Sanmati Library, Jaipur

Ath Dharmopdesh Ratnamala (vol - Iii)

Sharma, Suryadutt · 2009/10

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Front matter

* मोरेम् * आर्य ज्ञानोदय ग्रन्थमाला के * 'सहायक सज्जनों की सूची . ४ - ७ '६ । १ श्रीमान् माननीय राजा साहेब बहादुर छुरास्टेट (रायपुर C.P. . महाराजा रामकृष्ण पुरीजी- नागपुर C. P. महाराजा साहेद बहादुर देवास C.I. महाराजा साहेव वहादुर उचेहरा C.I. राजा लीलाधरजी साहेब बहादुर शक्तिस्टेट राजा रघुराजसिंह जी वर्मा पिररिया C.'P. राजा उदवन्तसिंह जी साहेब परियास्टेट राजा साहेब बहादुर ओडारबांध C. P. . ९ राजा खुशालसिंह जी वर्मा करगी स्टेट १० राजा विश्वनाथसिंह जी वर्षा इमलाई स्टेट १.१ राजा साहेब बहादुर पालम गंज राज्य राजा साहेव वहादुर सेमलियां राज्य R.P: , महाराजा साहेब वहादुर धांगंधरा स्टेट १४. श्रीमती महारानी साहिबा महोदया राजनाद गांव C.P. १५. श्रीमान् ,, . राजा दुर्गानारायणसिंह जी तिरवा राज्य " महाराजा साहेव बहादुर पन्ना स्टेट C.I. १७ y. महाराजा साहेब वहादुर बड़वानी स्टेट CT: १८ राजा इन्द्रमताप नारायणसिंहजी वर्मा रेहुआ. १९ ॥ राजा खेलकसिंहजी साहेब वहादुर खीलयाधान में राजा प्रतापसिंहजी देव वहादुर कड़वार स्टेट १२ ॥ १३ ॥ . २०

of धर्मोपदेश
रत्नमाला
:: तृतीय:भागः ।..
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ईश्वरप्रार्थना *
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अग्नेनय:सुपथा:रायेअस्मान
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यमज्जुहराण मेनों
भूयिष्ठान्ते नमउक्तिविधेम-11:
::::यजु० अ० ११ अ.१६
अंग्ने प्रकाशका,तम द हो हमारा,
"वेदिक प्रथा विदित हों, मिट जाय शोक सारा ।
ऐसी दया दिखाओ, हे दीन बन्धु खामिन् ।
हम सर्व प्रसन्नता से, दर्शन लहे तुम्हारा ।
मति: शुद्ध हो सदा ही उपकार में रहे नित.।।
तव ओ३म नाम हमको, होवे सदैव प्यार ...
आरोग्य और सुखी हो, माणी समस्त्र जंग के ....::
. विनती है यह हमारी सुनलो जगत अधारा:.:: ::
.

(२) * श्री स्वामी शंकराचार्यरचित * FRIEND प्रश्नोत्तरी ॥२॥ REASRECEAR. अपार-संसार--समुद्रमध्ये,निमज्जतो मे शरण किमास्त । गुरो कपाळो कृपया वदैतद्, विश्वसपादांबुज घिनौका ॥१॥ अर्थ-दयाळु गुरु! कृपा पूर्वक कथन करो कि इस अपार-संसार समुद्र के बीच में मुझे इवते का क्या सहारा है अगदीश्वर के चरण कमलरूपी दर्धिनौका ही सहारा है। बद्धोहि को यो विषयानुरांगी, का.वा विमुक्तिविषये विरक्तिः । कोवास्ति घोरो नरकंः स्वदेह) स्तृष्णाक्षयस्स्वर्गपदं किमस्ति ॥२॥ अर्थ-वधा हुआ कौन है ? जो विषय भोगो में फंसा हुआ है। सुति क्या है ? विषय भोगों से छुटकारा पाना । घोर नरक क्या है ? अपनी देह । स्वर्गपद क्या है ? तृष्णा का नाश । संसारहूंकः श्रुतिजामबोधः, को मोक्ष हेतुः कथितस्सएव । द्वारकिमेकन्नरकस्य नारी का स्वर्गदा प्राणभृतामहिंसा ॥ ३ ॥ अर्थ संसार, को दूर करनेवाला क्या है ? वेदों से उत्पन्न हुआ आत्मज्ञान । मोक्ष का हेतु क्या है ? वही आत्मज्ञान । नरक का मुख्य द्वार क्या है ? नारी । स्वर्ग देनेवाली वस्तु क्या है ? जीयों की अ. हिंसा अर्थात् किसी प्राणी को दुख नहीं पहुंचांना । शेते सुख फस्तु समाधिनिष्ठो, जागर्ति को वा.सदसद्विवेकी । के शत्रवस्सन्ति निजेन्द्रियाणि तान्येवं मित्राणि जिवानियानि।४। अर्थ-सुख से कौन सोता है ? जो समाधि में तत्पर है। जाग- ता कौन है ?.जो सत् असत् का विवेक करता है। शत्रु कौन है ? अपनी ही इन्द्रियां । यदि वश में करली जाय तो यही मित्र हैं । " .

( ३ ) को वा दरिद्रोहि विशालतृष्णः, श्रीमांश्च को यस्य समस्ततोपः जीवन्मृतः कस्तु निरुद्यमोयः, कोवामृतः स्यात्सुखदानिराशा।५। अर्थ-दरिद्री कौन है जिसकी घड़ी तृष्णा हे ? धनवान् कौन है? जिसे. सर्वथा सन्तोष है। जीता हुआ मेरा कौन? जो कोई उद्यम नहीं करता है । अमृत कौन है ? जिसने इन्द्रियजनित सुख भोगों की बांछा छोड़ दी है। पाशोहि को यो ममताभिमानः, संमोहयेत्येव सुरेवका स्त्री। कोवा महान्धो मदनातुरो यो, मृत्युश्च को वाऽपयशस्वकीयम् ।। 'अर्थ-पांश में कौन फैला है जो ममता का अभिमानी है।मदिरा के.समान कौन मोह उत्पन्न करने वाली है? नी । अत्यन्त अन्धा कौन है ? जो कामदेव के वश हो आतुर है । मृत्यु क्या है ? अपना अपयश अर्थात् अपनी यदनामी। को वा गुरुयोहि हितोपदेष्टा, शिष्यस्तु को यो गुरूभक्त एव । को दर्घिरोगों भव एव सांधो, किमौषधन्तस्य विचार एवं ॥ ७॥ अर्थ-गुरु कौन है ? जो हित का उपदेश करे। शिष्य कौन है ? ओ गुरु का भक्त है। दीर्घरोग क्या है ? यह संसार । औषधि इस की क्या है ? विचार किं भूषणाझूपणमस्ति शील, तथिम्परं किं स्वमनो विशुद्धम् । किमत्रहेय कनकं च कान्ता, श्राव्यं सदा कि गुरूंवेदवाक्यम् ।। अर्थ-सव भूपों में भूषण क्या है ? शील ।' सब से बड़ा तीर्थ क्या है ? अपना शुद्ध मन | छोड़ने योग्य क्या है ? सोना और स्त्री अर्थात् लोभ और विषय-भोग निरन्तर सुनने योग्य क्या है ? गुरु और वेद के वाक्य। के हेतवो ब्रह्मगतेस्तु सन्ति, सत्सङ्गतिर्दान विचार तोपाः । के सन्ति सन्तो खिल वीतरागा,अपास्तमोहा स्शिवतत्त्वनिष्ठा।९। अर्थ-ब्रह्मप्राप्ति के हेतु क्या है ? सत्संग, दान, विचार और 44 . ? .

- 10 { ४ ) सन्तोषः। सन्त कौन है ? जिन मैं रागद्वेष नष्ट होगये हैं, जिनका मोह जाता रहा है और जो आनन्दमय आत्मतत्व में लवलीन : हैं। को वा ज्वररमाणभृतां हि चिन्ता, मूर्योऽस्ति को यस्तुविचारहीन: काया प्रिया का शिवविष्णुभक्तिः किं जीवन दोपविवाजितंयत ; 7. अर्थ:प्राणियों का ज्वर क्या है । चिन्ता ।। मूर्ख कौन है..जो विचार हीन है। कौन मिय करने योग्य है: शिव और विष्णु की भक्ति श्रेष्ट जीवन क्या है जो दोष रहित है। विद्याहि का ब्रह्मगतिप्रदाया, बोधोहि कौ:यस्तु विमुक्तिहेतुः को लाम आत्मा वगमोहि यो वै, जितं जगत् केनं मनो हि येन।११ अर्थ-श्रेष्ट विद्या कौनसी है ? : जो ब्रह्मगति को दें सके. पोध क्या है ? जो मोक्षप्राप्ति का साधन, हो,। लाभ क्या है ?.आत्मज्ञान की प्राप्ति । जगत् को किसने जीत लिया है ? जिसने अपना मनः जीत लिया है।... शूरान्महाशूरतमोस्ति को घा, मनोजवाणैर्व्यथितो न यस्तु । प्राज्ञोथ धीरश्च समस्तु को वा, मातो नमोह ललनाकटाक्षः ॥१२॥ अर्थ-सव में वडा शूरवीर कौन है... जौ.कामदेव के वाणों से. पीड़ित नहीं होता है । बुद्धिमान, धीर और समष्टि कोन है ? जो स्त्रियों के कटाक्षों से मोह को प्राप्त नहीं होता है। विषाद्विप किं विपया समस्ता, दु:खी सदा को विषयानुरागी.... धन्योऽस्ति को यस्तु परोपकारी, का पूजनीयः शिवतत्वनिष्ठ :१३ अर्थ-:सव-विषों में तेज.विष कौनसा है ? इन्द्रिय विषय भोग। सदा दुःखी कौन है ? जो इन्द्रिय विपयों में फसा हुआ है. धन्य कौन है ? जो परोपकारी है। सन्मान के योग्य कौन है ? जोआनन्द मय आत्मतत्व में लवलीन है। सर्वांस्वस्थाबपि किन्न कार्यम्, स्नेहश्च पापं विदुषाः प्रयत्नात् । किंवा विधेयो गहनश्च धर्मः, संसारमूलंहि किमस्तिचिन्ता.१४ .. " ३ ..

? - । (' ५: ) '...अर्थ-सव अवस्थाओं में बुद्धिमान को प्रयत्न से क्या नहीं करना चाहिये ? पाप और (पुत्रपौत्रादि में ) मोह । बुधिमान् को यत्न से पया करना चाहिये ? गहन धर्म । संसार की जड़ क्या है ? चिन्ता । विझान्महाविज्ञतमोजीस्त को वां, नार्या पिशांच्या न चं पंचितोयः। का श्रृंखला प्राणभृतां हि नारी दिव्यंवतं किं च समस्तदैन्यम्।१५ "अर्थ- सब से बड़ा ज्ञानी- कोन है ? जो पिशाचिनी नारी के वश में नही,आया है ।प्राणियों के लिये वन्धन क्या है ? नारी अर्थात् विषय भोग- पवित्र प्रत क्या है ? सब पर दया करना.. ज्ञातुन्नशक्य व किमस्ति सर्वे, योपिन्मनोयच्चरितं तदीयं । कादुस्त्यजा सर्वजनैदुराशा, विद्याविहीनः पशुरस्तिकावा ॥१६॥ अर्थ-ऐसी क्या चीज है जिसे कोई नहीं जान सकता है ? श्री का मन और उसका चरित। ऐसी क्या चीज है जिसे सब मनुष्य बड़ी कठिनता से छोड़ सकते हैं? दुराशा अर्थात् विषय भोग की वालों पशु कौन है ?,जो विद्याहीन है। वासो न संगस्सह के "विधियो, मूखैश्च नीचश्व खलश्च पापः। मुमुक्षुणा कि त्वरित विधेय, सत्संगतिनिर्ममतेशभक्तिः ॥१०॥ अर्थ-किन के साथ संग और वास नहीं करना चाहिये ? मूर्ख नीच, खल और पापियों के साथ । मोक्ष चाहनेवालों को क्या फरना चाहिये ? सत्संग, ममता का त्याग और ईश्वर की भक्ति । लघुत्वमूलञ्च किमर्थितेव, गुरूत्वमूलं यदयाचनञ्च । - नातोहि को यस्य पुनर्नजन्म को वा मृतो यस्य पुनर्नमृत्युः।१८ अर्थ लघुता की जड़ क्या हैं मांगना पड़ेपन की जड़ क्या है? परमपद मांगना।जन्मां कौन हैं जिसका फिर जन्म नहीं है। अर्थात्.जो संसारचक्र से छुटगया है।मरा कौन है जिसकी फिर मृत्यु नहीं है मूकोस्ति को वा बधिरश्च को वा, वक्तुं न युक्तं समये समर्थः। तथ्यं सुपथ्यं न शृणोति वाक्य, विश्वासपात्रं न किंमस्तिनारी १९ - .

१ . ? अर्ध-शृंगा कौन है ? जो समय पर ठीक नहीं कह सके। यहरा कौन है ? जो अच्छे पाक्यों को नहीं सुने । विश्वासपात्र कौन नहीं है ? नारी। तत्वं किमेकं शिवमद्वितीय, किमुत्तमं संचरितं यदास्त । : त्याज्यं सुखं किं स्त्रियमेवसम्यग् देयं परं किं त्वभर्य सदैव।॥२०॥ अर्थ- एक तत्व क्या है? आनन्दमयआरंमा जो एकही है। उत्तम क्या है ? अच्छी चाल चलन । कौन सुख त्यागने योग्य हैं ? स्त्री सम्वन्धी सुख सय से बड़ा दान क्या है ? सर्वदा का अभय दान । शत्रोहाशत्रतमस्ति को वा, कामः संकोपानृतळोभतृष्णः । न पूर्यते को विपर्यः स एव, किं दुःखमूलममताभिधानम् ॥२१॥ अर्थ-शनओं में.महाशत्रु कौन है ? क्रोध, असत्, कौन है ? क्रोध, असत्, लोभ ओर तृष्णारूपी इच्छा भोगने से किस की तृप्तिमही होती है। काम अर्थात् घांछाओं की। दुःखकी जड़ क्या है ? ममता । किं मण्डन साक्षरता मुखस्य, सत्यं च किं भूतहितं सदैव । किं कर्म कृत्वा नहिं शोचनीयम्, कामारिकंसारिसमर्चनाख्यम् २२ अर्थ-मुख की शोभा क्या है ? विद्या । सत्य क्या है ? प्राणियों का निरन्तर हित-करना । ऐसा कौन सा.कर्म है जिसको करके सोच नहीं करना पड़ता है ? हरिहर की आराधना । कस्यास्ति नाशे मनसो. हि. मोक्षा, क्व सर्वथा नास्ति भर्यविमुक्तो. शल्य परंक निजमूर्खत्व, के के हुपास्या गुरुदेववृद्धाः ॥२३॥ अर्थ--किस के नांश होने पर मोक्ष है ? मन के । कहां किसी प्रकार का भय नहीं है ? मोक्ष में सबसे बड़ा कंटक क्या है? अपनी मूर्खता । किस किसकी उपासना करनी चाहिये ? देवता.गुर और शुओं की उपस्थिते प्राणहरे कृतान्ये, किमांशु कार्य सुधिया पूर्यत्नात् । .

? . (७) पाकायचित्तैः सुखदं यमन, मुगरिपादाम्बुज चिन्तनं च ॥२४॥ अर्थ-प्राण हरनेवाली मृत्यु के आनेपर बुधिमान् मनुष्य को यलपूर्वक शीघ्रता से क्या करना चाहिये ? मन, वचन और देह ईश्वर के चरण कमलों का ध्यान जो यम को नाश करने वाला और सुख देनेवाला है - के दस्यवः सन्ति कवासनाख्या, शोभते यः सदसिविधः। मातेवकाया सुखंदा सुविचा,किमेधते दानवसात्मविद्या ।। २५।।. अर्थ-चोर कौन है ? धुरी वासनाये । सभा में कौन शोभा, को प्राप्त होता है ? विद्वान् । माता के समान सख नेपाली कौन है? सहिया । कौन सी वस्तु दान करने से यंढ़ती है ? विद्या ।। कुतो हि भीतीस्सतत विधेया, लोकापवादाद्धधकाननाच्च।। कोवास्ति वन्धुः पितरश्चकोवा, रिपत्सहायः परिपालंका ये॥२६॥ अर्थ- हमेशा किस बात से डरना चाहिये ? लोकनिंदा और संसार से । वधु कौन है ? जो विपत्तिमै सहायता करे। पिता समा- न कौन है ,जो पालन करे। युध्वाःन पोध्यं परिशिष्यते किं, शिवप्रसाद:सुखबोधरूपम् । ज्ञाते तु फस्मिन् विदितं जगत्स्यात्, सर्वात्मके ब्रह्मणिपूर्णरूपा२७ अर्थ-वह क्या है जिसके जानने पर फिर वस्तु: जानने लायक नहीं रहती है ? शानरूपी आनन्दमय आत्मतत्वं विह.क्या है ? जिसके. जानने पर सय जगत् जानलिया जाता है। पूर्णरूप: ब्रह्म जो सब की आत्मा है। किं दुर्लभं सद्गुरुरस्ति लोके, सत्संगतिह्माविचारणञ्च । स्यागोहि सर्वस्व शिवात्मवोधः, को.दुर्जयस्सर्वननैमनोजः ॥२८॥ अर्थ-जगत् में दूर्लभ क्या है ? सद्गुर, ब्रह्म का विचार, सङ्गति आनन्दमय आत्मा का ज्ञान और संसार की सब बस्तुओं का त्याग ऐसी क्या.यस्तु है ? जो बडी काठनाई से जीती जाती है कामदेव . : . ?

( ) 1 - पंशोः पशुः को न करोति' धम्मे, मंधीत शास्त्रोपि न चात्मवोधः। किं तद्विपभाति सुधोपमं स्त्री के शत्रचो मित्रवदात्मजाद्याः २९ अर्थ-पशुओं का पशु कौन है जिसने शान्न पंढकर भी आत्मयोध प्राप्त नहीं किया है और जो धर्म नहीं करता है। वह कौनसा है जो अमृत के समान दिखाई देता है? वह विप स्त्री है। वे कौन स शत्र हैं जो मित्र समान दिखाई देते हैं ? पुत्र पौत्रादि दिधचल कि धनयविनायु, दीन परं किं च सुपात्रदत्तम् । कण्ठंगतैरप्य सुमिन कार्यम्, कि कि विधेयं मलिन शिवा ॥३०॥ अर्थ-विजली के समान चंचल वस्तु क्या है ? धन योवन और, आयु । सबसे बड़ा दान क्या है। जो सूपात्र को दिया:जाय कंउगत. प्राण होने पर भी क्या नहीं करना चाहिये? पाप., क्या करना चाहिये शिव की पूजा अर्थात् ईश्वर-भजन. अहर्निशं किं परिचिन्तनीयं, संसारमिथ्या शिवात्मतत्वम् । कि कर्म यत्पीतिकरं मुरारे, क्वास्थान कार्या सततं भवान्धौ ३श अर्थ-रात दिन क्या चिन्तना करना चाहिये। संसार मिथ्या है और आनन्दमय आत्मा ही. सत्य है। कार्य कौनसा.अछी है ? जो ईश्वर को प्रेशन करने वाला हो। किस.मे.बुद्धिःस्थिर नहीं करनी चाहियें संसार सागर में कण्ठं गता वा श्रवण गंताचा प्रश्नोत्तराख्यामणिरत्नमाला :: तनोतु मोदं विदुषां सुरम्यं, रमेशगौरीशकथेव सद्यः । ३२ ।। अर्थ यह प्रश्नोत्तर नाम को रत्नमाला सुनने और पढ़ने पर विद्वानों को हरिहर कथा के समान बड़ा आनन्द देता है। , - 14 مهرمیه (९) नै E श्रीमती महारानी मन्दालसा. का उपदेश शुद्धोति रे तात ! नतेऽस्ति नाम कृतं हि तें. कल्पनयाऽधुनैव । पञ्चात्मकं देहमिदंतवैतवास्य त्वं रोदिपि कस्य हेतोः ॥ १॥ अर्थ-हे पुत्र ! तू शुद्ध है. तेरा नाम नहीं है यह नाम अभी कल्प- ना से रक्खा गया है यह देह पञ्चभूतों का है तेरा नहीं, न तू इसका है, तू किस लिये रोता है॥॥ वा भवान् रोदिति वै स्वजन्मा शब्दायमासाथ महीशमनुम् विकल्प्यमाना विविधागुणास्तें गुणाश्च भौताःसकलेन्द्रियेषु ॥२॥ अर्थ-अथवा तूं नहीं रोता है यह शब्द तो राजा का पुत्र जो देह है उसको वतला रहा है, इन्द्रियो में भूतों के गुण हैं तेरे नहीं। भूतानि भूतैः परिदुर्बलानि वृद्धिसमायान्ति यथेह. पुंसः । अन्नान्युदानादिभिरेव कस्य नतेऽस्ति वृद्धिनच तेस्ति हानिः॥३॥ : अर्थ-जिस प्रकार बाय भूत भूतों के योग से वृद्धि को प्राप्त होने है उसी प्रकार अन्न जलादि-फे दान से.पुरुष के शरीरस्थ भूतों ही की वृद्धि होती है, तेरी न वृद्धि है न हानि है ॥ ३ ॥ . . त्वं कञ्चुके शीर्यमाणे निजेऽस्मिस्तस्पिश्चदेहे मूढ़तां मां व्रजेथाः । शुभाशुमैः कर्मभिर्देहमेसन्मदादिमूढः फञ्चुकस्ते पिनदः ॥४॥. अर्थ-देह रूपी कपड़े के फटने से तू मूर्खता को मत प्राप्त हो शुभाऽशुभ कर्मों से यह देह रूपी कपड़ा बना है, मदआदिकों से इस में फस गया है॥४॥ तातेति किञ्चित्तनयोतिकिञ्चिदम्बेति किञ्चद्दयितेतिकिञ्चित् । भवेति किंचिन्नममेति किचित्रं भूतसंघ.बहुमानयेथाः ॥ ५ ॥ अर्थ-किसी-को पिता किसी को पुत्र किसी को माता किंसी को खी किसी को मेरा और किसी को पराया मत समक्ष यह सब भूतों का समूह है ॥ ५॥ .

.. (1.) दुःखान दुःखोपशमाय भोगान् सुखाय जानाति विमूढचेताः। तान्येव दुःखानि पुनः सुखानि जानात्यविद्वान् सुविडचेताः॥६॥ अर्थ-मूर्ण पुरुप दूःख ही को दूःख की शान्ति का उपाय सम- झता है और भोगों को जो बार-२, दूःख देने वाले हैं सुख का उपाय समझता है ॥ ६ ॥ हासोऽस्थिसन्दर्शनमाक्षयुग्ममत्युज्ज्वलं तर्जनमनायाः। :.' कुचादि पीनं पिशितं धनं तत् स्थान रते किं. नरकन योपित् ७ अर्थ-ईसी हड्डियों का दिखाना है, सुन्दर नेत्रों का जोड़ा हो का तर्जन ( कोड़ा है। मोटे स्तन माल के लोंदे हैं, रति (समागम फरने ) का.स्थान गन्दा है क्या स्त्री नरक नहीं है। यानं क्षितौ यानगंतञ्च देहं देहेपि चान्यः पुरुषो निविष्ठः । ममत्वबुद्धिर्न तथा यया स्वे देहेतिमात्रं वत मूढ़तया ॥ ८ ॥ अर्थ-पृथ्वी पर यान ( संवारी) हे संवारीमें देह, देह में भी और पुरुष बैठा हुआ है ममता जैसी देह में ऐसी उन में नहीं यह पड़ी भारी मूर्खता है ॥ ८॥ शक्रार्फयमसोमानां तदायोमहीपतिः। रूपाणि पञ्च कुर्वीत महीपालनकर्मणि ॥ १ ॥ अर्ध-पथिवी की रक्षा के लिये राजा इन्द्र, सूर्य, यम; चन्द्रमा, आयु इन पांचो के रूपोंको धारण करे ॥१॥ यथेन्द्रश्चतुरो मासान् तोयोत्सर्गेण भूगतम् । आप्याययेत्या लोकं परिहारैर्महीपतिः ॥ २॥ अर्थ-जैसे इन्द्र (मेघ) चार मांस वर्षा करने से पृथिवी को प्रसन्न करता है इसी प्रकार उपहारों से राजा प्रजा को प्रसन्न करे ॥२॥ मासानष्ठो यथा यस्तोयं हरति रश्मिभिः । सूक्ष्मणैमाभ्युपायेन तथा शुल्कादिक नृपः॥ ३ ॥ .

1 (११) अर्थ-जैसे सूर्य आठ मास किरणों से अल हरता है. इसीप्रकार सूक्ष्म उपाय से राजा कर लेवे ॥३॥ यथा यमः मियेश्य माप्तफाले नियच्छति। . : तथा पियापिये राजा दुष्टादुष्टे समो भवेत् ॥ ४ ॥ अर्थ-जैसे यम पुण्यात्मा और पापी को समय पर मारता हैं इसी प्रकार दुष्ट और साधु को दण्ड देने में राजा सम होवे ॥४॥ पूर्णेन्दुमालोक्य तथा प्रतिमान जायते नरः । एवं यत्र पूजाः सर्वा निवृत्तास्तच्छशिवव्रतम् ॥ ५॥ अर्थ-जैसे पूर्ण चंद्रमा के दर्शन से प्रजा को प्रसन्नता होती है. इस.. प्रकार जिस के दर्शन से प्रसन्न हो वह चन्द्रमा का.त्रोत है ॥५॥ मारुतः सर्वभूतेषु निगूढश्चरते यथा । एवं नृपश्वरेच्चारैः पौरामात्यादिवन्धुपू. ॥ ६ ॥ अर्थ-जैसे पवन संव भूतों में गुप्त होकर विचरता है इसी प्रकार पौर मन्त्री और सम्बन्धियों में गुप्त दूतों के द्वारा राजा. विचरे ॥६॥ न कोभावा न कामाद्वां नार्थावा यस्य मानसम् । पथान्धः कृष्यते वत्स! स. राजा. स्वर्गमृच्छति ॥ ७॥ अर्थ-अधेि के सदृश जिस राजा काभन.लोम से, फाम से, घा धम से नहीं खिचंता,वह राजास्वर्ग को प्राप्त होता है॥७॥ उत्पथग्राहिणो मूढान् स्वधर्माचलतो नरान् ! ... यः करोति निजे धर्म स राजा स्वर्गमृच्छतिः ॥ ८ ॥ अर्थ-अपने धर्म को त्याग कर कुमार्ग में चलते हुए मनुष्यों को जो अपने धर्म में स्थित रखता है वह राजा स्वर्ग को प्राप्त होता हैद ':. : वर्णधर्मानःसीदन्ति यस्य राज्ये तथाश्रमाः । वत्स ! तस्य सुखं प्रत्यं परत्रेह व शाश्वतम् ॥ ९॥ अर्थ-जिस राजा के राज्य में घों और आश्रमो के धर्म शिथिल .

: (१२) नहीं होते, हे पुउसको इस लोक और परलोक में निर्विन सुख प्राप्त होता है॥९॥ एतद्राज्ञः परं कृत्यं तथैतत्सिद्धिकारकम् । खधर्मस्थापनं नृणां चाल्यते यत्कुयुदिभिः ॥ १० ॥ अर्थ-यही राजा के लिये परमकर्तव्य है यही सिद्धिकारक है जो मनुष्यों को अपने २ धर्म में स्थापन करता है क्योंकि मुर्स पुरुष अपनी मूर्खता से इसको विगाड़ते रहते हैं ॥ १० ॥ 'पालनेनैव भूतानां कृतकृत्यो महीपतिः । सम्यक्पालयिता मागं धर्मस्याप्नोति यत्नतः ॥११॥ अर्थ-भतों के पालने ही ले राजा कृतकृत्य ( कामयार ) होता है यत्म से भरे प्रकार पालन करने वाला राजा प्रजाके धर्म काभागी होता है ॥११॥ अलक ने कहा हे माता! आपने कहा कि वर्णों और आश्रमों के धर्म फा पाइन करना क्षत्रिय का परम धर्म है,आप कृपा करके मुझे वों और आश्रमों के धर्म बतलायें। मातोवाच-:: दानमंध्ययनं यज्ञो ब्राह्मणस्य त्रिधा मतः । नान्यश्चतुर्थो धोस्ति पुत्र ! तस्यापदं विना ॥१॥ अर्थ-दान, अध्ययनः यजै यह तीन धर्म ब्राह्मण के हैं, है पुत्र! विपत्ति के बिना ब्राह्मण का चौथा धर्म नहीं है ॥१॥ याजनाध्यापने शुद्धे तथा पूतपारिग्रहः। एषा सम्यक् समाख्याता त्रिविषा चास्य जीविका।। अर्ध-यज्ञ कराना, शुद्ध, पुरुषों को विद्या पड़ाना.पवित्र पुरुषों से दान लेना यह तीन जोविकार्य है ॥२॥ ::. दानमध्ययनं यज्ञः क्षत्रियस्थापन निया...:... - ! . .

(१३) धर्मः प्रोक्तः क्षितरक्षा शस्त्राजीवञ्च जीविका ॥ ३॥ अर्थ दान, अध्ययन, यश क्षत्रिय के भी यही तीन धर्म है शख. धारण करके पृथिवी की.रक्षा करनी जीविका है॥३॥ दानमध्ययनं यज्ञो वैश्यस्यापि त्रिधैवसः। । वाणिज्यं पाशुपारपञ्च कापश्चवास्थ जीविका ॥४॥ अर्थ-वैश्य के 'भी यही तीन.धर्म हैं, वाणिज्य, पशुरक्षा, और खेती, यह तीन जीविकार्थ है: ४ ॥ दानं यज्ञोथ शुश्रूषा द्विजातीनां विधा मता। । व्याख्यातः शूद्रधर्मोपि जीविका कारुकर्म च ॥५॥ अधदान यज्ञ, और द्विजातियों की सेवा यह सीन शूद्र के धर्म हैं, कारुकर्म (शिल्पविद्या ) इसकी.जीविका है ५ ॥ सद्विजातिशुश्रूषा पोषणं क्रयविक्यौ । ... वर्णधर्मास्त्विमे पोक्ताः श्रयन्तां-धाश्रमाश्रयाः ॥ ६॥ अर्थ-इसी प्रकार द्विजातियों की सेवा पशु, पालन, क्रय विक्रय (मोललेना.वेचना.),यह भी शूद्र के धर्म है । यह वर्णों के धर्म हैं, आश्रमो के धर्म सुन-॥ ६॥ स्ववर्णधर्मात् संसिद्धि नरः पाप्नोतिन च्युतः । पूयाति नरकं पेत्य प्रतिषिद्धनिपेवणात् ।।७।। अर्थ-अपने वर्ण के धर्म से ही.पुरुष सिद्धि को प्राप्त होता है धर्ण धर्म से गिरा हुआ पुरुष सिद्धि को नहीं प्राप्त होता है। प्रत्युत निषिद्ध वस्तुओं के सेवन से मरकर नरक को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ यावतु.नोपनयन: क्रियते वै द्विजन्मनः । : कामचेष्टोतिभक्ष्यश्च तावद् भवति पुत्रक ! ॥८॥ अर्थ-हे पुत्र ? जबतक.द्विजाति का.उपनयन. नहिं किया जाता है तबतक खेखने खाने और बोलने में कामयार (स्वतंत्र.) हैं .

(१४). कृतोपनयनः सम्यग् ब्रह्मचारी गुरोहे । - वसेत्तत्र च धर्मोऽस्य कथ्यते तं निवोध में ।।.९॥ अर्थ-उपनयन करके ब्रह्मचारी गुरु के. घर में पसे। यहां पर उस का जो धर्म है वह तू सुन ॥ ९॥ “स्वाध्यायोऽधाग्निशुश्रूषा स्नानं भिक्षाटनं तथा । गुरोनिवेद्य तवाद्यमनुज्ञातेन सर्वदा ॥:१०.॥ . अर्थ-स्वाध्याय, अग्निहोत्र; स्नान, सदा भिक्षा करके गुरु के अर्पण करके गुरु की आज्ञा से भोजन करे ॥ १० ॥ गुरोः कर्मणि सोद्योगः सम्यक् प्रीत्युपपादनम् । तेनाहूतः पठच्चैव तत्परो नाऽन्यमानसः ।। ११.॥ अर्थ-यत्न से गुरु सेवा करे, गुरुको भली प्रकार प्रसन्न करेगुरु के बुलावे पर पढ़े गुरु के चरणों में तत्पर रहकर अन्य विषयों से चित्त को हटाता हुंआ-॥११॥ . एक द्वैलफलान् तापि वेदान् माप्य गुरोर्मुखाई । अनुज्ञातोऽथ वन्दित्वा पक्षिणां गुरवेः ततः ॥ १२ ॥ अर्थ-एक, दो या सब वेदों को गुरुंमुख से पढ़ आशा ले गुरु दक्षिणा दे नमस्कार करे-॥१२॥...... गाईस्थ्याश्रमकामस्तु गृहस्थाश्रममावसेत् । वानप्रस्थाश्रयं वापि चतुर्थ चेच्छपात्मनः ॥ १.३.।। अर्थ- अपनी इच्छानुसार गृहस्थ वानप्रस्थ वा सन्यासाश्रम को अहण करे ॥ १३ ॥:::: तत्रैव वा गुरोर्गेहे द्विजो निष्टामवाप्नुयात् ।। :: गुरोरंभावे यत्पुत्र तच्छिश्ये तत्सुतं विना !! १४ ॥ अर्थ-या गुरु ही के घर में ब्रह्मचर्य को पालन करता हुआ मृत्यु को प्राप्त होवे, गुरु के अभाव में उसके पुत्र के घर में और पुत्र . . .

. . (.१५) के अभाव में गुरु के शिष्य के घर में शेष ब्रह्मचर्य को पूर्ण करे ॥१४ शुश्रपूर्निरभिमाना ब्रह्मचर्याश्रमं वसेत् ।" उपात्तस्ततस्तस्माद् गृहस्थाश्रमकाम्यया ॥ १५ ॥ ततः समां शुद्धकुंलां तुल्यां भार्यामरोगिणाम् । उदहेन्न्यायतोऽव्यंगा 'गृहस्थाश्रमकारणात् ॥ १६ ॥ अर्थ-अभिमान को त्यागकर सेवा करता हुवा ब्रह्मचर्याश्रम में बसे, गुरुकुल से समावर्तन करके गृहस्थाश्रम की इच्छा से अपने से पृथक् गोत्र और कुल वाली अपने सघश रोग रहित पूर्णाङ्ग कन्या से गृहस्थ धर्म को पूर्ण करने के लिये विवाह करे ॥ १५,१६ ॥ स्वकर्मणां धनं लब्ध्वा पितृदेवातिथीस्तथा । .: सम्यक् सम्पीयन् भक्त्या पोपयेच्चाश्रितास्तथा।१७ . :: अर्थ-अपने २..वर्णाश्रम के उचित फ से धन..'उपार्जन करके भक्ति से पितर, देवता, अतिथियों की भली प्रकार तृप्तं करता हुवा अपने आश्रितों को पाले । १७॥ ! - : भृत्यात्मजान् जामयोथ दीनान्धपतितानपि । . :.यथा शक्त्पन्नदानेन पांसि पशवस्तथा ॥ १८ ॥ अर्थ-भृत्य, पुत्र, जामि, (मावसी, फुफी, आदि ) दीन, अम्ध पतितो तथा पक्षि और पशुओं को यथाशक्ति अन्न दान से पालनकरे।।८ एष धर्मो गृहस्थस्य ऋतावभिगमस्तथा । पञ्जयज्ञविधानन्तु यथाशक्ति न हापयेत् ॥ १९ ॥ अर्थः यह गृहस्थ.का धर्म है बेस ही ऋतु काल में. स्त्रीसंग भी गहस्थ का धर्म है, जहांतक.सामर्थ्य हो पञ्चयज्ञ विधि को न त्यागे ॥१९॥ '' पितॄदीतीर्थज्ञातिभुक्तशेष स्मपं नरः । भुञ्जति च समं भृत्यैर्यथाविभवमादृतः ॥ २० ॥ अर्थ पितर, देवता, अतिथि और सम्बन्धियों के भोजन कर .

। - (१६) चुकने पर नौकरी के सहित धनानुसार नाना प्रकार भोजन करे.२७ एपतूदेशतः प्रोक्तो गृहस्थस्याश्रमो मया । वानप्रस्थस्य धमन्ते कथयाम्यवधार्यताम् ॥ २१ ॥ अर्थ--यह गृहस्थाश्रम मैने संक्षेप से कहा अब वानप्रस्थ का धर्म फहती.हूं सो त श्रवण कर ॥ २१ ॥ अपत्यसन्तति दृष्ट्वा प्राज्ञो देहस्य क्षीणताम् । वानप्तस्थाश्रमं गच्छेदात्मनः शुद्धिकारणात् ।। २२ ।। अर्थ-पुत्र के पुत्र को देख कर और अपने देह को अवनति देखकर मन की सुद्धि के लिये वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करे ॥ २२ ॥ तत्रारण्योपभोगश्च तपोभिश्चानुकर्षणम् । भूमौ शय्या ब्रह्मचर्य पितृदेवातिथिक्रिया ।। २३ ।। अर्थ-वहां धन की वस्तुओं से निर्वाह करे, तप से शरीर को सुखावै पृथिवी पर सोत्रे, ब्रह्मचर्य को पालन करता हुवा पितर, देवता तिथियों की सेवा करे ॥ २३ ॥ !' : होमस्तिषवणस्नानं जटावर फलधारणम् । :: : यागाभ्यासः सदात्तैव वन्यस्नेहनिवणम् ॥ २४ ॥ अर्थ-होम करे तीन काल श्नान करे, जटा और वृक्षों की छाल को धारण करे, सदा योगाभ्यास करे और बनवासीयों के साथ मेह करे ॥ २४॥ "".इत्येष पापशुद्धचमात्मनश्चोपकारकः । वानप्रस्थाश्रमस्तस्माद् भिक्षोस्तु चरमोऽपरः ॥ २५ ॥ अर्थ-अपने पापो की शुद्धि के लिये और संर्वभूती के उपकार लिये यह वानप्रस्थ आश्रम है, इस से आगे अन्तिम आश्रम सं. त्यासी का है ॥२५॥ चर्तुथस्य स्वरूपन्तु श्रयतामाश्रमस्य मे। ܕܝܐ - (१७) यः स्वधर्मोऽस्य धर्मः प्रोक्तस्तात ! महात्मभिः ॥२६॥ अर्थ-अव चतुर्थ आश्रम कास्वरूप और धर्मश महात्माओं ने जो इसका धर्म कहा है सो तूं सुन ॥ २६ ॥ सर्वसङ्गपरित्यागा ब्रह्मचर्यमकोपता । यतन्द्रियत्वमापास नैकस्मिन् वसतिश्विरम् ।। २७ ।। अर्थ-सब के संग का त्याग, ब्रह्मचर्य, क्रोध न करना, इन्द्रियों को जीतना एक स्थान में देर तक न रहना.॥ २७ ॥ अनारम्भस्तथाहारो भैक्षानेनैककालिना..... आत्मज्ञानाववोधेच्छा तथांचात्मावलोकनम् ॥ २८ ॥ अर्थ किसी कामको आरम्भ न करना; एक काल के अन्न से भोज- 'जना करना, आत्मज्ञान की इच्छा और आत्मा का ध्यान ॥ २८ ॥ चतुर्थेत्वाश्रमे धर्मो; मसायं ते निवेदितः । । सामान्यमन्यवर्णानामाश्रमाणां च.मे मृणुः ॥.२९ ।।. अर्थ-यह मैंने.चतुर्थ आश्रम का धर्म कहा है। अब वों और आश्रमों के साधारण धर्म को तूं सुन ॥ २९ सत्यं शौचमहिंसां च अनसूया तथा क्षमा । आनृशंस्यमकार्षण्यं सन्तोपश्चाष्टमी गुणः ॥ ३० ॥ एते संक्षेपतः प्रोक्ता धर्मा वर्णाश्रमेषु ते । ऐतेषु च स्वधर्मेपु स्वेषु तिष्ठेसमन्ततः ।। ३१ ॥ अर्थ-सत्य, शौच, अहिंसा अनसूया (हसदन करना ), क्षमा, आनुशस्य (किसी को भूख न देना), अकार्पण्य (उदारता), आ- ठवां सन्तोप, संवावों और आश्रमों के यह संक्षेप से धर्म कहे है, इन धर्मों में और अपने २ वर्ण: आश्रम के धर्मों में पुरुष सदा 'स्थित रहे ॥३०॥ ३॥ 'यश्चोल्लङध्य स्वकं धर्म स्ववर्णाश्रमसंज्ञितम् नरोन्यथा प्रवर्तेत सदण्ड्यो भूभृतो भवेत् ॥ ३२ ।। अर्थ-अपने वर्ण आश्रम के धर्मको उल्लंघन करके जो पुरुष विरुद्ध आचरण करे उसको दण्ड देना.राजा का धर्म है ॥३॥ । .04.1.

4. -- ....: ये च स्वधर्मसन्त्यागात्पापं कुर्वन्ति मानवाः । " उपेक्षंतस्तान्नृपते रिष्टापूर्त प्रणश्यति ॥ ३३॥ अर्थ-अपने धर्म का त्याग करके जो मनुष्य पाप करते हैं उनकी उपे- क्षा करने वाले राजा के यज्ञ, दान, आदि सब नष्ट होजाते हैं ॥ ३३॥ तस्माद्रीज्ञा प्रयत्नेन सर्वे वर्णाः स्वधर्मतः । प्रवर्वन्तोऽन्यथा दण्डथा स्थाप्या वैवस्वकर्मणा ॥३४॥ अर्थ-इसलिये अपने धर्म से विरुद्ध भाचरण करने वाले पुरुषों को राजा यत से दण्ड देकर अपने २ कर्मों मे स्थापन करे ॥ ३४॥ वत्स ! गार्हस्थ्यमादाय नर सर्वमिदं जगत् । मुष्णाति तेन लोकांथ स जयत्यभिवाञ्छितान् ॥शा अर्थ- हे पुत्र । गृहस्थाश्रम में स्थित होकर मनुष्य सारे जगत् को पालता.है उस सेवान्छित.सुंखों को प्राप्त होता है॥१॥ पितरों मुनयों देवा भूतानि मनुजास्तथा । कृमिकीटपत साथ व्यासि पशवोऽसुराः ॥ २॥ गृहस्थमुपजीवन्ति सतस्तृप्ति पूयान्ति च । मुख चास्य निरीक्षन्ते अपि नो दास्यतीति वै ॥३॥ अर्थ-पितर, मुनि, देवता, अन्य जीव, मनुष्य, कृमि कीट, पतं पक्षि और पशु गृहस्थ ही से जीविका पाते हैं उसीसे तृप्ति को प्रागव होते हैं इस के मुखं को देखते रहते हैं कि हमें देवेगा ॥२, ३॥.: :: सर्वस्यापारभूतेयं वत्स ! धेनुवयीमयी । ... यस्यां प्रतिष्ठितं विश्वं विश्वहेतुश्च या मता ॥ ४॥ अर्थ-हे पुत्र ! वेद, रूपी गौ सव. का आधार है जिस में सारा जगत् स्थित है और जो जगत् का कारण हैं।॥ ४ ॥ ऋक्पृष्टासौं यजुर्मध्या सामवक्ताशिरोऽधरा ! - इष्टापूतिविषाणा च साधुसूक्ततनूरुहा ॥ ५॥ .. H - ." . ( १९) शान्तिपुष्टिक्षीरघृता वर्णपादपूतिष्ठिता।.. आजीव्यमाना जगतां साक्षया नापचीयते ॥६॥ अर्थ-ऋग्वेद जिसकी.पीठ यजुर्वेद जिसका पेट है सामवेद मुख के स्थान और अथर्ववेद ओष्टों के स्थान है, इष्ठ पूर्त यक्ष सींग हैं सूक्त याल (लोम) शान्ति दुग्ध और पुष्टिं जिसका घृत है, वर्ण रूपी पादों पर स्थित है सारे जगत को जीवन देती हुई भी 'दुर्बल नहीं होती॥५॥६॥ स्वाहाकारस्वधाकारौ वषदकारश्च पुत्रक.! हन्तकारस्तथाचान्यस्तस्याः स्तनचतुष्टयम् ॥७॥ अर्थ-स्वाहाकार स्वीकार,वषट्कार, हन्ताकार, यह चार उस के स्तन हैं ॥७॥ स्वाहाकारस्तनं देवाः पितरश्च स्वधामयं । मुनयश्च वषट्कारमुपजीवन्ति तत्स्तनम् ॥८॥ अर्थ--स्वाहाकार स्तन को देवता, स्वधाकार को पितर और षषदकार को मुनि पीते हैं ॥5॥ इन्तकारं मनुष्याश्च पिवन्ति सततं. स्तनम् । एवमाप्याययत्येषा वत्स! धेनुत्रयीमयीः ।। ॥९॥ अर्थ-हन्तकार रूपी स्तनं को मनुष्य पीते हैं अर्थात् देव पूजा स्वाहा शब्द से, पितृ पूजा स्वधा शब्द से, मुनि पूजा वषट् शब्द से होती है अन्य सामान्य मनुष्यों को जो अन्नादि दिये जाते हैं, हम शब्द से दिये जाते हैं इस प्रकार वेद रूपी धेनु सब को तृप्त कर रही है ॥९॥ . तस्या उच्छेदकर्ता च यो नरोऽत्यन्तपापकृत । स तमस्यन्धतामिस्त्रे, तामिनेच निमज्जात -॥ १० ॥ अर्थ-जो पुरुष उसका उच्छेद (वेद मार्ग का भ्रंश) करता है यह-अत्यन्त पापी है अन्धतामिन नाम नरक अर्थात् अशान प्रधान योनियों को प्राप्त होता है ॥ १० ॥ 7 - ( २० ). यश्चमां मानको धेनुं स्ववत्सरमरादिभिः । पाययत्युचित काले स स्वर्गीयोपचते ॥ ११ ॥ अर्थ-जो पुरुष इस धेनु से 'देवादि वछड़ों को समय र दुध पिलाता है वह स्वर्ग (सुखं ) को प्राप्त होता है.॥ १६॥ तस्मात्पुत्र ! मनुष्येण देवपिपितमानवाः । भूतानि चानुदिवस पोष्याणि स्वतनुर्यथा ॥१२ ।। अर्थ-इसलिये हे पुत्र गृहस्थ को चाहिये कि प्रतिदिन देवता ऋषि, पितर और मनुश्यों को अपने शरीर समान पाले॥ १२ ॥ ....... तथाच-एव पुत्र. गृहस्थन.देवताः पितरस्तथा। सम्पूज्या हव्यकव्याभ्यामन्नेनातिथिवान्धवाः ।..१ ॥ भुवानि भृत्याः सकली पशुपक्षिपिपीलिकाः । भिक्षवो याचमानाश्च ये चान्ये वसतागृहे ॥ २ ॥ ... संदाचारवता तातः साधुनी गृहमेधिना. ...... पापं भूदक्ते समुल्लथ्य नित्यनैमित्तिकी क्रियानाशा है पुत्र ! घर में रहने वाले गृहस्थ को चाहिये कि सदाचारी और साधु (परोपकारी) वन फर नित्य उत्तमोत्तम अन्नों (भोजनों ) से देवता, पितर, अतिथि,-सम्वन्धि, सेवक, पशु, पक्षी चीऊंटी पर्यन्त जीवों की और इसके घर में जो संन्यासी भिक्षा लेने आये हो उन की नित्य पूजा करे जो गृहस्थ नित्य ( सन्ध्यावन्दनादि.) नैमित्तिक (गर्भाधानादि ) कर्मों को त्याग कर भोजन करता है वह पाप करता है ॥ ११२,३, ॥ अलर्क ने कहा है माता! आप ने नित्य नैमित्तिक कर्म बतलाये अब मैं सदाचार सुनना चाहता हूं जिसके करने से. पुरुष इस लोक और परलोक में सुख पाता है। मातोवाच- गृहस्थेन सदा कार्यमाचारपरिपालनम्। नह्याचारविहीनस्य सुखमत्र परत्र वा ॥ १ ॥ 'अर्थ-हे पुत्र ! गृहस्थ को सदा आचार को पालना करनी चाहिये आचार हीन पुरुष को न इस लोक में सुख होता है औरन परलोकी M , .

( १ ) 'यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये । भवन्ति यः सदाचार समुल्लध्य भवर्तते ॥२॥ अर्थ-जो पुरुष सदाचार का त्याग करता. है उसके किये हुचे यज्ञ, दान, तप, कल्याणकारी नहीं होते ॥ ३॥ दुराचारोहि पुरुषों नेहायुर्विन्दते महत् । कार्यों यत्नः सदाचार आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ ३ ॥ अर्थ-दुराचारी पुरूप दीर्घायु नहीं होता एवं सदाचार में यत्न फरना चाहिये सदाचार बुरे लक्षणों को दूर कर देता है ॥३॥. तस्य खरूपं वक्ष्यामि सदाचारस्य पुत्रक! : तन्ममैकमनाः श्रुत्वा तथैव परिपालय ॥४॥ अर्थ- हे पुत्र! मैं तुझे सदाचार का स्वरूप बतलाती हूंतू एकमन होकर सुन और उसी प्रकार उनका पालन कर॥४॥ त्रिवर्गसाधने यत्नः कर्तव्यो गृहमेधिना। तत्संसिद्धौ गृहस्थस्य सिदिरन परत्र च ॥५॥ .: अर्थ-गृहस्थ को धर्म धन और काम इन तीनों की सिद्धि में यल करना चाहिये तानों की सिद्धिं सें गृहस्थों को इस लोक और परलोक में सिद्धिाहै ॥५॥ पादेनार्यस्थ पारव्यं कुर्याद सञ्चयमात्मवान् । अर्धेन चात्मभरण नित्यनैमितिकान्वितम् ॥६॥ अर्थ-अपने आय के चतुर्थाश से परलोक का.साधन जो धर्भ उसका सञ्चय करे और आधे से नित्यं नैमित्तिक कर्म करता हुवा कुटुम्य का पालन करें ॥६॥ पादचात्मार्थमायस्य मूलभूतं विवधयेत् । एवंमाचरितः पुत्र । अर्थः साफल्यमर्हति ॥ ७ ॥ अर्थ-आय के चतुर्थाश का सञ्चय करता हुवा-उस-सञ्चित मूल धन'को बढाता रहे। हे पुत्र ! इस प्रकार वर्त्तने वाले पुरुष का धन सफल होता है ॥७॥ तद्वन पापनिषेधार्थ धर्मः कार्यों विपश्चिता।

. -- ( २२). परत्रार्थ तथैवान्यः काम्योऽत्रैव फलप्रदः॥४॥ अर्थ-उसी प्रकार पापों को दूर करने के लिये और परलोक में सहायता के निमित्त बुद्धिमान् पुरुष धर्म करे इस लोक में फल सिद्धि के लिये सकाम कर्म भी करना चाहिये ॥८॥ प्रत्यपायभयाकाम्यस्तथान्यश्चाविरोधवान् । द्विधा कामोपि गतितस्त्रिवर्गरयांविरोधतः ॥९॥ अर्थ-त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) के साथ विरोध न होने से सकाम कर्मों को दो प्रकार का कहा है एक जो विरोध के भय से अर्थात् भीड़ पड़ने पर किया जावे और दुसरा जो विना विरोध के किया जावे ॥९॥ परस्परानुबन्धाश्च सर्वानेतान्विचिन्तयेत् । विपरीतानुबन्धाश्च धर्मादास्तान भृणुष्वमे ।। १० ॥ अर्थ-धर्म, अर्थ, काम इन तीनों के परस्पर सम्बन्धी बातों को सोच जिसप्रकार उनका परस्पर सम्बन्ध होता है वह तू सुन॥१०॥ धर्मो धर्मानुवद्धाणे धर्मों नात्मार्थवाधकः । उभाध्यां च द्विधा कामस्तेन तो च.द्विधा पुनः ॥११॥ अर्थ-धर्म ऐसा करे जो धर्मानुकूल धन का पैदा करने वाला हो, ऐसा धर्म न करे जो अपने धन को हानि पहुंचाने वाला, हो, धर्म और धन इन दोनों से युक्त काम को भोगे.और काम से युक्त धर्म ! और धन को पैदा करे ॥ ११ ॥ ब्राह्म मुहूत बुध्येतं धर्मार्थों चानुचिन्तयेत ! ‘समुत्याय तथा चम्य पाङ्मुखो नियतः शुचिः ॥१२॥ अर्थ-ब्राह्म मुहूर्त में जागकर धर्म और अर्थ को सोचे तदनुः उठकर स्नान कर पवित्र होकर पूर्व की ओर मुख करके आचमनकरे ॥१२॥ पूर्वा संध्या सनक्षत्रां पश्चिमा सदिवाकराम् । '. उपासीत यथान्यायं नैतां जह्यादनापदि ॥ १३ ॥ अर्थ-पूर्व सन्ध्या तारों के देखते हुए और पश्चिम सन्ध्या सूर्यास्त से आरम्भ करके नियम से उपासना करें, बड़भारी दाख के विना सन्ध्या का कभी त्याग न करे ॥ १३ ॥ ३ 4.

(२३)
असत्यूलापममृतं वाक्पारुष्यं च वर्जयेत् ।
असच्छास्त्रमसद्वादमसत्सेवाञ्च पुत्रका ।। १४ ।।
अर्थ नीचं पुरुषों से वार्तालाप न करे झूठ और कठोर बचन न
घोले, असत्य ग्रन्थ न पढ़े, झूठा झगड़ा और नीच पुरुषों की
सेवा त्यागे ॥१४॥
• सायं प्रातस्तथा होम कुवात नियतात्मवान् ।
नम्नां परस्त्रियं नेक्षेत निन्दा कुर्यानः कस्यचित् ॥१५॥
अर्थ-सायं प्रात: नियम से होम करे, परस्त्री को नग्न न देखे
और किसी की निन्दा न करे ॥१५॥ ॥
पितृदेवमनुश्याणां भूतानां च तथार्चनम् ।
कृत्वा विभवतः पश्चाद् गृहस्थो भोकमर्हति ॥ १६ ॥
अर्थ-यथा शक्ति पितर, देवता.और अन्य मनुयों की पूजा कर
के गहस्थ को भोजन करना चाहिये ॥ १६ ॥
उपयातादृते दोष नान्यस्योदीरयेवुधः ।
प्रत्यक्षलवणं वज्यमन्नमत्युष्णमेव च ॥१७॥
अर्थ-यावत् प्रवलं कष्ट न पहुंचे तावत् दूसरे का दोष न पतलावे ।
केवल लवणमय (नमकीन) और उण भोजन न करे ॥ १७ ॥
गुरुणामासनं देयमभ्युत्थानादि सत्कृतम् ।
अनूकुळं तथालापमभिवादनपूर्वकम् ॥१८॥
अर्थ जव गुरु आवे तो उठकर आदर से आसन देवे और प्रणाम
पूर्वक ( अर्थात् : नमस्ते " कहकर ) मृदु वचन बोले ॥१८॥
पन्था देयों ब्राह्मणानां राज्ञो दुःखातुरस्य च ! . .:"
विद्याधिकस्य गुर्विण्या भारतस्यायवीयसः ।।
मूकान्धवधिराणाश्च मत्स्योन्मत्तकस्य च ॥ १९॥
अर्थ-ब्राह्मण, राजा और दूखिया उनके लिये मार्ग.छोड़ देवे।
विद्वान, गर्भिणी और सिरपर भार लिये हुएं पुरुष, गुङ्गा, अंधा,
धिर और उन्मत्त यहं वय में छोटे भी हों तो उनके लिये रास्ता
1.
..
-
.
छोड़ देवे ॥१९॥

" ( २४) उपानसमाल्यादि.धृत्तमन्यैर्न धारयेत .. , उपवीतमलंकार करकञ्चैव वर्जयेत् ॥ २० ॥ :- .. अर्थ-जूता, वस्त्र, माला, जनेऊ, आभूपण, घट, अन्य के व हुए नं वः ॥ चतुर्दश्यां तथाष्टम्यां पञ्चदंश्यों च पर्वसु।::..::: तैलाभ्यंग तथा भोग योपितश्च विचजयेत् ।। २१ ।। अर्थ चतुर्दशी, अष्ठमी, पौर्णमासी और अमावस्या में तैल मर्दन और स्त्रीसङ्ग त्याग देंवे ॥३१॥ परदारान् गन्तव्याः पुरुषेण विपश्चिंता। इष्टापूर्त्तायुषां इन्वी परंदारगतिनृणाम् ।। २२ ।। अर्थ बुद्धिमान् पुरुप कभी परस्रो सङ्ग न करे, परस्त्री सक, पुरुषों 'के यज्ञ, दान, और आयु का नाशक है ॥ २२ ॥ 'नहीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते । यादृशं पुरूपस्येह परदाराभिमर्पणम् ।। २३ ।। अर्थ-लोकमै आयुनाशक ऐसा अन्य कर्म नहीं है जैसा परस्त्रीसङ्गत॥२३॥ 'अध्यतव्या त्रयी नित्यं भवितव्यं विपश्चिता । धर्मतो धनमाहार्य यष्टव्यञ्चापि यत्नतः ।। २३ ॥ अर्थ-प्रतिदिन वेद को पड़े, धर्म पूर्वक धन उपार्जन करे और 'यत्न पूर्वक यज्ञ करे ॥ २४॥ 'यचापि कुर्वतो नात्मा जुगुप्सामेति पुत्रक ? तत्कर्तव्यमशन यन्न गोप्यं महाजने ॥ २५ ॥ अर्थ-जिस काम को करते हुवे आत्मा में जुगुप्सा [घृणा न हो और जो करें महात्माओं के सन्मुख छिपाना न पड़ें उसको निशङ्क होकर करे ॥ २५॥ :::.एवमाचरतो. वत्स! पुरुषस्य गृहे सतः । धर्मार्थकामसम्प्राप्या परत्रेह च शोभनम् ।। २६ ।। अर्थ है पुत्र ! एवं विध सदाचार करते हुवे को धर्म, अर्थ,और काम की प्राप्ति से इस लोक और परलोक में सदा.यश होता है ।२६। . - ॥ ओम ॥ धन्यवाद पूर्वक स्वीकार ॥ निम्नलिखित् सज्जनोंको हार्दिक धन्यवाद है जिन्होंने ग्रन्थमाला की सहायता की वाबू केदारनाथ जो गोयनका दिल्ली ५) सेठ रामसहायमल पदीदास जी मुम्बई ५) वा. श्रीलाल जी चमड़िया कलकत्ता ५) श्री. स्वामी शिवपुरी जी: वीकानेर ५) सेठ सीताराम मदनगोपाल जी मुम्बई ५) रायसाहय बाबूरामचन्द्रजी बैंकर दिल्ली ५) ठा. जसंवन्तं सिंहजी बर्मा हरियाना५) ठा० प्रतापसिंह जी बर्मा पीकानेर ५) डा० बल्देव सिंह जी वर्मा जोधपुर ) सेठ बंशीलाल अवीरचन्दजी जवलंपुर ५) राजारामशरण सिंह जी, चापा ३) राजराजेश्वरी वली जी दयाबाद.३) मा वंशीधर जी कुसुम्बी दाल ३) म० हरनामदास कुसुम्बीदास जी मेरट ३) मि० यम-ए-गुप्तांसाहब नागपुर २) डा. पेड़ामल जी अमृतसर २ रा.सा. पं. चन्द्रिकाप्रसाद जो शर्मा अजमेर) रा. सा सेठ गोविन्ददास जी जबलपुर २) ठा. लाल- तावक्ष सिंह जी नीलगांव २) बाबू विजयवहादुर रायजादा साहेब जव: २) पं. विश्वनाथ शालिग्राम चांदासमः कुसमर्थ सिंह जी रावटी २) ठा० हनुमानसिंह जी वर्मा डुमरांव.२) मीरालाल जी साहेव ए. सी. वरधाम परशुराम व गयादीन जी मागु भालेश्वर २०) सेठ मानिकचन्दजी वर्मा हिगोली १०) योग ११२).शेषमंग्रे॥ विज्ञापन-विभाग।। गीताऽनुशीलन अर्थात् भगवद्गीता की मायानन्दी व्याख्या । यह ग्रन्थ प्रश्नोत्तर रूप में खडशः प्रकाशित होरहा हैं प्रथम खण्ड छपगया मूल्य-Eyn जिनको गीता से कुछ भी प्रेम हो अरने मनुष्य जीवन के उद्देश्य को सोफल्य करना हो तथा प्रचलितटीकाओं ,' से जिनको जिज्ञासा रूपी पिपासा शान्त न हुई हो वे ( अवश्यमेव गीतानुशीलन को मगार पढ़ें पुस्तक अत्यन्त उपयोगी उत्तम है ॥ ..पतीः-गणेशचन्दपूमाणिक गढ़ाफाटक जवलपुर ॥ लाभकारी औषधियें अजीर्ण नाशकं मूल्य ।)ज्वरादि नाशक ॥) रक्तशोधक =) उपयोगी तैल १) शुद्ध शहद [ मेधु]२) मलहम ) दर्दनाशक ). बलवर्धक पाकर)... पता:-पं. ब्रह्मदत्त शर्मा, Tertia via gatti E.I.Ry, - आर्य के नियम। उद्देश्य-वैदिक धर्म शिक्षार्थ, आर्ष (ऋषि) प्रणीत, अन्यों के प्रचार प्राचीन और नवीन ग्रन्थों को प्रशित करना है। . इसका वार्षिक मूल्य सर्वसाधारण से श) मान्य- जनों ले २) और सहायक संजनों से ५) तथा राजा महा- राजाओं से उनके सम्मानार्थ १०) नियत है। ३. यह ग्रन्थमाला. धार्मिक विषयों से विभूषित होकर प्रति दुसरे मांस प्रकाशित होती है । ४. जो सज्जन १०) तक सहायतार्थ देंगे वे सहायक समझे जायंगे और उनका नाम सहायक श्रेणी में सधन्यवाद "सहायक श्रेणी मैं" वर्ष भर प्रकाशित किया जायगा। आवश्यक निवेदन हर्ष का विषय है कि ग्रन्थमाला. का दूसरा घर्ष सानन्द समाप्त होगयो । अव तृतीय भाग की प्रथम पुस्तक उन सज्जनों की लेश में वी०प से भेजी जायगी.जिन महा. शयों का द्वितीय वर्ष का चन्दा समाप्त होगया है। आशा है कि वैदिक धर्म के सच्चे प्रेमी वी० पी. स्वीकार कर अवश्य सहायता करेंगे। जिन सज्जनों के पास कोई भाग कदाचित् में पहुंचा हो, वे शीघ्र मंगाल जिनका मूल्य नहीं आया है, वें कृपया मूल्य शीघ्र प्रेपित करें वावी०पी० करने, की आज्ञा देचे जिनको अन्धमाता की प्राहकता स्वीकार न हो वे अस्वी- कार पत्र अवश्य भेज देव । कागज व छपाई का भाव बहुत.. बढ़ गया है अंतः विवश होकर सत्य कुछ बढ़ायांगया है पूर्ण आशा है कि प्राहकपमं देने में संकोच न करेंगे ! ॥ इत्यलम् ।। प्रकाशक आय ज्ञानोदयं प्रन्यमाला भवदीय- पचपच (अनार) यू.पी. E,I.R. सूर्यदत्त शर्मा. REARRESERE ।

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Ath Dharmopdesh Ratnamala (vol - Iii)

Author
Sharma, Suryadutt
Title
Ath Dharmopdesh Ratnamala (vol - Iii)
File name
Ath Dharmopdesh Ratnamala (vol - Iii)
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2009/10
Publisher
Benares, Shambhu Printing Works
Language
Sanskrit
Pages
28
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345568
Barcode
99999990233903.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
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