Sanmati Library, Jaipur

Vaidik Rahashya (vol - Iv)

Sharma, Shiveshankar · 2009/10

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Front matter

श्रो ३५
का चतुर्थ
*वक्तव्य*
बहुत विलम्ब के पश्चात् " वैदिक रहस्य
भाग ईश्वर की कृपा से आज. प्रकाशित होता है। मैं अपने
ग्राहकों से क्षमाप्रार्थी हूं | आप जानते हैं कि श्रेयस्कर कार्य में
बहु विघ्न हुआ करते हैं । यह चतुर्थ भांग बहुत बड़ा होगा ।
वेदों के रूपक विन्यास को पढ़ते २ पाठकगण उदासीन और
अधीर होगए थे । अतः वैसे वर्णन को कुछ समय के लिये
छोड़ वेदों और शास्त्रों के अन्यान्य परमोपयोगी विषय से
पाठक लाभ उठावें इस इच्छा से " वैदिक विज्ञान के
पश्चात् " वैज्ञानिक सिद्धान्त " प्रकाशित करता हूँ । इस भाग
में बड़े २ रोचक और गंभीर सिद्धान्त रहेंगे। जिसके अभाव
से आज भारतवासी मामसिक विचार में परम दुर्बल होगये हैं
उनका ही विशेष वर्णन इस भाग में रहेगा। इस भाग को बड़े
ध्यान से पाठक महोदय यदि पढ़ेंगे तो बहुत कुछ लाभ उठायेंगे ।
किंबहुना।
मिथिलादेश निवासी
ता० १२-८-१६१२] शिवशङ्कर शर्मा,
काव्यतीर्थ

*वैज्ञानिक सिद्धान्त
* जिज्ञासाऽध्याय
विद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्थी
इत्यभिमन्यन्ति बालाः। मुण्डकोपनिषद्॥
LeMeer
ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा । जानने की प्रबल इच्छा
का नाम जिज्ञासा है । विज्ञान, अन्वेषण, खोज,
तहकीकात ( Research ) इत्यादि अर्थो में यहां जिज्ञासा शब्द
प्रयुक्त हुआ है । प्रत्येक नरनारी के हृदय में जिज्ञासा का
बीज स्वभावतः विद्यमान है । इसी हेतु पश्वादिकों की अपेक्षा
मानव जाति की उत्तरोत्तर वृद्धि, सृष्टि की आदि से होती
चली आती है। जब बालक उत्पन्न होता है, यद्यपि उसकी
इन्द्रिय-शक्ति बहुत स्वल्प रहती है । देखना, सुनना,
सूचना, रसलेना, हिताहित विचार आदि व्यवहार में और अग्नि,
सादिकों के ज्ञान में इसका इन्द्रियगण अति दुर्बल रहता है।
तथापि वह सूतिकागृहकी शय्यापर सोते २ अपनी चारों ओर
आंख फार २ देखता, हाथपैर मारता, अनेक प्रकार की चेष्टा
करता ही रहता है । ज्योंही बढ़ता और बोलने लगता है।
तब देखो कितनी इसमें जिज्ञासा की शक्ति बढ़ती जाती है।

( २ ) नवीन वस्तु को देखते ही झट पूछता है मा ? यह क्या है कभी छोटे बच्चे को लेकर कहीं वाह्य स्थान में निकलो । प्रत्येक नई वस्तु को देख २ कर वह शिशु उतने प्रश्न पूछता जायगा कि उत्तर देने हारे की नाक में दम आजायगी । इस प्रकार वह थोड़े ही वर्षों में अपने परितःस्थित वस्तुओं को वाहा रूप से जानकर ही छोड़ता है । अति मूर्ख जाति में वह जिज्ञासा यहां ही तक रह जाती है । सभ्य जाति में अध्ययन और मननादिकों के द्वारा वह नानाशाखावलम्बिनी होती चली जाती है। मध्यमकोटि की मानवजाति में इसकी परम दुर्दशा होने लगती है। जिज्ञासा का स्थान साम्प्रदायिक मज़हवी ( Religious ) विश्वास ले लेता है । मूर्ख नर नारी इसके परम थैरी हैं । धूर्त जनों के भोज्य येही होते चले आए हैं । ऐ मेरे श्रोताओ ! ये वंचक, बकवृत्ति, बैडालतिक जनही व्याघ्र हैं । मनुष्यजातिरूपा अरण्यानी में प्रवेश कर अविवेकी अमन्ता अबोद्धा विश्वासी पुरुपरूप मृग शशकादिकों को पकड़ पकड़ खूब चवाते हैं । वे पशु, मृग, शशक तो अपने शत्रु को झट पहचान भी लेते हैं और उनसे डरके भाग भी जाते हैं कदाचिदेव विवश होकर उन्हें कवलित होना पड़ता है । किन्तु शोक की बात है कि इस मानव जाति के १०० भागों में से निन्यानवे भाग इतने विचार शून्य हैं कि वे साम्प्रदायिक विश्वासी वन के अपनी विवेक रूप आंखें ऐसी चूर्ण २ करवां लेते हैं कि वे अपने प्रिय हाथ को भी नहीं देखते इस कौतुक में महान् आश्चर्य यह है कि अन्ध अपने को चक्षुप्मान् ,बधिर , ३) अपने को श्रोता, नूक अपने को वाचाल, पंगु अपने को धावक और अज्ञानी अपने को परमज्ञानी मानने लगता है। बहुत क्या कहूं वे विश्वासी त्रिग सर्वथा अविद्या रूपी पिंजरे में बन्द कर दिये जाते हैं । उनको धूर्तजन शुक्रवत् पढ़ाने लगते हैं कि देखो ? यह तुझे परम गुप्त मन्त्र देता हूं किसी से मत फहना । देख ! दूसरे को कह देने से मन्त्र का प्रभाव जाता रहता है । मात्र काया विचारणा । गोपनीय गोप- नीयं गोपनीयंप्रयत्नतः। एपाशाम्भवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिकः । देखो ? यह श्री व्यासजी का वचन है। यह साक्षात् श्री भगवान जी का वाक्य है। यह पार्वती जी की वाणी है । इसमें कभी दुर्भाव न करना । तेरा कुल नष्ट हो जायगा । तू मर जायगा । तेरी सन्तति न रहेगी । इत्यादि २ अनेक शापाभिशाप देके विश्वासी जनों को ठगा करते हैं। ऐ मेरे प्यारे श्रोतायो ! क्या इस अज्ञान से तुम वचना नहीं चाहते ! किसी ने ठीक कहाई कि "धूतैर्जगद् वञ्चितम्" इस दृश्य को यानवल्क्य ने अन्य प्रकार से दिखलाया है यथा-- अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽह- मस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानां यथा ह वै यहवः पशवो मनुष्य भुज्ज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्ति। एकस्मिन्नेव पशावादीपमानेऽप्रियं भवति किमु यहुपु तस्मादेषां तन्नप्रियं यदे तन्म- नुष्या विद्यः। अर्थ-मैं अन्य हूँ वह अन्य है ऐसा समझ जो कोई (४.) . अन्य देवता की उपासना करता है वह नहीं जानता। जैसा पशु है वैसाही वह देवता का पशु है । जैसे बहुत से पशु मनुष्य पालते हैं वैसे ही एक एक पुरुष देवों को पालता है । यदि किसी के एक ही पशु को कोई चुराले जाय या व्याघ्र मार के खाजाय तो उसको कितना दुःख होगा । यदि इसी प्रकार उसके अनेक पशु चुराए जायं तो कहिये उसको कितना असह्य क्लेश होगा । अतः देवता इसको अच्छा नहीं समझते हैं कि मनुष्य जान जावें क्योंकि जानकार होने से वह भी देव वा देव से भी अधिक होजाता है तब वह ऐसे स्वार्थी देवकी सेवा नहीं करता अतः देव नहीं चाहते कि मनुप्य ज्ञानी बने । आजकल इस आर्यावर्त देश में याज्ञवल्क्य जी का वचन ठीक चरितार्थ हो रहा है । अविवेकी सम्प्रदायी विश्वासी जन ही यहां पशु हैं ।वचक स्वार्थान्ध गुरु जी देव हैं। वे अज्ञानी अपने को नीच, पापिष्ठ, मान अपने वचक गुरुको ईश्वरावतार, धर्ममूर्ति, निष्कलङ्क, परमशुद्ध पुरुषोत्तम, साक्षात् भगवान जान उन्हें विधिपूर्वक पूजते हैं, पैर धोते हैं, पैर धो पानी को चरणामृत समझ देह पर सींचते और पीते । उनके चरणों पर प्रेमसे फूल चढ़ाते । मोती सोने चांदी रुपये पैसे भेंट देते हैं, फलों, फूलों, अन्नों तथा अन्यान्य शतशः पदार्थों से उनके गृह भर देते हैं। इतना ही नहीं, किन्तु स्त्रियां तक भी तन, मन, धन गुसाई जी को अर्पण करती हैं। ऐसे नरपशु उन २ गुरुदेवों को पाल २ कर ऐसे २ हृष्टपुष्ट सांढ़ बना देते है कि वे मदोन्मत्त होके यथेच्छ आहार विहार भोगविलास को ही परमानन्द समझ उद्दण्ड नास्तिक " बन सर्वमानव हितकारी नियमरूप शृंखलाओं को तोड़ डालते हैं । ये गुरुदेव जब २ अपने नरपशु को देखते हैं कि यह कुछ जानने लगा है। यह किसी विवेकी प्रकाश के निकट जाता है तो उन्हें बड़ाही क्लेश होता है । सोचने लगते हैं कि कहीं ऐसा नहीं कि यह मेरा पशु कहीं चलानाय । ऐ विवेकी पुरुषो ? देखो ? श्री याज्ञवल्क्य नी वया कह रहे हैं । देवता नहीं चाहते हैं कि मेरे पशु ज्ञानी होजाय । मैं निश्चय कहता है कि वे सम्प्रदायी गुरुदेव तुमको कभी विवेकी होने नहीं देखेंगे। अतः प्रथम यदि इनकी हथकड़ी से छूटने का यत्न करोगे तब कहीं जिज्ञासा के अधिकारी बनोगे । मैं तुमसे कहता हूं कि कभी जिज्ञासा से मुख मत गोड़ो । जिज्ञासा के लिये ही मानवजाति बनाई गई है । इन परितः स्थित पदार्थों को देख २ फर जिनके हृदय में उनके विशेष बोधार्थ प्रश्न नहीं उठते हैं दे निश्चय पशु हैं । वे दुर्बल हृदय के पुरुष हैं जिनके हृदय में प्रश्न तो उटते हैं किन्तु किसी खास मजहव में वा धर्म सभा में रहने के कारण उन प्रश्नों को विचार में नहीं लाते, प्रकट नहीं करते । बहुत से ऐसे भी हैं जो जानते हुए भी अजान हैं। वे अपनी २ ज्ञाति, परिवार, मज़हब, वा किसी लोभ, मोह, मय, आदि कारण वश सत्यको प्रकाशित नहीं करसकते । वैसे पुरुप परम शोचनीय हैं अहा !!! मनुप्य किसप्रकार गुलाम बनाया गया है। ऐ मेरे परमप्रियो ? जो अपने को नीच समझता है वा अपने कर्म से आत्मा को दीन दरिद्र बनाता है वह अवश्य a la - । नीच होजाता है । तुम्हारे शरीर में जो आत्मा है वह महान् वह ज्ञान का राशि है वह आगाध है । गीता में कहा गया है कोई आत्माको न गिरावे। "उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानम- वसादयेत् ।आत्मैवद्यात्मनोबन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः" । गी०६।५।। अतएव ऋषिगण प्रार्थना करते चलेआए हैं " अदीनाः स्याम शरदः शतम्" प्रथम आपको यह जिज्ञासा करनी चाहिये कि यह गुरुदेव मुझ से किस बात में श्रेष्ठ हैं । मेरेही समान, खाते, पीते, स्त्री रखते, पुत्र जनमाते । फिर वे. कैसे देव! मैं कैसे मनुष्य! प्रथम तो यह सोचो। अच्छे प्रकार विचारो। यदि उन में कोई विशेष गुण है तो उन के आदर करने में कोई क्षति नहीं । योग्य आदर करो । अति मत करो। यथार्थ में तुम्हारे गुरु आ- चार्य तो वे हैं जिन्होंने तुम्हे पढ़ाया । जो सदा सदुपदेश देते हैं और स्वयं भी उसके अनुसार चलते हैं। दूसरों के उपदेश देनेहारे तो बहुत हैं किन्तु उसके अनुसार स्वयं चलने हारे बहुत थोड़े हैं। कृतकृत्यता-जो अपने को कृतकृत्य समझते हैं वे भी जिज्ञासा के परम बाधक हैं क्योंकि वे खोज से निवृत्त हो जाते हैं । परन्तु मैं कहता हूं, मरण की घड़ी तक तुम अभीष्ट पदार्थों का अन्वेषण करते रहो । मनुष्य जाति को सुशोभित करने हारा केवल अन्वेषण है। जिज्ञासु ही सचमुच मनुष्य है। बहुत कहते हैं कि यदि जन्मभर खोजतेही हैं तो परमार्थ की प्राप्ति कब करें । उत्तर-तुमने परमार्थ को क्या समझा है क्या ईश्वर की विभूति का खोज करना परमार्थ नहीं है ? तुम पहिले ही

(७)
तत्य से हो सकते । क्या तुगने परमात्मा की सारी विभू-
तियों की त्या पाली ? यह भी नहीं होसकता। मनुष्य सर्वदा
स्वरुप ही रहेगा। परमात्मा परम पिता की मृष्टि फा कदापि
भी एल तक यह जीवात्मा फिसी अवस्था में नहीं पहुंच
समता प्रतः जहांतक अपने जीवन में जितना दूंद निकालोगे
यह तुम्हारे लिये परमार्थ है यह परमानन्दप्रद होगा । मैं कहता
जनम भी अपने को तटात्य मत समझो। सर्वदा जिज्ञास
परता
जो फोर यह कहते हैं कि बहुत ग्रन्थों के देखने से क्या?
बाहुन यकन से क्या? जब श्रहं ब्रह्मास्मि का ज्ञान होगया तो
हम में पर क्या है । एक ही रामनाम काफी है । एकवार गंगा
पचार है। एकवार एक बाघ लोक पदलनाही मुक्ति का
फारण है । जगन में तीन हा वस्तु है परमात्मा, जीवात्मा,और
प्रतानि सो असे प्रकार जाने गण । मन एक यज्ञ करलिया परम
पवित्र होगया अप क्या करना है इत्यादि नाना अविद्याओं में
फंस अमानी अपने को तृप्त मानने लगते हैं इन के ही लिये
सायि श्रगिस दत है
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः
पण्डिनंमन्यमानाः । जङ्घन्यमाना परियन्ति मूढ़ा
अन्धनव नीयमाना यथान्धाः। ८। अविद्यायां
पढ्या वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति
पाला। यत्कम्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेना-
तुरा क्षीणलोकाश्च्यवन्ते।

1 इस विषय में भर्तृहरिने भी अच्छा कहा है। के यदा किञ्चिज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धासमभवम् । सदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवरलिप्त मम मनः । यदा किंचित् किश्चिद् वुधजन सकाशाद्वगतम् । तदा सूर्योऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः । नारद और जिज्ञासा--छान्दोग्योपनिषद् सप्तम प्रयाठक में यह आख्यायिका आई है। एक समय नारद सनत्कुमार सन्निधि जा बोले कि भगवन् ? मुझे आप उपदेश देवें । सनत्कुमार ने कहा कि आप जितना जानते हैं उतना प्रथम कहजाइये । तब मैं उस के आगे कहूंगा ॥१॥ नारद बोले- मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ अथर्वण, पञ्चम इतिहास पुराण, वेदों का वेद (व्याकरण) पित्र्य, राशि, दैव, निधि, वाकवाक्य, एकायन, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूत- विद्या, क्षत्र विद्या, नक्षत्र विद्या, सर्प देव यजन विद्या ये १८ अष्टादश विद्याएं जानताहूं ॥२॥ हे भगवन् ? सो मैं अभीतक केवल मन्त्रवित्ही हूं। आत्मवित् नहीं । आप लोगों के समान पुरुषों से सुनता हूं कि आत्मवित् शोक को तैर जाता है। मैं शोक कर रहा हूं अतः मैं आत्म- वित् नहीं, मुझे शोक से पार उतारें ।३। इसके पश्चात् सनत्कु- मार ने कहा कि हे नारद ! ये ऋग्वेदादि नाम ही हैं । नाम की जहां तक गति है वहां तक उसकी गति होती है जो नाम

(६)
में
-
माग की उपासना करता है । भागे नारद और सनत्कुमार
मनोका सुन्दर संवाद है।
१ वाणी २ मन ३ संकल्प ४ चित्त ५ ध्यान ६ विज्ञान
पल शाह जल १० तेज श्राकाश १२ स्मरण
१३ जागा १४ प्राण ये नौवह उतरोत्तर अधिक माने गए हैं।
इसके पश्चात् कहा है कि सत्य ही सबसे अधिक है
नारदने कहा कि-"सत्यं भगवा विजिज्ञास इति"।
भगवन् ? में सत्य की विशेष रूप से विज्ञासा करता हूं।
सनत्कुमार-जन जानता है तब सत्य बोलता है । विना
जान सत्यनहीं बोलता । जानता हुया ही सत्य बोलता है अतः
दे नारद? विज्ञान ही विजिशासितव्य है ।
नारद-विज्ञानं भगवो विजिज्ञासे । इति । भगवन्?
में विज्ञान की विशेष रूपसे विनासा करता हूं।
सनत्कुमार-जय मनन करता है तर जानता है । विना
मनन किए नहीं जानता है, मननहीं विजिशासितव्य है ।
मारद-मति भगयो विजिज्ञासे । इति। मति = मनन
सनत्कृमार-जब श्रद्धा करता है तबही मनन करता है
अश्रद्धालु मनन नहीं करता । श्रद्धावान ही मनन करता है।
हे नारद । श्रद्धाही विजिज्ञासितव्य है।
नारद-श्रद्धां भगवो विजिज्ञासे । इति ।
* नोट-मनिषदों में ब्राह्मशब्द बृहत्, परमादरणीय, प्रीतिभाजक,दत्यादि
मयों में प्रयुश हुआ है।

। १०)
सनत्कुमार--जब निष्ठावान् होता है तब श्रद्धा करता है,
अनिष्ठ श्रद्धा नहीं करता । नैष्ठिकही श्रद्धा करता है । हे नारद।
निष्ठाही विजिज्ञासितव्य है ।
नारद-निष्ठां भगवो विजिज्ञासे ।। इति।
सनत्कुमार--जब किसी वस्तु को क्रिया में लाकर देखता
है तबही निष्ठा होती है अकर्मी कभी निष्ठावान् नहीं होता । हे
नारद, कृति ही विजेज्ञासितव्य है।
नारद--कृर्ति भगवो विजिज्ञासे । इति।।
सनत्कुमार-जब सुख पाताह तब कर्म करता है। सुख
को न पाफर कोई कर्म नहीं करता । सुखको पाकरही कर्म
करता है सुखही विजिज्ञातितव्य है।
नारद--सुखं भगवो विजिनासे । इति ।
सनत्कुमार-जो भूमा अर्थात् परम महान् है वही सुख है
अल्पमें सुख नहीं। भूमाही सुख है।भूमाही विजिज्ञासितव्यह
नारद-भूमानं भगवो विजिज्ञासे इति ।
इसके पश्चात् सनत्कुमार ने उपदेश दिया है । कि सर्वच्यापी
परमात्मा ही भूमा है । वही सुखस्वरूप है।
नारद--वह परमात्मा है कहां ?
सनत्कुमार-अपनी महिमा में
अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सूर्य, चन्द्र, पृथिवी मनुष्य
पशु आदि उसकी महिमा है । इसी में प्रतिष्ठित है । इत्यादि

(११) नारद और र सनत्कुमार का संवाद है। ऐजिज्ञासु पुरुपो ! प्रथम तुम देखते हो कि नारद जी कितनी विद्याएं जानते थे। तो भी इन्हें सन्तोष नदी । ये पुनः गुरु के समीप जाते हैं और इनसे परमार्थ के उपदेश ग्रहण करते हैं। क्या तुमने नारद से भी अधिक जान लिये जो जिज्ञासु बनने में संकोच करते हो। यदि तुम में से दो एक सनत्कुमार बन गए हैं तो भी क्या क्षति तो भी संतुष्ट न होना चाहिये वे सनत्कुमार भी तो सदा मनन में ही लगे रहते थे। * विराट और वैश्वानर रूप-सनत्कुमार कहते हैं कि यह वा अपने महिमा में प्रतिष्ठित है । सूर्य से लेकर तृगपर्यन्त ब्रा का महिमा है। अतः सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पृथ्वी नोटलापि न महात्माओं का इतिगत यथार्थ रूपमें नहीं पाया पुरानों ने इनफे विषय में अनेक गल्ल कल्पित किए है। पुराणों के अनुगार में नमारे पुन २६ गए है सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कु- गारमनार माई गाने गाते है । यह ध्यान रखना चाहिये कि जितने अच्छे गाव माना हुए पे गप ही प्रायः पिरंनी के साक्षात् तनय कहे गए हैं। पुगों की मी फलनाएं त्याज्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये सनत्कु- मार कोई अनुभवी मननशील हुए है। किसी नयीन विद्या के बेटे भारी आविता था धोरे २ ये परमसिद्ध, सदा एकही रूप में विद्यमान मान- लिए गए इनमें से तीन भाइयों के नाम अभीतक तर्पण की पद्धति में आते है और मनुप्न मानकर इनका तर्पण होता है यथा- मनुप्यास्तर्पयेत्या पिपुत्रानृपस्तिथा । सनफश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः ॥ कपिलश्चासुरिश्चैव वोदुः पंचशिखस्तथा।सर्वते तृप्तिमायान्तु महत्ते नाम्बुना सदा इत्यादि ( १२ ) प्रभृतियों में से जितना भाग जो जानेगा वह मानो उतना ब्रमके महिमा कोही जानेगा । पुनः विराट्रप में वर्णन आता है कि मानो, ब्रह्मका चरण यह वसुन्धरा है, नयन दिनमणि, श्रुति दि- शाएं, घ्राण वायु है, आस्य अग्नि है, महाकाशउदर है । इत्यादि-- छान्दोग्योपनिषद् पञ्चम प्रपाठक, एकादश खण्ड से एक आख्यायिका आरम्भ होती है कि, प्राचीनशाल औपमन्यब, सत्ययज्ञ पौलुपि, इन्द्रद्युम्न भालवेय, जन शार्कराक्ष्य और बुडिल अश्वतराश्वि ये सब महाशाल (वड़ीपाठशालावाले ) और महा श्रोत्रियथे । मिलकर विचारने लगे कि " कोनु आत्मा किं ब्रह्मेति " आत्मा और ब्रह्म क्या वस्तु है । निश्चय न कर सके। तब उस समय के सुप्रसिद्ध उद्दालक आरुणि ऋषि के निकट आए । ये भी उनके सन्देहों को मिटाने में अपने को असमर्थ देख उन्हे साथले केकय अश्वपति के निकट पहुंचे । राजा अश्वपति उन की यथाविधि पूजाकरवा कहने लगे हे परमपूज्यो? मेरे जनपद में १ स्तेन २ कदर्य ३ मद्यप ४ अनाहिताग्नि और ५ अविद्वान् नहीं हैं और पष्ठ स्वैरी (व्यभिचारी) नहीं हैं तो स्वैरिणी (व्यभिचारिणी कुट्टिनी) कहां से होगी। हे पूज्यो ? यज्ञ करनेहारा हूं आप यहां निवास करो। एक २ ऋत्विज को जितना दूंगा उतना आप को भी दूंगा। राजाके इस वचन को सुन वे सब बोले कि पुरुष जिस प्रयोजन के लिये आवे वही इसे देना उचित है । आप इस समय वैश्वानर आत्मा को जानते हैं । वही हमको देवें राजाने कहा कि मैं प्रातः काल. 'कहूंगा वे सब भी समित्पाणि हो पूर्वाडा में राजा के समीप मैं

पहुँने । महाराज ने यथोचित रूप से वैश्वानर आत्मा के विषय
में उपदेश दिया है, मैं यहां अतिसंक्षेप से उस सम्बाद को
दिखलाताई।
अन्धपति-हे औपमन्यव ! आप किस आत्गा की उपासना
फरन?
जोपमन्यव-राजन् ! मैं एलोक की ही उपासना करता हूं।
अन्वपमनि-यह मात्मा का तो दूर्धामात्र है।
सालमा ! पाप किम वाला की उपासना करते हैं ?
नत्यवतराजन् ! में नादिन्य ती उपासना करता हूं।
अन्चपनि- माला का तो नहुमात्र है।
इसमाप शिस आत्मा की उपासना करते हैं ?
इन्द्रधुम्न-राजन् ! मैं वासु की ही उपासना करता है।
अबपति--यह आत्मा का तो प्राणमान है।
है जन : आप किस यात्मा की उपासना करते हैं ?
जन--राजन् ! मैं आकाश की उपासना करता हूँ।
अबपति-यह प्रात्मा का तो मध्य देह मात्र
हे वुडिल ! आप किस अात्मा की उपासना करते हैं ?
दुधिल-राजन् ! मैं जल बी टी उपासना करता है।
अन्बपति-यह बात्मा का तो वस्तिमात्र है।
दे उछालक ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ?
उहालक-राजन् ! मैं पृथिवी की उपासना करता हूं।
है

अश्वपति-यह आत्मा का चरणमात्र है। राजा ने इस प्रकार उनकी उपासनाओं का खण्डन करके कहा कि आप सब अभी तक एक २ अवयव मात्र की उपासना में तत्पर हैं यह उचित नहीं । झुलोक से लेकर पृथिवी तक एकही वैश्वानर है। हां,एक २ अवयव की उपासना से भी आप कल्याणभागी हैं । यदि सस्पूर्ण वैश्वानर को जाने तो बहुत फल पावेंगे । राजा के उपदेश का मुख्य तात्पर्य यह है कि प्रथम ऐ महाश्रोत्रियो ! इस अपने शरीर को ही वैश्वानर समझिये । इस देह में शिर द्युलोक, नयन आदित्य, प्राण वायु, मध्यदेह आकाश, मूत्रस्थान जल और पैर पृथिवी है । छाती ही वेदि है। लोम ही कुशहै। हृदय ही गार्हपत्य अग्नि है । मन ही अन्या- हार्यपचन अग्नि है । मुखही आहवनीय अग्नि है । ऐ श्रोत्रियो प्रथम इसके महत्व को जानिये पश्चात् वाह्य जगत की गवेषणा कीजिये तबही पूर्ण कल्याण भागी होवेंगे । निःसन्देह जो कोई अपने आसा के महत्त्व को नहीं जानता है वही वास्तव में अधम है । इसके पश्चात् इस पृथिवी पर के पदार्थों का अच्छे प्रकार अध्ययन करे। शोक की बात है कि अज्ञानी जन स्वर्ग की बड़ी २ लम्बी २ बातें करेंगे परन्तु जिस पृथिवी पर वे रहते हैं वहां की सच्ची २ बात जानने के लिये उद्योग न करेंगे । ये पृथिवी, हिमालय पर्वत, समुद्र, वनस्पति, पशु, पक्षी, आदि सहस्रों पदार्थों को वास्तव रूप में नहीं जानते । ऐ मनुष्यों ? प्रथम पैर का ही बोध उत्पन्न करो, धीरे २ आकाशस्थ मेघ, वायु, विद्युत्, .

(१५) प्रकाश, चन्द्र, सूळ. आदि पदार्थोके तत्व सीखो ! जब समूह के विज्ञान में गयपणा फरोगे तब तुम अझकी विभूति के अति शुद्र अधिकारी माने जाओगे। इस आख्यायिका से सिद्ध है कि इस अनन्त ब्रह्माण्ड महा विर रूप में से जो जितना जानेगा वह मानो उतना आपके ही रूप को जानेगा । सम्पूर्ण ब्रमाण्ड का बोध कदामि नहीं हो सकता सूर्य से लेकर गृथिवी तक प्रथम जानने का प्रयत्न करे । पुनः ऐसे २ सूर्य सहसूशः, पृथिवी सहसूशः जहां तक हो उन्हें भी जाने । यहां ध्यान रखना चाहिये कि उपासना शब्द का अर्थ अध्ययन है जब ऐसे २ महाशाल महा : श्रोत्रिय आपके पूर्वज एक २ पदार्थ के विज्ञान में अपना संपूर्ण जीवन लमादेतथे तौभी सन्तुष्ट न होकर पुनः जिज्ञासा किया फरतथे तब क्या आप इस परमोधोग से सदा के लिये वंचित ही रहेंगे ! आपने अभी क्या जाना है। अतः सदा जिज्ञासु बनो ! वेदान्त के कर्त। पादरायण भीमांसा की जैमिनिये दोनों "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा अधातोधर्म जिज्ञासा।" ऐसा प्रतिज्ञासूत्र लिखते हैं वे यह नहीं कहते हैं कि हम ब्रह्म और धर्म को जानते हैं । वे ब्रह्म और धर्म की जिज्ञासा में कितने दिन लगे रहे होंगे और कितने दिनों के मनन लिखकर तैयार किए होंगे। अतः ऐ भारत वासियो ! अपने पूर्वजों के महान कार्य पर दृष्टि डालो और जिज्ञासु बनो। पश्चात् ग्रन्थ ( १६ ) वेद में जिज्ञासा। स्वयं आम्नाय (वेद) जिज्ञासा की और मनुष्य को भूयोमयः लेजाते हैं। मनुष्य की प्रतिभा तीक्ष्ण हो, सूक्ष्माति सूक्ष्म वस्तु में इसकी अप्रतिहतगति हो और आत्मचेष्टा की परम काष्ठातक पहुंचे इसकारण श्रुतियां परमहितकारिणी होके मनुष्यको इस गयेपणा की और लेजाती हैं। एक स्थान में वेद कहते हैं कि वह विश्वकर्मा परमात्मा किस आधार पर खड़ा होकर और किस आरम्भिक पदार्थ से इस जगत् को बनाता है । यथा- १-किंस्विदासीधिष्ठानमारम्भणं कतमत् स्वित् कथासीत् । यतो भूमि जनयन् विश्वकर्मा विद्यामौर्णोन महिना विश्वचक्षाः । ऋ०१०1८॥ २॥ जैसे लोकमें देखाजाता है कि कुम्भकार किसी स्थान पर बैठ मृत्तिका ले चाक के ऊपर यथाभिमत घट और विहगादि की मूर्तियां बनाया करता है वैसेही क्या ईश्वर भी कहीं श्रासन लगा, जगत बनाने की सामग्री ले सूर्य चन्द्र पृथिवी प्रभृति अनन्त सृष्टि रचा करता है ? इसी विषय को प्रश्न और उत्तर रूपसे कहते हैं (स्वित्) वितर्क अर्थात् इस ऋचाके द्रष्टा ऋषि वितर्क करते हैं कि (अधिष्ठानम्+किम्+आसीत् । पृथिवी से लेके द्यलोक तक सृजन कहते हुए परमात्मा का बैठने का स्थान कौनथा ? क्योंकि लोक में निरधिष्ठान हो के कोई भी कुछ नहीं । १७ ) करता अतः ईश्वर का भी कोई अधिष्ठान होना उचित है सो यह स्थान कौन है ? जहां बैठ के जगत् रचता है। (स्वित्+ भारम्भमतमत्+आसीत् ) पुनः वितर्क करते हैं कि आरम्भ करने की सागगी क्या थी (कथा) क्रिया भी किस प्रकार की थी अर्थात् निमित कारण कैसा था यतः जिस काल में (भूमिम् चाम्) भूमि और घलोक को बनाता हुशा (विश्वकर्मा) सकल सृष्टि फती (विधवक्षाः) सर्व द्रष्टा परमात्मा (महिन्ना) अपने महिमा से (पाम्-मिन्) चलोक और भूमि को (वि) विशेप रूपसे (ोलन ) यानाति अमात् बनारहाथा उस समय उसकी बैठक और सागली कौनसी थी विश्वका = विश्वकर्चा- सबक वनान दारा विश्वचक्षा = विश्व - सब । चक्षा%D देखने दारा। भागीन = गुंज याच्छादने । वहां ही पुनः कहते हैं कि वह कैनमा वन और वृक्ष है जिसको काट कर यह संसाररूप भवन बनाता है ? हे मनापी पुरुषों ! यह भी विश्वकर्मा से पूछो कि वह इन समस्त भुवनों को पकड़े हुए किस पर खड़ा है । यथा- २--किंस्विनं क उस वृक्ष आसयतो धावा- पृथिवी निष्टतक्षुः । मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठभुवनानि धारयन् ॥ऋ० १०८११४ (स्वित्) द्रष्टा ऋषि इस ऋचा के द्वारा वितर्क करते हैं (किम्+बनम् ) वह कौन वनहै? (क:+उ+सः+ वृक्षः ) वह कौन वृक्ष है। (यतः यावापृथिवी ) जिस वन और वृक्ष से विश्व- (१६) कर्मा ने द्यलोक और पृथिवी को (निष्टताः) काटकर अलंकृत किया है ( मनीषिणः) हे मनीषी विद्वानों?(मनसा तत्+इत्+उ) मनसे पालोचना करके उनको भी (पृच्छत) पूछिये । (भुवनानि धारयन् ) सम्पूर्ण भुवनों को पकड़े हुए वह विश्व- कर्मा ( यद् अधि+अतिष्ठत् ) जिसके ऊपर खड़ा रहता है अर्थात् इस जगत को पकड़ कर वह किस आधार पर खड़ा रहता है। ऐ विद्वानो ! इस बात को भी तो कभी पूछो । तीसरी जगह कहते हैं कि आश्चर्य की बात है इसको कौन जानता है कौन कह सकता है कि ये विविध सृष्टियां कहां से आई सव ही पीछे उत्पन्न हुए हैं इसका कारण कौन जानता है कि वह सृष्टि कहां से आई यथा- ३-को अद्धा वेद क इह प्रयोचत् कुत आ- जाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वागदेवा अस्य विस- जनेनाथा को वेद यत आवभूव ॥ ०१०।१२६ १६ (क+अद्धा वेद) कौन इसको निश्चय रूप से जानता है (का+इह+प्र+वोचत् ) कौन यहां इसका व्याख्यान कर सकता है (कुतः+माजाता) यह सृष्ठि कहां से आगई (कुतः+ इयम्+विसृष्टिः) कहां से यह विविध प्रकार की सृष्टियां बनी ? (देवाः ) विद्धवण वा सूर्यादि देव सवही (अस्य+विसर्जनेन+ अर्वाग् ) इस सृष्टि के बनने के पश्चत् हुए हैं ( अथ+का+ वेद+यतः+आ+बभूव) तब कौन जानता है कि यह सृष्टि कहां

। १६
सूर्य को अस्त होते देख कहते है कि यह सूर्य कहां
चला जाता है । इसके किरण अब किस लोक को प्रकाशित
फरते होंगे । यथा-
४-क्वेदानी सूर्यः कश्चिकेत कतमा यां-
रश्मिरस्याततान || ०१ । ३५ । ७
अब सूर्य कहां है ? इसको कौन जानता है ? किस
चोक में इसके किरण अब फैल रहे हैं।
यह गौ कृष्णा है किन्तु इसका दूध श्वेत क्यों ? यथा-
५-सनेमि सख्यं स्वपस्यमानः सूनुर्दाधार
शवसा सुदंसाः । आमासु चिद्दधिपे पकमन्तः
पयः कृष्णासु रुशद रोहिणीषु ।। १ । ६२।।
(स्वपम्यमानः ) सुन्दर कर्म करता हुआ (सुदंसाः)
और सदा शोभन कर्म करनेहारा ( शवसा+सूनुः ) बल का
पुत्र जो यह इन्द्र जीवात्मा है ( सनेमि+सख्यम् ) वह प्राचीन
मित्रता ( दाधार ) रखता है । हे इन्द्र ? आप (आमासु+
चित् ) अपरिपक्व गौवों के (अन्तः ) भीतर (पक्वम्।
दधिषे ) परिपक्व दूध को स्थापित करते हैं (कृष्णासु) काली
और (रोहिणीपु ) लाल गोंवों में तद्धिरुद्ध (रुशद् पयः)
देदीप्यमान श्वेत दूध बनाते हैं ।
यह पृथिवी और यह द्यलोक है इन दोनों में कौन ऊपर और
कौन नीचे इस प्रकार के कोई ऋषि वेदद्वारा प्रश्न करते हैं यथा--
?

( २०
६-कतरा पूर्वा सतरा परायोः कथा जाते
कवयः कोवेद ।
(आयोः) इस पृथिवी और शुलोक में से (कतरा+पूर्वा)
कौन पहिली या ऊपर है ( कतरा+परा ) और कौन पिछली
या नीचे है (कथा+जाते) वे दोनों बसे उत्पन्न हुए. (कवयः+
का वेद) हे कविगण इस को कौन जानता है ।
कोई अपि पूछते हैं कि जो नक्षत्र बहुत ऊंचे रात्रि में
दीखते हैं वे दिन में कहां चले जाते हैं। यथा-
७-नमी पक्षा निहितास उच्चा
नक्तं ददृशे सह चिहियेयुः । ऋ०१॥२४ । १०
(अमी) ये (ये) जो (रक्षा) नक्षत्रगण (उच्चा:निहितास:)
ऊंचे स्थापित (नक्तम् ददृश्रे) रात्रि में दीखते हैं (दिवा) दिन
में (कुह-चित्-ईयुः) कहां चलेजात है?
वे लिया है किन्तु उन्हे पुरुप कहते हैं आंखवाला देखना
है अन्धा नहीं देखता । जो पुत्र विद्वान् है वह इसको जानता
है । जो उनको जानता है वह पिता का भी पिता होता है।
-
यथा-
८-स्त्रियः सतीस्तां उ मे पुंस आहुः पश्यदक्ष
भवान् वि चेतदन्धः । कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत
यस्ता विजानात् सपितुष्पितासत् । ऋ० १ ।
१६४।१६।
(सतीः स्त्रियः) जो उत्तम स्त्रियां हैं अर्थात् सर्वत्र विस्तृत

( २१ )
हो के लोगों को मोहित कर रही हैं (ताम्+उ पुस+आहुः) उन्हीं
को कोई २ पुरुष कहते हैं (अक्षरावान+पश्यत्) ज्ञान दृष्टि
वाला देखता है (अन्धः) अन्ध पुरुष (न+वि+चेतत्) नहीं
जानता (यः कविः पुत्रः) जो विद्वान् पुत्र है (स:+ईम्) वही
(आचिकेत) सत्र प्रकार से जानता है (यः+ता+ विजानात् )
जो उनको जानता
(स: +पितु: +पिता +असत्) वह
पिता का पिता होता है।
इतनाही नहीं किन्तु कई एक स्थानों में दृष्टा ऋषि वेदद्वारा
कहते हैं कि मैं अवशानी हूं नहीं जानता पवित्र मन से पूछताई
यथा-
है-पाकः पृच्छामि मनसा विजानन्देवामेना
निहिता पदानि वत्से वकयेऽधि सप्ततन्तृन्धि
तत्निरे कवय ओतवा उ । ऋ० १।१६४१५
(पाकः)पक्तव्य अर्थात् परिपकमति में (मनसा+अवजानन्)
सुसंस्कृत समाहित मन से भी उस के गहन तत्त्वको न
जानता हुआ (पृच्छामि) पूछता है क्योंकि (एना+पदानि)
ये अतिगहन और सन्देहास्पदतत्त्व (देवानाम्) परमविद्वान्
पुरुषों के समीप भी (निहितानि) छिपे हुये हैं।
दीर्घतमा ऋषि कहते हैं कि मैं अज्ञानी हूं मैं विद्वान्
नहीं हूं । मैं विद्वानों से पूछता हूं । इन पट् संसारों को
किसने एक कर रखा है । यथा--

( २२ )
१०-अचिकित्वाञ्चिकितुपश्चिन्द्र कवीन्पृच्छामि
विद्मने न विद्वान् वि यस्तस्तम्भं पालमा रजस्य
जस्य रूप किमपि स्विदेकम् । ऋ० १२१६४१६
(अचिकित्वान्) देवतत्व को न जानता हुआ मैं (चि--
कितुषः चित्) परमार्थ तत्त्वके जानने हारे (कवीन्+अत्र)
फवियों को यहां (पृच्छागि ) पूछता हूँ (न+विद्वान् ) में
विद्वान् नहीं हूं (विमने ) जाननेकेलिये पूछता हूं ( यः)
जो परमेश्वर (इमान् पट्+रजांसि) इन छःलोकों को ( वि+त-
स्तम्भ) अच्छे प्रकार अपने नियमों में बांधे हुए है (अज-
स्य+रूपे) उस परमात्मा अजन्मा के स्वरूप में ( एकम् )
एक ही (किमपिस्वित्) कुछ है।
सौचकि ऋपि कहते हैं कि मैंने पाप किया है। मैं नहीं
जानता कि इसका कौनसा प्रायश्चित्त होगा। यथा-
११-किं देवेषु त्यज एनश्चकर्थाग्ने पृच्छामि
नु त्वामविद्वान् । ऋ० १० १७६ । ६
मूर्धावान् आझिरस कहते हैं हे पितरो ! हे कविगणो ! मैं
अज्ञानी होकर पूछता हूँ। आप को क्लेश पहुंचाने केलिये नहीं
किन्तु विज्ञान के लिये मैं जिज्ञासा कर रहा हूं । अग्नि कितने
हैं ? सूर्य कितने हैं ? उपएं कितनी हैं ? जल वा अन्तरिक्ष
व्यापक पदार्थ कितने प्रकार के हैं
१२-कत्यग्नयः कति सूर्यासः कत्युषासाकत्यु
स्विदापा । नोपस्पिज वः पितरो वदामि पृच्छामि
बः कवयो विझने कम् ॥ ऋ० १० । ८८ ॥ १८ ॥

( २३ ) मैं आपको कितने उदाहरण दिखलाऊं ऋषि गणों में से पन्ही नहीं किन्तु प्रापः सब ही जिज्ञासा का भाव प्रकट करते है । परमात्मा ने मानवजाति में जो मननशक्ति दी है उसी ने इस को प्रेरणा करके अद्भुत २ बात खोज करवाई हैं खोज होरहे हैं और दोते रहेंगे। ए विद्वद्वा! गवेषणा ही ने मानव: जाति को पशुदशा से मनुप्यदशा तक पहुंचाया है । ॥ इति जिज्ञासाध्यायः॥ * जिज्ञास्याऽध्याय २* जिस पदार्थ की जिज्ञासा की जाती है उसको जिज्ञास्य पहते हैं। अब प्रथम किसकी जिज्ञासा करनी चाहिये इसके उत्तर में यह कहा जाता है कि प्रथम सब से परमोपयोगी रात्रिन्दिवा कार्य में लानेवाले जो २ पदार्थ है उनको अच्छे प्रकार जानो। जैसे जल । किन २ पदार्थों से जल बना हुआ है ? पृथिवी से ऊपर जल कैसे चढ़ता वा वाप्प होता है? और वाप्प होके मेघ रुप में और मेघरूप से वर्षाप में कैसे आता है ? पुनः कभीर देखते हैं कि वही जल छोटे २ श्वेत उपल पत्थर-वनारी बनर कर मेघ से गिरता है इसका क्या भेद है? इसी प्रकार कभी कुहक (कुहेसा, कुहरा) लोगों की दृष्टि घेर लेता है। कभी रात्रि में हिम इतनी गिरती है कि समस्त वृक्ष, लताएं, गेहूं, जौ आदि फसलें । सूख जाती है । इसका क्या कारण ? जब कोई डब्बा किसी कूए वा नदी में डूबता है और वीस २ हाथ जलके नीचे चला जाता है। तब इस डब्बे को जल का बोझा क्यों नहीं प्रतीत होता । कोई.

( २४ ) वस्तु पानी में तैर जाती और कोई डूब जाती है इसका क्या कारगा इत्यादि अनेक वार्ताएं प्रथम जल के सम्बन्ध में जानो । जो लोग कहते हैं कि जल एक स्वतः स्वतन्त्र तत्त्व है वे नहीं जानते । ऐसेही एक इन्द्र नामका देव मेघ वर्षाया करता है । मेघ के कार जो कभी २ धनुप सा प्रतीत होता है वह इन्द्रधनुप है। मेप में ज़ो महागर्जन होता है वह इन्द्र गर्जता है। जो बिजुली नगकती है वह रुद्राणी है जो बिजुली गिरती है वह वलि को मारने के लिये इन्द्र फैंका करता है । मिट्टी के महादेव पूजने से वर्षा होती है वा, जप, तप, करने से वा मेंडकों को मेघ देवता के नाम पर मार के चढ़ाने से वृष्टि होती है इत्यादि जो सहलो वात दशम फैली हुई हैं वे सबही मिथ्या है या सत्य हैं उनकी परीक्षा करो। ऐप्यारे ? खोजो मेव होने का यथार्थ कारण क्या है इसके सम्बन्ध में आधुनिक बड़े विज्ञानं शास्त्र पढ़ो। पश्चात् वायु परम आवश्यक पदार्थ है । वायु भी स्वतन्त्र तत्त्व नहीं । कई एक पदार्थ मिलकर वायु बना हुआ है। हम सब सदा देखा करते हैं कि प्रीप्म तथा कमी २ वर्षा ऋतु में वायु बहुत वेग से चलता है । हेमन्त और शिशिर में मन्द पड़ जाता है। किसी २ देश में पूर्वीय और किसी २ में पश्चिमीय वायु सदा चला करता है । समुद्र का वायु कुछ विलक्षण होता है। इन सब का क्या कारण ? वायु को आंख से नहीं देखते किन्तु जब बेग से बहने लगता है तो बड़े २ पृश और मकान गिर पड़ते हैं : इस में ऐसी शक्ति कहां से आती है? वायुमें गुरुत्व है या नहीं? हरएका श्रादमी के ऊपर वायु का बोका कितना रहताहै। बोझा जल के ?

रहने पर भी हम लोगों को बोध क्यों नहीं होता! इस आश्चर्य चात को क्या आप जानना नहीं चाहते। पृथिवी से ऊपर कितनी दूर तक यह वायु है वायु के न रहने पर क्या हम क्षणमात्र भीजी सन। इम के द्वारा शब्द को दूर २ फैलते । इस के बिना अग्नि मयों नही जलता दाद क्यों नहीं होता । यदि एक कोठरी से किमा यात्र के द्वारा वासु निकाल दिश जाय तो यहां न तो अनि सनी और न अग्नि जलना इसका क्या कारण इत्या- दिया में भगवान् की लीला हा अन्वेषण कीजिये । ज्यो २ वगु सम्बन्धी विज्ञान में निपुण हो जायगे त्या २ परमात्मा में परम प्रीमि होती जायगी। जो काई कहते हैं कि वायु एक नतन देवई यह कभी २ मनुष्य का रूप धर स्त्रियों पर मोहित हो उनके पातिव्रत को भग्न करता है । जैसे केसरी की को अंजना और वायु की कथा है। यह वायु ४६ भाई हैं इत्यादि मिथ्या २ कथा मुना २ कर जगत् को श्रम जाल में फसा रहे हैं. ये स्वाधान्ध बानी मनुन्यजाति के महाशत्रु हैं। जिज्ञासुओ? से जल एक जड़ वस्तु है वैसे ही यह पवन भी जड़ है, यह भी मनुष्य का रूप धारण नहीं कर सकता । वायु विज्ञान पढ़ो मापको सब कुछ का ज्ञान होगा। इसके पश्चात् जिस पृथिवी के ऊपर आप निवास करते हैं उसको अच्छी तरह से जानें । परमात्मा की अद्भुत लीलाएं इस पृथिवी में देखगे। यद्यपि उसकी विभूतियां सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि में भी बहुत ही आश्चर्य जनक है, तथापि वे सत्र दूर ? . fho ( २६ ।। मुगमता से आप उन्हें नहीं जान सकते । पृथिवी सम्बन्धी विद्याएं बहुत सरलता से जान सकते हैं । इसकी लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई कितनी है यह गोल या चटाई के समान चिपटी है । सूर्य की चारों तरफ करीब ३६५ दिन में कैसे घूम आती है । इसके घूमने से दिन रात्रि कैसे बनजाते । ऋतु कैसे परिवचन होते । उत्त- रायण और दक्षिणायण क्योंकर होते । अथवा यह घूमती है या नहीं। यदि नहीं घूमती तो किस आधार पर है यह नीचे या ऊपर जा रही है । आप देखते हैं कि कहीं पृथिवी के भीतर से अग्नि और कहीं गर्म जल निकल रहा है। कभी भूकम्प होता। कभी समुद्र का पानी हटकर एक द्वीप बन जाता । इसके विष- रीत कहीं सूखी जमीन समुद्र बन जाती । कहीं सदा रात्रि के समान ही रहता। कहीं ६ कहीं ५ कहीं ४ कहीं ३ कहीं २ कहीं? ऋतु होती है। इन सब का क्या कारण ? पृथिवी के ऊपर विचित्र घटनाओं को देखकर भी क्या आपके हृदय में जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती है सूर्य पूर्व से पश्चिम आते हुये दीखता है क्या यह सत्य है क्या कभी आपके हृदय में ऐसा प्रश्न उठता आप पृथिवी सम्बन्धी, विद्याएं पढ़ेंगे तो आपको विस्पष्ट मालूम होगा कि सूर्य पूर्व से पश्चिम को नहीं जाता । जैसे नौकास्थ पुरुष को अपने विपरीत वृक्ष अादि चलते हुए प्रतीत होते हैं वैसे ही पश्चिम से पूर्व की ओर भ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर स्थित मनुष्यों को सारे ग्रह पश्चिम की ओर आते हुये प्रतीत होते हैं । पुनः यह भूमि जल से कितनी घिरी हुई है । समुद्र किस रूप से इसके ऊपर स्थित हैं। जब है समुन्द्रों के कारण भूमि पर क्या २ परिवर्तन होता है। कैसे समुन्द्र से वाप्प चलकर आकाश में मेघ बन वर्षा होने लगती । ज्वारभाटा क्योंकर हुन्ना करता है इत्यादि सहसूशः बात पृथिवी के सम्बन्ध में अध्ययन कीजिये । यह पृथिवी पहले कैसे बनी फिर धीरे २ इस के ऊपर जीवनन्तु कैसे होगये । मनुष्य कहां से वागये । पर्वत, नदियां, समुद्र, कैसे बन गये ! क्या इत्यादि बातों के जानने के लिये आप के मन में उत्कण्ठा नही होती ? यही तो ईश्वर की परम विभूति है । भूगोल, भूगर्भ विद्या, वनस्पतिशास, प्राणि शास, प्राणियों के क्रमाभ्यु- दयशाल इत्यादि विद्याओं के अध्ययन से परमात्मा के अकथ- नीय कौशल का किश्चित् २ बोध होने लगता है । इस प्रकार प्रथम पृथिवीस्थ पदार्थों की पूरी जिज्ञासा फीजिये । तदनन्तर ऊपर दृष्टि दीजिये । सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों की ओर रष्टि दीजिये । जिन नक्षत्रों को यहां से बहुत ही छोटे २ टिमटिमाते हुए देखते हैं क्या सचमुच उतने ही छोटे या बहुत ही बड़े हैं ? इस पृथिवी से वे कितनी दूरी पर है ? वे हमारे ऊपर क्यों नहीं गिर पड़ते ! पृथिवी से सूर्य चन्द्र कितने दूर व कितने लम्बे चौड़े हैं वे हैं क्या ? ऐ मनुष्यो इन बातों को जानिये । मिथ्या २ बातों में क्योंकर फसेहुए रहत हैं। श्राप प्रथम उनके विषय में प्रश्न कीजिये । जानिये और बारम्बार विचारिये जिन को आंखा वा अन्यान्य इन्द्रियों से वा किसी दूरनिरीक्षण और सूक्ष्म वस्तु निरीक्षण यंत्रों से देखते चा अनुभव करते हैं । आप अपनी चारोंतरफ़ स्थित वस्तुओं - ( २८ को जानें । परन्तु शोक की बात है कि प्रथमही आप उन विषयों को पूछना वा जानना चाहते हैं जिनको श्राप देख नहीं सकते । जैसे वे बतलादिए जायंगे वैसे ही आपको मान लेने पड़ेंगे, सोचिये तो वैसे प्रश्नोंसे श्राप को अभी क्या प्रयोजन ! आप जानना चाहते हैं कि शरीर को छोड़ यह जीव कहां जाता कैसे जाता ? पृथिवी पर कितने दिन रहता । पुनः कहां जाता। कोई इसको साथ ले जाता वा एकाकी ही यात्रा करता है । देह छोड़ते ही क्या दूसरा देह पालेता या कहीं जाकर स्वर्ग वा नरक में वास करता रहता है। यह जीव कैसा है। कितना छोटा, कितना वड़ा, कितना मोटा इत्यादि अज्ञेय वस्तु को आप जानना चाहते हैं । किन्तु इस जीव में कितनी शक्ति है क्योंकर कोई बुद्धिमान् और कोई मूर्ख बना रहता है । क्योंकर बुद्धिमानों ने ऐसी २ विद्याएं निकाली, कैसे इस जीवात्मा से रेल, तार, विमान इत्यादि सहसूशः विद्याएं निकली, कैसे उत्तम २ काव्य शास्त्र वनगए इत्यादि प्रत्यक्ष वस्तुओं की जिज्ञासा नहीं करते । आप सोचें तो किसी ने आप से कहदिया कि जीवात्मा अणु है वा विभु है वा मध्यम परिमाण है। आप अब क्या मानेंगे। अांख से देखते नहीं। पदार्थ ज्ञान विना तर्क भी ठीक नहीं हो सकता। इस अवस्था में केवल विश्वासकरनाही पड़ेगा। अब ऐसे २ प्रश्नों से क्या प्रयोजन पुनः किसीने कहा कि यह जीवात्मा शरीर को छोड़ एक ही दिन में चार लाख कोश दूर यम पुरी में पहुंच जाता है ' दूसरे ने कहा कि नहीं ? यह शरीर को छोड़ प्रथम दिन बीस हजार कोश चलता है। दूसरे . ? ।

( २६ , . दिन चालीस हजार फोस, तीसरे दिन साठ हजार कोश इस प्रकार दश दिन चलकर यम पुरी में जा पहुंचता है। किसी ने कहा कि यह सब झूठी बात है । अात्मा न कहीं जाता न आता। यहां ही रहता है । किसी शरीर में प्रवेश कर जाता इत्यादि । तीसरे ने आके कहा कि यह भी मिथ्या है । आत्मा कोई वस्तु ही भिन्न नहीं है । यह भ्रम मात्र है ब्रह्म ही जीव है। यह भी कथन मात्र है । न मैं हूं न तू है । सारी माया है । माया क्या है ? अरे माया भी कोई वस्तु नहीं । किसी ने कहा किये सब पागल हैं । जीव एक शरीरसे पृथक् वस्तुहै । परन्तु इम नहीं कह सकते हैं कि वह कैसा है । अब आप विचार करें कि जहां ऐसी अंधेर लीलाएं हैं वहां आप क्या जान सकते हैं हां, मूर्ख, मंदमति, पुरुषों के लिये ऐसे ही विपय रोचक होते हैं । ऐ मेरे धार्मिक पुरुषो ? प्रथम श्राप प्रत्यक्ष पदार्थों की जिज्ञासा करें अप्रत्यक्ष की ओर न जाएं । जब देश में विद्या नष्ट होजाती पाखण्डी, धूर्त, स्वार्थी उत्पन्न होते हैं तब वे मूर्यो को फंसाने के लिये अनेक जाल बनाते हैं इस लिये आप कभी ऐसी बातों की ओर न जायं जिन को श्राप देखते नहीं । पदार्थ ज्ञान की परमावश्यकता। चारोंवेद, छहों अङ्ग, छहों उपाङ्ग, धर्मशास्त्र तथा १८ अष्टादश पुराण इत्यादि २ सब शास्त्र पदार्थ ज्ञान के अधीन हैं जब तक आप को पूर्णरीति से पदार्थों का परिचय नहीं होता तबतक न लौकिक और न परलौकिक ही कार्य यथाविधि निष्पन्न होंगे। बात बात में आप ठगे जायंगे । वैदिक यज्ञ ? काल में कुछ उत्तर प्रत्युत्तर होते हैं उनके पदार्थज्ञान न होने से वैदिक यज्ञ ही व्यर्थ है जैसे- को अस्य वेद भुवनस्य नाभिं को बाबा पृथिवी अन्तरिक्षस् । कः सूर्यस्य वेद वृहतो जनित्रं को वेद चन्द्रमसं यतोजाः । यजुर्वेद । २३ । ५६ (अस्य भुवनस्य नाभिं कःवेद) इस संसार के नाभि अर्थात् बन्धनस्थान आदिकारण और परस्पराश्रयायिभाव को कौन जानता है ? ( द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम् ) घुलोक, पृथिवी लोक और अन्तरिक्ष लोक इन तीनों लोकों को कौन जानता है (वृहतः सूर्यस्य जनित्रं कः वेद ) इस महान् सूर्य के जन्म को कौन जानता है ? (यतो जः चन्द्रमसं कः वेद) जहां से चन्द्र उत्पन्न होता है अर्थात् शुक्लपक्ष में बढ़ता और कृष्णपक्ष घटता कैसे है इसको कौन जानता ? यहां चार प्रश्न हैं । इनके समाधान में कहा जाता है कि मैं जानता हूं । अब आप बता कि कोई मूर्ख या किंचित् पढ़ा हुआ अथवा एक २ शास्त्र का ज्ञाता कभी भी इन चारों का यथाविधि यथोचित समाधान कर सकताहै ? मैं छोटे से अन्तिम प्रश्न पर विचार करता हूं तो सारे सम्प्रदायी पुस्तकों में इसका समाधान अशुद्ध पाता हूं। चन्द्रमा क्यों घटता क्यों बढ़ता। उसकी उत्पत्ति कैसे हुई इस पर नाना विप्रतिपत्तियां (परस्पर विरुद्ध बचन ) देखता हूं। कोई कहता है कि छः दिनों में ही यह सम्पूर्ण विश्व बन गया कोई कहता है कि समुद्र से या अत्रि की दृष्टि से चन्द्र उत्पन्न हुआ है । देवता और पितर दोनों दल बराबारी ?

(३१) चन्द्रस्य अमृत पीते हैं इस हेतु यह घटता बहता रहता है। पहिये यही चन्द्रोत्पत्ति का ज्ञान है ? प्यारे मित्रो ! इस प्रश्न के उत्तर के लिये क्या २ जानना चाहिये। शास्त्र पढ़कर देखो अत: नुम यदि वेदों की रक्षा करना चाहते हो तो पहले पदार्थ विधान सन्मन्धी शास्त्रों को अच्छे प्रकार पड़ी। उन चारों प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार दिया जाता है। वेदार मस्य भुवनस्य नाभिं वेद द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम् । वेद सूर्यस्य वृहतो जनित्रमथो वेद चन्द्रमसंयत्तोजाः । यजुः २३ । ६० । १- इस संसार के नाभि को जानता हूँ। २-मैं याचा- पृथिवी और अन्तरीक्ष को जानता है । ३-मैं महान् सूर्य का जन्म जानता हूं ४-मैं चन्द्रमा को जानता हूं जहां से वह उत्पन्न होता है। वेद भगवान् का यह उत्तर जतला रहा है कि ऐ मनुप्यो ! प्रथम तुम पदार्थतत्त्ववित् बनो तव वैदिक कर्मों में प्रवृत्त होवो । इसी प्रकार नैयायिक तर्क क्या करेंगे जब उन्हें पदार्थ ज्ञान ही पूरा २ नहीं है । पदार्थ ज्ञान के ऊपर ही तर्क भी श्राश्रित हैं। मानलो कि कोई कहता है कि पृथिवी तीक्ष्ण वेग से लट्ट के समान घूम रही है। अब इसपर नैयायिक यदि कहें कि नहीं । आंख से पृथिवी को घूमती हुई नहीं देखते अतः आपका कथन मिथ्या है तो क्या नैयायिक का इतना कहना पर्याप्त होगा ? नैयायिकों के उस कथन को वैज्ञानिक पुरुष अति तुच्छ दृष्टि से देखेंगे और जैसे बालक के बचन पर विद्वान् हंसता है वैसेही हंस देवेंगे । इसी प्रकार आजकल के वैशेषिक और नया- । ३२ . यिक मिलकर कह कि वायु और जल अमिश्रिततत्त्व है तो क्या वैज्ञानिक इन के शिर को सावित रहने देंगे ? मुन्यतया आक्सी- जन और नैट्रोजन इन दो वाप्पीय पदार्थों से वायु बना हुआ है और श्राफ्सीजन और ईट्रोजन इन दो पदार्थों के रासायनिक संयोग से जल बनता है । इसी प्रकार भारत भूषण प्रातः स्मर- णीय श्री भास्कराचार्य सिद्धान्तशिरोमणि प्रभृतिमन्थ विरचयिता थदि जीते रहते तो पृथिवी अचला है स्वशक्ति से भाकामा में स्थिर है और सूर्य इसकी परिक्रमा करता है ऐसे कहते हुए श्री भास्कराचार्य जी के आगे मोटे २ लम्बे २ लट्ठले २ कर वैज्ञानिकपुरुष खड़े हो जाते । किगधिकम् । प्यारे पालम्य त्यागो पदार्थ ज्ञान की ओर आयो । पदार्थज्ञान विज्ञान के ही गुलाम समस्त शास्त्र हैं । हां मैं यह अवश्य जानता है कि पुराणों ने आप की बुद्धि के ऊपर ऐसा अट ताला लगा दिया है । उस फोठरी का खुलना दुष्कर हो गया है। कुछ चिन्ता नहीं यह शास्त्र तीक्ष्ण महान् चुम्बक लोहा है । अथवा इसके निकट सब तरह की कुञ्जियां हैं यदि तुम चाहोगे तो वह ताला खुल जायगा। ॥ इति जिज्ञास्याध्यायः॥ *वेद-जिज्ञास्याध्याय ३* पूर्व उदाहरणों से विदित है कि वैदिक समय के ऋषिगण बहुत ही तलाश में लगे हुए थे। ऋषियों के अनुगामी पुरुषों को उनित है कि उनके पथ पर चलें । वे नर पशु हैं जिनका मन प्राकृत घटनामों से प्रेरित हो खोज में नहीं लगता है। अथवा उस २ विधा के ज्ञाता के समीप जाके नहीं पूछते हैं । भूकम्प, मूर्यचन्द्र का उपराग, चन्द्र का घटना बढ़ना, इन्द्रधनुष, चवण्डर, पूर्वीय पश्चिमीय वायु और समुद्र का ज्वारभाटा आदि शतशः घटनाएं प्रतिदिन, प्रतिमास प्रतिवर्ष होती ही रहती है। इनके सत्य कारण जानने के लिये जो प्रयत्न नहीं करता है वह नगन में प्रजागलस्तनवत् व्यर्थ है । यदि कहैं कि ये सब अति तुच्छ वाते हैं। पुराणों में इन सब का उत्तर एक २ श्लोक में देके झंझट कर दिया गया है अब हम इन में क्या तलाशी करें। जिस के सहम् फणों पर पृथिवी पुष्पवत् स्थापित है वह जब २ करवट लेना चाहता अथवा जब कभी देह सुग बुगाता तवही भूकम्प होता, इस में कौनसी विशेषता, और आश्चर्य- प्रदबात है जिसकी जिज्ञासा में अपना समय व्यर्थ वितावें । राहु की सूर्य चन्द्र से शत्रुता होगई है वह कभीर बदलालेने के हेतुं उनपर धावा करता है । यही ग्रहण है । देवता और पितर वारी २ चन्द्रस्थ अमृत पियाकरते हैं अतः वह घटता बढ़ता हैं पलिके मारने के लिये इन्द्र अपना धनुप तैयार करता । भूत प्रेतों को जब कभी यात्रा करनी होती है तो वात्या अर्थात् ववण्डर पैदा होता है । देवता जब सभा करने को बैठते हैं तब सूर्य और चन्द्र की चारों तरफ परिधि गोलचक्र वनजाता है वहां बैठकर देवगण विचार करते हैं । समुद्र का पुत्र चन्द्रमा है । अपने पुत्र से मिलने के हेतु समुद्र बढ़ता है । इत्यादि सहस्रशः वातों का समाधान ऐमा बुझा २ फर पूर्ण करते हैं कि एक छोटा बच्चा भी समझ जाता है तय ऐसी २ पाहत घटनाओं के विचार में केवल बालक और वालिश जिन्हे कोई काम नहीं, भले ही पड़े रहे । ईश्वर का भजन करना ही मनुष्य जीवन का परम उद्देश व पुरुषार्थ है । परमार्थ की बात कीजिये ! माया की बात क्यों जगत् में फैलाते हो। इस में पया धरा है । लोग नास्तिक हैं ही इस से अधिक घोर कर हिंसक बन के क्षयकारी होजायंगे । समाधान । श्रद्धालु विश्वासी जनो ? आपने जो कहा है वह पापका दोष नहीं ऐसे ही कुल और समाज में आपका जन्म हुआ है कि ऊपर की ओर दृष्टि नहीं जायगी । रेणुकण ऊर्ध्व जा के भी नीचे ही गिरता है। शुक जैसे काक नहीं पढ़ता । भारतवासी इस समय विपरीत दिशाको जा रहे हैं न जाने किस अन्धकारमय कोठरी में ये गिरेंगे। सोचिये । मापन पुराणों पर विश्वास करलिया तब तो वातुल जैसे वकते हैं। त्वयं मी कभी भृगु जैसे तपकर इन घटनाओं की परीक्षा की है(१)डार्विन जैसे कभी दो चार दिन भी इसके लिये सर्फ किए हैं (२) ऋषि भरद्वाज जैसे एक जीवन भी इस महान कार्य में परायण हुए हैं। जो जन-समुदाय किसी एक के पीछे चल पड़ता है उस का अध: पतन बायवलीय आदम सा (४) पौराणिक नहुप सा (५) अथवा नियागरा जलप्रताप सा अथवा रात्रि का ज्योतिष का सा होता है। पुराणों के ही पीछे मत चलिये । पृथिवी पर और भी तो कोहनूर जैसे वहु मूल्य शास्त्र हैं और आपके अभ्यन्तर नोट-१ ऋषि भृगुजी पांचवार अपने पिता के निकट ब्रह्म विद्या की शिक्षा (३५ ) म भी तो विवेक रोडियम स्थापित है इनके द्वारा भी देखा मीजिये। विधागियो ! जब प्रत्यक्ष पदार्थो का ज्ञान ठीक से पुराणों में वर्णित नही है तब अजय, समाधिगम्य परम त्मा का निरूपण उनमें तथ्यही है हम कैसे कह सकते हैं । देखिये ! पुराण कहते कि यह गंगा स्वर्ग से गिरती है किन्तु अब लाखो विज्ञ देख प्राप है कि वह हिमालय के एक झील से वह के निकलती है। यहां अपर से इसको गिरती हुई कोई नहीं देखता। फिर Mamamkeen तर मनग करते रहे। -अधिनसाय ने मनुष्य का विकाश पृथिवी gभाग के लांज में पृथियों पर के प्रायः चारों प्रकार के जीवों पूरी माना लली मार दमों में अपना सम्पूर्ण जीवन वितादिया ।-३ माम परन न हो गए तब इन्द्र आके बोले कि मध्ये यदि मैं आप को एक सनायु और दूं तो आप उस से क्या करेंगे । भरद्वाज ने कहा कि विचादी गोजता रहूंगा । इन्द्र वर देके चले गए और वह पुनः विद्या सोज ने लगे। इस प्रकार भाद्रज को तीन शतायु और भी दीये गए वह विद्या हो सोते रहे । अन्त में आके इन्द्र ने कहा" अनन्ताव वेदाः" वेद पयात विद्याएं अनन्त है नहानक आप टुंठेंगे । बहुत प्रशंसनीय जीवन मापका पीता है । अग मुक्ति धाम चलिये । वह आलम्हारिक कथा है । ऋषियों के परम परिश्रम दिखलाने के लिये अतिशयोक्ति और मनुष्य प्रवृत्यर्थ गेचक है । ४-बायबल में कथा आती है कि एक शैतान के बहकाने से भादम ने निषिद्ध फल खाया इस अपराध के लिये वह स्वर्ग से गिरा दिया गया। ५-इन्द्राणी के फन्दे में पड़के राजा नहुप, स्वर्ग से गिर गया और अजगर सांप होगया ये दोनों ही काल्पनिक कथाएं हैं :- किसी २ रात्रि को आकाश से बहुत सी ज्योतियां गिरती हुई दीखती हैं। इग्रे कोई तारा टूटना कहते हैं। वास्तव में वह यायु है किसी कारणवश अग्निवत् जल रठता और गिरता हुआ प्रतीत होता है।

( ३६ । . क्योंकर ऐसी बात पर विश्वास करें । यदि कोई भी सिद्ध पौराणिक भागीरथी को रुद्रकी जटा से वा विष्णु के पैर से निकलती हुई दर्शन करवाते तो सबही इसको कबूल करही लेवेंगे । इनकार करने की कोई भी गुंजाइश न रहेगी । मरे कहते हैं कि मगध की कर्मनाशा नदी के ऊपर लटकेहुए त्रिशंकु के मुह से लार गिरता रहता है अतः उस में नहाना पाप है । यहां विचार ने की बात है मेघ से गिरते हुए पानी को लोग : वरावर देखा करते हैं तब वैसा ही त्रिशंकु का लार गिरता ৪। क्यों नहीं दीखता यदि वह नहीं दीखता तब कर्मनाशा का जल भी न दीख पड़े । शैव कहते हैं कि काशी त्रिशूल पर स्थापित स्वर्णमयी है। इसीहेतु अभीतक मथिल ब्राह्मण वहां से मिट्टी वा मिट्टी के वर्तन नहीं लाते क्योंकि वहां की मिट्टी सोना है उतना दाम दे नहीं सकते । किन्तु भूगर्भ विद्या के अध्ययन से जाना जाता है कि यह सारी बातें मिथ्या हैं । यदि वहां कुछ भी विश्वनाथका प्रताप होता तब औरंगजेब इनका मन्दिर तुड़वा मसजिद ही कैसे बनाते ? पौराणिक चिरंजीवी मार्कण्डेय वलि, व्यास महावीर, विभीषण कहां हैं ! किस पर्वत पर परशु- राम तपकर रहे हैं। उनका वह २१ बार क्षत्रियों को अन्त करने हारा बल कहां है ?. प्यारे ! ये सब गप्प हैं। तुम कहते हो कि अभी तक लंकाद्वीप में राक्षसों के साथ विभीपण राज्य कर रहे हैं । अंगरेजों का राज्य वहां नहीं है । भला सोचो तो अयोध्या में अंगरेज राज्य करते हैं या नहीं ? जब रावणान्तक राम राज्य में ये विराजमान हैं तब रावण राज्य में इनके राज्य . -

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का होना असंभव कसे ? पुराण कहता है कि मुंगेर के एक
अगर में जो गरम जल निकालता है उसका कारण वहां सीताजी का
गान है। परन्तु यदि वैसा होता नप वहां ही खोदकर अंगरेज
में गरम जल निकाल इसको मिन्या सिद्ध करते । तुम ३३
संतीस कोटि देवता पूजते हो । कभी अपने आंखोसे किसी देवता
मो दवा नही विचारशील पुरुषों : इन मदोन्मत्त कथाओं
पर अपना अप्राप्य जीवन गत जानेदो। अाजकल विज्ञान
का मार दि इसमें पीछे रहजाओगे तो तुम्हारा कहीं
भी पता नहीं लगेगा । सोनपुर के कार्तिकी मेले में जैसे अयोध
मालक भगजाते हैं ऐसे तुम भी मनुष्य समाजों से कहीं पृथक्
जोगे । पुराणों की बात मत किया करो वे वायवल के
दानान के समान है।
जमे निरपराधी समुद्र के उपरतटवासियों को रामके बाणने
अमलिया। विष्णु के चक्र ने दुर्वासा को पतित कर ही छोड़ा वैसाही
पुराना पायर्यावर्त को निगले विना न छोड़ेगा, पुराणमहाऽजगर इस
भारत विहग के समीप पहुंच गया है अब निगलने की थोड़े ही देरी
है। भाइयो ! यदि इस अजगर से अब भी बचना चाहते हो तो
विज्ञान की शरण में भाग आओ । त्राण की अब भी आशा है
जयपुर के रामनिवास बाग के फूल, कलकत्ते के अजायबघर के
मृत शरीर पंजर ! जियालोजिकलगार्डन के समस्त प्राणी, जापान
की रंगविरंगी मछलियां आफ्रिका के विचित्र पक्षी आपके मनको
अपनीओर आकर्षण नहीं करते पृथिवी पर घूम २ कर देखो।
चकित होजाओगे।मैं कहांतक लिखू, यदि आपको वेदों, शास्त्रों,
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( ३८ ? (३ तथा अन्यान्य धर्म पुस्तकों में विश्वास है तो उन्ही ग्रन्थों से कुछ बातें दिखाता हूं कि वे किस २ वस्तु के वर्णन करने से इतने महत्व को पाए हुए हैं। पूर्व में वेदों के अनेक उदाहरण दिखला चुका हूं कि परमात्मा से प्रेरित होकर ऋषिगण कैसी २ वातों की जिज्ञासा करते हैं । ऐ मेरे श्नाबको ? सुनो ? वे महर्षि इनही अग्नि, वायु, मेघ, विद्युत्, सूर्य, पृथिवी, जल, वृक्ष, पति, प्रातःकल, पूर्णिमा, अमावस्या, घोड़े, हाथी, जलचर, थलचर, नभचर, आदिकों के ही तो वर्णन करते हैं । परमात्मा की विभूतियों से वे ऋषिगण इतने मोहित हुए कि सुध बुध भूलकर इनके ही वर्णन करते ठककमागए । मैं दो चार बातें प्रथम यजुर्वेद की कहता हूं। यजुर्वेद-प्राणायस्वाहा । अपानायस्वाहा । क्यानायस्वाहा । चक्षुषेस्वाहा । श्रोत्रायस्वाहा । वाचेस्वाहा । मनसेस्वाहा । यजुः २२ । २३ यहांपर प्राण, अपान, ब्यान, चक्षु. श्रोत्र, वाक्, और मन के लिये स्वाहा कहा गया है । परन्तु ये प्राण अपानादि कौन वस्तु हैं यह आप यदि न जानेंगे तो इस से कौनसा फल प्राप्त करेंगें पुन:- प्राच्यदिशैस्वाहा । अर्वाच्यदिशेस्वाहा । द- क्षिणायैदिशेस्वाहा । अर्वाच्यैदिशेस्वाहा । प्रती- च्यैदिशेस्वाहा । अर्याच्यदिशेस्वाहा । उदीच्यैदि- शेस्वाहा।अर्वाच्यदिशेस्वाहा। जायै दिशेस्वाहा। - भाच्यदिशेस्याहा ! अर्वाच्यदिशेस्वाहा । अर्या- च्यैदिशेस्वाहा । पतुः । २२ । २४ । यहां सर दिशाओं और विदिशाओं के नांग पाए जाते हैं भानी मंदिगादसिगदि। । मतीची पश्चिमदिशा उदीची- आमा जम्मा ऊपर की दिया और अयानी नीचे की दिशा और इन दिनों की वाचली दिदाएं जो अर्यानी कदाती हैं इन मर के लिये स्वाहा बानी पुरुषा ? नही वस्तुयों का वैशेषिक मीराज फल के बड़े र बिहान यदी बुद्धिमता के साथ नि. र कर रहे है। सोचिए तो पूर्व पश्चिम दिशा कहां से और मीन परतुदै । इनका कद अंत है । ऐसे ख्यालात क्योंकर उसकते हैं। क्या इसके पता लगाने फेलिये आपको प्रयत्न नदी करना चाहिये ! पुन:- अद्भपास्वाहा। वाय स्वाहा । उदकायस्वाहा निष्टन्तीभ्यः स्वाहा । सवन्तीभ्यः स्वाहा । स्यन्द- मानाभ्याःस्वाहा कृप्याभ्या स्वाहा। सूद्याभ्यःस्वाहा धार्याभ्यास्वाहा।अर्णवाय स्वाहा।समुद्राय स्वाहा सरिराय स्वाहा । २२ । २५ । यहां सब प्रकार के जलों के नाम पाए जाते हैं । आप वार और उदक ये तीनों नाम तीन प्रकार के जलों के हैं। ति- छन्ती नदियां वा समुद्रादिकों के जल जो खड़े हैं। सवन्ती- किसी पर्वत के वा पृथिवी के छिद्र से जो जल स्रवित होरहाहै। स्पन्दमाना-जो धीरे २ नहरहा है । कूप्या = कूएं का जल।

(४०)
सूद्या = खाते का जल । धाऱ्या = गृह में वा कहीं जमा किया
हुआ जल । अर्णव और समुद्र ये दोनों नाम सागर के हैं।
एकही कण्डिका में सब प्रकार के जला के नाम आगए
हैं । कहिये आजकल के वैज्ञानिक पुरुष इनहीं जलों के तो
तत्त्वावधान कर रहे हैं जल क्या वस्तु है । क्या आप जानते
हैं। नैयायिक, वैशेषिक, और सारख्य इसको कौन वस्तु ठहराते
और आज कल के वैज्ञानिक क्या कहते हैं। इनके भिन्न २
सिद्धान्त तो पदिये । जैसे पिपासित मृग जलकी पोर दौड़ता
है वैसे ही इस विद्या की ओर दौड़िये। आप समुद्र से डरते हैं
क्योंकि समुद्र आपसे बहुत दूर है। प्रति साल कई लक्ष नरनारियां
समुद्र को देखे बिना ही मरजाते हैं। भारतवर्ष के मरुदेश
निवासी प्रायः नदियों का भी दर्शन नहीं करने पाते हैं । कालाग्यस
वास्कोडेगामा और मजिल्लां के समान सामुद्रिक यात्रा करके
परमात्मा की आश्चर्य विभूतियां देखो । पुन:-
वातायस्वाहा । धूमायस्वाहा। अभ्रायस्वाहा।
मेघायस्वाहा। विद्योतमानायस्वाहा।स्तनयतेस्वाहा
स्तनयतेस्वाहा । अवस्फूर्जतेस्वाहा । वर्षतेस्वाहा।
अववर्षत स्वाहा। उग्रंचर्षतेस्वाहा।शीघ्रवर्षतेस्वाहा
उद्गृहणंतेस्वाहा । उद्गृहीतायस्वाहा । प्रष्णते-
स्वाहा। शीकायतेस्वाहा । प्रष
पुष्वाभ्यास्वाहा । हादः
नीभ्यःस्वाह । नीहारायस्वाहा । यजुः २२ ॥ २६
यहां सब प्रकार के मेघों का वर्णन है । मेघ कैसे बनता
है इसकी कौन २ दशाएं होती हैं यहां इनके नाम देखते हैं
.

(४१) सूर्य की गरमी की सहायता से वायु पानी को ऊपर चढ़ाता है। फिर वह धूमसा दीखता है । फिर मेध अर्थात् वरसने सा हो जाता है तब उसमें विद्युत गर्जन, वर्पण किञ्चित् वर्पण, अधिक वर्षण श्रादि व्यापार होने लगते हैं पीछे छोटे २ बूंद होके समाप्त होने लगता है । पुनः इसी जलका एक भेद कभी २ जाड़े के महीने में कुहेसा दीखता है। इसको वेद में नीहार कहते हैं। चिन्तकजनो ! क्या तुम समझते हो कि कैसे समुद्र से वा पृथिवी से जल उठके मेघ बन पृथिवी को पुनः२ सिक्त करता रहता है। कभी २ मेघ से पानी के छोटे २ पत्थर क्यों- कर गिरते हैं। ये उपल कैसे बनते हैं ? फालगुन, चैत्र,वैशाख में कभी भयंकर रूपसे जलीय पत्थर गिरते हैं जिससे किसानों को बड़ी हानि पहुंचती है । क्या इसका कारण है । कुहेसा क्या पदार्थ और कैसे बनता है, क्या मेघ की दौड़ती हुई काली घटा आप के मन को मोहित नहीं करती । इसके चरित्रों से परिचित होनाक्या आप नहीं चाहते । यदि चाहते हैं तो पदार्थ विद्याको ध्यान से पढ़िये । कैसी २ अाश्चर्य विभूतियां दीख पड़ेगी । पुन- नक्षत्रेभ्यःस्वाहा । नक्षत्रियेभ्यःस्वाहा । अहो. रात्रेभ्यःस्वाहा । अर्द्धमासेभ्यःस्वाहा । ऋतुभ्यः- स्वाहा । आतेभ्यःस्वाहा संवत्सरायस्वाहा । द्या- वापृथिवीभ्यां स्वाहा । चन्द्राय स्वाहा । सूर्याय स्वाहा । रश्मिभ्यास्वाहा। वसुभ्यास्वाहा । रुद्रे । ४२ भ्य स्वाहा । श्रादित्येभ्यःस्वाहा । मरुभ्यःस्वाहा विश्वेभ्योदेवेभ्यः स्वाहा । मूलेभ्यास्वाहा । शाखा- भ्यःस्वाहा । वनस्पतिभ्यःस्वाहा । पुष्पेभ्यःस्वाहा। फलेभ्यः स्वाहा । ओषधीभ्यःस्वाहा । यजुः २२।२४ यहां नक्षत्र से लेके ओपधि पर्यन्त के नाम है । रात्रि में नक्षत्र क्यों दीखते । वे संख्या में कितने और कितनी दूर है। इनको कौन गिन सकेगा किन्तु अाजकल बड़े २ दूरबीन बनाए गए हैं जिनके द्वारा इनके बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं । शुक्ल और कृष्णपक्ष क्यों होते । सूर्य और चन्द्र कहां उदय अस्त लेते हैं । चन्द्र तो दिन में भी दृश्य होता परन्तु मूर्य रात्रि को कहां चला जाता । फिर वायु जल गरमी और प्रकाश की सहायता से कैसे मूल, शाखा वनस्पति, पुष्प, फल, और विविध औषधियां उत्पन्न होती हैं । इनके क्या २ स्वभाव है। प्यारे! इस एक कण्डिका के तत्वजानने के हेतु अनेक विद्याओं की जरूरत है । ज्योतिष शास्त्र, वनस्पति शास्त्र, भौतिक शास्त्र प्रभृति विद्याओं को जाने बिना इनका भेद कैसे भासित होगा । पुन:--- वसन्ताय कपिजलाना लभते । श्रीमाय कलविङ्कान वर्षाभ्यस्तित्तिरीन ,शरदेवर्तिका हेम- न्ताय ककरान शिशिराय विककरान् यजु०२१।२० यहां बसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर इन छचों ऋतुओं के नाम हैं । पुनः यहां एक और भी बड़ी विल-

(४३,
पणता और विद्या की और लेजानेवाली वार्ता देखते हैं। वसन्त
ऋतु के लिये फपिजल = पौईकी या कबूतर। ग्रीप्मार्थ कलर्विक
चरकपनी । वर्षा के लिये तीतर । शरद के लिये वटेर । हेमन्त
के लिये फकरनाम के पक्षी। और शिशिर के लिये विककरनाम
फे पक्षियों को प्राप्त करें। जब तक ऋतु विद्या और पक्षी विद्या
का वास्तविक्तत्व न जानेगा तब तक इसका भेद कैसे मालूम
होगा । वसन्त और कपिजल से क्या सम्बन्ध है ? इन पक्षियों
का फ्या २ स्वगाव है यह सब अवश्य ज्ञातव्य है ।
?
समुद्राय शिशुमारानालभते। पर्जन्याय मण्डू
कान् । अयोमत्स्यान् मित्राय कुलीप्यान् ।
घमणाय नामात् । २१ सोमाय हंसानालभते ।
वायवेवलाका इन्द्राग्निभ्यां ऋञ्चान् । मित्राय'
मद्ग्रन् । वरुणाय चक्रवाकान्। २२ अग्नये कुदरुना
लभते । वनस्पतिभ्य उलूकान् । अग्नीषोमाभ्यां
चापान् । अश्विभ्यां मयूरान् मित्रावरुणाभ्यां
कपोतान् । २३ ।। इत्यादि ।
यजुर्वेद के इस
चौबीसवें अन्त तक बहुल से
जलचर, स्थलचर, नभश्चर प्राणियों के नाम आए हैं। पता
सहित उन के नाम यहां लिखदेते हैं विचार कीजिये ! जहां
वक होगा भाषार्थ कर दिया जाता परन्तु इन वैदिक नामों को
सी तो स्मरण रखिये।
अध्याय
के

४४. देवता के नाम प्राणियों के नाम पता (२१) समुद्र के लिये ... शिशुभार = जलजन्तु जो अपने बच्चों को भी मारके खाजाय । पर्जन्य.. मराडूक - मढ़क, मढ़क, मेढुक मत्स्य मित्र कुलीपय केंकरा जल - मछली वरुण, नाक मगर सोम •he वायुम मित्रा वरुण अग्नि, वनस्पति,, अग्नीषोम, अश्वी मित्रा वरुण, सोम, इंस (२२) वलाका बगुली कच - सारस, मद्गु शुतुरमुर्ग चक्रवाक - चकवा, चकई . कुटरु मुर्ग (२३) %D उल्लू चाष - नीलकण्ठ मयूर कंपोत - फबूतर 'लव - बटेर (२४). कौलीक = कौलीक नाम कापक्षी गोषांदी = गौवापरबठनहारेपक्षी कुलीक :: = मोर. त्वष्टा, देवपत्नी, देवजामि,, ...

( ५ ) देवता के नाम आनि.. दिन, रात्रि, अटेरासन्धि मा संवत्सर भूमि, अन्तरिक्ष, प्राणियों के नाम पती पारुण पारावतं = पांडकी,कबूतर(२५) सीचा जतु दात्यो %3D काले कौया सुपर्ण सुन्दरपांखवालापक्षी याखु %3D चूहा (२६) पाङ्ग = जो पंक्तियांधकरचले. कश नकुल नेउला वश्रक - भूरा नेउली ऋश्य = ऋश्यजातिकाहरिण (२७) मुंगविशेष चलोका दिशा, अवान्तर दिशा वटा रुद्रा आदित्य, न्यकु पृपत " विस्वेदेव, साध्य ईशान मित्र कुलुङ्ग परश्वान - गौर महिप 2, (२८) मृग भैंस नीलगाय वरुण " बृहस्पति, गवय स्वष्टा उष्ट्र ऊंट . " चक्षु श्रोत्र कुलुन-पक्षी देवता के नाम प्राणियों के नाम पता प्रजापति पुरुषारथी = वाम्, लुषि मच्छर मशक मच्छर श्रृंग भौरा अब आगे केवल पशु पक्षियों के नाम लिख देता हूं। गोमृग- मेष मेला अज-बकरा मर्कर वानर शक- रोहिदृपि लालमृगं कोटा सियार वर्तिका-वत्तक पिद्ध-मृग नीलङ्गो ककट- मयु-किन्नर सागर-पपीहा उल-छोटा कीड़ा सृजयः हालक्ष्ण-सिंहविशेष शपाण्डक वृषदंश-विलार शारी-युग्गी कंक-उजजीचील्हं श्वावित्-सेही वक-वगुला शार्दूल केशरी सिंह वृक-भेड़िया कलविङ्क चिपैरी पृदाकू-सांप लोहिताहि-लालसांप शुक-सुग्गा पुष्करसादी-तालावरहनेहारा ' अति - धुक्ष कौआ ( ४७ ) -- गाथा: - दाहम-अजगर कश्यक फछुया दादि = काठफोड़नेदारापक्षी कुण्डूणाची यजल गोलनिका पारान%D वर्षाभ = मेडुकी फश 3 कर्म = कटुमा मान्थल पुरुष अजगर शशखरहा गीवान् = वा(नस - कण्ठ में थन वाला दार्याघाट = फठकोखा वकरा शक्त्वाकु%3D = मुर्गा समर-नीलगाय मार मगर कृपि: शल्पक = सोही । साही पिक = कोकिल पणी-हरिण खड्ग = गैंडा मूपिक = चुहा श्वा =कुत्ता गर्दभ =गदहा ऋ = रीच्छ तरभु-व्याघ्र जतू - शूकर-सूअर लुपिलीक: सिंह = सिंह वकलास-गिरगट पिप्पका . लोपाश- जहका: अन्यवाप-कोकिल उद्र जलचर गिंगचा।

(४८)
इस २४ ३ अध्याय में नाना प्रकार के
पशु पक्षियों के
नाम कहेगए हैं। इन सबों का यज्ञ में प्रयोजन होता है।
षटु शतानि नियुज्यन्ते पशूनां मध्यमेऽहनि
अश्वमेधस्य यज्ञस्प नवभिश्चाधिकानिच ।
प्रतिदिन तीन सवन प्रातः सबन, माध्यन्दिन
सवन
और
तृतीय सवन होते हैं । इन में से जब माध्यन्दिन होने लगता
है तब ६०० और १ प्रकार के पशुयों की प्रदर्शनी होती है।
ग्राम २ नगर २ से यज्ञदर्शनार्थ लोक आते हैं उनके मनोविनो-
दार्थ और इन पशुओं पक्षियों तथा ओषधि आदिकों के स्वभाव
गुण आदि से सब कोई परिचित होव और इनको यथायोग्य
काम में लावे या त्यागें इस कारण यज्ञ में सब प्रकार के पदार्थ
एक स्थान में एकत्रित किये जाते हैं। जो लोग आजकल की
कलकत्ते,पम्बई, प्रयाग, लाहोर आदि बड़े शहरों की प्रदर्शनी
देखा करते हैं । वे समझ सकते हैं कि किसी एक स्थान
इतने पदार्थ सरकार की ओर से क्योंकर इकठे किये जाते हैं।
क्यों इसमें इतने व्यय किए जाते हैं । प्राचीनकाल में भी प्रकृति-
विमोहित ऋषिगण भी सम्राटद्वारा ऐसी२ प्रदर्शनी लोकोपकार
के लिये करवाया करते थे । आप देखिये उस समय के
ऋषिगण कितने उद्योगी और प्रकृति के प्रेमी थे। उन पशु-
ओ में २६०के करीब जंगली पशु होते थे। इनको कैसे जीवित
रखें इसके लिये मनुधर्म सूत्र में उपाय दिया हुआ है।
नाड़ीषु प्लुषिमशकान् । करण्डेषु सपान् ।
पञ्चरेषु मृगव्याघ्र सिंहान् । कुम्भेषु मकरमत्स्य
म

(४)
मण्डूकान् । जालेषु पक्षिणः । करासु हस्तिनः नौषु
चौदकानि यथार्थमितरानिति ।
नाड़ी = एक प्रकार के तृणों से बनी हुई पेटी उनमें भर
कर प्लषि-छोटीर चोटी से लेकर मशकपर्यन्त प्राणी रक्खेजाय।
फरण्ड =एक प्रकार की सापों के रखने के लिये पेटी। इन
करण्डों में सांप रक्खें। पांजरे में मृग, व्याघ, सिंह आदि ।
घरों में मकर, मछली और मण्डूक = मेड़क आदि । जलों में
पक्षीगण । कराओं में हाथी । नोकाओं पर जलचर जन्तु ।
अर्थात् जिसतरह से जिसका मुविधा हो उम २ उपाय से उन २
जन्तुओं को यज्ञमदर्शनी में अवश्य रक्खें ।
निज्ञामुयो ? विचारो. वेदभगवान् और ऋपिगण क्या
मदोन्मत्त थे जो इस माया में फंसे हुए थे और राम २ नहीं
मजते थे । वात सत्य यह है कि पदार्थज्ञान विना ईश्वर को
कोई पहचान नहीं सकता । मूर्ख अज्ञानी भक्त से ईश्वर डरता
रहता है । वह अज्ञानीजन, मिथ्या २ कलंक अपने इष्टदेव पर
लगाया करता है पुनरपि सुनिये वेदभगवान क्या वतला रहे हैं।
व्रीहयश्च मे।यवाश्चमे।माषाश्च मे तिलाश्च
मे।मुद्गाश्च मे । खल्वाश्च मे । प्रियङ्गवश्च मे।
अणवदच मे।श्यामाकाश्च मे।नीवाराश्च मे। गोधू-
माश्च मे। मसूराश्च मे। यज्ञेन कल्पन्ताम् । यजुर्वेद
१८1१२
ब्रीहि
= धान । यव = जौ। माप -
उद । मुद्ग :
.

'- ( ५० ) पूसा ग्राम में तथा पंजाव के मूंग । खल्व = चने । प्रियङ्गु कौनी । अणु = चीन। श्यामाक = कोदो। शामा । नीवार जंगली धान । यहां सब प्रकार के खाद्य अन्नों के नाम हैं। प्रार्थना की जाती है कि यज्ञ के द्वारा हे परमत्मन् ! ये सब पदार्थ मुझे दो। ईश्वर केवल प्रार्थना से नहीं देते किन्तु उन्होंने मनुष्य जाति को इस कार्य के लिये बुद्धि दी है। आजकल कृषि विद्या की भी दिन २ उन्नति हो रही है। अनेक नहरें खोदी गई हैं । तिरहुत के लायलपुर नगर में तथा अन्यान्य स्थान में कृषि विद्या सिखाने को सरकार ने पाठशालाएं स्थापित की हैं पुनः-- अश्मा च मे । मृतिका.च मे । गिरयश्च मे। पर्वताश्च मे सिकताइच मे।वनस्पतश्च मे । हिर: ज्यश्च मे। अयश्च मे। श्यामाश्च मे। लोहश्च मे।सीस- श्व मे।पुच मे। यज्ञेनकल्पन्ताम् । यजुर्वेद १८/१३! अश्मा-पाथर । मृत्तिका= अच्छी मिट्टी। गिरि छोटे २ पर्वत । पर्वत-बड़े २ हिमालय पहाड़ । सिकता बालू, रेती। वनस्पति = फूल बिना फल देने हारे वृक्ष जैसे कटहल, गूलर वगैरह । हिरण्य-सोना वा चांदी । अयम् लोह । श्याम ताम्र, लोह, कांसा । लोह काला लोह । सीससीसा । त्रपु-रांगा। इस अठारहवें अध्यायको पढ़िये देखिये कितने पदार्थों की प्राप्ति के लिये प्रार्थना है परन्तु ईश्वर मेरा पुत्र होवे । मैं उसके साथ क्रीडाकरूं । मैं इस का मानवरूप देखाना

( ५१ ।
me
चाहता हूं। मुझे कव मुक्ति मिलेगी। मैं केवल भक्ति चाहता हूं
और कुछ नहीं इत्यादि ऐसीर प्रार्थना वेदों में कहीं भी नहीं है।
भव यागे मन्त्र न देके सिर्फ़ अनुवाद लिखेदेता हूं । इन पर
विचारिये और इन के तत्वावधान के लिये सिकन्दरिया के राजा
टालमी (१) जैसे अजायब खाना स्थापित कीजिये ।
यजुवेंद १७।२ में निम्न लिखित संख्याओं के नाम पात
है और प्रार्थना है कि इतनी ईटय का कुण्ड बनाने की शक्ति दो ।
एक
दश : १०
१००
सहलं १०००
अयुत = १००००
नियुत = १०००००
प्रयुत
अर्बुद = १०००००००
न्यर्बुद = १००००००००
समुद्र = १०००
१०००००००००
मध्य = १००००००००००
अन्त = १०००००००००००
पराध % १००००००००००००
नोट-१-सिकन्दर आज़म का यह एक सेनापति था । वल्कि इसको
सिकन्दर का भाई समझना चाहिये क्योंकि सिकन्दर के पिता फिलिप की
दासी "आरसिना" से इस की उत्पति हुई है । सिकन्दर के वावालन
नगर में मृत्यु के पश्चात् मिसू देश में टालेमी ने अपना एक स्वतन्त्र राज्य
स्थापित किया, यह योग्य विद्वान् था | विद्या प्रचारार्थ इस ने
सिकन्दरिया नगर में एक विशाल अजायव घर बनवाया।
.

। । ।
। ५२ .
गणित के लिये संख्याओं की आवश्यकता होती है।
पुनः गणित की ओर प्रवृत्ति के लिये दो प्रकार से संख्याएं
कहते हैं । १।३१५/७।९।११ । १३ । १५ । १७ ।
१९ । २१ । २३ । २५ । २७ । २९ । ३१ । ३३ ।
यजुर्वेद १८ । २४ । दूसरा-४।८।१२ । १६ । २० ।
२४ । २८ । ३२ । ३६ । ४०१ ४४ । ४८ । यजुर्वेद
१८।२५।
प्रधानतया यजुर्वेद यज्ञों का निरूपण करता है । यज्ञ
शब्द के मुख्य तीन अर्थ हैं “यज्ञदेवपूजासंगतिकरणदानेपु"
१ देवपूजा २ संगतिकरण ३ और दान । पदार्थों को
यथायोग्य मिलाने का नाम संगतिकरण है। इस हेतु ऋषिगण
जहां तक जिस २ वस्तु को जानते थे इन सब पदार्थों का यज्ञ
में संगति अर्थात् संगम'= एकत्र किया करते थे अतएव उस
समय तक जितने पदार्थ विदित थे प्रायः उन सब का प्रयोग
किसी न किसी रूप से यज्ञस्थल में किया करते थे। खेती की
सामग्री हल, बैल, कूप, वीज, खनित्र हल का चलाना, बोना,
काटना, सींचना आदि । खाने में जो भात, दाल, रोटी, धान,
करम्भ-सक्त, परीवाप, दूध, दही, आमिक्षा, मधु, जल, आसन,
पीढ़ी आदि । यज्ञ के स्रक, चमस, व्यायव्य, द्रोणकलश,प्रावा,
अधिषवण, पूतभृत्, आधवनीय वेदी, 'कुश इत्यादि और
मनुष्यों के जितने भेद हो सकते हैं ये सब यहां इकट्ठे किये .
जाते थे । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, तस्कर, चीरहा, क्लीव,
अयोगू, पुश्चल, मागध इत्यादि दो सौ से अधिक नाम ३०

1 ५३ । वें अध्याय में जाए हैं। मैं कहां तक गिनाऊ । एक कोश ही बननायगा । स्वयं यजुर्वेद और उसका ब्राह्मण शतपथ पढ़के देखिये । यज्ञ में कितने पदार्थ भायोजित होते थे। यजुर्वेद में दर्शार्णमासेष्टि । अग्निष्टोम। वाजपेय । राज- मूग । सौवामणि । अश्वमेध । और सर्वमेध श्रादि यज्ञों का वर्णन आया है । परन्तु किसी में भी ईश्वर प्रयोग नहीं पाया जाता । ईश्वरीय पदार्थों का ही बहुत प्रयोग देखते हैं। इस से विशद- नया परमात्मा अपनी विभूति जताने के लिये ही प्रेरणा करते हैं यह सूचना होती है । एवमस्तु । इसी प्रकार सम्पूर्ण ऋग्वेद अग्नि, वायु, मेघ, विद्यत्, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, नदी, पर्वत, समुद्र, वर्षा, भेदक, कपिञ्जल, पृथिवी, मनुष्य, वाय, आदियों की ही स्तुति से भरा हुआ है। सामवेद इन को ही विशेषरूप से गाते हैं। वेदों से लेकर तुलसीदास जी के भापा रामायण तक, ऋग्वेद के माद्य ऋपि मधुच्छन्दा से ऋषि दयानन्द तक, प्रथम कपि वाल्मीकि से विहारी तक, कथा लेखक व्यास से सोमदेव भट्ट तक, इतिहासान्वेपी प्रोसदेश के हिरेडोटस से वंगवासी रमेशचन्द्र तक, एवं सम्प्रदाय प्रवर्तक इरानी ज़रदुस्त, यहूदी- मूसा, कपिलग्रामनिवासी बुद्धदेव, जेरुजेलम प्रदेशविभूषक, ईसामसीह, अरवदेशालंकार मुहम्मद, तथा भारतभूषण शंक- राचार्य, रामानुज, वल्लभ माध्व, विष्णु, कवीरदास, नानक साहिव, गुरुगोविन्द, दादूराम, नारायण, राजा राममोहनराय, केशवसेन और नूतन २ विद्याओं के सृष्टिकर्चा षट्शास्त्र रचयिता ( ५४ । , . , कपिल, पतन्जलि, गौतम, कणाद, व्यास, जैमिनि, तथा विदेशी एथेन्स नगर शिरोमणि साफ्रेटीज, प्लेटो, अरिष्टोटल, विला- यती, गलेलियो, सरआइज़कन्यूटन कहां तक मैं नाम गिनाऊं सृष्टि की आदि से अभीतक जितने आचार्य वा अन्य लेखक हुए हैं। ऐ जिज्ञासु पुरुषो ! वे किन बातों का वर्णन कर गए हैं और कर रहे हैं। कदाचित् आप समझते होंगे कि वे किन्ही महा महा अति अद्भुत बातें कह गए हैं जो हम लोगों की समझ में न आवेगी । वे कोई महान् देव थे वा आश्चर्य सिद्ध, सिद्धेश्वर योगी थे जो आंखों से प्रत्यक्ष करके सब बातें कहगम हम लोगों में इतनी बुद्धि नहीं कि उनके जानने में समर्थ हो । प्यारे विद्याभिलापियो ! सुनों वे प्राचीन फिन्ही महा महा अद्भुत् बातों को न लिख गए और न नवीन किन्ही अज्ञेय बातों को लिख रहे हैं । ऐ शुद्ध हृदय ग्रामीणजनो ? जिन पदार्थों को आप अपनी चारों तरफ प्रति दिन देखते हैं उन्हीं का वर्णन यथामति सब कर गए हैं और अब तक कर रहे हैं आप चारों ओर किन वस्तुयों को देखते हैं कहिये तो। क्या. आप राति में जब ऊपर शिर करते हैं तो अनन्त असंख्य आकाश में लटके से हुए नक्षत्र समूहों को नहीं देखते ? जब उससे नीचे आते तब क्या वर्षा ऋतु के मेव की घटाएं, विजुली, घोरगर्जन और वृष्टि आपको चकित, विस्मित, भीत, आनन्दित नहीं कर देती। कभी मन्द, सुगन्ध, शीतल, कभी तीव्र, दुर्गन्ध, उष्ण और आंधी तूफान, ववण्डर लिए हुए वायु कैसे झोंकोसे चलता है। पृथिवी पर अग्नि, जल, पशु, पक्षी, तृण, गुल्म, वीरुध, लता । ५५ ) दो दो धान्य, औषध, फल मूल फन्द, स्थलचर,जलचर, नभश्चरकीट पतंग कीड़े, गकोड़े इत्यादि सहलो पदार्थ देखते हैं । जिसी और आप अांख उठा। उसी ओर ईश्वर की विभूतियां दीख पड़ती हैं। इनही का वर्णन सर्वत्र है । वाग्वेद सब से पहले अग्नि की ही स्तुति करता है । सामवेद प्रथम मन्त्र में अग्नि नाम से ही लाल का गान करता है । यजुर्वेद आदि काण्डिका में श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्ति के और पशुयों की रक्षा के लिये प्रार्थना करता है । अथर्ववेद त्रिसत अर्थात् उत्तम, मध्यम, और अवम भेद से इसीस प्रकार के जो दो आंखें, कान, नासिकाएं एक मुख हैं उनका ही वर्णन से प्रारम्भ होता है । प्रात्मणग्रन्थ-वेदों के पश्चात् ऐतरेय, शतपथ, ताण्ड्य गोपथ, कृष्णयजुबंद, तचिरीय, कौषीतकि आदि शतशः जो ब्राह्मण नाम से ग्रन्थ प्रसिद्ध है । और आपस्तम्ब, आश्वलायन, कात्यायन, बौद्धायन सत्यापाढ़ीय वैखानस आदि श्रौत वा गृह्य- सूत्र हैं। वे सवही कर्मकाण्ड का ही वर्णन करते हैं। कदाचित् कर्मकाण्ड शब्द सुनकर आपके मन में अलौकिक भाव की उत्पति हुई हो । नहीं । उन में भी किसी अलौकिक बात का वर्णन नहीं । आप भी कर्म करते हैं स्नान, सन्ध्या, पूजापाठ, होम, बलि, तपर्ण आप भी प्रतिदिन अब भी करते हैं। उस सब का ही ढंग रंग से उन ग्रन्थों में वर्णन है । दर्शेष्टि, पूर्णमेष्टि, राज्यसूय, सर्वमेध, अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम, गवामयन, आदित्यानामयन, अंगिरसानामयन, इत्यादि २ विविध यज्ञों का निरूपण उन ग्रन्थों में है । वैदिक यज्ञों का यदि आप अध्ययन , । ५६ । से करें तो आश्चर्यान्वित होजायंगे । वह लीला देखते २ उकस जायंगे । ब्राह्मण विहित याशिक समय के पश्चात् उपनिषद और आरण्यक का समय आता है । उपनिषदं अध्यात्म- और वेदान्त शास्त्र कहलाता है परन्तु इन में है क्या ? सज्जनो! नयन, कर्ण, श्रोत्र, घाण, जिहा, मन, चित्त आत्मा इनको ही तो विविध अंगों से ऋषिगण निरूपण करते हैं। परमात्मा इस जगत् का क्या सम्बन्ध है और वह कैसा है। उस ब्रह्म की प्राप्ति कैसे होसकती है। यह विषय भी वहुधा वर्णित हुए हैं। प्रारण्यक अन्थ वह कहलाता है जिसको प्राचीन ऋषि मुनि अरण्य- वन में जाके पढ़ते पढ़ाते और विचारते थे । जैसे वृहदारण्यको- पनिषद् । यहां पारण्यक और उपनिषद् दोनों शब्द आए हैं। ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और वृहदारण्यकोपनिषद् ये दश उपनिपर्दै परम प्रसिद्ध है । इसके अतिरिक्त कौपीतकी, श्वेताश्वतर और मैत्रेयी आदि भी उपनिषदें उपयोगी हैं । ऐतरेयारण्यक, तैत्तिरीयारण्यक आदि आरण्यक ग्रन्थ हैं इन में भी प्रधानतया अध्यात्म वस्तु का ही वर्णन आया है । ॥ इति वेदजिज्ञास्याध्यायः ॥ * षट्शास्त्रजिज्ञास्याध्याय ४।* वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा, और वेदान्त ये घट्शास्त्र वा षट्दर्शन कहाते हैं । इनके रचयिता क्रमशः कणाद, गौतम, कपिल, पतज्जति, जैमिनि, और वादरायण व्यास हैं । वैशेषिक साल का सहायक न्याय, और सांख्य का सहायक योगशास है इस प्रकार चारही श.स कहे जासकते हैं। विषयों के भेद से ये तीन में विभक्त होसकते हैं। प्रकृतिकारणवाद, परमाणु कारण वाद और ब्रमकारणवाद । इस में वैशेषिक और सांख्य शाल स्वतन्त्र और मीमांसा और वेदात परतन्त्र हैं। कपिल और कणाद को नुतन विधास्थापक कहते हैं । जैमिनि और व्यास ये दोनों किसी नूतन विद्या के आविष्कार कर्ता नहीं किन्तु ब्रह्मणों और उपनिषदों के प्रतिपादित अर्थों को निज २ युक्तिरूप फूलों से भूपित करनहारे हैं। ये छपों शाम जिन २ रूपों से प्रकट हुए थे वे उनके रूप अब नहीं हैं। इन में सांख्य बहुत प्राचीन है परन्तु शोक के साथ कहना पड़ता है कि कपिल प्रणीत अन्य कोई भी अब उपलब्ध नहीं होता । उनका सिद्धान्त प्रचलित है इस में सन्देह नहीं । वैशेपिक और न्याय दोनों आगे चलकर गंगा, यमुना के समान मिलगए और न्याय नाम से प्रसिद्ध हुए। आगे न्याय भी इसका यथार्थ नाम नहीं रहा । इस शास्त्र को तर्क नाम से पुकारने लगे । इसकी अपने ढंगपर बड़ी तरकी हुई परन्तु कणाद वागौतम की पद्धति नहीं रही। वेदान्त का स्वरूप सर्वथा वदल गया। जिस वेदान्त का व्यास प्रचार करते थे वह अब नहीं रहा । यह मायावाद बनकर जगत् के मोह के लिये होगया । व्यास ने जिस ब्रह्मोपादान कारण की स्थिरता के लिये उतना उद्योग किया था, वह ब्रह्म भी उपादान कारण न. रहा । बीच में माया आगई । अजातवाद की शखध्वनि होगई, जो पिता पुत्र का सम्बन्ध (५८) . ब्रह्म और जगत् में स्थापित किया गया था स्वप्न होगया, श्रम ठहरायांगया । न यह सृष्टि कभी वनी और न बनेगी फिर पिता पुत्र, को सम्बन्ध ही क्या ? जव सृष्टि हुई ही नहीं तो सम्बन्ध का अन्वेषण कैसा ? इस प्रकार वेदान्त की महती अधोगति हो रही है। मीमांसा की भी अपने समय में कुछ तरक्की हुई परन्तु वह वढ्ने न पाई। मीमांसा प्रतिपादित कर्म काण्डों से जनता घृणा करती ही रहगई क्योंकि ये कर्म प्रायः हिंसा से रहित नहीं हैं। यज्ञों में पशु हिंसा की इन्हों ने रक्षा की । जैमिनि फुमारिलभंट्ट और शवर आदि अनुयायी जितने हुए वे इस यज्ञ को सप्रमाण पुष्ट करतेगएँ । शंकराचार्य जैसे विद्वान गण भी इसी पक्ष में रहे। पर इस के विरुद्ध मोटी २ लाठी लेके वौद्ध और जैन खड़े थे। पीछे वैष्णव-सम्प्रदाय भी इस प्रसंग में बौद्ध का ही अनुगामी हुआ। यद्यपि शंकराचार्य हिंसा को वैदिकी और कर्त्तव्य कहकर मुंह छिपा लेतेथे । तथापि इन्हों ने ऐसी युक्ति निकाली जिस से मीमांसा के कर्म- काण्ड का अभ्युदय न होने पाया। शंकराचार्य ने कहा कि कर्म एक तुच्छ चीज़ है। अज्ञानियों के लिये उपदिष्ट है । ब्रह्मज्ञान की ही श्रेष्ठता है। कर्म से कदापि मुक्ति नहीं होगी । कर्म महाबन्धन है । ज्ञान से ही मुक्ति होती है । ब्रह्म और हम जीवों में कोई भेद नहीं। अहं ब्रह्मास्मि का बोध होने से ही कृतकृत्यता होती है । सामवेदी छान्दोग्योपनिषद में इस के बहुत उदाहरण हैं । तत्त्वमसि श्वेतकेतो यह नववार कहा गया । इत्यादि वर्णन ( ५६ ) ने मनुष्यों के चित्त को आकर्षित करलिया । इस कारण भी मीमांसा की तरकी. न हुई। इस के सिवाय भक्ति मार्ग का ऐसा प्रवाह वहनेलगा कि जिस में छवों शाल वगए, मीमांसा को यहां कौन पूछता। वेदान्त भी एक कोने में छिपगया। मनुप्य इस भक्ति से भी प्रसन्न न रहे। इस समय सब ही सम्प्रदायें खिचरी होके भयंकर रूप धारण कियेहुए हैं। भारतवर्ष में इस समय काल रानि का समय है । हो, पश्चिम से कुछ प्रकाश आरहा है । देखें क्या परिवर्तन लाता है । अब मैं यहां संक्षेप से पट्दर्शनों का निरूपण करता हूं। पट्शास्त्र। वैशेषिक शास्त्र-छवों शास्त्रों में वैशेषिक शास्त्र की अधिक प्रतिष्ठा है । आप को आश्चर्य होगा कि यह किस अलौ- किक वस्तु को दिखलाता है जिससे इसका इतना गौरव है। यह शास्त्र प्रधानता से पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, इन पांच भूतों का तथा समय, दिशा, शरीर, इन्द्रिय, मन, जीवात्मा का वर्णन कर रहा है । आप प्रतिदिन इन पृथिवी आदि पांच महाभूतों को क्या आंखों से नहीं देखते ? क्या इन से यथाशक्ति यथा बोध काम नहीं ले रहे हैं ? पृथिवी से सहा पदार्थ आप उत्पन्न करते हैं। स्वच्छ जल पीते हैं । अग्नि से आप कितने स्वा- दिष्ठ भोजन तैयार करते हैं । मन्द, शीतल, सुगन्ध, वायु को आप बहुत पसन्द करते हैं । आकाश चारों ओर घेरे हुए है । इसके अतिरिक्त आप देखते हैं कि प्रातः काल कैसा रमणीय होता है ।

सायंकाल कैसी दैवी घटना दिखला कर परमात्मा की विभूतियों की ओर मनुष्य को ले जाता है। अब दिन नहीं रहा । अन्धकार रात्रि आगई । पशुपक्षी चुप साध गए। उलूक और चमगीदर दौड़ने लगे। इस प्रकार प्रतिदिन वही दिन वही रात्रि चक्रवत् घूमते रहते हैं । पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, दिशाओं का अन्त आपको नहीं लगता । शरीर में मन कैसा एक अद्भुत वस्तुहै। जीवात्मा विना यह देह किस काम का । अब आप परीक्षा और समीक्षा कर सकते हैं कि जिसकी इतनी महती प्रतिष्ठा है वह भी इनही वस्तुओं के वर्णन में अपना समय बिता रहा है । वैशेषिक कर्त्ता कणाद कहते हैं कि-- धर्मविशेषप्रसूताद द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशे- पसमवायानांपदार्थानां साधवैधाभ्यां तत्व- ज्ञानान्निाश्रेयसम्"।१।४। छः पदार्थ हैं द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय । इनके ही जानने से मनुष्य मुक्तिलाम करता है। पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं कालोदिगात्मा- मन इति द्रव्याणि । १।५ १-द्रव्य के नौ भेद है-पृथिवी, जल, तेज, वायु, आका- श, काल, दिशा, आत्मा, और मन । रूपरसगंधस्पर्शाः, संख्याः, परिमापानि, पृथक्त्वं, संयोगविभागौ, परत्वापरत्वे, बुद्धयः, सुखदुःखे, इच्छा छेषौ, प्रयत्नाश्चगुणाः ७ । ६

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आर्य भाताओ ! अभी तक वेदों के ऊपर साक्षात्
विचार यथार्थ रूप से आयो तथा पौराणिकों में नहीं हुआहै ।वेदों
पर कितने लान्छन लगाए हुए हैं इसको कौन नहीं जानता ।
प्रत्येक भारतवासी को उचिंत था कि वह इस ओर पूरा ध्यान
देता, परन्तु कई सहस वर्षों से यह कार्य न होसका । मैं
अपनी बुद्धि के अनुसार कई वर्षों से वेद सम्बन्धी लेख लिख
आपके निकट पहुंचा रहा हूं । अभीतक मेरा मनोरथ पूर्ण
महीं हुआ, मैं इतने से प्रसन्न नहीं हूं अंब मैं आप लोगों की
सहायता चाहता हूं कि वेदों के गुप्त २ अर्थ प्रकाशित किये
जाय । उदाहरण के लिये यह " वैज्ञानिक सिद्धान्त " आपके
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और बनावें । अग्रिम मूल्य भेजने वालों को (१०००) एक
सहन पृष्ठों का ग्रन्थ ३०) में मिलेगा। इसके चार भाग
निकल चुके हैं।
अब मैं अपने ग्राहकों और अनुग्राहकों से प्रथम विनय
कर शुभ समाचार देता हूँ कि कि अब विलम्ब नहीं होगा।
अब वे क्षमा करें। पञ्चम भाग भी प्रेस में देदिया गया है बहुत
शीघू (१०००) पृष्ठ प्रकाशित हो जावेगे । जिन मेरे शतशः
भ्राताओं ने इसके विषय में बारम्वार पत्र लिखकर मुझे
उत्साहित किया है उन्हें बहुत धन्यवाद देता हूं। वे मेरे मित्र
अब इसका प्रचार करें करावें ॥
भषदीय
शिवशङ्कर-काव्यतीर्थ

विक्रीय पुस्तके
१-छान्दोग्योपनिषद्भाष्य संस्कृत तथा भाषा
टी०स०३)
२-बृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य
३-प्रोङ्कारनिर्णय
४-जातिनिर्णय
१)
५-श्राइनिर्णय
111)
६-त्रिदेवनिर्णय
110)
७-वैदिक इतिहासाथै निर्णय
१॥)
-अलौकिकमाला .....
)
8--कृष्णमीमांसा
॥
१०-प्रश्नरामायण
H
११-प्रश्नोत्तरीय
00
१२-वैदिक रहस्य
३)
-
पुस्तफ मिलने का पता-
मन्त्री आर्य समाज
-मु० डा० कमतौल
(जिला दरभंगा)

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Vaidik Rahashya (vol - Iv)

Author
Sharma, Shiveshankar
Title
Vaidik Rahashya (vol - Iv)
File name
Vaidik Rahashya (vol - Iv)
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2009/10
Publisher
Agara, Rambhushan Press
Language
Sanskrit
Pages
64
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345551
Barcode
99999990233887.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
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