Adarsh Library, Jaipur
Swapna Bhang
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स्वप्नभंग
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स्वप्नभंग
प्रतापचन्द्र चन्द्र
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली
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प्रथम पर्व Mantशिश करते तो मेरा घर नही टूटता । आपने कोशिश नहीं की, इसीलिए मेरा पर टूटा," अपरिचित युवती ने मुझपर सीधा अभियोग लगाया। मुबह का समय । मैं अपने कमरे में बैठा अखबार पढ़ रहा था। तभी वह लड़की आई । नमस्कार करके खड़ी ही रही। मैंने अखवार से सिर उठाकर उसे बैठने को कहा। वह वेठी। मैंने पूछा, "कसे आई ?" लड़की ने आगा-पीछा सोचे बिना ही मुझपर यह अभियोग लगा दिया। मैं हैरान । पूछा, "क्या मतलब ? मेरी वजह से तुम्हारा घर टूटा ?. मैं...मैं तो..." "तुम्हें पहचानता तक नही," लड़की ने मेरे की बात छीन ली, "जरा अच्छी तरह देखिए मुझे ! पहचानते हैं या नहीं ?" में उसे गौर से देखने लगा। कुछ गोलाई लिए हुए भरा-भरा-मा चेहरा; बड़ी-बही आंखें; आखो को कोरो पर शायद काजल की हल्की सो रेखा थी, जिनके काले घेरे में भूरी प्राणोच्छ्वल पुतलियां, ओठ कुछ ज्यादा ही भरे हुए, किंतु आकर्षक, रग गोरा; सुचिक्कन केशो में तेल, माग सिंदूर-विहीन । बासमानी साड़ी उसकी यौवनपुष्ट देह को पूरी तरह छिपा भी नहीं पा रही थी । सुन्दर यी लडकी । "अब भी नही पहचान सके ?" युवती ने पूछा, "हालांकि कितनी हो बार मुझे देखा होगा। आपके क्लव के नाटकों में मैंने कई वार वाम किया "मैं तो रिहर्सल वगैरह में खास जाता नहीं हूं। स्टेज पर तुम्हें देखा भी हो, तो बिना मेक-अप के पहचानना मुश्किल है।" "यह तो सच है," लड़को मुस्कराकर वोली, "मैं मालती मित्र है। अब पहचाना?"
। - "हां, हां, याद आ गया,"मैं बोल उठा, "मेरे 'उपनगर' नाटक में पसी का रोल क्या खूब किया था तुमने !" अव मालती मित्र की बातें याद आ गई थीं। हमारे क्लब के 'नाट्या- चार्य' थे वेणीदा । उन्हीं से इसके संबंध में कुछ बातें सुनी थीं । एमेच्योर दलों में कुछ लड़कियां नियमित रूप से अभिनय करती हैं। दक्षिणा भी लेती हैं। मालती भी उन्हीं में से एक है वेणीदा ने ही उसका कहीं से पता लगाया था। खुद ही अभिनय की तालीम देकर उसे तैयार किया था । मालती नियमित रूप से रिहर्सल करती थी। कभी-भी कोई गलत कदम उठाते उसे नहीं देखा गया। अपना काम निबटने पर सीधी घर लौट जाती। उसके हाव-भाव में एक ऐसा सहज गांभीर्य था कि उससे छेड़-छाड़ करने की कोशिश भी कोई नहीं करता था। इसीसे वेणीदा भी उससे बहुत खुश थे। अचानक ही उसे जब वह कठिन रोल दिया गया तो और लड़कियों को कुछ ईर्ष्या भी हुई थी, पर वेणीदा ने किसीकी परवाह नहीं की। दरिद्र, रुग्ण, गंजेड़ी पति के सामने ही रूपसी उसके मालिक के घर जा बैठी थी, पर पति के प्रति भी उसके मन में कुछ मोह था। यह सव होते हुए भी वह साथ ही एक नौजवान फुटबॉल-खिलाड़ी से प्रेम भी करती थी। ऐसा जटिल, किंतु जीवंत चरित्न एक नई अभिनेत्री को सौंपना दुःसाहस ही तो था, पर वेणीदा ने रंचमान भी चिता नहीं की। और मालती ने भी उनके विश्वास की रक्षा की। मैंने भी देखा था वह नाटक । मालती के सजीव अभिनय ने नाटक में प्राण फूंक दिए थे। पर उस दिन पर्दे की ओट में जो कुछ हुआ था, वह वेणीदा ने मुझे वाद में बताया। उससे मालती के चरित्र पर भी कुछ प्रकाश पड़ता है। रूपसी पति के मालिक करालीचरण के घर जा बैठी थी। उस मालिक का रोल किया था केशव दत्त ने । केशव का रंग-रूप भले ही भैसे जैसा रहा हो, पर मिजाज का वह वड़ा रंगीन था। किसी व्यापा दफ्तर में अच्छे पद पर था। अभिनय का उसे नशा था। बोनस : ओवरटाइम के रुपये वह नाटकों के ऊपर खुले हाथों खर्च करता सूरत-शक्ल हीरो जैसी तो थी नहीं, तो विलेन के ही रोल किया । ६ था वह । अभिनय बुरा नहीं करता था। सिर्फ हमारे क्लब में ही नहीं, - और भी कई जगह मिलाकर वह सारे साल नाटको में भाग लेता रहता था। एमेच्योर कलाकारों में उसका खासा नाम था, और इसका घमण्ड भी उसे कम नहीं था। कई लड़कियो के साथ वह अभिनय कर चुका था। पर इस नवागता आभनेत्री मालती के संग अभिनय के दौरान वह मानो अस्थिर हो उठा था। रिहर्सल मे प्रेम करते-करते वह शायद सचमुच ही मालती पर अनुरक्त होने लगा था। पहले तो किसीकी नजर इस ओर नहीं गई। रिहर्सल में अगर रात अधिक हो जाती तो केशव मालती को घर पहुंचा पाने का आग्रह करता। पर मालती सदा उससे बचकर ही चलती । एक शाम वर्षा हो रही थी । मूमलाधार पानी बरस रहा था । कुछ देर मे ही सडकें पानी में डूब गई। उस दिन रिहर्सल जम नहीं पाया। बारिश रुकते ही सब घर जाने को व्यग्र हो उठे । सडको पर लग- भग कमर-कमर पानी भरा था। मालती उस पानी में ही घर जाने को तयार थी । वेणोदा कुछ परेशान हो उठे। केशव ने कहा, "चिंता किस बात की है ! मैं रिक्शा करके उसे घर पहुंचा आता हूं।" आज मालती ने भी आपत्ति नहीं की। - पूछा। अगले दिन क्लब मे मानो भुकप-सा आ गया । मालती रिहर्सल करने नही आई । आया प्रसाद नामक एक युवक । अच्छा कसरती बदन । आते ही वेणीदा के पास जाकर गुर्राने-गरजने लगा । "वात क्या है ?" वेणीदा ने प्रसाद बोला, "आप लोग शरीफ नहीं हैं, नीच हैं, महानीच !" क्लब के और दो-एक सदस्य भी वही थे। वे भड़क उठे। वेणीदा ने उन्हें रोका । प्रसाद ने कहा, "मालती अब नाटक-वाटक करने नहीं आएगी।" "क्यो? क्यो?" "अपने उन केशववाबू से पूछिए," प्रसाद वोला, "रेशमी कुर्ता और चुन्नटदार धोती पहनने से ही कोई शरीफ नही बन जाता।" ७ . केशव दत्त तव तक आया नहीं था। वेणीदा ने कहा, "अरे भई प्रसाद, इतने गरम क्यों हो रहे हो? बात क्या हुई, यह तो बताओ।" "बात बताऊं ?" प्रसाद गुर्रा उठा, "कल आपके इस केशव दत्त ने रिक्शे में ही मालती के साथ बदतमीजी करने की कोशिश की थी। रिक्शे से कूदकर कमर-कमर पानी में मालती घर लौटी। नाटक करने आई है तो क्या इज्जत वेचकर ?" वेणीदा कुछ संकुचित होकर वोले, “वात अगर सच है तो वाकई वड़ा अन्याय हुआ। मैं केशव को डपट दूंगा। ऐसे तो हमारे क्लब की बदनामी फैल जाएगी।" प्रसाद तमककर वोला, "आप क्या डपटेंगे, मैं ही ठीक कर दूंगा उसे ! केशव दत्त ने अभी प्रसाद पाल को पहचाना नहीं है । मोचीपाड़ा थाने में दादाओं के रजिस्टर में मेरा नाम है । ओ० सी० अच्छी तरह से जानते हैं मुझे ! उनकी ही परवाह नहीं करता मैं, यह केशव दत्त क्या चीज़ है ? साइकिल की चेन से हड्डी-पसली एक कर दूंगा।" वेणीदा ने कहा, "भैया मेरे, केशव की तरफ से मैं माफी मांगता हूं। आगे से ऐसा नहीं होगा । मालती कब आएगी रिहर्सल के लिए ? उसे भेज देना भया !" प्रसाद कुछ नरम पड़ा, “पानी में भीगकर उसे सर्दी लग गई है। गला बैठ गया है । आज नहीं आ सकती। अगले दिन आएगी।" "शनिवार को फुल रिहर्सल है । उस दिन जरूर आ जाए, क्यों ?" वेणीदा ने कहा। "ठीक है, कह दूंगा," प्रसाद चला गया। केशव दत्त के क्लब में आते ही सब उसके चारों ओर घिर आए । केशव भड़ककर बोला, "जो किया है, ठीक किया है ! साली दो कौड़ी की औरत, मिजाज़ देखो उसका ! बहुत छोकरियां देखी हैं ऐसी। ऊपर से गुण्डे भेजकर धमका रही है। पता नहीं उसे, कितने मंत्री मेरे हमप्याला हैं ? श्यादा चौं-चपड़ की तो इस प्रसाद को मीसा में अंदर करवा दूंगा।" !
"और हमारा नाटक फासी लगाकर लटक जाए, क्यों ?" वेणीदा कुछ चिढकर बोले, "केशव बाबू, आप अनुभवी अभिनेता हैं । आपको समझना चाहिए कि इस मवसे नुकसान हमारे नाटक का होगा-शायद बंद ही हो जाए । ऐसे समय यह सब करना क्या आपके लिए उचित 1 । । "क्या किया है मैंने !" केशव वोला,"रिक्शे में अगल-बगल बैठे थे दोनों-बदन से बदन सटा हुआ था। नीचे से पानी का स्रोत बहे जा रहा था, मन में जरा कविताई जागने लगी । अपने आप ही प्रेम कवि- ताओं की दो-चार लाइनें निकल पडी मुंह से । रिक्शे का पहिया एक गड्ढे मे पहा तो झटके से मेरा मिर उसके सिर के करीब हो गया। मुझसे रहा नहीं गया तो उसे चूम लिया मैंने।" "वाह । खूब मीठा लगा ना !" किसी ने छौंक लगाया। "अरे, विलकुल वेस्वाद था जनाव, एकदम बेस्वाद ।" "कैसे भई ?" "झटके से चेहरा हटाकर, पर्दा उठाकर छोकरी भरे पानी में ही कूद पड़ी। फिर मुझे 'असभ्य' कहकर पानी में चलती हुई अंधेरे मे ही गुम हो गई। वरियत थी कि किसी और ने नहीं देखा। रिक्शावाला जरूर बौखला गया था। उससे कह दिया, "माईजी का पेट दरद हो गया." इससे जल्दी से घर चला गिया," अपने ही मजाक पर केशव दत्त ठठाकर हस पड़ा। "बस इतना ही ?" किसी ने कहा, "नहीं, और भी कुछ जरूर हुआ था, आप मुह से फूट नही रहे है।" "कसम से," केशव दत्त हलफ उठाने लगा, "एक चुम्मा,वस । इतने मे ही ये धमकियां !" "जो भी हो," वेणीदा ने कहा, "हमारा नाटक हो जाने दीजिए । नहीं तो वही दुर्दशा होगी !" ये सब बातें वेणीदा ने मुझे बाद में बताई थी, और बताई थी नाटक को रात की नेपथ्य-कथा । मैं तो प्रेक्षागृह में बैठा था। पर्दे की ओट में क्या हुआ था, वेणीदा के बताए बिना मुझे पता ही नहीं चलता। ६ । - उस रात केशव दत्त ने थोड़ी-सी पी रखी थी। मुंह से शराब की बू आ रही थी। पर अभिनय में कोई कसर नहीं थी । पराई स्त्री को उसके पति के सामने ही घर में डाल लेने वाले, चाय की दुकान की आड़ में भले घर की कुमारी कन्याओं के अपहरण की व्यवस्था करने वाले, जिसकी उपेक्षा करके उसकी प्रेमिका दुकान के एक नौजवान ग्राहक से प्रेम की पेंगें बढ़ा रही है, ऐसे करालीचरण के चरित्र को केशव दत्त ने मंच पर जीवित कर दिया था। उसके साथ ही चरित्रहीना, चंचल रूपसी के 'रोल' में मालती ने भी गजब का अभिनय किया था। दोनों ने मिलकर नाटक में जान फूंक दी थी। पर गड़बड़ हुई नेपथ्य में। नाटक के अंकों के बीच केशव दत्त मालती के आगे-पीछे घूम रहा था। किसी बहाने से लड़कियों के ग्रीन-रूम में भी धुस पड़ा और मालती से उलझने लगा । वेणीदा को यह अखर रहा था, पर शांति बनाए रखने की खातिर वे भी कुछ नहीं बोले । पर वडा काण्ड हुआ, नाटक के ड्रॉप सीन के बाद । मालती को स्टेज के एक तरफ पाकर केशव दत्त उसपर टूट पड़ा, बांहों में जकड़कर उसके चुंबन पर चुंबन लेने लगा। मालती चीख कर उसके चेहरे को दूर हटाने की कोशिश करने लगी । इसी सब में उमके नाखूनों से केशव दत्त के गाल छिल गए। खून बह निकला । वेणीदा वगैरह ने जाकर उन्हें अलग किया । मालती फफक-फफक कर रोने - । लगी। केशव ने व्यंग्य से कहा, 'ईऽऽस ! क्या कहने सती-साध्वी के ! यह ले अपने चुंबन की कीमत !" कहते-कहते उसने जेब से कुछ नोट निकालकर मालती के सामने फेंक दिए । "असभ्य ! जानवर कही का !" मालती फुकार उठी, "जूती की नोक पर रखती हूं तेरे रुपयों को !" इतना कहकर मालती धड़धड़ाती हुई चली गई, मेकअप उतारने के लिए भी नहीं रुकी । आखिर वेणीदा को ही उसके कपड़े पहुंचाने उसके घर जाना पड़ा। मालती उनसे मिली तक नहीं । इसके बाद पता नहीं किसने अकेले या कुछ साथियों को लेकर, केशव दत्त को अकेले में पाकर उसके सिर पर लोहे की छड़ का ऐसा वार किया कि उसे लगभग सात १० दिन अस्पताल में विताने पड़े। वही मालती मिन अभियोग लगा रही है कि मैंने उसका घर तोड़ दिया है। । उसके घर का मामला भला मुझे क्या मालूम ! वेणीदा ने भी मुझे कभी कुछ नहीं बताया और मुझे भी कुछ जानने का कौतूहल क्यों हो? कितनी ही लडकियां क्लय के नाटको में भाग लेने आती हैं। मुझे कहां समय है कि सबके घर की जानकारी लेता फिरू ? पर केशव दत्त की बातो से कुछ-कुछ अदाज जरुर मिला था। अस्पताल में केशव को देखने में गया था-मुलाकात वाले समय मे, कुछ सेव और सतरे लेकर । अस्पताल सियालदह के पास था । वह एमर- जेन्मी वार्ड में भर्ती था । पलंगो की कतार में केशव जरा मुश्किल से ही मिला । उसके सिर और हाथ पर पट्टी वधी थी। हमलावरों ने लोहे का रॉड उसके सिर का निशाना लगाकर मारा था। उसने हाथ से वार रोकना चाहा । फलस्वरूप सिर और हाथ दोनोही घायल हो गए, पर चोट गहरी नहीं लगी। रोज की तरह ऑफिस से लौटते हुए घर की गली मे वह घुसा ही था कि धुधलके मे किसीने हमला कर दिया । पता नही, हमलावर एक ही था या अधिक,पर लपककर रॉड चलाई गई। केशव ने सिर एक ओर झुकाकर हाथ उठाया। चोट का वजन हाथ सह गया। सिर पर चोट लगी, पर हल्की। हमलावर रफूचक्कर हो गया। केशव चीख मारकर गिर पडा । आस-पास के लोग दौडे आए, रिक्शे में डाल फरउमे अस्पताल ले गए । इलाज जल्दी हो गया इसलिए तकलीफ वन नहीं पाई। "किसी पर शक है तुम्हे ?" मैंने पूछा "क्या कहू ?" केशव ने कहा, "गुडागर्दी आजकल व मे ही इतनी बड़ी हुई है । पर मुझे लगता है, इसमें उस छोकरी का हाथ है।" "किसका ? मालती या !" "और नही तो किसका ? वाजारू औरत है साली । मुहल्ले के दादा लोग उसके गाजियन हैं । एक साला तो उस दिन आकर धमका हो गया था। उन्ही में से होगा कोई।" - - "थाने में रपट लिखवाई?" "हत्, कौन ये सव झंझट मोल ले ! कोर्ट-कचहरी की भाग-दौड़ करते रहो फिर !" "तुम्हारा खयाल है, इस वारदात के पीछे मालती मित्र है ?" "क्या कहा जा सकता है ? एक तरफ तो साली छुईमुई बनती है, मानो मर्द के छूने से ही सतीत्व नष्ट हो जाएगा, और दूसरी तरफ चरित्न- हीन रूपसी के रोल में कैसा अभिनय किया था ? अंदर कुछ रस न हो तो उस रोल में कोई ऐसा अभिनय कर सकता है ?" "उम रस को चखने की कोशिश में ही तुमने कैसा उपद्रव खड़ा करवा दिया था !" "वाकई । छोकरी एकदम मानो फन उठाकर फुफकारने लगी। ठीक है, मैं भी देख लगा। केशव दत्त ने ढेर लड़कियों को चराया है। एक दिन इसका बदला मैं लेकर रहूंगा।" "पर ये भी तो हो सकता है कि इस हमले के पीछे मालती का हाथ न हो । खुद तुमने कहा है कि गुण्डागर्दी आजकल बेतरह बढ़ी हुई है।" "बात तो ठीक है," केशव ने कहा, "अभी मेरा दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा है । जरा ठीक हो लूं, फिर खुद ही खोजबीन करूंगा।" -- केशव ने खोजबीन की या नहीं, यह जानने की फिर मुझे फुरमत नहीं मिली। हां, एक दिन वात-बात में वेणीदा ने पारूर कहा था, "क्या लड़की श्री ! कमी अद्भुत अभिनय प्रतिभा थी मालती मिन्न में, और देखो, वही व्याह करके असमय ही एमेच्योर थियेटर से रिटायर हो गई।" "अच्छा ! सच ?" "सोलह आने सच !" वेणीदा ने कहा, "इस वार एक विदेशी नाटक करने का इरादा था। एकदम एक्स्ट्रक्ट नाटक का पक्का अनुवाद था। उसके लिए मालती का पता लगाने उसके घर गया था। वहां सुना कि व्याहकर ससुराल चली गई है।" "जरूर लव-मैरिज होगी," मैंने कहा, "किसी हैसियत वाले आदमी १२ - - से प्रेम चल रहा होगा, शादी-वादी सब तय हो चुकी होगी, इसीलिए सतीत्व की इतनी चिता थी। क्या हाल किया वेगव दत्त का !" "अरे नही 55," वेणीदा बोल उठे, "प्रेम-चैम नहीं या कुछ । मां- बाप ने तय किया था रिश्ता । लड़का भी ठेठ गाव का है, किमान । डाय- मण्ड हार्वर के आम-पास कहीं खेती-बाड़ी करता है। मामी जगह-जमीन है । गाय-बैल, मय हैं । शादी में नगद रुपये तो लिए ही, दहेज में एक नई माइकिल भी ली है।" टठाकर हंसने लगे वेणीदा, "जरा कल्पना करो, तुम्हारी रूपमी रानी एक किसान की कमर को वांहो में बाधे, साइकिल के कैरियर पर तिरछी बैठी सनसनाती चली जा रही हैं। हम्बारव का पाव-संगीत बज रहा है, और वे किसी गढे-गहया के किनारे वंठी, किमान महाशय के गले से लिपटी मधुर मधुर प्रेम-गुंजन कर रही हैं । वाह वा ! क्या ड्रामा है ! किसान की बहू ! ना, ना, आजकल के दर्शक इस तरह की कहानियां पसद नहीं करते, नहीं तो भाई तुम्हीं से कह देता इस थीम पर एक नाटक लिखने को।" "पर वेणीदा, आपको इतनी बातें पता कैसे चली ? शादी का म्यौता मिला था क्या?" "नारे भाई, मुझमे पहचान ही कितने दिन की थी ? उन लोगो के बारे में खाम कुछ मुझे मालूम भी नहीं है। नये नाटक में मालती को लेने के इरादे से उसके घर गया था। उसके पिता ही बकर-बकर कर मव बता गए।" "पर केशव तो कह रहा था कि वह बाजारू औरत है।" "क्या पता भाई। मैं तो वस नाटक कराता हूं। कौन-सा शादी-ब्याह करना है जो कुल-गोत्र का पता लगाने बंठू। देखने से तो भरीफ घराना ही लगता था। पिता का नाम हारू मित्र था-उसीने सारी बातें बताई। आदमी कस लगा। दहेज में अटी ढीली करनी पड़ी थी ना, उसीको चोट अभी तक कसक रही है । उमी दुख मे सब बता गया मुझे।" "आपको पता था कि मालती की शादी तय हो गई है ?" "कैसे पता होगा? उससे तो सिर्फ रिहसंल मे सबंधित बातें ही होती थी। और फिर इधर-उधर की बातें खोदना मेरा स्वभाव भी नहीं - मैं तुम्हारा केशव दत्त नहीं हूं।-पर शादी अचानक ही हुई। "दुनिया में क्या लोगों की कमी है, जो मालती ने एक किसान से ह किया ?" . "जेण्टलमैन फारमर है भई । खास पढ़ा-लिखा तो नहीं है, पर खेती- ड़ी का अच्छा ज्ञान है । आजकल उसी में तो दाम है भाई, नहीं तो हम लोगों की तरह कलम-घिसाई से भला कितना जुटता है ?" "मालती शहर से गांव में जाकर निभा सकेगी? इस संबंध से उसने आपत्ति नहीं की ? वह कोई नन्ही-मुन्नी तो है नहीं कि मां-बाप के अनु- सार चलने पर मजबूर हो।" "अरे, उसने खुद यह संबंध स्वीकार किया है। उसके पिता हारू मित्र की विलकुल भी इच्छा नहीं थी कि लड़की गांव में सड़ने जाए, पर वह तो मालती ने ही जिद पकड़ ली कि विवाह वहीं करेगी। हारू मित्र दुनियादार आदमी है । लड़की अभिनय अच्छा करती है, इसमें नाम भी कमाया है। थोड़ा-बहुत नाचना-गाना भी आता है। बाप की इच्छा थी कि अभी शादी न हो, वह इसी लाइन में रहे । क्या पता, आगे चलकर भाग्य प्रसन्न हो, किसी सिने-नवाव की नज़र पड़े और लड़की फिल्मस्टार ही बन जाए। पर मालती ने ही पिता की आशाओं पर पानी फेर दिया। इस रिश्ते के आते ही उसने व्याह करने का हठ पकड़ लिया। शादी करके गांव चली गई और उसका निश्चय है कि अव शहर नहीं लौटेगी। वा अब पछता रहा है-क्या उसे किसान की बहुरिया बनाने के लिए ही खर्च करके रहीम उस्ताद को रखा था गाना सिखाने के लिए? क व्यर्थ ही पैसे खर्च करके नाच की तालीम दिलवाई थी?" मैंने कहा, "मालती को दूल्हा तो ज़रूर पसंद आया है । नही शहर की मौज-मस्ती, नाच-गाना-नाटक वगैरह की चकाचौंध भूल लक्ष्मी बहू बनकर गांव क्यों जाती भला?" "हारू मिन बता रहा था कि जमाई देखने में बुरा नहीं है । रंग धूप में जलकर काला पड़ा हुआ है, पर चेहरा एकदम कृष्ण कन्हैयार "इस युग के राधा-कृष्ण की जोड़ी जंचेगी खूब," मैंने कहा "मालती-सुन्दरी गोधन की परिचर्या करेगी, उसका प्रियत १४ किल की घंटी बजाएगा। ननद का भय भी नहीं। आखिर अग्नि की माक्षी में किया गया विवाह टहरा, कोई अवैध प्रणय तो होगा नहीं । ईश्वर करे वे लोग मुखी हो।" "ऐमा ही कहो भया," देणीदा ने कहा, "लड़की मुझे बहुत ही अच्छी लगी है । योग्यता है उसमें, तेज भी है । मैंने तो अपनी आखो से देखा है ना, उस के शव के दिए कड़क नोटों पर किम तरह लात मारकर चली गई । इस लाइन में हर कोई अपने को मंभालकर नहीं चल सकता, पर मालती से पोहे-मे दिनों के परिचय में ही ऐसा लगता है कि वह उम तरह की लड़की है ही नहीं। सच, सुखी हो वह । मुझे दुम्न वम इतना ही है कि एक जन्मजात कलाकार दप-से जलकर वझ गया।" मुखी हों, सच ही मुखी ही, यही तो मैंने और वेणीदा ने चाहा था। फिर भी मालती मिन्न अभियोग लगा रही धी-मेरी ओर मे चेप्टा के अभाव के कारण ही उमका घर टूट गया। मैंने मालती से कहा, "मैंने तो चाहा था कि तुम विवाह करके सुखी होओ। खबर मुझे वेणीदा ने सुनाई थी, उनकी भी यही कामना थी।" "पर वह हुआ कहा ?" मालती दीर्घश्वास दबाकर बोली, "मेरा सुखी घरौदा विखर गया। आप अगर थोड़ी-सी भी चेष्टा करते तो वह जुड़ सकता था।" "तुम फिर मुझे दोप दे रही हो मालती पर सच, मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा है, तुम्हारा घर तोड़ने में मेरा हाप कहां है ?" मालती होंठों पर मुस्कान लाकर बोली, "आपको झूनू दासी वर्मम सहदेव दास का मुकदमा याद है ?" "क्यों नहीं," मैंने कहा, 'मैंने ही तो सहदेव की तरफ से बचाव किया था। पर तुम्हारा इस मुकदमे से क्या सबंध ?" मालती ने कहा, "मैं ही झूनू दामी हूं । मालती मेरा औपचारिक नाम है, घर का नाम तो भून ही है । सहदेव दास मेरे ही पति..." वह कुछ रुककर बोली, "थे।"
। मुकदमा था रेस्टिट्यूशन ऑफ कंजूगल राइट्स का, अर्थात् पत्नी ने अदालत के मार्फत पति के साथ रहने का अधिकार वापस पाना चाहा था। पर पति स्वयं उस अधिकार को अस्वीकार कर रहा था। सहदेव मेरा मुवक्किल था। पर वह मुकदमा मैंने लड़ा नहीं। मेरे ही कहने पर सहदेव मुकदमा दूसरे वकील के पास ले गया था। बाद में फैसला क्या हुआ, इसकी कोई खोज-खबर मैंने नहीं रखी। सहदेव का बड़ा भाई नकुल दास मेरे मुकदमे के कागजात लेकर आया था। नकुल मेरे मित्र बैरिस्टर संजित दत्तगुप्त का ड्राइवर था। संजित के साथ मैं कितनी ही बार घर लौटा हूं, नकुल गाड़ी चलाता रहा है। ड्राइवर होने पर भी नकुल खानदानी आदमी दिखाई देता था, साथ ही चुस्त और चालाक । कुछ फुसफुसाहट सुनी थी कि उसका चाल- चलन कुछ ऐसा ही है । निषिद्ध मुहल्लों में आते-जाते उसे देखा गया है। पर उसके निजी मामलों में नाक घुसाने की किसे पड़ी थी ? मुझे देखते ही उसके चेहरे पर अभ्यर्थना की मुस्कान दौड़ जाती। आगे आकर, दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता। वड़ा मेहरवान था। एक दोपहर अचानक ही वह मेरे दफ्तर में हाजिर हुआ। साथ में एक सुवेश भद्र युवक था। रंग उसका बेहद काला था-नकुल से भी इक्कीस ही होगा-पर मुखाकृति अत्यंत सुंदर थी, मानो कसौटी के पत्थर की तराशी हुई कृष्णमूर्ति । "क्या बात है नकुल ?" मैंने पूछा। "हुजूर, विना इजाजत के ही कमरे में आ गया," नकुल ने कहा, "वैरे से पता चला कि आप अकेले ही हैं। इसीलिए एक गोपनीय काम के लिए आपकी शरण ली है।" "ठीक है, ठीक है, बैठो," मैंने कहा। "नहीं हुजूर, आपके सामने मैं कैसे बैठ सकता ?' नकुल ने कहा "आपकी इजाजत हो तो मेरा भाई सहदेव बैठ सकता है।" "कह रहा हूं ना, तुम दोनों ही बैठो । खड़े-खड़े कहीं काम की बातें होती हैं ?" दोनों भाई अत्यंत विनीत भाव से कुर्सियों पर बैठ गए । नकुल ने स्व-१ मुकदमे से संबंधित एक कागज निकाला । मैंने पढा-एक अर्जी थी। अदालत के उल्लेख और मुकदमे के नंबर के बाद बादी-प्रतिवादी के नाम- पते दिए गए थे-श्रीमती झुनू दामी, साकिन कलकत्ता, पांच नंबर विपिन यश लेन, वनाम श्री सहदेव दास, साकिन गाव मुरला, थाना हरिपुर, जिला चौबीम परगना । वादिनी की मर्जी का मुद्दा था कि कलकत्ता के उक्त पते पर प्रति- बादी के साथ उमका कानूनन विवाह हुआ था । उस विवाह की कलकत्ता में रजिस्ट्री भी हुई थी । वादिनी प्रतिवादी की विवाहिता स्त्री के तौर पर उसके साथ उक्त गाव में रहने लगी थी । पति-पत्नी के रूप में दोनों मवसे अंत में कलकत्ता वाले पते पर एक साथ रहे थे। पर बाद में प्रति- वादी ने अन्यायपूर्वक वादिनी का त्याग कर दिया । वादिनी पति के साप रहने की इच्छुक है, और इसके लिए तैयार भी है। पति के साथ रहने का आग्रह भी उसने किया है, पर प्रतिवादी ने इनकार कर दिया । इसलिए वादिनी अदालत में दापत्य अधिकार की पुनप्रतिष्ठा के लिए आवेदन कर रही है, इत्यादि। अर्जी में पेचीदा या उलझा हुआ कुछ भी नहीं था. पर उसे लिखा पा एक प्रतिष्ठित वकील ने, जिनका कानूनी ज्ञान तो ज़बर्दस्त था ही, दक्षिणा भी तगड़ी थी। अगर अर्जी मामूली होती तो पहली ही बार में इतने बड़े वकील की फीस भरने की जरूरत नहीं थी। वादिनी मुकदमे में शुरू से ही खासा खर्च रही थी। "हः" मैंने कहा, "नकुल, मुकदमे की अर्जी तो सीधी-साफ है । अव इसका क्या जवाब देना है ?" "वही तो आपको बता रहा हू सर,"नकुल ने कहा, "इस मुकदमे को लड़ने की जिम्मेदारी आपको लेनी पड़ेगी। मेरा सगा भाई है, हुजूर । सीधा-सादा आदमी है, सेती-बाही करता है । ठीक-ठाक गिरस्ती चलाले जाता है । जादा खर्चा करने की हैसियत नहीं है सर । फीम के मामले में कुछ मेहरवानी रखिएगा।" "वह सब बाद में देखा जाएगा," मैंने कहा, "पर जवाव लिखाने की भी तो फीस लगेगी।" - - "उसकी फिकर मत कीजिए सर, नकुल ने कहा, "मेरे साहब ने कहा है कि आप अगर केस लेने को तैयार हों तो वे विना फीस के हमारा रिटेन स्टेटमेण्ट तैयार कर देगे। बाद में अगर जरूरत पड़ी तो वे हमारी तरफ से अदालत में भी खड़े होंगे।" "ये तो अच्छी बात है," मैंने कहा, "अव बताओ, जवाव का मुद्दा क्या है ?" "फ्रॉड, सर," नकुल ने कहा, "ये शादी धोखे से हुई है। मेरे भाई को ठग लिया गया है ?" "क्या मतलब ! तुम लोगों को क्या कुछ भी पता नहीं था ? क्या लड़की बदल दी गई है ?" "नहीं हुजूर । शादी उसीके साथ हुई है," नकुल ने कहा, "पर असली परिचय दवाकर । हारू मित्र की बेटी झूनू मिन्न वगैरह सुनकर हमने समझा था कि लड़की शरीफ खानदान की होगी। पर वाद में पता चला कि उसकी मां चकलेवाली है-मोयरापट्टी की प्रसिद्ध विंदी बाड़ी वाली । छः-सात बदनाम मकानों की मालकिन है वह, कुछ-एक दर्जन लड़कियां उसकी तावेदार हैं । यह सब पता लगने के बाद क्या ऐसी लड़की को घर में रखा जा सकता है ?" सहदेव अब तक चुप ही बैठा था। अब वह झिझकता-झिझकता कुछ वोला। उसकी आवाज़ भी नरम थी। वह वोला, "लड़की का कोई दोप नहीं है सर, पर आखिर समाज में रहना है । आप लोगों के शहरों में थोड़ा-बहुत चलता है, पर गांवों में अगर खवर जरा भी फैली तो मुसीबत हो जाती है।" नकुल लज्जित होकर बोला, "माफ कीजिएगा सर, यही बात हो गई है। गांव में बात फैल गई है। छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां भी गा-गाकर चिढ़ाते हैं. खानगी को वेटी, खानगी का दमाद !" "हूं," मैंने कहा, "शादी के पहले तुम लोगों ने ठीक से पता नहीं लगाया था ?" सहदेव चुप रहा । नकुल मानो कुछ निगलता हुआ-सा वोला, "पूछ- ताछ करने पर तो कुछ पता ही नहीं लगा था सर । पता यही लगा था कि १८ हारू मित्र की लड़की है, विपिन यश लेन में रहती है, पटी-लिखी है, नाच-गाना भी आता है, सुना है वावू लोगो के माथ नाटकों वगैरह में भी हिस्सा लेती है । ये तो हमें मालूम हो नहीं था कि वह वाठीवाली को लड़की है। यानी- हमें कोई शक ही नहीं हुआ। और फिर मादी भी तो चटपट ही हो गई।" नकुल के बात करने का ढग बहुत सरल नहीं जान पडा। मामला ठीक तरह से मेरी समझ में नही आया । बात निकालने के लिए में जिरह करने लगा, "तुम कहते हो, पता नहीं चला। लेकिन मोयरापट्टी की प्रसिद्ध वाड़ीवाली की लड़की के बारे में मुहल्ले में कोई नहीं जाने, यह तो हो नहीं सकता। तुम मुहल्लेवाली से पूछ-ताछ कर सकते थे !" “यह तो वही गलती हो गई सर," नकुल ने कहा, "लगा कि सबंध अच्छा है, एकदम मित्र कायम । हमारी जात जरा नीची है।" "इमोसे तुम्हें शक होना चाहिए था, मैंने कहा, "कायय अचानक ही अपनी बेटी नीची जात में व्याहने को तैयार हो जाए तो इसके पीछे जरूर कोई रहस्य होना चाहिए।" "हम लोगों को क्या आपकी तरह कानून आता है सर !" नकुल नै कहा, "उन लोगो ने बड़े भारी दहेज का लालच दिया तो हम लोग भी तैयार हो गए।" अव सहदेव बोल उठा, "सच्ची बात कहूं मर, पहले दादा ने ही उममें व्याह करना चाहा था, वहां घरजमाई बनकर रहने को भी तैयार था, पर लडकी ही राजी नहीं हुई।" "क्यों ? नकुल मे क्या बुराई है ?" नकुल चिढ़कर बोला, "लडकी का मिजाज ही कुछ टेढ़ा है सर। कहती है ड्राइवर से ब्याह नहीं करेगी। अरे ! वाडीवाली की छोकरी का मिजाज तो देखो!" "इसका मतलब, तुम्हें पता था कि वह बाड़ीवाली को लड़की है सब कुछ जानते-बूझते यह विवाह हुआ है।" पकड़े जाने पर नकुल हंस पड़ा। सिर खजाता हुआ बोला, "आपकी जिरह से कहां जीतूगा सर । सच ही कहता हू, मुझे मालूम या। पर मेरे भाई को पता नहीं था। मैंने देखा, ऐसा मालदार रिश्ता हाथ से निकला जा रहा है, इसलिए भाई के साथ मामला चला दिया । भाई को उसने नापसंद नहीं किया।" मैं कुछ चितित होकर बोला, "इसीसे तो फ्रॉड की डिफेंस कुछ कम- जोर हो रही है । जिरह के मागे तुम्हारी इस कहानी का टिकना मुश्किल । । I . "पर इधर हम लोग गांव में जो नहीं टिक पा रहे हैं," नकुल ने कहा "कस के लड़ना होगा, इस शादी को खतम करना ही होगा। मेरी वजह से ही इतना झंझट उठ खड़ा हुआ है । मैं भाई की दूसरी शादी करूंगा।" सहदेव ने कहा, "मैं और शादी करना नहीं चाहता सर ! पर उसे लेकर गांव में रहा भी नहीं जा रहा है। इसीलिए..." "इसीलिए व्याही पत्नी को त्याग दोगे?" मैंने कहा, "शहर में रहो।" "त्यागना तो नहीं चाहता सर, पर..." सहदेव ने कहा, "और कोई चारा नहीं रहा, इसीलिए ऐसा कर रहा हूं। वीवी के लिए पुरखों की माटी कसे छोड़ दूं? वहां तो छोटे-छोटे बच्चे भी गा-गाकर चिढ़ाते हैं-बानगी का जमाई।" "तुम क्या सच ही अपनी बीवी का असली परिचय नहीं जानते थे?" मैंने "कालीमाता की सौगंध, सर, मैं नहीं जानता था," सहदेव ने कहा, "दादा ने संबंध तय किया और मैं चुपचाप व्याह करके बहू को घर ले आया।" "इसीलिए तो, नकुल," मैंने कहा, "मामला कुछ उलझा हुआ है। वहुत-कुछ तो गवाही पर ही निर्भर करता है। अभी से यह कह सकना कठिन है कि जज साहब किसका विश्वास करेंगे । वह पक्ष अभी से पूरी तैयारी से सब काम कर रहा है। वकील भी बड़ा ही किया है। आखिर तक मुफदमे का क्या पता क्या रुख हो?" "आप ये कागज-पत्तर रखिए," नकुल ने कहा, "एकवार मेरे साहब के साथ बात कर लीजिएगा। एकवार लड़ देखता हूं, फिर तो भाग्य की २० पूछा।
बात है।" मैंने पूछा, "और भी कुछ कागधात है ?" "कसे कागजात ?" नकुल ने पूछा। "जैसे यही, मुकदमे से संबंधित चिट्ठियां वगैरह।" "वकील की चिट्ठी है, और हम लोगों का जवाब ।" "इसके अलावा ?" सहदेव कुछ झेंपकर बोला, "कुछ-एक चिट्ठिया है, सर । उसने मुझे लिखी थी। पर वे क्या किसी काम की होंगी?" "गरमा मत," नकुल ने कहा, "डॉक्टर और वकील से कुछ नहीं छिपाना चाहिए । चिट्ठिया हुजूर को दे दे, क्या पता मुकदमे में काम आए।" "मैं साप तो नहीं लाया," सहदेव ने कहा, "याद मे ला दूंगा।" "अच्छी बात है," मैंने कहा, "जवाब देने के लिए कितने दिन का समय है?" फिर कागज देखकर बोला,"नहीं, अभी भी काफी समय है । सहदेव, तुम वकालतनामे पर दस्तखत कर दो।" नकुल ने कहा, "मैं रिश्तेदार का काम निपटा लेता है। स्टैम्प वगैरह के लिए कुछ रुपये भी जमा कर जाता है।" आखिर तक हुआ यह कि सजित दत्तगुप्त ने जवाब लिख दिया और मैंने प्रतिवादी सहदेव की तरफ से वह अदालत मे फाइल कर दिया । पर शुरू से ही मुझे मानो तसल्ली नहीं थी। मुकदमे की सफलता के सबंध में भी मुझे यथेष्ट सदेह था। इस संदेह का कारण था, पति को तिखे गए झूनू दासी के प्रेमपत्र । दत्तगुप्त ने कहा, "ये चिठ्ठिया दया जाओ । इन्हें पढ़कर जज साहब जरूर प्लेंटिफ के पक्ष मे ही डिग्री देंगे, यह किसी भी तरह रोका नहीं जा सकेगा।" मोयरापट्टी की बिंदी बड़ीवाली को मैं पहचानता हूँ । विंध्यवासिनी दासी उर्फ विध्यवासिनी मित्र निपिद मुहल्ले की एक सुप्रतिप्टिता नेत्री है। बहुत मे चकलों की वह लीजी या फिर किरायेदार है। उसके अधीन बहत-सी 5.
। , - वेश्याएं अपनी रोजी कमाती हैं। विदी मां या विंदी दी वहुत-सी अभा- गिनियों की गुरु-मां है । हारू मित्र के साथ उसका सच ही विवाह हुआ था या नहीं, मुझे नहीं पता, पर वे पति-पत्नी के रूप में रह रहे थे । विपिन यश लेन ठीक निषिद्ध पल्ली के बीच में नहीं है, कुछ बाहर है। उनके घर का रहन-सहन भी शरीफाना था। हारू मित्र घर का स्वामी था और विंध्यवासिनी का रक्षक भी। पृथ्वी के इस आदिमतम व्यवसाय को संभा- लना अकेली औरत के बस का काम नहीं है ! गुण्डे-बदमाश हैं, थाना- पुलिस है, कोर्ट कचहरी भी है-कौन इन सव झमेलों को संभाले ? इसी- लिए एक रक्षक की जरूरत होती है। हारू इन सब कामों में खूब पुस्ता है । गुण्डे-बदमाशों पर वह काबू रखता है, दारोगा-सिपाहियों के साथ उसका मेल-मिलाप है, वकील-मुख्तार उसके लिए अनजाने नहीं हैं। मोयरापट्टी के इलाके में मिन-दम्पति का खासा रोव है। इनके साथ मेरा भी अच्छा परिचय है। पर मालती मित्र उर्फ झूनू दासी विंध्यवासिनी की बेटी है, यह मुझे पहले पता नहीं था। वेणीदा ने हारू मिन का नाम लिया, तब भी ख्याल नहीं आया। चुनाव के सिलसिले में मैं कुछ-एक वार उनके दरवाजे पर गया था। गणतन्त्र बहुत-से स्तरों के लोगों को पास ला देता है । गणिका होने के नाते ही किसी को दूर नहीं रखा जा सकता। मतदाता सूची में किसी-किसी सड़क पर असंख्य ऐसी लड़कियों के नाम मिलते हैं, जिनके वोट हैं। उन पर निर्भर पुरुषों की संख्या भी कम नहीं होती। चुनाव के लिए सामयिक रूप से उनमें भी राजनैतिक संगठन तैयार करना पड़ता है। चुनाव के पहले और बाद में भी कुछ संपर्क रखना ही पड़ता है--गण-संयोग की खातिर गणिका संयोग-हां, केवल राजनैतिक कारणों से। अगर कोई इसके भी आगे जाए, तो रोकनेवाला कौन है ? विंध्यवासिनी अर्थात् विदी दी चुनाव में विशेष सहायता देती है। देखने-भालने में वह भारी-भरकम है । अपनी उमर में वह अच्छी सुंदर थी। अब मोटी हो गई है। चौड़े लाल किनारे की सफेद साड़ी पहने,सिर ढके,ललाट पर रुपये के वरावर सिंदूरी टीका लगाए जव वह गजेन्द्र गति से मुहल्ले के काली-मंदिर में फूल-मिठाई चढ़ा आती है, तव कोन २२ उसे भले घर की गृहिणी ममझने की भूल नहीं करेगा ? उमका व्यव- हार भी सयत तथा भद्र है, बातचीत भी शालीन । पर बावाज कुछ खन- सनाती भी है। विदी वाडीवाली के प्रभाव का सबसे बड़ा कारण है, उसका व्यक्तित्व । कुल मिलाकर वह निषिद्ध मुहल्ले की लीडर है। उमे अलग छोड़कर उस इलाके में क्मिी भी सार्वजनिक पूजा-पूर्व, यात्रा-नौटंकी, उत्मव, राजनैतिक समा-समिति आदि का आयोजन सभव ही नहीं है। पुलिस का अत्याचार या धर-पकड़ होने पर विदी वाडीवाली ही पहला कदम उठाती है, वाहीवालियों और लड़कियो की सभा बुलाती है, प्रस्ताव पास कराती है, उच्च अधिकारियो के पाम अर्जियां देती है, हेपुटेशन का नेतृत्व करती है । तूफान या वाढ़ की स्थिति में चदा इकट्ठा करना हो, तो भी विदी पीछे नहीं रहती। खुद तो चदे में मोटी रकम देती ही है, कुछ पुरुष-स्त्रियों को जुटाकर गली-गली, घर-घर घूमकर, रुपया-पैसा, पुराने कपड़े, दाल-चावल यादि इकट्ठे करती है; इम सबका हिमाव रखती है, फिर इकट्ठी की हुई चीजें रामकृष्ण मिशन या भारतसेवा-श्रमसघ में पहुंचाकर रसीद भी ले आती है । लड़क्यिों पर कोई मुसीवत आए तो भी विदी मा हाय खोलकर मदद करती है। पर उन्हें कहीं भी कोई गलत काम करते देखती है तो उमका रूप ही बदल जाता । दिन हो या रात, परीदार फंमाने के लिए लडकिया मजधज कर गली के मुहाने या घर के दरवाजे पर खड़ी रहती हैं, आपस में हसी-ममखरी करती हैं। पर रास्ता चलते किमी व्यक्ति के साथ ये अभद्र व्यवहार करें, तो विंदी के शासन मे उनको निप्कृति नहीं है-भले ही वे लहक्यिा उसके अपने चकलो की हों, या किसी और बाडीवाली के । विदी ऐसी बातों को लेकर शोर मचा ही देती है. भले घरो के लडके इस मुहल्ले में जाते हैं, हमारे धन्न भाग ! यहा वैचाल चलोगी तोपरीफ लोग क्यों आएंगे भला? पुलिस का झगडा- झंझट बढ़ जाएगा । तब मुमीवत में पडकर-बिंदी की, दिदी मा-- थाना-पुलिम, कोर्ट-कचहरी की दौड-भाग कराने के लिए, अपना दरद दिखाकर मन पिघलाने की कोशिश करती घूमोगी। इसमे तो अच्छा है, मझट से दूर ही रहा जाए । बिलल्लापन करेगी, तो मरेंगी। आखिर में रोजी-रोजगार ही मुश्किल हो जाएगा। खुद तोमरेगी ही, औरो को भी २३ । । । मारेगी।' विदी का जीवन-दर्शन बहुत यथार्थवादी है। बिंदी का गणतन्त्र भी यथार्थवादी है। वह कभी एक दल का समर्थन करती है, कभी दूसरे दल का । हिसाव करके देखती है, कौन-से दल की मदद करने से उसका या उसके मुहल्ले का भला होगा। परिणाम-स्वरूप सभी दल बिंदी की खुशामद करते हैं, उसे अपने पक्ष में खींच लाना चाहते हैं । विदी चुनाव के पहले तक अपना मनोभाव स्पष्ट व्यक्त नहीं करती। बिध्यवासिनी का अभ्युत्थान कैसे हुआ, इसका इतिहास मुझे ज्ञात नहीं है । जानने का समय भी मुझे नहीं था, पर मुकदमे के सिलसिले में कुछ खोजबीन करनी पड़ी। इस प्रभावशालिनी प्रौढा बाड़ीवाली के अतीत की कहानी स्वयं उसके अतिरिक्त शायद बहुत कम लोग ही जानते हैं। मेरी जांच-पड़ताल खास आगे नहीं बढ़ सकी । फिर भी इतना मानना पड़ा कि विपिन यश लेन में जैसे भद्र परिवेश में शरीफाना ढंग से विध्य- वासिनी की छोटी-सी गृहस्थी चल रही थी, उससे सहदेव दास जैसे ग्रामीण कृपिजीवी युवक का धोखा खा जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। हां, उसके बड़े भाई नकुल की वात अलग है । वह वर्जित मुहल्ले में जाता-आता रहता था। विध्यवासिनी का वैकनाडण्ड भी उसे भली प्रकार पता था । सब जानते-सुनते उसने विदी बाड़ीवाली की बेटी से विवाह करना चाहा था, पर लड़की ने ही उसे ठुकरा दिया। आखिर नकुल ने अपने सीधे-सादे भाई के साथ उस लड़की का व्याह तय कर दिया। मालती या झूनू के बारे में जितना मुझे पता लग सका, वह यह है-- वह वेहद कठोर अनुशासन में पली थी। मां वाडीवाली हुई तो क्या हुआ, लड़की के मामलों में खूब तेज नज़र रखती थी। मालती पुरसुन्दरी बालिका विद्यालय में नियमित रूप से पढ़ने जाती थी। नवीं कक्षा तक वह पढ़ी। फिर पढ़ाई छोड़ दी । वेणीदा ने तो पहले ही बताया था, उसने नाच के स्कूल में नाच सीखा है, उस्ताद से गाना । शौकिया रंगमंच से वह स्वयं ही जुड़ गई थी। इस मामले में उसकी मां ने बहुत आपत्ति की थी, पर मालती मानी नहीं। रुपये-पैसे का उसे अभाव नहीं था, पर खुद २४ । -- अभिनय करके वह जो कुछ कमाती थी, उससे उसे बहुत खुशी होती थी। ये सब बातें बताते नकुल दारा ने कहा, "विश्वास कीजिए सर, बाही- वाली की लड़की हुई तो क्या हुआ, झूनू खरी लड़की है । कोई पाप नहीं है उसमें । कम-से-कम लड़की के बारे में मैंने अपने भाई को नहीं छला । "तव तुम लोग उसे त्याग क्यो रहे हो ?" मैंने कहा, "घर की बहू को घर लोटा ले जाओ । वात यत्म करो।" "यह हो नहीं सकता सर," नकुल बोला, "अब सारी बात खुल गई है । गाव में रहा नहीं जा सकता।" "...विश्वास करो, मैं निष्पाप हूँ," मालती ने अपने पत्र में लिखा था, "फिर तुम मुझे त्याग क्योकर रहे हो ? यह सच है कि मेरी मां का चरित्र आज छिपा नहीं है। हमने छिपाना चाहा भी नहीं था। तुम्हारे भैया, मेरे जेठजी तो सभी कुछ जानते थे। उन्होने अगर तुम्हे बतलाया नहीं तो क्या ये मेरा अपराध है ? मुहागरात को स्वयं मैंने तुम्हे सब कुछ बतला दिया था। बोलो, तब तो तुमने मुझे दोषी नहीं माना या ' मुझे वाहों मे बाधकर कान में कहा था, 'वह सब भूल जाओ भून, ये सब बातें किसी को मत बताना; पछी को भी पता न चले।' इसका यही तो अर्थ होता है ना, कि तुमने मुझे क्षमा कर दिया था! तुमने मुझे ग्रहण किया था, प्यार-सुहाग से भर दिया था। इसी का गर्व है मुझे। पर आज मेरे प्राणों के देवता कहा हैं ? मुझे क्यो भूल गए वह ? मुझे क्यो छोड दिया है ? आखिर क्यो, क्यों, वयो ? क्या अपराध किया है मैंने ? ..." एक और पन में मालती ने लिया था, "हाथ काप रहे हैं, फिर भी तुम्हें लिख रही हूं, क्योकि ये बातें तुम्हारे सामने कहने का मुझमे साहस नही है, न होगा। तुम्हारे भैया ने मुझसे व्याह करना चाहा था, पर मैं ही तैयार नहीं हुई । इसलिए नहीं कि वे वैरिस्टर साहब के यहा ड्राइवरी करते हैं। अगर कोई सही रास्ते पर चतकर कमाता है, भले ही ड्राइवरी ५ । करके..तो मैं उससे घृणा क्यों करूंगी ? पर वे गलत रास्ते पर पड़े हुए हैं । शहर में रहते हैं। हमारे मुहल्ले में उनका आना-जाना लगा ही रहता है। मेरी मां के चकले की कई लड़कियों के साथ भी उन्होंने कितनी ही रातें विताई हैं। ये बात मुझे प्रसाददा से पता चली थी। तुम्हारे भैया चरित्रहीन हैं, इसीलिए मैंने उनसे व्याह करना नहीं चाहा था। मैं चाहती थी महादेव जैसा पति-जिसे लेकर मैं अपना घर बनाऊं, जो मेरे अति- रिक्त और किसी को न चाहे । हम दोनों एक-दूसरे के होकर ही रहें। पर तुम्हारे भैया वैसे आदमी नहीं हैं। जिस दिन मेरे साथ विवाह का प्रस्ताव उन्होंने रखा, वह रात भी उन्होंने मातंगिनी के साथ विताई थी। खुद मातंगिनी ने मुझे बताया है। वह मेरी मां की किरायेदार है ।तुम्हारे भैया ने डींग मारते हुए उससे कहा था, 'मेरी अच्छी तरह से खातिर- तवज्जो कर । पता है, मैं तुम सबका मालिक बनने जा रहा हूं। मैं तेरी बाड़ीवाली का दामाद बनने जा रहा हूं, उसकी बेटी झूनू से ब्याह करके । सास मुझे राजकुमारी और आधा राज्य देगी। तब तुम लोगों का मालिक बनूंगा मैं ।' मातंगिनी मेरे पास आकर सारी बातें बता गई, तुम्हारे भैया के लिए मेरे मन में जहर भर गई। मैंने मां से कहा, 'हरगिज़ नहीं, मैं इस ड्राइवर से किसी भी हालत में शादी नहीं कर सकूँगी । तुम्हें पसंद हो, तो तुम उसे ड्राइवर रख लो, पर मैं उसे दामाद नहीं बनने दूंगी।' मां ने भी खूब गाली-गलौज की-'मुंहजली, अभागी-।' जाने क्या-क्या कहा ! पर मैं अपनी जिद पर अड़ी रही । आखिर मां ने बाबा से सलाह की। तुम्हारे साथ संबंध हुआ। तुम्हारे भैया ने ही संबंध करवाया। मां ने कहा, 'करमजली की नजरें ऊंची हैं । ड्राइवर से व्याह नहीं करेगी, पर किसान को पसंद करेगी !' सुनो ज़रा मां की वात । खुद मां भी तो किसान की बेटी हैं। नाना किसान थे। मेदिनीपुर में काफी जगह- जमीन थी उनकी। अपने हाथों से हल चलाते थे। मैंने भी बचपन में उनकी गोद में चढ़कर बैलों की पूंछ मरोड़ी है। तुम खेती-बारी करते हो, सुनकर पुरानी बातें याद हो गई। प्रसाददा को भेजकर सारी वातों का पता लगवाया। प्रसाददा मुहल्ले के नाते मेरे भैया हैं- छवि वाडीवाली के बेटे। बचपन से उनका हमारे घर आना-जाना । ।
है । मुझे वहन की तरह मानते हैं । भाईदूज पर मैं उन्हें टीका करती हूं। मुझे आख की पुतली बनाकर रखते हैं । कोई मुझसे बुरा व्यवहार करता है तो वे उसको यबर ले लेते हैं। उन्ही प्रसाददा से तुम्हारे बारे में पता लगाने को कदा । घर पर किमी को भी पता नहीं चला। प्रमाददाको मैंने पैसे दिए। वे चुपचाप तुम्हारे गाव मे गए । लौटकर बोले, 'अरी झून, तेरा दूल्हा तो विलकुल महादेव है,बम भोलानाथ ।' मैं भी तो यही चाहती थी। मुहल्ले के शिवमदिर में मैंने भी तो बचपन से ही फूल-चेलपत्र चढाए हैं; शिवरात्रि पर उपवास किया है, शिव जसा वर मांगा है। अब मेरी उमा-तपस्या सार्थक हुई थी। मैंने मां से कहा, 'यहा व्याह करने को तैयार हूं।' मा ने कहा, 'क्या कर रही है ? तू एक गवई किसान का घर सभालेगी? बहुत तकलीफ होगी तुझे । मैं यह नहीं होने दूंगी। लड़के को मैं घरजमाई बनाकर रगी।' मैंने विगडकर कहा, 'कभी नहीं । तुम्हारा जमाई घरजमाई बनने क्यो जाएगा? उसके क्या घरवार नहीं है ? उसके पास जगह-जमीन है, गाय-बछड़े हैं, मैं कर सकूगी उसकी गृहस्थी।' मां चिढ कर बोली, 'लडकी के मिजाज समझ में नहीं आते । शहर की लड़की है, जहां नल घुमाते ही पानी मिलता है, स्विच दबाते ही रोगनी। नाच-गान, सिनेमा-थियेटर, सभी सुन हैं। ये सब छोड़कर लड़की देहात में रहने जाएगी। पोपर मे नहाकर, भीगी साडी लपेटकर घर लौटना, घड़े में भर-भर कर पानी लाना, गोवर लोपना, गाय की सानी-पानी-यू !' मुझसे रहा नहीं गया, बोली, 'मा, तुम्हारे पिता, मेरे नाना भी तो किमान थे।' मा मूठमूठ गुस्सा करके वोली, 'मर अभागी ! तेरी हिम्मत तो कम नहीं है। बिंदी बाड़ीवाली के आगे बाप का नाम घरती है। और कोई होती तो मैं उसका मुंह झलम देती। कहते-कह्ते मा की आगो मे दो आमू दुलक पडे। मुझे कलेजे से लगाकर वोली, 'वे पुरानी बातें अव मत याद दिसाया कर विटिया। यह सब यतम हो गया है । इस जगह व्याह करके मगर तू सुखी होती है, तो मैं आपत्ति नहीं करूगी। पर मेरे मरने के बाद इन पर-मकानो को देख-भाल कौन करेगा ?" मैंने कहा, 'तुम जिसे भी चाहो, सब दे जाना मां, मुझे कुछ नहीं चाहिए। पाप का अन्न बहुत खाया है, अब जरा प्रायश्चित करना चाहती हूं।' मा नाराज नहीं हुई, केवल - बोली, 'हाय रे जरा देखो !पाप-पुन्न का न्याय करने की अकल किसने दी है तुझे? देवताओं के राजा इन्दर भी उरवसी, रंभा, मेनका के साथ विहार नहीं करते थे ? देवता करें तो लीला, और मानुस करे तो पाप? लोग जांगर (श्रम) के बल पर रुपया कमाते हैं, हम भी जांगर के बल पर कमाई करती हैं। इसमें पाप-पुन्न की कौन-सी बात है ? घर-वार से दूर ये कितने, गरीब-दुखी अभागे दो पैसा देकर कम-से-कम कुछ समय के लिएशरीर का सुख खरीद लेते हैं । किसी का क्या जाता है इससे ? मानुस शराब, गांजा, भांग चढ़ाता है; चोरी, डकैती, राहजनी, खूनखरावी करता है; चीजों में मिलावट करके आदमियों को मारता है, हम क्या इससे भी खराव काम कर रही हैं ?' मुझसे रहा नहीं गया, बोली, 'तुम कुछ भी कहो मां, यह पाप है-पाप, पाप, पाप । लड़कियां शरीर बेचकर पैसे कमाएं इससे बढ़कर और कौन-सा पाप होगा, मां?' मां बोली, 'तू तो मजाक करती है विट्टो । शरीर तो कितने लोग वेच रहे हैं-रिक्शावाला रिक्शा खींचता है, ड्राइवर वस-मोटर चलाता है, किसान खेत में खून-पसीना बहाता है, ये सब भी तो एक तरह से देह बेचना ही है। वे लोग कोई पाप नहीं करते और हम करें तो पापिन हैं?' मैं जोर देकर वोली, 'फिर भी यह पाप है। मैं पाप की इस आवहवा से छुटकारा पाना चाहती हूं।' इसीलिए तो मैं व्याह करके घर बसाने के लिए व्याकुल थी। तुम्हारे घर आकर मैंने मानों शांति की सांस ली। मुझे लगा, मानो तुम्हारी पोखर-तलैया में नहाकर मेरे सब पाप धुल गए हों। तुम्हारी पुआल-छाई झोंपड़ी में की हवा मानो मन के भीतर की सब दुर्गन्ध उड़ा ले गई..." वहुत लम्बे-लम्बे पत्र थे । वात खूब सुलझाकर लिख सकती है मालती-कितने छोटे-मोटे विपय, कितनी मीठी-मीठी प्यारी बातें। पत्रों में मालती ने पति के आगे अपने को विलकुल खोल दिया था। उसने तो सोचा नहीं था कि ये पत्न किसी और के हाथों में पड़ेंगे, या लोभी कानों की तृप्ति के लिए अदालत में असंख्य लोगों के सामने उच्चस्वर में पढ़े जाएंगे । पर दत्तगुप्त ने ठीक कहा है, ये चिट्ठियां २८ अदालत में दाखिल की गई तो सहदेव का केस तो खतम ही हो जाएगा। जज साहब 'फ्रॉड' की कहानी पर रंचमान भी विश्वास नहीं करेंगे । हां, हो सकता है कि इन पत्रों को पेश करने की मांग वादिनी की तरफ से उठे । पर वह झंझट तो सहदेव के अस्वीकार कर देने से ही खतम हो जाएगा। पति को लिखे प्रेमपत्रों की कोई कॉपी थोड़े ही रखता है ? कम से कम सहदेव ने तो अपने पत्रों को कोई नकल रपी नहीं पी। इसीलिए यह जानने का मेरे पास कोई उपाय नहीं था कि उसने मया लिया था। पर मालती के पन से सहदेव की दो-एक बातों का पता चला । सहदेव खुद भी खास पढ़ा-लिखा नहीं था। गांव के स्कूल में सातवी तक पदकर ही वह लेती-बारी के काम में जुट गया था। उसका वहा भाई गांव में पड़े रहना नहीं चाहता था। शहर आकर एक मोटर ट्रेनिंग स्कूल से गाडी चलाना सीखकर उसने लाइसेन्स ले लिया । इधर-उधर काम करके हाथ जमाने के बाद सजित दत्तगुप्त के यहाँ वहाल हुआ। पर सहदेव गांव में ही रह गया। अपने हाथो से खेती मावाद करके बाजार में काफी मुनाफा भी कमाता रहा । उसकी हमियत भी अच्छी थी। मोटे भात और कपड़ो का अभाव नहीं था। बगीचे की तरकारिया, पोखर की मछलियां, खेत का धान-सव मिला कर वह संपन्न कहा जा सकता था। वह गाव को राजनीति में भी भाग लेता था। चुनावों में आगे रहता था; क्षेत्रीय पचायत में सफलता के साथ निर्वाचित होता था; कृषि मेले का मायोजन करता था; जावा (नौटको) यादि की व्यवस्था करता था; घुमत सिनेमा भी बुलवाता था, कठपुतली के खेलों का भी इंतजाम करता था। कुल मिलाकर, महदेव ग्राम पंचल का एक विशिष्ट व्यक्ति था, एक मुसस्कृत कृषिजीवी। वहीं सहदेव जब कलकत्ता की लड़की को व्याहकर ले गया, तो गाव में हलचल मच गई थी। सब बहुत खुश थे। ग्रामवधुए दल बाधकर नई बहू को देखने आई थी। गहरी लड़की जैसे कोई नखरे नही, मिजाज नही; सुंदर शिष्ट रूप, मीठी हसी, गाने मे आवाज़ और भी मोठी। मुहल्ले को मौसी-बुआ, अपने-पराए, सबने, इच्छा से हो या अनिच्छा से, सहदेव और नई बहू को प्रशंसा की झड़ी लगा दी थी। सहदेव भी । - । बहुत खुश था । फिर पता नहीं कैसे, असली बात खुल गई। मालती • के जीवन में अंधेरा घिर आया। एक और पत्र में मालती ने लिखा था, ".."तुमने लिखा है, प्रजारंजन के लिए राम ने सीता देवी को निष्पाप जानते हुए भी त्यागा था। पर मैं कहती हूं, यह तो त्रेतायुग नहीं है, तुम भी राम नहीं, न मैं सीता हूं। कौन से अपराध के कारण तुम मेरा त्याग करोगे ? एक बार 'संध्यातारा क्लव' में 'मृच्छकटिक' का अभिनय हुआ था-संस्कृत नहीं, ज्योतिरीन्द्र ठाकुर का अनुवाद -कुछ काट-छांट कर । मैं वसंतसेना बनी थी। उस गणिका को दरिद्र ब्राह्मण चारुदत्त से प्रेम हो गया था। राजा के साले के प्रलोभन और धमकियों की उपेक्षा करके भी वह चारुदत्त के प्रति अनुरक्त थी। वधभूमि से प्रेमी का उद्धार करके उसने चारुदत्त से व्याह किया था। गणिकावृति त्यागकर वह ब्राह्मण की धरनी बनी थी। राजा ने भी इसकी स्वीकृति दे दी थी। तुमने शायद वह नाटक पढ़ा नहीं है । पढ़ते तो तुम्हें अवश्य ही वह बहुत अच्छा लगता। मुझे तो लगा था। अभिनय के समय मैंने अपने आपको वसंतसेना में खो दिया था। मैं अभिनय कहां कर रही थी--मानो अपने मन की छुपी बात को लोगों के आगे प्रकट करती चल रही थी। बहुत प्रशंसा पाई, तालियां बजीं। पर बस, इतना ही । गणिका को घरनी बनाकर भी उस युग के ब्राह्मण चारुदत्त की निदा नहीं हुई थी, पर इस युग की गणिका की कन्या को भी क्या घर-वर नहीं मिलेगा ? मिलेंगे केवल सामाजिक निंदा, लोक- लज्जा, कुत्सा, घृणा, अत्याचार ? मैं तो वेश्या नहीं हूं। ठीक है, मेरी मां वेश्या थी, अभी भी चकले चलाकर धन कमाती है----उसी अन्न से मैं पली हूं। पर मुझे यह भी पता है कि समाज में वेश्या का अन्न खा कर भी कितने ही बड़े-बड़े आदमी शान से सिर ऊंचा किए खड़े हैं। यह जरूर है कि इस मामले को वे चुपचाप ही निपटाना चाहते हैं । अगर कोई कलंक रहता भी है, तो ऊपर खोल चढ़ाकर उस कलंक को ढांके रखना चाहते हैं। उन सब बड़े-बड़े आदमियों के नाम में फाश कर अनेकों के ऊंचे सिर झुक जाएंगे। पर वेश्या समाज का भी एक नीति- शास्त्र होता है । खरीदार वावुओं को वे मुसीबत में डालना नहीं चाहतीं। ३० ।
? चोरों की भी एक नैतिकता होती है। पर जो लोग बाहर शराफत का मोल चढ़ाकर भीतर कदाचार करते हैं, क्या वे और भी बड़े अपराधी नहीं हैं ? वे क्या पाखण्ड के बल पर पार हो जाएगे ? में गणिका नहीं हूं। विश्वास करो, मेरा चरित्र निष्कलुप है, मैंने शराफत से जिंदगी विताई है, पर क्या लोकनिंदा के भय से तुम मुझे त्याग दोगे ? तुमने कहा , है, 'तुम मुझे प्यार करते हो।' मैं भी तुमसे प्रेम करती हूं। विवाह के वाद ही यह प्रेम हुआ है। फिर भी हमारा धर्मविवाह क्या विफल हो जाएगा ? जिम विवाह में प्रेम नहीं होता, जिम मिलन के पीछे केवल भय, लोभ या कामना रहती है, वही तो असली वेश्यावृत्ति है ।..." - नकुल-सहदेव एक दिन मुझे अपने गाव ले गए । नकुल गांव की जमीन-जायदाद वेचकर शहर में ही रहता था। सहदेव ने अपनी पतृक भूमि रखी ही नहीं, बढ़ाई भी । वही उसके आत्मीय-स्वजन भी थे। मुझे ले जाने का उपलक्ष्य पा–गांव के जूनियर हाईस्कूल का पारितोषिक वितरण । सहदेव उस स्कूल का मेनेटरी था। उसकी इच्छा थी, स्कूल दसवी श्रेणी तक हो जाए और उसे अधिकारियो की स्वीकृति भी मिल जाए । उसका कहना था कि मेरे जाने से गाववालो का उत्साह बढ़ेगा । चदा इकट्ठा करने का काम भी आसान हो जाएगा। दो कमरे माघे तैयार हुए पड़े हैं। उन पर एत हाली जाएगी । वहां दो वनासें लगमकती हैं । मेरी सिफारिश से अधिकारियो के साथ सपर्क करना भी उनके लिए संभव होगा। जगह कलकता मे कोई पचीस मील दूर थी । उन लोगों के अनुरोध पर मैं तैयार हो गया । उनलोगों ने निमन्त्रण-पत्न पवाए। जिनमें मेरा नाम बडे-बडे अक्षरों में छापा गया। नकुल ने उस दिन संजित दत्तगुप्त मे छुट्टी लेकर मेरी कार चलाई। कार पुरानी थी । नकुल वेहद 'रंश ड्राइव करता है। बार-बार मुझे उसे टोकना पड़ रहा या । ठाकुरपुकुर तक भोड़ थी। उसके बाद मड़क काफी खाली थी। डायमण्ड हावंर रोड से होकर गंतव्य स्थान तक पहुंचने में हमें घण्टे-भर से कुछ अधिक लगा। नकुल मुझे लेकर सुबह ही ३१ चल पड़ा था। सहदेव नहीं आया था। वह फंक्शन की व्यवस्था करने में व्यस्त था । वात तय हो गई थी कि मैं सुवह ही चल दूंगा। खाना उनके यहां खाऊंगा। दोपहर को विश्राम करके शाम को सभा का काम निवटाकर रात के पहले ही घर लौट आऊंगा। एक दिन की सैर ही सही। गांव वस के रास्ते पर था। खासा बड़ा गांव । विजली अभी भी नहीं आई थी, पर शहर के साथ संपर्क काफी था । कितने ही लोग बस में 'डेली पैसेंजरी' करते थे। किसान साग-भाजी लेकर जाते थे, मछुए मछली ले जाकर वेहाला के बाजार में वेच आते थे । वातावरण वहां का । अच्छा था। । वह हाट का दिन था। हफ्ते में दो बार हाट लगता था। सुबह से ही अच्छी भीड़ होने लगी थी। रास्ते के किनारे पर ही छोटा-सा बाजार था । उसके पास की खुली जगह में ही हाट लगता था। गाड़ी नकुल-सहदेव के घर तक नहीं जा सकती थी। इसीलिए हाट के पास थोड़ी-सी खुली जगह में गाड़ी पार्क करके, खिड़कियों के शीशे चढ़ाकर लॉक करके नकुल ने चाय की दुकान के मालिक को उसकी जिम्मेवारी सौंप दी। फिर हम दोनों पैदल ही पगडण्डी से होकर उनके घर गए । कुछ कौतूहली बच्चे भी हमारे पीछे हो लिए। पेड़-पौधों से छाए एक आंगन के चारों तरफ कमरे बने हुए थे। दो कमरे पक्के थे और उनपर खपरैल की छत थी, वाकी सव कच्चे । गोठ में दो-तीन गाय-बछड़े थे। रंग-बिरंगी देशी मुर्गियां चारा चुगती घूम रही थीं। बड़े-से पोखर में कुछ बत्तखें थीं। धान के दो वखार भी दिखाई दिए। कलकत्ता के पास ही ऐसा ग्राम्य वातावरण बड़ा भला लग रहा था। सहदेव ने बढ़कर अगवानी की। मेरा स्वागत किस प्रकार करे, यह मानो उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था। हरा नारियल स्वयं काट कर उसने मीठा जल पिलाया । आंगन में एक चबूतरे पर तख्त था, जिस पर सुन्दर दरी विछी थी और दो मसनदें। वहीं मैं बैठा। सहदेव ने मुझसे स्नान के लिए पूछा । गर्व से उसने कहा, “पोखर ३२ मे नही नहाना पड़ेगा, सर । एक पक्का स्नानघर और सेनिटरी पाखाना अभी ही बनवाया है । पानी ट्यूबवेल से आता है। नहाने से किसी वीमारी का डर भी नहीं है।" मैंने कहा, "मैं नहा आया हूं," और मन ही मन सोचा कि 'शहरी बीवी की सुविधा के लिए ही शायद ये सब नल-पाखाने का इन्तजाम हुआ है। पर गृहिणीहीन घर सूना-सूना लग रहा था । इधर-उधर दो-एक ग्राम-रमणियां नजर जरूर आई, पर वे शायद रसोई में व्यस्त थी। नकुल तो मुझे महदेव के हाथो सौंपकर ही मरक गया था। सहदेव अकेला ही मेरे सत्कार में जुटा था। मैंने कहा, "सहदेव, मरी वजह से अपने काम का हर्जा मत करना । मैं मजे में हूँ। तुम्हे कोई और काम हो तो चले जाओ।" "हां,जाऊगा सर," सहदेव ने कहा ,"घर खाली है। दादा भी कही गए हैं । फक्शन के मिलसिले मे मेरा कुछ काम वाकी है। यहा अकेले- अकेले आपको अच्छा लगेगा ?" "मेरी चिन्ता मत करो तुम।" "सर, अगर बुरा न मानें तो कहू," सहदेव ने कहा, "मेरे पास अलमारी भरकर वगला क्तिावें हैं। तब तक आप दो-चार किताबें उलट-पलटकर देखें।" "कहां हैं कितावें ?" "आपके लिए तो ये सब कुछ भी नहीं है, पर.." यांगन पार करके महदेव मुझे एक पक्के बने हुए कमरे में ले गया। यह उसका शयन-गृह था । नया, आधुनिक फर्नीचर था -सुन्दर, जुडे हुए पलग, जिनपर आकर्षक वेड कवर लगे हुए थे; ड्रसिग टेवल, जिस पर आधुनिक प्रसाधन-मामग्री मजाकर रखी हुई थी; शीशा जड़ी हुई स्टील की अलमारी; कपड़े टागने का रैक; एक अलमारी भरकर कितावें; खिडकियों पर रंगीन पर्दै। कमरे की छन खपरैल की थी, पर फैशनेबल फर्नीचर के कारण उसका अपना एक ऐमा वैशिष्ट्य नजर आ रहा था, जो गांव के लिए अप्रत्याशित था। सहदेव मलज भाव से बोला,"ये सब देहेज है। सोच रहा है, सब - टा दूं। देखू, मुकदमे का नतीजा क्या होता है !" में मुस्कराकर बोला, “लौटाओगे क्यों? वल्कि अपनी पत्नी को ही ले आओ। घर की लक्ष्मी घर लौट आए।" पता नहीं, जज साहव क्या फैसला देंगे, पर मालती के पत्र पढ़कर पहले ही उसके पक्ष में फैसला दे चुका था। मन में सोचा कि इस फैसले ही मेरे मुवक्किल का कल्याण है। सहदेव बोला, " मैं तो यही सोच रहा हूं, सर । लेकिन..." "अच्छा, ये सब बातें बाद में होंगी," मैंने कहा, "तुम अब अपने काम पर जाओ। मैं इस अलमारी की किताबें देखता हूं।" अलमारी का ताला खोलकर सहदेव चला गया। कमरे में मैं अकेला रह गया । किताबें बंद करके मैं कमरे में लगी तस्वीरें देखने लगा। यह शयन-कक्ष मानो मालती-मय था। दीवारों पर उसकी तस्वीरें थीं, शृंगार-मेज पर उसकी तस्वीरें थीं अलग-अलग पोज़ में। मालती की तस्वीर इसके पहले कभी नहीं देखी थी, आग्रह के साथ देखने लगा। वह सुन्दर नहीं थी, पर चेहरे पर एक अनोखी रौनक थी। तस्वीरों में ओंठ काफी भरे-भरे लग रहे थे, नाक भी मोटी थी, पर आंखें उज्ज्वल थीं- प्राणवंत । दो-एक ग्रुप फोटो भी थे, शायद शौकिया थियेटर- दलों के मेकअप के बावजूद उसे पहचानने में असुविधा नहीं हुई। श्रृंगार-मेज पर अकेली मालती कीतस्वीर के अलावा एक तस्वीर वर-वध की भी दिखाई दी। सहदेव खूब जंच रहा था। काला था तो क्या हुआ उसके नाक-नक्श बहुत ही सुन्दर थे। मेरे पास समय बहुत था । आराम से कितावों को उलटने-पल लगा। तरह-तरह की किताबें थीं। कुछ शादी में उपहार के रूप मिली थीं, कुछ पर झनू दासी का नाम लिखा हुआ था। कुछ कितावेंन की थीं जिनपर बड़े-बड़े अक्षरों में मालती मित्र का नाम लिखा हुआ काम में आने के कारण ये किताबें कुछ मैली भी हो गई थीं; उनमें कहीं कुछ काट-कूट भी दिखाई दे रही थी। अरे, मेरे नाटक 'उ की भी एक प्रति है ! समझ गया, यह मालती के व्यवहार के लिए कॉपी है। उसने ये कितावें संभाल कर रखी थीं, विवाह के व ३४ रही थी ले आई; पर जाते समय इन्हें ले नहीं गई । यह मानो इस बात का प्रमाण है कि वह लौटकर अपने घर आना चाहती है। किताबें उठाते-घरते ही ममय बीत गया। दोपहर केधाने का जोरदार आयोजन था। पेट-भर खा लेने पर नीद का नशा चढने लगा । सहदेव ने अपने शयन-कक्ष मे ही मेरे विधाम की व्यवस्था की थी। -धोवी की धुली कलफदार चादर और गिलाफ। दरवाजा भेड़कर वह चला गया। मुझे वहा अजय-अजय-सा लग रहा था। यह मालती और सहदेव के ध्याह का पलंग था। गहा धूब नरम पा । इमोशया पर लेटकर नव- दंपति ने प्रणय गजन किया होगा,एक दूसरे को प्यार से भर दिया होगा |-यही सब आकाश-पाताल सोचते-सोचते न जाने कब मुन्ने नोद आ गई । अचानक एक कोलाहल से नीद टूट गई । मैं उठ बैठा, मामला ममझने की कोशिश करने लगा। जोर-जोर से बोलने की आवाजें आ -क्रुद्ध आवाजें । कान लगाकर सुनने की कोशिश की। नवल. सहदेव के युद्ध कठस्वर के कुछ अश सुनाई दिए। औरो को आवाजें भी थी। बात क्या है ? कमरे के बाहर निकलकर देखा, सहदेव एक लाठी लिए छटपटा रहा है । नकुल उसे पकड़कर रोकने की चेष्टा कर रहा है । दूर, दूसरा पक्ष लडाई के लिए तैयार है । सहदेव चीख रहा था, "आज में खून कर दूगा । मारकर, सिर फोड़ कर फांमी पर चढ़ जाऊगा । इन लोगों ने समझ क्या रखा है ? बाहर मे इरशतदार मेहमान आए हैं । उनका भी लिहाज नही ?" विपक्ष से कोई बोला,"रजतदार को इरजत रखने की ही तो हम कोशिश कर रहे हैं।" पीछे से बच्चो का दल एक स्वर से चिल्ला उठा,"खानगी के दामाद, गद्दी छोडो, अभी छोडो, जल्दी छोड़ो।" सहदेव नाटी लिए, उन्हे भगाने के लिए दौडने को लपका । चौखकर बोला, "छोड़ो सुअर के बच्चो को मार कर पून की नदी बहा दूगा। नहीं तो मेरा नाम सहदेव दास नहीं !" नकुल के लिए उसे पकड़कर रोके रखना मुश्किल हो गया था।
! + के लोगों के उकसाने पर बच्चों ने फिर नारे लगाने शुरू क व, अश्लील लग रहे थे ये नारे। और रहा नहीं गया। मैंने आवाज़ दी,"नकुल ! सहदेव!" आवाज़ से सभी मानो चौंक उठे । सहदेव लाठी झुकाकर आया, पीछे-पीछे नकुल। प्रतिपक्ष अचानक वहां से खिसक गया। न चिन्तित होकर पूछा,"वात क्या है नकुल ? वात क्या है ?" 1 सहदेव चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा। नकुल ने कहा, "गांव की दलवंदी है सर । आप तो जानते हैं, सभी हों पर अलग-अलग दल रहते हैं । हमारे गांव में भी हैं। हमारा विरोधी आज के फंक्शन को बिगाड़ना चाहता है । बहुत दिन से ये लोग कूल पर अपना अधिकार जमाना चाहते हैं, लेकिन गाजियनों के वोटों की वजह से यह हो नहीं सका । अब इन्हें मौका मिला है । इस शादी के यहाने गांव में अपनी खिचड़ी पका रहे हैं। इन्हें काफी सपोर्ट भी मिल रहा है। लड़कों को भी भड़का दिया है । स्लोगन तो आपने भी सुने हैं।" "क्या चाहते हैं ये ?" मैंने जानना चाहा । "ये चाहते हैं कि सहदेव अभी, आपके सामने ही सेक्रेटरी का पद छोड़ दे," नकुल ने कहा, "इसकी शादी ऐसी घृणित है कि अब ये स्कूल चलाने लायक नहीं रहा। वहां को-एजुकेशन है। लड़के-लड़की एक साथ पढ़ते हैं । इस बुरे आदर्श से वे लोग बहक जाएंगे।" "मैं कहता हूं सर, छोड़ दूंगा सेक्रेटरी का पद," सहदेव विफर कर बोला, "क्या रखा है उसमें ? मैं तो मास्टरों की तनखा मारकर कमाई नहीं करता, मुझे क्या फायदा है उससे ? पर लोग सुनते ही नहीं। कहते हैं, अभी इस्तीफा लिख दो, नहीं तो फंक्शन नहीं होगा।" नकुल वोला, "उन्हें यह भी समझाया कि सहदेव ने बहू को छोड़ दिया है। अदालत में मुकदमा चल रहा है । साहब लोग हमारी तरफ से मुकदमा लड़ रहे हैं । पर वे लोग विश्वास ही नहीं करते । कहते हैं, लुक छिप कर मियां-बीवी की चिट्ठी-चपाती चलती है । कलकत्ता में ये ले साथ गिरिस्ती भी करते हैं-ये ही सव ऊटपटांग वातें।" ३६ - "न हो फंक्शन !" में कुछ गरम होकर बोला, "मेरी चिंता मन करो। यहां आकर माया-पिया, एक सर ही हो गई। इस जमाने के देहाती समाज की नीचता भी अपनी योयो से देश ली। मेरी यातिर तुम इस्तीफा मत देना । अगर मुकदमा लडना पड़े, तो मैं तो हूं।" महदेव कुछ आश्वस्त होकर बोला, "डर उम यात का नहीं है मर जरूरत पड़ी तोमुकदमा भी लहगा, लाठी भी पडू गा।विमान का बेटा हूं, मुझे इतनी मान-इरजत को फिकर नहीं है । पर वह लोग गुट बनाकर स्कूल का मत्यनाश कर देंगे, यही चिन्ता है।" "मैं कहता हूं" नकुल विज्ञ की भाति परामर्श देने लगा, "तू रेजिग्नेशन दे दे, फक्शन में भी मत जा । सर आए हैं, प्राइज-डिस्ट्रीब्यूशन हो ले; तब इस्तीफा वापस लेकर लहा जाएगा।" महदेव बोला, "ना,वह मुझसे नहीं होगा। उनकी हिम्मत बढ जाएगी। मिर्फ स्कूल ही नहीं, अचल-पचायत के मामले में भी मेरे पाद लग जाएगे। आखिर मुझे गाव में बाहर करके दम लेंगे । मैं तो लगा।" "बहुत अच्छे, महदेव," मैंने कहा,"तुम्हारे फवशन में कितनी देर है ? चलो, चलें।" "चलिए सर," महदेव ने कहा, "मुझे आपकी हो चिन्ता थी । जव आपने ही बुरा नहीं माना, तो मुझे अब किमीकी परवाह नहीं । मेरा दल-बल तैयार ही है।" हम लोग और देर न करके स्कूल की ओर चल पडे । रास्ता धान के खेतों के बीच से गया था। दूर स्कूल के कमरे दिखाई दे रहे थे । एक बड़ा-सा पक्का कमरा था, जिसपर टीन को एन पी। बाकी कच्चे कमरे थे, पुआल से छाए हुए । पक्के कमरे पर राष्ट्रध्वज लहरा रहा था। टाट से शामियाना बनाया गया था, कागज की ण्डियों के बदनवार लटक रहे थे । कुछ युवक लाठी लिए घूम रहे थे। महदेव ने बताया, "वे हमारे प्रादमी हैं।" सहक पर फल और वाम के पत्तों मे हमारे लिए दो स्वागत द्वार बनाए गए थे। उनमें से एक लचककर टूटा पड़ा था। महदेव ने उम ओर इशारा किया, "बदमागो ने इम गेट को नोड डाला है।"
-- यह बताने की अब क्या आवश्यकता है कि इस उत्तेजना के बीच पुरस्कार-वितरणी सभा जरा भी नहीं जम पाई । हंगामे की आशंका से उपस्थिति बहुत कम थी। शिक्षकों का आना अनिवार्य था, इसलिए वे हाजिर थे। एक लड़की उद्घाटन-गीत गानेवाली थी। सुना, वह मालती से गाना सीखती थी। पर आज वह गैरहाज़िर थी। सहदेव ने कहा, "लड़की बहुत आज्ञाकारिणी है। ज़रूर उसे आने नहीं दिया गया है।" एक शिक्षक ने बैठे गले से वेसुरा रवीन्द्र-गीत गाकर सभा का उद्घाटन किया। दूर से अनेक कण्ठों से वे गंदे स्लोगन और ज्यादा सुनाई देने लगे। बहुत-से कृतीछात्र-छात्रा इनाम लेने आएही नहीं थे। माइक पर बार-बार नाम पुकारे जाने पर भी वे नहीं आए। इसी बीच दो-चार इंटें धपाधप आकर शामियाने के टाट पर गिरी । ईंट का एक टुकड़ा शायद एक स्वयंसेवक के सिर पर लगा । चोट अधिक नहीं थी, पर रक्त वहने लगा। फर्स्ट-एड बॉक्स स्कूल में ही था। एक शिक्षक ने झटपट उसकी चिकित्सा की । इसी कारण सभा के कार्य में कुछ बाधा पड़ी । सहदेव का दल लठी लेकर हमलावरों को खदेड़ने के लिए दौड़ पड़ा। मैंने दो-चार मिनट कुछ बोलकर बोलकर ही सभापति का भाषण समाप्त कर दिया। उन लोगों ने चाय की व्यवस्था की थी। मेरे मना करने पर यह इरादा छोड़ दिया गया। अव लौटने की वारी थी। सहदेव के लाठीवंद साथियों ने अपने घेरे में ले जाकर मुझे गाड़ी पर चढ़ा दिया । सहदेव ने लज्जित होकर क्षमा मांगी। बोला, "आपको बहुत कष्ट हुआ। मुझे अंदाज भी नहीं था कि वे लोग इतनी नीचता पर उतर आएंगे; नहीं तो और भी अधिक पहरे की व्यवस्था रखता।" मैंने कहा, "इसकी चिता मत करो सहदेव । तुम्हारा क्या दोष है ? तुमने अपनी तरफ से तो सभी कुछ किया है। अब मैं तुम्हारी स्थिति समझ पाया हूं। यह भी कि तुम मालती को वापस क्यों नहीं ला पा रहे।" सहदेव का दल उत्साह से मेरी जिन्दाबाद के नारे लगाने लगा। दूर से वे गन्दे स्लोगन फिर हल्के-हल्के सुनाई देने लगे।
नकुल ने मेरी गाड़ी स्टार्ट की। मैंने हाय हिलाकर उन लोगों से विदा ली। गाडी सड़क पर आते ही ढम् से एक इंट का टुकरा उमपर आ गिरा। गाड़ी का शीमा वाल-बाल बचा। नकुल ने दांत भींचकर हमलावरों के नाम गन्दी गालियों की मड़ी लगा दी, फिर एक्सिलरेटर दवाया। गाड़ी सरं-से गांव छोड़कर निकल भागी। मालती ने एक पत्र में लिखा था, ".."मैंने तुम्हारे गाव के लोगों का कोई नुकमान तो नहीं किया है, बल्कि उपकार ही किया है। सड़कियां मेरे पास गाना सीखने आई हैं, लड़के कविता-पाठ सोखने । बच्चो को लेकर मैंने "सिराजुद्दौला' नाटक करवाया था। रिहसंल, अभिनय, माज-सज्जा, स्टेज बनवाना, मभी कुछ तो मैंने ही करवाया था। तुम्हारे स्कूल का मांगन उम दिन लोगो मे भर गया था। कितने लोगों ने आकर मेरी प्रशंसा की थी, मेरे जसो पत्नी पाने पर तुम्हें बधाई दी थी। कितनी दोपहरियों को लडकियां मेरे पास आकर सिलाई-कढ़ाई सीखती थीं । मुझसे ही सारा सामान लेकर उन्होने नई-नई चीजें सीखी हैं, मेरी मशीन पर मिलाई की है । रेडियो से महिलाओं के प्रोग्राम सुनकर, पत्रिकाओ में महिलाओं के पृष्ठों मे देखकर मैं नए-नए पकवान बनाती थी, और तुम लोग खाकर उनकी तारीफ करते थे। वही पकवान मैंने कितनी लडकियों को बनाने सिखाए हैं । और भी बहुत कुछ सिखाया है-साफ-सुपरा रहना, स्वास्थ्य के साधारण नियम । अव ऐसा क्या हो गया कि रातोरात में ऐमी पूणित, गदी, अस्पृश्य, अपवित्र हो गई कि मेरे पति के घर में भी मेरी जगह नहीं रही ? क्या पुरुप सभी पवित्र होते हैं ? तुम्हारे भैया- अपने जेठजी की बात छोड़े दे रही हूं । वे शहर में अपनी रातें कहा-कहां बिताते हैं, उसे लेकर तो गांव में कोई आपत्ति नहीं करता ? तुम लोगो की दोत्रीय परिषद् के सभापति बनर्जी महाशय-उन्होंने भी तो बेहाला में एक गरजात की लड़की को रण छोड़ा है । इसके लिए उन्हें तो किसी के आगे जवाबदेही नहीं करनी पडती? फिर भी उन सवका जितना आरोश, निंदा, पणा है, सब मिर्फ मेरे ऊपर !..."
- - नए नाटक का रिहर्सल शुरू हो गया था। वेणीदा के विशेष अनुरोध पर थे वहुत दिनों बाद क्लब में गया था। कुछ लोग रिहर्सल के लिए आए एक नई अभिनेत्री आई थी। उसका चेहरा पाउडर की परतों से सफेद हो गया था, आंखों में काजल, ओंठों पर चटक रंग की लिप्स्टिक, महीन साड़ी कंधे से गिर-गिर जा रही थी और सारा शरीर अनावृत हो रहा था-उत्तुंग वक्षस्थल की गढ़न, लो-कट ऊंचे ब्लाउज़ में ऊपर से झांकता उभार, नीचे से दिखाई देते पेट पर चर्वी की तहें । इस लास्यमयी नारी को घेरकर कुछ सदस्य हंसी-मजाक कर रहे थे। उन्हींमें केशव दत्त भी था। उसने नई अभिनेत्री से मेरा परिचय करवा दिया। बदले में उसने मृदु हंसकर मुझे एक संक्षिप्त-सा नमस्कार किया। केशव ने कहा, "अनुराधा देवी के साथ हम लोगों का परिचय यदि पहले हो जाता तो ये रूपसी का पार्ट और भी अच्छा करतीं । 'कालो हरिण चोख' फिल्म देखी है ? अनु- राधा देवी ने साइडरोल में जो एक्टिग की है कि छा गई हैं। हमारे इस नाटक को ये अकेली ही जमा देंगी।" मैंने उमका अभिनय नहीं देखा था, पर यह सोचे बिना नहीं रह सका कि इसकी वेशभूपा में देह-प्रदर्शन की जैसी उदग्र इच्छा थी, मालती इस विषय में इसके सर्वथा विपरीत थी। अनुराधा को पाकर केशव मानो नवीन उत्साह से उमग रहा था। मैंने पूछा, "केशव, तुम्हारी तबीयत अब तो ठीक है ना?" "कैसी लग रही है ?" "अच्छी।" "विलकुल अच्छी है," केशव व्यंग्य से बोला, "मालती का गुण्डा-दल मुझे खतम नहीं कर पाया।" "क्या मतलब ?" "मतलब एकदम सीधा है," केशव मुझे खींचकर एक ओर ले गया। वोला, "मैंने जासूसी की है। कुछ दिन विपिन यश लेन और उसके आस- पास घूमकर सब बातें पता लगा ली हैं।" "कौन-सी बातें?" - । ४० "मुझे उस परसाद पाल के गिरोह वालों ने मारा था।" "कैसे पता चला?" "बताया तो, जासूसी की थी,"केशव तृप्त स्वर में बोला, "उन मुहल्ले की चाय की दुकान मे दो-एक गुण्डों को चाय-ऑमलेट क्या मिलाए कि मदर की पवर वाहर आ गई। परसाद पाल मालती को बहुत 'पियार' करता है । साले का एक धोवीवाना है-नाम भी भारी-भरकम है- '६ प्रेट ईस्टनं डाइंग क्लोनिंग कंपनी।' पर अमली काम है, लोडियो को दलाली करना । मोटी कमाई उसीसे होती है। उसके हाथो में कुछ नौज- वान छोकरे हैं, उन्ही के बल पर इतना रोष जमाता है । उस दिन देना नहीं, हमारे क्लब मे आकर मुझे ही धमका गया?" "पर इसका प्रमाण क्या है कि उसीने यह दुष्कर्म किया है ?" "ठीक है, खुद उसने नहीं किया है । पर लहको ने उसके उकमाने पर ही यह काम किया है । मुना है, मालती ने रो-धोकर परमाद पाल से जाकर शिकायत लगाई थी कि एक लुच्चे बदमाश केशव दत्त ने यिपेटर के विंग्स में सबके सामने उसपर बलात्कार करने की कोशिश की थी। हरामजादे दत्त का एकतरफा फैसला हो गया। उसे सजा देने के लिए परसाद को फौज हाथ में रॉड लेकर कूद पडी।" "मच, वडी गलत बात है," मैंने कहा, "क्या पता, पून तक हो जाता। तुमने थाने में रपट लिखाई है या नही?" "पागल हुए हो? इन सब बातो में पाना-पुलिम करने से कोई लाभ है क्या ? गवाही कोन देता ? कार से मेरे हो रुपयों का नुकसान होता। पर मैंने भी बदला ले लिया है।" "कैसे?" "वह छोकरी ही तो सारे झगड़े की जड थी," केशय गुमियापा हुआ सा वोला, "उमीको 'टाइट' कर दिया है। व्याह पर भी चैन नहीं मिलेगा साली यो।" "क्या कह रहे हो ?" "हा, फिलिम-प्रोड्यूमर होने का बहाना करके उसके याप हार मिनर से जाकर मिला या । नट-चित्रम् का डायरेक्टर मालती देवी को हीरोइन ४१ - . [ चाहता है । एक बार उनसे ही सीधे बात करनी जरूरी है। हारू र ने चारा निगल लिया। वीवी के साथ सलाह की । वीवी कौन है, है ? मोयरापट्टी की बदनाम बिंदी वाड़ीवाली । वही इस मालती मां है। मैंने सोचा था कि औरत ऐसे ही कुलटा गिरिस्तिन होगी, पर खता हूं, वह तो बाजार की वेश्या है । फिलिम का नाम सुनते ही हुमच ड़ी। फिर तो उसके पेट से मालती की ससुराल का पता निकलवाने में जरा भी देर नहीं लगी। ऊपर से चाय, समोसे, संदेश भी खा आया।" "तुम्हारा इरादा क्या था ?" "बदला," वह दांत निपोरकर बोला, "मैं वहां मुरलाग्राम चला गया । सहदेव दास को खोज निकालने में देर नहीं हुई । नट-चित्रम् के डायरेक्टर के रूप में अपना झूठा परिचय दिया, मालती से मिलना चाहा। पर इस आदमी ने चारा नहीं निगला । डरा-धमकाकर मुझे भगा दिया।" "क्या कह रहे हो? तुम्हारी चाल चली नहीं ?" मैं आश्वस्त हुआ। "कौन कहता है, नहीं चली ?" मैं भी ताक लगाए रहा। मच्छरों ने काटा, जोंकें चढ़ आई, मैंने उफ् तक नहीं की। छोकरी को आखिर पकड़ ही लिया। एक चौड़े किनारे की साड़ी पहने, मांग-भर सिंदूर और ललाट पर सिंदूर का टीका लगाए वह घर के पासके टयूबवेल से गागर भर कर पानी ला रही थी । कौन कहेगा कि यह विदी बाड़ीवाली की बेटी है परसाद पाल की प्रेयसी, ऊंचे मिजाज वाली रूपसी मालती देवी है-हर भरा मधु, बंगवधू जल लेकर जाए घर को-मां कहने को मेरा मन = चाहा, जी चाहा प्रियतमा कहने को। वाह, कितनी जंच रही थी घर बहू के रोल में ! छोकरी मुझे देखकर चौंक उठी, मानो पहचाना ही हो । पर उसका फक् चेहरा देखकर मैं समझ गया, साली बिलकुल प गई है।" "फिर ?" "मैंने चेलेंज करते हुए कहा, 'परसाद पाल मेरा खून क आया था ?' उसने कहा. 'कौन परसाद पाल ? आप मुझसे यह पूछ रहे हैं ?' मैंने कहा, 'ढोंग हो रहा है ? जैसे निरी वच्ची ही तुम्हारा नाम लेकर परसादपाल ने मुझे धमकाया था। फिर मे . . ४२ 1 करने की कोशिश की। उमे में फांसी पर चढ़वा दूंगा।' बम, पर्दा निमक गया । छोकरी रोने-रोने को हो आई, बोली, 'ना-ना, फांमी पर मत चढ़- वाइएगा। उमका कोई दोष नहीं है। मैं जाकर रोई-धोई पौ, तो उगके दल के लड़कों ने गुम्मे में आकर यापके माप मार-पीट कर डाली। मैं उनकी तरफ से माफी मांगती हूं।' कहते-कहते उसने गागर नीचे रयकर अचानक मेरे पर पकड़ लिए। मैं तो बम पिघल हो गया था। पर मन की अतृप्त वामना जाग उठी । लगा, वह पियेटरवाली रूपमी मेरी आंखों फेमामने ही मेरे हाथ से निकलकर नौजदान प्रेमी के हत्थे चढ़ रही है । मैंने उसके सामने अपना प्रस्ताव रखा। यह माप की तरह फुफकार उटी, बोली, 'मुझे क्या बाजारू औरत समन्ना है ?' मैंने कहा, 'और नहीं तो यपा?' वह बोली, 'दूर हो जाइए यहां से!' हमारी उत्तेजित आवाजें मुन- कर उसका पति दौड़ा आया। मालती ने कहा, 'ये अनजान आदमी मेरा अपमान कर रहा है।' गाव का गंवार आदमी मुझे धम्न्मे घूमा जमा चंठा । मैं गुस्से में बोला, "पानगी के जमाई का राव तो देयो !" उसने जमकर मेरी मरम्मत शुरू कर दी। मेरी चीखें मुनकर गाद के लोग जमा हो गए। उन्होंने मुझे छुडाया, मेरा मुंह वगैरह धुलवाया। वह औरत एक बात भी नही बोली, मदं को लेकर पर में घुस गई। पर गाव के लोगों ने मुझे घेर लिया, जानना चाहा, मामला क्या था । चाय की दुकान पर मुपत की चाय पीते-पीते मैंने उन लोगों का अमली परिचय दे डाला । लोगों ने पहले तो विश्वास ही नहीं किया । मैं आपनी गाठ का पमा सर्च करके एक मुखिया को विपिन यश लेन लाया और माग मामला मममा दिया । बम, छोकरी को मती बनने को साध चूर-चूर हो गई।" मैं नाराज होकर योला, "केशव,तुम खुद नहीं जानते कि तुमने उसका कितना बड़ा मर्वनाश किया है।" "क्यो नहीं करूं?" केशव गुस्से में गुर्गया, "उमने मेरी जान लेने की कोशिश की थी, मैं बदला न तू ?" "झूठी बात है । उसने तुम्हारी जान लेने की कोशिश नहीं की थी। वह उस तरह की लड़की ही नहीं है।" मेरी हार्दिकता से केशव कुछ आश्चर्यचकिन हुआ। बोला," 'उफ्, ४३ बड़ा दर्द उमड़ पड़ा है ! कितना जानते हो तुम उसे ?" मालती के पत्र मेरे मन में कौंध गए। मैं बोला, "बहुत ।" "तुम्हें शायद उसने वकील बनाया है ?" केशव ने व्यंग्य किया। "बिलकुल उल्टी बात," मैंने कहा, "अदालत में मैं उसके खिलाफ मुकदमा लड़ रहा हूं।" "यया गतलव ?" "मालती के पति ने उसे त्याग दिया है। उसने पति के विरुद्ध नालिश की है । मैं पति की तरफ से लड़ रहा हूं।" "अच्छी तरह से लड़ो। मैं लड़ाई के लिए और भी माल-मसाला और रसद जुटा दूंगा । ऐसी लड़गी जरूर हारेगी।" इसी समय अनुराधा हमारे बीच आ पहुंची। वह इठलाकर बोली, "आप लोग बहुत देर से मुझे नेगलेक्ट कर रहे हैं। मैं क्या इतनी अग्ली (भद्दी) हूं कि आप मेरी तरफ देखेंगे भी नहीं ?" "कौन कहता है कि आप अग्ली हैं ?" केशव गद्गद् होकर बोला, "आप अगर अग्ली होती तो क्या मैं आज की रात आपको 'चिन नाउ' में टिमर के लिए इन्वाइट करता ?" "यू आर स्वीट माइ डालिंग," अनुराधा पिपल गई। एज सुबह अचानक ही विंध्यवासिनी आ पहुंची मुझसे मिलने के लिए। वही लाल किनार की सफेद साड़ी पहने, सिर पर सिंदूर का टीका। ललाट पर रुपये जितना बड़ा गिदूर गा टीका दमक रहा था। निरंतर पान खाने के कारण ओठ कुछ बदरंग-रो थे। उसने सिर ढक रखा था और एक रेशमी शॉल लपेटे थी। रबर की चप्पल दरवाजे के बाहर ही सोलकर वह मेरी बैठक में घुसी। हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर, बड़ी भक्ति से उसने मुझे प्रणाम किया। मेरे कहने पर हो वह बैठी। मैं शिष्टाचार निभाते हुए बोला, "आइए, इननी सुबह-सुबह पसे भूल पड़ीं?" वह व्याकुल प्रार्थना-सी करती हुई बोली, "बाबू, मेरी लड़की को - ४४ . बाबू. बचाइए। "मैं पया कर सकता हूं?" मैंने पूछा। "आप सभी कुछ कर सकते हैं बाबू," उसने कहा, "एक जवान जिन- गानी बचा सकते हैं । मेरी बेटी को वचा लीजिए। उमने नहाना-पाना छोड़ दिया है । घर-वर की रट लगाकर मर रई है । थाप जैसे भी हो, इस मुकद्दम को गतम करा दीजिए, बाबू । आपकी जितनी बी पीस होगी, में युद आकर सिरीचरनी में चढा जाऊगी।' "छि, छि, ये क्या कह रही हैं आप?" मैंने प्रतिवाद किया, "मैं क्या रुपयो के लिए लड़ रहा हूं? महदेव का भाई नकुल मेरे दोस्त का ड्राइवर है । उमीको पातिर ये मुकदमा एक तरह गे विना फीस लिए ही लह रहा हूं।" "आप भले आदमी हैं, सज्जन आदमी हैं," वह बोली, "अगर कोई गलती को हो, तो माफ कीजिएगा। लडको पर दया कीजिए जैसे बी हो मुकद्दमा रातम करवा दीजिए।" "मैं क्या कर सरताह ?" "आप कहेगे तो जमाई सुनेगा। आपको वो बोत मानता है ।" "आपलोगो का केस तो खराव नहीं है क्या होगा, कहा नहीं जा सकता । पर आपके साथ ये सब बाते करना मेरे लिए उचित नहीं है, मैंने कुछ टालते हुए कहा। "ये क्या अदालत का काम है वाबू ? बेटी तो मेरी मुकद्दमा करना ई नई चाहती थी। मैंने ई जोर देकर केस करवाया था, का था, केस के डर से जमाई समझौता कर लेगा। पर अब आपलोग उसके पीछे पड़े हैं, वो जमकर लड़ रा है।" "यह लड कहां रहा है !" मैंने कहा, "उमने तो मिर्फ जवाब दामिल किया है ।" "झूठा जवाब है वायू, सिरफ हम लोगो को हैरान करने के लिए।" मैंने कहा, "नकुल झूठ बोल सकता है, पर सहदेव को मच ही आप लोगो के बारे में पता नहीं था।" "उससे क्या हुआ याबू ? उसने मेरी लडको को तो अपना लिया " । ४५ । लड़की को वो अब बी चाहता है।" बोल न सका क्योंकि विंध्यवासिनी की वात विलकुल सच मैं कुछ । "मैं बढ़ा-चढ़ा कर नई के रई वाबू, मेरी लड़की हीरा है। उसके पिता वी तो ऐसे-वैसे आदमी नई थे।" मुझे कौतूहल हुआ। कुछ झेंपते हुए मैंने पूछा, "क्यों, हारू बाबू उसके पिता नहीं हैं ?" "हाय दैया, वो क्यों उसका पिता होने लगा! वो तो अवी कुछ साल से ई है मेरे पास । एक मजबूत आदमी के न होने पर हमलोगों का काम नई चलता, इसीलिए उसे साथ रखा है। उसका नाम मेरे काम आरा "फिर ?" मैंने विस्मय से पूछा । "उसके बावा एक नामी डॉक्टर थे," विध्यवासिनी कहती चली गई, "नाम बताऊं तो सब पैचान लेंगे, आप भी पैचान लेंगे, पर नाम मैं वता- ऊंगी नई । वो महान थे, उनको मैं वदनाम नई करूंगी। उनने मुझे सात बरस तक रखा, पंछी तक को पता नई चला। वो नियम से मेरे पास आते-छुप-छुप कर । मेरे लिए अलग मकान किराए पर लिया था। अकेले घर में मैं राजरानी थी। इन सात सालों में मैंने उन्हें छोड़ और किसीको नई जाना। झूनू उन्हींकी बेटी है । झूनू को कित्ता प्यार करते थे वो । लड़की के भाग फूटे थे----इसके तीन साल की होते न होते वे गुजर गए । उनकी दया से ई दो रोटी खा रई हूं वावू । उनके दिए हुए रुपये मैंने उड़ा नई दिए। उन्हीं से मकान किराया करके रोजी कमा रई हूं।' "वे सब बातें जाने दो," मैंने कहा, "मुकदमे में इस सबसे कुछ खा फरक नहीं पड़ता।" "मैं मुकद्दमा लड़ने तो नई आई वावू," उसने कहा, "मुकद्दमा खत करने आई हूं। उनकी वौत इच्छा थी कि लड़की को अच्छा घर- मिले । पर मेरा जला नसीब, उनकी आखिरी इच्छा वी शायद पूरी कर सकूँगी।" मुझे कुछ दया आई। मैं वोला, "सहदेव तो शायद मालती को - ४६ लेना चाहता है, पर समाज तो तैयार नहीं होगा।" "चूल्हे मे जाए समाज !" विंध्यवामिनी चिढ़कर बोली, "इम निगोड़े ममाज के मर पर मेरी जूती !" फिर कुछ दम लेकर बोला, "मैंने सव सुना है । उनके गांव में आप जमे देवता का भी अपमान किया है लोगों ने। यहां तक कि पपराव बी किया था !" "ऐसी हालत में क्या आपकी लड़की वहां रह सकेगी ?" मैंने पूछा। "मैं ही क्या चाहती हूं कि वो वां उस जड़ देहात में रहे ? वो कल- फत्ता में रहेगी। जमाई वी कलकत्ता में ई रहे। मेरा पर पसद नई हो तो अच्छे मोहल्ले में 'फलाट' किराए पर ले दूगी। इस कलकत्ता सहर मे कौन जानेगा? कौन पचानेगा?" "आपका प्रस्ताव बुरा नहीं है," मैंने कहा, "अच्छा, मैं सहदेव से वात करके देखता हूं।" विंध्यवासिनी व्याकुल होकर बोली, "आपके जोर देकर कते ही वो राजी हो जाएगा। आपको वो ना नई के सकेगा । मेरी जितनी विसय. संपती है, सब मालती को ही तो मिलेगी, याने जमाई को ई मिलेगी। जमे, तो गांव की जर-जमीन बेच दाले । कीमत ही क्या होगा उसकी । उम रुपये से कलकत्ता में ई अपना छोटा-मोटा घर घरीद सकता है वो। रुपये कम पड़े, तो मैं दूंगी । कलकत्तं मे ई अपना घर बसाए दोनों।" "ठीक है, मैं सहदेव से बात करता हूं।" विध्यवासिनी और भी झुककर प्रणाम कर चली गई। कहती गई, "बहुत आस लेकर जा रई हूं वायू, निरास मत कीजिएगा । जनम भर आपके गुन गाऊगी।" विध्यवासिनी की आशा में पूरी नहीं कर सका, उसे भी मेरे गुन गाने का अवसर नहीं मिला । सहदेव को मैंने इस प्रस्ताव को जानकारी दी, पर उसने इनकार कर दिया। उसने कहा, "सर, यह प्रस्ताव में किसी भी हालत में नहीं मान सकूगा । दादा तो पुरखो की माटी का मोह छोड़कर कलकत्ता आ गए हैं, मुझसे यह नहीं होगा। जितना भी छोटा हो, उस घर का मोह मुझसे ४७ छोड़ा नहीं जाएगा।" "वह घर रहते हुए भी तो तुम शहर में रह सकते हो।" "रह तो सकता हूं, पर फिर समाज में मुझे जगह मिलेगी ? लुक-छुप कर कितने दिन रहूंगा ? बात फिर खुल जाएगी। शहर के लोग मुंह से भले कुछ न कहें, मन ही मन निंदा करेंगे, पीठ-पीछे चर्चा करेंगे।" "पर सहदेव, तुम तो अपनी पत्नी को अभी भी चाहते हो । अपने कमरे में अभी भी उसकी कितनी तस्वीरें टांग रखी हैं।" "यही तो मेरा दुख है सर। उसे प्यार करने पर भी अपने समाज में खींचकर नहीं ला सका । मैं हार मानता हूं। लड़ाई में मैं हार गया हूं। देखा नहीं, आप जैसे सज्जन को भी उस दिन मेरे कारण लांछित और अपमानित होना पड़ा।" "तुम अगर सच ही उसे प्यार करते हो, तो उसकी खातिर कुछ त्याग नहीं कर सकते ?" सहदेव कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, "मुझे गलत न समझिएगा सर । आप बड़े हैं, शायद मेरे मन का खयाल करके, मेरे भविष्य का खयाल करके ही मुझे यह सलाह दे रहे हैं । पर मैं, सर, मालती का त्याग कर दूंगा, उसके संग-साथ का त्याग कर दूंगा, उसके रुपये-पैसे का त्याग कर दूगा, पर समाज का त्याग नहीं कर पाऊंगा। जो गलती कर बैठा है, उसे सुधारूंगा। मैं सिर्फ यही मुकदमा नहीं लड़गा, मैंने तय किया है, मैं मालती के खिलाफ मुकदमा दायर करूंगा, इस शादी को खतम करने के लिए।" "तुम्हारी तरफ से वह मुकदमा मैं दायर नहीं कर सकूँगा," मैंने कहा, "वल्कि तुम ये मुकदमा भी किसी और वकील के पास ले जाओ। मैं नकुल से कह दूंगा । मुझे कोई खर्च-वर्च देने की भी ज़रूरत नहीं है ! तुम लोग देर मत करो, चेंज ले जाओ। तुम्हारा ये मुकदमा मैं नहीं कर . - । - सयूंगा।" "आप नाराज हो गए सर," सहदेव वोला। "ना, नाराज नहीं हुआ,"मैंने कहा, "इस मुकदमे को लड़ने का उत्साह नहीं रहा । मैं सब कागज-पत्र तैयार करके रखूगा, तुम्हारे नए वकील की -- ३ । चिट्ठी पाते ही भेज दूंगा। उसके पहले मालती के पत्रों का यह वंदन तुम सेते जाओ। तुम्हारे मुकदमे में ये चिट्टियां मिली काम नहीं आएंगी।" मैंने दराज घोलकर चिट्ठियों का दंडल महदेव गेनोर दिया। चिट्टियों में एक मधुर-मी गंध आकर मेरे नामापुटों में भर गई। यही मानो मेरी दक्षिणाधी। पन्नों का बंडल लेकर महदेव मिर नीचा किए कमर में निम्न गया। द्वितीय पर्व मानती को केमे ममता कि मेरी बोर में चेप्टा के बझाद में नहीं टूटा है उसका घर । मैंने तो भरमक चेप्टा को यो, फिर भी उस दृढ विम्दान है कि अगर जोर डालता तो सहदेव में मदा के लिए नहीं त्याग देता। मैंने मुकदमा छोडकर गलत किया है । अगर मैं मुकदमा अपने हाए में रखता तो सहदेव किमी भी दशा में विवाह ममाप्त करने का दादा दायर नहीं करता, और विवाह समाप्त भी नहीं होता। मुकदमा छोड़ने के बाद मैंने मालती-महदेव को कोई बौर-नवर भी नहीं रखी थी। कुछ महीनो बाद मालती ही मेरे पाम आई। पहले तो मैं उसे पहचान ही नहीं मका। उसोने मोघे अभियोग लगाया,' "बाप कौगिक करते तो मेरा घर नहीं टूटता । थापको और मै चेप्टा न होने के कारण ही मेरा घर टूटा है।" मेरे पतिवाद पर उसने कान ही नहीं दिया । मालती ने आगे की जो घटनाएं बताई, मुलझाकर रखने पर वे इस प्रकार हैं: महदेव ने विवाह समाप्त करने के लिए मुकदमा दायर किया । मानती ने उनके विरुद्ध जवाब दाखिल किया। एकसाथ दोनों मुकदम V0 चलने लगे, पर मालती के लिए यह दुर्विसह्य हो उठा । जिस पति पर उसने प्राण-मन उत्सर्ग कर दिए थे, उसीके विरुद्ध मुकदमा लड़ना उसे सहन नहीं हो रहा था। केवल विध्यवासिनी की जिद के कारण ही वह लड़ रही थी। फिर मालती ने तय किया कि मुकदमे समाप्त करने के लिए वह स्वयं सहदेव से अनुनय-विनय करेगी। इसीलिए वह सबसे छिपाकर फिर सहदेव को पत्र लिखने लगी -अनुनय-भरे पत्न, युक्ति, तर्क, मान- अभिमान, नीति, प्रेम, कर्तव्य-सभी के बारे में वह लिखती। कभी-कभी उसके आंसुओं से भीगकर लिखाई अस्पष्ट हो उठती । पन पर पत्र लिखती गई मालती। लेकिन पत्र पर पत्र मालती के पास वापस लौटने लगे। किसीने भी वे पन खोले नहीं, पढ़े नहीं; डाक-विभाग से ही वे पत्र मालती के पास वापस लौट आए। लिफाफे के ऊपर कभी लिखा रहता---एड्रेसी अन. नोन--(हो ही नहीं सकता। मुरलाग्राम में सहदेव को भला कौन नहीं जानता !) कभी लिखा होता. -लेफ्ट---(अगर वह कहीं चला ही गया होता तो लिफाफे पर मालती का नाम-पता किसने लिखा? लिखावट तो. मालती की खूब परिचित थी), कभी सिर्फ लिखा रहता-रिटर्ड टु सेण्डर। साफ था, सहदेव मालती के पत्र ले नहीं रहा है, खोल नहीं रहा है, पढ़नहीं रहा है, फिर भी फाड़कर फेंकता भी नहीं, कृपा करके उन पत्रों को लेखिका के पास ही लौटा देता है, मानो कह रहा हो, 'तुम मुझे पत्र मत लिखा करो।' असली बात का पता लगाने के लिए मालती प्रसाद पाल के पास गई। वही एकमात्र व्यक्ति था, जिसपर मालती को विश्वास था ।विश्वास था कि वह कभी धोखा नहीं देगा। मालती ने अपने प्रसाद को मुरलाग्राम भेजा, सहदेव के बारे में पता लगाने के लिए। प्रसाद को वहां कोई भी नहीं पहचानता, सिर्फ नकुल-सहदेव को छोड़कर। प्रसाद ने लौटकर खवर दी, नकुल शहर में है, बहुत दिनों से गांव नहीं गया, परन्तु सहदेव गांव में ही मौजूद था, बहुत समय से शहर का रुख भी नहीं किया है। मालती ने लौटी हुई चिट्ठियां प्रसाद के हाथों सहदेव के पास भिज- वाई थीं। प्रसाद सहदेव से मिला था । सहदेव ने उसका असम्मान नहीं । किया था; मादर से घर में बैठाया था, अपने हाथों से पेड से कच्चा नारियल तोडकर प्रसाद को उसका मोठा पानी पिलाया था, यहा तक कि मालती को कुशल भी पूछी थी। पर प्रसाद के द्वारा पल दिए जाने पर उसने बिना पढे ही वे लौटा दिए; फोकी-सी हसी हनकर बोरा,"को मर सतम ही हो गया, उसकी लकीर पीटने से लाभ क्या है दादा!" कुछ और कहने का साहस नहीं हुआ प्रसाद को। महदेव ने प्रसाद को जल्दी नहीं छोड़ा। दोपहर का खाना खिलाया, बहन-मो यातेको-सिर्फ मालती की बातें छोड़कररादतदल के पास वाली जमीन पर इस बार धान अच्छा हुआ है। रासायनिक खाद ठोक माय पर देने का अद्भुत परिणाम हुआ है। वी० डी० ओ ने कहा है कि महदेव को इस बार इस क्षेत्र के श्रेष्ठ कृपिजीवी का पुरस्कार भी मिल मकता है । लाल गाय ने एक बछड़ा दिया है। सहदेव डीप लिटर पद्धति से मुर्गी पालन कर रहा है। अभी करीद पच्चीस चूजे हैं । स्कूल दाना झंझट खतम हो गया है। मालती के खिलाफ मुकदमे की बात सुनकर अभि- भावक भी सश है। सेक्रेटरी के चुनाव में सहदेव फिर जीत गया है। विरोधी दन हार गया है, पर वे लोग अभी मुकद्दमे के नतीजे का इन्तजार कर रहे हैं। अगले महीने सहदैव दस कट्ठा धानवाली जमीन खरीदेगा- इत्यादि। यह सब सुनकर भी मालती रुको नहीं। वह एक वार आखिरी कोभिग करके देखेगी । इसीलिए मालती किसीको वताए वर्गर, चादर लपेटकर एरप्लानेट जाकर एक बस पर चढ़ गई। यह बस उसे मुरलाग्राम पहुंचा देगी । अपने साप उसने कुछ भी सामान नहीं लिया कि किसीको सदेह हो । इसके अलावा उसके अपने कपड़े लत्ते तो पति के घर में ये हो। उस समय शाम हो चली थी। बस में करीब दो घण्टे लगे । पहुंचते-पहुंचते रात हो जाएगी। होने दो।पहचाना रास्ता है। बल्कि अंधेरा हो भन्छा रहेगा। वह लेडीज सीट पर बैठ गई। इस तरफ धुंधला अंधेरा-ना है। अच्छा ही हमा। कोई परिचित कहीं उसे देख न ले । यह मानो उनका गुप्त अभिसार है । फिर भी वह जा रहो है पति के घर। बस में समय बीत ही नहीं रहा था । इतनी धीरे का चल रही है 1 । - । चलने लगे, पर मालती के लिए यह दुर्विसह्य हो उठा । जिस पति पर उसने प्राण-मन उत्सर्ग कर दिए थे, उसीके विरुद्ध मुकदमा लड़ना उसे सहन नहीं हो रहा था। केवल विंध्यवासिनी की ज़िद के कारण ही वह लड़ रही थी। फिर मालती ने तय किया कि मुकदमे समाप्त करने के लिए वह स्वयं सहदेव से अनुनय-विनय करेगी। इसीलिए वह सवसे छिपाकर फिर सहदेव को पत्र लिखने लगी -अनुनय-भरे पन्न, युक्ति, तर्क, मान- अभिमान, नीति, प्रेम, कर्तव्य-सभी के बारे में वह लिखती। कभी-कभी उसके आंसुओं से भीगकर लिखाई अस्पष्ट हो उठती । पन पर पत्र लिखती गई मालती। लेकिन पत्न पर पन मालती के पास वापस लौटने लगे। किसीने भी वे पत्र खोले नहीं, पढ़े नहीं; डाक विभाग से ही वे पत्र मालती के पास वापस लौट आए। लिफाफे के ऊपर कभी लिखा रहता-एड्रेसी अन- नोन--(हो ही नहीं सकता। मुरलाग्राम में सहदेव को भला कोन नहीं जानता !) कभी लिखा होता-लेफ्ट-(अगर वह कहीं चला ही गया होतातो लिफाफे पर मालती का नाम-पता किसने लिखा? लिखावट तो. मालती की खूब परिचित थी), कभी सिर्फ लिखा रहता-रिटर्ड टु सेण्डर। साफ था, सहदेव मालती के पत्र ले नहीं रहा है, खोल नहीं रहा है, पढ़नहीं रहा है, फिर भी फाड़कर फेंकता भी नहीं, कृपा करके उन पत्रों को लेखिका के पास ही लौटा देता है, मानो कह रहा हो, 'तुम मुझे पत्र मत लिखा करो। असली बात का पता लगाने के लिए मालती प्रसाद पाल के पास गई। वही एकमात्र व्यक्ति था, जिसपर मालती को विश्वास था। विश्वास था कि वह कभी धोखा नहीं देगा। मालती ने अपने प्रसाद को मुरलाग्राम भेजा, सहदेव के बारे में पता लगाने के लिए। प्रसाद को वहां कोई भी नहीं पहचानता, सिर्फ नकुल-सहदेव को छोड़कर। प्रसाद ने लौटकर खवर दी, नकुल शहर में है, बहुत दिनों से गांव नहीं गया, परन्तु सहदेव गांव में ही मौजूद था, बहुत समय से शहर का रुख भी नहीं किया है। मालती ने लौटी हुई चिट्ठियां प्रसाद के हाथों सहदेव के पास भिज- वाई थीं। प्रसाद सहदेव से मिला था । सहदेव ने उसका असम्मान नहीं - किया था; मादर मे घर में बैठायापा, अपने हापों में पेट से कच्चा नारियन नोड़कर प्रमाद को उसका मीठा पानी पिलाया पा, यहां तक किमालती की कुशन भी पूटी थी। पर प्रमाद के द्वारा पत्र दिए जाने पर उगने विना पढे ही वे नौटा दिए: पीकी-मी हंगी हमरर बोला, "जो मर पतम हो हो गया, उसको लकीर पीटने में लाभ क्या है दादा !" कुछ और कहने का माहम नहीं हुआ प्रमाद को । महदेव ने प्रमाद को जल्दी नहीं छोड़ा। दोपहर का पाना गिनाया, बहन मी वाते को-मिर्फ मालती की बातें छोड़कर दलदल के पाम वानी जमीन पर इस बार धान मच्छा हुआ है। रासायनिक पाद टोर मपय पर देने का अद्भुत परिणाम हुआ है । यो० डी० ओ० ने कहा है कि महदय को इस बार इस क्षेत्र के घेष्ट पिजीवी का पुरस्कार भी मिल सकता है । मास गाय ने एक बछडा दिया है । सहदेव हीष लिटर पदति से मुगी-पालन कर रहा है । अभी करीब पच्चीम चूने हैं । स्कूल वाला समट ग्रतम हो गया है। मालती के खिलाफ मुकदमे को यात मुनकर अभि- भायफ भी जग है। सेनेटरी के चुनाव में सहदेव फिर जीत गया है। विरोधी दल हार गया है, पर वे लोग अभी मुकदमे के नतीजे का इन्तजार कर रहे हैं। अगले महीने सहदेव दस कट्ठा धानवाली जमीन परीदेगा- इत्यादि। यह सब मुनकर भी मालती एकी नहीं। यह एक बार आखिरी योगिय करके देखेगी । इसीलिए मालती किसीको बताए वर्गर, चादर मपंटकर एरप्लानेट जाकर एक बस पर घट गई। यह बम उमे मुरलाग्राम पहुंचा देगी । अपने साथ उसने कुछ भी सामान नहीं लिया कि किमीको सदेह हो। इसके अलाया उमके अपने कपड़े-सत्ते तो पति के घर में पे ही। उस समय शाम हो चली थी। बस में करीब दो घण्टे लगेगे। पहुंचते-पहुचने रात हो जाएगी। होने दो। पहचाना रास्ता है। बल्कि अधेराही अग्छा रहेगा। वह मेडीज सीट पर बैठ गई । इस तरफ पधला अघेरा-मा है। मन्छा ही हुमा । कोई परिचित नही उसे देश न ले । मह मानो उसका गुप्त अभिमार है । फिर भी वह जा रही है पति के पर। घस में समय बीत ही नहीं रहा था। इतनी धीरे पो चल रही है । ।
। - ! बस ? लगता है, यह इसकी आखिरी ट्रिप है। इसीलिए इतनी देर तक खड़ी-खड़ी यानी लिए जा रही है। बाहर भी अंधेरा है, मालती के मन में भी। उसके दिमाग में ऊटपटांग बातें आने लगीं-क्या पता, सहदेव घर पर ही न हो ? यदि हो, तो क्या पता वह मालती को घर में न घुसने दे ? मालती को चाय की दुकान पर बैठकर सारी रात बितानी होगी। इतनी रात को वापसी की बस तो मिलने से रही । क्या पता, सहदेव उसे घर में बुला ही ले ? उसे उसका अधिकार लौटा दे ? मालती से सोचा नहीं जाता। बस के धचकों और हॉर्न की कर्कश आवाज से उसका सिर दुखने लगा। कितनी दूर आ गए ? ठाकुरपुकुर पार हो गया है। खुले मैदान की हवा से उसे राहत मिली । आमतला, दस्तीपुर''मुरलाग्राम के मोड़ पर वह उतर पड़ी। सबसे बचते-बचाते उसने पतिगृह में प्रवेश किया। दो-चार वार ठोकर खाई, पर कोई बात नहीं। चांदनी का उजाला ही बहुत है । एक कुत्ता गुर्रा उठा, पर फिर शायद परिचित व्यक्ति जान- कर चुप हो गया। घर में अंधेरा था। हाय ! किसीने एक दीया तक नहीं जलाया, मानो भुतहा मकान हो। सहदेव शायद क्षेत्रीय पंचायत के दफ्तर से अभी भी नहीं लौटा है। मालती थी वह तब वह जल्दी लौट आता था । अव पीछे कौन बैठा है ? अच्छा ही हुआ, सहदेव घर पर नहीं है। घर में घुसने में कुछ भी प्रिय- अप्रिय नहीं हुआ। आजकल चोरियां बढ़ गई हैं, फिर भी सहदेव ताला नहीं लगाता । मालती का इससे भलाही हुआ। खुले दरवाजे से होकर वह आंगन में आ गई । सब उसका जाना-पहचाना है। सोने के कमरे के चबूतरे पर वह चढ़ी। कमरे की सांकल खोली। अपने कमरे में घुसी। मालती पो हंसी आने लगी । एक दिन राजरानी के सम्मान से वह इस कमरे में घुमी थी, आज चोरों की तरह अंधेरे में घुस रही है । बत्ती जलाए ? क्यों नहीं जलाए? कोई सचमुच ही चोर थोड़े ही है । अपना हक लेने आई है, बत्ती भला क्यों नहीं जलाएगी? टटोलकर देखा-लालटेन, दियासलाई, सब ठीक वहीं हैं, जहां पहले रहती थीं । 'फस्' -दियासलाई लगाकर मालती ने लालटेन जला ली। उसने देखा, सोने का कमरा जैसा पहले था, वैसा ही है। दीवारों ५२ - । - पर पहले की ही भांति उसकी ढेर मारी तस्वीरें टगी हैं। शृंगार-मेड पर दुल्हा-दुल्हन का चित्र है। शृगार-मामग्री भी ज्यों की त्यो पड़ी है। मालती मानो कुछ आश्वस्त हुई । लगता है, कुछ यदला नहीं है, बदलेगा भी नहीं। हाथ-मह धोने के लिए वह स्नानघर में गई। टंकी में पानी भरा ही पा। वम के धवकों से देह पसीने से भर गई थी। यदयू-मी महसूस होने लगी है। मालती भरे हुए पानी में आराम में नहाई । महदेव अभी भी उमी ग्राण्ड के गायन का व्यवहार करता है। यह बाण्ड मालती ने ही दम पर में चलाया पार गमछे से उमने बदन पोछा । गमछे में मानो महदेव की देह की गध मिली। नहाकर मालतीको काफी राहत महमूग हुई। उसकी अलमारी में ताला लगा था। पाभियो का गच्छा माना भूली नहीं पी मालती । आज यह पूर शृगार करेगी । जैसे उमा ने शिव को मोहित किया था, वह गह- देव को मोहित करेगी। अपने पति को रिझाएगी। अलमारी मे निशान- कर उमने सिल की मुन्दर माही पहनी । यह सहदेव ने गुद पमर करके, न्यू माट से परीदकर उपहार में दी थी। हेमिंग टेबल के आगे बैठे. बैठे उसने अपना प्रसाधन पूरा किया। शरीर पर थोडा-मा सेप्ट छिटक लिया। भाग्य से इस बीच सहदेव नहीं आया, नही तो उसका शृगार अधूरा ही रह जाता । ललाट पर कुकुम का टीका लगाते-लगाते उगने लालटेन के प्रकाश में अपनी प्रतिच्छवि को निहारा । देयने में अन्टी हो मग रही थी । महदेव ने स्वयं कई बार उसके सलाट पर टीका लगाकर और फिर रीझकर उसे घूमा था। अब मालती को भूय लगी थी। शाम को यो हो कुछ प्राया था। अभिसार को उत्तेजना मे पाने की बात ही ध्यान में नहीं पाई थी। अब जरा स्वस्ति मिली, तो भूय ने जोर मारा । अब जाकर ध्यान आया, रसोईघर में भी अघेरापा। राधी की मा घाना बनाती थी, वह तो आई नही । तोपया सहदेव रात को घर पर नहीं गाएगा ? मापद नी। मालनी ने घो टटोली। गाने की कोई चीज नहीं मिली। मिर्फ कुछ बिना पकी माग-सब्जी पड़ी थी। अब गाना कौन बनाए । मालती गटा.
- गट एक गिलास पानी पी गई। रिस्टवाच में देखा, रात के दस बजने को थे। अभी भी सहदेव. नहीं लौटा और प्रतीक्षा । मालती ने सोचा, सहदेव को चौंकाया जाए। उसने लालटेन वुझा दी। कुछ देर बैठी-बैठी मच्छरों का काटना सहती रही। देह पिराने लगी। जरा लेट जाती तो अच्छा था। वह सोने के कमरे में घुसी। दरवाजा उसने भेड़ दिया, आपादमस्तक चादर लपेटकर विछौने पर लंबी हो गई। चादर के बाहर असंख्य मच्छरों का क्रुद्ध गर्जन सुनाई दिया। उनके साथ ही तान मिलाकर चल रही थी, झींगुर की झनकार। शायद मालती को झपकी लग गई थी। बाहर के दरवाजे पर खटका होने से आंख खुल गई। कान लगाकर उसने सुनी, अपनी परिचित पद- चाप । सहदेव घर लौट आया है। मालती उसे चौंकाएगी, अभी विस्तर से नहीं उठेगी। वह चादर लपेटे बिस्तर पर पड़ी रही, ज़रा-सी फांक से देखने की कोशिश करती रही। सहदेव टॉर्च जलाकर आंगन में बढ़ आया, जूते खोलकर पांव धोए, एक डकार ली और सोने के कमरे में ही चला आया। उसने लालटेन जलाई। (आश्चर्य है ! ) अब भी मालती को नहीं देख पाया। उसने ट्रांजिस्टर खोला । शास्त्रीय गायन हो रहा था, उसने तुरन्त बंद कर दिया । दरवाजे की आगल लगाई, ड्रेसिंग टेबल पर सजी हुई व्याह की तस्वीर उठाई, लालटेन के पास लाकर कुछ पल टकटकी लगाकर उसे देखता रहा, फिर उसे वापस रख दिया। एक और डकार ली, सुराही से एक गिलास पानी लेकर पिया, फिर रोज के अभ्यास के अनुसार कमीज़ उतार दी। उस आधे अंधेरे में भी मालती ने उस स्वस्थ, सुडौल, गठी हुई देह को आंख भरकर देखा । सहदेव ने रैक से एक लुंगी लेकर पहनी, अपने उतारे हुए कपड़े रैक पर टांगे। फिर लालटेन को बुझा- कर वह अंधेरे में ही अभ्यस्त भाव से आकर अपनी जगह पर लेट गया- मालती के बगल में ही मालती से अब रहा नहीं गया । वह सहदेव के गले में बांहें डालकर उसका सिर खींचकर अपने वक्षस्थल पर ले आई। सहदेव ने झटके से अपने को छुड़ा लिया, डरकर चिल्ला उठा, "कौन है ? कौन ?" - --
पिनगिला कर हम उठी मानती।
महदेव ने पटपट से सालटेन जलाई। उसको रोगनी मालती के
घेहरे पर आई। तब तक मालतो उठ बैठी थी। महदेव तब भी कॉप
रहा था। वस्त स्वर में वह बोला, "कोन ? मा"""ती ! मैं
समझा..."
"हंस !," मालती गिर-गिककर हमने लगी।
सहदेव बोला, "मुझे हरा दिया पा। अभी भी दिल धड़क रहा
"हरने को कोई बात नहीं," मालती ने मजाक किया, "मैं तुम्हारी
गर्दन मरोडने नहीं थाईहूं।"
सहदेव ने कुछ आश्वस्त होकर पूछा, "तुम कब आई ? मुझे तो पता
ही नही पसा।"
"मैंने ही तो नहीं बताया। पता चलने पर तुम मुझे आने नहीं देते,
इसीलिए मुछ कहे बिना चली आई हूं।"
महदेव चुप बरा रहा।
"क्या हुआ ?तुम चुप क्यों हो गए ? तुम नहीं चाहते कि भाऊ ?
बहुत अच्छा, मैं अभी यहाँ मे चली जाती हूं।"
"ना, ना, अभी क्यो जाओगी बल्कि कल मुबह चली जाना,"
महदेव ने कहा, "मैं बैठकमाने में सो जाता हूं, तुम यहीं मो जामो।"
"क्या मतलब ?" मालती ने कहा, "तुम क्या मेरे जेठ या ससुर हो !
या कि मैं अस्पृश्य हूं, अछूत हूं?"
"कमो बातें कर रही हो?" सहदेय बोला, "मैं बाहर के कमरे में ही
सोता हूं।" यह दरवाजे की मागम गोलने लगा।
मालती तड़पकर उठ पो हुई। महदेव का रास्ता रोकर बोली,
"तुम मेरा त्याग क्यों कर रहे हो ? मैं क्या तुम्हारी पत्नी नहीं हूँ ? तुम
पया मुझमे प्रेम नही करते ? क्या मैं तुममे प्रेम नही करती ?"
"नये सिरे में फिर क्या समझाक? मुझे तो जो पहना था, सब तुममे
मह चुका हूं," महदेव मधे स्वर में बोला।
मामती प्याकुम हो रटी, "नहीं, नहीं मुझे छोड़ो मन । नहीं तो में
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नहीं वचूंगी।" मालती रोने लगी, पर सहदेव ने शांत लेकिन दृढ़ हाथों से उसे एक करके शयनकक्ष का दरवाजा खोला और वाहर निकलने को पांव या। मालती दृढ़ स्वर में बोली, "रुको !लोग पालतू कुत्ते-विल्लियों से भी तनी घृणा नहीं करते, जितनी तुम मुझसे कर रहे हो ! मैं क्या तुम्हारी धर्मपत्नी नहीं हूं? मैं क्या इन्सान नहीं हूं ?" सहदेव संयत स्वर में बोला, "वेकार उत्तेजित मत होओ मालती !" मालती ने यह बात सुनी भी नहीं। वह उनांत-सी कहती गई, "अगर मुझसे इतनी ही घृणा करते हो, तो अभी हमारे व्याह की तस्वीर लेकर इतनी हाय-हाय क्यों कर रहे थे ? क्यों अब तक मेरी तस्वीरें चारों तरफ टांग रखी हैं ? ब्याह ही जब अस्वीकार करना चाहते हो, मुझे ही जव छोड़ देना चाहते हो, तो दूर करो ना ये सब कूड़ा-कबाड़ ! तुम न कर सको, मैं अपने हाथों से किए देती हूं।" मालती ने पागलों की तरह दीवारों से खींच-खींचकर तस्वीरें उतार डाली, फर्श पर पटक-पटककर उन्हें तोड़ने लगी। झनाझन-कांच टूटने की आवाज आने लगी। विवाह का फोटो खूबसूरत फ्रेम से निकालक उसने टुकड़े-टुकड़े कर डाला और उन टुकड़ों को फर्श पर पटककर पै से रौंदने लगी। सहदेव पत्थर-सा खड़ा था। वह मानो समझ नहीं पा: था कि क्या करे ! मालती ने किताबों की अलमारी खोल डाली। "च्याह की या ढोकर क्या होगा? इन आफतों को भी विदा किए देती हूं।" कहते वह किताबें निकालकर इधर-उधर फेंकने लगी। उसकी यह कर देखकर सहदेव स्तंभित खड़ा था। मालती की दृष्टि शैया पर पड़ पागलों की तरह तकिये-तोपक उठाकर फेंकने लगी। "इस सुख क्या होगा!" वह चीख उठी और दांतों से चीर-फाड़कर विछोने की धज्जियां उड़ा दीं । उत्तेजना से हांफने लगी थी मालती। उस में मानो आग धधक रही थी। पता नहीं कैसे यह आग शां ।
। लालटेन पर नजर पड़ते ही वह दोडकर गई और उसे उठा लिया। पुटी हुई गर्जना के स्वर में बोनी, "माज में शरीर पर केरोमिन छिड़ककर आग सगाकर जल महंगी।" पलक झपकते सालटेन का ढक्कन खोलकर उमने माड़ी पर केरोमिन छिड़क लिया । वंसे लालटेन में घोड़ा ही तेल वाकी था, उमीको दुगंध से कमरा भर गया। फिर चलती हुई सालटेन टिक- कर पावों के पाम आ गिरी। कांच को निमनी टुकड़े-टुकड़े हो गई। अन्तिम लो से साड़ी को नीचे के किनारे पर आग लग गई। पलक झप- यते महदेव कद पहा, मालती का पाव जकड़कर पकड़ा और आग पर ड़ती हुई साड़ी को अपने शरीर से अप्से दया दिया। दोनों फर्श पर लुढक गए । महदेव के शरीर से दयकर घटी हुई आग ने दम तोड़ दिया। कमरे मे अटूट बंधेरा छा गया। केवल उत्तेजित सहदेव की तेज में और मालती को दयी स्लाई मुनाई दे रही थी। सहदेव ने अधेरे में ही मालनी को देह से केरोसिन-भीगी माही उतार दी। सौभाग्य से लालटेन में तेल कम ही था, साड़ी के भीगे हिरो तक आग नहीं पहुंची। सहदेव ने तकिये उचकाकर बिस्तर पर डाले, फिर मयल हाथो से मालती की कापती देह को उठाकर विगरी हुई शैया पर लिटा दिया। सहदेव ने टॉर्च जलाकर देया कि मालती कही से जली तो नही। अच्छी तरह से देखकर वह आश्वस्त हो गया कि शरीर कही से भी जला नहीं है, सिर्फ पांव के पाम एक जगह कुछ मुलस-मी गई है। सहदेव योला, "उफ् ! पोहे मे ही घात टल गई। छि:छिः क्या पागलपन कर रही थी, बोलो तो?" मालती ने रलाई भरे स्वर में कहा, "अब पागलपन नहीं करूंगी। तुम आओ, मेरे पाम आओ।" सहदेय उमके निपट गया। मालती ने उसे बाहो में आवद्ध कर लिया । सहदेव ने गधा नहीं दी। मालती ने चुंवनों में भर दिया सहदेव का पेहरा-आंग, नाक, कान, ललाट, कष्ट । सहदेव ने बलिष्ठ हायो से मालती की देह को अपने वक्ष पर पीच लिया। मोघ्र ही मालती को पत्नी का सहज अधिकार पापम मिल गया। मालती को गहरी नीद आ गई थी। जब नीद टूटी तम भोर हो आई आकाश उजलने लगा था। पहले तो वह सोच में पड़ गई, 'कहां हू 'आंखें मलकर चारों ओर देखा । नींद का नशा टूटते ही उसका मन खी तृप्ति से भर उठा । पिछली रात की यंत्रणा और आनंद-दोनों याद आए। मिलन के बाद वह कब पति की बांहों पर सिर रखकर सके प्रशस्त वक्षस्थल में मुंह छिपाकर सो गई थी, पता ही नहीं चला। इसने इधर-उधर देखा, सहदेव नहीं था, पहले ही उठ गया था। उसकी आदत है, बड़ी भोर ही उठ जाने की। लंबे अंतराल के बाद पति-संसर्ग की अलस अनुभूति से उसकी सारी देह में एक तृप्त अवसाद छा गया था। कुछ देर और वह बिस्तर पर ही लोटती रही, उवासी ली। शरीर पर साड़ी नहीं थी, केवल पेटीकोट और ब्लाउज पहने थी। वह अचानक ही लजा उठी। धड़धड़ाकर उठ पड़ी। सहदेव की दी हुई सिल्क की साड़ी फर्श पर पड़ी थी। उसने साड़ी उठा ली। एक जगह से जरा-सी जल गई है। साड़ी से केरोसिन की बदबू आ रही है । उसने नाक सिकोड़- कर वह साड़ी फेंक दी । रैक से उठाकर पहले उतारी हुई साड़ी पहन ली। प्रकाश और बढ़ गया है। खिड़की का पर्दा पार करके रोशनी कमरे में आ रही है । कमरे की हालत देखकर मालती स्तब्ध रह गई। लंका- काण्ड मचा हुआ था। चिन्न सब टूटफर चूर-चूर हुए पड़े थे, किताबें इधर उधर फिकी हुई, दो तकिये फर्श पर लोट रहे थे। कमरे पर से मानो को तूफान गुजर गया हो। पांव में कांच का टुकड़ा चुभते ही मालती व बैठ गई। चटपट उस टुकड़े को बाहर निकाला। सावधानी से क. रखती वह दरवाजा पार करके वाहर आ खड़ी हुई। बाहर से अन्दर ओर देखने पर उसे अपने ही ऊपर गुस्सा आने लगा। सजे-सजाए का सामान उसने पागलों की तरह अपने ही हाथों तहस-नहरा कर था। फिर सोचा, अच्छा ही किया। कुछ चीजें गई सही, पर पी उसने वापस पा लिया है । हपं से डगमगाती वह स्नानघर की से गई । शरीर रो अभी भी केरोसिन की गंध निकल रही थी। वह से मल-मलकर नहाएगी। पिछली रात की कालिमा वह पोंछ अपने हाथ से कमरे की सफाई करेगी, नये सिरे से कमरा सजाए ५८ - 1 उमने इधर-उधर सहदेव को तनागा। "मजी, वहाँ हो तुम? वहां ?"-मालती ने उसे मावाजनगाईकोई उत्तर नहीं मिला। माम- पाम ही कही होगा। लानवाली गंगा रा उठी। भोर में मात परिवेश में वह रमाना भी मालतीको महामगा।सपा,कोई उमे पार अपनी पगी जाहिर कर रहा है। गुमनाने में जाते-जाते मालती को जोरो यो भूय मग आई। ध्यान आया, एक गिलास पानी पर ही सारी रात बिता दी है। भूग से पेट कुर- मुहाने सगा । रमोईघर में जाकर फिर टटोलना शुरू किया--मिला- सिर्फ कच्चा अनाज, नमक, तेल । अचानक ध्यान आया, एक बहे पोरे में मुरमुरे पड़े रहते थे न. पीपा है यही । प्रट से ढक्कन योलते ही मुरमुरे मिल गए । माय में गुड भी मिल जाता तो अच्छा रहता । गुरु है नहीं। मानती ने ममे मुरमुरे निगलकर एक गिलास पानी पिया । सहदेव में मुध रूटने का-मा भाव जागा । विना रहे हो भयो उठ गया ? और गपा भी कहाँ ? इननी मुयह इतनी देर माला भला कौन-सा काम हो सकता है ? कभी-कभी ऐमा कर बंटता है सहदेव । केरोसिन की बदबू वी शिद्दत से महसूस हो रही है। पहले नहा- निबर लेना होगा। अलमारी से धुले हुए साड़ी-लाउज निकालने होंगे। कमरे के फर्श पर काच की किचें फैली है । फिर पांव में पाच पभा। मालती दुविधा में पड़ गई–पहले कमरा साफ करे या नहाए घोए । महदेव होता तो वही कपडे निकाल देता। मालती ने फिर एक बार पुकारा, "अजी, यहा गए तुम ?" कोई आहट तक नहीं। उसकी नगर चबूतरे पर रगी अपनी चप्पलो पर पड़ी। चप्पल पहनकर वह मयनगृह में पमी । अलमारी से घुले कपडे लेकर वह स्नानगृह में चली गई। बहुत दिन बाद वह आराम से नहाएगी। शहराती वह बी मुविधा के लिए मदेव ने एद यह परका स्नानघर और सेनिटरी प्रिवी बनवाए में। एक बड़ा-सा होज मी पा । नत हर नहीं था, पर महदेव ने दिमाग नगाकर एक कामचलाऊ म्यवस्था कर दी थी। ट्युबवेल के एक ओर उमने मजबूत बांस के महारे तेल का पाती टिन सगा दिया था। उनमें पेर करके एक रवर का पाइप अटरा दिया था। यह पाइप होर में - आकर गिरता था। ट्यूबवेल से पानी खींचकर वाल्टी-बाल्टी लाकर हौज़ भरने की ज़रूरत नहीं थी। बाल्टी का पानी इस टिन में डालते ही हड़हड़ाता हुआ हौज़ में आ जाता था। यह काम प्रायः सहदेव ही अपने हाथों से करता था। मालती ने देखा, हौज़ में अभी भी काफी पानी था। सिर और शरीर में तेल की मालिश करके मालती को काफी राहत मह- सूस हुई। पांव झुलसा था, जलन महसूस हो रही थी, पर मालती ने उफ तक नहीं की। अच्छी तरह साबुन मलकर उसने पानी के कई लोटे उड़ेल लिए । वड़ी तृप्ति महसूस हो रही थी । शरीर और सिर पोंछकर नये कपड़े पहनकर अपनी देह ही बड़ी हल्की लग रही थी। वाल उसने फैला दिए । ड्रेसिंग टेबल के शीशे के सामने बैठकर देर तक बाल सुलमाएगी। भीगे कपड़े आंगन में सूखने को डालकर वह फिर शयनगृह में घुसी। कमरे की दुर्दशा मानो उसे फटकारने लगी। सच, कल शुरू रात में जरा ज्यादती ही हो गई ।। क्या पागलपन सवार हो गया था कल उसपर? सहदेव के आने पर वह उससे इस ज्यादती के लिए क्षमा मांग लेगी। लालटेन मानो दांत फाड़े जमीन पर लोट रही थी। कैसा सर्वनाश करने जा रही थी वह कल ! भाग्य से सहदेव पास था, औसान कायम रखकर उसपर कूदकर आग बुझा दी। नहीं तो-नहीं तो अब तक---आगे सोच भी नहीं सकी मालती । जीवन-रक्षा की इस कृतज्ञता के कारण पति के प्रति उसकी श्रद्धा सौगुनी बढ़ गई। उसने झटपट लालटेन एक ओर सरका दी । अंगुली सूंघकर उसने देखा, केरोसिन की वदवू हाथ में नहीं आई थी। मालती शृगार-मेज़ के शीशे के आगे बैठी। अन्यमनस्क भाव से वह गीले बालों में कंघी फिराने लगी। फर्श पर, विवाह के समय खींचे हुए वर-वधू के चित्र के टुकड़े बिखरे थे। छिः, गुस्से में आकर इसे क्यों फाड़ा उसने ? फोटोग्राफर की दुकान से इसकी नई कॉपी ज़रूर मिल जाएगी, लेकिन । वाल सुलझाना रोक कर उसने चित्र के टुकड़े बटोर लिए । लगता था, 'जिगसॉ पजल हो।' ड्रेसिंग टेवल पर उन टुकड़ों को जमा- करके चित्र पूरा करना चाहा, वह हुआ नहीं। सारे टुकड़े नहीं हैं । सहदेव के चेहरे में कुछ जगह छूट गई है। खुद मालती का चित्र भी अधूरा है। इस फोटो की एक कॉपी बनवानी ही होगी। फ्रेम तो सावुत ही है। कहां है । ।
फेम ? फर्श पर नहीं है। पर यहीं तो पड़ा था। मालती उमे खोजने लगी। ये रहा, विष्टोने पर 1 यहां की पहुंचा? सुबह के धुंधलके में नींद भरी यागों में भापती इसे देय नहीं पाई थी। जिस तरफ सहदेव सोया था, समी तरफ के मिरहाने पर रखा है फेम । सहदेव ने ही इसे संभालकर सया रणा होगा। मालती ने जाकर उसे उठाया । ये क्या ! इसके नीचे एक पत्र है। मतलय, फ्रम से यह पन्न दबाकर रखा गया था। मासती ने जल्दी से पत्र पढ़ा। महदेव के हाप की लिखी कुछ-एक पक्तिया थी. "मन, जो हाटो बीच बाजार में टूटी है, हम कितना भी पलस्तर क्यो न लगाएं, वह जड़ेगी नहीं। तुम जितने दिन इम मकान में रहोगी, मैं यहाँ पर भी नही रयूगा । चलता हूं।-सहदेव ।" ममसी हुई चिट्ठी मालती की मुट्ठी मे बद यो । उसकी आयो के मागे मानो ब्रह्माण्ड घूम रहा था। सारा शरीर मानो भूकप के भयानक पक्के से लडाटा रहा था। मालती होल रही है, घूम रही है, गिर रही है, डोल रही है. घूम रही है। एक उत्ताल प्रलयकरी बाढ़ मानो उसे वहाए लिए जा रही है, गगनचुंबी लहरो पर उठाती-गिराती, गिराती-उठाती। सती जा रही है मालती, हयती चली जा रही है अगाध उन्मत्त जल- राशि के अतहीन तल मे। जय उसकी समा लौटी तो देखा राधी की मां ने अपनी गोद में उमरा मिर ले रखा है और वोच-बीच मे चेहरे पर ठण्डे पानी के छोटे देती हुई ताड़ के पसे से हवा किए जा रही है । नरम गोद, शीतल जल के छोटे और ठण्डी हवा-अच्छा ही लग रहा था। मालती को पन हिंसी-हली सो राधी की माने भीगे तौलिए से बड़े जतन से उमका माया पोछ दिया। मालती ने आयें घोली। राधी की मां ने शांति की सांस ली, "चलो, भाभी को होम तो आया। अय जान में जान आई।" राधी की मा विधवा पड़ोसिन है । मामूली-मी दक्षिणा और भोजन के बक्से वह महदेव के घर दोनो समय का साना बना जाती है और घर. गिरिस्ती के छोटे-मोटे काम कर देती है । उसको वेटी राधी का विवाह हो गया है, वह ससुराल में रहती है। सिर हिपाने को एक झोंपड़ी है राधी की । - . मां के पास, पर उससे पेट तो नहीं भरता। इसीलिए उसने सहदेव के घर का वह हल्का काम हाथ में लिया है। मालती उठ बैठी। राधी की मां अपने आप ही बड़बड़ाने लगी,"आ- कर देखू तो एक जना वेहोश पड़ा है। घर में चिरई का पूत भी नहीं। आवाज दीदादावाबू, दादाबावू, दादावाबू-! कोई जवाब नहीं । कमरे में भी सब टूटा-बिखरा पड़ा। डर से मुझे तो पुरखे याद आ गए, और क्या ! कई रात-विरात डाकू तो नई आए ? कई वो भाभीरानी का खून करके चले गए हों। मैं तो रो-रोकर गुहारने लगी।" मालती चुपचाप सुनने लगी राधी वी मां बोली, "मेरी चीख सुनकर आस-पड़ोसी दौड़े आए । पर जैसे ई देखा कि भाभीरानी की ये हालत है, तो सुसरे { फेरकर चल दिए । आदमी हैं या कसाई ? मैं टेर लगाने लगी, 'अरे कोई है ? डाक्टर- वैद बुलाओ, कोई थाना-पुलस में खवर दो।' वनरजी मोशाय का साला बोला, 'घर की महाभारत में पुलस क्या करेगी ? सहदेव ही बऊ को मार- मूरकर लापता हो गया है।' सुना, दादावाबू भोर होते न होते एक वकस लेकर पैली बस से कलकत्ता चले गए, चाय की दुकान के छोरे ने अपनी आंखों से देखा।" मालती शांत भाव से बोली, "ना, ना, राधी की मां, तुम्हारे दादा- बाबू ने नहीं मारा । मुझे ही चक्कर आ गए थे, सो गिर पड़ी।" राधी की मां बोली, "मैं लड़ी उन लोगों से । मेरे दादावाबू कवी वऊ की कुटाई नई कर सकते। ऐसे चंडाल नई हैं वो। पर वो लोग माने भला ! बोले, 'औरत को हड़का देने पर भी घर में आ धुसी है। सहदेव मार-पीट नई करेगा तो और क्या करेगा ?' सुन लो बात ।" मालती ने मन ही मन सोचा, सहदेव मारपीट करता तो अच्छा था। मालती को मार डालता तो सारी जलन ही खतम हो जाती। पर वह तो हुआ नहीं। मालती ने आग में जलकर मरना चाहा था। उससे सहदेव ने बचाया, उमर भर जला-जलाकर मारने के लिए। राधी की मां बोली, “अब उट्ठो भाभी रानी, जमीन से उठकर बिछोने पर सो जाओ। मैं कुछ पका देती हूं। गरम-गरम खिचड़ी रांध ६२ , ।
- उठ पड़ी हुई। सिर अब भी चकरा रहा था। चिट्ठी फर्श पर पड़ी पो। मासती ने एक-बार उस ओर देखा। पडी रहे। उसके कठोर अक्षर हमेगा लिए मालती के हृदय पर खुर गए है। कभी भी मिटेंगे नहीं। है। तुम नाजीत दरबने।" गरी गंनी,"नही रात्री दन्त अरबैंक है। मैं नानाजानी।" "कमी दाट माम?" मम अगंका बाहिरको, "को बहोम पुग्न पहीदी. अब माननीसदी कैनेजाजोदोकनस्ता बम के एक मेजोरिकही मरका का? तुन कनकम कार दिन महंगजामी।" मारती मधे गले में बांनी, "महा रहने का अधिकार नहीं है न. राधी को मा में पड़ा रही तांदुम्हारे दादादादू घर की तरफ झारेर भी नहीं । मैं उनका घर को वहाक रहा मुझे ठांव है, वहीं डाने "दादावादू के माय मादन फिर सहाई हो गई तुम्हारी," राशि की मा ने कहा, "इधर-उधर में काना-फूमी में सुना कि तुम दोनों भार में ही मुकद्दमा सह रए हो । नये जमाने की ये बातें भली नई हैं भाभी रानी ! मैं कऊ, तुम सोग मेस कर लो। येई देखो, राधी का दाप मुस्ता होने पर मुझे कितना मारता था, तो हम सोगों ने क्या आपस में मुकदमा नड़ना शुरू कर दिया ? गुस्मा मतम होता तो वई कितना सुहाग करता पा मेरा ! तुमे बी सुहाग मिलेगा भाभीरानी।" "सरको हालत तो एक जैसी नहीं होती, राधी की मा," मासती ने गहरी सारा सी। "जानती हूं. इन नासपीटी ने चुगली कर-करके दादाबाबू के कान भर दिए हैं." राधो को मा आह भरकर वोलो, "नई तो ऐसा बम भोला- नाए ऐमी सोने की मूरत की बेकदरी करता? तुम चिंता मत करना भाभी, सब ठीक हो जाएगा।मा काली को मनोती मानो। मा सम ठीक कर देंगी।" इस सरल-स्वभावा ग्रामीणा के साथ मालती भला क्या तक करे! वह मालती झूम रही थी। राधी की मां ने उसे संभाल लिया । पर मालती जाएगी ही । अव एक पल भी इस घर में नहीं रहेगी। राधी के मां ने कहा, "वात नई सुनोगी? यई सरीर लेकर जाओगी? चलो, फिर वस पर चढ़ा आऊं तुमें।" राधी की मां के कंधे का सहारा लेकर ढुलकती-डोलती मालती बस के रास्ते तक गई। गांव के दो-चार लोगों ने उसे देखा, पर पूरी तरह अपेक्षा कर गए। कुछ देर में ही बस आ गई। मालती ने पर्स से पांच रुपये निकालकर राधी की मां के हाथों में खोंस दिए । बोली, "मिठाई खाना।" बस में चढ़ गई मालती-श्रांत, क्लांत, अपदस्थ, लांछित, परि- त्यक्त। । -- बिंदी बाड़ीवाली प्राणपण से जुट गई-~-मुकदमे में हराकर जमाई के होश ठिकाने लगाने ही होंगे । अदालत के माध्यम से उसे मजबूर करना होगा, पत्नी को वापस लोटा लेने के लिए। "व्याही-सराही बहू ; अगनी की साच्छी में व्या हुआ, ऊपर से रजिस्टरी । 'नई मानता' कैने से ई हो गया? अदालत में जब साव नाक घिसवाकर छोड़ेंगे। व्याही बहू को वापस लेना ही पड़ेगा," विदी ने पीड़ामिश्रित फुफकार से कहा। पर बिंदी की दुश्मन निकली अपनी जाई बेटी । वह मुकदमा लड़ना ही नहीं चाहती। इसीको लेकर मां-बेटी की तकरार हो जाती है । अर्थात्, मां बेटी पर बकझक करती है। बेटी तो ज़बान बंद किए बैठी रहती है। बीच-बीच में एक ही बात कहती है, “बीच बाजार में हांडी टूटी है। पलस्तर से उसमें जोड़ नहीं लगेगा।" सहदेव की बात को ही मालती कातर भाव से दुहरा देती है। पर विदी बाडीवाली इस बात पर कान भी नहीं देती। "हैं वावू, ऐसा कोई बी कानून है कि वेसवा (वेश्या) की वेटीव्या नई कर सकती ?" उसने वकील से पूछा। "पता है मुझे, ऐसा कोई कानून नई है । क्या होता है फराड ? फोरट्वेंटी-जिसे कते हैं ठगना, धोका ६४ wom दना । मैंने पब घोरा दिया जमाई मो? जमाई के बड़े भाई ने मंगेरी से म्या करना न पाहा पा? वो सो सड़की ही राजी नहु, उमे मुग्ला जानकर | जमाई ने सो मय जान-गुनकर शादीमी पी।विटी वासीवामी ने अपने घर, विपिन यमन में ही यूम धाम से शादीशी है। किसे मी लोग न्योता गा गए ।रित वायू मोग आए थे; मारीयातिया माई पी; पाने के बड़े बाबू, धोटे याय, मिपाई मोग आए थे; एमने पायूनोग भी आए पे-पत्तन परोमयाकर पा गए। पाल्टी के नेता भी आए पेयहाँ, मिमीने बी तो बेगयाा अन्न याने में आपत्ती नदी। और, किम समाज में किसीने पुष्कदिया तो पर मतो-ममी पर भी त्याग देना होता है ? रिम दम का न्याय-धरम है ये? उमाई के बड़े भाईगो में मा पर मेंगोई मान नईपी, तो उमाई रोक्यों हो? बलापूर बोलता है कि हममोगों ने धोका दिया है ' में पद कटघरे में पड़ी होगी, पर गाईगी। मेरा चरितर पराव हो सकता है. पर इमोसिए मेरी यात यी भूटी होगी पया? "हाँ, मूट तो हम मय योसती है-दोसार-गुहाग के समय, गवनोगो से पपे-गहने की बगगीस लेने के ययत । गीमिए पा र मापीn माह टूट राहो, जीवन-मरन की बात या पड़ी हो, तब भी में जन सार के आगे झूटी बात बोनूगी ? जज साय बो गया वैमवा, बारी- यामी होने के कारन मेरा बिमधाम नई करेंगे?"विसी याहीवासी वीन से बहती पती गई, "कार में जमाईकी चिट्टियां मी तो है । आहा, क्या मुहागमरी चिट्टिया है ! अचर-अच्छर पानोपविताई है । मरे, सिमान बेटे ने इतनी कबिताई गीगी बरवायू, मब मिष्टा १ मिनेमा पो, नाटक-नायेम को धोकरी, यपन इन्हें पी चिट्टिया दी वरील मायूमो?" मालनी ने मिर हिलाकर बताया, "नहीं।" "पाती है ? गिर पटक-मटरसर गमलाया पाकिपिट्टियां पीसग को दे । नान में गई नई यो मान ? गाव. घिटिया पहले तो पता चलता, जमाई को हमारे बारे में सब कुछ पता पाना पते ही रमने लिया था, 'बीघा में ममता न उनममा है। तुम मेरी लती ने मृदुस्वर में प्रतिवाद किया, "नहीं मां, व्याह के पहले याह के बाद उन्होंने ये लिखा था।" अरे, एक ही बात है। व्या के पले-बाद में होने से क्या आता-जाता - . - . में "बहुत-कुछ आता-जाता है," वकील ने कहा, "कम-से-कम प्रतिवादी तो कह ही सकता है कि विवाह के पहले इनलोगों का असली परिचय लूम नहीं था।" विदी कुछ इतस्ततः करके वोली, "व्या के बाद तो जरूर ई पता चल गया था। जमाई ने चिट्ठी में क्या अडं-बड़े मंतर नई लिखे--'इस्तिरी रतनं दुष्कुलादपि...? ए छोकरी, चिट्ठियां दे ना वकीलबाबू को !" "चिट्ठियां तो हैं नहीं, मां," मालती ने कहा। "लो, सुनो वात !" विदी बोली, "घर पे छोड़ आई क्या ?" "नहीं मां," मालती वोली, "सारी चिट्ठियां उस दिन मैंने गंगाजी वहा दीं।" विदी गाल पर हाथ रखकर बोली, "आसमान से गिराया तूने ! छोकरी, इत्ती सारी चिट्ठियां-सब गंगाजी में बहा दी? अव केस कैसे लड़ेगी ?" "मैं तो लड़ना नहीं चाहती," मालती ने कहा। "लड़ना तो तुझे होगा ई," विदी जोर देकर बोली, "और जीतना वी होगा। जरूरत पड़ी तो मैं जज साव के घर तक जाऊंगी। जाके उनके पर पकड़ लूंगी।" वकील ने धमकाया, "खवरदार, यह काम कभी मत करना। न तो कंटेंप्ट आफ कोर्ट हो जाएगा। अदालत की मानहानि के जुर्म में जाना पड़ेगा।" "वह भी जाऊंगी, बाबू, वह भी जाऊंगी। बेटी के व्या के किस्से लेकर समाज में मूं नई दिखा पा रई हूं। वाड़ीवालियां अफसोस क वहाने मेरा मज़ाक उड़ाती हैं । किरायेदार लड़कियां कैती हैं, 'बेटी की साध तो पूरी कर ली, अब उसे पेशे में लगाकर रुपया कमाओ ६६ - मेरा या मापा नीषा हो गया, और ये पर की दुगमन, ये भीयन मंत्री है कि लड़ाई हो नई करती। मर गई ! निगरे निए पोरी रो, यईहे पोर।" यसीर ने कहा, "प्रय नाम को यात पर आयो । सुम्हारी बान ने मुन मी । तुम जो गवाही देना चाहती हो, मेरा जनिपर गंभेष में, यंगना मे लिंग देगा । उमे मच्छी तरह पढ़कर, संपार होकर आना। कटपरे में ऊटपटांग युछ मत बोलने लगना, नहीं तो अच्छा-मना करा बिगड जाएगा। इगवार मनु दागीमी गवाही है। वही अमन गयाही है । तुम बोनो, तुम्हें गया कहना है ?" मालती ने पहा, "मैं क्या योनू ? मुझे कुछ भी नहीं पहना है।" "ये कमी रात हुई ? तुम्हारे ही विवाह का मुकदमा है । तुम हो गयाही न दो, ये से हो गमता है ? केश तो पहुन-कुछ ठीक गवाही पर ही निर्भर करता है। कोप बगेस्ट मोच । वेग सिर्फ पागज-पा, नील. दरतायेत का तो नहीं है। इसका फैमला इगपर निर्भर करता है किन माहब फिमरी कही हुई यात का विश्वास करते हैं।" "मैं गपाही नहीं दे सरगी।" मासती ने कहा। "यह भी कोई बात है ?" वकीन योले, "तुम्हें र रिम बात का है ? मैं बहो रहूंगा हो । उग पस कारिस्टर उल्टी-मीधी जिरह करे तो मैं एतराज उठाऊंगा। नज गाहय नमे संट देगे। तुम्हें कोईर नहीं।" मासती बोती, "मैं गवाही नहीं दूगी।" "पि.छि ! दो-दो केम है । सम गवाही नहीं दोगी तो कंगे पलेगा? गुना है, तुम नारकों में भाग लेती रही हो, ऑभियन्स को फेम किया है। गोब लो, ये भी एक पियेटर है, और तुम एपिटग कर रही हो।" मन ही मन हम परी मालती, 'जीयन-मरण की समस्या को लेकर नाटकमिटंग?' यह पुप ही रही। हिंदी बोली, "अलयत गवाही देगी ये होरी, यकीनराय । मापने तो मय मुना है । इसे बना योजना है, जरा लिय दीलिएगा, सर रट याएगी। किया-बई पारट रटकर घायद बोल जाती है. ये नई कर गरेगी मला?"
- वाद में वकील बोले, "अच्छा, मेरा जूनियर इसकी गवाही भी लिख देगा। उसे ठीक से पढ़ आना, अच्छा ? उसी से मुकदमा, समझो, जीता हुआ रखा है।" कंसल्टेशन के बाद वे जब वकील के यहां से लौटे, टैक्सी में ही बिंदी वाहीवाली रास्ते-भर वेटी को कथ्य-अकथ्य गालियां सुनाती आई। उसने चिटिठ्यां गंगा में क्यों फेंक दी ? गवाही देना क्यों नहीं चाहती ? यही सव प्रश्न । एक धोखेबाज़ ने शादी के वहाने इतना भारी दहेज मार लिया-रुपये, सामान, कपड़े,घड़ी, अंगूठी, साइकिल । धोखेबाज के होश ठिकाने नहीं लगाने होंगे ? मालती चुपचाप सब सहन करती गई। मित्तर ने कहा, 'सामनेवाले बड़ा वैरिस्टर लगा रहे हैं, हमलोग सिर्फ वकील रखें ? हम भी उन लोगों से बड़ा वैरिस्टर लगाएंगे।" "उससे केस अच्छा होगा ?" विंदी ने प्रश्न किया। "पक्की बात है," हारू ने कहा । "खरचा कितना पड़ेगा?" बिंदी ने पूछा। "वह तो काफी पड़ेगा । दो-दो मामले हैं, सस्ते में थोड़े ही निवटेगा। कितने दिन मुकद्दमा चले, कुछ पता नहीं। वैरिस्टर साहब एक- एक दिन की पचास मोहर के हिसाब से चार्ज करेंगे।" "सत्यानाश !" विंदी बोली, "मेरे घर में तो इतनी मोहरें नहीं हैं। चांदी के रुपये ही नहीं जुटते, सोने की मोहर कहां से आएगी?" हारू रोव डालता हुआ बोला,"तुम सव औरतें, कोर्ट-कचहरी की बातें क्या समझो ? कोई सचमुच की सोने की मोहरें देनी हैं ? उन मोहरों की कीमत देनी होगी कागज़ के नोटों में । एक-एक मोहर की कीमत है, सतरह रुपये ।" "ऐसे भी तो ढेर रुपये लगेंगे," विंदी त्रस्त होकर बोली, "दो मुकद्दमों में इसी बीच कितने रुपये निकल गए।" "मुकद्दमा लड़ने में रुपये बहाने पड़ते हैं," हारू बोला, "छोकरियों को लेकर ऐश करने में कितने रुपये लगते हैं ? तो फिर केस लड़ने में भला रुपये नहीं लगेंगे ? वो क्या मुफ्त में ही हो जाएगा? तुमलोग कुछ भी नहीं ममाती। हो, यकीनया ने कहा है, वरिस्टर माहल रे. या पोपटाकर पीम पुरुयम करया लंग।" "वो या हो जो ?" विदी हेगन पी, "हमनोगों की तरह परिष्टर माह के भी याव होते हैं ?" 'दुरजनामी !"हा बोला,"इस तरह के या नहीं। योतो गाहय में पापं होने है । साहब ये साप-गाय उन्हें भी दक्षिणा देनी होती है।" "मैं भूयं औरत जान, कानग-प्रातून परां से गमा? हो, इनमे हो मुपदमा जीते तो चरिस्टर माहब को भी उजरस दो।" दो-दो मुकदम-उमर नयागे हो रही थी। मासती के पक्ष में पसीना बैरिस्टर थे । पंगा पानी की तरह यहने सगा। एक दिन गिटर मात्र मे पथर मे जगकर ससाह-मशविरा हमा। पितामोपी अलमारियां समरेको पल सफ ऊची पी-मोटी-मोटी मिल्द मी पुस्तके, गय देयने में एक-गी ही सगती थी। मालनी ने कभी भी एम-गाप इतनी पिसावे नहीं देगी पी। यह हरबरा गई। बड़े भारी बैरिस्टर पे-मिटर या सामन्त-श्री पनीट मामन्न । होटों के कोने में लटकता पाएपबा-चबाकर जंगी यगामा बोन रहे पे, यहन-गो यातें मालती को गमा में ही नहीं पा रही पी। वाले गन. कुछ यही पहनेयासी पी। मापती ने मिनमिनाते हुए कहा, "यह गयाही नहीं दे पाएगी।" रोक्दार आवाज में माहब ने उमै एक पटवार सगाई। वसीम गे पहा, "मुवक्रिम हो मगर होस्टाम विटनेग हो जाता है. तो मोटा में जाए अपना श्रीफ।मोटं मलापिग स्टॉक बनाना है हमें " पशील ८ये रवर में बोले, "बचपना है । वम दुग्री है. मोनिए इनना हर रही है।" माहय युग होगर नगी-तुमी हमोहगे-पर-गा. योने,"टोर यी अपड।" गाय ने एक मोटी क्लिाय गोनी। मे देग. पर प आदेग दिया और जूनियरी ने अलमारियो में मोटी-मोटी शिक्षा निराली । एप.एर पर उन अमेरो शिकायों में सुध पड़ा गया, ६६ । कुछ नोट लिए गए, मालती सारे विचार-विमर्श का विदु-विरार्ग भी नहीं समझी। अंत में तय हुआ कि बैरिस्टर साहब जज साहब से प्रार्थना करेंगे कि दोनों मुकदमों की सुनवाई एक ही दिन हो-एक के बाद दूसरा। पुरासे काम में सुविधा होगी। जरूरत पड़ी तो उन्हीं गवाहों को दोनों मामलों में काम लिया जा सकता है । इससे रपये भी कमखर्च होंगे, शंट भी कम होगा । साहब के घर से वे लोग काफी रात गए लोटे1 बैरिस्टर साहब की प्रार्थना मंजूर हो गई । जज साह्य ने दिन तय कर दिया। उस दिन दोनों ही गुकदमे सुने जाएंगे-लिस्ट में एक बाद दूसरा। सुनवाई का दिन नजदीक आ रहा था। कलेण्डर में तारीखें गिनी मलती ने। दस दिसम्बर को सुनवाई होगी। सुबह से सारा पर अदालत जाने को तैयार हो गया। मां की डांट खाकर मालती भी वन-संवर गई । मामूली राज्जा, सीधी-सादी पोशाक । ठीक दस बजे टैक्सी आ गई। हारू मित्तर आवाजें लगाने लगा। बिंदी वाडीवाली ने काली माई के चित्र को प्रणाम किया, मुकदमा जीतने पर दो बकरे चढ़ाने गी मनौती मानी। हारू बिंदी को लेकर टैपसी में चढ़ा। मालती को उतरने में कुछ देर हो रही थी। हारू पोर मचा रहा था। भालती ने इस शोर मी जरा भी परवाह नहीं की। उसने अपना रास्ता चुन लिया था। वह पीछे के दरवाजे से घर के बगलवाली गंदी गली में निकल आई । कूड़े का ढेर पार करके, ठोकर खा-खाकर संभलते हुए, उसने बगल की एक संकरी गली में प्रवेश किया। गलियों-गलियों होती हुई यह बड़ी सड़क पर आ पहुंची। तब तक दस बज चुगो थे। राया पर ऑफिस जाने वालों की भीड़ थी। उसी भीड़ में मालती ने अपने आपको छुपा लिया। उसमें घुल-मिलकर वह पैदल ही चलने लगी। चलना शुरू किया तो चलती ही गई । उद्देश्यहीन-भाव से रास्तों पर भटकते-भटगते यह किले के मैदान में गंगा के किनारे आ पहुंची। बहुत देर से चलते-चलते वह थक गई थी। एक खाली बेंच पाकर वह उसपर बैठ गई। नदी में जहाज, नावें, मोटर बोट छप-छक कर रहे थे । कुली, पलासी, मल्लाह शोर मचा रहे थे। पीछेवाली सड़क पर लॉरियां, बरों, । - , - टेगियां, मारे दोर रही थी। मालती अमहीन भाव से इधर-उधर देय रही पी, तरह-तरह का गौर एक कान में आकर दूमरे कान में निकल जाता था। उमरे मन मे याद गाय-यह मुषदमा नहीं महेगी,नहीं महंगी, नहीं मांगी। गहिर है. नम दिन मानती का मुकदमा पारित हो गया। महदेव के पक्ष में एकतरपा मना हो गया उनका विवाह-विष्टर हो गया। । गिफंगहाती यी गातिर पहानी होती तो यही समाप्त हो जाती। पर माती तो कालनिक नाविका नहीं है-वह तो यपापं है, मापद पटोर यपाय । मम तो यह है सिमालती गे मंग परिचय ही मुगदमा ममाण होने के यादहमा उमीने याकर मुमपर अभियोग मगाया था, "माप यगर कोगिग परते तो मंग पर नहीं टूटता । मापने कोशिश नही पी, सीगे मेरा पर टा।" उगारीमान धारणापी में गदर कर? मालनी भरनी ही पन में बोलती चली गई, "पता है याएको, पर नमाने का मरमान मेरा बहुत पुराना है । म जिम वातावरण में यरी, यहां कोई पानही यमा पाता। पम-भर परिषय, पनिष्टता, सार- गृहाग, मेन-देन, यग । यहत मे बहन यह रिसोई माती बुध दिनल बनकर रहमी। पर यह भी नि दिन? साग का पर टहरा, कभी भी टुट साता है। देगा परसी पी, ही नारी गुण पर मानकर एक गाप गर्म है, गाते है. मतमागहते , प्यार है। मेरी एक दीदी प्याह पार किती गुगी ।। मैंने भी कोशिश कीपी, पर मेरे प्राय में ही गुप नही है।" "तुम्हारी मी, ?" "धनीदीतीनही मंग मोगरीबाग "तुम्हारी मामी भी ?" - । "है क्यों नहीं। देस में-~-मेदिनीपुर में ! मोसी तो मेरी मां की तरह घर से भाग नहीं आई थी। मां ही वेवकूफों की तरह भाग आई थी। मालती अचानक ही मुझसे बोली, "देखिए, मुझे कोई नौकरी दिलवा सकेंगे ? अच्छी नौकरी । अच्छी से मेरा ये मतलब नहीं है कि बहुत रुपये मिलें, बल्कि ऐसी नौकरी, जिसमें मैं अपना सम्मान वचाए चल सकू।" "तुम नौकरी करोगी, मालती ?" "हां ! यह अवश्य है कि मेरी योग्यता मामूली ही है । मैं थोड़ा-बहुत गा सकती हूं, नाच सकती हूं, अभिनय कर सकती हूं, मामूली सिलाई- कढ़ाई, रसोई जानती हूं। पर पढ़ी-लिखी तो मैं ज्यादा नहीं हूं। कैसी नौकरी करूं, वताइए तो?" "तुम तो अच्छा अभिनय कर सकती हो । मेरे नाटक में रूपसी का रोल तुमने बहुत शानदार किया था।" "भटीवृत्ति ?"मालती म्लान मुस्कान के साथ बोली, "अव और नहीं।" "क्यों?" "मैं जो नहीं हूं, वही लोगों के सामने दिखाना होगा ? इस झूठ को जितनी कुशलता से दिखा सकूँगी, उतनी ही तालियां मिलेंगी। पर असल में मैं जो हूं, उसे क्या लोग कभी भी स्वेच्छा से ग्रहण नहीं करेंगे, या चाह कर भी ग्रहण कर नहीं सकेंगे ?" "इसी चिंता में तो तुमने डाल दिया । आत्मसम्मान बचाए रखकर कौन-सा काम कर सकती हो ? शिक्षिका-?" "पागल हुए हैं आप ? दुनिया भर के लोग मेरे पीछे पड़ जाएंगे, खोद-खोदकर कीचड़ निकालेंगे। गंदगी के छींटे उड़ा-उड़ाकर मेरा जीना दूभर कर देंगे।" "सही बात है । रेडियो पर ऑडीशन दिया है कभी ?" "सलाह बुरी नहीं है। एक बार देकर देखूगी, पर उसमें सफल होने पर भी जरूरी नहीं है कि नियमित प्रोग्राम मिलें ही। मैंने पढ़ाई फिर शुरू कर दी है," वह बोली। ७२ मैंने पहा, "पटाई करने में नौकरी मिन हो जाएगी, रवी पा मारटी है ? हजारों ग्रेजुएट, एम०ए०.इंजीनियर बेकार घंटे है। मेरे पाय हो मितने मादमी याते रहते है, मिपाणि के लिए, मटिफिोट के लिए। रिननी ही उच्चशिक्षिता, गुणी मारियां भी आती है । पर नौकरी रिननों को मिलती है ?" "तब मापही यताइए, पया फारू?" मालती हनान होकर योनी । "तुम नौकरी करने की धुन में बगे पडी हो? तुम्हें नौकरी पो जम्तया??"मैंने प्रश्न पिया। "वह क्या रहे है आप? जरूरत नहीं है?" माननी पुग्ध होर योली, "पर मेरे लिए पंद हो गया है । वहा में भागरर जितनी जल्दी अपने पैरों पर गही हो मर-गीमे मंगपल्याण है।" "क्यो ? तुम तो माता-पिता पी इकलौती गंतान हो-" मालसी पितकर योनी,"ौर मत कीजिए—ये गय ममं पो पाते हैं। कभी कभी मन में आता है, मैं पंदा होते ही मर मची नहीं गई? मां के पेट में तो और भी कई माए थे। मां ने उन्हें नष्ट पर दिया था। पर मष्ट होकर ही ये यच गए। म यर फर नष्ट हो रही हूं।" "क्यों, मां के माप परा तुम्हारी बनती नहीं ?" "पिल्लुम भी नहीं। मा पा चाहती है, मेरी ममा में नहीं माना। मापको मैंने अपनी कहानी रहा तक सुनाई है ? ओ-हो, पर में भाग फर मागिनारे बैठी थी, यहा तक ।" "और भी बताया है. दोनो मुरदमों की परिणति के बारे में।" "यह तो मुझे बहुत याद में पता चना । मुनिए न, आगे और पा. सराहमा।" मालती अपनी पहानी गतम करना नहीं चाहती थी । यह आगे मुनाने लगी। एक टेपरेयार होता तो उमली जीवन-यभारंद कर सेता। पर यह तो था नहीं । इसलिए याददाश मे ही में अपनी भाषा में लिग पर सौटने हो माननी ने देगा-मरक्यिो की एक भी वहा मिन- भिना रही है। उनमें में सुध को यह पहचानती पो । उमवी मा को - - किरायेदार थीं वे । वाकी सब चेहरे नए थे। मालती को देखकर कुछ चुपके-से हंस दी, किसीने दूसरी को धक्का दिया, आंख मारी। मेनका नाम की लड़की खनखनाती हुई बोली, "कहां चली गई थी दीदी ?तुम्हारी मां को तो फिट आ रहे हैं । उधर तुम गायव हुई , इधर तुम्हारी मां टैक्सी में ही वेहोश हो गई । बड़े बाबू की चीख-पुकार पर मुहल्ले के लोगों ने आकर उठा-उठू कर उन्हें कमरे में लाकर सुलाया। तकदीर से खबर मिल गई तो लड़कियों को लेकर मैं आ गई । नहीं तो बड़े वाबू कचहरी भी नहीं जा पाते । माधो डाक्टर आया था। नाड़ी देखकर बोला, 'कोई खास बात नहीं है। आंतों में चोट लगी है तो सिर चकरा गया है ।मैं एक पुड़िया देता हूं। थोड़ा होश आए तो प्रांडी पिला देना ।' तुम कहां गई थीं दीदी ?" बिंदी रोज ही थोड़ी-सी ब्रांडी पीती थी, बहुत पुरानी आदत थी उसकी । पर अधिक पीने से उसे नशा हो जाता था । मालती ने कहा, "गंगा के किनारे घूमने गई थी।" "ये धूमने का समय था तुम्हारा ?" मेनका समककर बोली, "मुझे कोई बाबू सौ रुपये भी देता, तो ऐसे समय उसके साथ घूमने नहीं जाती।" "मां कैसी है ?" "वहो 55 त अच्छी । जाओ ना उसके पारा । मुकद्दमे में तो हार हुई है, बड़े बाबू ने फोन किया था कचहरी से । तब से बिंदी मां बकझक किए जा रही हैं । मतलव-वेमतलब मेरे बालों को मुट्ठी में ले-ले कर झिंझोड़ रही हैं । इस नई लड़की संध्या को बार-बार लतियाया-बेचारी पांव दाब रही थी। बिंदी मां का हुकुम है, जैसे ही तुम घर लौटो, हमलोग तुम्हें पकड़कर उनके पास ले जाएं।" "पकड़ने की ज़रूरत नहीं होगी मेनका । चलो, चलें," मालती ने कहा। जैसे अपराधी को गिरफ्तार करके इंस्पेक्टर दरोगा के पास ले चला हो, उत्सुक लड़कियों का झुण्ड भी पीछे-पीछे चला। सोने के कमरे में विंध्यवासिनी एक चटाई पर चित पड़ी हुई थी। ७४
उसकी स्पून काया मगमग नग्न यो। केवलपर : गिर एक छोटा-गा
वरा अगिप्ट मना निवारण पर रहा पा । एकसमी उगी पर
मेया कर रही पी.एक महमी हाय दवा रही पी, एसमोर कोई हाप
के.
पसे मे हया पर रही पो। सनी कम अपगह मे भी पन मा पा पूरी
रोजी गे गल रहा था। पाम ही शराब का ग्राम रा या और बाकी
पोतन मगमग गली होती की।
आहट गुनकर विध्यवागिनी में पता और मिमियाते-गे
ग्यर में योगी, "भो री मेनका, परीफोपी बेटी पर गोटी है। तुम सोग
गत बनायो, उसूध्वनि करो।"
ये गम घापचाप रहीं।
विध्ययागिनी पीय उटी, "मुनाई नही पहा गमजादियो ! म
मजाओ, उनवनि परो।"
सानिया गमयेत कट गे उलूप्यनि परने लगी। मनपा यगल के पूजा-
पर मे गय नाकर बडे उरमाह में बनाने लगी।
"ए चिंता, करमजसी," विध्ययामिनी ने कहा, "पूजापर में पूर.
दानी पड़ी है, पटपट जपा मे। मरीपोरी बेटी के सामने पुरानीगा
नाप तो नाप रे, अंगा इस बार मार्वजनिक दुर्गापूजा में नानी पी।"
निता नाम की लहकी हुक्म की तामीम परने दोद पड़ी।
विवागिनी योनी,"आहा, बार उमा मेरे पर पधारी है. उनगा
मतकार नहीं करना होगा।"
मी थीम चिता पानी जमा माई । पनामा उट रहा पा. घर
की गुगंध फैल रही थी।सारियों ने जगह पनागिगा गारीमा
पल्ला रमर मे योगकर, हाय में धूपदानी मगर उग पोडी-गो मह में
ही मालती गामने नाचने मगो । मालती फरपुनामी की निटिन
होर यही रही विवामिनी रियर बायोगे नाली और देयती
रही।
नाप समाप्त हुआ।
विवामिनी उठवठी। बनावटी मानस में वह बोली, "मारे,
भार मेरे लिए कितनी मोका दिन है ! मेरी पेटी पार भागा।
पोंछ डाल, व्याह की सांकल काटकर | पिंजरे का पंछी अब आसमान में उड़ेगा। पर ये क्या? पंछी की मांग में सिंदूर क्यों है ? वो तो सांकल का निसान है, पोंछ डाल" मालती दृढ़ स्वर में बोली, "ये सिंदूर मैं नहीं पोंडूंगी मां। कैसा भी, कुछ भी हो, मैं नहीं पोंडूंगी।" 'हि-हि-हि-हि-' हंसते-हंसते विंध्यवासिनी लोट-पोट हो गई। "सुना मेनका? सुना चिता? सरीफों की वेटी कहती क्या है ? तुम लोगजैसे कवी-कवी मांग में सिंदूर भरकर बस-टरामपारक-बगीचे में गाहकों का शिकार करने जाती हो, पराई औरत जानकर वावू लोग झट-से फिसल जाते हैं, चारा निगल लेते हैं, वैसे ही ये भलेमानस की बेटी भी तुम लोगों का रास्ता ही पकड़ेगी रे । मरद ने तल्लाक दे दिया फिर भी बहू की सिंगार करने की साध देखो। पोंछ डाल, मैं कहती हूं, पोंछ डाल मांग का वोली, सिंदूर !" 'ना, मैं नहीं पोंडूंगी," मालती अपने संकल्प पर दृढ़ थी। "अरी हरामिन, मुंहझौंसी, खानगी की वेटी," विंदी गुर्रा उठी,"फिर वात टालती है ? एइ चिती, एइ मेनका मेरा हुक्म है, लौंडिया के दुल्हन बनने के सौख को मेट दे। पोंछ डाल इसकी मांग का सिंदूर।" मेनका ने कहा, "क्यों झगड़ा बढ़ाती हो दीदी ? मां की बात मान लो।" मालती ने कहा, "ना, मैं नहीं पोंडूंगी।" "अरी, तुमलोग खड़ी क्यों हो ?" विध्यवासिनी कर्कश-स्वर में चीखी जवरदस्ती पोंछ डालो !" कुछ लड़कियां मालती पर कूद पड़ीं। मालतीने रोकना चाहा, पर इतनी सारी ईर्ष्या से धधकती लड़कियों के आगे उसकी कहां तक चलती ? वह जमीन पर गिर पड़ी। हाथ-पांव मारे, पर पार नहीं पा सकी । लड़कियों ने उसके हाथ-पांव दबोच लिए और आंचल से घिस-घिसकर उसकी मांग का सिंदूर पोंछ डाला। इसी धमाचौकड़ी में मालती के हाथ की शंख की चूड़ी भी खट् से टूट गई। विध्यवासिनी के कानों में यह आवाज जाते ही वह बोली, "अच्छा हुआ संख की चूड़ी टूट गई। दूसरे हाथ वाली बी तो रामोनर चूर कर दो।" मनाने घटपट आमाका पालन किया। विध्यदामिनी ने कहा, "अरे, रामकी लोहे की चुटो भी गोल नी।" मारियों ने जोर लगाकर जबरदप्ती वह भी उतारी सीच-ताल में माननी हापट गया। अब विध्यवागिनी ने मवमे बड़ा प्रहार किया । बोली,"योग मेनका करीशंधोती पनाद, माही गोत ने । उसका विधवा का भम पूरा हो राए पायदा ती पालना होगा। इधर गूटी पर यादू की एक काली किनार की धोनी टंगी है। वई पंना दे मेरी रानी विटिया।" मालनी शो मामों में अगि उमा रहे हैं। पर वह रोई नहीं, हाफने मगीनपिपा ने तब नामकी माड़ो योन डाली थी, वह केवल पैटी. फोटमाटर पहने गरी थी। मनका एक तह को हुई धोती ले माई । मापनी ने कोई पाधा नहीं दी। सडकियों ने उसे धोती पहना दी, मालोजी तरह। वह मधे स्वर में बोली, "बहुत अपमान तो महा है मां । तुम और अपमानों कर रही हो?" "गरम नई याती।" विध्यवामिनी गरज उठी, "मा का मिर नीचा पर दिया । गार ममात्र मे धू-थू हो रई है, विदी बाड़ीवाली की ऊंची ना नानी हो गई है। जो वियो वाडीयाली कभी-बी नईहारी, एक साले घोगेवार छोकरे के भागे उगे हार माननी पड़ी? किसके कारन ? इस रीट, बेअदब सड़की के कारन । समाज में मूदिखाने लायक नई रई।" मारती बोली, "तुम्हारा इतना अपमान अगर मेरे ही कारण है, तो आज में तुम्हारे गाय मेरे सारे संबंध टूटते हैं। तुम्हारे इस घर में मैं पर एक पर भी नहीं रहूगी।" सिंदी वाडीवाली बोसी,"जाएगी यहां रे छोकरी ! भरतार का दर- पाराती बंद है। अब अगर मां का धरवी छोडेगी तो सड़क पर बसेरा ला होगा।" "दद भी अच्छा, पर तुम्हारे इम नरककांड में अब एक बड़ी भी नहीं," मानतो इन परमों में उम कमरे से निकाल आई।
विध्यवासिनी चीखने लगी, "अरी, मत दिखा इतना तेज ! काल ही वकीलबाबू को बुलाकर विल बना दूंगी। एक फूटी कौड़ी वी नई मिलेगी तुझे !" . - । मालती जवाव दिए विना दनदनाती हुई घर से निकल गई। निकल तो आई, पर अब जाए कहां ? शरीर पर विधवा का वेश पास एक पैसा नहीं, कहां जाए ? जान-पहचान तो अनेकों के साथ है, पर सारा मान संभ्रम खोकर वह दीन-दुखी की तरह, किसके घर जाकर आश्रय ले?" एक चबूतरे पर बैठ गई वह । देह तोड़ती हुई रुलाई उमड़ आई। आंचल से मुंह ढककर वह फफक-फफककर रो पड़ी। दो-चार राह चलते लोग इकट्ठे हो गए । कौतूहली दर्शक फुसफुसाने लगे, "लड़की रो क्यों रही है जी ?" एक बूढ़ी बोली, "हाय बचिया रे, इस कच्ची उमर में ही सिंदूर पुंछ गया। रोएगी नहीं भला ?" किसीने पूछा, "तुम रो क्यों रही हो बेटी ? क्या हुआ है ?" मालती आंखें पोंछकर रुधे स्वर में बोली, "मुझे कुछ भी नहीं हुआ है, कुछ भी तो नहीं हुआ है।" वह अचानक उठकर वहां से चल दी। सहसा ध्यान आया, प्रसाद पाल के धोवीघर पर क्यों न जाए आपत्ति-विपत्ति में प्रसाद दा ने उसकी कई वार मदद की है। इस समय भी उससे सलाह करने की ज़रूरत है। तेजी से वह प्रसाद पाल की डाइंग-क्लीनिंग शॉप की ओर चलने लगी। शिरीप যুষ্ঠান लेन के मुंह पर ही थी प्रसाद पाल की 'ग्रेट ईस्टर्न डाइंग क्लीनिंग कंपनी ।' दूकान छोटी-सी थी, पर साइन बोर्ड बड़ा था। दो दरवाजे थे। कांच के शो-केस, काउण्टर और अलमारियों से दूकान जगमगा रही थी। धुले हुए कपड़े वहीं रहते थे। पीछे एक छोटी-सी कोठरी थी । वहाँ मैले कपड़े जमा होते थे। धोबी आकर वहीं से कपड़े ले जाते थे। प्रसाद के चेले जरूरत के अनुसार वहीं बैठकर सलाह-मशविरा करते ? ७८ पेर नाम का एक कम उम्र का छोरा प्रमाद का एकमात्र सहकों पा। वह कपड़े माता पंवारता पायाको मय काम प्रसाद अपने हायो में करता या-हिमाय-विताय मय । दूकान छोटी होने पर भी प्रमाद का पारोवार अच्छा ही पनता पा।इम निपिट मुहल्ले में वि याहीवाली के बेटे प्रसाद के अनेक पृष्ठपोषक थे। तब मध्याका अधेरा पिर आया था। गली की पत्तियां जलने लगी पी। तृप्ति कप. प. गामने प्राहको को भीड़ थी। गलियों में भी मरगर्मी होने नगी पी। गाम में आधी रात तक मुहल्ले की गलिया गुलजार रहती हैं । मरक पर कई का पहाड पहा था। इधर-उधर लडकिया गाहक कमाने के लिए मजी-धजी गदी घो। किमीने माही पहन रखी थी, किमी. ने मनवार-कमीठ, दिगोने घाघरा । यौवनपुष्ट गरीरों में भुलाने-बहकाने की क्षमता थी। जो मोक-मनाई थी, वे भी पोशाक-मजा से, प्रमाधन- वंचिन्न से वीली दियाई देने की कोशिश कर रही थी। इमी धीच कुछ पाहा पाकर लगाने लगे थे। सभी उनों के गम लोग बाते-जाते थे। एर पूरे मजन (?) ने तो बिलकुल नवदीर आकर अनुचित प्रस्ताव किया । मालती बिना कुछ बहे-मुने तेजी मे प्रसाद के धोवीघर की ओर वापसी। नियोन ने मीनी रोशनी से दुकान जगमगा रही थी । वहाँ कोई भी पोदार नहीं था। प्रमाद हिमाव का रजिस्टर लिए बैठा था। एक पीये पहा-या मने पपरों में उलझ रहा था। मारतीको विधया के येश में देखकर प्रसाद भौचक्का रह गया। "यात क्या है ?" प्रमाद ने पूछा, "तुम्हारा यह वेग?" "मब बताती हूं," मालती योती। फिर एक की तरफ इशारा करके जाहिर पिया कि उसके सामने बनाना नहीं चाहती। प्रमाद ने पूछा, "गरम चाय पियोगी?" "गि पाप ही नहीं," मालती ने कहा, "पिसा-पिला ही रहे हो, सो पेट भरकर पुध पिलामो प्रमार दा। दोपहर मे कुछ भी नहीं गाया प्रमाद ने हाँक सगाई, "B. 'तृप्ति कफ से घरपट दो कप चाय - और दो मटन कटलेट ले आ। मैनेजर से कहना, अच्छा माल दे, परसाद भयाने कहा है । हां, मालती, मिठाई खाओगी ? एइ छकू, सुभद्रा मिष्ठान भण्डार से दो राजभोग लेते आना । ले यह दस रुपये का नोट । ठीक से हिसाव करके लाना।" छकू उत्साह से चल पड़ा। "अच्छा ही हुआ। आज मेरे ऊपर से मानो तूफान गुज़र गया है।" "हुआ क्या, यह तो बताओ," प्रसाद ने कहा, "इतनी भूमिका किस बात की है ?" मालती ने संक्षेप में सारी घटना बता दी। सुनकर प्रसाद चिंतित होकर बोला, “चाकई, बड़ी मुसीवत पड़ी आज तुम्हारे ऊपर । अब क्या करोगी ? जाओगी कहाँ ? "वही तो सोच रही हूं," मालती ने कहा। "दो-चार दिन में मौसीजी का गुस्सा जरूर शांत हो जाएगा। पर इन दो-चार दिन भी रहोगी कहाँ ? मां के मकान में एक कमरा कुछ दिन से खाली है, किराएदार नहीं है कोई । वहां रह सकती हो कुछ दिन । हां, आस-पास के कमरों में लड़कियां रहती हैं।" "ना, ना, मैं किसीके घर में नहीं रहना चाहती," मालती ने कहा, "अगर किसी होटल में इंतजाम हो सकता लेकिन उसमें तो खर्च बहुत होगा।" "वह तो तुम मुझसे उधार ले सकती हो, पर इतनी रात को सुविधा- नुसार होटल कहां मिलेगा? एक काम करता हूं। तुम खा-पी चुको । तव दूकान बंद करके तुम्हें लेकर सियालदह चलता हूं । देखू, शायद किसी मुसाफिरखाने में जगह मिल जाए।" मालती बोली, "इतना झंझट क्यों करोगे? आज की रात मैं तुम्हारी इस दूकान की पीछेवाली कोठरी में ही रह जाती हूं। तुम्हें कुछ असुविधा होगी क्या?" "मुझे भला क्या असुविधा होगी ?" प्रसाद बोला, "मैले कपड़ों की बदबू के मारे तुम्हारा ही टिकना मुश्किल होगा।" "दूकान बंद होने पर इस लंबी टेबल पर भी मैं आराम से सो सकती है," मामती ने कहा, "और मकान-मालिक का मंहास-गुमलगाना तो तुम्हारी पान के पीछे ही है।" "यह तुममे नही होगा," प्रमाद बोला,"तुम्हें बड़ी तकलीफ होगी।" "एक रात की तो बात है." मालती बोली, "समान लूगी, किसी स्टेगन के येटिंग-रूम में रात बिता रही हूं।" "तुम अगर रह गयो, तो मुझे आपत्ति नहीं है । सुवह दस के पहले तो वैसे भी दूकान नहीं गोतना है। मुझे कोई दिक्षत नहीं होगी।" "पसो, याज की रात के लिए तो चिता मिटी," मालती आश्वस्त होकर बोली। टर पाने-पीने का मामान में आया। मालती बोली, "इतना सब मैं मरेसे में गागी सुम भी याओ प्रसाद दा!" "मन्टा, अच्छा, मैं एक कप चाय ले लेता हूं।" "यह नहीं होगा। तुम भी सो। और मैं राजभोग नही पाकगी। ये दोनो एक में से । उमने मेहनत भी बहुत है, है ना?" "नहीं भून दो," एक पता हुआ बोला, "मैं ये सब नहीं पाता।" ","प्रमाद ने कहा, "देश या तो, पौधे का नहानपर माली है पानही ? हो, तो होग से एक बाल्टी पानी निकालकर रख दे । और अजितमी दूरात मे घटपट कोई अच्छा नहाने का साबुन से मा। तेरी गन्दी हाप-मुंह धोएगी।" पहराम को तामील करने दौड़ पड़ा। "तुम्हें पह वेग मी बदलना होगा भून," प्रसाद ने कहा, "यह मुझे बहुत पुरा मग रहा है।" "पर मेरे पाम कर रहा है ?" मालती विवृत होकर बोली, "मैं तो तन कपड़ों में ही निकल आई है।" "धोबी के पर में पड़ी को क्या कमी ?" प्रमाद बोला । एस.पैकेट शेरी योमहर उमने तारो धुपी, इग्नरोकी हुई नीली माड़ी, पेटी- कोट, मोहिग और माउज निकासकर उमे दिए । एक घुला हुमा तोलिया मो दिया। मालती हिचकिचा रही थी। प्रमाद वोमा, "तुम्हें कोई गदी पोर देमरताहमया? ये मेरी दीदी मे ८१ , कपड़े हैं। यहां धुलने के दिए थे। दो-चार दिन वाद लौटाने से भी चलेगा। तुम्हें ये फिट भी बैठेंगे । नहा-धोकर आकर आराम से खाओ। देर मत लगाना, चाय ठण्डी हो जाएगी।" छकू सावुन ले आया। मालती अब और नहीं हिचकिचाई । सब लेकर स्नानघर में चली गई। सिर्फ शरीर पर ही पानी नहीं डाला । जाड़े की रात होने पर भी सिर पर ठण्ठा पानी डालकर मालती को बड़ा आराम महसूस हुआ। झटपट स्नान करके, बाल फैलाकर वह दूकान वाले हिस्से में भा गई। प्रसाद किसी ग्राहक को धुले हुए कपड़े लौटा रहा था। पैसे कैशवक्स में रखकर बोला, 'लोगों को भी टाइम-बेटाइम का कुछ होश नहीं है । जब- तब आ जाते हैं तंग करने।" उस आदमी के जाने पर मालती काउण्टर के पीछे आ गई। प्रसाद ने कहा, “उतारे हुए कपड़े रखो। मैं कल ही अर्जेण्ट धुलवा दूंगा।" मालती प्रसाद की कुर्सी पर बैठकर खाने लगी। प्रसाद सड़क की ओर पीठ करके काउण्टर पर ही बैठ गया। दोनों आपस में बांटकर खाने लगे। खाते-खाते कोई खास बात नहीं हुई। गली में से पुलिस की एक गाड़ी मुहल्ला कंपाती हुई निकल गई। उसके कर्कश हार्न से संकरी गली गूंज उठी। यह आवाज सुनकर शिकारी लड़कियां अपने-अपने घरों में जा छिपी । एक लड़की चकराकर खड़ी ही रह गई । एक सिपाही सटाक् से गाड़ी से उतरा और चटपट उसे गाड़ी पर चढ़ा दिया। लड़की अश्राव्य गालियां बकने लगी, काटने-नोचने लगी। पर उस वलिष्ठ देह के आगे उसकी एक न चली। ये रोज़ की बात थी। रोज ही थोड़ी-बहुत धर-पकड़ होती है, नहीं तो शांतिरक्षकों की इज्जत नहीं रहती। थाने के जमा-खर्च में तो घाटा पड़ता ही है. ऊपरी आमदनी भी बंद हो जाती है । वाड़ीवालियां उपयुक्त दक्षिणा और जुर्माना देकर अपनी किरायेदारों को छुड़ा लाती हैं । यह भी व्यवसाय का अंग ही है । पुलिस की गाड़ी जाते ही लड़कों का एक दल प्रसाद की दूकान पर आया । ये मुहल्ले की युवा-सेना थी-प्रसाद की भक्त । भोस्ता, जेदो, झण्टा, घण्टे, हिटलर और भी कई लड़के । शोर मचाते हुए उन्होंने अभि- ८२ .
योग मगाया, "पुलिस पोरगर्शिवानी ही जा रही है। पर तो मगला है. दो-पार पतुए भाई रिना माले टर्ग नही होगे । पंगुण, भपात बम । पुनिग राय मषियों को ही नहीं पानी, गरोफों भी दरेगावरती है। उस परर म मो गई तोहरमन यतो जाएगी।" प्रमाद ने कहा, "पंनुमो की बार छोर। परा गया तो मंत्री मीवार को हो जाएगी। उम पार मोरम मनाने में मट पाहाप ही उस गया था। रितनी परेशानी हुई पो उसे भगाने में । उगगे तो मामान राना है, दुट-एक हारिया, अमली पतुए मारियोंगरार करना। इसके लिए पारिट्ठा करना होगा।" हिंगर ने कहा, "इतने पर भी मगर हुमत पर नहीं हुई तोदमा- दम दुध पटागे सारगे। उगमे हाप भी नही उगा, और सबो माया भी नहीं होगी। हद हद होगी-पाने में पिटाई, विजनी गटक भोर दिनोगी।" प्रमाद यात परटने के लिए बोला, "जानने हो, तुममोगों की मन दी माजगत इगो दूकान में रहेगी।" भोन्ता योला, "क्यों ? दिल्ली के हाप से मरने के लिए ?" "हट् मेयरफ," प्रगार मोला, "तेरो मन दो यम-मागे माहती हैं या हिनालपना करती है ? यह अच्छी मायो है।" "यह तो पता है," मोन्ता ने कहा, "मीमे तो पात ममा में नही माई।" प्रगाद ने कहा, "मागे नया गडा हो गया है।" भोला योना,"हा है तो होने दो। बारुर समुरास में रहें।" प्रसाद ने कहा, "यह वारा भी बद है । आर के मुकदमे में इना समार हो गया है।" हिटसर नेहा, "तभी माग मे मिदूर नहीं दिखाई दे रहा है, न हायों में गणको पूदियो । मन दी, एक बार हम दो, हमसोग तुम्हारी मगुरान के दरवाजे तोड़ भाए। मुरहमा-उपदमा हम नहीं मानते । म एक बार यह दो, हम उम माले बहनोई को हाय-पाव टापर मार तुम्हारे परोमे गत देंगे।"
नेपो है- इतने दुख में भी मालती को हंसी आ गई। वोली,"कोई जरूरत नहीं है बहादुरी दिखाने की हां रे हिटलर, उस वार क्लब के केशव दत बाबू को रॉड से किसने मारा था रे ?" "बताऊं?" हिटलर सिर खुजाने लगा। "मुझे भी नहीं बताएगा ?" मालती ने कहा, "मैं तो तुम लोगों की दीदी हं ना।" "नेपोलियन," हिटलर ने कहा । "नेपोलियन ?" झूनू हैरत से बोली, "नेपोलियन को मरे तो जमाना हो गया।" "धत्, वो तो नौटंकी का नेपोलियन था, "हिटलर ने कहा, कहा,"ये हमारा -निरमेंदर । हम उसे नेपोलियन कहकर ही पुकारते हैं । जब तुमने परसाद दा को बताया था कि क्लव के उन कप्तान बाबू ने थियेटर में तुमसे जबरदस्ती करने की कोशिश की, तो सुनते ही हम लोगों का खून खौलने लगा। झूनू दी का अपमान ! कप्तान हो या और कोई, कुत्ते के वच्चे के होश ठिकाने लगाने ही होंगे। हमलोगों ने तय किया, उसकी अच्छी खबर ली जाएगी। ताक लगाए रहे हम ! उसके आफिस का पता लगाया । उसे पीछे-पीछे फॉलो किया। एक बार अकेले में मिला, बस! साला नेपोलियन गुस्से से पागल हो रहा था-धम् से सिर पर रॉड चला दी। उस आदमी ने हाथ से वार रोक लिया, नहीं तो सिर हो जाता फट्ट ! इन वन सेकेण्ड यमराज के घर पहुंच जाता।" "उस आदमी को मारकर ठीक नहीं किया भैया," मालती बोली। हिटलर बोला, “तुम नाराज हो गई झूनू दी। अच्छी बात है, हम लोग पराश्चित करते हैं । एक बार उस बहनोई साले को टांगकर लाकर तुम्हारे पैरों पर डाल देते हैं। साला जब तक तुम्हारे पैर पकड़कर, तुम्हें मना-मनूकर घर नहीं ले जाए, उसकी जान नहीं छोड़ेंगे हम।" "रहने दे भैया," मालती म्लान हंसी हंसकर बोली। "भई तुमलोग अब और झंझट मत बढ़ा देना," प्रसाद ने कहा, "जाओ अपने-अपने घर लौट जाओ। फिर हल्लागाड़ी ने आकर तुम लोगों में से किसीको पकड़ लिया, तो मुझे जमानत के लिए थाने दौड़ना - ।
परमा।"
"सभी गेही पर मौट जाएं ?"न्याने. "म मोपेगी, जागे
उन्सी पर लौट
यार पारेकोमगार-गार मा गया।
यीदवाई पिला देगी।"मरमर टाराइंग पर।
गों ने पहा,"पलपन, हम मांग भोला पर पर
कारपदेर गण मनाए।"
हिटलर ने 1, "रानी पर आरमारी मांग मागे
भागेगेगा मोदी पर पागो। न दी हेंगी नाकामी पानी
जी मगर घर-उपर नार-मांग करनोमाने गारदीग।"
मिफंयही रानी, मौरीपगर्ने माली ने भयो उम जोगीपर में
विताई। दिन शतिम समय यह गडगो और पारी में पारिता
देती थी। गत होने पर इमरान मे भाषय मेनी भी। सभीनमी प्रमा
माहिमाया रविष्टर भो ममान मेनी को मारी भार
तरह तरह हपी-मजाक गे वातावरण पुरवार रणता पा। उनमें
मेमोईनोई रात भोजन दो की पहरेदारी भी करवा पा मगर
मरदरवार में भी देरादेले दिया।
एकदिन प्रमाद ने पहा, "जानती हो नु, नरेग बीम पर हा
पा, मुरारमेश पतरपा पंगपाहोने पर उमे पनौतीही गमती ।।
ममी भी गमर है, मुरारको नए गिरेगे मनवाई हो मस्ती। मरे
मिए दरगान जमर देनी पडेगो, परंभी गमगे।"
मानती हा भाव में बोली, "क्य मर रही गरि
पुग्दार पून उराई जाए व मुदमा नही मागी प्रमा।'
गापरषा रहा, पिरोना, "कर मर में नपुर
पारगे मुमाराम हो गई थी।पान नर पर मं निकग ~मार्ग
मास मूहुई। मगा मारो माना गये।"
मारती बोगी, "रहने दी ये गर पाने ।
पर्माना
मेना?"
? - प्रसाद बोला, "पूरी बात तो सुनो, नाराशगयों हो रही हो ? सुमसे पूछा नहीं था, पर मैंने उगरो गाहा, "ये सब क्या हो रहा है नगुलबाबु बापू जैसी लड़गी को तुम लोगों ने त्याग दिया ? तलाक पारवा दिया ?" उराने गहा, "तलागा हो गया तो गया हुआ, शादी फिर से हो सकती है।" मैंने कहा, "शुन अव भी राहय से प्रेग गरती है।" गगुल ने कहा, 'तो सहदेव को साथ ही फिर से शादी हो सकती है। मैंने गाहा, 'ये नगा बारा हुई ?' गगुल बोला, 'एक बार गैरे ही गादी पारपाई थी, अगर मैं चाहूं तो दुवारा भी फरया रागाता हूं। मैंने पूछा, 'सो कसे ?' यह बोला, विदी ठगुराइन अगर एका पालापर मेरे नाम लिखा दें, तो मैं फिर बात पलाऊ ।' 'गुस्से में आकर मैंने साले नगुल गो पह यह गालियां सुनाई हैं, गि याद रखेगा। फिर भी उसकी बात सोष देखने लायक है।" "दरा आदगी पर फिर से विश्वास करू ?"गालती बोली। प्रसाद ने कहा, "ये बात तो सही है।" रविवार को प्रसाद की दुकान बंद भी। यह किसी काम से गालगत्ता बाहर गया था। दुकान का दरवाजा बंद गारगो गालती ने सारा दिन अंदर ही बिता दिया। शाम होते-होते गा-हारा प्रसाद लौटा। हताश-भाप से मालती की ओर देर बोला, "ना, नहीं हो रागा।" मालती ने पूछा, "गया नहीं हो सका प्रसाद दा?" "यह आदमी किसी भी तरह राजी नहीं हुआ।" "कौन आदमी ? गिरा बात पर राजी नहीं हुआ?" प्रसाद चोला, 'गगुगुलबान की बात मैं ऐसे ही नहीं टाल सका। सोना, एगा बार जांचगार तो । इसीलिए तुम्हें बताए चिना आज मैं धरा से गुरणााम गला गया था।' " 'उनरो' मिले ?" गालसी उत्सुगाता गो दवाती हुई बोली, "गौसे हैं थे?" "अच्छा ही है," प्रसाद ने गाहा, "तुम्हारी बात उठाते ही टाल गया । आइआर एट धान उपजागार प्रादया जीता है, स्पून गो दसयों गलारा राफ की स्पीति मिल गई है. यही राय बम-बग पारता रहा । ५६ . - मागिर मैंने उसे दयावर पारा महा, 'तुम पन मे फिर मादीपरतो।' उमने पहा, 'दास, टूटी मटरी में जितना भी पलस्तर सगाओ, वह jांगी नहीं।' "तुम मेरे लिए अपमानित होने वो गए प्रसाददा?" मालती मृता भाष में धोनी1 "इममें मान-आमान की क्या बात है?"प्रसाद ने कहा, "लेरिन सह- देव माते हपने एक सारी किराये पर लेपर दहेज का सारा मामान मय मारहिसके मोटा रहा है। दहेज में नाद रपये तो प्रायः सभी यचं हो गए है, यह पोड़ी-सी जमीन बेचकर यह रकम भी तुम्हारी मां को तोटा "हमारा कोई भी ऋण नही रमेगा वह अपने ऊपर ?" मालती कुछ उत्तेजित होकर योनी। प्रसार पप रहा। कुछ दिन बाद हारू मित्तर स्वय मा पहुंचा । इधर-उधर करके वह मालती से बोला, "मून बिटिया, ये क्या अच्छी बात है ? तुम्हारे जैसी सड़की नने दिन से धोबीपर में रह रही है।" "बों? मैं सो मजे मेंहू ?" मालती बोली। "ऐमा भी कभी होता है ?" हासने कहा, "तुम्हारा यह सुन में पसा गरीर. ऐमी जगह नहीं रह सकता है ? तुम मोट चलो बेटा मैं तो ममाव में मुंह नहीं दिया पा रहा हूँ।" मासती बोली, "यह भी पूब रही । 'दे' कहते थे, मैं तुम्हारी वजह से समाज में मह नही दिया पा रहा है। मां ने कहा, 'तेरी वजह में ममार में मुंह नहीं दिया पा रही हू ।' और अब नुम भी वही बात यह हे हो। पर तो मरा परमय?" हार ने पहा, "वह महदेव तुम्हें त्याग माता है, पर मैं से पाय टीक है, तुम्हारे माप मेरा गुना रिमा न मही, पर एक वन टी है। हुम्हारी मापा-यह हैं। तुम्हारे नाम में मेरा गुलनार गुहा है।
वस, वही एकवार वह मेरे पास आई थी और इसी एकवार की बातों उसने अपना हृदय खोलकर रख दिया था। कई महीनों बाद, एक विशेष उपलक्ष्य में मैं विपिन यश लेन में उन गों के घर गया। पर मालती मुझसे मिलने नहीं आई। कह भिजवाया :, "उनसे मिलने में मुझे शरम आती है, मैं मिल नहीं सकूगी।" . कई महीनों वाद की बात है। उसीसे कहानी का उपसंहार करता हूं। मैंने कुछ मित्रों से मालती के उपयुक्त कार्य मिले तो बताने को कहा । उनमें से कोई भी सफल नहीं हुआ। इसीलिए मैंने भी मालती से कोई संपर्क नहीं किया। वह भी मुझसे मिलने नहीं आई। इसके अलावा कार्याधिक्य के कारण मैं मालती की बात लगभग भूल ही चला था। अचानक एक दिन एक अपरिचित नवयुवक आया। गोरा रंग, भरा- भरा बदन, हृष्ट-पुष्ट, मझोला कद। चेहरा कुछ पहचाना-पहचाना-सा लग रहा था। उसने आकर नमस्कार करके कहा, "मुझे पहचान रहे हैं ? मैं प्रसाद पाल हूं।" "अब याद आया, मालती से उसका नाम कई बार सुना है। उसने विपत्ति-आपत्ति में मालती की बहुत सहायता की है । वह भी एक वाड़ी- वाली का बेटा है। पर इस बात को मैं विशेष महत्त्व नहीं देता। मैंने उसे बैठने को कहा। फिर शिष्टाचारवश पूछा, "क्या बात है भाई ?" 'हमारे मुहल्ले में सार्वजनिक कालीपूजा हो रही है," प्रसाद ने कहा, इस बार हमने इसे खूब धूमधाम से मनाना तय किया है । हम चाहते हैं, आप उसकी उद्घाटन सभा के प्रधान अतिथि बनें।" "कब होगी वह ?" "कई लोग पहले ही कर लेते हैं," प्रसाद ने कहा, "पर हमलोग पूजा के दिन की शाम को ही सभा करेंगे। ठीक साढ़े छः बजे। उसके बाद पंडाल में एक जलसा होगा। आप आएं तो हमें खुशी होगी।' मैंने डायरी देखकर कहा, "ठीक है, ये समय मेरा खाली है । आऊंगा।" । ६४ दिन गुरंग में तुझे पता नई क्या-गग के गर्ग, मुझे होगा मईया । इमो. लिए उस भेनका की बच्ची को मैंने गृव मारा है। करी ने मेरी यात मानकर तेरी ऐगी दुरदशा मयो को ?" मामती भी मां मे मिपटकर रो पड़ी थी। विध्ययागिनी ने आगे पोहसर बहा, "यह सब पाट-बचाइ, मह मामान सेगही है। जो पगद हो, रण सेना, जोरहा हो बेच देना।" मानसी योनी, "यह गय होता रहेगा। दो दिन बाद गोप-विचार करम मम पिया जाएगा।" फिलहाल नीपेक्षालान में मारा गामान गवा दिया गया। भलं. मारी में मामती के गारे पपटे-गहने मौजूद थे। महदेव ने अपने हायों में लिस्ट बना दी थी। अपने यह भाई पर उसे विनाम नहीं था। बहा पा, प्राप्ति के प्रमाणस्याप मानती के हाथ की गही करया माए। विघ्न- वामिनी ने स्वप मारी निट मिला ली थी। मय टीकपा। यह उमने जरूर पहा, "प्रमाई ने अपने गारे पर रग लिए हैं । हो, पढी और भगूठी उमर मोटा दी है ।" मानती ने मन ही मन मोबा, 'मां का दिल इतना छोटा क्यो है ? हर समय कोटी-कोटीका हिमाय ।' मालतीने हाप की सियाई यापम नहीं मोटाई। अपने हापो उमसी एक प्रतिमिपि बनाई। मीपर मही करके नएल के हापो में उगने नोटाया। गाल के पाले जाने पर मानती ने मो मे कहा, "एक बात यह पहले महो किनारा नही होलोगी।" "या यात है, रे "विदी ने गुम होकर पूटा । "गोप रही है, गाइरिल प्रगादा को दे दी जाए तो कंगा रहे." मामसीने पहा। विदी मह बनाकर योनी, "जंगे मित्राउ है उमरे, मेना मसरारे तर है।" "मच्या में एक बार पूछकर तो देगू," मानती ने बहा। मा के गाय गुना-गर हो जाने पर भी मालती को गानि नही मिली।ग वार अगाशि मूवपान पिया, हार मित्तर ने । प्राइवेट मंदिको परीक्षा देने का इरादा करसे. मालती ने पिता । खरीदकर फिर पढ़ाई में मन लगाया। स्कूल की पुरानी सहेली कावेरी ने वहुत पहले ही वी० ए० की पढ़ाई शुरू कर दी थी, पार्ट-वन पास भी कर चुकी थी। मालती भी नियमित पढ़ती रहती तो यहां तक पहुंच जाती। उसके साथ संपर्क करके मालती पढ़ाई का ढंग समझ ले रही है । अपने कुछ तैयारी कर लेने के बाद प्राइवेट टयूटर रखने का इरादा है उसका । पर मुसीवत आई हारू मित्तर की तरफ से । हारू मित्तर नहीं चाहता था कि मालती पर बैठकर केवल पढ़ाई-लिखाई करे। वह गा सकती है, नाच सकती है, अभिनय कर सकती है । ये गुण जंग खा रहे हैं । यह उचित नहीं है । मालती फंक्शनों में जाए, नाचे, गाए, एक्टिंग करे-इसीसे उसे संसार में थोड़ा सहारा मिलेगा, यही था हारू मित्तर का प्रस्ताव । प्रस्ताव तर्कसंगत था । क्लब में एक नए नाटक की तैयारी हो रही थी । वेणीदा गए थे, मालती को हीरोइन का पार्ट देना चाहा था। कट- कटाकर दो सौ रुपये और यातायात का खर्च दक्षिणा में दिया जाएगा। मालती तैयार नहीं हुई। वेणीदा नकद तीन सौ तक तैयार हो गए थे। पर मालती ने वह प्रस्ताव ठुकरा दिया। और भी कई क्लव और मर्चेण्ट ऑफिस संघ कई दिनों तक मालती के पास अपने प्रतिनिधि भेजते रहे। मालती ने कोई भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। हारू मित्तर ने हिसाव करके देखा, एक माह में मालती ने लगभग तेरह-सौ रुपये के कांट्रेक्ट खोए । वह गुस्से में गजबजाने लगा। यहां तक कि उसने विंध्यवासिनी से भी शिकायत की, पर उधर से उसे कोई समर्थन नहीं मिला । हारू मित्तर कुछ दिन चुप रहा। कुछ दिन बाद वह एक प्रस्ताव लाया। केतकी प्रोडक्शंस नामक एक नई फिल्म कंपनी बनी है । सुना है, वे. लोग ताराशंकर के उपन्यास पर फिल्म वनवाएंगे। एक साइड पार्ट के लिए मालती ट्रायल दे सकती है। पसंद आई तो वे मालती को काफी रुपये देंगे। मालती का मन भी ललचा गया था। वोली थी, "दो-एक दिन में सोचकर जवाब दूंगी।" पर अंत में उसने इस प्रस्ताव को नकार ही दिया था। पर हारू मित्तर सबसे आखिर में जो प्रस्ताव लाया, उसे सुनकर मालती स्तंभित रह गई। श्रीवास्तव नामक एक उभरते हुए व्यवसायी ने । नमा बाम गोना पाटीट पर उमा मजा-गजाया ऑफिग है माम पनि एमपोटं गा । यदल-गे यह-यह आदमियों में गाय प्या- पार पर है। हार मिसर में गाय भोयर उगमा परिचय बढ़ पना यौपानव एकोगिपार रिमप्यनिस्ट की तमाम में पामित्तग्याय मी मावी की बात उठी तो यह मगभग तैयार हो गया। भालती मी सम्योर देगार तो गेनोपरी पर यहाल करने के लिए यह तत्पर हो उठा। नामसापा, और सनायाह भी अच्छी-गामी पी। माद पार गौ से शुरू माम राम अनाया अलाउग पे-दुल मिलाकर Tr.गुरू में ही सारे गौ रपये परवाएगे। प्रस्ताप गुनगर मालती यह उल्लगिन हो उटी विध्यवामिनी भी राशी थी। पर प्रगादगे बात करने ही यह बोला, "हार मिगर पारया मादमी है। पहले मैं मय तमाम कर स, तब जवाब देना।" • प्रमाद एक दिन ये. अदर ही जो गयर माया, वह भयानक पी। श्री. वास्तव महासान पा। फारवार के बहाने वह काल गलं की दलाली परता है । माफिम उगमा नाममात्र के लिए है। रिहान-रूम में मोपा- पमा रया है । प्रापिग-रूम मे भी दीवारों में पुमे हुए फोम-रवर के पर यहा महत-गी माधुनियाए माती है । जो प्रगिट लोग मम्मान की पातिर निषिद मुहल्लों में नहीं पा पाने, उनमे से अनेक यही जाते है। वहीं मामती के लिए काममा प्रस्ताव माया पाहार मिसर । मासनी बोहार मिसर पर गुस्मा माया । गुम्मे की मोर में बहुत- एप भला-पुरामह गई। हारू मिसर भी चुप नहीं रहा । योला, "बैठे. बंटे भरोमकर तो मुटा रही हो। जवानी क्तिने दिन रहेगी इगी उमर में समाई नहीं की, सो और पब करोगी?" "मेरे पितामहलाते हो..." मामती उफनार योसी,"यह गदा प्रस्ताव माप तुम्हें मना नहीं माई ?" "प्रण्टा मेरी मती-माध्वी की बेटी मीता-दमयती।" रिपपरो हुए गोला, "मासम तो नई अमानी याप गर गडे होकर मागीको पटार सदर में पंसा बगूमते हैं । मैं तो फिर मुहयोला गप - हार मित्ता - , मालती गुस्से को रोक नहीं सकी । उसने हारू मित्तर के गाल पर तड़ से एक तमाचा जड़ दिया। "तुमने मुझे मारा ? तुमने मुझे मारा ?" हारू मित्तर सिर नीचा करके चला गया। ये सब बातें किसी भी पक्ष ने विंध्यवासिनी को नहीं बताईं। मालती ने केवल इतना ही कहा, "वहां नौकरी नहीं करूंगी।" कुछ दिन से मालती मास्टर की तलाश में थी। उसने अखबार में विज्ञापन भी दिया था, पर सही आदमी नहीं मिल रहा था। इस मामले में प्रसाद भी विशेष मदद नहीं कर सका। हारू मित्तर ने एक दिन कहा, “एक वी० ए० पास लड़का है। पहले मास्टरी करता था, अव मर्चेण्ट ऑफिस में अच्छी नौकरी करता है ! उसे जात्रा-थियेटर का भी शौक है । मालती तैयार हो, तो वह रोज़ आकर पढ़ा सकता है।" आजकल मालती हारू मित्तर के किसी भी प्रस्ताव पर कान देना नहीं चाहती। फिर भी विध्यवासिती ने कहा, "एकवार मास्टर को आजमा कर देखने में हर्ज क्या है ?" जिस शाम को नए मास्टर के आने की बात थी, उस दिन मालती ने पहले से ही अपने कमरे में पढ़ने की मेज़ पर किताबें जमा-सजाकर रख लीं । मेज़ पर अपने हाथों से काढ़ा हुआ एक मेज़पोश भी विछाया। खुद भी साफ-सुथरे कपडे पहनकर तैयार हो गई। हारू मित्तर मास्टर को लेकर कमरे में घुसा। नवागत व्यक्ति को देखकरमालती स्प्रिंग की गुड़िया की तरह तड़ से उछल पड़ी। उसने बिगड़- कर कहा, “यह क्या, केशवबाबू, आप यहां ?" केशव ने कहा, "क्यों, तुम्हें पता नहीं था कि मैं आऊंगा ?" "बिलकुल भी नहीं," मालती ने कहा, "मैं आपका मुंह भी देखना नहीं चाहती । जाइए, मैं कहती हूं, निकल जाइए !" "यह कैसा व्यवहार है हारूबाबू ?" केशव गुस्से में बोला, "अपनी लड़की से अपमान करवाने के लिए ही मुझे बुलाया है ?" हारू बगलें झांकता हुआ बोला "मुझे तो पता नहीं था कि आप लोगों ૨૨ 1 में पहले से ही जान-पहचान है । इन देतो. शिरगफिन Int उनकी मास्टरी की योग्यता को एक बार परेको हो। मालती अनशनाकर बोली, "तुम चुर हो, स्लोर पर रही हूं। केशव बाबू, आप सीनी रहा है ना हो है, पर मचाकर मुहल्ला इकट्ठा कहं?" केशव भी छोडनेवाला नहीं वह गेला, Sोने कराने के लिए ही क्या आपने मुझने पांच-नो रेत निर:" "क्या मतलब?"मामती ली। "मुझसे तुम पड़ोगी-याने बातचीत करो इसके रिसर करने की शर्त पर इन्होंने मुझसे पाच-सौ रूपनिर है." देश इसर में बोला। "झूठी बात है बिलकुल । मैंने तो पाच-सो सरेका भार समय आने पर चुका दूगा," प्रतिवाद में हारू मित्तर ने कहा। फोन सच्ची बात कह रहा है, समझना मुश्किल पााकानो चिर बोली, "मुझे कोई भी बात नही सुननी है । आपसी पन रहा ने इस हो जाइए।" बात बिगड़ती देखकर केशव टल गया। मालती पोदार रो- "अगर फिर भी मुझे तंग करने आए तो ऐसा इतरान करूगी कि मारकर आपकी छोपडी खोल दी जाए।" इसके बाद ही मेरे पास आकर मालती ने नौकरी छोर देने सेन्हा। कौन-सी नौकरी करेगी यह ? इस भरी जवानी में उने उहा-नहा दोश नहीं जा सकला काम के लिए । इसके अलावा उनकी जो दोभा दो दह भी आम नौकरियों के लायक नहीं थी। वेकारी को समस्या तिदिन बढ़ती ही जा रही है । अच्छे-अच्छे लड़को को हो काम नहीं निदाटो मालती जैसी लड़की को कहा मिलेगा?" अपनी असामध्यं पर मुझे दुख भी हुआ। फिर भी उसे ताली देने के लिए बोला, "अच्छा,अगर किसी अच्छे काम का पता चला, दो तुम्हें गयर दूंगा।" मालती चली गई। ।
बस, यही एकबार वह मेरे पास आई थी और इसी एकावार की बातों में उसने अपना हृदय खोलकर रख दिया था। कई महीनों बाद, एक विशेष उपलक्ष्य में मैं विपिन यश लेन में उन लोगों के घर गया। पर मालती मुझसे मिलने नहीं आई। कह भिजवाया था, "उनसे मिलने में मुझे शरम आती है, मैं मिल नहीं सकूँगी।" कई महीनों बाद की बात है । उसीसे कहानी का उपसंहार करता हूं। मैंने कुछ मित्रों से मालती के उपयुक्त कार्य मिले तो बताने को कहा। उनमें से कोई भी सफल नहीं हुआ। इसीलिए मैंने भी मालती से कोई संपर्क नहीं किया । वह भी मुझसे मिलने नहीं आई। इसके अलावा मार्याधिक्य के कारण मैं मालती की बात लगभग भूल ही चला था। अचानक एक दिन एक अपरिचित नवयुवक आया। गोरा रंग, भरा- भरा बदन, हृष्ट-पुष्ट, मझोला कद। चेहरा कुछ पहचाना-पहचाना-सा लग रहा था । उसने आकर नमस्कार करके कहा, "मुझे पहचान रहे हैं ? में प्रसाद पाल हूं।" "अब याद आया, मालती से उसका नाम कई बार सुना है। उसने विपत्ति-आपत्ति में मालती की बहुत सहायता की है। वह भी एक बाड़ी- वाली का बेटा है। पर इस बात को मैं विशेष महत्त्व नहीं देता। मैंने उसे बैठने को कहा। फिर शिष्टाचारवश पूछा, "क्या बात है भाई ?" 'हमारे मुहल्ले में सार्वजनिक कालीपूजा हो रही है," प्रसाद ने कहा, इस बार हमने इसे खूब धूमधाम से मनाना तय किया है। हम चाहते हैं, आप उसकी उद्घाटन सभा के प्रधान अतिथि बनें।" "पाच होगी वह ?' "पई लोग पहले ही कर लेते हैं," प्रसाद ने कहा, "पर हमलोग पूजा के दिन की शाम को ही सभा करेंगे। ठीक साढ़े छः बजे। उसके बाद पाल मैं एका जलसा होगा। आप आएं तो हमें गुशी होगी।" मैंने डायरी देखकर कहा, "ठीक है, ये समय मेरा खाली है । मैं आऊंगा।" . ६४ आए प्रमाद ने पूछा, "हम में में कोई आपको लेने ?" मैंने कहा, "उसकी जरूरत नहीं है । विपिन यग लेन मरी परिचित प्रमाद ने कहा, "मैं गली के मोड पर राह देसुगा । उसके पाम ही मैदान में पूजा होगी।" में निश्चित ममय से कुछ पहले ही चला गया। बड़ी धूमधाम मे पूना का यायोजन किया गया था। मड़क पर वत्तियों की कतार रोशनी इन प्रकार की गई थी कि लगता था, प्रकाश की एक मुरंग चली गई है। गेट भी दर्शनीय था, पंडाल भी विराट् । काली-प्रतिमा बृहदाकार थी- आदमी से लगभग डेढा याकार। चेहरा भी अच्छा था। काली-प्रतिमा के दोनों और को राक्षमिया मानो निगलने को बढ़ी चली आ रही हों। पंडाल बड़ी मुरुचि से मनाया गया था। मजावटी कपड़ों की चुलटें ऐमी निपुणता में बैठाई गई थी, कि वह माही दरवार का वक्षमा लग रहा था। एक कचे मच पर पदाधिकारियों के बैठने की व्यवस्था थी, माप ही जलने का इंतजाम । मामने तीनेक सो फोल्डिग कुर्मियां लगी थीं। लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बज रहे थे। उन्हें दवाती हुई पटायो और वमों की घूमधड़ाम सुनाई दे रही थी। मामने ढेर मारे छोटे बच्चे. बच्चियां विचर-मिचर कर रहे थे। बीच-बीच में स्वयं मेवक उन्हे उपटते जा रहे थे। धक्कामुक्की पर काबू रखना ही मुश्किल था। वहा पहुंचते ही मुझे मवने आदर में बंटाया । समा शुरू होने में कुछ देर थी। मभापति आए । वै स्थानीय अध्यापक थे। कुछ देर उनके साथ कुछ इधर-उधर की बातें होती रही। उद्घाटन का समय आ गया। मवकै मव व्यस्त होकर घूमने लगे। हर कोई लीडर था। दो-एक आर्टिस्ट बा पहुंचे थे। उन्हें वंठाने की व्यवस्था पास के ही एक घर में की गई थी। पंद्रह मिनट बीत गए । प्रसाद को बुलाकर कहा, "क्यो भई, और कितनी देर है?" प्रमाद बोला, "अभी इंतजाम हो रहा है । देखिए ना, इतने कार- कर्ता हैं, पर काम के समय एक का भी पता नहीं। मुझे ही सब तरक संभालना पड़ रहा है। एई माइकमैन, भई अब व्यवस्था करो।"
पिलगी गाना ग्नतग होते ही लाउरस्पीकर बन्द हुआ। मादकमैन माइगरी उलाने लगा। ग...गो.. परर-परर-पाई आवाजों के बाद गागागंन जिल्लामा, 'मान टेस्टिंग वा-------श्री----कोर।' "माइया रेपी," प्रसाद ने कहा,"अव आपलोग आगरा पर लिए।" मैं गंग पर पहा । लोग गवार-बजार गिाए जा रहे थे। लड़गियों का दल भी ग्रासा बड़ा था। एग नपार से देखने की कोशिश की, गालती है या गा नहीं। जल्दी में दूर से गुछ पता नहीं चला। रामापी कार्रवाई हमलोगों ने जल्दी ही पूरी कर ली। इतने शोर- गुल में भाषण सुनगा कौन पाहता गला ? अब जलसा शुरू होनेवाला था। मैं गंच से उतर आया। प्रसाद सागनेही राड़ा था। मैंने पाहा, "लू अब ?" "ऐसा भी पाहीं हो सकता है ?" प्रसाद बोला, "गुंह तो मीठा पार जाइए।" "यह गया बात है भाई?" मैंने पाहा । "राव रेसी है," उराने पाहा, "आप आइए, आइए तो।" उराने गुझे एग बैठकलाने में ले जापार बैठाया। गगान में पैर रखते हुए लगा था, मगान परिचित-सा है, विंध्यवासिनी का रिहाइशी गयान-गालती या पर। मैं अगेला ही बैठा। प्रसाद ने पाहा, "वैठिए भाई साहब । जलपान की गवस्था हो रही है।" पाहते-गाहो ही विंध्यवासिनी कमरे में आ गई। पहले जैसी ही दिगाई दे रही थी। उसके एक हाथ में भी तयारी, दुरारे में शरबत गा गिलास । बड़ी-सी तपतरी में बढ़िया-बहिगा मिठाइयां और समोरो थे। विंध्यवासिनी ने जैसे ही तश्तरी गेप पर रखी, में बोल उठा, "इतना सारा गयों ? इतना गोन खाएगा? गोड़ा-सा निकाल लीजिए।" यह बोली, "नाइए भी बाबू । ऐसा गोग-सा जादा है ? अच्छी दूकान की मिठाई है, आएर देकर बनवाई है । परसाद खुद लागा है खरीद है।" प्रसाद गन्द-मन्द मुस्करा रहा था । आगिर मैंने खाना शुरू किया। - 1 विध्यवामिनी बोली, कितने दिन बाद आपसे मिलना हुमा बाबू । वहीं, जब यापके घर गई थी। आपने मुकद्दमा खतम नई कराया।" "मेरा क्या दोष है, वताइए?" मैंने कहा, "मैंने कोशिश तो को थी। अत में केस ही छोड दिया।" "बई तो गलती की वायू," विध्यवासिनी ने कहा, "अगर आपके हाप में ई रता तो मुकद्दमा खतम हो जाता। हमलोग तो बड़े तूफान से होकर निकले हैं।" फिर कुछ स्ककर वह बोली, "सून का फिर से व्या कर दिया है । इस वार दूसरी विरादरी में नई, अपनी ही विरादरी में। बौना होकर चांद पकडने की कोसिस क्या हमे सोहती है ?" मैं घुश होकर बोला, "बहुत अच्छा, वाह! कहां की शादी ? दामाद कैसा है ?" विंध्यवामिनी हमकर वोली, "दामाद तो यई आपके सामने खड़ा है बाबू । वेटा परसाद, वावू को परनाम कर।" में कुछ विस्मित हुआ, प्रसाद मालती का पति ! फिर यह विस्मय भी जाता रहा । प्रमाद के साथ विवाह होना शामद अन्टा ही हुआ है। बरावरी का मैल है। इसके अलावा प्रमाद मालती के बहुत निकट पा। अब दोनो अभिन्नहृदय हो गए हैं। झेपते हुए प्रसाद ने मेरी चरणधूलि लो। मैंने कहा,"बहुत अच्छा हुआ।पर मालती कहां है ' दिखाई नहीं दे रही ?" उमकी मा बोली, "वह छत पर दीये मजा रई है। आज दीवाली है ना ? लादन-लाइन से सजाकर दीये बाल रई है। बेटा परमाद, मनू को बुलालाना। वावू से मिल प्रसाद चला गया। मेरा खाना समाप्त हुआ। मन में मालती को वधू रूप में देखने का भाग्रह था। विध्यवामिनी ने कहा, "यह लोग मेरे पास ईरते हैं। मेरा ये दामाद बड़ा अच्छा है। मामोरवाद दीजिए बाबू, इस पार मेरे बेटी. दामाद सुखी होवें।" "रूर, आशीर्वाद देता हूँ," मैंने हार्दिकता मे जमा जाए।"
। प्रसाद अकेला ही लौट आया। विंध्यवासिनी ने पूछा,"क्या हुआ बेटा परसाद ? झून का है ?" प्रसाद बोला,"वह आई नहीं । बोली, 'दादा के सामने निकलते मुझे लाज आती है।" मेरा कौतूहल शान्त नहीं हुआ। मैंने उन लोगों से विदा ली। प्रसाद मुझे गाड़ी तक छोड़ने आया। दूर से मैंने देखा, विंध्यवासिनी का रिहाइशी मकान-अर्थात् मालती का घर- दीपमालाओं से जगमगा रहा है । दूर से मैंने आशीर्वाद दिया, मालती के नए जीवन में भी सदा-सदा ऐसा ही प्रकाश रहे। मुझे गाड़ी पर चढ़ाकर प्रसाद ने पूछा, "दादा, कल सुवह माप घर रहेंगे ?" मैंने कहा, "हां, पर क्यों पूछ रहे हो ?" प्रसाद ने कहा, "एकबार मापसे मिलूंगा । कुछ कहना है आपसे।" "ठीक है, सुबह नौ बजे के लगभग आ जाना।" अगले दिन प्रसाद ठीक समय पर ही आ गया। उसके हाथ में मिठाई का डिव्या था। मैंने पूछा, "फिर ये क्या ले आए ?" उसने डिव्वा मेज़ पर रखकर कहा, "झूनू ने आपके लिए भेजा है। कहा, हमारे व्याह में तो आपका मुंह मीठा हुआ नहीं था । उस अपराध को क्षमा कीजिएगा।" "तुमलोगों का विवाह कब हुआ ?" "पिछले आपाढ़ में । वह भी तो पूरा काण्ड हुआ। मौसीजी, याने मेरी सास ब्याह के विषय में एकदम निलिप्त थीं। एक बार झूनू का ब्याह टूट चुका था, फिर से व्याह की वात वे सोचती भी नहीं थी। बल्कि कोई कहता भी, तो वे व्यंग्य करके कहती, "अति-घरनी को घर नई मिलता। मेरी लड़की की नज़र ऊंची है । बौने को चांद पकड़ने की साध है । सरीफ घर में व्या नई हो, तो महारानी को रुचेगा नई । अव मैं ऐसा फरमाइसी सरीफ कां से लाऊं? कुम्हारटोली से माटी का सरीफ तो घड़वा के ला नई सकती । एक बार तो कोसिस कर देखी। खेती-किसानी करता था तो क्या, सहदेव छोकरा अच्छा ई था। पर लड़की के ई तो भाग फूटे हैं। - - घर-बार उसके भाग को नई महा।" हार मित्तर तो शादी का नाम सुनते ही सौखिया उठना या । कहता था,"फिर व्याह ! उममे तो अच्छा है, झूनू अपने पैरों पर खडी होकर कुछ कमाए। अरे, कितने लोग आ रहे हैं काम के लिए । झूनू मान जाए तो क्या कमी है ? पर लड़की तो महा जिद्दी है।" मैंने कहा, "मालनी परेशान होकर नौकरी की तलाश में आई थी। पर मैं कुछ भी नहीं कर मका।" प्रमाद ने कहा, "हां, मुझे सब बताया है उसने । अखबारों में आवश्य- कता के विज्ञापन देखकर उसने कुछ अजियां भी दी थी। दो-चार जगहों से इन्टरव्यू के लिए भी पन आए थे। पर कहीं भी नौकरी नहीं जुटी।" मैंने कहा,"मैंने भी कुछ लोगों मे कह रखा था उपयुक्त काम के लिए। पर कुछ हो नहीं सका।" प्रसाद ने कहा, "उसे दवाइयों की कैनवासिंग का एक काम मिला था। तनख्वाह कम पी, विक्री पर कमीशन मिलता था। बहुत धूमने का काम था। बड़ी मेहनत थी। मैंने कहा, 'वह काम मत लेना इन दो दिन में बीमार पड़ जाओगी।" वह बेहद तनाव से गुजर रही थी। वह रो पड़ी। बोली, 'अव में कहें क्या ?' मैंने सांस्वना दी। कहा, "जो कर रही हो, वही करो। प्राइवेट मैट्रिक दो, कॉलेज मे भर्ती हो जाओ, फिर देखा जाएगा।" झूनू चली गई । फिर गई दिन उसमे मुलाकात नहीं हुई। "एक दिन जोरों से बरमात हो रही थी। मैं दूकान में ही था। सड़क पर पानी इकट्ठा हो गया था। कोई ग्राहक नही था। छक भी नहीं आया था। मैं अनमने भाव में बैठा-वेटा बरमते पानी को देख रहा था। अचानक न जाने कहां से झून आ पहुंची। उस वारिश में वह छाता लिए बिना ही निकल पडी थी । साड़ी भीगकर तरबतर थी। गंदे पानी मे मे चलती हुई वह आई थी। मैं हैरान ! झून ने कहा, "घर मे रहा नहीं गया प्रमाददा। इमौलिए भाग आई हूं।" मैंने कहा, 'बड़ी बहादुरी दिखाई है । एक छाता लेकर भी नहीं था सकी ? भीगकर तो बीमार पड जाओगी।' वह कातर होरर बोली, 'उममे किमीका क्या आता-जाता है ? मर जाऊं, तो मेरी जान बचे।' मैं वातावरण हलका करने के लिए - बोला, 'इसी बीच अकाल-वैराग्य हो गया है ?' झूनू रोते-रोते बोली, 'मेरा कोई नहीं है प्रसाददा, कोई भी नहीं। मां निर्विकार हैं-~-अपनी किरायेदारिनों के सिर पर सवार होकर रुपया.कमाने में व्यस्त । और वाप के रूप में जो अपना परिचय देता है, वह एक विच्छू है। मां कुछ बोलती नहीं, इसलिए इधर वह सिर उठाने लगा है । आज मेरे साथ जोगें का झगड़ा हो गया । कहता क्या है। -नवाबजादी का गद्दों पर बैठे-बैठे भकोसना अब नहीं चलेगा। अभी भरपूर जवानी है। यही तो कमाई की उमर है । कमाई करो और खाओ । नहीं तो..-' झूनू क्रुद्ध होकर वोली, 'मैं क्या तुम्हारे पैसे का खाती हूं? मेरे अपने पिता जो रख गए हैं, उसी- में का खाती हूं।' हारू मित्तर गंदी-गंदी गालियां वकता हुआ वोला, 'तेरा कौन-सा बाप कितना रख गया था हरामजादी? तेरी शोक की शादी के पीछे इतने रुपये वरवाद हुए, उनका हिसाव रखा है ?' झूनू बोली, 'मां को कहती हूं जाकर सब ।' हारू मित्तर बोला,"बोल दे ना, कलमुंही। तेरी मां अव मेरी मुट्ठी में है । उसने घर, चकले, सबकी मेरे नाम वसीयत कर दी है । मैं न दूं, तो उसे खाने को भी नहीं मिले। जिस दिन कहूंगा, उसी दिन सारी संपत्ति का दानपत्तर मेरे नाम कर देगी।'झूनू वोली, "मुझे चाहिए भी नहीं तुम्हारी पाप की दौलत ।" इसके बाद ही वह गुस्से में भरकर भीगती-भीगती मेरी दुकान में चली आई। मालती सच ही बड़ी मुसीबत में पड़ गई थी। मैंने पूछा, 'उसके बाद क्या हुआ "बरसात थम गई," प्रसाद ने कहा, "मैं 'तृप्ति' कैफे से चाय लाने गया । गरम चाय पीकर झूनू को जरूर कुछ राहत महसूस होगी। चाय लेकर लोटा तो देखा, झूनू ने सूखे कपड़े से सिर पोंछ डाला है, पर भीगी साड़ी नहीं बदली है। इसी हालत में मैले कपड़ों के गट्ठर पर बैठी वह कोई गीत गुनगुना रही है----रवि ठाकुर का गीत । उसके वोल मुझे याद हैं, क्योंकि वे बोल ही हमदोनों को नजदीक ले आए थे।" कौतूहल से मैंने पूछा, "कौन-सा गीत था?" "ओई मालतीलता दोले पिआल तरुर कोले (वह मालतीलता पिआल वृक्ष की गोद में झूल रही है)'," प्रसाद ने कहा। - ? । ।
मैंने हंसकर पूछा, "पिमाल तरु कोन है ?" प्रसाद ने कहा, "मेरा भी यही प्रश्न था झूनू से । मैंने भी भेदभरे स्वर मे उससे यही प्रश्न किया था। चाय को चस्की लेते-लेते वह मुस्कुरा• कर बोली, "मेरे पिआल तर तुम हो प्रसाददा।' 'क्या मतलब ?' मैंने आश्चर्यचकित होकर पूछा झूनू ने अचानक साग्रह मेरा हाथ पकडकर पूछा, 'तुम मुझसे ब्याह करोगे प्रसाददा? तुम मुझसे ब्याह कर लो, कर लो। मेरा कोई नहीं है प्रसाददा। तुम मुझे बचाओ। मुझे वहा मजा का रहा था। जिससे मैं वचपन से ही एकतरफा प्रेम करता आ रहा है, वही लड़की भीगे कपड़ों में, धोबी की दूकान में मेले कपडो के गट्ठर पर बैठो हुई, प्रेम-निवेदन ही नहीं कर रही है अपने आपको मेरे आगे समर्पित भी कर रही है । मैं अचानक ही ठठाकर हम पडा । लगा, अनू इमसे आहत हुई, है । वह बोली, "हम क्यो रहे हो ? मेरा मजाक उड़ा रहे हो मैंने जल्दी से कहा, 'नही झुनू, नहीं । तुममे मैं जरूर शादी रूगा । एकदम राजपोग है। खानगी के बेटे के साथ महानगी की बेटी का ध्याह जन्महीन के साथ जन्महीन का। बरावरी का सबध है । अनु आश्वस्त होकर बोनी 'ठीक कहा प्रमाददा, बरावरी मे ब्याह । पर एक अनुरोध कर सकती मैंने कहा, 'कहो, कहो।' झून ने कहा 'तुम एक पंमा भी दहेज नहीं माने। मैंने कहा, 'मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, मैं सिर्फ तुम्हे वाहता है तुन्द्र में हमेशा से चाहता आ रहा है। चलो, मोमोजो को बना आए । नुन कहा, 'नहीं, उनलोगो को कुछ भी नहीं चलाएगे । हम नारसे कारी- घाट में ब्याह करेंगे। तुम्हें जरूरी लगे तो रजिस्ट्री भी कादाने झुनू के कहे अनुमार हमलोगो ने चुपके-म, छिपार विस्तार हां, कुछ वराती-धराती शुरूर थे । वे पे-पी अमन में हिटलर और नेपा-नेपोलियन।" "उनका परिचप जानता हूँ," मैंने बताया। शादी के रजिस्ट्री ऑफिस में भोला और कलर सबने मिलकर एक होटल में दावत उडाई। , सास लड़की से कितने दिन बिगड़ी रहती ? उन्होंने कहा, 'मैं सिरफ एक शर्त पर ये व्या मान सकती हूं। लड़की-जमाई को मेरे घर पर रैना होगा।' मैं तो घरजमाई बनने के लिए हरगिज़ तैयार नहीं था, पर झूनू के समझाने पर मैं मान गया कि मैं ससुराल में रहूंगा, पर दोनों जनों का खाना-खर्चा मैं ही दूंगा । मेरी लांड्री से जो आय होती है, उससे दो लोगों का काम हंसते-खेलते चल सकता है।" "तुम्हारी सास के विचार तो पता चले, पर हारू मित्तर ने क्या कहा ?" "वे क्या कहेंगे ? जिस दिन मेरी सास ने विल वदलकर सारी संपत्ति झूनू के नाम लिख दी। उस दिन हारू मित्तर महाशय ने खाट पकड़ ली। उनका वात-रोग बढ़ गया । अव मकानों का किराया भी नहीं वसूलते। हम भी उन्हें तंग नहीं करते । वे बैठे-बैठे, खाते हैं, और सासजी के आगे तिनतिनाते रहते हैं। और किरायेदारों को संभालते हैं हम-~मैं और "अब समझा, मालती शर्म के मारे मेरे सामने क्यों नहीं आई थी। ये लज्जा केवल मालती की ही नहीं थी, मेरी भी थी।" वन की अंधेरी छाया में सरस्वती का तीर न जाने कब लुप्त हो चुका है। गौतम ऋपि नहीं रहे, सत्यकाम जावाल भी खो गया है। पर जावाला अव भी है, और है विश्वका आदिमतम पेशा, और लगता है, रहेगा भी। ये अमर हैं, अजर हैं । ।
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