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Ankon Ki Kahani

Dr. Jai Narain Kaushik · 2011/03

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अंकों की कहानी
डॉ. जय नारायण कौशिक
साहित्यसहकार
दिल्ली-110051

tawiona t 01
الخط الماء
دامد
عدد 4 ماهه 066
لما إلا لله
110، ط الرشد دارد

विषय-सूची
5
अक
अक गणना
एक
FEEEEEEEEEEE
8
15
23
28
35
40
47
52
57
सात
आठ
62
दस
66
69

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अक
-
मैं सख्याजगत का चिह्न अक हूँ। मेरा अर्थ ही चिह्न
है । जिस समय मै टेढा-मेढा रूप बन कर पहली बार लिखा
गया तो मैं अक का चिह्न कहलाया। मेरे टेढे-मेढे, आडे-तिरछे
कई रूप बने । एक रेखा (। या -) एक का चिह्न बनी।
दो रेखाएँ (॥ या =) दो का चिह्न और तीन रेखाएँ
(n या =) तीन का चिह्न मानी गई। इसी तरह चार, पाँच,
छ, सात, आठ और नौ एक-एक रेखा बढा कर लिखे जाने
लगे। कुछ मनुष्य केवत एक-एक बिन्दी लगा कर मुझे
लिखने लगे।
धीरे-धीरे मेरे रूप का विकास हुआ। जिस रूप में
आज मैं लिखा जाता हूँ उस तक पहुँचने की यात्रा हजारो
वर्ष लम्बी है।
भारत की सभी पद्रह भाषाओ मे लिखे जाने वाले अको
का विकास ब्राह्मी लिपि से माना जाता है। हमारा इति-
हास हजारो वर्ष पुराना है। कुछ विदेशी लिपि के अको का
विकास भी ब्राह्मी से माना गया है।
नमूने के तौर पर हमारा रूप आगे चित्रो मे निहारिए।
देश की राष्ट्रीय भापाओ मे मेरे नाम का उच्चारण भी
सीखिए।
एक बात यह है कि जिन्हे लोग भूलकर अग्रेज़ी अक

6
(1, 2, 3, 4, 5 आदि) कहते है ये वास्तव मे भारतीय मूल
के ही है । आजकल इनका नाम भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अक
पड गया है।
अक लिखने को विद्या का विकास सबसे पहले भारत
मे ही हुआ। लेखन की शिक्षा धूलि पर अक बनाकर दी
जाती थी। अक लेखन को धूलिकर्म कहते थे। कागज़,
स्याही और लेखनी के अभाव मे पाटी या तख्ती पर धूलि
विछा कर अक लिखे जाते थे।
जिस समय भारत से अक-विद्या अरब देशो मे पहुँची
तो उन्होने इसका नाम 'हिन्दसा' दिया और गणित-विद्या
को 'हिसाबुल हिन्द' कहा गया। यही अक-विद्या अरब
देशो से यूरोप मे पहुँची। अब तो मेरा रूप अन्तर्राष्ट्रीय
हो गया

देश विदेश की अक-पद्धतियो के कुछ नमने राष्ट्रीय रामन मयअफ बेबीलोनी । ... Le T TT m/IV y VI VII VIL VIm/nx EX V b. 6 01 OU - 2 2 ३ 4 ॥ 5 ५ . h (६ 4 17 2 8 ८ ६ 3 120 120 2008 30 (३० wo 140160do 50५० 00 16010140 7000140 80 COM 90101१० 100900100lm IIXX XXX IXxxx Ipxxxxx Y YC Y YIC YE अक गणना आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जिस समय मनुष्य जगलो मे नदी किनारे घूमता था तो उसे गिनती की कोई आवश्यकता नही थी। गिनने की आवश्यकता सग्रह करने की आवश्यकता के साथ हुई । अपनी भेड-बकरियो या गाय- भैमो की गिनती का उसने मरल उपाय निकाला। हर पशु का एक तिनका या झूटा रखा जाता । जितने तिनके या खूटे बच जाते उससे वह अनुमान लगाता कि उसके कितने पशु जगल से नहीं लौटे उसने तिनको के स्थान पर छोटे ककडो से भी पशुओ की गिनती का ताल-मेल वैठाया। एक से दो तक को गिनती गिनने में काफी समय लगा। शरीर में दो हाथ, दो पैर, दो आँखे और दो कान है। इन्ही के साथ ताल-मेल बैठाकर दो तक की गिनती आरभ गिनती गिनने की कहानी कुछ और आगे बढी । एक हाथ मे पाँच ऊँगलियाँ होती हैं । पाँच तक की गिनती का नाम एक पजा दिया गया। पांच-पांच की ढेरी बना कर गिनती की कहानी और आगे वढी । दोनो हाथो मे दस उँगलियां होती है। पजे की गिनती दो पजो तक पहुँची। इस प्रकार 6, 7, 8, 9 और 10 तक गिनती की कहानी आगे बढ़ी।

नागरी अक शाती तक १वी शती १२वी १२वी से शती १६वी पाल पोथियो जैन से पोथियो से ११वी शती शारदा टाकरी मैथिली 12 21 10 12 22 2 उ 3222 [३२ ३३3/2313३ 2 6 ४४ ९४५४ प घyu247in ! 7 -- strelo 2 ६६ठ ६ 2733/25/25 ali lite slelo- کے د و در جاهى ० १

10
,
मनुष्य का ध्यान उँगली के पोरो की ओर भी गया।
हर उँगली मे तीन पोरे होते हैं। चार उँगलियो के 12 पोरे
हुए। बहुत से बच्चे जोड सीखते समय आज भी पोरो की
सहायता लेते है। बारह की सख्या का नाम दर्जन पडा।
आज भी केले, सन्तरे आदि फलो की गिनती दर्जन के हिसाब
से की जाती है।
दस, बारह से होता हुआ सख्या का इतिहास 20 तक
पहुँचा । मनुष्य ने दोनो पैरो की उँगलियाँ गिन कर हाथ की
उँगलियो मे जोडी । इस तरह पहले यह सख्या 15 तथा
बाद मे 20 तक पहुँची। बीस की गिनती को बीसा तथा
कोडी नाम दिया गया । एक बीसा, दो बीसे, तीन बीसे,
चार वीसे आदि से गिनती की कहानी साठ तथा अस्सी
तक पहुँची । साठ को सय्या का बहुत महत्त्व है । एक घटे
मे साठ मिनट होते है । एक मिनट मे साठ सैकिंड होते हे ।
सौ की ढेरी का नाम सैकडा पडा। क्रिकेट के खेल में
शतक या सेच्युरी का बहुत महत्त्व है। सौ दौडे या रन
कहने के स्थान पर शतक शब्द कहना आसान है।
आवश्यकता के अनुसार सौ-सौ की ढेरियॉ बना कर
गिनने का कार्य आगे बढा । एक सौ, दो सौ, तीन सौ आदि
से बढ कर गिनती गिनने की कहानी नौ सौ तक पहुँची ।
दस सौ की ढेरियो को एक हजार या सहस्र नाम दिया गया।
इस प्रकार दस हजार तक की गिनती गिनी जाने लगी।
सौ हजार को एक लाख नाम दिया गया। सौ लाख एक
करोड कहलाए। इसी प्रकार अरव, खरब, नील,
को सख्याएँ बनी। जब कोई वस्तु मनुष्य की गिनती से बाहर
,
पद्म आदि

11
-
हो जाती है तो वह उसे असख्य कह कर अपना काम
चलाता है।
देखा आपने, एक की सख्या किस प्रकार बढकर
असख्य तक पहुँची। मनुष्य को एक की सख्या को भी कई
छोटे भागो मे बॉटने की आवश्यकता पडी। एक रोटी को
कभी दो, कभी तीन और कभी चार टुकडो मे बाँटा गया ।
एक वस्तु को दो भागो मे बॉटा गया तो उसे आधा या अर्ध
नाम दिया गया। जिस समय यही भाग तीन, चार, पाँच
आदि के साथ जुडा तो यह 'सार्ध' कहलाया यानी आधे के
सहित । यही 'साध' बाद में 'साढे' बन गया जैसे-साढे तीन,
साढे चार आदि ।
एक वस्तु के चौथाई भाग को पाद या पाई कहा गया।
जिस समय किसी सख्या के साथ चौथाई भाग जोडा जाता
है तो वह सख्या 'सपाद' अर्थात् पाई समेत कही जाती है ।
'सपाद' को ही वाद मे हम 'सवा' कहने लगे। सवा दो,
सवा-तीन, सवा चार आदि का अर्थ है कि दो, तीन, चार
आदि के साथ चौथाई भाग भी जुडा हुआ है।
अव एक वस्तु के चार भागो मे से तीन भागो पर विचार
करे। तीन चौथाई का अर्थ है कि पूरी वस्तु से एक पाद या
अश न्यून या कम । यदि किसी वस्तु मे एक अश न्यून है
तो उसे 'पाद ऊन' या 'पादोन' कहा जाने लगा । यही अश
पाद-ऊन, पौन या पौना कहलाया। पौने एक, पौने दो, पौने-
तीन, पौने चार आदि का अर्थ हुआ एक, दो, तीन, चार
आदि सख्याओ में चौथाई भाग या अश की कमी
मनुष्य हर काम मे सरलता की खोज करता रहता
-

12
है। 19 29, 39, 49, 59, 69, 79, का उच्चारण
करके देखिए । इनको नामश उन्नीस, उनत्तीस, उनतालीस,
उनचास, उनसठ, उनहत्तर और उनासी कहा जाता है । इन
सब गिनतियो के आरभ मे 'उन' शब्द जुडा हे । 'उन' का अर्थ
हे न्यून या कम । यानी बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ,
सत्तर ओर अस्सी की सख्याओ से एक कम । अगर आप
'उन' का अर्थ समझ ले तो इन सख्याओ को कभी भी अशुद्ध
नहीं लिखेगे । यहाँ दस नौ, बीस नौ, तीस नौ आदि न कह
कर बीस, तीस, चालीस, आदि की पूरी सय्या से एक कम
(उन) कह कर काम चलाया है ।
पीछे चित्र मे रोमन लिपि के अको को देखिए । हर
सय्या की गिनती मे दाई ओर एक जोड दिया जाता है ।
जैसे I, II, III, III । पाँच की सरया पूरी होने पर पजे का
निशान बना दिया जाता है । जैसे--V । फिर आठ तक पाँच
अक के दाईं ओर एक-एक को सय्या खीच दी जाती है।
जैसे VI, VII, VIII । अब जरा दस, बीस, तीस ओर चालीस
को देखिए। इन्हे दस-दस को ढेरियो के चिह्न से दर्शाया
गया है । जैसे-x, xx, xxx, ।
इस लिपि मे भी नौ, उन्नीस, उनत्तीस आदि को लिखने
के लिए पूरी सय्या के बाईं ओर एक कम का सकेत दिया
जाता है । जैसे—IX, IXX, IXXX आदि ।
दस से ऊपर की गिनती मे देवनागरी लिपि मे 11 से
18 तक की गिनती 10 को आधार मान कर बोली जाती
है। जैसे-दस एक ग्यारह, दस दो बारह, दस तीन तेरह
आदि। 19 की सख्या एक कम वीस (एकोनविंशति) बोली
।

13
जाती है।
।
उच्चारण की सुगमता के लिए दस शब्द कही 'रह तो
कही 'दह' बोला जाता है । जैसे—ग्यारह, बारह, तेरह,
चौदह, पद्रह आदि अको मे एक दस, दो (द्वि) दस, तीन
(त्रि) रह, चार (चतुर्) दह, पच (पच) रह आदि अक ।
अग्रेजी अको के उच्चारण मे भी टुवेल्व, थरटीन,
फोरटीन, फिफटीन आदि शब्दो मे टू, श्री, फोर,
फाइव आदि अक पहले वोले गए हे और Ten या Teen अक
बाद मे बोला गया है।
कहानी काफी लबी होती जा रही है। कुछ अको की
छानवीन आप अपनी ओर से भी करे। अक गणना की कहानी
हम यही समाप्त करते है।

भाषा देश विदेश की विभिा लिपिया के माप प्रयुक्त होने पाले ब्राह्मी मे वियमित आधुनिक मर सकेत 2 3 4 5 6 7 8 9 . भारतीय अतर्राष्ट्रीय । देवनागरी १ गुजराती १ २ ४ ६ 0 २ ४ n ५ . به به و بس बगला २ ७ 8 6 5 १ रा १ २ ह 2 ए र गुरुमुवी तेलुगु कन्नड x 2 ० ० म 2 F मलयालम m १ m 0 . भDI । 12 ६ ५ ४ १ ट ० ० ० २ ० . b. 6८ ? ० .P. 30 ? ३ ४ ३ 34 . R 0 0 २८ 0 S D a तमिल ६ 2 h उडिया तिब्बती मगोली १ n मिहली. बी ० 2 ० 6 2 . 9 Or o G स्यामी " रस्मेर १४ m ८८ जावी 26 6 ८ . .

एक मैं सख्या जगत का जनक 'एक' हूँ। मेरा इतिहास सृष्टि के समान प्राचीन है। मेरा अपना एक विशाल परिवार है। इकाई से लाख, अरव, खरब, पद्म, शख, आदि मेरा एक-एक अश मिल कर बने हैं। मैंने मनुष्य को एकता का पाठ पढाया है। एक-एक दो और ग्यारह होने का सिद्धान्त उसने मुझ से ही सीखा है। ज्योतिष, वैद्यक, गणित, राजनीति, सामुद्रिक, सगीत, कोप, उपवन विज्ञान, न्याय, धर्म, इतिहास, व्याकरण, वाणिज्य आदि के विभिन्न क्षेत्रो मे प्रयोग होने वाले अनेक शब्दो की रचना मेरी सहायता से हुई है । मैं 'एकमुख' होकर अर्थात् एक लक्ष्य की ओर प्रवृत्त होकर अपनी कहानी सुनाता हूँ। साहित्यकारो ने अपनी लेखनी को प्रभावशाली वनाने और अपनी विचारधारा मे गति और प्रवाह भरने के लिए मेरा प्रयोग लोकोक्तियो और मुहावरो के रूप मे किया । मेरे आश्रय से उन्होंने 'एक के दस-दस किए है। कथाओ को रुचिकर बनाने के लिए 'एक को चार' लगा कर कहा है। मेरा आश्रय लेने वाले सभी साहित्यकार 'एक- तवे की रोटी, क्या मोटी क्या छोटी' तो नहीं हैं किन्तु लेखक होने के नाते 'एक थैली के चट्टे-बट्टे' अवश्य है । मेरे आश्रय से उन्होंने 'एक पथ दो काज' की सिद्धि की, प्रसिद्धि मिली और भाषा भी प्रभावशाली बनी। मैं

भाषा
उच्चारण
हिन्दी
एक
पंजाबी
एक इक्क
उर्दू एक/यक
कश्मीरी
अरव
सिंधी
हिकु
मराठी
एक
गुजराती एक
बंगला
एक/अक्
असमिया
स्क/अक्
उड़िया एको
तेलुगु ओकटि
तमिल ओष्णु/ओनस
मलयालम ओन्नु
कन्नड आंद
संस्कृत
अंग्रेजी
-
एक
वन
ब्राली चीनी रोमन मयअंक वेबीलोनी

17
हर प्रकार से आपका सेवक हूँ। आपकी सेवा मे 'एक पांव
पर खडा रह सकता हूँ। मै ‘एक लाठी से मवको हाँकने'
का पक्षपाती नही हूँ। जो ऐसा करते है उन्हे 'एक की दस
सुननी' पडती है । यदि आप मेरे लिए 'एक चने की दाल'
बनना चाहे, या 'एक जान दो कालिब रहना चाहे तो मेरी
ओर मित्रता का हाथ वढाइए। मैं बहुत शान्तिप्रिय हूँ।
मेरा न तो 'एक पॉव भीतर और एक पॉव बाहर' रहता है
और न ही सदा 'एक पॉव रकाब मे रहता है। यही कारण
हे कि मेरे साथ 'एक जान हजार गम' वाली बात कभी
नही घटती। इसका यह अर्थ मत लगाइए कि मैं इस सिद्धात
का पक्षपाती हूँ कि 'एक चना भाड नही फोड सकता' । वह
अगर भाड नही फोड सकता तो भूनने वाले की एक आँख
को काना कर सकता है।
मैं अपनी शक्ति से भली प्रकार अवगत हूँ। अपनी
शक्ति के कारण मैं 'एक न शुद, दो शुद' अर्थात् एक विपत्ति
के रहते दूसरी विपत्ति के आ पडने वाली घटना मे दूर हूँ।
मैंने 'एक के दो-दो करना' अर्थात् दिन काटना नही सीखा।
मैं प्रसन्नचित्त रहता हूँ। मैं अभिमानरहित हूँ फिर भी 'एक
की दवा दो' वाली बात मे विश्वास रखता हूँ। मैं जिस दिन
से 'एक से दो हुआ हूँ' तभी से मैं सबको 'एक आँख से
देखता हूँ' । मेरा विशाल परिवार होते हुए भी 'एक अनार
सौ बीमार' वाले कलक से बचा हूँ। अपने परिवार को
कष्ट मे रखने वाले प्राणी मुझे 'एक आँख नहीं भाते'। इन्ही
विशेपताओ के कारण मैंने अक जगत को 'एक हत्या कर
दिया है' अर्थात् अपना एकाधिकार जमा लिया है।

18 - - धर्मगुरुओ की मुझ पर विशेष कृपा रही है । वे मेरा प्रयोग बडे गर्व से करते है। उन्होने मेरा सम्वन्ध अनेक देवी-देवताओ, यज्ञ-हवन आदि के साथ जोड दिया है। 'एक गव्य' स्वय साक्षात् एकाक्षर परब्रह्म है । 'एक दत', 'एक दष्ट्र', 'एक रदन', स्वय गणेशजी हे। 'एक-नेन', 'एक-लिग', 'एक-नायक', 'एक दृक', 'एक-नयन', 'एक नेत्रक', 'एक पत्नी व्रत', 'एक-पाद', 'एक-रस', 'एक-वर्ण, स्वय शिव है। 'एक चारिणो', 'एक चित्त', 'एक-निष्ठ' स्वय माता पार्वती है। 'एक पाटला', 'एक पर्णा' दुर्गा के रूप हे । दानी कुवेर ने मुझसे अपना सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अपना नाम 'एक कुडल', 'एक पिगल' रखवाया । बलराम ओर शेप भी 'एक कुडल' नाम से प्रसिद्ध हुए। 'एक वासा' या 'एक वासस्' जैनो का एक भेद होने के कारण मेरा सम्बन्ध जैन धर्म से भी है। 'एकाह' और 'एक रात्र' एक रात मे पूर्ण होने वाले यज्ञ हे । अत मेरा निवाम यज्ञ-हवन आदि कर्मो मे भी हुआ। 'एकेश्वरवादी' अपने मत 'ईश्वर जगत का सर्जन- नियमन करने वाली शक्ति एक ही है-के समर्थन के लिए मेरी शरण मे आए। यद्यपि आप मेरे 'एकज', 'एकजा' या 'एक तीर्थी' नहीं हैं तथापि आप 'एक मत' होकर मेरे महत्त्व को एकाकी होकर समझ सकते है। अक गणित का तो मानो मैं प्राण हूँ। छोटी से छोटी इकाई मे मेरा सूक्ष्म रूप और पद्म, नील आदि मे मेरा ही विराट् स्प जानो। पहले मैं 'एक-दम था' । शून्य ने मेरा वरण किया । तब से मेरा परिवार वढता ही गया । 'एका- 19 दश', 'एकविंशति', 'एकपष्टि, आदि आदि मेरे साथ अपना नाम अपने पिता के समान जोडते है। चौथाई, आधा, पौना आदि मेरे अश है। मेरे अकजाल मे बडे-बड़े गणितज्ञ उलझ जाते हैं । मुझे भली प्रकार समझने के लिए गणितज्ञो ने मुझे नियमो-उपनियमो मे वाँधा है। छोटी-बडी सभी गणित की पुस्तको मे मेरा स्थान सुरक्षित है। वैद्यो को आपने 'एक कुष्ठ', 'एक पत्रिका', 'एक मूला' (अलसी, शालपर्णी) आदि शब्दो का प्रयोग करते सुना होगा । औपधियो की करामात से वे मनुष्य को 'एक पाठी, 'एक घर' बना सकते है। सगोतज्ञो ने मेरा उपयोग 'एक तान' होकर किया है। 'एक तारा', 'एक ताल' (जिसमे ताल-सुर का पूरा मेल हो), 'एक ताला' (सगीत का एक ताल), 'एक तालिका' (एक मित्र राग) आदि मे मैं विद्यमान हूँ। डमरू को तो 'एक- सून' कहा गया है। अब व्याकरण तथा पिंगल क्षेत्र में अपने व्यापार की चर्चा करता हूँ। 'एक वचन', 'एक वचनान्त' मेरी सहायता से बने है। 'एक शेप' (द्वन्द्व समास का एक भेद जिसमे दो मे से एक ही पद रह जाता है) मुझे प्रिय है । 'एक मानिक', 'एक पदी', 'एक श्रुति' (वेद पाठ का वह कम जिसमे उदात्त, अनुदात्त आदि का विचार नही किया जाता) आदि मेरे ही रूप है। राजनीति मे मेरे कुछ शब्दो का 'एकच्छत्र' राज्य है । 'एक तत्र', 'एक शासन प्रणाली' 'एक सत्ताक', 'एक हत्या' आदि शब्दो की चर्चा तो आप प्रतिदिन सुनते ही रहते होगे। , .

20 - - अपने विपय मे अनेक बाते बताते समय यदि न्याय-क्षेत्र को छोड दिया जाए तो विषय 'एक तरफा' रह जाएगा। 'एक राय', 'एक पक्षीय', 'एक रुखा' आदि शब्द न्यायालयो मे नित्यप्रति सुने जा सकते है। प्राचीन काल मे 'एक हस्त- पाद वध', 'एक पाद वध' आदि दड 'एक राय होकर दिए जाते थे। न्यायाधीश बहुत से निर्णय 'एक साक्षिक' पर ही निपटा देते थे। आइए, इतिहास के सूत्रो मे भी आप मेरे साथ बँधिए । 'एकलव्य' द्रोणाचार्य का निपाद शिष्य था जिसने उसकी मूर्ति को गुरु मानकर वाण-विद्या मीखी ओर गुरु दक्षिणा मे दाहिने हाथ का अँगूठा काट कर दे दिया। 'एक-लिंग' मेवाड के राजवशो के कुल-देव रहे है । महाभारत मे वर्णित 'एक चक्रा' नगरी मे मेरा वास रहा है। विज्ञान जगत को भी मेरा लघु योगदान है। 'एक कोपी' (जिस प्राणी का शरीर एक ही कोप का बना हो), 'एक धर्मा', 'एकस्थ', 'एक पुप्पो', 'एक वर्ण', 'एकेन्द्रीय' आदि शब्द विज्ञान जगत मे प्रचलित है। 'एक सूत्र', 'एक मुख', 'एक दरा' आदि शब्दो को स्थापत्य-कला तथा 'एक देह' (बुधग्रह) शब्द ज्योतिष शास्त्र मे काम में लाए जाते - - मल्लयुद्ध करने वालो ने भी अपने दांव-पेचो का सवध मुझ से जोडा है। "एक लगा', 'एक दस्ती', 'एक हत्थी', 'एक पक्ष' आदि शब्द कुस्ती के दांव-पेचो के हैं। पशु-पक्षियो, लता-वृक्षो में भी मेरा विस्तार है। एक पुनका (कोडिल्ला पक्षी जो मछलो खाता है) मे मेरे प्राण 21 - हैं। 'एक दृक्' (कोवा) मी मुझ मे चेष्टा है। 'एक चर' (गेंडा), एक दता (हाथी) की में सवारी करता हूं। 'एक लेख' (सुन्दर फूल) मुझे अतिप्रिय है। जल क्रीडा के लिए मैं 'एक्-गाछी' (नाव) मे विहार करता हूँ। अब आप मेरे 'एक नोने (एक खम्बे पर खडा किया जाने वाला येमा) मे बैठकर विविध शब्दो पर विचारिए । 'एक चत्री', 'एक जन्मा' (राजा, शूद्र), 'एक जात', 'एक टक', 'एक जल', 'एक डिग्री', 'एक पदी' (पगडडी) आदि शब्दो से मेरा अनुराग है। 'एक विक्रय', 'एक मोला' व्यापारी पर मेरी विशेष कृपा रहती है। यद्यपि अपनी माता के मैं 'एक मूनु' हू तथापि 'एक हायन' (वर्ष) मे मैंने उसे निर्भय कर दिया था। मेरी मां ने मुझे 'एक कृष्ट' (एक बार जोता हुआ) रोत से उत्पन्न अन्न पिलाया था। मापा वैज्ञानिको ने मेरी शाब्दिक उत्पत्ति के विपय मे अनेक प्रमाण उपस्थित किए हैं। सख्यावाचक विशेपणो के विकास की चर्चा करते हुए विद्वान् मान लेते हैं कि वैदिक- पद-बहुला भापा से मैं सस्कृत मे आया । उस समय मुझे 'एक' कहा जाता था । प्राकृत भापा मे मैं 'एक्क' कहलाया। हिन्दी का 'एक' इस 'एक्क' से बना । उस समय मुझे 'एगा' भी कहते थे । 'ग्यारह' मे मेरा 'एगा' का रूप सुरक्षित है। सयुक्त सख्याओ मे 'ए' का 'इ' हो गया है यथा-इसकोस, इकत्तीस आदि । मेरे इतिहास के ज्ञान से आप सृष्टि के इतिहास के विकास का ज्ञान प्राप्त कर सकते है । मेरी 'एक' ध्वनि का

22
विभिन्न भापाओ मे थोडे स्वर-व्यजन भेद के साथ उच्चा-
रण इस बात का प्रमाण है कि मानव परिवार पहले एक
स्थान विशेप से देश-देशान्तरो मे फैला है। शायद आगल
भापा-मापी कहे कि हमारे 'वन' का आप से क्या सम्बन्ध ।
इसका उत्तर भी मेरे पास है । देश-भेद और काल-भेद के
भारी अन्तर के कारण अनेक शब्दो मे भारी परिवर्तन आ
गया। शब्दो के पर्यायवाची बने। ताश के खेल मे 'एस' (Ace)
शब्द का प्रयोग अव भी होता है । 'एस' का अथ 'इक्का'
या एक होता है। 'एस' मे 'सी' की ध्वनि 'क' की ध्वनि
के रूप मे भी उच्चरित होती हे यथा--'काउ' (Cow) । अत
'स' की ध्वनि को 'क' बोले तो एस (Ace) 'एक' के
अतिरिक्त और कुछ भी नही ।

दो
'द्विदेह' (गणेश), 'द्विमातृ' (गणेश) को नमस्कार कर,
'द्विसहस्राक्ष' (शेप) शायी, 'द्विज वाहन' (विष्णु) का ध्यान धर,
'द्वीपासनधारी, (व्याघ्र के आसन वाले-शिव) को स्मरण
कर मैं 'द्वि' अथवा 'दो' नामधारी अक अपनी जीवन कहानी
को दोनो हाथ बॉव कर आपको सुनाता हूँ। मैंने अपनी यह
जीवन कहानी 'द्विजो' से 'द्विगुणित' रुचि के साथ 'दोपहर'
मे 'दो घडी' के लिए बैठ कर सुनी थी।
मेरे जन्म के समय मेरी माता ने प्रसन्न होकर विप्रो
को 'द्विहायनो' (दो वर्ष की आयु की गाय) दान की। इस
प्रकार उसने अपनी 'द्वि-हृदया' (गर्भिणी स्त्री) प्रतिज्ञा पूर्ण
की। 'द्विजप्रपा' (पक्षियो आदि को पानी पिलाने के लिए
बना हुआ गड्ढा) का प्रवन्ध किया गया। पिता ने 'द्विजा-
यनी' (यज्ञोपवीत) धारण कर 'द्वि-रात्र' (दो रात मे पूरा होने
वाला यज्ञ) आरभ किया।। यज्ञ वेदी 'द्विजप्रिया' (सोमलता)
से सुगधित हुई । 'द्विजराज' ने ऋचाएँ पढी।
मैं 'एक' का 'द्वितीय' (पुत्र जिसके रूप मे आत्मा ही
दूसरी बार जन्म लेती है) हूँ। मेरा नामकरण सस्कार
'द्विवेदी' (दुवे) 'द्विजो' ने किया। 'द्वि', 'दो', 'दोऊ', 'दोउ',
'दोय', 'दुई', 'दू' आदि मेरे अनेक नाम है । "द्विशीपा'
(अग्नी) के समक्ष मुझे गुरुमत्र मिला। मेरा जीवन 'द्विभूम'
-
-
।

भाषा
उच्चारण
ब
हिन्दी दो
पंजाबी दो
उर्दू
दो
कश्मीरी
सिंधी
मराठी दोन
गुजराती बैं
बंगला
दुई
असमिया दुई/दुई
उडिया
तेलुगु
तमिल
रेण्ड/इण्ड
मलयालम रण्टु रण्ड
कन्नड
डायुरङ
संस्कृत द्वि
अंग्रेजी टू.
ब्रानी चीनी रोमन मयअंक वेबीलोनी
॥

25 - अर्थात् 'दो तल्ला' (दो मज़िला), द्विवज्रक (16 कोनो का भवन) भवनो मे बीतना शुरू हुआ। ननसाल से मुझे 'दो पलका' (दो नगीनो वाला), 'दो पल्ली' आदि आभूषण मिले । शीत से बचाने के लिए मुझे 'दो तही' और 'दो तारा' वस्त्र पहनने को मिले । बचपन से ही मुझे पशु-पक्षियो मे रुचि है। 'द्विककुद' (ऊँट), 'द्विप', 'द्विपायो'-'द्विरद-द्विहा' (हाथी) पर मैने सवारी की है । 'द्विरेत' (खच्चर), 'द्विदाम्नी' (दो रस्सियो मे बाँध कर रखने योग्य दुष्ट गाय) से मुझे भय लगता है । 'द्विक- कार' (कौवा, कोक), 'द्विरेक' (भ्रमर), 'द्विजिह' आदि 'द्विजो' (पक्षी) के खिलौनो से मै खेला हूँ। 'द्विसीत्य' (दो बार हल चलाया गया) क्षेत्र की 'दोमट भूमि,' से उत्पन्न 'दो फसली' भूमि की 'द्विदल' दाले मुझे भाती है । इस प्रकार के अन्न ने मेरे स्वभाव पर अच्छा प्रभाव डाला है। मैं कभी 'दोचित्ता' नहीं रहता। 'दो-चित्ती' (व्यग्रता) मेरे से कोसो दूर है। 'दोगली' बाते मुझे नही भाती। मैं सदा 'दो टूक' बात करने मे विश्वास रखता हूँ। अत मैं हर 'द्विविधा' से दूर हूँ। सगीत, पिंगलशास्त्र, व्याकरण आदि विपयो मे मेरी रुचि है। 'द्विगूढ' (एक प्रकार का गाना) तथा 'द्विपदी' (दो चरणो को गीति) मुझे प्रिय है। 'द्विरेफ' (जिसमे दो 'र' हो यथा-भ्रमर), 'द्वित्व' (दोहरा होने का भाव जैसे 'सूय्य' मे 'य' दो बार है), 'द्विबिन्दु' (विसर्ग ), 'द्विकक' (जिस वाक्य मे दो कर्म हो), 'द्विगु' (समास का एक उपभेद), 'द्विमात्र' (जिसमे दो मात्राएँ हो, दीघ), 'द्विवचन' आदि का ।

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27 , के अनेक रोग दूर होते है । 'दोजर्वी', 'दो नली' आदि बन्दुके तथा 'दोधारी तलवारे उस काल मे वनने लगी थी। मेरे शासनकाल मे धर्म का व्यापक प्रचार था। 'द्वैपायन' रचित महाभारत, पुराण आदि का पाठ होता था। 'द्विज- वन्धु' (कर्महीन ब्राह्मण) अल्प संख्या मे थे । 'द्वैतवाद', जिसके अनुसार जीव और ब्रह्म, भूत और चिच्छक्ति मे भेद माना जाता है, का भी प्रचार था। वेदान्तवादी द्वैत- वादी नहीं थे। 'द्विजानि' (जिसके दो स्त्रियाँ हो) कम थे 'द्विनग्नक' (वह मनुष्य जिसकी सुन्नत हुई हो) मेरे राज्य मे नही थे। किसी को 'द्विपाद्य' (शास्त्रोक्त दड से दुगुना दड) नही दिया जाता था। मै सबको दो आँखो से देखता हूँ अर्थात् समान दृष्टि से देखता हूँ। मेरा विश्वास है कि दो नावो पर पैर रखने वाला प्राणी सदा दुखी रहता है । अनेक बार दो नावो पर चढना 'दो सिर होना' (मौत को न्योता देना) ही है।

26 मुझे पूर्ण ज्ञान है। पूर्ण भापा के ज्ञान के कारण मैं 'दो- भापिया' का काम कर सकता हूँ। मैं नित्य प्रति व्यायाम करता हूँ। मैं 'द्वन्दज' (वात, पित्त, कफ मे से किन्ही दो के विकार से उत्पन्न रोग) रोगो से रहित हूँ । नित्य दन्त मार्जन करता हूँ अत 'द्विज व्रण' (दाँत का एक रोग) से पीडित नहीं होता। मेरे सारे शरीर पर आप को एक भी 'द्विवण' (घाव) का चिह्न नही मिलेगा। एक काल मे पजाब की सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब, झेहलम आदि नदियो के 'दो आवो' मे मेरा राज्य रहा है । उसी समय मैंने 'द्वितीयाधम' (गृहस्थाश्रम) मे प्रवेश किया था। मैंने अग्रेजो के समान 'दो अमली' राजनीति नही अप- नाई। 'द्वैत' शासन प्रणाली (वह शासन प्रणाली जिसमे सत्ता दो वर्गो मे विभक्त हो) से मुझे घृणा है। मेरे राज्य मे 'हिज्' (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जिनका यज्ञोपवीत सस्कार दूसरे जन्म के समान माना जाता है) तथा 'द्विज- सेवक' (शूद्र) प्रसन्न थे । मेरा राज्य 'द्वराज्य' (दो राजाओ मे विभक्त राज्य) नही था। वहाँ मेरा ही एकच्छ राज्य या। मेरा राज्य 'द्वैमातृक' (जहाँ नदी तथा वर्षा दोनो का जल खेती के काम आता हो) कहलाता था । मेरे राज्य मे विज्ञान के अनेक अनुसधान हुए। 'द्विक्षार' (शोरा और सज्जी) और "द्विधातु' (काँसा, पीतल आदि जिसमे दो धातुओ का मिश्रण रहता है) पर विशेप अनु- सधान हुए। मेरे शासन काल मे 'द्वयप्ठ' (ताबा) के बरतनो का अधिक प्रयोग होता था। इन बरतनो से आँख और पेट

भापा
उच्चारण
हिन्दी तीन
पंजाबी तिन
उर्दू तीन
कश्मीरी त्रे
सिंधी
मराठी तीन
गुजराती । त्रण
बंगला तिन
असमिया तिनि/टिनि
उडिया तिनि
तेलुगु मूड
तमिल
मूणु/मुरू
मलयालम
कन्नड़
संस्कृत
अंग्रेजी
1
ब्राली चीनी रोमन मयअंक बेबीलोनी
D

तीन
मैं दो की 'निणीता' (पत्नी) से उत्पन्न 'तीन'-'त्रि' हूँ।
'विधातु' (गणश) को नमरकार कर मैं अपनी आत्मकथा
आप से निवेदन करता हूँ। 'त्रिचक्षु'-'निजट'-'निधर्मा',
'विघ्न', 'त्रिदहन', 'विहर', 'निगुरु' (शिव) की कृपा,
'निकुकद'-'विपुगव' 'त्रिनाम-त्रिपृष्ठ' (विष्णु)के अनुराग और
माता 'निगुणा'-त्रिपुरसुन्दरी (दुर्गा) के स्नेह के कारण मै
'निजग' (आकाश, पाताल, भूमि) मे व्याप्त हूँ। "त्रिगुण'
(धर्म, अर्थ, काम) प्राप्ति मेरा लक्ष्य है।
मेरे जन्म के समय 'विगुणी' (वेल का पेड) पर
'त्रिगर्ता' (एक प्रकार का झीगुर) 'त्रिधनी' (एक रागिनी)
गा रहा था । 'त्रिदिनसप्तक' (वह तिथि जिसका भोग तीन
दिनो में समाप्त होता है) तिथि में मेरा जन्म हुआ।
मनुष्यो की एक टोली निगूढक (स्त्रियो के वेश मे पुरुपो का
एक नृत्य) नृत्य कर रही थी। अश्विनी कुमार 'त्रिचक्र'
(अश्विनी कुमार का रथ) पर बैठे मुझे आशीर्वाद दे रहे
थे। 'त्रिदडी' सन्यासो (वाणी, मन और शरीर को वश मे
करने वाले सन्यासी) 'त्रिदड' (वह दड जिसे कुटिचक
सन्यासी जो शिखा सून का त्याग नहीं करते और अपने
कुटुब-कुटुबियो को छोड कर दूसरो के यहा भिक्षा
नहीं करते, धारण करते है, वह बांस के तीन दडो को

31 थे। वेदो का ज्ञाता) ब्राह्मणो ने 'तिपादिका' (गोधापदी लता) को आसन बना कर वेदो पर 'त्रिपाण' (तीन वार भिगोया हुआ : सूत) पूरा । 'त्रिवेणो' की धार पर 'निपिंड' (पिता, पिता: मह, और प्रपितामह को दिए गए तीन पिंड) दिए गए। ये सभी पडित 'त्रिपुड' (भस्म अथवा चन्दनादि की तीन आडी या अध चन्द्राकार रेखाएँ) धारण किए मुझे त्रिफले की छुट्टी पिलाई गई। तदनन्तर विरेख (शस) मे त्रिमधु (दूध, चीनी और मधु) का पान कराया गया । 'त्रिम' मे 'निमार्गा' जल (गगाजल) मिला हुआ था। मेरी माता ने 'विविनत' (देवता, ब्राह्मण और गुरु के प्रति श्रद्धालु) होकर मेरी 'निवली' (पेट पर पड़ने वाले तीन वल) का चुम्बन किया। विभग मुद्रा' मे नियामा (यमुना) के तट पर चिनित श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। मेरी माता ने भाव- विभोर होकर ज्योतिपी से मेरे पूर्व जन्म के सम्बन्ध मे 'निप्रश्न' (दिशा, देश और काल सम्बन्धी प्रश्न) पूछे । ज्योतिपी ने भविष्यवाणी की कि मैं 'त्रिसध्य' (दिन के तीन भाग-प्रात , मध्याह्न और सूर्यास्त) मे सदा प्रसन्न रहूँगा। साथ ही 'त्रिप्रस्तुत' (जिस हाथी से मद का स्राव हो रहा हो) आदि का दान करते देख मेरी माता को सचेत किया कि वह 'त्रिमद' (विद्या, धन और कुटुब सम्बन्धी भद) का त्याग करे। मेरी विद्या का प्रबन्ध 'त्रिस्थली' (काशी, गया और प्रयाग) मे किया गया । 'त्रिमधुर' (ऋग्वेद का एक अश), 'त्रिपदा' (गायनी छद), 'निवेद' (ऋक्, यजु और माम), 'त्रिस्कन्ध' (सहिता, तत्र तथा होरा-इन तीनो शास्त्रो से -

30
-
एक मे बाँध करबनाया जाता है) चारण किए 'त्रिकूट' पर्वत
(वह पवत जो सुमेरु का पुत्र माना जाता है) पर शोभित
थे। 'त्रिदश, (देवता) 'त्रिगुरु' (देवगुरु बृहस्पति) को प्रणाम
कर रहे थे। 'त्रिदेव' (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) प्रसन्नवदन थे।
उस समय 'त्रिदिव' (स्वर्ग-आकाश) मे 'त्रिदीपिका'
(आकाशगगा-मदाकिनी) शोभित थी। 'त्रिवधु' (अप्सरा)
'त्रिपति' (इन्द्र) की सभा मे नृत्य कर रही थी। 'त्रिकोण'
(कामरूप का एक सिद्ध-पीठ) के गृहस्थियो के घरो मे
'त्रिचित' (गार्हपत्य अग्नि-जो परिवार मे वशानुगत जलाई
जातो है) प्रज्वलित थी। कुछ योगी 'त्रिकोण' (मोक्ष)
प्राप्ति के लिए 'त्रिकुटि' (भौहो के मध्य के कुछ ऊपर का
स्थान जहाँ त्रिकूट चक्र की स्थिति मानी जाती है) पर व्यान
लगाए बैठे थे । ज्योतिपिगण मेरो जन्म कुडली बनाने के
लिए त्रिकोण और विभवन (जन्म कुडली मे लग्नस्थल से
पाँचवाँ और नवाँ स्थान) फलित कर रहे थे।
श्रेष्ठ 'त्रिकर्मा' (ब्राह्मण) ने उस समय 'त्रिककुभ' यज्ञ
(नौ दिन मे होने वाला एक यज्ञ) आरभ किया। कुलगुरु
से 'त्रिकुकद' (दस दिन में समाप्त होने वाला योग) योग
आरम्भ किया । 'त्रिपत्रक' (पलाश का पेड) की समिधा से
अग्नि प्रज्वलित की गई। 'विपथा' (मथुरा) के पडितो ने
'त्रिपदी छन्द' (गायत्री छन्द) मे मत्र वोलना आरभ किया।
'निनाभिनी' (गगा) के तट पर 'त्रिपरिक्रान्त' (ब्राह्मण जो-
जीविकार्थ यज्ञ कराए, अध्यापन करे और दान न ले) ब्राह्मणो
ने "त्रिपण' (पलाश), 'चिपर्णा' (वन कपास) की अग्नि मे
'विपणिका' (वन कन्द) को आहूति डाली। 'निपाठी' (तीन

31 - वेदो काजाता) ब्राह्मणो ने 'विपादिका' (गोधापदी तता) को आसन बना कर वेदो पर 'त्रिपाण' (तीन बार भिगोया हुआ सूत) पूरा । 'निवेणी' की धार पर 'त्रिपिंड' (पिता, पिताः- मह, और प्रपितामह को दिए गए तीन पिंड) दिए गए। ये सभी पडित 'त्रिपुड' (भस्म अथवा चन्दनादि की तीन आडी या अध चन्द्राकार रेखाएँ) धारण किए हुए थे मुझे त्रिफले की घुट्टी पिलाई गई। तदनन्तर निरेख (शख) मे त्रिमबु (दूध, चीनी और मधु) का पान कराया गया । 'त्रिम' मे 'निमार्गा' जल (गगा जल) मिला हुआ था। मेरी माता ने 'त्रिविनत' (देवता, ब्राह्मण और गुरु के प्रति श्रद्धालु)होकर मेरो 'निवली' (पेट पर पडने वाले तीन वल) का चुम्बन किया। विभग मुद्रा' मे नियामा (यमुना) के तट पर चिनित श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। मेरी माता ने भाव- विभोर होकर ज्योतिपी से मेरे पूर्व जन्म के सम्बन्ध मे 'निप्रश्न' (दिशा, देश और काल सम्बन्धी प्रश्न) पूछे । ज्योतिपी ने भविष्यवाणी की कि मैं 'त्रिसध्य' (दिन के तीन भाग--प्रात , मध्याह्न और सूर्यास्त) मे सदाप्रसन्न रहूँगा। साथ ही 'त्रिप्रस्तुत' (जिस हाथी से मद का स्राव हो रहा हो) आदि का दान करते देख मेरी माता को सचेत किया कि वह 'त्रिमद' (विद्या, धन और कुटुब सम्वन्धी मद) का त्याग करे। मेरी विद्या का प्रबन्ध 'निस्थली' (काशी, गया और प्रयाग) मे किया गया । 'त्रिमधुर' (ऋग्वेद का एक अश), 'त्रिपदा' (गायत्री छद), 'निवेद' (ऋक्, यजु और साम), 'निस्कन्ध' (सहिता, तत्र तथा होरा-इन तीनो शास्त्रो से - 32 युक्त ज्योतिप शास्त्र) आदि का मैंने घोर अध्ययन किया। नित्य 'निस्नान' (त्रिकाल स्नान) कर मैं 'त्रिदशाचार्य' (वृहस्पति) 'त्रिदशाध्यक्ष' (विष्णु) 'त्रिदशेश्वर' (इन्द्र) तथा 'त्रिदशेश्वरी' (दुर्गा) का ध्यान करता था। 'त्रिकाड' (अमर- कोष और निरुक्त) मैंने कठस्थ किए। कथा साहित्य मे मेरी विशेष रुचि रही है। 'त्रिशकु' की कथा मुझे बहुत भाती थी। ये एक प्रसिद्ध सूर्यवशी राजा हुए है। ये हरिश्चन्द्र के पिता थे। इनके बारे में कहा जाता है कि ये पृथ्वी और स्वर्ग के बीच मे उलटे लटके हुए है । विश्वामिन अपने तपोवल से इन्हे सदेह स्वर्ग भेजना चाहते थे । इन्द्र ने उन्हे नीचे ढकेल दिया। विश्वामित्र ने इन्हे गिरने से रोक दिया । कर्मनाशा नदी इनकी लार से उत्पन्न मानी गई है। 'त्रिजटा' (अशोक वाटिका मे सीता जी के साथ रहने वाली राक्षसी) और 'विशिख' (रावण का एक पुत्र) की कथा मुझे अब भी स्मरण है। 'त्रिशिरा' (एक राक्षस जिसे राम ने दडकारण्य मे मारा था) भी रावण कुटुम्ब का राक्षस था। 'त्रिपुर दाह' की कथा बडी रोचक है। मय ने स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा पृथ्वी पर नगर बसाए थे। शकर ने इन्हे जला दिया। 'त्रियाजी' (विश्वामित्र) के ब्रह्मऋपि बनने की कथा कितनी भयावही है। 'त्रिकाय' (बुद्ध) और 'त्रियान' (महायान, हीनयान तथा मध्ययान) की अनेक कथाएँ मुझे याद ह । 'त्रिविष्टय' (तिब्बत) मे मनु-श्रद्धा मिलन की कथा रोमाचकारी है। मैंने वैद्यक शास्न का अध्ययन किया। त्रिकुट (तीन कडवे 33 पदार्थों का समाहार-सोठ, पीपर, काली मिर्च) 'त्रिकापिक' (मोठ, अतीस और मोया का समाहार) 'विकुला' (यव- तिक्ता) 'विकूट' (ममुद्री लवण) और 'निजात' (इलायची, दारचीनी, तेजपात) का उपयोग मुझे भली प्रकार आता है । 'निदोष' (वात, पित्त और कफ इन तीनो से उत्पन्न होने वाला रोग, सन्निपात) रोग का मैं उपचार कर सकता हूँ। 'त्रिसम' (सोठ, गुड और हड का समाहार) और 'त्रिफला' (हड, बहेडा, आवला) वैद्यक मे रामबाण समझे जाते है। 'त्रिसर' (खिचडी) खाने से अनेक रोगो से छुटकारा मिल सकता है। 'त्रिलवण' (साभर, सेधा और सोचकर) उदर रोग का नाश करने वाला है। वनस्पति जगत का मुझे यथेष्ठ ज्ञान है। 'त्रिमजरी' (तुलसी) के पत्तो का सेवन रोगनाशक है। 'त्रिफल' (सिंघाडा) बहुत लाभदायक है। 'रिख' (खीरा) स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है । 'त्रिसधि', 'त्रिदल' आदि पुप्प-बेले, बहुत लाभदायक है। गणित शास्त्रियो ने मेरी सहायता से 'विभगी,' 'त्रिज्या' आदि वृत बनाए है। अनेक प्रकार की 'त्रिकोण' मेरी सहा- यता से बनाई जाती है । 'तेतीस, 'तेतालीस' आदि सख्याओ मे मेरा अश विद्यमान है। कुछ अधविश्वासो मेरी सख्या को अशुभ मानते है। मेरे प्यार भरे अनेक नाम है । 'तिन', 'तिन्न', 'तीनि', 'तिउ', (२) आदि नामो से मैं प्रान्तीय भाषाओ मे बोला जाता हूँ । अग्रेज मुझे 'श्री' नाम से पुकारते हैं। वास्तव मे 'श्री' 'त्रि' का ही बदला हुआ रूप है। .

34
भाषा वैज्ञानिको ने मेरे नाम के मूल स्रोत तक पहुँचने
का भारी प्रयत्न किया है। संस्कृत 'प्रीणि' से प्राकृत
भापा मे 'तिण्णि' बना। इसी 'तिण्णि' से 'तीन' निकला।
'ते', 'त', 'ति', 'तिर' रूपान्तर अनेक शब्दो में पाए जाते
है जैसे—'तेरह', 'तेतीस', 'तिरपन' 'तिरानवे' आदि। ये सभी
रूपान्तर सस्कृत के 'त्रय' से निकले है।
'तीन-चार' बाते और। मैं अपने शत्रुओ को 'तीन तेरह
करने की शक्ति रखता हूँ। यही कारण है कि मुझे 'न तीन
मे न तेरह में' (उपेक्षित) समझ कर नही भुलाया जा सकता।
अधिक 'तीन पाँच' करने वाला व्यक्ति मुझे पसन्द नहीं।

चार । मैं चार हूँ। मेरा विकास अतमुखी हुआ है । 'चतु- प्पथ' के निकट एक 'चतुप्पाटी' (नदी) बहती है। वहीं एक 'चतुप्पाठी' (वह विद्यालय जिसमे चारो वेद पढाए जाते हो) विद्यालय में मैंने 'चतुर्विद्या' (चार वेद, 6 वेदाग और धर्मशास्त्र, पुराण, मीमासा औरतक (न्याय)--ये 14 विद्याएँ) ग्रहण की । मेरे गुरु 'चतुर्वेदी जी' (चारो वेदो को जानने वाला) मेरे लिए 'चतुष्पाणि' (विष्णु) के समान वन्दनीय थे। उन्होने मुझे ज्ञान कराया कि 'चतुर्मुख' (ब्रह्मा) ही 'चतुर्युगी' (सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग) मे 'चतुर्वर्ग' (चारो पुरुषार्थ) प्राप्ति का एकमात्र साधन है। मेरे गुरुजी ने मुझे 'चतुर्होता' (वेदोक्त चारो होम कराने वाला) बनने की विधियाँ बताई। फिर मेरी देख- रेख में 'चतुर्वीर यज्ञ' (चार दिन चलने वाला एक सोम- यज्ञ) सम्पन्न करवाया । तदनन्तर मैंने एक 'चतुरात्र यज्ञ, (एक वैदिक यज्ञ जो चार रात मे पूरा होता है) किया। मैं नित्य प्रति 'चतुर्होत्र (विष्णु) को प्रणाम करता हूँ। मैंने छन्दशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। मैं 'चतुष्पाद' (अमावस्या का पूर्वाध) मे 'चतुष्पदी' (चार चरणो वाला पद्य, गीत, चौपाई, छन्द आदि) की रचना किया करता हूँ। चतुर्वेद' (ऋक्, यजु, साम, अथर्व) मे वर्णित विभिन्न छन्द

भापा
उच्चारण
हिन्दी चार
पंजाबी चार
उर्दू चार
कश्मीरी चोर
सिंधी चार
मराठी चार
गुजराती
चार
बंगला चार
असमिया चारि/सारि
उडिया चारि
तेलुगु नाला
तमिल नालु/नागु
मलयालम नाल
कन्नड
संस्कृत चतुर
अंग्रेजी फोर
ब्रानी चीनी रोमन मयअंक वेबीलोनी
4
7
IV

37
तथा अलकारो पर मेरा पूर्ण अधिकार है।
'चतुर्दोल'(चार आदमियो द्वारा ढोई जानेवालीपालकी,
नालकी आदि) मे बैठ कर मैंने 'चतुर्धाम' (चारो दिशाओ
मे स्थित हिन्दुओ के चार धाम-पुरी, बदरिकाश्रम, द्वारका
और रामेश्वर) देखे है । मेरा विचार 'चतुर्दिशाओ मे व्याप्त
सभी धर्म-तीर्थो को देखने का है। इस ससार मे 'चार दिन
को चाँदनी' है फिर 'चार-पाँच' करने से क्या लाभ ? एक
दिन 'चार के कधे चढ कर' (अर्थी पर) सभी को जाना
है । 'चार पथ' (राजमार्ग) यही है कि 'चतुरानन' को सदा
स्मरण रखें। 'चतुदशर्भुवन' (भू , भुव , स्व , मह , जन , तप,
सत्य ये सात स्वर्ग और अतल, सुतल, वितल, तलातल महातल,
रसातल और पाताल ये सात अधोलोक) का स्वामी वही है ।
में चतुस्सम्प्रदाय (वैष्णवो के ये चार सम्प्रदाय-श्री,
माधव, रुद्र और सनक) मे विश्वास रखता हूँ। 'चार अवरु
सम्प्रदाय' (मुसलमानो का वह सम्प्रदाय जिसमे सिर, भौ,
दाढी और मूंछ कटवा डालते है) की मुझे जानकारी है।
'चार यारी सम्प्रदाय' (सुन्नी सम्प्रदाय, चॉदी का चौकोर
सिक्का जिसमे कलमा या मुहम्मद के चारो साथियो के
नाम खुदे रहते है) के लोगो से भी मेरी जान पहचान है ।
मैंने 'चतुरन्ता' (पृथ्वी) पर 'चतुर्भाक्' राजाओ (वे
राजा जो प्रजा की आय का चौथा भाग लेते है) का राज्य
देखा है। उनकी चतुरगिनी सेना (हाथी, घोडा, रथ और
पैदल- इन चारो से युक्त) वहुत शक्तिशाली थी। उनकी
सीमा चतुरत (चारो ओर से सीमित) नहीं थी। केवल
'चतुर्मास' (बरसात का चौमासा-आषाढ पूर्णिमा या शुक्ल

38 द्वादशी से कार्तिक शुक्ल द्वादशी तक का काल) मे युद्ध- बन्दी होती थी। अन्यथा राजा स्वय 'चार आईना' (एक प्रकार का कवच जिसमे छाती, पीठ और दोनो भुजाओ पर बाँधने के लिए लोहे की चार पट्टियाँ होती है) पहने युद्ध- स्थल मे जाया करता था। राजा 'चार गुर्देवाला' वीर (बहादुर) होता था । 'चार चक्षु' (गुप्तचर जिसके चक्षु है- राजा) सदा 'चार-चार' (गुप्तचर) की सहायता लिया करता था। 'चार पालो' (गुप्तचरो) और 'चार पुरुषो' (भेदियो) का जाल बिछा ता था। शत्रु की सेना का भेद लगाने के लिए राजा 'चार प्रचार किया करता था (गुप्त- चर लगाया करता था)। राजा के विजयी होने पर उस पर 'चार तूल' (चॅवरी) झोली जाती थी। 'चार वीसी' (अस्सी) 'चार भट' (वीर योद्धा) उसके आगे तलवार के कौतुक दिखाते चलते थे। उस काल मे शत्रु को 'चार मेख' करना (अपराधी को लिटा कर उसके हाथ पैर खूटे से बॉधने की सजा) साधारण वात थी। मै 'चतुर्थ काल' (भोजन का विहित काल, दोपहर) मे भोजन करता हूँ। मेरा भोजन बहुत सात्विक है । मैं 'चतुर् उष्ण' (सोठ, पीपल, मिर्च और पिपरामूल) का सेवन करता हूँ। कभी-कभी मे 'चतुर्जातक' (इलायची, दारचीनी, तेज- पत्र तथा नागकेसर का समाहार) का प्रयोग करता हूँ। उदर-रोग के लिए 'चतुझेज' (काला जीरा, अजवायन, मेथी और चसुर का समाहार) खाता हूँ। 'चतुरम्ल' (अमलवेल, इमली, जवीरो, नीबू) का सेवन कम करना चाहिए। मैं चतुसम (कस्तूरो, चदन, कुमकुम और .

39
कपूर के योग से बनने वाला) सूंघता हूँ। गरमी मे चार
मग्ज (खरबूजा, खीरा, ककडी और कद्दू के बीज की गिरी)
खाता हूँ।
'चतुराथम' (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास)
के अनुसार जीवन यापन मुझे रुचिकर लगता है।
'चतुर्वर्ण' (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) अपने-अपने
कर्तव्य निभाएँ तो ससार मे सुख सभव है । भला काम वही
समझा जाए जिसे 'चार आदमी' (दो चार भले आदमी)
अच्छा कहे।
आप भारत की शोभा को 'चार चाँद' लगाइए । जो
शत्रु इस पर आक्रमण करे उसे आप 'चारो खाने चित्त'
मारिए। आपको कीर्ति 'चार के कानो' तक अवश्य पहुंचेगी।
जिस मनुष्यो की "चारो फूट चुकी' (दो स्थूल आँखे और
दो हृदय की) है वह देश की क्या भलाई कर सकता हे ? आप
में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि शत्रु आप का यश सुनते
ही 'चार पर पीठ लगा ले' (सख्त बीमार पड़ जाए)। सयम
द्वारा 'चार दत' (ऐरावत हाथी) सी शक्ति प्राप्त की जा
सकती है।
अपने जन्म और नामकरण के विषय मे कुछ बताना
आवश्यक समझता हूँ। 'चतुर्मास' के चौथे महीने की चतुर्थी'
को मेरा जन्म हुआ। मेरा नाम 'चत्वारि' रखा गया ।
प्राकृत मे मुझे 'चत्तारि' कहने लगे। खडी बोली में में
'चार' कहलाया। 'चहुँ', 'चारि', 'चारो', 'चार', 'चतुर',
चतुप', 'चतुस्', 'चत्वारि' आदि मेरे अनेक स्नेहपूर्ण नाम
है । सयुक्त सख्याओ के 'चौ', 'चो', 'चौर' पर सस्कृत
'चतुर्' तथा प्राकृत के 'चउरो' का प्रभाव है । यथा--
चौतीस चौरासी, आदि ।
-
-

पाँच पच-देव (विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश और दुर्गा) को मेरा बार-बार प्रणाम स्वीकार हो । पच-बाहू को (शिव) जिस पर पचकाम (काम, मन्मथ, कदप, मकरध्वज और मीनकेतू) के पच-वाण (सम्मोहन, उन्मादन, स्तभन, शोपण ओर तापन) का प्रभाव नहीं होता, मै पचाग प्रणाम (घुटना, सिर, हाथ तथा छाती को पृथ्वी से सटा कर और आँखो को देवता के चरणो को ओर करके किया जाने वाला प्रणाम) करता हूँ। पच गौड (उत्तरीभारत के पाँच प्रकार के ब्राह्मण--सारस्वत, कान्यकुब्ज, गौड, मैथिल और औकल) और पच-द्रविड (दक्षिण भारत के पाँच प्रकार के ब्राह्मण-महाराष्ट्र, तैलग, कर्णाट, गुजर ओर द्रविड) को मेरा नमस्कार । पचपिता (पाँच प्रकार के पिता-पिता, उपनेता (उपनयन कराने वाला~जनेऊ दिलाने वाला), श्वशुर, अन्नदाता और भय- त्राता) का मै अभिनन्दन करता हूँ। पच गग (गगा, यमुना सरस्वती, किरणा और धूतपापा) का जल पच गव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोबर और मूत्र) मे मिला कर पच भत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश आदि से वना शरीर) की शुद्धि करता हूँ। पच रश्मि (सूर्य) की पच मुद्रा (पूजन विधि के अन्तगत पाँच प्रकार की मुद्राएँ-~आवाहनी, स्थापनी, सन्नीधापनी, सम्बन्धिनी और सम्मुपीकरणी) मे पूजा करता

भाषा
उच्चारण
हिन्दी
पॉच
पंजाबी पज
उर्दू पाँच
कश्मीरी पाँछ
सिंधी पंज
मराठी पाँच/पाच
गुजराती पाँच
बंगला पाँच
असमिया
पाँच/पास
उडिया पॉच/पाँच
तेलुगु रोटु
तमिल अंजु/न्दु
मलयालम अन्जु
कन्नड सेदु
संस्कृत
पचन्
अंग्रेजी फाइव
ब्राली चीनी रोमन मयअंक
h
है

42 हूँ। पच कन्या (अहिल्या, द्रौपदी, कुती, तारा और मन्दोदरी) को मैं स्मरण करता हूँ। पच वृक्ष (पाँच देव वृक्ष-मवार, पारिजात, सतान, कल्पवृक्ष और हरिचन्दन) से अपनी आत्म-कथा पूर्ति की कामना करता हूँ। पचवटी (पीपल, वेल, बड, हड और अशोक ये पाँच वृक्ष जहाँ निकट लगे हो) के नीचे पचमी को मेरा जन्म हुआ। उसी समय पच वर्ण (ऊकार, उकार, मकार, नाद और विन्दु से सयुक्त–ओकार) की ध्वनि से पच शैल (एक पर्वत) गूंज उठा। पच वल्कल (बड, पीपल, पाकड, गूलर और बेत) को जल मे उबाल कर मेरा स्नान कराया गया। पच सुगन्धक (कपूर, शीतल चीनी, लोग, सुपारी और जायफल) से वातावरण सुगन्धयुक्त किया गया । पच शार- दीय यज्ञ (एक यज्ञ) आरभ कराया गया। मुझे पच महा- व्याधि (अर्श, यक्ष्मा, कुण्ठ, प्रमेह और उन्माद) से बचाने के लिए अनेक जतन किए गए। ब्राह्मणों को 'पच लॉगलक' (पाँच हलो से जोती जाने वाली भूमि का दान) दिया गया। पचरत्न (नीलम, हीरा पद्मराग मणि, मोती और मूंगा) लुटाए गए। पचनद प्रदेश (पाँच नदियो का देश-पजाब) मे 'पच- तृण' (कुश, कास, सरकडा, डाभ और ईख) के आसन पर बैठ कर मैंने पच ज्ञान (पाशुपत दर्शन) प्राप्त किया। बाल्यकाल से पच मकार (मद्य, मास, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) का त्याग कर पच-महायज्ञो (स्वाध्याय-ब्रह्मयज्ञ, होम-देव यज्ञ, वलिवैश्वदेव-भूतयज्ञ, पिंड क्रिया-पितृयज्ञ और अतिथि- पूजन-नृयज्ञ) का भागी बना । पच-महाव्रत (अहिंसा, सूनृता- .

43 - सत्य और सद्भावपूर्ण वचन, अस्तेय-चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह-मपत्ति न जोडने वाला) धारण किए। पचतीर्थी (पाँचो तीर्थ-विश्राति, शौकर, नैमिप, प्रयाग और पुष्कर) करने के लिए पचशाख (हाथी) पर वैठ पच शब्द (शख ध्वनि आदि पाँच मगल वाद्य) करता हुआ भ्रमण करता रहा । पाँचो तीर्थों का पचनीराजन (दीपक, कमल, आम, वस्त्र और पान इन पाँच वस्तुओ द्वारा को गई आरती) किया। पचपर्वो (अष्टमी, चतुर्दर्शी, पूर्णिमा, अमावस्या और रविसकाति) के दिन पच नाथो (बदरीनाथ, द्वारकानाथ, जगन्नाथ, रगनाथ और श्रीनाथ) के दर्शन किए । वहाँ पच जन (देव, मनुष्य, नाग, गधर्व और पितर) के दर्शन सुलभ हुए। पच चोल (हिमालय श्रेणी का एक भाग) मे पच- प्राण (शरीर मे सचरण करने वाली वायु के पाँच भेद- प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) की साधना की। तदनन्तर पच तन्मात्र (रूप, रस, गध, स्पर्श और शब्द) की साधना की। वहाँ से पचस्रोत (एक तीर्थ) गया। फिर पचाग्नि (चारो ओर अग्नि और एक ओर से सूर्य की गरमी मे तप करना) साध कर 'पचतपा' कहलाया। तदनन्तर पचकोश (अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश) पर चिन्तन मनन किया। अपने जीवन का कुछ समय पच घाट (काशी का एक प्रसिद्ध घाट जो कई नदियो का संगम स्थान माना जाता है) पर व्यतीत किया। वहाँ पचदशी (पूर्णिमा और अमा- 44 - . वस्या) के दिन पच भर्तारी (द्रौपदी) की कथा सुनाई । पच- तत्री (पाँच तारो वाली वीणा) पर जिस समय पच सधि (स्वर सधि, व्यजन सधि, विसग सधि, स्वादि सवि और प्रकृति भाव) से युक्त पचाली (एक प्रकार का गीत) गीत गाया जाता था तो श्रोता भाव विभोर हो जाते थे। पच- चामर और पच पद आदि छन्दो और ऋचाओ मे पच-बाहो (शिव) की स्तुति की जाती थी। काशी के पच प्रासाद (वह मन्दिर जिसमे चार शृग और वीच मे गुबद हो) उस वेला मे सिहर उठते थे। वहाँ पर मैंने ईश्वर के पच कृत्य (ईश्वर के सृष्टि, ध्वस, सहार, तिरोभाव और अनुग्रह- करण) पर विसद् प्रकाश डाला। पच क्रोशी (काशोपुरी जो पॉच कोसो मे बसी हुए है) की वह शोभा किस के मन को नही हर लेती होगी। हे भारतवासियो, तुम पाँच महापातको (ब्रह्म हत्या, सुरापान, स्तेय, गुरुतल्प गमन-गुरुपत्नी के अनुचित सम्बन्ध, और उक्त चार महापातको को करने वाले का ससग) से बचो । पच लक्षण (पुराण) का अध्ययन करो। तुम पच सूना पाप (गृहस्थ के घर मे निम्नलिखित पाँच वस्तुएँ जिनके द्वारा छोटे-छोटे कीडो की हिंसा हो जाया करती है-चूल्हा, चक्कीया सिलबट्टा, झाड, ओखली और पानी का धडा) से मुक्त रहो । हे ग्रामीण भाइयो, पचायत शासन पद्धति को अपनाओ। पच मे परमेश्वर का निवास समझो। पचनामे का आदर करो। पचायती राज्य भारत के लिए नया नहीं है। व्यथ की पच की पुकार (सहायता मांगना) का कोई लाभ नही । साथ वैद्यक के विपयो मे मेरी रुचि जन्मजात है। रोग के निदान के लिए मै पच कर्म (वमन, विरेचना नस्य-सुघनी, निरूह-एनिमा और अनुवासन (एनिमीदि) मे, विश्वास रयता हूँ । पच कपाय (जामुन, सेमर, बेर, मौलसिरी और वरियारा) उत्तम रस हे। पच कोल (पीपर, पीपरामूल, चव्य, चित्रकमूल और सोठ) का सेवन शीत ऋतु मे हितकर है। उदर रोग के लिए पचक्षार (पाँच प्रकार के लवणकाच, सैधव, सामुद्र, विट साभर नमक, और सौवर्चल) का प्रयोग लाभदायक है। पच गुप्त (कछुवा) की हड्डी अनेक औपधियो मे काम आती है । पच तिक्त (पाँच कडवी औप- धियाँ-गुडच, भटकटैया, सोठ, कुठ और चिरायता) का सेवन स्वास्थ्यवर्द्धक है। पच पित्त (सूअर, वकरा, भैसा, मछली और मोर का पित्त) की औषधियाँ बनती है। पच- वला (बला, अतिबला, नागवला, राजबला और महाबला) पाँच औषधियाँ है। पचमूत्र (गाय, बकरी, भेड, भैस और गधी का मूत्र) और पचाज (बकरी का दूध, दही, घी, पुरीप--विष्ठा और मूत्र) का प्रयोग औपचियो मे कम किया जाता है। पचदसा (ऑवला) वैद्यक को मुख्य औपधि है । पच लोहक (मोना, चॉदी, तांबा, रॉगा और सीसा भस्म का प्रयोग अच्छा माना गया है। पच शस्य (धान, मूंग, तिल, उडद और जौ) से अनेक औपधियाँ बनती है। मेरे ज्ञान के कारण मेरी पाँचो अगुलियाँ सदा घी मे रहती है (लाभ ही लाभ होता है)। पांच सवारो मे नाम लिखाना (पानता न होते हुए भी अपने को बडो मे सम्मिलित करना) मुझे नहीं भाता। मैं पचानन (शेर) के

46
समान शक्तिशाली होने मे अपना विश्वास रखता हूँ।
अधिक क्या। मेरा नाम वैदिक काल मे पचथा।प्राकृत,
अपभ्र श काल तक पज, पाच, पच आदि हुआ । पॉ, पज,
पचम्, पजम आदि मेरे अनेक उपनाम हे । मेरे सयुक्त
अक्षरो मे प्राकृत रूप 'पण' तथा 'पन' का प्रभाव है-पद्रह,
तिरेपन, इक्यावन, चौवन आदि । कही 'पन' की जगह 'वन'
भी है। अन्य अक्षरो मे 'पच' रूप हे-पच्चीस ।
पचाक्षर मत्र (ऊँ नम शिवाय) पढ कर मैं विसर्जन
करता हूँ।

मैं छ हूँ। पट्, पड्, पप्, पण मेरे ही दुलार भरे नाम
हैं। छह , छि, छउँ, छो, छय आदि मेरे आधुनिक नाम है।
अग्रेजी के सिक्स मे मेरा पष्ठ रूप निहित है। काल और
स्थान भेद के कारण यह परिवर्तन बढ गया। मैं 'एक' की छठी
पीढी में उत्पन्न हुआ हूँ। पष्ठी के दिन पष्ठ काल (भोजन
का छठा काल) मे पष्ठ भक्त (तीसरे दिन शाम को भोजन
खाने वाला) के पट्पदातिथि (आम) को छाया मे मेरा जन्म
हुआ अत पष्ठ या छह कहलाया।
मेरे जन्म के समय पड् राग (भैरव, मलार, श्री,
हिंडोल, मालकोस और दीपक) अलापे गए । छठी के दिन
मुझे पड्रस (छ प्रकार के स्वाद-मीठा, नमकीन, कडवा,
तीखा, कसैला और खट्टा) को जन्म धुट्टी पिलाई गई । मेरे
पड् अगो (सिर, धड, दो पैर और दो हाथ) पर पड़ धूप
(चीनी, गोघृत, मधु, गुग्गुल, अगरु काष्ठ और श्वेत चन्दन
के मिश्रण से बनाई गई धूप बत्ती) का लेपन किया गया ।
पड्पद (भ्रमर) और पड्पदी (भ्रमरी) ने मिलकर नृत्य
किया । पट्शास्त्री (वह जो छ हिन्दू शास्त्रो का ज्ञाता हो)
ने भविष्यवाणी की कि बालक पड्विकार (जीव के छह
विकार-उत्पत्ति, वृद्धि, बाल्यावस्था यौवन, वार्धक्य और
मृत्यु) मे प्रसन्न रहेगा और पट्शास्न (वेदो को प्रमाण
,

भापा
उच्चारण
उर्द
हिन्दी
पंजाबी
छ
कश्मीरी शे
सिंधी
छ
मराठी सहा
गुजराती
बंगला छय/छाय
असमिया छय/छ/छोय/सो
उड़िया छ/छा
तेलुगु आरू
तमिल आरू
मलयालम आर.
कन्नड़
आरू
षद
अंग्रेजी सिक्स
ब्राी चीनी रोमन मयअंक बेबीलोनी
Le T
संस्कृत
VI

49 . मान कर चलने वाले छ हिन्दू दर्शन साख्या पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा और वैशेषिककार बनेगा। आयु पाकर मैं पट्कर्म (ब्राह्मण के छ कर्तव्य- अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान और प्रतिग्रह) में प्रवृत्त हुआ । यदाकदा निर्वाह सम्बन्धी छ कर्म (उछ-खेत मे कटाई के बाद पडे हुए दानो को चुगकर जीवन विताना, प्रतिग्रह, भिक्षा, वाणिज्य, कृषि और पशु-पालन) का आश्रय भी लिया। छ तात्रिक कर्म (मारण, उच्चाटन, स्तभन, वशीकरण, शान्ति और विदूपण-अपमानित करना) सीखे । योग सम्बन्धी छ कर्म (धोती-कपडे की चार उँगल चौडी और पद्रह हाथ लम्बी, गीली पट्टी को निगलने और फिर वाहर निकालने की क्रिया, वस्ती-गुदादि मे पिचकारी देना, नेती-पेट मे पट्टी डाल कर आँत साफ करना, त्राटक- किसी बिन्द पर दृष्टि जमाने की क्रिया, नौलिक और कपालभाती-एक विशेष प्रकार की श्वास क्रिया) से मैं अछूता नही रहा। पटचक्र (शरीर के भीतर सुपुम्ना नाडी के मध्य स्थित अति सूक्ष्म कमलाकार छ चक्र--मूलाधार, अधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा) की साधना की। पड् रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर) को वश मे करने के कारण पड्वश्य (इन छ इन्द्रियो को जिसने वश मे कर लिया है) कहलाया। पड् वर्ग (छह ज्ञानेन्द्रियाँ-आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा तथा मन) साधना मेरा लक्ष्य रहा । षट्क सम्पत्ति (शम, दम, उप- - 50 - रति-विराग, तितिक्षा-क्षमा, श्रद्धा और समाधान) सम्बन्धी पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। पड़ अग्नि (कर्मकाड सम्बन्धी छ प्रकार की अग्नि-गाहपत्य-परिवार मे वशानुगत जलाई जाने वाली अग्नि, आहवनीय-~-आहूति देने योग्य, दक्षिणाग्नि-गार्हपत्य अग्नि के दक्षिण मे रखी जाने वाली अग्नि, सम्याग्नि, आवस्य्य-लौकिकाग्नि, औपासनाग्नि- गृह्याग्नि) प्रज्वलित रखने की विधि से अवगत हुआ। तीर्थ यात्रा करना मेरे जीवन का अभिन्न लक्ष्य रहा। मैं पड़ मास तक पड् तीथ (गया, गयासुर, गायत्री, गयागज, गयादित्य और गधावर) मे निमज्जन करता रहा। पट्कूटा (भैरवी का एक रूप) की आराधना की। पण्मुख- स्कध और कार्तिकेय) की पूजा करता रहा । पड्बाहू- (दुर्गा) को भक्तिभाव से प्रसन्न किया। पड्-अग (वेद के छ अग-शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छद, व्याकरण और ज्योतिष) ज्ञान के कारण मैं अपने आप को कृतकृत्य समझता हूँ। पाण् मातुर् (कार्तिकेय-जिसका पालन छ माताओ ने किया या) की कृपा से मैंने पाप्ठिक व्रत (चार मास का एक व्रत जिसमे दूध के साथ केवल हर छठे दिन भोजन किया जाता है) पूरा किया। राजनीतिक व्यवस्था से मै भिन्न नहीं रहा। मैने पाड्गुण्यवेदी (राजनीति के छ अगो का ज्ञाता) की उपाधि प्राप्त की। मै पड्गुण (परराष्ट्र नीति की सफलता के लिए राजा द्वारा व्यवहार्य छ उपाय-सधि, विग्रह, यान–चढाई, आसन--विराम, द्वैधी-भाव-दुविधा और सश्रय--परस्पर - -

51
सहायता के लिए की जाने वाली सधि) नीति का सफल
प्रयोग जानता हूँ। मेरा विश्वास है कि पड्-अगिनी सेना
(सारे अगो से पूर्ण सेना) ही देश की रक्षा कर सकती है।
आयुर्वेद के सिद्धान्त के अनुसार मै पड्-ऊण्ण (पीपल,
काली मिर्च, सोठ, पिपरामूल, चव्य और चीता), छ कटु
मसाले) पड् लवण आदि का उपयोग करता हूँ। पड्-ऋतु
(वसन्त ग्रीष्म, वर्पा, शरद्, हेमन्त तथा शिशिर) मे ऋतु
अनुकूल भोजन करता हूँ। पण्मुखा (खरबूजा) को जी
भर कर खाता हूँ। सात्विक वृत्ति के कारण मै पटज्य
(कामदेव का धनुप) का आखेट नही बन पाता।
मै छठी का राजा (पुश्तैनी अमीर) हूँ। पराजय मेरी
छठी में नहीं पडी (भाग्य मे नही लिखी गई)। बडे-बडे
शनुओ को मैने छठी का दूध याद दिला दिया (बचपन का
खाया पोया निकलना)। छठे-चमासे (कभी-कभी) मुझे मेरी
छठी-वरही (छटी और बरही के उत्सव) की याद दिलाई
जाती है जिसमे लाखो छ माशी (गिन्नियाँ) बाँटी गई थी।
सृष्टि के उत्पत्ति सम्बन्धी शशमाही और शशरोजा
सिद्धान्त (मुसलमानो की धारणा के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति
छ दिन मे हुई) मैने पढा है। मै पड्-समन्वागत (बुद्ध) के
दुखवाद सिद्धान्त का पक्षपाती नही हूँ।

सात - मै छ से एक अधिक सात या सप्त हूँ। मैं देवी देव- ताओ को प्रणाम करके अपनी लघु आत्मकथा आपके सामने निवेदन करूंगा। सप्त-लोकमय, सप्तशीर्ष, सप्त- महाभागी (विष्णु) को मेरा प्रणाम । सप्ताश्व, सप्त- सप्ति (सात घोडो से युक्त रथ वाला—सूर्य) को मेरा नमस्कार। सप्तऋपि (शतपथ ब्राह्मण के अनुसार-गोतम, भारद्वाज, विश्वामिन, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप ओर अत्रि। महाभारत के अनुसार--मरीचि, अनि, अगिरा, पुलह, कृतु, पुलस्त्य और वसिष्ठ) के समक्ष में नमन करता हूँ। सप्त पुरी (अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काची, अवन्तिका, और द्वारका) का मै ध्यान करता हूँ क्योकि इनका स्मरण- मान ही मोक्ष देने वाला है । सप्त लोक (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक) मे निवास करने वाले सभी प्राणियो का मै कल्याण चाहता हूँ। सप्त पाताल (सात अधोलोक-अतल, बितल, सुतल, रसा- तल, तलातल, महातल और पाताल) के जीवो की मै शुभ- कामना करता हूँ। में सप्त पुरुष (सात पुरस लम्बा) युवक हूँ। सप्त जिह्व (सात जिह्वा वाला) होते हुए कम बोलता हूँ । सप्त- पदी (विवाह की एक विधि जिसके अनुसार वर-वधू अग्नि

भाषा
उच्चारण
सात
हिन्दी
पंजाबी सत
उर्दू
सात
कश्मीरी सथ
सिंधी सत/सत्त
मराठी सात
गुजराती सात
बंगला सात/शात
असमिया साताहाट
उड़िया सात/साता
तेलुगु
तमिल
मलयालम एल
कन्नड़
संस्कृत
सप्तन
अंग्रेजी सैवन
ब्रानी चीनी रोमन मयअंक बेबीलोनी
TT VII
म
एल

54 की सात बार परिक्रमा देते है) के समय मेरी धर्मपत्नी मेरे विचिन शरीर को देख कर चकित रह गई थी। सप्त भूम (सात मजिल वाला) भवन मेरा निवास स्थान है। अपनी साधना के बल पर मै सप्त मरीचि (अग्नि) को निगल सकता हूँ। सप्त नाडिका (सिंघाडे) के ढेर के ढेर हडप कर सकता हूँ। मप्तमत्र (अग्नि) मुझे देख कर कम्पित हो उठती है। मेरे सप्त रक्त (लाल रगवाले शरीर के सात अग- हथेली, तलवा, नख, आँख का कोण, जीभ, ओठ, तालु) सप्त सिरा (पान-ताम्बूल) चवाए हुए मुख के समान लाल - सप्तार्णव (सात समुद्र-हिन्द महासागर, प्रशान्त महा- सागर, अध महासागर, उत्तरी हिम महासागर, दक्षिणी हिम- महासागर आदि) और सप्त समुद्रान्त (पृथ्वी) पर मेरा एकच्छत्र राज्य रहा है । मेरी सप्त प्रकृति (राज्य के सात अग-राजा, मत्री, मित्र, कोप, राष्ट्र, दुर्ग और सेना) उस काल मे ख्याति प्राप्त कर चुकी थी। सप्तद्वीप (पृथ्वी के सात सट-एशिया, उत्तरी अमरीका, दक्षिणी अमरीका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया आदि) मे पूर्ण शान्ति थी। सप्त रात्रक (सात रात तक चलने वाला) यज्ञ बहुत होते थे। बाद मे सप्त बौव्यग कुसुमाढ्य (बुद्ध) और सप्त भगी (स्याद्वाद के मानने वाले जैन) सम्प्रदाय के लोगो ने मेरे शासनकाल की वडी प्रशसा की है। जिस समय मै सप्त मास्य (सात महीने का) था तो मैने सप्त गगा ( हरद्वार से ऊपर एक स्थान जहाँ गगा सात धाराओ मे बहती है) के निकट अपनी सप्तसू (सात 35 बच्चो को मॉ) को त्याग सप्तला (चमेली, सातला, नव- मल्लिका, रीठा, घुघुची, गुजा) की माला धारण कर सप्त- लोकी नाथ (शिव) को प्रसन्न किया था। सप्तग्रही (सात ग्रहो का एक स्थान पर आना) के योग के समय मैने सप्ताचि (शनिग्रह) को प्रसन्न करने के लिए एक सप्तशती (सात सौ पद्यो का सग्रह) प्रशस्ति स्प मे लिखी । दक्षिणा मे सप्त दान (एक प्रकार का दान जिसमे सात पानो मे सात प्रकार की चीजे भरकर दी जाती है) दिया । सगीत विद्या मे मेरी रुचि है। सप्तक सगीत के सात स्वर-(पड्ज, ऋपभ, गाधार, मध्यम, पचम, धैवत, और निपाद) की मेरी भारी सावना है। अपनी माता की सप्तकी (कटिवन्ध) के नूपरो मे स्वर मिलाकर मै गीत गाया करता था। अपने यौवनकाल मे मेरी सगीत विद्या की कीर्ति सात- समुद्र पार (वहुत दूर) पहुँची थो। श्रोतागण मेरा सगीत सुनते-सुनते सात भूल जाते (होशहवास खोना) थे । मै सात राजाओ की साक्षी देकर (किसी बात की सच्चाई पर जोर देना) कहता हूँ कि मैने अपनी सगीत विद्या को सात परदो के अन्दर (छिपाकर रखना) नही रखा। मेरी तो आपसे यही विनती है कि आप किसी से सात- पाँच (दगा, तकरार) न करे। यदि ऐसा किया तो समझो सात की नाक कट (सारा परिवार बदनाम होना)गई। चुगल- खोर को एक दिन सात घर की भीख मांगनी पडती (घर घर भीख मांगना) है । उसका माँग कर खाया हुआ भोजन सात धार होकर (बिना पचे निकल जाना) निकल जाता -

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आठ - - मै अण्ट या आठ नामधारी आपको अपनी आत्मकथा सुनाता हूँ। सवप्रथम अष्टमूर्ति (शिव-जो आठ रूपो वाले हैं-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और ऋत्विक्) को मेरा अष्ठाग (शरीर के वे आठ अग जिनसे साष्टाग प्रणाम किया जाता है-घुटना, हाथ, पॉव, छाती, सिर, वचन, दृष्टि और बुद्धि) प्रणाम स्वीकार हो । अष्टभुजी माता दुर्गा तथा अष्ठनायिका (दुर्गा की ये आठ शक्तियाँ उग्रचडा, प्रचडा, चडोना, चडनायिका, अति- चडा, चामुडा, चडा, तया चडवती) को मैं अपना शीश झुकाता हूँ क्योकि वह दुष्टो का दलन करने वाली है । अष्टकृष्ण (वल्लभ सम्प्रदाय मे माने जाने वाले कृष्ण के आठ रूप-श्रीनाथ, नवनीतप्रिय, मथुरानाथ, विट्ठलनाथ, द्वारकानाथ, गोकुलनाथ, गोकुलचन्द्रमा और मदनमोहन) को मेरा नमस्कार । अष्ट कर्ण (ब्रह्मा) से मेरी प्रार्थना है कि वे मुझे अष्टसिद्धि (आठ अलौकिक शक्तियाँ--अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्रदान करे। अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए मैं अष्टाक्षर मन (ॐ नमो नारायणाय) का जाप करता हूँ। मै अष्टधाती (जिसके माता-पिता का ठीक पता न हो) ही हूँ। 'एक' की आठवी पीढी मे मेरा जन्म हुआ। अठ- .

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मेरे अनेक नाम है। पहले-पहल मै सप्तम् या सप्त
कहलाया । अग्रेजी का 'सेविन' मेरे सप्तम् का रूप जानो।
सत्त, सत्ता, सत्तो, सत्ती आदि नाम से मै भिन्न-भिन्न
प्रान्तो मे जाना जाता हूँ। प्राकृत काल मे में सत्त कहलाता
था। हिन्दी वाले मुझे सात कहने लगे। मेरी सयुक्त सख्याओ
मे सत्त या सत रूप प्राय मिलता है-सत्ताईस, सतासी ।
मेरा 'सै' रूप भी है जैसे-सैतीस । 'सर' या 'सड' मेरा
असाधारण स्प है यथा-सरसठ या सडसठ ।

आठ मै अष्ट या आठ नामधारी आपको अपनी आत्मकथा सुनाता हूँ। सर्वप्रथम अष्टमूर्ति (शिव-जो आठ रूपो वाले है-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और ऋत्विक) को मेरा अष्ठाग (शरीर के वे आठ अग जिनसे साष्टाग प्रणाम किया जाता है-घुटना, हाथ, पॉव, छाती, सिर, बचन, दृष्टि और वुद्धि) प्रणाम स्वीकार हो । अष्टभुजी माता दुर्गा तथा अष्ठनायिका (दुर्गा की ये आठ शक्तियाँ उग्रचडा, प्रचडा, चडोना, चडनायिका, अति- चडा, चामुडा, चडा, तया चडवती) को मै अपना शीश झुकाता हूँ क्योकि वह दुष्टो का दलन करने वाली है। अष्टकृष्ण (वल्लभ सम्प्रदाय में माने जाने वाले कृष्ण के आठ रूप-श्रीनाथ, नवनीतप्रिय, मथुरानाथ, विट्ठलनाथ, द्वारकानाथ, गोकुलनाथ, गोकुलचन्द्रमा और मदनमोहन) को मेरा नमस्कार । अष्ट कर्ण (ब्रह्मा) से मेरी प्रार्थना है कि वे मुझे अष्टसिद्धि (आठ अलौकिक शक्तियाँ अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्रदान करे। अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए मैं अष्टाक्षर मन (ॐ नमो नारायणाय) का जाप करता हूँ। मै अष्टधाती (जिसके माता-पिता का ठीक पता न हो) नही हूँ। 'एक' की आठवी पीढी मे मेरा जन्म हुआ । अठ- -

भाषा
उच्चारण
आठ
हिन्दी
पंजाबी अठ
उर्दू
आठ
कश्मीरी आठ
सिंधी
अठ/अठ्ठ
मराठी आठ
गुजराती आठ
बंगला आट
असमिया
उडिया आठ/आठा
तेलुगु
तमिल स्टटु
मलयालम सट
कन्नड एण्ट
संस्कृत अष्टन
अंग्रेजी
बाली चीनी रोमन मयअंक बेवीलोनी
आठ
एनिमिदि।
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T
VIL

59 - वाँसा सस्कार (गर्भ के आठवे महीने मे होने वाला सस्कार) के समय मेरी माँ ने अप्टधातु दान (सोना, चाँदी, ताबा, रॉगा, जस्ता, लोहा, शीशा और पारा) किया । मै अपनी माता से उत्पन्न अष्टम सतान हूँ। किम् वदन्ति हे कि मेरा जन्म अष्टका (अगहन, पूस, माघ और फाल्गुन की कृष्णाष्टमी) को किसी महीने में हुआ था। इसी कारण मेरा नाम अष्ट पडा। आठ वप की आयु मे अष्टाग योग (योग के आठ अग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समावि) सीखने का कार्य आरभ किया । अष्टाग आयुर्वेद (आयुर्वेद के आठ अग या विभाग- शल्य. चीरफाड, शालाक्य-गर्दन से ऊपर की इन्द्रियो की चिकित्सा, काय चिकित्सा-~-सर्वागव्यापी रोगो की चिकित्सा, भूत विद्या-पिशाच आदि की वावा से उत्पन्न रोगो की चिकित्सा, कौमार मृत्य-शिशु चिकित्सा, अगद तत्र- सपीदि दत की चिकित्सा, रसायन तत्र-पदार्थो का तत्व- ज्ञान, और वाजीकरण-औषधि द्वारा शक्ति वर्धन) की शिक्षा ग्रहण की। अण्ट वग (आठ औषधियाँ-जीवक, ऋप- भक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीर काकोली, ऋद्धि और वृद्धि) को मै आयुर्वेद का बोज मत्र मानता हूँ। मैंने हठयोग के अष्ट कमल दल (मूलाधार से मस्तक तक माने गए अष्ट चक्र) का पूण ज्ञान प्राप्त किया । अष्ट- हव्य (यज्ञादि की सामग्री के आठ हव्य-पीपल, गूलर, पाकड, बरगद, तिल, सरमो, पायस और घृत) से यज्ञ - 60 . - . करते अप्टपदी छन्द मे देवताओ को प्रसन्न किया। अष्टाग मार्ग (वुद्ध द्वारा उपदिष्ट दुपनिवृत्ति का आठ अगो वाला मार्ग-~सम्यग्दृष्टि, सम्यक्सकल्प, सम्यग्वाक्, सम्यक्कर्म, सम्यगाजीव, सम्यग्व्यायाम सम्यक् स्मृति और सम्यक्समाधि) पर चलने का मैने पूर्ण प्रयत्न किया है। यही कारण है कि मै आठो याम प्रसन्न रहता हूँ। सगुण अवतार की महिमा को समझने के लिए मै अप्ट- छाप के कवियो (गोसाईं विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित आठ कवियो का दल-सूरदास, कुभदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, चतुर्भुजदास और नन्ददास) के निकट सम्पर्क में रहा । जरत्कारु वश के सर्प की कहानी का अध्ययन करते मैने नागो के अष्ट वश का ज्ञान प्राप्त किया । मेरा शासन काल बहुत नियमित रहा । अष्ट प्रकृति (राज्य के आठ प्रधान कमचारी-सुमन, पडित, मत्री, प्रधान, सचिव, अमात्य, प्राड्विवाक, और प्रतिनिधि) पर पूरा ध्यान देता था। नीति शास्त्र का अध्ययन करते समय मैने अष्ट प्रकृति (राजा, राष्ट्र, अमात्य, दुर्ग, बल, कोप, सामन्त और प्रजा) के विषय मे गहरी रुचि प्रकट की थो।नीति शास्त्र के अध्ययन के समय मेरा ध्यान अष्टवर्ग (राज्य के अगभूत ऋपि, बस्ती, दुग, सेतु, हस्ति- बन्धन, खान कर ग्रहण, तथा सैन्य सस्थापन) को व्यवस्था की ओर भी दिलाया गया था। मेरे अष्ट प्रधान (आठ प्रकार के अगी-प्रधान, अमात्य, सचिव, मत्री, धर्माध्यक्ष, न्यायशास्त्री, वैद्य और सेनापति) बहुत जागरूक थे । अष्ट- -

61
मगल (सिंह, वृप, हाथी, कलश, पखा, वैजयती, भेरी और
दीपक-ये मागलिक माने जाते है) का बडा सम्मान होता
था।
मेरा आपसे कुछ निवेदन है । आप अष्टावक की गीता
का अव्ययन कर लाभ उठा सकते है। आपको अष्टावक
ऋपि के समान आठ जामे से बाहर (हर समय क्रोध में
रहना) नही जाना चाहिए। क्रोधी जीव पर कोई आठ आँसू
(विलाप करना) नही बहाता। ऐसे व्यक्ति की आठ पहर
चौसठ घडी (हर समय) आठ अठारह होने (हैरान) की
सभावना है। आठ गाँठ (कम्मत चालाक) बनने से सदा
आठ सूली पर रहना (हमेशा कष्ट मे रहना) पडता है ।
अन्त मे अपने विभिन्न उपनामो की चर्चा कर तिपय
को समाप्त करता हूँ। अठ, अड, आदि मेरे ही नाम
है। अग्रेजी का 'एट' मेरा 'अष्ट' का ही विकृत रूप है।
प्राकृत काल मे मुझे अट्ठ कहते थे। मेरी सयुक्त सय्याओ
मे अट्ठ, अठ, अड रूप मिलते है अट्ठाईस, अठासी,
अठहत्तर, अडसठ आदि ।

नौ
-
.
-
.
मैं नव अथवा नौ हूँ। नवग्रह (सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध,
गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) का पूजन कर मैं नव दुर्गा
(दुर्गा के नव विग्रह-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघटा,
कूष्माडा, स्कन्द माता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी,
और सिद्धिदात्री) को अपना शीश झुकाता हूँ। नवकुमारी
(नवरात्र मे पूजी जाने वाली नव कुमारियाँ-कुमारिका,
त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, काली, चडिका, शाभवी, दुर्गा
और सुभद्रा) का मै श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूँ। नवशक्ति
(शक्ति के नव विग्रह-प्रभा, माया, जया, मूक्ष्मा, विशुद्धा,
नदिनी, सुप्रभा, विजया और सवसिद्धिदा) का मै ध्यान
करता हूँ। अन्त मे मै नवव्यूह (विष्णु) से अपनी आत्मकथा
पूर्ति की कामना करता हूँ।
नवद्वीप (बगाल का एक प्राचीन विद्या केन्द्र, नदिया)
मे नवरात्र (चैत्र और आश्विन मे शुक्ल प्रतिपदा से नवमी
तक नौ दिन जिसमे दुर्गा की विशिष्ट पूजा की जाती है)
की नवमी को मेरा जन्म हुआ। उस समय मेरी माता ने
नवधातु (स्वर्ण, रजत, अशोधित लोहा, सीसा, ताबा, रागा,
तीक्ष्णक, काँसा, कान्त लोहा- शब्द चिन्तामणि) का दान
दिया । मुझे प्राप्त कर वह इतनी प्रसन्न हुई कि मानो उसे
कुवेर की नवनिधि- पद्म, महापद्म, शख, मकर, कच्छप,
,

भाषा
10
-
उच्चारण
हिन्दी नौ
पंजाबी नौ
उर्दू नौ
कश्मीरी नव
सिंधी
नव
मराठी नऊ
गुजराती नव
बंगला नय/नाय
असमिया नाना
उडिया नाना
तेलुगु तोम्मिदि
तमिल
मलयालम
ओम्पत।
ओम्बद
कन्नड़ ओबतु
संस्कृत
अंग्रेजी नाश्न
ब्राली चीनी रोमन मयअंक वेबीलोनी
3
IX
ओम्बद्ध
नव
1

64
.
-
मुकुद, कुद, नील और गर्व) प्राप्त हो गई हो । मेरी माता
ने मुझ पर नवरत्न (मोती, मानिक, वैदूर्य, गोमेद, हीरा,
मूंगा, पद्मराग, पन्ना और नीलम) वार दिए । नव पनिका
(बेल, अशोक, केला, अनार, धान्य, हल्दी, मानक, अरुइ,
और जयती) के जल मे मेरा स्नान कराया गया। नवशायक
(नौ जातियाँ-ग्वाला, तेली, माली, जुलाहा, हलवाई, बढई,
कुम्हार, कमकर कहार, और नाई) को वस्त्र, अन्न आदि
का दान दिया गया। नवे दिन मेरी माता ने नवशत शृगार
कर (सोलह शृगार-उबटन लगाना, स्नान करना, वस्न
धारण करना, बाल सँवारना, अजन लगाना, सिंदूर भरना,
महावर लगाना, भाल पर तिलक लगाना, ठोडी पर तिल
बनाना, मेहदी रचाना, सुगवित द्रव्यो का प्रयोग, अलकार
धारण करना, पुष्पहार पहनना, पान खाना, ओठ रगना,
और मिस्सी लगाना) विप्रो को भोजन कराया।
नव वर्ष की अवस्था में साहित्य के नव रस (शृगार,
हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और
शान्त) का अध्ययन किया । राजा विक्रमादित्य की सभा के
नवरत्न (धन्वन्तरी, क्षपणक, अमर सिंह, शकु, बेताल भट्ट,
घटखर्पर कालिदास, वराहमिहिर ओर वररुचि) की विधाओ
का अन्वेषण किया।
तदनन्तर नवधा भक्ति (नौ प्रकार से की जाने वाली
भक्ति श्रवण,
कीतन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन,
दास्य, सख्य और आत्म निवेदन) का आश्रय ले विभिन्न
देवी देवताओ से इष्ट प्राप्त किए।
मेरा राज्य नवखड (पृथ्वी के नौ विभाग-भारत,

65 , इलाव्रत, किंपुरुप-मद्र, केतुमाल, हरि, हिरण्य, रम्य और कुश) पर था । अपराधियो को नव विप (नौ प्रकार के विप- वत्सनाम, हारिद्रक, सक्तुक, प्रदीपन, सौराष्ट्रिक, शृगक, कालकूट, हलाहल, और ब्रह्मपुन) पान करने पड़ते थे । व्यवहार मे नौ-दसी (साल भर मे ६ के बदले १० या दसे लेना) का प्रयोग होता था। नौसरिया (चालबाज) केवल शब्द-कोश मे मिलता था । शत्रु, सम्मुख आने से पूर्व नौ दो ग्यारह (चपत होना) हो जाता था। नो, नौ, नह, नू, नवि, नवी, नव आदि मेरे अनेक नाम है । अग्रेजी का 'नाइन' मेरा ही विकृत रूप है प्राकृत काल मे मै 'नअ' कहलाया। मेरी सयुक्त सख्याएँ दस मे एक 'उन' करके बनाई जाती है उनतालीस, उनचास आदि । नवासी और निनानवे मे मेरा वास्तविक रूप विद्यमान रहता है। ,

शून्य
मैं शून्य हूँ। मेरे कई नाम है । मुझे सीफर भी कहते
है। कुछ लोग मुझे बिन्दी या बिन्दु भी कहते हैं। जीरो
भी मेरा ही नाम है । लेटिन भाषा मे मुझे 'जेफोरम' कहते
है। इटली में मुझे 'जमीरो' कहते है।
मेरी जन्म भूमि भारत है। भारत के गणितज्ञ के
मस्तिष्क से ही मेरा जन्म हुआ । मेरी प्रसिद्धि अरब देशो मे
पहुँची । उन्होने मुझे अपनाया । अरव से मेरी यात्रा यूरोप
के देशो तक हुई । वे भी मुझे पाकर धन्य हो गए।
भले ही मैं शन्य हूँ, कुछ नही होते हुए भी मेरी सत्ता
है। सारा शून्य पथ (आकाश) मेरा निवास स्थान है। शून्य
मध्य (नरकट) से मेरी कहानी कोई शून्य हृदय (खुले दिल
वाला) व्यक्ति ही लिख सकता है । शून्य दृष्टि (लक्ष्यहीन)
मेरी महत्ता को क्या जाने । शून्य हस्त (जिसका हाथ खाली
हो) भी मेरी महत्ता नही समझ सर
मेरे नाम पर शून्यवाद (वो चला।
शून्यवादी (बौद्ध) आज भी अनेकदै
अपने धर्म का प्रचार
,

भाषा
उच्चारण
हिन्दी शून्य
पंजाबी सिफर
उर्द
सिफ
कुश्मीरी सिफर
सिंधी बुडी
मराठी शून्य
गुजराती मोड
असमिया शून्य
तेलगू सुन्न
तमिल
मलयालम पूज्यं
कन्न्ड
सोन्ने
संस्कृत
शून्य
Lअंगेजी जीरों
पूज्यम,/सैपर
--

68 कभी भी शून्य वहरी रोग (जिसमे शरीर का कोई भाग शून्य हो जाता है ) से पीडित नही होगे। आप मेरी बात को शून्यमना (मन को दूसरी ओर लगाना) न हो कर ध्यान से सुन रहे होगे। गणित के क्षेत्र मे मेरे महत्त्व को कौन भुला सकता है। जिस ममय तक मेरा गणित के क्षेत्र मे पदार्पण नहीं हुआ था उस समय तक केवल नौ सख्याएँ रही। मेरे प्रवेश से अक- गणित का इतिहास ही बदल गया। जिस अक के साथ मैं जाती हूँ वह दस गुणा हो जाता है। आप 1, 2, 3, 4, 5 आदि के माथ मुझे दाईं ओर लगा कर तो देखिए। आप किमी अक मे मुझे जोडिए। आप पाएँगे कि उसमे कोई अन्तर नही पडता। आप किसी संख्या मे से मुझे घटाइए, कुछ अन्तर नही पडेगा। किन्तु आप मुझसे किसी अक को गुणा कीजिए । मै सभी सख्याओ को अपने परिवार का बना दूंगी यानी सभी मप्याएँ शून्य बन जाएँगी । मैं अपनी छोटी सी कहानी सुनाकर अव शून्यालय (एकान्त स्थान) मे विधाम करने जा रही हूँ।

एक और शून्य के स्नेहपूर्ण दाम्पत्य से उत्पन्न उन्ही का आत्मज मैं दस हूँ। शिव के समान मेरी आवी आकृति स्नी और आधी आकृति पुरुष की है। मैं ही प्रकृति और पुरुष का अवतार हूँ। दशबाहू (शिव) तथा दशरूपभृत (विष्णु) को मेरा प्रणाम । दस भुजो (दुर्गा) को मेरी वन्दना। दशरश्मिशत (सूय) तथा दशवाजी (चन्द्र) को मैं शीश झुकाता हूँ। दश- दिक्पाल, [दस दिशाओ के रक्षक देवता--इन्द्र (पूर्व), अग्नि (अग्निकोण), यम (दक्षिण), नैऋत (नैऋत कोण), वरुण (पश्चिम), मरुत् (वायु कोण), कुबेर (उत्तर), ईश (ईशान कोण), ब्रह्म (ऊर्ध्व दिशा) और अनत (अधोदिशा) की मैं आराधना करताहूँ। मै दशरय सुत (राम) से अपनी आत्म- कथा पूर्ति की प्रार्थना करता हूँ। दशहरा(ज्येष्ठ शुक्ल मै दशमी जिस दिन गगा का जन्म हुआ था और सेतु बन्ध मे राम ने रामेश्वर की स्थापना की थी) के दिन मेरा जन्म हुआ। दश मास्य (जो दस महीने तक पेट मे रहे) होने के कारण मेरा नाम 'दस' पडा । जन्म घुट्टी मे दशमूल (दस पेडो की जड या छाल-सरि वन, पिठवन, छोटी कटाई, वडी कटाई, गोखर, वेल, सोनापाठा, गभारी, गनियारी ओर पाठा) का काढा पिलाया गया।

मापा
उच्चारण
हिन्दी दस
पंजाबी दस/दह
उर्दू दस
कश्मीरी दह
सिंधी दह/ डह
मराठी दहा
गुजराती दस
बंगला दश/दाश
असमिया दहाडाह
उड़िया दासा
तेलुगु
पदि
तमिल पत्त
मलयालमा पत्त
कन्नड़
हत्त
संस्कृत दश
अंग्रेजी
हैन
ब्राली चीनी रोमन
X
है
-

11
,
-
-
दशकुल वृक्ष (तत्र मे गृहीत दस वृक्ष लसोडा, करज, बेल,
पीपल, कदम्ब, नीम, बरगद, गूलर, आँवला और इमली)
की छाल के पानी मे मेरा स्नान कराया गया।
हवन की दशाग सामग्नी (गुग्गल, चदन, जटामासी,
शिलारस, लोबान, राल, खस, नख, भीमसेनी कपूर तथा
कस्तूरी) से दशरात्र यज्ञ (दस रात तक चलने वाला यज्ञ)
कराया गया । ज्योतिपी ने मेरी दशा (जीवन की काल कृत
विशेष अवस्था-गभवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पौगड,
यौवन, स्थावीर्य, जरा, प्राणरोध और नाश) पर विचार
किया । उसने उसी समय कह दिया था कि अब अक परि-
वार की दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति होती चली जाएगी।
अक परिवार अव देश काल की सीमा मे नही बाँधा जा
सकेगा।
हुआ
भी ऐसा ही। आज अक परिवार का
विस्तार विश्व के कोने-कोने मे हो चुका है। इसके परिवार
की सहायता के विना ससार के कामकाज रुक जाएँ । अब
आप अक परिवार रहित ससार की कल्पना भी नहीं कर
सकते।
वास्तव मे

भाषा
उच्चारण
हिन्दी दस
पंजाबी दसादह
उर्दू
दस
कश्मीरी दह
सिंधी दहा डह
मराठी दहा
गुजराती दस
बंगला दश/दाश
असमिया दहाडाह
उड़िया दासा
तेलुगु पदि
तमिल पत्त
मलयालमा पत्त
कन्नड़ हत्तु
संस्कृत दश
अंग्रेजी
ब्राली चीनी रोमन मयअंक वेबीलोनी
C
x
ocI
स्न

71
,
दशकुल वृक्ष (तत्र मे गृहीत दस वृक्ष लसोडा, करज, बेल,
पीपल, कदम्व, नीम, बरगद, गूलर, आँवला और इमली)
की छाल के पानी मे मेरा स्नान कराया गया।
हवन की दशाग सामग्री (गुग्गल, चदन, जटामासी,
शिलारस, लोबान, राल, खस, नख, भीमसेनी कपूर तथा
कस्तूरी) से दशरात्र यज्ञ (दस रात तक चलने वाला यज्ञ)
कराया गया । ज्योतिपी ने मेरी दशा (जीवन की काल कृत
विशेप अवस्था-गर्भवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पौगड,
यौवन, स्थावीर्य, जरा, प्राणरोध और नाश) पर विचार
किया । उसने उसी समय कह दिया था कि अब अक परि-
वार को दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति होती चली जाएगी।
अक परिवार अव देश काल की सीमा मे नही बाँधा जा
सकेगा।
वास्तव मे
हुआ
भी ऐसा ही । आज अक परिवार का
विस्तार विश्व के कोने-कोने मे हो चुका है। इसके परिवार
की सहायता के बिना ससार के कामकाज रुक जाएँ । अव
आप अक परिवार रहित ससार की कल्पना भी नहीं कर
सकते।

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Ankon Ki Kahani

Author
Dr. Jai Narain Kaushik
Title
Ankon Ki Kahani
File name
Ankon Ki Kahani
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2011/03
Publisher
Sahitya Sahakar Krishna Nagar Dehli
Language
Sanskrit
Pages
79
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551218
Barcode
4990010031981.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
q9bO8cFznP2
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