Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Khartargachha Brihdgurvavali

Jin Vijay Muni · 2012/08

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सिं घी जैन ग्रन्थ मा ला
writtein-[ ग्रन्थांक ४२]*****re
श्री जिनपालोपाध्यादि-सङ्कलित
खरतरगच्छ
बृहद्गुर्वावलि
SRI PALCHAND OTSINGH
ALLOLIMATION
डानचटजी सिंघी
SINGHI JAIN SERIES
...........[ NUMBER 42]umm......
KHARATARA GACCHA BRIHAD GURVAVALI
(A COLLECTION OF WORKS OF JINAPALA UPADHYAYA AND OTHERS
RELATINO TO THE SPIRITUAL LINEAGE OF THE EMINENT
ACARYAS OF THE KHARATARA GACCHA)

SINGHI JAIN SERIES
A COLLECTION OF CRITICAL EDITIONS OF IMPORTANT JAIN CANONICAL,
PHILOSOPHICAL HISTORICAL LITERARY, NARRATIVE AND OTHER WORKS
IN PRAKRIT, SANSKRIT. APABHRAMSA AND OLD RAJASTHANI
GUJARATI LANGUAGES, AND OF NEW STUDIES BY COMPETENT
RESEARCH SCHOLARS
ESTABLISHED
IN THE SACRED MEMORY OF TIE SAINT LIRE LATE SETË
SRÍ DÁLCHANDJI SINGHI
OF CALCUTTA
HIS LATE DEVOTED SON
DANASILA-SAHITYARASIKA-SANSKRITIPRIYA
SRI BAHADUR SINGH SINGHI
DIRECTOR AND GENERAL EDITOR
ACHARYA JINA VIJAYA MUNI
PUBLISHED
UNDER THE EXCLUSIVE PATRONAGE OF
SRI RAJENDRA SINGH SINGHI
AND
SRI NARENDRA SINGH SINGHI
BY THE DIRECTOR OF
SINGHI JAIN SHASTRA SHIKSHAPITH
BHARATIYA VIDYA BHAVAN
BOMBAY

KHARATARA GACCHA BRIHAD GURVĀVALI
(A COLLECTION OF WORKS OP JINAPALA UPADHYAYA AND OTHERS
RELATING TO THE SPIRITUAL LINEAGE OF THB EMINENT
ACARYAS OF THE KHARATARA GACCHA)
COLLECTED AND EDITED FROM VARIOUS OLD MANUSCRIPTS
BY
ACHARYA, JINA VIJAYA MUNI
(Honorary Member of the German Oriental Society, Germany; Bhindārkar
Oriental Research Institute, Poona; Vishveshyranand Vaidic Research
Institute, Hosigarpar; and Gujarat Săbitya Sabhi, Abmedabad.)
Honorary Director, Rajasthan Oriental Research Institute, Jaipar.
General Editor, Rajasthan Poratan Granthamıla; etc.
2013 Flat
PUBLISHED BY THE ADHIŞTHĀTĀ
Singhi Jain Shastra Shikshapith
BHARATIYA VIDYA BHAVAN
BOMBAY
V. E. 2012)
(First Edition)
[ 1956 A. D.
Vol. 42]
(Price Rs. 7-0-0

कलकता निवासी
साधुचरित-प्रेष्ठिवर्य श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी पुण्यस्मृतिनिमित्त
प्रतिष्ठापित एवं प्रकाशित
सिंघी जैन ग्रन्थ माला
[जैन भागमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, कथात्मक-इत्यादि विविध विषयगुम्फित
प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, प्राचीनगूर्जर - राजस्थानी आदि नानामापानियद्ध सार्वजनीन पुरातन
पाहाय तया नूतन संशोधनात्मक साहित्य प्रकाशिनी सर्वश्रेष्ठ जैन प्रन्यावलि]
प्रतिष्ठाता
श्रीमद्-डालचन्दजी-सिंधीसत्पुत्र
ख. दानशील-साहित्यरसिक-संस्कृतिप्रिय
श्रीमद् बहादुर सिंहजी सिंघी
प्रधान सम्पादक तथा संचालक
आचार्य, जिन विजय मुनि
अधिष्ठाता-सिंघी जैन शास्त्र शिक्षापीठ
श्री राजेन्द्र सिंह सिंघी तथा श्री नरेन्द्र सिंह सिंघी
प्रशासनाती-अधिष्ठाता
सिंधी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्या भवन,
बम्बई
मारक- अयन्तन. ६वे, नररी डॉयरेक्टर मारदर विद्या भवन, करारी गेर, पम्मी, म. .
सुरक-लक्ष्मीबाई मारामण बोपरी, मदर गर प्रेस, २९-२८ कोलमाट स्ट्रीट, बम्बई, मं. २

श्री जिनपालोपाध्यायादि-विद्वत्कर्तृक
खरतरगच्छबृहद्गुर्वावलि
सङ्ग्राहक एवं संपादक
आचार्य, जिनवि जय मुनि
ऑनररी मेंवर
जर्मन मोरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी; भाण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट पूना, (दक्षिण);
गुजराव साहित्यसभा, महमदाबाद (गुजरात); विश्वेश्वरानन्द वैदिक
शोध प्रतिष्ठान, होसियारपुर (पाब)
ऑनररी डायरेक्टर
राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जयपुर (राजस्थान)
निवृत्त सम्मान्य नियामक भारतीय विद्या भवन, यम्बई
5-
प्रकाशनकर्ता-अधिष्ठाता
सिंघी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्या भवन, चम्बई
विक्रमाद २०१२]
प्रथमावृत्ति
[सिलाद ९५०
पन्यांक ४२]
सोधिघर सुरक्षित
[मूल्य रू.७-०-१

।। सिंघीजैनग्रन्थमालासम्पादकप्रशस्तिः ॥ aceca १ २ ३ ४ ५ ८ ९ १० १ - १४ १५ स्वस्ति श्रीमेदपाटाख्यो देशो भारतविश्रुतः । रूमाहेलीति सन्नानी पुरिका तत्र सुस्थिता ॥ सदाचार-विचाराभ्यां प्राचीननृपतेः समः । श्रीमच्चतुरसिंहोऽत्र राठोडान्वय भूमिपः ॥ तत्र श्रीवृद्धिसिंहोऽभूद् राजपुत्रः प्रसिद्धिभाक् । क्षात्रधर्मधनो यश्च परमारकुलाग्रणीः ।। मुज-भोजमुखा भूपा जाता यम्मिन् महाकुले। किं वय॑ते कुलीनत्वं तरकुलजातजन्मनः ॥ पत्नी राजकुमारीति तस्याभूद् गुणसंहिता । चातुर्य-रूप-लावण्य-मुवाक् सौजन्यभूपिता ॥ क्षत्रियाणी प्रभापूर्णा शौर्योद्दीसमुग्वाकृतिम् । यो दृष्ट्वैव जनो मेने राजन्यकुलजा लियम् ।। पुत्रः किसनसिंहाख्यो जातस्तयोरनिप्रियः । रणमल्ल इति चान्यद् यशाम जननीकृतम् ॥ श्रीदेवीसनामात्र राजपूज्यो यतीश्वरः । ज्योतिभैषज्यविद्यानां पारगामी जनप्रियः ।। भागतो मरुदेशाद् यो भ्रमन् जनपदान् बहून् । जातः श्रीवृद्धिसिंहस्य प्रीति-श्रद्धास्पदं परम् ॥ तेनाथाप्रतिमप्रेरणा स तत्सूनुः स्वसन्निधौ । रक्षितः शिक्षित: सम्यक्, कृतो जैनमतानुगः ॥ दौर्भाग्यात् तच्छिशोबाल्ये गुरु-तातो दिवंगतौ । विमूढः स्वगृहात् सोऽथ यदृच्छया विनिर्गतः ॥ तथाच- भ्रान्त्वा नेकेषु देशेषु संसेव्य च बहून् नरान् । दीक्षितो मुण्डितो भूय जातो जैनमुनिस्ततः ।। ज्ञातान्यनेकशास्त्राणि नानाधर्ममतानि च । मध्यस्थवृत्तिना तेन तत्त्वातत्वगवेपिणा ॥ अघीता विविधा भाषा भारतीया युरोपजाः । भनेका लिपयोऽप्येवं प्रव-नूतनकालिकाः ॥ येन प्रकाशिता के प्रन्या विद्वत्प्रशंसिताः । लिखिना बहवो लेसा ऐतिह्यतथ्यगुम्फिनाः ।। बहुभिः सुविद्वद्भिस्तन्मण्डलैश्च स सत्कृतः । जिनविजयनान्नाऽयं विख्यात सर्वनाभयद् ॥ सस्य तो विश्रुति ज्ञात्वा श्रीमद्गान्धीमहात्मना । आहूतः सादरं पुण्यपत्तनात् स्वयमन्यदा ॥ 'पुरे चाहम्मदापादे राष्ट्रीय शिक्षणालयः । विद्यापीठ इति ख्यात्या प्रतिष्टितो यदाऽभवत् ।। भाचार्यस्येन तत्रोच्चैनियुक्तः स मदारमना । रस-मुनि-निधीन्देदे पुरातत्याख्य मन्दिरे ॥ वर्षाणामष्टक यावत् सम्भूप्य तत् पदं ततः । गत्या जर्मनराष्ट्रे स तत्मंस्कृतिमधीतवान् । सत भागत्य सल्लमो राष्ट्रकार्ये च सक्रियम् । कारावासोऽपि सम्प्राप्तो येन स्वातन्त्र्यसगरे । क्रमात् ततो विनिर्मुक्तः स्थित. शान्ति नि के तने । विश्ववन्द्यकीन्द्रश्रीरवीन्द्रनाय भूषिते ॥ सिंधीपदयुतं जैनज्ञानपीठं तदानितम् । स्थापितं तय सिंघीनीडालचन्दस्य सूनुना ॥ श्रीवहादुरसिंहेन दानवीरेण धीमता । स्मृत्यर्थ निजतानस्य जैनज्ञानप्रसारकम् ॥ प्रतिष्ठितश्च तस्यासौ पदेऽधिष्ठाससके। अध्यापयन् धरान् शिव्यान् ग्रन्थयन जैनबाध्ययम् ॥ सस्यैव प्रेरणा प्राप्य श्रीसिंघीकुलोना । स्वपितृश्रेयसे झेपा प्रारब्धा ग्रन्थमालिका ।। मधैवं विगतं तस्य वर्षाणामष्टकं पुनः । ग्रन्थमालाविकासार्थिप्रवृत्तिषु मयस्यतः ।। माणे-रो-नेयेन्द्र दे मुंयाईनगरीस्थित । मुंशीति विरदायातः कन्हैयालालपीपयः ॥ प्रवृत्तो भारतीयानां विद्यानां पीठनिर्मिती । कर्मनिष्टस्य तस्याभूत प्रयतः सफ्लोऽचिरात् ॥ विदुषां श्रीमतां योगान् पीठो जातः प्रतिष्टितः । भारतीय पदोपेन विद्यामयन सम्ज्ञया । माहूत: सहकार्यार्थ स मुनिस्तेन सुहृदा । ततःप्रभृति तम्रापि तरकार्य मुप्रवृत्तसन् । तंदवनेऽन्यदा सस्य सेवाऽधिका अपेक्षिता । स्वीकृना च सद्भावेन साऽप्याचार्यपदाश्रिता ॥ मन्द-निध्य-चन्दादे बैकमे निहिता पुनः । एतग्रन्थापलीस्थैर्यकृत् तेन नव्ययोजना ।। परामर्शात् सतम्तस्य श्रीसिंघीकुर मास्वसा । भाविद्यामय ना येयं मन्यमा समर्पिता ॥ प्रदशा दशसाहस्री पुनम्नस्योपदेशतः । स्वपितृस्मृनिमन्दिरकरणाय मुकीर्तिना ॥ देवादापे गते काले सिंघीपर्यो दिवंगतः। यतस्य ज्ञानसेगया साहाय्यमकरोत् महत् ।। पितृकार्यप्रगत्यर्थ यसनारसदारमनः । राजेन्द्रमिहमुग्यैश्च साकृतं तवचम्नत। पुण्यश्लोकपिनुर्माना प्रन्यागारले पुनः । यन्धुग्येष्टो गुणधेटो बदलक्षं धनं ददौ । प्रन्यमादाप्रमिययं शिवत् उस्स यौक्षितम् । धाKिधीमपु. सतगिराऽनुविधीयते ॥ -पिदमनकृतासादा सचिदानन्ददा सदाचिरं नन्दविर्य से शिनजियभारमी । २० २५ २६ २७ २८ खरतरगच्छ वृहद्गुर्वावलि-विषयानुक्रम १-३ ३- ५ प्रास्तारिरक्तव्य गरतरगच्छपट्टापलिरांग्रह-किशिद्वक्तव्य सरतरगच्छगुरलिका ऐतिहासिक महत्व .१ पर्द्धमानाचार्पवर्णन २ जिनेघरपरिवर्णन ३ जिनचन्द्रमरि-अभपदेयररिवर्णन जिनपरामररिवर्णन ५ जिनदनमरिवर्णन ६ जिनचन्द्ररारिवर्णन ७ जिनपतियरिवर्णन ८ जिनेवरयरिवर्णन जिनपालोपाध्यायग्रथितनन्यभागपूर्ण ९ जिनप्रबोधरिवर्णन १० जिनचन्द्रयरिवर्णन ११ जिनकुशलरिवर्णन १२ जिनपमसूरिवर्णन ८-१४ १४-२० २०-२३ २३-४८ ४८-५४ (५०) ५४-५८ ६९-८५ ८५-८८ ९० ९० वृद्धाचार्यप्रवन्धावलि १ पर्द्धमानसरिप्रपन्ध २ जिनेश्वरसूरिप्रवन्ध ३ अमयदेवमूरिप्रबन्ध जिनवल्लभरिप्रवन्ध ५ जिनदत्तरिप्रवन्ध ६ जिनचन्द्रसूरिप्रवन्ध जिनपतिमरिप्रसन्ध जिनेश्वरमरिप्रबन्ध ९ जिनसिंघमूरिमवन्ध जिनममम्ररिप्रबन्ध सरतरगच्छ-गुर्वावलिगतविशेपनाम्नां सूचिः ९२ ९३ 5 w a voi ९३-९६ ९७-११२ प्रास्ताविक वक्तव्य । , । सिंघी जैन ग्रन्थमालाके १२ वें गुच्छकके रूपमें, प्रस्तुत होने वाली इस 'खरतर गच्छीय युगप्रधानाचार्य गुर्वावली' (संक्षेपमें- खरतर बृहद् गुर्वाग्ली) की प्राचीन हस्तलिखित प्रति, मूलतः बीकानेर निवासी श्रीयुत अगरचन्दजी नाहटाको, वहाँके सुप्रसिद्ध क्षमाकल्याणजीके प्रन्यभंडारमें उपलब्ध हुई थी। कोई १९-२० वर्ष पहले, इनने उस प्रतिको हमें देखने के लिए भेजा । अन्यको देखनेसे, हमें ऐतिहासिक दृष्टिसे यह बहुत महत्त्वका मादम दिया, अतः प्रस्तुत प्रन्थमालामें इसे प्रकाशित करनेका हमने निश्चय किया । तदनुसार प्रेसमें देने योग्य प्रन्यकी प्रतिलिपि (प्रेसकॉपी) कर बाई गई । प्रतिलिपिके पढने पर ज्ञात हुआ कि मूल प्रति बहुत ही अशुद्ध रूपमें लिखी गई है । प्रत्येक पंक्ति अशुद्धप्राय ज्ञात हुई । अतः इसका कोई प्रत्यन्तर कहीले उपलब्ध हो तो उसे प्राप्त करनेका प्रयत्न किया गया पर उसमें हमें सफलता नहीं मिली । तब उसी प्रतिको वारंवार आद्योपान्त पढ पढ़ कर, उसकी अशुद्धियोंका तारण किया गया, तो ज्ञात हुआ कि, जिस लहिया (लिपिकारक) ने यह प्रति लिखी है, उसने अपने सन्मुखवाली मूलाधार प्रतिके कुछ अक्षरोंको, भ्रमसे कुछ अन्य ही अक्षर समझ समझ कर, उनके स्थान पर, अपने अक्षर ज्ञानके मुताबिक, अन्य अक्षर लिख डाले हैं; और इससे, अन्य बहुत ही अशुद्ध हो गया है । ग्रन्यगत विषय हमारे लिये सुपरिचित था और इस प्रकारकी अन्यान्य अनेक छोटी-बड़ी गुर्वावलियां - पट्टावलियां भी हमारे संग्रहमें उपलब्ध थीं; अतः तदनुसार हमने सारे ग्रन्थके पाठको शुद्ध करनेका यथाशक्य प्रयत्न किया । कई महिनोंके परिश्रमके बाद हम इस प्रन्यकी शुद्ध प्रतिलिपि करनेमें सफल हुए । यादमें हमें इस गुर्मावलिकी एक अन्य त्रुटित और अपूर्ण प्रति प्राप्त हुई, जिसके साथ मिलान करने पर हमें ज्ञात हुआ कि हमने जो पाठकी शुद्धि की है यह ठीक उस प्रतिमें उसी तरह मिल रहा है । उस अपूर्ण प्रतिमें, कुछ पाठभेद भी दृष्टिगोचर हुए, जिनको हमने इस मुद्रित पाठके नीचे, पाद-टिप्पनीमें दे दिये हैं । यह अपूर्ण प्रति केवल ५ पनेकी थी, जो प्रस्तुत प्रन्यके २३ वें पृष्ठ पर छपी हुई १२ वीं पंक्तिके 'श्री जिनपतिसूरिरिति नाम कृतम् ।' इस याक्यके साथ खण्डित हो जाती है । इस गुपिलिकी उक्त मूल प्रतिके दो पृष्ठों का प्लाफ वनवा कर, उनका प्रतिचिन साय दिया जा रहा है, जिससे मूल प्रतिके आकार-प्रकारका एवं लिपिके स्वरूपका तादृश ज्ञान हो सकेगा। इस प्रन्यका मुद्रण कार्य बहुत समयसे समाप्त हुआ पड़ा है पर विधिके किसी अज्ञात संकेतानुसार हम अभी तक इसको प्रसिद्धि में रख नहीं सके । हमारी इच्छा रही कि इस विशिष्ट प्रकारकी ऐतिहासिफ गुरुयलिसे संबद्ध, तत्कालीन जैन श्वेताम्बर संप्रदापों और गष्ठोंके बारेमें मी, विस्तृत उहापोहात्मक निबन्ध लिया जाय और पयाज्ञात सम प्रकारकी ऐतिहासिक सामग्री संकलन कर दिया जाय । इस विषयकी बहुत सी सामग्री हमने संचित कर रखी है। और इसी लिये कई वर्षों तक इसकी प्रसिद्धि रुकी रही । पर हमारे टिपे वैसा करना अब संभव नहीं रहा, मतः इसको इसी मूल रूपमें ही प्रसिदिमें रख देना उचित समझा है। प्रस्तुत 'गुरिलका ऐतिहासिक महत्व' यनयने याला श्री अगरचन्दजी नाहटाका एक लेटा, हमारी संपादित 'भारतीय विधा' नामक प्रेमामिकी दोधपत्रिकाके, प्रथम वर्षके ४ थे अकमें प्रकाशित हुआ है । इस टेरके प्रारंभमें, गुर्गायनिकी परिचायक एक छोटी सी नोंघ (नोट) हमने लिखी थी जिसको यहाँ उद्धृत करते हैं। मायमें आगे पृष्ट नाइटाजीरा यह लेग मी मुदित किया जाता है, जिसने पाटोको प्रस्तुत प्रत्यके ऐतिहासिक तथ्यों के बारेमे योग्य जानकारी प्रात हो सकेगी। ["निधी जैन मन्पमाटामें गरतरगच्छ-युगप्रधानाचार्य गुर्मानली नामक एक मत गप अन्य कर रहा है जो सीम ही मासिन दोगा मध शिवमयी ११ वी मातादी प्रारंभ होने या आचार्य पदमन गरिने से कार १४ की साली अन्तमें होने या निनाम सूरि ताक परतर गयो मुरुप आपा मिस्तर परितपन है । गुग . खरतरगच्छ -पट्टावलि संग्रह संमाहक एवं संपादक मुनि जिनविजय, अधिष्ठाता-सिंघी जैन ज्ञानपीठ, शान्तिनिकेतन । (प्रकाशक-यापूरण चन्दजी नाहार, इण्डियन मिरर स्ट्रीट, कलकत्ता।) संपादकीय किश्चित् वक्तव्य। लगभग ६० वर्षसे खरतरगच्छीय पदावलियोंका यह छोटा सा संग्रह छप कर तैयार हुआ था, लेकिन विधि के किसी अज्ञेय संकेतानुसार आज तक यह यों ही पड़ा रहा और यदि विद्वदर बावू पूरणचंदनी नाहारदी उपालंभ भरी हुई मीठी चुटकियोंकी लगातार भरमार न होती तो शायद कुछ समय बाद यह संग्रह साराका सारा ही दीमकके पेटमें जा कर विलीन हो जाता। पूनामें रह कर जय हम "जैनसाहित्य-संशोधक' का प्रकाशन करते थे उस समय अहमदाबाद-निवासी साहिल-रसिक विद्वान् श्रावक श्री केशवलाल प्रे० मोदी B. A. LL B. ने सरतरगच्छ की एक पुरानी पट्टावलीकी लिखित प्रति हमें ला कर दी-जिसमें इस संग्रहमें की प्रथम ही एपी 'खरतरगच्छ-सरिपरंपरा-प्रशस्ति' लिखी हुई थी। उस समय तक सरतरगच्छ की जितनी पट्टावलियां हमारे देखने अथवा संग्रह करनेमें आई उन सबमें यह प्रशस्ति हमें प्राचीन दिखाई पड़ी इसलिये हमने इसकी तुरंत नकल कर, "जैन सा० सं०' के परिशिष्ट रूपमें छपवा देनेके विचारसे प्रेसमें दे दी । कुछ समय बाद मोदीनीने एक और पट्टावली भेजी जो गद्यमें थी और साथमें उन्होंने यह भी इच्छा प्रदर्शित की कि इसे भी यदि उसी प्रशास्तिके साथ छपवा दिया जाय तो अच्छा होगा। हमने उमकी भी नकल कर पेसमें छपनेको दे दी। जब ये प्रेससे कंपोज हो कर आई तो पूरे फार्म होने में कुछ पृष्ठ खाली रहते दिखाई दिये, तब हमने सोचा कि यदि इसके साथ ही साथ उपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी की बनाई हुई वृहत्पावलि भी दे दी आय तो सरतरगच्छके आचार्योंकी परंपराका १९ वीं शताब्दि पर्यतका वृत्तान्त, प्रक्ट हो जायगा और इतिहास प्रेमियोंको उससे अधिक लाभ होगा। इस पावलीकी प्रेस कापी की हुई हमारे संप्रहमें बहुत प.ले ही से पड़ी हुई थी; अतः हमने उसे भी प्रेसमें दे दिया। इसी तरह की, लेकिन इससे प्राचीन एक और पहावली हमारे पास थी उसे भी, प्रत्यंतर होनेसे विशेष उपयोगी समझ कर, इसी संग्रहमें प्रकट करनेकर हमें लोभ हो आया और उसे भी छपने दे दिया। इस प्रकार बार पट्टावलियोंका यह छोटा सा संग्रह जब तैयार हो गया, तव हमने इसे 'जैन सा० स०' के परिशिष्ट रूपमें न दे कर खतंत्र पुस्तकाकार प्रकट करनेका विचार किया और यह स्वतंत्र पुस्तकका विचार मनमें घुसते ही हमारे दिलमें एक नया भूत मा घूसा । हम सोचने लगे कि जब पुस्तक ही बनाना है तघ पिर क्यों नहीं विशेष स्पसे एक संकलित ऐतिहासिक ग्रंथके आकार में इसे तैयार कर दिया जाय और खरतर गच्छके इतिहासके जितने मुख्य मुख्य और महत्वके साधन हो उन्हें एकत्र रूपमें संगृहीत कर दिया जाया क्यों कि हमारे संग्रहमें इस विषयकी कितनी ही सामग्री- इन पदावलियोंके अतिरिक कई अन्य भाषाकी पट्टावलियो, ग्रंथप्रशस्तियां तथा ख्यात आदि विविध प्रकारकी ऐतिहासिक सामग्री - इक्ट्ठी हुई पड़ी थी। उस सब सामग्रीको संकलित कर ऐतिहाठिक सदापोह परनेवाली विस्तृत भूमिका और टीका टिप्पणी आदि साथमें लगा कर इस सप्रहको परिपूर्ण बना दिया जाय तो वेताम्बर जैन संघके एक बड़े भारी शाखा-समुदायका मच्छा और प्रामाणिक इतिहास तैयार हो जाय । इस भूतके आवेशानुमार हमने उस सब सामनीका संकलन करना शुरू किया। ऐसा करनेमें हमें कुछ अधिक समय लग गया और अहमदावादके पुरातत्त्व मंदिरके आचार्यपदके भारने हमारी पूनाकी विशेष स्थितिको अस्थिर यना दिया । इसलिये इस संग्रहके विस्तृत-संकलनका जो विचार हुआ था वह शिथिल होने लगा और चिरकाल तक घुट कार्य न हो सका। इधर जिस प्रेसमें यह संग्रह छपा उसके मालिक्ने छपाईके खर्च आदिका तकाजा वरना शुरू किया। जिस विस्तृत रूपमें इसे प्रकाशित करनेका सोचा था उसमें बहुत कुछ समय और अर्धव्ययकी आवश्यकता अनुभूत हुई और शीश ही इस कार्यो परिपूर्ण करने जैसे संयोग दिसाई न दिये, अतः इमने उस विचारको स्थगित किया और यह संप्रद जो इस रूपमें छप गया या, इमे ही प्रकाशित कर देना उचित समझा। इसी पीचमें बाबूवर्य श्री पूरणचंदजी नाहारफे अवलोकनमें यह छपा हुआ साह पाया और आपने इसे अपने सर्चसे प्रकाशित कर अपनी धर्मपत्नी श्रीमती इंद्रकुमारीजीके ज्ञान पंचमी तपके उद्यापन निमित्त वितीर्ण कर देनेश भभिप्राय प्रकट किया। तदनुसार पूनासे यह छपा हुआ पंथ-भाग वलत्ते मंगवा लिया गया और प्रेसका बिल इत्यादि चुक्ता किया गया। इस महके मायमें हम कुछ दो शब्द दिस दें तो इसे प्रकाशित कर दिया जाय ऐसी घाबूजीकी इच्छाको हमने सादर खोकार पर, हम इस विषयमें कुछ सोपवे ही थे कि पुछ ऐसे प्रसंग, एकके बाद एक, उपस्थित होते गये जिससे वर्षों तक हम उनकी उस आज्ञाका पालन नहीं कर सके और २४ घंटेके कामको २४ वर्ष तर टेलते रहना पड़ा। . . सन् १९२८ के प्रारम्भमें महात्माजीने गुजरात-विद्यापीठको पुनर्घटना की, और विद्यापीटा ध्येय 'विद्या नहीं 'सा' निषित किया और साथमें कई प्रतिज्ञाओंका बन्धन भी लगाया । हमारा उसमें कुछ विशेष मतभेद रहा और हमने अपने विचारोंग्रे स्थिर करने के लिए कुछ समय तक, विद्यापीठके वातावरणसे दूर रहना चाहा । इसीके याद तुरंत हमारा इरादा युरोप आनेका हुआ। युरोपमें मामाजिक और औदोगिक तंत्रों का विशेषावलोकन करनेका हमें अधिक मौका मिला और उसमें हमें अधिक रचि टसन हुई। हमारा जो भाजीवन अभ्यस्ता विषय संशोधनका है, उसमें तो हमें दही कोई नवीन सीखनेी बात नहीं दिखाई दी, क्योंकि जिम पति और दृष्टिसे युरोपियन पटितगण संशोधन कार्य करते हैं, वह हमें यधेट सात थी और उसी पद्धति तथा दृष्टिसे हम बहुत समयसे अपना संशोधन-कार्य करते मी माते थे ।

- खरतर वृहद्गुर्वावलि-प्रास्ताविक वक्तव्य केवल वहाके विद्वानोंका उत्साह और एकाग्रभाव विशेष अनुकरणीय माटम हुआ।हमें जो खास अध्ययन करनेके विशेष विचार मालुम दिये, वे वहाके समाजवाद विषयक थे। इन विचारोंका अध्ययन करते हुए हमारी जीवनाभ्यस्त जो सशोधन रचि है, वह शिथिल हो चली। समान- जीवनके साथ सम्बन्ध रखने वाली बातोंने मस्तिष्कमें अड्डा जमाना शुरू किया । इन बातोंका विशिष्ट अध्ययन करनेके लिये हमारी इच्छा वहा पर कुछ अधिक काल तक ठहरनेकी थी, लेकिन सयोगवश हमको जल्दी ही भारत लौट आना पड़ा । इधर आने पर नाहाराने इस सग्रहकी सर्वप्रथम ही याद दिलाई, लेकिन सत्याग्रहके नूतन युद्धमें जुड जानेके कारण और फिर जेलखाने जैसे एकान्तवासके विलक्षण अनुभवानन्दमे निमग्न हो जाने के कारण इन, पुरानी बातोंका स्मरण करना भी क्व अच्छा लगता था। एक तो यो ही मस्तिष्कम समाज-जीवनके विचारोंका आन्दोलन धुडदौड कर रहा था, और उसमें फिर भारती इम नूतन राष्ट्रक्रान्तिके आदोलनने सहचार किया । ऐसी स्थितिमें हमारे जैसे नित्य परिवर्तनशील प्रकृति वाले और क्रान्तिमें ही जीवनका विकाश अनुभव करने वाले मनुष्यके मनमें, वर्षों तक पुराने विचारोका सग्रह कर रखना, और फिर जब चाहें तर उन्हें अपने सम्मुख एकदम उपस्थित हो जानेरी आदत बनाये रखना दु साध्य सा है। जेलमुक्ति होने पर विधाता हमें शान्तिनिकेतन खींच लाया। विश्वभारतीके ज्ञानमय वातावरण्ने हमारे मनको पिर शानोपासनाकी तरफ खींचना शुरू किया और हमारी जो स्वाभाविक सशोधन रुचि थी, उसको फिर सतेन बनाया। वाँसे हमने २।४ ऐतिहासिक ग्रन्थोंके सम्पादन और सशोधनका सकल्प कर रखा था और उसका कुछ काम हो भी चुका था,इसलिये रह रह कर यह तो मनमें आया ही करता था कि यदि इस सकल्पके पूरा करनेका कोई मन पूत साधन सम्पन्न हो जाय, तो एक बार इसको पूरा कर लेना अच्छा है। बाबू श्री बहादुरसिंहजी सिंघीके उत्साह,औदार्य, सौजन्य और सौहार्दने हमारे इस सकल्पो एक्दम मूर्तिमन्त बना दिया और हम जो सोचते थे, उससे भी कहीं अधिक मन पूत साधनकी सप्राप्ति देख कर, परिणामम हमने सिंघी जैन ज्ञानपीठ और सिंघी जैन ग्रन्थमाला का कार्यभार उठाना स्वीकार कर लिया। जयसे हम यहा आये, तभीसे इस सग्रहके लिये श्री नाहारजीरा बरावर स्मरण दिलाना चालू रहा । हम भी आन लिखते हैं, कल लिखते हैं, ऐमा जवाब दे कर उन्हें आशा दिलाते रहते थे। वहुत समय बीत जानेके कारण इस विषयमे जो कुछ हमारे पुराने विचार थे और जो कुछ हमने लिसना सोचा था, वह स्मृति पट परसे अस्पन सा हो गया। जिन प्रतियों परसे यह सग्रह मुद्रित हुआ था, वे मी पासमें नहीं रहनेसे, इस विषयमें क्या लिखें, कुछ सूझ नहीं पड़ती थी। 'विज्ञप्ति निवेणि', 'कृपारस कोप', 'शत्रुजय तीर्थोद्धार प्रवन्ध' इत्यादि पुस्तकोंके संपादन के बाद हमारा हि दी लेसन प्राय वन्द-सा ही है। पिछले कई वर्षोंसे निरन्तर गुजराती भाषा ही में चितन, मनन, लेखन, और वाग्व्यवहार चलते रहनेसे हिन्दी भाषाका एक तरहसे परिचय ही छूट गया। इस कारणसे कुछ हिन्दी लिखनेका ठीक ठीक चित्तकाम्य न हो पाता था । लेकिन पिछले कुछ दिनोंम हमारा साहित्य-सग्रह हमारे पास पहुंच गया और वर्षोंसे संदूकोंमे वद पड़े हुए पुराने कागजों और टिप्पणों से उथल पुथल करते समय, इस विषयके कुछ साधन भी हाथमें आ गये, जिससे ये पक्तिया लिखनेका मनमें कुछ विचार हो आया । यस यही इस सग्रहके बारेमें हमारा किश्चित् वक्तव्य है। श्वेताम्बर जैन सघ जिस स्वरूपमें आत विद्यमान उस खरूपके निर्माणमें, खतरतर गच्छके आचार्य, यति और श्रावक-समूहका बहुत बड़ा हिस्सा है। एक तपागच्छको छोड कर दूसरा और कोई गच्छ इसके गौरवकी बराबरी नहीं कर सकता। बातोंमें तपागच्छसे भी इस गच्छका प्रभाव विशेष गौरवान्वित है । भारतके प्राचीन गौरवको अक्षुण्ण रखने वाली राजपूतानेकी वीर भूमिमा, पिछले एक हनार वर्षका इतिहास, ओसवाल जातिके शौर्य, औदार्य, बुद्धिचातुर्य और वाणिज्य व्यवसाय-चौशल भादि महद् गुणों से प्रदीप्त है और उन गुणोका जो विकारा इस जातिमें, इस प्रकार हुआ है, वह मुख्यतया खरतरगच्छके प्रभावान्वित मूल पुरुषोंके सदुपदेश तथा शुभाशीर्वादका फल है। इसलिये खरतरगच्छका उज्वल इतिहास यह केवल जैन सपके इतिहासका ही एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण नहीं है, बल्कि समप्र राजपूतानेके इतिहासका एक विशिष्ट प्रकरण है । इस इतिहासके सकलनमें सहायभूत होने वाली विपुल साधन-सामग्री इधर-उधर नष्ट हो रही है । जिस तरहकी पट्टावरिया इस सग्रहमें सगृहीत हुई हैं, वैसी कई पहावलियां और प्रशस्तियां सगृहीत की जा सकती हैं और उनसे विस्तृत और शृखलाबद्ध इतिहास तैयार किया जा सकता है। यदि समय अनुकूल रहा, तो 'सिंघी जैन प्रथमाला' में एक-आध ऐसा वडा सग्रह जिज्ञासुओंको भविष्यम देसनेको मिलेगा। बाबू श्री पूरणवदनी नाहारने बड़ा परिश्रम और बहुत द्रव्य व्यय करके जैसलमेरके जैन शिलालेखोंका एक अपूर्व संग्रह प्रकाशित कर इस विषयमें विद्वानों और जिज्ञासुओंके सम्मुख एक सुन्दर आदर्श उपस्थित कर दिया है। इसके अवलोग्नसे, रापूतानेके जूने पुराने स्थानोंम जैनोंके गौरवके कितने स्मारक स्तभ बने हुए हैं तथा उनसे हमारे देशके ज्वलन्त इतिहासकी कितनी विशाल समृद्धि प्राप्त हो सक्ती है उसकी कुछ कल्पना आ सकती है । इस प्रथमैं प्राय खरतरगच्छके ही इतिहासमी बहुत सामग्री सगृहीत है जो इस पट्टावलिवाले सहकी बातोंको पुष्टि करती है तथा कई बातोंकी पूर्ति करती है। इन सब बातोंके दिग्दर्शनकी यह जगह नहीं है। ऐसे सदोंके सकलन करनेमें कितना परिश्रम आवश्यक है वह इस विषयका विद्वान् ही जान सकता है विद्वानेव जानाति विद्वज्जनपरिश्रम। जैसलमेरके लेखोंका ऐसा सुन्दर सग्रह प्रकाशित कर तथा इस पहावली सप्रहको भी प्रकट करवा कर श्रीमान् नाहारतीने सरतरगच्छकी मनमोल सेवा की है। एतदर्थ आप अनेक धन्यवादके पात्र हैं। आपका इस प्रकार जो स्नेहपूर्ण अनुरोध हमसे न होता तो यह सग्रह यों ही नष्ट हो जाता और इसके तैयार करनेमें जो कुछ हमने परिश्रम किया था वह अकारण ही निष्पल जाता। अत हम भी विशेष रूपसे आपके कृतज्ञ हैं। सिंघी जैन शान पीठ शान्ति निकेतन मुनि जिन विजय पर्युपणा प्रथम दिन, सं १९८५ ।

- खरतरगच्छ - गुर्वावलिका ऐतिहासिक महत्त्व [लेखक-श्रीयुत अगरचन्दजी नाहटा - सपादक राजस्थानी ] ऐतिहासिक साहित्यकी दृष्टि से खरतरगच्छ गुर्वापली एक अत्यन्त महत्वका और अपने ढगका अद्वितीय ग्रन्थ है। कुछ वर्ष पूर्व, बीकानेर के प्राचीन जैन ज्ञान भडारोंका अन्वेषण करते हुए हमें यह निधि उपलब्ध हुई थी। इसमें विक्रमकी ग्याहरवीं शताब्दीके उत्तरार्द्धसे ले कर वि० स० १३९३ तफके खरतरगचीय जेनाचार्योंगा विस्तृत और विश्वसनीय इतिवृत्त लिखा हुआ है । इस वृत्तान्तसे तत्कालीन भारतीय इतिहासकी और और बातों पर भी अच्छा प्रकाश पडता है । जो लोग कहते हैं कि भारतमें सरतानुक्रयसे शृखलाबद्ध इतिहास लिखनेकी प्रणाली सर्वथा नहीं थी उन्हें निरुत्तर करने के लिये यह अन्य एक पर्याप्त उदाहरणरूप है। {-प्रस्तुत गुदीमें स. १३०५ आषाढ मु० १० तम्या वृत्तान्त तो श्रीजिनपनि सरिजीके विद्वान शिष्य श्रीजिनपालोपाध्यायने दिश निवासी सेठ साहुली पुन हेमचद्रकी अभ्यर्थनासे सठित किया है । इसके पचानका वर्णन भी पट्टधर आचाया साथमें रहो वाले व दफ्तर रसनेवाले विद्वान मुनियों द्वारा लिखा गया प्रतीत होता है । यह प्रति पत्र ८६ की है और प्राय पदहवीं या सौरहवीं शताब्दी में लिखी होकर यीशनेरस्थ श्रीक्षमाकल्याण शानभहारमें विद्यमान है। इनमें स०१३९३ तक्या इतिवृत्त है। इसके पीछेका इतिहास जानने के लिये हम कोई भी इस कोटिकी गुजिली उपलब्ध नहीं है, परन्तु पराबद्ध इतिहास लिखने की प्रणाली तो पीछे भी बराबर रही है । स. १८६. की एक सूची के अनुसार, जेमल मेरके सुप्रसिद्ध ज्ञानभडारमें, उस समय ३१२ पा जिनती विस्तृत एक गुर्वावली वही विद्यमान थी। यदि यह गुर्वावली प्राप्त हो जाय तो अनेकों नवीन ज्ञातव्य मिले। खेद है कि अभीतर तो यर्नमान श्रीपूज्योंने पाम प्राचीन दफ्तर मी नहीं मिले। पाठोंको यह जान कर प्रसनता होगी कि दमका सम्पादन पुरातत्त्वचार्य श्री जिनविजयजी जैसे विद्धान द्वारा हो रहा है।] यह अन्य दो तरहकी शैलीमें सकलिन किया हुआ है । श्री जिनेश्वर सूरिजीसे श्री निनदत्त सूरिजी वर्गवास स० १२११ तफया वृत्तान्त तो, स० १२९५ में मुमतिगणि द्वारा रचित ' गणधरसाईशतक-वृहद्वति' के अनुसार ही प्राचीन शैलीका है। पर इसके पश्चात्की प्रत्येक घटना सरतानुक्रम और पगबद्ध रूपसे लिखी गई है, जो घटना ओंके साथ साथ लिखी हुई डायरी-सी प्रतीत होती है । जैनाचार्योका निहारानुक्रम, मार्गदर्ती ग्राम-नगर, दीक्षाए प्रतिष्टए तत्तत् प्रामवासी श्रापकोंके नाम, राजसभाओंमें किये गये शाखार्थ, तीर्थयात्रा वर्णन - इत्यादि सभी बातें इतनी विशदताके साथ लिखी गई है कि तत्कालीन परिस्थिति आपोंके सामने आ जाती है । भ्रमणशील जैनाचायोंके प्रयास मार्गका वर्णन तो भारतीय साहित्यमें एक नवीन वस्तु है । क्यों Eि भारतके साहित्यमें प्राय इसका अभार ही है । हमारे पास, जो पुल विदेशी विद्वानोंने भ्रमणवृत्तान्त लिखे, वे ही उपलब्ध हैं, पर उनमें स्थानों के नामादिने कई भूरें हुई है। किन्तु इसमें विशुद्ध भौगोलिक वर्णन मिटता है। प्रस्तुत निनन्धमें हम, इम गुपिगमें उपग्ध राजकीय इतिहास सामग्री और मांगलिक नागेश मक्षिा परिचय देना चाहते हैं । आशा है, विद्वानोरो इससे युद्ध नगीन ज्ञातव्य मिले। राजकीय इतिहास-सामग्री पाटणके दुर्लभराज चौलुक्पा उल्लेख । श्री यमान सूरिके शिष्य श्री जिनेवर सूरिने अपहल पत्तनमें गूर्जरेश्वर दर्तराजकी ममा चत्वानि माय शास्त्रार्थ कर उनको पराजित किया जिसका विस्तृत वर्णन हम पाने दिया गया है । धारानरेश नरवर्मका निर्देश। श्रीजिनवादम सूरि । स्वर्ग २० ११६७ ] जर विचौदमें थे तर, धारापीदा नवी मम में दो दक्षिणी पण्डितोंने "पदे बुगर दमटे यह समस्यापद र स्पनीय विद्वानों व गजपन्हिोंने अपनी अपनी गुर्वावलो अधार पर, प. दारपी शर्मा एम् ए न, इडियन हिस्टोरेता, कॉ. 11,न.४,रएभिर, चॉ. २, पृ. ७५ में, संसप्त नर दिखे ये बिनने एके ऐतिहासिक महापमा बीमगने दिन काम पाहन म पूर्वशतम्य प्रापित करते है। - ठकार ७ खरतरगच्छ-गुर्वायलिका ऐतिहासिक महत्त्व बुद्धिके अनुसार समस्यापूर्ति की, पर उससे उन दक्षिणी विद्वानोको सन्तोष नहा हुआ। तब किसीसे श्रीजिन उल्लम सूरिजीकी प्रतिभाका परिचय पा कर राजाने यह समस्यापद उनके पास भेजा । सूरिजीने तत्काल ही सुदरताके साथ उसकी पूर्ति कर दी, जिमसे समन विद्वान संतुष्ट हुए । फिर जब सरिजी चित्तौड़से विहार कर धारा पधारे, तर नृपतिने उन्हें अपने प्रासादोंमें बुला कर उनसे धर्मापदेश श्रवण किया। राजा सूरिजीका भक्त हो गया और उसने ३ लाख रुपये और ३ ग्राम उन्हें भेंट किये । परन्तु सूरिजी निरीह थे । उन्होंने उस दानका ग्रहण करना अस्वीकार किया, तर उनके उपदेशानुसार उसने चित्तौड़के दो जैन मन्दिरोंमें २ लाख रूपयोंसे पूजाके लिये मण्डपिकाए बनवा दी। अजमेरके अर्णोराजका उल्लेस । श्री जिनदत सूरिजी जब अजमेरमें पधारे तो वहाका राजा अर्णोराज स्वय दर्शनार्थ आया और उनके उपदेशसे अतीव प्रसन्न हो कर उन्हे सर्वदा अजमेर में ही रहने की विज्ञप्ति की । परन्तु सूरिजीने साध्वाचारका खरूप बतलाया और समय समय पर यहा आते रहनेका कह कर राजाको सन्तुष्ट किया । इस नृपतिने अजमेरके दक्षिणी भागमें पहाडीके नीचे श्रावकोंगो मन्दिर व निवासगृह बनानेके लिये यथेच्छ भूमि दी । त्रिभुपनगिरिका राजा कुमारपाल । श्री जिनदत्त सूरिजीने त्रिभुवनगिरि पधार कर वहाके महाराजा कुमारपालको प्रतिरोध दिया। श्रीशातिनाथ मन्दिरकी प्रतिष्ठा की और उधरके प्रदेशमें प्रचुरताके साथ अपने शिष्योको विहार कराया । दिल्लीके महाराजा मदनपाल | स० १२२३ में श्री जिनदत्त सूरिजीके शिष्य श्री जिनचन्द्र सूरिजी दिल्लीके निकटवर्ती ग्राममें पधारे । उनको वन्दनार्थ जाते हुए श्रापक समुदायको राजप्रासादस्थित महाराजा मदनपाउने देखा और मत्रियोंसे सूरिजीके पधारनेकी खबर पा कर महाराजाने समस्त मुसाहियों और सेनाको एकत्र किया और बड़े समारोह पूर्वक सूरिजीके पास गया । उनसे धर्मापदेश श्रवण कर महाराजा अत्यन्त प्रमुदित हुआ और उनको अपने नगरमें पधारनेकी अत्यन्त आग्रहपूर्वक विनति की। सरिजी अनिच्छाके होते हुए भी राजाके आग्रहसे दिल्ली पधारे। बड़े भारी समारोहसे उनका प्रवेशोसर हुआ। महाराजा मदनपाल खय सूरिजीका हाथ पकड़े हुए उनकी पेशवाईमें चल रहा था । राजाकी प्रार्थनासे उन्होने यही चातुर्मास किया पर दुर्भाग्यवश उनका वहीं स्वर्गवास हो गया । आशिका नरेश भीमसिंह। श्री जिनपति सूरिजी स० १२२८ में बम्बेर नगरको पधारे । सवाद पा कर अशिकाके श्रापक रोग राजा भीमसिंहके साथ सूरिजीके दर्शनार्थ आए । सूरिजीके उपदेशसे प्रसन्न हो कर उहे आशिका पधारनेकी वीनति की । राजाके विशेष अनुरोधसे श्री पूज्य आशिका आए । भूपति मीमसिंहके साथ पूर्वोक्त दिल्लीके प्रवेशकी भाति आशिकामें प्रवेशोसा हुआ। सूरिजीने स्थानीय दिगम्बराचार्यके साथ शास्त्रार्थ किया और उसमें सरिजीका विजय हुआ । इससे आशिमा ( हासी) नरेश बहुत प्रसन्न हो कर सरिजीके प्रति श्रद्धाल बना । स० १२३२ में मन्दिरकी प्रतिष्टा करने हेतु सूरिजी पिर आशिका पधारे । उस समय आशिकामा भर दर्शनीय था । नगरके बाहर राजा भीमसिंहके आज्ञापी राजाओं के तबू-डेरे लगे हुए थे, राजकीय पौज-पटनका जमघट लगा हुआ पा । राजप्रामादों और बाग-बगीचोंके मनोहर दृससे आशिका नगरी चरीकी राजधानी सी प्रतीत होती थी। अजमेरका महाराजा पृथ्वीराज चौहान । श्री जिनपति रिजी सं० १२३९ में अजमेर पधारे । राजसभा चत्सवासी उपवेशगन्छीय प० पराभो साप उनका शाखार्य हुआ, जिसमें सूरिजीकी विजय हुई। महाराना पृथ्वीराजने म्वय नरानयनके राजप्रासादोंमे अनमेर आ m खरतरगच्छ गुर्यायलिका ऐतिहासिक महत्त्व कर सरिजीको "जयपत्र" समर्पण किया। इस वर्णनमें यह भी बताया गया है कि उसी वर्षमें महाराजाने भादानक देशको जीता था। इस शाखार्थका वृत्तान्त वडे विस्तारके साथ इस गुर्मावलीमें दिया गया है जिसमें बहुत सी अन्य ऐतिहासिक बातें भी हैं । विशेष जाननेके लिये 'हिन्दुस्तानी' नामक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित "पृथ्वीराजकी सभा जैनाचार्योंझा शास्त्रार्थ नामक हमारा विस्तृत निबन्ध पदना चाहिये । अणहिल्लपुर (पाटण) का राजा भीमदेव । सं० १२४४ में, अगहिल्लपुरका कोट्याधिपति श्रापक अभयकुमार तीर्थयात्राके हेतु संघ निकालनेकी इच्छासे महाराजाधिराज भीमदेव और प्रधान मंत्री जगदेव पड़िहारके पास गया और उनसे अरज करके स्वयं राजाके हाथसे अजमेर निवासी खरतर संघके नामका आज्ञापत्र लिखया लाया। फिर एक विनंतिपत्र अपनी ओरसे श्री जिनपति सूरिजीको लिस कर अजमेर भेजा। सूरिजीने निमन्त्रण पा कर अजमेरी संघके साथ विहार कर दिया । तीर्थयानाके अनन्तर वापस लौटते हुए सूरिजी आशापल्ली पधारे । वहा चैत्यवासी प्रद्युम्नाचार्यसे उनका शास्त्रार्थ हुआ जिसमें विजयलक्ष्मी सूरिजीको मिली । इससे प्रतिपक्षीके भक्त अभयड़ दण्डनायकने कुटिलतासे संघको यह कह कर अटका लिया कि -- 'महाराजाधिराज भीमदेवकी आज्ञा है कि आप लोग हमारी आज्ञा बिना यहाँसे नहीं जा सकेंगे। इतना ही नहीं उसने संघकी चौकीके लिये १०० सैनिकोंकी गारद डाल दी । इस प्रकार १४ दिन संघ अटके रहा । इधर अपने बचायके लिये अभयड़ दंडनायकने प्रतिहार जगदेवके पास, (जो उस समय गूर्जर कटकके साथ मालव देशमें गया हुआ था) पत्रके साथ, अपना सेवक भेज कर कहलाया- 'यहा सपादलक्ष - अजमेरका एक विशाल और वैभवशाली संघ आया हुआ है; यदि आपकी आज्ञा हो तो सरकारी घोडोंके लिये दाल-दानेका प्रबन्ध कर- अर्थात् लूट कर या तंग कर द्रव्य एकत्र करू ।' जगदेव अपने कर्मचारीसे पत्र सुन कर आगबबूला हो गया, और उसी क्षण अपने आज्ञाकारी व्यक्ति के हायसे एक आज्ञापत्र लिखा भेजा कि-'मैंने बडे कष्टसे अजमेर नरेश पृथ्वीराजके साथ सन्धि की है; यह संघ मी वही का है; अतः इस संघकी तनिक मी छेडछाड मत करना । यदि करोगे तो तुम्हें गधेकी खालमें सिला दिया जायगा । जब अभयडको यह आज्ञा मिली तो उसने फौरन संघसे क्षमा माग कर उसे रवाने किया। लवणखेडाका राणा केल्हण । सं० १२४९ में श्रीजिनपति सूरिजी लपणखेडासे विहार करके पुष्करिणी, विक्रमपुर आदिमें विचरते हुए स० १२५१ में अजमेर गये । दो मास वहा पर मुसलमानोंके उपदके कारण बडे कष्टसे बीते । फिर पाटग, भीमपल्ली, कुहियप हो कर पुन. राणा केहणके आमहसे लवणखेटक पधारे । वहां दक्षिणावर्तआरात्रिकामतारणोत्सर बडी धूमधामसे मनाया। नगरकोटका राजा पृथ्वीचन्द्र। सं० १२७३ में (वृहद्वार ) में गगादशहरे पर गगास्नानके लिये बहुतसे राणाओंके साथ महाराजाधिराज श्रीपृथ्वीचंद्र नगरकोटसे आया । उसके साथ प० मनोनानन्द नामक एक काश्मीरी पण्डित मी था। उसने श्री जिनपति सूरिके उपाश्रय पर शास्त्रार्थके चैलैनका नोटिश लगा दिया । तब मूरिजीके शिष्य जिनपालोपाध्याय आदि शास्त्रार्थ के लिये महाराजा पृथ्वीचन्द्रकी सभा आये, और वाद विवादमें उक्त पण्डितको परास्त कर दिया । महाराजाने पण्डितके चैलैाको फाड़ कर उपाध्यायजीवो जयपन दिया । पालनपुरका राजकुमार जगसिंह । स० १२८८ में पालनपुरके सेठ भुवनपाल्ने, राजकुमार जगसिंहकी उपस्थितिमें घजारोपणका उत्सर बड़े समारोहसे मनाया।

खरतरगच्छ-गुापलिका ऐतिहासिक महत्त्व जावालिपुरका राजा उदयसिंह । सं० १३१० वैशाख सुदि १३ शनिवार स्वाति नक्षत्रके दिन, श्रीमहावीर विधिचैत्यमें, राजा व प्रधान पुरुषोंकी उपस्थितिमें राजमान्य महामनी जैत्रसिंहके तत्वावधानमें, पालनपुर, वागडदेश आदिके श्रावकोंके एकत्र होने पर श्रीचौवीस जिनालय आदिकी प्रतिष्ठा, दीक्षादि महामहोत्सवपूर्वक हुई। सं० १३१४ में माघ शु० १३ को राजा उदयसिंहके प्रमोदपूर्ण सान्निध्यसे कनकगिरिके मुख्य मन्दिर पर , घजारोप हुआ । खर्णगिरिका चाचिगदेव । सं० १३१६ के माध सुदि ६ को, राजा चाचिगदेवके राजत्वकालमें वर्णगिरिक शान्तिनाथ मन्दिर पर वर्णमय घजदंड व कलश स्थापित किये गये। भीमपल्लीका राजा माण्डलिक। सं० १३१७ वैशाख सुदि १० सोमवारको, मीमपल्लीमें राजा माण्डलिकके राजत्वकालमें दण्डनायक श्रीमीलगण (1) के सानिध्यसे महावीर जिनालय पर स्वर्णदण्ड-कलशादि चढाये गये । चित्तौडका महाराजा समरसिंह । सं० १३३५ फा० कृ० ५ को, महाराजा समरसिंहके रामराज्यमें, चित्तौडके चौरासी मुहल्लेमें जलयात्रापूर्वक स्थानीय ११ मन्दिरोंके ११ छत्र व मुनिसुव्रत, आदिनाथ, अजितनाथ, वासुपूज्य प्रमुकी प्रतिमाएं स्थापित की गई। चित्तौडके युवराज अरिसिंह। सं० १३३५ फाल्गुन शुक्ल ५ को, सकल राज्यधुराको धारण करने वाले राजकुमार अरिसिंहके सान्निध्यसे आदिनाय मन्दिर पर घजारोप हुआ। पीजापुर नरेश सारंगदेव । सं० १३३७ ज्येष्ठ कृष्ण ४ शुक्रबारको, महाराजाधिराज सारंगदेवके रामराज्यमें, महामात्य मल्लदेव व उपमंत्री विच्यादित्यके कार्यकालमें, बीजापुरमें श्रीजिनप्रबोध सूरिजीका नगरप्रवेश बडे समारोहसे हुआ। मं० विन्ध्यादित्य सूरिजीकी स्तुति करता था। शम्यानयन (सिमाना) का राजा श्रीसोम । श्रीजिनप्रबोध सूरिजीने (सं० १३४० में) सन्मुख आये हुए 'श्रीसोम महाराजाकी वीनति स्वीकार कर शम्यानयनमें चातुर्मास किया । जेसलमेर नरेश कर्णदेव । से० १३४० के फाल्गुनमें श्रीजिनप्रमोध सूरिजी जेसलमेर पधारे । नगर प्रवेश बड़े समारोहसे हुआ । राजा कर्ण ससैन्य दर्शनार्थ सामने आया । महाराजाके आमहसे चातुर्मास मी उन्होंने वहीं किया । जागलिपुरका राजा सामन्तसिंह। सं० १३४२ ज्येष्ट कृष्णा ९ को, जालारमें सुप्रसन्न महाराजा सामन्तसिंह के सानिध्यसे अनेक जिन प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा और इन्दमहोत्सर सम्पन हुआ। शम्पानपनका महाराजा सोमेघर चौहान । १० १३४६ फाल्गुन गुरु ८ को, महाराजा सोमेघरकारित विस्तृत प्रवेशोत्सग्मे श्रीजिनचन्द्र मूरिभी शपानपन पधारे । सा० याइड, भा० मीमा, जगसिंह, रोनसिंह सुधारों के बनाए हुए प्रासादमें उन्होंने शान्तिनाप प्रमुनी सापना की। २ सरतरगच्छ-गुर्यायलिया ऐतिहासिक महत्त्व जेसलमेर नरेश जैनसिंह। सं० १३५६ में राजाधिराज जैनसिंहकी प्रार्थनाको मान दे कर, श्रीजिनचंद्र सूरिजी, मार्गशीर्ष शुमा ४ को जसमेर पधारे । पूग्यश्रीके स्वागतार्थ महाराजा ८ कोश सम्मुख गया था। सं० १३५७ मार्गशीर्ष कृष्णा ९ को, महाराजा जैनसिंहके भेजे हुए याजित्रोंकी धनिके साथ मालारोपण य दीक्षा महोत्सव संपन्न हुआ। शम्यानपन नरेश शीतलदेव । सरत् १३६० में महाराजा शीतलदेवकी चीनति और मनी नाणचन्द्र आदिकी अभ्यर्थनासे श्रीजिनचन्द्र सरिजी शम्यानयन पधारे और शान्तिनाय भगवान के दर्शन किये। सुलतान कुतुबुद्दीन। सं० १३७४ में, मधिदलीय हर अचलसिंहने यादशाह कुतुबुद्दीनसे सर्वत्र निर्विततया यात्रा करनेके लिये फरमान प्राप्त कर, नागौरसे संघ निकाला । जय मारवाड़ और वागड़ देशके नाना नगरोंको पार कर, संघ दिल्लीके समीपवर्ती तिटपय नामक स्थानमें पहुंचा तो इर्ष्यालु द्रमकपुरीय आचार्य (चैत्ययासी) ने यह कह कर उकसाया कि-'जिनचन्द्र सूरि नामक साधु वर्णका छन सिंहासन धारण करता है।' वादशाहने संघको रोक लिया और ठकूर अचलसिंहादिके साप सूरिजीको अपने पास बुलाया । सूरिजीकी शान्त मुद्रा देख कर सम्राट अत्यन्त प्रभावित हुआ और वातचीत होने पर उसे पूर्ण विश्वास हो गया कि दमकपुरी आचार्य मिष्यामापी है। अलाउद्दीनके पुत्र सुलतान कुतुबुद्दीन ने कहा-'इन श्वेताम्बर मुनियोंमें उसके कथनानुसार एक मी बाल नहीं पाई जाती'-अतः दिवानको हुक्म दिया कि इनके आचार व्यवहारकी अच्छी तरह परीक्षा कर अन्यायीको दण्ड दिया जाय । राज्याधिकारियों ने सूरिजीको निदोप पा कर दमकपुरीय आचार्यको गिरफ्तार कर लिया । दयाल सूरिजीने श्रापकोंसे कह कर उसे छुड्या दिया। सूरिजीने दिल्लीकी खण्डासरायमें चातुर्मास किया । पश्चात् सुलतान व संघके कथनसे प्राचीन तीर्थस्थान मथुराकी याना करने पधारे । मेडताका राणा मालदेव चौहान । सं० १३७६ में राणा मालदेवकी प्रार्थनासे श्रीजिनचन्द्र सूरिजी मेड़ता पधारे और वहा राणा व संघकी प्रार्थनासे २४ दिन ठहरे। दिल्लीपति गयासुद्दीन बादशाह । सं० १३८० में दिल्लीनिवासी सेठ स्यपतिके पुत्र सा० धर्मसिंहने प्रधान मन्त्री नेब साहबकी सहायतासे सम्राट गयासउद्दीन द्वारा तीर्थयात्राका फरमान निकलवाया, और श्रीजिनकुशल सूरिजीके नेतृत्वमें शगुंजयादि तीर्थीका संघ निकाला। सं० १३८१ में मीमपल्लीके सेट वीरदेवने मी सम्राटसे तीर्थयात्राका फरमान प्राप्त कर श्रीजिनदुशल सूरिजीके उपदेशसे शत्रुजयादि तीयोंके लिये सब निकाला। विशेष जाननेके लिए हमारी 'दादा जिनकुशलसरि' नामका पुस्तक देखना चाहिये। सौराष्ट्रनरेश महीपालदेव । सं० १३८० में शत्रुजय यात्राके प्रसंगमें, सेठ मोखदेवको, सौराष्ट्रमहीमंडनभूपाल महीपाल देवकी दूसरी देह सदृश अर्थात् अत्यत प्रभावशाली लिखा है। पाहड़मेरनरेश राणा शिखरसिंह । स० १३९१ में श्रीजिनपद्म सूरिजी वाग्भटमेरु पधारे 1 उस समय चौहानकुलप्रदीप राणा शिखरसिंह, राजपुरुष व नागरिक जनोंके साथ, सूरिजीके सन्मुस गया और महोत्सपूर्वक उनका नगरप्रवेश कराया।

खरतरगच्छ -गुर्वावलिका ऐतिहासिक महत्त्व साचोर (सत्यपुर) का राणा हरिपालदेव । सं० १३९१ में श्रीजिनपद्म सूरिजी वाहड़मेरसे सत्यपुर पधारे उस समय राणा हरिपालदेव आदि उनके स्वागतार्थ सन्मुख गये। आशोटाका राजा रुद्रनन्दन । सं० १३९३ में पाटणसे नारउद्र होते हुए श्रीजिनपद सूरिजी आशोटा पधारे । उस समय वहांका राजा रुदनन्दन, राज० गोधा सामन्तसिंहादिके साथ स्वागतार्थ पूज्यश्रीके सन्मुख आया । पूजदीका राजा उदयसिंह। सं० १३९३ में श्रीजिनपद सूरिजी बूजद्री पधारे । वहां सुश्रावक मोखदेवने राजा उदयसिंह एवं समस्त नागरिकोंके साथ सूरिजीका बड़े समारोहसे नगर प्रवेश कराया। इसके बाद अन्यत्र विहार करके सूरिजी फिर वहां पधारे तब भी राजा उदयसिंह प्रवेशोत्सबमें सम्मीलित हुआ था। त्रिशङ्गम नरेश रामदेव। संवत् १३९३ में, श्रीजिनपम सूरिजी त्रिशृङ्गम पधारे । मन्त्रीश्वर सांगणके पुत्र मण्डलिकादिकने, महाराजा महीपालके मंगज महाराजा रामदेवकी आज्ञासे राजकीय वाजिब्रोंके साथ बड़े समारोहपूर्वक प्रवेशोत्सर किया । मूरिजीको संघके साथ चैत्यपरिपाटी करते समय उनकी प्रशंसा सुन कर महाराजाके चित्तमें उनके दर्शनकी उत्कण्ठा जागृत हुई। महाराजाने सेठ मोखदेव और मत्री मण्डलिक आदिको कहा- 'छोटी उम्रपाले होते हुए भी आपके गुरु बड़े चमत्कारी मुने जाते हैं, मुझे उनके दर्शनोंकी अभिलाषा है । आप कहें तो मैं उनके पास चल्लू या वे कृपा कर मेरी सभामें पधारे। श्रावकोंकी प्रार्थनासे सूरिजी राजसभामें पधारे । नृपतिने उन्हें आते देख कर, राजसिंहानसे नीचे उतर कर, उनकी चरणवन्दना की। पूग्यश्री आशीर्वाद दे कर चौकी पर विराजे । महाराजा सारंगदेवके व्यासने अपनी रचना पढ कर सुनाई, जिसमें श्री लब्धिनिधान उपाध्यायजीने कई श्रुटियां बतलाई । महाराजा रामदेव कहने लगे-'उपाध्यायजीका वचनचातुर्य और शास्त्रीय ज्ञान असाधारण है । इन्होंने तो हमारे व्यासजीकी मी श्रुटिया बतलाई' इसी प्रकार अन्य सभासदोंने उपाध्यायजीकी भूरि भूरि प्रशंसा की । सूरिजीने तात्कालिक कवितामें राजा रामदेवका वर्णनात्मक श्लोक कहा । जिसे सुन कर राजसभामें उपस्थित सम्यगण आश्चर्य निमग्न हो गये । राजा रामदेवने सिद्धसेन आदि पण्डितोंसे उस श्लोकको विकटाक्षरोंमें लिखवाया । सूरिजीने नानार्थक नाममाला कोपके बलसे उसके अनेक अर्थ कह सुनाये, जिससे सब लोग एक नजर हो कर पूज्य श्रीके मुखकमटकी ओर निहारने लगे। इसके बाद सूरिजीने लहियोंसे प्रत्येक श्लोकले एक एक अक्षरको भिन्न भिन्न लिखपा कर और उन्हें मिटा कर तीसरी पार तीन श्लोकोंको सम्पूर्ण कर दिया । फिर उन तीनों लोकोंको एक पट्टी पर लिखा कर नृपतिके मनोरक्षनार्थ राजईसमय चित्रकाव्यकी रचना की । सरिजीकी इस प्रतिभा और बुद्धिमाको देख कर राजा और समाके सारे लोगोंके चित्तमें चमवृति उत्पन्न हुई। महामत्री वस्तुपालका उदेख। सं० १२८९ में श्रीनिनेश्वर सूरिजीके खंभात पधारने पर महामास वस्तुपालने यदे ममारोहसे उनका नगर प्रवेशोत्सर पिया था । गुरुग्लीमें, श्रीजिनकुराल सरिजीके खेमात पधारने पर भी इस उत्सरकी याद दिटाई गई है। राजकीय हलचलें और उपद्रय । म्लेच्छोपदय होनेमा उहए। सं० १२२२ में श्रीजिनचन्द्र सूरिजीने रुद्रपाटीमे विहार कर बोरसिदा प्रामके पास संधी साप पार डाला। सरिजीने साप पाडौको आफुल म्पाकुर देम पर पूजा-'आए लोग मपमीन क्यों हो रहे हैं!' उन ग्ोगोंने कहा- १२ खरतरगच्छ - गुर्वाचलिका ऐतिहासिक महत्त्व 'भगवन् ! देखिये न इस ओर आकाश धूलिसे आच्छादित हो गया है- मालूम देता है समीप ही में कोई म्लेच्छ कटक है । पूज्यनीने कहा-'महानुभावो । धैर्य रखो, अपने बैल आदि चतुष्पदोंको एकत्र कर लो; प्रभु,श्रीजिनदत्त सूरिजी सबका भन्दा करेंगे । पूज्यश्रीने मन्त्र-ध्यान पूर्वक अपने दण्डेसे संघके पड़ावके चारों तरफ कोटके आकार वाली रेखा खींच दी । सब लोग उसमें छिप गये। संघके लोगोंने आस-पाससे जाते हुए हजारों म्लेच्छोंको देखा पर सूरिजीके प्रभावसे वे लोग संघको न देख सके; केवल कोटको देखते दूर चले गये, जिससे सब लोग निर्भय हुए । सं० १२५१ में माण्डव्यपुरसे अजमेरके लिये श्रीजिनपति सूरिजीने विहार किया । वहां म्लेच्छोंका उपद्रव होनेसे २ मास बडे कष्टसे बीते । सं० १२५३ में मुसलमानोंने पाटणका भंग कर दिया। गुर्वावलीमें “पत्तनभंगानन्तरं धाटीग्रामे चतुर्मासी कृता" लिखा है। सं० १३७१ ज्येष्ठ वदि १० को, जावालिपुरमें कलिकाल केवली श्रीजिनचन्द्र सूरिजीकी विद्यमानतामें दीक्षा, मालारोपणादि उत्सव हुए । फिर म्लेच्छोंने उस नगरका भंग कर दिया-"ततो म्लेच्छकृतो भंगः श्रीजाबालपुरे जातः ।" सं० १३७७ में, पाटणको 'म्लेच्छवहुलेऽपि समप्रजनपदे" लिखा है और सं० १३८० के वर्णनमें "प्रभूतम्ले- च्छव्यवहारीसमूहसंकुले श्रीपत्तने श्रीमहाराजाधिराजसैन्यलीलायमान आरासितः" लिखा है । सं० १३८४ में श्रीजिनकुशलसूरिजीने सिन्ध प्रांतमें विहार किया। उस समय सिन्ध देशको “महाम्लेच्छकुला- कुलगुरुतरश्रीसिन्धुमण्डलोपरि" लिखा है। उच्च नगरके प्रवेशोत्सबके समयमें "हिन्दूराज्यकालमें श्रीजिनपति सूरिजी पधारे थे" लिखा है, इससे निश्चित है कि उस समय वहां मुसलमानोंका शासन हो चुका था। पाटणमें मीपण दुष्काल । सं० १३७७ में श्रीजिनकुशल सूरिजीके महोत्सबके समय पाटणमें महादुर्भिक्ष था। लिखा है कि- " श्रीपत्तने समागताः, तत्र च विषमकाले महादुर्भिक्षप्रवर्चमानेऽपि । इस प्रकार इस पट्टापलिमें ऐतिहासिक दृष्टिसे अनेक महत्वकी बानोंका उल्लेख मिलता है जो अन्यत्र अज्ञात हैं। पट्टायलि-साहित्यमें यह एक बहुत ही विशिष्ट प्रकारकी रचना है।

खरतरगच्छालंकार युगप्रधानाचार्य गुर्वा व ली। नमो युगप्रधानमुनीन्द्रेभ्यः। वर्धमानं जिन नत्या, वर्धमानजिनेश्वराः । मुनीन्द्रजिनचन्द्राख्याऽभयदेवमुनीश्वराः॥१॥ श्रीजिनवल्लभसूरिः, श्रीजिनदत्तसूरयः। यतीन्द्रजिनचन्द्राख्यः, श्रीजिनपतिसूरयः॥२॥ एतेषां चरित किश्चिन्मन्दमत्या यदुच्यते । वृद्धेभ्यः श्रुत[चेत्तृभ्य स्तन्मे कथयतः शृणु ॥३॥ १. अ भो ह र दे शे'.जिनचन्द्राचार्या देवगृहनिवासिनचतुरशीतिस्थावलकनायका आसन् । तेषां वर्धमाननामा शिष्यः। तस्य च सिद्धान्तवाचनां गृह्णतश्चतुरशीतिराशातनाः समायाताः। ताश्च परिभावयत इयं भावना मनसि समजनि-'यद्येता रक्ष्यन्ते तदा भद्रं भवति'। बतगुरोश्च निवेदितम् । गुरुणा चिन्तितम्-'अस्य मनो न मनोहरम्' 'इति ज्ञात्वा सरिपदे स्थापितः । तथापि तस्य मनो न रमते चैत्यगृहवासे स्थातुम् । ततो गुरोः सम्मत्या निर्गत्य कति चिन्मुनिसमेतो दिल्ली वा दली प्रभृतिदेशेषु समायातः। तस्मिन् प्रस्तावे, तत्रवोद्योतनाचार्यसरिवर आसीत् । तस्य पार्थे सम्यगागमतत्त्वं युद्धा, उपसम्पदं गृहीतवान् । तदनन्तरं श्रीवर्धमानमरेरियं चिन्ता जाता-अस्य सूरिमन्त्रस्य कोऽधि- छाता' । तस्य ज्ञानायोपचासत्रयमकारि । तृतीयोपवासे धरणेन्द्रः समागतः । तेनोक्तं सरिमन्त्रस्याहमधिष्ठाता । ततथ सर्वेषां सुरिमत्रपदानां प्रत्येकं फलं निवेदितम् । ततश्च संस्फुर आचार्यमत्रो जातः । तेन च संस्फुराः सपरिवारा वर्ध- मानसेग्यो जज्ञिरे। २. अस्मिन् प्रस्ताचे विज्ञप्तं पण्डितजिनेश्वरगणिना-'भगवन् ! ज्ञातस्य जिनमतस्य किं फलम् , यदि कुत्रापि गत्वा न प्रकादयते । गूर्जरमादेशः प्रभूतो देवगृहवासाचार्यन्याः श्रूयते । अतस्तत्र गम्यते' । 'युक्तमुक्तं परं शपुननि- मित्तादि परिभाव्यते, ततः सर्व शुभम् । ततो मामइवृहत्संघातसहिता आत्माष्टादशाश्वलिताः । क्रमेण पट्टी प्राप्ताः । यहिभूमिगतस्य पण्डितजिनेश्वरगणिसहितवर्धमानमूरेः सोमघजो नाम जटाधरो मिलितः । तेन सहेष्टगोष्टी जो । तन्मध्ये गुणं रन प्रश्नोत्तरः कृतः- का दौर्गत्यपिनाशिनी परियिरच्युग्रणयाची घ को, पर्णः को व्यपनीयते न पधिकरत्यादरेण श्रमः। चन्द्रः पृच्छनि मन्दिरपु मरुलां गोभाविधायी को, दाक्षिण्यन नयेन विश्वविदिनः कोपा भुवि भाजते ।। १ प्रसन्नर-आभोहर०१२ मतं । ३ मापातः । १ मम्फुर । ५ वर्समानाचार्याः। एतद्धिनारकानगनः पाटो गोर- म्यते प्रायन्तरे।

२ खरतरगच्छालंकार "सो म घज"। स जटाधरस्तुष्टः । भक्तिपही कृता । ततस्तेनैव संघातेन चलिता:* क्रमेणा ने हि ल प त ने प्राप्ताः । उत्तरिता मण्डपिकायाम् । तस्मिन् प्रस्तावे तन प्राकारो नास्ति, सुसाधुभक्तः श्रावकोऽपि नास्ति या स्थानादि याच्यते । वोपविष्टानां धर्मो निकटीभूतः । ततः पण्डितजिनेश्वरेणोक्तम्-'भगवन्नुपविष्टानां किमपि कार्य न भविष्यति' । 'तहि सुशिष्य, किं क्रियते । 'यदि यूयं बदध तदोचैर्गृहं दृश्यते तत्रव्रजामि' । ब्रज । ततो बन्दिला सुगुरुपादपमान गतस्तत्र । तच्च गृहं श्रीदुर्लभराज्ञः पुरोहितस्य । तस्मिन् प्रस्तावे स उपरोहितः शरीराम्यङ्गं कारयस्ति- प्रति, तस्याग्रे स्थित्वा श्रिये कृतनतानन्दा विशेषवृपसङ्गताः। भवन्तु तैव विप्रेन्द्र ! ब्रह्म-श्रीधर-शङ्कराः॥ [२]] इत्याशिवाद पठितवान् । ततस्तेन तुष्टो वक्ति । विचक्षणो 'व्रती कश्चित् । तस्यैव गृहमध्यप्रदेशे छात्रान् वेदपा- ठपरिचिन्तनं कुर्वतः श्रुला 'इत्थं मा भणत वेदपाठान् । 'किं तर्हि ?' 'इत्यम् । ततः पुरोहितेनोक्तम्-'अहो ! शुद्राणां वेदेऽधिकारो नास्ति' । ततः पण्डितेनोक्तम्-'वयं चतुदिनो ब्राह्मणाः, सूत्रतोऽर्थतश्च' । ततस्तुएः 'पुरोहितः । 'क- स्माद् देशादागताः ?' 'ढि ल्ली दे शाद' । 'कुत्र स्थिताः स्थ' शुकशालायाम् । अन्यत्र स्थानं न लभ्यते, वि- रोधिरुद्धत्वात् । मदीया गुरवः सन्ति सर्वे] अष्टादश यतिनः' । 'चतुःशालमगृहे परिच्छदां बवा, एकस्मिन् द्वारे प्रविश्यकस्सां शालायां तिष्ठन:(थ) सर्वे सुखेन । भिक्षावेलायां मदीये मानुपेऽने कृते ब्राह्मणगृहेषु सुखेन भिक्षा भविष्यति । ततः पत्त ने” लोके उच्छलिता वार्ता 'वसविपाला यतयः समायाताः। ततो देवगृहनिवासिबतिभिः श्रुतम् । नैर्विदितं नेपामागमनं श्रेयस्करम् । कोमलो व्याधियदि च्छिद्यते तदा कुशलम् । ते चाधिकारिपुत्रान पाठ- यन्ति । तैश्च वर्षोपलादिदानेन ते चट्टाः सुखिनः कृत्वा भणिता:-'युष्माभिर्लोकमध्ये भणनीयम्-"एते कैचन परदे- शान्मुनिरूपेण श्रीदुर्लभराजराज्यहेरिका आगताः सन्ति" | सा च वार्ता सर्वजने प्रवृत्ता। सा च प्रसरन्ती राजसभा- यामपि 'वृत्ता। राज्ञाऽभाणि-'यद्यत्रैवंविधाः क्षुद्रा आयाताः, तहिं तेपामाश्रयः केन दत्तः १' केनाऽप्युक्तम्-'देव! तवैव गुरुणा स्वगृहे धारिताः । ततो राज्ञोक्तमाकारय तम् । आकारित उपरोहितः, भणितश्च-'यद्येवंविधा एते किमिति स्थानं दत्तम् ? । तेन भणितम्-'केनेदं दूषणमुद्भावितम् , यद्येषां दूपणमस्ति तदा लक्षपारुस्थः कर्पटिकाः प्रक्षिप्ताः। यथेषां मध्ये दूपणमस्ति तदा छुपन्तु तां भणिवारः'। परं न सन्ति केचन । ततो भणितं राज्ञः पुर उपरोहितेन-'देव ! ये मद्गृहे सन्ति ते दृष्टा मूर्तिमन्त एव धर्मपुञ्जा लक्ष्यन्ते न तेषां दूपणमस्ति' । तत इमां वार्तामाकर्ण्य सर्वैरपि सूरा- चार्यप्रभृतिभिः परिभाषितम्-'वादे निर्जित्य निस्सारयिष्यामः परदेशागतान मुनीन्"। ततस्तरुपरोहित उक्त:-'स्वगृ- हतयतिभिः सह विचारं कर्तुकामा आस्महे । तेपो पुरस्तेनोक्तम्-'तान् दृष्ट्वा यत्स्वरूपं तद्भणिप्यामि' । तेनापि स्वस- दने गखा भणितास्ते-'भगवन्तो ! विपक्षाः श्रीपूज्यैः सह विचारं कर्तुं समीहन्ते' । वैरुक्तम्-'युक्तमेव, परं त्वया न मैतव्यम् । इदं भणितव्यास्ते-'यदि यूयं तैः सह रिवदितुकामास्तदा ते श्रीदुर्लभराजप्रत्यक्षं यत्र मणिभ्यथ तन्त्र विचार करिष्यन्ति । तैश्चिन्तितं सर्वेऽधिकारिणोऽस्माकं वशंगता न तेभ्यो भयम् , भवतु राजसमक्षं विचारः। ततोऽसिन् दिने पश्चाशरीयवृहद्देवगृहे विचारो भविष्यतीति निवेदितं सर्वेषां पुरः। उपरोहितेनाप्येकान्ते नृपो भणितः-'देव! १'अनपिल' इति आदर्शे । २ श्राद्धोऽपि । ३ 'पण्डित' शब्दो नास्ति प्र०। ४ नास्ति पदमेतत् प्र० ।५ प्र० राजपुरोहि- तस्य । ६ मूलादर्श 'उपरोहित' इति सर्वत्र । ७ वो भवन्तु च । ८ तुष्टश्चिचे ।९°पादपरावर्तनं । १० पदान् । ११ किं नहीत्यम् । १२ पदमिदं नास्ति प्र० । १३ प्र० स तुष्टः' इत्येव पदम् । कोष्ठकान्तर्गता पतिः पतिता मूलादर्शे, प्रत्यन्तरादत्रानुसन्धिता । १४ पचने' नास्ति प्र०। १५ सुखकरम् । १६ मूलादर्शे वर्षोलकादि। १७ 'राजकुले प्रस्ता' इत्येव प्र०। १८ तत उक्त राज्ञोऽने। १९ 'मुनीन्। नास्ति प्र० ।

युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ३ आगन्तुकमुनिभिः सह स्थानस्थिता मुनयो विचार विधातुकामास्तिष्ठन्ति । स च विचारोन्यायवादिराजप्रत्यक्षं क्रिय- माणः शोभते । ततः पूज्यः प्रत्यक्षर्भवितव्यं विचारप्रस्ताव प्रसादं कृत्वा' । वनो राज्ञाऽमाणि-'युक्तमेव कर्तव्यमसाभिः'। ततश्चिन्तिते दिने तस्मिन्नेव देवगृहे श्री सूराचार्य प्रभृतिचतुरशीतिराचार्याः स्खविभूत्यनुसारेणोपविष्टा । राजा- ऽपि प्रधानपुरुपैराकारितः। सोऽप्युपविष्टः । राज्ञोक्तम्-'उपरोहित ! आत्मसम्मतानाकारय । ततः स तत्र गत्वा विज्ञ- पयति श्रीवर्धमानमरीन्-'सवें मुनीन्द्रा उपविष्टाः सपरिवाराः । श्रीदुर्लभराजश्च पञ्चाशरीयदेवगृहे। युप्माकमागम- नमालोक्यते । तेऽप्याचार्याः पूजितास्ताम्बूलदानेन राज्ञा । तच्छृखोपरोहितमुखात् पैश्वाच्छ्रीवर्द्धमानसूरयः श्रीसुधर्म- खामिजम्बूस्वामिप्रभृतिचतु......न् युगप्रधानान् सरीन्। हृदये धृत्वा पण्डितश्रीजिनेश्वरप्रभृतिकतिचिद्गीतार्थसुसाधु- भिः सह चलिताः सुशकुनेन । तत्र प्राप्ताः, नृपतिना दर्शिते स्थान उपविष्टाः, पण्डितजिनेश्वरदत्तनिपद्यायाम् । आत्मना च गुरुभणितोचितासने गुरुपादान्त उपविष्टः । राजा च ताम्बूलदानं दातुं प्रवृत्तः । ततः सर्वलोकसमक्षं भणितवन्तो गुरवः-'साधूनां ताम्बूलग्रहणं न युज्यते राजन् !' । यत उक्तम्- ब्रह्मचारियतीनां च विधवानां च योपिताम् । ताम्बूलभक्षणं विप्रा ! गोमांसान विशिष्यते ॥[२] ततो विवेकिलोकस समाधिर्जाता गुरुपु विपये। गुरुमिर्भणितम्-'एप पण्डितजिनेश्वर उत्तरप्रत्युत्तरं यद्भणि- प्यति तदस्माकं सम्मतमेव ।' सर्वैरपि भणितं भवतु । ततो मुख्यमराचार्येणोक्तम्-'ये वसती वसन्ति मुनयस्वे पड्द- नियाधाः प्रायेण । पदर्शनानीह क्षपणकजटिप्रभृतीनि-इत्यर्थनिर्णयाय नूतनवादस्थलपुस्तिका वाचनार्थ गृहीता करे। तस्मिन् प्रस्तावे "भाविनि भूतबदुपचारः" इति न्यायाच्ट्रीजिनेश्वरसूरिणा भणितम्-'श्रीदुर्लभमहाराज ! युष्माकं लोके किं पूर्वपुरुपविहिता नीतिः प्रवर्तते, अथवा आधुनिकपुरुपदर्शिता नूतना नीतिः । । ततो राज्ञा भणितम्-'अस्माकं देशे पूर्वजवर्णिता राजनीतिः प्रवर्तते नाऽन्या । ततो जिनेश्वरसूरिभिरुक्तम्-'महाराज ! असा मतेऽपि यद् गण- धेरैश्चतुर्दशपूर्वधरैश्च यो दर्शितो मार्गः स एव प्रमाणीकर्तुं युज्यते, नाऽन्यः' । ततो राज्ञोक्तं युक्तमेव । ततो जिनेश्वर- परिभिरुक्तम्-'महाराज ! वयं दूरदेशादागताः, पूर्वपुरुषविरचितस्वसिद्धान्तपुस्तकवृन्दं नानीत । एतेषां मठेभ्यो महा- राज! यूयमानयत पूर्वपुरुषविरचितसिद्धान्तपुस्तकगण्डलकं येन मार्गामार्गनिश्चय कुर्मः" । तो राज्ञोक्तास्ते-'युक्त वदन्त्येते, स्वपुरुषान् प्रेपयामि, यूयं पुस्तकसमर्पणे निरोपं ददध्वम्' । ते च जानन्त्येपामेव पक्षो भविष्यतीति, तूंष्णी विधाय स्थितास्ते । ततो राज्ञा स्त्रपुरुषाः प्रेपिताः-शीघ्र सिद्धान्तपुस्तकगण्डलकमानयत । शीघ्रमानीतम् । आनीत- मात्रमेव छोटित में। तत्र देवगुरुप्रसादाद् दशवकालिकं चतुर्दशपूर्वधरविरचितं निर्गतम् । तस्मिन् प्रथममेवेयं गाथा निर्गता- अन्नदं पगडं लेणं, भइज्ज सयणासणं । उच्चारभूमिसंपन्नं, इत्थीपसुविधज्जियं ।। [४] एवंविधायां यसतो यसन्ति साधयो न देवगृहे । राज्ञा भावितं युक्तमुक्तम् । + सर्वेऽधिकारिणो विदन्ति निरुत्तरी- १ 'विचारं करिष्यन्ति' इत्येव प्र०, २ 'पूज्याः प्रत्यक्षा भवितव्यं' इति मूला 1 + दण्डान्तर्गतपाठस्थाने प्र० विज्ञप्ता वर्द्धमानाचार्याः सर्वे उपविष्टाः सन्ति' इत्येव वावयविन्यासः । 'पश्चात् ' मास्ति प्र० ।+प्र० 'सुधर्मस्वाम्यादियुगप्रधानान्' इत्येव । ४ जिनेश्वरगणि प्रभृति° १५ जिनेश्वरगणिदत्त १६ 'पुस्तिका करे धृता' इत्येव! १७ 'प्रस्तावे जिनेश्वरसूरिणा मणित भो राजन् ' इत्येव प्र०1८ 'पूर्वराजनीति.' प्र०१९'जिनेश्वरेणोक्तं राजन् । १० "विरचितानि पुस्तकादीनि नानीतानि । ११ सिद्धान्तपुस्तकं येन मार्गनिश्चयं कुर्मः । १२ 'ततो' नास्ति । १३ तूष्णी स्थिताः । १४ 'राज्ञा स्वपुरुषाः प्रेषिताः । शीनं पुस्त- कान्यानीतानि । छोटितानि' इत्येष पाठः प्रत्यन्तरे । १५ तत्रेयं गाया। + एतचिहास्तिपाठस्थाने प्र०-'सर्वरधिकारिपुरुषविदितं निरुतरीभूता अम्मगुरवः । ततः सर्व राजप्रत्यक्ष गुरुत्वेन वर्तमानसूरयोऽनीताः। येनास्मान् बहुमन्यते राजा'। इत्येपा पंक्तिः । - खरतरगच्छालंकार भूता असाकं गुरवः । ततः सर्वेऽधिकारिणः श्रीकरणप्रभृतयः पटवपर्यन्ता यदन्ति प्रत्येकमम्माकमेते गुरख-इति गुरु- निवेदनं राजप्रत्यक्षं कुर्वन्ति । येन राजाऽसान् बहु मन्यते, अस्माकं कारणेन गुरुनपि । राजा च न्यायवादी । तस्मिन् प्रस्तावे श्रीजिनेवरसरिभिरुक्तम्-'महाराज! कश्चिद्गुरुः श्रीकरणाधिकारिणः, कश्चिन्मत्रिणः, *किं बहुना कधि- पटवानाम् । यानाठिः (१) सा कस सम्बन्धिनी भवति ? राज्ञोक्तं मदीया । 'तर्हि महाराज ! कः कस्याऽपि सम्बन्धी जातो* वयं न कस्याऽपि । ततो राज्ञाऽऽत्मसम्बन्धिनो गुरवः कृताः । ततो राजा भणति-'सर्वेषां गुरूणां सप्त सप्त गब्दिका रत्नपटीनिमिताः, किमित्यस्मद्गुरूणां नीरासने उपवेशनं, फिमस्माकं गन्दिका न सन्ति । ततो जिने- श्वरमरिणा भगितम्-'महाराज! साधूनां गब्दिकोपवेशनं न युज्यते । यत उक्तम्- भवति नियतमेवासंयमः स्याद्विभूपा, नृपतिककुद ! एतल्लोकहासच भिक्षो। स्फुटतर इह सनः सातशीलत्यमुचैरिति न खलु मुमुक्षोः सङ्गतं गब्दिकादि। इति वृत्तार्थः कथितः । राज्ञोक्तम्-'कुत्र यूयं निवसत ?' तैरुक्तम्-'महाराज ! कथं स्थानं विपक्षेषु सत्सु । अहो ऽपुत्रगृहं क र डि ह ट्टी मध्ये बृहत्तरमस्ति, तत्र वसितव्यम् । तत्क्षणादेव लब्धम् । 'युष्माकं भोजनं कथम् । तदपि पूर्ववदुर्लभम् । 'यूयं कति साधवः सन्ति ?"-'महाराज ! अष्टादश' । 'एकहस्तिपिण्डेन सर्वे हप्ता भविष्यन्ति । ततो भणितं जिनेश्वरमरिणा-'महाराज ! राजपिण्डो न कल्पते, साधूनां निपेधः कृतो राजपिण्डस्य । तर्हि मम मानुपेऽने भूते भिक्षाऽपि सुलभा भविष्यति'. ततो वादं कृत्वा विपक्षान् निर्जित्य राज्ञा राजलोकैच सह वसती प्रविष्टाः । यस- विस्थापना कृता प्रथमं गूर्जरमादेशे। ३. द्वितीयदिनेऽचिन्ति विपक्षरुपायद्वयं निरर्थक जातम् , अन्योऽपि निस्सारणोपायो मन्यते । पट्टराज्ञीभक्तो राजा विद्यते, सा च यद्भणति तत् करोति । सर्वेऽप्यधिकारिणः स्वगुरु-स्वगुरुवचनेनाम्रकदलीफलद्राक्षादिफलभृतभाज- नान्याभरणयुक्तप्रधानवसनादीनि च ढौकनानि गृहीसा गता राज्ञीसमीपे । तस्या अग्रे वीतरागस्येच यलिविरचनं च- क्रिरे । राज्ञी च तुष्टा प्रयोजनविधानेऽभिमुखीभूता । तस्मिन्नेव प्रस्तावे राज्ञः प्रयोजनमुपस्थितम् । राज्ञीसमीपे ततो दिल्ली देश सम्बन्धी पुरुष आदेशकारी राज्ञा तत्र प्रेपितः-इदं प्रयोजनं राड्या निवेदय । देव ! निवेदयामीति भणित्वा शीघ्रं गतः । राजप्रयोजनं निवेदित राज्याः । अनेकेऽधिकारिणो नानाढौकनिकाच विलोक्य तेन चिन्ति- तम्-'ये मम देशादागता आचार्यास्तेषां निस्सारणोपायः संभाव्यते, परं मयाऽपि किञ्चितेषां पक्षपोपकं राज्ञः पुरो भणनीयम् । गतस्तत्र देव प्रयोजनं निवेदितं भवताम्, परं देव! बृहत् कौतुकं तत्र गतेन दृष्टम्' । कीदृशं भद्र ।। 'राज्ञी अर्हद्रूपा जाता, यथार्हतामने बलिविरचनं क्रियत एवं गड्या अप्यग्ने' । राज्ञा चिन्तितम्-'ये मयां न्यायवा- दिनो गुरुत्वेनाऽङ्गीकृताः, अद्यापि तेषां पृष्ठि न मुश्चन्ति' । राज्ञा भणितः सोऽपि पुरुषा-'शीघ्रं गच्छ राज्ञीपार्थे, गत्या भणनीयम्-राजा भाणयति राधी 'यद्दत्तं भवत्या अग्रे तन्मध्यादेकमपि पूगीफलं यदि लास्यसि तदा न त्वं मम नाहं तब' इति श्रुता भीता राज्ञी, भणितं च 'भो । यद् येनाऽऽनीतं तत्तन खगृहे नेतव्यम् । मम नास्ति प्रयो- जनम् । सोऽप्युपायो निरर्थको जते । ४. चतुर्थ उपायचिन्तितः यदि राजा देशान्तरीयमुनीन्द्रानं बहु मंस्यते तदा सर्वाणि देवसदनानि शून्यानि मुक्त्वा देशान्तरेषु गमिप्यामो वयम् । केनापि राज्ञो निवेदितम् । राज्ञाऽभाणि 'यदि तेभ्यो न रोचते तदा गच्छन्तु' । देव- * एतचिहान्तर्गतो वाक्यविन्यासो नास्ति प्र० । १ प्र० परं वयं न कस्यापि सम्बन्धिनः । २ 'आचार्याणां' । ३ 'तद्देयम्' । ४ जिनेश्वरेणोक्तं राजपिण्डो न कल्पते । ५ 'चिन्तितः' । ६ 'लात्वा' । तारकान्तर्गतः पाठो नास्ति प्र०। ७-७ बलि- दौकनेनेति' इत्येव पदम् । ८ 'समीपे' १ ९ 'पूगीफलं न ग्राह्यं यदि'। १० देशान्तरादागतान् मुनीन् मस्यते । ११ नास्ति प्र० 'केनापि । १२ 'राज्ञोकं गच्छन्तु' इत्येव प्र० । - युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। गृहपूजका वृत्त्या बटुका धारिताः । सर्वे देवाः पूजनीयाः। परं देवगृहमन्तरेण [तः बहिःस्थातुं न शक्यते, ततः कोऽपि केनाऽपि व्याजेनागतः । किंबहुना, सर्वेऽप्यागता देवगृहेषु स्थिताः। ५. श्रीवर्द्धमानसूरिपि सपरिवारो राजसन्मानेन सर्वत्र देशे विहरति , कोऽपि किमपि कथयित्तुं न शक्नोति । ततः श्रीजिनेश्वरसूरिः शुभलग्ने स्वपट्टे निवेशितः। द्वितीयोऽपि तदाता बुद्धिसागर आचार्यः कृतः। तयोर्भगिनी कल्याणमतिनाम्नी महत्तरा कृता । श्वाच्छ्रीजिनेश्वरसूरिणा विहारक्रम कुर्वता जिनचन्द्र-अभयदेव-धनेश्वर-हरि- भद्र-प्रसन्नचन्द्र-धर्मदेव-सहदेव-सुमतिप्रभृतयोऽनके शिष्याः कृताः । ततो बर्द्धमानसूरिः सिद्धान्तविधिना श्री अर्घ द शि स र तीर्थे देवत्वं गतः । ६. पश्चाच्छ्रीजिनेश्वरसूरिभिः श्रीजिनचन्द्राभयदेवौ गुणपात्रं ज्ञात्वा सूरिपदे निवेशितौ, क्रमेण युगप्रधानो जातौ । अन्यौ च द्वौ सूरी धनेश्वरो जिनभद्रनामा, द्वितीयश्च हरिभद्राचार्यः, तथोपाध्यायत्रयं कृतं धर्मदेव-सुमति- विमलनामानः । धर्मदेवोपाध्यायः सहदेवगणी च द्वावपि भ्रातरौ । धर्मदेवोपाध्यायेन हरिसिंह-सर्वदेवगणिभ्रातरौ सोमचन्द्रपण्डितच शिप्या विहिताः । सहदेवगणिनाऽशोकचन्द्रः शिष्यः कृतः। स चातीवयल्लम आसीत् । स च श्रीजिनचन्द्रमरिणा विशेपेण पाठयित्वाऽऽचार्यपदे निवेशितः । तेन च स्वपदे हरिसिंहाचार्यों विहितः । अन्यौ च द्वौ सरी प्रसन्नचन्द्र-देवभद्राख्यौ । देवभद्रः सुमत्युपाध्यायशिष्यः । प्रसन्नचन्द्राचार्यप्रभृतयश्चत्वारोऽभयदेवसरिणा पाठितास्तर्कादिशास्त्राणि { यत उक्तम्- सत्तर्कन्यायचर्चार्चितचतुरगिरः श्रीप्रसन्नेन्दुसूरिः, सरिः श्रीवर्द्धमानो पत्तिपतिहरिभद्रो मुनिर्देवचन्द्रः। इत्याद्याः सर्वविद्यार्णवसकलभुवः सञ्चरिष्णरुकीतिः- स्तम्भायन्तेऽधुनापि श्रुतचरणरमाराजिनो यस्य शिप्याः ।।* ७. श्रीजिनेश्वरमस्य आशा पल्ल्यां विहृताः । तत्र व्याख्याने विचक्षणा उपविशन्ति । तत्र लीलावतीकथा कृता अनेकार्थवर्णनसमेता । तथा डि ण्डि या गा मा मे कथानककोशः कृतो व्याख्यानाय । प्रथम स्थानस्थितदेवगृह- निवास्पाचार्याणां समीपे व्याख्यानाय पुस्तकयाचनं कृतम् । तैर्न दत्तम् । पश्चात् , पश्चिममहरद्वये विरच्यते, प्रभाते व्याख्यायते । इत्यं कथानककोशथतुर्माखां कृतः । तथा मरुदेविगणिन्याऽनशनं गृहीतं, चत्वारिंशदिनानि स्थिता। श्रीजिनेश्वरमरिणा समाधानमुत्पादितं भणितं च-'यत्रोत्पत्स्यसे तत्स्थानं निवेदनीयम् । भणितं 'निवेदयिष्यामि। श्रावक एको युगप्रधाननियामावे उ अ य न्तै गत्वा तस्य निश्चयार्थमुपयामान फर्तुमारब्धः। तम्मिन् प्रस्तावे मक्षशान्तिस्तीर्थसन्दनाथ महा वि दे है" गतः। तस्याऽयं महदेविदेवेन सन्देशो मणित:- मादेविनामअना गणिणीजा आसि तुम्ह गच्छमि सग्गमि गया पढमे, देवो जाओ महिडीओ! पक्षलपंमि विमाणे दुसागराज सुरो समुप्पन्नो । समणेससिरिजिणेसरसूरिस्स इमं कहिनासु ।। टपाउरे जिणवंदणनिमित्तमिहागएणं संदिह । चरणमि उनमो भे, कायन्बो किं च सेसेसु ।। तेनाऽपि स्वयं गता न कथितं गायात्रयम् । म श्रावक उपयास प्रवृत्त उत्थाप्य कथितम् , अशलेऽवगणि लिगितानि १ सूरयोऽपि सपरिवाराः' । २ विहरन्ति' । ३ 'न फायति' । ४ 'सतो पश्चा०१५'रिश । ६ 'पदमान गरिविधिना- बुदे देवन्ये गनः'। एनपिहान्तर्गताः पंचयो नोपलभ्यन्ते प्रत्यन्तरे । ७० "दिण्डियागमा । ८ 'कण्यं । ९ तया. नं।१० नाति पदमेतत् प० । ११ 'तस्मा। - ६ खरतरगच्छालंकार 'मसट सटच' । पत्त ने गत्वा यस्याऽऽचार्यस्य हस्तेन प्रक्षालितानि यास्यति स युगमधानः । सर्वासु वसतिपु गतः, दर्शितान्यक्षराणि, न केनाऽपि युद्धानि । श्रीजिनेश्वरमरिखसती गतः। दर्शितान्यक्षराणि । चिन्तयित्वा प्रक्षालितानि, गाथात्रयं चालेखि। तेन चिन्तितम्-एप युगप्रधानः । विशेषेण गुरुत्वेनाऽङ्गीकृतः । *इत्यादितीर्थकरमहावीरदर्शित- धर्मप्रभावनां कृत्वा श्रीजिनेश्वररिदैवत्वं गतः। ८. पश्चांजिनचन्द्रसरिः सरिवर आसीत् , यस्याऽष्टादश नाममालाः सूत्रतोऽर्थतच मनस्यासन् । सर्वशास्त्रविदा चनाऽष्टादशसहस्रप्रमाणा 'संवेगरंगशाला' मोक्षप्रासादपदवी भव्यजन्तूनां कृता । येन जा वा लि पुरे विहृतेन आय- काणामने 'चीचंदणमास्सय' इत्यादिगाथाया व्याख्यानं कुर्वता, ये सिद्धान्तसंवादाः कथितास्ते सर्वे सुशिष्येण लि- खिताः । शतत्रयप्रमाणो 'दिनचर्याग्रन्थो जातः श्राद्धानामुपकारी । सोऽपि श्रीवीरधर्म याथातथ्यं प्रकाश्य दिवं गतः । ९. तदनन्तरं श्रीमदमयसरिर्नवाङ्गवृत्तिकर्ता युगप्रधान आसीत् । स कथं नवाझवृत्तिकर्ता, तबाह-तस्य श म्मा णा ग्रा मे शरीरकारणं बभूव । यथा यथोपधादिः प्रयुज्यते तथा रोगो वृद्धि याति, न निवर्तते । लोकः पृथग्ग्रामेषु भक्तः, यदा यदा चतुर्दशीप्रतिक्रमणं भवति ततश्चतुर्योजनदूरक्षेत्रादागत्य प्रतिकामन्ति श्रावकास्तत्र । कदाचिदतीव रोगाकान्तं शरीरं ज्ञात्वा दुष्कृतनिमित्तं समाहूताः सर्वे श्राद्धाः । त्रयोदशीदिने पवादात्री प्रहरद्वये शासनदेवता समा- जगाम । तयाऽमाणि-'खपिपि जागपिं वा । ततो मन्दं मन्दं भणितम्-'जागमि' । तया भणितम्-'शीघ्रमुत्तिष्ठ, सूत्रकुक्कुटिका नवोन्मोचय' । भणति-'न शक्रोमि । 'कथं न शंकोपि ? अद्यापि बहुकालं जीविप्यसि, नवाझवृत्ती प्रतिविधास्यसि । 'कथं विधास्याम्येवंविधे शरीर ?' तत उपदेशं ददाति देवता-'स्तम्भ न क पुरे से ढी नधुपकण्ठे खंखरापलाशमध्ये पार्श्वनाथप्रतिमा स्वयम्भूविंद्यते । तस्या अग्रे देवान् बन्दस्ख, येन स्वस्थशरीरो भवसि' । पश्चाद्देवताऽ- देर्शनी भूता । प्रभाते मिथ्यादुष्कृतं दास्यन्ति गुरवः-इत्यभिप्रायेणाऽगन्तुकाः स्थानस्थिताश्च सर्वे मिलित्वा समाययुः । पूज्या वन्दिताः । वन्दितः सद्धिर्भणितम्-'स्त म्म न क पुरे श्रीपार्श्वनाथदेवो चन्दनीयः । ततोऽनायि श्राद्धैः- श्रीपूज्यानामुपदेशो जातः । ततो भणितं तैयमप्यागभिप्यामः । ततो गुरूणां वाहनं कृतम् । युभुक्षा सर्वथैव भष्टा- ऽऽसीत् । प्रथमेऽपि प्रयाणक रसविपयेऽभिलापोऽभूत् । क्रमेण घ च ल के यावत् प्राप्तस्य शरीरं स्वस्थ जातम् । पश्चात् पादैः स्तम्भ न क पुरे विहतः । श्रावकाः श्रीपार्श्वनाथप्रतिमामवलोकयितुं प्रवृनाः। कुत्राऽपि न दृष्टा । पश्चाद् गुरयः पृष्टाः, तैरभाणि-'संसरापलाशमध्येऽवलोकयत । ततोऽवलोकिता दृष्टा देदीप्यमानी । प्रतिदिनं गौरका स्नानाय दुग्धं क्षरति । ततस्तैस्तुररागत्यै भणितं गुरोः पुरः-'भगवन् ! दृष्टा यथा मणिता' । ततो भगवान् वन्दनाय मक्या चलितः। दृष्टा तत्र, वन्दिता भच्या । तत ऊद्धं हितेन देवप्रभावात् तदव 'जय तिहुयणे'त्यादि नमस्कारद्वात्रिंशिफा कृता । देवताभिर्भणितम्-'नमस्कारद्वयमुत्तारय; तसिन् ध्याते सर्वस्याऽपि प्रत्यक्षीभवनं भविष्यति । तदपि कष्टम् । त्रिंशताऽपि नमस्कारातः सर्व मद्रं विघांस्यामः । तत उत्तारितम् । समुदायेन मह देवबन्दनं कृतम् । समुदायन विस्तरेण स्नानायाभरणपूजा कृता । तत्र स्थापना विहिता । देवगृहं जातम् । मर्वलोकवाञ्छितपूरणेन श्रीमदभयदेव- परिस्थापितं श्रीपार्श्वनाथतीर्थ नाम प्रसिद्धिं गतम् । * एतत् स्थाने 'तीर्थ प्रभाव्य' इत्येव प० । १ 'ततः' । २ नाम्नि पदमेतत् प० । ३ 'वीरशासनं। ४ ततोऽमयदे- वसूरि । ५ 'आसीत्' नास्ति प्र० । ६ पतितं मूलादरों पदमेतत् । ७ तदा तदा' । ८ 'वपुः' । ९ 'समागता' । १० शक्ष्यसि । ११ ददते । १२ 'अदृश्यी' । १३ 'लाम्यन्ति' । १४ 'मिलिताः' । १५ गताः' । १६ 'श्राद्धाः । १७ ते । १८ नास्ति पदमेतत् प० । १९ 'आगन्योकं भगवन् । २० 'पूज्या वन्दनाय चरिताः । २१ 'करिष्यामः' । २२ 'संघेन । २३ सर्वलोकेप्सित युगप्रधानाचार्यगुर्वावली । १०. तत्स्थानात् प त ने समापाताः । क र डि हट्टी वसतौ स्थिताः । तत्र स्थितनवाङ्गानां स्थानप्रभृतीनां वृत्तयः कृताः। यत्र सन्देह उत्पद्यते तत्र स्मरणप्रस्तावे, जया-विजया-जयन्ती-अपराजिता देवताः स्मृताः सत्यस्तीर्थकरपाधै महाविदेहे गत्वा तान् पृष्ट्वा निस्सन्देहं तत्स्थानं कुर्वन्ति । ११. तस्मिन् प्रस्तावे देवगृहनियास्याचार्यमुख्यो द्रोणाचार्योऽस्ति । तेनाऽपि सिद्धान्तो व्याख्यातुं समारब्धः। सर्वेऽप्याचार्याः कपलिकां गृहीत्वा श्रोतुं समागच्छन्ति । तथाऽभयदेवसरिरपि गच्छति । स चाचार्य आत्मसमीपे निपयां दापयति । यत्र यत्र व्याख्यानं कुर्वतस्तस्य सन्देह उत्पद्यते, तदा नीचैः स्वरेण तथा कथयति यथाऽन्ये न शृण्वन्ति । अन्यस्मिन् दिने यद् व्याख्यायते सिद्धान्तस्थानं तवृत्तिरानीता । एतां चिन्तयित्वा व्याख्यानयन्तु भवन्तः । यस्तो पश्यति सार्थकां, तस्याऽऽश्चर्य भवति; विशेपेण व्याख्यातुराचार्यस्य । स चिन्तयति-किं साक्षाद्गणधरैः कृताऽथया:- नेनापि, तसिन् विपये ऽतीवादरो मनसि विहितः । द्वितीयदिने सम्मुखमुत्थातुं प्रवृत्तः । ततस्तादृशं सुविहिताचार्य- विषयमादरं दृष्ट्वा, रुष्टा व्युत्थिताः सन्तो वसतौ गता भणन्ति देवहनियास्याचार्या:-'केन गुणेनेपोऽधिका, येना- ऽस्माकं मुख्योऽप्येवंविधमादरं दर्शयति; पश्चात् के वयं भविष्यामः । द्रोणाचार्योऽपि वृहत्तरः सदों विशेषज्ञो गुणपक्षपाती सन् नूतनं वृत्तं कृत्वा सर्वेषु देवगृहनिवास्याचार्यमठेपु प्रेपितम्- आचार्याः प्रतिसभ सन्ति महिमा येपामपि प्राकृतै- मातुं नाऽध्यवसीयते सुचरितैस्तेपां पवित्रं जगत् । एफेनापि गुणेन किन्तु जगति प्रज्ञाधनाः साम्प्रतं, यो धत्तेऽभयदेवसूरिसमतां सोऽस्माकमावेद्यताम् ॥ [१०] तत उपशान्ताः सर्वे । द्रोणाचार्येणाभाणि श्रीमदभयदेवमरीणामग्रे-'या वृत्तीः सिद्धान्ते करिष्यसि ताः सर्ग मया शोधनीया लेसनीयाथ ।' तथा तत्र स्थितेन पारिग्रहिकद्वयं प्रतियोधितम् , सम्यक्त्वद्वादशमतस्थितं कारितम् । तय समाधिना श्रावकत्वं प्रतिपाल्प देवलोकं गतम् । देवलोकात् तीर्थकरबन्दनार्थ महाविदेहे गतम् । सीमन्धरस्वामि -युग- न्धरस्वामिनी वन्दिती, धर्म श्रुत्वा पृष्टो-'मम गुरुः श्रीमदमयदेवसरिः कतिथे भवे मुक्तिं गमिप्यति ?" भगवद्भयां मणितम्-'तृतीये भवे सेत्स्यतीति श्रुत्या तुष्टौ देवौ स्यगुरुपाचे गती जिनार्ता कधिता । वन्दित्या गच्छद्भयामिमा गाथा पठिता- भणियं तित्यपरेहिं महाविदेहे भवंमि तइयंमि । तुम्हाण चेच गुरवो मुत्ति सिग्धं गमिस्संति ।। सा च स्वाध्यायं कुर्वत्या प्रतिन्या श्रुता नापिता च गुरुणां निवेदिता । मणितम्-ज्ञाता चाम्माभिः । १२. पश्चात् पाल्ह उ दाना मे हिनाः । तत्र मम्पन्धिनो भक्ताः श्रमणोपामाः सन्ति । तेषां यानपात्राणि वहन्ति। पपोधौ तानि च प्रेषितानि । तैपां चाआच्छता ऋयाणभृतानां याता जाता-'युडितानि' ने च श्राद्धा यातां शुन्या- मुसिनो जागिरे। ते च श्रीमदमयदेवमूरिस्मरणप्रस्तीवे यमतो गताः । वन्दिता मगन्तः । तैश्च पृष्टा:-सिमिति बन्द- नफविषपर्वताविक्रमो जातः । 'मगरम्! कारणेन' । 'किं कारणम् १" 'पोतमुडनोदन्ताकर्णननाशुचिताः स्मः तेन नागनाः । ततः धणमा चिचे ध्यानं धृत्वा भणितम्-अत्र विपयेध्नमाधानं न निधेयं मादिः । पमा दिनीपदिने मानुप आगतः । पोताः मेयोतरिताः" । वानांमागमे श्रादः ममम्मतेन गुरो मणिना:-'यारहामा प्रयापरेन १सनः पपने। २ 'स्पाना। ३त्यापपत्र ५६चत्यनिया०10 पादउट मामे ८ 'मास'! ९ गावाः । १. मरणापाने । ११ 'उत्तम् । १२ 'चिन्ता न हो। १३ 'उपीना।

१० खरतरगच्छालंकार १५. ततो वाचनाचार्यों जिनवष्लभगणिः कतिचिद्दिनानि पत्तनभूमौ विहृत्य न वादृशो विशेषेण बोधो विधातुं' कस्यापि शक्यते येन सुखमुत्पद्यते मनसि । ततश्वाऽऽत्मतृतीय आगमविधिना सुशकुनेन भव्यजनमनसि भगवद्भणि- तविधिधोत्पादनाय चित्रकूटदेशादिपु विहृतः । ते च देशाः सर्वेऽपि प्रायेण देवगृहनिवासिमुनीन्द्राप्ताः । सर्वोऽपि तद्वासितो लोकः, किंबहुना । नानाग्रामेषु विहारं विदघश्चित्रकूटे प्राप्तः । यद्यपि त्राऽशुभांविता लोकास्तथाऽप्ययुक्तं कर्तुं न शक्नुवन्ति, पत्तने गुरूणां प्रसिद्धिश्रवणात् । स्थानं याचितास्तत्रत्यथाद्धाः। तैश्च भणितम्-'चण्डिकामठोऽस्ति यदि तत्र तिष्ठथ । ततो जिनंवल्लभगणिना ज्ञातमशुभयुद्ध्या भणन्त्येते, तथापि तत्रापि स्थितस्य देवगुरुप्रसादाद् भद्रं भविष्यतीति चिन्तयित्वा भणितास्ते-'तत्रैव बहु मन्यघं यूयं येन तिष्ठामः । तैरभाणि तिष्ठत। ततो देवगुरुन् स्मृत्वा देवतां चानुज्ञाप्य स्थितास्तत्र । देवता च तेषां ज्ञानेन ध्यानेन सदनुष्ठानेन तुष्टा सती तान् प्रत्ययुक्तं रक्षति । ते चे जिनवल्लभगणयः सर्वविद्यानिधानभृताः । किथम् , तथाहि-वेदितारो जिनेन्द्रमतस्थापकतर्कभियदेवानेकान्तजयपता- कादि परदर्शनकन्दली-किरणावली-न्यायतर्कादि पाणिन्यायष्टव्याकरण सूत्रतोऽर्धतश्च, चतुरशीतिनाटक-सर्वज्योतिष्क- शास्त्र-पञ्चमहाकाव्यादिमर्वकाव्य-जयदेवप्रभृतिसर्वच्छन्दोज्ञातारः इति प्रसिद्धिश्चित्रकूटे जाता। सर्वे परदर्शनीयवित्रा- दिलोका आगन्तुं प्रवृत्ताः । यस्य यस्य यस्मिन् यस्मिन् शास्त्रविपये संशय उत्पद्यते स सर्वोऽपि जनः पृच्छति, यथा सन्देहस्त्रुट्यति तथोत्तरं ददाति । श्रीवका अपि केचन केचन समाजग्मुः । सिद्धान्तवचनानि श्रुत्वा तदनुसारेण क्रि- यामपि दृष्ट्वा साधारण-सडकप्रभृतिश्रावकैः समाधिना श्रीवाचनाचार्यजिनबल्लभगणयो' गुरुत्वेन प्रतिपन्नाः । गुरूप- देशन परिज्ञान, ज्योतिप्कपरिज्ञानमप्यतीवाऽऽसीत् । साधारणेन परिग्रहपरिमाणयानं कृतम् । गुरुणा भणितम्- 'गृहाणं कियन्मानं ग्रहीप्यसि ?'। भगवन् ! विंशतिसहस्रमा सर्वसंग्रहे करिप्यामि' । पश्चाद् गुरुभिरुक्तम्-'बहुतरं कुरु, किंबहुना, लक्षं द्रम्माणां परिमाणं कारितः। पश्चाद् यथा यथा सर्वसम्पदा प्रवर्धमानः साधारणो जज्ञे तथा तथा संघस्य सर्वसामयेन गुर्वाज्ञया साधारणो भवितुं प्रवृत्तः । अन्ये तु श्राद्धास्तथा प्रवर्तितुमारब्धाः । १६. तथाऽश्वयुजि मासे कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां श्रीमहावीरगर्भापहारकल्याणकदिने भणित" श्रीजिनवल्लभगणिना श्राद्धानां पुरः-'यदि देवा वन्यन्ते देवगृहे महावीरस्य तदा सुभद्रं भविष्यति । पष्ठमपि कल्याणकं गर्भापहारलक्षणम् , श्यतः "पंच हत्थुत्तरे होत्था साइणा परिनिव्युडे" इति सिद्धान्ते भगना' । तम्मिन् प्रस्तावे विधिचैत्यं नास्ति । चैत्यनिवासिगुरुदेवगृहेषु गम्यते । पश्चाच्छावकर्मणितम्-'भयवन् ! यदि युप्माकं सम्मतं तत् क्रियते' 1 ततः मवें श्रावका निर्मलशरीरा निर्मलवस्त्रा गृहीतनिर्मलपूजोपकरणा गुरुणा मह देवगृहे गन्तुं प्रवृत्ताः। ततो देवगृहस्थितयाऽऽपिकया गुरुन् श्राद्धसमुदायेनाऽऽगच्छतो दृष्ट्वा पृष्टम्-'को विशेषोऽद्य ?' केनापि कंधितम्-वीरगर्भापहारपेठकल्याणकपूजाक- रणार्थ समागच्छन्ति । तयाऽचिन्ति -पूर्व केनापि न कृतमेते करिप्यन्तीति न युक्तम् । पश्चाद संयती देवगृहद्वारे पति- त्या स्थिता, द्वारे समागतान् दृष्ट्वा वयाऽशुभयाऽभाणि-मया मृतया यदि प्रविशंत' । ततोयीतिकं ज्ञात्वा निवर्त्य खसाने गत्वा श्राद्वरुक्तम्-'वृहत्तरसदनानि सन्त्यकस्य गृहस्योपरि चतुर्विंशतिजिनपट्टकं धृत्वा देवयन्दनादिसर्व धर्मप्रयोजनं क्रियते । गुरुणा भणितं युक्तमेव । तव आराधितं विस्तरेण कल्याणकम् । समाधान ममजनि । ततो १ कोऽपि बोधः । २ नास्ति ! ३ येन चिचे। १ तन आत्मना तृतीय.! ५ नास्ति । ६ चत्यनिवासि । ७ कुवं । ८ गतः। एसदन्तर्गता पंक्तिनास्ति प्र०।९ लोकाः । १० जिनवल्लभेनाऽचिन्ति-एतेऽशुमवुझ्या मणन्ति । ११ वा० जिन' । ++ एतद्दण्डान्तर्गतः पादो नास्ति प्र० । १२ श्राद्धाः ।१३ समाययुः। १-१ नास्ति प्र० । १४ याचितं । १५ गुरुणोक्तं । १६ 'लक्षं परिमाण' इत्येव प्र०। १७ ततो। १८ उक्त । १९ मद्रं भवति । २० श्रीगीरम्य पष्ठ कल्याणकं 1 * नाम्नि प्र०॥ २१ श्राद्धः सहा ।२२ केनोक्तं । २३ वीरपष्ठ । २५ चिन्तितं । २५ चैत्यद्वारे पतिना मया मृनया मध्ये गमियन्ति-हन्येव । २६ गुरुणोक्तं।

युगप्रधानाचार्यगुर्वावली । गीताथैः श्रावकैर्मत्रितम्-'विपक्षरविधिप्रवृत्तविधिजिनोक्तो विधातुं न लप्स्यते, ततो यदि गुरोः सम्मतं भवति तदा तले उपरि च देवगृहद्वयं कार्यते । स्वसमाधानं गुरोनिवेदितम् । ततो गुरुणा कथितम्- जिनभवनं जिनविम्बं जिनपूजां जिनमतं च यः कुर्यात् । तस्य नरामरशिवसुखफलानि करपल्लवस्थानि ।। इति देशनया ज्ञातं गुरोरप्य]भिप्रेतमेय । लोके च प्रवृत्ता वार्ता-एते देवगृहे कारयिष्यन्ति । प्रह्लादनवृहत्तरेण बहुदाकेनाऽपि कथितम्-एते कापालिका देवगृहे कारयिष्यन्ति, राजमान्या भविष्यन्ति । इदं च श्रुतं गुरुणा। तदो बहिभूमौ गच्छतः श्रीजिनवल्लभगणेः सोऽपि मिलितस्तथा भणितः-'भद्र ! गर्यो न विधेयः । एतेषां मध्यात् कश्चि- द्राजमान्योऽपि भविष्यति, यस्त्वां बद्धमुच्छोटयिष्यति । ततः श्रावकैः सोत्साहैमिलित्वा देवगृहे कारयितुमारब्धे । देवगुरुप्रसादेन प्रमाणीभूते । उपरि श्रीपार्श्वनाथविम्यं तले च महावीरबिम्बं कारितम् । यिस्तरेण प्रतिष्ठा जाता। विधिना श्रीजिनवल्लभगणिभिः कृता । सर्वत्र प्रसिद्धितित एव गुरवः । १७. अन्यदा ब्राह्मणः कश्विज्योतिष्किकः पण्डितमानी श्रीजिनवल्लभगणिसमीपे समागतो लोकमध्ये श्लाघां क (श्रु?) त्वैवंविधा धर्मशास्त्रविदः, श्वेतपटाः समाजग्मुः। श्रावकैः पट्ट आसनं दत्तम् । गुरुणा पृष्टः-'कुत्र भवतो वासः' 'अब । पश्चाद्गुरुभि पितः-'कसिन् शास्त्रे विशेषेणाभ्यासोऽस्ति ?' | 'ज्योतिप्क' । 'चन्द्रादित्यलग्ने सम्यग्वेरिस ?' 'सम्यगेव, किमत्रैयागणित एकं द्वे त्रीणि च लग्नानि भगामि ।' जिनवल्लभगणिना ज्ञातम्-'गर्वेगाऽऽगतः ।' गुरुणी- क्तम्-'भद्रं परिज्ञानम् । स ब्राह्मणः पृच्छति-'युप्माकमपि परिज्ञान विद्यते, लग्नविपये भविष्यति किश्चित्तहि कथ- यन्तु भगवन्तः । 'कति कथयामि दश विंशतिर्या लग्नानि ?' । तस्यातीवाश्चर्यमभूत् । पश्चाच्छ्रीजिनवल्लभगणिना भणितम्-'भो विप्र ! गगने हस्तद्वयमाना डम्बरिका दृश्यते सा कियन्मात्रं पानीयं करिष्यति। [विप्रोजानानः शून्यदृष्टिदिशोवलोकयति। ततो भणितं गुरुणा-'भो विन! भाजनद्वयं यावत् ] पश्चादत्रैवोपविष्टस्य क्षणमा- श्रेणैव तया डम्परिकया सकलं गगनमाच्छाद्य वृष्टिः कर्तुमारब्धा, तावटिजज्ञे यावद्भाजनद्वयमपि परिपूर्णीभूतम् । ततो विनो मस्तके हस्तौ योजयित्वा सुगुरोः पादयोः पतित्वा भणितवान्-'यावत्तिष्ठाम्यत्र तावद्भगवती पादान् वन्दि- त्वा निश्चयेने भोजनं विधास्यामि । न मयाज्ञायि भगवन्त एवंविधाः' । पश्चात् सर्वत्रैव प्रसिद्धिर्जाता ज्ञानिन एवं श्वेतपटा भवन्तीति। १८. अन्यदा कदाचिन्मुनिचन्द्राचार्येण शिष्यद्वयं सिद्धान्तवाचनानिमित्तं श्रीजिनवल्लभगणिपार्थे प्रेपितम् । गणि- रपि तयोर्वाचनां दातुं प्रवृत्तः। तावप्यशुभौ चिन्तयतो जिनवल्लभगणेः श्राद्धान् विप्रतारयात्र इति युद्ध्या रञ्जयन्तः श्राव- का५ । कदाचित् स्वगुरुपार्थे प्रेपितुं लेसोलेखि । तं च वाचनापलिकायां प्रक्षिप्य वाचनां ग्रहीतुं गतो तो वसती । गणिसमीपे वन्दनं दचोपविष्टौ तत्र । उच्छोटिता कैंपलिका । ततो नूतनो लेखो दृष्ट्वा गृहीतः, उच्छोटितथ। तावपि हस्ताद् गृहीतुं न शक्नुतः । अवघारितो लेखः। तत्रालेखि-'जिनवल्लभगणेः केचिच्छाद्धाः स्वशं नीताः सन्ति, क्रमेण स (सन् १) वशीकरिप्या इति मनोवृत्तिरस्ति । ततः श्रीजिनबल्लभगणिना द्विधा विधायाऽऽर्याऽमाणि- १-१ एतदद्वयमध्यगतः पाठो नास्ति प्र० । २ चैत्ये। ३ चैन्ये । ४ जिनवलभेन कृता इत्येव प्र० १५-५ गुरुपार्ध आगतः । आसनं दत्तं श्राद्धः-इत्येव प्र० । ६-६ 'गुरुणा भाषितः' इत्येव प्र०। ७-७ युप्माकं परिनानमस्ति । किंचित् । कथयन्तु भवन्तः-इति म०१ ८ ततो गुरुणोक्तम् । ९ जलं । १०:०-वृष्टिः कृता भाजनः । ११ नियोग्य । १२ भवता । १३ नास्ति । १४ फरिष्ये । १५ 'ज्ञानिनः श्वेतपटा इति लोके प्रसिदिजातेति । इत्येव । १६ आदान् । १७ अन्यदा । १८ 'कपिलिका' मूलादर्से । १९ 'भूतनं लेख' प० ।

१२ खरतरगच्छालंकार आसीजनः कृतघ्नः क्रियमाणघ्नस्तु साम्मतं जातः । इति मे मनसि वितकों भविता लोकः कथं भविता।। [१५] अहो ! सृतं वाचनया भवतोरेवंविधाशुभभावेन ! पश्चाद्विमुखौ गतौ स्वस्थानं पुनर्न दृष्टौ तदैव गतौ । १९. कदाचिजिनकल्लभगणेहिभूमौ गच्छतो विचक्षणः कश्चित् प्रसिद्धि ज्ञात्वा पाण्डित्यस्य मिलितः । सम- स्यापदं प्रक्षिप्तं कस्यापि राज्ञो वर्णनामाश्रित्य 'कुरङ्गः किं भृङ्गो मरकतमणिः किं किमशनिः' पश्चान्मनाक् परिभाव्य पूरिता समस्या, तदैव कथिता तस्य पुरः- चिरं चित्तोद्याने वससि च मुखाजं पियसि च, क्षणादेणाक्षीणां विपयविपमोहं हरसि च । नृप ! त्वं मानादि दलयसि च क्षितौ कौतुककरः, कुरङ्गः किं भृङ्गो मरकतमणिः किं किमशनिः ।। [१६] इति श्रुत्वाऽतीव तुष्टः । कथितवान्-सत्या लोके प्रसिद्धिः, अस्मिन्विपये, गुणस्तुतिं कृत्वा पादयोः पतित्वा गतः । पश्चात् सुगुरुवसतौ समागतः । ततः श्रावकैः पृष्टः सुगुरु:-'यही वेला लग्ना मुगुरोः, किं कारणम् ?' पश्चात् सहगतेन शिष्येण सर्वा वार्ता कथिता । प्रमोदो जज्ञेऽतीव श्रावकाणाम् । २०. तथा गणदेवश्रावकः स्वार्थी जिनवल्लभगणिपाधै मुवर्णसिद्धिरस्तीति श्रुत्वा तस्य समीपे चित्रकूटे गत्वा पर्यु- पासनां कर्तुमारब्धा। लक्षितो भायो गणिना । ततो योग्यं ज्ञात्वा तथा तथा तस्य देशना कृता यथा संविमभावो जातः । पश्चाद् भणति गणिः-'भद्र ! सुवर्णसिद्धिं कथयामि' । 'भगवन् ! सृतम् , विंशतिद्रम्मनीव्या व्यवहार कुर्वन् श्राद्धधर्म करिष्यामि । भव्यानां धर्मकथने लब्धिरस्ति तस्य । ततः शिक्षयित्वा धर्म प्रेपितो वागडदेशे । ततो लिखितकुलकलेखः सर्वोऽपि लोको जिनपल्लभगणिधर्मेऽभिमुसीकृतस्तेन । २१. श्रीजिनवल्लभगणेाख्याने सर्वे विचक्षणजना उपविशन्ति; विशेषतो ब्राह्मणाः स्वस्वविद्यानिःसन्देहार्थम् । कदाचिदियं गाथा व्याख्याने समागता-धिनाईण गिहीणं इत्यादि-धिग्जातीया ब्राह्मणाः इति व्याख्यानं श्रुत्वा रुष्टा विप्रा बहिनिर्गताः, कुपिता एकत्र मिलिताः, विपक्षाश्च निकटीभूताः । एतः सह विवादं विधाय निष्प्रभीकरि- प्पामः । किं तेषां स्वरूपं ज्ञात्वा श्रीजिनवल्लभगणे«दि तेभ्यो भयं समजनि ?, न मनागपि । तस्य तीर्थकरसदृक्ष- . त्वात् । ततश्च मर्यादाभङ्गभीतेरमृतमयतया धैर्यगाम्भीर्ययोगान् न क्षुभ्यन्त्येव तावन्नियमितसलिलाः सर्वदैते समुद्राः। आहो क्षोभ बजेयुः क्वचिदपि समये देवयोगात्तदानीं न क्षोणी नाद्रिचक्रं न च रवि-शशिनो सर्वमेकार्णवं स्यात् ।। [१७] इदं वृत्तं भूर्जपण्डे लिखित्वा विवेकिजनहस्ते दत्त्वा प्रेपितम्, भणितच संमिलिताना मध्ये वृहबामणहस्ते दातव्यम् । तेन तथैव कृतम् । तेनाचिन्ति विवेकबुद्धशा-यमेककविद्याधारिणस्ते च सर्वविद्यानिधानम् , कथं तैः सह विवाद का शक्यते । तेन सर्वे विप्राः सम्योध्योपशमं नीताः । १ याचनया सृतं' इत्येव प्र०1 एतत् समग्र प्रकरणं नोपलम्यते प्र०।२ श्रादः। ३ हेमसिद्धिं श्रुत्ला । ४ नास्ति प्र०॥ ५गुरुसेवा प्रारब्धा। ६ गणिभिरुक्तम् । ७ हेमसिद्धि । ८ कयनेन । ९ जनो।

युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। २२. अन्यदा धारानगर्यां श्रीनरयर्मराज्ञों राजमान्यां पण्डितसभां श्रुत्वा दक्षिणदिग्विभागात् पण्डितद्वयं कौतुकेन पाण्डित्यस्य दर्शनार्थमाजगाम । आगत्य पण्डितसभामध्ये 'कण्ठे कुठारः कमठे ठकार। इत्येकपदानुसारिणाऽन्य- पदप्रयेण पूरयन्तु समस्यां भवन्तः। प्रत्येकं पूरिता, परं न तयोस्तां दृष्ट्वा मनो मुमुदे । केनापि राज्ञः पुरो भणितम्- 'देव ! न पण्डितपूरिताः समस्याः प्रतिभान्त्यनयोः। देवेनामाणि-'अस्ति कश्चिदुपायो येनानयोर्मनो रज्यते ? केनापि विवेकिना पुरुपेणोक्तम्-'देव ! चित्रकूटे श्वेतपटो जिनवल्लभगणिः सर्वविद्यानिधानमाकर्ण्यते ।' राज्ञा तदैवो- प्ट्रद्वयं शीघ्रगतिं सपुरुपं सलेख प्रेपितम्-'इयं समस्या पूरिता मनोहारिणी सती स्वगुरोः पार्थात् समागच्छन्ती शीघ्र भोः साधारण ! तथा कार्यम्' । प्रतिक्रमणवेलायां सन्ध्यासमये प्राप्त स्वरूपं साधारणेन । गुरोर्दर्शितं स्वरूपम् । प्रति- फ्रमणं कृत्वा पूरिता, लेखिता च- रे रे नृपाः ! श्रीनरवर्मभूपप्रसादनाय क्रियतां नताहै। कण्टे कुगर कमठे ठकारश्चके यदश्वोऽग्रखुराप्रघातैः ।। [१८] आगन्तुकपुरुषद्वयं रात्रावपि मुत्कलितं शीघ्रं प्राप्तम् । तया समस्यया रञ्जित तयोर्मनः, भणितं ताभ्याम्-'अस्यां सभायां नास्तीदृशो विद्वान् , येनेयं पूरिता; किं तबन्यः कश्चित् ।' वखादिदानेन पूजयित्वा मुत्कलितौ । २३. श्रीजिनबल्लभगणिरपि कतिचिद्दिनविहृतो धारायाम् । केनाप्युक्तं राज्ञः पुरो-'देव ! सोऽपि श्वेतपटो सम- स्यापूरक आगतोऽस्ति ।' राज्ञोक्तम्-'शीघ्रमाकारय तम्' । तमाकारितः । राज्ञा तुष्टेनोक्तम्-'भो जिनवल्लभगणे! पारु- स्थलक्षत्रयं ग्रामत्रयं वा गृहाण' । भणितं गणिभिः-'भोः महाराज ! वयं वतिनोऑदिसतहं न कुर्मः। चित्रकूटे देवग- हद्वयं श्रायकैः कारितमस्ति, तत्र पूजार्थ स्वमण्डपिकादानात् पारुत्थद्वय प्रतिदिनं दापय । ततो राजा तुष्टः-अहो निर्लो- भता एतस्य महात्मनः श्रीजिनाल्लभगणेरिति चिन्तितवान् । चित्रकूटमण्डपिकातस्तत् शाश्वतदानं भविष्यतीति कृतम् । श्रीजिनयल्लभगणेर्धामिकत्येन सर्वत्र प्रसिद्धिर्जते । २४. श्रीनागपुरे श्रापकर्नेमिनाथदेवगृहं नेमिनाथविम्यं च कारितमस्ति नूतनम् । तेपामेपोऽभिप्रायो अजे-'वयं श्री- 'जिनवल्लभगणिं गुरुखेनाङ्गीकृत्य तस्य हस्तेनोभयोः प्रतिष्ठा कारयिष्याम:'-इति चिन्तयिला सर्वसम्मतेन प्रतिपल्या श्रावकैराकारितः श्रीजिनवल्लभगणिः । ततः शुभलग्नेन देवगृह नेमिनाथविम्ब च प्रतिष्ठितम् । तत्प्रभावाखक्षपतयः श्रापको जजिरे । नेमिनाथविम्बे रत्नमयान्याभरणानि कारितवन्तः । एवमनेके श्राद्धाः प्रतियोधितास्तत्र, प्र०] तथा नरवरभावकाणां तथाऽभिप्रायो जजे-'वयमपि जिनवल्लभगणिं कक्षीकृत्य गुरुसेन प्रतिष्ठां देवगृहे च विम्वे च कार- यामः' इति पर्यालोच्य कृतं तथैव । उभयोरपि देवगृहयोरात्रौ यलिधरण-सीप्रवेश-लाटादिदानं निपेधादिको विधि- लिंपिको मुक्तिसाधकः । ततो मरुकोदृश्रावकः श्रीजिनवडभगणयो विहारक्रमेण समाहतास्ततो विक्रमपुरमध्येन मरुकोट्टे विहताः । तत्र श्राद्धः श्रद्धावद्भिर्यसतिर्गुमिस्थानयुक्ता दत्ता। स्थितास्तत्र । श्रावकैरमाणि-'भगवन् ! युप्म- दनारविन्दाजिनवचनरसमाखादितुमिच्छामः' । 'युक्तमेतन्यायकाणाम् , तथुपदेशमाला कयितुमारम्यते । वैरमाणि -'पूर्वमेव श्रुता । तथापि पुनरपि भणितच्या'-अभयदिने भणितुमारब्धा । 'संबच्छरमुमभजिणों इत्यादिगाधाया एक- स्था भणने पण्मासायधिः कालो लग्नस्तथाऽपि श्रावकाणां नानासिद्धान्तोदाहरणामृतेन दतिर्न जाता । बदन्ति-'भगवन् ! तीर्थकरा एवंतत्सुसमुत्पादयितुं समर्थाः,वचनामृतेन भगवन्तोऽप्येवंविधातुं समर्थाः-इत्यार्यतुष्टाः श्रावकाः देशनया । २५. अन्यदा कदाचिद् व्याख्यानं कृसा श्रादः सह यसतो समाजगाम । तस्मिन्ने प्रस्ताव एका पुरुषोश्वारूढः • एतत् प्रकरणं गाम्नि प्र०1१ गृहं विम्य । २ जाताः पादाः। ३ नैमिबिन्। ५-१ एनदारिता मंजिनानि प्र०। ५-५ एतत् सननमकरणम्माने म० ततो मरको विदलास्तत्र प्रादैः सह यमनी जगाम'-इत्येव पाठः । .

खरतरगच्छारकार , , . खीभिर्गीयमानो बहुपसिारो गच्छन् परिणेतुं दृष्टः। श्रीजिनबल्लभगणिना भणितम्-'एता एव खियो रोदनं पुर्वन्त्यो व्या- घुटिप्यन्ति'-इति परिभाष्यम् । पश्चाद्गवास्तत्र । तेपो मध्यात् परिणेता निःश्रेण्यामारा चटितुमारब्धः। आरोहतः पादचलितः, पतितस्तथा यथाऽमौ पतन घरट्टोपरि पतितः, उदरं द्विधा जातम् , मृतश्च । वा अपि तथाभूता आगच्छ- न्त्यो दृष्टाः सरैरपि । अहो! परिज्ञानं गुरूणाम् । पश्चाच्छाकाणां धर्मपरिणाममुत्पाद्य पुनर्नागपुरे निर्दताः श्रीजिन- बल्लभगणयः। २६. तसिन प्रस्तावे देवभद्राचार्या विहारक्रमं विदधाना अणहिल्टंपत्तने समायाताः। तत्रागतेचिन्तितम्-'प्रसन्नच- न्द्राचार्येण पर्यन्तसमये भणितं ममाग्रे "भरता श्रीजिनवल्लभगणिः श्रीमदभयदेवरिपट्टे निवेशनीयः" । स च प्रस्ता- पोऽद्य' । ततः श्रीनागपुरे श्रीजिनकल्लभगणेनिस्तरेण लेसः प्रेषित:-'खया शीघ्रं समुदायेन सह चित्रकंटे समागन्त- व्यम् , येन वयमागत्य चिन्तितप्रयोजनं कुर्मः । ततः समागताः श्रीजिनपल्लभगणयः सपरिवाराः। तेऽपि तथैव समागता देवभद्रसरयः। पण्डितसोमचन्द्रोऽप्याकारितः पर नागन्तुं शक्तः । इदानी श्रीदेवभद्रसूरिभिः श्रीमदभ- यदेवरिपट्टे श्रीजिनबल्लभगणिनिवेशितः, स० ११६७ आपाढ सुदि ६, चित्रकूट वीरविधिचत्ये । अनेके भव्यजनाः श्रीजिनवल्लभसूरीन् युगप्रधानान् युगप्रधानश्रीमदभयदेवमूरिपादभक्तान् समालोक्य मोक्षमार्गे प्रत्ताः। देवभद्रा- चार्यादयोऽपि स्वस्थाने प्राप्ताः" । क्रमेण ११६७ एकादशशतपष्टिसप्ताधिकसंनत्सरे कार्तिककृष्णद्वादश्या रजन्यावरम- यामे दिननयमनगर्न विधाय मिथ्यादुष्कृतपूर्वकं नमस्कारपरावर्तनं कुर्वन्तः श्रीजिनवल्लभसरयश्चतुर्थदेवलोकं प्राप्ताः। २७. पूर्व श्रीजिनेश्वरमीणा श्रीधर्मदेवोपाध्यायस प्रतिनीभिर्गीतार्थाभिवतुमासी धरलके कृता ।क्षपनकभक्ता- छिगपत्नी बाहडपुनसहिता प्रतिनीपार्श्वे धर्मकथा श्रोतुं समागच्छति । प्रतिन्य विशेपेण धर्म कथयन्ति । ताश्च पुरुष- लक्षणं शुभाशुभं विदन्ति । तस्याः पुत्रस्य प्रधानलक्षणानि पश्यन्ति । तल्लाभनिमित्तं बह्वाक्षिपन्ति तन्मातरम् । कि- बहुना तथा भक्ता कृता यथा शिष्यत्वेन पुनं दास्यतीति । चतुर्मास्यनन्तर धर्मदेवोपाध्यायस्य स्वरूपं दत्तम्-'पान- मेकं प्राप्तमस्ति यदि युप्माकं प्रतिभास्यति । ततः शीघ्रं सुशकुनेन समागताः । दृष्टश्च यथोक्त एव । ततः शुभलने एकादशशतकचत्वारिशरसवत्सरे (सं० ११४१) सोमचन्द्रनामा पिनयो विहितः-'सर्वदागंणे ! त्वया प्रतिपाल्पः, सन बहिभूमिनयनादिकार्यमस्य कार्यम्' । एकादशशतद्वात्रिंशत्संवत्सरे (सं० ११३२) जन्माऽस्य । स्वयमेर मातृका- दिपाठोपाठि। अशोकचन्द्राचार्येणोत्थापना कृता । प्रथमतदिवसे बहिभूमौ नीतः सर्वदेवगणिना सोमचन्द्रमुनिः । शिशुत्वादज्ञानत्वादुगतचणकक्षेत्राण्यामूलात् नोटितानि । शिक्षानिमित्तं रजोहरणं मुपरखिका च गृहीता-'स्वगृह गच्छा ते गृहीते न गोटयन्त क्षेत्राणि'-"युक्तं गणिना कृतं, पर सा मम मस्तके चोटियाऽऽमीत् ता तु दापय, येन गच्छामी'ति भणिते गणेरावर्यमभूत्-'अहो! असोत्तर नास्ति' । एपा वार्ता धर्मदेवोपाध्यायसाग्रे जने । गुरंभित्रि- न्तितम्-भविष्यति योग्य एपः। २८. सर्वत्र पत्तने परिभ्राम्य परिभ्राम्य लक्षणपञ्जिकादिशास्त्राणि मणितुमारमे मोमचन्द्रः । एकदा पञ्जिका- भणनार्थ भावडायरियसमीपे गच्छन्तं दृष्ट्वा रेनाप्युद्धतेन भणितम्-'अहो सितपट ! पलिसग्रहणं किमर्थम् - 'स्व- १ श्रीजिनवालमेनोक्तम् । २ रम । ३--३ पादश्चरित , पतित , पतन् । ४ तथैवा० । ५ एव श्राद्धाना । ६ नागपुरे गता । ७ प्र० 'अनघिल्पत्तन प्राप्ता' । ८ ममा उक्तमासीत् । जिनवल्लमोऽमयदेवपदे स्थाप्य । ° नाम्नि प्र० । १० चिन्तिा कार्य। ११ तेऽप्यागता' इत्येव । १२ शकित । १३-१३ एतदद्वान्तर्गतपाटम्याने प्र० 'जिनवर मोऽमयदेवपदे म्थापित । युगप्रधानान् श्रीअभयदेवरिपादमतान् जिनवाडभसूरीन् दृष्ट्वा सर्ने दृष्टा । आचार्या सर्वे म्यम्थान प्राप्ता' । १४ नाम्नि पदमिदै प्र० । १५ ततो। १६ सर्वदेवगणे पालनाय दत्त । १७ नास्ति वाक्यमेतत् प० । १८ "गच्छेत्युक्ते शिष्येणोक्नम्' इत्येव प्र० । १९ गुरुगा। २०६० 'वीरायरिय । २१ उक्त ।

. खरतरगच्छालंकार १५ दीयमुखचूरणार्थमात्ममुखमण्डनार्थ च' । पश्चाद्गतः स न किमपि वक्तुं शक्तः । भणनस्थाने गतः। तत्रानेकेऽधिका- रिपुत्रा भणन्ति पञ्जिकाम् । सा च धर्मशाला । तत्र सोमचन्द्रोऽपि भणति । अन्यदा कदाचित्तेनाचार्येण परीक्षार्थ पृष्टं:-'भो सोमचन्द्र ! नवकारो यथार्थ नाम ?' पश्चादभाणि सोमचन्द्रेण-'मैवमाचार्या भणन्तु, किं तर्हि ? नवकरणं नवकार एवं व्युत्पत्तिः कार्या' । आचार्येण ज्ञातं वक्तुं न शक्यतेऽनेन सह । सदुत्तर एपः। अन्यदा लोचदिने न गन्तुं शकितो व्याख्याने। व्याख्यानव्यवस्थेशी-योकोऽपि छात्रो नागच्छति तदा व्याख्यानं न भाणपत्याचार्यः । ते अधिकारिपुत्रा गर्विछा भणन्ति-'तस्य स्थाने पाषाणो धृतः भाणयन्त्राचार्या व्या- ख्यानम् । तदनुरोधेन भाणितम् । द्वितीय दिने त्यागतः सोमचन्द्रो भणितवान्-'युक्तं कृतं यन्मम स्थाने पाषाणो धृतः । परं यावती पञ्जिका भाणिता तावती मां पृच्छन्तु, एतानपि; याथातथ्यां यो भणिप्यति, स न पाषाणोऽन्यः पापाण एच'। 'भोः सोमचन्द्र ! खां कस्तूरिका जानाम्येव परमेतैखेः प्रेरितो व्याख्याने, क्षन्तव्यं भवता।' २९. हरिसिंहाचार्येण सर्वा सिद्धान्तवाचना दत्ता पण्डितसोमचन्द्राय । तथा मन्त्रपुस्तिका कपलिका च दत्ता यया सिद्धान्तवाचना गृहीता, भगवता तुप्टेन । तथा देवभद्राचार्येण कटासरणं दत्तं येन महावीरचरितादि चखारि कथाशा- खाणि पट्टिकायां लिखितानि तुटेन । पण्डितसोमचन्द्रगणिग्रामानुग्राम ज्ञानी ध्यानी मनोहारी सन् विहरति यतिक- मेण श्रावकाणामतीवाह्लादकारी । ३०. एवं सोमचन्द्रे पण्डिते विहारं कुर्वति सैति श्रीदेवभद्रसूरिभिः श्रीजिनवल्लभम्ररीणां देवलोकगमनमश्रावि । अती- ३ सन्ताप उत्पन्नः । अहो सुगुरूणां पदमुयोतितमासीत् परं विघटितम् । पश्चाद् देवभद्राचार्याणामीदृशं चित्तमुदपादि- यदि श्रीजिनवल्लभम्रेर्युगप्रधानपदं योग्यस्थानेन नोद्धियते तदा का भक्तिः कृत्ता भवति । चाचिन्तयत्याचार्योऽसिन् गच्छे कस्तत्पदयोग्यः । चिन्तयतश्चित्ते पण्डितसोमचन्द्रो लम-एप एव योग्यः, श्रावकरणामानन्दकारी नानध्यान- क्रियापरवात् । पश्चात् सर्वसम्मतेन 'पण्डितसोमचन्द्रस्य लेखो दत्तः-खया चित्रकूटे समागन्तव्यम् , येन श्रीजिनवल्ल- भसूरीणां पदे निवेशयामि त्वाम् । तेपामपि सम्मतमेतत् श्रिीजिनवल्लमसूरीणाम् । यतः पूर्वमेवाकारित आसीत् । अनेके तत्पदे स्थातुमभ्युद्यता आसन् । किंबहुना सोमचन्द्रपण्डितो देवभद्राचार्या अपि समाजग्मुः। सर्वोऽपि लोको वेत्ति सामान्येन श्रीजिनवल्लभमरिपदे सूरिस्थापनं भविष्यतीति। । श्रीचित्रकूटे श्रीजिनवल्लभमरिप्रतिष्टिते श्रीमहावीरचत्ये श्रीसाधारणसाधुना श्राद्धेन पूजिते श्रीमहावीरसंघे त्वामहं श्रीजिनवल्लभमरिपदे स्थापयिष्यामि -अर्वागेव दिने पण्डि- तसोमचन्द्रं भणितवान् श्रीदेवभद्रसरिरेकान्ते-'अस्मिन् दिने परिभावितमस्ति लग्नम्' । 'युक्तमेतत् , परं यद्यस्मिन् लग्ने स्थापयिष्यथ तदा न चिराय जीवितं भविष्यति । यदी तु पण्णां दिनानामुपरि शनैश्चरवारे यल्लमं भविष्यति तत्रोप- विष्टानामस्माकं चतुर्दिक्षु विहरतां चैतुबिंधश्रीश्रमणसंघः श्रीजिनवल्लभसखिचने प्रभूतो भविष्यति । श्रीदेवभद्रसू- रिमिरमाणि-'तल्लनं न दूरे, तत्रैव भवतु' । ततस्तस्मिन्नेव दिने"-११६९ वैशाख सुदि १-चित्रकूटे श्रीजिनवल्लभमू- रिपदे विस्तरेण संस्थापिताः श्रीजिनदत्तमरिनामानः । सन्ध्यासमयं यावल्लग्नवेला, ततो पादिद्यिमानः समागता वसतौ । प्रतिक्रमणानन्तरं चन्दनकं दत्वा श्रीदेवभद्रसूरिभिर्मणितम्-'देशनां कुरुता तथा देशना सिद्धान्तोदाहरणः सुधा- १ नास्ति प्र०।२ शक्तिः। ३ पृष्टः सोमचन्द्रः। ४ इति । ५ नायाति । ६ भणत्या । ७ व्याख्यानं । ८ द्वितीयेऽहि । ९-९ किं करोम्याचार्येणोक्तमेतैमूर्खः प्रेरितः । १०.हरिचन्द्राचा० । ११-११ एतद्रकारिता पंक्तिर्नास्ति प्र० । १२ ज्ञानी ध्यानी श्राद्धानामतीवाहादकारी विहरति । १३ एवं विहरति । १४ रिणा। १५ °सूरेः। १६ 'अतीव' नास्ति । १७-१७ 'ततो गच्छे आचार्येणोपयोगो दत्तः। सोमचन्द्रो लमः, जनानन्दकारी' । १८ लेखः प्रेपितः सोमचन्द्राय । -1 एतदहिता पंक्तिर्नास्ति प्र० । १९-१९ श्रीजिनवल्लभसूरिप्रतिष्ठिते श्रीवैरचैत्ये सूरिपदे स्थापयामि । २० यदि । २१ शनिवारे। २२-२२ चतुर्विधः संघः प्रभूतो' । २३ आचाणोक्त तन्त्र भवतु । २४ दिने सरिपदे । २५श्रीआचार्येणोक्त । , खरतरगच्छालंकार सदृशैः कृता यथा सर्वाऽभयाप्रजा रञ्जिता सती भणति-'धन्या देवभद्राचार्या यरिदं सुपात्रं पात्राणां पदे निवेशितम्।' यच्छ्रीजिनवल्लभमरिमिरुक्तमस्मत्पदे सोमचन्द्रगणिर्भरद्भिः स्थापनीय इति तत्सफलीकृतम् । विज्ञप्तं च देवभद्राचार्य:- 'कतिचिदिनानि पत्तनादन्यत्र विहर्तव्यम्' । 'एवं करिष्यामः । ३१. अन्यदा जिनशेसरेण व्रतविषयेऽयुक्तं कृतं किश्चित् , ततो देवभद्राचार्येण निस्सारितः । ततो यत्र भूमी पहिर्गम्यते तत्र गत्वा स्थितः। यदा श्रीजिनदत्तमरयो यहिभूमौ गतास्तदा पादयोः पतितो भणितगान्-'मदीयोऽ- न्यायः क्षन्तव्यो पारमेकं न पुनः करिप्यामि' । कृपोदधयः श्रीजिनदत्तमूरयः । प्रवेशितः। पश्चादाचाणितम्-'न सुसावहो भवतां भविष्यति' । मूरिभिरभाणि-'श्रीजिनमल्लभरिपृष्ठे लग्नो यावदनुवर्तयितुं शक्यते तापदनुपर्त्यते । पश्चादाचादियः स्वस्थाने गताः। ३२. ततः श्रीजिनदत्तमरीणां विहारक्रमः। क क्रियते ।-देवगुरुम्मरणार्थमुपपामत्रपमझारि। ततो देवलोका- उनीहरिसिंहाचार्य आगतः। 'फिमिति सरणा कृता ?' 'जुत्र विदरामीति ।' मरुस्थलीप्रभृतिषु देशेषु विहरेत्युपदेशो जातः। तत्रय स्थितवतां मेहर-मोसर चासल-भरतादयः श्रापास्तन व्यवहारे समागताः । तत्र श्रीजिनदत्तरारिगुरु दृष्ट्वा वचनं च श्रुत्वाऽतीन मुमुदिरे। ते गुरुन्वेन प्रतिपन्नाः । भरतस्तत्रय स्थितो वाचकरवेन । अन्ये स्वस्थाने गत्वा फुटुम्येपु गुरुवर्णनं कुर्वन्ति। वनापि किश्चित् प्रवेशो जातः । ततो नागपुरे रिहनाः । तत्र धनदेवः श्रावकः प्रतिपत्ति करोति, मणति च-'यदि मदीयवंचनं करोपि तदा मपां पूज्यो भासि ।' पश्चाद् भणितं श्रीजिनदत्तसारिभिः-'भो धनदेव ! सिद्धान्ते श्राद्धन गुरुवचन विधयं न तु श्राद्धवचनं गुरुणेति भणितम् । न च वक्तव्यं परियागभागात् पूजा न भविष्यति । यत उक्तम्- मैवं मंधा यहुपरिकरो जनो जगति पूज्यतां याति । पेन धनतनपयुक्ताऽपि शकरी ग्यमानाति ।। पथाप भारितं धनदेवस्य । यधपि न मावितं नस तथापि गुरुणा युक्तमेव यनान्यं (उनामिनि) पांचिहिये. किनां भारितम् । मतोऽजयमेरो बिहनाः । नत्र ठ० आमघर मा० गमलप्रभृतिश्रापराः मन्ति । पाटदरगृह गरान्ति देवचन्दना श्रीजिनदशमग्यः । अन्यदा नमान्य आचार्य आगतः । म प पर्यायण लघुः, ना पन्य गन्छना गुग्णां ध्याहारं न करोति । ननसराऽऽगधरप्रभृतियारम्भपितम्-'रिमिनि गएना फलं यदि पुन: न प्रपनने ? मनोबन्दना- दिव्यपहारो निधृतः। ननः पापविमोमोगना-'दयाम्मा. श्रीजिनदमागपः मगुग्यः गमागताः सन्नि' | गणा- भाणि-'यपागतास्तदा भद्रम् । पापं फ्यपा' । दय! भूमिगण्टमरलोक्यने, यय देवगृह-धर्मस्थानानि धापराणा स्वदम्बमदनानि गम्पापन्ने' ! पत्रादमाणि-दधिपदिमागे यः पर्वतमम्मिमनन च यदीपन महरन । आमीपगु- रवी दर्शनीया:'-इदं सम्पं गुगुगेर मणिनवन्तः पारशः । ततो गुरुगाऽमाणि-'प्रारपिनच्यो गजाय एवं पप- मेव भगति, गुण एव नाऽऽगतम' । मारिनो मध्यदिन । आगेनोन नमम्माः कृतः गुगुम्प नेए । आशीर्वाद युगप्रधानाचार्यगुर्वाक्ली। श्रिये कृतनतानन्दा विशेपवृपसंगताः। भवन्तु भवतां भूप ! ब्रह्म श्रीधर-शङ्कराः॥ [२०] तं श्रुत्वा तुष्टो राजा । भणति 'सदैवात्र तिष्ठन्तु गुरखा' । 'युक्तमुक्तम् , परं राजन्! अस्मदीया स्थितिरेपा यत् सर्वत्रच विहारक्रमा क्रियते लोकोपकाराय । अत्रापि सदाऽगमिष्यामो यथा युष्माकं समाधानं भविष्यति तथा विधा- स्यामः। ततः समाधानेनोस्थितो राजा । पश्चाटुक्कुर आसधरो भणितः [गुरुणा]- इदमन्तरमुपकृतये प्रकृतिचला यावदस्ति सम्पदियम् । विपदि नियतोदयायां पुनरुपकर्तुं कुतोऽवसरः ।। [२१] इत्यादि तितः]स्तम्भनक-शत्रुञ्जय-उञ्जयन्त-कल्पनैया पार्श्वनाथ-ऋषभनाथ-नेमिनाथविम्बस्थानानि परिभा- वनीयानि । उपरि अम्बिका देउली, तैले च गणधरादिस्थानं चिन्तनीयम् । ३३. पैश्चाद् वागडे विहारकमः कर्तुमारब्धः। सुशकुनेन विहृतास्तत्र । पूर्वमेव तत्रत्यलोकाः श्रीजिनवल्लभसू- रिविपये समाधानवन्तः सन्तस्तदेवलोकगमनमाकर्ण्य तेषां पदे ये संस्थापिता ज्ञानध्यानगुणोपेताः श्रीमहावीरसदना- रविन्दनिर्गतस्यार्थतः सूत्रतश्च सुधर्मस्वामिगणधररचितसिद्धान्तवेदिनः क्रियापराः श्रीजिनदत्तनामानः सुगुरवो युग- प्रधानास्तीर्थकरकल्पास्तेज विहृताः श्रूयन्ते, तान् दृष्ट्वा सर्वेषां समाधानं समजनि । ततेश्च ते श्रापका यद्यत् पृच्छ-' न्ति तत्कथयन्तः केवलिन इस श्रीजिनदत्तसूरयस्तेपां समाधानमुत्पादयन्ति । ततश्च लोकाः केचन सम्यक्त्वं, केचन देशविरतिं, केचन सर्वविरतिं गृह्णन्ति तुष्टाः सन्तः। प्रतिनो वहयः कृताः। बतिन्यश्च तसिन् प्रस्तावे द्विपञ्चाशत् कृताः श्रूयन्ते । ३४. तस्मिन्नेर प्रस्तावे जिनशेसरमुपाध्यायं कृत्वा कतिचित्साधुसहितो रुद्रपल्ल्यां विहारक्रमे मुत्कलितः । स च तपः करोति । स्वजनास्तत्र वसन्तीति तेषां समाधानहेतोः । तथेदं स्वरूपं श्रीजयदेवाचायः सपरिवारैः सस्थानस्थितैः श्रुतम्-श्रीजिनवल्लभरिपदे निवेशिताः श्रीजिनदत्तसूरयः सर्वगुणोपेता अत्र देशे विहृताः । भद्रं जातम् । पूर्वमेव तेषां श्रीजिनवल्लभगणेवसतिनिवासप्रतिपत्ति श्रीमदभयदेवमूरिपार्थे कृतां श्रुखा वसतिनिवासाभिनाय उत्पन्न आमीदिदानी- मित्रागताः] अश्यन्ते सुगुरसस्ततः सपरिसारा बन्दनार्थ समाजग्मुः। वन्दिताः सविनयं श्रीजिनदत्तसूरयः। तेश्च तथा सम्भापिताः सिद्धान्तमधुरवचनैर्यर्थपरिणामोऽभूद्-भवे भन एत एप गुरयोऽस्माकं भूयासुः । पश्चाद् भव्यदिन उप- सम्पदं गृहीतवन्तः । पश्चान्न विलोकितं सनत्कुमारचक्रवत्तिमुनिरत् । श्रीजिनप्रभाचार्या अपि केरलीपरिज्ञानेन मर्वज- नप्रसिद्धाः, ते च तुरुकभूम्यां गता आसन् । एकेन तुरुप्फण ज्ञानिनो ज्ञाखा पृष्टा:-'मदीयहस्ते किमस्ति ?" तेनापि गणपित्वा कथितम्-'यदामः, सटिकासडं च बालश्च। स च वालं न जानाति । तेन दर्शितः करो । वालोऽपि सटिकायां लग्नोऽस्ति । ततस्तुष्टो हस्तं गृहीत्वा चुम्वितरान् , चङ्गा चङ्गेति कथितवान् । आचार्येण ज्ञातं दुष्टा एते भान्ति कदाचिन्मारयिष्यन्तीति रात्रौ प्रपलाय्य स्वदेशे समागताः । तत्राऽऽगतो जयदेवाचार्य वसतिमार्गप्रतिपनारं श्रीजिनदत्तरिमार्थे श्रुत्वा तस्याप्यभिप्राय उत्पन्नः। परं गाढो मार्ग एतेषाम् । केवलीपरिज्ञानेन चिन्तयति । श्रीजिन- दत्तरिरागच्छति युगप्रधानत्वेन । पुनचिन्तिते तदेवाऽऽगच्छति । तृतीयवेलाचिन्तनेऽमिपुत्रो गगिनात्पनितः, वा- गुत्थिता-यदि धर्मे प्रयोजनं तर तदाऽयं सुगुरुं प्रतिपद्य धर्म कुरु । ततोऽङ्गीकृतान् समाधानं जने" वर स्थि. १ मणितं च सदैवान स्यातव्यम् । २-२ फ्ल्पनया स्थानानि कारितानि। ३-३ नाम्ति प्र० । ४-४ एतदशान्तर्गतपाट- स्थाने-'ततो बागडे विहृतास्ते । जिनवलभरिधिपये समाधानवन्तो लोका ये ज्ञानध्यानगुणोपेत्ताम्तेषां पदे ये स्थापिताम्तेयामागमन- माकर्ण्य दृष्ट्वा च देशनां च श्रुत्वा सर्वेषां समाधानमनि' इत्येव प्र० 1 ५-५ नास्तीय पंक्ति प्र०१६ तेषां सम्बन्धिना 1 0.5 एतदस्तिपाठम्याने प्र. 'तया जयदेवाचार्य. सपरिवार. जिनदत्तमूर्यागमनं श्रुत्वा वसतिनिपामामिमायः ल.' इत्येव पाठः । ८ मयन्तु । ९ नास्ति याक्यमिदं प्र० । १० मम करे। ११ फार्य । १२ ततो गन्धोपसम्पद् गृहीता। " - . खरतरगच्छालंकार तानां श्रीजिनदत्तसूरीणामतिशयज्ञानिनां पार्थे विमलचन्द्रगणिर्देवगृहनिवासी सोऽप्याचार्ययोसति निवासप्रतिपत्ति श्रुत्वा वसतिमार्गमङ्गीकृतवान् । तस्मिन्नेव प्रस्तावे जिनरक्षित-शीलभद्रौ मात्रा सह प्रबजितौ। तथा धिरचन्द्र-परद- तनामानौ भ्रातरौ प्रवजितौ । जयदत्तनामा मुनिमत्रवादी । तस्य पूर्वजा मत्रशक्तियुक्ता आसन् । ते सर्वेऽपि रुष्टया देवतया विनाशिताः । एप पुनर्नष्टः श्रीजिनदत्तसूरीणां शरणागतो व्रतं गृहीतवान् । श्रीपूज्यस्ततो रक्षितो देवतातो । गुणचन्द्रगणिः सोऽपि श्रीजिनदत्तमरिभिर्दीक्षितः । पूर्व स ायकः सन् तुरुप्फैनीत आसीत् । हस्तदर्शनेन चङ्गी भाण्डारिको भविष्यतीति । नाशनभयात् संकलानिबद्धः । तेन च नमस्कारलक्षं गुणितम् । तत्प्रभारात् संकला स्वय- मेव त्रुटिता । ततो निर्गत्य रात्रिपश्चिमाहराधे कस्याश्चिबृद्धापा गृहे यातिष्ठन् । तया च कृपया कोष्ठिकामध्ये प्रक्षिप्त- स्तुरुकैः प्रेक्षितो न लब्धः। रात्रौ निर्गत्य स्वदेशे गतः । तेन च संवेगेन व्रतं गृहीतम् । रोमचन्द्रगणिर्जीवानन्दपुत्र- सहितोऽन्यगच्छाद्भव्यं धर्म ज्ञात्वा श्रीजिनदत्तसरेराज्ञां प्रतिपन्नः । तथा ब्रह्मचन्द्रगणितं गृहीतवान् । एतेषां मध्या- जिनरक्षित-स्थिरचन्द्रप्रभृतिसाघवः, श्रीमति-जिनमति-पूर्णश्रीप्रभृतियतिन्यश्च धारायां प्रेपिता वृत्तिपञ्जिकादिलक्षण- भणनार्थम् । तैश्च भणितं श्रापकसाहाय्येन । आत्मना श्रीजिनदत्तबरयो रुद्रपल्ल्यां विहताः । तत्र पथि गच्छतामेक- स्मिन् ग्रामे श्रावक एकः प्रतिदिनं न्यन्तरेण प्रचण्डेन पीड्यते, उस पुण्येन श्रीजिनदत्तमूरिस्तत्रैवोत्तरितः। तेन विज्ञप्त शरीरस्वरूपम् । परिभावितं सरिभिर्मत्रतत्रैः साध्यः पीडाकर्तृव्यन्तरः। ततो गणधरसप्ततिका कला, टिप्पणके लेख- यिखा, हस्ते टिप्पनकं दत्तम् , हृदयं दृष्टिश्चात्र निवेशनीया श्राद्धस्याग्रे कथितम् । तेन च तथा कृतम् । स च व्यन्तरो विस्तरेण पीडायै समागतः सदासीमाम् , न शरीरे संक्रान्तो गणधरसप्ततिकाप्रभागात् । द्वितीयदिने द्वारसीमा समाग- तस्तृतीयदिने नाऽऽगतः, श्रामकः स्वस्थो जातः, किं बहुना । रुंद्रपल्ल्यां प्राप्ताः । जिनशेसरोपाध्यायाः श्रापकः स- हिताः सम्मुसाः समाजग्मुविस्तरेण मध्ये प्रविष्टाः । विंशत्युत्तरं शतं कुटुम्बानां तत्र श्रीजिनाचने कारितम् । पार्श्वनाथ- ऋपमचैत्यद्वयं प्रतिष्ठितम् । श्रावकैः सम्यक्त्वमङ्गीकृते देशविरतिरङ्गीकृता । सर्वपिरतिष देपालगणिमभृतिभिः श्रारक सद्भिः परिगृहीता। तेषां समाधानमुत्पाद्यात्र जयदेवाचार्य प्रेपयिष्याम इति भणिला पुनः पश्चिमदेशे विहताः । ३५, वागडदेशे समायाताः तत्रापि व्याघ्रपुरे । श्रीजयदेवाचार्याः शिक्षा दरचा श्रीरुद्रपल्ल्या मुत्कलिताः । तर स्थितैश्च च चरी श्रीजिनवालमसूरिप्ररूपितश्रीचैत्यगृहविधिस्वरूपा कृता । सा च टिप्पनकै लेसयिता प्रेषिता.....यास- लप्रभृतिश्रावकाणां ज्ञानार्थम् । विक्रमपुरे देवधरपिलसहियागृहसमीपे पौषधशालाऽस्ति । तत्र श्रीजिन.......अाफैरुप- विश्योच्छोटितं चचरीटिप्पनकम् । 'चचरीटिप्पनकं कचरीटिप्पनक' भणिखा मदोन्मत्तेन देवधरेण हस्तादुद्दाल्य द्विधा कृतम् । तस्य किमपि कतुं न शक्नुवन्ति । पितुरग्रे वार्ता कथिता । तेनोक्तम्-गाढ एपः, तथापि धारयिष्यामः । पुनरपि पूज्येभ्यो लेसो दत्तस्तत्र चचरीटिप्पनरुवरूपं लिसितम् । श्रीपूज्यलेंगस्वरूपं परिभाव्य द्वितीयटिप्पनकं प्रेषितम् , लेसथ प्रेषितः । इदं च लिखितम्-देवधरस्योपरि निरूप न भणनीयम् , देवगुरुप्रसादाद्भन्यो मरिष्यति । द्वितीय- टिप्पनकं प्राप्त तेपाम् । प्रतिपत्त्योच्छोटित याचितं समाधानं जज्ञे । देवघरेण चिन्तितम् यद्यपि मया स्फाटितं टिप्पनऊं तथापि पुनरपि प्रेषितम् , कारणेन भवितव्यम् । किं तत्राग्लेखि प्रच्छन्नं परिमारयाम्येकान्ते। यदा श्राद्धाष्टिप्पनक स्थापनाचार्यालके मुक्त्वा द्वारं स्थगयित्वा गतास्तदोपरि पाटकै स्वगृहात प्रविश्य पहिार म्पगितेऽपि टिप्पनकं गृहीवम् । वाचयितुं प्रवृत्तः । यथा यथार्थानवधारपति तथा तथा मनस आहाद उत्पद्यते । अनापतनं निम्बम् , स्त्री पूजा न १ 'गुरूणा' इत्येव प्र०। २ विमलचन्द्राचार्य चैत्यवासिभिर्वसतिगासोऽशीत. । ३-३ एतदशारिता पतिनाति प्र। ४-४ एतदतिपाठसाने म० गुणचन्द्र सोऽपि दीक्षित । पूर्व पाद्धसन् तुरकै वो हम्मदर्शनाद मत्र्यो माटारि भविष्यति । नाशनमयासंकल्या पद्धः । नमस्कारलक्षं गुणितं । संकला स्वयमेव धुटिता । रात्री निर्मात्य स्वदेशे गतौ गुरु दृष्ट्या संवेगेन मत गृहीतम्। इत्येप पाठो लम्यते । ५-५ नास्ति पंक्तिरियं प्र०।६-६ ततो बिनाः। ७-७ एतदद्धारित प्रारण नास्ति ।

-- " " युगप्रधानाचार्यगुर्वावली । करोतीति सन्देहद्वयं प्रच्छनीयमन्यत्सर्व भव्यम् । पश्चाद् यत् कथयिष्यति तत् करिष्यामि। अग्रे श्रीपूज्यैर्वागडदेशे स्थितर्ये धारायां प्रेपिता आसन् ते सर्वेऽप्यानायिताः, सिद्धान्तं श्राविताः । ततः स्वदीक्षितो जीवदेवाचार्यों मुनीन्द्र- पदै निवेशितः । तथा दश वाचनाचार्याः कृताः । वाजिनचकित (चन्द्र ?) गणिः, वा० शीलभद्रगणिः, वा० स्थिर- चन्द्रगणिः, वा० ब्रह्मचन्द्रगणिः, वा० विमलचन्द्रगणिः, वा० वरदत्तगणिः, वा भुवनचन्द्रगणिः, या० वरणागगणिः, पा० रामचन्द्रगणिः, वा. माणिभद्रगणिरेते दश । श्रीमति-जिनमति-पूर्णश्री-जिनश्री-ज्ञानश्रियः पञ्च महत्तराः। हरिसिंहाचार्याणां शिप्यो मुनिचन्द्राभिध उपाध्याय आसीत् , तेन जिनदत्तमरिः प्रार्थित आसीद्-यदि कश्चिन्मदीयः शिष्यो भवतां समीपे समागच्छति योग्यस्तदाऽऽचार्यपदं दातव्यमेवं प्रतिपन्नम् । तस्य शिष्या जयसिंहनामा चित्र- कूटे मुनीन्द्रपदे निवेशितः । तस्यापि शिप्यो जयचन्द्रनामा पत्तने समवसरणे मुनीन्द्रपदे स्थापितः। भणितं द्वयोर- प्यग्रे-रीत्या प्रवर्तितव्यम् । तथा जीवानन्द उपाध्यायपदे निवेशितः। यद्याचार्योपाध्यायवाचनाचार्यपदानां प्रत्येक स्थानादिविशेपो भण्यते तदा विस्तरो भवति तेनेकत्रैव भणितम् । सर्वेषु पदस्थेषु शिक्षा दत्वा विहारादिस्थानानि भणित्वा स्वयमजयमेरो विहृताः । विस्तरेण प्रवेशो जातः । ३६. ततः श्रावकश्चैत्यगृहनयाम्बिकास्थानानि पर्वते प्रगुणीकारितानि । ततः श्रीजिनदत्तसूरि शोभने लगे देव- गृहेषु मूलनिवेशे वासान् प्रक्षिप्तवान् । ततः शिसरादिनिवेश कारितवन्तः श्रावकाः । ततो विक्रमपुरे सहियापुत्र- देवधरेण स्वकुटुम्वानां पञ्चदश श्रावकसमुदायं कृत्वा स्वपितृश्रेयोऽर्थम् , आसदेवादयः श्रावका भणिताः-मयान श्रीजिनदत्तसूरयो विहारक्रम कारयितव्याः। तस्याग्रे कोऽपि किमपि भणितुं न शक्नोति। श्राद्धसमुदायेन निर्गतो नागपुरे प्राप्तः। ३७. तस्मिन् प्रस्तावे तत्र देवाचायों विशेषेण प्रसिद्धो वर्त्तते । देवधरोऽपि प्रसिद्धो विक्रमपुरादागतः श्रुतः । पश्चा- देवगृहे व्याख्यानप्रस्तावे देवाचार्य उपविष्ट आस्त । देवधरोऽपि पादप्रक्षालनादिशौचं कसा देवगृहे गतः । आचार्यों यन्दितस्तेनापि क्षेमवार्ता पृष्टा । ततः प्रथमत एव देवधरेण पृष्टः-'भगवन् ! यत्र रात्रौ देवगृहे स्त्रीप्रवेशादि प्रवर्तते तत्कीदृशं चैत्यं भण्यते ।" इति प्रश्नकृते चिन्तित देवाचार्येण-कश्चिजिनदत्ताचार्यमन्त्रोऽस्य कर्णे प्रविष्टोऽतस्तद्वा- सित इव लक्ष्यते' इति विचिन्त्योक्तम्-'श्रावक ! रात्री स्त्रीप्रवेशादिकं संगतं न भवति । देवधरः-'तर्हि किं न वार्यते ?' आचार्यः प्राह-'लक्षसंख्यलोकानां मध्ये को वार्यते ।' देवधरः-'भगवन् ! यत्र देवगृहे जिनाज्ञा न प्रवर्तते, किं तर्हि जिनाज्ञानिरपेक्षः स्वच्छया जनो वर्तते, तजिनगृहं जनगृहं वा प्रोच्यत इति प्रतिपादयध्वं यूयम्' । आचार्यः- 'यत्र साक्षाझिनोऽन्तनिविष्टो दृश्यते तत्कथं जिनमन्दिरं नोच्यते ?' | देवघर:-'आचार्य ! वयं तावन्माः, परमेतद् वयमपि जानीमो यदुत यत्र यस्याज्ञा न प्रवर्तते तद्गृहं तदीयं नोच्यते । एवं च पापाणरूपाईद्विम्बमात्रान्तनिवेश- नेन मगादानापरिहारेण खेच्छया व्यवहारे कथं नाम तजिनमन्दिरमुच्यते । परमेवं जानाना अपि यूयं प्रवाहमार्ग न निवारयध्ये प्रत्युत पोपयध्ये, तदेते वन्दिता अनुज्ञापिताय मया यूयम्-यत्र तीर्थराज्ञा प्रवर्तते स मागों मपाऽभ्यु- पेतन्या'-इत्यभिधायोत्यितो देवधरः। सहानीतस्व कुटुम्बरूपश्रामकाणां जातं स्थिरीकरणं रिधिमार्गविपये। प्राप्तः श्रावकममुदायमहितोऽजयमेरौ । वन्दिता भावसारं श्रीजिनदत्तमुग्यमदभिप्रायारगमपूर्वकं कृता पूज्यर्देशना । जानो- जो निम्मन्देहः । अभ्यर्थिताः प्रमः श्रीविक्रमपुरविहारं प्रति । ततो विस्तरेण तर देवगृहपिम्याम्बिकागणधरादि- प्रतिष्ठां विधाप समागताः श्रीदेवघरेण मह विक्रमपुरं । प्रोधितम्तत्रत्यो जनो पहः । म्यापिता श्रीमहापरिप्रतिमा । ३८. नत्र उचायां गल्छतामन्तराये भूतादयस्तेऽपि प्रतियोधिताः । किं पुनरुपीयलोकः। तनो नाहरे बिहनाः । ततरिमपनगिरी, प्रतियोषितस्तत्र मारपालो नाम राजा । कृतम्तर अनुग्तरपतिजनविहारः । प्रतिष्ठिनो भगान् शान्ति नायदेवः । तयोपिन्या रिहारेण प्रतियोधितं पूज्ययोगिनीचक्रम् । तदाश्रीनिपटप्रोगके दुटरपगनाय सम्मु- २० खरतरगच्छालंकार खीकृतो रश्मियद्धः कृष्णभुजङ्गमः । ततो मन्दीभूतानि गीतवादित्रादीनि । श्रावका अद्याऽहो न सुन्दरमिति जाता: सविपादाः । ततः प्रोक्तं ज्ञानदिवाकरः श्रीजिनदत्तरिभिः-'भो किमेवं विमनस्का यूयम् ? यथैप कृष्णभुजङ्गो रश्म्या यद्धः, एवमन्येऽपि ये केचनास्मदुष्टास्तपां वन्धनं पतिप्यतीति प्रेरयिताऽतीय सुन्दरं शकुनमेतत् । पुनरग्रतो गच्छता दुष्टैरेका कृत्नासिका दुनिमिचविधानाय प्रेपिता । सा चाग्रतः स्थिता दृष्टा पूज्यपादैर्जल्पिता च यथा 'आई! भल्ली ततस्तया दुष्टरण्डया दत्तं प्रतिवचो यथा 'भल्लइ धाणुक्का मुक्की' । पुनरुक्ता किञ्चिद्विहस्य सप्ततिभैः श्रीपूज्यैर्यथा- 'पक्खहरा तेण तुह छिना । ततः सा गयविलक्खा उत्तर निक्खुट्टी (१) । इत्यनेकाचर्यनिधानानां निरन्तरं किरैरिव सुरैः सर्वदोपास्यमानपादानां करुणासमुद्राणां धारापुरी-गणपद्रादिस्थानेषु प्रतिष्ठितवीरपार्श्वशान्त्यजितादितीर्थकृद्धिम्व- देवगृह-शिखराणां स्वज्ञानवलदृष्टनिजपट्टोद्धारका रिरासलाङ्गहाणां भास्करवद्विवोधितभुवनमण्डलभच्याम्भोरुहाणां श्रीजिनदत्तसूरीणां चरित्रलेशः प्रतिपादितः। ततो महता विस्तरेण श्रीचित्रकूटे प्रविष्टाः । ततः श्रीजिनविम्वप्रतिष्ठादि- महामहोत्सवाः कृताः । ततः सं० १२०३ अजयमेरौ फाल्गुन सुदी ९ जिनचन्द्रसरिदीक्षा। सं० १२०५ वैशाखशुक्ल- पष्ठयां विक्रमपुरे, इतरजनदुःसाध्पध्यानतपोबलावलोकितानवद्यविद्यामत्रतत्रयात्रप्रभावैचिन्तामणिगणायमाना:-चिन्ता- मणिगणा इवाचरन्ति चिन्तामणिगणायन्ते, चिन्तामणिगणायमाना उपदेश्या येषां ते तथा तैर्देशः-श्रीजिनदत्तरिभिः स्वकीयपदे सा० रासलकुलव्योममण्डलायमाननववर्षवयोमानवियुधजनमनोहारिसौभाग्यभाग्यारोग्यादिगुणगणनिधान- श्रीजिनचन्द्रसरय उपवेशिताः । सं० १२११ आषाढ यदि ११ जिनदत्तसूरयो दिवं गताः । ३९. सं० १२१४ श्रीजिनचन्द्रसूरिभित्रिभुवनांगरौ श्रीशान्तिनाथशिखरे सजनमनोमन्दिरे प्रमोदारोपणमिव सौवर्णदण्डकलशध्वजारोपणं महता विस्तरेण कृत्या, हेमदेवीगणिन्याः प्रवर्तिनीपदं दत्त्वा, मधुराया यात्रां कृत्वा, सं० १२१७ फाल्गुनशुक्लदशम्यां पूर्णदेवगणि-जिनरथ-वीरभद्र-धीरजय-जगहित-जयशील-जिनभद्रैः सार्ध श्रीजिनप- तिम्ररयो दीक्षिताः । सा० क्षेमन्धरः प्रतियोधितः । वैशाखशुक्लदशम्यां मरुकोट्टे चन्द्रप्रभस्वामिविधिचैत्ये साधुगोल्लक- कारितसौवर्णदण्डकलशध्वजारोपणं कृतम् । तत्र च सा० क्षेमन्धरेण पारुत्थद्रम्मशतपञ्चकेन माला गृहीता। सं० १२१८ उच्चायां ऋषभदत्त-विनयचन्द्र-विनयशील-गुणवर्धन-वर्धमानचन्द्रसाधुपञ्चकं जगश्री-सरस्वती-गुणश्रीसाध्वी- अयं च दीक्षितम् । अनेन क्रमेण साधवो यह] कृताः । सं० १२२१ सागरपाटे सा० गयधरकारिता श्रीपार्श्वनाथ- विधिचत्ये देवकुलिका प्रतिष्ठिता । अजयमेरौ श्रीजिनदत्तमरिस्तूपः प्रतिष्ठितः । वन्वेरके च वा० गुणभद्रगणि-अभय- चन्द्र-यशश्चन्द्र-यशोभद्र-देवभद्रा दीक्षिताः । देवभद्रभार्याऽपि दीक्षिता । आशिकायां नागदत्तस्य वाचनाचार्यपदं दत्तम् । महावने श्रीअजितस्वामिविधिचैत्ये प्रतिष्ठा देवनागकारिता । इन्द्रपुरे शान्तिनाथविधिचत्ये सौवर्णदण्डकलश- प्रतिष्ठा वा० गुणभद्रगणिपितामहलालेश्रावककारिता । तग(?)लाग्रामेऽजितस्वामिविधिचत्यं प्रतिष्ठा च । कृताश्च सर्वा अपि श्रीजिनचन्द्रमरिभिः। सं० १२२२ बादलीनगरे श्रीपार्श्वनाथभवने वा० गुणभद्रगणिपितामहलालेश्रावकका- रितसौवर्णदण्ड-कलशौ प्रतिष्ठाप्याम्बिकाशिखरयोग्यं सौवर्णकलशं च प्रतिष्ठाप्य, रुद्रपल्ल्यां विहताः। ततोऽपि परतो नरपालपुरे कचिज्ज्योति शास्त्रसम्यक्षरिज्ञानाभिमानादागत ज्योतिपिकं घृपलमसत्कैकोनविंशात्रिंशांशे मृगशीर्षमुहूर्त पदसप्तत्यधिकवर्षशताचलस्थित्यवधिप्रदानप्रतिज्ञया श्रीपार्धनाथदेवगृहपुरतो रझायामकां शिला स्थापयिता जितवन्तः । तच्छिलोपरितना भित्तिरद्यापि तथैव वर्तते । ४०. पुनरपि रुद्रपल्ल्यां विहृताः । तत्र चान्यदा कदाचिन्मुनिमण्डलीमण्डितपार्थदेशाधघुवयसो बहिर्भूम्यां गच्छ- ताश्रीजिनचन्द्रसूरीन् दृष्ट्वा श्रीपाचन्द्राचार्यों मत्सरवशात् पृच्छति स्म-'आचार्यमिश्राः ! यूयं मद्राः स्य ? श्रीमत्पू- ज्पैरुक्तम्-'देवगुरुप्रसादाद' । पुनरपि स प्राह 'साम्प्रतं किं किं शाखं वाच्यमानमस्ति ? पार्श्वस्थेन मुनिना मणितम्- 'साम्प्रतं श्रीमत्पूज्या न्यायकन्दली चिन्तयन्ति । स प्राह-'आचार्यमिश्राः ! तमोवादचिन्तितः ?' श्रीपूज्यरक्तम्- . युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। 'चिन्तितः । स प्राह 'हृदयेऽवगतः श्रीमत्पूज्यैरुक्तम्--'अवगतः । स प्राह 'तकि तमो रूपविशेषमेव " श्रीपूज्यै- रुक्तम्-'ननु भवतु स्वखरूपेण यादृशं तादृशं तमः, परं वादव्यवस्थया राजसभायां प्रधानसभ्यसमक्षं वादिना कदापि कीदृशं स्थाप्यते, नतु स्थापनामात्रेण वस्तु स्वस्वरूपं त्यजति' । पुनरपि स माह-'मा त्याक्षीत् स्थापनामात्रेण वस्तु स्वख- रूपम् , परं परमेश्वरैतीर्थकरैस्तमो द्रव्यमेवोक्तम् । श्रीपूज्यैरुक्तम्-'को नाम न मन्यते द्रव्यत्वं तमसः। परमाचार्य- दपिष्ठ! प्रतिवादी यथा तथा जितो विभीय (?) । तदनन्तरं कोपावेगाद्रक्तीभवनेत्रः कम्पमानगात्रः सन् स इदमाह- 'प्रमाणरीत्या द्रव्यमेव तम इति स्थापयति सति मयि, तव योग्यताऽस्ति सम्मुखी भवितुम् ?' श्रीपूज्यैरुक्तम्-'कस्या- ऽपि योग्यताऽस्ति, कस्याऽपि नास्तीति ज्ञायते राजसभायाम् । पशुप्रायाणामेवारण्यं रणभूमिः । तथाऽचार्य ! माऽस्मान् लघुवयसो दृष्ट्वा खशक्तिं स्फोरय; लघुरपि सिंहः पर्वतसमानोपममतगजानुत्रासयति । एवं च विवदतां तेपां कौतुकदर्शनार्थ मिलितः सर्वोऽपि नागरिको लोकः । उभयभक्तश्रावकाच निजनिजाचार्यपक्षपातेन परामहङ्कार- कोटिमारूढाः । किम्बहुना राजलोकसमक्षं व्यवस्थापत्रे लिखिते सति सावष्टम्मेषु च श्रीजिनचन्द्रमरिपु सत्सु, वाद- वार्तयाऽपि भग्नं श्रीयनचन्द्राचार्य दृष्ट्वा सर्वलोकसमक्ष राजलोकैर्दत्तं जयपत्रं श्रीजिनचन्द्रसूरीणाम् । जयकारथके। लोके महती प्रभावना संजाता जिनशासने । महानन्दभरनिर्भरैश्च श्रावकैवहद्वर्धापनकं कारितम् । तदनन्तरं श्रीपूज्य- भक्तश्रावका 'जपतिहट्ट' इति नाम्ना प्रसिद्धिं गताः । पाचन्द्राचार्यभक्ताश्च श्रावकाः सर्वैरपि लोकैस्तय॑माना हस्य- मानाः 'तर्कह' इति नाम्ना प्रसिद्धिं गताः । अनया रीत्या कानिचिद्दिनानि खित्वा, सिद्धान्तोक्तविधिना सुमार्थन सह ततः प्रचलिताः। ४१. मागे च चौरसिंदानकग्रामसमीप उत्तरितः संघातः । तत्र च म्लेच्छभयादाकुलीभृतं संघातलोकं पृष्ट्वा श्रीपूज्यैरुक्तम्-'किमिति भो! यूयमाकुलीभूताः ?' तैरुक्तम्-'प्रभो ! म्लेच्छकटकमागच्छदस्ति, पश्यता- ऽसां दिशि गगनतलावलम्बिनीं धूलिम् , शृणुत निखानशब्दम् । श्रीपूज्यैरवधानं दत्वा भणितम्-'अहो साथिक- लोका ! विश्वस्तीभवत, सर्वमपि वस्तु यूपभादिचतुप्पदादिकमेकत्र कुरुत, प्रभुश्रीजिनदत्तमरिभलिप्यति । तदनन्तरं श्रीपूज्यमन्त्रध्यानपुरस्सरं निजदण्डकेन संघातकम्य चतुर्दिक्षु कोष्ठाकारा रेखा कृता । सार्थलोकश्च सर्वोऽपि गोणीपू- पविष्टः । संघातनिकटदेशे वहमानान तुरगाधिरूढान् सहस्रसंख्यान म्लेच्छान् पश्यति, म्लेच्छाच संघातं न पश्य- न्ति, केवलं कोर्ट पश्यन्तो दूरं गताः । निर्भये सति ततः स्थानात् प्रचलितान् पृष्ठग्रामे संघातेन सहाऽऽगतान् श्रीपू- ज्यान शुसा दिल्लीवास्तव्य ठ० लोहट-सा० पाल्हण-सा० कुलचन्द्र-सा० गृहिचन्द्रादिसंघमुख्यश्रावका महता विस्तरेण बन्दनाथं सम्मुसं प्रचलिताः । तांश्च प्रधानपान् प्रधानपरिवारान् प्रधानवाहनाधिलदान दिल्लीनगराद्धहिर्ग- छन्तो दृष्ट्या स्वप्रसादोपरि वर्तमानः श्रीमदनपालराजा विस्मितः सन् स्वकीयराजप्रधानलोकं पप्रच्छ-'किमित्येप नगरवास्तव्यलोकः सर्वोऽपि पहिर्गच्छति ?' रामप्रधानरुक्तम्-'देव ! अतीवरमणीयरूपोऽनेकशक्तियुक्तो गुरुरेषा समागतोऽस्ति । तस्य सम्मुस भक्तिवशाधान्यते । तदनन्तरं कुतूहलिनतेन राजोक्तम्-'महामाधनिक ! प्रगुणय पट्ट- तरगम, वादय च काहलिकहस्तेन काहलां यथा सोऽपि राजलोकः प्रभूय प्रभ्य शीघमत्राऽऽगच्छति' । आदेशान. न्तरं सहस्रसंख्यपोटकाधिरूढसुमटरलंक्रियमाणः श्रीमदनपालराजा श्राश्कलोकान् प्रथममेव श्रीपूज्यानां पार्थे गतः । चत्र घ सार्थमध्यसितलोकः प्रभूतढौकनिकदानपुरस्सरं राजा ज्योत्कृतः; श्रीपूज्यश्च कर्णमुसफारिण्या घाण्या धर्मदे- शना कृता । राज्ञा चोक्तम्-'आचार्याः ! युतः स्थानायूयममाऽजाताः ?" श्रीपूज्यरुक्तम्-'स्द्रपालीतः । रामोक्तम्- 'आचापः ! उचिष्ठत यूयम् , पवित्रीहरुत मदीयं नगरम् । श्रीपूज्यः प्रसश्रीजिनदत्तरिदत्तोपदेशम्मरमान किमपि भगितम् । पुनरपि राज्ञोक्तम्-'आचार्याः । किन त यूपम् , कि मदीये नगरे पुप्मा प्रतिपयी कथितत ?, आहो- १ 'सक्तः ।

. २२ खरतरगच्छालंकार श्चित् परिवारोपयोग्यन्नपानादि न लभ्यतेऽथवान्यत्किमपि कारणं वर्तते यद्यूयं मार्गमुख आगतमपि मदीयं नगर परिहत्याऽन्यत्र जथ ?' श्रीपूज्यैरुक्तम्-'महाराज! युप्मदीयं नगरं प्रधान धर्मक्षेत्रम् । 'तीचिष्ठत चलत डिल्ली प्रति, न कोऽपि युप्मानङ्गुलिकयापि संज्ञास्यतीत्यादि । 'श्रीमदनपालमहाराजोपरोधाद् युष्माभियोगिनीपुरमध्ये कदापि न विहर्तव्यमित्यादिश्रीजिनदत्तमरिदत्तोपदेशत्यागेन हृदये द्यमाना अपि श्रीपूज्याः श्रीढिटी प्रति प्रस्थिताः। राधमानासु चतुर्विशतिषु निखानयुगलीपु, विरदावली पठत्सु भट्टलोकेषु, धक्लेषु दीयमानेषु, बसन्तादिमाङ्गलिक्य- रागेण गायत्सु गापनेपु, नृत्यमानासु नर्तकीपु, अाकृतेप्वालम्बसहस्रेषु, मस्तकोपरि ध्रियमाणछत्रैलक्षसंख्यलोकैर- नुगम्यमानैः श्रीमदनपालमहाराजदत्तहस्तैः श्रीजिनचन्द्रहरिभी राजादेशात्कृततलिकातोरणादिमहाशोभे श्रीयोगिनीपुरे प्रवेशः कृतः। ४२. तत्र चान्यदा कदाचिदत्यन्तभक्त कुलचन्द्रश्रावकं दुर्बलं दृष्ट्वा करुणाहृदयैः श्रीपूज्यदचो द्रवरूपीकृत- कुङ्कुमकस्तूरिकागोरोचनादिसुरभिद्रव्यलिखितानकमत्राक्षरो यत्रपटः, भणितं च तस्याग्रतः-'महानुभावकुलचन्द्र ! निजमुष्टिप्रमाणसिरेप पटो दिने दिने पूजनीयः, निर्माल्यीभूताचते वासाः पारदादिसंयोगात् सुवर्णा भविष्यन्ति । स च गुरुपदिष्टरीत्या पटं पूजयन कोटीध्वजः सञ्जातः । ४३. अन्यदोत्तरप्रतोल्या पहिभूमौ गच्छद्धिः श्रीपूज्यैर्महानवमीदिने मांसनिमित्तं मिथ्यादृष्टिदेवताद्वयं महासंर- म्भेण युध्यमानं दृष्ट्वा करुणयाऽधिगालिनाम्नी देवता प्रतिबोधिता। तया चोपशान्तचित्तया श्रीज्या विज्ञप्ता:- भग- वन्तो! मया परित्यक्तो मांसपलिः, परं मम किश्चिद्वासस्थानकं दर्शयत यथाऽहं तत्र स्थिता युप्मदादेशं प्रतिपालयामि। श्रीपूज्यैस्तदग्रतो [भणितम्-] 'महानुभावे! श्रीपार्श्वनाथविधि,त्ये प्रविशतां दक्षिणस्तम्भ त्वयाऽवस्थातव्यम्' इत्युक्ता पौपधशालायां चाऽगत्य सा० लोहड सा० कुलचन्द्र सा० पाल्हणादिप्रधानश्रावकाणामधे कथितम् यथा-'श्रीपाच- नाथप्रासादे प्रविशतां दक्षिणस्तम्भेऽधिष्ठायकमूर्तिमुत्कारयतैति' । आदेशानन्तरं श्राद्धस्तथैव सर्व कारितम् । महावि- स्तरेण श्रीपूज्यैस्तत्र प्रतिष्ठा कृता । 'अतिबल' इति नामाऽधिष्ठायकस्य कृतम् । श्रावकच तस्य महान् भोगः कर्तु पारेमे । अतिगलोऽपि श्रावकाणां वाञ्छितं पूरयितुं प्रवृत्तः। सं० १२२३ समस्तलोककृतक्षामणापूर्वकमनशनविधिना द्वितीयभाद्रपद वदी १४ देवीभूताः श्रीजिनचन्द्रसूरयः । ४४. तदनन्तरं श्रापकर्महाविस्तरेणानेकमण्डपिकामण्डिते विमान आरोप्य 'यत्र काप्यामाकं संस्कारं करिष्यत यूयं तावती भूमिका यावनगरवसतिर्मविप्यती' त्यादिगुरुवास्यस्मृतेरतीव दूभूमौ नीताः। तत्र च भूमौ धृतं श्रीपूज्यविमानं दृष्ट्वा जगवयानन्ददायकश्रीपूज्यगुणस्मरणात् समुच्छलत्परमगुरुस्नेहाच- चातुर्वर्ण्यमिदं मुदा प्रयतते त्वद्पमालोकितुं, मादृक्षाश्च महर्पयस्तव वचः कर्तुं सदैवोद्यताः। शक्रोऽपि स्वयमेव देवसहितो युप्मत्प्रभामीहते, तकि श्रीजिनचन्द्रसूरिसगुरो! स्वर्ग प्रति प्रस्थितः ।। [२२] साहित्यं च निरर्थकं समभवप्निलक्षण लक्षण, मन्त्रैर्मन्त्रपरैरभूयत तथा कैवल्यमेवाश्रितम् । कैवल्याज्जिनचन्द्रसूरिवर ! ते स्वर्गाधिरोहे हहा! सिदान्तस्तु करिष्यते किमपि यत्तन्नैय जानीमहे ।। [२३] १-१ एतदन्तर्गतं प्रकरणं नास्ति प्र० ।

• युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। २३ प्रामाणिकैराधुनिकैविधेयः, प्रमाणमार्गः स्फुटमप्रमाणः । हहा ! महाकष्टमुपस्थितं ते, स्वर्गाधिरोहे जिनचन्द्रसूरे ! ।। [२४] इत्यादि मणिसा बृहदसमाधानवशादुच्चैःस्वरेणाऽथुपातं कर्तुं प्रवृत्तः प्रवर्तकसाधुगुणचन्द्रगणिः । तदनन्तरमित- रेऽपि साधयो निजगुरुस्नेहविह्वलाः परस्परपराङ्मुखीभूयाश्रुपातं कर्तु लग्नाः, श्रापका अपि प्रच्छादिकाश्चलं नेत्रयो- स्ने दत्त्वा तथैव भावं कर्तुं प्रवृत्ताः । क्षणान्तरे तादृशमसमजसं दृष्ट्वा स्वयं धैर्यमवलम्ब्य च-'भो ! भो ! महासत्याः साधयो! माउसमाधानं कुरुत, श्रीपूज्यैर्मम सर्वाऽपि शिक्षा दत्ताऽस्ति, यथा युष्मन्मनोरथाः सेत्स्यन्ति तथा विधास्ये- ऽतो मम पृष्ठलग्ना यूपमागच्छत' इत्याश्वास्य सर्वसाधुसमेतः कृतकर्तब्यक्रियाकलापः समाजगाम पौपधशालायां सर्व- जनमान्यो भाण्डागारिकगुणचन्द्रगणिः । कतिचिदिनानन्तरं चतुर्विधसंघसमेतः श्रीवब्बेरके विहृतः। ४५. तत्र च सं० १२१० विक्रमपुरे जिनपतिहरेर्जन्म, सं० १२१७ फाल्गुन शुक्लदशम्यां व्रतम् , सं० १२२३ कार्तिकसुदि १३ अनेकदेशसमागतानेकसंघसम्मत्या प्रधानशकुनप्रेरणया श्रीजिनदत्तसूरिपादोपजीविश्रीजयदेवाचार्य- हस्तेन श्रीजिनचन्द्रसारिपट्टे चतुर्दशवर्षप्रमाणः पत्रिंशदाचार्यगुणालङ्कतो महाप्राज्ञो नरपतिनामा क्षुल्लको महता महोत्स- वेनोपवेशितः श्रीजिनपतिम्ररिरिति नाम कृतम्।। तस्य च द्वितीयस्थानीयः श्रीजिनचन्द्रसूरिवाचको मुनिः श्रीजिनम- काचार्यनामाऽऽचार्यः कृतः। तत्र च तत्रत्यसमुदायसहितेन सा० मानदेवेन देशान्तरीयसमुदायसत्कारपूर्वकं सहस्रसं- ख्यद्रव्यव्ययेन महामहोत्सवः कारितः । तत्रैव स्थाने श्रीजिनपतिसूरिभिः पद्मचन्द्र-पूर्णचन्द्रयोर्वतं दत्तम् । सं०१२२४ विक्रमपुरे गुणधर-गुणशीलयोः पूर्णरथ-पूर्णसागरयोरिचन्द्र-वीरदेवयोः क्रमेण दीक्षानन्दित्रयं कृतम् । जिनप्रि- यस्य चोपाध्यायपदं दत्तं श्रीजिनपतिसरिभिः। सं० १२२५ श्रीपूज्यैः पुष्करिणां सभार्यस्य जिनसागरस्य जिनाकर- जिनबन्धु-जिनपाल-जिनधर्म-जिनशिष्य-जिनमित्राणां बतं दत्तम् । पुनर्विक्रमपुरे जिनदेवगणिदीक्षा। सं० १२२७ श्रीपूज्यैरुचायां धर्मसागर-धर्मचन्द्र-धर्मपाल-धनशील-धर्मशील-धर्ममित्राणां धर्मशीलमातुश्च व्रतम् , जिनहितस्य वाचनाचार्यपदं दत्तम् । तथा मरुकोट्टे शीलसागर-विनयसागरयोः, शीलसागरभगिन्यजितश्रीगणिन्या व्रतं दत्तम् । सं० १२२८ सागरपाटे दु० सा(दुसाझ १) साढलसेनापत्याम्बडकारिता अजितस्वामि-शान्तिनाथचैत्ययोः प्रतिष्ठा कृता च श्रीपूज्यैः । तत्रैव वर्षे यन्बेरके बिहारः । आसिकापां चाऽऽसिकासमीपपर्तिग्रामागतान् श्रीपूज्यान् श्रुला प्रमोदाति- शयादासिकावास्तव्यसमुदायेनाऽऽत्मना साधं श्रीभीमसिंहनामा राजाऽपि सम्मुखमानीतः। तत्र च सर्वातिशायिरूपान् लघुवयसः श्रीपूज्यान् दृष्ट्वा हर्षप्रकर्षाच्छ्रीमीमसिंहभूपतिः कुशलवार्ताप्रश्नव्याजेन जिहापाटवदर्शनकुतूहलादालापया- मास । श्रीपूज्यैश्व राजनीत्युपदर्शितद्वारेण विसरेण धर्मदेशना कृता । लब्धावसरेण राज्ञा कैलिवशादुक्तम्-'आचार्य ! अस्माकं नगरे महाविद्वान् दिगम्बरो वर्तते वेन साधं वादं ग्रहीप्यसि ?" पार्थोपविष्टेन श्रीजिनप्रियोपाध्यायेनोक्तम्- 'महाराज ! अम्माकं दर्शन उपेत्य केनापि सह वादो न क्रियते, परं यदि कदापि कोऽपि पण्डितमानी स्वशक्ति स्फोरयन् जैनदर्शनं वावहेलपन्नसानुद्वैजयति तदा पश्चाद् न भ्यते, किंबहुना यथातथा तस्मिन्निर्लोटित एवाऽसार्क शरीरे मुरां भवति । श्रीपूज्यानुद्दिश्य राज्ञोक्तम्-'आचार्य । एवम् ?' श्रीपूज्यरुक्तम्-'महाराज ! एवमेव' । पुनरप्यु- पाध्यायेनोक्तम्-'महाराज ! ज्ञानबाहुल्येनासद्गुरव एव समर्थाः, परं दर्शनमर्यादया जानामिमानं न कुर्वन्तोऽपि दर्शनपिप्लयकारिणं प्रतिवादिनं स्वशत्या सकललोकममक्षं मानपर्वतादुत्तार्य मुश्चन्ति' । राजोक्तम्-'आचार्य! किमय- माचष्टे युप्माकं पण्डितः ? श्रीपूज्यरक्तम्-'महाराज! शानं मददर्पहरं माद्यति यस्तेन तस्य को वैद्यः । अमृतं यस्य विपायति तस्य चिकित्सा कथं मियते ॥१॥ [२५] १५० 'सायवः साध्य अत्र ५ पत्रात्मकं प्रत्यन्तरं समाप्तं भवति ।

२४ खरतरगच्छालंकार इत्यादिदेशनया गाढतरमावर्जितो राजोक्तवान्-'आचार्य ! किमिति विलम्बः क्रियते १; नगरप्रवेशेऽपि वृहती चेला लगिप्यतीति । तदनन्तरं चतुर्विधसंघेन पृथ्वीपतिश्रीमीमसिंहेन च साधं पूर्वोक्तदिल्लीप्रवेशकरीत्या श्रीआसि- कायां श्रीपूज्याः प्रविष्टाः। ४६. तत्र चान्यदा बहिर्भूमौ गच्छतां साधुन्दालतपश्चाद्भागानां श्रीपूज्यानां प्रतोलीप्रदेशे मिलितः सम्मुखमाग- च्छन् महाप्रामाणिको दिगम्बरः । सुखवार्ताप्रश्नव्याजेनाऽऽलाप्य श्रीपूज्यैः सजनस्वरूपप्रतिपादकवृत्तेषु व्याख्यायमानेषु मिलितः कुतूहलाद सर्वोऽपि नागरिकलोको राजलोकश्च । तत्र च श्रीपूज्यानां स्फुर्जितं दृष्ट्वा लोकः सर्वोऽपि लघुनाऽपि श्वेताम्बराचार्येण जितो दिगम्बरः पण्डितराज इति परस्परं वार्तयामास । राजप्रधानदिदा-ककरिउ-कालाश्च राजसभायां गला राजश्रीभीमसिंहस्याने कथयामासुः-'देव ! यस्याऽऽचार्यस्य सम्मुखं तस्मिन् दिने यूयं गता आसन तैनाऽऽचा- येण लघुनाऽप्यनत्यो दिगम्बरो जित इति ।' राजा हर्षवशाद् विकसितबदनः प्राह-'सत्यम् ?' ते पाहुः-'देव ! सत्यं, नास्त्यत्र हास्यम्' । राजोवाच-'भोः कथं कथम् ?' ते च हपविगात् परवशा इबोचुः-'देव ! प्रतोलीप्रदेशे सर्वलोक- समक्ष तैरिस्थमित्य दिगम्बरो जितः।' राजा प्राह-'अहो! पौरुपमेव प्राणिनां सर्वसम्पदो हेतुर्न लघुत्वं महत्वं या । मया तस्मिन्नेव दिने तदाकृतिं दृष्ट्वा सम्भावितं यदस्याग्रतो दिगम्बरो वाऽन्यो वा विद्वान् स्थातुं न शक्यते'-इत्या- दिकां वहीं प्रशंसां कृतवानिति । फाल्गुनशुलतृतीयायां देवगृहे श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा स्थापयिला श्रीसागरपाटे देवकु- लिका प्रतिष्ठिता श्रीपूज्यैः। ४७. सं० १२२९ धानपाल्यां श्रीसंभवस्थापना शिखरप्रतिष्ठा च कृता । सागरपाटे च पं० माणिभद्रपदे विनयभद्रस्य वाचनाचार्यपदं दत्तम् । सं० १२३० विक्रमपुरे थिरदेव-यशोधर-श्रीचन्द्राणाम् , अभयमति-जयमत्यासमति-श्रीदेवीप्ता- ध्वीनां च दीक्षा दत्ता। सं० १२३२ फाल्गुनसुदि १० विक्रमपुरे भाण्डागारिकगुणचन्द्रगणिस्तूपः प्रतिष्ठितः । तत्रैव वर्षे निजप्रभुप्रसादननिमितसमागतमण्डलीकभूपमण्डलीमण्डितमण्डलाकारस्कन्धावारवारोपशोभितकोट्टयहि प्रदेशस्वकीय- प्रासादमध्यवर्तमानचक्रवत्तिराजधानीसमानलक्ष्मीकतत्कालनिष्पनश्रीपार्श्वनाथमन्दिरशिखरहिरण्यमयकलशदण्डप्रभृति- प्रभुतधर्मस्थानार्थप्रारब्धप्रतिष्ठामहोत्सवदर्शनकुतूहलवलमिलितनानादेशवास्तव्यभव्यलोकसंघसंघाताकारसनिवेशविशेष शोभमानयहि परिसरश्रीमदासिकायां चत्वारिंशत्संख्यसनिवद्यविद्याभ्यासजितवाचस्पतिमतिसुयतिजनमनाकुमुदखण्ड- मार्तण्डमण्डलायमानोपदेशैः श्रीपूज्यैर्विक्रमपुरीयसमुदायेन साधं विजहे । तत्र च ज्येष्ठानुक्रमेण समकालपुरःप्रार- धपृथक्पृथक्प्रेक्षणीयकपञ्चशन्दवादनादिवर्धापनकहर्षमरनृत्यमानास्तोकलोकोत्तारितनिरन्छनकदानगीयमानयुगप्रथा- नगुरुनामश्रवणानन्तरवितीर्यमाणार्थसार्धतिरस्कृतवैश्रयणद्रव्यगर्वगान्धर्विकलोकोपश्लोक्यमाननिजनिजदेशपूर्वजनामधे- याकर्णनोच्छलदमन्दानन्दामृतसरस्तरङ्गभङ्गिसङ्गमुखीभवदनसमग्रमझानुगम्यमानानां श्रीपूज्यानां प्रवेगः सञ्जातो ज्ये- एशक्तृतीयापाम् । बादलब्धिलब्धजगन्मध्याध्याममाधुवादाशीतिसंख्यसाधुमधुपपर्युपास्यमानक्रमकमल श्रीपूज्यर्म- हता विस्तरेण प्रतिष्ठिते श्रीपार्श्वनाथशिसरे प्रतिष्ठितौ सुवर्णदण्ड-कलशावध्यारोपितौ । तस्मिन्नेव समये दुसाझसाद- लपुत्र्या साऊश्राविकया पारुत्थद्रम्मशतपञ्चकेन माला गृहीता। धर्मसारगणि-धर्मरुचिगणी प्रतिनी कृतौ । आपाढ- मासे च कन्यानयने विधिचैत्यालये गृहस्थावस्थजिनपतिसरिपितव्यविक्रमपुरवास्तव्यसा मानदेवकारितश्रीमहावीरदेवप्र- तिमा स्थापिता । व्याघ्रपुरे पार्श्वदेवगणिदीक्षितः श्रीपूज्यैः । सं०१२३४ फलवधिकायां विधिवेत्ये पार्श्वनाथः स्थापितः। लोकयात्रादिकारणकलापभावि विज्ञस्वकीयधर्मध्यानशास्त्रपरिज्ञानहानिसंभावनानगीकृतलभ्यमानाचार्यपदानुमेयजगद- साधारणगुणगणस्य जिनमतस्य चोपाध्यायपदं दत्तम् , गुणश्रीगणिन्या महत्तरापदं च, श्रीसर्वदेवाचार्याणां च दीक्षा जयदेवीसाव्याश्च । सं० १२३५ अजयमेरौ चतुर्मासी कृता । श्रीजिनदत्तमूरिस्तूपः पुनरपि महाविस्तरेण प्रतिष्ठितः। देवप्रभो दीक्षितस्तन्माता चरणमतिगणिनी च । सं० १२३६ अजयमेरौ पासटकारितमहावीरप्रतिमा प्रतिष्टिता, अम्बि- . युगप्रधानाचार्यगुबली। २५ काशिखरश्च । सागरपाटेऽप्यम्बिकाशिखरः। सं० १२३७ बब्वेरके जिनरथी वाचनाचार्यः कृतः। सं० १२३८ आसि- कायां बृहजिनयुगलं स्थापितम् । ४८. सं० १२३९ फलवधिकायां भक्तिवशादनेकश्रावकैरनुगम्यमानान् यहि मौ गच्छतः श्रीजिनभक्ताचार्यान् दृष्ट्वा मत्सरवशादज्ञानाद्वा महर्द्धिकश्रावकदद्विा कुकर्मपरिपाकाहा नटभटपटलवेष्टित ऊकेशगच्छीयः पानभनामा पण्डितमन्य आत्मनः पुरः पद्मप्रभेण जितो जिनपतिसरिरिति भट्टान् पाठयितुं लगः । तदनन्तरं कोपावेगादुत्तालगत्या गत्वा श्रीपूज्यभक्तश्रावकैरालापितः स-'आः पाप ! अलीकमापिन् पद्मप्रभ ! कस्मिन् काले जितस्त्वया जिनपतिमरि- यदेवं भट्ठान् पाठयसि ?' तेनोक्तम्-'यद्यलीकं मन्यथ तदा पुनरप्यानयत खगुरुमिदानीमपि जेप्यामीति' । नैरु- तम्-'आस्ताम[स]मभीमसमप्रकृते दुरात्मन् ! शृगालोऽपि सन् सिंहेन सह स्पर्धमानो निश्चितं मुमूर्पसी' त्यादिवद- त्सु तेपु, मिलिता उभयभक्तश्रावका अहङ्कारवशात् पणत्यागपूर्वकं चक्रुदिन्यवस्थाम् । श्रुता च वार्ताऽजयमेरौ श्रीपू- ज्यैः, प्रपितश्च तत्र तद्विजयाथ संघप्रमोदार्थ च श्रीजिनमतोपाध्यायः । पुनरपि तत्रत्यसमुदायेन चिन्तितम्-'एप दुरात्मा मृपाभापी कथयिष्यति मया पूर्व जिनपतिसरिर्जितोऽतो ममाग्रे स्थातुमशक्नुवन् स्वकीयपण्डितं प्रेपितवानि- त्यादि । तस्माच्छीपूज्याः श्रीमुखेन जयन्त्वेनमिति विचार्य समुदायः श्रीजिनमतोपाध्यायेन सहाजयमेरौ गतः । तत्र च राजमान्येन श्रा० रामदेवेन विज्ञप्तः श्रीपृथ्वीराजः पृथ्वीपतिः-'देव ! अस्मद्गुरूणां श्वेताम्बरेणैकेन सह वाद- व्यवस्था निप्पन्ना वर्तते, अतो यथा महापण्डितमण्डलीमण्डिते युष्माकं सभामण्डपे फलवती भवति तथा प्रसाद कुरुतावसरं प्रयच्छतेति' । केलिप्रियेण राज्ञोक्तम्-'इदानीमेवाबसरः । श्रे० रामदेवेन विज्ञप्तम्-'गोस्वामिन् ! द्वितीयः श्वेताम्बरः पद्मप्रभनामा फलवधिकायां वर्तते । कौतुकाधिना राज्ञोक्तम्-'तद्विपयेऽहं भलिप्यामि, स्वकीयान् गुरून प्रगुणयेति' । श्रे० रामदेवेनोक्तम्-'देव ! अम्मद्रवोऽत्रैय यन्त इति । तदनन्तरं राजा भट्टपुत्रान् प्रेष्य पद्मप्रभ आनायितः । तसिंश्चागते दिग्विजयार्थ नरानयने प्रस्थानीभृतः सकलबलसमेतः श्रीपृथ्वीराजः । तत्र पुनरपि श्रेष्ठि- रामदेवेन विज्ञप्तो राजा-'देव ! असाद्विज्ञप्तिकाविषये कीदृश आदेशः ?' प्रतिपन्नप्रतिपालकेन राज्ञोक्तम्-'प्रगुणय स्वगुरून् , कात्तिक शुक्ल सप्तमीदिने वादावसरः । श्रे० रामदेववचनात्तद्दिनोपरि श्रीअजयमेरुतः श्रीजिनमतोपाध्याय- पं० थिरचन्द्र-वा० मानचन्द्रादिसाधुवृन्दपरिकरिताः श्रीजिनपतिमूरयो नरानयने राजसभायां प्रभूताः, पद्मनभोऽपि भट्टपुत्रसमेतस्तत्र समागतः । 'यावदहमागच्छामि तावचया वागीश्वर-जनार्दनगौड-विद्यापतिप्रभृतिपण्डितसमक्षमेती वादयितव्यो' इत्यादेश मण्डलेश्वर-कहमासस्य दवा खयं राजा श्रमकृते श्रमस्थानं गतः। अतीवरमणीयां श्रीपूज्यानां मूर्ति दृष्ट्वा हर्षादाह मण्डलेश्वरः-'अहो ! एके ईदृशा दर्शनिनः सन्ति ये दृष्टाः सन्तो नेत्रयोरानन्दं जनयन्ति, निर्या- साथ दिगम्बराः पिशाचप्राया दृष्टाः सन्तो नेत्रयोरुद्वेगमुत्पादयन्तीति । तदनन्तरं श्रीपूज्यरुक्तं मण्डलेश्वरं [प्रति]- पञ्चैतानि पवित्राणि सर्वेषां धर्मचारिणाम् । अहिंसा सत्यमस्तेयं त्यागो मैथुनवर्जनम् ॥ [२६] अतो दर्शनिनां निन्दा न कर्तव्येत्यादि च्याचख्यानेषु पूज्येप्वन्तरेवेविशादुत्तालः पण्डितपद्मप्रभो वृत्तं पठितुं प्रवृत्तो मण्डलेश्वरं [प्रति]- प्राणा न हिंसा न पिवेच मद्यं, वदेव सत्यं न हरेत्परत्वम् । परस्य भार्या मनसा न वान्छे, स्वर्ग यदीच्छे विधियत्मविप्टुम् ॥ [२७]] -इति । श्रीपूज्वरुक्तम्-'अहो शुद्धपाठकता' । स माह-'आचार्य ! मामुपहससि ?' श्रीपूज्यरुक्तम्-'महानुभाव पम- प्रभा कलाविकले कालेऽम्मिन् क एक उपहस्यते को वा नोपहस्यते । स पाह-'तर्हि किमित्यहो शुद्धपाठकतेत्युक्तम् ।' श्रीपूज्यैरुक्तम्-'महामत्त्व ! पण्डितसभायां शुद्धमेव पट्यमानं मुसालङ्कतये भवति । स पाह-'किं कथित् मोऽप्यस्ति यु.गु. ४ ૨૬ " यो मयि नादिकं पनि टानि निकमति ? श्रावन व पुनपि पङ' । 'जनाईन- पिद्यापतिप्रमृतिपन्टिमिश्राः! यु मादधानाय गोदामोनयुमितोऽपि घाष्टर्याद परितुं नमः । श्रीयः सम्यान माविक वा नाहिने दश हमनेश ने नया 'नहापुमा एवं पठ्यमानं शुद्ध, पृनं भवनि; यथा- मागान दिल्यान पियंच मय, वदेव सन्न हरेत् पालन्। परम्य मायां मनमा न बाळेन, स्वर्ग यदीच्छेद विधिवत प्रवेष्टुन् । अश्यान पुनरपि ग पाद-'प्राचार्य ! अनया वचनाचनमा मुन्धानन्द विप्रतापनि । श्रीपूज्यैरुक्तम् वमपि विप्रताय यदि अहिरमि' । मन्टनेश्वर बहमासनोमा गुफादः प्रारब्धः?; यदि युवयोः प्रापि प्रनिनि दकः कश्चिन पदार्थ यापयत, द्वितीयानाकरोतु । धारपरकम्-'पप्रम! रुचिरं भणति मण्टगेश्या दनि, कचिन पश्यं कीकृत्य धूदि' । स प्राह-आचार्य ! जिनशासनाधारभूतप्रभूतथीमदाचार्यसंमतदक्षि- गायनांगविकावनाग्णविधिपरित्यागे किं कारणम् ?' | 'वको वनोपय निलोया' इत्याशयवद्भिः श्रीपूज्यैरुक्तम्- या पहजनगंमतं भवनि तदादरणीयम् ?; मिथ्यात्वमपि तहि किमिति नादियते स पाह-'वृद्धपरम्परया- गगं गर्वमप्याट्रियाम' 1 श्रीपूज्यरक्तम्-'पद्धपरम्परानागतोऽपि फिमिति भवत्पूर्वबंधैत्यवाम आरतः । स पाह 'कार्थ मायने शृद्धपाम्परानागनः ?' इति । श्रीपूज्यरक्तम्-'कि श्रीमहावीरसमवसरणेऽन्यस्मिन् वा जिनभवने श्रीगों, गमम्यामिगणधरः प्रायाना राधानो या कदापि कापि शुनः ? । उत्तरदानासामलक्ष्यात् स पाह-'आचार्य । की पृष्टः कटिं चालयसि !; अहमपृच्छे दक्षिणाव रात्रिकावतारणविधिद्धपरम्परागतोऽपि किमिति परित्यक्त इति, यं च चस्पयाममादायोस्थिनः । श्रीपज्यरुतम्-'भूख ! वन काठेवको वैधः क्रियत इति न्यायो भवता विस्मा- रिसः १, अथया गपसिदानीं सावधानीभूय शृणु-ननु दाक्षिणावतारात्रिकारितारणविधिद्धपरम्परागत इति कथं मायने ? । सिद्धानी तायदागत्रिकविचारो नास्ति; किन्तु श्रेयस्कृते पाश्चात्यर्वहुश्रुतैराचीर्णः। तच स किं दक्षिणा- यी यागावी वाऽऽचीर्ण इति विप्रतिपत्तिनिरासा युक्तिर्गवेपणीया । नशमुष्टिन्यायः कर्तव्यः । यद् युक्तं प्रति- गाति नदादरणीयं न शेपम् ।' गम्यरुक्तम्-'पद्मप्रभ ! सत्यमाहाचार्यः। तदनन्तरं सभ्यसम्मत्या प्रमाणरीत्या श्रीपूजया गम्यशारीरंगमा रगगनदफगारिण्या गीर्वाणवाण्या तस्यां सभायां यथा यामायारात्रिकावतारणं स्थापितं तथा प्रयुगागाकाधादयानकोपरि श्रीपूज्यकतवादस्थलम्योऽयसेयम् । अत्र गौरवभयान लिसितम् । किम्बहुना, हर्षप- रपागा श्रीपूज्यानुदिश्य जयजयकारच। ४९. अमिशागरे श्रीधीराजः समामध्ये समागतः । सिंहासने चोपविश्य पप्रच्छ मण्डलेश्वरम्-'केन जित न हारिगम् १" ! श्रीपज्यानाण्या दर्शयता मण्डलेश्वरेणोक्तम्-'देव ! एतेन जितमिति' । अमर्षात् पमप्रभः प्राह.. 'rem ! मण्डलेश्वगे Cliar व प्रवीणो न गुणिनां गुणग्रहणे' । उच्छलत्कोपावंशान्मण्डलेश्वरः ग्राह-र पण्डिफ ! गोरापट ! अगापि न किमपि विनष्टम् , अयमाचार्यों वर्तते, त एते सम्यावर्तन्ते; मया लञ्चा गृहीता- smast गौन शरपा विधागि ला; त्वं चेदिदानीमपि श्रीपृथ्वीराजसमक्षमाचार्य जेष्यसि तदा प्रागपि जित गैति । स माह-'मण्टलेश्वर । नाई कथयामि भवताऽऽचार्यपार्थातचा गृहीता; किन्तु सर्वाचार्यसंमतदक्षिणावर्ता- राशिफारसारणनिषि गलदर्द रिफाप्राणेन निषेध्यानार्पण प्रत्यापितो मण्डलेश्वर इति । श्रीपूज्यरुक्तम्-'महात्मन् पम- गणारागागिरयगुतगुताग, अम्गदासापानार्याणामसंमतत्वात् । स प्राइ-कि स्यमन्यतराचार्यम्पो TET सारो गदेपा संगतगर्भ ग मन्याये । श्रीपूज्यरक्तम्-'पद्मप्रभ ! किमन्ये आचार्या असदाज्ञावाचार्यम्यो IIT गारो योपो संग पामापारापिकनिधि गते --इत्यादि वक्रोक्तिमणनेन श्रीपृथ्वीराजसमक्ष युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। निर्वचनीकृतः पद्मप्रभः प्रोक्तवान् यथा-'महाराज! यदि यौप्माकीणं वचनं भवति तदिदानीमत्रोपविष्टविशिष्टलोक- प्रमोदोत्पादनाय कुतूहलानि दयन्ते; तद्यथाऽऽकाशमण्डलादवतीर्य युप्मदुत्सङ्गे निविष्टामतिरूपपात्रामेका विद्या- धरी दर्शयामि, पर्वतमङ्गुलमय कसा दर्शयामि, नभस्तल इतस्ततो नृत्यमानान् हरिहरादीन् देवान् दर्शयामि, उच्छ- लत्कल्लोलमालाकरालं पारावार समागच्छन्तं दर्शयामि, सकलमपीदं नगरमाकाशस्थितं दर्शयामीत्यादि । सभ्यविह- सोक्तम्-'पण्डित पद्मप्रभ ! यदि भवतेक्षेन्द्रजालकला शिक्षिता तत्किमाचार्यः सह बादः प्रारब्धः। श्रीपृथ्वीराज- दानलाभाभिग्रापनिरन्तरसमागच्छदपरलक्षसंख्येन्द्रजालिकैः समं प्रारभ्यताम् । हर्षाकुलचित्तेन तेनोक्तम्-पण्डित- मिश्रा ! अपमाचार्यः सर्वकलाकुशलमात्मानं मन्यतेऽतो यद्यद्य श्रीपृथ्वीराजसभायां युष्माकं समक्षं गर्वपर्वतानोत्तार- यिष्यते तदैप वातेन भिद्यमानो धर्तुमपि न शक्यते । विहसितवदनान् श्रीपूज्यान दृष्ट्वा तेनोक्तम्-'आचार्य ! कि वि- लक्षं हससि ? अयं सोऽवसरो यदि काचिच्छक्तिरस्ति तदा दर्शय सर्वलोकचेतश्चमत्कारि किमपि कलाकौशलं स्वकी- यम् , किं वाऽमुप्याः सभातो बहिनिःसरेति' । तदनन्तरं श्रीपूज्यैर्जिनदत्तमरिनाममन्त्रसरणपूर्वसुन्नम्-'पद्मप्रभ ! त्वं तावदात्मशक्तिस्फोरणानुसारेण यथोक्तमिन्द्रजालं प्रथमं निष्फासय, पश्चाद् वर्तमानकालोचितं किमपि वयमपि के रिष्यामः' । कुतूहलावलोकनाभिलापाकुलतया श्रीपृथ्वीराजेन सोत्सुकमुक्तम्-'पद्मप्रभ ! आचार्येणानुमतिर्दत्ताऽ- स्त्यतो वेगं कृत्वा स्वेच्छानुसारेण दर्शय नानाविधानि कौतुकानीति' । तदनन्तरमन्तःशून्यत्वादाकुलव्याकुलेन श्रीम- त्पूज्यपुण्यप्राग्भारप्रेरितेन च पद्मप्रभेणोक्तम्-'महाराज ! अद्य रात्रौ देवी पूजयित्वाऽभीष्टदेवताहानमत्रमेकाग्रचित्तेन ध्यात्वा कल्ये नानाविधमिन्द्रजालं दर्शयामि'-इति श्रुत्वा च हास्यरसोत्कर्पोच्छलदमन्दानन्दाचव्यापूर्णनयनैः सर्वैरपि लोकर्याक्यभाषणपूर्वकं गाढतरमुपहसितः पद्मप्रभः। तत्पश्चानिर्लजचूडामणिना तेन सविकाशवदनान् श्रीपूज्यानवे- क्ष्योक्तम्-'आचार्य ! किं हससि ?, यदि त्वं भद्रोऽसि तदिदानीमेव किमपि दर्शय' इति विहस्य श्रीपूज्यैरुक्तम्- 'पद्मप्रभ ! स्थिरीभूय ब्रूहि, किमिन्द्रजालमुच्यते " तेनोक्तम्-'त्वमेव ब्रूहि' । श्रीपूज्यैरुक्तम्-'देवानाम्प्रिय ! असंभ- वद्वस्तुसत्ताविर्भावः' । 'तत् किम् ?' श्रीपूज्यैरुक्तम्-'पद्मप्रभ ! तदिदमद्य तवैव प्रत्यक्षीभूतं किं न पश्यसि ?' तेनो. क्तम्-'किमिति ?' तदन्तरं श्रीपूज्यैः सोत्कर्षमुक्तम्-'महानुभाव ! किं त्वया स्वमान्तरेऽपि संभावितमिदं कदाचिद्, यदहं विशिष्टासनोपविष्टसहस्रसंख्यमुकुटबद्धराजराजिपिराजितायां श्रीपृथ्वीराजसभायां गत्वा यथेच्छया वक्ष्यामीति परमिदमसंभाव्यमपि देवनियोगादस्मत्सान्निध्यादय संजातमिति, कोऽस्येन्द्रजालाद् भवचिकीर्पिताद् भेद इति ?' 1पुन- रपि राशयतया लोकोपहासमवगणय्य राजानमुद्दिश्य तेनोक्तम्-'महाराज ! अनाक्रमणीयपराक्रमाक्रान्तनिजपदाधः- कृतप्रतापप्रचण्डप्रभूतभूपतिवातसततमृग्यमाणादेशामृतसर्वस्वे त्वपि सकलामपि पृथ्वी शासति युगप्रधान इति विरु- दमात्मन्ययमाचार्यः प्रचुरत्यागदानवशीकृतसमस्तभट्टलोकमुखेन पाठयति' । राज्ञोक्तम्-'पद्मप्रभ! युगप्रधान इत्यस का शब्दार्थः ?' सहर्पण तेनोक्तम्-'महाराज ! युगशब्देन वर्तमानः कालो भण्यते, तस्मिंश्च यः प्रधानः सर्वोत्तमः स युगप्रधानशब्देनोच्यते' । अत्रान्तरे श्रीपूज्यैवेंगादेवोक्तम्-'मूर्ख पद्मप्रभ ! यदपि तदपि भणित्वाऽस्माकं मुसोपरि राजानमुच्छालयितुमिच्छसि ! श्रीपृथ्वीराजराजानमुद्दिश्य चोक्तम्-'महाराज ! भिन्नरुचयः सर्वेऽपि प्राणिन इति केपांचिद कोऽपि सुसायते । ततो यः कश्चियेपामभीयो भवति तं प्रति नानाविधान्तरङ्गरसूचकानेकाविरुदन्यासम- नोहरान् प्रधानसन्दानुच्चरन्ति ते। यथा त्वामाश्रित्य-जीवाऽऽदिश, पादावधार्यताम्-इत्यादिशब्दान् मणन्ति मर- त्पादारविन्दाराधनकमावधानमानसश्रीकइमासमण्डलेश्वरप्रमुसराजप्रधानलोकाः, तथतानुद्दिश्य यथोक्तान शब्दानुचार- यन्त्येतत्सेवका इति । एवं तेपामपि सेवकाः प्रवर्तन्ते । अन्योऽपि लोकः सर्वोऽपिसवल्लभजनं नानाविधर्वचनर्वादयति परं न कोऽपि तेषां दोपमुद्घाटयति । अयं च पद्मप्रभोऽस्यां सभायामित्यं यदपि तदप्पृष्टण्ठं वदन् सस्स मजनप्रत्य- १ "मुपच्छाल' आदर्श ।

२८ खरतरगच्छालंकार नीकता प्रकाशपति' । तदनन्तरम् 'अयमाचायों लोकाचारानुसारेण युक्तं भापते, पद्मप्रभश्व बलक्ष्यात पैशून्यं प्रकट- यतीति विचिन्त्य श्रीपृथ्वीराजेनोक्तम्-'जनार्दन-विद्यापतिप्रभृतयः पण्डितमिथाः ! सावधानीभूय यूपमनयोः परीक्षां कुरुत, यथा पो महाविद्वान् भवति तस्मै जयपत्रं दीयते सत्कारथ क्रियते' । पण्डितैरुक्तम्-'देव ! तर्कविद्या- विपये महाक्षुण्णमतिराचार्य इति परीक्षितम् । इदानीं युष्मदादेशात् साहित्यविषये परीक्षां कुर्मः। पण्डितमिश्री ! युवा श्रीपृथ्वीराजेन भादानकोर्वीपतिर्जित इति वर्णयतम् । श्रीपूज्यैः क्षणमेकमेकाग्रीभ्य- यस्याऽन्तर्वाहुगेहं बलभृतककुभः श्रीजयश्रीप्रवेशे, दीपप्रासमहारमहतघटतटमस्तमुक्तावलीभिः। नूनं भादानकीयै रणभुवि करिभिः स्वस्तिकोऽपूर्यतोचैः, पृथ्वीराजस्य तस्यातुलबलमहसः किं वयं वर्णयामः ।। [२९] इति वृत्तं पठित्या व्याख्यातम् । पद्मप्रभेणाऽपि लाघवभीरुणा पौर्यापर्यमनालोच्य शीघ्र वृत्तं पठितम् । श्रीपूज्यै- रुक्तम्-'वृत्तं चतुष्पदमेव दृष्टं श्रुतं किमेतत् पश्चपदं कृतम् ?' सम्यानां च तत्पठिते वृत्ते पञ्चापशब्दा दर्शिताः ।ईर्ष्या- वशात् तेनाप्युक्तम्-'पण्डितमिश्रा ! यस्यान्तर्याहुगेहमित्यादिवृत्तमाचार्येणेदानीं न कृतं पूर्वपठितमेव पठितम्'। पण्डितैरुक्तम्-'स्थिरीमव ज्ञायते लग्नम्' । 'आचार्य! श्रीपृथ्वीराजसभामण्डपं गद्ययन्धेन वर्णय । श्रीपूज्या मनसि स- भावनिं कृत्वा खटिकया भूमौ लिखितुं प्रवृत्ताः, यथा-'चञ्चन्मेचकमणिनिचयरुचिररचनारचितकुट्टिमोचरन्मरीचिप्रप- श्वखचितदिक्चक्रवालम्, सौरभभरसम्भृतलोभवशवम्भ्रम्यमाणझङ्कारभृतभुवनभवनाभ्यन्तरभूरिभ्रमरसम्भृतविकीर्णकुसु- मसम्भारविभ्राजमानप्राङ्गणम्, महानीलश्यामलनीलपट्टचेलोल्लसदुल्लोचाञ्चललम्बमानानिलविलोलबहलविमलमुक्ताफल- मालातुलितजलपटलापिरलविगलदुज्ज्वलसलिलधारम्, दिग्विक्षिप्तवलक्षचक्षुःकटाक्षलक्षविक्षेपक्षोभितकामुकपक्षामुक्तमौ- क्तिकायनपञ्चवर्णनूतनरत्नालङ्कारविसरनिःसरकिरणनिकुरुम्बचुम्बिताम्बरारब्धनिरालम्बनविचित्रकर्मप्रविशत्कुसुमायु- धराजधानीविलासबारविलासिनीजनम् , क्वचिच्चूताङ्कुररसास्वादमदकलकण्ठकलरयसमाननवगानगानकलाकुशलगाय- नजनप्रारब्धललितकाफलीगेयम् , क्वचिच्छुचिचरित्रचारूवचनरचनाचातुरीचञ्चुनीतिशास्त्रविचारविचक्षणसचियचक्र- चर्यमाणाचारानाचारविभागम् , क्वचिदासीनोद्दाममतिवाद्यमन्दमदभिदुरोधदनवद्यहृद्यसमग्रविद्यासुन्दरीचुम्व्यमाना- यदातवदनारचिन्दकोविदयन्दारकन्दम् , उद्धतकन्धरविविधमागधवर्ण्यमानो रधैर्यशी-दार्यवर्धिष्णु, मुधाधामदीधि- तिसाधारणयशोराशिधवलितवसुन्धराभोगनिविशमानसामन्तचक्रम् , प्रसरनानामणिकिरणनिकरविरचितघासवशरामन- सिंहासनासीनदोर्दण्डचण्डिमाडम्बरखण्डिताखण्डवरिभूमण्डलनमन्मण्डलेश्वरपटलस्पर्धोद्भटकिरीटतटकोटिसंकटविघ- टितविसंकटपादविष्टरभूपालम् ; अपि चोद्यानमिव पुन्नागालङ्कतं श्रीफलोपशोभितं च, महाकविकाव्यमिव वर्णनीयव. कीर्ण व्यञ्जितरसं च, सरोवरमिव राजहंसावतंसं पद्मोपशोभितं च, पुरन्दरपुरमिव सत्या(?)धिष्ठितं विवुधकुलसङ्कुलं च, गगनतलमिव लसन्मङ्गलं कविराजितं च, कान्तावदनमिव सदलकारं विचित्रचित्रं च'। अत्रान्तरे पण्डितैरुक्तम्- 'आचार्य ! समर्थय वर्णनं स्थालीपुलाकन्यायेन, बास्यते युप्मा शक्तिः । तदनन्तरं श्रीपूज्य:-'एवंविधं श्रीपृथ्वी राजसभामण्डपमवलोक्य कस्य न चित्रीयते चेतः' इति समर्थनं कृतम् । पुनरपि वाचयिता विस्तरेण व्याख्यातं च । श्रुत्वा च पण्डितविम्मयपशान्निजशिरो धूनितम् । पमप्रमेणोक्तम्-'पण्डितमिश्राः । एतदपि कादम्बादिकथा- सम्बन्धि सम्भाव्यते । पण्डितैरुक्तम्-'मूर्स ! कादम्बर्यादिकथाः सर्वा अम्माभिर्वाचिताः सन्ति, अतस्त्वं मौनं पुरु। मा भारयासद्धस्तेन वं मुसं लिभिः । ५०. पूज्यानुद्दिश्योक्तम्-'आचार्य ! प्राकृतभापया गाथायन्धेन श्लेपालकारेण श्रीपृथ्वीराजमत्कान्तःपुरमुभटौ वर्णय । श्रीपूज्पर्मुहूर्तमेकं चिन्तयित्वोत्तम्- - . युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। वरकरवाला कुवलयपसाहणा उल्लसंतसत्तिलया। सुंदरिविंदु व्व नरिंद! मंदिरे तुह सहति भडा । [३०] इति गाथाया विस्तरेण व्याख्याने च श्रीपूज्यमुखसम्मुखमतिकुतूहलात् सकलमपि लोकमवलोकमानमवलोक्य वैलक्ष्यात पद्मप्रभेणोक्तम्-'आचार्य ! मया सह वादमारभ्येदानीमन्यतराणामग्रे आत्मानं भद्रं भावयसि ?" श्रीपूज्यैश्च नन्दिनीनाना छन्दसा- पृथिवीनरेन्द्र ! समुपाददे रिपोरवरोधनेन सह सिन्धुरावली। भवतां समीपमनुतिष्ठता स्वयं नहि फल्गुचेष्टितमहो! महात्मनाम् ।। [३१] इदं नवं वृत्तं पठिखोक्तम्-'पद्मप्रभ ! किमिदं छन्दः?' पण्डितैरुक्तम्-'आचार्य! अनेनाज्ञानेन सह बुवाणस्त्वमा- त्मानमेव केवलं क्लेशयति न फलं किश्चिद्भविष्यति । तथाऽचार्य ! खङ्गबन्धेन चित्रकाव्यं कुरु । तदनन्तरं श्रीपूज्यैः खटिकया भूमौ रेखाकारं खरं कृला तात्कालिकम्- लसद्यशासिताम्भोज! पूर्णसम्पूर्ण विष्टप!। पयोधिसमगाम्भीर्य । धीरिमाधरिताचल!॥ [३२] ललामविक्रमाकान्तपरक्ष्मापालमण्डल!। लब्धप्रतिष्ठ! भूपालायनीमच कलामल! ।। [३३] इत्येवंरूपश्लोकद्वयाक्षरलिखनेन भरितम् । तच्च चित्रकाव्यं वाचयिताऽतिहष्टैः पण्डितैः प्रशस्यमानान् श्रीपूज्यान दृष्ट्वाऽमर्पवशादाह पद्मप्रभः-'पण्डितमिश्रा ! द्रम्ममहस्रमेकं दातुमहमपि समर्थो वर्तेऽतो मामपि प्रशंसयत' । मण्ड- लेश्वरकइमासेनोक्तम्-रे मुण्डिक ! श्रीपृथ्वीराजसमक्षं यदपि तदपि बुवाणस्त्वमात्मानं गले ग्राहयसि । राज्ञोक्तम्- 'पण्डितमिश्रा! एनमपि वराकं समदृष्ट्या वादयत' । तैरुक्तम्-'देव! यदि गोरूपः किमपि वेत्ति तदैपोऽपि वेत्ति' । राज्ञोक्तम्-'मूाऽपि दृष्टया ज्ञायत आचार्यों विद्वान् , परमस्मत्सभायां न्यायमय्यां वचीयता यथा न भवत्यतः कारणात् पद्मप्रभोऽपि सर्वविपये युप्माभिः परीक्षयितव्यः' । पण्डितैरुक्तम्-'गोस्वामिन् ! पद्मप्रभः काव्यं कत्तुं न जानाति, आचार्यपठिते वृत्ते छन्दो नोपलक्षयति, आचार्येण तर्करीत्या वामावर्त्तारात्रिकाचतारणे स्थापिते प्रत्युत्तर किमपि न दत्तवान् , तर्कमार्गमपि न परिछिनत्ति, केवलं विरूपं भापितुं वैत्ति, तथापि युप्मनिरोधाद् विशेषण सम- दृष्ट्या प्रक्ष्यामः'। 'आचार्य ! पण्डितपद्मप्रभ ! युवाम्- "चकर्त दन्तद्वयमर्जुनं शरैः क्रमादमुं नारद इत्ययोधि सः।" इति समस्यां पूरयतमिति । क्षणादव श्रीपूज्यैरुक्तम्- चकर्त दन्तद्वयमर्जुनं शरैः क्रमादमुं नारद इत्ययोधि सः। भूपालसन्दोहनिपेवितिक्रम! क्षोणीपते ! केन किमत्र संगतम् ।। [३४] -इति । सम्यैरुक्तम्-'आचार्य ! न किमपि लभ्यते, ईदृशया समस्यया पूरितया; यदस्माभिरसंगत्युत्तारणाय युवा पृष्टौ, त्वया च सैव समर्थितेति । तथा सरलकाव्यादेतदेव समस्याया दुःसवं यदसांगत्यमपनीयते' । पूज्यरुक्तम्- 'पण्डितमिश्रा ! एवमपि समस्या पूर्यत एव; यतः श्रीभोजदेवसभायां केनाप्यागन्तुकपण्डितेन- "सा ते भवाऽनुसुप्रीताऽवद्यचित्रकनागरैः । आकाशेन यका यान्ति"........ इति समस्यापादत्रयं कथितम्, 'देव! किं केन संगतम्' इति चतुर्थपादप्रक्षेपेण श्रीभोजराजसत्कपण्डितेन पूरिता' । पण्डितैरुक्तम्-'एवमपि पूर्यत एव, यदि पद्मप्रभसदृक्षः कोऽपि पूरको भवति; युप्मादृशानां तांविषकाव्य- ३० खरतरगच्छालंकार शक्तियुक्तानां न युज्यत इदृशी सम्यस्यां पूरयितुमिति' । तदनन्तरं श्रीपूज्यैः क्षणमेकं विभृश्योक्तम्- चकत दन्तद्वयमर्जुनः शरैः की| भवान् यः करिणो रणागणे । दिक्षया यान्तमिलाप दूरतः क्रमादमुं नारदमित्ययोधि सः ।। इत्येतद्व्याख्यानावसाने च विस्मयरसपरवशैः पण्डितैरुक्तम्-'आचार्य! भगवती सरस्वती सय्येवैकस्मिंस्तुष्टा, यदेवं चिन्तितान् पदान् ददाति । पार्थोपविष्टश्रीजिनमतोपाध्यायेनोक्तम्-'पण्डितमिश्राः ! सत्यमेतद् यदाचार्यविषये परमेश्वरी श्रीवाग्देवी प्रसन्नाभूदिति, कथमन्यथैपा भगवती निजपुत्रैर्युप्माभिः सहाचार्यस्य साङ्गत्यमकारपत्' । पण्डितैरुक्तम्-'पद्मप्रभ ! त्वमपि किमपि ब्रूहि । स प्राह-'क्षणमेकं प्रतीक्षवं चिन्तयन्नसि' । वैश्च स-पण्मासान् यावचिन्तयरित्युपहसितः । तथा भणितम्-'सर्वाधिकारिन् ! मण्डलेश्वरकइमास ! आचार्यसदृशः कोऽपि विद्वान् दृष्टः १ स माह-'अद्याग्रतो न दृष्टः' । अङ्गुल्या निजतुरङ्गमान् दर्शयता राज्ञोक्तम्-'आचार्य! परतः पश्य पश्येत्यमी पट्टयोटकाः केन कारणेनोत्पतन्ति ?' श्रीपूज्यैर्विमृश्योक्तम्-'शृणु महाराज ऊर्ध्व स्थित श्रोत्रवरोत्तमाना जेतुं हरेरश्वमिवोधुरादाः । खमुत्प्लवन्ते जवनात्तुरङ्गास्तवाऽवनीनाथ ! यथा कुरङ्गाः ॥ [३६] एतदर्थश्रवणे च प्रसन्नवदनं राजानं दृष्ट्वा पण्डितैरुक्तम्-'आचार्य ! उदयगिरिनाम्नि हस्तिन्यध्यारूढः कीदृशः पृथ्वीराजः शोभत इति वर्णय' । पूज्यैहृदये विमृश्योक्तम्- विस्फूर्जद्दन्तकान्तं लसदुरुकटकं विस्फुरद्धातुचित्रं, पादैविभ्राजमानं गरिमभृतमलं शोभितं पुष्करेण । पृथ्वीराजक्षितीशोदयगिरिमभिविन्यस्तपादो विभासि, त्वं भास्वान् ध्वस्तदोपः प्रवलतरकराफ्रान्तपृथ्वीभृदुचैः ।। [३७]] इति वृत्तार्थ श्रुखा प्रसाददानाभिमुसे राजनि सति पण्डितैरुक्तम्-'देव ! इतः स्थानाचतुर्दिक्षु योजनशतमध्ये ये केचन विद्वांसो विद्यावाहुल्यस्फुटदुदरोपरिदत्तसुवर्णपट्टाः श्रूयन्ते तेभ्यः सर्वेभ्य एव लक्षणस्मृत्या साहित्यपरिचयेन तांम्यासेन सिद्धान्तावगत्या लोकव्यवहारपरिक्षानेनायमेवाचार्यः समधिकः । किम्बहुना, सा विद्या नास्ति या- ऽस्य मुखाम्भोजे सुखासिकया न विलसति । समस्यामपूरयित्वाऽपि पद्मप्रभेणोक्तम्-'महाराज! कपांचिन्मानुपाणां पार्श्व विद्या असन्त्य एव भद्राः, यतस्ते तद्विद्याबलेन लोक सह निरन्तरं कलहायमानाः सकलमपि जगदुत्सूत्र- यन्ति । यदुक्तम्- विद्या विचादाय धनं मदाय प्रज्ञाप्रकाऽपरवञ्चनाय। अभ्युन्नतिौकपराभवाय येषां प्रकाशे तिमिराय तेपाम् ॥ [३८] श्रीपूज्यैरुक्तम्-'भद्र पद्मप्रभ । त्वदने किंचिदभिहितं भणामि भग्नस्सं मा रुष तेनोक्तम्-'मण महानुभाव !! 'इस्थमशुद्धं कृत्तादिकं पठन्तमेकमपि यतिनं दृष्ट्वा सर्वोऽपि मिथ्यादृष्टिलोको-अहो ! एने श्वेतपटाः शुद्धमपि पठितुं न जानन्ति किमन्यज्ज्ञास्यन्तीत्युपहसति 1-अतः कारणादम्मिन् वृत्तेऽद्य पथाद्भवता 'प्रकपः परवञ्चनायेति 'प्रकाश- स्तिमिरायेति च पठनीयम् । तथाऽसिन्प्रस्तावे 'विद्या विषादाय त्यादिसुभाषितममम्बद्धमुक्तम् , यतो धर्मशील ! किमस्माभिरुक्तं यचमस्माभिः सह वादं गृहाण, किं वा त्वयैवासद्भक्तश्रावकाणामग्रे कथितं यदहो! अत्रानयत स्त्र- गुरुं यथेदानीमपि जयामीति' । स स्वस्कन्धाकालनपूर्व प्राह-' -'मया कथितम्' 1 पूज्यरुक्तम्-'कस्य शच्या ?' म ग्राह स्वशच्या।' पूज्यैरुक्तम्-'इदानीं सा कि काकैर्मक्षिता" स प्राइ-'नहि नहीं'ति । पूज्यैरुक्तम्-'वहिं क गता ? म युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। माह-'मम भुजयोर्मध्ये वर्तते, परमवसरमन्तरेण न प्रकाश्यते । पूज्यैरुक्तम्-'अवसरः कदा भविष्यति । स पाह- 'इदानीमेव' । 'तर्हि किमिति विलम्बः क्रियते ?' स प्राह-राजानमालाप्य सशक्तिं स्कोरयिष्ये' । पूज्यैरुक्तम्-'वर्ग कुरु । तत्पश्चात् पद्मप्रभः सचेतसनेनाचार्येण निजशरीरसौभाग्येन वचनचातुर्येण विद्यावलेन वशीकरणादिमत्रप्र- योगेण वा सर्वोऽपि राजलोकः खात्मनि सानुरागी कृतः, मया पुनरात्मभक्ताः श्रावका अपि तादृशराजप्रसादवर्णनो. भूतविकाशमुखा अपि श्याममुखीकृताः, किं क्रियते ? कोऽप्युपायो न फलति; भवतु, तथापि "पुरुपेण सता पुरुष- कारो न मोक्तव्यः" इति न्यायादिदानीमपि यदि किश्चित्साहसं कृताऽऽययोर्द्वयोरपि समश्रीकता भवति तदाऽस्मिन् देशे स्थातुं शक्यतेऽन्यथा महान्तं लोकोपहासमसहमानानामस्माकं सश्रावकाणां देशत्याग एव भविष्यतीति विभाव्य, राजानमुद्दिश्य चोक्तवान्-'महाराज ! अहं पत्रिंशसंख्यदण्डनायकायुधप्रकाराभ्यासेन मल्लविद्यायां कृतश्रमो वर्तेऽतो मया सममेनमाचार्य याहुयुद्धेन योधयेति' । राजा च दर्शनिनामाचारानभिज्ञतया कौतुकदिक्षया च श्रीपूज्यमुखसं- मुरामवलोकितवान् । पूज्यैश्वाकारेङ्गित्तादिभिः श्रीपृथ्वीराजाभिप्रायमनुमीयोक्तम्-'महाराज ! बाहयुद्धादिकं दिक- रिकाणामेव क्रीडा, यतो गलागलिलमा वालका एव शोभन्ते न महान्तः, शस्त्राशस्त्रि युध्यमाना राजपुत्रा एव शोभन्ते न वणिजः, दन्तकलहेन युध्यमाना रण्डा एव शोभन्ते न राजदाराः, तत्कथमस वचनमुपादेयं साद । पण्डितायो- तरप्रत्युत्तरदानशचया परस्पर स्पर्धमानाः शोभन्ते' । अत्रान्तरे पण्डितैरुक्तम्-'देव! वयमपि पाण्डित्यगुणेन युप्माकं पार्थाद् वृत्ति लभामहे न मल्लविद्याकुशलतया' । पूज्यैरुक्तम्-'पद्मप्रभ ! अस्यां सभायामेवं चुत्राणः वदष्ट्रिकयाऽपि न लजसे ?; महाराज ! यद्यस्य शक्तिरस्ति तपोऽस्माभिः सह शुद्धया प्राकृतभापया संस्कृतभाषया मागधीभापया पिशाचमापया शूरसेनीभापया शुद्धयाऽपभ्रंशभापया गयेन या पद्येन या लक्षणेन या छन्दसा बालङ्कारेण वा रसवि- चारेण या नाटकविचारेण या तर्कविचारेण वा ज्योतिर्विचारेण वा सिद्धान्तविचारेण वा घेताम् , यदि पश्चाद् वयं भवामस्तदा यादृशानेप कथयति तादृशा एव वयम् , परं यदेपोऽम्मा हस्तेन लोकविरुद्धं स्वदर्शनविरुदं मल्लयुद्धादि कारपति तत्कथमपि न कुर्मः । न चास्माकं तावन्मात्राकरण लाघवम् ; यतः कदाचित् कोऽपि हालिकादिः कथयि- प्पति-यदि यूयं पण्डितास्तदा मया सह हलकर्पणादि कुरुध्वमिति-तदा किमसाभिस्तत्कर्तव्यम्, अकरणे च किमस्माकं पाण्डित्यं याति ? । तथा महाराज ! यद्येप यथा तथाऽस्मान् जेतुं वाञ्छति तदाऽस्माकं पार्थात् क्लिष्टं काव्यं प्रश्नोत्तरं वा गुप्तक्रिया-कारकादिक या पृच्छतु । अथवा खेच्छानुसारकर्तव्याक्षरसनिवेशरूपया कल्पितया लिप्या किश्चित्त सम्यकणे कथयिता सटिकया भूमौ लिखत, ययदसीयहृदयस्थं वृत्तं न निष्काशयामस्तदा हारितमेव । अथवा वृत्तस्य कैलान् स्वरान् लिसतु केवलानि व्यञ्जनानि वा लिखतु, यदि केवलस्तरस्य हृदयस्थ वृत्तं न निष्काशयामतदापि हारितमेव । तकवारश्रुतवृत्ताक्षराणि पश्चानुपूज्यप लिसतु, किंवा वयं लिखामः । तथा वर्तमानकालवतियांगिकीय- माननवनयरामनामधनपूर्वकं तात्कालिककाव्येनान्यनिर्दिष्टकोष्ठकाक्षरप्रक्षेपण कोष्ठकानेप पूरयतु, किं या वर्ष पूरया. म: । रातोक्तम्-'आचार्य मिश्रा ! यूयं सर्वान् रागान् परिच्छिन्त ?' पूज्यरुक्तम्-'महाराज ! यदि केनापि पण्डि- तेन मह यादव्यवस्था निप्पन्ना साद तदा क्रियते वार्ता कापि, अनेन पुनरज्ञानेन मानुषेण मह विपदमानानां केरलमात्मनः कण्ठशोप एवेति । रातोक्नम्-'आचार्य ! मा विषाद, यथोक्तकोष्टकपूर्तिरी निदर्शनेन यथाऽमाकं पुतूहले पूर्यते तथा पुरु' । पूज्यरुतम्-'ईनं किमपि यदि कथयत तदाऽस्माकमपि शरीर मुग मानि । तत्काल- कारितवांशिकतापमानवंशोतिष्ठन्नापनरागमणनपूर्वकं तत्कालकनश्रीपृथ्वीगजन्यायप्रियसगुणवर्णनरूप लोकायराणि सधिकारि-रहमासनिर्दिष्ट कोष्ठक प्रधिपतिः श्रीपूज्यस्तस्पां ममायां कम्य कस्य मनःपङ्कज आचर्यलक्ष्मीः सुगा- मिस्या न सापिता। अतिप्रमान श्रीपृथ्वीराजपृथ्वीपनिनोस्तम्-'मानार्य ! जिनं सपा, विकल्पः कोऽपि मनमिन फार्पः । सीपधर्मनमाना महरसंपदेशसामिलं प्राप्तं मया मानिगइसतरजमानामाधिपत्यं च; नया न कोऽपि .

३२ खरतरगच्छालंकार प्रतिपक्षो मदीयां भूमिकां क्रमितुं शक्रोति यत्त्वमस्मिन् देशे यससीति । तथाऽऽचार्य ! मया न ज्ञातं यत्त्वमेवंविधं रखं वर्तसे, अतो यत्किञ्चिदनुचितमाचरितं तरक्षन्तव्यमिति वदता हस्तौ योजितौ । पूज्यैश्च हर्षवशाद्- यम्भ्रम्यन्ते तवैतास्त्रिभुवनभवनाभ्यन्तरं कीर्तिकान्ता, स्फूर्जत्सौन्दर्यवर्या जितसुरललना योपितः संघटन्ते। प्राज्यं राज्यप्रधानप्रणमदवनिपं प्राप्यते यत्प्रभावात्, पृथ्वीराज ! क्षणेन क्षितिप! स तनुतां धर्मलाभः श्रियं ते॥ [३९] इत्याशीर्वाददानपूर्वकं राजयचनं बहुमानितम् । एवंविधं समाचारमवलोक्य लक्ष्यात् पद्मप्रभेणोक्तम्-'महाराज! एतारन्तं कालं समेकः समदृष्टिरस्यां सभायामासीः, इदानीं च त्वमपि स्वपरिवारानुवृत्त्याऽऽचार्ये पक्षपातं कृतवान् । राजोक्तम्-'पद्मप्रभ ! किमसद्धस्तेन कारयसि ?, यदि तब शरीरे काऽपि पाण्डित्यकलाऽस्ति तदाऽऽचार्येण सह भूहि, वयं न्यायं दापयिष्यामोऽथ नास्ति तदुचिष्ठ स्वप्रतिश्रये गच्छति' । स प्राह-'महाराज! न्यायवत्यां पृथ्वीराजस- भायां गवा यः कश्चित् कलाकौशल्येनाऽऽत्मानं बहु मन्यते स मया सह ढोकतामित्याह्यानपूर्वकमङ्गुलीमूर्ध्व करिष्य इत्याशावता मया पत्रिंशत्संख्यदण्डनायकायुधप्रकारा अभ्यस्ताः, अतो यद्यद्य तव सभायामेपा कला फलवती न भविष्यति तदा कदा भविष्यतीति । ५.१. अनान्तरे श्रीपृथ्वीराजातिवल्लभेन मण्डलीकराणकसमकक्षेण श्रीजिनपतिम्ररिपादभक्तेन श्रे० रामदेवेनोक्तम्- 'देव ! शृणुत वार्तामेकाम्-श्रे० वीरपालपुत्रजन्मपत्रिकानुसारेण ज्ञायते, तव पुत्रो राजमान्यो द्रव्याख्यो दानप्रियश्च भविष्यतीत्यादिज्योतिपिकवाक्यश्रद्धया मदीयः पुत्रो राजसभायां सञ्चरन्मा केनाप्यवहेल्यतामित्यभिप्रायेणाबाल्यका- लादहमात्मविप्रेण पण्डितहस्तेन द्विसप्ततिः कला अभ्यासितः । अन्यानां च धनानां कलानां फलं मया दृष्टं किन्तु युप्मत्प्रसादान्मम संमुसं वक्रया दृष्टया केनापि नावलोकितम् , अतो बाहयुद्धस्य फलं न दृष्टम्; इदानीं च मम पुण्या- कृष्टस्तव सभायां पद्मप्रभः समागतोऽतो यदि युष्माकं निरोपो भवति पद्मप्रभस्य च संमतं भवति तदा पाहुयुद्धकलायाः फलमालोक्यते । केलिप्रियेण राज्ञोक्तम्-'श्रेष्ठिन् ! वेगं कुरु, अधों भव पद्मप्रभ !, त्वमपि स्वकलायाः फलं प्राप्नु- हीति' । तदनन्तरं द्वावपि मलग्रन्थि यद्धा गलागलि योद्धं प्रवृत्तौ । क्षणान्तरे श्रे० रामदेवेन निहत्य भूमौ पातितः पद्मप्रभः । 'श्रेष्ठिन् ! श्रेष्टिन् ! अस्य कर्णी लम्यौ स्तो मा त्रोटयेति श्रीपृथ्वीराजवचनं निषेधकमप्युपहासपरतया विधायकं मत्वा तत्कर्णपाली हस्तेन गृहीत्वा पूज्याभिमुसमवलोकितवान् रामदेवः । पूज्यश्च स्वशिरोधूननेन 'प्रवच- नोड्डाहं मा कृथा' इत्यादिवचनेन च निपिद्धः । लोकैश्च कलरलं कृत्वा परस्परमहमिकयोक्तम्-'यथाऽहो मया प्रथममेव कथितं यच्छ्रेष्ठी जेप्यति; यदनेन सावष्टम्भं पद्मप्रभाभ्यस्तपत्रिंशद्दण्डकलातो द्विगुणकलास्यासः कथितः-इत्यादि । 'राजादेशात् पद्मप्रभ मुत्योत्थितः श्रे० रामदेवः। सोऽपि चोत्थाय धूलिमलिनं निजं वस्त्रादि प्रास्फोटयत्, राजपुत्रश्च श्रीपृथ्वीराजाक्षिसंज्ञानुसारेण गले गृहीला पर्यस्तः स वराकः । तत्पश्चात्तस्य पततः सोपानपतिसंसक्त्या भग्नं मस्तक- मधस्तनसोपानसमीपे क्षणं मूर्छा समागना । केनापि यण्टेन प्रच्छादिकाऽपहृतेति तादृशमसमञ्जसं दृष्ट्वा जिनमासन- लाधवभीरुभिः श्रीजिनपतिमूरिभिर्दयापरिणामानरक्षणादेवाऽऽत्मभक्तश्रावकहस्तेन वेना अच्छादिका दापिता तस्य । 'तथकेन च वण्ठेन हस्तकादानपूर्वकमू कृत्य जितमस्माकं ठक्युरेणेति वदता द्वितीयहस्तेन दत्ता तन्मस्तके टकरा ! तदनन्तरं सहस्रसंख्यैचिंटप्रायोकिस्तन्मस्तके टक्कगं ददर्धियलगृहादहिनिष्कासितः । श्रीपूज्यश्च श्रीपृथ्वीराजहस्ते महानवहिकापट्टचतुष्कोणसण्डलघुहस्तचित्रकरलिसितमहाप्रधानछत्रवन्धपटो दत्तः । राजा पुनरतितहलाच्छत्र- मवलोक्य- १३ युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। पृथ्वीराय ! पृथुप्रतापतपन प्रत्यर्थिपृथ्वीभुजां, का स्पर्धा भवताऽपरार्थ(य)महसा साधं प्रजाराने। येनाऽऽजो हरिणेव खगलतिकासंक्तिमत्पाणिना, दुर्वाराऽपि विदारिता करिघटा भादानकोर्वीपतेः ॥ [४०] इत्येतच्छत्रचन्धवृत्तं वाचित पण्डितश्योभयथाऽपि व्याख्यातम् । तथा तस्मिन्नेव पटे चित्रकरलिखितराजहंसिकायुग- लोपरिस्थितम्- कयमलिणपत्तसंगहमसुद्धवयणं मलीमसकमं च । माणसहियं पिअवरं परिहरियं रायहंसकुलं ।। [४१] परिसुद्धोभयपक्खं रत्तपयं रायहंसमणुसरह । तं पुहविरायरणसरसि जयसिरी रायसि व्व ।। [१२] इति गाथाद्वयं वाचित स्वयं पूज्यैर्महाविस्तरेण व्याख्यातं श्रुत्वा चाऽतिप्रमोदात् 'कमेकमस्थाचार्यस्वाभीष्टं करो. भीति चिन्तयित्वा राज्ञोक्तम्-'आचार्य ! ममाथवा निजगुरोः शपथोऽस्ति ते, यदि त्वमात्मनोऽभीष्टमसम्पद्यमानं ममाग्रे न कथयसि; यसिन् कस्मिन् वा देशे यस्मिन् कस्मिन् वा नगरे तावकं मनो रमते तदुपरि गृहाण पत्तला- मिति' । श्रीपूज्यैरुक्तम्-'महाराज ! शृणुत, निजभुजोपार्जितलक्षसंख्याद्रव्यः सा० माणदेवनामा श्रावकः श्रीविक्रम- पुरे वसन्नस्ति । स च मम गृहस्थसम्बन्धेन पितृव्यो भवति । तेन च मम व्रतग्रहणसमयेऽत्यादरेण भणितम्-'"वत्स ! कथमहमात्मीयान् जातकाननेकधा विलासान् कुर्वतो द्रक्ष्यामीत्यभिप्रायेणानेकानि कप्टानि विपा मयतावानर्थ उपा- जिंतः। अतो वत्स! किमेवं त्वयाऽऽत्ममनसि विकल्पितं यच्वं गृहस्थवासादुद्विग्न इव लक्ष्यसे । कथय किं द्रम्मान सहस्राणि दश विंशतिं दत्त्वा देशान्तरे कस्मिंश्चित् प्रेपयाम्यत्रैच वा हट्ट मण्डयामि कन्यकां वा कामपि परिणाययामि, अन्यो वा यः कश्चित्तव चेतसि मनोरथो वर्तते तं कथय यथा पूरयामीत्यादि"-मया तु तत्सर्वमवगणय्य स्वगुरूपदेशश्रवणो- च्छलितपरमसंवेगात् सर्वसङ्गपरित्यागः कृतः । सोऽहं कथमद्य युप्माकं देशाय वा नगराय या स्पृहयामीति' । राज्ञो- कम्-'तर्हान्यतरं किञ्चित्कार्य भण, यथाऽहमात्मोत्पन्न हर्ष सन्मानयामि' । उत्सुकीभूय श्रे० रामदेवेनोक्तम्-'देव ! जयपप्रार्पणविपये प्रसादः क्रियताम्' । राज्ञोक्तम्-'श्रे० रामदेव ! अद्य सरमुत्सूरं बभूव, दिनद्वयमध्ये निजकार्यगा- जयमेरावागमिष्यामि । तत्रागतः सनिश्चयेन जयपत्रमर्पयिष्यामि' । श्रेष्ठिनोक्तम्-'देवनिरोपः प्रमाणम् , परमितः स्थाना- यथाऽस्मद्गुरूणां महाविस्तरेणाजयमेरी प्रवेशो भवति तथाऽऽदिशत' । राज्ञोक्तम्-'मण्डलेश्वर ! त्वया तथा कर्तव्य यथा श्रे०रामदेवगुरवो महत्यां शोभायां भवन्त्यामजयमेरौ निजोपाश्रये प्रभूता भवन्ती'त्यादिशिक्षा कामासस्य दत्ता । ५२. तदनन्तरं ततः स्थानादुत्थाय सहस्रसंख्यतुरङ्गमाधिरूढराजपुत्रानुगम्यमानमण्डलेश्वरकइमासप्रमुसराजन- धानः सह प्रीतियातां कुर्वन्तः, स्वकर्णाम्यामात्मीयकीत्ति शृण्वन्तः, प्रभूतलोकदीयमानाशिपो गृहन्तः, श्रीपृथ्वीराज- सरके मेघाडम्परनाग्नि छन्ने प्रभावनायै मस्तकोपरि धिपमाणे, पुरमध्ये स्थाने स्थाने रङ्गभरेण प्रेक्षणीपक निष्पद्यमाने, दाने च व्याप्रियमाणे, चचर्यां दीयमानायां, धवलेपु गीयमानेषु, श्रीगौतमस्वामिगणघरप्रमुखपूर्वजसत्कगुणगणनश- सनपूर्वक विरुदावलीददत्सु भट्टलोकेषु, श्रीपृथ्वीराजसभायां श्रीजिनपतिमरिभिजितः पण्डितपाप्रम इत्याधप्रतिय- द्धासु तत्कालनिष्पनासु चतुष्पदीपु पठ्यमानासु, निःस्वानः सह पञ्चशन्देषु याद्यमानेषु, राजादेशानगरशोमपा शोमिते श्रीअजयमेरौ चत्यपरिपाटिपूर्वक पौपधशालायां समागताः श्रीपूज्याः। ५३. दिनद्वयानन्तरं प्रतिज्ञातानिहिकः सबलवाहनो महाराजाधिराज-श्रीपृथ्वीराजः श्रीअजयमेरो निजपाल- ५ ३४ खरतरगच्छारंकार गृहे समागत्य ततः स्थानादस्तिस्कन्धाधिरूढेन जयपत्रेण सह पौपधशालायामागतो ददौ च जयपत्रं श्रीपूज्यानां हस्ते । पठितवाशिदः श्रीपूज्यैः । थापकैश्च कारितं महापर्धापनकम् । तस्मिंश्च वर्धापनके ० रामदेवेनात्मगृहात् पारु- स्थद्रम्माः पोडश सहस्राणि व्ययीकृताः। सं० १२४० विक्रमपुर आत्मना पश्चदशः श्रीपूज्यैर्गणियोगतपयक्के । १२४१ फलिपधिकायां जिणनागाजित-पद्मदेव-गणदेव-यमचन्द्राणां धर्मश्री-धर्मदेव्योश्च दीक्षा दत्ता । सं० १२४२ मावसुदि १५ श्रीजिनमतोपाध्याया देवीभूताः । सं० १२४३ खेटनगरे चतुर्मासी कृता । सं० १२४४ श्रीमदणहिल. पाटकनाम्नि पतन इष्टगोप्ठ्यां वर्तमानायां वश्यायमभयकुमारमुक्तमान् भाण्डशालिमसंभवः-'अभयकुमार! लव स्वाज- न्येन तन कोटिसंरयद्रव्याधिपत्येन तर राजमान्यतया फिमसाकं फलम् ? यचमस्मद्गुरून् श्रीउजयन्त-शनुञ्जयादिती- धेपु यात्रां न कारयसि ?' एवं प्रोत्साहितः सन् वश्यायोऽपि 'भाण्डशालिक! मा कांचिदनिर्ति कृथाः, करिष्यामि सर्व भद्रम्'-इत्युक्त्वा राजबुलं गतः । तत्र च महाराजाधिराजभीमदेयं राजप्रधानं जगद्देवनामानं प्रतीहारं च विज्ञप्या- जयमेरुपास्तव्यसरवरसंघयोग्यं स्वयं लेसितराजादेशं गृहीखात्मगृह आगतः । तदनन्तरं वश्यायेनात्मसमीपाका- रितभाण्डशालिकसमक्षं राजादेशं सरतरसंघयोग्यं श्रीजिनपतिमरियोग्यं स्वकीयं विज्ञप्तिकाद्वयं दचा प्रधानलेसनाहका श्रीअजयमेरौ संघपार्श्व प्रेपितः । श्रीपूज्या अपि राजादेशदर्शनाद् वश्यायश्रीअभयरमारसरकविज्ञप्तिकाद्वयवाचनास संघमार्थनया च श्रीअनयमेनास्तव्यसंघेन सह तीर्थचन्दनार्थ चलिताः । ५४. त्रिभुवनगिरौ यशोभद्राचार्यसमीपेऽनेकान्तजयपताका न्यायानतारादिजैन-दशरूपकादिग्रन्थान् भणित्वा, श्रीपूज्यादेशात् त्रिभुपनगिरीयसंघेन सह, तर्फभणनोपप्टम्भकारकशीलमागर-सोमदेवयतिद्वयसहितौ पं०यतिपालगणि- धर्मशीलगणी तीर्थयात्रोपरि प्रस्थितानां श्रीपूज्यानां मिलिला कथयतः स्म, यथा-'प्रभो! श्रीयशोभद्राचार्येण युप्मदा- देशात् प्रस्थितानामस्माकमग्रे कथितं यथा-"यदि यूयं कथयत तदहमपि युप्माभिःसह यातायामागच्छामि, यथा श्री- गूर्जरवायां सञ्चरतां श्रीपूज्यानामग्रे स्थितः काहलिक इव ब्रजामि येन कोऽपि प्रतिमल्लः संमुखमपि स्थातुं न शक्नोति ममापि च निजगुरुरहमानं कुर्वतो लघुतरः कर्मसञ्चयो भवतीति"-अस्माभिस्तु युप्मनिरोपाभागनिपिद्धः श्रीमदा- चार्यः । श्रीपूज्यरुक्तम्-'रुचिर कुर्सीघंयदि तमाचार्यमानयध्वम् । भोरिदानीमपि कथमपि स आगच्छति ?" सैरुक्तम्- 'प्रभो! इदानीं दूरदेशे वर्तते स इति नागच्छति । तथा, यथा चतुर्दश सहस्राणि नदीप्रवाहा गङ्गाप्राहे मिलन्त्येवं विक्रमपुर-उचा-मरुकोट्ट-जेसलमेरु-फलमधिका-दिल्ली-पागड-माण्डव्यपुरादिनगरवास्तव्यभव्यलोसिंघा अहमह- मिकया श्रीअजयमेरखीयसंघस्य मिलिताः। श्रीपूज्या अपि विद्यागुणेन तपोगुणेनाचार्यमत्रादिशक्या श्रारकलोक- भच्या संसारविरक्त्या वृहस्पतिप्रायप्राणि(वाणी?)संसक्या स्थाने स्थाने प्राचनप्रभावनां कुर्वन्तः श्रीसंघेन मह प्रामाश्च- न्द्रापत्याम् । ५५, तन च संघमध्यस्थितरथप्रतिमापन्दनार्थ पञ्चदशभिः साधुभिः पञ्चभिराचार्यश्च सह प्रामाणिकाः पूर्णिमा- पक्षीयाः श्रीअकलङ्कदैरसूरयः समागत्य स्थप्रतिमालानमहोत्मपदर्शनार्थमिलितलोफमेलापफदर्शनाद् व्याघुदय दूरदेशे वृक्षस्याधस्ताद स्थिताः । श्रीपूज्यैश्च मानुपं प्रेष्य पृच्छापितास्ते, यथा-'आचार्यमिश्राः ! केन कारणेन चत्यपन्दनाम- कृत्वैव यूयं व्याघुल्य स्थिताः ?" इति। तैरपि प्रेपितमानुपस्याग्रे कधितं यथा-'येनाचार्याः मन्ति तेऽस्माभिः मह लघुरहत्तया व्यवहार करिष्यन्तीति । तेनाप्यागत्य पूज्यानामग्रे भणितम् । पूज्यश्च-'करिप्यते व्यवहारः, शीघ्र- मागच्छते'त्यादि भाणितं तन्मुसैन तैपामग्रे। तदनन्तर ते ममागत्य ज्येष्ठानुक्रमेण वन्दनानुवन्दनादिकं स कृतवन्तः। अफलदेवमरिभिरुक्तम्-'किं नामधेया आचार्यमिश्राः ?' पार्थस्थिनेन मुनिनोक्तम्-'श्रीजिनपतिमूरिनामानः श्रीपू- ज्या' । तत्पश्चारुक्तम्-'आचार्यमिश्राः केन कारणेनेदृशमयुक्तमात्मनाम कारितम् । पूज्यरक्तम् - 'क्थं जायतेऽ- युक्तमेतदिति ? तैरुक्तम्-'व्यक्तमेन ज्ञायते; तथाहि जिनशब्देन सामान्पकालिन उव्यन्ते तेपा पतितीर्थकर एवेति .

युगप्रधानाचार्यगुवांवली। तीरनाम्नाऽऽस्मानं पादयन्तः परमेश्वराणां तीर्थराणां महतीमाशातनां कुरुष्वमिति । तस्माजिनपत्तिमरिरिति नाम युक्तम् । श्रीपूज्यरुक्तम्-'आचार्यमिश्राः । सादेवं यदि युप्माकमेवैकं विवक्षितं प्रमाणीकुर्वन्ति विद्वांसः, परं तेऽग्रतः पश्चाच घनं विचारयन्त्यन्यथा तेषां प्रेक्षावत्ताहानिप्रमक्तेः । याप्माकीणां चेदृशी वाणीं दृष्ट्या वयमेवं मन्यामहे यदुन युप्माभिलोकयात्रयव केलया...(1) ग्रन्याम्यासः परित्यक्तः। कथमन्यथा युप्माकं जिनपतिशब्द एवंविधा विप्रतिपत्तिरुत्पद्यते ?; यतो नहि लक्षणविद्यायामेक एव तत्पुरुपनामा समासो वर्णितः । सन्त्यन्येऽमि पश्च समासा वर्णिताः। यदुक्तम्- पटू ममामा बहुव्रीहि ढिगुर्द्वन्द्वस्तथाऽपरः । तत्पुरुपोऽव्ययीभावः कर्मधारय इत्यमी॥ [१३] तथाऽन्येनापि पण्डितेन चित्री(?) प्रकटनाथ पदसमासनामनिनद्धाऽऽर्या कृतेयम् - द्विगुरपि सद्वन्द्वोऽहं गृहे च मे सततमव्ययीभावः । तत्पुरुप ! कर्म धारय येनाहं स्यां यहुग्रीहिः ।। [४४] वरुक्तम्-'ततः किम् ?' पूज्यैरुक्तम्-'योऽर्थः छाप्येन ममासेन न घटते स तत्र द्वितीयेन घटिप्यते, अतः किमित्युत्तालीभ्यायुक्तमित्युक्तम्' । तरुक्तम्-'कधमन्येन समासेन जिनपतिरिति नाम युप्मासु सद्गतिमङ्गति ? श्रीपूज्यरक्तम्-'शृणुत, जिनः पतिर्यस्यासी जिनपतिरिति बहुव्रीहिममासे क्रियमाणे को गुणः को या दोपो भरतीति मणत' ।तरुतम्-'आचार्यमिया बगुग्रीहौ क्रियमाणेन कोऽपि दोपो भाति, स्वस्य जनवख्यापनलक्षणो गुणच भाति । परमिश्या मनमि कपितया कष्टपिष्टिकया फिमिति लोको च्यामोहते ; प्राञ्जलमेच जिनपत्तिमरिरिति नाम फिमिति म क्रियते ?' पूज्यरुक्तम्-'येषां चेतसि लक्षणविधा सम्यक् परिस्फुरति तेपामग्रे ममं विपमं या किमपि नास्ति । यत- स्तेऽपशदानपि प्रधानशब्दत्वेन ममर्थयन्ति, किं पुनः प्रधानाव्देषु प्रयुज्यमानेषु याच्यम्' । पुनरपि रुन्तम्- 'मातिदमेन, परं संघेन मह यात्रा कापि मिद्धान्ते साधूनां विधयतया भणिताऽस्ति, यदेयं यूयं प्रन्थिका ? पूज्यरु- तम्-'किमेरमुत्यूनमापकं मुस्माऽन्ये विद्वांमः स्तोक पनं या सिद्धान्तभणिनमनाश्रित्य धर्मकृत्ये प्रान्ति ?' तरक्तम्- 'आचार्य ! अनिष्टा पूयं यदद्यापि सिद्धान्नपलमालम्रत' । पूज्यरुक्तम्-'गायत लमं केचिदृष्टाः केचिन्न धृष्टा इनि' । वैक्तम्-"किं. युप्माभिः सिद्धान्ता दृष्टा न द्वितीयः । पूज्यरक्तम्-'यदि द्वितीयः सिद्धान्ता रमा अमरिष्यन् पदाने नियि िनरमपदिप्यन् तिरुक्तम्-आचार्यमिया तिना सता संयेन मह तीर्थयातायां न गन्तपमित्याहीनि निपेयरुपास्यानि सिद्धान्ते किंवा वयं दर्गयामः, किंवा यूयं रियायसवराणि दर्शयध { अययाऽस्तु रे गिद्धान्तः सफीयगुरोरेय यांगि मा पिग्मार्ट । यतस्तेनोक्तम्- पिदिसमधिगपसुपत्यो संविगो विहिपमुविहियाविहारो। गदपा पंदिस्मामि सामि भणयनपरे ।। [१५] इस्पादि । पूज्यरतम्-'भाचार्यमिधाः ! किमिनि पुनप्राणेन (?) कथ्यते यद्वयं सिद्धान्तामगि दायाम नि? पमा मानिन्धर फोर्यने, यदि मिसान्नान्त्यप्रगति दयन, मानि पुननितान्यपि न प्रमाणीरियन सिद्धि- शित निग्ध मानिम्फोग्णम् । यानि पुनः गिदान्नमध्ये गन्त्यक्षराणि तान्पन्परा পানি মানিন রানি दपि गस्तिपोरगं युगामिनि नितम्-'युष्मानमपि मिशनमनिमाधिपर पप गपन गा मागापा प्रग. निजी पईन मुस्तम्' । परराम्-'इदमीरगमेर, पदि यमपि गं मिदान्नानुमाग्न पुमान परिमापित नगनुमा गुप्मामिपि मागमा मामानीभूप गोयम् । पपरमाशिना तिमिदानानुपापिनी मीनदा माननीया, न गारमुगिन्मादः पाप । मनम्-'मसामगिनन्ना श्रीमानम्-'भाषा- खरतरगच्छारकार यमिश्रा ! आचार्यः स एव क्रियते येनानेके देशा दृष्टा भान्त्यनेकदेशसम्बन्धिन्यश्व भाषा ज्ञाता भवन्तीति सिद्धा- न्तेऽस्ति । तैरुक्तम्-'अस्तीति' । श्रीपूज्यैरुक्तम्-'कार्यकारणेन लघुपयसोऽपि वयमाचार्यपदे च प्रवेशिवा इत्यतोऽ- धुनाऽज्ञातदेशभाषापरिज्ञानार्थ संपेन सह प्रस्थितानामस्माकं तीर्थयात्रा यदि भाति तदा शङ्को दुग्धभृतः, कस्तूरिका कर्पूरेण यासितेत्येकमुत्तरम् ; तथा संपेन गाडतर वयमभ्यर्थिता यदुव-प्रभो ! अनेकचाफिलोकसंधुलायां गूर्जरत्रायां तीर्थानि सन्ति, तानि च ज्योत्कर्तुं चलितानस्मान् दृष्ट्वा कश्चिञ्चाकिस्तीर्थयानानिपेघाय प्रमाणयिष्यति, तदा सिद्धा- न्तरहस्यापरिज्ञानाद्वैदेशिकत्वाचासाभिन किमप्युत्तरं दातुं शक्यते; अतो मा जिनशासने लायमभूदिति यूयं यथा तथाऽस्माभिः सह तीर्थवन्दनार्धमागच्छत-इत्यादिसंघाभ्यर्धनया वयमागता इति द्वितीयमुत्तरम् । तथा साधूनां नित्यकृत्यव्याघातसंभावनया सिद्धान्ते संघेन सह यात्रा निपिद्धति । यदा नित्यकृत्यव्याघातो भनति तदा न क्रियत एव । अस्मिंश्च संघ उभयकालप्रतिक्रमणब्रह्मचर्यनियमकमस्ताद्यनेकाभिग्रहग्रहणपूर्वकतीर्थानि वन्दितुं श्रावकलोथा- गतोऽस्तीति कथमसाफमावश्यकादिनित्यकृत्यव्याघातसंभवः १-इत्याधनेकयुक्तिप्रतिपादनप्रमोदिताः श्रीअकलङ्क- देवसूरयः प्राहुः-'आचार्यमिश्राः! सरतराचार्य इति शब्दश्रवणेनाप्यम्माभितिमेव यदि(द) यूयं पुष्टालम्बनमन्त- रेण नैवमपवादमाश्रयतः, पर किन्तु मारवो लोकोऽतिस्थूलभापी श्रूयते, अद्य च मरुस्थलात् संघेन सहाचार्या आगताः सन्तीति श्रुतम् । अतोऽम्याचार्याः कथं कथं भापन्त इति द्रष्टुं कौतुकादागत्यास्माभियमालपिता न निरूपा- भिप्रायेणेति यदनुचितमुक्तं तत्क्षन्तव्यम् । पूज्यैरुस्तम्-'आचार्यमिश्रा ! इष्टगोष्ठयामपि यदपि तदपि वक्तुमायाति, किं पुनर्मादावस्थायाम् । अतो युप्मानुद्दिश्याम्माभिरपि यत्किश्चिदनुचितमाचरितं तरक्षन्तव्यमिति' । तदनन्तर तैरु- क्तम्-'आचार्यमिश्राः ! अद्येह युष्माकं त्रुपता रीतिं पश्यतामम्माकं चित्ताद् यदेतदस्मिन् देशे श्रूयते-सरतराणामा- चार्यो वादलब्धिमम्पन्नः-इति तत्कि सत्यं कियाऽलीफमित्येवंरूपः मन्देहोऽपगतः। यतो नहि निर्मूला प्रसिद्धिर्भ- चति । तथाऽचार्यमिश्राः! साधूना निहरणस्यातिकालो भवत्यतो मुत्कलयामः' इति । पूज्यैरुस्तम्-'अद्याम्माकं प्राणका न भविष्यथ १ हपतित्क्तम्-'प्राघुर्णकास्त एवोच्यन्ते ये देशान्तरादागता भरन्ति, वयं चावत्या एवेति कथं युष्माकं प्राघुर्णका भवामः, पूयं पुनरस्माकं प्राघुणका भान्त्विति' । पूज्यस्स्तम्-‘युक्तमेवैतद्' इत्यादिकां प्रीति- याता कृत्वा हर्पितचित्ता गतास्ते निजोपाश्रयम् । ५६. द्वितीये च दिने तात्यः थारकैः श्रीपूज्यानामग्रे द्वादशावर्तनन्दनकं दातुं समागत्य श्रीपूज्या विज्ञप्ता यथा-'भगान्तो! चन्दनकं दापयतेति' । श्रीपूज्यैर्मुद्रां धृता 'यथासमाधी'त्युक्तम् । तदनन्तर ते श्रीजिनवल्लभमूरिद- शितमार्गागतविधिना वन्दनकं दातुं प्रवृत्ताः । हर्पयशाच्छीपूज्यैरुक्तम्-'भो भो महासचा! गूर्जरसायामटपुटया मुरा- पत्रिकया वन्दनकं दीयते, युष्माभिः किमिति चतुप्पुटया दत्तम् १। वरुक्तम्-'भगरन्तो ! वयं श्रीअमयदेवमरिभिरेवं शिक्षिता'-इत्यादिका पूर्वजगा श्रुता कामहद विहताः सन सह । तत्रापि चत्यनन्दनाथं महाप्रामाणिः पौर्ण- मासिक प्रभूतमाधुपरिकलितः श्रीतिलकप्रभबरिः समानगाम सपमध्ये । नाच मुग्याप्रिश्नपूर्वक खगुरुपादपमरो- वाहनोच्छलितकीर्तिपयःपूरवेलेहितक्षीर परिहितप्रधानपट्टहीर स्वामरणालङ्कतमनसिजमदृशशरीर माण्डव्यपुरीययवह- रक्लक्ष्मीधरावामगुल्या दर्शयता तेन श्रीपूज्याः पृष्टा'-'क्रिमेते संघपतयः ?' इति । श्रीपूज्यरक्तम्-'आचार्य! श्रा- कमानस संघपतिरिति नाम दातुं न युक्तम् । तेनोक्तम्-'भापा नारदेवरिया श्रूयते । पूज्यैः सोपडाममुक्तम्- 'ग्रामीणजनसुलभा भाषामाश्रित्योत्तर दास्समि' नेनोक्तम्-'कि लोस्पमिद्धा मापा वचनमात्रेण त्यानयमि पूज्यरुक्तम्-'बहुला लोकप्रमिद्धा भाषा अवगनास्यशुद्धिनामाध्ययनाथः माधुमिः परिडियन्ने। तथाऽऽचार्य ! नाम्मा लोकेषु कोऽपि मत्लरोऽम्ति, येन तेपा मापामप्रमाणीकुर्मः; किं तर्हि मतिना मना तर माषया भाप्यं यया भाष्यमाणया मान्याना लापरं न भाति । नेनोक्तम्-'स्मिनया मापया राप पिचिङ्गानि ?' पूज्यन्तम्-'मत्रों- युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ऽपि कोऽपि जानात्येतत्' । तेनोक्तम्-'कथम् ?' पूज्यैरुक्तम्-'आचार्य ! संघशब्देन श्रमण-श्रमणी-श्रावक-श्रावि- कारूपलोकसमुदायो भण्पते । यदुक्तम्-'साहश साहुणीण य साचय-सावियचब्धिहो संघो-इत्यादि। तस्य च पतिस्तीर्थकर एवाऽऽचार्यों वा । तेनोक्तम्-'केवलश्रावकमेलकेऽपि संघशब्दः प्रयुज्यमानो दृश्यते । पूज्यै- रुक्तम्-'कारणे कार्योपचाराद् दृश्यते यथा घृतमायुरित्यादि परमुपचारवलेन यस्मिंस्तस्मिन् क्रियमाणे प्रयोगे मिथ्या- दृष्टिलोकमध्ये कदाचिदुपहासो भवति, यदेप गृहस्सखात्तस्य श्रावकस किमपि कुत्सितं दृष्ट्वोपहासपरतया वक्ष्यति- यदहो । जनानामयमादिरि(मधिपतिः?) यदेतस्मादधोवर्तिनोऽन्ये सर्वेऽपि जनाः, अस्स चायं प्रक्षाल(१) इति । तथा- ऽऽचार्य ! परत उपचार मुश्चाहमन्यथापि संघपतिशब्दं श्रावके वर्तमान दर्शयिप्यामि' । तेनोक्तम्-'कथम् ?' पूज्यै- रुक्तम्-'महुव्रीहिसमासाश्रयौन, यथा-संघः पर्तिर्यस्यासौ संघपतिः श्रावकमात्रः। तेनोक्तम्-'ननु मया महद्धिक श्रावके संघपतिशब्दः प्रयुक्तः । पूज्यैरुक्तम्-'भ्रान्तिवशात् प्रयुज्यन्त एवान्यत्रापि शब्दा:'-इत्येवमादिना प्रकारेण अपञ्चेनानेकसिद्धान्तयुक्तिप्रकाशनेन श्रावके प्रयुज्यमानतया संघपतिशब्दे निषिद्ध विलक्षीभूतः श्रीतिलकप्रभसरिः । पुनरप्पालपितः मुखवार्ताप्रच्छनेन श्रीपूज्यैर्यथा-'साम्प्रतं यूयमत्रैव स्थाप्णयः?' इति । तेनापि सोपहासमुक्तम्-'आचार्य! अति मुवता भवताऽहो ! स्वस चाक्पशुद्धिनामाध्ययनार्थनैपुण्यं प्रकाशितम् । यतस्तत्र 'तहेव सावजणुमोइणी गिरा ओहारिणी जाउ परोवघाइणी' इत्यादिना ग्रन्येन कृताध्ययारिणी वाणी न घूयान्मुनिरित्युक्तम् । भयांश्चात्रैवेति सावधारणे भापत इति । सर- लाशयः श्रीपूज्यरक्तम्-'आचार्य ! अतीव शोभना नोदना दत्ता, यतः सावधारणं वाक्यमुक्तं सत् कदाचिद् व्यभिच- रत्यतो मुनिरीकभापी सात् , तथा च बतभङ्ग इति; परं तिलकप्रभसूरे ! भवता ममाभिप्रायो नावयुद्धोऽतः स्वामि- प्रायस्तर्कभापया प्रकाशिप्यते । तथाऽऽचार्य ! तर्कम्य भणितस्यैतदेव फलं यन्निरमिनिवेशीभूय खकीयं वाक्यं यादृशं तादृशं वा यथा तथा समर्थ्यते । अद्य च काफतालीयन्यायेनाऽऽप्रयोगङ्गा-यमुनाप्रवाहयोरिव प्रियमेलकः संजातः, ततो यद्यभिनिवेशं मुक्त्या तर्करीत्येप्टगोष्ठी क्रियते तदा सफली भवति । तेनाप्युक्तम्-'प्रमाणमिति । तदनन्तरं श्रीपू- ज्यरुक्तम्-'आचार्य ! साधुः सावधारणं वचनं न चूयादेव किंवा कदाचिद् यादपि ?' तेनोक्तम्-‘कस्मिन् किं किं ? आये पले स्ववचनव्याघातः। अइयम्मि य कालम्मि य पच्चुप्पन्नमणागए। निस्संकिय भवे जंतु एवमेयं तु निहिसे॥ [४६] इत्यादिसिद्धान्तविरोधश्च । द्वितीये च पक्षे न ययभुपालम्याः, भवदम्युपगमानुसारेणास्माभिरुक्तलान् । तथा- ऽऽचार्य ! यस्मिन् वाक्येऽवधारणं साक्षान्न दृश्यते तत्र स्वयमवश्यमूहनीयम्-'सर्व वाक्यं मावधारण'- इति न्यायाद्, अन्पधा व्यवस्था कापि न स्यात् । पटमानयेत्युक्ते यदपि तदप्यानयेन्नयेद् । अपि च, तथा-अर्हन् देवः, मुमायुगुरुरि- त्यादिवाक्येयपि अईनेर देवः परमपदापाप्या, अर्हन् देव एर नाऽदेवः, तथा सुमाधुर्गुरुरेव परमपदपथदर्शकन्वेना- मित इत्यादयोऽपि निपमा न स्युः। तथा सैद्धान्तिकान्यपि वाक्यानि सामधारणानि मन्ति मनोहराणि भान्ति,यथा- "धम्मो मंगलमुपिह" इत्यादि धर्म एव मलमुत्कृष्टं न दघिदुग्धादि धमों मङ्गलमेर नामगलरूपा; धर्मों मगत्तमुत्कृष्टमेव ग दधिवादिसमानमिति'। तेनोग्नम्-'आचार्य ! अयोगव्यवच्छेदाय याययोगव्याच्छदार्य बाध्यन्नायोगव्याच्छदार्थ याकारः प्रयुज्यते दिनक्षणः । अत्र च प्रयुक्नेना नकारेग किं व्यान्छियन ?, न नापदयोगनपाठाप प विगेपणान पुः पटिन एस समर्पः म्याद, अन प विशेषणम्य वामावान; नाप्प- न्ययोगो या, नम्य नाम्मासमुपाविहारियन म्यानान्तग्योगं निपटुमनस्पत्याननाप्पत्पन्नायोगः, क्रियया गर्म परिन पर मदन डाय प्रमुन्नाभायामारातमाहियागमहत्यादपुर एपाय मेरमन्द पनि'। श्रील्यः ३८ " खरतरगच्छालंकार सावष्टम्भमुक्तम्-'भवेदयुक्तमेवायं यदि वयं कथमपि समर्थयितुं न शक्नुमः, परमत्रानेका युक्तयो दर्शिताः, पुन-- रपि भवत्प्रश्नोत्तरदानपूर्वकमनेका युक्तीर्दयामः। प्रतिपाद्यस्य सवि सन्देहे विप्रतिपचौ या तदपनोदार्थमवधारण प्रयुज्यते विचक्षणः । तथा हि-एक युक्तिवलेन समर्थयन्त्यस्त्यात्मेति; अपरेऽपि युक्तिवलेन कथयन्ति नास्त्यात्मेति; स्वयं च प्रत्यक्षेण नोपलभ्यते तस्मात् किमस्ति नास्ति चाऽऽत्मेति संशयानं शिष्यं प्रति, तथा यद्वस्तुनः सकाशा- तत्यान्यत्वाभ्यामवाच्यं तदवस्तु, यथा व्योमकमलम् , तथा च मुखादिकम् । अथाऽऽत्मनः सुखादिकं भिन्नाभिन्नमि- त्यसिद्धताहेतोर्यतोऽभेदे क्रियाविरोधो नित्यस्पैकरूपस्य क्रियाया असंभवात् । भेदपक्षे तु ये क्रममायिनो न ते परा- भिमतात्मसमवायिनो यथा बीजाश्रादयस्तथा च सुखादयः-इत्यादिना प्रकारेण नास्त्यात्मेति विप्रतिपद्यमानं च शिष्यं प्रति सावधारणं वाक्यमुच्यते । यथा-अस्त्येवाऽऽत्मा प्रतिप्राणिस्वसंवेदनप्रमाणप्रसिद्धचैतन्यान्यथाऽनुपपत्ते- रिति । स चावधारणरूप एवशब्दः कसिंचित्स्थानके प्रयुक्तः किमपि व्यवच्छिनत्ति । असत्प्रयुक्तस्त्वयमयोगान्य योगात्यन्वयोगांस्त्रीनपि व्यवच्छिनत्ति । तथा हि-साम्प्रतं यूपमत्रैव स्थाप्णव इत्यस्माभिरुक्तं तत्र सप्तम्यन्तैतच्छन्दे- नात्रेतिरूपेण मासकल्पादियोग्येतरक्षेत्रेभ्यः सकाशादस्य क्षेत्रस्य किमपि व्यवच्छिद्यते च नवा ?। यदि न व्यव- च्छिद्यते तदाऽस्य-प्रयोगो निरर्थक एच । अथ किंचिद् व्यवच्छिद्यते तदैतद्विशेषणं सातम् , प्रकरणयलाच विशेष्यं नगरमायातम् । विशेपणाच पुरः पठित एवशब्दो वर्तमानकालापेक्षयतेन नगरेण सदा युष्मद्योग व्यवस्थापयति, तस्मिंश्च व्यवस्थापित, वर्तमानकालापेक्षयैवाऽन्येन नगरादिना योगं स्वयमेवकारो व्यवच्छिनत्ति । तथैवात्यन्तायोग- मपीत्यनेनाभिप्रायेण साम्प्रतमित्युक्तम् । तस्माद्युक्तमेवायमेवकारः। "अः कामचारे" तद्विषय एव शब्दे परेऽवर्णस्य लोपो भवति, यथा-इहेव विष्ठान्यत्रेव वा तिष्ठेत्यादि । नियोगे तु,. इहैव तिष्ठ मा यासीः क्यापीति' । पूज्यविहस्सोक्तम्-'तत्किमस्मन्नियोगादेतायता परिवारेण सह भवानत्र स्थितः ?' तेनोक्तम्-'तहिं अत्रैवेत्यपप्रयोगः' । पूज्यरुक्तम्-'प्रयोगार्थापरिज्ञानेऽपशब्दसं नोद्भावनीयम्' । तेनोक्तम्-'वच- नमात्रेण मय्यज्ञानता नाऽऽरोपणीया' । पूज्यैरुक्तम्-'एवमेतत्' । तेनोक्तम्-'तर्हि भण्यतामयमेवशब्दः कसिन्नर्थे ?' पूज्यैरुक्तम्-'अनेकप्वर्थेषु भविष्यति, परं प्रथममेकसिन्नर्थे भण्यते, लग्नं वं सावधानीभूय शृणु-यथा वचनमेव वचनमात्रमित्यादिपु प्रयोगेषु स्वाथै एवशब्दः, एवमत्रापीति । अथवाऽयमर्थः-यथा अपि संभावनायां प्रयुज्यते, एवमयमप्येवशब्दः संभावनायां प्रयुज्यते विद्वद्भिर्यथा-'चपुरेव तवाचष्टे भगवन् ! वीतरागता' मित्यादि श्रीहरिभद्रसरिवाक्येपु। यत्र तत्रैव गत्वाऽहं भरिप्ये स्वोदरं बुधाः । मां विना यूयमन्त्रैच भविष्यथ तृणोपमाः॥ [४७] इत्यादिषु वेति चेति युक्त एवायमेवकारः । तथा पृच्छाकाले हि प्रच्छकः सावधारणं वा यानिरवधारणं या ध्यान्न तस्य वचनं विचारमर्हतीति लोकस्सितिर्यतोऽसावजानान एव पृच्छति । यस्त्वन्यदा यक्ति तस्य वचने व्य- भिचारित्वादिदोपोद्भावनेन स्वशक्त्यनुसारेण कदर्थ्यते, यथा तस्य महती शोभा भवतीत्यादि विदग्धजनरीति विस्सा- रयता भवता स्वकीयं पाण्डित्यं प्रकाशितम्' इत्यादिवचनसन्दर्भणात्मप्रयुक्तवकारविपये उत्तराणि शतं श्रीजिनपति- हरिमुखाम्भोजात् श्रुत्वाऽतिप्रमुदितमनसा तिलकप्रभारिणोक्तम्-'आचार्य ! सकलायामपि गूर्जरत्रायां व सिंह इव निःशङ्कः सन् विचरेन कोऽपि तय सम्मुखं प्रतिमहतया स्थास्यति, येन त्वया ममाप्यन एवं विजृम्भितमिति' । श्री- पूज्यपास्थितेन मुनिना शकुनग्रन्धिर्वद्धः। अभूतपूर्वस्वोचितपण्डितगोष्ठीसमुद्भूतहर्षप्रकात्तिलकप्रभसरिः श्रीपूज्यान प्रशंसन् स्वोपाश्रयं गतः। ५७. तत्पश्चात् संघः श्रीआशापल्लयां जगाम । तत्र च साधुक्षेमन्धरः स्वपुत्रप्रद्युम्नाचार्यवन्दनार्थ वादिदेवाचार्यस- कपोपधशालायां गतः। तेनापि च चन्दनाऽनन्तरं सादरमालपितः कुशलयापिच्छनेन सः । तथा-'साधो ! कन कार- युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ३९ न पितृपर्यागतं बादलब्धिलब्धजगजयपताकश्रीदेवाचार्यप्रदर्शितमार्ग मुक्त्वा यस्मिन् तसिन् कुमते लग्नः ?' क्षेम- घरेणोक्तम्-'मस्तकेन बन्दे, स्वाभिप्रायेणाहमेवं जाने यन्मया रुचिरं कृतं यत्परतरमार्गे सर्वविद्यापारगतः सिद्धान्तानुवर्ती नव्यः श्रीजिनपतिसर्गुिरुत्वेनादृतः । अमर्पयशादाचार्येणोक्तम्-'साधो! यन्मरुस्थलीमध्ये जडलोकं प्राप्य सर्वज्ञायितमनेन भवद्गुरुणा, तनुचितमस्य, यतो निक्षे देशे एरण्डोऽपि कल्पवृक्षायते; परं युप्मादृशां परमगु- रुश्रीदेवरिवचनामृतभृतकर्णयुगलीकुल्यासंसिक्तहृदयक्षेत्रोद्गतविवेकाङ्कराणां जिनप्रवचनप्रतिकूलप्रतिपादनप्रवीणविप्र- तारकलोकवाक्यहिममहिम्नां यदन्यथाभायो जनितस्तनासाकं मनो द्यतेतराम् । परं यदद्यापि यूयमम्माकं मिलिता- स्तनातियोभनं सञ्जातम्' । सा० क्षेमन्धरेणोक्तम्-'आचार्य ! मम गुरुर्मरुस्थली मुक्त्या गूर्जरत्रामध्ये भवतः समीपे टकायां वाद्यमानायामागतोऽस्ति; परं ज्ञायते लग्नं यदि वं कथमपि संमुखो भवसि' ! विलक्षहास्यकरणपूर्वकमाचार्य- णोक्तम्-'साधो ! वेगं कृत्वा खगुरुं प्रगुणय स्वप्ररूपितस्थापनायेति । सा० क्षेमन्धरोऽपि निजपुत्रप्रद्युम्नाचार्यप्रति- पोधनार्धाभिप्रायेण समीपमागत्य श्रीपूज्या विनाताः, यथा-'भगवन्तो ! मम पुत्र प्रद्युम्नाचार्यमायतनानायतनविचार- करणपूर्वकं प्रतियोध्य स्खशिप्यीकुरुतेति । अहमिदानी बन्दनार्थ तत्पार्थं गतोऽभूवम्। सोऽपि च वादाभिमुस इव मया लक्षित इति' । पूज्यरुक्तम्-'साधो! प्रमाणमिति'। संघमध्यस्थितभाण्डशालिकसंभववाहित्रिकोद्धरणप्रमुखप्रधानपुरुपैश्य परस्परं विचार्योक्तम्-'येन मुख्यन प्रयोजनेनागता यूयं प्रथमं तव फुरुत, पश्चाद्वादविवादादिकं कुर्यात्' । सा० क्षेम- न्धरणोक्तमेवं भवतु । पूज्यरक्तमेवमपि प्रमाणमिति । सा० क्षेमन्धरण प्रद्युम्नाचार्यसमीपे गता भणितम्-'आचार्य! इदानी संघस्तीर्थवन्दनार्थमुत्कण्टावशादुत्तालो व्रजति, वलन्तश्च श्रीमन्तो भट्टारका भवता सममायतनानायतनरिचार करिम्पन्ति' । तेनोक्तम्-'भवतु, परमितः स्थानाद् बहिर्न गन्तव्यमिति। तदनन्तरं सर्वोऽपि संघो महाविस्तरेण स्त- म्मनकोअयन्तादितीर्थेषु महाद्रव्यस्तवेन महाभावस्तवेन तीर्थानि वन्दितवान् पूजितवानिति । शत्रुञ्जये च मार्गासौ- स्पादिकारणानगतः। ५८. ततो व्याघुट्यागच्छति संपे कौतुकवशात् केचिदने भूसाऽऽशापट्टीमध्ये आगताः श्रीपूज्यपादभक्त- धारकाः, उपविष्टाय वाणिजकम्पकस्य हटे । वाणिजकेनापि पृष्टाय ते-'संघमध्य आचार्यः कोऽप्यस्तीति' तरुस्तम- सीति । तेनोक्तम्-‘भरिप्यन्ति धना आचार्याः, परं प्रद्युम्नाचार्यमदृशो भरतक्षेत्रमध्ये कोऽपि नास्तीति' । उपहाम- वानरप्युक्तम्-'श्रष्ठिन् ! मत्यमेतदुक्तम्, यथा सर्वथा भवतापि सदृशः संमारे कोऽपि नास्ति, किं पुनगार्यण सरश इति । ये च प्रघुनाचार्या मरंगुणः ममधिकास्ते कथं तेन सहमा इति कथ्यत । तथा प्रद्युमाचार्यमस्तामयट- दण्डनायकन गलीस्मदिनैन संघसंमुसमागत्य महाविस्तरेण प्रवेशः कारिता, श्रीपूज्यानां च धरलगृहमाप आरामो पागते दर्मितः । न्याय गपरिगरान्तत्र स्थिताः । मा० मन्धरः पुनरपि श्रीपूज्यानुाया प्रघुमाचार्यवन्दनाथ गदपाश्रये गनः । तेनापि ममानमालप्य तीथंपन्दनवानापन्छनारमाने ग मणितो यथा-'मायो ! कितन् मीयं पो रिमारिलम् ? क्षेमन्धरेगोक्तम्-'मन्नन बन्द, कथं रिमार्यन म्बपनः ?, यहाहमनेनर प्रयोजनेनाप्रागनः । नामगांगारिकनियोधनाभिप्रायोटलदोन्गुरपादुम्नम्-'नहिं फिमिति लिम्बः क्रियने ?' मन्धरणोक्तम्- 'मन्नान मन्द उनिप्टेदानीमपि । गतोऽमी जिनपनियरिगीप ममागतः, ना ग ज्येष्ठानुक्रमेण पन्दनानुदिनादि- परदारः मंगतः। श्रीपरिन्धमातापितःमः-'पागार्य ! के ग्रन्या रशः गन्नि ?' नगरमाप्रमान्छनदहमा- पनिनेन नेनोनम्-'रनमानसनानिनः मरेंऽपि । श्रीपत्र-यदि वर्ष प्रथममेराम यग दोषानुसापिप्पाम- ना मानणालीभूनः गन किमपि सारि गोम गागाशिानादिमा नमाग्या-त्यादि रिभ्योतम्- 'नधारि नाममिः पावित गेनोन -हमन्यारणाममूनानि लगायानि, मापसम्पादिमहासाम्पानि, पार- मपादिकमा, मगरिमा यानि नाटशनि, जपदेशविन्नागि, कन्दली मिरमापनपदेल्यापप्रमुगाना, पार- ..

४० खरतरगच्छालंकार प्रकाशनमुखा अलङ्काराः, सिद्धान्ताच सर्वेऽपि । श्रीपूज्यश्च-'अहो! अनेन यनं गल्लो चादितः। किमस्यैतावन्मानं शास्त्रपरिज्ञानमस्ति या नवेत्युपलक्षयामः' इति हृदये विचायोक्तम्-'आचार्य लक्षणायाः किं स्वरूप कति मेदाः?' इत्यादि । तस्मिंश्च सपि काव्यप्रकाशानुसारेण बुवाणे-'यदि वयमिदानीमेव निधनाभिप्रायेण गाढं भणियामस्त- दाऽसावत्रैव स्थासति, न करिष्यत्यायतनानायवनविचारम् , तम्मादसावद्यास्पलितप्रसरः सन् वदतु; यद्वा परामहङ्का- रकोटिं रोहत्ती त्यादि विमृश्य श्रीपूज्यन किमपि तादृशं वचनं भणितं चैन स दूयते । ततस्तेन वहीं गलगजि कृला भणितम्-'आचार्य! अनायतनं कस सिद्धान्तस्य मध्ये कथितमस्ति, यदेवं भवान् वराकान् लोकान् विप्रतारयतीति ?' श्रीपूज्यरुक्तम्-'दशवकालिकोपनियुक्ति-पश्चकल्प-व्यवहारादिसिद्धान्तमध्ये कथितमस्तीति । तेनोक्तम्-'आचार्य । गाढतराभ्यासवशादोपनियुक्तिः सकलाऽपि स्वनामसदृशी मम भूताऽस्ति, परं तन्मध्येऽनायतनं कापि भणितं ना. स्ति' । श्रीपूज्यैरुक्तम्-'आचार्य ! ट्रे सन्खन्य सिद्धान्ता यदि कथमपि वयमोपनियुक्त्यक्षरः कृत्वा देवगृहं जिनम- तिमा बानायतनं भवतीति भवन्तं मानयामस्तदा वयं जयामः । तेनोक्तम्-'प्रमाण परमिदानीमुत्सरं बभूव, प्रभाते वार्ता । पूज्यरुक्तम्-'एवं भवतु' । स च सा० क्षेमन्धरदत्तहस्तः स्वपापधशालायां जगाम । तत्र च श्रीपूज्यपादस्थित गृहोपरि बद्धं पट्टमुद्दिश्य सा० क्षेमन्धरे शृण्वति सा० रासलपित्रा सा० धणेश्वरेणोक्तम्-प्रातस्यिते पादबद्धस्य चीर- कटकस्य प्रमाणम्' । प्रोच्छलितकोपारक्तनेत्रेण सा० क्षेमन्धरेणोक्तम्-'अरे लम्पक ! खदीयस्य वृहत्तरस्याऽपि मानो- ऽस्ति श्रीपूज्यपादस्थितं चीरकटकम् । प्रद्युम्नाचार्येणोक्तम्-'साधो ! कीदृशेन कारणेनात्मनोऽपि मध्ये कलहः क्रियते ।। प्रातः सर्वमपि भद्रं भविष्यति। संपामपि मानानि प्रमाणानि ज्ञास्यते । तदनन्तरं सा० क्षेमन्धरो वन्दिता श्रीपू- ज्यान्त आगतः। तत्र च- यदपसरति मेपः कारणं तत् महां, मृगपतिरपि कोपात् संकुचत्युत्पतिष्णुः । हृदयनिहितवैरा गूढमन्त्रोपचाराः, किमपि विगणयन्तो बुद्धिमन्तः सहन्ते ॥ [४८] इत्यादिधीरपुरुपसमाचारमजानानाः साधवः श्रावकाश्च । श्रीपूज्यानामग्रे भणति-'मस्तकेन वन्दे' । स्वकपोलाब- लीमास्फाल्य तेनोक्तम्-'युष्माभिः किमिति किमपि न भणितम् ?' पूज्यैरुक्तम्-'भो ! स्थिरीभव, न कैनैव खमेन रात्रिविमास्यति' । प्रद्युम्नाचार्येण चाकारितखपक्षानुयायिप्रभूताचार्यपण्डितैः सह जाज्वल्यमानेषु प्रदीपेषु सकलाम रजनीमोपनियुक्तिसूत्रवृत्तिपुस्तकानि वाचितानि परमनायतनखरूपप्रतिपादकं स्थानकं न लब्धम् । पश्चात्पूज्यानां पाधै मानुपं प्रेपितम् । पूज्यैश्च तदीयपृच्छानुसारेणोद्देशः कथितः । तैरपि पूज्योपदिष्टमुद्देशं गवेपयद्भिर्लब्धं स्थानकम् । अनायतनप्रतिपादकगाथासम्बद्धवृत्यक्षराण्यन्यगाथावृत्यक्षरैः सह संयोज्य तेन चिन्तितानि । प्रातःक्षणे च सहस्रसं- ख्यलोकानुगम्यमानमार्गः, अभयडदण्डनायकदत्तहस्तकः समाहृतदेशान्तरीयानेकाचार्यपरिकरितः प्रद्युम्नाचार्यः समा. जगाम श्रीपूज्यालङ्कत आवासे । अधस्तनभूमिकापां च क्षुद्रत्वेन शीघ्रमुपविष्टाः सर्वेऽप्याचार्याः । श्रीपूज्या अप्युप- रितनभूमिकातः स्वपरिवारेण सह तत्राययुः । वयापकरण जिनागरगणिना तत्र तैपां तादृशं कपटमालोक्य श्रीपूज्या विज्ञप्ता:-'प्रभो! क निपद्यां ददै ? पूज्यैरुक्तम्-'अन्यत्किमप्युपवेशनस्थानकं न दृश्यतेऽतोच देहि । तेनोक्तम्- 'प्रभो ! संमुसा योगिनी भविष्यति' । 'भवतु श्रीजिनदत्तमरिभलिप्यति, त्वं देहि निपद्यामवैति' । तदनन्तरं श्रीपू- ज्यास्तत्रोपविष्टाः । सा० क्षेमन्धर-चाहित्रिकोद्धरणाभ्यां हस्तौ योजयिखा श्रीज्या विज्ञप्ताः, यथा-'प्रमो! ईदृमेला- पको धनेभ्यो दिनेभ्योऽद्य संजातोऽस्मामिदृष्टः, अतो यदि गीर्वाणमापया यूयं व्रत तदाऽम्मत्कर्णयोः सुसं भवति । श्रीपूज्यैरुस्तम्-'न किमप्येतद्विरूपमस्ति, परं परतः प्रद्युम्नाचार्याणामो कथयत । तदनन्तरं ताभ्यां प्रद्युम्नाचार्य वन्दिखा भणितम्-'मस्तकैन बन्दे, किल लोकमध्य एवं श्रूयते यदुत देवाः सर्वदेव संस्कृतमापया परस्परं भापन्ते परं ते न दृश्यन्ते; अतोऽस्माकं महद् कुतूहलमस्तीति यदि यूयमम्मासु महान्तमनुग्रहं कृत्वा संस्कृवभापया धूत, तदा - युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ऽस्माकं देवदर्शनेच्छा पूर्यते; यतो युवाभ्यां द्वाभ्यामपि रूपेण देवा निर्जिताः । विहस्य प्रद्युम्नाचायणोक्तम्-'अहो श्राद्धाः किं यूयं संस्कृतभाषामध्ये परिच्छिन्त !' ताम्यामुक्तम्-'मस्तकेन वन्दे, यद् यूयं भणथ तद् सत्यमेव । यतो मरुस्थलोत्पन्ना बदरस्य वृन्तमधस्तादुपरिटाद्वा भवतीत्यपि न जानन्ति ।. परं तथापि, भट्टारकाः ! क य्यं क वयम् , पुनरयास्मद्भाग्याद् युप्माकं सर्वेपामपि संयोगो बभूवेति, यदि कथमप्यस्मत्कर्णयोः मुखं जनयत बदाऽतिसमाधानं भवति; यतः क पुनरपीदृशः संयोगः संभाव्यते'-इत्यादिः श्रावकोपरोधात् प्रद्युम्नाचार्येणोक्तम्- 'प्रमाणमिति' । तदनन्तरं श्रीपूज्यैस्तत्समीपे खटिका-संपूटिके दृष्ट्वोक्तम्-'केनाभिप्रायेणैप खटिकाखण्ड आनीतः। प्रद्युम्नाचायेंणोक्तम्-'कदाचित् संस्कृतभापया ब्रुवता कश्चिदपशब्दः पतति, तस्य साधनकृते' । श्रीपूज्यैरुक्तम्-'यो हि मुखोपरि शब्दं साधयितुमसमर्थस्तस्य संस्कृतभाषया वक्तुं कोऽधिकारः १, तस्मात् परतः क्षिप्यताम् । तथैपा संपुटी किम- र्थमानीता ?' प्रद्युम्नाचार्येणोक्तम्-'पतिष्यदपशब्दलेखनार्थम्'। श्रीपूज्यैरास्फाल्योक्तम्-'यो हि पतितानपशब्दाना- त्महृदयेऽवधारितुं न शक्नोति तस्स वादादिषु का जिगीपा?,तस्मात् संपुट्यपि परतः क्रियताम्'-इत्याक्षिप्य परतः कारिते खटिका-संपुटिके। तत्र च वर्करीत्याऽनायतनस्थापन-निपेधनार्थ संस्कृतभाषया तयोर्युबतोर्भरतेश्वर-बाहुवल्योरिख महा- संरम्भेण वाग्युदं संजातम् । तत्र च यादृशं किमपि प्रद्युम्नाचार्येणोक्तं तादृशं सर्वमपि कुतूहलिना प्रद्युम्नाचार्यकृतवाद- स्थलेषु द्रष्टव्यम् । यथा श्रीजिनपतिसरिभिः प्रद्युम्नाचार्यवचनानि निराकृत्य सर्वलोक्रसमक्ष सरतरमार्गः स्थापितस्तथा प्रद्युम्नाचार्यकृतवादस्थलोपरि श्रीजिनपतिरिकृववादस्थलानि द्रष्टव्यानि। यथा महान् प्रमोदो भवति। अत्र च गौरव- भिया न लिखितानि । यतः श्रावकोपरोधादित्थमेता वार्ता लिख्यन्ते, अतः श्रावकोपयोगिन्य एव वार्ता लेख्या, पादस्यले लिखिते त्वेता वार्ता अपि दुर्गायाः स्युरिति । तथापि किंचिदुच्यते । प्रद्युम्नाचार्येणोक्तम्-'यत्र देवगृहादौ साक्षात् साधयो यसन्ति तद् भवत्यनायतनम् , यत्र तु पहिःस्थितैरेव सारा क्रियते तत्र का वातेति. 1 श्रीपूज्यः सोपहासमुक्तम् , यथा-'आचार्य । साराशब्दं प्रयु- आनेन भवता वर्तमानकालपतिशास्त्रपरिज्ञानता स्वकीया प्रकाशिता'। तेनोक्तम्-'कि साराशन्दो नास्ति ?' पूज्यै- रुक्तम्-'नास्त्येव । तेनोक्तम्-'सर्वलोकप्रसिद्ध शब्दं वचनमात्रेणाचार्य ! माऽपलापी' । पूज्यैरुक्तम्-'को लोकः १- किं हलधर-गोपालादिस्तवाभिप्रेतः १, किं या लक्षणादिविद्यापारश्वा पण्डितगणः । यद्याधपक्षस्तदा गीर्वाणभाषा- न्तराले हलधरादिभाषा सुवाणस्त्वमात्मानं पण्डितसभामध्ये लघु करोपिअथ द्वितीयः पक्षस्तहि कश्चित्पण्डितं साक्षिण कुरु; अथवा क्यापि केनापि पण्डितेन प्रयुक्तं दर्शयेति' । आकुलव्याकुलीभूतेन तेनोक्तम्-'सारणवारणेत्यादि । श्रीपूज्यैः सोपहासमुक्तम्-'अहो । वर्तमानकालशाखदर्शिता'-इत्यादि । तदनन्तरं विलक्षीभूतेन तेनोक्तम्-'सिद्धान्ता- नुपापिनि विचारे प्रारम् कीदृशीयं शब्दापशब्दचिन्ता , प्रस्तुत एव सिद्धान्तः किमिति न वाच्यते । पूज्यरु- तम्-'एवं क्रियताम्' । तेन च मण्डिता सापनिका धृता च तदुपर्योपनियुक्तिमत्रवृत्तिपुस्तकसत्कसर्वपत्रभृता कप- रिका । पूज्यैरुक्तम्-'को बाचपिप्यति ?' तेन कूटाभिप्रायेणोक्तम्-'अहं वाचयिष्यामि । सरलाशयः श्रीपूज्यश्विन्ति- तमहो । किमस्य क्षोमवशान्मतियालः (१) साम्प्रतमभूत् , यदसायसाकमग्रे याचकत्वाङ्गीकारेण स्वस्य लघुना न गणितनानिति । भवतु वा ! प्रकटमुक्तम्-'एवं कुर्विति' । तदनन्तरम्- नाणस्स सणसं य परणस्स य तत्व होइ बाधाओ। यजिन्न घन मीरू अणाययणवलमो खिप्पं ।। [११] जत्य साहम्मिया यहये भिन्नचित्ता अगारिया।मूलगुणप्पडिसेयी अणापपणं तं विपाणाहि ॥ [५०] जय साहम्मिपापहये भिसचित्ताअणारिया। उत्तरगुणपडिसेवी अणापपणं तं यियाणादि। [५] खरतरगच्छालंकार जत्य साहम्मिया यहवे भिन्नचित्ताअणारिया। लिंगवेसपडिच्छन्नाअणाययणं तं बियाणाहि[२२] आययणं पि य दुविहं दब्वे भावे य होइ नायव्वं । दवम्मि जिणहराई भावे मूलत्तरगुणेसु ।। [५] जत्थ साहम्मिया बहवे भिन्नचित्ता पहुस्सुया । चरित्तायारसंपन्ना आययणं तं वियाणाहि ॥ [१४] सुंदरजणसंसग्गी सीलदरिई कुणइ य सीलड्डे। जह मेरुगिरीलग्गंतणं पि कणयत्तणमुवेइ ।। [५५] इत्यादिगाथावृत्तीः पूज्योपदर्शिता वाचयितुं प्रवृत्तः प्रद्युम्नाचार्यः । पूज्याचास्खलितयाण्या व्याख्यातुं प्रवृत्ताः । तदनु खमतस्थापनाभिप्रायरचितकूटबुद्धिनान्यां गायां वाचयित्वा प्रस्तुतपत्रद्वयोत्पाटनपूर्वकमन्यतरगाथासत्कवृत्रि वाचयितु प्रवृत्तः प्रद्युम्नाचार्यः । श्रीमत्पूज्यपाश्र्थोपविष्टेन श्रीजिनहितोपाध्यायेन हस्ते गृहीत्वोक्तम् , यथा-'आचार्य ! पाश्चात्य पत्रद्वयं वाचयित्वेदं पत्रं वाच्यम्' । सोऽपि व्याकुलतया गतस्मृतिः पत्राण्यप्रतः पश्चाच करोति । अनायसरे मातुलतया प्रतिपन्नमभयडदण्डनायकं लोकप्रसिद्धमामेत्यक्षरः सम्बोध्य हेडावाहकेन श्रीमालवंशीयेन वीरणागेन भणि- तम् , यथा-'त्वदीये नगरे स एव किं निगृह्यते यो रात्रौ चौर्य करोति ? यस्तु दिवसे दीप्ते चौर्य करोति स मुस्कला' । तदनन्तरं संभ्रमवशादिगवलोकनं कृताऽभयडदण्डनायकेनोक्तम्-'हेडावाहक! किमेतद् भवता भणितम् ?' वीरणागेनोक्तम्-'मामा! पश्य पश्य, आचार्येण पत्रद्वयमपलपितम् । कोपावेगादमयडदण्डनायकन हस्तस्थितया चर्मयप्ट्या पृष्ठप्रदेश आहतो वीरणागः । प्रद्युम्नाचार्योऽपि प्रस्तुतं वाचयितुं प्रवृत्तः । विस्तरेण व्याचक्षाणेषु श्रीपूज्येषु श्रीपूज्यभाग्यप्राग्भारप्रेरितेन प्रद्युम्नाचार्येणोक्तम्-'आचार्य ! अनया रीत्या देवगृहमेवानायतनं भवति, न तु जिनप्रतिमा; युष्माभिस्तु प्रतिमाऽप्यनायतनत्येन भणिता' । श्रीपूज्यविहस्योक्तम्-'स्थिरीभव, आचार्य ! यदन सभायामात्ममुग्वेन भवता देवगृहमनायतनं भवतीति कथितं तेनास्माकं सर्वेऽपि मनोरथाः सिद्धाः। प्रतिमाऽप्यनाय-. तनत्वेन भणिता' । श्रीपूज्यैविहस्योक्तम् .....द्धा ज्ञेया। प्रद्युम्नाचार्येणोक्तम्-'किवचनमात्रेण किंचा कयाऽपि युज्या?' श्रीपूज्यैरुक्तम्-'नियुक्तिकं वचनं हलधरादय एव भापन्ते न वयम्' । तेनोक्तम्-'तहिं युक्ति हि' । श्रीपूज्य- विमृश्योक्तम्- एचमिणं उयगरणं धारेमाणो विहीइ परिसुदं। होइ गुणाणाययणं अविहि असुद्धे अणाययणं॥ [५६] अस्याश्च गाथाया व्याख्यानं श्रुखा विमना इव मौनं कृता स्थितः प्रद्युम्नाचार्यः। तदनन्तरं सा० क्षेमन्धरेण हस्तयोजनपूर्वकमुक्तम्-'मस्तकैन वन्दे, जिनप्रतिमानायतनं भवति वा नवेति' प्रद्युम्नाचार्येणोक्तम्-'साधो! अस्सा गाथाया अनुसारेणेदंज्ञायते, यदुत जैनी प्रतिमाऽपि भवत्यनायतनमिति। तत्पश्चात् क्षेमन्धरेण नेत्रयोरानन्दाश्रुविभ्रता स्वकीयमस्तककैशैः कला प्रद्युम्नाचार्यपादाचुघृष्टी, पुत्रनहाच भणितम्-'वत्स ! एतापन्ति दिनानि श्रीजिनदत्तमरि- मागे लमस्य मम भूतानि परं मम मनसि न परिणतम् । यदुत लक्षसंख्यद्रव्यव्ययेन कलोत्तुगतोरणं देवगृहं निष्पा- दितमप्यविधिप्रवृत्तिवशादनायतनं भवतीति । इदानीं च तर मुसात् तादृशमपि देवगृहमनायतनं भरतीति श्रुता महान् प्रमोदः संजातः । प्रद्युमाचार्येणोक्तम्-'साधो क्षेमन्धर ! अन्येषां सिद्धान्तानामहराणि दर्शयिता देवगृहमना- यवन न भवतीति परिच्छेदयिष्यामि । श्रीपूज्यानामग्रे भणितम्-'आचार्य । अम्मन्नामाङ्किता रास-काल्प-चतुप्पया- दयो न कारयितव्या न पाठयितव्याच। तदनन्तरं श्रीपूज्यः मा० क्षेमन्धरदाक्षिण्यादुचःवरेणोक्तम्- 'अहो ! यः कश्चिदम्माकमाज्ञां मनुते तेन प्रद्युम्नाचार्यपराजयनरूपार्थप्रतिवद्ध रास-काव्य-चतुष्पद्यादयो न कर्तव्या न पठिनव्या'। आर्द्रहृदयत्वान्नत्रयोरथुप्रवाहं विभ्रता सा० क्षेमन्धरेणोक्तम्-'वत्स! न मया मनन्तं विगोपयितुमारमितो वादा,किन्तु विद्यापात्रमात्मपुत्रं लब्धाचार्यपदं प्रतिनोध्य युगप्रधानगुरोः श्रीजिनपतिमरेः शिष्पं कारयितुम्'-इत्यादि बदमु तेव- युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ४३ तिप्रमुदितैः श्रावकैः साधुभिश्च सह अभयडदण्डनायकदत्तहस्तकास्ततः स्थानादुत्थायोपरितनभूमिकायां प्रभूताः श्री- पूज्याः, नागरिकलोकोऽपि । तत्र च पूज्यान् बन्दित्वा, अभयडदण्डनायकोऽधस्तादागतः । प्रद्युम्नाचार्योऽपि सा०क्षेम- न्धरदत्तहस्तको मनखेदोद्भवन्मुखकालिमगुणो लावशाद् भूमिमवलोकयन् स्वपौपधशालायां गतः । इतरोऽपि कौतु- कार्थी लोका स्वकीये स्वकीये गृहे गतः । ५९. स्वकीयगुरुप्रद्युम्नाचार्यहृदयस्थकष्टदर्शनादसुखिन्यभयडदण्डनायके सकलमपि नगरं शून्यमिव जातम् । पहिश्च संघमध्येऽत्यानन्दोऽभवत् । भा० संभव-वैद्यसहदेव-४० हरिपाल-सा० क्षेमन्धर-वाहित्रिकोद्धरण-सा० सोमदेवादिस- मुदायेन महाविस्तरेण विजयसूचर्फ वर्धापनकं च कारितम्-'अहो! एते परतो गता मदीयं गुरुं विगोपपिप्यन्त्यतो यद्यत्रैच कथमपि शिक्ष्यन्ते तदा भद्रं भवतीति हृदि विमृश्याऽभयडदण्डनायकेन मालव्यदेशमध्यस्थिते गूर्जरीये कटके प्रतीहारजगद्देवपाधैं विज्ञप्तिकादानपूर्वकं मानुपं प्रेप्य द्वितीये दिने संघमध्ये दापिता राजाज्ञा, यथा-'राजाधि- राजश्रीभीमदेवस्थाज्ञाऽस्ति यदि यूयमितः स्थानादस्माभिरमुन्कलिताः सन्तो यास्यथेति'। धृतं च राजपुत्रशतमेकं गुप्तवृत्त्या संघस्य प्राहरिकपदे । संयोऽपि स्वचेतसि यदपि तदपि संभावयितुं प्रवृत्तः। विजयदर्शनोच्छलितपरमानन्द- वशाद् भाण्डशालिकसंभयः श्रीपूज्यानां पार्थे समागत्य हर्पप्रकर्पोद्भवद्गद्गदस्वरेण भणितुं प्रवृत्तः, यथा-'प्रभो! जानामि तापकीनं पराक्रमम् , यतः सिंहस्य पोतकाः सिंहा एव भवन्ति न शृगाला!; परं कपटबहुला गूर्जरत्रास्तत्र च येनापि तेनापि समं माऽऽस्फाल्यताम् । कापटिकगूर्जरलोककूटप्रयोगात् कूटा चेद्वचनीयता तादृशी भवति यादृश्या खकीयं मुसमुद्घाटयितुं न शक्यते-इत्याशक्य मया वादकरणविपयेऽनुमतिर्न दत्ता। भवता च प्रभो ! अतीय शोमनं कृतं यद् गूर्जरत्रामध्यप्रदेशे समस्ताचार्यमुकुटभृतं प्रद्युम्नसरिं सकललोकसमक्षं निजित्योर्ची कृता स्वकीयागुलिका । प्रमो! तौकेन चरित्रेण धनमानन्दितस्य स्वर्गस्थम्य श्रीजिनदत्तरेरय विस्मृतो निथितममृतपानामिलापः। प्रभो! तावकीनं धर्यमालोक्य शासनदेवताऽप्यद्यात्मानं सजीवभृतं मन्यते । प्रभो! त्वदीयामीदृशीं वादलब्धि दृष्ट्वा भग- वती सरस्वत्यपि स्वप्रसादस्य माहात्म्यं ज्ञातवती । प्रभो ! तवेदृशं साहसमवेक्ष्य पुरन्दरादयो देवा अपि भवतो वरप्रदा- नोत्सुकाः संजाताः'-इत्यादिकां पहीं प्रशंसां कृतवान् भां० संभवः । श्रीमालवंशभूपणवैद्यसहदेव-व्य० लक्ष्मीधर-ठ० हरिपाल-सा० क्षेमन्धर-बाहित्रिकोद्धरणादयोऽपि संघप्रधानपुरुषाः श्रीपूज्यानां पार्थे ममागत्याभयडदण्डनायकस दुष्टमभिप्रायं कथयामामुः। श्रीपूज्यविमृश्योक्तम्-'अहो श्राद्धाः ! अनिवृत्तिः काऽपि न कार्या। श्रीजिनदत्तमुरिपा- दप्रसादात् सर्व भद्रं भविष्यति । परं परमेश्वरश्रीपाराधनाथ स्नात्रकायोत्सर्गादिधर्मकंत्येपूद्यता यूयं भवतेति' । श्रीपूज्योपदेशाद्धर्मकृत्योद्यते संघे सति मुसेन जातानि चतुर्दश दिनानि परं निर्गमः कोऽपि न संजातः । तदनन्तरं संघमध्यस्थितलोसमध्यादौष्ट्रिकाः शते द्वे संघस्स श्रेयाकते श्वाकल्ये किमपि साहसं तादृशं करिष्यामो येन संपः सोऽपि सकीय स्वकीये स्थानके प्रभूतो मविप्यतीत्यभिप्रायेण प्रगुणीभूताः । इतथ-अभयडदण्डनायकप्रेषितमानुपेण कटकमध्ये गला श्रीजगद्देवप्रतीहारपादयोः पुरो धृता सस्वामिविज्ञप्तिका। श्रीनगदेवनिरोपाद् वाचयितुं लगः पारिग्रहिकः, यथा-अत्र देशे साम्प्रतमतिमहदिका सपादलक्षीयो बहुलोकः समा- गतोऽनि । यदि युप्माकं निरोपो मानि तदा राजकीपानां पोटकानां कृते दालिं करोमीति' । युता च कोपाधिरर्टन श्रीनगदेयेन तक्षणादेय स्वकीयपारिग्रहिकहस्तेन लिमितो राजादेशः । लिसितं च तत्र-'मया महना कप्टन माम्प्रतं धीरवीराजेन सह सन्धिः कृतोऽस्त्यतो यदि मपादलक्षीयस्य लोफस्स हत लास्समि तदा गर्दमोदरे ता समय- प्पामि'-इनि राजादेशेन मा प्रेपितो मानुपः । पथात् वेनापि गोचालगत्या गसा दसो दण्डनायकहते राजादेगा। पानपिसा पर दप्टनापफैन पहुमानपूर्वकं मुकलितः सन् संयः ममागतः श्रीमदमाहिलपाटकनामपनने । तत्र प भोपः पगोपीयाधयारिंशदानाः स्वमटल्यां समद फारपित्या यगदानपूर्वकं सम्मानिनाः । - खरतरगच्छालंकार ६०. ततः संघेन सह लवणखेटे प्रभूताः श्रीपूज्याः । तत्र च पूर्णदेवगणि-मानचन्द्रगणि-गुणभद्रगणीनां क्रमेण दत्तं वाचनाचार्यपदम् । सं० १२४५ फाल्गुने पुष्करिण्यां धर्मदेव-कुलचन्द्र-सहदेव-सोमप्रभ-यूरप्रम-कीर्तिचन्द्र- श्रीप्रभ-सिद्धसेन-रामदेव-चन्द्रप्रमाणां संयमश्री-शान्तमति-रखमतीनां च दीक्षा दत्ता। सं० १२४६ श्रीपचने श्रीमहावीरप्रतिमा स्थापिता । सं० १२४७, (१) सं० १२४८ लवणसेटे जिनहितस्योपाध्यायपदं प्रदत्तं । सं० १२४९ पुष्करिण्यां मलयचन्द्रो दीक्षितः। सं० १२५० विक्रमपुरे पद्मप्रभसाधोराचार्यपदं दत्तं-श्रीसर्वदेवमूरिरिति नाम कृतम् । सं० १२५१ माण्डव्यपुरे व्यवहारकलक्ष्मीधरादिप्रभूतश्रावकाणां मालारोपणादि विस्तरेण कृतम् । ६१. ततोऽजयमेरौ विहारः । तत्र च म्लेच्छोपद्रवे मासद्वयं यावन्महाकष्टस्थिती पत्तने समागत्य भीमपल्ल्यां चतु- मौसी कृता । कुहियपग्रामे जिनपालगणेाचनाचार्यपदं दत्तम् । लवणखेटे राणकश्रीकल्हणकृतसामवादोपरोधादक्षिणा- वारात्रिकावतारणं मानितम् । सं०१२५२ पत्तने विनयानन्दगणिर्दीक्षितः। सं०१२५३ भाण्डागारिकनेमिचन्द्रश्रावका प्रतियोधितः । पत्तनभङ्गानन्तरं घाटीग्रामे चतुर्मासी कृता। सं० १२५४ श्रीधारायां श्रीशान्तिनाथदेवगृहे विधिः प्रवर्तितः । तर्कोपन्यासैश्च महावीरनामा दिगम्बरो रजितः । रत्नश्रीप्रवर्तिनी दीक्षिता । नागदहे चतुर्मासी कृता । सं० १२५६ चैत्र वदि ५ लपणखेटे नेमिचन्द्र-देवचन्द्र-धर्मकीर्ति-देवेन्द्रनामानो व्रतिनः कृताः। सं० १२५७ श्रीशा- न्तिनाथदेवगृहे प्रतिष्ठारम्भः प्रधानशकुनाभावे विलम्वितः । सं० १२५८ चैत्र यदि ५ शान्तिनाथविधिचत्ये श्रीशा- नाथप्रतिमा प्रतिष्ठिता, शिसस्थ । चैत्र वदि २ वीरप्रभ-देवकीर्तिगणी दीक्षितौ । सं० १२६० आपाट वदि ६ वीर- प्रभगणि-देवकीर्तिगण्योरुपस्थापना कृता । सुमतिगणि-पूर्णभद्रगण्योतं दत्तम् । आनन्दश्रियो महत्तरापदं दत्तम् । श्रीजेसलमेरौ देवगृहे फाल्गुन सुदि २ श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा स्थापिता। स्थापना च सा० जगद्धरेण महाविस्तरेण कारिता । सं० १२६३ फाल्गुन यदि ४ महं० कुलधरकारितश्रीमहावीरप्रतिमा लवणखेटे प्रतिष्ठिता । नरचन्द्र-राम- चन्द्र-पूर्णचन्द्राणां विवेकशी-मङ्गलमति-कल्याणश्री-जिनश्रीसाध्वीनां दीक्षा दत्ता, धर्मदेव्याः प्रवर्तिनीपदं च। ठ० आभुल-प्रभृतिवाग्गडीयसमुदायः श्रीपूज्यपादयन्दनार्थमागतो लवणसेटे। सं०१२६५ मुनिचन्द्र-मानभद्रगणी दीक्षितो, सुन्दरमतिरासमतिश्च । सं० १२६६ विक्रमपुरे मावदेव-जिनभद्र-विजयचन्द्रनामानो वतिनः कृताः। गुणशीलस्य वाचनाचार्यपदं दत्तम् , ज्ञानश्रियथ दीक्षा । सं० १२६९ श्रीजावालिपुरे श्रीविधिचत्यालये महता विस्तरेण महं० कुल- धरकारितश्रीमहावीरप्रतिमा स्थापिता। श्रीजिनपालगणेरुपाध्यायपदं दत्तम् । धर्मदेवीप्रवर्तिन्याच महत्तरापदं दत्तं प्रमा- वतीति नाम कृतम् । महेन्द्र-गुणकीर्ति-मानदेवानां चन्द्रश्री-केवलभ्योश्च दीक्षा दत्ता । ततो विक्रमपुरे विहारः। ६२. सं० १२७० वाग्गडीयसमुदायप्रार्थनया श्रीनाग्गडदेशे विहताः । दारिद्रेरके शतसंख्यश्रावक-श्राविकाणां . सम्यक्वारोपण-मालारोपण-परिग्रहपरिमाणदानोपधानविधापनादिधर्मकृत्यकृते महाविस्तरेण सप्त नन्दयः कृताः । सं० १२७१ बृहद्वारे संमुखागतश्रीआसराजराणकप्रमुसप्रभूतलोकैः सह महाविस्तरेण ठ० विजयश्रावकारितायां महत्यामुत्सर्पणायां प्रविष्टाः श्रीपूज्याः । नन्दादिकं च दारिद्रेरकवत्तत्र कृतम् । मिथ्यादृष्टिगोत्रदेवतादिमिथ्यात्व- कृत्यपरिहारकारापणेन समुदायस्य महान् प्रमोदो जनितः । सं० १२७३ तत्रैव वृहद्वारे लौकिकदशाहिकापर्यो- परि गङ्गायात्राभिमुसेषु तत्रागतेपु बहुपु राणकेषु सत्सु नगरकोट्टीयराजाधिराजश्रीपृथ्वीचन्द्रसाक्षेत(सहायात ?) का. श्मीरीयेन श्रीजिनप्रियोपाध्यापशिष्यजिनदासापरनामश्रीजिनमद्रभूरिप्रोत्साहितेन पण्डितमनोदानन्देन श्रीजिनपति- खरिपोपधशालाद्वारे पत्रावलम्बनं पटुं ब्राह्मण एक प्रेषितः । सोऽपि द्वितीयाट्टै प्रहरसमये वसतिद्वार आगत्य पत्राव- लम्पनं बढुं प्रवृत्तः । विस्मयवशाद् दूरदेगे गत्वा धर्मरुचिगणिना संभापितो ब्राह्मणः, यथा-'बटो! किं करोपि?' निर्भयः सन् स पाह-'पण्डितमनोदानन्दो युष्मद्गुरूनुद्दिश्य पत्रावलम्पनं करोति' । धर्मरुचिगणिना सोपहाममुक्तम्- 'वटो! मदीयसन्देशमेकं पण्डितस्याग्रे कथयेर्यथा-पण्डितश्रीजिनपतिमूरिशिष्येण धर्मसचिगणिना मम मुसेनेदं .

" . युगप्रधानाचार्यगुर्वाधली। भाणितम्, यथा-पण्डितराज ! मनोदानन्द ! यदि मदीये भणिते लगसि तदद्यपश्चाच्छासालम्बनं कुर्याः, मा पत्राव- लम्बनं कथा; अन्यथा दन्ता भजयन्तीति" । मनोदानन्दपण्डितस्वरूपं सर्व पृष्ट्वा मुक्तः सन् गन्तुं प्रवृत्तो बटुः । धर्मरुचिगणिना सर्च पूज्यानामने निवेदितम् । श्रीपूज्यपादसमीपोपविष्टठक्कुरविजयकश्रावकेण पत्रावलम्बनयाा श्रुखा स्वकीयो मानुपः प्रेपितः। कथितं तस्साग्रे यथा-'अहो ! खमय बटोः पादे लगो बजेः । कमिन् कसिन् फटक एप पर्बजतीति परिभावयेः । वयं पृष्ठलना एवागच्छामः स्म'-इत्यादिशिक्षां गृहीला गतो मानुपो बटुपादैः। संभ्रमादा- सनादुत्थाय-'भो भोः साधवः ! शीघ्रं प्रावृणुत-इति भणन्तः स्वयं प्रावृताः श्रीपूज्याः। श्रीजिनपालोपाध्यायेन ठ० विजयकश्रावकेण विज्ञप्ताथ, यथा-'प्रभो! साम्प्रतं भोजनवेला वर्तते, साधवश्व विहृत्य समागताः सन्त्यतो भोजनं कुरु तत्पश्चात् तत्र यास्यत' इति । तदुपरोधाद् भोजनं कृखोस्थिताः श्रीपूज्याः । श्रीजिनपालोपाध्यायैर्वन्दनापूर्वक पादयोर्लगित्वा विज्ञप्ता, यथा-'प्रभो ! मनोदानन्दपण्डितजयनाथं मां प्रेपयत, यथाऽहं यामि युप्माकं प्रसादाचं जे- प्यामि; सहानीतानामस्माकं क उपयोगो यधूयमेकैकेन मानुपेण सह स्वयमुत्तिष्ठध्वम् । तथा प्रभो! तस्मिन् वराके मनोदानन्दे युप्माकं कः संरम्भः । यतः- कोपादेकतलाघातनिपातमत्तदन्तिनः । हरेहरिणयुद्धेपु कियान् व्याक्षेपविस्तरः॥ [५७] राजनीतावपि प्रथमं पदातयो युध्यन्ते पश्चाच्च नायकाः। श्रीपूज्यरुक्तम्-'उपाध्यायमिनाः! न ज्ञायते पण्डितस्य स्वरूपम् , यथा पण्डितः कीदृशोऽस्ति' । उपाध्यायेनोक्तम्-'प्रभो ! भक्तु पण्डितो यादृशस्तादृशो वा। सर्वत्र युष्माकं प्रसादो विजयते'। श्रीपूज्यरुक्तम्-'ययमपि तत्रागमिष्यामः, परं भवद्भिस्तत्र वक्तव्यमिति' । उपाध्यायेनोक्तम्- 'प्रभो ! युप्मासु संनिहितेषु सत्सु मम जिह्वा लजावशाद् वक्तुं न वहति, अतो यूयमन्त्रैव तिष्ठत' इत्यादि । श्रीजिन- पालोपाध्यायविहितोपरोधात् प्रसन्नमानसः श्रीपूज्यमनध्यानपूर्वकं मस्तके हस्तं दत्वा धर्मरुचिगणि-वीरभद्रगणि- सुमतिगणिभिः, उ०विजयकप्रमुखप्रधानश्रावकैथ सह मनोदानन्दपण्डितजयनार्थ प्रेपितः श्रीजिनपालोपाध्यायः । सुर- वार्ताप्रच्छननिमिचसमागतानेकराणकावस्थानमण्डिते नगरकोद्दीयराजाधिराजश्रीपृथ्वीचन्द्रसभामण्डपे प्राप्तः श्रीजिन- पालोपाध्यायः सपरिवारः। ६३. श्रीपृथ्वीचन्द्रराजानमुपश्लोक्य तत्रसः पण्डितमनोदानन्दो भापितः श्रीमदुपाध्यायेन, यथा-'पण्डितराज ! फिमर्थभस्मासविद्वारे पत्रायलम्यनं दचम् " तेनोक्तम्-'जयनार्थम् । उपाध्यायेनोक्तम्-'तहिं कुरु कस्यापि पक्षसाङ्गी- फारम्' । तेनोक्तम्-'युष्मान् दर्शनपायसेन स्थापयिष्यामीति मम पक्षः' । श्रीउपाध्यायेनोक्तम्-'कुरु प्रमेपमिति । तदनन्तरं तेनोक्तम्-'विवादाध्यासिता दर्शनबायाः, प्रयुक्ताचारविफलत्वान्म्लेच्छादिति' । श्रीमदुपाध्यायेन चिहयो- तम्-'पण्डितराज मनोदानन्द ! त्वदुफ्तेऽसिन्ननुमाने फति दूपणानि दर्शये ?' तेनोक्तम्-'पधाशक्ति दर्शयेः, परं तत्समर्थनायां समधेन भाव्यम् । श्रीमदुपाध्यायेनोक्तम्-'पण्डितराज ! सावधानीभूय श्रूयताम् , यथा-विवादाध्या- सिता दर्शनयामा,प्रयुक्ताचारविफललान्म्लेच्छयदिति-भत्तोक्तम् , तत्र प्रयुक्ताचारविकलत्यादिति हेतुरनेकान्तिकः, परदर्शनवावस्ये साध्ये पदर्शनाभ्यन्तरवर्तित्वेनाभ्युपगतेषु चौद्ध-चार्वाकादिपु विपक्षभूनेप्यस्य हेतोगमनात् । तथा साधनविकलो दृष्टान्तः । तथा हि-त्वदुक्ताचारवैकल्यं म्लेच्छेप्वेकदेशापेक्षया सामस्त्यापेक्ष्या वा मवेन् ?! न तापदा- परिकल्पः, म्लेच्छा अपि हि खजात्यनुयायिनां लोकाचारं किमपि पुर्राणा दृश्यन्ते । लोकाचारय सयोऽपि वैदिक एपेत्यसिद्धो हेतुटान्तः । अथरा सामस्त्यापेक्षया, वर्हि भरानपि दर्शनरायः, नहि मानपि सर्वमपि वैदिकमाचार का मोति'-इत्यादिना प्रकारेण तकरीत्या मुपापेन समस्तराजलोफचेतमि चमत्कारसुणिन श्रीमदुपाध्यायनानेक- दूषणोद्धापनेन कदाधितेऽपि प्राथमिकऽनुमाने, धापदिन्यान्यनुमानानि भगित प्रश्नः पं०मनोदानन्दः । प्रभूनप्रति- ४६ खरतरगच्छालंकार भाप्रभावेन श्रीमदुपाध्यायेन स्थाने साने ज्वलन्तीषु दीमासु दीपिकासु समस्तराजलोकसमक्षमसिद्धविरुद्धानेकान्तिका- दिदूषणोद्भावनेन तान्यपि निराकृत्य जितो मनोदानन्दः । प्रधानानुमानभणनपूर्वकमात्मा च स्थापितो दर्शनाम्यन्तर- वर्तित्वेनोपाध्यायेन । उत्तरास्फुरणे चैलक्ष्याचिन्तितुं प्रवृत्तः पण्डितः, यथा-'अहो! तथाविधवैदग्भ्याभावादेते राजानो यं कंचिद् यतिबुवाणं पश्यन्ति तमुद्दिश्य भापन्ते यथाऽयं मद्रो चादीति; तस्मादहमपि फिमपि सुबनसिम यथाऽमी जानन्ति पण्डितमनोदानन्दो गाढो याग्ग्मी'-इति विचिन्त्य- शब्दब्रह्म यदेकं यचैतन्यं च सर्वभूतानाम् । यत्परिणामस्त्रिभुवनमखिलमिदं जयति सा वाणी ।। [२८] इत्यादि पठितुं प्रवृत्तः । ततश्च श्रीमदुपाध्यायेन कोपावेगादुक्तम्-'अरे वठरशेखर! किमेतदसम्बद्धं भापसे ? मया त्यां पड्दर्शनयाह्यः कृतःप्रमाणसामध्येन; यदि तब काऽपि शक्तिरस्ति तदा स्वकीयपत्रावलम्बनसमर्थनाय प्रमाणा- नुयायि किञ्चिद् हि । पूर्वपठितगुणनेऽपि वयमेव समर्था । तदनन्तरं श्रीमदुपाध्यायवचनेन श्रीजिनवल्लभमरिकृत- चित्रकूटीयप्रशस्ति-संघपट्ट-कर्मशिक्षादिसंस्कृतप्रकरणान्युदात्तस्वरेण गुणयतो धर्मरुचिगणि-वीरप्रभगणि-सुमतिगणीन् दृष्ट्वा तत्रोपविष्टान्यराजभिरुक्तम्-'अहो ! एते सर्वेऽपि पण्डिताः' इति । मनोदानन्दपण्डितमुखे कालिमानमवलोक्य राजाधिराजश्रीपृथ्वीचन्द्रेण चिन्तितम् , यथा-'अहो ! न दृश्यते शोभना मनोदानन्दस्य मुराच्छाया। अतो यधेप हार- यिष्यति ततो महल्लाघवं मम भविष्यति । तस्मादिदानीमेवानयोः समश्रीकतां करोमीति-चिन्तनानन्तरं च श्रीमदुपा- ध्यायानुद्दिश्योक्तम्-'वृहन्त ऋपयो यूयमिति' । मनोदानन्दमुद्दिश्योक्तम्-'यहन्तः पण्डिता यूयमिति' । श्रीपृथ्वीच- न्द्रराजवचनं श्रुत्वा श्रीमदुपाध्यायेन चिन्तितम् ,यथा-'अहो ! अद्यैतावत्प्रमाणेन संरम्भेण रात्रिप्रहरवयं जागरित्वाऽपि न किमपि फलं संग्रामम् , यदित्थं निर्वचनीकृतेनापि मनोदानन्देन समं मम समश्रीकता कता राज्ञा स्वपण्डितपक्षपा- तात् । भवतु, तथापि जयपत्रमगृहीत्वा मयेतः स्थानान्नोत्थातव्यमिति' । प्रकटं च खस्कन्धास्फालनपूर्वकमुक्तम्-'महा- राज ! किमेतदुच्यते । मय्यूयं सत्यन्यो भरते सकलेऽपि न कश्चित्पण्डितो भवति । यधेप पण्डितस्तदा मया सह लक्षण- मार्गेण तर्कमार्गेण साहित्यमार्गेण वा वदतु, अन्यथा खकीयमिदं पत्रावलम्बनं पाटयतु । अरे यज्ञोपवीतमानवहनशक्ते मनोदानन्द ! श्रीजिनपतिसूर्युपरि पत्रावलम्बनं करोपि ? न जानासि रे पटो। यदनेन सर्व विद्यानिर्णयदायकाः श्रीप्रद्युम्ना- चार्यसदृशाः पण्डितराजाः सकललोकसमक्षं धूली चर्विताः । अत्रान्तरे श्रीपृथ्वीचन्द्रेण पत्रावलम्बनं गृहीत्वा पाटितम् । श्रीमदुपाध्यायेनोक्तम्-'महाराज ! न तुप्यामो वयं पत्रावलम्बनपाटनमात्रेण । राज्ञोक्तम्-'कथं तुप्यथ उपाध्या- येनोक्तम्-'जयपत्रलाभेन; यतो महाराज ! अस्माकमीशी दर्शनव्यवस्थाऽस्ति, यः कश्चिदस्मदुपाश्रयद्वार एकसिन् दिने पत्रावलम्बनं बनाति तस्यैव हस्तेन द्वितीये दिने खोपाश्रयद्वारे जयपत्रमुद्भाव्यते । अतो महाराज! यथा न्याय- श्रीकरणैकसंमत्याऽसईर्शनव्यवस्था पृद्धि प्रामोति तय सभायां तथा विधीयताम्' । राज्ञा च लघूछतस्वपण्डितमनोदा- नन्दमुखकालिमावलोकनोच्छलितमानसिकदुःखेनापि न्यायविचारप्रवीणपार्श्वस्थितप्रभूतप्रधानलोकोपरोधात स्वकीय- पारिग्रहिकहस्तेन लेखयित्वा दत्तं जयपत्रं श्रीजिनपालोध्यायानां हस्ते। उपाध्यायैश्च धर्मलाभाशीदिदानपूर्वकं बहु- लमुपश्लोकितो महाराजाधिराजश्रीपृथ्वीचन्द्रः । ततः स्थानादुत्थाय प्रातः क्षणे पंचशब्दवादनादिवपिनपूर्वकं गृही- तजयपत्राः सपरिवाराः श्रीजिनपालोपाध्यायाः समागताः श्रीपूज्यानां समीपे। श्रीपूज्यश्च स्वशिष्यनिष्पादितजिन- शासनप्रभावनोद्भूतप्रभूतप्रमोदान्महासंभ्रमेणालापिताः श्रीमदुपाध्यायाः। सं० १२७३ ज्येष्ठदि १३ शान्तिनाथ- जन्मकल्याणकै कारितं च वर्धापनकमानन्दमरनिर्भरेण तत्रत्यममुदायेन । ६४. सं० १२७४ बृहद्वारादागच्छद्भिरन्तरा भावदेवमुनिर्दीक्षितः। सा० थिरदेवप्रार्थनया दारिद्भरके चतुर्मासी .

४७ युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। कृता । तन्नापि नन्दयः पूर्ववत् । सं० १२७५ जावालिपुरे ज्येष्ठसुदि १२ भुवनश्रीगणिनी-जगमति-मङ्गलश्रीसा- 'वीत्रयेणसह विमलचन्द्रगणि-पद्मदेवगणी दीक्षितौ । सं० १२७७ श्रीमहादनपुरे प्रभूताः प्रभावनाः कृता । अन्यदा नाभ्यधस्तनप्रदेशोद्भूतग्रन्थिदोपोत्थितवेदनावशसंजातमूत्रसंग्रहरोगसत्ककष्टादात्मन आयुपो गमनमवगम्य श्री- 'पूज्यदत्ता यथोचिता शिक्षा चतुर्विधयापि संघस्य । मिथ्यादुष्कृतं च दत्त्वा भणितं च संघस्याने-'संघेन मनोमध्ये का- ऽप्यनिर्जिन कार्या-यद्भोरिदानी कथं भविष्यति,यतो येषां प्राणेनानेकैर्लोकः सममास्फाल्यास्फाल्योक्तं ते देवीभूता "इति । यतः पश्चादपि श्रीसर्वदेवमरि-श्रीजिनहितोपाध्याय-श्रीजिनपालोपाध्याया वयमिव सर्वेपामप्युत्तरं दातुं क्षमाः, युप्माकं मनोरथान् पूरयितुं समर्थाः सन्ति । तथा वाचनाचार्यसूरप्रभ-कीर्तिचन्द्र-वीरप्रभगणि-सुमतिगणिनामान- श्वखारः शिप्या महाप्रधाना निष्पन्ना वर्तन्ते । येषामेकैकोऽप्याकाशस्य पततो धरणे क्षमः । परमस्माकं स्वकीयपद- योग्यं परिभावयतां बीरप्रमगणिः समागच्छति । वयमपि साम्प्रतं साबाधा वर्तामहे । अतो यदि संघः कथयति तदि- दानीमपि स्वकीयपदे वीरप्रभगणिमुपवेशयामः । शोकहर्षप्रकर्पाकुलचिन संधेन विज्ञप्ताः श्रीपूज्याः, यथा-खामिन् ! ययुष्माकं परिभावयतां समागच्छति तदस्माकं प्रमाणम् , परमिदानीमौत्सुक्येन क्रियमाणमाचार्यपदस्थापनमतिशोभा- युक्तं न संभाव्यते । अतो यदि युष्माकं निरोपो भवति तदाऽवत्यसमुदायलेखदर्शनसमागतसमस्तदेशवास्तव्यखरतर- समुदायैरानन्दभरेण स्थाने विधीयमानासु महतीपूत्सपिणीपु वीरप्रभगणेराचार्यपदस्थापना महाविस्तरेण कार्यते । श्रीपूज्यैरुक्तम्-'यत्समुदायस्य पर्यालोचयतः समागच्छति तत्प्रमाणम् । तदनन्तरं समस्तलोकक्षमितक्षामणपूर्वकमन- शनविधिना निखिललोकचेतसि चमत्कारं कृसा [सं० १२७७ आपाढ सुदि १०] दिवं गताः श्रीजिनपतिसरयः। ६५. तदनन्तरं श्रीपूज्यविरहोच्छलितपरमदुःखेन शून्यान्तःकरणेनापि पाश्चात्य[कृत्य] कृते श्रीपूज्याननेकमण्डपिका- मण्डिते विमानेऽध्यारोप्य स्थाने स्थाने च वारविलासिनीभिस्तत्कालसुसदेन वरेण हृदयाकरणप्रवीणमेघरागादिशो- करागेण देवोपालम्भायर्थनिबन्धनमधुमधुरेपु गीतेपु गीयमानेषु उच्छाल्यमानेषु च नानाविधेषु बहुपु वनफलेषु, पश्च- शब्देषु च वाद्यमानेषु नेतुमारेभे समस्तलोकसहितेन चतुर्विधेन संघेन । अत्रान्तरे कणपीठमध्ये साबाधशरीरथीपूज्यवार्ताश्रयणादुचालीभूय जावालिपुरादागतः प्रधानसाधुसहितः श्रीजि- नहितोपाध्यायः । स च तत्र तागवस्थान् श्रीपूज्यानवलोक्य शोकभरविह्वलीभवन्मानसेन श्रीपूज्यगुणगणसरणपूर्वक नानाप्रकारान् विलापान् कृत प्रवृत्तः । यथा- श्रीजिनशासनकाननसंचद्धिविलासलालसे वसता। हा श्रीजिनपतिसूरे, किमेतदसमञ्जसमवेक्षे ? ॥ [५९] जिनपतिसूरे! भवता श्रीपृथ्वीराजनृपसदासरसि । पद्मप्रभासिवदने नारमिव जयनियासार्धम् ।। मथितप्रथितप्रतिवादिजातजलधेः प्रभो ! समुदृत्य । श्रीसंघमनाकुण्डे न्यधात् त्वमानन्दपीयूपम्। [६१] युधयुद्धिचक्रवाकी पटतर्कासरिति तर्कचक्रेण । क्रीडति यथेच्छमुदिते जिनपतिसूरे! त्वयि दिनेशे॥ [६] तव दिव्यकाव्यदृष्टावेकविधं सौमनस्यमुल्लसति। द्राक् सुमनसां च तत्प्रतिपक्षाणां च प्रभो ! चिनम् ।। धातुविभक्त्यनपेक्षं क्रियाकलापं त्वनन्यसाध्यमपि । यं साधयत् जिनपते। चमत्कृते कस्य नो नातः॥ [६४] .

१८ खरतरगच्छारकार [६९] मयि सति कीहक् चासन्नयमत्र कविरिति नाम यहतीति । रोपादसुराचार्य जेतुं कि जिनपते ! स्वरगाः ॥ [६५J भगवंस्त्वयि दिवि गच्छति हत्त्विदभिमुखमक्षताः क्षिप्ताः । सुररमणीभिर्मन्ये सारीभूतास्त ण्वाने ॥ इन्द्रानुरोधवशतोमध्ये स्वगं ययौ भवानित्यम् । जिनपतिसूरे! सन्तो दाक्षिण्यधना भवन्ति यतः॥ [६७ घामपदघातलग्नेन्द्राण्यवतारितशरायपुटखण्डाः। स्वाश्रीविचारकार्य तव नूनं दिव्युडूभूताः ।। जिनजननदिनस्नानाधानेच्छातः किमाकुलीभूय । त्वं पञ्चत्वं माप्तः-सुरपतिवन्जिनपतिर्भगवान् ॥ त्वदभिमुखमिव क्षिप्तानाशानारीभिरक्षतान् नूनम् । उपभोक्तुं वियदजिरे विचरति चन्द्रो मराल इव ।। [७०] नास्तिकमतकृदमरगुरुजयनायेवासि जिनपते ! स्वरगाः । परमेतजगदधुना विना भवन्तं कथं भावि १ ॥ [७१] हा ! रा! श्रीमज्जिनपतिसूरे ! सूरे स्वयीस्थमस्तमिते । अहह कथं भयिता नीतिचक्रवाकी वराकीयम् ॥ [७२] करतल धृतदीनास्ये श्रीशासनदेवि ! मा कृथाः कप्टम् । यन्मन्ये तव पुण्यर्जिनपतिसूरिदिवमयासीत् ।। रे दैव ! जगन्मातुः श्रीवाग्देव्या अपि त्वयानेपि । ना मन्ये यदमुष्याः सर्वस्व जिनपतिरहारि ॥ [४] इत्यादिशोकविलापभरोच्छलितमूवित्ताने च धैर्यालम्बनपूर्वकं श्रीपूज्यपादौ पन्दित्वा पाश्चात्यकरणार्ध त सह शुद्धे स्थंडिले जगाम सपरिवारः श्रीजिनहितोपाध्यायः । तत्र च कृत्यं समस्तमपि कृत्वा स्वोपाश्रयगमनपूर्वक श्रीगौतमस्वामिगणधरादिमहापुरुषचरितोत्कीर्तनेन सक्लमपि लोकमाहादयति स्म । ततश्चतुर्मासी कृता जापालिपुरे। ६६. ततः कालान्तरे श्रीसधेन सह श्रीजापालिपुरे श्रीजिनहितोपाध्याय-श्रीजिनपालोपाध्यायादि- प्रधानसाधुसमन्वितः श्रीसर्वदेवमरि. समस्तसंघसम्मत्या श्रीजिनपतिसरिगुरूपदिष्टरीत्याऽऽचार्यपदोपयोगिपट्- निंगद्गुणफलितसौभाग्यभाजनमुपादेयवाक्यं दशविधयतिधर्मादिभूतक्षमाकेलिभवन वीरप्रभगणि भक्तिभरसमागत- समस्तदेशवास्तव्यभव्यलोकसधैः स्थाने स्थाने मण्डितेषु सम्रागारेपु, दीयमानेपु रासकेषु, गीयमानेषु युगप्र- धानगुरु [ ] अमारियोपणाया निष्पाद्यमानायाम् , सहस्त्रसख्यद्रव्यार्पणेन याचफवाञ्छासु पूर्वमाणासु, प्रधानरूपवेपलक्ष्म्या शक्रेण सह स्पर्धमानेषु लोकेषु, महामिथ्यादृष्टिभिरपि निरन्तर प्रशस्यमाने जिनशासने, स्व- स्वदेवावहेलापरेप्पपरेषु दर्शनेषु, सरतरमार्गसत्कबिरुदारली पठत्सु भट्टलोकेषु, नानाविधास्वाशिस्सु दीयमानाम, तलिकातोरणादिशोभाभूपिते श्रीमहावीरदेवभवने तीर्धप्रभावनानिमित्त श्रीजिनपतिसरिपट्टे मापसुदि६ उपवेशयामास । कृतं च तस्य पूर्वगुरुपदिष्टं श्रीजिनेश्वरसूरिरिति नाम । आनन्दभरनिर्भरेण च संघेन पारिता महत्युत्सर्पणा। * * . युगप्रधानाचार्यगुवावली। ६७. श्रीजिनेश्वरसूरीणां च संक्षेपवाचनेयम्-सं० १२७८ माघ सुदि ६,श्रीमजिनेश्वरमरीणां पदस्थापना । माघ सुदि ९, यश कलशगणि-विनयरुचिगणि-बुद्धिसागरगणि-रत्नकीर्तिगणि-तिलकप्रमगणि-रत्नप्रभगण्यमरकीर्तिगणि [नामानः] एते सप्त साधयो दीक्षिताः श्रीजावालिपुरे । श्रीमाले सा०यशोधवलेन सह विहत्य ज्येष्ठ सुदि १२,श्रीविजय-हेमप्रभ-श्री- तिलकप्रभ-श्रीविवेकनभ-चारित्रमालागणिनी-ज्ञानमाला [गणिनी]-सत्यमालागणिनीनां दीक्षा । आपाढ सुदि १०, पुनः श्रीश्रीमाले सा० जगद्धरसत्कसमवसरणप्रतिष्ठा श्रीशान्तिनाथस्थापना च । श्रीजावालिपुरे देवगृहप्रारम्भश्च । जावा. लिपुरे १२७९ माघ सुदि ५, अर्हदत्तगणि-विवेकश्रीगणिनी-शीलमालागणिनी-चन्द्रमालागणिनी-विनयमालागणिनीनां दीक्षा । श्रीमाले १२८० माघ सुदि १२, श्रीशान्तिनाथभवने ध्वजारोपः । श्रीऋषभनाथ-श्रीगौतमस्वामि-श्रीजिनपतिमू- रिमेघनादक्षेत्रपाल-पद्मावतीप्रतिमानां प्रतिष्ठा । फाल्गुन वदि १, कुमुदचन्द्र-कनकचन्द्र-पूर्णश्रीगणिनी-हेमश्रीगणिनीनां दीक्षा । वैशाख सुदि १४, श्रीप्रह्लादनपुरे सकलनगरे(१) स्तूपे जिनपतिमरिप्रतिमा स्थापिता, विस्तरेण श्रीजिनहितो- पाध्यायद्वारेण । सं०१२८१ वैशाख सुदि ६, जावालिपुरे विजयकीर्ति-उदयकीति-गुणसांगर-परमानन्द-कमलश्रीग- णिनीनां दीक्षा । ज्येष्ठ सुदि ९, जावालिपुरे श्रीमहावीरमवने धजारोपः । १२८३ माव वदि २, वाहडमेरो श्रीमपभदे- वभवने ध्वजारोपः । माघ वदि ६, श्रीसूरप्रभोपाध्यायपदं मङ्गलमतिगणिन्याः प्रवर्तिनीपदै च, वीरकलशगणि-मन्दिव- धन-विजयवर्धनगणिदीक्षा । १२८४ वीजापुरे श्रीवासुपूज्यदेवस्थापना, आपाढ सुदि २, अमृतकीर्तिगणि-सिद्धकी- तिगणि-चारित्रसुन्दरिगणिनी-धर्मसुन्दरिगणिनीदीक्षा । सं० १२८५ ज्येष्ठ सुदि २, कीर्तिकलशगणि-पूर्णकलशगणि-' उदयश्रीगणिनीदीक्षा । ज्येष्ठ सुदि ९, वीजापुरे श्रीवासुपूज्यभवने जलानयनादिमहर्या ध्वजारोपः । १२८६ फाल्गु. न यदि ५,वीजापुरे विद्याचन्द्र-न्यायचन्द्रा ऽभयचन्द्रगणिदीक्षा । १२८७ फाल्गुन सुदि ५,प्रलादनपुरे जयसेन-देव- सेन-प्रबोधचन्द्राशोकचन्द्रगणि-कुलश्रीगणिनी-प्रमोदश्रीगणिनीदीक्षा । १२८८ भाद्रपद सुदि १०, स्तूपध्वजप्रतिष्ठर श्रीजावालिपुरे । आश्विन सुदि १०, स्तूपे ध्वजारोपः प्रह्लादनपुरे साधुभुवनपोलेन समुदायसहितेन राजपुत्रश्रीजग- सीहसान्निध्येन महामहोत्सवेन कारितः श्रीजिनपालोध्यायद्वारेण । पौप सुदि ११, जावालिपुरे शरचन्द्र-कुशलचन्द्र- कल्याणकलश-प्रसन्नचन्द्र लक्ष्मीतिलकगणि-वीरतिलक-रततिलक-धर्ममति-विनयमतिगणिनी-विद्यामतिगणिनी- चारित्रमतिंगणिनीदीक्षा । चित्रकूटे ज्येष्ठ सुदि १२, अजितसेन-गुणसेन-अमृतमूर्ति-धर्ममूर्ति-राजीमती हेमावली-कनका- वली-रत्नावलीगणिनी-मुक्तावलीगणिनीदीक्षा । आपाढ वदि २, श्रीऋपभदेव-श्रीनेमिनाथ-श्रीपार्श्वनाथशतिष्ठा साधुल- क्ष्मीधर-सा राहाभ्यां कारिता। सहस्र ८ लक्ष्मीधरेण वेचिताः (व्ययीकृताः)। राजनिखानेषु वाद्यमानेषु जलानयनम् । १२८९ उजयन्त-शत्रुञ्जय-स्तम्भनकतीर्थेषु यात्रा ठ० अश्वराज-साराल्हासाहाय्येन कृता । स्तम्भती च वादियमद- ण्डनामदिगम्बरवादिना सिह पण्डितगोष्ठी। महामात्यश्रीवस्तुपालस सपरिवारस्य श्रीपूज्यानां संमुखागमनेन प्रभा- बना च । १२९१ वैशाख सुदि.०, जावालिपुरे यतिकलश-क्षमाचन्द्र-शीलरत-धर्मरत्न-चारित्ररत्न-मेधचमारगणि-अभ- यतिलकगणि-श्रीकुमार-शीलसुन्दरिगणिनी-चन्दनसुन्दरिदीक्षा । ज्येष्ठ यदि २, मूलाकें श्रीविजयदैयसरीणामाचार्यप- दम् । १२९४ श्रीसंघहितोपाध्यायस्य पदम् । १२९६ फाल्गुन यदि५, प्रह्लादनपुरे प्रमोदमूर्ति प्रबोधमूर्ति देवमूर्तिगणीनां महर्या दीक्षा । ज्येष्ठ मुदि१०, श्रीशान्तिनाथप्रतिष्ठा, साम्प्रतं पत्तन उपविष्टोऽस्ति । १२९७ चैत्रसुदि १४, देवतिल- क-धर्मतिलकदीक्षा ग्रहादनपुरे । १२९८ वैशाख ११, जावालिपुरे खर्णदण्डे ध्वजारोपो मह कुलधरेण समुदायसहितेन वसायगुणचन्द्रेण-कारितः। १२९९ प्रथमाश्विन वदि २, महामत्रिकुलधरस्य सफलराजलोकनगरलोकाथर्याम्भोधिप्रो- लासपार्षणेन्दुसोदरेण महामहोत्सवेन दीक्षा, तस्य च कुलतिलकमुनिरिति नाम संजातम् । १३०४ बैशाखमुदि१४, विजयवर्धनगराचार्यपदस्थापना,जिनरताचार्य इति नाम । त्रिलोकहित-जीवहित-धर्माकर हर्षदत्त संघप्रमोद-विवेकस मुद्र-देवगुरुभक्त-चारित्रगिरि-सर्वज्ञभक्त-त्रिलोकानन्ददीक्षा । १३०५ आपाठ सुदि १०, श्रीमहावीर-श्रीमपभनाय- . .

५० सरतरगच्छालंकार श्रीनेमिनाथ-श्रीपार्श्वनाथविम्बानां नन्दीश्वरस्य च प्रहादनपुरे प्रतिष्ठा । इति श्रीजिनचन्द्रसरि-श्रीजिनपतिमरि-श्रीजिनेवरमरिसकमजनमनश्रमत्कारिप्रभारनावा नामपरिमितत्वे- ऽपि तन्मध्यवत्तिन्यः कतिचित् स्थूलाः स्थूला वार्ताः श्रीचतुर्विधसंघप्रमोदार्थम् । दिल्लीवास्तव्यसाधुसाहुलिसुत सा. हेमाभ्यर्थनया। जिनपालोपाध्यायरित्थं ग्रथिताः स्वगुरुवार्ताः ।। लोकभापानुसारिण्यः सुखयोध्या भवन्त्यतः। इत्येकवचनस्थाने काऽपि [च यहत्तिरपि ॥ [७६] यालावयोधनायैव सन्ध्यभावः कचित्कृतः । इति शुद्धिकचेतोभिः सद्भिज्ञेयं स्वचेतसि ॥ [७७] बुद्धये शुद्धये ज्ञानवृद्धय जनसमृद्धये । चतुर्विधस्य संघस्य मण्यमाना भवन्त्वतः ॥ [७८]] । उद्देशतो ग्रं० (३) १२४ ॥ ६८. सं० १३०६ ज्येष्ठ सुदि १३, श्रीश्रीमाले कुन्थुनाथारनाथप्रतिमाप्रतिष्ठा । द्वितीयवेलाघजारोपणं च कारितं सा० धीधाफेन । सं० १३०९ श्रीप्रह्लादनपुरे मार्गशीर्ष सुदि १२, समाधिशेसर-गुणशेखर-देवशेसर-साधुभक्त-वीरवल्लभमुनी- नां तथा मुक्तिसुन्दरिसाध्वीदीक्षा । तस्मिन्नेर वर्षे माघ सुदि १०, श्रीशान्तिनाथ-अजितनाथ-धर्मनाथ-वासुपूज्य- मुनिमुव्रत-सीमन्धरस्वामि-पद्मनाभप्रतिमायाः प्रतिष्ठा कारिता च सा० विमलचन्द्राहीरादिसमुदायेन । तथा हि-साधु- विमलचन्द्रेण श्रीशान्तिनाथो नगरकोप्रासादस्थो महाद्रव्यव्ययेन प्रतिष्ठापितः, अजितनाथो बलमाधारणेन, धर्मना. थो विमलचन्द्रपुरक्षेमसिंहेन, वासुपूज्यः सर्वश्राविकाभिः, मुनिसुव्रतो गोष्ठिकथेहडेन, सीमन्धरस्वामी गोष्ठिकहीराकण, पद्मनाभो महाभावसारेण हालाफेन श्रीमहादनपुरे । तसिन्नेन संवत्सरे वाग्भटमेरौ श्रीआदिनाथसिसरोपरि स्वर्णदण्ड- स्वर्णकलशौ प्रतिष्ठापितो, सहजापुत्रेण वत्थडेन महोत्सवेन च तत्र गसाऽऽरोपितो। सं० १३१० वशास सुदि ११, श्रीजावालिपुरे चारित्रवल्लभ-हेमपर्वत-अचलचित्त-लोभनिधि-मोदमन्दिर-गज- कीति-रत्नाकर-गतमोह-देवप्रमोद-चीराणन्द-विगतदोप-राजललित-बहुचरित्र-विमलप्रज्ञ-रत्ननिधाना इति पञ्चदश सा- धयः कृताः। चारित्रवल्लभ-विमलप्रज्ञौ पितृ पुत्रायेतन्मध्यान्झयो। तस्मिन्नेन वैशासे १३ स्वातिनक्षत्रे शनी चारे श्री- महावीरविधिचैत्ये राजश्रीउदयसिंहदेवादिराजलोकममागमे महजैत्रसिंहे राजमान्ये सति श्रीमह्नादनपुरीय-वाग्गडी- यप्रमुसमर्वसमुदायमेलापके सति चतुर्विंशतिजिनालय-सप्ततिशत संमेत-नन्दीश्वर-तीर्थकरमात-हीरामत्कश्रीनेमिनाथ- उज्जयिनीसत्कश्रीमहावीर-श्रीचन्द्रप्रम-शान्तिनाथ श्रेव्हरिपालसत्कमुधर्मस्वामि-श्रीजिनदत्तरि-सीमन्धरस्वामि-युग- मन्धरस्वामिप्रभृतिनानाप्रतिमानां महामहोत्सयेन प्रतिष्ठा जजे। प्रमोदश्रीगणिन्या महत्तरपदं च लक्ष्मीनिधिनाम कृतम्, ज्ञानमालागणिन्याः प्रवर्तिनी पदम् । सं० १३११ वैशास सुदि ६, श्रीमहादनपुरे श्रीचन्द्रप्रभस्वामिविधिचैत्ये श्रीभीमपल्लीनामादसितश्रीमहावीर- प्रतिमा साधुभानपालेन महामहोत्सवेन निजभुजोपार्जितद्रव्यव्ययेन प्रतिष्ठापिता। श्रीऋपमनाथः समुदायेन, अनन्तनाथो बोहित्येन, अभिनन्दनो मोल्हाकेन, वाग्भटमेरुनिमित्तं श्रीनेमिनाथ आम्नासहोदरेण मारमारेण केल्ह- गेन, श्रीजिनदत्तरिप्रतिमा हरिपाललघुभ्राना श्रे० कुमारपालेन । श्रीप्रहादनपुरे श्रीजिनपालोपाध्यायानामनशन पूर्व द्योगमनम् । सं० १३१२ वैशास सुदि १५, चंद्रकीलिंगणेरुपाध्यायपदं श्रीचन्द्रतिलकोपाध्याय इति नाम कृतम् , पाचना- युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ५१ चार्यपदं प्रयोधचन्द्रगणि-लक्ष्मीतिलकगण्योच संजातम् । तदनन्तरं ज्येष्ठ वदि १, उपशमचित्त-पवित्रचित्त- आचारनिधि-त्रिलोकनिधिदीक्षा । सं० १३१३ फाल्गुन सुदि ४, श्रीया(जावालिपुरे वर्णगिर्युपरि महाप्रासादे वाहित्रिकोद्धरणप्रतिष्ठापितश्रीशान्ति- नाथस्थापना । चैत्र सुदि १४,कनककीर्ति-वियुधराज-राजशेखर-गुणशेखर-जयलक्ष्मी-कल्याणनिधि-प्रमोदलक्ष्मी- गच्छवृद्धिदीक्षा । अनन्तरं वैशाख बदि १, श्रीअजितनाथप्रतिमा प्रतिष्ठापिता। पटू-भूलिगाभ्यां यहुद्रव्यव्ययेन स्थापिता द्वितीयदेवगृहे । ततः प्रह्लादनपुरे आपाइ सुदि १०, भावनातिलक-भरतकीर्तिदीक्षा । श्रीभीमपल्लयां च तस्मिन्नेव दिने श्रीमहावीरस्थापना च । सं० १३१४ माघ सुदि १३, कनकगिर्युपरिनिर्मापितप्रधानप्रासादोपरि ध्वजारोपः। श्रीउदयसिंहराजप्रसाद- पूर्वकं निर्विघ्नं संजातं । आपाढ सुदि १०, सकलहित-राजदर्शनसाध्वोर्बुद्धिसमृद्धि ऋद्धिसुन्दरि-रत्नवृष्टिसाध्वीनां च श्रीप्रह्लादनपुरे महाविस्तरेण प्रव्रज्या। सं० १३१६ श्रीजावालिपुरे माघ सुदि?, धर्मसुन्दरिगणिन्याः प्रवर्तिनीपदम् । माघ सुदि ३, पूर्णशेखर-कनक- कलशयोः प्रवज्या । माघ सुदि६, स्वर्णगिरी श्रीशान्तिनाथप्रासादे स्वर्णकलश-स्वर्णदण्डारोपणं पदू-मूलिगाभ्यां श्रीचा- चिगदेवराज्ये कारितम् । आपाढ सुदि ११, श्रीबीजापुरे श्रीवासुपूज्यजिनमन्दिरे स्वर्णकलश-स्वर्णदण्डधजारोपणं विशे- पेण श्रीसोममत्रिणा कारितम् । सं० १३१७ माघ सुदि १२, लक्ष्मीतिलकगणेरुपाध्यायपदं ' महर्या पद्माकरस्य दीक्षा च ! माघ सुदि १४, श्रीजावालिपुरालङ्कारश्रीमहावीरजिनेन्द्रप्रामादचतुर्विशतिदेवगृहिकासु स्वर्णकलश स्वर्णदण्डध्वजानामारोपणं सर्वममु- दायेन कारितम् । फाल्गुन सुदि १२, श्रीशान्तनपुरे श्रीअजितस्वामिप्रासादे ध्वजप्रतिष्ठारोपौ वा० पूर्णकलशगणि- द्वारेण । श्रीभीमपल्लयां श्रीमण्डलिकराज्ये दण्डाधिपतिश्रीमीलगण (सीलण ?) सान्निध्येन अनेकप्रह्लादनपुरादिसमु- दायमेलकेन सा०सीमडसुत सा० जगद्धर-तदङ्जरख सा० नेन समुदायमहितेन दर्या, बैशास सुदि १० दशम्यां सोमवारे, श्रीमहावीरफेवलतानमहोत्सवदिने, मन्दिरतिलकनामश्रीवर्धमानजिनप्रासादशिखरे स्वर्णदण्ड-स्वर्णकलशन- तिष्ठा तयोरध्यारोपश्च कारितः । तथा श्रेष्ठिहरिपालेन तद्रात्रा श्रेष्ठि कुमारपालेन श्रीसरस्वतीप्रतिमा अननद्यविद्याचक्र- वर्तिकल्पा शशाशुभ्रप्रभाऽनल्पा सकलसंघमुबुद्धिप्रदायिनी एकपञ्चाशदगुलप्रमाणा महर्वा प्रतिष्ठापिता । अङ्गुलि- कत्रिंशत्प्रमाणा श्रीशान्तिनाथप्रतिमा सा० राजदेवेन, ऋषभनाथप्रतिमा मूलदेव-क्षेमन्धराम्याम् , श्रीमहावीरप्रतिमा सायदेवपुरेण पूर्णसिंहेन, आजडसुतयोपान श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा, घारमिहेन श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा भीमभुजवलपराक्रम- क्षेत्रपालपिम्यं च, श्रीकपभनाथ महावीरप्रतिमे पूनाणीऊदाफेन, चतुर्विशतिपट्टाजितप्रतिमे सा० बालचन्द्रण, श्री. ऋषभनाथप्रतिमा श्रेष्ठिधान्धलन भावडमुतेन, शान्तिनाथप्रतिमा यो० शान्तिगेन, श्रीमपमनाथप्रतिमा आमणागेन, महावीरप्रतिमात्रयं साढलपुत्रधनपालेन, यमा० भोजाफेन शान्तिनाथप्रतिमा, श्रेष्ठिहरिपाल कुमारपालाम्यां जिनदत्त- गरिम्ति-चन्द्रप्रभस्वामिप्रतिमे, रूपचन्द्रमुतनरपतिना श्रीनेमिनाथविम्यं, स्तम्भ० धनपालेन, चण्डे० वीजाकेन, अम्पि- काप्रतिमा समुदायेन । द्वाददयां सौम्यमूर्ति न्यायलक्ष्मीदीक्षा । संचन १३१८ पौप मुदि ३, संघमक्तस्स दीक्षा धर्ममूर्तिगणाचनाचार्यपदं च । सं० १३१९ मार्ग० मुदि ७, अमयतिलकगोपाध्यायपदम् । तम्मिन्नेर वर्षे श्रीअभयतिलकोपाध्यायः पं० देवमन्यांदिसाधुपरिपतरअपिन्यां निहत्य तपोमतीयं पं० विद्यानन्दं निजिव्य प्रागुकं शीतलं जलं यतिस्स- फिल्पन ?] इति गिद्धान्तपलेन व्यरसाप्य च जयपत्रं गृहीतम् । नस प्रसादनपुगदिपु सिन्नरण प्ररेश- ५२ खरतरगच्छालंकार . . कोत्सवः । सं० १३१९ माघ यदि ५, विजयसिद्धिसाच्या दीक्षा । माघ वदि ६, श्रीचन्द्रप्रभखामिप्रतिमा अजितनाथ- प्रतिमा सुमतिनाधप्रतिमा श्रेष्ठियुधचन्द्रेण महामहोत्सवेन प्रतिष्ठापिता । श्रीभनाधप्रतिमा सा० भुवनपालेन, धर्म- नाथप्रतिमा जिसधरसुतेन जीविगथापकेण, सुपार्श्वप्रतिमा रख-पेथडश्रावकाम्याम्, श्रीजिनवल्लमसरिमृत्तिः सिद्धा- न्तयक्षमूर्षिय श्रेष्ठिहरिपाल-तद्भाश्रेष्ठिमारपालाम्याम् । श्रीपत्तने श्रीशान्तिनाथदेवप्रासादे अक्षततीयायां दण्डक- लशारोपः सा० अमयचन्द्रेण कारापितः । सं० १३२१ फाल्गुन सुदि २, गुरौ चित्तममाधि-क्षान्तिनिधिसाध्च्योर्दीक्षा । सं० १३२१ फाल्गुन वदि ११, श्रीप्रसादनपुरे आलयप्रतिमात्रयस्य दण्डस प प्रतिष्ठा कारयित्वा जेसलमेरवास्तव्यसमुदायेन सा० जसोधवलकारिते देवगृहशिखरे जेसलमेरौ ज्येष्ठ सुदि १२ श्रीपार्श्वनाथस्य स्थापना दण्डध्वजारोपश्च कारितः 1 सं० १३२१ ज्येष्ठ , मुदि १५, चारित्रशेखर-लक्ष्मीनिवास-रत्नावतारसाघवो दीक्षिता विक्रमपुरे। . सं० १३२२ माघ सुदि १४, निदशानन्द-शान्तमूर्ति-त्रिभुवनानन्द-कीर्तिमण्डल-सुबुद्धिराज-सर्वराज-वीरप्रिय- जयवल्लभ-लक्ष्मीराज-हेमसेननामानो दश साधवः, मुक्तिवल्लभा नेमिभक्ति-मङ्गलनिधि-प्रियदर्शनाभिधानाश्चतस्रः सा- ध्न्यथ कृताः। श्रीविक्रमपुरे वैशाखसुदि ६ वीरसुन्दरी साध्वी च । १३२३ मार्ग० वदि ५, नेमिध्वजसाधुः, विनयसिद्धि-आगमवृद्धिसाव्यौ च कृताः। जावालिपुरे, सं०१३२३ वैशाख सुदि १३, देवमूत्तिंगणेचिनाचार्यपदम् ; द्वितीयज्येष्ठ सुदि १०, जैसलमेरुश्रीपार्श्वविधिचैत्यारोपार्थ स्वर्ण- दण्ड-कलशयोः सा० नेमिफुमार-सा० गणदेवकारितयोः प्रतिष्ठा; विवेकसमुद्रगणेचिनाचार्यपदस्थापना च कृता । आपाढ वदि १, हीराकरसाधुः कृतः । सं० १३२४ वर्षे मार्ग० यदि २ शनी, कुलभूपणसाधु-हेमभूपणमाधुद्वयम् , अनन्तलक्ष्मी-यतलक्ष्मी-एकलक्ष्मी-- प्रधानलक्ष्मी इति साध्वीपश्चकं (चतुष्टयं ?) च महा श्रीजावालिपुरे कृतम् । सं० १३२५ वैशाप सुदि १०, श्रीजावालिपुरे श्रीमहावीरविधिचैत्ये श्रीप्रह्लादनपुरीय-स्तम्भतीर्थीय-श्रीमेद- पाटीय-श्रीउच्चीय-श्रीवाग्गडीयप्रमुखसर्वसमुदायमेलापके व्रतग्रहण-मालारोप-सम्यधारोप-सामायिकारोपादिनन्दी महा- विस्तरेण संजते । तत्र गजेन्द्रवल इति साधुः, पद्मावतीति साध्वी च कृता । तथा वैशास सुदि १४, श्रीमहावीरविधि- चैत्य एव चतुर्विंशतिजिनविम्बानां चतुर्विशतिध्वजदण्डानां सीमन्धरस्वामि-युगमन्धरस्वामि-बाहु-सुबाहुपिम्बानाम् , अन्येषां च अभूतविम्बानां महाविस्तरेण प्रतिष्ठा जज्ञे । तथा ज्येष्ठ वदि ४, सुवर्णगिरी श्रीशान्तिनाथविधिचत्ये चतु- विंशतिदेवगृहिकामध्ये तेषामेव चतुर्विंशतिजिनपिम्बानां सीमन्धरस्वामि-युगमन्धरस्वामि-बाहु-सुबाइपिम्बानां सर्वसमु- दायमेलकेन महामहोत्सवेन विस्तरेण स्थापनामहोत्सवः संजातः । तत्रैव च दिने धर्मतिलफगणेर्वाचनाचार्यपदम् । तथा शास मुदि १४, श्रीजेसलमेरौ श्रीपार्श्वनाथविधिचैत्ये सा० नेमिकुमार-सा० गणदेवकारितयोः सुवर्णदण्ड- सुवर्णकलशयोः सविशेपमोत्सयो विस्तरेण संजातः । ६९. सं० १३२६ वर्षे, सा० भुवनपालसुत सा० अभयचन्द्रविरचितेन, मं० अजितमुत मं० देदासुश्रावकाङ्गीक- तपच्छेयाणप्राग्भारेण, सा.अभयचन्द्र-महं. अजितसुत महदेदा सा राजदेव श्रेष्टिकुमारपाल-सान्नीम्यदेवमुतसा० श्रीपति-सा० मूलिग-सा० धनपालप्रमुखेण चतुर्दिग्भवेन विधिसंघेन सह तद्गादाम्यर्थनया श्रीशत्रुक्षयादितीर्थयात्रार्थ श्रीजिनेश्वरमरिगुरुपु श्रीजिनरत्नाचार्य-श्रीचन्द्रतिलकोपाध्याय-चुमुदचन्द्रप्रभृतिसाधु २३ पर्युपास्यमानेपु, श्रीलक्ष्मीनि- धिमहत्तराप्रमुससाध्वी१३परिवृतेपु, चैत्र वदि१३,श्रीमहादनपुराव प्रचलितेषु,स्याने स्थाने श्रीविधिसंघे चमत्कारकारिणी विधिमार्गप्रभावनां कुर्वाणे श्रीतारणमहातीर्थे महं० देदाकेन ढूं० १५०० इन्द्रपदम्, पूनाकमुनेन सा० पेथडेन + - युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। दं० ४०० मन्त्रिपदम् , कुलचन्द्रसुतवीजडेन द्रं० १०० सारथिपदम् , सा राजाकेन ई० ११० भाण्डागारिकपदम् , महं देदाथापिकाइयेन ई० ३०० आधचामरधारिपदम् , सा० जयदेव-तेजपालभार्याभ्यां पाश्चात्य चामरधारिपदं तिलकेन; तेजपालेन ९०छत्रधरपदं महामहोत्सवेन गृहीतम् । श्रीबीजापुरे श्रीवासुपूज्यविधिचत्ये सान्धीपतिना ई० ३१६ माला गृहीता । द्रम्मसहस्र ३ आयपदे जाताः । श्रीस्तम्भनकमहातीर्थे बहुगुणभ्रात्रा धकणेन द्रं०६१६ इन्द्रपदम् , साकरिया- सहजपालेन द्रं०१४० मत्रिपदम् , सा०पासूश्रावण द्रं०२३२ चामरधारिचतुष्कपदम् , ,०८० प्रतीहारपदं सांगण- पुत्रेण, द्र०७० सारधिपदं पासपुत्रेण, भां० राजाकपुत्रनावन्धरण द्र० ८० भाण्डागारिकपदम् , बहुगुणेन द्रं० ४० छत्रधरपदम् , का०पारसपुत्रसोमाकेन नं० ५० स्थगिकावाहकपदं गृहीतम् । सर्वसंख्यया पदेपु ;० १३०८, आयपदे ५००० संपेन सफलीकृतानि । श्रीशत्रुवयमहातीर्थे सा० मूलिगेन द्रं० १४७४ इन्द्रपदम् , महं० देदाकपुत्रमहं० पूनसीहेन दं० ८०० मत्रि- पदम् , भां० रानापुत्रइसलेन ० ४२० माण्डागारिकपदं गृहीतम् । सालाकेन २७४ प्रतीहारपदम् , महं० साम- न्तपुराहणमिहेन २२४ सारथिपदम् , सा० धनपालपुत्रधीन्धान ११६ छत्रधरपदम् , छोन्देहडेन २८० पार- चियपदम् , पद्मसिंहेन ,०१०० स्थगिकावाहकपदम् , बहुगुणेन ४५० आधचामरधारिपदम् , भां० राजाकेन १००, सांसवान १०० पाचात्यचामरधारिपदम् । सर्वाग्रेण पदेषु ५३३८ । सा० पामश्रावण ३८ लेप्पमयमूलनायक- युगादिदेवमुसीघाटनमाला, सा० पसुनसाहुदाहडेन ३०४ मूलनायकयुगादिदेयमाला, महं देदाननन्या हीरलश्रापि- फया ५०० मरुदेवीसामिनीमाला, सा राजदेवजनन्या तीवी(?) श्राविकया १४० पुण्डरीकगणधरमाला, तत्पुत्रेण मूल- राजेन १७० कपर्दियक्षमाला गृहीता। सर्वसंख्यपाऽऽयपदे ,०१७००० । श्रीउआयन्तमहातीर्थे सा०श्रीपतिनाद्रं० २१०० इन्द्रपदम्, श्रेष्टिहरिपालपुत्रपूर्णपालेन ६१६ मन्त्रिपदम् , पास मा० २९० प्रतीहारपदम् , भा० राजपुत्रेण आटाभिधेन ५०० भाण्डागारिकपदम् , का मनोरथेन २६० सारधि- पदम्, मा० राजदेवापुत्रेण भुषणान १५० पारिघियपदम् , सा० राजदेवेन पु० मलराणेन १४० म्यागिकापा- इफपदम्, धनदेवेन ११३ छत्रपरपदम् , मा० श्रीपतिना २०० अपमनामरधारिपदम् , ८५ चतुर्धचामरधारिपदम् , ।०मा० मडगुणेन १६० द्वितीपनामरधारिपदम् , ९० तृतीयचामरधारिपदं च । पै० हांसिलगुत पै० देवडेन ५१६ श्रीनेमिनाथभुग्योद्घाटनमाला, सा- अभयचन्द्रमात्रा निहुण)पालहीथानिकया २४० राजीमतीमाला, सा० श्रीपतिमामा मोहाभाविकया ३५ अम्पिकामाला, पाहणमुतदेवहमारेण १४४ माघमाला. मा० अभपचन्द्रपुनवीर- पवलेन १८० प्रघुममाला, मा राजदेवमात्रा मोलान ११ कल्याणजयमाला, मा० पाशुभगिन्या गगलभाविकपा २५० श्रीगअयप्रापमदेवमाला, मा. पागमाना पाहीथापिकया १२४ मरुदेवीमाला, गा० उदापुरमीमनिटेन १०८ पुष्टरी रमाला, मा० धणपालन ११६ सालीफनाशिसरमाला, मा० गनदेवनागुणधरपचीजटेन ६४ कपर्दिपक्षमाला गृहीता । एवं म प्रेण ७०९७ । शत्रुजये देवमाण्डागारं उदानः महम २०, उन्नपन्ने महम १७ संजाना। धीनिने मायरिमिः धीरजपन्ने धीनेमिनाथराजपुग्नो ज्येष्ठादि.....प्रपोपममुद्र-ग्निपगमुद्रमापृश्यमा दी- धामोन्मयो मालागेपणादिमहोमस्य हनः । ननो देवगने पनिपानंदन पादिकमंदना रिमरण गनुपिगंपतिः भोजिनमार्गिमः मरतनोगदिन] साग्निी पत्यारिटी का। गोऽपि परिवानानन्धमय अनिमियः। पांमाने माने महामानामतः मानाननिजजन्ममामध्यन मनमनोयन रिधिमार्गगंपेन गाना- पारिपार, आमा गरि ९, मा. अमपमन्नंनदेशनपार श्रीजिनवायग्निगाधिपधिप प्ररे- खरतरगच्छार कार शक्महोत्सवः सकलनगरालोकचमत्कारकारी [कृतः] श्रीमहादनपुरे महता विस्तरेण महोत्सवेन श्रीजिनेश्वरमरिसुगु- रुप्रसादानिमिश्रेयसेऽस्तु । सुमेरौ निर्मरैरपि सपदि लग्मे तरुवरै- टुंगव्या दिव्यन्ते सलिलनिधौ चिन्तामणिगणैः । फलो काले वीक्ष्यानवधिमभितो याचगणं न तस्थौ केनापि स्थिरमभयचन्द्रस्तु विजयी । [७९] धैर्य ते स विलोकतामभय ! यः शैलेन्द्रधैर्योत्मना, गाम्भीर्य स तवेक्षतां जलनिधेर्गाम्भीर्यमिच्छुश्च यः। भक्ति देवगुरौ स पश्यतु तव श्रीश्रेणिकं यः स्तुते, यात्रां तीर्थपतेः स वेत्त भवतो यः स सांप्रती झीप्सति ॥ [८] सं०१३२८ वैशाख सुदि १४, श्रीजापालिपुरे सा० क्षेमसिहेन श्रीचन्द्रप्रभस्वामिमहाविग्यस्य, महं पूर्णसिंहेन श्रीऋषभदेवस्य, महं ब्रह्मदेवेन श्रीमहावीरनिग्यस्य प्रतिष्ठामहोत्सवः कारितः । ज्येष्ठ पदि ४, हेमप्रभा साध्वी कृता । सं० १३३० वैशारा यदि ६, प्रनोधमूत्तिंगणेाचनाचार्यपदम् , कल्याणऋद्धिगणिन्याः प्रार्तिनीपदम् । वैशाख पदि ८, श्रीस्वर्णगिरी श्रीचन्द्रप्रभखामिमहानिग्य शिसरमध्ये स्थापितम् । एवं प्रतिदिनचमत्कृतविश्वविश्वचित्तानि नैरानि सच्चरित्राणि कुर्वन्तः, श्रीमहावीरतीर्थराजतीर्थ अभावयन्तः, प्रोच्छल्द्व्यापल्लहरिरौद्रसंसारमहाम्भोधिमजजन्तुजातं निस्तारयन्तः, ममस्तप्राणिप्राज्यमनोराज्यमालाः कल्पद्रुवत्पूर- यन्तः, सवारचातुरीतजितदेवसरयः प्रभुश्रीजिनेश्वरसूरयो लोकोत्तरज्ञानसारभाण्डागाराः श्रीजागलिपुरस्थिताः स्वा- न्त्यसमयं ज्ञात्वा सर्वसंघममक्षं संक्षेपेण सहस्तेनानेक्गुणमणिपिपणि वा० प्रबोधर्तिगणिं १३३१ आश्विनकृष्ण- पञ्चम्या प्रातः स्वपदे समस्यापयत् । श्रीजिनप्रयोधसरिरिति नाम ददुः । श्रीमहादनपुरस्थितान् श्रीजिनरत्नाचार्यानव- मादिशश्च यच्चतुर्मास्यनन्तरे सर्वगळं समुदायं च मेलयित्वा युप्माभिः प्रधानलग्ने यथारिधि निस्तरेण धरिपदस्था- पना] कार्या। ततः श्रीपूज्यरनशनं प्रतिपन्नम् । तदनन्तर विशेषतः श्रीमत्पञ्चपरमेष्टिनमस्सारमन्त्रराज ध्यायन्तो- उनैका आराधना गुणयन्तः सर्वसन्यान् क्षमयन्तः शुभध्यानाग्रमारूढा आश्विनकृष्णपष्ठथा रानिप्रथमघाटकाद्वये गते श्रीपूज्याः स्वर्गाङ्गणविभूपणा बभूवुः । ततः प्रभाते समुदायेन सर्वराजलोकसहितेन स्थाने स्थाने प्रेक्षणीय संजायमाने नान्दीतूर्ये वाद्यमाने श्रीमत्पूज्य- संस्कारमहोत्सवः सर्वजनचमत्कारकः कृतः । तर च सर्वसमुदायसहितेन सा० क्षेममिहेन स्तूपः कारितः। ७०. . ७१, ततचतुर्मास्यनन्तर श्रीजिनरत्नाचार्याः श्रीजिनेश्वरमरिसुगुरूपदिष्टश्रीजिनप्रमोधमरिबिस्तरपदस्थापना चिकीर्षक: श्रीजावालिपुरे समागमन् । ततः सर्वदिक्समुदायमेलापके श्रीचन्द्रतिलकोपाध्याय श्रीतिलकोपाध्याय वा० पनदेनगणिप्रमुसानेरसाधुमेलापके च प्रतिदिनं दीनानाथदुःस्थितलक्ष्मीदानश्रीचतुर्निधसंघमत्कारविधानादिपु महो- सवेपु जगजनमनोमयूरताण्डवाडम्मराम्भोघरेपु भरिफ्लोरविधीयमानेषु, सं० १३३१ फागुन यदि ८ गौ, श्रीजिन- रलाचायः श्रीजिनप्रयोधसूरीणा पदस्थापना चक्रे । ततः श्रीनिनप्रयोधमरिमिः फाल्गुन मुदि ५, थिरकीति भुवन- कीर्तिमुनी केलप्रभा हर्पप्रभा जयप्रभा यशाप्रमामाच्यथ दीक्षिनाः ।

- युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। सं० १३३२ ज्येष्ठ वदि १, शुक्रे श्रीजावालिपुरे सर्वदेशसमुदायमेलापके महाविस्तरेण सा० क्षेमसिंहश्रावको- सेन नमि-विनमिपरिवृतश्रीयुगादिजिन-श्रीमहावीर-अवलोकनाशिखर-श्रीनेमिनायविम्वान् शोध-प्रद्युम्नमूर्योः श्रीजिनेश्वरमरिमूर्धनदयक्षमूर्ति-श्रीसुवर्णगिरि-श्रीचन्द्रप्रभस्वामि-बैजयन्त्याश्च प्रतिष्ठा कारिता । श्रीयोगिनीपुरवास्त- च्यदलिकहरुश्रावकेण श्रीनेमिनाथस्य, सा. हरिचन्द्रश्रावकेण श्रीशान्तिनाथस्य, अन्येपामपि प्रभूतविम्बानां प्रतिष्ठा जते । ज्येष्ठ वदि ६, श्रीसुवर्णगिरी श्रीचन्द्रप्रभस्वामिध्वजारोपः । ज्येष्ठ यदि ९, स्तूपे श्रीजिनेश्वरमरिमूतः स्थापना । तस्मिन्नेव दिने विमलप्रज्ञस्योपाध्यायपदम् , राजतिलकस्य च वाचनाचार्यपदम् । ज्येष्ठ सुदि ३, गच्छकीति-चारित्र- कीर्ति-क्षेमकीर्तिमुनयो लब्धिमाला-पुण्यमालासाव्यौ च दीक्षिताः। ७२. सं० १३३३ माघ यदि १३, श्रीजावालिपुरे कुशलश्रीगणिन्याः प्रवर्तिनीपदम् । अत्रैव संवत्सरे सा० वि. मलचन्द्रसुत सा० क्षेमसिंह-सा० चाहडविरचितेन मन्त्रिदेदासुतमन्त्रिमहणसिंहनियूटपच्छेवाणमाग्भारेण सा०क्षेमसिंह -सा चाहड-सा० हेमचन्द्र-श्रेष्ठिहरिपाल--योगिनीपुरवास्तव्य साजेणूसुत सा० पूर्णपाल-सौवर्णिकधान्धलसुतसा० भीम-मन्त्रिदेदापुत्रमन्त्रिमहणसिंहप्रमुखेन सर्वदिग्भवेन विधिसंघेन सह तद्गाढोपरोधेन श्रीशत्रुञ्जयादिमहातीर्थयात्राय श्रीजिनप्रबोधसूरिसुगुरुपु श्रीजिनरत्नाचार्यपु श्रीलक्ष्मीविलकोपाध्याय-श्रीविमलप्रज्ञोपाध्याय-वा० पद्मदेवगणि-वा० राजतिलकगणिप्रमुखसाधु २७ सेव्यमान चरणारविन्देपु, प्र. ज्ञानमालागणिनी-प्र०कुशलथी-प्र०कल्याणद्धिप्रभृ- तिसाध्वी २१ परिवृतेपु, चैन वदि ५ श्रीजावाल(लि)पुरात प्रस्थितेषु, स्थाने स्थाने श्रीविधिसंघसर्वजनमनश्चमत्कारका- रिणी विधिमार्गप्रभावनां विदधानेपु, श्रीश्रीमाले श्रीशान्तिनाथविधिचैत्ये द्रं० १४७४ विधिसंघेन सफलीकृताः। तथा श्रीमहादनपुरादिषु विस्तरेण चैत्यपरिपाटयादिना प्रभावनां विधाय, श्रीतारणतीर्थ सा० नीम्बर्दवसुत सा० हेमाकेन द्रं० ११७४ इन्द्रपदम् , इन्द्रपरिवारेण द्रं० २१०० ‘मन्व्यादिपदं गृहीतम् । कलशाद्यायपदे सर्वसंख्य- योद्देशतो ;० ५२७४ विधिसंघेन सफलिताः । तथा वीजापुरे श्रीवासुपूज्यविधिचैत्ये उद्देशतो,० सहस्र ४ मालादि- ग्रहणेन श्रीसमुदायेन कृतार्था विदधिरे । तथा श्रीस्तम्भनकमहातीर्थे गोष्ठिकक्षेमन्धरसुत गो० यशोधवलेन द्रं०११७४ इन्द्रपदम् । इन्द्रपरिवारेण द्रं० २४०० मन्त्र्यादिपदं गृहीतम् । कलशाद्यायपदे सर्वसंख्ययोद्देशतो ई० सहस्र ७ संघेन कृतार्थी चक्रिरे । तथा भृगुकच्छे नं० ४७०० समुदायेन स्थिरीकृताः। तथा श्रीशत्रुञ्जये श्रीयुगादिदेवचैत्ये योगिनीपुरवास्तव्य सा पूनपालेन दं० ३२०० इन्द्रपदम् , इन्द्रपरिया- रेण ट्रे० सहस्र ३ मन्यादिपदं जगृहे । श्रेष्ठिहरिपालेन ट्रं० ४२०० पाहधापदे । उद्देशतः कलशाधायपदे सांग्रेण द्रं० सहस्र २५ श्रीसंघेनाऽक्षया निर्ममिरे। तथा युगादिदेवपुरतः श्रीजिनप्रयोधसरिभिर्येष्ठ वदि ७ जीवानन्दसाधोः पुष्पमाला-यशोमाला धर्ममालालक्ष्मी- मालासाघीनां च दीक्षामहोत्सवो मालारोपणादिमहोत्सवच विस्तरेण विधिमार्गप्रभावनाय चक्रे । श्रीश्रयांमविधि- चैत्ये द्र०७०८, तथा उज्जयन्ते सा० मूलिगसुत सा० कुमारपालेन द्रं० ७५० इन्द्रपदम् , इन्द्रपरिवारेण २१५० मन्न्यादिपदम् । सा० हेमचन्द्रेण सामातराजूनिमित्त द्रं सहस्र -२ नेमिनाथमाला जगृहे । उद्देशतः कलशायायपदे सर्राग्रेण दै० सहस २३ श्रीसंघेन साधतीकृताः । एवं स्थाने स्थान प्राचनप्रोत्सर्पणाकारिप्रभावनाविधानतः सफलीकृतनिजजन्म-द्रव्य-कलामामध्यन मम्पूर्ण- मनोरथेन श्रीविधिसंघेन सह महातीर्थयात्रां विधाय मा० क्षेमसिंहन श्रीजावालिपुरे आपाट मुदि १४ श्रीदेवालयस्य श्रीजिनप्रयोधरिप्रमुराचतुर्विधसंघममन्धितस्य विधिमार्गप्रभावनया निर्विघ्नं निमापितः प्रवेशकमहोत्मयः । सम- स्तसंपप्रमोदायामायाचन्द्राम् ।

- खरतरगच्छालंकार . ७३. सं० १३३४ मार्ग सुदि १३, रत्नवृष्टिगणिन्याः प्रवर्तिनीपदम् । श्रीभीमपल्ल्यां वैशाख वदि ५,श्रीनेमि नाथ-श्रीपार्श्वनाथपिम्पयोः, श्रीजिनदत्तमूरिमृत्तः, श्रीशान्तिनाथदेवगृहध्वजादण्डस्य च सा राजदेवेन, श्रीगौतमस्खा- मिमूतः सा० ययजलेन, प्रतिष्ठामहोत्सवः सर्वसमुदायमेलकैन महामहोत्सवेन कारितः । वैशाख यदि ९ मङ्गलकल- शसाधोर्दीक्षा । ज्येष्ठ सुदि २, याहडमेरौ बिहारः। सं० १३३५ मार्ग० यदि ४, पद्मकीर्ति-सुधाकलश-तिलककीति- लक्ष्मीकलश-नेमिप्रभ-हेमतिलक-नेमितिलकसाधूनां विस्तरेण दीक्षा । ७४. पोप सुदि ९, श्रीचित्रकूटे बिहारः। तस्मिंश्च दिने सौवर्णिकधान्धल तत्पुत्र भा० याहडश्रावकाभ्यां सकल- 'राजलोकसकलनागरिकलोके......सविस्तरः प्रवेशकमहोत्सवः कारितः । फाल्गुन यदि ५, श्रीसमरसिंहमहाराजरामराज्ये प्रत्यासन्ननगरग्रामसमुदायमेलापके समस्तब्रह्मलोक-जटाधर-राजपुत्र-प्रधानक्षेत्रसिंह-कर्णराजप्रमुखराजलोकनागरि- कलोकेषु मध्येभूय महोत्सवं कुर्याणेषु सर्वदेवगृहसत्केपु एकादशसु मेघाडम्बर-छत्रेषु जनितशोभातिशयेषु स्थाने स्थाने व्याप्तदिगन्तेषु समुच्छलवादशविधनान्दीनिनादेषु सम्पूर्णविश्वमनोरथविताने यथेच्छं प्रवर्तमाने दाने जग- न्मनश्चमत्कारकारिजलयात्रापूर्व चतुरशीतौ श्रीमुनिसुव्रतस्वामि-युगादिदेव-अजितनाथ-बासुपूज्यविम्वानाम् ,श्रीमहा- वीरसमवसरणस्य, सा० धनचन्द्रसुत मा० समुद्धारकारित श्रीपू(स )र्णगिरिधीशान्तिनाथविधिचैत्यसंस्थित्तश्रीशान्ति- नाथपित्तलामयसमवसरणस, अन्यामां बहूनां प्रतिमानां शाम्पमूर्ति-दण्डाष्टकस्य च विधिमार्गजयजयारकारका स. विस्तरं प्रतिष्ठामहोत्सवः संजातः । तसिन्नेव दिने चतुरशीनी श्रीयुगादिदेव-श्रीनेमिनाथयोः स्थापना । फाल्गुन मुदि ५ चतुरशीती श्रीयुगादिदेव-श्रीनमिनाथ-धीपार्श्वनाथानां शाम्ब-प्रद्युम्नमुन्योरम्बिकायाश्च प्रासादेषु चपा(वारहट्टी अम्बिकायाश्च वजारोपमहोत्सयः सकलराज्यधुराधरणधौरेयराजपुत्रश्रीअरसिंहमानिध्यात् तीर्थप्रोत्सर्पणाकारी सम्पन्नः । एते च सर्वे महामहोत्सवाः सौषणिकधान्धल-तपुत्ररन्नमा० बाहडाम्यां सकलसमुदायमहिताम्यां प्रभूत- स्वखापतेयसफलीकरणेन कारिताः। बद्रदहाग्रामे श्रीजिनदत्तमूरिप्रतिष्ठित श्रीपार्थनाथविधिचत्य मा० आहाकेन महण-झाझगादिपुत्रसहितेन कृत- नवोद्धारे चित्रकूटे प्रतिष्ठितस्य दण्डस्य, फाल्गुन मुदि १४, विस्तरेणाध्यारोपः संजातः । आहेडाग्रामे चा गदि १३, सम्यक्त्वारोपादिनन्दिमहोत्सवः सा० सोमलारण सा० कुमाप्रभृनिम्याटुम्बमहितेन मविस्मरः कारितः। पर- डियास्याने, वैशास यदि ६, श्रीपुण्डरीक-लस्वामि-अधुनमुनि-जिनसहभारि-जिनदारि-निनवपरि- मृतीनां सरस्सत्याच मविस्तरजलयात्रापूर्व वितरण निर्विघ्नं प्रतिष्ठामदोन्मयः, गाय यदि७, मोहविजय-निवाड- भयोर्दीक्षा, हेमप्रभगणेचिनाचार्यपदं च संपन्नानि । ७५. सं० १३३६ ज्येष्ठमुदि ९ श्रीमत्पूज्ययुगप्रधान श्रीआर्यनक्षतरित्रं संस्मरशिः मपितुः माधुधीचन्द्रम्य प्रान्त्यसमयं विनाय श्रीचित्रकूटान्महता वेगेन श्रीमहादनपुरे ममागन्य नद्राग्याष्टदेवपत्तनीयाद्यनककोमलसंघमहा- मेलापन दीनानाथमनोमनोरयान् पूग्यनः सप्तक्षेत्र्यां स्वं स्वं मफलीकुर्वनः, प्रभृनयगुदानप्रदानेन द्वादपियनान्दीनि- नादवाद विवादयतः, अनवरत शुद्धशीलालझारधारकम्प, पुण्यरागागरागमुग्मीकनारम्य, नानाविधम्बाप्पायरमना- म्यूलेन मुभगस्प, सा० श्रीचन्द्रपरमधावफस्य संयमश्रीः प्रदना। तेन च पुण्यामना प्रकटितपुगेनिमोमदेचचरिण प्रतिक्षणं वर्धमानसंवेगरसेन उच्चण्डव्यारला (१)कग्वालजालोरममपुम्पयनां दुष्माएं प्र प्राप्य मतदामिनप्रदागिन- दलिनसप्तदशाविधासंयममहामुभटेन निरतिचारप्रतिपालिकृतप्रान्रयान्याग्यानेन हननवनवागवनामृतपानन अपू. चारित्रेण जगप्रयचित्रायना स्तम्भनीधीयाचनेकमंधानां बन्दासमव्यजनान्दान बल्लामादमौवर्णकलीन महा- मुनिना श्रीकलगेन श्रीपशपरमेष्टिमहामश्रपरमध्याने सोपानग्यारोहण मागहम्याहगमलयर। .

युगप्रधानाचार्यगुर्वाचली। ७६. सं० १३३७ वैशाख वदि ९ श्रीमजिनप्रयोधरिसुगुरुभिः श्रीसकलगूर्जरत्रापुरवरं श्रीबीजापुर खचरणवि- चरणैः पावनीचक्रे । तस्मिंश्च सुवासरे सा० मोहन-श्रेष्ठिआसपालप्रमुखसमस्तसमुदायेन मत्रिविन्ध्यादित्य-ठ उदयदेव- मा० लक्ष्मीधरप्रमुखराज्यधुरन्धरसकलनागरिकमहाजनमेलापकैन व्याप्तरोदसीरन्धेषु विविधजनजनितानन्देपु,द्वादशवि- धनान्दीनिनादेपु जृम्ममाणेषु नानाविधविलासिनीजनबारेण थाने स्थाने प्रवरप्रेक्षणीयकेषु क्रियमाणेषु, उदात्तखरेण दानावजितभट्टलोकादिपु पठत्सु सत्सु, उत्तमदेशनानिनादानन्दितैर्मत्रिविन्ध्यादित्य ठक्कुरोदयदेवप्रमुखराजपुरुपकुखरैः संस्तूयमानानां धृतश्वेतातपत्रजिनेश्वरानुगानां सकलनगरमध्ये देवाधिदेवान् नमस्कुर्वाणानां श्रीमत्पूज्यानां महामि- ध्यालोत्कटतयाऽदृष्टपूर्यत्वात् सकलपौरपुरन्ध्रीजनमनाक्षोभावहो नानाविधयाचकजनानां मनोमिलापपूरको विविधभ- व्यप्राणिमनोहारको लीलयैव निर्दलितविनैः(मः?) लोकोत्तरः प्रभूतस्वखापतेयसफलीकरणेन सरङ्गः प्रवेशकमहामहो- सवः कारितः। ७७. तथा ज्येष्ठ वदि ४ शुक्र, श्रीसारङ्गादेवमहाराजाधिराजरामराज्ये विजयमाने महामात्यमल्लदेवप्रतिशरीर- मं०विष्यादित्ये शास्तरि सकलपृथ्वीतलसारश्रीगूर्जरत्रावनितानानापुरालङ्कारकिरीटायमानश्रीवीजापुरस्य माणिक्यभूते श्रीवासुपूज्यविधिचैत्यै अहमहमिकया नानाविधदेशसमायातमहद्धिकसंघमहामेलापकेषु, याचमानजनेन वाद्यमानदी- प्रनान्दीनिनादविवादग्नारब्धकोलाहलपरिपूर्यमाणेपु दिगङ्गनाकर्णकोटरेपु, हर्षाङ्करपूरपूरितमनोमङ्गलपाठकजनपठ्यमा- नविरुदावलीपर सहस्रेषु, स्थाने स्थाने प्रमुदितजनेन दीयमानेषु प्रधानरासकेपु, नानाविपणिमागेषु गीयमानेषु विवि- धप्रवरचचरीश्रेणिशतेषु, मथितमहामिथ्यात्वावलमहामोहादिसुभटेपु जिनशासनमहाराजशास्त्रेषु, छात्रयचामरालम्बा- दिपु अग्रतो ध्रियमाणेषु, पुरोवत्तिमहामत्रिविन्ध्यादित्य-ठ०उदयदेवप्रमुखराज्यधुरन्धरैर्महामहोत्सवेपु स्वयं कार्यमा- णेषु, कौतुकाक्षिप्त विविधपौरजनसमाजैः स्थगितनानाप्रकारनिगमगृहभित्तिमालाट्टालदेवकुलवितानेषु. सकलावनीतल- चमत्कारकारी भव्यलोकजनमनोहारी अभूतपूर्वो जलानयनमहोत्सवः सरङ्गः सम्पन्नः । द्वितीयदिने तथैव महामहो- त्सवेषु संजायमानेपु, अवारितशत्रेषु क्रियमाणेपु, अमारिघोषणायां प्रवर्तमानायां चतुर्विंशतिश्रीजिनालयविम्यानां ध्वजदण्डानां च, जोयलानिमित्तं श्रीपार्श्वनाथस्स, अन्येषां प्रभूतविम्बानां भूयिष्ठप्रतिमानां च, श्रीवृत्तप्रयोध-धीप- जिकाप्रबोध-श्रीचौद्धाधिकार विवरणादिश्रीमत्पूज्योपजसुग्रन्थदर्शनोदितचित्तेन तुरमपदचिन्तितसमसाऽनुलोमप्रतिलो- माधनेकमङ्गिकथितश्लोककथनाधनेकावधानप्रतिपादनचञ्चुना कृष्णपण्डितेन क्षणे प्रतिदिनमनेकपण्डितगोप्ट्या मत्रिविन्ध्यादित्यादिसमासु च नानावृत्तः पवित्रः संस्तूयमानश्रीमत्पूज्यनिष्प्रतिमध्यानाधिरोहप्ररोहशतकोटिको टिना निर्दलितकलिकालानुभावकिञ्चिदुस्थितप्रत्यूहसमूहशैलो विधिमार्गजयजयारवपूर्वकः सरङ्गः सप्रभावः प्रतिष्ठामहो- त्सवः समजनिष्ट । एते सर्वेऽपि महोत्सवाः सा मोहण श्रेष्ठिआसपालप्रभृतिसकलसंपलासंख्यसकीयासारसंसारसारस. फलीकरणेन कारिताः । अस्मिन् महसि श्रीवासुपूज्यविधिचत्ये ई० सहस्र ३० उत्पन्नाः। द्वादश्यामानन्दमूर्ति- पुण्यमूर्तिमुन्योर्दीक्षादानमहोत्सवः सम्पन्नः । ७८. सं०१३३९ फाल्गुन सुदि ५,मत्रिपूर्णसिंह-भां० राजा-मो० जिसहड-देवसीह-मोहाप्रमुखश्रीजावालिपुरीयसर्व- संपेन श्रीमहादनपुरीय-श्रीबीजापुरीय-श्रीश्रीमालपुरीय-रामशयनीय-श्रीशम्यानयनीय-श्रीवाग्भटमेवीय-श्रीरन- पुरीयानेकनगरनामशकटपञ्चशतीमेलापकैरनपैः सर्वविधिमार्गसंघः सह प्रस्थाय श्रीजिनग्नाचार्य-देवाचार्य-याचना- चार्यविवेकसमुद्रगणिप्रमुसमानामुनिमतष्ठिकोदनिकरविराजमानः, उच्छेदयद्भिः मकलानि तमःपटलानि, विकाश- यद्भिः समस्तजनतावदनकुमुदकाननानि, पुर्वद्भिर्याक्यमुघावृष्टया परमनिविलक्ष्मी समस्तजननयनचकोरनिकरस्य, युगप्रधानश्रीजिनप्रयोधसरिमुगुरुराजपादः पाविश्यमाजा, प्रतिपुरं प्रतिग्रामं विधिमार्गजयजयाकारकारिणं स्वकीयं विभयं सफलयता फाल्गुनचतुर्मासके सर्वविश्वसारे सकलवसुधातलयतिरामणीयकाधार श्रीअयुंदगिरीन्द्रवर श्रीयु- .

५८ सरतरगच्छालंकार गादिदेव-श्रीनेमिनाथतीर्थचरिणी नमश्चक्राते । ततो विस्मृतगृहमारमारेण हरिपूरितारीरेण समस्तथीसंपेन सर्वखापतेयसारपुण्यानुवन्धिपुण्यसारोपार्जनया त्रैलोक्योपरि स्वं मन्यमानेन श्रीइन्द्रपदादिभिः सर्वमहोभिः मुदिनप्प- एमु दिनेषु घुम्नस्योद्देशनः सप्त सहस्राणि सफलीचक्रिरे । तदनन्तरं श्रीमत्पूज्यप्रसादात् सफलीकृतनिजजन्मभवो दलितदुर्गतिसंभवः सम्पूर्णासर्वसर्वमनोरथः श्रीजापालिपुरे सम्पन्नमहाप्रवेशकमहोत्मनः क्षेमेण सोऽपि संघः प्राविशत । ७९. तम्मिनेर वत्सरे ज्येष्ठ वदि ४, जगचन्द्रमुनिः कुमुदलक्ष्मी भुग्नलक्ष्मीमाव्यौ च दीक्षिताः । पञ्चम्यां चन्द- नसुन्दरीगणिन्या महत्तरापदं प्रदनं तस्साच श्रीचन्दन श्रीरिति नाम जज्ञे । ततः संमुसीनायातश्रीमोममहाराजाभ्यर्थ- नया श्रीशम्यानयने चतुर्मासी विधाय, अतुलपलक्षोणिपालमालामौलिमाणिक्यकिरणकदमपानीयपूरप्लुतचरणकमला- नां सम्पादितभव्यभव्यलोकनिरुपमसम्यक्त्यामलानां सकलसन्यपरिवारपरिकलितसंमुसायातप्रमुदितश्रीकर्णमहानरे- न्द्राणां श्रीजिनप्रनोधमरिमुनीन्द्राणां श्रीजैसलमेरौ सं०१३४० फाल्गुनचतुर्मासके महता पिस्तरेण प्रवेशकमहोत्सनः समपनीपद्यत। तर च वैशासमुदिअक्षततृतीयादिने श्रीउच्चापुरीय-श्रीविक्रमपुरीय-श्रीजागलिपुरीयाद्यनेमसंघमेलापफेन सर्व- समुदायसहिताम्यां साम्नेमिकुमार-सा गणदेवाभ्यां महर्दा कृतसर्वमहोत्सवाभ्यां चतुर्विंशतिजिनालयसाष्टापदा- देव निम्नानां घजदण्डाना च गरिष्ठप्रतिष्ठामहोत्सवः कारितः सर्वमहोत्सवः । श्रीदेवगृहायपदे ,सहस्र ६ समु- स्पन्नाः । ज्येष्ठ वदि ४, मेरुकलशमुनि धर्मकलशमुनि-लब्धिकलशमुनीनां पुण्यसुन्दरी-लसुन्दरी-भुननसुन्दरी-हर्पसु- न्दरीसाध्वीनां दीक्षामहोत्सर उत्पेदे। श्रीवर्णदेवमहाराजोपरोधेन चतुर्मासी तरैर विधाय नानाविधधर्मदेशनया सकलनगरलोफस्स चित्तेपु चमत्कारमुत्पाद्य श्रीविक्रमपुरसमुदायगाढाभ्यर्थनया युगप्रधानश्रीजिनदत्तमरिसंस्थापितं मरु- स्थलीकल्पद्रुमं श्रीमहावीरवरतीर्थ महता विस्तरेण श्रीविक्रमपुरे प्रविश्य जिनप्रनोधसूरयो वन्दितवन्तः । तत्र श्रीउच्चा- पुरीप-श्रीमरुकोट्टीयप्रभृतिनानासमुदायमेलके श्रीमहावीरनिधित्ये महता विस्तरेण सम्पत्यारोप-मालारोपण-दीक्षा- दानादिमहानन्दिमहोत्सवः सं०१३४१ फाल्गुनकृष्णकादश्यां श्रीजिनप्रमोधसूरिमिश्चक्रे । तत्र च नन्दिमहोत्सवै विन- यसुन्दर-सोमसुन्दर-लब्धिसुन्दर-चन्द्रमूत्ति-मेघसुन्दरनामानः क्षुल्लकाः पञ्च, धर्मप्रभा-देवप्रभाख्ये क्षुल्लिके द्वे च संजाते। ताच श्रीमहावीरतीर्थ प्रभाश्यतां ज्ञानध्यानयलेन समस्तजनमनःस्वार्थर्यमुत्पादयतां खपक्ष-परपक्षाराध्य- मानचरणानां पवित्रचरणानां श्रीपूज्यानां महान् दाहज्वरः संजातः । ततो ध्यानवलेन वायुःपरिमाणं स्वल्पं सम्यक् परिज्ञायानिच्छिन्नप्रयाणैः श्रीपूज्याः श्रीजागालिपुरे समायाताः । तत्र च सफललोकचमत्कारकारिणि श्रीनर्धमान- स्वामिनो महातीर्थे वाद्यमानेषु द्वादशविधनान्दीतूर्येषु, गीयमानेषु प्रपरगीतेषु, दीयमानेषु धरलेषु, नृत्यमानामु प्रवर- पुराङ्गनासु, वितीर्यमाणेपु दीनानाथदु स्थिताना महादानेपु, मिलितेपु नानापुरग्रामसंघेषु, नानाविधायदातानुकृतपू- सरिभिः श्रीजिनप्रयोधसरिभिः, सद्रूपलक्ष्मीतजितकलाकेलयः समस्तभव्याम्युजप्रकाशनहेलयो नानागुणरत्ननिधयः प्रवरगभीरिमाधरीकृतवार्धयः श्रीजिनचन्द्रसूरयः सं० १३४१ श्रीयुगादिदेवपारणकपपितितायां वैशासशुक्लाक्षततृती- यायां स्वपदे महाविस्तरेण स्थापिताः । तस्मिन्नेव दिने राजशेखरगणेचिनाचार्यपदं प्रदत्तम् । ततथाटम्यां श्रीम- त्पूज्यैः सकलसंघेन सह विस्तरेण मिथ्यादुष्कृतं दत्तम् । ततश्च दिने दिने वर्धमानशुभभारादिज्ञातसांसारिकमारा- नित्यवभागाः सुमाधुभिर्निरन्तर श्राव्यमाणसमाराधनाः सम्यग्निहितश्रीदेवगुरुपादपद्माराधनाः सज्वानलक्ष्मीकण्ठ- कन्दलहाराः खपदनकमलोचारितपञ्चपरमेष्टिनमस्काराः कीधिलिवक्षोगयः श्रीजिनप्रयोधरयो राधशुल कादश्यां स्वर्गाङ्गणभूपणा यभूयुः।

५९ युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। '८०.तदनन्तरं सं०१३४२ वैशाखशुक्लदशम्या,श्रीजावालिपुरे श्रीमहावीरविधिचैत्ये श्रीजिनचन्द्रमरिभिर्महामहोत्सवेन प्रीतिचन्द्र-सुखकीर्तिनामकं क्षुल्लकद्वयं जयमञ्जरी-रत्नमञ्जरी-शीलमजरीनामकं क्षुल्लिकात्रयं च विहितम् । तसिन्नेय दिने वाचनाचार्यमिश्राणां विवेकसमुद्रगणीनामभिषेकपदम्,सर्वराजगणेर्याचनाचार्यपदम्,युद्धिसमृद्धिगणिन्याश्च प्रवत्ति- नीपदं च प्रदत्तम् । सप्तम्यां च सम्यवारोप-मालारोपण-सामापिकारोप-साधुसाध्वीउत्थापनानन्दिमहोत्सवयके । तथा ज्येष्ठकृष्णनवम्यां साधुराजक्षेमसिंहेन कारितस्य रत्नमयस्य श्रीअजितखामिविम्यस्य सप्तविंशत्यगुलप्रमाणस्य तेनय कारितानां श्रीयुगादिदेव-श्रीनेमिनाथ-श्रीपार्श्वनाथविम्यानां च, महामं० देदाकारितश्रीयुगादिदेव-श्री- नेमिनाथ-श्रीपार्धनाथविम्यानाम् , भाण्डागारिकछाहडकारितस्य श्रीशान्तिनाथविम्बस्य महत्तमस्य, वैद्यदेहडिकारि- ताप्टापदध्वजादण्डस्य, अन्येषां च बहूनां विम्यानां महता विस्तरेण श्रीसामन्तसिंहविजयराज्ये सकललोकमनश्चम- कारी निःशेपपापहारी श्रीजिनचन्द्रसूरिभिः प्रतिष्ठामहोत्सवो विहितः । अस्मिन् प्रतिष्ठामहोत्सवे विशेषतोऽतिप्रसन्न- श्रीसामन्तसिंहमहाराजसान्निध्येन सकलखपक्ष-परपक्षाहादकः सकलविधिमार्गप्रोत्सर्पणामुत्पादकः प्रभूततरद्रव्यस- फीकरणेन सा० क्षेमसिंहप्रमुखसमस्तश्रावकविधिमार्गप्रभावकः प्रमोदभरमेदुरैः सद्भावनापन्धुरः श्रीइन्द्रमहोत्सवः फारितः । ज्येष्ठकृष्णकादश्यां च वाल्देवमूर्तिगणेः श्रीअभिपेकपदं मालारोपणादिनन्दिमहोत्सपश्च संजातः । सं० १३४४ श्रीजावालिपुर श्रीमहावीरविधिचत्ये मार्गशीर्ष सुदि १०, सा० कुमारपाल पु०पं० स्थिरकीजिंगपोः श्रीजिनचन्द्ररारिभिविस्तरेण आचार्यपदं दचम्-श्रीदिवाकराचार्या इति नाम । सं० १३४५ आपाढ मुदि ३, मतिचन्द्र-धर्मकीयोंीक्षा । वैशाख वदि १, पुण्यतिलक-भुवनतिलकयोधारित्रल- क्ष्मीसाध्च्याच दीक्षा | राजदर्शनगणेर्याचनाचार्यपदं च । सं० १३४६ माघ यदि १, सा० क्षेमसिंहभा०(भ्रा०? ) बाहडकारितवर्णगिरि[स्थ] श्रीचन्द्रप्रभखामिदेवगृहपार्श्व- स्थितयोः श्रीयुगादिदेव-श्रीनेमिनाथपिम्पयोर्मण्डपसातकेषु च समेतशिखरविंशतिपिम्नानां च स्थापनामहोत्मयः । फाल्गुन सुदि ८, सा० पाहड-भा० भीमा-भां० जगनिह-भां० सेतसिंहमुश्रावककारित प्रासाद श्रीशम्यानपने चाहट (राह ?) मानाहयवंशे श्रीसोमेश्वरमहाराजकारितविस्तरप्रवेशमहोत्सवस्य श्रीशान्तिनाथदेवस विस्तरेण म्याप- नामदोरमवः देययाहम-चारिणतिलक-पुशलकीर्तिसाधूनां रत्नश्रीसाधण्याच दीक्षा | मालारोपणादिमहोत्सवय । चत्र सुदि १, श्रीप्रसादनपुरे सर्वत्र आहट्टोधितपताकोत्तरे निःस्खानेपु वायमानेषु मं० माधवप्रमुससकलनगरलोकसं मुगा- गमनपूर्व सा० अमपचन्द्रप्रमुरासमुदायेन प्रवेशमहोत्मयः कारितः । वेगास यदि १४, श्रीभीमपालयां श्रीप्रसादनपुर- पत्प्रयामहोन्मयः । यमास मुदि७, मा० अभपचन्द्रकारिताछुतगिलमयश्रीयुगादिदेवपिम्प-धीचापिंशतिजिनालप- पकिंगनिपिग्य-इन्द्रध्वज-श्रीअनन्तनाथदण्डधज-श्रीजिनप्रयोधरिस्तूप-मृत्ति-दष्टयजानेकशिलमयपित्तलामय- विमानां विस्तरेण प्रतिष्ठामहोत्सवय । ज्येष्ठ यदि ७, नाचन्द्र-राजचन्द्र-मुनिचन्द्र-पुष्यचन्द्रमाधूनां मुक्तिलक्ष्मी- मुक्तिश्रीमाप्न्योय महाप्रभावनापूर्व दीक्षा छ । सं० १३४७ मार्गशीर्ष मुदि ६, श्रीप्रसादनपुरे मुमनिकी निदीक्षा, नाचन्द्रादिमाधुमाधीनामुपम्यापना-मानागेप- पादिमदोन्मा। ततो मार्गमीपं मुदि १४, गदिगढकायां पाने माने ननिकातोग्णानालापां में महापुर में रामपारेन मनमराजनपरिग्रहयामणादिमेलापन प्रवेनमहोमरः काग्निः । मं० महापालेन गमनगंपलान भीगारमनीधांनाभीमतिनायामिनीपापा कालिा।पौर यदि ५, धीजापुप मा जगमगिह- भाग- पानभागमादान गदिगउमारप्रयेगमहोगाः कारितः। श्रीनारानिपुरे श्रीजिनमोपरिगना मनिभानामो- रमरो पापमयमाप मुदि ११ मा. अमरपन्द्रन पारित गंग पदिधानापुरे अमान-पर- परतरगच्चारकार रत्न-विजयरत्नमाधो मुक्तिचन्द्रिका साधी प स्तम्मतीर्थ-आशापल्ली-पागड पटपद्रकादिसंघमेलापन मिस्तरेग दीक्षिता, मालारोप-परिग्रहपरिमाणादिनन्दिमहोत्सरच संजातः । सं० १३४८ वैशाम मुदि ३,श्रीमहादनपुरे वीरशेखरस्य अमृतश्रीमाध्च्याच दीक्षा, निदशकीजिंगणेचिनाचार्य- पदम् । तस्मिन्नेर य श्रीपूज्यैः सुधारलश-मुनिरालमसाधुपरितर्गणियोगतपश्चक्रे । सं० १३४९ भाद्रपद यदि ८, साधर्मिस्मनाकारस्य संघपुरुषस सा०अभयचन्द्रसुधारकस्य संस्तारकदीक्षा, अभय- शेसर इति नाम । मार्गशीर्ष बदि २, यश-कीर्तिदीक्षा । सं० १३५० पैशास मुदि ९, करहेटक-अर्बुदादिविहितमविस्तरतीर्थयात्रामफलीकृतजन्मीरितस्य वरडियानगर- सर्वाधिकारिणो नालक्षालोचमस्य भा० झांझणसुश्रावकरस सफलस्वपक्ष-परपक्षचमत्कारकारिणी संस्तारकदीक्षा, नरतिलपराजपिरिति नाम । सं० १३५१ माधवदि १.श्रीप्रहादनपुरे श्रीयुगादिदेवनिधिचत्ये मं० तिहुणसत्कश्रीयुगादिदेव-श्रेष्ठिपीजासत्क- श्रीमहागीरनिम्पप्रमुसाद्भुतनिम्नानां चत्वारिशदधिकपदशतीप्रमाणानां महं० तिहुण-श्रे० वीजामुश्राकाम्यां समुदा- यसहिताभ्यां विस्तरेण प्रतिष्ठामहामहोत्सवः कारितः। पञ्चम्या श्रीपूज्यानामनेऊमाधुमाध्वीश्रानफवारिकापरिवृताना मालारोपमहामहोत्सनन्दिः,विश्वकीतिमाधोहेमलक्ष्मीमाव्याश्च दीक्षा 1 ८००(१) ८१.सं०१३५. जिनचन्द्रमरिगुरूपदेशेन वा० राजशेखरगणिः सुबुद्धिराजगणि-हेमतिलकगणि-पुण्यकीर्तिगणि- रत्नमुन्दरमुनिसहितः श्रीवृहद्रामे निहतवान् । ततश्च तत्रत्यठ० रत्नपाल-सा० चाहडप्रधानधारकमेपिताभ्यां सभ्रात- हेमराज-भागिनेययांचूधारकाम्यां सपरिवाराभ्यां सा० बोहिथपुत्रेण सा० मूलदेवश्रामकैण श्रीकौशाम्बी-पाणारसी-- काक्रिन्दी-राजगृह-पागपुरी-नारिन्दा-क्षत्रियकुण्डग्राम-अयोध्या-रत्नपुरादिनगरेपु जिनजन्मादिपविनितेषु तीर्थया- त्रा कृता । तैः श्राः साधं समुदायसहितपूर्वनिहितहस्तिनागपुरयात्रेणया राजशेखरगणिना सपरिवारेणैतानि तीर्थानि वन्दितानि । राजगृहमगीप उडविहारे चतुर्मासी कृता, मालारोपणादिनन्दिमहोत्सयश्च कृतः । तथा तव वर्षे नाना- द्भुतपुण्यमल्लीश्रीश्रीभीमपल्लीतः सा० धनपालमुश्रावकमत्पुत्र सा० भडसीह-सा० सामलधारककृतसंघेन श्रीप्रह्लादन- पुरीय-भीमपल्लीय-श्रीपत्तनीय-सत्यपुरीयाद्यनेकवपक्ष-परपक्षमेलापकेन च साधं प्रस्थाय वाश्चातुरीपराभूतगी - णोपाध्याय-श्रीनिवेकममुद्रोपाध्यायनमुरासुमाधुमण्डलीपरिय॒तैर्जगत्पूज्यैः श्रीमत्पूज्यैः श्रीशङ्गेश्वरपुरालङ्कारचूडामणि- श्चिन्तातीतबमुसम्पादनापहस्तितचिन्तामणिः ससारदुःसदाराग्निपाथः श्रीपार्श्वनाथः प्रणतः। तत्र च श्रीसपन स्नान- पूजाउद्यापनक घजारोपादिमहोत्सवा पिहिताः। ततः सर्वसघसमन्विताः श्रीमत्पूज्याः श्रीपत्तने समाजग्मुः । तत्र च श्रीशान्तिनाथविधिचत्ये सविस्तरध्वजारोपादिमहोत्सवपूर्वकनानाविधवाद्यमाननान्दीतूर्यमार्तमानाङ्गनाचगनृत्येषु सक- लपत्तनमध्यस्थसमस्तचैत्येपु विस्तरेण चैत्यपरिपाटी विधाय, श्रीपूज्याः श्रीभीमपल्ल्या समायाताः। पश्चान्छीवीजा- पुरीयसमुदायाम्पर्थनया वीजापुरे चतुर्मासी कृता। तत्र च सं० १३५ [३१] मार्गशीर्षकृष्णपश्चम्या श्रीवासुपूज्यपि- धिचत्ये मुनिसिह-तपःसिह-जयसिंहसाघमो दीक्षिताः, मालारोपणादिनन्दिमहोत्सपथ संजातः । ततः श्रीजावालिपुरे तत्समुदायाम्पर्थनया विहारः । तस्मिन्नेर संवत्सरे सा० सलराणश्रामपुत्ररत्न सा० सीहा आपक-माण्डव्यपुरीय सा० झाझणसत्पुनसा० मोहनधारकाभ्यां निर्मितसंघेन श्रीजावालिपुरीय-श्रीशम्पानयनीय- श्रीजेसलमेरवीय-श्रीनागपुरीय-रुणापुरीय-श्रीमालीय-सत्यपुरीय-प्रहादनपुरीय-भीमपल्लीपाद्यनेमद्धिक-श्रीमा लज्ञातिमण्डनश्रीयोगिनीपुरवास्तव्य सा पाहामुश्रारकपुन सा० लोहदेवप्रमुसप्रभूतधारकमेलापानिभूषितेन मार्गानव- रतविरचितावारितसरचैत्यपरिपाट्यनेकमहामहोत्सवेन श्रीजारालिपुराद् वैशासकृष्णपञ्चम्पा प्रस्थाय, प्रभूतमुनिमण्ड-/ युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। लीसंसेव्यमानः श्रीचतुर्विधश्रीश्रमणसंवस्तूपमानैर्जगत्पूज्यैः श्रीमत्पूज्य श्री अदालङ्कारकारिणौ समस्त दौर्गत्यविदारिणी श्रीयुगादिदेव-श्रीनेमिनाथ जिनेश्वरी नमस्कृतौ । ततोऽपहस्तितकलिकालमहाचौरेण महादानपराभूतदेवतरुवरेग परम- चासनाक्षालितानेकभवसहस्रसंचितदुप्पापौधेन श्रीसमस्तविधिमार्गसंघेन श्रीइन्द्रपद-स्नान-धजारोपादिमहोत्सबरुदेशतो द्रम्म द्वादश सहस्राणि कृतार्थीकतानि । तदनन्तरं हाकुरपूरितः खसुकतमहाराजपूजितः सदानधः श्रीविधिमार्गसंघः क्षेमेण श्रीजायालिपुरे विस्तरेण प्रविष्टः । सं० १३५४ ज्येष्ठ यदि १०, श्रीजापालिपुरे श्रीमहावीरविधिचैत्ये सा० सलखगपुत्र सा० सीहाकारितो दीक्षा-मा- लारोपणादिमहोत्सवः संजातः । तस्मिन्महसि वीरचन्द्र-उदयचन्द्र-अमृतचन्द्रसाधूनां जयसुन्दरीसाध्ब्याथ दीक्षादा- नोत्सवः सम्पन्नः । तस्मिन्ना बत्सर आपाठशुक्ल द्वितीयायां सिरियाणकग्रामे श्रीमहावीरप्रासादोद्धार-श्रीमहावीरविम्य- स्थापना श्रे०भाडाश्रावकपुत्रेण श्रेजोधाश्रावकेण महाविस्तरेण कारिता । सं० १३५५ । सं० १३५६ राजाधिराजश्रीजैत्रसिंहविजया मार्गशीर्षासितचतुर्थ्यां श्रीजेसलमेरो श्रीपूज्याः समायाताः। तत्र च श्रीमहाराजजेत्रसिंहन योजनद्वयसंमुसागमनेन बहुमानपूर्वकं सा० नेमिकुमारप्रमुससमस्त समुदायेन च प्रभूतद्रव्य- चेचनेन विधिमार्गप्रभावनापूर्वकं निःखानादितूर्येषु याद्यमानेपु, पठत्सु चन्दियन्दपु, स्थाने साने संजायमाननपन- मनाप्रहादकारिप्रेक्षणीयकेषु, श्रावकश्राविकाभिविस्तार्यमाणेपु रास-गीत-धवलमङ्गलेषु, स्वपक्ष परपक्षवेतचमत्कार- कारी श्रीपूज्यानां प्रवेशकमहोत्सवः संजातः । सं० १३५७ मार्गशीर्षशुलनवम्यां श्रीमहाराजजत्रसिंहप्रेपितनिःस्वानादिपु वाद्यमानेषु दीक्षा-मालारोपणादि- महामहोत्सवः संजातः । तत्र ०लसम-भांगजपुत्रौ जयहम-पद्महंमनामानौ दीक्षितौ । सं० १३५८ माघशुक्लदशम्यां श्रीपार्थनाथविधिचत्ये महाविस्तरेण निःखानादिपु वाद्यमानेषु श्रीसमेतशिवरादि- चिम्पानां प्रतिष्ठामहोत्सवः श्रीमत्पूज्पैः कृतः। सा० केशरपुत्रेण सा० तोलीधारकैग कारापितः, फाल्गुनगुष्ठापचयां मालारोपण-मम्यत्यारोपादिमहोत्सवश्व सम्पन्नः । ततः सं० १३५९ फाल्गुन यदि ११, श्रीयाहटमेरी मा० मोफलसिंह साल बीजडप्रमुससमुदायाभ्पर्धनया श्रीपू श्रीयुगादिदेवतीर्थ नमस्कृतवन्तः। तत्र च सं० १३६० माष बदि १०, सा० बीजइ-सा० विरदेवादिसुधारकः प्रभूतद्रव्पवेचनेन श्रीनिनग्रामन- प्रभावनापूवं मालारोपगादिनन्दिमहोत्सरः सविस्तरः कारितः । ततश्च थीशीतलदेवमहाराजविजया मं० नाणचन्द्र-मं० कुमारपाल-थे पूर्णादिसमुदायाम्पर्धनपा च श्रीशम्पानपने श्रीशान्तिनापदेवत्तीय श्रीपूज्पनमश्चक्रे । ततः सं० १३६. शान्तिनायविधिचत्ये म. नागचन्द्र-मं० कुमारपाल-मां पर- पूर्ण-गा. रूपचन्द्र- प्रमुगममुदापेन दिनीपांशास मुदि६,श्रीजागलिपुरीय-सपादलक्षीयप्रमुगनानानगरपामगास्तव्यमंघमेलापन श्रीपा- भनाधममुगनानापिम्पानां प्रतिष्ठामहोन्मयः, दशम्यां च मालारोग्णादिनन्दिमहोत्माः मालम्पा परपक्षचमका रफारी थीदेवगुरुपमादाभिरिंगः कारितः। अस्मिन्महोत्सरे ५० लक्ष्मीनिरामणि-पं० हेमभूषणगायोगांचनाचार्यपदं दामिति । ८२. रातः श्रीनारालिपुरीयममुदापाम्पधनया धीवापालिपुर श्रीमहायोग धीम्या नमयः । नन घसं. १३६४ पेशामकृष्णपोदम्पा, मं० सानसिंह-मा० गुमट-मनयनसिंह-म० दम्माज-म• मोजगन-गामीदा- प्रमुगममतभीगमुदापरिदिननानाप्रोन्नपंगाक भीम पूज्पनांनाश्रीगजगृदादिमदातीर्यनमसगममुगनिगरप- पुन्यप्रामारावगगगनामपदं प्रदगा माय-पापगमकारी मानागेनगादिनन्दिमोन्मान योगमा:

६४ खरतरगच्छालंकार देहडानुज ४० थिरदेवत्रिकायाः श्रीजिनचन्द्रमरिस्वहस्तकमलदीक्षिताया रतमञ्जरीगणिन्या महत्तरापदं प्रदत्तम्-~- श्रीजयद्धिमहत्तरेति नाम चिहितम् , प्रियदर्शनगणिन्याः प्रवर्तिनीपदं च। ततः श्रीसमुदायाभ्यर्थनया श्रीपूज्याः पत्तनपुरवरे समायाताः। तत्र च सं० १३६९ मार्गशीर्वासितपष्ठयां स्वप- क्ष-परपक्षचैतश्चमत्कारकारकेण श्रीसमुदायविधापितमहोत्सवेन 'जयति जिनशासनम्' इति समुत्साहपूर्वक श्रीपूज्यैर्ज- गत्पूज्यश्चन्दनमूर्ति-भुवनमूर्ति-सारमूर्ति-हीरमूर्तिनामकं क्षुल्लकचतुष्टयं विहितम् , केवलप्रभागणिन्याः प्रवर्तिनीपदं च प्रदत्तम् , मालारोपणादिमहानन्दिमहोत्सवश्व कृतः । सं० १३७० माघशुक्लकादश्यां पुनः श्रीसमुदायकारितसकलस्वपक्ष-परपक्षचेतश्चमत्कारकारी दीक्षामालारोपणादि- नन्दिमहामहोत्सवः सकलजगत्कल्पद्रुमावतारः श्रीमत्पूज्यैः कृतः। तम्मिन्महोत्सवै निधानमुनेयशोनिधि महानिधि- साध्वीद्वयस्य च दीक्षा प्रदत्ता। ततः श्रीभीमपल्लीसमुदायाभ्यर्थनया श्रीपूज्याः श्रीभीमपल्लयां समायाताः । तत्र च सं० १३७१ फाल्गुनशुक्ल- कादश्यां श्रीमत्पूज्यैः साधुराजश्यामलप्रमुखश्रीभीमपल्लीसमुदायकारितः श्रीअमारिघोषणावारितसत्रसंघपूजासाधर्मिक- वात्सल्यादिनानाविधनोत्सर्पणापूर्वकं सकलजनमनोहारी व्रतग्रहणमालारोपणादिनन्दिमहामहोत्सवः कृतः । तस्मिन्महो- त्सवे त्रिभुवनकीर्तिमुनेः, प्रियधर्मा-आशालक्ष्मी-धर्मलक्ष्मीसाध्वीनां च दीक्षा प्रदत्ता। ८५. ततः श्रीपूज्यपादाः श्रीजावालिपुरीयसमुदायगाहतराभ्यर्थनया श्रीजावालिपुरे विहताः। तत्र च सं० १३७१ ज्येष्ठचदिदशम्यां मं० भोजराज-देवसिंहप्रमुखसकलश्रीजावालिपुरीयसमुदायकारितः सकलस्वपक्ष-परपक्षचेतश्च- मत्कारकारी समस्तजनमनोहारी दीक्षामालारोपणादिनन्दिमहामहोत्सवः श्रीपूज्यैः कृतः । तस्मिन् महोत्सवे देवेन्द्रदत्त- मुनि-पुण्पदत्तमुनि-ज्ञानदत्त-चारुदत्तमुनीनां पुण्यलक्ष्मी-ज्ञानलक्ष्मी-कमललक्ष्मी-मतिलक्ष्मीसाध्वीनां च दीक्षा प्रदत्ता । ततो म्लेच्छकृतो भङ्गः श्रीजावालिपुरे जातः । ततः श्रीपूज्याः श्रीशम्यानयन-श्रीरुणापुरी-श्रीवघेरकादि- नानास्थानयास्तव्यसकलसमुदायिनां समाधानमुत्पाद्य श्रीरुणातः श्रीश्रीमालफुलोसैः श्रीजिनशासनप्रभावकैः सकल. साधर्मिकवत्सलः साधुमानलपुत्ररत्नैः सा०माहा-सा धान्धूप्रमुखभ्रातृभिः सह सकलसपादलक्षनगरग्रामवास्तव्यसम- स्तसुश्रावकशकटशतत्रयमेलापकेन श्रीपूज्यपादैः श्रीफलयधिकायां सकलातिशयनिधानस्य म्लेच्छव्याकुलसकलसपाद- लक्षजनपदक्षारसमुद्रामृतकूपतुल्यस्य श्रीपार्श्वनाथस्य प्रथमो यात्रामहामहोत्सवयके । तस्मिन् यात्रामहोत्सवे श्रीवि- धिसंघसुश्रावकः श्रीइन्द्रपदादिनानापदग्रहण-अवारितसत्र-श्रीसाधर्मियात्सल्य-श्रीसंघपूजादिनानाविधश्रीजिनशास- नप्रोत्सर्पणापूर्वकममेयं सौवस्वापतेयं सफली चक्रे । पश्चाच्ड्रीनागपुरसमुदायाभ्पर्थनया श्रीपूज्या नागपुरे विहताः । ततः श्रीलोहदेव-सा०लखण-सा० हरिपालप्रमुखश्रीउच्चापुरीयविधिसमुदायानुत्तराम्यर्थनया नानाम्लेच्छसंकुले महामिथ्यात्वबहुले श्रीसिन्धुमण्डले महाग्रीमत्ती प्रवर्तमाने दुर्गममरुस्थल्यां सौवज्ञानध्यानवलशालिभिः श्रीमेपकु- मारदेवकृतसानिध्ययुगप्रवरागमश्रीजिनचन्द्रसूरिभिरनेकमुसाधुपरिवृतः श्रीधर्मकल्पद्रुमारोपणाय विहारथके । तत- स्तशालङ्कारे श्रीउच्चापुरीप्रत्यासन्ने श्रीदेवराजपुरे श्रीउचापुरीयविधिसमुदायकृतप्रवेशकोत्सवाः श्रीपूज्या महामिथ्या- त्वराज्योत्पाटनायावस्थिताः । तत्र च सकलसिन्धुमण्डलमुश्रारकगाढतराभ्यर्थनया सं० १३७३ वर्षे मार्गशीर्ष. चदिचतुर्थ्या श्रीआचार्यपदस्थापनावतग्रहणमालारोपणादिमहामहोत्सवाः सकलानानिलोकसम्यक्त्योपार्जनहेतया श्रीपूज्यपादैः प्रारब्धाः । पश्वान्महोत्सवदिनोपरि आरम्भसिद्धिरात्रौ जानध्यानातिशयसंस्मारितश्रीजिनदत्तमरियुग- अवरागमः श्रीपूज्यश्चतुर्मासीमध्येऽपि गुरुतरराजविड्रेण संजायमानशून्यजनपदेषु तस्करादिनानोपद्रवहुलेप्यपि मार्गेषु सौवज्ञानातिश्यवलेन कुशलं परिभाष्य, ....वीसल-महणसिंहमुश्रावको श्रीदेवराजपुराच्छीगूर्जरत्रामुकुटकल्पे - युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ६५ श्रीपत्तने श्रीविवेकसमुद्रमहोपाध्यायानां पार्थे लक्षण-तर्क-साहित्यालङ्कार-ज्योतिष्क-स्वसमय-परसमयसारनिष्कनि- कपणनिकपोपमे समग्राचार्यगुणालङ्कृतमात्रस्य स्वशिष्यरतस्य पण्डितराजराजचन्द्रस्य समाकारणाय प्रेषितौ । ततः श्रीउपाध्यायैः सद्गुर्यादेशानुसारेण ताभ्यां सह पुण्यकीर्तिगणिं दवा पं० राजचन्द्रमुनिः प्रेपितः । ततः श्रीमत्पूज्य- गुरुतरध्यानवलाकर्षिताधिष्ठायककृतसान्निध्यात् तस्करायनेकोपद्रवानवगणय्य कार्तिकचतुर्मासकदिने स्वदीक्षागुरु- श्रीपूज्यपादपद्यमहातीर्थ पं० राजचन्द्रमुनिना नमस्कृतम् । ततथ श्रीमत्पूज्यैः श्रीउच्चापुरीय-श्रीमरुकोट्ट-श्रीक्यासपुर- प्रमुखसिन्धुदेशनानानगरग्रामवास्तव्यासंख्यसुश्रावकसंघमहामेलापकेन स्थाने स्थाने प्रेक्षणीयेषु संजायमानेषु, दीयमा- नेषु तालारासेषु, नृत्यमानेषु युवतीजनेषु, पापख्यमानेपु वन्दि......पु दीयमानेषु, श्रे०उदयपाल-- गोपाल-सा० क्यरसिंह-ठ०कुमरसिंहप्रमुखमहद्धिकसुश्रावकलोकैः स्वर्णान्नवस्त्रदानेषु क्रियमाणेषु अपारितसत्रेषु संजायमानेषु साध- मिंकवात्सल्येषु श्रीआचार्यपदस्थापना व्रतग्रहण-मालारोपणादिनन्दिमहामहोत्सवश्चक्रे । तस्मिन् महोत्सवे स्वशिष्यरत्नस्य समग्रविद्याधुद्धिपानकुम्भपिंसमानस्य चाक्चातुरीविनिर्जितसुराचार्यस्य पण्डितराजचन्द्रमुनिवरस्य आचार्यपदं प्रदत्तम्- श्रीराजेन्द्रचन्द्राचार्या इति नामधेयं च कृतम् । ललितप्रभ-नरेन्द्रप्रभ-धर्मप्रभ-पुण्यप्रभ-अमरप्रभसाधूनां दीक्षा प्रदत्ता। अनेकभावकथाविकालोकर्माला गृहीता, सम्यक्त्वारोपसामायिकारोपश्च कृतः । तस्मिन् महोत्सवे साधुराजयशोघवल- फुलप्रदीपेन सा नेमिकुमारपुत्ररत्नेन श्रीजिनशासनप्रभावकेण सकलसार्मिकवत्सलेन सा चयरसिंहसुश्रावण विशेषतः श्रीसाधर्मिकवान्सल्यावारितसत्रामारिघोपणाश्रीसंघपूजानिर्मापणपूर्वकं स्वस्खापतेयं सफलीचक्रे । ८६. ततः पुनः सं० १३७४ फाल्गुनवदि पष्ठीदिने श्रीउच्चापुरीयादिनानानगरग्रामवास्तव्यसकलसिन्धुदेशविधि- समुदायकारितः श्रीपूज्यैर्वतग्रहणमालारोपणोत्थापनादिनन्दिमहामहोत्सवः सकलस्वपक्ष-परपक्षचेतश्चमत्कारकारी कृतः। तस्मिन् महोत्सवे दर्शनहित-भुवनहित-[त्रिभुवनहितमुनीनां दीक्षा प्रदत्ता, श्राविकाशतेन च माला गृहीता । एवं श्रीदेवराजपुरे महामिथ्याखतिमिरं चतुर्मासीद्वयेनोन्मूल्य श्रीपूज्याः [सा ?]री० पूर्णचन्द्रसत्पुत्रोदारचरित्रश्रीजिन- शासनप्रभावक सारी० हरिपालसार्थवाहसान्निध्येन मरुस्थलवालुकासमुद्रमुल्लङ्य श्रीनागपुरे श्रीसमुदायकृतगुरुतर- प्रवेशकमहोत्सवाः समायाताः। ततः श्रीकन्यानयनवास्तव्यश्रीश्रीमालकुलोत्तंसश्रीजिनशासनप्रभावक साकाला- सुश्रावककारिता श्रीकन्यानयनादिसमग्रवागडदेश-सपादलक्षदेश-नगरग्रामवास्तव्यनानासुश्रावकमहासंघमेलापकैन श्रीफलवधिकायां श्रीपार्श्वनाथदेवस्य श्रीपूज्यैद्वितीयवारं यात्रा कृता । महद्धिकसुश्रावकलोकैरवारितसत्रसाधर्मिकवात्स- ल्यश्रीसंघपूजानिर्मापणपूर्वकं श्रीजिनशासने महती प्रभावना चक्रे । ततः सं० १३७५ माघशुक्लद्वादश्यां श्रीनागपुरे मत्रिदलकुलोत्तंस-ठ०विजयसिंह -४० सेह-सा० रूदाप्रमुस- श्रीयोगिनीपुरसमुदायसंघपुरुषमत्रिदलीय-ठ०अचलप्रमुखसमग्रडालामऊसमुदाय-श्रीकन्यानयन-श्रीआसिका-श्रीन- रमटप्रमुखनानानगरग्रामवास्तव्य-समस्तवागडदेशसमुदाय-म० कुमरा-मं० भूधराजप्रमुखकोशवाणासमुदाय-नानानगरपा. मवास्तव्यसमग्रसपादलक्षसमुदाय-सा सुभटप्रमुसश्रीजावालिपुर-श्रीशम्यानपनप्रमुखमारुषत्रासमुदायादिनानाजनपद- प्रचुरसमुदायमहामेलापके स्थाने साने संजायमानेष्ववारितसत्रेषु, कार्यमाणेषु महाप्रेक्षणीयेषु, नृत्यमानेषु पुची जनेषु, दीयमानेषु तालारासेपु, क्रियमाणेषु सामिकवात्सल्येपु, दीयमानेषु महामहद्धिकसुश्रावकलोकैः कन- ककटकरूप्यकटकवस्त्रान्नदानेपु, श्रीवर्धमानवामितीर्थप्रवर्तनपरायणैः श्रीपूज्यैः श्रीनागपुरीयसमुदायाभ्यर्थनया स्व. पक्ष-परपक्षासंख्यजनमनोहारी सकलमहामिच्याइग्लोकमत्तकाबधूननकारी श्रीनवग्रहणमालारोपणादिनन्दिमहामहो- त्सवश्चक्रे । तस्मिन् महोत्सवे सोमचन्द्रसाधोः शीलसमृद्धि-दुर्लभसमृद्धि-भुवनममृद्धिसाध्वीनां दीक्षा प्रदत्ता । पं० जगचन्द्रगणेः सर्वविद्याविलासिनीनाट्यनाय्योपाध्यायकल्पस्य नानाशिप्यरत्ननिष्पादनलब्धिसमुद्रस्य द्विधा स्वसन्तान- जस्य परिभावितस्यपट्टलक्ष्मीयोग्यस्य तस्य पण्डितराजकुशलकीर्तिगणेश्च वाचनाचार्यपदम् । धर्ममालागणिनी-पुष्प- ६२ खरतरगच्छालंकार येन कारितः । ततौरचरटाधुपालुतेऽपि मागें भण० दुर्लभसाहाय्यात् श्रीभीमपल्लयां श्रीपूज्याः समाजग्मुः । ततः- श्रीपत्तनीयश्रीकोट्टडिकाश्रीशान्तिनाथविधिचाये श्रीश्रावकपॉपधशालासनिवेशनप्रमुखश्रीधर्मकृत्यपेशलसा जैसलप- भृतिश्रीसमुदायाभ्यर्धनया श्रीपत्तने श्रीशान्तिनाथदेवं नमस्कृतवन्तः । ततः श्रीस्तम्भतीर्थीयकोट्टडिकाश्रीअजि- तनाथदेवविधिचैत्यालयश्रीश्रावकोपधशालाप्रमुखसद्धर्मकृत्यकुशलेन सा० जेसलेन समामन्यमाणाः श्रीशेरीपके. श्रीपाश्र्धनाथदेवं नमस्कृत्य सा० जैसलकारितेन वपक्षपरपक्षचमत्कारकेणानुकृतमत्रीश्वरश्रीवस्तुपालकारितश्रीजि- नेश्वरमरिमहाप्रवेशकमहोत्सवेन श्रीस्तम्भतीर्थे श्रीपूज्याः श्रीअजितनाथदेवं नमश्चक्रुः । ८३. ततः सं० १३६६ ज्येष्ठ यदि १२, नानावदातयातसा द्धृतसर्वपूर्वजकुलेन सामिकवत्सलेन सा० जैसलसुभाव- केण मेलितेन श्रीपत्तनीय-श्रीभीमपल्लीय-श्रीबाहडमेखीय-श्रीशम्यानयनीयसमस्तसंघमेलापकेन स्वकीयवृहद्भाव सा० तोलियनिवेशितसंघधुर्यपदेन लघुभ्रात सा० लाखूनिवेशितपच्छेवाणपदेन विषमदुःपमाकालेऽप्यतुच्छम्लेच्छसंकुलेऽपि देशे श्रीस्तम्भतीर्थाच्छीदेवालयप्रचलनमहोत्सवो विहितः । तेन सह श्रीमत्पूज्या जयवल्लभगणि-हेमतिलकगण्यादि- साध्वेकादशकेन प्र० रनवृष्टिगणिन्यादिसाध्वीपञ्चदशकेन च परिवस्यमानाः श्रीमहातीर्थनमस्करणाय प्रस्थिताः। ततः स्थान स्थाने चैत्यपरम्परासु चैत्यपरिपाट्याद्यनेकमहोत्सवेषु श्रीसंघन क्रियमाणेपु, नानाविधतूर्यपु वाघमानेष्वनेक- श्रावक(श्राविका?) लोकेन श्रीमद्देवगुरुगुणगणेषु गीयमानेषु, मट्टयः सकीयनव्यकाव्येषु पख्यमानेषु, क्रमक्रमेण पीपलाउलीग्रामे सर्वोऽपि संघः समायातः । तत्र च श्रीशत्रुञ्जयमहातीर्थपर्वतावलोकमहोत्सवः श्रीसंघेन कृतः। ततो- ऽपारसंसारपारावारनिमजजन्तुजातप्रवहणायमाननिःशेपदेशागतजन्तुजातपूज्यमानश्रीशत्रुञ्जयमहातीर्थालङ्कारश्रीदेवाधि- देवश्रीयुगादिदेवपादपद्मनमस्करणयाघाहर्पप्रकर्पपादु ताकुरपूरपरित्रितः श्रीचतुषिधसंघपरिभृतः श्रीपूज्यविहिता। तत्र च सा० सलखणपुत्ररत्न सा० मोकलसिंहादिसुश्रावकः श्रीइन्द्रपदादिमहोत्सवाः सविस्तरा विहिताः । तत्र च ज्येष्ठशु- लद्वादश्यां मालारोपणादिनन्दिमहोत्सवः सविस्तरः श्रीसमुदायेन कारितः। ततः सुराष्ट्रालङ्कारश्रीगिरिनारसंस्थितश्रीनेमिनाथमहातीर्थनमस्करणाय चतुर्विधसंघपरिवृताः श्रीपूज्याः प्रस्थिताः । नेदीयोगच्छदतुच्छम्लेच्छकटकोपटुतेऽपि मुराष्ट्रादेशे जगन्नाथश्रीनेमिनाथप्रसादान्टीअम्बिकासान्निध्या- च्छीमरपूज्यज्ञानवलाच्च सुखसुखेन श्रीउजयन्ततलहट्टिकायां सर्वोऽपि संघः प्राप्तः । ततः श्रीनेमिनाथकल्याणकायप- विनितश्रीउजयन्तमहापर्वतराजालझारभाराम्भोधरसौभाग्यसुन्दरनेमिनाथपादपद्ममहातीर्थ श्रीपूज्याः सकलसंघसम. न्विता नमश्चक्षुः । तत्र च सा० कुलचन्द्रकुलप्रदीप सा० वीजडप्रमुखसकलसुश्रावकः श्रीइन्द्रपदादिप्रोत्सर्पणा विहिता। ततः श्रीनेमिनाथदेवं नमस्कृत्य, स्थाने स्थाने नानाप्रभावनां विधाय, श्रीपज्याः श्रीसंघसमन्निताः श्रीस्तम्भतीर्थे समायाताः। तत्र च सा० जेसलसुश्रावकेण श्रीदेवालयस्य श्रीमत्पूज्यानां च महता विस्तरेण प्रवेशकमहोत्सवश्चक । तत्र च चतुर्मासी विधाय श्रीस्तम्भनकालङ्कारश्रीपार्श्वनाथदेवतीर्थ मत्रिदलीप ठ० भरहपालसुश्रावकसाहाय्याच्छी- मत्पूज्या ववन्दिरे। ८४. ततः श्रीवीजापुरे श्रीवासुपूज्यदेवं नमस्कृतवन्तः । तत्र च सं० १३६७ माघकृष्णनवम्यां श्रीमहावीरप्रमुखशैल- मयादिविम्यानां प्रतिष्ठा श्रीमत्पूज्यमहता विस्तरेण कृता, मालारोपणादिनन्दिमहोत्सवच जज्ञे। ततः श्रीभीमपल्लीय- श्रीसमुदायाभ्यर्थनया श्रीमहावीरदेवं नमस्कृतवन्तः । तत्र च सं० १३६७ फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदि, सकलश्रीमीमपल्लीय- श्रीपत्तनीय-श्रीमहादनपुरीयसमस्तश्रीसमुदायमेलापके नानाविधपुण्यांकदानादिप्रभावनापुरस्सरं क्षुल्लका क्षुल्लिका- द्वयं च श्रीपूज्याश्चक्रुः । तन्नामानि च परमकीति-घरकीति-रामकीर्ति-पद्मश्री-व्रतश्रीरिति । तस्मिन्नेव च दिने मालारो पणादिनन्दिमहोत्सवः सविस्तरः श्रीसमुदायेन कारितः। पं०सोमसुन्दरगणेर्वाचनाचार्यपदं दत्तम् ।

युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। तस्मिन्नेव वत्सरे सा०क्षेमन्धर-सा०पद्मा-सा०साढलकुलावतंसेन निजभुजोपार्जितचारुकमलाकेलिनिवासेन कुकुमपत्रि- कादिना दानसन्मानपूर्वकविहितश्रीपत्तन-श्रीमहोदनपुर-श्रीजावालिपुर-श्रीशम्यानयन-श्रीजेसलमेरु-श्रीराणुकोट्ट-श्रीना- गपुर-श्रीरुणा-श्रीवीजापुर-श्रीसत्यपुर-श्रीश्रीमाल-श्रीरतपुरादिप्रभूतश्रावकसंघमेलापकेन निप्रतिमपुण्यपण्यशालिना स्थैर्यगाम्भीर्यादिगुणगणमालिना सत्तीर्थयात्रापवित्रगात्रसाधनपालनन्दनेन श्रीभीमपल्लीपुरीवास्तव्येन राजमान्येन -सद्धर्मकर्मकुशलेन सुश्रावकसाधुसामलेन श्रीतीर्थयात्रा प्रारम्भि । तस्य च सकलसमुदापसहितस्य गाढाम्पर्थनपा प्रचुर- म्लेच्छसंकुलेऽपि जनपदेऽविचलसुधयसुश्राविकाभिर्गीयमानेषु धवलमङ्गलेपु, दीयमानासु चचरीपु, पठत्सु भट्टघट्टेषु, वाद्यमानेषु प्रवरतूर्यपु, महतोत्साहन श्रीवर्धमानस्वामिजननोत्सवपवित्रितायां चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां नानातिशयशालिनः श्रीचतुर्विधसंघसहिताः श्रीजगत्पूज्याः श्रीपूज्याः श्रीदेवालयेन सह श्रीभीमपल्लीतः प्रास्थिपत । ततश्च पदे पदे शुभ- शकुनैः प्रेर्यमाणाः श्रीशद्देश्वरे महाप्रभावभवनं श्रीपार्श्वनाथजिनं महता विस्तरेण नमस्कृतवन्तः । तत्र च समस्तसंघेन दिनाष्टकं श्रीपार्श्वनाथमहातीर्थे महान्महोत्सवो व्यधायि । ततः पाटलाग्रामे श्रीनेमिनाथतीर्थ चिरकालीनं नमस्कृत्य श्रीराजशेखराचार्य-जयवल्लभगण्यादिसाधुपोडशक-प्र० बुद्धिसमृद्धिगणिन्यादिसाध्वीपञ्चदशकपरिवृताः सकलप्रारभार- धौरेयेण साधुसामलेन, भण० नरसिंहपुत्रआसा-दुर्लभादिवान्धवन्यस्तसंघरक्षाभारेण भण० पूर्णपुत्ररत्नेन, वयॊदार्यशा- लिना भण० लूगाकेन पाश्चात्यपदनिर्वाहिणा समस्तविधिसंघेन च कलिताः, प्रतिपुरं प्रतिग्राम निःशवं गीतनृत्यवा- द्यादिना जिनशासनप्रोत्मर्पणायां विजृम्भमाणायां क्रमक्रमेण सुखंसुखेन श्रीशत्रुञ्जयालङ्कारत्रैलोक्यसारसमस्ततीर्थपर- म्परापरिवृतं प्रविहितसुरासुरनरेन्द्रसेवं श्रीनामेयदेवम् , श्रीउञ्जयन्ताचलशिखरमण्डनं समस्तदुरितखण्डनं सौभाग्य- कमलानिधानं यदुकुलप्रधान कल्याणकत्रयादिनानातीर्थावलिबिराजमान श्रीअरिष्टनेमिखामिन च नूतनस्तुतिस्तोत्रवि- धानपूर्वकं परमभावनया सकलसंघसहिताः श्रीपूज्या महता विस्तरेणावन्दिपत । तत्र च श्रीजावालिपुरवास्तव्यमहा- जनप्रधानगुणनिधान सा० देवसीहसुन-सान्यालणनन्दनाभ्यां निजकुलमण्डनाभ्यां सा० कुलचन्द्र-सा० देदासुश्रा- चकाभ्यां द्वयोरपि महातीर्थयोः प्रचुरखापतेयसफलीकरणेन श्रीइन्द्रपदमङ्गीकृतम् । गोष्ठिकयशोधवलपुत्ररत्नेन गोष्ठिक- स्थिरपालेन प्रभूतद्रव्येण श्रीउज्जयन्ते श्रीअम्बिकादेव्या माला गृहीता। अन्यैरपि धायकपुङ्गवैः सा० श्रीचन्द्रपुत्र सा० जाहण-सा चाहडपुत्र सा० झाञ्झण-सा ऊधरण-नवलक्षकनेमिचन्द्र-श्रे०पूना-सा०तिहुणा-भां०पदमपु०भउणा- सा० महणसीह-सा० भीमापु० लूणसीहादिभिः श्रीतीर्थपूजा-संघपूजा-साधमिंकवात्सल्यावारितसत्रादिपु, अमेयस्वस्खा- पतेयसफलीकरणेन महत् पुण्यानुवन्धिपुण्यं समुपार्जितम् । एवं च विषमकालेऽपि लोकोत्तरधर्मनिधानेन वरेण्यपुण्य- प्रधानेन श्रीविधिसंघेन सजनचित्तहारिणी सर्वजनचमत्कारकारिणी श्रीतीर्थयात्रा विहिता निर्विघ्नम् । समस्ततीर्था- वली महत्या प्रभावनया बन्दित्वा सासामलादिसंघसहिताः सपरिवाराः श्रीजिनचन्द्रसूरयः क्षेमेण अपाढचतुर्मासके श्रीवायडग्रामे जीवितस्यामिका श्रीमहावीरप्रतिमां निष्प्रतिमा महाविस्तरेण नमश्चक्रुः । ततः श्रावणप्रथमपक्षे नृत्य- न्तीपु धर्मभाविकासु श्राविकातु, गायन्तीपु नागराङ्गनासु, स्थाने स्थाने विधीयमानेषु प्रेक्षणीयेषु, पठत्सु वन्दिवृन्देषु, श्रावकजनीयमानेषु महादानेषु, सकलसंघसहितानां लोकोत्तरातिशयशालिनां श्रीजिनचन्द्रसूरीणां श्रीविधिसमुदायेन महाविस्तरेण महत्या प्रभावनया श्रीभीमपल्ल्यां प्रवेशमहोत्सवः कारितः । संघागतेन श्रीदेवगुर्वाज्ञाप्रतिपालनोद्यतेन श्रीसाधर्मिकवत्सलेन भण० लूणासुश्रावकेण श्रीपूज्यपादान्ते श्रीसंघपाश्चात्यपदप्राम्भारनिहिणमहाप्रभावनाकरणममु- पार्जितं पुण्यं सर्व समातुर्दानशीलतपोभावनोद्यताया भण०धेनीमुश्राविकायाः प्रदत्तम् । तया च श्रद्धानपरया:- नुमोदितम् । .म्यां श्रीभीमपल्लीसमुदायकारितमहामहोत्सवेन प्रतापकीर्त्यादिक्षुल्लकयोयोत्थापना क्षुल्ल कद्वयं च पूज्यैर्व्यधायि ।तन्नामानि तरुणकीर्तिस्तेजाकीर्तिः, साव्योव व्रतधर्मा दृद्धयर्मेति । तस्मिनेर दिने ठ० हामिर पुत्ररत उ० खरतरगच्छालंकार सुन्दरीगणिन्योः प्रवर्तनीपदं च प्रदत्तम् । ततश्च ठ० विजयसिंह-४० सेहू-ठ० अचलप्रमुखसमग्रसंघशकटाचमहामे- लापकैन श्रीफलवधिकायां श्रीपार्श्वनाथस्य श्रीपूज्यैस्तृतीयवारं यात्रा कृता । तत्र च जिनशासनप्रभाषनाकरणप्रवणेन सर्वसाधर्मिकपत्सलेन मत्रिदलकुलोत्तंसेन ठ० सेहसुश्रावकेण जैथलसहस्रद्वादशप्रदानपूर्वकमिन्द्रपदग्रहणेन, अन्य मुश्रावकलोकैरमात्यादिपदग्रहणेन अवारितसत्रसंघपूजासाधर्मिकवात्सल्यस्वर्णरजतकटकवस्त्रादिदानश्च श्रीजिनशासने महती प्रभावना चके । श्रीपार्श्वनाथदेवभाण्डागारे च जैथलसहस्र ३० समुत्पन्नाः । ततः पुनः श्रीपूज्याः श्रीसं- घेन सह नागपुरे समायाताः। ८७. ततः सं०१३७५ वैशाखवद्यष्टम्यां नानावदातवातसमुद्धृतसर्वपूर्वजकुलेन निजभुजोपार्जितचारुकमलाकेलिनिवा- सेन मत्रिदलकुलोचस-उ०प्रतापसिंहपुत्ररत्नेन श्रीजिनशासनप्रभावनाकरणचतुरेण सकलसार्मिकवत्सलेन निः- प्रतिमपुण्यपण्यशालिना स्यैयौदार्यगाम्भीर्यादिगुणगणमालिना सकलराज्यमानेन ठक्कुरराजअचलसुश्रावकेण प्रतापा- क्रान्तभूतलपातसाहिश्रीकुतबदीनसुरजाणफ़रमाणं निष्कास्य कुङ्कुमपत्रिकादानसन्मानादिपूर्व श्रीनागपुर-श्रीरुणा-श्री- कोसवाणा-श्रीमेडता-कडुयारी-श्रीनवहा-सुझणू-नरभट-श्रीकन्यानयन-श्रीआसिका-झरे [१] रोहद-श्रीयोगिनी- पुर-धामइना-यमुनापारनानास्थानवास्तव्यप्रभूतसुश्रावकमहामेलापन प्रारम्भिते श्रीहस्तिनागपुर-श्रीमधुरामहातीर्थ- यात्रोत्सवे श्रीवज्रस्वामि-श्रीआर्यमुहस्तिमुस्वित्सातिशयशालिनो जगत्पूज्याः श्रीमत्पूज्या जयबल्लभगणि-पं० पम- कीतिगणि-पं० अमृतचन्द्रगण्यादिसाध्वष्टक-श्रीजयद्धिमहत्तराप्रमुखमाघी.......श्रीचतुर्विधसंघसहिताः प्रचुरम्लेग- चलीसंकुलेऽपि जनपदै अविधवसुधवाभिः सुश्राविकाभिर्गीयमानेषु धवलमङ्गलेपु, दीयमानामु चचरीषु, पठत्सु नाना- विधवन्दिवृन्देपु, वाद्यमानेषु द्वादशाविधनान्दीतूर्येषु, श्रीदेवालयेन सह श्रीनागपुरात प्रचलिताः । ततश्च पदे पदे शुम- शकुनैः नर्यमाणाः सकलसंघकार्यप्राभारधुराधौरेयेण निरुपमदानतिरस्कृताशेपकल्पद्रुमेण ठ-अचलमुश्रापकणा, श्री- श्रीमालकुलोत्सेन श्रीदेवगुर्शज्ञाचिन्तामणिविभूषितमस्तकेन अगीकृताशेपसंघपाश्चात्यपदारमारेण सा० मुरराजपुर- रत्नेन साधुराजरुदपालसुश्रावकेण समस्तसंपेन च कलिताः, प्रतिपुरं प्रविग्रामं निःशझं गीतनृत्यवाधादिना श्रीजिन- चत्येषु चैत्यप्र(परिपाटीकरणपूर्व श्रीजिनशासनप्रोत्सर्पणायां विजम्ममाणायां क्रमक्रमेण श्रीनरभटे श्रीजिनदत्तमूरि- प्रतिष्ठितं नवफणमण्डितं समग्रातिशयनिघानश्रीपार्श्वनाथमहातीर्थ श्रीसमुदायकारितासमप्रवेशकमहोत्सवाः श्रीपूज्या नमः। ततश्च श्रीनरभटसमुदायेन श्रीचतुर्विधसंघसमन्वितानां श्रीपूज्यानां श्रीसंथपूजादिनिर्मापणेन महती प्रभावना चक्रे । ततः स्थानात् पुनः श्रीचतुर्विघसंघश्रीदेवालपसमन्विताः श्रीपूज्याः ममग्रवागडदेशनगाग्रामवास्तव्यगुभारम्लोक मनोरथमालां परिपूरयन्तो महतोत्साहन श्रीकन्यानयने श्रीजिनदनप्रितिष्टिनं सकलतीर्थमुकुटकल्प सानिमारिन श्रीवर्धमानखामिन नमः । मेहर-पम-मा० कालाप्रमुग्नश्रीकन्यानयनममुदायेन मालम्लेच्छसंबुलेऽपि नगर हिन्दु कमारकवत् स्थाने स्थाने संजायमानेषु प्रेक्षणीयेषु, श्रीदेवालयश्रीमंघममन्वितानां श्रीपूज्यपादानां प्रवेशकमहोत्मपकर- गपूर्वकं श्रीसंघपूजामाधर्मिकवात्मन्यनिर्मापणपूर्वक च श्रीमहावीतीर्थे मवमत्रान्तरेणाजितपापकदमलापहारिणी महती भावना के । तत्र च श्रीसंथैन श्रीवर्धमानस्याम्पग्रे दिनाष्टकं गुरुतगेन्माहपूर्वकमाकिमहामहोत्माय! ८८. ततः स्थानान् ममग्रयमुनापार-बागडदेशमुथापकमन्कनुगद्गमशनचतुष्टय सकटयनपश्चक-पभशतसमकार्स- रख्यलोकमहामेलापन पापमानामु टोलपरम्परामु, मागेषु म्यान म्याने दीपमानामु पगरीपु, पाथमानेपनि दादर विधनान्दीतूर्येषु, असंख्यम्लेशाधपरम्परानुगम्यमानः, २० जयनपाल-ठ० विजयमिंद-ट० मेह-० कुमरपाल-३० देवसिंहप्रमुसनानामनिदलीप-सुधायक र मोजा-श्रेष्ठि पद-मान्याला उदेपाल-ठपूर्ण- महणा-ग-मा गा-फरूपमुखानेकश्रीश्रीमालीय-भाषकश्रेप्नड-मा०कुम्मरपाल-ममहा-मवीन्हा-माताहण-मा०म.

युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। हिराजप्रमुखऊकेशवंशीयासंख्यसुश्रावकपरम्परैकवितानः श्रीचक्रवर्तिमहासैन्यसमानः, चारुद्रोणीभिर्यमुनामहानदी- मुत्तीर्य क्रमक्रमेण निःशङ्कं मन्दमन्दप्रयाणकैः श्रीशान्तिनाथ-श्रीकुन्थुनाथ-श्रीअरनाथतीर्थकरचक्रवर्तिनां गर्भाव- तार-जन्म-दीक्षा-ज्ञानकल्याणकचतुष्टयपवित्रितवसुन्धरं हस्तिनापुरं चक्रवर्तिसमानश्रीमत्पूज्य-सेनानीसमानठ. अचल-पाश्चात्यपदनिर्वाहक-सा०रुदपालालंकृतः श्रीचतुर्विधोऽपि संघः सम्प्राप्तः । ८९. ततश्च श्रीमत्सूज्यैः श्रीचतुर्विधसंघसमन्वितैनूतनकृतस्तुतिस्तोत्रनमस्कारभणनपूर्व श्रीशान्तिनाथ-कुन्थुनाथा- रनाथदेवानां भवभवोपार्जितपापपोत्तारिणी यात्रा चक्रे । श्रीसंपेन च श्रीइन्द्रपदादिग्रहणावारितसत्र-साधर्मिकवात्स- ल्य-श्रीसंघपूजानिर्मापण-हेमरजतकटकतुरगवस्त्रवितरणपूर्वकं कलिकाले प्रवर्तमानेऽपि श्रीकृतयुगवच्छ्रीवीरशासने वपक्ष-परपक्षचेतश्चमत्कारकारिणी महती प्रभावना चक्रे । तत्र च ठहरिराजपुत्ररत्नेनोदारचरिप्रेण श्रीदेवगुर्वाज्ञाचि- न्तामणिविभूपितमस्तकैन ठ०मदनानुजेन ठ०देवसिंहसुश्रावकेण जैथलसहसविंशत्येन्द्रपदं गृहीतम् । उहरिराजादि महर्द्धिकसुश्रावकैरमात्यादिपदानि गृहीतानि । सर्वसंख्यया देवभाण्डागारे जैथललक्ष १ सहस्र ५० समुत्पन्नाः। तत्र च दिनपञ्चकं श्रीजिनशासनप्रोत्सर्पणां विधाय श्रीहस्तिनागपुरात सर्वोऽपि संघः श्रीमथुरामहातीर्थोपरि प्रचलितः सन् स्थाने स्थाने प्रोत्सर्पणां विदधानः श्रीयोगिनीपुरप्रत्यासन्ने तिलपथस्थाने समायातः । अत्रान्तरे द्रमकपुरीयाचार्येण युगप्रवरागमश्रीजिनचन्द्रसूरीणामतिशयमसहिष्णुना दुर्जनस्वमावेन स्वर्णच्छत्रधरणसिंहासनोपवेशनादिकं पेशुन्यं महाराजाधिराजपातसाहिकुतपदीनाने कृतम् । ततश्च म्लेच्छखभावेन पातसाहिना समयोऽपि संघस्तत्रावग्रहे कारितः। श्रीपूज्याः सपरिवाराः संघपुरुप-ठ० अचलादिमहद्धिकसुश्रावकसमन्विताः स्वपार्श्वे समाकारिताः । ततश्च श्रीमत्पूज्य- मुखकमलाबलोकनादेव न्यायिमहोदधिना प्रतापाक्रान्तसमग्रभूतलेन श्रीअलावदीनसुरत्राणपुत्ररत्नेन श्रीकुतवदीनमुरत्रा- णेन कथितम्-'एतेषां श्वेताम्बराणां मध्ये दुर्जनोक्तं वाक्यं न किमपि जाघटीति' पश्चाद् दीपानाने आदिष्टम्-'एतेषां कर्णवारं सम्यगालोच्य येज्यायिनो भवन्ति ते शिक्षणीयाः'-इत्युक्त्या श्रीपूज्या दीपाने प्रेपिताः । सतश्च प्रधाना- धिकारिपुरुपैः सम्यन्यायान्यायं परिभाव्य द्रमकपुरीयाचार्यो नष्टोऽपि सन् निकासयिला राजद्वारे जीकृतः । पश्चादालापितः सन् किमपि सत्यमनुवत् । श्रीपूज्यानामग्न एव राजद्वारे लक्षसंख्यम्लेच्छ-हिन्दुकप्रत्यक्ष यष्टि-मुष्टि- लकुटादिप्रहारः कुट्टपिसा विगोपयिला च पन्दी कृतः। श्रीपूज्यानामप्रे कथितम्-'युप्माभिः सत्यभापिभियापै- कमहोदधिभिः सत्यश्वेताम्बरैः पातसाहिमेदिन्यां परिभ्रमणं स्वेच्छया करणीयम् , अवार्थे शङ्का काऽपि न कार्या' । पश्चाद्रीपूज्यः साधुराजतेजपाल-साधुराजखेतसिंह-ठ०अचला-ठ-फेरूणामग्र आदिष्टम्-'वपमितः सानात् पातसा- हिपिता अपि तदैव अजिप्यामो यदाज्य द्रमकपुरीयाचार्यस्य दुर्जनस्वभावस्यापि मोचनं विधास्यथाम्' । यतः श्री. वर्धमानशिप्पेण श्रीधर्मदासगणिनोपदेशमालायामुक्तमस्ति- जो चंदणेण याहुं आलिप्पइ वासिणाइ तच्छेह । संधुणइ जोवि निदइ महरिसिणो तत्थ समभाया। [८१] अन्यशास्त्रेयप्युक्तमस्ति- शत्री मिन्ने तृणे स्त्रैणे स्वर्णेऽश्मनि मणौ मृदि। मोक्षे भवे च सर्वघ्र निस्पृहो मुनिपुद्गयः ।। [८] इति श्रीपूज्यानो शमित्रसमपृचीनां समवणमणिलोप्दुकाञ्चनानां करुणाममुद्राणां गाढतरं मोचनाभिप्राय विशाय सर्वोऽपि राजलोको नगरलोकश्च मस्तकामधूननपूर्वकं श्रीपूज्यानां गुणग्रहणपरायणो जो । ततः श्रीपूज्या ...सा तेजपालादिमिः कारणिकपुरुषान् सम्बोध्य स द्रमकपुरीयाचार्यों मोचयिता सपोपयशालायां प्रेषितः ।

६८ खरतरगच्छालंकार पश्चाच्छीपूज्या अश्वपतिवहुमानिता महाम्लेच्छराजलोकनगरलोक-सा०तेजपाल-सा खेतसिंह-सा ईश्वर-ठ०अचलप्रमुः खासंख्यसुश्रावकलोकानुगम्यमाना गुरुतरप्रभावनापूर्वकं पा(सां)डासरायस्थाने समायाताः। अस्मिन् प्रस्तावे श्रीपूज्यानां समग्रसंघस्य च श्रीजिनशासनप्रभावकैः सकलराजमान्यैः सर्वकार्यनिर्वाहणसमथैः सकलसंधाधारैः श्रीश्रीमालकुलो- सैः सा तेजपाल-साल्खेतसिंह-सा ईश्वरसुधायकैः सकलसंघधुरन्धरेणोदारचरित्रेण चतुर्दिक्षु विख्यातेन मत्रिः दलकुलोत्सेन उ०अचलसुश्रावकेण उ० श्रीवत्सपुत्ररतसमन्वितेन च भव्यं साहाय्यं कृतम् । अत्रान्तरे चतुर्मासी लगा। ततः श्रीपूज्याः संघविसर्जनं विधाय : अचलादिभिः सुश्रावकैरिखसमानाः सण्डकसराजो चतुर्मासी चक्रुः । अत्रान्तरे पुनः श्रीमत्पूज्यैः श्रीसुरत्राणकथनेन श्रीसंघानुरोधेन च 'रायाभियोगेणं गणाभियोगेग' मित्या- दिसिद्धान्तवचनमनुसरद्भियतुर्मासीमध्येऽपि श्रावणमासे संघभारनिर्वाहक-ठ अचल-पाश्चात्यपदनिर्वाहकसा रुद: पालादिसमग्रवागडदेशसुश्रावकसंघमहामेलापकेन श्रीमथुरायां श्रीसुपार्श्व-श्रीपार्श्व-श्रीमहावीरतीर्धकराणां महता विस्तरेण यात्रा कृता । श्रीसंघेन च अवारितसत्रश्रीसाधर्मिकवात्सल्यादिभिर्महती प्रभावना चक्रे । ततः पुनः श्रीयोगि- नीपुरे समागत्य पा(खा)डासरायस्थाने श्रीपूज्यैः शेषा चतुर्मासी चक्रे । श्रीजिनचन्द्रमुरिस्तूपे च वारद्वयं सविस्तरा यात्रा कृता। ९०. ततश्चतुर्मास्यनन्तरं श्रीमत्पूज्यैः शरीरे कम्परोगेण सावाधितैः सौवज्ञानध्यानवलेन वायुः शेपं परिभाष्य खह- स्वदीक्षितस्य द्विधावसन्तानप्रभवस्य स्वपट्टलक्ष्मीपाणिग्रहणयोग्यलक्षणस्य तर्क-साहित्यालङ्कार-ज्योतिष्कसारविचार- चतुरस्य स्वसमय-परसमयाम्भोधितारणतरण्डस्य स्खशिप्परलस्य वा कुशलकीलिंगणेः सपट्टस्थापनस्वपरिभावितनामका- रापणादिसर्वशिक्षासमन्वितचिष्ठिकागोलकः श्रीराजेन्द्रचन्द्राणां निमितं विश्वासपात्रीदेवगुज्ञिानिरत-ट०विजयसिं- हहस्ते समर्प्य चाहुमानकुलोत्सगरणागतवज्रपञ्जरराणकश्रीमालदेवेन गादतरोपरोधेन समामव्यमाणैः श्रीयोगि- नीपुरान्छीमेडतास्थानकोपरि विहारश्चक्र । ततो मार्गे धामइना-रोहदप्रमुखनानास्थानगुश्रावकलोकान् बन्दापयन्तः श्रीकन्यानयने श्रीमहावीरदेवं नमश्चक्रुः । तत्रागतेः श्रीमत्पूज्यपादैः तापश्वासादिना घनतरमाणाधितः श्रीकन्या- नयनीयसमुदायप्रत्यक्षं चतुर्विधसंघमिध्यादुष्कृतदानपूर्वक पुनः सर्वशिक्षासमन्वितो लेसो विश्वासपात्रप्रवर्तकजप- वल्लभगणिहस्ते श्रीराजेन्द्रचन्द्राचार्याणां निमित्तं प्रदत्तः। ततो मासमेकं श्रीकन्यानयनीयममुदायस्य समाधाना- स्पाय श्रीनरभटादिनानास्थानसुश्रावकलोकान् चन्दापयन्तः श्रीमेडनास्पाने समायाताः। तत्रापि राणकश्रीमालदे- याभ्यर्थनया श्रीसमुदायसमाधानाय च चतुर्विशतिदिनानि स्थित्या स्वनिर्वाणयोग्यं स्थानं परिभाव्य श्रीकोशयाणा- स्थाने श्रीपूज्याः समायाताः । तत्रागतैः श्रीमत्पूज्य सं० १३७६ आपाइशुलनवमीरात्रिप्रथमसाईप्रहरे...शपश्चपष्टि श्रीचतुर्विधसंघमिध्यादुप्फतदानमदनफलाकितहस्तकमलः अखिता(?)नशनह- स्तिमलैः स्वर्गलक्ष्मीपाणिग्रहणं चक्रे । ततः श्रीसमुदायेन श्रीवर्धमानस्यामिनिर्वाणसमयशिविफातमानगुरुतमासंख्यमण्डपिकाशोभितविमाननिर्मा- पापूर्वकं वायमानेषु द्वादशविधनान्दीपु, उच्छाल्यमानेषु नालिफेरादिफलममूहए, अविघयमुधवामिः श्राविकामि- पिमानेषु पूर्वमहर्पिगीतेपु, प्रभातसमपे नगरलोक-राजलोकमहामेलापन निर्वाणमहामहोत्सवः सविस्तरभरश्यक ।

* युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ज्योतिर्लक्षणतर्कमन्त्रसमयालङ्कारविद्यासमा, दुःशीला वनिता इवात्रभुवने वाञ्छन्ति हातुच्छताम् ॥ पङ्कापहारनिखिले महीतले गामिनिर्जरतरलितः । विधाय येऽस्तं गताः श्रीस्वर्ग ये............!! [८४] ये तु रीनेपुत्रनिचतवयं मुक्तं मा हत्याकुलं (१), सद्यस्तत्पधगामिभिः सहचरैः सौराज्यसौभिक्ष्यकैः। स्थास्यामोऽपनयः(1) कथं वयमिति ज्ञात्वेव चिन्तातुरैः, प्रातः श्रीजिनचन्द्रसूरिगुरवः स्वर्गस्थिता मङ्गलम् ॥ भाव्यं भूवलये क्षयं कलिपतेर्दुभिक्षसेनापते- त्विा तन्मथनोद्यताः सुरगुरुं प्रष्टुं सखायं निजम् । मन्ये नाशिकमन्नधारणयुताभावात् पत्राद्धृता (2), राजानो जिनचन्द्रसूरय इति स्वर्ग गता दैवतः ॥ [८६] पश्चान्मत्रीवरदेवराजपौत्रेण मं० माणचन्द्रपुत्ररत्नेनोदारचरित्रेण मं० मुन्धराजसुश्रावकेण तस्मिन् स्थाने श्रीम- पूज्यपादुकासमन्वितं स्तूपं कारितम् । ९१. ततश्चतुर्मास्वनन्तरं जयबल्लभगणिः श्रीपूज्यप्रदत्तं सर्वशिक्षासमन्वितं लेखं गृहीत्या श्रीभीमपल्लयां श्रीराजेन्द्र- चन्द्राचार्याणामन्तिकै समायातः । ततः श्रीमदाचार्या जयवल्लभगणिप्रमुखसाधुसमन्विताः श्रीपत्नने विहताः । तत्र च विपमकाले महादुर्भिक्षे प्रवर्तमानेऽपि स्वज्ञानध्यानवलेन श्रीचतुर्विधस्य संघस्य कुशलं परि...सिद्धिरामावदातैर्निजगुरु- श्रीमत्पूज्यादेशप्रतिपालननिमित्तैः श्रीराजेन्द्राचार्यवयः सं० १३७७ ज्येष्ठायैकादश्यां कुम्भलमे श्रीमूलपदस्थापना- महोत्सयविनिश्चयश्चाकृत । पचाच्ट्रीश्रीचन्द्रकुलावतंसेन श्रीजिनशासनप्रभावनाकरणनिरतेनौदार्यविनिर्जित...सा० जाल्हणपुत्ररत्नेन साधुराजतेजपालसुश्रावकेण वभ्रातृसा. रुदपालपरिपृतेन मृलपदस्थापनामहोत्सवकारापणाप • भारं श्रीमदाचार्याणां प्रसादादगीकृत्य, चतुर्दिक्षु श्रीपोगिनीपुर-श्रीउच्चापुर-श्रीदेवगिरि-श्रीचित्रकूट-श्रीस्तम्भती- दर्याक समग्रजनपदनगरग्रामवास्तव्यसमग्रविधिमार्गसुश्रावकाणां तदिनोपरि समाकारणाय फुकुमपत्रिकां दत्त्वा लेसवाहकाः प्रेपिताः । पश्चात् सर्वस्थानकविधिसमुदायाः प्रमुदितवदना अहमहमिक्रया महाविपमकाले प्रवर्तमानेऽपि 'तदिनोपरि श्रीपत्तने समाजग्मुः । ठ० विजयसिंहोऽपि श्रीपूज्यप्रदत्त मूलपदयोग्यशिष्यस्थापनशिक्षाचिष्ठिका...कं गृही- खाश्रीयोगिनीपुरा तदिनोपरिश्रीपत्तने समायातः। ततः सस्थानकसमुदायसमागमनं ज्ञात्वासप्रतिवाता निर्वाहणा- अनैतिभिः (१) श्रीराजेन्द्रचन्द्राचायः श्रीजिनचन्द्रमरिमगडावासमूलस्तम्भप्रायसकलविद्यापाठनाद् द्वितीयोपाध्या- यश्रीविवेकसमुद्रमहोपाध्याय-प्रवर्तकजयबहभगणि-हेमसेनगणि-वाचनाचार्यहेमभूपणगणिप्रमुरागमाधुत्रयसिंगन्मे- लापके श्रीजयदिमहत्तरा-प्र० बुद्धिममृद्धिगणिनी-प्र०प्रियदर्शनागणिनीप्रमुसमाघीत्रयोविंशति-सर्वथानकमर्वस- मुदायमहामेलापके च जयपालभगणिहस्तक-श्रीमत्पूज्यसहस्तप्रदत्तलेसः, ठ० विजयसिंहहम्नका श्रीमत्पूज्यबह- स्तप्रदत्ता गोलकमध्यस्था चिष्टिका च याचिता । तदाफर्णनात् तत्क्षणादेव चतुर्विधसंयोऽपि नानिधानप्राप्तिनदर्प- काटोलामृतपूरितो नृत्य कर्तुमारेमे। पचाट्रीमदाचापरस्पलितनिजगुवाप्रतिपालनोयतैः समातिपयशालिमिः श्रीच. * अब पुनः मूरादर्श २५-२५ अक्षरमितः पद्दतिमागः शून्यरूपेण मुत्तोऽस्ति ।

खरतरगच्छालंकार तुर्विधविधिसंघपरिवृतैः साधुराजतेजपालप्रमुखनानास्थानसमुदायैरहमहमिकया स्थाने स्थाने कार्यमाणेपु प्रेक्षणीयेपु.. दीयमानेपु स्वर्णरजतकटकतुरगवखानदानेपु, नानाविधकाव्यं परम्पराभिः पठत्सु बन्दिवृन्देषु, क्रियमाणेपु महदिक-- सुश्रावकलोकैः श्रीसाधर्मिकवात्सल्येषु, वाद्यमानेप्वहर्निशं द्वादशविधनान्दीतूर्येषु, संजायमानासु संघपूजासु, स-- शिक्षासमन्वितश्रीपूज्यप्रदत्तगोलकचिष्ठिकालेखानुसारेण सर्वलम्धिवितानसंस्मारितपूर्वगणधराणामुटभाग्यप्रताप- लकेश्वराणां स्थैयौदार्यगाम्भीर्यादिगुणावलीसमुपार्जितहीराट्टहासराकाशशाङ्ककरनिकरसोदरगोक्षीरधाराहारिहारपालेयो. ज्ज्वलदन्तिदन्तक्षोदसमानपशकाचकरपूरवासितविश्ववलयानां स्वसहाध्यायिनां नवनाट्यरसावतारतात्कालिक- सम्पादितनवनवविच्छित्तिकाव्यपरम्पराविस्मापिताशेपकोविदचक्राणां शानध्यानाविशयसंस्मारिसकलपूर्वपुरीणां निखि- लविद्यापारीणानां वाक्चातुरी विनिर्जितसुराचार्याणां मन्त्रीश्वरराजकुलप्रदीपमधी ठ० जेसलरत्नकुक्षिधारिणीमत्रिणी- जयतश्रीपुत्राणां चत्वारिंशद्वर्पप्रमाणानां समग्रयुगप्रवरागमकमलाकेलिनिलयानां वाचनाचार्य.........श्रीशान्ति- नाथदेवाग्रे सकल... .श्रीगूर्जरत्रामुकुटकल्पनरसमुद्रश्रीपत्तनवास्तव्यनानामहद्धिकस्वपक्ष-परपक्षमहाव्यावहारिका- संख्यलोकगुरुतरानेकराजलोकचेतचमत्कारकारी म्लेच्छयहुलेऽपि समग्रजनपद श्रीश्रेणिक-श्रीसम्प्रति-श्रीकुमारपाल-- महाराजाधिराजवारकवत् श्रीयुगप्रधानपदवीसंस्थापनमहामहोत्सवश्चके । श्रीपूज्योपदिष्टश्रीजिनकुशलमूरय इति नाम- निर्माणश्रीपूज्यदापितश्रीपूज्यसमवसरणप्रदानपूर्वकं श्रीयुगप्रवरागमश्रीजिनचन्द्रसूर्यादेशप्रासादोपरि महाकलशाधि- रोपश्च चक्रे । तस्मिन् महोत्सव सम्पूर्णाचिन्त्यमनोरथमालेनोदारचरित्रेण साधुराजतेजपालेन सर्वस्थानकवास्तव्यः श्रीच. तुर्विधसंघः समग्रोऽपि वस्त्र प्रदानपूर्व बहुमानितः । अनेकगच्छाश्रिताः शतसंख्या आचार्याः सहस्रसंख्याः साधवश्व वखादिप्रदानेन रलिकचित्ताः कृताः। समस्तवाचकाचार्योऽपि सम्पूरितमनोरथः कृतः । साधुराजसामलपुत्ररत्नेन' सर्वसाधर्मिकवत्सलेन श्रीभीमपल्लीसमुदायमुकुटकल्पेन पुरुपसिंहेन साधुराजवीरदेवसुश्रावकेण, श्रीश्रीमालकुलो- स-सा० बजलपुत्ररत्नसाधुराजसिंहेन, मत्रिदलकुलोत्सेन राजमान्येन श्रीदेवगुर्वाज्ञाचिन्तामणिविभूषितमस्तकेन ठ.. विजयसिंह-४० जैनसिंह-ठ० कुमरसिंह-ठ० जवनपाल-ठ० पाहाप्रमुखश्रीमत्रिदलीयसमुदायेन, साधुराजसुभटपुत्र- रत्न-सा मोहण-म०धनू-झांकाप्रमुखश्रीजावालिपुरीय-सा० गुणधरप्रमुखश्रीपचनीय-साहु तिहुणाप्रमुखश्रीवीजा-- पुरीय-ठ० पउमसिंहप्रमुखश्रीआशापल्लीय-गो० जैत्रसिंहप्रमुखश्रीस्तम्भतीर्थीयसमुदायैश्च श्रीसंघपूजा-श्रीसाधर्मि- कवात्सल्याधारितसत्रनिर्माणपूर्वकममेयं स्वस्खापतेय सफलीचक्रे । तस्मिन्नर दिन श्रीमालारोपणादिनन्दिमहामहो- त्सवः श्रीपूज्यैश्चक्रे । ततः श्रीसमुदायेन श्रीशान्तिनाथदेवाग्रे युगप्रधानश्रीजिनकुशल रिपनिवेशनसंस्तवनार्थ गुरु तरोत्साहपूर्वकमष्टावष्टाह्निकाः कृताः। ९२. तदनन्तरं श्रीपूज्याः श्रीजिनकुशलमूरयः प्राप्तयुगप्रधानराज्या महामिथ्यात्वशत्रूचाटनाय दिग्विजयं कर्तुकामाः साधुवीरदेवसुश्रावककारितगुरुतरप्रवेशकमहोत्सवाः श्रीभीमपल्लयां प्रथमां चतुर्मासी चक्रुः । ततश्व सं०१३७८ माघ- शुक्लतृतीयायां साधुवीरदेवप्रमुखसकलश्रीभीमपल्लीसमुदायेन श्रीपत्तनीयसमुदायमहामेलापकैन सकलजनमनश्चमत्कार- कारी दीक्षोत्थापना-मालारोपणादिनन्दिमहामहोत्सवः श्रीसाधर्मिकवात्मल्यश्रीसंघपूजादिनानाप्रभावनापूर्वकं कारितः। तस्मिन् महोत्सवे श्रीराजेन्द्रचन्द्राचार्यवर्येण माला गृहीता, देवप्रभमुनेदीक्षा दत्ता, वाचनाचार्यहेमभूषणगणेः श्रीअभि- पेकपदम् , पं० मुनिचन्द्रगणेाचनाचार्यपदं प्रदत्तम्। तस्मिन्नेव च वर्षे स्वप्रतिज्ञातार्थप्रतिपालनप्रवीणः श्रीपूज्यः स्वज्ञानध्यानपलेन सकलगच्छातुच्छवात्सल्यसमुद्यतानां श्रीविवेकसमुद्रोपाध्यायराबानामायुरोपं विज्ञाय श्रीमीम- पल्लीतः श्रीपत्तने समागत्य ज्येष्ठाद्यपक्षचतुर्दशीदिन आरोग्यशरीराणामपि श्रीविवेकसमुद्रमहोपाध्यायानां चतुर्विध. संपेन सह मिथ्यादुष्कृतदानं दापयित्वा, गुरुतरश्रद्धानपूर्वकमनशनं प्रत्याख्यानं च दत्तम् । तदनन्तरं च श्रीपूज्यपा- १'रलीयायत' इति । ।

+ युगमधानाचार्यगुर्वावली। दारविन्दं ध्यायन्तः श्रीपञ्चपरमेष्ठिनमस्कारमहामन्त्रं स्मरन्तो नानाविधाराधनामृतपानं कुर्वन्तः श्रीसमुदायकृतप्रोत्स- पणाः स्वकर्णाभ्यां श्रीउपाध्याया आकर्णयन्तो ज्येष्ठसुदिद्वितीयायां सकलामरगुरुजयनार्थ स्वर्गे प्राप्ताः । पश्चाच्छ्री- पत्तनीयसमुदायेन गुरुतरविमाननिर्माणपूर्वकसकलजनमनश्चमत्कारकारी निर्वाणमहामहोत्सवः कृतः । तदनन्तरं च श्रीपूज्यैः स्वकीयसुगुरुश्रीजिनचन्द्रमुरिस्वसहाध्यायिश्रीराजेन्द्राचार्य-श्रीदिवाकराचार्य-श्रीराज- शेखराचार्य-वा० राजदर्शनगणि-वा० सर्वराजायनेकमनिमण्डलीपाठकानां वारत्रयं भणितश्रीहैमव्याकरणहपुँति- पत्रिंशत्सहस्रप्रमाणथीन्यायमहातकर्कादिसर्वशाखाणां सकलगच्छगौरवाणां श्रीविवेकसमुद्रोपाध्यायानां स्तूपं श्रीसमु- दायपाश्चात् कारापयित्वा अपाढशुक्लत्रयोदश्यां महता विस्तरेण वासक्षेपः कृतः। ततः श्रीपत्तनीयसमुदायाभ्यर्थनया श्रीपत्तने द्वितीया चतुर्मासी कृता । ९३. ततः सं०१३७९ वर्षे मार्गशीर्षवदिपञ्चम्यां नानानगरपामवास्तव्यासंख्यमहद्धिकसुश्रावकलोकमहामेलापकैन श्रीसाधर्मिकवत्सलेन श्रींजिनशासनप्रोत्सर्पणाप्रवीणेनोदारचरित्रेण दक्षदाक्षिण्यौदार्यधैर्यगाम्भीर्यादिगुणगणमालालङ्क- तसारेण युगप्रवरागमश्रीजिनप्रबोधसूरिसुगुर्वनुजसाधुराजजाह्नणपुत्ररत्नेन स्वभ्रातृ-सा०रुदपालकलितेन साधुराजतेज- पालसुश्रावकेण दिनदशकादारभ्य संजायमानेषु महाप्रेक्षणीयेषु, दीयमानेषु तालारासेपु, नृत्यमानेष्ववलावृन्देपु,दीप- मानेष्वमेयस्वस्खापतेयेषु, क्रियमाणेषु श्रीसंघपूजाश्रीसाधमिकवात्सल्यावारितसत्रेषु, सकलगूर्जरत्रामुकुटभूतश्रीपत्तनीय- महामहद्धिकमहाजनलोक-राजलोकमहामेलापकेन महिष्ठजलयात्रापूर्वकं गुरुतराचर्यकारी खपक्ष-परपक्षचेतोहारी प्रति- -ठामहामहोत्सवः श्रीशान्तिनाथविधिचैत्ये कारितः । तस्मिन्नेव दिने श्रीशत्रुज्जयतीर्थोपरि साधुराजतेजपालादिसमुदाय- कारितश्रीयुगादिदेवविधिचैत्यप्रारम्भः सा नरसिंहपुत्ररत्नश्रीदेवगुर्वाज्ञाप्रतिपालनोद्यतखींवडसुश्रावकोयमेन संजातः । समिन् महोत्सवे श्रीशान्तिनाथप्रमुखश्रीशैलमय-समय-पित्तलामयविम्बानां सार्धशतं खकीयं मूलसमयमरणद्वयं श्रीजिनचन्द्रसरि-श्रीजिनरत्ननरिप्रमुखनानाधिष्ठायिकानां मूर्तयश्च श्रीपूज्यैः प्रतिष्ठिताः । तस्मिन् महोत्सवे थीभीमप- इट्टीसमुदायमुकुटकल्पेन सा श्यामलपुत्ररत्रेनोदारचरित्रेण साधुवीरदेवेन श्रीपत्तनीय-श्रीभीमपल्लीय-श्रीआशापल्ली- यसमुदायेन श्रीसंघपूजा श्रीसाधमिकवात्सल्यैः साधुसहजपालपुत्रसा० धिरचन्द्र-साधीणापुत्रसा० खेतसिंहप्रमुखश्रा- बकैः श्रीइन्द्रपदादिमहामहोत्सवनिर्मापणादिना महती प्रभावना चक्रे । ततः श्रीवीजापुरीयसमुदायाम्यर्थनया श्रीपूज्याः श्रीबीजापुरीयसमुदायेन सह श्रीबीजापुरे सकललोकाचर्यकारकगुरुतरप्रवेशकमहामहोत्सवपूर्वकं थीयासुपूज्यदेवमहा- तीर्थ नमश्चक्षुः । ततः श्रीबीजापुरीयसमुदायेन सह श्रीत्रिशृङ्गमके विहृताः। तत्र च साधुराजजेसलपुत्ररताभ्यां श्री- जिनशासनप्रभावकाभ्यां साधुराजजगधर-साधुसलक्षणसुश्रावकाम्यां सकलजनमनयमत्कारकार्यनेकसहस्रसंख्यलोकम- हामेलापकैन प्रवेशकमहामहोत्सवः कारितः । ततः स्थानाच्ट्रीआरासणमहातीर्थे श्रीतारङ्गकमहातीर्थे श्रीबीजापुरीयश्री- त्रिशङ्गमकीयसमुदायेन सह मत्रिदलकुलोत्तंसश्रीदेवगुर्वानाप्रतिपालनोद्यत-ठ० आसपालपुत्ररत्न-ठजगत्सिंहमुथार- कामुराश्रीसाधर्मिकवात्सल्यश्रीसंघपूजां श्रीअवारितसत्रमहाध्वजारोपादिनानाविधोत्सर्पणापूर्वकं तीर्थयात्रां कृत्वा श्रीपत्तने तृतीयां चतुर्मासी चक्रुः । तदनन्तरं सं० १३८[.] वर्षे कार्तिक शुक्लचतुर्दश्यां श्रीजिनशामनप्रभावनाकरणप्रवीणेन स्वपूर्वअमरुसलीकल्प- वृक्षसाधुराजयशोधयलयत्साधर्मिकवत्सलेन निर्गर्यचूडामणिना साधुश्रीचन्द्रकुलप्रदीपश्रीजिनप्रयोपचरिमुगुरुचक्रव- पर्यनुजसाधुजाहणपुत्ररसेन युगप्रवरागमश्रीजिनकुशलमरिमुगुरुराजपट्टाभिपेककारापणोपार्जितद्दीरागृहासहारतुपादिम- करकरनिकरगोक्षीरधाराधवलपदपुण्ययशःप्राग्भारेण साधुराजतेजपालमुश्रावण स्वानुनमाधुरुदपालपरियतेन श्रीशा. अपनिप्पयमानविधिचंत्ययोग्यमूलनायकश्रीयुगादिदेवविम्यं सप्तविंशत्यगुलप्रमाणं कर्पूरमदृशं कारपिता, मफलम्या- नवास्तव्यसर्वसमुदायान् कुद्धमपत्रिकादानपूर्वकं समामन्य, क्रियमाणेघपारितमपु, दीयमानेवमेयेषु वसापनयेपु, खरतरगच्छालंकार गीयमानेपहनिरामविधवसुधवाभिर्नारीमी रासम्पन्देषु, नृत्यमानेषु खेलकममूहेषु, सम्पद्यमानेपु श्रीसाधर्मिकपास- ल्येपु, समग्रश्रीपत्तनीयमहामहद्धिकव्यवहारिकलोक राजलोकमहामेलापकेन गुरुतरजलयानानिर्माणपूर्वकं सकलजनम- नश्चमत्कारकारी नानाभगोपार्जितपापसंभारापहारी प्रतिष्ठामहामहोत्सवः सविस्तरतरः कारितः । तसिन् महोत्सवे साधु- तेजपालकारितश्रीयुगादिदेवप्रमुखानेकशैलमय पित्तलामयविम्यानां श्रीजिनप्रयोधमरि-श्रीजिनचन्द्रमरिमृतींनां श्री- कपर्दयक्ष-श्रीक्षेत्रपालाम्बिकायधिष्ठायिकानां नानासुश्रावककारितानां प्रतिष्ठा संजाता। श्रीशशुञ्जयप्रासादयोग्यद- ण्डध्वजप्रतिष्ठा च । तस्मिन् महोत्सवे साधीणापुत्ररत्नसाखेतसिंहादिसुश्रानकैरिन्द्रपद-श्रीयुगादिदेवमुखोद्घाट- 'नादिमालाग्रहणपूर्वकममेयं वखापतेयं सफलीकृतम् । मार्गशीर्षवदिषष्ट्यां च सविस्तरतरः श्रीमालारोपण-श्रीसम्य- ज्यारोप-सामायिफारोप-परिग्रहपरिमाणादिनन्दिमहामहोत्सवच कृतः। ९४. तदनन्तरं सं०१३८० श्रीयोगिनीपुरवास्तव्येन श्रीश्रीमालकुलोत्तंसेन गगाम्युप्रवाहातखच्छाशयेन श्रीजिनशा- सनप्रभावनाकरणप्रवीणेन पूर्व कृतसनिस्तरतरश्रीफलवधिंकामहातीर्थयात्रोत्सवेनोद्भटभाग्यप्रतापलङ्केश्वरेण दानाध:- कृतमकलविश्वम्भरादावर्गेण साधुहरुपुनरत्नेन साधुश्रीरयपतिसुश्रावकैण राजमान्यप्रमानफनिदेशरिख्यातोद्भटचरि- त्रस्वपुनरत्नसाधुराजधर्मसिंहपार्धात् पातसाहिश्रीग्यासदीनमहाराजाधिराजफुरमाणं सकलमीरमलिकशिरोमधूननकारक श्रीराजप्रधानश्रीनेबसाहाय्येन निष्कासयित्वा, श्रीपूज्याना श्रीपत्तनस्थिताना समीपे, श्रीशत्रुञ्जयोजयन्तादिमहातीर्थ- यात्रामरणार्थ स्वविज्ञप्तिकादानपूर्वकं मानुपाणि प्रेषितानि । तदनन्तरं सकलातिशयनिधाननिध्यानादिगुणगणानुकृतसकलपूर्वयुगप्नधानः श्रीपूज्यैः श्रीजिनकुशलसरिभिः सम्यक् परिभाव्य श्रीतीर्थयानाकरणादेशः प्रदत्तः । तदारर्णनादेव हापुलचेतसा साधुश्रीरयपतिसुधारकेण प्रभाव- कोदारचरित्रपुत्ररत्नसाधुमहणसिह-साधुधर्मसिंह-साधुशिवराज-साधुअभयचन्द्र-पौनभीष्म-भ्रात्साधुजवणपालादि- सारपरिवारपरिपतेन थीपूज्योपदिष्टविधिना श्रीयोगिनीपुरसमुदायमुकुटकल्पमत्रिदलकुलोत्तसंसाधुजरणपाल-श्रीदेव- गुर्वाज्ञाप्रतिपालनोवतश्रीश्रीमालीयसाघुभोजा-सा छीतम-ठ० फेरू-धामइनापास्तव्य सा०रूपा-सा वीजाप्रमुस-प- श्वउलीसा क्षेमन्धरप्रमुख-श्रीलूणीवडीपास्तव्यसमुदायान् श्रीयोगिनीपुरप्रत्यासन्नानेकग्रामसमुदायांश्च मेलपित्या, स्वपुत्ररत्नसाधुराजधर्मसिंहराजनलेन अत्थसंअण(?) श्रीयोगिनीपुरराजमार्गेण चायमानेषु द्वादशविधनान्दीत्र्येषु,दीय- मानेषु रासकेषु, गीयमानेषु गीतेपु, पठत्सु श्रीसुरनाणादिमहाराजान्दिवृन्देषु, दीयमानेपु कनकाश्वपट्टांशुकादिना- नाविधेपु दानेषु, अश्वाधिल्यापमानबोलपरम्परारधिरीकुताशाचने', प्रथमवैशासवदिसप्तम्यां नूतनकारितासाद- सदृशः श्रीदेवालयस्य चतुर्विधसंघसमन्वितस्य निष्क्रमणमहामहोत्सवः कृतः । तदनन्तर प्रथमदिनादारभ्य प्रतिदिनमगारितसरं कुर्वाणो गुर्गाडम्बरेण साधुश्रीरयपतिसुश्रामकः समग्रसंघान्वितः श्रीकन्यानयने समायातः। तर च श्रीयुगप्रधानश्रीजिनदत्तरिप्रतिष्ठितश्रीमहावीरदेवतीर्थराजस्य यानानिर्माणपूर्वकं समग्रम्लेच्छानामपि सम्यक्त्वदायिनी प्रभावना कृता । ततः स्थानाच श्रीजिनशामनप्रभावकमक्लोत्समधुराधुरीण| पूना-श्रे. पमा-श्रे राजा-श्रे०रातू-ठल्देपाल-साधुराजकाला-सारद्र(?)पूनाप्रमुखश्रीसमुदायो गुडम्बरेण मा०देदाप्रमुख- श्रीआसिकासमुदायः श्रीसंघेन सह प्रचलितः । तदनन्तर ग्रामनगरादिषु प्रोत्सर्पणा पुर्माणः सोऽपि संघः श्रीनर- भटे समायातः । तत्र च श्रीजिनदत्तमूरिप्रतिष्ठित नवस्फटाविभूषितं सातिशयप्रधान श्रीपार्श्वनाथदेवाधिदेवं नाना- विध ...पूर्वकं सरलसंपेन नमश्चक्रे । ततः स्थानाश मा०भीमा-सा देवराजादिममुदायः श्रीसंघेन सह प्रचलितः। तदनन्तर साट्वास्तव्यसागोपालप्रमुसनानानगरपामनास्तव्यानेकानमः श्रीननहा-झञ्झनास्तव्यसाकाहार- मुसरिधिसमुदायादिश्रापकाच संघेन सह प्रस्थिताः। ततः पश्चात् श्रीजिनशामनप्रभावना वणिः ससंघपमन्वितः साधुश्रीरयपतिसुश्रावकः श्रीफलपर्धिकाया श्रीपार्श्वनाथदेवयानाथं समायातः । तत्राऽऽगते माधुश्रीरपपतिसंघममुद्रे.

युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ७३ तुमपत्रिकाप्रदानपूर्व पूर्वमाकारित श्रे हरिपालपुत्ररत्न श्रे०गोपाल-सा पासवीरपुत्र सानन्दन-सा हेमलपुत्र सा० कडया-सा पूर्णचन्द्रपुत्रप्रभावक सा हरिपाल-सा पेथड-सा चाहड-सा०लाखण-सा०सीवा-सा०सामल-सा कीक- टप्रमुखश्रीउचकीय-साध्वस्तुपालप्रमुखश्रीदेवराजपुरीय-श्रीक्यासपुरवास्तव्य सा०मोहणप्रमुससमुदाय-सान्ताहण- प्रमुखश्रीमरुकोट्टसमुदायादिसकलसिन्धुनगरपामसमुदायाः,सालसमसिंहप्रमुसश्रीनागपुरादिसपादलक्षसमुदायाः, सा० आंबाप्रमुखधीमेडतासमुदाय-म०केल्हाप्रमुखश्रीकोसबाणासमुदाया नदीनां प्रयाहा इव अहमहमिकया प्रविष्टाः । ततः स्थानात संघः सर्वोऽपि सामेलूप्रमुखश्रीगुडहासमुदायमात्मना सह गृहीत्वा श्रीजावालिपुरे सकलराजलोकनगरलोक- खीममुदायकृतमहाप्रवेशकोत्सवः समायातः । तत्र च गुर्याडम्बरेण सकलविपक्षहृदयकीलकानुकारिणी श्रीचैत्यप्रपा- व्यादिप्रभागना श्रीसंघेन कृता । ततः स्थानाच सा महिराज-कोरण्टकवास्तव्यसा गालाममुसानेकखपक्षपरपक्षीयाः श्रापका यात्रार्थ संघेन सह प्रचलिताः । पश्चात् सर्वोऽपि संघः श्रीश्रीमाले श्रीशान्तिनाथदेवयात्राम् , श्रीभीमपल्लयां श्रीवायडे च श्रीमहावीरदेवयात्रां च गुरुतरप्रभावनापूर्व निर्माय, ज्येष्ठवदिचतुर्दश्यां श्रीगूर्जरत्रामुकुटकल्पे प्रभूतम्ले- उपवहारिकममृहसंकुले श्रीपत्तने महाराजाधिराजसैन्यलीलां दधान आवासितः । पश्चात् सफलस्वपक्ष-परपक्षाऽथयों- त्पादनपूर्वकं श्रीदशार्णभद्रमहाराजाधिराजवन्महा महाभक्त्या च श्रीशान्तिनाथस्थावरतीर्थ युगप्रवरागममुगुरुचक्र- यतिथीजिनकुशलमरिचरणारविन्दं जगमतीर्थ च सुवर्णरत्रवृष्टिनिर्माणपूर्वकं साधुराजश्रीरयपति-सा महणमिहना- सनानास्यानपास्तव्यसर्वसमुदायैर्नमश्चक्रे । तदनन्तरं श्रीशान्तिनाथपुरतो महामहर्याध्याद्विकामहोत्सव कुणिन श्री- संपेन श्रीपत्तनीयदेवालयेषु, अश्वाधिरूढेपु वाद्यमानेषु ढोल्लेषु, दीयमानेष्वमेयेषु खस्खापतेयेपु, घमघमायमानेपु द्वाद- शविधनान्दीतूर्येषु, असंख्यलोकमहामेलापकेन सकलजनचेतश्चमत्कारकारिणी मिध्यादृशामप्युपहाद्वारेण श्रीमम्य- योपार्जनदायिनी असहिष्णुलोकहृदयशल्यानुकारिणी सविस्तरसरा चैत्यप्रपाटी कृता । ९५. तदनन्तरम् , सकलसंघमुकुटकल्पसंघपुरुपसाधुश्रीरयपति-सकलसंघभारनिर्वाहणप्रवीणसा महणसिंह-३० गोपाल-सा० जवणपाल-सा० काला-सा० हरिपालप्रमुखश्रीदेशान्तरीपसमुदायमुख्यमुश्रानकैः, साधुराजजाहणाल- प्रदीपमकलोत्मवनिर्मापणोपार्जितपुण्यकदम्पकमाधुराजतेजपाल-श्रीश्रीमालालोत्तमसाधुगजछजल[ . ...]युलाप- चंगफमाधुश्रीरयपतिसंघागीकतपाचात्यपदनाग्भारनिरुपमनिहिणोयतसाधुराजराजसिंह-साधुश्रीपतिपुत्रग्समाधुाल- चन्द्र-साधीगापुत्ररत्नसा गोसलप्रमुराश्रीपचनीय-धीहम्मीरपत्तनीयसमुदायमुख्यमुवाच त्यक्तामन्मार्गाम- त्याशौचायन्यायालतगात्रप्रचण्डकलिकालभूपालभयाकम्पमानः श्रीपूज्यश्रीजिनकृशलमरिधर्मचक्रीन्द्रपादा विशताः पत्-‘स्वामिन् । प्रत्यासनायामपि वर्षायां समागतायाम् , मालसंघोपरि महत्ममादं निघाय अनेकोपयादि- महाभयलिष्ठदुष्टकलिकालमहीपालमृतापक्षणाय प्रमय तीर्थविजययात्रायां पादारधारणं क्रियतां येनामाकं मन- विन्तितार्थमम्परयतत्क्षणादेव सम्पनीपयन्त' । पचा दाक्षिण्यैफमहोदधपः परोपकृतिकरणोपतादनिशयुद्धपः श्रीभा- याइमिमूरि-धीरपरस्वामि-श्रीमदभयदेवरि-श्रीजिनदत्तरिप्रमुखानेकयुगप्रवरागमानदातानुकार्यवदाननिर्मापणो. पार्जिनमत्कीर्तयः श्रीजिनामालगायः- जो अवमग्नइ संघं पायो धोयं पिमाणमपलित्तो। सो अपाणं पोला युक्रमाामागरे भीमे ॥१॥ [८] सिरिममणसंघमासागणाओ पायिनि दुर जीया । सं माहिउं ममत्यो सद परि भययं जगो होना [८८] नित्यपणामं फाउं को माहारणेण महणं । मम्पेसि सती जोपणनावारिणा भायं ॥३॥ + .

खरतरगच्छालंकार तपुस्विपा अरहया पूइयपूया य विणयकम्मं च । कयकियोऽवि जह कह कहेइ नमए तहा तित्थं ॥४॥ [९०] इत्यादिश्रीआवश्यकादिसिद्धान्तानुसारेण; "या संसारनिरासलालसमतिर्मुक्त्यर्थमुत्तिष्ठते, यं तीर्थ कथयन्ति पावनतया येनास्ति नान्यः समः । यस्मै तीर्थपतिनमस्यति सतां यस्माच्छुभं जायते, स्फुतिर्यस्य परा वसन्ति च गुणा यस्मिन् स संघोर्च्यताम् ॥१॥ [९१] लक्ष्मीस्तं स्वयमभ्युपैति रभसात् कीर्तिस्तमालिङ्गति, प्रीतिस्तं भजते मतिः प्रयतते तं लन्धुमुत्कण्ठया। स्वःश्रीस्तं परिरन्धुमिच्छति मुहुर्मुक्तिस्तमालोकते, यः संघं गुणसंघकेलिमदनं श्रेयोरुचिः सेवते ॥२॥" [९२] इत्यादिपूर्वाचार्यवाक्धैश्व श्रीसंघः श्रीतीर्थकराणामपि मान्यः किमस्मादृशामिति सचेतसि परिभाव्य, प्रत्या- सन्नमानिनी चतुर्मासीमप्यवगणय्य, श्रीसंघगाढनराग्रहं च ज्ञाला, श्रीपूज्याश्चक्रीन्द्रसमानाः प्रधानसाधुमप्तद- शसंसेव्यमानचरणारविन्दाः, श्रीजयर्द्धिमहत्तराप्रमुस-पुण्यसुन्दरीगणिनीप्रमुखसाध्व्येकोनविंशतिपरिवृताः, साधुश्री- रयपतिसुधारकं श्रीचतुर्विधसंघसैन्ये समग्रसन्याधिपसेनानीसमानं विधाय, साधुराजसिंह च संघसैन्यपाश्चात्यपद- प्राग्भारनिहिणपदे निधाय, सा०महणसिंह-साजरणपाल-सा भोजा-सा काला-ठ०फेरु-ठ देपाल-गोपा- ल-साधुराजतेजपाल-साधुराजहरिपाल-मा०मोहण-मा गोसलप्रमुसानेकमहद्धिकसुश्रानकमहारथान् सञ्जयित्वा श- कटपञ्चशती अश्व[ ]शतीसंरयसुभटपदातिवर्गप्रमाणेन श्रीसंघसन्येन सह वाद्यमानेषु निःखानप्राग्रेषु अश्वाधिरू- ढेषु ढोल्लेपु, गु डम्बरेण कलिकालभूधरनिर्जगार्थ खकार्यसिद्धयर्थ च ज्येष्ठ शुक्लपष्ठीदिने शुभमुहूर्ते स्वगुरुश्रीजिन- चन्द्रमुरिराज ध्यायन्तः प्रचलिताः । तदनन्तरम् , प्रतिदिनं संजायमानेपपारितसनेषु, प्रतिपदं दीयमानेपु रासकेषु, श्रीसंघसैन्यौस्थिवरज-परम्परा. समाच्छादिताम्बरीशागणेपु, भविष्यत्क्षुल्लकानां दीयमानेषु प्रतिदिनं महा पुष्पांकदानेषु, सकलनगरग्रामा- धिपमलिक-हिन्दुकादिसमग्रलोकसंसेव्यमानश्रीसंघसैन्याधिपे च श्रीशद्वेश्चरे श्रीपार्श्वनाथतीर्थराजं नमस्कृत्य, श्री. महापूजामहाघजारोपादिना प्रभावनां पिघाय, क्रमक्रमेण दण्डकारण्यप्राय वालाफदेशमतिरम्य, समग्रम्लेच्छाधिप- कृतसाहाय्याः श्रीपूज्या निरागाधवृत्त्या सर्वसंघममन्विताः समग्राधिष्ठायककृतमान्निध्याः श्रीगजुञ्जपतलहट्टिकायां , प्राप्ताः। तत्र च श्रीपाश्वनाथदेवयानां विधाय अपाढदिषष्ठीदिन सफलतीर्थावलीप्रधानं सातिशयनिधानं शत्रुञ्जय- शैलालङ्कारायमाणं श्रीयुगादिदेयतीर्थराजं सरलसंघपरिवृताः श्रीमत्या नव्यालङ्कारमारनूतनकृतस्तुतिस्तोतन- मस्कारनिर्माणपूर्वकं नमस्कृतवन्तः। साधुश्रीरयपतिसुश्रारण पुरकलरपरिधृतेन प्रत्येक प्रत्येक नागपु हेमटकैः प्रथमा पूजा कृता कारिता च; अन्यैर्महदिरमुश्रापकैथ रूप्यटकादिना पूजा कृता । तस्मिन्नेर च दिने श्रीयुगादिदेव- पुरवो देवभद्र-यशोभद्रक्षुल्लकयोः सविस्तरतरो दीक्षामहामहोत्सवः कृतः । तदनन्तरम् , श्रीजिनशासनप्रमावनाकरणप्रगुणेन श्रीदेवगुर्वानाप्रतिपालनममुद्यतेन माधुश्रीरयपतिमहासंघ- पाश्चात्यपदप्राम्भारनिहिणेनागारिताहनिशानदानोपार्जितपुण्ययशःप्राग्भारेण चतुर्विधयुद्ध्यतिशयानुकतवीश्रेणिरम- ७५ युगप्रधानाचार्यगुर्वावली । हाराजाधिराजराज्यभारनिर्वाहणप्रवीणश्रीअभयकुमारेण श्रीसुराष्ट्रमहीमण्डलभूपालश्रीमहीपालदेवप्रतिशरीरकल्पसमग्र- संघकार्यनिर्वाहणप्रवीणप्रभावकसाधुराजमोखदेवानुजपरिवृतेन श्रीश्रीमालकुलोत्तंससाधुछजलकुलप्रदीपेन साधुराजसिंह- सुश्रावकेण, वाद्यमानेषु द्वादशविधनान्दीतूर्येपु, दीयमानेषु स्वर्णकटकवस्त्राश्चदानेपु, ध्रियमाणेषु मेघाडम्बरछत्रेषु, ढाल्यमानेषु चामरेपु, गीयमानेषु गीतेपु, संजायमानेषु श्रीसाधर्मिकवात्सल्येपु, निष्पाद्यमानेष्ववारितसत्रेषु, संपद्य- मानासु सविस्तरतरासु श्रीसंघपूजासु, साधुश्रीरयपतिप्रमुखमहासंघमेलापकेन आपाढाद्यसप्तम्यां जलयात्रानिर्माण- पूर्वकमष्टम्यां श्रीयुगादिदेवमूलचैत्ये स्वकारितश्रीनेमिनाथविम्वप्रमुखानेकविम्वानां स्वभाण्डागारयोग्यश्रीसमवस- रणस्य श्रीजिनपतिसरि-श्रीजिनेश्वरमूरिप्रमुखगुरुमूर्तीनां च अनेकभवोपार्जितपापविध्वंसकः स्खशिष्यलब्ध्यनुरञ्जित- पुगप्रवरागमश्रीजिनचन्द्रसरिभिः खर्गात समागतैः कैबिच्छ्राद्धोत्तमैरवलोक्यमानैर्गवेष्यमाणः प्रतिष्ठामहामहोत्सवः समग्रलब्धिनिधानजङ्गमयुगप्रधानश्रीजिनकुशलस रिहस्तकमलेन कारितः । तस्मिन्नेव च दिने साधुराजजाहणकुलप्रदी. पायमानेन सर्वधर्मकृत्याराधनानुकृतश्रीवर्धमानपरमसुथावकाऽऽनन्द-कामदेवादिश्रावकवर्गेण संप्रीणिताशेपयाचकग- येन साधुराजतेजपालसुश्रावकेण खानुजसा०रुदपालसहितेन श्रीपत्तनप्रतिष्ठापितश्रीयुगादिदेवमूलनायकविम्बस्य श्री- समुदायसहितेन कारिते नूतननिष्पन्ने प्रासादे समग्रवैज्ञानिकवर्गफनकहस्तशृङ्कलिका-कम्पिका-पट्टांशुकादिवखसन्मान- दानपूर्वकं श्रीसम्प्रतिमहाराजाधिराजसमानसाधुश्रीरयपतिप्रमुखनानास्थानवास्तव्यसर्वश्रावकवितानमेलापकेन स्थापना प्रासादप्रतिष्ठा च श्रीवज्रखाम्यनुकारिश्रीपूज्यहस्तकमलेन कारिता । नवम्यां सविस्तरतरः श्रीमालारोपण-श्रीसम्य- चचारोपण-श्रीपरिग्रहपरिमाण-मामायिकारोपनन्दिमहोत्सवः श्रीयुगादिदेवमूलचैत्य एव श्रीपूज्यैर्विहितः। तस्मिन् दिने सुसकीर्तिगणेचिनाचार्यपदं दत्तम् , सहस्रसंख्यश्रावकश्राविकाभिनन्यारोहणं च कृतम् । तसिन्नेव च दिने नूतन- निष्पन्ने ग्रामादे सविस्तरतरो धजारोपमहोत्सवः संजातः । एवं दिनदशकं यावच्छ्रीशघुञ्जयशैलोपरि सदावारितसत्र- निर्माणपूर्वकं मुलचैत्य-खचैत्ययोः श्रीमहापूजाकरणपट्टांशुकादिनानावस्त्रेसत्कमहायजादानखानवरदानसम्पूरिता- शेपयाचकमन्तानेन्द्रपदादिविधानादयो महामहोत्सवाः श्रीश्रीमालकुलोत्ससाधुराजहरुकुलप्रासादकुम्भायमानश्रीयो- गिनीपुरारब्धाहनिशनानाविधवस्तुदानाधाकृतकल्पवृक्षसन्तानसाधुधीरयपति-साधुमहणसिंह-साधुराजतेजपाल-साधु- राजराजसिंहप्रमुखसकलसंघेनाहमहमिकया चक्रिरे। तस्मिन् महोत्सवे श्रीउद्यानगरीवास्तव्यरोहंडहेमलपुत्ररत्नेन सा० कडपासुश्रायकेण भ्रातृपुत्र श्रीजिनशासनप्रभावकसा० हरिपालसहितेन द्विवल्लकद्रम्मशत २६७४ श्रीइन्द्रपदं गृहीतम् , मत्रिपदं च सा वीणापुत्ररत्नेन साधुगोसलेन द्रम्मशतपदकेन गृहीतम् । अन्यान्यपि पदानीन्द्रपरिवारयोग्यानि प्रभूतश्रावकथाविकाभिहीतानि । सर्वसंख्यया श्रीयुगादिदेवभाण्डागरे प्रतिष्ठामालोटन-श्रीहन्द्रपदमहोत्सर- फलशमण्डनादिना द्रम्मसहस्र ५० समुत्पन्नाः। ९६. तदनन्तरम् , श्रीपूज्याः सर्वसंघपरिवृताः श्रीयुगादिदेवमुत्कलनं विधाय तलहडिकायां संघमध्ये समायाना। वनः न्याना म्लेच्छसन्योपद्रवात् मर्वशून्यायामन्नातमार्गायामपि सुराष्ट्रायाम् , संप्राप्तायामपि वर्षायाम्, श्रीमयमा. रदेवकनमाहाय्याः श्रीसंघमैन्यमुकुटकल्पप्रचण्डशामनमाधुश्रीरयपतिनशीनासंग्यम्लेशानुगम्यमानमार्गाः श्रीपूज्य- धर्मचकायचतुर्विधसंघसन्यपरिवृताः पोक्तरीत्यय श्रीपत्तनादिमहानगरराजमार्गमन मुग्रीन, अश्वानेकशतादिमहा- नायकादिममग्रराजलोफेन नगरलोफेन च समुपागमनदत्तपहुमाना रजितगजलोक- प्रधानाः श्रीउपन्तमहातीर्थतलहट्टिकापामापासिताः । ता र रागाग्गडमध्ये मालस्वपक्षपरपध-जनतथमन्कार- कारिणी गत्यप्रपाटी संपेन सह विधाय अपाडचतुर्मानमदिने आपालनमानारिगं राज्य राजीमतीपरिहारकारिणं धीउसपन्नालमहाताला श्रीनामामारं नतनकृनम्तुति-स्नोपदानपूर्वक नमः । संघाधिपमापुधीरपपति- प्रमुगमुभारंभ श्रीशअपए सुपर्णशादिना पूजा कना । श्रीशअपयन् (१) उमियर दिने श्रीमालउरनगर- मेलापन मुराष्ट्रालझार-रागार खरतरगच्छालंकार वास्तव्योदारचरित्रप्रभारफनानाभिग्रहग्रहणपूर्वक चन्दनार्थ समागत सा० जगसिह पुत्ररतसाधुजयतासुश्रावक-सद्गार- गढवास्तव्यमहद्धिंकरीहडझांझण-री० रनपुनरत्नसा० मोसादिसुधावकथापिकाणां श्रीमम्यक्त्यारोप-सामायिकारोप- परिग्रहपरिमागादिनन्दिमहामहोत्सवः कृतः। साधुश्रीरयपनिप्रमुखसर्वसंघमुश्रानः शगुञ्जयमहातीर्थपदिनचतुएयं सर्वादरेण महापूजा महायजारोपादिमहोत्समा निर्मिताः । परमिन्द्रपदं च श्रीहम्मीरपत्तनवास्तव्येन श्रीजिनशासन- प्रभावकेण सा० धीणापुत्ररत्नेन सा० गोसलमुबारकेश द्विवल्लकद्रम्मगत २४७४ गृहीतम् । मत्रिपदं च प्रभावक- साधुकालासुबारकपुत्ररत्नेन सा० वीजासुश्रानकेण द्रम्मशताप्टफेन गृहीतम् । शेपसुश्रावकैरन्यानि पदानि गृहीतानि । सर्वसंख्यया श्रीनेमिनाथदेवभाण्डागारे द्विवल्लरुद्रम्मसहस्र ४० उत्पन्नाः। तदनन्तरम् , श्रीनमीश्वरमुत्कलनं रिघाय सर्वसंघममन्विताः श्रीपूज्यराजाधिराजास्तलहट्टिकायो संघमध्ये सम्प्राप्ताः । तत्र च नानानिधोत्माप्रमरनिर्मापणेन प्रचलप्रचण्डकलिकालभूपालोन्मूलनलब्धप्रकर्षान् स्वस्वामिनो वीक्ष्य निजदानतिरस्कृतचिन्तामणि कामधेनु कल्पद्रुमचयेन समुपाजितयशःपुञ्जन साधुश्रीरयपतिसुथारकशेसरेण सा०महणमिहादिपुत्रपरिवृतेन दिनत्रयं यावदहनिशं स्वर्णशङ्कलिफाकटकानपट्टांशुरुश्रीकरीचीनांशकादिवस्तु- कौशल दक्षिणादानेन स्वस्सामिजयसंस्तवनार्य समग्रमुराष्ट्रादेशमध्यपत्पमेययाचकरों यथेच्छ पोपितः। अन्यैरपि साधुराजराजसिंह-साधुराजतेजपाल-सा. हरिपालादिश्रानरसारितसत्रनिर्मापणादिना हर्षप्राकुलः कृतः । ९७. तदनन्तरम् , ततः स्थानाद प्रस्थाय सम्पादितस्वार्थसम्पत्तयः साहाय्यीभृतयुगप्रवरागमश्रीजिनचन्द्रमरि श्री- अम्बिकाप्रमुखनानादेवदेवतापलयो लक्षण-तर्क-साहित्यालङ्कार-नाटक-ज्योतिष्क-मन्त्र-तत्र-छन्दोविधासंस्फुरता तुरगपद-कोष्ठकपूरण-नानालङ्कार-काव्यकरण-चिन्तितादिनानासमस्यापूग्णादिना रञ्जिताशेपफोपिदचक्रचूडामणयः अस्खलिताज्ञैश्वर्यारोपणोपार्जितचन्द्रचन्द्रज्योत्स्नाममानकीर्तयः खानदातोयोतितस्त्रचन्द्रकुलोद्भवानेकपूर्वधरयो युग- प्रधानश्रीजिनपुशलमरिसुगुरुचक्रायः श्रीतीर्थयात्राकरणसफलीकृतात्मजन्मानेकापामसमुपार्जितामेपससापतेये- नाहनिशं श्रीजिनगामनापरमामनोद्भवमहापुरुषसम्हैन्दिवर्गवत्संस्तूयमानेन नानाविधाभिग्रहप्रतिपालनपत्रिीक- ताजन्मदेहेन मनोवाञ्छितार्थसम्प्राप्तिसमुद्भूतमहाहर्पविकमिताननेन साधुश्रीरयपतिप्रमुसमकलरिधिमार्गसंचन सह निरागाधवृत्या वपदापिविराधनानिवृत्त्या शून्यमपि सुराष्ट्रादेशं राजमार्गनदतिलद्धय श्रीसंघनिर्मितासु स्थाने स्थाने संजायमानासु प्रभारनासु, सुसं सुखेन श्रीपत्तनोपरने श्रापणशुक्लत्रयोदश्यां समवसृत्य, दिनपञ्चदशकं च यावच्च- तुर्दिग्भ्यः समागतश्रीचतुर्विधसंघस्य महत्समाधानममुत्पादनार्थ श्रीसंघमध्येवास्थिताः । तदनन्तरम् , भाद्रपदवद्येकादश्यां चिन्तितार्थसम्पादनसमर्थेन साधुश्रीरयपतिसुश्रावकेण सा महणमिहादि- पुत्रपरिवृतेन साधुतेजपाल-साधुराजसिहाम्यां चाहमहमिझया देशान्तरीयसंघममुदाय-श्रीपत्तनीयममग्रस्थपथपरपक्ष- महाजनलोमिहामेलापन दीयमानेषु दानेषु, गीयमानेषुगीनेषु, नृत्यमानेषु सेलस्पन्देपु, पाद्यमानेषु द्वादशानिध- नान्दीतूर्येषु, अश्वाधिरूढनानाढोल्लपादनविस्मापितासिललोकपु,मालराजलोकनगरलोकचेतश्चमत्कारमार्ग ममस्तदुर्ज- नजनहृदयोद्वेगकारी स्वजनजनमनोऽम्भोजवनरिकासनसूर्यानुकारी वचनातिगः श्रीपूज्यराजानां श्रीरामचन्द्र राप्र- वेशकमहामहोत्सनःश्रीपत्तने संजातः। ९८. उदनन्तरम् , साधुश्रीरयपतिः सुश्रावो द्वितीयमारं श्रीपचनीययाचकग संपोष्य ममग्रसंघपरितः श्री- पूज्यराजपादान् मुत्कलाप्य श्रीपचनाद प्रस्थाय, आगमनरीत्यैव व्याने स्थाने प्रभारना कुर्वाणो युगप्रश्रागमश्रीजिन- चन्द्रमरिनिर्माणपनिविते श्रीकोशवाणके ममग्रसंघपरिवृतः प्राप्तः। तर च श्रीजिनचन्द्रमरिस्तूपे महापजारोप-महा- पूजास्नानपिलेपननिर्मापणापारितमत्रकरणतुरगफनकादिदानादिना प्रोत्मर्पणां विधाय, पुनर्दितीयगार श्रीफलादि- .

युगप्रधानाचार्मगुर्वावली। कायां यात्रांच कृत्वा, वस्खादिदानसन्मानपूर्वक देशान्तरीयसंघान् स्वे स्वे स्थाने प्रविष्टान् कृत्या, यथागमनमागेंण श्रीयोगीनीपुरे प्रभूतम्लेच्छसंकुले सुपुत्ररत्नसाधुराजधर्मसिंहकारितनिगमनमहोत्सववत्समधिकतरप्रवेशकमहामहोत्स- 'चैन थीदेवालयसमन्वितः साधुश्रीरयपतिसुश्रावकः प्रविष्टः कार्तिकवदिचतुर्थ्याम् । ९९. तदनन्तरम् , पुनः सं० १३८१ वैशाखबदिपश्चम्यां श्रीपत्तने श्रीशान्तिनाथविधिचैत्ये श्रीयोगिनीपुर- समागतश्रीश्रीमालकुलोत्स-सा०रुदपाल-सान्नीवा-श्रीजावालिपुरागतमत्रिभोजराजपुत्र मसलखणसिंह-रङ्गाचार्यलख- (२)ग-श्रीसत्यपुरागत म मलयसिंह-श्रीभीमपल्लीसमागतसाधुराजवीरदेवप्रमुखसमग्रसमुदाय-श्रीस्तम्भतीर्थागतच्य० छाडा-श्रीघोघावेलाकूलागतसा०देपाल-म०कुमर-साखीमडप्रमुखानेकसुश्रावकसमुदायमहामेलापकेन दिनपश्चद- शकादारभ्य संजायमानेषु महाप्रेक्षणीयेषु, वितीर्यमाणेष्वमेयेषु स्वस्थापतेयेपु, दीयमानेषु तालारासेपु, सम्पद्यमाना- मु सविस्तरतरासुश्रीसंघपूजासु, क्रियमाणेषु श्रीसाधर्मिकवात्सल्याचारितसत्रेण, भविष्यत्क्षुल्लक क्षुल्लिकानांसकललोका- शर्योत्पादनपूर्व दीयमानेषु सविस्तरतरेषु पुप्पाङदानेषु,साधुजाइणपुत्ररत्नाभ्यां समस्तोत्सवसम्पादनोपार्जितातुल्यपुण्य- कदम्बकाभ्यां साधुराजतेजपाल-सा०रुदपालसुश्रावकाम्यां श्रीश्रीमालकुलोत्तस-सा आना-सा० राजसिंह-भण०लूगा- सा० क्षेमसिंह-सा देवराज-भण पद्म-मन्नाप्रमुखसमस्त श्रीपत्तनीयसमुदायपरिवृताभ्यां चतुर्या सविस्तरतमजलया त्राधियासनानिर्माणपूर्वक मकलजनमनश्वेतश्चमत्कारकारी भवभवोपार्जितपापहारी समस्तमहाजनलोकप्रत्यासन्नानेक- ग्रामवास्तव्यलोकमस्तकावधूननकारी प्रतिष्ठामहामहोत्सवः कारितः । तस्मिन् महोत्सवे समग्रलब्ध्यनुकृतश्रीवज्र- स्वामिप्रमुखानेकयुगप्रधानः स्वगुरुचक्रवर्तिश्रीजिनचन्द्रमुरिकृताहर्निशसाहाय्यैः श्रीजिनकुशलमरिभिः श्रीजावालि- पुस्योग्यश्रीमहावीरदेवबिम्ब-श्रीदेवराजपुरयोग्यश्रीयुगादिदेवपिम्प-श्रीशत्रुञ्जयस्थितबूल्हावसहीप्रासादजीणोद्धारार्थ- सा० छज्जलपुत्ररत्नसाधुराजराजसिंह-साधुमोखदेवकारितश्रीश्रेयांसमुखानेकविम्य-श्रीशत्रुञ्जपस्थितस्वप्नासादमध्यस्थ- भण लूणाकारिताप्टापदयोग्यचतुर्विंशतिविम्वप्रमुखशिलमयचिम्पानां सार्धशतद्वयं प्रतिष्ठितम्, पित्तलामयानां संरुपैव नास्ति । श्रीउच्चापुरीयोग्यश्रीजिनदत्तमुरि-जावालिपुर-श्रीपत्तनयोग्यश्रीजिनप्रबोधमूरि-श्रीदेवराजपुरयोग्य श्रीजिनचन्द्रमुरिमूर्तीनां श्रीअम्बिकायधिष्ठायिकानां प्रतिष्ठा कृता । स्वभाण्डागारयोग्यं प्रधानं समवसरणं च प्रतिष्ठितम् । पप्ठयां च व्रतग्रहणोत्थापना-मालारोपणादिनन्दिमहामहोत्सयोऽतिशयेन सविस्तरतरः कृतः। तस्मिन् महोत्सवे देवभद्र-यशोभद्रमल्लकोरुत्थापना कृता । सुमतिसार-उदयसार-जयसारक्षुल्लकानां धर्मसुन्दरी-चारि- वसुन्दरीक्षुल्लिकयोश्च दीक्षा दत्ता । अयधर्मगणेः श्रीउपाध्यायपदं दत्तम्-तन्नामधेय च श्रीजयधर्मोपाध्याय इति कृतम् । अनेकसाध्वीश्राविकामिर्माला गृहीता । प्रभूतश्रावकश्राविकाभिः श्रीसम्यक्त्वारोप-सामापिकारोपश्रीश्रावक- द्वादशवतारोपश्व कृतः । तदनन्तरम् , श्रीतीर्थयात्राकर्तुकामसाधुराजश्रीवीरदेवप्रमुखश्रीभीमपल्लीसमुदायाभ्यर्थनया श्रीपूज्याः श्रीमीय- पल्ल्यां साधुवीरदेवकारितसपिस्तरतरप्रवेशकपूर्वक श्रीमहावीरदेष पैशाखपदिप्रयोदश्यां नमः । १००, तदनन्तरम् , तस्मिन्नेव संवत्सरे श्रीजिनशासनप्रभावकेण सकलस्वपक्ष-परपक्षासंख्यलोकमर्याधमाधनो- धतमनस्केन सकलभीमपल्लीसमुदापाकुटकल्पेन निजावदातसंस्मारितस्त्रपूर्वजसाधुराजसीवड-साव्यशोधवल-साधु- राजअभयचन्द्र-सा०साल-साधु धणपाल-सा० सामलसुश्रावकामुसवपूर्वजकदम्बनोदारचरित्रेण दुप्फरनगभिग्न- हाबलीप्रतिपालनप्रवीणेन साधुराजवीरदेवमुश्रावकेण सा०मालदेव-मा हुलमसिंहस्यभ्रातृपरिवृतेन प्रतापाक्रान्तभूत- लपातमाहिश्रीग्यासदीनसुरवापसरफरमाणं निफास्य, सर्वदेशेषु कुङ्कमपत्रिकामदानपूर्वकं नानास्थानसमुदापान मेलपित्या, सकलाविशयनिधाना निजावदातसंस्मारितश्रीगौतमस्वामि-श्रीमुधर्मस्वामि-श्रीजम्यस्यामि-श्रीस्थूलभद्र- , खरतरगच्छालंकार श्रीआर्यमहागिरि-श्रीवजस्वामि-श्रीजिनदत्तमरिप्रमुखानेकयुगप्रधाना युगप्रवरागमश्रीजिनकुशलसूरयः श्रीमहातीर्थ- यात्रोपरि गादतरनिवन्धेन सर्वस्थानसंघपरिवृतेन सा वीरदेवश्रावकेण विज्ञप्ता। तदनन्तरम् , मरिचक्रवत्रियुगप्रवरागमश्रीजिनचन्द्रसरिशिष्यचूडामणिभिः श्रीपूज्यपादैनिध्यानबलेन सम्परः परिभाव्य ज्येष्ठाद्यपञ्चम्पां साधुराजवीरदेवश्रावकं सकलश्रीविधिसंघसैन्यमुख्यत्वेन श्रीजिनशासनप्रभावकं सकल- कार्यनिर्वाहणसमर्थ साहुराजदेवपुत्ररत्नं साहुझाझासुश्रावकं साहुपूर्णपाल-साहुसण्टापरिवृतं श्रीसंघपाचात्य- प्राग्भारनिर्वाहणपदे संन्यस्य, पुण्यकीर्तिगणि-चा० सुखकीर्तिगणिप्रमुखसाधुद्वादशक-प्र० पुण्यसुन्दरीप्रमुखसाध्वी- न्दपरिवृताः साधुराजवीरदेवकारितकृतयुगावतारमहारथतुल्यश्रीदेवालथे चतुर्विंशतिपट्टकं महदुत्सर्पणापूर्वकं संस्थाप्य, शकट [शत ] अयानेकाश्ववृन्दोष्ट्रवृन्दनानाज्ञातिसम्मिलितामेयपदातिवर्गसम्मिलितसर्वस्थानवास्तव्यश्रीविधिसंघेन साध सविस्तरतरश्रीदेवालयनिष्क्रमणमहामहोत्सवपूर्वकं श्रीभीमपल्लीतः श्रीपूज्यपादाः श्रीतीर्थनमस्करणार्थ प्रत्यास-- भायामपि चातुर्मास्यां गाढतमसर्वसंघोपरोधेन प्रस्थिताः । तदनन्तरम् , स्थाने स्थाने संजायमानेष्ववारितसत्रेषु, वाद्यमानेष्वश्वाधिरूढेपु ढोल्लेषु, निजशब्दवधिरीकृताम्र- राशासु भेरीशब्देषु, दीयमानेषु तालारासकेषु, श्रीकरीऊ(१)मालेन विराजमानः सर्वोऽपि संघः, अन्तरागतश्रीवायड- नगरालङ्कारश्रीमहावीरदेव-श्रीशेरीपकालङ्कारश्रीपार्श्वनाथादिनानास्थानतीर्थेषु दिनद्वयं श्रीमहाध्वजारोपपूजाविशेषा- वारितसत्रनिर्माणपूर्वकं यात्रां विधाय श्रीशिरखिजे महानगरे समग्रलोकाचर्यकारकजङ्गमप्रासादकल्पश्रीदेवालयप्र- वेशकमहामहोत्सवपूर्व प्राप्ताः । तत्मत्यासनश्रीआशापल्लीनगरीवास्तव्यव्यवहारिकमहणपाल-5 -व्यव०मण्डलिक-सा० क्यजलप्रमुखश्रीविधिसमुदायाभ्यर्थनया सर्वसंघसुश्राक्कपरिवृतः श्रीपूज्यपादैः सकलजनाचर्यकारकश्रीआशापल्लीसमु- दायकारितप्रवेशकमहामहोत्सवपूर्वकं श्रीआशापल्ल्यां श्रीयुगादिदेवतीथं नमस्कृत्य, सविस्तरतो मालारोपणमहामहो- त्सवः कृतः। तदनन्तरम् , पुनः सर्वसुश्रावकलोकपरिवृताः श्रीपूज्याः श्रीसंघमध्ये समायाताः। तत्पश्चात् , ततः स्थानात् सर्वोऽपि संघो विशेपतो गुरुतराडम्बरेण श्रीस्तम्भनकश्रीपार्श्वनाथयात्राकरणार्थ सकलगूर्जरत्रालङ्कारभूतश्रीस्तम्भ- तीर्थोपरि प्रचलितः सन् मार्गागतसर्वनगरपामेषु प्रधानप्रासादसमानश्रीदेवालयस्य प्रवेशकमहोत्सर्व कुर्वाणः श्रीस्तम्भतीर्थे प्राप्तः। १०१, तत्र च निरुपमातिशपशालिश्रीआर्यसुहस्तिसूरि-युगप्रवरागमानुकारिश्रीजिनमुशलमरिसुगुरूपदेशेन सर्वप्रकारेण श्रीसम्प्रतिमहाराजाधिराजसमानेन सकलघुद्धिनिधानेन साधुराजवीरदेवसुश्रावण सकलश्रीस्तम्भतीर्थ- वास्तव्योत्तममध्यमजधन्यलोकापालगोपालमहामेलापकैन महाम्लेच्छानां पश्यतामपि ढोल्यमानेषु चामरेपु, धिय- माणासु श्रीकरीपु, वाद्यमानासु मेरीपरम्परासु, अश्वाधिरूढढोल्लादिवादित्रनिनादयधिरीकृताम्बराशाचक्रपु, नृत्यमा- नेषु पदे पदे खेलकवृन्देपु, दीयमानेप्यविधवसुध्वामिनारीभी रासकेषु, गीयमानेषु श्रीतीर्थङ्करदेवश्रीयुगप्रधानश्री- संघपुरुषकृतावदातसंस्तवकेषु गीतेपु, पापळ्यमानेषु वन्दियन्देपु, दीयमानेप्रमेयेपु स्वस्थापतयेपु, किंबहुना वचना- तिगेपु नानाविधेपु नाटकाद्युत्सवेषु संजायमानेषु, समग्रनगरहट्टशोभातलिकातोरणनिर्माणपूर्वकं हिन्दुगराज्यालधार- मत्रीधरवस्तुपालकारितयुगप्रवरागमश्रीजिनेश्वरमरिप्रवेशकमहोत्सववमहाम्लेच्छराज्यप्रधानालङ्कारभृतसाधुराजजेस- लकारितसमग्रातिशयनिधानश्रीजिनचन्द्रसरियुगप्रधानमहाप्रवेशकाधिकजङ्गमयुगप्रधानानेकलब्धिनिधानश्रीजिनकुश- लसूरीणां प्रवेशकमहामहोत्सवो हिन्दुकवारकवन , श्रीरथयात्रानुकारिप्रासादकल्पश्रीदेवालययावानिर्माणपूर्वकं नवा- त्तिकारश्रीमदमयदेवसरिप्रकटित श्रीस्तम्भनकालङ्कारश्रीपार्थनायविपिचत्यालयसंस्थितश्रीअजितस्वामितीर्थीयनून- + युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। नकृवनवनवालङ्कारस्तुतिस्तोत्रमणनपूर्वकं श्रीपूज्यैः सर्वचतुर्विधसंघपरिवृतैः सकलभवोपार्जितपापकश्मलप्रक्षालनप- 'वित्रा यात्रा कृता। - तदनन्तरम् , दिनाष्टकं यावत् साधुराजवीरदेवप्रमुखदेशान्तरीयमहद्धिकसुश्रावकैः श्रीस्तम्मतीर्थवास्तव्यश्री- "विधिसमुदायेन च श्रीमहाध्वजारोपश्रीमहापूजा-वारितसत्र-श्रीसंघवात्सल्य-श्रीसंघपूजा-धीइन्द्रमहोत्सयामेयखा- पतेयोत्सर्पणानिर्माणपूर्वकं सकलखपक्षलोकानन्ददायकाः सर्वविपक्षलोकहृदयकीलानुकारका महामहोत्सवाश्च चक्रिरे। इन्द्रपदं च सा कडयासुश्रावकपुत्ररत्नेन दोसांभराजसुश्रावकानुजेन दो सामलसुश्रावकेण द्विव० द्र० शत १२ गृहीतम् । श्रीमत्रिपदादिपदानि चान्यैः सुश्रावकैगृहीतानि । १०२. तदनन्तरम् , श्रीस्तम्भतीर्थात् प्रस्थाय सर्वोऽपि संघः संजायमानेषु राजविधुरेप्वपि सर्वशून्यभूतेषु देशेषु, समग्रोत्साहपूर्वकं श्रीराचुञ्जयोपरि प्रचलितः सन् , अन्तरागतश्रीधान्धृकामहानगरे संप्राप्तः। तत्र सकलनगरनायकेन मविदलकुलोत्सेन ठ०उदयकर्णसुश्रावकेण श्रीसंघवात्सल्यश्रीसंघपूजानिर्माणपूर्वक महती प्रभावना कृता। ततः पुनः प्रस्थाप, क्रमक्रमेण थीशत्रुञ्जयतलहट्टिकायां सम्प्रातः। तदनन्तरं श्रीपूज्यपादैः सर्वसंघपरिवृतैः श्रीशत्रुञ्जयशलोपर्य- प्यारोई विधाय भवभयवल्लीप्रोन्मूलनासिलतासमानां द्वितीयवारं श्रीशत्रुञ्जयालङ्कारश्रीयुगादिदेवमहातीर्थयात्रा नाना- भनियन्धुरसर्वालङ्कारसुन्दरनूननकृतस्तुतिस्तोत्रप्रदानपूर्वकं कृखा, तदनन्तरं दिनदशकं यावद सकलसंघमुख्यभूतसा- घुराजबीरदेवश्रीसंघपाश्चात्यपदप्राग्भारनिर्वाहक-सा साहुतेजपाल-मा नेमिचन्द्र-योगिनीपुरवास्तव्यश्रीश्रीमालसा० दपाल-साहुनींचदेव-मत्रिदलकुलोत्तंसठ जवनपाल-सा लखमा-श्रीजावालिपुरवास्तव्यसा०पूर्णचन्द्र-सा०महना- गुडहावास्तव्यसायाधूप्रमुखनानास्थानकवास्तव्यमहामहद्धिकसुश्रापकैः श्रीमहाध्वजारोपमहापूजावारितसब-श्रीमाध- मिंकवात्सल्य-श्रीसंघपूजा-श्रीइन्द्रपदमहामहोत्सवनिर्माणामेयवस्खापतेपेय पट्टांशुकादिनानावस्रवर्णकटकादिवित- रणपूर्वक श्रीशघुञ्जयोपरि श्रीजिनशासनप्रोत्सर्पिका प्रभावना कृता । इन्द्रपदं च श्रीजिनशासनप्रभावनाकरणप्रगुणेन माइलोइटपुत्ररलेन साधुलखमासुश्रायकेण द्विवति(टोकद्रम्मशतमप्तविंशद्भिर्गृहीतम् । अमात्यपदं च श्रीयोगिनीपु- सासम्पश्रीश्रीमालसा सुरराजपुत्ररसेन सा रुदपालानुजेन साहुनींचदेवश्रावकेण द्विवाल्लकद्रम्मद्वादश हीतम् । श्रेषपदान्यन्यमहादिकसुश्रावकसुश्राविकामिगृहीतानि । सर्वसंख्यया श्रीयुगादिदेवमाण्डागारे श्रीविधिसंघेन सहमप- शदाप्रमाणं सम्यापतेयं सफलीकृतम् । स्वकीयश्रीयुगादिदेवविधिचैत्ये नूनननिष्पन्नश्रीनतुर्विंशतिजिनालयदेवगृहि- शामु श्रीपूज्यराजः सविस्तरतरः कलराघजारोपः कृतः । बदनन्तरम् , सर्वसंघपरिश्रताः श्रीपूज्याः श्रीयुगादिदेवमुत्कलनं विधाय तलहट्टिकायां ममायाताः। ततः मयोऽपि संघ आगमनरीत्यय गुर्याडम्परेण व्याघुट्य पुनः शेरीपके श्रीपार्थयात्रां विधाय, क्रमप्रमेण श्रीधर ममायानः । नत्र च दिनचतुष्टयमवारितसन-श्रीमाधर्मिकवात्सल्य-श्रीमहापूजा-महाघजारोपनिर्माणपूर्वकं श्रीपाच- नाथप्रत्यामनपाइलालझारीनेमीचरयोननातस्तुनिम्तोत्रप्रदानपूर्वकं मालगंधपग्निः श्रीपूज्पयर्यात्रा गना। ना- नला सकलसंघपरिश्ता: श्रीपूज्याः आगरकादश्यां प्रभाररमाधुगजरीग्देवकारितमविमानप्रवेशानिमांग- पर श्रीओमपन्यां धीमदारिदेवं नमः । देशान्तर्गपः गः मंगः माहुयीग्गुबारकण गन्मानदान मरम्पाने प्रविष्टः । १०३. तदनन्तरम्, सं०१३८२ या वंशागगुदि ५ मापुगजमामलानप्रदारापमानमांदापंगाम्भीयांनी मन्दग्पयोनिधिविनानमनगानोरमाटापमानश्रीजिनमानयोगलाकरगमपानीमअपादिमहानीया पादिपनिपानमाजवीरदेवमुथाराग्निी दीधामालागेरगादिनन्दिमहामोगाः धीमीमपी-भी- खरतरगच्छालंकार पत्तनीय-श्रीमहादनपुरीय-श्रीबीजापुरीय-श्रीआशापल्लीयादिनानाम्यानसमुदायमहामेलापकन याद्यमानेषु द्वादशवि- धनान्दीतूर्ये पु, दीयमानेपु तालारासेषु, नृत्यमानाखविधवसुधवासु नायिकासु, संजायमानासु श्रीसंघपूजासु, क्रिय; माणेषु श्रीमाधर्मिकवात्सल्येषु, दीयमानेष्वमेयेषु स्वस्खापतेयेपु, सम्पद्यमानेप्पयारितमत्रेषु, दिनत्रयममारिघोपणानि- मणिपूर्वकं हिन्दुकधारकवत्सकलजनमनश्चतश्चमत्कारकारी विपक्षहृदयकीलानुकारी सकलातिशयनिधानः सलिन्धिप्र- धाननिजावदातसंस्मारितपूर्वसरिभिः श्रीजिनकशलसरिभिश्चक्रे । तस्मिन् महोत्सवे क्षुल्लकचतुष्टयं क्षुल्लिकाद्वयं कृतम् , तेपां नामानि विनयप्रभ-मतिप्रम-हरिप्रभ-सोमप्रभक्षुल्लकाः, कमलथी-ललितश्रीक्षुल्लिके इति। प्रभूतमावीथावि- काभिर्माला गृहीता । अनेकथानकवाधिकामिः सम्यक्त्वारोप-सामायिफारोपः कृतः, परिग्रहपरिमाणं च गृहीतमिति। तम्मिन्नेव संवत्मरे श्रीपूज्याः श्रीसत्यपुरीयसमुदायाभ्यर्धनया श्रीसत्यपुरे श्रीममुदायकारितसविस्तरतरप्रवेशक- महोत्मवाः श्रीमहावीरदेवतीर्थराजं नमश्चक्रुः । तत्र च माममेकं श्रीसमुदायस्थ ममाधानं समुत्पाद्य. श्रीलाटाहदसमु- दायाभ्यर्थनया श्रीलाटइदे श्रीसमुदायविहितसविस्तरतरप्रवेगकमहोत्मवाः श्रीमहावीरदेवाधिदेवं नमश्चतुः। तत्र च पक्षमेकं श्रीसमुदायस्य समाधानं समुत्पाद्य, श्रीनाग्भटमेरवीयममुदायाभ्यर्थनया श्रीमग्भटमेरो श्रीसमुदायकारितस- कलस्वपक्ष-परपक्षचेतधमत्कारकारिप्रवेशकमहोत्सवाः श्रीयुगादिदेवतीर्धनाथं नमस्कृत्य चतुर्मामी चकुः। १०४. पश्चात् , तत्र च सं० १३८३ वर्षे पौपशुक्ल पूर्णिमायां श्रीजिनशासनप्रभारनाश्रीसाधमिकमात्सल्यादिनाना- धर्मकृत्यकरणोद्यतसाधुराजप्रतापसिहप्रमुखश्रीपाग्भटमेवीयममुदायाम्पर्थनया श्रीजेमलमेरवीय-श्रीलाटाद-श्रीसत्य- पुर-श्रीप्रह्लादनपुरीयादिनानाम्यानपास्तव्यमहद्धिकसुधारकलोमहामेलापफैन संजायमानेषु श्रीमाधर्मिवात्सल्य- श्रीसंघपूजादिनानाविधेषु धर्मकृत्येषु, दीयमानेषु नालारासेषु, क्रियमाणेप्पयारितसनेषु, अमारियोपणानिर्मापणपूर्व श्रीउत्थापना-मालारोपण-श्रीसम्यतारोपण-सामायिकागेप-परिग्रहपरिमागादिनन्दिमहामहोत्सवं चतुः। १०५. ततस्तम्मिन्नेर संवत्सरे श्रीजवालिपुरीयममुदायगाटतराम्यनिया मकलातिशयनिधानाः समग्रारिमाला.. प्रधानाः श्रीजिनकुशलमरियुगप्रधानाः श्रीवाग्भटमेरुनः प्रम्याप ममग्रगज्यमारघुराधरणधौरेयम्पकीयपूजवाहित्र- कोद्धरणकारित-श्रीशान्तिनाथमहाविसममन्वितोनुगतोरगनिरुपमगुरूारप्रामादशिसरे श्रीलरपटकनगरे युगप्रर- रागमसकीयदीक्षागुरुश्रीजिनचन्द्रमरिमुगुरुजन्ममहोत्सवमौनजन्मदीक्षाग्ररणमहामहोन्मपरिलोकनपत्रिीभूतारित- सपक्ष-परपक्षजनताननाः श्रीगम्यानयने च श्रीशान्तिनाथदेवाधिदेवम् , श्रीममुदायकारितगम्पिगारप्रवेशकमदो. समा नमस्कृत्य क्रियन्ति दिनानि उभयस्थानममुदाययोः गमाधानं च ममुन्पाय धीविविधर्मकमलाननमरोहगगेरे भीजावालिपुरे नानोत्मानिर्मापपममुद्यत श्रीजापालिपुरीयमहागमुदायकारितगरिम्नग्तानशरमहामदोगवाः सहलकमलप्रतिष्ठितं श्रीजागलिपुरीयममुदायमनोरान्छिनार्थपूरणालीरनप्रति श्रीमहावादिपमहावीधंगजचरणा- कल्पनुमं नमः । न च मन्त्रीश्वरयलधरपुलप्रदीप ० गोजराजपुग्न मं० गलगनिद-गा० चाहट- पुनरत्नमा० झाक्षणप्रमुखश्रीनागलिपुरीपरिधिगमुदायाम्पनिया रिपालपुग्न्न गांगलप्रमुगबीउगरीय देगजपुरीयममुदाय-ममनोन्मरधुराधरपोरयधरलमा जापपुरग्नमाधुगजनंजपाल-मा० स्टपानप्रमुगधीप- चनीय-श्रीजेपलमेरसीय-श्रीगन्यानपनीय-श्रीश्रीमानीय-धीनत्यपुरीप-श्रीगुडहाप्रमुपनानानगरप्रामगनपा- ग्यधीविधिममुगयधारस्लोर महामेलापन दिनदशपभर दाम्य गंडापमान मरियानां गरिमग्न पुप्पादानमहामहोत्मवेपु. दीयमानंपु नालागप, अनेरमहामहरिगुधारस्रः मनजतनामानिः मानी- मिपमापेपमेयेषु स्वमापतेपेषु, गीयमानेपरिषरमुपामिनांगमिः माने याने गोनेपु, श्रीगंगाजा-कि- वागल्यागरितमप्रामाग्घिोषणादिनानाप्रमानानु प्रश्नमानानु.मं० १३८३ य फान्गुनाटिनाम्यामनियन नित- मदुःषमाकाले प्रश्नमाने, सरलसपधपपयोनसमापनवपन्पन्शनां मम नाम्यागेह....हाचामपि, निगम- युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। सौवज्ञानध्यानालातिशयादागामिकुशलं परिभावयद्भिः श्रीजिनकुशलपरिभिः सुपमसुपमावत्सकलस्वपक्ष-परपक्षा- संख्यम्लेच्छलोकचेतश्चमत्कारकारी विधिधर्मप्रभावनाप्रद्विष्टलोफहृदयकीलानुकारी निर्विघ्नः श्रीप्रतिष्ठा-व्रतग्रहणो- त्यापना-भालारोपण-श्रीसम्यत्वारोपादिनन्दिमहामहोत्सवः सविस्तरतरः कृतः । तस्मिन् महोत्सवे श्रीराजगृहनिया- सिसमग्रलोकक्रीडास्थानक श्रीवर्धमानस्वामिचरणकमलन्यास-श्रीगौतमस्वामिप्रमुखश्रीमहावीरकादशगणधरादिमहामु- निनिर्वाणपवित्रीकृतश्रीवैभारगिरिशैलोपरि ठ० प्रतापसिंहकुलप्रदीपमन्निदलकुलो ससंघपुरुष ४० अचलकारितश्री- चतुर्विशतिजिनालयोत्तुङ्गतोरणप्रासादमूलनायकयोग्यश्रीमहावीरदेवप्रमुखानेकशिलमय-पित्तलामयाद्यनेकविम्यानां गु. समूर्तीनामधिष्ठायिकानां च प्रतिष्ठा संजाता। क्षुल्लकपदकं च कृतम् , तन्नामानि न्यायकीर्ति-ललितकीर्ति-सोम- कीर्ति-अमरकीर्ति-नमिकीर्ति-देवकीर्तिमुनय इति । अनेकाभिः श्राविकाभिर्माला गृहीता नानाश्रावकश्राविकाभिः श्रीसम्पत्यारोप-सामायिकारोप-द्वादशवताङ्गीकारश्च कृतः । १०६. तदनन्तरम् सिन्धुदेशालङ्कारथीउच्चानगर-श्रीदेवराजपुरवास्तव्यमहद्धिकसुश्रावकसमुदायगाढतरोपरोधय- शाइ युगप्रवरागमश्रीआयसुहस्तियुरिलोकोत्तरावदातप्रकटनपरा दुष्करतरनिरतिचारचारित्रशीलप्रतिपालनलोकोचस्त- पोविधानाकृष्टकिङ्करीतभून्यन्तरामरनिकरसततविहितसान्निध्योद्धुराः समाश्रितसौवध्यानातिशयनिरुपमगम्भीरदेविकु- जराः सायानिताष्टादशसहस्रशीलाङ्गमहारथनिकरा नवपत्रिंशिकामरिगुणजात्यावधट्टण्यासवसुन्धराः पराजय्यानेक- मुनिमण्डलीपदातिवर्गसारपरिवारा युगाग्यश्रीजिनकुशलमरिसुगुरुचक्रीश्वरा महाम्लेच्छकुलाकुलगुरुतरश्रीसिन्धुमण्डलो- परि महामिथ्यात्यदुर्दान्तभूपालोन्मूलनार्थ स्वाश्रितश्रीविधिधर्मधरणीधवसंस्थापनार्थ चत्राद्यपक्षे दिग्विजयमुहून वि- याय, स्याने स्थाने शुभशकुनैः प्रेर्यमाणाः, पुनर्वितीयवारं मार्गागतश्रीशम्यानयन-धीखेडनगरादिसर्वस्थानेषु स्वाबा- भूपालसंस्थापना कुर्वाणाः, क्रमझमेण मरुस्थलीजनपदमुखकल्पश्रीजेसलमेरुमहादुर्गमध्यनिवासिसामान्यनराजय्यमहा- ज्ञानदैत्योत्पाटनाप श्रीराजलोक नगरलोकमहामेलापन याद्यमानेषु द्वादशयिधनान्दीतूर्येषु,दीयमानेषु महर्दिकसुश्रा- वकैरमैयेषु सखापतेयेषु, श्रीविधिसमुदायकारितसकललोकयुतचमत्कारकारिप्रवेशकमहोत्सवपूर्वकं खहस्तकमलप्रतिष्ठित निःशेपचिममालाविनाशनसमुद्यतं श्रीपार्श्वनाथदेवाधिदेवचरणारविन्दद्वैत नमस्कुर्वन्ति स्म । पश्चात्तत्र दिनदशपञ्चकैः स्वकीययाक्चातुरीसगलतयाऽज्ञानदैत्योच्छेदनं विधाय, सर्वजनमुसायहं धानावनो. पभूपालं संस्थाप्य, श्रीउद्यकीय-श्रीदेवराजपुरीयसुश्रावकेचराः श्रीपूज्मयुगवराः, ग्रीष्मती प्रवर्तमानायामपि साग्नि- ध्यकार्यम्पुदामरनिकरा:, किरीभूतमरुस्थलीमध्यसानेकभूतप्रेतपिशाचनिकराः, शनैः शनैः सन्छन्दलीलया ईसिमित्यादिनानासमित्यलझारा, मरुस्थलीमहाममुद्र श्रीपत्तनगजमार्गयत् समुलर, वाद्यमानेषु द्वादयविधना- न्दीतूर्येषु, समालोकनगरलोकमहामेलापकेन नानाविषवर्णपट्टांशुकादिदानपूर्वकं श्रीदेवराजपुरीयममुदायकारिवगुरु- सरप्रवेशकमहोत्सवाः, स्वहस्तकमलप्रतिष्ठित श्रीपुगादिदेवतीर्थराज नमः । तत्र चाहनिशं धर्ममर्मदण्डरनविराजमानव्याग्ज्यानमेनाधिपतिना मिथ्यासभूपालपक्षपाति- सामनादिसीमालभूपालान् प्राणिहृदयदुर्गमध्यसितान् मायकेन निर्घाय्य, श्रीमत्पूज्यमहाराजाधिराजाः श्रीउचकी- यसमुदायगादतराभ्यर्थनया नानाविधामोत्यमक्तिशालिनो दुयमिपासारनिपालोन्मूलनाधं तद्वाजधानीममायां हिदकारके यादीन्द्रपिटापन्धान श्रीजिनपतिमरिगुरुचक्रवर्तियाणाम्मोहपरित्रितायां श्रीउशायां नगरमध्य- निगपिचातुर्वर्णम्लेबराजलोका रूपमेलापन यापमानेषु दादाविधनान्दीपु, महदिकमुश्रादीपमानेषु या. परमनोगम्विाधनिया, श्रीउधकीपमहासमुदायकारितमरितरतरप्रवेशकमहोत्सवाः श्रीचतुर्षिगतिपालभार- श्रीपुगादिदेर नमस्तत्व निनिता अपस्थिताः। पपा मालनीसामुगाई प्रचन्द्रमपनिमिथ्यानभूमीवर सरोनममोरपर्मगुमायारोपमा निर्माय, मासमेकं पार पिता, म्यपधाधितं श्रीपिपिपर्ममहाराज पदभूनं . , १०७. तदनन्तरम्, खरतरगच्छालकार स्थाप्य च पुनश्चतुर्मास्युपरि सकलानार्यसिन्धुदेशजनतानुगम्यमानचरणाः श्रीदेवराजपुरवरे श्रीयुगादिदेवं नमश्चकुः । १०८. पश्चात्तदनन्तरम् ,सं०१३८४ वर्षे माघशुक्ल पञ्चम्यां प्रवर्धमानशिष्यसंप्रात्यायनेकलन्धि-आर्यानार्यदेशजि- नधर्मप्रवृत्तिभूपालादिप्रतियोधनशक्ति-निर्लोभतापाचनप्रभावनाविधानश्रीमरिमाराधन-नानासमयार्धव्याख्यान- संवेगतासुरासुरवशीकरणता-परवादिनिर्धाटन-सर्वनगरग्रामजिनभुवनचिम्पस्थापनादिनानानिजलब्धिशत्यादिसंस्मा- रितश्रीगौतमस्वामि-श्रीसुधर्मस्वामि-श्रीआर्यसुहस्ति-श्रीवयरस्वामि-श्रीआचार्यमत्रप्रकटीकरणप्रवीणश्रीवर्धमानसरि- श्रीनवागवृत्तिकारश्रीस्तम्भनकपार्श्वनाथप्रकटीकरणोपार्जितभूरियशाश्रीअभयदेयसरि अनेकदेवाराध्य-मरुस्थलीकल्प- दुमावतारश्रीजिनदत्तमरि-वादीन्द्रद्विपपटानिद्रायणपश्चाननश्रीजिनपतिसरि-नानास्थानसंस्थापितश्रीतीर्थकरदेनोत्तुङ्ग- तोरणप्रासादश्रीजिनेश्वरवरिप्रमुसानेकस्वयंशोद्भवगणधरयुगप्रधानमालापदातैः तपःक्रियाविद्याव्याख्यानध्यानातिशया- वर्जितक्रीिभृतामरमहाम्लेच्छहिन्दुकनरेश्वरमधुफरनिफरसमाश्रितचरणाम्भोजयुगप्रवरागमश्रीजिनचन्द्रमरिशिष्परा- जैर्युगप्रधानपदवीप्रायनन्तरप्रत्यब्दप्रवर्धमानप्रतिष्ठा व्रतग्रहण मालारोपण-श्रीमहातीर्थयाविधान-समुपार्जितगोक्षी- रधाराधालहीराट्टहासतुपारकरनिकरोज्ज्वलयश.काचकर्पूरयासितविश्ववलयैः सुगुरुचक्रवर्तिथीजिनदुशलसूरिभिः स्थैर्यो- दार्यगाम्भीर्यादिनानागुणगणमुक्ताफैललतालतगात्रश्रीदेवगु ज्ञास्सलितप्रतिपालनजात्यजाम्बूनदमुकुटालङ्कतोत्तमा- गश्रीजिनशासनप्रभाग्नावलीविविधक्रीडापिनोदविधानसमुद्यतश्रे गोपालपुत्ररक्षश्रे नरपाल साल्वयरसिंह-सा नन्द- ण-सामोखदेव-सा लावण-सा आम्बा-सा कडया-सा हरिपाल-सा वीकिल-सा चाहडप्रमुखानेकोचकीयम- हामहर्द्धिकसुश्रावक-श्रीदेवराजपुर-श्रीफियासपुर-श्रीबहिरामपुर-श्रीमलिकपुरप्रमुसनानानगरग्रामपास्तव्यासंख्यसु- श्रावक-राणक-राजलोक-नगरलोकगाढतराभ्यर्थनया प्रचुरदिनादारभ्य स्थाने स्थाने संजायमानेषु नानाविधेषु नाट- केप, दीयमानेषु नराविधरसुघवाभिर्नारीभिस्तालारासकेपु, हाहाहूहूममानानेऊगायनापलीमिर्गीपमानेषु गीतेपु, पापल्यमानेषु भट्टघट्टयन्देपु, दीयमानेषु महामहद्धिकसुश्रावकै राजलोनानाप्रकारवर्णरजतझटपतुरङ्गमपट्ठांशुकादि- वखानदानेपु, संजायमानेषु भविष्यत्क्षुल्लक्षुल्लिझामालायाः सविस्तरतरेपु पुष्पासदानेषु, क्रियमाणेपु श्रीसाधर्मिक- वात्सल्यश्रीसंघपूजाद्यनेकप्रकारेषु धर्मकृत्येपु, विषमदुःपमकाले प्रवर्तमानेऽपि सुपमावन्द्रीचक्रवर्तिपट्टाभिषेकमहोत्स- चानुकारी महामिथ्यात्वदैत्यविनाशनमधुसूदनानुकारी सफलस्वपक्षमहाजनलोकपेतश्चमत्कारकारी प्रद्विष्टाखिललोक- हृदयकीलानुफकारी सौपश्रीविधिधर्मसाम्राज्यसम्प्राप्तिमिथ्यात्वभूपालोन्मूलनश्रीसिन्धुदेशपिजपयानापरणसमुपार्जित- पुण्यराज्यलक्ष्मीपाणिग्रहणसंस्तरकः श्रीप्रतिष्ठानतग्रहणमालारोपणादिनन्दिमहोत्सनः सविस्तरतरश्चक्रिरे । तस्मिन् महो- त्सवे श्रीराणकोदृषिधित्य-श्रीकियासपुरविधिचैत्यमूलनायकयोग्यश्रीयुगादिदेवनिम्बद्वयप्रमुखानेकशिलमयपित्तला- मपविम्बाना श्रीमत्पूज्यप्रसरतरकीर्तिस्तम्भानुफारिणा प्रतिष्ठा संजाता | नवनिधानानुकारिक्षुल्लकनवकं स्वायत्तं जातम्, क्षुल्लिकारयं च-तनामानि भावमूर्ति-मोदमूर्ति-उदयमूर्ति-विजयमूर्ति-हेममूर्ति-भद्रमूर्ति-मेयमूर्ति-पममूर्ति-हर्ष- मूर्ति क्षुल्ला इति, कुलधर्मा-पिनयधर्मा-शीलधर्मा साध्व्य इति । सप्तमप्तनिश्राविकामिर्माला गृहीता। अनेक- श्रावकारिकालोकैः परिग्रहपरिमाणग्रहण-सामायिकारोप-सम्पमारोपाः प्रचक्रिरे। १०९. ततश्च सं०१३८५ वर्षे लक्षणच्छन्दोलङ्कारसारनाटकाप्रमाणप्रमाणप्रसिद्धमिद्धान्तायननद्यविध्यमहापुरवी- थीविज्ञेयजनमचाररधीभूतकुशाग्रनिशातसौवमतिवाततिरस्कृतसुरमरिभिः श्रीजिनकुशलमरिभिः श्रीउच्चकीय-श्रीपहि- रामपुरीय-धीक्यासपुरीयादिश्रीखरतरसमुदायमेलापके फाल्गुनशुद्ध चतुर्थीदिने पदस्थापनाक्षुलकभुष्टिकोत्थापनामा. लामहणादिनन्दिमहोत्सवः सविस्तरतरश्चक्रे । तस्मिन् महोत्सवे पं०कमलाकरगणेाचनाचार्यपद प्रदत्तम् , नूतनदीक्षि- ताल्लिकानामुत्थापना कृता । विंशतिधारिकाभिर्मालाग्रहणं विहितम् । यहुमिः श्रावक-श्राविकाभिः परिग्रहपरिमाण- सामायिकारोप-सम्पच्यारोपा विदधिरे। - ८३ परमानंता, मो! मी मनुकसानला. मगमगानाmarimm, नामा ममाप्रपासनीति पपनमानगान गमान गुमा मानपान मारना युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। ११०. तदनन्तरम् , सं०१३८६ वर्षे निरुपमाकृत्रिमान्तरदृढतरभक्तियाग्भारशृङ्गारसुभगं श्रीदेवगुर्याशाचिन्ताम- गिविभूपणप्रियं भावुकमस्तकश्रीजिनशासनप्रभावनापनीतलसमुल्लासनधनायनालीसमवायश्रीपहिरामपुरीयसरतरसमु- दापयनतरोपरोधवशतः सततविहितमुविहाराः सकीयसप्रसरज्योतिर्विसरापसारितान्तरघोरान्धकारा जागरूकीकृतवि- चित्रचित्रमाङ्गलिक्यप्राम्भाराः स्वीकृतचरणकरणालङ्करणमुथावकगणपरिवाराः थीजिनकुशलम रियुगप्रवरा दिवाकरा स सकलमविककमलकाननप्रबोधनप्ररद्धादरा मोहान्धकारतिरस्कारकरणार्थ श्रीवहिरामपुरे सा भीम-सा०देदा-सा० धीर-सा रूपाप्रमुखसमग्रश्रीपहिरामपुरवास्तव्यश्रीविधिसमुदायविधीयमानसमग्रवपक्षपरपक्षपेतचमत्कारकारिसविस्त- रतरप्रवेशकमहोत्सवाः संमुखागतास्तोकलोकसमुत्कीरीमानकुन्देन्दुममानानेकप्रविवेकशमदमसंयमप्रकाराः कमनीयरू- पलानण्यादिप्रगुणगुणश्रेणयः स्वमहिमातिशयनिशितपरशुधारालूनविनवल्लीविततयः श्रीपादेवरिधिमन्दिरे समप्ल- समीहितसम्पादनसमर्थसे श्रीपार्श्वनाथदेवं नमस्कृतवन्तः । तत्र च प्रतिष्ठित श्रीपहिरामपुरवास्तव्यविधिसमुदायेन श्रीपूज्यपादारविन्दयन्दनार्थमागतनानाग्रामरास्तव्याय: कसमुदायेन कोमलकथापकरप्यहमहमिकापर्व........श्रीसाधर्मिकयात्मल्य-धीसंघपूजावारितमत्र निर्मापणादिनमाव- नामु विघीयमानामु, कार्यमाणेषु नागरिकजननिनिमेपेक्षणप्रेक्षणीयेपु, संजायमानेषु स्थाने स्पानेऽन्य.....कमलय- चैत्यग(१)नर्तनपूर्वक नागरिकलोकेन श्रीपूज्यगुणग्रामवर्णनेपु, कियन्त्यपि दिनानि स्थित्वा. नोभिगिध्यान्धकारतिर- स्कारसमुहासश्रीकस्यकुक्षपमहाप्रकाशनिवेश्य(?), श्रीपहिरामपुरान् श्रीस्यासपुरीयपरतरगमुदायगाइनरोपरोधेन प्रया पप्रात्ययुगप्रयरागमरतपादप्रधाराभावरिमोभूयमागधानतमस्काण्डमाडापुरे(१) श्रीश्यामपुगेपरि विजः श्रीपूज्याः। अत्र न...सा०पीणिग-सा जेह-साव्येला-सा महाधरप्रमुखश्री........लारवाहणीयममुदायेन श्रीलारवादणे पकी- पम्लेचनायकसमुपानयनपूर्वकम् , याद्यमानढोलनान्दीतूर्यचर्यनिनादेन गुग्गरीक्रिपमाणेषु दिसुपु, मिलिनत्र.... पादाय नेमूली(१)वातसंमूछेदतुभ्याम्बुदअमेणाकाण्डताण्डबाटम्बरं कुर्वन्तु मयूरेस, मन्दिरद्वाणु पच्यमानामु बन्द- नमालिका]म श्री...पूज्यानां प्रवेशकमहोत्मयो कारयांचके । तत्र च, आपकलोकन... संजायमानेषु श्रीमामि कमात्मन्यायारितसप्रेषु, जापमानामु गरिम्तातगमु श्रीसंयपूजाग. दिनाटक......प्रोपा...... नगः मानान प्रन्या. पान्धरालसोजावाहनादिव..........मानप्रवेशकोत्मया.......... प्राग्भागनुगमकथारकलोकानोमानाजपुतान- (अत्र फियान् पिटिनः निमानि) 0 १११. तदनन्तरम् . नमगिकगुस्नग्गुरुभक्तिरसरातहिलमानमनिग्यधिषिभिमागेपरमधीम्यामारनिगमि- भे० मोहन-मानमरमिंद-प्पा सीममिह-गानाथ-गाजरप्रमुगाफामुदायेन युगमागगमधीजिना एग्पिादारधारणममुसलदनर्गततरासादपयःपटनप्रेक्ष्यमाणघेवोनामनगमाग्योदयेन गीपनेनापका- दु कफनिनदण्टकं तुरकाष्टकं दुष्टलोनियाक नदादाप, राजनोरनगलोक गानानिगमगोपभारलो मेलापके पापमाने पपरीकनगदमाद्रपदीयमजतजनगम्भोगगु गान्दीप. दीपणानगु मामिभ्यागानिस पिसमपयनरी पारीत गापमानपरिषरगुपामिनांगमिः मम्मामाजनिश्पमानमातानिने मालम- अध, पापट्यमाने मालपाटकादम्पन भीगजमिदनापानानाना नाम ने गायान्दैन ममग्रमा कर्णगान गानेषु, पमनोरनागोयनानी पनि सन्दिारीपंमिलीसिमितसितिमिमुकानिजनित्यामिः धान्यानोरन. प्रापिमान नापानस्पिषमाराभिगि नि....... ..नागामा ! मी मानाAm. अन्यमा.... ................

८४ ............ खरतरगच्छालंकार पा)विरं जीवेत्यादिविविधाशीर्वादराशिष्यमाणाः, अग्रेगच्छदतुच्छश्रीपूज्यपुण्यविलासाहृतप्रभूतकामकलशायमान- कामिनीजनवराशविन्यस्तपूर्णकलशाः, सौवप्रभावातिशयनिशितपरशूप्रलूनप्रत्यूहन्यबल्लिवितानाः, दुष्टम्लेच्छरपि सुश्रावकलोकैरिव वन्धमानपादारविन्दाः, वादीन्द्रद्विपघटापञ्चाननाः, श्रीजिनपतिमरिश्रीअजयमेरुमहानगरश्रीपृथ्वी- राजकारितमहाप्रवेशकमहोत्सवानुहारिणा निरवधिविधिमार्गदएलोकमुखमालिन्यनिर्मापणमपीकूर्चकानुकारिणा सवि- स्तरप्रवेशकमहोत्सवेन प्रवेशिताः सार्वकामुकस्वप्रतिष्ठितश्रीयुगादिदेवपादस्वापादपयुगं वयन्दिरे । तत्र च विधिमार्गीयक्यासपुरवास्तव्यखरतरसमुदायेन कोमलथावकैश्च श्रीपूज्यज्ञानध्यानपवित्रचारित्रादिवरेण्य- गुणगणावजितः प्रतिदिनविधीयमानशालिदालिहेयङ्गवीननवीनपक्कानव्यञ्जनफलावलिबहुलश्रीसाधर्मिकवात्सल्य-श्री- संघपूजापारितसत्र-रासकप्रदान-खेलक-नर्तन-प्रेक्षणीयकनिर्मापणादिभिर्गुप्रिवचनप्रभावना विरचयाञ्चके । श्री- पूज्याः कौतूहलागततुरुष्कनायकान् स्ववचनचातुरीभिराहादयन्तः सुप्रथितमिथ्यात्वान्धकारपूरितबहुललोपहृदयक- न्दरासु बोधिलाभमहोद्योतमुल्लासयन्तः, सुश्रावकभविकक.... ...दापयतश्चतुर्मास्युपरि श्रीदेवराजपुरे समस्तसमुदायकारितगुरु- तरप्रवेशकमहोत्सवाः श्रीयुगादिदेवं नमस्कृतवन्तः । ११२. तदनन्तरम् , सं० १३८७ वर्षे श्रेनरपाल-सा हरिपाल-सा आम्बा-सा लसण-सा० वीकलप्रमुखश्री- उचकीयसमुदायगुरुतराग्रहवशादात्मत्रयोदशा...... ..(अत्र कियान् पाठो नष्टः)। तत्र च मासमेकं पूर्ववचीर्थप्रभावना ........गृर्जरनगर इव प्रकटतयाऽहद्धर्मकमलपरिमलं विस्तार्य श्रीउयापुरीतः श्रीपरशुरोरको वास्तव्यसा० हरिपाल-सा रूपा-सा आशा-सा०सामलप्रमुखसमुदायद्वाग्रहवशाद श्रीजिनकुश- लसूरयश्चक्रेणइयदि(?)यात्राकरणप्रवणाः प्रभूनश्रावकानुगम्यमाना नानाग्रामेषु श्रीपूज्यागमनोत्कर्णनोद्भवत्प्रमोदामि- रामेषु श्रावकान् वन्दापयन्तः परशुरोरकोट्टे वाद्यमानढोल्लनिनादमेदखिप्रतिनिनादेन गहरितेषु दिग्विवरेषु, संमुख- मागच्छत्सु शृङ्गारस्फारेपु नागरेषु, संजातगुरुतरप्रवेशकोत्सया.. ......श्रीवहिरामपुर- श्रीपार्श्वदेवपादारविन्दं नमश्चक्रुः । तत्र च महतीश्रीजिनशासनप्रभावनां पूर्ववद्विरचयां............ 1 ततः स्थानाव श्रीक्यासपुरादि. ..... ग्रामे एका राधिनगरे पञ्चरात्र'मित्यनया रीत्या भविकलोकपरोपकाराय मास्युपरिश्रीदेवराजपुरवरे श्रीयुगादिजिनपरेन्द्रपादारविन्दं प्रणेमुः । ११३. ततश्च सं०१३८८ वर्षे श्रीविमलाचलचूलालङ्कारहारश्रीमन्मानतुगविहारशृङ्गारश्रीप्रथमतीर्थकरप्रमुसा- हद्विम्बनिकरप्रतिष्ठापन संस्थापन-ग्रतग्रहण-मालारोपणादिमहामहोत्सवानेकदेशप्रदेशविहाराद्यवदातपातविततकदली- ......संजातयशःकाचकर्पूरपूरपारीपरिमलत्रिभुवनोदयमूरिभिः श्रीजिनकुशलमूरिभिविशिष्टवरिष्ठनानध्यान- चलेन सम्यक् समयं परिभाव्य निजभुजासमुपार्जित......निजितपारिजातकल्पद्रुमश्रीउच्चापुरी......तिकस्तरको... लितसौवर्णतिलकायमानश्रीविधिममुदायश्रीवहिरामपुर श्रीक्यासपुर-श्रीसिलारवाहणादिनानानगरग्रामवास्तव्यमामि- न्धुदेशसमुदायमेलापके प्रभूतदिनेम्य आरम्य नरीनृत्यमानेषु खेलकवितानेषु, दीयमानेषु श्रावकलोकेन सकर्णकर्ण- सुधासेकेषु रासकेपु, संजायमानेपु श्रीसाधर्मिकवात्सल्यावारितसत्रश्रीसंघपूजादिषु, दीयमानेषु श्रावकलोकेन सततम- मेयेषु खखापतेयेषु, वितन्यमानेषु भाविक्षुल्लक क्षुल्लिकानां पुप्पाकेषु अ......णायां स्वपक्ष-परपक्षनश्चमत्कारकारी पदस्थापन-प्रतग्रहण-मालारोपण-सामायिकारोपण-सम्यक्रोपादिनन्दिमहामहोत्समो मार्गशीर्ष शुलदसमीदिने निर्मापयामासे । तस्मिन् महोत्सवे गाम्भीयौदार्यपर्यस्थैर्यार्जनविद्वत्सरुपिखवाग्मिलसचौविहित्यज्ञानदर्शनचारित्रवि- शदपत्रिंशत्सरिगुणगणमणिविपणीनां पं०वरुणकीर्तिगणीनामाचार्यपदंप्रदचम्-नाम श्रीवरुणप्रमाचाः; पं०लन्धि- ........... विहृत्य चतुः ....... जातत्र नपामिन भावककदम्पत, निजभुजाािमेपरापनपीजपनक्षेपभूमिमगु किपमानागु श्रीगरिंगगंप• जानु, यीजिनामा शिक्षानुमारण पनि दाम्प पीविनायतपूर्गन्नपदागिदागंन संम्पारना दिये। मापनदेरमग्न-माहेमसान-मापुरनगर पुषग्नेन धानिनमानसमारनामिन धीमाप्रपोजपला. दिसानासावारम्भीतिनगरिभाजिनामनगमागमीगिरिधान भीमामा-भी- युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। निधानगणीनामभिपेकपदं प्रदत्तम्-नाम श्रीलब्धिनिधानोपाध्यायाः, क्षुल्लक क्षुल्लिकाद्वयं च बभूव, तन्नामानि जयनि- यमुनि-पुण्यप्रियमुनिक्षुल्लको जयश्री-धर्मश्रीक्षुल्लिके । दशभिः श्राविकाभिर्मालाग्रहणं कृतम् । अनेकवावक-श्रारिका- मिः परिग्रहपरिमाण-सामापिकारोप-सम्यवारोपार्थ नन्धारोहश्च । सौवभुजापरिघसमुपार्जितविततनिनिंदानदानोल्छ- पितदन्तिदन्तान्मुक्तोदक्षीरोदक्षीरडिण्डी......ट्टहासकाशसंकाशयशःकुसुमसमुच्चयसमन्वितसकलदिग्देवताचक्रयालेन बभूवे । ११४. ततश्च चतुर्मासी श्रीदेवराजपुरे श्रीजैनशासनसंस्थानां परमनिदानेऽपूर्यापरिशीलितश्रीस्याद्वादरनाफरमहा- तरनाकरश्रीतरुणप्रभाचार्य-श्रीलब्धिनिधानमहोपाध्यायानां सूक्ष्मशेमुपीवियरगोचरं कुर्माणाः,खप्रान्त्यसमयमवलो- क्य वर्ग पिरचैव (१)वर्णिनीपाणिपीडनविधौ शुद्धक्षेत्रमयधार्य ते तस्थुः । ततो माघशुक्ल......गाढज्वरश्वासादिरोगा- बापित स्वनिर्माणसमयं ज्ञासा श्रीतरुणप्रभाचार्य-श्रीलब्धिनिधानमहामहोपाध्यायानां श्रीमुसेन सकीयपट्टयोग्यप- सदशार्पप्रमाणस्वशिष्यरत्नप्रधानसालक्ष्मीधरपुत्ररत्नसाधुराजआम्बा-साध्वीनीकीकानन्दन-युगप्रधानकमलालीलाप- नीरेलिलीलालासनश्रीमेरुमहीधरमण्डनश्रीनन्दनाभिधानप्रधानकाननसमानं पद्ममूर्तिक्षुलकं खकीयपदसंस्थापनविपयां मिवां सा दचा, सं०१३८९फाल्गुनकृष्णपश्चम्यां पाश्चात्यग्रहरे श्रीचतुर्विधसंघेन सह दत्चमिथ्यादुष्कृतदानाः स्वमु. गोयारिताशनाः नानाराधनामृतपानाः पञ्चपरमेष्ठिश्रेष्ठध्यानसन्धानपश्चसौगन्धिकताम्यूलास्वादनमुरभिवानना रात्रि- हरदयोदेश स्वर्गकमलापाणिपीडनविधिं विदधुः । वतः प्रातः समये साम्प्रतिकविषमकालकालरात्रन्यझारसमाचारचतुरभास्करप्रसारश्रीमद्विधिसंघमहापारधीमझि- नारालगरियुगप्रवरास्तमनेन विधुरितान्तःकरणेनापि श्रीसिन्धुमण्डलनानास्थानवास्तव्यगुश्राफममुदायप्रपरेण श्रीदेव- गुलार्यकरणप्रगुणेन पश्चसप्ततिमण्डपिकामण्डितममुद्दण्डदण्डविडम्बिताराण्डमण्डलविमाननिर्माणविमानविधानपू- के निर्माणमहामहोत्मयश्च । शरीरसंस्कारथ सारपनमारागुरुकम्तुरिकाधीमलपाचलमारचन्दनप्रमुखमुगन्धिद्रव्यै- रेव पिरचयाश्च । संस्कारभम्यां साधुराजरीहडपूर्णचन्द्रगुलप्रदीप-माधुराजहग्पिालगुधारकवरण मत्पर सामाझण-साव्यशोपवलप्रमुससर्वपरितारपरिपृतेन समस्तशस्तदर्शनजनजाननेत्रपत्रमुघापागपारणाकारणाप्रवीण- रूपं श्रीभरताधिपरिनिर्मित श्रीमदष्टापदशिसरिशिसरगेसरायमानश्रीवाटलांशीयमुनिमतष्ठिकारितानगंस्कार स्थानप्रधानस्लूपस्वरूपमतुच्छम्लेच्छकुलजनव्यालश्रीमिन्धुमण्डलमप्पनिरामिश्रापरलोकमनोजष्टम्मनादानान्तर्ग ११५. ततय सं० १३९० वर्षे ज्येष्ठशुलपयां मोमगार मिथुनलमे श्रीदेवगजपुरे श्रीपुगादिदेवरिधिमन्ये श्री. कामाचापः श्रीजयधर्ममहोपाध्याय-श्रीलब्धिनिधानमहोपाध्यायप्रमुगविंगन्मंग पाकनि...मालागावी- मानाजनपदनगग्नाममासव्यासंग्यम्पपक्ष-पपक्षमुधारक-बामण-नमक्षत्रिय राजपूत्र-तुगमनायापनमहाप- सोपडामेलापानीमानाम्यमारपोपणागु, प्रियमाणागु नानाविधागु प्रोन्मर्पणाम. पित्यमाने या पारितमा, म्याने स्थान दायमानेषु तालाराम, गीयमाने परिधरगुपनार्गमिधरनमा रेप, गंजापमानपु गम- जननपनप्रमोदन्त्याभिपए प्रेक्षणीया, पुष्फगर मेपपदरापनधान्यरगवर्गगुरनुग्गमादिनानाविषमता- सोलादेशानुसार भोजिनपरायशी नाम कनन् । श्रीजिनामा पहानिरमोमाय नाही श्रीस्नूपं कारयामास।

खरतरगच्छालंकार : पाध्यायसंस्थापनास्वपुत्रिकादीक्षादापनप्रमुसदन्तिदन्तायदाताचदातबावसंजातसुयशःकुसुमश्रेणीसौरभभरसुरभितसर्व- दिक्कुटुम्बकेन साधुराजहरिपालसुश्रावकेण पितृव्यसाधुकटुक-भ्रात्साधुकुलघर-सत्पुत्रसाधुझाझण-सा० यशोधवल- प्रमुखसकलपरिवारपरिकलितेन सर्वेषु देशेषु कुकुमपत्रिकाप्रेपणपूर्व चतुर्दिक्षु सर्वस्थानश्रीविधिसंघान् समामन्त्र्य,मास- कादारभ्य प्रतिदिनं श्रीसाधर्मियात्सल्यादिनानाप्रभावनासंघपूजादिमहामहोत्सवेषु स्वभुजोपार्जितानेकसहस्रसंख्य- रूप्यटककन्ययेन याचकजनमनःसन्तोषपोषपूर्वकं कारितः। तस्मिन् महोत्सवे साधुआम्बा-सा झाझा-सा०मम्मी-सायचाहड-साधुस्सुर-०मोहण-सा नागदेव-सागोसल -सा कर्मसिंह-साखेतसिंह-साव्योहिथप्रमुखनानास्थानवास्तव्यमहामहद्धिकसुथापकैश्च स्वकीय स्वापतेयं सफली- चक्रे । तसिन्नेव महोरमवे जयचन्द्र-शुभचन्द्र-हर्षचन्द्रमुनीनां महाश्री-कनकधीक्षुल्लिकायाश्च श्रीजिनपरिभिर्दीक्षा प्रददे । पं०अमृतचन्द्रगणेवाचनाचार्यपदं प्रदत्तम् । अनेकधाविकाभिमाला गृहीता । अनेकश्रावक-श्राविकाभिः श्रीस- म्यक्त्वारोप-श्रीसामायिकारोप-परिग्रहपरिमाणानि गृहीतानि । तदनन्तरं ज्येष्ठशुक्लनबम्यां साधुराजहरिपालकारित- श्रीयुगादिदेवप्रमुखाईद्विग्बानां स्तूपयोग्य-श्रीजेसलमेरुयोग्य-श्रीपासपुरयोग्य-श्रीजिनकुशलसूरीणां मूर्तित्रयस्स प्रतिष्ठामहोत्सवः पदस्थापनामहोत्सवयत् सविस्तरतरः कृतः। तस्मिन्नेव च दिने महता विस्तरेण श्रीचतुर्विधसंघम- हामेलापकेन श्रीजिनकुशलपूरीणां मूर्तिः स्तूपे संस्थापिता । तदनन्तरं पट्टाभिषेकमहोत्सवोपरि समागतश्रीजेसलमेर- वीयश्रीविधिसमुदायगाढतराभ्यर्थनया श्रीउपाध्याययुगलप्रमुखसाधुद्वादशपरिवारपरिवृत्ताः श्रीपूज्याः श्रीजेसलमेरवी- यश्रीविधिसमुदायकारितस्वपक्ष-परपक्षातुन्छम्लेच्छानन्दकारिमविस्तरतरप्रवेशकमहामहोत्सवपूर्वकं श्रीपाश्वनाथदेवा- घिदेवं नमाकृतवन्तः । प्रथमा चतुर्मासी च तत्र कृता । ११६. तदनन्तरम् , सं० १३९१ वर्षे पोपरदिदशम्यां मालारोपादिमहोत्सवं सविस्तरतरं विधाय, लक्ष्मीमाला- गणिन्याः प्रवर्तिनीपदं दचा, श्रीपूज्या वाग्भटमेरूपरि विहताः । तत्र च सा०प्रतापसिंह-सा०सातसिंहप्रमुराश्रीसमु- दायेन श्रीचाहमानकुलप्रदीपरागकश्रीशिखरप्रमुखश्रीराजलोकनगरलोकसंमुसानयनपूर्वकं प्रवेशकमहोत्मा विधाय श्रीयुगादिदेवमहातीर्थ नमस्कारिताः । तत्र च दिनदशकं श्रीसमुदायस्य समाधानं समुत्पाद्य, श्रीपूज्याः श्रीसत्यपुरो- परि विहताः। श्रीसत्यपुरे च राजमान्यसर्वसंघकार्यनिर्वाहणसमर्थसाधुनिम्बाप्रमुसश्रीसमुदायेन राणकधीहरिपालदे- वप्रमुखश्रीराजलोक-नगरलोकमम्मुसानयनपूर्वकं प्रवेशकमहामहोत्सवः प्रचक्रे । श्रीमहावीरदेवं च श्रीपूज्या नमस्क. तवन्तः। तत्र च माघशुक्लपष्टयां श्रीसमुदायकारितं सफलजनचेतश्चमत्कारकारकं व्रतग्रहणमालागेपादिमहोत्सव चक्रुः । श्रीपूज्यस्तस्मिन् महोत्सरे नयमागर अभयमागरक्षुल्लकयोर्दीक्षा प्रदत्ता । अनेकथाधिकाभिर्माला मगृहीता । श्रीसम्यक्त्यारोपश्च कृतः। तत्र च किंचिद्नं माममेकं श्रीसमुदायस्य ममाधानमुत्पाद्य, पश्चात् श्रीआदित्यपाटके संघपुरुपसा०वीरदेवादिसर्वसमुदायकारितसविस्तरतरप्रवेशकमहामहोत्सवैन श्रीशान्तिनाथमहातीर्थ नमथः । ततो माघशुक्लपूर्णिमायां साजाहणकुलावतंससा तेजपालप्रमुखश्रीममुदायकारितः सविस्तरतरः प्रतिष्ठामहामहोत्मयो निर- चयाचने। तस्मिन् महोत्सवे श्रीयुगादिदेवममुसजिनविम्रपश्चशत्याः श्रीपूज्यः प्रतिष्ठा विदधे । ततः फान्गुनाधपष्ठी- दिने मालारोपण-श्रीसम्यत्यारोपादिमहोत्सयो विरचयामासे । ततः सं० १३९२ वर्षे मार्गशीर्पयदिपष्ठीदिने क्षुल्लकयोस्स्थापनाश्राविकामालाग्रहणादिमहोत्माश्चझे । ११७. ततः सं० १३९३ वर्षे कार्तिकमासे श्रीपूज्यैलघुपयोभिरप्यवश्यकर्तन्यतया साधुतेजपालकारितमविस्तर- तरधनसारनन्दिपूर्वकं प्रथमोपचानवपो व्यूढम् । ततः श्रीश्रीमालालावतंममा०मोमदेवमुश्रारकम्य श्रीजीरापष्टीममल- झारथीपार्थनाथ जिननि साविहितगाडतराभिग्रहस्य रिनसिरुया फाल्गुनायदशम्यां श्रीपत्तनात् प्रस्थाय, नारउद्रस्पाने ८७ युगप्रधानाचार्यगुर्वावली। मं० गेहाकेन कारितमहाप्रवेशका दिनद्वयमवस्थाय श्रीआशोटास्थाने श्रीपूज्याः समाययुः । तत्र च साधुश्यामलकुलो- सेन श्रीशत्रुञ्जयादिमहातीर्थयात्रनिर्माणविश्वविख्यातनानावदातेन सचपुरुषसाधुवीरदेवसुश्रावकेण श्रीविधिसमुदा- यसहितेन राजश्रीसंकी)द्रनन्दनराज गोधा-सामन्तसिंहादिसकलराजलोकनागरिकसम्मुखानयनपूर्वकं श्रीभीमपल्ली- कारितयुगप्रवरागमश्रीजिनकुशलसरिप्रवेशकमहोत्सववत् श्रीपूज्यानां सविस्तरतरः प्रवेशकमहोत्सवचक्रे । ततश्च साधु- मोखदेवकारितविहारक्रमोपक्रमा विपमकालेऽप्यस्मिन् चौरचरटप्रचारप्रचुरेऽपि मार्गे नगरमार्ग इव निःशङ्काः श्रीपूज्या जद्रीस्थाने पादाववधारयाचः । तत्र च साधु जलविपुलकुलगगनतलसमलकरणसहस्रकिरणकल्पेन सामोखदेव- सुश्रावकेण सर्वश्रीविधिसमुदायसहितेन चाहमानवंशमानससरोराजहंससमानखवाचाप्रदाननिर्वाहणप्रधानराज श्रीउ- दयसिंहप्रमुखराजलोकनागरिकलोकसम्मुखानयनेन महाप्रभावनापुरःसरप्रवेशकमहामहोत्सवश्चके । ११८. ततस्तत्रैव वर्षे राजश्रीउदयसिंहमहाप्रसादमासाद्य साधुराजमोखदेवेन साधुराजसिंहतनय-सा०पूर्णसिंह- साधनसिंहादिसकलस्वकीयकुटुम्बसहितेन श्रीअर्बुदाचलादितीर्थयात्रा कर्तुं श्रीपूज्या विज्ञपयामासिरे। श्रीपूज्यैश्च ज्ञानध्यानविधानसमनुकृतसर्वखपूर्वजयुगप्रधानपरम्परावदातैनिधिसमिति परिभाव्य धीतीर्थयात्रामहत्प्रभावनाङ्गं श्री- सम्यक्त्यनिर्मलतानिदानं सुश्रावकाणां कर्तव्यैवेति तद्विधाने समादेशः प्रादायि । ततश्च श्रीसपादलक्षीय-श्रीश्रीमालीय- सा वीजा-सादेपाल-सा०जिनदेव-सा०साङ्गाप्रमुखस्वपक्ष-परपक्षश्रावकसङ्घकुद्मपत्रिकाप्रदानेन, मार्गे च सामूल- राज-साल्पासिंहाभ्यां सर्वसङ्घस्य शुद्धौ क्रियमाणायां समाकार्य, चैत्रशुक्लपष्ठीदिने आदित्यवारे श्रीपूज्यानां पार्थात् श्रीतीर्थयात्रायोग्यनूनकारितथीदेवालये श्रीशान्तिनाधबिम्बस्य संस्थापनावासक्षेपः साधुमोखदेवेन कारयामासे । ततो- ऽष्टाविकामहोत्सवान महाप्रभावनया विधाय चैत्रशुक्लपूर्णिमायां श्रीजडीवास्तव्य-सा०काला-सा कीरतसिंह-सा० होता-सा भोजाप्रमुखश्रीविधिसंघ-मऊदाप्रमुखान्याचकसंघमेलापकैन श्रीदेवालयप्रचलनमुहूर्त जज्ञे। श्रीपूज्या अपि श्रीलब्धिनिधानमहोपाध्याय-बा० अमृतचन्द्रगणिप्रमुखमुनिमतल्लिकापञ्चदश-श्रीजयद्धिमहत्तराप्रमुखसाध्व्यष्ट- कपरिपृताः श्रीसद्धेन सह श्रीतीर्थयात्रायां अचेलुः । ११९. ततः श्रीब्जद्रीसङ्घः श्रीसपादलक्षीयसद्धेन सह मिलिला श्रीनाणातीर्थे समाययौ । तत्र च सासूराप्रमुख- श्रावकवृन्दस्वीकृतश्रीइन्द्रपदादिनिर्माणेन महती प्रभावनां विधाय, श्रीमोखदेवग्नमुखश्रीसङ्घः श्रीमहावीरमहामासादे रूप्यटक शरा २ द्रव्यं सफलीचकार । ततः श्रीपूज्याः गुमशनैः प्रोत्साह्यमानाः समस्तश्रीविधिसङ्घनाहमहमिकया वरिवस्यमानाः श्रीअर्बुदाचलालङ्कारसकललोकमनोपहारविज्ञानवितानसारश्रीविमलविहार-श्रीणिगविहार श्रीतेजसिंह- 'विहारमूलालङ्कारश्रीनाभेय-श्रीनेमीश्वरप्रमुखश्रीतीर्थकरवारं भावसारं नमथः । तत्र च सामोखदेवप्रमुखश्रीविधिसङ्घन श्रीशक्रपदामात्यपदादिपदनिर्माणमहाध्वजारोपणाचारितसत्रादिमहामहोत्सवपरम्परां विरचयता रूप्पटङ्कशत५ प्रमाण द्रविणं सफलीचक्ने । ततः श्रीमहादनपुरस्तूपालङ्कारश्रीमञ्जिनपतिसरियुगप्रधानमूर्ति मुद्रस्थलाग्रामे श्रीपूज्याः सकलस- इसमन्विताः प्रणेमुः। ततः श्रीजीरापल्लयां जायत्प्रभावकमलासनाथश्रीपार्श्वनाथं श्रीपूज्या: श्रीसङ्घसमन्विताः प्रणमन्ति स्म। तत्र व श्रीसकेन श्रीशक्रपदादिमहोत्सवान् विधाय रूप्यटङ्कशत १५०कृतार्थीकृतम् । ततः स्थानात् प्रस्थाय श्रीसङ्घः श्रीचन्द्रावत्यां सकलसह पादायधारणं विदथे । तत्र च श्रीसङ्घस साधुलाञ्झण-म०पाप्रमुखनागरिकसुश्रावफलोकैन श्रीसाधर्मिकवात्सल्यश्रीसद्धपूजादिविधानेन बहुमानप्रदानं प्रचक्रे । श्रीसद्धेन च तत्रापीन्द्रपदादिविधानेन श्रीयुगादि- देवप्रासादे रूप्परवशतर कृतार्थयामासे । ततोऽपि प्रस्थाय श्रीरासने श्रीनेमीश्वरप्रमुखपञ्चतीर्थी श्रीपूज्याः श्रीसद्देन सह नमन्ति स्म । तत्रापि श्रीसझेन पूर्ववच्छपदादिनिर्माणेन रूप्यटङ्कशत १५० सफलं निर्ममे । ततय श्रीतारङ्गके श्रीकुमारपालभूपालकीर्तनं श्रीअजितस्वामिनं श्रीसङ्घः प्रणनाम । तत्र च विशेषतरं श्रीसकेन श्रीशक्रपदादिनिर्माणन रुप्यटकराते २ सफले विदधाते । ततो व्याधुख्य श्रीसद्धः श्रीत्रिशृङ्गमके समागमत् । तत्र च मं० साङ्गणपुत्ररत्न-मं०० खरतरगच्छालंकार मण्डलिक-मव्ययरसिंह-साम्नेमा-सा०कुमरपाल-सा महीपालप्रमुखत्रिशङ्गमकसद्धेन महाराजश्रीमहीपालाङ्गज-म- हाराजश्रीरामदेवविज्ञपनं कृखा, तदीयनिरोपमासाद्य निखानेपु वाद्यमानेषु सविस्तरवरः श्रीसद्यस्य नगरप्रवेशकम- हामहोत्सवश्वक्र । श्रीपूज्यैश्च सर्वचतुर्विधसङ्घसमन्वितैः सवित्तरा सर्वप्रासादेषु चैत्यप्रपाटी विदधे। श्रीसद्धश्च श्रीश- क्रपदादिनिर्माणेन रूप्यटकशत १५० श्रीपार्श्वनाथप्रासादे कृतार्थांचकार | १२०. ततः प्रतिदिक्प्रसर्पत्प्रतिनिनादश्रीपूज्यनिष्प्रतिमप्रातिभवैभवादिगुणगणसंभवयशोवादसमाकर्णनेन संजा- तकौतुकसमाजः श्रीरामदेवमहाराजः सामोखदेव-मं०मण्डलिकाले प्रतिपादयामास-'युप्मद्गुरूणां लघुवयसामपि महान् प्रज्ञाप्रकर्षः श्रूयते । अतस्तदवलोकनार्थमहं तत्रागमिष्यामिः अथवा तान् मम पाच समानयत'। ततः सामोखदेव- मं०मण्डलिकाभ्यां श्रीपूज्या महताऽऽग्रहेण विज्ञप्यन्ते स्म । ततस्तदाग्रहाच्छीपूज्याः श्रीलब्धिनिधानमहोपाध्यायादि- साधुपरिवृताः श्रीरामदेवमहाराजसभायां पादा अवधारितवन्तः। श्रीरामदेवमहाराजः श्रीपूज्यान समागच्छतोऽवलोक्य स्वकीयासनात् समुत्थाय श्रीपूज्यपादान् ननाम । श्रीपूज्योपवेशनार्थ चतुष्किकां मोचयामास च । श्रीपूज्यैश्वाशी- दिः प्रादायि । तत्र चोपविष्टेन श्रीसारङ्गदेवमहाराजव्यासेन स्वोपझं काव्यं व्याख्यायि । तत्काव्ये च श्रीलब्धिनि- नमहोपाध्यायः क्रियापदे कूटं निरफास्यत । ततः श्रीरामश्चित्ते चमत्कृतः । पुनः पुनः सभायां यमाण-'अहो ! अमीपामुपाध्यायानां जाग्रत्समग्रशास्त्ररहस्यानां महाभटवद्वाक्पटुता, येनास्माकमपि सभायां व्यारावचने कूटं नि- प्कासितम्' । ततः सर्वाऽपि राजपर्पत् मस्तकधूननेन ताण्डवं नाटयन्ती श्रीपूज्यराजश्रीमदुपाध्यायमिश्रगुणवर्णनपरा जते । ततः श्रीपूज्यैः श्रीराममहाराजवर्णनं तात्कालिकयार्यया विदधे । तथा हि- विहितं सुवर्णमारङ्गलोभिनाऽपि त्वयाऽभुतं राम!! यत्ते लङ्कापुरुपेण ननु ददे श्रीर्वरा सीता ॥ ततः सर्वाऽपि सभा चमत्कृता । ततः श्रीरामेण श्रीसिद्धसेनाप्रमुखाचार्यान् समाकार्य, तत्प्रत्यक्ष श्रीपूज्यपार्थात् कायस्थकथितं विकटाक्षरं काव्यमलेख्यत । तच श्रीपूज्यनूतनदृष्टराजसभायामपि धाटयशालिभिवारमेकं वाचयि- खोत्पुंस्य च मुखे नाममालामनवच्छिन्नाण्या गुणयत् सर्वकं समलिख्यत । लोकश्च सोऽपि श्रीपूज्यानां संमुखो बभूव । ततः पुनरप्येकस्यैकस्य श्लोकस्य प्रत्येकमेकमेकमक्षरमाचार्य-व्यास कायस्थपार्थालेसयित्वा श्रीपूज्यैरुत्यु- सितम् । एवं द्वितीयवारं तृतीयवारमित्यादि यावत् श्लोकत्रय सम्पूर्णमजनिष्ट । ततः श्रीपूज्पनि प्रतिमप्रज्ञापोपविशे- पशालिभिः सम्पूर्ण श्लोकत्रयं पट्टकेऽलेखि । तेन च सुकर्मणा विश्वप्रयेऽपि स्वकीयश्लोकराजहंसः सेलनार्थमपि । ततः सर्वाऽपि राजसभा-'अद्यापि विषमकलिकालविलमसकलकलास्वपि लोकेषु श्रीजनशासने विलोक्यन्तेऽतिशा- यिकलाकलापकलिताः श्रीमरिचराः' इति श्रीपूज्यगुणगणवर्णनपरा जते। श्रीपूज्याश्च सराजराजसभाषेतचमत्कार समुत्पाद्य श्रीसङ्के पादाववधारयाश्चक्रुः । १२१. ततश्चन्द्रावत्यादिमार्गेण श्रीचतुर्विधसङ्घन परिवस्यमानाः श्रीपूज्या जडीस्थाने पादायवधारयामामुः। तत्र च निपढश्रीसङ्घप्राग्भारेण निर्निदानस्वर्णरुप्यास्ताचप्रमुखवस्तुयितानमहादानप्रदानपवित्रीकृतामयखकीयस्वाप- तेयसारेण सङ्घपुरुषसाधुमोसदेवसुश्रावकवरेण श्रीउदयसिंहमहाराजप्रमुसराजलोकनागरिकलोकसंमुसागमनेन....... याधमानेषु सर्वेष्वपि वाद्येषु श्रीसद्धसहितश्रीदेवालयस्य प्रवेशकमहामहोत्सवो विरचयामासे । श्रीपूज्याश्च सपरिवारा- स्वत्र चतुर्मासी चक्रुः॥ ॥ समाप्तिमगमदत्रेयं गुर्वावली ॥

. वृद्धाचार्यप्रबन्धावलिः । १.-श्रीवर्द्धमानसूरिप्रबन्धः। अथ वृद्धाचार्याणां प्रवन्धाः संक्षेपेण कथ्यन्ते- १. अहन्नया कयाई सिरिवद्धमाणमरिआयरिया अरनचारिंगच्छनायगा सिरिउजोयणरिपट्टधारिणो गामाणु- गामं दूइजमाणा अप्पडिचंधेण विहारेण विहरमाणा अन्यगिरितलहट्टीए कासदहगामे समागया। तयणंतरे विमल- दंडनायगो पोरवाडवंसमंडणो देसभागं उग्गाहेमाणो सोवि तत्व आगओ। अब्युयगिरिसिहरं चडिओ। सव्यओ पव्वयं पासित्ता पमुइओ चित्ते चिंतेइ-'अत्थ जिणपासायं करेमि' । ताव अचलेसरदुग्गवासिणो जोगी-जंगम-तावस- सन्नासि माहणप्पमुहा दुट्ठा मिच्छत्तिणो मिलिऊ विमलसाहुं दंडनायगं समीयं आदता । एवं वयासी-'भो विमल ! तुम्हाणं इत्थ तिथं नस्थि । अम्हाणं तित्थं कुलपरंपरायातं वट्टइ । अओ इहेव तब जिणपासायं काउं न देमि' । तो विमलो विलक्खो जाओ। अब्युयगिरितलहट्टीए कासद्दहगामे समागओ। जत्थ बद्धमाणसूरी समोसड्डो तत्थेव । गुरुं विहिणा वंदिऊण एवं वयासी-'भगवन् ! इहेब पव्यए अम्हाणं तित्थं जिणपडिमारूवं चट्टइ ति नो वा । तओ गुरुणा मणियं-'वच्छ । देवयाआराहणेण सव्यं जाणिजइ । छउमत्था अन्नहा कहं जाणंति। तओ तेण विमलेण पत्थणा कया। किं बहुणा वद्धमाणसरीहिं छम्मासीतवं कयं । तओ धरणिंदो आगओ। गुरुणा कहियं-'भो धरणिंदा ! गरिमंतअधि- टायगा चउसहि देवया संति । ताण मज्झे एगोवि नागओ, न य किंचि कहियं, किं कारण ?'-धरणिंदेणुत्तं-'भगवन् । तुम्हाणं मरिमंतस्स अक्खरं वीसरियं । असुद्धभावाओ देवया नागच्छति । अहं तवरलेण आगओ' । गुरुणा उत्तं- 'भो महाभाग! पुज्यं मरिमंतं सुद्धं करेहि। पच्छा अन्नं कझं कहिस्सामिति । धरणिदेणुतं-'भगवन् ! मम सत्ती नस्थि सरिमंतक्खरस्स सुद्धासुद्धं काउं तित्थंकरं विणा' । तओ मरिणा मरिमंतस्स गोलओ धरणिंदस्स समप्पिी । तेण महाविदेहखित्ते सीमंघरसामिपासे नीओ । तित्थंकरेण सूरिमंतो सुद्धो कओ। तओ धरणिंदेण सरिमंतस्स गोलओ खरीण समप्पिओ। तो पारत्तयसरिमंतसमरणेण सन्ये अहिट्ठायगा देवा पञ्चक्सीभूया। तओ गुरुणा पुट्ठा-'विमल- दंडनायगो अम्हाणं पुच्छइ-अब्बुयगिरिसिहरे जिणपडिमारूवं तित्यं अच्छड् णया' । तओ तेहिं भणियं-'अव्वुयादे- वीपासायबामभागे अदबुदआदिनाहस्स पडिमा वट्टइ । अखंडक्खयसत्थियस्स उवरि चउसरपुष्पमाला जत्थ दीसइ, वत्थ सणियच । इय देवयावयणं सुच्चा गुरुणा विमलसाहुस्स पुरओ कहियं । तेण तहेब कयं । पडिमा निग्गया। विमलेण सव्वे पासंडिणो आहूया। दिट्ठा जिणपडिमा । सामवयणा जाया । तओ पासायं काउमारद्धं विमलेण । चओ पासंडेहिं भणिय-'अम्हाणं भूमि पूरिऊण दव्वं देहि । तओ विमलेण भूमि दवैहि परिऊण दव्वं दिनं। तओ पासायं । युद्धमाणवरीहि तित्थं प[य]डियं न्हवणपूयाइयं सव्यं कयं । तओ गयकालेण मिच्छत्तिणो तस्माघीणा जापा। तओ पावनजिगालओ सोवण्णकलसदंडघयसहिओ पासाओ निम्मविओ विमलेण । अट्ठारसकोडी तेवनलक्स- संखो दो लग्यो । अजवि असंडो पासाओ दीसइ ।। इस वदमाणसरिप्पांघो समतो॥ यु.गु.११ वृद्धाचार्यप्रबन्धावलि । जापइ । पच्छा अभयदेवमरिपोसहसालाए गो। दिवो सुविहियचूडामणिनिग्गंयो आयरिओ। तस्स सयासे दिक्खा गहिया। कमेण जोगवाहाविऊण गीयत्यो कओ । सव्यसंघअभत्थणावसानो एगारह सड सतसट्टे वरिस अभयदेवर- "रिणा सूरिमंती दिनो जिणवल्लहमरि इइ से नाम विहियं । सव्वत्थ विहरइ विहिपक्खथापगो सुविहियचकचूडामणी। संवेगपरायणो विहरतो मेइणि मेदपाडदेसे चित्तक्डदुग्गे संपत्तो। तओ मिच्छत्वहुलो लोओ जिणधम्म कोवि न पडियाइ । तओ सूरी चामुंडादेवीपासाए ठिओ । तओ रयणीसमए चामुंडा आगया। कंपियं पासायं । गुरुणं उप- सग्गं काउमाढता । सूरिणा मरिमंतवलेण खीलिया वसीकया। छागाइजीनवहलि छंडावियं । जिणसासणस्स पभावणा जाया । देवया भणिय-'मम नामेण गच्छनामं कुणह, जहा संतुट्ठा महायं करेमि तुम्हें । गुरुणा तहेव कयं । सब्वे लोया योहिया । सम्मत्तं दिन्न । ५. अन्नं च-जिणवल्लहस रिसमीचे एगो सारगो साहारण इइ नामो निद्धणो धम्मिओ चिछ । गुरुणा तस्स दसकोडिदयस्स परिग्गहो दिनो । रायपहाणपुत्तेण हसियं लोगसमक्सं। एसो दरिद्दी गिहे गिहे भोयणं करे । एयस्स दसकोडिदव्बपरिग्गहं पस्सह । गुरुणो नि तारिसा । तओ गुरुणा उत्तं-'भो पहाणपुत्त नो हसियव्यंएयस्स। एसो तम मत्थयाओ [क]कर उत्तारिस्सड त्ति कटु । अनया गुरुपयणाओ साधारणसामगेण पंचसयमयणसगडाणि गहियाणि । तम्मज्झे उपरि मयणं मज्झे सुमनं । विधिय धणड्डो जाओ। रायपहाणपुत्तो रन्ना दंडिओ, बंधिओ। दर नत्थि तस्स सिरे ककर दिन्न । साहारणसारगेण कोडिदव्यं दारुण छोडानिओ। जिणपासायं कारियं चित्त- कडनगरे । जिणवल्लहरिणा पइटियं । सेत्तुज संघाहियो जाओ। साहारणसारगो देरगुरुपयभत्तो परमसुमारगो। अन्नं च - वागडदेसे दससहसगेहाणि सिरिमालाणं पडियोहियाणि जिणपल्लहरिणा । पिडविसुद्धिपगरणं च रइयं ।। इति जिनाल्लभमरिप्रवन्धः ॥४॥ ५.-श्रीजिनदत्तसूरिप्रवन्धः। ६.जिणालहरिपट्टे जुगप्पहाणा जिणदत्तमूरिणो अणहिलपुरपत्तणे विहरिया । तत्थ सिरिनागदेवो नामसारगो परिचसइ । तस्स संसओ जाओ जुगप्पहाणस्म । सवे साहुणो अभिमाणसेण नियनियगच्छे अपाणं आयरियं जुगप्प- हाणन वपंति । सम्मं न नाइ फेणापि । तमो नागढेयमारगो गिरनारपयए अविकादेवीसिहरे गंतूण अट्ठमं तवं फर्य । अंपिका पञ्चपसीभूया । तस्स हन्थे अक्सरा लिहिया। एवं पयामी-'भो नागदेवसागा! तुह चित्त जुगप्प- हाणस्स ससओ अस्थि । गच्छह णं देवाणुप्पिया तुर्म अणहिलपुरपत्तणे। सच्चाए पोमहसालाए चुलमीगच्छठियाण आयरियाणं दारमह नियहत्य । जो हत्यसराणि पाएइ सो जुगप्पहाणो नायन्यो । तओ देयारयण नागदेवो तत्य गओ । सन्याए पोमहसालाए आपरियाणं निपहत्थं दरिमियं, न कोपि वाएड । तओ सोमाग्यो सरतरगच्छा- विस्म जिणदत्तमरिणो पोमहसालाए गओ। वंदिओ सूरी दिछो हत्यो । मुग्गिा मोणं कयं । महाणुमागा नियगु- पायुत्ति न कुवंति, लजति य । तमो मरिणा तस्म समपोसामगस्म हत्थे यामक्पेगो को । गुरूण आएमरसाओ सीसेण रइ अक्सराणि वाइयाणि- दासानुदामा इव सर्वदेवा यदीयपादान्जतले लुठन्ति । मरुस्थलीकल्पतरः स जीयाद् युगप्रधानो जिनदत्तसरिः ॥१॥ तओ नागदेवेग निसासएण तिपयादिणीरमाणो मारमारनपंदणर्ग बंदिनी ! सब्यविक्माओ जाओ। ७. अन्नया जिगदत्तरी अजयमेरदुग्गं पद रिहरिओ ! उस्य चउमहिजोगिणीपीदें! जया जिगडनगरी इत्य चिहिस्सह, तया आम्हाणं पूधामयारो न भरिम्मइ ति कटटु, जोगिणीहि पिचितिऊन यउसटिमारिया काग ९२ वृद्धाचार्यप्रबन्धावलिः। वक्खाणमज्झे समागया। दुहा देवीओ छलणत्यं । तओ सरिणा सरिमंतधिट्ठायगवसेण सीलिया थंभिया । उहिउँन सका। तओ दयावसेण मुक्का । अन्नुनं वायाधो को। जत्थ अम्हे न तत्थ तुम्हे । अहूंठपीढे तुमे न गंतव्यं । पढमं एग उजेणीपीढं। बीयं दिल्लीपीढं । तइयं अजयमेरदुग्गे पीढं । अद्धं भरवच्छे । जोगिणीहि भणिय-'भो भट्टारगा! जो तुम्ह सीसो तुम्हें पट्टे सो अम्हाणं पीठे न विहरइ । जइ विहरइ तया वध-बंधादिकह सहई-त्ति नियमो जहा जिण- हंसमरी । तओ जिपदत्तसूरीहिं तह ति कयं । तओ आयरिया सिंधुमंडले विहरिया । तत्थ इगलक्खासीइसहस्साणि ओसवालाणं गेहाणि पडिचोहियाणि । तओ उच्चनगरे गया। तत्थ मिच्छदिट्ठी हिं एगो माहणो छुहोअरणो रोगपत्यो मुयमाणो जिणालए मुक्को मडओ। तओ संघेहिं जिणदत्तसूरी विनत्तो-'भगवन् ! माहणेहि दुत्वं विहियं । किं किजइ ?'. तओ गुरुणा परकायप्पवेसविजाए जिनालयाओ मडयं माहणं सजीवं काऊण नारायणपासाए खित्तं। माहणा सचिंता जाया । गुरुसमीवे आगया माहप्पं दद्दूण चरणे पडिया । पुणरवि गुरुणा मडयं सजीचं काऊण सयमेव मसाणभूमीए गंतूण पडिओ। जिणसासणस्स महिमा कया। सन्चे माहणा सावया जाया। मिच्छत्वं परिहरियं । एवं जेसलमेर-नाहडमेर-मम्मणवाहण-मरपट्टपमुहनगराणि विहरिऊण ठाणे ठाणे पभावं काऊण पंचनदे पत्ता । जत्थ पंच नईओ मिलियाओसोमरो नाम जक्खो पडियोहिओ। जया जिणवल्लहसूरी सग्गं गओ तया अट्टायरिया गच्छायासे। एगो आयरिओ पुनदिसाए रुदओलीनगरे जिणसेसरसरि इइ नामेण भट्टारगो रुद्दपल्लीगच्छाहियो जाओ। जिणवल्ल- हरिपदे अन्ने सत्तायरिया जालउरनगरंमि मिलिऊण मंतं इइ कयं । समग्गसंघगच्छपरिवारिया वीयं भट्टारगं करि- स्सामि, जिणवल्लहसूरिपट्टे । तओ दक्खिणदेसे देवगिरिनगरे जिणदत्तगणी चउमासी ठिओ अस्थि । तं सपभावगंगीय- त्थं पट्टजुग्ग जाणिऊण संघेहि आहूओ। पट्टठायणा दो मुहुत्ता गणिया । तो संघपत्थणावसामो जिणदत्तगणी च. लिओ। मालवदेसे उजेणीनयरीए आगओ विहरंतो । तंमि अवसरे जिणवल्लहदव्यगुरुस्स कचोलायरियस्स अंतकालो वहइ । तओ कचोलायरिएग जिणदत्तगणिपासाओ आराहणा गहिया । सुहझाणेग मओ। सोहम्मे कप्पे मुरो जाओ। जिणदत्तगणी अग्गे चलिओ । जीहरणिनामनगरउजाणे मुष्णदेवालए ठिओ।तत्थ पडिक्कमणं काउमारद्धं । तत्थ कचो- लायरियस्म जीवो देयो उदंडपयंड पवणलहरीहि सुब्भमाणो पयडीओ। गुरुणा उत्तं-'कोसि ? । तेणुतं-'अहं तुहप्पसायाो देवत्तं पायिओं । तओ तेण जिणदत्तगणीणं सत्त वरा दिन्ना । तंजहा-तुह संघमझे एगो सट्टो महडिओ होही, गामे वा नगरे वा.-इय पदमवरो।१। तुह गच्छे संजईणं रिउपुप्फ न हनिस्मइ-धीओ वरो ।२ तुह नामेण विज्जुलिया न पडिस्मइ-तइओ परो ।३। तुह नामेण आंधीवधूलाइ परिमो टलिस्मइ-चउत्थो यरो।४। अग्गिथंभो पंचमो।५। सैन्यजलथंभो छट्ठो ६। सप्पविसो न पहविस्मइ-सनमो वरो। अन्नं च पढममुहुने पट्टे मा उबविससि, तुच्छाऊ भविस्मसि वीयमुहुत्ते तु जुगप्पहागजिणसामणप्पभावगो भविस्सइ (सि) । तुह गच्छे दसस- यसाहुणो समगणिप्पमुहा, धम्मदेववाणापरिपाइ पयस्था । मत्तमया माहुणीणं संपया भविस्ममि । इइ वपर्ण कहि- ऊण देवो अदिहो जाओ । तओ गणी वीयमुहुत्ते जालउरदुग्गे एगारहमयगुणहत्तरे वरिसे जिणदत्तमरी पट्टे ठविओ सब्यसंघेहिं । आरिसो जाओ। पुणो विहरतो अजयमेरदुग्गे पनो। पडिकमणमझे विज्ज उजोयं करेमाणा थभिया । जिणदत्तमरी सवाउयं पालित्ता सग्गं गओ । तत्थेर अञ्जयि धुभो वट्टइ ।। इति संक्षेपण जिणदचनरि. प्रवन्धः ॥५॥ ६.-श्री जिनचन्द्रसूरिप्रवन्धः । ८. जिणदत्तमरिपट्टे जिणचंदमूरी मणियालो जायो। तस्स भालयले नरमणी दीपइ । मो नि मलमेर- दुग्गाओ दिल्लीनयरवासिसंघेण आहओ। तो सरिणा संघस्न लेहो पेमिओ-अम्हाणं तत्य गए जिणदत्तगणं -- . वृद्धाचार्यप्रबन्धावलिः । जोगिनीपीठे विहारो निसिद्धो तेहिं । तओ डिल्लीपुरसंघस्स अन्मस्थणावसेण जिणचंदसरी आगओ जोगिनीपीठे। पवेसमहोच्छवमज्से जोगिनीहिं छलिओ मओ। अञ्जवि पुरातनढिल्लीमज्झे तस्स धुंभो अच्छइ । संघो तस्त जचा- कम्म कुणइ ।। इतिजिनचन्द्रसूरिप्रवन्धः ॥६॥ ७.-जिनपतिसूरिप्रवन्धः। ९. जिणचंदररिपट्टे सिरिजिणपतिसरी हुत्था । सो वि पारवरिसवइठिओ पट्टे ठाविओ। विहरतो आसीनगरे समागओ। संघेहि पवेसमहोच्छओ कओ महावित्थरेण । पुणो चित्रपइट्ठाकारावणमारद्धं संघेहिं । तयणरे एगो विजा- सिद्धो जोगी आगो भिक्खट्टा । विग्गचित्तो संघो कोवि तस्स भिक्सं न देइ । तओ सो रुटो। भूलनायगपिंयो कीलिओ, गओ। पइट्ठालग्गवेलाए सबोवि संघो उहावेउं लग्गो परं न उठेइ वियो । तओ संघो चिंताउरो जाओ । जो- गिणं पिच्छंति, कत्थवि न लद्धो। तया साहुणीणं मझे जा महत्तरी अजिया सा आयरियं वंदित्ता एवं धुत्ता समाणा- 'भगवन् ! संघो हसइ, अम्हाणं भट्टारगो बालो तारिसी विजा नत्थि, किं किजइ' । तओ जिणपतिमरी सीहासणाओ अब्भुढेइ, अब्भु इत्ता सूरिमंतेण विनस्स मत्थए वासक्खेओ कओ। तकालं एगेण सावगेण उद्यापिओ दियो । वियपइट्ठामहसयो जाओ। सरयरगच्छे जयजयसद्दो उच्छलिओ। अन्नं च-रायसभाए छत्तीसवादा जिया। जिनपति- सूरिणा पुणो खरपरगच्छसमापारी उद्धरिया। महापभाक्गो जाओ। जिणवष्ठहसारिकयस्स संघपट्टयपगरणस्स टीका जेण कया । इति जिनपतिसूरिप्रवन्धः ॥७॥ :.-जिनेश्वरसूरिप्रवन्धः। १०. जिनपतिमूरिपट्टे नेमिचन्द्रभंडारी जिणेसरसूरीणो (१) पिया संजाओ। तस्स दोसीसा संजाया । एगो सिरि- मालो जिनसिंहधरी। बीओ ओसवालो जिगप्पयोहरी । अन्नया जिणेसरबरी पल्हपुरे नियपोसहसालाए उपविट्ठो संतो मूरिस्स दंडगो अकम्हा तडतडित्तिसई काऊण दुहाखंडो संजाओ' । तओ मरिणा भणियं-'भो सीसा ! एस सद्दो कुओ संजाओ?' । अवलोइऊण सीसेहिं कहियं-'सामि! तुम्ह हत्थदंडओ दुहा संजाओ। तओ चिंतियं आयरिएण- 'मम पच्छा दो गच्छा होहति । तओ सयमेव नियहत् गच्छं करिस्सामि' । इत्येव पत्यावे सिरिमालसंघहि मिलिऊण चितियं-इत्थ देसे कोई गुरू नागच्छइ । पयलह गुरुसयासे गुरुं आणेमो। मिलिऊण सयलसंघो गुरुममीयं गओ। वंदिऊण आयरियं विनत्तं सयलसंघेहि-'भो सामि ! अम्ह देसे कोवि गुरू नागच्छइ । तओ अम्हे किं करमो । गुरुं पिना सामग्गी न हबई । तेण गुरुणा पुष्यनिमित्तं नाऊण जिणसिंधगणी लाडणुयाउत्तो सिरिमालचंमुभयो नियपट्टे ठविओ । नामधेयं कयं जिनसिंघसरि ति । कहियं-'एए सावया तुम्ह मए समप्पिया। गच्छह संघसहिओं' । तओ वंदिऊण गुरुं साश्यसहिमो जिनसिंघसूरी समागमओ। सव्यमिरिमालसंधैहिं कहियं-अज्ञप्पभिइ एम मम धम्माय- रिओ । अओ दो गच्छा संजाया। पारससयअसीए संवच्छर पन्हपुरे नयरे जिणेसरमरिणा जिनसिंघसरी को। पउमाईमंतो उवएसिओ केवइ बरिसेहिं जिनेसरमी देवलोयं गओ ।।८॥ ९.-जिनसिंघसूरिप्रवन्धः। ११. जिनेसरगरिपट्टे जिनसिंघसूरी संजाओ । एउमापईमंतसाहणतप्परो निचं झाएइ । माणाप्रसाणे पउमावइए मणियं-'तुह छम्मासाऊ वट्टा' । तो परिणामणियं-'मम सीमाण पचवतीभूया । कहनु मम पट्टे को होही । सो पोमाचईग भणियं-'गच्छह मोहिलबाडीए नपरीए वा गोत्तपबित्तकारगो महाधरनामगो महीमो मायगो अच्छा। सप्पुणो स्यपालो। तस्स मसासेठष्टदेवीउपर महडपाल इइ नामपेयो सहलाणसंपन्नो, तह पट्टे जिगपहसूरी वृद्धाचार्यप्रसन्धावलिः। . - नामभट्टारगो जिणसासणस्स पभावगो होही । इय वयणं मुचा जिनसिंघसरी तत्थ गओ । महया महोच्छवेण साव- गेण पुरप्पवेसो कओ। पच्छा महाधरसिद्विगिहे गओ सूरी। दट्टण आयरियं सत्तट्टपयं सम्मुहं गच्छड । बंदिऊण आसणे निमंतिओ-'भगान् ! ममोगरि महप्पसाओ तुमे कओ जेण मम गिहे समागया। परं आगमणप्पयोयणं चयह' । तओ गुरुणा भणियं-'भो महाणुभार ! तुम्ह गिहे सीसनिमित्तं समागओहं । मम एगं पुत्तं पियरह' । तओ तेण तह त्ति पडिवणं । तओ तेग अन्ने पुत्ता संसकारं काऊण पत्यादिणा आणीया। कहियं-'एयस्स मझे जो तुम्हाणं रोयइ तं गिण्हह' । गुरुणा भणियं-'एए पुत्ता दीहाउया तुम्ह गिहे चिटुंतु । परं जो मुहडपालो पालो तं वि. यरह' । तहेब कयं, निहारिओ, सुमुहुत्ते दिक्खिओ य । तेरहसयछवीसावरिसे दिक्सं सिक्सं दाऊण पउमाईमंतो समप्पिओ। कमेण गीयत्थचूडामणी संजाओ। तेरहसयडकतालवरिसे किढिवाणानगरे जिणसिंघारिणा मुमुहुत्ते नियपट्टे थप्पिओ जिणप्पहसूरी। जिणसिंघसूरी देवलोयं गओ । इति जिणसिंघसरिपनन्धः ॥९॥ १०.-जिनप्रभसूरिप्रवन्धः । १२. अहुगा जिगपहरिपयंघो भण्णइ-इओ य जिनसिंघमरिपदे जिणपहसूरी संजाओ। तस्म पुत्वपुष्णवसा पउमाबई पञ्चक्सा संजाया। एगया पउमाई पुच्छिया सूरीहि-'कहसु भगाइ! मम कत्थ नयरे उन्नई भविस्सई' । तओ पउ- मावइए लनियं-'तुम्ह विहारो जोगिनीपीठे ढीलीनयरे महुच्छओ भनिस्मइ, तत्थ तुम्हे गन्छह'। तओ गुरुणा निहारो कओ। कमेण जोगिणीपुरे [स]मागओ पाहि वा(सा?)हापुरे उतिनो । एगया मरी पियारभूमि गओ संतो, नत्य अणारिया मिच्छादिविणो पराभवं काउमारद्धं लेटुमाईहिं। तओ गुरूहि भणिय-'पउमाइ ! सुह महुच्छओ संजाओ। तओ पडमाईए तस्स वहगस्म लेट्ठमाईहिं तस्सेर पूया कया। ते अणायरिया पलायमाणा महम्मदमाहिणो समीचे गया। कहियं सरिसाइयर । तओ चमक्यिचित्तो पुच्छेड-'कत्थ सो अत्थि पुरिसो" तेहिं निवेइपं-'पाहि पएसे दिट्टो अम्हेहिं । तो पहाणपुरिमा आइट्टा-'गन्छह तुम्भे, तंआणेह इत्य,जहा तं पस्मामि। तो ते गंतूण गुस्समीवे एवं निवे- इयं-'आगच्छह भो सामि ! अम्ह पहुसमीरे । तुमे पयलह' । तओ आयरिया पउलिदुगारे गंतूण ठिया। भिहिं गंतूग निवेइयं । जान ते साहिणो निवेययंवि,तान मूर्ग[हिं] सीसाण कहियं-'अई भगासणं क्रोमि। जया माहि ममागच्छर तया तुम्हेहिं कहियई-एस मम गुरु । तओ सो कहिस्मइ-जारिमो आमि तारिसं कुणह । तओ तुम्भे अष्ट्रत्यं धरिऊण कंधे ठवेह' । इय वुत्तण गुरू माणमस्सिओ। कुंभसमाणो संजाओ।तो आगंतूण महम्मदमाहि सीसं []पइ-'कत्य तुज्य गुरू । तेण कहियं 'अग्गो दीमइ तुम्हाण। तो साहिणा कहिये-'भो ! जारिमो पुचि आमि तारिसं कुणह' । तओ सीसेण वत्यं सरसं काऊण सजीकया । उहिऊग मूरिणा आमीमा दिन्ना धम्मलाहम्म । तओ कहासंलाओ संजाओ दुन्हति । तो साहिणा लप्रियं-'भो मामि ! अम्ह पाणप्पिया वालादै राणी अच्छः । तस्म रितरो लग्गो आमि । न सा वत्थाणि गिन्हइ नियदेहे, न मुम्ममा निपुणइ । तस्म तुम्हे पमिउण मीरणह । मए मंतजंतचिगिन्छगा आहूया परं जं जं पासइ तं न लेट-लहिणा हणइ । अगुणा पमायं काऊण तुम्हे पामह ।' गुग्णा मणिय-'तुम्भे गच्छर नम्म समीने,एवं निवेएह-तुम्हं मौवे जिणप्पहमरी समागच्छई। माहिगा गंग कहियं तं वयण । मोऊण महमा उट्टिया। कहियं-'दामि ! आणेह पत्यं । तो चेडीहिं पत्थं आणिउण पहिगरियं । तओ माही चमवारिओ। आगंनूण गुग्म- मीवे साहियं-'आगच्छह तस्म ममीचे पामह त । तमो गओ सूरी। तं दट्टण निवेयं मूर्गद्दि- दृढस्य तुम इत्य ? गच्छ तुम अस्म वानाओ नेण निवेडयं-कहं गच्छामि अहं, मुटु गिह लद्ध। गुम्मा भणिय-'अन्नत्य गिह नन्धि ?' तेण भणिय-नित्यि एयारिमो'। तो गुस्णा मेहनाओ पित्तवालो आओ, कहियं-'एयं दीवृण । तो मेहनाएप सो वितरो गाढं पीडिओ। तेग वितरण एवं निइयं-'अहं गुहाउगे मम मिचि ममं परन्छ । किं पपच्छामि।

" वृद्धाचार्यप्रवन्धावलिः । तओ कहियं तेण-'मम हिंसाईणि पयच्छह' । गुरुणा भणियं-'मम अग्गे एवं मा भणह । अहं तुम्हाणं दढवंधणेण बंधामि' ! तो सूरिणा मंतो जविओ। तओ कहिय-सामि! तुम सबजीवदयापालगो ममं कहं पीडेहि' । मरिणा भणिय-'गच्छ इत्य ठाणाओ' । तेण कहिंयं-'किंचिवि ममं पयच्छह' । तओ भणिय-'किं पयच्छामि ?' । घियगुड- सहियं चुन्नं पयच्छह मम । तओ साहिणा कहियं पयच्छामि । गुरूहि भणिय-'कहं जाणामि तुम गओ?". कहियं तेण-'मम गच्छंतस्स असुगपिप्पलस्स साहा पडिस्सइ, तो जाणिलाहि । तओ रयणीसमए तं चैव जायं । पमाए सजीजाया बालादेराणी। दट्टण साहिणो म[हा हरिसो जाओ। निवेइयं तस्स-'पिए तुमं कत्थ आसि जो न एस महाणुभागो आगओ इंतो' । तओ एवं सोऊण भणिय तीई-'सामि ! एस मम पियासारिसो, जया एस महप्पा आग. च्छा तुम्हपासे तया तुम एयस्स आगइसागई करिस्ससु, अद्धासणे निवेसेह' । तओ तेण तह त्ति पडिवण्ण । एस राया गुरुसमीचे गच्छइ । गुरुं नियगिहे आणेइ । अद्धासणं दलइ । एवं सुहंसुहेणं बच्चइ कालो। तओ सबपासंडाण पवेसो जाओ। १३. इत्थ पत्थावे पाणारसीओ समागओ राघवचेयणो बंभणो चउदसविजापारगो मंतजंतजाणओ। सो आगंतूण मिलिओ भ्वं । साहिणा बहुमाणो कओ। सो निचमेव आगच्छइ रायसमीवे । एगया पत्थावे सहा उबविट्ठा । सरि- राघवचेयणपमुहा कहाविणोयं चिट्ठति । तओ राधवचेयमेण चिंतिय दुट्ठसहावं एवं जिणप्पहरि दोसवंतं काऊण निवारयामि इत्य ठाणाओ। एवं चिंतिऊण साहिहत्थाओ अंगुलीयं विजानलेण अवहरिऊण जिणप्पहरिस्यहर- णमझे पक्खितं, जहा सूरी न जाणइ । तओ पउमावईए निवेइयं मूरिस्स ! तुम्हाणं तकरीदाउकामो राघवचेयणो। साहिपासाओ मुद्दारयणं गहिऊण तुम्ह रयहरणमन्झे ठविओ। सावहाणा हवह तुम्भे । तओ मरिणा तं मुद्दारयणं गहिऊण राघवचेयणस्स सीसवत्थे पक्खित्तो जहा सो न जाणइ । तओ महम्मदसाहि पासइ, मुद्दारयण नत्थि । पच्छा अग्गओ पासइ । न पासइ तं मुद्दारयणं । साहिणा निवेइयं-'इत्य मम मुद्दारयणं आसि, केण गहिय ? । तओ राघ. वेण निवेइयं-'साहि ! एयस्स सरिसमीये अच्छइ । मरि पइ साहि मगिउं लग्गो। सरिणा भणिय-साहि एपस्स समीवे अच्छइ' । तेण नियवस्थाणि दंसियाणि । सरिणा भणिय-'साहि अस्स सीसे अच्छई' । तओ मुद्दाऽवलोइया । गहियं साहिणा । कहियं राघवचेयणस्स-'धन्नोसि णं तुम सञ्चवाई। सयं गहिऊण जिणपहरिस्स दूसणं देसि'. तो साममूहो संजाओ। नियगिहं पत्तो। १४. अन्नया चउसहिजोगिणी सावियारूवं काऊग रिसमीवे छलणत्थमागया। ता सामाइयं गहिऊण वक्खाणं निमुणति । पउमाइए निवेइयं मूरिस्स-'तुम्ह छलणत्थं एयाओ चउमहिजोगिणीओ समागपाओ' । सूरीहिं अब- लोइयाओ ताओ। पासंति अणमिसनयणं सरिगयदिट्ठीओ यक्सापरसलुद्धाओ । तओ सूरीहिं कीलियाओ ताओ सबाओ । उपएसपच्छा सच्चे सावया सावियागो बंदिय नियगिहे पत्ताभो। तामओ आमणाओ जओ उपविद्वति तओ आसणसहिय लग्गं पासंति। पासिचा पुणरवि उपविटाओ। पुणरवि सूरीहि भणियं-'साविया ! रिसिणो पिया- रभूमि-विहारभूमिला संजापा । तुम्भ चंदह' । तओ तेहि भणियं-'सामि ! अम्हे तुम्ह छलणत्यमागया ! परं तुम्मे अम्हे छलिया। कुपह पसायं, मोयह अम्हाण' ! मरिणा भगियं-'जड़ मम वाया दलह नओ मुशामि ननदो । 'ययह का वाया । 'जइ मम गच्छाहिवइगो तुम्ह जोगिणीपीठे वचंति तेमि तुम्मे न उबवे कृणह, तो मुंचामि' । तेहिं तह नि पडियनं । ताओ उपीलियानो निपनियठाणं गयाओ। तमो आयरिपा सत्यत्व गच्छंनि । न उपदयो जाय तस्म । ताओ नियवानाबडायो निट्ठति । १५. अग्नया सहाउविट्टो मर्ग । मुरामाणाओ मषिको एगो कलंदरो समागओ। तंग आगंनूण निपल उचारेऊन गपणे सिरियानो । कहियं महम्मदमाहिणो-'माहि! मो कोषि अत्यि तुम्ह महाए, जो एवं उत्साह वृद्धाचार्यप्रवन्धावलि । साहिणा महा अवलोइया । तओ सुरी महम्मदसाहिं पड़ एवं बयासी-'पस्सह राया जंमए एयस्स काय तओ सरिहिं. आगासे रयहरणं सिविओ। गंतूण तस्म बल्लहस्स मत्थए पाडियाओ। तओ तेण कलंदरेण पुणरवि एगाए इत्थीए जलयडयमाणीयमाणं सीसे आगासे मियं अंतलिक्से । कहियं साहिस्म । पुणरवि सूर्गहिं तं घडयं भंजिऊण जलं कुंभायारं कयं । साहिणा मणिय-'जलस्म कणफुमियं कुणह' । तैण तहेव कयं । कलंदरस्म अहंकारो गो। पुणरवि सहोचविण साहिणा भणियं-'अज मे महोगविट्ठा जाणया कहतु, पभाए केण मग्गेण अहं वचामि रेवाडीए । तओ सहहिं नियनिय युद्धीए चिंतिऊण लिहिऊण य दिनं चिट्ठीए माहिस्स । माहिणा भणियं-'सरि ! तुम्हमवि दलह' । मूरिणा नि निययुद्धीए चिट्टी दत्ता। तओ महाओ नेऊण नियउत्तरिए बद्धाओ । साहिणा चितियं-जहा एए सवे असचवाइणो होति तहा करेमि । एवं चिंतिऊण वंदर(ण ?)गुरजाओ मंजिऊण निग्गओ। गंतूणं पाहि कीडा कया। एगट्ठाणोगविद्या सरिपमुहा सई आहृया । कहियं च तैमि-'यायह नियनियलिहिये । तेहिं सोहि नियनि- यलिहियं वाइयं । सरिस्म कहियं-'नियलेहं वायह। नो याइयं आयरिएण-'चंदण(र १)पुरजाओ भंजिऊण कीडं का- ऊण वडपायसम्म अहे दिम्माम काही'-एवं निमुगिऊण चमकरिओ साही-भी एम आयरिओ परमेमरमारियो । एयस्म संरं देवापि कुणंति' । तओ साहिणा भणियं-'जिगप्पर परि! एम बटो सीपन्छायो मनोहगे तहा करेह जहा मम मह गच्छड' । रहेर कयं । तो पंचकोमाणतरं शरिणा भपियं-'साहि! एयंत सिमअह। जहा नियठाणं गच्छद' । माहिणा निसअणं कयं तस्म कसम्म । १६. अन्नया कनाणापुरस्म महावीरो पिच्छहिं नेऊण मादिपोलिदुनारे पारिओ अहीमुदं । तम्मोरि लोपा आयंति जति । तओ निणपहसरी ममागच्छर । पाम तदरत्धं पटिमं । मन गंण माहिम्म निर्वयं मुर्गदि-गादि एग पत्थयामि तुम्ह ममी, जर दलद' । तो माहिणा भपियं- मगह जे देमि' । नओ पोलिदुपारहिमो मग्गियो महापीरो । तओ माहिणा नियगीरे आगापिओ महाचीगे। जो पागर अभुपपरं विगहा । गरि पद एवं मणइ-'नो दाहामि तुम्हाण' ।नओ मर्गहि भगियं-'अम्हापं आगमणं निरन्धयं जानी मारिया पदियं-जह एयं मुह युल्लाह नया दादामि' । मर्गहिं भनियं-'जा एम्म पूपानवार कृषह नमो भागः । माहिणा नदाफयं । पुओरगाणं फाऊण हन्ध जोडिउण मणार-रग्यि पमायं यह । नओ दारिगहन्धी पनारिउण एवं मणः पापीगे- विजयतां जिनमामनमुचलं, विजपतां भुपाधिपथाभा। विजयतां मुधि माशि माहम्मदो, वियतां गुग्नपिजिगरमः ॥2॥ नमो गुरमुदायो अन्य आरनिका तुही माही-'भासद पम्न दियामि ? हि भाग-गादि! एस देयो मुगहिदहिं तपाई। गओ गाहिला भणिय-दृमि गाम दिन्न, गट-माटो नंगापमा पाग नेउप धूवो गाहनि मया । गुलनारेण नम्म पागाप्रो यागनियो । गायनमामी जिग्री । गुनतापम्प अग्मुधियाग्या रापरययग मासे टापिओ । सरमग दर्गिमय । पूजी मुग्धागो मेनु ना पाहियों को गिर्यामागी दुदेहि परिमारियो। अमापमिनिहीउ पृमिनानिही यया । गंटेटपुरे नपरे तेरस्मा घउत्ताप्टे । जंगलमा मिरमाता पिपा जिशमागणे धम्म || १६. तेनि च मम्यं ममद-एगा मंदनवानगुना मिना दर मजिई गुरदास माना चिट्ठति । बागर चूर्णता पाया बानग आया। गुटोमोटिलोनिम्न महसम्म मेरा प्रमाविमा निगे मझ कारिऊन शिक्षिणिय सगा। नगरवि मसरामा मिनाया। कई घरममा मानहानी। पुरवं परिननु अमवा पत्र यामागा दिया। नगेजिनपद पाउमा परिमारिधी गरयो । ॥ इति श्रीजिनसमरिमन्यः १०|| खरतरंगच्छगविलीगतविशेषनाम्नां सूचिः । . A . ] . . ]] अकलङ्कदेव सूरि अचल (ठकुरराज) ६५-६८, ८१ 'अचलचित्त [मुनि] अचला [४०] अचलेसर [दुर्ग] अजयमेर नगर-दुर्ग] १६, १९, अजयमेरु १२०, २४, २५, ३३, . ३४,४४, ८४,९१,९२ अजित [ मुनि ] अजित [ महं०] ५२ अजितश्री [साध्वी ] २३ अजितसेन { मुनि ] ४९ अणहिल पाटक [ नगर] ३४, ४३ अणहिलपुर पत्तण अणहिल्ल पत्तण १४ अणहिल्लपुर पट्टण अतिबल [ अधिष्टायक देव ] २२ अनन्तलक्ष्मी [ साच्ची] ५२ अनहिछ पत्तन २,८ अनेकान्तजयपताका [माथ} १०,३४ अपभ्रंश भाषा अपराजिता [ देवता] ] " अभयड [दण्डनायक] ३९, ४०, ४२, ४३ अभयतिलक गणि [उपा०]४९, ५१ अभयदेव [न्याय-ग्रन्थ ] १०, ३१. अभयदेव [ सूरि] १, ५,७,८,९, १४, ३६, ७३, ७८, ८२, ९०, ९१ अभयमति [साध्वी] अभयशेखर [ मुनि ] अभयसागर [ क्षुल्लक] अभयसूरि ६ अभोहर [ देश] अविकादेवी [ सिहर] अमरकीर्ति क्षुल्लक अमरकीर्ति गणि अमरप्रभ [मुनि] अमररल [मुनि ] अमृतकौति गणि ४९ अमृतचन्द्र (मुनि] अमृतचन्द्र गणि वा०] ६६,८६,८७ अमृतमूर्ति [ मुनि ] अमृतश्री [साची] अम्बिका [ अधिष्ठायिका ] १७, २४, ५१, ६३, ७२, ७६, ७७ अयोध्या [ नगरी] अरसिंह [ राजपुत्र] अर्णोराज [प] अर्बुद [ गिरि ] ५, ५७, ६०, ६१ अर्बुदाचल [तीर्थ अर्हदत्त गणि १९ अलावदीन [सुरत्राण] अशोकचन्द्र [ मुनि अशोकचन्द्र गणि '१९ अशोकचन्द्राचार्य अश्वराज [10] अहीर (सा० आगमवृद्धि [ साध्वी ] आचारनिधि [ मुनि ] आजड [सा०] आटा [ भा० आदित्यपाटक [नगर] आनन्द [सा. आनन्दमूर्ति [मुनि ] ५७ आनन्दधी [महत्तरा] १४ आना [ सा०] आभुल [४०] आम्बड [सेनापति ] २३ आम्बा [सा०]५०,७३,८२,८४,८६ आन्त्रा [श्राविका ] आर्यमहागिरि [ सूरि. आर्यरक्षित [ सूरि] आरामण,न [ महातीर्थ ७१, ९७ आर्यसुहस्ति सूरि ६६, ७३, ७८, ८१, ८२ आवश्यक [अन्य ] आशा [सा०] आशापली [ग्राम ] ५, ३८, ३९, ६० ७८ आशापटीप [संघ] ७०,७१,८० माशाउमी [साची] ७७ " ४४ ७८ ४९ अन्य गिरि अब्बुया देनी ७४ ८१ अभयकुमार [ मंत्रीचर] अभयकुमार [सा०] ३४ अभयचन्द्र [मुनि २० 'अमयचन्द्र [सा०] ५२, ५३, ५४,५९, ६०, ७२, ७७ अमयचन्द्र गाण ९८ ९०,९२ با ८७ सरतरगच्छगर्यापलीगतविशेषनाम्नां साथ। आशिका [ नगरी] उज्जयिनी [नगरी] १९, ५०,५१ फकरित [राजप्रधान] आशीदुर्ग उजेणी [नयरी] ९०,९२ कचोलायरिअ आशोटा [प्राम] उजेणी पीढ कटुक [ सा०] ८६ आसणाग [सा०] उज्जोयण सूरि कडया [सा०] ७३, ७५,७९, ८२ आसमति [साधी] २४,४४ उदयकर्ण [20] फडया [ प्राम] आसदेव [सा०] उदयकति [मुनि] कणपीठ [ ग्राम आसधर [२०] १६,१७ उदयगिरि [ हस्तिनाम] ३० कथानककोश [प्रन्थ ] आसपर ( स०] उदयचन्द्र [मुनि] कनककलश [ मुनि ] आसपाल [. उदयदेव [२०] कनककीर्ति [ मुनि ] आसपाल [स] ५७,५९ उदयपाल [सा०] कनकगिरि [ पर्वत ] आसपाल ( श्रे०] उदयमूर्ति [क्षुल्लक] ८२ कनकचन्द्र [ मुनि ] ४९ आसराज [ राणक] उदयनी [गणिनी] कनकी [ भुलिका ] ८६ आसा [ भाण.] ६३ उदयसार [क्षुल्लक ] ৩৩ कनकापली [ गणिनी] १९ आसिका (आशिका) २३-२५, ६५ उदयसिंह [राजप्रधान] कन्दली [ प्रन्य' १०, ३९ ६६, ७२ उदयसिंह [राजा] ५०, ५१, कन्नाणापुर ४६ आसी दुर्गा [संघ ] ९, ९३ कन्यानयन [प्राम] २४, ६५, ६६, आसी नगर उइंडविहार [स्थान ] ६० ६८,७२ आहणसिंह [सा०] उद्योतनाचार्य कन्यानयनीय [ संघ ६८ आहाक [ सा०] उद्धरण [वाहिनिक सा०] ४०,४३, कपर्द (दि) यक्ष ५३,७२ इन्दपुर [ नगर] २० ५१,८० कमलश्री [ क्षुल्लिका ] इसल [ मा०] उपदेशमाला [अन्य] १३, ६७ कमलश्री [ गणिनी] ४९ ईश्वर [ सा० ६८ उपशमचित्त [ मुनि] कमललक्ष्मी [ साध्वी ] ६४ उच्चकीय [संघ) ७३,८०-८२, ८४ ऊकैश [गच्छ] २५ कमलाफर गणि ૮૨ ऊकेश [वंश ६७ करडिहट्टी [ वसति] उञ्चनगर ऊदा [म.] १९, २०, २३, करहेटक [प्राम] उच्चानगर ऊदा [सा०] ५३ कर्णदेव राजा] ३४, ७५,८१ उचानगरी ऊदाक [सा०] कर्पटकाणिज्य [माम ] उच्चापुर ऊधरण [सा०] कर्णराज [प्रधान] ६४,६९,८४ उमापुरी ऋद्धिसुन्दरी [साची] ५१ कर्मशिक्षा [अन्य ४६ उच्चापुरीय [ संघ ] ५२,५८, ६४, ऋषमदत्त [मुनि २० फर्मसिंह [सा०] ८६ एकलक्ष्मी [ साध्वी] कलंदर [फकीर] ९६ उजयन्त [तीर्थ ] ५, १७, ३४, ओपनियुति [अन्य कल्याणद्धि [गणिनी] ३९, १९, ५३, ५५, ६२, ओसवाल [ज्ञाति] ९२,९३ कल्याणकलश गणि ४९ ६३, ७२,८५ फइमास [ मण्डलेश्वर ] २५-२७, कल्याणऋद्धि [प्र.] उज्जयन्त तलहहिका ६२, ७५ २९, ३०, ३३ कन्याणनिधि [ मुनि ] ८७,८८ } ५३ ८० ] ८७ ९ ६५, ७७ खरतरगच्छगुर्वावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। क्यासपुर [प्राम] ६५, ७३, ८३, ४४ कल्याणमति [ महत्तरा] ५ कल्याणश्री [ साची] ४४ काकिन्दी [ नगरी] काहा [ सा०] ७२ कादम्बरी [ ग्रन्थ ] २८, ३९ कामदेव [ सा०] ७५ काला [ राज प्रधान ] २४ काला [ सा०] ६५, ६६, ७२- ७४, ७६, ८७ काव्यप्रकाश [प्रन्थ] ३९, ४० कायस्थ [ जाति ] ८८ काश्मीरीय [ पण्डित ] कासहद [ नगर] कासदह [प्राम] . कियासपुर [प्राम] किरणावली [ग्रन्थ] १०, ३९ किढिवाणा [ग्राम]. ९४ कीकट [सा०] ७३ कीका [सा०] कीरतसिंह [सा०] कीर्तिकलश गणि ४९ कीर्तिचन्द्र [मुनि] ४४,४७ कीर्तिमण्डल [ [मुनि] ५२ कुतंबदीन [पातसाहि] कुतुबदीन [ सुरत्राण] कुमर [ सा०] कुमर [ मं०] कुमरपाल [80 कुमरसिंह [. ६५,७० कुमरसिंह [ सा०] बुमरा [मंत्री] ६५ कुमारपाल [ मंत्री, कुमारपाल [ राजा] १९,७०, ८१ कुमारपाल [ सा०]५०-५२, ५५, ५९,८८ कुमुदचन्द्र [मुनि ४९,५२ कुमुदलक्ष्मी [सायी] कुम्मरपाल [सा०] कुलचन्द्र [ मुनि] कुलचन्द्र [सा०] २१, २२, ५३, ६२, ६३, ७३ कुलतिलक [ मुनि ] कुलधर [ मन्त्रीश्वर] ८० कुलधर [ महं०] कुलधर [सा०] कुलधर्मा [ साप्पी] ८२ कुलभूषण [ मुनि ] ५२ फुलश्री [गणिनी] कुशलकीर्ति [ मुनि ] कुशलकीर्ति गणि कुशलचन्द्र गणि कुशलधी [प्र. गणिनी] कुहियप [प्राम] कूपा [म०] कूर्चपुरीय [संघ] केल्हण [राणक] कल्हण [सा०] ५० केल्हा [मं०] केवलप्रमा [ग० प्रवर्तिनी] ५४, ६४ केवलनी [साध्यो] केशव [सा०] कोडिका [ स्थान] कोमल [ सा०] कोमल [संघ] कोमलक [सा०] कोरण्टक [ग्राम कोशवाणक माम]] कोशवाणा ६५, ६६,६८ ७३, ७६ कोसवाणा कौशाम्बी [ नगरी] ६० क्यासपुरीय [ संध] ८२, ८३ क्षत्रियकुण्ड [माम] ६० क्षपण (न)क क्षमाचन्द्र [मुनि] ४९ क्षान्तिनिधि [साची] क्षेत्रपाल [ देव ] ७२ क्षेत्रसिंह [प्रधान] क्षेमकीर्ति [मुनि क्षेमन्धर [गोष्ठिक] क्षेमन्धर [ सा०] २०, ३८, ३९, ४०,४२, ४३, ५१, ६३ क्षेमन्धर [पंचटली सा०] क्षेमसिंह [ सा०] ५०, ५४,५५, ५९, ७७ खङ्गारगढ ७५, ७६ खंडेलपुर खंडेलवाल [गोत्र] खदिरालुका [ग्राम] खंभाइति नयर खरतर [गच्छ] ३४, ३६, ३९, ४७, १८, ८२-८४, ४४ खरयर [ गच्छ] खाटू [ग्राम] . ७७ ७२ ७९ ५१, ७७ ] .] ८३, ८४ खांभराज [ दो०] खीमड [स] स्वीमसिंह [व्यव०] खींवड [सा० ७१, ७७ खुरासाण [देश] खेटनगर खेडनगर खेतलदेवी, खेतसिंह [ मो०] ९३ " १०० ४९ ८७ 1 - 2 परतरगच्छगुवलीगतविशेषनाम्नां सूचिः । खेतसिंह [स] ६७, ६८,७१, गूर्जरीय [संघ] चारित्रतिलक [मुनि ] ५९ ७२, ८६ गृहिचन्द्र [सा०] २१ चारित्रमति [गणिनी] गच्छकीर्ति [ मुनि ] गेहाक [मं०] चारित्रमाला (गणिनी] गधृद्धि [साध्वी] गोधा [सा०] चारित्ररत्न [मुनि ] गज [ भां०] गोपाल [सा०] ६५, ७२-७१, चारित्रलरमी [सावी] गजकीर्ति [मुनि] ८०, ८२ चारित्रपल्लम [ मुनि] गजेन्द्रवल [ मुनि ] गोल्लक [सा०] २० चारित्रसुन्दरि [गणिनो] गणदेव [मुनि ] गोसल [सा०] ७३-७६, ८६ चारित्रसुन्दरी [ क्षुल्लिका] गणदेव [सा०] १२, ५२, ५८ गौतमस्वामी [गणधर] २६, ४८, चारित्रशेखर [मुनि ] ५२ गणधरसमतिका [प्रत्य] ४९, ५६, ७७, ८१, ८२ चारुदत्त [मुनि] गणपद्र [प्राम] २० ग्यासदीन [पातसाहि] ७२, ७७ चाहड [प्रधान] ६० गतमोह [ मुनि ] ५० घोया येलाकुल चाहड [सा० २] ५५, ५९, ६३, गयधर [सा० २० चउसहि जोगिणी पीढ ७३, ८०, ८२, ८६ गाहर [सा ] ७३ चक्क (स्व! ) रहट्टी चाहमान [ कुल ] ६८,८६, ८७ गिरनार [ पर्वत] चच्चरी [प्रन्थ] चित्तप्समाधि [साची] ५२ गिरिनार [ तीर्य] ६२ चन्दनमूर्ति [क्षुल्लक] चितकूड दुग्ग ९१ गीर्वाण भापा चन्दनसुन्दरी [गणिनी] ४९, ५८ चित्रकूट [दुर्ग] १०, १२-१५, गुडहा [प्राम] ७३, ७९, ८०, चन्द्रकीर्ति गाण ५० *१९, २०, ४९, गुणकीर्ति [ मुनि ] चन्द्र [ कुल ] ६९, ७१ ५६,६९ गुणचन्द्र गणि • १८, २३, २४ चन्द्र [सा० •]] ६३. चित्रकूटीय प्रशस्ति [अन्य ] ४६ गुणचन्द्र [वसाय सा०] चण्डा [ मंत्री] चूडामणि [ज्योतिर्मन्य ] गुणधर [मुनि] चण्डिकामठ चौरसिंदानक [प्राम] २१ गुणधर [सा० '५३, ७०, चन्द्रतिलक [उपाध्याय] ५०,५२,५४ छजल सा०] ७३,७५,७७,८७ चन्द्रप्रभ [मुनि ] ४४ छाडा [व्य०] गुणवर्धन [मुनि ] २० चरणमति [सावी] २४ छाहड [ भां०] गुणशील [मुनि ] २३, ४१ चन्द्रमाला [गणिनी] ४९ छीतम [सा०] गुणशेखर [मुनि ] ५०,५१ चन्द्रमूर्ति [क्षुल्लक] जगच्चन्द्र [मुनि ] ५८ गुणश्री [ सावी] २०,२४ चन्द्रश्री [महत्तरा] ६५ गुणप्तागर [ मुनि] ४९ चन्द्रश्री [ साध्वी ] जगद्देव [प्रतीहार] ३४,४३ गुणसेन [ मुनि ] चन्द्रावती [ नगरी] ३४, ८७,८८ जगद्वर [ सा०] १५,४९,५१,७१ गुजर [ देश] चाचिग [मा०] ८३ जगमति [सायी ] गूर्जर [देश] चाचिगदेव [राजा] जगसिंह [ मां०] ५९ गुर्जरत्रा [देश] १, ४, ३४, ३६, चामुंडादेवी जगत्सीह [सा०] ३८,३९, ४३, ५७,६४, चारित्रकीर्ति [मुनि ] जगसींह राजपुत्र] ७०,७१, ७३, ७८ चारित्रगिरि [मुनि] २० जगश्री [साची] ८ ] गुणभद्र गणि २०,४४ ७७ जगचन्द्र गणि ४४ ८१ ७१, ७६ ४९ ४९ १ ७० खरतरगच्छगुर्वावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः । जगहित [मुनि ] २० जयहंस[सा०] जिनचंद्राचार्य जंगल [गोत्र ] जया [ देवता] जिनदत्त [ सूरि] १,१६, १८-२४, जवणपाल (सा०] ७२-७४ जग्गा माहण २७, ४०, ४२, ४३,५०, जवनपाल [30] ६६, ६०, ७९ जटी ३ ५१, ५६, ५८, ६४,६६, जसोधवल [ सा० .] ७२,७३, ७७, ७८,८२ जड [सा०] जालउर (नगर-दुर्ग] ९२ जिनदत्ताचार्य जनार्दन गौड [पंडित ] २५, २६ जावालिपुर [नगर] ६, ४४, ४७ जिनदास [सूरि] जम्यूस्वामी ३, ७७ -५२, ५४, ५५, ५८- जिनदेव [सा०] जयचन्द्र [मुनि ] १९, ८६ ६१, ६३, ६५,७३, ७७, जिनदेव गणि जयतश्री [भत्रिणी] जिनधर्म [ मुनि] २३ जयता [सा०] जापालिपुरीय [संघ] ५७, ५८, जयतिहट्ट [ बिरुद] २१ जिनपति [सूरि ७०, १, २०, ६१,६४, ७०,८० जयतिहुयण [स्तोत्र ६,९० जाहेडामाम २३-२५, २९, ३२-३५, जयदत्त [ मुनि जाहण सा०] ६३, ६९, ७१, ३८,३९,४१, ४४, ४६- जयदेव [छन्दःशास्त्र] १०, ३९ ७३, ७५, ७७, ८०,८५ ५०, ७५, ८१, ८२,८४, ८७ जयदेव [सा जिणचंद सारे [मणियाल जयदेवाचार्य जिनपद्म [ सूरि ] ९२, ९३ ८५, ८६ १७, १८,२३ जयधर्म गाणि जिणदत्त गणि २३ जिनपाल मुनि] ९२ जयधर्म [ महोपाध्याय ] ७७, ८५ जिणदत्त सूरि ९१, ९२ जिनपाल गणि जिनपालोपाध्याय ४५-५० जिणनाग [मुनि जयन्ती [ देवता] ८ जिनप्रबोध [ सूरि ] ५४,५५,५७, जिणप्पः सूरी जयप्रभा साध्वी] जयप्रिय [मुनि, क्षुछक] जिणपति सूरी ५९, ७१, ७२,७७ जयमसरी [क्षुल्लिका] जिगप्पडोह सूरी ९३ जिनप्रभाचार्य जयमति [साची जिनप्रिय { मुनि] २४ जिणवल्लए सूरि जपाई [ महत्ता] ६४, ६६,६९, जिणसिध गणि जिनप्रियोपाध्याय ७४, ८७ जिणसेखर हि ९२ जिनबंधु [ मुनि ] जयउदमी [सायी] जिगइंस सरि ९२ जिनमद ( मुनि जपषम [मुनि] जिणेतर हि ९०,९३ जिनभद्र सूरि जिनकुदाल सूरि ७०,७३, ७५ जिनमताचार्य २३, २५ ७८,८०-८७ जिनमत [उपाध्याय] २४, २५, ३४ जयशील (मुनि ] जिनमती [सापी] १८, १९ जिनचक्रित (चन्द्र!) गणि २० जपसार [स] जिनचन्द्र सिरि] १,५,६,२०-२३ जिनमित्र [मुनि] १८ जयसिंह [मुनि] जिनरशित [सा०] ५०,५८-६०, ६३, ६४- १८ विनरक्षित [मुनि जपान्दरी[सायी] ६८, ६९, ७०-७२, ७४- जिनरान सरि ७८,८०,८२,८५ जयसेन गगि २०, ४४ जपरल्लम गणि १९, ६० १०२ परतरगच्छगुर्यायलीगतपिशेषनाम्नां सूचिः। जिनरत्नाचार्य १ ७० ७० जिनरथ [मुनि] जिनरय [या०] २५ जिनवल्लभ [श्रेष्ठीपुर जिनयछम [मुनि] जिनमलभ गाणि [वा०] ९-१४ जिनवल्लभ सूरि १, १५-१७, ३६, ४६, ५२, ५६ जिनशिष्य [मुनि ] २३ जिनशेखर [मुनि ] ८,१६ जिनशेपर [उपाध्याय ] १७, १८ जिनश्री [ सावी] १९, ४४ जिनसंघ सूरि ९३ जिनसागर [ मुनि] २३ जिनसिंह सूरि जिनहित [वा०] २३ जिनहित [उपाध्याय] ४२,४४,४७, ४८, ४९ जिनाकर [मुनि ] २३ जिनागर गणि जिनेश्वर [गणि, मुनि ] १-३ जिनेश्वर सूरि ४-६, १४, ४८- ५०, ५२-५६, ६२,७५, ७८,८२ जिनेश्वर सूरि [ चैत्यवाप्ती] ८ जिसधर [सा०] ५२ जिसहड [गो०] जीरापल्ली [प्राम] ८६, ८७ जीपदेवाचार्य जीवहित [मुनि जीवानन्द [ उपाध्याय] जीपानन्द [ मुनि जावानन्द [ सा०] १८ जीविग [सा० जाहरणि [ नगर जेठू सा० .] जेणू [सा०] जेसल [मंत्री, ठ०], जेसल [ सा०] ६२, ७१, ७८ जेसटमेर [दुग्ग] ९२ जेसलमेरवीय [संघ ] ६०,८०,८६ जेसटमेरु [नगर] ३४,५२, ५८ ६१, ६३, ८१, ८६ जैनसिंह [गो०] जैनसिंह [२०] जैत्रसिंह [ महं०] ५० जैत्रसिंह [राजा] जैथल [द्रम्म] जोगिनी पीद ९३, ९४ जोगिणीपुर जोधा [सा०] जोयला [ग्राम ज्ञानदत्त [ मुनि ] ६४ ज्ञानमाला [गणिनी ] ४९,५०,५५ ज्ञानलक्ष्मी [साची] ६४ ज्ञानश्री साध्वी] १९,४४ झाका [श्रा०] शाझा [ सा० ८६ झाझण [सा०] ५६, ६०, ६३, ८०,८५-८७, झाझण [रीहड, सा०] ७६ झाझा [सा०] टिल्लो नयर ९२,९४ दिल्ली देश २,४ दिल्ली पांढ ९२ ढिल्लीपुर दिल्ली यादली तग [ 8 ] [ प्राम तपोमतीय ५१ तपःसिंह [ मुनि ] तरुणकार्ति [ क्षुल्लक ] ६३ तरणकीर्ति गाण [पं०] ८४ तरुणप्रभाचार्य, ८४,८५ तर्कहह [ विरुद] २१ तारङ्गक [महातीर्थ ७१,८२ तारण [ महातीर्थ ५२, ५५ तारणगढ [तीर्थ ] ताहण [सा०] ६६,७३ तात्री [गोत] तिलककीर्ति [मुनि] तिलकप्रभ गणि [मुनि ] तिलकप्रभ सूरि ३६-३८ तिलपथ [प्राम] तिहुण [मंत्री] तिहुणा [ सा०] तिहुणा [ साहा तीनी (!) [श्राविका] ५३ तुरुष्क [ देश] १७,१८ तेजपाल [ सा०] ५३,६७-७७, ७९, ८०, ८६ तेजसिंह निहार तेजः कार्ति [क्षुल्लक] तोलिय [सा०] तोली [सा०] त्रिदशकीर्ति गणि त्रिदशानन्द [मुनि] ५२ त्रिभुवनकीर्ति [ मुनि] ७० [प्राम] ६६, ७२ झूझण टकउर [प्राम] डालामउ [प्राम] ६५ डिण्डियाणा [ग्राम] दिल्ली [नगरी] २१, २२, २४, ३४, ५० . ] ४४ ४४ यमणय नयर ७ 1 खरतरगच्छगुवलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। १०३ त्रिभुवनगिरि [ नगर] १९,२०,३४ देदा [ महं०] ५२, ५३, ५५,५९ देवसेन गणि ४९ [त्रि] मुवनहित [मुनि ] देदा [सा०] ६३, ७२, ८३ देवशेखर [मुनि] त्रिभुवनानन्द [मुनि ] देदाक [महं०] ५३ देहड [छो०] त्रिलोकनिधि [मुनि ] देपाल [60] ६६, ७२, ७४ देहड [30] ६४ त्रिलोकहित [मुनि ] देपाल [सा० देहद [वैद्य निलोकानन्द [मुनि] ४९ देपाल गणि देहडि [ [वैद्य] त्रिशङ्गमक [ प्राम ] ७१, ८७, ८८ देवकीर्ति [ क्षुल्लक ] देवाचार्य [चादी] १९, ३८, त्रिशृङ्गमकीय [संघ] देवकीर्ति गणि ३९, ५७ निहुण (:) पालही [ श्राविका ] ५३ देवकुमार [ सा०] ધરે देवेन्द्र [मुनि] थकण [सा०] ५३ देवगिरि [नगर] देवेन्द्रदत्त [मुनि] ३५ देवगुरुभक्त [ मुनि ] ४९ ६७ द्रमकपुर [प्राम] थालण [सा०] देवचन्द्र [मुनि ] द्रोणाचार्य थिरचन्द्र [पं०, मुनि] १८, २५ देवतिलक [मुनि ] ४९ द्विवछक [द्रग्म] ७५, ७६, ७९ थिरचन्द्र सा०] ७१ देवधर [ सा०] १८, १९ धणपाल [सा० ५३, ७७ थिरदेव [मुनि] देवनाम २० धणेश्वर [सा०] थिरदेव [४०] ६४ देवपत्तन [नगर] धनचन्द्र [ सा०] थिरदेव [स] ४६, ६१ देवपत्तनीय [संघ] धनपाल [ सा०] ५१-५३,६०,६३ थेहड [ गोष्टिक] ५० देवप्रभ [ मुनि] २४, ७० धनद यक्ष दक्षिण देस ९२ देवप्रभा [क्षुल्लिका] २४, ५८ धनदेव [सा०] १६, ५३, ८५ दर्शनहित [ मुनि ] देवप्रमोद [मुनि] ५० २३ धनशील [मुनि] दशरूपक [साहित्यग्रन्य] देवभद्र [क्षुल्लक ] धनसिंह [सा० .] ६३ दशौकालिक [प्रन्य] देवमद [ मुनि ] धनी [भण श्राविका ] दारिद्रक आग] ९६ देवभदाचार्य धनु [40] दारिद्रेरक [ग्राम] देवमूर्ति [पं०, गणि] ४९, ५१, धनेश्वर [मुनि] दाइड [सा०] ५३ धम्मदेव [वा०] दिगम्बर २३, २४ देवराज [मंत्रीघर] धरणेन्द्र [ देवता दिदा [राजप्रधान ] २४ देवरान [सा०] ७२, ७७, ८१ धर्मकलश [मुनि दिनचर्या [अन्य] ४४, ५९ धर्मकीर्ति [मुनि ] देवराजपुर [प्राम] ६४, ६५, ७७, ६ दिवाकराचार्य ५९, ७१ ८१, ८२, ८४, ८५ धर्मचन्द्र [मुनि] १९ दुर्लभ [भण.] धर्मतिटक [मुनि ६२, ६३ देवराजपुरीय [संघ ] ७३, ८०,८१ ५२ धर्मतिटक गणि दुर्लभराज [ महाराज] २, ३ देवाठम [मुनि] दुर्लभसमृद्धि [ साम्बी] देवसिंह [40] धर्मदास गणि ११ धर्मदेव [मुनि दुसराय (दुरभरान) ९० देवसिंह [४०] दुरसान [मं०] देवमीह [सा०] धर्मर [ उपान्याय] धर्मदेवी [प्र० महरा] देवसहि इधर्मा [साची] ७४, ७७ ५, २० ७० ५ ४४ ५२, ५९ ११ परतरगच्छगुर्यायलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। नाथ [स] नावन्धर [ मां०] नारउद्र [नगर नारिन्दा [स्थान] निम्बा [सा०] ८६ नीम्बदेव [ सा०] ५२, ५५, ७९ नींवा [सा०] नेब [राजप्रधान ] ७२ - नेमा [ सा० ८८ ४४ - धर्मदेयी [साधी] नगरफोह [सार्थ] धर्मपाल [मुनि ] नगरकोटीय [ संघ] ४४,४५ धर्मप्रभ [ मुनि नामिकीर्ति [क्षुल्लक ] धर्मप्रमा [क्षुल्लिका] नन्दन [सा०] धर्ममति गणिनी] ૪૩ नन्दिवर्धन [ मुनि धर्ममाला [ग० प्रवर्तिनी ] ६५ नन्दीश्वर [ तीर्थ] ५० धर्ममाला [साध्वी] नयनसिंह [मंत्री] धर्ममित्र [ मुनि ] २३ नयसागर [क्षुल्लक ] ८६ धर्ममूर्ति [गणि, मुनि ] ४९, ५१ नरचन्द्र [ मुनि] १४, ५९ धर्मरुचि गणि २४, ४४-४६ नरतिटक [राजप] ६० धर्मलक्ष्मी [साची] नन्दण [सा०] ८२ धर्मशील गणि नरपति [क्षुद्धक] २३ धर्मश्री [सायी] नरपति [सा०] धर्मसागर [गाणि, मुनि ] २३, २४ नरपालपुर [ प्राम] २० धर्मसिंह [सा० ७२,७७ नरपाल [श्रेष्ठी] ८४ धर्मसुन्दरी (क्षुल्लिका] ७७ नरपाल [सा०] ८२ धर्मसुन्दरी [गणिनी ४९, ५१ नरभट [प्राम] ६५,६६,६८,७२ धर्माकर [मुनि ४९ नरवर [प्राम धवलक [नगर] १४ नरवर्म [राजा] १३ घाटी { ग्राम] ४४ नरसमुद्र [पत्तन] धानपाली [प्राम] २४ नरसिंह [भण.] ६३, ७१ धान्धल [स] ५१ नरानयन [ नगर] २५ धाधल[सौषणिक, सा० ५५,५६ नरेन्द्रप्रम [ मुनि ६५ धान्धू [स] ६४ नवलक्षक [कुल] धाधूका [नगर] नवहर [प्राम] धामइना [प्राम] ६६, ६८, ७२ नवहा { ग्राम ६६, ७२ धारसिंह [सा. .] नवाझवृत्ति [अन्य] धारा [नगरी]१३,१८,१९,४४ नागदत्त [वा०] नागदेव [सा० ] धीणा [ सा०] ७१-७३, ७५,७६ नागद्रह [माम] धीणिग [सा० ८३ नागपुर [नगर] १३, १४, १६, धीधाक [सा०] १९, ६३-६६, ७३ धन्धाक [सा०] नागपुरीय [ संघ धीर [सा०] नाणचन्द्र [मंत्री] धुस्सुर [ सा०] ८६ नाणा [ तीर्थ ] नेमिकुमार [सा०] ५२, ५८, ६१, ६५, नेमिचन्द्र [नवलक्षक, सा०] ६३ नेमिचन्द्र [भां० सा०] ४४, ९३ नेमिचन्द्र [मुनि ] नेमिचन्द्र [सा०] ७९ नेमितिलक [मुनि] नेमिध्वज [साधु] नेमिप्रभ [मुनि] नेमिभक्ति [साधी] ५२ न्यायकन्दली [अन्य], २० न्यायकीर्ति [क्षुल्लक] न्यायचन्द गाण ४९ न्यायमहातर्फ.प्रिन्थ] न्यायरक्ष्मी [साध्वी] न्यायावतार [अन्य] पउमसिंह [30] पउमाबई | देवी] ९३, ९१,९५ पंचनद [ देश] पञ्चाशरीय [चैत्य] पञ्चकल्प प्रन्य] पञ्जिका [प्रत्य] १८ पञिकाप्रबोध [प्रन्थ ] पतियाण (:) पतन [ नगर ] २, ६, ७, १०, १४,१६,१९,४४,४९,५२, ७० घारापुरी " २० ४४ ४० खरतरगच्छगुर्वावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। १०५ ] ]] ] ७७ प् (स्व) गिरि له ७० पूर्णदेव गणि ॐ ६०, ६३-६५, ६९-७३, पातिसाहि पूना [सा० ६३, ७२ ७५-७७, ८१, ८६ पारस [सा० पूनाक [सा०] ५२ पत्तनीय [संघ ] ६०, ६२, ७० पारुत्य [द्रम्म] १३,२०,२४,३४ पूनाणी [ सा०] ५१ ७३,७६,७७,८० पार्श्वदेव गाण २४ पूर्ण [सा०] ६१ पदम [भा०] पाल्हउद्रा [ग्राम] पूर्ण [ठ०] पम [भण. पाल्हण [सा०] २१, २२, ५३ पूर्णकलश गणि ४९, ५१ पम [भां०] ६१ । पायापुरी [ नगरी] पम [सा० पासट [स] २४ पूर्णचन्द्र [मुनि] २३,४४ पनौति [मुनि] ५६ पासवीर [सा०] ७३ पूर्णचन्द्र [रीहड, सा०] ६५, ८५ पअकीर्ति गणि पासू [सा०] पूर्णचन्द्र [ सा०] ७३, ७९ पद्मचन्द्र [मुनि ] २३ पाहा [30] २०, ४४ पद्मचन्द्राचार्य २०, २१ पाही [श्राविका] ५३ पूर्णपाल [सा०] ५३, ५५, ७८ पद्मदेव [मुनि ] पिंडविसुद्धि [ पगरण] पूर्णभद्र गाण पद्मदेव गाण ४७,५४, ५५ पिशाच [भाषा] ३१ पूर्णरथ [ मुनि २३ पद्मप्रभ [ऊ० ग० मुनि] २५, ३३, पीपलाउली [ग्राम] पूर्णशखर [ मुनि ] पुक्खरणागोत ९० पूर्णश्री साध्वी] १८, १९ पद्ममूर्ति [क्षुल्लक] ८२, ८५ पुण्यकीर्ति गणि ६०, ६५, ७८ पूर्णश्री [गणिनी] पमरत्न [ मुनि] पुण्यचन्द्र [मुनि] ५९ पूर्णसिंह [ महं०] पद्मश्री [क्षुल्लिका] पुण्यतिलक [ मुनि] पूर्णसिंह [सा०] ५१,८७ ५३, ८७ पुण्यदत्त [ मुनि] ६४ पूर्णसागर [मुनि ] २३ पमहंस [सा०] पुण्यप्रभ [मुनि ] ६५ पूर्णिमा [गच्छ] पमा [सा०] ६३, ७२ पुण्यप्रिय [क्षुल्लक ] पृथिवीनरेन्द्र (पृथ्वीराज) २९ पभाकर [मुनि ] पुण्यमाला [ साची] ५५ पृथ्वीचंद्र [ राजा ] पावती [ देवी] पुण्यमूर्ति [मुनि] पृथ्वीराज [राजा] २५-३३, पमायती {सायी] पुण्यलक्ष्मी [साध्वी] ६४ ५२ ४३,४७, ८४ पद् [सा०] ५१, ५३ पुण्यसुन्दरी [ग० प्रवर्तिनी ] ५८, पेथड [सा०] ५२, ७३ ६५, ७४, ७८ पोरवाड [स] परमानन्द [मुनि ] पौर्णमासिक [गच्छ] पुर्ण [भण. ४९ परशुरोर [कोट ] [माम] पुष्करिणी [ प्राम] प्रतापफीति [ क्षुल्लक ] १ पुष्करी [प्राम] २३ प्रतापसिंह [30] ६६,८१ प्रतापसिंह [सा०] ८०,८६ पहपुर [प्राम] पवित्रचित्त [मुनि] ३३ पुहरिराय [पृथ्वीराज, राना] ५१ प्रधुम्ररि ६६ । प्रधुम्राचार्य २६, ३८-१३, ४६ प्रधानलक्ष्मी [साप्पी] पादला प्रबोधचन्द्र गाण ४९, ५१ ५४, ५७ . पमसिंह [ सा०] परमकीर्ति [ क्षुल्लक] ] ८४ पल्ली [प्राम] पुष्पमाला [सावी] पाटडा } [प्राम] ६३, ७९ पूनड [स] पूनसी [मई०] पूनपाल [सा०] पाणिनि [अन्य] १०६ ] परतरगच्छगुर्यायलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। प्रबोधमूर्ति [मुनि] वालादे [राज्ञी] ९४, ९५ भावडायरिय [गच्छ] प्रगोधमुर्ति गणि ५४ वाहड [ देवगृह ] भावदेन मुनि ] प्रबोधसमुद्र [मुनि ] ५३ वाहड [ मा०] भारनातिटक [मुनि] ५१ प्रभावती [ महत्तरा] बाहड [सा०] भानमूर्ति [ क्षुल्लक] ८२ प्रमोदमूर्ति । मुनि १९ बाडमेरु [नगर] १९, ५१, ५६ भीम [क्षेत्रपाल ५१ प्रमोदलक्ष्मी [ साध्यी] बाइडमेस्वीय [ सघ) ६२ भीम [सा०] ५५, ८३ प्रमोदश्री [गणिनी] ४९, ५० बाहला [सा०] ६० भीमदेव [राजा] ३४, ४३ प्रसनचन्द्र [ मुनि] बुद्धिसमृद्धि [ग० प्रर्तिनी] ५१, भीमसिंह [ राजा] २३, २४ प्रसनचन्द्र गणि ५९, ६३, ६९ भीमसिंह [सा० ५३ प्रसन्नच द्राचार्य ९, १४ बुद्धिसागर [मुनि ] भीमपल्ली [ग्राम ] ४४, ५०, ५१, प्रल्हादन [वृहत्तर] बुद्धिसागर गणि ५६, ५९, ६०, ६२-६४, प्रल्हादनपुर नगर ४७,४९-५२, बुधचन्द [ सा०] ५२ ६९-७१,७३,७७-७९,८७ ८८ ५४-५६, ५९, ६०, ६३, ८७ बूजडी [ माम] भीमपल्लीय [स]६०, ६२,७१,७९ प्रल्हादनपुरीय [ सघ] ५०, ५२ चूजदी [ प्राम] भीमा [मा०] ५७, ६०, ६२, ८० चूल्हारसही भीमा [ सा०] ६३,७२ ४४,४६ बृहद्वार [ग्राम ] भीष्म [ सा०] प्राकृत [भापा] २८,३१ बोधाक [सा०] ५१ भुवणाक [सा०] प्रियदर्शना [ साधी] ५२ बोहिथ [सा] ६०, ८६ भुवन [सा०] प्रियदर्शना [ गणिनी] ६४,६९ बोहित्य [सा० भुवनकीर्ति [मुनि ] ५४ प्रियधर्मा [साची] ब्रह्मचन्द्र गणि [वा०] १८, १९ भुवनचन्द्र गाणि पा०] १९ प्रीति'द्र [क्षुछक] ब्रह्मदेव [ मह.] मुरनतिलक [मुनि] ५९ फलपाईका [ नगरी] २४, २५, प्राशाति [ यक्ष] मुरनपाल { सा०] ४९, ५२ ३४, ६४-६६, ७२,७६ भउणा [ मा०] मुवनमूर्ति [क्षुल्लक फेरू [10] ६६,६७,७२ भडसीह [सा. .] भुवनलमी [साची] ५८ बजल [स] मदमूर्ति [क्षुल्लक] ८२ मुवनश्री [गणिनी] बबेरक [ग्राम) २०, २३, २५, भरत [क्षेत्र] ३९ मुसनममृद्धि [साषी] ६४ भरत [ सा०] मुवनसिंह [ मी] वरडिया [नगर] भरतकीर्ति [ मुनि ५१ मुरनमुन्दरी [ साध्वी यहिरामपुर [प्राम] ८२, ८३, ८४ भरयच्छ [ नगर] ९२ मुवनहित [मुनि बहिरामपुरीय [ सघ] ८२,८३ भरहपाल [30 सा०] ६२ भृगुक [नगर ५० भवनपाल [सा०] वहगुण [सा०] भोखर [सा०] बहुचरित्र [मुनि ] माढा [सा.] मोजराज [म.६१,६४,७७,८० बहुदाक [श्रापक] मादानक [नगर २८,३३ भोजराज [राजा मामह वाचू [स] मोजा [801 भोजा [मा०] भावड [सा०] बालचन्द्र [ सा०] ७२, ७, ८७ ] खरतरगच्छगुर्वापलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। मानदेव [सा०] ४४ -- ४७ ८८ भोजाक (वसा०] भोलाक [सा०] मङ्गलकलश [ मुनि मालनिधि [साध्या] मङ्गलमति [गणिनी] मङ्गलमति [ साध्वी] मङ्गलश्री [साध्वी] मण्डलिक [मं०] मण्डलिक [राजा] मण्डलिक [व्यव०] मतिचन्द्र [मुनि] मतिप्रभ [ क्षुल्लक मतिलक्ष्मी [ साध्वी ] मथुरा [ तीर्थ ] मदन [10] मदनपाल [ राजा] मनोदानन्द [पं०] ६४ २०,६६-६८ . २१, २२ १४-४६ मलिक ७४ २३, २४ मल्लदेव [ महामात्य ] मानल [ सा०] ६४ महण [सा०] मानभद् गणि मणपाल [व्यव० मारव महणसिंह [मंत्री ] मारुवत्रा [देश] महणसिंह [सा०] ६४,७२-७६ मालदेव [राणाक] महणसीह [सा०] मालदेव [सा०] महणा [ सा०] मालय [ देस] ९०, ९२ महम्मदसाहि मालव्य [ [देश] ४३ महाधर [ सा०] ८३,९३ माहला [सा०] महाधर [ सि]ि मीलगण (सीलण !) महावन [ देश] २० [दण्डाधिपति महाविदेह [क्षेत्र] ५, ७, ८९ मुक्तावली गणिनी ४९ महावीर [ दिगंबर] ४४ मुक्तिचन्द्रिका [ साध्वी] महावीरचरित अन्य] १५ । मुक्तिलक्ष्मी [ साध्वी] ५९ महाश्री [ क्षुल्लिका ] ८६ मुक्तिबल्लभा [साधी] ५२ महिराज [सा०] ६६, ७३ मुक्तिश्री [साधी] महीपाल [महाराज] ८८ मुक्तिसुन्दरी [ साधी] महीपाल [ सा०] मुद्रस्थला [प्राम] महीपालदेव [राजा] मुनिचन्द्र [ उपाध्याय ] १९ महेन्द्र [ मुनि] मुनिचन्द्र गणि माइयड [ग्राम] ९ मुनिचन्द्र [ मुनि] मागधी [ भाषा] ३१ । मुनिचन्द्राचार्य ११ माघकाव्य [अन्य] मुनिवल्लभ [मुनि ] मागलर [नगर] मुनिसिंह [ मुनि] ६० माणचन्द्र [मं०] मुरारि [नाटक] ३९ माणदेव [सा.] ३३ भून्धराज [म.] माणिभद्र [पं० मुनि ] २४ मूधराज [मन्त्री] माणिभद्र गणि [वा०] मूलदेव [ सा०] ५१, ६० मूलराज [ सा०] ५३, ८१ माण्डव्यपुर [प्राम] ३१,३६, ४४ मूलिग [सा०] ५१-५३, ५५ माण्डव्यपुरीय [ संघ] मेघकुमार गाणि १९ मेघनाद [ क्षेत्रपाल] मानचन्द्र गणि [वा०] २५,४४ ८२ मानदेव [मुनि मेघमुन्दर [क्षुलक] मनोरथ [का० ] मन्त्रिदलकुल ६५, ६६, ७०-७२, ७९,८१ मन्दिरतिलक [प्रासाद] ५१ मन्ना [सा०] मम्मणयाहण [ नगर ] ९२ मम्मी [सा०] मरवा [देश] ९२ मरुको [नगर ] ८, ९, १३, २०, २३, ३४, ६५, ७३ मरुकोद्रीय [संब] ५८ मरुदेवी गणिनी] मरुस्थल मरुस्थली माग [सा०] १६, ३९, ५८, ६४, ८१,८२ ४४ माधव (मंत्री] मेघमति [भुलक] मलयचन्द्र [ मुनि मलयसिंह [मंत्री मलिकपुर [ माम] ७७ ८२ खरतरगच्छगुर्वावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। ૨૦૮ ] ] मेडता [ग्राम] ६६,६८,७३ यशोभद्राचार्य ३४ मेदपाटीय [संघ] ५२ यशोधर [मुनि] मेदपाड [ देश] ९१ यशोधवल [गोष्ठिक] ५५, ६३ मेरुकलश [ मुनि] यशोधयल [सा०] ४९, ६५,७१, मेलू [सा०] ७७,८५, ८६ मेहनाअ [खितपाल] ४४ • यशोदामाला [साची] ५५ मेहर [ सा०] १६, ६६ या [जा] वालिपुर [नगर] ५१ मेहा [मं०] युगमन्धरस्वामी मोकलसिंह [सा० ६१, ६२ योगिनीपुर [ नगर] २२,५५,६० • मोख [सा० ६५, ६९,७२,७५,७७, ७९, मोखदेव [ सा०] ७५, ७७, ८२, रत्न [री० सा०] ५२, ७६ ८७,८८ रत्नकीर्ति गाण मोदमूर्ति [क्षुल्लक] ८२ रत्नतिलक गाणे ४९ मोदमन्दिर [मुनि] रत्ननिधान [ मुनि ] मोल्हाक [सा०] ५० रत्नपाल [30] मोहण [थेष्टी] ६२ रत्नपुर [नगर] ६०,६३ मोहण [सा०] ५७, ७०, ७३, रत्नपुरीय [संघ] रत्नप्रभ गणि ४९ मोहन [सा०] रत्नमञ्जरी [क्षुल्लिका] मोहविजय [ मुनि] रत्नमञ्जरी [गणिनी] ६४ मोहा [सा०] रत्नमति [साध्वी ] मोहिलयाडी [प्राम] ९३ रत्नदृष्टि [प्र०, गणिनी] ५६, ६२ मोहला [श्रारिका] ५३ रत्नवृष्टि [सापी] ५१ यतिफलश [मुनि] ४९ रत्नश्री [साधी ] ५९ यतिपाल गणि [पण्डित] । रत्नश्री [प्रयतिनी] यमचन्द्र [मुनि ३४ रत्नसुन्दर [ मुनि ] यमदण्ड [दिगम्बरयादी] ४९ रत्नसुन्दरी [साची] रत्नाकर [मुनि ] एनावतार [ मुनि १९ रत्नावल [गगिनी] यशःकीर्ति [मुनि ६० रपणपाल [रनपाल ९३ यशःप्रभा [साघी ] स्पपति [सा०] ७२-७७, ८१, यशश्चन्द्र [मुनि] २० राघवचेयग [पन्हित] ९५, ९६ यशोभद्र [क्षुटक] राज [मंत्रीपर यशोभद [मुनि] राजगृह [नगरी] ६०,६१,८१ राजचन्द्र [पं०, मुनि ] ५९, ६५ राजचन्द्र [सूरि] राजतिलक गणि [वा०] राजदर्शन गाण [वा०] ५९,७१ राजदर्शन [ मुनि ] राजदेव [सा०] ५१-५३,७८ राजपुत्र [भा०] ५३ राजललित [मुनि] ५० राजशेखर [मुनि] ५१ राजशेखर गणि ५८,६०, ६१ राजशेखराचार्य ६३,७१ राजसिंह [सा०] ७०,७३-७७,८७ राजा [ भां०] ५३, ५७, ७२ राजाक [भां०] राजाक [सा०] ५३ राजीमती [गणिनी] राजू [श्राविका ] राजेन्द्रचन्दाचार्य ६५, ६९, ७० राजेन्द्राचार्य ७१ राणकको [प्राम] राणुको [ग्राम ] ६३ राद [४०] रात [ मा०]] ७२ रामकीर्ति [क्षुल्लक] रामचन्द्र [मुनि रामचन्द्र गगि [पा०] १८, १९ रामदेव [महाराजा ८८ रामदेव [मुनि रामदेव [सा०] २५, ३२, ३३ रामशयनीय [संच रामल [सा.] १६, २०,१० राम [प्राविका] राइटा [श्री.] राहद [घा] ७४, ८३ ४४ ४४ यमुना [नदी] यमुनापार [प्रदेश] यशःफलश गाणे ७. ७४, ७७ खरतरगच्छगुर्वावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः । १० ९ वरकीर्ति [क्षुछक] ] १ ] रोहंड [ सा०] रुणा [माम] ६३, ६६ रुणापुरी [प्राम] ६४ रुणापुरीय [संघ] रुदओली [नगर] ९२ रुदपाल [सा०] ६६, ६९, ७१, ७५, ७७,७९, ८० रुद्दपल्ली [गच्छ ] ९२ रुद्रपल्ली [प्राम] १७, १८,२०,२१ रूदा [सा०] ६५ रूपचन्द्र [सा०] ५१,६१ रूपा [ सा०] ७२, ८३, ८४ रूवाक [सा०] ५३ रोहद [प्राम] ६६, ६८ रोहण्ड [ कुल; वंश !] ७५ ७५ लक्षणपलिका [प्रन्थ] लक्ष्मीकलश [ मुनि लक्ष्मीतिलक उपाध्याय ५५ लक्ष्मीतिलक गणि ४९,५१ लदमीधर [भां०] लक्ष्मीधर [यवहरक, सा०] ४४ लक्ष्मीधर [व्य०] ४३, ४४ लक्ष्मीवर [ सा०] उदमीनिधि [महत्तरा] ५०, ५२ लक्ष्मीनियास [मुनि] ५२ लक्ष्मीनिवास गणि लक्ष्मीमाला [गणिनी] लक्ष्मीमाला [साध्वी] लक्ष्मीराज [मुनि ५२ लख(क्ष)ण [रक्षाचार्य, सा०] ७७ लखण [सा.] लखम [सा०] टखमसिंह [सा०] ५९,७३ लखमा [सा०] ७९ लन्धिकलश [मुनि ] लब्धिनिधान गणि वयरस्वामी ७३, ८२ लब्धिनिधान महोपाध्याय ८५-८८ लब्धिमाला [सावी] घरडिया [ प्राम] ५६ लब्धिसुन्दर [क्षुल्लक] घरणाग गणि[वा० ललितकीर्ति [क्षुल्लक] वरदत्त [ मुनि] १८ ललितप्रभ [ मुनि] ६५ : वरदत्त गणि [वा०] १९ ललितश्री [भुल्लिका] वर्षमान [ मुनि लवणखेटक [ नगर] ४४,८० वर्धमान सूरि १, ३, ५, ८२ लाखण [ सा०] ७३, ८२ वर्धमानचन्द्र [मुनि ] लाखू [ सा० वर्द्धमानाचार्य ९ लाटहृद ग्राम ] वश्याय [गोत्र नाम] लाडणुवाड" ९३ वस्तुपाल [ महामात्य] १९,६२,७८ लाभनिधि [मुनि] ५० वस्तुपाल [ सा०] लारवाहण [प्राम] वागड [ देश] १२, १७-१९, लारवाहणीय [ संघ ], ३४,६०,६५,६६,६८,९१ लाले [श्रा०] २० वागीश्वर [पंडित २५ लीलावती कथा [प्रन्थ] वाग्गड [ देश] लूणसीह [सा०] वागाडीय [संघ} ४४,५०,५२ लूणा [ भण] ६३, ७७ वाग्भट मेरु [ग्राम ] ५०,८०८६ लूणा [सा०] वाग्भट मेरवीय [ संघ] ५७, ८० लूणाक भण] वाछिग [सा०] णिगविहार [ मन्दिर ] वाणारसी [नगरी] ६०,९५ लूणीवडी [प्राम] ७२ वादली (दिल्ली) १, २० लोहट [30] वादस्थल [अन्य] २६ लोहट [सा०] बादस्थान [प्रन्थ] २६ लोहड [सा०] २२ बाधू [ सा०] लोहदेव [सा० ६०,६४ वायड [ग्राम] ६३, ७३, ७८ बज्रस्वामी ६६, ७५, ७७, ७८ चालाक [ देश] घटपद्रक [नगर] .६० वासल [सा० वायड [सा०] या(वा)इडमेर [ नगर] ९२ घद्धमाणत्रि विक्रमपुर [नगर ] १३, १८-२०, वद्रदहा [ग्राम] २३, २४, ३३, ३४, १४, वयजल [सा०] ५६, ७८ ५२, ५८ वपरसिंह [40] ८८ विक्रमपुरीय [संघ] वयरसिंह [सा०] ६५, ६६, ८२ विगतदोष [मुनि] ] ६४,८४ ८९, ९० खरतरगच्छगुपावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः । ८४ ] वीरभद्र [मुनि] २० वीरभद्र गाण ४५ वीरवल्लभ [ मुनि ] वीरशेखर [मुनि] वीरसुन्दरी [साधी] ५२ वीराणन्द [मुनि] वील्हा [मं०] चीसल [सा०] ६४ वृत्तप्रबोध [प्रन्थ ] वृहग्राम ६० वेला [सा० व्रतधर्मा [ साध्वी ] व्रतलक्ष्मी [साध्वी ५२ व्रतश्री [क्षुल्लिका ] व्यवहार [ सूत्र-ग्रन्थ] ४० व्याघ्रपुर [ नगर]. १८,२४ शवेश्वरपुर [ तीर्य ] ६०, ६३, ७४ शत्रुक्षय [ महातीर्थ १७, ३४,३९, ४९, ५२, ५३,५५,६२, ६३, ७१, ७२,७४-७९, ८५, ८७ शत्रुञ्जयतलहटिका ७४, ७९ शम्भाणा [प्राम] शम्पानयन [प्राम]५८-६५,८०, ८ विजय [80, सा०] विमलचन्द्र [सा०] ५०,५५ विजयक [6०, सा०] ४५ विमलप्रज्ञ [मुनि] विजयकीर्ति [मुनि विमलप्रज्ञ [उपाध्याय] विजयचन्द्र [ मुनि] विमलविहार [ मन्दिर ] विजयदेय सूरि विमलाचल [ तीर्थ] विजय [प्रभ ] मुनि विवेकप्रभ [ मुनि ] विजयमूर्ति [ क्षुल्लक] विवेकश्री [ साध्वी] विजयरत्न [मुनि] विवेकश्री [गणिनी] विजयवर्धन गाण ४९ विवेकसमुद्र [ मुनि ] १९ विजयसिद्धि [साध्वी ] ५२ विवेकसमुद्र [उपाध्याय] ६० विजयसिंह [४०] ६५, ६६, ६८, ६९,७९, ७१ विवेकसमुद्र गणि ५२, ५७, ५९ विश्वकर्कीर्ति [मुनि ] ६० विजया [देवता] विहिपरख (विधिपक्ष) चिंधाचन्द्र [गणि] १९ वीफल [सा०] ८४ विद्यानन्द [पं०] ८२ विद्यापति [पंडित ] २५, २६,२८ वजड [सा०] ५३,६१, ६२ विद्यामति [गणिनी] वाजा [सा०] ६०, ७२, ७६, ८७ विनयचन्द्र [मुनि] २० वीजाक [सा०] विनयधर्मा [ साध्वी] बीजापुर [नगर ] ४९, ५१, ५३, विनयप्रभ [ क्षुल्लक] ५५, ५७, ५९, ६२, ६३, विनयभद्र [वा.) ७०, ७१ ४९ पिनयमति [गणिनी] वीजापुरीय [संघ ] ५९,६०, ७१,८० विनयमाला [गणिनी] ४९ वीर [सा०] विनयरुचि गणि वारकशल (गाणि] ४९ विनयशील [ मुनि २० वीरचन्द्र [मुनि २३,६१ विनयसमुद्र [ मुनि] वीरजय [मुनि] २० विनयसागर [ मुनि] २३ वीरणाग [ हेडाबाइक ] ४२ पिनयासद्धि [ साध्वी] ५२ धीरतिलक [गणि] ४९ विनयसुन्दर [ क्षुल्लक] वीरदेव मुनि विनयानन्द गणि वीरदेव [सा०] ७०,७१,७७-७९, विन्ध्यादित्य [मन्त्री] ८६,८७ विबुधराज [मुनि ] वीरधवट [सा०] रिमल [ मुनि] वीरपाल [सा०] विमल [दंडनायग] ८९ वीरप्रभ गणि १,४६-१८ मिटचन्द्र गणि १८, १९, ४७ वीरप्रिय [मुनि] वाकिल [सा०] शम्यानयनीय [संघ] ५७,६२,८० शरचन्द्रमाण शान्तनपुर ५१ शान्तमति [सानी] ४४ शान्तमूर्ति [मुनि शान्तिग [श्रा०] शिविर [रागक] शिरखिज [प्राम] शिवराज [स] शीतलदेव [ राजा शोलधर्मा [ साध्वी] ८२ शीरभद्र [मुनि ] शीलमद गगि [वा.

खरतरगच्छगुर्वावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। ] ] ५३ .] ] शीलमञ्जरी [ क्षुल्लिका] शीलमाला [गणिनी] ४९ शीलरत्न [ मुनि] ४९ शीलसमृद्धि [सावी शीलसागर [मुनि] २२, ३४ शीलसुन्दरी [गणिनी] ४९ शुभचन्द्र [ मुनि] शूरसेनी [ भाषा] शेरीपक [ तीर्थ ] ६२, ७८, ७९ श्याम [सा० स्यामल [सा०] ७१,८७ श्रीकलश [मुनि ] श्रीकुमार श्रीचन्द्र [ मुनि] २४ श्रीचन्द्र ( सा०] श्रीतिलक [ उपाध्याय ] श्रीदेवी [ साध्वी ] श्रीपति [ सा०] ५२, ५३, ७३ श्रीप्रभ [ मुनि ] श्रीमती [ साघी ] श्रीमाल [वुल] ५५, ६३-६६, ६८,७०, ७२, ७३, ७५, ४९ संघपट्टय [ पगरण] सहजा [सा. ५०, ७९ सघप्रमोद [ मुनि] ४९ सहणपाल [ मंत्री] संघभक्त [मुनि ] सहदेव [ मुनि] ५,४४ संघहितोपाध्याय सहदेव [ वैद्य] ४३ साऊ [श्राविका] २४ सङ्घक [ सा०] १० सागरपाट [नगर] २०-२३, २५ सण्यिा [सा० १८, १९ सागण [सा०] सत्यपुर [ माम ] ६३,७७,८०,८६ सागण [मं०] सत्यपुरीय [संघ] ६०,८० सागा [सा० सत्यमाला [गणिनी] साढल [सा०] २३,५१,६३, ७७ सं (रु ?) द्र [राजा] सातसिंह [ सा०] सपादलक्ष [ देश ] ६४, ६५, ७३ साधारण [बल० ५० सपादलक्षीय [ संघ] ४३,६१,८७ साधारण [सा०] ९०, १५, ९१ समरसिंह [राजा] ५६ साधुभक्त [मुनि] समाधिशेखर [ मुनि ] ५० सामन्त [ महं०] समुद्धार [श्रा०] ५६ सामन्तसिंह [राजा] ५९, ८७ समेतशिखर [ तीर्थ ] ५९, ६१ सामल [दो०] समेत [तीर्थ ] ५० सामल [सा० ] ६०, ६३, ७०, सम्प्रति [ राजा] ७३, ७७, ७९, ८४ संयमश्री [ साध्वी ] ४४ सारङ्गदेव [महाराज ] ५७,८८ सरस्वती [ देवी] सारमूर्ति [ क्षुल्लक] सरस्वतीश्री [ साध्वी] २० सालाक [प्रतीहार] ५३ सरस्सई ! नदी] ९० सारदेव [सा०] सर्वज्ञभक्त [मुनि] साहारण [साग] सर्वदेव [मुनि ] साहुलि [ सा०] सर्वदेव गणि सितपट १४ सिद्धकीर्ति गणि सर्वदेव सूर ४४,१७,४८ सर्वदेवाचार्य सिद्धसेन [आचार्य] ८८ सर्वराज [ मुनि ] सिद्धसेन [मुनि ] सर्पराजगणि [वा० ५९, ७१ सिन्धु [देश] ६५,७३, ८१, ८२, सलखण [पुर] सलखण[सा०] ६०-६२, ७९ सिन्धुमण्डल सखणसिंह । मन्त्री ६४,८१,९२ सिरिमाल [ नगर] संगरंगशाला [अन्य] ९१, ५३ सञ्चगणि (सर्वगणि) सिरियाणक [प्राम] संत [मारा ३१, ४०, ४१ सिलारवाहण ८१ सइजपाल [सा०] सीधपुर [नपर ५३ सीमाधरस्वामा ७०, ७८ ४४ १८, १९ ५१ श्रीमाल [ज्ञाति ] श्रीमाल [नगर] श्रीमाल [वंश] श्रीमालीय [ संच] ६०, ६६, ७२ ७७, ७९, ८६ ६० ४९, ५० ८०,८७ सिद्धान्त यक्ष ] ५२ ७० श्रीमालपुरीय [संघ] श्रीवत्स [30] श्रेणिक [राजा] सेतपट श्वेताम्बर घेताम्बराचार्य पा(खा)डासराय [माम] सफल [नगर सकसहित [मुनि ] संघपा [मन्य] ११, १३, २६, ३० २५, ६७, ८३ ७७,८० ६८ ७ सहजपाल [ साकरिपा) ] ] , ७७ ७ ५० ] परतरगच्छगुर्वावलीगतविशेषनाम्नां सूचिः। सीहा [सा०] ६०, ६१ सोमर [यक्ष] हर्पप्रभा [ साथी] ५४ सीवा [सा० सोमल [सा०] ५६ हर्पमूर्ति [ क्षुल्लक] सुखकीर्ति [ क्षुल्लका] सोमसुन्दर [क्षुल्लक] हर्पसुन्दरी [साधी) सुखकीर्ति गणि सोमसुन्दर गाण হবিনাশ ६०,६६, ६७ सुधर्मस्वामी ३,१७, ७७, ८२ सोमाक [का० हालाक [सा०] सुधाकलश [मुनि] ५६, ६० सोमेश्वर [ राजा हॉसिल [80 .] सुन्दरमति [साध्वी] ४४ सौम्यमूर्ति [ मुनि] हॉसिल [वै] ५३ सुबुद्धिराज [मुनि ] ५२ स्तम्भतार्थ ६०, ६२, ६९, ७७, हिन्दुक हिन्दुग [जाति ] ६६, ७४, सुबुद्धिराज गणि ६० ७८,७९ सुमति [ मुनि स्तम्भतार्थाय [ सघ] ५२,५६,७० ७८,८०,८१, ८२ सुमतिकीर्ति [मुनि] स्तम्भनक [पुर, महातीर्थ ] ६, १७, हीरमूर्ति [क्षुल्लक] ६४ सुमति गणि ४४-४७ ३९, ४९, ५१, ५५, ७८, ८६ होरल [सा०] सुमतिसार [ क्षुल्लक] स्थान [ठाणाग, सूत्र] हीरा [श्रे०] सुभद [ सा०] ६१,६५, ७० स्थिरकीर्ति [ मुनि] हीराक [गोष्टिक] सुरराज [ सा०] ६६, ७९ स्थिरकीति गणि [श्रा०] हीराकर [मुनि ] ५२ सुरत्राण ६८, ७२ स्थिरचन्द्र [मुनि ] १८ हुलमसिंह [श्रा०] सुरा [ सा०] हेम [ सा०] स्थिरचन्द्र गणि [वा०] सुराष्ट्र [ देश] ६२,७५, ७६ हेमचन्द्र [सा० स्थिरपाल [गोष्ठिक] सुवर्णगिरी [ पर्वत ] ५२, ५५ हेमतिलक [ मुनि ] स्थूलभद्र सुहडपाल ९३,९४ हेमतिटक गणि स्याद्वादरत्नाकर [प्रन्थ ] ८५ ६०, ६२ सूण्टा [ सा०] स्वर्णगिरी पर्वत ] ५१, ५४, ५९ हेमदेवी [गणिनी] २० सूरप्रभ [ मुनि] हेमपर्वत [मुनि ] सूरप्रभ [ उपाध्याय हम्मीरपत्तन [नगर] ४९ हेमप्रभ [मुनि] ४९ सूराचार्य हम्मीरपत्तनीय [ सघ] हरिचन्द्र [स] ५५ हेमप्रभ गणि ५६ सेढी [नदी] ५४ हरिपाल [ठ० सेट [10] हेमप्रभा [सायी] १३ ६५, ६६ ०) हेमभूषण [मुनि] ५२ हरिपाल [राणक] सेत्तुज [ महातीर्थ ९१,९६ ८६ हरिपाल [ सा०] ५०-५५, ६४, हेमभूषण गणि सेयवर [ श्वेताम्बर ] ६१, ६९, ७० सोम [ मन्त्री] ७३,८०,८२-८६ हेममूर्ति [क्षुल्लक] हरिपाल [सारी, सार्थवाह ] ६५ हेमराज [स] ६० सोम [राजा) हरिप्रम [ क्षुल्लक ] ८० सोमकीर्ति [क्षुल्लक] हेमल [रोहण्ड, सा०]७३,७५,८५ हरिभद्र [ मुनि] हेमलक्ष्मी [ साधी] ६० सोमचन्द्र [१०] ४९ ३८ हरिभद्र सूरि हेमश्री [गणिनी]] सोमचन्द्र [ मुनि ६५ सोमचन्द्र गणि हरिराज [. हेमसेन [मुनि ६९ हेमसेन गणि सोमदेव [ मुनि] ३४ हरिसिंह [मुनि ५५ हरिसिंहाचार्य . सोमदेव [सा०] हेमाक [प्रा०] १५,१६,१९ सोमवन [ जटाधर] हरु [दलिक, सा०] ५५,७२,७५ हेमावली [गगिनी] सोमप्रभ [क्षुल्लक] हर्षचन्द्र [मुनि] हैमत्र्याररण [प्रय सोमप्रभ (मुनि] हर्षदच [मुनि ४४ होता [मा.] १४,४७ ५ ] १९ ।

गुर्वावलीगतनृपति-मन्त्रि-दण्डनायकादि-सत्ताधारिज़नानां नाम्नां पृथक् सूचिः । ६९ अजित [ महं०] अरसिंह [राजपुत्र] अर्णोराज [नृपति] अश्वराज [30] ४४ ७० अचल [ ठकुरराज ] ६५-६८, १ । कुलधर [ महं० '४४, ४९ अचला [२०] ६७. केल्हण [ राणक] केल्हा [मं०] ५२ ७३ अभयकुमार [ मंत्रीश्वर.] क्षेत्रासिंह [प्रधान] अमयड [ दण्डनायक] ३९,४०, खांभराज [दो०] ४२ ४३ खेतसिंह [ भां०] गज [ भा०] १६ गेहाक [मं०] ८१ अलावदीन [ सुरत्राण] ६७ ग्यासदीन [ पातसाहि ] ७२. ७७ चण्ड {मंत्री] आटा [मां०] चाचिगदेव [नृपति] ५३ आमुल [30] चाहड [प्रधान] ६० आम्बड [ सेनापति] २३ छाहड [ भां०] आसधर [४०] १६, १७ जगद्देव [प्रतीहार] आसपाल [10] जगसिंह [भां०] आसराज [राणक] जगसींह [भां०] ४९ जवनपाल [४०] ६०, ६६ ७९ उदयसिंह [राजप्रधान] जेसल [ मंत्री, ठ०] उदयसिंह [ नृपति] ५०, ५१, जैत्रसिंह [30] जैत्रसिंह [ महं०] फइमास [मण्डलेश्वर] २५-२७, जैत्रसिंह [नृपति] २९, ३०, ३३ तिहण [मंत्री] ६० फकारिउ [ राजप्रधान ] २४ थिरदेव [30] ६४ कर्णदेव [ नृपति] दिदा [राजप्रधान ] २४ दुर्लभ [भण.] ६२, ६३ फाला [राजप्रधान] २४ दुर्लभराज! [नृपति ] २, ३,९० ६७ दुल्लहराय अतृपदीन [पुरमाण] ६६ कुमर [मं०] देदा [ मई०] ५२,५३, ५५,५९ पुमरपाल [२०] देदाफ [महं०] कुमरासिंह [४०] ६५,७. । देपाट [४०] ६६, ७२, ७४ -देवराज [मंत्रीश्वर] देवसिंह [मं०] ६४ देवसिंह [30] देहड [10] ६४ नयनसिंह [मंत्री] नरवम [नृपति] नरसिंह [भण० ६३, ७१ नाणचन्द्र [मंत्री] नारन्धर [ भां०] ५३ नेब [राजप्रधान ] ७२ नेमिचन्द्र [ भां०] पउमसिंह [30] पद्म [ भां०] पाहा [30] पुहविराय ( पृथ्वीराज ) [ नृपति ३३ पूनसी [ महं०] ५३ पूर्ण [४०] पूर्णसिंह [ महं०] ५४,५७ पृथिवीनरेद्र (पृथ्वीराज) २९ पृथ्वीचंद्र [नृपति] ४४-४६ पृथ्वीराज [.] २५-३३, ४३, ४७,८४ प्रतापसिंह [30] फेरू [30] ६६, ६७,७२ वाइड [मां०] प्रसदेव [महं०] मउणा [म.] मरहपाल [30] ૬૨ भीमदेव [नृपति] ३४,४३- भीमसिंह २३,२५ मीमा [मो०] ४४ उदयकर्ण [४०] ७० ७० ८७,८८ } फर्णराज [प्रधान] कुतुवदीन पराए]} दुस्सान [मं०] ७७ ] गुर्वावलीगतपति मन्त्रि दण्डनायकादि सत्ताधारिजनानो नामां पृथर सूचिः। ] ७०, ७८ ७७,८० ৩৩ ] भुरनसिंह मंत्री भोजराज [मं०]६१,६४,७७,८० भोजरान [नृपति] २९ भोजा [30] मण्डलिक [ नृपति] ५१ मण्डलिक मं.] ८८ मदन [30] ६७ मदनपाल [ नृपति। २१, २२ मलयसिंह [ मंत्री ] मल्लदेव [महामात्य] महणासिंह [मं] महम्मदसाहि (पातसाह ] ९४-९६ महीपाल [नृपति ' ७५,८८ माधय [ मंत्री] ५९ मालदेव ( राणाक ६८ मीलगण ( सीलण :) [ दण्डाधिपति ] ५९ मूधिराज (मं०] भूधराज [ मन्त्री] ६५ मेहा [म०] रत्नपाल [30] स्यणपाल (रलपाल) ९३ श्रीस [४०] राच , मंत्रीधर) श्रेणिक राजा राजपुत्र (भा०] सं (रु ! ) [ राजा] राजा [भा०] ५३, ५७, ७२ समरसिंह [नृपति ] ५६ राजाफ [ भा०] ५३ सम्प्रति । रात् [6.] सहसणसिंह [ मंत्री] रामदेव [ नृपति] ८८ सहणपाल [मंत्री] लक्ष्मीधर [ भा०] ५७ सागण [ मं०] लूणा [भण. सामन्त [ महं०] लूणाफ [भण.] सामन्तसिंह [ नृपति ] ५९,८७ सामल [दो०] ७९ वयरसिंह [मं०] सारङ्गदेव [ नृपति] वस्तुपाल [महामात्य] १९, ६२, ७८ साटाक [प्रतीहार] विजय [10] सेतु [30] विजयक [४०] सोम मंत्री विजयसिंह [४०] ६५, ६६,६९,७० सोम [ नृपति ] विध्यादित्य [मन्त्री] सोमेश्वर [] विमल [ दण्डनायक] ८९ हरिपाल [30] वोल्दा [40] ६६ । हरिपाल [ राणक] शिखर [राणक] ८६ । हरिराज [30] शीतलदेव [नृपति] हासिल [10] लोहट [४०] ५७, ८८ ४३ ६० गुर्वावलीसमुपलब्धस्थलादिज्ञापकानां विशेषनाम्नां पृथक् सूचिः । ]] " S अणहिल पाटक अणहिलपुर पत्तण अणहिल पत्तण अणहिल्लपुर पण अनहिल पत्तन अञ्चुगिरि [ अर्बुदगिरि] अंभोहर [ देश] अयोध्या [ नगरी] با ४७ १ ६८,७२ गूर्जर ] " अचलेसर ] दुर्ग] ८९ उज्जयन्त (तीर्थ ] ५,१७,३४, क्षत्रियकुण्ड [] ६० अजयमेर [नगर, दुर्ग] १६, १९, ३९,४९,५३,५५,६२,६३, खझारगढ (दुर्ग) २०,२४,२५ ७२,८५ खंडेलपुर अजयमेरु उज्जयन्त तलङ्कटिका ६२,७५ । खदिराल्लुका [ग्राम ] ९१,९२, उज्जयिनी [नगरी] १९,५०,५१ खंभाइति [ नगर] ३४६ ४३ उजेणी । ९०,९२ खाद ! प्राम] ७२. उजेणी [ पीढ] ९२ खुरासाण (देश] उइंदविहार [स्थान] ६० खेटनगर कडुमारी [प्राम] खेडनगर कणपीठ [ गणपद [माम] कनकगिरि [पर्वत ] गिरनार [पर्वत ६२,९१ कन्नाणापुर [प्राम] गुडहा {प्राम] ७३, ७९, ८० कन्यानयन (प्राम] २४,६५, ६६, गुजर [ देश ! अर्युदगिरि ५,५७,६०,६१ करडिहट्टी [ वसति) अर्बुदाचल [ तीर्थ ] ९० गुर्जरना [, ] १, २, ३४, ३६, करहेटक [प्राम]] आदित्य पाटक (नगर] ३८,३९, ४३, ५७, ६१,७० कर्पटफवाणिज्य [प्राम] ९ आरासण,-सन [ महातार्थ ]७१,९७ । कामिन्द्री [नगरी] ७१, ७२, ७८. आशापल्ली [ग्राम ] ५,३८, ३९, घोषा वेळाकुल कासहद [ नगर] ६०,७८ चउसहि जोगिणी पीढ कासह [प्राम] आशिका [ नगरी] कियासपुर [] चा (ख) रही ८२ আহা चण्डिकामठ किदिवाणा [.] ९४ कुहियप [] चन्द्रावती [नगरी ] ३४,८७,८८ आसिका [ आशिका] २३-२५, चित्तकूड दुग्ग १०,१२~१५,१९, कोडिका [ स्थान] ३२ २०, ४९,५६,६९ ६५,६६,७२ कोरण्टक [प्राम] ७३ चौरसिदानक [ग्राम इन्द्रधर [नगर] २० फौशवाणक) [प्राय ] ६५,६६, ६८,७३,७६ ९२ कोशवाणा जालउर [नगर, दुर्ग] उञ्चनगर उधानगर जावालिपुर [ नगर] २९,२०,२३,३४ कोसगाणा ४७-५२,५४,५५,५८-६१, उधानगरी ७५,८१ | कौशाम्बी [नगरी] ६२,६५,७३,७७,७९,८० ঘাসে। ६२,६९,८४ स्पातपुर प्राम] ६५, ७३,८३, उमापुरीण जाहेदाग्राम ८१, ८६ ८ आशोटा [आम] ४४ गुयलीसमुपलम्धस्थलादिशापकानां विशेषनाम्नां पृथक् सूचिः । ८६,८७ 8 ४४ ७० जीरापल्ली [ग्राम] जीहरणि [नगर] जेसलमेर [दुर्ग] जेसलमेरु [नगर] ३४, ५२,५८, ६१, ६३, ८१,८६ जोगिणी पीढ जोगिणीपुर [ नगर ] जोयला [ प्राम] सुझगू [ग्राम] ६२, ७२ झुझगू टक्कर [] डालामा [1] डिण्डियाणा [.] दिल्ली [ नगरी] २१, २२, २४, ३४,५०, ९२, ९४ दिल्ली देश २,४ दिल्ली पीढ दिल्लीपुर दिल्ली वा दली १ तग [ला] [ग्राम] तारङ्गक [महातीर्थ ] ७१, ८२ तारण [, ] ५२, ५५ तारणगढ [ ५९ तिलपथ [माम तुरुष्क [ देश] त्रिभुवनगिरि १९, २०,३४ त्रिशृङ्गमक [प्राम] ७१,८७, ८८ यंभणय (स्तंभनक)[] दक्खिण देस ९२ दारिद्रक [प्राम] दारिद्ररक [] देवगिरि नगर ६९,९२ देवपतन [1] देवराजपुर [प्राम] ६४, ६५,७७, ८१, ८२, ८१, ८५ द्रमकपुर [प्राम ६७ पावापुरी [ नगरी] धवटक [ नगर] पीपलाउली [प्राम] ६२ धाटी [ग्राम] पुष्करिणी [] धानपाली [.] २४ पुष्करी [] २३ धान्धूका [ नगर पू( स्व ) गिरि [पर्वत] धामइना [ माम] ६६,६८,७२ प्रल्हादनपुर [नगर ] ४७,४९-५२ धारा नगरी] १३, १८, १९,४४ ५४-५६,५९,६०,६३,८७ धारापुरी [.] २० फलपदिका [ नगरी] २४,२५, ३४ नगरको [ तीर्थ ] ६४-६६,७२,७६ नन्दीश्वर [] बबेरक [प्राम] २०,२३,२५,६४ नरपालपुर [ प्राम] २० वरडिया [नगर] ६० नरभट ,,] ६५, ६६, ६८,७२ बहिरामपुर [ग्राम ] ८२,८३, ८४ नरवर [] १३ । वाहडमेरु [नगर] ४९,५१,५६ नरसमुद [ पत्तन ] बूजडी [ प्राम] ८८ नरानयन [ नगर] ૨ बूजी [,] नवहर [प्राम] बूल्हारसही नवहा [,,] ६६, ७२ वृहदार [ माम] १४,४६ नागद्रह [1] भरत [ क्षेत्र] नागपुर [ नगर ] १३, १४, १६, भरवच्छ [नगर ] १९, ६३-६६, ७३ भादानक [.] २८, २३ नाणा [ तीर्थ ] ८१ भीमपल्ली [m] ४४,५०,५१, नारउद्र [नगर] ५६,५९,६०,६२-६४, नारिन्दा [ स्थान] ६९-७१,७३,७७-७९,८७ पंचनद [ देश ९२ मृगुकन्छ [ नगर] पतियाण (1) मथुरा [ तीर्थ ] २०,६६-६८ पत्तन [अणहिटपुर २,६,७, १०, मन्दिरतिटक [प्रासाद] ११,१६,१९, १४, १९,५२ मम्मणवाहण [ नगर] ९२ ६०,६३-६५,६९-७३,७५ मरवट्ट [ देश] ९२ ७७,८१, ८६ मरुको [नगर] ८, ९,१३,२०, परशुर [फोह ] [प्राम] २३, ३४,६५, ७३ पल्ली [] मरुस्थल ३६, ४१, ६५ पन्दूपुर [] मरुस्थटी १६, ३९, ५८,६४, .पाटला ८१,८२ ६३, ७९ पाडला मलिकपुर [प्राम] ८२ पाइउदा [] महावन [देश] २० ४४ ] ३५ ८४ १ }] गुर्वावलीसमुपलब्धस्थलादिशापकानां विशेपनानां पृथक् चिः। महाविदेह [ क्षेत्र] ५, ७, ८९ माइपड [प्राम] मागलउर [नगर] ७५ माण्डव्यपुर ग्राम ] ३४,३६,४४ मारवत्रा [ देश] मालय [] ९०, ९२ मालव्य [.] ४३ मुद्रस्थल [ग्राम] मेडता [.] ६६, ६८, ७३ मेदपाड़ [देश] मोहिलवाडी [प्राम] यमुना [नदी] ६७ यमुनापार [प्रदेश] या (जा) वालिपुर [ नगर] ५१ योगिनीपुर [नगर ] २२,५५,६०, ६५, ६९, ७२, ७५, ७७,७९ रत्नपुर [ नगर ६०, ६३ राजगृह [ नगरी] ६०, ६१, ८१ राणककोट [प्राम] ८२ राणुकोट्ट [] रुणा [प्राम] ६३, ६६ रुणापुरी [,] रुदओली [नगर ] ९२ रुद्दपल्ली [गच्छ] रुद्रपल्ली [प्राम] १७, १८,२०,२१ रोहद [प्राम] लवणखेटक [नगर] लाटहृद [ग्राम] लाडणुवाड [1] लारवाहण[,] लूणीवडी [.] ७२ वटपद्रक [नगर] पद्रदहा [प्राम] परडिया [.] वागड [ देश ] १२,१७-१९, ३१, ६०, ६५, ६६, ६८, ९१ वाग्गड [देश] ४४ वाग्भटमेरु [ग्राम ] ५०, ८०, ८६ वाणारसी [नगरी] ६०,९५ बादली (दिल्ली !) १, २० वायड [ग्राम] वालाफ [ देश] ७४ वा (बा) हडमेर [नगर ] ९२ विक्रमपुर [नगर] १३, १८-२०, २३, २४, ३३, ३४,४५, ५२, ५८ विमलविहार [मन्दिर] विमलाचल [ तीर्थ] वीजापुर [नगर ] ४९, ५१, ५३, ५५, ५७, ५९, ६२, ६३, ७०, ७१ वृहग्राम व्याघ्रपुर [नगर] १८, २१ शङ्खश्वरपुर [तीर्थ ] ६०, ६३, ७१ शत्रुञ्जय [ महातीर्थ ] ३९, ४९,५२, ५३, ५५, ६२, ६३, ७१, ७२,७४-७९, ८५, ८७ शत्रुञ्जय तलट्टिका ७४, ७९ शम्भाणा [ग्राम ] शम्यानयन [J५८-६५, ८०, ८१ शान्तनपुर शिरखिज [ग्राम] शेरीपक [ तीर्थ] ६२, ७८,७९ श्रीमाल [नगर] ४९,५० पां (खां) डासराय [प्राम] सकल [नगर] ४९ सत्यपुर [ग्राम] ६३,८०,८६ सपादलक्ष [ देश] ६४,६५, ७३ समेतशिखर [तीर्थ ] ५९,६१ समेत [] सरस्सई [नदी] सलखण [ पुर] सागरपाट [नगर] २०-२३, २५ सिन्धु [देश ] ६५, ७३, ८१,८२, ८४, ८५ सिन्धुमुण्डल ६४,८१,९२ सिरिमाल [नगर ] ९१,९३ सिरियाणक [प्राम] सिलारवाहण [ सिधपुर [ नगर] सुराष्ट्र [ देश] ६२, ७५, ७६ सुवर्णगिरी [पर्वत] ५२, ५५ सेढी [ नदी] सेत्तुज [ महातीर्थ] ९१,९६ स्तम्भतीर्थ ६०, ६२, ६९, ७७, ७८, ७९ स्तम्भनकपुर [ महातीर्थ] ६, १७, ३९, १९, ५१, ५५, ७८,८६ स्वर्णगिरी पर्वत ] ५१, ५४, ५९ हम्मीरपत्तन [नगर] १६ हस्तिनागपुर "]६०,६६,६७ ] -- ६६,६८ ८० गुर्वावलीस्थितानामवतरणरूपपद्यानामनुक्रमः । ३९ ४७ ९ ७३ ० ४८ ३५ १२ ५४ ४८ ३० १ ४२ २५ ३३ २९ ४८ १ अइयम्मि य कालम्मि अन्नट्ठ पगडं लेणं अत्रोत्सूत्रजनक्रमः आचार्याः प्रतिसम० आययणं पि य दुविहं यासीजनः कृतनः इदमन्तरमुपकृतये इन्द्रानुरोधवशतः ऊर्ध्वस्थितश्रौत्रपरो० एतेषां चरितं किञ्च एपमिणं उपगरणं कयमलिणपत्तसंगह. करतलधृतदीनास्ये कोपादेकतलाघात कौ दुर्गत्यविनाशिनी चकर्त दन्तद्वयमर्जुनं शरैः-कीर्त्या चकर्त दन्तद्वयमर्जुनं शरैः-क्रमात् चातुर्वर्ण्यमिदं मुदा चिरं चित्तोचाने जत्य साइमिया-उत्तरगुण. जत्थ साइम्मिया-चरित्ता. जत्य साइम्मिया-मूलगुण. जत्य साइम्मिया-लिंगवेस. जिनजननदिनस्नान जिनपतिरे । मवता जिनभवनं जिनबिम्बम् जो अवमन्नइ संघ जो चंदणेण बाई ज्ञानं मददर्पहरम् ज्योतिर्लक्षणतर्कमन्त्र. दिल्लीवास्तव्यसाधु० तापुब्विया अरहया तब दिव्यकाव्यदृष्टा तिथपणाम काउं त्वदाभिमुखमिव क्षिप्त द्विगुरपि सद्वन्द्वोऽहम् धातुविभक्त्यनपेक्षम् धैर्य ते स विलोकताम् नाणस्स देसणस्स य नास्तिकमतकृदमर० पङ्कापहारनिखिले पञ्चैतानि पवित्राणि परिसुद्धोभयपक्वं पृथिवीनरेन्द्र । समुपाददे पृथ्वीराय ! पृथुप्रताप प्राणा न हिसान प्राणान्न हिंस्यान प्रामाणिकैराधुनिकैः बम्भ्रम्यन्ते तवैतास्त्रिभुनन० बालावबोधनायैव बुद्धये शुद्धये ज्ञानवृद्धयै बुधबुद्धि चक्रवाकी ब्रह्मचारियतीना च भगवस्त्वयि दिवि भणियं तित्थयरेहि भवति नियतमेवासंयमः भाव्य भूवलये क्षयम् मथितप्रथितप्रतिवादि० मयि सति कीहक् मरिजा सह विजाए मरुदेवि नाम अजा मर्यादाभयभीतरमृत० ३० २९ २२ १२ २५ २६ २३ ३२ ५० ४७ ४२ ४१ ४२ ३ ४८ ७ ४७ ४ ४७ १८ 2 ८ १२ . ८८ ४० ६७ २ १७ गुर्वावलीस्थितानामवतरणरूपपद्यानामनुक्रमः । निस्कर्जद्दन्तकान्तं ३८. विहितं सुवर्णसारङ्ग विहिसमहिगयसुयत्यो शत्रौ मित्रै तृणे स्त्रैणे शब्दब्रह्म यदेकम् २८ श्रिये कृतनतानन्दा-तव० ६९ श्रिये कृतनतानन्दा-भवताम् ४८ श्रीजिनवल्लभसूरिः श्रीजिनशासनकानन० ७४ सत्तर्कन्यायचर्चा २९ सा ते भवाऽनुसुप्रीता २९ साहित्यं च निरर्थकम् ५० सिरिसमणसंघ आसा २९ सुमेरौ निमरैरपि सपदि सुंदरजणसंसग्गी स्वःश्रीविवाहकार्यम् हा ! हा ! श्रीमजिनपतिसूरे । मैवं संस्था बहुपरिकरः यत्र तत्रैव गत्वाऽहम् यदपसरति मेषः कारणम् यः संसारनिरासलालस० यस्मिन्नस्तमितेऽखिलम् यस्यान्तर्बाहुगेहम् ये तुरीनेपुत्रनिचतवयं (:) रे दैव जगन्मातुः रेरे नृपाः । श्रीनरवर्म० लक्ष्मीस्तं स्वयमभ्युपैति ललामविक्रमाक्रान्त० 'लसघशासिताम्भोज! लोकभाषानुसारिण्यः वरकरवाला कुवलय० वर्द्धमानं जिनं नत्वा वामपदधातलग्ने. विधा विवादाय धनं० १ २२ ७३ ५४ ४२ ४८ १ ४८ ३० ४८

Khartargachha Brihdgurvavali

Author
Jin Vijay Muni
Title
Khartargachha Brihdgurvavali
File name
Khartargachha Brihdgurvavali
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,bhartiya Vidhya Bhawan
Language
Sanskrit
Pages
133
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311057
Barcode
99999990319982.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
qE46Ow3pV01
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