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Mul Pali Mahaparinirvadh Sutra

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महास्थविर महावीर-ग्रन्थमाला-३ पुष्प.
मूल पालि
महापरिनिर्वाण सूत्र
(हिन्दी अनुवाद सहित)
suta
Mchapa
सम्पादक
Acc.no
506.
भिनु कित्तिमा
Kittina
(Kirliman)
प्रकाशक
ऊ० चोज़न्
अक्याव (बर्मा)
Bla3
Kit
२४८५. बु० सं०
१९९८. वि० सं०
प्रथम संस्करण
}
मूल्य ११)
१०००
-

Published by
U. Kyaw Zan,
Akyab,
Burma.
CENTRAL ARCHEOLOGIOAL
1118) NEW DELHI.
Acc No.
506.
Data 31!!! 53.
部修邊
Oell No...B Pa 3./. Kit.
Printed by
A. Bose,
at The Indian Press, Ltd.,
Benares-Branch,

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स में निवेदन आज मैं "महास्थविर महावीर-ग्रन्थमाला" के इस तृतीय पुष्प महा- परिनिर्वाण सूत्र को पाठकों के सन्मुख उपस्थित करता हूँ। इस सूत्र मूल पालि के साथ हिन्दी अनुवाद भी रखा गया है। ताकि मूल पालि न जाननेवालों को भी मूल का आनन्द मिल सके। इस सूत्र में उत्तरी भारत के प्राचीन मगध, वैशाली, कपिलवस्तु, कुशीनारा आदि तत्कालीन प्रजातन्त्र राष्ट्रों की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक अवस्था का सुन्दर विवरण है। दूसरे शब्दों में यह सूत्र बुद्ध-कालीन भारतके प्रजातन्त्र राज्यों का एक प्रामाणिक इतिहास है। अतः इस पर प्रकाश डालने के लिए एक विद्वत्तापूर्ण विस्तृत ऐतिहासिक भूमिका की अनिवार्य आवश्यकता थी; किन्तु बर्मी भाषा-भाषी होने के कारण मैं वैसा नहीं कर सका। मूल पालिभाषा को यथाशक्ति शुद्ध-शुद्ध छापने की कोशिश की गई है। फिर भी यदि कुछ त्रुटियां रह गई हो तो आशा है कृपालु पाठक इस ओर विशेष ध्यान न दे कर पूज्य तथागत की उन शिक्षाओं और आदर्शों को, जो अमीर-गरीब सबके लिए कल्याणप्रद हैं, ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे। इस सूत्र का हिन्दी अनुवाद प्रसिद्ध भारतीय विद्वान् त्रिपिटकाचार्य महामण्डित राहुल सांकृत्यायन जी और भिक्षु जगदीश काश्यप जी एम० ए० द्वारा अनूदित 'दीघनिकाय' से लिया गया है। इसके लिए मैं इन विद्वानों का कृतज्ञ हूँ। मुझे यह उमीद न थी कि यह पुस्तक इतनी जल्दी प्रकाशित हो सकेगा, किन्तु अराकान (बर्मा) निवासी श्रद्धालु उपासक श्री ऊ० चोजन (U. Kyaw Zan, Akyab, Arakan) ने धन द्वारा सहायता दे कर मेरी हार्दिक इच्छा पूरी की। इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सकता। अन्त में मैं अपने पाठकों को धन्यवाद देना अपना परम कर्तव्य समझता हूँ, जिनकी गुण-ग्राहकता के फल-स्वरूप समय समय पर बौद्ध साहित्य को राष्ट्र-भाषा में प्रकाशित करने का अवसर मिलता रहा है। बर्मी बौद्ध विहार, विनीत सारनाथ (बनारस) १८-७-४१ भिक्षु कित्तिमा

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त । विषय-सूची ... ३-१७ १८ 4. ... 1/4/- ... १९-२२ २३ .. ro २५ ... ... ... २६,२७ ... ... ... ३० ... ३२ .. उW ૨૨ ... ... .. विषय १-वजियों के विरुद्ध अजातशत्रु राजा २-हानि से बचने के उपाय ३-बुद्ध की अन्तिम यात्रा ४-बुद्ध के प्रति सारिपुत्र का उद्गार ( नालन्दा में ) ५-भगवान पाटलिग्राम में ( वर्तमान पटना ) ... ६-दुराचार का दुष्परिणाम ७-सदाचार का सुपरिणाम ८-पाटलिपुत्र का निर्माण ९-पाटलिपुत्र प्रधान नगर होगा १०-पाटलिपुत्र के तीन शत्रु ११-गौतम-द्वार १२-गौतम-तीर्थ १३-कोटिग्राम में १४-जानने योग्य चार आर्य-सत्य १५-नातिका के गिञ्जकावसथ में १६-धर्म-आदर्श १७-वैशाली में १८-अम्बपाली गणिका का भोजन १९-लिच्छवी २०-वेलुव-ग्राम में चतुर्मास-वास २१-सख्त बीमारी २२-आचार्य मुष्टि (=रहस्य) नहीं है २३-श्रात्मशरण होकर रहो २४-चापाल चैत्य में २५-निर्वाण की तैयारी २६-भूकम्प के आठ हेतु २७-आठ परिषद ... ... ... ... -w ... ३ ३ ३६ ... .. ४१ ... ... not .... ... ... ... ... ... ४९ ... . ५० ... 282 ... ... ... ५२ ... ... ... ... ... ६०,६१ 14 ... ... ... ... .4 ( २ ) ६३ ६६ ... ... ... ... ८६ ९० ... ... ... ... .. .. ... .. १०४ विषय २८-आठ अभिभायतन ( योग) २९-आठ विमोक्ष ३० -कुसिनारा की ओर ३१-भण्डु-ग्राम में ३२--भोगनगर में ३३-महाप्रदेश ( कसौटी) ३४-पावा में ३५-चुन्द सोनार का अन्तिम भोजन ३६-ककुधा नदी ३७-पुक्कुस ( मल्ल )... ३८-प्रातुमा के भुसागार की घटना ३९-दुशाला का दान... ४०-जीवन की अन्तिम घड़ियाँ ४१-हिरण्यवती नदी ४२-जुड़वे शाल वृक्षों के बीच में ४३-दर्शनीय स्थान (चार बौद्ध तीर्थ) ४४-स्त्रियों के प्रति भिक्षुओं का बर्ताव ४५-चक्रवर्ती राजा की दाहक्रिया ४६-आनन्द के गुण ४७-चक्रवर्ती के चार गुण ४८-महासुदर्शन-जातक .. ४९-सुभद्र की प्रव्रज्या... ५०-अन्तिम उपदेश ५१-निर्वाण ५२-महाकाश्यप को दर्शन ५३-दाहक्रिया ५४-स्तूप निर्माण ५५-पुरातत्त्व लेख-संग्रह ... ... १०४ .. १०८ ... ... १०९ ... .... ... ... ११६ ... ... १२२ ... ... १२३ .... •. श्री. ..... ... ... १३२ १४३ ... ... ... .. ... १४६ ... ... ... ... ... १५४-१५७ ... ... state नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्वुद्धस्ल महापरिनिब्वान सुत्तं (१) एवं मे सुतं-एक समयं भगवा राजगहे विहरति गिज्झकूटे पब्बते । तेन खो पन समयेन राजा मागधो अजातसत्तु वेदेहि- पुत्तो वज्जी अभियातु कामो होति । सो एवमाह-'अहं हि मे वज्जी एवं महिद्धिके, एवं महानुभावे, उच्छिज्जामि वज्जी विनासेस्सामि वज्जी अनयव्यसनं आपादेस्सामि वज्जी, ति । (१) ऐसा मैंने सुना-एक समय भगवान् राजगृहमें गृध्रकूट पर्वतपर विहार करते थे। उस समय राजा मांगध अजातशत्रु वैदेही-पुत्र* वजीपर चढ़ाई (=अभियान ) करना चाहता था। वह ऐसा कहता था-'मैं इन ऐसे महर्द्धिक (= वैभव- शाली),= ऐसे महानुभाव, वज्जियोंको उच्छिन्न करू गा, वज्जियोंका विनाश करूँगा, उनपर आफत ढाऊँगा। * गंगा (?) के घाट के पास आधा योजन अजातशत्रुका राज्य था, और आधा योजन लिच्छवियोंका ।...। वहाँ पर्वत के पास (= जळ) से बहुमूल्य सुगन्ध-वाला माल उतरता था। उसको सुनकर अजातशत्रु के-'आज जाऊँ कल जाऊँ' करते ही, लिच्छवी एक राय, एक मत हो पहले ही जाकर सब ले लेते थे। अजातशत्रु पीछे जाकर उस समाचारको पा क्रुद्ध हो चला आता था। वह दूसरे वर्ष भी वैसा ही करते थे उसने अत्यन्त कुपित हो...ऐसा सोचा- 'गण (=प्रजातंत्र) के साथ युद्ध मुश्किल है, (उनका) एक भी प्रहार बेकार नहीं जाता। किसी एक पण्डित के साथ मंत्रणा करके करना अच्छा होगा ।...'। (सोच) उसने वर्षकार ब्राह्मणको भेजा।-(अट्ठकथा) + वर्तमान मुजफ्फरपुर, चम्पारन और दरभंगा के जिले ।

२ महापरिनिब्बान सुत्तं (२) अथ खो राजा मागधे। अजातसत्तु वेदेहिपुत्तो वस्सकारं ब्राह्मणं मागध महामत्तं आमन्तेसि । “एहि त्वं ब्राह्मण ! येन भगवा, तेनुप- सङ्कम । उपसङ्कमित्वा मम वचनेन भगवतो पादे सिरसा वन्दाहि । अप्पा बाधं अप्पा तङ्क लहुठानं बलं फासुविहारं पुच्छ—'राजा भन्ते ! मागधो अजातसत्तु वेदेहिपुत्तो भगवतो पादे सिरसा वन्दति । अप्पा बाधं अप्पा तङ्क लहुठानं बलं फासुविहारं पुच्छती, ति । एवञ्च वदेहि-"राजा भन्ते ! मागधो अजातसत्तु वेदेहिपुत्तो वज्जी अभियातु- कामो सो एवमाह-'अहंहि मे वज्जी एवं महिद्धिके एवं महानुभावे उच्छिज्जामि वज्जी विनासेस्सामि वज्जी अनयब्यसनं आपादेस्सामि वज्जी, ति'। यथा ते भगवा ब्याकरोति । तं साधुकं उग्गहेत्वा मम आरोचेय्यासि । न हि तथागता वितथं भणन्ती, ति" । (३) 'एवं भो', ति खो वस्सकारो ब्राह्मणो मागध महामत्तो रजो मगधस्स अजातसत्त्स्स वेदेहिपुत्तस्स पटिस्सुत्वा भद्दानि भद्दानि यानानि योजत्वा भई भई यानं अभिरूहित्वा भद्दहि भद्दे हि यानेहि राज- गहम्हा निय्यासि । येन गिज्झकूटो पब्बतो, तेन पायासि । यावतिका (२) तब० अजातशत्रु० ने मगधके महामात्म्य (= महामंत्री) वर्षकार ब्राह्मणसे कहा- "ाो ब्राह्मण ! जहाँ भगवान हैं, वहाँ जाओ। जाकर मेरे वचनसे भग- वान्के पैरों में शिर से वन्दना करो। आरोग्य-अल्प-आतंक, लघु-उत्थान (= फुर्ती ), सुख-विहार पूछा-'भन्ते ! राजा० वन्दना करता है, आरोग्य० पूछता है।' और यह कहो-'भन्ते ! राजा० वज्जियोंपर चढ़ाई करना चाहता है, वह ऐसा कहता है-'मैं इन० वज्जियोंको उच्छिन्न करूँगा।' भगवान् जैसा तुमसे बोलें, उसे यादकर ( आकर ) मुझसे कहो, तथागत अ-यथार्थ (= वितथ ) नहीं बोला करते ।" (३) "अच्छा भो।" कह...वर्षकार ब्राह्मण अच्छे अच्छे यानोंको जुतवाकर, बहुत अच्छे यानपर आरूढ़ हो, अच्छे यानोंके साथ, राजगृहसे निकला; (और) जहाँ गृध्रकूट-पर्वत था, वहाँ चला। जितनी यानको भूमि थी, उतना यानसे जाकर, । " ३ महापरिनिब्बान सुत्तं यानस्स भूमियानेन गन्त्वा याना पचोरोहित्वा पत्तिकोव येन भगवा तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मादि । सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि । एकमन्तं निसिनो खो वस्सकारो ब्राह्मणो मगध महामत्तो भगवन्तं एतदवोच-"राजा भो गोतम ! मागधो अजातसत्तु वेदेहिपुत्तो भो तो गोतमस्स पादे सिरसा वन्दति । अप्पा बाधं अप्पा तङ्क लहुगनं बलं फासुविहारं पुच्छति" । एवञ्च वदेति-"राजा भो गोतम ! मागधो अजातसत्तु वेदेहिपुत्तो वज्जी अभियातुकामो सो एवमाह-'अहं हि वज्जी एवं महिद्धिके एवं महानुभावे उच्छिज्जामि वज्जी विनासेस्सामि वज्जी अनयब्यसनं आपादेस्सामि वज्जी, ति"। (४) तेन खो पन समयेन आयस्मा अानन्दो भगवतो पिठितोठितो होति भगवन्तं बीजयमानो । अथ खो भगवा आयस्मन् अानन्दं आमन्तेसि, [१] "किन्ति ते आनन्द ! सुतं वज्जी अभिण्हं सनिपाता सन्निपात बहुला, ति? "सुतमेतं भन्ते ! वज्जी अभिएहं सन्निपाता सन्निपातबहुला, ति" । याव किवञ्च आनन्द ! वज्जी अभिण्हं सन्निपाता सन्निपात बहुला भविस्सन्ति, बुद्धियेव अानन्द ! वज्जीनं पाटिकला ना परिहानि। यानसे उतर पैदल ही, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान्के साथ संमोदनकर... एक ओर बैठा; एक ओर बैठकर...भगवान्से बोला-“भो गौतम ! राजा० आप गौतमके पैरोंमें शिरसे वन्दना करता है 10 वज्जियोंको उच्छिन्न करूँगा'" (४) "उस समय आयुष्मान् आनन्द भगवान्के पीछे ( खळे) भगवान्को पंखा झल रहे थे। तब भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दको संबोधित किया- [१] "आनन्द ! क्या तूने सुना है, वजी ( सम्मतिके लिये ) बराबर बैठक (=सन्निपात ) करते हैं = सन्निपात-बहुल हैं ?" ) महापरिनिब्बान सुत्तं [२] किन्ति ते आनन्द ! सुतं, वज्जी समग्गा सनिपतन्ति । समग्गा ठहन्ति । समग्गा वज्जी करणीयानि करोन्ती, ति ? सुतमेतं भन्ते ! 'वज्जी समग्गा सन्निपतन्ति, समग्गा वुठहन्ति, समग्गा वज्जी करणीयानि करोन्ती, ति' । याव किवञ्च प्रानन्द ! 'वज्जी समग्गा सन्निपतिस्सन्ति, समग्गा ठहिस्सन्ति, समग्गा वज्जी करणीयानि करिस्सन्ति, वुद्धियेव आनन्द ! वज्जीनं पाटिकवा, नो परिहानि । [३] किन्ति ते आनन्द ! सुतं 'वज्जी अपञ्चत्तं न पचपेन्ति, पञ्चत्तं न समुच्छिन्दन्ति, यथा पञ्चत्ते पोराणे वज्जी धम्मे समादाय वत्तन्ती, ति?" सुतमेतं भन्ते ! 'वज्जी अपञ्चत्तं न पञपेन्ति, पञ्चत्तं न समुच्छि- न्दन्ति, यथा पञ्चत्ते पोराणे वज्जी धम्मे समादाय वत्तन्ती, ति । याव किवञ्च आनन्द ! 'वज्जी अपञत्तं न पञपेस्सन्ति, "सुना है, भन्ते ! वज्जी बराबर।" "आनन्द ! जब तक वज्जी बैठक करते रहेंगे = सन्निपात-बहुल रहेंगे; (तब तक) आनन्द ! वज्जियोंकी वृद्धि ही समझना, हानि नहीं । [२] "क्या आनन्द ! तूने सुना है, वजी एक ही बैठक करते हैं, एक ही उत्थान करते हैं, वज्जी एक ही करणीय (= कर्त्तव्य ) को करते हैं ?" "सुना है, भन्ते ! " "आनन्द ! जब तक [३] "क्या ० सुना है, वज्जी अ-प्रज्ञप्त* (= गैरकानूनी) को प्रज्ञप्त * ''पहले न किये गये, शुल्क या बलि (= कर) या दंड लेनेवाले अप्रज्ञप्त (काम) करते हैं। । पुराना वजिधर्म...यहाँ पहले वजिराजा लोग-'यह चोर है = अपराधी है, (कह) लाकर दिखलाने पर, 'इस चोरको बाँधो'.- न कह विनिश्चय-महामात्य (= न्याया- धीश) का देते थे, वह विचारकर अचोर होनेपर छोळ देते थे, यदि चोर होता, तो अपने महापरिनिव्बान सुत्तं ! पञ्चत्तं न समुच्छिन्दिस्सन्ति, यथा पञत्ते पोराणे वज्जी धम्मे समादाय वत्तिस्सन्ति, वुद्धि येव अानन्द ! वज्जीनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि' । [४] किन्ति ते आनन्द ! सुतं-'वज्जी ये ते वज्जीनं वज्जी महल्लका, ते सकरान्ति गरुं करोन्ति मानेन्ति पूजेन्ति तेसञ्च सातब्बं मचन्ती, ति ? सुतमेतं भन्ते ! 'वज्जी ये ते वज्जीनं वजनी महल्लका, ते सक्करोन्ति गरुं करोन्ति मानेन्ति पूजेन्ति तेसं च सातब्बं मञ्जन्ती, ति' । याव किवञ्च प्रानन्द ! 'वज्जी ये ते वज्जीनं वज्जी महल्लका, ते सक्करिस्सन्ति गरुं करिस्सन्ति मानेस्सन्ति पूजेस्सन्ति तेसं च सोतब्ब मञिस्सन्ति, वुद्धि येव आनन्द ! वज्जीनं पाटिकला ना परिहानि' । [५] किन्ति ते आनन्द ! सुतं-'वज्जी या ता कुलिथियो कुल- कुमारियो ता न ओकस्स पसयह वासेन्ती, ति' ? (= विहित ) नहीं करते, प्रज्ञप्त (= विहित ) का उच्छेद नहीं करते। जैसे प्रज्ञप्त है, वैसे ही पुराने पुराने वजि-धर्म (= नियम ) को ग्रहण कर, वर्तते हैं ?" "भन्ते! सुना है।" "आनन्द ! जब तक कि" [४] "क्या आनन्द ! तूने सुना है-वज्जियोंके जो महल्लक (= वृद्ध ) हैं, उनका ( वह ) सत्कार करते हैं, = गुरुकार करते हैं, मानते हैं, पूजते हैं; उनकी (बात ) सुनने योग्य मानते हैं।" "भन्ते ! सुना है ।" "आनन्द ! जब तक कि " ) कुछ न कहकर व्यवहारिकको दे देते थे। वह भी विचारकर अचोर होनेपर छोळ देते थे, यदि चोर होता तो सूत्रधारको दे देते थे। वह भी विचारकर अचोर होनेपर छोळ देते थे, यदि चोर होता ते। अष्टकुलिकको दे देते। वह भी वैसा ही कर सेनापतिको, सेनापति उपराजको, और उपराज राजा (= गण-पति को। राजा विचारकर यदि अचोर होता तो छोळ देता। यदि चोर ( = अपराधी) होता, तो प्रवेणी-पुस्तक बँचवाता। उसमें- जिसने यह किया, उसको ऐसा दंड हो--लिखा रहता है। राजा उसके अपराधको उससे मिलाकर उसके अनुसार दंड करता।"--अट्ठकथा । । - महापरिनिब्बान सुत्तं सुतमेतं भन्ते ! 'वज्जी या ता कुलिथियो कुल-कुमारियो ता न अोकस्स पसरह वासेन्ती, ति। याव किवञ्च आनन्द ! वज्जी या ता कुलिथियो कुल-कुमारियो ता न ओक्कस्स पसरह वासेस्सन्ति, वुद्धि येव आनन्द ! वज्जीनं पाटिकवा नो परिहानि। [६] किन्ति ते आनन्द ! सुतं-'वज्जी यानि तानि वज्जीनं वज्जी चेतियानि अब्भन्तरानि चेव बाहिरानि च । तानि सक्करोन्ति गरु करोन्ति मानेन्ति पूजेन्ति । तेसंच दिन पुब्बं कत पुब्बं धम्मिकं बलि ना परिहापेन्ती, ति' ? सुतमेतं भन्ते ! 'वज्जी यानि तानि वज्जीनं वज्जी चेतियानि अब्भन्तरानि चेव बाहिरानि च। तानि सकरान्ति गरुं करोन्ति मानेन्ति पूजेन्ति । तेसं च दिन-पुब्बं कत-पुब्बं धम्मिकं बलिं ना परिहापेन्ती, ति' । याव किवञ्च आनन्द ! 'वज्जी यानि तानि वज्जीनं वज्जी चेतियानि अब्भन्तरानि चेव बाहिरानि च। तानि सकरिस्सन्ति गरु- करिस्सन्ति मानेस्सन्ति पूजेस्सन्ति । तेसञ्च दिन-पुब्बं कत-पुब्बं धम्मिक-बलिं नो परिहापेन्ति । वुद्धियेव आनन्द ! वज्जीनं पाटिकङ्खा नो परिहानि। [५] "क्या० सुना है-जो वह कुल-स्त्रियाँ हैं, कुल-कुमारियाँ हैं, उन्हें (वह ) छीनकर, जबर्दस्ती नहीं बसाते ?" "भन्ते ! सुना है।" । "आनन्द ! जब तक " [६] "क्या ० सुना है-वज्जियोंके (नगरके ) भीतर या बाहरके जो चैत्य (= चौरा=देव-स्थान ) हैं, वह उनका सत्कार करते हैं, ० पूछते हैं। उनके लिये पहिले किये गये दानको, पहिले की गई धर्मानुसार बलि (=वृत्ति) को, लोप नहीं करते ॥ "भन्ते ! सुना है • ?" "जब तक .

महापरिनिब्बान सुत्तं [७] किन्ति ते आनन्द ! सुतं-'वज्जीनं अरहन्तेसु धम्मिका रक्खा वरण गुत्तिं सुसंविहिता। किन्ति अनागता च अरहन्तो विजितं आगच्छेय्युं । आगता च अरहन्तो विजिते फासुविहरेय्युन्ति ?' सुतमेतं भन्ते ! 'वज्जीनं अरहन्तेसु धम्मिका रक्खा वरण गुत्ति सुसंविहिता। किन्ति अनागता च अरहन्तो विजितं आगच्छेय्युं । आगता च अरहन्तो विजिते फासुविहरेय्युन्ति ।' याव किवञ्च आनन्द ! 'वज्जीनं अरहन्तेसु धम्मिका रक्खा वरण गुत्तिं सुसंविहिता भविस्सन्ति । किन्ति अनागता च अरहन्तो विजितं आगच्छेय्युं । आगता च अरहन्तो विजिते फासु- विहरेय्युन्ति । वुद्धियेव आनन्द ! वज्जीनं पाटिकवा, नो परिहानी, ति' । (५) अथ खो भगवा वस्सकारं ब्राह्मणं मगंध महामत्तं आमन्तेसि- "एकमिदाहं ब्राह्मण ! समयं वेसालियं विहरामि सानन्दरे चेतिये, तत्राहं वज्जीन इमे 'सत्त अपरिहानिये धम्म देसेसि । किवञ्च ब्राह्मण ! इमे सत्त अपरिहानिया धम्मा वज्जीसु ठस्सन्ति । याव [७] "क्या सुना है,-वजी लोग अर्हतों (=पूज्यों) की अच्छी तरह धार्मिक (= धर्मानुसार ) रक्षा=आवरण =गुप्ति करते हैं। किसलिये ? भविष्यमें अर्हत् राज्यमें आवें, आये अर्हत् राज्यमें सुखसे विहार करें।" "सुना है, भन्ते ! " "जब तक (५) तब भगवान्ने ० वर्षकार ब्राह्मणको संबोधित किया- "ब्राह्मण ! एक समय मैं वैशालीके सानन्दर-चैत्यमें विहार करता था। वहाँ मैंने वज्जियों को यह सात अपरिहाणीय-धर्म (= अ-पतनके नियम ) कहे। जब तक ब्राह्मण ! यह सात अपरि-हाणीय-धर्म वज्जियोंमें रहेंगे; इन सात अपरिहाणीय- महापरिनिब्बान सुत्तं इमेसु च सत्तसु अपरिहानियेसु धम्मेसु वज्जी सन्दिस्सिस्सन्ति । वुद्धियेव ब्राह्मण ! वज्जीन पाटिकवा, नो परिहानी, ति।" (६) एवं वुत्ते वस्सकारोब्राह्मणो मगध महामत्तो भगवन्तं एतदवोच- "एकमेकेनपि भो गोतम ! अपरिहानियेन धम्मेन समन्नागतान वज्जीन बुद्धियेव पाटिकला नो परिहानि । कोपनवादा सत्तहि अपरिहानियेहि धम्मेहि ? अकरणीया च भो गोतम ! वज्जीन रञा मागधेन अजात- सत्तुना वेदेहिपुत्तेन यदिदं युद्धस्स अअत्र उपलापनाय अञत्र मिथुभेदाय"। "हन्द च दानि मयं भो गोतम ! गच्छाम । : बहुकिच्चा मयं बहु करणीया, ति" “यस्स दानि त्वं ब्राह्मण ! कालं मञ्जसी, ति"। (७) अथ खो वस्सकारो ब्राह्मणो मगध महामत्तो भगवतो भासित अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उडायासना पक्कामि । धर्मों में वज्जी ( लोग) दिखलाई पळेंगे; (तब तक ) ब्राह्मण ! वज्जियोंकी वृद्धि ही समझना, हानि नहीं।" (६) ऐसा कहने पर० वर्षकार ब्राह्मण भगवान्से बोला- "हे गौतम ! ( इनमेंसे) एक भी अपरिहाणीय-धर्मसे वज्जियोंकी वृद्धि ही समझनी होगी, सात अ-परिहाणीय धर्मोंकी तो बात ही क्या ? हे गौतम ! राजा • को उपलाप (=रिश्वत देना ), या आपसमें फूटको छोळ, युद्ध करना ठीक नहीं । हन्त ! हे गौतम ! अब हम जाते हैं, हम बहु-कृत्य = बहु-करणीय (= बहुत कामवाले ) हैं " "ब्राह्मण ! जिसका तू काल समझता है।" (७) "तब मगध-महामात्य वर्षकार ब्राह्मण भगवान्के भाषणको अभिनन्दन- कर, अनुमोदनकर, आसनसे उठकर, चला गया । - * अ. क. "राजाके पास गया। राजाने उससे पूछा-'आचार्य ! भगवान्ने क्या कहा। उसने कहा-'भो ! श्रमण के कथनसे तो वज्जियोंका किसी प्रकार भी लिया नहीं जा सकता; हाँ, उपलापन (= रिश्वत) और आपसमें फूट होनेसे लिया जा महापरिनिब्बान सुत्तं (८) अथ खो भगवा अचिर पक्कन्ते वस्सकारे ब्राह्मणे मगध महामत्ते आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि- "गच्छ त्वं आनन्द ! यावतिका भिक्खू राजगहं उपनिस्साय विहरन्ति । ते सब्बे उपहानसालायं सन्निपातेही, ति। (८) तब भगवान्ने वर्षकार ब्राह्मणके जानेके थोळी ही देर बाद आयुष्मान् अानन्दको संबोधित किया- "जाओ, आनन्द ! तुम जितने भिक्षु राजगृहके आसपास विहरते हैं, उन सबको उपस्थान-शालामें एकत्रित करो।" . . ) सकता है। तब राजाने कहा-'उपलापन से हमारे हाथी घोळे नष्ट होंगे, भेद ( = फूट) से ही पकळना चाहिये ।।" "तो महाराज ! वज्जियोंको लेकर तुम परिषद्में बात उठाओ। तब मैं- 'महाराज ! तुम्हें उनसे क्या है ? अपनी कृषि, वाणिज्य करके यह राजा (= प्रजातन्त्रके सभासद् ) जीयें-कहकर चला जाऊँगा। तब तुम बोलना-क्योंजी! यह ब्राह्मण वज्जियोंके सम्बन्धमें होती बातको रोकता है। उसी दिन मैं उन (= वज्जियों ) के लिये भेंट (= पर्णाकार) मेजू गा; उसे भी पकळकर मेरे ऊपर दोषारोपण कर, बन्धन, ताळन आदि न कर, छुरेसे मुण्डन करा मुझे नगरसे निकाल देना। तब मैं कहूँगा- मैंने तेरे नगर में प्राकार और परिखा ( = खाई। बनवाई है; मैं दुर्बल...तथा गम्भीर स्थानों को जानता हूँ, अब जल्दी (तुझे) सीधा करूँगा'। ऐसा सुनकर बोलना—'तुम जाओ' । "राजाने सब किया। लिच्छवियोंने उसके निकालने (=निष्क्रमण) को सुनकर कहा-'ब्राह्मण मायावी (= शठ) है, उसे गंगा न उतरने दो।' तब किन्हीं किन्हींके 'हमारे लिये कहनेसे तो वह (राजा) ऐसा करता है' कहनेपर,-'तो भणे ! आने दो'। उसने जाकर लिच्छवियों द्वारा-'किस लिये आये ?' पूछनेपर, वह (सब) हाल कह दिया। लिच्छवियोंने-'थोळीसी बातके लिये इतना भारी दंड करना युक्त नहीं था' कहकर-'वहाँ तुम्हारा क्या पद = (स्थानान्तर) था'-पूछा। 'मैं विनिश्चय महामात्य था-कहनेपर)-'यहाँ भी (तुम्हारा) वही पद रहे'-कहा । वह सुन्दर तौरसे विनिश्चय (= इन्साफ) करता था। राजकुमार उसके पास विद्या (= शिल्प) ग्रहण करते थे। अपने गुणोंसे प्रतिष्ठित हो जानेपर वह एक दिन एक लिच्छवीको एक अोर ले जाकर- २ R महापरिनिब्बान सुत्तं १० (९) एवं भन्ते तिखो आयस्मा अानन्दो भगवतो पटिस्सुत्वा यावतिका भिक्खू राजगहं उपनिस्साय विहरन्ति, ते सब्बे उपहानसालायं सन्नि- पातेत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्त अहासि । एकमन्त ठितो खो आयस्मा आनन्दो भगवन्त एतदवोच-"सन्निपतितो भन्ते ! भिक्खु-संघो। यस्स दानि भन्ते ! भगवा कालं मञ्जसी, ति ।" (९) "अच्छा, "भन्ते ! भिक्षुसंघको एकत्रित कर दिया, अब भगवान् जिसका समय समझ।" भन्ते !"01 दा खेत (= केदार, क्यारी) जोतते हैं। ? 'हाँ जोतते हैं'। 'दो बैल जोतकर? -'हाँ, बैल जोतकर' - कहकर लौट आया। तब उसको दूसरेके. 'आचार्य ! (उसने) क्या कहा - पूछनेपर, उसने वह कह दिया। (तब) 'मेरा विश्वास न कर, यह ठीक ठीक नहीं बतलाता है' (सोच) उसने बिगाळ कर लिया। ब्राह्मण दूसरे दिन भी एक लिच्छवी को एक ओर ले जाकर 'किस व्यंजन ( = तेमन, तरकारी) से भोजन किया' पूछकर लौटनेपर, उससे भी दूसरेने पूछकर, न विश्वासकर वैसेही बिगाळ कर लिया। ब्राह्मण किसी दूसरे दिन एक लिच्छवीको एकान्त में लेजाकर-'बळे गरीब हो न ?'-पूछा। 'किसने ऐसा कहा ? 'अमुक लिच्छवीने।' दूसरे को भी एक ओर लेजाकर-'तुम कायर हो क्या ?? 'किसने ऐसा कहा' अमुक लिच्छवीने।' इस प्रकार दूसरेके न कहे हुएको कहते तीन वर्ष (४८३-४८० ई. पू.) में उन राजाओंमें परस्पर ऐसी फूट डाल दी, कि दो आदमी एक रास्तेसे भी न जाते थे। वैसा करके, जमा होनेका नगारा (= सन्निपात- । । मेरी ) बजवाया। लिच्छवी-'मालिक (= ईश्वर ) लोग जमा हो'-कहकर नहीं जमा हुए। तब उस ब्राह्मणने राजाका जल्दी पाने के लिये खबर (= शासन ) भेजी। राजा सुनकर सैनिक नगारा ( = बलभेरी ) बजवाकर निकला। वैशालीवालों ने सुनकर भेरी बजवाई- '(आओ चलें) राजाको गंगा न उतरने दें। उसको भी सुनकर-'देव-राज (= सुर- राज) लोग जायें आदि कहकर लोग नहीं जमा हुए। (तब) भेरी बजवाई-'नगरमें घुसने न दें, (नगर-) द्वार बन्द करके रहें। एक भी नहीं जमा हुआ। (राजा अजात- शत्र) खुले द्वारोंसे ही घुसकर, सबको तबाह कर (= अनय-व्यसनं पापेत्वा) चला गया। ) ११ महापरिनिव्वान सुत्तं . (१०) अथ खो भगवा उहायासना येन उपहानसाला, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा पञ्जत्ते आसने निसीदि। निस्सज्ज खा भगवा भिक्खू आमन्तेसि-"सत्त वो भिक्खवे ! अपरिहानिये धम्मे देसेस्सामि । त सुरणाथ साधुकं मनसिकरोथ भासिस्सामी,” ति । 'एवं भन्ते, ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सासुं। (११) भगवा एतदवोच। [१] "याव किवञ्च भिक्खवे! भिक्खू अभिण्हं सन्निपाता सन्नि- पात बहुला भविस्सन्ति, वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकला नो परिहानि।" [२] "याव किवञ्च भिक्खवे! भिक्खू समग्गा सन्निपतिस्सन्ति, समग्गा वुट्टहिस्सन्ति, समग्गा संघ करणीयानि करिस्सन्ति । वुद्धि येव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकङ्खा, नो परिहानि [३] “याव किवञ्च भिक्खये ! भिक्खू अपञ्जत्तं न पञपेस्सन्ति, पञ्चत्तं न समुच्छिन्दिस्सन्ति; यथा पञ्चत्तेसु सिक्खापदेसु समादाय वत्तिस्सन्ति । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकला ना परिहानि ।" [४] "याव किवञ्च भिक्खवे ! ये ते भिक्खू थेरा रत्त चिरपब्बजिता (१०) तब भगवान् आसनसे उठकर जहाँ उपस्थान-शाला थी, वहाँ जा, बिछे आसन पर बैठे। बैठ कर भगवान्ने भिक्षुओंको संबोधित किया-"भिक्षुओ! तुम्हें सात अपरिहाणीय-धर्म उपदेश करता हूँ, उन्हें सुना कहता हूँ।" ..."अच्छा, भन्ते !"... (११) "[१] भिक्षुओ! जब तक भिक्षु बार बार (= अभीक्ष्णं ) बैठक करनेवाले =सन्निपात-बहुल रहेंगे; ( तब तक ) भिक्षुओ ! भिक्षुओंकी वृद्धि समझना, हानि नहीं। [२] जब तक भिक्षुओ ! भिक्षु एक हो बैठक करेंगे, एक हो उत्थान करेंगे; एक हो संघके करणीय ( कामों) को करेंगे; ( तब तक ) भिक्षुओ! भिक्षुओंकी वृद्धि ही समझना, हानि नहीं। [३] जब तक ० अप्रज्ञप्तों (= अ-विहितों) को प्रज्ञप्त नहीं करेंगे, प्रज्ञप्तका उच्छेद नहीं करेंगे; प्रज्ञप्त शिक्षा-पदों (=विहित भिक्षु- नियमों ) के अनुसार बर्तंगे। [४] जब तक • जो वह रक्तज्ञ (=धर्मानुरागी) ( ) महापरिनिब्बान सुत्तं संघ परिणायका, ते सक्करिस्सन्ति, गरूं करिस्सन्ति, मानेस्सन्ति, पूजेस्सन्ति । तेसश्च सातब्बं मअिस्सन्ति । बुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकला ना परिहानि।" [५] “याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू उप्पन्नाय तराहाय पोनाभविकाय न वसं गिच्छिस्सन्ति । बुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकला ना परिहानि ।" [६] "याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू आरकेसु सेनासनेसु सापेक्खा भविस्सन्ति । बुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकला ना परिहानि ।" [७] "याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू पञ्चत्तव सति उपट्टपेस्सन्ति । किन्ति अनागता च पेसला सब्रह्मचारी आगच्छेय्युं, आगता च पेसला सब्रह्मचारी फासुविहरेय्युन्ति । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकला ना परिहानि।" "याव किवञ्च भिक्खवे ! इमे सत्त अपरिहानिया धम्मा भिक्खूसु ठस्सन्ति । इमेसु च सत्तसु अपरिहानियेसु धम्मेसु भिक्खू सन्दिस्सि. स्सन्ति । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकला नो परिहानि ।" (१२) अपरेपि वो भिक्खवे ! सत्त अपरिहानिये धम्मे देसेस्सामि । त सुणाथ साधुकं मनसिकरोथ भासिस्सामी, ति । 'एवं भन्ते,' ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच-[१] याव किवच चिरप्रब्रजित, संघके पिता, संघके नायक, स्थविर भिक्षु हैं, उनका सत्कार करेंगे, गुरुकार करेंगे, मानेंगे, पूजेंगे, उन ( की बात ) को सुनने योग्य मानेंगे । [५] जब तक पुन: पुन: उत्पन्न होनेवाली तृष्णाके वशमें नहीं पळेंगे। [६] जब तक ० भिक्षु, आरण्यक शयनासन (वनकी कुटियों) की इच्छावाले रहेंगे०। [७] जब तक भिक्षुओ ! हर एक भिक्षु यह याद रखेगा कि अनागत (=भविष्य ) में सुन्दर सब्रह्मचारी आवें, आये हुए (= आगत ) सुन्दर सब्रह्मचारी सुखसे विहरें; ( तब तक ) । भिक्षुओ ! जब तक यह सात अ-परिहाणीय-धर्म ( भिक्षुओंमें ) रहेंगे; (जब तक ) भिक्षु इन सात अ-परिहाणीय-धर्मों में दिखाई देंगे; ( तब तक ) । (१२) "भिक्षुओ ! और भी सात अ-परिहाणीय धर्मोको कहता हूँ। उसे सुनो ........। [१] भिक्षुत्रो ! जब तक भिक्षु ( सारे दिन चीवर आदिक) काममें महापरिनिब्बान सुत्तं AU भिक्खवे ! भिक्खू न कम्मारामा भविस्सन्ति, न कम्मरता न कम्मारा. मतमनुयुत्ता, वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकङ्खा नो परिहानि । [२] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू न भस्सारामा भविस्सन्ति, न भस्सरता न भस्सारामतमनुयुत्ता। वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकवा नो परिहानि। [३] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू न निद्दारामा भविस्सन्ति, न निदारता, न निद्दारामतमनुयुत्ता । बुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकला नो परिहानि । [४] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू न सङ्गणिकारामा भविस्सन्ति, न सङ्गणिकरता, न सङ्गणिकारामतमनुयुत्ता वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकला नो परिहानि। [५] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू न पापिच्छा भविस्सन्ति, न पापिकानं इच्छानं वसंगता । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकला नो परिहानि [६] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू न पापमित्ता भविस्सन्ति, न पाप सहाया, न पाप सम्पवङ्कता। वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकला नो परिहानि। [७] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू न ओरमत्तकेन विसेसाधिगमेन अन्तरा वोसानं आपिज्जिस्सन्ति । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकला नो परिहानि । याव किवञ्च भिक्खवे ! इमे सत्त अपरिहानिया धम्मा भिक्खूसु लगे रहनेवाले (=कर्माराम )=कर्मरत=कमारामता-युक्त नहीं होंगे। (तब तक)। [२] जब तक भिक्षु बकवादमें लगे रहनेवाले (=भस्साराम ),=भस्सरत =भस्सारामता-युक्त नहीं होंगे। [३] . निद्राराम=निद्रा-रत=निद्रा-रामता- युक्त नहीं होंगे। [४] 0 संगणिकाराम (= भीळको पसन्द करनेवाले)=संगणिक- रत= संगणिकारामता-युक्त नहीं होंगे। [५] ० पापेच्छ (=बदनीयत)=पाप- इच्छाओंके वशमें नहीं होंगे० । [६] • पाप-मित्र (=बुरे मित्रोंवाले), पाप-सहाय, बुराईको ओर रुझानवाले न होंगे० । [७] ० थोळसे विशेष (=योग-साफल्य) को पाकर बीचमें न छोळ देंगे।

१४ महापरिनिब्वान सुत्तं ठस्सन्ति । इमेसु च सत्तसु अपरिहानियेसु धम्मेसु भिक्खू सन्दिस्सि- स्सन्ति । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि । (१३) अपरेपि वो भिक्खवे! सत्त अपरिहानिये धम्मे देसिस्सामिका [१] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू सद्धा भविस्सन्ति ।। २]"हिरिमना भविस्सन्ति । ] ३ ]"श्रोत्तप्पी भविस्सन्ति ।। [ ४ ] "बहुस्सुता भविस्सन्ति। [५] 'पारद्ध वीरिया भविस्सन्ति...|| [६]..."उपद्वित सती भविस्सन्ति॥ [७]. "पञ्बवन्तो भविस्सन्ति। वद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकला ना परिहानि । याव किवञ्च भिक्खवे ! इमे सत्त अपरिहानिया धम्मा भिक्खूसु ठस्सन्ति । इमे सु च सत्तसु अपरिहानियेसु धम्मेसु भिक्खू सन्दिस्सि- स्सन्ति । बुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि ॥ (१४) अपरे पि वो भिक्खवे! सत्त अपरिहानिये धम्मे देसेस्सामि ।। त सुणाथ साधुकं मनसि करोथ भासिस्सामी, ति ॥ 'एवं भन्ते' ति खो ते भिक्खू भगवतो पञ्चस्सासु ।। भगवा एतदवोच- [१] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू सति-सम्बोज्झङ्गं भावेस्सन्ति । (१३) "भिक्षुओ! और भी सात अ-परिहाणाय-धर्मों को कहता हूँ .....। [१] भिक्षुओ ! जब तक भिक्षु श्रद्धालु होंगे। [२] ० (पापसे) लज्जाशोल (=ह्रीमान् होंगे। [३] ० (पापसे) भय खानेवाले (= अपत्रपी) होंगे । [४] ० बहुश्रुत ० [५] ० उद्योगी (=प्रारब्ध-वीर्य) ० । [६] • याद रखनेवाले (= उपस्थित-स्मृति) ० । [७] ० प्रज्ञावान् होंगे 101 (१४) “भिक्षुओ ! और भी सात अ-परिहाणीय-धर्मोंको० । [१] भिक्षुओ!

महापरिनिब्बान सुत्तं १५ याव [२]."धम्मविचय-सम्बोझङ्ग भावेस्सन्ति। [ ३ |"वीरिय-सम्बोझङ्ग भावेस्सन्ति । [४]"पीति-सम्बोज्झॉ भावेस्सन्ति। [५] "पस्सद्धि-सम्बोझङ्ग भावेस्सन्ति । [६]""समाधि-सम्बोज्झङ्ग भावेस्सन्ति। [७] उपेक्खा-सम्बोझङ्ग भावेस्सन्ति ।। वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकवा नो परिहानि । किवञ्च भिक्खवे ! इमे सत्त अपरिहानिया धम्मा भिक्खूसु ठस्सन्ति । इमेसु च सत्तसु अपरिहानियेसु धम्मेसु भिक्खू सन्दिस्सिस्सन्ति । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि । (१५) अपरे पि वो भिक्खवे ! सत्त अपरिहानिये धम्मे देसेस्सामि । तं सुणाथ साधुकं मनसि करोथ भासिस्सामी, ति। 'एवं भन्ते', ति खो ते भिक्खू भगवतो पञ्चस्सोसुं । भगवा एतदवोच- [१] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू अनिच्च-सचं भावेस्सन्ति.... [२] अनत्त-सञ्बं भावेस्सन्ति......॥ Rashan जब तक भिक्षु स्मृतिसंबोध्यंग * की भावना करेंगे। [२] ० धर्म-विचय-संबोध्यंगकी। [३] 0 वीर्य-सं० । [४] प्रीति-सं० । [५] ० प्रश्रब्धि-सं०। [६] ० समाधि-सं० । [७] 0 उपेक्षा-संबोध्यंगकी भावना करेंगे । (१५) “भिक्षुओ! और भी सात अ-परिहाणीय-धर्मों को कहता हूँ।......। [१] भिक्षुओ ! जब तक भिक्षु अनित्य-संज्ञाकी भावना करेंगे. [२] • अनात्मसंज्ञा० । * परमज्ञान प्राप्त करने के लिये सात आवश्यक बातें।

१६ महापरिनिब्बान सुत्तं [५ . . [३] ......असुभ-सञ्वं भावेस्सन्ति [४] आदीनव-सञ्ज्ञ भावेस्सन्ति......।। ५] पहान-सञ्चं भावेस्सन्ति .....|| विराग-सबं भावेस्सन्ति .....॥ [७] ..... निरोध-सञ्ज्ञ भावेस्सन्ति ......|| वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकला नो परिहानि । याव किवश्च भिक्खवे ! इमे सत्त अपरिहानिया धम्मा भिक्खूसु ठस्सन्ति । इमेसु च सत्तसु अपरिहानियेसु धम्मेसु भिक्खू सन्दिस्सिस्सन्ति बुद्धियेव भिवखवे ! भिक्खूनं पाटिकवा, नो परिहानि ॥ (१६) छ भिक्खवे ! अपरिहानिये धम्मे देसेस्सामि । तं सुणाथ साधुकं मनसिकरोथ भासिस्सामी, ति ॥ एवं भन्ते,' ति खो ते भिक्ख भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच- [१] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू मेत्तं काय कम्मं पच्चु- पट्टापेस्सन्ति सब्रह्मचारी सु ावीचेवरहो च । बुद्धि येव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकवा, नो परिहानि ।। [२].. मेत्तं वची कम्मं पच्चुपट्टापेस्सन्ति ।। [३].. मेत्तं मनोकम्मं पच्चुपट्टापेस्सन्ति सब्रह्मचारीसु ावीचेव- रहोच । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि । [ ४ ] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खू ये ते लामा धम्मिका धम्म लद्धा अन्तमसो पत्त-परियापन-मत्तंपि तथा रूपे हि लाभेहि अप्पटि [३] • भोगोंमें; अशुभसंज्ञा । [४] • आदिनव (= दुष्परिणाम )-संज्ञा। [५] प्रहाण-(=त्याग ) संज्ञा । [६] ० विराग-संज्ञा । [७] निरोधसंज्ञा । । (१६) “भिक्षुओ ! और भी छै अ-परिहाणीय-धर्मोंको कहता हूँ।...| [१] जब तक भिक्षु-सब्रह्मचारियों (= गुरुभाइयों) में गुप्त और प्रकट, मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म रखेंगे । [२] ० मैत्रीपूर्ण वाचिक-कर्म रक्खेंगे । [३] ० मैत्रीपूर्ण मानसिक-कर्म रक्खेंगे । [४] 0 जब तक भिक्षु धार्मिक, धर्म से प्राप्त जो लाभ हैं-अन्तमें पात्रमें महापरिनिब्बान सुत्तं विभत्त भोगी भविस्सन्ति सीलवन्ते हि सब्रह्मचारी हि साधारण भोगी। वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकडा नो परिहानि ॥ [५] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खूनं यानि तानि सीलानि अखण्डानि अछिद्दानि असबलानि अकम्मासानि भुजिस्सानि विप. सहानि अपरामहानि समाधि संवत्तनिकानि । तथा रूपे सुसीलेसु सील सामञ्जगता विहरिस्सन्ति सब्रह्मचारी हि आवीचेवरहोच । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानि । [६] याव किवञ्च भिक्खवे ! भिक्खूनं या यं दिहि अरिया निय्यानिका निययाति तक रस्स सम्मा दुक्खक्खयाय तथा रूपाय दिहिया दिहि सामञगता विहरिस्सन्ति सब्रह्मचारी हि आचीचेवरहोच । बुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खून पाटिकङ्खा, नो परिहानि । (१७) याव किवञ्च भिक्खवे ! इमे छ अपरिहानिया धम्मा भिक्खूसु उस्सन्ति । इमेसु छसु अपरिहानियेसु धम्मेसु भिक्खू सन्दिस्सिस्सन्ति । वुद्धियेव भिक्खवे ! भिक्खूनं पाटिकङ्खा, नो परिहानी, ति । (१८) तत्र सुदं भगवा राजगहे विहरन्तो गिझकूटे पब्बते एतदेव बहुलं भिक्खूनं धम्मि-कथं करोति । 'इति सील, इति समाधि, इति चुपळने मात्र भी-वैसे लाभोंको (भी) शीलवान् सब्रह्मचारी भिक्षुओंमें बाँटकर भोग करनेवाले होंगे ० [५] ० जब तक भिक्षु, जो वह अखंड (=निर्दोष ) अ-छिद्र,अ-कल्मष =भुजिस्स ( =सेवनीय), विद्वानोंसे प्रशंसित, अ-निन्दित समाधिकी ओर (ले ) जानेवाले शील हैं, वैसे शीलोंसे शील-श्रामण्य-युक्त हो सब्रह्मचारियोंके साथ गुप्त भी प्रकट भी विहरेंगे । [६] जो वह आर्य ( = उत्तम ), नैर्याणिक ( =पार करानेवाली ), वैसा करनेवालेको अच्छी प्रकार दुःख-क्षयकी ओर ले जानेवाली दृष्टि है, वैसी दृष्टिसे दृष्टि-श्रामण्य-युक्त हो, सब्रह्मचारियोंके साथ गुप्त भी प्रकट भी विहरेंगे। ( १७) भिक्षुओ! जब तक यह छै अपरिहाणीय-धर्म । (१८) वहाँ राजगृहमें गृध्रकूट-पर्वतपर विहार करते हुए भगवान् बहुत करके भिक्षुओंको यही धर्मकथा कहते थे-ऐसा शोल है, ऐसी समाधि है, ऐसी प्रज्ञा ) , ३ १८ महापरिनिब्बान सुत्तं , पना। सील परिभावितो समाधि महप्फलो होति महानिसंसो। समाधि परिभाविता पञ्जा महप्फला होति महानिसंसा। पञ्जा परिभावित चित्तं सम्मदेव आसवेहि विमुञ्चति । सेय्यथिदं, कामासवा, भवासवा, अविज्जासवा, ति।' (१९) अथ खो भगवा राजगहे यथाभिरन्त विहरित्वा आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि 'आयामानन्द ! येन अम्बलटिका तेनुपसङ्क- मिस्सामा, ति।' 'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पच्चस्सोसि । (२०) अथ खो भगवा महता भिक्खु संघेन सद्धि येन अम्बलहिका तदवसरि । तत्र सुदं भगवा अम्बलहिकायं विहरति राजागारके । तत्र पि सुदं भगवा अम्बलहिकायं विहरन्तो राजागारके, एतदेव बहुलं है। शीलसे परिभावित समाधि महा-फलवाली=महा-आनृशंसवाली होती है। समाधिसे परिभावित प्रज्ञा महाफलवाली=महा-आनृशंसवाली होती है। प्रज्ञासे परिभावित चित्त आस्रवों*,-कामास्रव, भवास्रव, दृष्टि-आस्रव से अच्छी तरह मुक्त होता है। बुद्धकी अन्तिम यात्रा अम्ब-लटिका- (१९) तब भगवान्ने राजगृहमें इच्छानुसार विहारकर आयुष्मान् आनन्दको आमंत्रित किया- "चलो आनन्द ! जहाँ अम्बलटिका है, वहाँ चलें।" "अच्छा, भन्ते !"... (२०) तब भगवान् महान् भिक्षु-संघके साथ जहाँ अम्बलट्ठिका थी, वहाँ पहुंचे। वहाँ भगवान् अम्बलट्टिकामें राजगारको विहार करते थे। वहाँ । राजगारकमें भी भगवान् भिक्षुओंको बहुधा यही धर्म-कथा कहते थे-०। * आस्रव (= चित्त-मल )- भोग (= काम)-संबंधी, आवागमन (= भव)-संबंधी, धारणा ( = दृष्टि )-संबंधी। - Maclass-

(२१) भगवान्ने अम्बलट्ठिकामें यथेच्छ विहार कर आयुष्मान् आनन्दको
महापरिनिब्बान सुन्त
१९
भिक्खून धम्मि-कथं करोति । 'इति सील, इति समाधि, इति पञा।
सील परिभावितो समाधि महप्फलो होति महानिसंसो । समाधि
परिभाविता पना महप्फला होति महानिसंसा। पचा परिभावित
चित्तं सम्मदेव आसवेहि विमुञ्चति । सेय्यथिदं—कामासवा, भवासवा,
अविज्जासवा, ति।'
(२१) अथ खो भगवा अम्बलडिकायं यथाभिरन्त विहरित्वा
आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि 'आयामानन्द ! येन नालन्दा,
तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति ।
'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पच्चस्सोसि ।
(२२) अथ खो भगवा महता भिक्खु संघेन सद्धि येन नालन्दा,
तदवसरि । तत्र सुदं भगवा नालन्दायं विहरति पावारिकम्बवने ।
अथ खो आयस्मा सारिपुत्तो येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा
भगवन्त अभिवादेत्वा एकमन्त निसीदि । एकमन्त निसिन्नो खो
ओमंत्रित किया-
"चलो आनन्द ! जहाँ नालन्दा है, वहाँ चलें।” “अच्छा, भन्ते !"...
बुद्ध के प्रति सारिपुत्रका उद्गार
नालन्दा-
( २२) तब भगवान् वहाँसे महाभिक्षु-संघके साथ जहाँ नालन्दा थी, वहाँ
पहुँचे। वहाँ भगवान् नालन्दा*में प्रावारिक-आम्रवनमें विहार करते थे।
तब आयुष्मान सारिपुत्रां जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान्को
अभिवादनकर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् सारिपुत्रने
भगवान्से कहा-
-
* वर्तमान बळगांव, जिला पटना।
प्र० १२५ टि०१से विकट होनेसे मारिपत्रका दमनको

२० महापरिनिब्बान सुत्तं आयस्मा सारिपुत्तो भगवन्त एतदवोच-'एवं पसन्नो अहं भन्ते ! भगवति । न चाहु न च भविस्सति न चेतरहि विज्जति अमो समणो वा ब्राह्मणो वा भगवता भिय्यो भिबत्तरो यदिदं सम्बोधियन्ति । (२३) उलारा खो ते अयं सारिपुत्त ! असम्भिवाचा भासिता। एकं सो गहिता सीहनादो नदितो । 'एवं पसन्नो अहं भन्ते ! भगवति । न चाहु, न च भविस्सति, न चेतरहि विज्जति अञ्चो समणो वा ब्राह्मणो वा भगवता भिय्यो भितरो यदिदं सम्बोधियन्ति ।' (२४) 'किनु सारिपुत्त ! ये ते अहेसुं अतीत-मद्धानं अरहन्तो सम्मा- सम्बुद्धा। सब्वे ते भगवन्तो चेतसा चेतापरिच विदिता । एवं सीला ते भगवन्तो अहेसुं इति पि । एवं धम्मा, एवं पञ्चा, एवं विहारी, एवं विमुत्ता ते भगवन्तो अहेसुं इति पी, ति ? ॥ ना हेतं भन्ते! (२५) किं पन सारिपुत्त ! ये ते भविस्सन्ति अनागत-मद्धानं अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा। सब्बे ते भगवन्तो चेतसा चेतो परिच्च विदिता । एवं सीला ते भगवन्तो भविस्सन्ति इति पि । एवं धम्मा, एवं पञ्चा, एवं विहारी, एवं विमुत्ता ते भगवन्तो भविस्सन्ति इति पी, ति" ॥ "भन्ते ! मेरा ऐसा विश्वास है-'संबोधि (=परमज्ञान) में भगवान्से बढ़कर(=भूयस्तर) कोई दूसरा श्रमण ब्राह्मण न हुआ, न होगा, न इस समय है।" (२३) “सारिपुत्र ! तूने यह बहुत उदार ( =वळी) =आर्षभी वाणी कही। बिल्कुल सिंहनाद...किया-'मेरा ऐसा ।' (२४) सारिपुत्र ! जो वह अतीतकालमें अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध हुए, क्या (तूने ) उन सब भगवानोंको (अपने ) चित्तसे जान लिया; कि वह भगवान ऐसे शीलवाले, ऐसी प्रज्ञावाले, ऐसे विहारवाले, ऐसी विमुक्तिवाले थे ?" "नहीं, भन्ते !" (२५) “सारिपुत्र ! जो वह भविष्यकालमें अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध होंगे, क्या उन सब भगवानोंको चित्तसे जान लिया 07 महापरिनिब्बान सुत्तं २१ ना हेत भन्ते! (२६) किं पन सारिपुत्त ! अहं एतरहि अरहं सम्मासम्बुद्धो चेतसा चेतो परिच विदितो। एवं सीलो भगवा इति पि। एवं धम्मा, एवं पञ्बो, एवं विहारी, एवं विमुत्तो भगवा इति पी, ति ? । ना हेत भन्ते ! (२७) एतरहि ते सारिपुत्त ! अतीतानागत पच्चुप्पन्नेसु अरहन्तेसु सम्मासम्बुद्धेसु चेतसा चेतो परियाय आणं नत्थि, अथ किञ्च-रहिते अयं सारिपुत्त ! उलारा असम्भि वाचा भासिता। एक सो गहिता सीह- नादो नदितो-'एवं पसन्नो अहं भन्ते ! भगवति । न चाहु, न च भवि- स्सति, न चेतरहि विज्जति अञो समणो वा ब्राह्मणो वा भगवता भिय्यो भिबतरो यदिदं सम्बोधियन्ति । (२८) न खा मे भन्ते ! अतीतानागत पञ्चुप्पनेसु अरहन्तेसु सम्मा- सम्बुद्धसु चेता परियाय आणं अस्थि । अपिच खो मे भन्ते ! धम्मन्वयो विदितो, सेय्यथापि भन्ते !-रञ्बो पञ्चन्तिमं नगर दल्ह द्वार, दल्ह पाकार तारणं एक द्वार। तत्रस्स दोवारिको पण्डितो वियत्तो मेधावी "नहीं, भन्ते !" (२६) “सारिपुत्र ! इस समय मैं अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध हूँ, क्या चित्तसे जान लिया, (कि मैं ) ऐसी प्रज्ञावाला ० हूँ ?" "नहीं, भन्ते !" (२७) "(जब) सारिपुत्र ! तेरा अतीत, अनागत (=भविष्य), प्रत्युत्पन्न (=वर्तमान) अर्हत्-सम्यक्-संबुद्धोंके विषयमें चेतः-परिज्ञान (=पर-चित्तज्ञान) नहीं है; तो सारिपुत्र ! तूने क्यों यह बहुत उदार = आर्षभी वाणी कही ०?" (२८) "भन्ते ! अतीत-अनांगत-प्रत्युत्पन्न अर्हत्-सम्यक्-संबुद्धोंमें मुझे चेत:- परिज्ञान नहीं है; किन्तु (सबकी) धर्म-अन्वय (=धर्म-समानता) विदित है। जैसे कि भन्ते ! राजा का सीमान्त-नगर दृढ़ नींववाला, दृढ़ प्राकारवाला, एक द्वारवाला २२ महापरिनिब्बान सुत्तं अातानं निवारेता जातानं पवेसेता। सो तस्स नगरस्स समन्ता अनुपरियाय पथं अनुक्कममानो न पस्सेय्य पाकार सन्भि वा पाकार विवर वा अन्तमसो बिलार निक्खमन-मपि। तस्स एव-मस्स ये खो केचि अोलारिका पाणा इमं नगर पविसन्ति वा निक्खमन्ति वा । सब्बे ते इमिनाव द्वारेन पविसन्ति वा निक्खमन्ति वा, ति। एवमेव खो मे भन्ते ! धम्मन्वयो विदितो ॥ ये ते भन्ते ! अहेसुं अतीतमद्धानं अरहन्ता सम्मा- सम्बुद्धा । सब्बे ते भगवन्तो पञ्च नीवरणे पहाय चेतसो उपक्किलेसे पाय दुब्बलि करणे, चतूसु सतिपट्टानेसु सुपहित चित्ता, सत्त बोझङ्गे यथाभूतं भावेत्वा अनुत्तर सम्मासम्बोधि अभिसम्बुझिसु । ये पि ते भन्ते ! भविस्सन्ति अनागतमद्धान अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा। सब्बे ते भगवन्तो पञ्च नीवरणे पहाय चेतसा उपक्किलेसे पञ्बाय दुबलि करणे, चतूसु सतिपट्टानेसु सुपहित चित्ता, सत्त बोझङ्गे यथाभूत भावेत्वा, अनुत्तर सम्मासम्बोधि अभिसम्बुझिस्सन्ति । भगवा पि भन्ते ! एतरहि अरहं सम्मासम्बुद्धो पञ्च नीवरणे पहाय चेतसा उपक्किलेसे पञ्चाय दुब्बलि करणे, चतूसु सतिपटानेसु सुपहित चित्तो, सत्त बोज्झङ्गे यथा- भूत भावेत्वा अनुत्तर सम्मासम्बोधि अभिसम्बुद्धोति ॥ को प्रवेश करानेवाला पंडित व्यक्त =मेधावी द्वारपाल हो। वहाँ नगरको चारों ओर, अनुपर्याय (=क्रमशः) मार्गपर घूमते हुए (मनुष्य), प्राकारमें अन्ततः बिल्लीके निकलने भरकी भी संधि (=विवर ) न पाये। उसको ऐसा हो-जो कोई बळे बळे प्राणी इस नगरमें प्रवेश करते हैं; सभी इसी द्वारसे । ऐसे ही भन्ते ! मैंने धर्म- अन्वय जान लिया- 'जो वह अतीतकालमें अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध हुए, वह सभी भग- वान् भी चित्तके उपक्लेश (=मल) प्रज्ञाको दुर्बल करनेवाले, पाँचों नी व र णों को छोळ, चारों स्मृति-प्रस्थानोंमें चित्तको सु-प्रतिष्ठितकर, सात बोध्यंगोंकी यथार्थसे भावना कर, सर्वश्रेष्ठ (=अनुत्तर) सम्यक-संबोधि (=परमज्ञान) का साक्षात्कार किये थे। और भन्ते ! अनागतमें भी जो अर्हत्-सम्यक्-संबद्ध होंगे; वह सभी भग- वान । भन्ते ! इस समय भगवान अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध ने भी चित्तके उपक्लेश ०।"

महापरिनिब्बान सुत्तं २३ - (२९) तत्र पि सुदं भगवा नालन्दाय विहरन्तो पावारिकम्बवने एतदेव बहुलं भिक्खूनं धम्मि-कथं करोति । इति सील, इति समाधि, इति पञ्बा । सील परिभावितो समाधि महप्फलो होति महानिसंसो । समाधि परिभाविता पञ्चा महप्फला होति महानिसंसा। पञ्चा परिभावित चित्तं सम्मदेव आसवेहि विमुच्चति । सेय्यथिदं-कामासवा, भवासवा, अविज्जासवा, ति। (३०) अथ खो भगवा नालन्दायं यथाभिरन्तं विहरित्वा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि-'आयामानन्द ! येन पाटलिगामो तेनुपसङ्क- मिस्सामा, ति। 'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सोसि । (३१) अथ खो भगवा महता भिक्खु संघेन सद्धिं येन पाटलिगामो तदवसरि । (२९) वहाँ नालन्दामें प्रावारिक-आम्रवनमें विहार करते, भगवान् भिक्षुओंको बहुधा यही कहते थे। पाटलि-ग्राम- ( ३० ) तब भगवान्ने नालन्दामें इच्छानुसार विहारकर, आयुष्मान् आनन्दको आमंत्रित किया- "चलो, आनन्द ! जहाँ पाटलि-ग्राम है, वहाँ चलें।" "अच्छा, भन्ते (३१) तब भगवान् महान् भिक्षुसंघके साथ, जहाँ पा ट लि ग्रा म* था, वहाँ गये। पाटलिग्रामके उपासकोंने सुना कि भगवान् पाटलिग्राम आये हैं। तब... उपासक जहाँ भगवान् थे वहाँ गये। जाकर भगवान्को अभिवादनकर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे...उपासकोंने भगवान्से यह कहा- !" * वर्तमान पटना।

महापरिनिब्बान सुत्तं अस्सोसुंखो पाटलिगामिया उपासका 'भगवा किर पाटलिगाम अनुप्पत्तो, ति । अथ खो पाटलिगामिया उपासका येन भगवा, तेनुपसङ्कमिंसु । उपसङ्कमित्वा भगवन्त अभिवादेत्वा एकमन्त निसी- दिसु । एकमन्त निसिन्ना खो पाटलिगामिया उपासका भगवन्त एतदवोचुं-'अधिवासेतु नो भन्ते ! भगवा श्रावसथागारन्ति । अधिवासेसि भगवा तुहिमावेन । (३२) अथ खो पाटलिगामिया उपासका भगवतो अधिवासनं विदित्वा उहायासना भगवन्त अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा येन आवसथागार, तेनुपसङ्कमिसु । उपसङ्कमित्वा सब्ब सन्थरि सन्थत आवसथागार' सन्थरित्वा आसनानि पञ्जापेत्वा उदकमणिकं पतिद्वापेत्वा तेल-पदीपं आरोपेत्वा येन भगवा, तेनुपसङ्कर्मिसु । उपसङ्कमित्वा भगवन्त अभिवा- देवा एकमन्त असु । एकमन्त ठिता खो पाटलिगामिया उपासका भगवन्त एतदवोचुं। "सब्ब सन्थरि सन्थत भन्ते ! आवसथागार आसनानि पञत्तानि। उदकमणिको पतिहापितो। तेल-पदीपो आरो- पितो । यस्स दानि भन्ते ! भगवा कालं मचती, ति ।" "भन्ते ! भगवान् हमारे आवसथागार ( =अतिथिशाला ) को स्वीकार करें।" भगवान्ने मौनसे स्वीकार किया। (३२) तब...उपासक भगवान्की स्वीकृति जान आसनसे उठ, भगवानको अभिवादनकर, प्रदक्षिणा कर जहाँ आवसथागार था, वहाँ गये। जाकर आवसथा- गारमें चारों ओर बिछौना बिछाकर, आसन लगाकर, जलके बर्तन स्थापितकर, तेल दीपक जला, जहाँ भगवान् थे वहाँ गये। जाकर, भगवान्को अभिवादनकर एक ओर खळे हो गये। एक ओर खळे हो पाटलिग्रामके उपासकोंने भगवानसे यह कहा-"भन्ते ! आवसथागारमें चारों ओर बिछौना बिछा दिया ०, अब जिसका भन्ते ! भगवान् काल सममें।" ।

महापरिनिब्बान सुत्तं २५ (३३) अथ खो भगवा सायन्ह समय निवासेत्वा पत्त चीवर आदाय सद्धि भिक्खु संघेन येन श्रावसथागार', तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा पादे पक्खालेत्वा आवसथागार पविसित्वा मज्झिमं थम्भं निस्साय पुरत्थि- माभिमुखो निसीदि । भिक्खुसंघो पि खो पादे पक्खालेत्वा आवसथा- गार पविसित्वा पच्छिमं भित्ति निस्साय पुरत्थिमाभिमुखो निसीदि भगवन्तमेव पुरक्खित्वा । पाटलिगामिया पि खो उपासका पादे पक्खा- लेत्वा आवसथागार पविसित्वा पुरत्थिमं भित्तिं निस्साय पच्छिमा- भिमुखा निसीदिसु भगवन्तमेव पुरक्खित्वा । (३४) अथ खो भगवा पाटलिगामिये उपासके आमन्तेसि,-पश्चिमे गहपतयो ! आदीनवा दुस्सीलस्स सीलविपत्तिया। कतमे पञ्च ? [१] इध गहपतयो ! दुस्सीलो सीलविपन्नो पमादाधिकरणं महति भोगजानि निगच्छति । अयं पठमो आदीनवो दुस्सीलस्स सीलविपत्तिया । [२ ] पुन च पर गहपतयो ! दुस्सीलस्स सीलविपन्नस्स पापको कित्ति सद्दो अब्भुग्गच्छति । अयं दुतियो आदीनवो दुस्सीलस्स सील- विपत्तिया। [३] पुन च पर गहपतयो ! दुस्सीलो सील विपन्नो यं-यदेव (३३ ) तब भगवान् सायंकालको पहिनकर पात्र चीवर ले, भिक्षु-संघ के साथ . आवसथागारमें प्रविष्ट हो बीचके खम्भे के पास पूर्वाभिमुख बैठे। भिक्षुसंघ भी पैर पखार आवसथागारमें प्रवेशकर, पूर्वकी ओर मुंहकर पच्छिमकी भीतके सहारे भगवान्को आगेकर बैठा। पाटलिग्रामके उपासक भी पैर पखार श्रावसथागारमें प्रवेशकर पच्छिमकी ओर मुंहकर पूर्वकी भीतके सहारे भगवान्को सामने करके बैठे (३४) तब भगवान्ने...उपासकोंको आमंत्रित किया- "गृहपतियो! दुराचारके कारण दुःशील (=दुराचारी) के लिए यह पाँच दुष्परि- णाम हैं। कौनसे पाँच ? गृहपतियो! [१] दुराचारी आलस्य करके बहुतसे अपने भोगोंको खो देता है, दुराचारीका दुराचारके कारण यह पहला दुष्परिणाम है । [२] और फिर...दुराचारीकी निन्दा होती है । [३] दुराचारी आचारभ्रष्ट (पुरुष) - ?

महापरिनिब्बान सुत्तं परिसं उपसङ्कमति यदि खत्तिय-परिसं, यदि ब्राह्मण-परिसं, यदि गहपति-परिसं, यदि समण-परिसं अविसारदो उपसङ्कमति, मङ्कुभूतो । अयं ततियो आदीनवो दुस्सीलस्स सीलविपत्तिया । [४] पुन च पर गहपतयो ! दुस्सीलो सील विपन्नो संमुल्हो कालं करोति । अयं चतुत्यो आदीनवो दुस्सीलस्स सील विपत्तिया । [५] पुन च पर गहपतयो ! दुस्सीलो सील विपन्नो कायस्स भेदा पर मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपात निरयं उपपज्जति । अयं पश्चमा श्रादीनवा दुस्सीलस्स सील विपत्तिया ॥ इमे खो गहपतयो ! पश्च श्रादीनवा दुस्सीलस्स सील विपत्तिया ॥ (३५) पश्चिमे गहपतयो ! आनिसंसा सीलवतो सीलसम्पदाय । कतमे पञ्च? [१] इध गहपतयो ! सीलवा सील सम्पन्नो अप्पमादाधिकरणं महन्त भोगक्खन्दं अधिगच्छति । अय पठमो आनिसंसो सीलवतो सील सम्पदाय ॥ [२] पुन च पर गहपतयो ! सीलवता सील सम्पन्नस्स कल्याणो कित्ति-सदो अब्भुग्गच्छति । अयौं दुतियो आनिसंसा सीलवतो सील सम्पदाय ॥ क्षत्रिय ब्राह्मण, गृहपति या श्रमण जिस किसी सभामें जाता है प्रतिभा रहित, मूक होकर ही जाता है ० । [४] ० मूढ रह मृत्युको प्राप्त होता है । [4] और फिर गृहपतियों! दुराचारी प्राचार भ्रष्ट काया छोळ मरनेके बाद अपाय =दुर्गति = पतन= नरकमें उत्पन्न होता है। दुराचारीके दुराचारके कारण यह पाँचवाँ दुष्परिणाम है। । (३५) "गृहपतियो ! सदाचारीके लिये सदाचारके कारण पाँच सुपरिणाम हैं। कौनसे पाँच ?-[१] गृहपतियो ! सदाचारी अप्रमाद ( =गफलत न करना) होकर बळी भोगराशिको ( इसी जन्ममें ) प्राप्त करता है। सदाचारीको सदाचारके कारण यह पहला सुपरिणाम है। [२] ० सदाचारीका मंगल यश फैलता है ।

महापरिनिब्बान सुत्तं २७ [३] पुन च पर गहपतयो ! सीलवा सील सम्पन्नो यं यदेव परिसं उपसङ्कमति यदि खत्तिय-परिसं, यदि ब्राह्मण-परिसं, यदि गह- पति-परिसं, यदि समण-परिसं विसारदा उपसङ्कमति अमङ्कुभूतो । अय' ततियो आनिसंसो सीलवतो सील सम्पदाय ॥ [४] पुन च पर गहपतयो ! सीलवा सीलसम्पन्नो असंमुल्हो कालं करोति । अयं चतुत्था आनिसंसा सीलवतो सील सम्पदाय ।। [५] पुन च पर गह पतयो ! सीलवा सील सम्पन्नो कायस्स- भेदा परमरणा सुगति सग्गलोकं उपपज्जति । अय पञ्चमो आनिसंसो सीलवतो सील सम्पदाय ॥ इमे खो गहपतयो ! पञ्च आनिसंसा सीलवतो सील सम्पदाया, ति । (३६) अथ खो भगवा पाटलिंगामिके उपासके बहुदेव रत्ति धम्मिया कथाय सन्दस्सेत्वा समादपेत्वा समुत्तेजेत्या संपहंसेत्वा उय्योजेसि । अभिकन्ता खो गहपतयो ! रत्तियस्स दानि तुम्हे कालं मळथा, ति । 'एवं भन्ते', ति खो पाटलिगामिया उपासका भगवतो पटिस्सुत्वा उठायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कर्मिसु । [३] • जिस किसी सभामें जाता है मूक न हो विशारद बनकर जाता है । [४] • मूढ़ न हो मृत्युको प्राप्त होता है । [५] और फिर गृहपतियो ! सदाचारी सदाचारके कारण काया छोळ मरनेके बाद सुगति स्वर्गलोकको प्राप्त होता है। सदाचारीको सदाचारके कारण यह पाँचवाँ सुपरिणाम है । गृहपतियो ! सदाचारीके लिये सदाचारके कारण यह पाँच सुपरिणाम हैं।" (३६) तब भगवान्ने बहुत रात तक...उपासकोंको धार्मिक कथासे संदर्शित... समुत्तेजितकर...उद्योजित किया-“गृहपतियो ! रात क्षीण हो गई, जिसका तुम समय समझते हो (वैसा करो)" २८ महापरिनिब्बान सुत्तं अथ खो भगवा अचिर पक्कन्तेसु पाटलिगामिकेसु उपासकेसु सुजा- गारं पाविसि ॥ (३७) तेन खो पन समयेन सुनिध वस्तकारा मगध महामत्ता पाटलिगामे नगरं मापेन्ति वज्जीनं पटिबाहाय । तेन समयेन सम्पहुला देवता सहस्सस्सेव पाटलिगामे वत्थूनि परिग्गएहन्ति । यस्मि पदेसे महे- सक्खा देवता वत्थूनि परिग्गएहन्ति । महेसक्खानं तत्थ रनं राज-महा- मत्तानं चित्तानि नमन्ति निवेसनानि मापेतु। यस्मि पदेसे मज्झिमा देवता वत्थूनि परिग्गएहन्ति, मज्झिमानं तत्थ रज्जे राज-महामत्तानं "अच्छा भन्ते ! "...पाटलिग्राम-वासी... * उपासक...आसनसे उठकर भगवान्को अभिवादनकर, प्रदक्षिणाकर, चले गये। तब पाटलिग्रामिक उपासकोंके चले जानेके थोळी ही देर बाद भगवान् शून्य-श्रागारमें चले गये। (२) पाटलिपुत्रका निर्माण ( ३७ ) उस समय सुनीध ( -सुनीथ) और वर्षकार मगधके महामात्य पाटलिग्राममें वज्जियोंको रोकनेके लिये नगर बसा रहे थे। उस समय अनेक हजार देवता पाटलिग्राम में वास ग्रहण कर रहे थे। जिस स्थानमें महाप्रभावशाली (=महेसक्ख ) देवताओंने वास ग्रहण किया, उस स्थानमें महाप्रभावशाली राजाओं * "भगवान् कब पाटलिग्राम गये ?... श्रावस्तीमें धर्मसेनापति ( सारिपुत्र) का चैत्य बनवा, वहाँसे निकलकर राजगृहमें वास करते, वहाँ आयुष्मान् महामौद्गल्यायनका चैत्य बनवाकर, वहाँसे निकल अम्बलटिकामें वासकर ; अ-त्वरित चारिकासे देशमें विचरते; वहाँ वहाँ एक एक रात वास करते, लोकानुग्रह करते, क्रमश: पाटलिग्राम पहुँचे । ...पाटलिग्राममें अजातशत्रु और लिच्छवि राजाओंके आदमी समय समयपर पाकर घरके मालिकोंको घर से निकालकर (एक) मास भी आधे मास भी बस रहते थे । इससे पाटलिग्राम वासियोंने नित्य पीळित हो- उनके आनेपर यह (हमारा ) वासस्थान होगा-( सोच ) ... नगरके बीचमें महाशाला बनवाई। उसीका नाम था आवसथा- गार। वह उसी दिन समाप्त हुआ था।"-अट्ठकथा ।

महापरिनिब्बान सुत्तं २९ चित्तानि नमन्ति निवेसनानि मापेतु । यस्मि पदेसे नीचा देवता वत्थूनि परिग्गएहन्ति, नीचानं तत्थ रज राज-महामत्तानं चित्तानि नमन्ति निवेसनानि मापेतु। अदस खो भगवा दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अति. कन्त मानुसकेन ता देवतायो सहस्सस्सेव पाटलिगामे वत्थूनि परिग्ग- एहन्तियो॥ (३८) अथ खो भगवा रत्तिया पच्चुस समयं पच्चुट्टाय प्रायस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि-"कोनुखो आनन्द पाटलिगामे नगरं मापेतीति ?" "सुनिध वस्सकारा भन्ते! मगध महामत्ता पाटलिगामे नगरं मापेन्ति वज्जीनं पटिबाहाया,ति ॥" (३९) सेय्यथापि आनन्द ! देवे हि तावतिसे हि सद्धि मन्तेत्वा एवमेव खो आनन्द ! सुनिध वस्सकारा मगध गहामत्ता पाटलिगामे नगरं मापेन्ति वज्ज्जीनं पटिबाहाय। इधाहं आनन्द ! असं दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्त मानुसकेन सम्पहुला देवतायो सहस्सेव और राजमहामंत्रियोंके चित्तमें घर बनानेको होता है। जिस स्थानमें मध्यम श्रेणीके देवताओंने वास ग्रहण किया, उस स्थानमें मध्यम श्रेणीके राजाओं और राजमहामंत्रियोंके चित्तमें घर बनानेको होता है। जिस स्थानमें नीच देवताओंने वास ग्रहण किया, उस स्थानमें नीच राजाओं और राजमहामंत्रियोंके चित्तमें घर बनानेको होता है। ( ३८ ) भगवान्ने रातके प्रत्यूष-समय ( =भिनसार ) को उठकर आयुष्मान् अानन्दको आमंत्रित किया- "आनन्द ! पाटलिग्राममें कौन नगर बना रहा है ?" "भन्ते ! सुनीथ और वर्षकार मगध-महामात्य, वज्जियोंको रोकनेके लिए नगर बसा रहे हैं।" (३९) "आनन्द ! जैसे त्रायस्त्रिंश देवताओंके साथ सलाह करके मगधके महामात्य सुनीथ, वर्षकार, वज्जियोंके रोकनेके लिये नगर बना रहे हैं। आनन्द ! मैंने अमानुष दिव्य नेत्रसे देखा-अनेक सहस्र देवता यहाँ पाटलिग्राममें वास्तु ( =घर, ३० महापरिनिब्बान सुत्तं पाटलिगामे वत्थूनि परिग्गएहन्तियो । यस्मि आनन्द ! पदेसे महेसक्खा देवता वत्थूनि परिग्गणहन्ति, महेसक्खान तत्थ रज राज- महामत्तान चित्तानि नमन्ति निवेसनानि मापेतु। यस्मि पदेसे मज्झिमा देवता वत्थूनि परिग्गएहन्ति, मज्झिमान तत्थ रनं राजमहामत्तान चित्तानि नमन्ति निवेसनानि मापेतु। यस्मि पदेसे नीचा देवता वत्थूनि परिग्गएहन्ति, नीचान तत्थ रखं राजमहामत्तान चित्तानि नमन्ति निवेसनानि मापेतु ॥ यावता आनन्द ! अरियं आयतन यावता वणिप्पथा इदं अग्ग-नगर भविस्सति पाटलिपुत्तं पुटभेदन ॥ पाटलि- पुत्तस्स खो आनन्द ! तयो अन्तराया भविस्सन्ति अग्गितो वा, उदकतो वा, मिथुभेदावा, ति ॥ (४०) अथ खो सुनिध वस्सकारा मगध महामत्ता येन भगवा, तेनुप- सङ्कमिसु । उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धि सम्मोदिसु । सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं अहंसु । एकमन्तं ठिता खो सुनिध वस्सकारा मगध महामत्ता भगवन्त एतदवोचुं-'अधिवासेतु नो वास ) ग्रहण कर रहे हैं। जिस प्रदेश में महाशक्ति-शाली ( =महेसक्ख ) देवता वास ग्रहण कर रहे हैं, वहाँ महा-शक्ति-शाली राजाओं और राज-महामात्योंका चित्त, घर बनानेको लगेगा। जिस प्रदेशमें मध्यम देवता वास ग्रहण कर रहे हैं, वहाँ मध्यम राजाओं और राज-महामात्योंका चित्त घर बनानेको लगेगा। जिस प्रदेशमें नीच देवता०, वहाँ नीच राजाओं०। आनन्द ! जितने (भी) आर्य-आयतन ( = आर्योंके निवास ) हैं, जितने भी वणिक्-पथ ( =व्यापार-मार्ग) हैं, (उनमें ) यह पाटलिपुत्र, पुट-भेदन ( =मालकी गाँठ जहाँ तोळी जाय) अग्र ( =प्रधान )- नगर होगा। पाटलिपुत्रके तीन अन्तराय ( =शत्रु) होंगे-आग, पानी और आपसकी फूट।" (४०) तब मगध-महामात्य सुनीथ और वर्षकार जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान के साथ संमोदनकर... एक ओर खळे हुए...भगवान्से बोले- ) - महापरिनिब्बान सुत्तं ३१ भन्ते ! भवं गोतमो अज्जतनाय भत्तं सद्धि भिक्खु संघेना, ति। अधिवासेसि भगवा तुएिहभावेन । (४१) अथ खो सुनिध वस्सकारा मगध महामत्ता भगवतो अधिवासनं विदित्वा येन सको आवसथो, तेनुपसङ्कमिसु । उपसङ्कमित्वा सके आवसथे पणीतं खादनीयं भोजनीयं पटियादापेत्वा भगवतो कालं आरोचापेसुं-'कालो भो गोतम ! निहितं भत्तन्ति' ।। (४२) अथ खो भगवा पुब्बन्ह समयं निवासेत्वा पत्त चीवर-मादाय सद्धि भिक्खु संघेन येन सुनिध वस्सकारानं मगध महामत्तानं आवसथो, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा पञत्ते आसने निसीदि । अथ खो सुनिध वस्सकारा मगध महामत्ता बुद्ध पमुखं भिक्खु संघ परणीतेन खादनीयेन भोजनीयेन सहत्था सन्तप्पेसुं सम्पवारेसुं । अथ खो सुनिध वस्सकारा मगध महामत्ता भगवन्तं भुत्ताविं ओणीत पत्त पाणिं अतरं नीचं आसनं गहेत्वा एकमन्तं निसीदिसु । एकमन्तं निसिनो खो सुनिध वस्सकारे मगध महामत्ते भगवा इमाहि गाथा हि अनुमोदि- "भिक्षु-संघ के साथ आप गौतम ! हमारा आजका भात स्वीकार करें ।" भगवान्ने मौनसे स्वीकार किया। (४१) तब • सुनोथ वर्षकार भगवानको स्वीकृति जान, जहाँ उनका आवसथ =डेरा) था, वहाँ गये। जाकर अपने आवसथमें उत्तम खाद्य-भोज्य तैयार करा ( उन्होंने) भगवान्को समयकी सूचना दी... । (४२) तब भगवान पूर्वाह्न समय पहनकर, पात्र चीवर ले भिक्षु-संघके साथ जहाँ मगध-महामात्य सुनीथ और वर्षकारका आवसथ था, वहाँ गये; जाकर बिछे आसनपर बैठे। तब सुनीथ, वर्षकारने बुद्धप्रमुख भिक्षु-संघको अपने हाथसे उत्तम खाद्य-भोज्यसे संतर्पित-संप्रवारित किया । तब • सुनीथ वर्षकार, भगवानके भोजनकर पात्रसे हाथ हटा लेनेपर, दूसरा नीचा आसन ले, एक ओर बैठ गये । एक ओर बैठे हुए मगध-महामात्य सुनीथ, वर्षकारको भगवान्ने इन गाथाआंसे (दान-) अनुमोदन किया- road R ३२ महापरिनिब्बान सुत्तं (४३) यस्मि पदेसे कप्पेति, वासं पण्डित जातियो । सीलवन्तेत्थ भोजेवा, सञते ब्रह्मचरियो । यातस्थ देवता आसुं, तासं दक्षिणमादिसे । पूजिता पूजयन्ति न, मानिता मानयन्ति न॥ ततो न अनुकम्पेन्ति, माता पुत्तव ओरसं । देवतानुकम्पितो पोसो, सदा भद्रानि पस्सती,ति॥ (४४) अथ खो भगवा सुनिध वस्सकारे मगध महामत्ते इमाहि गाथाहि अनुमोदित्वा उद्यायासना पक्कामि । तेन खो पन समयेन सुनिध वस्सकारा मगध महामत्ता भगवन्तं पिहितो पिहितो अनुबन्धा होन्ति । येनिज्ज समणो गोतमो द्वारेन निक्खमिस्सति, त गौतम-द्वारं नाम भविस्सति । येन तित्थेन गङ्ग नदि तरिस्सति, तं गोतम-तित्थं' नाम भविस्सती, ति । अथ खो भगवा येन द्वारेन निक्खमि, तगोतम-द्वार नाम अहोसि । अथ खो भगवा येन गङ्गानदी, तेनुपसङ्कमि । तेन (४३) "जिस प्रदेश ( में ) पंडितपुरुष, शीलवान् , संयमी, ब्रह्मचारियोंको भोजन कराकर वास करता है ॥१॥ "वहाँ जो देवता हैं, उन्हें दक्षिणा ( =दान ) देनी चाहिये। वह देवता पूजित हो पूजा करते हैं, मानित हो मानते हैं ॥ २ ॥ "तब (वह ) औरस पुत्र की भाँति उसपर अनुकम्पा करते हैं । देवताओंसे अनुकम्पित हो पुरुष सदा मंगल देखता है ॥ ३ ॥" (४४ ) तब भगवान् ० सुनीथ और वर्षकारको इन गाथाओंसे अनुमोदन- कर, आसनसे उठकर चले गये। उस समय ० सुनीथ, वर्षकार भगवानके पीछे पीछे चल रहे थे-'श्रमण गौतम आज जिस द्वारसे निकलेंगे, वह गौतम-द्वार...होगा। जिस तीर्थ ( =घाट) से गंगा नदी पार होंगे, वह गौतम-तीर्थ...होगा। तब भगवान् जिस द्वारसे निकले, वह गौतम-द्वार...हुआ। भगवान् जहाँ गंगा-नदी है, वहाँ गये। उस समय गंगा करारों बराबर भरी, करारपर बैठे कौवेके पीने योग्य थी। कोई आदमी नाव ।

३ थे। तब भगवान्, जैसे कि बलवान् पुरुष समेटी बाँहको (सहज ही) फैला दे, महापरिनिब्बान सुत्तं खो पन समयेन गङ्गानदी पूरा होति । समतिथिका काकपेय्या। अप्पेकच्चे मनुस्सा नाव परियेसन्ति । अप्पेकच्चे उलुम्पं परियेसन्ति । अप्पेकच्चे कुळं बन्धन्ति पारा पार गन्तुकामा । अथ खो भगवा सेय्यथापि नाम, बलवा पुरिसो समिञ्जित वा बाहं पसारेय्य पसारितं वा बाहं समिजेय्य, एवमेव गङ्गाय नदिया ओरिम तीरे अन्तरहितो पारिमतीरे पच्चुहासि सद्धि भिक्खु संघेन । अहस खो भगवा ते मनुस्से अप्पेकच्चे नावं परियेसन्ते, अप्पेकच्चे उलुम्पं परियेसन्ते, अप्पेकच्चे कुल्लं बन्धन्ते पारा पार गन्तुकामे । अथ खो भगवा एतमत्थं विदित्वा तायं वेलायं इमं उदानं उदानेसि- (४५) ये तरन्ति अण्णवंसर, सेतुकत्वा विसज्ज पल्ललानि । कुल्लं हि जनो पबन्धति, न तिषण मेधाविनो जना, ति ॥ पठम भारणवारं ॥१॥ खोजते थे, कोई .. बेळा ( = उलुम्प ) खोजते थे, कोई ० कूला ( =कुल्ल ) बाँधते फैलाई बाँहको समेट ले, वैसे ही भिक्षु-संवके साथ गंगा नदीके इस पारसे अन्तर्धान हो, परले तीरपर जा खळे हुए। भगवान्ने उन मनुष्योंको देखा, कोई कोई नाव खोज रहे थे। तब भगवान्ने इसी अर्थको जानकर, उसी समय यह उदान कहा- (४५)" (पंडित ) छोटे जलाशयों ( =पल्वलों) को छोळ समुद्र और नदियोंको सेतुसे तरते हैं। (जब तक ) लोग कूला बाँधते रहते हैं, ( तब तक ) मेधावी जन तर गये रहते हैं। (इति) प्रथम भाणवार ॥ १॥ ५ महापरिनिब्बान सुत्तं (४६) अथ खो भगवा आयस्मन्तं अानन्दं आमन्तेसि-"आया. मानन्द ! येन कोटिगामो, तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति" ॥ ‘एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सोसि ॥ (४७) अथ खो भगवा महता भिक्खु संघेन सद्धि येन कोटिगामो, तदवसरि । तत्र सुदं भगवा कोटिगामे विहरति । तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि-"चतुन्नं भिक्खवे ! अरिय-सच्चानं अननुबोधा अप्पटिवेधा एवमिदं दीघमद्धानं सन्धावितं संसरितं ममञ्चेव तुम्हाकञ्च, कतमेसं चतुन्नं? (४८) [१] दुक्खस्स भिक्खये ! अरिय-सच्चस्स अननुबोधा अप्पटिवेधा एवमिदं दीघमद्धान सन्धावितं संसरितं ममञ्चेव तुम्हाकञ्च ॥ [२] दुक्ख-समुदयस्स भिक्खवे ! अरिय-सच्चस्स अननुबोधा अप्पटिवेधा एवमिदं दीघमद्धानं सन्धावितं संसरितं ममञ्चेव तुम्हाकश्च ।। [३] दुक्ख-निरोधस्स भिक्खवे ! अरिय-सच्चस्स अननुबोधा अप्पटिवेधा एवमिदं दीघमद्धानं सन्धावितं संसरितं ममञ्चेव तुम्हाकश्च ॥ [१] दुक्ख-निरोध-गामिनिया-पटिपदाय भिक्खवे ! अरिय- - - कोटिग्राम- (४६) तब भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दको आमंत्रित किया- "आश्रो आनन्द ! जहाँ कोटिग्राम है, वहाँ चलें ।" "अच्छा, भन्ते !" (४७) तब भगवान् भिक्षु-संघके साथ जहाँ कोटिग्राम था, वहाँ गये। वहाँ भगवान् कोटि-ग्राममें विहार करते थे। भगवान्ने भिक्षुओंको आमंत्रित किया- "भिक्षुओ ! चारों आर्य-सत्योंके अनुबोध = प्रतिवेध न होनेसे इस प्रकार दीर्घकालसे ( यह ) दौळना=संसरण ( = आवागमन ) 'मेरा और तुम्हारा' हो रहा है। कौनसे चारोंसे? (४८) भिक्षुओ! [१] दुःख आर्य-सत्यके अनुबोध-प्रतिबोध न होनेसे । [२] दुःख-समुदय ० । [३] दुःख-निरोध । [४] दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपद् । ( महापरिनिब्बान सुत्तं น - - सच्चस्स अननुबोधा अप्पटिवेधा एवमिदं दीघमद्धानं सन्धावितं संसरितं ममञ्चेव तुम्हाकञ्च ॥ तयिदं भिक्खवे ! दुक्खं-अरिय-सञ्चं अनुबुद्ध पटिविद्ध । दुक्ख- समुदयं-अरिय-सच्चं अनुबुद्ध पटिविद्ध। दुक्ख-निरोध-अरिय-सच्च अनुबुद्धं पटिविद्ध। दुक्ख-निरोध-गामिनि-पटिपदा अरिय-सच्च अनुबुद्ध पटिविद्ध। उच्छिन्ना भव तण्हा, खीणा भव नेत्ति । नत्थि दानि पुनब्भवो, ति। (४९) इधमवोच भगवा, इद वत्वान सुगतो अथापर एतदवोच सत्था- चतुन अरिय सञ्चान, यथाभूत अदस्सना । संसरितं दीघमधान, तासुतास्वेव जातिसु ॥ तानि एतानि दिहानि, भव नेत्ति समूहता। उच्छिन्नं मूलं दुक्खस्स, नत्थि दानि पुनब्भवो, ति ।। (५०) तत्र पि सुदं भगवा कोटिगामे विहरन्तो एतदेव बहुलं भिक्खून धम्मि-कथं करोति । 'इति सील, इति समाधि, इति पञ्चा। सील परिभावितो समाधि महप्फलो होति महानिसंसो। समाधि परिभाविता पञ्बा महप्फला होति महानिसंसा । पञ्चा परिभावितं चित्तं सम्मदेव आसवे हि विमुच्चति । सेय्यथिदं,-कामासवा भवासवा अविज्जासवा, ति। भिक्षुओ ! सो इस दुःख आर्य-सत्यको अनु-बोध प्रतिबोध किया ०, (तो) भव-तृष्णा उच्छिन्न हो गई, भवनेत्री ( =तृष्णा) क्षीण हो गई" (४९) यह कहकर सुगत ( =बुद्ध ) ने और यह भी कहा-"चारों आर्य- सत्योंको ठीकसे न देखनेसे, उन उन योनियोंमें दीर्घकालसे आवागमन हो रहा है। जब ये देख लिये जाते हैं, तो भवनेत्री नष्ट हो जाती है, दुःखकी जळ कट जाती है, और फिर आवागमन नहीं रहता। (५० ) वहाँ कोटिग्राममें विहार करते भी भगवान , भिक्षुओंको बहुत करके यही धर्म-कथा कहते थे यह शील 10 , - महापरिनिब्बान सुत्तं (५१) अथ खो भगवा कोटिगामे यथाभिरन्तं विहरित्वा प्रायस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि-"पायामानन्द ! येन नातिका, तेनुपसङ्क- मिस्सामा, ति"। 'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा अानन्दो भगवतो पच्चस्सोसि । अथ खो भगवा महता भिक्खु संघेन सद्धिं येन नातिका, तदवसरि। तत्र पि सुदं भगवा नातिके विहरति गिञ्जकावसथे। (५२) अथ खो आयस्मा अानन्दो येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्क- मित्वा भगवन्तं अभिवादेवा एकमन्तं निसीदि । एकमन्त निसिन्नो खो आयस्मा आनन्दो भगवन्त एतदवोच । साल्हो नाम भन्ते ! भिक्खु नातिके कालं कतो, तस्स का गति, को अभिसम्परायो ?; नन्दा नाम भन्ते ! भिक्खुनी नातिके कालं कता, तस्सा का गति, को अभिसम्परायो ?; सुदत्तो नादिका- (५१) तब भगवान्ने कोटिग्राममें इच्छानुसार विहारकर, आयुष्मान् आनन्द को आमंत्रित किया। "आओ आनन्द ! जहाँ नादिका* (=नाटिका) है, वहाँ चलें।" "अच्छा, भन्ते !" तब भगवान् महान् भिक्षु-संघ के साथ जहाँ नादिका है, वहाँ गये। वहाँ नादिकामें भगवान गिंजकावसथमें विहार करते थे। धर्म-आदर्श (५२) तब आयुष्मान् आनन्द जहाँ भगवान थे, वहाँ गये; जाकर भगवानको अभिवादनकर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् आनन्दने भगवान्से यह कहा- "भन्ते ! साल्ह भिक्षु नादिका में मर गया, उसकी क्या गति = क्या अभिसम्पराय (= परलोक) हुआ ? नन्दा भिक्षुणी ० सुदत्त उपासक * मिलाश्रो जनबसभसुत्त पृष्ठ १६० । दीघनिकाय ।

महापरिनिब्बान सुत्तं नाम भन्ते ! उपासको नातिके कालं कता, तस्स का गति, को अभिसम्परायो ? सुजाता नाम भन्ते ! उपासिका नातिके कालं कता, तस्स का गति, को अभिसम्परायो ? कुक्कुटो नाम भन्ते ! उपासको नातिके कालं कतो, तस्स कागति, को अभिसम्परायो ? कालिम्बो नाम भन्ते ! उपासको नातिके कालं कतो, तस्स का गति, को अभिसम्परायो ? निकटो नाम भन्ते ! उपासको, कटिस्सहो नाम भन्ते ! उपासको, तुट्टो नाम भन्ते ! उपासको, सन्तुट्टो नाम भन्ते ! उपासको, भदो नाम भन्ते ! उपासको, सुभदो नाम भन्ते ! उपासको नातिके कालं कतो, तस्स का गति, को अभिसम्परायो, ति ? (५३) साल्हो आनन्द ! भिक्खु आसवानं खया अनासवं चेतो विमुत्तिं पञ्चा विमुत्तिं दिवेव धम्मे सयं अभिञ्बा सच्छि कत्वा उपसम्पज्ज विहासि । नन्दा नाम आनन्द ! भिक्खुनी पश्चन्न ओरम्भागियानं संयोजनानं परिक्खया प्रोपपातिका तत्थ परिनिब्बायिनी अनावत्ति धम्मा तस्मा लोका । सुदत्तो आनन्द ! उपासको तिएणं संयोजनानं परिक्खया राग दोस मोहानं तनुत्ता सकदागामि सकिदेव इमं लोकं आगन्त्वा दुक्खस्सन्तं करिस्सति । सुजाता आनन्द ! उपासिका सुजाता उपासिका ० ककुध उपासक ० कालिंग उपासक ० निकट उपासक ० कटिस्सह उपासक ० तुट्ठ उपासक ० सन्तुट्ठ उपासक • भद्द उपासक० भन्ते ! सुभद्द उपासक नादिकामें मर गया, उसकी क्या गति = क्या अभिसम्पराय हुआ ?" (५३) "आनन्द ! साल्ह भिक्षु इसी जन्ममें आस्रवों (=चित्तमलों) के क्षयसे आस्रव-रहित चित्तको मुक्ति प्रज्ञा-विमुक्ति (=ज्ञानद्वारा मुक्ति) को स्वयं जानकर साक्षात्कर प्राप्तकर विहार कर रहा था। आनन्द ! नन्दा भिक्षुणी पाँच अवरभागीय संयोजनोंके क्षयसे देवता हो वहाँसे न लौटनेवाली (अनागामी) हो वहीं (देवलाकमें) निर्वाण प्राप्त करेगी। सुदत्त उपासक आनन्द ! तीन संयोजनोंके क्षीण होनेसे, राग-द्वेष-मोहके दुर्बल होनेसे सकृदागामी हुआ, एक ही बार इस लोकमें और आकर दुःखका अन्त करेगा। सुजाता उपासिका...तीन संयोजनोंके ३८ महापरिनिब्बान सुत्तं तिएणं संयोजनानं परिक्खया सोतापन्ना अविनिपात धम्मा नियता सम्बोधि परायना । कुक्कुटो नाम आनन्द ! उपासको पञ्चन्नं ओरम्भा- मियानं संयोजनानं परिक्खया श्रोपपातिको तत्थ परिनिब्बायि अनावत्ति धम्मो तस्मा लोका । कालिम्बो आनन्द ! उपासको । निकटो आनन्द ! उपासको | कटिस्सहो आनन्द ! उपासको० । तुहो आनन्द ! उपासको । सन्तुट्टो आनन्द ! उपासको । भद्दो आनन्द ! उपासको • ! सुभद्दो आनन्द ! उपासको ० । पञ्चन्न ओरम्भागियानं संयोजनानं परिक्खया ओपपातिको तत्थ परिनिब्बायि अनावत्ति धम्मो तस्मा लोका। परो पनासं आनन्द ! नातिके उपासका कालङ्कता पश्चनं ओरम्भामियानं संयोजनानं परिक्खया ओपपातिका तत्थ परिनिब्बायिनो अनावति धम्मा तस्मा लोका। साधिका नवुति आनन्द ! नातिके उपासका कालं कता तिएणं संयोजनानं परिक्खया राग दोस मोहानं तनुत्ता सकदागामिनो सकिदेव इमं लोकं आगन्त्वा दुक्खस्सन्तं करिस्सन्ति । सातिरेकानि आनन्द ! पश्वसतानि नातिके उपासका कालं कता तिएरणं संयोजनानपरिक्खया सोतापन्ना अविनिपात धम्मा नियता सम्बोधि परायना। (५४) अनच्छरियं खो पनेत आनन्द ! यं मनुस्स भूतो कालं क्षयसे न-गिरनेवाले बोधिके रास्ते पर आरूढ़ हो स्रोतापन्न हुई। ककुध ० अनागामी । कालिंग। निकट ० । कटिस्सह ० । तुट्ठ । संतुट्ठ । भद्द ० । सुभद्द उपासक अानन्द ! पाँच अवरभागीय संयोजनोंके क्षयसे देवता हो वहाँसे न लौटने- काला (= अनागामी) हो वहीं (देवलोकमें) निर्वाण प्राप्त करनेवाला है। आनन्द ! नादिकामें पचाससे अधिक उपासक मरे। हैं, जो सभी ० अनागामी ० हैं। . नब्बेसे अधिक उपासक सकृदागामी 10 पाँचसौसे अधिक उपासक • स्रोत- आपन्न०॥ (५४) श्रानन्द ! यह ठीक नहीं, कि जो कोई मनुष्य मरे, उसके मरनेपर तथागतके पास आकर इस बातको पूछा जाय। प्रानन्द ! यह तथागत को कष्ट ।

महापरिनिब्बान सुत्तं ३९ करेय्य तस्मि येव कालं कते तथागत उपसङ्कमित्वा एतमत्थं पुच्छिस्सथ । विहेसाहेसा आनन्द ! तथागतस्स । तस्मा-ति-हानन्द ! धम्मादासं नाम धम्म परियायं देसेस्सामि । येन समन्नागतो अरिय सावको आकङ्खमानो अत्तनाव अत्तानं ब्याकरेय्य -"खीण निरयोम्हि, वीण तिरच्छान योनि, खीण पित्ति विसयो, खीणा-पाय दुग्गति विनिपातो सोवापन्नो हमस्मि अविनिपात धम्मो नियतो सम्बोधि परायनो, ति" । (५५) कतमो च सा आनन्द ! धम्म-दासो, धम्म-परियायो ? येन समन्नागतो अरिय सावको आकङ्खमानो अत्तनाव अत्तानं ब्याकरेय्य "खीण निरयोम्हि, खीण तिरच्छान योनि, खीण पित्ति विसयो, खीणा- पाय, दुग्गति विनिपाता, सातापन्ना हमस्मि, अविनिपात धम्मो, नियतो सम्बोधि परायनो, ति"। [१] इधानन्द ! अरिय सावको बुद्धे प्रवेच्च पसादेन समन्नागतो होति, "इति पि सो भगवा अरह सम्मा सम्बुद्धो विज्जा चरण सम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिस दम्म सारथि सत्था देव-मनुस्सानं बुद्धो भगवा, ति"। , देना है। इसलिये आनन्द ! धर्म-श्रादर्श नामक धर्म-पर्याय (= उपदेश) को उपदेशता हूँ। जिससे युक्त होनेपर आयस्रावक स्वयं अपना व्याकरण (=भविष्य- कथन) कर सकेगा-'मुझे नर्क नहीं, पशु नहीं, प्रेत-योनि नहीं, अपाय = =दुर्गति= विनिपात नहीं। मैं न गिरनेवाला बोधिके रास्तेपर स्रोतापन्न हूँ।' (५५) आनन्द ! क्या है वह धर्मादर्श धर्मपर्याय ०?-[१] *आनन्द ! जो आर्यश्रावक बुद्ध में अत्यन्त श्रद्धायुक्त होता है-'वह भगवान् अर्हत्, सम्यक्- संबुद्ध (= परमज्ञानी), विद्या-आचरण-युक्त, सुगत, लोकविद्, पुरुषोंके दमन करनेमें अनुपम चाबुक-सवार, देवताओं और मनुष्योंके उपदेशक बुद्ध (= ज्ञानी) भगवान हैं।' * यही तीनों वाक्य-समूह निरन (= बुद्ध-धर्म-संघ) की अनुस्मृति ( = स्मरण), कही जाती है।

महापरिनिब्बान सुत्तं [२] धम्मे अवेच्च पसादेन समन्नागतो होति, "स्वाक्खातो भगवता धम्मो सन्दिहिको अकालिको एहिपस्सिको ओपनेथ्यिको पञ्चत्तं वेदितब्बो विश्वृही, ति ।" [३] संघे अवेच्च पसादेन समन्नागतो होति, "सुप्पटिपन्नो भगवतो सावक संघो, उजुप्पटिपन्नो भगवतो सावक संघो, बायप्पटिपन्नो भगवतो सावक संघो, सामिचिप्पटिपन्नो भगवतो सावक संघो, यदिदं चत्तारि पुरिस युगानि अह पुरिस पुग्गला एस भगवता सावक संघो, आहुनेय्यो पाहुनेथ्यो दक्खिणेय्यो अञ्जली करणीयो अनुत्तर पुञ्जखेत्तं लोकस्सा, ति" [४] अरिय कन्ते हि सीले हि समन्नागतो होति । अखण्डे हि अछिद्देहि असबलेहि अकस्मासे हि भुजिस्सो हि विपसहे हि अपरामहे हि समाधि संवत्तनिके हि। अयं खो सो आनन्द ! धम्मदासो धम्म- परियायो येन समन्नागतो अरिय सावको आकङ्खमानो अत्तनाव अत्तान व्याकरेग्य, खीण निरयोम्हि, खीण तिरच्छान योनि, खीण पित्ति- [२] ० धर्ममें अत्यन्त श्रद्धासे युक्त होता है-'भगवान्का धर्म स्वाख्यात (=सुन्दर रीतिसे कहा गया) है, वह सांदृष्टिक (= इसी शरीरमें फल देनेवाला), अकालिक (= कालान्तर में नहीं सद्यः फलप्रद), एहिपस्सिक (= यहीं दिखाई देनेवाला), औपनयिक (= निर्वाणके पास ले जानेवाला), विज्ञ (पुरुषों) को अपने अपने भीतर (ही) विदित हानेवाला है।' [३] ० संघमें अत्यन्त श्रद्धासे युक्त होता है-'भगवान्का श्रावक (= शिष्य)-संघ सुमार्गारूढ़ है, भगवानका श्रावक-संघ सरल मार्गपर आरूढ़ है, • न्याय मार्गपर आरूढ़ है, . ठीक मार्गपर आरूढ़ है, यह चार पुरुष-युगल (स्रोत. आपन्न, सकृदागामी, अनागामो और अर्हत्) और आठ पुरुष = पुद्गल हैं, यही भगवानका श्रावक-संघ है, (जोकि) आह्वान करने योग्य है, पाहुना बनाने योग्य है, दान देने योग्य है, हाथ जोळने योग्य है, और लोकके लिये पुण्य (बोने) का क्षेत्र है।' [४] और अखंडित, निर्दोष, निर्मल, निष्कल्मष, सेवनीय, विज्ञ-प्रशंसित, आर्य महापरिनिब्बान सुत्तं विसयो, खीणापाय, दुग्गति विनिपातो, सोतापन्नो हमस्मि, अविनिपात धम्मो, नियतो सम्बोधि परायना, ति । तत्र पि सुदं भगवा नातिके विहरन्तो गिञ्जकावसथे एतदेव बहुलं भिक्खून धम्मि कथं करोति । 'इति सीलं, इति समाधि, इति पञ्चा। सील परिभावितो समाधि महष्फलो होति महानिसंसा । समाधि परिभाविता पज्ञा महप्फला होति महानिसंसा। पचा परिभावित चित्तं सम्मदेव आसवे हि विमुच्चति । सेय्यथिदं,कामासवा, भवासवा, अविज्जासवा, ति। (५६) अथ खो भगवा नातिके यथाभिरन्तं विहरित्वा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि–'पायामानन्द ! येन वेसाली, तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति' । 'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सोसि । (५७) अथ खो भगवा महता भिक्खु-संघेन सद्धिं येन वेसाली, तदवसरि । तत्र सुदं भगवा वेसालियं विहरति “अम्बपालि-वने" । तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि-"सतो भिक्खवे ! भिक्खु विहरेय्य सम्पजानो । अयं वो अम्हाक अनुसासनी" | कथञ्च भिक्खवे ! (= उत्तम) कान्त, शीलों (= सदाचारों) से युक्त होता है। आनन्द ! यह धर्मादर्श धर्मपर्याय है " वहाँ नातिका में विहार करते भी भगवान् भिक्षुओं को यही धर्मकथा । (५६) तब भगवान्ने नातिका में इच्छानुसार विहारकर आयुष्मान आनन्दको आमंत्रित किया-"आओ आनन्द ! जहाँ वैशाली है, वहाँ चलें ! अच्छा, भन्ते !" अम्बपाली गणिका का भोजन (५७) ० तब भगवान् महाभिक्षु-संघके साथ जहाँ वैशाली थी वहाँ गये। वहाँ वैशालीमें अम्बपाली-वन में विहार करते थे। वहाँ भगवान्ने भिक्षुओंको आमंत्रित किया- "भिक्षुओ! स्मृति और संप्रजन्यके साथ विहार करो, यही हमारा अनुशासन है। कैसे...भिक्षु स्मृतिमान होता है ? जब भिक्षुओ! भिक्षु कायामें काय-अनुपश्यो ६ ४२ महापरिनिब्बान सुत्तं भिक्खु सतो होति ? इध भिक्खवे ! भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झा दोमनस्सं । वेदनासु चित्ते धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झा दोमनस्सं । एवं खो भिक्खवे ! भिक्खु सतो होति । (५८) कथश्च भिक्खवे ! भिक्खु सम्पजानो होति ? "इध भिक्खवे ! भिक्खु अभिक्विन्ते पटिक्कन्ते सम्पजान-कारी होति । आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी होति । समञ्जिते पसारिते सम्पजानकारी होति । संघाटि पत्त चीवर धारणे सम्पजानकारी होति। असिते पिते खायिते सायिते सम्पजानकारी होति । उच्चार पस्साव कम्मे सम्पजानकारी होति । गते ठिते निसिन्ने सुत्ते जागरिते भासिते तुबिहभावे सम्पजान- कारी होति । एवं खो भिक्खवे ! भिक्खु सम्पजानो होति । सतो भिक्खवे ! भिक्खु विहरेय्य सम्पजानो। अयं वो अम्हाकं अनु- सासनी", ति। (=शरीरको उसकी बनावटके अनुसार केश-नख-मलमूत्र आदि के रूप में देखना) हो, उद्योगशील, अनुभवज्ञान-(= संप्रजन्य) युक्त, स्मृतिमान् , लोकके प्रति लोभ और द्वेष हटाकर विहरता है। वेदनाओं (=सुख दुःख आदि) में वेदनानुपश्यी हो। चित्तमें चित्तानुपश्यी हो। धर्मों में धर्मानुपश्यी हो। इस प्रकार भिक्षु स्मृतिमान् , होता है। (५८) कैसे...संप्रज्ञ (=संपजान) होता है। जब...भिक्षु जानते हुये गमन- आगमन करता है । जानते हुये श्रालेोकन-विलोकन करता है। सिकोळना-फैलाना । ० संघाटी-पात्र-चीवरको धारण करता है। ० आसन, पान, खादन, आस्वादन करता है। ० पाखाना, पेशाब करता है। चलते, खळे होते, बैठते, सोते, जागते, बोलते, चुप रहते जानकर करनेवाला होता है । इस प्रकार भिक्षुओ! भिक्षु संप्रजानकारी होता है। इस प्रकार.. संप्रज्ञ होता है। भिक्षुओ! भिक्षुको स्मृति और संप्रजन्य- युक्त विहरना चाहिये, यही हमारा अनुशासन है।" । । ।

महापरिनिब्बान सुत्तं ४३ (५९) अस्सोसि खो अम्बपाली गणिका-'भगवा किर वेसालि अनुप्पत्तो वेसालियं विहरति महं अम्बवने, ति । अथ खो अम्बपाली गणिका महानि भद्दानि यानानि योजापेत्वा भई भई यानं अभिरूहित्वा भद्दे हि भद्दे हि याने हि वेसालिया निय्यासि । येन सको आरामो, तेन पायासि । यावतिका यानस्स भूमि यानेन गन्त्वा याना पचोरोहित्वा पत्तिकाव येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभि- वादेत्वा एकमन्तं निसीदि । एकमन्तं निसिन्नं खो अम्बपालि गणिकं भगवा धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि संपहंसेसि । अथ खो अम्बपाली गणिका भगवता धम्मिया कथाय सन्दस्सिता समादपिता समुत्तेजिता संपहंसिता भगवन्तं एतदवोच,- "अधिवासेतु मे भन्ते ! भगवा स्वातनाय भत्त सद्धि भिक्खु- संघेना, ति"। अधिवासेसि भगवा तुबिहभावेन । - (५९) अम्बपाली गणिकाने सुना-भगवान् वैशाली में आये हैं; और वैशालीमें मेरे आम्रवनमें विहार करते हैं। तब अम्बपाली गणिका सुन्दर सुन्दर (=भद्र) यानोंको जुळवाकर, एक सुन्दर यान पर चढ़ सुन्दर यानोंके साथ वैशाली से निकली; और जहाँ उसका आराम था, वहाँ चलो। जितनी यानको भूमि थी, उतनी यानसे जाकर, यानसे उतर पैदल ही जहाँ भगवान् थे, वहाँ गई। जाकर भगवान्को अभिवादनकर एक ओर बैठ गई। एक ओर बैठी अम्बपाली गणिकाको भगवान्ने धार्मिक-कथासे संदर्शित समुत्तेजित...किया। तब अम्बपाली गणिका भगवान्से यह बोली- "भन्ते ! भिक्षु-संघके साथ भगवान् मेरा कलका भोजन स्वीकार करें।" भगवान्ने मौनसे स्वीकार किया ।

महापरिनिब्बान सुत्तं (६०) अथ खो अम्बपाली गणिका भगवतो अधिवासनं विदित्वा उहायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कामि । (६१) अस्सोसुं खो वेसालिका लिच्छवी-'भगवा किर वेसालि अनुप्पत्तो वेसालियं विहरति अम्बपालिवने, ति। अथ खो ते लिच्छवी भद्दानि भहानि यानानि योजापेत्वा भई भई यानं अभिरूहित्वा भद्दे हि भद्दे हि याने हि वेसालिया नियिंसु । तत्र एकच्चे लिच्छवी नीला होन्ति, नीलवण्णा, नीलवत्था, नीला-लङ्कारा। एकच्छ लिच्छवी पीता होन्ति, पीत वएणा, पीत वत्था, पीता-लङ्कारा। एकच्चे लिच्छवी लोहिता होन्ति, लोहित वण्णा, लोहित वत्था, लोहिता-लङ्कारा । एकच लिच्छवी ओदाता होन्ति, ओदात वरणा, प्रोदात वत्था, ओदाता- लङ्कारा। अथ खो अम्बपाली गणिका दहरानं दहरानं लिच्छवीनं अक्खेन- अक्खं चक्केन-चकं युगेन-युगं पटिवट्टेसि । अथ खो ते लिच्छवी अम्बपालि गणिकं एतदवोचुं,-'किं जे अम्बपालि ! दहरानं दहरानं लिच्छवीनं अखेन-अक्खं चक्केन-चकं युगेन-युगं पटिवट्टेसी, ति ?' (६०) तब अम्बपालो गणिका भगवान्की स्वीकृति जान, आसनसे उठ भगवानको अभिवादनकर प्रदक्षिणाकर चली गई। ( ६१ ) वैशालीके लिच्छवियोंने सुना-'भगवान् वैशालीमें आये हैं। तब वह लिच्छवि ० सुन्दर यानोंपर आरूढ़ हो ० वैशालीसे निकले। उनमें कोई कोई लिच्छवि नीले-नील-वर्ण नील-वस्त्र नील-अलंकारवाले थे। कोई कोई लिच्छवि पीले थे। • लोहित ( =लाल ) । . अवदात (सफेद)। अम्बपाली गणिकाने तरुण तरुण लिच्छवियों के धुरोंसे धुरा, चक्कोंसे चक्का, जूयेसे जुआ टकरा उन लिच्छवियोंने अम्बपाली गणिकासे कहा- "जे! अम्बपाली ! क्यों तरुण तरुण (=दहर) लिच्छवियोंके धुरोंसे धुरा टकराती है। " दिया।

महापरिनिब्बान सुत्तं ४५ (६२) "तथा हि पन मे अय्यपुत्ता ! भगवा निमन्तितो स्वातनाय भत्त सद्धि भिक्खु-संघेना, ति ।" (६३) "देहि जे अम्बपालि ! एकं भत्तं सत-सहस्सेना, ति ।" (६४) "सचेपि मे अय्यपुत्त ! वेसालि साहारं दस्सथ, एवमहं तं भत्तं न दस्सामी, ति ।" (६५) अथ खो ते लिच्छवी अङ्गुलिं फोटेसुं 'जितम्हा वत भो अम्बकाय !, जितम्हा वत भो अम्बकाया, ति !!' (६६) अथ खो ते लिच्छवी येन अम्बपालि-वनं, तेन पार्यिसु । अहस खो भगवा ते लिच्छवी दूरताव आगच्छन्ते दिस्वा भिक्खू आमन्तेसि- "येसं भिक्खवे ! भिक्खून देवा तावर्तिसा अदिहा। ओलोकेथ भिक्खवे ! लिच्छवी परिसं, अपलोकेथ भिक्खये ! लिच्छवी परिसं !!, उपसंहरथ भिक्खवे ! लिच्छवी परिसं तावतिसा सदिसन्ति !!! ( ६२ ) "आर्यपुत्रो ! क्योंकि मैंने भिक्षु-संघके साथ कलके भोजनके लिये भगवान् को निमन्त्रित किया है।" (६३) “जे ! अम्बपाली ! सौ हजार (कार्षापण)से भी इस भात (भोजन)को (हमें करनेके लिये) देदे।" (६४) "आर्यपुत्रो ! यदि वैशाली जनपद भी दो, तो भी इस महान् भातको न दूंगी।" (६५) तब उन लिच्छवियोंने अंगुलियाँ फोळी- "अरे ! हमें अम्बिकाने जीत लिया, अरे ! हमें अम्बिकाने वंचित कर दिया।" ( ६६ ) तब वह लिच्छवि जहाँ अम्बपाली-वन था, वहाँ गये। भगवान्ने दूरसे ही लिच्छवियोंको आते देखा। देखकर भिक्षुओंको आमंत्रित किया- "अवलोकन करो भिक्षुओ! लिच्छवियोंकी परिषद्को । अवलोकन करो भिक्षुओ ! लिच्छवियोंकी परिषद्को । भिक्षुओ ! लिच्छवि-परिषद्को त्रायस्त्रिंश (देव)- परिषद् समझो (= उप-संहरथ)।" !

४६ महापरिनिब्बान सुत्तं (६७) अथ खो ते लिच्छवी यावतिका यानस्स भूमि यानेन गन्त्वा याना पच्चो-रोहित्वा पत्तिकाव येन भगवा, तेनुपसङ्कर्मिसु । उपसङ्कमित्वा भगवन्त अभिवादेत्वा एकमन्त निसीदिसु। एकमन्त निसिन्ने खाते लिच्छवी भगवा धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि, समादपेसि समुत्तेजेसि संपहंसेसि । अथ खो ते लिच्छवी भगवता धम्मिया कथाय सन्दस्सिता समादपिता समुत्तेजिता संपहंसिता भगवन्तं एतदवोचुं- "अधिवासेतु नो भन्ते ! भगवा स्वातनाय भत्तं सद्धि भिक्खु- संघेना, ति ।" (६८) अथ खो भगवा ते लिच्छवी एतदवोच,-"अधिवुत्तं खो मे लिच्छवी स्वातनाय अम्बपालिया गणिकाय भत्तन्ति ।" (६९) अथ खो ते लिच्छवी अङ्गुलि फोटेसुं–'जितम्हा वत भो अम्बकाय ! जितम्हा वत भो अम्बकाया, ति !!' अथ खो ते लिच्छवी भगवतो भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उहायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पकर्मिसु । (६७) तब वह लिच्छवि ० रथसे उतरकर पैदल ही जहाँ भगवान् थे, वहाँ... जाकर भगवान्को अभिवादनकर एक ओर बैठे। एक ओर बैठे लिच्छवियोंको भगवान्ने धार्मिक कथासे . ० समुत्तेजित किया। तब वह लिच्छवि भगवान् से बोले- "भन्ते ! भिक्षु-संघके साथ भगवान हमारा कलका भोजन स्वीकार करें।" (६८) “लिच्छवियो! कल तो, मैंने अम्बपाली-गणिका का भोजन स्वीकार कर दिया है।" ( ६९) तब उन लिच्छवियोंने अँगुलियाँ फोळी- "अरे ! हमें अम्बिकाने जीत लिया। अरे! हमें अम्बिकाने वंचित कर दिया।" तब वह लिच्छवि भगवानके भाषणको अभिनन्दितकर अनुमोदितकर, आसनसे उठ भगवानको अभिवादनकर प्रदक्षिणाकर चले गये।

महापरिनिब्बान सुत्तं (७०) अथ खो अम्बपाली गणिका तस्सा रत्तिया अञ्चयेन सके आरामे पणीतं खादनीयं भोजनीयं पटियादापेत्वा भगवतो कालं आरोचा- पेसि-"कालो भन्ते ! निहित भत्तन्ति !" (७१) अथ खो भगवा पुब्बएह समयं निवासेत्वा पत्त चीवर-मादाय सद्धि भिक्खु-संघेन येन अम्बपालिया गणिकाय निवेसन, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा पञ्चत्ते आसने निसीदि । अथ खा अम्बपाली गणिका बुद्ध-पमुखं भिक्खु-संघ पणीतेन खादनीयेन भोजनीयेन सहत्था सन्तप्पेसि संपवारेसि । अथ खो अम्बपाली गणिका भगवन्तं भुत्ताविं प्रोणीय पत्त पाणिं अतरं नीचं आसनं गहेत्वा एकमन्तं निसीदि । एकमन्तं निसिना खा अम्बपाली गणिका भगवन्त एतदवोच-"इमाई भन्ते ! श्राराम बुद्ध-पमुखस्स भिक्खु संघस्स दम्मी, ति । पटिग्गहेसि भगवा श्रारामं ।" अथ खो भगवा अम्बपालि गणिकं धम्मिया कथाय सन्दस्सेत्वा समादपेत्वा समुत्तेजेत्वा संपहंसेत्वा उहायासना पक्कमि । (७०) अम्बपाली गणिकाने उस रातके बीतनेपर, अपने आराममें उत्तम खाद्य-भोज्य तैयारकर, भगवानको समय सूचित किया...। ( ७१) भगवान् पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र चीवर ले भिक्षु-संघके साथ जहाँ अम्बपालीका परोसनेका स्थान था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। तब अम्बपाली गणिकाने बुद्ध-प्रमुख भिक्षु-संघको अपने हाथसे उत्तम खाद्य-भोज्य द्वारा संतर्पित=संप्रवारित किया। तब अम्बपाली गणिका भगवान्के भोजनकर पात्रसे हाथ खींच लेनेपर, एक नीचा आसन ले, एक ओर बैठ गई। एक ओर बैठी अम्बपाली गणिका भगवानसे बोली - "भन्ते ! मैं इस पारामको बुद्ध-प्रमुख भिक्षु. संघको देती हूँ।" भगवान्ने आरामको स्वीकार किया। तब भगवान् अम्बपाली ० को धार्मिक- कथासे० समुत्तेजित कर, आसनसे उठकर चले गये ।

४८ महापरिनिब्बान सुत्तं । (७२) तत्र सुदं भगवा वेसालियं विहरन्तो अम्बपालिवने एतदेव बहुलं भिक्खून धम्मि-कथं करोति, 'इति सील, इति समाधि, इति पञ्जा । सील परिभावितो समाधि महप्फलो होति महानिसंसो। समाधि परिभाविता पञ्बा महप्फला होति महानिसंसा। पज्जा परिभावितं चित्तं सम्मदेव आसवेहि विमुञ्चति। सेय्यथिदं,-कामासवा, भवासवा, अविज्जासवा, ति। (७३) अथ •खो भगवा अम्बपालिवने यथाभिरन्तं विहरित्या आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि –'आयामानन्द ! येन वेलुवगामको तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति' । 'एवं भन्ते, ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पच्चस्सोसि । अथ खो भगवा महता भिक्खु-संघेन सद्धिं येन वेलुवगामको, तदव- सरि। तत्र सुदं भगवा वेलुवगामके विहरति । तत्र खो भगवा भिक्खू आम- न्तेसि-“एथ तुम्हे भिक्खचे ! समन्ता वेसालिं यथा मित्तं यथा सन्दिहं यथा सम्भत्तं वस्सं उपेथ । अहं पन इधेव वेलुवगामके वस्स उपगच्छामी, ति" ! 'एवं भन्ते', ति खो ते भिक्खू भगवतो पटिस्सुत्वा समन्ता वेसालि यथा मित्तं यथा सन्दिहें यथा सम्भत्तं वस्सं उपगच्छिसु । भगवा पन तत्थेव वेलुवगामके वस्सं उपगच्छि । (७२) वहाँ वैशालीमें विहार करते भी भगवान् भिक्षुओंको बहुत करके यही धर्म-कथा कहते थे । वेलुव-ग्राम- (७३) ० तब भगवान् महाभिक्षु-संघके साथ जहाँ वेलुव-गामक (=वेणु- ग्राम) था, वहाँ गये। वहाँ भगवान् वेलुव-गामकमें विहरते थे। भगवान्ने वहाँ भिक्षुओंको आमंत्रित किया- "आओ भिक्षुओ! तुम वैशालीके चारों ओर मित्र, परिचित...देखकर वर्षावास करो। मैं यहीं वेलुव-प्रामकमें वर्षावास करूँगा।" "अच्छा, भन्ते !"... भगवान् भी उसी वेलुव ग्राम में वर्षावास करने लगे। । mom महापरिनिब्बान सुत्तं ४९ (७४) अथ खो भगवतो वस्सुपगतस्स खरो श्राबाधो उपज्जि बाल्हा वेदना बत्तन्ति मारणन्तिका । तत्र सुदं भगवा सतो सम्पजानो अधिवासेसि अविहनमानो । अथ खो भगवतो एतदहोसि, “न खो मे तं पतिरूपं स्वाहं अनामन्तेत्वा उपहाके अनपलोकेत्वा भिक्खु-संघ परिनिब्बायेय्यं । यं नूनाहं इमं आबाधं वीरियेन पटिपणामेत्वा जीवित सङ्खारं अघिद्वाय विहरेय्यन्ति" । अथ खो भगवा तं आबाधं वीरियेन पटिपणामेत्वा जीवित-सङ्खारं अघिद्याय विहासि। अथ खो भगवतो सो आबाधो पटिप्पस्सम्भि। (७५) अथ खो भगवा गिलानावुद्वितो अचिर वुहितो गेला विहारा निक्खम्म विहार पच्छाया यं पञ्चत्ते आसने निसीदि । अथ खो यस्मा आनन्दो येन भगवा तेनुपसङ्कमि । उपसङ्क- मित्वा भगवन्त अभिवादेत्वा एकमन्त निसीदि। एकमन्त निसिन्नो खो आयस्मा आनन्दो भगवन्त एतदवोच, सख्त बीमारी । (७४) वर्षावासमें भगवानको कळी बीमारी उत्पन्न हुई। भारी मराणान्तक पीळा होने लगी। उसे भगवान्ने स्मृति-संप्रजन्यके साथ बिना दुःख करते, स्वीकार (=सहन) किया। उस समय भगवान्को ऐसा हुआ-'मेरे लिये यह उचित नहीं, कि मैं उपस्थाकों (=सेवकों) को बिना जतलाये, भिक्षु-संघको बिना अवलोकन किये, परिनिर्वाण प्राप्त करूँ। क्यों न मैं इस बाधा (=व्याधि) को हटाकर, जीवन- संस्कार (=प्राणशक्ति) को दृढ़तापूर्वक धारणकर, विहार करूं । ।भगवान् उस व्याधिको वीर्य (= मनोबल) से हटाकर प्राण-शक्तिको दृढ़तापूर्वक धारणकर, विहार करने लगे। तब भगवान्की वह बीमारी शान्त हो गई। (७५) भगवान् बीमारीसे उठ, रोगसे अभी अभी मुक्त हो, विहारसे (बाहर) निकलकर विहारकी छायामें बिछे आसनपर बैठे। तब आयुष्मान् आनन्द जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये जाकर भगवान्को अभिवादनकर एक ओर बैठे। एक ओर बैठे आयुष्मान् आनन्दने भगवानसे यह कहा- महापरिनिब्बान सुत्तं ति" %3D (७६) “दिहो मे भन्ते ! भगवतो फासु, दिदं मे भन्ते ! भगवतो खमनियं, अपि च मे भन्ते ! मधुरकजाताविय कायो, दिसा पि मे न पक्खायन्ति । धम्मा पि मं नप्पटिभन्ति भगवतो गेलओन । अपि च मे भन्ते ! अहोसि काचिदेव अस्सास-मत्ता न ताव भगवा परिनिब्बायिस्सति । न याव भगवा भिक्खु संघं आरब्भ किञ्चिदेव उदाहरती, (७७) किंपनानन्द ! भिक्खु संघो मयि पञ्चासिंसति ? देसितो आनन्द ! मया धम्मो अनन्तरं अबाहिरं करित्वा, नत्थानन्द ! तथागतस्स धम्मेसु श्राचरिय मुट्टि । यस्स नुन आनन्द ! एवमस्स अहं भिक्खु-संघ परिहरिस्सामी, ति वा ममुद्देसिको भिक्खु-संघो, ति वा सो नुन भिक्खु-संघं आरम किश्चिदेव उदाहरेय्य । तथागतस्स खो आनन्द ! न एवं होति । "अहं भिक्खु-संघ परिहरिस्सामी, ति वा ममुसिको भिक्खु-संघो, ति वा । स किं आनन्द ! तथागतो भिक्खु- संघ प्रारब्भ किञ्चिदेव उदाहरिस्सति ? आनन्द! (७६ ) "भन्ते ! भगवान्को सुखी देखा ! भन्ते ! मैंने भगवान्को अच्छा हुआ देखा ! भन्ते ! मेरा शरीर शून्य हो गया था। मुझे दिशायें भी सूझ न पळती थीं। भगवान्की बीमारीसे (मुझे) धर्म (=बात) भी नहीं भान होते थे। भन्ते ! कुछ आश्वासनमात्र रह गया था, कि भगवान् तबतक परिनिर्वाण नहीं प्राप्त करेंगे ; जबतक भिक्षु-संघको कुछ कह न लेंगे।" ( ७७ ) "आनन्द ! भिक्षु-संघ मुझसे क्या चाहता है ? आनन्द ! मैंने न-अन्दर न-बाहर करके धर्म-उपदेश कर दिये। आनन्द ! धर्मोंमें तथागतको ( कोई ) आचार्य मुष्टि (= रहस्य ) नहीं है। आनन्द ! जिसको ऐसा हो कि मैं भिक्षु-संघको धारण करता हूँ, भिक्षु-संघ मेरे उद्दश्यसे है, वह जरूर आनन्द ! भिक्षु-संघके लिये कुछ कहे। आनन्द ! तथागतको ऐसा नहीं है...आनन्द ! तथागत भिक्षु-संघ के लिये क्या कहेंगे ? आनन्द ! मैं जीर्ण = वृद्ध = महल्लक = अध्वगत वयःप्राप्त हूँ। अस्सी वर्षकी मेरी उम्र है। आनन्द ! जैसे पुरानी गाळी (=शकट) बाँध-बूंधकर चलती है, ऐसे ही आनन्द ! मानों तथागतका !

महापरिनिब्बान सुतं अहं खो पनानन्द ! एतरहि जिएणो बुद्धो महल्लको श्रद्धगतो वयो अनुप्पत्तो। असीतिको मे वयो वत्तति । सेय्यथापि आनन्द ! जज्जर सकटं वेध मिस्सकेन यापेति, एवमेव खो आनन्द ! वेध मिस्सकेन मञ्ने तथागतस्स कायो यापेति । यस्मि आनन्द ! समये तथागतो सब्ब निमित्तानं अमनसिकारा एकच्चानं वेदनानं निरोधा अनिमित्तं चेतो समाधि उपसम्पज्ज विहरति । फासुतरो आनन्द ! तस्मि समये तथागतस्स कायो होति । तस्मातिहानन्द ! अत्त-दीपा विहरथ अत्त- सरणा अनञ्ज-सरणा। धम्म-दीपा धम्म-सरणा अन- सरणा। ! कथञ्चानन्द ! भिक्खु अत्त-दीपो विहरति अत्त-सरणो अनन- सरणो ? धम्म-दीपो धम्म-सरणो अनच-सरणो ? इधानन्द ! भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झा दोमनस्सं वेदनासु चित्तेसु । धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झा दोमनस्सं । एवं खो आनन्द ! भिक्खु अत्त-दीपो विहरति अत्त- सरणो अनब-सरणो। येहि केचि आनन्द ! एतरहि वा मम वा अञ्चयेन अत्त-दीपा विहरिस्सन्ति अत्त-सरणा अनज-सरणा, शरीर बाँध-बूंधकर चल रहा है। आनन्द ! जिस समय तथागत सारे निमित्तों (=लिंगों) को मनमें न करनेसे, किन्हीं किन्हीं वेदनाओंके निरुद्ध होनेसे, निमित्त- रहित चित्तकी समाधि (= एकाग्रता) को प्राप्त हो विहरते हैं, उस समय...तथागतका शरीर अच्छा (= फासुकत) होता है। इसलिये आनन्द ! आत्मदीप = आत्मशरण = 506.

महापरिनिब्बान सुत्तं ति"॥ धम्मदीपा धम्म-सरणा अनञ्च-सरणा तम-तग्गे मे ते आनन्द ! भिक्खू भविस्सन्ति ये केचि सिक्खा-कामा, दुतिय भाणवारं ॥२॥ (७८) अथ खो भगवा पुब्बन्ह समयं निवासेत्वा पत्त चीवरमादाय वेसालिं पिण्डाय पाविसि। वेसालियं पिण्डाय चरित्वा पच्छा भत्तं पिण्डपात पटिक्वन्तो आयस्मन्तं श्रानन्दं आमन्तेसि-'गण्हाहि आनन्द ! निसीदनं । येन चापाल चेतियं, तेनुपसङ्कमिस्साम दिवा विहा- राया, ति॥ (७९) 'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पटिस्सुत्वा निसीदनं आदाय भगवन्तं पिहितो पिहितो अनुबन्धि । अथ खो भगवा येन चापाल चेतियं, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा पञ्चत्ते आसने निसीदि । आयस्मा पि खो आनन्दो भगवन्त अभिवादेत्वा एकमन्त निसीदि। अनन्यशरण, धमदीप =धर्म-शरण =अनन्य-शरण होकर विहरो। कैसे आनन्द ! भिक्षु आत्मशरण ० होकर विहरता है ? आनन्द ! भिक्षु काया में कायानुपश्यो ०* ।" इति ) द्वितीय भाणवार ॥२॥ (७८ ) तब भगवान पूर्वाह्न समय पहनकर पात्र चीवर ले वैशाली में भिक्षाके लिये प्रविष्ट हुए। वैशालीमें पिंडचारकर, वैशालीमें पिंडचारकर, भोजनोपरान्त......आयुष्मान आनन्दसे बोले- "आनन्द ! आसनी उठाओ, जहाँ चापाल-चैत्य है, वहाँ दिनके विहारके लिये चलेंगे।" (७९) "अच्छा भन्ते ।"-कह...आयुष्मान् आनन्द आसनी ले भगवान्के पीछे पीछे चले। तब भगवान् जहाँ चापाल-चैत्य था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसनपर बैठे। आयुष्मान् आनन्द भी अभिवादन कर......। एक ओर बैठे angowave * देखा महासतिपट्टान-सुत्त २२ पृष्ठ १९० (दीघनिकाय)।

महापरिनिब्बान सुत्तं एकमन्तं निसिन्नं खो आयस्मन्तं प्रानन्दं भगवा एतदवोच,-"रम्मणीया आनन्द ! वेसाली, रम्मणोयं उदेन चेतियं, रम्मणीयं गोतमक चेतियं, रमणीयं सत्तम्ब चेतियं, रम्मरणीयं बहुपुत्त चेतियं, रम्मणीय आनन्द चेतिय, रम्मणीय चापाल चेतिय"। (८०) “यस्स कस्सचि भानन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता बहुली- कता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा, सो आकङ्खमानो कप्पं वा तितुय्य, कप्पावसेसं वा । तथागतस्स खो पन आनन्द ! चत्तारो इद्धि-पादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा, सो आकङ्खमानो आनन्द ! तथागतो कप्पं का तिहेय्य, कप्पावसेसं वा ति" । (८१) एवं पि खो आयस्मा आनन्दो भगवता ओलारिके निमित्त करियमाने, अोलारिके श्रोभासे करियमाने नासक्खि पटिविज्झितु। न भगवन्त याचि,-"तिहतु भन्ते भगवा ! कप्पं, तिहतु सुगतो कप्पं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकम्पाय अत्याय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति" ॥ यथा त मारेन परियुटित चित्तो। आयुष्मान् आनन्दसे भगवान्ने यह कहा-आनन्द ! वैशाली रमणीय है, ०० चापाल चैत्य रमणीय है। (८०) “अानन्द ! जिसने चार ऋद्धिपाद (= योगसिद्धियाँ) साधे हैं, बढ़ा लिये हैं, रास्ता कर लिये हैं, घर कर लिये हैं; अनुत्थित, परिचित और सुसमारब्ध कर लिये हैं, यदि वह चाहे तो कल्प भर ठहर सकता है, या कल्प के बचे (काल) तक। तथागतने भी आनन्द ! चार ऋद्धिपाद साधे हैं , यदि तथागत चाहें तो कल्प भर ठहर सकते हैं या कल्पके बचे (काल) तक ।" (८१) ऐसे स्थूल संकेत करनेपर भी, स्थूलत: प्रकट करनेपर आयुष्मान् आनन्द न समझ सके, और उन्होंने भगवान्से न प्रार्थना की-“भन्ते ! भगवान् बहुजन- हितार्थ बहुजन-सुखार्थ, लोकानुकम्पार्थ देव-मनुष्योंके अर्थ-हित-सुखके लिये कल्प भर ठहरे"; क्योंकि मारने उनके मनको फेर दिया था। !

५४ महापरिनिब्बान सुत्त ! (८२) दुतियम्पि खो भगवा ० । ततियम्पि खो भगवा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि—'रम्मणीया अानन्द वेसाली, रम्मणीयं उदेन चेतियं, रम्मणीयं गोतमक चेतियं, रम्मणीयं सत्तम्ब चेतियं, रम्मणीयं बहुपुत्त चेतियं, रम्मणीयं आनन्द चेतियं, रम्मणीयं चापाल चेतिय ।" "यस्स कस्सचि आनन्द ! चत्तारो इद्धि-पादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा, सो आकङ्खमानो कप्पं वा तिट्टेय्य, कप्पावसेसं वा। तथागतस्स खो आनन्द ! चत्तारो इद्धि-पादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा, सो आकङ्खमानो आनन्द ! तथागतो कप्पं वा तिहेय्य, कप्पावसेसं वा, ति।" एवं पि खो आयस्मा आनन्दो भगवता ओलारिके निमित्ते करिय- माने, ओलारिके ओभासे करियमाने नासक्खि पटिविज्झितु। न भगवन्तं याचि-'तिहतु भन्ते भगवा ! कप्पं, तिहतु सुगतो कप्पं बहु- जन हिताय बहु-जन सुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देवमनुस्सानन्ति !!" यथा तं मारेन परियुहित चित्तो । (८३) अथ खो भगवा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि,-'गच्छ त्वं आनन्द ! यस्स दानि कालं मञ्चसी, ति। (८४) 'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पटिस्सुत्वा उद्यायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा अविदूरे अञ्चतरस्मि रुक्ख मूले निसीदि। ! (८२) दूसरी बार भी भगवान्ने कहा-"आनन्द ! जिसने चार ऋद्धिपाद। तीसरी बार भी भगवान ने कहा-"आनन्द ! जिसने चार ऋद्धिपाद० । (८३) तब भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दको संबोधित किया-"जाओ, आनन्द ! जिसका काल समझते हो।" (८४) "अच्छा, भन्ते !" कह आयुष्मान् आनन्द भगवानको उत्तर दे आसनसे उठ भगवानको अभिवादनकर प्रदक्षिणाकर, न-बहुत-दूर एक वृक्षके नीचे बैठे। !

महापरिनिब्बान सुत्तं (८५) अथ खो मारो पापिमा अचिर पक्कन्ते प्रायस्मन्ते आनन्दे येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा एकमन्तं अहासि । एकमन्तं ठितो खो मारो पापिमा भगवन्तं एतदवोच,-"परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा परिनिब्बातु सुगतो !, परिनिब्बान-कालो दानि भन्ते ! भगवतो। भासिता खो पनेसा भन्ते ! भगवता वाचा-'न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि याव मे भिक्खू न सावका भविस्सन्ति वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामि- चिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनो सकं आचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खि- स्सन्ति देसेस्सन्ति पञपेस्सन्ति पट्टपेस्सन्ति विवरिस्सन्ति विभजिस्सन्ति उत्तानि करिस्सन्ति, उप्पन्न परप्पवादं सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेस्सन्ती, ति। एतरहि खो पन भन्ते ! भिक्खू भगवतो सावका वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानु- धम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनो सके आचरियकं उग्ग- हेत्वा आचिक्खन्ति देसेन्ति पञ्बपेन्ति पहपेन्ति विवरन्ति विभजन्ति उत्तानि करोन्ति उत्पन्नं परप्पवादं सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेन्ति ।" "परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा, परिनिब्बातु सुगतो !, परि- निब्बान-कालो दानि भन्ते ! भगवतो। भासिता खो पनेसा भन्ते ! , निर्वाणकी तैयारी (८५) तब आयुष्मान् अानन्दके चले जानेके थोळे ही समय बाद पापी ( = दुष्ट) मार जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, जाकर एक ओर खळा हुआ। एक ओर खळे पापी मारने भगवानसे यह कहा- "भन्ते ! भगवान् अब परिनिर्वाणको प्राप्त हों, सुगत परिनिर्वाणको प्राप्त हों। भन्ते ! यह भगवानके परिनिर्वाणका काल है। भन्ते ! भगवान् यह बात कह चुके हैं-'पापी ! मैं तबतक परिनिर्वाणको नहीं प्राप्त होऊँगा, जबतक मेरे भिक्षु श्रावक ।

५६ महापरिनिब्बान सुत्तं भगवता वाचा,-'न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्लामि याव मे भिक्खुनियो न साविका भविस्सन्ति वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनियो सक आचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खिस्सन्ति देसेस्सन्ति पञ्बपेस्सन्ति पडपेस्सन्ति विवरिस्सन्ति विभजिस्सन्ति उत्तानि करिस्सन्ति उत्पन्न परप्पवादं सहधम्मेन सुनिग्गहित निग्गहेत्वा सप्पाटिहारिय धम्म देसे- स्सन्ती, ति ॥ एतरहि खो पन भन्ते ! भिक्खुनियो भगवतो साविका वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मपटिपन्ना सामिचिष्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनियो सकं आचरियकं उग्गहेत्वा आचि- क्खन्ति देसेन्ति पञ्चपेन्ति पहपेन्ति विवरन्ति विभजन्ति उत्तानि करोन्ति, उप्पन्नं परप्पवादं सहधम्मेन सुनिग्गहित निग्गहेत्वा सप्पाटि- हारियं धम्म देसेन्ति" ॥ "परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा, परिनिब्बातु सुगतो, परि- निब्बान-कालो दानि भन्ते ! भगवतो। भासितो खो पनेसा भन्ते ! भगवता वाचा,-'न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि याव मे उपासका न सावका भविस्सन्ति वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनो सके आचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खिस्सन्ति देसेस्सन्ति पञ्जपेस्सन्ति पटपे- स्सन्ति विवरिस्सन्ति विभजिस्सन्ति उत्तानि करिस्सन्ति, उप्पन्न व्यक्त ( = पंडित ), विनययुक्त, विशारद, बहुश्रुत, धर्म-धर, धर्मानुसार धर्म मार्गपर आरूढ़, ठीक मार्गपर आरूढ़, अनुधर्मचारी न होंगे, अपने सिद्धान्त ( = आचार्यक) को सीखकर उपदेश, आख्यान, प्रज्ञापन ( = समझाना), प्रतिष्ठापन, विवरण विभजन, सरलीकरण न करने लगेंगे, दूसरेके उठाये आक्षेपको धर्मानुसार खंडन करके प्रातिहार्य ( - युक्ति) के साथ धर्मका उपदेश न करने लगेंगे। इस समय भन्ते ! भगवानके भिक्षु भावक० प्रातिहार्यके साथ धर्मका उपदेश करते हैं। भन्ते ! भगवान् । !

महापरिनिब्बान सुत्तं परप्पवाद सहयम्मेन सुनिग्गहितं निगहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेस्सन्ती, ति ॥ एतरहि खो पन भन्ते ! उपासका भगवतो सावका वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनो सकं आचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खन्ति देसेन्ति पञ्चपेन्ति पहपेन्ति विवरन्ति विभजन्ति उत्तानि करोन्ति, उप्पन्न परप्पवादं सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेन्ति"॥ परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा, परिनिब्बातु सुगतो ! परिनिब्बान- कालो दानि भन्ते ! भगवतो। भासिता खो पनेसा भन्ते ! भगवतो वाचा,- 'न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि याव मे उपासिका न साविका भविस्सन्ति, वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्म- पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनियो सकं प्राचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खिस्सन्ति देसेस्सन्ति पञपेस्सन्ति पट्टपेस्सन्ति विवरिस्सन्ति विमजिस्सन्ति उत्तानि करिस्सन्ति, उप्पन्नं परप्पवादं सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारिय धम्म देसेस्सन्ती, ति ।। एतरहि खोपन भन्ते! उपासिका भगवतो साविका वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिष्पटिपन्ना अनुधम्मचारि- नियो सकं आचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खन्ति देसेन्ति पञपेन्ति पहपेन्ति अब परिनिर्वाणको प्राप्त हों । भन्ते ! भगवान् यह बात कह चुके हैं-'पापी ! मैं तब तक परिनिर्वाणको नहीं प्राप्त होऊँगा, जब तक मेरी भिक्षुणी श्राविकायें० प्रातिहार्यके साथ धर्मका उपदेश न करने लगेंगी। इस समय ०। भन्ते ! भगवान यह बात कह चुके हैं-'पापी ! मैं तब तक परिनिर्वाणको नहीं प्राप्त होऊँगा, जब तक मेरे उपासक श्रावक ०।' इस समय । भन्ते ! भगवान् यह बात कह चुके हैं- महापरिनिब्बान सुन्तं विवरन्ति विभजन्ति उत्तानि करोन्ति, उप्पन्न परपवाद सहधम्मेन सुनिग्गहित निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेन्ति ।।" "परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा, परिनिब्बातु सुगतो ! परि- निब्बान-कालो दानि भन्ते ! भगवतो भासिता खो पनेसा भन्ते ! भगवता वाचा,-'न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि याव मे इदं ब्रह्म वरियं इद्धश्चेव भविस्सति फितञ्च वित्थारित बहु जनं पुथुभूत याव देव मनुस्से हि सुप्पकासितन्ति" । एतरहि खो पन भन्ते ! भगवता ब्रह्मचरियं इद्धश्चैव फितञ्च वित्थारितं बहु जनं पुथु भूतं याव देव मनुस्से हि सुप्पकासितं । परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा, परिनिब्बातु सुगतो! परिनिम्बान- कालो दानि भन्ते ! भगवता, ति ।' (८६) एवं वुत्ते भगवा मारं पापिमन्तं एतदवोच, पापिमन्तं एतदवोच,-"अप्पोसुको त्वं पापिम ! होहि, न चिरं तथागतस्स परिनिब्बानं भविस्सति, इतो तिएणं मासानं अञ्चयेन तथागतो परिनिब्बायिस्सती, ति ।" (८७) अथ खो भगवा चापाल चेतिये सता सम्पनानो आयु-सङ्खार श्रोस्सज्जि, ओस्सहे च भगवता आयुसङ्घारे महा-भूमिचालो अहोसि ! 'पापी ! मैं तब तक परिनिर्वाणको नहीं प्राप्त होऊँगा, जब तक मेरी उपासिका भाविकायें । इस समय । भन्ते ! भगवान् यह बात कह चुके हैं-'पापी ! मैं तब तक परिनिर्वाणको नहीं प्राप्त होऊँगा, जब तक कि यह ब्रह्मचर्य ( = बुद्धधर्म ) ऋद्ध ( = उन्नत) = स्फीत, विस्तारित, बहुजनगृहीत, विशाल, देवताओं और मनुष्यों तक सुप्रकाशित न हो जायेगा।' इस समय भन्ते ! भगवान्का ब्रह्मचर्य }" (८६) ऐसा कहनेपर भगवान्ने पापी मारसे यह कहा-"पापी ! बेफिक्र हो, न-चिर ही तथागतका परिनिर्वाण होगा। आजसे तीन मास बाद तथागत परिनिर्वाणको प्राप्त होंगे।" (८७) तब भगवान्ने चापाल-चैत्यमें स्मृति-संप्रजन्यके साथ आयुसंस्कार (= प्राण-शक्ति) को छोळ दिया। जिस समय भगवान्ने अायु-संस्कार छोळा उस महापरिनिब्बान सुस्त भिंसनको सलोमहंसो । देव-दुद्रभियो च फलिंसु । अथ खो भगवा एतमत्थं विदित्वा ताय वेलाय इमं उदानं उदानेसि- (८८) तुल-मतुलञ्च सम्भवं, भव सङ्घार-मवस्सजि मुनि । अज्झत्त रतो समाहितो, अभिन्दिक वच-मिवत्त सम्भवन्ति ।। (८९) अथ खो आयस्मतो आनन्दस्स एतदहोसि,--अच्छरिय वत भो ! अब्भुतं वत भो !! महावताय भूमिचालो सुमहावताय भूमिचालो भिसनको स-लोमहंसो। देव-दुद्रभियो च फलिंसु। कोनु खो हेतु को चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाया, ति! अथ खो आयस्मा आनन्दो येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि । एकमन्तं निसिनो खो आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवो च, (९०) "अच्छरियौं भन्ते ! अभुतं भन्ते ! महावताय भन्ते ! भूमि- चालो । सु-महावताय भन्ते ! भूमिचालो भिसनको स-लोमहंसो। समय भीषण रोमांचकारी महान् भूचाल हुआ, देवदुन्दुभियाँ बजीं। इस बातको जानकर भगवान्ने उसी समय यह उदान कहा- (८८) "मुनिने अतुल-तुल उत्पन्न भव-संस्कार (= जीवन-शक्ति) को छोळ दिया। अपने भीतर रत और एकाग्रचित्त हो ( उन्होंने ) अपने साथ उत्पन्न कवचको तोळ दिया।" (८९) तब आयुष्मान् आनंदको ऐसा हुआ-"आश्चर्य है ! अद्भुत है !! यह महान् भूचाल है। सु-महान् भूचाल है। भीषण रोमांचकारी है। देव- दुन्दुभियाँ बज रही हैं। (इस ) महान् भूचालके प्रादुर्भावका क्या हेतु = क्या प्रत्यय है ?" तब आयुष्मान् आनन्द जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान्को अभिवादनकर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान आनन्दने भगवानसे यह कहा- (९०)"आश्चर्य भन्ते ! अद्भुत भन्ते ! यह महान भूचाल आया ० क्या हेतु - क्या प्रत्यय है " महापरिनिब्बान सुत्तं देवदुद्रभियो च फलिंसु कोनु खो भन्ते ! हेतु, को पञ्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाया, ति ? अह खो इमे आनन्द ! हेतू, अह पञ्चया महतो भूमिचालस्स पातु- भावाय । कतमे अह? [१] अयं आनन्द ! महापथवी उदके पतिहिता। उदकं वाते पति- द्वितं । वातो आकासहो होति । सा खो आनन्द ! समयो यं महावाता वायन्ति । महावाता वायन्ता उदकं कम्पेन्ति । उदकं कम्पितं पथविं कम्पेति । अयं पठमो हेतु पठमो पञ्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय ॥ [२] पुन च परं आनन्द ! समणो वा होति ब्राह्मणो वा इद्धिमा चेतो-वसिप्पत्तो देवो वा महद्धिको महानुभावो। तस्स परित्ता पथवी- सा भाविता होति । अप्पमाणा श्रापो-सआ। सो इमं पथविं कम्पेति संकम्पेति संपकम्पेति संपवेधेति । अयं दुतियो हेतु दुतियो पच्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय ॥ [३] पुन च परं आनन्द ! यदा बोधिसत्तो तुस्सिता काया चवित्वा सतो सम्पजानो मातु कुच्छि ओकमति, तदा-यं पथवी कम्पति । "आनन्द ! महान भूचालके प्रादुर्भावके ये आठ हेतु = आठ प्रत्यय होते हैं। कौनसे आठ ? [१] आनन्द ! यह महापृथिवी जलपर प्रतिष्ठित है, जल वायुपर प्रतिष्ठित है, वायु आकाशमें स्थित है। किसी समय आनन्द ! महावात ( = तूफान ) चलता है। महावातके चलनेपर पानी कंपित होता है। हिलता पानी पृथिवीको डुलाता है। आनन्द ! महाभूचालके प्रादुर्भावका यह प्रथम हेतु = प्रथम प्रत्यय है। [२] और फिर आनन्द ! कोई श्रमण या ब्राह्मण ऋद्धिमान् चेतोवशित्व (=योग- बल) को प्राप्त होता है, अथवा कोई दिव्यबलधारी=महानुभाव देवता होता है; उसने पृथिवी-संज्ञाकी थोळीसी भावना की होती है, और जल-संज्ञाकी बळी भावना । वह (अपने योगबलसे) पृथिवीको कंपित = संपित = संप्रकंपित=संप्रवेपित करता है । • यह द्वितीय हेतु है। [३] • जब बोधिसत्व तुषित देवलोकसे च्युत हो महापरिनिब्बान सुत्तं ६१ संकम्पति संपकम्पति संपवेधति । अयं ततियो हेतु ततियो पञ्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय ॥ [४] पुन च परं आनन्द ! यदा बोधिसत्तो सतो सम्पजानो मातु कुच्छिस्मा निक्खमति, तदा-यं पथवी कम्पति संकम्पति संपकम्पति संपवेधति । अयं चतुत्यो हेतु चतुत्थो पञ्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय॥ [५] पुन च परं आनन्द ! यदा तथागतो अनुत्तरं सम्मासम्बोधि अभिसम्बुज्झति, तदा-यं पथवी कम्पति संकम्पति संपकम्पति संपवेधति । अयं पञ्चमो हेतु पञ्चमो पच्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय ।। [६] पुन च परं आनन्द ! यदा तथागतो अनुत्तरं धम्मचक पवत्तेति, तदा-यं पथवी कम्पति संकम्पति संपकम्पति संपवेधति । अयं छट्टो हेतु छटो पच्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय ॥ [७] पुन च परं आनन्द ! यदा तथागतो सतो सम्पजानो आयु- सङ्खारं प्रोस्सज्जति, तदा-यं पथवी कम्पति संकम्पति संपकम्पति संपवेधति । अयं सत्तमो हेतु सत्तमो पञ्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय ॥ [८] पुन च परं आनन्द ! यदा तथागतो अनुपादिसेसाय निब्बान- धातुया परिनिब्बायति, तदा-यं पथवी कम्पति संकम्पति संपकम्पति ! होश-चेतके साथ माताकी कोखमें प्रविष्ट होते हैं। . यह तृतीय ०।[४] 0 जब बोधिसत्व होश-चेतके साथ माताके गर्भसे बाहर आते हैं। . यह चतुर्थ हेतु है। [५] ० जब तथागत अनुपम बुद्धज्ञान (= सम्यक् संबोधि) का साक्षात्कार करते हैं। • यह पंचम हेतु है। [६] . जब तथागत अनुपम धर्मचक्र (=धर्मो- पदेश) को (प्रथम) प्रवर्तित करते हैं। • यह षष्ठ हेतु है। [७] और आनन्द ! जब तथागत होश-चेतके साथ जीवन-शक्तिको छोळते हैं । आनन्द ! यह महाभूचालके प्रादुर्भावका सप्तम हेतु = सप्तम प्रत्यय है। [८] और फिर आनन्द ! जब तथागत ६२ महापरिनिब्बान सुत्तं संपवेधति । अयं अहमो हेतु अट्ठमो पञ्चयो महतो भूमिचालस्स पातुभावाय॥ "इमे खो आनन्द ! अह हेतू, अट्ठ पञ्चया, महतो भूमिचालस्स पातुभावाया,ति" ॥ (९१) अह खो इमा आनन्द ! परिसा; कतमा अह ? [१] खत्तिय- परिसा। [२] ब्राह्मण-परिसा।[३] गहपति-परिसा। [४] समण- परिसा। [५] चातुमहाराजिक-परिसा। [६] तावतिस-परिसा। [७] मार-परिसा।[८] ब्रह्म-परिसा ॥ । (९२) अभिजानामि खो पनाहं आनन्द ! अनेक सतं खत्तिय-परिसं उपसङ्कमित्वा, तत्र पि मया सन्निसिन्न पुब्बश्चेव सल्लपित पुब्बञ्च साकच्छा च समापज्जित पुब्बा। तत्थ यादिसको तेसं वएणो होति, तादिसको महं वएणो होति । यादिसको तेसं सरो होति, तादिसको मयहं सरो होति । धम्मिया कथाय सन्दस्सेमि समादपेमि समुत्तेजेमि संपहंसेमि । भासमानञ्च मं न जानन्ति 'कोनु खो अयं भासति देवो वा मनुस्सा वा, ति ।' धम्मिया कथाय सन्दस्सेत्वा समादपेत्वा समुत्ते । संपूर्ण निर्वाणको प्राप्त होते हैं। यह अष्टम हेतु है। आनन्द ! महा-भूचालके यह आठ हेतु - प्रत्यय हैं। (९१) "आनन्द ! यह आठ (प्रकारकी) परिषद् (= सभा) होती हैं। कौनसी आठ ? [१] क्षत्रिय-परिषद्, [२] ब्राह्मण-परिषद्, [३] गृहपति-परिषद्, [४] श्रमण- परिषद्, [५] चातुर्महाराजिक-परिषद्, [६] त्रायस्त्रिंश-परिषद्, [७] मार-परिषद्, और [८] ब्रह्म-परिषद् । (९२) आनन्द ! मुझे अपना सैकळों क्षत्रिय-परिषदोंमें जाना याद है। और वहाँ भी ( मेरा) पहिले भाषण किये जैसा, पहिले आये जैसा साक्षात्कार ( होता है)। आनन्द ! ऐसी कोई बात देखनेका कारण नहीं मिला, जिससे कि महापरिनिब्बान सुत्तं जेत्वा संपहंसेत्वा अन्तरघायामि । अन्तरहितञ्च मं न जानन्ति, 'कानु खो अयं अन्तरहितो देवा वा मनुस्सो वा ति॥ (९३) अभिजानामि खो पनाहं आनन्द ! अनेक सतं ब्राह्मण- परिसं० । गहपति-परिसं, समणापरिसं, चातुमहाराजिक-परिसं, तावतिस- परिसं, मार-परिसं, ब्रह्म-परिसं उपसङ्कमित्वा तत्र पि मया सन्निसिन्न पुब्बञ्चेव सल्लपित पुरञ्च साकच्छा च समापज्जित पुब्बा। तत्य यादिसको तेसं वएणो होति, तादिसको महं वएणो होति । यादिस को तेसं सरो होति, तादिसको मय्हं सरो होति । धम्मिया कथाय संदस्सेमि समादपेमि समुत्तेजेमि संपहंसेमि । भासमानञ्च मं न जानन्ति, 'कोनु खो अयं भासति देवो वा मनुस्सो वा, ति ? । धम्मिया कथाय संदस्सेत्वा समादपेत्वा समुत्तेजेत्वा संपहंसेत्वा अन्तरघायामि । अन्तरहितश्च में न जानन्ति, 'कानु खो अयं अन्तरहितो देवो वा मनुस्सा वा, ति' । इमा खो आनन्द ! अह परिसा ॥ (९४) अह खो इमानि आनन्द ! अभिभायतनानि । कतमानि अह? [१] अज्झत्त रूप-सञ्बी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति परित्तानि सुवरण दुब्बएणानि । तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामी,ति एवं सञ्बी होति । इदं पठमं अभिमायतनं ॥ मुझे वहाँ भय या घबराहट हो। क्षेमको प्राप्त हो, अभयको प्राप्त हो, वैशारद्यको प्राप्त हो, मैं विहार करता हूँ। (९३ )आनंद ! मुझे अपना सैकळों ब्राह्मण-परिषदोंमें जाना याद है । गृहपति- परिषदोंमें 1 0 श्रमण-परिषदोंमें ।। . चातुर्महाराजिक-परिषदोंमें । ० त्रायस्त्रिंश- परिषदोंमें 01 मार-परिषदोंमें 01 ब्रह्मपरिषदोंमें । (९४) 'आनन्द ! यह आठ अभिभू-श्रायतन (= एक प्रकारको योग-क्रिया) हैं। कौनसे आठ ? [१] अपने भीतर अकेला रूपका ख्याल रखनेवाला होता और बाहर स्वल्प सुवर्ण या दुवर्ण रूपोंको देखता है । 'उन्हें दबाकर (= अभिभूय) ६४ महापरिनिब्बान सुत्तं [२] अज्झत्त अरूप-सजी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति अप्प- माणानि सुवरण दुब्बएणानि । तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामी,ति एवं सजी होति । इदं दुतियं अभिभायतनं ॥ [३] अज्झत्त अरूप-सजी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति परित्तानि सुवरण दुब्बएणानि । 'तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामी',ति एवं सञ्बी होति । इदं ततियं अभिभायतनं ॥ [४] अज्झत्त अरूप-सञ्बी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति अप्प- माणानि सुवरण दुब्बएणानि । 'तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामी',ति एवं सञ्बी होति । इदं चतुत्थं अभिभायतनं ।। [५] अज्झत्त अरूप-सजी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति नीलानि नीलवगणानि नीलनिदस्सनानि नील निभासानि ।-सेय्यथा पि नाम, उम्मा पुप्फ नीलं नील वएणं नील निदस्सनं नील निभासं ।- सेय्यथा वा पन, तं वत्थं बाराणसेय्यकं उभतो भाग विमहं नीलं नील वएणं नील निदस्सनं नील निभासं। एवमेव अज्झत्तं अरूप-सजी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति नीलानि नीलवएणानि नील निदस्सानि नील निभासानि ॥ 'तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामीति', एवं सञ्बी होति । इदं पञ्चमं अभिभायतनं ॥ जानूँ देखू-ऐसा ख्याल रखनेवाला होता है। यह प्रथम अभिभूय-आयतन है। [२] अपने भीतर अकेला अ-रूपका ख्याल रखनेवाला होता है, और बाहर अपरिमित सुवर्ण या दुवर्ण रूपोंको देखता है । 'उन्हें दबाकर जानें देखू-ऐसा ख्याल रखनेवाला होता है। यह द्वितीय ०। [३] अपने भीतर अकेला अ-रूपका ख्याल रखनेवाला बाहर स्वल्प सुवर्ण या दुवर्ण रूपोंको देखता है । [४] अपने भीतर अ-रूपका ख्याल • बाहर सुवर्ण या दुवर्ण अपरिमित रूपोंको देखता है ०। [५] अपने भीतर अरूपका ख्याल० बाहर नीले, नीले जैसे, नीलवर्ण, नीलनिदर्शन, नीलनिभास रूपोंको देखता है। जैसे कि अलसीका फूल नील ।

महापरिनिब्बान सुत्तं anta [६] अज्झत्तं अरूप-सची एको बहिद्धा रूपानि पस्सति पीतानि पीत वरणानि पीत निदस्सनानि पीत निभासानि । सेय्यथा पि नाम- कणिकार पुष्फ पीतं पीतवएणं पीत निदस्सनं पीत निभासं । सेय्यथा वा पन, तं वत्थं बाराणसेय्यकं उभतो भाग विमहं पीतं पीत वएणं पीत निदस्सनं पीत निभासं। एव-मेव अज्झत्तं अरूप-सञ्बी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति पीतानि पीत वरणानि पीत निदस्सनानि पीत निभा- सानि । 'तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामी',ति एवं सञ्बी होति ॥ इदं छ8 अभिमायतनं ॥ [७] अज्झत्तं अरूप-सजी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति लोहित- कानि लोहितक वरुणानि लोहितक निदस्सनानि लोहितक निभासानि । सेय्यथा पि नाम,-बन्धुजीवक पुप्फ लोहितकं लोहितक वएणं लोहितक निदस्सनं लोहितक निभासं । सेय्यथा पि वा पन, तं वत्थं बाराण- सेय्यकं उभतो भाग विमढ़ लोहितकं लोहितक वएणं लोहितक निदस्सनं लोहितक निभासं। एवमेव अझत्तं अरूप-सञ्जी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति लोहितकानि लोहितक वएणानि लोहितक निदस्सनानि लोहितक निभासानि । 'तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामी', ति, एवं सञ्बी होति । इदं सत्तमं अभिभायतनं । - नीलवर्ण = नीलनिदर्शन = नीलनिभास होता है; (वैसा) रूपोंको देखता है। जैसे दोनों ओरसे चिकना नील० बनारसी वस्त्र हो, ऐसे ही अपने भीतर अ-रूप ० । [६] अपने भीतर अरूप ०, बाहर पीत (= पीले) ० देखता है। जैसे कि कर्णिकारका फूल पीत ; जैसे कि दोनों ओरसे चिकना पीत ० काशीका वस्त्र । [७] अपने भीतर अरूप ०, बाहर लोहित (= लाल) ० देखता है। जैसे कि बंधुजीवक (= अळहुल) का फूल लोहित ; जैसे कि • लाल ० काशीका वस्त्र ० । ९ महापरिनिब्बान सुत्तं [८] अज्झत्तं अरूप-सजी एको बहिद्धा रूपानि पस्सति प्रोदा- तानि ओदात वरुणानि अोदात निदस्सनानि श्रोदात निभासानि । सेय्यथा पि नाम–ोसधितारका ओदाता प्रोदात वएणा प्रोदात निदस्सना प्रोदात निभासा । सेय्यथा वा पन,-तं वत्थं बाराणसेय्यक उभतो भाग विमटठं ओदातं प्रोदात वरणं प्रोदात निदस्सनं प्रोदात निभासं। एवमेव अज्झत्तं अरूप-सची एको बहिद्धा रूपानि पस्सति ओदातानि ओदात. वरुणानि ओदात निदस्सनानि प्रोदात निभासानि। 'तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामी', ति, एवं सञी होति । इदं अट्ठमं अभिभायतनं । इमानि खो आनन्द ! अट्ठ अभि- भायतनानि। (९५) अथ खो इमे आनन्द ! “विमोक्खा ।” कतमे अट्ठ ? [१] रूपी रूपानि पस्सति, अयं पठमो विमोक्खो ॥ [२] अज्झत्तं अरूप-सञ्बी बहिद्धा रूपानि पस्सति, अयं दुतियो विमोक्खो ॥ [३] सुभन्तेव अधिमुत्तो होति, अयं ततियो विमोक्खो। [४] सब्बसा रूप-सञ्ज्ञानं समतिकम्मा पटिघ-सज्ञानं अत्थङ्गमा नानत्त-सञ्चानं अ-मनसिकारा अनन्तो आकासो, तिं आकासोनचायतनं उपसम्पज्ज विहरति, अयं चतुत्यो विमोक्खो ॥ १ [८] अपने भीतर अरूप ०, बाहर सफेद ० देखता है। जैसे कि शुक्रतारा सफेद ०; जैसे कि ० सफेद ० काशीका वस्त्र । आनन्द ! यह आठ अभिभू-आयतन हैं । (९५) "और फिर आनन्द ! यह आठ विमोक्ष हैं। कौनसे आठ ? [१] रूपी (= रूपवाला) रूपोंको देखता है, यह प्रथम विमोक्ष है। [२] शरीरके भीतर अरूपका ख्याल रखनेवाला हो बाहर रूपोंको देखता है । [३] सुभ (= शुभ्र) ही अधिमुक्त (= मुक्त) होते हैं । [४] सर्वथा रूपके ख्यालको अतिक्रमणकर, प्रतिहिंसाके ख्यालके लुप्त होनेसे, नानापनके ख्यालको मनमें न करनेसे 'आकाश महापरिनिब्बान सुत्तं ६७ [५] सब्बसो आकासानश्चायतनं समतिकम्म अनन्तं विमानन्ति विज्ञानश्चायतनं उपसम्पज्ज विहरति, अयं पञ्चमो विमोक्खो ॥ [६] सब्बसो विज्ञानश्चायतनं समतिकम्म नत्थि किञ्ची' ति, पाकिञ्चचायतनं उपसम्पज्ज विहरति अयं छहो विमोक्खो॥ [७] सब्बसा आकिञ्चञ्चायतनं समतिकम्म नेवसञ्चा-नासञ्चा- यतनं उपसम्पज्ज विहरति; अयं सत्तमो विमोक्खो॥ [८] सब्बसो नेवसचा-नासायतनं समतिकम्म सञा वेदयित निरोधं उपसम्पज्ज विहरति; अयं अहमो विमोक्खो। इमे खो आनन्द अह विमोक्खा ॥ (९६) एकमिदाहं आनन्द ! समयं उरुवेलायं विहरामि नज्जा नेरञ्जराय तीरे अजपाल-निग्रोधेपठमाभिसम्बुद्धो। अथ खो आनन्द ! मारो पापिमा येनाहं, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा एकमन्तं अहासि । एकमन्तं ठितो खो आनन्द ! मारो पापिमा मं एतदवोच, "परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा, परिनिब्बातु सुगतो ! परिनिब्बान-कालो दानि भन्ते ! भगवतो,ति।।" अनन्त है'-इस आकाश-आनन्त्य-आयतनको प्राप्त हो विहरता है।[५] सर्वथा आकाश-आनन्त्य-आयतनको अतिक्रमण कर 'विज्ञान (चेतना) अनन्त है,-इस विज्ञान-अानन्त्य-आयतनको प्राप्त हो विहरता है । [६] सर्वथा विज्ञान-आनन्त्यको अतिक्रमणकर 'कुछ नहीं है'- इस आकिंचन्य-आयतनको प्राप्त हो विहरता है ।[७] सर्वथा आकिंचन्य-आयतनको अतिक्रमणकर, नैवसंज्ञा-नासंज्ञा-आयतन (= जिस समाधिके आभासको न चेतना ही कहा जा सके, न अचेतना ही) को प्राप्त हो विहरता है । [८] सर्वथा नैवसंज्ञा-नासंज्ञा-आयतनको अतिक्रमणकर प्रज्ञावेदितनिरोध (=प्रज्ञाको वेदनाका जहाँ निरोध हो) को प्राप्त हो विहरता है, यह आठवाँ विमोक्ष है। (९६) “एक बार आनन्द ! मैं प्रथम प्रथम बुद्धत्वको प्राप्त हो उरुबेलामें नेरंजरा नदीके तीर अजपाल बर्गदके नीचे विहार करता था। तब आनन्द ! दुष्ट (= पापो) मार जहाँ मैं था वहाँ आया। आकर एक ओर खळा हो गया। और बोला-'भन्ते ! भगवान् अब परिनिर्वाणको प्राप्त हों, सुगत ! परिनिर्वाणको प्राप्त हों।'

महापरिनिब्बान सुतं (९७) एवं वुत्ते अहं आनन्द ! मारं पापिमन्तं एतदवोचं,-"न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि, याव मे भिक्खू न सावका भवि- स्सन्ति वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनो सकं आचरियक उग्गहेत्वा आचिक्खिस्सन्ति देसेस्सन्ति पञ्चपेस्सन्ति पहपेस्सन्ति विवरिस्सन्ति विभजिस्सन्ति उत्तानिं करिस्सन्ति उप्पन्नं परप्पवाद सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेस्सन्ति । (९८) न तावाहं पापिम! परिनिब्बायिस्सामि, याव मे भिक्खुनियो न साविका भविस्सन्ति वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनियो सक आचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खिस्सन्ति देसेस्सन्ति पञ्न पेस्सन्ति पह- पेस्सन्ति विवरिस्सन्ति विभजिस्सन्ति उत्तानं करिस्सन्ति उत्पन्न परप्पवादं सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेस्सन्ति ॥ (९९) न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि, याव मे उपासका न (९७) ऐसा कहने पर आनन्द ! मैंने दुष्ट मारसे कहा - 'पापी ! मैं तब तक परिनिर्वाणको नहीं प्राप्त होऊँगा, जब तक मेरे भिक्षु आवक निपुण (= व्यक्त), विनय-युक्त, विशारद, बहुश्रुत, धर्मधर (= उपदेशोंको कंठस्थ रखनेवाले), धर्मके मार्गपर आरूढ़, ठीक मार्गपर आरूढ़, धर्मानुसार आचरण करनेवाले, अपने सिद्धान्त (= आचार्यक) को ठीकसे पढ़कर न व्याख्यान करने लगेंगे, न उपदेश करेंगे, न प्रज्ञापन करेंगे, न स्थापन करेंगे, न विवरण करेंगे, न विभाजन करेंगे, न स्पष्ट करेंगे; दूसरों द्वारा उठाये अपवादको धर्मके साथ अच्छी तरह पकळकर युक्ति (=प्रतिहार्य) के साथ धर्मका उपदेश न करेंगे। (९८) जब तक कि मेरी भिक्षुणी श्राविकायें (= शिष्या) निपुण 10 (९९) उपासक श्रावक 10 महापरिनिब्बान सुत्तं सावका भविस्सन्ति वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मघरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनो सकं प्राचरियक उग्गहेत्वा आचिक्खिस्सन्ति देसेस्सन्ति पञ्चपेस्सन्ति पट्टपेस्सन्ति विवरिस्सन्ति विभजिस्सन्ति उत्तानिं करिस्सन्ति उप्पन्न परप्पवाद सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेस्सन्ति । (१००) न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि, याव मे उपासिका न साविका भविस्सन्ति वियत्ता विनिता विसारदा बहुस्सुता धम्मधरा धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना सामिचिप्पटिपन्ना अनुधम्मचारिनियो सक आचरियकं उग्गहेत्वा आचिक्खिस्सन्ति देसेस्सन्ति पञ्चपेस्सन्ति पट्टपेस्सन्ति विवरिस्सन्ति विभजिस्सन्ति उत्तानं करिस्सन्ति उत्पन्न परप्पवाद सहधम्मेन सुनिग्गहितं निग्गहेत्वा सप्पाटिहारियं धम्म देसेस्सन्ति ॥ (१०१) न तावाहं पापिम ! परिनिब्बायिस्सामि, याव मे इदं ब्रह्म- चरियं न इद्धञ्चेव भविस्सति फितञ्च वित्थारितं बाहु जब पुथु भूतं याव देव मनुस्सेहि सुप्पकासितन्ति । (१०२) इदानेव खो आनन्द ! अज्ज चापाले चेतिये मारो पापिमा येनाहं, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा एकमन्तं अहासि । एकमन्तं ठितो खो आनन्द ! मारो पापिमा मं एतदवोच,-"परिनिब्बातु भन्ते ! भगवा परिनिब्बातु सुगतो ! परिनिब्बान-कालो दानि भन्ते ! भगवतो। भासिता खो पनेसा भन्ते ! भगवता वाचा,-"न तावाहं पापिम ! (१००) उपासिका श्राविकायें । (१०१ ) जब तक यह ब्रह्मचर्य (= बुद्धधर्म) समृद्ध = वृद्धिगत, विस्तारको प्राप्त, बहुजन-संमानित, विशाल और देव-मनुष्यों तक सुप्रकाशित न हो जायगा। (१०२) आनन्द ! अभी आज इस चापाल-चैत्यमें मार पापी मेरे पास महापरिनिब्बान सुत्तं भिक्खुनियो न साविका भविस्सन्ति । याव मे उपासका न सावका भविस्सन्ति । याव मे उपासिका न साविका भविस्सन्ति। याव मे इदं ब्रह्मचरियं इद्धश्चेव न भविस्सति फितश्च वित्थारितं बाहु जञ्च पुथु भूतं याव देव मनुस्से हि सुप्पकासितन्ति ।” एतरहि खो भन्ते ! भगवतो ब्रह्मचरियं इद्धश्चेव फितञ्च वित्थारितं बाहु जञ्चं पुथु भूतं याव देव मनुस्से हि सुप्पकासित । परिनिब्बातु दानि भन्ते ! भगवा, परिनिब्बातु सुगतो !! परिनिब्बान-कालो दानि भन्ते ! भगवतो, ति !!! (१०३) एवं वुत्ते अहं अानन्द ! मारं पापिमन्त एतदवोचं,- "अप्पो सुक्को त्वं पापिम ! होहि । न चिरं तथागतस्स परिनिब्बानं भविस्सति । इतो तिण्णं मासानं अञ्चयेन तथागतो परिनिम्बायिस्सती, ति।" इदानि खो आनन्द ! अज्ज चापाले-चेतिये तथागतेन सतेन सम्पजानेन आयुसङ्खारो ओस्सहो, ति ।। (१०४) एवं वुत्ते आयस्मा अानन्दो भगवन्तं एतदवोच,-"तिहतु भन्ते ! भगवा कप्पं, तिहतु सुगतो ! कप्पं बहुजन-हिताय बहुजन-सुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति । ! आया। आकर एक ओर खळा...हो बोला-'भन्ते ! भगवान् अब परिनिर्वाणको प्राप्त हों। , (१०३ ) ऐसा कहने पर मैंने आनन्द ! पापी मारसे यह कहा-'पापी ! बेफिक्र हो, आजसे तीन मास बाद तथागत परिनिर्वाणको प्राप्त होंगे। अभी आनन्द ! इस चापाल-चैत्यमें तथागतने होश-चेतके साथ जीवन-शक्तिको छोळ दिया।" (१०४) ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनन्दने भगवान्से यह कहा- "भन्ते ! भगवान् बहुजन-हितार्थ, बहुजन-सुखार्थ, लोकानुकम्पार्थ, देव-मनुष्योंके अर्थ-हित-सुख के लिये कल्प भर ठहरें।"

महापरिनिब्बान सुत्तं
(१०५) "अलं दानि आनन्द! मा तथागतं याचि । अकालो दानि
आनन्द ! तथागतं याचनाया, ति" ||
(१०६) दुतियम्पि खो आयस्मा आनन्दो० । ततियम्पि खो
आयस्मा आनन्दो भगवन्त एतदवोच,-"तिहतु भन्ते ! भगवा कप्पं,
तिहतु सुगतो ! कप्पं बहुजन-हिताय बहुजन-सुखाय लोकानुकम्पाय
अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति ।"
(१०७) सदहसि त्वं आनन्द ! तथागतस्स बोधिन्ति ?
(१०८) 'एवं भन्ते ॥
(१०९) अथ किश्च रहि त्वं आनन्द ! तथागत याव ततियक
अभिनिप्पिलेसी, ति?
(११०) संमुखा मे त भन्ते ! भगवतो सुतौं संमुखा पटिग्गहित
"यस्स कस्सचि आनन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता बहुलीकता
यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा । सो आकङ्खमानो
कप्पं वा तिट्टेय्य कप्पावसेसं वा। तथागतस्स खो आनन्द ! चत्तारो
इद्धिपादा भाविता बहुलीकता यानी-कता वत्थु-कता अनुहिता परिचिता
सुसमारद्धा । सो आकङ्खमानो आनन्द ! तथागतो कप्पं वा तिहेश्य
कप्पावसेसंवा, ति" ||
!
(१०५) "बस आनंद ! मत तथागतसे प्रार्थना करो! आनंद ! तथागतसे
प्रार्थना करनेका समय नहीं रहा।"
(१०६) दूसरी बार भी आयुष्मान् आनन्दने । तीसरी बार भी ।
(१०७ ) "आनंद ! तथागतकी बोधि (= परमज्ञान) पर विश्वास करते हो?"
(१०८) “हाँ, भन्ते !"
(१०९) "तो आनंद ! क्यों तीन बार तक तथागतको दबाते हो ?"
(११०) "भन्ते ! मैंने यह भगवान्के मुखसे सुना, भगवान्के मुखसे ग्रहण
किया-'आनंद ! जिसने चार ऋद्धिपाद साधे हैं ० "

७२ महापरिनिब्बान सुत्तं । (१११) सद्दहसि त्वं आनन्दा, ति ? (११२) 'एवं भन्ते । (११३) तस्मातिहानन्द ! तुम्हेवेत दुक्कटं तुम्हेवेत अपरद्धं । यं त्वं तथागतेन एवं ओलारिके निमित्ते करियमाने, अोलारिके अोभासे करि- यमाने, ना सक्खि पटिविज्झितु। न तथागत याचि-'तिहतु भन्ते ! भगवा कप्पं, तिहतु सुगतो! कप्पं बहुजन-हिताय बहुजन-सुखाय लोकानु. कम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति ।।' सचे त्वं आनन्द ! तथागत याचेय्यासि, द्वेवते वाचा तथागतो पटिपक्खिपेय्य । अथ ततियकं अधिवासेय्य । तस्मातिहानन्द ! तुम्हेवेत दुकटं तुरहेवेत अपरद्धं। (११४) एकमिदाहं आनन्द ! मयं राजगहे विहरामि गिज्झकूटे पब्बते । तत्रापि खो ताहं आनन्द ! आमन्तेसिं,-'रम्मणीयं आनन्द ! राजगह, रम्मरणीयो आनन्द ! गिज्झकूटो पब्बतो, यस्स कस्सचि आनन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा । सो आकङ्खमानो कप्पंवा तिट्टेय्य कप्पाव- (१११) “विश्वास करते हो आनन्द !" (११२) "हाँ, भन्ते !" (११३ ) "तो आनंद ! यह तुम्हारा ही दुष्कृत है, तुम्हारा ही अपराध है; जो कि तथागतके वैसा उदार-(= स्थूल) भाव प्रकट करने पर, उदार भाव दिखलानेपर भी तुम नहीं समझ सके। तुमने तथागतसे नहीं याचना को-'भन्ते ! भगवान् । कल्प भर ठहरें। यदि आनंद ! तुमने याचना की होती, तो तथागत दो ही बार तुम्हारी बातको अस्वीकृत करते, तीसरी बार स्वीकार कर लेते। इसलिये, आनंद ! यह तुम्हारा ही दुष्कृत (= दुक्कट) है, तुम्हारा ही अपराध है। (११४) "आनंद ! एक बार मैं राजगृहके गृध्रकट-पर्वत पर विहार करता था। वहाँ भी आनंद ! मैंने तुमसे कहा-आनंद ! राजगृह रमणीय है। गृध्रकूट-पर्वत रमणीय है। आनंद ! जिसने चार ऋद्धिपाद साधे हैं। तथागतके महापरिनिब्बान सुत्तं ७३ बहुलीकता यानीकता सेसंवा ।। तथागतस्स खो आनन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा, सो आकङ्खमानो आनन्द ! तथागतो कप्पंवा तिद्वेय्य कप्पावसेसंवा, ति। एवं पि खो त्वं आनन्द ! तथागतेन प्रोलारिके निमित्ते करियमाने, श्रोलारिके अोभासे करियमाने नासक्खि पटिविज्झितु, न तथागतं याचि,-'तितु भन्ते ! भगवा कप्पं, तिहतु सुगतो ! कप्पं बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति ॥ सचे त्वं आनन्द ! तथागतं याचेय्यासि, द्वेवते वाचा तथागतो पटिक्खीपेय्य, अथ ततियकं अधिवासेय्य; तस्मातिहानन्द ! तुरहेवेतं दुकटं तुरहेवेतं अपरद्धं ॥ (११५) एकमिदाहं आनन्द ! समयं तत्थेव राजगहे विहरामि गोतम-निग्रोधे । । तत्थेव राजगहे विहरामि चोर-पपाते । तत्थेव राजगहे विहरामि वेभार-पस्से सत्तपरिण-गुहायं ० । तत्थेव राजगहे विहरामि इसिगिलि-पस्से काल-सिलायं। तत्थेव राजगहे विहरामि सितवने सप्पसोण्डिक-पब्भारे । तत्थेव राजगहे विहरामि तपोदारामे ० । तत्थेव राजगहे विहरामि वेलुवने- कलन्दक-निवापे ० । तत्थेव राजगहे विहरामि जीवकम्बवने । -- वैसा उदार भाव प्रकट करने पर ० भी तुम नहीं समझ सके । आनंद ! यह तुम्हारा ही दुष्कृत है, तुम्हारा ही अपराध है। ( ११५) “आनंद ! एक बार मैं वही राजगृहके गोतम-न्यग्रोधमें विहार करता था 0 1 0 राजगृहके चोरपपात पर 10 राजगृहमें वैमार-पर्वतकी बगलमेंकी सप्तपर्णी (= सत्तपण्णी) गुहामें 0 1 0 ऋषिगिरिकी बगल में कालशिलापर 10 सीतवनके सर्पशौडिक (= सप्पसोंडिक) पहाळ ( = पब्भार) पर ० १ ० तपो- दाराममें ०।० वेणुवनमें कलन्दक-निवापमें । ० जीवकाम्रवनमें ० । ० महापरिनिब्बान सुत्तं ७४ तत्येव राजगहे विहरामि मद्दकुच्छिस्मि-मिगदाये ॥ तत्रापि खो ताहं आनन्द ! आमन्तेसिं,-"रम्मणीयं आनन्द ! राजगह, रम्मणीयो गिज्झकुटो पब्बतो, रम्मणीयो गोतम निग्रोधो, रम्मणीयो चोर-पपातो, रम्मणीया वेभार-पस्से सत्तपरिण-गुहा, रम्मणीया इसिगिलि-पस्से काल-सिला, रम्मणीयो सितवने सप्पसोण्डिक-पन्भारो, रम्मणीयो तपोदारामो, रम्मणीयो वेलुवने कलन्दक-निवापो, रम्मणीयं जीवकम्ब- वनं, रम्मणीयो मद्दकुच्छिस्मिं मिगदायो; यस्स कस्सचि आनन्द ! चत्तारो इंदिपादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा • , सो आकङ्खमानो आनन्द ! तथागतो कप्पंवा तिद्देश्य कप्पावसेसंवा, ति ॥ "एवं पि खो त्वं आनन्द ! तथागतेन पोलारिके निमित्ते करिय- माने पोलारिके प्रोभासे करियमाने नासक्खि पटिविज्झितु न तथागतं याचि-'तिदृतु भगवा ! कप्पं, तिहतु सुगतो! कप्पं बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति' । सचे त्वं आनन्द ! तथागतं याचेय्यासि, द्वेवते वाचा तथागतो पटिक्खीपेय्य, अथ ततियकं अधिवासेय्य । तस्मातिहानन्द ! तुरहेवेतं दुकतं तुयहेवेतं अपरद्धं । (११६) एकमिदाहं आनन्द ! समयं इधेव वेसालियं विहरामि उदेने चेतिये । तत्रा पि खो ताहं आनन्द ! आमन्तेसिं,-'रम्मणीया तुम्हारा ही मद्रकुतिमृगदावमें विहार करता था। वहाँ भी आनंद ! मैंने तुमसे कहा- आनन्द ! रमणीय है राजगृह । रमणीय है गौतमन्यग्रोध ।। अपराध है। (११६) "आनन्द ! एक बार मैं इसी वैशालीके उदयनचैत्यों विहार महापरिनिब्बान सुत्तं . अानन्द ! वेसाली, रम्मणीयं उदेन-चेतियं यस्स कस्सचि आनन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा; सो आकङ्खमानो कप्पंवा तिट्टेय्य कप्पावसेसंवा । तथागतस्स खो आनन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा; सो आकङ्खमानो अानन्द ! तथागतो कप्पंवा तिट्टेय्य कप्पावसे संवा, ति। एवं पि खो त्वं आनन्द ! तथागतेन श्रोलारिके निमित्ते करियमाने ओलारिके प्रोभासे करियमाने नासक्खि पटिविज्झितु। न तथागतं याचि-तिहतु भगवा ! कप्पं, तिहतु सुगतो ! कप्पं बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति' । सचे त्वं आनन्द ! तथागतं याचेय्यासि, देवते वाचा तथागतो पटिक्खीपेय्य, अथ ततियकं अधिवासेय्य। तस्मातिहानन्द ! तुरहेवेत दुक्कतं तुरहेवेत अपरद्धं । एकमिदाह आनन्द ! समयं इधेव वेसालियं विहरामि गोतमके चेतिये ० । इधेव वेसालियं विहरामि सत्तम्बे-चेतिये । इधेव वेसा- लियं विहरामि बहुपुत्ते-चेतिये । इधेव वेसालियं विहरामि सानन्दरे' चेतिय० । इदानेव खो ताहं आनन्द ! अज्ज चापाले-चेतिये । आमन्तेसिं-'रम्मरणीया अानन्द ! वेसाली, रमणीयं उदेनं-चेतियं, रम्मणीयं गोतमक-चेतियं, रम्मरणीयं सत्तम्ब-चेतियं, रम्मणीयं बहुपुत्त- चेतियं, रम्मरणीयं सानन्दरं-चेतियं, रम्मणीयं चापालं-चेतियं । यस्स कस्सचि आनन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा; सो आकङ्घमानो कप्पंवा करता था 0 1 0 गौतमक-चैत्य 0 1 0 सप्ताम्र (= सत्तम्ब) चैत्य । ० बहुपुत्रक- चैत्य । सारन्दद-चैत्य । अभी आज मैंने आनन्द ! तुम्हें इस चापाल-चैत्यमें कहा-आनन्द ! रमणीय है वैशाली । तुम्हारा ही अपराध है । १. किसी २ में 'सारन्ददे पाठ है।

महापरिनिब्बान सुत्तं ! तिढेग्य कप्पावसेसंवा ; तथागतस्स खो आनन्द ! चत्तारो इद्धिपादा भाविता बहुलीकता यानीकता वत्थुकता अनुहिता परिचिता सुसमारद्धा; सो आकङ्खमानो आनन्द ! तथागतो कप्पंवा तिट्टेय्य कप्पावसेसंवा, ति' । एवं पि खो त्वं आनन्द ! तथागतेन पोलारिके निमित्ते करियमाने, ओलारिके अोभासे करियमाने नासक्खि पटिविडिझतु। न तथागतं याचि-'तिहतु भगवा ! कप्पं, तितु सुगतो! कप्पं बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनु- स्सानन्ति !!' सचे त्वं श्रानन्द ! तथागतं याचेप्यासि । वेव ते वाचा तथागतो पटिक्खीपेय्य । अथ ततियकं अधिवासेय्य । तस्मातिहानन्द ! तुरहेवेतं दुक्कटं तुम्हेवेतं अपरद्धं । (११७) "ननु एतं आनन्द ! मया पटिकच्चेव अक्खातं सब्बेहेव पियेहि मनापेहि नाना-भावो विना-भावो अबथा-भावो। तं कुतेत्थ आनन्द ! लब्भा । यन्त जात भूत सङ्घत पलोकधम्म तवतमापलुज्जी, ति । नेत ठानं विज्जति । यं खो पनेतं आनन्द ! तथागतेन चत्तं वन्तं मुत्तं पहीनं पटिनिस्सह ओस्सहो आयुसवारो । एकसेन वाचा तथागतेन भासिता। न चिरं तथागतस्स परिनिब्बान भविस्सति । इतो तिएणं मासान अञ्चयेन तथागतो परिनिब्बायिस्सती, ति" । तश्च तथागतो जीवितहेतु पुन पञ्चा गमिस्सती, ति नेतं ठानं विज्जति । - - (११७) "आनन्द ! क्या मैंने पहिले ही नहीं कह दिया-सभी प्रियों= मनापोंसे जुदाई वियोग= अन्यथाभाव होता है। सो वह आनन्द ! कहाँ मिल सकता है, कि जो उत्पन्न = भूत = संस्कृत, नाशमान है, वह न नष्ट हो। यह संभव नहीं । आनन्द ! जो यह तथागतने जीवन-संस्कार छोळा, त्यागा, प्रहीण = प्रतिनिःसृष्ट किया, तथागतने बिल्कुल पक्की बात कही है-जल्दी ही • आजसे तीनं मास बाद तथागतका परिनिर्वाण होगा। जीवनके लिए तथागत क्या फिर वमन कियेको निगलेंगे! यह संभव नहीं।

महापागनब्बान सुनं (११८) आयामानन्द ! येन महावनं-कूटागार-साला, तेनुपसङ्क- मिस्सामा, ति। 'एवं भन्ते, ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सासि । (११९) अथ खो भगवा आयस्मता आनन्देन सद्धिं येन महावन कूटागार साला, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा प्रायस्पन्तं आनन्द आमन्तेसि--- 'गच्छ त्वं आनन्द ! यावतिका भिक्खू वेसालि उपनिस्साय विहरन्ति, ते सब्बे उपहान-सालायं सन्निपातेही, ति ॥ एवं भन्ते, ति खो आयस्मा आनन्दा भगवतो पटिस्सुत्वा यावतिका भिक्खू वेसालिं उपनिस्साय विहरन्ति, ते सब्बे उपहान-सालायं सन्निपातेत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं अहासि । एकमन्तं ठितो खे। आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच,- "सन्निपतितो भन्ते ! भिक्खु-संघो, यस्स दानि भन्ते ! भगवा कालं मञ्चसी, ति ॥" (१२०) अथ खो भगवा येनुपट्टान-साला, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा पञ्चत्ते आसने निसीदि । निस्सज्ज खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि- 'तस्मातिह भिक्खवे ! ये ते मया धम्मा अभिमा देसिता । ते वो साधुकं उग्गहेत्वा आसेवितब्बा भावेतब्बा बहुलीकातब्बा । यथयिद ब्रह्मचरियं अद्धनियं अस्स चिर-हितिकं । तदस्स बहुजनहिताय बहुजनसुखाय wearan -- (११८ ) "आश्रो आनन्द ! जहाँ महावन-कूटागारशाला है, वहाँ चलें।" "अच्छा भन्ते।" (११९ ) भगवान् आयुष्मान् आनन्दके साथ जहाँ महावन कूटागार-शाला थो, वहाँ गये जाकर आयुष्मान् आनन्दसे बोले-"आनन्द ! जाओ वैशालीके पास जितने भिक्षु विहार करते हैं, उनको उपस्थानशालामें एकत्रित करो।" । ( १२०) तब भगवान् जहाँ उपस्थानशाला थी वहाँ गये । जाकर बिछे अासनपर बैठे। बैठकर भगवान्ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया- । .NIHIP महापरिनिम्बान सुत्त ७८ लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सान' । कतमे च ते भिक्खवे ! धम्मा मया अभिमा देसिता ? ते वो साधुकं उग्गहेत्वा आसेवितब्बा भावितब्बा बहुलीकातब्बा । यथयिद ब्रह्मचरियं श्रद्धनियं अस्स चिरहितिकं । तदस्स बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानु- कम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं ? सेय्यथिद, [१] चत्तारो सतिपट्टाना, [२] चत्तारो सम्मप्पधाना, [३] चत्तारो इद्धिपादा, [४] पञ्चिन्द्रियानि, [५] पञ्च बलानि, [६] सत्त बोज्झङ्गा, [७] परियो-अट्टङ्गिको-मग्गो। इमे खो भिक्खवे ! धम्मा मया अभिबा देसिता। ते वो साधुकं उग्गहेत्वा आसेवितब्बा भावेतब्बा बहुलीकातन्बा । यथयिद ब्रह्मचरियं श्रद्धनियं अस्स चिरहितिकं । तदस्स बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानन्ति ।। (१२१) अथ खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि,-"हन्द दानि भिक्खवे ! आमन्तयामि वो वय धम्मा सङ्घारा अप्पमादेन सम्पादेथ। न चिरं तथागतस्स परिनिब्बानं भविस्सति । इता तिएणं मासानं अञ्चयेन तथागतो परिनिब्बायिस्सती,ति ।।" क "इसलिए भिक्षुओ ! मैंने जो धर्म उपदेश किया है, तुम अच्छी तौरसे सीख- कर उसका सेवन करना, भावना करना, बढ़ाना; जिसमें कि यह ब्रह्मचर्य अध्वनीय = चिरस्थायी हो; यह (ब्रह्मचर्य ) बहुजन-हितार्थ, बहुजन-सुखार्थ, लोकानुकंपार्थः देव-मनुष्योंके अर्थ-हित-सुखके लिए हो। भिक्षुओ ! मैंने यह कौनसे धर्म, अभि- ज्ञानकर, उपदेश किये हैं, जिन्हें अच्छी तरह सीखकर ०? जैसे कि [१] चार स्मृति-प्रस्थान, [२] चार सम्यक-प्रधान, [३] चार ऋद्धिपाद, [४] पाँच इन्द्रिय, [५] पाँच बल, [६] सात बोध्यंग, [७] आर्य अष्टांगिक-मार्ग ।। ( १२१ ) "हन्त ! भिक्षुओ! तुम्हें कहता हूँ-संस्कार (= कृतवस्तु), नाश होनेवाले (= वयधर्मा) हैं, प्रमादरहित हो ( आदर्शको) सम्पादन करो। अचिर- महापरिनिब्बान सुत्त (१२२) इदमवाच भगवा, इद वत्वान सुगतो अथापरं एतदवोच सत्था- परिपक्को वयो महं, परित्तं मम जीवितं । पहाय वो गमिस्सामि, कतं मे सरणमत्तनो ॥ अप्पमत्ता सती-मन्तो, सुसीला होथ भिक्खयो। मुसमाहित सङ्कप्पा, स-चित्त-मनुरक्खथ ॥ यो इमरिम धम्म-विनये, अप्पमत्तो विहस्सति । पहाय जाति संसारं, दुक्खस्सन्तं करिस्सती,ति ॥ भाणवारं ततियं ॥३॥ (१२३) अथ खो भगवा पुब्बन्ह समयं निवासेत्वा पत्त चीवर- मादाय वेसालि पिण्डाय पाविसि । वेसालियं पिण्डाय चरित्वा पच्छा भत्तं पिण्डपात पटिक्वन्तो नागापलोकित वेसालि अपलोकेवा आयस्मन्त :- कालमें ही तथागतका परिनिर्वाण होगा। आजसे तीन मास बाद तथागत परिनिर्वाण पायेंगे।" (१२२) भगवान्ने यह कहा । सुगत शास्ताने यह कहकर फिर यह भी कहा- "मेरी आयु परिपक्व हो गयी, मेरा जीवन थोळा है। "तुम्हें छोळकर जाऊँगा, मैंने अपने करने लायक (काम) को कर लिया । भिक्षुओ! निरालस, सावधान, सुशील होओ। संकल्पका अच्छी तरह समाधान कर अपने चित्तको रक्षा करो। जो इस धर्म में प्रमादरहित हो उद्योग करेगा; वह आवागमनको छोळ दुःख का अन्त करेगा। (इति) तृतीय भाणवारं ॥३।। , wam- कुसीनारा की ओर- ( १२३) तब भगवान्ने पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र चोवर ले वैशालोमें पिंडचार कर, भोजनोपरान्त नागावलोकन (= हाथीकी तरह सारे शरीरको घमाकर ८० महापरिनिब्बान सुत्तं आनन्द आमन्तेसि,-'इद पच्छिमकं आनन्द ? तथागतस्स वेसालिया दस्सन भविस्सति ।' आयामानन्द ! येन भण्डुगामो, तेनुपसङ्क- मिस्सामा,ति॥ एवं भन्ने,ति खो आयस्मा अानन्दो भगवतो पच्चस्सासि ॥ (१२४) अथ खो भगवा महता भिक्खु-संघेन सद्धिं येन भएडुगामा, तदवसरि । तत्र सुद भगवा भण्डुगामे विहरति । तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि,-'चतुम्नं भिक्खवे ! धम्मानं अननुबोधा अप्पटिवेधा एवमिद दीघमद्धान सन्धावित संसरित ममश्चेव तुम्हाकश्च । कतमे सं चतुन्न ? (१२५) [१]-अरियस्स भिक्खवे ! सीलस्स अननुबोधा अप्पटि- वेधा एवमिद दीघमद्धान सन्धावित संसरित ममञ्चेव तुम्हाकश्च ।। [२]-अरियस्स भिक्खवे ! समाधिस्स अननुबोधा अप्पटिवेधा एवमिददीघमद्धान सन्धावित संसरित ममश्चेव तुम्हाकञ्च ।। [३]-अरियाय भिक्खवे ! पञ्जाय अननुबोधा अप्पटिवेधा एव- मिद दीघमद्धान सन्धावित संसरित ममञ्चेव तुम्हाकञ्च ।। [४]-अरियाय भिक्खवे ! विमुत्तिया अननुवोधा अप्पटिवेधा एवमिदं दीघमद्धानं सन्धावितं संसरित ममञ्चेव तुम्हाकञ्च ।। देखना ) से वैशालोको देखकर, आयुष्मान् आनन्दसे कहा-'आनन्द ! तथागतका यह अन्तिम वैशाली-दर्शन होगा। आओ आनंद ! जहाँ भएडुगाम है, वहाँ चलें।" "अच्छा भन्ते !"... भराडुगाम- (१२४ ) तब भगवान् महाभिक्षु-संघके साथ जहाँ भंडुग्राम था, वहाँ पहुँचे। वहाँ भगवान् भण्डुग्राममें विहार करते थे। भिक्षुओ! चार धर्मों का अवबोध न होनेसे प्रतिवेध न होनेसे ही इस प्रकार दीर्घकाल तक मेरा और तुम्हारा पैदा होना तथा मरना चलता रहा। कौनसे चार ? ( १२५) [१] भिक्षुओ! आर्यशील का ज्ञान न होनेसे, प्रतिवेध न होनेसे। [२] भिक्षुओ! आर्य समाधिका......। [३] भिक्षुओ! आर्य प्रज्ञाका...। [४] भिक्षुओ। आर्य विमुक्तिका...। । WHUDAIm

महापरिनिब्बान सुत्तं
धम्मा, गोतमेन
(१२६) तमिदं भिक्खवे ! अरियं सीलं अनुबुद्धं पटिविद्धं । अरियो
समाधि अनुबोधो पटिविद्धो। अरिया पवा अनुबुद्धा पटिविद्धा!
अरिया विमुत्ति अनुबुद्धा पटिविद्धा । उच्छिन्ना भव-तण्हा, खीणा भव
नेत्ति, नत्थि दानि पुनब्भवोति । इदमवोच भगवा, इदं वत्वान सुगता;
अथापरं एतदवोच सत्था :
(१२७) सील समाधि पचा च, विमुत्ति च अनुत्तरा।
अनुबुद्धा इमे
यसस्सिना॥
इति बुद्धो अभिञ्चाय, धम्ममक्खासि भिक्खुनं ।
दुक्खस्सन्त करो सत्था, चक्खुमा परिनिबुतो, ति ।।
(१२८) तत्रापि सुदं भगवा भएडुगामे विहरन्तो एतदेव बहुलं
भिक्खूनं धम्मि-कथं करोति । 'इति सील, इति समाधि, इति पञा; सील
परिभावितो समाधि महप्फलो होति महानिसंसो०। पञ्बा परिभावित
चित्तं सम्मदेव पासवे हि विमुञ्चति । सेय्यथिदं, कामासवा भवासवा
अविज्जासवा, ति।
हुआ। उस
bans
(१२६ ) भिक्षुओ! उस आर्य-शीलका ज्ञान हुआ, प्रतिवेध हुआ।
आर्य-समाधिका० । उस आर्य-प्रज्ञाका०। उस आर्य-विमुक्तिका०। भव-तृष्णा
नष्ट हो गई। भव-नेता जाता रहा। अब पुनर्जन्म नहीं होगा। भगवानने यह
कहा;
और यह कहकर आगे भगवान्ने यह कहा-
(१२७) यशस्त्री गौतमने शील, समाधि, प्रज्ञा तथा सर्वश्रेष्ठ विमुक्तिका
प्रतिवेध प्राप्त किया।
बुद्धने इसे जानकर भिक्षुओंको धर्मका उपदेश किया। दुक्खका अन्त
करनेवाले शास्ता, चक्षुमान् शान्त हो गये ।
( १२८ ) वहाँ भंडुग्राममें विहार करते भी भगवान् ।

महापरिनिब्बान सुत्तं -- (१२९) अथ खो भगवा भएडुगामे यथाभिरन्त विहरित्वा अायस्मन्त' आनन्दं आमन्तेसि,-'प्रायामानन्द ! येन हस्थिगामो, येन अम्ब- गामा, येन जम्बुगामो, येन भोगनगरे, तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति । 'एवं भन्ते', ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सोसि। अथ खो भगवा महता भिक्खु-संघेन सद्धिं येन भोगनगरं, तदवसरि । (१३०) तत्र सुदं भगवा भोगनगरे विहरति सानन्दरे-चेतिये। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि-'चत्तारो मे भिक्खवे ! महापदेसे देसिस्सामि । तं सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ, भासिस्सामी, ति। 'एवं भन्ते' ति खो ते भिक्खू भगवतो पञ्चस्सोसुं । (१३१) भगवा एतदवोच- [१] इध भिक्खवे ! भिक्खु एवं वदेव्य-'संमुखा मे तं श्रावुसो! भगवतो सुतं संमुखा पटिग्गहितं; अयं धम्मो, अयं विनयो, इदं सत्यु सासनन्ति' ; तस्स भिक्खवे ! भिक्खुनो भासितं नेव अभिनन्दितब्ब, (१२९) ० जहाँ अम्बगाम (= श्राघ्रग्राम ) 0 1 0 जहाँ जम्बूग्राम (- जम्बू- ग्राम ) 01 0 जहाँ भोगनगर। भोगनगर- (७) महाप्रदेश ( कसौटी) (१३० ) वहाँ भोगनगरमें भगवान् सानन्दर-चैत्यमें विहार करते थे। वहाँ भगवान्ने भिक्षुओंको आमंत्रित किया-"भिक्षुओ ! चार महाप्रदेश तुम्हें उपदेश करता हूँ, उन्हें सुनो, अच्छी तरह मनमें करो, भाषण करता हूँ।" “अच्छा भन्ते !" कह उन भिक्षुओंने भगवान्को उत्तर दिया। ( १३१ ) भगवान्ने यह कहा-[१] "भिक्षुओ! यदि (कोई) भिक्षु ऐसा कहे---आवुसो ! मैंने इसे भगवान्के मुखसे सुना, मुखसे ग्रहण किया है, यह धर्म है, यह विनय है, यह शास्ताका उपदेश है, तो भिक्षुओ! उस दिन भिक्षुके भाषणका न अभिनन्दन करना, न निन्दा करना। अभिनन्दन न कर, निन्दा न कर, उन पद-व्यंजनोंको अच्छी तरह सीखकर, सूत्रसे तुलना करना, विनयमें देखना ।

महापरिनिव्वान सुत्त नष्पटिकोसितब्बं । अनभिनन्दित्वा अप्पटिक्कोसित्वा तानि पद ब्यञ्जनानि साधुकं उग्गहेत्वा सुत्ते ओसारेतब्बानि, विनये सन्दस्सेतब्बानि । तानि चे सुत्ते ओसरियमानानि विनये सन्दस्सियमानानि, न चेव सुत्ते ओसरन्ति, न च विनये सन्दिस्सन्ति; निहमेत्थ गन्तब्ब, “श्रद्धा इदं न चेव तस्स भगवतो वचनं, इमस्स च भिक्खुनो दुग्गहितन्ति ।" इति हेतं भिक्खवे ! छड्डेय्याथ । तानि चे सुत्ते ओसारियमानानि, विनये सन्दस्सियमानानि, सुत्ते चेव प्रोसरन्ति, विनये च सन्दिस्सन्ति; निहमेत्य गन्तब्बं । "श्रद्धा इदं तस्स भगवतो वचनं, इमस्स च भिक्खुनो सुग्गहितन्ति" । इदं भिक्खवे! पठम महापदेसं धारय्याथ । [२]-इध पन भिक्खवे ! भिक्खु एवं वदेय्य--'अाकस्मि नाम आवासे संघो विहरति सथेरो सपामोक्खो । तस्स मे संघस्स संमुखा सुतं, संमुखा पटिग्गहितं, अयं धम्मो, अयं विनयो, इदं सत्थु सासनन्ति । तस्स भिक्खवे ! भिक्खुनो भासितं नेव अभिनन्दितब्ब, नष्पटिकोसितब्बं । अनभिनन्दित्वा, अप्पटिकोसित्वा, तानि पदव्यञ्जनानि साधुकं उग्गहेत्वा सुत्ते ओसारेतब्बानि, विनये सन्दस्सेतब्बानि तानि चेव सुत्ते ओसारिय- मानानि, विनये सन्दस्सियमानानि, न चेव सुत्ते ओसरन्ति; न च विनये सन्दिस्सन्ति; निहमेत्थ गन्तब्बं । “श्रद्धा इदं न चेव तस्स भगवतो . यदि वह सूत्रसे तुलना करनेपर, विनयमें देखनेपर, न सूत्रमें उतरते हैं; न विनयमें दिखाई देते हैं; तो विश्वास करना कि अवश्य वह भगवान्का वचन नहीं है, इस भिक्षुका ही दुगृहीत है। ऐसा ( होनेपर ) भिक्षुओ ! उसको छोळ देना। यदि वह सूत्रसे तुलना करनेपर, विनयमें देखनेपर, सूत्रमें भी उतरता है, विनयमें भी दिखाई देता है, तो विश्वास करना-अवश्य यह भगवान्का वचन है, इस भिक्षुका यह सुगृहीत है भिक्षुओ ! इसे प्रथम महाप्रदेश धारण करना । "[२] और फिर भिक्षुओ! यदि (कोई ) भिक्षु ऐसा कहे-श्रावुसा ! अमुक आवास में स्थविर-युक्त प्रमुख-युक्त ( भिक्षु )-संघ विहार करता है। मैंने उस ( ( महापरिनिब्बान सुत्तं वचनं, तस्स च संघस्स दुग्गहितन्ति ।" इति हेतं भिक्खवे ! छड्डेच्याथ । तानि चे सुत्ते ओसारियमानानि, विनये सन्दस्सियमानानि, सुत्ते चेव प्रोसरन्ति, विनये च सन्दिस्सन्ति निहमेत्थ गन्तब्ब, “प्रद्धा इदं तस्स भगवतो वचनं, तस्स च संघस्स सुग्गहितन्ति" । इदं भिक्खवे ! दुतियं महापदेसं धारेय्याथ। [३]-इध पन भिक्खवे ! भिक्खु एवं वदेय्य -'अमुकस्मि नाम आवासे सम्पहुला थेरा-भिक्खू विहरन्ति बहुस्सुता आगतागमा धम्मधरा विनयधरा मातिकाघरा । तेस मे थेरानं संमुखा सुत, संमुखा पटिग्ग- हित । अयं धम्मा, अयं विनया, इद सत्थु सासनन्ति' । तस्स भिक्खवे ! भिक्खुना भासित नेव अभिनन्दितब्बं० । न च विनये सन्दिस्सन्ति । निट्टमेत्थ गन्तब्ब, "अद्धा इदन चेव तस्स भगवतो वचनं, तेसश्च थेरान दुग्गहितन्ति ।" इति हेत भिक्खवे ! छड्डय्याथ । तानि चे सुत्ते ओसा- रियमानानि । विनये चे सन्दिस्सन्ति; निहमेत्य गन्तब्ब, "श्रद्धा इद तस्स भगवतो वचन, तेसञ्च थेरान सुग्गहिन्ति ।" इद भिक्खवे ! ततियं महापदेसं धारेय्याथ ।। [४]-इध पन भिक्खवे ! भिक्खु एवं वदेय्य-'अमुकस्मि नाम आवासे एको थेरा-भिक्खु विहरति बहुस्सुतो आगतागमा धम्मधरो संघके मुखसे सुना, मुखसे ग्रहण किया है- यह धर्म है, यह विनय है, यह शास्ताका शासन है। । तो विश्वास करना, कि अवश्य उन भगवान्का वचन है, इसे संघने सुगृहीत किया। भिक्षुओ! यह दूसरा महाप्रदेश धारण करना । "[३] • भिक्षु ऐसा कहे-'श्रावुसा! अमुक आवासमें बहुतसे बहुश्रुत, आगत-आगम-( == आगमज्ञ ), धर्म-धर, विनय-धर, मात्रिका-धर, स्थविर भिक्षु विहार करते हैं। यह मैंने उन स्थविरों के मुखसे सुना, मुखसे ग्रहण किया। यह धर्म है। 0101 "[४] भिक्षुश्रो ! (यदि) भिक्षु ऐसा कहे-अमुक आवासमें एक बहुश्रुत ० महापरिनिब्बान सुत्त विनयधरो मातिकाघरो तस्स मे थेरस्स संमुखा सुतं, संमुखा पटिग्गहितं अयं धम्मो, अयं विनयो, इदं सत्थु-सासनन्ति ।' तस्स भिक्खवे ! भिक्खुना भासितं नेव अभिनन्दितब्ब, नप्पटिकोसितब्बं । अनभिन- न्दित्वा अप्पटिक्कोसित्वा, तानि पद-व्यञ्जनानि साधुकं उग्गहेत्वा सुत्ते ओसारेतब्बानि विनये सन्दस्सेतब्बानि । तानि चे सुत्ते ओसारियमानानि, विनये सन्दस्सियमानानि, न चेव सुत्ते ओसरन्ति, न च विनये सन्दिस्स- न्ति निहमेत्थ गन्तब्ब, “प्रद्धा इदन चेव तस्स भगवतो वचनं, तस्स च थेरस्स दुग्गहितन्ति" । इति हेत भिक्खवे ! छड्डेय्याथ । तानि चे सुत्ते ओसारियमानानि विनये सन्दस्सियसानानि, सुत्त चेव ओसरन्ति विनये च सन्दिस्सन्ति; निहमेत्थ गन्तब्ब, "श्रद्धा इद तस्स भगवतो वचन, तस्स च थेरस्स सुग्गहितन्ति" । इद भिक्खवे ! चतुत्थं महा- पदेसं धारेय्याथ । इमे खा भिक्खवे ! चत्तारो महापदेसे धारेव्याथा,ति ॥ (१३२) तत्र पि सुदं भगवा भोगनगरे विहरन्तो सानन्दरे-चेतिये एतदेव बहुलं भिक्खूनं धम्मि-कथं करोति, 'इति सील, इति समाधि, इति पञ्चा; सील परिभावितो समाधि महप्फलो होति महानिसंसो। समाधि परिभाविता पञ्बा महप्फला होति महानिसंसा। पञ्चा परिभावित चित्त सम्मदेव आसवेहि विमुञ्चति;-सेय्यथिद,- कामासवा, भवासवा, अविज्जासवा, ति ॥ . स्थविर भिक्षु विहार करता है। यह मैंने उस स्थविरके मुखसे सुना है, मुखसे ग्रहण किया है। यह धर्म है, यह विनय ।। भिक्षुओ! इसे चतुर्थं महाप्रदेश धारण करना । भिक्षुओ! इन चार महाप्रदेशोंको धारण करना।" (१३२ ) वहाँ भोगनगरमें विहार करते समय भी भगवान् भिक्षुओंको बहुत करके यही धर्म-कथा कहते थे ।

८६ महापरिनिब्बान सुत (१३३) अथ खो भगवा भोगनगरे यथाभिरन्तं विहरित्वा आयस्मन्तं अानन्दं आमन्तेसि-'आयामानन्द ! येन पावा, तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति'। 'एवं भन्ते । तिखो आयस्मा आनन्दो भगवतो पच्चस्सोसि । अथ खो भगवा महता भिक्खु-संघेन सद्धिं येन पावा, तदवसरि । तत्र सुदं भगवा पावायं विहरति चुन्दस्स कम्मार-पुत्तस्स अम्बवने । (१३४) अस्सोसि खो चुन्दो कम्मार-पुत्तो—'भगवा किर पावं अनुप्पत्तो पावायं विहरति मय्हं अम्बवने, ति । अथ खो चुन्दो कम्मार- पुत्तो येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेवा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नं खो चुन्दं कम्मार-पुत्तं भगवा धम्मिया-कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि संपहंसेसि । अथ खो चुन्दो कम्मार-पुत्तो भगवता धम्मिया-कथाय सन्दस्सितो समादपितो समुत्तेजितो संपहंसितो भगवन्तं एतदवोच,-'अधिवासेतु मे भन्ते ! भगवा स्वातनाय भत्तं सद्धि भिक्खु-संघेना, ति' । अधिवासेसि भगवा तुएिहभावेन । SAUR । । पावा- चुन्दका अन्तिम भोजन (१३३ ) ० तब भगवान् भिक्षु-संघके साथ जहाँ पावा थी, वहाँ गये। वहाँ पावामें भगवान् चुन्द कार-(= सोनार) -पुत्रके आम्रवन में विहार करते थे। (१३४ ) चुन्द कारपुत्रने सुना-भगवान् पावामें आये हैं; पावामें मेरे आम्रवनमें विहार करते हैं। तब चुन्द कार-पुत्र जहाँ भगवान् थे, वहाँ...जाकर भगवान्को अभिवादनकर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे चुन्द कार-पुत्रका भग- वान्ने धार्मिक-कथासे . समुत्तेजित ० किया। तब चुन्द ० ने भगवान् की धार्मिक- कथासे ० समुत्तेजित ० हो भगवान्से यह कहा- "भन्ते ! भिक्षु-संघके साथ भगवान् मेरा कलका भोजन स्वीकार करें।" भगवान्ने मौनसे स्वीकार किया। - महापरिनिब्बान सुत्तं (१३५) अथ खो चुन्दो कम्मार-पुत्तो भगवतो अधिवासनं विदित्वा उहायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कमि । अथ खो चुन्दो कम्मार-पुत्तो तस्सा रत्तिया अच्चयेन सके निवेसने पणीतं खादनीयं भोजनीयं पटियादापेत्वा बहुतञ्च सुकर-मदवं । भगवतो कालं आरो- चापेसि-'कालो भन्ते ! निहितं भवन्ति । (१३६) अथ खो भगवा पुब्बन्ह समयं निवासेत्वा पत्त चीवरमादाय सद्धि भिक्खु-संघेन येन चुन्दस्स कम्मार-पुत्तस्स निवेसनं, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा पञ्चत्ते आसने निसीदि। निस्सज्ज खो भगवा चुन्दं कम्मार-पुत्त आमन्तेसि–'यन्ते चुन्द ! सुकर-महवं पटियत्त, तेन मं परिविस; यं पनवं खादनीयं भोजनीयं पटियत्तं, तेन भिक्खु-संघ परिविसा, ति। (१३७) 'एवं भन्ते' ! ति खो चुन्दो कम्मार-पुत्तो भगवतो पटिस्सुत्वा यं अहोसि सुकर-मद्दवं पटियत्तं, तेन भगवन्तं परिविसि । यं पनवं खादनीय भोजनीय पटियत्तं, तेन भिक्खु-संघ परिविसि । ( १३५ ) तब चुन्द कार-पुत्र भगवान्की स्वीकृतिको जान, आसनसे उठ, भगवानको अभिवादन और प्रदक्षिणा करके चला गया। तब चुन्द कर्मार-पुत्रने उस रातके बीतने पर उत्तम खाद्य-भोज्य ( और ) बहुत सा शूकर-मार्दव (= सूकर-महव)* तैयार करवा, भगवानको कालकी सूचना दी-"भगवान् ! भोजनका समय हो गया है।" (१६६ ) तब भगवान पूर्वाह्न समय पहिन कर पात्र चीवर ले भिक्षु-संघके साथ जहाँ चुन्द कार-पुत्रका घर था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठे हुए भगवान्ने चुन्द कर्मार-पुत्रको आमन्त्रित किया,-"चुन्द ! जो शूकर-मादव तय्यार किया है, उसे हमें परोस, और जो खाद्य-भोज्य तैयार है, भिक्षु-संघको देना । (१३७ ) "अच्छा भन्ते !".........! * सुधरका मांस या शूकरकन्द का पाक। (अट्ठकथा) महापरिनिब्बान सुत्तं (१३८) अथ खो भगवा चुन्दं कम्मार-पुत्त आमन्तेसि'यन्ते चुन्द ! सुकर-महवं अवसिहं, त सोभे निखणाहि । नाहं त चुन्द ! पस्सामि स-देवके लोके स-मारके स-ब्रह्मके स-स्समण ब्राह्मणिया पजाय स-देव मनुस्साय, यस्स त परिभुत्त सम्मा परिणामं गच्छेय्य अत्र तथागतस्सा, ति। (१३९) 'एवं भन्ते', ति खो चुन्दो कम्मार-पुत्तो भगवतो पटिस्सुत्वा यं अहोसि सुकर-महवं अवसिहं, त सोब्भे निखणित्वा येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्त अभिवादेत्वा एकमन्त निसीदि । एकमन्त निसिन्नं खो चुन्दं कम्मार-पुत्तं भगवा धम्मिया-कथाय सन्दस्सेत्वा समादपेत्वा समुत्त जेत्वा संपहंसेत्वा उडायासना पक्कमि । (१४०) अथ खो भगवतो चुन्दस्स कम्मार-पुत्तस्स भत्तं भुत्ताविस्स खरो श्राबाधो उप्पज्जि । लोहित पक्खन्दिका पवाल्हा वेदना वत्तन्ति मारणन्तिका । ता सुदं भगवा सतो सम्पजानो अधिवासेसि अविहञ्जमानो। , । ( १३८ ) तब भगवान्ने चुन्द कर्मार-पुत्रको आमन्त्रित किया,-चुन्द ! जो शूकर-मार्दव बच गया है, उसको गड्ढा खोदकर गाड़ दे। चुन्द ! देव, मार, ब्रह्मा सहित लोकमें और श्रमण-ब्राह्मण, और देवता मनुष्य सहित इस प्रजामें तथा- गतको छोड़ कर और कोई नहीं दिखाई देता, जो इस ( भोजन ) को पचा सकेगा। (१३९) "अच्छा भन्ते । !"....। एक ओर बैठे चुन्द कार-पुत्रको भग- वान् धार्मिक-कथासे . समुत्तेजित ० कर आसन से उठकर चल दिये। (१४० ) तब चुन्द कर्मार-पुत्रके भात (= भोजन) को खाकर भगवान्को खून गिरनेकी, कळी बीमारी उत्पन्न हुई, मरणान्तक सख्त पीळा होने लगी। उसे भगवान्ने स्मृति-संप्रजन्ययुक्त हो, बिना दुःखित हुए, सहन किया। तब भगवान्ने आयुष्मान आनन्दको संबोधित किया- महापरिनिब्बान सुत्तं ८९ मे सुतं । आबाधं (१४१) अथ खो भगवा आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि-आया- मानन्द ! येन कुसिनारा, तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति'। 'एवं भन्ते ति खो प्रायस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सोसि । (१४२) चुन्दस्स भत्त भुञ्जित्वा, कम्मरस्साति संफुसि धीरो, पबाल्हं मारणन्तिकं ॥ भुत्तस्स च सूकर-महवेन, ब्याधि पवाल्हो उदपादि सत्थुनो। विरेचमानो भगवा अवोच, गच्छामहं कुसिनारं नगरन्ति । (१४३) अथ खो भगवा मग्गा रोक्कम येन अझ रुक्खमूलं, तेनुप- सङ्कमि। उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि-'इच मे त्वं आनन्द ! चतुगुणं संघाटि पञपेहि । किलन्तोस्मि आनन्द ! निसीदिस्सामी, ति' । (१४४) 'एवं भन्ते' ति खो आयस्मा अानन्दो भगवतो पटिस्सुत्वा चतुगुणं संघार्टि पञपेसि । निसीदि भगवा पञ्जते आसने। निसज्ज खो भगवा आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि-'इव मे त्वं अानन्द ! पानियं श्राहर, पिपासितोस्मि आनन्द ! पिविस्सामी, ति' । (१४१) ० "आओ आनन्द ! जहाँ कुसीनारा है, वहाँ चलें।" "अच्छा भन्ते ।" (१४२ ) मैंने सुना है-चुन्द कारके भातको भोजनकर, धीरको मरणान्तक भारी रोग हो गया। शूकर-मार्दवके खानेपर शास्ताको भारी रोग उत्पन्न हुआ। विरेचनोंके होते समय ही भगवान ने कहा-चलो, कुसीनारा चलें ॥ (१४३ ) तब भगवान मार्गसे हटकर एक वृक्षके नीचे गये। जाकर आयु- मान् आनन्दसे कहा- "आनन्द ! मेरे लिये चौपेती संघाटी बिछा दो, मैं थक गया हूँ, बैठूगा। (१४४) "अच्छा भन्ते !"...आयुष्मान् आनन्दने चौपेती संघाटी बिछा दी, भगवान् बिछे आसनपर बैठे। बैठकर भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दसे कहा- "आनन्द ! मेरे लिये पानी लाओ। प्यासा हूँ, आनंद ! पानी पिऊँगा।" M ९० महापरिनिब्बान सुत्तं (१४५) एवं वुत्ते आयस्मा आनन्दो भगवन्त एतदवोच-'इदानि भन्ते ! पञ्चमत्तानि सकट सतानि अतिकन्तानि त चकच्छिन्नं उदकं परित्त लुलित प्राविलं सन्दति । अयं भन्ते ! ककुधा नदी अविदूरे अच्छोदका सातोदका सीतोदका सेतोदका सुप्पतित्था रम्मणीया। एत्थ भगवा पानियश्च पिविस्सति, गत्तानि च सीत करिस्सती, ति। (१४६) दुतियम्पि खो भगवा आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि-'इल मे त्वं आनन्द ! पानियं प्राहर, पिपासितोस्मि आनन्द ! पिविस्सामी, ति'। दुतियम्पि खो आयस्मा आनन्दो भगवन्त एतदवोच-'इदानि भन्ते ! पञ्चमत्तानि सकट सतानि अतिक्कन्तानि त चकच्छिन्नं उदकं परित्त लुलित आविलं सन्दति । अयं भन्ते ! ककुधा नदी अविदूरे अच्छोदका सातोदका सीतोदका सेतोदका सुष्पतित्था रम्मणीया । एत्थ भगवा पानियञ्च पिविस्सति, गत्तानि च सीत करिस्सती, ति' । (१४७) ततियम्पि खो भगवा आयस्मन्त आनन्द आमन्तेसि-'इस मे त्वं आनन्द ! पानियं आहर, पिपासितोस्मि आनन्द ! पिविस्सामी, ति। (१४५ ) ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनंदने भगवान् से यह कहा- "भन्ते ! अभी अभी पाँच सौ गालियाँ निकलो हैं। चक्कोंसे मथा हिंडा पानी मैला होकर बह रहा है। भन्ते ! यह सुदर जलवाली, शीतल जलवाली, सफेद, सुप्रतिष्ठित रमणीय ककुत्था* नदी करीबमें है। वहाँ (चलकर ) भगवान् पानी पीयेंगे, और शरीरको ठंडा करेंगे। (१४६) दूसरी बार भी भगवान्ने । ( १४७) तीसरी बार भी भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दसे कहा-"आनन्द ! मेरे लिये पानी लाओ।" * बर्मी पिटक में 'ककुधा' पाठ है।

महापरिनिब्बान सुंत (१४८) 'एवं भन्ते' ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पटिस्सुत्वा पत्तं गहेत्वा येन सा नदिका, तेनुपसङ्कमि । अथ खो सा नदिका चक्कच्छिन्ना परित्ता लुलिता प्राविला सन्दमाना आयस्मन्ते आनन्दे उपसङ्कमन्ते अच्छा विप्पसन्ना अनाविला सन्दित्य । अथ खो आय. स्मतो आनन्दस्स एतदहोसि-'अच्छरियं वत भो ! अब्भूतं वत भो ! तथागतस्स महिद्धिकता महानुभावता। अयं हि सा नदिका चक्क- च्छिन्ना परित्ता लुलिता प्राविला सन्दमाना मयि उपसङ्कमन्ते अच्छा विपसना अनाविला सन्दती, ति ॥ पत्तेन पानियं श्रादाय येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं एतदवोच-'अच्छरियं भन्ते ! अब्भुतं भन्ते ! तथागतस्स महिद्धिकता महानुभावता। इदानि सा भन्ते ! नदिका चक्कच्छिन्ना परित्ता लुलिता आविला सन्दमाना मयि उपसङ्कमन्ते अच्छा विपसन्ना अनाविला सन्दित्थ । पिवतु भगवा ! पानियं, पिवतु सुगतो! पानियन्ति' । अथ खा भगवा पानिय अपायि ।। (१४९) तेन खो पन समयेन पुक्कुसो मल्ल पुत्तो आलारस्स (१४८ ) "अच्छा भन्ते !" कह भगवानको उत्तर दे पात्र लेकर जहाँ वह नदी थी, वहाँ गये। तब वह चक्कोंसे मथे हिंडे मैले थोड़े पानीके साथ बहनेवाली नदी, आयुष्मान् आनन्दके वहाँ पहुँचने पर स्वच्छ निर्मल (हा) बहने लगी। तब आयुष्मान् आनन्दको ऐसा हुआ-'आश्चर्य है ! तथागतकी महा-ऋद्धि, महानुभा- वताको अद्भुत है। यह नदिका (=छोटी नदी) चक्कोंसे मथे हिंळे मैले थोळे पानीके साथ बह रही थी; सो मेरे आने पर स्वच्छ निर्मल बह रही है।' और पात्रमें पानी भरकर भगवान्के पास ले गये। ले जाकर भगवानसे यह बोले-"आश्चर्य है भन्ते ! अद्भुत है भन्ते ! ० निर्मल बह रही है। भन्ते ! भगवान् पानी पियें, सुगत पानी पियें।" तब भगवान्ने पानी पिया। (१४९ ) उस समय अालार कालामका शिष्य पुक्कुस मल्ल-पुत्र कुसी- नारा और पावाके बीच, रास्तेमें जा रहा था। पुक्कुस मल्ल-पुत्रने भगवानको ।

९३ महापरिनिब्बान सुंतं Home कालामस्स सावको कुसिनाराय पावं अद्धान मग्गप्पटिपन्नो होति । अहस खा पुक्कुसा मल्लपुत्तो भगवन्तं अबतरस्मि रुक्खमूले निसिन्नं दिस्वा येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एक- मन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो पुक्कुसो मल्ल पुत्तो भगवन्तं एतदवोच-'अच्छरियं भन्ते ! अब्भुतं भन्ते ! सन्तेन वत भन्ते ! पब्बजिता विहारेन विहरन्ति ।' भूतपुब्बं भन्ते ! श्रालारो कालामो अद्धान मग्गप्पटिपन्नो मग्गा प्रोकम्म अविदूरे अञ्चतरस्मि रुक्खमूले दिवा विहारं निसीदि । अथ खो भन्ते ! पञ्चमत्तानि सकट सतानि आलारं कालामं निस्साय निस्साय अतिकर्मिसु । अथ खो भन्ते ! अञ्जतरो पुरिसा तस्स सकट सतस्स पिहितो पिहितो आगच्छन्तो येन आलारोकालामो, तेनुपसङ्कमि। उपसङ्कमित्वापालारं कालामं एतदवोच 'अपि भन्ते ! पञ्चमत्तानि सकट सतानि अतिक्कन्तानि अहसाति ? (१५०) न खो अहं प्राचुसो ! अहसन्ति ॥ किं पन भन्ते ! सई अस्सोसी, ति ? न खो अहं आवुसो ! सदं अस्सोसिन्ति ॥ एक बृक्षके नीचे बैठे देखा। देखकर जहाँ भगवान् थे, वहाँ...जाकर भगवान्को अभिवादनकर एक ओर बैठ गया। पुक्कुस० ने भगवान्से कहा- "आश्चर्य भन्ते ! अद्भुत भन्ते ! प्रब्रजित (लोग) शांततर विहारसे विहरते हैं। भन्ते ! पूर्वकालमें ( एक बार) आलार कालाम रास्ता चलते, मार्गसे हटकर पासमें दिनके विहारके लिये एक बृक्षके नीचे बैठे। उस समय पाँच सौ गालियाँ आलार कालामके पीछेसे गई। तब उस गाळियोंके साथ (= कारवाँ) के पीछे पीछे आते एक आदमीने आलार कालाम के पास...जाकर पूछा-'क्या भन्ते ! पाँच सौ गाळियाँ ( इधरसे ) निकलते देखा है ? ( १५०) "आवुस ! मैंने नहीं देखा।" "क्या भन्ते ! आवाज सुनी ?" "नहीं आवुस ! मैंने आवाज नहीं सुनी।" URRES -

महापरिनिब्बान सुत्तं
किं पन भन्ते ! सुत्तो अहोसी, ति ?
न खो अहं आवुसो ! सुत्तो अहोसिन्ति ।
किं पन भन्ते ! सञी अहोसी, ति ?
एवमाबुसे। 1, ति ।
(१५१) सो त्वं भन्ते ! सची समानो जागरो पञ्चमत्तानि सकट
सतानि निस्साय निस्साय अतिकन्तानि नेव अहस, न पन सई
अस्सासि । अपि सुते भन्ते ! संघाटि रजेन श्रोकिएणा, ति ?
'एवमाधुसो ! ति॥
(१५२) अथ खो भन्ते ! तस्स पुरिसस्स एतदहोसि-'अच्छरियं
वत भो ! अब्भुतं वत भो! सन्तेन वत भो! पब्बजिता विहारेन
विहरन्ति । यत्र हि नाम सञी समानो जागरो पञ्चमत्तानि सकट
सतानि निस्साय निस्साय अतिक्कन्तानि नेव दक्खति, न पन सई
सोस्सती, ति ॥ आलारे कालामे उलारं पसादं पवेदेवा पक्कमी, ति ॥
!
"क्या भन्ते ! सो गये थे ?"
"नहीं आवुस ! सोया नहीं था।"
"क्या भन्ते ! होशमें थे ?"
"हाँ, आवुस !"
(१५१ ) "तो भन्ते ! आपने होशमें जागते हुए भी पीछेसे निकली पाँच सौ
गाळियोंको न देखा, न ( उनका ) आवाजको सुना ? किन्तु ( यह जो) आपकी
संघाटी पर गर्द पळी है ?"
"हाँ ! अावुस ।"
(१५२ ) "तब भन्ते ! उस पुरुषको हुआ-आश्चर्य है ! अद्भुत है !!
अहो प्रबजित लोग शान्त विहारसे विहरते हैं, जो कि ( इन्होंने ) होश में, जागते
हुये भी पाँच सौ गाळियोंको न देखा, न ( उनकी) आवाजको सुना ।'- कह आलार
कालामके प्रति बळी श्रद्धा प्रकट कर चला गया।"

महापरिनिब्बान सुतं (१५३) तं कि मञ्चसि पुक्कुस ! कतमं नु खो दुक्करतरं वा दुरभिसम्भवतरं वा ? यो वा सञ्बी समाना जागरो पञ्चमत्तानि सकट सतानि निस्साय निस्साय अतिक्कन्तानि नेव पस्सेय्य, न पन सह सुणेय्य । यो वा सनी समानो जागरो देवे-वस्सन्ते देवे-गलगलायन्ते विज्जुलतासु निच्छरन्तीसु असनिया फलन्तिया नेव पस्सेय्य, न पन सदं सुणेय्या, ति॥ (१५४) किन्हि भन्ते ! करिस्सन्ति पञ्च वा सकट सतानि, छ वा सकट सतानि, सत्त वा सकट सतानि, अह वा सकट सतानि, नव वा सकट सतानि, सकट सहस्सं वा सकट सतसहस्सं वा । अथ खो एतदेव दुक्करतरश्चेव दुरभिसम्भवतरञ्च यो सञ्बी समानो जागरो देवे-वस्सन्ते देवे-गलगलायन्ते विज्जुलतासु निच्छरन्तीसु असनिया फलन्तिया नेव पस्सेय्य, न पन सह सुणेय्या, ति ॥ (१५५) एकमिदाह पुक्कुस ! समयं श्रातुमायं विहरामि भुसागारे । तेन खो पन समयेन देवे वस्सन्ते देवे गलगलायन्ते ॥ है (१५३ ) "तो क्या मानते हा पुक्कुस ! कौन दुष्कर है, दुःसम्भव है-जो कि होशमें जागते हुये पाँच सौ गाळियोंका न देखना, न आवाज सुनना; अथवा होशमें जागते हुये पानीके बरसते बादलके गळगळाते, बिजलीके निकलते और अशनि (= बिजली) के गिरनेके समय भी न ( चमक ) देखे न आवाज सुने ?" (१५४ ) "क्या है भन्ते ! पाँच सौ गाळियाँ, छै सौ०, सात सौ०, आठ सौ०, नौ सौ०, दस सौ०, दस हजार०, या सौ हजार गाळियाँ; यही दुष्कर दुःसम्भव जो कि होश में जागते हुये पानीके बरसते० बिजलीके गिरनेके समय भी न (चमक) देखे, न आवाज सुने।" (१५५) "पुक्कुस ! एक समय मैं आतुमाके भुसागारमें विहार करता था। उस समय देवके बरसते० बिजलीके गिरनेसे दो भाई किसान और चार बैल मरे। तब आतुमासे आदमियों की भीळ निकल कर वहाँ पहुँची, जहाँपर कि वह दो भाई किसान और चार बैल मरे थे। उस समय पुक्कुस ! मैं भुसागारसे महापरिनिब्बान सुत्तं ९५ विज्जुलतासु निच्छरन्तीसु असनिया फलन्तिया अविदूरे भुसमगारस्स द्वेकस्सका भातरो हता चत्तारो च बलिबद्धा । अथ खो पुक्कुस आतुमाय महाजनकायो निक्खमित्वा येन ते द्वेकस्सका भातरो हता चत्तारो च बलिबद्धा, तेनुपसङ्कमि । तेन खो पनाहं पुक्कुस ! समयेन भुसागारा निक्खमित्वा भुसागार द्वारे अब्भोकासे चङ्कमामि । अथ खो पुक्कुस ! अञ्चतरो पुरिसो तम्हा महाजनकाया येनाहं, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा मं अभिवादेत्वा एकमन्तं अहासि । एकमन्तं ठितं खो अहं पुक्कुस ! तं पुरिसं एतदवोचं-'किंनु खो एसो आवुसो ! महाजनकायो सन्नि- पतितो, ति ?' 'इदानि भन्ते ! देवे-वस्सन्ते देवे-गलगलायन्ते विजुल- तासु निच्छरन्तीसु असनिया फलन्तिया द्वेकस्सका भातरो हता चत्तारो च बलिबद्धा । एत्थे सो महाजनकायो सन्निपतितो, ति ॥ (१५६) त्वं पन भन्ते ! क्व अहोसी, ति ? इधेव खो अहं आवुसो ! अहोसिन्ति । किं पन भन्ते ! अहसा, ति ? न खो अहं भावुसो ! अहसन्ति । किं पन भन्ते ! सई अस्सोसी, ति ? न खो अहं आधुसो ! सई अस्सोसिन्ति । निकलकर द्वारपर टहल रहा था। तब पुक्कुस ! उस भीळसे निकल कर एक आदमी मेरे पास...आ...खळा होकर बोला-'भन्ते ! इस समय देवके बरसते. बिजलीके गिरनेसे दो भाई किसान और चार बैल मर गये। इसीलिये यह भीळ इकट्ठी हुई है। आप भन्ते ! ( उस समय ) कहाँ थे ?' (१५६) 'आवुस ! यहीं था।' 'क्या भन्ते ! आपने देखा ?' 'नहीं, आवुस ! नहीं देखा। 'क्या भन्ते ! शब्द सुना ? 'नहीं आवुस ! शब्द (भी) नहीं सुना।'

९६
महापरिनिब्बान सुत्तं
किं पन भन्ते ! सुत्तो अहोसी, ति ?
न खो अहं आधुसो ! सुत्तो अहोसिन्ति ॥
किं पन भन्ते सञ्बी अहोसी, ति ?
'एवमावुसो ! ति॥
(१५७) सो त्वं भन्ते ! सबी समानो जागरो देवे-वस्सन्ते देवे-
गलगलायन्ते विजुलतासु निच्छरन्तीसु असनिया फलन्तिया नेव अहस,
न पन सदं अस्सोसी, ति ? ॥
(१५८) 'एवमावुसो ! ति॥
(१५९) अथ खो पुक्कुस ! तस्स पुरिसस्स एतदहोसि-'अच्छरियं
वत भो ! अब्भुतं वत भो ! सन्तेन वत भो! पबजिता विहारेन
विहरन्ति। यत्र हि नाम सञ्बी समानो जागरो देवे-वस्सन्ते देवे-
गलगलायन्ते विजुलतासु निच्छरन्तीसु असनिया फलन्तिया नेव
दक्खति, न पन सह सोस्सती, ति । मयि उलारं पसादं पवेदेवा मं
अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पकमी, ति ॥
.
'क्या भन्ते ! सो गये थे ?
'नहीं श्रावुस ! साया नहीं था।'
'क्या भन्ते ! होशमें थे ?
'हाँ, भावुस!'
(१५७) 'तो भन्ते ! आपने होशमें जागते हुये भी देवके बरसते० बिजलीके
गिरनेको न देखा, न शब्दको सुना ?
(१५८) 'हाँ, आवुस !
(१५९) "तब पुक्कुस ! उस आदमीको हुआ-आश्चर्य है ! अद्भुत है !!
अहो प्रब्रजित लोग शान्त विहारसे विहरते हैं। न आवाज सुने ।-कह मेरे प्रति
बळी श्रद्धा प्रकटकर चला गया।"

महापरिनिब्बान सुत्तं (१६०) एवं वुत्ते पुक्कुसो मल्ल पुत्तो भगवन्तं एतदवोच-'एसाह भन्ते ! यो मे आलारे कालामे पसादो, तं महावाते वा ओफुनामि सिङ्घ- सोताय वा नदिया पवाहेमि । अभिकन्तं भन्ते ! अभिवन्तं भन्ते !! सेय्यथा पि भन्ते !!! निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेथ्य, मुल्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य, चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्ति; एवमेव भगवता अनेक परियायेन धम्मो पकासितो। एसाह भन्ते ! भगवन्तं सरणं गच्छामि, धम्मच, भिक्खुसंघञ्च । उपासकं मं भगवा ! धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गतन्ति ॥ (१६१) अथ खो पुक्कुसो मल्ल पुत्तो अञ्चतरं पुरिसं आमन्तेसि- 'इड मे त्वं भणे ! सिङ्गी वगणं युगमहं धारणियं आहरा, ति ॥ (१६२) एवं भन्ते ! ति खो सो पुरिसो पुक्कुसस्स मल्ल पुत्तस्स पटिस्सुत्वा तं सिङ्गी वएणं युगमहं धारणियं आहरि । अथ खो पुक्कुसो (१६०) ऐसा कहनेपर पुक्कुस मल्लपुत्रने भगवानसे यह कहा- भन्ते ! यह मैं, जो मेरा श्रालार कालाममें श्रद्धा (=प्रसाद) थी, उसे हवा उळा देता हूँ, या शीघ्र धारवाली नदीमें बहा देता हूँ। आश्चर्य भन्ते ! अद्भुत भन्ते ! जैसे औंधेको सीधा कर दे, ढुकेको खोल दे, भूलेको रास्ता बतला दे, अंधेरेमें चिराग रख दे, कि आँखवाले रूपको देखें, ऐसे ही भन्ते ! भगवान्ने अनेक प्रकारसे धर्मको प्रकाशित किया। यह मैं भन्ते ! भगवान्की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु संघकी भी। आजसे मुझे भगवान् अंजलिबद्ध शरणागत उपासक धारण करें।" ( १६१ ) तब पुक्कुस मल्लपुत्रने ( अपने ) एक आदमीसे कहा-"श्रा रे! मेरे इंगुरके वर्णवाले चमकते दुशालेको ले आ।" ( १६२) "अच्छा, भन्ते !" कह उस आदमीने पुक्कुस मल्लपुत्रको कह, • दुशालेको ला दिया। तब पुक्कुस मल्लपुत्रने ० दुशाला भगवान्को अर्पित किया--"भन्ते ! कृपाकरके इस मेरे ० दुशालेको स्वीकार करें।"

९ ८ महापरिनिब्बान सुन्तं मल्ल पुत्तो तं सिङ्गी वएणं युगमहं धारणियं भगवतो उपनामेसि-'इदं भन्ते ! सिङ्गी वण्णं युगमहं धारणियं तं मे भगवा पटिगगहातु अनुकम्पं उपादाया, ति॥ (१६३) 'तेन हि पुकुस ! एकेन में अच्छादेहि, एकेन आनन्दन्ति । (१६४) 'एवं भन्ते' ति खो पुक्कुसो मल्लपुत्तो भगवतो पटिस्सुत्वा एकेन भगवन्तं अच्छादेसि, एकेन आयस्मन्तं अानन्दं । अथ खो भगवा पुक्कुसं मल्लपुत्तं धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि संपहंसेसि । अथ खो सो पुक्कुसो मल्ल-पुत्तो भगवता धम्मिया कथाय सन्दस्सितो समादपितो समुत्तेजितो संपहंसितो उद्यायासना भगवन्तं अभिवादेवा पदक्खिणं कत्वा पक्कमि ॥ (१६५) अथ खो आयस्मा आनन्दो अचिर पक्कन्ते पुक्कुसे मल्ल-पुत्ते तं सिङ्गी वएणं युगमह धारणियं भगवतो कायं उपनामेसि । तं भगवतो कायं उपनामितं हतचितंविय खायति । अथ खो आयस्मा श्रानन्दो भगवन्तं एतदवोच-'अच्छरियं भन्ते ! अब्भुतं भन्ते ! याव परिसुद्धो भन्ते ! तथागतस्स छवि वएणो परियोदातो। इदं भन्ते ! सिङ्गी (१६३ ) "तो पुक्कुस ! एक मुझे ओढ़ा दे, एक आनंदको।" (१६४) "अच्छा, भन्ते !"--कह, पुक्कुस मल्लपुत्रने भगवानको उत्तर दे, एक ० शाल भगवान्को श्रोढ़ा दिया, एक • आयुष्मान् आनंदको। तब भगवान्ने पुक्कुस मल्लपुत्रको धार्मिक कथा द्वारा संदर्शित = समुत्तेजित संप्रहर्षित किया। भगवान्की धार्मिक कथा द्वारा ० संप्रहर्षित हो पुक्कुस मल्लपुत्र आसनसे उठ भगवान्को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर चला गया। (१६५) तब पुक्कुस मल्ल-पुत्रके जानेके थोळीही देर बाद आयुष्मान आनंदने उस ( अपने) ० शालको भगवानके शरीरपर ढाँक दिया। भगवान्के शरीरपर किरणसी फूटी जान पळती थी। तब आयुष्मान् आनंदने भगवान्से यह कहा-"आश्चर्य भन्ते ! अद्भुत भन्ते ! कितना परिशुद्ध = पर्यवदात तथागत !

महापरिनिब्बान सुत्तं ९९ वएणं युगमह धारणियं भगवतो कायं उपनामितं हतचितविय खायती, ति॥ (१६६) एवमेतं आनन्द ! एवमेतं आनन्द ! द्वीसु कालेसु अतिविय तथागतस्स परिसुद्धो कायो होति छवि वएणो परियोदातो। कतमेसु द्वीसु ? [१] यञ्च आनन्द ! रत्तिं तथागतो अनुत्तरं सम्मा-सम्बोधि अभिसम्बुज्झति । [२] यश्च रतिं अनुपादिसेसाय निब्बान-धातुया परिनिब्बायति । इमेसु खो' आनन्द ! द्वीसु कालेसु अतिविय तथागतस्स कायो परिसुद्धो होति छवि वएणो परियोदातो। अल्न खो पनानन्द ! रत्तिया पच्छिमे यामे कुसिनारायं उपवत्तने मल्लानं सालवने अन्तरेन यमक सालानं तथागतस्स परिनिब्बानं भविस्सती, ति । आयामानन्द ! येन ककुधा नदी, तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति ॥ (१६७) 'एवं भन्ते' ति खो प्रायस्मा आनन्दो भगवतो पच्चस्सोसि ॥ के शरीरका वर्ण है !! भन्ते ! यह • दुशाला भगवान्के शरीरपर किरणसा जान पळता है।" (१६६) "ऐसा ही है आनन्द ! ऐसा ही है आनन्द ! दो समयोंमें आनन्द ! तथागतके शरीरका वर्ण अत्यन्त परिशुद्ध = पर्यवदात जान पळता है। किन दो समयोंमें ? [१] जिस समय तथागतने अनुपम सम्यक्-संबोधि ( = परमज्ञान ) का साक्षात्कार किया, और [२] जिस रात तथागत उपादि ( = आवागमनके कारण रहित निर्वाणको प्राप्त होते हैं। आनन्द ! इन दो समयोंमें । आनन्द ! आज रातके पिछले पहर कुसीनाराके उपवर्तन (नामक) मल्लोके शालवनमें जोळे शाल- वृक्षोंके बीच तथागतका परिनिर्वाण होगा। आओ, आनन्द ! जहाँ ककुत्था नदी है, वहाँ चलें।" (१६७ ) "अच्छा, भन्ते !" कह आयुष्मान् आनंदने भगवानको उत्तर दिया।

महापरिनिब्बान सुत्तं सिङ्गी वएणं युगम, पुक्कुसो अभिहारयि । तेन अच्छादितो सत्था, हेम वएणो असोमथा, ति ॥ (१६८) अथ खो भगवा महता भिक्खु-संघेन सद्धिं येन ककुधा नदी, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा ककुषं नदि अझोगाहेत्वा न्हत्वा च पिवित्वा च पक्षुत्तरित्वा येन अम्बवनं, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं चुन्दकं आमन्तेसि-'इच मे त्वं चन्दक ! चतुगुणं संघाटिं पञ्अपेहि। किलन्तोस्मि चुन्दक ! निप्पिज्जिस्सामी, ति' ॥ (१६९) एवं भन्ते' ति खो आयस्मा चुन्दको भगवतो पटिस्सुत्वा चतुगुणं संघार्टि पञ्बपेसि । अथ खो भगवा दक्षिणेन पस्सेन सीह-सेय्यं कप्पेसि पादेन पादं अच्चाधाय सतो सम्पजानो उद्यान सज्वं मनसि करित्वा । आयस्मा पन चुन्दको तत्थेव भगवतो पुरतो निसीदि ॥ (१७०) गन्त्वान बुद्धो नदियं ककुषं, अच्छोदकं सातोदकं विपसन्नं । इंगुर वर्णवाले चमकते दुशालेको पुक्कुसने अर्पण किया। उनसे आच्छादित बुद्ध सोनेके वर्ण जैसे शोभा देते थे। ( १६८ ) तब महाभिक्षु-संघके साथ भगवान् जहाँ ककुत्था नदी थी, वहाँ गये। जाकर ककुत्था नदीको अवगाहन कर, स्नानकर, पानकर, उतरकर, जहाँ अम्बवन (आम्रवन) था, वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् चुन्दकसे बोले- "चुन्दक ! मेरे लिये चौपेती संघाटी बिछा दे। चुन्दक थक गया हूँ, लेदूंगा।" (१६९) "अच्छा भन्ते ।"......तब भगवान् पैर पर पैर रख, स्मृति सं. प्रजन्यके साथ, उन्थान-संज्ञा मनमें करके, दाहिनी करवट सिंह-शय्यासे लेटे। आयु- ष्मान् चुन्दक वहीं भगवान के सामने बैठे। (१७०) बुद्ध उत्तम, सुन्दर स्वच्छ जलवाली ककुत्था नदी पर जा, महापरिनिब्बान सुत्तं १०१ ओगाहि सत्था अकिलन्तरूपो, तथागतो अप्पटिमो च लोके ।। न्हत्वा च पिवित्वा चुन्दकेन सत्था, पुरक्खतो भिक्खु-गणस्स मज्झे । वत्ता पवत्ता भगवा इध धम्मे, उपागमि अम्बवनं महेसि । आमन्तयि चुन्दकं नाम भिक्खु, चतुग्गुणं सन्थर मे निपज्जं । सो मोदितो भावितत्तेन चुन्दो, चतुग्गुणं सन्थरि खिप्पमेव । निप्पज्जि सत्था अकिलन्त रूपो, चुन्दो पि तत्थ संमुखे निसीदि ।। (१७१) अथ खो भगवा आयस्मन्त आनन्दं आमन्तेसि-'यो खो पनानन्द ! चुन्दस्स कम्मार पुत्तस्स कोचि विप्पटिसारं उप्पादेय्य । - तस्स ते श्रावुसो चुन्द ! अलामा तस्स ते दुल्लद्धं यस्स ते तथागतो पच्छिमं पिण्डपातं परिभुञ्जित्वा परिनिब्बुतो, ति' । चुन्दस्स आनन्द ! लोकमें अद्वितीय, शास्ताने अ-क्लान्त हो स्नान किया। स्नानकर, पानकर चुन्दकको आगे कर भिक्षु-गणके बीचमें (चलते ) धर्मके वक्ता प्रवक्ता महर्षि भगवान् आम्रवनमें पहुंचे। चुन्दक भिक्षुसे कहा-चौपेती संघाटी बिछाओ, लेदूंगा। आत्मसंयमीसे प्रेरित हो तुरन्त चौपेती ( संघाटी) को बिछा दिया। अक्लान्त हो शास्ता लेट गये, चुन्दक भी वहाँ सामने बैठ गये ॥१८॥ तब भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दसे कहा- (१७१) "आनन्द ! शायद कोई चुन्द कारपुत्रको चिंतित करे ( = विप्प- टिसारं उपदहेय) (और कहे )-'आवुस चुन्द ! अलाभ है तुझे, तूने दुलोभ कमाया, जो कि तथागत तेरे पिंडपातको भोजनकर परिनिर्वाणको प्राप्त हुये। आनंद ! चुन्द कर्मार-पुत्रकी इस चिंताका दूर करना ( और कहना)-'श्रावुस !

१०२ महापरिनिब्बान सुत्तं कम्मार पुत्तस्स एवं विप्पटिसारो पटिविनेतब्बो। "तस्स ते आधुसो चुन्द ! लाभा तस्स तेसु लद्धं यस्स ते तथागतो पच्छिमं पिण्डपातं परिभुञ्जित्वा परिनिब्बुतो।" (१७२) संमुखा मे तं आवुसो चुन्द ! भगवतो सुतं । संमुखा पटिग्गहितं--"वे मे पिण्डपाता समा सम फला सम विपाका । अतिविय अम्बेहि पिण्डपाते हि महफ्फलतरा च महानिसंसतरा च । कतमे द्वे ? [.१] यश्च पिण्डपातं परिभुञ्जित्वा तथागतो अनुत्तरं सम्मा-सम्बोधि अभिसम्बुज्झति। [२] यञ्च पिण्डपातं परिभुञ्जित्वा तथागतो अनु- पादिसेसाय निब्बान-धातुया परिनिब्बायति । इमे द्वे पिण्डपाता समा सम-फला सम-विपाका। अतिविय अञ्चे हि पिण्डपाते हि महप्फलतरा च महानिसंसतरा च। प्रायु संवत्तनिकं आयस्मता चुन्देन कम्मार पुत्तेन कम्मं उपचितं । वण्ण संवत्तनिक प्रायस्मता चुन्देन कम्मार पुत्तेन कम्म उपचितं। सुख संवत्तनिक आयस्मता चुन्देन कम्मार पुत्तेन कम्मं उपचित । यस-संवत्तनिक आयस्मता चुन्देन कम्मार पुत्तेन कम्मं उपचित । सग्ग-संवत्तनिक आयस्मता चुन्देन कम्मार पुत्तेन कम्मं उपचित । अधिपतेय्य-संवत्तनिक आयस्मता लाभ है तुझे, तूने मुलाभ कमाया, जो कि तथागत तेरे पिंडपातको भोजनकर परिनिर्वाणको प्राप्त हुये। (१७२ ) आवुस चुन्द ! मैंने यह भगवान्के मुखसे सुना, मुखसे ग्रहण किया-'यह दो पिंड-पात समान फलवाले = समान विपाकवाले हैं, दूसरे पिंडपातों से बहुत ही महाफल-प्रद = महानृशंसतर हैं । कौनसे दो ? [१] जिस पिंडपात (=भिक्षा) को भोजनकर तथागत अनुत्तर सम्यक्-संबोधि (= बुद्धत्व) को प्राप्त हुये, [२] और जिस पिंडपातको भोजनकर तथागत अन्-उपादिशेष निर्वाणधातु (=दुःख- कारण-रहित निर्वाण) को प्राप्त हुये । आनन्द ! यह दो पिंडपात ० । चुन्द कारपुत्रने आयु प्राप्त करानेवाले कर्मको संचित किया;० वर्ण०० सुख०० यश०, ० स्वर्ग०,० महापरिनिब्बान सुतं १०३ चुन्देन कम्मार पुत्तेन कम्मं उपचितन्ति ॥ चुन्दस्स आनन्द ! कम्मार पुत्तस्स एवं विष्पटिसारो पटिविनेतब्बो, ति ॥ (१७३) अथ खो भगवा एतमत्थं विदित्वा तायं वेलायं इमं उदानं उदानेसि- (१७४) ददतो पुनं पवड्ढति, संयमतो वेरं न चियति । कुसलो पजहाति पापकं, राग दोस मोहक्खया स निबुतो, ति ।। भाणवारं चतुत्थं ॥४॥ (१७५) अथ खो भगवा आयस्मन्तं श्रानन्दं आमन्तेसि- 'आयामानन्द ! येन हिरञ्जवतिया नदिया पारिमं तीरं येन कुसिनारा उपवत्तनं मल्लानं सालवनं तेनुपसङ्कमिस्सामा, ति॥ (१७६) 'एवं भन्ते ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सोसि । । Himala आधिपत्य प्राप्त करानेवाले कर्मको संचित किया । श्रानन्द ! चुन्द कारपुत्रकी चिन्ताको इस प्रकार दूर करना ।" (१७३ ) तब भगवान्ने इसी अर्थको जानकर उसी समय यह उदान कहा- (१७४) "(दान) देनेसे पुण्य बढ़ता है, संयमसे वैर नहीं संचित होता। सज्जन बुराईको छोळता है, (और) राग-द्वेष-मोहके क्षयसे वह निर्वाण प्राप्त करता है ॥ १७ ॥ (इति) चतुर्थ भाणवार ॥४॥ जीवनकी अन्तिम घड़ियाँ ( १७५) तब भगवान्ने आयुष्मान् आनंदको आमंत्रित किया-"पाश्रो आनन्द ! जहाँ हिरण्यवती नदीका परला तीर है, जहाँ कुसीनाराके मल्लोंका शालवन उपवत्तन है, वहाँ चलें।" ( १७६) "अच्छा भन्ते!"

१०४ महापरिनिब्बान सुत्त (१७७) अथ खो भगवा महता भिक्खु-संघेन सद्धि येन हिरञ्जवतिया नदिया पारिमं तीरं, येन कुसिनारा उपवत्तनं मल्लानं सालवनं, तेनुप- सङ्कमि । उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि-'इच मे त्वं आनन्द ! अन्तरेन यमक सालानं उत्तर सीसकं मञ्चक पञपेहि। किलन्तोस्मि आनन्द ! निपिज्जिस्सामी, ति॥ (१७८) 'एवं भन्ते' ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पटिस्सुत्वा अन्तरेन यमक सालानं उत्तर सीसकं मञ्चकं पञ्चपेसि । अथ खो भगवा दक्खिणेन पस्सेन सीह-सेय्यं कप्पेसि पादेन पादं अचाधाय सतोसम्पजानो। (१७९) तेन खो पन समयेन यमक साला सब्ब फालि फुल्ला होन्ति अकाल पुप्फेहि । ते तथागतस्स सरीरं श्रोकिरन्ति अझोकिरन्ति अभिप्पकिरन्ति तथागतस्स पूजाय । दिब्बानि पि मन्धारव पुष्पानि अन्तलिक्खा पपतन्ति । तानि तथागतस्स सरीर ओकिरन्ति अजमो- किरन्ति अभिप्पकिरन्ति तथागतस्स पूजाय । दिब्बानि पि चन्दन चुराणानि अन्तलिक्खा पपतन्ति, तानि तथागतस्स सरीरोकिरन्ति अज्झोकिरन्ति अभिप्पकिरन्ति तथागतस्स पूजाय । दिब्बानि पि तूरियानि अन्तलिक्खे वज्जन्ति तथागतस्स पूजाय। दिब्बानि पि संगीतानि अन्तलिक्खे वत्तन्ति तथागतस्स पूजाय ॥ (१७७ ) तब भगवान् महाभिक्षु-संघके साथ जहाँ हिरण्यवती ० मल्लोंका शालवन था, वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् आनन्दसे बोले-"आनन्द ! यमक (=जुळवें ) शालों के बीचमें उत्तरकी ओर सिरहानाकर चारपाई ( = मंचक) बिछा दे। थका हूँ, आनन्द ! लेदूंगा।" (१७८ )"अच्छा भन्ते !" ० । तब भगवान् ० दाहिनी करवट सिंह-शय्यासे लेटे। (१७९) उस समय अकालहीमें वह जोळे शाल खूब फूले हुये थे। तथागतकी पूजाके लिये वे (फूल ) तथागतके शरीरपर बिखरते थे। दिव्य मन्दार-पुष्प आकाश से गिरते थे, वह तथागतके शरीर पर बिखरते थे। दिव्य चंदन चूर्ण ० । तथागतकी पूजाके लिये आकाशमें दिव्य वाद्य बजते थे। दिव्य संगीत । ।

महापरिनिम्बान सुत्तं ! (१८०) अथ खो भगवा आयस्मन्तं अानन्दं श्रामन्तेसि--सब्ब फालि फुल्ला खो आनन्द ! यमक साला अकाल पुप्फेहि । ते तथागतस्स सरीर ओकिरन्ति अझोकिरन्ति अभिप्पकिरन्ति तथागतस्स पूजाय । दिब्बानि पि मन्धारव पुष्फानि अन्तलिक्खा पपतन्ति । तानि तथा- गतस्स सरीर ओकिरन्ति अझोकिरन्ति अभिप्पकिरन्ति तथागतस्स पूजाय । दिब्बानि पि चन्दन चुराणानि अन्तलिक्खा पपतन्ति तानि तथागतस्स सरीरोकिरन्ति अज्झोकिरन्ति अभिप्पकिरन्ति तथागतस्स पूजाय । दिब्बानि पि तूरियानि अन्तलिक्खे वजन्ति तथागतस्स पूजाय दिब्बानि पि संगीतानि अन्तलिक्खे वत्तन्ति तथागतस्स पूजाय। “न खो आनन्द ! एत्तावता तथागतो सक्कतो वा होति गरुकतो वा मानितो वा पूजितो वा अपचितो वा । यो खो आनन्द ! भिक्खु वा भिक्खुनी वा उपासको वा उपासिका वा धम्मानुषम्मपटिपन्नो विहरति सामिचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तथागत सकरोति गरु करोति मानेति पूजेति अपचियति परमाय पूजाय । तस्मातिहानन्द ! धम्मानुधम्मप्पटिपन्ना विहरिस्साम सामिचिप्पटिपना अनुधम्मचारिनो, ति। एवं हि वो आनन्द ! सिक्खितब्बन्ति ॥" (१८१) तेन खो पन समयेन श्रायस्मा उपवाणो भगवतो पुरतो ठितो होति भगवन्तं बीजमानो। अथ खो भगवा आयस्मन्तं उपवाणं अपसारेति । ( १८०) तब भगवान्ने आयुष्मान् आनंदको संबोधित किया-'आनंद ! इस समय अकालहीमें यह जो शाल खूब फूले हुये हैं। । किन्तु, आनन्द ! इससे तथागत सत्कृत गुरुकृत, मानित-पूजित नहीं होते। आनन्द ! जो कि भिक्षु या भिक्षुणी, उपासक या उपासिका धर्मके मार्गपर आरूढ़ हो विहरता है, यथार्थ मार्गपर आरूढ़ हो धर्मानुसार आचरण करनेवाला होता है; उससे तथागत ० पूजित होते हैं। ऐसा आनंद ! तुम्हें सीखना चाहिये।" (१८१) उस समय आयुष्मान् उपवान भगवानपर पंखा झलते भगवान्के सामने खळे थे। तब भगवान्ने आयुष्मान उपवानको हटा दिया- ! 1 महापरिनिब्बान सुत्तं memumm (१८२) "अपेहि भिक्खु ! मा मे पुरतो अहासी, ति ॥" (१८३) अथ खो आयस्मतो आनन्दस्स एतदहोसि-"अयं खो प्रायस्मा उपवाणो दीघरत्तं भगवतो उपहाको सन्तिकावचरो समीपचारी। अथ च पन भगवा पच्छिमे काले प्रायस्मन्तं उपवाणं अपसारेति- 'अपेहि भिक्खु ! मा मे पुरतो अहासी, ति' । कोनु खो हेतु को पञ्चयो ? यं भगवा आयस्मन्तं उपवाणं अपसारेति-'अपेहि भिक्खु ! मा मे पुरतो अहासी, ति॥ (१८४) अथ खो आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच- अयं भन्ते ! आयस्मा उपवाणो दीघरत्तं भगवतो उपहाको सन्ति- कावचरो समीप-चारी। अथ च पन भगवा पच्छिमे काले आयस्मन्तं उपवाणं अपसारेति-'अपेहि भिक्खु ! मा मे पुरतो अहासी, ति' । कोनु खो भन्ते ! हेतु को पच्चयो ? यं भगवा आयस्मन्तं उपवाणं अपसारेति-'अपेहि भिक्खु ! मा मे पुरतो अट्ठासी, ति' । (१८५) येभुय्येन आनन्द ! दससु लोकधातूसु देवता सनिपतिता तथागतं दस्सनाय । यावता आनन्द ! कुसिनारा उपवत्तनं मल्लानं ! ! ! ( १८२) "हट जाओ, भिक्षु ! मत मेरे सामने खळे होओ।" (१८३ ) तब आयुष्मान् आनन्दको यह हुआ-'यह आयुष्मान् उपवान चिरकालतक भगवान्के समीप चारी=सन्तिकावचर उपस्थाक रहे हैं। किन्तु, अन्तिम समयमें भगवान्ने उन्हें हटा दिया-हट जाओ ! भिक्षु । क्या हेतु प्रत्यय है, जो कि भगवान्ने आयुष्मान् उपवानको हटा दिया-०?' (१८४) तब आयुष्मान आनन्दने भगवानसे यह कहा- "भन्ते ! यह आयुष्मान् उपवान चिरकाल तक भगवानके ० उपस्थापक रहे हैं। . क्या हेतु ० है ?" ( १८५) “आनंद ! बहुतसे दसों लोक-धातुओंके देवता तथागतके दर्शनके लिये एकत्रित हुये हैं। आनंद ! जितना ( यह ) कुसीनाराका उपवर्तन मल्लोंका शालवन है, महापरिनिब्बान सुत्तं १०७ सालवनं समन्ततो द्वादस योजनानि नत्थि सो पदेसो वालग्गकोटि नितुदनमत्तोपि महेसक्खा हि देवता हि अप्फुटो। देवता आनन्द ! उज्झायन्ति दूरा च वतम्हा भागता तथागतं दस्सनाय-कदाचि रतिया पच्छिमे यामे करहचि तथागता लोके उपज्जन्ति अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा। अज्झच तथागतस्स परिनिब्बानं भविस्सति ।' 'अयं च महेसक्खो भिक्खु भगवतो पुरतो ठितो ओवारेन्तो! न मयं लभाम पच्छिमे काले तथागतं दस्सनाया, ति ॥ (१८६) कथं भूता पन भन्ते ! भगवा देवता मनसि करोन्ती, ति ? (१८७) सन्तानन्द ! देवता आकासे पथवी सबिनियो। केसे पकिरिय कन्दन्ति । बाहा पग्गयह कन्दन्ति । छिन्नपातं पपतन्ति । आवडन्ति विवन्ति । "अति खिप्पं भगवा परिनिब्बायिस्सति !, अति खिप्पं सुगतो! परिनिम्बायिस्सति, अति खिप्पं चक्खुमा ! लोके अन्तर- धायिस्सती, ति॥" सन्तानन्द ! देवता पथवियं पथवी-सबिनियो। केसे पकिरिय कन्दन्ति । बाहा पग्गयह कन्दन्ति । छिन्न पातं पपतन्ति । । उसकी चारों ओर बारह योजन तक बालके नोक गळाने भरके लिये भी स्थान नहीं है, जहाँ कि महेशाख्य देवता न हों। आनन्द ! देवता परेशान हो रहे हैं हम तथागतके दर्शनार्थ दूरसे आये हैं। तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध कभी ही कभी लोकमें उत्पन्न होते हैं। आज ही रातके अन्तिम पहरमें तथागतका परिनिर्वाण होगा। और यह महेशाख्य ( = प्रतापी) भिन्तु ढॉकते हुये भगवान के सामने खळा है। अन्तिम समयमें हमें तथागतका दर्शन नहीं मिल रहा है । ( १८६) "भन्ते ! भगवान् देवताओंके बारेमें कैसे देख रहे हैं ?" (१८७) "आनंद ! देवता आकाशको पृथिवी ख्यालकर बाल खोले रो रहे हैं। हाथ पकळकर चिल्ला रहे हैं। कटे ( वृक्ष) की भाँति भूमिपर गिर रहे हैं। (यह कहते ) लोट पोट रहे हैं-'बहुत जल्दी भगवान निर्वाणको प्राप्त हो रहे हैं। बहुत शीघ्र सुगत निर्माणको प्राप्त हो रहे हैं। बहुत शीघ्र चक्षुमान ( = बुद्ध ) लोकसे महापरिनिब्बान सुतं आवन्ति विवन्ति । "अति खिप्पं भगवा ! परिनिब्बायिस्सति, अति खिप्पं सुगतो ! परिनिब्बायिस्सति, अति खिप्पं चक्खुमा ! लोके अन्तरघायिस्सति ॥ या पन देवता वीतरागा, ता सता सम्पजाना अधिवासेन्ति "अनिच्चा सङ्खारा तं कुतेत्थ लम्भाति"। (१८८) 'पुब्बे भन्ते ! दिसासु वस्सं वुत्था भिक्खू आगच्छन्ति तथागतं दस्सनाय, ते मयं लभाम मनोभावनिये व भिक्खू दस्सनाय लभाम पयिरूपासनाय । भगवतो पन मयं भन्ते ! अञ्चयेन न लभिस्साम मनो- भावनिये भिक्खू दस्सनाय न लभिस्साम पयिरूपासनाया, ति' । (१८९) चत्तारिमानि आनन्द ! सद्धस्स कुलपुत्तस्स दस्सनियानि संवेजनियानि ठानानि। कतमानि चत्तारि ? [१] 'इध तथागतो जातो, ति आनन्द ! सद्धस्स कुलपुत्तस्स दस्सनियं संवेजनियं ठानं ॥ [२] 'इध तथागतो अनुत्तरं सम्मा-सम्बोधि अभिसम्बुद्धो, ति' आनन्द ! सद्धस्स कुलपुत्तस्स दस्सनियं संवेजनियं ठानं ॥ अन्तर्धान हो रहे हैं। और जो देवता होश-चेतवाले हैं, वह होश-चेत स्मृति संप्रजन्योंके साथ सह रहे हैं-'संस्कृत ( - कृत वस्तुयें ) अनित्य हैं। सी कहाँ मिल सकता है। (१८८) "भन्ते ! पहिले दिशाओं में वर्षावास कर भिक्षु भगवान्के दर्शनार्थ उन मनोभावनीय भिक्षुओंका दर्शन, सत्संग हमें मिलता था। किन्तु भन्ते ! भगवान के बाद हमें मनोभावनीय भिक्षुओंका दर्शन, सत्संग नहीं मिलेगा। (१८९) "आनन्द ! श्रद्धालु कुल-पुत्रके लिये यह चार स्थान दर्शनीय, संवेजनीय ( =वैराग्यप्रद ) हैं। कौनसे चार ? [१] 'यहाँ तथागत उत्पन्न हुये ( =लुम्बिनी)' यह स्थान श्रद्धालु ! [२] 'यहाँ तथागतने अनुत्तर सम्यक्- आते थे। ( महापरिनिब्बान सुन [३] 'इध तथागतेन अनुत्तरं धम्मचकं पवत्तितन्ति' आनन्द ! सद्धस्स कुलपुत्तस्स दस्सनियं संवेजनियं ठानं ॥ [४] 'इध तथागतो अनुपादिसेसाय निब्बान-धातुया परिनिब्बुतो, ति' आनन्द ! सद्धस्स कुलपुत्तस्स दस्सनियं संवेजनियं ठानं ॥ इमानि खो आनन्द ! चत्तारि सद्धस्स कुलपुत्तस्स दस्सनियानि संवेजनियानि ठानानि । आगमिस्सन्ति खो आनन्द ! सद्धा भिक्खू भिक्खुनियो उपासका उपासिकायो, 'इध तथागतो जातोति पि । 'इध तथागतो अनुत्तरं सम्मा-सम्बोधि अभिसम्बुद्धोति पि' 'इध तथागतेन अनुत्तरं धम्मचकं पवत्तितन्ति पि। 'इध तथागतो अनुपादिसेसाय निब्बान-धातुया परिनिबुतोति पि॥ 'येहि केचि आनन्द ! चेतिय चारिक आहिण्डन्ता पसन्न चित्ता कालं करिस्सन्ति, सब्बे ते कायस्स भेदा परं मरणा सुगति सग्गं लोकं उपपजिस्सन्ती, ति॥ (१९०) कथं मयं भन्ते ! मातुगामे पटिपज्जामा, ति ? अदस्सनं आनन्दा, ति॥ दस्सने भगवा ! सति कर्थ पटिपज्जितब्बन्ति ? । संबोधिको प्राप्त किया' ( बोधगया)। [३] 'यहाँ तथागतने अनुत्तर ( = सर्व श्रेष्ठ ) धर्मचक्रको प्रवर्तन किया' (=सारनाथ)। [४] 'यहाँ तथागत अनुपादि- शेष निर्वाण-धातुको प्राप्त हुये ( =कुसीनारा)। • यह चार स्थान दर्शनीय . । आनन्द ! श्रद्धालु भिक्षु भिक्षुणियाँ उपासक उपासिकायें (भविष्यमें यहाँ) आवेंगी-'यहाँ तथागत उत्पन्न हुये,' . 'यहाँ तथागत • निर्वाण ० को प्राप्त हुये...।" (स्त्रियोंके प्रति भिक्षुओंका बर्ताव ) (१९०) "भन्ते ! त्रियों के साथ हम कैसा बर्ताव करेंगे ?" "अ-दर्शन ( =न देखना ), आनन्द !" "दर्शन होनेपर भगवान् कैसे बर्ताव करेंगे ?" !

११० महापरिनिब्बान सुर्त । अनालापो आनन्दा ! ति॥ बालपन्तेन पन भन्ते ! कथं पटिपज्जितब्बन्ति ? सति आनन्द ! उपहापेतब्बाति ॥ (१९१) कथं मयं भन्ते ! तथागतस्स सरीरे पटिपज्जामाति ? अन्यावटा तुम्हे आनन्द ! होथ तथागतस्स सरीर पूजाय । इङ्घ तुम्हे आनन्द ! सारत्थे अनुयुज्जथ सारत्थे अप्पमत्ता आतापिनो पहितत्ता विहरथ । सन्तानन्द ! खत्तिय पण्डिता पि ब्राह्मण पण्डिता पि गहपति पण्डिता पि तथागते अभिष्पसन्ना, ते तथागतस्स सरीर-पूजं करिस्सन्ती, ति ॥ (१९२) कथं पन भन्ते ! तथागतस्स सरीरे पटिपज्जितब्बन्ति ? यथा खो आनन्द ! रज्जो चकवत्तिस्स सरीरे पटिपज्जन्ति, एवं तथा तथागतस्स सरीरे पटिपब्जितब्बन्ति ॥ (१९३) कथं पन भन्ते ! रब्बो चक्कवत्तिस्स सरीरे पटिपज्जन्ती, ति ? . आलाप ( = बात ) न करना, आनन्द !" "बात करनेवालेको कैसा करना चाहिये ?" "स्मृति ( = होश ) को सँभाले रखना चाहिये ?" चक्रवर्तीकी दाहक्रिया ( १९१ ) "भन्ते ! तथागतके शरीरको हम कैसे करेंगे?" "आनन्द ! तथागतकी शरीर-पूजासे तुम बेपर्वाह रहो। तुम आनन्द सच्चे पदार्थ ( = सदर्थ के लिये प्रयत्न करना, सत्-अर्थके लिये उद्योग करना। सत्-अर्थमें अप्रमादी, उद्योगी, आत्मसंयमी हो विहरना। हैं, आनन्द ! क्षत्रिय पंडित भी, ब्राह्मण पण्डित भी, गृहपति पंडित भी, तथागतमें अत्यन्त अनुरक्त; वह तथागतकी शरीर-पूजा करेंगे।" ( १९२) "भन्ते ! तथागतके शरीरको कैसे करना चाहिये ?" जैसे आनन्द ! राजा चक्रवर्तीके शरीरके साथ करना होता है, वैसे तथागतके शरीरको करना चाहिये।" (१९३ ) "भन्ते ! राजा चक्रवर्तीके शरीरके साथ कैस किया जाता है ?"

महापरिनिब्बान सुत्तं (१९४) रज्जो आनन्द ! चकवत्तिस्स सरीरं अहतेन वत्थेन वेठेन्ति । अहतेन वत्थेन वेठेत्वा विहतेन कप्पासेन वेठन्ति । विहतेन कप्पासेन वेठेत्वा अहतेन वत्थेन वेठन्ति । एतेनुपायेन पञ्चहि युग सते हि रब्बो चक्कवत्तिस्स सरीरे वेठेत्वा आयसाय तेल-दोणिया पक्खी पेत्वा अबिस्सा आयसाय दोणिया पटिकुज्जित्वा सब्ब गन्धानं चितकं करित्वा रज्यो चक्कपत्तिस्स सरीरं झापेन्ति । चतु महापथे रञो चकवत्तिस्स थूपं करोन्ति । एवं खो आनन्द ! रज्जो चकवत्तिस्स सरीरे पटिपज्जन्ति ॥ यथा खो आनन्द ! रनो चक्कवत्तिस्स सरीरे पटिपज्जन्ति, एवं तथा- गतस्स सरीरे पटिपज्जितब्बं । चतु महापथे तथागतस्स थूपो कातब्बो । तत्य ये मालं वा गन्धं वा चुएणकं वा आरोपेस्सन्ति वा अभिवादेस्सन्ति वा चित्तं वा पसादेस्सन्ति । तेसं तं भविस्सति दीघर हिताय सुखाया, ति || (१९५) चत्तारो मे आनन्द ! थूपारहा । कतमे चत्तारो ? [१] तथागतो अरहं सम्मा-सम्बुद्धो थूपारहो। [२] पञ्चक । । ( १९४) "आनन्द ! राजा चक्रवर्तीके शरीरको नये वस्त्रसे लपेटते हैं; नये वस्त्रसे लपेटकर धुनी रुईसे लपेटते हैं। धुनो रुईसे लपेटकर नये वस्त्रसे लपेटते हैं। इस प्रकार पाँच सौ जोड़े वस्त्रों से लपेटकर तेलकी लोहद्रोणी (=दोन) में रखकर, दूसरी लोह-द्रोणीसे ढाँककर, सभी गंधों ( वाले काष्ठ ) की चिता बनाकर, राजा चक्रवर्तीके शरीरको जलाते हैं; जलाकर बळे चौरस्ते पर राजा चक्रवर्तीका स्तूप बनाते हैं।" "वहाँ आनन्द ! जो माला, गंध या चूर्ण चढ़ायेंगे, या अभिवादन करेंगे, या चित्त प्रसन्न करेंगे, तो वह दीर्घ काल तक उनके हित-सुखके लिये होगा। ( १९५) आनंद ! चार स्तूपाह (=स्तूप बनाने योग्य ) हैं। कौनसे चार ? [१] तथागत सम्यक् संबुद्ध स्तूप बनाने योग्य है। [२] प्रत्येक संबुद्ध ।

११२ महापरिनिब्यान सुत्तं ! सम्बुद्धो थूपारहो। [३] तथागतस्स सावको थूपारहो, [ ४ ] राजा चक्क वत्ति थुपारहो, ति ।। किश्चानन्द ! अत्थवसं पटिच्च तथागतो अरहं सम्मा-सम्बुद्धा थूपारहो ? अयं तस्स भगवतो अरहतो सम्मा-सम्बुद्धस्स थूपोति आनन्द ! बहु जना चित्तं पसादेन्ति, ते तत्थ चित्तं पसादेत्वा कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जन्ति । इदं खो आनन्द ! अत्थ वसं पटिच्च तथागतो अरहं सम्मा-सम्बुद्धो थुपारहो ॥ किश्चानन्द ! अत्थवसं पटिच्च पञ्चेक-सम्बुद्धो थुपारहो ? अयं तस्स भगवतो पञ्चेक-सम्बुद्धस्स थुपोति आनन्द ! बहु जना चित्तं पसादेन्ति, तत्थ चिपसादेवा कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जन्ति । इदं खो आनन्द ! अत्थवसं पटिच्च पञ्चेक-सम्बुद्धो यूपारहो ।। किश्चानन्द ! अत्यवसं पटिच्च तथागतस्स सावको थूपारहो ? अयं तस्स भगवतो अरहतो सम्मा-सम्बुद्धस्स सावकस्स थुपोति आनन्द ! बहु जना चित्तं पसादेन्ति । ते तत्थ चित्तं पसादेत्वा कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जन्ति । इदं खो आनन्द ! अत्थ वसं पटिच्च तथागतस्स सावको थुपारहो ॥ किश्चानन्द ! अत्थवसं पटिच्च राजा चक्कवत्ति थुपारहो ? अयं तस्स धम्मिकस्स धम्मरबो थूपोति आनन्द ! बहु जना चित्तं पसादेन्ति । ते ! ! ! [३] तथागतका श्रावक ( - शिष्य) । [४] चक्रवर्ती राजा आनंद ! स्तूप बनाने योग्य है। सो क्यों आनंद ? तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध स्तुपाई हैं ! यह उन भगवान् । संबुद्धका स्तूप है-(सोचकर ) आनंद ! बहुतसे लोग चित्तको प्रसन्न करेंगे चित्तको प्रसन्न कर मरनेके बाद सुगति स्वर्ग लोकमें उत्पन्न होंगे। इस प्रयोजनसे आनंद ! तथागत ० स्तूपाई हैं। । किस लिये आनंद ! राजा चक्रवर्ती स्तूपाह हैं ? आनन्द !

महापरिनिब्बान सुत्तं तत्य चित्तं पसादेत्वा कायस्त भेदा परं मरणा सुगति सगं लोक उपपज्जन्ति । इदं खो आनन्द ! अत्थवसं पटिच्च राजा चकवत्ति थुपारहो। इमे खो आनन्द ! चत्तारो थुपारहा, ति ॥ (१९६) अथ खो आयस्मा आनन्दो विहारं पविसेत्वा कपिसीस आलम्बेत्वा रोदमानो अहासि । 'अहञ्च वतम्हि सेखो स-करणीयो । सत्थु च मे परिनिब्बानं भविस्सति यो मम अनुकम्पको, ति॥ (१९७) अथ खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि-कहनु खो भिक्खवे ! आनन्दो, ति? (१९८) एसो भन्ते ! आयस्मा आनन्दो विहारं पविसेत्वा कपिसीस आलम्बेत्वा रोदमानो ठितो। 'अहश्च वतम्हि सेखो स-करणीयो । सत्थु च मे परिनिब्बानं भविस्सति यो मम अनुकम्पको, ति ॥' (१९९) अथ खो भगवा अञ्चतरं भिक्खं आमन्तेसि,-'एहि त्वं भिक्खु ! मम वचनेन आनन्दं आमन्तेहि सत्था तं श्रावुसो आनन्द ! आमन्तेती, ति॥ यह धार्मिक धर्मराजका स्तूप है, सोच आनंद ! बहुतसे आदमी चित्तको प्रसन्न करेंगे। आनंद ! यह चार स्तूपाई हैं। आनन्द के गुण ( १९६) तब आयुष्मान् आनन्द विहारमें जाकर कपिसीस ( = खूटी)को पकळकर रोते खळे हुये-"हाय ! मैं शैक्ष्य = सकरणीय हूँ। और जो मेरे अनुकंपक शास्ता हैं, उनका परिनिर्वाण हो रहा है !!" ( १९७) भगवान्ने भिक्षुओंको आमंत्रित किया-"भिक्षुओ! आनन्द कहाँ है ?" (१९८) "यह भन्ते ! आयुष्मान् आनन्द विहार (= कोठरी) में जाकर रोते खळे हैं ।" ( १९९) "श्रा ! भिक्षु ! मेरे वचनसे तू आनन्दको कह-'आवुस आनन्द शास्ता तुम्हें बुला रहे हैं।" "अच्छा, भन्ते !"

११४ महापरिनिब्बान सुत्तं ! एवं भन्ते ! ति खो सो भिक्खु भगवतो पटिस्सुत्वा येनायस्मा आनन्दो, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच 'सत्था तं श्रावुसो आनन्द ! आमन्तेती, ति॥ (२००) एवमावुसो ! ति खो आयस्मा अानन्दो तस्स भिक्खुनो पटिस्सुत्वा येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेवा एकमन्तं निसीदि ॥ (२०१) एकमन्तं निसिखो आयस्मन्तं आनन्दं भगवा एतदवोच- 'अलं आनन्द ! मा सोचि, मा परिदेवि । ननु एवं आनन्द ! मया पटिकच्चेव अक्खातं सब्बेहेव पियेहि मनापेहि नानाभावो विनाभावो अबथाभावो, तं कुतेत्थ आनन्द ! लब्भा। यन्तं जातं भूतं सङ्खतं पलोक धम्मं तं वत तथागतस्सा पि सरीरं मा पलुज्जी, ति । नेतं ठानं विज्जति ॥ दीघ-रत्तं खो ते आनन्द ! तथागतो पच्चुपहितो मेत्तेन काय कम्मेन हितेन सुखेन अद्वयेन अप्पमाणेन, मेत्तेन वची कम्मेन हितेन सुखेन अद्वयेन अप्पमाणेन, मेत्तेन मनो कम्मेन हितेन सुखेन अद्वयेन अप्पमाणेन । कत पुञोसि त्वं आनन्द ! पधान मनुयुञ्ज खिप्पं होहिसि अनासवो' ति ॥ (२००) आयुष्मान् श्रानन्द जहाँ भगवान् थे वहाँ आकर अभिवादनकर एक ओर बैठे। (२०१ ) आयुष्मान् आनन्दसे भगवान्ने कहा- "नहीं आनन्द ! मत शोक करो, मत रोओ ! मैंने तो आनन्द ! पहिले ही कह दिया है-सभी प्रियों = मनापोंसे जुदाई होनी है, सो वह आनन्द ! कहाँ मिलने- वाला है। जो कुछ जात (= उत्पन्न =भूत संस्कृत है, सो नाश होनेवाला है। 'हाय ! वह न नाश हो' यह संभव नहीं। आनन्द ! तूने दीर्घरात्र (=चिरकाल) तक अप्रमाण मैत्रापूर्ण कायिक-कर्मसे तथागतकी सेवा की है। मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्मसे 10 मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्मसे । आनन्द ! तू कृतपुण्य है। प्रधान (=निर्वाण-साधन) में लग जल्दी अनास्रव (=मुक्त) हो जा।"

महापरिनिब्बान सुत्त ११५ । (२०२) अथ खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि-'ये पि ते भिक्खये ! अहेसुं अतीतमद्धानं अरहन्तो सम्मा-सम्बुद्धा, तेसंपि भगवन्तानं एतप्परमायेव उपट्टका अहेसुं। सेय्यथा पि, मय्हं आनन्दो । ये पि ते भिक्खवे ! भविस्सन्ति अनागतमद्धानं अरहन्तो सम्मा-सम्बुद्धा। तेसं पि भगवन्तानं एतप्परमायेव उपट्टका भविस्सन्ति । सेय्यथा पि, मय्हं आनन्दो ॥ पण्डितो भिक्खवे ! अानन्दो मेधावी, भिक्खवे ! आनन्दो जानाति अयं कालो तथागतं दस्सनाय उपसमितु भिक्खून, अयं कालो भिक्खुनीनं, अयं कालो उपासकानं, अयं कालो उपासिकानं, अयं कालो रञ्बो राजमहामत्तानं, तित्थियानं तित्थिय-सावकानन्ति ॥ (२०३) चत्तारो मे भिक्खवे ! अच्छरिया अब्भुत धम्मा आनन्दे । कतमे चत्तारो ? [१] सचे भिक्खवे ! भिक्खु-परिसा आनन्दं दस्सनाय उपसङ्कमति दस्सनेन सा अत्तमना होति । तत्र चे आनन्दो धम्म भासति, भासितेन पि सा अत्तमना होति । अतित्ताव भिवखवे ! भिक्खु- BHARA (२०२) तब भगवान्ने भिक्षुओंको संबोधित किया- "भिक्षुओ ! जो तथागत अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध अतीतकालमें हुए, उन भगवानोंके भी उपस्थाक (=चिरसेवक) इतने ही उत्तम थे, जैसा कि मेरा ( उपस्थाक ) आनन्द । भिक्षुओ ! जो तथागत • भविष्यमें होंगे। भिक्षुओ! आनन्द पंडित है । भिक्षुत्रो! आनन्द मेधावी है। वह जानता है-यह काल भिक्षुओंका तथागतके दर्शनार्थ जाने का है, यह काल भिक्षुणियोंका है, यह काल उपासकोंका है, यह काल उपासिकाओंका है। यह काल राजाका ० राज-महामात्यका ० तैर्थिकोंका • तैर्थिक-श्रावकोंका है। (२०३) "भिक्षुओ! आनन्दमें यह चार आश्चर्य अद्भुत बातें (=धर्म) हैं। कौनसी चार ? [१] यदि भिक्षु-परिषद् आनन्दका दर्शन करने जाती है, तो दर्शनसे सन्तुष्ट हो जाती है। वहाँ यदि आनन्द धर्मपर भाषण करता है, भाषणसे भी सन्तुष्ट हो जाती है; भिक्षुओ ! भिक्षु-परिषद् अ-तृप्त ही रहती है, जब कि आनन्द चुप हो ।

महापरिनिब्बान सुत्त परिसा होति, अथ खो आनन्दो तुण्ही होति ।। [२] सचे भिक्खवे ! भिक्खुनि-परिसा आनन्दं दस्सनाय उपसङ्कमति, दस्सनेन सा अत्तमना होति । तत्र चे आनन्दो धम्मं भासति, भासितेन पि सा अत्तमना होति । अतित्ताव भिक्खवे ! भिक्खुनि-परिसा होति, अथ खो आनन्दो तुण्ही होति ॥ [३] सचे भिक्खवे ! उपासक-परिसा आनन्दं दस्सनाय उपसङ्कमति, दस्सनेन सा अत्तमना होति । तत्र चे आनन्दो धम्मं भासति, भासितेन पिसा अत्तमना होति। अतित्ताव भिक्खवे! उपासक- परिसा होति, अथ खो आनन्दो तुण्ही होति ॥ [४] सचे भिक्खवे ! उपासिक-परिसा आनन्दं दस्सनाय उपसङ्कमति, दस्सनेन सा अत्तमना होति। तत्र चे आनन्दो धम्मं भासति, भासितेन पि सा अत्तमना होति । अतित्ताव भिक्खवे ! उपासिक-परिसा होति, अथ खो आनन्दो तुएही होति ॥ इमे खो भिक्खवे ! चत्तारो अच्छरिया अब्भुत धम्मा आनन्दे । (२०४) चत्तारी मे भिक्खवे ! अच्छरिया अब्भुत धम्मा रम्ने चकवतम्हि । कतमे चत्तारो ? जाता है। [२] यदि भिक्षुणी-परिषद् । [३] यदि उपासक-परिषद् । [४] यदि उपासिका-परिषद । भिक्षुओ! यह चार ०। चक्रवर्ती के चार गुण ( २०४) "भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजामें यह चार आश्चर्य, अद्भुत बातें हैं। कौनसी चार ? [१] यदि भिक्षुओ ! क्षत्रिय-परिषद् चक्रवर्ती राजाका दर्शन करने जाती है, तो दर्शनसे सन्तुष्ट हो जाती है। वहाँ यदि चक्रवर्ती राजा भाषण करता है, तो भाषणसे सन्तुष्ट हो जाती है; और भिक्षुओ ! क्षत्रिय-परिषद् अ-तृप्त ही रहती है, जब कि चक्रवर्ती राजा चुप होता है। [२] यदि ब्राह्मण परिषद् । [३] यदि गृहपति-परिषद् । [४] यदि श्रमण-परिषद् । इसी प्रकार भिक्षुओ! यह चार आश्चर्य, अद्भुत बातें आनन्दमें हैं। [१] यदि भिक्षु-परिषद् । ० । भिक्षुओ! यह चार आश्चर्य अद्भुत बातें आनन्दमें हैं।"

महापरिनिब्बान सुत्तं अत्तमना [१] सचे भिक्खवे ! खत्तिया-परिसा राजानं चक्कपत्ति दस्सनाय उपसङ्कमति, दस्सनेन सा अत्तमना होति । तत्र चे राजा चक्कवत्ति भासति, भासितेन पि सा अत्तमना होति। अतित्ताव भिक्खवे ! खत्तिय-परिसा होति, अथ खो राजा चकवत्ति तुण्ही होति ॥ (२-३-४) सचे भिक्खवे ब्राह्मण-परिसा, गहपति-परिसा, समण-परिसा, राजानं चकवत्तिं दस्सनाय उपसङ्कमति, दस्सनेन सा होति । तत्र चे राजा चक्कवत्ति भासति, भासितेन पि सा अत्तमना होति । अतित्ताव भिक्खवे ।। । समण-परिसा होति, अथ खो राजा चकवत्ति तुण्ही होती' ति ॥ एवमेव खो भिक्खवे ! चत्तारो मे अच्छरिया अब्भुत धम्मा आनन्दे । सचे भिक्खवे ! भिक्खु-परिसा आनन्दं दस्सनाय उपसङ्कमति, दस्सनेन सा अत्तमना होति । आनन्दो धम्मं भासति, भासितेन पि सा अत्तमना होति । अतित्ताव भिक्खवे ! भिक्खु-परिसा होति, अथ खो आनन्दो तुणही होति । सचे भिक्खुनि परिसा, उपासक-परिसा, उपासिक-परिसा अानन्दं दस्स- नाय उपसङ्कमति, दस्सनेन सा अत्तमना होति । तत्र चे आनन्दो धम्म भासति, भासितेन पि सा अत्तमना होति । अतित्ताव भिक्खवे ! उपासिक-परिसा होति, अथ खो श्रानन्दो तुण्ही होति ॥ इमे खो भिक्खवे ! चत्तारो अच्छरिया अब्भुत धम्मा आनन्दे ति ।। (२०५) एवं वुत्ते आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच-“मा भन्ते ! भगवा इमस्मि खुदक-नगरके उज्जङ्गल-नगरके साख-नगरके परिनिबायि! सन्ति भन्ते ! अम्बानि महा नगरानि, सेय्यथिदं-चम्पा ,राजगह, तत्र चे (२०५) आयुष्मान् आनन्दने भगवान्से यह कहा-"भन्ते ! मत इस क्षुद्र नगले (= नगरक) में, जंगली नगलेमें शाखा-नगरकमें परिनिर्वाणको प्राप्त होवें। भन्ते । और भी महानगर हैं; जैसे कि चम्पा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कौशाम्बी, ११८ महापरिनिब्बान सुत्त । ! सावत्थी, साकेतं, कोसम्बी, बाराणसी; एत्थ भगवा ! परिनिब्बातु !! एत्थ बहू खत्तिय-महासाला ब्राह्मण-महासाला गहपति-महासाला तथागते अभिप्पसन्ना। ते तथागतस्स सरीर-पूजं करिस्सन्तीति ।। (२०६) मा हेवं आनन्द ! अवच, मा हेवं आनन्द ! अवच, 'खुदक नगरक, उज्जङ्गल नगरक, साख नगरकन्ति' । भूतपुब्बं अानन्द ! राजा महासुदस्सनो नाम अहोसि चक्कवत्ति धम्मिको धम्म-राजा चातुरन्तो विजितावी जनप्पदत्यावरियप्पत्तो सत्त रतन समन्नागतो। रज्जो आनन्द ! महासुदस्सनस्स अयं कुसिनारा कुसावती नाम राजठानी अहोसि । पुरथिमेन च पच्छिमेन च द्वादस योजनानि आयामेन उत्तरेन च दक्खिणेन च सत्त योजनानि वित्थारेन । कुसावती आनन्द ! राजठानी इदाचेव अहोसि फिता च बहु जना च आकिण्ण मनुस्सा च सुभिक्खा च । सेय्यथा पि,-आनन्द ! देवानं पालकमन्दा नाम ! %3- वाराणसी । वहाँ भगवान् परिनिर्वाण करें। वहाँ बहुतसे क्षत्रिय महाशाल ( = महा- धनी), ब्राह्मण-महाशाल, गृहपति-महाशाल तथागतके भक्त हैं। वह तथागतके शरीरकी पूजा करेंगे।" महासुदर्शनजातक (२०६) “मत आनन्द ! ऐसा कह; मत आनन्द ! ऐसा कह-'इस क्षुद्र नगले । आनन्द ! पूर्वकालमें महासुदर्शन नामक चारों दिशाओंका विजेता, देशोंपर अधिकार प्राप्त, सात रत्नोंसे युक्त धार्मिक धर्मराजा चक्रवर्ती राजा था। आनन्द ! यह कुसीनारा राजा महासुदर्शनकी कुशावती नामक राजधानी थी। जो कि पूर्व-पश्चिम लम्बाईमें बारह योजन थी, उत्तर-दक्षिण विस्तारमें सात योजन थी। आनन्द ! कुशावती राजधानी समृद्ध स्फीत, बहुजना=जनाकीर्ण और सुभिक्ष थी। जैसे कि आनन्द ! देवताओंकी पालकमंदा नामक राजधानी समृद्ध स्फीत, बहु- * देखो महासुदस्सन-सुत्त पृ० १५२ दीघनिकाय ।

महापरिनिब्बान सुत्तं ११९ राजठानी इद्धाचेव होति फिता च बहुजना च आकिरण यक्खा च सुभिक्खा च। एवमेव खेा अानन्द ! कुसावती राजठानी इद्धाचेव अहोसि फिता च बहुजना च आकिरण मनुस्सा च सुभिक्खा च ।। कुसावतो आनन्द ! राजठानी दस हि सद्दे हि अवित्ता अहोसि दिवा चेव रत्ति च । सेय्यथिदं -हत्थि सद्देन, अस्स सद्देन, रथ सद्देन, भेरि सद्देन, मुदिङ्ग सद्देन, विणा सद्देन, गीत सद्देन, सङ्घ सद्देन, सम्म सद्देन, ताल सद्देन, अस्नाथ पिवथ खादथा' ति दसमेन सद्देन । (२०७) गच्छ त्वं आनन्द ! कुसिनारायं पविसित्वा कोसिनारकानं मल्लानं आरोचेहि ।-"अज्ज खो वासिहा ! रत्तिया पच्छिमे यामे तथागतस्स परिनिब्बानं भविस्सति । अभिक्खमथ वासिहा! अभिक्खमथ वासिहा! मा पच्छा विप्पटिसारिनो अहु वत्थ अम्हाकं च नो गामखेत्ते तथागतस्स परिनिब्बानं अहोसि । न मयं लभिम्हा पच्छिमेकाले तथागतं दस्सनाया ति"॥ (२०८) एवं भन्ते। ति खो आयस्मा श्रानन्दो भगवतो पटिस्सुत्वा निवासेत्वा पत्त चीवर-मादाय अत्तदुतियो कुसिनारं पाविसि । तेन खो जना=यक्ष-आकीर्ण और सुभिक्ष हैं; इसी प्रकार । आनन्द ! कुशावती राजधानी दिन-रात, हस्ति-शब्द, अश्व-शब्द, रथ-शब्द, भेरी-शब्द, मृदंग-शब्द, वीणा-शब्द, गीत- शब्द, शंख-शब्द, ताल-शब्द, 'खाइये-पीजिये'-इन दस शब्दोंसे शून्य न होती थी। ( २०७) आनन्द ! कुसीनारामें जाकर कुसीनागवासी मल्लोंको कह- 'वाशिष्टो ! आज रातके पिछले पहर तथागतका परिनिर्वाण होगा। चलो वाशिष्टो! चलो वाशिष्टो! पीछे अफसोस मत करना-हमारे ग्राम-क्षेत्रमें तथागतका परिनिर्वाण हुआ, लेकिन हम अन्तिमकालमें तथागतका दर्शन न कर पाये।" (२०८) "अच्छा भन्ते !" आयुष्मान् आनन्द चीवर पहिनकर, पात्रचीवर ले, अकेले ही कमीनागमें प्रविष्ट हए। उस समय कुसीनारावासो मल्ल किसी कामसे !

१२० महापरिनिब्बान सुत्तं पन समयेन कोसिनारका मल्ला सन्धागार* = सन्निपतिता होन्ति केनचि-देव-करणीयेन । अथ खो आयस्मा आनन्दो येन कोसिनार- कानं मल्लानं सन्धागारं, तेनुपसङ्कमि। उपसङ्कमित्वा कोसिनारकान मल्लान आरोचेसि,--"अज्ज खो वासिहा! रत्तिया पच्छिमे यामे तथागतस्स परिनिब्बान भविस्सति । अभिक्खमथ वासिहा! अभिक्खमथ वासिट्ठा! मा पच्छा विष्पटिसारिनो अहु वत्थ अम्हाकं च नो गामखेत्ते तथागतस्स परिनिब्बान अहोसि । न मयं लभिम्हा पच्छिमे काले तथागतं दस्सनाया' ति"॥ (२०९) इदमायस्मता आनन्दस्स सुत्वा मल्ला च मल्लपुत्ताच मल्लसुणिसा च मल्लपजापतियो च अघाविनो दुम्मना चेतो दुक्खसमप्पिता अप्पे कच्चे केसे पकिरिय कन्दन्ति बाहा पग्गयह कन्दन्ति छिन्नपातं पपतन्ति श्रावट्टन्ति विवन्ति-'अति खिप्पं भगवा ! परिनिब्बायिस्सति । अति खिप्पं सुगतो ! परिनिब्बायिस्सति । अति खिप्पं चक्खुमा ! लोके अन्तरघायिस्सती' ति" || । थे संस्थागारमें जमा हुए । तब आयुष्मान् अानन्द जहाँ कुसीनाराके मल्लोंका संस्थागार था, वहाँ गये। जाकर कुसीनारावासी मल्लोंसे यह बोले-'वाशिष्टो ! ।' (२०९) आयुष्मान् आनन्दसे यह सुनकर मल्ल, मल्ल-पुत्र, मल्ल-वधुयें, मल्ल- भार्याय दुःखित दुर्मना दुःख-समर्पित-चित्त हो, कोई कोई बालोंको बिखेर रोते थे, बाँह पकळकर क्रंदन करते थे, कटे ( वृक्ष ) से गिरते थे, (भूमिपर) लोटते थे-बहुत जल्दी भगवान् निर्वाण प्राप्त हो रहे हैं, बहुत जल्दी सुगत निर्वाण प्राप्त हो रहे हैं । बहुत जल्दी लोक-चक्षु अन्तर्धान हो रहे हैं। तब मल्ल ० दु:खित ० हो, जहाँ उपवत्तन मल्लोंका शालवन था, वहाँ गये । * 'सन्थागारे' भी पाठ है।

महापरिनिव्वान सुत्तं १२१ अथ खो मल्ला च मल्लपुत्ताच मल्लसुणिसा च मल्लपजापतियो च अघाविनो दुम्मना चेतो दुक्ख-समपिता येन उपवत्तनं मल्लानं सालवनं येनायस्मा आनन्दो, तेनुपसङ्कर्मिसु । (२१०) अथ खो आयस्मतो आनन्दस्स एतदहोसि-'सचे खो अहं कोसिनारके मल्ले एकमेकं भगवन्तं वन्दापेस्सामि । अवन्दितो भगवा कोसिनारके हि मल्ले हि भविस्सति । अथायं रत्ति विभायिस्सति । यं नूनाहं कोसिनारके मल्ले कुलपरिवत्तसो कुलपरिवत्तसो थपेत्वा भगवन्तं वन्दापेय्यं ।- (२११) 'इत्थन्नामो भन्ते ! मल्लो सपुत्तो सभरियो सपरिसो सामच्चो भगवतो पादे सिरसा वन्दती, ति' । (२१२) अथ खो आयस्मा आनन्दो कोसिनारके मल्ले कुलपरिवत्तसो कुलपरिवत्तसो थपेत्वा भगवन्तं वन्दापेसि । “इत्थन्नामो भन्ते ! मल्लो सपुत्तो सभरियो सपरिसो सामञ्चो भगवतो पादे सिरसा वन्दती, ति ॥" अथ खो आयस्मा आनन्दो एतेन उपायेन पठमेनेव यामेन कोसि. नारके मल्ले भगवन्तं वन्दापेसि ।। - (२१० ) तब आयुष्मान आनन्दको यह हुआ-'यदि मैं कुसीनाराके मल्लोंको एक एक कर भगवानकी वन्दना करवाऊँ तो भगवान् ( सभी) कुसीनाराके मलोंसे अवन्दित ही होंगे, और यह रात बीत जायेगी। क्यों न मैं कुसीनारा के मल्लोंको एक एक कुलके क्रमसे भगवान्की वन्दना करवाऊँ- (२११) भन्ते ! अमुक नामक मल्ल स-पुत्र, स-भार्य, स-परिषद्, स-अमात्य. भगवानके चरणोंको शिरसे वन्दना करता है।' ( २१२ ) तब आयुष्मान् आनन्दने कुसीनाराके मल्लोंको एक एक कुलके क्रमसे भगवान्की वन्दना करवाई। इस उपाय से आयुष्मान् अानन्दने, प्रथम याम (= छैसे दस बजे राततक) में कुसीनाराके मल्लोंसे भगवानकी वन्दना करवा दी।

महापरिनिब्बान सुत्तं (२१३) तेन खो पन समयेन सुभदो नाम परिब्बाजको कुसिनारायं पटिवसति । अस्सोसि खो सुभद्दो परिब्बाजको "अज्ज किर रत्तिया पच्छिमे यामे समणस्स गोतमस्स परिनिब्बानं भविस्सती, ति । अथ खो सुभहस्स परिब्बाजकस्स एतदहोसि 'सुतं खो पन मे तं परिब्बाजकानं बुद्धानं महालकानं आचरिय-पाचरियानं भासमानानं-कदाचि करहचि तथागता लोके उप्पज्जन्ति अरहन्तो सम्मा-सम्बुद्धा। अज्जेव रतिया पच्छिमे यामे समणस्स गोतमस्स परिनिब्बानं भविस्सति । अस्थि च मे अयं कला धम्मो उम्पन्नो । एवं पसन्नो अहं समणे गोतमे । पहोति मे समणो गोतमो तथा धम्मं देसेतुं, यथाहं इमं कला-धम्म पजहेय्यन्ति" ।। (२१४) अथ खो सुभदो परिब्बाजको येन उपवत्तनं मल्लानं सालवनं, येनायस्मा आनन्दो, तेनुपसङ्कमि। उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्द एतदवोच-"सुतं मे तं भो आनन्द ! परिब्बाजकानं बुद्धानं महल्लकानं आचरिय-पाचरियानं भासमानानं,--कदाचि करहचि तथागता लोके उप्पज्जन्ति अरहन्तो सम्मा-सम्बुद्धा। अज्झेव रत्तिया पच्छिमे यामे सुभद्रकी प्रव्रज्या (२१३) उस समय कुसीनारामें सुभद्र नामक परिव्राजक वास करता था। सुभद्र परिब्राजकने सुना, आज रातको पिछले पहर श्रमण गौतमका परिनिर्वाण होगा। तब सुभद्र परिब्राजकको ऐसा हुआ-'मैंने बृद्ध महल्लक आचार्य-प्राचार्य परि- ब्राजकोंको यह कहते सुना है-'कदाचित् कभी ही तथागत अर्हत् सम्यक्-सम्बुद्ध उत्पन्न हुआ करते हैं। और आज रातके पिछले पहर श्रमण गौतमका परिनिर्वाण होगा, और मुझे यह संशय (=कखा-धम्म ) उत्पन्न है;...इस प्रकार मैं श्रमण गौतममें प्रसन्न ( = श्रद्धावान् ) हूँ-श्रमण गौतम मुझे वैसा, धर्म उपदेश कर सकता है; जिससे मेरा यह संशय हट जायेगा।" ( २१४) तब सुभद्र परिव्राजक जहाँ मल्लोंका शाल-वन उपवत्तन था, जहाँ आयुष्मान् आनन्द थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान् आनन्दसे बोला-"हे महापरिनिब्बान सुत्तं १२३ समणस्स गोतमस्स परिनिब्बानं भविस्सति । अस्थि च मे अयं कला- धम्मो उप्पन्नो। एवं पसन्नो अहं समरणे गोतमे तथा धम्म देसेतु, यथाहं इमं कला-धम्म पजहेव्यं । साधाहं भो आनन्द ! लभेय्यं समणं गोतमं दस्सनाया, ति" || (२१५) एवं वुत्ते आयस्मा आनन्दो सुभदं परिबाजकं एतदवोच- "अलं भावुसो सुभद्द ! मा तथागतं विहेठेसि । किलन्तो भगवा, ति" ॥ दुतियम्पि खो सुभद्दो परिब्बाजको। ततियम्पि खो सुभदो परि- बाजको आयस्मन्तं श्रानन्दं एतदवोच "सुतं मे तं भो आनन्द ! परि- बाजकानं बुद्धानं महलकानं पाचरिय-पाचरियानं भासमानानं,--'कदाचि करहचि तथागता लोके उप्पज्जन्ति अरहन्तो सम्मा-सम्बुद्धा। अज्जेव रतिया पच्छिमे यामे समणस्स गोतमस्स परिनिम्बानं भविस्सति । अस्थि च मे अयं कला-धम्मो उप्पन्नो। एवं पसनो अहं समणे गोतमे पहोति मे समणो गोतमो तथा धम्म देसेतु, यथाहं इमं कला-धम्म पनहेय्यं । साधाहं भो आनन्द ! लभेव्यं समणं गोतम दस्सनाया, ति"। ततियम्पि खो यस्मा आनन्दो सुभदं परिबाजकं एतदवोच-"अलं आधुसो सुभद्द ! मा तथागतं विहेठेसि । किलन्तो भगवा, ति॥" (२१६) अस्सोसि खो भगवा आयस्मतो आनन्दस्स सुभद्देन परि- बाजकेन सद्धिं इमं कथा-सल्लापं । अथ खो भगवा आयस्मन्तं आनन्द oran आनन्द ! मैंने बृद्ध = महल्लक ० परिव्राजकोंको यह कहते सुना है । सो मैं... श्रमण गौतमका दर्शन पाऊँ ?" (२१५) ऐसा कहनेपर आयुष्मान् आनन्दने सुभद्र परिव्राजकसे कहा- "नहीं आवुस सुभद्र! तथागतको तकलीफ मत दो। भगवान् थके हुए हैं।" दूसरी बार भी सुभद्र परिव्राजकने ०। । तीसरी बार भी ० । । (२१६) भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दका सुभद्र परिव्राजकके साथका कथा- सैलापे सुन लिया। तब भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दसे कहा- १२४ महापरिनिब्बान सुत्त । NARAN प्रामन्तेसि--"प्रलं अानन्द ! मा सुभई वारेसि । लभतं आनन्द ! सुभदो तथागतं दस्सनाय । यं किश्चि में सुभदो पुच्छिस्सति, सब्बन्तं अआ पेक्खोव पुच्छिस्सति, नो विहेसापेखो। यश्चस्साहं पुढो ब्याकरिस्सामि, तं खिप्पमेव आजानिस्सती, ति" ॥ (२१७) अथ खो आयस्मा अानन्दो सुभदं परिबाजकं एतदवोच- "गच्छाचुसो सुभद ! करोति ते भगवा ओकासन्ति " ॥ (२१८) अथ खो सुभद्दो परिब्बाजको येन भगवा, तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयंकथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो सुभद्दो परिब्बाजको भगवन्तं एतदवोच- (२१९) "ये मे भो गोतम ! समण ब्राह्मणा सजिनो गणिनो गणा. चरिया आता यसस्सिनो तित्थकरा साधु सम्मता बहु जनस्स । सेय्य- थिदं-पूरणो कस्सपो, मक्खलि गोसालो, अजितो केस, "नहीं आनन्द ! मत सुभद्रको मना करो। सुभद्रको तथागतका दर्शन पाने दो। जो कुछ सुभद्र पूछेगा, वह आज्ञा ( =परम-ज्ञान ) की इच्छासे ही पूछेगा; तकलीफ देनेकी इच्छासे नहीं। पूछनेपर जो मैं उसे कहूँगा, उसे वह जल्दी ही जान लेगा (२१७ ) तब आयुष्मान् आनन्दने सुभद्र परिव्राजकसे कहा- "जाओ आवुस सुभद्र ! भगवान् तुम्हें आज्ञा देते हैं।" ( २१८ ) तब सुभद्र परिव्राजक जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान्के साथ संमोदनकर...एक ओर बैठा। एक ओर बैठ...बोला। (२१९) "हे गौतम ! जो श्रमण ब्राह्मण संघी गणी = गणाचार्य, प्रसिद्ध यशस्वी तीर्थकर, बहुत लोगों द्वारा उत्तम माने जानेवाले हैं, जैसे कि-पूर्ण काश्यप, मक्खलि गोसाल, अजित केशकम्बल, पकुध कन्चायन, संजय बेलडिपुत्त, ।

महापरिनिब्बान सुतं १२५ कम्पलो, पकुधो कच्चायनो, सञ्जयो बेलट्टपुत्तो, निगण्ठो नाटपुत्तो, सब्बे ते सकाय पटिनाय अब्भबिसु । सब्बेव न अब्भ- बिसु । उदाहु एकच्चे अब्भञ्जिसु । एकच्चे न अब्भञ्जिमू , ति" । (२२०) अलं सुभद्द ! तिहते तं । सब्बे ते सकाय पटिबाय अब्भनिसु। सब्बेव न अब्भबिसु । उदाहु एकचे अभबिसु । एकच्चे न अभबिम्, ति ॥ धम्मं ते सुभद ! देसिस्सामि। तं सुणाहि साधुकं मनसि करोहि । भासिस्सामी, ति ॥ (२२१) एवं भन्ते! ति खो सुभदो परिबाजको भगवतो पच्चस्सोसि ॥ भगवा एतदवोच-"यस्मि खो सुभद्द ! धम्म-विनये अरियो अहङ्गिको मग्गो न उपलब्भति, समणो पि तत्थ न उपलब्भति । दुतियो पि तत्थ समणो न उपलब्भति । ततियो पि तत्थ समणो न उपलब्भति । चतुत्यो पि तत्थ समणो न उपलब्भति ॥ यस्मि च खो सुभद्द ! धम्म- -- निगण्ठ नाथपुत्त। (क्या ) वह सभी अपने दावा ( = प्रतिज्ञा ) को (वैसा) जानते, ( या ) सभी ( वैसा ) नहीं जानते; (या ) कोई कोई वैसा जानते, कोई कोई वैसा नहीं जानते हैं !..." ( २२०) "*नहीं सुभद्र ! जाने दो-'वह सभी अपने दावाको ०। सुभद्र ! तुम्हें धर्म 0 उपदेश करता हूँ; उसे सुनो, अच्छी तरह मनमें करो, भाषण करता हूँ।" (२२१) "अच्छा भन्ते !' सुभद्र परिब्राजकने भगवान्से कहा। भगवान्- ने यह कहा- "सुभद्र ! जिस धर्म-विनयमें आर्य अष्टांगिक मार्ग उपलब्ध नहीं होता, वहाँ प्रथम श्रमण ( = स्रोत आपन्न ) भी उपलब्ध नहीं होता; द्वितीय श्रमण (=सकृदागामी) भी उपलब्ध नहीं होता; तृतीय श्रमण (= अनागामी) भी उपलब्ध नहीं होता; चतुर्थ श्रमण (= अर्हत् ) भी उपलब्ध नहीं होता। सुभद्र ! जिस धर्म-विनयमें आय- अष्टांगिक-मार्ग उपलब्ध होता है, प्रथम श्रमण भी वहाँ होता है । सुभद्र ! इस * अ. क. “पहिले पहर में मल्लोंको धर्मदेशनाकर, बिचले पहर सुभद्रको, पिछले पहर भिक्षु-संघको उपदेशकर, बहुत भोरे ही परिनिर्वाण...

१२६ १ महापरिनिब्बान सुत्तं विनये अरियो अहङ्गिको मग्गो उपलब्भति समणो पि तत्थ उपलब्मति | दुतियो पि तत्थ समणो उपलब्भति । ततियो पि तत्थ समणो उपलब्भति ॥ चतुत्थो पि तत्थ समणो उपलब्भति । इमस्मि खो सुभद्द ! धम्म- विनये अरियो अहङ्गिको मग्गो उपलब्भति, इधेव सुभद्द ! समणो । इध दुतियो सगणो। इध ततियो समणो । इध चतुत्यो समणो । सुब परप्पवादा समणे हि अबे हि । इधेव सुभद्द ! भिक्खू सम्मा विहरेय्युं असुञ्बो लोको अरहन्ते हि अस्साति । एकूनतिसो वयसा सुभद्द ! यं पबजि किं कुसलानुएसी। वस्सानि पञ्चास समधिकानि, यतो अहं पब्बजितो सुभद ! बायस्स धम्मस्स पदेसवत्ति । इतो बहिद्धा समणो पि नस्थि । दुतियो पि समणो नत्यि । ततियो पि समणो नत्थि। चतुत्यो पि समणो नस्थि सुबा परपवादा समणे हि अञ्चे हि । इमे च सुभद्द ! भिक्खू सम्मा विहरेव्युं असुनो लोको अरहन्ते हि अस्साति" ।। (२२२) एवं वुत्ते सुभद्दो परिबाजको भगवन्तं एतदवोच। भन्ते ! अभिकन्तं भन्ते !! सेय्यथा पि भन्ते ! निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मुल्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा धर्म-विनयमें आर्य अष्टांगिक-मार्ग उपलब्ध होता है; सुभद्र ! यहाँ प्रथम श्रमण • भी, यहाँ ० द्वितीय श्रमण भी, यहाँ ० तृतीय श्रमण भी, यहाँ ० चतुर्थ श्रमण भी है। दूसरे वाद (= मत ) श्रमणोंसे शून्य हैं। सुभद् ! यहाँ ( यदि) भिक्षु ठीकसे विहार करें (तो) लोक अहतोंसे शून्य न होवे।" "सुभद्र ! उन्तीस वर्षकी अवस्था में कुसल (= पुण्यधर्म )का खोजी हो, जो मैं प्रबजित हुआ। सुभद्र ! जब मैं प्रब्रजित हुआ तबसे इक्कावन वर्ष हुए । न्याय-धर्म (= आर्य-धर्म =सत्यधर्म ) के एक देशको भी देखनेवाला यहाँसे बाहर कोई नहीं है। ( २२२) ऐसा कहनेपर सुभद्र परित्राजकने भगवान्से कहा- "अभिवन्तं महापरिनिब्बान सुतं तेल-पज्जोतं धारेय्य, चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्ति, एवमेव भगवता अनेक परियायेन धम्मो पकासितो। एसाह भन्ते ! भगवन्तं सरणं गच्छामि धम्मच भिक्खु-संघश्च । लभेय्याह भन्ते ! भगवतो सन्तिके पबज्ज । लभेव्यं उपसम्पदन्ति"॥ (२२३) यो खो सुभद ! अन तित्थिय पुब्बो इमस्मि धम्म-विनये आकङ्घति पब्बज्ज आकति उपसम्पदं, सो चत्तारो मासे परिवसति । चतुन्नं मासानं अच्चयेन आरद्ध चित्ता भिक्खू पब्बाजेन्ति उपसम्पादेन्ति भिक्खु-भावाय । अपि च मेत्थ पुग्गल वेमत्तता विदिता, ति । (२२४) सचे भन्ते ! अञ्चतित्थिय पुब्बा इमस्मि धम्म-विनये आकजन्ता पब्बजं आकङ्घन्ता उपसम्पदं चत्तारो मासे परिवसन्ति । चतुम्नं मासानं अञ्चयेन पारद्ध चित्ता भिक्खू पब्बाजेन्ति उपसम्पादेन्ति भिक्खु-भावाय । अहं चत्तारि वस्सानि परिवसिस्सामि । चतुम्नं वस्सानं अञ्चयेन आरद्ध चित्ता भिक्खू पब्बाजेन्तु उपसम्पादेन्तु भिक्खु भावाया, ति॥ -- "आश्चर्य भन्ते ! अद्भुत भन्ते ! ० मैं भगवानकी शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघकी भी। भन्ते ! मुझे भगवान के पाससे प्रव्रज्या मिले, उपसंपदा मिले।" ( २२३) "सुभद्र ! जो कोई भूतपूर्व अन्य-तीथिक (= दूसरे पंथका) इस धर्म...में प्रव्रज्या...उपसंपदा चाहता है वह चार मास परिवास (=परीक्षार्थ वास) करता है। चारमास के बाद, आरब्ध-चित्त भिक्षु प्रब्रजित करते हैं, भिक्षु होने के लिये उपसंपन्न करते हैं।"... (२२४ ) "भन्ते ! यदि भूतपूर्व अन्यतीर्थिक इस धर्म विनयमें प्रव्रज्या ० उपसंपदा चाहनेपर, चार मास परिवास करता है , तो भन्ते ! मैं चार वर्ष परि- नाट IITRAT.चिन शिव प्रबलित करें।"

महापरिनिब्वान सुत्तं (२२५) अथ खो भगवा श्रायस्मन्तं थानन्दं आमन्तेसि । तेनहानन्द ! सुभदं पब्बाजेही, ति ।। एवं भन्ते ! ति खो आयस्मा आनन्दो भगवतो पञ्चस्सोसि ।। (२२६) अथ खो सुभद्दो परिब्बानको आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच-"लाभा वो आवुसो आनन्द ! सुलद्धं वो आवुसो आनन्द !! ये एत्य सत्थु संमुखा अन्तेवासिकाभिसेकेन अभिसित्ताति ॥ (२२७) अलत्थ खो सुभदो परिबाजको भगवतो सन्तिके पबज्ज, अलस्थ उपसम्पदं। अचिरूपसम्पन्ने खो पनायस्मा सुभदो एकोवूपकहो अप्पमत्तो आतापी पहितत्तो विहरन्तो न चिरस्सेव यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति । तदनुत्तरं ब्रह्मचरिय परियोसानं दिखेव धम्मे सयं अभिबा सच्छि कत्वा उपसम्पज्ज विहासि। खीणा जाति। बुसितं ब्रह्मचरियं । कतं करणीयं। नापरं इत्यत्ता याति अभबासि । अम्चतरो खो पनायस्मा सुभदो अरहत्तं अहोसि। सो भगवतो पच्छिमो सक्खि सावको अहोसी, ति ।। भाणवारं पञ्चमं ॥५॥ (२२५) तब भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दसे कहा-"तो आनन्द ! सुभद्रको प्रबजित करो। “अच्छा भन्ते " ( २२६) तब सुभद्र परिब्राजकको आयुष्मान् आनन्दने कहा- "श्रावुस !...लाभ है तुम्हें, सुलाभ हुआ तुम्हें; जो यहाँ शास्ताके सम्मुख अन्तेवासी (= शिष्य ) के अभिषेकसे अभिषिक्त हुए।" ( २२७ ) सुभद्र परिब्राजकने भगवानके पास प्रव्रज्या पाई, उपसंपदा पाई । उपसंपन्न होनेके अचिरहीमें आयुष्मान सुभद्र...आत्मसंयमी हो विहार करते, जल्दी ही, जिसके लिये कुलपुत्र ० प्रब्रजित होते हैं; उस अनुत्तर ब्रह्मचर्यफलको इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्कारकर, प्राप्तकर, विहरने लगे। ० । सुभद्र अहंतोंमेंसे एक हुए। वह भगवान्के अन्तिम...शिष्य हुए। (इति) पंचम भाणवार ॥ ५ ॥ 300 महापरिनिब्बान सुत्तं १२९ (२२८) अथ खो भगवा आयस्मन्तं श्रानन्दं श्रामन्तेसि-"सिया खो पनानन्द ! तुम्हाकं [१] एवमस्स अतीत सत्थुकं पावचनं नत्थि नो सत्था, ति । न खो पनेतं आनन्द ! एवं ददृब्बं । यो वो आनन्द ! मया धम्मो च विनयो च देसितो पञ्चत्तो, सो वो ममच्चयेन सत्था, ति ॥ [२] यथा खो पनानन्द ! एतरहि भिक्खु अन-मञ्चं 'श्रावुसो' वादेन समुदाचरन्ति । न खो ममञ्चयेन एवं समुदाचरितब्बं । थेर-तरेन आनन्द ! भिक्खुना नवकत्तरो भिक्खु नामेन वा गोत्तेन वा आवुसो वादेन वा समुदा चरितब्बो । नवकत्तरेन भिक्खुना थेरत्तरो भिक्खु भन्ते' ति वा 'श्रायस्मा' ति वा समुदा चरितब्बो ॥ [३] आकङ्कमानो आनन्द ! संघो ममञ्चयेन खुदानुखुदकानि सिक्खापदानि समुहनतु ॥ [४]- सन्नस्स आनन्द ! भिक्खुनो ममञ्चयेन ब्रह्म-दण्डो दातब्बो, ति" ॥ (२२९) कतमो पन भन्ते ! ब्रह्मदण्डो, ति ? अन्तिम उपदेश ( २२८) तब भगवान्ने आयुष्मान् आनन्दसे कहा- "आनन्द ! शायद तुमको ऐसा हो-[१] अतीत-शास्ता (= चले गये गुरु) का (यह) प्रवचन (= उपदेश) है, (अब) हमारा शास्ता नहीं है। आनन्द ! इसे ऐसा मत समझना। मैंने जो धर्म और विनय उपदेश किये हैं, प्रज्ञप्त (= विहित) किये हैं; मेरे बाद वही तुम्हारा शास्ता (गुरु) है।-[२] आनन्द ! जैसे आजकल भिन्नु एक दूसरेको 'श्रावुस' कहकर पुकारते हैं, मेरे बाद ऐसा कहकर न पुकारें । आनन्द ! स्थविरतर (= उपसंपदा प्रबज्यामें अधिक दिनका) भिक्षु नवक-तर (= अपने- से कम समयके) भिक्षुको नामसे, या गोत्रसे, या आवुस, कहकर पुकारें। नवक- तर भिक्षु स्थविरतरको भन्ते' या 'आयुष्मान' कहकर पुकारें। [३] इच्छा होनेपर संघ मेरे बाद क्षुद्र-अनुक्षुद्र (= छोटे छोटे) शिक्षापदों (=भिक्षुनियमों)को छोळ दे। [४] आनन्द ! मेरे बाद छन्न भिक्षुको ब्रह्मदण्ड करना चाहिये।" ( २२९) "भन्ते ! ब्रह्मदण्ड क्या है ?"

महापरिनिब्बान सुत्तं (२३०) छन्नो आनन्द ! भिक्खु यं इच्छेश्य तं वदेश्य, सो भिक्खु हि नेत्र वत्तब्बो, न ओवदितब्बो, न अनुसासितब्बो, ति ।। (२३१) अथ. खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि-"सिया खो पन भिक्खवे ! एक भिक्खुस्स पि कला वा विमति वा बुद्धे वा धम्मे वा संघ वा मग्गे वा पटिपदाय वा । पुच्छथ भिक्खवे ! मा पच्छा विपटिसारिनो अहुवत्थ संमुखी भूतो नो सत्था अहोसि । न मयं सक्खिम्हा भगवन्तं संमुखा पटिपुच्छितुन्ति । (२३२) एवं बुत्ते ते भिक्खू तुराहो अहेसुं। दुतियम्पि खो भगवा । ततियम्पि खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि ।-"सिया खो पन भिक्खये ! एक भिक्खुस्स पि कला वा विमति वा बुद्धे वा धम्मे वा संघे वा मग्गे वा पटिपदाय वा। पुच्छथ भिक्खवे! मा पच्छा विप्पटिसारिनो अहुवत्य संमुखी भूतो नो सत्था अहोसि । न मयं सक्खिम्हा भगवन्तं संमुखा पटिपुच्छितुन्ति" । ततियम्पि खो ते भिक्खू तुण्ही अहेसुं । अथ खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि--"सिया खो पन भिक्खवे ! सत्थु गारवेन पि न पुच्छेय्याथ । सहायको पि भिक्खवे.! सहायकस्स आरोचेतू , ति ॥" एवं बुत्ते ते भिक्खू तुण्ही अहेसुं ॥ (२३०) "आनन्द ! छन्न भिक्षुओंको जो चाहे सेा कहे, भिक्षुओं को उससे न बोलना चाहिये, न उपदेश = अनुशासन करना चाहिये।" (२३१) तब भगवान्ने भिक्षुओंको आमंत्रित किया--"भिक्षुओ ! (यदि) बुद्ध, धर्म, संघमें एक भिक्षुको भी कुछ शंका हो, (तो) पूछ लो। भिक्षुओ ! पीछे अफसोस मत करना-शास्ता हमारे सन्मुख थे, (किन्तु) हम भगवानके सामने कुछ पूछ न सकें।" ( २३२) ऐसा कहनेपर वह भिक्षु चुप रहे । दूसरी बार भी भगवान्ने । । तीसरी बार भी 101 - महापरिनिब्बान सुत्त wom (२३३) अथ खो प्रायस्सा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच- "अच्छरियं भन्ते ! अब्भुतं भन्ते ! एवं पसन्नो अहं भन्ते ! इमस्मि भिक्खु-संघे नत्थि एक भिक्खुस्सा पि कला वा विमति वा बुद्धे वा धम्मे वा संघे वा मग्गे वा पटिपदाय वा, ति ॥" (२३४) पसादा खो त्वं आनन्द! वदेसि ? जाणमेव हेत्थ अानन्द ! तथागतस्स । नत्थि इमस्मि भिक्खु-संघे एक भिक्खुस्सा पि कला वा विमति वा बुद्ध वा धम्मे वा संघे वा मग्गे वा पटिपदाय वा । इमेसं हि आनन्द ! पश्चन्नं भिक्खु सतानं यो पच्छिमको भिक्खु सो सोतापनो अविनिपात धम्मो नियतो सम्बोधि परायनो, ति" ॥ (२३५) अथ खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि-"हन्द दानि भिक्खवे ! श्रामन्तयामि वो वय-धम्मा सङ्घारा अप्पमादेन सम्पादेथा, ति" ॥ अयं तथागतस्स पच्छिमा वाचा ॥ ( २३३) तब आयुष्मान् अानन्दने भगवानसे यह कहा-"आश्चर्य भन्ते ! अद्भुत भन्ते !! मैं भन्ते ! इस भिक्षु-संघमें इतना प्रसन्न हूँ। ( यहाँ) एक भिक्षुको भी बुद्ध, धर्म, संघ, मार्ग, या प्रतिपद्के विषयमें संदेह (=कांक्षा) = विमति नहीं है।" ( २३४) "आनन्द ! 'प्रसन्न हूँ' कह रहा है ? आनन्द ! तथागतको मालूम है-इस भिक्षु-संघमें एक भिक्षुको भी बुद्ध के विषयमें संदेह =विमति नहीं है । आनन्द ! इन पाँच सौ भिक्षुओं में जो सबसे छोटा भिक्षु है। वह भी न गिननेवाला हो, नियत संबोधि-परायण है।" (२३५) तब भगवान्ने भिक्षुओंको आमंत्रित किया-"हन्त ! भिक्षुओ अब तुम्हें कहता हूँ- "संस्कार (= कृतवस्तु) व्यय-धर्मा (= नाशमान् ) हैं; अप्रमादके साथ (= आलस न कर) (जावनके लक्ष्यको) संपादन करो।"-यह तथागतका अन्तिम वचन है १३२ महापरिनिब्बान सुत्तं पठम भाना (२३६) अथ खो भगवा पठमं झानं समापज्जि । बुढहित्वा दुतियं झानं समापज्जि । दुतिय माना बुढहित्वा ततियं झानं समापज्जि । ततिय झाना बुढहित्वा चतुत्थं झानं समापज्जि । चतुत्थ झाना वुढहित्वा श्राकासानश्चायतनं समापज्जि । आकासानञ्चायतन समापत्तिया वुढहित्वा विज्ञानश्चायतनं समापज्जि । विञ्चानञ्चायतन समापत्तिया वुढहित्वा आकिञ्चचायतनं समापज्जि । प्राकिञ्चम्ञायतन समापत्तिया वुढहित्वा नेवसजा-नासचायतनं समापज्जि । नेवसा-ना सम्ञायतन समापत्तिया वुढहित्वा सञ्चा-वेदयित-निरोधं समापज्जि ॥ (२३७) अथ खो आयस्मा अानन्दो आयस्मन्तं अनुरुद्धं एतद. वोच-परिनिबुतो भन्ते अनुरुद्धं ! भगवा, ति ॥" (२३८) नावुसो आनन्द ! भगवा परिनिबुतो, सञ्बा-वेदयित. निरोधं समापन्नो, ति ॥ (२३९) अथ खो भगवा सञ्चा-वेदयित-निरोध-समापत्तिया वुदृहित्वा नेवसबा-नासना-यतनं समापन्जि । नेवसजा-नासवायतन समापत्तिया निर्वाण ( २३६ ) तब भगवान् प्रथम ध्यानको प्राप्त हुए। प्रथम ध्यानसे उठकर द्वितीय ध्यानको प्राप्त हुए। ० तृतीय ध्यानको । ० चतुर्थ ध्यानको । ० आकाशानन्त्या- यतनको 10 विज्ञानानन्त्यायतनको 10 आकिंचन्यायतनको नैवसंज्ञाना- संज्ञायतनको 01 0 संज्ञावेदयितनिरोधको प्राप्त हुए। ( २३७ ) तब आयुष्मान् श्रानन्दने आयुष्मान् अनुरुद्धसे कहा-"भन्ते अनुरुद्ध ! क्या भगवान् परिनिवृत हो गये ?" (२३८) "श्रावुस आनन्द ! भगवान् परिनिवृत्त नहीं हुए। संज्ञावेदयित- निरोधको प्राप्त हुए हैं।" (२३९) तब भगवान् संज्ञावेदयितनिरोध-समापत्ति (= चारों ध्यानोंके ऊपर- की समाधि)से उठकर नवसंज्ञा-नासंज्ञायतनको प्राप्त हुए। 1द्विवीय व्यानसे उठकर महापरिनिब्बान सुत्तं १३३ बुढहित्वा आकिश्चञ्चायतनं समापज्जि । आकिश्चञ्चायतन समापत्तिया बुद्दहित्वा विबाणश्चायतनं समापज्जि । विवाणञ्चायतन समापत्तिया बुढहित्वा आकासानञ्चायतनं समापज्जि । आकासानञ्चायतन समापत्तिया बुदृहित्वा चतुत्थ झानं समापज्जि । चतुत्य झाना बुद्दहित्वा ततियं झानं समापज्जि । ततिय झाना वुदृहित्वा दुतियं झानं समापज्जि । दुतिय झाना वुढहित्वा पठमं झानं समापनि ॥ पठम झाना बुढहित्वा दुतियं झानं समापज्जि । दुतिय माना वुढहित्वा ततियं भानं समापज्जि । ततिय माना वुदृहित्वा चतुत्थं मानं समापज्जि । चतुत्थ झाना बुद्दहित्वा समनन्तरा भगवा परिनिब्बायि । परिनिब्बुते भगवति सह परिनिब्बाना महा भूमिचालो अहोसि । भिसनको सलोमहंसो देवदुद्राभियो च फलिंसु । परिनिब्बुते भगवति सह परिनिब्बाना ब्रह्मा सहंपति इमं गाथं अभासि- (२४०) सब्बेव निक्खिपिस्सन्ति, भूता लोके समुस्सयं । यस्थ एतादिसो सत्था, लोके अप्पटि पुग्गलो ।। तथागतो बलप्पत्तो, सम्बुद्धो परिनिबुतो, ति ॥ प्रथम ध्यानको प्राप्त हुए। प्रथम ध्यानसे उठकर द्वितीय ध्यानको प्राप्त हुए। । चतुर्थ ध्यानसे उठनेके अनन्तर भगवान् परिनिर्वाणको प्राप्त हुए। भगवान्के परिनिवोण होनेपर निर्वाण होतेके साथ भीषण, लोमहर्षण महाभूचाल हुआ। देव- दुन्दुभियाँ बजीं। भगवान्के परिनिर्वाण होनेपर निर्वाण होतेके साथ सहापति ब्रह्माने यह गाथा कही- ( २४० ) "ससारके सभी प्राणी जीवनसे गिरेगे। जब कि ऐसे लोकमें अद्वितीय पुरुष बलप्राप्त, तथागत, शास्ता बुद्ध परिनिर्वाणको प्राप्त हुए"

महापरिनिब्बान सुत्तं
(२४१) परिनिब्बुते भगवति सह-परिनिब्बाना सको देवानमिन्दो
इमं गार्थ अभासि-
अनिचा वत सङ्खारा, उप्पाद-वय-धम्मिनो ।
उपज्जित्वा निरुज्झन्ति, तेसं खूपसमो सुखो, ति ॥
(२४२) परिनिब्बुते भगवति सह परिनिब्बाना आयस्मा अनुरुद्धो
इमा गाथायो अभासि-
नाहु अस्सास-पस्सासो, ठित चित्तस्स तादिनो।
अनेजो सन्तिमारब्भ, यं कालमकरी
कालमकरी मुनि॥
असल्लिनेन चित्तेन, वेदनं अझ वासयि ।
पज्जोतस्सेव निब्बानं, विमोक्खो चेतसो अहू, ति ॥
(२४३) परिनिब्बुते भगवति सह परिनिब्बाना आयस्मा आनन्दो
इमं गाथं अभासि--
तदा सियं भिंसनक, तदा सियं लोमहंसनं ।
सब्बाकार वरूपेते, सम्बुद्धे परिनिबुते, ति ।।
( २४१) भगवानके परिनिर्वाण होनेपर देवेन्द्र शक्रने यह गाथा कही-
"अरे! संस्कार (= उत्पन्न वस्तुएँ) उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं।
(जा) उत्पन्न होकर नष्ट होते हैं; उनका शान्त होना ही सुख है।"
(२४२ ) भगवानके परिनिर्वाण होनेपर . आयुष्मान् अनुरुद्धने यह
गाथा कही-
"स्थिर-चित्त तथागतको (अब) श्वास-प्रश्वास नहीं रहा।
शान्ति के लिये निष्कम्प हो मुनिने काल किया।"
( २४३ ) भगवानके परिनिर्वाण होनेपर ० आयुष्मान् आनन्दने यह
गाथा कही-
"जब सर्वश्रेष्ठ आकारसे युक्त संबुद्ध परिनिर्वाणको प्राप्त हुए,
"तो उस समय भीषणता हुई, उस समय रोमांच हुआ।"

महापरिनिब्बान सुत्तं ! (२४४) परिनिब्बुते भगवति ये ते तत्थ भिक्खू अवीतरागा अप्पे कच्चे बाहा पग्गरह कन्दन्ति । छिन्नपातं पपतन्ति । आवन्ति । विवन्ति । "अति खिप्पं भगवा! परिनिब्बुतो, अति खिप्पं सुगतो! परिनिब्बुतो, अति खिप्पं चक्खुमा ! लोके अन्तरहितो, ति" ॥ ये पन ते भिक्खू वीतरागा ते सता संपजाना अधिवासेन्ति । "अनिच्चा सङ्खारा तं कुतेत्थ लब्मा ति"। (२४५) अथ खो आयस्मा अनुरुद्धो भिक्खू आमन्तेसि--"अलं श्रावुसो ! मा सोचिस्थ, मा परिदेवित्य । ननु एतं भावुसो ! भगवता पटिकच्चेव अक्खातं सब्बेहेव पिये हि मनापे हि नाना-भावो विना-भावो अबथा-भावो तं कुतेत्य आवुसो! लब्भा। यं तं जातं भूतं सङ्घतं पलोक- धम्मं तं वत मा-पलुज्जीति नेतं ठानं विज्जति । देवता आवुसो! उज्झायन्ती, ति"॥ (२४६) कथं भूता पन भन्ते अनुरुद्ध ! देवता मनसि करोन्ती, ति ? (२४७) सन्तावुसो आनन्द ! देवता आकासे पथवी सञ्चिनियो केसे पकिरिय कन्दन्ति । बाहा परगव्ह कन्दन्ति । छिन्नपातं पपतन्ति । (२४४) भगवान के परिनिर्वाण हो जानेपर, जो वह अवीत-राग (= अ-विरागी) भिक्षु थे, (उनमें) कोई बाँह पकळकर क्रन्दन करते थे; कटे (वृक्ष) के सदृश गिरते थे, (धरतीपर) लोटते थे-'भगवान् बहुत जल्दी परिनिवृत्त हो ग ये ० । किन्तु जो वीत. राग भिक्षु थे, वह स्मृति-सप्रजन्यके साथ स्वीकार (= सहन) करते थे-सस्कार अनित्य है, सो कहाँ मिलेगा?' (२४५) तब आयुष्मान् अनुरुद्धने भिक्षुओंसे कहा- "नहीं आवुसो ! शोक मत करो, रोदन मत करो। भगवान्ने तो आवुसो ! यह पहले ही कह दिया है-'सभी प्रियासे जुदाई होनी है ।" ( २४६ ) "भन्ते अनुरुद्ध ! देवताओंके मनमें कैसा है ? (२४७) आवुस आनन्द ! देवता आकाशको पृथिवी ख्यालकर बाल खोले रो रहे हैं। हाथ पकड़कर चिल्ला रहे हैं। कटे (वृक्ष) की भाँति भूमि पर गिर रहे हैं। AURAHAN - १३६ महापरिनिब्बान सुतं आवन्ति । विवन्ति । “अति खिप्पं भगवा ! परिनिबुतो, अति विप्पं सुगतो ! परिनिबुतो, अति खिप्पं चक्खुमा! लोके अन्तरहितो, ति ।" सन्तावुसो आनन्द ! देवता पथविया पथवी-सबिनियो केसे पकिरिय कन्दन्ति । बाहा पग्गरह कन्दन्ति । छिन्नपातं पपतन्ति । आवट्टन्ति । विवन्ति । अति खिप्पं भगवा परिनिबुतो, अति खिप्पं सुगतो परि- निबुतो, अति खिप्पं चक्खुमा लोके अन्तरहितो, ति ॥" या पन देवता वीतरागा ता सता संपजाना अधिवासेन्ति,-"अनिच्चा सङ्घारा तं कुतेत्थ लब्भा, ति ॥" (२४८),अथ खो आयस्मा च अनुरुद्धो आयस्मा च अानन्दो तं रत्तावसेसं धम्मिया-कथाय वीतिनामेसुं। अथ खो आयस्मा अनुरुद्धो आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि-"गच्छावुसो आनन्द ! कुसिनारं पविसित्वा कोसिनारकानं मल्लानं आरोचेहि-"परिनिबुतो वासिहा ! भगवा यस्स दानि कालं मजथा, ति ॥" (२४९) एवं भन्ते ! ति खो आयस्मा आनन्दो आयस्मतो अनु- रुद्धस्स पटिस्सुत्वा पुबन्ह समयं निवासेत्वा पत्त चीवरमादाय अत्त दुतियो कुसिनारं पाविसि । तेन खो पन समयेन कोसिनारका मल्ला संधागारे (यह कहते) लोट पोट रहे हैं,-बहुत जल्दी भगवान् निर्वाणको प्राप्त हो रहे हैं। बहुत शीघ्र सुगत निर्वाणको प्राप्त हो रहे हैं। बहुत शीघ्र चक्षुमान (= बुद्ध) लोकसे अन्तर्धान हो रहे हैं। । और जो देवता होश-चेतवाले हैं, वह होश-चेत स्मृति संप्रजन्योंके साथ सह रहे हैं,-"सस्कृत (= कृत वस्तुएँ) अनित्य हैं । सो कहाँ मिल सकता है।" (२४८) आयुष्मान् अनुरुद्ध और आयुष्मान् आनन्दने वह बाकी रात धर्म- कथामें बिताई। तब आयुष्मान अनुरुद्धने आयुष्मान् आनन्दसे कहा- "जाओ! आवुस आनन्द ! कुसीनारामें जाकर, कुसीनाराके मल्लोंसे कहा- 'वाशिष्टो ! भगवान् परिनिवृत्त हो गये। अब जिसका तुम काल समझो (वह करो)।" (२४९) "अच्छा भन्ते !" कह...आयुष्मान् आनन्द पहिनकर पात्र-चीवर ले अकेले कुसीनारामें प्रविष्ट हुए। उस समय किसी कामसे कुसीनाराके मल्ल, संस्था- । ।

महापरिनिब्वान सुत्तं सन्निपतिता होन्ति तेनेव करणीयेन। अथ खो आयस्मा आनन्दो येन कोसिनारकानं मल्लानं सन्धागारं तेनुपसङ्कमि । उपसङ्कमित्वा कोसिनार- कानं मल्लानं आरोचेसि-"परिनिबुतो वासिहा! भगवा यस्स दानि कालं मजथा, ति ।" (२५०) इदमायस्मतो आनन्दस्स वचनं सुत्वा मल्ला च मल्लपुत्ता च मळसुणिसा च मल्लपजापतियो च अघाविनो दुम्मना-चेतो दुक्ख- समपिता अप्पे कच्चे केसे पकिरिय कन्दन्ति । बाहा परगव्ह कन्दन्ति । छिन्नपातं पपतन्ति । अावन्ति । विवन्ति-"अति खिप्पं भगवा ! परिनिब्बुतो, अति खिप्पं सुगतो ! परिनिबुतो, अति खिप्पं चक्खुमा ! लोके अन्तरहितो, ति ॥" (२५१) अथ खो कोसिनारका मल्ला पुरिसे आणापेसुं-"तेन हि भणे ! कुसिनारायं गन्ध मालं सब्बश्च तालावचरं सन्निपातेथा, ति ॥" । गार ( = प्रजातन्त्र-सभा-भवन) में जमा थे। तब आयुष्मान् आनन्द जहाँ मल्लोंका संस्थागार था, वहाँ गये। जाकर कुसीनाराके मल्लोंसे बोले- "वाशिष्ठो! भगवान् परिनिवृत हो गये, अब जिसका तुम काल समझो (वैसा करो)।" (२५०) आयुष्मान् आनन्दसे यह सुनकर मल्ल, मल्ल-पुत्र, मल्ल-बधुयें, मल्ल-भार्यायें दुःखित हो ० कोई केशोंको बिखेरकर क्रंदन करती थीं, दुर्मना चित्तमें संतप्त हो कोई कोई केशांको बिखेर कर रोती थीं, बाँह पकळकर रोती थीं, (वृक्ष) की भाँति गिरती थीं, (धरतीपर) लुठित विलु ठित होती थीं-"बळी जल्दी भगवान्का निर्वाण हुआ, बळी निर्वाण हुआ, बळी जल्दी लोकनेत्र अंतर्धान हो गये।" (२५१) तब कुसीनाराके मल्लोंने पुरुषोंको आज्ञा दी-"तो भणे! कुसीनाराका सभी माजा बरा" जल्दी सुगतका महापरिनिब्बान सुर्त (२५२) अथ खो कोसिनारका मल्ला गन्ध माले च सब्बञ्च तालावचरं पञ्च च दुस्स युग सतानि आदाय येन उपवत्तनं मल्लानं सालवनं, येन भगवतो सरीरं, तेनुपसङ्कमिसु । उपसङ्कमित्वा भगवतो सरीरं नच्चे हि गीते हि वादिते हि माले हि गन्धे हि सक्करोन्ता गरुं करोन्ता मानेन्ता पूजेन्ता चेलवितानानि करोन्ता भएडल माले पटियादेन्ता एक दिवसं वीतिनामेसुं। (२५३) अथ खो कोसिनारकानं मल्लानं एतदहोसि-"अति विकालो खो अज्ज भगवतो सरीरं झापेतु। स्वेदानि मयं भगवतो सरीरं झापेस्सामा, ति" ॥ (२५४) अथ खो कोसिनारका मल्ला भगवतो सरीरं नच्चे हि गीते हि वादिते हि माले हि गन्धे हि सक्करोन्ता गरुं करोन्ता मानेन्ता पूजेन्ता चेलवितानानि करोन्ता मण्डल माले पटियादेन्ता दुतियम्पि दिवसं वीतिनामेसुं। ततियम्पि दिवसं दिवसं वीतिनामे। चतुत्थंपि दिवसं वीतिनामेसुं । पञ्चमंपि दिवसं वीतिनामेसु । छटुंपि दिवसं वीतिनामेसुं॥ (२५२) तब कुसीनाराके मल्ल गंध-माला, सभी वाद्यों, और पाँच हजार थान (= दुस्स)-जोळोंको लेकर जहाँ *उपवत्तन ० था, जहाँ भगवानका शरीर था, वहाँ गये। जाकर उन्होंने भगवान्के शरीर को नृत्य, गीत, वाद्य, माला, गंधसे सत्कार करते, = गुरुकार करते, = मानते = पूजते कपळेका वितान (= चंदवा) करते, मंडप बनाते उस दिनको बित्ता दिया। (२५३) तब कुसीनाराके मल्लोंको हुआ-भगवान के शरीरके दाह करनेको आज बहुत विकाल हो गया। अब कल भगवान के शरीरका दाह करेंगे।' (२५४) तब कुसीनाराके मल्लोंने भगवान के शरीरको नृत्य, गीत, वाद्य, माला, गंधसे सत्कार करते=गुरुकार करते = मानते पूजते, चंदवा तानते, मंडप बनाते दूसरा दिन भी बिता दिया। तीसरा दिन भी 10 चौथा दिन भी ०।० पाँचवा दिन भी। छठाँ दिन भी । * वर्तमान माथाकुंवर, कसया (जि. गोरखपुर)। ,

महापरिनिम्बान मुत्तं
१३९
(२५५) अथ खो सत्तमं दिवस कोसिनारकानं मल्लानं एतदहोसि
"मयं भगवतो सरीर नच्चे हि गीते हि वादिते हि माले हि गन्धे हि
सकरोन्ता गरुं करोन्ता मानेन्ता पूजेन्ता दक्खिणेन दक्खिणं नगरस्स
हरित्वा बाहिरेन बाहिर दक्खिरातो नगरस्त भगवतो सरीर
झापेस्सामा, ति" ॥ तेन खो पन समयेन अह मल्ल पामोक्खा
सीसन्हाता अहतानि वत्थानि निवत्था मयं भगवतो. सरीर उच्चारे-
न सकोन्ति उच्चारेतु।।
(२५६) अथ खो कोसिनारका मल्ला आयस्मन्त अनुरुद्धं एतदवोचुं-
"कोनु खो भन्ते अनुरुद्धं ! हेतु, को पञ्चयो येनिमे अह मल्ल पामोक्खा
सीस न्हाता
अहतानि वत्थानि निवत्था मयं भगवतो सरीर
उच्चारेस्सामा, ति। न सकोन्ति उच्चारेतुन्ति ? ॥"
(२५७) "अजथा खो वासिहा! तुम्हाक अधिप्पायो, अबथा
देवतानं अधिप्पायो, ति ॥
(२५८) कथं पन भन्ते ! देवतानं अधिप्पायो, ति ?
सामा, ति।
(२५५) तब सातवें दिन कुसीनाराके मल्लोंको यह हुआ-'हम भगवान के
शरीरको नृत्य० गंध से सत्कार करते नगरके दक्षिणसे लेजाकर बाहरसे बाहर नगरके
दक्षिण भगवान के शरीरका दाह करें। उस समय मल्लोंके आठ प्रमुख (=मुखिया)
शिरसे नहाकर, नये वस्त्र पहिन, भगवान के शरीरको उठाना चाहते थे लेकिन वह
नहीं उठा पाते थे।
(२५६) तब कुसीनाराके मल्लोंने आयुष्मान् अनुरुद्धसे पूछा-'भन्ते !
अनुरुद्ध ! क्या हेतु है - क्या कारण है; जो कि हम आठ मल्ल-प्रमुख • नहीं
उठा सकते ?"
(२५७) "वाशिष्टी ! तुम्हारा अभिप्राय दूसरा है, और देवताओंका अभिप्राय
दूसरा है।"
(२५८) "भन्त ! देवताओंका अभिप्राय क्या है ?"

महापरिनिब्बान सुत्तं (२५९) तुम्हाकं खो वासिहा ! अधिप्पायो "मयं भगवतो सरीरं नच्चे हि गीते हि वादिते हि माले हि गन्धे हि सकरोन्ता गरु-करोन्ता मानेन्ता पूजेन्ता दक्खिणेन दक्खिणं. नगरस्स हरित्वा बाहिरेन बाहिर दक्खिणतो नगरस्स भगवतो सरीर झापेस्सामा, ति" ॥ (२६०) देवतानं खो वासिहा ! अघिपायो----"मयं भगवतो सरीर दिब्बे हि नच्चे हि गीते हि वादिते हि माले हि गन्धे हि सक्करोन्ता गरु करोन्ता मानेन्ता पूजेन्ता उत्तरेन उत्तर नगरस्स हरित्वा उत्तरेन द्वारेन नगर पवेसेत्वा मज्झन मज्झ नगरस्स हरित्वा पुरस्थिमेन द्वारेन निक्खमित्वा पुरथिमतो नगरस्स मकुट-बन्ध नाम चेतियं, एत्थ भगवतो सरीर झापेस्सामा, ति" ॥ (२६१) "यथा भन्ते ! देवतानं अधिप्पायो तथा होतू, ति" ।। (२६२) तेन खो पन समयेन कोसिनारका मल्ला याव सन्धिसमल- संकटिरा जएणुमत्तेन श्रोधिना मन्धारव पुप्फे हि सन्थाता होति ।। । (२५९) "वाशिष्टो! तुम्हारा अभिप्राय है, हम भगवान्के शरीरको नृत्य०से सत्कार करते० नगरके दक्षिण दक्षिण ले जाकर, बाहरसे बाहर नगरके दक्षिण, भगवान्के शरीर का दाह करें। (६०) देवताओंका अभिप्राय है-हम भगवानके शरीरको दिव्य नृत्यसे० सत्कार करते० नगरके उत्तर उत्तर ले जाकर, उत्तर-द्वारसे नगर में प्रवेशकर, नगरके बीच ले जा, पूर्व-द्वारसे निकल, नगरके पूर्व ओर ( जहाँ) मुकुट-बंधन नामक मल्लोंका चैत्य (= देवस्थान) है, वहाँ भगवान् के शरीरका दाह करें।" (२६१) "भन्ते ! जैसा देवताओंका अभिप्राय है-वैसा ही हो।" (२६२) उस समय कुसीनारामें जाँघभर मन्दारव-पुष्प (= एक दिव्य पुष्प) बरसे हुए थे। * वर्तमान रामाभार, कसया ( जि. गोरखपुर )।

महापरिनिब्वान सुतं (२६३) अथ खो देवता च कोसिनारका च मल्ला भगवतो सरीर दिब्बे हि च मानुस्सके हि च नच्चे हि गीते हि वादिते हि माले हि गन्धे हि सक्करोन्ता गरुं करोन्ता मानेन्ता पूजेन्ता उत्तरेन उत्तर नगरस्स हरित्वा उत्तरेन द्वारेन नगर पवेसेवा मज्झन माझ नगरस्स हरित्वा पुरथिमेन द्वारेन निक्खमित्वा पुरथिमतो नगरस्स मकुट-बन्धन नाम मल्लानं चेतियं, एत्थ च भगवतो सरीर निक्खिपिसु ॥ (२६४) अथ खो कोसिनारका मल्ला प्रायस्मन्तं आनन्दं एतदवोचुं- "कथं मयं भन्ते आनन्द ! तथागतस्स सरीरे पटिपज्जामा, ति ?" (२६५) "यथा खो वासिहा ! रञ्बो चक्कवत्तिस्स सरीरे पटि- पज्जन्ति, एवं तथागतस्स सरीरे पटिपज्जितब्बन्ति ।" (२६६) कथं पन भन्ते आनन्द ! यो चकवत्तिस्स सरीरे पटि- पज्जन्ती, ति? (२६७) रज्जो वासिहा! चकवत्तिस्स सरीरं अहतेन वत्थेन वेठन्ति । अहतेन वत्थेन वेठेत्वा विहतेन कप्पासेन वेठेन्ति । विहतेन कप्पासेन वेठेत्वा अहतेन वत्थेन वेठन्ति । एतेन उपायेन पश्च हि युग सते हि रञो चकवत्तिस्स सरीरं वेठेत्वा आयसाय तेल-दोणिया पक्खिपित्वा अजिस्सा आयसाय-दोणिया पटिकुडिजत्वा सब्ब गन्धानं चितक । (२६३) तब देवताओं और कुसीनागक मल्लोंने भगवान्के शरीरको दिव्य और मानुष नृत्य०के साथ सत्कार करते० नगरसे उत्तर उत्तरसे ले जाकर (जहाँ) मुकुट-बंधन नामक मल्लोंका चैत्य था, वहाँ भगवान् का शरीर रक्खा। (२६४) तब कुसीनाराके मल्लोंने आयुष्मान् आनन्दसे कहा --"भन्ते ! आनन्द ! हम तथागतके शरीरको कैसे करें ?" (२६५) "वाशिष्ठो ! जैसे चक्रवर्ती राजाके शरीरको करते हैं, वैसे ही तथागतको शरीरको करना चाहिये।" (२६६) "कैसे भन्ते ! चक्रवर्ती राजाके शरीरको करते हैं।" (२६७) "वाशिष्टो ! चक्रवर्ती राजाके शरीरको नये कपळेसे लपेटते हैं । (दाहकर) बळे चौरस्ते पर तथागतका स्तूप बनवाना चाहिये। वहाँ जो माला संध महापरिनिब्बान सुर्त करित्वा रञ्बो चकवत्तिस्स सरीरं झापेन्ति । चातु महापथे रज्जो चकवत्तिस्स थपं करोन्ति । एवं खो वासिहा ! रञो चकवत्तिस्स सरीरे पटिपज्जन्ति । “यथा खो वासिहा! रज्जो चक्कवत्तिस्स सरीरे पटिपज्जन्ति, एवं तथागतस्स सरीरे पटिपज्जितब्बं । चातु महापये तथागतस्स थूपो कातब्बो। तत्थ ये मालं वा गन्धं वा चुण्णकं वा आरोपेस्सन्ति वा अभिवादेस्सन्ति वा चित्तं वा पसादेस्सन्ति, ते सन्तं भविस्सति दीघ रत्तं हिताय सुखाया, ति" ॥ (२६८) अथ खो कोसिनारका मल्ला पुरिसे प्राणापेसुं-"तेन हि भणे ! मल्लानं विहतं कप्पासं सन्निपातेथा, ति" ।। (२६९) अथ खो कोसिनारका मल्ला भगवतो सरीरं अहतेन वत्थेन वेठेत्वा विहतेन कप्पासेन वेठेसुं। विहतेन कप्पासेन वेठेत्वा अहतेन वत्थेन वेठेसुं। एतेन उपायेन पञ्च हि युग सते हि भगवतो सरीरं वेठेवा श्रायसाय तेल दोणिया पक्खिपित्वा अबिस्सा आयसायन्दोणिया पटिकुज्जित्वा सब्ब गन्धानं चितकं करित्वा भगवतो सरीरं आरोपेसु॥ या चूर्ण चढ़ायेंगे, या अभिवादन करेंगे, या चित्तको प्रसन्न करेंगे, उनके लिये वह चिरकाल तक हित-सुखके लिये होगा।" (२६८) तब कुसीनाराके मल्लोने आदमियोंको आज्ञा दी-"जाओ रे ! धुनी रुईको एकत्रित करो। (२६९) तब कुसीनाराके मल्लोंने भगवान के शरीरको कोर वस्त्रमें लपेटा। कोरे वस्त्रमें लपेटकर धुने कपाससे लपेटा। धुने कपाससे लपेटकर, कोरे वनमें लपेटा। इसी प्रकार पाँच सौ जोळे में लपेटकर ताँबे (= लोह) की तेलवाली कळाही (=द्रोणी) में रख सारे गंध (काष्टों) की चिता बनाकर, भगवान्के शरीरको चितापर रक्खा।

महापरिनिब्बान सुतं (२७०) तेन खो पन समयेन आयस्मा महाकस्सपो पावाय कुसिनार श्रद्धान मग्गप्पटिपन्नो होति महता भिक्खु-संघेन सद्धि पञ्चमत्ते हि भिक्खु सते हि। अथ खो आयस्मा महाकस्सपो मग्गा भोकम्म अञ्चतरस्मि रुक्ख मूले निसीदि । तेन खो पन समयेन अञ्जतरो आजीवको कुसिनाराय मन्धारव पुप्फ गहेत्वा पावं अद्धान मग्गप्पटिपन्नो होति । अहसा खो आयस्मा महाकस्सपो तं आजीवकं दूरतो व आगच्छन्तं दिस्वा तं आजीवकं एतदवोच,- (२७१) "आधुसो ! अम्हाकं सत्थार जानासी, ति ?" (२७२) "श्रामाधुसो ! जानामि, अज्ज सत्ताह परिनिबुतो समणो गोतमो। ततो मे इदं मन्धारव पुष्पं गहितन्ति" ॥ (२७३) तत्थ ये ते भिक्खू अवीतरागा अप्पे कच्चे बाहा पग्गयह कन्दन्ति । छिन्नपातं पपतन्ति । आवन्ति । विवन्ति,-"अति खिप्पं भगवा ! परिनिबुतों, अति खिप्पं सुगतो ! परिनिन्भुतो, अति खिप्पं nauka -- महाकाश्यपको दर्शन (२७०) उस समय आयुष्मान् महाकाश्यप पाँच सौ भिक्षुओंके महाभिनु संघके साथ पावा और कुसीनाराके बीचमें, रास्तेपर जा रहे थे। तब आयुष्मान् महाकाश्यप मार्गसे हटकर एक वृक्षके नीचे बैठे। उस समय एक श्राजीवक कुसानारासे मंदारका पुष्प ले पावाके रास्तेपर जा रहा था। आयुष्मान् महाकाश्यपने उस आजीवकको दूरसे आते देखा। देखकर उस आजीवकसे यह कहा- (२७१) “श्रावुस ! क्या हमारे शास्ताको भी जानते हो ?" (२७२) "हाँ, श्रावुस ! जानता हूँ; श्रमण गौतमको परिनिवृत हुए आज एक सप्ताह होगया; मैंने यह मंदार-पुष्प वहींसे पाया।" (२७३) यह सुन वहाँ जो अवीतराग भिक्षु थे, (उनमें) कोई कोई बांह पकळकर रोते.. । उस समय सुभद्र नामक (एक) वृद्धप्रब्रजित (=बुढ़ापेमें साधु हुआ) उस परिषद्में बैठा था। तब वृद्ध-प्रबजित सभढने उन भित्रोंमे गह १४४ महापरिनिब्बान सुत्तं चक्खुमा! लोके अन्तरहितो, ति"। ये पन ते भिक्खू वीतरागा ते सता सम्पजाना अधिवासेन्ति,-"अनिचा सङ्घारा तं कुतेत्थ लब्भा,ति"।। तेन खो पन समयेन सुभदो नाम वुद्ध-पन्बजितो तस्स परिसायं निसिन्नो होति । अथ खो सुभद्दो बुद्ध-पब्बजितो ते भिक्खू एतदवोच,- "अलं आधुसो ! मा सोचित्य मा परिदेवित्थ । सुमुत्ता मयं तेन महा- समणेन उपद्दुता च होम 'इदं वो कप्पति, इदं वो न कप्पती, ति'। इदानि पन मयं यं इच्छिस्साम तं करिस्साम । यं न इच्छिस्साम न तं करिस्सामा, ति" ॥ (२७४) अथ खो आयस्मा महाकस्सपो भिक्खू आमन्तेसि,-"अलं आवुसो ! मा सोचित्य मा परिदेवित्य । ननु एतं आवुसो ! भगवता पटिकञ्चेव अक्खातं, सब्बे हेव पिये हि मनापे हि नाना-भावो विना-भावो अवथा-भावो । तं कुतेत्थ भाबुसो ! लब्भा। यन्तं जातं भूतं सङ्कतं पलोक धम्म, तं तथागतस्सा पि सरीरमा पलुज्जीति । नेतं ठानं विज्जती, ति" ।। (२७५) तेन खो पन समयेन चत्तारो मल्ला पामोक्खा सीसं न्हाता अहतानि वत्थानि निवत्था मयं भगवतो चितकं आलिम्पेस्सामा, ति। न सक्कोन्ति प्रालिम्पेतु। अथ खो कोसिनारका मल्ला आयस्मन्तं अनुरुद्धं आवुसो ! मत शोक करो, मत रोओ। हम सुमुक्त हो गये। उस महाश्रमणसे पीळित रहा करते थे-'यह तुम्हें विहित है, यह तुम्हें विहित नहीं है।' अब हम जो चाहेंगे, सो करेंगे; जो नहीं चाहेंगे, सो नहीं करेंगे।" (२७४) तब आयुष्मान् महाकाश्यपने भिक्षुओंको आमंत्रित किया-"आयुसो ! मत सोचो, मत रोओ। आवुसो ! भगवान्ने तो यह पहले ही कह दिया है -सभी प्रियों-मनापोंसे जुदाई ० होनी है, सो वह अावुसो ! कहाँ मिलनेवाला है ? जो जात (= उत्पन्न) = भूत ० है, वह नाश होनेवाला है। 'हाय ! वह नाश मत हो-यह सम्भव नहीं।" (२७५) उस समय चार मल्ल-प्रमुख शिरसे नहाकर, नया वस्त्र पहिन, भगवान्की चिताको श्राग देना चाहते थे, किन्तु नहीं दे सकते थे। तब कुसीनारा के मल्लान ।

महापरिनिब्बान सुत्तं १४५ एतदवोचु-"कोनु खो भन्ते अनुरुद्ध ! हेतु को पच्चयो, येनिमे चत्तारो मल्ला पामोक्खा सीसं न्हाता अहतानि वत्थानि निवत्था मयं भगवतो चितकं आलिम्पेस्सामा, ति। न सकोन्ति आलिम्पेतुन्ति" ।। (२७६) "अबथा खो वासिहा ! देवतानं अधिप्पायो, ति" ॥ (२७७) कथं पन भन्ते ! देवतानं अधिप्पायो, ति ? (२७८) देवतानं खो वासिहा! अधिप्पायो,-"अयं आयस्मा महाकस्सपो पावाय कुसिनार अद्धान मग्गप्पटिपन्नो महता भिक्खु- संघेन सद्धिं पञ्चमत्ते हि भिक्खु सते हि । न ताव भगवतो चितको पज्जलिस्सति, यावायस्मा महाकस्सपो भगवतो पादे सिरसा न वन्दिस्सती, ति" ॥ (२७९) "यथा भन्ते ! देवतानं अधिपायो तथा होतू, ति" ।। (२८०) अथ खो आयस्मा महाकस्सपो येन कुसिनारा मकुट- बन्धनं नाम मल्लानं चेतियं येन भगवतो चितको तेनुपसङ्कमि । उपसङ्क- मित्वा एकसं चीवरं कत्वा अञ्जलिं पणामेत्वा तिक्खत्तुं चितकं पदक्खिणं आयुष्मान् अनुरुद्धसे पूछा-"भन्ते अनुरुद्ध ! क्या हेतु है = क्या प्रत्यय है, जिससे कि चार मल्ल-प्रमुख० आग नहीं दे सकते हैं।" (२७६) "वाशिष्टो ! ० देवताओंका दूसरा ही अभिप्राय है।" (२७७) भन्ते ! देवताओं का अभिप्राय क्या है ? (२७८) आयुष्मान् महाकाश्यप पाँच सौ भिक्षुओंके महाभिक्षुसंघके साथ पावा और कुसीनाराके बीच रास्तमें आ रहे हैं। भगवानकी चिता तब तक न जलेगी, जब तक आयुष्मान् महाकाश्यप स्वयं भगवान्के चरणोंको...शिरसे वन्दना न कर लेंगे।" (२७९) "भन्ते ! जैसा देवताओंका अभिप्राय है, वैसा ही हो।" (२८०) तब आयुष्मान् महाकाश्यपने जहाँ मल्लों का मुकुटबन्धन नामक चैत्य तहाँ मानी - १४६ महापरिनिब्बान सुतं Ram कत्वा भगवतो पादे सिरसा वन्दि । तानि पि खो पञ्च भिक्खु सतानि एकसं चीवरं कत्वा अञ्जलि पणामेत्वा तिक्तत्तु चितकं पदक्खिणं कत्वा भगवतो पादे सिरसा वन्दिसु । वन्दते च पनायस्मता महाकस्सपेन तेहि च पञ्च हि भिक्खु सते हि सयमेव भगवतो चितको पज्जलि। (२८१) झायमानस्स खो पन भगवतो सरीरस्स यं अहोसि छवीति वा चम्मन्ति वा मंसन्ति वा न्हारूति वा लसिकाति वा । तस्स नेव छारिका पनायित्थ न मंसी। सरीरा नेव अवसिस्सिसु । सेय्यथा पि नाम,- सप्पिस्स वा तेलस्स वा झायमानस्स नेव छारिका पञ्चायति न मंसी, एवमेव भगवतो सरीरस्स झायमानस्स यं अहोसि छवीति वा चम्मन्ति वा मंसन्ति वा हारूति वा लसिकाति वा, तस्स नेव छारिका पञ्जा. यित्थ न मंसी। सरीरा नेव अवसिस्सिसु। तेसश्च पश्चन्नं दुस्स युग सतानं देव दुस्सानि न डम्हिसु यश्च सब्ब अब्भन्तरिमं यश्च बाहिर। डडढे च खो पन भगवतो सरीरे अन्तलिक्खा उदक-धारा पातुभवित्वा भगवतो चितकं निब्बापेसि । उदक-सालतो पि अब्भुन्नमित्वा भगवतो चितकं निब्बापेसि। कोसिनारका पिमल्ला सब्ब गन्धोदकेन भगवतो चितकं निब्बापेसु॥ जोळ, तीन बार चिताकी परिक्रमाकर, चरण खोलकर, शिरसे वन्दना की। उन पांच सौ भिक्षुओंने भी एक कन्धेपर चीवर कर, हाथ जोळ तीन बार चिताकी प्रदक्षिणाकर, भगवान के चरणों में शिरसे वन्दना की। आयुष्मान् महाकाश्यप और उन पाँच सौ भिक्षुओंके वन्दना कर लेते हो, भगवान्की चिता स्वयं जल उठी। (२८१) भगवान के शरीरमें जो छबि (=झिल्लो) या चम, मांस, नस, या लसिका थी उनकी न राख जान पळो, न कोयला; सिर्फ अस्थियाँ ही बाको रह गई; जैसे कि जलते हुए घी या तेलकी न राख (= छारिका) जान पळती है, न कोयला (- मसी)...। भगवान् के शरीरके दग्ध हो जानेपर मेवने प्रादुर्भूत हो आकाशसे भगवान्की चिताको ठंडा किया।...। कुप्सोनाराके मल्लोंने भी सर्वगन्ध(-मिश्रित) जलसे भगवान्की चिताको ठंडा किया ।

महापरिनिब्बान सुस्त (२८२) अथ खो कोसिनारका मला भगवतो सरीरानि सत्ताह सन्धागारे सत्ति-पञ्जरं करित्वा धनु-पाकार परिक्खीपापेवा नच्चे हि गीते हि वादिते हि माले हि गन्धे हि सक्करिसु गरुं करिसु मानेसुं पूजेसुं । (२८३) अस्सोसि खो राजा मागधो अजातसत्तु वेदेहि-पुत्तो,- 'भगवा किर कुसिनारायं परिनिबुतो, तिः। अथ खो राजा मागधो अजातसत्तु वेदेहि-पुत्तो कोसिनारकानं मल्लानं दूतं पाहेसि,-'भगवा पि खत्तियो अहं पि खत्तियो। अहं पि अरहामि भगवतो सरीरानं भागं । अहं पि भगवतो सरारानं थूपश्च महश्च करिस्सामी, ति' ॥ (२८४) अस्सोसु खो वेसालिका लच्छवी,-'भगवा किर कुसिनारायं परिनिबुतो, ति। अथ खो वेसालिका लिच्छवी कोसि- नारकानं मल्लानं दूतं पाहेसुं,-'भगवा पि खत्तियो मयम्पि खत्तिया । मयम्पि अरहाम भगवतो सरीरानं भागं। मयम्पि भगवतो सरीरानं यूपश्च महश्च करिस्सामा, ति॥ (२८२) तब कुसीनाराके मल्लोंने भगवान्की अस्थियों (- सरीरानि) को सप्ताह भर संस्थागारमें शक्ति (-हस्त पुरुषोंके घेरेका)-पंजर बनवा, धनुष (-हस्त पुरुषोंके घेरेका)-प्राकार बनवा, नृत्य, गीत, वाद्य, माला, गंधसे सत्कार किया = गुरुकार किया, माना - पूजा । स्तूप-निर्माण (२८३) राजा मागध अजातशत्रु वैदेहीपुत्रने सुना-'भगवान् कुसीनारामें परिनिर्वाणको प्राप्त हुए।' तब राजा० अजातशत्र०ने कुसीनाराके मल्लोंके पास दूत भेजा-'भगवान् भी क्षत्रिय (थे), मैं भी क्षत्रिय (हूँ); भगवान के शरीरों (= अस्थियों) में मेरा भाग भी वाजिब है। मैं भी भगवान् के शरारोंका स्तूप बनवाऊँगा और पूजा करूंगा। (२८४) वैशालीके लिच्छवियोंने सुना ० ।

१४८
महापरिनिब्बान सुत्त
(२८५) अस्सोसुं खो कपिलवत्थु वासी सक्या-'भगवा किर
कुसिनारायं परिनिब्बुतो, ति। अथ खो कपिलवत्थु-वासी सक्या
कोसिनारकानं मल्लानं दूतं पाहेसुं,- 'भगवा अम्हाकं बाति सेहो।
मयपि अरहाम भगवतो सरीरानं भागं । मयपि भगवतो सरीरानं
थपञ्च महश्च करिस्सामा, ति॥
(२८६) अस्सोसु खो अल्लकप्पका बुलयो-'भगवा किर
कुसिनारायं परिनिबुतो, ति। अथ खो अल्लकप्पका बुलयो कोसि-
नारकानं मल्लानं दूतं पाहेसु,-'भगवा पि खत्तियो मयम्पि खत्तिया ।
मयम्पि अरहाम भगवतो सरीरानं भागं। मयपि भगवतो सरीरानं
थूपश्च महञ्च करिस्सामा, ति ॥
(२८७) अस्सोसु खो रामगामका कोलिया--'भगवा किर
कुसिनारायं परिनिबुतो, ति । अथ खो रामगामका कोलिया कोसि-
नारकानं मल्लानं दूतं पाहेसु,-'भगवा पि खत्तियो मयस्पि खत्तिया ।
मयम्पि अरहाम भगवतो सरीरानं भाग। मयपि भगवतो सरीरानं
थूपञ्च महञ्च करिस्सामा, ति ॥
(२८८) अस्सोसि खो वेठ-दीपको ब्राह्मणो-भगवा किर
कुसिनारायं परिनिब्बुतो, ति । अथ खो वेठ-दीपको ब्राह्मणो कोसि.
नारकानं मल्लानं दूतं पाहेसि,-'भगवा पि खत्तियो अहमस्मि ब्राह्मणो।
अहम्पि अरहामि भगवतो सरीरानं भागं। अहंपि भगवतो सरीरान
थपञ्च महञ्च करिस्सामी, ति' ||
(२८५) कपिलवस्तुके शाक्योंने सुना ०।-भगवान हमारे ज्ञातिके (थे)।
(२८६) अल्लपके बुलियों ने सुना ।
(२८७) रामग्रामके कोलियोंने सुना ।
(२८८) वेठ-दीपके ब्राह्मणांने सुना , भगवान् भी क्षत्रिय थे, हम ब्राह्मण ।
* शिलालेख में 'विष्णु-द्वीप' है।

महापरिनिब्वान सुतं १४९ ति॥ manese hamare (२८९) अस्सोसुखो पावेय्यका मल्ला-'भगवा किर कुसि- नाराय परिनिबुतो, ति। अथ खो पावेय्यका मल्ला कोसिनारकानं मल्लानं दृतं पाहेसु,-'भगवा पि खत्तियो मयपि खतिया। मयम्पि अरहाम भगवतो सरीरानं भागं। मयम्पि भगवतो सरीरानं थूपञ्च महञ्च करिस्सामा, (२९०) एवं वुत्ते कोसिनारका मल्ला ते सङ्घ गणे एतदवोचुं- 'भगवा अम्हाक गाम-खेत्ते परिनिबुतो । न मयं दस्साम भगवतो सरीरानं भागन्ति' । (२९१) एवं बुत्ते दोणो ब्राह्मणो ते सङ्के गणे एतदवोच, "सुणन्तु भोन्तो ! मम एक वाचं, अम्हा बुद्धो अहु खन्ति-वादो। नहि साधु यं उत्तम पुग्गलस्स, सरीर-भागे सिया संपहारो॥ सब्बे व भोन्तो ! सहिता समग्गा, सम्मोदमाना करोमह भागे । वित्यारिका होन्तु दिसासु थूपा, बहूजना चक्खुमतो पसन्ना, ति ॥" (२९२) "तेन हि ब्राह्मण ! त्वचेव भगवतो सरीरानि अधा समं सुविभत्तं विभज्जाही, ति" ॥ (२८९) पावाके मल्लोंने भी सुना । (२९०) ऐसा कहनेपर कुसीनाराके मल्लोंने उन संबों और गणोंसे कहा- "भगवान हमारे ग्राम-क्षेत्रमें परिनिवृत हुए, हम भगवान के शरीरों (- अस्थियों) का भाग नहीं देंगे।" (२९१) ऐसा कहनेपर द्रोण ब्राह्मणने उन संघों और गणोंसे यह कहा- "आप सब मेरी एक बात सुनें, हमारे बुद्ध शांति (=क्षमा )-वादी थे। यह ठीक नहीं कि (उस) उत्तम पुरुषकी अस्थि-बॉटनेमें मारपीट हो। "आप सभी एक साथ = एक राय संमोदन करते आठ भाग करें। दिशाओंमें स्तूपोंका विस्तार हो, बहुतसे लोग चक्षुमान् ( - बुद्ध) में प्रसन्न हो । (२९२) "तो ब्राह्मण! तूही भगवान के शरीरोंको आठ समान भागांमें सुविभक्त कर " * पडरौना के आस पास में रहनेवाले महा।

महापरिनिब्बान सुत्त (२९३) "एवं भो" ति खो दोणो ब्राह्मणो तेसं सङ्कान गणान पटिस्सुत्वा भगवतो सरीरानि अढया समं सुविभत्तं विभज्जित्वा ते सङ्घ गणे एतदवोच-"इमं मे भोन्तो ! तुम्बं ददन्तु, अहं पि तुम्बस्स थपञ्च महञ्च करिस्सामी, ति"॥ (२९४) अदंसु खो ते दोणस्स ब्राह्मस्स तुम्बं ।। (२९५) अस्सोसु खो पिप्पलिवनिया मोरिया-'भगवा किर कुसिनारायं परिनिबुतो, ति ॥ अथ खो पिप्पलिवनिया मोरिया कोसि- नारकान मल्लान दूतं पाहेसुं,-'भगवा पि खत्तियो मयम्पि खत्तिया । मयपि अरहाम भगवतो सरीरान भाग। मयपि भगवतो सरीरान थूपञ्च महञ्च करिस्सामा, ति ॥ "नत्यि भगवतो सरोरानं भागो, विभत्तानि भगवतो सरीरानि । इतो अङ्गारं हरथा, वि" । ते ततो अङ्गार आहरिसु ॥ (२९६) अथ खो [१] राजा मागधो अनातसत्तु वेदेहि-पुत्तो राजगहे भगवतो सरीरान यूपश्च महश्च अकासि ॥ (२९३) "अच्छा भो !"...द्रोण ब्राह्मणने भगवान के शरीरोंको आठ समान भागोंमें सुविभक्त (= बाँट कर, उन संघों गणेांसे कहा-"आप सब इस तुम्बेको मुझे दें, मैं तुम्बका स्तूप बनाऊँगा और पूजा करूंगा।" (२९४) उन्होंने द्रोण ब्राह्मणको तुम्ब दे दिया। (२९५) पिप्पलीवनके मोरियों (= भौयों) ने सुना • "भगवान्भी क्षत्रिय हमभी क्षत्रिय " "भगवान्के शरीरोंका भाग नहीं है, भगवान के शरीर बँट चुके । यहाँ से कोयला (= अंगार) ले जाओ।" वह वहाँ से अंगार ले गये। (२९६) तब [१] राजा० * अजातशत्रु • ने राजगृहमें भगवान् के अस्थियोंका "अ. क. "कुसीनारासे राजगृह पचीस योजन है। इस बीचमें आठ अषम महापरिनिब्बान सुत्तं [२] वेसालिका पिलिच्छवी वेसालियं भगवती सरीरानं थपञ्च महश्च अकंसु॥ [३] कपिलवत्थु वासी सक्या कपिलवस्थुस्मि भगवतो सरीरानं थूपश्च महश्च अकसु॥ [४] अलकप्पका पि बुलयो अल्लकप्पे भगवतो सरीरान यूपञ्च महञ्च असु॥ [५] रामगामका पि कोलिया रामगामे भगवतो सरीरानं थूपञ्च महश्च अकंसु॥ स्तूप (बनाया) और पूजा (मह) को [२] वैशाली के लिच्छवियोंने भी । [३] कपिलवस्तुके शाक्योंने भी । [४] अल्लमपके बुलियोंने भी । [५] राम- PANA चौळा समतल मार्ग बनवा, म राजाओंने मुकुट-बंधन और संस्थागारमें जैसी पूजा की थी, वैसीही पूजा पचीस योजन मार्ग में की।...(उसने) अपने पांच सौ योजन परिमंडल घेरेवाले) राज्य के मनुष्यों को एकत्रित करवाया। उन धातुओंका ले, कुसीनारासे धातु (-निमित्त ) क्रोळा करते निकलकर (लोग) जहाँ सुन्दर पुषों को देखते,...वहीं पूजा करते थे। इस प्रकार धातु लेकर आते हुए, सात वर्ष सात मास सात दिन बीत गये।... लाई गई धातुओं को लेकर (अजातशत्रुने) र राजगृहमें स्तूप बनवाया, पूजा कराई।... इस प्रकार स्तूगेंके प्रतिष्ठित हो जानेपर महाकाश्यप स्थविरने धातुओंके अन्तराय विन) को देखकर, राजा अजातशत्रुके पास जाकर कहा-"महाराज ! एक धातु-निधान (= अस्थि धातु रखनेका चहबच्चा ) बनाना चाहिये ।" "अच्छा भन्ते !'... स्थविर उन-उन राजकुलोंको पूजा करने मात्रकी धातु छोळकर बाकी धातुओंको ले आये। रामग्राममें धातुओंके नागोंके ग्रहण करनेसे अन्तराय न था; भविष्य में लंका. द्वीपमें इसे महाविहारके महाचैत्यमें स्थापित करेंगे'- के ख्यालसे भी) न ले आये। बाकी सातों नगरोसे ले आकर, राजगृहके पूर्व दक्षिण भागमें...(जो स्थान है। ; राजाने उस स्थानको खुदवाकर, उससे निकली मिट्टीसे ईंटें बनवाई। 'यहाँ राजा क्या बनवाता है, पूछनेवालोंको भी 'महाभावकोंका चैत्य बनवाता है' यही कहते थे; कोई भी धातु-निधानकी बात न जानता था।

१५२
महापरिनिब्वान सुतं
[६] वेठ-दीपको पि ब्राह्मणो वेठ-दीपे भगवतो सरीरानं यूपश्च
महश्च प्रशासि।
[७] पावेश्यका पि मल्ला पावायं भगवतो सरीरानं थूपश्च महश्च
अकंसु॥
[८] कोसिनारका पि मल्ला कुसिनारायं भगवतो सरीरानं थूपञ्च
महश्च असु ॥
[९] दोणो पि ब्राह्मणो तुम्बस्स थूपश्च महश्च अकासि ॥
[१०] पिप्पलिवनिया पि मोरिया पिप्पलिवने अङ्गारान थपञ्च
महञ्च असु ॥
(२९७) इति अह सरीर-थूपा, नवमो तुम्ब-थूपो, दसमो
अङ्गार-थूपो; एवमेतं भूत-पुष्यन्ति ।।
अट्ट दोणं चक्खुमतो सरीर, सत्त दोणं जम्बुदीपे महेन्ति ।
(२९८) एकञ्च दोणं पुरिस वरुत्तमस्स, रामगामे नागराजा महेति ॥
एका हि दाठा ति दिवे हि पूजिता, एका पन गन्धार-पुरे महीयति ।
कालिङ्ग रम्बो विजिते पुनेकं, एक पन नागराजा महेति ।।
गामके कोलियोंने भी । [६] वेठदीपके ब्राह्मणोंनेभी । [७] पावाके मल्लोंने
भी। [८] कुसीनाराके मल्लोंने भी । [९] द्राण ब्राह्मणने भी तुम्बका ।
[१०] पिप्पलीवन के मौर्योंने भी अंगारोंका ।
(२९७) इस प्रकार आठ शरीर (= अस्थि) के स्तूप,
नवा
तुम्ब-स्तूप
और
दसवाँ कोयला-स्तूप पूर्वकाल ( = भूतपूर्व) में थे।
(२९८) "चक्षुमानका शरीर आठ द्रोण था, (जिसमें) सात द्रोण जम्बूदीपमें
पूजित होते हैं।
(और) पुरुषोत्तमका एक द्रोण राम-गाममें नागोंसे पूजा जाता है।
एक दाढ़ (= दाठा) स्वर्ग-लोकमें पूजित है, और एक गंधारपुरमें पूजी जाती है।
-

१५३
देविन्द नागिन्द नरिन्द पूजितो, मनुस्सिन्द सेहे हि तथैव पूजितो ।
महापरिनिब्बान सुत्तं
तस्सेव तेजेन अयं वसुन्धरा, आयाग सेहे हि मही अलङ्कता
एवं इमं
इमं चक्खुमतो
चक्खुमतो सरीर,
सरीर, सुसकतं सकत
सुसकतं सक्कत सकतेहि ।।
तं
तं वन्दथ पञ्चलिका लभित्वा, बुद्धो हवे कप्प सते हि दुल्छभो, ति ॥
चत्तालीस समा दन्ता, केसा लोमा च सब्बसो ।
देवा हरिसु एकेक, चक्कवाल
परंपरा, ति॥
महापरिनिब्बान सुत्तं ततियं ।।
एक कलिंगराजाके देशमें है; और एकको नागराज पूजते हैं ।
उसी तेजसे पटुकाकी भाँति यह वसुधरा मही अलंकृत है।
इस प्रकार चक्षुष्मान् (= बुद्ध) का शरीर सत्कृतों द्वारा सुसत्कृत हुआ।
देवेन्द्रों नागेन्द्रों नरेन्द्रोंसे पूजित, तथा श्रेष्ठ मनुष्योंसे पूजित हुआ।
उसे हाथ जोळकर वंदना करो, सौ कल्पमें भी बुद्ध होना दुर्लभ है ।
चालीस केश, रोम आदिको चारों ओर,
एक एक करके नाना चक्रवालोंमें देवता ले गये।
तृतीय महापरिनिर्वाण सूत्र ॥
amppattimewAHUNT

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कुशिनगर का वर्तमान "रामाभार" स्तूप; इसी स्थान पर
भगवान् की दाह-क्रिया हुई थी।
कुशिनगर का एक मन्दिर । इसमें भगवान् की एक विशाल मूर्ति है ।
( वर्तमान माथा बाबा )

१
(१) कुशिनगर के महापरिनिर्वाण-स्तूप की खुदाई में प्राप्त भगवान् के
शरीर-धातु रखने की कुछ डिब्बियाँ ।
(२) कुशिनगर महापरिनिर्वाण-स्तूप के अन्दर से मिली हुई पकी मिट्टी की कुछ मुद्राएँ;
इन मुद्रायों के मध्य में "श्रीमहापरिनिर्वाण' आदि लेख खुदे हैं।
कुशिनगर के महापरिनिर्वाण-स्तूप की खुदाई में प्राप्त ताम्र-घट । इस घट में
कोयला, मोती, सोना आदि अनेक चीजें मिली हैं।
।

कुसिनगर का पुरातत्व-लेख संग्रह भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण स्थान् , कुसिनगर (वर्तमान, माथाकुंवर, जि० गोरखपुर) में पुरातत्त्व विभाग की ओर से समय समय पर जो खुदाई हुई थी, उसमें मिले हुए पुराने लेखों में से कुछ आवश्यक लेखों का यहाँ संग्रह है। वहाँ की खुदाई सन् १८७५ ई० से लेकर सन् १९११ ई० तक हुई थी। अधिकांश लेख सन् १९१०-११ ई० के बीच प्राप्त हुए। (१) एक पत्थर के छत्र (जिसमें सारिपुत्र की मूर्ति भी बनी है) पर कुटिल अक्षर में निम्नलिखित लेख लिखा हुआ है- "xxxxx(ते) सन्युवाच तेसञ्च यो निरोधा- xxxxxसंघ सारिपुत्रस्य ।" (२) श्री महापरिनिर्वाण मन्दिर के सामने जमीन के अन्दर से एक ताम्र- पत्र मिला था, उस पर भगवान् के शिष्य अस्सजित (अश्वजित् ) द्वारा सारिपुत्र को राजगिरि में दिया हुश्रा उपदेश संस्कृत भाषा में लिखा है- "ये धर्मा हेतु प्रभवा हेतु तेष्यान्- तथागताह्य वदत् । तेषञ्च यो निरोध एवम् वादी महाश्रमणः ।” (३) मिट्टी को पकाकर बनाई हुई मुद्राएँ ( Clay seals) सब मिलाकर ८६५ प्राप्त हुई। उनमें से कुछ मुद्राओं पर निम्नलिखित लेख हैं-- (क) आर्या-ष्ट वृध्यै ॥ (ख) श्री महापरिनिर्बान विहारे भिक्षु संघस्य ।। (ग) श्री महापरिनिर्धान विहारीयार्य भिक्षुसंघस्य ॥ (घ) कुसनगर ॥ (ङ) देयधर्मोयम् साक्य भिक्षुर्भदन्त सुवीरस्य कृतिर्दिनस्य ।। (च) श्री विष्णु-द्वीप विहारे भिक्षू संघस्य ॥ NAININNAR * पालि पिटक में 'वेठ-दीप' है।

romo (१५६ ) (छ) श्रीमद एरण्ड महाविहारे आर्य भिक्षु संघस्य ॥ (४) बाकी मुद्राओं पर लिखे हुए नाम इस तरह हैं- घण्डक। विद्धिसम्पर। ताराश्रय। रत्नमति । प्रसन्ता श्रीप्रभा। अभिप्रासिद्धि। वासुक। विक्काक। शन्त ज्ञान । छत्र दत्त । अानन्द सिंग। गङ्गायल। सिरिन्द । दिवाकर पभा। तारामित्र । तारा- शरण । ताराबल। तारक-ऊम् । यक्षपालित। प्रट्ठान श्रीप्रभ । सीलगुत्त। देनुक। कुसल। अप्रमाद। कमल सिरीप्रभ । कमल प्रभ। सब्ब सिद्धि। सब्ब मित्त। यखुक । पझावला। सावक। सील। दूगसरण। यागदत्त। भूरद्धर दत्त । वल्लभ । सीरिममाक । प्रिय गुप्त। हरक। बाला|"अरिय। दहुक ।...मन । सीरिमद दिन । वीरसेन । सीरिबाला । सीरिसेन । लाचेक। विनीत- मत। कुमारामातस्स। कमलसीरिप्रभ। सुप्पबुद्ध ॥ (५) श्री महापरिनिर्वाण स्तूप को खोदते समय उसके अन्दर ताम्बे का एक बड़ा घड़ा मिला था। उसके ऊपर जो तान-पत्र ढका हुआ था, उस पर निम्नलिखित लेख लिखा हुआ है। डा० फ्लीट के मता- नुसार यह लेख सन् ४००-५०० ई० के बीच गुप्त-काल का है* । 1-एवम् मया श्रुतम् = एकस्मिं समयेन भगवान् श्रावस्त्याम् विहरतिस्म जेतवने अनाथपिण्डदस्यारामे [......] ...] ध [माणाम् वो भिक्षवः देश] यिश्यामि-अपचयम् च तच्च श्रि [णुत साधु च] 3-सुष्टु च मनसि कुरुत भाषिश्ये धर्मा] ना [माचयः कतमो यदुत =ऽस्मि सतिदम् भव] ति. अस्योत्पादादि [दमुत्पद्यते यदुता] 4-विद्या प्रत्ययाः संस्काराः संस्कार प्रत्ययम् विज्ञानम् [विज्ञान-प्रत्ययम् नाम रूपम् नामरूप-प्रत] य [ऽयम् ] षडायतनम् षडा [यतन-प्रत्ययः स्पर्शः] • 5-स्पर्श-प्रत्यया वेदना वेदना-प्रत्यया तृष्णा तृष्णा-[प्रत्ययम् = उपादानम् = उपादान-प्रत्ययो भुवो] भुव-प्रत्यया जाति [जाति-प्रत्यया.. जरा] * विस्तार के लिये 'The Archeological Annual Report, 1910-11' को देखो।

TVNIRM HERE (१५७ ) 6-मरण-शोक-परिदेव-दुःख-दौमनस्योपा [यासा भवन्ति । एवम् अस्य केवल]स्य मह तो दुःख-स्कन्धस्य समुद [यो भवति......अय-] 7-मु] च्यते धर्माणाम् =ाचयः धर्माणाम् =अपचयः कतमः]............. .....] तद न भवत्यस्य निरोधादि [...] निरुध्यते- [...................] 8-निरोधः संस्कार-निरोधाद्-विज्ञान-निरोधा: विज्ञान निरोधान-ना [म-रूप-निरोधाः नामरूप-निरोधात्-घडायतन-निरोधाः प [ड-आय- तन निरोधात्-स्पर्श-निरोधाः] -स्पर्श-निरोधा=वेदना-निरोधो वेदना-नि [रोधात्-तृष्णा-]निरािधाः तृष्णा]-निरोधाद्=उपादा [न] निरोधाः उपादान-निरोधाद=भुव- निरोधाः [भुव-निरोधाजाति-निरोधो] 10-जाति]-निरोधाजरा-मरण-शोक-परिदेव]-दुःख-दौमनस्यो] पाया- सानिरुध्यन्ते एवम्-अस्य केवलस्य मह तो दुःख-स्कन्धस्य निरोधो] 11- भवति अयमुच्यते धर्मा [णाम् =अपच-] यः धर्माणाम् वो भिक्षवः आ [चय] म् च देशयिष्यामी=sपचयम् च इति मे य [दुक्तम् = इदमे] 12-[त] त्=प्रत्युक्तमि [दमऽ] वोचद् =भगवाना [त्तम] नासस्ते भिक्षवो भगवतो [भाषितम् अभ्यनन्द [न. दे] यधोयम् अने [क विहार]- स्वामिनो हरिबलस्य य [द=s- 13- त्र] पुण्यम् तद् [भ] वतु सर्व-सत्वानाम् =अनुत्तर-ज्ञानावापत्ये साक्य [भि-] क्षुर्धर्मानन्दो सर्वत्रानुमोदते [........ निर्वाण चैत्ये ताम्र- पट्ट इति॥ इस ताम्रपत्र का खास अर्थ इतना ही है कि "अनेक विहारों के स्वामी (कर्ता ) हरिबल ने इस महापरिनिर्वाण चैत्य को बनाया है।" (६) महापरिनिर्वाण मन्दिर के अन्दर भगवान् की मूर्ति के सिंहासन पर सुभद्र परिब्राजक की एक छोटी मूर्ति है, ठीक उसी के नीचे एक शिला- लेख अभी तक वर्तमान है- १-देयधर्मोयम् महाविहारे स्वामिनो हरिबलस्य २-प्रतिमाचेयम् घटिता दिनेxx मा सु स्वारेन* ॥ कुछ पुरातत्ववेत्ताओं ने “माथुरेन' पढ़ा है। अर्थात्-इस बुद्ध प्रतिमा को बनाने- वाला मथुरावासी 'दिन शिल्पकार था। और दाता वही हरिबल है, जो चैत्य को बनाया था। mAR

(१५८ )
HEMANTRA
(७) माथाकुंवर मन्दिर (वर्त्तमान् , माथाबाबा) के दक्षिण दोवाल पर लगा
हुश्रा एक काले रंग के पत्थर पर शिलालेख खुदा है। लेकिन अधिक
खराब हो जाने के कारण पूरा नहीं पढ़ सका। शेष लेख इस प्रकार है-
ॐ नमो बुद्धाय । नमो बुद्धाय भिक्षुन्'
इस स्थान के मुख्य मन्दिर तथा बौद्ध धर्म का अन्त किस तरह हुआ ?
इसको जानने के लिये
पुरातत्व वेत्ता मि० ए० सी० एल० कारलाईल के रिपोर्ट
का कुछ अंश नीचे दिया गया है-
..
...but in the inner doorway of the temple itself
I made an interesting discovery. In two hollows, one
on each side, at the lower part of the doorway, I found
the ancient cup-shaped iron pivot hinges of the former
doors; and with and adhering to the hinges I found some
fragments of black charred wood, which showed that
the doors had been destroyed by fire, and as numerous
human bones and various charred substances were found
in the outer chamber, as well as in both doorways, it
was evident that Buddhism had here been annihilated
by fire and sword.”
(From the Report of a tour in the Gorakhpur
District. By A. C. L. Carlleyle, in 1875-76 & 1876-77;
page, 62 and 63)
RANAMARIHARANJARSamaniase

परिशिष्ट शब्दानुक्रमणी। अजपाल निग्रोध-(= अजपाल बर्गद, अरिय सञ्चानं-(=चार आर्य-सत्य), ३४॥ बुद्ध-गया के समीप), ६७ ॥ अरिय सावक-(-बुद्ध के शिष्य), ३९, अजात सत्तु-(= अजातशत्रु, मगध का राजा) १ अरिया-(= आर्य = उत्तम) १७ । अजित केस कम्बल-(जड़वादी तीर्थ- अंगार थूप-(= कायला-स्तूप, पिप्पलिवन कर) १२४-५॥ में), १५२। अत्तदीपा-(एक प्रकार की समाधि), ५१। आचरिय-मुट्ठि-( = प्राचार्य-रहस्य ), अनत्त-सा-(= अनात्म-संज्ञा), १५ । अन्तराय-(= शत्रु), ३० । श्रानन्द के गुण, ११३, ११७ । अन्तिम उपदेश-७८। आनन्द विलाप-, ११३ । अन्तिम वचन---१३१ । पापो-सज्ञा--जल-संज्ञा की भावना), अपरिहानिय धम्म-(= अपतन के ६०॥ नियम), ३, ७, ८, ११, १६ । आबाधा-(=बीमारी), ४९ । श्र-प्रज्ञप्त-(= गैरकानूनी), ४ । प्रायु-लङ्कार-(= जीवन-संस्कार, ६१ । अभिरह-(= सम्मति के लिये बराबर आरज्ञक सेनासन-(= बन की कुटी) ५०॥ बैठक), ३॥ के अभिभायतन-आठ प्रकार की योग आर्य-अष्टांगिक-मार्ग-, १२५ । क्रिया), ६३ । पालकमन्दा-(= देवताओं की राज- अम्बकाय--(= अम्बपाली गणिका), ४५ । धानी), ११८ । अम्बपालि-वन-(= अम्बपाली गणिका आलार कालाम-(= एक ऋषि का आम्रवन, वैशाली में), ४१, ४४ । नाम), ९१, ९२॥ अम्बपाली गणिका-(= अम्बपाली वेश्या, आवसथ-(= निवासस्थान), ३१ । वैशाली में), ४३, ४७। श्रावसथागार-(= अतिथिशाला), ३४ । अम्बलट्टिका-(= सम्भवत: वर्तमान आहार-(=जनपद, राज्य), ४५ । सिलाव), १८॥ उजङ्गल-नगरक-(जंगली नगरक), श्ररहन्त-अहंत), ७। ११७॥

( २ ) उपलाय-~-(=रिश्वत देना), ८। चार धर्म-,८०,८१॥ उपवाण-(एक भिक्षु, जिनको भगवान ने चुन्द--, (= चुन्द भिक्षु), १००, (पावा अपने सामने से हटा दिये थे), १०५ । के एक सोनार), ८६। उरुवेला-(= उरुवेला वन, बुद्ध गया के चोर-पपात-(= राजगृह में), ७३ । पास में), ६७ । जीवक-(= राजगृह का राजवैद्य), ७३ । ककुधा नदी-(पडरौना और कसया के जीवकम्बवन-(जीवक का दान किया बीच में), ६०,६६, १०० ॥ हुआ विहार), ७३। कामासव-(= काम-भोग सम्बन्धी चित्त- तपोदाराम - (गर्म जलवाली नदी के मल), १८॥ समीपवर्ती विहार, राजगृह में), ७३ । काल सिला-(राजगृह में), ७३ । तावतिस--( = त्रायस्त्रिंश देवलोक ), कुसावती-(= कुसिनारा का पुराना नाम), ११८। तुम्ब-(- तुंबा, अस्थि बांटने का पात्र), कुसिनारा-(= मल्लों की राजधानी), १० १५२। कोटिगाम-(= काटिग्राम), ३४ । तुम्ब-थूप - (= द्रोण ब्राह्मण का तुंब-स्तूप), खुद्दक-नगरक-(= तुद्र नगर), ११७ । १५२॥ खुद्दानुखुद्दक-(=छोटे छोटे), १२९। तुस्सिता-(=तुषित देवलोक), ६० । गङ्गानदी-(= गंगा नदी), ३३ । थेर- स्थविर भितु), ११ । गिझकूट-(= गृध्रकूट पर्वत, राजगृह थेर-तर-(उपसम्पदा प्रव्रज्या में अधिक में), १॥ दिन का), १२९ । गिञ्जकावसंथ-(नातिका में), ३६ । दस शब्द--(कुशावती के), ११९ । गोतम-तित्थ-(गौतम-तीर्थ), ३२ । दुशाला-दान-,६७ । गोतम-द्वार-(गौतम-द्वार, पटना शहर दो श्रेष्ठ भोजन-१०२ । का एक द्वार का नाम), ३२ । धम्म चक-( धर्म चक्र), ६१ । गोतम-निग्रोध-(राजगृह में), ७३ । धम्मदास-(= धर्म आदर्श) ३९ । चक्रवर्ती के गुण--, ११६, ११७ । धम्मपरियाय-(=धर्म पर्याय), ३९ । चक्रवर्ती की दाह-क्रिया-, ११० । धम्म विनय-(= बुद्ध-धर्म) ७९ । चतुमहाराजिक-(= चारदिग्पाल देवता), धम्मिक बलि-(= धार्मिक दान) ६ । ६२। धर्म गुण-४०। चापाल चेतिय-(चापाल चैत्य, वैशाली धातु-विभाजन- (कुसिनारा में), १४९ । में), ५२, ७०, ७५ ॥ नातिका-३६ ।

, ३ ) नालन्दा-(= वर्तमान् बड़गांव, जि. मक्खलि गोसाल-(यशस्वी तीर्थंकर), पटना), १९, २३ । १२४। निगराठ नाटपुत्त-(= महावीर), १२५ । मगध-(= विहार प्रांत), १, १४७, १५० । निब्बाण-=-शेष विराग और आवा -(सैंथवार जाति, गोत्र वशिष्ट), १०३, गमन रहित निर्वाण), ५५, १३३ । ११६, १२०, १२१, १३६, १४७, १४९, नेरञ्जरा-(= वर्तमान निलाजन, जि. (पावा के मल्ल) १४९, १५२ । गया), ६७। महाकस्सप-(पावा और कुसिनारा के पकुध कञ्चायन-(एक यशस्वी तीर्थंकर) बीच में), १४३ । १२५। महानगर-११७ । परिवास-(=परीक्षार्थ वास), १२७ । महापदेस-(= कसौटी)८२ । पाटलिगाम-(= पटना), २३, २६, ३० । महावन-(=मुजफ्फरपुर के आस पास पावा-(= पडरौना के पास 'पपउर'), के वन) ७७ । ८६, ९२। महावन-कूटागार शाला-(बखरा, पावारिक-अम्बवन-(=प्रावारिक-श्रान जि० मुजफ्फरपुर) ७७ । वन)१९। महासुदर्शन-(= कुशावती का चक्रवर्ती) पुकस-(एक मल्ल का नाम) ६१ । ११८। पुरण कस्सप-(= पूर्ण काश्यप,प्रक्रिया. महेसक्ख-(= एक शक्तिशाली देवता वादी तीर्थंकर), १२४ ॥ का नाम), २८। बाराणसेय्यक-(= बनारसी वस्त्र), ६४, मातिका-धर-(अभिधर्म के पण्डित ), ८४,८५॥ बुद्ध-गुण-३६ । मार--(= कामदेव) ५३-४ । बुद्ध-सिद्धान्त-७८। मारो पापिमा-(= पापी कामदेव) ५५ । बौद्ध तीर्थ-(चार दर्शनीय स्थान),१०८। मिथुभेद-(आपस में फूट) ८ । ब्रह्मचरिय-(= बौद्धोपदेशित सदाचार), यथार्थ पूजा-१०५ । ५८। यमक साल-(= जुड़वे शाल वृक्ष), ब्रह्म दण्ड-(छन्द भिक्षु को), १२९ । १०४ । भराडुगाम-८०॥ राजगह-(वर्तमान राजगिर, जि० पटना), भूमिचाल (भूकम्प के पाठ कारण),६० १,७२। भोगनगर-(कुसिनारा के रास्ते में), ८२। राजागारक-(अम्बलट्ठिका में) १८ । मकुट-बन्धन-(वर्तमान् रामाभार, कसया, लिच्छवी-(= वैशाली के वजीगण) ४४, जि. गोरखपर). १४०-१. १४५ । ४५, १४७, १५१।

Manuman वजी-(= लिच्छवी, मुजफ्फरपुर, चम्पा- सभाभवन), १२०॥ रन और दरभंगा जिले के अधिकारी सम्पजान-(= संप्रजन्य) ४१ । गण)१॥ सम्बोझ-=सात आवश्यक बातें) वस्सकार-(मगध के महामंत्री वर्षकार ब्राहाण)२॥ सम्मा-लम्बुद्ध-(= स्वयम् अच्छी तरह वासिट्टा -मल्लों के गोत्र 'वशिष्ट') जाननेवाले बुद्ध भगवान) २० । ११६॥ सरीर-पूजा-(कुसिनारा में), १४७ । विमोक्खा-(= विमाक्ष आठ) ६६ । संघ-गुण-,४०॥ वेदेहिपुत्त-(= वैदेही रानी का पत्र सानन्दर चेतिय-(भोगनगर में) ७,८२। अजातशत्रु राजा) १, १४७, १५० । सारिपुत्त-(= बुद्ध के प्रधान शिष्य) १९ । वेलुबन-(राजगृह में) ७३ । सालवन-(कुसिनारा में) ९९ । वेलुवगामक ---(अन्तिम वर्षावास का स्थान) सासन-(= धर्म) ८२। सीहनाद-(= सारिपुत्र का सिंहनाद) वेसाली-(= बसाढ़, जि० मुजफ्फरपुर) २०॥ ७, ४१, ५२, ५३, ७४-५, ७७, १४७, सुकर-मद्दव-(= सुअर का मांस १५१॥ शूकरकन्द का पाक)८७ ॥ वैशाली-दर्शन-८०। सुनिध-(= मगध के मंत्री) २८, ३०-३ । सञ्जय बेलट्ठपुत्त-(= एक अनिश्चित सुभद--(= वृद्ध भिक्षु) १४४, (परिव्राजक) वादी तीर्थकर). १२५ ॥ १२२ । सति-(= स्मृति) ४१ । स्तूप निर्माण-(अस्थियों का) १४७ । सत्तपरिण गुहा-(= सप्तपर्णी गुहा, स्तूप बनाने योग्य-१११ ॥ जहाँ बौद्धों की प्रथम सभा हुई थी, राजगृह स्त्रियों के प्रति बर्ताव-१०६ । में), ७३ । हिरञ्जवती-(= वर्तमान् सानानाला, सन्धागार-(कुसिनारा के मल्लों का कुसिनारा के बगल में) १०३ । या BLISHES

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Mul Pali Mahaparinirvadh Sutra

Author
Bhichu Kittima
Title
Mul Pali Mahaparinirvadh Sutra
File name
Mul Pali Mahaparinirvadh Sutra
Text
OCR done
Publisher
U Kyaw Zan Akyab Burma
Language
Sanskrit
Pages
171
Library
Central Archaeological Library_asi_new Delhi
Classification
Literature
DLI number
281151
Barcode
5990010902080.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
In public domain
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