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Shree Achyut Ramayana

Lala, Lalmani · 2009/09

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अतरामायण
- روان
9
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॥
त
सो बन्दिजोरियुगपानि गरगनायक करुणयन ।।
होत बिम सब हानि, लेन नाम शंकर सुवन ॥
बक्रतुण्ड मुज चार, बुदिपुज मङ्गल सर्दैन ।
लोचन शुभ रत नार, विन्न राज करि बर बदन
नीलाम्बुजतनश्याम, कन्नासालोचनसुखद् ।।
ममाहिय करविश्राम,पयनिधिबासीकरकुमुद ॥
निगमानपावत पार, शारदादि कहिगुण विशद् ॥
इवभजन महिभार,प्रभुकरमा करशुभगुराद्॥
बन्दोंभव अभिगम, भव्य नाथ भवभयहरण ।।
होत सफल मनकाम,जासुनामभजिभवतरण ।।
बन्दीगुरुपदरेणु शुचि भेषजभवरुनशमन ।।
मनु मनोपय फेरनेत्राजन भुभ दृष्टि धन ॥
बन्दीसन्न सुजान, पद सरोज रज शीश धरि ।
अनुरिन श्रीपतिध्यान, जिनमजिहरिनिजवश्यकरि।
बन्दौंबायु कुमार, हरत शोक लिय नाम के ।
मुद मङ्गल नागारनिषत्तम नितसिथ रामके।

अडन रामायण हो। रामनामकलिमलहरा, दादोष सुखरास । लालमनीमन कर्मवच, निज उर कर विश्वास ॥९॥ सो। जिनके मन विश्यास, ते हरि पद नितध्यायहीं।' हर निकामतनिवास, स्वरबाञ्छितगतिपाहीं ॥९॥ timin Mike बन्दोगपति पद्जल जाता | उमातनयशिवसुत सुखदाता सुर अनादि जानत सब कोई । प्रथम तासु जग पूजनहोई दीनदयालु विषुध हितकारी । असुरनकाल लालत्रिपुरारी श्राउ सिद्धि नवनिधिकेरानी । संकटहर शरण सुरवरवानी गरापसमान कौनजगस्वामी । सुरमुनि मनुजजासुचनुगामी हुनौ नाच जोवर बतिपावन । सुरविरचिनारदमनभावन जनरजन सन्तान सुख दाई । जहि भजतमुरमुनि समुदाई

وت مااشم
अङ्गत रामायण
सो दयालु बर मांगे दीजै । उमासुवनजगयशकरलीजै
सियाराम पद पङ्कज नेहू । उपजै नित याबरमोहिं देहू
हो । देश हर्षि बरदानयह बिनय करौं कर जोर ।
सियबर चरणसरोजन,चाहेप्रीति न थोर ॥
सो. विनयकरौ शिर नाय; जाते होइ सो मोरहित
करिये सोड्सहाय, धरौं ध्यान सियराम पद.॥
श्री गुरुघरगसरोजनमानी । सुमिरत सुलभभक्ति अभिरामी
बिनुगुरुकृपाभक्तिहरिवहई । तेनर मूड मन्दमति अहई
जोपरसतगुरुहाउँदयाला । सो पापैहरिभक्ति विशाला
तातेनाथ विनय यह मोरी । मन क्रमपचनशरराप्रभुतो
तुम स्वामी मै सेरफ तोरा । नौगुणसकलक्षमप्रभुनोए
करौं नाथ मैं एक ढिठाई । हरि प्रेरित जोमम उर बाई
अजर-अमर सुखसिन्धुनिहारी । जाफरध्यानधरत मदतारी
भुकसनकादिसिद्द मुनिनाद । सहसानन चतुरानन शारद
रहत सदाचरणवञ्चनुरागी । सोइबर वायदेमोहिमांगी
दो । हाथ जोरिबर माँगहूं, दीजै परम उदार
जन्म जन्मसियराम पद,बारे प्रेम अपार ॥
सोका जापर तुम चनुकूल, रामभक्ति सोइ पायहीं ।
सुकृत सुमङ्गलमूल, जेनर नितहरिध्यायहीं।
यौ उमाप्रासापति चरणा । संशय शोफमोहभ्रमहरगण
मुदमङ्गाल मूरति शिवशंकर | शमन दोष रिपु.कालभयंकर
नाम बिदित जगचौघड्दानी । उनाशक्ति जोहबदेपरवानी
करौप्रशामधरशिरिमाथा ! मन भारत बर मांगों नाया
1

و نفت برائن۔ ۵
अद्भुतरामायण
सुर बिरवि नारदरुनकग्दी | कबि कोबिदपरमारवादी
काकभुशुरडगरुड़जेहिभांती | धरतध्यान जाकरदिनराती
तुमहूं जाकरध्यान धरेहू । सोइ बरसुलभउमावरदेहू
हरिपद पङ्कजप्रीतिअपारा । देव दया करि देव उदारा
होय मनोरथ पूरग मोरे । केवल नाथ अनुग्रहतारे
दो । यद्यपि अधममलायतन, तप कहाँकरलो ।
क्षमह सकल अपराधमन, हरि सापनीनोर ॥
सोल। सुनियेशन्धुसुजान, बिनैमोरिकतारतन . ।
दीजै यह वरदान हरिपदभजिभवनिधि त ।
चन्दौशिरपरि रज पद्गङ्गा । जोहि मान होचे अध मेंगा
महिमा अमिनविदितति लोका। मजनपानहरतिसंशोक
जेज शिरधरिध्यानलगाईं। चिनु प्रयास पुरधामसिधाचे
है प्रताप जग गङ्गा माई | कीरतिकलितहूदिशियाई
गङ्गा बहत.यतित तुम तारे। तागजिते गगन नहिं तारे
भागीरथ सम को परमारथ। जिननिनहेतु कीनजगरवारय
मातुएक मन है श्चभिलाया। कहींसोप्रकट गुप्ताहिराखा
जोह रखोजत सुरफिरेभुताना । उमा समेत धेरै हर ध्याना
सोद्ध्यानधरि हरियध्याऊं । मातु सोयह बर मांगे पाऊ
दो महिमा अमित देव सरि, अवम उधाराहारि.
पावन सुयश सुमुक्ति हित, कहीकविनविस्तारि ॥.
सो । दिन दिन बड़ ऋतुराग, परपङ्कजसियरामके ।
कपटलोभमदत्याग, भजौनिरन्तरध्यानधार।
बौंमन क्रमबचनानिचली। भारतिहरगिसकलपुरवंदेनी

अडुतरामाया
و بستری کرن۔
.
सार यदलमनोहर धामा । दृष्टि परत पूजत गत कामा
लाई निकटवरह युनिहन्ता लिहत चारिफतारतमनन्दा
रेशिधुल सहजपनप योगा । पामनवाक्षितसुरयभोगा
पशिलक्षवलीमाधव । होयंसनाथाश अनि साधय
मजन याद मरतति गङ्गा ! जाते होय दिव्य मनचङ्गा
भरहाज मुनि दर पर लागी । होयविमलमतिभूडयभागी
रघरम्न प्रयाग बड़ाई । शेष सहसमुखसकन गाई
लालमनीसिमिकहरवानी | मितबुधिमोरिचाक्रितभमसाली
हो । साते सुमिराशर सुन रिनय करौं करजोर।
देशरामद भीति वर,जेहिदिधि सप हित मोर ।।
शोक। सकलिकुलत्यापा, देश भीख माँगे गोही।
मेहि विधिवड़ अनुराग जन्म नम्मसियरामपद ॥' ।
यी दशा कालहनुमाना [जासुसुयश प्रमुबाबखाना
पंपाज हरिको तुभपायक । दुष्ट दलन गनदीनसहायक
लुहिनिशान कानगुनासतार संकटमोचन नाम उजागर
अनाकुमार चलनी दारे ( लपसारामसिम शारापिरोरे
परपसार सदा मनमाहीं । असकोजोजगजानन नाही
नाशिनयककहिनहिनाई । जोनकहीं तोहोत रखोटाई
लोगहनत भारत बानी । करौं छोह निनःशेषकाजानी
नाकोमजन करत गौरीग । थरतध्यानरसिद्धमुनीशा
मनार सोइ ध्यानमहः येरौ.: । यहबर देनाइया कार हेरो
दो. हि विधि हो मोर हित,करिये पवन कुमार।
नलसियान के मिलेलभवनिधि पार॥

अडत रामायण
सो.। सकलकाल हित मोर, हरिपद पङ्कजके भने।
कहौतुम्हें कर जोर, यह वर शुभम्बहिंदीजिये।
पन्दी दशरथ पजलजाता । भये सुवन जिनके सुर त्राता
इनसबधत्य कयन संसार | जिन घरब्रह्म तोह अवतार
पुनिकौशल्याचरणनमामी | जिनकेतनय मयेरुश्स्वामी
धन्यकोरिवनिमुक्तसुताके । खेलतगोदब्रह्मशिशुमा
सुर मुनिसिह समाधि लगावें । करिजएयोगध्यानाध्या
तेसपन्यहन दर्शअधिकारी | सोप दशरथ जिविहारी
यन्दी के कयि पदशिर नाई । भेसुत्तभरत पोतिय छाई
बहरिसुमित्रापद परगामा | भये शेष सुराज्याभिरामा
लक्ष्मणानामावदितदिशिधारी | सदा राम पद बाबा कार
दो। रिपुरसुदन लक्ष्म अनुज भयेसुमिमा ताल ।
लघुश्चनुगामी भरतके, सफलभुवनविख्यात ।
सोल। चारों मुंत सुरवधाम,नृपदशरथ के लाहिले।
फरौतिनहिं परणाम, नोरिपाशिशिर नायक।
बनरिराम सुखधामनमामी | भत्ताबल्ल सब अन्तरयामी
सीताचर जोरि युगमारगी । करौं प्रशामकर्ममम वाणी
बन्द नवध पुरी शुभवामा । पानमुक्तिधाम भिरामा
निकटपुननिसरयुसरिवहई । जेहि मजनने सुरपुर लहई
पुनिनर नारियवधपुरवासी । अतिसुकृतीमुदमङ्गल ससी
सरल सुसीलसुमनिमतिमोरी । जिनहिं राम पदशीतिनायो
लिनके चरणकमलकरजोरी । हौं प्रशामी पुर माचिभोरी
होसायपरमज चुकूला । देजहर्षि यह बरपुरखमूलत

و ترانه
अजुनरामायण
मदाराम पंद झुमिरा करहूं । शान उपायनस्यनिधि तरह
छ । जेते चराचरमपदासीरामप्रिय जिनके मना ।
निनसीयुगलकरमोरिकै सन्नतफरौपदयन्दना ॥
मोहिंजानिनिमकिंकरसदारतिकमलपदप्रभुदीजिये।
सुरलोक हिमाहिमराहलीभक्तिवरयशतीकिये।
दो देवचराचर चयधने, घसचर कोट समेत ।
खगपतङ्ग-पुनि दुमरु रज विनों तिनानिजहेत ॥
सो। दनुजकिगर गन्धर्व पिपिशाचाहियसगरण।
करीतपामिलि सर्व जानिदास मोहिं श्रापतो ॥
तुमिरौशारद पद करकोरी ! होयलालसापूर मोरी
देहगुज्ञान दिमल गति मोही। ताते विनय करौं मैं तोही
जोतुम मोपर होउयहाई । नौवनहरिगुणासुखदाई
करी अनुग्रह मोपर सोई । जिहि विधिमोरमनोरयह
देजयाक विद्या बरदाना । जाते मोर परम कल्याना
करौघास स्सना कछु कला | कौंगानहरि चरितविशाला
रयासले जिमिभसकसमीरा । तैसे दिनहरि भजन शरीरा
पासवसिन्धु बगाईपारा । विनामजनहरिपाइनपारा
जो चहमारविना रखेवनारा । रशियूडिह मझधारा
घोल बुद्धिहीन अतिमन्दमाद, स्यूस न रुकवाय।
कीन्हाचौहरिगुणविशद करोसोबाकसहाय॥
सो मांगोंयह बरदान ,जाले होथै विमल मति।
हरिशुशफहबाद, बुद्धिविनायके।
एन्चाविपद रजशिया ! जिनहारचलिरोचिस्तमी

او بتابان- و
"
अहुतरामायण
श्वतिहि विचित्रपरमसुखदाई। कौतिकलिलरहीजगाई
काव्यसूरकृततुलसीदासा । केशवभागितविदित पदभरता
सोजानबहरिनामसहाई । कोहरिमजिनालियोपड़ाई
पुनिकलिकबिनकरोंपरणमा | जिनाबस्तीगर चरितलालामा
यहीकाव्यस्यमातिमुहाई। छन्दप्रबन्ध अनेकचनाई
भगवतपरितकालोनहिंगाई । जन्मापदारथ धागवाई
तिनकीफाव्यसोहफाजीसी । ससनहीनभामिनि है जैसी
सुशानश्यसंवतवज्ञविधिवती । पाट कञ्चकी शक्षितनी
। तिनमा प्रथम पाध्यमम, सत्यकोतजिम्माम्।
साँचौचनहिलाही, शिधविराविधुशिया
सो०। सबप्रकारशुशाहीन, मशिनदेशीर बात।
जनिह सुजन प्रवीन, जोसुदृष्टिपारदेखि हैं।
भाषामाशात न जाता मोरे । सही समस्ययुगवारगोरे
नाहि कविनार्मिकोचिदशाबाना । यतिमतिसन्धमहायज्ञाना
करतकाव्यमनसिकुारखोले । लाजोरी कर परसात जैसे
करिय उपायसोचायसनाहीं । सासोधिनयरोंथपाही
होउसहाय जारि मोहिबिहार । नहरोकथाभगपाशाकुन्दर
जानक्सकलजीवनाविनासी । विक्षुहरिमाल अमन चौरार्थ
স্ববিস্বস্কুিংকুৰঞ্জী। ২টি ই ঈ শী
विनयविवेकशि अनुगगे । रामसनेह सुधारस पागे
तिनके घरणासरोजसणाझं । माते भुक्ति मुक्ति गावि पाजे
हो। बारबारशिरनायके, बिनय करों कर मोर:
करत कथा हरि पुरा विशद लगैनहींकछुरखोर॥

अदुतरामायण
وجتن -هو
सो। विप्रकवीवर सन्न, क्षमौमोर अपराध सब ।
सरगोगुणभगवन्त,कृपादृष्टिवलोकिये।
वर्मधर्मनहिं ज्ञान बिएगा । नहींनीतिशुभगुणअनुरागा
कपलहरिगुरणकरौंबखाना । जाहेमलसमाविधिकल्याना
रामनामशविौषध
पधूरा ।
शमन दोधमवसनसम्पूरण
विदित निगम विहासपुरना। भजनमासमनापुरयाना
जिनाहिंसनेहरानपद लागा। सुरझुलिसिमराहतभागा
मनक्रमदचनरामप्रियताके। सुरक्षनेह रहिवनितडाके
लोभकोधकासादिकजेते । सत्सर सोहमदादिक तेते
हैंसवचनुचरमाया केरे । तेकवाई साधन नहिं नरे
रामप्रताय समुझिमनमाहीं। हरियतालुश पूरि पराही
होला धन्यमुक्ततधनिभागनरजिनाहिरासपदशीति।
तिनहिंयुगतरजोरिको पन्दोशहितषिताति
सोला धन्यधरीधनिजन्म, पन्य तासभानिमातफो।
पत्य जेनर शुभकर्म भयजेहरिएपरिति ।
जन्मभूमिममबेहटागाऊँ । परगन कोड़ा नामवाताई
विदितहमीरपूर फग्रामा । एजनिकट अन्तरवरिश्यामा
पातालेश्वरधामसुहाएन । सतामुखअदपुज्जनथाचन
चाथमश्री दुर्गा महरानी । बरदायिनिसमाविधिकल्पाव
शुभमन्दिरविश्रामलिहारी । सहितशियारमानर्दुलारी
ताकेभजतमजत भवनांधा । विनात जन्मलोहि पराय
मुगलि मनोहरसुन्दरधामा । सुमिरत होवासिहयसकामा
वेत्रवतीसरिदाक्षिणाचाई। मिलीपूर्वयमुनहिंसगुहाई

او ته امائی۔ ان
अडुतरामायण
११
संगममहेश्वर तहमरवाना । सिधिदायकत्रिभुवन गवाना
दो तहियामरकलुकालते, भयोउदरहितघास।
सवणार सुपहीलयों, भई पूर मन शास।
सोला भयोलहानुराग,विनामजनहारिवादिसला
कारियेश्चम सबत्याग,कछुकगानभगवनचरित।
नमोनमापरित बिहारी । अलजाराालोचनसुखकारी
डलरमायनशास्रषठूला । सुनतश्रवराचिनशतभपभूला
प्रथमहिंधामी किमुनिया भरहाजमुनिवरहिंसनाया
सोइमायामोहिमा सासामुगमनहायभुलाया
तेमुनिनाथ कन्नागपलामी । करिनावावरणमा अनुरागी
रामकलेवागुरु सकारा । बायोअधसमोबाधत्रपारा
श्वसुनिजोमोतनामिनाई। करवप्रबन्धकमा मैसोई
नवचौपाई पनि इक दोहा । तेहि प्रति एक सोरहासोहा
बरसाबाजहें नहसहिनविका। इन्दप्रबन्धपिवित्रचनेका
हो। रोजमुनियादो, ब्रल्लाव सुधाम ।
सोमबाह हेतु सा, सुमिरिरामगुराग्राम
सोचले जारवासीध, होयनकबईभरमपथ।
शहिहिदिनारियलोध, करपायावयनसुखदा
श्रीगुरुचरापरिसिनाई। ककथाहरिगुरणसुरबदाई
जोहिकारशाहरिन । लीन्ह दयालुहररामहिमार
कीन्हजोसीलापरण मुहाई । निरामागमाविकोधिदयाई
कहतसुनत अन्तसनेत्रोई। तारातरापरायाहोई
हरिकेचरितविभिचनमा शारदशेषन यावत प्रता

وجودت باش نیروی
अडुवरामायण
लालमनीवरी कहिभाती । युधिभितभमित अवमानाने
संरक्षत नहींकछू अस्यासा । होयकोनविधिमनविश्वासा
केवलरामनामकराना । फोकथाबडतकहिमाण
सम्पत उनसी इकत्तीशा | समिसिगरणपगुरुगोगिगिरीशा
ना। मासयबादलउँशुभ,विधिपूनोशशिकार।
.: शिरधरिरमपदधीपतिहिकीन्हकथापरचार।।
सा। सुनियेमन्तजान, प्रातापिय रघुनाथके।
मदुरावाभावान, सावधानमनधानधारण
बालमीकिमुनियरमसुजामा | ज्ञानविरति विज्ञाननिधाना
देवस बार । भक्तिविषका मुक्तिभण्डार
भराचं मुनितहें यमलारा | शायसिजनसुनिहिवामान
तह मुनिहरिभिलेजरलाई । खागापूछिनिकटयैठाई
बोले भरद्वाज कर जोरी । मुनियदयालुबिनयको
सहाराज तुम श्वन्तस्यासी हौसर्वच प्रपितोस्वामी
कयोफोटिशतजोइरोका । कर प्रशंसासुरविधिलोका
शिषमाजविशाइन्द्रसनकायो। एहत्तरतर्गसधिसबभुतिवादी

وجت بامان۔ ۱۴
अडुतरामायण
ब्रह्मादिक यह द्रव्यसुपाई । भागविभूतिसुरनके भाई
दो। विंशविचारसहस्रप्रभुजोजगशालोमा
सोमुनि ब्राह्मण मुरखनते,नरपावतसुरलोक्ष।
सो०। आवागमननहाय, अनैजोकोईध्यानधार।
मुन्शनाथमसोय,सावधानचतुरागयुत।
तदपिनयुसीलाल माध्याम | जानिसिन्धुकायोलुसमासा
करौक्या नया बसोई । समक्षा सम होई
जोनहिं कपासुनी सोई । कहोनाथरारक्षेत्रनिगोई
हसियोलेसुनिमुनिसुनिशी प्रश्न तुम्हारसकल वखानी
बडुत कया चुनावोंगाई । भरवाजमुनिसुनुमनलाई
यहाथाजगत सोन्यारी | अवतासुनतमुखमयदुखही
प्रथमहि इन्ट्रादिकाहट कीन्हा। रहवेडगोउतरनाहिदीन्हा
हौतुम नुनिममपलसनेही तुम्हाँविहायसुनाउक्केही
तुम्हींसमुझिहीमुनिपरसोना शिकनिजामहरिरसतीना
हो।ये हैं प्रश्न तुम्हारे,ऐसे रव श्योल ।
लहन जोहरीसन्मुखहि मणिमाशियाको मोल॥
सो। सुनौशम चार जेहिकारशाभोजरात में।
कहोंसोमनि अनुसार, वरितसुखपालमपरम
भूपचक्याविरशंपुरसुजाना । कर्मधर्मपचीतिनिधाना
सहधर्मिगीतासुपतिवर्ता । मनक्रमबचनपतिपत्थी
रामनामनिशिदिनमुखकाई । एकादशिवससोनितरहाई
एकबार जब यह बताया है जिनुजलभोजन दिवसानिया
पतिसँगविद्यादेवालयमाय । निशिविशाम करवाताभयक
...

و جهت دان اور
सोला सुधम
२४
अडुदरामाया
तहिनिशिवाक गगनबाई । श्रीपतिनिजसुरवताहिपाई
जानिप्रसन्चानुनृपमाहीं । माँगनबरहि मैं तोहीं।
गदगदगिराबिनधास्तपफीन्न । देजनमतावास अधीना
पुनिमाग्योघरधरिलहिमाश । जस्का सुतत्रिभुवननाथा
हो। राजनराजाहोयश्च और महा शिरताना
सासु हट्य यावासमा, पर गरीधानियाज।
बाग, मई तुरत शाकाहाने
सम्मान तुल्याय, मनोकामनापायाशा
चौरमशिशोषहरयायो । सुश्वारीसेका फलबायो
वानंदपूर्वक लफलवाई । मूख्य मनोरमन कीपाई
फूल्यो दुमहि वारणायन । गर्भसाहितभन्तरतसथानी
भयो पुत्रीले नवमासा । तेजवन्तजदुरवि परकासा
ताकोनालाविदित जगलोई । अम्हशेष जानतसषकोई
विद्याधनीनहीं समजा करतसक्षश्रीपतिपद पूजा
कडुफकासयहिदिशिलिंगय । पितानासुमनुस्वागतभयक
राज्यमार सपनेशिरलीन्हा । पालनप्रजसिंधिविविविधिकोहा
पावनपात्राज्यघरपाये । हेतुतपस्याबनहिसिधाये
दो। करन रामतपतचीत चीतिमायेचनकाशा
खास धीमयामहरि सहसरव्योमडियालय
सोको सायपरीक्षा काय, श्रीपति तवबैकुराहते।
घरेसर राजा गपड़ मेव रोगपती ॥
नमिलचरण श्रीपाहिजगबन्दन। रघुकुलहिलकाकोशलानन्दन
पातमीवियलिहरिगुणगाना भराज मुनिनुनिसुरखपाचन

وجبت زابان ۱۵
१५
अडुतरामायणा
कहाविष्णुमही सुरराजा । आयोंसफालकरमतवकाज
जोच्यानृपहोयतुम्हारी । सोबरमाँगजमनाहिंविचारी
देखिनाचराभूपतितोरे । उपजी दयाहृदयकछुमारे
औरनकछुजानसिगनभोरे । करिहीपूर मनोरथ तोरे
जानिप्रसन्नमाजरुपमाहीं। मनभावत दरवहीं तोही
बोले परमसता तब राजा । सुरपतिसोनामोहिकछुकाजा
मेरेवोध्यान विशाकोनासा । करिहैलीपूर सबकामा
हो। हरिकोहॉडि के चौरमा नाहि मांगों वरदान ।
जागरेश्वरलोकनिज, मानिशिरा घरमान ॥
सो। सत्यवचनमुनिकान, छानिहीभूपालका
भेप्रसन्न भगवान निजस्वरूपकटतमयो।
अविचलमलित माना। हुस्तरपनिमारभगवाना
चतुर्भुजी तहसूप दिखायो । मुरलिहिताविपरयो
चक्रथादि ग्वायुधकरधारे। शीट फुटशिरकचर्षको
भालतिलकाकेशरको सोहे। दिशाशयुतिदेवतरिमोहै.
शुविकुण्डमपाराष्ट्रात राजत । शितभिवरलिपतिमनलानत
करिनिन्दकशुनपारिधिशाला। कन्युकराराजसबनमाला
चानन र मनोहर हासा ।तायाधरशानिन्दकनासा
भृकुरीकुटेिलकमलदलसोपना चितपतससितारसदमोचन
रदपट वरुणदशनज्योंहीरा । निकोदर जिविसंघरगंभीर
दो। जानुनढायद्कझवत,शोभादशिन जाय ।
जहाँनित्य वनशंकरह करत विनयविनाया।
सोका पीताम्बरधागात, शोभितदीनदयालुले।

زوجت زان ۱۶
१६
अडुतरामायण
मनी अमितवसात पिताकीनाहिंजातसहि।
नखद्युतियावरणनिहिंगाई। मुनिशनमधुपरहतनहें छाई
मृदुमुसकानमनोहत्वयना । चितवनृपतितनराजिव नयना
कहानोरावरभावह जीका । हेतुम्हनहिहोयबलीका
बोले सूप जोरियुगा हाथा । रेशातित चपने पदनाथा
कबन घटै हत्यतेसौरे अनुदिन बढेश्चनुग्रहतारे
हसियोलेशापतिमाहाना । दीनहुम्हें नरभूपतुजाना
सयेशनशानिशमुनिजनन । दीन्हमतिको कसुद्रशन
विशदकाल में करैमझाई । तेहैशचुतहिं बचाई
इन पाइने
जनप्रतिपाला
हो। सत्यसिन्धाशंशारामनदीनानाधान
देव भक्ति शायनी युति के समान ।
सो.। चम्बारीमाभिरताज, माय झवश्वरायने।
लगेफारम खूषकांज, बोटिसिंहासन राजपर ।
नमतचरसामीपतिमानी। बालमीयिमुनिकरतयस्थानी
श्रीमतिनारूप निधारी ! बन्दरीद छन भई कुमारी
गुरान बाहिरीयलिEिR ! भई विधाहन योगसोबाला
व्याहशोकभोपियवान
नारद मुनि पर्वतमानकोश । आदेशमधमकादिनको
माइसंसार

14-opeani
জাখো
रोषिकुमारीरुए लोमाने । भयेवशमनरहनाठिकाने
पूही नपहि कहो याबासू । कोहै करनपिता है तालू
पोनृपतिसुनोमुनि होई । श्रीमतियह कन्याममहोई
मुनिहत्तान्चालभितमन्सया । करिएकान्तनुपनारदकहेज
हो। सुतातुम्हारामनहरा भाई हमें यति चाह ।
करिविचार नृपतासको हम संगकारौविवाह
सोल। पुनिपर्वत यह बात, कझोरचन्तकभूपों।
. देशमुतहिं पाहतात, वेदनीतिकूल धर्म सों।
बोलेभूप जोरियुगपानी । सुनोविनय दोउमुनिबिज्ञानी
जादिनहोय स्वयग्दरमाला 1 शायदोउ मुनिदीनदयाला
करौपरीक्षा नियनिशाला । औरउपायनमुनिसेहिकाला
करिने माहि प्रसनाकुमारी । देहलाहि बिनहिंविचारी
सुनिनृपबचतमपनढरहेन । विशालोकदोडगमनतभयज
कहा विवाह सोनारद जाई । हैकारमयककरौ सहाई
पर्वतरुपकपीशाहिहोई । जाने कन्या औरन कोई
महाविष्णुमुनिस्साहिहोइहै । मनमामिलापतुम्हाजिलहिले

।
अडुलगमाया 18
गशारद पर्वत मुनिमाये । समाचारकहिबिनय सुनाये
रोका दिन जायस्वयम्बर नारद पानिधना
देशरूपमलूकको, दीन बन्धुभगवान।
सो। औरन देखैकोय,एक कुमारी छोडिकै ।
होई ऐसहि सोय,कटोविहंसिकरुणायाम
श्रीपसिधारणकमलकरतोरी। वालमीकि मुनिकाहतबहोरी
च्याहहेतुनुपरच्योसमा अायतश्चगतिमहिराजा
ऋषिमुनिसहिसुरसुसान्धी। सचिवमहाजन परजनसर्बा
नारद पर्वत हर्ष बढ़ाई । सुनत खयम्बरएचेधाई
करि श्रृंगारसश्विनलंगवाला । करसरोजसुन्दर जयमाला
रत्नजरिताशिर बेसीसहै । बालइन्दुविनिरखतमाह
शीशफूलविवाशिनलाई । सनोबारियुतअधिकाई
पुटबन्धन सो गूंधी चोटी । उपशाकिराविशाफरछोटी
निरविचलकमेचकलहराई। भागिरिनागिनिदुरिजाई
हो। अवसानक लघुति मनोदनिखिलेत।
बाल अरुसारविनिन्दक, अतिशयशोभादेत
सोला टीकाटितावशात जैसेशुशिशशातलिता
सोहत सुन्दर मालायालाइटुरिझोनकै . ।
हरिव विषयुगौहनिलाई । इन्द्रधनुअनलायो दुराई
शरकटाक्ष हर रेरिखपाने । मुमशादकावनसागिहिपाने
रेखिकंपोलनकीच्यरुपई। रक्तकलारंगगयो उड़ाई
शुकनिन्दानासिक्षाबुहाई। निखिकीयन दुरेसाई
अवरचरणारितारेगुमलने। रघुतिन्दकाती समान

अधुनरामायण
।
19-01
निखिवदनशशिमणिपरकामा मुनिचकोरमनपरमालामा
सुनिमृदुवचनसेषडरलाई । बनप्रियविषिनरहीमचुप
मन्दमधुरलखिमुखमुसकाई । शुकप्रिय उरदारबजरवाई
नियुकसुभंगज्योकूपससीके । देतमानिसहचिनिरखननीरे
हो। शिबुकमनोहरविलतित मनोञ्चमीके कूप ।
देतरनत पटतरनहीं, शोभाअमितचनूप।
सोधररसकुराडभराय, जगयोनीरदपट तरे।
करत पानहर्षाय, सन्तसुमतिद्धभक्कतेय
कराठफलितमनहर्षवदावत । भोलितलरिखमोरपरावत
मुक्तावलीशिरोध सोहाई । मनोदीवि उगशाअधिकाई
हस्तशिरोतन अङ्गादराजत । कोटिप्रभाकरलरिवधुनितान
उदररेवत्रिबलीतिरबेनी है परतसिजन सुरषदेनी
लखिनिम्बोदर वस्गभीरा । स्वातचऋविचमरितमधीरा
योशिराफतकसुन्दस्मनभावन। अमिताखिनगरानलनाक्न
पदपङ्कज पुनिनावकशोभा । युनियनमधुपविलोकन सोमा
छवि शृङ्गार रूपकी राशी । मनोदीक्षि शशिमत्कारी
उपमाको असकविजोकहई । पटतरसकतमबनलघुबहई
दो। नीलवरसासारीसुक्षय, सोहतगौर शरीर ।
छवि वृक्षारहिजोकहै,कोच्यसकविमतिधीर।
सो हैनोलस्मीरूप, शोभा ताकी को कह।
श्रद्भुत कला-अनूप रुपराशि मन मोहनी ॥
ठिठुकतचलनधरतपगधीरे । लाजकोचननकननतीरे
यह विधिराजमहलाई । जहंसमाजसव साजबनाई

وقت رانان شد ۲۰
अबुनरामावर
दीपसमाजबरूपकुमारी । भवेझाकिरतन दशाविसमी
जोजह तह तेसहि रहिययज । चिलिरसेमौनहिरात
सकलसमादिशिदोविकुलसि । लहोगदारको निजननुहारी
मनहींमनहिबिसूरतिटरहे । सुमिरतिबिधानाममनगाड़े
तुमप्रभुकरुणासिन्धुअगा। पूरा करीनाथ मम साधा
तुम्हें छोडि मैं कासोंबर | चौरपुरुषन्नहिंसनतरधर
करोलालसा पूरानाधा | मोरिलाजत्रभुतुम्हरेहाया
हो। स्मारूप कालाधरे, हूँढ़त मर भन्दु सूर
पस्योनकोऊ दृष्टितर, नरमुनिसुर गशभूप।
सोनगडीगन कीकोर, रूपश्यामधी कन्सी
नारद पर्वत योर तनकन देख्यो भूलि के।
भयोशोकदोमुनिखनमारी । हमादशिकुरिनरस्वनिहारी
दृष्टि हुँचरिजोहमहापर्छ । हरिहायशानको घरई
सभामध्यमुनिवनिनिब। मलाई फूलै तनातन से
नेहिश्शवलीनुषकन्यामाई । तेहिपली मुनिबेटे धाई
बार बार इत उतजारदे । रहनुष साविहाय लोउसेटौं
बहुतकीन्हनियुक्ति पाई । तबहूचरिनिवारनहिबाई
कह राजातप गरि हकारी । देखु सभासद मोरनिहारी
सेनार पर्वत सुनि होई । बैठसमाइनसानाहिकोई
लखुरचक बनानउठाई । देजनमात कराठपहिराई
दो। स्थापनुमानिपिता तब देख्यो हरि उधार।
रहीसिमकिनिकझफैि देरियरुपविकार
मोती उरतभई उरमाहि देरिणभयानबारूपमुनि।

ویتار-یز
POINo.
• .
अजुन रामायरा
सहमिगई धिरनाहि कामाल सापली
कहानृपतिसुनुराजक्षिशोरी। फेहिकाशामुनित्यविमुख पारीन
बोलीकुंचशिपिताविशिहेरी। हैकारणासुनिये नृप मेरी
यहनार पर्वत सोड नाहीं। हैं दुइभालु कीशयहिटाही
पुनिपितुकहसुनुरामाफुमति दे जयमाल एक उरडारी
पनि दीरव्योमुनिशेरकुमारी बोलीवचनमधुरसुखकारी
भरकटभालु बीचयकरूपा । ओहि पिताम्बर बैठ अनूपा
षोडशवर्ष अवस्था जाल | क्रीट मुकुट राजतशिरवास
प्रभुतासाराचसकाद्युतिकैसी किरासमूहदमकरजैसी
aslil
सिसेवचन सुनन जयभयऊ । कसभामुखद्युतिउडिगया
छ। श्रीनायकसान श्रीहितमध्यसंसदनायक।
अपटनसरयोस्वरूपनर मुनिगुप्तबैठे अायकै।
तेसमय लरिख धीमतीसाइनिकट बनहर्यायके।
अमातरीन्घोडारप्रभुगत युगतहाथ उठायकै।
सुरदेरिपकौतुकशिरीधरनभदुन्दुभीधुनितावह।
करिनान्तृत्वारा बनसुमनंसुरलविहीं॥
गहिवाह सुरनरनाह कन्यसाधते अपनेगये।

روایت فرمائے ۔
२२.
अटुलरामायसा
बैठे समाजैमनुजऋषिमुनिदेरियसबचकितभये।
दो पुनिसमुझाईदारिका,करि हट भूप प्रवीन ।
जायनिकटतबब्रह्मबर डारहार गल दीन ।
सो। सुमन सहि तेहिकाल, सुलकीन्हाकाशते ।
जयजयद्रीन दयाल करतश्वगन्नागान नभ।
भइतवलुप्त दृष्टि देवाला | गगनशब्दचाई ततकाला
श्रीमतियाज्छापूरसाभयक | जोतिनोयादिशक्तिकाराज
वायविष्णु साकेनाया | आदर सहित गये ले साधा
लखिश्चाश्चर्यसभासदभूगा । गमने वाचमनिजतनिरूपा
शिस्योशोकगिरिपर्जन ऊपर | नारदधयोञ्चश्मचातीपर
कीन्हामनमुनिशिवाहितोका पईचेभरेगनजलशोफा
कहाविद्यासुनौहपाला | तुमसब जानौ दीन दयाला
कवन हतेउ जोमध्यहमारे । बैठायतेहिसमननिहारे
जैसेवास सुसन डिजाई । तैसहिगालैकुंवरिभगाई
दो दीन्ह विपुल वोडनको लैगयोपालचनूप ।
हैयह कामतुम्हारो, सुनो नाथ सुर भूप ॥
सो० है परमाद संसार, नाम तुम्हारो नाथजी।
कीन्ह कहा करतार सेसोतुम्हें न चाहिये।
बोलविष्णु सुनौनुनिसजन । कामक्रोधकवहूंम्बहिछजन
रहतमोह माया से न्यारे । हैंहमत्रिभुवन के रखवारे
छल छात्मसहसैनेकाजा । सुधाशोकमुनिमन उपरामा
दैत्योयुशवाय पहजोई है होइ ज्ञानवान पद कोई
कधीवातजोप्रतिञ्चनुहारी । मोवाश्चर्यनसुनिप्रतधारी
।

محبت را ان۲۲
-
अद्भुतरामायण ... २३
वगत असुर ऐसे बलसाना । निजस्वरूपपलटतमनमाना
चिह मेरेतन के हैं न्यारे । विभवकाशयसनश्चनियारे
गदाशंपन्योयनसुदर्शन । थेलरयात मेरे तन दर्शन
कडमुनिकवहमसें चमकाना । हो हैदोष देत महि लाजा
रोल करिरिचारसमझीमुनी, तुम तोपरम प्रवीना
कीयह काम हमारो, की औरफोड़ कीन।
सोला कह मुनिसाँचदयालु,फिरतुम्हरेमन काबसी।
कीन्ह हमें कपि भासु, मध्यसमाधितुकान
कह जाकीइच्छा जसहोई । देतत्ताहि मोहिबेरन होई
पायोनारद जोब्बर माँगा । भयोमुफलपर्वतधनुरागा
समुझौमुनिनकहबाफिरभूले । काके फूल फुलाये फूले
जोकरत्यों बरसोइनकारा ! सृषाहोतसवपरवाहमारा
फाजहमैं बरदान दिये से । नहिंकारजकछुकामकियेसे
हरय क्रोधसभिमान मियचो। सपने सुखसोन्यायचुकायो
सुनतबाकयुनिरयोचुपाई । चलेअधमन क्रोधवढ़ाई
पहुँचे अम्बरीष के पासा । बोलवचनजानुऋषिपुर्यासा
हितवचूकसबै महिधाला । कीन्दकुँगरिजिनुहविहाला
दोल। हमैंबाश मेराखिके, दीन्ह और को बाल।
हैंहम बशनबमोधक, लेजशाप ततकात।
सोली जैस फैसे हम साथ, प्रीतिजाल के मालिकों
तैसतिमिर में जाय, बशोधूपति समशाएवेग
तुरतै प्रकट भई अधियारी । से मेघ घटा यति कारी
ज्योति सुदर्शनसीन्यप्रकाशा । आईवतितहाँलुरततममाशा

اوت رابان-۲۴
अजुन रामायणा
लारिखकोतुकमुनिनोभागे। चालुदर्शन पाळू लागे
जितदेखतलितचदिपाई। गयेयुगलमुनिसहमिसुखाई
खायोचक चक्र के मारे । विशालोकतनवायपुकारे
আন্নি স্বাস্ফীলিখালী হুম্মাজান
टारीनायव्यथाखावतपर । लेशदायहोयहि अवसर
अम्बरीयशरणाशिसुनिलहन। करोधिनयोतिजमलचहज
जोपचहतोले बचाई। पविलुयाननकोडसहाई
दो श्रीतिकालयमातियो बोले मुनि करिशोपी
कीन्योनस इन हमलों, लेशाप शिर रोपि ।
सोल। होइहै इशरय नाम, अन्दरीकोश।
लहौतिनले धामगुजरुपयहारतुर ॥
श्रीमति जन्म क्षेत्रतेहोई। हैप्रतिविमावतीसोई
सोकन्यामिथितापदिपाई। कार तोहियोक्षशावरलाई
होइ हैतासोंग्याहतुम्हारा । मदहोइ हरसदन उजारा
कीन्ह कपट रजनीचर शरयोहारकारि चार्ग अनैसे
हरिहैविश्वरनारिहारी । बिरहादिलशहाज दुश्वारी
खोजमाहिरिहर ही चाहत शोककोरा
।
।

درجت رایان ۲۵::.
अडुतरामायरा
२५.
भयोयिष्णुगनहर्यश्नपारा । कीन्हशापमुनिअङ्गीकारा
दोउमुनिवरिअवधपुरबाये । दीनबचनकाहबिनयसुनाये
दरिषभूपमुनिनिषट दुखारी। तीन्ह वक्रतेतिनहिचारी
हो। भयविगतजबकटते, मुनिमनकीन्ह विचार।
कब करब विवाहसुत, जबलोंयह संसार।
सो भयोराम अवतार सुनिन शाप ते अवध में।
गोमायातेपार फैसिगे माया जाल में ।
पालमीकि मनपरमसलासा । करतकथाहरिगुराापरफासा
विष एक त्रेतायुग माहीं । कोशिकानामविदित सबटाहीं
विधवान युगज्ञान निधाना । गिरागान में निपुरारावरखाना
यांचज्ञाकार करत बहारा । हत्योधनपयमनकाउदाग
पूजाध्यान विष्णु दिनराती । रहतभजनहरिकेनिमावी
सावशिष्यतिनो संगमाहीं । गानशास्त्र मेंकोजसमनाहीं
चाटीयामविशाको नासा । बसत देहरीनीह के धामा
भोपनाक्ष नाम हिज कोई । रसिकप्रवीशाधन धनसोई
एकदिवसझुनिकौशिकगाला। भाप्रसन्न मनतिहरयाना
हो। कौशिककोशिष्यनसहितबोलिभवननिजली।
भ्रातृमिसहि विनाहिंबात, इध्यमिन्धुसमदीन्ह ।
सो करिविचारमनसाय,निपट पुरखारी देखिो।
तिन्यशन दियघाँध, निवप्रतिभोजन के लिये।
वियपद्माक्ष सुशीलविनीता । नारिधर्म परिवर्त पुनीता।
। मीसुगंध निर्मिततनतासू
पतिसिवायडूसरमहिं देवा । मनक्रमवचनकरतिनितसेवा

ولایت را شن۔ ۲
m
२६.
अडतरामायण
पूनाहितकौशिका गाया । सावतिरमोनिसदासर्वसामा
सावधानपतियुतनित श्वले । सुनारिषजनकौशियाने मुखसे
गानकोशिकानिपुरानहायत । मुनि श्योहावीत नाचत
विदिवंकलिड्स स्वाहै देशा । गानसुननबह शासन
काप्रतिवादविष्णुयशेगावो । तस उत्कर्षहमारसुनावो।
सुनि कोशिकमममह तिमोथे। कह चुप होपविष्णुविरोधे
दो। कहाँविधा लक्ष्मीपति मायागुशा दोपार !
कहीं मनुजमति सूदत, असितहबार ।।
सो०। करत प्रशंसानाहि, दिशाछोडिले औरफी
স্বলস্যাকামি,স্বামী!
जपकौशिकच्चसषचनसुनाये। चारस्वरापातपतिबोलाये
कहकोशिक के भागेगावो । सस उदारता शाहि सुनायो।
लागेकर गान तब चारी । सोकोशिकलेजनदुख भारी
होइ अनुन्ध मनमनमाना । करियलस्टर परैनाना
शिष्यनसह कोशिकवनक्रोधे । निजविजकर्याभ्यन्तर रोधे
परी उन्हें धुनियह धुनिठानी । करें प्रतिज्ञाकोशिकाहानी
तानतरण गान बह छोड़े । शिरधुनियाकाइनफोड़े
भेअशक्तपछुचलनापाई । करिकानलब रयोचुसाई
बहठकीन्हीपति दुबारा । भयोशोकसनलीहविचारा
दोछेदेडरसनाउलटिक, निज निज परमशान ।
रोक्योमारंगलको, त्यो पर्याप्रमान
सोलन मेकोधित भूपाल, तीनहीन धन सात सब ।
कीन्ह दूर नकाश, पद्माक्षादिक देश ते ॥
।

اوچت رأ۲
अडन रामायया
रहते निफसिउत्तरदिशिया । पईचेगहालाहाल भयक
एकदिवस विधियोमनचायाः । ब्रहालकमहपिनहिंयोलाया
हतीसुरन उनकीवभिलारवा । करिसन्मान उन्हें सहराना
श्रीपतिस्क दिवस तहबाये । सानातिन्हैविशापुरलाये
विष्णुलोक जयपाउँथे जाई । सुरन लीन्ह मन हर्षबढ़ाई
विविधि विधानभईयाइनाई । सेतहाँसवमतिसुखपाई
मालनीति निकातक्षस्थानी । भरवावमुनिसुनुभमबानी
हिसयाजमाई रखाऊँ । सोशिकागानसुनततभयऊँ
सुनत समाजवाद सुखवाया । ये प्रसन्न रमा के नाया
दो। घोणे विहरिविक्षातय, सब परम विरता।
नसावाचा फर्मरमा हैं हारे प्रिय मता ॥
सो.! ऐशो बड़ा सिरो पांव, ही इन्हें विचार के।
थडेगजनसय भाव विनावियोवन चोरको
कहनीशिकोहारिमुखाई। दोन्ह तुम्हें निजगुणपडताई
सिवका सहित हमारे लोका । रही सदापरिहरिसवशोका
मालती पति के संशा । पतिपदनिह पति अंगा
पालनीक कोशे मुबानी | पल्मनीतमधुर रस सानी
मध्य सभा सुर पर इस बारा । राजतनीपति अधम उधार
करिये माह की कौन बड़ाई जह सजत यशामुरबदाई
भृत्यासहचरि शकिशोरी । खड़ी रमा मागे कर जोरी
किय शरणकोशिकानईचाना ! भषसुखीसुरसबसुनिताना
तुम्बुसमास एक मनाली । बैटिसमान नहीं सुर सी
दो गानवान शोमानदय, हारो तान वितान् ।
।

२४
अजुन रामायण
وکت رایان ۲۸
कीन्ह प्रशंसायातविधि निकै श्री भगवान।
सोवा सिन्धुसुता सुनिगान,भइहर्षितअतिशयहिये।
दीन्हसो अपने पनि मणिमासिक बनमोलके।
समय सुलत्यसरियनकीबाई । सिन्धु सुतासबदीन्हरजाई
सभामध्यजोहोई पराये । सोनहिं बैठे जाई उठाये
सुनि असषचनसभासदनाना । शये सबैौनिज निज चस्थाना
तहाँसारिपननहिं कीन्हबिचारा । करगहिनादतुम्हेनिकारा
भईदेवऋषिञ्चतिशयभीरा । करत विचारभयेमुनिधीरा
गाननादमा मोसम कोई । उपज खष्ठितेमया नहोई
करौकहा देखनन बहाई । सन्मुख मोरे सकेनगाई
आगेविषा सभागवारी ! गायब हमें निकारी ॥
श्वति दुखाई होननहिपाएँ । तहाँ बैठितुम्बुरुधुनिगाहें
दो। बीसोंकोसुनारद, विपुल रोष सुन्ताप ।
कीन्ह अवज्ञाहमहिंजेस, बस्तुमलेवोशाय।।
सो०। परीक्षारिजसाँव, हारथोमोहिंघसीटिकै।
फेफोवनीनाक, उपजिसमासी उरते ॥
राक्षसि उत्रने जन्मलुम्हारा । होय त्यहाशापनमारा

تران- ۲۹
अडतरामायरा
बदरिकयोमुनिपरमविवेकी । जायधरगिपरपुनितुमफेंकी
जबसबाकदेवऋषिबोले । ब्योमरसाततदिनाजडोले
सक्षमीसहितरमाणे नाथा । बोलेवचनजोरियुगहाया
कोरमामुनितुमतपधारी । शिरपरवाशानाय तुम्हारी
सुनौविनयक मुनिपरवीना । हम तुम्हरे शररावधीना
करुप्रतिज्ञानजोहमचनुसरहीं। घरशोणितअपनेपावि
पियेराक्षसीशोरिणत सोई । जन्म हमार ताहि सों होई
दयालागि मुनिकहाबहोरी । होइहै पूर मनोरथ तोरी
दो। नारदसों विष्णुहिकह्यो,कीन्होनुपापिषाद ।
जपतप योगसुदानते, परम प्रियामोहिनाद ।
मोह रैभजन अौगान, मोहिंप्यारतेपारासम ।
सत्यवचन मम मान,प्रथमवेदते नादबर ॥
गानते मुनिकौशिकहिवड़ाई । हैजगविदित सुरनमनभाई
तुम्बुरुगानसन्नमोहिंभयऊ । तुमकसहयोधनिर्मयज
नाहोत्योमुनिपरम सुरागी । तौकसकरतसभाममत्यागी
जोउत्कर्ष चही मुनि राई ।। सीरवीगानमहं तुम जाई
गुरुविनु विद्या कोउ नपाये । तैसे गुरुबिनुगान नावे
चहौजोसीखनमुनितुमगाना । सोमैं तुसकरव बरसाना
विश्वलोकविदितजगनामा । हैगिरि उत्तर मानुषधामा
सीरवीजण्यताहि डिग रही । सोवत भाग चहै उठ जागे
दयनारदमुनिकरिधनुमाना। चाये तुरतअलोकास्थाना
हो । यसमा यो साहसों, गुन्नत र अस्थाना
परतहिशदहिथवा में उपजतरसुखरवानम

وجت رامائن و
३०
अडतरमाया
सोलर पड़े समुरष सजिशान, यक्ष नारा गन्धरख ।
निकद अलोक समाज, पमहानिहर्षयुत।
कहानलोककहांसुनिचाये । पाकीस्वाहिंदादिवाये
कहा पाबाजा श्री नारायन्तियननाद सुरखगाया
शुनिये विनय कहाँ कर जोरी । म शासधूसा विज मोरी
यापन हालयाहालौकहिये । चाहीकपानिजसुनितुरषासहिये
यासम्पदाकारनंविधि पाई सोशलेकाहीसुनाई
ययाभूपति भुवनेश सुनाना , पल धुरीबासुनीति परवाना
शासुराजसबासुरधारी सुन साधारधीर दुरवादी
शान्तवासश्चमितिशिरबाई ! कहा किंवोरा नगर बजाई
भगवतभजन परेशान होई । विवाभांसाहान होई
सिल करो विचममा गान सब बहं उपदेशह भार।
जोनकानफरिह नहीं, वहीं नगर विकार ।।
सो। अायोसदितातीर,
विमा हरिरशानभुन
डासिएर सुधधार, लग्योकर भगवान
पाइपरन्पादिनहिंसदाशस्तहो ताहि भगाया
लछुदिनगवेभूपालनत्याग । गासन्जुरु यमराजश्रभागा
लयोनहनमानुषं लहं राजा काहिहासातनु यमराजा
लागीतांशुधाप्रति भारी । जाबालासमराज पुकारी
का पराध अन्तक मैं शीन्हा जोसहमदियाचा दीन्हा
कह छत्तान्त द्विज हिंसतावा तोह भारतनुजन पाया
जैसे नगरते हिनहि लिकार हालहिं हम द्वारा
जोतोहिंसुधा सतावैश्याई । करना पल मुर्तजाई

ات راائم
अहतरामायण
३१.
खतदिवसतीशहिलदरहि है। सुभाषियालसमालूसहिहै
दो। पहजम्बुका जन्मदिर,मतिमन्द गैयार ।
बहन कालवीत युनि, होइ है बेड़ा पार ॥
सो०। धारहमानुन रूप,घर्च सत्यपरमा कर। . . :-
होइ है वही सस्मा सहितज्ञान चैतन्यता
कहा अलोकमारसूलाली । झुनु श्ययानिशानी
हैं हमहीं भुनेश भहीमा भयोउलूकवाययहिहीपर
धर्मराजजवानिमयुख गाई । कीन्हवालयहिगिस्पिरचाई
सरितमध्यकर्तगहता | लागिषुधारोस्योरोहिजाता
पुनिनभपदेशोरिजमोही। भयोमासु चिनु कारवाही
चोविसाद सूशिरारी | चकित भयोहिजरूपनिहारी
कह दिनपलसानुवनिलाई । जोहो पाई पछितादू :
महिं जानततूमूह निहंगा । है भुवनेशनरेश को नंगा
कहेउ चरितसयधापनरोई। कहानमिटौतिस्थाविधिजोई
दो। सम अपराध नियारिलो, दीन्ही शाशिरवाद ।
होय जन्म मानुष तन, रहैं राना सब साद ।।
सो शयोपिरलोक मोर मनोरथ पूर कर।
रद्योनएको शोक, मनवाञ्छित बरपायकै । ...
पन्दिचरणमीपति भगवाना । बालसीकिमुनिकररावखाना
विषचलोकशिशुरायावन । लग्योनारदहिंरागसिखापन
लाजवन्त मुनिकोटिन देखी । मूदुलवचनतबकोपिशेखी
करताजगुरुसोशिष जोई । विद्याथान निशा नहिं होई
गानतिरवलवह अनुशमा । भोजन दिव्यमधुरमृदुरागा

و جت روائی- ۲
३२
अडुतरामायरा
लाभखर्चमहहोय उदारा । भावभक्ति श्रौतोष श्वपारा
इनवातनतेलाजजोकरई । श्रवशिंजानियेकाजनसई
फरे लाज नौबेमन गावै । तासुरागकबहूं नहिं भावै।
गानखोलिमुखमारसमाना। अकड़तोलितन करेंजोगाना
दो। भरेजोरमीखरनहसि, इरिकै कम्पित गान।
वृथा रागमाला करै सुनिश्रोतै नसोहात ॥
सो. करियन कबहूंगान,क्षुधाप्यासकेत्राशयश।
वरजत सुनिविज्ञान,तिनिरनिशाश्वत शोको
जयश्रलोकवसवचनमुनाये। भेप्रसन्न नारद मन भाये
कीन्हगानप्रफुलितमनखोली। भयेशगिसिख गुरुञ्चमोती
जयसिखभयनादमुखगाथा । दीन्ह वशीशहर्षमुनिनाथा
पीते कल्पमान विश्वासर । पैहौतुम जितुर पुर बासा
श्रीपतिमूरति महमिलिजही। हरि सूरतिमह जाय समेही
चलनारद तुम्बुरुस्थाना। जीतातहिकस्मिनन्द्राभिमाना
पहुँचेमुनितुम्बुरु नागारा। देव्योकेतिकविविधप्रकार
बड़वक झरभार नरनारी । सकलनिकलतननिपटदुखारी
कोउयेशिरकोउनयनाविहीना। कोउवायलकोउतितनरवीना
हो। कोउग्रवलकोउपादपिन कोउबिन मुस्खचिननाका
भरेशोकजलगनकोड, कारलसकतकोउबाक।
सोका कहनार गतिदेखि, सत्य कहो तुमकोनही।
कहौसोकधारिशोरिप,फोहिकारातुमहीदुखितय
रागरागिनी नास हमारा । भयोभाराहमजीवपियारा
नोखे नाखभयेक रागी । पढ्यो रागमाला अनुरागी

رہتا ۳
श्रद्धन रामायरा
146
सिखिकै गानगश्चधिकाई । बन्योनवयोगीमूड मुहाई
समस्वरतालतान नहिं जाने। ऊँचनीचगतिनहिपहिचाने
धुनि गिटकरीनतेहिकछुवानी गानभातकोनिशिमुरुगावै
यहिकारशा हमसबैरिहाला । फँसेहाबदारुणाचुखजाला
तुम्बुरुहमे खजयमुख गाँव । तपतोजीद मुतनाचे
सुनिकै नारद भये उदासा । गमने लाजितश्रीपति पासा
करिरोदन निज कथा सुनाई । परेधरशिगहिपदलपटाई
दो। बोलेपयन विवातब, सुनु नारदमुनिराज।
का दिन धरौधीर मना, कारिहीं पूरराकाज
सो। बोइहै पूरा काम, चविंशतापरघुगहि।
हौंपसुदेव के धामा उददेषकी जमम लै।
हजोगान परप्रेमश्चपार । वायोतह तुम देव उदार
महेंहम तुम्हेंसिवादनीके । हो है पूर मनोरथ जीके
तोलोममकरिवाकप्रमाना । जहँ तहसिरवीज्ञायतुमगाना
निनारद मुनिचलाई । यासरागिनीमनहिं समाई
गपने इन्द्रलोक यवलोका सलोकश्रुयानमेलोकन
चहैजहाँमुनियर वहनाहीं । जहिविधियाययनकउँनाहीं

अञ्जत रामायण
دردت رانو
गये जहाँ तहभोश्चतिचादर । चले मिलनउठिकै सुरसादर
एक दिवस विधिलोकसिधाये। पडंचिभवन विधिपरमसोहाये
ब्रह्मसमाज गान होइरहेऊ । सुनिनारदहिहर्षचतिभयज
दो। वहाँ संग रागीन में, नारद परम सुनानी
शरश्चनुराय रह्योमन,कीन्ह तहातसयान।
सोः। सुनिजनारदगान तनपुलकितमनहर्षयुत।
सकलभासुरखमान कीन्हप्रशंसाधिविधाविधिक
हापरयुगतियहरिचयतारा । भारयकरणाहरगामहिभारा
मुमिरिषचन तब नारद वाये । करिबाद प्रभुनिकटविठाये
जाम्बवती हरिकी पटरानी । रागरागिनीबिपुल सयानी
तिन्हें बोलि बोले भगवाना । सिखव नारदकोकलगाना
जाम्बचतीतबगानसिखावा । सुनिनारद अभिमतफलपावा
कृष्णाताहि पुनियापसिखाये । सिषिमुनिगाननिपुरकहलाये
कह्योविसि बसुदेवकुमारा । सुनौ देव ऋषिश्चनहमारा
करखन क्रोधकपटमुनिकायहूं । बैरभाव विसराउब अबहू
याते होत सकल गुणा हानी । करी प्रमाणावचन मुनि ज्ञानी
दो। बोले दिहसिषचनपुनि कृपासिन्धुसुरखमूतः ।
परिहरि ईरिसंब, जानी म्वहिं अनुकूल ॥
सो। तुम बरुतुन्धुरसाथ करोगाननित हर्ष मन ।
रहौत्तहाँ मुनिनाथ, शुभचिन्तक मन्त्रीसुखद।
बालमीकि मुनिकथारसाला । कहत सुनन बिनशतभ्रमजाता
भयोप्रकटजगऋषिवरदाना । यातुधान रावरा मलवाना
विभवधनदाखिभयो दुखारी । कीन्हेसिवर्षसहसतपभारी

.اومت رامائن - قم
३५
अड्डत रामायण
भेप्रसन्न तब मनचतुरानन .। कहां माँगु बरपुत्र दशानन
फोन हेतु दारुणा दुख तोही । सोसब व्यथा सुनावो मोही
सुनि विधिगिराजोरिघुगहाथा । बोला बिहंसि वचनदशमाधा
होइन कषहूं मृत्यु हमारी । तेहि कारसाकीन्योंतपभारी
कह बिराचि सब जगममरांचा । कालकौर सोकोउन बाँचा
हैयह बात अपन र नाहीं । कहौं सत्य समाजमनमाही
दो। कह बिधि सोराव बहरि, करौसिइइकबाचा
यक्षदैत्यगन्धर्व सुर, अरु अप्सरापिशाच ॥ .
सो। लगै नइतने आँच, मेरे भिय यहि जीव को।
करौपा यह साँच, दयानाथ चारविहरणा॥
एककठिनपरा और विधाता । सुन प्रभूदैचितममवाता
सुना सोनवलोहोन दुराशाः । तबलौं होमोरनहिनाशा
स्पमस्तु बोले जगदीशा। गयोमुरा मद छकदशशीय
धनद सुरेश दैत्य सुर शेशा । घरुण यक्ष गन्धर्व नरेशा
रविशशिगगनदेष दिगपाला । पायकपयन मेष यमकाला
नीति तिन्हैंदारुगादुखदीन्हा । हठसयहीचपनेवशकीन्हा
पुनिबाडकवनगा अभिमानी । सन्तऋषिनसोंकहहठ्यानी
देजदराड गोहि जानि सुरारी । नहिं करिहों तुमसोहठरारी
भये क्रोधवशभुनिलपधारी । लगेकर सवशोचविचारी
दो. । बोले क्रोधित सप्त ऋनि मरिहगनीरहरास।
हैयक शोगिव अङ्ग मेंचौर न कछुहमपाता
सो.। भयोससब्याचकहाबाक अभिमान युतः ।
देडसोईन जात, जानि मलाई पनी ।

युद्धनरामाया
وتزامان -
कोधनलसेगलजिमिपाला | चलायोजयटकेदशभाला
यालमीकि मुनिएरमप्रवीना । बगेकहनयककथानवीना
वित्रएकगिरतसमदनामा । हरिपदभानिपुणगुणाधामा
करतयोगतय लैतियताथा । उरभरोसंधारिलक्ष्मीनाथा
या अभिलाषचसी मन तामे। होइ सुता लक्ष्मी समजाके
भोरसाँझ पयघटहिं भराई । करसम्बवाहन लक्ष्मी लाई
पुनिनिजपतिनीकाहिथियावे। शाराधियारधकहाये
सोपटरावशालीन्ह छोड़ाई स्वानिकट स्वपिनदुखदाई
स्टमोरिणतऋविक्षरदीन्हा । लेकर रामलला कोकीन्हा
VAVAVAVA
दोका दीन्हजायमन्दीदारहि, कहाब्ज मुलाया
हैघट भराहताहल, सरतीयतन कराय।
सोल वलासोधुनिराधार, विजय लड़ाई केलिये।
परेजेसन्मुखबीर, जीति तिन्हनिजवश किये।
समरभूमि जेबसन मारले : १. नीतिसरीनिजयशरिराखे
कस्मित भूलिनकाशा
सुरशरयोशाला
सन्यादेव नाग महिशाला लोपकाडि অকাল
भरीजोशिरतेहिचाहमिनियाल । तिनयकीन्हेसिभोगवितासा

اوت رایانه نه
نو
अडत रामायण
जबयाधारिमंदोद्रि पाई । डाह विवशशिर धूर उड़ाई
फह विषखायमरवमलनीको । सयतिडाहनहिंजीवबजीको
जानिगरल मय सुतासयानी । कीन्ह पान घटशोशितश्चानी
लग्योमनोरथ तरुफलसोई । जातहतनिश्चरकुल होई.
एकतोपयलक्ष्मीनाबाहुन । राजेशोता प्रषिनतनपावन
हो। फरत पान मन्दोदी, कीन्ह गर्भ परफास।
भारहरा क्षितिलक्ष्मिनबालीन्हाउरसहवास।।
सो.। हनीमूर्निज्योंज्याल, उठतचमकतनवालिसम।
पासनसकरहिवाल,भृत्याांचनसहिसके।
मानिमंदोदरिनिन ऋवधाना । पतिभयहृदय तासु घबड़ाना
तुरतबिमानविचित्र संगाई । होइअरूढ़ कुरुक्षेत्रसिधाई
वहाँजायचवधान गिराई । वेसितहिंमहिधूशिछिपाई
भयोनजलजगमुनितहिकाला | बिनधनरससबस्टशिविहाला
सुधाशोकवश सपजियधारी । बिनाशन संघ मरेदुखारी
कीन्ह शोचमनतिरजनराज । होय सलिलसोकरिय उपाऊ
भूमिसचिवबहदूत पहाये । देश देश केगक बोलाये
करि सम्मान निकट बैठारे । शूदुमचुलनुपवचनउचारे
मानिधिकलजगवाहीविचारी । वर्षहिं जलद वेगसुख नारी
दो। गुणागास्कैवरजसो, बोल विषसमुदाय।
देवारिकारिदन, करिये सपा उपाय ।
सो। लांगलरजत बनायागनिसहितकुरुक्षेत्र में।
- हनहिमोतीमाया र रिसंशयनहीं।
पचनक्षिजनयुनिअवनीशा । बार समायोपद शीशा

دج رامائن ۳۸
अडुतरामायण
रानीसहित हर्ष उर मानी । सुमिरिंगजाननशम्भुभवानी
कीन्हपयान तुरत नरनाहा । चल्यो सुमारगज्योंपरयाहा
नृपति सोई जहँ प्रजासुरणारी । सहें कष्ट तिनके हितभारी
श्वसविचारकरितिरहतराई । गये कुरक्षेत्र क्षेत्रसुखदाई
वह कर धरिहलन्नृप औरानी । लागेजोतन महिलित पानी
लगतनीहल अवनिकिशोरी । 'भईश्काट गमी घट फोरी
देखीजनकप्रीति उर छाई । लीन्ह तुरत तोहगोदउठाई
हर्ष सहित नृपघर लैगयज । जानिफन्यासम प्रोपितृमयक
दो। सिन्धुसुता श्रीलक्षमी,पावन श्रमलतूप ।
धस्योजानकीनाम शुभ, जगतशिरोमणिभूप।।
सो०भोपुनील नपगेह, करत प्रवेशहि रमाके ।
भागबिमय वैदेहा शारदशेषन काहि सके ।
नमोनमोश्रीपति रघुनायका, । अगजगनाथप्रगतसुखदायय
करोअनुग्रहप्रभुसुररस्त्रन । विश्वभरासुरनमदगञ्जन
बालमीकिमुनि मन हर्षाई ! कहन का अद्भुत सुखदाई
जबरावरा सीता लै गरज । विरह दुखितरघुनायकभयत्र
रवोजतबिपिन फिरतरघुनाथा । धनुषवारणकरलक्ष्मण साथा

و جت رانن-4
-
.
बडुतरामाया
३६
पुगुलश्चतुलवलयितुरखसीवौं । गे गिरि निकटजहाँसुग्रीवा
मिल्यो नहाँअञ्जनीकुमारा । पस्योचरणतनपुलकि श्रधारा
करि अस्तुतिबद्धविनय सुनाई । तुमईश्वरत्रिभुवनसुख दाई
नभभूधर नहि सरित पनाला । निम्येसिब तुम दीन दयाता
छ । जयजयरघुनन्दन असुरनगजनजनरञ्जनधीकता।
सुरमुनिमारतध्यानलगायतपावत कादिन श्रन्ता।
जयजयकिरपालादीनदयालोमगातपालभगवत्ता।
सर्वच मुकुन्दापरमानन्दा धर्मप्रद वेद भनन्ता ।
कलिकलुषविनासीसबउरबासीशोमानिधिसुखमूला।
त्रिभुक्ननाथाफरौसनाथाहोइमोपर श्रनुकूला ॥
। कर्मधर्म के नायक, तुम प्रभु कया निधान ।
ही चर अचर के नायक, दीनबन्धु भगवानं ॥
सो। तुम त्रैलोकी नाथ, होपालक त्रैलोक्य के।
नावत सुर मुनि माथ, चरणबन्दिकरजोरिके।
नयसच्चिदानन्द परधामाः । चलखनिरजनश्रगुणाचनामा
कमला कन्तअनन्तमुकुन्दा । जलशायनभगवन्तगोबिन्दा
पारब्रह्म अच्युत अबिनासी । अजित अनादिसर्वघटबासी
परमात्मा परमेश्वर स्वामी । त्रिभुवनपतिउर अन्तरयामी
बजयवरवराइवरूप श्रमाया । अादि अन्ततवनिगमनपाया..
भक्तपल सन्तत सुखरासी । श्रीपनि पुर बैकुराठ निवासी
निरतन धरिमहि भार उतारन। फिरोविपिनसुरकाज सँवारन
दयायन्त दाया पास भोपर ! जमनियमोहिनायनिमकिंकर
जिभक्तिनिज पद रघुनाथा । करियसनाथ राखियुनिसाथा

اوت نااندام
अंड रामायण
छ. । भारतिहरा शरारपदायककपासिन्भुभगवाना।
सुरसुनिध्यावतममनपावत्यादिमध्यवयसाना।
सन्तन हितकारीभवभयहारीगायतवेदपुराना।
किरपापभुकीजयिनयमुनीजैदीभक्तिवरदाना ।
दो०) मारुतसुत्तविनतीसुनताविहसिको भगवान
हौ मैतेरीभक्ति ते,अति प्रसन्न हनुमान ।
सो। करवस्तुतिसकोयजैसीवुमनिजसुरसंकियो।
ताहिसदासुखहोय,मोईरहिहीतासोंमगन ॥
छ । मनकर्मपचश्चनुरागयुतजोनारिनरमोहिध्यापहीं।
दिनयोगनपतयदानसँध्यमबासममपुरपायहीं ।
सुनिधाकानीपतिकीपवनसुतपुलकितनचतिसुखल्के।
कत्तिविनयवाभांतिपुनिपुलिहर्षिपद पहजगहे।
जानिप्रभुनिजासतेहिगलियाँद लीन्ह उठायकै।
करितोषपुरनरनाह बहुविधिमिल्योकण्ठलगायके
हो। राम नामधामोल है,लगैन करकछुदाम ।
वे नर मूद मन्द मति, जे न भने श्री राम ।
सो। हर्ष नहृदय समाय, भये मगनमनपवनसुना
सोमुखयरसिरानमाय लालमनीकिमिकहिस्कै।
बालमीकिमनच्यानंदभारी । कहतकथाहरिगुणबिस्तारी
श्ववनिसुतापतिरामकृपाला । कहापवलवुतसोसबहाला
कहीकषासवञ्चवधवरखांनी 1 दीन्हरामनयनसिविधरामी
गयहरिसियामाराममप्यारी । खोजतसाहिफिरतबनझी
तत्रमारुतसुतभक्ति हटाई । सकलकथासुग्रीवसुनाई

اربت رانم
अपत रामायण
..
पालिकेत्रासरहतगिरिऊपरं : । करौछापा तामरकरुगा कर
कहसुग्रीच जो देखन पाऊँ । दारुणाविपतिमंतामुभिटाऊँ
हनू राम लक्ष्मणा दोउ भाई । गपो लैगिरिपरकन्धचढ़ाई.
मिलि सुग्रीवहिहृदय लगाई । बालि यधन की चार बनाई.
दो । जानि दास प्रभुनापन, झापासिन्दुराम ।।
बालिमारि सुग्रीवहीं, दीन्ह सिंहासन राज ॥
सोल। पुनि सीता में खोज, चलें तुरन बन्दर करकः ।
उरधरि चरासरोज, सिन्धुपारगोपवनसुत ।
पहाँ सेन युत श्री रघुवीरा । पहुँचेजाय सिन्धु के नीरा
फिरे पवन सुन लङ्क जराई । सिन्धुनिकट सेना सब पाई
कहा सिन्धुसतक्ष्मण जाई । करौ यत्न उतरै कमाई
दीन्ह न उत्तर जब वारीशा । क्रोधयन्त तबमोबहीशा
परे कूदि प्रभुसिन्धु मझारी । उठी अनल लन नारिदभारी
भयोबारिवारिधि जर हारा । कम्प्यो कम्पितगातव्यपारा
मच्योकुलाहल जिय अकुलाने । जीव जन्तुं लै जीव पराने
លោកពុកពិត
WALI
जानिप्रलय सब भये निराश । सम्योरदिशशिभूमि
तवं देवन प्रभु पद शिर नाई । करिं अनुनिवबिदाई

روتانان نوم
अद्भुत रामायणा
दो । नाप तुम्हारी शरण तजि, हमैन औरकि मास
करौ चनुग्रह सिन्धुपर पावै सकल सुपास ॥
सो शररा सुखद प्रभुजान, आये हम सब देवताः ।
फरु रक्षाभगवान वाहि त्राहिवारति हरसा।
बोले बचननीति युत रघुबर कीहकामलक्ष्मणा नहिंसुन्दर
नहीं उचित काहू कोसतावव । बरियाई निजवल दिखरावर
श्वसकहि कृपासिन्धुचरगाये। बहरिदगनतेचाँधु पहाये
भराबहोरिसिन्धु जल वारा । करत कलोल फूल अपारा
लारिश्चनुकूल रामसुर हरखे । कार उत्कर्ष सुमन बड़वरखे
वंध्यो सेतु पुनिश्चम्बुधिऊपर । भये प्रसन्न देखिकरुणाकर
कहाराम यह भूमि सोहावन । करिहीं इहाँशंभु धावाहन
बनी तहाँ रामेश्वर मूरति । सुदिन सुतिथिग्रहसाधिमुहूरति.
धूप दीप नैवेद्य पुंगीफल । पान तेंदुल चन्दनतुलसीदल
हो। मृगमद कुम कुमफूलफल,ौसवतीरथ नीर ।
:. पूजा हितहि मंगाये, सीतापति रघुबीर॥
सो दिय बाजा भगवान, लाउ खोजिद्दिजवेयर
चारौ विशा प्रधान, हूँडि फिरे पायो नहीं ।
कहा सचिव सुनदीनदयाला 1 हैलायकक्रतुहिनदशभाला
महिरावण समकोउद्दिलाना । बित्र ज्योतिषी बेद पुराना.
मौदह विघा करतल नाके । करै कौन दिज सरचार ताके
नहिं पण्डित ऐसो जगकोई । करै यज्ञ वा सन्मुख जोई
काधाबहोरिकोज मंत्रीवर् । है अचरज वाक्य दशकन्धर
कटक माझहम कैसे सेहैं । वैर मान सन्देह बड़े हैं.

وروت را این نرم .
४३
अडुतरामाया
बारे सचिव पुनिमनश्चनुरणे । बोले वचन सत्य रस पागे
जोरावर श्राज्ञा प्रभु पैहै । जानि कर्म शुभतुरतसो है
परम विवेकी विद्या धारी । चारौ बेद शास्त्र अधिकारी
दो०। करै स्पबर दशशीश को, प-योदूत तह जाय।
लावैताहि बोलाय कै, करै कृत्यशिवश्वाय॥ .
सो०। प्रभु रजाय धरि शीश, चला दूत शिर नायकै ।
गयो जहाँ दशशीश लैसँदेश रघुकुलतिलक ।
कहासंदेश रावरााहिं जाई । सफल कथा उपहार सुनाई
हैसामान कृत्य वह ढेरी । चलिये शाप आपकी देरी
विहसा सुनत दूत पुरषवानी । कहाकौनअसमतिअनुमानी
नहिंफारसाकछु मोहिंषुलाई । श्रावैजनक सुता सँगलाई
समझे मनहिं जानकी नाथा । गठबन्धन कोलयहै साथा
शुभकारज कृत जेजगमाहीं । बिनपतिपद दर्शनभनाही
देषन चहत सियहि रघुराई । हैंपरपशपशकछुन बसाई
सेंसि तर्कना मन उपजाई । कीन्ह बहाना बाक बनाई
पुनिकछुवेदनीतिउरानी । कीन्ह तर्क सबमनने हानी
दोला है गोतुम्हारेयही मन, कज रावरा कुशलात ।
हो समाज के शामिल, हौयद्यपि चापात ॥
सो असफहि निशिचरनाथ कीन्हागमनावियानयहि ।
लै जानकि साथ, कटक माझ प्रभुकेगयो ।
गयोराम लक्ष्मण के भागे । बैरकपट छल समय त्याग
भयो सभा मन भरनमारी । निकट रामरावहिं निहारी
कारेवारतामनु टुबानी । कीन्ह अरम्मयोहजज्ञानी

بوت زابان - ہم
४४:
अजुनरामायण
निकट रामलै ममक किशोरी । निमकर गाँठ रामसँग जोरी
ले करजल मूरति हनवाई 1. मलयज अक्षत फूल पढ़ाई
कीन्ह भारती धूप राई । धूप बास महि मराइलछाई
दल तुलसी फल भोगमिष्ठाई। करि अर्पा नैवेद्य लगाई
पनि राजग जल के दवाया | पान पुंगीफल अर्पिचढ़ावा
एक शताबड़त कर जाया । लिङ्ग रामेश्वर पुनिवस्थापा
.! आईपिषुध ब सुमन बा गगन निशाना
पनि बिरकि, गौरें मम गान ।।
सोमबर एक सुनान, अन्त समुभाशिष दियो।
हौ दुरलीभगवान भक्तजनकत्रिभुवन पती॥
सुफलकाज सरहोयतुम्हारे । जग जीवन जीयन रखवारे
हाइ है वचलराजसुखराशी । फले कामना औरिपुनाशी
सुनित्रीशसबकटकतमानू । मन पुलकित हर्वे रघुरानू
कर हिजबजरिएकछवानो। बिनमक तिमिक परवानी
जिल्लामाद शानकी । हैसन्मुरष जगजननि जानकी
वापसु देत न फरक संदेहू · । रखिये पर्ण वेद मति एल
महा राम मृदुमदुल हानी । हहनारि जोतुमहारानी
विनादूटे न तोर उशारा । मिया हो तब पाहमारा
हर्ष सहित तब राबताया ! गयोबरि लैसीलहिलङ्गा
हो। सेन सहित रघुवंशमणि, उत्तरे सागर पार ।
कीहरुधन सघाहिकर, निशर अधमधार।
तो! दोन्हविभीषसा राज, लसुत्रसहितकरुणायतन ।
फिरे शवक्ष रघुराम ले के जानकि सेन युक्त ॥

و بهتر امامهم
ए
अडत रामायण
पन्दि चरराश्नम्वुज अघहारी । कमलापतिपयसिन्धुबिहारी
पालमीकि मुनि हर्ष बढ़ाई । कहत विभव सीतासुखदाई
जोति लङ्गः जब श्रीरघुराई। फिरे अवधसुरवरहजगाई
देव ऋषीश्वर दर्शन हेतू । श्राये सब नह रघुकुलकेत
श्रीरघुनाथ हर्ष वह कीन्हा । करि दाइयतशुभासनदीन्हा
ऋषिन प्रशंसिकवचनउचारे । तुम ईश्वर सबजगरवारे
अति चराड रावराबरियारा । सुरहित लागिताहिरामार
शोक दुसह दारुराभयदावा । काल फोसते हमैं छोड़ावा
सुनवराम निजवल प्रभुताई । 'विहसे नन बाई चंगड़ाई
हो । सुनि अनुमोदन ऋषिनसुखक सियादीन्हमुसकामा
मारिविष इफरापराहि, कौन बड़ापन चाय।।
सो.। नहिं उत्कर्ष कि बात, ऐसे लघुताकाम की। ::
कह सब उकुर सोहात, का मनुसाई राम की
सुनिवाणी सियसुरसकुघाने । भये चकित मन मासिकाने
कारणा कौनसियामुसकानी । रामप्रशंसा सिय नमोहानी
अचनिस्तानमहंसिकेकोज । जन्महमार अवनिने भयज
झूट बचन कबहूँ नहिं मोते । यिनुकारजमुखकतानस्योल
नवमैं अपने पितु घर वासा । परतहतीमन परमखलासा
तहकपरित मैं कहींवखानी । सुनीसफल सुरअनिविज्ञानी
चावा जनकनिकट हिजस्की । पार्म धर्मगुरानिपुरा विवेकी
कहा हमें नृप देय निवासू । करी तहां वर्षा ऋतु बासू
वपद् काल महोउ शहाई । तुन्, उचित नृपजिसेवकाई
दो। दीह बासन्ध निजभवन, पायो जिविश्राम।

अजनरामायरा
وجبت زناش۔1م
,
पठवा देह रजाय मोहिं नित प्रति सेवाकाम।
सोला पायोसुख सामान, डिजानिन बासन हासिकै।
लग्योकरन जपध्यान, उपदाजोरि मैं लावती.॥
नित पूजन हित चौकादेऊँ । पुष्प सुगन्धित चुनिधरिदेऊँ
करि पूजा नैवेद्य जो पावै । कथा विचित्र अनूपसुनाई
कहाएका दिन विष पुनीता । अचरज एक सुनौतुमसीता
सप्तसिन्धु में परगट अहई । तामें एक उदाधिदाधिफहई
तोकेपार बसत यक दीपा । विदित नामतहि हॉकर दीपा
विपिन सघनति उतंगपहारा । तह ऋषिमुनिकेयामधपार
बसत उहाँइक नगर चनूपा । तेहि नगरी महरायाभूपा
स्नुज प्रचण्ड मनुष्य वनारी । करिलसकतववकोउधतुमारी
पारिजानकी सब दिशिरी । कहति कथाउत्पतितिनकेरी
दो। जहाँ करत पुलस्त्य मुनि, तप नितरिहरिध्याना
कन्यातापिनुपतिकी, आवै तोहि अस्थान॥
सोली गायवजाय निशान, और सरिखनकोसाथ ।
'होयजायजप हान, परत भनकवर के अपरा:।
सुनिकरिकोपदोन्ह वष शापा । जो आपैरपराडन मम जापा
रहेगर्भचिन मनमथ पाये । कहियसमुनि पुनिध्यानलगाये
गई जब अपने भवन कुमारी । गर्भपिलहिलविभोदुखभाग -
कीन्ह विचार वरिसनमाहीं । कहा दोष कन्यै का नाहीं
सो कन्यापुलस्त्यकह दीन्हीं । हर्षलहितमुनि करगहितीन्हीं
भविश्वासुन सुत ताके .. सर्व धर्म पता सुन्दर जाके
भराज मुनि शुभगति देखी ! दिय कन्यानिजहर्ष विशेखी
1

وجهت رنانم
.
.
अडतरामायणा
तासों में कुबेर दातार । धर्म धुरीणा धनेश उदार
लाविकै तम वनभयेसुखारी । कल्ला माँगुपर पुत्र विचारो
हो। कर कुबेर फरजोरि कर, सुनिये अग जगनाथ।
देश एक पर यह सदा रहै लक्षमी हाय ॥
सोल। तब विरचि.मुभवानि, स्व मस्तु कहि हर्षयुत।
दीयोंचमारि विमान, चढ़ि कुबेर गेपितु सदन ।
कह अभिलाय एक मन माहीं । धनकी मोहिं इच्छाकानाही
नहिं अस्थान नहीं कहेंग्रामा । करौं जाय मैं तह विश्रामा
कह त्रिकूट पर्वत के ऊपर | गढ़ श्रदूट लक्षाबसतापर
वियुकर्मा निन हाथ बनाई । सुरल निवासकीन्ह तह जाई
भदनुज जग विकट कुचाली । मालवन्त मालीय सुमाली
कीन्ह उपन्य तीनों भाई . . लीन्ह सुरन तेलङ्ग छोड़ाई
भयो विश्व उर दारुराकोपा । मारितिनहिंसाकीन्हचलोया
सोतुम करी जाय तहें बालू । सुखसंम्पतियुतभोगविलातू
भकुबेर पितु याज्ञा पाई । रहेजाय पुनि लङ्का बसाई
हो । करत संयत श्री विष्णके, बच्यो सुमाली. भाग।
बास कुबेर सुनत तेहि, बहुत हृदयदुखताग५.
सो। बस कछु करिय उपाय, लीजै धनदतेनिगई।
मन यति तर्क बढ़ाय, लगे करन रचना सोई॥ ..
नाम केफसी ताकै कन्या । कीन्ह विवाकी सो धन्या
माते जा सुत उत्पति होई । होइ है समकुबेर के सोई
कह कन्या सों मुनि हाई । का अमिलाब सोकहो बुझाई
बोली केकशी तव कर जोरे । बड़े वंश तुमसे मुनि मोरे

جهت رهائن منم
अडतरामायण
कह कुसमय मांगा वरदाना । होइहै सुत राक्षस बसवाना
घोलिककशी दुखयुत यानी । हैश्वचरजमुनितुमजोवरवानी
तुमपति मुनि मैं तुम्हरी जोई । तिनसों उत्तपति राक्षस होई
कह मुनिजोसुत पाछेहोई । भक्त शिरोमणि हरिकासोई
सकहिहर्षत्रियहिगहिलयऊ । कारिबिलासपुनिरतितेहि दयऊ
दो। आदि जन्म रावरा पुनि, कुम्भकररावलयन्त।
शूर्पणखा कन्याभई, बहरिविभीष सन्त ।
सोल। अवसानयन भुजपीस, दशानन रावण सुभट।
कीन्हविनहतिखीसानगपरितापीसुरन रिम्॥
एक दिवस की सुनु यह पाता । गये कुबेर भवन सँग-माता
दोन्ह केकसी शाहि कानषी । है रुबेर तुम-शत विशेषी
विभव कुबेर दीख जवरायन. । दाह अनस उपजीतनतावन
फह ही मोहूं बरदाना । नप बल विभव कुबेरसमाना
काहि बस चलासहित दोभाई । निकट गोकरानाभ केजाई
कीन्ह तपस्या तीवौं भ्राता । कथा समस्तजगविख्याता
लहि वरदानयरिजय भावा । पचन सुभाती ताहि सुनावा
है यह लङ्का पुरी हमारी । दीन्ह देवतन हमैं निकारी
लेग कुवेर सों बेगि छोड़ाई । करी तात सोइयान उपाई
दो। विहसि कहा रावण तब, है कुखेर मम भ्रात।
उचित मोहिं तासांनहीं, करव धेरै उतपात ।
सो०। कह कश्यप के वंश, सुरौअसुरज वादिसब।
वैरभाव को इंश, एक एक को मारहीं.
वगरि सुमाती तक बढ़ाई । कहा विनपकार लेडं वड़ाई

دامت روان و
अडुनरामायरा
लेइकटक रावराण तह धावा । पुनि पाछे ते दूत पठाया
जायें कहा रावराण प्रभुताई । देश लंक की लेह लड़ाई
तपः कुबेर मनकीन्ह बिचारा । है यह माल सु भात हमारा
गहलङ्का तव त्यागनकीन्हा । जाकैलास बास तह लीन्हा
पुनि रावरा पित्याज्ञामानी । कीन्ह जाय लङ्का रजधानी
'खाएमपिनऋषिबागंजारा । सहि हित रामसमरतेहिमारा
सुनौ चरित उभव माहिराव । जन्यो केकसि यकसंगरावरम
भयोबली श्रतिकहिनाहिजाई । क्षणाक्षराबकड़वमानन समाई
होली खेलतरखेल बालपन, रविशशि गेंद समान।
लापत थैचेगगनते, सुरपति रहतसकान :
सोला रेसो भटबलवान, दीन्ह हिलाई गगनको ।
बुर गहें तहाँ परान, भये विकल सब देवता ॥
बॉधि सुरन रजु त्रास दिखाये। पकड़ि पाँचधुनिमहिधसिलाय
श्रावा इन्द्रलोक इफवारा । सब देवन को जायनिकारा
इन्द्रासन पर बैव्यो जाई । राक्षस दैत्य युलाय बसाई
भिवेदेव सब निपटनिरासा । गिरिकन्दरमहॅलीन्हनियासा
कहति सियामृयुबचनवहोरी । बैठि सभासन्मुखऋविचोरी
का पुरा दश शीशकरावन ।.पध्यो राम लाग्योयशगावन
सन्नस शीशकोह महिरावन । सुरदेषीऋषिमनुन सतावन
साको मधन करै जो कोई । पावन सुयश युगनयुगहोई
सुनीराम गसिप खबानी ।. गये सहमि मनभईगलानी
दोला भये सरुष श्रीराम तब, कहो सुमन्नबोलाय।
करु इकौरी अवध दल हय गयसाजबनाय॥

अडुन रामायरंग
از زمین ۵۰
सो । पटवालक संदेश, श्रावविभीवरा सेन युत
चलै संग श्ववधेश, रिपुदल जीतनके लिये ॥
पटवा पम्पापुर यक धावन । चमू साहेत सुग्रीवहिलावता
तङ्कापति सुग्रीव कपीशा । बाय राम पद नाये शीशा
पाय रजाय सुबाशा कारी । निज निजदलासबसाज सैयारी
पहिरि मिलमिलीधारशिरसोरा। सुभटनके मनति मोदा
बौध्रि धनुष तोमर किरपाना । गदा गुर्ज मुद्गर परि पाना
नाय माय टाढे प्रभु नागे । निरखिसुमट प्रभु मनश्चनुरने
चिड़े विमान जानकी नाथा । लैदलकपिनिशिचरसिपसाबा
करिपयान श्रीपतिरघुराई । पहंचे देश शत्रुके जाई
परिजनहिं महिरावापाई । कीन्हबाहिनी अवयचढ़ाई
दो। लागकथन मनहीं मन, फा बापुरा पुमान।
करै जोसन्मुख मोरे, समर भूमि कल्यान॥
सो। कह विधि एकै बार, भे प्रसन्न निश्चर सवै।
घर पैठे वाहार बिन अमदीन्हो लायकै ।
कहा बहोरि तर्क उपराजी। कीशभालु मानुषहमखाजी
नहिं कछु मोहिंअवश्यहताना ! चहिय सहायकधनु रवाना
अस कहिसन्मुख राकेचाया । पवनवागतह सपदिचलावा
गयोकटक जहं तहसयामाही । जिमि भारात संगमेघउहाही
भूपविभीषण सहित सहाई । गिलो तुरत लंका परजाई
कटर भालु कपिरसातउड़ाई । गिरपम्पापुरमनहिलजाई
ध्याजिनीववववधपुरगया । सबलसुभट मनहीं मनकाज
जोरा समिकरोत लडाई । लड़तेहाबलाहि दिवाई

او توان نه
..
.५२
अड्डनरामायण
मरते ताहि कृपा उपाटी । लेते शिर कराटककर काटी
हो। करत प्रहार नपलभर, यह धोखे का तीर ।
तौर ताहि बनकर, लेते जग यशवीर ॥
सो। कीन्ह जोछल सोंघात नीति रीति सों दूर है।
है अनीति कीवात , दै धोखालडिवो समर ॥
लव्योराम जय शत्रुकुचाली । भयोक्रोधचा भई लाली
दिनहरजाय अवध कटकाई । चलें लड़ें फिरि साज बनाई
सिनसहित पुनिनपतिविभीवन। बाये अवधपाय पर सीखन
तेदन कपि सुग्रीव फपिन्दा । ठे अवध जहरफुलचन्दा
नामवन्त निज सेन बटोरी । श्रायरामसन्मुख कर जोरी
करिस्चिार बहरिजरघुराई । चार अनी कटकार बनाई
हरपलभरपहिकीन्हशत्रुहरा । वनीपतिनपरभेपुनिलक्ष्मण
बानै विघुल निशान गुमाल । मुनिसुभटनमन उपजतचाज
चलाकटक जैसे जल धारा । उतरा जायसिन्धुके पारा
हो। कहत भूरमा परसपर, लड़िये शव दिलखोला
करिये चोट शत्रुपर, चॉ दिशितेकरिटोत॥
सो। धरिय संभरिकै पाक, हिलन हिलायेफोरिविधि।
सेलियपचिके दांव, समरभूमिवक्ष शत्रुते
महिरावणाकरि क्रोध श्रपारा । पुनिरासन्मुख तीर पवारा
लागतझरक तीर कटकाई । कोसौं उड़े नधूरि दिरपाई
गिनिजभवनकपीशविभीषन । अवधभरपलक्ष्मरणशवहन
जामवन्त नल नील समेता । गे उड़ायसव अपननिकेता
समरभूमिकोडरहाना गया । अतिशय रोषरामउरवाड़ा
मापवरदेनेवाला ।
३

نوعیت را این or
अडत रामाया
करिबधन अवशिमैयोही । बहुतवा भरलीसुरद्रोही
पहरि राम की याय रजाई । श्राशरदुरि कटक समुदाई
यापहुँचे महिरावण देशू । बाँधि कोट राकीन्ह प्रवेन्यू
होनहार नाहि मिटै मिटाये। फविकोयिद निगमागम ग्रायें
दो। जबै राममनकोपकरि खैचोविशिवस्वास।
कॉपे दिग्गजनहीधर, क्षिति पताल शाकास।
सो.। भयो कोलाहल धोर, घर परफॉपतिसधिसका
सुनिमहिरावण शोर निजवलसीन्हहकारितक,
दोन्ह रजायसुसुभट योलाई । चलो बेगिस्ता करी लड़ाई
मज भालु रजनीचर बन्दर । भाये पहिश्वशंकपुर चन्द्र
श्रदनकोड रता रहबभुरवारी । मनुनभातुफपिखालि हमारी
वावधरौ महिभारिपछारो । भूलगदानासशिरपर वारे
अट्टहास करि सेन चलाया । बाप राम के सन्मुख चापा
अवधलक्षः दलोज्यका साया । सहित विसीवानसिपनाया
कीशभालु दल दाहिन पाये । चतरपुसम्मुख फदम उठाये
गेकापिभालु चसुर दल पेली । का दावन दे, हफेली
सुभटतमीचर पुनि उठिधावै । कोशयली माहिसारि गिराव
दो०। तब सकोपि महिरावण, शालेसि तीर समीर ।
चले उड़ाई जीयलै, हय गय दल सद थोर ॥
सोगे उडि निज निजधान, हनूमानसियासतान।
रहानकोउ संग्राम , सतज छोडिनो बहतररा॥
चलातमकि कै मुनिमहिरावन । हगजिनिशोगितरुपभयावन:
का कहिये तेहिरय किबड़ाई । अनि उतङ्ग रविचन्द्र छिपाई
।

. او چت رامان
अडत रामायण
तवमारुतसुत कीन्ह उपाई । रयतेविगुणितचरावढ़ाई
दीरष रूप धरयो हनुमाना। अध्यबाहकरलीन्ह विमाना
तामर राजतः श्री रघुराई । लीन्ह पुष्य समशीशउठाई
तवरघुनाथ बनल शरमारा । शत्रु कटकसब भाजरिधारा
बराक्षस लै जीय एराने । बजत भाणिगिरिखोहसमाने
बजतकराड मुराड बिनुलो। लापर काफ गीध की चो
दिखिदशारिनुभयो मलीना । तीर कमान क्रोधकरिलीना
दो। भारतीर संभारिची, लैचि अचालगितान। :
स्वाय परा छातीउपर , भे मच्छित भगवान !
।ৈ না জুষ্ট্রিক্ষ্মী মালাখাল
पुष्पक पर विश्वास करतभयेरचुकुलतिलक।
हर्ष विषाद नासिय उरानी । बैठौ मौन साधि महरानी
तनस नहीं मुखसाहिं उदासी । धादिशक्तिनिर्गुशिशुरखरासी
ऋषिमुनि सुरसवशोरमचाया। कह दुख बेझ नउठे उटावा
दुषित देखिसुर मुनि समुदाई । हंसी उठाय सिया हरवाई
लीन्हरूपरिसियमहकाली । इरादेव मम दीन दयाली
परीशिरोध शिरन की माला । सुमाचारिबलश्चतुल विशाला
घरमा उतन: झपट प्रलयासी । जीह अरुमुखबाहिर निकासी
पारा शूलकिरपात कपाता। शोभितफरशिरकेशकराला
भौह मह. यापन सुरङ्गी । पलकचक्राचितयनतिरभङ्गी
दो कियउत्पाहि चालें, शक्ती अमित कराल । :
रूसभयंकर देखि के, कॉप्यो स्वर्ग पताल ... ...
सो. कोजकवि सकेनगाथ, रूपश्याम जगदम्बको।
६.
,

ویت نان بره
५४..
वडतरामायण
अद्धतकलादिस्याय कीन्हचरितपावननिमल
धादिज्योतिभगयति महमाई । तासुचरितमुनिये मनलाई
कीन्नकटकरियुकेपयमारा । लागीमर्दन अस्ववारा
मारिखनरिपुदलसवकाटा । परैनधरशिरुधिर सवचाटा
शत्रुबाहिनी करि संहारा । पुनिसकोपिमहिरावसामारा
लाखिकौतुकनभसुरचनुरागे । बर्विसुमन यशगावन लागे
करिश्चस्तुतियोले मृदुबानी । अब निजरूपपलदुमहरानी
जवैसुरन बनविनयसुनाई । धयोरुपनिज सिय हर्याई
मईलुप्त शक्ती समा माहीं । सियारूपलखिसुर हर्षाहीं
जयजयकहि मृदुवचन उचारे । सुर हित तुमसुररिपुरगामारे
हो। कीन्ही कृपासुनपर, दारण शोकामिटाय।
करियप्रशंसा कौनय गति चरणी महिनाया
सोल। अनपरस्पोनिन हाथ, सन्मुख सबके राम उर।
गइ मुर्छासिय नाथ, हैं उठबैठ विमान ते ।
शिव बिरचिसनकादिमुनीशा । श्रायरामागिदीन्हअशीशा
तबकमलनसवकथावखानी । जेहिबिधिकीन्हबिजयमहरानी
विहंमिजानकीकहसुस्त्रोरी । हैविचित्रजुतगतिमोरी

اربن ، اماره
अड्डन रामायण
जोन प्रकट फरतीप्रभुताई । तौ किमिजनत्योमममनुसाई
कोटिौति सुरयत्न लगावै । तबहूंमोर मर्म नहिं पार्दै
होयें गगन जो ताखोभानू । मोरे सन्मुख रेणु समानू
असकहिचमकाविचित्र दिखाई। बहरिदमकिनभमाहिसमाई
तवरघुनाथ जोरियुगहाथा । करि दाडवतनयायोमाथा
विविधांतिवनुमोदनकीन्हा । पुनिसियरूपसियाधरितीन्हा
दो। हाथ जोरि शिरनायक, विदा देवता मागि
चले प्रशंसा करत मन, उमैगिउमगिअनुरागि
सो.। गेसुर निज निज धाम,दै अशीशचन्तरहियो
वायथपथ श्रीराम, सहित जानकीपवनसुत५
बैठि सिंहासन सिय रघुराई । देवनसुमनवष्टि झारेलाई
जय नयनयधुनि त्रिभुवनछाई । कीन्हसुरनपुनिश्चतुनिचाई
बोलेबालमीकि तपधारी । भरहाज सुनु विनयहमारी
कथानखिल मैं तुमसोंगाई । हरिगतिबद्धतकहिनसिराई
भगवत चरित अनन्तनपारा । कहि कविकोविद पावनपारा
भरहाजमुनिमुनि वर यानी । भक्ति विवेक प्रेमरससानी
गालमीकि सन्मुख करजोरी । कह का करौं प्रशंसा तोरी
सुनिहरिकपाश्चमीरसबोरी । भई वपित तिरियासबमोरी
पुस्तफि शरीर हर्ष उरलाई । गेनिजभवन मुनिहिशिनाई
हो। करिश्रस्तुतिसबदेवगा गमने निजनियामा
राजत राज सिंहासन, सहित जानकीराम ॥
सोनतालमनीकरजोरि करतविनयकरुणायतन ।
कतरसाचमनोरियाहि त्राहिारविहरत ।

وجبت رائن
' अडत रामायण
भत्त्यनुसार तुरुत रूविज्ञानी गाबादहरि करेंबरवानी
भक्ति सोयह स्कीम्बहिनाही। सत्यकहौसिखिकागदमाहीं
जोगुराचानक मोहिं कोई । नहिं जानत अनजानतसोई
गुसानरहितसबकविकृतिमोरी। कायरगर्व करौं मति भोरी
भाषांसगित एकनहिं मोरेः । छन्द प्रबन्ध न जानौ भोरें
उर्दू प्रति से भाषा गाई । जानि सनेह राम सुरपदाई
केपलयहिमह नाम धारा । यह रै भवसिन्धु चपारा
हरिभक्त जो कहैं सुनाई । उनै सोसुजन श्रवणाचितलाई
तिन सबसोयाबिनय हमारी होइ चूक तो लेउ सुधारी
दो। लालमनी सतर्कतान, सजिले सीताराम ।
... करिहैं पूर मनोरचहि, निशिदिन बाठौंयाप।
सो०। छोड़ि कपट मन मोहा कामक्रोधिसे दूर रहा।
। कराइनसबसोद्रोह लालमनीस्थिराम भनु ।
दो। जिमिविषयीरुचिकामिनी तिमिजोहरिपदोया
जायचलोसुंरधानको, मगनहिरोकै कोय ॥
इतिश्रीश्वद्धतरामायणं लालमणि विरचितं-
समाशसू ॥

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Shree Achyut Ramayana

Author
Lala, Lalmani
Title
Shree Achyut Ramayana
File name
Shree Achyut Ramayana
Text
OCR done
Citation
1914
Published
2009/09
Publisher
Lakhanow, Munshi Naval Kishor Press
Language
Sanskrit
Pages
56
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Ramayan
DLI number
345582
Barcode
99999990233916.00
Scanning centre
Banasthali University
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