Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shripal Charit

Rai Dhanpatsingh · 2011/02

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२ वही लोकसहू हरष्या गहगही॥६॥ वांदण आव्या श्रेणिकराय नगरलोक पिश वांदण जाय । श्री०या० आपै प्रभुगण धर उपदेश सजलजलद अनुहार विसेस ॥ ७॥ अहोभव्य प्राणी तुम्हे सुणौ एमा नव भव दुल भगिणउ। आर्यक्षेत्र उत्तम कुलजाणि तेपिण दुर्लभ छेमन आणि ॥ ८॥ धर्मतणी सामग्री लही श्रीजिन धर्मकरोऊ मही। इण भवघामरिद्धि समृद्धि परभवामै अविचल सिद्धि ॥ ६ ॥ इम गौतम दीधू उपदेस सांभलियौ नरनार नरेस । पहिली ढाल एही अटकलौ कहै जिन हर्षहिवै सांभलौ ॥१०॥ दूहा । दानसील तपभावना भेदधरम नाच्यार। इह भव परमव एहथी लहीयें सुखथीकार ॥१॥ दानसील तपमांहि जो चोथो भावभिलत। तौ कारिजसीम सई बंछित सकलमिलत॥२॥ निश्चलमनराषी करी परिहरिमननोताप । भाव विशुद्ध होयडे धरी जमीय नवपद जाप ॥३॥ अरिहंत १ सिद्ध २ सरौसवर ३ उवझाया ४ मुनिपत्ति ५ टसण : नांण ७ चरित्त ८ तप र ण सुंधरीयै चित्त ॥४॥ ढाल २ अलवेलानी॥ ए नवपद धाराधीयै रे लाल आणी निरमल भाव महाराजारे। एहधीसह सुखसंपजै रेलाल भवसायग्नीनाव म० ॥१॥ एक नवपदसंघात जप रेलाल सिद्धचक्रचउसाल म । तेलहैमङ्गलमालिका रेलाल जिमलयां नृपथी- पाल म० ॥२॥ ए श्रेणिकक है भगवन कहौ रेलाल कुणते नृप श्रीपाल म । किमपामो सुपसंपदा रेलाल किमलह्या भोगरसाल म० ॥३॥ ए० गौतम कहै मगधेसनै रेलाल आराध्यौ सिध चक्र म । रोगगया वंछित लह्यां रेलाल जाणे अभिनवसक्रम.॥४॥ ए० श्रीगौतममुभाने कहौ रेलाल एइनौस अधिकार म० । साभलिवा मन अमह्यौ रेलाल सुणस्यै सहुनरनारि म० ॥५॥ एचण श्री पाच ४ जो० ॥ २॥ रूपसुन्दरि कहै सांभलिबहिनी कसीयै कंचण जेमरे। कीजै धर्मपरिक्षा करिने पालन जपीयै एमरे जो० ॥ ३॥ धरमर सड़कोई भाषै पणि अंतर असमानरे । साकरलगासरीपा दीसै काचपाचसमवानरे जो० ॥४॥ सूरजपतयै जिबड़ो अन्तर अन्तरराजार करे। अरकटूध गोदूधै अन्तर अन्तररुष अातंकरे जो० ॥ ५ ॥ चंदन आकधतूरे अन्तर अन्तरविषपीयूषरे। जैन धर्ममोटौ जगमाहे जेहथीजाय दूपरे जो० ॥६॥ धरम अनेक अवै जगमाहे पिणते हिंसामूल- रे। धरम जैन अधिको जोवंता जीवदया अनुकुलरे जो० ॥ ७ ॥ एक घरमथीसिवसुष ल- हीये दहीयै कर्म कठोररे। एकथकीपिंड पापभरायै लहोयै नरक अघोर रेजो॥ ८ ॥ धर- मतगणीचर चा माहोमांहे करद अहो निसिए मरे। प्रीतिरीति सुंबेबे सुंदरी पालै परोजे मरे जो० ॥ ६ ॥ सुपै समाधै इन परिरहती धरती प्रीउ सुरंगरे। विषयतणा सुषविलसै बहु- परि दिनदिन अति उछ रंगरे जो० ॥ १० ॥ काल नजाणे कि महीजातौ प्रिऊ प्रियाद करा- गरे। कहै जिन हर्पढाल एनीजी गावौ स्यारागरे जो० ॥ ११ ॥ दूहा ॥ सुषविलसंता बेजणो जनमो पुलो दोह। राय करै उछवषणौ हीयड हरषित होई॥ १ ॥ राणी सोहग सुदरी दरीभरोगुणप्रेम । तासुसुता मुरसुंदरि नाम वुलावीतेम॥ २ ॥ रूपसुंदरि वौजी पौया तेहनी पुत्रीजेह। भवणा सुन्दरी ते हनो नामठव्यौ गुणगेह ॥ ३ ॥ पाचधाद पाली- जता करता प्यालविनोद । वरस पांच नोतेथई दीठा परम प्रमोद ॥ ४॥ भगिावा सारिषीथई बुद्धितणो भंडार। मातपीता देषीकरी इण परिकरै विचार ॥ ५ ॥ ढाल ४ हरीया मनलागौ

बी०पा०च०
६
॥ १३ दूहा ॥ जिन अतिधर अध्यापक कुमरी भणावीजेह। मिथा मतिशाच नहीं धरम
रंगाणी देह ॥ १॥ एक जसत्ता दुविधिनय काल निगमगति च्यार। अस्तिकाय पांचे कए
द्रव्य सात नयधार ॥ ३॥ आठकरम जवतवतिम दसविध अलिबर धर्म पडिस इत्यारस
बार व्रत जांचै एहवा मर्म ॥ ३ ॥ मूलत्तर कम्पपवडि इगसौ अट्ठावन्न । काझ बंधना हेतु
पिण जाणे सत्तावन्न ॥ ४ ॥ बंधह उदय उदोरणा सत्ताजांणे तेह। सुहाविचार सबै
लहै प्रवचन आण्या जेह ॥ ५ ॥ ढाल ५ आंबानांनिखी रे एहनौ ॥ तुंदरिए सुनसुंदरीरे
जोवनपद्धती जोर भणीगुणीसगलीकलार चतुरपणेचितचोर ॥१॥ सुगुणनर जोवो पुण्य
विशेष। घुन्यैलहीवैरिद्धि असघ ॥ पुन्यै लहीयै प्रभुतामिपि वाजयुवतणालदेवि सु० ॥ २ ॥

1 रूपवन्तगुणलवणभारे विद्याप्रभुतासार। मदनाकारण छसहरे पिण मदनकरैलिगार सु० ॥३॥ इकदिन प्रत्यक्तरसभारे बैठौरायउलास । बोलावीवे निजसुतारे साथैपाठकतास सु० ॥४॥ विन- यवतो निजतातनरे अावी कीधसत्नाम । चकितथई सगलोसमारे रूपनिरषि अभिराम सु० ॥५॥ पोलै वेसारोतुतारे राजाधरियविवेक । बुद्धिपरोयाकारणै रै दोधसमस्या एक सु० ॥ ६॥ गद कयौपदछेहलोरे पुण्येलहीये एह । गुणवतो सरसुन्दरीरै बोली ततपिण तेह सु० ॥ ७॥ धन योवन डाहापणौ रे रोगरहित निजदेह । मनवल्लभ मेलावडौ रे पुण्यैलम्भे एक सु० ॥८॥ रलि- यायत राजाथयौ रे साभल तासवचन । कुमरी अध्यापकमणीरे लापगमे दीधौधन्न सु०॥९॥ लोक पुस्खाल सह थयारे रंज्या रांणीभूप । सहको लोक कहैदूसरे एतौ सरसतिरूम स० ॥१०॥ - श्री पाच० तुम्हे पिण मैणासुन्दर रे समस्यापूरो एह। अनुमतिल है निजतातनीरे कहै कुमरी गुणगेह सु० ॥११॥ विनय विवेक प्रसन्नतारे सोल सुनिर्मल देह । सिवपदनो मेला वडोरे पुन्थेलहीयै एह सु॥ १२॥ मातपिता हरषित थयारे हरप्या लोकनजात । प्रायै मिथाातीभणीरे नगमै उत्तमवात सु ॥ १३ ॥ उत्तम उत्तमनगमै रे गोचनै नी वसुहाइ । ढालथई एपांचमीरे कही जिनहर्षबनाइ स० ॥ १४ ॥ टूडा॥ कुमरौनोऽण परिकरी बुद्धिपरिष्याराय। अागलिजेथायैहिवै तेस णिज्यौ चितलाई ॥१॥ कुसजंगलसे अछे संषपुरोइणनांम। नगरीतहनो रागवी दमितारो अभि- ७ राम ॥२॥ उज्जैणीराजातणो नितमतिसारैंसेव । निजबदलै एकण बरस मुक्यौ अंगजव ॥३॥ नामतासछ अरदमन अरदमिकीधाजेर। जाणे सूरतिकामनी नारिरहे नितघेर ॥ ४॥ भमरो केतकिगंधसं मांडिरहै जिममोह। तिमसुखपामै नारीयां कुमरिनिहालोसोइ ॥५॥ ढाल ६ जाटणीनी ॥ मदन मनोहर कुमर कलानिलो देषो जोवन वयस्कमाल ॥ कुामरो मोहीहो कुमर- सुजाणसं । नयने जोवैहो फिफिर समरने पांमै सुषमुपतास निहालि कु० ॥१॥ दौठांहोयड उहजे उलसे दौठापाप अंदोह कु० । एतौ अण पायपाणीरसौ एहयौपापीरखोह कु० ॥१॥ ढाक्यो नरके किमहोनेहलो जो करौ कोडि उपाय कु०। अागछिपाईवासपलालमै परगटते पिण माघाय कु० ॥३॥ चोवाचंदन कुसमनो वासना छानौधरीयै हिमाय कुछ। तौहि पिणांहे परगट तिम एनेह दिषाय वा ॥ ४॥ वापैजाण्यो नेह सुतातणो पुलीसांभलि तु सुविचार । नेम न माने जेहसुनौतडी ते परणावु भरतार कु० ॥ ५॥ हीयड हरषी कुमरो इमक लोक पी.पा.च. ८ तणी तजिलाज कु० । वांछ्यौवर पांमुतो एहनै परणावौ महाराज कु० ॥६॥ अथवा तुम्हे मुझनै परणाविस्यौ मारतह प्रमाण कु०। बापदीयौ वर कन्यावर तेसुक लीणो तुजांण कु०॥७॥ तमथो लहौये बंछितवापजी तुमथी सुषलहोयै थीकार कु०। पोतानोंजांणी सुषणीकरो तुम्हेमा- हरै करतार कु० ॥८॥ दूण वचने राजा तूठौक है जांणी अंतरभाव कु० । ए अरिदमण कुमर पुत्री वरोजुगतो सरलसुभाव कु.॥६॥ सड़कौने मनमांनी वातड़ी भलौकह्यौ महाराय कुछ। सरिसास- रिसोएजोड़ी जुडी अावी सहकोनइदाइ कु० ॥१०॥ लोक सहुकौ राजाने कहै होस्यै दहारंगरोलि ८ एहजमाई सोभै तिमघर जिममुष सोभै तंबे ल कु० ॥ ११॥ राजा पिण रलीयायत थई- करी कोधो धचन प्रमाण कु। छडीढाल सगाई नृपकरी कहै जिनहरष सुजाण कु० ॥ १२ ॥ कु०।

टूहा॥ हिवमयणाने पूछोयौ पिण बोले नहीतेह। नीचौदृष्ट निहालती भुषड लाजकरह ॥१॥ पुनरपि राजा पूछीयौ पुत्रौमझनै भाष। ताहरामनमां हे हुवै वरनौने अभिलाष ॥२॥ वार वार इमपूछता कुमरी थई सलाज। मुषमुलकी कहै तातनै पूछणस्युस्यो कान ॥३॥ चतुर विचक्षण कौतुम्हे जाणौ छौ सहुनीति । कुलकन्या पूछीयै एह नही जुगतीरोति ॥ ४ ॥ कुलवंती कहौ किमक है मुझपरणावौ एह। मात पिताजेहनै दोयै तेह जबर सुतेह ॥ ५ ॥ निश्चय मुंजो जोईयै ते पिणवाद्य निमित्त। सषटुषपामै प्राणोयौ निन २ परबक्रित्त ॥ ६ ॥ ढाल ७ मयामोडिदिषणो आणि मिलाइ एहनी॥ मयणाक है सुणि तातजीरे पूरपलिखित प्रमाणा। ते सगलो आवौमिल होजोके हो इहा विनगंण ॥१॥ पिताजी कर्म सबलजगमाधि ०पा.च. । कर्म करतेहिजहुवै होजी सुष टुष अरति उछाह ॥ २॥ पि. जिणवेलायै जेहवारे जीव कौधाकर्म । उदयथया तिण अवसरै होजीलहोयै फलनो कर्म।३। पि. रंक फेड़ो राजा- करैरे राजाफेडोरंक। एहवौ कुण फेडीसकै होजी कमलिष्या जे अंक ॥ ४॥ पि. राय कहै पुत्रीमुणौ रे तुं मुझ प्राण आधार । वार वार, तुझसकहु होजीमांगि बंछित भरतार ॥ ५॥ पि. सुताजीहं सबलोजगमा ह। मुझतू ठ सहसंपजै होजी सुख दुख अरति उछांहि ॥ ६ ॥ सु. माहरो अास्यासह करैरे निवलानै बलवंत । हतूठौ दालिदगम होजोरूठोजांणि क्रितंत र सु० ॥७॥ रंकप्रतै राजा करूंरे रायभणो कसरंक। सबला ते पिण माहरीर हौजीमांनैमा संक स० ॥८॥ करणमतेत्युहं करू रे सुष दुषमाहरै हाथ। रूठोजमघर मोकलू होजो- तूठोकर नग्नाथ सु० ॥ ६॥ वलिन् मयणावीनवरै तातसुगौ मुझवत्त । तुमनै पिणकरमै कीया होजी राजन राजनिमित्त सु० ॥६॥ नेहन पोते पुन्यछरे तेहनैरूसै राय । पुन्यविना- तूसै नही होजोजोकरैलाष उपाय पि० ॥१०॥ छोरूपिण मोटातणारे सुपौया दुषीया होइ कारण छदसह कर्मनो होजीगरब मकरज्यौ कोइ पि० ॥ ११॥ थाप्यो कुमरो कर्म नैरे उथाप्यौ नृपवैण। रोसवसैथयौडाकलौ होजोकीधा रातानेण पि० ॥ १२॥ गरवारौ पौटौजिकैरे तेहमै किसोसवाद। ढालथई एसातमी जिनहरप सुतानु पवाद पि० ॥ १३ ॥ दूहा ॥ रीसाणौ नृप इमक है रे रे मूढगिमार! लीला सुपभोगवै तेसहुमुझ उपगार ॥१॥ पहिरकंचण अाभ- रण नव नव वेस बणाव | पाणापोणा पेलणा तेसइ मुझपसाव ॥२॥ मयणा कहे सुरिण- श्री.पा.च. तातजी ह तुम्ह कुलउतन्न । मै पांमी सुखसाहिबी तेमुझ पौतैपुन्न ॥३॥ मयणा इणि परि- भाषतां राजाथयौ क्रितंत। जिमपावक तसोंचीयौ बाधकाल अत्यंत ॥४॥ भाग्यहीण एदी- १० करी दीसै छ परतक्ष। कह्यौ नमानै माहरौ लीयौ नमेलै पक्ष ॥ ५॥ क्रोधवसै थयौरातड़ो धमधमीयौ नरनाह । सगपणवेटीवापनौ भागौमन उछाह ॥६॥ ढाल ८ नायकानी॥ मयणाकर सुणितातजीरे वड़ो मकरौरीस मोरा तातनीर। जांण तुम्ह सहुवातनारेलाल तुम्ह मोटा अवनौस मो० ॥१॥ म फोकट गरब नकीजीयैरे गरवै सहुगुण जार मो। इंद्र नरेंद्र पिणा • १० गर्बधीरेलाल लघुतापणौ लहाइ मो० ॥ २॥ म तुम्ह कहो जेहंकर रे सुषीया दुषीया लोक मो। करता हरताहं सहीरेलाल तेतौ महीफोक मो० ॥३॥ म तुम्हसेवाथी कोहरे - - सुपौया सहुजगमांहि मो। तुम सेवाकरता नथोरे लाल तो सुषीया कांह मो० ॥ ४॥ म० राय क है रूठोथकिरेलाल तुनिरधनवर जोगरे । दुहागिणि एमतिसारून विमिलेरै लाल तुभने उत्तम भोगरे दु० ॥ ५॥ म. मयणा सुणिमुझवातडीरलाल ताहरै पोते पापरे दु। तौसझे तुझएह बुरेलाल मामिसबहु संतामरे दु० ॥ ६॥ म० हठमानी मोतातणैरे नाणे ई बुद्धिवंतरे दुः। सम- झावा समझे नहीर लाल अवगुणएह महंतरे दु० ॥ ७॥ म० राती निजगुणग्यान मेरे भूरधः निगुण निटोलरे दु । लेषवतो केहनै नथीरेलाल मूढ नजाणे बोलरे दु०॥८॥ महु- नाणु सुपणीकररे परणावु वरसाररे दुः। पिणमाहरो नकरै कटोरेलाल थायैस दुपभ- डारर दुः॥ ६॥ म मयणाक है तुझनै राचैरे ते परणावौ नाह दु। मुझपोत पुन्यजोह

५
श्री पान. रेलाल तोमझ हे स्यै उछाह दु० ॥ १०॥ म. गाढेरोरोसावीयोरे सांभल एहवाबोल दु।
मोटाबोली दोकरीरेलाल मुझ लेषव्यौ ढ णते लरे टु० ॥११॥ म. मुझनै दूण जथापीयौरे
११
थाप्यौ वषत सहायरे दुः। कहै जिनहर्ष सहसुणोरे लाल अाठमी ठाल कहावरेटु० ॥ १२ ॥
म०॥ दूहा॥ रोषातुर नृपदेषिनै मलौचिंते एम। ठार वयण सुधारसै सोतलथायजेम ॥१॥
महाराय रयवाड़ीयै रमिवानौ छै लाग। नईयैरमिवा आजप्रभू फूलरह्यौ छ वाग ॥ २ ॥
अंतरगतिदाझीरह्यौ क्रोधागनि विकराल । उठ्यौतुरत ऊतावलौ मांन वचनभूपाल ॥ ३॥ चर ११
वादार प्रतै कहै करौ तुरंग तयार। हुकमणी श्राण्यौतुरी सफलाणौ तिणवारं ॥ ४ ॥
चतुरंगसेना परिवरौ रायथयो असबार। हिवै अागलिजेनीपजे ते सुणिज्यौ अधिकार ॥५॥

ढाल र रेहमीरीयार रहि वैरीनैणझकोलतो एहनी ॥ राय रयवाडी संचयो भागलि अडै- घेह। मंबीसर । राजा चकितथई कहै आवैके कुण एह मं० रा॥१॥ आडबर करताथका न धरै कामिप्रवाहम। कोलाहल इलबोल मंत्री कहै सुगिनाह मं० ॥२॥ रा. एपैडौ कोठीतणौ सातसया परिवार में। कोढी महुभेलाथया वायौ रोग अपार म०॥३॥ रा. राम करएक नान्हडौ भावीमिलीयो मांहि म। तेपिणकोढी फरसथी ऊंबर रोग लहायम ॥ ४॥ रा० ऊंचररोगथको थयो ऊंबरराणौनाम म। ते आवैकै एचल्यो एप समाधनोठांम म० ॥५॥ रा. असवारी वेसरतणी परवरीयो परिवार म। गतनासा चामरधरै गलित त्वचा छचधार म ॥६॥ रा-छटाहाये झालिनै मुहरचले गतकर्ण मं। 'लोकांनबीहावनि भूडौ श्री०पाच १२ जेहनौ वर्ण म०॥ ७॥ रा० कोटमंडल अंगोलगू गलितांगुल मंत्रीस मं०। सर्वगलितको टवाल के तेहमैं ऊंबर ईस मं०॥८॥ रा. द्रादमंडलके ढेगल्या दीसंता बिकराल म०। सेक्क तास दोहागौया राधिरुधिर पर नाल म॥६॥ देसाधिप पारो लीय मननौ मांन्यौ माल म। नाकोई नकही सके एहवी ऐहनीचालि मं० ॥ १०॥ रा तेह भणोबीजौदिसे चाल्यौ श्रीमहाराय म। जावाद्यौ एकोढीया जिम दरसण न विधाइ मं० ॥ ११॥ रा० बोजो- दिसि राजा चल्यौ मारगछोड़ी जाम में। कोटी दे निरषीयौ इकल करतातांम मं० ॥ १२ ॥ रा० अाव्याद ऊतावला नृपसांम्हा तिणवार म०। तब राजा एहवु कहै सुणिमंत्री सुविचार मं० ॥ १३॥ रा परचावो पासै जई मुहमांग्यौद्यौ माल मं० । पिणदूरैरे रहाविज्यौ करि १२ ज्यौ सपलालपाल मं० ॥ १४ ॥ रा. हुकमदोयो मुहतामणौ वोउतै भूपाल में० । कहै जिन दर्प पूरीघई नवमी ढालरसान मं ॥ १५ ॥ रा०। दूहा ॥ गलितागुल जतावलौ जंबरनौ परधान । ते पहिली भावीक है साभलिहो रागान ॥१॥ ऊम्बरराणौ अन्ह तणौ साहिबछ सुपरांण । मान सहको सेहनै कोइ न लोपै आंण ॥ २॥ मणिमाणिक कंचिणरयण भोजन कूरकपूर। जम्बर राणौ हुकमसं मङ्गावै भरपूर ॥३॥ अम्हे सहसेवक नफार सुपोवाता सपसाय । को नही किण बातनी मिण सामलि महाराज ॥४॥ राणी नही राजातणे एकै मोटी पोड। इककन्या द्यौ अमभणी निम पुह मनकोडि ॥ ५॥ ढाल १० वातसकाढौहौ प्रततगणी ॥ राय कहै किम दौजियै निजकन्या गुणवन्तौ रे। रोगी नरनै अपता जगमै अपजस लहन्तौ रे रा०॥२॥ बलि ॥

श्री.पा.च. ॥२॥ १३ तो गलितांगुल कहै ताहरौ जसजगगाजरे। मांग्यौदै मालवधी एहविमद तुझ छाजे रे रा० कैतौ कीरतिहारोथै कैदीजै निजकन्या रे। नेहवी तेहवी अन्ह भणी मानीस्यैते धन्या रे रा० ॥३॥ पड़ीयौ रायविचारणा अजुगत वातसुणाई रे। किमही दुरसपड़े नहो दोतड़ पडीयो भाई रे रा०॥४॥ नृपनमयणा सांभरी कन्याएवर जोगी रे। अविनयनो फलजिम लहै थायै दुषिणी रोगी रे रा० ॥ ५ ॥ कीरति कहो किमहारीय टोहिलीजे अगमाहे रे। कन्या देता जसरहै तौ जसगमीवै काहे रे रा० ॥ ६॥ मुझ मन्दिर तुम्ह पाविज्यौ रम कहि पाछो १३ वलीयौ रे। राय गृहांगरण प्रावीयौ मासीतौ हलफलीयौ रे रा० ॥ ७॥ तेड़ी मयणा सुन्दरी राय कहे सुण बेटीरे। हं तुझनै सुपचिन्तवतु अवगुणनौपेटीरे रा०॥८॥ वाप सुकरमीने हुवै बंछितवर परणारे। 'हठ परहर सव बालिका दोहग दूर गमावुरे रा० ॥६॥ जौ प्राप करमीत हुवै तौ बर ऊम्बर राणौरे। तुझ करमैए प्राणीयौ परणवानो टाणोरे रा० ॥१०॥ मयणा मुलकीने करवपतलिख्यौ वरराजौर। ते मुझसिग्नौ सेहरोमांहरै तेहसं काजोरे रा० ॥ ११ ॥ राय ते तेडावीयौ सपरवारसं बायोरे। करमसंयोगै नृपकहै तु वर मयणपायोरे रा. ॥१२॥ उम्बर कहै एराजवी वातन जुगतौ दीसै रे। दसमी ढाल पूरी थई कहै जिन इर्ष जगी सैरे रा० ॥१३॥ दूहा। वायस कंठ कनकनी जिस सोभ नहीं माल । जोडी नही वग हंसनी तिममुझनै एबाल ॥१॥ राय कहै एदौकरी कह्यौ न मानै मुझ। आप करम मानै सही तिण आछू तुझ ॥२॥ मुझ दीधौ वर आदरै तउपरणावुजोय। करम मांहि तुहिम लिख्यौ मुझनै दोसन कोद ॥३॥ दयानांणी चित्तमै नांण्यो नेहलिगार । लोकक है एस्थ थयौ श्री पा.१० करै अधम अाचार ॥ ४॥ उत्तम कोप करै नही करे ते मान प्रमाण। पिण एजुग ठून विकरै कोमै चल्यौ यांण ॥ ५॥ ढाल ११ बंगरी यानी॥ जम्बर कहै सुणि राजवीरे। माहरी नही १४ एजोगि रे॥ गुणवंता। कोढ़ी रोगै भग्यो रे। रतन लगा षोड रे गु० ॥१॥ मुझ सोभै नही एकांता। मैं पातक कीया अनंता गु०॥ मुझ देषी सह बाहंता तिगा एहनो नही मुझ कोडि रे गु० ॥२॥ एकन्यांनै हंकिहां रे एहसी हूं काग रे। सरिषै सरिषौ जो मिले रे १४ तौ सोभै महाभाग रे गु० ॥३॥ अविचार्यो जो कीजीय रे लोक हंसै घरि हांणि रे गु० । तुमने एहनचिघटै रे अपजसनो एषांण रे गु० ॥ ४ ॥ तूंद्यै पिण हं ल्युनही रे थायो तुझा कल्याण रे गु०। वीजीठामे मांगिस्युरे उबरनो एवाणि रे गु० ॥ ५॥ राय कहे एस्यू कर रेएनौ एहवो भाग रेगु०। वाकनको तुझ मुझ तौरै एकन्या तुझ लागि रेगु०॥ ६ ॥ मयणानि सुनो एहरे ऊठी तरतति वार रे गु०। एवर लिषीयो भागमै रे तौहिव किसी विचार रे गु० ॥ ७॥ जम्पर कर निज करगुह्यौ रे मयणा धरीय विवेक रे गु०। कोढी वर पिण भादग्यौ रे छोडी नही निज टेक रेगु० ॥८॥ उमरा उसासंतजे रे मली सरपर धांन रेगु०। अंते वरवारै सहुरे बलै नही राजन रे गु० ॥२॥ लोक सड़ जोई रह्या रे दुषभर रोवेसैण रेगु०। सुषमैघाली अांगुली रे इण परभाषे वैण रे गु० ॥१०॥ एअजुगतुं नृपकरै रेकाडोजपरिधाव रे गु०। पिण कोई न कही सकै रे राजा वदै सुन्याव रे गु० ॥ ११॥ एथई कहै अधम एभूप श्री.पा.च० ठाल इग्यारसो रे कोयौ राय अपार रे गु०। कहै जिन हरष हि सुणौ रे भाग लिजे अधि- कार रे गु० ॥१२॥ दूहा। रोवंतां इणपरि सह । रयण असुलक कन्यका १५ किम नांष भूप ॥१॥ छोरूकु छोरूजे हुवै तौही पहिड़े नही मादौति । भोलपण एह वो कह्यौ तौही राजा चालै नीति ॥ २॥ छोरूवेचे बाप जौ तौ कुण अाडौ थाय। जोरन चालै रायसुं सह करै हाय हाय ॥३॥ दुर्लभ दरसण देषतां मयणा मोहन वेलि। अांबाएरंडपापती रोपे छैगुण गेलि ॥४॥ सगले कीधा वीनतो सह कह्यौ समझाय। कहणा माहेकेहनी बाकी न रही १५ काय ॥५॥ ढाल १२ सुगुण सनेही मेरे लाला एहनी॥ मयणा निज मन काठौ कौधो। जो मुझ वष एवर दोधो॥ तौ मा हरै ए ऊम्बर राणौ देण भव एहिज प्रीतम जांणौ ॥१॥ 4 -- इहां कोई नो नही छैचारो। वाक न कोई इहां पितारो॥ दाय उपाय अनेक विचारो। करम सबल जग माहि अतारो॥२॥ मन दृढ देषी कुमरी रो। राय बल्यो मन मां हि घणरो॥ सतीशिरोमणि सत्वनचके । लीधो पषसा पुरसन मूकै ॥३॥ सायर मरज्यादा जो लोपै। क्षमा- वन्त मुनिवर जो कोपे। सैषनाग मुषजो विष उलटे । तौ पिण उत्तम वयण न पलट ॥४॥ पवन बुलायौ मेरनडौले। मोटा दीनवचन न विवोले ॥ आपट् संपद मां हि सरीषा। से भरबावन वोर सरीपा ॥ ५॥ कर मायत्त सहुए दीये। कुमरी निज मन माहे होसै॥ एहवौ देषी राय परणावी। जम्बर राणाने मनभावी ॥६॥ ऊंबर कुमरो वेसर चढीया। निज डेरानै पंथै पडीया ॥ नगरलोक सह ऊभाजोवे ।. करे कुलाहल डसके रोवै ॥७॥ एक कई धिग धिग श्री पान. ए राजा। एहनापोटा थयादिवाजा ॥ कोई कहै कुमरी अयाण। राजा रायवचन कोयो पर- माण ॥८॥ केई कहै मा भूडी कोधो । निज कन्या नै सीष न दीधो ॥ कई पाठक अवगुण १६ काढ़े। जिन मतनै केई दूषण चाढ़े ॥६॥ मयणा चाली ऊबर संगे। होयछे हरष धरी पठ रंग॥ जैनधरम मोजो भेदाणी। किम पलट तेहनी कहो वाणी ॥१०॥ बारमो ढाल थई ए मांणौ। कुमरी परण्यौ उबर रांणा॥ करम तणो जिन हरष कहांणी ग्यांनी विण न विजाये जांणी ॥ ११॥ दूहा। हि वै वीजी कन्या तणौ जोडेवा वौवाह । तेडावी सिव भतनै इन भाषे १४ नर नाह ॥१॥ लग्न अनोपम जो वो विरदूपण थोकार । सुरसुंदरि परणावीयै करी महो- छवसार ॥२॥ लगन शुद्ध अमुक दिन र बोल गनन कोइ । ज्योतिषशास्त्र निहाल तां एह.

नो कदो कहोद ॥३॥ जोसी वचन प्रमाण करि माद्यौ रायविवाह। परणावु सुरसुंदरी अधिको करी उछाह ॥ ४॥ ढाल १३ करडौ तिहा कोटबाल एहनी ॥ प्रीति धरी मन मांहि राय तेडाव्याहो साजण आपणा। सगासणी जा लोक प्रोतिवधारण हो याव्या अति घणा ॥१॥ रानवीयोरै साथि अाव्याही राजकुमर रलीया मणा। अमरपुरी अवतार नगरविराजे मनुष्य सुहामणा ॥२॥ डेरा तंब तांणि मंडपरचीया हो नव नव भातिना। रंग मंडप रंगाविकारण कीधा हो सगला पातिना ॥३॥ लोकिक विधि सह कोधते हनो स्यू कहौ3 लोक जाणे सह । श्राव्यौ लगन सुदीस आरिम कारिम कीधा तिहा बहु ॥४॥ हिवै अरदमण कुमार सुंदर वा गाहो अंग वणावीयौ। पुरष तणासिणगार कीधा हो सडकोनै मनभावीयौ॥ ५॥ चंचल N

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१७
श्री पाच० चपल तुरंग सोवनसाकत चढ़ीयो नचावतो। जांणौ देवकुमार मुष तंवोल सरंगा चावतो॥
चवरी मंडप मां हि कुमर भावीने बैठो तिन सौ । बैठा सहू भूपाल वेह वणावी कंचन कलस
मै ॥ ७॥ सोलेही सिणगार कुमरी वणाया सुंदर मनरली। आवी चवरी मांहि वादल मां
नाणे चमकी वीजली॥८॥ बैवी बरनै पासि सोहे जाणे श्रीपति रुकमणी। सोभा अधिक
सुहाइ जांणे इंद्राणी इंद्र कन्ह वणी ॥ ६॥ फिरौ या फेरा च्यारि च्यारे चमरीमा मंगल बर-
तीया। कन्यावर कंसार मांहो मांहे मिलि जा रोगीया ॥१०॥ वरकन्या वीवाह करपरणा
व्या ढोलघुरावीया। ग्डि धुधु घुऱ्यारेनीसांण भेर भुङ्गल वाजावजाविया ॥ ११॥ थयौ १७
सुरंग विवाहरंग सुरंग रह्यौ वैवाहीयां। ऊभाचारण भाट विरुद भणै मनडै उमाहीयां ॥१२॥

हथ लेवौ तिणवार जोसी जोडाव्यौ खडी जुगति। ए थई तेरमो ढाल कहै जिन हरप जाण 'ज्यौ विगति सं॥१३॥ दूहा। करमे लावै नपढीया सोवनरयण भंडार। सुंदर घोडा हाथौथा दासी दास अपार ॥ १॥ बहु मोलिक वागादीया रतिन जडित सिणगार। सोवन पाए ढोलीया सउडि तुलाई सार ॥२॥ दोधो सबलो दायजो कह ता नावै पार । प्रीति तिहा दे तां थकां न करे कोई विचार ॥३॥ राजा राणी नौ घणौ पुत्री उपरि प्रेम । माल अमामो पापीयौ प्रीति जणावी एम ॥ ४॥ कोधी बहु पहिरावणी राजवीयानै रंग रसराप्यो जस संग्रह्यौ वाध्यौ प्रेम अभङ्ग ॥५॥ ढाल १४ राजा जौमिले एहनी ॥ लोकलुगाई मिलीया अछेह । वात करे मांहो माहि तेह ॥ पुन्ये सह मिले । मुन्ये सननामान्या सह मिले ॥ पुन्ये उत्तम सयण ॥

श्री.पा.च. १८ संयोग। पुन्ये लहीये परघल भोग पु० ॥१॥ सुन्दरि मिन्दिर रमणि विलास । पुन्ये पहुचे मननी आस ॥ पु० जौवौ कुमरी नौ पुन्य प्रकास। वंछित वर लयौ लोल विलास पु० ॥२॥ देवकुमर सरिषौ वरराज । कुमरी अपकरने सिरताज॥ पु० सरिपी जोड़ि जोड़ी जगदीस । सुषभोगविस्ये ए निसिदोस पु० ॥३॥ करिसे रूप सफल हिवे देह। जोवन सफल लेस्थे गुण गेह॥ पु० एहवौ वरवररिद्धिपडूर। लहीणे जो हुवे पुन्य अंकर पु० ॥ ४॥ भाग्यवती कुमरी एधन्य । एह सरोषौ नही कोई अन्य ॥ पु. एक वापनी पुत्री दोह। परतिय पुन्य पटन्तर जो पु० ॥ ५॥ एककहे वारूको राय । राजा तूठेस्युन विधाय । पु० एककहे कुमरो बुद्धिवन्त। बाप षुसी करि वरीयौ कन्त ॥ ६॥ पु० अध्यासने हाथे सिदि। भणी गुणी पांमी ८८

वलिरिधि पु०॥ एक कहे परतिप फल जोई। सैंव धरमथी स्युन विहोर पु० ॥ ७॥ पोछ
लिभव इणि पूजी गौरि। फललहस्ये आगे एतौ मौरि॥ पु० लोकमिली इण पर करे बात ।
जीतानापली काहि वात पु०॥८॥ मयणाने पोते नही पुन्य । पुन्य विना किम थईये धन्य ।।
पु० रानवीयांसुं करीय उपाधि । तौ जोवौ तेहना फललाध पु० ॥६॥ इम निजर मुष बोले
वोल । समझि विहंणा निगुण निटोल पु०॥ कहै जिन हरष एचवदमौं ढाल पु० ॥१०॥
। हिवै राजा ताजा प्रघल विवध भांति पकवान | असन पान खादिम प्रसप जुगति जिमाडी
जांन ॥१॥ अपर दीधा अति अबल पान लवंग मुखवास | जस लोधो जीमा इनै सई कहै सा
बास ॥२॥ सगा सह संतोषीया परज्यौ माल अपार । पुत्री हिबै चलाइवा राजा थयो तयार ॥३॥

वैभरजै बोष बा० ॥१॥ . . सोपान हयगजरथ पायक प्रघल निहसपनीसांण । कुमरी न माता दीय सीष भली हित प्राणि ॥ ४॥ ढाल १५ इतला दिनहुं जाक्तीरेहां ऐहनी। हिवते सोहगसंदरी रेहां पुत्रीने दौयै सौष । १६ बाई सांभलौ ।सासरीयां संतोषिजे रेहां हल छैचतुर सुजांगा रेहां मुझ आतम प्रांण बा० । विद्यापिनयनीषांणि रेहां तुझ मुषि मधुरी गांणि वा ॥ २॥ सेवकर परीजण तणी रेहां खजन तणौ सुविसेष बा ॥ कुविचन मकहिस केहनै रेहां किणसु मकरम द्वेष बा० ॥ ३॥ देव तणी परिपूजि जे रेहां भगत करे भरतार बा । कहो मलोपे प्रिउ तणौ १६ रहा उत्तम संगति धार बा ॥४॥ सासू नणद जे ठाणीयां रेहां पडिजे सह नै पाय बा० । सुसरानी सेवा करैरेहां सह नै श्रावै दाय बा० ॥५॥ सूई जे नाह सृता पक्ले रेहां जीम नाज जीमाडि बा० । भोजन वेला घर तणा रेहां मेल्हे बार उघाडि बा० ॥६॥ आवै कोई मांगिवारहां न करे तास नाकार बा०। पर कर ऊपरि कर'करे रेहां भरजे सुजस भंडार बा० ॥ ७॥ रूडौ घर देपालिजे रेहां चलि मे चतु आचार वा। सुपौहरी कह राविजे रेहां करिज सहनी- सार बा० ॥८॥ भूपा दुषीया देषनै रेहा करिजे करुणा सदीव बा। दोल तिहत्यो थाई जे रेश कठिण करे मति जीव बा| निसनेहणि मति थादूजे रेहां लिषि मोकालिज लेष बा। पुत्री भीतम माणसां रेहां सुप लयीयै देषि देष बा० ॥१०॥ जीव थकी तू बाल ही रेहां तु अम्ह प्राण सरीप वा० । कहै जिन हर्ष सह भणी रेहा पनरमी ढालै सीष बा ॥ ११॥ दूहा मातपिता पाय लागिनै कुमरी चली मोउ साथ । हय गज पायक सुहिवै बोलावै नरनाथ ॥१॥ - श्री.पा.च. २०. ए मंदिर ए मालीया नगरी अाही ठाण। मुझने वीसरि स्यै नहीं राति दिवससु प्रमाण ॥२॥ सीट करी सह लोकसु नयणे नीरप्रवाह । होयौ फाटै मायनौ उलयो विरह अथाह ॥३॥ गलि लागी पुत्री तणे माइ करै आक्रद । प्रेम तणे परवस थई है है मोहनरिंद ॥४॥ आंसू कुमरी लोयणे जलधर जिम संजोई। हत्यली छाला पद्या चीर निचोद निचोई ॥५॥ रोतां मृग रोवरावीया वाट वटाऊ लोक। जांतां जीव वहै नहो वीछड़वानौ सोक ॥ ६॥ कुमरी चाली सासरै हिलमिल सीष करेह । फिर फिर जोवै पालै डब डब नयण भरेह ॥७॥ हिवै ऊंबर राणां तणौ सांभलि ज्यौ अधिकार। मन मां निश्चय राषीयौ न धरै दुषलिगार ॥८॥ ढाल १६ बिंदली तौ नणद गमा ईन्हारै लहौद्य देवर पाई हे नणद बिंदली ल्यै एहनी॥ ऊंबर क है २० सुणि कुमरो उतौ रुपै जाणे प्रसगै हो । सुन्दरि वणि मणौ। राय प्रजुगति कोधी मुझ कोढीने त दीधी हे सु० ॥१॥ वयण सुणो मृगनयणी मृगराज कटी सिसिवयणी हे सु० । विधिना रूपनी पायौ देपो पोते सुप पायौ हे सु ॥२॥ ए जोवन तुझनो को सह नारि तणै सिर टोको हे सु। मुभा आणा सिरधारी कोई पुरुष अवर सुविचारो हे सु० ॥३॥ मोगवि तिणसु भोगा मन गमता सरस संयोगा हे सु। हुकम धणी नो होई इम कर ता दोष न कोई हेसु ॥ ४॥ नारि रयण तुहीरा हु नर मै काचक थोरा हेम। तुतौ उत्तम हंसी हु वायस जाणि कुर्वसौ हे सु० ॥५॥ मुझ हियडै दुष झा राय करणी देवी दामू सु० । तै माटै ठ छोडी मुझ इकमै कर काई जोडी हे सु० ॥६॥ मुझ पासै तेरहिस्सै तुझसु सुषफल भोग विस हे सु। - श्रोल्पाच० उम्बरनी ए बांणी सुणि मयणा दुषभरांणी हे सु० ॥७॥ प्रीतम वयण मुणौ । नयणे नौरप्रवाहा करजोड़ी कहै सुणि नाहा हो प्री। चरणे सौस लगावी कहेसी एवात सुणावी हो मो० ॥८॥ २१ मनिमां जांणी रहिज्यो फिरिवीजीवार मकहिज्यो हो प्री। अधम जनम नारी नौ लौ जांग कुण्डगारी नौ हो प्रो० ॥६॥ तजीय सील अमोलौ तौकांजी कही तोलै हो मी.। सौयल विभूषा कहौर्य सौलै जस महीयल लहौयै हो प्री० ॥ १०॥ इणि भवप्रिय तु मोरै हु चेड़ी सरणै तोरै हो प्री० ! कां मन कोई वीजै तुझनै देषो मन रीभै हो प्री० ॥ ११॥ वाल्हे सर तुं २१ मन माहरै बलिहारी प्रौतम ताहरै हो मी। ए निश्चै मुझ जोवी होणहार हुवै तेहोवो हो प्रो० ॥ १२ ॥ सोलमो ढाल सुहावै जिन हर्ष सह सुप पावै हो प्रो०। दूहा। सतीसिरोमणि मनि सुदृढ निरमल सील सुहाइ। इकतारी इमराषता अनुक्रमिरयण विहाय ॥१॥ प्रहविहसी पूरबदिसै उदयथयौ प्रादौत। मानु मयणा सुन्दरी देषे वा सुप्रवीत ॥ २॥ चिई दिसि चि- डीया चहचही बोल्या पंपी टन्द। मान मयणानै कह चिरंजीव चिरनन्द ॥३॥ मयणा क्यण कहै हिवै सुनि प्रीतम तुसनेह । जईये उलट भावसु श्रीरिस हेसरगेह ॥४॥ मयणा अम्बर अावीया वद्यारिपभ जिणंद । मयणा स्तुति इणपरि करै होइडे धर आणंद ॥ ५ ॥ ढाल १७ प्रादरि जीव नमागुण आदर एहनौ॥ जय जय रिषभ जिणे सरसाहिब सिव संपति- दातारजी। नामथको नवनिधि सिद्धि लहौयै त्रिभुवन जन आधारजी॥१॥ ज° तुं करुणा सागर गुण अागर महीयल महिमावन्तजी। सुर नर नायक प्राय नमै नित दसण नाण श्री.याच० २२ ४ अनन्तजी ॥२॥ ज० अजर अमर अविचल अविनासी न लहै कोई सरूपनी। जोतीरूप अंरूपी अरिहन्त त्रिभुवननाथ अनूपजी ॥३॥ ज० सयंभू रमण विहुजलकेरा संख्या कहै कोई तासजी । तुझ गुण संख्या न लहै कोई जो सारद मुष वासजी ॥ ४॥ ज० तुं परतिषि सुरतर अवतारी बलिहारो तुझ नामजी। तुं सह जन्तुतणौ उपगारौ भवधमतां विथामजी ॥५॥ ज. तुझ नाम पांमै वंछित फल तुझ नामै बहुबुद्धिजौ। तुझ नाम लहोयै जस निरमल तुझ नामै कुलसुद्धिजी॥६॥ ज० सक्र चक्रधर पदवी लहोय तिणमै किसौ विचारजी। मोक्ष २२ तणी पदवीनो दाता तुझ गुण अधिक अपारजो॥७॥ ज० बोधयोज तुझथी पांमीजै तुझथी लहीयै धर्मजी। लवधि सिद्धि तुझ नाम थायै तूटै सगला कर्मजी॥८॥ ज० ताहरौ ज्योति सकल विभवनमै गावै सगला सन्तजी। केवल ग्यांन करीनै दे लोकालोक अनन्तजी ॥१॥ अ० रोग सोग तुझ नामै नासै तुझ नामे समद्धिजी। तुझ नामे लहै काया निरमल तुझ नामें रिद्दि रविजी ॥१०॥ ज० पास्या पूरै चिन्तापूरै दूर गमै कलेसजी। पुन्यपसाय दरसण पाम्यौ पाप गया सुविसेसजी ॥ ११॥ ज० मयणा इणि परि स्तवना कीधी भावभगति सुविसालजी। कहै जिन हर्ष थई एपूरी भली सतरमी ढालजी ज० ॥१२॥ दूहा॥ इम स्तवनां करतांथकां अन्तर भाव विसाल। जिन कंठेथी ऊछली कुसम माल ततकाल ॥१॥ माला हाथै अछल्यु जिन वर कर फलजाम | अम्बर मयणा वयण थी ते फललीधो ताम ॥२॥ माला मयणा संग्रही वचन कहै तिणवार। खामी ताहरा देहनौ रोगगयो निरधार ॥३॥ आपणसं सुम श्री०या०च० पांमीय नवपद थी नवकार भ० ॥ ११ ॥ स० अरिहंत १ सिद्ध २ सूरोसरू ३ उवझाया ४ सहु २४ साधि ५ भ० । दंसण ई नांण ७ चरण वली ८ तप । नवपद धाराधि भ० ॥१२॥ स० मयण। नै मुनिवर कह्यौ नवपद नौ अधिकार भ० । ढाल अठारमी एतलै थई जिन हरष विचार भ० ॥१३॥ स० दूहा। ए नवपद संपद दियण उद्धारण त्रयलोय । जिन सासन नौ सारए एथौ चिंतित ॥१॥ मंत्र यंत्र एथौ अधिक कोई नही संसार । कल्पक्षथी एअधिक भव भव सुष- दातार ॥२॥ जे सौधा जे सोभि स्यै सोझो छै वलेजेह । ते नवपदना ध्यांनथी ए मां नही संदेह ॥३॥ ढाल १६ चतुर सनेही मोहनां ॥ नवपद महिमा सांभलौ ए सम अवरन कोईरे। एकनी मोटि मम हियलै दिन दिन अधिकौ होइ रे ए० ॥ १॥ ए नवपद थी नौपजे सिद्धिचक्र सुवि- धारो रे। सकल सिद्धिदायक कह्यौ ज्ञानी सास्त्र मझारो रे ए० ॥२॥ चौवीस जिन थापीयै पोडश विद्यादेवीर। सासनदेवी देवता ग्रहंगणउ चितठवेवीरे ए० ॥३॥ षेत्रपाल दिगपालजे सपरिवार थापोजैरे। यंत्रकरी विधि पूजीयै तनुबंछित फललीजैरे ए० ॥४॥ उत्तम तपसंज मपरी विणयोग थिर रापीर। निरमल ध्यान धरी करी ध्यावै जिनवर सापीरे ए० ॥५॥ थाय ततपिण निर्जरा अनुक्रम केवल लहीयै रे। मोक्ष एहना जापथी वारम कठिन नरदहीय रे एक ॥६॥ संसारी सुपपिण सह लहीये एहनै जाप रे । भवभवना पातिककीया पांणी वलि मां कापरे ए० ॥ ७॥ पुरुषोत्तम तुझनै कह्यौ एसिधचक्र सरूपोरे। समता रस मनमाधरी ए पाराधि अनूमोरे ए०॥८॥ निरमल सीलधरौ करो मन पर द्रोह निवारीरे। सुजस सभावै श्री.पा.च. २५ विस्तरे जायै एह जयकारीरे ए० ॥ ६॥ आसू चैत्सातिमथकी श्रांविलकरि नवदिवसोरे। अष्ट प्रकारे पूजौये ध्यानधरी जगदीसोरे ए० ॥१०॥ पञ्चायत पूजाकर नवमै दिन मनरङ्गोरे। पच श्रांविल गुरुमुपै पांमै सुष्य अभंगोरे ए० ॥ ११॥ ढाल कही उगणौसमी सिद्धचक्र अधि- कारोरे। मयणा सुष लहिस्यै हिवै कहै जिन हर्ष अपारोरे ए० ॥ १२ ॥ दूहा॥ नवोली आंबिलकीयां पूरो ए तप होइ। ऊजमणु उचित करै पांमै नवनिधि सोइ ॥ १॥ मयणा क है करजोडिनै भगवन पूछतुझ। जजमणानी विधि कहौ ममझावीने मुझ ॥२॥ मुनि क है २५ सांभलि श्राविका एइनी विधिकै भूरि। नाममात्र तुझनै कह पामिस सुषभरपूरि ॥ ३॥ ढाल २० अाश्रव कारण एजगजांणीये एहनी ॥ तपऊजमणौ रे। मुनिवर दापवै भयणानै हित.

श्राणि । तपफल ऊजमणाथी पांमीयै पूरण तप सुप्रमाण त ॥१॥ आलि प्रमुख पञ्चवरण तणापणा ढोवे धान प्रधान । सिद्धचकनी तिहांकरै थांपना धारी निरमल ध्यान त॥२॥ अरिहन्तादिक नवपद अागलै ठावै श्रीफल गोल । गौरत उज्जल पंडमिश्रत करी जेथी होड रङ्गरोलित ॥३॥ अरिहन्त पद धवलो गोलो ठवै ककै तन अठरयण। चोलीस हीरा रेवली मांहे ठवै वंछित सम्पति लैण त० ॥४॥ सिद्ध पदै इकवीस प्रवालडा रातामाणिक अष्ट । रक्तचन्दन लेपति गोलिकधरै टलै उपद्रव कष्ट त० ॥ ५॥ पञ्चमणो गोमेद छत्रीसनो सूरि पदै ठवै गोल। पञ्चवीस ठावै पाठक पदै नीलरतननीरे श्रोल त° ॥ ६॥ रिष्ट रतन सगवौसे मनिपदै सतसठ एकावन्न । सित्तरिनै पञ्चास उलासखं मुगतासेस सुमन्त्र त ॥ ७॥ निज पाचक २६ ६ निज वरणरे वस्त्रादिक ठवै नवपदतणै समेलि। षाजा दो ठारे नुकतोलाडुबा माझी साकर भेलि त० ॥८॥ पारिक षुरमारे द्राष सोपारीयां निमजानै नालेर। इत्यादिक नव नव प्रा- गलि धरै षामै मोटिममेर त०॥६॥ देम ऊजमणौ रे मनरङ् करे श्रांणी भावविसाल। कहे जिन हर्ष लहै सिव सम्पदा एथई वौसमी ढाल त० ॥१०॥ दूहा ॥ दूण परिजे ए तप करै दुष्ट कुष्ट क्षय घास। रोग सोग दालिद्र दुष थाय सहनो नास ॥१॥ दोहा गिणि वंध्यापणौ विस कन्यादिक दोष। स्त्रीनै एथायै नही पुण्यतणौ होइ पोष ॥ २॥ सिंघ भणी गुरु उपढिस्यु ए नर लक्षणवन्त। जिन शासन दीपाविस्यै भगति करौ मनषन्ति ॥३॥ सातषेत्र जिनवर कह्या खाविक पुण्य पवित्र। सात संचवायै सही साहमी भगति विचित्र ॥ ४॥ इमनि सुणी सहको . २६ - की ऊंबर भगति अपार । रहिवा मन्दिर पापीया धणकण कञ्चन सार॥५॥ दूहा ॥ ढाल २१ सोभितरो सिरदार एहनो॥ हिवै उम्बर निज नारि वयण मनमांधरीहो लाल व० । सद गुरु हितउपदेश हीयामै अनुसरोहो लाल ही। सिद्ध चक्र पूजा सीषी गुरुसानिधे होलाल सी। जाणे बुद्धिप्रमाण सुजाण भलीविधै होलाल सु० ॥१॥ श्राव्यौ मासूमास महरत सुभ- दिने होलाल म। सिद्ध चक्रनो तम आरंभ्यो सुभमने होलाल प्रा०तिम मन वचन पवित्र करी जिन मन्दिरै होलाल क०। पूजा श्रीजिन राय-अपाय दूरैकर होलाल अ० ॥२॥ सिद्ध चक्रनी पूजकि प्राठि प्रकारनी होलाल कि०। मयणा- अम्बर दोइ करै विस्तारनी होलाल क। आबिल नोपच खाण करै मनउ मही होलाल क०। सुगुरु वचन प्रमाण हीयामै गह श्री. पा०३० २७ पज गही होलाल ही० ॥३॥ दिन दिन अोछो रोग हुवै इण जापथी होलाल हु०। तूटै करम कठोर विछूटै पापथी होलाल वि० । नवमै दिस विसेस न्हवण पञ्चायतै होलाल न्ह। सिद्ध चक्रनी रचे सुमन ससितै होलाल र० ॥४॥ स्नान करी मनरङ्ग न्हवण जल छाठीयौ हो लाल न्ह। रोग गयो ततकाल नीरोगी तन थयो होलाल नी। जांणे रतिपति रूप अनूप विराजीयो होलाल अ०। नवपद महिमा अधिक जगत मांगाजीयौ होलाल ज° ॥५॥ सिद्ध चक्रनै न्हवण अवर सह रोगीया होलाल अ०। कञ्चण वरणी देह थया नीरोगीया डोलाल २७ था। मयणा पतिनो रूप निहाली इम कहै होलाल नि०। गुरुनौ ए उपगार सुजस महीयल लहै होलाल सु० ॥ ६॥ ऊंबरदेव कुमार सरुमै आगलौ होलाल स०। सहुना टलीया रोग धरम थयो जजलो होलाल ध। फलीय मनोरथ माल कुमर मयणा तणी होलाल कु.। की रति वाधी लोक मझारि घणु घणी होलाल म० ॥ ७॥ महिमा श्रीजिन धर्म सुगुरुनौ निरषीयो होलाल सु०। देव धरम गुरु भक्ति उजमणौ तिमकीयो होलाल उ। जिन गृहथी इक दिव स नीसग्या दम्पती होलाल नी०। साम्ही प्रावि नारि श्रोलपी सुभमती होलाल मो० ॥८॥ पायें लागै ताम कुमरहर करी होलाल कु०। हीय. हेज अपार सजल अप्यिां भरी होलाल स०। मायडौ पुत्र वियोग संवेदन उपसमी होलाल सुं०। ढाल यई जिन हर्ष कहै इकवीसमी होलाल क० ॥ ६ ॥ दूहा॥ कुमर कहै सुण मातजी बहुदिवसे मिली याह। जमाहौ सफलौ वयो दुपदोहगटलीयाह ॥१॥ मयणा सासू जाणिनै पायपडी तिणवार। माता तुझ बहु - श्री.पा.च. २८ अरथकी नीरोग विचार ॥२॥ माय कहै बहुअर सहित जीव कोड़ि वरोस। अविचल जोड़ी तुम तणी इम दीधी आसीस ॥३॥ आलिंगन देई करौ पूछ कुसल सरीर। माता तुझ परसादथी थयौ श्रासस धीर॥४॥ इतला दिवस किहांता मात कहौ मुझ वात । जणणी कहै सुत आगलै पूरवला अवदात ॥ ५॥ ढाल २२ म्हारी लालपोथै रङ्गकोतरा एनी । तुझर्ने पूछी सुवहुंचली उज्जेणी थीको संबो पढ़तीरे। मुनिवर दौठौ एकदेहरै वादी मनमांगह गहतीर तु० ॥ २॥ मै दाप्य मुनिवरनै एहवू इण नगरी वैद्यनो वासोरे। श्रावी पुत्र रोग पड़ो गणौ पूछवातहनो पासौरे तु० ॥२॥ भगवन कहौ पुत्र कहीयै हुस्यै निरावाध मुनि २८ तब भाषेरे। तुझ सुत कोढी टोले भिल्यौ निजनाथ करीनै राषैरे तु० ॥ ३॥ उम्बर राणा नाम कयौ परण्यौ मालवपति बेटीर। मयणा सुंदर नामै भली सीलवन्ती गुणपेटौरे तु० ॥ ४॥ सद गुरु वचने दम्पती भाव सिद्ध चक्र आराधेर। कञ्चण वरणी काया थई 'निजधर्म भली परि- पालैरे तु ॥५॥' उज्जैणी मै सुषसं रहै इमथई सुणि हर्ष सनाथीरे। इहा भावी मिलि वामणी तुझने दौठो बहु साथोरे तु० ॥ ६॥ सासू बहूपुत्र सुषै रहै करता जिन धर्म उमैदेरे । इकदिन जिनवर पूजाकरी अंग अग्रभली बिहु भेदैरे तु० ॥ ७॥ एहवै अवसर हिवै सांभलौ मयणा सुन्दरीनी मातार। राणी रूप सुन्दरी गुणभरी नृपसं रीसावी जातार तु० ॥८॥ जई बैठी निज भाई घरे पुन्यपाल कृपाल कहावरे। दुष सोक घणौ मनमां करे मयणा विणिपिण न सुहावरे तु० ॥६॥ कित लेके दिवसे दुषतजी जिन धर्म करै मनरंगैरे। श्रावौ जिनवर - श्रो पाच० दरसण भणी तब दे कुमर सुरंगेरे तु० ॥१०॥ एतो अमर कुमर रूपै भलौ फिर फिर सामो जोवरे। जोतार तिणि ओलषी एतौ यमणा पुत्री होवैरे तु०॥ ११॥ पुत्री पास कोई ए नवो २६ राणी मनमांभरमांणीरे। जिन हर्ष कहै मह आगल बावीसम ढाल वषाणीरे तु० ॥१२॥ दूहा॥ कोढ़ीपति छोड़ी करि अवर पुरुषसुप्रीति । तजि आचार सती तणौ कीधो इणि विवरोति ॥१॥ एहवी एहन जांणीयै मयणा जिन मत जांणि । रजनीकरवा किमघट दिवस करैजे भांण ॥२॥ अथवा वलीयो कर्मकै करमै दुरमति होइ। सूड़ा भूड़ास्यूं कर पहुचे २६ जोर न कोई ॥३॥ कुल निकलंक कलंकोयौ जिन सासन दूषाय। पुती मई दुष नही पिण दुष सह्यौ न जाई ॥४॥ माता इणिपरि दुष करै मैणाकडे वैसि । कांपै पुत्री कृत अधम हियडां .

॥ मांहि पैसि ॥५॥ ढाल २३ ईढोणी चोरीरे एहनी॥ मयणानि सुणी बोलडा मामौरीरे। संका प्रावी मनमांहि सुताई तोरी। चैत्यवन्दन पूजो करी मामोरीरे । वंद्या जिनवर उछाहि सुताई तोरोरे॥२॥ करवन्दन मायनै करी मामोरौरे। साभलि माहरा अवटात सुताई तोरीर। तुम्हनै दुष करवो नही मामोरौरे। एहवी किमकरीयै वात सुताई तोरौरे ॥२॥ साम्हो हरप वधारीय मामोरीरे। पुत्रीवर देपि सरीर सुताहु तोरीरे। रोग गयो जिन धर्मयी मामोरे। मकरो मन दिलगीर सुताहु तोरौरे ॥३॥ मायायै नहीकदे मामोरोरे। तुझ पुचौथो निरधार सुताई तोरीरे। पूरब तजि पश्चिम दिस मामोरीरे। किमऊगै कहौ दिन- कार सुताई तोरीरे ॥४॥ अजौलगै छोडै नहो मामोरीरे। सायर अपणी मरजाद सुताई ।

श्रीपा०३० तोरी। हरष विनोद हीय धरो मामोरौरे। परहरि मन विषवाद सुताई तोरौरे ॥५॥ एहवै कुमरनी मायड़ी मामोरौर। बोली मुष मीठी वांणि सुताई तोरौरे। मुझ सुत नोरोगी ३० कीयो मामोरीरे । उत्तम गुणिनी षांणि सुताहु तोरीरे ॥६॥ धन धनताहरी कषड़ी मामोरीरे। उपनी मयणा जिहां प्राय सुताई तोरीरे। सीले सीता सारिषी मामोरीरे। इणमै घोडिन काय सुताई तोरीरे ॥ ७॥ तुम सतबाई जगतमां मामोरीर। निरमल पांम्यौ जसवास सुताहु तोरौरे। सन्तितजेहन एहवी मामोरौर। जनम जीवित धनतास सुताई तोरीरे ॥८॥ ३० मिलीवे वाहिणि बेतिहां मामोरीरे। रूप सुन्दरि मिटयौ सन्देह सुताई तोरीरे। धन धन मयणा सुन्दरी मामोरीरे। जिण पाल्यौ सील निरीह सुताई तारीरे॥६॥ निरमल कुलदीप वीयो मामोरौरे। धरम उतार्यो बाल सुताई तोरीरे। कहै जिन हर्ष पूरी थई मामोरौरे । एवेवीसमो ढाल सुताई तोगरे॥ १० ॥ दूहा ॥ रुप सुन्दर मयणा प्रतै पूछे धरीय सनेह तुझ पति नीरोगी घयो ते मुझ संभला वेह ॥१॥ सावद्य देहरै वोलतां थायै निसही भंग। मुझ पर नई कहिसं सही चालो धरमन रंग ॥२॥ मन्दिर श्रावी अापणे कही सगली वात । सिद्धचक्र आविल तणौ ए महिमा विष्यात ॥३॥ कुमर तणो माता प्रतै पूछ भयणा माय । वंसादिक तुन्ह पुत्ननौ बाई मुझ सुणाय ॥ ४॥ ढाल २४ के कई वर लाधो एहनौ। हिवै कहै कुमरनी मायडी अंगदस सुरंग विष्यात रे वैवाहिणि तुम्हें सुणौ। नगरी चम्पा तिहां अति भली नरि नारी सुपौ दिन राति रे वेवा ॥१॥ सिंहरथ राजा तिहां राजीयो मरजा पालै जी .पा.च ३१ सुतजेम। कमलप्रभा पटरागिणी कुंकण नृप वहिनी प्रेम रे वे ॥२॥ वह देवी देव पारा धतां सुत जायौ रूपै कामरे वे। तृप लिषिमी लीलापामिस्री श्रीपाल दीयौ तस नांगरे दे ॥३॥ सुतं दोइ वरसनौ ते थयो राजा सूलै पीडा रे वे०। तिण गेगै टत्यु लह्यौ सहो हाहा रव नगरी थाइरे वे ॥४॥ मतिसागर मन्त्री बुद्धि निलौ से सब वय अापै राजरे बे०। श्री- पाल भपालनी आगन्या मन्त्रीस चलावै काजरे वे ॥५॥ राजकारताके ईक दिन बया काको श्रीपालनो तासरे वै। अजितसेन नांझे अछ राज्य लेवानौ थयौ कामरे वे ॥६॥ द्वेष धरै मन्त्री रायसु सामन्त साधे करै भेदरे वे। दोइ जणनै हणिवा कारणे करै मन्त्रणौ परिवा छेदर वे॥७॥ मन्त्री जांणी ते वातड़ी संभलावी मुझनै ते हरे वे। मन्त्रोखर कहै राणी ३१ सुणौ जतने रापो सुत ए हरे वे ॥८॥ जीवस्यै तौ राजहुस्सै वली सुत एकज एदही दूधरे वे। तिण कारणि ए लेई करी जात्रौ तुम्हे अास्थाल धरे वे ॥ ६॥ केडैथी अम्हे पिण जाह युनाठां विण कुसल न होइरे । मन्त्रौना वयण सुणी इसा नाठाहु नै सुत दोहरे वे ॥ १०॥ एकलडी ऊं रातै चलौ छानी न विजाणी के.मरे वे। नन्दन कडीए पन्थ चलिवु कांटा भागै पाएणरे वे० ॥११॥ धरती ऊंचो नीचो घणु अथडा तन सुकमालरे वे। दुप एक हतो पति मरणनो राज्यपृष्ट धया सुत बालरे वे ॥१२॥ वयरी नौ भय मनमै घणो दूम चलता रात विहायरे वे। एतलै थई ढाल चौवोसमी जिन हर्ष कड़ी चित लाहुरे वैवाहिणि तुम्ह सुणौ ॥१३॥ टूहा॥ दुप भर इण परिचालता नीठ थयौ परभात। कोढी नो टोलो श्री पाचसबल भागलि एक दिषात ॥ १॥ कमला ते देषी करी मनमां थई भयबांति। कड़ोए बालक एकलौ न लहै चितने रांति । २॥ गेवै जोवै दहदिसै कोढ़ी करुणावन्त । टुपणी देपो मुझ भणी पूछ सह इतन्त ॥३॥ ए बन्धव सह ताहरा तुं अम्ह वहिन सरीप। पछो वात कही सह अापी रूड़ी सीप ॥४॥ ढालमांनांदरजणरी ॥ २५॥ देई इम आसासनारे निरभव कीधी जांम। वरवे सरिबैसारिनै अोढाड़ी अम्बर तांझरे। सांभलिज्यौ आगै वातरे जिस मीठी লাল ॥१॥ भागैरे भागैरे मनना दुष दोहग भागै अांकणी दूग्ण अवसर के डै घकोरे । अरि असवार रोस भऱ्या अाउ धधरया मुष बोलता मार माररे। सांभलि० ॥ २॥ पड़ाने श्रावी कहेरे तुम्ह दीठी इकनारि। पासै सुंदर दी करौ रूपै रतिपति अवताररे। सांमलि. श्राव्या ३२ ॥३॥ पेडौ कहे तुम्हे साभलौ रे अम्ह पासैछ पाम । ते तुम्हनै आपु अम्हे आवै जो कोई कामरे। सामनि० ॥ ४॥ सुभटे जाण्यु रोगीयारे काई नदीसै पासि। इहांजभांजुगतौ नही रोग भय दूरैगया नासिरे। साभलि०॥ ५॥ उम्बर रोगे पीडीयो रे अङ्ग थयौ विदरग । पुत्र पडी गणौ पूछती हु गई कोसंबी ट्रगरे। सामलि ॥ ६॥ तिहां जाईने लोकनै रे पूछ्यौ वेद्य नौ गेह । लोकमुपै मै साभल्यौ तीरथ भणी पडतो ते हरे । सांभलि०॥७॥ हुरही तिहां वासर घणारे जोती वैद्यनो वाट। साधु थकी सुधलही सई मननो मिटीयो ऊचाटरे। सांभ. ॥८॥ हुगावी इहा पूछतीरे अङ्गज मिलिवा काज। हुकमला एमाहरो सुत जाणज्यो सिरताजर। सामलि०॥६॥ कमलाने वचने करीरे राणी थई निसंक। पुत्री गुणवन्ती सती श्री.पा.च० एहनै किम लागे कलङ्करे। सांभलि० ॥ १०॥ निरषि जमाईसांमुहोरे पति न पांमै लेस । मुझ पुत्रौनो जोईज्यौ फलीयो काई भाग्य विसेसरे। सांभलि० ॥ ११॥ रूप सुन्दरि सुष पांमी योरे जलसीथा सम्ह अङ्ग। ढाल थई पचवीसमो जिन हर्ष थथा उछरङ्गरे। सांभलिज्यौ आगे बातरे जिम मीठी लागै॥१२॥ दूहा॥ पुन्यपालन सह कह्यौ रूपसुन्दरी जई गेह। मांमै तेड़ी निज घरे प्राण्याघणै सनेह ॥ १॥ सुन्दर मिन्दर अापीया अापी धननी कोड़ि। पञ्च विषय सुख भोगवै बेजण प्रेम सजोड़ि ॥२॥ इक दिन राजा नीसरयौ पास कुमर आवास । ३३ दीठी मयणा कुमरसुं करती विवध विलास ॥३॥ मयणा कोइ बीजौ करौ सुंदरि पुरुष सरूप । कोढ़ी परिहरियो परौ इम मन चिन्तै भूप ॥ ४॥ पहिली क्रोध वसेण मै काम अजुग -- तो की। पीजो मयणा मयणवि लंछण मुझ कुलदोध ॥ ५॥ ढाल २६ पौछो नारी पाल शामा टोर मोगेयाहांग लाल एहनी ॥ पुन्यपाल ततकाल जणाबै रायनै म्हारा लाल जा माणे जीनी वात सह समझायनै म्हारा लाल स०। आव्यो नृप आवास कुमरने जमही म्हारा गाल कः। प्रणमै मयणा कुमरि चरण मन गह गही म्हारा लाल च० ॥१॥ लज्जावन्त निरन्द करवाई तो म्हारा लाल क०। मै तुझनै मतिहीण दीयौछ दुषघणौ म्हारा लाल दी। मुझ अविनय अपराध असाथ वीसारजे म्हारा लाल अ०। उत्तम गुण गुणवन्त हीयामै धारिज म्हारा लाल ही० ॥२॥ मयणा विनय वहंत मधुर वयणे कहै म्हारा लाल म०। दोसनको तुम्ह तात करम फल मह लहै म्हारा लाल क० ।, सुष दुष करम संयोग सह आवो मिलै म्हारा० स।

- सोपा च० ३४ करम महा बलवन्त न ठाल्यौ ही ढलै म्हा० न० ॥३॥ इसजााणी तुम्हे तात जिणे सरधर्मसु व्हां जि०। नवतत्व राचौ नाय गराचौ अर्म सो व्हां० अ०। इसनि लुणी नरनाथ धरम अङ्गी- कग्यौ म्हां ध०। अपकार उपकार सुतात याचरो हा० सु०। वालौने वलि विनय वहै गुण संग्रह म्ह० ३० । धर्मपमा जेह जगत जसलहै म्हां० ज०। कुमरी सम नोपाल जमाई निर- पीयौ व्हा० ज०। ऊलट अंगनमाइ हीया हरषीयौ म्हारा लाल ही० ॥५॥ कीधो वांको राय जालौ थयौ पाधरौ म्हा० क०। मूगमांहे जाणे धौय टुल्यौ थयौ एघरौ म्हां० टु०। पुत्रीए धनवन्त फल्यौ पुन्य एहनै म्हां० १० । श्रीजिन धर्म पसाय थया तुघ जेहनै हो लाल म्हांल्य० ॥६॥ गजि जपरि आरोपि जमाई पुत्रिका व्हा० ज०। लेई गयौ निज गेह करी अाराविका म्हा ३४ क०। गोरी गावै गोत नगारा वानीया म्हा० न०। आडम्बर उछाह गुणीगण गाजीया म्हा. गु०॥७॥ घणकण कञ्चण माल महल मापीया म्हा० म०। सारी नगरी लाहि सुजस धिर वापीया म्हा० सु०। कुमर चब्यौरे वाडी रमिवा किणि समै म्हा० २०। देषै लोक अपार सहुनै मनगमै म्हा० स० ॥८॥ पूछ माहो माहि कुमरि ऐ कुण अछै म्हा० कु०। एक कहै नृप धूय धौ बीजो नछ म्हा० ध० । वचन मुण्यो श्रीपाल विछाय धयो घणु म्हा०वि० । छावीसभी जिन हर्प ढाल इण परि भणु म्हा० ॥ ६॥ ढाल सर्व गाथा ४३६॥ दूहा ॥ रयवाडी नई भावीयो पिण मनमै दिलगीर। जननी पूछ अाज तुं एहवो किमतु वीर ॥ १॥ चिन्ता मनमाहे किसी पुत्र कहो मुझ तेह। चिन्ता कारण मायनै कुमर कहै ससनेह ॥२॥ माहरे गुणेन अोल श्री०पाच ३६ जे । कौधरै पर० ॥११॥ आदर करि तेडी गयौ विद्याधर निज गेहरे। सोवन सिद्ध रसकुंपिका कुमर सहाज्य करे हरे पर० ॥१२॥ गुण सांभलि जलतारिणी एक जडीकै ए हरे। बीजी शस्त्र निवारणौ महिमा तास कहेहरे पर० ॥१३॥ ढाल कही सत्तावीसमी वयता वरनर हरे। कहै जिन हर्ष जिहां तिहां सषोयो थायै ते हरे पर ॥ १४ ॥ सर्वगाथा ४५५ ॥ दूहा ॥ कुमर भणी कतधन कीयौ चाल्यौ सीष करेह । भरुअछ नयरै आवीयौ सुषसं तिहां रहेह ॥१॥ इण अवसर हिवै तिण नंगर धवलसेठ धनवन्त। पूरै प्रवहण पांचसै परो धरी मनपन्ति ॥२॥ सुभट सहसदस राषीया चौकी पौहरा काज। नृप अादेस लेई करी सुभमहुरत दिन साज ॥३॥ बलवा कुल देई करी वाहण पर जांम। ठामथकीनविचातरै धवल चिन्तातुरतांम ॥४॥ ३६ * ।

दाल २८ चरण करण धर मुनिवर वन्दीय एहनी॥ सेठे जई पूछौसीकोतरी ते कहै नर चलतो नो । पल श्राप तौ उफवाहण चले बत्ती सलक्षण गुणबंतो जी से ॥१॥ सांभलि सेठ पुमी मनमा थयौ वीनवीयो नई रायो जी। खामो एक पुरुष सझा दौजीयै बलि काजे सुष थायो नी से ॥२॥ राय कहे जे परदेसी हुवै नर एकलडौ अनाथो जी। ते लेजे गारीदै आगन्या अवरमला एही थायो जी० ॥३॥ सुभट धवलना फिरता जोवता दीठो तिक्षा श्रीपालो जी। जाण्यं नरए परदेसी सही लक्षण अंग विसालो जी से०॥४॥ तुभट कहे साभल परदेसीया जाव्यो तारो कालो जो। धवल सेठ हणिस्वैवल कारणे हठौ जिम विकरालो जौ से ॥५॥ मुझे वनपालीसोपो कहै सुमठ तुणेज्यो वातो जी। धवलतणो वलद्यौ चामडने तेहनै करीये श्रीपा०० घातो जौ से० ॥ ६॥ सौहतणी बलकदे न सांधली सीपो विस बल दीजै । धधमाया राई थयौ रातडौ तुज रपरापरपीजै रे से ॥ ७॥ अविचार वो बोलोको एज लाहिन्योलकता कालो जो। अावी तुझटे कुलरनै वीटीयो जदमातामहरालो जीप ॥८॥ धन का को घंड कीजो एहने एहोगदंडोजी। वरसै तीर साखांउ अतिबगा तो भाप निहोत्री से० ॥ ६॥ नालगालागर गयणं गौ सोगर गुरज अमानो। बनने पोल इम बाहै हथीयारो जी से० ॥ १०॥ इण परि जुद्ध ययो अति आकरो धवल वान बोपालो जी कहै जिन हर्ष पूरी थई एतले अठावीसमी ढालो जी से ॥ २२ ॥ मर्वगाया 20 सा! सस्त्र न लागै कुमरनै जड़ीतणे परभाव । पिणि कुमर सड़ना कीया नीसाकेस 'गभार १५ ।

प्रांण हण्या नही कहना दयातणे भंडार। धवल विचार वित्तमां देपी सकति अपार ॥२॥ बल छोडो जोडी कमल धवल कहे ग्रहिपाय । खामी वाहण किम चलै ते कहौ कोई उपाय ॥२॥ कुमर चलावुहु कहै जोयेलाप दीनार। भारत मीठो अापणी सेठ भण्यौ हाकार ॥४॥ धवल सहित वाहण चदी नवपद जपि थई वाक । सोहतणी परगाजतौ सीपै मेल्ही हाक ॥ ५॥ ढाल २६ थेणिक मन अचिरिज थयौ एहनी ततषिण प्रवाह चालीया वाज्या भूगल भेरौ रे । ताल नगारा वाजोया महिमा थई अधिकैरो रे॥१॥ लापदौनार देई कहै तुम्हे पिण अोलग- सारो रे। वरसै स्यु लेस्यो तुम्हे कीजे तेह विचागे रे॥२॥ सुभट सहुल्यै जेटलौ तास जमल मुझ दीनै रे। विपमो करि स्य चाकरी माहरो मुजरो लीजै रे त० ॥३॥ सेठ कहैपप अम्हे ॥

श्री.पा.च. नथी वैठोभाडौ देई । भरीय दरोयै चालिया नमद् हरष धरैई रे त ॥ ४॥ रतन दीप भणी म कौया पाया बब्बर कलै रे। जलई धण लेवा भणी ऊतरीया तटमले रे त० ॥५॥ बब्बर राय मोकल्या दान लेवाने काजै रे। सेठगिणे नही तेहनै सुहड़तणे वलगाज रे॥६॥ बब्बर पतिनै वीनव्यौ आवौलागति मांगैरे। सेठ सुरीलेद्यै नहो क्रोधा गनि तबजागै रे त० ॥ ७॥ बब्बर पति सुहड़ा भणी हलकाऱ्या जुधमंद्यो रे। सेठ सुहड़नासो गया कायर थया बलछंद्यौ रे त०॥८॥ बबरपतिनी जय थई धवल सेठ बंधाणौ रे। कुमर कहै सहताहरा किहां गया कुलगाणा रे त० ॥ ६॥ इं छोड़ाकू उफभणी तो मुझनै स्यु आपैरे। अरधमाल वाहणतणौ हाथो हाथै थाप रे त ॥१०॥ बोल बंध लेई करौ विचि परमेसर दीधो रे। ढाल थई गुण

तीसमी कहै जिन हर्ष म कौधो रे त० ॥११॥ सर्वगाथा ४८६।
दूहा
तव धणु तूण
धरी करी केडैधस्यौ कुमार। बोलाव्यौ महाकालने जादूस किहां गिमार ॥१॥ कायरजी
पीगरजीयौ पिण माहरो बलजोड्। नासिम जाइ सिरा कज्यु जोऊ क्षत्री होइ ॥२॥ वयण
सुणी पावो वल्यौ मनमा नाण्यौ बीह। वापुकाऱ्या किम रहै साहसीक नरसोह ॥३॥ को
वयण इम कुमरनै रेरे भोलावाल । मुझसौ जो कांकल करिस पामिस मरण अकाल ॥ ४॥ काद
मरैरे वाल्या परकज्जै वेकाम । कुमर कहै मांटी अछै तौ करि मुझ सु संग्राम ॥ ५॥ ढाल ३०
चल्योरिण भूभवाचंड प्रद्योत नृप ॥ श्रावीयो ताम करि जोरि बलफोरतौ बव्वराधीस मन-
रीस आणी। सुभट थटविकट साथे करी आपणा रोस चढीयो वदै असुभ वाणी प्रा० ॥१॥

श्रीपाच० आविरे मूढजो रूढ़ मेल्है नही आज मृगराज सूतौ जगायौ। धरण धूजावतो सामहो प्रावती छेह धरिलोह सुहडे उडायौ श्रा० ॥२॥ धरणि धड़धड़िय गड़गड़िय दमां मधुनि दहदिसे ३१ परवऱ्या सवलसूरा तुरंग भलयाषरथा सहस हाथे धा नाचता माचता रणसनूरा श्रा० ॥३॥ वांण वरसै घणा सुहड़ हाथा तणां गयण रविरयणि अंधार कीधो। भाटभड़उबली सबलपांडां तणी कुमर. जे प्रथमघाव दीधो ग्रा० ॥ ४॥ झूझतौ सयुट्ल सूड़करतौ प्रबल गाजतो गाज आवाज करतौ। केविकेवी हण्या सौस टूरै लुण्या अंग उछ रंग धरि जंग फिरती प्रा० ॥ ५ ॥ ३६ अधिक वाचाल मछराल श्रीपाल इम घावघमसांण हैराण कोधा। घावठामेमाहिर बिधारा पड़े अरितणा जीवकण काढ़ि लीधा था० ॥ ६॥ इम लयो प्राथयौ कुमर अरसैन्य स्युबवरा- घोस ततकाल वाध्यौ। बंदि करि आपणा साथ मै पाणीयो सामहो किण ही नवितौर सांध्यो गा ॥ ७॥ धवल छोडावीयो कुमर बंधण थको कोप करि षडग धारे राय केडै । मारि वासं- चरर्यो सेठ वार्यो कुमर ांधीयो मारता सुजसफे. श्रा०॥८॥ राय महाकालने अभय देई करी सहस दस धरलना सूहडसरा। मेहना ठाहुता कुजस भावीपता वृत्तिछेदी कीया सह हरा या ॥६॥ कुमर राप्या सह वृत्ति देई बहू' अाढीस पोतनो माल लोधौ। एतलैए थई वीसमी ढाल तिमकामजिन हरषए कुमर कौधौ श्रा० ॥१०॥ सर्वगाथा ५०१॥ दूहा ॥ बप्पर नृप आदर करी कहै कुमरनैएम । पावन मुझपुर कीजीय जिमवाधे मनप्रेम ॥१॥ कुमर सकल परिवारसं पहुतौ नगर मझोर। प्रेमप्रीति हितसं मिल्यो वाधी प्रीति अमार॥२॥ करजोडी भोपाच राजा कहै मुझा कन्या गुणवन्त । मदनसेना नाम निपुण परणौ साहसवन्त ॥३॥ परदेशोनविओं ल. न्याति पांति कुलसील। अणजाण्यौ परणावतां थास्यै तुम्ह चोहोल ॥ ४॥ नृप भाप अकारथी मै जांण्यौ कुलसुद्ध। ति परणाव न्दौकरी थायै केमविरुद्ध ॥ ५॥ ढाल ३१ ढाल मुषनै मन कलझे एहनी। परणी तिहां नृपकन्या जी सुषनै कारणे एतौ मदनसेना कत गुण्या जो तुष० । अणिमाणिक सोवन दोधाजी सुष। प्रीति राषण कुमरै लोधाजी सुष ॥ १॥ नाटकना नव नव वृन्दाजी सुष.। प्राण्या धरि अधिक प्राणन्दाजी सुप०। नृप साधि थई बोलावैजी सुष। हिवै प्रवहण जलनिधि चाल्याजी सुप० । कांई रतन दीप भणी माल्या जी सुष। वाहण जई दीम अतरौया जी सुष। सह लोक विन्दर सञ्जरीयागी सुप० ॥३॥ ।

भला डेग ताणि उतगाली सुप। तिहा कुमर रहै सुपसगाजो सप० । इणि अवसर एक नर अायोगी स०। अादर देई बोलायोजी सु०॥४॥ किहाथी आया किहां जास्यौ जी सु० । कोई दीठी अगलतमासो जी सु०। ते पुरप कहै तिण ठांमैजी सु०। नयरी नर सञ्जया नांमै जी सु० ॥ ५॥ विद्याधर छ तिहा राजाजी सु०। काई कनककेतु दिवाजाजी सु। कनक मान तसु गणीनी मु०। मयण मजपा कन्या जाणीनी सु० ॥ ६॥ सकल कला गुण ग्याताजी सु। ज्ञाणसै घ घडी विधाताजी सु०। तिहां ऋपभदेवनो देहरोजी सु० । जाणै भूमिरमणि सिर सेहगेगी मु० ॥ ७॥ विद्याधर राय सदाईजी सु०। पूजै निज मन तन लाईजी सु० । नपकन्या पुजघणावैजो सु०। सह देपीनै सपपावैजो सु० ॥८॥ इक दिन नप पूजा दीटोनी, ४१ श्रीपाच. सु०। राजानै लागै सीठोजी सु०। एसरिषो वर कोई जोऊं जो सु०। तेहनै ए कन्या दोऊ सु० ॥६॥ इक दिन जिन पूजी कुमरीजी सु०। गुंभारा थोनौसरी कुमरीजी सु। तत घिण बार जड़ाणाजो सु०। सहुलोक यया हैराणाजी सु० ॥ १०॥ कुमरी कहै अातम निन्दा जी सु०। धिग धिग हु पापरिण मन्दाजी सु। मुझमे कोई दूषण दीसैजी मु०। प्रासातन विसवा वीसैजी सु० ॥ ११ ॥ इम दुष करि कन्या रोबैजी सु०। नृप कुमरी सनमुप जोवैजो सु। राजा कहै सांभल बाईजो सु०। तुं चिन्ता मकरिसि काईजी सु० ॥ १२॥ इहां दूपण ४१ तुझ नविकोई जी सु०। 9 न तुझथो न विहोईजी मु०। एकत्रीसमो ढाल यई पूरीजी सु. जिन हर्ष कथाछ अधूरोजी सु ० ॥ १३ ॥ सर्वगाथा ५६६ ॥ दूहा ॥ राय कहै सांभलि सुता इहां दूपणछ मुझ। जिन गृहमा मनमै धरौ चिन्तावरनी तुझ॥१॥ सावद्य ए पासातना तेह तणा फल जाणि। वारजडाणा एसही ते तले थई सुरवाणि ॥२॥ दोसन कोई कुमरि यह नरवर दोसन को। निण कारण जिण हरजडिउ तंनि सुणौ सह कोई ॥३॥ जसुनर दिदै होहिस्यै जिण हम मुक्क दुवार। सोइ ज मयण मंसि एह होएसै भरतार ॥ ४॥ सिरि रिस हे सरयोलगणि हु चञ्चेसरि देवि। मासभिंतरित सुनरह प्राणसु निश्चयलेवि ॥५॥ रान लोक सह हरपिया आया सह कोई गेही दिन दिन अावी देहरै लोगराइ निरपे ॥ ६॥ ढाल ३१ मोरो मनमोह्यौ इण डूगरै एहनी ॥ अाज दिन मसनौछे हलो जो हिवै तुझ थकी बार रे। अपडे तो मिली देवनी वाणि साचो निग्धारि रे मा० ॥१॥ कुमर असवार थई तिहा गयो श्रीपालन साथि परिवार अपार रे। भावीया लोक नृपसुता हरष धर मनहमभारि रै श्रा० ॥२॥ श्रावता तुरत जिन गृहतणा उघड्या भाटकि किमाड़ रे। कुमर जिनराय ज हारीया भगति वह मांति ४२ दिषाडि र प्रा० ॥३॥ राइ मन लाइ देषी रह्यौ नृपसुता थई वसि प्रेम रे। देवि दाषित नर एसही एह अमूलिक हेम र प्रा० ॥४॥ राइ पछै कहौ निज वगै ठांमनै नाम कुण गांम रे। कुमर चिंते सुष ग्रांपणे किम कहुं वात निज नाम रे श्रा० ॥५॥ चैत्यजु हारिवा भावीयौ तेतले चारण साध रे। देव जुहारि बैठौ तिहां मुनिवर चित्तसमाधि रे प्रा० ॥ ६॥ धरम देसण नृप सांभली नवपद नौ अधिकार रे। एहथी वंछित पांमीय जेम थीपाल कुमार रे पा॥७॥ कवण श्रीपाल नरवर कहै एह बैठौ तुम्ह पास रे । चरित्र सहु पछीया कुमरना मुनि कह्या ४२ धरिय उलास रे आ॥८॥ राय कन्यावर एहुवै लेख निज बापनौ राज रे। देवतणी गति पामिस्यै वली लहिस्यै सिवराज रे पा० ॥८॥ दम कही मुनिवर पांगर्यो नृपसता कुमरने दीध २। पाणिगृहण करी तिहा रहै सड भनवंछित सीध रे प्रा० ॥१॥ इक दिन कुमर राना विन्हे जिनवर भगति उदार रे। रंग मै भंग श्राव्यौ तिहां तेतले नगर तलार रे पा० ॥ ११ ॥ ते कहै खामि अवधारीय वणिक इक कपट नौ गेहरे। आण भांगी प्रभुताहरी दाण चोरी पद्यौ तेह रे बा० ॥ १२ ॥ तेहनै दंड स्युं अापौयै राय कहे हरौ प्राण रे । एतलै ढाल वनीसमी थई शिन हर्ष प्रमाण रे आ० ॥ १३ ॥ सर्वगाथा ५३७. दूहा। कुमर कहै किम दौजीय जिन मंदिर प्रादेस। प्राणहरगा पातिक वरण कुगतिहरण सुविसस ॥१॥ बंधन छोडा श्रीपा.च. ३४ वीकरी तेडाव्यौ नृपपासि । धवल सेठ साच्यातए ऐऐ लोनप्रकाश ॥२॥ छोड़ा व्यौ तिहां सेठन कीधो तसु उपगार। पुन्यपसायै भोगवै दिन दिन सुपश्रीकार ॥३॥ कुमर चलाऊ हिव थयौ राय जणावौ बात। बैठी कुमर चखावीया प्रवहण सभी विष्यात ॥ ४॥ मणि माणिक मोती घणा प्राप्यौ माल अपार । राय बोलावी कुमरनै बरि अाव्यौ सुविचार ॥ ५ ॥ ढाल ३३ कंत तमाकू परिहरौ एहनी । कुमर सेठ एक वाहणे बीजा बौजे पोत । मोरा लाल वे रमणी जाणे पदमणी हुयर हीयौ उद्योत मो० ॥१॥ कु. धवल अधम देवी करी चिंते चित्त मझार मो०। ए रिद्धि ए नारी लहो अपरनै अाकार लो॥२॥ कु. विरह वियोगै कलौ अंतर व्याप्यौ दुष मो० । नयणी नाबो नींदड़ी भागी लिसनै भूष मो० ॥ ३॥ कु० च्यारि मित्र तेड़ी कई ६३ देयौ एहनी रिद्धि मो०। ए सुंदर दोइ सुंदरी इण पांमी नवनिद्धि मो० ॥४॥ कु० गुपत वात तुम रापि ज्यो किणहि मकहि स्यौ गूझ मो०। एहनै नापी जलधि मै एनारी द्यौ मूझ मो० ॥५॥ कु० त्रिण जण सेठ भणो कहै एस्य बोल्या बोल मो०। परउपगारी एहना गुणनो नही कोई मोल मो० ॥६॥ कुछ वाहण चलाव्या ताहरा कोधो तुमा उपगार मो०। विद्या वर महाकाल थी छोडाव्यौ तिण वार मो० ॥ ७॥ कु० ते गुण तुझनै वोसऱ्या इणि ऊपरि धरयो द्रोह मो० । दुरजन तुझ सरिषो न को मिलनौ नाण्यौ मोह मो० ॥८॥ कु० यतः। मैलावांका चालता विपमय भीषण देह । पौरपावं ता पिण डसै सही दुजीहा तेह ॥१॥ मुह कडूया अतिनीरसा छाडै पूरव नेह। मलिन सभाव धरै सदा पल जाणीजै तेह ॥२॥ सविसडसै विरसा मसै

श्रीपाच०
४४
फिरता सधै देह। अवसर ताकै अापणौ खान समाखल तेह ॥३॥ धीठा पिण मीठा मुषै
परिणामै दुषहेत। महुरा परित छाडीयै दुषरंजन दोष समेत ॥ ४॥ ढाल ।
कनघन तुं
महापातकी तुझने पड़ौधिकार मो०। इम कहि त्रिण ऊठी गया एक रह्यौ तिण वार मो० ॥६॥
कु० ते कहै स्वामी सुणौ एहसु केही वात मो०। गुण अवगुण न विजाणीयै कलीयै नही जसु
धात मो० ॥ १०॥ कुछ हं सोषो छ ताहरो अवरन सोषी को भो। काम करि सई ताहरो
जेछे मुझ थी होइ मो० ॥ ११॥ कु. भाग्य तुमारौ सेठजी बुद्धि हमाहरो जांणि मो। थास्य
ढाल तेवौसमी कहै जिन हरष कल्याण मो० ॥ १२॥ कु०
सर्वगाथा ५५५। दूहा॥
धवल
कहै धीरज धरौ तुं मुझ वाल्हौ मित्र । तुझ थी सहु सार इस्य ताहरो बुद्धि विचित्र ॥ १ ॥

तेह कुवुद्धी दम कहै धवल भणी तिणि वार। करि ज्यौ प्रीत विसेष थी सोपा साथ विचार ॥२॥ मोठे वयणे रिझवी उपजावै विसवास। जिम तिम दुसमण मारीयै थई तेहना दास ॥३॥ कपट प्रीति कीने प्रथम दोनै निज विसवास। अवसर पामी शत्रुनौ ततषिण कीजै नास ॥४॥ बुद्धि मोपवी धवल नै तिण पांभो मतिहीण । रलीयायत धवलौ थयौ जाण्यौ एह प्रवीण ॥५॥ ढाल मारूरागै जीरावल पुरुसामीस लहीये एहनी॥ धवल कहै हिव केलि अहोनिसि कुमर सुं रे। मन मै कपट धरंत हसतो रेरे रमतो वयण इसा कहै रे ॥१॥ तुझ मुष देपी माहरी श्रोपडीया ठरे। हीयडो हरष भराय वाल्हा रेरे तुभा विण माह किम सरैरे॥२॥ तुझ सु लागी प्रीति अधिक मन माहरैरे। विणदीठां न सुहाइ माहरु रे माहरु मनडुवस थयु श्रीपा०स० ताहरैरे ॥३॥ भद्रक कुमर परो करि जाण्यौ तेहनै रे। भेला रहे निसदौस कारज र कारज पायै जेहसं जेहन रे ॥ ४॥ निसि भरि सेठ कहै भाई सुणि माहरै रे। प्रावि दिपालुं प्याल ४५ जल मारेर जलमांणस जाइतिऱ्या रे॥५॥ सरल सभावी अाव्यौ तुरत कुमर तिहां रे। मेठ कहै इणि डोर चढिनैरे२ जोवो अावीनै इहां रे ॥६॥ जोवन्ता पापी कापी ते दोरड़ी रे । जलधि पद्यौ श्रीपाल पड़तां रे रे नवपद जपीया तिण घड़ो रे ॥ ७॥ मगर मच्छ प? ते ध्यान थीरे। जल तारणी परमाण जलनारे२ सङ्कट न इवे तेहथीरे ॥८॥ पालि देपै जागैतबै रे। विनय करी कहै तेह अमरनैरै२ वसुपाल नृप मक्या अरै ॥ ६ ॥ तुरी पलांणौ चावक हाथे संग्रहौ रे। चढि चाल्यौ श्रीपाल वसुपालर२ राजा अाव्यो सांमुहौ रे ॥ ११ ॥ सुभट घणा ४५ ग्रासण वैसणटेई कुमर भणी कडैरे । अम्ह पर जोसी एक तेहनैरे२ पूछ्यौ कन्या कुण लहैरे॥१२॥ मदनमञ्जरी टी मुझने वालही रे' ए सरियौ वर जोद तौ मुझरती मुझ मन धास्या पूगै सत्तीरे ॥१३॥ ढाल थई एतनै पूरी चोवीसमीरे। कहै जिन हरष निहाल चिन्तारे२ कुमर तणी सगन्दी गमीरे ॥ १४॥ सर्वगाथा ५७४ ॥ दूहा ॥ सुदि दसमो वैसापनी पहुर पाहिले जोड। सायरतटि चंपातले सूतो ते वर होइ ॥ १॥ वयण मिल्यौ जोसीतणौ परणौ कन्या एह। लगन देई वसुपाल नृप परणाव्यौस सनेह ॥२॥ राय कहै कोई काजल्यौ रापौ माह रो मान। घई या यत कामो लोयौ राय अपावै पनि ॥३॥ धवल कुभरनै नापिनै मायामाडी भूरि। रो पीटै सडसडै मनमा वाधौ नूर ॥४॥ सीपा नारि भणी कह्यौ तुम्ह पति थयौ श्रीपा०च० जलपात । जो नरहीं जगदीससु पिण मित्र विना न सुहात ॥ ५॥ ढाल ३५ यत्तिनी राग सोरठ॥ प्रीजर करि मयणा रोवै ४६ मृगी परिजोवै। सांमलि प्रीतम गुण वन्ता अमची जूथवष्ट कुण करिसौ चिन्ता ॥१॥ अधिविचि छोड़ी गयौ अम्हनै करुणा नांवी कां तुम्हनै। अम्हे अबलानै एकलड़ी परमेसर अम्हनै वीछड़वी ॥२॥ दृहा॥ विनड़ी देवै अम्ह भणी छोड़ी प्रिउ निरधार। दुष सायर मांहे पड़ी किम पांमु हिवै पार ॥ ३॥ चालि ॥ यामु किण पर दुष पार प्रीतम पापै करतार। चोड़ी गयो नाहनवीनो हाहा गयो नाहनवीनो ॥ ४॥ हीय 88 डाना दुष किण आगै कहीथै कोई दुष न भागे। मनमोहन नाह मिलावै मुह मांगौ वधाई पावै ॥५॥ दूहा ॥ पावै अबला टुष घणौ बारहे सर करि सारि। किण सारमेली गया एक लडी निरधार ॥ ६॥ चालि ॥ निग्धार कहौ किम कोजै प्रीतम विग्ण केमरहीजै। दरीयौ लागै दुपदाई ऊटयागत अधम कमाई॥७॥ परभव केई पातक कोधा परतिष तेहना फल नीधा। निरदोस पराई नाई छोडता महिरन पाई॥८॥ दूहो ॥ महिरन अावी प्रीतमा हे जनही मनमाहि। जो मनमा एहवु हतुं तौ चउरी चढीयौ काइ ॥६॥ चालि ॥ चवरी अमची तुं चढीयौ टक्षणकर करसं पकडीयो। ते बोलदीयो वौसारी परणी छोडी निरधारी ॥ १० ॥ वाट जोस्यै कमला माइडी श्राव्या छौविचमै छाडी अम्हनै इहा आणी नांपी भूरै पंप विणि जिम पंपी ॥ ११॥ दूहा॥ पंपो जिम विण पंषडौ फोरी न सके प्राण । प्रीतम टरीया मै पड्यौ कीजै किसौ विनाण ॥ १२॥ चालि ॥ हिवनाण विनांण न सूझ छाती धड हड़ इम धूजै। दादुर गुण जांगण श्रीपाच. ४७ थी पाणी सरजाज सु प्रांण ॥१३॥ पौहर तौ पर गट रहीया प्रीतम विरहा गनि दहीया। प्रमदा इणि परिविलवन्ती दुष गई गति गलन्ती॥ १४ ॥ दूहा ॥ राति गलन्ती तिमरड़ी पाहण फट्टै जेह। पिणि होयडौ फाटो नही थयौ कठिन विरहेण ॥१५॥ चालि ॥ प्रिय विरहवियोगै पीड़ी वलिसेठ कुद्रिष्टै भीड़ी। पांमै नही किमही थाग निज प्रौतमसुं बहुराग ॥१६॥ सतीयां निज सौल सपाई तेहनै तौ चिन्तन काई । जिन हरषदेव वरदाई पानीसमी ढाल सुहाई ॥ १७॥ सर्वगाथा ५६६ ॥ दूहा ॥ इम विल- ४७ वन्ती सुन्दरी रोवन्ती नर हाइ। धवल अधरमी तिण समै भासै पासै अाय ॥ १॥ सुन्दर तुम्हे सौभलौ मकरौ मनमै घेद। हु तुम्हनै सारी परैरापिसिघणे उमेद ॥ २॥ विधि विल- हो मित अहिलो नही नही के हनो जोर। पिण मुझ वयण मलोपि सो तुमने कम निहोर ॥३॥ यमग्ण सुगी मयणा चिन्हे जाण्यं एहना काम। सायर मा प्रिउ नापीयो रही अबोली ताम ॥ ४॥ ढाल ३६ वाण गिा वाउली रे जसोटा फौजा पाछी वालि एहनी॥ इण अवसर गयणंगणे रे मिलोयौ घनघोर अंधार देवि चक्के सरौरे। मयणानो वाहिरि अाइजी धाई वाहर आई धारनै नागीनही काईवार दे॥ पवनचिहं दिसि उपझ्या सायर कलोल अपार दे ॥१॥ जल- निधिना जलकरल्यारे ऊधागाचच्या असमा न दे। वाहण लागोडोलिया जाणे चंचल पीपल पान दे ॥२॥ वीज झलामल झलहरे बीहावतोवाल गोपाल दे। घोर अंधार करिऊं नम्यौ जलधर वरसै असराल दे ॥३॥ लोलकल्लोल हिलोलतो वाजै दधिगाजै पूर दे। लोक सोक प्रोपाच० ४८ भय उपनौ कायरथयांसूरविनूर दे० ॥४॥ पांडाहत्थउ भैरवो करडमरूनै डाक दे०। तिण अवसर प्रगयौ तिहां आब्यौ मारतौ हाक दे॥ ५ ॥ मांणभद्र बीजो वली पूरणभटू कपिल सरौर दे। पिङ्गल चोथो दीषोयौ रे सिद्धचक्र नायरे वीर दे॥६॥ मोगर हाथे साहिया अन्याई करै चकचूर दे। सेवक श्रीजिन रायना प्रगट्य जाणे अंकूर दे० ॥ ७॥ कुमद अंजण वलीवामणौ पुष्पदन्त चौथौ सुरनाम दे। दण्डधरा अति आकरा पड़ीहार च्यारे अभिरांम दे॥८॥ हाथे चक्र भमाडती झलकन्त अत्यन्त उद्योत दे। वयण इसा मुप भाषती प्रग- ४८ टीच केसरिनी जोति दे ॥६॥ रे रे वीर एहनै ग्रहौ दुरबुध प्रथम इण दीध दे। ए पापी हणिवौ सही अनरथ जिण ए हवो कीध दे॥ १०॥ वौरे झाली बांधीयो अवलंब्यो कूवार्थभ mar दे। ऊधे मुप दुषीयौ कौयौ हणीयौ फल पाम्यौ दंभ दै० ॥११॥ भय चकित धवलौ भणे तुम सरणे मयणा माय दे। राषि राषि मारण थकी मै भाल्या ताहरा पाय दे० ॥१२॥ निज गुण सांम्हो जाइज्यो म्हाहरा अवगुण मनिहाल दे। उत्तम गुणकारी हुवै जिन हरप छलीसमी ढाल दे० ॥ १३ ॥ सर्वगाथा ६१३ ॥ दृहा॥ ताम चकेसरि इम भणै रे पापिष्ट अनिष्ट । मैं तुझ मु कयौ जोवतो भयणा सरणिपविष्ट ॥ १॥ दोहमणा करि जोडिनै भाषै विनय विसेण । सारकरी माता तुम्हे विसमै अवसर एण ॥२॥ देवौ वाकं । वच्छावल्लह तुम तणौ गिरूई रिद्धि समेउ। मासभितर निच्छदण मिलस्यै धरौ मम ॥३॥ एम भणे विणु चक्क हरि परमल गुणह विसाल। मयणह कण्ठै परिठवै सुरतरु कुसुमह माल ॥ ४॥ तुम्मह दुष्ट न देषिस्यै ११ श्रीपाच० मालह तणे प्रमाण। एम मणै विणु चकहरि देवि गई नियठाण ॥ ५ ॥ ढाल ३७ ते मुझ मिच्छामि दुकर्ड एहनी॥ हिवै वाहण कुंकण जई जतरीया जांम। धवली भलो लेई भेटगो भेद्यौ राजा तांभ हि० ॥१॥ राय घुसी थई सेठनै दिवरावै पान। थईया यतनै अोलप्यौ थयौ होयडै हैरान हि ॥२॥ ए नीकल्यौ किम जीवतौ वैरी विकराल । वली मुझ थी अधिको थयो हीयडै उठी माल हि० ॥३॥ कोई ऊपाय कहिवै जिमसे राय। एहने जीव रहित करै भाव ठटलि जाय हि० ॥४॥ डुम्बकटुव अाव्यौ तिहां सेठ श्रादरदीध। काम कह्यौ करि ४६ सुं अम्हे सवा लाष धनलीध हि० ॥ ५॥ राय जमाई जो हलै धनद्यो सवाकोड़ि। डम्ब भणे ए सोहिलु काम करिसुं दोड़ि हि० ॥ ६॥ रावले डूब जई करी गाया भला मीत । वली विसपै ते दिन रीझयौ राय चौत हि० ॥७॥ नृप तूठो बोडा दौयै गायन न लीयन्त। राय जमाई सैहथै लीउ' जो दीयन्त हि०॥८॥ हुकम दीयो श्रीपालनै वसपाल नरिन्द । बीडा दैवाने गयौ नविजाणे फन्द हि ॥६॥ गायन सड़ देपी करी सीपा कंठ बिलग्ग। एकभणे पुत्र अोलप्यौ इमरोवालग्ग हि० ॥१०॥ एक कहै भाई मिल्यौ बहु दिवसे आज। नारि थई इकडूवणी बैठौ करि लाज हि० ॥ ११॥ माय थई माया करै रहि रहिहिवै पूत । माली वाहबै सारीयौ वलीयो घर सूत हि ॥१२॥ राजा अचरिज पामीयौ जोवो देव सरूप । ढाल यई सैवीसमी जिन हर्ष अनूप हि० ॥१३॥ सर्वगाथा ६३१ ॥ दूहा ॥ कोप चयौ राजा कहै वाभणडाभु आज । ए कन्या वरदापव्यौ गमी सहुमै लाज ॥१॥ वली नृप पूछ कुमरनै दाष ५० श्रौपा०० वीयै निज बंस। निजजीभै सीपौ कहै कुल कीजै न प्रसंस ॥१॥ चतुरङ्गी सेना सझौ मण्डा वौ भारथ। तिण वेला तुम्हे जाणि ज्यौ कुललहिस्ये मुझ हाथ ॥३॥ अथवा प्रवहण मांहिछ दोइ नारी गुणवंत। कुललहिस्यै ते माहरो मिटस्यै मननी वन्ति ॥ ४॥ भूपति तेड़ी नारित्रे मको पुरुष प्रधांन। अावी हीयडै अमही पूछ तब राजांन ॥ ५॥ ढाल ३८ कोइ लोपरबत धूधलोरे एहनी॥ बोलौ तब विद्याधरी रेलो अङ्गदेस भूपालरे राजेसर। सिंहरथ राय कम लातणौ रेलो ए नन्दन श्रीपालरे नरेसर ॥१॥ बो० पूरब बात सह कहो रेलो एहनी कुंचे ५० अम्हे नारिरे न। नृप सुणि अचिरिज पांमीयौ रेलो पांग्यौ चितचमकाररे न०॥२॥ बो० ततषिण बांध्या डुम्बडारेलो दीधी मार अपार रे न। हुकम कीयौ हणि वातणो रेलो गा- यन वोल्या तिण वारर न०॥३॥ बो० वांक अम्हारो को नथीरे लो सगपण पिण नही कोई रेन०। धवल अछै एक वाणीयौ रेलो पापीमा धूरि होइरे न० ॥४॥ बो० धन प्रापी अम्हनै घलो रेलो एह कराव्यौ काजरे न। पोटो बोली कि रेलो तुम्ह आगलि महाराजरे न. ॥५॥ वो राय भर्यो रीसै घणु रेलो पाठवीया निज दूतरे न। धवल भणी बांधी करीरेलो लेवातुरतप इतरे न० ॥ ६॥ बो बांह अपूठी बांधिनै रेलो लायावेग तलाररे न०। वाहोबार मलाविसोरेलो धवल तणौ सिरधाररे न०॥७॥ बो मारन्तो छोडावीयो रेलो करुणा करि श्रीमालरे न०। वकीया यत ए वांणीयो रेलो हणीय किम भूपालरे. न०॥८॥ वो बन्धन थी छोडावीयौ रैलो दिवराव्यौ सनमानरे न०। सापुरस रीस धरै नही रैलो वलिन करै अति श्रीपा०च० ५१ मांनर न०॥६॥ बो. विडं मयणा सुष-भोगवै रेलो सुष गमता निसदौसरे न०। कुमर प्रताप निहालन रेलो सेठ धरै मनरीसरे न० ॥१०॥ वो कुमर सूतो भूमि सातमी रेलो वली मांद्यौ मनद्रोहरै न०। निसि भरि बांधो डोरडी रेलो मूकी चन्दन गोहरे न० ॥ ११॥ वो हणिवा कुमर भणी चद्यौ रेलो पालोकर संबाहरे न। पाली सहित पाछो पद्यौर पूती होयडामाहिरै न० ॥१२॥ बो ततषिण प्राण तज्या तिहारे लो धवल गयौ जमलो करे न। देषी सह कहै एहवौ रेलो पातिक नहुवै फोकरे न० ॥१३॥ बो० माठी करगी थो दणे रेलो फलपांम्या ततकालरे न। कहै जिन इर्ष भलै तलौं रेलो कहै अडवीसमी ढालरे न॥१४॥ बो सर्वगाथा ६४६ ॥ दूहा॥ क्रोध लोभ श्रीपालना मनमांनही लिगार। प्रेतकार्य करि धव ५१ . लनो कीधो देम उपगार ॥१॥ तैडीने पासासना सेठ पुत्वनै दीध। पिता तणौ धन प्रापीयों लोका मै जसलीध ॥२॥ कोसंबीसं प्रेडीयौ उत्तमनी ए रीति। पीर नीर जिमसा पुरस पालै पूरी प्रीति ॥ ३॥ ढाल ३६ नणद लहे नण चूडल जोवन झिल रहियौ एहनी ॥ साजन हो साजन एक दिन रय वाडी गयौ सीपी मनमै रग। साजन सेवक साथि लेई करी वैसी चपल तुरङ्ग सा० ॥ १ ॥ पुन्यकथा तुम्हे सांभलौ पुन्यकीयां आणंद सा०। कष्टटलै संपतिमिले जिम श्रीपाल नरिंद सा० ॥ २॥ पु० भागलि वनमा ऊतर्यो दीठो सारथ वाह सा। पूछ्यौ कुमर कि हाथको अाव्या किण पुर मांहि सा० ॥ ३॥ पु० अचिरिज कोई निहालीयो काई अपूरस बात सा० । तेह कहै कातीनै थकी अाव्यो सुणि वडगात सा० ॥ ४॥ पु० इहां यकी श्रोपा०३० सी जोयणे कुण्डल नगर वसन्त सा०। मकरकेतु राय रागिनी कमल तिला गुणवन्त सा ॥५॥ पु० गुण सुन्दरी तेहनो सुता विद्या रूप प्रसाद सा०। परण नर ते मुझ भणी जी वीणावाद ५२ सा०॥६॥ पु० नरपति नन्दन बहु मिल्या सी वीणा चाल सा। वात इमी तिग नरकही घर पुडतौ श्रीपाल सा० ॥ ७॥ पु० ते अचरिज जोइ बा भगो लागी मनमै पन्त सा भाव धरी नवपद जपै तन मन करि एकन्त सा०॥८॥ पु० नवपद भगत परतच थयौ यौविमलेसर यक्ष सा। तूठौ सौपानै कहै मांगिर वरदन सा० ॥ ६॥ पु० गुणरंज्यौ मीपा भगी औने निरमल हार सा०। पहिर्यो कण्ठ मोहन करे जायै जिहां जांगा हार सा० ॥20॥ पुरु हार तणौ महिमा कही सुरपड़तौ निज ठांण सा०। कुमर गयौ कुण्डलपुरै पहिगै हार सु ५२ - जाण सा० ॥ ११॥ पु० रूप रच्यो वामन तणौ गयौ आषाडा साज सा० । भणिवा पाठक तुम्ह कनै श्राव्यौ कुाज सा० ॥१२॥ पु० वीण कला मुष सीषवौ मझने पिण के डंस सा० । राणि कुमरिनै रीझयु नापु मगज विधुस सा० ॥ १३ ॥ पु० नृप नन्दन हडर हस्या बोल्यो बामणसाच मा। इंस करै वरिवा भणी किहा कञ्चण किहां काच सा० ॥१४॥ पु० राय कुमर पावौ मिली माहरे पास पास सा०। राजकुमर तेद्या सह मुझरोले वा काज सा० ॥ १५॥ पु० वामण पिण साथै गयौ गुण सुन्दर आवास सा०। ढाल ए उगणचालीसमी कही जिन हरप उलास सा० ॥ १६ ॥ पु० सर्वगाथा ६६८ ॥ दूहा ॥ वीणा सुर सहुए कर्यो तंत उताऱ्या राग। पिण किण होना नासं कुमरी चित्तन लाग ॥१॥ वीणा मागी बामणे पार श्रीपान० कुमर अचंभ। आरंभ कीधो नादनो थंभ्या सह जिम थंभ ॥२॥ सह को देषी वामणो नृप कन्या श्रीपाल। कुमरी वरवरि वा भणी कंठठवी वरमाल ॥३॥ रूप अनूप कीयो प्रगट ५३ चम्पापति तिण वार। मकरकेतु मन हरपीयौ परणावीयो कुमार ॥ ४॥ आप्या कक्षण मणि रयण आप्या वर आवास। कुमरि तिहां सुख भोगवै वारूलील विलास ॥५॥ ढाल ४० प्यारौ प्यारौ करती एहनी। एक दिन रमिवा नीकलौयौ वाटै एक पंथी मिलीयौ। कु- मरै परदेसी कलीयौ पछै अचरिज अटकलीयौ हो लाल ॥१॥ कहौ पंथी किहां जासौ कहां थी आया मुझ भासौ। दीठौ कोई तम्ह तमासौ मुझ अागलि तेह प्रकासौ हो लाल ५३ क० ॥२॥ पंथी कहै चतुर सुजाण, कुंडनपुर नयर मंडाण। श्राव्यौ तिहां घी सुप्र- माण जाय सह पुरपय ठाण हो लाल क० ॥३॥ कणयापुर मांहे पायो राजा विजयसेन कहायौ। राणी कनकमाला मनभायौ जिण पुन्य थकी सुष पायौ हो लाल क०॥४॥ त्रैलोक्य सुंदरी तसु बेटी जाणै रूपकला गुण पेटी। पास रहे सुंदर वेटी मननी अरति जिण मेटी हो लाल क०॥५॥ कन्या थई जोवनवंती दीठी बाप मलपंती। वरजोग्य थई गुणवंती सरषै पूगै मनपंती हो लाल क० ॥६॥ सयंबरा मंडप मंडाउं सह देसाधिप तेडाउ। इण सरिषौ जो वरपाउं तो बेटी परणाई हो लाल क० ॥ ७॥ इम चिंत विचित्त मझारा मंडपरचीया विस्तारा। जगमाहे नरसिरदारा अाव्या लेई परवारा हो लाल क०॥८॥ त्रीस जोयण इव्हां थी थायै काल्हे वरिस्यै मनभायै। सीयौ सांभलि विहां जायै पंषौ जिम गयण पुलायै हो लाल ५४ श्रीपाश्च० क° ॥६॥ कणयापुर मांहे आयौ धुंधानो रूप वणायौ। अचरिज देषण ऊमाह्यौ देषी मंडप सुषपायो होलाल क० ॥१०॥ प्रतिहार नद्यै पेसेवा हथसंकलो दीयो देषेवा। आयो जिन हरषवरेवा चाली समीढा कहेवा हो लाल क० ॥११॥ सर्वगाथा ९८४॥ दूहा ॥ पूठमाग ऊंचौ घणु ऊरसां कडौ प्रर्दस। ऊचौ नीचो नासिका माथै कपिला केस ॥१॥ पूठे टूबड कूबड़ी मोटौ माथौ जास। दांत गदहडा सारिषा तेहवा दांत ऊजास ॥२॥ कोढगली वांकी नली पिंजर नयन विसाल । लालपड़े होठ लड़वड़े इसो वगायौ गात ॥३॥ राजहंस समराजवी ५४ बैठा करै कलोल। काग सरीषौ कबड़ी आवी ऊभोलोल ॥ ४॥ ढाल ४१ थौचंद्रा प्रभ प्राहु- णौ रे एहनी॥ कहौ घूधा नरपति कहौ रे किम उभा दहां आज रे। जिण कारण बैठा तुम्हे रे ऊभौछु तिण काल रे क॥१॥ दृड हड हसीया राजवी रे रूपवण्यो वाह वाह रे। तुम सरियोयर किहा मिले रे एह वा राजवीयां माहिरे क०॥२॥ कन्या नरवाहण चढीरे खय- म्वरकीधो प्रवेस रे। ढोलदमामा वाजीया रे सपर वाया बेस रे क० ॥३॥ सोपानो रूप मलगो रे देपै कन्या तेह रे। प्रमुदित चित्तथयौ घणु रे लागो निवडसनेहरे क० ॥ ४॥ तीपे नयणे ताडिने रे जोवै वारंवार रे। चंबक लोहतणी परै रे मनमिलीयौ तिणवार रे क०॥५॥ प्रतीहारी प्रावीहि वैरे लाल बडीले हाथरे। सयंवर विचमै माजतौर राजकुंअरिकरि साथि रे क० ॥६॥ राजवीयानै ओलषैरे जाणे देस विदेस रे। वंसतणी विरुदावली रे संभलावै सविसेस रे क० ॥७॥ छोडि चलौ सहराजवीरे जिमभाद्रवडै छांण रे। थंभापूतलीनै मुषैरे भोपा. ५५ देव तणीथईवांण रे क० ॥८॥ तथाहि ॥ यदि धन्यासि विज्ञामि जानासि च गुणान्तर। तदैम कुन्जकाकारं दृणुवल्ले नरोत्तमं ॥१॥ देवतणो वाणी सुणौ रे कुजगले वरमाल रे। पाली कन्यायै वग्यो रे म की सह भूपालरे क० ॥ ६॥ धड़हड़ीया को करोरे मांनी नरम छालरे । कहतारे रे कूबड़ा रे म्हेलिपरीवर माल रे क° ॥ १० ॥ मूक्यौ मूक्यौ जीवतौ रे नहींतोमू का जमलोक रे। राजसतानै कारणैरे काम तुं फो करे क० ॥ ११ ॥ काई अदेषा राजवीरे कार वड़ोकरो रोसरे। रूप न पाम्यौ जोतुम्हे रे तो के हनो कहो दोसर का ॥ १२॥ नासतणाम- ५५ लनीपरै रे तुम्हनै तज्या ग बाल रे। अादर मानदेईपणौ रे मुझ कण्ठै ठवीमाल रे क० ॥१३॥ भाग्य बिना किमपामीय रे रायसता सुकमाल रे। करे जिन र्ष मपत्रिस्यौरे इकताली समी ढाल र क० ॥१४॥ सर्वगाथा ७०२ दूहा ॥ एहवा वयण सुणीकरी भडभडीया भूपाल। मारो मारो कूबडो पाडील्यौ वरमाल ॥ १॥ इमकहि अव्या मारिवा घुधदिषाया हाथ। कायरथ- ईनासी गया मांडै कुण भारथ ॥२॥ घुध पराक्रम देखिनै विजयसेन राजांन। तब बोल्यौवछ आपणौ प्रगट करौ बलवान ॥ ३॥ रूपकीयौ निजमूलगौ जाणे अभिनव काम। राजा रलोया यतथयौ कुमरी समवरपांम ॥ ४॥ परणावी नृप अंगना उच्छवकरी अपार । सुन्दर मिंदर पापीया रयण कयण सिणगार ॥५॥ सीपौवर सुन्दरपवर त्रैलोक्यसुन्दरी नारी । जोडी जोडी सारिषी ऊसो हुइ करतार ॥६॥ ढाल ४२ बालुरे सवायौ वयरडं पाणौ रे एहनी ॥ राय सभायै श्राव्यौ चर एकदा रे कहनि सुणौ श्रीपाल । देवक पट्टण धणकंचण मर्यो रे रायतिहां श्रीपाच. ५७ * अथ विचक्षगा पठति ॥ अवर मझषो पाल २ । पुत्तलिका कथयति ॥ अरिहंतदेव सुसाइ गुरु धमतुदया विसाल। मन्तुत्तम नवकार पर अवरमभषो बाल ॥ २॥ प्रगुणा पठति । करहु सफल अप्पांण ३। आराहो धुरिदेवगुरु द्यौसुंपत्तै दांण । तव संयम उवया रड़ो करहु सफल अप्माण ॥३॥ निपुणा पठति । जित्तौ लियौ निलाड़ि। रेमन अप्पो पंच करि चिंताजाल मयाडि । फलतित्तोही पामीयै जित्तो लियौ निलाडि ॥४॥ ततो दक्षणा पठति। तसुतिह अण- जिण दास ४। अच्छि भवंतर संचियौ पुन्नसमग्गल जास। तसु बल तमु मैतसु सिरिय तसुतिह ५७ श्रण जिण दास ॥५॥ कुमर समस्या पूरवी हरषी कुमरी चित्त । एवरमुझ सुन्यै मिल्यौ पूरब भवनौ मित्त ॥६॥ ढाल ४३ मोतीद्यौन हमारो राजंदा मोतीद्यौनै एहनी॥ राजा सुणिरोझौ चतुराई एवरसरियो मिलीयौ वाई। जोज्यौ पुन्याईतणा फल जोज्यौ पुन्याई । पुन्याईएाबी मिलीयौ माण अकाले यात्रौ फलोयौ जो०। पंचसपी साथै नृपवाला सीमाकंठ ठवी वरमाला जो० ॥१॥ गमा परणावी निज कन्या लोकसह भा एधन्या जो०। पंचप्रकार विषय सुषविलसै पुन्यथको आस्यासह फलिमै जो० ॥२॥ भाटभणै श्रासीस मलीपरि चिरजीवौ महाराय कुमर वर जो अचिरिम एक अपूरवदीठौ। कोल्लागठररिधि समृद्धि अनीठौ जो० ॥३॥ राय पुरंदर जाणी पुरंदर गणी विजयादे अतिसंटर जो। बेटो गुणपेटी जय सुन्दर रूपै अभिनव रति मति मन्दिर जो ॥४॥ कुमरी प्रतीक्षाकरि रहि थिरता राधा वेधसाधे सोई भरता जो०। बाम कन्याने कानरोडाव्या दिसि दिसिना देसाधिप आव्या जो॥५॥ पिणते किणही वेधन सान्यौ श्रोपा० च० कुमरी मन उक्साह वांधौ जो० ! भाटभसीबहुदान देईनै कुमर चल्यौ निजहार लेईनै जो॥६॥ कोल्लागपुर ऊड़ीनै आयौ राधा बेधसभी सुष पायौ जो। जय सुन्दरि कन्यावर वरीयौ राय वीवाह सबल आचरीयौ जो० ॥७॥ दोजणभोले सुषसायरमै सरिषी जोडिमिली निज करमै जो। तिण अवसर मामा तेड़ावै नरमेलहीने षवर करा वै जो० ॥८॥ कुमरै पिण निजपुरष पठाया नारी तेडण सैन्य बुलाया जो । बंधु सहित सह सुन्दरि आई सेना बहुत मिलोमन भाई जो ॥६॥ हयदल गयदल पयदल मिलीयौ चालतां अहिपति सलसलीयौ जो। सात- सायरनो जल' झलफलीयौ जायै किणही नही बलकलीयौ जो० ॥१०॥ स्थानपुरी नयरी ऊत- ५८ रीयौ मातुल निरपि हरषमन धरौयौ जो०। मामैकरि अभिषेक सुदिवसै राजा पददीधो मन हरसे मो० ॥ ११॥ पुन्यपसायै लह्या सुपसाजा श्रीश्रीपाल थयौ महाराना जो० । बेताली समीढाल वषाणी कहै जिन हर्ष वषत नीसाणी जो० ॥१२॥ सर्वगाथा ७३८ दूहा॥ दसदि- सिकेग राजवी वीजागा पाय । हय गय कञ्चण मणिरयण लेई भेट्यौ राय ॥१॥ हिवै थीपाल नरेसवर लेई सैन्य अपार । चाल्यौ उज्जेणी भणी मिलिवा जननी नारि ॥२॥ वि- चिसोपारै पाटणे नई दीधौमेल्हाण। परदल श्राव्यौ जाणिनै राय मल्यौदीवांण ॥३॥ श्री यौपाल नरिन्दने प्रावीलागौ पाय । करजोडीने वीनवै खामी करौपसाय ॥४॥ महीसेन पक अरी इसीयौ अङ्ग भुयन। तिलक सुन्दरो विषभरी तिण दुषराय भयंग ॥ ५॥ समसाणे ते लेगया दुषीपिडित भूपाल। तुम्ह मिलिवातिणिवासते नाव्यौ अहो कमाल ॥ ६ ॥ ढाल ४४ ५र श्रीपाच० परदेसीयारमेरी अंषीया लगी एहनी ॥ परउपगारी साहसधीर समसाणे पौहतौ वड़वौर। उप गारी लालताकै पायनमीजै । नयणे मुषदेषालौ बाल एजीवाड़ी सह तत काल उ० ॥१॥ पायनमी जैताकी सेवाको जै उ०। आ० दौठीकन्या मृतक समांन महामंत्वनौ कीधोधनांन उ०॥२॥ कुमरी कण्ठै ठवीयौ हार ततषिण बैठीथई तिणवार उ०। विष ऊतरीयौ निरविष प्राण वाज्या हरष तणा नीसाण उ० ॥३॥ राजा महीसेन इरण्यौ अपार भेटकरे मणिरयण भंडार उ०। पर णावी निजकन्यातेह तिलक सुन्दरी घणेसनेह उ० ॥ ४॥ देवतणी पर विलसै भोग पांप्पो पुन्य ५६ तणे संजोग उ०। प्राणौ करिचाल्यौ थोपाल कटक सुभट दल बहुल विसाल उ० ॥ ५॥ सैन्य चढाई कीध भूपाल बड़त नगारा थई करनाल उ० ॥६॥ देस देसना राय संजुत्त चलता माल बमाहि पहात उ० उज्जेसी भायौ चौपाल चरमुष सांभलीयो भूपाल उ० ॥७॥ ত্তিক कापड जलमाहे लोध गढ रोहो मालवपतिकीध उ०। सायर वीटोलकाजेम उज्जैणी वीटीरह्यौ तेम उ०॥८॥ चिन्तातुर नगरीनो लोक अधिक उदासी रहै ससाक उ। रातिपडी सबथयो जमाल चाल्यौ मायमिलगा श्रीपाल उ०॥६॥ समरै निसिपतिजे मचकोर मेहागम जिमचारी मोर उ०। मधुकर पावै मालति दाइ मयण सुन्दरि तिम अधिक सुहाइ उ० ॥१०॥ सह अंत उरतेडी माथि निर्भय यः पुडतो घरनाथ उ०। माइ उघाडौ मन्दिर बार तुम्ह सेवक जिम करै जुहार उ० ॥ ११॥ उलसी मयण सुन्दरिनी देह बाई तुम्ह सत सादजएह उ। झटकिउ- धाऱ्याघरना बार मिलीया माय सुत विरह निवार उ० ॥ १२॥ लागी बहसह सासू पाय श्रीपा 'च० Par मयणासं सगली मिली प्राय उ०। चमालीसमोढालै थयौ सुख कहै जिन हर्षटल्या सह दुख उ० ॥१३॥ दूहा ॥ राति रहीनिय मन्दिरै जाया जणणी लेय। आयौ दिन अणउ गते निय दल मांहि वलेह ॥१॥ प्रात थयौ उगौ दिवस भाठ भणे कल्याण । सेनानी तेडाविनै भासै दूण परिवाणि ॥ २॥ दूत मोकलीवेगसुं राय करावौ जांण। कंधकुहाई प्रायमिलि जोराप निजप्रांण ॥३॥ तौलसकर पाछै चलै रहै तांहरी मांम। प्रांणनमांन माहरी तौकरि मुझ सं संग्राम ॥ ४॥ · सेनानी चर मौकल्यौ अाव्यौ जिहां भूपाल। अम्हखामी बलीयो हठी पर तिष वयरी कात ॥५॥ कंधकुहाड़ौ करिमिलै तौ पाछौ बलै कटकि। नहितौ गढ हुँदोलिस्यै लेस्यै नगर झटक्वि ॥ ६ ॥ ढाल ४५ बेबे मुनिवर विहरण पांगुऱ्या रे एहनी ॥ दूतवणि सुणि उज्जेगो धणी रे मनमा कौधो एह विचार रे। सबला बलमाडीने थारे कोण करावे लोक- संहार रे दू० ॥१॥ कंध कुहाडौ करि अवनीपती रे सनमुप अावीनै ततकाल रे। चतुर सम- यनौ जाण प्रवीण तेरे भैयौ महाराजा श्रीपाल रे दू॥२॥ चंपापति श्राव्यौ तब सामुही रे ससरानै दीधौ सनमान रे। कंध कुहाडो दूरनपावीयौ रे बैठ बैठा पासै राजान रे दू० ॥ ३ संतोम्यौ सनमान्यौ बहु परै रे मालवपति चिंते मनमाहि रे। पार नदीस एहनी रिद्धि नौ रे एहस्यं सरभर किम था रे टू ॥४॥ तात तुम्हे वर मुझ दीधो हुतो रे ते परितिष जोज्यौ ए प्राज रे। कंध कुहाडौ जेण न पावीयौ रे पोखषि ज्यौ ऊंवर महाराज रेटूण् ॥ ५॥ मालवपति मममा विनाय थयौ रे वपु वा नोज्यौ अचरिज एह रे। पुन्यसरीपौ नग मै को नही रे एहने गोपा. १० फलीयौ पुन्य अछह रे दू० ॥६॥ सौपो मयणा निरषी हरषीया रे मिलिवा अाव्या लेक अपार २। सोहग सुंदरिनै रुप सुंदरी रे मिलिंवा अाव्यौ सह परिवार रे दू० ॥७॥ श्रीश्रीपाल नरेस ६१ र तिम्णि सम रे दौधौ नाटक नौ दिस रे । नाटकहन्द बलावौ माहरौ रे जोवै सह नरनारि नरेस रे दू॥८॥ नाटक अाव्यौ तिहा मिलि नाचबा रे पहिरी सुंदर चरणाचौर रे। करामसता कंचू होयै कस्या र सोहे भूषण सयलसरी रे दू० ॥६॥ एक नारी लाजै साजै नही रे ते विण न पड़े नाटक रंग रे। माहो आहे अबलाहाकनै रे उठाड़ी तेहनै मन भंग रे पु० ॥ १० ॥ नाटकिणी पेठो ते नाचिदा रे जोवा मिलिया रांणो रांण रे। टूही एक कह्यौ तिण ६१ अवसरैरे मनमोहन मुष मधुरी वाणि रे टू० ॥ ११ ॥ दूहा। किहां मालव किहां संषपुर

किहां बम्वर किहां नह। सुरसुंदर नचापीय दैवै दल्या' मरट्ट ॥१॥ जणणी बाप श्रवण
दृहौ सुणी रे - इंधरी भाचतो नयणे- दौठ रे। ' नाटकणी थई सुरसुन्दरीरे स्यं कीधा
देव धीठ रे टू० ॥२॥ सह को 'देषी. मनविस्मय थयौ रे है है जोवौ एहना कर्म रे।
ढाल ईए पैतालीसमी रे कहै निन हर्षषरौ जिन-धर्मरे। दू० ॥१३॥ सर्वगाथा ७७५टूहा॥
सभामांहि नई कुमरिनै राणौ कण्ठ विलग्गं । -- वाम असंभम देषिनै दुषतरिरोवा लग्ग॥१॥
राइ सताने पूछोयो एस्युं तूझ सरूप। 'जोई परणाव्यौ हुतौ तुझ मनमांन्यौ भूप ॥२॥ वल
तूं सुरसुन्दर कहै पिता सुनौ मुझ वात। परणींचाली कंतसं संषपुर नगर दिषात ॥ ३ ॥
उतरीया तिहां जई करी रद्यावगड बहुदीह।- साथ सह धरमोकल्यौ बैठा रह्या अबीह ॥४॥

श्रीषा च० १२ मारि मारि करती तिहां आवीधाड़ि अपार । नासिगयौ मुझनाहलौ मुझमेली निरधार ॥ ५ ॥ तिहां झाली मुझकोलौए वेची जई नेपाल । मोलदेई मालणिग्रही तिणवेची ततकाल ॥ ६ ॥ इम वेचाती अनुक्रमै इक विणजार लीध। वचर देसै जाइन गणिकानै घरदीध ॥ ७॥ ग- णि का नाटक सौषव्यौ ई थई निपुण प्रवीण। नाटकिणी मांहि सरै कलाग्रही अकुलीण॥८॥ ढाल ४६ मोरा साहिबहो एहनी। हिव बञ्चर होनायक महाकालिक नाटकनो रसीयौ सही। वैस्यानै होरि नाटक साथिकि तेड़ी तिणि सह संग्रही हि ॥ १॥ दिन दिन प्रतिहो नाटक ६२ नवरंग कि राय करावै नवनवा। परणावी हो कन्या निज भूपकि मयणसेना सुपनालिवा हि. ॥ २॥ घण कंचण हो भूषण बहुदीधकि मयणापति श्रीपालनै। दोधावली हो नवनाटक टंद- - कि साथे मुझ निहालिनै हि० ॥३॥ मैकीघाहौ नाटक बहुवारकि मयणापति श्रागै षडौ। रहां देपोहो मायबाप कुटंबकि लज्या दुषसायर पडी हि०॥४॥ परणावीहो अाडम्बर भूरकि मानघणौ मुझ बापनौ। सुप सगलाहो फीटीथया दुपकि फलपांग्यौ मै पापनौ हि ॥ ५॥ मुझ बहिनीहो मयणा धनधन्नकि एसरिषी जगकी नही। दुष मिटीयाहो सुषपाम्या एहकि सील- फल्यौ एहने सही हि० ॥ ६॥ कुलथांपणि होऊं थई कुलमाहिकि सह पाणि माहि पापणी। मै सेव्यौ हो वहुमांति कुसीलकि लही कमाई अापणी हि० ॥ ७॥ सोदाहो मुझ कर्मनो वातकि तुम्ह भागलि हि कह। पातकनाहो पुन्यना मावापकि परतिषि फलदेषो सह हि० ॥८॥ श्रीपाले हो अरदमण कुमार कि तेडाव्यौ अादर करी। धण कंचण हो पापो भर श्रोपाच० पूरिकि पापी वली सुरसुन्दरी हि०॥६॥ सुर सुन्दरहो अरिदमण कुमारकि समकित पांम्यौ निरमलो। पूरवलौहो परथाप्यौ रायकि मति सागर मति अजलो हि ॥१०॥ : जे हुताहो ३३ कोढौसय सातकि रोग गमी ठाकुर कीया। माटांनाहो जोवो उपगारकि निज सरिषा करिथा पीया हि० ॥ ११॥ नवरांणीहो पटराणी कीकि टङ्गार संदरीनी सघो। पांचे वलिहो चव- दै ए नारिकि विलसै अपछर सारिषा हि ॥१२॥ नीसाणेहो हिवंचलयो पायकि चंपा ऊपरि चालीयौ। जिन हर्षे हो एतलो अधिकार कि ढाल छैताली समीकोयौ हि ॥ १३॥ सर्वगाथा ७६६ टूहा। कटका सुभट नाथट गरट मिलोया एका एक , सुसरा साला मावला' रिणवा- वला अनेक ॥ १॥ रिणरसौया कसीया जरद पहिऱ्या टोप करीट। बगतर पहिऱ्या लोहमय ६३ माणे कालाकीट ॥२॥ पापरीयाह वर प्रपल मद भरता गजराज । गयणंगण छायौ गिरद गोलानान अवाम ॥३॥ इमचलती चंपापुरी श्राव्यौ नप यौमाल। तडवायै नासीगयो अनित सेन ततकाल ॥ ४ ॥ राज लीयो निज भुजबलै बैठौ पितातपत्त। पामी परघल संपदा मोटोजा सतपत्त ॥ ५॥ लजाणौ राजा घण मन धरतौ-विषवाद । नासतां माहरो थयौ लोकांविच अपवाद ॥ ६॥ अजितसेन मन चीतवै हंड्यो द्रोहीयार। राजलीयो भत्रीजनौ चीतवीयो अपकार ॥ ७॥ गोवद्रोहयी जसनही नृपद्रोह नीत विग्णास। बालद्रोहथी गति नही निराधे करया अभ्यास ॥८॥ हिवै दिक्षाजो आदर्श मालू संयम सुइ। तो टू एपापथी बूटै करम निरुद्ध ॥ ६॥ इम तुमभाव विचारता चढतां मन परगांम। ज्ञाना वाणी कर्मनो चयोपसम श्रीपा.च. ६४ थयो ताम ॥१०॥ ढाल ४७ हीडोलानी। सुभभावना मन भावतां जाती स्मरगा उतपन्न। दैववसै लीयौ संजम विसदजांणि रतन्न ॥ सुमति सूधी गुपति पालै दोप टालै दुष्ट । सागर नमत मागर चतुर चारित्र करै पुष्ट ॥१॥ धन्नधन्न माई जे तने इण परिक्रोध ॥ महा ग्यांनी महायानी अभय दांनी जह। भविकनै उपगार करतां चरण करण गुणगेह, विच- रतां भूलोक ऊपनि अजितसेन मुणिन्द। श्रावीया चम्पा नयर अनुक्रमि लोकनै थयो प्राण न्द ध०॥२॥ श्रीपाल सांभलि सुगुरु आगमि बांदिवा मनरङ्ग। यावीयौ बाड़म्बरें करि भाव के भवगति अभङ्ग ॥ प्रदक्षिणा त्रिणहे देह वन्दी बैठौ भागलि राय। देसना दूक चिनि सुमो माय मुनिवर माय ५० ॥३॥ दोहिलोमां नव चतुर गति मांहि भवतां एड़। देस पारिज . .

सकुल उतपति सुगुम सलहे ह । तत्वरुचि पिण दोहिली तिम श्रवण आगम वाणि। धर्म उद्यम छोडि आलस मानव करै सुष हाणि ध० ॥ ४॥ धर्म नो संजोग पांमी कोनीय जिन धर्म राज्य। लीला सकल सम्पति धर्मथी सिवधर्म देसणा मुनि राय दीधी॥ सांभली चितलाय रायहिवै श्रौपान्न पछ कहो जानी मुनि राय ध० ॥५॥ किणे करमै बालरोगी हुवौ किमनी गेग। रिदिपामो एतलौ किम ड्रम्बनो सयोग ॥ केमसायर पड्यौ कुसले नीकल्यौ कहौ केम । नारिपरण्यौ एह सुन्दरि न्यानी पूठ्यौ मुनि एम ध० ॥ ६॥ मुनि कहै सांभलि तुं नरेसर चतर गति संसार। जीव कम लहै सुप दुप जाणि जे निरधार॥ कर जेहवा कर्म प्रांणी तेहवा फल अन्त। तिण मंहिवै ताहरा नृप सामलि कर्मरत्तन्त ध० ॥ ७॥ चणे भरतै हिरण्य पुर ६५ दुष अतीव श्रीपा.१० बर सिरोकन्त नरेस। श्रीमती राणी जगवषांणी दयापाल विसस ॥ राइ आषटक निरन्तर भमे हणिवा जीव । नारि कहै प्रिय जीव हणतां पांमीमै ध०॥८॥ बीहतानासै लिलामुषल्यै क्षत्रि न हणे तास । वारीयौ पिण कह्यौ न करें व्यसन लागौ जास ॥ विठ लेई सातसै इक दिन आहे. जाइ। गहन वनमै निजर पड़ीयौ घीणकाया मुनिराय ध० ॥६॥ हाथोषौ देषि राजा कहै चामर धार। कोई कोढ़ी एहदीसै सह कयौ तिगा वार ॥ यष्टि मुष्टिकरीय ताड्यौ सातसै उल्लण्ठ । साधनै इम कष्टदौधौ चीकणी बांधी गण्ठ ध० ॥ १० ॥ मुनि ६५ भणी उपसर्ग करिनै मृगहणी सुष पाय । सात सयां वण्ठ उलण्ठ साथै श्रावौयौ धरराय ॥ वली इक दिन गयौ मृगया एक लो नरनाह। नदी तटै दूक साधु दीठौ नाषौयौ सलिल अगाह ध० ॥ ११॥ नदी मारे देषि दुषियौ थयौ करुणावन्त । नदी जलथी काढीयो मुनि सुमतिवन्त महन्त ॥ कह्यौ निजकृतिनारि श्रागै रागिनी कहै एम। अवर जीवन पौडीये तो पीडीये सुनिवर केम ध० ॥ १२ ॥ साधुही लाहानि थायै हास्य रोगी जाणि। निन्दा थको बधबन्धना वलि ताडणाकि पिछाणि ॥ इम सुणी काई कहीये पायौ धर्मनौ परणांम। ढाल सैतालोस मी एघ जिन हर्षतमाम ध० ॥ १३ ॥ सर्वगाथा ६१६ ॥ दूहा ॥ दिवसे कितले कैगए गोपे बैठौ भूप। मलिभूषति कसकाय मुनि दीठौ एहवौ रूप ॥१॥ सीष वयण गयौ वीसरी सेवकन कहे राय। नगर विटाल्यौ डूम्बडै कादो परोध काय ॥२॥ तिण पुरषै तिमहीज करो थीमति राणी दीठ। कोपकरी राजा प्रतै निमंछ धिगधोठ ॥३॥ साधु भणो किम नन्दौये जेगि रूपा श्रीपाच ६६ गुणवन्त। तारे अपना आतमा परनै पिण तारन्त ॥ ४॥ ढाल ४८ धनर श्रीरिषिराज अनाथी एहनी॥ राणीने बोलभे लाज्यौ एमै कीधी अकाजजी। वोधलता कायी पापीमे तेडाव्यो रिष राजजी रां० ॥१॥ नमी षमावी कौधी स्तवना श्रीमती कहै करजोडिजी। भगवन रायै तुम्हने दूहव्या तेहथकी हिवै छोड़िजी रां० ॥२॥ मनिभा पातिक रिघि घात. कि छटै ते ततकाल जी। सिद्धचक्र आराधन करतां प्रांणी भावि विसाल जो रा०॥३॥ श्रीमती राणौनै राजायै आराधधौ गुणिनिद्धि जी। रांणीनी जे आठ सहेलो तिण अनुमोदन कोध जी ग० ॥ ४॥ पूरै उजमणौ कीधौ विंठनरेसै सात जो। धरमकांम नृपना अनुमोद्यां सुभभावन विष्यात जी रा० ॥ ५॥ खामि वयण थी ते इक दिवसै सोहरायनौ गांम जी। भांजौने गोधण लेई वलीया तप tur सोहकेडै थयौ तामनी रा॥६॥ करि संग्राम हण्यासयसाते क्षत्री कुल उतपन्नजी। रिषि उपसर्ग धको थया कुष्टी विगयौ सहनौ तन्त्रजी रा०॥७॥ पुन्य थकी श्रीपाल थयो तुं थोमती मयणा एहनी। पहिली पिण ताहरी हितवछक इण भव परम सनेहजी रा०॥८॥ मुनिनै जनपोडा उपनावी सायर पडीयौ तेणनी। डुम्ब कह्यौ ते डूम्ब कहाणौ कुष्टी वयण वसेणजी ग० ॥ ६॥ श्रीमती वयणे पूज्यौ पहिलो सिद्धचक्रगत पापजी। इण भव पिण मयणाने वयणे भागो सहु सन्तापजी रा० ॥१०॥ रिद्धि लही सिद्धि चक्र पसायै आठ सहेलो जेहजी। अनमोदन थीएथई रांणी धरम तणा फल एहनी रा०॥११॥ धर्म प्रसंसा थी सैसाते थया नीरोगी देह भो। सीह ग्रही प्रत अणसण अन्तै अजितसेन ई एहजी रा० ॥१२॥ बालपणाथी राज्य ६७ पाच लीयौ मै पूरव वैर सम्भारिजी। करम जिसा जीवै भोगवीय ज्ञानी वचन रसालजी रा० ॥१३॥ राजा सुणि चमक्यौ चितमाहे ऐऐ करम विरुपजी। ढाल थई अडतालीसमीए कहै जिन हर्ष अनूप जो रा० ॥ १४॥ सर्वगाथा १३७ ॥ दूहा ॥ राय कहै सुणि साधुजी दिक्षा सगतिन मुझ। जे जाणौ मुझ जोग्यता ते कहौ पडू तुझ ॥१॥ नवपद ए अागधिस्यु सास्त्रो गति विधि जोग। एथी सह सुष पांमिस्यौ लहिस्यौ उत्तम भोग ॥२॥ सह ए नरसुर भवकरी भोगवि अनुपम सुख। नवमै भववल तौसही सहिस्यौ अविचल सुख्ख ॥३॥ टाल ४६ इम धन्नौ धणनै परचावै ए हनी॥ दूण परि साधु तणी सुणि बायो हरष्या राजा रांणीजी। अा- राधै ऊलट मन आंणी सिद्धचक्र गुण पांणोरे इ० ॥ १॥ श्रीनवकार गुणै सुभभावै जिनवर पूज ६७ रचावेजी। जैन धरमसं निज चित लावे जीर्णोद्धार करावैरै दू० ॥२॥ सामा इक पोषध बत पाले कुमति कदाग्रह टालेरे। श्रीजिनवर मारग उजवाले पाप थकी मनवालैरे इ० ॥३॥ इण परिरिद्धि चना अाराधी चढती सुरगति बाधीरे। दण भव पिण एहवी रिधि लाधो कोरति विभुवन वाधीरे इ० ॥ ४॥ राजा राणी माइ संजुत्ता समकित गुण सुभचित्तरे। आज पूर्मा कर तुरग महत्ता पांस्या भोग समत्ताजी इ. ॥५॥ तिहांथिको चविनर भव पांमी मयणा सुन्दरि पकन्दार। पाली जिनवर गाण अमन्दा काप्या भवना फन्दाजी इ० ॥ ६ ॥ অনলাম थीपाल नरिन्दा मवणा सुन्दरि सुपकन्दाजी। पाली जिनवर याण अमन्दाजी काप्या भवर फन्दाजी ४० ॥ ७॥ इम श्रीपाल चरित्न मनरागै श्रेणिक जिनवर बागैरे। कयौ गोतम गण ओषा १० G हर बड़भागै सांभलितांमति जागैरै दू० ॥८॥ दूम जाणो नवपदसं राता सिद्धिचक्र जे ध्या.. तारे। नृप श्रीपाल तणी परिमाता रहै सदा सुतसातारे इ० ॥ ६ ॥ संवत सतरै से चालीस चैत्रा दिक सुजगीसैरे। सातिम सोमवार सुभदीसै पाटण विसवावीसरे दू० ॥ १०॥ श्रीपरतर गच्छ, महिमाधारी जिनचन्द सूरपट्टधारीरे । शान्ति हरष वाचक सुषकारो तास सीस सुविचारोरे इ ॥११॥ कहै जिन हरष भविक नर सुणिज्यौ नवपद महिमा थुणिज्यौरे। उगण पचासे ढाले गुणिज्यो निज पातक बन लुणिम्यौरे इ० ॥ ११॥ सर्वगाथा १२२५ ढाल सर्व मिलकै संप्या भई ।। ६८ ढाल ४६॥ इति श्रीसिद्धचक्रमहिमापरि श्रीश्रीपाल महाराय चतप्पदिका समाप्ता॥

नाम मन्त्रज रिसहजिणे सरसो नयो मङ्गलकेलि निवास । वासव- वन्दियपय कमल विजगजन पूरव आस ॥१॥ ढाल ॥ चन्दकुलंबर पूनिमचन्द वन्दो श्रीजिण कुशल मणिन्द । सुमहिम निवास जो समरैतस पूरवै पास ॥२॥ मरूमण्डल समौर्याणौ गाम धणकण कक्षण अति अमिरांम। तिहां निवसैं जेल्हागर मन्त्रि ज्योति श्री तसु धरणि पवित्र ॥३॥ जसुतेरै सैंतीसे जन्म सेताले सिरि संयम रम्म। पाटणिसतहो तरैज सुपाट निव्यासीयैतस खर्गे वाट ॥ ४॥ भूमण्डल सुरगह पाया सचिराचर जगिहाणि कलिकाल । प्रभु प्रतापन विमानै जोइ मेंन विनयणेंदौठो कोद॥ ५॥ निरधन लहै धनधन्न सुवन्न पुन्नहीण- पांमै बहुपुन्न। असुखी पामै सुखसन्तान एकतना गुरुकरतां ध्यान ॥ ६॥ प्रभु समरण आपद सविटले श्रेय सान्ति सुख हर श्रीपान सम्पति मिल। आधिव्याधि चिन्तासन्ताप सविछाडी नहुमंड व्याप ॥७॥ पाप दोष नवि- लागैतिहां प्रभुदरसण उत्कण्ठातिहां। सेवंता सुरतरुनी छांहि निश्चैदालिद्रमेह वाहि॥८॥ विसहर विसनिरवस नरनाह भूतप्रेत ग्रह विन्तरराह। प्रभुनांमै जेन करैपीड भांजै भावट भवभय भौड ॥६॥ रोग सोग स विनासै दूर अन्धकार जिम जगैसूर। मरष फौटी पण्डित थाय प्रभु प्रताप दुखदुरीय पुलाय ॥१०॥ धन धन जिन सासन मुद्योत जिहा अछ भवसायर पोत। सो सदगुरुमें भेट्यो आज रलीय रंग सहसौधा काज ॥११॥ ढाल। श्राजघर प्रांगण सुरतरु फलोयो चिन्तामणि करकमले मिलीयौ। उदयौ परमानन्द करै यान दीहमें धन्ये गिणीयो। जुग पव राग मजो थुणीयौ चन्द्र गच्छ महिमा निलौए ॥ १२ ॥ कांई करो पृथी- ६९ पति सेवा कांई मनावौ देवी देवा चिन्ता प्राणौ कोइ मनें। वार२ एकवित भणीजै श्रौनिन कुशलसूर समरीजै सरै काज प्रायास मनो॥१३॥ संवत चवद इक्यासी वरसे मुलक वाहण पुरवर मन हरसैं अजिय जिणेसर परि भवणे। कीयौ कवित्त ए मङ्गल कारण विधन हरन यह पाप निवारण कोई मने शंसय धरौ मने ॥ १४॥ जिमर सेवे सरनर राया थीजिन कुशल मुनी सरपाया जय सागर उवझाय धुणे। इम जे भागर गुण अभिनन्दै रिद्धि समृद्धि जे चिर नन्दै मनवंछित फल मुझ हुवौए ॥ १५ ॥ इति श्रीजिन कुशलसूरि स्तवनं ॥

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Shripal Charit

Author
Rai Dhanpatsingh
Title
Shripal Charit
File name
Shripal Charit
Text
OCR done
Citation
1873
Published
2011/02
Publisher
Culcutta, Maniklata Street No,79 Puran Prakash
Language
Sanskrit
Pages
128
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549849
Barcode
99999990030697.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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