरो संवोध मोहि सँगदेह मिलाई। प्रभु वहदिनरैन संवोधकर जिंह किंह विधढिगआनहै। वल इतपुरुपोत्तमआयतनपत्रपठे मदमानहै ॥१२॥ और कहें विरतांत नाथ नीके मनधारो॥ काम सहित जो धरमकहूं कहिहोतन्यारो॥ विराग विवेक सुगूढ-मनो कछु मंत्र दृढायो॥ कहूंकहूं हरिहेतहोत हमहूं लखपायो । धुलायकर ॥ .

. , 'महामोह उवाच ॥ दोहा। पीनउरू कुच अंकमिल, कीजे मोहि निहाल । हरणाक्षि शिवशिवाकी, शोभा हरो विसाल ॥ १७९ हसी सुमिथ्यादृष्टि तव, मिली सुभुजा पसार ॥ महामोह सुखताहिको, निजमुखकरे उचार ॥ १८० अहोप्यारी संग तव, लयो रसायन सार ॥ जराइकाग्रमेटि पुन, यौवन भयो उदार ॥ १८१ ॥ सवैया। पूर्वजो नव जोवनमें, सुमनोजविकार भयो वलकारी ॥ चीत मत्थेउर आनंदथे सभ औरपदार्थ थे सुखकारी वीत इकागर ताजरठापनते मुखचन्दअमी सुनिवारी ।। संगमते नवजोवनमें, अव फेर भयोतव प्रेम उदारी॥१८२॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। तरनापन तज विपय सुख, बहु दिन भजे मुरार ।। जरठापनविन भागसठ, युवती मदनविकार ॥ १८३ ॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ संवैया। झाराज कहों इकवात सुनो जिह उपरहोत कृपाल पियो। ग पूरन ताहि मनोरथहे कछु चाहत नाबहु औरवियो । पापामावयहहः-उमा महादेवकी न्याई हम तुम दोनों निराध निर्भय पितों।

अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। यामप्रेमाण प्रभु आपतुम जानेभले मनमाहिधरो प्रभु जिहविध मिटे अरातिगनसोउपायशीघरकरो१२७ महामोह उवाच ॥ छप्पय छन्द। महामूढ बहुभये शांतिते जिन डरकीनो। कहांहोइगी शांतिभयोजग कार्यलीनो॥ ब्रह्मा निसदिन करे पुनःपुन जगतनवीनो ॥ दक्षमखविनाशक शंभु रहे गौरी सुखभीनो ॥ कमलोकपोलमकरीलिखतउर हरिपयोनिधिशैनकर ।। पुन और जगतके जीवमेंशांतिकहाकहहोइडर ॥१२८॥ महामोह उयाच पुरुपमति ॥ सवैया। जालम जाह सित्तावअवै ममकामको एहु संदेसह दीजे ॥ धर्मविहीनभयो हमसों इनको क्षणनाहि विसाहु सुकीजे ॥ जिहभांति भजेन मतो हरिको तिमयाहिमले दृढवंधगहीजे॥ मूल इहे दृढ याहि गहो वस याहिभये नकटू मम छाजे १२९ दोहा। भूपमोलमणि जो कहो, देवकरों वहु जाइ । ऐसे पुरुपवखानके, गयो वेग सिरनाइ ॥ १३० ॥ (१)भपह-अन्तापरपमहामोह तपाचर्मोनोरहते हैं पले पनी निया- मताजानमें मामाहो मांद मानानो । (२) समीके फोटाहिये, गरपरमें मारीरिसेमस्पको भातिन्वाई पटेमा रिमा) कर निहटरस्पट- मिरुषों ऐकामाहार। (१)दून स्लिाविचारमें परास्टेस नमनाली।

नव जोवनते संग मोहि लयो विनसेवनते किह काम जियो॥ करुआयसुवेगकरों भरताममजाहि निमित्तसुयादकियो १८४ महामोह उवाच ॥ तोहि चितारतहैं निशिवासर वामउरू सुनि मोहि प्यारी॥ माहिदिवार यथा पुतली तिमनीत वसो मम चीत मझारी॥ चीतविपे तव प्रेम रहो मम नीतखिरे सुमनोजकी वारी ॥ नुन मिथ्यादृष्टि प्रसन्नभई, सुप्रसादकियोमुख एहु उचारी १८५ महामोह उवाच ॥ दोहा। औरकहों दासी सुता, श्रद्धा शांति सुजान ॥ दूतीभई विवेककी, पत्रलिखे मदमान ॥ १८६॥ उपनिपत विवेक मिलापहित भई कुट्टणी सोइ ॥ जिहाविध होइ मिलाप नहिं, करोउपाय सुसोइ ।।१८७॥ एक उपाय सुमैकहों, वही करो मनधार ॥ श्रद्धा जो उपनिपतकी, सो अव देहु निवार ॥ १८८॥ अकुलीनी प्रतिकूल मम, श्रद्धा पापिन नारि ॥ केशनते गहि ताहिको, देहु पखंड मतडारि ॥ १८ ॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। याहिकाजकी चिंत न कीजे । मम वचननते भयो पिखीजे ॥ मेरा वचन सुने जव रंडी । तजे वेदपथ भजे पखंडी ॥१९॥ (१) जीवना । (२) मेरो दासीकी सुना यह गाली महान है। (३) स्त्रीपुरके मिलाप करावनेवालीका नाम कुट्टनी है । (४) नियामकरहित ॥

- चौपाई। गोह पुन चिंतनकरहै। कौनउपाय शांति जगमरहै ॥ और उपाइन कैयै । असंतनसंग सुवोलमंगैये १३१॥ लोभलो मम भट जेते। वेगवुलयै • संगलेतेते ॥ भुकहें वने तिमकयो । ऐसेभाप पुरुप इक गयो।।१३२॥ दोहा। क्रोधलोभ दोनों तवै, आए सभामझार ॥ गुलावसिंहनृपवंदपद, लागेकरन उचार ॥ १३३॥ क्रोधउवाच ॥ सवैया। (मोहिसुनीयहवात कहें, तुम्हरे सँगशांति विरोधकमाए॥ हरिकी पुन भक्ति तथा तिनकी यह दोनभई सुसहाए।। जीवत शांतिकी वाति कहां,यहचाहतीतीनहुप्राणगयाँए॥ कोवलनाथ कहांकहिये,कछुभापतहो सुसुनो मनलाए। करों दृगवंतनको श्रुतिवंतनकोवधरोंकरडारों। वंतनकोंसुअधीरकरों, पुन चातरकी मति दूर निवारों॥ कार्य नाहिपिखे कवही, जिनक उर भीतरमै पगधारों॥ आत्मको नसुनेकवहीपश्यो,जितनो क्षणमाहि विसारो॥ लोभ दवाच ॥ संवेया। नके सिरउपर हाथधरों तिनकी सुदशा सुन मीत यता।। नोरथकी सरिता परकुलहि नाहि कदाचित तेनर पायें।

.) प्रवोषचंद्रोदय नाटक । [अं०२] जीवन जवलग होई । वसे पखंड ग्रहते पर्दधोई ॥ धर्म मिथ्यामुक्ति । मिथ्यावेद मिथ्यायुक्ति ॥ १९१॥ दोहा। याविधि मेरो वचन सुनि, तजे वेदपथसोइ। जनवेदन श्रद्धा मिटे, कहि उपनिपमै होइ ॥ १९२॥ सवैया। खाननपाननतीसुखहै वहु मोक्षकहो कतआवत कामा।। लोक नहीं सुखहोइ कहाँ उलटे सुत नारि तजावत धामा।। वंचनके हित व्योतरची जन धूरत वेद धरे तिह नामा॥ सुन यों पथवेद तजे सुपखंडनके वसवै वहुवामा १९३॥ महामोह उवाच ।। चौपाई। करें पिआरी जवही । मेरो इर्ट सिद्धजग तवही ।। हि प्रेम भयो अधिकाई।मुखचूम्यो गहिकंठलगाई॥१९४॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। यह नहिं रीति सुहहै । मेरो चीत सुबहुत लजेहैं। हतव कीन उचारा। धस्योवनेअब वास अगारा॥१९५॥ दोहा । ऐसे मखो वखानके, गयो अखाडो त्याग ॥ पिख भूपति विसमै भयो, गुलाबसिंह वडभाग ।।१९६।। तव पद दासी। (२) प्रकार का टगी या बनावट। (३)वानि।

[अं०२1 प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६३) तिनके उर अंतर शांति कहां नरजोधनकोदिनरैनहि ध्याव।। अवक्रोधसखे सुनिये सुकहों जिह भांतिनतेधनमैमनलावै ॥ इह मत्तगयंद सुझुलतमम एहुतुरंगम भौनसुहाए । लिखपत्र सुभूपतिमोहिदयो, धनल्यावोंऔर वंगालाहिजाए। इहगांउदयेकछुऔरकहे नरजे इह भांति सुचीतचध्याए । तिनके उरशांतिकीकौनको, इमचिंततही जगमाहिबुढाए। क्रोध उवाच ॥ मोहि प्रभाव सुमीत सुनोममसंगहते जन एहुकमाए । तुष्टाद्विजपूत हने मघवा शिव शीश विरंचिकेकाटवगाए। वाहजमारसुश्रोणतमै गुनंदनआपभलीविधनाए । सुवसिष्ठमुनीश्वरके सुतजे मुनिकौशिक आपसुताहिहताए।। दोहा। विद्याकीरतिवंत पुन, सदाचार दातार ॥ मेपदके प्रताप नर, क्षणमै भजे विकार ॥ १३९ ॥ लोभ उवाच॥ चौपाई। तश्ने आउवेग इतओरा । मेरो वैनसुनो श्रुतभोरा ॥ तृश्नावैठ समीप उचारे । आज्ञाकरो सुप्राणप्यारे ॥१४॥ लोभ कहे सुनप्राणप्यारी । क्षेत्रग्राम पुन नगरउदारी ।। पुर अरु दीप भूमिको चहे। आशापाश जिनके मनगहे १४१ तिनपर कृपासु ऐसीकरियो। ब्रह्मांडलापनहतामन भरियो । तृष्णे जांउर चरन टिके । शांतिकहा जगतेनर पैहें।।१४२॥ (१) वार्ता । (२) धासुर ! (३) विश्वामित्र । येसर्वगायालोकमें प्रसिद्धहै ।

अ० प्रवाषचद्रादयनाटक। दोहा। करुणा सखीसमेत पुन, शांति सुशील उदार ॥ जैहै श्रद्धाशोधहित, जगसभ पंथमझार ।। १९७॥ इति श्रीमन्मानसिंह चरण शिक्षित गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदय नाटके द्वितीयोः समाप्तः ॥ २ ॥ इति श्रीमदुदासीनवर्य परमानंद शिष्य गुरुमसादविरचिता मबोधचंद्रोदय नाटक दितियांऽकटिप्पणिका समाप्ता ॥ २ ॥ . Dow , तृष्णोवाच ॥ दोहा। आर्यसुतमै आपहीं, सदाचहों सभभौन ॥ अवआयसु तुमरीभई, मम तृप्ताव कौन ॥१४३॥ ब्रह्मांडकोटको पाइ नरमें उर संगति होइ । मेरो उदर नपूरई, तामहि शांति नकोइ ॥ १४४ ॥ क्रोध उवाच ॥ चौपाई। हिंसेआउ तूंइत मम ओरा । भापत वैन सुनो तुममोरा ॥ इतनेमे हिंसाढिग आई। आर्यसुत मम देहुवताई १४५॥ तूंमम धर्मचारणीनार । यहतव संगतिको उपकार ॥ मातपितादिक वधहै जोई । करें सुपेन डरें नहिकोई॥३४६॥ सवैया। कौन पिसाचनी मात अहे पुन कौन सुमकंड तात हमारे॥ भ्रातसमे ममकीट समा, अव वाधव पुंज वने सभमारे । जात जये खलहै सभही, इमवोलतहैं जनकीस पुकारे । मीज दोऊकर क्रोधवली,कविसिंहगुलावसु एहुउचारे॥१४७॥ नराज छन्द। सुगर्भलौंइनेकुलं समस्तआज मारहों । युवासुवाल वृद्धली, नएकको उवारहों। (१) मेरे वचनके करनेवाली। (२) तेरे संगतिसें मीवको यह उसकार होनाचाहिये । (३) मकडनाम पक्षवालेनीवविशेषकाहै तथापि शाकाहे तपा पासंही फोह तथा कंजर (वेश्यासंबन्धी पुरुष ) का है यह मसंगसें मान लेना ! (")मितने. उत्पनभयेहैं ॥

ॐ श्रीगणेशाय नमः। अथ तृतीयोङ्कप्रारंभः ॥३॥ दोहा। माया जिह जग मोहियो, बहु कुपंथ भरमाइ॥ वहु रघुनायक दासके, होवै नीत सहाइ ॥१॥ जिहविध कलियुग फैलियो, सकल भ्रमायो लोइ॥ गुलावसिंहनृप सभामें, प्रगट दिखावत सोइ ॥२॥ सवैया। ते इहभांति गए जवहीं तब शांति तथा करुणा तहँ आई ॥ ऊँच बुलावतहै जननी मम उत्तर देहु कहा मम माई ॥ शांति सुनयनननीर वहै कहँ मात गई नहिं देत दिखाई। तो विन जीवन मोहि कहांअव प्राण तजों सुलगे दुखदाई॥३॥ मृगरंजतकाननप्रीतिहुती जल शैलनमें तवप्रीति नई ॥ अति पावन थानन प्रीति हुती तपसा तनमैं लवलीनभई॥ जिम भौनचंडालन गौकपिला तिम मात पखंडनहाथ गई। अब जीवनमातको होत कहांतनडारइहायमधामगई॥४॥ विन मोहि पिखेनहिं नावतथी अरुनाहिकछूजननीमुखपाए।। नहिसोवत मोहिविना कवहीं नहिमोहिबिनापथमाहि सिधाए (१) जैसे सर्वगौओंके मध्यमें कपिला गौ उत्तमहै; तैसे शांत्यादिकोंके मध्यमें श्रद्धा उत्तमहै ॥

[अं०२] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (६३) समस्तभूमिके विपे नयाहिकोठराइहै। सुक्रोधज्वाल नैनकी, विरामतो सुपाइहै ॥ १४८॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। हिंसा तृष्णा क्रोध पुन, लोभ मिले यह चार ॥ जाइ समीप सुमोहके, जयजय कीन उचार ॥ १४९॥ महामोह उवाच दोहा। श्रद्धापुत्रि शांतिहै, हमसंग वैरकमाइ॥ तुम तिह ल्यावो वांधिक, आयसुमेरी पाइ ॥ १५॥ श्रद्धापुत्रीवंधहित, गए माननृप वैन । गुलाबसिंह साचीकहे, भयो अखाडेचैन ।। १५१॥ चौपाई। महामोह पुनकीन विचारी । श्रद्धापुत्री शांति विचारी ॥ | तानिग्रहको और उपाइ । सोमेरे उर भास्यो आइ॥१२॥ शांतिमातश्रद्धाहे जोई ।रहेपरतंतर सदा सुसोई ॥ उपनिपतविपे श्रद्धा नरजेती। प्रथम हटैयेसगली तेती॥१५॥ मातवियुक्त जवै वहु होई । मरे शांति क्षणभीतरसोई ॥ श्रद्धावेग हटावनकाज । मिथ्यादृष्टि खुलये आज||१५॥ इतउत भूपति दृष्टिपसारी । विभ्रमवती सुताहिनिहारी ॥ विभ्रमवती प्यारी जये । मिथ्यादृष्टिसुवोललिये१५५॥ (१)माधीन ॥ 4- ३] प्रवाघचद्रादय नाटक.! श्रद्धाविन मोहिपिखे मरती, नहिं एक महूरत प्राण रहाए ॥ अव तांविन जीवन मोहि विडंवन, प्राणवने यमधाम सिधाए करुणेसजनी अवशांति मरे,जग तूं मम देहु चितासुवनाई।। अव मोहि विलंब सुहातनहीं, तन देहु हुताशनमांहि जलाई॥ जनचित्त निवासतजोसजनी, तहँजाउँ जहाँ सुगई मम माई॥ सुनशांति विलापमहाकरुणा, हगनीर वह्यो सुलईगललाई॥ करुणोवाच ॥ सवैया । सजनी इह भांति कहे मुख अक्षर,ज्वाल मनो सुदैवानलकी॥ तन प्राण चिलातठरातनहीं उरमोहि भयो मछलीथलकी ।। सुमहरत प्राण धरो न मरो मुखकंज प्रसन्न नहो हलकी ॥ अब सोध लहे जगमें श्रद्धा, न मुई कछुवात भई कलिकी॥ इत औउत पुन अरण्यपिखेमुनिआश्रमजेसुतपोवनमाहीं॥ तटगोमतिक यमुना तटमें कि वसी सुभगीरथिकेतटमाहीं।। कदाचित मोहमहीप डरी, छपिजाइ वसी गिरि कंदरमाहीं॥ कुरुजांगलकै मखसालनमें श्रद्धा कहूंजाइवसी जगमाही ८ शांति रुवाच ॥ दोहा । सखी निहारेगी कहां, श्रद्धा कथा न लेश। "मैंकुरुक्षेत्र सुगोमती, औरपिखे सभदेश ॥९॥ (१) मोहि पिसे दिन श्रद्धा मरती, इस कहनेकर श्रदा शानिरी प्यानि मान हो अर्थात् जहाँ श्रदाह तहां शांनिहै । (२) अमि । (३) वनको अमि । (१) कलिका विरन है॥

(६४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२J विभ्रमावत्युवाच ॥ देवकरीजो आयसुमोको । मिथ्याहष्टिमिलावों तोको । इमकहि त्याग आखाडोगई। मिथ्याहष्टिसहित पुन अई १५६॥ अथ मभउत्तर मिथ्यादृष्टिविभ्रमवतीका ।। मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। पेपेवहुदिनभये वितीत । निकटिजात लाजत मम चीत ॥ महाराज उपलंभनकरे ।ताते चीत सखी ममडरे॥१७॥ विभ्रमावत्युवाच ॥ सखी तोहिमुखकंज निहारे । तोभूपति निज आप सँभारे ॥ तूं वाको है अतिस प्यारी । ताते डरोन चीत मझारी १५८॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ सखीअलीकसुभागहमारा । काहेको तें वहुत उचारा ॥ भूपति मोमै चीत नधरई । तुं ममकाहि वडंबन करई १९९॥ विभ्रमावत्युवाच ॥ सखी अलीक सुभाग हमारे । अवही तूं निजनैन निहारे ॥ तेरो तनु जव भूप निहारे । तोमै रमैं न और चितारे १६०॥ और सखी इक वातिउचारों । घूमतनैनसु तोहि निहारों ॥ कारण कौन न निद्रा कीनी । घूमतनेनसखीरसभीनी॥१६॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ एकपतीकी जो बहुप्यारी । तिनके नींद न नैनमझारी ॥ मोको सगललोक जग गहें । नीदनेन मम किहविधिलहें१६२ प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] - सवैया । सरितातटमें बहुभांति पिखे तपसी जिनमाहि अनेकसुहाए। पुन मोहि मीमांसकधाम पिखे चमेसाकर यूपसुथान वनाए पुन आश्रम चार निहाररहीदिनकोटिनकोटन जातगिनाए। नाहंवात सुनी कहूं काननमेंश्रद्धासजनी किहठौरखसाए१० । करुणोवाच ॥ चौपाई। सखीकहों श्रद्धाहै जोई । पखंडनके वसपरे नसोई ॥ 'जे अंतिपुण्यवती जगनारी। ते यों विपति नलहे प्यारी ॥११॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। सखीकहों इकबात सुन, जो धाता प्रतिकूल ॥ कहो असंभव कौनगति, वेसभ अपदामूल ॥१२॥ सवैया। जनकात्मजा गृह रावणके सुवसी दुःखभांति अनेकभरे ॥ बस दानव वेदत्रयी सुभई तिनजाइ रसातल वासकरे ॥ पुन गंधर्वकी दुहिता पतिदैत्य हरी सुमदालस रूपवरे । । | विधिवासभयेजगमें सजनी कहुआपदकौननशीशधरे॥१३ (१) पात्र विशेष । (२) कार्याऽसिदिमें क्या आर्यहै । (३) सीता (४) मदालसा नामक कन्या पातालकेतु नामक दैत्यने हरली यह गाथा तुलसीदास कृतरामायण, तथा श्रीमद्भागवतमें प्रसिद्धहै इसमकार श्रद्धाका पासण्डोंके हस्तमें । जानेका देवही मूलहै वेदवाह्यकानाम पाखण्डहै । मा -- [अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक (६६) विभ्रमवत्युवाच ॥ दोहा। संखी प्यारी लोक बहु, मोकों करोउचार॥ जे तोकों निशिदिन भजे, जासो करें प्यार ।। १६३॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। सखी मोह मम नाह पछानो। काम क्रोध लोभ पुन जानो ॥ अथवा सुनो तत्त्व निजसार । एक एक कहि करोंउचार॥१६॥ याकुलभीतर जेनृप जाए। मोहिविपे सगले मन लाए ॥ वालक वृद्ध युवा पुनि जेई । मोविन रहे न निशिदिन तेई १६५ कवि रुवाच॥ दोहा। काम क्रोध पुनि लोभ यह, गुलाबसिंह मदमान ।। तनमै आत्महटि विन, होत नहीं पहिचान ॥१६६॥ विभ्रमवत्युवाच ॥ चौपाई। कामहिकी रति परमप्यारी। हिंसा कोधकी सुनी सुनारी ।। तृष्णा लोभहिकी जग गैहै । याविध नारि सुऔर वतहै।॥१६॥ दोहा। तूंसभके पतिसो रमहि, इहै वतावो मोहि ।। तेचुपको क्यों होइरही, करे न ई तोहि ॥ १६८॥ (१) शरीरमें आत्मबुद्धिविना इनकी मतीति होवे नहीं किंतु शरीरमें आत्मवृदिसे ही इनकी मतीति होवैहै ।।

चंद्रोदय नाटक। दोहा। 'श्रद्धा तहां जिहोइ॥ उखी, इमकहि चाली दोइ ॥१४॥ सवैया। डरी सजनी मम राक्षसनन निहारे।। क्षसहै करुणातवपीठहिपीठउचारे।। ते तनमें दुरगंध भयानक भारे ।। महा इहमुंडेपिसंग सुझंड खिलारे १५॥ दोहा। वेपे, आवतहै इतओर ॥ सकों, चित्त डरतहै मोर ॥१६॥ नहीं, पुर्दगलहै वलहीन ॥ न पुन, ऐसो परम मलीन ॥ १७॥ शाच यह, ऐसे मेमन आइ॥ चनहि, बहु निसमें प्रगटाइ ॥ १८॥ शमें, किरणप्रकाशे लोइ ॥ स, कहिअवकाश सुहोइ॥ १९ ॥ शाचनहि, तो यह पापी आहि ॥ नरकते, आवतहे पथमाहि ॥२०॥ है रगाया है। (२) मस्तकमें भूसरंगको नय (५) (पुट्रलं बारात्मनः) अर्थयहः-आमाके --- -- मिथ्यादृष्टि रुवाच॥ चौपाई। कैसे सखी ईर्षा करई । मोहि विन प्राणनते क्षण धरई ॥ रति हिंसा तृष्णालौं जेती । मेरो भलो मनावें तेती ॥ १६९॥ कवि रुवाच॥ दोहा। मिथ्या दृष्टि सुमरे जव, गुलाब सिंह इम जान ।। हिंसा तृष्णा आदिलै, होइ सगल पुन हान॥१७॥ विभ्रमवती उवाच ॥ चौपाइ। याहिते सखी मोहि वखानी। तोसम सुभग न दूसरी रानी ॥ तोहि सुभाग जवै वहु लहे । ते गतिरूपप्रसादहि चहे॥१७॥ सवैया । सखिऔरकहों निशिनींदविना जुगनैन सरोजसुतेअकुलाए।। युगनूपरकी धुनि चीतहरे परभूमिविपे पदते खिंसलाए । गजगामनि तूं गति मंद चले उर चाहत, निजनाह रिझाए। इह लक्षण जो तव नाह पिखे डरहों उर संककरें सुनसाए१७२ मिथ्यादृष्टि रुषाच ॥ सवैया। सखि काहेतसंकभई तुमको हम नाहिकीआयसमेंसुखपाए।। इक और कहों सुनमोहिअली जिहतेसगलोडरतोहिमिटाए। (१)मिप्या जो देहांदियां अन्त:करण इनमें गो इष्टि कहिये इनमें गो मारमाका तादात्म्पाभिमान मरे कहिये निवृत्तहावे मन सर(२) सस्पानसे अटहोतो।।

प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] - वहुरोशांति विचारकर, अब मैंलखियोनृतांत ॥ महामोह पठयो अयो, यह जग जैन सिद्धांत ॥२१॥ याको दर्शन दूर तज, यह अति पतित मलीन ॥ ऐसे शांति वखान के, फिर चाली मुखदीन ॥२२॥ करुणोवाच ॥ दोहा । सखीमहूरत थिररहो, श्रद्धा लेहि निहार ॥ यही पखंडी भाखिये, मत या भवनमझार ॥२३॥ गुलाब सिंह इम भापकर, दोनों खरी इकांत ॥ तव नृप सभा प्रवेशकर, वोल्यो जैन सिद्धांत ॥२४॥ नमोनमो अहैतपथ, जे जन चले उदार ॥ भुक्तिमुक्ति दोनोंलहै, मैं अब करों उचार ॥२५॥ कवित्त। नव है द्वार तन भौनके मझार पुन, आत्मा प्रकाशदीप ताहिमें सुहाई है। जैन वरभाख्यो सिद्धांतसुइकांत यह गहे जनजोई जगसूख मोप पाइहै ॥ अरे सुन श्रावक सुवाकमें वखानो तुम, मलमय प्रमाणुते सुदेह उपजाइहै ॥ मूढनर शुद्धकरें शीतजल शीशचरें, होवत न शुद्ध जलकोटन नवाइहै ॥२६॥ ) दिगम्बर सिद्धान्तशास्त्र। (२) दीपक दृष्टान्तसे आत्मापरिच्छिमारमाण (३) व्यभिचार रहितहै अर्थात् निदोपहै । (४) शिष्य ।।

घनाटक।
(७७)
।
; रिपिसेवा तिहज्ञान ॥
नहोकरों वखान ॥२७॥
था।
चन्दनशीश निवाइ करो ॥
ताहि जिवावहु जोरकरो ॥
मनमै नहि रंचक रोप धरो॥
मांति करो भवसिंधुतरो॥२८॥
ह्यो श्रद्धे इतआज कहां चिरलाए
, इनपेखत कोन कनात हलाए।
पुन जेनसमान सुवेस बनाए।
उनशांति दुःखी सुभईमुरझाए२८
उवाच ॥
हा।
को, श्रद्दे तूं गहि आज
सिद्धहोइ मम काज ॥३०॥
राजकुलीन महान ॥
ऊ, करुणाशांति वखान ॥३१॥
गोवाच ॥
हा।
काहेतूं डरपाइ॥
हे कछु और वलाइ ॥३२॥

टक। नलए, कायोहै। नवडे, पहि कह्यो, उगायोहै। राल अति, सायोहै ॥ ९१॥ ॥ नीवडे, दाइहै ॥ गाइगए, आइहै.॥ इलए, इहै॥ भाव जाहि,. पाइहै ॥ ९२.॥ प्रभावनयो, दीजिए॥. दिवडेदेव, नदीजिए॥ - वैष्णव उनारण करने से 10.4 चौपाई आहिंसा देवी मोहिं सुनाई । पखंडधाम श्रद्धा इक आई ॥ परवहु अंबातेहे आन । तामस श्रद्धा कहै वखान ॥३॥ दोहा। ताते श्रद्धा तामसी, यह तूं क्यों डर पाइ ॥ ऐसे करुणा भाखियो, अब पुन शांतिअलाइ ॥३४॥ शांति रुपाच ॥ चौपाई। सावधान सजनी में होई । जैसे कहें वार्तिहै सोई ॥ यह अतिदुराचारणी है ये। अंबा सदाचार रतिपै ये॥३५॥ यह दुर दर्शनरूप मलीनी । अंवा प्रियदरशन सुखभीनी ॥ रसो रूप ताहि नहि होई । संसा मनमें करो न कोई ॥३६॥ अंवा याके वस नहिं होई । जो तूं कहें वात है सोई ।। चलें अगारी सौगत धामा । तहाँ मिले जो बहुअभिरामा ३७ नों कहि चली अगारी जवहा । भिक्षुक एक निहायो तवहीं ॥ स्तक हाथविपे दर्शायो वौइसिद्धांत सभामहि आयो३८ भिक्षुक उवाच ॥ चौपाई। अणभंगुर सकल पदार्थ हैये । है भीतरखाहर समपैये ॥ नहे निरात्ममाहि ज्ञान ।दर्पणसम मुख होवैभान॥३९॥ (१) मुद्धशास्त्राभिमानिदेवता । (२) पगदिकविषय बुदिमें कसितहोनेते तरवर्तिहुएभी भ्रांतिसे बाहरकी न्याई प्रतीत होते है । बहे निगममाहि न ॥ दर्पणसममुख होवैभान ॥ याका भन्वय यहहैः-शानमाहिनिएल्मअहै अदि शान इथे बुद्धिरूपआत्मामें प्रवृत्तिविज्ञानघाराप अनात्मस्थितहै सो आत्मपातिसँगमातीत दे मैसें योवा स्पितमुखदर्पणमैं भासे है तैसे ॥

नभरविचन्दऔनक्षत्रकेकदंव जिते, कहो याहिगतेधरवठेहीस्कीजिए। कहो नरनागर मुभूमिजल पूरदियों, कहो क्षणभीतर सुतोयसभ पीजिये ॥ ९३ ॥ क्षपणक उवाच ॥ सुनरे कपालक सुभईमति वालक, सुमानवको मूंड तव करमै उठायोहै ॥ काहूं इंद्रजालक सुमायाको दिखाइ तव, मोह मन लयो उर तोहको भ्रमायोहै ।। ऐसे सुन कान सुकपालक मलान अति, दावि दोऊकान मनमाहि सुनसायोहै ।। इंद्रजालवत भगवंतको सुमूढकहें, तीनलोक जाहि क्षण एकमै वनायोहै ॥ ९४॥ तोहि दुष्टात्मता सुमोहिते नसहीजाइ, काढिके सुखग अव करमै उठाइहों। कालकरवालसों उतार भाल तेरो अब, कंठ तव नालते सुलोहूकोचुआइहों । डमरू वजाइ पुन भूताकिलकाय संग, काट तव मूंड सुभवानीको चढाइहों। "श्रोणतकी धार छुटे फेन अरु बूंद उठे, पेखि मुखहसें शिवपतनी रिझाइहों ॥ ९५॥ (१)महादेव ॥

[अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (७९) सो बहुज्ञान वासना हीन । फुरे विपय विनु लखैप्रवीन ॥ यो कहि पोथी आगे धरी । शीशनिवाइप्रकरमाकरी॥४०॥ अहो साधु यह धर्म सुहायो । जो निजमुखते बुद्ध वतायो। यामैं सुखमोक्ष जगदोई । खेदविना जनपावै सोई॥४१॥ सेवकके निज भौनमझारे। सुंदरवास सुमाहि चुवारे ॥ मनअनुकूल वनककी नारी । वहुविध भोजन धरेसवारी४२॥ कोमलसेज सुवणक विछाए । जोर दोऊ कर देइवैठाए ॥ श्रद्धासहित उपासक जेते । युवतीसहित भजे पदतेते॥४३ दोहा। अंगराग तनलाइकै, वणक मनोहरनारि॥ भजे निशाशशिऊजली, पद निजपाणिमझार ॥४४॥ करुणोवाच ॥ सवैया। सजनी यह कौन सुआहिइहा तनुतालसमान सुजाहिलंवायो। सुपिसंगकंपाय धरे तन अंबर सूक्ष्मजो धरमे लटकायो। पुनभाल सुकिंचित मुंडतहै किपिखो कचमूलहुते उखडायो॥ दुमछाल विसालसुनाल धरी नयती यह जान परे रसकायो। शांति स्वाच ॥ दोहा। वौद्धागम सजनी इहै, भिक्षुक रूपवनाइ ॥ वंचतहै सभलोकको, यों मेरे मनआइ ॥१६॥ (१) कामचन्दनादिलेप । (२) साल तथा सुगन्धीवाले दनवारणकोये हैं।

दय नाटक। (८९) हा। नोखगनिकार॥ नयो, लागो करन उचार॥९६॥ उवाच। हा। महाभाग इमजान॥ , ऐसे मुखो वखान ।। ९७ ॥ गे, वारन कीनो आप॥ पणकहै निहपाप ॥९८॥ च, हनो न याके प्राण ॥ कीनोखगमियान ॥ ९९॥ तर, बहुर पुछे विख्यात ॥ तदपि पूठों वात ॥ १०॥ ब, क्षपणक प्रश्न सुकीन॥ ने, अहे सुपरम प्रवीन ॥१०॥ कसे मोक्ष तुहार ।। जीके करो उचार ॥ १०२॥ कटवाच॥ पाइ। आनंद वोध विषयमें लेखै ॥ वहीसूख कछु और नहोई।।१०३॥

, -- मिक्षुक उवाच ॥ दोहा। यंतीउपासक औरसभ, सुनो सुनिजनिज कान ।। वाक सुधारस बंधहर, कहे सुगत भगवान ॥४७॥ योंकहि पुस्तक लीनकर, खोलि नवायो शीश ॥. गुलावसिंह पेखत सभे, राजसमाजमहीश ॥१८॥ दिव्यनैनसभकी पिखो, गति शुभाशुभ दोइ ॥ क्षणभंगुरसभ भोवहैं, थिर नहिं आतमकोइ ॥१९॥ सवैया । इमजानत जो सभमोहजितोनिजदारन औरअगारनमाही। भिक्षुकजो घरमाहि रमे तव द्वेप न रंचकरो मनमाही ॥ मन कोमलतो इहभांति मिटे पुन नेपथ्यपेखि कयोमुखमाही।। श्रद्धे इतआउ विलंबकहा सुप्रवेशकियो श्रद्धाक्षणमाही ५० श्रद्धोवाच ॥ दोहा। देव करो आयसु प्रगट, करों कोन अब काज॥ मे क्षणमें सोईकरों, तुम सभके सिरताज ॥५॥ भिक्षुक टवाच ॥ दोहा। भिक्षुकं सेवक सकलजे, ताको गहि निजहाथ ।। मोहिमतेअतिथिरकरो, सभे निवावे माथ ॥५२॥ (१) यती नाम माथु तथा मेना । (२) पदार्थ । (३) दिग्धिनिहित ॥

आत्मस्थित मोक्ष वखाने । ते पशुबुद्धि सुमहा अजाने उपलअवस्था बहुजगअहै । बुद्धिवंत तिह किह विधचहै।।१० अपनीवयकी जो अनुरूपा। युवती मिले सोमोक्ष अनूपा यापर संमत तोहि दिपाऊं। तेरो सवसंदेह मिटाऊं।।१०५ पारवती प्रतिरूप नवीना । तासंगरहे सदा सुखभीना चन्द्रचूड शिव मुक्तिभनीजे । क्रीडाकरें दरस दुःखठीजे॥१० भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। श्रद्धालायक नाअहे, महाभाग यह रीत।। विपयराग वीत्यो नहीं, मुक्तिं कहा तिहमीत ॥१०७ क्षपणक उवाच। दोहा। अरेकपालक रोपतजि, पूछों वात प्रसिद्ध.॥ । अर्धशरीरी मुक्तिपुन, यह मत सकलअशुद्ध ॥ १०८॥ सुनत कपालक मनविपे, कीनो-इहे विचार ॥ याके अंतःकरणमैं, अहे अश्रद्धाभारः॥ १०९ ॥ निजमतश्रद्धा आज पुन, लीजे वेगबुलाइ । मुखोंवखान्यो प्रगट तिन, श्रद्धे तूं इतआइ ॥ ११०॥ तथ आई श्रद्धा तहां, रूप कपालक धार ॥ करुणाताको हेरकर, कीनो शांतिउचार ॥ १११॥ (१) सुखानुभवसे रहित ने नौकरी स्थिति मुक्ति मानतेहैं। (२) हर्शत । ३) पार्वतीके सदृश श्री साय मो फोडाफनाई सो मुक्त फदानावी मादेखती -हतेहैं अर्थात् उमासहित महादेवके उसामगोंको सकपामुनिको मानिदोती है हतात्पर्धिहै। (५) अर्धगोकी मानिही तिनके मनमें मुनि सो पूजाहाभीमानीन- कामोअनुरूपा ॥ मुक्ती मिटेमो मोक्षगाइति । - अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (८१) श्रद्धोवाच॥ जो आयसु सोईकरों, ऐस वखाने वैन । निकसि चले वै सभाते,शांतिनिहारे नैन॥५॥ शांति रुवाच ॥ सजनी यहभी तामसी, श्रद्धा जानी मोहि ॥ करुणा कह्यो सुऎवहै, भली पछानी तोहि ॥५४॥ याअवसर क्षपणक अये, लावो डीलसुहाइ॥ भिक्षुक जातो हेरकै, ऊचेलयो वुलाइ ॥१५॥ रेभिक्षुक इतआउ तुम, कछु पूछो अब तोहिं ।। तेरी मेधा मैं पिखों, प्रगट वखानो मोहि ॥५६॥ सुनि भिक्षुक पुनि कोपियो, भापे वचनकठोर ।। हापापी मलपंकधर, लेहि परीक्षा मोर ॥२७॥ क्षपणक कहे सुक्रोध तज, करो वेगि अतिरोध। शास्त्रगति कछु पूँछहों, काहेकरो सुक्रोध ॥ ५८॥ भिक्षुक उवाच ॥ क्षपणक तूं कछु जानहै, शास्त्रकथा उदार ॥ भवतुं प्रतीत पूछो सुअव, भाखों क्रोधनिवार ॥१९॥ चौपाई। | क्षणभंगुर तव मतआत्मअहै । काहिनिमित्त व्रत्ततुमगहै ॥ याको उत्तर प्रथम उचारो।क्षणक आत्मा किहविधितारो६ (१) अरेक्षपणक शास्त्रमपिवेसि । भवतुपतिक्षामस्तावत् उपमृत्पकिंपृच्छसि ।। यह संस्कृतका पाठहै अर्थ यहः भवतु पहिये जैसा तू जानताहै तैसा जाणो परंतु मैंभी तेरी परीक्षा फरताहूं ऐसे फहिकर भिक्षुक क्षपणकके समीप जायकर कहनेलगा कहुं क्या पूछता है मोधरहित होय कर मैं तेरेको उत्तर कहताहूं यह दोहाका भावहै । क्षपणक उवाच ॥ ६ अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक (९१) सखी रजोगुणकीसुता, श्रद्धा याहि पछान ॥ गुलावसिंहकवि रूप तिह, आगे करे वखान ॥ ११२॥ सवैया। नील सरोज विलोल महाटग मांग संधूर सुपूर बनाई। सुंदर भूपण आहि घने नर हाडनकी गलमाल सुहाई॥ पीननितंव सुपीनकुचाकटि मध्यम आननचन्द लजाई ॥ आइ प्रदक्षण ताहि दई कहिस्वामिन् आयसुदेहु वताई।।११३ हैअभिमान बडो इनको अब भिक्षुकको गहिलेहु पियारी॥ योसुनवांत कपालककी हँस भिक्षुक अंकमिली भुजडारी॥ भिक्षुक सानद अंकलई तन रोमखडें सुजगे शिवओरी ॥ सुअहोमुख याहि कपालनिका हम धनभये इमवात उचारी॥ पीन पयोधर नारि कबूं जिनके मतना मम अंक छुहाई ॥ भूलंपिखों तव मारकरें अरु दोपजनावत ग्रन्थ सुनाई। श्रावग औ तिनग्रन्थनको शतवार धिकारवडे दुःखदाई॥ आजकपालनिपीनकुचाछुहि मोदवढे सुवडीसुखदाई॥११५ सुंअहो शुभपुण्यकपालकके जिनके मतयाविधकोसुखपैये।। सुअहो यह सोमसिद्धांत बडो, जिनके सम और नदूसरहैये।। पुन है यह धर्म अचंभ बडो, बडभाग सुनो सुकहामुख गैये।। अवमै दृढश्रावगपंथ तजे, कवहूं तिनके मत भूल नजैये ११६ परमेश्वरको यह सोमसिद्धांत, सुतांहिविपेअब में चलआयो।। अवतूं गुरुशिष्यसु मोहि पिखो गुरु सीपदिजे सुपरेंतव पायो। पिख ताहि दिगंवर कोपभये, सुकपालनिसों तव अंगछुहायो।। शठ भिक्षुकदूरचलो अति दूपत क्यों मम आवतहनिकटायो ११७ (१)कामदेव ।।

भाषपदादयनाटका [अ०३ भिक्षुक उवाच ॥ अरे अरे अब करों वखान । मेरो मतो सुनो निजकान ॥ विज्ञानलक्षण आत्महे जोई । रहे संतानमरेक्षण सोई॥६॥ दोहा । अस्मतपंक्तिपरो पुनः, कश्चिवज्ञान सुहोइ.॥ नवासना ऊजलो, मुक्ति लहेगो सोइ ॥ ६२.। क्षपणक उवाच । चौपाई। सुन मूर्ख जन्मान्तरमाही । जो आत्मको मुक्ति लहाही ॥ तो अव नष्टकलेवर थारा कीनलाभकोतव उपकारा॥६३॥ पूछों और सुनो मनलायो । किन तब ऐसो धर्म बतायो । ननु सर्वज्ञ बुद्धहै जोई । ताहि कह्यो यह धर्म सुसोई६४ दोहा। बुद्ध भयो सर्वज्ञजो, कैसे जान्यो तोहि ।। याको उत्तर होय जो, प्रगट 'बखानो मोहि ।। ६५ ।। भिक्षुक उवाच ॥ 'चापाइ। बुद्ध वनायो आगम जोई। तामें कयो सर्वन सुसोई॥ तातें तां सर्वज्ञ सुजाने । बुद्धवाक यह प्रगट वखाने ॥६६॥ (१) अमननिसदिय विज्ञानम्ननिमें विद्वानपरंपरामें कभिदादिप काशित ভশন সাধনায় বাস কথ্য ব্যক্তির গুপি বা, (२) मनन्तर (कायलर) में कोई श्रामा मुनिको को भर नट या नमको साप र रेंगा न करनी कोगा पर काम २२) प्रवधिचंद्रोदय नाटका [अ०३] , - दोहा। तब भिक्षुक क्षपणक कह्यो, बच्यो पापविसाल।। याहि कपालनिसंगसुख, कहां तुम्हारेभाल ॥ ११८॥ चौपाई। न भिक्षुक पुन एहु उचारी । क्षपणकको गहुवेगप्यारी ॥ पणकअंग मिली गलोले । भयेरुमंचसुक्षपणकवोले॥११९ सवैया। अहो सुन श्रावगावगजुसुकपाल निसंगवडोसखदाई। नतिसुंदर देह सनेह पटे, मुहिफेरमिलो भुजदंड लंबाई ॥ नावगमूख महानमयो, यह अमृतको सुविरंचि बनाई। नवजाइ इकंतरमोतिनसों,इम गूदतिने मनमाहिटराई॥१२० नपीनपयोधरसोभिन तूं,मृगशावकभीत सुनैन तिहारे । कपाल निजोममसंग रमे, तब श्रावगको डक नादिदमारे।। कपालक आगमधनअहो, जिनभीतर मोक्षमुमूखअंपारे । कपालक आज अवार्य , दम दाममये तय पादनुहारे १२१ दोहा। भैरवके अनुमारने, शिक्षा दीजे मोहि ।। मनभ पंथ निहारया, पूरण पाये ताहि ॥ १२२ ॥ कयो कपालक दोनको, बंदा मा टिग आइ ।। तय क्षपगक भिक्षुक नथा, यंट माल झुकाद॥ १२३॥ कपालक मांजन हाथलं, मंटो ल्याईध्यान ॥ श्रद्धा नवे कपाटनी, ल्याई मग महान ।। १२ ।। , अं०.३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। क्षपणक उवाच॥ सवैया। बुद्धवाकनते सर्वज्ञ सुबुद्ध जवै, रिजुबुद्धिसु-ताहि पछाने । तो सर्वज्ञ सुमोहिलखो जगमैं, सवभूत भविष्यत जाने ॥ पितरापितामह सातकुलीलग, तूं मम दासनही ममछाने ॥ सुनके यहवात दिगंवरकी,पुनि भिक्षुक चीत्त वडे खुनसाने६७ भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। हा पिशाचपापी वडे, मोको कहे सुदास ॥ दंतपंकघर मलन अति, बुरीसुतें तनवास ॥.६८॥ क्षपणक उवाच ॥ चौपाई। रे विहार दासोक पियारे । यह इक मम दृष्टांत उचारे ॥ कोपना मनभीतर आन । तेरोहित अव करोवखान।।६९॥ दोहा। चुद्धअनुसासन दूरतज, अर्हतमतो सुधार ॥ मोहि दिगंवरपदलहो, देहु सुवसन उतार ॥ ७० ॥ भिक्षुक उवाच ॥ चौपाई। हा .पापी तूं भयो सुनष्ट । औरन नाशचहें अतिदुष्ट । मनोमशान पिसाच हि आयो । यो तव देख लोक डरपायो७॥ (१) वेश्याके भर्ता यह हमने दृष्यंत फहाहै ॥ , .

प्रबोधचंद्रोदय नाटक। सवैया। भगवंत महंत बडे जगसंत, सुमैमदसों यह पूर्णकीयो ।। तवनैन उघार विलोकि भलीविध आपकपालकसो मद पीयो कछु शेपरह्यो मदभांजनमैं, तिनभिक्षुक और दिगंवरदीयो॥ यह पावन अमृतपानकरो,सक्वंधतजोसुखसोंसुतजीयो १२५ तथाच तंत्र॥ पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति न भूतले ॥ उत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १॥ सवैया। भवभेपज है पशु पाशकटे, मदपानसु भैरव आप वतायो॥ इत ते मनमाहि विचार करें, सुदिगंवर योंमुखमाहिंअलायो। हमरे मतमै मदपाननहीं, सुअर्हतगुरुमुहि आप छुडायो। किहभांति कपालक जूठपिवों,मदिराइहभांतिसुभिक्षुकगायो।। सुकपालक पेख कह्यो श्रद्धे, सुविचारकरें मनमें सकुचाए। अवलौं मति याहि मलीन अहे, पशुंभावनही इनके सुमिटाए। हमरे मुखःसंग सुदोप अपावन, याहि सुरा मनमाहिं ठराए॥ अव तूंमुखैआसवपूरणकै, इन देहु सुराजु इनेभ्रम जाए १२७॥ सुसदा शुचि नारिनको मुखहै, इहभांत कहें कवि वेदवीयो। श्रद्धा सुकपालक जोरदोऊ कर, नाथ कहो सुवन अवकीयो। मदभांजन ले मुखपानकरे, पुनशेप सुभिक्षुककै कर दीयो। मुहिआजप्रसादमहानभयो,इमभापसुभिक्षुकसोमदपीयो १२८ (१) मूर्खता। (२) अपने मुसमें मदिरा पवित्रकरकै। (३)(स्त्रीमुखं - सदा शुचिः) ऐसे कहाहै परंतु तहां अपने स्त्रीकामुस शुचिहै यह कथन है परस्त्रीके मुखफा निषेध है. पापका जनकहोनाते ॥ .

प्रवाषचन्द्रादय नाटक। लोकनिंदत जो बड मागी । अपनो राजमुख बहुत्यागी तेरो वेस पिसाच सुजोई । कीनबहे भवभीतर सोई॥७२॥ दोहा । अहंत नहिं सर्वज्ञयो, धर्म कहे किह सोइ ।। तो विनश्रद्धा ताहि मत, कहो सुकाको होइ ॥७३ ।। क्षपणकटयाच॥ चौपाई। ग्रहनक्षत्र सकल सोजाने। चंद्र रविको ग्रहण वखाने ॥ नष्ट लाभ पुन भावीज्ञान । पाछे भई सुकरे बखान ॥७॥ गणनामहि अंतर नहिरहे । अतीन्द्रियवस्तुज्ञान बहुकहे ॥ तातेहै सर्वज्ञ अर्हत । ऐसैं माने जे जगसंत ॥ ७ ॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। सुन भिक्षुक अतिशयहँस्यो, भूपति सभामंझार ।। गुलावसिंहगति औरही, लागो करन उचार ॥ ७६॥ भिक्षुक उवाच ॥ चौपाई। अनादिकालकाज्योतिपजोई। अतीन्द्रियज्ञान कहेसवकोई ॥ तापरतारक तुम जग भये । कटवत शिरपर धरलये ॥७॥ और कहों इककरो वखान । तव मतजीवशरीर प्रमाण ॥ विनासंबंध त्रिलोकीज्ञान ।ताको किविध होइसुभान७८॥ (१) अहंत तो सर्वज्ञ या नहीं तिसने धर्म किसमकार कहा सो कहिये । (२) वश्चक । (३) विज्ञानरूप ॥ ,

(९४) प्रबोधचंद्र
सुअहे यह आसैव गंधवडी
नहिं वारवधूसंग पानकरे,
मुकपालिंनिके मुख गन्धर्धा
सुर सांच सुधा उर चाहते
रेभिक्षुक मतपीव
याहि कपालिनि
तव भिक्षुक मद
पीवत प्रसन्न मुह
मुअहो मदस्वाद मह
चिरवेमुखयासुखते
सुन भिक्षुक मेहग
अवसैनकरोंपुनमि
वहु-दोन तहां तव
पिख पहु कपालि
अव नाचकरेंतव
भिक्षुकरे गुरुसंग
....

[अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (८५) कुंभोपहित दीपकह जोई । यद्यपि शिपा वडीतिह होई॥ ग्रहमैं अहे पदार्थ जेते । कवी प्रकाश सके नहिंतते॥७९॥ ताते अहंतदर्शने जोई । उभै सुलोक विरोधी सोई ॥ सौगतदर्शन अतिसुखकारे । वहु हम सुंदरनयन निहारे ॥८॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। सजनी श्रद्धा नहिंइहां, चलें ठौर अब आन ।। करुणा कह्यो सुएवकर, आगे कियो पयान ॥ ८॥ शांतिसु आगे देखकर, वोली वचनउदार ॥ सामासद्धांत सुयह खडो, आगे सखीनिहार ॥ ८२॥ भवतु तथा करुणाकह्यो, चलें समीप सुयाहि ।। मतश्रद्धा तह होइ पुन, अवलो पेखीनाहि ॥ ८३ ॥ तवे कपालकरूपधर, सोमसिद्धांत प्रवेश ।। कीनो सभामझार तह, जहकीरतिवरम नरेश ॥ ८ ॥ सवैया। नरहाडनकी गल मालधरी, शेवदंतनके श्रुतिकुंडलछाए। भुज अंगदहाडनके सुधरे, निशको सुमशाननमाहि वसाए । मजन छारविपे सुकरे, तनमें सुमशानकी छार लगाए ॥ अतिभीपन आहि अकारवडो,नरमुंडकपाल सुभोजन पाए८५ (१) (२) उमाके साप नोहा मी पहिये मोनसिति । (१) मुस्ता " ३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। सवैया। संग आउ सुनाचकरें, कहि भिक्षुक ऐक्करें विगसाए। मतं नैन सुनाचकरें, थिके पदयों मुखमाहि सुगाए॥ जीनपयोधर चन्दमुखी,मृगनेन कपालिनितोहि लजाए। संहगुलाव लहें गतियों जिनके उरमैं महामोह भ्रमाए१३४ कवि रुवाच॥ सवैया। नके मनमैं हरिध्यान नहीं, शुभपंथनते मिटजावहिगे। संयमनेम असंकरहें, जगभीतर सिद्ध कहावहिंगे । पंथ सनातन-माहि कलू, मन वांछत पंथचलावाहिगे ॥ फेलेगो इहभांति कलू शुभसंत अनादर पावहिंगे ॥१३५॥ भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। अद्भुत आगम एहहै, कहे कपालक जोइ विनकलेश जिद्द मतविपे, अभिमत सिद्ध सुहोइ।। १३६।। कपालक उवाच॥ दोहा। -क्या अद्भुततात पिसी, और पिखो अब सोइ॥ वांछित विषय सुभोगिये, बहुर सिद्ध सभहोइ ॥१३७॥ दोहा। • अणमा महिमा आदिजे, अएसिद्धि प्रधान ।। तेसम यांमतम लेहे, विनाखेद पहिचान ॥ १३८॥ (१) भूमि पर सटिन होते हैं नान गिरतेहैं। (२) बानिदि ममिति -

अं०३
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(८६)
कपालक टयाच ॥
दोहा।
योगांजनसों मैं पिखों, जोकछु जगतमझार ।।
भिन्नोऽभिन्न सो ईशते, लीनो जगत निहार ॥ ८६
कवि रुवाच ॥
क्षपणक ताहि विलोकिकर, भिक्षुक कीन उचार
एहु कपालक वृतीनर, पूछे ताहि विचार ।। ८७।
क्षपणक भिक्षुक पूछियो, ताहि समीप सुजाइ ।
कपालकर नरमूंडधर, हमे सुदेहु बताइ ।।८८
हमरे उर संशयभयो, धर्मसुते मत कौन ॥
तवै कपालक वोलियो, महा अमंगल भौनः।।।
कपालक उवाच॥
कवित्त।
सुन क्षपणक अव तोहिको वखानकरों,
सुनके हमारो धर्म चित्तमाहि धारिये ॥
भालके कपाल यह चरखी विसाललगी,
मांसकी अहूतीगहि पावक सुडारिये॥
भूसुर कपाल डारमदरा विसाल पुन,
कीजे मुंखपान इम वृतको उपारियें।
काट नरमुंड हम भैरवसुझुंड भनें,
श्रोणतकी धार पांव भैरवपपारिये ॥९०
परस्पर भिन्नहै ईमरसे आभिन्न है ।
जगद

भवायचदादय नाटक। वर्श आकर्पण मोहणी, और परमाथनिजान। परक्षोभन उच्चाटनं, प्राकृतसिद्ध पछान ॥ १३९॥ योगविधन यह तज्ञको, चहें नाहितिहधीर ॥ परअनपंगकंआइहै, औसो मतो गंभीर ॥१४॥ क्षपणक उवाच ॥ चौपाई। अलेकवालि यायों मुखगायो । क्षपणक वहुर विचार सुआयो। अथवा अले अचालेभाले । अॉलपलाकम अहे सुथाले१४१ सवैया। पिख भिक्षुक ताहि हसे मुखमै,सुकपालकके प्रति एहुउचारे।। मदरा वहुपानकरी तपसी, मतिभूलगई सुभये मतिवारे ॥ मुखवाकसु.व्याकुल एहुभयो, मदकोउनमादसु देह निवारे। सुन भिक्षुक वातकपालकती, मुखभीतरतेसुतंबूलनिकारे१४२ मुखसीत तंबूलकपालकजो, सुदिगंवरको निजहाथ दयो॥ मदको मद दूरभयो क्षणमें, धरशीस तंबूल चयाइ लयो ॥ कर जोर गयो गुरुकेढिगते, मन भीतरसो सवधान भयो। गुरु पूरणते पदकंजलदे, इक पूँछत तोहि संदेशनयो॥१४३॥ (१) यसपाहिये मंत्रोपधियोंकरदी अन्यको वशकरना १ आफरंग कहिये योपियोंक दी दूसरेको अपने पास सैचिडेना । २ मोहन पहिये मंत्रोपधियोरी सको भ्रांतिकी उत्पत्ति करनी ३ परमाथिन पहियें मंगोपनियोकरके पार मतरी साकीन्याई मपनकरना मक्या सकट जानका नागकरना ५ प्रक्षोभण पहिये मंगोपियों के पुका चित्त विशेष साभारता ५ उचाटनाहिये मंराधिपार सायानगें को मारना ६ इत्यादिकं प्राकृतमिदि कहीना ॥ सोनयर प्राद। २)मरे काटिक। (३)भरे भाचपं। (५) पाटे नाम मारे. मस्तम्। का परे नुमाप बाट कहिपे मार रम पादप पराकमा ।। " दय नाटक। कउवाच ॥ करवाच ॥ गहिबेगसु भैरवके मतलयाए । पी, तिम और कहों कछुहैनरपाए। रुजो तव सेवक चीत लुभाए। इहसंक बडीगुरुदेहुमिटाए १४४ हा। त, सकल वखानो तोहि ॥ ढील नलागत मोहि ॥ १४५॥ सर्प यक्षनी नारि ॥ , ल्यावों भीनमझार ॥ १४६॥ पाई। ।कीन गणत मम एहु निहारा ।। । धर्मपथ सभ करें विनासा१४७॥ चौपाई। । साँच अहे नहिंझूठ वखान्यो।। । करें विचार भले कछु आज१४८ । क्षपणक कहें वताबहु आज ॥ । भूप कही गहिल्यावोसोई १४९॥ । दासी मुता कहाबहुनारि ॥ ताको वेगकेश गहिल्याऊ१५०॥ लेकर नीपुन गणन मुलागे । करुणासखी सुनो देकान१५१॥ कउवाच ॥ मोसमासानिति

.
[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(१०७
मृगतृष्णा जलहै निहसार न्याविधको 'सागर संसार ।
मूरख ताहिकरे . अचमान । केचित ताहि करे मुखपान५०॥
दोहा।
करअवगाहनरमे तिह, अरथ उरध पुनजाइ ।
गुलावसिंह विनवोध जग, सदा परमदुःखपाइ॥९१ ।
चौपाई।
अथवा यह चक्रसंसार । महामोह तिह प्रेरनहार
ताको मूल अवोध विचायो।तत्ववोधकर बने निवायो॥५२
दोहा ।
ईशअराधन वीजते, उपजे तत्व सुबोध ।।
ताविन और उपाइ नहिं, हम देख्योअति सोध ॥५३
चौपाई।
पुनवंत जे करे उपाइ । करें देवता ताहि सहाइ
ऐसे तत्व विवेकी कहें । जनके सर्वसंदेह सुदहें.॥ ५४
विष्णुभक्तिममआयसुकीनी श्रद्धा आनि मोहि कहिदीनी
कामादिक जीतन उपाइ । करोसिताव सुवारनलाइ ॥५५
मैभी करो सहाय तथारी। यों हरिभक्ति सुकीन उचारी
वस्तु विचार अहे जगजोई । काम जिने क्षणभीतर सोई॥५६
ताते ताको वेग वुलैये । तांजीतनहित ताहि पठेये
वेत्रवती अब वेगसु जाई । ल्यावो वस्तु विचार बुलाई।।२७
(१)श्लोक-मायः सुतिनामर्षे देवा यान्ति सहायताम् ॥ अपन्यानं तुगच्छन्तं
दरोपि विमुञ्चति ॥ अर्थ यहः पुण्यात्मा पुरुषोंके अर्थ देवताभी मायःकर सहायताको के
तेहैं परंतु कुमार्गगमनकरतेहुए पुरुषको सोदरकहिपेसाथ उसनधाताभी त्यागकरदेवे है

, ८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] हतआशसुकरें विचार । मम माताको नाम उचार ॥ - इकागर सुनो प्यारी । करुणा कह्योसुभली उचारी १५२ दोहा। दोनों ठाढी तहां, चीत इकागर धार॥ रं गणती क्षपणक तव, लागो करण उचार॥१५३॥ चौपाई। इंजल नहिंथल नाहि पहारन । श्रद्धा नांहि सुमाहि पतारन ॥ णुभक्तिके संग मिलाइ । वसीमहात्मजनउरजाइ १५४। णा सानंद कीन उचार । भलाभया सजनी सुनीसार।। हा विष्णुभक्तिके पास । वसे महात्म उरसुखरास१५५ नेकर शांति हर्ष उर भयो । बहुर कपालकवचनअलयो॥ विहीन धर्म पुन जोई । क्षपणक कहो कहाअवसोई॥ णक अंकमालविसतारी गणेतीकर पुन कीन उचारी॥ -थल गिर पताल सोनाही । अहे महात्मके उरमाहीं१५७ लकंसुनत विखादहि भयो । मोहमहीप कष्ट अतिभयो । -- विष्णुभक्ति है जोई। सभसिद्धिनिकी मूल सुसोई॥ तेसुता श्रद्धाहै जोई। ताहिसमीप वसी अव सोई॥ विमुक्त धर्म तह जव हीं। वसेअनर्थ होइहमतवहीं१५९) कभूपके कार्य जते । यद्यपि सिद्ध होइगे तेते ॥ पे महामोहको काज । करें होइ जेतो कछुआज०६० 5 लौन वहुतदिन खाए । ताहित मरे.जगत जसपाए । ने. 'प्राण- जाहि-तो जये। स्वामिकाज चललायसुकैये। -- पतिहारी तव वेगसिधाई । देव कह्यो सुकरों अवजाई । वस्तुविचार संग प्रतिहारी । आई वेगसु सभामझारी॥ ५८ ॥ वस्तुविचार उवाच ॥ छप्पयछन्द ॥ विनसुंदरतनु सुंदर पापी मदन दिखाए। करे वंचना जगतलोकको नरकि लिजाए। अथवा सभदुःखमूल दुष्टमैल्योविचारी ॥ महामोह जह अहे जगतमै वडो विकारी। पुन जिहविध मोहनिलाज सठ जनउरको भ्रमनाकरे ॥ संग मदनमिल दुए यह अव सोप्रकार जनमनधरे॥१९॥ सवैया। यह कामनि कुंचतहै अलिका,गकंजपिखेजन चीत चुराए । घन पीन उतंग पयोधरहैं,मुखचन्द मनोसुविरंचि वनाए । इहभांति सराहकरे जन मूरख, जांउर तीर अनंग लगाए। मलमूत्र मुहाडतुचा पुतली, युवती खलमोह सुयों दरसाए६०॥ वस्तु विचार करे नर जो, तिहको युवती इमदेत दिखाई। मलमांसकी चिकडसंग विरंच,सुहाडनकी पुतली सुवनाई। मुखथूक सुनाकमै सीढभरी, निसवासरनयनन गीड वहाई दुरगंध मलीन सुनारि मनो, खिरकी यमधाम विरंचलगाई६१ सवैया। मणी रमणी नह रंचकहै, गुण औरनकै रमणी दरसाए। मुक्ताहलहारसुहेमतटकह, कुंकमचन्दनलेप लगाए । (१) रमणी कहिये स्त्री रमणी नह कहिये मुंदर नहीं है किंतु और गुणों आरोपमें देसनमें आतीहै सो गुणकोनहैं। (२) करणफूल ॥

रोदय नाटक।
(९९)
अवी पछै येहोइ नवार ॥
| महात्मजनहु कुपंथ चलावै १६२
हा।
गए अखाडो त्याग ॥
'पुन, भापतहै वडभाग ॥ १६३॥
।, हताशन आश सुकीन ॥
भव, कहिये सखी प्रवीन ॥१६॥
। पुन, भई सुअंतरध्यान॥
व, भयो शुभाशुभ ज्ञान ॥१६५ ॥
दोहा।
, श्रद्धा रक्षा कीन॥
होईसकल अरिखीनं ॥१६६॥
गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदयनाटके
तृतीयोऽकः समाप्तः ॥ ३ ॥
कपटउपाय तिनोने रचा। (२) हताशन
इये हताशन ॥
शेष्य गुरुमसादविरचिता मबोधचंद्रोदयनाटक'
णिका समाता ॥ ३ ॥

[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१०१) J बहु फूलनकी गलमाल धरे, पुन पाट दुकूल शरीर सुहाए । गतिमंद हरेमननारि नही,नरकाऽनिचंडशिपा चमकाए६२॥ जिह भूपन नारिनके झनकार, सुने मनहेरनको अकुलाए। विनभाग तिसे सुविपत्ति परे,कैनके हितसो पुन काननजाए। मलिनांवर सूपधरे सिरप, पिठरी पुनश्यामकरे लटकाए । निशआवत हेर वजारविपे,कविसिंह गुलावनकोउ लुभाए ६३ दोहा । पापी काम चंडाल तूं, जो उर करें मलान॥ तो व्याकुल जन होतहै, ऐसे करे वखान ॥ ६४॥ सवैया। यह कामनि मोहि चितारतहै,पुन चन्दमुखी सुअनंद निहारे।। दृगनीलसरोजसुपीन कुचा, मुअलिंगनके हित उदमधारे। सठे कोनचहे तव कोनपिखे, युवतीमलहाड सुमांस विकारे । सुपुमान अमूरति चेतनजो, तव हेरत मूढ नहीं तवसारे॥६॥ मतिहायुवाच ॥ संवैया। इत आवहु हेवडभागसुनो, तब दोनचले पगवेग उठाए। इह राजनकोअधिराजविवेक,समीप चलो तुम वेर मिटाए।। तव जाइसमीप विचार कह्यो, जय देवनदेव वडे मुखदाए। करुणाकरके इतओरपिखो, यह वस्तुविचारलगे तव पाए६६ (१) शिटार। (२)खी हादमांमुत्र वियर होनार मह है, तिममें (सादिकसंमोनहीं तथापि रीमें भो पुमान् पुरना अमूलननई सो तेरेको देखना है रे मूर तेरेमें सार का नहीं यह भावहै ।। - ॐ श्रीगणेशायनमः। अथ चतुर्थोङ्कप्रारंभः॥४॥ दोहा। पेखत जांतज मोहको, लहे प्रबोध उदार॥ सीतावर वरकल्पम, बसे सुचित्तमझार॥१॥ कीरति वरमा देवकी, आई सभामझार ॥ मैत्री रूप निहारके, मिटे सुनिखल विकार ॥२॥ सवैया। गि नीलसरोरुह शोभतहैं, अलिकै कच नील कपोल सुहाई॥ मुखचन्द अनन्द करे उरको, गतिमंद मनोजन चीत चराई। टिसुक्ष्म पीन नितंब कुचा, दृग लाजवडीनिरखे सुखदाई ॥ विसिंह गुलाव निहार सभा, नृपकीरति वरंमाकी विगसाई३ मैत्र्युवाच ॥ चौपाई। देता मोप्रति कीन वखान । मैं मुनियो सजनी निज कान॥ भैिरवी धरणिगिराई । श्रद्धा विष्णुभक्तिमु वचाई॥१॥ उत्कंठा चीतमझारी । किहविध पेखो सखी पियारी ।।. मंत्री भाप्यो जवहीं । प्रवेशकीयो श्रद्धातिहतवहीं॥५॥ श्रदोवाच ॥ दोहा। मे उर मै अतिडर भयो, काँपत मोदि शरीर ।। mins शानाMEM . । प्रबोधचं सवैया। कह्यो यहठोर निवास,करो श्रम आपन दूर निवारो।। वार सुवैठगयो, पुन जोर दोऊकर कीन उचारो॥. करदेव समीपअयो, करुणाकरके कछु आय सुधारो॥ कह्यो महामोहके संग,सुहोवतहै जगजंग हमारो ६७॥ सवैया। ली सुपताकनमै, प्रथमै सिरदार सुकाम वनायो । तिवीर सुसैननमै, हमरे मनमै इक तूं जग आयो । धनविचारकह्यो मुखते,भट कोटिनमै प्रभु मोहि बुलायो।। करों सभखंड मनोजह, जंबुकपुंज सुखाइ अघायो ६८॥ राजोवाच ॥ दोहा। वस्तुविचार उदार, अति शस्त्रविद्या कौन ॥ जाकर हने मनोज रण, मोहि वतावो तीन ॥ ६९ ।। विस्तुविचार उवाच ॥ 'दोहा। अहो पंचसर हाथमे, फूलनको धनु आहि ॥ तांजीतनहित शस्त्रकी, ग्रहण अपेक्षा नाहि ॥७॥ सवैया। गढ देह मनोजके द्वारजिते दृढ रोक करों तिह व्याकुल भारी।। निजराखनहेत चिते अवला पुन, दूरहितेजु पिखे बहुनारी ॥ तव मे परिणामसुदूपकहों, मलमूतभरीसु दिखावहु सारी॥ इहभांति मनोजकरोंवलखीण,सुलेबहुतां क्षणभीतरमारी ७१ गागररूपकिसके भीतर कामके आनेनाने के लिये इंदिपती बार है

सेदय नाटक।
(१०१)
वैया ।
नरमूंड कपालन कुंडल पाए ॥
हगपेखनते जनु ज्वाल बमोए ।
ला, तिनभीतर दीरघजीभ हलाए॥
जनु नैन पिखो इमचीत डराए ७॥
होहा।
र, लागी करन बखान॥
भई, होवत ना कछु भान ॥८॥
चौपाई।
। संभ्रमरिदेसुभई दुःखारी ॥
। कछु मनभीतर करत विचारा ९॥
। लखै नमोहि नशुद्ध सुकाई ॥
। पूछो जाहि संदेह मिटाऊ ॥१०॥
संन्युवाच ॥
दोहा।
कहागयो मन तोहि ॥
नाहिनिहारत मोहि ॥११॥
पुन, लांवो लीन श्वास।
आउ हमारे पास ॥१२॥

अं०४]: प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१११) . - दोहा। साधुसाधु भूपति करो, वोल्यो बहुर विचार ।। जिहविध जीतों कामअरि, राजन सुनो प्रकार ॥७२॥ सवैया। पावनहै सरिता जगमै, घन कानन तीरविपे अतिछाए ॥ कोमल सैल सिलातल है, गिरिवास इकंत महासुख दाए॥ जोसमवाक व्यासकथा, सत्संगतिभाग वडे जनपाए । तौकहि नारि मलीनहरे मन, और मनोज कहा उपजाए॥७३॥ कामको आयुध एक प्रधान,इहै अवला जगभीतर गायो॥ ताहि जिते पुन कामसहायक, उदम होवहिगो विफलायो। भंग करों जव कामसहायक, तो यह प्राणतजे दुखदायो॥ कामसहायक जेजगमै, तिहनामकहोंसुसुनो मनलायो॥७॥ चन्द सुचन्दन धौलखिपा, मधुपावली गुंजतफूल सुहाई ॥ वागवसंत मयूर पिको पुन, श्यामघटा घन घोर लगाई ॥. मंद सुगंध कदंव प्रभंजन, और शृङ्गारजु कामसहाई ॥ नारि जिती तब जीतलए, सभ नाहिपिखों इनमैवलराई॥७॥ दोहा। अति विलंब नकीजिये, सुनो जगतके राय ॥ आयसुमोको दीजिये, हनो काम रण जाय॥७६॥ सवैया। सार असार विचार सिलीमुख, मैसुदशो दिशमाहि पसारे ॥ सैन मथौं आरिमंडलकी सुवने प्रभुके अब कारज सारे ॥ (१)व्यासपगीत शांतिके प्रतिपादिक वास्यहै तथा सत्सङ्कति । (२) रात्रि'।

- प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४ चौपाई। कालनिशासम वदन कराला । मैं ताभीतर. ग्रसी विहाला ॥ याहि जनमविपे पुनप्यारी । तोहिपिष्योममभाग उदारी१३॥ मैत्री सखीसु अंग मिलीजे । मेरे दुख दूर सभ कीजे ॥ तव मैत्री पुन अंग मिलानी श्रद्धालाइ गले विगसानी॥१४॥ मैत्र्युवाच ॥ चौपाई। महाघोर दरशन है जाहि । विष्णुभक्ति पुन डाटयो ताहि ॥ महाभैरवी विपति मलीन । कहो सखी तिन करम सुकीन।।१५॥ श्रद्धोवाच ॥ सुनसजनी मै करों बखान । जैसे वाजपरे बलवान ॥ एकहाथमै कच गहिलीने । दूसर धर्मगह्यो दुःख दीने॥१६॥ लेकरदोनो गगन उडानी । मनो गीझ लेमांस पलानी ॥ 'मैत्री सुन उरमाहि डराई।हा धृग हा धृग मुखोअलाई १७॥ भई मूरछा तनमै भारी । श्रद्धा वहुरों कीन उचारी ॥ सखीप्यारी डरु नहि करो। तुम नीके उर धीरज धरो॥१८॥ | मैत्री तवै धीर उर धार । श्रद्धे सखी मुकरो उचार ॥ श्रद्धा वहुरों कीन वखान । सुनो सखी नीके देकान ॥१९॥ मैअतिआरत दीन पुकारी । विष्णुभक्ति उर दया सुधारी॥ टेढीदृष्टिनिहायो जवहीं। गिरी भैरवी धरमै तबहीं॥२०॥ वज्रपातजिम शैल गिराई । जरजरअंग गिरी तिमआई ॥ विष्णुभक्ति उर बसे हमारे । गुलाबसिंह सेवक प्रतिपारे।।२१।। (१) एकहायसे मेरेको केशोंसे गहिलिया । (२) दूसरे हायसे निष्कामधर्मको ।

प्रवा विमंथ्यसखा हरिके, जिम सिन्धुपतीरणभीतरमारे॥ लंक हनोतिमही, प्रभुआयसुदेहुनलाइ सुवारे॥७७॥ सवैया। रेरमे अपवाद धनो, सिर दंडसहे यमलोक गहेगो ॥ नारिमिले अनुकूल कहां, कछुदोपसुने उरमाहिदहेगो॥ पूत महादुख चीतदहे, खलपूतभये भवधार वहेगो॥ जे दुहिता घरमाहि धनी,धननाहिमिले दुख लाज गहेगो।। वेध नारिनको सुखजो, क्षणएक भजे दुःख देवत भारी ।। रन संगमते जन मूरख, घोरसंसार वहे वहु वारी ॥ है तिनको कछु पाइ विवेकजु,प्रीतिकरें पुन नारमझारी ॥ वसिंह गुलावनहीनरते जग,साचकहों वहु नारि विगारी७९ नभूप विवेक प्रसन्नभयो, मुख भीतर यों तिन कीन उचारी॥ टका कटिभीतर बैंचकसो, सभआयुधवीर सुलेहु सभारी।। व शष्ठ सुजीतनहेतु चढो, सुकरे शिव आप सहाय तथारी!! स्तुविचार कह्योजिम आयस दुंदभवाइचढे वलधारी॥८॥ तव भूपति फेर विचारकह्यो, मुन वेत्रवती सुभले मनलाए ॥ अब क्रोधके जीतनहेतु सुपावन, एक क्षमा तुम लेहु बुलाए। प्रतिहारनि फेरकह्यो विनवेर, करों प्रभुजो मुखमाहिअलाए। हुजाइ सिताव अई क्षणमै, सुक्षमा पुनआपनसाथ लवाए।।८१॥ सवैया। अतिसुंदर चीतगंभीर वडी, गलाजभरे धर ओर निहारे । इहभांति लसे मुखमंडलता,नभकातक चन्दकला सभधारे॥ (१) भर्नुन। (२) जपद्रय । (३) पन्या । (५) दुपय ॥

धचंद्रोदय नाटक । ((१०३) मैत्र्युवाच । दोहा। [संखी,आज निहारियो तोहि ॥ लमुख, छुटी बहुर कहुमोहि ॥२२॥ श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। री । भई क्रोधमुख एहु उचारी ॥ नोई । हनो समूल रहे नहि सोई॥२३॥ राई । श्रद्धा केशनते सुफराई ॥ वान। श्रद्धे बेगम करो पियान ॥२४॥ नाई । काम क्रोध मोह दुखदाई ॥ लाइ। हुइ वैरागसु तोहि सहाइ ॥२६॥ दोहा। गमिल, मैं आवों ततकाल ॥ सैनपर, करो सुजंग विसाल ॥२६॥ चौपाई। ती । शमदमादि सगली मिलतेती॥ गाए । कव विवेकउपनिपत मिलाए२७॥ दोहा।। पत संग, मिल विवेकसुत मोर।। वोधसुत, होवेगो ग्रह तोर ॥२८॥ ) महाभैरवीसे मेरा तिरस्कार करायाहै । (३) (मतं - मज्ञा) अर्थपह-कनकहिये सत्य अर्थ जो धारणक- तंभरा मज्ञाहै ॥ ,

प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (११३)
अतिपावन दीरघ हेर कविजन, सिंच सुधा उरताप निवारे ॥
भांतिक्षमासभलोकपिखी, अवआपक्षमा मुखमाहि उचारे८२
क्षमावाच ।
कवित्त।
क्रोध अंधकारके विकार उर भये अति,
भृकुटी चढाइ खल फीके मुख वोलई ।।
नैनकरे लाल सुविसाल होठ डसे अति,
जरे अंगअंग सुभुजंग विपघोलई ॥
धीरजे गंभीरनीर सागरसमान अति,
भजे न विकार नहिरंच उर डोलई ।।
समावंत संत भगवंतके महंत जन,
वोले मधुवैन जन अमी झकझोलई ।। ८३॥
खेद न जवानको नशीसको महानदुःख,
चित्तको नं ताप नहि देह दुःख पाइहै ।।
हिंसादिदोप विन क्रोधको निफोर्ट हनो,
क्षमा मेरो नाम जग मेरो जस गाइहै ।
ऐसेतु अलाइ पुन दोनही समीपजाइ,
कहे प्रतिहारी क्षमा और समुझाइहै ॥
यही देवदेव सुविवेक भूप भारी अति,
चालिये समीप सखी पेखि हरपाइह ।। ८४ ॥
दोहा।
क्षमा समीप सुजाइ पुन, जयजय देव उचार ।।
यह दासी आई क्षमा, वन्दों पाद तिहार ।। ८५ ॥
(१) अत्यन्त ।।

२०४) प्रबोधचंद्रोदय नाटका [अं॰] चौपाई। मैत्रीमैं विवेक ढिगजाऊ । विष्णुभक्ति संदेश सुनाऊ ॥ वासर तूं किहभांति विताए। कीनकीन आचरन कमाए॥२९॥ मैत्र्युवाच ॥ दोहा। विष्णुभक्तिकीआज्ञया, चार वहिन हम नीत ॥ विवेक काजके सिद्धहित, वसें महात्म चीत ॥३०॥ चौपाई। महात्मजन जगभीतर जेते । याविध वर ते सगले तेते ॥ सुखियनमैं जनमें उरधरें। दुःखियनमैं करुणा उरकरें३३॥ पुनवंतमै मुदिता धरें। दुष्टनमाहि उपेक्षा करें। योंकर रागद्वेप कलपाई। मिटे निजात्मकी सुमलाई ॥ ३२ ॥ दोहा। मैत्री करुणा मुदिता, और उपेक्षा जान ॥ चार वहिन हम जीवकी, करें सकल मलहान ॥३३॥ चली प्यारी सखी तूं, महाराजके पास ॥ कहां निहारे भूपको,मोहि करो प्रकास ॥३४॥ (१) तथाच सूत्रं (मैत्री करुणा मुदितोपेक्षाणां सुसःसपुण्याऽपुण्यविषयाणा भावनातः चित्तप्रसादनम्) अर्थयह-सुखी दुःखी पुण्यात्मा पापात्मा पुरुषोंविषयक यथाकममे मित्रता दया मुदिता उपेक्षा इनधमोंकी भावनाके अनुटानसे चित्तोसनाहिये निर्मटकरे अर्थात् जे पुरुषसुखी, तिनमें मैत्रीकी भावना करे ने दुःखीह उनपर कृपाकी भावना को मे पुण्यशीलमाणी हैं उनमें मुदिताकी भावनाफरे ने पापाचारहैं उनमें उपेक्षाकी भावनागरें अर्थात् उनके सगउदासीनभावसे वर्ते, इस प्रकार धमाकी भावनासे ( चिन्तनमें) चित्तके रागदेषादिक मट दूरहावे हैं इति ॥

.
(११४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
[अंक
सवैया।
सुक्षमा इहठौर निवासकरो पुन, वैठ क्षमा यह बात प्रकासी॥
प्रभु आयुसु देहु विलंवकहा, जिहहेतु बुलाइलई यह दासी॥
सुक्षमे यह संगरमाहि दुरात्म, क्रोध बडो सुभपंथ विनासी।
भट औरनको मुखजोरतहै, सुक्षमे अवताहि करोतुम नासी ८६
क्षमोवाच ॥
दोहा।
देव अनुग्रह पाइतव, महामोह रणनास ॥
मै सुकरो क्षण एकमै, कहा क्रोध तिह दास ।। ८७॥
सवैया।
इह वेदन पाठ सुयज्ञतपो पुन, और जिते नर पुन सवारे ॥
विनकारण वैरकरे दुष्टात्म, क्रोध सभो शुभपंथ निवारे ॥
सम लोह सुदेह तपावतहै पुन, नैननते जन आगि निकारे॥
तिह क्रोधको मै इहभांति हनो,दुरगामहिपासुरज्यों रणमारे८८
दोहा।
वहुर विवेक वखानियो, क्षमे सुने हम कान ॥
जांउपाय क्रोधहि जने, वहु मम प्रगट वखान ।। ८९ ।।
सवैया।
सुक्षमा कहि देव सुनो मनमै, नर कोधकरेतव मौन गहीजे ॥
वहिगारिवके मुखभीतरजो, पुन तांप्रति कोमलयाकभनी।।
जुधिकारकरे परेतिहपांइआपद, पेख महाकरुणा उरकीजे।।
तमताडनमै हरपे उरमै, कतपूर्वपाप समेअब खीजे ॥९॥

[अ०१] प्रबोधंचद्रोदय नाटक। (१०५) श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। विष्णुभक्ति देवीहै जोई। कहीठौर सुनिये अव . सोई ॥ राढा नाम देश इक गाए । महापुनीत जहां वनछाये ॥३५॥ दोहा। तिह उत्तरतट गंगके, चक्रतीरथ महान ।। मनो विधाता गंगश्रुत, रचे तंटंक सुजान ॥ ३६॥ चौपाई। तहां विवेक वसे वडभागी। मीमांसामै जिनकी मतिलागी॥ किवेंकिवें धारे निजमाना । भये व्याकुलचीत महाना ॥३७॥ धर्मनी व्याप्ततां तनुभयो । उपनिपत संगहित तप निरमयो ।। परशुरामसम धार सुटेक । करे तपस्या तहां विवेक ।। ३८ ॥ दोहा। कह मैत्री अव जाहि तूं, श्रद्धे वेर नहोइ ।। विष्णुभक्ति जो मम कह्यो, कर नियोगहै सोइ ॥३९॥ इमकहि दोनो चली तव, श्रद्धामैत्री जान ॥ अपने अपने पंथमे, बन्दनकर भगवान ॥४०॥ चौपाई। श्रद्धा जायविवेक निहारा । धमनी व्याप्ततांतनुसारा ॥ तातजीत अरिमुखो अलायो । पिख विवेक पदमोलझुकायोट श्रद्धा कर गहि लयो उठाइ । पूछो कुशलनेन जलजाइ ॥ विष्णुभक्ति मुख कीनवसान । सुनोपूत नीके दे कान॥२॥ (१) करणफूल । (२) नाही ॥

प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (११५) हभांति विचारकरे निसवासर, ताहि सुक्रोध नहीं उपजाए। विभूपशवासकही मुखते, सुक्षमे तव भाख्योसाच उपाए ।। सुन देव जितेजव क्रोध वली, तव हिंसन पारुपमान वसाए।। भजीतलए नहिं फेरलरें, इनकीभुज नावल देतदिखाए॥९॥ दोहा। कह्यो विवेक प्यानकर, रणमै शत्रु संहार ॥ सात्विक संपति देवियां, करें सहाय तथार ॥ ९२॥ क्षमा सुआयसु सीसघर, गई सुशंखवजाइ । राजा प्रतिहारी कह्यो, लेहु संतोप बुलाइ ।।.९३ ॥ महामोहभट लोभजो, ताको मारे सोइ ।। तांविन प्रतिहारी सुनो, और उपाय न कोइ ।। ९४ ॥ जो आयसु सोईकरों, प्रतिहारी इम जाइ। ले संतोपको संग पुन, कीन प्रवेश सुआइ ॥ ९५॥ चित्त चितार सन्तोप पुन, दयारसीले नैन । गुलावसिंह बहुवोलियो, सुनो ताहिके वैन ॥९६॥ सन्तोप उवाच ॥ सवैया। फल काननमाहि अनेक मिले,विनखेद सदा तरुहैं सुखदाई। पुन नीर जहांतहं पूर रह्यो, अतिशीतल पुंन नदी मधुराई॥ मृदुसुंदर पल्लवसेज वने, विजनावन आप समीर झुलाई ।। जनहा धनवंतनद्वारनमै, कृपण पुन खेद सह बहुजाई ॥९॥ (१) हिंसा, कोरवचन वा कटुवचन मान का मभुना अधीन होते है ।

(१०६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं० कामक्रोध पुन मोह अराती । करो पूत इनको तुम धात सुन विवेक मुख एहु उचारीहनोअरातिसहायतुमारी याअवसर इक मंत्री आयो । नामसुबुद्धि रूप मन भाय मंत्री आइ सुवन्दन कीनो । भूपविवेकसु आदर दीनो४ समाचार सभ भूप सुनायो । सुन मंत्री मनमें हरपायो देव करो तुम बेग उपाइ । जीते निखल अरातीजाइ दोहा। सभामाहि उरहरंप अति, अए विवेकसुराय ॥ जा पदकंज प्रतापते, निखल शोक मिटिजाइ ॥१६ सवैया। सूर्यसों तनु शोभतहै, भुजदंड मनो ब्रीड दवाए ॥ नैन सरोज मनोज हने, सुप्रताप दशदिशमे चमकाए॥ धरणीसम धैर्यहै उरमै, मुखमैघनश्रावणसों गरजाए ॥ भूप निहारसमेतसभा, कविसिंह गुलाव बडे हरपाए ॥४७॥ राजोवाच ॥ दोहा। हापापी महामोह शठ, हने महाजन तोहि ॥ मै तेंप्राण निकारहों, विष्णुभक्ति कहि मोहि ॥ १८ ॥ चौपाई। शांति अनंतमहिमा उजागर । चिदानंद अंमृत सुखसागर ॥ मगनभयो तामे इकवारा । वहुनरचहे न सुखसंसारा।।१९॥ || (१) विष्णुभक्तिका ॥ , १६) प्रबोदचंद्रोदय नाटक। [अं॰] न मूरख ना मम चीतधरें, अतिमोहमये सठ देह तपाए । हुवार अरंभ भये भगना, जग फेर करे पशु नाहि लजाए ॥. नमकालरनीरभ्रमे हरणा, इतते उत मृरख त्यों जगधाए । न मोहिप्रसादन आशमिटे, हतवज्रसमान घनोविललाए९८ कवित्त। लोभ अंधकार हग याविध विकारभजे, पांउ धन और कछु एतो अव पायोहै ॥ एतो थाप रापों एतो व्याजमै चलाऊं आगे, मे पिता पितामेपुन याविध बढायोहै। ऐसै धनध्यानकरे कालकी नसारपरे, आश सुपिसाची पुन याविध ग्रसायोहै ।। बिनही सन्तोप जग लहे धनो दोप पुन, गहे काल मूंड जाने लोक सुख पायोहै ॥ ९९ ॥ सवैया। न एक उपाइकरै नलहें, पुन एक वडे सुउपाइ मिलाए । मिलाइ धरे धनभीन विपे, विनभाग सुभोगविना विनसाए।। न्य वियोग उभै धनकोघर, आइगयो वहु चित्त तपाए। जगमाहि सन्तोपविना,कवि सिंहगुलावनको तृताए१००॥ सुधौल भये शिरके, सुजरा जगसापिन डंक लगाए। पिमृढ चहे धनको, सुख हेतु कवीनहि रामको ध्याए। .) संयोग वियोग ॥

[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (११७) वोधसुनीर अवोधजनी रज, लोभ भले जगमाहि मिटाए। सन्तोपरसामृत सिंधुविपे पुन, देडुबकी सुख पूरणपाए १०१॥ प्रतिहान्युवाच ॥ दोहा। एहु स्वामी भूपहै, चलो सुयाके पास ॥ जाय सन्तोप समीप पुन, जयजयकीन प्रकास १०२॥ इहु सन्तोप प्रणाम प्रभु, करे सुचरण तिहार ॥ भूपति को समीप इह, वैठो आउ हमार ॥ १०३॥ कवि रुवाच ॥ वरनो रूपसन्तोपको, वैठो सभामझार ।। सीतावर वर मैं चहों, वसो सुचित्तमझार ।। १०४॥ सवैया। चित गंभीर मनोनिधि नीर, शरीर महाद्यति सोहतहै । दृग सिंच सुधारस शांतिकरे, इहभांति चहूंदिश जोहतहे ॥ निज दोरदलै अरिमंडलको, भवमंडलमैं यश सोहतहै ।। कविसिंहगुलाव पिखे इहभांति, मनो सभके मन मोहतहै१०५ दोहा। बहुर सन्तोप वखान्यो, आज्ञा देहु मुमोहि ॥ भूपति कह्यो प्रसंग सभ, नाहि मुछानोतोहि ॥ १०६॥ वेगवनारस जाहुअब, लोभहनो बलधार ॥ कह्यो सन्तोप सुकरोअव, जो प्रभुकरोउचार॥१०७॥ (१) ज्ञानरूपी जलकरके अजान बहुललोभकर उत्पन्न रजोगुणको धोयकर ॥

अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१२७) करी वन्दना ठोरनीक निहारी॥ इही विष्णुभक्ति जनं मोक्षकारी ।। मिली शांतिसंगं कछ सोविचारे।। चलों यासमीपं कहों सर्वसारे ॥११॥ दोहा। विष्णुभक्ति अरु शांति पुन, वरीसभामहि आइ॥ विष्णुभक्तिको कहेगी, शांतिसुकछु सुनाइ ॥ १२ ॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। देवी तोकों मै पिखों, चिंताकुल उरमाहि ॥ विष्णुभक्ति मोको कहो, कौनहेतु मनमाहि ॥ १३॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ संवेया। वत्से सुवनारसमांहि महारण होवत मोहविवेकहिकेरो॥ जिहठीर सुधीर अनेकमरे सुमनो यमराजकरे सुनिवेरो॥ तहि मोहवलीसहि वालविवेक मिरे रणमैं बहुभांति घनेरो।। नहिजानत तांगति कीनभई इहकारणते उर कंपत मेरो ॥१४॥ दोहा। कह्यो शांतिकहचितहै, तोहिकृपा जयहोइ ।। तब विवेक जीते सही, म जानो यहलोइ॥ १५॥ (१) वृतान्त । (२) इंदिपनिग्रहका नाम शांति है। (३) जानताहंसरा दिपसिं रहित सत्यज्ञानानन्दाचारसत्यचेतनकू विश्पकरना नाअन्तः करणकी वृत्ति है ताकानाम विमुभान है।

(११८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४ सवैया। मानव देव सुदैतसमै, जिह जीतलए जगभीतर सारे ॥ तापसमंडल विप्र हने, बहुभांतिनके पद संगल डारे ॥ तां खललोभको में इहभांति, हनो पुन संगर भूमिमझारे । दाशरथीरघुवीरवलीजिह, भांतिसुरावणराक्षसंमारे ॥ १०८॥ चौपाई। ऐस वखान सन्तोप सुगयो। और एक नर आवत भयो । देव विजयहित मंगलजेते । सभमिलाइ लियाए तेते ॥१०९॥ दोहा। तरुण ज्योतिपि आइ कर, कहे महूरत सार। प्रस्थान भले अब कीजिये, विजयमहरत धार॥११०॥ भूपति पुरुप वरखान्यो, सेनापती बुलाइ । कहु प्रस्थान अब कीजिये, शिवसुतपाद मनाइ१११॥ कहो सारथी जाइ अब, संग्रामक रथ आन ॥ कृतमंगल रथ वेठकर, बंग मुकरें पयान ॥ ११२॥ सर्वया। भूपकि आयमु जाइकही, सरदारनसों नहवर लगाई ॥ मृत स्पंदन वंगअने स्थ, भूपचंट मुगणेश मनाई ।। ताहिसम सुरदार मनट, वाहनसन अशेष चलाई ॥ धुनिकुंदभकीनरजल्लभयो, मुपलेघनजानगरजेनभाई ११३ मत्तगयंदन कोर मजी, भ्रमरावलीगंडनमादि मुहाई ॥ जान मपक्ष चले गिरिपुंज संवेग बड़ी अपनी गजछाई ॥ ((या

१२६)
प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५
यद्यपि यो सुविचारकरों, पुन तदपि शोक विवेक दवाए।
दीरघ शोककी ज्वाल वढे, विधहा टर अंतरमोहिजलाए।।
यद्यपि करस्वभावहुते, मम भ्रात चले कुपंथनमाही ।।
काम सुक्रोध तथा मदमान मुए सगले रणमंडल माही॥
तदपि दुःख कटे उरको, अरु देह सुकावत में जगमाही ॥
शोक दवानलज्वाल लगी मम अंतरआत्मकाननमाही॥६॥
चौपाई
रकै मनकेमाहि विचार । श्रद्धा बहुरों कीन उचार ॥
वेष्णुभक्ति उर परमदयाल । एसो मोप्रति कह्यो विसाल॥७॥
विष्णुभक्ति रुवाच ॥
शंकरछन्द।
इहठौर संगर होइगो भट करेंगे कुलनास ॥
मैहेरसाकों पापनहि मनमोहि भयो उदास ।।
अव छोडिके वनारसी मैं सालग्रामसु जांउ॥
भगवानके स्थान वसकर काल ताहि वितांउ ॥८॥
दोहा।
श्रद्धे युध वृत्तांत सभ, करीनिवेदन आइ ॥
सो मै सगलो ताहिढिग, करों निवेदन जाइ ॥९॥
भुजंगप्रयातछन्द ।
तहांवेगश्रद्धासुनीकेसिधाई॥
पिखेतीरथं गंडकापावनाई॥
जहां आप देवो सदा वास धारे।
ससंसारसिंधुं जनं पारतारे॥१०॥

- . [अं०१.] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (११९) कांचनके झुलवार लसें, गजश्याम भली उपमा मनआई॥ दामनिपुंज सुसंगमनो, निस भादवकी घटहैं उमडाई ११४॥ श्वेतवरूथ सुऊच बडे, धनसारदसें रथपुंज सुहाए । वेग प्रभंजन जीत तजे, इहभांति तुरंगम स्यन्दन लाए ॥ ते रणरंगमही अति धावत, ता उपमा कवि कौन बताए । धावनमै मन एक बली, कविसिंहगुलाब सुहेर लजाए११६|| सवैया। पेदलके बहु पुंज चले, रणमै सभके उमगे मनहै ॥ फैटनमै यमदाड कसी, सणखोलसंजोह सजे तनहै ।। कुंत मुदीरवहै करमै सुगुलाव कळू उपमा भनहे ॥ जान दिगंतर भूरखिरे, यह नीलसरो जनके वनहें॥ ११६॥ कोटन कोट मुवीर वली पुन, मांहि तुरंग अरूढ भयेहै ॥ मानहु भूमिनपाइ छुहे, नभमैं हरियाहन कोटिधएहै ॥ थर थल्लभयो दिगमंडलमै, कर वीजुछटा करवार लएहे ॥ यों चतुरंगन सैन चली, सभके तनम अति रूप नएहे ११७ मध्यविराजत भूपतिको रथ, मानहु मेरुइसो चमकाए ॥ वाजि सुरागर बत भूमि, मुले रथमाहि अकाश उडाए । योधुनि होवतह स्थकी जनु, खीरनिधी हरि फेर मथाए । धरिकीपुंज अकाशचढे, पथऊर्ध्वहे रवि मंडल छाए।११८॥ (१) मूल । (२) उग्वाह । (३) भरदार बादल में । (५)प्यादोंके । (५) परिवनमें कयरी वमह । (६)ोरसहित फवन । (७)नेना। (८)हि मापोंके अंतर ।।

. प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१२७) करी वन्दना ठौरनीके निहारी ।। इद्दी विष्णुभक्ति जनं मोक्षकारी॥ मिली शांतिसंग कछू सोविचारे॥ चलों यासमीपं कहों सर्वसारे ॥११॥ दोहा। विष्णुभक्ति अरु शांति पुन, वरीसभामहि आइ ।। विष्णुभक्तिको कहेगी, शांतिसुकछु सुनाइ ॥ ३२ ॥ शांति रुवाच ॥ दोहा । देवी तोकों मै पिखों, चिंताकुल उरमाहि ।। विष्णुभक्ति मोको कहो, कौनहेतु मनमाहि ॥ १३॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ सवैया। वत्से सुवनारसमांहि महारण होवत मोहविवेकहिकेरो॥ जिहठौर सुवीर अनेकमरे सुमनो यमराजकरे सुनिवेरो॥ तहि मोहवलीसहि वालविवेक भिरे रणमैं बहुभांति घनेरो॥ नहिजानत तांगति कौनभई इहकारणते उर कंपत मेरो॥१४॥ दोहा। कह्यो शांतिकहचितहे, तोहिकृपा जयहोइ॥ तब विवेक जीते सही, मे जानो यहलोइ॥१५॥ (१) वृतान्त । (२) इंद्रियनिग्रहका नाम शांति है। (३) नडाऽनृताहंकारा दिकोंसे रहित सत्यज्ञानानन्दाऽकारसत्यश्चेतनहुं विषयकरनेवाली नाअन्तः करणको वृत्ति है ताफानाम विष्णुभक्ति है ॥

सत उवाच ॥ कवित्त । राजनके राई मुनजीकआई एहु पिखो, शिवकी बनारस मुदेत यों दिखाई है ॥ नीरयंत्रधार मुफुहारे जहँ अपार छुटे, पावनी वनारसकी भूमि सुसुहाई है ।। सौधनके शीश जन रचे जगदीश तह, कांचन बनाइ लिपलेप चमकाई है। जाहिकी अपार छवि हेर छवि छीनभई, कहि मुगुलावचन्द किरणन लजाईहै ॥ ११९॥ सवैया । धौल पिखो ग्रह ऊच वने, जनुसारदमेघनपुंज सुहाए । वीच पताक सुऊच लसे, सुमनो तडतागनकै चमकाए ॥ है मुकलाकृत वारजपुंज, सुगुंजततां मधुपावलि आए॥ गंधकरें उदगार मुखो, मकरंदभयो झडसुर छपाए ॥ १२०॥ फूल खिरे सुचुफेर पिखो, यह पावन भूमिसमीप सुहाई ॥ एहु पिखो घन छाइ मही, तरुपुंज किधो घटहें उमडाई ॥ मारुत जाइ मुठौरविपे, जन पूजत शंभुप्रेम वढाई ॥ गाँवत फूल चढावतहे सुनिवावत वन्दतशीश निवाई।।१२१॥ १) मन्दिरोंके शिखर । (२) सुफेद । (३) मुक्तामाणिके किये। (५) वायुफे न्धकर जो वृक्षोंका शब्द है तिसशब्दकर वायु मानो गावत कहिये शिवका जाप है और अपने आपसे जो वृक्षासें फूल गिरतेहैं सोई मानो शिवनीको वायु फूल वताहै औ निवायत कहिये वृक्षोंको अपने वटों वायु भूमिमें सर्ग करावेहै तिम नेकर मानो शिवनाको वायु वन्दना करहै ।।

[अं० प्रबोधचंद्रोदय नाटक। दोहा। बद्यपि वत्से ऐवहै, संतनको कल्यान ॥ नापतह अनुमानते, तदपि संक महान ॥ १६॥ अवलो श्रद्धा नहिअई, समाचारले पाहि ॥ यांते पुत्री मनविपे, वड़ो संदेह सुआहि ॥ १७॥ ताहिसमे श्रद्धा अई, लागी करन उचार ॥ विष्णुभक्ति मोकोमिलो, पुत्री भुजापसार ॥ १८॥ विष्णुभक्ति श्रद्धा कह्यो, सुखसों आई माइ । श्रद्धा कह्यो प्रसाद तब, कह कलेश जनपाइ ॥ १९॥ को शांति कर जोरके, अंब नमो पद थार ।। श्रद्धा कह्यो सुगलमिलो, पुत्री भुजापसार ॥२०॥ शांति मिली गलमें तवे, भयो अनंदनृतांत ॥ विष्णुभक्ति वोली तब, श्रद्धे कहहु वृतांत ।। २१॥ देवीतेंप्रतिकूलको, जोकछु लायकहोइ ।। सोवृतांत उहांभयो, और नजानो कोइ ॥२२॥ विष्णुभक्ति पुन तिहकयो, मोकोकाहि विसतार ।। गुलावसिंह श्रद्धा तहा, लागी करन उचार ॥ २३ ॥ श्रद्धावाय॥ सर्वया। भागवती सुनतजवही, तह केशवमंदरते निकसाई ॥ प्रातभयो पुन ताहिमम, रश्मीरविकोमलजोनिसराई। दुंदभ भेरि निशानबजे, सुप्रलयवनको धुनि जाहि सनाई। मसिंहसमानगजे, वर तीमुखकातरकेपियगई ।।२।।

[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१२१) आरंद्रगंगको नीर करे पुन फूलपराग सुगंध चढाए । गुंजत वीच सुभ्रंग फिरें, मिसताहि मनो शिवगीत सुनाए ।। तरुलंबलता अंति नाचतहैं, सुमनोभुजदंडनभाव दिखाए ।। सारस हंस चकोर धुनी मिस, वायुमनो शिवपाठ सुनाए १२२॥ दोहा। पिख अनंद भूपति भयो, लागो करन उचार ॥ यह शिवनगरी पावनी, मुक्तिकरे संसार ॥ १२३॥ सवैया। तम हॉरद दूरकरे क्षणमै, पुन आनंद आत्ममै उपजाए । विधुमोलपुरीमन अँचतहै, सुमनो पदै मोक्षहि ज्ञान लजाए। जिह ठौरविपे यह गंगभले, अति वनभई इहभांति सुहाए। जन हासकरे यह चन्दकला सुकिधोंधर मोतिनहार सुपाए १२४ सोरठा। स्थते उतर सुसूत, दुई प्रकरमाभूपकी ।। पिख विवेक पुरुहूत, दीरघ आयुविसालमति ॥ १२॥ सवैया। गंगक तीर सुधीर महामति, मंदरऊच सुमेर सुहाए । आदिनारायण केशवको, यह पावन थान महात्म गाए । भूप निहार अनंदभयो, मुखभीतरते यह वाक अलाए । क्षेत्रकुआत्म एहुसुनो, सुपुराविद पंडित मोहि वताए।।१२६|| (१) गंगाकेनीरसेंमानकरके । (२) तालस्वरतानादि। (३)स्तोत्रपाठ अन्य सुगम है। (४) हृदयगतनम । (५) काशी मानो मोक्षका पद कहिये कारण है। (६) क्षेत्रमहिमाके जाननेवाले व्यासादिकनि पूर्व हमको क्षेत्राऽभिमानिदेवता केशव भगवान् कहाहै ॥

'०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१२९) 7 वाजिनऔरथनेमिदली, धरचूरणधूरअकाशउडाई ॥ रजान विरंचिसुलोकचली, नहि जानपरे रविलीनछपाई॥ [ज कुंभसंधूर सुभूर सजे, तिनकी इहभांति सुकोरेवनाई ।। जनसांझसमैदिगपञ्चमते, यहलालघटाउमडीअधिकाई २५॥ कवित्त। अपनी पराई मिल आई सैन दोऊजव, गजैवीर ऐसे जन प्रलयघन आएहैं। भेदके सुवेलमानो लोकनके सुखेदहित, पश्चमसु पूर्वके सिंधु उछलाएहैं। राजनकराय सुविवेक योंठराइ मन, दरसननैयायिकको दूतकै पठाएहैं। जैसे रामचन्दसुतवालिके पठाए तिन, जाइ महामोहकों सुवाक योसुनाएहैं ॥२६॥ सवैया। तजके हरिमंदिरसंतरिदे, सरितातट पावनकानन सारे ॥ तुम जाइ मलेच्छनमाहि वसो,इहभांति सुरायविवेक उचारे॥ नहि जो पुन धार कृपाणहते सभअंग गिरेंधरमाहि तुमारे। तव जंबुक श्रोणत पानकरें पलं गीझरेरणभूमिमझारे॥२७॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी बलिहार ।। तिहते वहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥२८॥ (१) पंक्ति । (२) कोनारे। (३) गात्र। (४) मांस ॥

(१२२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
दोहा।
याहिौर तज देहको, मिले परात्मजाइ॥
पुनवंत जन लोकमैं, लहैं मरण इह आइ ॥ १२५
सृत उवाच॥
दोहा।
कामक्रोध पुन लोभलौ, भूपति हमे निहार ॥
देखो दूर पलातहैं, ज्योंकातर असिधार ।। १
भूपति को प्रसाद हरि, सर्वसिदि जगहोइ ।।
कर प्रवेश भगवानके, मैं वन्दो पद दोइ ॥ १.
स्थते उतर प्रवेशकर, भूपति भले निहार ।।
भगवनभक्त कलेशहर, जयजय सदा तिहार
विवेक उवाच॥
भुजंगप्रयात छन्द।
सुग्चक्रचूडामणीदीपजागे॥
करे आग्ती पादकंजं सभागे।
नखं जोतिशोभा लसे हेमपीठे ॥
मनो कोटिखद्योत चांदे सुदीठे ।।
भवंद्वैतसंभ्रांतिसंतानिताए।
तुमे दैत मेटो करो बोधछाए
समामंडलो धार संभार पीने
लगी दाड कोटी गिरी नाकीन
प्र। (२) मुरमादर। (३)
निमगार

प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] श्रद्धोवाच । सवैया। न मोहमहीप सुन्योजवही, विकुटी कुटीखलताहि चढाई॥ ति क्रूर सुक्रोध महानभयो, हगलालकरे इहवात अलाई ॥ विवेककरे दुष्टात्मताफल, याहिपिखे इमदूत सुनाई। गहेत पखंडको आगमजो, खल मोह वली तबदीनपठाई२९ छप्पयछन्द। याअवसर पुन आपनी सैन अगारी आई। श्रीसरस्वतीपद्महाथशशिकांतसुहाई ॥ वेद वेदांग पुराण धर्म पुन शास्त्र सुजेते ॥ भारतली इतिहास संगमिल आए तेते ॥ खतां प्रताप अरिसैनवल गयो निखल सकुचाइ अति ।। नज्यों अतिपावन धारपिख दिव्यधुनी जग पापगति॥३०॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ दोहा। मात प्यारी शशीमुखी, मृगननी वलिहार॥ तिसते वहुरों क्याभयो, मोको करो उचार ॥३१॥ श्रद्धोवाच॥ तब देवी आगमजिते, वणवसूर्यआदि । गये सरस्वतीपास सभ, पूर शंपधुनि नाद ॥ ३२॥ (१) ऋग्, साम, यनु, अयरंग, ये पारवेद ॥ आयुर्वेद, धनु, गान्धी, सपनवेद, ये चार टरबेद ॥ शिक्षा, फस, प्यारन, निगन, छन्दी, ज्योता, पेपर के अंग है ॥ नारदपबराब, स्दयामरादिक, से आगम हैं ।। मत्स्यमापार मिति में धर्ममाण ॥

[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१२३) वलीयागमाही करे रूप भारी ॥ पदोंसाथ मापी त्रिलोकी सुसारी ।। भुजादंडआगे गिरं छत्रलीने ॥ वलारातिको मान कीनो सुखीने ॥ १३३॥ सतगोकुलं त्राणकारी दयाले। टरीअंववरपा करे गोपपाले ॥ सुरारातिभामासुसुंधूरशीशं ॥ सुसंध्याभ्रकांतं हसे देवईशं ॥ १३४॥ तिने दूरकारी मनो मारतंडं ॥ कहे कोविदा ईशतेदौरदंडं ॥ सुदैत्येंद्रवख्यातटी पाटनारी॥ नखश्रेणकानाथतेरी उचारी ॥ १३५॥ त्रिलोकीरिपूकैटभो कंठकाठं॥ कटे चक्रधारा करे भूमिमोठं । फुरे ज्योतिरुल्का भुजादामतेजं ॥ करेखीरशैनं सजे शेपसेजं ॥ १३६॥ सदा शंभुप्यारे महातेजधारी॥ भुजादंडसंभ्रांतिशैलं मुरारी॥ मथे खीरसिंधं भ्रमे वाहुपीने ॥ भयेलांछनं ताहिवीचनवीने ॥ १३७॥ (१) इंद्र। (२) हिरण्यकशिपु। (६) कैटभदैत्यका स्थूल कंठ । (४) भूमिको एक रस किया। (५) मन्चलतन्योति । (६) भुनारूप दण्डेकर भरमतानो है मन्दराचल। (७)चिह्न ।

अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१३१) विष्णुभक्ति रुवाच ॥ मात प्यारी शशीमुखी, मृगनैनी बलिहार ॥ तिसते वहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥३३॥ श्रद्धोवाच ॥ कवित्त । सांख्य औ न्याय सुकणादकृत भाष्य पुन, आगम अनेक सुमीमांसा संगलियाईहै ॥ युक्ति अपार मानो भुजाही हजारफुरें, दिशाको मिटाइतम जंगहुलसाईहे ॥ धर्मेंदुआनन सुवेदत्रयी संग मनो, तीननैनहूं सोंकात्यायनी सुहाईहै ॥ सरस्वतीके आगे प्रगटानी सुसहायइत, विजुरी अनेकजनु आई चमकाईहै ॥३४ ॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। स्वभावविरोधी आगम, तरक तथा पुन जान ।। मिले कथं रणहेत सभ, माता करो बखान ॥३५॥ श्रद्धोवाच ॥ सोनवंशते जेभये, लरे परस्परं सोइ ॥ जो परसों पुन रणपरे, संगति ताकी होइ ॥३६॥ तिमहम वेदप्रसूत सभ,कछु विरोध निजमाहि॥ वेदसुरक्षणहेत पुन, सभ इकत्र होइजाहि ॥ ३७॥ (१) ये सारे भीमांसाके विशेषण हैं। (२) धर्म वेदाऽर्थसोई भया इन्दु (चन्द्रमा) तदत है मुस निसका । (३) तीनवेद हैं नेत्रनिसके। (४) यथा कुरुपांडव.॥

नावपासनाटका
[अ०.४
.
सुमोतीफलोदारहारं सुहाए॥
प्रभा कंठमध्ये सकेको बताए ।
महामोहछेदी दिजे वोधनाथं ॥
नमो देवपादं दोऊजोर हाथं ॥ १३८॥
दोहा
आदिनारायण दीनवर, भये प्रसन्न उदार ॥
वोध वली सुत होइगो, भूपति भौन तिहार ॥ १३९ ॥
मंदरनिकस विवेक पुन, पिख इम कीन प्रकास ॥
यह नीको स्थान है, ईहा करेंनिवास ॥१४॥
कवि रुवाच ॥
दोहा।
सभासमेत सुएहु जव, पेखी भूपतिरीत ॥
कीरतिवरमा देव तव, भयो इकागर चीत ॥ १११॥
उपजेगो वैराग मन, आइ सस्वती दयाल ।
वोधकरे मनको भले, हेहै कथा विशाल ॥ १४२॥
इति श्रीमन्मानसिंह चरण शिक्षित गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदय नाट
चतुर्थोङ्कः समातः ॥
इति श्रीमदुदासीनवर्ण्य परमानंद शिम्य गुम्मसादविरचिता बोधचंद्रोदय नाटक
चतुर्थीऽकटिप्पणिका समामा ॥ ४ ॥

(१३२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक । [अं० नास्तिकपक्ष निषेधहित, संगतभई हमार ॥ आगममाहि विरोधनहि, कीनो तत्त्वविचार ॥३८ शांतिअनंत सुज्योतिजो, अद्वैअजवल एक ॥ मायाके वहु संगमिल, भासे रूप अनेक ॥ ३९ ॥ नानाआगमपंथ बहु,एक जनावत ईश ॥ ज्यों वहुनदीप्रवाह जल, मिले जाइ वारीश ॥४०॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी बलिहार ॥ तिसते वहुरों क्याभयो, मोको करो उचार ॥४३॥ श्रद्धोवाच ।। सवैया। तव युध आरंभ भयो दुईते, रण आपसमै करि कुंभमिलाए सुतुरंगमसंग तुरंग जुरे, रथसंग रथी सुप्रहार लगाए । सरपुंज पदाति चलाइ इसे, जनतोयद रोपभरे बरपाए । अतियुध भयानक भूरभयो, डर कातरवीर महांहरपाए।।४२ तह श्रोणतकीसुभई तटनी, बहुभूत पिसाच सुकंक सुहाए। सरदार तुरंग मतंग वडे, जगदीश मनो तन सेल बनाए । सिर छत्र सुहंससमान फिरे, सितपागसुफेनमनो चमकाए॥ अतिवीर वली तह नभये, पिख कातरतांउरमैदहलाए४३) चौपाई। याविध दारुण भयो संग्राम । पखंडागम इम कीन सुकाम ।। लोकायतको तंत्र सुजोई। कीनो सेन अगारी सोई ॥४॥ परस्परं दोनोदल जुटे । मुए लोकायत प्राण सुछुटे । चहर पखंडागमहे जोई। मये निर्मूल सगल तिहसोई४५|| ॐ श्रीगणेशाय नमः। अथ पञ्चमोऽङ्कप्रारंभः ॥५॥ दोहा। पदप्रसाद रघुनाथके, लहे वोध मतिमान । हने मोहवलवानको, तिह वन्दो भगवान ॥१॥ कीरतिवरमाभूपके, देखत सभामझार ॥ श्रद्धा कीन प्रवेश तव, लागी करन उचार ॥२॥ श्रद्धावाच ॥ संवैया। प्रसिद्ध सुपंथ अहे जगमे, यह जातिकुवैर बडो दुःखदाई। क्रोध दवानलते जबढी, क्षणमै सगली कुलजाहि पपाई। ज्यों बनवांससंघ रसनते, पुनपावककाननखेहरलाई ॥ तिमहींग्रह वाधवक्रोधजले, दुखमरभयो दृगतेजलजाई॥३॥ दुःखदेखनअंकलिखेविधिभाल,सुआजपिखेनदिजातमिटाए मम सोदरवन्धु हते रणम, तन भृमिरुले किहटीर सिधाए। दुरवारण दारुण शोक महां, अतिपावकमें उर भूर जलाए।। सुविवेककी मेह अनेक परे,क्षणपावकशोकनलाटबुझाए| सागर शैल मही सरिता, सभअंतक अंतसमे सुखपाए । तो त्रिणजीरणसें तनुम, जन कोविदको भवमै पत्याए। (१)षितपत्रा आरमारिल निमपसनानमा प्रबोधचंद्रोदय नाटक। मसिद्धांत कपालक जोई । सत्य आगम पिख भाग्यो सोई॥ त्यआगम इहुआइ वखानी।सुनो ताहिकीसाची वानी॥४६॥ दभवभेपज करें वखान । ते मतिमंद सुमहा अजान ॥ नुस्मृतिलौ आगम जेते । सुने नमूढन काननतेते॥४७॥ तथौचस्मृतिः-सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णी सुरां पिवेत् । तेन निर्दग्ध कायस्तु मुच्यते किल्विपात्ततः॥१॥ चौपाई। नत्य आगम प्रवाह वहाए । सौगत काशीछोडि पलाए। रोसीक औ सिंधुगंधारे । अंग वंग पुन मगध पधारे ४८॥ पलेच्छपाय कलिंगादिक जेई। तामै जाइ बसे पुन तेई ॥ और पखंड दिगंवर जेते गये पंचालदेशको तेते ॥४९॥ गलव और अभीर अनिरता । सागर मारूदेश त्रिगरता ॥ वेचरे तामै गूढ स्वभाए। मंदरसेवक द्वारवनाए ॥५०॥ नास्तकतर्क अहै पुन जेती । दलीमीमांसा पाइन तेती॥ नां अनुपथ मै वही सिद्धाई । जहां पखंड दुरे जगजाई५१॥ विष्णुभक्तिरुवाच॥ दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी वलिहार ॥ तिसतें बहुरो क्याभयो, मोको करो उचार॥५२॥ (१) मनुस्मृति, अर्थ यहः-दिनकहिये बाह्मण रागसें वा प्रमादसें सुरापानकरके अमिवर्णवाली सुराका पानकरे तिस सुरापानकरके दग्ध शरीर हुआ तिसपापसें छुटिजावेहै। (२)ये सर्वदेशोंके नामहे ॥

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१२६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
यद्यपि यों सुविचारकरों, पुन तदपि शोक विवेक दवाए।
दीरघ शोककी ज्याल बढे, विधहा उर अंतर मोहि जलाए।
यद्यपि करस्वभावहुते, मम भ्रात चले कुपंथनमाही॥
काम सुक्रोध तथा मदमान मुए सगले रणमंडल माही॥
तदपि दुःख कटे उरको, अरु देह सुकावत मैं जगमाही ।।
शोक दवानलज्वाल लगी मम अंतरआत्मकाननमाही ॥६॥
चौपाई
करकै मनकेमाहि विचार । श्रद्धा बहुरों कीन उचार ॥
विष्णुभक्ति उर परमदयाल । एसो मोप्रति कह्यो विसाल॥७॥
विष्णुभक्ति रुवाच ॥
शंकरछन्द।
इहठौर संगर होइगो भट करेंगे कुलनास ॥
मैहरसाकों पापनहि मनमोहि भयो उदास ॥
अब छोडिके वनारसी मैं सालग्रामसु जांउ॥
भगवानके स्थान वसकर काल ताहि वितांउ ॥८॥
दोहा।
श्रद्धे युध वृरतांत सभ, करीनिवेदन आइ ॥
सो मै सगलो ताहिढिग, करों निवेदन जाइ ॥९॥
भुजंगप्रयातछन्द।
तहांवेगश्रद्धासुनीकेसिधाई॥
पिखेतीरथं गंडकापावनाई॥
जहाँ आप देवो सदा वास धारे ।।
सुसंसारसिंधं जनं पारतारे॥१०॥

१३४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५१ श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। हुरों वस्तुविचार उदारे । काम वली रणभीतर मारे ॥ मा क्रोधगहिके सप छान्यो । हिंसादिकको मूल उखान्यो ६३ न्तोपलोभकोई उरण मान्यो।ज्यों रघुपति दशकंठ संहान्यो।। ष्णा चोरी मिथ्यावैन । परिग्रहसहित उडाएगैन ॥५४॥ अनसूया मत्सर जिती, नीके शंखवजाइ॥ परउत्कपहिभावना, मदको दीन खपाइ ॥१५॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ दोहा। भलाभया आरिंगन मूए, संगरभूमिमझार ॥ महामोहवृतांतजो, मोको करो उचार ॥५६॥ श्रद्धोवाच ।। दोहा । योगेउपसरगनसंग पुन, महामोह खलजोइ । लीनभयो कहि कंदरे, जापतनाही सोइ ॥ ७॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ चौपाई। हि अनरथहि कारण जोई। रहियो सेपयह भली नहोई ॥ इस विवेकी जोसुरज्ञान । जोचाहे अपनी कल्यान९८॥ (२) देवनानी॥ सागि [अं॰] प्रवोधचंद्रोदय नाटक । (१३५) दोहा। अग्नि ऋण अरु शत्रुको, देवे मूल उपार ।। रहे सेप काहुसमै, बहुर देहि दुखभार ॥५९ ॥ चौपाई। मनको समाचार है जोई। श्रद्धा कहो प्रगट मोहि सोई॥ श्रद्धा लागी करन वखान । विष्णुभक्ति सुनिये देकान ६०॥ मूपपूत अरु पोते सारे । भयो दूखमन चीतमझारे । शोकवेगमन भूरि वहायो।जीवन त्यागसुतिहठहिरायो६१ विष्णुभक्ति मुखमै मुसकानी । वहुरों याविध कीन वखानी।। जो मनमरे सुजगतमझारे । तो सभ कार्य होहि हमारे ६२॥ | पुरुप सनातनहै जगजोई। परमानंद सुपावे सोई॥ परदुष्टात्म मनहै जोई । जीवनत्याग कहांतिन होई ६३ श्रद्धा बहुर सुकीन बखान । विष्णुभक्तिमें भाख्यो मान ।। वोध उदेहित तूं दृढहोई । वेगमरे मनरहे नकोई ॥६॥ विष्णुभक्ति कर अंगीकार । बहुरोलागी करन उचार ।। वैरागउत्पतिहेत योंकीजे । व्याससरस्वती तहां पठीजे६५ दोहा। भई सुअंतरध्यान वैहु, ऐसे मुखो अलाइ ॥ मनसंकल्पसु दोन पुन, वरे सभामहि आइ ॥६६॥ (१) सो शास्त्रमेंभी कहाहैः-अत्यादरपरो विद्वानोहमानः स्थिरां श्रियम् । अनेः शेष ऋणाच्छेषं शत्रोः शेष नशेषयेत् ।। अर्थयहः-अत्यंत आदरयुक्त विद्वान् निश्चलसं- पत्ति• इच्छाकरताहुआ अग्निकेशेषकू ऋणकेशेष शत्रुकेशेषा अवशेष नछोडे अर्थात तिसतिस समयमें दूरकरे । (२.) व्यासमगीतवाणी । (३) विष्णुभक्ति तथा श्रद्धा ॥

[अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१४५) चौपाई। लोल दोले सम भोग सुहाए । जरा प्रणाम भये दुखदाए । विपदाको यह गेह पछानो । धनकोनास परमदुखमानो१२९ जितेलोक सभदेवहि शोक । अवला अहे अनरथन ओक ॥ याहि घोरसंकटपथमाही । हाहाजीव अज्ञलपटाही॥१३०॥ योभापत वैराग सुआयो । सारस्वती तव वैन अलायो॥ हेसुत आयों यह वैराग । आदरकरो सुतिह वडभाग १३१ कहांपूत मन एहु उचायो। वैरागसमीप सुतिह अनुसान्यो। तातचरण अव तें दरसाए । यह वैरागसु लागत पाए१३२॥ मन उवाच ॥ जन्मसमे तब दरसन पाए । फेर पूतकहु कहां सिद्धाए । मेरे कंठ मिलो मुत पिआरे । मिले वैराग सुभुजापसारे १३३ तव मन याविध बैन अलायो । तै पेखत मम शोक पलायो॥ वैराग बहुर मनको योंकहै । कहा शोकको अवसर अहै१३४ ज्यों पथभीतर पथक मिलाए । समापाइ पुन वीछुरजाए। ज्योत्रिणकाठसु नदीप्रवाहा । कबीमिले कबहोहि दुराहा१३५ ज्यों जलबूंद मेघकी धारा । यथा जहाजसु सिंधुमझारा॥ पिता मात सुत बंधु सुदारा । मिले विछुरेयाजगतमझारा१३६ याको होइ वियोग सुजवहीं । शोकनलए विवेकी तवहीं ।। ईहा जगतकी गतिहै जोई। कोटनमाहि लखै नर कोई१३७ पूर्वहुतो तात नर जोई । मरकर भयो पूत सुत सोई॥ पूत तातहित पिंड कराए । तात पूत कहिगो दखिलाए१३८ (१) होला वा हिंडोला । (२) राही । (३)संयोगनोहे सो वियोगनन्यही है ।। १०

(१३६)
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
[अं०५]
संवेया।
मन नननते अतिनीर बहे, पुन मुंड धुने मुख एहु अलाई॥
कहि पूत गए तज मोहि ईहां, इकवारसुदेवहु फेर दिखाई ॥
कहि राग गयो कहि उपगयो, मदमानमुए कछुसारनपाई॥
मम अंगनमें दुःखआगिवले, इकबारमिलो गलभीतरआई६७
इहठोरनवृद्धजहाजकोऊ मम, शोकसमुंद्रहित गहि तारे ॥
सुअसूयतेआदिसभे दुहिता, किहीरगई नअहे कछुसारे॥
तृष्णादिकजे मुतनारिहुती, किहभांतिमुई सभलोकमझारे॥
बिनभागसमें दुखभूरभये, इकवारमुए सववन्धु हमारे॥६८॥
अव व्याकुल मेउर भूरभयो, विप पावक जानलगी उर आए।
अति दूखभयो तनुछीदतहै, दुःखशोकदवानल देह जलाए ।
मम आज विवेक सुलोपभयो,सुत मोह महाउरमाहि बढाए॥
अव जीवनमें जग दूरभयो, तनतापवडो उरमोहि तपाए ६९
दोहा।
यों नृपसभामझार मन, भई मूरछा भार ॥
आइसंकल्प सुतिहकह्यो, राजन देह संभार ॥ ७० ॥
सावधानमन होइ पुन, वोल्यो यो मुखमाहि ॥
कहां प्रवृति सुनारि मम, देत दिलासा नाहि ॥ ७१ ॥
सुन संकल्प दृग नीर अति, लागो करन उचार ॥
देवप्रवृतिसुकहा अब, ढूढों जगतमझार ॥७२॥
कुटंब शोकदवदाहिसों, दग्धरिदे अतिहोइ ॥
वह उडी तनकी सुनो, मुई जगतमै सोइ ॥७३॥

दोहा। तोहि पिता महिं मुएको, भये वरप सुत तीन ॥ हम भूमंडलमै वसे, बहु भये अमरपुर लोन ॥ १३९ ॥ चौपाई। चहूं मर पर लोक सिधाए । कवहूं ग्रह भीतर उपजाए । नगतिजाने मूरख रोवै । विवेकी शोक नरंचक जोवै१४० से वचन सुने मन जवहीं। भयो अनंद चीतमें तवहीं ॥ रस्वती जैसे यह कहैं । सत्य वात एवंही अहै ॥ १४॥ वमैनीके लयो निहार। जूठो अहै सगल संसार ॥ चजोवन नारी है जेई । मधुकरसहित खिरे दुमतेई१४२॥ ल मालती वहुत सुगंध । पसरे जह तह पौन सनबंध । गतृष्णासायर जल जैसे । भयो विवेक पिखोअब तेसै१४३ हुर सरस्वती करुणा वान । मन प्रति लागी करन वखान ॥ यपि यों तब भयो सुभान । तदपि वत्स कह्यो मममान १४४ गरही एक महूरत वीर। विनआश्रम नहोवै धीर ।। ते अहे निवृतिसुजोई। धर्मचारणी कीजे सोई॥११॥ से मंगलकरइ सनान । फूलमाल सिरऊपर ठान ॥ बले कपूरकुंकमपट भीने । वाजे संग अनेक सुलीने १४६॥ याही तव प्रवृति सुनारि । त्योंनिवृति कर अंगीकारि ॥ शपासूत्र अव तजो विसाल । होइ दिगंबरक मृगछाल १४७॥ (१) तथा न ब्रह्मोपनिषच्युतिः ॥ सशिसंवपनं कृत्वा बहिः सूझ स्यनेधः ॥ यह- करं परं ब्रह्म तत्मममिति धारयेत् ॥ १ ॥ सूचनात्मूत्रमित्याहुः सूर्य नाम परं पदम् । तत्सून विदितं येन स विमो वेदपारगः ॥ २॥ अर्थ यह सन्यासेषु बुद्धिमानपुरम [अं०६] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (१३७) मन उवाच ॥ मन उवाच॥ चौपाई। हाप्यारी किह ठौर सिधाई । भयो दूख मोको अधिकाई ॥ स्वप्नेभी मोहिसंग पियारी । हमेनहोती रंचन्यारी ।। ७४ ।। आज भागविन दूर सिधाई । जीवनमोहि भयो दुःखदाई ।। तदपि जीवो पापी भार । गिरियो मूरछा धरनमझार ७५ संकल्प उवाच॥ राजन सावधान अतिहूजे । होनीमाहि विपादन कीजे ॥ भयो स्वस्तमनदेह संभार। कहे संकल्पहको सुउचार ।। ७६॥ चौपाई। सुत अरु दारवियोगसुजोई। जाहिभयो दुःख जानत सोई।। अव जीवनकी चाहनमोकों। मरोंवेग इम भापत तोकों॥७७॥ दोहा। चिता वनावो वेग अव, करोंसु अनल प्रवेश ॥ शोक अनल दुःख दाहजो, मेटोसकलकलेश ॥ ७८॥ याविध व्याकुलमनभयो, पायो बहुत कलेश ।। तवै सरस्वती आइ पुन, कीनो सभाप्रवेश ॥ ७९ ॥ सवैया। श्वेतदुकूल परे तनमे, मुख सारदचन्दसमान सुहाए । कर एकविपे सभ आगमहे, पुन एकविपे मणिमाल फिराए ॥ पुन दोनविपे अभेवरदान, महाभुजसुंदर चार सुहाए । वैन मयूपन आत्मको, तम दूरकरे उरताप मिटाए ।।८० ॥

अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१४७) संतनसंग सो भले विचार । वसो इकांतसु विपिनमझार ॥ वन नवनीलसरोज सुलोचन । गहोनिवृतिहोयभवमोचन१४८ लाजसहित मन करे उचार । देवी कहहुसु अंगीकार ॥ बहुर सरस्वति करे अलाप । मनके निखल मिटावे ताप१४९ दोहा। समदम सतसंतोपली, उपजे पूत तुम्हार ।। सेवा तेरी वैकरे, सगलेदुःख निवार ॥ १९ ॥ चौपाई। | यम अरु नेमआदिकहै जेते । तोहि वजीर होहिंगे तेते ॥ ब्रह्मचर्य जो अहे महान । मंत्र कहेगो तेंढिगआन१५१॥ दोहा। विवेक उपनिपत संगमिल, यौवराज सुखसार । तोहिअनुग्रहते लहे, शांतिपूत उरधार ॥ १५२॥ मैत्रीआदिक चार यह, वहिनि मनोमलहार॥ विष्णुभक्ति तोपै पठी, आदर इने सुधार ॥ १५३ ॥ सरस्वती आय सुजो करो, धरीशीश मम सोइ । योंकहि शीश झुकाइयो, गहे चरन कर दोइ ॥ १५॥ आयुप मत सादरपिखो, यह संगत सुखकार ॥ यम नेम आसन सहित, प्राणायाम सुधार ॥ १५५ ॥ -शिखासहित मुंडन करवायके बाहरले सूत्रका त्याग करे जो अक्षर परब्रह्मरूपि सूत्र है तिस सूत्रको धारणकरे काहेत; सूचनसे परब्रह्महीं सूत्रहै ऐसे कहते इसलीये सूत्रनाम परम पदका है सो सूत्र नान्याहै निमने ऐसा जो विभ सो वेदपारगामि होताहै अर्थात् वेदके तात्पर्य को जाननेवाला होताहै ॥ १ ॥ २ ॥ युवरानकर्मका नाम यौवरानहै सो युवरानकर्म यहहै अपने नातेही राज्याभिोकको देना ॥ , - सरस्वती उवाच॥ चौपाई। विष्णुभक्ति मोको सुपठायो । सखी सरस्वती मन दुख पायो । संतानवियोगभयोदुःखभारी । करोजाइ तिह वोध उदारी॥८॥ मनको जिहविध होई वैराग । तैसो यतनकरो वडभाग ।। सोमै अव मनकी ढिगजावों। तहाँजाइ वैरागउ पावों ।। ८२ ॥ गई सरस्वतीमनढिगआकुल। कह्यो पूत क्यों भयो व्याकुल ॥ पूर्वहीते लख्यो प्रभाव समेअनित्यअहे जगभाव ॥८॥ अध्ययनकीयेतेंनिखलइतिहास। भारतली सभकथा प्रकास॥ कलपशतायु अहे जगजोई । मरे अंत चतुरानन सोई ॥८॥ इंद्रलो सुर असुर मुजेते । मरें अंतको सगले तेते ॥ मनुआदिकमुनि मही समुंदा । नटकरेक्षण कोट मुकुंदा ॥५॥ अहो मोह काते तव भयो। जाते वडो शोक उरछयो॥ नष्टशरीर नष्ट जव होई । कोविदशोककरे नह कोई ८६|| भाव अनित्य सदा उर धारो । नित्यअनित्य सुवस्तु निहारो॥ नित्य अनित्य विवेकी जोई। शोकवेग तिह छहे न कोई ८७॥ तयाच श्रुतिः॥ एकमेवं यदा ब्रह्म सत्यमन्यदिकल्पितम् ।। को मोहस्तत्र का शोक एकत्वमनुपश्यतः॥२॥ (१) मलदी। (२) भर्ष यहः-जहाँ अपमादितीपाती गाय है श्रीमान मिस ग विकस्ति है नाम अनिरंचती है इसमहार एकल नाम परमाई गालोपे मोरनमुनिको नहीं कानमोहद कौन शोर हैन को मारमको गोली मारा. সমাধা কবিৰলশ: ??

- १४८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५ दीरघायु इनसंग तुम, अवे लहो सुखसार ॥ सामराज निजलोकमै, नीके करो उदार ॥ १५६॥ तोहि इकाग्रहंभये, जीवं लहे सुखसार ॥ तव चंचलता संग वस, पाए बहुतं विकार ॥१७॥ सागरवीचीभेदते, ज्यों रवि नाना होइ ॥ बुद्धिवृत्ति वस जीव वहु, भयो परात्म सोइ ॥ १५८॥ वृतां सकल संकोचकर, वत्स तू सनीधार । सहिजानंदसु आत्मा, लहेसूप निजसार ॥ १५९ ॥ चौपाई। तीवंधु जिते रणमारे। प्रेतपतिके भौन सिधारे ।। कृतिलांजुली ताको दीजे । देवनदीमै मजन कीजे १६०॥ मन नैन न नीर बहायो । वहुरो याविध वैन अलायो॥ कछु आयुसु अहे तिहारी । करों सकल मैसिरपरधारी ।। दोहा । सारस्वती मन भाखि, योतजी रंगप्रवृति ।। कीरतिवरमा देव तव, गहीचीत निरवृति॥१६२॥ १) परमात्मभावको पाम हो । (२) पविकार । (३) सो परमात्मा वृत्तियों के अधीन होयकर नानानीवरूपसें प्रतीत होवे है तथा श्रुतिः ॥ स्व हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकथा यहुधा चैव दृश्पते मठमन्दयन् ।। पहः-एकही भूतात्मा (परमात्मा) भूतभूतमें स्थित हुआ तथा एकमकारका । नलमें चन्द्रमाको न्याई बहुतमकारका देमानावहै इति । (५) नाटयप्रवृत्ति ।।

[अं०५]
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(१३९)
मन उवाच ॥
दोहा।
शोक वेग दूपतभयो, देवी चीत हमार ।।
लहे विवेक सुठौर नाहि, मेरे चीतमझार ।। ८८॥
सरस्वती उवाच ॥
चौपाई।
पूत सनेह दोपहैं
भारी। जाते होइ अनरथ विकारी॥
विपवलीवीजन सम जानो । करे कलेश अंतको मानो८९॥
सुत अरु नारी प्यारे जान । कीजे तहाँ सनेह महान ॥
वज्र अग्नि जाके उर अंतर । उपजे वेगदूपके अंकुर ॥९०॥
दोहा।
ताते शोक अनेक द्रुम, उपजे जगतमझार ॥
दूप अनल तनदाहकर, करे चीतको छार ।। ९१ ।।
मन उवाच॥
दोहा।
देवी यदपि ऐवहै, तदर्पि शोक सुभार ।।
मेउर अंतरको दहे, सकौनप्राणसुधार।। ९२॥
सरस्वती तें पदकंज जो, जीवनको सुखदैन ।
भलाभया प्राणांतमे, सो पेखे निजनैन ॥ ९३॥
सरस्वती उवाच ॥
दोहा।
यह इक और अकाज सुत, चाहतहै वसमोह ॥
जो आत्म निज हननको, कीनो निश्चे तोह ॥ ९४ ॥

[अं०५]] प्रबोधचंद्रादय नाटक।
सोरठा।
जनहे पूत प्रवोध, उपनिपतस विवेक मिल ॥
साधन वडो निरोध, जीवनमुक्तिसु होइगी ॥ १६३॥
इति श्रीमन्मानसिंहचरणशिक्षित गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदयनाटके
वैराग्यो नाम पञ्चोकः समासः ॥ ५॥
(१) यह पष्टमअङ्कका बीनहै ॥
इति श्रीमदुदासीनवर्य परमानंदशिष्य गुस्मसादविरचिता प्रकोपचंद्रोदयनाटक
पञ्चमांकटिप्पणिका समामा ॥ ५॥

१४०) प्रबोधचद्रादय नाटका चौपाई। काम सुलोभादिक सुत जेते । अति अपकारी जानो तेते ॥ इनहित संचो कीजे जोई। करे अनरथ अंतकोसोई ९५ ॥ संचेहित जन अतिदुःखपाए । कामलोभ वहुपाप कमाए । लोभ जवे उरमै हुलसाए । नदी अनेक सुगहन तराए ९६॥ अतिउचे पुन सैल चढाए। कानन घोरमाहि भरमाए । धनमदमलनकुर मुख राजे । खडो कराए तिह दरवाजे९७॥ भने कुर भूपति मदभीने । हाथजुराइ करावत दीने ॥ यों अपकारी तें सुत जेते । तांहित लहें कलेश सुएते ९८॥ मन उवाच॥ चौपाइ। है योंही ज्यो मुखो वखाने । तदपि मे दुख और न जाने ॥ तिनके ललत वोल रिदहारी। चिरंकाल रिदमाहि चितारी९९ मनोप्राणको होइ विछेदा । याविध मै पावों उर खेदा ॥ याविध सुनि मनकी दुखवानी।कहे सरस्वती मुखोभवानी१०० सरस्वती उवाच ॥ दोहा। ममताकी जन वासना, प्रेमसहित दृढहोई ॥ तिहमूलक अतिमोहवस, दुःखपावत जनलोई॥१०॥ ग्रहकुकटको खाइ मन, जब मंजारग्रह आइ॥ ममताके वस होइ तव, दूखघनो जन पाइ॥ १०२॥ (१) तुमको दुखदाई । (२) मदीयत्वाऽभिमानका नाम ममता है तिसफी जावासना कहिये सर्वदा काल वर्तणा सोई है मूल कहिहै कारणनिसका महामोहका तिसमहामोहके बस यहदोहाका तात्पपार्य है। (३) मुरगा। 11 ॐश्रीगणेशाय नमः। अथ पटोङ्कः प्रारंभः ॥६॥ दोहा। याउपरंत सुहोयगी, जीवनमुक्ति रसाल ॥ सभामाहिं प्रवेशतव, कीनो शांति विसाल ॥१॥ शांति स्वाच ॥ चौपाई। विवेक इममोहि अलायो। समाचार शांतितें पायो । सुत कामादिकये जेई । मुए महारणभीतर तेई ॥२॥ ह विलीन वैगग्य उपाए । पंचकलेश सुदूर मिटाए। प्रशांतिकी मंगति धार । ततबोध नरकरे विचार ॥३॥ म उपनिपदपाम अवजायो । आदरकर तिहममटिगल्याप कहि शांति मुजब पधारी। श्रद्धा आवत ताहि निहारी ॥३॥ हरपर इन शांति उचारे । यहश्रद्धा कामंत्र विचारे॥ दही और यह आवत नीकी । मुना भला अव यांक जीनीया (१) जन्मदिरा लागः-प्रामाजिक प्राय मां AFTEST SAng मिमनोद नाना प्रभाविो पागला तापनाम जन्मनि है । (२)(अप्रियागमागमा दादा प्रभावितया अामाकागानाममि.frst ३.मनाताग, विमा arre अ५:

- प्रबोधचंद्रोदय नाटक। ममता सून सुग्रह चटका, औ मूसाखाइ विडाल ॥ विनसनेह दुख नाहि सुत, होवत हर्प विसाल॥ १०३॥ सर्वअनरथसुवीज सुत, ममताही जगजान ॥ तां छेदनके माहि पुन, करो यतन मतीमान ॥ १०४ ।। मन उवाच ॥ चौपाई। मेतनते सुतथे उपजाए । कुकटमूसासम किम गाए। ताको नास जने दुःखभार । कहे सरस्वती बहुर विचार १०५ सरस्वती उवाच ॥ चौपाई। यातनते यूका उपजाए। औ व्रणकृमी नहिजात गिनाए। यतन सहित ताको नरघाए । दूख न रंचक मनमै पाए१०६॥ यूका कृमि सुत होइ समान । एकनको उर जान संतान ॥ महामोह एकनमै धार। मुए मूढ दुख लहे अपार १०७ मन उवाच ॥ चौपाई। तम अज्ञान ग्रन्थहै जोई । दुहउछेद जानो मैसोई॥ सरस्वती तूं सर्वज्ञ उदार । लोकनमै जस आहितुमार१०८ निरंतर कीनो दृढ अभ्यास । सनेह सूतजीवनको फास ॥ जाते ‘फास इहै तुटिजाइ । देवी कहोसुमोहि उपाइ १०९॥

अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१५१) - दोहां। श्रद्धा तवे प्रवेशकर, कीनो इहे विचार ॥ नैनसुधा पूरतभये, भूपतिकुलहि निहार ॥६॥ जहादुएनीकेहने, पूजेसंतसमादि । वशेअनुजीवीसेव्यहे, स्वामिदेव अनादि ॥७॥ शांतिकहे अंवा सुनो, कौन सुमंत्र विचार ॥ करेचीतकहिहेंचली, मोको करो उचार ॥ ८॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा। में विवेककेढिग चली, पठीपुरुप मतिमान ॥ पुरपविवेक मिलाओगी, मंत्र इहै उरठान ॥९॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। कहो पुरुपको कौनविध, मनसों वरतन आहि ।। काराग्रह वांधेविपे, ज्योंवरते नरनाहि ॥१०॥ कहो पुरुपहीं करेगो, सामराज जगमाहि ।। अहेशांति इंउहीं सुनो, ज्योंसमुझे मनमाहि ॥ ११ ॥ कैसे मायामाहि अव, देव अनुग्रह आहि ॥ निर्ग्रह यों कहिवोरह्यो, कहें अनुग्रह काहि ॥ १२॥ (१) रानफुलको। (२) राजकुटमें मोहादियः । (३) वमकहिये शमादि फर्गेकर अनुमीवीरहिये ईभरके अनुाभाव है नौवना निनोका सो कहिये दराजनीती में से जो निन नोवोहर सामोशमनादि सेप्य है नाम पूलहै । (५) श्रद्धा कहनाद हिमानि निग्रह ऐसा नेरेको फहना राया, (उचितया) परंतु अनुग्रह में फंसारहती है कालें।

सरस्वती उवाच ।। चौपाई। मन उवाच॥ अनित्यम उरमै धारो प्रथम उपावसु यही निहारो॥ समागम अहेसु जोई । विजुलीचमतकारसम होई ११० दोहा। ऐसे उरमै धारतूं, करो सुदृढ अभ्यास ॥ होहु सुखी मुतलोकमै, कटे मोहकी फास ॥ १११॥ दोहा। देवी तोहिप्रसादतें, नटभयो मम मोह ॥ पर उरमाहि संदेह इक, पूछतहो अब तोह ॥ ११२॥ तव मुखचन्दमरीचते, सुधाझरे उपदेश। क्षालत में उर मलन पुन, हरहै शोक कलेश॥११३॥ शोक सुमूल प्रहारको औपध जो जगहोइ ॥ तापत में उरमलनको, मात वतावो सोइ॥ ११॥ सरस्वती उवाच॥ चौपाई। कहें मुनिश्वर सर्व विचार | मरमभेदते शोकप्रहार ।। ताहि निवारण औपध इहै ।चिंता उरम मूल नगहे।। ११५॥ दोहा। कह्यो तुमारो ससत्यहै, परचिंता है दुर वार । चिंता चित्त डुला इहै, ज्योंजलइंदुव्यार ।। ११६॥ (१) पदार्य। (२) यनयंपदेशका नाम निरिहा (3) मर्ममेरा दुमके फरनेवाले ने शोरनहार है। मन उवाच॥

प्रबोधचंद्रोद - माहि माया अहे, सर्वअनरथनवीज ॥ को निग्रह भलेकर, कियोचहे निरवीज ॥ १३ ॥ शांति वाच॥ काराग्रहमै डारमन, माया निग्रहकीन ।। कहो काहिमै अवअहे, भूपतिको उरलीन ॥ १४॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा। नित्य अनित्य विचारम, सदा चितपरवाहि ॥ इह अमुत्र वैराग्यजो, वही सुहृद सुआहि ॥ १५ ॥ मंत्री अहे यमनेमही, सम दम सखा सुजान ।। मैत्री करुणादिक सभे, यही ग्रहंदासी मान ॥ १६॥ है मुक्तेच्छा सहचरी, भये पुरुप वलवंत ॥ ममता मोह संकल्पसह, हने कृपा भगवंत ॥ १७ ॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। कहो स्वामी पुरुपकी, धर्मकर्मफलमाहि ॥ किहिविध अहे प्रवृतिअव, मे समुझों मनमाहि ॥ १८॥ श्रद्धोवाच ॥ सोरठा। जादिन भयो वैराग्य, पुत्रीलेदिन ताहिते ॥ इह अमुत्र फलत्याग, स्वामीधारे ताहिते॥१९॥ (१) सहकारी है। (२) समीद। (३) अर्थ यह-मायामी पुन पाटमें मत्ति किमतभारसाद यहाहो॥

[अं०५j प्रवाषचंद्रोदय नाटक। (१४३) सरस्वती उवाच॥ चिंता चित विकारसुत, देवे बहुत कलेश॥ काहूं शांतिसुविपे मै, कीजे ताहि निवेश ॥ ११७॥ मन उवाच ॥ तुम प्रसन्न अति होइ उर, मोको देहु वताइ । ताको ध्यानसु मै धरो, दुखपुंज मिटजाई ॥ ११८॥ सरस्वती उवाच ॥ दोहा।। हे सुत यहअतिगोपहै, करेजु वन्धनमोप ॥ पर आरतउपदेशमैं, कहेन आगम दोप ॥ ११९ ॥ सवैया। नव नीरद श्याम विसालमहा, उरहार भुजासु कियूर सुहाए। मकराकृत कुंडल काननम जुगनेनसरोज मनो विगसाए । जनमाहि निदाघसुसीत सरोवर, वेद सदा जिह ब्रह्मवताए। हरिध्याव सदामनतूं उरमै, निज सूखलहें दुखपुंज मिटाए१२० सुनके मनदीरघस्वास लयो करजोर दोऊपदशीशझकायो। भवभेपज मात सुतोहिकह्यो भवसिंधुवयोतवमोहि वचायो। करुणारस नेन विसाल दवे, पुनसारस्वतीगह हाथ उठायो। सुतलाइकतूंउपदेशहिकी, अवनीठभयोइममेमनआयो१२१॥ चौपाई। हेसुत औरप्रकारह कहों। तव संसारमोह सभ दहाँ ॥ जितोमोह मुजाम होई । अंतजने तेतो दुख सोई ॥ १२२॥ (१)शति विषय काहे भोकमोहादिरहित महाविपमें ।

प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१५३) दोहा। पापनके फल नरकतें, जैसे डरपै नीत ॥ त्योंही सुखहै पुनफल, स्वरगभयो भयभीत ॥२०॥ सुकृतको फल भोगसुख, मिले कदाचित् जोइ ।। करै गिलानि सुउरविपे, अधिक नमाने सोइ ॥२१॥ प्रत्यक्प्रवण पिखपुरुपको, सफल आपनिरधार ॥ धर्म आपही होइयो, सने स्थल व्यापार ॥२२॥ शांतिरुवाच ॥ दोहा । जे उपसरंगसुसंगले, भयो लीन खल मोह ।। कहो वृतांत सुताहिको, जननी पूछो तोहि ॥ २३॥ श्रद्धोवाच॥ दोहा। मधुमत्तविद्यासहित पुनि, पठे मोह उपसरग ॥ लोभनिमित सुपुरुपको दिखलाए वहुस्वरग ॥ २४ ॥ जो तिनमाहि आसक्त पुन, पुरुप कदाचित होइ ॥ तो विवेक उपनिपतको, स्मरनकरे न कोइ ॥२५॥ शांतिरुवाच ॥ दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी वलहार ॥ तिसते बहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥२६॥ ११) स्वामीपुरुषको आत्मैकनिष्टाकू देखकर सोधर्म कीयाहे वैराग्यरूप फलनिसने अपने आप मानकर स्वयं आपही व्यापारसे रहित होताभया । (२) योगविन्न । ) काचित् सिद्धि ।

प्रबोध ) नने वाधव पति भाई । काल जवे गहि शीशलिजाई॥ पुरखजनअतिदुख पाव। खोहिसिरोरुह धृहरुलावे ॥१२॥ उर हगते जलवहैं । पेख विवेकी यों उर कहें ।। संसार बडो दुखदाई । यामे चीत गडोमत राई ।।१२।। वरागसुजांउर होई । समसुख लहे आपमें सोई॥ रस्वती इम जब अलायो। ताहीक्षणवैरागसु आयो । १२५।। पैगग उपान॥ संवेया। हाविधि एक विडंबकन्यो, जिहते सभलोक मुतादि टगाए। पनवनीलसुनीरजपे, सेलपांतदलंसम देहवनाए । श्रोणत मांस सुमेद वसा, तिनउपरते तुच अंवर छाए । करुणायसनावयायमचीलव्याघरजातसुखाए ॥ १२६ ॥ दोहा। मओर श्रोणत मिल्यो, आमिरसापिंड निहार ।। परे सुपायम चील बहु, कोकरमके निवार ।। १२७ सर्वया । हमलमृत कुमतमभो, पुन आरमलेपम माजन भार नाक मल जब निकम अम नाहि मंमार गुपोषिउत्ता ना मुखनन्द कहें निहको, बहिनादि निमारसके तवन पिसागरमल गलानी, गट जाननगादिदिकामा (१)मास इटालिसा when

प्रबोधचंद्रा
(१५२)
देवमाहि माया अहे,
ताको निग्रह भलेकर
शां
काराग्रहमै डारमन,
कहो काहिमै अव
नित्य अनित्य नि
इह अमुत्र वैराग्य
मंत्री अहे यमने
मैत्री करुणादिर
है मुक्तेच्छा सह
ममता मोह संव
कहोस्वामी
फिहिविध
जादिन भी
इह अमुत्र
(१)मा

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। दोहा। पापनके फल नरकतें, जैसे डरपै नीत ॥ त्योंही सुखहै पुनफल, स्वरगभयो भयभीत ॥२०॥ सुकृतको फल भोगसुख, मिले कदाचित् जोइ ।। करै गिलानि सुउरविपे, अधिक नमाने सोइ ॥२१॥ प्रत्यक्प्रवण पिखपुरुपको, सफल आपनिरधार ।। धर्म आपही होइयो, सनै स्थल व्यापार ॥ २२ ॥ शांतिरुवाच॥ दोहा। जे उपसरंगसुसंगले, भयो लीन खल मोह ॥ कहो वृतांत सुताहिको, जननी पूछो तोहि ॥ २३ ॥ श्रद्धोवाच ।। दोहा। मधुमत्तविद्यासहित पुनि, पठे मोह उपसरग ॥ लोभनिमित सुपुरुपको दिखलाए वहुस्वरग ।।२४ ॥ जो तिनमाहि आसक्त पुन, पुरुप कदाचित होइ ॥ तौ विवेक उपनिपतको, स्मरनकरे न कोइ ॥२५॥ शांतिरुवाच ॥ दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी बलहार ॥ तिसते वहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥२६॥ (१) स्वामीपुरुषको आत्मैकनिष्टाकू देखकर सोधर्म कीपहैि वैराग्यरूप फलनिसने | ऐसा अपने आपकू मानकर स्वयं आपही व्यापारसे रहित होताभया । (२) योगविन । (३) काचित् सिद्धि ।

" अं०.६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१६३) तव विवेकढिगजाइक, कीनो पुरुप प्रणाम । कह्यो पुरुप तव एहु सुत, कीनो भलो न काम ॥८॥ ज्ञानवृद्ध तुम हो वडे, हमको पितासमान ॥ यही अर्थ ऋपिदेवता, पूर्व कीन वपान ।। ८१॥ चौपाई। एकसमे आपदके मारे । भूले निगम देव ऋपि सारे ॥ तिनको एक वाल थोजोई। तीर सरस्वती बसियो सोई ।।८।। दोहा । दधीचऋपीसर पूतबहु, जन्यो सरस्वतीमाहि ॥ नाम सारस्वत ताहिको, धन्यो जगतकेमाहि ॥ ८३॥ चौपाई। मात सरस्वती तिह प्रतिपाल । रहे कंठ तिहवेद विसाल । तवते समापाइ ऋपिजेते । पूछे परस्पर वेद सुतेते ॥८४॥ जव तिन कंठन किने निहारे । तवते वालक पास पधारे । कह्यो वालको वेद पढ़ये । कह्यो वाल पूत सुनलै ये॥८॥ (१) श्रुतिः-अनापतिब्रह्मा देवान् सृष्ट्वा केनचिन्निमित्तेनाज्ञानिनो भूयासुरिति देवाशशाप । तदनन्तरं ताननुगृह्णन् देवानामन्योन्यं पितृलं पुत्रत्वं च ददौ । अर्थ यहः-अनाका पति ब्रह्मानी सबदेवताओंको रचिकर तथा कोई कार्यरूप निमि- तार अज्ञानि होवो इसमकार देवताओंको शाप देतेभये तिसके अनन्तर तिनोपर अनुग्रह करतेहुए ब्रह्मानी देवताओंको परस्पर पितापणा तथा पुत्रपणा देतेभये । इस- | श्रुतिकर देवते धर्ममार्गमें नष्टसंज्ञावाले होतेभये, पुत्रोंसे वेद पूछिकर पुत्रसंज्ञाको मातभये इसकहनेकर ज्ञानवृद्धको पितारूपिता दिखाई, यह संक्षेपार्थ है ऋषिमसंग आगे काहते हैं। (२) नारदादि ।

श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। तव उपसर्ग पुरुप ढिगगए । कौतुक एक करत पुन भये ॥ इंद्रजालकी विद्या जोई । लोभहेत दिखलाई सोई॥२७॥ दोहा। निखलसिद्धि प्रगटी तहा, पिसी पुरुप मनलाइ ॥ गुलावसिंह प्रभावतहि, नीके देत सुनाइ ॥२८॥ सवैया। शतयोजनते सभवातसुने, पुन नीरनपै विन नाववलाए। विनध्येनकिये सभ वेदपुराण, सुभारतली इतिहास सुआए। विनछन्दपढे सुभछन्दनक, भवमंडलमै सवकाव्य धनाए । सुजराउजरेसुरथानपिखे,सभलोकनको रुचिप्रेर चलाए २९॥ दृढभीतनते निकसे क्षणम, तनु मेरुसमान सुभूर बनाए । तनुकंटकपे समतूल रहे, क्षणमै रविमंडलमाहि सुजाए। इहभांति निहारत देवनज, दिगआनभलेपद मोल झुकाए। इहठौर स्वामिन वासकरो, दुसद्वंदसौ अव तोहि मिटाए ३० दोहा। ईहा जन्म नमृतह, यह अतिसुंदर देश ।। ईहावट कलोलकर, मनके हगे कलेश ॥३१॥ दोहा। विद्याधरी अप्सरा, विविध मुन्धं सुरनार ।। ते पदवन्दनकरतहैं, हाथ उपाइनधार ॥ ३२॥ (१)काई मुंदरकारी वनाशिविता प्रतिमानामाला -)नपामा मोहनरा॥ .

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[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१५५) सवैया। याहिपिखो तुम सुंदरता, मदमत्तविलोचन रूप अपारे । दीरघ वारज गंधमिली, अलकै कचघुघरवंत सुकारे॥ पीनपयोधर रंभेउरूकमलानन अंजननैन सवारे ।। दाडमसीरदपांतिवनी, समदामनि हासहरे तमभारे ॥३३॥ हाटककी सिकता धरनी, पुन इंद्रसी नीलमणि धनलाई ॥ एवनपांति नृतांतखिरी, बहुफूल सुगंध चहूंदिश छाई ।। गुंजत एमधुपावलिया, मनवावलियासुमनोजचलाई ॥ संग विलासनि केलकरो, तपसा तव पुंनफले अवआई॥३॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनेनी बलिहार ।। तिसते वहुरों क्याभयो, मोको करो उचार ।।३।। अदो याच ॥ दोहा। सुन उपसर्गनवाकको, कीनो पुरुप उचार ॥ अतिसुंदर यह भोगसुख, मोमन वाढियो प्यार॥३६॥ संकल्पकियो उत्साहमन, स्वामीपुरुष उदार ॥ योमतिसुन उर खेदगहि, करे सुशांति उचार ॥ ३७॥ शांति स्वाच ॥ दोहा। हाधिग हादुख कटअति, भई बडी अवहान ।। पुनरपि जगफासीविपे, पो सुपुरुप महान ॥ ३८॥ (१) रेटा । (२) रेती ॥

अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१६५) दोहा। माता औ उपनिपतम, वडो अंतरो जान ॥ वहुदृढबन्धनको करे, यह करे बन्ध सभहान ।। ९४ ॥ पुन उपनिपत विवेकपिख, अभिवन्दन तिहधार ।। वैठी किंचत दूर तिह, पूछत पुरुप विचार ॥ ९५ ॥ कहो अब एते दिवस, कहि कहि करे वितीत ॥ उपनिपत वखाने पुरुपको, सुनो इकागर चीत ॥९६॥ चौपाई। नठमझार पुन शून अगार । मृरखजनकी संगतधार । आपददिन इहभांति विताए । कहांकहो मै अतिदुःखपाए९७ दोहा। कह्यो पुरुप वहिततकछु, जानतथे पुन तोहि ॥ उपनिपत कह्यो कहिजानहै, सगल व्यापे मोहि ॥९८॥ चौपाई ते निजइच्छाके अनुसार । मेरो अरथ सुकरें उचार ॥ अरथ विचारविना इंउ कल । द्रवंडागणज्यों वाणी जलपै९९ परको ठाग द्रव्य तिह हरें। याहित भोहि विचारण करें । में उपनिपत मोक्षको कारण । पेट हेत सठ करें सुधारण१०० दोहा। पुरुपको सुन मात पुन, मोप्रति करो उचार ॥ किहविध वासरतेंविते, भाखोसगल विचार।।१०१॥ (१) मेरे पीछे रग गर । (२) नागा कहिये जैसे दाविदेशस्तरोगको भातको गुनार फलना फरते नह पानी कहनेभपे । का नाम परिये मेंडा समुदाय॥

(१५६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अ०६] मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी बलिहार ॥ तिसते वहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥ ३९ ॥ श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। तव तांमीत पुरुप इकसार । तर्कनाम तिहकरें चार ॥ क्रोधभरे हग ताहि सुलाल । मनो समीर सखां सुविसाल४० तिन उपसर्गन ओर निहार । वहुरपुरुपको कीन उचार ॥ यह अस्थानी देव सुजेते । विघनकरें तुमको प्रतितेते४१॥ श्रद्धा यावचननकेमाही। मीत कदाचित कीजे नाही ॥ थानअभिमानी देव सुजेते । है अतिधूरत वंचक तेते ॥४२॥ विपर्यवडसपिंडीको डारे । मीनसमान निखलजन मारे ॥ भोगनकी चिंता दुखआग । डारे तोहि नलखे अभाग४३॥ सवैया। एह अतिसुंदर नारि जितीनरकाऽग्निकी सुशिपा पहिचानो। ताहिकि संगमते दुःखजोबहु वारलयो कहितोहि भुलानो॥ तेंतप दीरघ नीतकरे, सभलोक वखानत तोहि स्यानो ॥ भोगनपावकते हटियो, दुःखनाहिमरो सुकह्यो मम मानो४४॥ भवसागरतारणयोग्य जहाँजसुतें चिरकालहिते अव पायो। मदमत्तविलोचननारि दिखाइ सुचाहत, सुरतोहि छुडायो।। (१) सत् असत् विचारका नाम तर्कहै । (२) अमि । (३) मधुमत्तसिद्धि अभिमानी देवते । (४) विश्यरूप मांसयुक्तकांटा । (५) मनुष्यगरीर ॥

प्रवाधचद्रादय नाटका
[अ०६4
दोहा।
पुरुपप्रश्न उपनिपत सुन, लागी करन वखान ॥
गुलावसिंह वहिवाक पुन, साधधरो निजकान ।।१०२॥
उपनिषदुवाच ॥
चौपाई।
मै चली बडोपथ. जहां । देखी यज्ञविद्या तहां॥
न कृष्णाजिन अग्निजलाई । इत समधाघृत जपसुहाई १०३
आली समभांजन हाथ । इप्टिंपशु मख सोम सुसाथ ॥
र्मकांडकी पद्धति जोई। नीके मुखो अलाए सोई १०४
व मे मनमै कीन विचारा । एहु धरे बहु पुस्तक भारा॥
क छु ततपछाने मेरा । कोदिन ईहा करों बसेरा१०५॥
व मै ताढिग शीशु झुकायो । तिन मोको पुन एहु अलायो॥
हु कल्याणी वांछतसार । तब मै तिनसोंकीन उचार१०६
अनाथ दूर मम नाह । तोहि समीप वसनकी नाद ।।
च तिन मोको एटु वखानी । कीनकाजतूंकरें कल्याणी १०७
च में कह्यो जुपुरुप उदार । ताको रूप सुकगें उचार।
ति विश्वउदे यह होई। जाम रहे लीन पुनसो १०८||
कभास निखलजग भासे । महजानंदमु ज्योति प्रकास ॥
जति निरंतर अरूपा। निरावयवमुअसंगअनृपा१०९
(१) बारेमा गर्न । (0) यू-टाभूतभुमादि पात्रा () मग
समान समयाग ना मीमामा परिम।
र कतिपत्र रमले, मिटान भामा पार्टी
मनोवट दमाः। भवधियं पनप रे -
सम्म पनि मिसन हमने friti

धिचंद्रोदय नाटक । (१५७) रनदी सुचहेंकिम आत्मआप वहायो॥ कमलीनसुभोगनहेर कहा हुलसायो ४५ र दिगंवर जावन वास कएहै ॥ तपदीरघ, भोगमहानल पारभएहै । कहें, अरु कांपत भूपतिपांइ पएहै ।। पर फेर रसातलमाहि गएहै ॥१६॥ तुही, इहवार कहांसु अघाइ रहेगो॥ उखिसे, भवसागरधारसु फेर वहेगो॥ क्षिअहै, इह औसर मीत न फेर लहेगो॥ नत जो, नरकाऽग्निमै वहुदुख सहेगो४७ शांति रुवाच ॥ दोहा। शमुखी, मृगनेनीवलिहार॥ याभयो, मोको करो उचार॥४८॥ श्रदोवाच ॥ दोहा। कानधर, विपय नस्वस्ति उचार ।। ह तज, भयो वैराग उदार ॥४९॥ सवैया। चितार, सुशीशधुन्यो मनताहिउठायो॥ वेपे, परतो मम मीत सुतोहि वचायो। कवी, इह मीत सुनोतवसाचवतायो। नवढी भरअंक भले सुसखागललायो९० -निमत॥

- [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१६७) दैत अंधेरो दूर मिटाइ । जामै मिले मुमोक्षी जाइ । तत्वज्ञानते पावे मोक्ष । पुरुप पुरातन है निरदोप११० यहि पुरुप उर् ब्रह्म पछानो । ब्रह्म न यांते भिन्न सुमानो॥ विनाज्ञान भासे पुन भेद । ज्ञान जनावे ब्रह्म अभेद १११ वचन सुमेउरधार । यज्ञविद्या कीन उचार॥ निखलक्रियाको करता जोई। कैसै पुरुप ब्रह्म पुनहोई११२॥ क्रिया भवफासीपर हरे ।ज्ञाननमुक्तिसु काहूं करे॥ वेदकहें निजकर्म सुकरे । जौलौ जीवै नहिपर हरे ११३॥ दोहा। तात तेग्रह रापणे, सरेन मेरो काज ।। पर तदपि तूं ऐवकर, ज्योमम भाखों आज ॥११४॥ करताऔ पुन भोक्ता, पुरुप सुअहे विसाल ॥ ऐसे निसवासर की, वसोसु किंचतकाल || ११५॥ यामैंकहो सुकोन तव, लागत याजग दोप ॥ योसुन राय विवेक पुन, बोल्यो धार सुरोप ॥ ११६ ।। चौपाई। अहो मखनकोधूम सुकारा। यज्ञविद्याके नैन मझारा ।। तांकर मलनदृष्टि बहुभई । यों कुतर्क यांत निरमई ११७॥ यज्ञविद्या है निरबुद्ध । ईश्वर पुरुप अकरता शुद्ध ॥ चुंबक मणि ज्यों निहचल अहै । तासमीप लोहाकृत गहे११८॥ त्यों ईश्वरकी संगतपाइ । माया लेवे निखल उपाइ॥ अज्ञान जनत वन्धनहै जोई। कैसे कर्म निवारें सोई॥११९॥ (१) श्रुतिः-(कुर्वनेवेह कर्माणि, मिनीविषेच्छतपममाः) अर्थयहः-इस कर्माधिका- रभूलोकमें अमिहोत्रादि काकू कर्ताहुआही सौर्वापर्यंत जीवनेको इच्छा- करे । (२) ईभर भी पुरुषनीवात्मा ॥

१५८)
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
[अं०६]
शांति रुवाच ॥
चौपाई।
भलाभया बहुपुरुप उदार। भयो विरक्त कटे दुःखभार ॥
- अब मातसु कहां सिद्धाई। मोको नीके देहु वताई ॥५१॥
श्रद्धावाच ॥
दोहा।
पुरुप पठाई मै चली, हेरन आज विवेक ॥
जावों भूपविवेकढिग, मेटिसु विघन अनेक ॥५२॥
शांति रुवाच ॥
चौपाई।
नोकोवी पुन रायविवेक । पन्यो सुकारज भापो एक ॥
उपनिपतलियावनहेत पठाई ।चले सुवेग विलंब मिटाई॥५३॥
कवि स्वाय॥
दोहा ।
विवेक उपनिपत समीपयहि, श्रद्धा शांति उदार ॥
गई जब वहुपुरुप पुन, आए सभामझार॥५४॥
फरविचार उर हपं अति, लागो करन उचार ॥
गुलाबसिंह वहुवाकपुन, मुनो साथ उरधार ॥ ५५ ॥
पुरुप व्यार॥
दोहा।
अहो महातम है बडो, विष्णुमतिका लोइ ।
जांप्रसादयन्यनमिटे, मुनिजी जग दो ॥५६॥

E८) प्रयोदचंद्रोदय नाटक ज्यों तमको दूर नकरे । त्यों नहीं कम सुबन्धनहरे ॥ । यज्ञविद्या है जोई। सम्यक अर्थ नजाने सोई१२० दोहा। लीने अंधेरो भवन तम, करेसुजय प्रकास ॥ तब विनज्ञान सुकर्मते, होवे बन्धननास ।। १२१॥ विन आत्मके ज्ञानते, मुक्तिपंथ नदि आन॥ ऐसे बदनसरोजते, करे सुवेयरखान ॥ १२२ ॥ को पुरुष उपनिषतको, बहुरों कही मिनार ।। यनविद्या तोडिको, केमकीन उगार ॥ १२३ ॥ उपनियागाय॥ चौपाई। पतरिया यह विचार । मौकी गायिकीन उपार ॥ पापी मुतेर्ग मंगति जोई । हमरे शिय विगारे माई १२३ दोहा। फल अनित्य मांजान, कंग्न मादा कम्म। नंग मंगति पाइंक.जाने निगल गुगाम ।। १२ ।। नातं बांटनदेशको, कंगं गमन नताल॥ नब में नामो छोडिकर, चाली या माय ॥ १२६ कमांडकी महर्ग, पिणी मीमामा जार॥ बहु प्रसार मात्र कर्म, व विकासपा 121 नान कयां माप तर, योगनिताए । दर न कर परम भागमा mfr: 1 " अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१८९) सवैया । जिहमाहि कलेशवडीलहरी, सुभयानक जाहिके पंथ अपारा॥ सुत मीत कलत्र सुवंधु सखा, मकराग्रह ग्रन्थ वडे सुविकारा॥ निजक्रोध महावडवानलहै, तृष्णानिजनागनिरूपसुकारा ।। हरिकीभक्ती पदकंजप्रसादतन्यो भवसागरमैं अजभारा॥१७॥ दोहा। तर्क वडो मम मीतहै, होयो मोहि सहाइ । पावक भोग करालते, लीनो मोहि वचाइ ॥१८॥ कषि रुवाच ॥ दोहा। उपनिपत शांति दोनो तवै, कीनो सभाप्रवेश ॥ कीरतिवरमा मोलमणि, वैठो जहाँ नरेश ॥ ५९॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। चलो सखी सुविवेकका, वदन तिहारो आज ॥ भाग तुमारे जागया होहि सभे तव काज ॥६॥ उपनिपदुवाच ॥ दोहा । सखी स्वामी निरदई, जाहि त्याग्यो मोहि ॥ ताको मुख किहविध पिखों तूं मनभीतर जोहि ॥६॥ (१) यहां रूपकालंकार है ।

(१६८) प्रवोदचंद्रोदय नाटक। तमज्यों तमको दूर नकरे । त्यों नही कर्म सुबन्धन तति यज्ञविद्या है जोई। सम्यक अर्थ नजाने सोई दाहा.। लीने अंधेरो भवन तम, करेसुजव प्रकास ।। तव विनज्ञान सुकर्मते, होवे वन्धननास ।। १२१ विन आत्मके ज्ञानते, मुक्तिपंथ नहि आन॥ ऐसे वदनसरोजते, करे सुवेदंवखान ।। १२२॥ कह्यो पुरुप उपनिपतको, बहुरों कहो विचार ॥ यज्ञविद्या तोहिको, कैसे कीन उचार ॥ १२३ ॥ उपनिपयाच ॥ चौपाई। यज्ञविद्या वहुर विचार । मोको याविध कीन रखा सखी सुतेरी संगति जोई । हमरे शिप्य विगारे दोहा। फल अनित्य सोजानक, करेन सादर करम तेरी संगति पाइके, जाने नि तातें वांछतदेशको, करोगा तव में ताको छोडिकर, चा कर्मकांडकी सहचरी, पिखी बहु प्रकार-भाप कम, बद्दुआत ताम को समीप तर, बांसु किंचताला तर उन करो सुकर्ममुहि, भापो मसी धिमाल ।। १२० (1) अन्धेरेर प्रना। (क)मा नान्यः त्यादिवानाप सिंह।

शांति रुवाच ॥ दोहा। देवी स्वामी परोथो, परम विपदके माहि ॥ इहविध एह उलाहनो, तूं भापतहे ताहि ॥ १२॥ उपनिपदुवाच॥ सखी न देखी दुरदशा, मोपर वीती जोइ ॥ जाकर ऐसै तूंकहैं, सुनो वखानो सोइ ॥ ६३॥ चित्रपदाछन्द। भुजदंडतोडिकुपंडितामणिकंठकीवहुफोर ॥ करकाढिकंकणलीतियाकररहीमैवहुशोर ॥ चूडामणिममशीशतकटिदीनवहुतकलेस ॥ समद्रोपतीकेशांतिमेरेबैंचियातिनकेस ॥ ६ ॥ कुछ अरथ मेरो औरथो, बहु करहै औरप्रकार ॥ जीवकाके हेत मूरख तोडिफोडि उचार ॥ अर्थको सुअनरथभा देहि बहु संताप ॥ बहुभांति मैं दुखपाइयो नहिडरें ते सठपाप ॥६५॥ (१) कुत्सित पण्डतोंने मेरे मनन तथा निदिध्यास न रूपदो भुनाइंड तोड हारेहें | तहां ब्रह्मरूप विषयसें भिन्न विषयका जो मनन है तथा निदिध्यासन है सोई भुनाओंका तोडना है, धारणा ध्यान समाधिरूप कंटकी मणिहै सोभी ब्रारूप विश्यमें भिम विष- | यका धारणा ध्यान समाधि करनाही तिसका फोडना है-उपक्रम उपसंहारादि रूप जे वेदांततात्पर्य के पद लिंग है, सोई भपे कण तिनकोभी वेदांततात्पर्य छोडिफर अन्या- थकेतात्पर्य पर लगावना यही तिनका लैना है-चूडामणि कहिये शिरभूषणकीन्याई आरम स्वरूप तिसका नो रिसीत निश्चय है यही शिरसे काटदेनाद-केश कहिये वैदतिभाग (उपनिष भाग) तिसको नो अन्याधार लगाना सोई केशोरा सेंचना है दोपतिवन् । यह यन्दका तात्पर्य है ।

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१६९) चौपाई। तव मै कह्यो पुरुपको रूप । मै भाखोंगी परम अनूप ॥ निज शिष्यनको वन निहार । बहुर मीमांसा कीन उचार१२९ फलउपभोग योग्यहै जोई। पुरुप वखानेगी यह सोई॥ करो कर्म इम ताहि उचारियो। तवतांशिष्यअनुमोदनधारियो तव तांशिष्य एकथो जोई। मीमांसाकोरिद अंगम सोई॥ नाम कुमारलस्वामी वाको । करविचारतिनभाख्योताको । करम निफल उपभोगता जोई। उपनिपत कहे नहआत्मसोई॥ किंतु कहे अकरता सोई ।भुक्ता नाहिकदाचित होई १३२ आत्म रूप सुजोई । करम उपयोग्य करे नह सोई॥ बहुरो बोल्यो अपर विचार ।ज्योंहे त्यों ममकरो उचार १३३ पुरुपदोइ जगभीतर गाए । एक जीव इक ईश वताए । मोह अंधेरे जीव दवायो । ईश्वरसकल सुसाक्षीगायो १३४ वांछे करमफल जीव सुजेते । ईश्वर देवे. ताको तेते ॥ जीव करममें है अधिकारी । ईशअकरतावेदउचारी१३५॥ कल्पतवन्ध जीवमै अहै। नित्यमुक्ति परमेश्वर कह ॥ सुन विवक भूपति हरखाने । साधुसाधु मुखमाहि वखाने । होवै भले सुदीरघ आयो । जाने याविध अर्थ अलायो। दोन सपेरण वेदमै गाए । रहें इकठे सखा वताए॥१३७॥ (१) यस्मादिभमुदेति, इस पूर्वोक्त श्लोककर पुरुषका रूप कहा। (२) साधुसाधु इसमकार स्वीकार किया । (३) (दासुपर्णा स्युना ससाया, समानं वृक्षं परिपस्तनाते तपोरन्यः पिपलं स्वा दत्पनभनन्यो अभिचाकशीति ॥ अर्थयहः-दो पक्षो जीवात्मा परमात्मा सो कैसे हैं साथ रहिनेवाले हैं तथा परस्पर अनुकूल हैं, तथा एक शरीरकप वृक्षकू आलिङ्गन (सीकार,) करत, तिन दोनोमें एक नो नोच है सोसाद (पर्क) कर्मके फल भोगताह और अन्यजो परमात्मा है सोतिम कर्मफलकू नहोभोनाहा प्रकाशता है नाम सातिरूप होयार देसताहै ।

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१६१) दुरविदग्ध अनेक मोको मिलेलोक मलीन ॥ विवेकपतिविन जान मोको चहें दासीकीन । कैंचित कहें जग सत तूं मुखकरो इह प्रकास ।। कैचित करें मतद्वैतमै उपनिपत तूं कर वास ।। ६६॥ इककहें जीवपरेशको है भेद एहु बखान ॥ इक कहें भेदाभेदको उपनिपत तूं उर मान ।। इह भांतिव्याकुल मै करी नहिलखे मूरखवात ॥ ज्यों दुटकौरवसभामे भई द्रोपदी विष्यात ॥ ६॥ शांतिरुवाच॥ चित्रपदाछन्द। महामोहके अपराधते तें लह्यो है दुख सोइ । देवको अपराध नाही होनहारी होइ । मोह मन उपजाइ कामसुपुरुपको गहि लीन ॥ डार विपयआरण्यमै सुविवेक दूरहिकीन ॥ ६८ ॥ कुलनारिके यहधर्म देवी रच्यो भगवान॥ संपद सुआपदमे सदा बहुचहे निजपति प्रान ॥ अव आउ दर्शनदेहु नीके मिष्टपियाप्रतिवोल॥ अब फले तोहि मनोरथा सभहते द्वेपी टोलि ॥ ६९॥ उपनिपदुवाच ॥ दोहा। पुत्री गीता यों कह्यो, मोहि इकंत विठाइ । स्वामी भरता पुरुपको, करो तोप अवजाइ ॥ ७० ॥ (१) दुवुदि । (२) सांख्यमतताले । (३) मीमांसक । (५)नयायिक (५) विदण्डी। (६) उपनिषद भर्पको मतिपादिकनाकर वा मनिरासस उत्पत्निहोनेकर गीताको टनिन्दा पुत्रिमा है ॥ - ०६८) प्रवादचंद्रोदय नाटक। [अं० तमज्यों तमको दूर नकरे । त्यों नही कर्म सुवन्धनह तांत यज्ञविद्या है जोई। सम्यक अर्थ नजानेसोई। दाहा। लीन अंधेरो भवन तम, करेसुजव प्रकास ॥ तव विनज्ञान सुकर्मते, होवैवन्धननास ।। १२३ ।। विन आत्मके ज्ञानते, मुक्तिपंथ नहि आन॥ ऐसे वदनसरोजते, करे सुवेदंबखान ॥ १२२॥ कह्यो पुरुष उपनिपतको, बहुरों कहो विचार ॥ यज्ञविद्या तोहिको, कैसे कीन उचार ॥ १२३ ॥ उपनिपदुवाच॥ चौपाई। यज्ञविद्या बहुर विचार । मोको याविध कीन उचार सखी सुतेरी संगति जोई । हमरे शिष्य विगारे सोई १२ फल अनित्य सोजानक, करेन सादर करम ॥ तेरी संगति पाइके, जाने निखल सुभरम ॥ १२५ ॥ तातें वांछतदेशको, करो गमन ततकाल ॥ तब मैं ताको छोडिकर, चाली वहुर उताल ।। १२६॥ कर्मकांडकी सहचरी, पिखी मीमांसा जाइ ।। वहु प्रकार-भाप कम, बहु अधिकारी पाइ ॥ १२७॥ तामे कह्यो समीप तव, वसांसु किंचतकाल ।। तव उन कझो सुकर्ममुहि, भापो सखी विसाल || १२८ (१) अन्धेरफेर ग्रस्त ग्रह। (२) बानागमुनिः । ज्ञानात न फैलत्यम् । न्यः पन्याविद्यतऽयनाय इत्यादिवेद ॥

बद्रोदय नाटक।
प्रबोधपूत तव होइगो, वन्धनदये निवार ।।
परस्वामीप्रति कहनते, आवत लाज सुभार
शांतिरुवाच ॥
दोहा।
विष्णुभक्ति सुविवेकको, कीनो इहै उचार ॥
पेखो स्वामी पुरुप अब, काहेकरें विचार ॥७
उपनिपत कह्यो ज्योंकहितहै, सोइकरों वडभाग
गुलावसिंह दोनो तवी, गई अखाडो त्याग ॥
तब विवेकराजा सुनो, श्रद्धासहित सुहाइ ॥
मोदपटलको दूरकर, वन्यो सभामहि आइ॥७४
विवेक उयाच ॥
दोहा।
अद्ध शांति सुगई है, उपनिपतनिहारनकाज॥
किहविध प्यारी को पिखों, मोहिवसानोआज ||७२
देवसुआय सुथारीया, गई शीस परमान ।।
विष्णुभक्ति पुन शांतिको, कीनो एड्दु यखान ॥७६ ।
मंदरनाम सुसलमे, है हरिको अस्थान ।।
तह गीताके निकट बहु, वसत तक डरमान ॥ ७ ॥
वियक दयार।
तकविद्याते कहो, कस तिद डरभार ।
दागर॥
देव टपनिपत करंगी, तोको एद उंचार ॥७८॥
अब तुम चलो ममीप प्रमु,लेखोपुरप निहार।।
बंट इकंत मुध्यायह, तोदि आगमन उदार ॥७९॥

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। ( १६९
चौपाई।
तव मै कह्यो पुरुपको रूप। मै भाखोंगी परम अनूप ।
निज शिष्यनको बदन निहार। वहुर मीमांसा कीन उचार१२९
फलउपभोग योग्यहै जोई । पुरुप बखानेगी यह सोई ।
करो कर्म इम ताहि उचारियो । तवतांशिष्यअनुमोदनधारियो
तब तांशिष्य एकथो जोई। मीमांसाकोरिद अंगम सोई।
नाम कुमारलस्वामी वाको । करविचारतिनभाख्योताको ।
करम निफल उपभोगता जोई। उपनिपत कहे नहआत्मसोई।
किंतु कहे अकरता सोई । भुक्ता नाहिकदाचित होई १३.
ऐसे · आत्म रूप सुजोई । करम उपयोग्य करे नह सोई।
बहुरो वोल्यो अपर विचार राज्योंहै त्यों ममकरो उचार १३३
पुरुपदोइ जगभीतर गाए । एक जीव इक ईश वताए।
मोह अंधेरे जीव दवायो । ईश्वरसकल सुसाक्षीगायो १३६
वांछे करमफल जीव सुजेते । ईश्वर देवे. ताको तेते ।
जीव करममें है अधिकारी । ईशअकरता वेदचारी १३५
कल्पतवन्य जीवमै अहै । नित्यमुक्ति परमेश्वर कहै ।
सुन विवेक भूपति हरखाने । साधुसाधु मुखमाहि वखाने ।
होवै भले. सुदीरघ आयो । जाने याविध अर्थ अलायो।
दोन सपेरण वेदमै गाए । रहें इकठे सखा वताए।१३७।
(१) यस्मादिश्वमुदेति, इस पूर्वोक्त श्लोककर पुरुषका रूप कहा। (२) साधुसा
इसमकार स्वीकार किया। (३)(दासुपर्णा स्युना सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वना
तपोरन्यः पिपलं स्वा दत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ अर्थयहः-दो पक्षी जीवात्म
परमात्मा सो कैसे हैं. साथ रहिनेवाले हैं तथा परस्सर अनुकूल हैं, तथा एक शरीररू-
वृक्षा आलिङ्गन (स्वीकार,) करतेहैं तिन दोनोमें एक जो नीव है सो स्वादु (पकं
कर्मके फल भोगताहै और अन्यनो परमात्मा है सो तिस कर्मफलकू नहोभोक्ताहू
प्रकाशता है नाम साक्षिरूप होयकर देखताहै ॥

(१७०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
[अं
समान वृक्षम कीन सुवासा । एक खाइ फल एक उदार
बहुर पुरुप उपनिपत अलयो। कहो मात तहबहुरसुभयो।
सुन शिष्यनको एहु विचार । मिमांसा मोप्रति कीनु उचा
जह इच्छा तह कीजेगौन । लायक नाहि हमारे भौन १
मीमांसाते मैचली अगारी । तर्कविद्या और निहार
बहुते शिष्य सुसंग सुहाए । सेवत ताहिं निरंतर पाए१४
धनकी इच्छा मनमै धार । वैठी भूपति सभामझार
जलप वितंडावाद विसाला। छलनिग्रहवहुकरेकराला ११
सांख्यविद्या बहुर निहारी । वैठी लांबी भुजा पसारी
पुरुपनको वहुभेद वखाने । ततनकी गणना उर ठगने१४
कहे प्रकृतिसु जगत उपाये । महदादिक कमभाख सुनाए
वदुर पतंजलविद्या देखी । पुरुप भेदेवहुकहे विसेखी१४
मेसभ इनके निकटि सुगई। भाप्यो ईहावासहित अई
तर तिन करो सुकरमअलाइ । मेपुन वही सुदयो वताइ१४
ईश्वर निखल मुजगत उपाए । पुरुप नाम पुन वही कहाए।
काधयुक्त ताम इक भई । फुरेहोठयों वातअलई ११५॥
(१) (उभयपक्षस्थापनानी विनिगापुरुया नसः) अर्भपहः-वादी पनि
दोनोरमांक स्थापन करनेहारी ऐसा ना परस्सरनातनी स्थावान् नाली मनिरामी दीनी
को प्रमउत्तरका कयाई नाम नाम नसंह। (२)(सामानहोना निगी
कपा विस)असं यदः-आप पर्श म्यानत रहित मी मा नोनीमा
पुरुषको परसरकया है ताका नान वितंडाई । (३)(तनुमा या कारः)
अर्थ पहः-तनाम्नुके बोपनी इच्छा होमी नारसरममा
नारवाई। (१) (अनिल प्रयुनग्य समस्यामानान्)प्रपा
अनिरसमें कपनारदहुए गन्दं अन्य वर्गम मानसा (५) TRA
गुर मनासा नाम नानि ना हनिमें महदा, मनमा
जायमfitATRIEमा
11.7

.
आज कृतार्थभूरभये सुमिटी निजआत्मकी कलखा
वोधकरे सभकाजसंपूरन, यूत सुपूतभये सुखदाई ॥२
दोहा।
। श्रद्धा मति विवेक पुन, शांति यमादिक धार ।
सर्वात्मप्रभविश्न जो, सोहम भए उदार ॥ २०८
हरिकी भक्तिप्रसादते, भए कृतार्थ रूप ॥
वन्धन सगल मिटाइया, पाए ज्ञान अनूप ॥२०
बैठ इकंत सुमोन गहि, मनकर कीनो ध्यान ॥
शांतिभयो भय शोकहन, भयो मोह सभहान ॥२
यांप्रबोधहित भवनतजि, भवें भवारण्यमाहि ।।
ताकोपाइ सुमुनिभयो, मैं निजभवन सुमाहि ॥२
विष्णुभक्ति आई तवै, उरमै हरप अपार॥
आइ समीप सुपुरुपके, कीनो एहु उचार॥२१२
वहुतकालकर फले जग, मोहि मनोरथ आज।।
शांतिअराति सुतवपिखों भये सगल ममं काजा
पुरुप कह्यो तव कृपाते, कोफल दुहकर आहि ॥
ऐसे मुखो अलाइकर, पन्यो सुचरननमाह ॥२
दोहा।
विष्णुभक्ति सुउठाय तिह, कीनो एहु उचार ॥
पूतकहो प्रयकाजकछु, पुन मैं करों तिहार ॥२
पुरुप कह्यो अव याहिते, परे नप्यारे काज ॥
जीत अराति विवेकनृप, भयो कृतार्थ आज ।।
(१) श्रद्धा गुरुवेदवास्ययोविश्वासः,-विवेकमतिनित्यानित्यवस्तुविवेक
न्तिदासीन्यम्-यमश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।
:

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१७१) कौन बलाय कहांते आई । जाने ऐसी वात अलाई ॥ ऐसी बुद्धि तुमारी यातें धक्केखातफिरतहै ताते॥१४६॥ हापापिनि ईश्वरहैं जोई । किहाविध जगत् उपावै सोई॥ एक कहें प्रधान उपायो। एके कहें प्रमाणुजायो॥१४७॥ योसुन रायविवेक सुजोई । लागो करण उचारण सोई॥ तरकविद्यालो सभ जेती । दुष्टबुद्धि जानी सभतेती १४८ कार्य अहै निखलजग जेतो। ईश्वर सगल उपायो तेतो।। एतीवाति नजानत जेई । हैं अति मूरख जगमै तेई१४९॥ प्रधान प्रमाणुलौ समजते । कल्पत अहे सगल पुन तेते॥ भूमि नीर अरु पावक पवना । कलपत सगल स्वप्नपुरभौना।। गन्धर्वनगर पुन इंन्द्र सुजाल । तांसमजान असत बिसाल ॥ सीपरूप ज्यों रज्जु भुजंगा ब्रह्मअज्ञानजन्योजगअंगा१५१ दाहा। ब्रह्मज्ञानके उदेते, होवतह पुन लीन ॥ ज्यों जागेते होतहै, स्वप्न सगल भ्रम खीन ।। १५२ ।। चौपाई। विकारसंक तिहभीतर जोई । मूढमति उर कल्पी सोई॥ शांति सदा वहिज्योति प्रकासी। नित्यप्रकास सदाअविनासी ॥ जगत गन्धर्व नगर सुउपाए। रंचकनाहि विकार सुपाए । नीलमेघ अरु धूल अपारा । नभमै करेनरंच विकारा।।१५४ चौपाई। संदेहदवानल चीतमझारी । अमृत सिंच विवेक निवारी ॥ मेरो चीतसु अतिहरपयो भिलो विचारविवेक अलयो१५५ (१) सांख्यो । (२) नैयायिक ॥ पुरुप उवाच॥

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• दोहा। पुरुप कह्यो उपनिपतको, बहुरों करो प्रकास ॥ तरकविद्या पासत, कैसे भई उदास ॥ १५६॥ उपनिपदुवाच ॥ सर्वभईते क्रोध मन, ऐसे कीन वखान ॥ कहे जीवकी मुक्ति यह, सकलविश्वकर हान ।। १५७॥ तातें नास्तकपंथको, एअव करे उचार ॥ केसनतें याको गहो, करो भलीविध मार ॥ १५८॥ चौपाई। पुरुप नारायण ईश्वर जोई। तब मै चीत चितान्यो सोई ।। कह्यो पुरुप ईश्वरहै कोइ तव करुणाकर जानो सोइ १५९ उपनिपत्कयो जो आपनजाने। ताको उत्तर कौन वखाने । हरपसंयुक्त पुरुप पुन कहे । किहविध मेपरमेश्वर अहे १६० उपनिपतको परमेश्वर जोई। तोतेभिन्न नही पुन सोई ।। तूं परमेश्वरते नही न्यारो । ऐसे सदा चीत निरधारो १६१ दोहा। माया अहे अनादि जो, ताकी संगति पाइ ॥ जल सूर्य प्रतिक्विज्यों, भेदवंत दिसलाइ ।। १६२॥ बहुरो पुरुप विवेक प्रति, कयो जोर कर दोइ ॥ भगवन अर्थउपनिपतको करो न निधे होइ॥ १६३ ।। चापाइ। मै अवच्छिन्न भिन्न पुन जोई। जरामरण घरमा पुन सोई॥ नित्यअनंद चिदात्म गाए। परब्रह्म मम रूप वताए १६०॥ (१) रोग बसिन । (२) निम्न् ।

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१७३) कह्यो विवेक पदार्थज्ञान । अवलग तोहिभयो नहि भान।। पदार्थज्ञान उपावसु जोई कह्यो पुरुपअव भापोसोई१६५ कह्यो विवेक सुनो मनलाई । तोको देहु उपाइ वताई ॥ तत्वंपदके अर्थ भनीजे । एकवाच्यपुनलक्ष कहीजे१६६ वाच्य अभिन्न कदाचित नाही । लक्षमाहि विरोधसु नाही। लक्ष चिदात्म है ये जोई। सो मेयों उर चितवो सोई१६७ निखल उपाधिसु दूर निवारो। बहुरो तत अर्थ निरधारो॥ तत्वमसि यों भाखे वेद । तातें निखल मिटावे भेद १६८ निखलद्वैतको दूर निवारो। चिदानंद उर आत्म धारो॥ बहुर पुरुप उपनिपत अलयो।तिहउपरंत कहो क्याभयो१६९ उपनिपदुवाच ॥ दोहा। तवते सर्व सुदुष्टमति, मोहि फरनकेकाज ॥ दोरीचारों ओरते, मैंतव चाली भाज ॥ १७० ॥ सीतापति रघुवंशमणि, रामशील यशभौन ॥ जिह दंडकवनमै गए, तिह मैकीनो गौन ॥ १७१ ।। तिह मंदर परवतविपे, मधुसूदन असथान॥ ताहिनिकट जोदशामें, भई सुकरों वखान ॥ १७२॥ चौपाई। किनहूँमै भुजदंड प्रहारे । तोडि मणि करकंकण तारे॥ चूडामणि शीशते लीनो । खेंचे केशवहुतदुःख दीनो१७३ (१) के कपण्डतोने. संधिविभक्तिमा नो मेरेभुनदण्डहैं सो तोडडारे, तथा कंटको मणिस्थानी अहंग्रह उपासनाहे सो फोडहाराहै अर्थात् संदकर प्रतीक उपासनामें स्थापन कर भी करके कंकणस्थानापन निष्कामकर्म तथा विधिह इनदोनोको हरणकरे हैं और नूहामणीस्थानापन नो तत्वमस्पादिमहावास्य, तिनको मतवादियोंने शीशको न्याई प्रधान ४) प्रवाधचद्रादय नाटक। [अं०६ दुरविदग्ध बहुता बनसाही । दासीकरन सुमेंउरचाही विछुरी मम विवेकते जान बहुविधमेदुःखदयोअजान १७ कह्यो पुरुप बहुरोंभयो जोई। मोको सगल सुनावो सोई। कहि उपनिपत सुनो मनलाई । तव मेरे हरि भये सहाई १७० तव मधुसूदनके असथान । निकसे पुरुप परमवलवान । लेकरगदा सगलतेडानी । तव.मोको वहिछाडि पलानी। राजोवाच॥ दोहा। भागविहीन विमूढजे, करेंते अपमान ॥ सहे न उरमै रंच वहु, जगसाक्षी भगवान ॥ १७७॥ पुरुष उवाच ॥ वैदुष्टादशदिश गयी, दंडक विपनमझार॥ तवते कौन सुविधभई, मोको करो उचार ॥ १७८॥ उपनिपदुवाच ॥ चौपाई। गीताके आश्रमकीओरा । दीरी मे उर डन्यो सुमोरा ।। नूपर टूटिपरी • पथमाही । वरी जाय आश्रमकेमाही १७९ तव गीता दुहिता मम प्यारी । पेखिकह्योआई महतारी ॥ मातमातयों मुखो अलायो । मैपदपंकजशीशु झुकायो १८० -मुझ उपनिषदसे टीपाद अर्थात् अंशअंशी, विकारविकारी, कार्यकारण, माश्यमवशफ, आधेयआधार, उपासकउपास्यादिक भान् (ज्ञान) कर असंड अर्थका संहन किया तथा अवांतरवास्परूपी फेा तिनवादियोंने मेरे बवह भात्र यद्दद- (सत्यं नमनं मन) इसअवांतरवास्यने मतानातिमानीहे तथा ज्ञानादिक गुणमानत हैं इति । (१) चरणभूषण । (२) मर चरणों में शिर निवाया ।

+ [अं०६] प्रवोधचंद्रोदय नाटक । (१७५) भलीभांति मुहि अंकमिलाइ । हेमपीठमै ल्यो वैठाइ । भयो वृत्तांत निखल तिनजान्यो।वहुर सुमोकोएहुवखान्यो १८३ दोहा। मात डरो नहि चीतमें, तेरो कर अपमान ॥ दुए यथेष्टमें रमंजे, ताहि हने भगवान ॥ १८२॥ चौपाई। श्रीपति योंमुख आप वखाने । दुटसुजे उपनिपत नमाने ॥ क्रूर नराधम है जग जेते । असुरयोनिमेंडरों तेते॥१८॥ सुनकर पुरुप.अनंद तव भयो । यो मुखमाहि सुवैन अलयो॥ सुन्यो अर्थमै - पूर्व जोई । उपनिपत करावत निश्चे सोंई। कवि रुवाच ॥ दोहा। श्रवण मनन पूर्णभयो, निखल संदेह निवार ॥ निदध्यासनकी चाह उर, भई सुपुरुप उदार ॥ १८५॥ चौपाई। याअवसर निदध्यासन आयो । बैठ सभामै एहु अलायो । विष्णुभक्तिने मोहि पठायो । तात मै ईहाचल आयो१८६॥ | गूढ हमारो आसय जोई उपनिपत विवेकप्रति भाखोसोई दोनोको यहबात प्रकास । पुरुपमाहि तूंकरी निवास १८७ (१)गीतामें कहाहैः-तानह द्विपतः दूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यननमशुभाना- सुरीप्वेवयोनिषु ॥ अर्थयहः-हेअर्जुन-देषकरणेहारे तथा फूर तथा नरोंविषेअधम तथा निरंतर भशुभकांकू करणेहारे ऐसे तिन आसुरमाकृतिपुरुषोंकू मैं परमेश्वर अत्यन्त क्रूर व्यावसादिक योनियोंविषे ही गेरताहूं। (२) श्रवणनामादेते ब्रह्मण्युपनिषदांता- त्पर्यावधारणम् । मननं नाम युनिभिरनुचिन्तनम् । निदिध्यासनं नाम विनातीयमत्यय- तिरस्कारेण सनातीयमत्ययप्रवाहीकरणम् ॥

बहुर विलोकसु एहु वखानी । यह वैटी उपनिपत सुरानी॥ पुरुप विवेकसंग सुहाए । चलो नजीक सुदेहसुनाए १८८ एसवखाननिकट बहुगयो । उपनिपतसमीपसुवाक अलयो देवी विष्णुभक्ति है जोई।ताहि वखान्यो सुनिये सोई १८९ संकल्पयोनि देवता सारी। यह नीकेमै आप निहारी॥ उपनिपतसंगर्भा तूं अब भई । कन्या तेउरमै निरमई॥१९॥ और प्रबोधचन्द्र सुत जान । मेरो कह्यो सुसत्य पठान ॥ फरंसुभावजु कन्या अहे । उपजीनिखलसंवन्धी देहे १९१ ब्रह्मविद्या कन्या जोई। मनमें करो संचारण सोई॥ संकर्पणविद्याको उरधार । मनके उदर कन्या डार १९२॥ प्रबोधचन्द्र पूत पुन जोई । पुरुपसमर्पणकीजे सोई॥ विवेकसहित तूं मेरे पास ।उपनिपत करो अव सहजनिवास दोहा। विष्णुभक्ति जोभाष्यो, सोईकरौं न और ॥ योंकहि संग विवेकके, गई इकंत सुठौर ॥ १९४॥ निदध्यासन तव पुरुपके, कीनो आन प्रवेश ॥ धन्यो पुरुप उर ध्यान तब, जाकर हरे कलेश १९५ ॥ नेपथ्यमाहि प्रवेशकर, दोनो नयन मिलाइ। अद्भुतरूपध्याय उर, वोल्यो सहज सुभाइ ।। १९६॥ (१) संकल्पमात्रतेउत्पतिहै निनोको न मैथुनसें तथा चश्रुतिः (ब्रह्म वा इदमय सीत् ) इहासें आरंभकरके ( इदंसर्वमभवत् ) ईहापर्यंतसंकल्पमभवत्व दिखायाहै है- रण्यकमें इसमकारमै योगसामार्यनन्यध्यानसे नान्या । (२) विवेककेसंकल्पसें । ३) जगत्का नाशक होनेते कूरसुभाववाली है। (४) आत्मसाक्षात्कार रूपा । ५) योगकर आकर्षणरूप । (६) निरतिशय ब्रह्मपकाशक || [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१७७) मन वक्षस्थल फोरकै, कन्या भई प्रकास ॥ सहत समग्री मोहको, कीनो एक ग्रास ॥ १९७॥ तडता समदमकी महां, दिशको तिमर मिटाइ। अंतरध्यानक्षणमै भई, ऐसोरूप दिखाइ ॥ १९८॥ यह प्रबोधशशि उपज्यो, ताको भ्रात विसाल ॥ सभाप्रवेश प्रवोध तव, कीनो वाहूंकाल ॥ १९९॥ कहांगयो किनभयो भव, लीनभयो ततकाल । जाउपजेते भयो यों, सोमै बोध विसाल ॥२०॥ परकरमदेपिखभाष्यो, यहाँ पुरुप उदार॥ चलों समीप सु याहिके, करों सुपाद जुहार ॥२०१॥ जाइसमीप सुपुरुपके, भगवनमुखो उचार ॥ हो प्रबोधउपनिपत सुत, वन्दो पाद तिहार ॥२०२॥ पुरुप विलोक आनंदर, हेसुत परम अनूप ॥ मिलोसु मेरे अंकमें, कीजे शीतल रूप ॥२०३॥ मिल्यो प्रबोध सुपुरुपको, शीतलचन्द उदार ॥ पुरुप अनंद सुहोय उर, लागो करन उचार ॥२०४॥ अहो तिमर पट फाटियो, भयो प्रभात अनूप॥ निखलकलेश विनाशया, पायो परम सरूप ॥२०॥ मोह अंधेरै विनाशकर, नीद विकल्प सुमार ॥ वोधशशि यह ऊपजो, जाकी प्रभा अपार ॥२०६॥ सवैया।. आज परात्म पूरन जो, वहि पूरन रूप सुदेत. दिखाई ॥ वन्धन जो सभ दूरभये, रविसी उरअंतर ऊजलताई।। (१)-(संसारराज्यपगमा शेषः प्रातः क्षणो मतः) अर्थयहः संसाररूपी रात्रीके नानसे बोधही मातःक्षम मान्याहै । (२) अज्ञान । (३)भ्रमही निंदाहै ॥

आज कृतार्थभूरभये सुमिटी निजआत्मकी कलखाई॥ वोधकरे सभकाजसंपूरन, पूत सुपूतभये सुखदाई ॥२०७॥ दोहा। । श्रद्धा मति विवेक पुन, शांति यमादिक धार॥ सर्वात्मप्रभविश्न जो, सोहम भए उदार ।। २०८॥ हरिकी भक्तिप्रसादते, भए कृतार्थ रूप ॥ वन्धन सगल मिटाइया, पाए ज्ञान अनूप ॥२०९ ॥ वैठ इकंत सुमोन गहि, मनकर कीनो ध्यान॥ शांतिभयो भय शोकहन, भयो मोह सभहान ॥२१०॥ यांप्रबोधहित भवनतजि, भवें भवारण्यमाहि ॥ ताकोपाइ सुमुनिभयो, मैं निजभवन सुमाहि ॥२१॥ विष्णुभक्ति आई तवै, उरमै हरपअपार॥ आइ समीप सुपुरुपके, कीनो एहु उचार॥२१२॥ बहुतकालकर फले जग, मोहि मनोरथ आज॥ शांतिअराति सुतवपिखों, भये सगल मम काजा॥२१३ पुरुष को तव कृपाते, कोफल दुहकर आहि ॥ ऐसे मुखो अलाइकर, पन्यो सुचरननमाह ॥ २१४ ॥ दोहा। विष्णुभक्ति सुउठाय तिह, कीनो एहु उचार ॥ पूतकहो प्रयकाजकछु, पुन मैं करों तिहार ॥२१५ ॥ पुरुप कह्यो अव याहिते, परे नप्यारे काज ॥ जीत अराति विवेकनृप, भयो कृतार्थ आज ॥ २१६॥ (१) यद्धा गुरुवेदवास्ययोर्विधासः,-विवेकमतिनित्यानित्यवतिकविषया-शा. न्तिदासीन्पम्-यमधिनवृत्तिनिरोधः ॥

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१७९) रुजविहीन आनंदपद, थाप्यो ताहि सुमोहि ॥ विष्णुभक्तिपदवन्दना, करेकाज सभ तोहि ।। २१७ ।। सर्वया । यद्यपि पूर्ण आहि मनोरथ तदपि मात सुएहु वरे॥ रुचिके अनुसार करें वरपा, घनभूपति भूमिसुपालकरे। तेंकरुणाकर लोक महात्म, आत्मको तम दूरहरें। भवसागरधारविपेममता, गहि वोधजहाजसुपार परें।।२१८॥ दोहा। प्रत्यक्तत्व निज आत्मा, कीरति वरमाभूप॥ मनोवृत्ति सभनाटकै, कोविदलखें अनूप ॥२१९॥ सवैया। यह नाटकहे रसुभूपतिके उरमाहि सुभाऽसुभ ज्ञानभयो । तजिया जगमाहि कुपंथ वडो शुभपंथ महीपति चीतलयो॥ विसमाय रह्यो उरभीतर सो सुशिलूपनको बहु दानदयो । बहुनाटकहेंभवमंडलमें नरनाहनको यह नाटनयो॥२२०॥ दोहा। कहनेको यह नाटहै, दरपन अहे अचार ॥ पावै पावन मोक्षको, कीने याहि विचार ॥२२१॥ गौरी जननी लोकमें, राया जनक महान ॥ गुलावसिंह सुत ताहिके, नाटक कीन वखान ॥२२२॥ कीरति पूरनलोकमै, पूरण परमानंद ॥ पूरन पददातारप्रभु, वन्दी श्रीरघुनंद॥२२३॥ (१) अन्तः करणमें जो अज्ञान ॥

Prabodhchndrodayanatak

Author
Kavigulabsingh
Title
Prabodhchndrodayanatak
File name
Prabodhchndrodayanatak
Text
OCR done
Citation
3391952
Published
2011/08
Publisher
Bombay,khemraj Shrikrishandas
Language
Sanskrit
Pages
209
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310991
Barcode
99999990314425.00
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Banasthali University
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