Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Rupay Ki Kahani
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रुपए की कहानी
लेखक
घनापामदास दिला
पारसनाय सिंह
१९४६
मस्ता माहित्य मण्डल
नई विस्ता
प्रकाशक
मातण्ड उपाध्याय, मत्री
सस्ता साहित्य मण्डल नई दिल्ली।
दूमरी बार १९४६
मूल्य
तीन रुपए
मुद्रक
प्रमरचा
राजहस प्रस, दिल्ली।
समर्पण
काई तान माल की बात है गाचीजी न मुझ कहा गहनी में हुडी
और चलण पर एक एमी मरन पुस्तक लिषो जा हर काई मामानी स
ममम सके। उमा माना का फल यह पुस्तक है।
सारी कहानी ना हिस्सा में मुनाई गई है। अब लिमना गुरु क्यिा
था तब ता साचा पा कि पूर्व भाग मोमासा का होगा और उत्तर माग
रुपए की हुडी का इतिहास हागा,मोर मारा-का-मारा स्वय म ही लिखूगा।
पर मामामा am समाप्त करते-करत जव इतिहाम माग के लिए मसाला
इकटठा करन लगा तव स्मरण पाया कि परेशन माफ इडियन चेम्बस
मा कामस एण्ड इडस्टो" क नत्वावधान में श्री पारसनाथजी ने कुछ
साल पहले रुपय की हुण्डी का एक अच्छा इतिहास अग्रजी में लिया
या। इसलिए उपयुक्त यही लगा किम थी पारसनापजी स बह दि
इम अथ का इतिहास माग मा वही लिप द मौर उसमें यथासम्भव
पाजत की बाता काममा करदें।
इस तरह भीमामा भाग मन लिया और इतिहास भाग श्री पारस
नामजीन।
जिनकी माता से यह सब कुछ हुमा व ता फाटक के भीता बन
ह, इसलिए छपन क पहले इस गाधीजी को दिखा देना असम्भव पा।
Tह बिना दिमाए ही यह छापामान में जा रहा है ।
गाधानी को आना था कि इस जटिल विषय को सरल मापा म
लिमा जाय। हम दानी ने को ित यही की है पर वहा व सफलता
मिला ह यह ता पाठक ही बता सग।
जिनका माना स मह पुस्तक लिखी गई उन्ही महापुरुष र चरणी
में पह समपित की जाती है।
मार सालि, म० २०००
धनगपापवास मिला
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विषय-सूची पूर्व माग : मीमामा १ सिक्के की आवश्यकता-प्रसा-बदली की व्यवस्था से असुविधा-~~-सिया राजा न क्या चलाया ?--सिक्का सोन चादी का क्यों ? २ नोट क्यों आया क्यों चला?-नोट सलाम--- नोट से हानि--राज-दुराजी में भरपतना ३ फुलावट मोर गिरावर-विस्तार चार संकोच ४ दव्य-परिमाण-मन-दव्य की पगुता ५ बह कुलावट के नतीज-फुलावट का कत्र पर मार- लाम पौर हानि ३२-३७ ६ प्रतीक की कीमत और विगी दाजार- विमें कोमन से बनती ३८-४४ हुही की दर और उद्योग-ध-रगिरन म नाम स्थायी या प्रस्थायो'-फुलावर-नियंत्रित मोर अनिपतित ४५-५० ८ मूचर प्रक चता को रोमन गिरती आई है सकर बचना मसम्भव-सा है १. उधार की फुलावर ११ गिरावट व वाहनीय है 7 १२ दार्मा को साम्यावस्था-नियत्रम ७.७३ उत्तर माग : इतिहास १ अनेक को जगह एक २पारीका परित्याग ६.
६
११२
१७७
१६०
८
३ सोने का ग्रहण
४ आड से शिकार
५ लेन के देन
६ १८ पस का रुपया
७ इतिहास को पुनरावत्ति
मती की मार
६ स्टलिग से गठबंधन
१० गठबपन के बाद
११ ग्जिव बक की स्थापना
१२ माहूकार की समस्या
१३ सिंहावलोकन
परिशिष्ट
२३१
२४४
२५७
२७७
२०६
(पूर्व
भाग)
मीमांसा
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रुपए की कहानी इस पुस्तक के नाम का मुन कर गाय किमी का यह बयाल हा कि यह चानाक मिन की क्या है जिममें पर बनाया गया कि चारी पहर माना में म म निरनी पिर कम गलाई गई कम इमक पान बन फिर टक्साल में कम रुपए टार गए दयादि। बच्चों की चा नवोचिनी में अवसर एमी क्याए पाती ननपर यह इस पुस्तक का विषय नहीं है। इस पुस्तक का मम्बर हपए की गमान म । इसे मुन कर मी गाय का - म पड । कौन ह नादाविप रुपए का करामात मशिटमकी भी बनानी लिन्बी नाय? एमावर कह ना मुक्ता है। पर यह क्यान बनान का घातक हागा।पा की बाहरी नाक्त म लाग चाह अनमिन न हों पर स्पा के पीठ कौन-मी गति है जिमने इम नारन हो इस बार में ग्राम उनता का पान बिलकुल प्रपूर ह । समाहरणाय ग्राम सांग ना या मानत ह किम्पए की कीमत म्बिर ह । जिन्मा का दर बाट घर-दर पर पा का दर नो मुभर की तरह प्रचाह । यह क्यन उतना ही मयह जितना किया कहना कि पध्वी अचर ह । पदी न भूप त्रा' और नारे ही पमत है। यदि पम्वी पूमती ना गत के समय हमारे पाव ऊपर का मार और सर नीचे की पार होना।" का नागन ही एनी नागनी की बात कर सुना हा पर जस पप्वी पूमता द वम पर की गेमन नी घटती और बढी ह। मन १०२६२३ में वह जोर म एक प्रानगरन हमा पा किम्पए की दर १ गिरिंग : म निधारित न गाकर निगि ४ म निधारित हा।म्पा कादर मम्बध में इमी नरह का पानानन मन १९ में भी बहोर गोर साप चप्पEEEरारन १५एसीपर २ रुपए की कहानी २ मिलिंग निर्धारित की थी । प्रजा पक्ष के लोगो का कहना था कि यह दर ऊची ह, १ गिलिंग ४ पस स ऊची दर हगिज निर्धारित नहीं होनी चाहिए, इमम ऊची दर टिक नही मवेगी और ऊंची दरटिकान की कोशिश से देश को हानि ह । हुमा भी प्रत में एसा ही, पर करोडा रुपए खो देन के बाद । इसके पहल भी एक भादोलन १८६३ पौर फिर १८६८ के करीब इमी तरह दर के सम्बध में चला या । यह रूपए की दर का झगडा क्या था? रुपएको दर माग्विर ह क्या कम इसकी निर्धारित *रको टिकाया जाता ह' घटा वढी दर में क्योकर होती है ? घटा बढी से हानि लाभ क्या है ? क्या कोई घटा वढी र लिए जिम्मेदार ह? कौन इसकी व्यवस्था करता ह? ममाज में सिक्के का स्थान क्या ह, मोर प्राचीन सिक्का प्रथा और प्रब की सिक्का प्रया में क्या भद है? इन प्रश्नो के झमेल में गायद कोई पडता ही नहीं । इस प्रश्न को जो समझना चाहत भी ह वे यह मान कर सन्तोप करते ह कि यह प्रश्न अय शास्त्री ही समझ सकत है, यह चीज सवसाधारण के बूते के बाहर की है। फिर भी यह सही ह कि रुपए की क्या जितनी रोचक ह उतनी जटिल नही ह । जटिल थोडी सो ह तो अप गास्त्रिया ने बड़ी बडी पेचीदा शदमाला का प्रयाग करके इसे और भी जटिल बना दिया है । सीधी भाषा में लिखने से यह सम्भव ह कि हम इसे सरल बना दें। पहले पहल तो हम यह जानना चाहिए कि यह रुपया ह क्या ? 'भाई भलो न भैयो सबसे बडो रुपयो -एसा जय कोई कहता ह तब तो रुपए के निश्चित मूल्य को ध्यान में रख कर यह उक्ति नही कही जाती क्यापि रुपए की निश्चित निर्धारित मूल्य और "भयो भाई के बीच यहा तुलना नही है । यहा तो रुपए की धन का साधारण प्रतीक मान कर उसकी महिमा का बसानना ह । और उस महिमा को शास्त्रीय विधि से समझन के लिए हम गहरे पानी में उतरना होगा, रुपए के सब पह लुमा पर विचार करना होगा और उन पहलुमो से क्या हानि लाम ह, समझना होगा। पर मेरा प्रस्ताव ह कि सबस पहुए हम यह समझ लें कि सिरके के
३
रूपए को पानी
चरण की मान क्या है और कम-बम इसका व्यवम्या में प्रगति
T
मिक्के की पापण्यस्ना
एक पल के लिए हम यह कल्पना करें कि एक एमा समाज ह जिसमें
मिका हनी नगा मौर फिर अपन मन में एक एमा ना मजा
हमें यह बताया कि बिना मिक् क उम ममाज का राजमरा की मरीन परात्र
और रन-नन का व्यवहार कम चग्गा । मान लीजिए कि एमे बमिक्के
के ममात्र में एक मनुष्य पाम र अन और कुछ नए वस्त्र भी है।
दूसरा नमका पडामी ह । उमक पाम बुट पाम है नौर बुध भूमा भी है।
एक नीमर पनामी के पाम घी और कुतता भी है।
भव य तीना जामी मुबह उठकर उछ तरवारी और दूर मरी
दन के लिए नितह प्रोर ग्य पोर तराग दवनगता के पास
पहुँचत । दूधवार का एक ने कहा कि मर पान कुछ पा उमे तुम
लो और बर में मुभ दूध र दा । रमी तरह तरबार्ग बचनेदार मे
इमने कहा कि य तरकारी और वा में मुनम कुछ अनला।
पर नरवाग चनबारे सौर दूर वचनवार दाना कान पण चाहिए
न अन्न चाहिए । दमलिए वे या ना पड या अन्न म नग्वारी और दूध
वा बला करन म इन्वार करेंगे, पादूर और नावारी दर में श्वनी
ज्या मिग्र अन्न मोर करने की माॉग हि गाय ये मग्गन बिना दूध
और तरकारी वे रत्ना पम । नताना यता ह कि दिना दृष
और नरवागरही ये मन वापिस घर लौर पातह।
दूमर पडोसी के पास कुछ काम और भूमा ह । दूध वचनवाने का
भूमे की जरूरतह इमनिए मूमे मे दुघरा वाला वग्ने पर ता वह गली
हो जाता है पर सामना नर्ग चामि। "मतिर कपास पहामी
पामयाँ-कोन्या मनचारी वस्नु २ प में पर्ग र जाग।
इमर दार वतीनों पहामी नुछ मनाला मरीन निरनतराममारे
वार को बुधमाजात हा इमलिए प्रयम मापन करा पर
वह दर में उम ममाना दनगर । रमा नर्गवदिइसलिए
४ रुपए की कहानी उपरोक्त मज्जन का अन्न ज्या वा-रया उनके पास रह जाता ह । प्रय पडोसियो के पास कुछ घी ह तेल है क्पास ह और भूसा है । उहें भी मसाला ना ह । पर मसालवाले को न घी की जरूरत ह और न उसे तेल कपास या भूसा चाहिए । इमनिए वह इन चीजा के बदले में ममाला देने से इन्कार कर जाता है। अदला-बदली की व्यवस्था से असुविधा अब प्रथम सज्जन को दूध, तरकारी, मसाला य तीन चीज लनी था। उनम से उहें केवल मसाला मिला। इनके पडासियो को भी तीनो चीजें लेनी थी । उनमें से केवल एक को द्ध मिला । अब य सब लाग इसी खोज म ह कि जो चीजें इनके पास ह उनकी चाह वाला कोई दूध तरकारी और मसालाफराश मिले तो इन लोगो को अपनी इच्छित वस्तुए मिनें। और जब तक परस्पर की इम अटला बदली की चाह वाले मनुष्य नहीं मिलते तब तक इह अपना इष्ट वस्तुपा के विना गुजारा करना पड़ता ह । इन लोगो के पास जो चीज ह उनकी जरूर किसी न किसी को चाह ह । वमे ही जिनके पास दूध तरकारी और मसालाह उ है भी इन चीजो को देकर दूसरी चीजें लाना ह। पर जब तक परस्पर की अदला बदली वाले मनुष्य नहीं मिल जाते तब तक मभी को अपनी अपनी इच्छा पूर्ति के लिए वठे रहना पडता ह । इस उदाहरण के आधार पर हजागे बचनवाले मौर हजारो खरीदनेवाला कल्पना कर सक्ते ह जिनमें क्सिीको कोई चीज चाहिए और क्सिीके पास कोई चीज अावश्यकता से ज्यादा : जिसके लिए वह गाहक ढर रहा ह । इन चीजा की अदला बदली के लिए य हजारो भादमी गाहक टूटते-ढूँढते शाम तक थक जायग और फिर भी शायद उनका सौदा ममय पर समाप्त होगा। एस समाज में समय की कितनी बरबादी होगी कितनी अव्यवस्था होगी भोले प्रादमी को चालाक पातमी से ठग रेगा-इसकी कल्पना महज ही की जा सकती है। इसके अलावा एमे समाज म यह जोखिम तो रहंगी ही, कि इस भरला बदली में वस्तु की जात बिगड़गी, पौर सोल जोख म पीज बरयाद रुपए की कहानी मी हागी । ममय की वरवादी, चीजों की वरबादी और चीजा की जात की वरवाटी । और राज का भगडा तकरार ठगी यह अलग । जस बिना गजा के राज्य में अघर अवश्यम्भावीह से ही विना सिर व समाज म स्नान के राज्य में यह अवर अनिवाय हा जाता है । अधर का मिटाने के लिए, व्यवम्याम्यापना के लिए, गाति रक्षा के लिए जम मनुष्या न मिल कर मनु म राज्यसिंहासन पर बश्न का प्रायना की और उन्हान राजा वन पर मुम्म और गालिका मचार किया वम , ही पिसी समझटार राजा न ममाज करनदन क क्षत्र में अराजकता और इम गडबड का मटन + लिए सिर को रायसिंहासन पर बठाया। जम पुरी राज्य प्रणाली, गानि और अमन का म्यापन करव भी प्रय दाता में समाज का हानिप्रद हा मकती ह वम ही सिक्वा प्रणाला मा पनि बुरी तरह या बनायता स मचाक्ति की जाय तो सिर व क्षत्र में राजक्ता और नियम हात हुए भी ममाज क लिए हानिकारक साबित हा सकती है। जा हा मिक्के की ममाज में क्या आवश्यकता है इसके बिना क्विनी अमुविस हा सकती ह इसका उत्तर पर यि हुए कायनिक उगहरण म समझ में या जायगा । सिरा गुरु में कब बना यह बताना ना अनुभव है। पर हजारा साल पह मिया था, इतना ना निश्चित ह। प्राचीन समय में माना पादा, तावा पयर कोग-इन प्रगावा भौर भी वस्तुमा व मिने वरित वात में यहा मान २ मिर तप जिन नाम निष गतमान, मुवा पार मानिय। बार बारीक मिका नाम मिलन हजम पा, बापा, विशनि बितिक आन्।ि रुपया परगाह का चलाया हया बताया जाता है। मिका राजा ने क्यों चलाया ? पह प्रान हो सकता हरि मिरा राजानहानगपनाया व्यापारी ६ रुपए की कहानी . भी तो चला सकते थ । या तो इन भदला-बदली करनवाला न ही क्यो न इसका संचालन किया ? इसका उत्तर कठिन नहीं है । यदि लोग जिन्सो की अदला-बदली छोड कर सिक्के से चीज की मदला-बदली कर जसा कि सिक्के के माविर्भाव के बाद होता माया ह तो यह आवश्यक ह मिसिक्वे की साख इतनी जबरदस्त होनी चाहिए कि उस साख में किसीका वहम या T करन वे लिए रत्ती भर भी गुजाइश न हो । यदि हम जिसा की जिसा से अदला बदली करते है तो उन अदला बदली की जानवाली जिन्सा की जात, उनकी माप-तौल वगरह सब चीजो को सामन रख कर कितनी अमुक जिस में कितनी दूसरी अमुक जिस की अदला बदली हो, इनका लेन और दनवार दानो को विचार करना पड़ता है । इस विचार में वहस मुबाहसा तो होता ही ह पर चूकि किसी भी जिस की जात हर हालत में एक सी नहीं बनी रहतो इमलिए जात की निरख की बार बार जरूरत पड़ती है । इसमें समय की वरवादी होती ह बकझक हाती ह–फिर भी लेन दनवार को पूरा सन्तोष नहीं होता। इस बकझक को मिटान के लिए ही तो सिक्का सिंहासन पर वठा था। इसके मान यह य कि सिक्क क सफलता से चलन के लिए यह आवश्यक था कि जसे जिन्सों की जात और माप-तौल क बारे में राजमर्रा की निरख की जरूरत पडती थी वसे कोई जरूरत सिक्क की जात और माप-तौल को निरस क सम्बध म न रह-अर्थात सिक्का म जो धातु ह उसकी जात सदा यक्सा हो और उसकी तौल भी सदा यक्सा हो। इस निश्चितता स ही तो सिक्क की धार और साख जमती ह । फिर यदि सिक्के की भी जात माप तौल पर लन-दनवाला में बीच बहस जारी रहे तो सिक्के के राज्य में भी वही अराजक्ता आ जाती है जो जिन्सा की अदला-बदली म थी मौर सिया एसी हालत में एक मजा गल-स्तनवत निकम्मी चीज बन जाता है। प्राचीन समय में जब सिक्य का प्राविर्भाव हुमा तव सिक्के की कीमत इसी बुनियाद पर टिकी थी कि इसम क्तिनी, कौनसी और कितनी अच्छाई की धातु ह । धातु की कीमत पर ही तो प्रापिर सिक्वे की साख पी । मान लीजिय कि एक सुवए मुद्रा में एक तोला रुपए की कहानी ७ कभी 7 खालिम १०० को अच्छाई का माना है, तो उस मुद्रा की कीमत ह- १ मुद्रा= १ ताला १०० की अन्टाई का साना । जद एक मनुष्य एक गाय १ मुवण मुद्रा में बचता थाता वह यह मान लेताया कि मन एक ताला साना १०० की अच्टाद का पाया ह यानी उम मुद्रा का साब इस बाठ पर पी कि निश्चयामक रूप स उममें १ ताना मुवण ह और वह मुदए १०० की अच्छाद का ह । गाय बचनवाल का इन दो वाठा के मम्बध में कमी कोद शक नहीं हाना चाहिए कि मुद्रा में साना १ ताला स कम भी हा मक्ताया ता अच्छाद१०० नहीं, दा सकती है। और यह निश्चय इस हागा मीती बात ह । जब तक उस मुद्रा को अच्छाई और वजन व वारे में कार्द जारटार व्यक्ति जामिन नहीं ह तब तक उम मुद्रा की तोल और अच्छाई क बार में लागा कपिल में पूरा इनमीनान नहीं हा मकना । राजा को मुद्रा चलाने में क्या वाच में पडना पड़ा प्रजा न ही क्या नहीं मुद्रा चला दी जिन्मों की प्रलाबरला बरनवालों न यह वारावार वयाँ न चला किया इसका उत्तर प्रब समझ में भा जायगा। प्रजा या मुद्रा चलाव ता फिर उममें भी एक एम उवरम्न व्यक्ति की जरत पडगा त्रिसकी माय प्राममाना मुनाना हरकता सपाहुर वरसी का या वर वाकी ध्रुव की तरह मचल हा। यति लामवा वाइ मुद्रा का माना कम करत या उमुत्री प्रच्छाइ कम कर दे ता पिर लागतो चौपट हा जाय, मौर मुद्रा चलान वाना लागों का यदा का प्रचटिव पाया उठा कर मालामान हा जाप । और एम घानबाज को फिर चाह कारागार में ही क्यों न ठेल दिया जाय पर लोगों का जा चौरद कर दिया गया उस घाट की पूति ना होन स रही। इस तरह की घानवाजा न हा लागी मिस वी प्रच्छाइपौर तौल म अट असा बनी रह इस मा वामन के लिए राग का छाड भयकोन व्यक्ति उपयुक्त हा माता पा? इमद यह मान नहा कि विमा राजान एमी पायवाजी नगे की ह । इतिहास में एम उपहरण मिनत ह सही जहा रारा न मा लान वा मवरण न करक एमा प्रघटित कम किया। पर एम उगहरण रम ह । मोर यह बात भी ह कि राजा द्वारा इस तरह ८ स्पप को पहानी की गई घोषवाजी के कारण जो क्षति हुई हो उसकी पूर्ति की संभावना है। साधारण नागरिक तो घावा देकर नौ-दो ग्यारह भी हो सकता है। इस लिए इस काम के भार के लिए स्वभावतया ही राजा सवधष्ठ माना गया । कई मुल्को में कई एस सठ भी हुए ह जिनकी सास को लोगो न राजा की साख स वही ऊचा माना। यहा भी ईस्ट इंडिया पनी के जमात में जगत सेठ का मुद्रा चलाने का अधिकार था और वतमान समय म तो प्राय हर मुल्क म सिक्वेकी व्यवस्था के लिए एक विशेष वक्के हाथ म ही सिक्के सम्बधी सारा कारोबार चला गया ह । पर गुरू गुरू में यह सभव नही था कि सिक्के की यवस्था क्सिी साधारण नागरिक के हाथ में हो। इसलिए राजा के हाथ में इस व्यवस्था का होना अनिवाय हो गया । इतिहास रुखक एक युग का सुवण-युग के नाम से पुकारते हैं । इसके वाद का युग रौप्य युग हुअा पीछ ताम्रयुग और अन्त में लौह-युग पाया। सुवए पथ्वी के गभ म युद्ध अवस्था में पय क्सिी धातु से अमिन मिलता है और चाटी अय धातुमा स मिश्रित अवस्था में मिलती है । इसलिए बादी एक युग म सुवण की अपेक्षा दुलभ भी मानी जाती थी। यही कारण था कि उस प्राचीन काल म चादी और ताम्र सुवण से कहीं ज्यादा मूल्यवान मान जाते थ । जो हो आज तो सान और चादी के सिक्क हो अधिक लोकप्रिय ह और इस लोकप्रियता के पीछ दृढ कारण भी है। सिक्का सोने चादी का क्यों ? अन्य किसी धातु या जिस के भी सिक्के कायम किए जा सकते है। मसलन एक मेर गहू का भी सिक्या हो सकता है पर इममें कितनी भारी अडचने ह यह सहज ही समझ में आ जायगा। यति एक सेर गेहू का एक सिक्का चलाया जाय ता फिर ११ सेर गहू को अलग अलग वोथ लिया में हमें भर देना पड़गा । उसमें काम तो काफी बढ़ ही जायगा, पर जो साल भर की पुरानी कोथली होगी उसम से यनि वह फट गई तो, कुछ गहूं निकल भी जायग । इसलिए तौल का कोई भरोसा नहीं । गहू को जात भी २४ साल वे बाट पोथली म सराव हो सकती ह । इसलिए नई कोयली जिसमें नया गेहू होगा, उसे तो लाग स्वीकार कर लेंग, पर पुगनी कोषली रुपए को कहानी ६ कोई ट्रागा भी नहीं क्याकि उसके गैह कीजात के सम्बध में भी कोई तिर नहीं । नताशा यह होगा कि नई कोयली और पुरानी कोथली हानी नए और पुराने मिक्स की कीमत में पर पड जायगा। पुरानी कोयली क्यात पुराने गेहू के सिवा का बट्टा लगने लगेगा-प्रयात उसकी कामत के मुकादिर में नीची होगी। इस अनादा गट की कोयली का सिक्का वजनी भी होगा। १०० मिक्कों का एक माय उठाना करीव करीव प्रसम्नव-मा होगा । और मीअडचन ह । कोरिया का कपडा किमी काम में न पाकर बरबाद हागा वह फितूनयी अग। मरा मयान ह कि इसमें कितनी अमुविधा हा मक्ती ह दम विन्तार मममयान की जरूरत हो नहीं है । वताना ता यह ह, कि यदि हम मुविधा अमुविधा का बयान छाड दें, और कीमत की स्थिरता का बयान भी चाह दें तो मिना किसी भी चीज' का हो सकता ह । एस प्रमुविधावार मिक्का का हमें प्राचीन समय में वारान भी मिलता है। सिक्का महनत की बुनियात पर भी रचा जा सकता ह । ममलन . . सस्कृत व्याकरण में 'पचग', 'पचावा', 'मौदिगकम' बसे गन्द मिलते जिनसे पता चलता है कि प्राचीन समय में यहा पण, अनाज प्रादि म चीजें खरीदी' जाता ची। अप्रजी में pecuntary नन्द 'पापिर" अप में व्यवहत होना ह । इसका व्युत्पत्ति तदिन भाषा pecunia Tद से ह जिसका अर्थ ह दोर, अनि गाय-बन परत है कि महाकवि होमर ने जव मी रिमो चीज को कीमत बताई ह तब बलों को सख्या में सो भारत की तरह प्रोम में भी मूल्य मापने का काम इम पाओं में लिया जाता था। प्राचीन काल में निगेरे पन को माप मी पामों में की जाती यो । प्रमुष पुरष पास इतनी पर गाए थी, इमरा साम्पय इतना ही हम इतनी र गायों की उसरे पाम सम्पत्ति पी। प्रा ने इतनी पर गाए दान में दरों, यह भी दान से माप का घोतक है। इसमे यह पता लगता है कि जो स्थान प्राज सोनेरा या नोटाह वह रिसी समय पापोंरा रहा होगा।
रुपए की कहानी एक मनुष्य की महनत के नोट निकाले जा सकते ह, जो उस नोट के स्वामी को यह अधिकार देंग कि वह नोट छापनवाली बक या उसकी कोई व्यवस्था करनेवाली सस्था मे एक मनुष्य की मजदूरी चाहे जव भावान कर ले। पर इममें भी असुविधा होगी। एक मनुष्य की मजदूरी-वह मोट की या दुवले की जवान की या बूढ की? गेगी की या नीरोग की ? इन सब अमुविधाना को दूर करन के लिए स्वाभाविक हो यह तय पाया वि सिक्का एमी वस्तु का हो जो ज्यादा सुलभ न हो प्रति प्रति अधिक मिकतार में जिम वस्तु की पदादा न हो जो जल्दी न बीज प्रति जल्दी से घिस न जाय जिसकी जात में, सिक्का पुराना हान पर भी कोई अन्तर न पड और जिसकी जात अमुक अच्छाई की जाच पडताल ने वाद निश्च यात्मक रूप से कायम की जा सक जिसकी थोडी सी मिकदार में कीमत बड़ी हो और जिसके, चाहे जितन टुक्ड किय जाय प्रत्यक टुक्ड की वजन के हिसाब में कीमत बनी रह । और चूकि एसी वस्तुए सोना और चादी ही थी प्रधान सिक्के की रचना इही धातुमा पर की गई । होरे पान मोर भय रत्ना की रचना स थाड से वजन की काफी कीमत हो जाती पर इनकी जात में इतना मन्तर होता ह दि एक ही हीरा लाख रुपए रत्ती का भी हो सकता है और सौ रुपए रत्ती का भी। सो सिक्के के वास्ते रल भी उपयुक्त नहीं थ। इसलिए वरमाल सान चादा के गले में ही पड़ी।
इस मिलमिल में हमें नाटा की रचना और उनको व्यवस्या के मम्बर में नी कुछ जान लना जरूरी है। मिला जया कि हमन पहल बताया ह, अपनी कीमत म्बर रेकर चरता है । एक सुवाण-मृद्रा १ तोला बातिम १०० की अच्छाई क मोन की है तो वह कोमन उन मुद्रा क मातर हा मरी परी । पर नोट में यह बात नहीं ह । नाट एक ष्टि में ता माज बागज का टुकड़ा ह । कागज के टुकड का कीमत कमी ? पर नाट का कामत इसलिए है कि हमें आवश्यकता हो ता नोट निकासनवानी मन्या म हम चाह जब उस नाट की कीमत तलब कर सरत है। पाजत ना सभी मुल्काका नाट निकालनेवाली सम्याग्रा या प्रसारण काठिया(Reserve Banks) न नार की स्वयंसिद्ध मुद्रा म माला बाली बन्द कर दी है। पर इसम नाट का माव में बन में वाइ अन्तर नही इमाह क्याकि नाट के बारे में जिन्म या श्रम मरीन म बाई कठिनाइ नही ह । नाट की जा कीमन ह वह दमा प्रावासन पर व्यवस्थित हमि उमकी जिन्म या श्रम में प्रलादल्ली में काई विकत नहीं है, पर किसी कारणवा यति नाट निकारनवाली मुम्या नस्तनाबूर हा बार या उस मस्या का निवाला निकन जाय ताकिर नोट की कीमत असवार थे वह म भी गई-योती' इमरे विगत, मुद्रागकीमत चूति मुद्रा के भीतर ही हानिए मुद्रा निकालनदाना राजा हदयी हा वाय या मिहामनच्युत हा नाय ता मी मुद्रा के मालिक का वाइ सनि न होगा। गाय नोट पोर मिक्क की तुलना के लिए भागात वि और विष्णु की मूनिका तुलना उघमा र टान हा मरता । मागान विष्ण म्वयं विष है,पौर पापान निरापया है। पर पया मूनि मतका दृष्टि १२ रपए की कहानी में प्राण प्रतिष्ठा के बाद विष्णु-तुल्य ही इसलिए बन जाती ह कि भक्ति भाव से पूजने पर वह विष्णु की प्राप्ति करा देती है। कागज का टुकडा वस तो कागज ही ह पर नोट निकालनवाली संस्था उसमें प्राणप्रतिष्ठा स्थापन करके उसे सजीव बना देती ह-उस कीमत का सपूण प्रतिनिधि व ददती है। पर शायद नोट की सपूए उपमा हुण्डी से दी जा सके क्याकि नोट एक तरह की वमीयादी हुण्डी ह जो चाहे जब नोट निकालनवाली सस्था मे सिकराई जा सकती है । इस सबध म यह बता देना आवश्यक है कि रुपए की मुद्रा भी एक प्रकार का चाटी पर छपा हुआ नोट मात्र हो ह । रुपा के भीतर जो चादी है उसकी कीमत पूरे एक रुपए की नही है । रुपए में पहले कुल १६५ ग्रन प्रयात तोला चादी थी और उस चादी की कीमत, अाज मे कुछ समय पहले के भाव से (अर्थात १०० तोले- ६२॥) कुल ०६२॥ पाई की होती थी। हाल म नया रपया दाला गया है जिसमें चादी की मात्रा पहले से बहुत कम ह अर्थात १८० प्रन म कुल ६० अन । चादी का भाव इस समय प्राय १०० तोले- १२०) है । इस दर से भी नए रुपए की चादी की कीमत प्राय उतनी ही सी होती ह । इसके मान यह हुए कि यदि रुपया चलाने वाली सरकार की अवहेलना करके रुपए की मुद्रा के भीतर भरी हुई चादी की कीमत के आधार पर ही हम रपए को वच, ता रुपएकी कीमत हम कुल प्राय ॥)॥ मिले। इसलिए रुपएके चादी के सिक्के और नोट को हम स्वयसिद्ध मुद्रा नहीं कह सकते। । पर वतमान समय में शायद ही एमा काई मुल्क ह जहा म्वयसिद्ध मुद्रा कायम हो। १९३३ तक ममरीका का डालर स्क्य सिद्ध मुद्रा थी, पर वहा भी सिक्के के दामा में जब से सरकारी दस्त दाजी शुरू हुई और सिक्के के दाम गिराए गएतर से स्वयसिद्ध मुद्रा अर्थात एसी मुद्रा जिसकी पूरी कीमत मुद्रा के भीतर ही हो, नही रहो । जहा तक खयाल क्यिाजाता ह, माज सभी सुसभ्य देगा म नाटो का अर्थात् प्रतीक मुद्रा का ही चलण ह । इस प्रणाली प्रर्यात नोटो के चलण के लाभ और हानिया अनक है। इसका विश्लेपण मागे चलकर करग। । ।
रुपए की कहानी १३ नोट क्यों आया? पर म्वमिद्ध मुद्रा के बाद प्रतीक मुद्रा प्रति नोट का आविर्भाव बस हुआ इसका विचार भी कर लें। जर मसार में स्नन्न वढा और लाखों का रखा और करोडा पर क्लम चलने लगी तब समावतया जिस मुद्रा को हमने कम वजनी और घनमूल्यवानी माना था वह भी अधिक वजनी मालम देने गी। एक गाहर के यहा से हमें प्राज दम लाख रुपए का भुगतान मगाना है और दूमर को उनना ही मजना ह तो ति सव-वा-सव लन-दन सुवण-मुद्रा म ही हो तो करीब २५००० मुवए मुद्राए-~~पनि एक सुवर्ण मुद्रा की कीमत ४० रुपए मान ल तो हम देनी और लेनी होगी। इन मुद्रामा का वजन भी करीव ८ मन होगा । २५,००० सुवाण मुद्रा के गिनन के निए कितना समय चाहिए और उम वजन को उठान के लिए क्सिने গামী দায়ি। বম সময় কী দিলনী বল্লেী কীর্তী দকী বন্দনা सामान है । इसके अलावा यनि सिक्को द्वारा भुगतान हो तो सिक्का की पिसाई और उसके द्वारा हानवाली पन की छीजन का भी प्रश्न तो ह ही। इन सब प्रमुविधामा और क्षनियों के बचाव के लिए नोट पनि प्रतीक मुद्रान प्रवेशक्या। इसमें न गिनन का ग्नना झमटन इतना वजन १०० नोट पदि १० १० हजार दे दे दिय तो दम लाप का भुगतान समाप्त चेक क्यों चला १ पर मागे पत कर व्यापार और रेन देन ज्यादातच तो प्रती मुद्रा भी धमाध मालूम होन लगी और मारा टेनन और द्वारा ही होने सगा। एतरह का माला परह, जो मापा देनवाला अपनी बर के नाम निपता हदि इतना रुपया अमुक सरजन कोरिया जाय । और उस पानापानदार का उतनी रकम वद म मिल जाती है। स्वपरित मुद्रा रा प्रतिनिधित्व प्रनीरन्मुद्रा का मिला, पोर उसके बाद एक कदम भाग परेला प्रतीक्दा वा म्यान पर दो मिला । मिरे की प्रगति की यह पापा दिसघस्प ह।
रुपए की कहानी हमारे देश में तो बड़े शहरो को छोड कर चेक का चलण कही नहीं है । चेक तो वहीं चल सकता ह जहा प्रथम तो बक हो, दूसरे जहा लेन देन का काम भी ज्यादा हो और बडी बडी रक्मों का लेन दन हो । चूकि गावो में यह स्थिति नहीं ह इसलिए हमारे देश में तो,जसा कि ऊपर वहा जा चुका ह चेक का चलण बड़े शहरो तक ही सीमित ह, मोर नोटो का स्वो और बड गावो तक । छोट गावो में तो चादी और ताबे के सिक्का वा ही चलण हा पर य चादी-ताब के सिक्के भी तो जसा कि पहले बताया जा चुका है, एक तरह के धातु पर छपे नोट-प्रतीक मुद्रा ही ह क्योकि उनकी स्वयसिद्ध कीमत का उनकी निर्धारित कीमत से कोई मेल नहीं साता। नोट से लाम प्रतीक मुद्रा प्रणाली के लाभतो स्पष्ट ह । वजन कम होता है। लेन देन म गिनती करन में, समय की बचत हाती ह । मुद्रा हाया में से रोज रोज निकल उसस धातु की जो छीजत होती है उसकी बचत होती है। पर एक और लाभ ह । मान लीजिए, सारे देश के लन-देन के कारोबार के लिए १० करोड सुवण मुद्राआ की जरूरत ह । यदि प्रति मुद्राकी ४० रुपए कीमत मान लें, तो इस हिसाव स ४०० करोड रुपए के मोने की, देश के लन-देन की सहूलियत के लिए जरूरत होगी। पर यदि नोटो का चलण ह तो यही काम बहुत पोड सोने से चल जाता ह । आखिर नोट का काम तो इतना ही ह कि वह उतनी निर्धारित मुद्रामो का स्वामित्व नोट के स्वामी को सौंपता है। यह सही ह कि प्राज एसा कोई मुल्क नही ह जहा नोट के बदले बक सुवण मुद्रा द दे। पर इससे नित्य प्रति के व्यवहार में कोई बाधा नही पहुंची है । यति सुवण मुद्रा भी हमें नोटा के बदल में मिलती तो उस मुद्रा का उपयोग भी हम जिस, सम्पत्ति या मनुष्य श्रम खरीदन में ही तो करत । और जब तक किसी मुल्क की साख सुरक्षित ह तब तक सुवण मुद्रा प्रचलित न हो तो भी नोट जय विश्य में वही काम दता ह,जो काम सुवण मुद्रा देती। इसलिए सुवए मुद्रा काममाव विसीको वह उतनी रुपा की कहानी नहीं घटकना । साम मुर्गरत है या नहीं इमा पना भी तो हमारे नाट की कीमत विगों में साह इमाम लगता है। इस प्रश्न का विवेचन तो भाग चल कर करेंग यहा दा मुद्रा के जाप नोट चरण में क्या-क्या विपायत ह उपका किराना है। बताना नोया या विनाट का सत्र इतनानी है निधाग्नि मद्रामा का स्वामित्व नाटक स्वामी का सौंपनाह। ममलन प्रापर पाम दम मुवण-मुद्रा का नोट है । (यह बाहरण-मात्र ह क्याति जैमा दिऊपर बताया गया - प्राज विमा भी मूल में म्वमिद मुद्रा का चरण नहा है। तो आप चाह जब नदि प्रमार वरन वाली पर या मन्या के पास जाकर अपना नाट देकर उमरे बदल में १० मुवण-मुद्राए भाग मक्त ह जिमके कि पाप अधिकारी है और वह बर प्रापका १० मुक्त महाए ६ दगी जिमन लिए कि वह बाध्य ह। पर एम किमी मी माधारण ममय की कल्पना नहीं की जा मस्ती जबकि तमाम नाटकार अपन नाट व पाद से नाटोंक बार में मुद्रा मार्गग । यदि दा के सरावार के लिए १० रा मुवर्ग महामाये चलण की जरूरत ह और नाग अपनी मुविधा के कारनामा से नहीं, पर प्रतीक मृद्रा पर्यात नोटा म अपना काम कसाना बाल ह. तो यह स्पष्ट ह कि अब तर नाट चनानवालो की माम माविरह नव तब का मपकार प्यक्ति नोट का मना कर भद्रा मागने के मन्ट में न पडगा । इनिए वर मावधानों के लिए १० करोड मुवश महामारे प्रतावा के पीछ कवर ३ वराड मुवण-मुदा अपन बाप में ततो भी पयाप्नुह। इमो मान यह हुए रि पनि हम अपना राधार वल मुबा मात्रा से हो चलाना चाहते ह तब जहा १० करोड मुद मुद्रामों के लिए ४.. पए , मोन की जहरत होगी यहा यहि हम नोट प्रया का अपना लें तो कुन १०० गड रए वे माने म ही धाम पल जापणा-पति बर १२. परोद पए देने के प्राचार पर समानी मे ४०० PTETपए की कीमत कानारामा प्रभार करनेगी। बैंकसमान में सपना पाल १२. पानार प्रसार पिर रुपए की कहानी - कुल ४०० करोड रुपए की कीमत के । नोट प्रसारिणी बक का तलपट एसी हालत में इस प्रकार होगा- ४०० करोड-नोट चलण में १२० करोड-सोना खरीदा डाले उसकी कीमत पाई २८० करोड--ब्याज पर रोका ४०० करोड ४०० करोड इस तरह २८० करोड रुपए का नाणा बेब्याज जो बक को मिल गया उसे लोगा को उधार देकर व मुनाफा बना साएगी। देश के लिए यह किफायतसारी अवश्य ही ग्राह्य चीज ह । इस तरह नोट न अपन गुणो से समाज को मुग्ध करके अपना सिक्का जमा लिया। नोट से हानि पर जड चतन गुण दोषमय विश्व को ह करतार।" नोटो में गुण ह तो अवगुण भी ह । एक अवगुण तो प्रत्यक्ष ह । चूकि स्वयसिद्ध मुद्रा की कीमत तो इसके गभ म ही ह मौर प्रतीक मुद्रा (नोट) की कीमत तो जब तक प्रतीक मुद्रा का प्रसार करनेवाली यक सलामत ह तभी तक कायम ह,इसलिए राज दुराजी के जमान में नोटा में लोग सहज ही विश्वास खो बठते ह और स्वयसिद्ध सिक्को का संग्रह वरखे उह दवाने लगते ह। इस महायुद्ध में पोलण्ड, फ्रास वगरह मुल्का में जहाँ जहाँ राज गिरन को सम्मावना हुई वहा लोग नोटो में विश्वास खो बठे। पर चूकि स्वयं सिद्ध मुद्रा का इन मुल्को में चलण नही था इसलिए लोग जवाहरात या सोना एसी वस्तुमा कासग्रह करने लग,या एसी वस्तुआ को लेकर देश के बाहर भागन लग । यहा भी जब फ्रास की हार हुई उस जमाने में लोगों ने रुपया का बुरी तरह सग्रह करना शुरू किया। या तो जसा कि पहले बताया जा चुका ह, रुपए का सिक्का भी एक तरह का नोट ही पा, क्योकि इमपी पाटी की कीमत तो कुल ६ पान २॥ पाई थी। पर रुपए के सिको क पक्ष कुछ बातें पी। माखिर इसकी स्वयसिद्ध कीमत रुपए की कहानी म कागज के नाट का वीमत म तो ज्यादा यो। इसलिए लागा न घबडा हट म इसका मग्रह करना शुरू कर लिया। यह संग्रह करन का मज यहा तक बढ़ा कि छोटी रकमा के लन दन के लिए स्पए का मिक्का कुछ दिना के लिए दुलभ-सा हान लगा था। सिक्का की काइ कमी ता न थी पर जब लोग भय स पागल म हा जात ह उस समय वुद्धि स काम नहीं लिया जाता । इसलिए भयभान लागा न चादी क रुपया की धराहर इकटठो करव सिक्क का अकालमा पदा कर दिया और अन्त म इस कठिनाई का दूर करन के लिए मरकार न एक रुपए का नाट भी छापा और मिक्क दवा बठन के विरुद्ध कानून भी बनाया। इस बीच म लोगो म भी विश्वास का पुन सचार हान लगा। पर भय के या प्रविश्वास के जमान में स्वयमिद मुद्रा की या ता चादी के रपए जमी प्रधस्वयसिद्ध मुद्रा का साप ता कम सुरक्षित रहती ह और प्रतीक मुद्रा की सास कस नस्तनाबूद होन लगती ह इसका प्राभाम इस और पिछले महायुद्ध क इतिहास म मिल मकता है। इम दृष्टि में हम कह सकत ह कि स्वयमिद मुद्रा क मुकाविरे प्रतीक मुद्रा का सबम व दाप तो यह ह कि प्रतीक-मुद्रा को वीमत व स्थायित्व के वार में या सुरक्षितता क वार में घबडाहट के जमान में पूरा यकीन ता कभी हो ही नहा मवता । पर क्या इम मुरभिनता के लिए इतनी बडा कीमत चुकानी वाजिब हागा वि स्वयमिद मुद्रा का ही चरण रख कर हम मुवए मुद्रामा के भार का वहन कर, उनक गिनन-सम्हालन के भमट में समय बापू और उनकी छाजत-जामुन्य धन की छीजत होगी-उस बरसात कर' और इसके प्रतावा, जाकाम १२० करोड रुपए क सान मचा सकता ह उसक लिए, जमा दि पहल बताया जा चुकाह, ४०० बराह रूपए का रकम का सोन में पमा रण राज-दुराजी म अरक्षितता आज हमार दा में नागवा कुल चसण प्राय ८०० बराड़ रुपए की कीमत का हागा । पर दुध ममय पहले यह चना २५० करोड रपए पाया। इमर मान यह है कि यति रिसव वर,जाइन नाटासा प्रमार रपए को कहानी करनवाली बक है, उसकी साख का ठस पहुचती तो इन २५० कराड के नोटो की कीमत को खतरा था। पर एमी स्थिति की हम कल्पना करें तब तो यह जानना चाहिए, कि इससे कहीं ज्यादा सतरा तो सरकारी प्रोमिसरी नोटो की रकम की हो सकता था और इन सरकारी प्रोमिसरी नोटो म तो प्रजा की कुल रकम लगमग १००० करोड के लगी हुई थी-अर्थात् नोटो की २५० कराड दा कीमत से चौगुनी रकम ता प्रोमिसरी नाटो में लगी हुई थी। इससे पता लगेगा कि नोटा को सुरक्षितता की जब हम बात करते ह तब हम भूल जाते ह वि किसी भी राष्ट्र के पतन के कारण हानवाली क्षति से बचन का तो काई रामवाण उपाय ह ही नहीं और उस होनवाली सारी क्षति म नोटो की कीमत नस्तनाबूद हो जान कारण होनवाली क्षति का स्थान प्रपेक्षाकृत छोटा ह । नोट का स्वामी यह सहज ही कह सकता ह कि सारी क्षति क्या होगी इससे मुझ क्या मतलब-मुझ तो अपन नोट की कीमत में नाश से होने वाली क्षति का ही नद ह । पर इसका उत्तर तो यह है कि देश के सिक्के को नीति व्यक्ति की सुविधा के लिए नही पर समष्टि का सुविधा के लिए बनाई जाती है, और इस दृष्टि से स्वयमिद्ध मुद्रा स प्रत्यक मुद्रा की सुरक्षितता कम होन पर भी दश के लिए प्रतीक मुद्राशली का त्याग और केवन स्वयमिद्ध मुद्रा की नीति का ग्रहण बशी खर्चीला होगा।
३ प्रतीक मुद्रागली में एक दाप और ह-~यति उम दाप कहा जाय ता- और उम दाप का वणन करन म पर कुछ तत्सम्बची वाता वा विव चन करना आवश्यक जान पडता है। हमन बनाया ह कि नाट प्रमार करनवाली मम्था यदि ४०० कराड रुपया व पीठ १२० कराड एपए का भी माना रख ता पयाप्त हागा क्यादि जबतक बक की माख अधन ह नवता कौन नाट का भुना कर वाले म मुवए-मुद्रा मागगा । इमत्तिए नोट की पाच प्रगत ताजा नाटा के पीव माना पगह उम पर वावी मोट प्रसारक वक की दशता सावधानी और नकनीयती पर ह । मान लीजिए कि १०० गडक सान के मद्द ४०० वराड रुपए नाटा के वजाय व न विमी भा कारणवा, अपना मर्जी स या बाध्य हावर ८०० करो रूपएक नाट चरणमें डालयि ना जा मान का मिक्लारपहरे प्रतिगत नोटा कपीछ ० की थी वह मिफ १५ का रह गई। एसी हालत में महन ही नाटा की मास में लागा का कुछगक हान लगा । और मान लीजिए कि यनि नाट प्रमारक वक न ८०० के बजाय उसी १२० करार रुपए की कीमत के मोन कापूजी के बल पर १६०० कराह कनाट चलण में डालनिय नब तो फिर नाटा की माष जारों स डूबन लगी। और यति १६०० करोड व बजाय २२०० कराड क नोट चलप म डाल यि तब तो लागा घबराहट फल जायगा मोर नाग नाटो स दूर भागन लगेंग क्यामि ३२०० फराह पौछ या कुल १२० वराह का ही सोना हा तब ता प्रनि मौ नाटक पीछे वेवल 1 रुपए का ही साना रहा जा धक की नगरी कासन हुए मत्यात अल्प कहा जायगा । यह मनहाना मा उगहरण जानबूझ कर ही लिया ह। काई समझ रबर जानवभर मुम गानि व जमान म एमा बहुदाहट तर नहा जानी पर घमाधारण ममय में एसी घटनाए कई मुका में है भौह । भारतदप की ही वात मीजिए । इम ममय जहाँ नोट प्राय २०० बरार रूपए के ह वहा मोना कुमराह रपए वा ह ।
२० रुपए की कहानी नोटो का प्रसार करना मासान काम है। उसके लिए जरूरत ह बस कुछ कागज की। टढ समय में या तो मरकार का काई कज दनवाला नहा मिलता या मिलता भी है तो बहुत क्ड सूद पर । इसलिए कई बार एसा हुया ह कि संक्टापान सरकार ने अपनी प्रावग्यक्तानो का पूत्ति न तो टक्स लगाकर की न कज लेकर-उमन बस नोट छापने वाली मीना को दिन रात चला कर अपना मतलब पूरा विया । प्राय एसा भी हुपा है कि जिस सरकार न यह तरीका अस्तियार किया उससे औचित्य की मीमा का उल्लघन हुए विना न रह सका-और वह इतनी दूर भाग बढ़ गई कि उसका दिवाला निकल के हा रहा । फास की इतिहामप्रसिद्ध क्राति के समय वहा कुछ नाट जारी क्यि गए थ जिहे assignat कहते थ । महन्त मठाधा। की जो जायदाट जन्न कर ली गई थी उमी की पुश्ती या आधार पर य नोट जारी किए गए थे। मगर उस जायदाद की कीमत से कहीं अधिक नोट निकाल दिए गए और इसका नतीजा यह हुआ कि इनकी कीमत बहुत नीच गिर गई। कुछ काल बाद सरकार को मजबूर होवर इन नाटो को चलण से हटा लेना पडा। २४ माल पहले रूस म कम्यूनिस्ट क्राति के समय भी एसी ही वात हुई । वहा चलण में जो सिमा या उसका नाम रूबल ( Rouble) था। क्राति से पहले एक रूबल की कीमत प्राय २ गिनिग अर्थात १०) थी। मगर बाद इसकी कीमत यहा तक गिर गई कि कुछ समय तक रूस म माध सेर रोटी के २५० रूबल और आध मेर चीना क६०० व्वल लगत । फुलावट और गिरावट इस तरह पोड सोन की पूजी पर वहद परिमाण म नोट निकालन की नीति को अग्रजीम Inflationary policy क्ले ह । हम इस अग्रजी परिभाषा के लिए चरण की फलावटी नीति -इस मुहाविर का प्रयोग कर सकते हैं । इसी तरह किसी कारणवा नोट प्रसारक बक यह भी कर सकती ह वि १२० वगेड की कीमत के सोन व मद्द ४०० कराइ रुपय की कीमत के नोट चलण में न रख कर केवल २०० करा म्पए के नोट ही
रुपए की कहानी
चरण में ग्म या ना और भी घटा कर १२० गहनगरम। इस नीति
काभाजी में Deflatienary policy वहन हिलाये हम स्य
चरणको गिरावटी नीति वह मक्त।
ষ +ৰা নানি যানিশা নাৰিক ৰা যায় য্যি মান্য
इमा विवचनमा मादा है पर पर विवचन बरन पहर नोट
कम मंघिक परिमाग में चनार में डाल दशक पजावट पदा की जाती
है और कम नाट वम करक गिरावट की जाती है इस प्रयोग का मोहम
कोई नौट मार र बिना सरकार की मर्जी के ता पूनावट या
गिरावर
ज्यान नहीं मानी। मिलिए जमावारी
এ য বাম ক্য = পা মা মা মা মন মা মিন আবা
है। एमी हागन में पति पुलावर्गनाति का प्रयाग करना होता है तो एक
नराकामिरकार निम्ना मच परता- उमम कर कम उगा
भलाह-पानी मानजिर विमरकार का मर्ग मानना १०००
पराव नाकर गा कर मरकारन गाहा स्वत ३५० रोह और
वारी ना २५० बरा का पारा उमरा वमा रावमा या प्रयात पर
दमून भार उमको प्रतिनी हो।नतीजा यह गाविप में भाया
७५० करो और पारस निकला १००० रो । मह २५० रोड
जापाप म बैनी निराद मरवार न बम निकासा दम, मानार
मशीपा-मा काम किया। उमने-५० कराहनाट छापकर या नाव
मनार पवार उम उपार का लोगों का चुनायिा, और इस नाह
*५० वराह पल में ज्या प्रकार गया।
महमरीका नानी शाम में लाया जाता है अब सरकार
मापिय रठिनाइया में मी हाती माना निवामिनर बनने की
रा' पर होता है। पर मामा अपना का व्यवसाय मुपारनेर
बदर मी हुन्डी कोदर गिगर्ने निरा पुमादी नीति को परण
रेनी पटना हा मार्ग नीति मगमों में वर्ग पाडीह और मात्राम
मीमा मीर, मनीति का प्रमागान मे शवमा परामर
साह, ममी पण पोर पारमान पनाह किती भागात
२२ रुपए की कहानी पर इसका असर खराब पड़ता है । इमलिए धनी मुक भी कभी-कभी अपन लाभ के लिए इस नोति का मीमा के भीतर प्रयोग करते है। उसका तरीका इस तरह का है। उदाहरण दे बतौर हमन बताया ह कि प्रसारक बर न ४०० करोड के नोटा के पीछे १२० करोड का सोना बतौर इसकी पुरती के रखा था। सोने की कीमत १ मुद्रा की १ तोला मोना थी और उसीका प्रतीक १ मुद्रा का नोट था। इसके माने थे १ नोला सोना= १ मुद्रा% १ मुद्रा का नोट । अर्थात १ नोट की कीमत १ तोला सोना थी। अब हमन यह निश्चय कर लिया कि हम अपन नोट की कीमत एक ताला सोना न रख कर केवल पोन तोला मोना ही रखग । तो फिर प्रसारव धक के पास जो १२० करोट का सोना ४०० करोड के नोटो की पुश्ती के लिए था वह नोटा की ३० प्रतिशत कीमत का न रहकर ४० प्रतिगत कीमत का हो गया । फल यह हुमा वि १२० करोड चे मोन के बरल म १६० कराड के नोट निकालन को हमम शक्ति हो गई। बस, हमन नए नोट निकाल कर वर और सराफा की माफ्त व्यापार म डाल निय। व्यापार पनपन लगा। चीजो के दाम बढ़ने लगे। एक हद के भीतर फुलावट नीति से व्यापार, व्यवसाय वाणिज्य मौर कारखानो पर अच्छा अमर क्या होता है, विशेशी पायात पर बुरा अमर क्या होता है इसकी चर्चा माग करेंग। मौसिम के दिना में फसल जब परती ह तब मक्मर बाजार में रुपए पीटान होती है। उसकी वजह से व्यापारियो में दिक्कत न हो मोर स्पए की कमी की वजह से किसानो की जिस नीचे दार्मा म न बिक जाय, इस लिए वक ऐसी टान के समय में भी फुलावट करती ह सही, पर यह पोडे ममय के लिए और स्वल्प मात्रा में। तरीका उमका वही है जो व्यापार यवसाय की स्थायी उन्नति के लिए काम में लाया जाना है। जो अस्थायी होता है उसमें सिक्के की कीमत नही बदली जाती । वहा तो केवल यही होता है कि नोट प्रसारक धक अत्यन्त मस्ते ज्याज पर लोगो को रुपए उधार देती है । मान लीजिए कि व्याज इतना सस्ता कर दिया कि लोगो को रुपया उधार लेकर कारोबार में लगाने में रुपए की कहानी - अयत लाभ प्रतीत होन लगा नो पिर चारा तरफ से घडाय: लोग पपा उधार लना गुरूगा और नोट प्रमार यक इमरी बों के जरिए rपया उधार देना शुरू कर गी । मान लीजिए इस तरह २५० करोड रुपए के नए नोट छाप बर वन ने उधार दे दिय तो वलण में २५० करोड रुपया और वह गया । और गिरावट पदा करन के लिए ठाक इमस सटे उपायों का प्रयोग होता है यानी या तो सरकार कर ज्यादा वसूल करती है और सच कम करती ह या तो बक गुट ऊचे व्याज पर उधार लेकर बाजार से नोट खचती है। दोना हा कारण चलण में स नोट निक्ल मातह और चलण में गिरावट पदा कर देते ह । जहा फुलावट के कारण दाम चत है वहां गिरावट के कारण दाम गिरते हैं । पुलावट या गिरावट सम्बध म एक बात ध्यान में रमन की ह प्राव पवनानुसार नोट चला में महज बह गये या घट गए केवल इसी लि स्थिति को फुलावट और गिरावट को म्पिनि नी पहना चाहिए । प्राव"यक्ता में अधिक पौर मा भी पोरे से मोन पर जब हर से बाहर नाटा का चलण बद घर मा पुनावत, और पयाप्त सोने पर मावस्यक्ता म कम नोटो का चलग हो जाय नो गिरावट की नीति नहीं जाना चाहिए । ममलन वैर ने यह नियम पर रमा हमि १०० से नोट के चलण के पीछ ३० प्रतिशत माना बरे बाप में रहेगा अब या मोन वा अनुपान ' से नोचे जाता ह ता हम समा फ्लावट की मार मोर पर जाना हनी गिगवर की मार कर रहा है। विस्तार और मकोच बमा स और उचित परिमाण से प्राव यकतानुमार जो नोटों में पतण में कमी या यती हो उसे स्वाभाविप मोच या विम्नार बना चाहिए । मान लीजिए में धन भरा है, धीरों के दाम तेज है। वित मोग हमारा मान धराया ले रहे ह। हमन सपना माल पर इस साल दिगास ५० रोड पा सोना गरीन । उगा र मह १०० पर २४ रुपए की कहानी । के नोट चलण में रख, हालाकि नियम के हिसाब स १५० करोड के भी नए नोट निकाल सक्त थ । नए नोट, बिना सोन का कोप बनाए नहीं निकारे । इसके अलावा पहले जो सोना १२० करोड का और नोट ४०० क्रोड वेय अब वह सोना १७० करोड का और नोट ५०० करोड के हो गए। इस तरह कुछ सोना, जो पहल नोटा के अनुपात से ३० प्रतिशत था वह अब ३४ प्रतिशत हो गया। दूसरे यह सारा काम जरूरत के मुता बिन हुमा। देश की सम्पत्ति बढ रही थी दाम बढ रहे थ चलण में ज्यादा नोटो की जरूरत भी थी। इसलिए जा हा ठीक हुा । यह स्वाभाविक विस्तार हुप्रा । इसी तरह मान लीजिए देश में भयकर अकाल पडा भूमिकम्प हुमा या पग महामारी हुई। इसके कारण देश की सम्पत्ति इम माल कम हो गई । बाहर से माल मगाया ज्यादा और भजा बम । इसलिए हमें २। करोड सोना कुछ बाहर भजना पडा । बक न इस २५ करोड सोन के मद्द ५० करोड के नोट चलण में से निकाल निय । इस हिसाब से अब नोटो का चलण ४०० करोड से घट कर ५० करोड रह गया और सोना रह गया १२० करोड से घट कर कुल ९५ करोट जो नोटो की कुल कीमत का २० प्रतिशत हुमा । पर चूकि यह मद सावधानी से आवश्यकतानुसार हुमा, और सोने का परिमाण भी ३० से गिर कर २७ प्रतिगत रह गया इसलिए इस स्वाभाविक सकोच कह सकते है । अथशास्त्री प्रामतौर मे फुलावट या गिरावट इन दो ही परिभाषामो का प्रयोग करते ह । पर मरा खमाल ह कि यह ययाय नहीं है । सकोच मौर गिरावट में कुछ भद तो ह ही पोर इसी तरह विस्तार भोर फुलावट में मी भद है । यह भेद भवय सूक्ष्म है पर इस मद को मान लेना ही गायद ज्यादा शास्त्रीय ह इसलिए मन यह भर मान कर फुलावट- विस्तार, भौर गिरावट--सोच ऐसी अलग-अलग परिभाषाए रखी है। यह भद इसलिए मान लिया ह कि जहा फुलावर पोर गिरावट कृत्रिम पायो से की जाती है और विरुष हेतु को लेकर की जाती है सगाव तिर विस्तार मावश्यक्तानुसार स्वभावतया ही होते है। तो भी यह सही होक यह मद मूक्ष्म-सा ही है ।
चदि पुतावर या गिगवर अत्रिम उपायों में और विगप हतुक लिए की जाती है इसलिए यह क्या का जाती। और इसका क्या पल हाता है यह समझना भी जारी है। पर इमी मिमित में एक और मन वा लोप पावाया है। जिन्मों के दाम में घटा-वही माट तौर पर दावारण हा मरने है-एक ना उन जिस में ही सम्बध मनवाना दूमरा उस दध्य म सम्बर रमनवाला जिम द्वारा दाम मूचित किया जाता ह जम नोट या धातु का सिका। एक चीज की कीमत कर दो पम ची माज तीन पमह । प्रथगास्थी इसका कारण जगह दमाहा माना -जिपम परिमाण माई मन्नर नहीं पहाद पर वह चीज पर चली है. कल जितनी उपलभ्य यो मात्र उतनी नहीं -----मोर इम पटी के अनुपात म उमा दाम बढ़ गया है । और हो मरना है कि चीन व परिमाण में पाई पन्नर नहीं पहा है पापम का परिमाण दर गया , और इस वद्धि के अनुपात म उम बाज का गम बा चला है । पहा जामवाल पग हाता है वह यों रमा जा सपना हरि दाम बढा वह चार महगी होने से या द्रव्य मन्ना होन म' मगर हम Value , मूल्य और Price भय में नाम र व्यवहन करें ता इमे यों रख मरत हरि सम वन्नु का प्रपना मूल्य चट जानेर या माग अपना मूल्य गिर जान के कारण म बहा' घस्नुभों क मूल्य में घटा-बड़ी कारण निकालना कठिन प्रयाम ह। एक फमल मार्ग गई मनावृष्टि से दूमरी बार या जन-बाहुल्य से तीसरी टिदियों पात्रम सा नीनों चीजेएम हा गा, उनकी माग यों को-पों बनी रही परत उन मूल्य बर गपाप्रपात उनके गमों में नजोपा गई। मम्भव नहीं दिका मोएमा मन प्रनिपानि पियाजा मरे जो अनावधि बार मोर रिडिडयों से प्रारमा जन विरिन सम्बद्ध कारणों का प्रपन घरे में लापर नजनित जटिलमा मानिमी भी हैं- मा मरमता में परितमा । वास्तव म हा तीन बार- रुपए की कहानी है वहाँ नीन मो तो क्या तीन हजार भी हो मक्ते ह। किसी वस्तु के मूल्य में इस कारण भी वद्धि हो सकती ह कि लटन के 'टाइम्स' अखबार न एक खास तरह की राय जाहिर कर दी-या राष्ट्रपति रूजवेल्ट न किसी पत्रकार के तत्सम्बधी प्रश्न को मजाक में उड़ा दिया--याक्सिी करोड पति ने स्वप्न देखा कि वह उस वस्तु के ढेर पर बठा हुमा पासमान की मोर उठता जा रहा है । जहा दाम में घटा बढी किसी वस्तु के मूल्य में घटा बढी का प्रतिविम्ब ह वहा इस घटा बढी पर कोई सूत्रात्मक मत या नियम प्रकाश नहीं डाल सक्ता-जिज्ञासु को प्रत्यर कारण का अलग प्रवेषण और उसकी अलग व्याश्या करनीपडगी। द्रव्य-परिमाण-मत द्रव्य अर्थात रुपए पसे के मूल्य में घटा-बढी के कारण न तो इतन अधिक ह न इतन विभिन्न । इसलिए इनके सम्बध में Ricardo नामक अग्रज शास्त्री के समय स एव एसा उपयोगी मत चला पाता ह और उसका नाम ह द्रय परिमाण मत (Quantity Theory of Money) । जितने भी दाम होग द्रव्य के ही रूप में होगे । इसलिए द्रव्य के रूप म वद्धि या ह्रास के जो भी कारण हाग वे दामो के प्रसग में सवत्र लागू होगे । इस मत का निचोड यह है द्रव्य वे मूल्य में घटा बटी का दामों पर उल्टा असर होता है और वे उमी अनुपात से तेज या मन्ने हो जाते है । मान लीजिए कि किसी वस्तु का दाम होता ह ४ ग्रन सोना। अगर सोने का मूल्य घट कर माधा हो जाय तो उस चीज का दाम ४ पेन की जगह ग्रन सोना हो जायगा। अब यह देखना ह कि द्रव्य के मूल्य में घटा-बढी होती क्यो ह । इसके चार कारण हो सकते हैं. (१) द्रव्य के परिमाण का घटना-बढना । सोना या चांदी खानो से ज्यादा निक्ली तो उसका मूल्य कम हो गया-क्म निकली तो उसका मूल्य बर गया । मगर सिरके सोना चादी के ह तो उनके मूल्य में भी एसी ही पटा बटी होगी और चीजो के दाम में-उसी हिसाब से- फक पडगा। मगर चलण में सोना चादी के सिक्को की जगह वागजी नोट २७ रुपए की कहानी है और इनका परिमाण वढता घटता है तो इनके मूल्य में भी उसी प्रकार अन्तर पडगा और चीजा के दाम उमी प्रकार तेज या मन्ने होग । (0) हा सकता ह निद्रय का परिमाण ज्यो का-त्या बना हुमाह पर उमक चलण या रफ्तार म कुछ खास कारण या कारणा से तेजी प्रा गई। इस तेजी का अमर वही होगा जो उस द्रव्य का परिमाण बढ़ने का हाता । कारण यह कि रफ्तार म जीवमान है उतन हो द्रव्य का ज्यादा चार लगाना अर्थात द्रव्य के परिमाण वा वद सा जाना। अगर चलण या रफ्तार धीमी हो गई तो इसका असर उल्टा पडगा क्योकि इसका अथ होगा द्रव्य के परिमाण का घट सा जाना । जव काइ रुपए को अपने पास रपना नहीं चाहता तब दाम चढते ह जब लोग रपए को दबावर चठ जात ह तब दाम गिरते है। (३) द्रव्य की माग अवम्या विशष में इस कारण वम हो जाती है कि नाग भुगतान के लिए चर या हुण्डी-पुरज का अधिकाधिक व्यवहार करन लगते है । एसी अवस्था में नाम गिरते नहीं, ऊपर चढते है क्याकि द्रव्य की माग कम हो गई द्रव्य का मूय गिर गया, चोगा के दामा , तेजी आ गई। चक और हुण्डी भी तो माबिर द्रव्य ये ही प्रतीक है। उनकी मख्या बढ़ गई तो एक प्रकार से वह द्रव्य ही बह गया क्योकि यदि चाहण्डो न होती तो उनके स्थान की पूर्ति नोटा को करनी पडती । इसलिए इस पहा को यों भी बनाया जा सकता ह कि द्रव्य परिमाण बढ़ गया इमलिए दव्य वे दाम गिर गए, और चीजो के दाम च गए। (४) मार इसके विपरीत यह भी हो सकता है कि पाणिज्य-व्यापार मा लेन देन की वृद्धि के कारण द्रव्य की माग यह जाम । माग की पूर्तिन की जाय मोर घलण म द्रव्य न बढ़ाया जाय तो स्पष्ट ह कि ऐसी भवस्था में दम का मूल्य बडगा-भपात बीजों क दाम गिरेंग। दमक मूल्य में घटा बड़ी क कारणो को समझान के लिए ऊपर यह मान लिया कि जहा एक बात बदलती है वहा योर मम रात समान बनी रहती ह। पर मान जीवन में एसो अवस्था बहुत कम मिलती है। एनी मन भावें प्राय साम-ही-माय वमती रहती है और परम्पर विरोधी गतिर्माबी मुठ मान्मी बनी रहती है । पटा बोका जा + २८ रुपए की पहानी कारण बताया गया है उस पर फिर एक नजर डालिए। लिया है कि द्रव्य की माग-बरन स उसका मूल्य बनगा और चीजा के दाम गिरग । मगर सम्भव ह कि जहा एक ग्रोर द्रव्य की माग बढ़ वहा दूसरी ओर साथ ही माय उसका परिमाण भी इतना बर जाय कि उसके मूल्य में किसी प्रकार की वाद न हा मोर दामा पर कोई असर न पड। वास्तव में वस्तु स्थिति कभी कभी इतनी जटिल होती ह दि उसका पूरा विश्लेषण करना और यह जान लेना कि वह कौन-कौन से कारणो के फलस्वरूप बनी ह प्रत्य त पठिन काय हो जाता है । पर जटिल-से जटिल भवस्था म भी द्रव्य के मूल्य में घटा बढी उपरोक्त कारणो से ही होतो ह-चाहे उनमें से एक मौजूद हो गहे एक से अधिक । माग बगी या परिमाण कम होगा तो उसके मूल्य में वद्धि होगी । माग घटगी या परिमाण बगा तो मूल्य में ह्रास होगा। यह सरल या जटिल प्रत्यक अवस्था के लिए मत्य ह। उपरोक्त विश्लेषण को सामन रख कर ही हम 'द्रव्य परिमाण मत के गुद स्वरूप को समझ सकते हैं जो यह है कि सिक्का-चाहे वह स्वय मिद्ध मद्रा हो चाहे प्रतीक मुद्रा-जब चलण में ज्यादा होताह नो जिन्मो के दाम--- बढ चलण के अनुपात से-बढ़ जाते ह मौर सिक्का चलण में कम होता ह तो जितना कम होता ह उमी अनुपात से जिन्सो के दाम गिरते है। यह बात सहज ही समझ में मा सकती ह । मान लीजिए कि मचानक मोन की नई खाने पिकल माइ मौर सोन की पदाइश बहद बन चली। उसके कारण सोन के दाम गिर गए, यहां तक कि सोने के नाम पहले से माध हो गए तो स्वभावतया ही, यदि हम विटेशों में खरीद से ज्यादा माल बच रहे ह तो बले में पहले जितना सोना खरीदते थे उसके बजाय उतने ही माल के लिए दुगुना सोना हमें मिल सकेगा। सोना दुगुना मिलेगा उम पर फिर नोट भी ज्यादा चलण में बनेंगे । जसे पहले यदि १० करोडका नया सोना हम हर साल खरीदते य मौर उसके मद्द ३० करोड के नए नोट चलण में रखते ५ तो अब उतने ही माल के बदले में विदेगों में हमें १० कगड के बजाय ( क्याकि मोन के दाम माध हो गए ) २० करोड का सोना मिलेगा जिम मह हम मासानी से ६० बरोड के नए नोट रुपए की कहानी चलण में रख मङग। नए नोट चलण म मान म ब्याज गिरगा नाणा मदा होगा और बहुतायत स उधार मिल मगा। काई भा चीज कम होती है तो वह महगा हो जाती है ज्यादा होती ह ता मम्नी होती है। चूचि नाणा ज्यादा हो गया इमलिए नाणा सस्ता हा गया। नाणा सस्ता हा गया इसके मान दूसरगम यह हुए कि चाज महमा हो गई। दर असल जब हम का चाज खरीतना उम चाज का नाण साय तवाला मात्र हाता है। याना नापामग्चत ह और चाज मगरत है। जद नाणा सस्ता हाताह ना मम्न म विगा-~~प्रपात निमा क माथ नाग की प्रवा-बजली म, या नागा मना है ना हम नापा ज्याग दना पहया । दूसर गेम इमाय यह हुमा विचाजाराम महग हो गए। अव नाट चसण म वर जान ह ना नाणा मामानी और महलियर स और यहनायत म कम पान पर मिलन लगना है। एमा हाल न म लागा का अपना व्यवमाय बहान का पिक हानाह। नए कारावार म रुपया लगान में क्मिा का हिवविवाह नहीं होती। नताना पर हाना हदि व्यापार पनपता ह हा चाज के गम बात है। पर इस मन पूणनमा सिद्ध हान करत हा एकतना यह है कि द्रव्य का बलण वढा -- घार नागा या मिका वा~~ना ही या व्यापार और रमन भी बर गया ना फिर रामनहा वण । दाम तानमा बहग जव कि चलण अपमान बर गया हा-मथात् यत्रि व्यापार वहा ह प म एक पाना और चलण वर गमा रुपए मामाना, तभी नाणा मनाएमा हम बग । एमो हालत मेंम्पए की छूट होगा और इस कारण चानाक दाम बडग । इमर विपरान यति व्यापारया रन रन का जरूरत बड़ी गपएम एस माना और धन ब पौन पाना ही, ता यह वर जायगा वि अपमान चलण म संकोच हमाद और इसलिए चीना के नाम भवाव का प्रारहाms अमल में तो इस मन का मिद्धिने लिए हमें यह र लगाना हागो दिया तुलनामा म्पितिया हर बात में विलयबमा र नाफिर यह नि संरकहा जा सकता कि भ्य परिमा(नार वा मिशा का पा) बटन पर जितना परिमाण दहा मी अनुपात मचाना शाम बाग मोर नाणा मना होगा। पौरम्य परिमाप पटना, बिना परिमाण . ? रूपए को कहानी घटा उसी अनुपात से चीजो के गम गिरग। द्रव्य की पगुता यहा फुलावट और गिरावट के सम्बध में हम एक बात पहनी ह जो जाहिरा तौर पर अबतक जो कुछ वहा जा चुका ह उसके विपरीत जान पड़ती ह । हर हालत म फुलावट और गिरावट + नताज वही नहीं हात जो ऊपर बनाय जा चुके है । सभव ह पुलावट हात हुए भी दाम समानमे बन रह या उनमें तेजी भीमाय तो नाममात्र की । और सभवह, गिरा वट होते हुए भी जिसा वे दाम चढ़ जाय । पाप कह सकत ह कि यह खूब रही और अगर यह सच ह तो इससे ता द्रय परिमाण मत का खाखला पन ही साबित हुआ । आप दोना वाता का सामन्जस्य कस करते ह फुलावट होते हुए भी भगर लोगो के सच करन का वेग उस हिसाब स नहीं बढता गोर द्रव्य या पसा पगु सा हा कर वठा या पड़ा रहता ह तब दामो म उतनी तेजी नही आ सक्ती जितनी फुलावट का देखत हुए सभव जान पड़ती है । इस महासमर म इग्लण्ड की बात लीजिए । वहा फुलावट काफी हो चुकी ह पर उस अनुपात म दाम नही वर पाय ह । कारण यह है कि लोग मौजूदा हालत में मनोवाञ्छित रोति स जिन्स नहीं खरीद सकते। उनके पास पसा अवित ह उनकी श्याक्ति बन गई ह पर वह पसा तरह-तरह के नियमणों के कारण नित्रिय सा पडा हुमा ह । सरकार को लडाई के लिए हर तरह की जिन्स की जरूरत ह- और सख्त जरूरत है। अगर बाजार में उन जिसा का खरीदत समय सरकार को सवसाधारण की प्रतियोगिता का सामना करना पड, ता उसकी समस्या बडी जटिल हो जाय, और लड़ाई के लिए जसा तयारी होना चाहिए, न हो सके । उम प्रतियोगिता को सरकार न विभिन्न उपायास बहुत कुछ रोक दिया है । इस कारण लोगो की कय गक्ति अशक्त सी हो गई ह-उनके पास पसा अधिकाधिक होत हुएभी वह उस एक हद स प्राग खच करन म असमपह। फिर दाम फुलावट के से अन ताकस। मान लीजिए कि लडाई बद होत ही सरकार की नाति फुलावर स गिरावट की हा गई तो क्या दाम गिरने लगग माज आय-वदिहाते हुए - रुपए की कहानी भी व्यय करन क माग बल, इमलिए उस पम वागमोपर जा असर पर सकता या वह नहीं पडरहा है । पर, कल अगर यह माग मुल गए और लाग मनमाना सध करन क लिए स्वतन हा गए गिरावट के बावजून भी जिन्सों के दामा में बहद तजी पा सकती है। सारा यह विदामा की दष्टि म प्रधानता इस प्रश्न काह कि विनना पसा खच हो रहा है न कि इम प्रान की कि कितना पमा मौजूर है। साधारण समयम यह भर काई माम अथ नहीं रखता क्या नाम अपन पम को मनमानी रीति सच करने के लिए म्बतहत ह। पर हर महासमर जसे प्रभाधारण समयम जति पमा होना एक वानह उम मनमानी रीति सखच करत की स्वतरता होना दूसरी बात यह भद विद्याप महत्त्व पूरा ह फिर भी यह बात कोई एमी नर्ग, जिसका द्रव्य-परिमाण-मन स मत्त या सामन्जस्य न हो सर । वाम्नव में यह उसा मत अनगन है, क्यानि वर द्रव्य परिमाण पर ही नहीं उस चरण या रफ्तार पर भी जोर दना है। हम मान लो कोदाहरान है--- जब काई पर अपन पास रखना नहीं चाहना तब दाम चन है जब लोग रुपए कर दरा कर व जात ह तब दाम गिरते हैं।' इस समय रुपया अधिक हात हुए भी दवा हुभा है, इसलिए शाम जिनन ऊच हा मकन य नहीं है।
ह इसकी पर चलण के स्वाभाविक विस्तार और मकोच स जो असर चीजा के दामो पर पडताह उसस कहीं अधिक जोरदार प्रसर चीजो के दामा पर चलण की फुलावट और गिरावट के कारण पडता है। चूकि विस्तार या सकोच तो अपन प्राप वरीब करीब स्वभाव से ही होता ह इसका गति भी मद हाती ह और इसका असर भी मह्य पोर मदु होता है । पर चूकि फुलावट और गिरावट जान बूझ कर की जाती गति द्रुत होती है । इसलिए जितनी ही कस कर फुलावट या गिरावट की नीति काम म लाई जाय उतना ही अधिक तात्कालिक प्रसर इस नीति का जि सा की कीमत पर होगा। और खास कर फुलावर की नीति म ता- यदि अत्यधिक बपरिमाण, फुलावट की जाय तौ-लोगो का नोटो स विश्वास इस कार भाग जाता ह कि वे नाटा को एक रात भी अपन पास रखना नापस करते ह और अपना पूंजी पल्ला जिसो म ही रोक्ना पसन्न करत है। इसका नतीजा यह होता ह कि चीजो क दाम अनाप नाप बट जात ह । मोर याज की दर भी बढन लगती है। लडाई के बाद जमन माक और स्सी रूबल के चलण की पुलावट यहा तक बढी को साधारण समय म जितन नोट चलण म थ उसस कई लाख गुन नोट चलण म रख दिए गए । नतीजा यह हुआ कि नाणा कागज के टुकडा की तरह इतना सस्ता हो गया कि उसकी कोई कीमत हा नही रह गई और जमनी में जिस चीज के दाम साधारण समय म १२ माक रह हाग उसके दाम लाखो माक तक हो गए । ज्यो ज्यो मा छप छप कर जार सचलण में प्रान लग त्या त्यो बडी तजा के साथ चीजा के दाम बन्न लग -यहा तक कि हर मिनिट दाम ऊचे जान लग । कहा जाता ह कि जब एक नानवाई अपन गाहक का राटी बचकर उस माव पाता था तो उस यह चिन्ता होती थी कि ताजा गेटो बनान के लिए आय खरात खरीपत कही मार काम बढ न जाय । इसलिए वह राटी बचत ही माक लकर बतहागाई कर आटवाले की दुकान पर पहुच पर प्राटा ल लता पा मोर माक मVिछुन पर ही शान से सांस रता या ।
- रुपए की कहानी चेहद फुलावट के नतीजे उस जमान की इसस भी ज्यादा मजदार कई सच्ची कहानिया प्रच लित है । जब मान की कीमत बोडोस भी कम होन जा रही थी, तव तो मॉस्ट्रिया और जमनी के लोगा का विश्वास इस बुरी तरह डुल गया कि कई लोगों न तो अपनी फन पाठी भी मरने के पहले वरील कर रख दी ताकि बाद म कहीं दाम वशुमार ज्यादा न वह जाय । एक प्रतिष्ठित भारतीय कोठी का कुछ मा एक जमन व्यापारी स पाउना था । वह मा हजारो की तादाद मेंपा जिसकी साधारण समय मजारों रुपए कीमत थी। भारतीय कोटी न जब जमन व्यापारी स रुपया मागा और लिखा वि पाप हमारे मा भज दीजिए तो जमन च्यापारी नवाब लिखा कि महाराय श्राप २५,००० मार पावन थ, पर म जो यह खत प्रापको लिख रहा हूँ उस टिष्टि भोर लिफाप के दाम ही तो हाई लाख मार हा जाया । इस हिसाब से यदि म हिसाव लगा तो उल्टा मराही माप म पावना निकलेगा। रहते हैं प्रास्ट्रिया म दो भाई प जिनमें से एक के पास २० ३० हजार पाउन य जिसके कारण यह सम्पन माना जाता था और दूसरामारावी था, जो निय जिमना माता या उसका एक वडा हिम्सा गराब में बरवा पर देना पा और शराब की बोतलें घर में जमा रखता था। जराउन को फुजावट हर तर जो भाई मम्पन्न या उसो पारनता कोठी हो गए पर जो पारीया उमदी वाली बातला / कीमत लायो काउन गई। नाश की फुलावट क्या क्या करामात हिमानी ह इमवा यह एक मजेदार उदाहरण है। प्रस्तु। मान लीजिा कि हमारे महा २१० वरोह रुपए के नोटा चलण है उसे बड़ा दर २५,००० रोड के नोटो का कुल चल कर दिया जाय--- भयात् सौगना चलम बहा दिया जाय, तो स्वमातया रुपए भी साप भीमा हिस्मा रह जायगी । और जो मेथी भी सजी मान दो पमे मेर मिली उसराम २०० पसे मेर, अयात एर मेर मधीबीपीमत करीव-वरीब ३ रुपए दा जायगी। कार हमने बनाया हविनामा चतण में मारा होता है तो चीजों 4 रुपए की कहानी राम पनपने गते हैं और सस्ते व्याज में उधार मिलन लगता है। पर यह मस्त ब्याज की बात वेवल नियश्रित विस्तार तक ही सीमित ह– अथात व्यापार को पनपान के लिए या केवल मौसिमी टान मो मटन के लिए ही जब हम चलण में सिक्का ज्याला डालते ह, और मा भी नियत्रण के के साथ स्वल्प मात्रा म तभी तक व्याज मटा रहता है । पर जहा पुलावर को नीति जार स गुरू की और चलण म लोगा का विश्वास बपिन हुप्रा वि ब्याज की दर जोर म बटन लगती है। जमनी म फुलावट के समान में चीजा के दाम कसे बन गए,मका उदाहरण हमने ऊपर निया ह । उस जमान म ब्याज की दर भी यहातक रही थी कि एक जमान में ब्याज १२०० प्रतिशत अथा१०० मिक्वे का याज एक साल का १२ ० रुपया हो गया। आपन यदि कुल १०० मिक्के उधार लिय ना एक माल के बाद प्रापको अपन देनदार से १२०० सिक्क "याज न मिल गए। एसी विषम स्थिति हो गई थी। यह कुछ अनहोनी मी बात नगती ह कि इतनी ऊची याज की दर हो गक्ती ह-जोर मो भी एक मुसभ्य देश म । कानुला प्याज वडा हाता हा पठान लोग गरीवा दो अत्यत ऊच ब्याज पर उधार देत है । पर य १२०० प्रतिशत का ब्याज ना कावुलियों से भी बाजी मारता ह । पर उस समय वो परिस्थिति को देखते हुए इममें कोई प्राचय की बात नहीं है। जसा वि हमन पहले बनाया है जब पुलावर नीति जोरस तुम होती ह तो चलण का मूल्य घडाधड गिरन लगता है । मान लीजिए जिम चलण का मूल्य माज एक मात्रा है उसका मूल्य माल म शनांग रह गया और भय यह हाकि गाय महीन बीस दिन के बाद . रह जाय या इससे भी कम हो जाय तो फिर चलण अपन पास कोई नही रखगा। इगलिए जिम नानबाई का मन उदाहरण दिया ह यह बनहाता दौड कर मार वा पाटा खरीद करहा दम एता था। एमी जहा हालत हो यहा पिर चरण को प्रपन पाम बौन रख? जिसन उधार दिया वह तो मारा गया वयाकि माल भर के लिए यदि विमो न १००माव उधार दिया और माक के नाम गिर वरमाल भर में.' रहजाय तो जो मोर उम वापिम मिगे मोर वजाय आप मार का मा काम ग । इमवे भान यह हए कि रुपए की कहानी . यद्यपि उसे वापिस १०० मूल रकम और १००० ब्याज के कुल १३०० माक मिले,पर १२०० की कीमत ' के हिमाव मे" माय ही कुल रह गई । इनना व्याज पान पर भी वज दनवाला घाटे में ही रहा । यही कारण ह कि इस तरह की फुलावट की नीति के जमान में नाणा प्रचुर मात्रा में होते हुए भी व्याज की दर वहद बट जाती ह क्याकि उधार नवाले को बडी जोखिम उठाना पड़ती ह । पुलावट का रन पर अमर पुलायट में प्रतीर को साख में ठस पहुच गई और प्रतीक की मिकदार चलण में ज्यादा हो गई । इमलिा जमा कि पहले बता चुक ह जिन्मों के दाम भी बन गए । पर क्मिी वजदार को एक मौका देना था और पावन दार का उतना ही पावना या तो-यद्यपि जब दोनो का रेन न हुआ था तव प्रतीक स्वयसिद्ध मद्रा का सच्चा प्रतिनिधि रहा हा-प्राज प्रतीक रवयसिद्ध मुद्रा का प्रतिनिधित्व खो वठा तब भी पावनदार को वही सौ मिलेंग, और देनेवाले को वही मौ दन पडेंग । फुलावट के कारण प्रतीक की करामात कम हो गई मस लेननेन की निर्धारित रकम पर कोई अमर नहीं पड़ेगा। पहले जो एक पिया दम सेर गहू परीद सकता था, अव पुलावट के कारण रुपय की साख गिर गई और जिन्सो के दाम बन गए इसलिए चाहदस मर गहू के वदल ८ मर ही खरीद सक पर पावनगार देनार मे यह नहीं कह मकता, 'माई माब-मन जर प्रापका उधार रिया तब रुपए की मास मोलह क्ला मपूण थी। प्रतीक के स्वामी को वक्वाले पाठा पहर छूटस म्वयमिद्ध मुद्रा दते थ। अब वह बान नहीं रही। फुला. वट की नीति के दारण प्रतीप हतभी हो गया। इसकी क्लाए घट गई। १० मेर गहू व बजाय पव इमक बदरे म८ मर गहू ही मिल सकते है। इसलिए भरा रुपया जो पहले मोतह क्लावाला था उमौका लौटाने की भापकी जिम्मतारी ह । इमनिए माप या तो मुझ स्वयमिद मुद्रा या प्रतीक लोटाइए, और यदि भाप मुझ घट नाम का रपया लौटाना चाहते ह मो मो व ऋगवे बजाय प्रापवा मवा मो देना होगा। यपिावनेदार रुपए की कहानी एसी बात कहे तो देनदार अवश्य ही कहेगा, "तुम कहा आकाश पाताल की बातें कर रहे हो ? मालूम होता है तुम्हार दिमाग को कोई कील गिर भागी ह इसलिए वहतर ह कि तुम अपनी चिक्त्मिा करायो। लाभ पार हानि पर वावजूद इस प्रश्नोत्तरी के यह ता मननाही पडगा कि इस फुला वट की नीति के कारण पावनदार को घाटा हुमा मोर दनदार को लाभ, क्याक्पिावनदार वा जो पावना था वह था पूणकला रुपया या सुवर्ण मुद्रा और अब वापिस मिल रहा है उसे घटी कीमत का प्रतीक, जो पुरान रुपए को अपेक्षा कम जि म सगैट सकता ह । पर चूकि कानून का यह तकाजा ह कि पुलावट या गिरावट के कारण प्रतीक की कीमत म चाहे जो घटा वढी हा (उम घटा बढी का निश्चित रूपेण मापन का कोई साधन नही है और यदि हो भी तो वह सरकार को मा य नहीं है) उमसे पावनदार या रेनटार के पावन दन की रकम पर कोई अमर नही होगा---अर्थात यदि स्वयसिद्ध मुद्रा के चलण के समय का १०७ का पावना देना ह ता वह फुलावट-नीति के समय भी १०० वा ही पावना देना माना जायगा। क्रोडा का दना पावना हर मुल्ल म होता ह और उस दन-पावन की रवम ज्या-वो-त्या बनी रहती है इसलिए सवसाधारण को प्रतीक की कीमत गिर गई ह या बढ़ गई ह इसा थाडी घटा-बढो म कोई पता भी नहीं चलता। पर पता न भी रह तो भा उमय प्रसर स लोग वचित नही रहत । यनि नाम चरत ह तो सभी का उसका फल भुगतना पटता ह और गिरत ह नब भी यह सभी को लागू पडता ह । एक सावधान और गम्पन्न व्यक्ति प्रास्ट्रिया म क्स दरिद्र हो गया और उसरा भाई जा रावी या कम धनिव बन गया इमवा उदाहरण हम पर द प्राय है। यद्यपि फुलावट के कारण प्रतीर मुद्रा की दर कितनी गिर गई ह इस माप तौल वा सवगाधारण को पूरा पता नहीं चनता पर जाननवार तो मानन ही ह दि पुलावट के कारण प्रतीक की कीमत कम हो जाती - भौर इसके फलस्वरूप पावनदार वा नकर पिया रमनवार को जिमो की सपत करनवारे को मजदपणा लागा ।
रुपए की कहानी को, और जिनकी आय निर्धारित ह उनको (जस जमादार पन्शनयाफ्ता लोग, नौकरीपेशा लोग, कर वमूल करनेवाली मस्थाए-जसे सरकार, म्युनिसिपलिटी, कारज, स्कूल इत्यादि) हानि होती ह, और क्जदार लोग, कारखानवाले, माल पा परनवाले, (जस क्सिान, जुलाहा बद, लोहार, चमार आदि) इन लोगो को लाभ होता है । गिरावट की नीति म जिह फुलावट में लाभ होता है उनका हानि है और फुलावट म जि हे नुकसान ह, उनको लाभ है ।
६ इस फुलावट या गिरावट के कारण हमारी मुद्रा की कामन पर विगा म क्या असर होता है इसका भी जरा विवेचन परल । हमन पहले बताया है कि प्रतीक मुद्रा ता स्वयसिद्ध मुद्रा की प्रतिनिधि मात्र ---प्रर्थात एक मुवण मुद्रा की कीमत का प्रतीक हम नोट प्रसारक चक के पास पंग करें तो हम एक सुवण मुद्रापान के अधिकारी हाग और बक एक मुवण मुद्रा देन के लिए बाध्य होगी। पर यह अधिकार और जिम्मेदारी दोना-के-दाना फुलावट नीति के प्रवेग परत ही समाप्त हो जाते ह और गिरावट नीति के पान पर टोना और भी सुरक्षित बन जात है। कारण स्पष्ट है । थाड स सान की पूजी पर एक तरफ ताप यधिक और परिमाण प्रतीप चलण म डाल यि जाय और दूसरी तरफ प्रत्तीय मैं स्वामी का प्रताप के बर म स्वयसिद्ध मुद्रा पान का अधिकार अक्षुण्ण बना रह और बक प्रतीक मुद्रा क वरले में मुवण मुद्रा देन के लिए बाध्य हा-य दोनो बात असगत है क्योकि १५० कराड की कीमत के सान के आधार पर यदि ३२०० करोड के नाट चलण में डाल दिय जाय और उनमें से यदि २०० करोड की कीमत के नोग्वाले भी अपन अधिकार का उपयोग कर और वा स नोट भुना पर मुवण मुद्रा माग नो बक का अपना दरवाजा व परल के सिवा कोई चारा न होगा । कुल पूजा ही यदि १२० करोड ह ता फिर २०० करोड के नोटो का भगतान बक चुका ही कसे सक्ती ह १ ज्यादा से ज्यादा –३२०० करोड के नोटा में स--कुल १२० करोड हो नो चका सकती है। वावी व नोटा के पीछ जब बाप म सोना ही नहीं रहता ना पिर नोटा की पुश्नी नी नस्तनाबूद हो जाती है और इमलिए नाटक साख पूयवत रह जाती ह । इमलिए जहा पुलावर नीनिक प्रयाग का विचार हुमा कि प्रतीक मुद्रा के स्वामी का सुवण मुद्रा पान का अधिकार समाप्त हमा। किराफ्ट की नीति में, इस विपरीत यह अधिगार मोर ठोम वन पए की कहानी ३६ जाना है, क्यादि चरण व नाटो व परिमाण + मुकाबले म वा व काप म स्थित मान का परिमाण और भी बन जाता है। इसलिए स्वभावनया प्रतीर मुद्रा की साम्ब बढ़ जाती ह । पर फुलावट-नीति में ता प्रतीक नाममात्र का प्रतीक रहता है। पहल प्रतीक की कीमत जो एक मुवए मा यो, पुलावट हान पर अब उसको कोई नि चत कीमत नही रहो । अब प्रतीर की कीमत उसकी माग्व की घटा-बढी के अनुसार घटनी घोर बढती रहना है । और वह साख पुलावद के परिमाण + पीछ क्मो वा होती रहती है। यदि पुलावट ज्यादा होती ह नो जसाकि ऊपर बताया ह प्रतीक को कोमन ज्याना गिर जाती ह मौर यदि फुला वट अपक्षाकृत कम होती है तो प्रताप की कीमत कम गिरती ह । जब तक प्रतीक और म्वयसिद्ध मुद्रा का काननन सम्बध था, दानो गठजोड-से वध थ, तब तक तो प्रतीक की निर्धारित कीमत कायम थी। पर जहा प्रताक और स्वसिद्ध मदा का तला हुमा कि कीमत की स्थिरता गायव हुई । यद्यपि कहन के लिए तो प्रतीक फिर भी एक सुवण मुद्रा का नोट ही होगा जसा कि इग्लण्ड में एक पाउण्ड का नोट प्राज भी एक पाउण्ड का नाट ही कहलाताह पर उस मान यह नहीं कि उसके पीछ एक पाउण्ड वी मुवण मुद्रा पहीह, जिस हम चाह जब व ग्राफ इग्लण्ड मे माग लग और वह हमें दे दगी । इस तलाक के बाद असलम तो प्रतीक री वीमन की पतग की तरह हो जाती है और जस हवा के कोको क बल पर पागिरती ह या उठनी ह उमी तरह प्रतीक की कीमत भी चरण की फुलावट की वमीवीर माघार पर हिलारे खाता रहती ह। पतीफ भी कीमत पर विदेशी बाजार यह सही है कि मवमाधारण का फुलावट या गिरावट के कारण प्रतीर की दर में क्या घटा-बटोहुई इसका काई पता नहीं चलता योनि उनकी नजरो मामने तो मिवा जिन्मा की कीमत की घटा-वही पोर राम क्षण नही मान जिनमे हैं प्रतीक की नई कीमत या प्रत्यक्ष मान हो । उनके सामन रपए की वो पल वाली गल वी दनगर पावनवार को समर घही पा का नाम है ।
४० रपण को कहानी पर विदेश में लोग हमारे प्रतीक की बीमत के सम्ब ध म इतन अपवार म नहीं रहत। उह हमार प्रतीक की कीमत का और उसमें राज होनवाली घटा-बरी की करीब करीब सही माप-तौल मिल जाता ह और इसलिए जस मनुष्य अपन चहर को स्वय नहीं देख सकता किन्तु पण की सहायता स अपन मुह की बदसूरती या सुरता को सही माप-तौल कर सकता ह उमी तरह हमारे प्रतीक का विदेशी लोग क्या दर-दाम करते है, इससे उसकी कीमत का अधिक सही ज्ञान हम हा सकता है। विदेशी बाजार एक तरह सपण का काम देते हैं, क्योकि उही के द्वारा हम अपन प्रतीक की सही कीमत का पता लगता ह । पर विदेशी बाजार हमारे दपण क्यो बन जाते १ यदि विटेगास हम माल न तो खरीद और न उह बचें, तब तो क्सिको फुसत है कि हमारे चलण को क्या कीमत होनी चाहिए इसपर कोई विदेगी वहस करने बठगा । पर चूकि हम विद्या में जिस माल ल्तेह भोर वचते ह इसलिए हमारे चलणी प्रतीक का कीमत को हर समय कूतते रहना उनक लिए अनिवाय हो जाता ह । मह क्या ? मान लीजिए आप लदन के बाजार म कुछ चीजें मोल लत ह तो उनका दाम प्राप यदि भारतीय नोटो म चुकाना चाहेग तो काई दूकानदार प्रापको माल न बचेगा इसलिए आपको वह दाम अग्रजी नोटो में चुकाना पड़ता है। अग्रजी नोट माप कहा से लाते ह? आपके घरवाले हिन्दुस्तान म विसी विदगी बक को स्पया दते ह और उसकी कीमत का अग्रजी द्रव्य खरीद कर आपको उसी वक की माफ्त भज देत ह जो पापको अग्रजी नोट या सिक्का वी गल म मिल जाता है। पर इसी तरह यदि सब लाग यहा स इग्लण्ड भजनवाले ही होग और मगानवाला कोई न रहगा तब तो कारो बार अपने प्राप कुछ दिन के बाद बंद हो जायगा। पर चूकि जस भजन थाले ह वस ही लगन स द्रव्य भगानवाल भी ह इसीलिए यह दुतरफा कारोबार चलता रहता ह और जब हम रुपए स अग्रजी पाउण्ड सरीदत है (लदन धन भजन के लिए) या तो पाउ बच कर रुपया सरीत है (लन्दन स धन मगान के लिए) तव जिस कीमत में या तो हम रुपया बच कर पाउण्ड सरीन ह या पाउपर वच बर रुपया खरीदम उमम रपा की कहानी हम पता लग जाता ह कि हमारे प्रतीक (चलण) को दिन में क्या कीमत है। 7 रिदेश में कीमत मे स्नती है ? प्रश्न का उत्तर यह ह कि हर चीज की कीमत एने और उचनवालों की गरज पर अवलम्बिन है । वसे ही इस विषय में भी हाता है। पर इम ज्यादा स्पष्टतया समझ लेना आवश्यक है। यदि हम विटेगो में माल ज्यादा लेते है और कम बचत ह जस कि हमन १०० का माल तर लिया और ६० का वचा, तो हम विगो को १० चुकाना वापी रहा। यह ४० हम कस चुनाण इसके तीन तरीके हा सक्त है। एक तरीका ताह पावनगर का माता मज पर। सोन के सभी ग्राहक हाल ह और तमाम मुल्ला ने करीब-वराव सोन को एक निधारित कीमत कायम कर रखी है उम निवारित कीमत पर हर मुम्क की नोट प्रसारक बक प्राय साना खरीदन का तयार रहती है । इसलिए पावनेदार को सोना भेज कर हमारा वज चुकान में तो कोई कठिनाई है ही नहीं। पर हर साल सोना भेज पर तो वही मन्द माल खरीद मफ्ना ह जिसक पास सोने की बडी-बही माने हो मोर जहा सोन की बडी पिकार म पदादा मा हो । इसलिए मोना मज कर दाम चुवान का यह तरीका चाह १-२ साल के लिए भले ही चर पर हरम के लिए निरन्तर इस तरीक का चताना व्यावहारिक नहीं हो सकता। दूसरा तरीका ह-जहा माल खरीदा वही लोगा में धन उधार लेकर माल का दाम चुकापा। यह तरीका भी विशष समय लिए चाह उपयुक्त हा पर निर तर नही चल सकता । निरलर उधार कौन दता जायगा? मासिर कमी ता वापिस जाना ही होगा। इसलिए यह तरीका भी निरन्तर नहीं चल राबता पब एक सीसरा तरीका है जाम एकान के लिए सवा व्यावहारिक होता है । यह तरीका यह ह कि अपने यहा बनी चीजो या पा अपनी मेवा या प्रमाविर में बेचार उमम जाय्य मिले हम
रपए को हामो
खरीदी, उसको कीमत चुकाने के लिए बदले में हमने वहाँ गहूं वेचा ।
अव गहूँ यहा मिलता ह १ रुपए का सर । बहा भाव ह १ मा वा
१० सर गहूँ। हम १ माक वहा भजना चाहिए, षयोकि हमन १ माके
की वस्तु ली है । तो हमको एक माक बुकान के लिए यहा १० सेर गहूँ
वचना पड़ा जिसका कि हम यहा स्वदे। म १३ रुपया देना पड़ा।
इसक माने यह हुए कि पहले जहा रुपए की कीमत १ माक पी, अब
१३ रुपए की कीमत १ माक हुई। दूसरे सोम हमारे रुपए की दर
१ माक से गिर कर ५० माक रह गई।--
मान
८० मार्क।
१९ रुपया
अर्थात २० प्रतिगान कीमत गिर गई।
हमारे द्रव्य की कीमत को शास्त्रीय भाषा में हुण्डी
को दर कहत ह । जब हमारे चलण की कीमत विदेशों में बती ह तो हम
पहंग कि हमारी हुण्डी की दर तेज है। हमारे चलण की कीमत गिरी, तो
कहेग कि हुण्डी की दर मादी है ।
विटेगी मुल्को
-
७ हुण्डी की दर गिरने से या ऊची होने से हमारे मुल्क के उद्योग धधो और पायात निर्यात पर क्या असर होता ह और वह अमर कसे होता ह इसका विवेचन भी कर लें। यह तो अब समझ म पा ही गया होगा कि पुलावट-नीति की रचना चलण में प्रतीक की बहुतायत की बुनियाद पर खडी की जाती ह और इसके पलस्वरूप जिमो के दाम चढ जाते है । जिन्सो के दाम क्या चढ़ जाते है, यह पहले हम समझ चुके । नाए की अधिकता के मान - विनाणा सस्ता है । नाणा सस्ता ह इमी भाव को हम दूसरी भाषा में यो भी व्यक्त कर मवते ह कि चीजें महगी ह । यदि फुलावट नीति द्रुत गति मे पाती ह तो फिर लोग मुद्रा की साप में विश्वास भी सा बठते है । इससे भी लोगा की रुचि मुद्रा म धन रोक्ने मे हट कर जिमो में पन रोक्ने की ओर ज्यादा बढ़ जाती है। ये सब के सब जिन्सो के दाम तेज करन के हेतु बन जाते हैं। पर एक और चीज है जो जिन्सा के दाम बढाने में महायक होती है। यह ह विदेश से मानवाली चीजो का ऊचा पडता । जब हमारी हुण्डीपी दर गिर जाती है तो विदेश म तो हमारे यहा मानवाली चीज के दाम चाहे वही पुरान दाम हा पर हुण्डी गिर जान से यहा का पता अपन-आप ऊचा हा जाता है। ममसन हम एक घडी वि मे मगानी ह । उसकी बीमत, मान लीजिए १० मा ह । पुराने हिसाब मे १० मार के मान पे १० रुपा । पर चूदि पव हमारी हण्डो की दर २० प्रतिगत, जमा कि हम ऊपर बता चुमे, गिर ई इमलिए १० पिए ये हमें कुल ८ मार ही मिलते हैं। इम मान रह हुए कि १० माक सरीदने के लिए हमें भय १२॥ रपए की जरूरत है । इमवे मान यह भी हो गए कि जिम घडी का पडना पहर १० रपए का था वह प्रब १॥रपए का हो गया। इमी तरद हमारी निर्यात या चीजो का पडताना वा जाता ह..
४६ पए की कहानी - इस तरह--मान लीजिए कि हम यहा म बाहर रुई भात ह और १ गाठ रई के दाम जमनी में १०० माक पहले य । उसके मान थ पुरानी हुण्डी के हिसाब से, १०० माक - १०० रुपए । अब भी मान लीजिए जमनी में मई की कीमत वही १ गाठ क १०० मा ह। पर चूकि हुण्डी की दर गिर गई इसलिए १०० माक को बच कर हम रुपया खरीदते ह तो ८० माक = १ रुपया इस हुण्डी की दर से हमें १०० माक के १२५ रुपए उपाध होते है । इसके मान हुए कि मई के नियात के लिए पढता लगता है १२५ रपया प्रति गाठ जो पहल १०० रुपया प्रति गाठ था। विटेगो से पानवाली और विटगा को जानवाली चीजो का जय पडता बढ जाता है तो उन चीजो क चढ दाम देख कर प्रय चीजो के दामी अपने आप ऊच जान लगत ह । इस तरह अय वारणा के अलावा विरेशास सम्बय रखनवाली चीजों का पडता ऊचा होन की वजह से मा जि मो के नामो को ऊचा जान में महायता मिलती ह । हुएडी की दर और उद्योग धधे अब इस परिस्थिति में उद्योग धधा पर क्या असर होता ह इसका उत्तर तो साफ ह । जब जिता दाम ऊच जाते है तो कारखानार का मुनापा भी बढता ह । यह मही ह कि जिसो के दाम ऊचे जावह तो कच्चे माल के दाम भी बनते ह । पर इतना हान पर भी कारखानदार या प्रय माल उपजानवाले लागा (जसे विमान जुलाहा, खटीक इत्यादि) क मनाप का वृद्धि में कोई रुकावट नहीं होती। बतौर उदाहरण हम एक कारखानदार क काल्पनिक पडता का जरा विग्लेषण कर लें।हर १०० रुपए के माल पर मान लीजिए कारखानगर का खच नीच लिप अनुसार होता ह - रुपया २५ कच्चा माल मजदूरी घिसाई ५ रूपए की कहानी अब मान लीजिए पुलावट नीति कारण जिन्मों के दाम बद और जिम मार का कारमानार का पहर १०० रुपया मिरता था उसका अब १२५ रुपया मिरगा। इस माय माय मान लीजिा वन्च माल का दाम भी बढा और मजदूरी भी उमी अनुपान स वही ता फिर मुनाफ पर क्या अमर हागा नीच तलपट में इनका म्पष्ट पन्जाग जाया पुगनी कीमत नई कीमत सपा पिया कामाल ५० २५ घिमाई ५ " मनापा १० १०० १२५ उपरात तक्मीलम पता लगगा कि जहा वच्च मात्र प्रौर मज दूरी का दाम २५ ग्पया प्रतिशतक बग वहा घिमाइ मौर व्याज में पुराने और नए पच में पाइपर नहीं पड़ा । कारण प्रत्यम ह । बगा कि हम पहर बता चकह पुलावट भोर गिरावट के कारण ऐन-जन की रकम पर का प्रभाव नहीं पडता । १०० रुपए हमने बज गया या तो माज भी हमें १०० गया ही चाना है। इसलिए ब्याज पर कोट प्रमर नर्ग पडता । घोर घिमाई पर भी या प्रमर पहगा। इसलिए मनापा जो पहर १. सपा एक पा पर था वह प्रब १६॥ हो गया । या तो यों भी हा माना कि वारसानदार की मात्र यह विहकि पहल रहा बाहर की चीज का पडता १०० रुपए पा मोर गरसानगर मनाम वो अपुग रसन हुए १०० रुप में कम में नहीं वैध मानाचा मात्र वह विदेशी माल का पहना १२५ रुपया होन पर भी १० रुपमाही मनापा गयनो ११० म्परा १२मान में वन माना ।
रपए की कहानी इस हिसाब स यह सही ह विकारखानदार का मुनाफा बढ़ गया और दे वह अपन दाम नहीं घटाता तो मुनाफा १० के बजाय १६ हो गया नो ६॥ प्रतिगत बढ़ गया । पर साथ ही यह भी जानना चाहिए कि सो के दाम बढन के कारण उस मुनाफ का ताक्त ६२।। प्रतिशत नहीं की। यनि जिसा के दाम भोसतन सवाए हो गए ह जसा कि हमन हिमाव गया ह तो फिर दाम बढन के पहले जो करामात १३ रपए में यो वही ज १६। मह । मान लीजिए कि पहले १३ रुपए में १मन पाट मिलता और अब पाट के दाम बढ़ कर सवार हो गए -प्रर्यात् १६। हो गए, पहले के १३ और भवने १६॥ रुपए की त्रय शक्ति में कोई फर नहीं हा। बर। तो अब इस परिस्थिति के दो अपर माय साथ हुए। एक तोम्वनी योग धधो पर और दूसरा विदशा आयात पर और निर्यात पर। स्वदशी द्योग घघो पर अच्छा प्रमर हुआ । विगी नायात मुरझान लगा और र्यात पनपन नगा। सबसे पहले स्वरेगी उद्योग धधा को लीजिए। यह स्वाभाविक है कि जव मुनाफा बढ़ता ह तो कारखानदार या ल उपजानवाल को ज्यादा माल पदा करन को चाह होती है । ऊपर हिसाब से हमन मान लिया है कि मजदूरी भो अय जिन्सो के दामो के य माय बरन लगती है । पर व्यवहार में एसा होता नही । जव जिसो दाम बढते ह तो मजदूरी भी जब तक उसी अनुपात से नही बढ़ती त धारखाननार को हमारी क्त से भी मनाफा अधिक रहता है। पर फलस्वरूप कारखानदार माल ज्या पदा करन लगता है कार निा बढान भी उगता है । नए नए रवान भी खुलन लगते है । अधिक गो को मजदूरी मिलन लगती है। इसका प्रभाव बाहर से मानेवाली चीजो पर भी पड़ता है । चूषि कार निदार का मुनाफा बटा है, इसलिए उसमें यह ताक्त पा जाती है कि ह मनाप को थोडा कम करके भी विदेगा चीजो मुकावर ममपना ल सम्ता बच सके ।विगी चोगा का एमा प्रतिद्विता म टिकना मुश्किल गता ह । विगी प्रायात पर इससे बुरा असर पड़ता है।
रुपए की कहानी इसके विपरीत, नियात पर अच्छा अमर होता ह क्योंकि जब ऊचे पडता की वजह से यहा दाम ऊचा हो गया पर वियों में हमारी चीज का दाम वही पुराना है, तब यहा के उपजानवारे पाडा-मा यहा मार मंग कर दें तो विस मार पुरान दामों में भी मम्ठा हो जायगा । और इम तरह दिनों में हमारे माल को वित्री दगी । सारा यह कि अपनी मुद्रा की कीमत गिरा दने से हमारे कल-कारवान, उद्याग पप सब पनप उठत ह विनी पायात पर प्रहार होने लगता है. विपी निर्यात जागन लगना है। इस तरह देश की समादि वरने लगती है। दर गिरने में लाभ स्थायी या अम्पायी ? यह प्रान हो सकता ह वि जराहण्टी के हरपर से या महा की कीमत नमकरदेन से मटि बदन का क्या वास्ता वास्ता है । वह इस तरह से। एक पालखी मनुष्य है, वह न त बोता ह न महनत करता है। इमलिए दारिप न उसके घर पर प्रभाव जमा रखा है। भव किमीने उसमे रहा कि हम तुम्हें रोजमरा कुछ पिठाई बिनाएग छ तमारा दिया एग और कुछ पन्ध का भी दो वातं कि तुम अपन सत को मेहनत माय जीता और उसमें जो पसल हो उसरा आपा हिम्सा हमें ददो। वह मालसी मिटाई मोर प्रच्छ कपडा प्रसासन में प्रावर काम करने लगता हपौर प्रत में प्रच्छी फ्मल तयार करताहामल माघ हिम्से की मामन्ती वह प्रलोभन देनेवाले म जन । मोर ना । इस सजन सातो उमन जितना मिठाई इत्यादि पर मच पिया पा उमको पूरी कीमत उमपम आर हिध्य में म बसून हा जाती है और उस पानमीको प्रदा पान पहनने को मिला, और पापा पमर मिती जिससे उसकी मदि बढ़ गई। इसक अलावा उनकी मातु भी तो बसीरामपरत. करत वह पानमी मील बन गया । प्रसामननवाले सजना बुध स्यप नहीं हुपा, पोर पालपा समय बन गया। प्रदोई कहे हिलरी की दर गिरन और मटिस या वास्ता? ता यह भी रहा गावाहनिपातमी मिष्टान्न भोरन ममकी समृद्धिा या वादा' पर बात यह ह मिगिरती हुईहपोशीदरा ५० रुपए की कहानी दूसरे शो में गिरती हुई मुद्रा की कीमत माल उपजानवालों के दिला में एक तरह का उत्साह और तष्णा पदा करती है जो उह ज्यादा काम करन के लिए खदेडती ह और इस तरह देश की समद्धि पर इसका अच्छा प्रसर होता ह। ठीक इसका विपरीत असर गिरावट की नीति का होता है। हमने यह बताया है कि यह अच्छा प्रसर मुद्रा की गिरती हुई कीमत का होता है । पर एक दफा कीमत गिरा दी गई, फिर भी क्या उसका असर होता है 7 होता ह पर माशिक । हमने पप का पहिया घुमाया और पानी कुए में से निकलन लगा । जव पहिया घुमाना बद कर दिया तब पानी भी निक्लना बन् हो गया। इसी तरह जव हुण्डी की दर गिरती ही रहती , तब तो चीजो के दाम भी घरते ही चले जाते ह और उससे पदा होन वाले नतीज-जसे उद्योग धधो की उन्नति अधिक माल की पदाहा बकारो को रोजगार विटेगी आयात को ठम निर्यात की पुष्टि इत्यादि अपना प्रभुत्व जमाए रखते ह । उसी तरह हुण्डी की गिरी हुई दर भी एक जगह भार जब स्थिर हो जाती है और लोगा को उसकी स्थिरता में विश्वास मा जाता है तब गिरती हुई हुण्डी स जो नतीज पदा हुए ५ वे धीरे धीरे करके रफा होन लगते ह--प्रर्थात पप में से पानी निकलना धीर धीरे बद हो जाता है। पर इसके मान यह नहीं कि हुण्री गिरा कर फिर स्थिर कर दी तो उसका कोई असर ही नहीं हुमा । जोपानी कुंए से निकल पाया उसकी की तो कोई कीमत ह । उम निकले हुए पानी से हमन सिंचाई की धान पदा दिया उसस हम पुष्ट बने । पुष्ट बन कर हमने मेहनत ज्यादा की। उस मेहनत से फिर नई सम्पत्ति पा की और इस तरह से समद्धिचत्र जो चला तो फिर पलता ही गया। इस दृष्टि से गिराई हुई मुद्रा की दर का लाभ भी एक दृष्टि से स्थायी-सा हो गया। पर यह भी कोई कह सकता ह कि फिर हुण्नी की दर गिरने से इस तरह लाम होता ह तो हम दर को गिराते ही क्या न जाप? पिर पर ही क्यों ? इस रामबाण भौषधि म अघाना ही क्यों ? प्रमोम । मार रुपए की कहानी ५१ ध्वज के सेवन से शरीर की चपलता अवश्य बढती ह, पर वह स्वयं मनुष्य की क्षुधा को नहीं मेटता । और ज्यादा सेवन से तो शरीर का अन्त भी हो सकता ह। फिर यदि हम मुद्रा की दर को गिराते ही चले जाय तो एक समय ऐमा पा सकता है कि जव मुद्रा की साख में क्सिीको श्रद्धा ही न रहे प्रौर मृद्रा स्वयं नेस्तनाबूद हो जाय । और फिर तजनित हानि-लाम भी यहा रहे ? जब शरीर ही नहीं तो प्राण हा मद्राही मर मिट तो उसमे होनवाले हानि लाभ बहा रहे । और यदि मुद्रा की कीमत गिरा दना ही एक जादू का डडा हो जो एक पल में समद्धि पटा कर दे, तो फिर हर मूल्क ही इसका प्रयोग क्यो न परे ? भोर यदि हर मुल्क इसका प्रयोग करन लग जाय तो दो देनो के बीच जो हुपरी की घटा बढ़ी से हानि लाम होता ह वह होने ही नहीं पाए । दो लकीर पास-पास में हो, और एक बड़ी हो तो दूसरी छोटी पहलायगी । पर यदि बडो को काट कर बोटी कर भी जाय तो, जो पहले छोटी थी वह अब बडी कहलायगी। हुण्डी गिरन के मान भी तो पही है कि हमन अपनी मुद्रापी दर गिरा नी, भय मुल्क वाला ने नहीं गिराई । एसी हालत में अपेक्षाक्त हमारी मुटा मस्ती हो गई। पर पति दूसरे दावालोन भी गिरा दी, तो फिर हमारी हुण्डी की दर दूसरे दलो के मुरायले में नीची नहीं रही। पर ऐमी हालत में पिगी मायात निर्यात पर कोई भच्छा-बुरा असर नहीं हुआ। बताना तो यह हरि हुण्डी करने का असर पूर्णतया म्पायी नहीं है,एक प्रा में स्थापी ह । मकरध्वज-सेवन का कुछ तो लाभ गरीर को मिलता ही है। हुण्डी गिरान से समाज की प्राधिक स्थिति को जो एक मनचा लाभ मिलता है उसका स्थायी पमर मा रह हो जाता ह । ठीक इसके विपरीत,गिरावट नीति द्वारा मुद्रा की दर चढा पर समाज को पार्थिक स्थिति को हानि पहुच जाती है वह भी स्थायी नवमान पर बठती है । याती में जो मेल लगा उमा पाव तो हम गया, पर उमरा दाग ता रह ही गया और वह जगह मा समाये लिए नानुप बन गई। पभी-कभी तो ऐमा देखा गमा हरि संमार की बड़ी बड़ी ऐतिहासिर पटनामा की सहम एर छटी-मी घटना हुई है, जिसको इतिहाम जिपने वालो नेम महत्व दिया। प्रतिया के फोरिषदी प्रेट को महान पाने T - ५२ रुपए को कहानी का मौका या मिला कि आस्ट्रिया का शाहगाह मर गया । पर प्रास्टिया का शाहन्शाह भी तो इमलिए मरा कि वह एक रोज कुकुरमुत की तर कारी बहत परिमाण में खा गया। विधि का लिखा को मेटनहारा' यह उक्ति सही ह । पर विधि भी जब कोई बडी होनहार को घडने वठता है तब शुरुअात एक नगण्य चीज से करता है । मास्टिया के शाहजादा के खून न यूरोप म खून की नदिया वहा दी। दुर्योधन और अजुन, जब दोनो श्रीकृष्ण के पाम महाभारत युद्ध के लिए सहायता मागन गय तव यदि दुर्योधन श्रीकृष्ण के सिरहान न वठ कर पतान वठता या तो थोत्रण की मेना न लेकर स्वय श्रीकृष्ण को अपन पक्ष म लेता तो महाभारत युद्ध का पत क्या होता यह बताना कठिन है। पर कोलम्बस न अमेरिका का प्राविष्कार किया और नई दुनिया से व्यापार रोजगार चमक उठा । उसके कारण यूरोप भर में सरस जी फल गई एमा यूरोप के पार्थिव इतिहामज्ञ मानते । ममेरिका की भूमि क्या मिली यूरोप के लिए तो गडा मोना मिल गया। और केलीफोरनिया में तो सचमुच सोन की खान मिल गड जिहोन यूरोप की मद्धि की खूब वद्धि की। इन सबका यूरोप पर कितनी मात्रा म असर हुमा यह चाहे न मापा जा सक पर जो जाहोजलाली की वाढ पूरोप में मा गई उसन उसको मदा के लिए सम्पन्न कर दिया, इसमें पोई शक नही। इसलिए हुण्डी गिरन का प्रसर चाहे अस्थायी हो पर एक मतबा मिला हुमा महारा कमजोर गरीर में पनपन में कापी सहायता पहुचा देता है। फुलापट-नियरित ओर अनियनित पुलावट-नीति के शुभ परिणामो का भी हमन जिन दिया भोर प्रति मात्रा म उमरे बुरे नतीज का भी वणन किया। यहा यह समझ लेना चाहिए कि जहा पुलावट-नीति पेवत व्यापार रोजगार को चमकान के लिए उद्योग घघो को पनपान के लिए काम में लाई जाती है वहा फुलावट म्वप मात्रा में मोर नियंत्रण के साथ उपयोग में लाई जाती - " रुपए की कहानी हम बना चुके हैं कि जब पुलावट द्रुत गति स अनियत्रित होकर लिनी हनव व्याज मस्ता नहा महगा- अत्यन्त महगा हो जाता ह। महगा व्याज भी रोजगार व्यापार के लिए घातक ह । इसलिए स्वेच्छा से जब फुलावट शस्त्र का प्रयोग हाना ह नर मारी नीति पर इस हिसाब में नियत्रण रखा जाता है कि जिसमे मिक्के की साख में से लोगो की श्रद्धा न टूट, लोगो में इसके सम्बध में भय या घबराहट का मचार न हो ब्याज की दर माधारणतया ठीक हो और दामा में तेजी इतनी ही पाव जितनी कि सचाल चाहत हा। इस मान यह हुए कि एसी नीति तो स्वच्या मे ही काम में लाई जाती है और उसी हालत में काम म लाई जा सकती है जबकि देश की सरकार प्रजा का विश्वासमाजन हो बलिष्ठ हा और दश और परल में उस सरकार और उम देश की पूरी धाक हो। और चूकि यह सारा का-सारा सल अपन दा में उद्योग घधा को प्रोत्साहन दन के लिए भौर लोगो में नई प्राधिक जागति पता करन के लिए सला जाता है इसलिए यह पुलावट भी स्वल्प मात्रा में ही होती है। पर इसके विपरीन, जहा फुलावर अनियन्त्रित होती है-जसा गि कम जमनी वगैरह में सम्बध में हम ऊपर बता चुके ह-तव इमका परिणाम दूसरी तरह का होता है । यह सही हदि उम पुलावट में भी पल कारमान बेहद पनपत निखाई दने है पर मुद्रा की ननि काम जार सहास होता चला जाता है कि वह वरोडा वा मुनाफा हजारापे मुकाबले में भी बलहीन होता है । और दूसरी तरफ सरकार पर दा की गाव में इसने जोर वा धावा पहचता है कि जिन पाम पूजी होती ह के तबाह हो जात हजाग प्रपना माल मत्ता, सपत्ति मानि बाहर भने लगने ह । परम्पर की माय म भी विचाम हट जाता है। पन्तर्राष्ट्रों में भएकी माय दोगे की रह जाती है । मारा प्राधिक तर छिन्न भित्र हो जाता है। एमो स्पिनि भव य ही प्रवायवीय है, और यह स्पष्ट है कि जान बूझ कर एमो रिपति का कोई निम का नही रना । यह तो मजबूरी में है । देशका रिवाला निकन रा दूसरा नाम यह उप फुलावट ही पाती ५४ रुपए की कहानी है, जिसे राज दुराजी के जमान म ही सरकार बलात बाध्य होकर अपनाती ह । सरकार को जब राजतन्त्र चलाने के लिए कर संग्रह म भी कठिनाई मान लगती ह सब कागज स्याही प्रौर प्रस की शरण लेकर इस जोर से नोट छापना शुरू करती ह कि इस ताण्डव नृत्य को दत्र फर एक छिन के लिए भी कोई अपन पास नोट रखन की हिम्मत नहीं करता।
हम बना चुके हैं कि वसण का मूल्य स्थिर नहीं पर पटना-बरता है । ता भी जन-ममाज के मन पर एक एमी पायी पौर वबुनियाद छाप पड़ी हुई है कि चलण वा मूल्य स्थायो ह । यति एसा नहीं हाता ता जिम निभयता के माय लोग रुपया उधार देने ह और मरकारी कागजा में लगान ह वसा कभी नहीं हाता । पर मनुष्य तो प्राय वजमान का पुजारी होता ह और पुरानी स्मृति षटु मी हो तो उम भूल जाता है । इसलिए जब तक कोई भयकर युद्ध, विप्लव या मास्मिक घटना के कारण चलण की वोमन दुरी तरह नहीं गिरन लग जाती तब तक साधारण मनुष्य को को पना भी नही चलता कि चतण की कीमत गिरी ह क्या । साधारण पुला वट पनि नियत्रित हो तव ता पाम जनता का पता भी नहीं चलता कि परेक पाय क्या नाटक खला जा रहा है। तो भी जिन्मा लामो पापडा का हम मूश्म अध्ययन करें तो हमें सहन ही पता लग जायगा कि पिछर मो माला में वनण व मूल्य में घटा-बड़ी होती ही रही है। जिमों के दामा के माह स नयार होत ह इस शिप्त विवरण भा जान लना चाहिए । मान लीजिए कि हमार दा गरीब किमान अधिकतर गेहू, बाजरा मोठ, चना, पी तन, नियामलाइ, पहा, गुरु, इत्याशि-४० मा ५. चीना का उपयोग करत ह । नोमाकड तयार करन वाल विगत उनमव जिमाके तामाका एक गड-पहता निकाल रते है। व गड-पड़ता साधारण ताहा या निकाला जाता ह कि जिस सालको हम बनियादा माल मानते ह उमा गड पडतारापर मो मान लिया जाता है। मान लीजिए मन १९१४ का हमन बुनियादी साल माना। उस साल में गहू का भाव था ५रुपया मन जौ का भाव था ४६पया मन तरका भाव या २०पया मन घोरामाद था ४० रुपया मन रुपए की कहानी गुड का भाव या रुपया मन कपडका भाव था ४ पाने गज (यह महज उडाहरण ह इमीलिए ४० ५० चीजा के दाम न देकर मिफ ६ जिसो के दाम लिए है।) तो हमने उम साल की जिसो की कीमत १०० प्रक पर कायम कर दी । अब १६४१ म मान लीजिए - गहू का भाव था ६। रुपया मन (यान २५ प्रतिगत वढा) जी का भाव था ५ रुपया मन (यान २५ प्रतिशत बढा) तेल का भाव था १५ रुपया मन (याने २५ प्रतिशत घटा) घी का भाव था ८० रुपया मन (यान १०० प्रतिशत बढा) गुड का भाव था २॥ रुपया मन (यान ५० प्रतिशत घटा) कपड़ का भाव था ६ पान गज (यान ५० प्रतिशत बढ़ा) १ वस्तु म २५ प्रतिशत बढा २२ बढा २५ घटा बढ़ा घटा १ १ १ , " बढा तो १२५ प्रतिशत कुल वढा और ६ जि सों द्वारा १२५ प्रतिशत यो विभाजित किया तो पल यह निक्ला कि एक जिम पर २० प्रतिशत वृद्धि हुई (8% २० प्रतिशत)-अर्यात जिन्सा की दर १०० से बह कर १२०१ हो गई। तापय यह हुआ कि जिम पलण की अय शक्ति १९१४ म १०० थी वह १९४१ में २० प्रतिगत कम हा गई । दूसरे लो म, चलण का दाम २० प्रतिशत गिर गया। सूचफ ग्रक इस तरह जिसा वी दर जो प्रा तयार किय जाते ह उह हम 'सूचक मक" के नाम से पुकार सक्त ह । अब १९१५ स १९४० तक ६ सूचक मानीच की तालिया मदते हैं। इससे पता लगेगा कि चलण की कप शक्ति में स्तिनी घटा बड़ी हुई ह, अर्थात् चलण को कोमन किस रुपए की कहानी ५७ " " " , १०० कदर घटता या बदनी रही ह । कलकत्ते में कुछ सास चीजों पे थोक दाम १९१४-१०० प्रोसत १९२० ग्रीमत १४५ १२८ १९२६ १४१ १९१७ १६३० १६१० १७८ १६१६ १६३२ १६२० २०१ १९३३ १६२१ १७५ १९३४ R १६२२ १६३५ १६२३ १६२४ १९३७ १६२ १५० १६३० १६२६ १०० १६२७ १६०० १२० पर यह भी सहा ह कि चलण की कीमत के म्यायित्व में जिननी अक्षा यूरोपवासिया की रही उतनी इस देश के लोगो की न रही । हमार पिछले इतिहास में समय-समय पर इतन राज्य वदसत रहे हैं, इतने दगमा हाते रहे है कि इस कारण भारतवासिया को स्वभाव सही सीन चादीम मोह उपादा रहा । इस विपरीत इग्लिस्तान में, बाहर के पात्रमणों स मुक्न रहने की बजह, वहा क लोगा में काफी ममन बन रहा। नतीजा यह हमा कि स्वभाव से ही पारों भोर शान्ति मौर म्यवस्था दिखाई मी रही, और इसलिए उहें अपनी सरकार की साख में यदा भी ज्याग रही। लदन नाणे वापर यह बाजार पन गमा और भाजो की दवा-न्मी हमन भी सरकारी कागजों में पौरतरह तरह गमरो में रुपया लगाना सीख लिया। चलण की कीमत गिरती माई है पर बताना तो यह था कि पलण की कीमत स्थायी नहीं रही पौर दूसरी बात यह बतानी पोलिग की कामत गिरा कर अपना लू " " १४८ रुपए की कहानी पीधा करन का तरीका इतिहास में हर सल्तनत ने-जब वह विपरग्रस्त हुई तय-बिना किसी हिचकिचाहट के अख्तियार किया ह । रोमकी प्राचीन सरकार न हजारो साल पहले अपन घलण को प्रशत खोटा करफे अपना खजाना भरा सभी से हर सल्तनत न यह पाठ सीख लिया । पौर चलण क दाम गिरा कर प्रजा को बिना जानकारी के कर धमूली का यह प्रभुत सरीका मोके मौके पर हर सरकार न विपत के समय अपने लाभ के लिए कामयाबी के साथ प्राजमाया। बात यह है कि सिक्का जसा भी हो अच्छा या बुरा, उसके चलण का सपूर्ण अधिकार तो हर देश की सरकार के पास रहता है। और इस अधि कार का दुरुपयोग करके भी यदि कोई सल्तनत अपना दिवाला दबा सके और राज्यच्युत हाने से अपन मापको बचा सके तो कौन एसी सयमी सल्तनत हो सकती है जो इस अधिकार का दुरुपयोग करन के लोभ का सवरण कर सक । इसलिए जहा किसी सल्तनन पर माफत आई कोई बडा बलवा हान को ह या कोई बड़ा युद्ध छिड़ गया और धन की बड़ी राशि की जरूरत मा पडी मोर प्रजा सीधी तरह से देन को तयार नही, यदि जबरन लिया जाय तो क्राति की माग धधक उठतीह लोगो की रही सही सहानुभूति भी गायब हो जाती है, तो एसे विकट समय में सबसे सीधा और सहज माग कर वसूली का यही रह जाता ह कि नोट छापे जामो और उसीस अपना सच चलाए जामो। धन की जरूरत पड़ी और सीधी अगुली से घी न निकला तो फिर चलण के दाम गिरा कर टढ़ी अगुली से चाहे वह फिर अधिकार का दुरुपयोग ही क्यो न हा-घी निकाला पर एक बात मौर है । चलण के दाम गिरान म एसो विपग्रस्त सरकार का तो स्वाप रहना ही पर प्रजा के एक दल विप वी भी सहानुभूति रहती ह । हमन पहले बताया है कि चलण के दाम गिरन से बजदार और बधी मालगुजारी देनवाले मोर भय एसे लोग जिनका नायित्व रधी हुई रकम में हो, उहें माभ होता है । इसलिए एस सब लोग चलण के दाम गिरन के स्वभाव मे हो पक्षपाती होते हैं, और विपद्ग्रस्त सरकार का तमाम एमे लोगा की सहानुभूति प्रपन प्राप मिल जाती ह । प्रख्यात प्रपशास्त्री थी यस न सच कहा ह- रुपए की कहानी ५६ "चलण का मूल्य जब गिरता है तब उसका लाभ केवल सरकार ता ही सीमित नहीं रहता । विमान, पजदार और प्रय ताग जिह अपन अपन पत्र में एक निधारित रकम नी पडती है.-मसलन व्याज या माल गुजारी इत्यादि व मत्र-क सब इस लाम में शरीक हो जान है । जस धायिक क्षत्र म प्राजकल व्यापारी लाग समाज के एक रचनात्मर और रियारक प्रग मान जाते ह बसे ही प्राचीन समय में विमान इत्यादि एक विशिष्ट प्रग मान जाते थे और सन्तनत पर इनका प्रमाव तो पड़ता ही रहता था। पोई भी सासारिप परिवतन, जो द्रव्य के मूल्य को उस पहुचाता था वह नए पादमिया के लिए एक रसायन का काम कर जाता था। यह परिस्थिति पुरान लागो की दौलत का नाम करके नए लोगा क पास दौलत ला दती पी। जिन्हान धन सग्रह करके रखा था उनका खातमा कर व्यवसायील लागों को यह परिस्थिति सहायक हो जाती थी। कुदरत का यह सल एसा लगता ह मानो मग्रह और क्रिया के बीच के मग्राम में द्रव्य के मूल्य का गिरना प्रिया मा पा लेता रहा हा । दृष्य के मूल्य २ गिग्न की प्रति ने बपौता धन और उस पर पत्रवृद्धि ब्याज पानवाले इमान की खामियत पर काफी भागमण किया है । इसका नतीजा यह हुमा हवि वपोती सपनि का अक्मण्य हावर मोगन की वत्ति को इसन जबरदस्त धक्का मारा। इस परिक्यिा न हर पीढ़ी को बपौता सम्पत्ति के उत्तराधिकार से एक तरह से वचित-मा पर लिया। जो हा विपद्रस्त सरकार की जारतें और नजदार वा की आवश्यकताए, इन दा प्रभावान मिलार कमी एक तो कभी दूसरी शक्ति न द्रव्य व मूल्य का लगातार घटाना जारी रखा है। यह निया सावे ६०० साल पहल, जब पहले-पहल सिक्का चला, तमास यूनाधिक रूप से चलती मा रही है। पुलावट का यह एक गिलचस्प पहलू है। किस तरह समाज की भिन्न भिन्न प्रणिया का स्वाथ मि मूय साय वधाह, निस तरह जानबूझकर समाज की कुछ प्रणिया बलम क मून्य को गिरा दने के पा में रहती है और असाधारण समय में सुदरती हुई गल्तनत के लिए भी चला का मूल्य गिराना तिना उपयागी मन्त्र है, यह ऊपर थे कपन स जाहिर हालाह।
8 फुलावट एक तरह का पर-प्रच्छन कर है, यह कम लोग जानते है । पर यह ध्रुवसत्य ह कि एक कमजोर सरकार भी जिसके वर लगान क आय सव साधन सूख गए हो और जिसके लिए कोई भी कर उगा हना असंभव-सा हो गया हो इस प्रतिम अस्त्र का उपयाग करके प्रच्छन्न फर उपाजन कर सकती है । इस प्रच्छन कर का यह मजा ह कि कोई कितना ही सरकार का विरोधी क्यो न हो वह भी इस पर स बच नहीं सकता। इस पहलू को कुछ और विश्लेषण के साथ समझाने की जहा हमने द्रव्य परिमाण मत' का जिक्र किया है वहा यह बतला दिया है कि अय सब स्थिति समान रूप से वनती हो तो जितना ही चलण में हम द्रय का अधिक प्रवेश करावेंगे उसी अनुपात से द्रय का मूल्य गिरेगा और जिमो के दाम बरग! इसका फिर एक गहरण दे देना प्रच्छा होगा। मान लीजिए कि मामा य अवस्था में हमारे यहा २५० करोड रुपए के नोट चलण में ह, जिनकी सोने की कीमत १० करोड तोला सोना ह । (एक तोला सोने की कीमत- २५ रुपए । इसलिए १० करोड तोला सोनाx २५० २५० करोड रुपए) तो यदि हमन चलण में २५० करोड रुपए के नोट और छाप कर डाल दिए, तो भी सोने की कीमत तो वही १० करोड ताले की रहेगी। पर चूरि चलण में नोट मब ५०० करोड के हो गए इसलिए जहा पहले २५० करोड रुपए के नोटो की कीमत १० करोड तोला साना पी प्रब ५०० वरोड रुपए के नोटरी कामत १० करोड तोला सोना रहो-प्रति नोगों की मोन की माप में जो कीमत पहले थी उससे प्राधी हो गई। इसके मान यह भी हुए की जिन्मो की कीमन दुगुनी हो गई-प्रार नोटो का चलण दुगुना हुमा उससे अनुपान मे नोगे का मूप तो पापा रह गया पर जिन्मा का मूल्य दुगुना हो गया।
रपए की कहानी अब सरकार को जो नए २५० करोड रुपए नए नोट छापन कारण हासिल हुए वह मारा-का-सारा धन उन तागा की जव से निक्ला जिनके पाम चलण की धरोहर पा~प्रर्थात् एस लागावी जव म निक्ला जा रुपमा उधार दने का काम करत य~~जम व साहूकार इत्यादि,या तो शिहूँ जव-वच के लिए भी अपनी जब में कुछ नाद रखन परत य । इस २५० करोड का अय-साक्ति प्रदाय ही पहल र मुवावर में घट गई, क्यानि जिमा के नाम जो बह गए । पर जब लावट-नाति पहर पहन गुरू हाती ह तब लोगा अमान पारण जिन्मों के दाम अचानक नहीं चढ़ जाा और इमलिए नए २५० राड की क्यक्ति भी शुरू गुरू में पहल से बिल्कुल ग्राघो गायट न होगी। अब सरकार इस तरह स यदि २५० वराह का पर उगाहती तो सक्डों झमर होन पचासा वरहा विरोध हाता पर-कानून बनाना पडता । इसके विपरीन इस तरह से चुपचाप नाट धाप कर चलण में प्रवेश करा दन म सरवार न चुपचाप अपना काम बना लिया। इम र मे रचना अमम्मरमा है कोई कह सकता है कि क्या इस पर कोई वव भी समताह हा अपना में बच साता ह पर व्यवहार में गायर हो । मातिर यह कर उमी को जवस निलता है जिसक पाम द्रव्य को पराहर हो । जमा हम पहल बता पा है यह पर एक तो इस तरह लोगा की पावट मे निक्षमता है जो उपार रुपया तह दूमर, एम लोग गि कय विषय के लिए रोजगार पर लिए कुछ न कुछ एपया ता सिलर में रमना हो पडना है उनकी जर स मो यह र निकलना। भय य दोनों तरह वे लोग पर स इस तरह बच सरत हरिपार दनेवारे तो उधार ना बन कर घर में जवाहरात इत्यादिरस छाडे, और प्रयविषयवाले नोट राम्यवहार तारना छोड़ दें। पर यह नामुमकिन है ! मूर पर उधार दनवाल शायद उधार देना बन्द कर अपना धन जिन्मों में रोष पर निम्प की मगर परोन के लिए रपए वा पवार र सना यह दवा मा में भी नहीं साल है। .
रुपए की एक महीने रुपए की कहानी हम गहरे उतरन पर देखेंगे कि रोजमर्रा की खरीद फरोख्त के लिए जो रुपया हम उपयोग में लाते हैं उसके कारण हर व्यक्ति पर यह नई तरह का कर इतनी कम मिकतार में पडता ह कि वजाय इसके कि वह रुपए का व्यवहार बन्द कर दे एक नागरिक इस कर को प्रदा करना अधिक पसद करेगा। हम एक अन्तिम सीमा का उदाहरण ले लें। मान लीजिए सरकार चलण में इतना द्रव्य प्रविष्ट करती है कि जिसके कारण हर महीन द्रव्य का मूल्य करीब आधा ही रह जाता है । अव यदि रोजमर्रा के यवहार के लिए हर मनुष्य दो दिन में ज्यादा फरोख्त क्यि हुए माल का रुपया पपन पास नहीं रखता तो इसके मान यह हुए कि में १५ बार पल्लाई हुई–अर्थात १५ वार भिन्न भिन्न कामो के लिए उसी रपए का उपयोग हुमा । द्रय का मूल्य गिरा एक महीन म ५० प्रतिगत । रुपए की पल्टाई हुई एक महीन में १५ यार । ता ५०-१५ -३३३ । अर्थात् हर मौरे को लेवा बची पर ३ ३३ प्रतिशत कर पड़ा। यान १०० रुपए में जिस सौते को खरीदते उसके १००+३ ३३, अर्थात् १०३ ३३ रुपए असल में प्रापको टेन पह। यह कर असाधारण जमाने के लिए इतना कम ह कि केवल इससे बचन के लिए ही कौन रुपए का व्यवहार बन्द करेगा। इमलिए जसा कि ऊपर बताया जा चुका है, इस कर से प्रत्यत विगेधो भी बच नहीं सकता, और निकम्मी स निकम्मी सरकार भी यह पर उगाह सकती है । अमल में तो इस रास्त्र का उपयोग भी वही सर कार करती - जिसका दिवाला निकलन जा रहा हो। हा अल्प मात्रा में, और नियंत्रण के साथ तो उद्योग घघो को पनपान के लिए जसा कि पहले बता चुके ह हर मच्छी मरकार भी फुलावद नीति को समय-समय पर काम में लाती है। पर यह भी सही है कि जिस तरह हर चीज को सीमा होती है वसे ही इस गस्त की करामान के बारे में भी कहा जा सकता है। जब साल में लोगा की पोई अदा नही रहती तब लोग महज वरील वित्री के लिए पौर मा मी प्रपात कम ममय के लिए ही अपने पास नोट रखते ह ।
रुपए की कहानी नतीजा यह होता है कि चलण को व्यवहार में लानवारे इतन कम हो जाते हैं कि फिर हजागें मन नोट छाप पर चलण में प्रविष्ट करने पर भी कोई लम्बी रकम सरकार को हासिल नहीं होती। इसलिए इस शस्त्र की धार मा प्रत में करीब करीब झूठी सी पड जाती है । एमी भयकर फुलावट का एक परिणाम और होता है । सरवार का पज तो अपने पाप चुक जाता है । जब द्रव्य का मूल्य इतना गिर जाय कि रपया एक कोडी का भी न रहे तो फिर हजारा प्ररवो का देना पावना भी केवल हिसाव-बहियो को शोभा की चीज रह जाता है और इस तरह सरकार का बज अपने माप रफा हो जाता है । चूकि सारा-का-सारा यह पर द्रव्य के धरोहरधारी फी जब से निकला इसलिए इसे हम पनि पूजी घर की भी उपमा दें तो यह अनुपयुक्त उपमा न होगी। पर यह यूजी कर घुमा के नाम पकडन-जसो चीज ह । सीप रास्त स पूजी कर लगान में मनुष्य शास्त्रीय विधि का उपयाग कर सकता है। पर लुढक्ती हुई मन्तनत में मीधा माग अख्तियार करन की हिम्मत बहा? इमलिए यह प्रशास्त्रीय और भद्दा माग एसी विपदप्रस्त सरकार के लिए ज्यादा प्रातान होता है।
हमन भवतक फुलावट नीति की चर्चा की। उससे पाठक के दिल पर यही असर होगा-और वह स्वाभाविक है, क्यावि सारे विवेचन में ध्वनि भी वही निकलती ह-कि फुलावट या गिरावट की क्रिया का सचालन केवल सरकार मा नोट प्रसारक बस के हाथ में ही रहता है। किन्तु यह बात मात हो सही ह । हद दरज की भयकर फुलावट या गिरावट का सचालन तो अवश्य हा या तो सरकार कर सकती ह या उसके इशारे से नाट प्रसारक व । पर एक सीमा के भीतर, फुलावट या गिरावट भय वक या अन्य साहूकार भी पदा कर सकते है । हमने बतलाया ह कि धन का प्रतीक मुद्रा, मुद्रा का प्रतीक नोट और नोट का या मुद्रा का प्रतीक घेक या हुडी हो जाती है । जिस प्रासामी की साख मच्छी है उसकी हुइ! भी धन ही ह । फुलावट या गिरावट नोटावे' अधिक विस्तार या सकोच स पदा होता ह क्योकि नोट धन के प्रतीक है। तो उसा तरह चका पर हुडियो द्वारा भी तो धनका प्रसार या सकोच दिया जा सकता है, क्योकि यह भी तो धन प्रतीक ह । यह इस तरह होता है- मान लीजिए एक वक है या एक साहूकार है । उसके पास रुपया सिलक म नरद पड़ा ह, अथवा सरकारी कागजो में कम ब्याज म रुमा पडा ह । न तो वह मत्रिय रकम किसी तरह के वाणिज्य व्यवसाय में लगती है न रन देन में काम पाती ह । उपार रेनवालो की कमी नहीं पर रहे मक या साहूकार की उस विष पूंजी से कोई लाभ नहीं मिल रहा है। भव व्यापार को पनपते दखकर पूजा के स्वामी उस बर या साहूकार की रुपया उधार न की इच्छा होती है । वह व्यापारिया एव मय उधार हेनवालो को रुपया देना शुरू करता ह और इस तरह उस धन का उपयोग होन लगता हा मत्रिय रकम अब सक्रिय बन जाती है और जितनी ही रकम सत्रिय बनतो जाती ह उतनीही बाजार में नाणको बहुतायत होती जाती है । उधार की फुलापट इस बहुतायत का वही असर होता ह जो नार प्रगार के कारण होता ह रुपए की कहानी ६५ रुपया बल्कि नोट प्रसार स पदा हुई पुलावट को अपेक्षा उधार-द्वारा की गई पुलावट कमी-कभी ज्या गक्तिशाली भी होती है। एक पराड़ रुपए का नया नोट हम वलण म डालत है और मौ करोड का नोट पहले से चरण महता साधारणतया यह कहा जा सकता है कि एक प्रतिशतक पुलावट हुई और उमका माधारणाया (यनि और कोई नया मसला उलट फेर का मौजूद न हा नो ) उमी परिमाण म दामा पर मी असर हाना चाहिए । पर उधार द्वारा एक वरोर की पूजी यति नाण के बाजार में प्रवेश करती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि उमालमों पर असर, एक करोड़ की लास्ट में अनपात म ही होगा। हम कल्पना कर सकते है कि किसी प्रामामी के पास एक लाख का गल्ला पहा ह जिमपर उम प्रामामी की रकम लगती है। उमे उधार न मिलन की वजह म उमगा हाथ का पडा। दर अचानर बैन से रुपए उधार मिल जात - । यब उसका हाथ पता हा जाता है। एक लाख रुपए म वह म तल का कारमाना मालता है। उसे भव सरसा की जरूरत पड़ती है। मरमा बचनेवा प्रामामो के पास मुदत से सरसों पड़ी थी, यह विन नग रही थी। उसे बच पर सरसा वाला भामामी एक वतन बनाने का कारखाना घोल ला ह । उमरे लिए ताचा मगेना ह । तावैवारे प्रासामी के पास मुदत स तावा पापा जो विक नहीं रहा पा । तावा विकत हो कर नया माल बरीदने नगता है। नया माल खरीदने समानवाला पाम बहाता है। चारों तरफ से मजदूरा की माग होन स ठलुए मजदूरा का काम मिलता है । व फिर ज्यादा पडा सरीने लगते है, तो वह की पदादा बढती है। उसने मान ह-ज्या मजदरा की माग, ज्या रुई की बरत । बस इस तरह से बाजार की रागना जा पीकी हो चली थी, फिर चमकती है। उस चगरा दूसरी चीजा पर प्रभाव परता है। इस तरह सन्पल हुई माशावान्तिा चारा पार पालतीहोर पाहीमी रकम सही सी पुलापर भी पा सकती है। हमन यह उपाहरण र मापा ग चटारर पर किया है । एमा ही होता है सो नहीं, पर एसा हो सकता। इतना ही बनाना है। गरम रुपए की कहानी यह ह कि उधार स पदा हुई फुलावट कभी-कभी अपने अनुपात स ज्यादा काम कर जाती है क्योकि उसके पीछ एक भावना रहती ह जो लोगों में माता का सनार करके कभी भी आवश्यकता से अधिक सरगर्मी ला देती ह । इसी तरह जब ब अपना उधार मिमेटती ह तो प्रावश्यक्ता से ज्यादा मुदनी भी पदा कर देती ह । अव हम दख सकते हैं कि उधार द्वारा भी धन का विस्तार और सकोच और तज्जनित पुलावट या गिरावट पदा की जा सकती है। नोटा व प्रसार और सोच स जो काम होता ह एक तरह से उधार के विस्तार और सवाच स भी वही काम होता ह । दोनो चीजें एक तरह से तो एक ही ह क्यो कि दोना क द्वारा धन का सकोच या विस्तार हो सकता है। पर बको या साहूकारों द्वारा धन का विस्तार अथात धन का चलण में प्रवेग तभी होता ह जव कि व्यापार चलता हो या तो मच्छ चलने की प्रा हो कारखान वाले कमात हा भविष्य उज्ज्वल दिखता हो । रुपया उधार देन में किसी तरह का खतरा न लगता हो तभी उधार का विस्तार होता ह । साख एक नाजुक चीज ह जो लाज वती पोय की तरह खतरे की माशका होते ही अपन डाल पात को समेट रेती ह । जहा ममय अच्छा प्राया व्यापार पनपन लगा कि पूजी वाल उधार दन म बहादुरी दिसान लगते ह और जहा खतर की घटा बनी कि वे अपना बारिमा-बधना उठान लगन है। इस तरह स उधार देनवाल भी फुलावट और गिरावट के कर्ता बन जाते ह। इस पुलावट या गिरावट को साख की फुलावट या गिरावट भी कह सक्त है। पर यह उधार की फुलावट या गिरावट सीमा के भीतर ही रहती है। किसी पूंजीवार के पास प्रगनित धन तो होता नहीं सन्यावद्ध घन ही होता ह । इमलिए बक या साहूकारद्वारा की गई फुसावट या गिरावट भी सोमा के भीतर बद रहती ह ।
पुलावर नीति का हमन विम्नार ६ माय जिन दिया। शिगवट का हमन ज्याला जिन नहीं दिया है। पर गाय यह ममभान की जमात नहा कि गिरावट का परिणाम हा वान में फुलावट म अन्दा हाता है। विप ग्रस्त मरकार धन उगाहन क लिए...चारों तरफ म उसकी चालक जाती है तब~~ पुलावट-नाति का आसरा लती - याताम्वन्प और नियमित मात्रा म फुलावर उद्याग धधा को पनपाने व लिए मी बाम में नाई जाती है। ना फिर यह प्रन हो माता - कि गिरावट-नीति वारदीरा क्व हाता. गिरावट-नानि ग्राम और न एमोदा में प्रयोग में लाई जानी ह जवनि सरकार ना म्यिन ह और पवम्या माय दिशाहतु लिए उम मकार न फुलावर-नौनि वा प्रयोग किया है, पर मात्राम बुध पाग फुलावट हा गड ह पोर इमलिए पुलावर का जाप टडा करन के लिए अवस्था के साय प्रब कुछ गिरावट-नौति का प्रमाग की माद याना ह । एमी भावयता पड़ने पर गिरावर-नीति का उपप्रयाग किया जाता है। पर जम फुलावट ववमी की चीज है बस ही गिरावट इम बात की पाउन हकि सरकार महीअनामत ह, उसकी ताकत या व्यवस्था में कोई बमबारी नीह। गिरावट में तो लप की माम दानी पड़ती ६। इमलिए यह काम एक स्वयित सरकार ही मोर मो मा विशेष हेतु के लिए ही पर सस्ती है। यह इसलिए म्वामाविष हि जिम तरह फुलावट मसीमित हो सकती ह वन गिरावट मीमा र बाहर नहीं जा मानी। पर गिरावर नानि प्रयोग के उगहरण ममार भाधिक इति हाम में नम मिलते है । ज्यादातर मागों न विवाहाकर पाता के उचाग घों की उन्नति बनिए, मावट-नीनि हो प्रयाग पिया है।
रुपए की कहानी इसलिए फुलावट-नीति के गुण दोषो का हम अच्छी तरह विवेचन कर ल तो काफी ह, क्याकि जो हानि लाभ फुलावट के ह उराको ठीक तरह समझने के बा- गिरावट के गुण दोप अपन माप समझ में आ जायग । जब गिरावट-नीति का प्रयोग होता ह तब फुलावट नीति से ठीक उल्ट नियमा को काम म लाया जाता ह–प्रति किमी भी बहाने नोटो को चलण में से निकाल कर नाटो की एक बवावटी तगी पदा की जाती है । सरकारी खच के लिए, मान लीजिए, आवश्यकता ह एक सौ करोड की और कर-वसूली की गई सवा सौ करोड की तो जनता के पास से पचीस करोड का धन खच लिया गया। और इसी परिमाण मे जनता की श्य शक्ति कम हा गई या तो याज ऊचा देकर बिना किसी हेतु के सरकार न पचीस करोड का ऋण ले लिया और उसे खचन के बजाय कोप म ही रख छोडा । तो इसका भी वही असर पडा-अर्थात जनता कीय शक्ति कम हो गई। गिरावट कर वाचनीय है ? जनता की क्रय शक्ति को कम करन की यह नीति एक तरह से तो दम घोटन की नीति-जसी लगती है। इसलिए एसी नीति को काम म लाना तभी वाछनीय हो सकता ह जब कि सल्तनत को यह लग कि जनता समद्ध ह मौर समद्धि के नग में वित्त शाठय करन जा रही है- अपति बूते के बाहर खच करन की या व्यवसाय करन को जन-साधारण की प्रवत्ति वट रही है, जिसका आग जावर परिणाम भयानक हो सकता ह । जब सरकार को एसी विपत्ति की प्राश का होती है तभी, जसे दूध के उपान को ठडा करन के लिए पानी से छाट दिया जाता है उसी तरह समृद्धि के उफान को-समद्धि को नही क्योकि समद्धि तो ठोम अमली चीज ह उफान धोखा है- प्रावश्यक्तानुसार गिरावट का प्रयोग करके शान्त करना प्रजाप्रिय सरकार का क्तव्य बन जाता है। सरकार न कर-वमूली से या ऋण-द्वारा जो धन जनता से खेंचा उसका प्रखीर तो व्यय ही करना ह। और वह व्यय उस समय पिया जाता ह जव कि उफान के बाद की सुस्ती के मारे जनता भयभीत होकर ।
रुपए की कहानी अपनी सारी प्रगतियो का बन्द कर देती ह व्यय में प्रावश्यक्ता स ज्यादा कजूसी करन लगती ह व्यापारी मदी से भयभीत होकर प्रपन हाथ-पाव सिमट लेते ह बकारी बढन लगती और जिसा के दाम गिरन लगते हैं। एसे समय जनता को फिर प्रोत्साहन देन के लिए अतिशय प्राई हुई मना को शान्त करन के लिए ठड खून म फिर से गर्मी लान के लिए, जनता से खचा हुमा धन सरकार खचन लगती है। और जहा खच शुरू हुमा कि फिर ताजगी पाने लगती ह । इसके यह मान नहीं कि हि दुस्तान में सरकार न जा गिरावट का प्रयोग किया वह इसी सिद्धान्त पर क्यिा और जब मदी न नवाही शुरू की तब उसको रोकन के लिए फिर पुलावट का प्रयाग किया। यहा की स्था तो निरालीह। इस देश में गिरावट नीति अक्सर इसलिए काम में लाई गई ह कि द्रव्य के परिमाण में कमी करके उसका मूल्य उचा पर दिया जाय । प्राग जव हम भारतवर्ष की हुण्डी का विवेचन करेंग तव गिरावट नीति से इस देश की जिन्सो के दामा पर, क्ल-कारखाना पर समद्धि पर और पायात निर्यात पर क्या असर हुप्रा गिरावट की नीति को सफल बनान के लिए से करोडो रुपए वरवाद क्वि गए इन मव बाता का विवेचन करन के लिए हमें वापी मौका मिलेगा।
१२ पुलावट म दामा म तेजा गिरावट म म दा यह हमने बतलाया ह । और फुलावट या गिरावर मुरयतया सल्तनत की मर्जी की चीज ह । क्म स कम सरगार सहोमलामत रहे तो बबसी की फुलावट को तो हम अनहोनी चीज व रार दे सक्त ह । इसलिए सीमाबद्ध फुलावट या गिरावट मरकार की में गा पर अवलम्वित रह जाती है । तो फिर यदि फुलावट में तजी और गिरावट से मदी होती है तो दाम करीब करीब स्थिर रमन के लिए भी कभी फुलावर तो कभी गिरावट की चाभी घुमाई जा सकता है । दूसरे गाम दाम स्थिर रखन के लिए भी इन दोनो तरकीबा का उपयोग किया जा मकता है । और दाम स्थिर रहना, यह भी ता समाज के लिए एक बेडा लाभ है। हम पहले बता चुक ह कि दामो की जी से माल उपजानवाला का लाभ पोर बधा पाय वाला को नुक्सान है दामा को मदी में इससे उल्टा। पर इम तेजी पदी के उलट पर म क्भा विसीको लाभ और कभी हानि से सामाजिक प्रसन्तोष फलता है गो बुराई तो ह ही पर इस असन्तोष के माथ-माप पदाइस पर भी बरा असर पड़ता रहता है। धीर धीरे लगातार तेजी चलती है तो पदाइ बरती रहती ह पर पिर जब दामो म मड़को प्राती ह और दाम गिरते ह ता कारखाना को ताला लगने लगता है वकारी बनती है और इसस समाज में गरीबी मान लगती है। उसस प्रमतोष बढ़ता ह । सम्भव है दाम स्थिर हो -कम म-बम एक परिधि के भीतर-ताशायद इस परिस्थिति से पदाइश को वद्धि भी हा भौर समाज के विभिन्न फिरपा में दामा की घटा बढ़ी स पना हुमा प्रमतोप भी न होन पाए । इस भावना से प्ररित होकर कई प्रषास्त्री दामों की साम्यावस्था को पुष्टि करते है। दामो की माम्यारस्था दामों की साम्यावस्था स इतना ही प्रयोजन हकि नाम के गूचक रुपए की कहानी अक (Inder Figure) की साम्यावस्था । यह तो नामुमकिन चीज ह कि हम सब जिसा के अलग अलग दामा की घटा-बडो को रोक सक। मान लीजिए एक साल गहू की फसल बहुत बढिया बठी और सरसा को मल मारा गई । तो गहू को बहुतायत से गहू को मनी और सरसो की कमी के कारण मरमा की तजी अवश्यम्भावी है । इस कोई नहीं रोक सकता । पर अलग अलग चीजा की तेजी या मली एक बात ह और मम्मिलित दामा की तेजी या मी दुसरी बात । जब मम्मिलित दामों की तजी या मन्दी पाती ह तभी समाज के एक प्रा को लगभ और दूसरे को हानि होती है। इस मम्मिलित दामो को नेजी पा मदी का गिरावट पा फुलावट की नीति द्वारा कापी दर्जे तक रोका जा सकता है। वह इस तरह सत्तपत दामा सूचक प्रसे का अध्ययन करती रहती है और बहा दाम कुछ बढ कि नाट प्रसारक व चलण में मे मागका निवात र धन का सपोच शr कर देती है जहा नाम गिर किनाटो का चलण बढापर विस्तार कर देती है । इस तरह + मकार विस्तार-द्वारा दामों का यथासाध्य साम्यावस्था म रसन की वागि की जाती है । मोर सम उम माधारणतया सफलता भी मिलती है। इस सारी किया वो विस्तार स ममझाने म छोटी मोटी अय कई नियात्रा का भी उल्लेख पराना पडगा। चूकि पाठका के सामने एक मोटी सी म्प रेसा दना ही इस पुस्तक का ध्यय है इसलिए ज्याला ब्यौर में उतरना प्रावश्यक नहीं है। बतलाना इतना हो हानि पुत्रावट गिराषट की नीति स दामा में तजी मतमोर साम्यावस्था तीना चीज लाई जा सकता है। पर दामा को साम्यावस्था में रमन और भी तरी ह । एक तरीका ता याग करके इमी महायुद म बहुतायत म वाम म लाया गया ह् । यह तरीका नया नहीं है पर 'इनन विनार मे इसी युद्ध में नाम में जाया गया - दमलिए इस नया उगवा भी वह मन है । यह तरीका है मालकी उपज सानोरामोपा नियत्रण करना। जब हम नोट प्रमार प्रधिक्ता मवर दामा वीतजी को प्रो. हन त ह या तो कम कर दामा की मदीना मादान बरत र दो ७२ रुपए की कहानी एक तरह से हम दामों की तेजी या मदी पर सीधा हल्ला न घालकर ऐसे टढ़ मेढे उपायां का प्रयोग करते है कि जिसस जनता की य शक्ति कमोवश होकर चीजा की उपज और विपत पर प्रपन प्राप प्रच्छा या बुरा असर पडता रहे। जनता के पास श्य शक्ति है और वह उसका उपयोग करके दामा को तेज करना चाहती है । उम क्रय शक्ति को हमन पर द्वारा या उधार लेकर अपन का में कर लिया। पलस्वरूप मब जनता बाजार से हट जाती ह और दाम गिर जात ह । या तो जनता की त्रय शधित का हास हा गया और इसलिए बाजार म सन्नाटा छा गया । सत्तनत न नए नए पच करना शुरू करके जनता की क्रय शक्ति बढा दी मौर जनता फिर बाजार में खरीदन के लिए प्रा धमकी और इस तरह बाजार में फिर जान प्रा गई । यह गिरावट या फुलावट का एक तरीका ह दामा को घटान और पढ़ाना। पर मान लीजिए कि आपके पास पसरय दौलत पड़ी है। उसका किसी न नही छीना । पर प्राप पर यह दपा लगा दी कि पाप अमुक परिमाण में ज्यादा किसी भी हालत म विसी भी वस्तु को खरीपन नही पावेंग और न दूकानदार विना सरकारी इजाजत के मापको कोई चीज बचेगा । तो फिर इसका परिणाम भी वही होता जाता है जो पलण वी समी-बगी स पदा दिया जाता है क्यावि पापक पास शक्ति होते हुए भी पाप यराद के हकदार नहीं रहे। यदि सरकार इस तरह की सारी हलचला वा नियत्रए पर डाल दि अमुर चोज की इतनी पाइश होगी हर मनुष्य प्रमुक मिकदार ही अमुक चीज की खरीत और खपत कर सकेगा वचनवार और रेनवार अमुक बघ हुए दाम पर ही बरीत पौर फरोख्त कर सकगें और जा को मरकारी हुक्म उदूली करेगा उसे सजा भुगतनी पगी तो फिर चाह क्सिी क पाग प्रमश्य धन क्या न पढा हा वह धन वकार सा बन जाता है और उसकी नियमित क्रिया के कारण दामो बी घटा-बी भी नियत्रित हा जाती - । अवाय हा यह दूसरा तरीका, दामा की साम्यावस्था लान या ज्यादा सीधा ह-पाठा टवा नहीं ह-पर इसके यह मान नहीं कि यह ज्यादा वाहनीय है। ।
रुपए की कहानी ७३ नियत्रण इमनरीक में याजना और सचान लिए अपमरा और कारिन्दो चा एकबहत मना बागना पडता है जो गत दिन इमी नामा में रहनी हरि किमी न इस नियम का भग तो नहीं किया। इतन नागरिका को कवल याजना और संचालन में लिए रोक रखना यद मी दा की ममृद्धि के लिए पर हानिकर बाज है। आखिर जब तक हर मारपी कुल पदाइश करता रहता है नमो तक दा को मद्धि बढ़ती है । यदि सब लाग मचालन म वा विवाद में मय और पुनिम में और एम अन्य व उपजाऊ घघा में ही लग रहे तो फिर समद्धि कहाँ ? इमष्टि म वही नराका अच्छा है जिमम कम-म कम भादमियों की शक्ति का हास हो। पर युद्ध-काल में इन मत्र नियमा की अवहतना करनी पड़ती है। एस विक्ट समय में ध्यय की रक्षा साधन गौण बन माता है । इसलिए एम नियत्रणा का उपयोग विक्ट काल में ही वांछनीय माना जाना चाहिए । यद्यपि म म गांनि समय में मी निययण का उपयोग किया गया ह पर गम ने सम्बन्ध में ना यह भी कहा जा सकता है कि वदा माति का ममप माया हो ना-~-विक्ट समय का हा दौर- और इसरिए वहा नियत्रण नौनि अमीष्ठ ही यो। जो हो दामा को साम्यावस्या नियरण म मा लाई जा सकती है यह मय पाठक समझ सकंग। अब पाठकों से विदा लेता हूँ।
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(उत्तर भाग) इतिहास
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अनेक को जगह एक मुद्रा का अथ चिह्न ह । बहुत काल पहले जब मिसा के लिए चादी या सोने के टुकडो का यवहार बढ़ा तब यह आवश्यक हो गया कि वे टुक्डे ठीक तौल के हो और प्रमा गस्वरूप उनपर कोई चिह्न बना लिया जाय । इस प्रकार सिरके का नाम मुद्रा हो चला । प्रश्न उठता है कि मुद्रा-सम्बधी कला इस देश की अपनी उपज थी या वह कहीं बाहर से पाई ? यहा के सिक्कों को तोल और बनावट दाना ही निराल ढग और धीर धीरे इस मत की पुष्टि होती जा रही है कि भारत ने इस विषय में न तो किसीकी नकल की, न विसीका अपना गुरु माना। 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका" ( वाख १६९७ ) में प्रकाशित स्व. दुर्गाप्रसाद जी का लेख इम सम्बप में पढन लाया है। आप लिखते है-- 'मुझे जहा तक खान बरन का अवसर मिला ह इसका प्रमाण मिला ह कि भारत में गौतम बुद्ध से पहले सिक्का का चलण था। उस समय के सिक्के मुझ प्राप्त भी हुए ह मापके व से पता चलता कि गौतम बुद्ध के समय में धादी के सिवका की तौल ४० पौर २८ रत्ती होती था। पम वापिण-~ये चांदी के तत्कालीन मिाश क नाम । सिको पर पहले विमी राजा की मूर्ति या उपाधि प्रक्ति करन की प्रथा नहीं की, देवल कुछ चिह्न- -जम हाथी, कुत्ता या वृक्ष-उप्यों से अस्ति रशिय जातभाईमा पूर्व दूसरी तालीस प्रहारा बाप्रयाग न लगा। कुछ समय तर प्रारत का बोलबाला रहा। फिर दवनागरी या हिन्दी का प्रयोग होने लगा। चादी का रुपया बनानेवाला रगाह था। उस सियों पर पूफी के साथ हिन्दी का भी स्थान प्राप्त पा। उमदे बट इस्लामगाह के समय में भी यही बात रही। श्रीयुत दुर्गाप्रसाद जो सिसते है --"इनरे समय ता ता मुदामो पर हिलीको वरावर स्पान ७८ रुपए की कहानी मिला पर जब मुगल बादशाह बाबर, हुमायू मोर अकार न अपन अधि कार जमाए और सिक्के चलाए तो उहान पहले कूपी अक्षरा में अपन नाम सिकको पर लिख । हुमायू न पहले-पहल फारसी अक्षरो का प्रचार भारत में किया। उसके पहले फारसी अक्षरों को, जिसमें उदू लिखी जाती ह, यहा काई नहीं जानता था । अक्बर और उसके बाद जहागीर शाहजहा पोरगजव इत्यादि सभी वादगाहा न पारसी का प्रचार किया। राजकाय सब फारसी में होते रहे। सिक्का पर भी फारसी अक्षरो को जगह दी गई और हिन्दी देवनागरी को हटा दिया गया।" भारत म सोन के सिक्का का प्रचार भी अत्यात प्राचीन काल सह। उहें निष्क पाद आदि कहते थ । कुछ विद्वानो का मत है कि ससार में पहले पहल सिक्के के लिए सोन का ही प्रयोग होता था, क्याकि सोना सुलभ पा और चादी दुलभ । सोना जहा मिलता था वहा सोन के ही रूप में उसे अलग करन के लिए कोई विशप परिश्रम या प्रयाम नहीं करना पड़ता था, पर चादी को वात और थी वह दूसरे खनिज द्रव्या के साथ इस प्रकार मिश्रित यो वि उसे निकालना या हासिल करना जरा टढा काम था। कहते ह कि उस युग में सोने से चादी का मूल्य कही अधिक था। क्रमा चादी निकालन के नान या विज्ञान की उनति होती गई मौर चादी की दुलभता मिटती गई। कुछ काल बाद स्थिति बिलकुल बदल गई । घादी सुलभ हो चली और सोना दुलम । मालूम नहीं, इस देश में इनका क्या कम रहा। पर इतना निश्चित-सा जान पडता ह कि प्राचीन काल में यहा सोना, चादी की तुलना म सस्ता या। फोलर कमेटी के सामन बयान देते हुए अग्रज प्रपशास्त्री मि. मकलियड ने कहा था- 'प्रति प्राचीन काल में भारतवप सुसभ्य था, और पा.चात्य देश मसभ्य या यबर । उस समय भारतवप को विगी वस्तुभों को कोई खास जरूरत नहीं थी और वह विना सोना या चादी पाए अपना माल बचन का तयार नपा । पर भारतवष में सोना और देशों की अपेक्षा मस्ता पा-ईरान में १३ भाग पादी एक भाग सोन के बराबर होती थी और अनक को जगह एवं भारतवप में भाग चाटी एक भाग माने में लेहाजा भारत में बाहर स चानी बहुत बड परिमाण में प्रामा करती जिम+ बदले में वहा स या वा मोना बाहर जाता या दूसरा माल । मोने चादी के इतिहास में अमरिका का पता चलना (१४९३) एक अयन महत्वपूर्ण घटना । यूरापवाला का माना कुवेर का निधि हाय 'ग गई । जहा मोन या चादी का~पर पिणपत चाटी का एक साया रण माता-मा वहना था वहा, ममुद्र नहीं तो एक जबदस्त नरिया लहरें मारन लगा। योड ही समय में यूराप की भूमि इन परिप्लावित हा चला और वहा + माथिक्-पत्र म पूरा इनक्लिाव नजर मान लगा। पाना पलर पर खत में दाना बदल गया। १४०३मौर १८०० नवाच मान और चारी उत्पादन वा तबमीना यह है माना चादी (लाप प्रोस) (लास आम) २०० १००० १७०१-१८०० ३८४२० उत्पादन की दृष्टि स १६ वी सदी में मान मोर चारी वा पारस्परिक भनुपात १ ३२ था--प्रति जितना माना निकला उसस ३२ गुना अधिक चाली निकली। १७ वीं सदी में यह अनुपात १w हो चला । पारम्परिक मन्य का अनुपात पहर १११ या--प्रयात एक माग सोना प्राय ११ भाग चारी बरावर हाता था। पर यह भव प्राय ११५ हो चना, और प्राय दो सौ साल तक--प्रपात १९ वीं मनी पिछले भाग नर--- यही कामम रहा। इम देश में यूरोप स चादी का पायात भर प्रौर भी मधिर हो चला। विगी बम्पनियों मुध्यत ईस्ट इंडिया कमनीया इस व्यापार पर एकाधिप य-सा था। उधरणात विहार मेंपोर मात भया मो मापिक-रात्र के प्रधिपति य मतिदावारय जगत्सठ । नवाद ने इन्हें ८० रुपए की कहानी । टासाल का इजारा द रखा था । लेहाजा चादी के सबसे बड खरीदार यही ५ । ईस्ट इडिया कम्पनी प्रौर जगतमेठ घरान के वीच के रन देन के सम्बन्ध पर और तत्कालीन व्यापारिक अवस्था पर यह भवतरण अच्छा प्रकाश डालता है- (१७४६) अक्तूब म विलायत म कुछ चादी पाई । कोमिन के प्राग्रह करन पर (जगतसेठा) महताबराय न उस सरीद लिया। इसस कम्पनी को कई लाख रुपए तत्काल मिल गए और कुछ दिनो तक उसे बज लेन की जरूरत नहीं पड़ी। पर नया साल शुरू होते ही अवस्था फिर बदली और ढाका के कमचारियो न कौंसिल से रुपया माग। इसी समय कुछ चादी भा पहुची । कौंसिल न उसे कासिमबार भेज दिया। वहा वह महतावराय को बच दी गई और उसर पेट कम्पनी को डढ लाख रपया मिल गया। पर यह रपया कासिमबाजार की कोठी को न मिला इसकी वहावाला न शिकायत की और कौंसिल को लिखा- एसे समय म जब कि हमपर कज का इतना भारी बोझ ह और कम्पनी की साख इतनी कम रह गई ह मापने यह रुपया मगाकर अच्छा काम नही दिया । महाजन पहले से ही अधीर हो रहे थ, मालूम नहीं, अब वे क्या कर बठग ।' कौंसिल न उहे लिखा कि हम और चादी शीध्र ही भजन वाले हैं। चादी कासिमबाजार भजी गई पर महतावराय न उस उसी दम रेन से इनकार कर लिया। ईस्ट इंडिया कम्पनी के पुरान कागजात से जाहिर होता है कि रपए की टान उस समय काफी थी और जगतसेठ न चादी का दाम घटा दिया था। वह १७४७ के उत्तराद्ध म २४० सिक्के रुपए भर चादी के लिए २०१ रुपए से अधिक देन को तयार न प ! कम्पनी अपनी चादी उनके हाथ परती जाती और बराबर दाम बढान के लिए प्राग्रह बरती जाती। पलासी की लड़ाई में विजय पाकर ईस्ट इंडिया कम्पनी बगाल विहार का मोर धीरे धीरे सारे भारतवप का, भाग्यविधाता बन बठी । जगत् सेठा न इस राज्यत्राति को सफल बनान में प्रमुख भाग लिया था और कम्पनी को तन-मन धन से सहायता की थी, पर उहे अन्त में लने में देने पर गए और कहना चाहिए कि पलासी के मान की रचना कराकर अनेकको जगह ए उन्हान मान ही विनाशक वीज वा । प्रायिक और राजनतिक दोनों ही पत्रा में सर्वमवा ईस्ट इंडिया कापनी वन वैठी और जगनमठ उपाधि उम परान की विपुत सम्पदा और प्रमता का मार मात्र र गई। पर चारी के सिक्कों का प्रचार विगपत उत्तर भारत में ही था। दगिण में प्रधानता सान मिता को यौ। संस्कृत में चाग को प्य या रोप्य कहते हैं। प्राध्यायी में एक विशप प्रकार का मुद्रा के लिए प्राप्त प्य' र प्रयुक्त हुआ है। इसी मध्य या रौप्य का भ्राकारा है। १८३५ से पहले इम में तरह-तरह के रपए प्रचलित । इनम कुछ + नाम धाम इस प्रकार य १- पुगन मिस (१७६०-१८१७) २-नए मिक (१८१८-१८३२) ३---पुरान मोर नए फम्बावारी रुपए जाफम्याग बनारस और सागर की माला में ढल घ। ४.-धम्मावानीपए जो क्लरत्त की रिमाल ५---मद्रासी रुपए। मोन * मिसा का भी यही हाल था। हम बहुतायत पोर विभिन्नना म बड़ी मावन पा होता था-रन-न व्यापार के मामः में यह बनेकता प्रवल वाघ का काम करती था। ईस्ट इल्यिा कन्पनी ही पार मना क्लस्टर नियुक्त हात य उन्हें चारी रे रस-म-बम ६. और मान क मग कम २ मिरमान पा लगान में सामने पाते य । यान का यह गल था कि एक जिस में जा पा सना वह दूसरे जिद में नर्ग। यह भी नातिएर जिल पर ही प्रकार के मिल का यानवाला हा मतग अलग चीजों के लिए मला मनग मिश्र थे। पौर घिमाई की मात्रा नाघिर हान में वारण निको पर बट्ट का दिमाय मी मला लग याचारी और मान का पारगरिक सम्मान मग एक-मा नहीं रहता था~मा गाना मस्ताहा जाना बनी पानी। मेंरे । 'मनी की टासातों में रूपए की रसाईल-दाराहनीपो, इस लिए सरा नाम स्तरार पा।
८२ रुपए की कहानी इनमें जो चीज सस्ती होती वह तो धनम में रह जाती, और जो महंगी होती बह निकल जाती। इन सारी अडचनो मौर कठिनाइयो को दूर करने के लिए मुद्रा-सम्बपी सुधार आवश्यक था, और वह सुधार था भनेक्ता की जगह एकता का स्थापन। भारतवप का अधिकाश एक राजछत्र की छाया में आ चुका था इसलिए वह मुधार अब उतना कठिन मी नहीं रह गया था। बहना चाहिए कि गासन सम्बधी एक्ता के बाद मुद्रा सम्बधी एकता प्रान ही वाली थी। कम्पनी के डाइरेक्टरान इस विषय में अपना मत प्रकट करते हुए १८०६ म मद्रास सरकार को लिया कि भारतवप का प्रधान सिरका चादी का होना चाहिए जिसका वजन १८० ग्रन (एक तोला) हो और जिसमें १६५ ग्रन खालिस चादी हो। उनकी राय थी कि प्रधानता चाटी के सिक्के की रहे पर सोन का चलन भी वन हो । साथ ही वे इन दानो के बीच कानूनन काई सम्बन्ध स्थापित करना नहीं चाहते थे । उनका प्रस्ताव था कि साने का मूल्य उसके परिमाण और उसकी माग पर अवलम्बित हो । पर प्राय ३० साल तक मुद्रा सम्बधा एकीकरण का प्रस्ताव प्रस्ताव ही रहा । उसको विधान का रूप मिला १८३५ में जिसस दो साल पहले बगाल के गवनर-जनरल सारे देश के गवनर जनरल बनाए जा चुके थ और गासनसत्ता पूरी तरह बद्रीभूत हो चुकी थी। उस साल २७ मई वा सरकार की अोर से यह पापित किया गया कि भारतवष का जितना माग विटिल छत्रच्छाया म आ चुका ह उसमें अब एक ही प्रकार के रुपए का चलन होगा और हर बात म यह रुपया प्राजक्लक परवावानी रुपए के समान होगा। इस पापणा के अनुसार जो विधान बना उस मारत के मुद्रा सम्बधी इतिहास म बह ही गौरव वा स्थान प्राप्त ह । उसका साराच यह पा- (१) १ ली मितम्बर १८५५स यम्पनी की टक्साला म एक ही प्रकार के रुपए की ढलाई होगी। इस रुपए का वजन १८० ग्रन होगा जिसमें खालिस चादी १६५ गन होगी। मठनिया और चवनिया में भी इसी हिसाब से चांदी रहेगी। (२) कुछ खास तरह के सान दे सिकरे भी ढाले जायग पर कोई भी समेतको अवह एक भादमी म्पनी के राज्य में सोने का सिक्का दन या लेन को बाध्य न हागा। इस विधान की बदौलत १६५ ग्रन मालिस चादी वाला रूपमा मुद्रा सिंहासन पर जा बठा। दन-देन के लिए सब लोग इसीका व्यवहार करने को वाम थे, इसलिए अपन अब म धीरे धीरे इसका एकछा राज्य सा स्थापित हो गया । भारतवर्ष में हर प्रकार के मूल्य का मापदण्ड चारी धन गई। पर साय माथ एक हद तब सोन का चलन भी बना रहा। बम्पनी वीटरमान म मोन का जो प्रधान सिक्का ढलता उसका वजन भी १५० ग्रम था जिसमें पालिस सोना १६५ ग्रन था। इसका मूल्य था १५), और १८४१ का सरकारी पान था कि जब ता दूसरा हुक्म जारी नहीं किया जाता तब तक उमको ओर सय सिवा इसी दर में मजूर किए नाय । पर यह अवस्था चिरस्यायाम हा सकी। कुर ही वर वाद प्रास्ट्रलिया और कैलीफोर्निया में नई माना के बुनन म मोन का उत्पादन बहुत बर घना और चादी की तुलना में बह सस्ता हो चला। नतीजा यह हान लगा कि लोग अपना लगान या वररुपया म न चुका मर माहरा म चुरान नग । बाजार में एक मोहर दे १५) से कम मिलत, क्योंकि साना सस्ता हो रहा था-पर सरकारी खजाने में वह अब भी उमी दर भती जाती इसलिए मोहराकाहा भरमार हान नगा। और सरकार किसी का भी १५) में मोहर रेनो वाध्य नही कर सकती थी। सरकार चाहती तो चारीनी जगह उसी समय सान को दे देती और मोने से ही भूय का मापदण्ड बना देती। पर एसा न करक सरकार ने १८४१ मादेश को ही उठा लिया, भौर १ ला जनवरी १८५३ स मुवा के रूप में सोन का धनण बिलकुल बन्द हो गया। सन सत्तावन के गार के पारण भारत सरकार की प्रापिक वह नाइया वेहा वर गइ और यिनि मुधारन र लिग मि० जम्म विन्सन नामर विपन इग्लग लाए गए । यह भारत सरकार के प्रथम प्रय सदस्य य और रक्षा के समय में परेन्सी नोट जारी किए गए। यह १८६१ भी बात है । उसमे पहरे नोट जारीरन पामधिकार कुछ गास बरों प्राप्त पा, परसरता, सम्बई पोर महास के बाहर मोका अत में रुपए की कहानी प्रचार नहीं के बराबर था। उस समय कोई भी मादमी नोट देने या रेन को कानूनन बाध्य न था । विल्सन न नोटो का प्रचार बढान की दृष्टि स अपनी योजना भारत सचिव के सामन रखी। उस समय भारत सचिव सर चाल्स उड थ और उनका इस विषय में विल्सन से मतभट या। विल्सन इस मत के अनुयायी य कि नोटा की पुस्ती के लिए जो कोप या रिजव कायम किया जाय उसम एक हद तक सोना चादी रखकर वाकी हिस्सा सरकारी कागज के प म रखा जाय। सर चाल्स का सिद्धान्त था कि कम-स कम नोटा की पुश्ती एसे कागज से होनी चाहिए, और रिजव का वाकी सारा हिस्सा सोन या पानी का होना चाहिए। हुमा वही जो भारत सचिव को मजूर था। सा १८६१ में नोट सम्व धी जो विधान बना उसन करेसी रिजव में सरकारी कागज की हद चार करोड पर बाघ दी-प्रर्थात यहा तक तो नोट की पुश्ती सरकारी कागज या सिक्यूरिटीज से की जा सकती थी पर यहां पहुंच जान के बाद जो नोट निकाल जाते वे रिजव म सोना चाटी रखकर ही। प्रारम्भ म रिजव म चादी-ही चादी रहती थी १८६५ में कुछ सोना भी जमा हुप्रा पर उसकी मात्रा कम होती गई और १८७५ में यह बिलकुल गायब हो गया । फिर १८९८ के बाद करन्सी रिजव में सोना इकट्ठा हान लगा । प्रारम्भ म दस बीस सौ और एक हजार के नोट जारी किए गए थ। पाच रुपए का नाट १८७१ में जारी किया गया, पोर दस हजार का नोट उसके भी बाद । १९६१ के विधान न सारे देश को कुछ हल्का में बांट दिया जो सकल कहलाते थ-जसे कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और रगून । एप सकल का जारी किया हुआ नोट दूसरे सकल में कोई लेन का बाध्य न था, पर सरकारी देना किसी भी सकल के नोगे म अदा किया जा सकता था। नोगे की लोकप्रियता बनाने के लिए पौर भी सुभीते कर दिए गए थे । पर नोटा का विप प्रचार वत मान शतारी में ही हुप्रा है। समय समय पर नोट सम्बधी विधात म मगोधन होते रह ह । इस घतानी के पहले ग्यारह माल ये भीतर, पांच से लेकर सौ रुपए तक के नोट अखिल भारतीय कर लिए गए-अर्थात् वे चाहे रिसी मी साल ये हा लोग उहें सवा लेने का कानूनन बाध्य अना की जगह एक ८५ हो गए । इससे नोटा का प्रचार और भी स्वच्छन्ता से होने लगा । नाटो की कागजी पुरनी की हद भी १८६१ और १९४३ के बीच कहा-से-कहीं जा पहुंची ह । जिम समय नाट-सम्बधी विधान पहलेपहल बना उस समय यहा रुपए की बडी टान थी। इमक कुछ खास कारण थ । अमरिका में उत्तर और दक्षिण के राज्यो के बीच जो भीषण सग्राम हुमा उसका एक नतीजा यह हुआ कि दक्षिण से रुई का निर्यात (एक्सपोट) कुछ समय के लिए वन्द हो गया और यह व्यापार भारतवप को मिल गया। यहा स निर्यात काफी हान लगा और देश का पावना चुकान के लिए दूसरे देश के लिए अधिकाधि चाटी मजना आवश्यक हा गया। पर भारतवप इस समय बाहर कज भा काफी से रहा था। १८५५ ५६ भोर १८६९७० के बीच उसन प्राय ६६ करोड रुपए वन लिए । इन ना दारणा से चानी का भागात कहीं-स-वहीं बढ़ गया। १८५७ ५८ मोर १०६२ ६३ के बीच ससार मर में जितनी चाटी निकली उससे अधिक चादी प्रकार भारतवष न ली। फिर भी यहा रुपए की टान बनी ही रही। एसा प्रवस्था में लोगों का ध्यान सोन की ओर जाना स्वाभाविक था। १८६४ में यहा के वाणिज्य-भ्यापार से सम्बध रखनेवालो कुछ सभाओं या चेम्वरों ने प्रस्ताव दिया कि मूल्य का मान या स्टडह सोना कर दिया और सोन के सिक्के चलण में लाए जाय । इम सम्बन्ध में कुछ अवतरण उस भावनात्र म दिए जात ह जा वरई क चम्बर को मार मे वह लाटरे पास भजा गया था- भारतवप का व्यापार तजी स बह रहा ह वह भाषिक और भोगा गिक उमति के पथ पर अग्रसर हो रहा ह पर चारी इस समय उस व्यापार और तमन्नति में सहाया न हावर बाधक हा रहा है। जिस ममय चादीको अपनाया गया था उस समय उमका उत्पान सोने म प्राय दूना था। इसलिए वहा जा सकता है कि उम अपनाना दिमत्ता का काम पा। पर वह वात भय नहीं रही। इधर चांदी उत्पान में मोई वद्धि नहीं हुई है । पर भारतवप को माग बेहर बढ़ गई है, इसलिए पारी मे दाम पसाना प्रसम्मव-सा हो गया है। जाय, रुपए की महानी "ससार में हर साल प्राय एक करोड पी. (स्टलिंग) की चांदी मिकबनी है । पर पिछले छ साल में एक भारतवप ने ही हर साल एक करोड पद्रह लाख पौंड की चादी लोह। पिछले सात तो उसने १ करोड ४५ लाख पौंड की ली। ऐसी अवस्था म चादी के मूल्य में बहुत बड़ी वद्धि पनिवाय ह- जिसका अथ ह भारतवप जसे देश में द्रव्य की कमी और दामो का गिरना। . . उधर सोन का यह हाल है कि उसका उत्पादन बहुत बन गया ह और ससार म जितनी चानी निकलती है उससे कम मे-कम १५० प्रति- शत अधिक सोना निकलता है। मारतवप के लिए और वाकी दुनिया के लिए चांदी काफी नहीं है, पर सब के लिए सान की बहुतायत है इसलिए हम चाहिए कि हम चादी जसी कीमती और भारी चीज को छोडकर सोना जसी मस्ती और हलकी चीन का प्रपनाव । इसस कई लाभ हाग-बादी का मूल्य अपनी मुनासिब जगह पर बना रहेगा और इस देश के वाणिज्य-व्यवसाय का विस्तार प्रतिहत गति में होता रहेगा। योन का इस समय जो बहिष्कार है वह न तो सभ्योचित ह न युक्तिमगत ह न स्वाभाविक है । साना इस समय भी यहा कापी आना है, पर वह मिक्के के रूप म नहीं चल सक्ता । सरकार को चाहिए कि वह गोध-म शीघ्र चादी की गद्दी सोन को दे दे जिससे सोने के सिक्को का चलन हो जाय और इससे जो प्रन लाम हो सकते उनसे यह देश वचित न रहे। इस विषय पर काफी लिखा-पटी हुई पर कोई सास नतीजाम निकला। भारत-चिव मन्त म यहा तक जाने को राजी हुए कि सावरन या गिनी १०) की दर से सरकारी खजानो में ले ली जायगी। बाद यह दर १०1) कर दी गई। १८१६ में इस विषय के अनुस पान के लिए एक कमीशन भी वठा । भारत सरकार के तत्कालीन मय-सस्य सोने के सिक्के के पर मयामीन ने भी अपनी राय उसके पक्ष में दी। पर यह सब मन की पह एक निष्फल रहा। १८७२ मोर १९७३ में प्रथ-साम्य न फिर इस सम्पप में कुछ प्रस्ताव भारत सरकार के सामने रखे। पर सरकार को प्रस्तापित सुधार स्वीकार न हुआ। १८७४ की ७ वी मई को उसने अपमा निर्णय इन शब्दों में प्रकाशित कर दिया कि- "सोने के सिक्के को चलन में लान की वान्छनीयता पर विचार कर सरकार इस नतीन पर पहुंची है कि फिलहाल साने को मूल्य का मान बनाने के लिए कोई भी कारवाई न की जाय।' फलत यहा चाटी के रुपए का ही बोलबाला बना रहा । भव और देगा की सुनिए । कास म सोना और चादी दोनो के ही सिक्क चलते थ । पर १८५० से पहले वहा प्रधानता चादी की ही थी। कानूनन एक भाग सोना १५॥ भाम चाली में बराबर था, पर १८०३ और १९५० के बीच बाजार दर के अनुसार चादी इमसे प्राय सस्ती पडती थी, १४॥ के बजाय प्राय १६ भाम चानी एक भाग सोन के बराबर होती थी । जहा दो प्रकार के मिसे चलत ह वहा सम्ना या घटिया सिक्का तो चलन म रहता ह, और महगा या बढिया बाहर निकल जाता है । इमी का प्रयास्त्र म ग्राम नियम' कहत ह क्याकि सबसे पहले इसपर प्रकाश डालनवाले सर टॉमस ग्रेगम नामक अग्रज प्रथ मचिव थे। फास की ही बात लीजिए । सोन सिक्वे में काई भुगतान करता तो वह मिफ १५॥ माग चादी पाने का हार होता पर उमी सिक्के को गलाकर वह बाजार में बच देता तो उसे १६ भाग चारी मिल जाती। एसी अवस्था में यह स्वाभाविक था कि चलन से सोन के सिक्के निक्ल जाय मोर उसम चोरी सिक्को की भरमार हो जाय । पर १९५० के बाद गगा उलटी बहने लगी~मति चाटी महगी और सोना सस्ता हो पला । जो अनुपात कानूनन ११५॥ या वह अब कुछ ममय के लिए प्राय ११५ हो चला। मिक के रूप में ११॥ भाग चाटी एग माग सोन के बरावर होती, पर बाजार में अपने पसली रूप में विक्ने पर १५ भागा ही एक भाग सोना हो जाता । म परिचनिन पवस्या में चनन से पानी निकमन लत्री पोर उसकी जगह सोना भरने भगा । फ्रांस में पर यह प्रन उठा विदोनों हाल पाटन बी-दो भागों पर पैर रखने रुपए की कहानी की क्या जरूरत ? कुछ लोग कहने लग कि इग्लण्ड की तरह फास सिर्फ सोन को अपना ले, कुछ इसका विरोध बरत हुए उसकी जगह चादी यो सिफारिश करने लग । पर मास के कर्ताधर्तान सान का परित्याग वरना चाहत थ न चादी का। वे कुछ सशोधन के साथ परम्परा को कायम रखना चाहते थे । चलन से चादी के सिक्के निक्ले जा रहे पे, इसको रोकने के लिए उन्होन कुछ सिक्को में चादी पी मात्रा कम कर दी। फिर १८६५ म फास बल्जियम स्विटजरलण्ड और इटली की एक समा इस बात पर विचार करने के लिए हुई कि इन देशो की मुद्रा भोति क्या होनी चाहिए। इसके फलस्वरूप लटिन मुद्रा मघ की स्थापना हुई और आपस में यह तय पाया कि संघ पद्रह साल तक कायम रह भौर जा दा इस सदस्य हा वे सब-के-सब अपनी मुद्रा नीति एक रखें। नीति यह ठहगे कि साना और चादी दोनो से ही मुद्रा का काम लिया जाय और गौण सिक्को म चादी की मात्रा कम कर दी जाय तादि किसी के लिए उह गलाकर बचना लाभलायव न हो। सोन और चादी के बीच का अनुपात वही ११५॥ रखा गया और इस बात की व्यवस्था की गई कि संघ के भीतर एक दा के सिरके दूसरे देगा में भी चल सरें। मध को कुछ हद तक सफलता जरूर मिली पर यह नही पहा जा सकता कि उसकी स्थापना से मुद्रा सम्बधी प्रश्न का कोई स्थायी हल हो राका । इसलिए जून १८६७ में फास के प्राग्रह स उस प्रश्न पर विचार करने के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हमा। इसमें वीस देश सम्मिलित हुए थे जिनमें गवत दो-इग्लण्ड पोर पोग्गाल--सोन के प्रदतवादी उपासक ५ । बारी मर -सप या तोद्वतवादी थ, जो सोना और चादी दोना से ही मुद्रा का वाम लेते थ या जो क्वल चादी व उपासा थ । सम्मनन में हालण्ड को छोडकर मभी दशो पा भुकाव सोने की मोर पा और यह निश्चित हुमा कि धीरे धीरे मव-वे-सत्र घाटी को छोड मोने को अपना लें और सवत्र एक ही प्रकार के सिमा का चलन हो। यहा तक तो इग्लण्ड सवः साप रहा पर अब उसके प्रतिनिधि कहने लग कि हमन जो कुछ कहा ह उससे हमारी सरकार पाव- नहीं मौर वह अपनी मुद्रा प्रणाली म तव तर पोई भी हर पर न रेग ।
अनक की जगह एक ह जब तक उसे विश्वास न हो जाय कि यह सब प्रकार से वाछनीय ह । उनका यह नया सुर सुनकर लोगा का उत्साह ठडा पड़ गया और भार्ग जो कारवाई हुई उसमें उतनी एकता नजर नहीं आई। सम्मलन की सिफारिशों का तत्काल कोई नतीजा नही निक्ला, पर इसमें सन्देह नहीं कि उमन सीन का जा गुण-गान किया उसका निकट भविष्य में कितने ही गगा की मुद्रा-नीति पर खामा असर पड़ा। १८७० में पास मौर अशिया (जमनी) के बीच सग्राम विहा । इसमें मास की हार से उसका प्रभाव जाता रहा, और मुद्रा-सम्बधी अन्तर्राष्ट्रीय एकता के प्रश्न को भागे बहानवाला प्रब कोई दूसरा राष्ट्र न रह गया। मूल्य के मान के रूप में तो सोने को कई दशा ने ग्रहण कर लिया पर अन्तष्ट्रिीय सिरके की बात जहा थी वही रही।
- २ चादी का परित्याग लन्दन में चादी स्टड प्रौंस के हिसाब से विकती ह। वहा का स्टण्डह है १००० भाग में ९२५ भाग खालिस चाटी। जिस समय फा वत्ता त यहा दिया जाता है उस समय इग्लन की मुद्रा सोने की थी इसलिए कुल दाम सोने में ही समझ जान चाहिए। १८७३ से पहले कई साल तक लन्दन म चानी का दाम ६० पस के करीब था। इधर चादी में कुछ तेजी जरूर आ गई थी, मगर वह इतनी अधिक नहीं थी कि उस विष महत्वपूए कहा जा सके । लोगो को थोड समय लिए कुछ चिन्ता जरूर हुई मगर वे शीघ्र ही निश्चिन्त हो गए और उनका यह विश्वास फिर दृढ हो चला कि चादी मोर सोने के बीच का सम्बध स्थिर या स्थायी बना रहगा। वास्तव में १८७३ चादी के इतिहास म एक नय युग का प्रारम्भिक वप था । यह युग मुद्रा-जगत म भूचाल सा लान वाला और कई गहन समस्यामो को उपस्थित करन वाला था। इस भूचाल से चादी और सोने का पुराना सम्बघ छिनभिन्न-सा हो गया और इसका एक नतीजा यह हुप्रा कि कई देशा ने चादी से घबराकर सोन का पल्ला पकड लिया। चादी अव अधोमुख हो चली-उसका नाम क्रमश गिरन लगा। या तो यह पिरना पहले ही शुरू हो गया था पर १८७३ में जब दाम ५७५ पेंस हो गया तब संसार का ध्यान इस मोर विष रूप से प्राकर्षित हुपा भोर इस सम्बध में तरह-तरह के प्रश्न किए जाने लगे। चादी बराबर गिरती हो गई। हर पाच साल का मौसत लें तो १८७६ भौर १८६० बीच उसका दाम यह रहा- १९७६-८० १९८१-६५ ५२. पेंस ५०१ पेंस बांदीका परिवार ४४४ पस १८८५-१. दाम गिरतरित १८६३ में ३७स तक या गया था। पानी के पों प्रधामुत होत का कारण क्या पा 7 इम सम्मष में प्रधान कारण यह बताया जाता है कि कास पर विजय पाने के बाद जमनी नसान को अपनाना चादी को वहिप्पन कर रिया । यह माग चादी जब बाजार में विक्ने लगी तब दाम ना गिरना मनिवास हो गया। जमनी को पास में जा जाना मिला वह काफी बढी रकम थी। इसलिए चाल की जगह मोर का चलन बरना उसके लिए मामान हो गया। उधर उसकी महापाकामा वडी वही थी ही। पायद उमा यह भी खयाल पा कि माना बहप्पन का विह है और कोई भी राष्ट तव व बडों को श्री मनही पा सकता जब तक वह इस विषय में इग्लड को बराबरी नहीं करता। १८७१ में ही उमन इम मोर क्रम वाया पौर १८७३ में उमको स्वाहिश पूरी हो गइ । सोना मिहामन पर भान हो गया और चाली जहा-नहा जागर मरीगर टूटन लगी। १७° पौर १८७१ बीच जमनी की मार से जो चाटी समार में बची गई वह ११क्रोड पोम से कार पी। पर कुछ विद्वाना का मत है कि मगर भारतवप पर हुडी करके भारत-मचिव नरोग रुपए हर साल विलायत न माठ रहन ता जमनी का चाली इस तरह विकने पर भी बाजार इतना बरावन हाता। इस मत निपाटकों में मि. मार्टिन उड ये जा कभी बम्बई के टाइम्म पाव दहिया र सम्पारक रह चुरे थ। १८९' में हाल कमेटी को नहान इस विषय पर अपना सिमित दमध्य लिया था। उनका कहना पा जि जर मन को भार स इस प्रकार की हडी की जाती है तब सन्न लिए यह जरूरी नहीं रह जाता कि वह भारी मसार भगवान कर--और उनन करोड रूपए की चारी विस्न और भारतवप जाने से है । मगर भारतबर पर इग्नण्ड का राजनविर प्रवन होवा भौरना इतने करोड रुपए इस हा से हर सास न गाजावा तो पानी की वह हालत न होती।
रुपए की कहानी . हुइ। सोने चाटी का दाम गिरता गया और जसा कि ऊपर बह चुके है वह दाम सान में था। यहा यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ह कि चादी सस्ती हो गई या सोना महगा हो गया ? वास्तव में दोनो ही बातें। का उत्पादन इधर कम हो चला था और चादी का उत्पादन बहुत बढ़ गया था। अमेरिका में पहले चादो कम-बहुत कम-निकलती थी पर, १८५६ के बाद वहा इसकी पदावार इत्तनी बढी कि ससार पाश्चय चक्ति हा गया और चादी की समस्या सयुक्त राज्यो की राजनीति का एक प्रधान अग बन गई । १८५६ से १८६० तक वहा कुल चादी ३०६, ४०० भौंस निकली थी। दूसरे पाच वर्षों में निकली २८,१८० ६०० घोस । पर वाद को पदावार को देखते हुए यह भी बहुत कम था। अकेले १८७४ में वहा २८,८६८,२०० औंस चादी निकली और १८९२ में ६३ ५००००० औंस । अमेरिका म उस समय मुद्रा' सोने को पो और सोना महगा हाने के कारण दाम गिरते जा रहे थ । इसलिए वहा यह आदोलन उठा कि मुद्रा मिहासन पर चादी को भी बठन का अवसर दिया जाय । इस आदोलन के समथक चादी उत्पादक और कृपक थे। यह प्रादोलन तो सफल न हो सका पर इसके फलस्वरूप अमेरिका की सरकार बाजार में चादी की बहुत बड़ी खरागार बन गई। यहा दो विधाना का उल्लेख आवश्यक है-ए तो लाण्ड एलीसन एक्ट और दूसरा गमन एक्ट 1 पहला १८७६ पाम हुमा और उसके अनुसार सरकार हर साल कम से कम २०६२५,००० औंस और अधिक से अधिक ४१२५०००० भीम चादी खरीदने को बाध्य हुई । वारह साल तक सरकार चाटी खरीदती गइ पर दाम का गिरना रुका नही। १८७८ म जो दाम ५२, पेंस था वह १८९० में ४३. पम हो गया। इस माल विधान-द्वारा अमेरिका की सरकार प्रतिवप कम स कम ५४ ०००,००० पास खरीदन को बाध्य की गई। प्राय ऐसे प्रसग में मुद्रा का व्यवहार स्वयसिद्ध मुद्रा के अथ में किया गया है। प्रतो मुदा चारी या तांबे के मलावा कागज की भी हो सकती थी और हर जगह यी भी।
चादीका परित्याग चालीक बाजार इससे पोड समय के लिए तत्री पाई और दाम २४. पेंस हा गया पर उस फिर प्रधामुम हात देर न ला| और उसा कि ऊपर कहा जा चुका ह दाम गिरत गिरत १८०३ में ३३3' म पर मागमा। रुपए में खालिम चाटी थी १६५ ग्रन और जब चानी का गम ६० पेंस या तब एक रुपया प्राय दागिलिग' के बराबर हाता था। यह पए का विनिमय मल्य या। ज्यों-ज्यों चारी गिरती गई वह विनिमय मूल्य या एक्मचेंज भी गिरता गया। उरणाय चारी का पौमत दाम प्रोमन एकमत पम पंम १८७२-७३ १८७४-०५ २००१ १८०५-६ १८७६-33 ५२३ २०४१ एवमचेंज गिरन से ममाज के एक प्रग की हानि पी मौर दूमरे का बाम था। जब एक पप में दो शिलिंग अपात २४ पैम हान ५ तब म म्परा की समता एक पौंड स हाती थी। उस समय किमी का एक पोन विमा- यत्र में होता ना वह बैक का दवर उमरे बदन यहा १०) पाना पा पा किमी का एक पौंड वहा दना होना ता वह १०) या दकर वरल में रव पोट वहा पा सरता था । जव एक्सचेंज ग्नि गिरन या तामा गया कि एक रुपया सासह पेन वरादर होन सगा मव) की समता एक पोड मे होन लगी। मद भार विलायत में एक पर जमा हो वा उमरे बल १५) यहार गरिए मोर अगर विरायत में एक "१२स गिलिंग, योर २. निलिग-१ पोष्ट स्टतिग। पए बजन पा १८०पन (ओम), जिसमें सानिम चादरी पी १६५ प्रन । चारे दाम से रुपए का विनिमय-मूल्य निराननामाधारण परमपिता राम था।
१४ मरीनहानी पौंड चुकाना हो तो उसके लिए यहा १५) दानिष कीजिए। एक्सचज गिरने से इस देश के अपारको का-विशषकर कृषक समाज का--लाभ था। उनका जो माल विटेश म विक्ता उसका दाम पौंड शिलिंग-पेंस में मिलता। फिर इनका रुपा से विनिमय करना पडता । अब अगर रुपए का विनिमय मूल्य गिर गया तो पौड के उतने ही अधिक स्पए हुए जिसस यहा के उत्पादन या विमान विशष लाभ में रहे। हा जिहे रुपया विलायत भजना था उनकी बात और थी। एक्सचेंज ज्यो-ज्यों गिरता उह अधिकाधिक रुपए देकर पौड लेने पडते। इस श्रणी में थ ब्रिटिश क्मचारी जिह अपने परिवार के भरण पोषण के लिए विलायत पमे भजन पडत थ एसे यापारी या यवमायी जिनका कारोबार यहा था पर जा अपन मुनाफ या अपनी पूजी को यहा से उठाकर वहा ले जाना चाहते थ, और भारत सरकार, जिस भारत सचिव की माग पूरी करन के लिए हर साल कई करोड रुपए जुटान पडते पविलायत स माल मगानवाले भी इसी थणा में थ । मान लीजिए उहान एक पौंड का माल मगाया और हिसाब लमाया कि १३।) में उह वक से एक पौड मिल जायगा इसी बीच एक्सचज गिर जान म पौड के पन्द्रह रुपए लगन लग । लहाजा उहे उस पौंड के लिए १) अधिक दना पड़ा। भारतवप के अधिकाश निवासी किसान ह और एस विषय में देश के हानि लाम वा निणय उन्हीके हित की दष्टि स होना उचित ह । पर किसान न तो शिक्षित ह और न सगठित । इसलिए जहा उनकी गहरी हानि हाती ह वहाँ भी उनसे कुछ करते धरते नहीं बनता, और एसी दशा में उनके हित की उपेक्षा होना विलकुल स्वाभाविक है । उघर सरकार या अगरेज कमचारी या यवसायी सुशिक्षित, सुसगठित और सता साव धान रहनवाल ह । उनकी जहा थोडी भी हानि हाती ह वे रोन चिल्लान लगते हैं पोर एसा मातोलन खडा कर देते ह रि उनके हित री उपक्षा मसम्मघ-सी हो जाती ह । रुपए के एक्सचज के इतिहास में बार-बार ऐसा ही हुमा है।
चांदीचा परित्याग अब चादी की दर के साप रुपए की विनिमय-दर गिरने लगी, तो विलायत पसे भेजनेवालों को यह स्थिति बहुत मखरने लगी, मौर उन्होंने इसके खिलाफ हो हल्ला मचाना शुरू कर दिया । पिसान तो चजमान थ, और उनकी मार से बोलनेवाले दूसरे लोग भी प्राज की अपया बहुत कम थे। १८७५ में पालमेण्ट की ओर से एक कमेटी इस विषय के अनुसधान के लिए बठी कि चादी के दाम गिरन के क्या कारण ह, और भारत तथा इग्लण्ड के बीच के एक्सचेंज पर इसका क्या असर पड़ा है। इस कमेटी न अपनी रिपोट में विषय-विवेचना तो की पर भारतवप की बोर से किसी कारवाई की सिफारिश नहीं की। उसी साल अग्नेज व्यापारिया को मोर से भारत सरकार के पास आवेदन पत्र भेजे गए कि कुछ कास के लिए चाटी को टक्साल सव साधारण के लिए बद कर दी जाय । पर सरकार को यह मजूर न हुमा । तीन साल बाद स्वय सरकारन यह प्रस्ताव क्यिा कि भारतवप चादी जगह सोन का अपना ले और सवसाधारण को अपनी चादी टक्साल में ले जाकर उसके सिक्के ढलवा लेन का जो अधिकार प्राप्त है वह उससे ले लिया जाय- अर्थात मुद्रा सोन को हो और रुपया उसके प्रतीक का काम करे। 'दोनो के बीच की दर समय-समय पर सरकार निश्चित भरती रहे और जब उसमें यपेष्ट स्थिरता मा जाय तब यह दर बरावर के लिए दो शिलिंग कर दी जाय।' उम समय बाजार में एक्सचेंज की दर १ मिलिंग ७ पेंस थी। दो शिलिंगवाले दिन इस समुदाय को भी सर भूले नहीं थे। भारत-सरकार के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए सन्दन कमेटी वठो, जिसके सदस्या में भारत-सचिव की कोसिल पौर विटिस- दोनों के ही प्रतिनिधि प । इम कमेटी ने एकमत हो अपनी राय उस प्रस्ताव के विरुद्ध दी। ब्रिटिश-गरवार में मपविभाग को मोर से इस प्रस्ताव पर जो टिप्पणी की गई पो (नवम्बर २४,१८७९) उसका कुछ मा उद्धत परन सापकह- "मारत-सरकार का प्रस्ताव हमि पादीने रुपए पोइस समय जो सरका रुपए की कहानी . स्थान प्राप्त हावह उपसे छीन लिया जाय और उसे प्रतीक्-मुद्रा बनाकर उसके और सोने की मुद्रा के बीच एक स्थायी सम्बध सरकारी आदेश से स्थापित कर दिया जाय । 'पर यह व्यवस्था स्वाभाविक न होकर कृत्रिम होगी और इसकी सफलता के लिए सरकारी हस्तक्षप अनिवाय होगा। इस प्रकार के हस्त- क्षप से बहुत कुछ बुराई होन का डर ह । 'हो सकता ह कि इस प्रकार रुपए की दर बांध देन से भारत सर कार, अग्रज कमचारी और अग्रज व्यवसायी अपनी अपनी चिन्ता से मुक्त हो जाय और फायदे में रहे, पर आखिर इसका दाम चुकाना पडगा भारत के किसानो को जिनके कज का वोझ (गल्ले इत्यादि का दाम गिर जान के कारण) और भी भारी हो जायगा और जि हे लगान या कर चुकान के लिए (उपज के रूप में) प्राज जितना देना पडता ह उससे कहीं अधिक देना पड़ेगा। भारत सचिव न दिसम्बर १८७९ में भारत सरकार को लिखा कि इस परिवतन की मजूरी नहीं दी जा सकती। लटिन मुद्रा संघ के सदस्य-देशा को अपनी हितरक्षा के लिए अब दूसरे ही प्रकार की कारवाई करनी पडी । चलन से सोना निकला जा रहा था, और उसकी जगह सस्ती चादी भरती जा रही थी। चूकि उनके यहा चलन में चादी के सिक्कों का अनुपात बहुत वढा हुआ या वे अपनी मुद्रा प्रणाली में चादी का पूण बहिष्कार करन में असमथ य । पर प्राग के लिए उन्होंन चादी की टकसाल का दरवाजा सवसाधारण के लिए वन्द कर लिया। १८८० तक यूरोप में कोई भी देश ऐसा न रह गया था जहा सवसाधारण को यह अधिकार हो कि चादी टकसाल म ले जाकर उसके सिक्के ढलवा सके । मूय के मान के सिंहासन पर सिफ चीन और भारतवप में चादी रह गई थी। कमेटी- काम कमीशन, इनका सिलसिला बना ही रहा। दो मन्त राष्ट्रीय सम्मेसन फिर पेरिस में हुए, मोर दोना का उद्दा यही था कि चादी में स्थिरता लाने के लिए सर दसो को मोर से कुछ किया जाय । व एकमत न हो सके, इस कारण परिस्थिति में कोई मन्तर न पड़ा।
चांदी का परित्याग १८७८-७९ मे १८९४ ५ तव वादी ५१ पम के मासपाम बनी रही, पोर फ्लत एवमवेंज भी स्थिर रहा चाटी का प्रोमन दाम प्रीमत एवमचेंज पॅम पस १८७०--७६ ५२९६ १६७६१ १८७९-८० ५१ १६९६१ १८८०-८१ १९९५६ १८८१-२ १९८५ १८८२-८३ १९५२५ १८८३-८४ १९५३६ १८८४-८५ ५०६ १९३०८ पर १८८६ में चाटी फिर नीचे गिरी और भारत सरकार न फिर अपनी वठिनाइया का उल्लेख करत हुए एक्सचज बाधन उहा म एक स्कीम ऊपरवालो के मामन रखा । पर इस बार भी उसका प्रयल निकल रहा, ऊपरवाला न उमक प्रस्ताव को नामजूर कर लिया । उहाँने भारत-मरकार के प्रस्ताव को मालोचना करते हुए लिया 'इममें मटेह नही दि अग्रज क्मचारी-जम लगेगा यो इमसे कुछ नाम पहचगा, पर माय ही इसम भारतीय किसान या करदाता की वही हानि होगी। चादी का दाम गिरन मे इधर भारतवर्ष के वाणिज्य-व्यव साप की बडी उाति हुई ह मोर एसा जान पड़ता है कि जनता को हानि की भपक्षा लाभ अधिक हुमा ह । एसी हालत में भारत मरकार पा हस्ताप करके रुपए को वृत्रिम मूल्य देना बहुत प्रापत्तिजनक है। हम इस प्रश्न पर केवल सरकार या उनरे पग्रज कमचारियो के हित या मुविधा की दृष्टि से विचार नहीं कर सकते, हमें सब में अधिक तो यह देषना पोर विधाना होगा निघारी गिरने भारतीय जनता पर- उसरी व्यापारिक और प्रौद्योगिर प्रवन्धा परपा प्रमर पड़ा है। १८८९ म एक माही कमी गन, जिमके भम्पा माड हाम प धारी पौर मोनेरे मम्बर दी मालोचना लिए बेटा । इस कमीशन के १२ सस्मों में कर दिए बाबर ये, जो भारत सरकार प्रतिनिधि रह - - । रुपए की कहानी जा सक्ने थे। पर यह कमीशन भी एकमत न हो मवा । छ मरम्या। द्वत मुद्रा प्रणाली के पक्ष में राय दी पर बाकी छ की राय यह ठहरी कि प्रदत (मोना या चादी) की जगह द्वत (सोना और चादी दोनों) को ग्रहण करना अधिकार में कूटन के समान खतरनाक होगा। इस मत भर के कारण कुछ भी न हो मका । भारत सरकार ने माता की थी कि पतर्राष्ट्रीय समझौते से द्वत प्रणाली की स्थापना पोर चानी के प्रश्न का हल होजायगा पर वह माशा निरागा में परिणत हा उघर वाली नीचे गिरती हो गई और उसके साथ-साथ हमारी हुपरी कीनर भी चाटा का प्रोसन नाम भौमत क्सचेंज रस पेंस १८८५-८६ ४८ १०२५४ १८८६-८७ १८८७-८८ १८८८-८९ ४२३ १८८९-०० ४२. १८०८६ १८६१-१२ १९६२-६३ ३६। १४६८५ १९६३-६४ १८६ में मुनन में पाया कि अमेरिका बारी की ममस्या पर विचार परन के लिए एक अतर्राष्ट्रीय मम्मेलन का पायोजन पर रहा है। भारतवष में किसी को इस सम्मेलन से विशप माना नहीं पी। यहां मरवार और मनन व्यवसायी यह सोचन विधारने लग कि अगर यह सम्मेलन भी पहले मम्मेलनों की तरह असफल रहा तो हमारा क्तव्य क्या होगा। भारत सरकार न इम मम्बध में भारत-सचिव को लिमा (जन २१ १९१२) कि - 'गर यह स्पष्ट हो गया कि इस सम्मेलन में कोई सन्लोपजना भ्यवस्था होन वासी नहीं है, और यह भी स्पष्ट हो गया कि भारतवर्ष चादो का परित्याग और अमरिका के बीच का मममी हा मकना ना हमारा प्रस्ताव है किमत्र साधारण लिए चाग की कमान का गवाजा व कर या जाय मोर चाटीका जग मान का गानगी करने का नयाग को जाय। माने और नारी के बारा मदाय क्या हा इस विषय में अपनी गप जागिर करत हुए भारत-मरकार न लिया कि एक्सचर का म रमी सया दर वे प्राम-याम रमना बात जान व्यवस्था न ममय बाजार महा २१ जन को लिम्बन हुए भारत सरकार न माग्न-चिव को दि वाम শিয়া লাল বা এrdান মা মনি # গা ? प्रनकाह और व्यापागम हम इमाम मह प्रकार को उचित महायता मिल माना। वामन में यह अवस्ति और अमय था। माग्नवामिया २ मा पत्र प्रतिनिधि ही मान यव वा परित्यागोर दिगपाप विजानतपकिमान को भाइ म रम पमपानी एक्सचेंज का ऊना करना चादन य । दिगि व्यवमा। भी नो में दिन : एकल मारके माय या और उमर नना य मरीनन मागे कमानीमम ममे जो बार में वाह इचरेप क नाम म मादर हए। हम भार मेरियन बरेली एमोमियान' नाम म एमम्या मा की गई और पास मेष्टक पाम भजन लिए एक भावनपत्र पर पनरेनषकारेण लागों व दस्तखत करा जान लग। दूसरा दल पारी में বরিশােল সপার কা বিদ্যা বা मोर इसमें राती बम प्राहम पॉज हेमन, एडम्युलायम-जम प्रनिष्टिन म मम्मिलित ५ । इन लोगोंरा प्रारम फरवरी १९५३ को गवनर-जनरल रे पाम एस पावेन पर मना गया। सममें रहा गरा पा~ "हम मागन मरमाय बढ़त वर प्रतिनिधि है স্ত্রী সাল ম গ ব স বুম চাবাহী শ বিষযম শা माय है। हम साओं का मन हरिको भी एमामिमान विनिमय रपए की कहानी मूल्य ऊचा कराने और ठहराने के लिए जो प्रस्ताव कर रहा है वह हानि कारक ह जिससे सरकार को अपनी साख और इस देश के वाणिज्य व्यवसाय को खतरा है। हम लोग इस बात के पक्षपाती नहीं कि रुपए का मूल्य डावाडोल बना रहे या वह बराबर नीचे गिरता जाय पर हमारे विचार में ससे भी कही अधिक आपत्तिजनक ह उसको पौंड गिलिंग-पस में कृत्रिम मूल्य प्रदान करना । हम यह कहे विना नही रह सकते कि करे सीएमोसियान का बताया हुआ इलाज किया गया तो बीमारी और भी बढ जायगी और तरह तरह के उपद्रव होन लगेंग । 'हम लोग अनुभवी व्यापारी होन का दावा कर सकते हैं और इस हसियत से हम कर सी एमामियशन के अध्यक्ष के इस कथन का वन करना चाहते है कि चादी के गिरन से इस देश के यापार को बड़ा धक्का नगाह और यहा एसी मातीमा गह जसी पहले कभी न थी। वास्तव में जो मनी ह उसके कारण और ही है। 'हम जानते ह कि सरकार की आर्थिक स्थिति चादी या वसचेंज के गिरन स चिताजनक हो गई ह--और उसके जिन कमचारियो को इसके नुकसान पहुचा ह उनसे हमारी पूरी सहानुभूति भी ह। पर स्थिति का सुधारने के लिए न तो यह मावश्यक ह न वाछनीय, कि हम अपनी मुद्रा प्रणाली को ही-जा हमारे वाणिज्य-व्यवसाय का प्राधार ह और जिमम इस देश को धन सम्पदा इतनी बढी ह~-बिलकुल बगल दें।" ऊपर जिन फर्मों के नाम लिख गए है उनके अलावा इस आवेदनपत्र पर क्ल्बिन कम्पनी हागराग बधाई बकिंग कार्पोरेशन स्याल माशल, डाक्टवियम स्टील वामर लॉरी जम्स इफस, इविड ससून ऐंड कम्पनी मादि के भी हस्ताक्षर प । भारतीय मस्यामा की मार से भी टक्माल बद परन के प्रस्ताव का विरोध किया गया। काग्रम के मत का उल्लेख हम पौछ करेंगे यहां इतना ही कहना पयाप्त ममझन ह कि बलत्त की इण्डियन एसोसियान मौर पश्चिम भारत को प्रमुख सस्या इण्डस्टियल एसोसियान भी उस प्रस्ताव का पोर विरोध किया। इशियम एसोसियशन न अपने . ।
चादी परित्याग वस्तव्य में ठीक ही कहा भारत-मरवार को जो प्रायिक यिनि हा रही है उसे सुधारन का सही तरीका है फौजी मत्र में कमी करना जो रकम इगलण्ड में मच की जाती है उमको घटाना अग्रज कमचारिया की सम्या कम करके उनकी जगह भारतवासिया का भरती करना पौर--प्रादायक हा ता-एसी विशी वस्तुओं पर लका-मा कर गाना जा यहा न तो जनता की पावश्यक्तामा की पूर्ति क लिए माता द न इस दा + उद्योग घों की तरक्की के लिए। वास्तव में मरकारी क्मनाग रन्मी एमामियान म गिमण्डी का वाम ले रह थे। पर व उसन म ही मन्तुष्ट न हुए। उनकी प्रार में और भी जिनने उपायाम प्रान्गलन किया जा सकता था किया गया। २१ जनवरी १८८३ का एक टपुटान वह लाट (ला' लन्महाउन) म मा मिला । उन माय सरकार का हमनी जाहिर करत हुए वह लाट न यह मूचित किया कि यद्यपि माग विषय उम ममय विचागधीन था तथापि माग्न सचिव को प्रानानुमार यह निश्चित हा चूका था कि फिन हाल जा कमचारी छुट्टी रकर विलायत जायग उनका वतन और भना १६. म रट म मिला। बाजार पर टम सयय १४३: सपा। मरकार की हम और भी माग गई। टक्माल बन्द हो जान वा उमन गारे और प्रधगमवाग्यिा को एक माम तरह का भत्ता 'ना मर किया जा एक्सचज गिरने के कारण होने वाली क्षति का पूर्ति + लिए था। यह मना कद माल तक मिलता रहा । बाजार में वास्त विक एक्सचेंज रेट प्रौर १८ म के बीच जो पर हाता वह उह मरवार पा पोरस मिस जाना जिमम व माल में १००० पौंड तर विनायत मज म। जिहें इसना न मजना पडना द भी मता पाने हर हात ! हर माल इसमें सरकार का एक कराड रपए स पधिप मच होता रहा । कायम बरावर इस मन का विरोध करती रही। १मिनम्बर १८०२ वा भारत मरार प्रम्नाबों पर विचार करने र लिए एक बर-मीरमगरी नियुक्ति हुई। इसरे पप्या पे मार हाल (1 उग ममय साइ चाममर ५) पोर इसक बाका मारों में रुपए की कहानी मि० कटनी सर प्राथर गाडले, जनरल स्ट्राची प्राति य । इसी बीच वह अतर्राष्टीय सम्मलन भी बल्जियम की राजधानी म बठा । पर जिस गह और सम्मेलन जा चुकं प उसी राह यह सम्मलन भो गया। इसकी अमफलता का एक नतीजा यह हुमा विचादी की टक साल बद परान वालो के प्रादोलन में और भी बल आ गया। इघर हाल कमेटी की बठकें लटन म होती रही मौर गवाहिया गुजरती रही। उन गवाहो म एक मात्र भारतवासी प्रात स्मरणीय दाम भाई नौरोजी प, और उन्होन भारत सरकार के प्रस्ताव का विरोध हो किया । पर उनका साथ देनवाल कई प्रगरेज गवाह भी थ जिनम राली प्रन्स कमि० राली मि० राबट ग्रिफिन (जो वर्षों बोर पाव दड में बड क्मचारी रह चुके प) यूनियन बक प्राव स्काटलण्ड के जनरल मनजर मि० चाल्स गडनर मि. विलियम फोलर सर माक फाम एडम मादि मुस्य थ। कमेटी की रिपाट म १८६३ के अन्त में तयार हुई। उसका निचोड यही था कि भारतवर्ष चादी का परित्याग कर द-सवसाधारण के लिए टक्साल का दरवाजा व द कर दिया जाय और हुण्डी को दर फिलहाल १६ पेंस कर दी जाय । गरज यह विभारत सरकार का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। कमेटी न उसमें हेरफर किया नो इतना ही कि हुडी की दर १८ पस न करके (यह हह सरकार की प्रार स सुझाई गई थी) उमन फिलहाल १६ पस कर देन की सिफारिश का । भारत सरकार न रहा था और कमटी ने भी इसको दोहराया कि चाल का परित्याग सान क पहण क उद्दा स ही दिया जा रहा था। २० जून को भारत सचिव न तार-द्वारा भारत मरवार को टक्साल चन्द करन और नई व्यवस्था जारी ग्नि लिए मुनासिब कारवाई करन की इजाजत दी। २६ जून का बह लाट को विधान सभा में इस विषय स सम्बध रापन वाला कानून पास हुपा और उसी दम घाती सिंहामनच्यन कर दी गई। सवसाधारण क लिए अब टक्साल का दरवाजा खुला न रहा-~~-यहा चारी चांदी का परित्याग कमिक ढलवान का अधिकार प्रब क्वन सरकार को रह गया। साय हा साप इस बात की भी व्यवस्था का गई कि टक्मान में जो कोई १६ पेंस प्रयात १३५४४ मन मालम माना दाखिल कर उम बटन म एक रुपया मिल जाय । हाल मटी न जिम व्यवस्या का सिफारिश की पा और जा अब कानूनन जारी की गद बर याड ममय के लिए था। विचार यह था कि इसका अनुमव हा जान 7 स्यायी व्यवस्या की जाप । एक्सचेंज प्रधान हुण्डी कार मम्ब ब म य बात माम नौर स नार करनी चाहिए। हाल कमटान पष्ट में कहा था कि बार परिम्पिनि मनुल हा वा यह दर वाई जा सकता है। सरकार को भार म विधान-ममा में कहा गया कि चारी पए और मान क वाच जा सम्बध म्यापित किया जा रहा ह उमको अन्तिम निणम नहीं समझना चाहिए। कायम न प्रम्नावतारा इस बात पर बार रियाया कि हाल कमी की जा मिसरिंग हा व मधमाधारण क मामन रखी जाय पोर विसीबी पशर की कारवाई म पहर उस पर पूरी तरह म विचार हाल। पर हमारी सरकार उनन ममय के लिए भी ठहरन वाली न या अब एम भोर विपक्ष का माल मुनिए - बार-बार सरकार की प्रार म यह राना राया जाता था विचार गिरन से हराकर गिरती ह मोर इमानताना यह हाता हरिजा सम हमें बिलापन भजनी हानी है उमा लिए महा अधिकाधिक प है, हमाग प्रापित मस्ट बरावर बना ही रहता है और हम कभी यह निश्चयपूवक नहा जान मात कि हमारी परिस्पिति कब क्या रहगी। इममा जवाव यह या वास्तव में हमें इलण्डराजा दुध दना पड़ता था उमस हमारा रमाण-मा हाता पा पोर मगर हम परापान न होन तानने की यह नौतहान माती। उम जमान में यह मानाना सम हा रोड पौर सपा पा और पगर एक्सचेंज की दर १६ म परती जाय, नो उमा २॥ कराड रपए में घिर हा या इमम मिलना ही एसो रकम । जान पड़ते रुपए की कहानी गामिल थी जो हम पर सिफ इसलिए लाद दी गई थी कि हम ववस थ, और इग्लण्ड मनमानी जोर जबरस्ती कर सकता था। अफगानिस्तान की तो बात ही क्या भबीसीनिया की लड़ाई का विच भी हमसे वमूल किया गया । स्पालीपुलाक याय इससे ही समझ लीजिए कि क्या अवस्था थी। सबसे पहले देखन की बात तो यह थी कि भारतवष को जो कुछ देना पडता था उसमें यायत कहा तक वमी की जा सकती थी। फौजी खच का एक बड़ा हिस्सा इग्लण्ड को देना चाहिए था क्याकि जो फौज यहाँ थी वह कवल भारतवप की रक्षा के लिए नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य मात्र की रक्षा और भनाई के लिए । मि० ग्रिफिन के मतानुसार, भारत सरकार का प्राधिक संक्ट टालन या दूर करन के लिए मुद्रा प्रणाली म एस परिवतन की कोई आवश्यकता नहीं थी आवश्यकता थी तो खच घटान की भारतवष का बोझ हलका करन की। 'याय का यह था कि भारत के पच में करीब छ करोड की कमी कर दी जाय और उसके बोझ का यह हिस्सा इग्लण्ड अपन ऊपर ले ले।' एक्सचेंज गिरन से सरकार की कठिनाई जरूर बन जाती मगर उस हद तक नहीं जो सरकारी बयानो में दी जानी। इस विषय में यह भी याद रखन की बात ह कि चादी सस्ती होन और एक्सचेंज गिरन मे हमार एक्सपोट (निर्यात) व्यापार और उद्योग धपा की घडी उन्नति हुई और इसस सरकार की मापनी भी बटी। १८७३ ७४ में भारत-सरकार की माय चालीस करोड में लगभग थी। पर १८९१६२ में यह ५० करोड से ऊपर पहुच गई थी। जो रकम विलायत भजनी पडती उसमें थोडी सी वद्धि हो गई तो उसके लिए चादी वाफी बट नाम की गई। पर उसी चाटी न दूसरी आर करोडो की मामदनी कर दी तो उम इसका कुछ भा या नहीं मिला । श्री रमेशनद्रदत्त न अपन प्रसिद्ध प्रथ Economic History of India (भारतवर्ष का मार्थिक इतिहाम) में लिखा ह वि चाली और एक्सचेंज गिरन से जब चावल और गहूं में तजी माती तब सेटलमण्ट (वनगावस्त) अफ्गर जमीन का लगान या माल वडा नेते और जब वाणिज्य यापार वान स व्यवसायियो की प्राय में वद्धि होती तब इनकम टक्म प्रफमर टम बढ़ाकर मपन क्तव्य का पालन चादीका परित्याग करत-पाठी के गिरने में सरकार कान काई बास कठिनाई योन नक्सान । १८१११२ में ममान हानवाल -म वर्षों में व्यय स माय प्राय ५ करोड अधिक रही। यद इस बात का प्रमाण है कि मारन-मरकार का प्रायिक सक्ट जितना काल्पनिद या उनना वास्तविक नहीं । हिमाव किताब में जा हानि दिखाई जाती वह म आधार पर कि अगर इतना पयागिलिस या २४ पम का र म विलायत मजा जा मकता तो सरकार का यग इनना कम जगना पडता उगहरण व लिए १८९२.३ में एक्सचज के कारण हानवानी हानि प्राय दम रोड शिपाई गई थी--प्रति मगर नागिविग की दर कायम हाती ना उम माल इतन कम रुपए म ही मारन-मचिव का इण्डियों का भुगतान हा जाना पर इम मितमिले में क्या यह या गबन को वान नहीं थी कि दो गिलिंगवाल उमान में भारत-मचिव की माग माज म कहीं रम पी पौर मरकार के दूसरे वध मा इम वह पमान पर न य । भारत सरकार की आपिर कठिनाइया या मक्ट म कार वास्तविकता यी माना उमर निए पादा या एकाच जनही बल्कि मोर हा वात जिम्मवार दी। मरकार को हर हालत में प्रपन चय का माय के मोतर रमना माहिए था। तन पाव पमारिए जनी नावा मौर । पर इस तथ्य का उमस पालन न हुमा और वह लापरवाही के माम हर तरफ पर मारनी ही गई । मरहरीलाइया में पमा पानी की तरह बहाया गया पोत्री नारत बनाने में प्रचार पत्र दिया गया। पर अब पापित कठिनाई उपस्थित हुई नब इमर निग गपीठहाई गई चार्ग और रपएका गिग हमा विनिमय घडा मारे लिए यह मान मालिया आयकि बिना राबद्धितिय सरकार की भावना की पूर्ति नर्ग हा मानी था ना भी करना पडगा विमरकारका जा करना चाहिए था उस कान को वर तयार न पो। विगी वस्तुमा पर टम ममम जार या हवटी पी वह नहीं परावर थी। १८७५ में यह म्यूटी ५ प्रतिशत कर दी गई थी। पाके मिए माम रिमायत पा।१८८० में नमक और गव का Bार बारी थोत्रों पर म उयूरी हटा मी गई और हमर वा नई मान तक सिंधी रुपए की कहानी वस्तुए यहा बिना किसी प्रकार का कर लिए प्राती रही। इनमें प्रधानत कपड़ का थी। हाल कमेगन अपनी रिपोट में लिखा था कि प्राय बढान के लिए अगर चिनी वस्तुमो पर फिर से ड्यूटी लगा दी जाय तो इसका बहुत बम विरोध हागा --बहा तो यह जाता है कि यह काम लाकप्रिय होगा। पर कठिनाई यह है कि अभी हाल म ही कपड़े पर में डपूरी हटा ली गई है और अगर वह फिर से लगा दी गई तो इग्लण्ड म इसका घार विराध होगा। इग्लण्ड का विरोध स्वायमूलक था। उसका उहा था मस्टर की मिला को अधिक से अधिक सम्पन्न रखना । बार बार उनकी भलाई की वा पर भारत के हित का बलियन किया गमा । अगर भारत स्वात्र हाना, और चाली गिरन स सचमुच उसे कोई कठिनाई होती तो वह इमोट डयूटी वढाकर बडा ही प्रासानी में उस समस्या को हल कर सकता था। यह हुई सरकार के सकट का बात । मय अग्रज कमचारिया की वठिनाइयो का लीजिए। बहन का प्राव यकता नहीं कि हे ममार म ऊच स ऊच वतन और ऊचे ऊच भत मिलत य। कपिटल नामक पत्र न अपन १२ जुलाई १८९२ के अफ म बहुत ठीक लिखा था कि अगर एक गाही कमी गन महा प्राकर जाच कर तो यह बात का वात म स्पष्ट हो जायगा कि जो मफसर मा कमचारी सबसे ज्यादा गार जरूर मचा रह है वे इमार पान के सवम कम हकदार है । यहा तो जरूरत इस बात की है कि वेतन मोर भत्त नए सिर स मुकरर दिए जाय क्याकि कुछ ता बहुत ही कम पात ह और कुछ बहुत ही ज्यादा । ससार म मोर कोई देश नही जहा वतन इतनकच हा मोर चीज इतनी पस्ती। यह ध्यान में रस्सन की बात ह कि यूरोप म १५८३ और १८९३ ६ वाच सोना महंगा होने में मारण दाम काफी नाच गिर गए थे। स्वज को नहर खुलन स यरोप का राम्ना पहल स छोटा हो गया था और मान जान में सब कम पड़ता था। इधर भारतवष म रेलो का जाल फ्लता जा रहा था और व्यापारिक प्रति मागिता बरती जा रहा थो। य मार वारण विगी वस्तुमों के दामों का चादी का परित्याग था, पर फिर भी बाहर में मानवाली चीजें १८९३ में १८७३ का अपमा सम्नी थी। लन्न के स्टटिम्म नामक पत्रन इन कमचारिया की माग पर टीका करते हए लिखा था--- 'इनका कहना है कि वतन का जा हिम्सा हमें यूरोप स पानवाला चीजो पर खच करना पहना है उसमें मकर ३८ को वद्धि हुई ह। पायद इनका बयाल है कि यूराप म रहनवाल मारत की वातास बिल कुल अनमिन ह । यह बयान न गाताना य एमी बात बहन की पता न करते। अमलियन ना यह ह कि यह वद्धि न । बराबर हुई है। फिर इनका कहना है कि वतन का जा हिस्सा हमें विला मत भेजना पडना ह उसम भी नुकसान उठाना पड़ता है। पर अगर नृक्मान हा भी तो भारत सरकार का इमम क्या दोप · वह तो रहेगी पौर बहुत ठोक रहगी कि हमन तुम तागो को जो कुछ दन का बाला किया था वह दरिया । उमक जितन कमचारी है उन वतन वह रूपयों देती है । चाली क गिरन स रुपए का एक्सचेंज-र गिरता है तो उस लिन वह जिम्मवार है न वह उमक राकेर में चुदा वह क्या करे सस्ती है। चादी व विरुद्ध rलन बरनवार का कहना था कि पोज हालत में एक्सचेंज अम्बिर हावाहोल रता है पर यह व्यापार + माग में वाघर का काम करता है। पर हर व मेरी मामन कई एम 31 हरण पनि गा जो और ही चान मादिन कानवाल परिणम रिका म मादिमा प्रालि माघ---कमवन में प्रग्थिरला हात हुए भी इग्लण्ड व पमान पर व्यापार कर चाया और जिन्हान यह उगहरण कि उनका पूराना था कि जब एक्सचेंज की पावडी यहाँ बाधक नहीं हुई तब क्या कारण है निमिफ भारतवप में होगी? राली नामक जग-विभ्यान पम्पमा मानिन मिरन रामीम पपटी ने पूछा कि इधर रुपए का दर में जा घटानी हुई ह, उमने पारको अपन व्यापार में भाई गित ठाना पडी है या नहीं? म गसान जवाब पिया कि नहीं पाई भी नहीं। उन्हान वह सरोरामो बनापाका, व्यापारी साग जागिम स बचन क लिए बार मसान १०८ रुपए की कहानी और आज भी लाते ह ! मान लीजिए, हमें दो महीन बाद कुछ डालरो की जरूरत पडगी। एक्मचज अस्थिर होन कारण कोई नहीं कह सकता कि उस समय उन डालरो के लिए हम कितन रुपए देन पड़ेंग । पर हम इस विषय म निश्चित हो जाना चाहते ह । एसी अवस्था म हम पार वड मर्यात प्राग मिलनवाले डालर ग्राज ही बक से खरीद लग और समय पान पर उन्हें देकर भुगतान कर दग। अगर वक से पाग के डालर मिलन म टिक्कत हुई तो हम सम्भवत यहा कुछ माल मरीतकर अमेरिका में बच दग जिसमे हमें वहा समय पर डालर मिल जाय । सच पूछा जाय तो मुद्रा या विनिमय का प्रश्न सरकार या उमके कमचारिया या व्यापारियो का प्रश्न न हाकर इस देश की जनता का- पहा के कराडा क्सिाना का प्रश्न था । इस कमन की कसौटी यही थी कि चादा या एक्सचेंज व गिरन स उस जनता का--उन नरोडा किसानों का--लाम हुमा ह या हानि ? अगर किमान जस उत्पारक उससे लाभा वित हुए पता इससे यह सिद्ध था कि चादी हमारे देश के लिए हितकर पो और इसके सामन यह वात कोई महत्व पान लायक नहीं थी कि अगरेज कमचारी या व्यापारा उसस थाडी बहुत हानि उठा चुके थ और उससे भस तुष्ट प. ऊपर कहा जा चुका है कि यूरोप म दाम गिरते पा रह थे। माना महगा हो रहा था इसलिए जो दाम मान म दिए जात य वे कम हो रहे थ । भारतवप म चादी न होती और चादी का बाजार इस तरह न गिरता ता यहा भी दामा को यही गति होती । इसस विमान या दूसर उत्पारक बड घाट में रहत । किसान को लगान या वर या मूद के रुप जो दुछ दना पडता ह वह एक निश्चित रकम हाती है। यह रकम वह देना हभपन गाठ पसीन की कमाई से-अपन ग्वत का अन्न या गला बचा । इसका दाम जितना ही अधिक मिले, उसके हक म उतना ही अच्छा । मान लीजिए कि जिस समय यूरोप में नाम गिर रहे य उस समय हमार रुपए के विनिमय मूल्य में स्थिरता थी तो उस हालत में हमारे यहा भी दाम उसा हिसाब स गिरत और हमारे विसान बड संवर म पह बात। पर हुमा यह कि चारी सस्ती हो चली-रुपए का विनि चांदोबा परित्याग भायात मय मूल्य भी गिरता या~और द्रव्य मम्ता हान का अय ह दामो का उठना, इसलिए दाम (सोन के गिरन पर भी) यहा ऊपर उठ रह । साना महगा होकर हमारे विसानो पर प्राघात करन जा रहा था पर चादी न सस्ती होकर और बीच में पडकर, उनको बचा लिया। इग्लण्ड में जिन्सा का दाम जहा १८६३ म १०० था वहा गिरत गिरत १९६३ में ६१ रह गया था। भारत में गल्ल का दाम जहा १८६३ में १०० या वहा १८१३ में १२९ था। अगर यहा चाला का स्पया न हाता मोर इसका मूल्य न गिरता ता यहा मी दाम पर जान 4 बजाय इग्लण्ड की तरह नीचे गिरते। विगी व्यापार के प्राकह भी यही सिद्ध करत ह कि बादी से हमारा साम हा हुमा। १८७३-७४ निर्यात (एक्सपार) ५४९६०७८६०६० (इम्पाट) ३१६२,८४९७०० मायात निर्यात मयिक २३ २२२२६६० २० १८९२-६३ निर्यात (एक्सपोर्ट) १०६५१५१६३०१० पायात (मोट) ६२ ६१८०८३० रु. पायान स निर्यात अधिक ४३,८०६८१०० . भारतवप में इम्पाट (मायात) एवमपोर (निर्यात) पर निभर करता है । जब किसान अपना गल्ला वचकर ज्याग पए पाते ह सब ५ विगी वस्तुमो पर भी ज्यान बच परते हैं। एक्सचेंज गिरते रहने स इम्पो बहुत कम हो जाना चानिए था, पर प्रसानिमत में यह प्राय ट्रना हो गया। फिर भी करेंगी एसोसिमान वाले सन्तुष्ट नहीं १ पोर यही पहले जाने पकि व्यापार चौपट हो गया । नीषा एक्मज भारतवर्ष के लिए मामलायर ह या नही प्रश्न का उत्तर ते हुए पसरत की मार कम्पनी र पल म मानिस भि० जाँ यूसने ( जो इण्डियन नगन बायसरे चोय मधिवेशन रे सिट हुए पे) हा पाकि- रुपए की कहानी 'हा यह अवाय लाभदायक है । म यह उत्तर गहरी समीक्ष परीक्षा के बाद द रहा हूँ। मि० १० यून का कहना था कि ब्रिटिश पूजीपति यहा के उद्योग घ धो का गला घोट देना चाहते थे और इसा उहा से भारत सरकार के अगरेज चमचाग्यिो को प्राग खडा करके मारा भादोलन चला रहे थे। इसमें खास हाय लंगानायरवालो का या जो यहा की काटन मिलो पो नष्ट कर डालना चाहते थ । चादी में गिरन से इन मिलो को फायदा पहुचा था और इनकी तरक्की हुई थी। १८७६-७७ म जहा ४० पाटन मिलें था वहा १८६१-९२ म १२७ हा चसी थी। इस बीच में स्पिण्डल ( त) १०० ११२ से ३ २७२ ६८८ और लूम (करघ) ६ १३६ से २४ ६७० ही चल य । यहा की काटन मिल चीन के बाजार में भी मास्टर से प्रतियोगिता करन लगी या और इसमें व्यापार का काफी बडा हिम्सा उनके हाथ म मा गया था। नीचे के प्राडो को दपिए - इंग्लण्ड से सूता चौन गया-- कीमत पौंड में १८६० १७६७००० १८६१ १५०७००० भारतवर्ष मे मूता पीन गया-- कीमत पौंड में १७५०७००० १६३६७००० १८७६७७ में भारतवप मे जहां ७ ६२७ ००० पौंड मृता प्रऔर १५५४४,००० गज कपडा चीन गए पे वहा १८६१६२ में प्रमा १६१५५३००० पॉड मोर ७३ ३५४००० गा गए । जापान भी उम ममय यहा की मिलों के मूने का बहा बरोदार पा। यह मव मम्टर के लिए अमा था इसलिए उसकी आर स इस बात ह भरपूर कोगिता हुई कि भारतवर्ष स पानी की मुद्रा उठा ली जाय पौर एक्मवन र उस समय जो ऊंची-मे ऊपी हो सकती पी, रुपए
चादीका परित्याग
कर दीवार । इस प्रकार एक्मवत्र का जचा रन म चान में भारतवर
को क्या क्षनि हानवानी या य वनार हुए गाय को वान एनामिन
नामा माया नहाल कमा का लिया था
इस समय मारनवप की मिल जब २०००
६। कामना पहा
बचती है तब उस १०००० डामर हात । चीनदाल ००००
गलर इमलिए त? कि इमम मम बमा मना स्य नयार नहीं
कर मकने पर अगर एक्सचर की र एम कराई गईमा
भारत की मिल पाता7 कोहारह -२ पए मिलम पर
चीत के मरीगर इमर लिए यहा १२ ०० हार ना पडगा।
वहर सम्भव है कि भूता इनना मगा हो जान पर चीनदा पानी ही
मिनें माल लें और मारतवर + लिए स्थिति यह हा जाय दिया नो वह
अपना दामनाचा या इम व्यापार महायावर
नपाई अलावा मोर म्याना न भो- जमे हागभाग भोर सालान
न-दस प्रस्ताव का विगप क्यिा कि भारतवपम चारी की मद्रा उठा
नी जाय । चना में मा यहा ना पमा चलता था और इसराय
कृत्रिम हो जान म वहा के उपायों को भी हानि पा।
पर उनका
मावेन निवेन भा भरण्यरादन ही रहा।
३ सोने का ग्रहण नाट मूल्य मापने के लिए पहले चादी का रुपया काम में लाया जाता था। स्वयसिद्ध मद्राहीन के कारण १६५ ग्रन चाटी को सोन में जो कीमत हाती वही रुपए का कीमत थी। पर अब रुपए का वह स्वरूप न रहा । रुपया प्रव प्रतीक मुद्रा कर दिया गया। वह मोने का प्रतिनिधित्व करने लगा । १६५ ग्रन चादी की कीमत सोने में चाहे जितनी कम हो पर वह १६ पस अर्थात् ७५३३४४ अन सोने का द्योतक हो गई। हज क्या रुपया जो कागज का चना ? गम न खा-रोटी तो गहू की रही। पर सच पूछिप तो चाली का रुपया भी पब एक प्रकार का था । साधारण नोट से उसम फा था तो इतना कि यह नोट कान का न होकर चादी का था । मूल्य अब दोनो का ही कृत्रिम था। चादी की टक्साल बाद हो जान पर स्थिति यह थी (१) चादी पद स्वयसिद्ध मुद्रा गा मूल्य मापक नहीं रही। (२) मरकार प्रपन को बचनबद्ध कर चुकी थी कि यह स्पान मोने को प्रदान क्यिा जायगा। (३) इस देश में चलन सिफ प्रतीक मुद्रामो का रह गया जिनमें कागजी नोटों के साथ चाटी से भी नोट ५ । (४) साधारणत चोरी की एसी प्रतीक मुद्रा कानूनन एक हर तक ही लेन देन के काम में लाई जा सकती है । उन्हरणाय इग्लह में गिलिंग का सिक्का प्रती मुद्रा का काम करता था पर मिलिंग में एक पोर से ज्यादा देने ऐन को कोई भी कानूनन वाध्य नहीं था। पर यहाँ भारतवर्ष में रुपए पर एसी कोई कद नहीं लगाई गई-चाहे जितना देना पावना हो रुपए में या लिया जा सरता था । (५) अभी तर चलन में प्रत्यक्ष रूप से मोना नहीं पाया था। साल में या मरकारी खजान में सॉवरेन १६ पेंस की दर से लिए जा . सोरा ग्रहण पर सात था पर उह दन-जन का जनता कानूनन बाध्य नहीं थी। (६) सरकार इस दर म (मर्यान ७५३३४४ अन सोना-१ रुपमा) सान के बल सए देन का तयार यो पर रुपए के बदले साना दन का नहीं । १० का विनिमय-मूल्य १६ पस बाघ गिया गया था इसलिए वह उमम ऊपर नही जा मक्ता था। जव ७५३३४४ पन सोना सरकार को दकर इमसे एक रुपया लिया जा सकता था तब बाई दुमरे का एक रुपए के लिए उममें अधिक सोना क्याकर देता चूकि सरकार ने रुपए के वाले मोना नेन को कोई जिम्मेवारी हा ला यो, उमका विनिमय-मल्य १६ पम में नीचे गिर सकता था। (३) विनिमय मूल्य या एक्मधन १६ पम कर लिया गया था स्थायी रूप स नही । हमार गासर देखना यह चाहत ५ वि : क्सि परवट बैठता ह । परिस्थिति अनकूल हुई तो उनका इरादा उसको और भावा करने का था। मय के मान + लिए अमरजी मण्डड र व्यवहत होता है। माना पटर कर देन का प्रय है इस बात की व्यवस्था परना कि लन टेन के भुगतान के लिए लोगो को सोना पिल स1 पर इम समय यहा एमी कोई व्यवस्था नहा का। उधर चानी भी स्टपण्ड को जगह नहीं रह गई था। फिर यहा का स्टह क्या था? वास्तव म इस प्रश्न का उत्तर दना मासान नहा था। सर जॉन सबक नामर एक प्रसिद्ध बकर थ, जा १८६६ वाल माना पानी कमीशन मम्बर रह चुके थे । उहान इस विषय में अपनी राय जाहिर करते हुए पहा था कि यहा का तत्कालीन पडड एरमचेंज स्टडइ था। इसकी “याच्या उन्हान इन पदो में दी थी. "जब भी कोई सरकार ऐसे नोट (वे चाहे कागज के हो चाहे रुपए का सरह बादी में जारी करती ह जो कानूनन मोने मे वाले नहा जा माते, और उसकीमत ठरान को जिम्मेवारी अपने ऊपर लेनी है तब मेरी ममझ म इस साइड को इममे अग्छा और कोई नाम न मिस मान के -समज 'पला चाहिए।' मा ऑन लवक इस प्रकार के पडो विरोधी प। उनकी बाम प्रापति यह था कि इस प्रकार का पवस्या परेंसी सपना या याना - ६पए की कहानी प्राकृतिक रूप स न हाकर मरवार की मर्जी के मुताबिक हुमा मरगा जो बडी भयवर वस्तु होगी। चादी के पपाती बराबर यह कहत पा रह य कि जा लाग साना सोना चिल्ला रह ह वे कपटी ह और उनम उद्दश भारतवप का सोना देना नहीं बल्कि हुडी की दर को ऊचा करके रपए का ही बराबर चलन म रखना ह । मिस्टर राली न अपन मत का स्पष्टीकरण करते हुए कहा था कि मेरा विश्वास हकिमोन के स्तण्डड के प्रन की प्राइ या तह म एकगचेंज का प्रश्न है । अगर भारतवय म मोन का म्हण्टड हो चले नथा मान और कपए के बीच का एक्सचज र वाफी नीची हो तो म हगिज उम म्हण्डर वा पिरोन कम्गा । अब घार घोर यह स्पष्ट होन लगा वि मचमुच हमारे माम एक नरह वा चाल चली गई था-- हमको सोन वा स्टण्डड देन का वादा मचाई के साथ नहा क्यिा गमा था। जो हशल कमेटी के मम्बर रह चुके थ उनका भी मोन के सम्बध में अपना अपना विचार या। १८९८ में बयान देते हुए लाड फारर न ता यह कहा कि 'अगर मेरा वि वाम यह न होता कि हाल कमेटी की रिपोट भारतवप को सोन वा स्टण्डड दिलायगी तो म उग पर भी रस्तखत न करता। उनका कहना था कि यहा प्रमी तब मोन का स्टण्डड स्थापित नहीं हुआ है । उधर मि० करती न जो लाड पारर की तरह हार कमेटी के मेम्बर रह चुके य फर्माया fr-नही जब मरकार सवमाधारण से लगान या करके भगतान में मोना ऐन को तयार है और स्पए को एक्सचेंज-दर १६ म हो चकी ह तब समझना चाहिए कि मोने का स्टण्ड स्थापित हो चुका। रू से ही यहा की मुद्रा प्रणाली को साम्प दिया गया कि वास्तविकता प्रामानी से क्सिाकी समझ में न मा मये और उसकी जटिलता की धार में हमारे वषिर्ता जो दस्ताजी पाहें मकें। जिस रोज इस कमटी की रिपोट नयार हई थी उम रोज एवमचेंज की दर १४,६२५ पम घो। रिपोट निकल जान पर २७ जून को यह पर एक दिन के लिए १६ पस हो गई पर यही टहर न सकी। १९९६४ में भौमत दर १४५४ पैस रही। यह दर बाजार की हासत पर निर्भर करती है। ऐसा न होता तो सर- माने का प्रहण कार विधान-मात्र से को मोर मी चा कर मरतो यो। सरकार ने मानून पान बर पिया दि वर गिनिंग न वार का एक पमा नगी पर बाजार को हनन एनी नही कि किलो का म्फा = लिए मर कार व पाम जाना पड़ मोर ग गिलिंग म बम में गे पिया मिल जानाहता मरवार का कानन कानन हो रहगा वह गा चन नमागे। या जहर है कि सरकार अपनी नीति गति में पग्दिनन कर बाजार भी हालत परल मक्ती और बाजार का प्रपन पास मान लिए मजदूर वर माती । पर यह अवम्या मा एक हद ना ही पा की जा मानी है। लिमम्बर १८६ में काम का अधिवान मागेर में हवा और उममें यह प्रस्ताव पास प्रा कि- मारत-मरवार ने मानन फानन कानून पास करत मरमागरण के लिए चानी वीटरमारा रवाना बन र यिा। इस पर यह कारम प्रयतम प्रकट करती। भारण विगए का मन्य कृत्रिम और अचा करके उनना पर परोम म्पम ए नया कर लगा लिया गया है और इस कारवाई म हमार व्यापार और उद्याग पचों का~मासकर वह का मिला बा-दही हानि पहची है। टमानव ही जान बार पारी के दाम और एक्मचेंज की दर चादास भोमनगम म प्रोमत एक्सचेंज पैम १८९४-१५ १८.५-६६ १८६६-६७ २७.६ १९५४ भारम्भ में मान तर एबमचेंज म मा नीचे रहा- मपान मरसार राहती दो किरपरका माग "मदार में मगर रपया सस सस्ता बना रहा। अपनी नीतिको अमरुस हाने दस सारन रुपए की कहानी रुपए का प्रभाव या कमी करना शुरू कर दिया । पिपा ढालना न ढालना अव सरकार के बस की बात थी। उमने नए सिक्का की ढलाई बन्द कर दी जिससे बाजार म रुपए की टान बरती गई। टक्साल बन्द होने में पहरे नई करेसा के रूप में हम प्राय मात से नौ करोड रुपए की हर माल जरूरत पडनी थी। सिक्के ता इमस भी ज्यादा लत प, पर उनमें से कुछ गला लिए जाते थे और उन जवर इत्यादि बन जाने थ । जो मिक्क चलन में रह जाते उनकी ताद इतनी पी। हमारी जन संख्या हमारा वाणिज्य-व्यापार हमारी तरह-तरह की प्रावश्यक्ताए पर रही पी और इसलिए यह आवश्यक था कि वर मी भी उही के अनुसार वरती रहे । अगर स्वाभाविक रीति म वह बरती तो १८६४ मे १८६८ इन पाच वर्षों में कम से कम ४० करोड और रुपए नए मिया के रूप में चलन में आ जाते । पर वास्तव म हुमा कुछ और ही। इतन ममय म दुल पाच करोड रुपए के लगभग चलन म बर पाए । सरकार प्राय नए सिस्य ढालती हा नहीं थी इसलिए पुरान मिक्का से ही सब को काम बनाना पड़ता था। १८६३ में चलते फिरते रहावाले रुपयों का सख्या १३८ पराड कूती गई थी। अगर यह सध्या ज्या की त्यो बनी रहता तो भी हमारी भावश्यकनामा का पूर्ति के लिए अपयाप्त होती। पर स्वाभारिक कारण-जसे गमावर मोर काम में ल माना जमीन म गाड दना इस देश से बाहर भज दना~ उस सम्या में हास ही करने वार ५, इसलिए १८९७ की कूत के अनुसार यह केवल १५० करोड ठहरी थी । एस समय में जब कि रुपयो की भाव यक्ता ग्निदिन पर रही पी सरकार उनकी ढलाई वर कर और उनकी तादाद कमर उनका मूल्य वढा दिया और एक्सचेंज अन्त म १६ पॅम हो गया। पर पाच साल से कम में यह काम पूरा न हो सका। यहा यह प्रश्न किया जा सकता ह दि मवसाधारण के लिए, टकमाल जरूर व पी पर लोग सरकार को सोना देकर तो पपा से ही सरते ५ फिर व एमा क्यो नहीं करते पे उत्तर यह ह मि सोना लोग सर गर पास तभी ले जात जव मोर जगह वचन में भषिक लाम न होता । जय ना क्सचेंज १६ स न हुआ मोना बाजार में सरकारी दर सोने का ग्रहण म महगा विक्ता रहा । सरकार तो ७५२३४० ग्रन मान बदर एक रूपया ती पर इतन पान का मूल बाजार में एक रुपए से अधिक था। ऊपर रहा जा चुका है दिदग्लन में म्म हर मान का पा भोर पोह गिलिंग पेंस टस समय मात क द्यानत्र य । फिर जब बाजार में एक्सचेंज १८ पेम होता ना उसका प्रय यही था कि उनन मोने वा मन्य एक हुमा । प्रदय ही जब किमी का १४ पैम (माना) वचन मे हा एक कृपया मिल जाता ह तव वह । म (माना) दकर एक रूपया रेन को तयार न हागा । यरी कारण - कि इनन माल ना का अपना माना - जाकर मरवार म पए मागन न गया। इमा दात का दूमरा तरह यो यह मान ह कि तन समय तक एक्सचेंज-नीति मान न हो मी । चाली का बहाना पूरी करन के लिए या मरिका को भी कुछ घटनाओं का उन्म प्रावाया है। जब १८१३ में भारत-मरकार ने अपनी टकमाल बन कर चारी का मुद्रा यहा म रठा नौ तब मरिवान गपन विधान का मन्यूब करा बाजार में चारीघरीगना बन कर लिया। इमम चाना और भानीचे गिगानामा का यह हाल रहा-- पॅम--- १८६३ ३५३ १८६४ १८९५ १८६७ २७९ १८१८ १०६६ २० १८१६ मचाती समरिका मr arr फिर राजननिर पान का मुख्य विषय वन वठी। वगरविन चात पनि हग विषय पर अनरामाय मममोन की किस चा की जाय। पर डिमारट गमन विरामी या स्नी माया हि प्रमारिपन मरार दिना मोरोंम दिया प्रकाराममनोना किएदत मुदा मनमा पहनकर और मान तपा रुपए की कहानी चादी के बीच १ १६ का सम्ब व स्थापित कर दे । प्रसिडेंट के चुनाव म जात रिपलिकन पार्टी की रही और नए राष्ट्रपति ने दोनो धातुप्रो के बीच सम्बप निश्चित करन के उद्दश से इग्लण्ड और फास के साथ पत्रव्यवहार शुरू कर दिया । फास की राय थी कि यह सम्बध या अनु पात १ १५३ हो, पर यहा भारत सरकार को यह मजूर न था 1 बाजार में उस समय (१८९७) यह अनुपात १ ३४२० था-अर्थात् प्राय ३४ भाग चादी एक माग सोने का बराबरा करती थी। फ्रास का बात स्वी कार करन का अर्थ होता चादी का मूल्य इतना अधिक कर देना कि १५शा भाग चादी हा एक भाग मोन का बराबरी कर सके। साथ ही इसका प्रय होता रुपए के एक्सचज को अत्यधिक ऊचा कर देना -जो भारत सरकार को भी दृष्टि में सवथा अनुचित था। अमरिकन राष्ट्र पति क पत्रव्यवहार का कोई नतीजा नहीं निकला । इधर सान के उत्पा दन म बढी वृद्धि होन लगी थी मोर सोना सस्ता होने लगा था। लोग पाड ही समय म चादी को भूल से गए । १८९८ में भारत सरकार ने एक प्रस्ताव भारत मचिव के सामने रक्षा, जिसका उद्दश पा कज लेकर इग्लण्ड में सोने का एक रिजव कायम करना मोर रुपए गलागला कर चादी के रूप में बच देना। सरकार का कहना था कि चलन म रुपया मावश्यक्ता स अधिक मोर एक्मचज को १३ पेंस तक उठान और वहा टिकान के लिए इस प्राधिक्य या बाहुल्य को मिटा देना जरूरी है। २६ अग्रल को भारत-सचिव न एक नई कर सी कमेटी नियुक्त परक उस मादा दिया कि वह मरकार के प्रस्ताव पर विचार करे। इस कमटी सध्या सर हेनरा फॉलर य जो स्वय भारत सचिव रह चुक प। उगव दूमरे सदस्या में सर जान म्यूर मर डविड वावर, लाउ बल फर मि० कम्पबल मादि प। अनुसंधान के लिए जो सत्र कमेटी का दिया गया था वह भारत सरकार प्रस्ताव ता ही परिमित नहीं था भारत-मचिव , भारमानुसार यह भारतीय मुद्रा प्रणाली स सम्बप रमनेवाली हर बान का अनुस धान कर सकता पो और उमपर मपनी राय द सक्ती थी।
मोनेश ग्रहन मटीक मामन मुख्य प्रश्न गप--- (१) यहा का मान या स्टन माना हा या वारी (२) चारी और मात के बाच सम्बर क्या हा. बढ़तेरे गवाहों ने इस बात पर जार लिया कि १८९३ में जो भूत हुई उस लिए यह प्राव या ह कि चानी अपनी पुरानी जगह पर फिर म स्थापित कर दी जाय । कुछ गवाह एम नाथ जा चारी को तो हालत में फिर से उसका पगनी जगह पर लार के पमपातो , जब कि अन्तराष्ट्रीय ममोना हार नाना घातुआ का सम्बघ सदा के लिए निचिनाजाय। यह हुई चालक पक्षपातिया की बात । सान के पचपाती भीदा रलो में विभक्त थ । एक दल चाहता था कि सान का मान ता हो ही साप-साय मोन मिक्क मा चलन में हो। दूसरा दल पता था कि मान तो सान का रह पर यहा उसके सिर न चलाए जाय । गवाहा में इस बार दो भारतवासी पयायुत रमाद्र दत, (काग्रस क भावी प्रसिड) और बम्बइ क पारसी यापारी मि० भर वात जास्तमजीनान हा मरकार कानोनि की यही मालाचना की। चाएषपातियो का दलील यह यो कि उमस भारतवप की कामा लाभ हुआ था और एसी वस्तु का परित्याग हगिज न करना पाहिए पाए १८६३ में परिस्थिति भोर भी पाया म काबू में साई जा सकती थी। इसके लिए मुद्रा प्रणाली म एस उलट पर का कोई भाव श्यकता नहीं थी। इस बीच म यह अनुभव भी हो गया था कि इस क्षत्र म सरकारको दस्ताजी स क्या-क्या पनप हासपने है । व्यवस्था एमी हानी पाहिए कि गमाजवाभावश्यकनामा के अनुसार करमी मुद्रा की मात्रा स्वत घटती बरती रहे । पर यह प्रयाय जव मरवार अपने हाय म ले लेती है सब पद पटना-बना उमा इच्छानाल होन ताता है । पिता यह हो 11 - साकि यहाँ हा चुवापा-तिरुपए की मम्न जरूरत है, मोर मरबार उम ननस इनकार पाणी है 1 में पिए-पमा दुर्मिक्षा है और मरकार रहती हदि नहीं TV का याहु य ह हम मिसोको नमन में निकाल र गन का रह है। पर करारा स्वत १२० रुपए की कहानी घटना-बाना तभी हो सकता जब टक्साल का दरवाजा सबके लिए खुला रहे, जिमको मुद्रा की आवश्यक्ता हुई अपना सोना या चादी टक साल में ले गया और उसके सिक्के करा लिए । यहा भारतवर्ष में सोन की ढलाई की माग कम थी इसलिए यह मोर भी आवश्यक था कि चादा को टकसाल फिर से खोल दी जाय। इससे सारी कृषिमता पौर तजनित दोष दूर हो जायग। उस समय चाटी का दाम २७ और २८ पस के बीच पा पर चादी के पचपातियो का कहना था कि अगर टक्साल खाल दी गई मौर यहा घाटी के मिक्के प्ववत ढलन लग तो बाजार शीघ्र ही ३० पस हो चलेगा। इमका अथ होगा १२ पेंस का रपया । पर विपक्षी यह कहते कि इस बात की गारण्टी ही क्या ह कि चादी या एक्मचज इसस भी नीचे न गिरेगा? मि० राली ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था कि संसार में सभी कुछ सम्भव ह पर हम व्यापारी अनुभव से जानते ह कि क्या मम्भव ह और क्या असम्भव । जहा व्यावहारिक बातो की चर्चा हो वहा एसे प्रश्न उठाा से क्या लाभ? 'मि० डम्न नामक दसरे गवाह से भी यही प्रश्न किया गया और उनका उत्तर इस प्रकार पा हमारे स्कार लेण्ड में जब कमी कोई ऐसा सवाल करता ह तब इसका जवाव एक लोगोक्ति के रूप में दिया जाता ह । वह लोकोक्ति यह हमि मगर प्राम मान गिर पड तो गानवारे पक्षियो के गम घुट जायग । पर बावजूद इस वे पक्षी गात ही जाते है। लाड एल्डन हम इग्लण्ड के प्रसिद्ध बकर थ और बक माव इग्लण्ड के गवनर रह चुके य । होन प्रपन बयान में भारत सरकार की कारवाई को तोब मालाचना को और उरो जुर्म तक बताया। माड ल्हनम द्वत मुद्रा प्रणाली के पक्षपाती प और गोन चादी वा मम्मघ निश्चित करन के लिए चाहते पनि फिर से अन्तर्राष्ट्रीय ममझोन के लिए प्रयत्न किया जाय। मि. रावर बार' नामक व्यवसायी भी एमा समझौता चाहते थे । उहोन मपन इजहार में कहा- मरा विवाम ह दि भारत में चादी कीटक्साल कारवाजा पिर सोने का ग्रहण म खाल देन का निश्चय होते ही कुछ एसी शक्तिया काम करन लगगी जो चाची के मूल्य को बढाय बिना न रहेगी । भारतीय टकसाल बर होन से पहले नादी का दाम कम से कभी नीचे नहीं गिरा था, और एसे निश्चयमात्र से ही उस नाम में तेजी मा जायगी। चीन और अफ्रीका में भी चाटी के उपयोग के लिए बहुत बड़ा क्षत्र ह ।' सोन के पक्षपाती बही कहते जाते थ जो टक्साल बन्द होन से पहले बार-बार कह चुक य- चादी काफी चचल डावाडोल अस्थिर, अध्य वस्थित साबित हो चुकी ह । एक्सचेंज को अपने माथ नीचे गिरा कर इसन उन सबको नुकसान पहुंचाया है - और उनम भारत सरकार का नाम सबसे पहले लेने लायक ह---जि हे स्पया विलायन भजना पडना है।' पर इमसे पाय मोने के सब पक्षपाती साथ जान को तयारन । काई हमें सोना किसी प म देना चाहता था कोई विसी रूप में। कुछ तो मोना नाममान को ही देनवाले थ। इन सब सामन परला सवाल यह था कि जो रुपए चलण मय मौर जो प्रतीय मुद्रा बना दिए गए थ उ74 बरे जनना की माग हान पर सर बारमोना देने को तयार रहेगी या नहीं सर जान लवर का बहना था कि जब तक सरकार बदले म साना दन यो तयार नहीं होती तब सब मान का मान या "दडइ मापना ही नहीं सकता । पर मोन के पनपानिया न एष स्वर से यही कहा कि अगर मोन के स्टडह की प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक हो तब तो न होगा बास न बजगी कामुरी । भयो के बटने सरकार मोना देने को बाध्य न हो इसी प्राधार पर सबने अपनी अपनी स्वोम पेश की।हा अगर किसी साल भारत पी दतगारी ज्या हुई और उसके लिए भुगतान में मोना बाहर भजना मावायक हो गया तो इन स्कीमा म इस बात की प्राय व्यवस्था थी कि सरकार रुपए लेकर उस काम के लिए सोना । पापमा मतमद विशषत हम बात पर पा दिगो भीतर सण में सोन के सिवा रह या नहीं। मि. मतियह मॉड नाप सर मम्पमत माग सर एडगर विन जग माग इस बात के पग में प। उनका कहना था कि जर तक सान के गिर मन में न होग महा १२२ रुपए की कहानी की मुद्रा प्रणाली पूणत म्वस्य न हा सकेगी। मर एडगर विस्टन मिय मरकार के मलाहार रह चुके य । उनका कहना था कि सिद्धान्तत यह मम्भव ह कि सान का मान या स्टएन्ड बिना सोन सिक्को के चलण + हो, पर यह अपवा-स्वरूपह, और जिम मुद्रा प्रणाली में एसा व्यवस्था हा वह कभी उत्तम नही कही जा सकती 1 मोन क मान या स्टड का प्राधार एसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसम अावश्यकतानुसार सोना स बाहर बरोक टोक जा पा सके और देश के भातर भुगतान के लिए सान के सिक्को का स्वच्छ व्यवहार हो म । इस प्रकार की व्यवस्था उस व्यवस्था स अधिक प्रचलित और हिनकर है जिसम लेन न के लिए क्वल प्रतीक मुदा काम म लाई जाती हो । यह भी कहा जा सकता है कि जहा सोन का मान या स्टण्डड ह पर चलन म सोना नहीं है वहा सरकारद्वारा स्तू गजी विशष रूप स हागी। पर इस प्रकार की रस्त दाजी बहुत ही बुरी चीज ह । जो भी मुद्रा प्रणाली हा वह स्वत काम करनवाली हानी चाहिए और सरकारद्वारा हस्तक्षप कुछ खाम परिस्थितिया में ही-पौर वहा भा कम में कम-हाना चाहिए। सोन के सिक्के के विरोधा यह कहा करते नि चलन म मोना अधिक काल तक नही ठहर मकता- लोग उम दबाकर उठ जायग । इमक उत्तर में मि० मकलियन का कहना था कि साना इमटे लिए काई नई चीज नही थी। सान में सिको यहा मरिया तक चल चुरे य । १८५३ म पहले जो मान मिक्के यहा चलन में उनका तबमीना या बारह कराड पोड। नही, भारतवर्ष का सोन के मिश्की का एमा लाम या मोह नही ह कि वह उह चलन म रहन ही नद। सोनक मिक्के विरोधियो म बगाल- वाकमचारा मि० लिण्डम का नाम विप उ उखनीय है । यह इस विषय पर वर्षों में लिखत मा रहे घ और जब फोलर कोगे रहो तव उसके सामने इहान एक म्कीम रखो जो इनके नाम स माहूर है। इनका स्कीम मारप में यह पी सोना मानपाडकर दिया जाप पर चलन में मानक मिरके न हा ।दा भीतर रपए मोर नाट करे वा वाम कर । ल 'न म ए कराड पोड बजार रिचव (कोष) वायम किया जाय सोने का ग्रहण जिसका नाम गोल्ड स्टड- रिजव गे। रुपए की एकाज-र ऊपर और नीचे नाना पार चार दी जाय । जब किमीरा रुपया की जरूरत हो तब वह लग्न म माकार का स्टलिंग पोर १६ पेंस को दर में यहा उमस रुपए र लामक विारात जब क्मिाका विलायत मालिंग की जरूरत हो नद वह या पार कर १५, पम की दर म वहा सर वारस स्टलिगल" ००० म म विमा हपए नमिलें और १००० स कम क्सिाको मनिगन मिः। अगर किमो समय लिग की माग इतना अधिक हो कि जर याला हा जान का परगना उस हालन में मरवार मारतवष म मिनन वा पया का कुछ ह'नक गला डाल मोर चाटीको लदन मज कर वचन और उसका लिग कर ।। इम स्कीम का पास उहा था भारतवप म रन्मा व लिए मान मा व्यवहार न होन टना और इमम इस बात पर वहन जार पिया गया था किसान का जा रिजव हा वर नम ही रह । मि० लिडम का पहना पा वि लटनम माना रहन में ब्रिटिग माम्राज्य प्राधिरकेट की मजबूती बना रहगा और वह रिजन या भारतवप रखन कवट्टर शिरापी । पर उस समय भारत-मरवार का मत और ही था। उसके प्रय सम्म्य सरजस वम्टलर न इस बीम को आलोचना बात हुए कहा कि भारतवर्ष में नर मुद्रा प्रणाली का सफलता लिए यह पायल भावस्पर विमवसाधारण का उमार पूरा विश्वागहा। पोर उम दिवाम मचान लिए यह भयन प्राव यक है कि माने का रिचय इसी दा में रखा जाय ( मार रजद लन्दन में रखा गया और लागों पा मह वपान हा चला कि भारत मचिव या व्यापारिया की मांग पूरी यह कभी मा गायव हो सकता है ना विवाम हगित न बम मामा भर जम्म चम्टलर की एक रणगी यह पो कि जिव ६,००० पाल दूर न रमार भागलप में रपा नाय तो उमकी मिगर चाह जो हा वह हर हालत म ज्यान मुफो माविन हा मरना है। मोर मागान मा इम सीमा प्रातिजना बनाया और इसको को पापविना सी मबमे बसा दोर यह बताया गया कि इसमें १२४ रुपए की कहानी सरलता और स्वाभाविकता को तिलाजलि दे दी गई थी और सारी व्यव स्था जटिल स-जटिल और कृत्रिम-से कृत्रिम बना दी गई थी। प्राय सब कुथ सरकार के हाथ म या उसकी मर्जी पर छाड दिया गया था, और विशेष ध्यान इस बात का रखा गया था कि सोना यथासम्भव लग्न में ही के दीमत रहे। यद्यपि फोलर कमेटी ने यह स्कीम स्वीकार नहीं की तथापि हमारे गासको की कारसाजी से दंग जा मुद्रा प्रणाली प्रचलित हुई वह बहुत कुछ इसी स्कीम के अनुसार थी। इसीलिए इस विषय के इतिहास में लिण्डसे स्वीम वो विशप महत्व प्राप्त है। कमेटी न अपना निणय देत हुए पहरे तो भारत सरकार के प्रस्ताव को यह कह कर अस्वीकाय बताया कि इस बीचे म परिस्थिति बहुत कुछ बदल चुकी थी-एक्स्चज १६ पास तक पहुच गया था और स्थिर हो रहा था-पर वह समस्या नहीं रह गई या- अगर रुपए चलन स निकाल लिए गए तो यहा मुद्रा सम्बपी स्थिति भयकर हो जायगी और अगर उन रुपमा को गला कर बच दिया गया तो चादी और भी नीच गिर जायगी जिससे चीन-जसे चादी की मुद्रावारे देश मोर भारतवप के- बीच के एक्मचज में हरपल सी उपस्थित हो जायगी। चादी पौर साने के बीच के प्रग्न पर मटी न अपना फसला चादी के खिलाफ दिगा और भारतवर्ष के लिए सोने को ही श्रयस्कर बताया । 'भारतवष म मूल्य का मान या मापक साना ही होना चाहिए-चाहे वह मोने के सिक्को के साथ हो चाहे सोन के रिजब या कोष पर कमटी न उन सब म्वीमो को त्याज्य ठहराया जिनमें विना सोन के सिवको सोन का मान या स्टण्डड चलान की बात थी। एसे सिक्के इस देश म बहुत समय तक चल चुषे प और इतिहास से इस भाषा की पुष्टि नहीं होना थी कि जसे छलनी में पानी बाहर निकल जाता है वसे ही इस दशा में चलन स सान के सिक्क निकल जायग। क्गटी की सिफारित यह पी हम लोग इस बात पण मह वि-िटिश सावरन या गिनी का भारतवर्ष म भी चलन हान लग और लोग उगमन रन नो बाध्य कर ।'
सोन का ग्रहण , दिए जाय । साथ ही, त्रिटिश टमाल को भास्ट्रनिया म जा तीन शाखाए है उहे जिन शो पर मान कमिश्क (सावरन) ढालन का अधिकार प्राप्त है उन्हीं शों पर भारतवप की टक्साला को भी एसे सिक्के प्रवा पित रूप में ढालन रिया जाय । इमका पल यह होगा कि सब साबरेन समान होग और उनका चलन ग्रट विग्न म तथा भारतवर्ष में दोनो जगह होन लगा। रुपयो के बारे में कमी न निवा कि स्वसिद्ध मुद्रा सावरेन होगा, और कपए प्रतीक मुना का वाम वरण। पर लेन दन म रुपयों का पवहार परिमित या नियन्त्रित करना ममव नहीं इसलिए इस विषय में प्रता मुद्रा म्वयसिद्ध मद्रा के हो समान होगी। मेटी न ममेरिका १ सयुक्त राज्य और काम इन दो दशा के रहरण दकर या दिखाया कि वहा मान का मान या स्टडर था फिर भी चाह जिम हद तर हो लोग चाके सिलन-न को बाध्य थ। कमटी वा राय में भाव स्पक्ताकवल इस बात की पाविरुपयाका तादा जरूरत स ज्यादान बढ़ाई जाप, और उसकी सिफाति थी कि जब ता चलन में सोन का परिमाण प्रत्यधिक नहीं हो जाता तब ना मार रुपए न ढाल जाय । रपयो फेबमारत सरकार मानान का बाध्या-एसा कोई सिफारिश क्मटीन नहीं की। स्चन को स्थायी दर सम्बध में कमटान उपना निणय १६ पेंस के ही प में लिया। उसकी बाम दलील यह थी कि मौजूद दर यही है और यह प्राय हव साम म बायम है। इसको बस करणे विमो भी दूसरीर को इसकी जगह बिठाना-वन का बिगाडना, बसे का उनादना मोर मनगिनत मा मिया के माय भयाय वरना होगा। टकमाल कर जो परिस्थिति पर दीगई पी उममें सर कार ११ म ही क्यो, जो दर पाहता यम र मस्ती भोर टिका मरनी पी। सिक्कों की माई पर उतरे हाय की बात पौउनकी ता' या संभ्या कम र य उन मूय चाह जितना था पर मकतो पी। सवाल मिफ यहा यार मांगों का अपनी पाप में सिमा म दाम पाना पडगा और इसमें स्तिना समय लगानिम रुपए की कहानी ने यह सिफारिश करना मुनासिब समझा कि वह १६ के बजाय १५ पेंस कर दी जाय। इधर चादी के पक्ष विपक्ष की बातें हो रही थी, उधर सोने का उत्पादन वेग से बढ रहा था और सोने में चीजो के दाम मी ऊँचे होने लगे थ । १८६८ ६६ में दाम ऊचे होन के कारण इस देश के माल की माग अच्छी रही और एक्मपाट की उन्नति हुई । सोन के उत्पादन में इस वृद्धि पे कारण मसार के मुद्रासम्बधी इतिहास म एक नए अध्याय का प्रारम्भ हो चुका था या होनवाला था। मारतवष में भी अब शाम घर ने लग और कुछ समय बाद लोग १६ पस के टोपो को भूल से गए और उसीका स्वाभाविक समझने लग। यहा भारत सरकार के प्राय यय के विषय में कुछ कह देना पावश्यक है । लाड रिपन के जाने के बार इस दश म कई नए टक्म लगाए गए जिससे करदाता का बोझ वह भारी हो गया। १८८२ ८५ में सरकार प्रतिवष पर के रूप मजा कुछ ले चुकी थी उमको प्राधार मानकर स्व० गोखले न अपनी एक स्पीच में दिखाया था कि १८८५६८ इा १४ साला म सरकार ने जनता से १२० करोड अधिक लिया था। इसमें से ८० रोड तो फौजी खच में चला गया था और बाकी दूसरी मदा में। Pिा के लिए इमम से कुल एक करोड ही प्राप्त हुआ था। पहले सरकार की ओर से कहा जाता कि एक्सचज गिरन से जो हानि होती ह वह उमे त्वम घटान के प्र'न पर विचार भी करन नहीं देती। जव एक्सचेंज १६ पेंस कर दिया गया और सरकार की वह गहन समस्या हल हो गई तव लोगो को प्राशा होन लगी कि हमारा बोम अब हलका कर दिया जायगा। पर उनका वोम ज्योषा त्यो बना रहा और उनकी आग निरागा में परिणत हो गई। रुपए की कीमत जब १२ और १३ पेंस के बीच पी तव सरकार को जितना खर्च पड़ता था उसमें-रुपए की पोमन १६ पेंस होजान पर भार पोर पाच करोड के बीच की वचन हाने लगी पर इस बचत वा कई साल तक जनता को कोई सामन पहुंचा । पर सरकार की नीति यह हो चली कि माय से व्यय पूरा होना ही पर्याप्त नहीं कहा जा सकता-माय इतनी होनी चाहिए कि प्रतिवर्ष सोने का ग्रहण व्यय पूरा कर दने बाद मामी वचन रहे । १९०१२ में समाप्त होने वाले पाच वो म यह बचत १२२६ वराह रुपए रही। श्रीयुत गोखले का कहना था कि प्रगर युद्ध और प्रकार के कारण व्या में वद्धि न होती तो सरकार की प्राय उमकी ग्रावश्यकता से प्रतिवप प्राय ६॥ करोड रुपए अधिक होती। इस विषय पर दूसरे अध्याय में गौर भी प्रकाश डाला गया है ग्राड से शिकार फोलर कमेटी न बहुमत से जो सिफारिशें की थी उन सबको भारत सचिव म मजूर कर लिया। उन्हान अपन वक्तव्य में कहा कि--' इस रिपोट के महत्व के अनुसार इस पर ब्रिटिश सरकार न ध्यानपूवक विचार क्यिा ह । भौर इममें जो तथ्य भौर युक्तिया पग की गई ह उहे सारगर्मित मानती हुई वह इस नतीज पर पहुंची ह कि इसके उसूल मान लिए जाय और वे अमल में लाए जाय । पर इतना कह कर भारत सचिव और उनके सलाहकारा न रिपोट को ताक पर रख दिया और उन उसूलो के ही खिलाफ काम करना शुरू कर दिया । उहोने नई मुद्रा प्रणाली के संगठन या रचना में कानून से कम- बहुत कम-काम लिया और अपनी निरंकुशता प्राय अक्षुण्ण रखी। जो कुछ करते रहे हुक्मनामो यो फरमानों के जरिए, जो उनके मुविधानुसार बदले जा सकते थे। इस समय में कर कौन-सी घटना घटी इसका एक सक्षिप्त विवरण नीचे दिया जाता है- १८६९-एक एक्ट पास हआ, जिससे लोग सॉवरेन या गिनी लेने देने को बाध्य हो गए । दर रही १६ पैस- एक रुपया । १८६८१.०३-भारतीय टक्सालों में सॉवरेन ढालने में सम्बष में समझौते का जो प्रयत्न हो रहा था वह छोड दिया गया। १६००-रूपयो को ढलाई से जो मुनाफा होता उससे सन्दन में गोल्ड हर रिजर्व- मुघणनिधि या मुवण-कोष की रपना की गई। १९०४- भारत-सचिव की मोर से एलान किया गया कि १६ पेंस की दर से वह चाहे जितन की हुडी भारत सरकार पर बचने को तयार रहेंग। १९०५-नोटों की पुत्री के लिए जो परेसी रिजव पा उसकी मोर इसे निकार स कुछ सोना व प्राव इग्ल म रखा गया और यह विधान भी बना कि उस रिजव का एक हिस्मा लग्न में कज या उधार दिया जा सकगा। १९०६~~पहले यह व्यवस्था थी कि मारतवष म साना दनवाल का सरकार रुपए दे देती। अब यह व्यवस्या कर दी गई विमिफ सोन + ब्रिटिश सिक्के दनवाल रुपा पा मग । १९०७~~गाल्ड टण्ड रिजवी एक पाखा इस देश में खोली गई जिसमें रुपए रख जा सक्त प । १६०८-लक्त्त म लन्न पर १५:' पस की दर म हुडिया बची गह और मन में गाल्ड ण्ड रिजव से उनका भुगतान किया गया। १९१०--दम पोर पचास रुपए के नोट प्रखिल भारतीय कर दिए गए और,यह विधान बना कि मोन क ब्रिटिश सिक्का बाल नाट मिल सकेंगे। १९११-सौ रुपए व नाद भी अखिल भारताय पर लिए गए। १९१३-मारतीय मुद्रा प्रणाली को जाच के लिए एक ही कभी र नियुक्त हुआ। मन फोलर-मेटी की सिफारिणा को लेकर हम पर निमाना चाहत है कि सरकारद्वारा स्वोक्त हो जान पर भी कहा तक अमल में लाई गई। सबस पहल साने क सिकार बात लाजिए। कमेटीन शिफात्तिरीयो कि प्रिटिश सावरेन लेननको लाग बाध्य पर दिए जाय । १८९६ में ए* एक्ट द्वारा यह विधान कर लिया गया । ममेटी की दूसरी सिफारित यह थी कि जिन शनों पर विटिश माही टक्साल मोस्ट्रलिया में सॉवरन की दलाइ हान दना ह वही तो पर पहा भी होने दे। ब्रिटिश सरकार की भोर स या उस अप विभागी भोर स इराका एमा विरोध हा कि यह सिफारिश सिफारिश हो रह गई। वास्तव में वह विराय जाहिरा तौर पर नहीं किया गया । पर तरह तरह से जो मापत्तिया पग यो गइ उनरा उनव असला भाव २ सम्बध में कोई सह नहीं रह सकता था। पहल तो पाही सास ने यहा उसाई की व्यवस्था माविषयम भरपर्ने रासी, पर जब इनर भी राम बनत न दगा तब मन में मिल মষ যিমান স য ন ম বিবা দি মামি মাস ম খাবলৈ १३४ रुपए की कहानी ढालन की ऐसी जरूरत ही कौन सी ह । १८६९ से १९०३ तक पत्र व्यवहार ही चलता रहा और अन्त में भारत सरकार ने हार मानकर यह प्रयत्न ही छोड़ दिया। हा उसकी मार स यह बराबर कहा जाता रहा कि हमारा लक्ष्य ज्यो कान्त्या बना हुआ ह और हम आशा करते है कि हम किसी न किसी दिन सोन का सिक्का यहा ढाल सकेंग । यहा यह कह देना प्रावश्यक ह कि ब्रिटिश सरकार या ब्रिटिश शाही टकसाल को हमारे माग म रोड अटवान का अवसर इसलिए मिल गया कि हम विटिश शॉव रेन की ढलाई की इजाजत मागते थे । अगर हम अपना ही कोई सिक्का- जस मोहर या अशरफी-ढालन की बात करत तो हमारे माग में वह कठिनाई उपस्थित न होती। १६१२ में सर विट्ठलदास ठाकरसी न बड़ी “यवस्थापिका सभा म इस प्राय का एक प्रस्ताव पेग किया कि भारतीय टक्सालो म सोन + भारतीय सिक्के टालने की “यवस्था की जाय । उन्होन अपन भाषण में कहा . इस विषय म कभी कोई सदेह नही रहा है कि हमारी मुद्रा नीति का लक्ष्य ह सोने के सिर के साथ सोन का मान या स्टण्डह । पर माज तक सोन के सिक्के की व्यवस्था न हो सकी। विलम्ब से इस देश की बडी हानि हो रही ह भोर इस विषय को कठिनाई भी बढ़ती जा रही है। कहा जाता ह कि इस देश के लोग इतन गरीब है कि यहा सोन के सिक्के चलाना बुद्धिमता का काम नहीं । पर मह दलील लबर ह । सोने के स्टण्डर के लिए जब यहा के लोग गरीब नही तव, सोन के सिक्के के लिए क्याकर हो सकते है ? इस समय तो यह अवस्था ह वि हमारी सोन स आ भलाई हो सकती है नहीं हो रही पर जो बुराई हो मनी ह यह हो रही है। श्रीयुत गोपले न इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि मुद्रा प्रणाली एसी होनी चाहिए जिगका मचालन प्राकृतिक रोति में होता रहे ~~जिसमें सरकार का हस्तक्षप या दपल नहीं के बराबर हो, और वह प्रणाली तभी हो सकती ह जब फौलादमटी की रिपाट के अनुसार उसका माथार सोना बर दिया जाय ।
आ3 से गिकार सरकार को मार से कहा गया कि अवश्य ही सारे प्रश्न पर फिर से विचार करन की जमरत है और हम इस मारत-मचिव के सामने रसन जा रह ह । इस पर सर विट्ठल दास न अपना प्रस्ताव वापम र लिया । भारत सरकार ने भारत सचिव का लिसा और भारत-सचिव को फिर ब्रिटिश सरकार के प्रथ विभाग का दरवाजा पटखटाना पड़ा। पर इसकी मनावति या भाव म काई अतर मग पडा था। फिर वही विम्सा शुरू हुप्रा । कहा गया कि भारत सरकार इस ममले में क्या पडना चाहती ह मावरन गलन के लिए हमारी दसरख जारी है। जगर भारत सरकार का टकमाला का प्रवध हमन हाथ में लिया तो यह प्रसुविधाजना होगा और अगर मावरन डालन र लिए हमन अपनी गावा वहा खाल दी ता इसम बच बहुत ज्यादा पडगा। भारत-मचिव को अपनी राय सान के सिक्क व पक्ष में नही यो पर भारत सरकार का आयह दवावर उदान लिया कि शिलि अथ विभाग वी गत मापको मजूर न हो ता म यह इजाजत 'न को तयार ह कि माप दस रुपए की अपनी मोहर ढालना शुरु कर द। भारत सरकार इस पर राजी पर भारत-सचिव न लिया कि कुछ मा परन से पहरे सब साधारण की राय दयागत कर रेना जारी है। भारत-परवार को यह बुरा-सा लगा मोर उसन जवाब दिया कि व्यवस्थापिका समा में और उसके बाहर, इस विषय की विननी ही बार मालाचना हो चुकी है और यह सष्ट हो चुका है कि यहा मा लोकमत जारा स इस प्रस्ताव का समधन करता है, बल्कि यहा ता यह पूछा जाता है कि जो इजाजन कनाडा और भान्ट्रलिया को मिल चुकी ह वह भारत को क्यो नही मिल रहा है १४ फरवरी १६१३ का भारतचिव न मूचित किया कि जो शाही जमीन नियुक्त हान जा रहा है वह इस विषय का भी मनुम पान करेगा । भारत सरकार भव भोर बर हा क्या मक्तो पी पोलर-बमही की नामिफारित भारत-गचिव द्वारा स्वीकृत हो चुकी पा उमपर १४ सास या मय दूमरा वागन अपना राय न जा रहा था रिम प्रमन में साना कहा तो होगा। रुपए पा वजन जसा कि पहल रहा जा पुरा ह, १८० अन रपए की कहानी (प्रौस) होता ह जिसमे सालिस चाटी इस समय १६५ ग्रन थी। रुपए की नकली कीमत १६ पॅस थी, और असली कीमत इमसे बहुत कम । जव चादी का दाम लदन के बाजार में २४ पेंस होता तव सरकार को एक रुपया ढालन में प्राय ६१८१ पेंस म्वच पडता । जब चादो का दाम ३२ पेंस होता तब यह सच १२२४१ पेंस बठता । असली पौर नवली कीमतों के बीच जो फक था उसे सरकार अपना मनाफा सम झती थी। फौलर कमेटी की सिफारिश पी. ' रुपयों की ढलाई से जो मुनाफा हो वह सरकार को साधारण प्राय मामिल न किया जाय । सोन में उसका एक खास रिजव रखा जाय पौर यह रिजव पेपर करेन्सी रिजव या सरकारी रोकड से बिलकुल मलग हो। कमेटी को मना यह थी कि यह रिजव सोन के रूप म रखा जाय और भारतवर्ष में ही रखा जाय । पर भारत सचिव के सलाहकारों न सोन में एसे कागज को भी शरीक बताया जिमका तवावला सान से हो सकता था। भारत सरकार के तत्कालीन अथ सतस्य सर एडबड ला भी इसी मत के पहा लाड कजन स्वयं अप की एमी बचातानी के विरुद्ध ५ और उहान भारत सचिव का लिखा मा कि हमें कोई एसी कारवाई नहीं करनी चाहिए जिसस क्सिा प्रकार की गलतफहमी फ्ले या लोगा का विश्वास उठ जाय । पर भारत सचिव न उनकी एक न सुनी, और सरकार को पाटण दिया कि रुपयो की ढलाई से जा मुनाफा हो यह पाप नियमित रूप से हमारे पाम भज दिया करें। इस प्रकार गोल्ड स्टण्डह रिजव की स्थापना लटन में हुई। और उसमें सोन के अलावा स्टलिंग कागज भी रहन सग । १९१३ वाल गाही कमीगन ने कई गवाहो म इस विषय पर अन्न किए मोर यह जानना चाहा कि सान से फोलर-कमेटी का सचमुच पमिप्राय वया पा। एसे गवाहा में मि० मार्चेण्ट मि० कोल भोर मि० रासरे नाम उल्लेखनीय ह। मि० मार्चेण्ट स्वय फौलर-मटी के सदस्य रह चुरे य । उहोन कहा कि मब इस विषय में सागा ये विचार बदल आड से शिकार गए ह और म स्वय सोन की जगह स्टालिग के व्यवहार का समर्थन करूगा । पर जिस समय की यह बात ह उस समय ता मान स मभिप्राय वास्तविक सान से ही था। मि० कोल बैंक प्राव इग्लइ के गवनर रह चुके थ । उहोन भी कहा कि प्रारम्भ म यहा विचार था कि साराका-मारा रिजव सान म रखा जाय। मि० रास बगाल चम्बर + प्रतिनिधि स्वरूप गवाही देन गए थ । उनवा वान य यह था--- 'फालर कमेटी की रिपोट के भापा बहुत स्पष्ट ह। उसको सिका लिथी कि यह रिजव पपर करसी रिजव या सरकारी राबड स विल कुल अलग रखा जाय । इसका प्रय यही हो सकता है कि रिजव इसी देश में रहनवाला था। इग्लन म रखन की मा होती तो यह क्या लिसा जाता कि पपर करे मी रिजन और मरवारी रोक्ड म बिलकुल प्रलग वहा ताया ही यह रिजय अलग रहता । रिजव में खाली मोना रहे या नहीं इस सम्बन्ध म म कमेटी की इस सिफारिग का निणयामक समझता हूं-~~एवमचज का व गिरन का मार हाना सरकार अपने पास के मान का कुछ हिस्सा विलायत भज द । मना इसका अर्थ यही सगा सकता हूँ कि जर सरकार के पाम इस म सोना हा तव वह उस विनायत जान दापिर कमी की दूसरी सिफारिश यह पो कि जब सरकार के पास रिजव म कामा साना हो जाय और उस खजान म मा सोना हो तब वह मारववप में अपना दनारा मोन में चुका मानी है। मय का प्रनय करमत्य मोर याय की हत्या कर-भारत सचिव न इस देशका साना विलायत मगाना और उसरा मनमाना उपयाग करना शुरू कर दिया। इस घोगाधीगा न भारत सरकार को भी हरान कर दिया। १९०७ में रॉड इचपका अध्यक्षता में ए बमरी इस देश म रला की उन्नति में लिए रुपए जुगन र प्रन पर विचार करन क लिए वठी। इसकी सिफारिश हुई रि उम माल रपमा की दमाई र मुनाफे का हर - - पर मसाल ग्रह कोई मुनाफा नहीं था। असे पागल नोगेंगे पुश्तीरे लिए करे सो रिजय या बसे हो चांदी नोटो को पुश्ती.
रुपए की कहानी करोड रपया रेला के मुधार में लगा दिया जाय 1 पर भारत सचिव इससे भी दो क्रम भाग गए और उहाने निश्चय क्यिा कि जब तक गोड स्टडड रिजव ३० करोड रुपए का नही हो जाता तब तक हर साल मुनाफ की आधी रकम रेलो म लगती रहे | उनका विचार नायर यह था कि रिजब ३० करोड हो जान पर सारी रकम उस काम म लगा दी जाय । भारतवप म उनके इस निणय से बडा असतोष फ्ला पोर इसका काफी विरोध किया गया। भारत सरकार न भी २४ जून १९०७ को तार द्वारा निवेदन किया वि रिजव वा मोना अभी एसे काम मन लगाया जाय पर भारत सचिव न उस पर कुछ भी ध्यान नही लिया और डढ करोड से अपर स्पया रेलो में लगा ही दिया। साथ ही यह कहा कि जो निणय हा चुका ह उसी के अनुसार प्राग भी उपयोग होता रहेगा। भारत सरकार एक्सचज व गिरन को पागा प्रकट करते हुए कहा था जिरिजव का एसा परिस्थिति के लिए प्रपुण्ण रखा जाय। इसके उत्तर में भारत सचिव न लिखा था कि डरने की कोई बात नही व्यापार की वत्तमान अवस्था और अपन पास के माधना को देखते हुए म इस पाशका को निमूल समझता हू। पर जो मासमान इतना साफ नजर माता या उसी म घनघोर घटा का उमडत दर न लगी। १९०७ म यहा अनावष्टि रही। कुछ महीन बार अमेरिका में एक भीषण प्राविक मक्ट उपस्थित हो गया। यहा से एक्सपाट बहुत कम हुमा । माग इस समय रपए की नहीं स्टलिंग की थी क्याकि कई वारणा स लाग यहा से स्पया विलायत भज रहे । एकमचेंज गिरन लगा फिर भा रुप बदल सरकार न सोना देने को तयार यो न स्टलिग । बहुत कुछ मालन के बाद वह स्टलिग देने को तयार हुई मोर भारत मचिद पर उलटी हुडी वचन लगी। एक्सचेंज तब लिए गोल्ड स्टा रिजव । रपया अपनी नक्ली कीमत का कुछ हिस्सा अपन साथ लिए बना था, पर वाकी कीमत की पुस्ती के लिए रिजय में सोना रखना जररी या ।
आइ स शिकार १३६ तक गिर कर १५,' पम नो चत्रा पा। अत्र व ऊपर उठन लगा। सरकार फिर एक्मज निा मोना रन का भा तयार होगई। मितम्बर १९०८ तक परिस्थिनि मर चक्री या इमलिए अब सरकार ने स्टलिंग बचना व कर दिया । म मस्ट वारण विनायन में गाद स्टडा रिजवस ८,०५८ ००.पो.पो.१५पया उठाना पगानिस मद्रा प्रणालीका पोलर मीन मारिन का था नगर वह हातीना ज्योग एक्सचेंज एक हर म नाच फिरता लागा का रिजव म माना मिलन लगना पौर वे उस विलायत मजा अपना ना पकान लगन। हाजा एमचेंज एक सनाच न गिरता । पर जामदा प्रणाना या प्रनित थी उसम एसा कोई विधान नग या । मारा या लिंग दनान-दना सरकार की मर्जी की बात या। यह मा यान म मन की बात है कि गrमण्डड रिजव व पैस सबितायत म लिंग कागज बरा कर रिजवमय लिए गए य । जय स्टलिंग का मागन गा तब भाग्न-सचिव ननुछ समय तर उसका पूरा नहीं किया । बाजार का हालत गवयाभारत-मचित्र का र नगा कि व परिमाण म कागज बचन नि ता मालूम नहा दाम कहा तर गिर पड़ा। १मप्रल १६०६ रा भारत सरकार न f7 मारन मविव का लिया कि रुपया की ढलाई का मनापा पूरा का प्रा रिजव में रखा जाय और इसका काफी बड़ा हिम्रा मान मर । उनर उम पत्र में कुछ प्रवनाश यदानेलापन 'रेसका उन्नति हम भोगना चाल पर हमारा विश्वाम है विदा का भलाद की ष्टि में उसकी मद्रा प्रणाली को मजबना इस उन्नति म ज्याला जारी है। त्रिम ममप रिजवी माह लाड मजन को सरकार की इन्द्रा पी कि यह मान में पग रमानाय । बामे पूर्ववर्ती भारत-गचिव न यह न होन पिया घोर रिजय एम नागर या मिरपूरिगर में रखा गया जिन बीमन हपर काफी गिर गह। हम य नही कहा कि मारा रिजव सानप में या आप यापि यह बना दना हमारा तय हमि में इस बात काबोरा . १४० रुपए की कहानी मे माग ह, पर हमारा यह प्रस्ताव जरूर ह कि रिजव का काफी बडा भाग वहा सोने में रखा जाय । यह सच ह कि १९०८ में रिजव के कागज या सिक्यूरिटीज बचन से जो नुकसान हुमा ह उससे अधिक ब्याज सभाम दनी हा चुका है। पर एसा सयोग हो सकता है कि जिस समय हमारे लिए सिक्यूरिटीज बचना जरूरी हो उस समय साम्राज्य का हित उह न बचन में हो । परिस्थिति इतनी गम्भीर न भी हो ता भी कागज या सिक्यूरि टीज में रखन से रिजव के स्वच्छ द उपयाग म बाधा उपस्थित हो सकती है । इस विषय पर यहा के सभी पर लिख लोग सहमत ह कि जिस रूप में यह रिजव इस समय ह वह बहुत खतरनाक है। अक्मर यह पूछा जाता है कि जब दूसरे देश अपन अपन रिजव को-जो उनकी साख की भित्ति या प्राधार ह-सोन के कप में रखते ह तब हम पोड से ब्याज के लिए भपन रिजव को सिक्यूरिटीज के रूप म रखकर इतनी बडी जाखिम क्यों उठाते ह । इस समालोचना म बहुत कुछ सार ह और यह आपके ध्यान देन योग्य ह । हमारा खयाल ह अगर प्राप रिजव में अब पोर कागज या सिक्यूरिटीज रखना वर वर द तो इसका फल बहुत अच्छा होगा। पर भारत सचिव को यह स्वीकार न हुआ और उहान सरकार का उत्तर देते हुए लिखा कि सिक्यूरिटीज बचने की जिम्मेवारी हमारी ह, पौर चाह जसी भी परिस्थिति होगी हम लाग उसका सामना कर लेंगे। इस सम्बध में मि० कोल को सम्मति उदन करनयोग्य है १९०७-०८ में प्रायिक सक्ट का कद यूपा न हाकर लादन होता तो भारत सरकार के लिए स्टलिंग कागज या सिक्यूरिटीज बचना असम्भव हो जाता । असम्भव मे अभिप्राय यह ह किम जो मिलना चाहिए, नहीं मिलता-परागार जा कुछ दता वही रना पड़ता।' भारत-मचिव के निणय क भाग भारत सरकार न सिर झुकाया पर इतना कह बिना उममे न रहा गया कि माएका यह निणय हम म के साप स्वीकार परत ह। भारत-सचिव न केवल १०००.०० पौंड सान र रूप में रखना मंजूर किया था। १९०६ में गोल्ड स्टप रिजव वो एक शाखा इस दम मोली -
आइ से गिर
गई जिसम छ राह पए रखन की व्यवस्था की गई। यह कुछ अट
पाग-मा बात थी कि जिमका नाम म्वणनिधि हा उममें म्पए रस जाय।
पर भारत मचिव यहा भी एक चाल चल रहे थ। रैली रिजव में यह
वानूनी व्यवस्या यो दिन में एक हर म ज्याग रकम मान में हारखी
जा सकती थी। मान लाजिए कि रपया की माग हुई और नन्दन में
भारत-मचिव का माना मिना । अगर य प रेमो रिजवस Pए गए
ता वह माना उसी ग्जिव का मम्पत्ति इ और भारत मचिव को उस
सोन के साथ मनमाता नवा अधिकार नहीं था। पर गोल्ड स्टण्डड
रिजव में कानून का काई मा नियत्रण नदी था भारत-मधिवजा चाहत
कर सक्त थ । इसलिए दस जिद का यह गावा उन मुमीत लिए
खोला गई। रोड प नर माया म यस दिए जा सकता
और इनोवले विलायन में माना मिलना उमा भारत-सचिव जिम
पारचाहने उपयोग कर मकन ।
*१ माच १६१३ को गड रिजव इम पम था-
.
सिक्यूरिटीज या पागज (बाजार दर स)
रकम जापोड समय लिए उधार की गई थी
१,००५६६४
वक प्रॉव इन में रखा हआ मोना
१६२००००
मारतीयतामा में छ रोहपए १६मपीदर से ४,००.०००
२२५७१.३३ पोह
उस ममय गोल्ड रिजर्व-मम्ब पी नीति यह पीमिय यह
१०००००० पोर हो नाम तब इस विषय पर पिरम विचार हो
रुपयों का माई का मनासरा मोर भूस होनवाना पामना मबी-मर
इम रिजर्व में जमा की जाय या नहीं।
.१ मार्च १९१३ को पपरोसी रिजवाहार पारिन
में इस नौट १८६७ रोड रुपए । पानी पूनारे लिए जिय
१६४५ करोड रुपए रुपए की कहानी में य चीजें था- भारतवपम रुपए सोना लग्न में सोना लदन में सिक्यूरिटीज भारतवप में . २६३७ " ४०० " १००० ६८ ९७ करोड रुपए १८६२ में चलन म कुल नोट ३ ६९ करोड थ। १८९० में यह तादाद १५७७ करोड हा चली थी। मोटा के प्रचार में विशष वद्धि चादी की टक्साल बद हो जान के बाद हुई। इधर उनकी लोकप्रियता बढान के लिए विशष प्रवध किया गया और उनसे सम्बप रसने वाले विधान में कई सगोधन हुए। १८७५ से पहले रिजव में कुछ सोना रहना था पर पादी के मुकाबले जब सोना महगा हो चला तव उमका रिजव में पाना बट हो गया। १८१३ में सोन और रुपए के बीच की दर बाधी गई और सरकार सोन वे पर ले रुपए रने को तयार हुई। पर चूवि सोन की कीमत बाजार में ज्याला पी कोई रुपए देने के लिए सरकार के पास अपना माना न ले जाता पा । १००८ म जब एवमचेंज १६ पम हो गया तब लोग सरकार को सोना देकर उमम म्पए एने लग । परमी रिजव में इस प्रकार सोना इकटठा होने लगा। १९००२ प्रारम्भ में प्राय ७॥ करोड रपए का सोना वहा इकटठा हो चुका था। सोने को चलन में लाने के लिए कुछ प्रयत्न किया गया पर वह विशप सफल न हो सका । उस समय भारतवप के कुछ हिस्सों में मकाल पड़ा हुमा या पोर मार्थिक प्रवम्पा सोने के चलण के अनुकूल नहीं थी। पर जब सोना चलन मे सौर कर मरकारी खजाने में मान लगा तव भारनवप में उसके चलण + विरोधी इसका यह अथ लगाने लग कि यहां के लोग गरीब होन पे कारण माना व्यवहार नहीं कर सबसे, उनके लिए कृपया ही विप उपयुक्त है, इत्यादि । वास्तव में उस साल प्राड से गिकार यहा का अवस्था मान के चलण प्रतिकल यो। इमरे बार फिर भी मरकार की ओर स सोन को बलगम लान लिए काइ तास उद्योग नहीं किया गया। प्रारम्भ में करे सी ग्निव श माग सोना इमी देश में रहता था। १८९८ मैं अस्थायी रूप में कुछ माना लन्न में रखा गया । पर यह “यवस्था कुछ ही समय बाट स्थायी कर दी गई। कारण यह बताया गया विवहा चादी परीदन कति माना गवना जारी था। चाल में यह विधान बना वि करमा ग्जिव का माना सरकार लदन में या इमदा में जहा चाह रख सकता थी। भारत मचिव ६म रिजव का भी कापी मोना लन में रमन लग । १९०५ ५ विधानद्वारा सरकार का यह अधिकार लिया गया कि वह रेमो रिजव का एक निश्चित माग स्टलिंग मिक्यूरिटीज म रम मानी है। पहर इमको हद दोगड पिए यो। १९११ में वह चार करोड कर दी गई। मारा हिम्सा जामियरिटीज में यहा और लग्न में रखा जा सकता था १४ वरोड था। गोल्ड स्टप जिव भौर करे मी रिजव मलावा भी सरकार के हाप में कुछ पा रहत य, जिो सरकारी राबड पहन या यह रा' भारतवप और लग्न दाना जगह रखी जाती थी ध्ययम्मा म पो कि लनन में कम-स-बम ४०००००० पोर रह पौर भारतवप में कम म-बम ८०००००० पौंड | नए साल पारम्म में भारतवर्ष में प्राय १००००,००० पोट रखना पड़ता था अपान मन मिला कर १६०००,००० पौंड । वास्तव में एमपदा तिनी रोकड पी यह नीच की तालिका म स्पष्ट होगा ३१ माच सन में पोर भारतवप में पोट दुल जोह पर १६०८ १२,५१४१३ १० ३५६५६ १९०६ ६८.६१८ १०२२५४३ १८२९६३९५ १०२६५४२८ १६६६६६. १९१२ १८३६००१३ १२,२७६,६६ ३०,६६६७१३ - २५०४,५२२ रुपए की कहानी ००० स्पष्ट ह कि रोकड बाकी जितनी होनी चाहिए थी उससे कही ज्यादा पी और इसका कारण यह था कि लदन का हिस्सा बढ़ते-बढते प्राय तिगुना होन लगा था। जहा ४०००००० पौंड पर्याप्त या वहा १८०००, पौंड से भी अधिन जमा रहता था। आखिर इतना रुपया पाता कहा मे था इसका उत्तर ह-बजट की वचन म । हर साल “यय से प्राय अधिक हाती पौर जो बचत होती वह लग्न मगा ली जाती। १८६८ ९६ से बचत होना शुरू हुआ था और प्रथम महाममर के मारम्भ तक होता ही गया। पहले दस वर्षों म जो बचत हुई वह ३७६ करोड़ रुपए थी। १९१० और १९१४ के धीच २० करोड की और बचत रही। यह भारत सरकार के बजट की बात ह । प्रातीय मरकारो की बचत इसमें गामिल नहीं है। श्रीयुत गोखले वे बजट-सम्बधी भाषणो म मरकार की इसलिए काफी निदा मिलती है कि वह हर साल टवस के रूप जरूरत से ज्यादा लोगो स वमूल करती और अधाध घ सच करन के बाद जा चुछ बध रहना उसे शिक्षा मौर स्वास्थ्य सम्बधी कामो में न लगा वर पोर वामो म लगा देती । बजट बनाते समय प्राय का तस मीना जानबूझ कर कम पिया जाता । खय पर किसी प्रकार का नियंत्रण था ही नहीं। यूरोपियन कर्मचारियो की सख्या बढ़ती ही जाती थी पर यह सव होन पर भी जब बचत होती और सरकार से उमका कुछ हिस्मा शिक्षा प्रचार या स्वास्थ्य सुधार जसे कामों के लिए भागा जाता तव उत्तर मिलता कि इसमें से कुछ भी मिलना असम्भव है। योयुत गोसले ने अपने एक भाषण में दिखाया पाकि १८६८-६९ और १९०८-०९ के बीच भारत सरकार का खच-समान की तुलना ममान मे करन पर-वास करोड रुपए वड गांपा। इस बीच में कुछ 'क्स माफ कर लिए गए पे सही पर उसका प्रसली कारण यह था कि एवमचेंज ऊंची होने के कारण विलायत जानेवाली रसम में वापी बचत ने लगी थी। ५ मार्च १९१० को प्रायत गोवले का बड़ी व्यवस्पापिका समा में एक भाषण हमा, जिसमें उहोंने कहा - आड से शिकार १४५ प्राय छ साल से मै लगातार कोशिश करता पा रहा हूँ कि सर कार को जो बचत होती है वह प्रातीय सरकारो को सफाई जसे काम पर खच करन के लिए द दी जाय । दो साल की बात ह कि तत्कालीन मय सरस्य मर एडवड वर न म्यूनिसिपलिटिया द्वारा मफाई पर सच होन के लिए करीब पचास लाम्ब म्पए दिए थ। मेरी सारी अपीला का कोई नतीजा निकला तो वही । उसका छोर हैं तो कहना होगा कि मेरा प्रयत्न निष्फल रहा। सरकार का कहना था कि भारतवप जस देश में प्राय-व्यय का तम्ब मीना बहुत कठिन काम ह हमें वही मावधानी से काम ना पडता ह इम सावधानी के कारण अगर वचत रह जाती है तो हम इसके लिए अप राधी नही ठहराए जा मक्ते पर उम वचत का उपयोग सबसे पहले वज घटान के लिए होना मनासिव है। बज रन-न्न का काम विलायत में पडता, इसलिए यह रकम भी वही मजली जाती। मगर कुछ समय में लिए इसकी मावश्यक्ता नहीं भी हुई तो कहा जाता मि इस व्यापारियो को उधार देवर कुछ ब्याज उपजाया जा सकेगा। लान में भारत-सचिव वा रुपया वा प्राव इग्लड में जमा रहता या।यह इस वर में कम स-कम पाच लाख पौंड वरावर रमन मोबाध्य य । असलियत म वह रखन इससे ज्यादा थ। इस रुपए पर वह कुछ भी व्याज पान रे हावार नहीं पे। पर यह बक इडिया प्रापिम (भारत-मचिव का विभाग) का रपया पसा जमा रखन मलावा भी उसका कुछ बाम पर लिया परती-इसके लिए इस जो कमीशन या पुरस्कार मिलता वह साल में ६६००० पॉर होता था। सब मिला कर इस वर को इंडिया पोपिम स साल में प्राय ८६००० पौंड अति १२६०,००० रुपए का लाभ पा । चेम्बरलेन-कमीगन के सामन इडिया प्रॉफिस की भोर से पाने पारे गवाहो न भी स्वीरार किया कि यह रकम बहुत यश यी और भारत वर्ष को यह सौ बहर महंगा पड़ रहा था। पर उनका कहना था कि इंडिया प्रोक्सि लाचार है। कानूनन वह दूसरी बा स अपना काम करा नहीं मना पौर पर बर माय इंग्लगम अनुनय-विनय करता है कि कमीशन पटाइए तब बैक साफ इनकार पर देती है। वास्तव में बैंक मात्र रुपए की कहानी इग्लण्ड इडिया आफिस की बवसी का नाजायज फायदा उठा रही थी। इडिया ऑफिस लन्न में रुपया उधार देने का काम करता था। कहा जाता ह कि इस विषय में वह ईस्ट इडिया कम्पनी की बताई हुई राह पर चल रहा था। इडिया ग्राफिस की ओर से एक वाम दलाल लेन देन के इस काम को देखता था । एसे लोगो की एक लिस्ट रखी जाती जिहे रुपया उधार देने में कोई जोखिम नहीं थी। अगर कोई व्यक्ति या फम अपना नाम इस लिस्ट पर चढाना चाहता तो उस दरवास्त करनी पड़ती। यह दर स्वास्त इडिया भाफिस वी पाइनेंस कमेटी की सिफारिश हो जाने पर मजूरी के लिए भारत सचिव के पास जानी । जिनकी साख ऊची होती वे ही इस लिस्ट पर पा सकते थे। जिस फाइनेंस कमेटी का यहा जिन किया गया है उसके चेयरमन या अध्यक्ष इधर कुछ वों ललन के लाइ इचकेप या सर फलिक्स गुस्टर जसे वह व्यापारी होते पा रहे थे । लेन-देन के काम में इस चेयरमन का बहुत बहा हाथ रहता और भारत मचिव प्राय इही ये कहन के अनुसार पलते प। पज मिक्यूरिटीज पर लिया जाता था पर कुछ खास यनों को बिना जमानत के ही दे दिया जाता। या माद इग्लण्ड की भोर से गवाही देने पाले मि. कोल न चेम्बरलेन कमीगन से कहा था कि उनके यहा यह प्रया नहीं पी पौर बडी-से-वडी यक को भी सिक्यूरिटीज देने पर ही रुपया उधार मिल सकता था । क्रेनेवालो में तो बरी व एमी पी जिनसे लॉड इचवेप और सर पलिक्स गुम्टर स्वयं सम्बद्ध ५ । उस समय ऐसे ममालाचको की कमी नहीं पी जिहोने इन दोनों पर पभपात का दोषा रोपण करते हुए यह कहा कि इनका एक हाथ न देता था और दूसरा रेता पा । पर लॉर्ड इचप ने अपनी भोर मर फलियम गुस्टर की सफाई में कहा कि उन्होंन उन बैंकों के साय जरा भी रियायत नहीं की थी। इपिया मॉफिस के दलाल मि. होरेरा कॉट थे। उनसे पहले उनके पिता इस प पर रह चुरे ।माज से जो बामनी होती उमपर पांच प्रनित के हिसाब से मि० स्कॉट को दलाली मिलती थी। १६१०-११
आई से गिकार
में उनकी दलाली १६००० पो मनि २४०००० रुपए हुई थी। इस
पर टिप्पणी करते हा प्रसिद्ध प्रयास्त्री के म ने लिखा था-- जब पटले
पहल यह मालूम हुआ कि यड लाट का छोड भारत सरकार की पार से
मबसे अधिक वेनन गा पुरम्बार पानवाला इण्डिया प्रापिस का यह दलाल
ह तब लोग पापचय चक्नि गए । मजा यह कि इस लाल को अपना
पूरा समय इपिया प्रापिम व काम लिए नीलगाना पडना
अपना भी व्यवसाय है, और वह उम भी देखता भारता है।
पानोलन उटन पर मि० बाट की लाली घामा गई। फिर भी
इससे उनकी माय माठ हजार पाँड अर्थात १२०००० स्परागभग
थी। भारत सरकार की भोर में कार (कागज) पी त्रिी करने
के लिए उ १५०० पौर प्रलग मिलता था। ममालाच! या बहना
पा-और बहुत ठीक बन्ना यादि घटान पर भी ण्डिया माफ्मिर
"लाल को लालो बगत याला थी । मनन वोहो का होता था और
ब्याजदर बाजार को हालत पर गिभर ती पी। नाल बी काय
कुलना में प्राप्नो मतना ज्यान पाना पड गवता था कि उसे
इस पमान पर पुरस्कार दिया जाय । पर पिया माफिम एमी सलाह पर
पर ध्यान देनवाला या
भारतवप का जो रुपमा लग्न के व्यापारिया को इस प्रकार उघार
गिमा जाता यह भी पमा २७ रगड व पहुँच जाता था माज
कीपर कभी कभी इतनी नीची होनी बस पाव इल भी हैरान
हा मानी। इस यान से मद स्वीकार करते पविमान कामगार
बन का व्यापार दोन का इण्डिया मॉपिम की इम महारनी में बहन
सामपा।
पर भारतवर्ष का रुपया भारतकाम न मा मरता पा । यहाँ
मरकार की नीति इतनी मंकीण पी मिबही-मे-बड़ा बब ये लिए भी
उधार सेना सामना नही पा । १८६६ मोर १९०६ धीच पुस ।
शरदेश में सरकार में लिए-पर बार २८ म १० माप परा
बीच ! १०६ और १९११ बीच ऐनग्न राजामहपा ही नहीं।
सापारियों यहाँ प्राय मे स्यार पर एसया मिला। प्रति
रुपए की कहानी यहा के लिए साधारण दर थी। जब कभी लोग सरकार से कहते कि रुपया सस्ता वरखे वाणिज्य व्यापार और उद्योग घघो की उन्नति में सहायता पहुँचाइए तर उहें उत्तर मिलता कि यह सहायता पहुचाना हमारा काम नहीं । बाजार को अपन परो पर खड़ा होना चाहिए और भारतीय पूजी एसे कामो में लग सके इसका प्रवध करना चाहिए।' भारतवष का धन लदा के लिए था भारतवप के लिए नही । भारत सचिव भारत सरकार पर जो हुण्डी क्यिा करते वह कौंसिल बिल कहलाती थी। भारतवर्ष में पायात (इम्पोट) की अपेक्षा यहा से निर्यात (एवमपोट) अधिक हान के कारण स्टलिग की अपेक्षा रुपए की माग प्राय अधिध रहती थी। रपए चाननेवाले लोग विलायत म भारत सचिव को सोना या स्टलिंग देकर उमसे भारत सरकार के नाम हुण्डी ले सक्ते घ और हुडी भनाकर उसके पए कर सकते थे । इसक लिए कायदा यह था कि पिए चाहनवालो का टडर देना पडता--प्रति यह बताना पड़ता कि वे किस दर से उसे सरोदन को नयार हाफिर भारत सरकार की भोर से यह मूचित क्यिा जाता कि क्मिकी दर मजूर हुई ह और क्मिको कितने को हुनी मिलेगी। तार-द्वारा जो हुडी की जाती उमके लिए भारत सचिव १५ पेंस से नीची रेट को किसी भी हालत में मजर करन कोतयार नहीं थे। उस समय रुपए प्राप्त करन के दो तरीके य एक तो यह कि भारत सरकार का यहा माना लिया जाय और एक्सचेंज-दर से बल्ले में रुपए लिए जाय दूसरा यह कि भारत-सचिव स हुडी सरीवर उसने रुपए पर लिए जाय। विलायत से या दूसरे देश से सोना लान में कुछ मप जरूरी था। विलायत से यह सवं (जहाज का भारा प्याज की हानि और बीमा) १६ पॅम (सोना) पीय पेनी पडता पा-प्रर्थात् सोना सानवाले को एक रुपए की कीमत १६ स पडती पी। एसी हालत में उम प्रगर हडोदारा एक रुपया १६ पेंस में ही मिल जाता तो यह पव सोना परीन्ने भोर यहा भजन वाला पा? भारत सचिव की नीति बराबर बह रहती थी कि कम-स-यम मोना मारतवष जाप । इसलिए वह इस प्राई से निकार १४६ हुण्डो की दर प्राय इननी नीची रपते थ कि लोग रुपए के लिए सोन के बजाय इसो हुण्डी का उपयोग कर । उह विलायत म अपन काम क लिए रुपए पस की जरूरत हा या न हो वह हण्डी बनत ही रहत प बल्कि उहान यह एलान कर गया था कि १६ पस की दर सना का जितने की चाहे, हुडी ले सकता ह । भारत सचिव सोन का लन्न स यहा माना रोक कर हा सतुष्ट नहा ध। और दना स भा जब सोना यहा मान लगता तब वह लनेवाल को एमी दर से हुण्डा वच दत कि उसके लिए सोना लगन भज दना और हान्न मुनाकर यहा पए कर लेना अधिक लाभदायकहा जाता। भारत सचिव की ओर से कहा जाता कि आसिर सान को एक न एक दिन लदन माना हा है --ग्या की सातिर चाटी सरोदन के लिए या एक्सनज को गिरन में क्वान के लिए फिर क्या उसके जान आन में पसे का अपव्यय हान लिया जाय ? वहतर यह है कि साना सदन में ही बना रह और उसे उधार कर भारत मचिव कुछ व्याज भी अप जात रह। इसमजवाव य था -- (१) रूपयो के लिए चाती सरीन की जरूरत इसलिए पडती थी कि हमारे शामक हम वह सच्चा गोड दण्डड (सान का मान) दन को तैयार नहीं प जिसकी सिफारिश फौर-कमटी न की थी और जिम देना स्वयं भारत-सषिवन स्वीकार कर लिया था भार वलण में सोन + सिषक होत तो चाला इन सिक्को का न एमा भाव यकता होती, न एसी बहुतायत । १२) एक्सवज का गिरना बहुत दूर का बान या सम्मानना पी। भारतवर्ष में हम्पाट स एक्सपाट ग्याना हान व कारण लिग स रुपए पो माग ज्यादा रहता है। कभी किमा सात एमा सयाग हा जाता है कि एरापार स इमोट बढ़ जाता है और स्टलिंग या मागवड जान मारण एपसचज की गगा उलटी बहन लगता है। पर एम भरमर बहुत कम हुए है । भधिकारिया को सचम र (गरने यो किता हननी पी रि उसको रापन लिए साल-ब गाल नन्न म साना ठा परत जाते प र महासमरजसी परिस्थिति का उह काई म बिना नहा रुपए का कहानी पी, जिसमें न सोता मिल सकता था न सिक्यूरिटीज या कागज ही बने जा सकते थे। (३) व्याज तो भारतवप म मी उपजाया जा सकता था, बल्कि यहा इसका गुजाइश विलायत से ज्यादा थी। पर जहाँ मुद्रा प्रणाली मी वास्तविक भित्ति या भाधार का प्रश्न हो वहा ता सव से पहले यह देखना चाहिए कि वह सुरक्षित विस प्रकार रह सकगी। उसके सुरक्षित रहन से हम सुरक्षित बन रहग । यो से याज के लिए इतनी वही जोखिम उठाना यहा का बुद्धिमत्ता यो ? पर लन्दन में साना इग्लह की भलाई के खयाल से रखा जा रहा था~भारतवप को ब्याज के रूप में कुछ साभ करान के उद्दश से नहीं। नदन में चाटीसरीदन का कारण लग्न का पक्षपात था। वहा का बाजार बहुत ही छोटा है । चार दलाला के गुर या दाली को बदन म चादी का बाजार समझना चाहिए । भारतवप म लागों की माग थी पि शादी के लिए टहर कराए जाप भौर उनपर विचार होन के बाद चादी बम्बई म वरादा जाय। सर गापुजी भराचा क क्यनानुसार यह नगर समवत ससार म चाद) का सबसे बड़ा बाजार पाा पर इंडिया प्राफिस का लन्दन स बाहर चाल सरोदना मजूर न था। सर यापुर्जी चाम्बरलन कमाशन के मेम्बर ५ । उहान एक गवाह की जिरह परत हुए कहा था कि १६०४ ०५ म कालर-जनरल म मुझ चानी का एक वहा माडर मिला पर भारत सचिव न माग के लिए एसी खरी गी की मनाही कर दो। पारसाल लन्दन म जिस भाव धापरीला गई उरास बम्बई में दो ऐंस सस्ता खरीदी जा सकती पो। तमाशा यह पा कि लन्दन में जा चादा खरीदी गई पी वह भारतीय व्यापारियो की पी। पर भारतवासी भारत-सरकार को भारतवप म अपना चालीन बच पात ५। एक बार प्राय ९ करोड रुपए की पानी लग्न में समयल मोटापू सम्पनी (एसाल) की मार्फत मरीठी गई। मि. मोटग्यू-जो बाद में भारत-सचिव हुए प, उस समय इंडिया भाफ्मि में अार मेक्रटरी प, और उसी कुल-परिवार-4 ५ गा उस कम्पनी का मालिक था। उन विपक्षियान इस शो को रेकर हाउस मा मिन्स म कापी हो-हल्ला प्राड से गिकार मचाया और किननी हा एसी वाता पर प्रकाश डाला जिनस पक्षपात का सन्देह हुए बिना न रह सकता था। सान का उत्पादन इधर काफी बढ़ चला था और यह वृद्धि इस प्रकार हुई थी टन १८६० १७७ १८६५ २९० ३१७ १६०५ १६१० ६७४ सान में दाम भी बर चले य और वइत ही जारह थ। भारतवप म मी दाम ऊचे हो रहे थे । एसो भवस्था में जसा मि पिद्दल मध्याय में कहा जा चुका है -लोग चाrा को स्वयमित मुद्रा बरान क परमातीन रह गए । चेम्बरलन-कमान के सामन सिफ एक गवाह न यह माग पTT पो किमतर्राष्ट्रीय समझौता कर इस देश में चाल का उसकी पुरानी जगह फिर दी जाय । सोन म दामो को प्रपेशा रुपए में नाम ज्याग व प मोर पशो का~-पासकर श्रीगोसल कामत यह पा दि रुपा चलण में मावश्यक्ता मे अधिक य। उनका कहना था कि ' सोने में सिगरे, भावश्यक्ता न रहन पर, निकल जात ह (जम निर्यात व रूप में), पर रुपए निकल नहीं सक्ने उह गलान म लाम नहीं भुगतान के लिए उहें विग भजना सभव नहीं । या ताव लौट कर बका में या सरकारी वज्ञान में मा जायग या वलण म बन रहा । पर इस देश में वर-व्यय साय की सभी यषष्ठ उन्नति नहीं हुई ह, इसलिए रुपए जी लोटने नही मोगो ये ही पास बन रहन ह मौरमा पर अपना असर गमत रहते है। इस विषय का अनुमपान करन लिए १९१० में एक छोटी सीबमेटी बरीची जिसरे मध्य मि.२० एन० दत्त ध। इसकी राय यह ठहरी रि रुपयाको बडि प्रादयता र पनुगार ही हुई थी और उनकी गई एमा रहनापर न पो । हा बराम उधार मिलने पर कुछ विश १५२ रुपए की कहानी बडी सहूलियत हो चली था,और इसका असर दामो पर बेशक पहा पा। चेम्बरलन कमीशन को सिफारिशो का जिक्र करन से पहले परि स्थिति का सिंहावलाक्न कर लेना मावश्यक है- (१) इस समय सावरेन (गिनी) और रुपया दोनों ही चलण में थ, मोर लोग दोनों को ही लेने-देने को बाध्य य । (२) सरकार रुपए के बदले सोना देने को कानूनन बाध्य नहीं थी पर एक ह तक वह सोना देन को तयार रहती थी। (३) सरकार सावरन के वदले १६ पस की दर से रुपया देन को बाध्य थी, पर धातु के रूप म सोन बदले नहीं । (४) भारत-सचिव १६६ पेंस की दर से चाहे जितन को हुण्डी भारत-सरकार के नाम धेचने को तयार रहत थे। भारत सरकार भी भारत-मचिव के नाम उलटी हुटी वचना स्वीकार कर चुकी थी पर १५१ पेंस से नीधी दर स नहीं । एसी हालत में एक्सचेंज न तो १६६ पेंस से ऊपर जा सकता था.न १५॥ पेंस स नीच । (५) चलण म विशषता रुपया को थी। करेंसी रिजव और सर- वार के हाथ के रपयो को छोड बाको रुपयो का चलन १९१२ में २०० करोट कूता गया था। सान के सिक्को का प्रचार बर रहा था । ३१ माच १६१३ को समाप्त होनवाले १२ वर्षों में प्राय ९० करोड के सावरेन सावजनिक चलण में गए। इन बारह वर्षों में चादी के रुपए भी प्राय ९० करो- ही ढले। सोन के चलण का रफ्तार १६०६ के बाद तजी स बदन लगी पी। ३१ माच १९०९ मोर ३१ माघ १९१३ १ बीच ४५ कराड ये सॉवरेन सावजनिक चलण में गए । यह तो नहीं कहा जा सरता कि सब केराम सॉवरेन चलण में मौजूट प पर चम्बररेन-बमीन की रिपोट म भी यह बात स्वीकार की थी कि लेनन के काम में सॉवरेन मधिया धिक भा रहा था-खास पर बम्बई, मंयुक्त प्रात, पजाब पोर मद्रास के कुछ हिस्मों में। सोन का यह प्रचार या उपयोग हमारे शासको को मनिच्छा हाते हए भी होन लगा था । हमार भारान-गूत्रपर दी तो वरायर यह चष्टा आड से गिर १५३ रहनी पी हि सोना ललन में भारतवर प्रान न पाव । पर फिर मी कुछ न कुछ साना पाता ही रहता था ग्रौर करमा ३ प में सावरेन क उपयोग का बना कुछ भी पा चयन नहीं था। जिस विशुद्ध गाठ पड मा मुवा-मान की पोलर व मग न मिला रिश की पी वह हमें न दिया गया। उसकी जगह लिया गया गाड एक्सचेंज स्टडह जिमकी मिफारिणम लिष्टम न था और जो लम ममय अस्वीकृत कर दिया गया था। इम म्टएड मनमार मूल्य का मान या मापा सोनाहा था--एक रुपया वाम्नद म ३५३३४४ ग्रन सोन का प्रतीक या प्रििनधि या--पर हमाग अपना का साने का सिक्का नहीं था और रुपए का मूल्य मरकारी व्यवस्था पर निभर करता था। साल का रिजव यहा में सात गमुद्र पार विलायत म रख लिया गया पा और भारत-मचिव अपना नाति रानि एमा गमत पनि मम कम मोना भारतवप मान पाये। भारत-मरवार का अपना मत ३ बाता म मारल मचिव से मिल पा पर वह परतत्र होन कारण लावार थी। भारत-गविध लगन के पूजीपतिया रे हाय की कठपुतली य। उह वही करना पडना थापा इग्लण्ड के हित के अनुकूल पा निमसे इग्लण्ड का भला निचित था। १७ अप्रल १६१३ का एक रायल कमीन भारतीय मृदा प्रणाली हर पहलू पर विचार करन के लिए नियुक्त हमा।इमा अध्यन प मि. प्रास्टन चम्बरलन जो चाल में भारत-मचिद और परराष्ट्रचिव हुए प। वीगन के दूसरे मम्बरा में माड पबर मर गानों भराचा, सर पर्नेस्ट कंबल और अध्यापक वन्स य। इसक सेश्टरी ५ मर बसिन नरेट जा बार में भारत में भय सस्य हुए। पिछली समटिया की तरह इस समोशन को भा साग कारवाई पन में ही हुई। इसकी रिपार २४ परवरा १६१४ का विाि मरकार रे पास मंत्री गई। हम एक मम्बर मर जम्म बम्बा न मान प्रचार २ सम्बप में प्रौरोस अपना मतभा प्रस्ट रिया था। पिाट में मध्या पक (क्तमान लॉड) येम गारिज कर जमा मस्पा पर एक ना था। समीन न पनी रिपाट में यह स्वासराररिया विनोदावाना - रुपए की कहानी में वस्तुस्थिति फोलर कमेटी द्वारा स्वीकृत स्कीम मे भिन्न थी। यहा की मुद्रा प्रणाली का प्राचार था ता मि० लिण्डस का प्रस्ताव जो कमेटी द्वारा अस्वीकृत हो चुका था पर कमटी वताए हुए माग का अवलबन न करन के लिए कमीगन न अधिकारिया का किसी प्रकार की निदा नहीं की बल्कि उसका कहना था कि जो कुछ हुआ था अच्छा ही हुआ था। कमीशन की सिफारिशो म कुछ सास बातें य थी (१) यह निश्चित हो जाना चाहिए कि भारतीय मुद्रा प्रणाली का लक्ष्य क्या है । १८९८ की कमेटी का राय थी कि इस दशम सोन के मान की सफलता के लिए सोने का सिक्का अावश्यक है । पर पिछले १५ वर्षों के इतिहास से इस धारणा की पुष्टि नहीं होती। (२) चनण म सान के उपयोग को प्रोत्साहन देना भारतवर्ष के लिए हिनकर न होगा। (३) मोन के सिक्क की यहा ढलाई की काई आवश्यकता नहीं। पर भारतीय जनता सचमच इस चाहती है और भारत सरकार इसका सपन को तयार ह ना सिद्धातत काई आपत्ति नहीं हो सकती। हा जा सिक्का ढाना जाय वह मावरेन होना चाहिए । (४) एक्सचज की पुश्ती के लिए रिजव म कापा साना भोर स्टलिंग रहना चाहिए। (५) गोल्ड स्टपरड रिजव की अभी कोई हद नही बाथी जा सकती। (६) रुपया को ढलाई स जा मुनाफा हो वह पूरा का पूरा इसी रिजव में जमा किया जाय । (७) इस रिजव म इम ममय जितना सोना रखा जाता है उसस मधिन रखन को जरूरत है। (4) गाड स्टण्ड रिजव सदन म ही रह्ना चाहिए । (६) सरकार का माप तौर स यह जिम्मवारी अपन पर ल लेनी चाहिए कि जब कभी स्टलिंग का भारतवर्ष में माग होगी तब वह भारत सचिव के नाम १५६म की दर स हही वचन को तयार रहगी । (१०) भारत-सरकार व हाथ में जब स मा बचत का रुपया हा तर उस प्रसिसा दवा को उधार देन या नियम सा कर स्ना चाहिए । दिन
आरस गितार
गों पर रुपया उधार दिया जाय यह निश्चित हा जाना चाहिए।
(११) इस समय हम किसाट या मेष्ट्रल (इन्द्राय) या का
स्थापना र पप या विपन्न में कुछ मा नहीं कह सक्न पर इतना हम
अव य कहेंगे कि यह विषय मदवपूण - और इस पर बिगना की एक
छोटी-सी कमटी द्वारा विचार हार का मादयकता है।
इण्डिया माश्मि का फाइनन्म कमटा दा चयरमन और एक मेम्बर
एसी वरों स सम्बव रह चुक पत्रिनरा इंडिया आफ्गि म रन लेन का
सराकार रहता था। यह बात ममालाचका दाग भापतिजनक बताई
चुकी थी। इसपर कमान न अपना गय यह कि एम मुम्ब पर
कारण चिसो प्रकार का पमपान ना मादिन नहीं होना पर मारन-सचिव
का चाहिए कि जहा त हा मक एमा ममालाचता या पिकायत क लिए
काई मौकाही न
इंडिया पापिम व दलात का त्रिम अनून पर माली माता दी
उमका ममीन समयन न कर मका। उमकी मिफारित या कुछ
समय बाद इस प्रन पर फिर विचार किया गय।
बैंक प्राव इलड विषय म उमन वा बान इतना पहा रि
हम ला विचार में इहिया मामि भोर इस पर मम्बर नई
मिति पर रखन का समय मा गया है।
कमीन सौ रिपाट सरकार विचाराधीन हापारि प्रगन १९९५
में प्रथम महासमर विड गया। पब यह निचरहमा कि जर ता पति
स्थापित नहीं हाती तव तर कारवाई मननदा रह ।
५ लेने के देन महासमर ६ कारण भारतवप का जा माथिक लाभ होना चाहिए था नही हुआ वल्लि गहरी हानि हुई। परत त्रता के फलस्वरूप उसे लेने के देने पड़ गए। प्रारम्भ में हमारे व्यापार का धक्का सा लगा और काम-काज बहुत कम हो चला। एक्सचेंज में कमजोरी प्रान लगी जिमको रोक्न के लिए सरकार ने भारत सचिव के नाम उलटो हुण्डी वचना पूरू पिया । लोग वका में अपन अपन रुपए उठान लग। पहले दो महीनो म ही सेविंग्स बक डिपाजिट म छ करोड़ की कमी हो चलो। सितम्बर से अक्टूबर १९१४ तक दा बरोड की और कमी हुई । बाद म परिस्थिति सुधरी और डिपाजिट वढन लग । पुरुआत में घबराहट के मार लोग नोट भी तजा स भुनान लग। ३१ जुलाई १९१४ और ३१ माच १९१५ के बीच नोटा का चलण प्राय दस वराड कम हो चला। पर इसके बाद अवस्था सुपरन पर नाटा का चल फिर बढन लगा और बरता ही गया। जुलाई १९१४ के मन में सोन वा माग बढ़ चली और सरकार के हाथ से प्राय १८००००० पौंड का साना निकल गया। ५ अगस्त का सरकार न साना दना बन्द कर दिया। उसक वा नाटा बल सिफ रुपए मिल सवत थ। भारतवप की दरेसी मोर एक्सचज पर महासमर का क्या असर हुमा उमे बतान स पहले यह बना देना प्रावश्यक है कि इग्लड में प्रव साना और लिग दाना दो चीज हा चला उनकी समानता जाता रही। हमारा जितना धन विलायन में जमा था और जिस हम घरावर साना मानन प्रात य, प्रब स्टलिंग कागज रह गया। हाला तथा प्रय मित्रगोको इस समय भारतवर्ष से बहत मुछ माल मिल सकता था और वह मिलन भी सगा।
एक्मपोट क माग में कई कठिना या यो। जहाज कम मिलन य
प्रापित प्रतिवध कारण जितना माल जा सकता या न जा पाता था।
पिर भी एवमपाट में कमी नाह! वन्धि १९११७मवदि हा मोन
लगी। दूसरी पार बाग म म माल पान रगा क्यादि जमना प्रास्ट्रिया
हगरी जम दगा में ना दाग नहा मरना या और दुमा गाम भी
मान में कई तरह का प्यार था। फिर भी नाम ऊच हान के कारण
जा कुछ भाया उमका कामन मगममा पूत्र जमा हो बना रही।
१८१४१५ म १६१८. नक सम मार का जितना रमा हुमा उमम
हर माल प्राय ०६ दरा गा अधिक का समपार हुप्रा । यह का
प्रसापारप बात नहीपा पर माता चाग पहल को अपना बदन वम
प्राए इमलिए और दाम हमारा पावना पहर में अधिक होता।
लड़ाई म पहले पाच वर्षों में या १८० करा' + माना चाली पाए ।
पर इन पाच वर्षों में इन ५६ वगेट के पाए । मालाना प्रौपन प्राय
११ पराइ ठा।
भारतवास हा उस समय इगर इगन और पूर अशा में गई
करच क रुपए मगाए जात ५। पात्रका वनन माचिन सहा
सामान गरोदन मोर गामन-मम्ब पी मारा थम चुकान लिए इन
रूपों की जमरत पडती थी। इन पमों वल भारत सरकार विना
पठ में विलमरकार म स्टगि पाती थी। १६१४ भौर १९१९ के
बीच इस प्रकार कवच का आर २४० ०००,००० पोड हा चुका पा
पोर मर जारा हा या भारत में मारा और निति पनिशानी
पार स उन निॉरा मा परा' गए ५ इमरे लिए भी माम
म्पवस्या परनी पड़ी थी।
इन मर धारतों महापरे । माग बन सी और टरमानों
में सपाका इनाईजार गार सहान नगी। मा १०४ और माच
१९१६ बीच जब परेमी की माग कामा पन्दी घी, प्रार १०,
....०० स्टार पोम पारीए ४११। पर प्रम १६१६ पोर
मार्च १९१९ कोच प्राम २००,००००००मा ओत घाम
साम में उरमोग हमा।
१५८ रुपए की कहानी ३१ मार्च १९१४ को प्राय ६६ करोड के नोट बलण में थे। ३० नवम्बर १९१९ को यह तादार प्राय १८० करोड हो चली थी। नोट बढ़ते गए पर उनकी पुश्ती के लिए करेसी रिजव में जो सोना चादी रस जात थ उमा अनुपात घटता गया। महासमर से पहले कानून पा कि रिजव में मिक्यूरिटीज या कागज अधिक से अधिक १४ करोड रुपए से रख आ सकते थ। धीरे धीरे यह ह बडावर १२० करोड कर दी गई जिसमें २० कराड के कागज भारत मरकार के रख जा सकते थे वाका विटिश सरकार के । ३० नवम्बर १९१९ को नोटो के चलण की पुरती इस प्रकार थी करोड रुपए पानी (पए) ४७ मोना मागण १८० नोटो के सम्बध में दूसरी नई बात यह हुई कि १९१७ म ढाई रुपए के और १६१८ में एक रुपए के नोट जारी किए गए। ३१ माच १९१९ को दाई रुपए के नोट प्राम १ करोड ८४ लाख के और एक रुपए के नोट प्राय १०॥ रोड के चलण में थे। पहले सरकार की नीति यह रहती थी कि नोट भुनान के लिए सब साधारण वो हर तरह का मुविधा दी जाय। महासमर में यह नीति कायम न रह सको। कागज की पुश्ती कागज से करवे नोट बढ़ाए जा रहे थे इमलिए लोगो का नोटो में वह विश्वास न रह गया था जो पहले पा। लोग रुपए मांगते य । १९१६ १७ में प्राप ३८ करोड और १९१७ १८ में २८ करोड रुपए बलश में गए । १ पप्रल १९१८ को रिजर्व में कुल १०॥ कराड रूपए रह गए य-वर्षात् महासमर मे पूर्व मन्मेवम जितना रिज में रखना निराप ममझा जाता था उससे प्राय माठ करोड कम । माव और पप्रल १९१९ में महासमर-मम्बधी परिस्थिति दुख चिन्ता ननर हो पती जिसका नतीजा यह हुमा दि लोग नारों को बतहागा भुनाने लग । जून के पहले सप्ताह में रुपए इस प्राय चार करोड रह लेन देने गए ५ । इस बीच में सरकार न अमरिकास कुल वाशरन की व्यवस्था कर ली था और वह चाली अब प्रान भा लगी । इमक फलम्बम्प परि स्थिति में सुधार होन लगा। सरकार नोटा के बदले रुपए देन के लिए सब जगह बाध्य नही पी पर पाम तौर से दिया करता थी। पर यह सुविधा प्रबन रही। रेल या टीभर-द्वारा सितक जान पर प्रतिबर लग गया । डारद्वारा भा भव काई हे कही न भज सकता था । करेंसी प्रापियो मे मरवार नाटो के बदले रुपए देन को अब भी पाध्य थी। पर वा भा प्रब यह विधान कर लिया गया कि एक पादमा का एक ही दिन इतन म ज्या रुपए न मिल मग । इन प्रतिवचा और रकावटो के कारण चलन में रुपयो का म्पान नाट ग्रहण करत गए । पर नोटा पर एमी हालत में पट्टा सपना स्वामाविक था। कुछ समय तक बनी रही यह बट्टा १६ प्रतिशत तप रहा। हम स्वाधीन होत और दृमग + हाथ माल वचत या ननर लिए कुछ सर्च करते तो हम जनम दवाकी स्टलिग-जम कागजी रुपए में न परा चादी या मोन में कराते । घडी भर क लिए गह मान लें कि हमारे नार चादीया सोना देश में असमय होते और हम फिर भी उनके साप भारोबार करना चाहते तो हम यर यवस्था कर सक्ने पनि उहें कुछ समय के लिए अपना रुपया बजदें। पर हम पेपराधीन और इस परा धीनता के कारण हम दाम या भुगतान अपनी इच्छा या मुविधा नहीं यति इंग्लण्ड की इन्धा मोर मुविधा के अनमार रेन को विदा । वर्षों मेघहा हमन जो साना जमा कर खायावहतोकागज हो ही गया भर इंग्लण्ड हम में जो कुछ रेन मगा उममा दाम भी सागर में ही पुकान लगा बरेन्मी रिजवी जोगासान में भी उममें लिंगागर प दिए जाने और उनके मह इधर नोट निकाल लिए जाने दोनों मोर पतंगबाजी थी। महासमर हिरवे ही प्राय प्रत्यकन सोन निर्यात पर प्रति बम्पस गिया मोना बाहर जा माता पा सो उनी हालत में अब बिना मोना सिी देशापाम पसनेवासा न पा। १९१७-१८ में १६० रुपए की कहानी भारतवष में जापान और अमेरिका से कुछ सोना इस कारण पाया था कि उह यहा माल खरीदना था और उस समय भारत सचिव से हुडी मिलने में कटिनाई थी । जब मोना टुलभ हो चला तब चादी की माग बढी। पर चादी का उत्पारन १९१४ से ही कम होन लगा था। १९१० से १९१३ तक तमाम दुनिया की ग्वानो से २२८,५५२००० प्रौस चादी निकली थी। १९१४ म १६१७ तक कुल बादी १७८ ०७५००० पोस निकनी। इस कमी का खास कारण यह था कि मेविसको में राजनतिक अशानिये कारण चाटी वा उत्पादन बहुत घट गया। इधर ब्रिटिश साम्राज्य और चीन प्रादि देगो की भोर से माग कही-से कही बढ़ गई । इसका नतीजा यह हुआ कि चानी महगी हो गई । १६१५ में जा दाम २७। पेंस था वह अगस्त १९२७ में ४३ पस और एक ही महीना बाद ५५ पेंस हो चला था। अमरिका कनाडा और ग्रट विटन न चादी के दाम की घटावढी को रोक्न की कुछ खास यवस्था की जिससे चादी का दाम कुछ समय तक "पनि प्रौम प्राय एक डालर बना रहा। मई १९१८ और अप्रल १९१६ के बीच लग्न में दाम ४७।। पौर ५० पेंस के बीच रहा। मई १९१६ में अमेरिका और ग्रट दिन न चादी के बाजार से अपना प्रपना नियंत्रण उठा लिया जिमका नतीजा यह हुमा कि पटन में दाम फौरन ५८ पैम हा गया। उसके बाद भी दाम बढता ही गया और १७ दिसम्बर को ७८ पस तक पहुच गया था। चौथ प्रध्याय में कहा गया है कि जब चादी का दाम लदन बाजार में ०४ म होता तब एक रुपए की चादी की कीमत ६ से कुछ ऊपर होता । इसी प्रकार जर चानी का दाम ४३ पेंस हो गया तब रुपए की चांदी की कीमत १६ पैम के पास पहुंच गई अति चादी इतनी महंगी हात ही उपए की अगली कीमत उसकी नाली कीमत के पास पहप गई। पौर जब चानी मोर भी महंगी हुई तब १६ पेंस में रुपया देना सरकार 7 लिए प्रमम्भव हो गया। बचाव के लिए मरवार न एक्मचंज होऊचा परना गुहार दिया।
लेोके दन - २२ पंस २४ म २६ पेम २८ अगस्त १०१७ का १० टाका दाम १६९पॅम से १७ पेंस कर लिया गया। उसक कुछ हा पिन बार यह विनप्ति निता कि भारत सरकार व नाम हुडी की दर प्रब चारी र दाम पर निमर बगी। मप्रल १९१९ को दर १८ पम पर दी गई और १३ मई १९१६ र यही दर रहा । अमरिका ने बादी के बाजार पर स नियत्रण उठा लिया, इस कारण चादी और भा महंगा हो चला और रुपए की एक्सचेंज-दर पर २० पैस पर दी गई। उमा वा ज्या ज्या चाली तज हाती गद यह दर ऊची हाना गइ। इसक मरानिव यथ १० अगम्त ९१ १५ सितम्बर २२ नवम्बर १२ दिसम्बर २८ पेंस ३ मितम्बर १९१७ का चाली का व्यापारियाद्वारा इम्राट बटर लिया गया। एक्मपाट पर मा प्रतिवध नगा लिया गया-~-बिना मकार म लाइमस प्राप्त किए का माना या चाना मिस इम दाम बाहर नहीं मज माता था। इमाटा गया पा इम उद्दा सजिो चारी समार में उपसय यो उमराई हिस्सा मारनवय र व्यापारिया क हाय लगन न पाच । एक्सपाट इसलिए राणा गया या लिाग सिसरों का गला कर या या ही बाहर भजना न सार।२९ जून १९१७ क बार तो चार या मानव मिनाकामौर पिसी काममें ले पाना मी जम करार दया गया। चारोबोकमा वारण मरवार प्राता साने काममा बहान लगा। २९ जून १६१७ बाद जा माना विदास पाता उस ममानाव दो सरसार महाप बघ ना पाता। मगम्न १९१६ में रारत मिण्ट अपान निटिटामात कोए गाया बम्बई में पाली गई और वहा साँद- रेन हार जान मग मम पहर गुछ एपी मोर पहा वीटरमानों में बालो का पुषी पी मार हर 3 में सोयरन ने ममान पौ। मर "Telegraphic Transfers-तारद्वारा की जानेगनी १६२ रुपए की कहानी कुछ हिस्सा १६१९ में रायल मिण्ट की यह शाखा उठा दी गई। ऊपर कहा जा चुका ह कि महासमर छिडते ही सरकार ने सावरेन देना यन्द कर दिया था। बाजार में सावरेन की कीमत पर चली और १५) से ऊपर रहन लगी। कानूनन सावरेन की कीमत अब भी वही १५) थी और सरकार उमरे बदले १५) देन को ही वाध्य पी। साव रेन एसी हालत में करे सी के काम न आ मकत य। फिर भी रुपया का इतनी कमी हो रही थी कि दो बार सरकार को इस देश के में किसाना से माल खरीदन के लिए कई करोड के सोन के सिपवे (सॉव रेन और देशी मोहरें) दन पडे । नाति स्थापित हो जाने पर अमेरिका न ६ जून १९१६ से सोन के एक्सपोट की स्वतन्त्रता द दी। दक्षिण अफ्रीका और पास्टलिया का सोना भी बाहर जान के लिए स्वतत्र हो गया । इसलिए इस देश में सोन की मामद बढ़ चली। भारतवष लदन में और मयत्र भी सोना खरीदन लगा। १५ सितम्बर १९१७ के बाद भारत सरकार इम्पोटर को सोन फा दाम इस हिसाब से देने लगी कि हुडी की दर का घटा बढी मनु सार मोन की जा कीमत हा वह उमे मिल जाया करे। अगस्त १९१९ क पत में भारत सरकार ने यह घोषित किया कि हर पसवारे उसकी आर से सोन की वित्री की जायगी। इस वित्री का नताजा यह हुआ कि बाजार में सोन का दाम गिर पड़ा । १५ अगस्त (६१६ को दाम था ३२ १२ रुपए तोला । २२ मितम्बर को यह गिर कर २७ रुपए रह गया था। फिर दाम में कुछ तजी पाई और प्रबतूबर के मन्न तक वह २६ १२ रुपए तासा हा चला। फिर कुछ ही दिन बाद वह गिर कर २८५ रुपए तोला रह गया । जब दाम ३२१२ रुपए तोला या तब एक सांवरेन की यीमत २०६ रुपए थी। जब दाम २८५ रुपए तोला रह गया तो सॉवरेन की कीमत थी १७११ रुपए । चादी-सम्बधी परिस्थिति को बाद में लाने के लिए सरकार न हर तरह की तदबीर की, पर चांदी की कमी बनी ही रही भोर मन में उसे विग्नि मरवार की माफत अमेरिका का दरवाजा खटपटाना पड़ा। ममेरिका के पाम रिजव में बहुत कुछ चादी पड़ी हुई पी और उसने लेने के देने उसका एक हिम्मा भारत-मरवार को देना स्वीकार कर लिया। २३ भगस्त १९१८ को वहा इसके लिए पिटमन एक्ट नामक विधान बना जिसका आगय था कि वहा की मरकार दूसरी सरकार को इस रिजव में से ३५००००००० चाटी के डालर ता चादी बच सकती है। भारत को इसमें से २००,००० ००० मोम चारी मिली जिसका दाम प्रति मौस (खालिस चादी) १०१' मेंट चुकाना पड़ा । यह बाती मिल जाने से भारत सरकार का बहुन बहा मक्ट टल गया। ममय-समय पर वह बाजार में भी चादी वराती रही । सब मिला वर उमन ५३०००५ ००० औंस (स्टइड) चा सरालो। ३० मई १९१६ को करसी कमेटी की नियुक्ति हुई जिसके अध्यश मि. विंगटन स्मिथ य और जिसमें एकमात्र भारतवामी मम्बर पेमिनारीवा मरवान जी दलाल । कमेटी को यह बना था कि भार तीय प्रणाली पर महाममर का क्या असर हुआ ह-~-उमप्रणाली में कौन से हेरफर की जरूरत है और किम प्रकार यहा के गोन्ड एक्मचेंज स्टड में स्थिरत्व या स्थायित्व लाया जा सकता है। उस समय एवमचेंज की र २० पैस घो। २२ सिम्बर १९१९ को मटी की रिपोट तपार ईमोर मारत सचिव के पास भजी गई। मि० दलाल कमटी का रिपाट म महमनन हो सके और उहान मपन विचार अलग ही एक नोट में प्ररट लिए । समटी की खाम सिफारिश यह हुई रिपए की एक्मर माने में बाघ दी जाय और यह र २४ पॅम (मोना) हा । इम हिमा सॉवरेन की कीमत १५) क बजाय १०) होती । १८७३ स पहर एकग पंजाबो रसपा उसे पिर सरे मान के लिए ऊंच एकानप पातियों की दृष्टि में यह प्रवमा अनुपम पाइम हाप स जान दना परले सिरे की ममता होतो। मि० साल के इस पोगायोगी का जोरों से विराप दिया। दोन प्रकार यस्तियो गे यह प्रमाणित पर दिया दिएमा गोदर (१६ पेंस) में मिली प्रकार का परिवान न होना चाहिए पा। रमेटी ने जिस परवी मिफारिश की पीयह पी २४ पैंस(साना) । - रुपए की कहानी ५ उस समय इग्लैंड में मान का स्टडड या मान नहीं था-नोटों के बदले सोना मिलना ब हो गया था। सोना और स्टलिंग दोनो दो चीजें हो रही थी। एक सौ माँस खालिस सोना हो तो उसके ४२५ सावरेन ढाले जा सकते ह-गाय- यह कहना ठीक होगा कि ढाले जा सकत थ। पर १७ मिम्बर १९१९ को जो भाव था उसके अनुसार एक सौ प्रोस खालिस सान का दाम प्राय ५४४ पौड स्ट्रलिंग (कागजी) होता था। एक पौंड स्टलिंग (कागजी) अब तक सावरन के बराबर न होकर भर्यात ७८ सावरेन (साना) के बराबर था। इसीको दूसरी तरह यो यह सकत ह मि एक सावरेन (सोना) अब अर्थात १२८ पौड दलिग (कागजा) के बराबर था । कमटी 7 रुपए का स्टलिंग से न वाधकर सान स वाधन का सिफारिश की। २४ पस (साल) का अप २४ पेंस स्टलिंग नहीं बल्कि इससे कही अधिक था । एकमचेंज को उठाने के पक्ष म दलील यह दी गई थी और दी जा रही थी कि चादी का दाम ४३ पॅस से ऊपर हो जान पर रुपए का प्रतीक मुद्रा रहना असम्भव था इसलिए रुपए का चलण में कायम रखन के लिए उसकी एक्मा र वो काफी ऊँचा रखन की जरूरत पी। भविष्य के सम्बन्ध में भी वमटीको धारणा थी कि चीजा के सामनीघ्र गिरनवाल नय-और चाटी का दाम इतना ऊचा रहनेवाला था फिम्पए की कीमत २गिलिंग अर्थात २४ पेंस (सोने में) से कम रखन से उस पलन स निकल जान का मर्यात घातु मे *प में विन जान का डर पा । लाइ पन्स माधिविषया में बड दूरदर्गी मान जात ह । उहोन भी दो गिलिंग जसी ऊँचीरा समयन इस प्राधार पर किया किससार में चीजा के दामा गिरन की कोई सभावना न पी-बल्कि सम्भावना यह थी कि दाम मोर भी ऊपर चढंग । कहा गया कि इस महगी को ध्यान में रखते हुए यहोर भी जरूरी था कि रुपए की एक्सचेंजगर काफी ऊंची हो--जिससे भारत वष में महगा की भीषणता कुछ इ तक कम हो सके। वास्तव में-जसा कि मि० दलाल न मपन वक्तव्य में महा पा--- पानी की तेजी हो एवमचेज कोहर में वद्धि का एकमात्र कारण नहीं हो सकती थी क्योंकि अधिकारियों की मंगा थी कि चारी सस्ती हो हैन क देन जाय तो भी एक्सचेंज १६ स म काफी अचा रखा जाय । पर जालीन दी गई थी उसका मि० लार कग में जवान पहचा- "महाममर की ममाप्ति हो जान पर मी चागेर एक्सपोट पर प्रति बध बना रग। अगर पर प्रतिवर हरा दिया गया हाता तो चानी में इतनी तेजी न प्राना । भारतवर आसानी समर दा के हाथ अपनी पानी का एक निम्मा वच मरना था। इसरा चालाब नाम पर मच्दा अमर पडना । चालीवा एवमपाट १२ जान में और जा चादी वच सरना पा उमया बागामगेर बन जाने से ही इस बाजार में भाग लग गई। अगर यह मान मारिया जाय कि चाटी का एवमपाट हान लायक न पा तो मी लहाई क ममय उसका नाम वरन के कारण एक्सचेंज को ভানা সামির স । মাল সবি কা ৰাতি যা কি সিবন কথা की वजहरत हाती उनन का भारत-सरकार के नाम हुनी करके इस काम महाय याच रते-~-व्यापारी अपना दना वादा ने भजकर, पोर जिस तरह का मक्ते चबान । जब तक समार मात्र म सान ६ एक्सपाट पर प्रतिवध या तब तक था ममय के लिए एक्सचेंज में कुछ वद्धि शायद प्रनिदाय-मा पी, पर जब अमेरिका न ६ जून १९१६ म प्रतिवप हटा लिया और दक्षिण अफ्रीका का साना भा १८ जुलाई १९१६ मन में बाजार में बग- टोक विक्न लगा सब काई मा कारण न हो माता या सि एक्सचेंज की दरला २० म म म कर दिया जाय । 'गोन और हपा के बीच की दर को रायम पावह पहामगर ९ ममय उठा गई।पा महासमर 2 दारा कुछ लिया गया यह उसमे मा मनुचित पानि ग्यापित हो जाने पर परिम्पिनि बाल गई। मडाई राप र पमान पर हावार सरहनादरेमच की प्रसाईरल न रह गयापार के लिए समापी माग मवाय पा, पर यह माग पूरीपरन म कहीं अधिक भाव पर यह था कि पहा जनता रे मुरा-मादी अधिकार रक्षा की गार मन्या जा मानदार पिा गदा पा उप अविषल रहन पिया जाय । हर।
पए की कहानी हालत म-पर खास कर शान्ति स्थापित हो जान पर-चाहिए यह कि व्यापार उस मान या स्टण्डड के पीछ चले-न कि यह कि मान था स्ट पडा ही व्यापार का मन्वर्ती बन जाय । अगर उस स्टण्ड को बदल विना यापार की माग पूरी नहीं की जा सकता थी तो 'मुनासिब था कि वह माग पूरी न की जाय यह हगिज मुनासिब न था दिमाग तो पूरी की जाय मौर स्टण्डड को उठा दिया जाय ।" रुपया स्वयं हमारी मुद्रा प्रणाली में मूल्य का काई मान न था। यह मान या स्टण्डड १६ पॅस जति ७५३३४४ ग्रन सोना था। रुपया कागजी नोट की तरह उसका प्रतिनिधि मात्र या । भगर चादी महगी हो गई थी तो सरकार को चाहिए था कि मान या माप दण्ड को ज्या का-त्यो' में चादी का परिमाण कम कर देती या नए रुपए ढालती रखते हुए पिए 'मान या मापदण्ड के लिए जिस धातु का उपयोग होता था वह महगी हो रही थी, इसलिए मान या मापदण्ड हो बदल दिया जाय--- पह प्रस्ताव क्तिना अनुचित था यह नीचे उदाहरण से स्पष्ट हो जायगा । नापन के गज को लीजिए । यह १६ गिरह या तीन फुट का होता ह । मान लीजिए कि कहीं गज नापन के लिए रगम का फोता काम में लाया जाता ह (सोलह पेंस के लिए एक रूपए की तरह) । अचानक रेशम महगा हो गया और गज के लिए उसका उपयोग असम्भव है। एसी दशा में वहा वाले क्या करेंगे? अवश्य ही रेशम की जगह वह और किसी वस्तु का उपयोग करन लगेंग जो रेगम से सस्ती हो। योड़ी देर के लिए मान लीजिए कि इस विषय का नियंत्रण सरकार परती ह और उसन रगम की जगह सूत क व्यवहार की आज्ञा न देकर यह प्राज्ञा दे दी कि १६ प्रगुल के बजाय अब २४ प्रगुल का एक गज सममा जापगा। ऐसी आज्ञा या विधान का एष फल यह होगा कि जो किसीशी एक गज देने के लिए बाध्य ह उसे १६ को जगह अब २४ अंगल नाप कर देना होगा। एक्सचेंज रट बढ़ा देना नतीजा मी ठीक एसा हो हुआ । पहले जो पिसी हो १) देने को बाध्य पा उसे अब ७५३३४ पेन की जगह ११३००१६ प्रेन सोना (या इसौ हिसाब से अपने खत