Bharti Bhawan Liabrary, Allahabad
The Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana
Front matter
arrum
90
THE JAIMINIYA OR TALAVAKARA
UPANISHAD BRAHMANA.
DEVANAGARI TEXT WITH INDEXES.
PREPARED FROM THE EDITION, IN ROMAN SCRIPT
OF
SHRI HANNS OERTEL PH. D.
BY
PANDIT RAMA DEVA, B. A.
WITE
AN INTRODUCTION ON THE HISTORY OF SAMALEDA LITERATURE.
BY
BHAGAVAD BATTA.
FEBRUARY 1921
FIRST EDITION,
Price
1,000 Copies.
R: 31/
SL 6-Shillings
प्रोम
दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत ग्रन्थमाला।।
अनेक विद्वानों की सहायता से ।
संस्कृताध्यापक वा अध्यक्ष अनुसन्धान विभाग
दयानन्द महाविद्यालय, लाहौर द्वारा
सम्पादित ।
ग्रन्थाङ्क ३।
AAMSA
श्रीमद्दयानन्द महाविद्यालय संस्कृतग्रन्थमाला सं०३
353333333333333333333333
ओ३म्
जैमिनीय उपनिषद्ब्राह्मणम्
अथवा
तलवकार-उपनिषद्राह्मणम्।
पं० रामदेव बी० ए०
द्वारा
श्रीमान् हन्नस अर्टेल, पी० एच० डी०
महाशयस्य
रोमनलिपि-संस्करणात् देवनागर्याम् लिपिकृतम् ।
भगवद्दत्त
संस्कृताध्यापक दयानन्दकालेज, लाहौर,
लिखितं
भूमिका-सहितम् ।
प्रार्य सम्वत् १६६०८५३०२०।
विक्रम सं० १६७७॥
सन् १९२१ ई० ।
दयानन्दान्द३८।
प्रथमावृत्ति १००० प्रति
मूल्य २०
三、会长、会长会会长会影各家医是众餐公益
पं.भैरवप्रसाद के प्रबन्धसे विद्याप्रकाश प्रैस चङ्गाड़महल्लालाहौर में छपा।
Booksellero
Billig Willig NWU
Printed by Bhairo Prasada,
MANAGER, VIDYA PRAKASHA PRESS. LAHORE.
: ANO PUBLISHED BY
THE RESEARCH DEPARTMENT. D. A. Y. COLLEGE. LAHORE.
mamanMBAVOMOMANOMA AnamamanMPARAS
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Lal Road, Lahore.
॥ प्रोम् ॥
भूमिका।
सामवेदीय वाङ्मय का इतिहास ।
परमात्मा से सावेद का प्रादुर्भाव ।
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ।।
ऋ० १०६० सायजुः ३१७॥ ते० प्रा० ३१शक्षा
उस व्यापक सर्वपूज्य परब्रह्म से ऋग्वेद, सामवेद प्रादुर्भूत होते
हैं। अथर्ववेद प्रसिद्ध होता है उस से, यजुर्वेद उस से प्रकट हुमा ।
(पूर्वपक्ष) 'ऋचः' श्रादि पद बहुवचनान्त हैं, अतः इनका
अर्थ ऋग्वेद आदि कैसे हुग्रा? इनका अर्थ तो यही है कि ऋचाएं,
साममन्त्र और
छन्द उत्पन्न हुए।
(उत्तरपच ) यह सत्य है, कि 'ऋचः, सामानि, और
'छन्दांसि' पद बहुवचनान्त हैं, पर साथ ही 'यजुः पद एकवचन में
भी है । यदि तुम्हारी बात मानी जावे तो 'यजुः' पद से तुम क्या
अभिप्राय लोगे?
(पूर्वपक्ष) 'यजुः पद यहां जात्यर्थ में एकवचन होता
हुआ भी यजुर्मन्त्रों का बोधक है, यजुर्वेद का नहीं।
(उत्तरपक्ष) यह बात यहां न घटेगीक्योंकि'छन्दांसि पद पर
पूर्ण विचार किसी और परिणाम पर ले जाता है। देखो !'छन्दांसि
पद यहां किन्हीं मन्त्र-विशेषों का बोधक नहीं है। दयान्द सरस्वती
(२) ने इसी पर विचार करते हुए लिखा है-'वेदानां गायत्र्यादिच्छन्दो ऽन्वितत्वात्युमश्छन्दाँसीतिपदं चतुर्थस्याथर्ववेदस्योत्पत्तिं शापयती- त्यवधेयम् । (१० भाष्यभू वेदोत्पत्तिवि०) अर्थात् 'वेदों में सब मन्त्र गायत्र्यादि छन्दों से युक्त ही हैं, फिर (छन्दांसि ) इस पद के कहने से चौथा जो अथर्ववेद है उस की उत्पत्ति का प्रकाश होता है।' अन्यथा 'छन्दांसि' का यहां कोई प्रयोजन नहीं। इस अर्थ में अन्य प्रमाण भी देखो। (१) "ऋचाम. यजुषां.... सानामू... अथर्वणां.. .गायत्रं च्छन्दः। त्रैष्टुभं छन्दः। ..जागतं च्छन्दः। .सर्वाणि छन्दांसि।" गो० प्रा० १११॥२६॥ वैदिक विचार में यह सुप्रसिद्ध है कि ऋग्वेद गायत्री छन्द सम्बन्धी है [यद्यपि यह अनुसन्धेय है कि ऋग्वेद में गायत्री(२०५०) की अपेक्षा त्रिष्टुए (४२५३) क्यों अधिक है ? ] यजुर्वेद त्रिष्टुप् छन्द सम्बन्धी और सामवेद जगती छन्द सम्बन्धी है। अब रहा अथर्ववेद, सो वह पूर्वोक्त गोपथब्राह्मण के प्रमाणानुसार सर्व-छन्द-सम्बन्धी उसका किसी एक छन्द से सम्बन्ध-विशेष नहीं। यही कारण है कि उपस्थित मन्त्र में 'छन्दांसि' पद से अथर्ववेद का ग्रहण होता है। (२) प्रस्तुत मन्त्र-सम्बन्धी एक अन्य बात भी ध्यान देने योग्य है। अथर्ववेद में यह मन्त्र निन्नलिखित प्रकार से आया है- तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत । अथर्व० १६६।१३॥
( ३ ) यहां छन्दांसि' के स्थान में 'छन्दो ह' पाठ है। इस प्रकार पाठ में भेद कर देने से परमात्मा ने मन्त्रों द्वारा ही अन्य मन्त्रों का व्याख्यान कर दिया है । यह मन्त्र उन्नीसवें काण्ड का है, और यद्यपि पञ्चपटलिका की भूमिका में लिखे अनुसार हम अभी तक इस काण्ड के सिंहितान्तर्गत होने के विषय में कुछ नहीं कह सकते, फिर भी यह तो सब को स्वीकार करना पड़ेगा कि बहुवचनान्त 'छन्दांसि पद का अर्थ एकवचन 'छन्द' अर्थात ( पूर्व प्रमाणों की दृष्टि से) अथर्ववेद ही है । रहा क्रियापद 'जशिरें । सो वह व्यत्यय ही समझना चाहिये; यद्यपि ऐसे व्यत्ययों के उदाहरण सम्प्राप्त वैदिक ग्रन्थों में अत्यल्प मिले हैं पूर्वोद्धृत अथर्ववेद के मन्त्रों से निश्चय होता है कि 'छन्दांसि' आदि पदों का अर्थ एक वचन में ही है। ऐसी अवस्था में यजुः यजुः मन्त्रों का जाति-वाचक न रहेगा। इस विषय में अन्य प्रमाण देखो- -- (३) यस्मादृचो अपातक्षन यजुर्यस्मादपाक्षन् । सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेवसः॥ अथर्व १०७॥२०॥ इस प्रमाण में यजुः पद एक वचन में है, और अथर्वाङ्गिरस स्पष्ट ही ब्रह्मवेद का द्योतक है । अतएव 'ऋचः' और 'सामानि' पदों का प्रर्य भी ऋग्वेद और सामवेद ही होना चाहिये। विचारान्तर्गत "तस्माद्यज्ञात्" ऋ० १०EOIE मन्त्र की व्याख्या में सत्यव्रत सामाश्रमी त्रयीपरिचय तथा निरुक्तालोचन में लिखते हैं कि 'सामवेद छन्द और गान दो भागों वाला है । सो बन्द भाग का ग्रहण छन्दांसि पद से और गान भाग का अहए सामानि पद से करना चाहिये।' इसका कुछ खण्डन तो हरिप्रसाद । जी ने वेदसर्वस्व के उपोद्धात पृ०१५ पर किया है । यद्यपि हम उनके विचार-क्रम से सहमत नहीं, तथापि उन के इस परिणाम के कि गान भाग तो मूलसंहिता का गेय-रूपान्तर ही है, अनुकूल सम्मति रखते हैं। इस गान भाग के लिये कहीं अन्यत्र मन्त्रों में सामानि' धा 'साम' पद प्रयुक्त हुआ होता तो सत्यव्रत जी का पच कुछ ठहर सकता; पर ऐसा है नहीं, अतः उनकापच निराधार होने से सम्मान योग्य नहीं। सत्यव्रत जी के पक्ष को एक बात कुछ आश्रय दे सकती है, यद्यपि यह उन्हों ने स्वयं नहीं लिखी। अथर्ववेदीय पिप्पलाद शाखा में 'सामानि यस्य लोमानि' के स्थान में 'छन्दांसि यस्य लोमानि' पाठ आया है। ऐसी दशा में सत्यव्रत कह सकता था कि 'छन्दांसि पद 'सामानि का पर्यायवाची है, और सामवेद के छन्द भाग का द्योतक है । यह बात भी सत्य नहीं ठहरती क्योंकि सामानि' प्रादि पद जैसा आगे चल कर और भी विदित हो जायगा सामवेद पाचक हैं। वैसा कोई छन्द वेद हैं नहीं, और 'छन्द' पद अथर्ववेद बाची सिद्ध हो चुका है, अतः पिप्पलाद का पाठ जब तक कि उस शाखा के अन्य लिखित ग्रन्थ न मिल (जो कि बहुत कम सम्भव है) अशुद्ध ही कहा जायगा। विदेशीय (पारसीक) भाषा में छन्द का अर्थ । भाषा-विज्ञानी जानते हैं कि छन्द शब्द ही पारसीक भाषा में ज़न्द बना है। यही ज़न्द पारसीकों का धर्मग्रन्थ है। इस में अथर्वन पुरोहिते का नाम भी कई बार आया है। हाग के मता- नुसार तो इस में पाया हुआ एक मन्त्र भी अथर्ववेद का प्रथम मन्त्र है। इस प्रकार प्रतीत होता है कि ज़न्द का अथर्ववेद से सम्बन्ध- विशेष है, अतएव छन्द शब्द का अर्थी पूर्वोक्त मन्त्र में अथर्ववेद ही युक्तियुक्त है। ऐसी दशा में 'सामानि' आदि पद भी सामवेद प्रादि के वाचक हैं।
३ ब्राह्मणअन्धों में सामानि पद का अर्थ । (१) सामवेद आदित्यातू (ऐ० २५७) (२) प्रादित्यात्सामानि (कौशी ६.१०) (३) सूर्यात सामवेदः (श० १११५८) (४) सामान्यादित्यात् (छा० उ० ४।१७।२) (५) सामवेद आदित्यातू (जै० उ० ब्रा० ३.१५॥७) (६) सामवेदोऽमुष्मात् (षड्विं० ४।१) (७) श्रादित्यातू सामवेदम् (गो. ६) इन सात प्रमाणों में से दूसरे और चौथे प्रमाण में 'सामानि' पद पाया है, अन्य पाँच प्रमाणों में सामवेद । ये ब्राह्मणवाक्य एक प्रकार से पूर्वोर वेद मन्त्रों की व्याख्या में ही कहे गये हैं। इन में अधिकांश स्थलोले लामवेद का प्रयोग बता रहा है कि प्राचीन ब्रह्मादि ऋषियों की दृष्टि में भी इन स्थलों में 'सामानि' पद से सामवेद का ही अभिप्राय होता था। अतएव तस्माद्यज्ञातू" मन्त्र का इस लेख के प्रारम्भ में किया हुआ अर्थ ही सत्य है,और दूसरा नहीं। इस मन्त्र का यही अर्थ ऋषि दयानन्द सरस्वती ने अपने अनेक ग्रन्थों में किया है। हम ने लो उसी का उद्धरणमात्र दिया है। इस कल्पार भ में सामवेद सब से प्रथम किस को प्राप्त हुआ पूर्व लेख से यह स्पष्ट होगया होगा कि सामवेदादि वेद उसी यह स्कम्भ-परब्रह्म से प्राप्त हुए । यहां यह विवाद नहीं उठाया जायमा कि वेद-शान क्यों परमात्मा का है ? इसे किसी अन्य अवसर पर लूंगा। यहां अब यही निर्णय करना है कि इस कल्पा- रम्भ में सामवेद किसी एक व्यक्ति को परमात्मा से प्राप्त हुमाया अनेकों को। ?
अनेकों को प्राप्त हुआ, ऐसा मानने वाले बहुत थोड़े हैं । उन के पक्ष में कोई प्रमाण भी नहीं है । जो यह मानते हैं कि सामवेद किसी एक व्यक्ति को परमात्मा से प्राप्त हुश्रा, वे दो भागों में विभक्त हो जाते हैं। एक भाग वालों का मत है कि सामवेद अग्नि के अधिष्ठाता देव को प्राप्त हुआ। उसी से मन्त्र-द्रष्टा ऋषियों को प्राप्त हुआ। दूसरे भाग वालों का मत है कि मनुष्य-देह-धारी अग्नि ऋषि को प्राप्त हुआ जो इस कल्पारम्भ में अमैथुनि सृष्टि का एक सभासद था। इस पर विचार- (१) अग्नि आदि द्रव्यों का कोई चेतन जीव अधिष्ठाता है अर्थात् इनको स्व-शरीरवत् बनाये है, ऐसा वेद में कहीं नहीं प्राया। हां, अग्नि ईश्वरदेव का नाम तो सर्वत्र प्रसिद्ध है। इस का विशेष व्याख्यान भगवान् दयानन्द सरस्वती की ऋग्वेदादिभाष्य- भूमिका में मिल सकता है । इसी पक्ष के खण्डन में 'जड़ाग्नि से ऋग्वेद का प्रकाश हुआ' इस का खण्डन हो जाता है । कारण कि जड़ को शान होना असम्भव है। । (२) दूसरे मत में भी एक भारी आपत्ति प्राति है। पूर्वोक्त ब्राह्मणग्रन्थों के सात प्रमाणों में सूर्यात-आदित्यातू = अमुष्मात् पद पाये हैं । इस पर- (पूर्वपक्ष) यदि सूर्यादि मनुष्य देहधारियों के नाम होते तो उन के पर्याय प्रादित्य आदि और 'वायु' का पर्याय “योऽयं पवते" शत० ११।५।८।२न पाते । ब्राह्मणग्रन्थो में "अमुष्मात्” प्रयोग स्पष्ट इसी सूर्य के लिये पाया है। और वायु यदि कोई मानव समाज का सदस्य था तो क्या वह “योऽयं पवते” अर्थात् जो यह बहता है" ऐसा ही था ? क्या मनुष्य भी पवन समान बहते हैं? ।
(७) (उत्तर पक्ष) प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के न जानने का ही कारण है कि ऐसे पूर्वपत खड़े होते हैं । देखो महाभारत को- (क) वहां कर्ण के समीप उस के पिता सूर्य का पानालिखा है । यह सूर्य कोई देवता न था, प्रत्युत मनुष्य देहधारी व्यक्ति ही था। उस के निम्नलिखित नाम महाभारत वनपर्व अध्याय ३०१ में आये हैं। अभिप्रायमथो ज्ञात्वा महेन्द्रस्य विभावसुः । कुण्डलार्थे महाराज सूर्यः कर्णमुपागतः ॥६॥ स्वमान्ते निशि राजेन्द्र दर्शयामास रश्यिवान् । कृपया परयाऽऽविष्टः पुत्रस्नेहाच भारत ॥८॥ ब्राह्मणो वेदविद्भूत्वा सूर्यो योगद्धिरूपवान् ॥६॥ अंहं तात सहस्रांशुः सौहृदात्वां निर्दशये ॥२२॥ इस का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि योगसिद्धि-समन्वित सूर्य महात्मा ब्राह्मण वेष में रात्रि के अन्तिम प्रहर में कर्ण के जागने पर उसके समीप आया। उस सूर्य के यहां कई नाम पाये हैं जो सूर्य शब्द के पर्याय हैं,यथाविभावसु-रश्मिवान सहस्रांशु। अब रामायण पर किञ्चित ध्यान दो- (ख) वाल्मीकिरामायण में वानर जाति का सुविख्यात वर्णन है । वहां भी मुनि वाल्मीकि वानर शब्द के अनेक पर्याय उस जाति के लिये प्रयोग में लाते हैं। ध्यान रहे कि मिथ्या-कथा युक्त विवरण को छोड़ कर वानर जाति मानवेतर जाति सिद्ध नहीं हो सकती । और सत्य तो यह है कि (क) और (ख) स्थलों में सूर्य और वानर के क्रमशः पर्याय-प्रयोग को देख कर ही मध्यम कालीन लोगों ने इन्हें देवता वा पशु मान लिया था । अन्त में ब्राह्मण ग्रन्थों के वाक्य-प्रयोग पर भी ध्यान देना चाहिये- ।
, (८) (ग) सैत्तिरीयब्राह्मण ३२१शप में नचिकेता की कथा आई है। वहां उस का जिस ऋषि से प्रश्नोत्तर हुआ, उस का नाम मृत्यु ही कहा है । कठोपनिषद् में भी यही कथा बड़े विस्तार से आई है। वहां भूख ऐतिहासिक कथा के साथ २ कुछ अलङ्कार भाग मिश्रित करके औपनिषद-भाव अधिक खोला गया है। पर सब से अधिक विचारणीय यह है कि यहां मृत्यु ऋषि के कई दूसरे भी नाम दिये गये हैं। ये सब नाम मृत्यु शब्द के पाययवाची हैं यथा “यम श५ अन्तक शर"। (घ) वेद के ऋषियों के तो कई ऐसे नाम सर्वानुक्रमणी में प्राये हैं जैसे “अग्निः पावकः” १० १०१४०॥ अग्निस्तपसः ऋ० १०।१४१॥ यहां विशेष्य विशेषण भाव से ये समानार्थक शब्द प्रयुक्त हुए हैं । इन पूर्वोक्त प्रमाणों से यही निश्चित होता है कि बहुत प्राचीन काल में व्यक्ति विशेषों के नामों के यदि कोई पर्याय हों तो वे भी उसी के नाम के लिये प्रयुक्त हो जाते थे । और जैसे महाभारत में 'सूर्य' को 'रश्मिवालू' आदि कहा है वैसे ही शतपथ प्राह्मण में 'वायु' को 'योऽयं पवते' कह दिया गया है । अतएव प्राह्मण आदि अन्यों के पूर्वोक्त सात प्रमाणों में "आदित्य” मनुष्य देहधारी ऋषिदेव है, कोई जड़ वा जड़ सूर्य का अधिष्ठाता देव नहीं । इसी आदित्य-सूर्य-रवि के मन में इस कल्पारम्भ के समय सब से पहले परमात्मा ने सामवेद का प्रकाश किया । उसी ने ब्रह्मा आदि को पढ़ाया और फिर यह वेद सर्वत्र फैलता गया । षड्विंशब्राह्मण में जो "अमुष्मात्" प्रयोग आया है उस का यही अभिप्राय है कि मनुष्य शरीर में शिर स्थान आदित्य वा सूर्य सम्बन्धी है। सूर्य ऋषि को समाधिस्थ दशा में शिर की नाड़ियों में मन के जाने से इस वेद का ज्ञान होता था, अतः यह प्रयोग या गया है।
सामवेद की शाखाएं। आर्यावर्त में सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर दीध कालपर्यन्त लौकिक और वैदिक भाषा का बहुत प्रचार रहा। उस समय वेदादि शास्त्र आज कल की अपेक्षा अल्पपरिश्रम से ही समझे जाते थे। तब प्रव- चनकर्ता प्राचार्य वा ऋषि अपने शिष्यों के सामार्थ कठिन वैदिक शब्दों के स्थान में अन्य सरल वैदिक शब्द प्रयुक्त करके अथवा कुछ २ व्याख्या करके पढ़ाया करते थे ! उतने से ही शिष्य यथार्थ अभिप्राय समझ लेते थे। तब किन्हीं विस्तृतभाष्यों की आवश्यकता न थी। यही ऋषि-प्रवचन था जो पीछे शाखा आदि नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रवचन के सम्बन्ध में भाष्यकार पतञ्जलि मुनि ने लिखा है- न हि च्छन्दांसि क्रियन्ते । निसानि छन्दांसीति । यद्यप्यर्थो नियो या त्वसौ वर्णानुपूर्वी सानिया । तद्भेदाच्चैतद्भवति काठकं कालापकं मौदकं पैप्पलादमिति । "४॥३॥१०॥ अर्थात् वेद तो क्या, साधारण ग्रन्थों के समान शाखाएं भी बनाई नहीं गई । इनका शब्दार्थ निस्ल है। हां,अर्थ के नित्य होते हुए भी वर्णानुपूर्वी अनित्य है । इसी के भेद से ऋषियों ने नित्य वेदार्थ खोला है । और इसी भेद से काठक आदि अनेक शाखाएं हुई हैं। (प्रश्न ) मूल सामवेद जिस की आगे शाखाएं बनीं अब कहाँ है ? उस में ऋग्वेदीय ऋचाएं न होनी चाहिये। अब तो जितने अन्य सामवेद के नाम से मिलते हैं उन सब में ऋग् भाग सम्मिलित है। ( उत्तर ) मूल सामवेद था तो अवश्य क्योंकि विना इस के साम-शाखाएं बनती कैसे, और प्रवचन किल का होता ? उसी का वर्णन ऋग्वेदादि वेदों और ऐतरेय अादि ब्राह्मणों में प्राया है। वह मूल भी प्रतीत होता है, प्रवचन के बल से पीछे ऋषि-विशेष के नाम से प्रसिद्ध हो गया। ऋग्वेदीय ऋचाएं सामवेद में न ।
ampiomma (१७) और न हैं । हम यह कह सकते हैं कि ऋग्वेद और सामवेद के अनेक मन्त्र सहश हैं । उन्हीं मन्त्रों का पारिभाषिक नाम 'ऋक्' भी है। कर्ता परमात्मा ने प्रयोजन-विशेष के लिए ये समान मन्त्र दो वेदों में रक्खे हैं । मिथ्या इतिहास-प्रचारक जो लेखक हमारे इस कथन को नहीं मानते उन्हें हम ऋग्वेद का एक मन्त्र बताते हैं- गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम् । वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाक्षरेण मिमते सप्त वाणीः ।। ऋ०१।१६४।२४॥ सुप्रसिद्धएकसौ चौसठवें सूक्त का यह चौबीसवां मन्त्र है। उन पूर्वपक्षी लेखकों के मतानुसार प्रथम मण्डलीय होने से यद्यपि यह मन्त्र अत्यन्त पुराना नहीं, तथापि बहुत नया भी नहीं है । इस मन्त्र में भी स्पष्ट ही साम में ऋचाओं का होना जताया गया है। अर्थ इस का अतीव सरल है । पूर्व लिखा जा चुका है कि ऋग्वेद गायत्री छन्द प्रधान और यजुर्वेद त्रिष्टुप् छन्द प्रधान है। अर्क पदं मन्त्र वा ऋचा का भी पर्यायवाची है । अतएव मन्त्रार्थ यह है- गायत्री छन्द से अर्क-ऋचाम्ग्वेद का (जगदीश्वर) प्रतिमान करता है । ऋचाओं से सामवेद का । त्रिष्टुप् छन्द से वाक-यजुर्वेद का। यजुः मन्त्रों से वाक-अथर्ववेद का। [जोऐसी] सात छन्द युक्त वेद वाणी का मान करते हैं [वे कृतकृत्य होते हैं। इस से पूर्वपक्षियों को भी मानना पड़ेगा कि ऋचाएं वा ऋग्वेदीय मन्त्रों जैसे मन्त्र बहुत पुराने काल से सामवेद में चले आते हैं। हम पूर्व बता चुके हैं कि भार्येतिहासानुसार सामवेद प्रारम्भ से. ही संहितारूप में चला आ रहा है, अतः इस दृष्टि से जो सत्य ही है आदि सृष्टि से सामवेद में ऋचाएं चली आती हैं । जो व्यक्ति इन ऋचाओं को साम पाठ से पृथक् जानें, मानों,वह वैदिक वाङ्मय के इतिहास से प्रज्ञ है।
शाखा-विभाग। अब रहा शाखा-विभाग पर विचार। इस पर प्रकाश डालने वाला कोई अति प्राचीन ग्रन्थ हमारे पास विद्यमान नहीं। एक चरण-व्यूह.ग्रन्थ ही रह गया है । यह विक्रम से पांच, छ: सौ वर्ष पूर्व का ही प्रतीत होता है । इस में पाठभेद का बाहुल्य है । नीचे उसी की साक्षी उपस्थित की जाली है। चरणव्यूह की साक्षी। । शौनकीय परिशिष्ट। अथर्व-परिशिष्ट। सामवेदस्य किल सहस्रभेदा भवन्ति। तत्र सामवेदस्य शाखासहस्रमासीत् । एष्वनध्यायेष्वधीयानारते शतक्रतुवने- अनध्यायेध्वधीयाना: सर्वे ते. शक्रेण खाभिहताः। विनिहत: [प्रविलीनाः] तत्र केचिदवा- शिष्टाः प्रचरन्ति । तद्यथा । शेषान्व्याख्यास्यामः। तत्र राणायनीया (१) राणायनीयाः (२) साद्य- नां सप्तभेदा भवन्ति । (१) राणाय- मुग्राः * (३) कालापाः (8) महा नीयाः (२) शाट्यमुग्राः (३) का कालापाः (५) कौथुमाः(६) लाङ्ग- खोपा (४) महाकालोपा (५) लाङ्ग- लिकाश्चेति। खायनाः (६) शार्दूलाः (७) कौथु- माश्चेति। महिदास-प्रदर्शित प्रकारान्तर । तत्र कौथुमानां षड्भेदा भवन्ति । कौथुमानां षड्भेदा भवन्ति । तद्यथा। (5) कौथुमाः। (२) प्रासुरायणाः (१) सारायणीयाः (२) वातराय- (३) वातायनाः (४) प्राञ्चलिद्वैन-णीयाः (३) वैतधृताः(४) प्राचीनाः मृतः (१) प्राचीनयोग्याः (E) (५) तेजसाः (६) अनिष्टकाश्चेति मैंगमीयाः। * सात्यमुना नाम अधिक युक्त है। महाभाष्य ११४॥ १।११४८॥ पर ऐसा ही पाठ है।
हाल में तथ्य की किस अल्पमात्रा का होना जहां सैङ्कन्ड़ों साम-शाखाओं के नाम विलुप्त हो गये हैं बहा विद्यमान नामों में भी पाठ भेद के कारण एक बड़ा अन्तर पड़ गया है। पूर्वोक्त शाखा-नामों के पढ़ने से यह बात सुस्पष्ट हो जाती है। चरणव्यूह के टीकाकार महिदास ने निज व्याख्या में कुछ अन्य नाम भी दिये हैं। उन्हीं का पाउभेद स्वामी हरिप्रसाद जी के वेदसर्वस्व के पृष्ठ १७२ पर मिलता है । पता नहीं उन्हों ने स्व-बुद्धि से पाठ संशोधन किया है अथवा किसी लिखित ग्रन्थ के आधार पर ये नाम दिये हैं । तथापि हम उनके पाठभेदों को कोष्ठों में रख कर महिदास के पाठ जो संवत् १६५६ के काशी-संस्करण में छपे हैं, नीचे देते हैं। (१) प्रामुरायणीया (२) वासुरायणीया (३) वान्तिरेया [वार्तान्तत्रेयाः] (४) प्राञ्जल [प्राञ्जला:] (५) ऋग्वनविधाः [ऋग्वर्ण- मेदाः] (१) प्राचीनयोग्याः[७ ज्ञानयोग्या:] (७) राणायनीयाश्चेति । सत्र राणायनीयानां नव भेदा भवन्ति । (१)राणायनीयाः (२)शाट्या- यनीयाः (३) शाव्यमुग्राः [सात्वला:] (४) खल्वला: (१) महाखल्वला: (६) लाङ्गलाः (७) कौथुमाः (८) गौतमाः (t) जैमिनीयाश्चेति । पतञ्जलि मुनि कहते हैं “सहस्रवमा सामवेदः” (महाभाष्य कीलहान सं० भाग १, पृ०९) अर्थात् 'सहस्र शाखा वाला साम वेद है।' उन्हीं सहन शाखाओं में से कुछेक का उल्लेख पूर्वोद्भुत चरणव्यूह के पाठों में है । चरणव्यूह के शाखा-नाश-इति- सार वर्षी वा किसी विद्युत्-प्रकोप वाले दिन किसी सामशाखीय अध्यापक ने अपनी शाखा का पाठ किया होगा। वह इन्द्र-सूर्य के वज्र-तड़ित की धारा से अपने प्राण नष्ट कर बैठा होगा। साथ ही १-काशी-संस्करण में किसी भ्रष्ट-पाठ को देखकर कौथुमी, गौतमी छपा हैं ( १३ ) । उस के ग्रन्थ विनष्ट हो गये होंगे*। परन्तु यह सब दूर की कल्पना प्रतीत होती है । वस्तुतः कालक्रम से ही ये सब शाखाएं लुप्त होती गई होंगी। सम्प्राप्त तीन शाखाएं। सम्प्रति सामवेद की तीन शाखाएं ही प्रसिद्ध हैं। चरणव्यूह में भी इन्हीं का उल्लेख है । 'गुर्जरदेशे कौथुमी प्रसिद्धा। कार्णाटके जैमिनी प्रसिद्धा । महाराष्ट्रदेशे राणायनीया प्रसिद्धति ।” अर्थात् गुजरात में कौथमी, कार्णाटक में जैमिनी और महाराष्ट्र में राणाय- नीय शाखा प्रसिद्ध हैं। पूर्वोक्त तीन शाखाओं में से कौथुमी शाखा ही सम्प्रति सामवेद माना जाता है । इस का एक कारण तो इस का समस्त भारत में अत्यन्त प्रसिद्ध होना है। अन्य प्रबल कारणों की आगे खोज होनी चाहिये। इस सामवेद के आठ ब्राह्मण हम तक पहुंचे हैं। (१) ताण्ड्य महा- ब्राह्मण अथवा पञ्चविंशब्राह्मण अथवा प्रौढ ब्राह्मण अथवा छान्दोग्य ब्राह्मण (बिबलियोथीका इण्डिका संस्करण संवतू. १९२७-३०)। (२) षड्विंशब्राह्मण (जीवानन्द सं०१८८१ सन् तथा "विज्ञापनभाष्य- सहितम्,” एच० एफ० ईलसिंह सम्पादित, लीडन १९०८.)। (३) सामविधानब्राह्मण (ए०सी० बर्नेल सम्पादित १८८० सन्, लण्डन, तथा सत्यव्रत सामा० सम्पा० सं० १९५१) । (४) आर्षेय ब्राह्मण (ए० सी०बर्नेल सम्पा० १८७८ सन्, लण्डन,तथा सत्यव्रतला० सम्पा० * अलबेरूनी लिखता है कि 'उस के काल से कुछ पूर्व ही कश्मीर के वसुक्र नामक ब्राह्मण ने वेदों को लिपिबद्ध करने की प्रथा चलाई थी।' (अलबरूनी का भारत। भाग दूसरा। श्रीसंतरामकृत अनुवाद । सन् १६२० पृ०३१)। हमें इस बात पर विश्वास नहीं।
(१४ ) सं० १९४८)। (५) देवताध्याय वा दैवत ब्राह्मण (ए० सी० बर्नेल सम्पा० सन् १८७३ तथा जीवानन्द सन् १८८१)। (६) उपनिषद् ब्राह्मण-(क) मन्त्रब्राह्मण ( सत्यव्रतसा सम्पा० सं० १९४७ तथा प्रथम प्रपाठकमात्र के० स्टोन्नर सम्पा० १८०१) (ख) छान्दोग्योप- निषद् ( अनेक संस्करण निकल चुके हैं ) । (७) संहितोपनिषद् ए. सी० बर्नेल सन् १८७१) । () वंशब्राह्मण (ए. सी. बर्नेल सम्पा. १८७३ तथा सत्यव्रत सा० सं० १९४६)। कई विद्वानों का मत है कि वस्तुतः सामब्राह्मण एक ही है। वह सम्प्रति चार भागों में विभक्त हो गया है । (१) पञ्चीस अध्या- यात्मक पञ्चविंशब्राह्मण (२) पञ्च अध्यायात्मक षड्विंशब्राह्मण (३) अष्ट अध्यायात्मक छान्दोग्योपनिषद् (४) दो अध्यात्मक गृह्य- कर्म-प्रधान मन्त्रब्राह्मण । सारा ब्राह्मण चालीस अध्याय युक्त था। अन्य पांच ब्राह्मण अनुब्राह्मणमात्र हैं। जब तक सामवेद सम्बन्धी अनेक ग्रन्थों के शुद्ध वैज्ञानिक संस्करण न छप जावें, तब तक इस विषय पर कुछ कहना हमारे लिये अयुक्त है । इस का विचार तभी होसकता है जब इन ब्राह्मण-ग्रन्थों का काल-निरूपण हो जावे। ताण्ड्यब्राह्मण की प्राचीनता। अष्टाध्यायी ४।२।१३८॥ पर एक वार्तिक है "चरण सम्बन्धेन निघास लक्षणोऽण् ।” इस पर लिखते हुए पतञ्जलिमुनि चरणसम्बन्धी नौ (९) ऋषियों को निवास-विचार से तीन भागों में बांटते हैं। त्रयः प्राच्या: । त्रय उदीच्याः। त्रयो माध्यमाः । काशिकाकार इसी वाक्य को ध्यान में रखकर अष्टा० ४।३।१०४ ॥ पर लिखता है-“वैशम्पायनान्तेवासिनो नव ।” आगे चलकर वह कुछ प्राचीन कारिकाएं उद्धृत करता है। उन में से एक का अर्ध भाग यह है ( १५ ) ऋचाभारुणिताण्ड्याश्च मध्यमीयास्त्रयोऽपरे । अर्थात् ऋचाम, मारुरिण और ताण्ड्य तीनों वैशम्पायन-शिध्य माध्यम-मध्यम भूमि निवासी थे। इन तीनों के अपने २ चरण थे। इन में से ताण्ड्यों की शाखा प्रारम्भ से कौथुमी ही चली आ रही है। इस का कुछ पता पाणिनीय गणपाठ से लगता है। वहां हा२।३७ पर यह तीन गण भी दिये हैं। “कठकालापाः। कठकौथुमाः।कौथुमलौकाक्षा।" हम कह चुके हैं कि कठ और ताण्ड्य प्रादि सतीर्थ्य-एक गुरु के शिष्य थे। उन में से कठों की अपनी शाखा थी, परन्तु ताण्ड्यों का अपना चरण ही था। इस लिये गण में कठ और ताराज्य दोनों की शाखाओं का परिचय देने के लिये “कठकौथुमाः” कहा है । इस कथन में एक बात ध्यान देने योग्य है । सामविधान ब्राह्मण के अन्त में जो ऋषि-परम्पग दी है वहां ताण्ड्य का गुरु प्राजापत्यविधि से बादरायण कहा है । यथा- सोऽयं प्राजापत्यो विधिस्तमिमं प्रजापतिर्ब्रहस्पतये प्रोवाच । बृहस्पति रदायः। नारदो विष्वक्सेनाय । विष्वक्सेनो व्यासाय पाराशर्याय । व्यासः पाराशर्यो जैमिनये। जैमिनिः पौष्पिण्ड्याय । पौष्पिण्ड्यः पाराशायणाय । पाराशर्यायणो बादरायणाय । बादरायणस्ताण्डिशाध्यायनिभ्याम्। ताण्डिशाव्यायनिनौबहुभ्यः।। एक ताण्ड्य का वर्णन शतपथब्राहाण ।।१।२।२५ में पाया है- “अथ ह स्माह ताण्ड्यः ।" अतः इतना निश्चित है कि चाहे ताण्ड्य कोई भी हो, है वह अतिप्राचीन । तब उस की संहिता क्यों कौथुम हुई और मूल सामवेद क्यों कौथुम कहलाया ? इस के विचार के लिए बड़े परिश्रम की आवश्यकता है। सूत्रों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है। (१) मशककल्पसूत्र अथवा आर्षेयकल्प ( डबल्यू० कालेण्ड सम्पा० सन् १९०८)। (२) तुद्रसूत्र आर्षेयकल्प का परिशिष्ट ही है (उसी के उत्तर भाग में छपा है ) । (३) लाट्यायन श्रौतसूत्र (बिब० इण्डि० सं० १९२८)। (४) गोभिलीय गृह्यसूत्र (काएर सम्पा० १८८४ सन तथा बिब इण्डि०, द्वि० सं०, सन् १९०८)। (२) श्राद्धकल्प, परिशिष्ट, गोभिल अथवा वसिष्ठकृत (बिब० इण्डि० द्वि० सं० सन् १९०६) । (६) कर्मप्रदीप अथवा छन्दोमगृह्यपरिशिष्ट (धर्मशास्त्रसंग्रह, सन् १८७६,जीवानन्द संस्करण के पूर्वार्ध पृ०६०३-६४४ तक,कात्यायन- स्मृति वा कात्यायनविरचित कर्म प्रदीप के नाम से छपा है । तथा प्रथम प्रपाठक श्रेडर सम्पा,हले १८८६ सन तथा बिब० इण्डि० में सन् १६०और द्वि० प्रपाठक स्तृ. होलस्टाईन सम्पा०हले सन् १८६०)। (७) गृह्यासंग्रह,गोभिलपुत्रकृत (ब्लूमफील्ड द्वारा Z.D. M. G. Vol ३५ में सम्पा० तथा बिब० इण्डि० द्वि० सन् १९१०) । (८) पञ्च- विधसूत्र (सत्यव्रतसा० सम्पा० तथा रि० जीमन सम्पादित १९९३ ब्रेसला )। शिक्षाग्रन्थों में तीन शिक्षा प्रसिद्ध हैं। (१) नारदीय शिक्षा ( सत्यव्रतला० सं०, दत्तात्रेय सम्पा० लाहौर सन् १९०६ तथा शिक्षासंग्रह काशी में, सन् १८६३) । (२) लोमशीय शिक्षा (शिक्षा संग्रह सं०) (३) गौतमीयशिक्षा (शिक्षा संग्रह सं०)। प्रातिशाख्यों में निम्नलिखित ग्रन्थ हैं। (१) ऋक्तन्त्र (ए०सी० बर्नेल सम्पा० १८७६)। (२) सामतन्त्र (दयानन्द महाविद्यालय के लालचन्द पुस्तकालय में इस की एक प्रतिलिपि है जो मद्रास गवर्नमेण्ट के संग्रह के एक ग्रन्थ से कराई गई थी)। (३) पुष्पसूत्र वा फुल्लसूत्र (रि० जीमन सम्पादित)। कुल चौदह (१४) ग्रन्थों का हम ने ऊपर उल्लेख किया है। इन के अतिरिक्त अठतीस (३८) और ग्रन्थ हैं। उन सब के नामादि ( १७ ) जैमिनीय संहिता (ron Dr. W. Caland, Breslau, 1917 ) पृ० १३-१५ पर देखो। २. रामायनीय शाखा। इस शाखा की संहिता अभी तक नहीं छपी। इस के सूत्र ग्रन्थ निम्नलिखित हैं। (१) द्राशायण श्रौतसूत्र (कुछ भाग रियूटर सम्पादित लण्डन १९०४ सन्)। (२) खादिरगृह्यसूत्र अथवा द्राायण गृह्यसूत्र (मैसूर राज्य संस्कृत ग्रन्थमाला १९१३ लन् तथा प्रानन्दाश्रम पूना सन्१९१४)। (३) गौतमपितृमेधसूत्र (कालेण्ड सम्पा० लाईपज़िग १८६६ सन्) । (४) गौतमस्मृति ( स्मृतिसमुच्चय, पूना )। राणायनीय-शाखा सम्बन्धी इतने ग्रन्थों का वर्णन करके डाक्टर कालेण्ड महाशय एक विचार उपस्थित करते हैं। वह इतना आवश्यक है कि हम उस का अनुवाद दिये विना नहीं रह सकते- परन्तु इन सब ग्रन्थों का राणायनीय-शाखा सम्बन्धी होना अनिश्चित ही है। कर्मप्रदीप पर आशार्क का भाष्य है । उस में वह बताता है कि गोभिलसूत्र कौथमों का ही गृह्यसूत्र नहीं प्रत्युत राणाय- दीयों का भी है। हेमाद्रिभी अपने श्राद्धकल्प में तीन बार (पृ० १४२४, १४६,१४६८) गोभित को सणायनीय-सूत्रकृतू कहता है। यदि यह बात मान ली जावे तो खादिरगृह्यसूत्र राणायनीयों का सूत्र नहीं रह सकता । अस्तु, दक्षिण भारत में शारदूलों के एक खादिर गृह्यसूत्र की विद्यमानता कही जाती है । (देखो Report on a search for Sanskrit mss. in the Bombay Presidency 1892-95, by A. V. Kathavate Bombay, 1901, No. 79 ) । शारदूल भी सामवेद की एक शाखा है। अब यही खादिर गृह्यसूत्र शारदूल सामगों के खादिर सूत्र से कुछ पाउभेदों को छोड़ के प्रायः मिलता ( १८ ) बताया जाता है । हेमाद्रि के काल में शार्दूल शाखा की ऐतिह्य शृङ्खला अटूट थी, यह भी श्राद्धकल्प से झाल होता है। उस में (पृ० १०७८) पर, वह वेद के उन भागों का उल्लेख करता है जो ब्राह्मणों के भोजन-लमय शार्दूल-शाखा वालों को गाने चाहिये। अतएव यह स्पष्ट है कि कम से कम खादिरगृह्यसूत्र में मूलतः शार्दूलों सम्बन्धी गृह्यकर्म थे। परन्तु एक और ऐतिह्य भी खादिर- सूत्र सम्बन्धी है। मैसूर में १८८१ सबू में कण्ठभूषण भाष्य सहित जो गृह्यरत्न छपा है उस में अनेक बार गौतमगृह्यसूत्र का उल्लेख है । उस में जितने भी वाक्य गौतम के नाम से दिये गये हैं, वे सब हमारे खादिरगृह्यसूत्र में मिलते हैं । इस के अतिरिक्त जैसा हम पूर्व कह चुके हैं, हमारे पास एक गौतम पितृमेधसूत्र है, एक गौतम धर्मसूत्र ( स्टैनज़लर सम्पा० लण्डन १८७६ ) * और एक स्मृति भी है। ये सब गौतमों के ग्रन्थ भी हो सकते हैं कि जो सामवेद का गौण भाग है।" हम ने विद्वान् पाठकों के विचारार्थ श्री कालेण्ड-प्रदर्शित ये सब पक्ष उद्धृत कर दिये हैं । अपनी सम्मति किसी और समय पर प्रकाशित करेंगे। जैमिनीय शाखा। इस शाखा के निम्नलिखित ग्रन्थ अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। (१) जैमिनीय संहिता (Dr. W. Caland's edition, Breslau, 1907.)। (२) जैमिनीय-ब्राहाण (इस के अनेक खण्ड हन्नस अर्टेल ने पाश्चात्य अनुसन्धान पत्रों में प्रकाशित किये हैं। अन्य उपयोगी खण्डों का अधिकांश भाग नन्थरूप में छप गया है-Das Taiminiya Brahmana in Auswahal, Amsterdam, 1919) हस्तलिखित सामग्री के अपर्याप्त होने से यह बृहब्राह्मण अभी पूरा नहीं छप सका)। (३) जैमिनीय-उपनिषद्ब्राह्मण (अर्थात् गायत्र्युपनिषद्, इसके दो भारतीय संस्करण निकल चुके हैं (१) मैसूर (२) मद्रास । ।
( १६ ) पूर्वोक्त ब्राह्मण का उत्तर भाग है । हन्नस अर्टेल सम्पा० १८९४ सन्) (४) आर्षेय-ब्राह्मण (ए० सी० बर्नेल सम्पा० मंगलोर १८७८)। (५) जैमिनीय श्रौतसूत्र अग्निष्टोम-प्रकरण (डी गॅस्ट्रा सम्पा० लाईडन सन् १९०६)* ! (६) जैमिनीय-गृह्यसूत्र (edited by Dr. W. Caland, Amsterdam, 1905.): जैमिनीय-ब्राह्मण । शौनकादिस्यश्छन्दसि।" ४।३.१०६ के गण में पाणिनि "तलवकार" शब्द पढ़ते हैं। इसी तलवकार ऋषि के नाम पर तलवकार शाखा प्रसिद्ध थी। उसी का अव जैमिनि-शाखा नाम हो गया है । इसका कारण अभी पूर्णतया ज्ञात नहीं। संहिता के समान ब्राह्मण को भी अब जैमिनीय ब्राह्मण कहते हैं। श्री शङ्कराचार्य केनोपनिषद भाष्य के प्रारम्भ में लिखते हैं- केनेषितम्" इत्याद्योपनिषत्परब्रह्मविषया वक्तव्येति नवमस्या- ध्यायस्यारम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माण्यशेषतः परिसमापितानि समस्त- कर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासनान्युक्तानि कर्माङ्गसामविषयाणि च । अनन्तरं च गायत्रसामविषयं दर्शनं वंशान्तमुक्तम् ।” (अर्थ) "केनेषितम्” से प्रारम्भ होने वाली, परब्रह्मविषय के कहने वाली उपनिषद् कही जानी चाहिये । यह नवम् अध्याय का प्रारम्भ है । इस से पूर्व (पाठ) अध्यायों में यज्ञ कर्म पूरे कहे गये हैं। प्राणोपासना भी कही गई है। तत्पश्चात् गायत्रसाम और वंश कहा गया है।" तलवकार ब्राह्मण का यह वर्णन शङ्कर ने किया है । जैमिनीयब्राह्मण जो सम्प्रति मिलता है उसका अध्यायक्रम * जैमिनीय श्रौतसूत्र समग्र सभाष्य बड़ोदा राजकीय ग्रन्थमाला में श्रीघ्र ही छपेगा + जैमिनीय गृह्यसूत्र का कालेण्ड सम्पादित भारतीय संस्करण ला० मोतीलाल बनारसीदास सैदमिठा बाज़ार लाहौर द्वारा शीघ्र प्रकाशित किया जायगा। ।
( २० ) शङ्कर-प्रदर्शित अध्यायक्रम से विभिन्न है । प्रथम तीन अध्याय हैं। पश्चात् उपनिषद् ब्राह्मण आरम्भ होता है । उस में चार अध्याय हैं । केन उपनिषद् चतुर्थाध्याय के अठारहवें खण्ड से प्रारम्भ होता है, और इक्कीसवें पर समाप्त हो जाता है । वंश इस से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। सात.खयड इस से भागे और सो सारे मिल के ब्राह्मण के सात अध्याय होते हैं। यदि आर्षेय- ब्राह्मण भी मिला लिया जावे तो सारे आठ अध्याय होते हैं। सम्भव है और ग्रन्थ मिलने पर इस बात का निर्णय हो जावे। उपनिषद् ब्राह्मण । उपनिषद् ब्राह्मण को हन्नस अर्टल महाशव ने अमेरेकन ओरिएण्टल सोसायटी के जर्नलसं० १५ में रोमन-लिपि मे सम्पादित किया था। मेरे कहने पर पण्डित रामदेव जी ने उसी से इस का देवनागरी संस्करण तय्यार किया था। वही अब यहां छापा गया है। हस्तलिखित सामग्री। जिस हस्तलिखित सामग्री से अर्टेल ने अपना संस्करण तय्यार किया था उस का उल्लेख उस ने अपनी भूमिका में इस प्रकार दिया है- A. बर्नेल के नोटानुसार जो लपेटने वाले काग़ज़ पर है, यह हस्त्रलेख “मलाबार हस्तलेख से नकल किया गया,” १८७८ सन् में। अन्त में वह लिखता है "मूल की तिथि, कुल्लम १०४०=१८६४ सन्। पलघट के हस्तलेख से।" B. तालपत्रों पर लिखे ग्रन्थ से, लगभग ३०० वर्षपूर्व लिखा गया, तिन्नेवली से प्राप्त, परन्तु पहले अलेप्पी से लाया गया था।" इस के पाठभेद ही दिये गये हैं। C. बर्नेल के हाथ की रोमनलिपि में किया हुआ ग्रन्थ । यह ११५६ पर समाप्त हो जाता है।
pantananews ( २१ ) A. अन्थ का पाठ और B. के पाठभेद अन्धाक्षरों में हरिवर्षीय कागज पर हैं। वे प्रो० जानवेरे द्वारा रोमन में लिखे गये थे, और कापी प्रो० विटने ने मूल से मिला ली थी। उन्हों ने के पाठभेद भी दे दिये थे। इसी कापी से यह संस्करण तय्यार किया गया है। मूल अब इण्डिया आफिस बण्डल के पुस्तकालय में है। हस्तलेखों में होला शीर्षक है तलवकार ब्राह्मणे उपनिषदाह्मणम् । अनुवाक, खण्ड और कणिकादिक विभाग विषय में श्रील ने यह लिखा है । "वाक्यों (कण्डिकाओं) के अङ्क देने में हस्तलेख असावधान और असङ्गत हैं । A. अनुवाक और खण्डविभाग नहीं देता, परन्तु सत्येक अध्याय की कशिलकाओं पर क्रमशः भर देता है। मने अचाक और समाज किया. और हवा कशिडकाओं के अड्डों में तीनों हस्तले सो की साधारण अशुद्धियों और दिलोपों कालिखना उपयोगी नहीं समझा। अध्याय २१से A. और B. अडगे का नरा प्रकार (काण्डिकाओं की समाप्ति पर) प्रारम्भ करते हैं । तथापि तीन पहली कण्डिकाएं (२।१-३) छोड़ते हैं, और २।४ को २ लिखते हैं । पर इस के पश्चात् नियमपूर्वक अर्थात् २०५५ इत्यादि, लिखकर तृतीय अध्याय के अन्त तक जाते हैं, २४५७ । B. में अङ्क देने के एक और क्रम के भी अवशेष हैं। यहां तीसरे अध्याय की प्रथम तीन कण्डिकाओं पर और अङ्कने के साथ क्रमशः ५६,५७ और५८ लिखा है। B. में ३३१८ एर ७०,३१९२पर ७३, ३।३२ पर ७६ के अङ्क अधिक हैं । इन अन्तिम तीन अनुवाकों की गणना स्पष्ट ही इस अध्याय के प्रथम तीन से विभिन्न है। साथ ही मूल की कण्डिकाओं के क्रम से भी भिन्न है। "तीनों हस्तलेख एकही सदोष मूल से आए हैं। तीनों में बहुत सामान्य प्रष्टपाठ हैं । विराम, अक्षर-विन्यास और सन्धि-सम्बन्धी । - ( २२ ) वातों में भी वे असावधानी ने लिखे गए हैं। मैंने इन बातों के ठीक करने में स्वतन्त्रता वती है । सब स्थलों में, जो केवल अक्षर-विन्यास सम्बन्धी नहीं है, मैंने हस्तलेखों के पाठ-भेद पृष्ठ के नीचे दिये हैं। निर्देशों की सरलता के लिये मैंने प्रत्येक अध्याय में निरर्थक अनुबाक विभाग का ध्यान न करते हुए क्रमशः खण्डाङ्क देदिया है। हस्त लेखों में कण्डिकाओं पर कोई अङ्क नहीं तथापि मैंने यह दे दिया है। अमेरेकन संस्करण के अन्त में अर्टेल महाशय ने चार सूचियां दी हैं। [१] आवश्यक शब्दों और ऋषि नामों श्रादि की सूची। [२] निर्वचनों की सूची। [३] व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनीय स्थल । [४] उद्धरणों की सूची । हमने प्रथम सूची में से ऋषि नाम पृथक् करके उनकी सूची देदी है। अन्य शब्दों को इस लिए नहीं दिया कि दयानन्द महाविद्यालय के अनुसन्धान विभाग की ओर से उपलब्ध ब्राह्मणों आदि की एक विस्तृत सूची तयार हो रही है। उसमें ये शब्द और अन्य शब्द भी आवेंगे, अतः उनको यहाँ धापना आवश्यक नहीं समझा। सूचियां (२) और (४) भी हमने देदी हैं । तीसरी को हम आर्यावर्तीय पण्डितों के लिए अनावश्यक समझते हैं। पं० रामदेव ने पाठभेदों को देने के लिये A.B.C. के हवाले नहीं दिये। सो आवश्यक होने पर भी यह रह गये हैं। पहले फामों में उन्हों ने O.nitted के स्थान में "ओम्" दिया था। मैंने आगे चल कर उस के स्थान में संस्कृत शब्द "नास्ति' कर दिया है। यह संस्कृत शब्द होने से एतद्देशीय जनों के लिये अधिक उपयोगी है। अप्रेल ने प्रत्येक खर सन्धि पर 'कामें का चिह्न दिया हुआ था । रामदेव जी ने उस के स्थान में '' चिह्न दे दिया था । संस्कृत में यह अनावश्यक है, अतः दूसरे फार्म से मैंने इसे भी हटा दिया है।
( २३ ) जैमिनीय उपनिषदब्राह्मण के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य। जला पूर्व लिया जा चुका है, यह ब्राह्मण, वृहद् जैमिनीय ब्राह्मण का एक भागमान। इसका मूल नाम "गायत्र उपनिषद" है। जै० उ० ब्रा सन्त में ही नाम आया है। यह नाम भी सार्थक, क्योकि इन सारे अध्यायों में गायत्र साम का ही वर्णन । सो ले अनुत अर्थात मोक्ष की प्राप्ति जताई गई है जै० उ० वा० ३.४० के प्रारम्भ में यही कहा गया है- तदेतदमृत गायत्रम् । एतेन वै प्रजापतिरमृतत्वमगच्छदेतेन देवा एतेनर्षयः ॥१॥ अर्थात् वह यही अमृत गायत्र (साम) है। इसी से प्रजापति मुक्त हुश्रा, इसी से (अन्य ) विद्वान्, इसी से मन्नार्थ द्रष्टा (ऋषि)। इस ब्राह्मण में दो स्थलों पर अर्थात् ३४०-४२॥ और ४११६,१७, पर दो वंश परम्पराएं आई हैं । अन्तिम वंश परम्परा पहली से कुछ ही अन्य नाम रखती है। यह है भी छोटी। पहली का आरम्भ "ब्रह्म" से होता है। (१) ब्रह्मा ने (२ प्रजापति के लिये उसने (३) परमेष्ठी के लिये । उसने (४) देवसविता के लिये इत्यादि। शतपथब्राह्मण (माध्यन्दिन) में सी दशल काण्ड की समाप्ति पर और चौदहवें काण्ड के अन्त से कुछ पहले दो ऋषि वंशा- बलियां आई हैं। पूर्वली में बताया गया है कि स्वयम्भु ब्रह्म पति को विद्या पढ़ाई, और उत्तरली में कहा है कि परमेष्ठी को। जै० उ० ब्रा० में एक रूप से इन दोनों का मेल है। अर्थात् ब्रह्मा, प्रजापति, र परमेष्ठी यद्यपि समकालीन थे, तथापि गायत्र साम का रहस्य ब्रह्म ने स्वयं परमेष्ठी को नहीं बताया, प्रत्युत यह उस तक प्रजापति द्वारा प्राया। ने प्रजा- जैमिनीय ब्राह्मण कोई नया ब्राह्मण नहीं। शतपथ ब्रा० के द्वि. वंश में ब्रह्म से लेकर अपने प्राप (वयं) तक ६८.नाम है । जै० उ० ब्रा के प्रथम वंश में ब्रह्म से लेकर वैपश्चित दा. गुप्त लौहित्य तक ५० नाम हैं । प्रत्येक ब्राह्मण के सब वंशों को मिला कर और यदि कुछ नाम छूट गये हैं तो उनका स्थान छोड़ कर भी ब्रह्म से ऋषियों की एक जैसी संख्या होजायगी। इस से प्रतीत होता है कि प्रायवर्त के इतिहास में ब्राह्मणों के संकलन का समय प्रायः एक ही था। ब्रह्मा से जो अनेक विद्याय अनेको कुलों में चली आई थीं, वही इतिहासयुक्त करके प्रायः एक काल में एकत्र कर ली गई। जैमिनीय ब्राह्मण भी उसी समय संकलित जब यह ग्रन्थ छप रहा था, तब श्रीमान् कालेण्ड महाशय ने मुझे पत्र लिखा कि वे अर्टल के कई पाठ शुद्ध कर देंगे। तब मैंने उन्हें मुद्रित७२ पृष्ठ भेज दिये थे। उन्होंने उनके दाशिये पर संशोधन कर दिया है । वह भूमिका के अन्त में छाप दिया गया है । अगले पृष्ठों का संशोधन फिर कभी छापा जायगा। इस परिश्रम के लिए जो उन्होंने स्वयं मेरा ध्यान उधर खेंच कर किया है, उन का अत्यन्त अनुगृहीत हूं। इस ग्रन्थ के प्रफ पं० विश्वबन्धु एम० ए० शाखी, तथा पं० हंसराज पुस्तकाध्यक्ष लालचन्द पुस्तकालय ने देखे हैं । इन दोनों महाशयों का भी मैं कृतज्ञ हूं। परमदयामय भगवान अपनी कृपा से इन हृदय-पाचक ग्रन्थों के प्रचार में मेरी सहायता करें। इत्योम् इयानन्द महाविद्यालय लालचन्द पुस्तकालय लाहौर भगवदत्त माघ, संक्रान्ति सं० १६७७ श्री कालेण्ड-प्रदर्शित सटिप्पण पाठ संशोधन । पंक्ति মজাহান আঃ संशोधित पाठ ३, सिच्यादेवमे० सिच्येतवमे हैऽषा खला हैषाखला उतषांखला उतषाखला १२ ५. प्रति यस्य ७. ह १ ६ ववर्ज हस्त ले० पाठ शुद्ध है।देखो पाठभेद । लोष्ठो তা হল यित्वापनि ववृजे* वह बहो । ववेद यद ने देवा देवाः ६. १२ वावेद यदनुचे करना ४०, २ समाहोरात्राः सप्त होत्राः अभिपयक्त अभिपर्यस्त उश्या [उच्चा] हस्मिा चै० तद्यद्ध यद्यद्धे १ प्रजापतिर्वा वेद अग्र प्रजापतिवेदमन ४६, सुनोति सनोति सर्क स भयतना ३ पुलीचं न पूता वै पुनीध्वमपूताव খা: पपाच or पपर्च * The mss. (Grantha) have ags Or which nearly is the same in Grantha. If the Sandhi is effaced we ought to return az 1 + इमायतना is a bahuvrihi compound. पाठभेद जो नीचे दिया है, वह ठीक है। + Must be corrupt. Hunt EAR । शुद्धिपत्रम् । ខ្ញុំ ។ আন্ত ५ ४, ६, ६, ११ अग्नि संहि सूर्य " h lbo કે १ यत्पर तद० यत्परतद० ३ दामूज प० মানুষ श्रेयस एवंवि० २ पत्रं वि० १०० वाङ লা १०७ पाणी • पानी ७ युष्मासु युष्यासु रतो १३६ ३ सपृणाति स्पृणाति स्वर्गस्य च्छुक्ल १४६ h memberseasee । s जैमिनीय उपनिषद्राह्मणम्
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ओ३म् जैमिनीय-उपनिषद्-ब्राह्मणम् ३ प्रजापतिर्वा इदं त्रयेण वेदेनाऽजयद् यदस्येऽदं जित तत् ॥ १ ॥ स ऐक्षतेऽत्थं चेद्वा अन्ये देवा अनेन वेदेन यक्ष्यन्त इमा वाव ते जितिं जेष्यन्ति येऽयम्मम । हन्त त्रयस्य वेदस्य रस- माददा इति ॥२॥ स भूरित्येवर्वेदस्य रसमादत्त । सेऽयम्पृ- थिव्यभवत् । तस्य यो रसः प्राणेदत् सोऽग्निरभवद्रसस्य रसः ॥३॥ भुव इत्येव यजुर्वेदस्य रसमादत्त । तदिदमन्तरिक्षम भवत् । तस्य यो रसः पाणेदत् स वायुरभक्द्रसस्य रसः॥४॥ स्वरित्येव सामवेदस्व रसमादत्त । सोऽसौ धौरभवत् । तस्य यो रसः प्राणेदत् स आदित्योऽभवद्रसस्य रसः॥५॥अथैऽकस्यै- ऽवाऽक्षरस्य रस नाऽशनोदादातुम् ओमित्येतस्यैऽव ॥६॥ सेऽयं वागभवत् । ओमेव नामऽषा । तस्या उ प्राण एव रसः॥७॥ तान्येतान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रं साम। ब्रह्म उ गायत्री । सद् उ ब्रह्माऽभिसंपद्यते । अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥८॥१,१ प्रथमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। १बेदेन । २ बाजयदू । ३ पदेन । ४ हन्ता। ५'द' अधिका६ सा।
कर SAR । ३ ( २ ) स यद् ओमिति सोऽग्निर्वागिति पृथिव्योमिति वायुर्वा- गित्यन्तरिक्षमोमित्यादित्यो वागिति द्यौरोमिति प्राणो वागित्येव वाक् ॥ १॥ स य एवं विद्वानुद्गायत्योमित्येवाऽग्निमादाय पृथि- व्याम्प्रतिष्ठापयत्योमित्येव वायुमादायाऽन्तरिक्षे प्रतिष्ठापयत्यो- मित्येवाऽऽदित्यमादाय दिवि प्रतिष्ठापयत्योमित्येव प्राणमादाय वाचि प्रतिष्ठापयति ॥२॥ तदैऽतच्छैलना गायत्रं गायन्त्यो- वा ३ च् ओवाश्च् प्रोवा३च् हुम्भा अोवा इति ॥ ३ ॥ तदु ह तत्पराङ् इवाऽनायुष्यम् इव। तद्वायोश्चाऽपां चानुवम गेयम् ॥४॥ यद्वै वायुः पराङ् एव पवेत क्षीयेत (स)। स पुरस्ताद्वाति स दक्षिणतस्स पश्चात्स उत्तरतस्स उपरिष्टात्स सर्वा दिशोऽनुसे- वाति ॥५॥ तदेतदाहुरिदानी वा अयमितोऽवासीदथेऽत्थाद्वाती ऽति । स यद्रेष्माणं जनमानो निवेष्टमानो वाति क्षयादेव बिभ्यत् ॥६॥ यदु ह वा आपः पराचीरेव प्रसृतास्स्यन्दरन् क्षीरस्ताः। यदङ्कासि कुर्वाणा निवेष्टमाना भावान सृजमाना यन्ति क्षयादेव विभ्यतीः । तदेतद्वायोश्चैऽवाऽपां चाऽनु वम गेयम् ॥७॥१,२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। १२ २, १ अन्तरीक्ष । २ पापा । ३ वाची । ४ छेल्०, छील् । ५ च । ६ परांद, पुराद् । ७ रिष्ठात् । ८ सीत् । ६ यजमानी, जमानो। १० वम् ११ दयद्, यद् १२ अङ्कासि । - HUNT .
SE १ ३ ६ अोवा ओवा ओवा हुम्भा ओवा इति करोत्येव । एताभ्यां सर्वमायुरेति ॥ १॥ स यथा वृक्षमाक्रमणराक्रममाण इयादे- वमेवैऽते द्वे-द्वे देवते संधायेऽमां लोकान् रोहन्नति ॥२॥ एक उ एव मृत्युरन्वेत्यशनयेऽव ॥३॥ अथ हिङ्करोति । चन्द्रमा वै हिङ्कारोऽन्नमु वै चन्द्रमाः । अन्नेनाऽशनयां नन्ति ॥४॥ तां-तामशनयामन्नेन हत्वोऽमित्येतमेवाऽऽदित्यं समयातिमुच्यते । एतदेव दिवश्छिद्रम् ॥ ५॥ यथा खं वाऽनस स्स्याद्रथस्य वैज्वमे- तद्दिवश्छिद्रम् । तद्रश्मिभिस्संछन्नं दृश्यते ॥६॥ यद्गायत्रस्योऽऽ- 4 हिङ्कारात्तदमृतम् तदात्मानं दध्यादथो यजमानम् । अथ यदितरात् सामोऽऽध्वं तस्य प्रतिहारात् ॥७॥ स यथाद्भिरा- पस्संसृज्येरन् यथा ऽग्निनानिस्संसृज्येत यथा क्षीरे क्षीरमा- सिच्यादेवमेवै ऽतदक्षरमेताभिर्देवताभिस्संसृज्यते ॥८॥१,३॥ प्रथमेऽनुवांके तृतीयः खण्डः। तं वा एतं हिङ्कारं हिम्भा इति हिकुर्वन्ति । श्रीर्वै भाः। असौ वा आदित्यो भा इति ॥२॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमनु गमे १ ३.१ प्रोव २ ऐव् ३ अक्रम ४ इति ५ त्यां, त्य ६ नस ७ रसस्य ८न्न त्वदू, तद् (?) १० रान् । ४.१ प्रोम् २ गंभ।
.. (४) ३ ७ इति । यद् इति स्त्रीणाम् प्रजननं निगच्छति तस्मात्ततो ब्राह्मण ऋषिकल्पो जायतेऽतिव्याधी राजन्यश्शुरः ॥२॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमनु वृषभ इति । यद् इति निगच्छति तस्मात्ततः पुण्यो बलीवर्दो दुहाना धेनुरुक्षा दशवाजी जायन्ते ॥ ३ ॥ एतं हवा एतं न्यङ्गमनु गर्दभ इति । यद इति निगच्छति तस्मात्स पापीया- ञ्छ्रेयसीषु चरति तस्मादस्य पापीयसश्रयो जायतेऽश्वतरो वा- ऽश्वतरी वा ॥ ४ ॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमनु कुभ्र इति । यद् इति निगच्छति तस्मात् सोऽमार्यस्सन्नपिराज्ञः प्रामोति ॥५॥ तं है- ऽतमेके हिङ्कारं हिम्भा प्रोवा इति बहिषे व हिङ्कुर्वन्ति । बहिर्धे ऽव वै श्रीः । श्री साम्नो हिङ्कार इति ॥ ६॥ स य एनं तत्र ब्रूयादहिर्धान्वा अयं श्रियमधित पापीयान् भविष्यति । स यदा वै म्रियतेऽथाऽनौ पास्तो भवति । क्षिप्रेवत मरिष्यत्यग्नोवनम्पासिष्यन्ति" इति तथा हैऽत्र स्यात् ॥ ७ ॥ तस्माद् हैतं हिङ्कारं हि वो इत्यन्तरिवैज्वाऽऽत्मन- जयेत् । तथा ह न बहिर्धा श्रियं कुरुते सर्वमायुरेति॥८॥१,४ प्रथमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। ४. ३ स्त्रिण ४ जायत इतिव्य५ यषत् हब ७ ऽति' अधिक ८ नाक्थ्यरस, नायस ६ प्रोम् बहिर्वेऽव......तत्र ब्रयाद् १० बहिर्दवे, प्रोम् । व ११ यतीति - ६ (५, सा हैऽका सुन्दा सान्तोऽतिष्ठति । इदं वै त्वमत्र पापमकर्णेऽहैऽऽध्यसि । यो व पुण्यकृत् स्यात् स इहेऽयादिति ॥१॥ स बूम याद सवार तदकरवं तद्वै मा त्वं नाऽका- रयिष्यस्त्वं तदा तीऽसीतिमाशा सा ह वेद सत्यम्माऽऽहे- जति । सत्यं हैऽषा देवता । सा ह तस्य नेऽऽशे यदेनमपसेधेत् सत्यमुपेऽवह्वयते ॥ ३ ॥ अथ होऽवाचैऽऽक्ष्वाको वा वाष्णो- ऽनुवक्ता वा सात्यकीर्त उतैषा खला देवताऽपसेधुमेव ध्रियतेऽ- स्यै दिशः ॥ ४॥ [ तद् ] दिवोऽन्तः । तदिमे द्यावापृथिवी संश्लिष्यतः । यावती वै वेदिस्तावतीऽयम्पृथिवी । तद्यत्रैऽतच्चा- त्वालं खातं तत्सम्प्रति स दिव आकाशः॥५॥तदहिष्पवमाने स्तूयमाने मनसोऽद्गृह्णीयात् ॥ ६॥ स यथोऽच्छायम्प्रति यस्य प्रपद्यतेऽवमेवैतया देवतयेदममृतमभिपर्येति यत्राऽयमिदं तपती- ति ॥७॥ अथ होवाच-॥८, १, ४॥ प्रथमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । गोबलो वार्णः क एतमादित्यमइति समयेऽतुम् । दुराद्वा एष एतत् तपति न्यङ् । तेन व एतम्पूर्वेशा सामपथस्तदेव मनसा- ५. १ 'ऽति' अधिक २ व ३ अर्क ४ स ५ सत्यम्महे ६ मखम् ७क्षको ८ सत्यकोर्स अ१० धृय ११ प्रत्यस्य १२ सत्य।
૨ क्ष (६) हृत्योऽपरिष्टा देतस्यैऽतस्मिन्नमृते निदध्यादिति ॥ १ ॥ तद् र होवाच शाव्यायनिस्समयेऽवाऽतदेनं कस्तद्वेद । यद्येता आपो वा अभितो यद्वायुं वा एष उपह्वयते रश्मीन्वा एष तदेतस्मै व्यूह- तीति ॥२॥ अथ होऽवाचोऽलुक्यो जानश्रुतेयो यत्र वा एष एतत् तपत्येतदेवामृतम् । एतच्चद्वै प्रामोति ततो मृत्युना पाप्ममा व्यावर्तते ॥ ३ ॥ कस्तद्वेद यत्परेणाऽऽदित्यमन्तरिक्षमिदमना- लयनमवरेण ॥ ४॥ अथैऽतदेवाऽमृतम् । एतदेव मां धूयम्प्राप- यिष्यथ । एतदेवाहं नातिमन्य इति ॥५॥ तान्येतान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री । गायत्रं साम । ब्रह्म उ गायत्री । तदु ब्रह्मा- भिसम्पद्यते अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥५॥ १, ६ ॥ प्रथमेऽनुवाके षष्ठः खण्डः। ता एता अष्टौ देवताः । एतावदिदं सर्वम् । ते [......] करोति ॥ १॥ स नैषु लोकेषु पाप्मने भ्रातृव्यायावकाशं कुर्यात् । मनसैनं निर्भजेत् ॥ २॥ तदेतदृचाऽभ्यनूच्यते । "चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । ६. १वाऽयं २ तथ्, त ३ स्वैअथो ५ोम हऽवाचा (!) उस्लुक्यो, उल्लुक्यो ७ यत् ८ परोण अन्विलय १० त, प्रापिए ११ यत ।
। । May ( ७ ) १ गुहा त्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति” इति ॥३॥ तद् यानि तानि गुहात्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ती (ऽती)ऽम एव ते लोकाः॥४॥ तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्तीति । चतुर्भाग हवै तुरीयं वाचः । सर्वयास्य वाचा सर्वैरेभिलॊकैरसर्वेमास्य कृतम्भ- वति य एवं वेद ॥५॥ स यथाश्मानमाखणमृत्वा लोष्ठो विध्वं- सत एवमेव स विध्वंसते य एवं विद्वाँसमुपवदति ॥६॥ ६ प्रथमेऽनुवाके सप्तमः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ प्रजापतिर्वा इदं त्रयेण वेदेनाऽजयद्यदस्येदं जितं तत् ॥१॥ स ऐक्षतेत्थं चेदा अन्ये देवा अनेन वेदेन यक्ष्यन्त इमां वाव ते जितिं जेष्यन्ति येऽयम्मम ॥१॥ हन्तेऽमं त्रयं वेदम्पीळयानीति ॥३॥ स इमं त्रयं वेदमपीळयत् । तस्य पीळयन्नेकमेवाक्षरं ना- शक्नोत् पीनयतुमोमिति यदेतत् ॥ ४॥ एष उ ह वाव सरसः । सरसा ह वा एवंविदस्त्रयीविद्या भवति ॥५॥स इमं रसम्पी- ७.१ तानि २ को, अोम ३ गयन्ति ४ तानि ५ अोम् ६ करवा ७ लोष्टो ८ श्रोम् एवम् विध्वंसते ६ स एषो...उपवदन्ति । ने २-दा, द ३,- को४. द्रव ।
। ७ 9 ર ( ८ ) ळयित्वा पनिषायोऽऽर्थोऽद्रवत् ॥६॥तं द्रवन्तं चत्वारो देवाना- मन्वपश्यन्निन्द्रश्चन्द्रो रुद्रस्समुद्रः। तस्मादेते श्रेष्ठादेवानाम् एते ह्ये- नमन्वपश्यन् ॥ ७॥ सयोऽयं रस आसीत्तदेव तपोऽभवत् ॥८॥ त इमं रसं देवा अन्वक्षन्त । तेऽभ्यपष्यन्त स तपो वा अभूदिति ॥६॥ इममु वै त्रयं वेदम्मरीमृशित्वा तस्मिन्नेतदेवाक्षरमपीळित- मविन्दन्नोमिति यदेतत् ॥ १०॥ एष उ ह वाव सरसः । तेनै- नम्पायुवन् । यथा मधुना लाजान् प्रयुयादेवम् ॥ ११॥ तेऽभ्य- तप्यन्त । तेषां तप्यमानानामाप्यायत बेदः। तेऽनेन चतपसाऽपीनेन च वेदेन तासु एव जितिमजयन् याम्प्रजापतिरजयत् । त एते सर्व एव प्रजापतिमात्रा अया३म् अय३म् इति ॥१२॥ तस्मात्तप्यमा- नस्य भूयसी कीर्तिर्भवति भूयो यशः । स य एतदेवं वेदैवमेवा- ऽपीनेन बेदेन यजते। यदो याजयत्वेवमेवाऽपानेन वेदेन याजयति ॥१३॥ तस्य हैतस्य नैव काचनाऽतिरस्ति य एवं वेद । स य एवैनमुपवदति सार्तिमृच्छति ॥ १४॥ द्वितीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । ५. ह्येते ६. छोम् ७ सेनं ८ अन्, ऐच ६ तेभ्यप १०--श्यंस्त-११ पीळितं, ता १२ वा १३ प्राप १४ ययाद १५. तेन, ते एन, तेनेन १६. यत् १७-यन् १८ अ३याम १६ ओम् यजते यदो-देन २० एव अषि २१ असि २२ उपपत्ति उबदति २३ अच्छति, पर- १७ २० २१ ૨૨ IFALS .
(६) ७ तदाहुदोवा ओवा इति गीयते का भवति क सामेति ॥१॥ोम् इति वै साम वागित्यृक् । भोमिति मनो वागिति वाक् । प्रोमिति प्राणो वागित्येय वाक् । मोमितीन्द्रो वागिति सर्वे देवाः । तदे- तदिन्द्रमेव सर्वे देवा अनुयन्ति ॥२॥ प्रोमित्येतदेवाक्षरम् । एतेन वै सैसवे परस्येन्द्रं वृजीत । एतेन ह वै तद्धको दालभ्य भाजके- शिनामिन्द्रं ववर्ज । प्रोमित्येतेनैवाऽऽनिनाय ॥३॥ तान्यतान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री।गायत्रं साग। ब्रह्म उगायत्री। तदु ब्रह्माभिसम्प- यते । अष्टाशफाः पशवस्तेनोपशव्यम् ॥४॥तस्यैतानि नामानीन्द्रः कर्माक्षितिरमृतं व्योमान्तो वाचः । बहुर्भूयस्सर्वं सर्वस्मा- दुत्तरं ज्योतिः । ऋतं सत्यं विज्ञानं विवाचनमप्रतिवाच्यम् । पूर्व सर्व सर्वा वाक् । सर्वमिदमपि धेनुः पिन्वते परागर्वाक ॥५॥२६॥ १ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। सा पृथक्सलिलं कामदुधाक्षिति प्राणसहितं चक्षुश्श्रोत्रं वाक्पभूतम्मनसा व्याप्त हृदयाय म्ब्राह्मणभक्त मन्त्रशुभं वर्षपवित्रं १. पवा। २. ओवात (=ोबा ३?)३. मृग। ४. अज्-१५-शीन्-,शीम-६. वब्रज । ७. वनिनाय ८-इ; क्षीति । -हिर ।१०.विजिज्ञा-११-प्रः। १ सा । २-तुश्रोत्र-३-दयो-४. भ्रक्रम, भ्रत्रम्, भृत्रम् ।
( १० ) ६ गोभग म्पृथिव्युपरं तपस्तनु वरुणपरियतनमिन्द्रश्रेष्ठं सहस्राक्षर- मयुतधारममृतं दुहाना सर्वान् इमाँलोकानभिविक्षरतीऽति ॥२॥ तदेतत् सत्य मक्षरं यदोम् इति । तस्मिन्नापः प्रतिष्ठिता अप्सु पृथिवी पृथिव्यामिमे लोकाः ॥२॥ यथा सूच्या पलाशानि सन्तृण्णानि स्युरेवमेतेनाक्षरेणेमे लोकास्संतृण्णाः ॥३॥ तदिदमिमान अतिविध्य दशधा क्षरात शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रबुता (नियुतधा ) बुंधा न्यर्जुदधा निखर्वधा पञमक्षिति- व्योमान्तः॥४॥ यथौधो विष्यन्दमानः परः-परोवरीयान् भव- त्येवमेवैतदक्षरम्परः-परोवरीयो भवति ॥॥ ते हैते लोका ऊवी एव श्रिताः। इम एवं त्रयोदशमासाः ॥६॥ स य एवं विद्वानुद्गायति स एवमेवैताँलोकानतिवहति । ओमित्येतेनाक्षरेणा- मुमादित्यम्मुख प्राधत्ते । एष ह वा एतदक्षरम् ॥७॥ तस्य सर्वमाप्तम्भवति सर्व जितं न हाऽस्य कश्चन कामोऽनाप्नो भवति य एवं वेद ॥८॥ तद्ध पृथु:न्यो दिव्यान् व्रात्यान पपच्छ । १२. ५. पर्यंत-1 ६-: । ७ अोमिति । ८-सुः । ६ श्राम, 'इदं और दशधा के मध्य स्थान रिक्त है । १० निर्बु-११ निखर्वाच, निखर्वदाच् । १२-नान् । १३ ओम् । परः परो ।१४ ते । १५ तसि।१६ कण्व ।१७ वै।
RE H Pare म 34 MEE ( ११ ) स्थूणां दिवस्तम्भनी सूर्य माहुरन्तरिक्षे सूर्यः पृथिवीप्रतिष्ठः । अप्सु भूमीश्शिश्यिरे भूरिभाराः किं स्विन्महीधितिष्ठन्त्याप इति ॥ ६॥ ते ह प्रत्यूचुस् स्थूणामेव दिवस्तम्भनीं सूर्य माहुरन्तरिक्ष सूर्यः पृथिवीप्रतिष्ठः । अप्सु भूमीश्शिरियरे भूरि- भारास्सत्यम्महीरधितिष्ठन्त्याप इति ॥१०॥ ओमित्येतदेवाक्षरं सत्यम् । तदेतदापोऽधितिष्ठन्ति॥११॥॥॥१०॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः । १८ २० प्रजापतिः मजा असृजत । ता एनं सृष्टा अन्नकाशिनीरभित- स्समन्तम्पर्यविशन् ॥२॥ ता अब्रवीत् किंकामास्स्थेति । अन्नाच- कामा इत्यब्रुवन।।२॥सोऽब्रवीदेकं वै वेदमन्नायममुक्षि सामैव । तद्वः प्रयच्छानीति । तन्नः प्रयच्छेत्यानुवन् ॥३॥ सोऽब्रवीदिमान्दै पशून् भूयिष्ठमुपजीवामः । एभ्यः प्रथमम्पदास्यामीति ॥४॥ तेभ्यो हिङ्कारम्पायच्छत् । तस्मात्पशवो हिङ्करिक्रतो विजिज्ञास- १८-मिश् । १६ शिशिरे। २० प्रथित् । १. वा । २. षाम्-३ पृय-1४ -कृतो। Pain ( १२ ) माना इव चरन्ति ॥५॥ प्रस्तावम्मनुष्येभ्यः । तस्माद ते जुक्त इवेदम्मे भविष्यत्यदो मे भविष्यतीति ॥६॥ आदि क्योभ्यः। तस्मात् तान्याददानान्युपापपातमिव चरन्ति ॥७॥ उद्गीथं देवेभ्यो ऽमृतम् । तस्मात्तेऽमृताः॥८॥ प्रतिहारमारण्येभ्यः पशुभ्यः । तस्माते प्रतिहृतास्तन्तस्यमाना इव चरन्ति ॥६॥ १॥ ११ ॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । ६ उपद्रवं गन्धर्वाप्सरोभ्यः । तस्मात्त उपद्रवं गृह्णन्त इव चरन्ति ॥१॥ निधनम्पितृभ्यः । तस्मादु ते निधनसंस्थाः ॥२॥ तघदेभ्यस्तत् साम प्रायच्छदेतमेवैभ्यस्तदादित्यम्प्रायच्छत् ॥३॥ स यदनुदितस्सहिङ्कारोऽोदितः प्रस्तावासंगवमादिर्माध्यन्दिन उद्गीथोऽपराहणः प्रतिहारो यदुपास्तमयं लोहितायति स उपद्रवो ऽस्तमित एव निधनम् ॥४॥ स एष सबैलोकैल्समः । तद्यदेष सबैलोकैस्समस्तस्मादेष एव साम । स ह वै सामवित् स साम वेद य एवं वेद ॥६॥ ते ऽब्रुवन् दूरे वा इदमस्मत् । तत्रेदं कुरु । ५. स्तुवतेव। १. प्रतिहताम् । ७. तातृ (?) सू (!) यमाना; सातास्यमाना। १-प्रापसरेभ्यः।२ अर्थोदितू। आदित्यः। ४ द्विवार स सामवेद' देता है।
amava ३ यत्रोपजीवामेति ॥६॥ तहतूनभ्यत्यनयत् । स वसन्तमेव हिङ्कार- मकरोद्ग्रीष्मम्प्रस्तावं वर्षामुद्गीथं शरदम्प्रतिहारं हेमन्त निधनम् । मासार्धमासावेव सप्तामावकरोत् ॥७॥ तेऽब्रुवन्नेदीयो न्वावैतर्हि । तत्रैव कुरु यत्रोपजीवामेति ॥८॥ तत् पर्जन्यमभ्यत्यनयत् । स पुरोवातमेव हिङ्कारमकरोत् ॥६॥ १ ॥ १२॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । जीमूतान प्रस्ताव स्तनयित्नुमुद्गीथं विद्युतम्प्रतिहारं दृष्टि निधनम् । यदृष्टात्मजाश्चौषधयश्च जायन्ते ते साम्यावकरोत् ॥१॥ तेऽब्रुवन्नेदीयोन्वावहिं । तत्रैव कुरु यत्रोपजीवामेति ॥२॥ तयज्ञमभ्यत्यनयत् । स यज्रष्येव हिङ्कारमकरोडचः प्रस्ताव सामान्युद्गीथं स्तोमम्प्रतिहारं छन्दो निधनम् । स्वाहाकारवषट्- कारावेव सप्तमावकरोत् ॥३॥ तेऽब्रुवन् नेदीयो न्वावतार्ह । तत्रैव कुरु यत्रोपजीवामेति ॥४॥ तत्पुरुषमभ्यत्यनयत् । स मन एव हिङ्कारमकरोद्वाचम्प्रस्तावम्भाणमुद्गीथं चतुःप्रतिहारं श्रोत्रंनिधनम् रेवश्चैव प्रजां च सप्तमावकरोत् ॥॥ तेऽब्रुवन्नत्र वा एनत्तद- ५-म इति । ६ कर-1 ७ प्रस्तावः । वर्षा उद्गीथः, शरत्प्रतिहारः, ओम् शरदम्प्रतिहारम् । १. प्रस्तात्रैवम् २-तिर । ३सपतम्-४म इति । ५ अभ्यत्यत्यन- ( १४ ) १ कर्यत्रोपजीविष्याम इति ॥६॥ स विद्यादहमेव सामास्मि मय्येता देवता इति ॥७॥ १ ॥ १३॥ तृतीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । न ह दूरे देवतस्स्यात् । यावद्ध वा आत्मना देवानुपास्ते तावदस्मै देवा भवन्ति ॥१॥ अथ य एतदेवं वेदाऽहमेव सामाऽस्मि मय्येतास्सर्वा देवता इत्येवं हाऽस्मिन्नेतास्सर्वा देवता भवन्ति ॥२॥ तदेतद्देवश्रुत्साम । सर्वा ह वै देवताश्शृण्वन्त्येवं- विदम्पुण्याय साधवे । ता एनम्पुण्यमेव साधु कारयन्ति ॥३॥ स ह स्माऽऽह सुचित्तश्शैलनो यो यज्ञकामो मामेव स वृणीताम् । तत एवैऽनं यज्ञ उपनस्यति । एवंविदं झुगायन्तं सर्वा देवता अनुसंतृप्यन्ति । ता अस्मै तृप्तास्तथा करिष्यन्ति यथैऽनं यज्ञ उपनस्यतीति ॥४॥ १॥१४॥ तृतीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । देवा वै स्वर्ग लोकमैप्सन् । तं न शयाना नाऽऽसीना न तिष्ठन्तो न धावन्तो नैव केनचन कर्मणाऽऽप्नुवन् ॥१॥ ते देवाः प्रजापतिमुपाधावन स्वर्ग बै लोक मैप्सिष्म । तं न शयाना १ देवत । २ अोम् । ३ एस्म । ४ देवश्रेत् । देवश्रूत् । एवश्रूत्।५-नं। १-ऽऽशीना । २-त्यो। ३ उपाय- M R + nani NE BAD - ( १५ ) नाऽऽसीना न तिष्ठन्तोन धावन्तो नैव केनचन कर्मणाऽऽपाम । तथा नोऽनुशाधि यथा स्वर्ग लोकमाप्नुयामेऽति ॥२॥ तानब्रवीत् सान्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्पयातेऽति । ते साम्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्प्रायन् ॥ ३॥ प्र वा इमे साम्नाऽगुरिति । तस्मात्प्रसाम तस्मादु प्रसाभ्यन्नमत्ति ॥४॥ देवा वै स्वर्ग लोकमायन् । त एता- न्युक्पदानि शरीराणि धून्वन्त आयन् । तेस्वर्गलोकमजयन्॥५॥ तान्या दिवः प्रकीर्णान्यशेरन् । अथेऽमानि प्रजापतिर्ऋक्पदानि शरीराणि सञ्चित्याऽभ्यर्चत् । यदभ्यर्चत्ता एव!ऽभवन् ॥६॥ १॥ १५॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सैऽवर्गभवदियफ्रेव श्रीः । अतो देवा अभवन् ॥१॥ अथैऽषामिमाममुरारिश्रयमविन्दन्त । तदेवाऽऽसुरमभवत् ॥२॥ ते देवा अब्रुवन् या वै नश्श्रीरभूदविदन्त तामसुरः । कथं न्वेषा- मिमांश्रियम्पुनरेव ज्येमेऽति ॥३॥तेऽब्रुवन्नृच्येव साम गायामेति । । ४ प्रयामे । ५प्रयाते, प्रधामे, प्रयामे। लोकंमप्रायत् । ७ इसके बाद कुछगड़ बड़ है। ५ के पूर्व यह सब में लिखा है 'तएतान्य॒क्पदानि शरीराणि धून्वन्त आयन् (पयन् )। ते खर्गलोकमजयन् (-अत्)। अथेऽमानि प्रजापतिर् ...ता एव!ऽभवन् । ८ यत् । प्रोम् । ते स्वर्ग अजयन् , यहांअधिक है। १० प्रोम् । यद्......। ११ ओम् । ता एव । १ प्रास-२ तद् । ३ एवा । ४ विन्दन्त । ५ अव।
... ( १६ ) १० ते पुनः प्रत्याद्रुत्याचे सामाऽगायन् । तेनाऽस्माल्लोकाद- मुराननुदन्त ॥४॥ तद्वै माध्यन्दिने च सवने तृतीयसवने च न!ऽपराधोऽस्ति । स यत्ते ऋचि गायति तेनाऽस्माल्लोकाद् द्विषन्तम्भ्रातृव्यं नुते । अथ यदमृते देवतासु प्रातस्सवनं गायति तेन स्वर्ग लोकमेति ॥॥ प्रजापति सान्नेऽमां जितिमजयद्याऽस्ये ऽयं जितिस्ताम् । स स्वर्ग लोकमारोह ॥६॥ ते देवाः प्रजापति- मुपेत्याऽबुधभरमभ्यमपीऽदं साम प्रयच्छति । तथेति । तदेभ्य- स्साम प्रायच्छत् ॥७॥ तदेनानिदं साम स्वर्ग लोकं नाकामयत वोढुम् ॥८॥ ते देवाः प्रजापति मुपेत्याऽब्रुवन् यद्वै नस्साम प्रादा इदं वै नस्तत्वर्ग लोकं न कामयते वोडमिति ॥६॥ तद्वै पाप्मना संसृजतेति । कोऽस्य पाप्मेति । ऋगिति । तद्दचा समसृजन् ॥१०॥ तदिदम्प्रजापतेर्गहयमाणमतिष्ठदिदं वै मा तत्पाप्मना सम- सातुरिति । सोऽब्रवीयस्त्वैतेन न्यावर्तयाइयेव स पाप्मनावर्ताता इति ॥२२॥ स य एतचा प्रातस्संक्ने व्यावर्तयति व्येवं स पाप्मना वर्तते ॥१२॥ १ ॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ६-दुच्यत्य । ७ त्रीत्-1-पराथो। ई-र्चि। १०-नृते । ११ तम्। १२ अर -१३ न कामायते, न कामयते । १४ कामाय-, सामय्, । १५संत्र-। १६ एव ।
( १७ ) तदाहुर्यदोवा ओवा इति गीयते कात्रभवति क सामेति।।१।। प्रस्तुवनेवाष्टाभिरक्षरैः प्रस्तौति । अष्टाक्षरा गायत्री। अक्षरमक्षरं व्यक्षरम् । तच्चतुर्विशतिस्सम्पधन्ते। चतुर्विशसक्षरा गायत्री ॥२॥ तामेताम्प्रस्तावेनचमाप्चा या श्रीर्याऽपचितिर्यस्वर्गोलोको यद्यशो यदन्नाझं तान्यागायमान प्रास्ते ॥३॥ ॥१७॥ २ चतुर्थेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । १ प्रजापतिर्देवानसृजत । तान् मृत्युः पाप्मान्वसृज्यत ॥१॥ ते देवा प्रजापतिमुपेसाब्रुवन् कस्मादु नोऽपृष्ठा मृत्युंचेन्नः पाप्मा- नमन्ववस्रक्ष्यन्नासिथेति ॥२॥ तानब्रवीच्छन्दसि सम्भरत । तानि यथायतनम्प्रविशत ततो मृत्युना पाप्मना व्यावय॑थेति ॥३॥ वसवो गायत्री समभरन् । तां ते प्राविशन् । तान् साऽच्छादयत् ॥४॥ रुद्रास्त्रिष्टुभं समभरन् । तां ते प्राविशन् । तान साऽच्छाद- यत् ॥शा आदिसा जगतीं समभरन् । तां ते प्राविशन् । तान् साऽच्छादयत् ॥६॥ विश्वेदेवा अनुष्टुभं समभरन्।तांते प्राविशन्। तान् साऽच्छादयत् ॥७॥ तान् अस्यामृच्यवरायाम्मृत्युनिरजा- १. प्रस्तावेप्रस्तवेन । २-। १. ता, ताः। २ करमा । ३-ष्टा । ४-सृक्षन्न् । ५-शर ६-बक्स्य्, वत्स्य्-७च्छादू, याम् ।
NE । ( १८ ) नाद्यथा मणौ मणिसूत्रम्परिपश्येदेवम् ॥८॥ ते स्वरम्प्राविशन् । तान स्वरे सतो न निरजानात् । स्वरस्य तु घोषेणाऽन्वैत् ॥६॥ त ओमिसेतदेवाक्षरं समारोहन् । एतदेवाक्षरं त्रयीविद्या । यददो ऽमृतं तपति तत्प्रपद्य ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्तन्त ॥१०॥ एवमेवैवं विद्वान् प्रोमिसेतदेवाक्षरं समारुह्य यददोऽमृतं तपति तत्प्रपद्य ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्ततेऽथो यस्यैवं विद्वानुद्गा- ૬ ૨ यति ॥११॥ ॥१८॥ चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ on अथैतदेकविंशं साम ॥२॥ तस्य त्रय्येव विद्या हिङ्कारः । अग्निर्वायुरसावादिय एष प्रस्तावः । इम एव लोका आदिः । तेषु हीदं लोकेषु सर्वमाहितम् । श्रद्धा यज्ञो दक्षिणा एष उद्गीथः। दिशोऽवान्तरदिश आकाश एष प्रतिहारः। आपः प्रजा ओषधय एष उपद्रवः । चन्द्रमा नक्षत्राणि पितर एतानिधनम् ॥२॥ तदेतदेकविंशं साम । स य एवमेतदेकविंशं साम वेदैतेन हास्य ८-यैद् । ६ नास्ति । १० ओ । ११-पेद् । १२ एदो, प्रो । १. त्रै। २ वावायुर् । ३ येषु । ४-ज्ञा ।
सर्वणोद्गीतम्भवयेतस्माद्वेव सर्वस्मादाश्च्यते य एवं विद्वांसमुप- वदति ॥३॥ ॥१६॥ पश्चमाऽनुवाकस्समाप्तः । १ ३ १ इदमेवेदमग्रेऽन्तरिक्षमासीत् । तदेवाप्येतहि ॥१॥ तद्यदेतदन्तरिक्ष य एवाऽयम्परत एतदेवान्तरिक्षम्। एष ह वा अन्तरिक्षनाम् ॥२॥ एष उ एवैष क्तितः तथा काष्ठेन पलाशे विष्कब्धे स्यातामक्षेण वा चक्रावेवमेतेनेमो लोकौ विष्कब्धौ ॥३॥ तस्मिन्निदं सर्वमन्तः। तघदस्मिन्निदं सर्वमन्तस्तस्मादन्तर्यक्षम् । अन्तयेतं हवै नामैतत् । तदन्तरिक्षमिति परोक्षमाचक्षते ॥४॥ तद्यथा मूताःप्रबद्धाः प्रलम्बे- रन्ने हैतस्मिन्सर्वे लोकाः प्रबद्धाः प्रलम्बन्ते ॥।॥ तस्यैतस्य सान्नस्तिस्त्र आगास्त्रीण्यागीतानि षड्विभूतयश्वतमः प्रतिष्ठा दश प्रगास्सप्त संस्था द्वौ स्तोभावेक रूपम् ॥६।। तद्यास्तिस्त्र आगा इम ते लोकाः ॥७॥ अथ यानि (त्रीण्य) आगीतान्यग्निर्वायुरसा १ ૧ ૨ ५-अस् । ६ प्रावृच्योते। १-रीक्ष-२ अधिक है 'एष ह वा अन्तरीक्षम् । ३ एवम् । ४ नास्ति । ५-क्षोना-1 ६ नवम् । ७ एतन । ८ नास्ति । तद् अन्तस् । नास्ति । १०-बन्द-११-नंसू । १२ अगमाः । १३ एक- रैपम्, एकरूपम् । १४ लो।
। । kaise वादिय एतान्यागीतानि । न ह वै कांचनश्रियमपरानोति य एवं १ वेद ॥८॥ ॥२०॥ षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। अथ याष्षड्विभूतय ऋतवस्ते ॥११॥ अथ याश्चतस्रः प्रतिष्ठा इमा एव ताश्चतस्रोदिशः॥२॥ अथ ये दश प्रगा इम एव ते दश प्राणाः ॥३॥ अथ यास्सप्त संस्था या एवैतास्सप्ताहोरात्राःमाची- वषट्कुर्वन्ति ता एव ताः ॥४॥ अथ यौ द्वौ स्तोभावहोरात्रे एव- ते ॥५॥ अथ यदेकंरूपं कर्मव तत् । कर्मणा हीदं सर्व विवियते ॥६॥ तस्यैतस्य सानोदेवा आजिमायन् । स प्रजापतिहरसा हिङ्कारमुदजयदग्निस्तेजसा प्रस्तावं रूपेण बृहस्पतिरुद्गीथं स्वधया पितरः प्रतिहारं वीर्येणेन्द्रोनिधनम् ॥७॥ अथेतरे देवा अन्तरिता इवासन् । त इन्द्रमब्रुवन् तब वै वयं स्मोऽनुन एतस्मिन् सामन्ना- भजेति॥८॥तेभ्यस्वरम्प्रायच्छत् ।तम्प्रजापतिरब्रवीत्कयेथमकः। सर्व वा एभ्यस्साम प्रादाः। एतावद्वाव साम यावान खरः ऋग्वा एषर्ते स्वराद्भवतीति ॥६॥ सोऽब्रवीव पुनर्वाग्रहमेषामेतंरसमादा- स्य इति । तानब्रवीऽदुप मा गायत । अभि मा खरतेति । तथेति १ बास्ति । सप्त 'एतास् । २-या। ३ वर्ष-1 ४ वद् । परे । इ-सं। ७ तावव । ८-रम । सवर्-१० एषो, एषोम् ।
। नई योजना । H Catest नील R (.२१ ) ॥१०॥ तमुपागायन् । तमभ्यस्वरन् । तेषाम्पुनारसमादन ॥११॥ १॥२१॥ षष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स यथा मधुधाने मधुनाळीभिर्मध्वासिञ्चादेवमेव तत्सामन् पुना रसमासिञ्चत् ॥१॥ तस्मादु ह नोऽपगायेत् । इन्द्र एष यदुद्गाता । स यथा सावभीषां रसमादत्त एवमेष तेषां रसमादत्ते ॥२॥ कामं ह तु यजमान उपगायेयजमानस्य हि तद्भवसथो ब्रह्म- चार्याचार्योक्तः ॥३॥ तदु वा आहुरुपैव गायेत् । दिशो छुपागा- यन दिशामेवं सलोकतां जयतीति ॥४॥ ते य एवेमे मुख्या: प्राणा एत एबोदातारश्चोऽपगातारश्च । इमे ह त्रय उद्गातार इम उ चत्वार उपगातारः ॥॥ तस्मादु चतुर एवोऽपगातॄन कुर्वीत। तस्मादुहोऽपगातॄन् प्रसभिमशेद्दिशस्स्थश्रोत्रं मे माहिसिष्टेति ॥६॥ स यस्स रस आसीध एवायम्पवत एष एव स रसः॥७॥स यथा मध्वालोपमद्यादितिह स्माह सुचित्तश्शैलन एवमेतस्य रसस्यात्मान- म्पूरयेत।सएवोद्गातात्मानंच यजमानंचामृतत्वंगमयतीति।।८॥१२२ षष्ठेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः । १-धने । २ 'स' अधिक पढ़ो। ३-यत् । ४-शम् । ५ एवं। ६ वा ७ऽदा-,-तृन् ।८-तृन् । PRESS । Sarani . ( २२ ) अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाप्येतहि ॥१॥ १ ર ३ ६ स यस्स आकाशो वागेव सा । तस्मादाकाशाद्वाग्वदति ॥२॥ तामेतां वाचम्प्रजापतिरभ्यपीळयत् । तस्या अभिपीळितायै रसः प्राणेदत् । त एवेमे लोका अभवन ॥३॥स इमाँ लोकानभ्यपीळयत् । तेषामभिपीळितानां रसः प्राणेदत् । ता एवैता देवता अभवन्नाग्नि- र्वायुरसावादिस इति ॥४॥ स एता देवता अभ्यपीळयत् । तासामभिपीळितानां रसः प्राणे इत् । सा त्रयीविद्याभवत् ॥५॥ स त्रयीं विद्यामभ्यपीळयत्। तस्या अभिपीळितायै रसः प्राणेदत् । ता एवैता व्याहृतयो ऽभवन भूर्भुवस्स्वरिति ॥६॥ स एता व्या- हतीरभ्यपीळयत् । तासामभिपीन्तिानां रसः प्राणेदत् । तदेतद- क्षरमभवदोमिति यदेतद् ॥७॥ स एतदक्षरमभ्यपीळयत् । तस्या- ऽभिपील्तिस्य रसः प्राणेदत् ॥८॥ ॥२३॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । तदक्षरदेव । यदक्षरदेव तस्मादक्षरम् ॥१॥ यद्वेवाक्षरं ना- क्षीयत तस्मादक्षयम् । अक्षयं ह वै नामैतत् । तदक्षरमिति १. एता वा। २. रसम् । ३. “स त्रयीम्' 'रसम् (!) प्राणेदत्' अधिक है । ४. नास्ति । ५-मा | नास्ति । स त्रयीम 'प्राणेदत् । ७-या।
( २३ ) परोक्षमाचक्षते ॥२॥ तद्धैतदेक ओमिति गायन्ति । तत्तथा न गायेत । ईश्वरो हैनदेतेन रसेनान्तर्धातोः । अथो २ इवैवम्भवत ओमिति । ओ इत्यु हैके गायन्ति । तदु ह तन्न गीतम् । नैव तथा गायेत् । ओं इसेव गायेत् । तदेनदेतेन रसेन सन्दधाति॥३॥ तदेतं रसं तर्पयति । रसस्तृप्तोऽक्षरं तर्पयति । अक्षरं तृप्तं व्याहृती स्तर्पयति । व्याहृतयस्तृप्तावेदाँस्तर्पयन्ति । वेदास्तृप्ता देवतास्तर्प- यन्ति । देवतास्तृप्तालोकाँस्तर्पयन्ति। लोकास्तृप्ता अक्षरं तर्पयन्ति। अक्षरं तृप्तं वाचं तपर्यति । वाक् तृताकाशं तर्पयति । आकाशस्तृप्तः प्रजास्तर्पयति । तृप्यति प्रजया पशुभिर्य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुदायति ॥४॥ १॥२४॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः । ११ १२ ३ अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् स उ एवाप्येतहि ॥२॥स यस्स आकाश आदिस एव स । एतस्मिन् (हा) उदिते सर्व- मिदमाकाशते ॥२॥ तस्य मामृतयोवै तीराणि समुद्र एव । २ या-1३-थे। ४ , । ५ नास्ति । ६ नि-७ ने एव। ८ अो।६ अक्षरं "वाचं तर्पयति यह पाठ नहीं। १०-यन्ति । ११ वार्कस् । १२ गाय त । १ दव (!)।२ सुदिते । ३ वैर्व । ४ तरली।
E । । । Menopries ( २४ ) १० ૬ ૨ तद्यत्समुद्रेणं परिगृहीतं तन्मृत्योराप्तमथ यत्पर तदमृतम् ॥३॥ स यो ह स समुद्रो य एवायम्पवत एष एव स समुद्रः । एतं हि संद्रवन्तं सर्वाणि भूतान्यनुसंवन्ति ॥४॥ तस्य द्यावापृथिवी एव रोधसी । अथ यथा नयां कंसानि वा महीणानि स्युस्सरॉसि बै- व मस्यायम्पार्थिवस्समुद्रः ॥५॥ स एष पार एव समुद्रस्योदेति । स उद्यन्नेव वायोः पृष्ठ आक्रमते । सोऽमृतादेवोदोति । अमृतमनु- संचरति । अमृते प्रतिष्ठितः॥हातस्येतत् त्रिवद्रूपम्मृसोरनाप्तं शुक्लं कृष्णम्पुरुषः ॥७॥ तद्यच्छुल्लं तद्वाचोरूपमृचोऽग्नेर्मुसोः । सा या सा वाक् सा । अथ योऽग्निर्मृत्युस्सः ॥८॥ अथ यत्कृष्णं तदपां रूपमन्नस्य मनसोयजुषः । तद्यास्ता प्रापोऽन्नं तत् । अथ यन्मनो १२ यजुष्टत् ।।६।। अथ यः पुरुषस्स प्राणस्तत्साम तद्ब्रह्म तदमृतम् । १ स या प्राणस्तत्साम । अथ यद्ब्रह्म तदमृतम् ॥२०॥ ॥२५॥ अष्टमेनुवाके प्रथमः खण्डः। प्रथाध्यात्मम् । इदमेव चतुस्त्रिच्छुल्लं कृष्णम्पुरुषः ॥२॥ तबच्छुल्ल तद्वाचो रूपमृचोऽग्नेमसोः । सा या सा वागृक् सा। ५-गृण्ह-इन्द्रे- ७ अनु-८-या। -याम् । १० कसा- नि।११ महीणहीनि । १२ अधिक है 'सस्. स । १३ प्रतितिष्ठतः। १४ वाक्ग, वाग्म् । १५ ऋत् । १६ अन्नमस्य । १७ नास्ति, तद्या:-यः पुरुषसू॥ १ नृत् । २ अधिक क्सा ( २५ ) अथ योऽनिर्मृत्युस्सः ॥२॥ अथ यत्कृष्णं तदपा रूपमन्नस्य मनसो यजुषः । तथास्ता प्रापोऽनं तत् । अथ यन्मनो यजुष्टत् ॥३॥ ३ अथ यः पुरुषस्स प्राणस्तत्साम तद्ब्रह्म तदमृतम् । स यः प्राण- स्तत्साम । अथ यब्रह्म तदमृतम् ॥४॥ सैऽषोऽत्क्रान्तिब्रह्मणः । अथातः पराक्रान्तिः ॥५॥ सा या साऽऽक्रान्तिर्विद्युदेव सा । स यदेव विद्युतो विद्योतमानायै श्येत रूपम्भवति तद्वाचो रूपमृचो- ऽमेमसोः ॥६॥ यदेव विद्युतस्संद्रवन्यै नीलं रूपम्भवति तदा रूपमन्नस्य मनसो यजुषः ॥७॥ य एवैष विद्युति पुरुषस्स पाण- ९ स्तत्साम तब्रह्म तदमृतम् । स यः प्राणस्तत्साम । अथ यहह्म तदमृतम् ॥८॥ १॥२६॥ अष्टमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स हैषोऽमृतेन परिढो मृत्युमध्यातेऽनं कृत्वा ॥२॥ अथै- ऽष एव पुरुषो योऽयं चतुषि । य आदिले सोऽतिपुरुषः । यो विद्युति स परमपुरुषः॥२॥ एते हवाच त्रयः पुरुषाः। या हास्यैते जायन्ते ॥३॥ स योऽयं चक्षुष्येषोऽनुरूपो नाम । अन्वङ् वेष ३ ३-षो । सू (!)। ४-तू । ५ नास्ति । ६ चैतं । ७-ल-1-थे। १-सी । २-यो। ३-यो, पा, प ! ४-वज । ५ ह्र ।
AL - st . ( २६ ) सर्वाणि रूपाणि । तमनुरूप इत्युपासीत । अन्वश्चि हैनं सर्वाणि रूपाणि भवन्ति ॥४॥ य आदिसे स प्रतिरूपः । प्रसङ् ह्येष सर्वाणि रूपाणि । तम्प्रतिरूप इत्युपासीत । प्रयश्चि हैनं सर्वाणि रूपाणि भवन्ति ॥५॥ यो विद्युति स सर्वरूपः। सर्वाणि होतस्मिन् रूपाणि । तं सर्वरूप इत्युपासीत । सर्वाणि हाऽस्मिन् रूपाणि भवन्ति ॥६॥ एते ह वाव त्रयः पुरुषाः । प्रा हाऽस्यैते जायन्ते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥७॥ ॥२७॥ अष्टमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अष्टमोऽनुवाकरसमाप्तः । अयमेवेदमग्र आकाश पासीत् । स उ एवाप्येतहि ॥१॥स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्र एष एवं स य एष एवं तपति । स एष सप्तरश्मिदृषभस्तुविष्मान्॥२॥ तस्य वायो रश्मिः प्राइ प्रतिष्ठितः । सा या सा वागग्निस्सः । स दशधा भवति शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा नियुतधाऽर्बुदधा न्यर्बुदधा निखर्वधा पनमक्षितियोमान्तः ।। ३॥ स एष एतस्य रश्मिा- -ची, वनी, वं। ७ नम् । ८ प्रत्यं । ई अधिक है रूपाणिः'नास्ति-तं रूपाणि। १नास्ति । २ अ-३ निखर्वाचं-ति । ५-त, स्सोम्- ........... * ways HERE ।
। M ग्भूत्वा सर्वास्वासु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्च वदसतस्यैव रश्मिना वदति ॥४॥ अथ मनोमयो दक्षिणा प्रतिष्ठितः । तद्य- तन्मनश्चन्द्रमास्सः । स दशधा भवति॥॥ स एष एतस्य रश्मिर्मनो भूत्वा सर्वावामु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्चमनुत एतस्यैव रश्मिना मनुते ॥६॥ अथ चतुर्मयः प्रसङ् प्रतिष्ठितः।तयत्तश्चतु- रादिसस्सः । स दशधा भवति ॥७॥ स एष एतस्य रश्मिचतु- भूत्वा सर्वाखामु प्रजासु प्रसवस्थितः। स यः कश्च पश्यत्तस्यैव रश्मिना पश्यति ॥८॥अथ श्रोत्रमय उदङ्मतिष्ठितः। तद्यत्तच्छ्रोत्रं दिशस्ताः । स दशधा भवति ॥३॥ स एष एतस्य रश्मिश्श्रोत्र- म्भूत्वा सर्वावासु प्रजासु प्रसवस्थितः। स यः कश्च शृणोसेतस्यैव रश्मिना ऋणोति ॥१०॥ १॥२८॥ नवमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । प्रय प्राणमय ऊर्ध्वः प्रतिष्ठितः । स यस्स प्राणो वायुस्सः । स दशधाभवति ॥१॥ स एष एतस्य रहिमः प्राणोभूत्वा सर्वाखामु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्च प्राणिसेतस्यैव रश्मिना माणिति ६ पश्यति । ७ पश्यति । ८ नास्ति । दक्षणा । १० मन्वश् । ११ चत्तुम-। १२-य। १३ वस्थितः । १४ त, नास्ति। १५प्रत्यवस्थितः॥ १-स्य-1२नास्ति। in (२८ ) ३ ७ ॥२॥ अथाऽसुमयस्तिर्य प्रतिष्ठितः । स ह स ईशानो नाम । स दशधा भवति ॥३॥ स एष एतस्य रश्मिरमुर्भूत्वा सर्वाखामुमजाम प्रसवस्थितः । स यः कश्चाऽसुमानेतस्यैऽव रश्मिनाऽसुमान् ॥४॥ अथाऽन्नमयोऽर्वाङ् प्रतिष्ठितः । तद्यत्तदनमापस्ताः । स दशधा भवति शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा नियुतधाऽर्बुदधान्यर्बुदधा निखर्वधा पद्ममक्षितियोमान्तः ॥॥सएष एतस्य रश्मिरन्नम्भूत्वा सर्वांखासु प्रजामु प्रसवस्थितः । स यः कश्चाश्नासेतस्यैव रश्मिना- नाति॥६॥स एष सप्तरश्मिदृषभस्तुविष्मान् । तदेतदृचाऽभ्यनूच्यते यस्सप्तरश्मिवृषभस्तुविष्मानवासृजत्सर्त सप्तसिन्धून् । योरौहिणमस्फुरद्वबाहु-मारोहन्तंसजनास इंद्रइति ॥७॥ यस्मप्रश्मिरिति । सप्त ह्येत आदियस्य रश्मयः । वृषभ इति । एष ह्येवाऽऽसाम्प्रजानामृषभः। तुविष्मानिति । महीयैऽवा स्यैषा ॥८॥ अवासजत् सर्तवे सप्तसिन्धूनिति । सप्त तेसिन्धवः । १३ १४ स्थान खाली है 'स ई' । ४-वन्ति । ५ ' यत्' के पश्चात् 'तत्बुदं नाम' पाठ है, तदन्नम्..."स' नहीं है । ६ अन्नम्। ७ तेदा, स्त । ८ निखर्वाचम्, निखर्वधाच । ६ बं.म-1 १० सामाख ११ नास्ति तदेतद् "वृषभस्तुविष्मान् । १२ रोह- १३-हु । १४-त । १५ महये। । ।
१ (.२६ ) तैरिदं सर्व सितम् । तदेतैरिदं सर्व सितं तस्मात्सिन्धवः ॥६॥ यो रोहिणमस्फुरद्ववाहुरिति । एष (हि) रौहिणमर फुरद्वजाबाहुः ॥१०॥द्यामारोहन्तं स जनास इन्द्र इति । एप हीन्द्रः॥१२॥१२६।। नवमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। तधथा गिरिम्पन्थानस्समुदियुरिति हस्माऽऽह शाट्यायनि- रेवमेत आदिसस्य रहमय एतमादित्यं सर्वतोऽपियन्ति । स हैवं विद्वानोमिसाददान एतैरेतस्यरश्मिभिरेतमादिसंसर्वतोऽप्यति॥१॥ तदेतत् सर्वतो द्वारमनिषेध साम । अन्यतोद्वारं हैऽनदेक एवा- भ्रङ्गमुपासते । अतोऽन्यथाविद्युः ॥२॥ अथ य एतदेवं वेद स एवैतत् सर्वतो द्वारमनिषेधं सामवेद ॥३॥सा एषा विद्युत् । (यद) एतन्मण्डलं समन्तम्परिपतति तरसाम । अथ यत्परमतिभाति स पुण्यकृसायै रसः। तमभ्यतिमुच्यते ॥४॥ तदेतदभ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते । स यथेन्द्रो न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥॥॥३०॥ नवमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। नवमोऽनुवाकस्समाप्तः । १६ स्थान खाली है-हन्-वाला,हत्तं । १ एवम् । २ तिप्रतिवियन्ति। ३ अनुष्-१४ नास्ति । ५ नत, त। ६नास्ति । ७ एताव, एता ।८ गम्१६ एतो। १० विदुः। ११-तृधि ।
NAYA ( ३० ) अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाऽप्येतहि । स १ यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्रस्सामैवतत्॥॥तस्यै- तस्य साम्न इयमेव प्राचीदिग्धिकार इयम्प्रस्ताव इयमादिरियमुद्री- थोऽसौ प्रतिहारोऽन्तरिक्षमुपद्रव इयमेवनिधनम् ॥२॥ तदेतत्सप्त- विधं साम । स य एवमेतत्सप्तविधं साम वेद यत्किञ्चप्राच्यादिशि या देवता ये मनुष्या ये पशवो यदन्नाचं तत्सर्वं हिडारणामोति ॥३॥ अथ यद्दक्षिणायां दिशि तत्सर्वं प्रस्तावेनामोति॥४॥अथ यत्पतीच्यां दिशि तत्सर्वमादिनामोति ॥५॥ अथ यदुदीच्यांदिशि तत्सर्वमुद्गीथेनामोति ॥६॥ अथ यदमुष्यां दिशितत्सर्वम्पतिहारेणा- मोति ॥७॥ अथ यदन्तरिक्ष तत्सर्वमुपद्रवेणामोति ॥८॥ अथ यदस्यां दिशि या देवता ये मनुष्या ये पशवो यदनाद्यं तत्सर्व निधनेनामोति ॥३॥ सर्व हैवाऽस्याऽऽतम्भवति सर्व जितं न हा- ऽस्य कश्चन कामोऽनाप्तो भवति य एवं वेद ॥१०॥ स यद्धकिञ्च किञ्चैवं विद्वानेषु लोकेषु कुरुते खस्य हैव तत्स्वतः कुरुते । तदे- तहचाऽभ्यनूच्यते ॥११॥ २३॥ दशमेऽनुवाके प्रथमः खगः । १ दी । २-ईच । ३ एत् । ४ 'मनुष्या' अधिक है। ५-वा। है यहां चौथा श्लोक (मन्त्र) अधिक है और साथ ही प्रतिहारेण 'प्रस्तावेन के स्थान में। अन्या' अधिक है। दचियायांदिशि॥
। ४ यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतम्भूमीस्त स्युः। न त्या वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी इति ॥१॥ यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतम्भूमीरुतस्युरिति । यच्छतंद्यावस्स्युश्शत- म्भूम्यस्ताभ्य एप एवाऽऽकाशो ज्यायान् ॥२॥ नत्वा वजिन्सहस्रं सूर्या अन्विति । न ह्येतं सहनं चन सूर्या अनु ॥३॥ न जातमष्ट रोदसी इति । न ह्येतं जातं रोदन्ति । इमे ह वाव रोदसीताभ्या- मेष एवाकाशो ज्यायान् । एतस्मिन् वैते अन्तः ॥४॥स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्र एष एव स य एषतपति ।।। स एषोऽभ्राण्यतिमुच्यमान एति । तद्यथैषोऽभ्राण्यतिमुच्यमान एसेवमेव स सर्वस्मात्पाप्मनोऽतिमुच्यमान इति य एवं वेदायो यस्यैवं विद्वानुदायति ॥६॥ १॥३२॥ दशमेनुवाके द्वितीयः खण्डः । दशमोऽनुवाकस्समाप्तः । त्रिवृत्साम चहुष्पात् । ब्रह्म तृतीयमिन्द्रस्तृतीयम्प्रजापति- स्तृतीयमनमेव चतुर्थः पादः ॥२॥ तद्वै ब्रह्मस प्राणोऽय य इन्द्र- १ नास्ति । २-यां। ३ नास्ति । ४-यन् । ५ नास्ति,स-स। स्थान खाली 'ए' तक। -मानय, पमानय॥ १त्रित्- -anand (३२ ) स्सा वागध यः प्रजापतिस्तन्मनोऽनमेव चतुर्थः पादः ॥२॥ मन एव हिङ्कारो वाक्मस्तावः प्राण उद्गीथोऽनमेव चतुर्थः पादः ॥३॥ करोखेव वाचा जयति प्राणोन गमयति मनला। तदेतन्निरुद्धं यन्मनः। तेन यत्र कामयते तदात्मानं च यजगानं च दधाति ॥४॥ अथाधि- दैवतम् । चन्द्रमा एव हिडारोऽनिः प्रस्ताव आदिस उद्गीथ आप एव चतुर्थः पादः । तद्धि प्रसक्षगन्नम् ॥शा ता वा एता देवता अमावास्यां रात्रि संयन्ति । चन्द्रमा अमावास्यां रात्रिमादिसम्प्र- विशत्यादित्योऽभिम् ॥ ६॥ तद्यत्संयन्ति तस्मात्साम । स ह वै सामवित्स साम वेद य एवं वेद ॥७॥ तासां वा एतासां देवतानामे- कैकैक देवता साम भवति ॥८॥ एष एवादित्यस्त्रिवञ्चतुष्पाद्रश्मयो मण्डलम्पुरुषः । रस्मय एव हिडारः । तस्मात्ते प्रथमत एवोद्यत- स्तायन्ते । मण्डलम्प्रस्तावः पुरुष उद्गीथो या एता प्रापोऽन्तस्स एव चतुर्थः पादः ॥सा एवमेव चन्द्रमसो रश्मयो मण्डलम्पुरुषः । रममय एव हिडारो मण्डलम्प्रस्तावः पुरुष उगीयो या एता आपोऽन्त स्स एव चतुर्थः पादः॥१०॥ चत्वार्यन्यानि चत्वार्यन्यानि। तान्यष्टौ। अष्टाक्षरा गायत्री गायत्रं साम ब्रह्म उ गायत्री । तदु ब्रह्माऽभि- सम्पद्यते । अष्टाशफाः पशवन्तनोपशव्यम् ॥११॥ ॥३३॥ एकादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। २-देवतू-१३-अम्।४-या।५ सय-1-७नास्तिाउदा-त्री, ॥
R अथाऽध्यात्मम् इदमेव चतुस्थिञ्चतुष्पाच्छुक्लं कृष्णम्पुरुषः। शुक्लमेव हिङ्कारः कृष्णम्प्रस्तावः पुरुष उद्गीथो या इमा प्रापोऽन्तस्स एव चतुर्थः पादः॥शाइदमादिसस्यायनमिदं चन्द्रमसः। चत्वारीमान चत्वारीमानि । तान्यष्टौ। अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रसाम ब्रह्म उगा- यत्री । तदु ब्रह्माभिसम्पद्यते । अष्टाशफाः पञ्चवस्तनोपशव्यम्॥२॥ स यो ऽयम्पवते स एष एवं प्रजापतिः । तद्वेव साम। तस्यायं देवो योऽयं चक्षुषि पुरुषः । स एष आहुतिमतिमसोत्क्रान्तः॥३॥ श्रथ' यावेवौ चन्द्रमाश्चादिखश्च यावेतावप्मु दृश्येते एतावेतयोर्दैवौ ॥४॥ बद्ध वा इदमाहुर्देवानां देवा इत्येते हते । त् एत आहुतिमतिमयो- कान्ताः ॥॥ तद्ध पृथुर्वैन्यो दिव्यान्वाखान्पप्रच्छ येभिर्वात इषितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशस्समीचीः । य आहुतीरत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे ता- सन्निति॥६॥ते ह प्रत्यूचु रिमामेषाम्पृथिवीं वस्तएको- ऽन्तरिक्षम्पर्येको बभूव । दिवमेको ददते यो विधर्ता विश्वा अाशाः प्रतिरक्षन्त्यन्य इति ॥७॥ इमामेषाम्पृथिवीं १-पाद-२ नास्ति । ३-यते। ४ एता उ । ५ तान् । ६ एभिर् । ७ दशस, दश। -ई। इत्यम्-१० पराङ् । ११-ईच-१२-धत्ता। ५. १३ अन्य।
वस्त एक इसग्निर्हसः॥८॥अन्तरिक्षम्पर्येकोबभूवेति वायुह सः।।। दिवमेको ददते यो विधर्तेऽसादियो ह सः ॥१०॥ विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्सन्य इति । एता ह वै देवता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्ति चन्द्रमा नक्षत्राणीति। ता एतास्सामैव ससोव्यूढोऽन्नाधाय ॥१२॥ एकादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । एकादशोऽनुवाकस्समाप्तः । १ Vi अर्थतत्साम । तदाहुस्संवत्सर एव सामेति ॥१॥ तस्य वसन्त एव हिङ्कारः। तस्मात्पशवो वसन्ता हिकरिक्रतस्समुदायन्ति ॥२॥ ग्रीष्मः प्रस्तावः । अनिरुक्तो वै प्रस्तावोऽनिरुक्त ऋतूनां ग्रीष्मः ॥३॥ वर्षा उद्गीथः । उदिव वै वर्षगायति ॥४॥ शरत्प्रतिहारः। शरादि ह खलु वै भूयिष्ठा ओषधयः पच्यन्ते॥शा हेमन्तो निधनम् । निधनकृता इव वै हेमन्मजा भवन्ति ॥६॥ तावतावन्तौ संधत्तः। एतदन्वनन्तस्संवत्सरः। तस्यैतावन्तौ यद्धेमन्तश्चवसन्तश्च । एतदनु ग्रामस्यान्तौ समेतः। एतदनु निष्कस्यान्तौ समेतः।एतदन्वहि - गान्पर्याहृयशये ॥७॥ तद्यथा हवै निष्कस्समन्तं ग्रीवा अभिपर्यक्त ३ १४ विधर्ते, विधत्ते । १५ अन्न--'-याया। १-करिकुतस्,-करिकृतम् । २ नास्ति । ३-तत् । ४ सवतू- श्री-यत्तः। girietorys 15 PAL ना - -- । s ( ३५ ) । एवमनन्तं साम । स य एवमेतदनन्तं साम वेदानन्ततामेव जयति ॥८॥ १॥३॥ द्वादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। अथैतत्पर्जन्ये साम । तस्य पुरोवात एव हिङ्कारः। अथ य- दभ्राणि सम्प्लावयति स प्रस्तावः अथ यत् स्तनयति स उद्गीथः। अथ यद्विद्योतते स प्रतिहारः । अथ यद्वर्षति तनिधनम् ॥२॥ तदेतत्पर्जन्ये साम । स य एवमेतत्पर्जन्ये साम वेद वर्षको हास्मै पर्जन्यो भवति ॥२॥ अथैतत् पुरुषे साम । तस्यायमेव हिङ्कारो- ऽयम्प्रस्तावोऽयमुद्गीथोऽयम्प्रतिहार इदं निधनम् ॥३॥तदेतत्पुरुषे साम । स य एवमेतत्पुरुषे साम वेदोऽऽध एव प्रजया पशुभिरा- रोहन्नेति ॥४॥ य उ एनत्यग्वेद ये प्रसञ्चो लोकास्ताअयति । तस्यायमेव हिङ्कारोऽयम्प्रस्तावोऽयमुद्गीथोऽयम्प्रतिहार इदं निधनम् । ये प्रसञ्चो लोकास्ताञ्जयति ॥।॥ य उ एनत्तिर्यग्वेद ये तिर्यञ्चो लोकास्ताञ्जयति । तस्य लोमैव हिङ्कारस्त्वमस्ताबो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जानिधनम्॥६॥ तस्य त्रीण्याविर्गायतिप्रस्तावम्प्रतिहार ३ ६ ७ऽनन्ताम्। १-पक्-२-षो । ३ प्रजा । ४-ने । ५ नास्ति । ६ एन, एनं । ७-युच्-, 'म' अधिक है। बाक्-९ हिंकारं ॥
निधनम् । तस्मात्पुरुषस्य त्रीण्यस्थीन्याविर्दन्ताश्च द्वयाश्चनखाः । ये तिर्यञ्चो लोकास्ताअयति ॥७॥ य उ एनत्संयग्वेद ये सम्यञ्चो लोकास्ताभयति । तस्य मन एव हिङ्कारोवाक्प्रस्ताव प्राण उद्गीय- श्चतुः प्रतिहार श्रोत्रं निधनम् । ये सम्यञ्चो लोकास्ताति॥८॥ अथैतद्देवतासु साम । तस्य वायुरेव हिङ्कारोऽग्निः प्रस्ताव प्रादिस उद्गीयश्चन्द्रमा प्रतिहारो दिश एच निधनम्॥६॥ तदेतद्देवतासु साम । सय एवमेतद्देवतासुसाम वेद देवतानामेव सलोकतां जयति॥१०॥ hi द्वादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तस्यैतास्तिस्रागा आग्नेय्येकैन्द्रयेकावैश्वदेव्येका ॥२॥सा या मन्द्रा साऽऽग्नेयी । तया प्रातस्सवनस्योद्नेयम् । आग्नेयं वै प्रातस्स- वनमाग्नेयोऽये लोकः। स्वयाऽऽगया प्रातस्सवनस्योऽद्गायत्यूनोतीम लोकम् ॥२॥ अथ या घोषिण्युपब्दिमती सैऽऽन्द्री। त्या माध्य- न्दिनस्य सवनस्योद्नेयम् । ऐन्द्रं वै माध्यन्दिनं सवन मैन्द्रोऽसौ लोकः । स्वयाऽऽगया माध्यन्दिनस्य सवनस्योद्गायत्यूनोसमुंलोकम् ॥३॥ अथ यां वीडयन्निव प्रथयन्निव गायति सा वैश्वदेवी । तया १ ऐक्-२ ऽन्द । ३ नास्ति, सा' । ४ मनधी। ५ नास्ति अथ 'लोकम् । ६-अब्दी के लिये स्थान खाली है। ७-७ दिन । ८-तिमं । र या,' घोषिण्यु', भी लिखा है। Nepal NA HERE तृतीयसवनस्योद्नेयम् । वैश्वदेवं वै तृतीयसवनं वैश्वदेवोऽयमन्तरा- लोकः । स्वयाऽऽगया तृतीयसवनस्योद्गायत्यूनोतीममन्तरालोकम् ॥४॥ अथो उच्चा खल्वाड रेकयैवाऽऽगयोद्यं यदेवास्य मध्यं वाच इति । तया वैवाचा व्यायच्छमान उद्गायतितदेवास्यमध्यं वाचः । तया बा एतथा वाचा सर्वा वाच उपगच्छति। अव्यासिक्तामेकस्था श्रियमुनोति य एवं वेद ॥५॥ अथ या क्रौञ्चा सा बाईस्पस्या । स यो ब्रह्मवर्चसकामस्स्यात्स तयोद्गायेत् । तद्ब्रह्म वै बृहस्पतिः । तद्वै ब्रह्मवर्चसमृनोति तथाह ब्रह्मवर्चसीभवति॥६॥अथ ह चैकिता- नेय एकस्यैव सान्न आगां गायति गायत्रस्यैव । तदनवानं गेयम् तत् सान्न एवा प्रतिहारादनवानं गेयम् । तत्प्राणो वै गायत्रम् । तद्वै प्राणमनोति । तथा ह सर्वमायुरोत ॥७॥ १॥३७॥ द्वादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अथ ह ब्रह्मदत्तं चैकितानेयमुद्गायन्तं कुरव उपोदुरुज्जहिहि साम दाल्भ्येऽति ॥१॥ स होऽपोद्यमानो नितरां जगौ । तै होचुः किमुपोधमानो नितरामगासीरिति ॥२॥ स होवाचेदं वै लोमेऽसे- १०-यन्ति । ११ ताया। १२ सू, नास्ति । १३ 'वै गायत्रम् नीचे से ले के अधिक लिखा है। १४ सासू' अधिक है। १ तश । २ उजिहि । ३ सोमे।
तदेवैतत्मत्युपत्रणमः । तस्मादु ये नएतदुपावादिपुलोमशानीऽव तेषां श्मशानानि भावितारः । अथ वयमुदेव गातारस्स्म इति ॥३॥अथ ह राजा जैवलिर्गलूनसमाओकायणं शामूल पर्णाभ्यामुत्थितम्पन- छर्चाऽऽगाता शालावसा३ सान्ना३ इति ॥४॥ नैव राजन्नृचेति होवाच न साम्नेऽति । तद्यूयं तर्हि सर्व एव पणाय्या भविष्यथ य एवं विद्वाँसोऽगायतेति॥शाप्रथयद्धाऽवक्ष्यदृचाच साम्नाचाऽऽगामे- ति धीतेन वैतधातयान्नाऽमलाकाण्डेनाऽऽगातेऽति हैनास्तदवक्ष्यत् । तद्ध तदुवाच वरेण चैव हिङ्कारेण चाऽऽगामेति ॥६॥ १॥३८॥ द्वादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। अथहससाधिवाकश्चैत्ररथिस्ससयज्ञम्पौलुषितमुवाच प्राचीन- योगेति मम चेदै त्वं साम विद्वान् सानाऽऽविज्यं करिष्यसि नैव तर्हि पुनर्दीक्षामभिध्यातासीति । मुहुर्दीक्षी ह्यास ॥१॥ स होवाच यो वै सान्नरिश्रय विद्वान्सान्नाऽऽविज्यं करोति श्रीमानेव भवति । मनो वाव साम्नश्श्रीरिति ॥२॥यो वै सान्नः प्रतिष्ठां विद्वान्साना- अत्विज्यं करोति प्रखेव तिष्ठति । वाग्वाब साम्नः प्रतिष्ठेति ॥३॥ ३ ४-उपाश्- ५-पुल् । ६-तार । ७ गळूनसम, गुदिनसम् । ८-तपयाया। १०च प्रागमे ॥ १ मच । २-ची।३ प्रा। sage मा Schoot । Halam mokaar Homegrete Assam डो । यो वै साम्नस्सुवर्ण विद्वान् साम्नाऽऽविज्यं करोयध्यस्य गृहे सुवर्ण गम्यते । प्राणो वाव साम्नस्सुवर्णमिति ॥४॥ यो वै साम्नो ऽपचितिं विद्वान्साम्नाऽविज्यं करोसपचितिमानेव भवति । चतु- व साम्नोऽपचितिरिति ॥॥ यो वै साम्नश्श्रुतिं विद्वान्साम्ना- ऽऽविज्यं करोति श्रुतिमानेव भवति । श्रोत्रं वाव साम्नश्श्रुतिरिति ॥६॥ १॥३२॥ द्वादशेऽनुवाके पश्चमः खण्डः। द्वादशोऽनुवाकस्समाप्तः। १ चत्वारिवाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्तीति ॥१॥ वागेव साम । वाचाहि साम गायति । वागेवोऽक्थम् । वाचा शुक्थं शंसति । वागेव यजुः। वाचा हि यजुरनुवर्तते ॥२॥ तद्य- किंचार्वाचीनम्ब्रह्मणस्तद्वागेव सर्वम्। अथ यदन्यत्रब्रह्मोपदिश्यते। नैव हि तेनाऽऽविज्यं करोति । परोक्षणैव तु कृतम्भवति ॥३॥ ४-हो। १-हानि । २-हितानी । ३ नास्ति । ४-क्त-५ याचं । हने । ७ नास्ति।
(४७) 9 ૨ तस्या एतस्यै वाचो मनः पादश्चतुः पादश्श्रोत्रम्पादोवागेव. चतुर्थः पादः॥४॥ तबदै मनसा ध्यायति तद्वाचा बदति।यचतुषा पश्यति तद्वाचा वदति । यच्छ्रोत्रेण शृणोति तद्वाचा वदति ॥॥ तद्यदे- तत्सर्वं वाचमेवाऽभिसमयति तस्माद्वागेव साम । स ह वै सामवित्स साम वेद य एवं वेद ॥६॥ तस्या एतस्यै वाचः प्राणा एवाऽमुः। एषु हीदं सर्वमसूतति ॥७॥ १॥४०॥ प्रयोदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। तेन हैतेनाऽसुना देवा जीवन्ति पितरो जीवन्ति मनुष्या जी- वन्ति पशवोजीवन्ति गन्धर्वाप्सरसो जीवन्ति सर्वमिदं जीवति ॥२॥ तदाहुर्यदमुनेदं सर्वं जीवति कस्साम्नोऽसुरिति ।प्राण इति ब्रूयात् । माणो ह वाव साम्नोऽसुः ॥२॥ स एष प्राणो वाचि प्रतिष्ठितो वागु पाणे प्रतिष्ठिता। तावेतावेवमन्योऽन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ । प्रतितिष्ठति य एवं वेद ॥३॥ तदेतहचाऽभ्यनूच्यते- ८ चतुर्थः अधिक है। स्वाद । १० श्रुणोति । ११ऽहिससून १२-ण । १३' असूते' के परे 'एषु हीऽदं सर्वे सूतेऽति' सब में लिखा है (नास्ति' ति)॥ २-तीति । २ यदा । ३ येने । ४'इदं' अधिक है। ५-ये। मन्यस-1७प्रतिष्ठितः। ।
अदितिरिदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति- जर्जातमदितिर्जनितम् ॥ इति ॥४॥ ११ अदितिौरदितिरन्तरिक्षामिति । एषा वै द्यौरेषाऽन्तरिक्षम् ॥।॥ अदितिमाता स पिता स पुत्र इति । एषा वै मातैषा पितैषा पुत्रः ॥६॥ विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना इति । ये देवा असुरेभ्यः पूर्वे पञ्चजना प्रासन् य एवासावादिसे पुरुषो यश्चन्द्रमसि यो विद्युति योऽप्सु योऽयमक्षभन्तरेष एव ते । तदेव ॥७॥ अदिति- र्जातमदितिर्जनित्वमिति। एषा ह्येव जातमेषा जनित्वम् ॥८॥१॥४१॥ त्रयोदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। प्रयोदशोऽनुवाकस्समाप्तः। । आरुणिर्ह वासिष्टं चैकिनानेयम्ब्रह्मचर्यमुपेयाय ।तं होवाचा- ऽऽजानासि सौम्य गौतम यदिदं वयं चैकितानेयास्सामैवोपास्महे । कां वं देवतामुपास्स इति । सामैव भगवन्त इति होवाचः ॥१॥ तं ह पप्रच्छ यदग्नौ तदेथा। इति । ज्योतिर्वा एतत्तस्य सानोयद्वयं .. ८-रीक्स-1 ६ नास्ति, अदितिर्माता' अदितिरन्तरिक्षम् ।। १०-च । ११-यो । १२-वैर् । १३-षम् । १४ इतिर्, इति ॥ १ (वाचा) प्राज । २।३-माह-इति । ४-सनहीं।५-वत।ता।
( ४२ ) ९ सामोऽपास्मह इति ॥२॥ यत्पृथिव्यां तद्वेस्था३ इति । प्रतिष्ठा वा एषा तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥३॥ यदप्सु तद्वेस्था३ इति । शान्तिर्वा एषा तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥४॥ यदन्तरिक्षे तद्वेस्था३ इति । आत्मा वा एष तस्य सान्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥शा यद्वायौ तदेयाः इति । श्रीर्वाएषा तस्य सानो यद्वयं सामोऽपास्मह इति ॥६॥ यदितु तद्वेस्था३ इति । व्याप्तिर्वा एषा तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥७॥ यदिवि तद्वेस्था३ इति । विभूतिर्वा एषा तस्य साम्नो यद् वयं सामोपा- स्मह इति ॥८॥४२॥ ૧ ૨ १२ १ चतुर्दशेऽनुवाके प्रथमःखण्डः। यदादिसे तद्वेस्था३ इति । तेजो वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥१॥ यच्चन्द्रमसि तद्वेस्था३ इति । भा वा एषा तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥२॥ यन्नक्षत्रेषु तद्वेस्था३ इति । प्रज्ञा वा एषा तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥३॥ यदने तद्वेस्था३ इति । रेतो वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह १ ७ हाशिया पर लिखा है। ८एतस्य । ६ नास्ति यदू १० नास्ति सानो ऽप । ११-हा । १२ नास्ति ष' १ नास्ति । २ प्रजा। ३ नास्ति, 'एतत्' में 'लतू। 'इति ।
( ४३ ) १ ७ इति ॥४॥ यत्पशुषु तद्वेस्था३ इति । यशो वा एतत्तस्य साम्मो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥५॥ यदृचि तद्वेस्था३ इति । स्तोमो वा एष तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥६॥ यद्यजुषि तद्वस्था३ इति । कर्म वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥७॥ अथ किं उपास्स इति । अक्षरमिति । कतमत्तदक्षरमिति । यत्क्षरनाऽक्षीयते- ति । कतमत्तत् क्षरनाऽक्षीयतेति । इन्द्र इति॥८॥कतमस्स इन्द्र इति । योऽक्षत्रमत इति । कतमस्स योऽक्षत्रमत इति । इयं देवतेति होवाच ॥ योऽयं चक्षुपि पुरुष एष इन्द्र एष प्रजापतिः ।(स) समः पृथिव्या सम आकाशन समोदिवा समस्सर्वेण भूतेन । एष परो दिवो दीप्यते । एष एवेदं सर्वमित्युपासितव्यः ॥१०॥ सय १४ एवदेवं वेद ज्योतिष्मान् प्रतिष्ठावाञ्छान्तिमानात्मवाञ्छीमान् व्याप्तिमान् विभूतिमांस्तेजस्वी भावान् प्रज्ञावानेतस्खी यशस्वी स्तोमवान् कर्मवानक्षरवानिन्द्रियवान् सामन्वीभवति ॥११॥ तद्वे- तहचाऽभ्यनूच्यते ॥१२॥ १॥४३॥ चतुर्दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ४ नास्ति । ५ वो। हस्ते-1 ७..... "स्स' के लिये स्थान छोड़ा -द्। अक्षर । १०-१ । ११ इन्द्रमत् । १२ सो। १३ नास्ति । १४-ई । १५ दिव्य- १९-सीतव्यं । १७-वी । १८स्तोमान् । ११ उद्॥ ।
ર रूपं-रूपम्प्रति रूपोबभूव तदस्य रूपम्प्रतिचक्षणाय। इन्द्रोमायाभिःपुरुरूप ईयते युक्ताह्यस्य हरयश्शतादश। इति ॥शारूप-रूपम्प्रतिरूपो बभूवनि । रूपं-रूपं ह्येषप्रतिरूपोबभूव ॥२॥ तदस्य रूपम्प्रतिचक्षणायेति । प्रतिचक्षणाय हाऽस्यैतद्रूपम् ॥३॥ इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयत इति । मायाभिमुषे एतत्पुरु रूप ईयते ॥४॥ युक्ता ह्यस्य हरयश्शता दशेति । सहस्र हैत आदि- सस्य रश्मयः । तेऽस्य युक्तास्तैरिदं सर्वं हरति । तद्यदेतैरिदं सर्व हरति तस्माद्धरयः ॥५॥ रूपं रूपम्मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानः परितन्वं स्वाम् । त्रिर्यदिवः परि मुहूर्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरन्तुपा ऋतावेति ॥६॥ रूप-रूपम्मघवा बोभवीतीति । रूपं-रूपं शेष मघवा बोभवीति ॥७॥ मायाः कृण्वानः परि तन्वं स्वामिति । मायाभिषएतत्स्वां तनुं गोपायति ॥८॥ त्रिर्यद्दिवः परिमुहूर्तमागादिति । त्रिह वा एष एतस्य मुहूर्तस्येमाम्पृथिवीं समन्त: पर्येतीमा: प्रजास्संचनाण: ॥शास्वैर्मन्त्रैरनृतुपाऋतावति। अनृतुपा ह्येष एतदृतावा॥१०॥१॥४४ चतुर्दशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । १ पुरुर इप, पुरुरूपं ।२ रम्यते।३-णा।४-पम्।५-पम् । ६ रमीयते। ७ नास्ति, हरयश्तेऽस्य । ८'म' अधिक है। मुई-1१० नास्ति, इति । ११ पुनः लिखा है 'रूपंरूपं....."वीत्तीऽति (!) | १२ कृश्वा । १३-भि । १४ ।।१५ नास्ति ।१६ अति । १७ नृत्-1 १८ ऋता ॥ 3 ૨ ३.१४ १५ ( ४५ ) तद्ध पृथुर्वैन्यो दिव्यान्वासान्पप्रच्छ-- इन्द्रमुक्थमचमुद्गीथमाहुब्रह्म साम प्राणं व्यानम् । मनोवाचक्षुरपानमाहुश्श्रोत्रं श्रोत्रिया बहुधावदन्ती- ति ॥१॥ ते प्रत्यूचुः- anta ऋषय एते मन्त्रकृतः पुराजा: पुनराजायन्ते वेदानां गुप्त्यैकम् । ते वै विद्वांसो वैन्य तद्वदन्ति समानम्पुरुषम्बहुधा निविष्टम्, इति ॥२॥ ३ ६ १२ इमां ह वा तद्देवतां त्रय्यां विद्यायामिमां समानामभ्येक प्राप- यन्ति नैके । यो ह वावैतदेवं वेद स एवैतां देवतां सम्प्रति वेद ॥३॥ स एष इन्द्र उद्गीथः । स यदैष इन्द्र उद्गीथ आगच्छति नैवोद्गातुश्चोपगातॄणां च विज्ञायते । इत एवोऽऽव॑स्वरुदेति । स उपरि मूों लेलायति ॥४॥ स विद्यादगमदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशेक्ष्यत इति । तस्मिन् ह न कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशिष्यते ॥।॥ तदेतदभ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते।सयथेन्द्रोन कंचनभ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति॥६॥१४॥ चतुर्दशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। चतुर्दशोऽनुवाकस्समाप्तः। १-इदम् । १ नो। ३ त्रा, तृ-।४ ईमां । ५-ना । म्य् । ७ हवै। ८य वै।-तृन्-११० 'ति' अधिककरो।११ || १२ स्वर।१३परिषे-1 प्रजापतिर्वा वेद अग्र आसीत् । सोऽकामयत बहुस्स्याम्प्रजोयेय भूमानं गच्छेयमिति ॥१॥ स पोडशधाऽऽत्मानं व्यकुरुत भद्रं च समाप्तिश्चाऽऽभूतिश्च सम्भूतिश्च भूतं च सर्वं च रूपं चाऽपरिमितं च श्रीश्च यशश्च नाम चाऽग्रं च सजाताश्च पयश्चमहीयाच रसश्च १ ॥२॥ तद्यद्द्रं हृदयमस्य तत् । ततस्संवत्सरमसृजत । तदस्य संवत्सरोऽनूपतिष्ठते ॥३॥ समाप्तिः कर्मास्य तत् । कर्मणा हि समामोति । तत ऋतूनसृजत । तदस्यतवोऽनूपतिष्ठन्ते ॥४॥ आ- भूतिरन्नमस्य तत् । ( तच् ) चतुर्धा भवति । ततो मासानर्धमा- सानहोरात्राण्युषसोऽसृजत । तदस्य मासा अर्धमासाअहोरात्राण्यु- पसोऽनूपतिष्ठन्ते ॥शा सम्भूती रेतोऽस्य तद् । रेतसो हि सम्भव- ति॥६॥ ॥४६॥ पञ्चदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। ततश्चन्द्रमसमसृजत । तदस्य चन्द्रमा अनूपतिष्ठते । तस्मात्स रेतसः प्रतिरूपः ॥१॥ भूतम्माणोऽस्य सः । ततो वायुमसृजत । तदस्य वायुरनूपतिष्ठते॥२॥ सर्वमपानोऽस्य सः। ततः पशूनसृजत । तदस्य पशवोऽनूपतिष्ठन्ते ॥३।। रूपं ब्यानोऽस्य सः। ततः प्रजा १चे। २-याँ । ३-अन्ते । ४ 'त' अधिक है । ५ तद नास्तिार अंचर्धा, अर्धा । -ति, ता, त। १-त । २-४ । ३ रूपशवो।
( ४७ ) ॥ असृजत । तदस्य प्रजा अनूपतिष्ठन्ते । तस्मादामु प्रजासु रूपाण्य- धिगम्यन्ते ॥४॥ अपरिमितम्मनोऽस्य तत् । ततो दिशोऽसृजत । तदस्य दिशोऽनूपतिष्ठन्ते । तस्मात्ता अपरिमिताः।अपरिमितमिव हि मनः ॥॥ श्रीर्वागस्य सा । ततस्समुद्रमसृजत । तदस्य समुद्रो- ऽनूपतिष्ठते ॥६॥ यशस्तपोऽस्य तत् । ततोऽग्निमसृजत । तदस्या- ऽग्निरनूपतिष्ठते । तस्मात्स मथितादिव सन्तप्तादिव जायते ॥७॥ नाम चतुरस्य तत् ॥८॥ १४७॥ पञ्चदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तत आदिसमजत । तदस्यादियोऽनूपतिष्ठते ॥२॥ अग्र- म्मूर्धास्य सः। ततो दिवमसृजत । तदस्य द्यौरनूपतिष्ठते ॥२॥ सजाता अङ्गान्यस्य तानि । अङ्गैहि सह जायते । ततो वनस्पती- नसृजत । तदस्य वनस्पतयोऽनूपतिष्ठन्ते ॥३॥ पयो लोमान्यस्य तानि। तत ओषधीरसृजत। तदस्यौषधयोऽनूपतिष्ठन्ते ॥४॥ महीया माँसान्यस्य तानि । माँसहि सह महीयते । ततो वयाँस्यसृजत । तदस्य वयाँस्यनूपतिष्ठन्ते । तस्मात्तानि प्रपतिष्लूनि ।प्रपतिष्णूनी- ४-यते । ५ नास्ति, ततो तस्मात् । नाति। तस्या। ८मथितामिह, मथितिता ॥ १ अंगान्य, अंगहान्य, अगए । २ ता । ३ गैर् । ४ नास्ति, पयो......"अनूपतिष्ठन्ते । ५ मभिया, महिया। ६ त ।
( ४८ ) १ व महामासानि ॥॥ रसो मज्जास्य सः। ततः पृथिवीमसृजत। तदस्य पृथिव्यनूपतिनुते ॥६॥ स हैवं पोड़शधाऽऽत्यानं विकृय साध समैत् । तद्यत्सा समेतत् तत्साम्नस्सामत्वम् ॥७॥स एवैष हिरण्मयः पुरुष उदतिष्ठत्प्रजानां जनिता ॥८॥१४८|| पञ्चदशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । देवासुरा अस्पर्धन्त । ते देवाःप्रजापतिमुपाधावाअयामाऽमु- रानिति ॥१॥ सोऽब्रवीन वै मां यूयं विस्थ नाऽसुराः । पदै मां यूयं विद्यात ततो वै यूयमेव स्यात पराऽसुराभवेयुरिति ॥२॥ तद्वै ब्रूहीऽसब्रुवन् । सोऽब्रवीत्पुरुषः प्रजापतिस्सामेति मोऽपाद्भवम् । ततो वै यूयमेव भविष्यथ पराऽसुरा भविष्यन्तीलि ॥३॥ तम्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपासत । ततो वै देवा अभवन् पराऽसुराः । स यो हैवं विद्वान्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपास्ते भवसात्मना पराऽस्य द्विषन् भ्रातृव्यो भवति ॥४॥ १॥४६॥ पञ्चदशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । पञ्चदशोऽनुवाकस्समाप्तः । ७ महीम्-मज्ज्या | -स्ते । १० समैत; तत्पश्चात्, 'तद्यत्सार्ध समैत' (!) पुनः है। ११ जयिता ॥ १ षस्य । २-त । ३-हिं ॥
( ४६ ) " देवा वै विजिग्याना अब्रुवन्द्वितीयं करवामहै । माऽद्वितीया भूमेति । तेऽब्रुवन सामैव द्वितीयं करवामहै । सामैव नो द्वितीय- मस्त्विति ॥१॥ त इमे द्यावापृथिवी अब्रुवन् समेतं साम प्रजनयत-- मिति ॥२॥ सोऽसावस्या अबीभत्सत । सोऽब्रवीद्रहु वा एतस्यां किं चकिं च कुर्वन्यधिष्ठीवन्सधिचरन्सध्यासते। पुनीतन्वेनामपूता वा इति ॥३॥ ते गाथामअन्त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति । शप्तसनिस्स्या इति । तथेति । ते गाथयाऽपुनन् । तस्मादुत गाथया शतं सुनोति ॥४॥ ते कुम्ब्यामब्रुवन् त्वया पुनामेति । किं तत:-- स्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते कुम्ब्यया- ऽपुनन् । तस्मादुत कुम्ब्यया शतं सुनोति ॥५॥ते नाराशंसीमब्रु- वन् त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते नारा स्याऽपुनन् । तस्मादुत नारासँस्या शतं सुनोति ॥६॥ ते रैभीमब्रुवन् त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति ।शतस- निस्स्या इति । तथेति । ते रैभ्याऽपुनन् । तस्मादुत रैभ्या शतं । १२ १. विजिज्ञाना । २.वा । ३ सा । ४ अबीहत- ५-ष्ठि- -नि, नी । -भ्य्-1८५'पुनः । लिखा है । स तेन । १० शतनी । ११-भिम् । १२ त ॥
( ५० ) सुनोति ॥७॥ सेयम्पूता । अथाऽमुमब्रवीदहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीष्वेति ॥८॥ १॥५०॥ षोडशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। स ऐलबेनाऽपुनीत । पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यजृषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद ॥१॥ ३ ते समेस साम प्राजनयताम् । तद्यत्समेस साम पाजनयतां तत्सा- ६ नस्सामत्वम् ॥२॥ तदिदं साम सृष्टमद उत्क्रम्य लेलायदतिष्ठत् । तस्य सर्वे देवा ममविन आसन्मम ममेति ॥३॥ तेऽब्रुवन्वीद- म्भजामहा इति । तस्य विभागे न समपादयन् । तान्प्रजापतिर- ब्रवीदपेत । मम वा एतत् । अहमेव वो विभक्ष्यामीति ॥४॥ सोऽग्निमब्रवीत्त्वं वै मे ज्येष्ठः पुत्राणामसि । त्वम्प्रथमो वृणीष्वेति ॥५॥ सोऽब्रवीन्मन्द्रं सानो वृणेऽन्नाद्यमिति । स य एतद्द्वायाद- नाद एव सोऽसन्मामु स देवामामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्त- मुपवदादिति ॥६॥ अथेन्द्रमब्रवीत्त्वमनुवृणीष्वेति ॥७॥ सोऽब्र- ११ १३ तम्। १-ब-1, ऐखवैनां । २-वाम् । ३ - ४-अतू । ५ मे । ६ 'वीऽदम्' के लिये स्थान खाली है, बीदा। ७ भविष्य-1८श्रियम् । गायत्राच् । १०श्रीमान् । ११ अथ । १२ सोमम् ।
बोदुग्रं सानो वृणे श्रियमिति । स य एतद्दायाच्छीमानेव सोऽस- न्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति ॥८॥ अथ सोममब्रवीत्वमनुवृणीवेति ॥६॥ सोऽब्रवीद्वल्गु साम्नो वृणे नियमिति । स य एतद्गायात्मिय एव स कीर्तेः मियश्चतुपः प्रिय- सर्वेषामसन् मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतगायन्तमुप- वदादिति ॥१०॥ अथ बृहस्पतिमन्नवीत्त्वमनुवृणीष्वेति ॥११॥ सोऽब्रवीत्क्रौञ्चं सानो हरणे ब्रह्मवर्चसमिति । स य एतद्गायाब्रह्म- वर्चस्येव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुप- वदादिति ॥१२॥ २॥५१॥ षोडशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः ! अथ विश्वानदेवानन्नवीयूयमनुवृणीध्वमिति॥शातेऽब्रुवन्वैश्व- देवं सान्नोणीमहे प्रजननमिति। स य एतद्गायात्मजावानेव सोऽस- दस्मानु देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्वायन्तमुपवदादिति ॥२॥ अथ पशूनब्रवीद्यूयमनुसणीध्वमिति ॥३॥ तेऽब्रुवन्वायुर्वा अस्माक- मीशे। स एव नो वरिष्यत इति। ते वायुश्च पशवश्चाब्रुवनिरुक्तं सानो १३ वल्गु। १४ प्रियम् । १५ नास्ति,स य..."सोऽब्रवीद में। १६ गायत्रचू । १७ नास्ति । १८ नुवृ- १'म अधिक है। नीचे से च स वायु' अधिक लेता है । ३ वरिष्ठ । ४ अनिर-1 ६ ( ५२ ) वृणीमहे पशव्यमिति। स य एतद्गायात्पशुमानेव सोऽसदस्मानु च स वायुं च देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिलि॥४॥ अथ प्रजापतिरब्रवीदहमनुवरिष्य इति ॥५॥ सोऽब्रवीदनिरुक्तं सानो वृणे स्वमिति । स य एतद्गायात्वर्गलोक एव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतगायन्तमुपवदादिति ॥६॥ अथ वरुणमब्रवीत्त्वमनुवृणीष्वेति ॥७॥ सोऽब्रवीद्यद्वो न कश्चना- ऽत तदहम्परिहरिष्य इति। किमिति। अंपध्वान्तं सानोवणेऽपश- व्यमिति । स य एतद्गायादपशुरेव सोऽसन्मामुस देवानामृच्छाद्य एतद्गायादिति ॥८॥ तानि वा एतान्यष्टौ गीतागीतानि साम्नः । इमान्यु ह वै सप्तगीतानि । अथेयमेव वारुण्यागाऽगीता ॥६॥ स यो ह कां चैवं विद्वानेतासां सप्तानामागानां गायति गीतमेवास्य भवत्येतानु कामात्राध्नोति य एतासु कामाः। अथेमामेव वारुणी- G૨ १७ मागां न गायेत् ॥१०॥ ॥५२॥ षोडशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । षोडशोऽनुवाकस्समातः। ५-युथ् । 'इति' तक शेष नहीं लिखा। ७ति । ८ खर्गम् । समुत् । १०-दृष्य्-क-,यत । ११ अपद्धमातम, अपध्मातम् । १२ पश-1१३ ऋद्धादू । १४-थ, स्थ। १५-श् । ११ कामा। १७ नीरुध्न-, निधोति॥
M ( ५३ ) द्वयं वावेदमन आसीत्सच्चैवासच्च ॥१॥ तयोर्यत् सत् तत्साम तन्मनस्स प्राणः। अथ यदसत्सर्क सा वाक् सोऽपानः॥२॥ २ तधन्मनश्चप्राणश्च तत्समानम् । अथयावाक्चापानश्चतत्समानम्। इदमायतनम्मनश्च प्राणश्चेदमायतनं वाक् चापानश्च । तस्मात्पुमा- दक्षिणतो योषामुपशेते ॥३॥ सेयमृगस्मिन् सामन् मिथुनमै- उकृत । तामपृच्छत् का त्वमसीति । साहमस्मीत्यब्रवीत् । अथवा अहममोऽस्मीति ॥४॥ तद्यत्सा चाऽमश्चतत् सामाऽभवत् तत्साम्नस्सामत्वम् ॥५॥ तौ वै सम्भवावेति । नेत्यब्रवीत्वसा वै मम त्वमस्यन्यत्र मिथुनमिच्छस्वतिहासाऽब्रवीन वैतं विन्दा- मि येन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति । सा वै पुनीवेत्यब्रवीत् । अपूता वा असीति ॥७॥ साऽपुनीत यदिदं विप्रा वदन्ति तेन । साऽब्रवीत्क्वेदम्भविष्यतीति। प्रत्यूहेत्यब्रवीत्। धीर्वा एषा।प्रजानां जीवनं वा एतद्भविष्यतीति । तथेति । तत्पत्यौहत। तस्मादेषाधीरेव प्रजानां जीवनमेव ॥८॥ पुनीष्वेत्यब्रवीत् । साऽपुनीत गाथया साऽपुनीत कुम्ब्यया साऽपुनीत नारासँस्या साऽपुनीत पुराणेति- १ म्यक-अस्म्यदद्य भवितेऽति, (अस्त्य) भवितेति । २-ना। ३ उपवते । ४-म । ५ सम्भवेत् । यम् । ६ 'वा' अधिक है। प्रा, रिमा । चत्वे त्यबू । १०-म्भ-, 'वा' अधिक है।
૨ हासेन साऽपुनीत यदिदमादाय नाऽऽगायन्ति तेन ॥१॥ साऽब्र- वीत्केदम्भविष्यतीति । प्रत्यूहेत्यब्रवीत् । धीर्वा एषा । प्रजानां जीवनं वा एतद्भविष्यतीति । तथेति । तत्पत्यौहत् । तस्मादेषा धीर्वेवप्रजानांजीवनम्बेच ॥१०॥पुनीष्ववेत्यब्रवीत्॥११॥१॥५३॥ सप्तदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सा मधुनाऽपुनीत । तस्मादुत ब्रह्मचारी मधु नाऽश्नीयाद्वेदस्य पलाव इति । कामं ह त्वाचार्यदत्तमश्नीयात् ॥१॥ अथर्क सामा- ब्रवीदडु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीष्वेति । स भरण्डकेष्णेनाऽपुनीत । पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद॥२॥ ताभ्यां सदो मिथुनाय पर्यश्रयन् । तस्मादुपवसथीयां रात्रं सदसि न शयीत । अत्र ह्येताक्सामे उपवसथीयां रात्रि सदसि सम्भवतः । स यथा श्रेय स उपद्रष्टेवं हि शश्वदीश्वरोऽनुलब्धः पराभवितोः ॥३॥ अथो आहुरुगातुर्मुखे सम्भवतः । उद्गातुरेव मुखं नेक्षे- ११ इम। १२ मादायना, प्रादायना॥ १. सारे पद का पुनर्लेख है । २ स 'कामम्' के स्थान में। मा सर्वत्र है । ३ हरुण्डकेष्णेना, भरण्ड, भरुण्डकोदणेना ।४-वन् । ५-धीयाब,-शीयाम । -ई । ७ यीत, येत। -- चड्। १० नुनुलव, अनुनुलुव- १२ तेति ॥४॥ तदु वा पाहुः काममेवोदातुर्मुखमीक्षेत । उपवसथीयामे- वैतां रात्रिं सदसि न शयीत । अत्र ह्येताटक्सामे उपवस्थीयां रात्रिं सदसि सम्भवत इति ॥५॥ तां सम्भविष्यन्नाहाऽमोऽहम- स्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम् । सा मामनुव्रता भूत्वा प्रजाः प्रज- नयावहै । एहि सम्भवावहा इति ॥६॥ तां सम्भवन्नत्यरिच्यत सोऽब्रवीन वै त्वाऽनुभवामि । विराड् भूत्वा प्रजनयावेति । तथेति ॥७॥ तौ विराड्भूत्वा प्राजनयताम् । हिङ्कारश्चाऽऽहावश्च प्रस्तावश्च प्रथमा चोद्गीथश्च मध्यमा च प्रतिहारश्चोत्तमा च निधनं च वषट्कारश्चैवं विराड् भूत्वा माजनयताम् । ते अमुमजनयतां योऽसौ तपति । ते व्यद्रवताम् ॥८॥ १॥५४॥ सप्तदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । मदध्यभून्मिदध्यभूदिति । तस्मादाहुर्मधुपुत्र इति ॥१॥ तस्मादुतस्त्रियो मधु नाऽश्नन्ति पुत्राणामिदं व्रतं चराम इति वदन्तीः ॥२॥ तदयं तृचोऽनूदश्रयत । इयमेव गायत्र्यन्तरिक्षं त्रिष्टुबसौ जगती । तस्यैतत्तृचः ॥३॥ स उपरिष्टात्सामाऽध्याहितं तपति । २० ११ न । १२-थी-। १३ 'रण' अधिक है। १४--। १५ संभवत। १६ प्रात्यरिच्यते । १७]। १८ च । एवम् । १६ ग्रॅज्- २० व्यहप्ताम, भ्यहवताम्, व्यहपताम् (?)। १-श्रा । २ इदम् । ३-ई- । । सोऽध्रुव इवासीदलेलायदिव । स नोोऽतपत् ॥४॥ स देवा- नब्रवीदुन्मा गायतेति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिह रहेतेति ॥५॥ तथेति । तमुदगायन् । तमेतदत्राऽहिन् । तेभ्यरिश्रयम्पायच्छत् । सैषा देवानांश्रीः॥ातत एतवस्तपति। स नार्वाङतपत् ॥७॥ स ऋषीनब्रवीदनु मा गायतति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं बः प्रयच्छेयम् । मामिहहहतेति ॥मातथेवि। तमन्वगायन । तमेतदत्रादहन। तेभ्यश्श्रियम्पायच्छत् । सैषा ऋषीणां श्रीः ॥६॥ तत एतदर्वाङ् तपति । स न तिर्य अतपत् ॥१०॥ स गन्धर्वाप्सरसोऽब्रवीदामा गायतति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिहतोति ॥११॥ तोति। तमागायन। समेतदत्राऽहहन् । तेभ्यश्श्रियम्पायच्छत् । सैषा गन्धर्वाप्सरसा १२ श्रीः ॥१२॥ तत एतत् तिर्यङ् तपति ॥१३॥ तानि वा एतानि त्रीणि सान्न उद्गीतमनुगीतमागीतम् । तद्यथेदं वयमागायोद्गायाम एतदुद्गीतम् । अथ यद्यथागीतं तदनुगीतम् । अथ यत्किंचेति सा- म्नस्तदागीतम् । एतानि ह्येव त्रीणि साम्नः॥१४॥ १॥५॥ सप्तदशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । सप्तदशोऽनुवाकस्समाप्तः । ४ -- ५ दुहेते।६ उदगात्। ७-हत् । ८ तप्- तिय्यंदू । १० त । ११ तियद । १२ ग्रागयो, आगेयो-1 १३-थम् ॥
आपो वा इदमग्रे महत्सलिलमासीत् । सऊर्मिरूमिमस्कन्दत् । सतो हिरण्मयौ कुक्ष्या समभवतां ते एवसामे ॥२॥ सेयमृगिर्द ३ सामाऽभ्यप्लवत । तामपृच्छतु का त्वमसीति । साहमस्मीसब्रवीत अथ वा अहममोऽस्मीति । तद्यत्सा. चाऽमश्च तत्साम्नस्सामत्वम्॥२॥ तौ वै सम्भवावेति । नेसब्रवीत्वसा वै मम त्वमसि । अन्यत्र मिथुनमिच्छस्खोत ॥३॥ सा पराप्लवत मिथुनमिच्छमाना । सा समास्सहस्र सप्ततीः पर्यप्लवतः ॥४॥ तदेष श्लोकः- स्त्री स्मैवाऽग्रे संचरतीच्छन्ती सलिले पतिम् । समास्सहसं सप्तती स्ततोऽजायत पश्यत, इति ॥५॥ ९ म १२ असौ वा. आदिसः पश्यतः । एष एव तदजायत । एतेन हि पश्यति ॥६॥ साऽवित्त्वान्यप्लवत । साऽब्रवीनवैतविन्दामि. येन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति ॥७॥सा वै द्वितीयामिच्छ- खेसब्रवीन कै मैकोऽयस्यसीति । सा द्वितीयां वित्त्वा न्यप्लवत ॥बा (तृतीयाम् ) इच्छस्वैवेसनवीनो. वाव मा. द्वे उद्यस्यथ इति । सा तृतीयां वित्या न्यप्लवत । सोऽब्रवीदत्र वैमोऽद्यस्यथेति १-द । २ कुश्यौ । ३ येप । ४ केसा-1५ हाम्ल-1 ६ पपरा- ७ सम्ती।८-ति । पश्यः । १० तम् । ११ पित्वा । १२ नास्ति "न्यप्लवत । १३-यम् । १४ वै । १५ वा । १६ स्थान छोड़ा हुआ है, ध्वे । १७ अब्-१८-स्यसी । सा ।
( ५८. ) २० १ २ 1स यदेकयाऽग्रे समवदत तस्मादेकर्चे साम । अथ यहे.अंपा- सेधत्तस्माइयोन कुर्वन्ति । अथ यत् तिसभिस्समपादयत् तस्मादु तृचेसाम॥१०॥ता अब्रवीत्पुनीध्वंन पूतावै स्थेति॥११॥ १॥५६॥ अष्टादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सा गायत्री गाथयाऽपुनीत नाराशस्यात्रिष्टुबैभ्या जगती भीमम्बत मलमपावधिषतेति । तस्मागीमलाधियो वा एताः। धियो वा इमा मलमपावधिपतति । तस्मादु भीमलाः । तस्मादु गायतां नाऽश्नीयात् । मलेन ह्येते जीवन्ति ॥१॥ अथर्क सामाऽब्रवीद्भहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीष्वेति । स ऊर्ध्वगणेना- ऽपुनीत ॥२॥ पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद ॥३॥ ताभ्यां दिशो मिथुनाय पर्यौहन् । तां सम्भविष्यन्नह्वयताऽमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहमिति ॥४॥ तामेतदुभयतो वाचाऽसरिच्यत हिङ्कारेण पुरस्तातस्तोभेन मध्यतो निधनेनोपरिष्टात् । अतितिस्रो ब्राह्मणायनीस्सदृशी रिच्यते य एवं वेद ॥॥ तयोर्यस्सम्भवतो- १० १६-पद-। २० तिन- २१ सम्प-॥ १-स्योत् । २ ब । ३-थे । ४-ता। ५ ऽग्नी-1 के । ७-तानी । -ता। नूक-1 १०-प्यन्य । १२ अवचयत, अह्वयन्त । १२ साम १३-च । १४ त्यरूच्यते ।
रूवश्शूषोऽद्रवत् (प्राणास्) ते । ते प्राणा एवो; अद्रवन ॥६॥ सोऽसावादिसस्स एष एव उदग्निरेव गी चन्द्रमा एव थम् । सामान्येव उच्च एव गी यज्रष्येव थमिसधिदेवतम् ॥७॥ अथा- ऽध्यात्मम् । प्राण एव उदागेव गी मन एव थम् । स एषोऽधिदेवतं चाऽध्यात्मं चोद्गीथः ॥ स य एवमेतदधिदेवतं चाऽध्यात्म चोद्गीथं वेदैतेन हास्य सर्वेणोद्गीतम्भवसेतस्मादु एव सर्वस्मादा- वृश्च्यते य एवं विद्वाँसमुपवदति ॥६॥ ११५७॥ अष्टादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तद्यदिदमाहुः क उदगासीरिति क एतमादिसमगासीरिति १९ २० १ ह वा एतत्पृच्छन्ति ॥२॥ एतं ह वा एतं त्रय्या विद्यया गायन्ति। ३ ६ यथा वीणागाथिनो गापयेयुरेवम् ॥२॥ स एष हृदः कामानाम्पूर्णो यन्मनः । तस्यैपा कुल्या यद्वाक् ॥३॥ तद्यथा वा अपो हृदात्कु- ल्ययोऽपरामुपनयन्येवमेवैतन्मनसोऽधि बाचोद्गाता यजमानम् यस्य कामान् प्रयच्छति ॥४॥ स य उद्गातारं दक्षिणाभिराराधयति १२ १५ चु-। १६ द्र- १७ ऽद्धा-। १८ गीथ्-। १६-गी- २० भवत्येति, भवन्ति ॥ ९-सी। २ प्रच्छन्य । ३ नृय्या । ४-गायिनो, गायय-1 ५ हृद्- ६ कूल्-१७ यत् । ८ वात् । -त्र । १० अदो । ११-यन्य,-यन्ते, -यन्त्य् । १२-ना। १३ दक्षिणोभि । १४ राध्- १५ २१ ૨ ૨ तं सा कुल्योऽपधावति । य उ एनं नाऽऽराधयति स उ तामपि- हन्ति ॥५॥ अथ वा अतः प्रत्तिश्चैव प्रतिग्रहश्च । तममिति वै प्रदीयते । तद्वाचा यजमानाय प्रदेयम्मनसाऽऽत्मने। तथा ह सर्व न प्रयच्छति ॥६॥ तद्यदिदं सम्भवतो रेतोऽसिच्यत तदशयत् । यथा हिरण्यमविकृतं लेलायदेवम् ॥७॥ तस्य सर्वे देवा ममत्विन आसन्मम ममेति । तेऽब्रुवन्वीदं करवामहा इति । तेऽब्रुवच्छयो वा इदमस्मत् । आत्मभिरेवैनाद्विकरवामहा इति ॥८॥ तदात्मभिरेव व्यकुर्वत । तेषां वायुरेव हिड्डार आसाऽग्निः प्रस्ताव इन्द्र आदि- स्सोमबृहस्पती उद्गीथोऽश्विनौ प्रतिहारो विश्वे देवा उपद्रवः प्रजापतिरेव निधनम् ॥२॥ एता वै सर्वा देवता एता हिरण्यम् । अस्य सर्वाभिर्देवताभिस्स्तुतम्भवति य एवं वेद । एताभ्य उ एवस सर्वाभ्योदेवताभ्य आवृश्च्यतेय एवं विद्वाँसमुपवदति॥१०॥श५८॥ अष्टादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अथ ह ब्रह्मदत्तश्चैकित्तानेयः कुरुंजगामाऽभिपतारिणं काक्ष- सेनिम् । स हाऽस्मै मधुपर्क ययाच ॥१॥अथ हास्य वैप्रपद्य पुरो- ૨૪ १५ अधः । १६ प्रतिश् । १७ धु-1 १८ प्रात्-। १६ सिध्य्-1 २० दश्-1 २१ अपि-अपितृतं । २२ या ।२३ सोमा-इ।२४ हिरण्य ।। १ कू-, प्रारैन् । २ एक में यहां हि समाप्ति है । ३-य।
( १ ) । - हितोऽन्ते निषसाद शौनकः । तं हाऽनामन्त्र्य मधुपर्कम्पपौ ॥२॥ तं होवाच किं विद्वान्नो दाल्भ्याऽनामन्त्र्य मधुपर्कम्पिबसीति । सामवैर्यम्प्रपद्येति होवाच ॥३॥ त ह तत्रैव पप्रच्छ यद्वा यौ तद्वेस्थाश्इति । हिङ्कारो वा अस्य स इति ॥४॥ यदग्नौ तद्वत्था३ इति । प्रस्तावो वा अस्य स इति ॥॥ यदिन्द्रे तद्वेस्था३इति । अादिर्वा अस्य स इति ॥६॥ यत्सोमबृहस्पयोस्तद्वेस्था३इति। उद्- गीथो वा अस्य स इति ॥७॥ यदश्विनोस्तद्वेस्था इति । प्रतिहारो वा अस्य स इति ॥८॥ यद्विश्वेषु देवेषु तद्वेस्था३इति । उपद्रवो वा अस्य स इति ॥६यत्प्रजापतौ तद्वेस्थाइति । निधनं वा अस्य तदिति होवाच । आर्षेयं वा अस्य तद्वन्धुता वा अस्य सेति ॥१०॥ स होवाच नमस्तेऽस्तु भगवो विद्वानपा मधुपर्कमिति ॥११॥ अथ हेतरः पप्रच्छ कि देवसं सामवैर्यम्प्रपद्यति ।यदेवसा- मु स्तुवत इति होवाच तद्देवसमिति ॥१२॥ तदेतत् साध्वेव प्रत्युक्तम् । व्याप्तिर्य अस्यैषति होवाच ब्रूह्येवेति । मेदं ते नमो- ऽकर्मेति होवाच । मैव नोऽतिपातीरिति॥१३॥ स होवाचा प्रक्ष्य ४-मन्त्रः । ५ सामवैर्या, 'र' रहित ६ तत । ७ सोमा- 'द- का पुनर्लेख । ९ नास्ति । १० अव्य । ११-वत्या । १२ सामवैय्या । १३-उत्तम्।
( ६२ ) १ वाव त्वा देवतामप्रक्ष्यं वाव त्वा देवतायै देवताः । वाग्देवसं साम वाचो मनो देवता मनसः पशवः पशूनामोषधय ओषधीनामापः । तदेतदभ्यो जातं सामाऽप्सु प्रतिष्ठितमिति ॥१४॥ १॥५॥ अष्टादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । देवासुरा अस्पर्धन्त । ते देवा मनसोदगायन् । तदेषाममुरा अभिद्रुस पाप्मना समटजन् । तस्माद्बहु किं च किं च मनसा ध्यायति । पुण्यं चैनेन ध्यायति पापं च ॥१॥ ते वाचोदगायन। तां तथैवाऽकुर्वन् । तस्मादहु किं च किं च वाचा वदति । सत्यं चैनया वदसनृतं च ॥२॥ ते चतुषोदगायन् । तत्तथैवाऽकुर्वन् तस्मादहु किं च किं च चक्षुषा पश्यति । दर्शनीयं चनेन पश्यस दर्शनीयं च ॥३॥ ते श्रोत्रेणोदगायन्।तत्तथैवाऽकुर्वन् । तस्माद्बहु किं च किं च श्रोत्रेण शृणोति । श्रवणीयं चैनेन शृणोत्यश्रवणीय च ॥४॥ तेऽपानेनोदगायन् । तं तथैवाऽकुर्वन् । तस्मादहु किं च किं चाऽपानेन जिघ्रति । सुरभि चैनेन जिघ्रति दुर्गन्धि च ॥५॥ ते प्राणेनोदगायन् । अथासुरा श्राद्रवस्तथा करिष्याम इति मन्यमानाः ।।६।। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वसेतैवमेवाऽसुरा १४ भ्यो। १ऽगाय्-२-द्रक्ष्य अथवा-द्रत्य । ३-स-४व । ५ कूर- ह-त्य । ७ वै। नास्ति । -गात् ।
व्यवसन्त । स एषोऽश्माऽऽखणं यत्प्राणः ॥७॥ स यथाऽश्मान- १२ माखणमृत्वा लोष्टो विवसत एवमेव सविध्वंसते य एवं विद्वाँ- समुपवदति ॥८॥१६॥ अष्टादशेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । अष्टादशोऽनुवाकस्समाप्तः । [इति प्रथमोऽध्यायः।] १० सते, पन्ता । ११-णों । १२ आणेम् ।
[अथ द्वितीयोऽध्यायः ।। देवानां वै षडद्गातार आसन् वाक् च मनश्च नतुश्च श्रोत्रं चाऽपानश्च प्राणश्च ।।२।। तेथ्रियन्त तेनोद्गात्रा दीक्षामहै येनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्गलोकमियामेति ॥२॥ तेऽब्रुवन् वाचोद्गात्रा दीक्षामहा इति । ते वाचोद्गात्राऽदीक्षन्त । सयदेव वाचा वदति तदात्मन आगायदथ य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः॥३॥ साम्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव वाचा पापं वदति स एव स पाप्मा ॥४॥ तेऽब्रुवन् न वै नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । मनसोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥५॥ ते मनसोद्गात्राऽदीक्षन्त । स यदेव मनसा ध्यायति तदात्मन आगायदथ य इतरे कामास्तान्देवे- २ भ्यः ॥६॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव मनसा पापं ध्यायति ५ ६ स एव स पाप्मा ॥७॥ तेऽब्रुवन् नो न्वाव नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । चक्षुषोगात्रा दीक्षामहा इति ॥८॥ते चतुषो- द्वात्राऽदीक्षन्त । स यदेव चतुषा पश्यति तदात्मन आगायदथ य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः ॥६॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव चतुषा पापम्पश्यति ( स एव स पाप्मा)॥१०॥तेऽब्रुवन्नोन्वाव १-२'य अधिक है।३-त्यु।४नवीन्।५ न्धावत्य-1-मान्न नोऽयम्मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । श्रोत्रेणोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥११॥ ते श्रोत्रेणोद्गानाऽदीक्षन्त । स यदेव श्रोत्रेण शृणोति तदात्मन ागायदय य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः॥१२॥ तत्पाप्मा- ऽन्वसृज्यत । स यदेव श्रोत्रेण पापं शृणोति स एव स पाप्मा ॥१३॥ तेऽब्रुवन्नो न्वाव नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । अपानेनोगात्रा दीक्षामहा इति ॥१४॥ तेऽपानेनोगात्राऽदीक्षन्त । स यदेवाऽपानेनाऽपानिति तदात्मन आगायदय य इतरे कामा- स्तान्देवेभ्यः ॥२५॥ तम्पाप्मान्वसृज्यत । स यदेवाऽपानेन पापं गन्धमपानिति स एव स पाप्मा ॥१६॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽय- मृत्युं न पाप्मानमसवातीत् । प्राणेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति॥१७॥ ते प्राणेनोद्गात्राऽदीक्षन्त । स यदेव प्राणेन प्राणिति तदात्मन आगायदय यइतरेकामास्तान्देवेभ्यः॥१८॥तम्पाप्माना वसूज्यत। न ह्येतेन प्राणेन पापं वदति न पापं ध्यायति न पापम्पश्यति न पापं शृणोति न पापं गन्धमपानिति॥१६॥ तेनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमायन् । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य एवं वेद ॥२०॥२१॥ प्रथमेनुके प्रथमः खण्डः । ८अपारीत।
सा या सा पागासीत्सोऽग्निरभवत् ॥॥॥ अथ यत्तन्मन श्राजीव स चन्द्रमा अभवत् ॥२॥ अथ यत्तचतुरासीत् स आदियोऽभवत् ॥३॥ अथ यत्तच्छोमासीता इमा दिशोऽभवन् । ताउएव विश्वदेवाः॥४॥ अथ यस्सोऽपान आसीत्सबृहस्पतिरभवत् । यदस्य वाचो बृहले पतिस्तस्माबृहस्पतिः ॥॥ अथ यस्स प्राण आसीत्स प्रजापतिरभवत्। स एष पुत्री प्रजावानुद्गीयो यात्राणः। तस्य स्वर एव प्रजाः । मजावान्भवति य एवं वेद ॥६॥ तं हैतमके प्रसक्षमेव गायन्ति प्राणाप्राणामाणा३ हुम्भा प्रोवा इति॥७॥ तदु होवाच शाब्यायनिस्तत एतमर्हति प्रसक्षं गातुम् । यद्वाव वाचा करोति तदेतदेवाऽस्य कृतम्भवतीति ॥॥ अथ वा अत ऋक्सान्नोरेव प्रजातिः । स यद्धिकरोखभ्येव तेन क्रन्दति । अथ यत्प्रस्तासैव तेन प्लवते । अथ यदादिमादत्ते रत एव तेन सिञ्चति। अथ यदुद्गायात रेत एव तेन सिक्तं सम्भावपति । अथ यत्मति- हरति रेत एव तेन सम्भूतम्बवर्धयति । अथ यदुपद्रवति रेत एव तेन प्रवृद्धं विकरोति।अथ यनिधनमुपैति रेत एव तेन विकृतम्प्रज- १ यत् । २ अतम, अथ। ३ कुर्वते । ४ ए ! ५-भैल्-, नास्ति यति। अथ यत्प्रतिहरति ।
नयति । सैपसानीः प्रजातिः ॥६॥ स य एवमेतामृक्सान्नोः प्रजाति वेद प्र हैनमुक्सामनी जनयतः॥१०॥ २॥२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकत्समाप्तः ।। १ ७ एष एवेदमा आसीय एष तपति । स एष सर्वेषाम्भूतानां तेजो हर इन्द्रियं वीर्यमादायोध उदक्रामत् ॥२॥ सोऽकामयते- कमेवाऽक्षरं स्वादु मृदु देवानां बनामोते ॥२॥ स तपोऽतप्यतं । स तपसेकोतरमयर शातं देवाश्चर्षयश्चोपसमैप्सन् । अथैपोऽसुरान्भूतहनोऽसृजतेतस्य पाप्मनोऽनन्बागमाय ॥४॥ तं वाचोपसमैप्सन् । ते वाचं समारोहन् । तेषां वाचम्पर्यादत्त । तस्मात्पर्याद ता वाक् । ससं च ह्येनया वदसनृतं च ॥५॥ तम्म- नसोपसमेप्सन् । ते मनस्समारोहन् । तेषाम्मनः पर्यादत्त । तस्मात्पर्याद तम्मन[:]म् । पुण्यं च ह्यनेन ध्यायति पापं च ॥६॥ तं चतुमोसनेनान् । ते चतुस्समारोहन् । तेषां चतुः पादत्त। तस्मात्पर्यातं चतुः। दर्शनीयं च ह्योन पश्यत्यदर्शनीयं च ॥७॥ ६ स.नं.:, क्सानं.। १स ।२-श । ३ मदु । ४ नाहित । ५ एति । ऐका। ७ 'उदेवानाम् ' पूर्व से पुनः है। ८ पय्यंत्तं ।
( १८ ) तं श्रोत्रणोपप्समैप्सन् । ते श्रोत्रं समारोहन । तेषां श्रोत्रम्पर्यादत्त । तस्मात्पर्यात श्रोत्रम् । श्रवणीयं चनेन शृणोत्सश्रवणीयं च ॥६॥ रमपानेनोपसमैप्सन् । तेऽपान समारोहन् । तेषामपानम्पर्यादत्त। तस्मात्पर्यात्तोऽपानः । सुरभि च ह्यनेन जिबात दुर्गन्धि च ॥६॥ तम्माणेनोपसमेप्सन् । तन्त्राणेनोपसमाप्नुवन् ॥१०॥ अथाऽसुरा भूतहन आद्रवन्मोहयिष्याम इति मन्यमानाः ॥११॥ स यथा- ऽश्मान्मृत्वा लोष्टो विध्वंसतैवमेवाऽसुरा व्यध्वंसन्त । स एषोऽश्मा- खणो यत्माणः ॥१२॥ स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा लोष्टो विध्वंसत एवमेव स विश्वंसते य एवं विद्वांसमुपवदति॥१३॥२॥३॥ द्वतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स एष वशी दीप्तान उद्गीथो यत्प्राणः । एष हीदं सर्व वशेकुरुते ॥१॥ वशी भवति वशे स्वान्कुरुते य एवं वेद । अस्य ह्यसावग्रे दीप्यते३ अमुष्य वासः ॥२॥ तं हैतमुद्गीथं शाघ्यायनिराचष्टे वशी दीसाग्र इति । दीप्ताग्रा ह वा अस्य कीर्तिभवति य एवं वेद ॥३॥ आभूतिरिति कारीरादयः प्राणं वा अनुप्रजाः पशव भाभवन्ति । स य एवमेतमाभूतिरित्युपास्त ऐवप्राणेन प्रजयापशुभिर्भवति॥४॥ पांत्त, पर्याप्त। १ एषाँ त ईदं सर्व वशेकुरुते ऐसा पाठ देते हैं। २-शो। । ३-४प्रतः।
६ ५-भूर् । ६ शलि-1 ७'पजया' अधिक है। भूर्।९प्रवरोद्धा। ( १ ) सम्भूतिरिति सात्ययज्ञयः । पाणं वा अनुमजाः पशवस्सम्भवन्ति। स य एवमेतं सन्भूतिरित्युपास्ते समे [व] प्राणेन प्रजया पशुभि- भाति ॥ प्रभूतिरिति शेलगा। प्राण वा अनुमजाः पशवः प्रभवन्ति । स य एवमेतम्मभूतिरित्युपास्ते त्रैव प्राणेन प्रजया पशुभिर्भवति ॥६॥ भूतिरिति भाल्लविनः । प्राणं वा अनुप्रजाः परमो भवन्ति । स य एवमेतम्भूतिरित्युपास्ते भवत्येव प्राणेन प्रजया पशुभिः ॥७॥ अरोधोऽनपरुद्ध इति पाणशैलनः । एष ह्यन्यमपरुणद्धि नैतमन्यः । एष ह वाऽस्य द्विषन्तम्भ्रातृव्यम- परुणाद्ध य एवं वेद ॥८॥४॥ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । एकवार इत्यारुणेयः । एको ोवैष वीरो यत्माणः । प्रा हा ऽस्यैको वीरोवीर्यवाजायते य एवं वेद॥२॥एकपुत्रइतिचैकितानेयः। एको ह्येवैष पुत्रो यत्माणः ॥२॥ स उ एव द्विपुत्र इति । द्वौ हि माणापानौ ॥३॥ स उ एव त्रिपुत्र इति । त्रयो हि प्राणोऽपानो व्यानः ॥४॥ स उ एव चतुष्पुत्र इति । चत्वारो हि प्राणोऽपानो १०-णद्वि । ११ से । १२-त । १३-बीन्- १-रु । २त्य्। ३-णय, ‘एको केस्थान में सर्वत्र एका'४-प। ५द्वि- ઉ રે २ ( ७० ) ज्यानस्समानः॥॥ स उ एव पञ्चपुत्र इति। पञ्च हिमाणोऽपानो व्यानस्समानोऽवानः ॥६॥ स उएव षट्पुत्र इति । पड्ढि प्राणो- ऽपानो व्यानस्समानोऽवान उदानः ॥७॥ स उ एव सप्तपुत्र इति सप्तहीमे शीर्षण्याः प्राणाः ॥८॥ स उ एव नवपुत्र इति सप्त हि शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाचौ ॥ स उ एव दशपुत्र इति । सप्त- शीर्षरयाः प्राणा द्वावधाञ्चौ नाभ्यां दशमः ॥०॥ स उ एव बहुपुत्र इति । एतस्य हीयं सर्वाःमनाः॥११॥ एतं ह स्म वैतदुद्गीथं विद्वांसः पूर्वब्राह्मणाः कामागायिन आहुः कति ते पुत्रानागास्याम इति ॥१२॥२१॥ द्वित.येऽनुवाके तृतीयः खण्डः। 'स यदि ब्रूगादेका आगायेति प्राण उद्गीथ गते विद्वाने सन्मनसा ध्यायेत् । एको हि प्राणः। एकोहाऽत्यःऽऽजायते ॥१॥ स यदि ब्रूयाहो म आगायेति प्राण उद्गीथ इत्येव विद्वान्द्रो मनसा ध्यायेत् । द्वौ हि पाणागनी दो हेवाऽस्याऽऽज.यो.।२॥स यदि बूयाचीन्म पा- गायोते प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वाँस्त्रीन्मनसाध्यायेत् । त्रयो हि प्राणो । ६-ना । ७ अभि । ८-अ । वसुपुत्र । १० यम, दयम् । १६-गैन ॥ १ पेक्-२ त्रयो । ३ 'व्यानः' अधिक है। ४ स हैवाऽस्याऽऽजा- बन्ते अधिक है। ५ मन ।
६ पानोमानः यो हैवाऽरयाऽऽगायन्ते ॥३॥स यदि यातुरोम भागायेति प्राणा उद्गीथ इत्येव विद्वाँश्चतुरो मनसा ध्यायेत्। चत्वारो हिमाणोऽपानो च्यानस्समानः। चत्वारा हेवास्याऽऽजायन्ते ॥४॥ स यदिबूयारपञ्च म अागायेति माणद्रीयइत्येव विद्वानपञ्चमनसा ध्यायेत् । पञ्चहिमाणोऽप.नो च्यानलमानोऽवानः। पञ्च हैवाऽरया जायन्ते ॥॥ स यदि ब्रूयात् परम आगायेतिमाणउदगीथ इत्येव विद्वान् पाननला याये । पाई जाणोजानव्यानस्लमानोमान उदानः।पड्ढव:ऽस्याऽऽजायन्ते ॥६॥ स यदि यात्रूसमागा- येति प्राण उद्गीथ इत्येव विद्वान् सहमनसा ध्यायेत् । सप्त हीमे शोषण्य प्राणाःसा हैवाऽस्याऽजायनो॥जास यदि बयानव मागायेति प्राण उद्गीथ इत्येव विद्वानव मनसा ध्यायेत् । सप्त शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाञ्चौ । नव हैवाऽस्याऽजायन्ते !! स यदि याद्दश म आगायति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान्दश मनसा ध्यायेत् । सप्त शीर्षण्याः प्राणा द्वाक्वाञ्चौनाभ्यां दशमः। दश हैवा ऽरयाऽ.जायन्ते ॥६॥ स यदिब्रूयात्सहरूम्म आगायति प्राण उद्गीथ इत्येव विद्वान सहसन्मनसा ध्यायेत् । सहस्रं हैत आदित्यरदमयः। तेऽस्य पुत्रः । सहस्रहैवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥१०॥ एवं हैवैतमुद्गीथ ६ नास्ति । स यदि ....."व्यान। भिार ।।द्वा। १० त । ११ ह । ११ (१), म्परादणारकक्षीवाँस्त्रसदस्युरितिपूर्वेमहाराजाश्श्रोत्रियास्सह- सपुत्रमुपनिषेदुः। ते ह सर्व एव सहस्रपुत्रा पासुः॥१२॥ स य एवैवं वेद सहनं हैवाऽस्य पुत्रा भवन्ति ॥१२॥ २६॥ द्वितीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। द्वितीयोऽनुवाकरसमाप्तः । ६ १० १२ शर्यातो वै मानवः प्राच्यां स्थल्यामयजत । तस्मिन् ह भूता- न्युद्गीथेऽपित्वमेषिरे ॥२॥ तं देवा बृहस्पतिनोद्गात्रा दीक्षामहा इति पुरस्तादागच्छन्नयं त उद्गायत्विति । बम्बेनाऽऽजद्विषेण पितरो दक्षिणतोऽयं त उद्गायत्वित्युशनसा काव्येनाऽनुतः पश्चादयं त उद्गायविसयास्येनाऽऽङ्गिरसेन मनुष्या उत्तरतो- ऽयं त उद्गायत्विति ॥२॥ स हेतांचके हन्तैनात पृच्छानि कियतो वा एक ईशे कियत एकः कियत एक इति॥३॥स होवाच बृहस्पतिं यन्मेत्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥॥ स होवाच देवे- वेव श्रीस्स्याद्देवेष्वीशा खर्गमुत्वालोकं गमयेयमिति ॥॥ अय होवाच बम्बमाजद्विषन्मन्मत्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥६॥ स १२ जॅश् । १३ यद् । १शव्या-२ स्थाल्पाम् । ३ अजेयत । ४ ऽपिसनम् । ५ ऐशिरे । ६ बिम्ब-1 ७ दक्षणतो। ८ कांस्येना। -रा १० श्चातः। ११ अयाह्यस्येना, अयंहिस्येना। १२ किया। १३-तिः। १४ श्रियम् अधिक है। १५ नास्ति, स होवाच. 'ततस्स्यादिति। १४ ( ७३ ) होवाच पितृष्वेव श्रीस्स्यापितृष्वीशा स्वर्गमु त्वां लोकं गमयेयमिति ॥७॥ अथ होवाचोशनसं काव्यं यन्मे त्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥८॥स होवाचाऽसुरेष्वेव श्रीस्स्यादसुरेष्वीशा स्वर्गमु त्वां लोकं गमयेयमिति॥६॥ अथ होवाचाऽयास्यमाङ्गिरसं यन्मे त्वमुद्गायेः किं २० ૨૨ ततस्स्यादिति ॥१०॥ स होवाच देवानेव देवलोके दध्याम्मनुष्या- न्मनुष्यलोके पितॄन पितृलोके नुदेयाऽस्माल्लोकादसुरान स्वर्गमु त्वां लोकं गमययामिति ॥१शारा॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स होवाच त्वं मे भगव उद्गाय य एतस्य सर्वस्य यशो[ऽसी]ति ॥२॥ तस्य हाऽयास्य एवोजगौ । तस्मादुद्गाता वृत उत्तरतो निवेशनं लिप्सेत । एतद्ध नाऽऽरुद्ध निवेशनं यदुत्तरतः ॥२॥ उत्तरत आगतो यास्य आङ्गिरसश्शर्यातस्य मानवस्योजगौ । स प्राणेन देवान्देवलोके ऽदधादपानेन मनुष्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन् पितृलोके हिङ्कारेण वज्रेणाऽस्माल्लोकादसुराननुदत ॥३॥ तान् होवाच दूरं गच्छतेति । स दूरो ह नाम लोकः। तं ह जग्मुः। त एतेऽसुरा असम्भाव्यम्पराभूताः ॥४॥ छन्दोभिरेव वाचा १६ य । १७ जे । १८-शाः। १६न्वं । २०-ध्यातू । २१-लॅन् । २२ 'उ' अधिक है । २३ है। १-शस । २-तृन् । ३असंहोयम्-1 ३ * (७४) ५ ७ शर्यातम्मानवं स्वर्ग लोकं गमयांचकार ॥॥ ते होचुरमुरा एतत वेदाम यो नोऽयमिस्थमधत्तेति । ततपागच्छन् । तमेसाऽपश्यन् ॥६॥ लेऽब्रुवन्नयं वा आस्य इति । यदब्रुवन्नयं वा पास्य इति तस्मादय- मास्यः । अयमास्यो ह वै नामैषः । तमयास्य इति परोक्षमाच- सते ॥७॥ स प्राणो वा अयास्यः । प्राणो ह वा एनान् स नुनुदे ॥६॥ स य एवं विद्वानुद्गायति प्राणेनैव देवान्देवलोके दधासपानेन मनुष्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन् पितृलोके हिङ्कारणेव वज्रेणाऽस्माल्लोकाद्विषन्तम्भ्रातृव्यं नुदते ॥धारा॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । त ह ब्रूयाद्दूरं गच्छति । स यमेव लोकममुरा अगच्छंस्तं हैव गच्छति ॥१॥ छन्दोभिरेव वाचा यजमानं स्वर्ग लोकं गमयति ॥२॥ ता एता व्याहृतयः। प्रेसोत वाग[इति]भूर्भुवस्स्वरित्य[उदिति]॥३॥ तद्यत्मेति तत्याणस्तदयं लोकस्तदिमंलोकमस्मिँलोक आभजति॥४॥ एसपानस्तदसौ लोकस्तदमुं लोकममुष्मिलोक आभजति ॥५॥ वागितिं तद्ब्रह्म तदिदमन्तरिक्षम् ॥६॥ भूर्भुवस्वरिति सा त्रयी- विद्या ॥७॥ उदिति सोऽसावादियः । तद्यदुदित्युदिव श्लेष- ४ शय्या-1 ५ त । ६-छस् । ७-असो । ८ पान्-1 ६ पहिंक-1 १ १०-पान् ॥ १-श्रा।२ स्या-1३सतू।
( ७५ ) ७ यति ॥८॥ तद्यदेकमेवाऽभिसम्पद्यते तस्मादेकवीरः । एको ह तु सन्वीरो वीर्यवान् भवति । आहाऽस्यैको वीरो वीर्यवान जायते य एवं वेद ॥६॥ तदु होवाच शाब्यायनिर्बहुपुत्र एष उद्गीथ इसे- वोपासितव्यम् । वयो ह्येत आदिल रश्मयस्तेऽस्य पुत्राः । तस्मा- बहुपुत्र एष उद्गीथ इसेवोपासितव्यमिति ॥१०॥२१।। तृतीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । १ देवासुरास्समयतन्तेसाहुः । न ह वै तद्देवासुरास्सम्यतिरे। प्रजापतिश्च ह वै तन्मृत्युश्च सम्येताते ॥२॥ तस्य ह प्रजापतेर्दैवाः मियाः पुत्रा अन्त मासुः। तेऽध्रियन्त तेनोगात्रा दीक्षामहै येना- ऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमियामेति ॥२॥ तेऽब्रुवन्वा- चोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥३॥ ते वाचोदात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं वागागायद्यदिदं वाचा वदति यदिदं वाचा भुञ्जते ॥४॥ ताम्पाप्माऽन्वसृज्यत। स यदेव वाचा पापंवदति स एव स पाप्मा॥५॥ तेऽब्रुवन् न वै नोऽयम्मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । मनसोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥६॥ ते मनसोगात्रा दीक्षन्त । तेभ्य इदम्मन ४ श्येष्-५-६।६-यावान् । ७-ए (इत्य) ।आदित्यस्यास्त ॥ १-याय । २“नोगात्रा दीक्षामहा इति' अधिक है पर '' और 'भ्य' के बीच लाल रङ्ग से काटा गया है । ३ अवत्र- ( ७६ ) आगायद्यदिदम्मनसा ध्यायति यदिदम्मनसा मुअते ॥७॥ तत्पा- प्माऽन्वसृज्यत । स यदेव मनसा पापं ध्यायति स एव स पाप्मा ॥८॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । चतुषोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥६ते चतुषोद्गात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं चतुरागायद्यदिदं चक्षुषा पश्यति यदिदं चतुषा भुअते ॥१०॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव चक्षुषा पापम्पश्यति स एव स पाप्मा ॥११॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयम्मृत्यु न पाप्मा- नमसवाक्षीत् । श्रोत्रेणोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१२॥ ते श्रोत्रेणो- गात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं श्रोत्रमागायद्यदिदं श्रोत्रेण शृणोति यदिदं श्रोत्रेण भुञ्जते ॥१३॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव श्रोत्रेण पापं शृणोति स एव स पाप्मा ॥१४॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । प्राणेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१॥ ते प्राणेनोगात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं प्राण आगाय- यदिदं प्राणन प्राणिति यदिदं प्राणेन भुञ्जते ॥१६॥ तम्पाप्मा- ऽन्वसृज्यत । स यदेव प्राणेन[ पापं]पाणिति स एव स पाप्मा॥१७॥तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्युं न पाप्मानमसवाक्षीत्। अनेन मुख्येन प्राणेनोगात्रा दीक्षामहा इति ॥१८॥ तेऽनेन ४-त्यु । ५ "स' अधिक है । ६ ने ।
( ७७ ) मुख्येन प्राणेनोगात्राऽदीक्षन्त ॥१६॥ सोऽब्रवीन्मृत्युरेष एषां स उद्गाता येन मृत्युमसेष्यन्तीति ॥२०॥ न ह्येतेन प्राणेन पापं वदति न पापं ध्यायति न पापम्पश्यति न पापं शृणोति न पापं गन्धमपानिति ॥२॥ तेनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमायन् । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य ३ २ एवं वेद ॥२२॥२॥१०॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। स यथा हत्वा प्रमृद्याऽतीयादेवमेवैतम्मृत्युमत्यायन् ॥१॥ स वाचम्प्रथमामत्यवहत् । ताम्परेण मृत्यु न्यदधात् । सोऽग्निर- भवत् ॥२॥ अथ मनोऽत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधात् । स चन्द्रमाअभवत् ॥३॥अथ चतुरत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधात्। स आदित्योऽभवत् ॥॥ अथ श्रोत्रमत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधात् । ता इमा दिशोऽभवन् । ता उ एव विश्वे देवाः ॥५॥ अथ प्राणमत्यवहत् । तम्परेण मृत्यु न्यदधात् । स वायुर- भवद ॥६॥ अथाऽऽत्मने केवलमेवाऽन्नाधमागायत् ॥७॥ स एष ૨ २ । ७-यम्।८ गमयन्। १स अधिक है, 'अत्यायन्' के स्थान में-यत् ।२-यु। ३-न् । ४दथा।
( ७८ ) १२ एवाऽयास्यः । आस्य धीयते । तस्मदयास्यः । यदेवा [ऽयम्] आस्य रमते तस्मादेवाऽयास्यः ॥८॥ स एष एवाऽऽङ्गिरसः। अतो हामान्यङ्गानि रसं लभन्ते । तस्मादाङ्गिरसः । यद्वेवैषा- मङ्गानां रसस्तस्मा देवाऽऽङ्गिरसः ॥६॥ तं देवा अब्रुवन् केवलं वा आत्मनेऽन्नाघमागासीः । अनु न एतास्मन्ननाद्य आभज । एतदस्याऽनामयत्वमस्तीति ॥१०॥ तं वै प्रविशतेति । स वा आकाशान् कुरुष्वेति । स इमान् प्राणानाकाशानकुरुत ॥११॥ तं वागेव भूत्वाऽग्निः प्रविशन्मनो भूत्वा चन्द्रमाश्चतुर्भूत्वा ऽऽदित्यश्श्रोत्रम्भूत्वा दिशः प्राणो भूत्वा वायुः ॥१२॥ एषा वै दैवी परिषदैवी सभा दैवी संसत् ॥१३॥ गच्छति ह वा एतां दैवीम्परिषदं दैवीं सभां दैवीं संसदं य एवं वेद ॥१४॥२॥१२॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । यत्रो ह वैक चैता देवता निस्पृशन्ति न हैव तत्र कश्चन पाप्मान्यङ्गः परिशिष्यते ॥२॥ स विद्यानेह कश्चन पाप्मान्यङ्गः परिशेक्ष्यते सर्वमेवैता देवताः पाप्मानं निधक्ष्यन्तीति । तथा हैव १८ १७ १७ १ '५ प्रासे । ६ध्यति । ७ एगें। ८ स्ये। -ऽयास्यः। १० अङ-1 ११ अः । १२ आमयत्वम् । १३ असी । १४ आकाशात् । १५ प्रशासनम् । १६ कुरुत । १७ - नास्ति । १८वी-॥ १चे।२क्षते । ३ एवम् । ४ एता।
( ७६ ) भवति ॥२॥ य उ ह वा एवंविदमृच्छति यथैता देवता ऋत्वा नीयादेवं न्येति । एतासु बैवेनं देवतामु प्रपन्नमेतासु बसन्तमुप- वदति ॥३॥ तस्य हैतस्य नैव काचनाऽऽतिरस्ति य एवं वेद । य एवैनमुपवदति स प्रातिमाछति ॥४॥ स य एनमृच्छादेव ता देवता १२ उपसृय ब्रूयादयम्माऽऽरत् स इमामाति न्येविति। तां हैवाऽऽति न्येति ॥५॥ यावदावासा उहाऽस्येमे प्राणा अस्मॅिलोक एतावदा- १३ वासा उ हाऽस्यैता देवता अमुष्मिलोके भवन्ति ।।६।। तस्मादु हैवं विद्वान्नवाऽग्रहतायै विभीयानाऽलोकतायै । एता मे देवता अस्मिँलोके गृहान् करिष्यन्ति । एता अमुष्मिलोके भवन्ति । तस्मादु लोकम्पदास्यन्तीति ॥७॥ तस्मादु हैवं विद्वान्नैवाऽगृहतायै विभीयानाऽलोकतायै । एता मे देवता अस्मॅिलोके गृहेभ्यो गृहान् करिष्यन्ति स्वेन्य आयतनेभ्य इति हैव विद्याद् [एता] देवता अमुष्मिँलोके लोकम्पदास्यन्तीति ॥८॥ तस्मादु हैवं ५-विद् वा विद।६ दुच्छति।७ नेति । ८-तीर् । ६ आच्छति । १० एम् । ११ रात् । १२ अत्ति ।१३-दावशा। १४ ग्रह-१५ अस्मिन् । १६ प्रवदा-1१७ पायतनेभ्य' अधिक है । १८ एव ता।।
(.८०) विद्वानवाऽगृहतायै विभीयान्नाऽलोकतायै एता म एतदुभयं संनस्यन्तीति हैव विद्यात् । तथा हैव भवति ॥२॥१२॥ चतुर्थेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः। १ ३ देवा वै ब्रह्मणो वत्सेन वाचमदुहृन् । अग्निर्ह वै ब्रह्मणो वत्सः॥१॥सा या सावाग्ब्रह्मैव तत् । अथ योऽग्निर्मत्युस्सः ॥२॥ तामेतां वाचं यथा धेनुं वत्सेनोपसृज्य प्रत्तां दुहीतैवमेव देवा वाचं सर्वान्कामानदुहन् ॥३॥ दुहे ह वै वाचं सर्वान्कामान्य एवं वेद । स हैषोऽनानृतो वाचं देवीमुदिन्धे वद वद वदेति ॥४॥ तद्यदिह पुरुषस्य पापं कृतम्भवति तदाविष्करोति । यदिहैनदपि रहसीव कुर्वन्मन्यतेऽथ हैनदाविरेव करोति । तस्माद्वाव पापं न कुर्यात् ॥॥२॥१३॥ पञ्चमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। एष उ ह वाव देवानां नेदिष्ठमुपचर्यो यदग्निः ॥१॥ ते साधूपचरेत् । य एनमस्मिँलोके साधूपचरति तमेषोऽसुष्मिलोके १ पस्तेन, पत्लेन । २ वक्ष-1३-२।४ जहे । ५ उदिग्धे । ६ अमिह । ७-त। ८ अथ्-1 ६ 'एष उ ह वा दूसरे अनुवाक का यहां अधिक है। १चरति ।
( १ ) साधूपचरति । अथ य एनमस्मिलोके नाऽऽद्रियते तमेषोऽमुर्णि- लोके नाऽऽद्रियते । तस्माद्वा अग्निं साधूपचरेत् ॥२॥ तं नैव हस्ताभ्यां स्पृशेन पादाभ्यां न दण्डेन ॥३॥ हस्ताभ्यां स्पृशति यदस्याऽन्तिकमवननिक्त । अथ यदभिप्रसारयति तत्पादा- भ्याम् ॥शा स एनमास्पृष्ट ईश्वरो दुर्घायां धातोः । तस्माद्वा.. अग्निं साधूपचरति । मुधायां हैवैनं दधाति ॥६॥२॥१४॥ पञ्चमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः ।. एष उ ह वाव देवानाम्महाशनतमों यदामिः ॥शा तत्र व्रत्यमददानोऽश्नीयात् । यो चै महाशने:नश्नत्यनाती चारो हैनम- भिषक्तोः। तिमिव हाऽश्नीयात् ॥२॥ अथोह प्रोक्तेऽशने ब्रूयात् समिन्स्वाऽनिमिति । स यथा प्रोक्तेऽभने श्रेयाँसम्परिवेष्टवै ब्रूयात्तादृक् तत् ॥३॥ एतदु ह वाव साम यद्वाक् । यो वै चक्षु- स्साम श्रोत्रं सामेत्युपास्ते न ह तेन करोति ॥४॥ अथ य आदित्यस्साम चन्द्रमास्सामेत्युपास्ते न हैव तेन करोति ॥५॥ अथ यो वाक् सामेत्युपास्त स एवाऽनुष्टया साम वेदं । वाचा हि २ तण्डेनम्, तपढ्नम्। १ प्र-1 २ ददासीनो । है अभिष( अखाः -र । ५ इवमिव । ग्री- तम् । ८ना । यद् । ६ G ।
( २ ) सान्नाऽऽत्विज्यं क्रियते ॥६॥ स यो वाचस्स्वरो जायते सोड निर्वाग्वेव वाक् । तदत्रैकधा साम भवति ॥७॥ स य एवमेतदे- कधी साम भवद्वेदैवं हैतदेकधा साम भवतीत्येकव श्रेष्ठस्स्वा- नाम्भवति ॥६॥ तस्मादु हैवंविदमेव साम्नाऽऽविज्यं कारयेत । संह वाव साम वेद य एवं वेद ॥२॥१५॥ पञ्चमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः ।
[तृतीयोऽध्यायः।] 10 एका ह वाव कृत्स्ना देवतार्धदेवता एवाऽन्याः। अयमेव योऽयम्पवते ॥३॥ एष एव सर्वेषां देवानां ग्रहाः ॥२॥ स हैषो- ऽस्तं नाम । अस्तमिति हेह पश्चाद्रहानाचक्षते॥३॥ स यदादियो- ऽस्तमगादिति ग्रहानगादिति हैतत् । तेन सोऽसर्वः । स एतमेवा- ऽप्येति ॥४॥ अस्तं चन्द्रमा एति । तेन सोऽसर्वः। स एतमेवाऽप्ये- ति ॥५॥ अस्तं नक्षत्राणि यन्ति । तेन तान्यसर्वाणि । तान्येतमेवाऽपियन्ति ॥६॥ अन्वग्निर्गच्छति । तेनं सोऽसर्वः । स एतमेवाऽप्यति ॥७॥ एसहः । एति रात्रिः । तेन ते असर्वे । ते एतमेवाऽपीतः ॥८॥ मुह्यन्ति दिशो न वै ता रात्रिम्प्रज्ञायन्ते । तेन ता असर्वाः । ता एतमेवाऽपियन्ति ॥६॥ वर्षति च पर्जन्य उच्च गृह्णांति । तेन सोऽसर्वः । स एतमेवाऽप्यति ॥१०॥क्षीयन्त आप एवमोषधय एवं वनस्पतयः । तेन तान्यसर्वाणि । तान्येतमेवाऽपियन्ति ॥११॥ तद्यदेतत्सर्वं वायुमेवाऽप्येति तस्माद्वा- ६ १ पंचा।२-रः । ३-ताः १४ तां।५'स साम वेद'अधिक है। ६ एष-, श्रोषा-1 ... पारि युरेव साम ॥१२॥ स ह वै सामवित्स [कृत्स्न] साम वेद य एवं बेद ॥१३॥ अथाऽध्यात्मम् । न वै स्वपन वाचा वदति। सेयमेव प्राणमप्यति ॥१४॥ न मनसा ध्यायति । तदिदमेव प्राणमप्ये- ति ॥१॥ न चतुषा पश्यति । तदिदमेव प्राणमप्येति ॥१६॥ न श्रोत्रेण शृणोति । तदिदमेव माणमप्यति ॥१७॥ तदेतत्सर्व- म्याणमेवाऽभिसमेति तस्मात्माण एव साम ॥१८॥ स ह वै सामवित्स कृत्स्नं साम वेद य एवं वेद ॥१६॥ तद्यदिदमाहुर्न बताऽद्य वातीति[स] हैतत्पुरुषेऽन्तनिरमते स पूर्णरस्वेदमान प्रास्ते ॥२०॥ तद्ध शौनकं च कापेयमभिमतारिणं च[काक्षसेनिम्] माझणः परिवेविष्यमाणा उपावत्राज ॥२॥३॥२॥ प्रथमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। तौ ह बिभिक्षे । त ह नाऽऽदद्वाते को वा कोवेति मन्यमानौ ॥२॥ तौ होपजगौ। महात्मनश्चतुरो देव एकः कस्स जगार भुवनस्य गोपाः । ते कापेय न विजानन्त्यकेऽभिप्रतारिन् बहुधा निविष्टम् ।। ७ऽमम् । ८-यति । -मिते । १०-ण।११-काश् १२ विघ्या- १हिम्-द्राते । ३ सो । ४ कालपेय ।५ निविन्दम् ।
(५) ९ १२ २४ इति ॥२॥ स होवाचाऽभिप्रतारीमै वाव प्रपद्य प्रतिबहीति। त्वया का अयम्प्रत्युच्य इति ॥३॥ तह प्रत्युवाच- आत्मा देवानामुत मर्त्यांना हिरण्यदन्तो रपसो न सूनुः । महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यददन्तमत्ति ॥ इति ॥४॥ महात्मनश्चतुरो [देव] एक इति । वाग्वा अमिः। स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तद्वाचम्प्राणो गिरति ॥५॥ मनश्चन्द्रमास्स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तन्मनः पाणणे गिरति ॥६॥ चतुरादित्यस्स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तचतुः प्राणो गिरति ॥७॥ श्रोत्रं दिशस्ता महात्मानो देवाः । स यत्र स्वपिति तच्छ्रोत्रं प्राणो गिरति ॥८॥ तयन्महात्मनश्चतुरो देव एक इत्येतद्ध तत् ॥६॥ कस्स जगारेति । प्रजापति कीस हैतज्जगार॥१०॥भुवनस्य गोपा इति । स उ वाव भुवनस्य गोपा: ॥११॥ तं कापेय न विजानन्त्येक इति।नोतमेके विजानन्ति॥१२॥ अभिप्रतारिन् बहुधा निविष्टमिति । बहुधा होवैष निविष्टो यत्लाण: ॥१३॥ आत्मा देवानामुत मानाामेति । प्रात्मा ह्येष देवाना- ६ म(म)म, मा। ७ वय्या, यय्या । ८अया। वाव । १०-युञ्चे। ११ ऽति । १२-याव । १३ मत्य्-१४ परसो । १५ नु । १६ मभि- १७ यदि । १८ दतम, दैतम् । १६ अति । २० पाश, वा । २१ या । २२ स्वतिपिति । २३-न, इसके पश्चात प्रा । २४-भर् । २५ महात्मा अधिक है। २१ ।२७ सो । २८ जगॅर-२६-एषः।३०-मो। २६ २७ २९ होतस्य महिमाहुः' अधिक है। श्राहुर् ।। ( ८६ ) मुत मयानाम् ॥१४॥ हिरण्यदन्तो रपसो न सूनुरिति । न ह्येष मनुः । सूनुरूपो ह्येष-सन्न सूनुः ॥१५॥ महान्तमस्य महिमानमा- हुरिति । महान्तं ह्येतस्य महिमानमाहुः ॥१६॥ अनद्यमानो यददन्तमत्तीति । अनद्यमानो ह्येषोऽदन्तमत्ति ॥१७॥३२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः ॥ तस्यैष श्रीरात्मा समुद्रूढो यदसावादियः । तस्माद्गायत्रस्य स्तोत्रे णाऽवान्यानेच्छ्रिया अवछिद्या इति ॥१॥ स एष एवोक्थम् । यत्पुरस्तादवानिति तदेतदुक्थस्य शिरो यद्दक्षिणतस्स दक्षिणः पक्षो यदुत्तरतस्स उत्तरः पक्षो यत्पश्चात् [तत्]पुच्छम् ॥२॥ अयमेव प्राण उक्थस्याऽऽत्मा। स य एवमेतमुक्थस्याऽऽत्मानमात्मन्प्रतिष्ठितं वेद स हाऽमुष्मि लोके साङ्गस्सतनुस्[ सर्वस्]सम्भवति ॥३॥ शश्वद्ध वा अमुष्मिलोके यदिदम्पुरुषस्याऽऽण्डौ शिश्नं कौँ नासिके यत्किं चाऽनस्थिकं न सम्भवति ॥४॥ अथ य एवमेतमुक्थस्या- ऽऽत्मानमात्मन्यतिष्ठितं वेद स हैवाऽमुष्पॅिलोके साङ्गस्सतनुस्सर्व- स्सम्भवति॥॥ तदेतद्वैश्वामित्रमुक्थम् । तदन्नं वै विश्वम्प्राणो मित्रम् ३१-से । ३२ नस् । ३३ स् । ३४ प्राहुर् । और 'इति महान्त १ समाद्र-२वच-1३वा इति। ४-इएः। ५सद् । तद् । सांगतस् । -तद् ! अक्थ्- ६ ( ८७ ) १२ ॥६॥ तद्ध विश्वामित्रश्श्रमेण तपसा व्रतचर्येणेन्द्रस्य भियं धामो- पजगाम ॥७॥ तस्मा उ हैतत्लोवाच यदिदम्मनुष्यानागतम् ॥८॥ तद्ध स उपनिषसाद ज्योतिरेतदुक्थमिति ॥६॥ ज्योतिरिति द्वे अक्षरे प्राण इति द्वे अन्नामिति द्वे। तदतेदन एव प्रतिष्ठितम् ॥१०॥ अथ हैनं जमदग्निरुपनिषसादाऽऽयुरेतदुक्थमिति ॥१२॥ आयुरिति दे अक्षरे प्राण इति द्वे अन्नमिति द्वे । तदेतदन्न एव प्रतिष्ठितं ॥१२॥ अथ हैन वसिष्ठ उपनिषसाद गौरेतदुक्थमिति । तदेतदन्नमेव । अन्नं हि गौः ॥१३॥ तदाहुर्यदस्य प्राणस्य पुरुषश्शरीरमथ केना- ऽन्ये प्राणाश्शरीरवन्तो भवन्तीति ॥१४॥ स ब्रूयाद्यद्वाचा वदाति तद्वाचश्शरीरं यन्मनसा ध्यायति तन्मनसशरीरं यच्चक्षुषा पश्यति तश्चक्षुषश्शरीरं यच्छ्रोत्रेण शृणोति तच्छ्रोत्रस्य शरीरम् । एवमु हाऽन्ये प्राणाश्शरीरवन्तो भवन्तीति ॥१५॥३३॥ प्रथमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । तदेतदुक्थं सप्तविधम् । शस्यते स्तोत्रियोऽनुरूपो धाय्या प्रगाथस्मुक्तं निविपरिधानीया ॥१॥ इयमेव स्तोत्रियो १० पू-1 ११ तद् ! १२ उत्थ्-। १३ (-साद ) गौर, श्रायुगौर १४- । १५ उत्रेद । १६ ऽन्येन । १ ऽग्निर् अधिक है। २-नीयम् । ३ नास्ति।
६ प्रभिरनुरूपो वायुय्याऽन्तरिक्षम्यगाथो चौरसूक्तमादित्यो निविदा तस्मादहचा उदिते निविदमधीयन्ते । आदित्यो हि निवित् । दिशा परिधानीयेत्यधिदेवतम् ॥२॥ प्रथाध्यात्मम् । प्रात्मैव खोत्रियः प्रजाऽनुरूपा प्राणो धाय्या मनः प्रगाथश्शिरस्सूर्त चतुर्निविच्छ्रोत्रम्परिधानीया ॥३॥ तदैतदेके त्रिष्टुभा परिदधत्य- नुष्टभैके । त्रिष्टुभात्वव परिदध्यात् ॥४॥ तद्धैतदेक एता व्याहृती- रभिव्याहृत्य शंसन्ति महान्मह्या समधत्त देवो देव्या समघत्त ब्रह्म ब्राह्मण्या समधत्त । तद्यत्समधत्त समधत्तेति ॥शा नस्मा- दिदानीम्पुरुषस्य शरीराणि प्रतिसंहितानि । पुरुषो ह्येतदुक्थम् ॥६॥ महान्मह्या समधत्तेति । अग्नि महानियमेव मही ॥७॥ देवो देव्या समधत्तेति । वायुबै देवोऽन्तरिक्षं देवी ॥ ब्रह्मा ब्राह्मण्या समधत्तेति । आदित्यो वै ब्रह्म धौब्राह्मणी तासां वा एतासां देवतानां द्वयोर्द्वयोर्देवतयोर्नव-नवाक्षराणि सम्पद्यन्ते। एतदिमे लोकास्त्रिणवा भवन्ति ॥१०॥ तद्ब्रह्म वै त्रिवृत् । तब्रह्माऽभिव्याहृत्य शंसन्ति । एष उ एव स्तोमस्सोऽनुचरः॥११॥ - १८ ४ द्धास्या, दार्या । ५ प्राग्- ६ धार्या । ७-धाली- तदुक्थम् अधिक है (हाशिये में)१।९-य।१०-महा। ११ इदानि। (e-41 । १३ औ । १५-यो । १५-ौ । १-कौ । १७ पा । १८ साा 054 RAHASY horosis Laksi १ ३ । ( ८८ ) यदिममाहुरेकस्तोम इत्ययमेव योऽयम्पवते । एषोऽषिदेवलम् । प्राणोऽध्यात्मम् । तस्य शरीरमनुचरः ॥१२॥ तद्यथाह वै मणौ मणिसूत्रं सम्मोतं स्याद्-॥१३॥३॥४॥ प्रथमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । -एवं हैतस्मिन्सर्वमिदं सम्प्रोतं गन्धर्वाप्सरसः पशवो मनुष्याः ॥२॥ तद्ध मुअस्सामश्रवसः प्रययौ । तस्मै हश्वाजनि- श्यः प्रेयाय ॥२॥ तस्य हाऽन्तरिक्षात्पतित्वा नवनीतपिण्ड उरासे निषपात । तं हाऽऽदायाऽनुदधौ॥३॥ ततो हैव स्तोमंददाऽन्तरिचे विततम्बहुशोभमानम् । तस्यो ह युक्तिं ददर्श ॥४॥ बहिष्पवमान- मासघ टोत्र वियि प्राण्य इति कुर्यात् टीत्र गृहित्र अपान्य इति वाचा । दिदतवाऽक्षिभ्यं शुश्रूषेतैव कर्णाभ्याम् । स्वयामिदम्म- नोयुक्तम् ॥५॥ तद्यत्र वा इषुरत्ययो भवति न वै स ततो हिनस्ति तदु वा एतं नोपाप्नुयात् । प इत्येवाऽपान्यात् । तद्यथा बिम्धन मृगमानयेदेवमेवैनमेतया देवतयाऽऽनयति । स युक्तः करोति । एष एवापि युक्तः ॥६॥३॥शा प्रथमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः । १६-रन्त॥ १ एवम् (एवा) के पहले पश्चम कं० का द्वि० वाक्य।२मौज-३ साहश-1४ तमस्मै । ५ प्रोयाय । ६ तेतो ७-।-इ। टील, पहला अक्षर ल भी हो।१०गृहिन्न । ११अस्ति। हनस्ति।१२यद।१३-षो।१४-ति।
( ९० ) योऽसौ सान्नः प्रतिवेदन हास्मै दीयते॥१॥ददा इति ह वा अयमग्निर्दीप्यते तथेति वायुः पवते हन्तेति चन्द्रमा प्रोमित्या- दित्यः ॥२॥ एषा ह वै साम्नः प्रत्तिः । एतां ह वै सान्नः प्रति मुदक्षिणः मिविदां चकार ॥३॥ तां हैतां होतुर्वाऽज्ये गायेन्मै- त्रावरुणस्य वा ददा३ तथा३ हन्ता३ हिम्भा ओवा इति। म ह वा अस्मै दीयते ॥४॥ [सो] ऽप्यन्यान् बहुनुपर्युपरि य एवमेतां सान्नः प्रत्तिं वेद ॥५॥ य उ ह वा अबन्धुन्धुमत्साम वेद यत्र हाऽप्येनं न विदुर्यत्र रोपन्ति यत्र परीवचक्षते तद्धाऽपि श्रेष्ठचमाधिपत्यममाघम्पुरोधाम्पयति ॥ आनई वा अबन्धुन्धुमत्साम । कस्माद्वा ह्येनं दार्वोः कस्याद्वा पर्याहत्य मन्थन्ति स श्रेष्ठयायाऽऽधिपत्यायाऽन्नाधाय पुरोधाय जायते ॥७॥ स यत्र ह वा अप्येवंविदं न विदुर्यत्र रोषन्ति यत्र परीव- चक्षते तद्धाऽपि श्रेष्ठयमाधिपत्यमन्नाथम्पुरोधाम्पर्योति ॥८॥३६॥ द्वितीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स्वयमु तत्र यत्रैनं विदुः॥१॥सुदक्षिणो ह वै क्षैमिः प्राचीनशा- लिर्जाबालौ ते ह सब्रह्मचारिण प्रामुः ॥२॥ते हेमे बहु जप्यस्य १ प्रति । २ तदान्, ददान् । ३ प्रतिः, प्रवृक्तिः । ५ तौं । ६ 'हन्ताई' अधिक है ! ७ नास्ति । ८ अप्य् । हून्य । १०-उप । ११-धु । १२-धा। १३ श्रेष्ठ- १४-पाये। १५ परि ।। -शालिर् । २ है। १५ १५ ( १ ) १२ चाऽन्यस्य चाऽनूचिरे प्राचीनशालिश्च जाबालों च ॥३॥ अर्थ स्म सुदक्षिणः मिर्यदेव यज्ञस्याजो यत्सुविदितं तद स्मैव पृच्छति ॥४॥ त उ ह वा अपोदिता व्याक्रोशमानाश्चेरुश्शद्रो दुरनूचान इति ह स्म सुदक्षिणं मिमाक्रोशन्ति प्राचीनशालिश्च जावालौ च ॥५॥ स ह स्माऽऽह मुदक्षिणः मिर्यत्र भूयिष्ठा: कुरुपश्चालास्स्मागता भवितारस्तम्भ एष संवादो नाऽनुपदृष्टे शूद्रा इव संवदिष्यामह इति॥६॥ता उ ह वै जाबालौ दिदीक्षाते शुक्रश्च गोश्रुश्च । तयोर्ह प्राचीनशालिस्त उद्गाता ॥७॥ स तद्ध सुदक्षिणो ऽनुबुबुधे जाबालौ हाऽदीक्षिषातामिति । स ह संग्रहीतारमुवाचा- जनयस्वारे जाबालौ हाऽदीक्षिषातां तद्गमिष्याव इति ॥८॥३॥७॥ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तस्य ह ज्ञातिका अश्रुमुखा इवाऽऽसुरन्यतरां वा अयमुपागादिति ॥१॥ अथ ह स्म वै यः पुराब्रह्मवाधं वदत्यन्य- तरामुपागादिति ह स्मेनम्मन्यन्ते । अथो हस्मैनम्मृत्मिवैवोपासते ॥२॥ तं ह संग्रहीतोवाचाऽथ यद्भगवस्ते ताभ्यां न कुशलं २ है।३ ऽरूच्-१४-शालाश् ।५-ण।६ प्य्-'-श्रा। ७ चोरुश्। ८-मा। अक्रोश् । १० लीश् । १५-पतिष्य-। १६ वदी १३-कश् । १४ प्र-1 १५ संसं-1 १६ दिदीक्ष- ७-यास्था।
( २ ) कत्थयात्यति ॥शा भोमिति होवाच गन्तव्यम्म आचार्यस्मुय- मानमन्यतेति ॥४॥ स ह रथमास्थाय प्रधावयांचकार । तं ह स्म पतीक्षन्ते ॥शा के जानीतेति । मुदक्षिण इति । न वै नूनं स इइमभ्यवेवादिति । स एवेति ॥६॥ स ह सोपानादेवाऽन्तर्वेद्यव- स्थायोचाचाऽङ्गन्वित्थं गृहफ्वा३ इति । तेह नाऽनूदतिष्ठा- सत् । स होवाचाऽनूत्याता म एरि। कृष्णाजिनोऽसीति] । तादिमे कुरुपश्चाला अविदुरनूत्थातैव त इति होचुः ॥७॥ तं ह कनीयान्नातोवाचाऽनुत्तिष्ठ । भगव उद्गातारमिति । त हा ऽनूत्तस्यौ ॥६॥ स होवाच त्रि. गृहपते पुरुषो जायते । पितुरेवाऽग्रेऽधि जायतेऽथ मातुरथ यज्ञात् ॥६॥ त्रिव म्रियत इति। स यद्ध वा एनमेतत्पिता योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति-॥१०॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । तत्मथमम्म्रियते ॥२॥ अन्धमिव वै तमो योनिः । लोहि- तस्तोको वा वै स तदाभवत्यपां वा स्तोकः । किं हि स तदा- भवति ॥२॥ स यस्तां देवतां चेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या १२ १३ १४ । ३ २ - ३ पाचर्-1 ४ सूट-1 ५-ठेस-1 ६-ऊद्धा- ७।८ इति अधिक है। प्रातो। १० वा । ११ अनुतिष्ठ । १२ भिव् । १३ अ, ऊ । १४ नास्ति । १५त्रियत॥ १ अन्थ्-१२ वो। ३ स्।
(१३) ६ ११ चैनं तम्मृत्युमतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥३॥ अथ य एनमेतद्दीक्षयन्ति ताहितीयम्म्रियते । वपन्ति केशश्मश्रूणि निकृन्तन्ति नखान् । प्रत्यअन्त्यङ्गानि । प्रत्यचत्यङ्गुलीः अपकृतोऽपवेष्ठित भास्ते । न जुहोति । न यजते । न योषित चरति । अमानुषीं वाचं वदति । मृतस्य वावैष तदा रूपम्भवति ॥४॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चैनं तम्मृत्युमतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥॥ अथ य एनमेतदस्माल्लोकात्मेतंचित्यामादधति तद् तृतीयम्म्रियते ॥६॥ स यस्ता देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चैनं तम्मृत्यु- मतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥७॥ एतावदैवोक्त्वा रथमास्थाय प्रधावयांचकार ॥८॥ तं ह जाबालम्पत्येतं कनीयान भ्रातोवाच काम्भवाञ्छूद्रको वाचमवादीति । हस्तिना गाधमैषी- रिति॥॥ हैवैनं तच्छशंस यः कथमवोचद्भगव इति। यस्त्रयाणा- म्मृत्यूनां साम्नाऽतिवाहं वेद स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥१०॥३॥ द्वितीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । १२ ४चे।५दि-६-अजत्य। ७ यज्- ८ अव- यौष्-१०स। ११का' अधिक है । १२ यन्तस । १३-तीति । १४ वा । १५वहतीति' अधिक है। १६-वच् ॥
( ४ ) ३ or तं वाव भगवस्ते पितोद्गातारममन्यतेति होवाच । तदुइ प्राचीनशाला विदुर्य एषामयं वृत उद्गाताऽऽस । तस्मिन् ह.ना- ऽनुविदुः ॥१॥ ते होचुरनुधावत काण्ड्वियामिति । तं हाऽनु- सस्नुः ।। ते ह काण्ड्वियमुद्गातारं चक्रिरे ब्रह्माणम्प्राचीन- शालिम् ॥२॥ तं हाऽभ्यवेक्ष्योवाचैवमेष ब्राह्मणो मोपाय बादाय नाऽग्लायत् । स नाऽणु सान्नोऽन्विच्छतीति । अति हैवैनं लच्चक्रे ॥३॥ स यद्ध वा एनमेतत्पिता योन्यां रेतो भूतं सिञ्च- स्यादित्यो हैन तद्योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति । स हाऽस्य तत्र मृत्योरीशे ॥४॥ अथो यदेवैनमेतत्पिता योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति तद्ध पाव स ततोऽनुसम्भवति प्राणं च । यदा ह्येव रेतस्सिक्त माण प्राविशत्यथ तत्सम्भवति ॥५॥ अथो यदेवैनमेतद्दीक्षयन्त्य- मिह वैनं तद्योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति । स हैवाऽस्य मृत्योरीशे ॥६॥ अथो यामेवैतां वैसर्जनीयामाहुतिमध्वर्युर्जुहोति तामिक स ततोऽनुसम्भवति छन्दांसि चैव ॥७॥ अथ य एनमे- १-ए । २ विधुर् । ३ सः । ४ कान्त्यावयम् । ५-सः। र ब्राह्मणम् । ७-पेक्ष्या । ८न्वीच-1 रणम् । १० नास्ति।११रतू- १२-यो । १३ अयोवाच ' अधिक है । १४ ‘प्रथो य एनमेतही- "तत्रमृत्योरीशे' अधिक है। १५ 'अथो यदे_नमे- सहीक्षयन्ति' अधिक है । १६ मासि ।
( ५ ) १७ १७ तदस्माल्लोकात्मेतं चित्यामादधति चन्द्रमा हैवैनं तद्योन्या रेतो भूतं सिञ्चति । स उ हैवाऽस्य तत्र मृत्योरीशे ॥८॥अथो यदेवैन- मतदस्माल्लोकात प्रेतं चित्यामादधत्यथो या एवैता अवाक्षणी- या आपस्ता एव स ततोऽनुसम्भवति प्राणम्च । प्राणो ह्यापः॥३॥ तं ह वा एवंविदुद्गाता यजमानमोमित्येतेनाक्षरेणाऽऽदित्यम्मृत्यु- मतिवहति वागित्यग्नि हुमिति वायुम्भा इति चन्द्रमसम् ॥१०॥ तान् वा एतान्मृत्यून् सान्नोद्गाताऽऽत्मानं च यजमानं चाऽति- वहत्योमित्येतेनाक्षरेण प्राणेनाऽमुनाऽऽदित्येन ॥११॥ तस्यैष श्लोकः- उतैषां ज्येष्ठ उत वा किनष्ठ उतैषाम्पुत्र उत वा पितेषाम् एको ह देवो मनसि प्रविष्ट: पूर्वो ह जज्ञे स उ गर्भेऽन्तः- २१ इति ॥१२॥ तद्यदेशोऽभ्युक्त इममेव पुरुषं योऽयमाछनो ऽन्तरोमित्येतेनैवाक्षरेण प्राणेनैवाऽमुनवाऽऽदित्येन[...]॥१३॥३३१० द्वितीयेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ ३ त्रिह वै पुरुषो म्रियते त्रिर्जायते ॥१॥ स हैतदेव प्रथमम्ब्रियते यद्रेतस्सिक्तं सम्भूतम्भवति । स प्राणमेवाऽभिसम्भवति । आशाम- १७-प्रान् । १८-वन्तीति । १६ ता । २० जेष्ठ । २१ ता- २१अकएन् । १हे । २'स हैतदेव प्रथमम्म्रियते त्रिर्जायतें' अधिक है। सभ्- (१) ६ ७ मिजायते ॥२॥ अथतद्वितीयम्घ्रियते यद्दीक्षते । स छन्दांस्येवा- ऽमिसम्भवति । दक्षिणामभिजायते ॥३॥ अथैतत् तृतीयम्म्रियते यन्म्रियते । स श्रद्धामेवाऽभिसम्भवति । लोकमभिजायते ॥४॥ सदेतत् ध्याद्वायत्रं गायति । तस्य प्रथमयाऽऽस्तेममेव लोक जयति यदु चाऽस्मॅिलोके । तदेतेन चैनम्घाणेन समर्धयति यमभिसम्भवसेता चाऽस्मा आशाम् प्रयच्छति यामभिजायते॥शाअथ द्वितीययाते- दमेवाऽन्तरिक्षं जयति यदु चान्तरिक्षे । तदेतेश्चनं छन्दोभिस्स- मर्षयति यान्यभिसम्भवति । एतां चास्मै दक्षिणाम्प्रयच्छति याम- मिजायते ॥६॥ अथ तृतीययाऽऽताऽमुमेव लोकम् जयति यदु वाऽमुष्मिलोके । तदेतया चैनं श्रद्धया समर्धयति ययैवैनमेतच्छद्ध- याऽनावभ्यादधाति समयमितो भविष्यतीति । एतं चास्मै लो- कम्प्रयच्छाले यमभिजायते ॥७॥३॥१२॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । एतदै तिमृभिरावृद्भिरिमाँश्च लोकाञ्जयखेतेश्चनम्भूतस्समध्य- वि यान्यभिसम्भवति ॥१॥ अथ वा अतो हिडारस्यैव। तं ह खर्गे मोके सन्तम्मृत्युरन्वेसशनया ॥२॥ श्रीर्वा एषा प्रजापतिस्सानो ४ प्रोव । ५-मू । ६ त्रिय-। ७-अन्ति । ८इम्-(!)।- १०'न्यमिसम्भवति' अधिक है लाल रंग से कटा हुआ । ११ च । १२माय। १३-मा। १ घोक् । २-मृध्-1 ३ नास्ति ।४ सितम् । ५ अनेति । श्री।
(७) १२ यद्विकारः। समिदाता श्रिया प्रजापतिना हिडारण मृत्युमपसेष- ति ॥३॥ हुम्भेसिाह मात्र नु गा यत्रैतद्यजमान इति हैतत् ॥४॥ सः यथा श्रेयसा सिद्धः पापीयान् प्रतिविजत एवं हैवाऽस्मान्मृत्यु पाप्मा प्रतिक्जिते ॥शा यन्मत्याह चन्द्रमा वै मा मासः । एस ह कै मा मासः। तस्मान्मेसाह । भा इति हैतत्परोक्षणेवा यस्माद्वेक मेसाह यदेव मेखाहैतानि त्रीणि । तस्मान्मेति ब्रूयात् ॥॥॥१२॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। हुम्भा इति ब्रह्मवर्चसकामस्य। भातीव हि ब्रह्मवर्चसम् ॥२॥ हुम्बो झति पशुकामस्य । बो इति ह पशको वाश्यन्ते ॥२१॥ हुम बगिति श्रीकामस्य । बगिति ह श्रियम्पणायन्ति ॥३॥ हुमः भा प्रोवा इसेतदेवोपगीतम् ॥४॥ महदिवाऽभिपरिवर्तयन् गाये- दिति ह स्माऽऽह नाको महाग्रामों महानिवेशों भवतीति । स यथा स्थाणुमर्पयित्वेतरेण वेतरेण वा परियायात् ताक्तत् ॥॥ तदु होवाच शाळ्यायनिः कस्मै कामाय स्थाणुमर्पयेत् । प्रथोपगीतमे- वैतत् । नैवैतदाद्रियतेति ॥६॥ [इति] नु हिङ्काराणाम् । अथवा ७ पद् । ८ "इति' अधिक है। -विचन १०.९ पक्म । १९भाग1१२ ऐव॥ १ वो ।२ श्रिक-,सु । ३-वा, प्रयित्वा । ४-रेप 1.५ पय्या- ६ तंदू । ७ भाद्-विहिङ्कनक-।
१८ १.०.. अतो निधनमेव । ओवा इति द्वे अक्षरे । अन्तो वै सानो निधन- मन्तखो लोकानामन्तो बनस्य विष्टपम् ॥७॥ तमेतदुद्गाता यजमानमोमिसेतेनाक्षरेणान्ते स्वर्गे लोके दधाति ॥॥ य उ हवा अपक्षो वृक्षाग्रं गच्छत्सव वै स ततः पद्यते । अथ यद्वै पक्षी वृक्षाग्रे यंदसिधारायां यत्तुरधारायामास्ते न वै स ततोऽवपद्यते । पक्षाभ्यां हि संयत आस्ते ॥६॥ तमेतदुद्गाता यजमा- नमोमियतेनाक्षरेण खरपतं कृत्वाऽन्ते खर्गे लोके दधाति । स यथा पक्ष्यविभ्यंदासीतैवमेव स्वर्गे लोकेऽबिभ्यदास्तेऽथाचरति ॥१०॥ते ह वा एते अक्षरे देवलोकश्चैव मनुष्यलोकश्च । आदि- सश्च ह वा एते अक्षरे चन्द्रमाश्च ॥११॥ श्रादिस एव देवलोक- श्चन्द्रमा मनुष्यलोकः । ओमियादियो बागिति चन्द्रमाः ॥१२॥ तमेतदुद्गाता यजमानमोमियतेनाक्षरेणाऽऽदिसं देवलोकं गमय- ति । १॥३॥१॥ तृतीयेऽनुवाके सुंतीयः खण्डः । त हाऽऽगतम्पृच्छति कंस्त्वमसीति । स यो ह नाना वा गो- त्रेण वा प्रब्रूते ते हाऽऽह यस्तेऽयम्मथ्यात्माऽभूदेष ते स इति ॥१॥ हिंसयत । १०-श्रो । ११-ए।। १-ध्या ३ तस्मिन् हाऽऽत्मन् प्रतिपत्। तमृतबस्सम्पदार्यपद्गृहीतमपकर्षन्ति । सस्य हाऽहोरात्रे लोकमाप्नुतः ॥२॥ तस्मा उ. हैतेन प्रब्रुवीन को- ऽहमस्मि सुवस्त्वम् । स त्वां स्वयं स्वरगामिति ॥३॥ को ह वै प्रजापतिरथ हैवंविदेव सुवर्गः । स हि सुवर्गच्छति ॥४॥ तं हा- ऽऽह यस्त्वमसि सोऽहमस्मि योऽहमस्मि स त्वमस्येहीति ॥५॥ स एतमेव सुकृतरसम्प्रविशति । यदु ह वा अस्मिल्लोके मनुष्या यजन्ते यत्साधु कुर्वन्ति तदेषामूर्ध्वमन्नाद्यमुत्सीदति । तदमुं चन्द्रमसम्मनुष्यलोकम्प्रविशति ॥६॥ तस्येदम्मानुषनिकाशन- मण्डमुदरेऽन्तस्सम्भवति । तस्यो मन्नाद्यमुत्सीदति स्तनावभि । स यदाजायतेऽयाऽस्मै माता स्तनमन्नाद्यम्प्रयच्छति ॥७॥ अजातो ह वै तावत्पुरुषो यावन्न यजते स यज्ञेनैव जायते । स यथाऽण्ड म्प्रथमनिभिण्णमेवमेव ॥८॥ तदा ते ह वा एवंविदुद्गाता यज- मानमोमित्येतेनाऽक्षरेणाऽऽदित्यं देवलोकं गमयति । वागि- त्यस्मा उत्तरेणाऽक्षरेण चन्द्रमसमन्नाधमक्षितिम्प्रयच्छति ॥६॥ अथ यस्पैतदविद्भानुद्रायति न इन देवलोकं गमयति नो १६ १७. २त । ३ तेन । ४-अ-,-चीत् । ५-गम् । ६ सुस्वर्-,-म् । ७जायन्ते।दस-1-२।१०--नि-इसके पश्चात् इदम्'।११अदेरे। १२ व १३-नाच । १४ जायते।१५-स । १६-यक्षिति। १७ ना।
200 फुलामान समयति कारा स यथाऽण्ड विदिग्ध पीता- माधमलाममानमेवमेव विदिग्धशेतेऽनाधमलभमानः ॥१५॥ तस्मादु हैवविद्वमेवोद्गापयेत । एवविदिहैवोहातरिति प्रतिष्पातू ॥१२॥३॥२४॥ सुतीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । । वागिति हेन्द्रो विश्वामित्रायोक्थमुवाच । तदेतद्विश्वामित्रा उपासते वाचमेव ॥शा मनुई वसिष्ठाय ब्रह्मत्वमुवाच । तस्मादा- हुर्वासिष्ठमेव ब्रह्मोति ॥२॥ तदु वा आहुरेवंविदेव ब्रह्मा । क 3 एवंविदं वासिष्ठमईतीति ॥३॥ प्रजापतिः प्राजिजनिषत । स तपोऽतप्यत । स ऐक्षत इन्त नु प्रतिष्टां जनय ततो याः प्रजास्वक्ष्ये ता एतदेव प्रतिष्ठास्यन्ति नाप्रतिष्ठाश्चरन्तीः प्रदर्षिष्यन्त इति ॥४॥ स इमं लोकमजनयदन्तरिक्षलोकममुं लोकमिति । तानिमाँस्त्री- लोकाअनयित्वाऽभ्यश्राम्यत् ॥॥ तान् समतपत् । तेभ्यस्संतसे- भ्यस्त्रीणि शुक्राण्युदायमग्निः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षादादियो दिवः ॥६॥ स एतानि शुक्राणि पुनरभ्येवाऽतपत् । तेभ्यस्संतमभ्य १६-मुच-१-मा। २०-प्राः।२१-श्रुणु-॥ है। उन्य ३ जाये, जनये । ४ वर साम्भु। । समभव।स।। ife in स्त्रीरयेव शुक्राणयुदायन्नृग्वेद एवाऽगेयजुर्वेदो बायोसामवेद आदियात् ॥७॥ स एतानि शुक्राणि पुनरभ्येवाऽतपत् । तेभ्य- स्संतप्तेभ्यस्त्रीण्येव शुक्राणयुदायन्भूरिसबग्वेदादुव इति यजुर्वेदा- स्वरित सामवेदात्तदेव ॥६॥ तद्ध वै त्रय्यै विद्यायै शुक्रम् । एतावदिदं सर्वम् । स यो वै त्रयों विणं विदुषो लोकस्सोऽस्य लोको भवति य एवं वेद ॥६॥३॥२५।। चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः ।, अयं वाव यज्ञो योऽयम्पवते । तस्य वाक् च मनश्च वर्तन्यौ। पाचा व ह्येष एतन्मनसा च वर्तते ॥१॥ तस्य होताऽध्वर्युरुदाने- अन्यतरी वाचा वर्तनि संस्कुर्वन्ति । तस्मात्ते वाचा कुर्वन्ति । ब्रह्मैव मनसाऽन्यतराम् । तस्मात्स तूष्णीमास्ते ॥२२॥ स यद्ध सो- ऽपि स्तूयमाने वा शस्यमाने वा वावद्यमान आसीताऽन्यतरामेवा- ऽस्यापि तहि स वाचा वर्तनि संस्कुर्यात् ॥३॥ स यथा पुरुष एकपाद्यन् भ्रषन्नेति रथो वैकचनो वर्तमान एवमेव तहिं यो भ्रपति ॥४॥ एतद्ध तद्विद्वान् ब्राह्मण उवाच ब्रह्माणम्पातरनु- १ १-मान् । २-१३-मां ।४।
(१०२ ) ९ १११२ वाके उपाकृते वा वद्यमानमासीनमधु वा इमे तहि यज्ञस्याऽन्तर- युरिति । अधै हि ते तहिं यज्ञस्याऽन्तरीयुः ॥॥ तस्माद्ब्रह्मा मातरनुवाक उपाकृते वाचंयम आसीताऽऽपरिधानीयाया आ वषट् कारादितरेषां स्तुतशस्त्राणामेवाऽसंस्थायै पवमानानाम् ॥६॥ स यथा पुरुष उभया पाद्यन् भ्रषं न न्यति रथो वोभयानक्रो- वर्तमान एवमेतहि यज्ञो भ्रषं न न्येति ॥७॥३॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स यदि यज्ञ ऋक्तो भ्रषन्नियाब्रह्मणे प्रतेसाहुः । अथ यदि यजुष्टो ब्रह्मणे प्रब्रूतेसाहुः । अथ यदि सामतो ब्रह्मणे प्रतेसाहुः। अथ यवनुपस्मृतात् कुत इदमजनीति ब्रह्मणे प्रब्रूतसेवाऽऽदुः ॥२॥ स ब्रह्मा माङ् उदेस स्त्रवेणाऽऽग्नीध्र प्राज्यं जुहुयाद्भूर्भुवस्खरिसे- वाभिव्याहृतिभिः ॥२॥ एता वैव्याहृतयस्सर्वपायश्चित्तयः। तद्यथा लवणेन सुवर्ण संदध्या सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु पुरणा लोहायसं लोहायसेन काष्णायसं काष्णायसेन दारु दारु च चर्म १ ५-प्रो।' प्रासू-' द्विवार पढ़ा गया है । ७-न् । ८-गु- बद । ऽन्तयुः । १०-अ । ११-पाद् ।१२ यद् । १३ ॥ १६-२-यो ।३ रथ । ४ प्रन्दू, प्रा ।५ विदध- - च श्लेष्मणैवमेवैवं विद्वाँस्तत्सर्व भिषज्यति ॥३॥ तदाहुर्यदहौषीन्मे प्रहान्मे ग्रहीदियध्वर्यवे दक्षिणानयन्तशंसी मे वषड् अकर्म इति होत्र उदगासीन्म इत्युद्गात्रेऽथ किं चक्षे ब्रह्मणे तूष्णीमासीनाय समावतीरेखेतरैत्विग्भिदक्षिणा नयन्तीति ॥४॥ स ब्रूयादेर्ष- भाग्य वै स यज्ञस्याध ह्येष यज्ञस्य वहतीति । अर्धा इ स्म वै पुरा ब्रह्मणे दक्षिणा नयन्तीति । अर्धा इतरेभ्य ऋत्विग्भ्यः॥शा तस्यैष श्लोको- मयीदम्मन्ये भुवनादि सर्वम्, मयि लोका मयि दिशधतसः । १७ मयीदम्मन्ये निमिषधदेजति, मय्याप ओषधयश्च सर्वा, इति ॥६॥ मयीदम्मन्ये भुवनादि सर्वमिसेवंविदं ह वावेदं सर्वम्भुवनमम्वा- यत्तम् ॥७॥ मयि लोका मयि दिशश्चतस्र इलेवंविदि ह वाव लोका एवंविदि दिशश्चतस्रः॥८॥ मयीदम्मन्ये निमिषद्यदेजति मय्याप प्रोषधयश्च सर्वा इसेवंविदि हवावेदं सर्वम्भुवनम्प्रतिष्ठितम् ॥६॥ तस्मादु हैवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत । स ह वाव ब्रह्मा य एवं वेद ॥१०॥३॥१७॥ चतुर्थेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । ८श्येम (संदध्यात्) ण कोष्ठ लाल रंग में कटा हुआ।-षष् । १० अकृण् । ११ मय् । २० 'एवं' नास्ति । २१ आशांसीन् । १२-रे । १३-माट।१४ नास्ति।१५ | १६ष। १७मतिही । १५-दं । १६ एव ।
(१०४) अथ वा अतस्स्तोमभागानामेवाऽनुमन्त्राः ॥१॥ तद्वैतदेके स्तोमभामरेचाऽनुमन्त्रयन्ते । तत्तथा न कुर्याद ॥२॥देवेन सवित्रा मा प्रस्तोचदेवेभ्यो वाचमिष्येत्यु ईकेऽनुमन्त्रयन्ते सविता वै देवानामसाविता सवित्रा प्रसूता इदमनु मन्त्रयामह इति वदन्तः । बदु स्थान कुर्यात् ॥३॥ भूर्भुवस्वरित्यु हैकेऽनुमन्त्रयन्त एषा अवविधा ऋग्य वेदं विद्ययाऽनुमन्त्रयामह इति वदन्तः । तदु तथा नो एवं कुर्यात् ॥४॥ प्रोमिसेवानुमन्त्रयेत ॥॥॥ अथैष बसिष्ठस्यैकस्तोमभागानुमन्त्रः । तेन हैतेन वसिष्ठः प्रजातिकामो- जुमन्त्रया चके देवेन सवित्रा प्रसूतः प्रस्तोतर्देवेभ्यो वाचमिष्य भूसंवत्सरोमिति । ततो वै स बहुः प्रजया पशुभिः पाजायत ।। सहक तेन बसिष्ठस्यैकस्तोम भागानुमन्त्रेणानुमन्त्रयेत बडुरेव पथभिः प्रजायते । इयं त्वेवस्थितिरोमिसेवानुमन्त्रयेत चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । १ स्तोमा-२नु । ३ कुर्वाद् ।४।५ने'ए' लाल में कटा, 14ई। ७.त्रैय्ये । ८त्र-याया । १० । ११-जाया। १२ प्राज-! १३ तस्तोम' १४-येते । १५ इय । १६ पञ्चमः। an ( १०५ ) अथैष वाचा वज्रमुद्गृह्णाति। यदाह सोमः पवत इति वोपावर्त- ध्वमिति वा वाचैव तद्वाचो वजं विगृह्यते वाचस्सत्येनातिमुच्यते । तस्मादोमित्येवाऽनुमन्त्रयेत ॥१॥ देवा वा अनया अय्या [विद्यया] सरसयोर्ध्वास्स्वर्ग लोकमुदकामन । ते मनुष्या- णामन्वागमादिभ्यतस्त्रयं बेदमपीलयन् ॥२॥ तस्य पीलयन्त एकमेवाक्षरं नाऽशक्नुवन्पीलयितुमोमिति यदेतत् ॥३॥ एष उ ह वाव सरसः । सरसा ह वा एवंविदस्त्रयी विद्या भवति ॥४॥ स यां ह वै त्रय्या विद्यया सरसया जितिं जयवि यामृद्धिमनोति जयति तां जितिमनोति तामृद्धिं य एवं वेद ॥॥ एतद्ध वा अक्षरं त्रय्यै विद्यायै प्रतिष्ठा । ओमिति वै होता प्रतिष्ठित प्रोमित्य- ध्वयुरोमित्युद्गाता ॥६॥ एतद्ध वा अक्षरं वेदानां त्रिविष्टपम् । एतस्मिन्वा अक्षर ऋत्विजो यजमानमाधाय स्वर्गे लोके समुद्हन्ति तस्मादोमित्येवानुमन्त्रयेत् ।।४।१ चतुर्थेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः। १ गुहासि देवोऽस्युपवा स्युप तं वायख योऽस्मान्द्रष्टि यं च वयं द्विष्मः॥१॥ महिनासि बहुलासि बृहत्यसि रोहिण्यस्यपनाऽसि॥२॥ १य । २-३ विभ-४ भैय्- ५ प्रतिष्ठे।-ए । १देवास्मि ।२ प्र । वयस्विामहिका ।
६ सम्भूर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । आभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥३॥ यास्ते मजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्योमि । उपते ता दिशामि ॥४॥ नाम मे शरीरम्मे प्रतिष्ठा मे । तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहथा इतीमाम्पृथिवीमवोचत् ॥॥ तमियमागतम्पृथिवी प्रतिनन्दत्ययं ते भगवो लोकः । स ह नाक्यं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे स्वयीत्याह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥७॥ किं नु ते मयीति। नाम मे शरीरम्मे प्रतिष्ठा मे । तन्मे त्वयि. तन्मे, पुनर्देहीति । तदस्मा इयम्पृथिवी पुनर्ददाति ॥८॥ तामाह प्र मा बहेति । किमभीति । अग्निमिति तमनिमभिप्रवहति ॥६सोऽग्निमाहा- ऽभिजिदस्यभिजय्यासम् । लोकाजदसि लोकं जय्यासम् । अत्तिरस्यन्नमद्यासम् । अन्नादो भवति यस्त्वैवं वेद ॥१०॥ सम्भूर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । आभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥११॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्येमि । उप ते ता दिशामि ॥१२॥ तपो में तेजो मेऽनम्मे वाङ मे । तन्मे त्वयि । तन्मे मोऽपहथा इत्यग्निमवोचव ॥१३॥ तं तथैवाऽऽगत- १० ૧ ૨. । ५.प्राभूरितिर । ६ स । ७ मधी । म । -हन्ति । १० 'अभिजिदस्य दो वार प्राया है । ११ जय॑ । १२-थाय् । १३ तस्मा। १४मस्माय ।
( १०७ मानः प्रतिनन्दत्ययं ते भगवो लोकस्सह नावयं लोक इति ॥१४॥ यद्वाव मे त्वयीत्याहु तद्वाब मे पुनर्देहीति ॥१शा किं नु ते मयीति । तपो मे तेजो मेऽनम्मे वाङ् मे । तन्मे त्वाये । तन्मे पुनर्देहीति । तद] अस्मा अग्निप्नर्ददाति ॥१६॥ तमाह प्रमा । वहेति ॥१७॥२०॥ १ पञ्चमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । किमभीति । वायुमिति । तं वायुमभिप्रवहति ॥२स वायु- माह यत्पुरत्ताद्वासीन्द्रो राजा भूतो वासियदक्षिणतो वासीशानो भूतो वासि । यत्पश्चाद्वासि वरुणो राजा भूतो वासि ! यदुत्तरतो वासि सोमो राजा भूतो वासि। यदुपरिष्टादवबालस प्रजापतिर्भूतो- ऽववासि ॥२॥ वायोऽस्येकवासोऽनवसृष्टो देवानाम्बिलमप्या॥३॥ तव प्रजास्तवौषधयस्तवाऽऽपो विचलितमनुविचलन्ति ॥४॥ सम्भूर देवोऽसि समहम्भूयासम् । आभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासमः ॥शा यास्ते प्रजा उपदिष्टानाऽहं तव ताः पर्येमि । उप ते ता दिशामि ॥६॥ प्राणापाणौ मे श्रुतम्मे । तन्मे त्वयि । तन्मे मोऽपहथा इति वायुमवोचत् ॥७॥ तं तथैवागतं वायुः प्रतिनन्दसयं ते. भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥५॥ यदाव मे त्वयी- १ऽप-१२-१३-स्रष्टो।४(अ)वधिः।५सर्भूर। प्राणानौ ७वयी।
( १०८ ) साह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥६0 किं नु ते मयीति । पाणापानौ मे श्रुतम्मे । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै वायुः पुन- दंदाति ॥१०॥ तमाह प्रमा वहेति । किमभीति । अन्तरिक्षलोक- मिति । तमत्तरिक्षलोकमभिप्रवहति ॥११॥ तं तथैवागतमन्तरिक्ष लोकः प्रति नन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥२२॥ यद्वाव मे त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥१३॥ किं नु ते मयीति । अयम्म आकाशः स मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति। तमस्मा आकाशमन्तरिक्ष लोकः पुर्नर्ददाति ॥१४॥ तमाह प्रमा बहेति ॥१॥२२॥ पञ्चमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। किमभीति । दिश इति । तं दिशोऽभिप्रवहति ॥२॥ तं तथै- वागतं दिशः प्रतिनन्दमयं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्मास्विसाह तद्वाव मे पुनर्दत्तति ॥शा किं नु तेऽस्माखिति । श्रोत्रमिति । तदस्मै श्रोत्रं दिशः पुनर्ददति ॥४॥ ता प्राहम मा वहतेति । किमभीति । अहोरात्रयोलोकमिति । तमहोरात्रयोलोकमभिमवहन्ति ॥॥ तं तथैवागतमहोरात्रे प्रति- नन्दतोऽयं ते भगवो लोकः। स ह नोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाब १-दू।२-इति । १ in ( १०९) मे युवयोरिसाहतद्वाव मे पुनर्दत्तमिति॥७॥किं नु त प्रावयोरिति । अक्षितिरिति । तामस्मा अक्षितिमहोराने पुनर्दचः ॥८॥ से भाइ प्रमा वहतमिति ॥॥२२२॥ पञ्चमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। किमभीति । अर्धमासानिति । तमर्षमासानमिवहतः ॥१॥ ते तथैवागतमर्धमासाः प्रतिनन्दन्सयं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्माखिसाह तद्वाब मे पुनर्दचे. ति ॥३॥ किं नु तेऽस्माखिति । इमानि तुद्राणि पाणि । तानि युष्मासु । तानि मे मति संवत्तेति । तान्यस्यार्धमासाः पुनः प्रति संदधति ॥४॥ तानाह प्र मा वहतेति । किमभीति । मासा- निति । तम्मासानभिप्रवहन्ति ॥॥ तं तथैवागतम्पासाः प्रतिनन्दन्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे युष्माखिसाह तद्वाव मे पुनर्दचति ॥७॥ किं नु तेऽस्मा- खिति । इमानि स्थूलानि पर्वाणि । तानि मे युष्मामु । तानि मे प्रति संवत्तेति । तान्यस्य मासाः पुनः प्रति संदधति ॥८॥ तानाह प्रमा वहतेति ॥॥२३॥ पञ्चमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। मे ३ १ नास्ति । २-दति । ३-बाति, बाथ रंग से घोघा बुना है।
१ ( ११० ) किमभीति । ऋतूनिति । तमृतूनाभिप्रवहन्ति ॥१॥ तथैवाऽऽगतमृतकः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः । स ह मोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्मास्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दति ॥३॥ किं नु तेऽस्मास्विति । इमानि ज्यायांसि पर्वाणि । तानि मे युष्यासु तानि मे प्रतिसंवत्तेति । तान्यस्यतचः पुनः प्रतिसंदधति ॥४॥ तानाह प मा वहतेति । किमभीति । संवत्सरमिति । ते संवत्सरमभिप्रवहन्ति ॥शा तं तथैवाऽऽगतं संवत्सरः प्रतिनन्द- त्ययं ते भगवो लोकः। स ह नावयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव में त्वयीत्याह तद्वाष मे पुनर्देहीति ॥७॥ किं नु ते मयीति । अयम्म आत्मा । स में त्वाय तन्मे पुनर्देहीति । तमस्मा आत्मानं संवत्सर पुनर्ददाति ॥८॥ तमाह प्रमा वहेति ॥६॥२४॥ पञ्चमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः। किमभीति । दिव्यान् गन्धर्वानिति तं दिव्यान गन्धर्वानभि-. प्रवहति ॥२॥ तं तथैवाऽऽगतं दिव्या गन्धर्वाः प्रसिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोज्य लोक इतिः ॥२॥ यद्वाव मे युष्मा- स्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दत्तेति ॥३॥ किं नु तेऽस्मास्थिति। १ ते । २ त्वधी । ३ वहते ॥ R ( १११ ) गन्धों में मोदो मे प्रमोदो मे । तन्मे युष्मामु । तन्मे पुनर्दत्तेति तदस्मै दिव्या गन्धर्वाः पुनर्ददति ॥४॥ तानाह भ मा वहतेति । किमभीति । अप्सरस इति । तमपसरसोऽभिप्रवहन्ति ॥६॥ तं तथैवाऽऽगतमप्सरसः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः। स ह नोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे युष्मास्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दत्तेति ॥७॥ किं नु तेऽस्मास्विति । हसो मे क्रीड़ा में मिथुनम्मे । तन्मे युष्यानु । तन्मे पुनर्दत्तेति । तदस्मा अप्सरसः पुनर्ददति ॥८॥ ता आह प्रमा वहतेति ॥६॥२॥ पञ्चमेऽनुवाके षष्ठः खण्ड । किमभीति । दिवामिति । तं दिवमभिमवहन्ति ॥१॥ तं तथैवाऽगतं द्यौः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥३॥ किं नु ते मयीति । तृप्तिरिति । सकृत्तृप्सेव ह्येषा । तामस्मै तृप्ति द्यौः पुनर्ददाति ॥४॥ तमाह म मा बहेति । किमभीति । देवानिति। तं देवानभिप्रवहति ॥५॥ तं तथैवाऽऽगतं 'देवाः प्रतिनन्दन्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे युष्माखि- २गन्धर्वो । ३ युयम १चौ।
२ ७ ( ११२ ) साह तद्वार मे पुनर्दत्तेति ॥७॥ किं नु तेऽस्मास्थिति ।अमृतमिति। तदस्मा अमृतं देवाः पुनर्ददति।।८॥तानाह प्रमावहतेति॥॥२६॥ पञ्चमेऽनुवाके सप्तमः खण्डः। किमभीति । आदिसमिति । तमादिसमभिप्रवहन्ति ॥१॥स मादिसमाह विभूः पुरस्तात्सम्पत् पश्चात । सम्यङ् त्वमसि । समीचो मनुष्यानरोषी रुषतस्त ऋषिः पाप्मानं हन्ति । अपहत- पाप्मा भवति यस्त्वैवं वेद ॥२॥ सम्भूर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । प्राभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥३॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पौमि । उप ते ता दिशामि॥४॥ोजो मे बलम्मे चतुर्मे तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहृथा इसादिसमवोचत्॥॥ तं तथैवाऽऽगतमादिसः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥६॥ यद्वार मे त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देही- ति किं नु ते मयीति । प्रोजो में बलम्मे चतुर्मे । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मा आदिसः पुनर्ददति ॥८॥ तमाह प्रमा बहेति । किममीति । चन्द्रमसमिति । तं चन्द्रमसमभि- २-दाति। १-वत्। २ सयदें। ३ अरोतिषि 'ति' खान से कटा हुमा है,। ।४।५एवम् । -भूतिर् । ७ भृतिर् । ८ गता | नास्ति । १० स्वीयी, स्थी बीति । ११ बनू- R -- ( १९३) अवहति ॥ स चन्द्रमसमाह ससस्य पन्था न त्वा जहाति। अमृतस्य पन्था न त्वा जहाति ॥१०॥ नवो नवो भवसि जाय- मानो भरो नाम ब्राह्मण उपास्से। तस्मात्ते ससा उभये देवमनुष्या अन्नाद्यम्भरन्ति । अन्नादो भवति यस्त्वैवं वेद ॥११॥ सम्भूर्देवो- ऽसि समहम्भूयासम् । आभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥१२॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्येमि। उप ते ता दिशामि ।।१३।। मनो मे रेतो मे प्रजा मे पुनस्सम्भू- तितं तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहृथा इति चन्द्रमसमवोचत् ॥१४॥ तं तथैवाऽऽगतं चन्द्रमाः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । सह नावयं लोक इति॥१॥यद्वाव मे त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देहीति॥१६॥ किं नु ते मयीति । मनो मे रतो मे प्रजा मे पुनस्सम्भूतिौ । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै चन्द्रमाः पुनर्ददति ॥१७॥ तमाह प्रमा बहेति ॥१८॥३॥२७॥ पञ्चमेऽनुवाके ऽष्टमः खण्डः । किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति । तमादिसमभिप्रवहति ॥२॥ स आदिसमाह प मा वहेति । किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति । ११ चन्-1 १२ वा। १३-पास । १४ नास्ति, अमृतस्य पराधा देवोऽसि समहम् । १५-ति । १९ मे, म । १७किंतु १प्रथमो। २ ब्राह- ।
( ११४ ) ६ ७ तं चन्द्रमसमभिमवहति । स एवमेते देवते अनुसंचरति शी एषोऽन्तोऽतः परः प्रवाहो नास्ति । यानु काँश्चाऽतः प्राची लोका- नभ्यवादिष्म ते सर्व प्राप्ता भवन्ति ते जितास्तेष्वस्य सर्वेषु काम- चारो भवति य एवं वेद ॥३॥ स यदि कामयेत पुनरिहाऽऽजाये- यति यस्मिन् कुलेऽभिध्यायेद्यदि ब्राह्मणकुले यदि राजकुले तस्मिन्नाजायते । स एतमेव लोकम्पुनः प्रजाननभ्यारोहन्नेति ॥४॥ तदु होवाच शाय्यायनिर्बहुव्याहितो वा अयम्बहुशो लोकः। एतस्य वै कामाय नु ब्रुवते [वा] श्राम्यन्ति वा क एतत्प्रास्य पुनरिहेया- दैत्रैव स्यादिति ॥॥३॥२८॥ पञ्चमेऽनुवाकें नवमः खण्डः । पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्त। C sa १ उच्चैःश्रवा ह कौपयेयः कौरव्यो राजाऽऽस । तस्य ह केशी दार्यः पाञ्चालो राजा खस्रीय आस । तौ हाऽन्योन्यस्य प्रिया- वासतुः ॥१॥ स होवैवश्रवाः कौफ्येयोऽस्माल्लोकात् प्रेयाय । तस्मिन् ह प्रेते केशी दाभ्योऽरण्ये मृगयां चचाराऽप्रियं विनिनी- ३-अन्ति, । ४ 'एषोत्यमभिप्रवहति । प्रमावहेऽति । किमभीऽति। ब्रह्मणी लोकमितिः ..देवते अनु संचरति अधिक है। ५ऽस्मि । -दिष्ठा ७ तेषु। ८ 'वा' अधिक है । ६ श्रूवते। १० 'चा' अधिक है। १-ऐ-रकौव-३ केश्शी, केश। ४ खस्त्री-। ५'गो लाल रङ्ग में कटा हुमा अधिक है। ।
१२ ( ११५ ) पमाणः ॥२॥ स ह तथैव पल्ययमानो मृगान् प्रसरनन्तरेणै- वोच्चैश्श्रवसं कौपयेयमधिजगाम ॥३॥ तं होवाच हप्यामि स्वी३- जानामीति । न दृप्यसीति होवाच जानासि । स एवास्मि यम्मा मन्यस इति ॥४॥ अथ यद्गव आहुरिति होवाच य प्राषिर्भव- त्यन्येऽस्य लोकमुपयन्तीत्यथ कथमशको म आविर्भवितुमिति॥५॥ ओमिति होवाच यदा वै तस्य लोकस्य गोप्तारमविदेऽतस्त मावि- रभूवमप्रियं चास्य विनेष्याम्यनु चैनं शासिष्यामीति ॥६॥ तथा भगव इति होवाच । तं वै नुत्वा परिष्वजा इति । तं ह स्म परिष्वजमानो यथा धूमं वापीयाद्वायुं वाकाशं वाग्न्यचि वापोवैवं ह स्मैनं व्येति । न ह स्मैनम्परिष्वगायोपलभते ॥७॥३॥२८॥ षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स होवाच य? ते पुरा रूपमासीत्तत्ते रूपम् । न तु त्वा परि- ध्वगायोपलभ इति ॥१॥ भोमिति होवाच ब्राह्मणो वै मे साम विद्वान् सान्नोद्गायत् । स मेशरीरेण सान्ना शरीराण्यधूनोत् । तथस्य वै किल साम विद्वान् सान्नोद्गायति देवतानामेव सलोकतां गमयतीति ॥२॥ पतङ्गः प्राजापत्य इति होवाच प्रजापतेः प्रियः प्रस्सर-1 ७ वैश्र-,ऽवेश्-१८ य । प्रत । १० वा। ११ है । १२३॥ १व। २ ने..३-गोयो।ऽप लभते । ५-रण्य् ।
( ११९) ० पुत्र प्रास । स तस्मा एतत् सामाब्रवीत् । तेन स ऋषीणामुद- गायत् । त एत ऋषयो धूतशरीरा इति ॥३॥ एतेनो एव साम्नति होवाच प्रजापतिर्देवानामुदगायत् । त एत उपरि देवा धूतशरीरा इति । ४॥ तस्मिन् हैनमनुशशास । तं हानुशिष्यो- वाच यस्स्मैवैतत् साम विद्याव स स्मैव त उद्गायत्विति ॥॥ स हानुशिष्ट आजगाम । स ह स्म कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणानुपपृ- छमानश्चरति ॥६॥३॥३०॥ षष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । व्यूढच्छन्दसा वै द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मि । स यो बस्तत्साम वेद यदहं वेद स एव म उद्गास्यति । मीमांसध्वमिति ॥१॥ तस्मै ह मीमांसमानानामेकश्चन [न] सम्पत्यभिदधाति ॥२॥ स ह तथैव पल्ययमानश्मशाने वा वने वाऽऽतीशया- नमुपाधावयांचकार । तं ह चायमानः प्रजही ॥३॥ तं हो- वार कोऽसीति । ब्राह्मणोऽस्मि मातृदो भाल इति ॥४॥ स कि वेत्यति । सामति ॥६॥ भोमिति होवाच । व्यूढच्छन्दसा वै द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मिस याद तत्साम वेथ यदहं वेद त्व- ६ ७ ६ मा । ७।८वे। ई-टा । १०-पाजे -ब-२ यदि । ३त्वम्।४ वेत्थ।५श्मभूनाम् । वावःसाध।७न । ८उव,उप च्यायान, जायाम।१०-चम-1 ११ 'यदहं वत्व अधिक है। ।
S ( ११७ ) १८ ब मेव म उद्गास्यासे । मीमांसस्वति ॥६।। तस्मै ह मीमांसमानस्त- देव सम्मत्यभिदधौ ॥७॥ तं होवाचाऽयम्म उद्गास्यतीति ॥८॥ तस्मै ह कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणा असूयन्त आहुरेषु ह वा अयं कुल्येषु सत्सूदास्यति । कस्मा अय-लमिति ॥ ६॥ अलम् मामिति हस्माऽह । सैवाऽलम्मस्थाऽलम् मतायद्तस्य हाऽल- मेवोज्जगौ । तस्मादालम्यैलाजोद्गातेत्याख्यापयन्ति॥१०॥३॥३१॥ षष्टेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । बद्ध सात्यकीर्ता आहुयाँ वयं देवतामुपास्मा एकमेव वयं तस्यै देवतायै रूपं गव्यादिशाम एक वाहन एक हस्तिन्येकम्पुरुष एकं सर्वेषु भूतेषु। तस्या एवेदं देवतायै सबै रूपमिति॥१॥ तदेतदेकमेव रूपम्माण एव । यावद्धयेव प्राणेन प्राणिति तावद्रूपम्भवति तदू- पम्भवति ॥२॥ तदथ यदा प्राण उत्क्रामात दार्वेवेव भूतोऽनर्थ्यः परिशिष्यते न किंचन रूपम् ॥३॥ तस्यान्तरात्मा तपः । तस्मा- तप्यमानस्योष्णतरः प्राणो भवति ॥४॥ तपसोऽन्तरात्मानिः। ३ स निरुक्तः । तत्मात्स दहति ।।५।। अथाधिदेवतम् । इयमवैषा १२-ति से ठीक किया हुआ १३ 'त्त अधिक है।१४ नास्ति'इति। १५-पान्च-१६पासू- १७ कुलेषु । १८ ऽगास-1१६ अर्णम्। २० न्यै इसके प्रागे 'म' लाल रंग में कटा हुआ है ।२१ मप्रधिक है। २२ एवौ। १ यद् । २ एयो। ३-ए । ४-यः । ५ इति । -देव-७-- ( १९८) देवता योऽयम्पवते । चस्मिन्नेतस्मिन्नापोऽन्तः। तदनम् । सो- उरूक्ष उपासितव्यः । यदस्मिन्नापोऽन्तस्तेनाऽरूक्षः ॥६॥ तस्या- न्तरात्मा तपस् । तस्मादेष प्रातपत्युष्णतरः पवते ॥७॥ तपसो- ऽन्तरात्मा विद्युत्। स निरुक्तः। तस्मात्सोऽपि दहति ॥८॥तानि. वा एतानि चत्वारि साम पाणो वाङ्मनस्स्वरः । स एष प्राणो पाचा करोति मनो नेत्रः। तस्य स्वर एवं प्रजाः । प्रजावान् भवति य एवं वेद ॥६॥३॥३२॥ षष्ठेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। स यो वायुः प्राण एव सः । योऽग्निर्वागेव सा । यश्चन्द्रमा मन एव तद् । य आदित्यस्स्वर एव सः। तस्मादेतमादित्यमाहु- स्स्वर एतीति ॥२॥ स यो ह वा अमूर्देवता उपास्ते या असूरधि- देवनं दूरूपा वा एता दुरनुसम्प्राप्या इव । कस्तद्वेद्ययेता अनु वा सम्मानुयान्न वा ॥२॥ अथ य एना अध्यात्ममुपास्ते स हा- ऽन्तिदेवो भवति । निर्जीयन्तीव वा इत एता। [ ] अस्य वा एसमशरीरस्य सह माणेन निर्जीयन्ति । क उ एव तद्वेद यद्येता अनु वा सम्माप्नुयान्न वा ॥३।। अथ य एना उभयीरेकधा-भव- तानि वासितव्यो (!) यदस्मिन्नापोऽन्तम्-तस्मात्सोऽपि दहति' दोबारा पाया है। १ यदा । २-रु।। ३-पापा । ४ चा । ५। ६ उमेधीर।
( ११६ ) तीर्वेद स एवानुष्ठया साम वेद स आत्मानं वेद स ब्रह्मवेद ॥४॥ तदाहुः प्रादेशमात्राद्वा इत एता एकम्भवन्ति । अतो ह्ययम्पाण- स्स्वर्य उपयुपरि वर्तन इति ॥शा अथ हैक आहुश्चतुरंगुलाद्वा इत एता एकम्भवन्तीति । अतो ह्येवायम्माणस्वयं उपर्युपरि वर्तत इति ॥६॥ स एष ब्राह्मण आवर्तः। स य एवमेतम्ब्रह्मण श्रावत वेदाऽभ्येनम्मजाः पशव आवर्तन्ते सर्वमायुरेति ॥७॥ स यो हैवं विद्वानमाणेन प्राण्याऽपानेनाऽपान्य मनसैता उभयोर्दे- वता आत्मन्येत्य मुख आपत्ते तस्य सर्वमाप्तम्भवति सर्व जितम्। न हास्य कश्चन कामोऽनातो भवति य एवं वेद ॥६॥शदेशा षष्ठेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । तदेतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च । मिथुनमुक्सामे । आचतुरं वाव मिथुनम्मजननम् ।।१।। तद्यत्राऽद् आह सोमः पवत इति वोपावर्तध्वमिति वा तत्सहैव वाचा मनसा प्राणेन खरेण हिङ्- कुर्वन्ति । तद् हिङ्कारेण मिथुनं क्रियते ॥२॥ सहैव वाचा मनसा पाणेन स्वरेण निधनमुपयन्ति । तन्निधनेन मिथुनं क्रियते ॥३॥ तत्सप्तविध सान्नः । सप्तकृत्व उद्गाताऽऽत्मानं च यजमानं च शरीरापजनयति ॥॥ यादृशस्यो ह वै रेतो भवति ताशे ७-भाखय्य । ६-रि (!) । १०-ले इद् । ११ ब्रह्मन ॥ १पाप 1२कार।३-या। । ३ ।
( १२० ) सम्भवति यदि वै पुरुषस्य पुरुष एव यदि गोर्गौरव यवश्वस्याश्व एव यदि मृगस्य मृगएव । यस्यैव रेतो भवति तदेव सम्भवति ॥शा तद्यथा ह वै सुवर्ण हिरण्यमग्नौ प्रास्यमानं कल्याणतरंकल्याण- तरम्भवति एक्मेव कल्याणतरेण कल्याणतरेणात्मना सम्भवति य एवं वेद ॥६॥ तदेवचाभ्यनूच्यते ॥७॥३॥३४॥ षष्ठेऽनुधाके षष्ठः खण्डः। पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः । समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षते मरीची- नाम्पदमिच्छन्ति वेधस इति ॥१॥ पतङ्गमक्तमिति । प्राणो वै पतङ्गः । पतन्निव ह्येष्वङ्गेध्वति रथमुदीक्षते । पतङ्ग इसाचक्षते ॥२॥ असुरस्य माययेति । मनो वा असुरम् । तद्धयमुषु रमते । तस्यैष माययाक्तः ॥३॥ हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चित इति । हृदैव होते पश्यन्ति यन्मनसा विपश्चितः ॥४॥ समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षत इति । पुरुषो वै समुद्र एवंविद उ कवयः । त इमाम्पु- रुषेऽन्तर्वाच विचक्षते ॥शा मरीचीनाम्पदमिच्छन्ति वेधस इति । मरीच्य इव वा एता देवता यदाग्निर्वायुरादिसश्चन्द्रमाः॥६॥ न ह । ४ऋच्या। ५-स्या-11 १प्रसमा २-ताः। ३-५।४।५हुदा एवं। ७स।
( १२१ ) वा एतासां देवतानाम्पदमस्ति । पदेनो ह वै पुनर्मत्युरन्वेति ॥७॥ तदेतदनन्वितं साम पुनर्मुत्युना । अति पुनर्मुत्यु तरति य एवं वेद ॥६॥२३॥ षष्ठेऽनुवाके सप्तमः खण्डः । पतङ्गो वाचम्मनसा विभर्ति तांगन्धर्वोऽवदद्ग, अन्तः। तां द्योतमानां स्वर्यम्मनीषामृतस्य पदे कवयो निपान्ति इति ॥१॥ पतङ्गो वाचम्मनसा विभीति । प्राणो वै पतङ्गः। स इमां वाचम्मनसा बिभर्ति ॥२॥ तां गन्धर्वोऽवददर्भ अन्तरिति । पाणौ वै गन्धर्वः पुरुष उगर्भः। स इमाम्पुरुषेऽन्तर्वाचं वदति ॥३॥ तां द्योतमानां स्वर्यम्मनीपामिति । स्वर्या ह्येषा मनीषा यदाक् ॥४॥ मृतस्य पदे कवयो निपान्तीति । मनो वाऋतमेवंविद उ कवयः। ओमिसेतदेवाक्षरमृतम् । तेन यदृचम्मीमाँसन्ते यद्यजुर्यत्साम. तदेनां निपान्ति ॥शा॥३६॥ षष्ठेऽनुवाकेष्टमः खण्डः। ८। १-यो। २-मा।३ वदति । ४ अन्तू- ५-६ यल्साम' के आगे 'प्रोमित्ये-ऋतमू है ॥
( १२२ ) अपश्यं गोपामनिपथमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तरम् । स सध्रीचीस्स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुक्ने ध्वन्तर इति ॥१॥ अपश्यं गोपामनिपद्यमानमिति । प्राणो वै गोपाः। स हीदं सर्वम- निपद्यमानो गोपायति ॥२॥ आ च परा च पथिभिश्चरन्तमिति । तये च ह वा इमे प्राणा अमी च रश्मय एतैर्ह वा एष एतदा च परा च पथिभिश्चरति ॥३॥ स सध्रीचीस्स विषूचीर्वसान इति । सध्रीचीश्च ह्येष एतद्विषूचीश्च प्रजा वस्ते ॥४॥ आ वरीवति भुवने- श्वन्तरिति । एष होवैषु शुबनेश्वन्तरावरीवति ॥५॥ स एष इन्द्र उद्गीथः । स यदैष इन्द्र उद्गीथ आगच्छति नैवोद्गातुश्चोपगातॄणां च विज्ञायते । इत एवोर्ध्वस्स्वरुदेति । स उपरिमूनों लैलायति॥६॥ स विद्यादागमदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्मा न्यङ्गः पारेशेक्ष्यत इति । तस्मिन् ह न कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशिष्यते ॥७॥ तदेखद- भ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते । स ६ यथेन्द्रो न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव [न] कंचन भ्रातृव्य- म्पश्यते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥८॥३७॥ षष्ठेऽनुवाके नवमः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ १-रीच्-इंस पाद के प्रारम्भ में 'अति'ऐसाअधिक है।२ सस्ते। ३-तृण-४-ध्व । ५ भागाद् । ६ परिष- ७ षत । ८ भ्र-॥
( १२३ ) . ६ ७ प्रजापतिम्ब्रह्माऽजत । तमपश्यममुखमसृजत ॥२॥ तमप्र- पश्यममुखं शयानम्ब्रह्माऽऽविशन् । पुरुष्यं तत् । प्राणौवै ब्रह्म । प्राणो वावै तदाविशत् ॥२॥ स उदतिष्ठत् प्रजानां जनयिता। तं रक्षांस्यन्वसचन्त ॥३॥ तमेतदेव साम गायनत्रायत।यदायन- त्रायत तद्गायत्रस्य गायत्रत्वम् ॥४॥ त्रायत एनं सर्वस्मात्पाप्मनो मुच्यते य एवं वेद ॥॥ तमुपाऽस्मै गायता नर इत्यूचाऽऽश्रव- रणीयेनोपागायन् ॥६॥ यदुपाऽस्मै गायता नर इति तेन गायत्रम- भवत् । तस्मादेषैव प्रतिपत्कार्या ॥७॥ पवमानायन्दावा अभि देवमिया-हुम-भाक्षाता इति पोडशाक्षराण्यभ्यगायन्त। षोडशकलं चै ब्रह्म । कलाश एवैनं तद्ब्रह्माऽऽविशत् ॥८॥ तदेतच्चतुर्विंशसक्षरं गायत्रम् । अष्टाक्षरः प्रस्तावः । षोडशाक्षरंगीतं तच्चतुर्विंशतिस्स- म्पद्यन्ते । चतुर्विंशयर्धमासस्संवत्सरः । संवत्सरस्साम ॥६॥ ता ऋचश्शरीरेण मृत्युरन्वैतत् । तद्यच्छरीरवत्तन्मृसोराप्तम् । अथ यद- शरीरं तदमृतम् । तस्याऽशरीरेण साना शरीराण्यधूनोद ॥१०॥ १३ १० १४ ૨ ३॥३८॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १ मुख-1 २ अप्रव-३-५।४-प्रास्य । ५ अनुसच्-१६गा- यन । ७ श्रवसीय-1८ऽगा-1 १०-लाम् । ११ प्रास्तू-1 १२ तम् । १३-यत । १४-सासू॥
। (१२४ ) ओवाश्चोवा३चोवाश्च् हुम्भा अोवा इति षोडशाक्षरा- एयभ्यगायत । षोडशकलो वै पुरुषः । कलाश एवास्य तच्छरी- राण्यधूनोत् ॥१॥ स एषोऽपहतपाप्मा घृतशरीरः। तदेफिक्रया- इतियुदासंगायसो इत्युदास । आ इति आद्यात् । वागिति तब्रह्म । तदिदन्तरिक्षं सोऽयं वायुः पवते । डुमिति चन्द्रमाः । मा इसादिसः ॥२॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य क्रतो तीसाच- क्षते ॥३॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोरभ्रमियाचक्षते ॥४॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोः कुभ्रमियाचक्षते ॥५॥ एतस्य वा इदमक्षरस्य ऋतोश्शुभ्रमियाचक्षते ॥६॥ एतस्य हवा इदमक्षरस्य ऋतोर्टषभ इसाचक्षते ॥७॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य तोर्दर्भ इसाचक्षते ॥८॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोर्यो मातीलाचक्षते ॥६॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोरसम्भवती- साचक्षते ॥१॥ तद्यक्किं च भा३ इति च भा३ इनि च तदेत- मिथुनं गायत्रम् । प्र मिथुनेन जायते य एवं वेद ॥११॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । १-या।२ कृत्-३ सर्वत्र ऐसा पाठ १४-८।५ दृष्य ६ भ, सम्भवती। ७ य भती। ८ ॥ ।
( १२५ ) ६ तदेतदमृतं गायत्रम् । एतेन वै प्रजापतिरमृतत्वमगच्छदेतेन देवा एतेनर्षयः ॥१॥ तदेतद्ब्रह्म प्रजापतयेऽब्रवीत् प्रजापतिः परमेष्ठिने प्राजापसाय परमेष्ठी प्राजापखो देवाय सवित्रे देवस्सविता- ऽग्नयेऽग्निरिन्द्रायेन्द्रः काश्यपाय काश्यप ऋश्यशृङ्गाय काश्यपाय ऋश्यशृङ्गाकाश्यपो देवतरसेश्यावसायनाय काश्यपाय देवतराण्या- वसायनः काश्यपश्श्रुषाय वाह्नेयाय काश्यपाय श्रुषो वायः का- श्यप इन्द्रोताय देवापाय शौनकायेन्द्रोतो दैवापरशौनको दृतय ऐन्द्रोतये शौनकाय तिरैन्द्रोतिश्शौनकः पुलुषाय प्राचीनयोग्याय पुलुषः प्राचीनयोग्यस्ससयज्ञाय पौलुपये प्राचीनयौग्याय सस- यज्ञः पौलुषिः प्राचीनयोग्यस्सोमशुष्माय सासयज्ञाय प्राचीन- योग्याय सोमशुष्मस्सासयज्ञिः प्राचीनयोग्यो हृत्वाशयायाऽल्ल- केयाय माहापाय राज्ञे हृत्स्वाशय आल्लकेयो माहापो राजा जनश्रुताय काण्ड्वियाय जनश्रुतः कारिड्वयस्सायकाय जानश्रुते- याय काण्ड्वियाय सायको जानश्रुतयः कारिड्वयो नगरिणे जानश्रुतेयाय कारिड्वयाय नगरी जानश्रुतेयः कारिड्वयश्शाय १'काइपयो' अधिक है। २ श्यावसाय । ३ भूषो, शूषो। बाख्ने । ५ इन्द्रातू- ६-पिश् । ७ लोक- ८सू सात्यायधि: प्राचीनयग्यो हत्खा अधिक है । ६ जानु, जानवक्ष- १० शिंग-1 ७ ( १२६ ) शाळ्यायनय आत्रेयाय शङ्गश्शाट्यायनिरात्रेयो रामाय कातुजाते- याय वैयाघ्रपद्याय रामः कातुजातेयो वैयाघ्रपद्यः-२॥३॥४०॥ सप्तमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । ६ ३ -शङ्खाय बाभ्रव्याय शङ्खो बाभ्रव्यो दक्षाय कासायनय आत्रेयाय दक्षः कासायनिरात्रेयः कँसाय वारकये कँसो वारकि: प्रोष्ठपादाय वारक्याय प्रोष्ठपादो वारक्यः कँसाय वारक्याय कँसो वारक्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यः कुबेराय वारक्याय कुबेरो वारक्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुतो वारक्यस्मुदत्ताय पाराशर्याय मुदत्तः पाराशर्योऽषाढायोत्तराय पाराशर्यायाऽषाढ उत्तरः पारा- शर्यो विपश्चिते शकुनिमित्राय पाराशर्याय विपश्चिच्छकुनिमित्रः पाराशर्यो जयन्ताय पाराशर्याय जयन्तः पाराशर्य:-॥२॥२४॥ सप्तमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । श्यामजयन्ताय लौहिसाय श्यामजयन्तो लौहिसः पल्लि- गुप्ताय लोहियाय पल्लिगुप्तो लौहिसस्ससश्रवसे लौहिसायं सस- ११-नाब। १-नाय, कात्याजय-२वर्--३-१४सुदत्ता,सुदत्तताय। ५ अप (1), आष्-॥ १ लोह- ३ ( १२७ ) श्रवा लौहिसः कृष्णधृतये सासकये कृष्णातस्सासाकश्श्याम- मुजयन्ताय लौहिसाय श्यामसुजयन्तो लौहिसः कृष्णदत्ताय लौहिसाय कृष्णदत्तो लौहिसो मित्रभूतये लौहिसाय मित्रभूति लौहिसश्श्यामजयन्ताय लौहिसाय श्यामजयन्तो लौहियस्त्रि- वेदाय कृष्णराताय लौहिसाय त्रिवेदः कृष्णरातो लौहित्यो यशखिने जयन्ताय लौहित्याय यशस्वी जयन्तो लौहित्यो जयकाय लौहित्याय जयको लौहित्यः कृष्णराताय लीहत्याय कृष्णारातो लौहित्यो दक्षजयन्ताय लौहित्याय दक्षजयन्तो लौहित्यो विपश्चिते दृढजयन्ताय लौहित्याय विपश्चिदृढजयन्तो लौहित्यो वैपश्चिताय दाढजयन्तये दृढजयन्ताय लौहित्याय वैपश्चितो दाढ- जयन्तिदृढजयन्तो लौहित्यो वैपश्चिताय दाढजयन्तये गुप्ताय लौहित्याय ॥१॥ तदेतदमृतं गायत्रमथ यान्यन्यानि गीतानि काम्यान्येव तानि काम्यान्येव तानि ॥२॥२४॥ सप्तमेऽनुवाके पश्चमः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ StudPresistamino २-ति । ३ 'श्यामजयन्तो लौहित्याय' अधिक है। ४ वैविप्-1 - ५-दू॥
(१२८ ) [चतुर्थोऽध्यायः] श्वेताश्वो दर्शतो हरिनीलोऽसि हरितस्पृशस्समानबुद्धो मा हिंसीः । न मां त्वं वेस्थ प्रद्रव ॥१॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि खपन्तम्पुरुषमकोविदमश्ममयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा॥२॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यषि स्वपन्तम्पुरुषमको विदमयस्मयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥३॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यषि स्वपन्तम्पु- रुषमकोविदं लोहमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥४॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरुषमकोविदं रजतमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥५॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वषन्तम्पुरु- षमकोविदं सुवर्णमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥६॥ आयुर्माता मतिः पिता नमस्त आविशोषण । अहो नामाऽसि विश्वायुस्तस्मै ते विश्वाहा नमो ६ नमस्ताम्राय नमो वरुणाय नमो जिघांसते ॥७॥ यक्ष्म राजन्मा मां हिंसीः । गजन् यक्ष्म मा हिंसीः । तयोस्संविदानयोस्सर्वमायुर- ९ यान्यहम् ॥८॥४॥२॥ प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः। १-णा । २ इति मन्ममयेन ।३ प्रयाएय। ४ संक्षेप है। ५मातन । ६-वाहाच । ७ रुपाय।८॥ a ( १२६ ) वै पुरुषो वै यज्ञः ॥२॥ तस्य यानि चतुर्विशतिर्वाणि तत्मात- स्सवनम् । चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री । गायत्रम्मातस्सवनम् ॥२॥ तद्वसूनाम् । प्राणा वसवः। माणा हीदं सर्व वखाददते ॥३॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदुपद्रवेत्स ब्रूयात्माणा वसव इदम्मे प्रातस्सवनं माध्यन्दिनेन सवनेनानुसंतनुतेति । अगदो हैव भवति ॥४॥ अथ यानि चतुश्चत्वारिंशतं वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनम् । चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् । त्रैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनम् ॥५॥ तद्रुद्राणाम् । प्राणा वै रुद्राः । प्राणा हीदं सर्व रोदयन्ति ॥६॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदुपट्टवेत् स ब्रूयात्माणा रुद्रा इदम्मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयसवनेनानुसंत- नुतेति । अगदो हैव भवति ॥७॥ अथ यान्यष्टाचत्वारिंशतं वर्षाणि तत् तृतीयसवनम् । अष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती । जागतं. तृतीयसवनम् ॥८॥ तदादिसानाम् । माणा वा आदित्याः । पाणा हीदं सर्वमाददते ॥६॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदु- पद्रवेत्स ब्रूयात्माणा आदित्या इदम्मे तृतीयसवनमायुषानु- संतनुतेति । अगदो हैव भवति ॥१०॥ एतद्ध तद्विद्वान् ब्राह्मण १-ति । २-४।३वै अधिक है। ४ वर्माणि .
६ ( १३० ) उवाच महिदास ऐतरेय उपतपति किमिदमुपतपसि योऽहमनेनो- पतपता न प्रेष्यामीति । स ह षोडशशतं वर्षाणि जिजीव । प्रह षोडशशतं वर्षाणि जीवति नैनम्माणस्साम्यायुषो जहाति य एवं वेद ॥१॥४॥२॥ द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः। यायुष कश्यपस्य जमदमेस्त्र्यायुषम्। त्रीण्यमृतस्य पुष्पाणि त्रीण्यायूंषि मेऽकृणोः॥१॥ स नो मयोभूः पितवाविशस्व शान्तिको यस्तनुवे स्योनः ॥२॥ येऽग्नयः पुरीष्याः प्रिविष्टाः पृथिवीमनु । तेषां त्वमस्युत्तमः प्र णो जीवातवे सुव ॥३॥४॥३॥ तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः। अरण्यस्य वत्सोऽसि विश्वनामा विश्वाभिरक्षणोऽपाम्पक्वो- ऽसि वरुणस्य दुतोऽन्तधिनाम ॥शा यथा त्वममृतोमत्येभ्योऽन्तहितो- ऽस्येवं त्वमस्मानघायुभ्योऽन्तर्धेहि।अन्तर्धिरसि स्तेनेभ्यः॥२॥४॥४॥ चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः । ५ सम्य् ॥ १ त्रियाय-1 २ त्रीम् । ३ आयुंक्षि। ४-तो। ५ चतोका । या-नों।८प्रा। १ विश्वोन-अँ। २-क्षमा । ३ ऽर्धनाम । ४ त । ५ मर्त्तभ्यो। १ ३ ( १३१ ) व्युषि सविता भवस्युदेष्यन् विष्णुरुद्यन्पुरुष उदितो बृहस्पति- रभिप्रयन्मघवेन्द्रो वैकुण्ठो माध्यन्दिने भगोऽपराह्न उग्रो देवो लो- हितायनस्तमिते यमो भवसि ॥२॥ प्रश्नसु सोमो राजा निशाया- पितृराजस्वमे मनुष्यान्पविशसि पयसा पशून् ॥२॥ विरात्रे भवो भवस्यपररात्रेङ्गिरा अग्निहोत्रवेलायाम्भृगुः ॥३॥ तस्य तदे- तदेव मण्डलमूधः । तस्यैतौ स्तनौ यद्वाक् च प्राणश्च । ताभ्या- म्मेधुक्ष्वाऽध्यायम्ब्रह्मचर्यम्मजाम्पशृन् स्वर्ग लोकं सजातवन- स्याम् ॥४॥ एता आशिष प्राशासे । भूर्भुवस्वः। उदिते शुक्रमा- ७ दिश । तदात्मन्दधे ॥५॥४॥५॥ पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः। भगेरथो हैक्ष्वाको राजा कामप्रेण यज्ञेन यक्ष्यमाण प्रास॥शा तदु ह कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणा ऊचुर्भगेरथो ह वा अयमैक्ष्वाको राजा कामप्रेण यज्ञेन यक्ष्यमाणः । एतेन कथांवदिष्याम इति ॥२॥ तं हाऽभ्येयुः। तेभ्यो हाऽभ्यागतेभ्योऽपचितीश्चकार ॥३॥ अथ हैषां स भाग आवत्राजोप्त्वा केशश्मश्रूणि नखानिकृत्याऽऽज्ये- १-श्रो।२पराहेण । ३-ज । ४ त । ५-य । ६ प्रासिष। ७मादिष॥ १-पाञ्च-१२ यक्षम्- ३ एततेन । ४ 'भा' अधिक है। ५उपत्वा (. १३२ ) नाऽभ्यज्य दण्डोपानहम्बिभ्रत् ॥४॥ तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तः कतमो वस्तद्वेद यथाऽश्रावितप्रत्याश्राविते देवान् गच्छत इति ॥५॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यद्विदुषस्मृद्गाता मुहोता खध्वर्युस्सुमानुषविदाजायत इति ॥६॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यत्तानि सर्वाणि संस्तुतान्यभि- सम्पद्यन्त इति ॥७॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यथा गायच्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥८॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद बथा दक्षिणाः प्रतिगृहीता न हिंसन्तीति ॥॥४६॥ षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । एतान् हैनान् पञ्च प्रश्नान् पप्रच्छ ॥२॥ तेषां ह कुरुपञ्चा- लानाम्बको दालभ्योऽनूचान आस ॥२॥ स होवाच यथाऽऽश्रा- वितपसाभाविते देवान् गच्छत इति भाच्यां वै राजन् दिश्या- श्रावितप्रसाश्राविते देवान् गच्छतः । तस्मात्मातिष्ठन्नाश्रावयति प्राङ् विष्ठन्मत्याश्रावयवीति ॥३॥ अथ होवाच यद्विदुषस्सगाता सुहोता स्वध्वर्युस्सुमानुषविदाजायत इति यो वै मनुष्यस्य सम्भूतिं वेदेति होवाच तस्य सद्गाता मुहोता स्वध्वर्युस्मुमानुपवि- १ १-पाञ्च-२ अस्म-३ सम्-१६ च्-।
( १३३ ) दाजायत इति प्राणा उ ह वाव राजन् मनुष्यस्य सम्भूतिरेवेति ॥४॥ अथ होवाच यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यत्तानि सर्वाणि संस्तुतान्यभिसम्पद्यन्त इति गायत्रीमुह वाव राजन् सर्वाणि छन्दांसि संस्तुतान्यभिसम्पद्यन्त इति ॥शा अथ होवाच यथा गायच्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति वषट्कारेणो ह वाव राजन गायत्र्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥६॥ अथ होवाच यथा दक्षिणाः प्रतिगृहीता न हिंसन्तीति-॥७॥४७॥ षष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । -यो वै गायध्यै मुखं वेदेति होवाच तं दक्षिणा प्रतिगृहीता न हिंसन्तीति ॥२॥ अमिह वाव राजन् गायत्रीमुखम् । तस्माघदग्नावभ्यादधाति भूयानेव स तेन भवति वर्धते । एव- मैवैवं विद्वान्ब्राह्मणः प्रतिगृहन्भूयानेव भवति वर्धत उ एवेति ॥२॥ स होवाचाऽनूचानो वै किलाऽयम्ब्राह्मण आस । त्वामहमनेन यज्ञेनैमीति ॥३॥ तस्य वै ते तथोद्गास्यामीति होवाच यथै- कराडेव भूत्वा वर्ग लोकमेष्यसीति ॥४॥ तस्मा एतेन गाय- त्रेणोद्गीथेनोज्जगौ । स हैकराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमियाय । ४ सम्भूतिधुर, सम्भूतिद्धर । ५ है। १ प्रश्न-ए-पॅन् । ३गाया सो।
( १३४ ) तेन हैतेनैकराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमेति [य एवं वेद] ॥५॥ ओं वा इति द्वे अक्षरे । ओं वा इति चतुर्थे । ओं वा इति षष्ठे । हुम्भा ओं वागित्यष्टमे ॥६॥ तेन हैतेन प्रतीदर्शोऽस्य भयदस्या- समात्यस्योज्जगौ ॥७॥ तं होवाच किं त आगास्यामीति । स होवाच हरीमे देवाचा वागायेति । तथेति । तौ हास्मा आजगौ। तौ हैनमाजग्मतुः ॥८॥ स वा एष उद्गीथः कामानां सम्पदों वा३चों वाञ्चों वाश्च् हुम् भा ओं वागिति। साङ्गो हैव स तनुर- मृतस्सम्भवति य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥॥४॥ षष्ठेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ ६ १ पुरुषो वै यज्ञः पुरुषो होद्गीथः । अथैत एव मृत्यवो यद- निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमाः ॥१॥ ते ह पुरुषं जायमानमेव मृत्युपाशैर- भिदधति। तस्य वाचमेवानिरभिदधाति प्राणं वायुश्चतुरादित्यश्- श्रोत्रं चन्द्रमाः ॥२॥ तदाहुस्स वा उद्गाता यो यजमानस्य प्राणे- भ्योऽषि मृत्युपाशानुन्मुञ्चतीति ॥३॥ तद्यस्यैवं विद्वान् प्रस्तौति य एवास्य वाचि मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥४॥ अथ यस्यैवं ૨ ४ तोन । ५-शे। सवद् ॥ १अबा।२ यजा-३ उमुन्- ( १३५ ) विद्वानुद्गायति य एवास्य प्राणे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥शा अथ यस्यैवं विद्वान् प्रतिहरति य एवास्य चतुषि मृत्युपाशस्तमे- वास्योन्मुञ्चति ॥६॥ अथ यस्यैवं विद्वान्निधनमुपैति य एवास्य श्रोत्रे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुञ्चति ॥८॥ तदाहुस्स वा उद्गाता यो यजमानस्य माणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुच्याथैनं साङ्गं सतनुं सर्वमृत्योस्स्मृणातीति ॥६॥४॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । तयस्यैवं विद्वाहिङ्करोति य एवास्य लोमसु मृत्युपाशस्त- स्मादेवैनं स्पृणाति ॥२॥ अथ यस्यैवं विद्वान प्रस्तौति य एवास्य त्वचि मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥२॥अथ यस्यैवं विद्वाना- दिमादत्ते य एवास्य माँसेषु मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥२॥ अथ यस्यैवं विद्वानुद्गायति य एवास्य नावसु मृत्युपाशस्तस्मा- देवनं स्पृणाति ॥४॥अथ यस्यैवं विद्वान्मतिहरति य एवास्याङ्गेषु मृसपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥५॥अथ यस्यैवं विद्वानुपद्रवति य एवास्यास्थिषु मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥६॥ अथ यस्यैवं १ ४-द्वा । ५ उद्गायति । ६ प्राणे । ७ नास्ति । ८ प्रतिहरति । १क्व-२या।
३ ( १३६ ) विद्वान् निधनमुपैति य एवास्य मजसु मृत्युपाशस्स तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य माणेभ्येऽधि- मृत्युपाशानुन्मुच्याथैनं साङ्गं सतनुं सर्वमृत्योस्सपृणाति ॥८॥तदा- हुस्स वा उद्गाता यो यजमानस्य माणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुच्यानं साङ्गं सतनुं सर्वमृसोस्स्मृत्वा स्वर्गे लोके सप्तधा दधातीति ॥३॥ स वा एष इन्द्र वैमृध उद्यन् भवति सवितोदितो मित्रस्संगवकाल इन्द्रो वैकुण्ठो मध्यन्दिने समावर्तमानश्शर्व उग्रो देवो लोहितायन् प्रजापतिरेव संवेशेऽस्तमितः ॥१०॥ तद्यस्यैवं विद्वान् हिरोति या एवास्योद्यतस्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥११॥ अथ यस्यैवं. विद्वान प्रस्तौति य एवास्योदिते स्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं. दधाति ॥१२॥ अथ यस्यैवं विद्वानादिमादत्ते य एवास्य संगवकाले खगों लोकस्तस्मिनेवैनं दधाति ॥१३॥ अथ यस्यैवं विद्वानुद्गायति य एवास्य मध्यन्दिने स्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१४॥अथ यस्यैवं विद्वान् प्रतिहरति य एवास्यापराहे स्वर्गों लोकस्तस्मिन्ने- वैनं दधाति ॥१५॥ अथ यस्यैवं विद्वानुपद्रवति य एवास्यास्त- यतस्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१६॥ अथ यस्यैवं विद्वात्रि- ३ सम्भवक-1 ४--मोजनायां गमा। - ।६ माध्। ७ सा८ऐवा।
( १३७ ) धनमुपैति य एवास्यास्तमिते स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति॥१७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मु- च्याथैनं साङ्गं सतर्नु सर्वमृत्योस्स्मृत्वा स्वर्गे लोके सप्तधा दधाति ॥१८॥४॥१०॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ २ ३ ६ ३ षड् ढ वै देवतास्स्वयम्भुवोऽग्निर्वायुरसावादित्यः प्राणोऽनं वाक् ॥१॥ तात्रैष्ठ्ये व्यवदन्ताऽहं श्रेष्ठाऽस्म्यहं श्रेष्ठाऽस्म्य्? [स्मि] मां श्रियमुपाध्यामिति ॥२॥ ता अन्योन्यस्यै श्रेष्ठतायै नाऽतिष्ठन्त । ता अब्रुवन्न वा अन्योन्यस्यै श्रेष्ठतायै तिष्ठामह एता सम्प्रब्रवामहै यथा श्रेष्ठास्सम इति ॥३॥ ता अग्निमब्रुवन्कथं त्वं श्रेष्ठोऽसीति॥४॥ सोऽब्रवीदहं देवानाम्मुखमस्म्यहमन्यासाम्प्रजानाम् । मयाऽऽहुतयो हूयन्ते । अहं देवानामन्नं विकरोम्यहम्मनुष्याणाम् ॥५॥ स यन्न स्याममुखा एव देवास्स्युरमुखा अन्याः प्रजाः। नाऽऽहुतयो हूयेरन् । न देवानामन्नं विक्रियेत न मनुष्याणाम् ॥६॥ तत इदं सर्वम्परा- सप्त॥ १ षड्ढ । २ ड । ३-आ । ४-ठे । ५ प्वबदू- ६ श्रेष्- ७ धान्या- ८-है । ६ एत । १० त्वा । ११-कार-1 १२ । १३ हूयन्ते (1) लिख कर हुयरन (1) किया गया । १४-ए।
मवेततो न किंचन परिशिष्यतेति ॥७॥ एवमेवेति होचुवेह किंचन परिशिष्येत यत् त्वं न स्या इति ॥८॥ अथ वायुमब्रुव- १६ न्कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ॥६॥ सोऽब्रवीदहं देवानाम्प्राणोऽस्म्यह- मन्यासाम्प्रजानाम् । यस्मादहमुत्क्रामामि ततस्स अप्लवते ॥१०॥ स यदहं न स्यां तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येते- ति ॥११॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्वं न स्या इति ॥१२॥४॥१२॥ अष्टमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । अथादित्यमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ।।१॥ सोऽब्रवीद- हमेवोधनहर्भवाम्यहमस्तयनरात्रिः । मया चतुषा कर्माणि क्रियन्ते। स यदहं न स्यां नैवाहस्स्यान्न रात्रिः। न कर्माणि क्रियेरन् ॥२॥ तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येतेति ॥३॥ एवंमवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥४॥ अथ प्राणमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ॥॥ सोऽब्रवीत्माणो भूत्वाऽग्निर्दीप्यते । प्राणो भूत्वा वायुराकाशमनुभवति । प्राणो भूत्वाऽऽदिस उदेति।प्राणादन्नम्प्राणाद्वाक् ॥६॥ स यदहं न स्यां तत १५-ध्ये । १६ य । १७ अहहम् । १८ ऽव ह ॥ १ हंन । २ए। ३ उक् । ४ अंक्स ५ततू (1)।
( १३६ ) ३ ७ इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येतेति ॥७॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥८॥ अथान- मब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठमसीति ।।२।। तदब्रवीन्मयि प्रतिष्ठायाग्निर्दी- प्यते । मयि प्रतिष्ठाय वायुराकाशमनुविभवति । मयि प्रतिष्ठाया- दिख उदति । मदेव प्राणो मद्वाक् ॥१०॥ स यदहं न स्यां तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्यतेति ॥११॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥१२॥ अथ वाचमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठासीति॥१३।। साब्रवीन्मयैवेदं विज्ञायते मयाऽदः । स यदहं न स्यां नवेदं विज्ञायेत नाऽदः ॥१४॥ तत इदं सर्वम्पराभवेन् नैवेह किंचन परिशिष्यतेति ॥१॥ एवमेवे- ति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥१६॥४॥१२॥ अष्टमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ता अब्रुवन्नेता वै किल सर्वा देवताः । एकैकामेवानुस्मः । स यन्नु नस्सर्वासां देवतानामेकाचन न स्यात्तत इदं सर्वम्परा- भवेत्ततो न किंचन परिशिष्येत । हन्त साधं समेस यच्छष्टं १ ६ संक्षेप करते हैं । 'स (! न के स्थान में ) स्या इति' यहां तक छोड़ दिया है । ७ इ-त्य (!) संक्षिप्त दिया है । ८-शिष्य। तुर् ॥ १-५।२सामू-1 (१४०) तदसामेति ॥२॥ ता एतस्मिन् प्राण ओकारे वाच्यकारे समायन्। ६ ९ । तद्यत्समायन् तत्सान्नस्सामत्वम् ॥२॥ ता अब्रुवन् यानि नो मर्यान्यनपहतपाप्मान्यक्षराणि तान्युझ्यामृतेष्वपहतपाप्मसु शुद्धे- वक्षरेषु गायत्रं गायामाऽग्नौ वायावादिसे प्राणेऽन्ने वाचि । तेनापहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमियामेति॥३॥ एसग्नेर- मृतमपहतपाप्य शुद्धमक्षरम् । निरिसस्य मर्त्यमनपहतपाप्मा- ऽक्षरम् ॥४॥ वेति वायोरमृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । युरित्यस्य मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥५॥ एत्यादित्यस्याऽमृतमपहत्पाप्म शुद्धमक्षरम् । त्येत्यस्य मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥६॥ प्रेति माणस्यामृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । त्यस्य मर्त्यमनपहत पाप्माक्षरम् ॥७॥ एत्यनस्यामृतमपहतपाप्म शुद्धमतरम् । नमित्यस्य मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥८॥ वेति वाचोऽमृतमपहतपाप्म शुद्ध- मक्षरम् । गित्यस्यै मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥६॥ ता एतानि मान्यनपहतपाप्मान्यक्षराण्युद्धृत्याऽमृतेष्वपहतपाप्मसु शुद्धेष्व- क्षरेषु गायत्रमागायननौ वायावादित्ये प्राणेऽन्ने वाचि । तेनाप- १० १२ ३-णे । ४ वाच्च् । ५-त्य । ६ अम्-(!) । ७ येन । ८-त । ६-न । १० त्य इत्य् । ११ 'वेदिवाचो मृत' अधिक है पर लाल रङ्ग से काटा गया है । १२ ण इत्य् । १३-मासु ॥
हत्य मृत्युमपहत्य पाप्मान स्वर्गलोकमायन् ॥१०॥ अपहत्य मृत्यु (१४१ ) मपहत्य पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य एवं वेद ॥१॥४॥१३॥ अष्टमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । ता ब्रह्माऽब्रुवन्वयि प्रतिष्ठायैतमुधच्छामेति । ता ब्रह्माऽब्रवी- दास्येन प्राणेन युष्मानास्येन प्राणेन मामुपामवाथेति ॥१॥ ता एतेन प्राणेनौकारेण वाच्यकारमभिनिमेष्यन्त्यो हिङ्काराद्भका- रमोकारेण वाचमनुखरन्त्य उभाभ्याम्प्राणाभ्यां गायत्रमगायनो- वाश्चोवाश्चोवा३च् हुम् भा वो वा इति ॥२॥ स यथोभया- पदी प्रतितिष्ठत्येवमेव स्वर्गे लोके प्रत्यतिष्ठन् । प्रति स्वर्गे लोके तिष्ठति य एवं वेद ॥३॥ य उ ह वा एवं विदस्माल्लोकात्मौत स ४ प्राण एव भूत्वा वायुमप्येति वायोरध्यभ्राण्यभ्रेभ्योऽधि वृष्टिं ५ वृष्ट्यैवेमं लोकमनुविभवति ॥४॥ ऋषयो ह सत्रमासां चक्रिरे । ते पुनः पुनर्बहीभिर्बहीभिः प्रतिपद्भिस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं नानुचन बुबुधिरे ॥॥ त उ श्रमेण तपसा व्रतचर्येणेन्द्रमवरुरु- घिरे ॥६॥ तं होचुस्स्वर्ग वै लोकमैप्सिष्म । ते पुनः पुनर्बहीभि- बह्वीभिः प्रतिपद्भिस्वर्गस्य लोकस्य द्वारं नानुचनाऽभुत्स्महि । १ भास्येनेन।२-श्रा,-आँन् । ३-अत् । ४ प्-1-- ऐप्सिष्टु । ७ 'बह्वीभिर' अधिक है। ८ऽभूत-1१० मेषन्त- (१४२) तथा नोऽनुशाधि यथा स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुमनायाऽनातास्स्वस्ति संवत्सरस्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमियामेति ॥७॥ तान् होवाच को वस्स्थविरतम इति ॥॥४॥१४॥ अष्टमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । अहमिसगस्त्यः ॥२॥ स वा एहीति होवाच तस्मै बैतेऽहं तद्वक्ष्यामि यद्विद्वाँसस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुमनायाऽनार्तास्स्वस्ति संवत्सरस्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमेष्यथेति ॥२॥ तस्मा एतं गायत्रस्योद्गीथमुपनिषदमपृतमुवाचाऽग्नौ वायावादित्ये प्राणेऽन्ने वाचि ॥३॥ ततो वै ते स्वगस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनार्ता- स्स्वस्ति संवत्सरस्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमायन् ॥४॥ एवमेवैवं विद्वान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनार्तस्स्वस्ति संवत्सर- स्योहचं गत्वा स्वर्गलोकमेति ॥॥॥४॥१५॥ अष्टमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । अष्टमोऽनुवाकस्समाप्तः ।। १ एवं वा एतं गायत्रस्योद्गीथमुपनिषदममृतमिन्द्रोऽगस्त्यायो- वाचा गस्त्य इषाय श्यावाश्वय इषश्श्यावाग्विौषूक्तये गौषूक्ति- ६ 'अहमित्य' (!) अधिक है। १ नास्ति । २-शामि । ३ 'द्वारमवैवं' अधिक है । ४ वाय् ॥ १-गीतू-१२-पावो।
( १४३ ) ४ ५ ૨ ज्वालायनाय ज्वालायनश्शाट्यायनये शाळ्यायनी रामाय कातु. जातेयायवैयाघ्रपद्याय रामः कातुजातेयोवैयाघ्रपद्यः-॥२॥१६॥ नवमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । --शङ्खाय बाभ्रव्याय शङ्खो बाभ्रव्यो दक्षाय कात्यायनय आत्रेयाय दक्षः कात्यायनिरायः कँसाय वारक्याय कसो वार- क्यस्सुयज्ञाय शाण्डिल्याय सुयज्ञश्शाण्डिल्योऽग्निदत्ताय शाण्डि- ल्यायाऽग्निदशाण्डिल्यस्मुयज्ञाय शाण्डिल्याय मुयज्ञशाण्डि- ल्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुतो वारक्यासुदत्ताय पाराशर्याय ॥१॥ सैषा शाब्यायनी गायत्रस्योपनिषदेवमुपासितव्या ॥२॥४॥१७॥ नवमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । नवमोऽनुवाकस्समाप्तः ।। ३ केनेषितम्पतति प्रेषितम्मनः केन प्राणः प्रथमः प्रति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चतुश्श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ श्रोत्रस्य श्रोत्रम्मनसो मनो यद् वाचो हवाचं स उ प्राणस्य प्राणः । चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेसाऽस्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥२॥ ३ ब्वा-४-माये । ५ वाय्या-॥ १-प्राय । २- ३-श्रो, और । जनश्रुताय बारक्याय जनश्रुते (!) वारक्यसू' अधिक है। ४-भो।
( १४४ ) १ ३ ४ न तत्र चतुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः । न विझ न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥३॥ अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तव्याचचक्षिरे ॥४॥ यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५॥ यन्मनसा न मनुते येनाऽऽहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥६॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चचूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥७॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥८॥ यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥६॥॥१८॥ दशमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। यदि मन्यसे सुवेदेति दहमेवाऽपि नूनं त्वं वेस्थ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेषु । अथ नु मीमांस्यमेव ते मन्येऽविदितम् ॥ १॥ १ विदु । २-अ । ३ वै अधिक है । ४-शिष्- ५-श्रू- ६ मन्यो । ७ मतेम् । ८ नश् । ६ उत्तानुक्त है। १०-णीति ॥
(१४५ ) नाऽहम्मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद् वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥ यस्याऽमतं तस्य मतम्मतं यस्य न वेदं सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥३॥ ६ २ प्रतिबोधविदितम्मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्य विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥ इह चेदवेदीदथ ससमस्ति । न चेदिहाऽवेदीन्महतीविनष्टिः । भूतेषु-भूतेषु विविध्यधीराः प्रेसाऽस्माल्लोकादमृता भवन्ति॥५॥४।१६ दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः।। ब्रह्म हदेवेभ्यो विजिग्ये। तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्ताऽस्माकमेवाऽयं विजयः। अस्माकमेवाऽयं महिमेति ॥२॥ तटैषां विजज्ञौ । तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति ॥२॥ तेऽग्निम वातवेद एतद् विजानीहि किमेतद १ यक्षमिति । तथेति ॥३॥ तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । ३ अग्निर्वा अहमस्मीसब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥४॥ तस्मि- १ अम्-१२-वित्- १-प्रत । २-म् । ३ऽहम् ।
३ ( १४६ ) स्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वं दहेयम् यदिदम्पृथिव्यामिति ॥॥ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन। तन्न शशाकदग्धुम्। स तत एव निववृते नैनदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥६॥ अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति॥७॥ तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीयब्रवी- न्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥८॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वमाददीय यदिदम्पृथिव्यामिति ॥६॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्खेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाका- दातुम्।सतत एव निववृते नैनदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति॥१०॥ अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति। तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोऽदधे ॥१२॥ स तस्मिन्नेवाऽऽकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीम् । तां होवाच किमेतद यक्षमिति ॥१२॥४॥२०॥ दशमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद् विजये महीयध्व इति । ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ॥१॥ तस्माद्वा एते देवा अतितरामि- ४-म् । ५ निवत । ६ म (1)।
( १४७ ) ६ वान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रः । ते खेननेदिष्ठम्पस्पृशुस्स नित् प्रथमो विदांचकार ब्रह्मति ॥२॥ तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवा- ऽन्यान् देवान् । स झेननेदिष्ठम्पस्पर्श स होनत् प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥३॥ तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यत्रुतदा३ इति । न्यमिषदा३ । इसधिदेवतम् ॥४॥ अथाऽध्यात्मम् । यदेनद् गच्छतीव च मनोऽनेन चैनदुपस्मरसभीक्ष्णं संकल्पः ॥२॥ तद्ध तद्वनं नाम । तद्वनमित्युपासितव्यम् । स य एतदेवं वेदाऽभिहैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥६॥ उपनिषदम्भो बहीति । उक्ता त उपनिषत् । ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥७॥ तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदास्सर्वाङ्गाणि ससमायतनम् ॥८॥ यो वा एतामेवं वेदाऽपहस पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोकेऽज्येये प्रतितिष्ठति ॥६॥४॥२१॥ दशमेऽनुवाके चतुर्थःखण्डः । दशमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ Manusareesmaste १ नेदिष्मा,नेदिषुम् । २ ते । ३ अन् । ४ विद्यु। ५ इती३।६ मीः । ७ सुक् । ८ सम्वक्षन्ति । ओ।१०-ए॥
( १४८ ) १ आशा वा इदमग्र आसीद्भविष्यदेव । तदभवत् । ता आपो- ऽभवन् ॥१॥ तास्तपोऽतप्यन्त । तास्तपस्तेपाना हुस्सिसेव प्राची: प्राश्वसन् । स वाव प्राणोऽभवत् ॥२॥ ताः प्राण्याऽपानन् । स ३ वा अपानोऽभवत् ॥३॥ ता अपान्य व्यानन् । स वाव व्यानो- ऽभवत् ॥४॥ ता व्यान्य समानन् । स पाच समानोऽभवत् ॥१॥ तास्समान्योदानन् । स वा उदानोऽभवत् ॥६॥ तदिदमेकमेव सधमाद्यमासीदविविक्तम् ॥७॥ स नामरूपमकुरुत । तेनैनव्य- विनम् । वि ह पाप्मनो विच्यते य एवं वेद ॥८॥ तदसौ वा आदिवः प्राणोऽग्निरपान आपो च्यानो दिशस्लमानश्चन्द्रमा उदानः ॥६॥ तद्वा एतदेकमभवत्पात एव । स य एवमेतदेकम्भ- वद्वेदैवं हैतदेकधा भक्तीखेकधैव श्रेष्ठस्खानाम्भवति ॥१०॥ तदग्नि प्राणो वागिति पृथिवी वायु प्राणो वागित्यन्तरिक्षमा- दित्यो वै प्राणो वागिति चौदिशो वै पालो वागिति श्रोत्रं चन्द्रमा वै प्राणो वागिति मनः पुमान्दै प्राणो वागिति स्त्री॥११॥ तस्येदं सृष्टं शिथिलम्भुवनमासीदपर्याप्तम् ॥१२॥ स मनोरूपमकुरुत । १ १'आशा वा' का पुनः पाठ है । २ येद् । ३ अपान । ४ -१५-मादम् । -रैपम् । ७-विनोत् । ८-इम् । ६ उपा-१० खे-॥
( १४६ ) तेन तत्पर्याप्नोत् । दृढं ह वा अस्येदं सृष्टमशिथिलम्भुवनम्पर्या- सम्भवति य एवं वेद ॥१३॥४॥२२॥ एकादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १ २ सैषा चतुर्धा विहिता श्रीरुद्गीथस्सामाक्य ज्येष्ठब्राह्मणम् ॥१॥ प्राणो वावोद्वाग्गी स उद्गीथः ॥२॥ प्राणो वावामो वाक् सा तत्साम ॥३॥ प्राणो वाव को वाक् तदर्यम् ॥४॥ प्राणो वाव ज्येष्ठो वाग्ब्राह्मणं तज्ज्येष्ठब्राह्मणम् ॥॥ उपनिषदम्भो जूहीति । उक्ता त उपनिषद्यस्य ते धातव उक्ताः। त्रिधातु विषु वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ६ ॥ एतच्कुलं कृष्णं तानं सामवर्ण इति ह स्माह यदैव शुक्लकृष्णे ताम्रो वर्णोऽभ्यवैति स वै ते वृते दशम मानुषमिति त्रिधातु । स ऐनत क न म उत्तानाय शयानायेमा देवता बलि हरेयुरिति ॥४॥२३॥ एकादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः ॥ स पुरुषमेव प्रपदनायाऽत्रणीत ॥२॥ तम्पुरस्तात्प्रयञ्चम्पा- ६० १ ऽसाश् । २ विहीता । ३ अगीः, गीः । ४।५-अः। -पद् । ७-दा।८। -त। १० दश्श्; श् के पूर्व एक अक्षर पढ़ा नहीं जाता, कदाचित् कटा है। ११ उक्तानाय ॥
( १५० ) विशत् । तस्मा उरुरभवत् । तदुरस उरस्त्वम् ॥२॥ तस्मा अत्रसद एता देवता बलिं हरन्ति ॥३॥ वाचमनुहरन्तीमग्निरस्मै बलिं हरति ॥४॥ मनोऽनुहरचन्द्रमा अस्मै बलि हरति ॥॥ चतुरनु- हरदादियोऽस्मै बलिं हरति ॥६॥ श्रोत्रमनुहरादशोऽस्मै बलि हरन्ति ॥७॥ प्राणमनुहरन्तं वायुरस्मै बलिं हरति ॥८॥ तस्यैते निष्खाताः पन्था बलिवाहना इमे प्राणाः । एवं हैतं निष्खाता: पन्था बलिवाहनास्सर्वतोऽपियन्ति माणा य एवं वेद ॥६॥ सा हैषा ब्रह्मासन्दीमारूढा । आ हास्मै ब्रह्मासन्दी हरन्सधि ह ब्रह्मासन्दी रोहति य एवं वेद ॥१०॥ तदेतद् ब्रह्मयशश श्रिया परिदृढम् । ब्रह्म हतु सन् यशसा श्रिया परिढो भवति य एवं वेद ॥११॥ तस्यैष श्रादेशो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्नन्तः । तस्य यच्छुलं तदृचां रूपं यत्कृष्णं तत्सान्नां यदेव ताम्रमिव बभ्रुरिव तयजुषाम् ॥१२॥ य एवायं चक्षुषि पुरुष एष इन्द्र एष प्रजा- पतिस्समः पृथिव्या सम आकाशेन समो दिवा समस्सर्वेण भूतेन । एष परो दिवो दीप्यते । एष एवेदं सर्वमित्युपासि- ६ । तव्यम् ॥१४॥२४॥ एकादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । १ अदिश्रा।३बलिं वा ४ऽपय्।५हर ति।६-श।७मा।८-ऊर्॥
सच्चाऽसच्चाऽसच सच वाक् च मनश्च [ मनश्च] वाक् च १ चतुश्च श्रोत्रं च श्रोत्रं च चतुश्च श्रद्धा च तपश्च तपश्च श्रद्धा च तानि षोडश ॥२॥षोडशकलम्ब्रह्म। स य एवमेतत् षोडशकलम्ब्रह्म वेद तमेवैतत् षोडशकलम्ब्रह्माऽप्यति ॥२॥ वेदो ब्रह्म तस्य ससमायतनं शमः प्रतिष्ठा दमश्च ॥३॥ तद्यथा श्व: प्रैष्यन् पापात्कर्मणो जुगुप्सेतैवमेवाऽहरहः पापात्कर्मणो जुगुप्सेताऽऽ कालात् ॥४॥ अथैषां दशपदी विराट् ॥॥ दश पुरुषे स्वर्ग- नरकाणि । तान्येनं स्वर्ग गतानि स्वर्ग गमयन्ति नरकं गतानि नरकं गमयन्ति ॥६।४।२।। एकादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। मनो नरको वाङ् नरकः प्राणो नरकश्च चतुर्नरकश्श्रोत्रं नरकस्त्वङ्नरको हस्तौ नरको गुदं नरकशिश्नं नरकः पादौ नरकः ॥१॥ मनसा परीक्ष्याणि वेदति वेद ॥२॥ वाचा रसान्वेदेति वेद ॥३॥ प्राणेन गन्धान्वेदेति वेद ॥४॥ चतुषा रूपाणि वेदेति वेद ॥॥ श्रोत्रेण शब्दान्वेदेति वेद ॥६॥ त्वचा संस्पर्शान्वे- देति वेद ॥७॥ हस्ताभ्यां कर्माणि वेदेति वेद ॥८॥ उदरेणा- १--अश्॥
( १५२ ) ऽशनयां वेदेति वेद ॥६॥ शिश्नेन रामान्वेदेति वेद ॥१०॥ पादाभ्यामध्वनो वेदेति वेद ॥१॥ प्लक्षस्य प्रास्त्रवणस्य प्रादेशमात्रादुदक् तत्पृथिव्यै मध्यम् । अथ यत्रैते सप्तर्षयस्तदिवो मध्यम् ॥१२॥ अथ यत्रैत ऊषास्तत्पृथिव्यै हृदयम् । अथ यदे- तत्कृष्णं चन्द्रमासे तदिवो हृदयम् ॥१३॥ स य एवमेते द्यावा- पृथिव्योर्मध्ये च हृदये च वेद नाऽकामोऽस्माल्लोकाप्रति ॥१४॥ नमोऽतिसामायैऽतुरेताय धृतराष्ट्राय पाथुश्रवसाय ये च प्राणं रक्षन्ति ते मा रक्षन्तु । स्वस्ति । कर्मेति गाईपसरशम इसाह- वनीयोदम इसन्वाहार्यपचनः ॥१।४।२६॥ एकादशेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । एकादशोऽनुवाकस्समाप्तः । २ ३ ६ ७ कस्सविता । का सावित्री । अग्निरेव सविता । पृथिवी सावित्री ॥२॥ स यत्राऽग्निस्तत्पृथिवी यत्र वा पृथिवी तदग्निः। ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥२॥ कस्सविता । का सावित्री । वरुण एव सविता । आपस्सावित्री ॥३॥ स यत्र वरुणस्तदापो यत्र वाऽऽपस्तद्वरुणः । ते द्वेयोनी। [ तदेकम्मिथुनम् ] ॥४॥ २-वद् । ३-कोमो | ४-सामय-सामाय । (पार्जुश्र्-से ठीक किया हुआ है । ७-मम् ॥
( १५३ ) ३ कस्सविता । का सावित्री । वायुरेव सविता । आकाशस्सावित्री ॥।॥ स यत्र बायुस्तदाकाशो यत्र बाऽऽकाशस्तद्वायुः । ते दे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥६॥ कस्सविता। का सावित्री। यक्ष पुष सविता । छन्दांसि सावित्री ॥७॥ स यत्र यज्ञस्तच्छन्दांसि पत्र मा छन्दांसि तद्यज्ञः। ते २ योनी योनी । तदेकम्पिथुनम् ॥८॥ कस्सविता। का सावित्री सनायित्नुरेव सविता । दिद्युत् सावित्री ।। स यत्र स्तनयिलुस्तद्विद्युद्यत्र वा विद्युत् तत्स्तनायित्नुः। ते हे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१०॥ कस्सविता । का सावित्री । शादिख एव सविता। गैस्सावित्री॥११॥ स यत्राऽऽदिखस्तद्यौर्यत्र या द्यौस्तदादिसः। ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१२॥ कस्सविताका सावित्री चन्द्र एव सविता । नक्षत्राणि सावित्री ॥१३॥ स यत्र चन्द्रस्त नक्षत्राणि यत्र वा नक्षत्राणि तञ्चन्द्रः । से द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१४॥ कस्सविता । का सावित्री। मन एव सविता । यार सावित्री ॥१॥ स यत्र मनस्तद्वाग्यत्र [वा] वाक् तन्मनः । ते द्वे योनी। तदेकम्मिथुनम् ॥१६॥ कस्स- बिता । का सावित्री । पुरुष [एव] सविता । स्त्री सावित्री। स पत्र पुरुषस्तत् स्त्री यत्र वा स्त्री तत्पुरुषः। ते द्वे योनी। तदेकम्मि- थुनम् ॥१७॥२७॥ द्वादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १५-२६क्षेप किया गया है । ३-उन् । ४-ई: (!)
no ( १५४ ) तस्या एष प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेण्यमिति । अग्नि वरेण्यम् । आपो वै वरेण्यम् । चन्द्रमा वै वरेण्यम् ॥१॥ तस्या एष द्वितीयः पादो भर्गमयो भुवो भर्गो देवस्य धीमहीति । अग्नि भर्गः।आदियो वै भर्गः । चन्द्रमा वै भगः॥२॥ तस्या एष तृतीयः पादस्स्वर्धियो यो नः प्रचोदयादति । यज्ञो वै प्रचोदयति । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयतः॥३॥ भूर्भुवस्तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहीति । अग्निई भर्गः । आदियो वै भगः । चन्द्रमा वै भर्गः ॥४॥ स्वर्षियो यो नः प्रचोदयादिति । यज्ञो वै प्रचोदयति । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयतः ॥५॥ भूर्भुवस्स्वस्तव सवितुर्वरेण्यम्भगों देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादित । यो वा एतां सावित्री- मेवं वेदाऽप पुनर्मुत्युं तरति सावित्र्या एव सलोकतां जयति सावित्र्या एव सलोकतां जयति ॥४॥२८॥ द्वादशेऽनुपाके द्वितीयः खण्डः । द्वादशोऽनुवाकस्समाप्तः । इत्युपनिषद्ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ १-स। २'यज्ञो वै प्रचोदयात । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयत' प्राधिक करो॥
१-ऋषि-नामों की सूची। 4. से वंश का अभिप्राय है। अगस्त्य, ४१श॥१६॥ वं. अतिसाम एतुरेत, ४॥२६॥१५॥ अनुवक्ता सात्यकीर्त, राशा अभयद् प्रासमात्य, ४७॥ प्रमिप्रतारी, ३।१२।२।२,३,१३॥ अभिप्रतारी काक्षसेनि ११५६१॥३॥२१॥ प्रयास्य, श८७,८॥२८॥ अयास्य आङ्गिरस, २७१२,६॥८॥३॥ अषाढ उत्तर पाराशर्य ३।४।२॥ वं. प्राङ्गिरस, शशा देखो श्रयास्य भ्रांक। प्राजकेशी, १३॥ प्राजद्विश, देखो बम्ब प्रा०। पाटणार, देखो पार । पालेय, देखो दक्ष कात्यायनि धार, शङ्ग शाट्यायनि मा। भारुणि, १४२२१॥ आरुणेय, शश॥ प्राकिायण, देखो गळूनस प्रा। पाल्लफेय, देखो हृत्स्वाशय प्रा० पासमात्य, देखो अभयद धा। इन्द्रोत देवाप शौनक, ३।४०॥१॥ धे। इष श्यावाश्वि, ४१६॥ वं उश्नवस कौपयेय, ३।२९।१,२,३॥
(२) उधर, देखो आषाढ उ० पाराशर्ष। उमा हैमवती, ४।२०।१२॥ अनुक्य (?) जानश्नुतेय, १शक्षा३॥ शानः काव्य, श२,६॥ ऋष्यश्टङ्ग काश्यप, ३।४।। तुरेत (?), देखो प्रतिसाम ए.। ऐश्वाक, देखो भगेरथ ऐ०। हेदवाक वार्णा, शश ऐतरेय, देखो महिदास । इन्द्रोति, देखो रति ऐ. शौनक कंस वारकी, ३४॥२॥ च। कस वारल्य, ३२४१॥१॥ वं० १४११६॥ कक्षीधन्त, २१॥ कश्यप,४॥३१॥ काक्षसेनि, देखो अभिप्रजारी का । कागवेय, ३३१०१२॥ देखो जनश्रुत का। नगरी जानश्रुतेय का। सायक जानश्रुतेय का०1 कात्यायनि, देखो दक्ष का श्रात्रेय । कापेय, ३२,१२॥ देखो शौनक का। कारीरादि,२४॥ काव्य, देखो उशनः का। काश्यप, ३१४०१२॥ वं० देखो मृष्यङ्ग काग देवतरः श्यावलाचन कानुष वाढेष का। कुबेर धारक्य, ३।४११॥६०। कुरु, (एकव०) ११५६।१(बहुव०)१॥३८॥१॥ देखो कौरव । कुरुपश्चालाः, ३७॥७॥३०६,साडादा॥२॥ कृष्णदत्त लौहित्य, ३।४।१॥ ० । देखो त्रिवेद' का लौहित्य ।
३ कृष्णधृति सात्यकि, ३४२११॥ वं०। कृष्णरात लौहित्य, ३।४।१॥ २० । देखो त्रिवेद कं० लौहत्य । केशी दाh, ३।२।१,२॥ कोपयेय, देखो उच्चैश्श्रवः । कातुजातेय, देखो राम का वैयाघ्रपद्य । मि, देखो सुदक्षिण है। गालूनस पाकिायमा, ११३पा॥ गन्धर्वाप्सरसः,१४१२॥४।१०,१२॥३॥२१॥ गुप्त, देखो वैपश्चित दादजयन्ति गु० लौहित्य । गोबल वार्ण, १शहा॥ गोश्रु (जाबाल), ३।७॥ गौतम (मारुणि) १।४।१॥ गौषुक्ति, ४१६१॥ व०। कितानेय, १३७७॥२२॥२॥ (बहुव०) ११४१३१॥ देखो ब्रह्मदत्त चै० । वासिष्ठ चैः। चैलरथि, देखो सत्याधिवाक चै०। जनश्रुत काण्डविय, ३२४०१२॥०। जनश्रुत वारक्य, ३.४११॥ ५० ॥४॥११॥ ०। जमदग्नि, ३३१११॥४॥३॥ भयक लौहित्य, ३१४२॥२॥ जयन्त, देखो यशस्वी ज० लौहित्य । जयन्त पाराशर्य, ३१४१।१॥ बं० । जयन्त वारक्य,३७११॥ ३०। (इस नाम के दो व्यक्ति)१७॥ जानश्रुत, देखो नगरी जा० काण्ड्विय । मानश्रुतेय, देखो उलुक्य जा० । सायक जा काराड्विय। आबाल, ६॥ (द्विव०) ३।७।२,३,५,७,८॥ देखो गोश्च शुक्र ।
जैबलि, १३८४॥ ज्वालायन, ४१६॥०। सदस्यु,२।२१॥ त्रिवेद कृष्णरात लौहित्य, ३२४२२१॥२०॥ दक्ष कात्यायनि पालेय, ३२४११०५०। दक्षजयन्त लौहित्य, ३४२१३॥०॥ दाढजयन्ति, देखो वैपश्चित दार गुप्त लौहित्य, वैपश्चित दा. दृढजयन्त लोहित्य। दाय, देखो केशी दा। दाल्भ्य (ब्रह्मदत्त चैकित्तानेय), १३८॥५६॥३॥ दाल्म्य, देखो बन दा। दृढजयन्त, देखो विपश्चित दा. लौहित्य, वैपश्चिट दाजयन्न ह. लौहित्य। हति ऐन्द्रोति शौनक, ३।४०२॥ ॥ देवतरसू श्यावसायन काश्यप, ३१४००। देवाप, देखो इन्द्रोत दै० शौनक । वृतराष्ट्र, ४॥२६॥१५॥ नगरी जानश्रुतेय काण्ड्वेय, २०१॥ येक। नाक, ३.१३॥ पतङ्ग प्राजापत्य, ३०॥३॥ परमेष्ठी प्राजापत्य, ३.४०२॥ वा पल्लिगुप्त लौहित्य, ३१४२११॥ पाराशर्य, देखो अषाढ उत्तर पा० । जयन्त पावैपश्चित शकुनि- मित्र पा! सुदत्त पा०। पाथुश्रवस , १२६॥१५॥ पार्ण शैलन, शाम ७ पृथु वैन्य, ( ५ ) पुलुप प्राचीनयोग्य, ३१४२॥ ० ११०१॥३४॥६॥४५॥१॥ पौलुषि, देखो सत्ययज्ञ पौ० प्राचीनयोग्य पौलुषित, देखो सत्ययज्ञ पौ० । प्रतीदर्श, ४८॥ प्राचीनयोग्य, १३६१॥ देखो पुलुष प्रा०। सत्ययज्ञ पौलुषि प्रा० । सोमशुष्म सात्यय शिप्रा०॥ प्राचीनशाल (बहुव०), ३.१०॥६॥ प्राचीनशाल, ३१७:२,३,५,७॥१०॥१॥ प्राजापत्य, देखो परमेष्ठी प्रा। प्रातूद भान३३१४॥ प्रानरण, देखो प्लक्ष प्रा। प्रोष्ठपाद वारक्य, ४२॥ वं। लक्ष प्रास्त्रत्रण, ४॥२६॥१२॥ बक दाल्भ्य शस३॥४:७१२॥ बम्ब आजद्विष, २७२,६॥ बाभ्रव्य, देखो शङ्ख बाः । ब्रह्मदत्त चैकितानेय, शा॥५६॥१॥ भगेरथ ऐदवाक, ४६१,२॥ भाल, देखो प्रातृद भा। भाल्लबिन (वहुव०), २४/७॥ मनु, ३॥१५॥२॥ महिदास ऐतरेय, ४२११॥ मातरिश्चन, २०१८॥ मानव, देखो शर्यातमा मित्रभूति जोहित्य, ३।४।१॥ प.
. , मुख सामभ्रवस, दम यशस्वी जयन्त लौहित्य, ३१४२॥१॥५ राम कातुजातेय वैयाघ्रपद्य, ३।४०१२॥ २० ॥ ४.१६॥१॥ वंग रोहिण, ११२६७,१०॥ लौहित्य, देखो कृष्णादत्त लौ०, कृष्णारात लौ०, जयक लो०, निवेद कृष्णरात लौर, दक्ष जयन्त लौर, पल्लिप्त लौ, मित्रभूति लौ०, यशस्वी जयन्त लौ, विपश्चित दृढजयन्त लौ०, वैपश्चित दाढजयन्ति गुश लौ०, वैपश्चित दादजयन्ति हदजयन्त लौ०, श्यामजयन्त लौ०, श्यामसुजयन्त बौर, सत्यश्रवसूखौ। बसिष्ठ, ३।२११३॥॥१०॥१८॥६,७ तुल बासित। बारकि, देखो कंस वा। बारक्य, देखो कंस वार, कुबेर वा०, जनश्रुत वा०, जयन्त बा०, प्रोष्ठपाद बा। वाण, देखो ऐक्ष्वाक वा०, गोबल वा ! वासिष्ठ चैकितानेय, श४२॥६॥ वाह्नेय, देखो श्रुष वा० काश्यप। विपश्चित् दृढजयन्त लौहित्य, ३१४२॥१॥ विपश्चित् शकुनिमित्र पाराशर्य, ३२४१॥ वं० । विश्वामित्र, ३।२७॥१॥१॥ (बहुव०) ३३१५१॥ तुल० वैश्वामित्र । वैकुण्ठ (इन्द्र), ४२१॥१०॥१०॥ बैन्य, २४२॥ देखो पृथु वैः । पश्चित दाढजयन्ति गुप्त लौहित्य, ३॥४२॥१॥५०॥ बैपश्चित दाढजयन्ति दृढजन्त लौहित्य, २४॥ बं०। मृध (इन्द्र),४।१०।१०॥ चैयाघ्रपद्य, देखो राम कातुजातेय धै।
. (७) शकुनिमित्र, देखो विपश्चित् श० पाराशर्य। शङ्कबाभ्रव्य, ३।४।१॥ वं०।४।१७॥ व०। शङ्ग शाट्यायनि आत्रेय, ३।४०१॥ वं० । शर्व, ४।१०।१०॥ शर्यात मानत्र, १७॥८३,५॥ शाध्यायनि, शहा॥३०॥१॥रारा॥४३॥१०॥३॥१३॥६॥रा॥ ४।१६।१॥ ० । १७१॥ वं०। देखो शङ्ग शा० आत्रेय। शाण्डिल्य, देखो सुयज्ञ शा। शालावत्य, ११३८॥४॥ शुक (जावाल), ३७७॥ शैलन (बहुव०),२२॥३॥४६॥ देखो पार्ण श०, सुचित्त शै। शौनक, ११५८२॥ देखो इन्द्रोत द्वैवाप शौ०, इति एन्द्रोति शौ। शौनक कापेय, ३॥१॥२१॥ श्यामजयन्त लौहित्य (इस नाम के दो व्यक्ति), ३४२॥१॥६० श्यामसुजयन्त लौहित्य, ३।४२॥१॥ वं० । श्यावसायन, देखी देवतरसू श्या० काश्यप । श्यावाश्वि, देखो इश श्या। श्रुष वाह्नेय काश्यप, २४०।१॥4॥ श्वाजनि (एक वैश्य), ३।५।२॥ सत्ययज्ञ पौलुषित, १३१॥ सत्ययज्ञ पौलुषि प्राचीनयोग्य, ३२४०१॥ ५०। सत्यश्रवसू लौहित्य, ३।४।२॥ वं सत्याधिवाक चैत्ररथि, १३८१ सात्यकि, देखो कृष्णधृति सा। सात्यकीर्त (बहुव०), ३।३।१॥ देखो अनुवक्ता सा० । सात्ययहि (बहुव०), २४॥५॥ देखो सोमशुष्म सा० प्राचीनयोग्य ।
( ८) सामश्रवस, देखो मुञ्ज सा। सायक जानश्रुतेय कापड्विय, ३.४०॥२॥ वं० । सुचित्त शैलन, १॥१४॥४॥ सुदक्षिण, ३७.८॥ (देखो सुदक्षिण मि) सुदक्षिण मि, ३६॥३॥७॥१,४.५.६॥ (देखो सुदक्षिण)। सुदत्त पाराशर्य, ३१४११६॥ वं०४।१७।१॥ वं० । सुयज्ञ शाण्डिल्य, ४।१७।१॥ सोमबृहस्पति (द्विव०), ११५८॥ सोमशुष्म सात्ययज्ञि प्राचीनयोग्य, ३॥४०॥२॥ वं। हृत्स्वाशय पाल्लकेय, ३।४।२॥ वं हैमवती, देखो उमा है। २-निर्वचनादि सूची। अक्षर, २२४१॥४३।८।१।२४॥२॥ | देवश्रुतू , १२१४॥३॥ ४३॥८॥ पतङ्ग, ३३५॥२॥ अन्तरिक्ष, श२०१४॥ पश्यत,१५६६ प्रयास्य, शा॥१४॥ प्रतिहार, १११११२॥ अयं, ४॥२३॥४॥ प्रसाम, प्रसामि, ११शा॥ असु, ११४०७॥ प्रस्ताव, १११॥६॥ असुर,३३५३॥ बृहस्पति, २२॥ प्राङ्गिरस, २२११॥ भीमल, १६५७१॥ आदि, २११।७॥१६॥२॥ मधुपुत्र, ११५॥ आदित्य, ४ारा॥ महीया, श४८॥ प्रावर्त्त, ३३३३।७॥ रुद्र,४ाशा उरसू,४२४॥२॥ रोदसी, १३२॥४॥ वसु,४।२।३॥ ऋच, १९५६॥ गायत्र, ३।३८४॥ वैश्वामित्र, ३३॥
पतङ्गमक्तम, ३१३५१॥ ऋ० १०iall शतसनि, ११५०॥४॥ सजात, १॥४८॥३॥ समुद्र, ११२५॥४॥ सामन्, १२३३१७॥४०॥६॥७॥२॥४॥१३॥२॥१॥१२॥५॥१॥५३॥५॥ ५६२॥२३॥३॥ सिन्धु, १॥२२॥ सुवर्ग, ३।१४।४॥ हरि, २४४ा॥ ३-(क) ऋचादिसूची। अदितिौरदितिः, १॥४१॥४॥ ऋ० ८॥१०॥ अपश्यं गोपामनिपद्यमानाम, ३१३७॥१॥ ऋ०१।११४॥३१॥ प्रात्मा देवानामुत मानाम, ३२॥ तु छा० उ० ४॥३॥७॥ प्रायुर्माता मतिः पिता, ४११७॥ इन्द्रमुक्थमृचम्, १४०॥ इमामेषाम्पृथिवीम, १३४॥७॥ अथ०१०॥३६॥ उतैषां ज्येष्ठः, ३।१०।१२॥ अथ०१०ादा२८॥ उपाऽस्मै गायत, ३२३८६,८॥ ऋ० ११॥१॥ ऋषय एते मन्त्रकृतः, १४॥२॥ परिमिता, २७॥३॥४०॥२॥ ऋ० १६४॥४५॥ सत्सवितुर्वरेण्यम, ४॥२८॥१॥ ऋ० ३१२१०॥ घ्यायुषं कश्यपस्य, ४॥३॥१॥ तुल०, ०२८७॥ नघो नवो भवसि, ३।२७।११॥ तुल०, ऋ० १०१८४.१६॥ पतङ्गो वाचम्मनसा, ॥३६॥२॥ ०१०११७७२।। मयीदं मन्ये भुवनादि, ३२१७६॥ महात्मनश्चतुरो देवः, २२२॥ तुल छो० उ०४।३।६॥ चत्वारि वाक्
( १७ )
यद्यावा इन्द्र ते शतम्, २३२॥ ऋ० ८1०५॥
यस्सप्तरश्मिवृषभः, १।२७॥ २॥१२॥१२॥
येऽग्नयः पुरीष्याः, ४।३।३॥ य० १८६७॥
येभिर्वात इषितः, २३४॥ अथ० १०८।३॥
रूप-रूपम्प्रतिरूपः, ११४४।१॥ ० ६४७३१८॥
रूप-रूपम्मघवा, रा४४६॥ ऋ० ३५३८॥
स नो मयोभूः,४।३२॥
स यदा वै म्रियते, १४॥
स्त्री स्मैवाऽने, श५६॥५॥
स्थूणां दिवस्तम्भनीम, १।१०।८।।
(ख)
अभिजिदस्यभिजय्यासम्, ३।२०।१०॥
अमोऽहमस्मि, (दीर्घपाठ), ११५४६॥ (संक्षिप्त), ५७॥
परण्यस्य वत्सोऽसि ॥१॥
उपावतध्वम्, ३३११॥३४॥२॥
गुहासि देवोऽसि, ३६२०११॥
दिशस्था श्रोत्रम्, श२२।६
देवेन संवित्रा, ३।१८.३,६॥
पुरुषः प्रजापतिः, श४६॥३,४॥
प्राणा३ प्राणा३ प्राणा३,२२७॥
महान्मह्या समधत्त, ३४ाशा
यत्पुरस्ताद्वासीन्द्रः, ३।२११॥
विभूः पुरस्तात्सम्पत, ३२७॥१॥
व्युषि सविता भवसि, ४।५।१॥
श्वेताश्वो दर्शतो, श१॥
सत्यस्य पन्था, २२७॥१०॥
सोमः पवते, शा॥३४॥२॥