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Jainvartkatha Sangrh

Lala Jainy Lal · 2009/11

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ॐ
HASE
ऋषिपंचमीब्रतकथा भाषा।
-
दोहा-वन्दो श्रीजिनराजके, चरणकमल गुणहीर।
भवसमुद्रतारणतरण, हरणसकल भवपीर ॥१॥
बन्दोजिन वाणीसुभग, जाते दुरित नशाय ।
कथा पंचमीकी कहूं, गुरु के लागों पाय ॥२॥
॥ चौपाई॥
राज गृह नगरी शुभ वसै । श्रोणिक महाराज अतिलसै ॥
एकदिवसबन्देजिनराजा । श्रोणिकप्रश्नकियासुखकाजा ॥३॥
व्रतपंचमीकहो जिनदेवा । किनपायो फलकर व्रत सेवा ।।
तवगणधर बोलेसुनसंता । हस्तनागपुर बसे महंता ॥ ४ ॥
धनपतिनगरसेठतहंबसे । कमल श्री वनिता गृह लसै ॥
पुत्र सुभविकदत्ततिसगेह । भयो पुनीतमदनसमदेह ॥५॥
धनपतिऔरविवाहीत्रिया । नामरूप श्रीपति अतिप्रिया ॥
तबकमलनीअतिदुखसहै । पुत्रसहितन्यारेगृहरहै ॥ ६ ॥
धनपति रूप त्री आनन्द । वन्धुदत्त सुत उपजो 'चंद ॥
ज्यों ज्यों वड़ेसयानेभये । त्योत्योसकलकलागुणलये ॥ ७ ॥
एकदिवसमिलदोनोधात । धन बिढ़वनकीकहियोबात ॥
तात गात आनंदित भयो । रत्नदीपको आयसुदयो ॥८॥
संगलये योद्धा बहु धीर । लये पाट अम्बर वर चोर ॥
वणिजयोग्यलीनेसबसाज । रत्नाभूषणवर गजबाज ॥६॥

अषिपंचमीव्रतकथा ॥ (२) भविकदत्त मातासे बात । कहो वनिजको पठवततात ॥ बन्धुदत्तपुनि संग सुचले। औरभिलोगसंगभले ॥ १० ॥ सुनमाता तबधधकोहियो । तुम बिछुड़े सुत कैसे जियो । तुमगृह मंडनकुलआधार । तुमबिनसबसूनो संसार ॥ ११ ॥ अरुतुम संग सोतिकापूत । सो व्यसनी सुनियतहै धूर्त ॥ जोहठ पुत्र वणिजकोजाउ । तोधूर्तकोमतपतिआउ ॥ १२ ॥ नदी नखी जो श्रृंगी जीव । अरु दुर्जन करशस्त्रसदीव ॥ अरुवेश्याकघरबास । तिनकासुतमतकरोविश्वास ॥ १३ ॥ यह माताको सुनि कर बात। रोम २ आनन्दोगात।। चलत शकुन सवनीकेभये । चलतरसागर तट गये ॥ १४ ॥ तहां भरे प्रोहन जो अपार । वस्तुगिणत बाढ़े विस्तार ॥ गये तिलक पहनके तीर । जामें कोई जाय न धीर ॥ १५ ॥ भविकदत्त चितकीनोंचाव । गयो नगर में कर उच्छाव ॥ शून्य नगर ना कोई वसै । वस्तु बजारहजारों लसै ॥ १६ ॥ निर्भयभयो गयो सो तहां । चैत्यालय जिनवर को जहां । वंदेचंद्रप्रभूजिनराज । सुफलजन्मतिनमानों आज ॥ १७ ॥ वन्धुदत्त ने कीनों द्रोह । यान चलाये छोड़ो मोह ॥ कुछयक दिनमें पहुंचेतहां । रत्नद्वीपपहन है जहां ॥ १८ ॥ भविकदत्तफिरआयोथान । शून्य देख मन भयो मलान । मातावचनसुमरमनधीर । फिर आयो जिनवरकेतीर ॥१६॥ इतनी बात यहां हो रही । अब यह कथा मातपर गई ॥ पुत्र मोहकी व्यापीपोर । कमल श्रीमत धरे न धीर ॥२०॥ क्षण २ दीर्घले निश्वास । भूली सुधिबुधि भूख न प्यास ॥ संगसखीजो स्योनीलई । अवधि ज्ञानमुनिवरढिंगगई ॥२१॥ वन्दि मुनीश्वर पूछे सोई । जासे पुत्र मिलन अब होई ॥ ।

ऋषिपंचमीब्रतकथा॥ (३) जासेसुख परमानंदलहो । विछुरापुत्र मिलैसोकहो ॥ २२ ॥ सुने बचन तब मुनिवरकहैं । ज्यासों रोगशोक सबद हैं । जासे स्वर्गमुक्तिफलहोइ । व्रत पंचमीकरोभविलोइ ॥ २३ ॥ जोड़े कमलशी कर दोइ । कहो मुनींद्रकौन विधिहोइ ॥ सुनिधुनिमुनिबीलेअभिराम । मासअपाढ़सुक्खकाधाम २४ जबहिशुक्रपंचमिदिन होइ । तबहीव्रतकीजे भविलोइ ॥ व्रतकेदिनछोड़ो आरंभ । जिनवरजजोतजोसबदंभ ॥ २५ ॥ वर्षपंच अरुमासहि पंच । येसब ब्रत पेंसठ सुनसंच ।। जब यह व्रत पूरे हों लोइ । यथाशक्ति उद्यापन होइ ॥२६॥ लीनो व्रत कमलनी भाय । सव दुख ताके गये पलाय ॥ कथासुभविकदत्तकीठहीं । नगरप्रमोसोगयोनहिं कहीं ॥२७॥ पहुंचो राजाके दरवार । दिन आथयो भयो अधिकार ॥ तहां न कोई मानव रहै। कासोंबात चित्तकी कहै ॥२८॥ नृपकी सुता रूपगुण खान । बोली तासों कर सन्माल ॥ अहोधीरतुमआयेयहां। कोनजातिपुर निवसो कहां ॥२६॥ कौन भांतितुम आगमभयो। यह सन्देह भयो मोनयो । तासे भविकदत्त वृत्तांत । अपनोकहीभयो तब शांत ॥३०॥ सुनपुनि राजकुंवरि यों कहै । एक महाराक्षस यह रहै ॥ तानेपुरकीन्हों विध्वंशा। नरनारिनकारहान वंशा ॥३१॥ वहपुत्री करराखो मोहि । ना जानों अब कैसी होहि ॥ तुम्हेंदेख बहकरिहैक्रोध । सदालेत मानुष का शोध ॥३२॥ अब मैं एकजो तुमसे कहों। मैं द्वारे मंदिर के रहो। तुमभीतर रहिदेउकिवारा । तोवासेकुछहोइ उबारा ॥ ३३ ॥ कुंवर राखिदृढ़ दये किवारा । आपरही मंदिर के द्वारा ॥ सबैनिशाचर आयो तहां । पुत्री मंदिर बाहर जहां ॥ ३४ ॥ - - लूट (४) ऋषिपंचमीब्रतकथा ॥ सो हठकर मंदिर में गयो। देखकुंवर प्रमुदितमन भयो । अबमेरेसीझेसबकाज । तुमदर्शन पायो मैं आज ॥ ३५ ॥ तुमतो मेरे मित्र निदान । कन्या राखी तुम्हरे जान ॥ अबमोकोतुमअतिसुखदेऊ। कन्याराजपाटसबलेऊ ॥३६॥ तबहि असुरनेकियो बिवाह । कन्या दे कीन्हीं उत्साह ॥ भविकदत्तअराजकुमारी । सुखसेरहतसुमहलमझारी ॥३७॥ सप्त खने मंदिर के रहैं। तातमात की सब सुधि कहें यहतोलब्धिसुइनकोभई । कथा जो बंधुदत्त की ठई ॥ ३८ ॥ बस्तुबेच अरू लीनी नई । नफा न एक दाम की भई ॥ सोभरयानदेशको चले । वीचनीचतस्करबहुमिले ॥ ३ ॥ तिन मिल लयो सब संग । कठिन कष्टसे छोड़े.नंग ॥ आयेफेरतिलकपुरथान। भषिकदत्तअवलोकेजान ॥ ४० ॥ दम्पति लखि आनंदितमये । तबसब मिल आगे होलये ॥ वन्धुदत्तपावोंपड़गयो । तुम बिनधातमहादुखलयो ॥ १९ ॥ चोरों लये हम सके। कठिन कष्ट से छोड़े अबै॥ भविकदत्तहंसबोलोवीए । कछु शंकामतकरोशरीर ॥४२॥ मेरे बहु लछमी भंडार । रत्न जहाज भरो इक सार ॥ ऐसे कह सब गृह में गये। वस्त्राभूषण सबको दये ॥ ४३ ॥ पटरस व्यंजन भोजन करे । तासे सबहि कष्ट परिहरे ॥ कर सन्मान यानभरदये। सर्व लोगप्रमुदितमनभये ॥ १४ ॥ बन्धुदत्त विननै कर सेव । अब तुम चलो देश को देव ।। धर्म धुरंधर कुल आधार। तुम समनहींपुरुषसंसार ॥ ४५ ॥ तात मातके दर्शन करो। योसे सकल कष्ट परिहरो॥ अरुभावजसेबिनतीकरी । सुनधुनिसामोलीगुणभरी ॥ १६ ॥ अव प्रिय जिय कोजे सतभाव । देखें कमल श्री के पांव ॥

ऋषिश्चमीव्रतकथा ।
(५)
अरुसबमिलजुकहीहठबात । भविकदत्तमबमानीमात ॥४७॥
बनिता सहितचढ़ोसोजहाज । त्रिय बोलीभूलीप्रियसाज ॥
देव अनर्घ दिया संदूक । वस्त्राभरण भरे गई चूक ॥४८॥
सुनी धनी वाणी निजत्रिया। ऋद्विसिद्धबिनकम्पोहिया ॥
भविकदत्तआतुरहोधाय । नगरमध्यसोपहुंचोजाय ॥ ४ ॥
बन्धुदत्तचित्त चिंतो क्रूर । भातहिछोड़ गयो पुनि दूर ॥
वणिकोसहितमंत्रतिनकियो । सबहि दानमनवांछितदियो॥५०॥
पहुंचे जाय समुदके तीरा । निज नगरी आये धर धीरा ॥
मिलेसबहिजनगणअरुतात। मात मिलोप्रमुदितमन गात ॥
देख अपूर्व वस्तु संयोग । भये सर्व विस्मय युत लोग ॥
अरुसुंदरिघरभीतर लई । रूप श्री आनंदित भई ॥ ५२ ॥
ताहि देख सब पुर नरनारी । कोई नहीं तास उनहारी ॥
माता बन्धुदत्त से कहै । यहसुंदरिदुःखित क्योरहै ॥ ३ ॥
कौननगरीकिसकीयहधिया । किन उपकारसुतुमपरकिया ॥
सुनध्वनिबन्धुदत्तमुखइसो । रत्न द्वीपसागरवसो ॥ ५४ ॥
पृथ्वीपाल नृपतिकी सुता । राजादई हमें गुणयुता ॥
मात तात गृहकीसुधिकरै। अखिलदेखधीरनहिंधरै ॥ ५५ ॥
हमतुमविननाकियोविवाह । सुन ध्वनिसोआनंदोसाह ॥
ऐसेही सबसाथिन कही । तब सब केमनआईसही ॥ ५६ ॥
सुन सबके मनभयो उछाह । कीजे बंधुदत्तका व्याह ।
शोधघड़ीपंडितनेकही । व्याह करो तिनदूजे सही ॥ ५७ ॥
कामिन गावें मंगल चार । बिविध, भांति दीनी ज्यांनार ॥
कुंबररहीमंदिरसतखने । निंदिकर्ममुखजिन वरभने ॥५॥
करसाहव दृढ़दये किवार । त्यागे तिलक ताम्बूलाहार ॥
ऐसे यहां कथांतरहोइ । भविकदत्तसुधिकहै न कोइ ॥५॥

(६) ऋषिपञ्चमीव्रतकथा॥ भविकदत्त नगरी मे गयो । सब सामग्री ले आइयो । देखशून्यथल लईपछार । मुखजपे धिक्क २ संसार ॥ ६०॥ तव वहदेव भयो प्रत्यक्ष । भविकदत्तहम तुम्हरी पक्ष । अनतुमहमकोआज्ञादेव । पुजवोमन वांछितकरसेव ॥६॥ अविकदत्तयहकहो निदान । पहुंचोंजाय भातके थान॥ देवसुभगवहुलीनोशाज । रत्नपदाम्बरगजअरुबोज ॥ ६ ॥ चढ़ि विमान में पहुंची तहां । कमल ना पौढ़ी थी जहां ॥ देखविभूतिपुत्रको सोइ । सकिधोंयहस्वप्ना होइ ॥६३ ॥ भविकदत्त बोलो वर वोर । मिली माय मोको धरधोर ॥ सुने वचनतम संशयगयो । गहभर अंकपुत्रभेटयो ॥ ६४ ॥ बंधुदत्त जो कोनो पाप । कहा सर्व माता से आप ॥ माताबोली कर उत्साह । तासे बंधुदत्तकरे व्याह ॥६५॥ सो नित चित्त परिव्रतधरै । तासे मूढ व्याह विधिकरै ॥ सो तो बहू तुम्हारी आइ । ताको देहु. पारनो जाइ ॥६६॥ वस्त्राभरन बहूके जिते । माताको पहिराये तिते ॥ अरु निजकरकीमुंदरीदई । बैठ सुखासनसोतहं गई ॥ ६ ॥ कमल श्री आवतहो देख । रूप श्री मन भई विशेख ॥ मिलींपरस्परजियसुखभयो। करसन्मानबैठकादयो ॥ ६ ॥ कमल श्रीमंदिर पर गई । वचन सुनाय सो ठाढ़ी भई ॥ तबतिन जानी अपनीसास । पडीपांवढ़लईउसांस ॥६९ ॥ अरुसुतकोआगमनसुनाइ । देभोजनगृह पहुंचीजाय ॥ भविकदत्तराजापरगयो । मिलराजाआनंदित भयो ॥ ७० ॥ तवै राय सुन सो वृतंत । क्रोधन सको सम्हारि महंत ॥ किंकर पठये पहुंचे जाय । बंधुदत्तकोलाये धाइ ॥ ७१ ॥ आये लोग संग के सबै । पूंछी तिन्हें सौह दे तवै॥

'पुत्रलयो मैने सुगधदशमीव्रतकथा ॥ (७) तिन राजासेसांचीकही । समधनविक्रदत्तको सही ॥७२॥ राजासुनतकोपअतिकियो । बन्धुदत्तकोदण्ड जु दियो । अपनिसुतापुनिदीनीराइ । करविवाहमंदिरपहुंचाइ ॥७३॥ भविकदत्त माता गुण भरी। शुभ घरी मैंव्रतकियोपंचमी तनो। जाते भयोअतुलधनधनो ॥ ७४ ॥ तिनभीधुनिसुनकेत्तलियो । भावसहितविधिपूर्वक कियो । उद्यापन विधिपूरणकरी । जाते भूरिलच्छि विस्तरी ॥७॥ दोय २ सुत तिनकेभये । नित २ करत महोत्सव नये ॥ भविकदत्तदीक्षाव्रतलयो । दशवेंस्वर्गजायसुर भयो ॥६॥ भुगतेभोग परम सुखनयो । दयावन्तफिर मुक्तहिगयो । श्रेणिकसुनतसबहिवतकरो। तिनसबधोरदुःखपरिहरी ॥७७ और जो करे भावसे कोय । ताकोस्वर्ग मुक्ति सुख होय ॥ सत्रहसौसत्ताबनजान । मिती पौषसुदिदशमीमान ॥ ७ ॥ हती कंतपुरमें रचिकथा । श्रीसुरेंद्र भूषण मुनियथा ॥ नावकपढ़ोसुनोधरध्यान । जासेहोयपरमकल्याण ॥ ७६ ॥ इति श्रीऋषिपंचमी व्रतकथा भाषा सम्पूर्णम् ॥ सुगंधदशमी व्रत कथा। चौपाई॥ वर्द्धमान वंदो जिनराय । गुरु गौतम बंदों सुख दाय ॥ सुगंधदशमीव्रतेकीकथा । वर्द्धमानसुप्रकाशीयथा ॥१॥ मगधदेश राजगृह नाम । नेणिक राज करे अभिराम ॥ नामचेलनागृहपटरानि । चंद्ररोहिणी रूप समान ॥२॥ नृप बैठो सिंहासन परे । वन माली फल लायो हरे॥

(८) सुगन्धदशमीव्रतकथा ॥ करप्रणास वच पसेकहो । चित्त प्रमोदसेठाडोरहो ॥३॥ बर्द्धमानआयेजिनस्वामि । जिनजीतोउद्यतअरिकाम ॥ इतनीसुनतन्नपतिउठचलो । पुरजनयुतदलबलसेभलो ॥४ समोशरण बन्दे भगवान । पूजा भक्ति धार बहुमान ॥ नरकोठाबैठोनूप जाय । हाथ जोड़पछे शिरमाय ॥५॥ सुगंधदशमी व्रतफलभाषि। ता नरकी कहिये अवसाखि ॥ गणधर कहेसुनोमग्धेश । जंबूद्वीपविजयाई देश ॥६॥ शिवमंदिर पुर उत्तर श्रेणी । विद्याधर प्रीतंकर जैनी ॥ कमलावती नारिअत्तिरूप । सुर कन्या से अधिक अनूप ॥ सागरदत्त बसे तहों साह । जाके जिनप्रतमें उत्साह ॥ धनदत्तावनिता गृहकही । मनोरमा ता पुत्री सही ॥८॥ सुगुप्ताचार्य गृह आइयो । देख मुनींद्र दुःख पाइयो । कन्यामुनिकी निंदाकरी। कुछ मनमेंनहिंशंकाधरो ॥ ६ ॥ नग्न गात दुर्गंध शरीर । पगट पने देही नहिं चीर ॥ मुखतांबूलहतामुनिअंग । मानो सुखकोकीनोभंग ॥ १० ॥ भोजन अंतरायजबभयो । मुनि उठजायध्यानबनदयो । समताभाव धरेउरमांहिं । किंचित खेदचित्तमें नाहिं ॥ ११ ॥ वीतअवधिसमयकछुगयो । मनोरमा काकालसुभयो । भईगधीपुनिकुकरीग्राम । अपर ग्रामभईसूकरीनाम ॥ १२ ॥ मगधसुदेशतिलकपुरजान। विजय सेनतहंकानृपमान ॥ चित्ररेखा ता रानी कही। ता पुत्रीदुर्गंधाभई ॥ १३ ॥ एक समय गुरुवंदन गयो। पूजाकर बिनती को ठयो । मो पुत्रोदुगंधशरीर । कही भवान्तर गुण गंभीर ॥ १४ ॥ राजा बचन मुनीश्वर सुने । मुनि वृतान्त रायसे भने । सबवृतांतहाजिलोजान । मुनिराजासेकहोबखान ॥ १५ ॥ सुनदुर्गंधा जोड़े हाथ । मो पर कृपा करो मुनिनाथ ॥

--
सुगंधदशमीनं नकाशा।
(6)
ऐसा व्रत उपदेशोमोहि । यासे तनु निरोग अबहोहि ॥१६॥
दयावन्त बोले मुनिराय । सुन पुत्री बृत चित्त लगाय ॥
समताभावचित्तधरो। तुमसुगंधदशमीवृतकरो ॥ १७ ॥
यहनत कोजे मनवचकाय । यासे रोग शोक सब जाय ॥
दुर्गंधाविनवेनिकुताय । कहियेसविधिमहामुनिराय ॥ १८ ॥
ऐसे वचन सुने मुनि जबे । तव बोले पुत्री सुन अबे ॥
भादोशुक्लपक्षजवहोय । दशमीदिलआराधोसोय ॥ १६ ॥
चारों रस को धारा देव । मनमें राखो श्री जिनदेव ॥
शीतलनाधकीपजाकरो । मिथ्यामोहदूरपरिहरी ॥ २० ॥
वतके दिन छोड़ो आरंभ । यासे मिटे कम का दंभ ।।
याकेकरतपापक्षयजाय । सोदशबर्षकरोमनलोय ॥ २१ ॥
जब यह व्रत संपूर्णहोय । उद्यापन कीजे चित जोय ॥
दशश्रीफलअमृतफलजान । नीबूसरससदाफलआन ॥ २२ ॥
दश दीजे पुरतक लिखवाय । यहविधिसत्रमुनिदईबताय ।
विधिसुनदुर्गंधानतलयो । सबदुर्गंधततक्षणगयो ॥ २३ ॥
वत करआयु जो पूरणकरी । दशवें स्वर्ग भई अप्सरी॥
जिनचैत्यालयबंदनकरे । सम्यक्भावसदाउरधरे ॥ २४ ॥
भरत क्षेत्र तहमग्धसुदेश । भूति तिलकपुर वसे अशेश ॥
राजामहीपालतहांजान । मदनसुन्दरीत्रियाबखान ॥ २५ ॥
दशवें दिवसे देवी आन । ताके पुत्री भई निदान ।
मदनावलीनामधरतास। अतिसुरूपतनुसंकलसुवास ॥२६॥
बहुत बात को करे वखान । सुरकन्या नाता उन्मान ॥
कोसांवीपरमदननरेंद्र । राजीसती करे आनंद ॥ २७ ॥
पुरुषोत्तम सुलसुन्दरजान । विद्यावंत सुगुण की खान ॥
जोसुगंधमदनावलिजाय । सो पुरुषोत्तमकोपरनाय ॥ २८ ॥

कौन पुण्य अनूप ॥ (१०) सुगंधदशमीव्रतकथा । राजा मदनसुंदरी बाल । सुखसे जात न जानो काल ॥ एकदिवसमुनिवरवंदियो । धर्मश्रवणमुनिवरपरकियो ॥२६॥ हाथ जोड़ पूछे तब राय । महा मुनींद्र कहो समझाय ॥ मोगृहरानीमढनावली । ता शरीरसौरमताभली ॥३०॥ पुण्य से सुभग सुरूप । सुर वनितासेअधिक राजाबचनमुनीश्वरसुने । सबवृतांतरायसे भने ॥ ३१ ॥ जैसे दुर्गंधांबूत लहो । तैसी विधि नरपति से कहो ॥ सुने भवांतरजोड़ेहाथ । दिक्षावृतदीजेमुनिनाथ ॥ ३२ ॥ राजाने जब दिक्षा लई । रानी तबे अर्जिका भई ॥ तप करअंतवर्गकोगई। सोलमस्वर्गप्रतेंद्रसोभई ॥ ३३ ॥ वाइस सागर कालजो गयो । अंत काल ता दिवसे चयो॥ भरतसुक्षेत्रमग्धतहंदेश । वसुधाअमरकेतुपुरवेस ॥ ३४ ॥ ता नृपग्रह जन्म उनलहो । जो प्रतेंद्र अच्युत दिव कहो । कनिककेतुकंचनद्युतिदेह । बनिता भोगकरेशुभग्रह ॥ ३५ ॥ अमरकेतु मुनि आगमभयो। कनिक केतु तहं बन्दनगयो । सुनो सुधर्मश्नवणसंयोग । तजेपरिग्रहअरुभवभोग ॥ ६ ॥ घातिघातियाकेवललयो। पुनअघातिहनिशिवपुरगयो ॥ वृत्तसुगंधदशमीविख्यात । ताफलभयोसुरभियुतगात ॥ ३७॥ यह व्रत पुरुष नारिजो करे । सो दुःख संकट भूलि नपरे । शहर गहेलीउत्तम बास । जैन धर्मकोजहां प्रकाश ॥ ३८ ॥ सब नावकवतसंयम धरें। पूजा दान से पातक हरें॥ उपदेशी विश्वभूषणसही । हेमराज पंडित ने कही ॥ ३ ॥ मन वच पढे सुनेजो कोय । ताको अजर अमर पद होय ॥ यासेभविजनपढ़ोत्रिकाल । जो छूटविधिकेभ्रमजाल ॥ ४० ॥ इति श्रीसुगंधदशमीव्रतकथा भाषा संपूर्णम् ॥ .

अनंतचौदश व्रतकथा दोहा-अनंतनाथ बन्दों सदा,मनमें कर बहु भाव । सुर असुर सेवत जिन्हें,होय मुक्ति परचाव ॥१॥ चौपाई॥ जंबूद्वीप द्वीपोंमें सार । लख योजन ताका विस्तार । मध्य सुदर्शन मेरु बखान । भरत क्षेत्रता दक्षिणमान ॥२॥ मगध देश देशों शिरमणी । राजगृह नगरी अतिवनी। श्रेणिकमहाराजगुणवंत । रानीचेलनागृहशोभंत ॥३॥ धर्मवंत गुणतेज अपार । राजा राय महागुण सार ॥ एकदिवसविपुलाचलवीर । आयेजिनवरगुणगंभोर ॥ ४ ॥ चार ज्ञानके धारक कहे । गौतम गणधरसों संग रहे ॥ 'छहऋतुकैफलदेखेनयन । वनमालीलेचालोऐन ॥५॥ हर्ष सहित वनमाली भयो । पुष्प सहित राजा परगयो । नमस्कारकरजोड़ेहाथ । मोपरकृपाकरोनरनाथ ॥६॥ विपुलाचल उद्यान कहल । महामुनीश्वर तहां बसंत ॥ सुन राजाअतिहर्षितभयो । बहुतदान मालीकोदयो ॥ ७ ॥ सप्तध्वनि बाजे वाजत । प्रजा सहित राजा चालंत ॥ देप्रदक्षिणाबैठो रोव । जिनवर देखकरोचितचाव ॥८॥ है विधि धर्मकहो समझाय । यासे पाप सर्व जर जाय ॥ खग तहं आयो एक तुरंत । सुंदर रूप महागुणवंत ॥ ६ ॥ नमस्कार जिनवरको करो। जय जयकारशब्दउच्चरो ॥ ताहिदेखआश्चर्यितथयो । राजाश्रेणिकपूछतभयो ॥१०॥ सेना सहित महागुणखानि । को यह आयोसुंदरवाणि ।।

- (१२) अनंतचीदशव्रतकथा ॥ याकीवातकहोसमझाय । ज्ञानवंत मुनिवरतुमआय ॥ १९ ॥ गौतम बोले बुद्धि अपार । विजया नगर कहो अतिसार । मनो कुंभ राजा राजंत । श्रीमती रानीको कंत । १२ ॥ ताका पुत्र अरिंजय नाम । पुण्यवंत सुंदर गुणधाम ॥ पूर्वतप कीनो इनजोय । ताका फलभगतेशुभसोय ॥ १३ ॥ ताको कथा कहूं विस्तार । जंबू द्वीप द्वीपों में सार । भरतक्षेत्र तामें सुखकार । कोशलदेश विराजे सार ॥ १४ ॥ परम सुखदनगरीतहंजान । विम सोमशा गुणखान ॥ सोमिल्या भामिनताकही। दुखदरिद्रकोपूरितमही ॥१५॥ पूर्व पाप किये अतिघने । ताको दुःख भुगतही बने । सुनराजा याझा वृतांत । नगर २ सो भ्रमें दुःखान्त ॥ १६ ॥ देश विदेश फिरे सुखआश । तोहु न पावे सुक्खनिवास ॥ श्रमतर लो आयोतहां । समोभारणजिनवरको जहां ॥१७॥. दो-अनंतनाजिनराजका, समोशरतहिबार । सुरनर अति हर्पितभये, देखमहायुतिसार ॥ १८ ॥ ॥ चौपाई ॥ विप्र देख अलिहर्षित भयो । समोशरण बन्दन को गयो । वन्दिजिलेश्वर पूछे सोइ । कहापाप मैं कोनो होइ ॥ १६ ॥ दरिद्र पीड़ा दहे शरीर । सोतो व्याधि हरो गंभीर ॥ गणधरकसुनोद्विजराय । अनन्तव्रत कीजेसुखदाय ॥२०॥ तब विम बोलो कर भाय । किस विधिहोइ सोदेहुवताय ॥ किसप्रकारयाव्रतकोकरों । कहाविधान चित्तधरों ॥२१॥ भादोंमोस सुखकीखान । चौदशशुक्ल कही सुखदान । करस्नान शुद्ध होजाय । तब पूजेजिनवरसुखदाय ॥ २२ ॥ गुरुवन्दना करे चितलाय । या विधिसे व्रतलेय बनाय ॥ ॥ hot

अनन्त चौदशवनकथा ॥
(१३)
त्रिकालपूजेनोजिनदेव । रात्रिजागरणकरसुख लेव ॥ २३ ॥
गीतरुनृत्य महोत्सवजान । धारा जिनवर करो वखान ॥
वर्ष चतुर्दश विधिसेघरे । ता पीछे उद्यापन करे ॥ २४ ॥
करे प्रतिष्ठा चौदह सार । या से पाप होइ जर क्षार ॥
झारीधारीअधिकअनूप। चरणकलशदेवेशुभरूप ॥ २५ ॥
दीवट झालर संकल माल । और चंदोवे उत्तम जाल ॥
छत्र सिंहासन बिधिसे करे । ताते सर्वपाप परिहरे ॥२६॥
चार प्रकार दान दीजिये। याते अतुल सुक्ख लीजिये ॥
अन्तावस्था ले संन्यास । तातेमिले स्वर्गका बास ॥२७॥
उद्यापन की शक्ति न होइ । कीजे व्रत दूनो भविलोइ ॥
विप्रकियावतविधिसेआय । सर्वदुःखतसुगयाविलाय ॥२८॥
अंतकाल धरके संन्यास । ताते पायो स्वर्ग निवास ॥
चौधेस्वर्ग देव सो जान । महाऋद्विताकेसोवखान ॥ २६ ॥
विजयाईगिरि उत्तम ठौर । काचीपुर पत्तन शिरमौर ॥
राजातहअपराजितवीर । विजयातासप्रियागम्भीर ॥ ३० ॥
ताका पुत्र अरिंजय नाम । तिनयहआयकरोसोप्रणाम ॥
कंचनमयसिहासनआन । तापरभूप बैठौसुखखान ॥ ३१ ॥
व्योमपटलविनशतलखसंत । उपजो चित वैरागमहंत ॥
राजपुत्रको दयो घुलाय । आपलईदीक्षाशुभमाय ॥३२॥
सही परीपह दृढ़चित धार । ताते कर्म भये अतिक्षार ॥
घाति घातिया केवल भयो। सिद्धबुद्धसोपदनिर्मयो ॥३३॥
रानीने व्रत कीनो सही । देव देह दिव अच्युतलही ॥
तहांसुसुखभुगतेअधिकाय । तहांसेआयभयोनरराय ॥ ३४॥
राजऋद्धिपाई शुभसार । फिरतपकर विधिकीने क्षार ॥
तहांसेमुक्तिपुरीकोगयो । ऐसातिनव्रतकाफललयो ॥५॥

रबत्रयव्रतकथा। . । (१४) ऐसा व्रत पाले जो कोइ । स्वर्ग मुक्ति पद पावे सोइ ॥ विनयसागरगुरुआज्ञाकरी। हरिकिलपाठचित्त मेंधरी ॥३६॥ तव यहकथाकरीमनलाय । यथा शास्त्र में वरणीआय ॥ विधिपूर्वकपालेजोकोइ । तोकोअजरअमरपदहोइ ॥३७ ॥ इति श्रोअनंतचौदशव्रतकथा सम्पूर्णम् ॥ रत्नत्रयव्रत कथा दोहा-अरहनाथकोवन्दिके, वन्दोंसरस्वति पाय ॥ रत्नत्रयव्रत की कथा, कहूं सुनो मनलाय ॥१॥ ॥ चौपाई॥ जंबूद्वीप भरत शुभ क्षेत्र । मग्ध देश सुखसम्पति हेत ॥ राजगृहतहानगरवसाय । राजा नेणिकराजकराय ॥२॥ विपुलाचल जिनबीरकुंवार । केवलज्ञान विराजतसार ॥ मालीआय जनावो दयो । तत्क्षण राजा बंदनगयो ॥३॥ पूजा वंदनकर शुभसार । लागो पूछन प्रश्न विचार ॥ हेस्वामी रत्नत्रयसार । व्रतकहिए जैसा व्यवहार ॥ ४ ॥ दिव्यध्वनिभगवानवताय । भादोंसुदिद्वादशि शुभभाय ॥ करस्नान स्वच्छ पटश्वेत । पहिनोजिनपूजनके हेत ॥५॥ आठोद्रव्यलेय शुभजाय । पूजो जिनवर मनवचकाय ॥ जीर्णन्यूतन जिनके ग्रेह । विवधरावो तिनमें तेह ॥ ६ ॥ हेमरूग्य पीतलके यंत्र । तांवा यथा भोजके पत्र । यंत्रकरो बहुमन थिरदेउ । रत्नत्रयकेगुण लिखलेउ ॥ ७ ॥ निश्शांकादिदर्शनगुणसार । संशयरहितसो ज्ञान अपार ॥ अहिंसादि महाव्रतसार । चारित्र के ये गुणहैंधार ॥ ८ ॥ ये तीनों के गुणहैं आदि । इन्हें आदि जेते गुण वादि ॥

रत्नत्रयवतकथा ॥ ( १५) शिवमार्गके साधन हेत । ये गुण धारेवती सुचेत ॥ ६ ॥ भादोंमाघ चैत्र में जान । तीनोकाल करो भविआन ॥ याविधितेरहवर्षप्रमाण । भावनाभावगुणहिनिधान ॥१०॥ लवंगादि अष्टोत्तर आन । जपो मंत्र मनकर श्रद्वान । पुनिउद्यापन विधिजीएह । कलशाचमरछत्रशुभदेह ॥१९॥ संग चतुर्विधि को आहार । वस्त्राभरण देउ शुभसार ॥ विंव प्रतिष्ठाआदिअपार । पूजोत्रीजिनहोभवपार ॥ १२ ॥ दो०-इसविधि श्रीमुखधर्मसुन, भनोचित्तधरभाय ॥ कौनेफल पायोप्रभ, सो भाषो समझाय ॥ १३ ॥ ॥ चौपाई॥ जंबूद्वीप अलंकृत हेर । रहो ताहि लवणो दधिधेर ॥ मेरुसेदक्षिणदिशिहैसार । है सोविदेहधर्म अवतार ॥ १४ ॥ कच्छवती सुदेश तहांवसे । वीत शोक पुर तामें लसे ॥ वैत्रिवनामतहांका राय । करेराजसुरपतिसमभाय ॥ १५ ॥ वनमाली ने जनावोदयो । विपुलबुद्धि प्रभुबनमें ठयो । इतनीसुननपवंदनगयो । दानवहुतमालीकोदयो ॥ १६ ॥ हे स्वामी रत्नत्रय धर्म । मोसो कहौ मिटै सब भर्म ॥ तवस्वामीनेसबबिधिकही । जोपहिलेसोप्र काशी सही ॥१७॥ पंचामृत अविशेकसुठयो । पूजाप्रभुकीकर सुखलयो । जागिरनादिठयोबहुभाय । इसविधिन्नतकरविनिवराय ॥१८॥ भावसहित राजावतकरो। धर्मप्रतीत चित्त अनुसरो। पोडशभावनामावतभरो। अंतसमाधिमरणतिनकरी ॥१॥ गोत्र तीर्थंकर वांधोसार । जो त्रिभुवनमें पूज्यअपार ॥ सर्वार्थसिद्धिपहुंचोजाय । भयोतहांअहमेंद्रसुभाय ॥ २० ॥ हस्तमानंतनुऊंचोभयो । तेतिससागर आयुसोलयो । - ~

दशलक्षवनकथा ।
१६)
दिव्यरूपसुखकोभंडार । सत्यनिरूपणअवधिविचार ॥ २९ ॥
सौ धमेन्द्र विचारी घरी । यच्छेश्वर को आज्ञा करी ॥
वेगदेशनिर्माण्योजाय । थापासुथरापुर अधिकाय ॥ २२ ॥
कुंभपुर राजा तहांबसे । देवी प्रजावती तिस लसे॥
नोआदिकतहादेवीआय । गर्भ ले साधना कोनी जाय ॥२३॥
रत्न वृष्टि नूप अंगन भई । पन्द्रह मासलों बरसत गई ।
सर्वार्थसिद्धिससुरआय । प्रजावतीसुकुच्छउपजाय ॥ २४ ॥
मल्लिनाथ सो नामकोपाय । वेज चंद्रसम बढ़त सुभाय ॥
जबविवाहमंगलबिधिभई । तबप्रभूचितविरागतालई ॥२५॥
प्रभु गये । घोतिकर्म हनि निर्मलठये ॥
केवललेनिर्वाण सेोजाय । पूजा करीसुरेशोआय ॥ २६ ॥
यहविधान श्रेणिक ने सुनो। व्रतलीने चित अपने गुणा ॥
भक्तिविनयकरउत्तमभाय । पहुंचे अपनेगृहकोआय ॥२७॥
याविधि जो नर नारीकरे। सेो भवसागर निश्यतरे ।
नलिनकीर्तिमुनिसंस्कृतकही। ब्रह्मज्ञानभाषानिर्मही ॥२८॥
॥ इति श्रीरत्नत्रयव्रतकथा भाषा सम्पूर्णम् ॥
दशलक्षणब्रतकथा
दिक्षाधर वनमें
दोहा-प्रथमवन्दि जिनराज के, शारदगणधरपाय ।
दशलक्षणव्रतकीकथा, कहूंअगमसुखेदाय ॥ १॥
॥चौपाई॥
विपुलाचल श्रीवीरकुंवार । आये भवभंजन भरतार ॥
सुनभूपतितहविंदनगयो । सकललोकमिलिआनंदभयो ॥२॥

दशलापतकथा ॥ (१७) श्री जिनपूजे मनधर चाव । स्तुतिकरी जोड़कर भाव । धर्मकथातहांसुनीविचार । दान शील तप भेदअपार ॥३॥ भवदुःख क्षायक दायक शर्म । भाषो प्रभु दशलक्षणधर्म ॥ ताकोसुनश्रेणिकरुचिधरी । गुरुगौतमसेविनतीकरी ॥४॥ दश लक्षण व्रत कथाविशाल । मुझसे भाषो दीन दयाल ॥ बोलेगुरुसुनश्रेणिकचंद्र । दिव्यध्वनिकहोवीरजिनेंद्र॥५॥ खंड धातुकी पूर्व भाग । मेरु थकी दक्षिण अनुरागं सोतोदाउपकंठी सही । नगरी विशालाक्षशुभकही ॥६ नामप्रीतंकर भूपति बसे । प्रीयकरी रानी तसु लसे ॥ मृगांकरेखासुतासुजान । मति शेखरनामासोप्रधान ॥ ७ ॥ शशिप्रभा ताको वरनारि । सुता काम सेना निरधार ॥ राजसेठ गुणसागरजान । शीलसुभद्रा नारिबखान ॥८॥ सुतामदन रेखातसु खरी । रूपकला लक्षण गुणभरी ॥ लक्षणभद्रनामा कुतवाल । शशिरेखानारीगुणमाल ॥ ६ ॥ कन्या तास घरे रोहिनी । ये चारों वरणी गुरु शाखपढ़ेगुरुपासविचार । स्नेह परस्पर बढ़ा अपार ॥१०॥ मास वसंत भयो निरधार । कन्या चारो वनहि मंझार ॥ गईमुनीश्वरदेखतहां । तिन कोबंदनकोनोवहां ॥ १९ ॥ चारों कन्या मुनि से कही । त्रिया लिंग ज्यों छूटे सही ॥ ऐसाततउपदेशो अवै । यासे नर तनु पावे सबै ॥ १२ ॥ बोलेमुनि दश लक्षण सार । चारों करो होहु भवपार ॥ कन्यायोलीकिम्कीजिये। किस दिनसेव्रतकोलीजिये ॥१३॥ तयगुरुयोले वचनरसाल । भादोमास कहो गुणमाल ॥ धवलपंचमीदिनसेसार । पंचामृतअभिषेकउतार ॥ १४ ॥ पूजार्चनकीजे गुणमाल । जिन चौवीस तनी शुभसाल । तनी॥ । ३ . PM-

देशलगायतकथा।
(१८)
उत्तमक्षमाआदिअतिसार । दश मोब्रह्मचर्यगुणधार ॥ १५ ॥
पुष्पांजलिइसविधि दीजिये। तीनोंकाल भक्तिकीजिये।
इसविधिदशवासरआचरो।नियमितवृतशुभकार्यकरो ॥१६॥
उत्तम दश अनशन करयोग । मध्यमवतकांजीकाभोग ॥
भूमिशयनकीजेदशराति । ब्रह्मचर्य पालोसुखपांति ॥ १७ ॥
इसविधि दशवर्षे जबजाय । तबतकव्रत कीजै धर भाय ॥
फिरनतउद्यापनकीजिये । दानसुपात्रोंकोदोजिये ॥ १८ ॥
औषधि अभयशास्त्रआहार। पंचामृतअभिषेकहिसार ।
माड़नोरचिपूजाकीजिये। छत्रचमरआदिकदीजिये ॥ १९ ॥
उद्यापनकी शक्ति न होय । तो दूनो व्रत कीजे लोय ॥
पुण्यतनोसंचयभंडार । परभवपावेमोक्ष सोद्वार ॥ २० ॥
तबचारोंकन्योव्रतलायो । मुनिवरभक्तिभावलखिदियो ।
यथाशक्तिवतपूरणकरो। उद्यापनविधिसे आचरो ॥ २१ ॥
अंतकाल वे कन्या चार । सुमरण करो पंच नवकार ॥
चारोंमरणसमाधिसुकियो । दशवेस्वर्गजन्मतिनलियो ॥२२॥
षोडस सागर आयु प्रमाणं । धर्म ध्यान सेवें तहां जान ॥
सिद्धक्षेत्र में करें विहार । क्षायक सम्यकउदय अपार ॥२३॥
सुभग अवन्तो देश विशाल । उज्जयनी नगरी गुणमाल ॥
स्थूलभद्रनामानरपती । रानीचारुसो अतिगुणवती ॥ २४ ॥
देव गर्भ में आये चार । ता रानी के उदर मझार ॥
प्रथम सुपुत्र देव प्रभु भयो। दूजोसुतगुणचन्द्रभाषियो ॥२५॥
पदुम प्रमा तीजो बलवीर । पदम स्वारथी चौथो धीर"।
जन्म महोत्सवतिनकोकरो। अशुभदोषगृहदोनों हरी ॥२६॥
निकल प्रभा राजा-की-सुता । ते चारों परनी गुण युता ।
प्रथमसुतासोब्रह्मीनाम । दुतियकुमारीसो गुणधोम ॥ २७ ॥

मुक्तावलीव्रतकथा॥
( १८ ।
रूपवती तीजी सुकुमाल । मृगाक्ष चौथी सो गुणमाल ॥
करोव्याहघरकोआइयो । सकललोकघरआमन्दलियो ॥२८॥
स्थूल भद्गराजा इकदिना । भोग विरक्त भयो भवतना ॥
राजपुत्रको दीनो सार। वन में जाययोगशुभधार ॥ २६ ॥
तपकरउपजो केवलज्ञान । वसु विधिहनि पायोनिर्वाण ॥
अब वे पुत्र राजकोकरें । पुण्यकाफल पावें ते घरे ॥३०॥
चारोबांधव चतुर सुजान । अहिनिशिधर्मतनोफलमान ॥
एकसमय विरक्तसोमये । आतमकार्यचिंतवतठये ॥ ३१ ॥
चारों बांधव दिक्षालई । वनमें जाय तपस्या ठई ॥
निजमनमें चिट्ठपाराधि । शुक्रध्यानकोपायो साधि ॥३२॥
सर्व विमल केवल ऊपनो । सुख अनंत तब ही सोठनो ॥
करोमहोत्सवदेवकुमार । जय २ शब्दभयोतिहिवार ॥ ३३ ॥
शेष कर्म निर्बल तिन करे । पहुंचे मुक्ति पुरी में खरे ॥
अगमअगोचरभवजलपार । दशलक्षणव्रतकेफलसार ॥३॥
वीरजिनेश्वर कही सुजान । शीतल जिनके बाड़े मान ।
गौतमगणधरभाषीसार। सुनश्रेणिकायेदरबार ॥ ३५ ॥
जो यह व्रत नर नारी करे । ताके गृह सम्पति अनुसरे ॥
भहारक नी भूषणवीर । तिनके चेला गुणगंभीर ॥ ३६ ॥
ब्रह्माज्ञान सागर सुविचार । कही कथा दशलक्षणसार ।
मनबचनव्रतपालेजोइ । मुक्तिवरांगणाभोगेसोइ ॥
॥ इति श्रीदशलक्षणव्रतकथाभाषासम्पूर्णम् ॥
२
।
मुक्तावलीव्रतकथा॥
दो-पभनाथकेपदनमों, भविसरोजरविज्ञान ।
मुक्तावलिव्रतकी कथा, कहूं सुनो धरध्यान ॥ १ ॥

मुक्तावनीव्रतकथा ॥ मगधदेश देशों में प्रधान । तामें राजगृह शुभधान । राज्यकरे तहांगणिकराय । धर्मवंतसयको सुखदाय ॥२॥ ता गृह नारि चेलनासती । धर्म शीलपूरण गुणवती । इकदिन समोशरणमहावीर ।आयो विपुलाचलपरधीर ॥३॥ सुन नृपअत्यानंदितभयो । कुटुम सहित बंदन को गयो । पूजाकर बैठी सुख पाय । हाथजोड़कर अर्जकराय ॥४॥ हेप्रभु मुक्तावलि व्रतकहो । यह कर कौनेक्याफल लहो ॥ तब गौतमबोलेहाय । सुनौ कथा मुक्तावलि राय ॥ ५ ॥ याही जंबूद्वीपमझार । भरत क्षेत्र दक्षिण दिशि सार । अंगदेश सोहे रमनीक । नगर बसे चंपापुर ठीक ॥ ६ ॥ नगरमध्य एकब्राह्मणबसे । नाम सोमशर्मा ससुलसे ॥ ता गृह एकसुताजोभई । यौवनमदकर पूरणठई ॥ ७ ॥ एक दिन देखे श्रीगुरु जबे । नग्न गात सो निदेतये॥ अतिखीदेदुर्वचनकहाय । बहुतहीग्लानिचित्तमेलाय ॥८॥ ताकर महापापबांधियो । अवधिव्यतीतेमरण जुकियो । तरकजाय नानादुखसहे । छेदन भेदनजायनकहे ॥६॥ नरकआयु पूरीकर जोइ । भवभ्रमि द्विजगृहपुत्रीहोइ ॥ निर्नासिकापड़ातिसनाम । अतिदुर्गंधादेहनिकाम ॥ १० ॥ कोई ढिंग आवे नहिंतहां। क्रमकर बडी भई सो वहां । अन्नपानकरदुःखितमहा । जूठनभखेकष्टअतिलहा ॥११॥ एकदिवस देखे मुनिराइ । करप्रणाम विनवे शिरनाइ । कौनपापमैं कीनोदेव । मैं पायोअतिदुःख अभेव ॥ १२॥ तयमुनिवर पूर्व भवकहे । गुरु को निंदा से दुःखलहे । सबदुर्गंधा जोड़ेहाथ । ऐसाव्रतदीजेमोहिनाथ ॥ १३ ॥ यासे रोग शोक सबजाय । उत्तम भव पाऊं गुरुराय ॥ - मुक्तावलीव्रतकथा ॥ ( २१) तब नोगुरबोले हर्षाय । मुक्तावलीकरो मनलाय ॥ १४ ॥ तासे सर्वपाप जरजाय । सुखसम्पत्ति मिलेअधिकाय ।। तबदुर्गंधाकहे विचार । कौनभांतिकीजे व्रतसार ॥ १५ ॥ तबमुनिवरइमवचनकहाइ । सुनोभेद व्रतका चितलाइ ॥ भादोसुदिसप्तमिदिनहोइ । तादिनव्रतकीजेभविलोइ ॥ १६ ॥ प्रातसमय जिनमंदिरजाइ । पूजा कथासुनो मनलाइ ॥ सबआरंभतजोदिनमान । संयमशीलसजोगुणखान ॥१७॥ भोर भये जिन दर्शनकरो । शुद्ध अशनकीजेतबखरो॥ दूजोव्रतपूर्ववतकरो। अश्विनयदिछठिपापनिहरो॥ १८ ॥ तीजोबत कोजे उरधार । अश्विनवदितेरसि सुखकार ॥ करउपवासपालोगुणरसी । चौधोअश्विनसुदिग्यारसी ॥१६॥ पंचमवत कोजे मनलाइ । कार्तिकबदियारसि सुखदाय ॥ | फिरछठवांउपवाससुजान । कार्तिकशुक्रतीजगुणखान ॥२०॥ सप्तमवृत्तजिनधरनेकहो । कार्तिकसुदिग्यारसिशुभलहो । फेरकरोअष्टमवृतलोइ । मार्गबदिग्यारसिजवहोइ ॥ २९ ॥ नवमोवूत मार्ग सुदितीज। व्रत धर्म वृक्षके बीज याविधिकरोनववर्षप्रमान । मनवचकायशुद्धताठान ॥ २२ ॥ जय वृत पूर्ण होइ निदान । उद्यापन कीजे गुणवान ॥ श्रीजिनवरअभिषेककराइ । करोमाइनोजिनगृहजाइ ॥२३॥ अष्ट प्रकारी पूजा करो। जन्म २ के पातक हरो॥ यथाशक्तिउपकरणबनाय । श्रीजिनधामचढ़ावोजाय ॥२४॥ उद्यापनको शक्ति न होय । तो दूनो व्रत कीजे लोय ॥ सबविधिसुनदुर्गंधाबाल । मनवचतनव्रतलीनोहाल ॥ २५ गुरुभाषित तिनविधि सेकियो। पूर्वभवअघ पानीदियो । ताफलनारिलिंगछेदियो। सौधर्मस्वर्गदेवसोभयो ॥ २६ ॥ ये , .

(२२) रव्रितकथा। +-- तहांआयु पूरणकर सोय । चलतभयो मथुराको लोय ॥ श्रीधरराजा राजकरंत । तोकेसुतउपजोगुणवंत ॥ २७ ॥ नामपदमरथ मंडितभयो । एक दिवस वनक्रीड़ा गयो । गुफामध्यमुनियरकोदेख । वन्दनकरसुनधर्मविशेप ॥२८॥ तहांपळे मुनिवरसेसोय । तुमसेअधिक प्रभाप्रभुकोय ॥ . तबमुनिवरवोलेसुनबाल । बासपूज्यजिनदोप्तिविशाल ॥et चंपापुर राजें जिनराज । तेज पुंज प्रभु धर्म जहाज ॥ यहसुनधर्मविषेत्रितदयो । समोशरणजिनवंदनगयो ॥ ३० ॥ नमस्कारकर दीक्षा लई । तपकर गणधर पदवी भई ॥ अष्टकर्मइसबिधिसेजार । पहुंचो शिवपुरसिद्धिमझार ॥३१॥ लखोभव्यव्रतकासोप्रभाव । राजभोगिभयाशिवपुरराव ॥ जोनरनारिकरेवतसार । सुरसुखलहिपावभवपार ॥ ३२ ॥ ॥ इति श्रीमुक्तावलीव्रतकथासम्पूर्णम् ॥ श्रीरविव्रतकथा। चौपाई॥ त्री सुखदायक पार्स जिनेश। सुमति सुगति दाता परमेश॥ सुम शारदपदअरिवंद । दिनकरवृतप्रगटोसानंद ॥१॥ बाणारस नगरी सुविशाल । प्रजापाल प्रगटो भूपाल ॥ मतिसागरतहांसेठसुजान । ताकाभपकरेसन्मान ॥२॥ तासुत्रिया गुणसुंदरिनाम । सात पुत्र ताके अभिराम ॥ षटसुतभोगकरेपरणोत । वालरूपगुणधरसुविनीत ॥३॥ सहस्रकूटशोभिजिनधाम । आयेयतिपतिखंडितकाम ॥ सुनमुनिआगमहर्षितभये। सर्वलोगवन्दनकोगये ॥४॥ गुरुवाणी सुनके गुणवती । सेठिन तब जो करीबोनसी ॥ -

रव्रितकथा ॥
(२)
॥
-
।
।
वृतप्रभुसुगमकहोसमझाय । जासेरोगशोगसबजाय ॥ ५ ॥
करुणानिधि भाषे मुनिराय । सुनो भव्यतुम चित्त लगाय ॥
जबआषाढसितपक्षविचार । तत्र कीजेअंतमरविवार ॥ ६ ॥
अनसन अथवालधुआहार । लवणादिकजोकरे परिहार ॥
नत्रफलयुत पंचामृतधार । वसुप्रकारपूजोभवहार ॥ ७ ॥
उत्तम फल इक्यासी जान । नव श्रावक घर दीजे आन ॥
याविधिकरोनववर्षप्रमाण । यातहोयसर्वकल्याण ॥८॥
अथवा एकवर्ष एकसार । कोजेरवि व्रतमनहि विचार ॥
सुखाहुन ननिजघरकोगई । वृतनिंदासे निंदित भई॥ ६ ॥
बत निंदासे निर्धन भये । सातपुत्र अयोध्यापुर गये ॥
तहाँजिनदत्तसेठगृहरहें । पूर्वदुःकृतका फललहैं ॥ १० ॥
मातपितागृहदुःखितसदा । अवधिसहितमुनिपूछेतदा ॥
दयाबंतमुनि ऐसेकहो । व्रतनिंदासे तुमदुःखलहो ॥ १९ ॥
सुनगुरुवचनबहुरिबतलयो । पुण्यकियोघरधनभयो ।
भविजनसुनोकथासम्बन्ध । जहारहतथेवेसबनन्द ॥ १२ ॥
एकदिवस गुणधरसुकुमार । घासले आये गूहद्वार ॥
क्षुधावतभावजपेगयो। दंतविनानहिंभोजनदयो ॥ १३ ॥
बहुरि गये जहां भूलोदन्त । देखोतासे अहि लिपटत ॥
फणपतिकीतहायिनसीकरी । पदमावतिप्रगटीसुंदरी ॥१४॥
सुंदरमणिमय पारसनाथ । प्रतिमा पंचरत्नशुभ हाथ ॥
देकरकहो कुंवरकरभोग। करोक्षणकपूजासयोग ॥ १५ ॥
आनधि निजघरमें धरो। तिहकरतिनकोदारिद्र हरो॥
सुखविलसतसेवेसबनंद। दिनप्रतिपूर्जेपार्सजिनेंद्र ॥ १६ ॥
सांकेतानगरी अभिराम । जिनप्रसाद राचोशुभधाम ।
करीप्रतिष्ठापुण्यसंयोग। आयेभविजनसंगसोलोग ॥१७॥

८ - ( २४ ) पुष्पाजलिव्रतकथा। संगचतुर्बिधिको सन्मान। कियोदियोमन वांछितदान ॥ देखसेठ तिनकोसम्पदा । जायकहीभूपतिसेवदा ॥ १८ ॥ भूपतितय पूछो वृत्तन्त । सत्यकहो गुणधर गुणवन्त ॥ देखसुलक्षणताकोरूप। अत्यानन्द भयोसोभूप ॥ १६ ॥ भूपतिगृह तनुजा सुंदरी । गुणधरको दीनी गुण भरी ॥ करविवाहमंगलसानन्द । हयगयपुरजनपरमानन्द ॥ २० ॥ मनवांछितपायेसुखभोग । विस्मितभयेसकलपुर लोग ॥ सुखसेरहतबहुतदिनभये । तबसबबन्धुबनारसगये ॥ २१ ॥ मात पिता के परशे पांय । अत्यानन्द हृदय न समाय ॥ बिगटीविषमविषमबियोग । भयोसकलपुरजनसंयोग ॥२२॥ आठसातसोलह के अंक । विव्रतकथा रचीअकलंक ॥ थोड़ेअर्थग्रंथविस्तार । कहेंकबीश्वरजोगुण सार ॥ २३ ॥ यहनतजोनरनारी करें। सो कबही दुर्गति नहिंपरें। भावसहितसोसबसुखलहें ।भानु कीर्तिमुनियरइमकहें ॥२॥ इति श्रीरविब्रतकथा सम्पूर्णम् ॥ ब्रतकथा। दोहा-बीरदेवकोप्रणमिकर, अर्चाकरोत्रिकाल । पुष्पांजलिब्रतकीकथा, सुनोभव्यअघठाल ॥१॥ ॥चौपाई॥ पर्वतबिपुलाचलपरआय । समोशरण जिनबरकापाय ॥ तहसुनराजाश्रेणिकराय । चन्दनचलेप्रियायुतभाय ॥२॥ बन्दन कर पूछे नृप तबे। हे प्रभु पुष्पांजलि बुत अबे ॥ मोसेकहोकरीचितलाय । कोनेकरोकहाभईआय ॥३॥॥ बोलेगौतम बचनरसाल । जंबू द्वीप मध्य सो विशाल पुष्पांजलि पु - पुष्पागलिव्रतकथा । ( २५) सीतानदोदक्षिणदिशिसार । मंगलाबतीसुदेशअपार ॥४॥ दोहा-रत्न संघयपुर तहां, बजसेन नृप आय । जयवती बनितालसे, पुत्रबिहानोथाय ॥ ५॥ ॥ चौपाई॥ पुत्रचाह जिन मंदिरगई । ज्ञानोदधि मुनि बंदित भई । हेमुनिनाथ कहोसमझाय । मेरेपुत्रहोइ के नाय ॥ ६ ॥ दोहा-मुनियोले हे यालकी, पुत्रहोइ शुभसार । भूमिछखंड सुसाधिहै, मुक्तितनोभरतार ॥ ७ ॥ सुनकेमुनिकेवचनतब, उपजो हर्ष अपार । क्रमसे पूरे मासनव, पुत्रभयो शुभ सार ॥८॥ यौवन वयस सोपायके, क्रीड़ा मंडपसार । सहाव्योमसे आइयो, खगभूपरतिसवार ॥ ६ ॥ रत्नशेखरकोदेखकर, बहुतप्रीति उरमाहि । मेघवाहनने पांचसो, विद्यादीनी ताहि ॥ १० ॥ ॥चौपाई॥ दोनोमित्र परस्पर प्रोति । गये मेरु वन्दन तज भीति ॥ सिद्धकूट चैत्यालय बंदि। आये पंचचित्त आनंदि ॥ ११ ॥ ताकी सखो जनाई सार । वेग स्वयम्बर करो तयार ॥ भूरि भूप आये तत्काल । माल रत्नशेखरगलडाल ॥ १२ ॥ धूमकेत विद्याधर देख । क्रोधकियो मन माहिं विशेष ॥ कन्याकाजदुष्टताधरी । विद्याबल बहुमायाकरी ॥ १३ ॥ रत्नशेखर से युद्धसो करो। वहुत परस्पर विद्याधरी ॥ जीतोरत्नशेखरतिसवार । पाणिग्रहणकियोव्यवहार ॥ १४ ॥ मदन मजषा रानी संग । आयो अपने ग्रह असंग ॥ वजसेनकोकरनमस्कार । माततासमनसुक्खअपार ॥१५॥ एकदिनामंदिरगिर योग । पहुंचेभित्र सहित सब लोग । चारणमुनिबंदेतिहिवार । सुमोधर्मचितभयोउदार ॥ १६ ॥ ४ (२६) पुष्पांजलिनतय था ॥ हे मुनि पूर्व जन्म सम्बन्ध । तीनों के तुमकहो निबन्ध ॥ तबमुनिकहेंसुनौचितधार। एकमृणालनगरसुखकार ॥ १७ ॥ नृप मंत्रीएकतहांतिकीर्ति । बन्धुमतीवनिताअतिप्रीति ॥ एकदिना बन क्रीडांगयो । नारी संगरमतसोभयो ॥ १८ ॥ पापी सर्पसो भक्षण करी। मंत्री मृतक लखी निजनरी॥ भयांविरक्तजिनालयजाय । दिक्षालोनीमन हर्षाय ॥ १६ ॥ यथाशक्ति तप कुछ दिन करो। पाछेभ्रष्टभयो तपटरो॥ गृहआरंभकरनचितठनो । तबपुत्री मुख ऐसे भनो ॥ २० ॥ तातजोमेरुचढ़ोकिहिकाज । फिर भवसिंधुपड़ेतजलाज ॥ योसुनप्रभावतीवचसार । मंत्रीकोपकियोअधिकार ॥ २१ ॥ तब विद्याको आज्ञाकरी । पुत्रो को ले बन में धरी ॥ विद्या जब बनमें लगई। प्रभावती मन चिंता भई ॥२२॥ अरहंत भक्ति चित्तधरी । तब विद्या फिर आई खरी॥ हे पुत्री तेरा चित्त जहां । वेगवोलपहुंचाऊतहां ॥ २३ ॥ पुत्री कहीकेलाशकभाव । जिन दर्शनकोअधिकहीचाव ॥ पूजाकरके बैठी व्हां । पदमावति आई सो तहां ॥ २४ ॥ इतने मध्य देव आइयो। प्रभावती तब पूछन लयो । हे देवी कहिएकिसकाज । आयेदेवीदेवमाआज ॥ २५ ॥ पद्मावति बोलो बघसार । पुष्पांजलि व्रत है सुअवार ॥ माझौमास शुक्ल पंचमी । पंचदिवसआरंभनअमी ॥ २६ ॥ प्रापध यथाशक्ति व्यवहार । पूजो जिन चौबोसी सार । नानाविधिकपुष्पजोलाय । कराएकमालाजोबनाय ॥२७॥ तीनकाल वह माला देश । बहुत भक्ति से विनय करेय ॥ जपोजापशुभमंत्रविचार । याविधिपंचवर्षअवधार ॥२८॥ उद्यापन कीजे पुनिसार । चार प्रकार दान अधिकार ॥ उद्यापनकी. शक्ति नहोइ । तोटूनोन्नतकीजे लोइ ॥२६॥ यह सुन प्रभावती व्रतलयो । पदमावतो कृपा कर दयो । - - গুগলগিনা'। (२७) स्वर्गमुक्तिफलकादातार । हैयहपुष्पांजलिव्रतसार ॥ ३० ॥ दोष-पदमावति उपदेश से, लीनान्नत शुमसार । पृथ्वीपरसोप्रकाशिके, कियोभक्ति चितधार ॥ ३१ ॥ तपविद्याश्रुतकीर्तिने, पाई अति जो प्रचंड । प्रभावती व्रतखंड ने, आई सो बलबंड ॥ ३२ ॥ ॥ चौपाई॥ बासर तीन व्यतीते जवे । पद्मावत्ति पुनि आई तबे ॥ विद्यासवभागोतत्काल । करोसंन्यास भरणतिसवाल ॥३३॥ कल्प सोल्हवें मध्यसोजान । देवभयोसा पुण्य प्रवाण ॥ तहादेवने कियोविचार । मेरातात भ्रष्टाचार ॥ ३४ ॥ मैं सम्बोधों वाको अने। उत्तम गति वह पावे नये ॥ यहीविचारदेवआइयो । मरणसंन्यासतातकोकियो ॥ ३५ ॥ वाही स्वर्ग भयो सो देव । पुण्य प्रभाव लयो फल एव ॥ बंधुमती माता का जीव । उपजाताहीस्वर्ग अतीब ॥ ३६ ॥ दो-प्रभावतीका जीव तू, रतशेखर भयोआय । माताका जो जीव है, मदनमजूषा थाय ॥ ३ ॥ ॥चौपाई॥ श्रुतिकीर्तिको जीव जो तहां । मंत्री मेघ वाहन है यहां ॥ ये तीनोंके सुन पर्याय । भईसो चिंता अंग न माय ॥ ३८ ॥ सुनव्रतफलअगुरुकीवानि । भयोसुचितनतलीनोजानि ॥ अपनेधानबहुरिआइयो। चक्रवर्तिपदभोगसुकियो ॥ ३९ ॥ समय पाय वैरागसा भयो । राज भारसब सुत को दयो । त्रिगुप्तिमुनिकेचरणोंपास । दिक्षालीनोपरमहुलास ॥ ४० ॥ रत्न शेखर दिक्षालो जये । भये मेघ बाहन मुनि तबे ॥ भविजीवोंकोअनिसुखकार । केवलज्ञानउपार्जीसार ॥ ४ ॥ घाति कर्म निर्मूल सुकरे । पाछे मुक्ति पुरो अनुसरे ॥

(२८) नरीश्वरव्रतकथा॥ याविधिन्नतपालेजोकोह। अजरअमरपदपावेसोइ. ॥ १२ ॥ इति श्री पुष्पांजलिव्रतकथा सम्भृर्णम् । - नंदीश्वरव्रत कथा॥ - । । दो०-चरणनमोजिनराजके, जाते दुरित नशाय । शारद वंदो भावसे, सद्गुरु सदा सहाय ॥ १॥ ॥ चौपाई॥ जंबू द्वीप सुदर्शन मेरु । रहो ताहि लवणो दधि घेर । मेरुसेदक्षिणभारत क्षेत्र। मग्धदेशसुखसम्पति हेतु ॥२॥ गृह नगरी शुभ वसे । गढ़ मठ मंदिर सुंदर लसे ॥ बेणिकराजकरेसुप्रचंड । जिनलोनोअरियणपरदंड ॥३॥ पटरानी चेलना सुजान । सदा करे जिन पूजा दान ॥ सभा मध्यवैठो सो सय । बनमाली शिरनायो आय ॥४॥ दोकर जोड़ करे सो सेव । विपुलाचल आये जिन देव ।। बर्द्धमानकोआगमसुनो । जन्मसुफलचित अपने गुनो ॥५॥ राजा रानी पुरजन लोग ।बंदन चले पूजने योग । चलत २ सो पहुंचेतहां । समोशरणजिनवरकाजहां ॥ ६ ॥ दे प्रदक्षिणा भीतर गये। वर्द्धमान के चरणों नये ॥ पनिगणधरकोकियोप्रणाम । हर्पितचित्तभयोअभिराम ॥७॥ दशविधिधर्मसुनोजिनपास । जाते गयो चित्त का प्रास। दोकरजोड़नपति बीनयो । अतिप्रमोदमेरे मने भयो ॥८॥ प्रभु दयाल अब कृपाकरेव । अतनंदीश्वरकहो जिनदेव ॥ अरुसवबिधिकहियेसमझाय । भावसहितयोंपूछोराय ॥६॥ अवधिज्ञान धरमुनिवरकहें। कौशलदेश स्वर्गसम रहें । ताके मध्य अयोध्यापुरी। धनकण सुखीछत्तीसोकुरी ॥१०॥ तिहिपुर राज करे हरिसेन । त्याग तेग बल पूरणसेन ।

नदीश्वरप्रतकथा ॥ (२) लोन ॥ वंशइक्ष्वाकु प्रगटचक्रवे । ताकीआनि खंडपटचवे ॥ ११ ॥ पाट वध रानी नृप तीन । गंधारी जेठी गुण प्रियमित्रा रूपश्री नाम । साधेधर्मअर्थ अरुकाम ॥ १२ ॥ सुखसे रहत बहुत दिनभये । ऋतु बसंत कन राजागये ॥ जलक्रीडावनक्रीडाकरें। हास्य बिलासप्रीतिअनुसरें ॥ १३ ॥ तावनमध्य कल्पद्रुममूल । चंद्रकांतिमणि शिलानुकूल ॥ मंडपलताअधिकविस्तार । चारणमुनिआयेतिहिवार ॥१४॥ अरिजय अमितंजय नाम । सोमदयालु धर्म के धाम ॥ राजारानी पुरजननारि। देखेमुनितिनहष्टिपसारि ॥ १५ ॥ सत्र नर नारि अनंदित भये । क्रोडातजमुनिबन्दनगये ॥ त्रियापुरुषचरणोअनुसरे । अष्टद्रव्यसुनिपूजेखरे ॥ १६.॥ धर्म ध्यान कहो मुनिराय । श्रद्धा सहित सुनो करभाय ॥ राजाप्रश्नकरीमुनिपास । सुनो धर्म भयोचित्त हुलास ॥ १७ ॥ दलबलसहितसम्पदाघनी। और भूमिषट खंडजोतनी ॥ महापुण्य जोयहफलहोइ ॥ गुरुविनज्ञाननपावेकोइ ॥१८॥ पार २ विनवे कर सेव । पूर्व कहीं भवान्तर देव ॥ अवधिज्ञानबलमुनिवरकहै। परअहिक्षेत्रवनिकएकरहै । सुखित कुंवर मित्रता नाम । साधे धर्म अर्थ अरु काम ॥ जेष्ठ पुत्रश्रीवमकुमार । मध्यमजयवर्मा गुणसार ॥ २० ॥ लघुजयकीर्ति कात्ति विख्यात । तीनोंशुभआनंदितगात ॥ एकदिवसउपजोशुभकर्म । वनमें आये मुनिसौधर्म ॥२१ ॥ सेठ पुत्र मुनिवर बंदियो । श्रीवा जो अठाई लियो । नंदोश्वरव्रतविधिसेपाल । भव २ पापपुंजकोजाल ॥ २२ ॥ अंतसमाधि भरण को पाय । इस पुर वज्रबाहु नृपआय ॥ ताकेबिमलारानीजान । तुमहरिसेनपुत्रभये आन ॥ २३ ॥ पूर्व व्रत पालो अभिसम । ताते लहो सुक्खको धाम ॥ जयवर्माजयकीर्तिवीर । निकट भव्यगुणसाहसधीर ॥२४॥ ॥ - -- (३०) नदीवाव्रतकथा ॥ वन्दे गुरुजी धुरंधर देव । मन वच काय करी बहुसेव ॥ तबमुनिपंच अनुक्त दिये। दोनोंभावसहितव्रतलिये ॥२५॥ अरुनंदीश्वरबततिनलियो। अंतसमाधिमरणतिनकियो । हस्तनागपुरशु भजहांबसे । तहांविमलवाहन पलसे ॥२६॥ ताके नारि श्रीधरा नाम । आरिंजय अमितंजय धाम || पुत्रयगलहमउपजेतहां । पूर्वपुण्यभलपायो जहां ॥ १० ॥ गुरुसमीप जिन दिक्षालई । तपबल चारण पदवी भई ॥ यासे हम तुम पूर्व भ्रात । देखतप्रेम जपजो गात ॥२८॥ पूर्व ब्रत नंदीश्वर कियो । ताते राज चक्र पद लियो । अबफिरव्रतनंदीश्वरकरो। तातेस्वर्गमुक्तिपदधरो॥ २६ ॥ तब हरिसेन कहे कर जोर । ब्रत नंदीश्वर कहो बहोर ॥ मुनिवरकहें द्वीपआठमो। तासनामनंदीश्वरनमो ॥३०॥ ताकेचहुंदिशि पर्वत परे। अंजन दधिमुख रतिकरधरे ॥ तेरहतेरहदिशिदिशजान । येसबपर्वतबावनमान ॥ ३१ ॥ पर्वतपर्वत पर जिन ग्रह । वह परिमाण सुनो कर नेह ॥ सौयोजनताकाआयाम । अरुपत्रासविस्तारसुताम ॥३२॥ उन्नति है योजन पच्चीस । सुर तहं आय नया में शीश ॥ अष्टोत्तरसौ प्रतिमाजान । एक २ चैत्यालयमान ॥३३॥ गोपुर मणिमय केसुप्रकार। छत्र चमर ध्वजवंदनवार ।। प्रातिहार्यविधिशोभाभली । तिनरवि कोटिसोमछविछली॥ तास द्वीप में सुरपति आय । पूजा भक्ति करे बहु भाय ॥ देव अव्रतीत नहीं करें। भावभक्ति करपातिक करें ॥१५॥ तासद्वीप सम्बन्धी सार । व्रत नंदीश्वरको अधिकार ॥ यहांकहोजिनवरसुप्रकाशि। आदिअनादिपुण्यकीराशि ॥ जो व्रत भव्य भाव से करें । भव २ जन्म जरामय हरें। ताब्रतको सुनियेअधिकार। वर्ष २ में त्रय २ बार ॥ ३ ॥ .

नदीश्वरव्रतकथा ॥
( ३१ )
-
अष्ट प्रकारी
आपाढकार्तिकअरुजोफाग । शाखातीनकरो अनुराग ॥
आठोदिनआठपर्यंत । भक्तिसहितकीजेवतसंत ॥३८॥
सातैको एकासन करो। कर संयम जिनवर मनधरो॥
आठेकेदिनकरउपवास । जासेछूटे कर्मका त्रास ॥ ३ ॥
करोप्रथमजिनकाअभिषेक । जातेपातिक जायंअनेक ।
पूजा करो । मुख परमेष्टि पंच उच्चरो ।।
तादिनव्रत नंदीश्वरनाम । ताकाफलसुनियो अभिराम ॥
फलउपवासलक्षदशान । श्रीजिनवरनेकरोबखान ॥४१॥
दूजे दिन जिन पूजा करो। पात्र दान दे पातिकहरो ॥
अष्टविभूतिनामदिनसाइ । तादिनएकासनकरलाइ ॥ २४ ॥
फलउपवाससहस्रदशहाइ । अबतीजादिनसुनियेलोइ ॥
जिनपूजाकरपात्रहिदान । भोजनपानीभात प्रमाण । ४३ ॥
नामत्रिलोक सारदिनकहो । साठलाखपोषधफललहो ।
चतुर्थदिनकरआमौदर्य । नामचतुर्मुखदिनसीहर्य ॥ १४ ॥
तहांउपवासलक्षफलहोइ। पंचमदिनविधिकरियोसाइ ॥
जिनपूजाएकासनकरो। हयलक्षणजुनामदिनधरो ॥ ४५ ॥
फलचौरासी लक्ष उपास । जासे जायभ्रमण भव त्रास ॥
षष्टम दिन जिनपूजादान। भोजनभातआमिलीपान॥४६॥
तादिन नाम स्वर्गसोपान । व्रत चालीसलक्ष फलजान ॥
सप्तमदिनजिनपूजादान । कीजे पविजनकासन्मान ॥४७॥
सब सम्पत्तिनामदिन सोइ । भोजनभात त्रिवेलीहोइ ॥
फलउपवासलक्षकोजान । अष्टमदिनव्रतचितमें आन ॥१८॥
कर उपवास कथा रुचि सुनो । पान दानदेसुकृत गुनो ॥
इंद्रध्वजव्रतदिन तसनाम । सुमरोजिनवर आठोजाम ॥४॥
तीनकोड़अतलाखपचास । यह फल होइ हरेसबत्रास ॥
यहविधिआठवर्षमेंहोइ । भावसहितकीजेभविलोय ॥ ५० ॥

(३२) नंदीश्वरव्रतकथा ॥ उत्तम सातवर्पविधिजान । मध्यमपांच तीन लघुमान ॥ उद्यापन विधिपूर्वक सचो । वेदी मध्य माडनारची ॥५१॥ जिनपूजारुमहाअभिषेक । चंद्रोपमध्वज कलश अनेक ॥ छत्रचमरसिंहासनकरो । बहुविधिजिनपूजोअघहरो ॥५२॥ चारोदान सुपात्रहि देउ । बहुत भक्तिकर विनय करेउ । बहुविधिजिनप्रभावनाहोइ । शक्तिसमानकरोभविलाय ५३ उद्यापन की शक्ति न होइ । तो दूनो व्रत कोजोलोइ ॥ जिनयहव्रतकीनोअभिराम । तिनपदलयोसुक्खकाधाम॥५॥ यहवन पूर्वमहाफललियो । प्रथमऋषभजिनवरनेकियो । अनंतवीर्यअपराजितपाल । चक्रवर्तिपदवीभई हाल ॥५॥ श्रीपाल मैना सुंदरी । व्रत कर कुष्ट व्याधि सबहरी ॥ बहुतकनरनारीब्रतकरो। तिनसवअजरअमरपदधरो ॥५६॥ सुनो विधान राय हरिसेन । अति प्रमोद मुख जंपेवैन । सबपरिवारसहितव्रतलयो। मुनिवरधर्मप्रीतिकरदयो ॥५॥ व्रतकर फिर उद्यापन करो। धर्मध्यानकर शुभ पदधरो ॥ अंतसमाधिमरणकोपाय । भयो देव हरिसेन सुराय ॥८॥ पर्यायान्तर जैहे मुक्ति । श्रेणिक सुनी सकलवतयुक्ति ।। गौतमकहोसकलअधिकार । सुनामगधपतिचित्तउदारा॥ जो नर नारी यह व्रत करें। निश्चय स्वर्गमुक्ति पद धरें । संकट रोग शोकसबजाहिं । दुःख दरिद्रतादूरबिलाहिं ॥६॥ यह वृत नंदीश्वर की कथा । हेमराज सु प्रकाशी यथा ॥ शहर इटावा उत्तम धान । श्रावक करेंधर्मशुभध्यान ॥६१॥ सुने सदा ये जैन पुराण । गुणी जनोंका राखें मान ॥ तिहिठा सुना धर्मसम्बन्ध । कीनीकथाचौपई बंध ॥२॥ कहें सुनें देखें उपदेश । लहें भाव से पुण्य अशेष ॥ जाकेनाम पापमिटिजांय । ताजिनवरकेवन्दोंपाय ॥६॥ इति श्री नंदीश्वरव्रत कथा सम्पूर्णम् ॥ A

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- --- - - हमारे यहां निम्न लिखित जैनपुस्तकें मिलती हैं। जैलग्रन्थ संग्रह। इत्त, ३० पुस्तके हैं । और पुष्ट कागज पर सुन्दर टेप से छपी हैं और ऊपर से बुन्दर जिल्द बंथी है। यही एक पुस्तक परदेश में पास रखना काफी है । मूल्य प्रथम एक २० था । अब ॥) माठ माने ही मे देंगे। व्याख्यान रत्नमाला। छपगई ! छपगई !! छपगई !!! जिस पुस्तक के लिये सभा प्रेमी पुरुष वर्षो से भटक रहे थे। वही भाग इप कर तैयार हो गई । सचमुच ही यह व्याख्यानरूपी रत्नों की माला ही । इस को धारण करने से लोग सभा में धर्राटे के साथ व्याख्यान दे कर जाति सुधार कर सहेंगे तथा धन धर्म विद्या बुद्धि की वृद्धि कर सकेंगे जो पुरुष समा . में व्याख्यान कहना सीखना चाहते हैं वह इन के मंगाने में देरी न करे। की माग की।) नवीनहोलीसंग्रह,एकबार प्रवश्य पढ़ियेहुछा निषेध सांगीत मनोरमा (नौटंकीकीराहम) दुःखहरण विनती सागीतनेनचन्द्रका (नौटकीकीराहो) ) सकाटहरण विनती जैमगजन संग्रह (चालभीलिखा है )-) बारह भावना सग्रह, रतोनालय(भनेकागोम१००स्तुति) ३) समाधिकरण (एलविनती सहित) )। प्रमोकरमाला (पर्याणी दुस्तफा है)-) परमार्थजकाही, वा० रानुल सोरठमे)। तस्वार्थ उन्नशी मूल - पुकार पचीसी पंचमंगल पाठ ) जैनषालगुटका (वालों को बढ़ाइये)) লাক্ষাদ্ধা বানী "इट छत्तीसी निशिकांह गाथा ) बारहनामा नीता जी ) बाईसपरीषह, बारह भावना सहित) बारहमासा मुनिजी प्रश्नोत्तर नेमराजुल बारहमासा बजदंत )॥ | पालोचनापाठ अर्थसहित वैराय भावना | मामायक भाषा || सप्तऋषि पूजा नियाकांड भाषा निशिभोजन भजन कथा ਬਧt. महानर संस्कृत वा भाषा On बुढ़ापे का विवाह जैनधर्म की कुल छपीहुई पुस्तके वा ग्रंथ इसपते सेही मिलेंग- लाला जैनीलाल जैन-मुन्देववन्द-जि० सहारनपुर- । ) ॥ है व्याहला नेमिनाथ - ध्यात्म पनासा दश भारती कृपा पचीसी ।

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Jainvartkatha Sangrh

Author
Lala Jainy Lal
Title
Jainvartkatha Sangrh
File name
Jainvartkatha Sangrh
Text
OCR done
Citation
1907
Published
2009/11
Publisher
Etawah, Brahma Press
Language
Sanskrit
Pages
36
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Katha sangrah
DLI number
344236
Barcode
99999990234112.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
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