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Samrat Ke Aansoo

K. K. Shri Vastava · 2011/03

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सम्राट के आँसू

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सम्राट के आँसू

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श्री के० के० श्रीवास्तव 'केवल' द्वारा लिखी गयी पुस्तक 'सम्राट के आँसू' एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रकृति का एकांकी है। इस एकांकी में सम्राट अशोक के जीवन मे हुए उतार-चढ़ाव का जिस प्रकार चित्रण किया गया है, वह अत्यन्त रोचक है । यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि सम्राट अशोक का जीवन बडा ही रोमांचक और रहस्यपूर्ण रहा है। अशोक एक क्रूर शासक था तथा किंवदन्तियों एवं गाथाओं के अनुसार उसने अपने 99 भाइयों एवं 500 मंत्रियों का वध करके राजगद्दी पर अपना अधिकार जमाया था परन्तु इस क्रूरता के पीछे ऐसा कौन-सा कारण था, इसका उल्लेख इस एकांकी में किया गया है। यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि कलिंग विजय के बाद सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तित हो गया और उसके हृदय में जनता के प्रति प्रेम और वात्सल्य की भावना उमड़ पड़ी। इसी के बाद उसने बौद्ध धर्म को ग्रहण करके उसके प्रचार एवं प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। परन्तु कलिंग युद्ध के पश्चात सम्राट अशोक के हृदय परिवर्तन के लिए ऐसा कौन-सा कारण था, क्या कलिंग विजय अपवा कलिंग की जनता का बलिदान अथवा कलिंग की सेना और जनता का कत्लेआम। इन प्रश्नों का उत्तर वैज्ञानिक आधार पर ढूंढ़ने का प्रयास इस एकांकी में किया गया है। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को स्वीकार करके तन-मन-धन से उसकी सेवा की, परन्तु क्या वह भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और उपदेशों को अपने जीवन में अंगीकार कर सका, क्या वह अहिंसा का पुजारी बन सका, आदि आदि ऐसे प्रश्न हैं, जिनका मार्मिक मनोचित्रण इस एकाकी में किया गया है। संक्षेप में आज के साम्प्रदायिक माहौल में यह एकांकी एक अनूठी कृति मावित हो सकता है, क्योकि इस एकांकी में इस बिन्दु पर भी विचार व्यक्त किया गया है कि धर्म क्या है ? लेखक के विचार से जब सभी धर्मों का जन्मदाता मानव है और इन धर्मों का उद्देश्य मानव विकास एवं प्रगति है तब फिर धार्मिक अन्तद्वन्द्व का क्या तात्पर्य है ? मेरे विचार से यह एकांकी एक उत्कृष्ट सामाजिक एकांकी है, जिनमें काम, क्रोध,माया, मोह, मुख तथा दुख आदि पर गहनतम चर्चा की गयी है। अतः इस एकांकी

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मैंने श्री के० के० श्रीवास्तव 'केवल' द्वारा लिखित ऐतिहासिक एकांको 'सम्राट के आंसू' को प्रतिलिपि का अवलोकन किया है । इस एकाकी मे सम्राट अशोक के जीवन का जो संक्षिप्त चित्रण किया गया है, वह एक ऐतिहासिक महत्त्व का बिन्दु है। इस एकाकी में बड़े सजीव ढंग से यह दर्शाया गया है कि कलिंग युद्ध में सम्राट अशोक को क्या मिला, उसका हृदय परिवर्तन कैसे हुआ और उसने बौद्ध धर्म को क्यों स्वीकार किया। इन प्रश्नों के कुछ मौलिक उत्तर ढूंढने का प्रयास किया गया है । इसके बाद में सम्राट अशोक के जीवन मे क्या हुआ, क्या वह पूर्णतया बौद्ध धर्म की शिक्षाओं एवं उपदेशों को अंगीकार कर सका, यदि नही तो क्यों ? इस धर्म की प्रगति के लिए उसने क्या-क्या किया और उसके क्या परिणाम हुए? उसके नैतिक आदर्शों का अनुसरण लोगों ने किस हद तक किया, इन समस्याओं पर भी महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह एकांकी आज के सन्दर्भ में बहुत उपादेय सिद्ध होगा। अतः इस एकांकी के प्रकाशनार्थ आर्थिक व्यवस्था करने की संस्तुति करता हूँ, साथ ही श्री के० के० श्रीवास्तव 'केवल' से यह आशा भी करता हूँ कि वह भविष्य में भी ऐसी सामाजिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व की रचनाओं को लिखने में अपना योगदान प्रदान करते रहेंगे। डा० श्याम मनोहर मिश्र रीडर प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

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मैंने इस सम्बन्ध मे काफी विचार किया और धर्म वा अधर्म को लेकर कुछ ऐतिहासिक साक्ष्यों को एकत्रित करने की दिशा मे प्रयत्नशाम हो भयोगकाफी शाम और परिश्रम के बाद जो तथ्य प्रकाश में आए, उसके आधार पर हो इस ग्रन्य की रचना की गयी है। इसके अन्दर सम्राट अशोक के जीवन के उस भाग को एकाकी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, जहाँ मे उसमें परिवर्तन होना शुरू हुआ और उसने धर्म और अधर्म की परिभाषा का विश्लेषण करने के बाद कौन-सा मार्ग अपनाया, उसी का चित्रण इस सक्षिप्त रचना में किया गया है। जैसा कि विदित है कि सम्राट अशोक हमारे इतिहास के स्वर्णाक्षरों में लिखा गया एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिसे वास्तव न तो सम्राट की उपाधि से विभूपित किया जा सकता है और न ही एक सिद्धि प्राप्त संन्यासी की उपाधि दी जा सकती है । सम्राट अशोक ने अपने जीवन में पाप भी किए, इसलिए किए कि वह सम्राट था। वैसे भी सम्राट का यह जन्मसिद्ध अधिकार होता है कि वह युद्ध करे, अपने राज्य का विस्तार करे, अपने राजकोष में वृद्धि करे तथा अपने महल में सुन्दरियों की एक पूरी फौज रखे । इसलिए सम्राट अशोक ने पूर्व काल में राज्य प्रसार के अन्तर्गत जो कार्य किए उसे पाप नहीं कहा जा सकता। परन्तु सम्राट अशोक के जीवन पर एक सूक्ष्म दृष्टिपात करने पर यह विदित हुआ कि वास्तव में सम्राट अशोक ऐसे कार्य करने के लिए बाध्य किया गया था। सम्राट अशोक का जन्म 297 ई० पू० में हुआ था। वह राजा बिन्दुसार का 'पुत्र था। बचपन से ही वह अत्यन्त कुरूप था, यही कारण था कि उसके भाई उससे घृणा करते थे और उसे सदैव नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। परन्तु इन सब की परवाह न करते हुए उसने शिक्षा-दीक्षा में रुचि दिखाई और शास्त्र विद्या में निपुणता प्राप्त कर ली। परिणामतः बुद्धि के क्षेत्र मे वह अपने सभी भाइयों से श्रेष्ठ निकल गया। उसके ज्ञान एवं तर्क शक्ति से विन्दुसार काफी प्रभावित हुए और उन्होने उसे अवंति राष्ट्र एवं गंधार का राज्यपाल नियुक्त कर दिया। बिन्दुसार के परम्परानुसार 101 पुत्र पे। इन सबमें सुसीम सबसे बड़ा पुत्र था। मुसीम अशोक से सबसे ज्यादा नफरत करता था। यही नहीं जब से बिन्दुसार ने उसे गवर्नर नियुक्त कर दिया था, तब से वह उसे अपने रास्ते का कोटा समझने लगा था। फलतः उसने मंत्रियों से मिलकर उसकी हत्या का पड्यन्त्र रचना शुरू कर दिया। विन्दुसार मृत्यु होने के कुछ समय बाद ही सुसीम ने अशोक के राज्य पर आक्रमण कर दिया और योजनानुसार उसके वध का प्रयास किया जाने लगा। परन्तु सम्राट अशोक ने न केवल बड़ी ही बुद्धिमता से अपनी रक्षा की वरन् इस युद्ध को निर्णायक मोड़ देते हुए युद्ध जीत लिया। इस युद्ध में सुसीम मारा गया। सुसीम को हार और उसकी मृत्यु का समाचार मिलने पर उसके अन्य सभी भाइयों ने इस हार का बदला लेने का निश्चय किया और अपनी विशाल सेना के साथ रणभूमि में जा पहुंचे। अशोक ने जव अपने 10 सभी 99 भाइयों को विशाल सेना के साथ रणभूमि में देखा तो परेशान हो उठा और उसके मामने बडी ही असमंजसपूर्ण स्थिति विद्यमान हो गयी। उसकी समझ में नहीं मा रहा था कि इनसे युद्ध करे अथवा आत्मसमर्पण कर दे। परन्तु जब उसके विश्वस्त मश्रियो ने अवगत कराया कि यह सभी उसके रक्त के प्यासे वनकर उसकी हत्या कर देना चाहते हैं तब उसके समक्ष दो प्रश्न उपस्थित हो उठे। प्रयम या तो मृत्यु को गले लगाने के लिए आत्मसमर्पण कर दे अथवा युद्ध करते हुए रणभूमि मे वीरगति प्राप्त करे। उसके समक्ष हर स्थिति मे मृत्यु निश्चित थी। अतएव उसने अन्त में यही निर्णय किया कि वह इस विशाल सेना से युद्ध करेगा। इस निर्णायक युद्ध में अशोक को मुट्ठी भर सेना ने जिस साहस और बुद्धि मे युद्ध किया, उसके समक्ष विपक्षियो की मेना टिक न सकी और उसके पैर उखड़ने लगे। कुछ दिनों के युद्ध वाद ही अशोक की विजयघोष गूंज उठी और इस युद्ध में अशोक विजयी हो गया। परन्तु जब यह युद्ध समाप्त हुआ तो विदित हुआ कि उसके सभी भाई इम युद्ध में मारे गए है, तब वह अर्द्धविक्षिप्त-सा हो उठा और उसका चेहरा क्रूरता से भर उठा। हालांकि अशोक अपने पितामह चन्द्रगुप्त और पिता विन्दुसार के आदर्शों एव उनके चरणचिह्नों पर चलना चाहता था और उसी के अनुरूप राज्यपाल के रूप में जनता की सेवा भी कर रहा था, परन्तु जब उसे अपने भाइयों के इरादो का पता चला तब उसने जैसे अन्तिम निर्णय किया और युद्ध मे विजय प्राप्त करने के बाद वह एक क्रूरतम शासक के रूप में प्रख्यात हो गया। चूंकि अब वह बिन्दुसार का एकमात्र वारिस वचा था अतः उसी का राज्याभिषेक किया गया और अशोक अब सम्पूर्ण देश का सम्राट बन चुका था। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अपनी हत्या के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने और अपने भाइयों को प्रोत्साहित करने के आरोप मे लगभग 500 मत्रियो/पार्षदो को जलती आग में फिकवा दिया। इसके साथ ही उसने देश की सीमा के विस्तार का कार्य शुरू कर दिया। देखते ही देखते कश्मीर से कन्याकुमारी तक एवं पश्चिम मे हिंदुकुश से लेकर ईरान की सीमा तक उमका राज्य फैल गया। कहा जाता है कि अशोक की खूखारता, क्रूरता और वहशीपन से पडोसी राज्य इतने आतंकित हो गए थे कि उन्होने बिना किसी प्रकार का युद्ध किए ही उसकी अधीनता को स्वीकार कर लिया। परन्तु सम्राट अशोक के देश की सीमा से लगा एक छोटा-सा राज्य था कलिंग। इस छोटे से राज्य पर सम्राट अशोक की आतकवादी एव खूखार सेना ने अनेकों बार आक्रमण किया परन्तु हर वार उसे पराजय का मुख देखना पड़ा । सम्राट अशोक को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर कलिंग मे ऐमा क्या है, जो वहाँ उसे सदैव पराजय ही हाथ लगती है। इसी मध्य उसे यह जानकारी मिली कि कलिंग नरेश भूगेन्द्र के साथ ही उसकी रानी पद्मिनी अत्यन्त साहसी और बहादुर है और देश की रक्षा के लिए सेना के साथ हा जनता मा महत्वपूर्ण मामकाानभातारू पशप रूप से रानी पद्मिनी और उसके रूप-लावण्य की भूरि-भूरि प्रशंसा उसके समक्ष की गयी तो वह उसे पाने के लिए लालायित हो उठा। इसके साथ ही उसने एक विशाल सेना कलिंग की रणभूमि पर उतार दी। इस निर्णायक युद्ध में अशोक ने कलिंग पर अपनी खूखारता और क्रूरता की तमाम सीमाओं को लांघ कर अपनी विजय पताका फहरा दी । कहा जाता है कि इस युद्ध मे सैनिकों से अधिक देशप्रेमी जनता जनार्दन का कत्लेआम किया गया और लाखो देशप्रेमियों को गिरफ्तार करके यातनागृह मे डाल दिया गया। बहरहाल इस युद्ध में जो कुछ भी हुआ एक सम्राट होने के नाते, अशोक की भर्त्सना नहीं की जा सकती क्योंकि युद्ध और विजय पताका फहराना सम्राट का जन्मसिद्ध अधिकार होता है। परन्तु इस कलिंग युद्ध में जो कुछ भी हुआ, उसे यदि बुरा नहीं तो अच्छा भी नहीं जा सकता। परन्तु इस कलिंग युद्ध में विजय पताका फहराने के बाद जिस वास्तविकता का ज्ञान उसे हुआ, उससे उसका सारा अभिमान चूर-चूर हो उठा और एक बार पुनः वह अर्द्धविक्षिप्त-सा हो उठा। यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है कि कलिंग विजय के वाद सम्राट में क्यों और कैसा परिवर्तन आया। इसी बिन्दु पर मैंने इतिहास के कुछ पन्नों को पलटा और चिन्तन मनन करने के बाद जो कारण ज्ञात हुआ, उसी को एकांकी रूप में प्रस्तुत किया है। इस सम्बन्ध में यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि इस एकांकी के तारतम्य में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः इस सम्बन्ध में किसी प्रकार की ऐतिहासिक चुनौती दिए जाने का कोई प्रश्न नहीं उठता क्योकि यह मात्र ऐतिहासिक साक्ष्यो के आधार पर तैयार किया गया एक काल्पनिक एकांकी है । फिर इस एकांकी को और भी उत्कृष्ट बनाने के लिए मैं अपने प्रिय पाठकों/ गणमान्य विद्वानों के विचारों का स्वागत करूँगा और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहूँगा, जिससे कि भविष्य मे ऐसी सामाजिक रचनाएं समाज के समक्ष प्रस्तुत कर सकू। चूंकि यह एक ऐतिहासिक एकांकी है अतः वर्तमान समय में यह किसी धर्म, जाति अथवा व्यक्ति विशेष पर लागू नहीं होता है। यदि इस एकांकी में किसी भी वर्ग को किसी प्रकार को ठेस पहुंचती है, तो उसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं होगा। वैसे प्रयास यही किया गया है कि इससे किसी धर्म, जाति अथवा जाति के उरवर्ग को किसी प्रकार ठेस न पहुंचे और आपस में एक सद्भावपूर्ण माहौल बनाकर एक नये धर्म की रचना मे युवावर्ग एवं प्रबुद्ध वर्ग योगदान प्रदान करे, जिससे आज की गिरती हुई नैतिकता को पुनः उठाया जा सके और धर्म जातिवर्ग के आधार पर फैल रही सांप्रदायिकता से देश को बचाया जा सका। और यह कार्य तभी सम्भव हो सकता है जब शासक और जनता का समान रूप से योगदान प्राप्त हो । यहाँ यह कहना 12 अतिशयोक्ति न होगा कि धर्म जाति/वर्ग/उपवर्ग कोई भी मानवता मे ऊपर नही उठ सकता क्योकि सभी धर्मों जातियो/वों एवं उपवों का निर्माता मानव ही है। यदि इस पृथ्वी पर मानद न होता तो न तो धर्म होता और न ही जाति और न ही वर्ग । फिर जव मानव ही समस्त धर्मों का उत्पत्तिकर्ता है, तब धर्म की दासता क्यों ? क्यों न धर्म का मूल्याकन मानव के कर्म से किया जाए और कर्म को उच्च दर्जा प्रदान किया जाए, जिससे मानव धर्म की अपेक्षा कम में विश्वास करें। खैर, यह तो आने वाला युग ही बता सकता है कि क्या भारत जैसे शांतिप्रिय देश की पावन भूमि पर पलने वाली जनता धर्म की दासता स्वीकार करेगी अथवा नहीं। यहाँ पर सम्राट अशोक में कलिंग युद्ध के फलस्वरूपहुए परिवर्तन की एक छोटी-सी झांकी के रूप मे इस एकांकी को आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा है मेरी यह प्रथम कृति आपको निश्चय ही पसन्द आएगी। मैं अपने प्रिय पाठकों/विद्वानों के विचारो का स्वागत करूंगा, भले ही कड़वे वे हों या मीठे। -के० के० धीवास्तव केवल 4 पहला दृश्य [सम्राट अशोक राजमहल में अपने सिंहासन पर विराजमान थे। उनके दोनों ओर चार खूबसूरत दासियों मोर पंख से बने पंखे झल रही थी। दो दासियां मदिरा को गिलास में डालकर सम्राट अशोक को दे रही थी, जिन्हें सम्राट अशोक बड़ी हो बेदर्दी से पी रहा था। उनके दोनों ओर खूबसूरत नवयौवनाएं बैठी हुई है, जिनके शरीर पर नाम मात्र के वस्न थे। परन्तु सम्राट अशोक अन्य दिनों की अपेक्षा आज काफी गंभीर हैं और किसी गहरे सोच विचार में डूबे हुए थे । उनको गहन्तम सोच विचार मे डूबे देखकर उन नवयौवनाओं में से एक ने कहा-"राजन्, आज आपको क्या हो गया है जो आप"।"] अशोक : कुछ नहीं। मैं सोच रहा था कि इस बार मुझे कलिंग पर विजय प्राप्त होगी अथवा दासी : अवश्य होगी महाराज "मुझे पूरा विश्वास है कि आपके शौर्य की पताका कलिंग देश पर अवश्य फहरायेगी। अशोक : यही तो हर बार सोचता हूं, लेकिन हर बार मुझे पराजय का मुंह ही देखना पड़ता है । शायद तुम नही जानती कि कलिंग सम्राट भृगेन्द्र कितना शूरवीर है। सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि जितना वह सुन्दर एव शूरवीर है उससे अधिक कही अधिक उसकी रानी सुन्दर है। काश एक बार मुझे मिल जाती तो मैं अपने जीवन को धन्य पा जाता। दासी : (मुस्कुराते हुए)--ओह यह बात है । क्या महाराज हममें कोई दोष है ? अशोक : नही यहाँ बात गुण दोष की नही बल्कि अपने शत्रु राजा की सुन्दर रानी को पाने की है। [अभी सम्राट अशोक की यह वार्ता चल ही रही थी कि द्वारपाल ने आकर सूचना दी कि सेनापति जयदत्त आपसे मिलना चाहते हैं । अशोक : उन्हें तुरन्त मेरे सामने हाजिर किया जाए। [कुछ ही देर मे सेनापति जयदत्त कक्ष मे प्रवेश करता है और सम्राट अशोक के सामने जाकर अभिवादनोपरान्त एक ओर खड़ा हो जाता है।]

14/ सम्राट के आंसू अशोक : कहो सेनापति क्या खबर लाए हो? जयदत : महाराजाधिराज कलिंग पर हमारा अधिकार हो गया है. अब आप वहां के स्वामी हैं और अशोक : क्या कहा "एक बार फिर कहो "क्या हमने कलिंग पर विजयी हासिल कर ली है। जयदत्त : हाँ महाराज कलिंग पर हमने पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है और कलिंग नरेश भृगेन्द्र रणभूमि छोड़कर भाग गया है । अशोक : विश्वास नही होता सेनापति, इतना शूरवीर योद्धा रणभूमि में पीठ दिखाकर भाग निकलेगा। जयदत्त :जो सत्य है महाराज, वह सत्य ही रहेगा । अब आपका सम्पूर्ण भारत पर एक- छत्र राज्य स्थापित हो गया है। अशोक : (हर्षातिरेक से) यदि सेनापति तुम्हारी बात वास्तव मे सच हुई तो मैं तुम्हें इतना धन दूंगा कि तुम्हारी सात पुश्तें आराम से बैठकर खाएंगी. यह लो नील- मणि "तुम्हारा उपहार (कहते हुए सम्राट अशोक ने अपने गले में पड़ी रत्नजड़ित बहुमूल्य माला नीलमणि नामक दासी को दे दी) इसी के साथ दूसरी बांहो में झूल रही दासी को अपने हाथ की अगुली से रलजडित अंगूठी उपहार स्वरूप उसे देते हुए यह घोषणा कर दी कि कलिंग विजय के अवसर पर पूरे राज्य में खुशियां मनायी जाएँ 'घर-घर दिए जलाकर हमारे वीर योद्धाओं का स्वागत किया जाए। हाँ सेनापति, हम तुम्हारी वीरता और साहस से अत्यन्त प्रसन्न हैं, बोलो तुम्हें क्या चाहिए। जयदत्त महाराज मुझे बस आपका आशीर्वाद चाहिए। अशोक सेनापति मेरा आशीर्वाद तो सदैव तुम्हारे साथ है। तुम आज अपने लिए भी कुछ मांग लो। जयदत्त : महाराज आपके आशीर्वाद से सब कुछ तो है फिर क्या मांगें। जब आवश्यकता होगी, आपसे मांग लूंगा। अशोक : खर, तुम्हारी इच्छा मैं इसी समय कलिंग का निरीक्षण करना चाहता हूँ। जयदत:पया इसी समय । अशोक: हाँ इसी समय और अभी। जयदत्त : लेकिन महाराज इस समय तो रात्रि का पहला पहर व्यतीत हो चुका है। अशोरु :हा"हा"हा"रात्रि "तुम मूल रहे हो सेनापति इस पूरे देश का केवल में ही मासक हूं. देयो आकाश में देखो"इस विजयपी से खुश होकर चांद भी कलिंग भूमि के दधन कर रहा है. उसने हमारे लिए भी रास्ते के अन्धकार को दूर भगा दिया है."चलो सेनापति मैं इसी समय कलिंग के दर्शन करना चाहता .. .. ।

जयदत्त : जैसी आज्ञा महाराज । अशोक : (चौंकते हुए)-अरे सेनापति एक बात तो बताओ। जयदत्त : आज्ञा कीजिए महाराज । अशोक : कलिंग नरेश अकेले ही भागा है अथवा उसके साथ। जयदत्त : जी महाराज मेरे शूरवीर सैनिकों ने इतना मौका ही नहीं दिया कि वह महल में जाकर धन सम्पदा ले सकता। अशोक : तब तो उसकी रानी स्वप्न सुन्दरी पद्मिनी महल में ही होगी। जयदत : अवश्य होनी चाहिए महाराज । [रणभूमि में चारों ओर लाशों का अम्बार नजर आ रहा था। रात्रि के 1 बजे थे । आकाश में चांद अपना पीला प्रकाश चारों ओर बिखेर रहा था। कही-कही से चमगादड़ों की खूखार कर्कश आवाजें गुंजरित हो रही थी तो कभी-कभी सियार तथा अन्य हिंसक जन्तुओं की भयावनी कर्कश आवाजें वातावरण को दहला रही थी। उन लाशों में कुछ ऐसे भी अभागे थे, जिनको अभी तक मौत ने अपने आगोश में नहीं समेटा था। फलतः उनकी कराहती दर्दनाक आवाज से वातावरण और भी भयावह हो उठा था । कही-कही से मरते हुए व्यक्तियो द्वारा पानी मांगने की आवाजें वातावरण में गुजायमान हो रही थी। ऐसे समय में सम्राट अशोक लाशों के ऊपर खड़े होकर ठहाके पर ठहाके लगाता जा रहा था-"हा"हा"हा"है और कोई इस धरती पर जो सम्राट अशोक को चुनौती दे सके "हो"'हा''हो' अव कोई नहीं है अब तो इस संपूर्ण धरती पर मेरा एकछत्र राज्य हो चुका है 'हाहाहा! इस समय सम्राट अशोक का खूखार चेहरा तमाम पैशाचिक अलौकिक शक्तियो से भर उठा था। आँखें अंगारो की तरह दहक उठी थी, जिसे देखकर सेनापति भी भयभीत हो उठा । कुछ देर तो वह आश्चर्यमिश्रित नजरों से खूखार हो उठे अशोक के चेहरे को देखता रहा फिर बोला-"राजन ''आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है आपको इस समय आराम की जरूरत है ।"] अशोकः (ठहाका लगाते हुए) आराम"हाहाहा । जयदत्त : महाराज इधर आपने कई दिनों से आराम नहीं किया है। अशोक : सेनापति आराम तो अब जिन्दगी भर करना है. अब है भी कोन इस धरती पर जो हमारे आराम करने मे दखलन्दाजी करे''अब तो मैं आकाश में चमकने वाले चांद सितारों और दावानल उगलते सूरज को भी आदेश देता हूं कि वह मेरी आधीनता स्वीकार कर लें अन्यथा"हा "हाहा । जयदत्त : महाराज आपका विचार सही है. लेकिन अशोक : लेकिन क्या मैंने क्या कहा है सुना नहीं।

16/ सन्नाट के आँसू जयदत : सुन लिया है राजन् ! अशोक : (उन्मादित होकर)कालिग नरेश भाग गया है क्यों सेनापति । जयदत्त :जी महाराजा अशोक : तुम्हें याद है मैंने क्या कहा था । जयदत्त : मुझे याद है महाराज'लेकिन महाराज इस समय... अशोक : ऐ बुजदिल पीठ दिखाकर भागने वाले कलिंग नरेश अब देखना मैं तेरी खूबसूरत रानी को किम तरह अपनी अंकदायिनी बनाता हूं"हा"हा"ही सेनापति कल रात्रि में कलिंग की रानी को मेरे रंगमहल मे हाजिर किया जाए। जयदत्त : जो आज्ञा महाराज । दृश्य परिवर्तन [राजमहल के विशाल कक्षा में सम्राट अशोक स्वर्ण सिंहासन पर आरूढ़ थे। सिंहासन के दोनों ओर 4 दासियों मोर पंख शल रही थी। कुछ ही दूरी पर चार दामियो एक सुन्दर सा मर्तबान लिए खड़ी थी। सिंहासन से कुछ दूरी पर दोनो दिशाओ में मैनिक हाथ मे नंगी तलवारे लिए खड़े थे। कक्ष में सेनापति जयदत्त के साथ ही अन्य पार्षद भी मौजूद थे। अशोक : जैसाकि आप लोगो को विदित हो गया कि हमारा प्रमुख गनु कलिंग नरेश रणभूमि से पीठ दिखाकर भाग गया है। अब सम्पूर्ण कलिग राज्य पर मेरा अधिकार [हध्वनि] भशोक : जैमाकि आप लोगों को विदित है कि कलिंग पर काफी प्रयलों के बाद हमें विजय प्राप्त हुई है, अतः इस अवसर पर हमारा आदेश है कि सम्पूर्ण देश मे खुशियाँ मनायी जाएँ और हर घर मे दीप जलाकर हमारे बहादुर सैनिको का स्वागत किया जाए। हर्षध्वनि] अशोक : आज इसी खुशी के मौके पर यहाँ भी विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। आप सभी गणमान्य सहयोगी इस आयोजन में भाग लेकर आनन्द उठाएं। अशोक की इस घोषणा के साथ ही दासियों गिलासो मे मदिरा ढालकर सभा में उपस्थित पापंदो को देना शुरू कर दिया। कुछ ही क्षणों मे कक्ष में मधुर वाध संगीत गूंज उठा। इमी समय कुछ नतंकियों ने सभाकक्ष में प्रवेश किया और उनका पाश्चात्य नृत्य शुरू हो गया।

सम्राट के आंसू /17 गाना समाप्त होने के बाद सम्राट अशोक नर्तकियों तथा अन्य लोगो को उपहार देकर विदा लेते हैं। दृश्य परिवर्तन : [सभाकक्ष में सम्राट अशोक सिंहासनारूढ़ थे। सिंहासन की एक दिशा में कुछ सिपाही नंगी तलवारें लिए खड़े थे तथा उनसे कुछ ही दूरी पर गणमान्य पार्षद बैठे हुए थे। अशोक : सेनापति कलिंग युद्ध में हुई क्षति, लाभ व हानि का पूरा ब्यौरा सभाकक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। सेनापति : सर्वप्रथम यहाँ यह बता देना उचित होगा कि कलिंग देश एक समृद्धिशाली देश है। वहां की धरती अत्यन्त उपजाऊ है । विशेष रूप से वहाँ पाए जाने वाले भूरे हाथी विशेष उपलब्धि होगी, जिससे न केवल राज्य की आय में वृद्धि होगी वरन् हमारे देश को आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी। [हर्पध्वनि सेनापति : युद्ध में हुई क्षति का ब्योरा रक्षा एवं अर्थ मंत्री विक्रम सिंह प्रस्तुत करेंगे। विक्रम सिंह : महाराजाधिराज एवं सभा में उपस्थित गणमान्य सदस्य, आप सभी को यह जानकर हर्ष होगा कि अब केवल असम राज्य को छोड़कर सम्पूर्ण देश पर सम्राट अशोक का आधिपत्य हो चुका है। महाराजाधिराज के वीर सेनापति एवं उनके नेतृत्व की सेना ने जिस वोरता से कलिंग युद्ध लड़ा तथा उसमें विजयश्री हासिल की, उसके लिए सेनापति जयदत्त बधाई के पात्र हैं । [हर्पध्यनि] विक्रम सिंह : इस युद्ध में अब तक लड़े गए सभी युद्धों में कलिंग देश के सबसे अधिक सैनिक व जनता के व्यक्ति मारे गए । अनुमानतः 1 लाख से अधिक लोग इस युद्ध में मारे गए तथा लगभग इतने ही व्यक्ति घायल हुए है। इसके अतिरिक्त लगभग डेढ़ लाख व्यक्तियों को गिरफ्तार करके विभिन्न कारागारों में बन्दी बनाकर रखा गया है। [हर्पध्वनि अशोक: सैनिकों का कत्ले आम तो ठीक है, लेकिन जनता का कत्ले आम करने की बात समझ में नहीं आयी। विक्रम सिंह : राजन् इसमें हमारे सैनिकों का कोई दोष नहीं है। हमारे सैनिकों का उद्देश्य केवल कलिंग को महाराज के अधीन करना था, न कि जनता का कलेआम करना था। परन्तु जब हमारे बहादुर सैनिकों ने कलिंग पर विजयश्री हासिल कर 18 / सम्राट के आँसू ली तो जनता ने हमारे विरुद्ध विद्रोह कर दिया और हमारे सैनिको पर इंट व पत्थरो की वर्षा कर दी। यही नही बच्चे से लेकर बूढो तक ने हमारे सैनिको के विरुद्ध विद्रोह छेड दिया और उन्हे कलिंग भूमि से खदेडने को कसम खा ली थी। यही कारण था कि जिसके हाथ मे जो हथियार आया उससे वे युद्ध करने निकल पडे । हमारे सेनापति ने उन्हे समझाने का पूर्ण प्रयाम किया परन्तु वे नाकामयाब रहे । अन्ततः हमारे सैनिकों को विद्रोह शान्त करने के लिए कलेआम करना पड़ा, जिसके लिए हमारे सेनापति भी कम दुखी नहीं है। अशोक : ओह । विक्रम सिंह : राजन् सबसे दर्दनाक दृश्य विद्रोह शान्ति के बाद उपस्थित हुआ, जिसने कठोर से कठोर दिल इन्सान को भी मोम की तरह पिघला दिया। राजन् विलाप करती माताओ के आंसुओ से मृत बच्चो के शरीर से बहने वाले रक्त धुल गए, सुहागनो ने अपनी चूड़ियाँ तोड-ताटकर अपनी कलाइयो को लहूलुहान कर लिया वहीं बहनें अपने भाइयो को लाशो को देख आँसू बहाकर विलाप करते केवल यही कहती रही.'" कहते-कहते विक्रम की आँखों से बरबस ही आँसुओं की कुछ बूंदें टपक पड़ी। अशोक : विक्रमसिंह 'यह मैं क्या देख रहा हूँ"सम्राट अशोक के मंत्री की आँखों में आंसू..। विक्रम सिंह : हाँ सम्राट."उस दृश्य को स्मरण करते ही अशोक : दृश्य चाहे जैसा भी हो, एक मंत्री होकर आंसू बहाना सम्राट अशोक का अपमान करना है। विक्रम सिंह : सम्राट" .."आंसू छोटे बड़े को नहीं देखती । इन आँसुओं पर किसी का कोई अधिकार नहीं होता। फिर यही मन के भावों को अभिव्यक्ति करते हैं। अशोक : तो यह आंसू किन भावों की अभिव्यक्ति कर रहे हैं । विक्रम सिंह : सम्राट क्षमा हो''यह आंसू उन कलिंग योद्धा बालकों के लिए हैं, जिन्होने अपनी धरती मां की रक्षा करते-करते अपने प्राणो की आहूति दे दी। अशोक : (विधाड़कर) -क्या बकते हो विक्रम..." विक्रम सिंह : महाराज आप भले ही मेरी आवाज को अपनी तलवार से दबा लें, लेकिन उन सैकडों निरीह अबलाओ और वृद्धाओ को आवाज आप नही दबा सकते जिनकी आस्माएं धीत्कार कर रही हैं 'सम्राट अशोक तेरा नाश हो' कहते-कहते विक्रम सिंह फफक उठे। अशोक : आज तुम्हें क्या हो गया है विक्रम । तुम्हारे जहरीले तोर सरीसे शब्दो से मेरा दिल छिया जा रहा है "कही इनमे ज्वाला न भडक उठे। विक्रम सिंह : काश महाराज इनसे ऐसी ज्वाला भड़के, जिसमें हम सब जलकर राख हो जाएँ। ..

. अशोक : (चीखकर) विक्रम विक्रम सिंह : सम्राट"इस तरह चीखने अच्छा तो यहा होता कि आप स्वयजा उन दीन-दुषियों को देखें और मुनें । अगर वास्तव में आपके अन्दर हृदय नाम की चीज है तो अशोक : ठीक है विक्रम तुम्हारी इस आखिरी ख्वाहिश को हम इसी समय पूर्ण करते हैं। यही नहीं जो नंगा येल कलिंग को भूमि पर खेला गया है, वही नंगा सेत वहाँ की रानी पद्मिनी के साथ उसी राजमहल में खेला जाएगा। तब देखूगा तुम्हारी ममता, दया भावना और इस उत्तेजक मापण का अन्त !"हा"हो"हो " सेनापति जयद्रथ हमारे इसी ममय कलिंग प्रस्थान की व्यवस्था की जाए। जयद्रथ : जैसी आज्ञा कलिंग युद्ध भूमि में चारों ओर ताशें ही लाशें नजर आ रही थी। वहीं कालिए देश की सड़कों, गली कूचों में इधर-उधर लाशों का सैलाव-सा नजर आ रहा था। जगह-जगह नवविवाहिताएं, वृद्धाएं ओर कुमारियों का हुजूम इकट्ठा होकर बिलाप कर रहा था। रह रहकर उनको उखड़ी सांसों से एक ही शब्द गूंजता है- "सम्राट अशोक तेरा नाश हो।" ऐमे समय में मम्राट अशोक का स्वर्णजटित रथ उन सड़कों पर जा पहुंचा। और सड़कों पर बिखरे बच्चों वृद्धों के शवों को देखकर वह आश्चर्यमिश्रित स्वर में कहता है - नापति यह मैं क्या देख रहा हूँ। इन बच्चों और असहाय वृद्धों की लाशें "वया यह यथार्थ में अपनी धरती मां की रक्षा के लिए शहीद हुए हैं।] जयदत्त : राजन यह युद्ध है और युद्ध में शत्रु देश के लिए देशभक्ति का कोई मूल्य नहीं होता । आप देकार परेशान न हों। इन लोगों ने सम्राट अशोक के विरुद्ध विद्रोह करके उनके सैनिकों से संघर्ष किया था, जिसका परिणाम भी तो इन्हें भुगतना पा। अशोक : यह तो मैं भी जानता हूँ जयदत्त 'लेकिन इन वृद्धाओं के मुख से निकलने वाली अभिशप्त वाणी"नवविवाहितों की लहूलुहान कलाइयाँ सेनापति मेरा मन डूबता-सा जा रहा है "मुझे तत्काल कलिंग नरेश के महल ले चलो"यहाँ मैं इसी समय रानी पद्मिनी से मिलना चाहता हूँ। অবরে : লা সায়া পারি ? यह मायंकाल का समय था और सूर्य पश्चिम दिशा की गहराइयों में आराम करने के लिए प्रवेश कर चुका था। सुदूर आकाश में लाल रंग बिखेरती किरणे किसी खूनी आपदा को परिचायक-सी बन उठी थी। रह-रहकर सम्राट अशोक की नजरें पश्चिम दिशा के डूबते सूरज की ओर जा टिकती पी। धीरे-धीरे कलिंग को रणभूमि में देखा गया दृश्य वह भूलता-सा गया और पश्चिम दिशा में विद्यमान 20/ सम्राट के आँसू .. खूनी आभा को देखकर उसकी आंखें भी रक्तिम हो उठी और बरबस ही खूबसूरत पद्मिनी का चेहरा उसकी आंखों के सामने नाच उठा । कुछ ही देर में उसका रथ कलिंग नरेश के महल में जा पहुंचा। महल पहुंचकर उसने जो दृश्य देखा उससे उसे एक बार पुनः चौंकना पड़ा। महल के बीचोबीच में एक चिता जल रही थी। उस चिता के पास सजी- संवरी एक स्त्री खडी थी, जिसकी आंखों से अविरल आंसुओं की धारा बहती जा रही थी। उसके निकट ही कुछ और भी स्त्रियां सजी-संवरी खड़ी थी, जिनकी आंखो से भी आंसू बह रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह सभी स्त्रियां किसी विवाह-संस्कार में उपस्थित होकर किसी की विदाई कर रही हो। अशोक : सेनापति यह क्या हो रहा है। जयदत्त : मुझे खुद भी आश्चर्य हो रहा है सम्राट ! अशोक : कही ऐसा तो नहीं कि रानी पद्मिनी आत्मदाह करने जा रही हो। जयदत्त : उनका सजा-संवरा रूप "जलती हुई चिता' सम्राट यह तो इसी तथ्य की पुष्टि कर रहा है। अशोक : लेकिन यह चिता किसकी हो सकती है। जबकि तुमने तो कहा था कि कलिंग नरेश भृगेन्द्र रणभूमि छोड़कर भाग निकला है। जयदत्त : मैंने सच कहा था सम्राट् ! मुझे खुद भी आश्चर्य है कि यह चिता किसकी हो सकती है। [इसी समय स्वप्न सुन्दरी पद्मिनी की नजर महल मे प्रविष्ट हो गए रथ एवं उस पर सवार सम्राट अशोक एव सेनापति पर पड़ती है। सम्राट अशोक को देखते ही उसके होंठ हिल उठते हैं।] पद्मिनी : आ गए अशोक सम्राट के नाम पर कलक का बदनुमा.धब्बा। अशोक : (चीखते हुए) ऐ बदजुवान रानी पद्मिनी, अपनी जुबान को लगाम दे अन्यथा पद्मिनी : (हसते हुए) क्या करोगे अब तुम "जो करना था वह कर चुके "कलिंग की जनता का नरसंहार करने के बाद भी क्या अभी रक्त की प्यास नहीं भरी है जो इस महल मे चले आए। अशोक : (नम्र स्वर में) रानी पद्मिनी, जो कुछ हुआ उसके लिए मुझे स्वय भी काफी पश्चाताप है। पद्मिनी : जय तुम्हें पश्चाताप ही था तो यहाँ किसलिए आए हो। अशोक : केवल तुम्हारे लिए पद्मिनी । शायद तुम नही जानती कि जब से मैंने तुम्हे देखा है"हर पल तुम्ही मेरी नजरों के सामने विद्यमान रहती हो."स्वप्नसुन्दरी पता नहीं कब से मैं तुम्हे पाने के लिए तड़प रहा हूँ। अब में सम्राट अशोक तुम्हे । ..

सम्राट के आंसू /21 अपने दिल की रानी का खिताब देना चाहता हूँ। 'पद्मिनी (उपहास भरे स्वर में) ओहो ! सम्राट अशोक कही पागल तो नहीं हो गया . .. अशोक : हाँ.."हाँ"मैं पागल हो गया हूं स्वप्न सुन्दरी । बस तुम एक बार मेरे दिल की रानी बनना स्वीकार कर लो। 'पद्मिनी : (एकाएक कोध से फुफकारती हुई) मूर्ख सम्राट, तुम शायद यह भूल गए हो कि एक विवाहिता स्त्री अपने जीवन में किसी दूसरे को प्यार नहीं करती। शायद तुम अपनी औकात भी भूल गए हो कि तुम किस तरह से इतना बड़ा पद हासिल कर सके हो । अपने भाइयों के रक्त से टीका लगाने वाले अधर्मी सम्राट अशोक 'कलिंग की रानी में अपनी लाज बचाने की क्षमता है । तुम प्यार की बात करते हो""अगर तुममें पुरुषत्व है तो मेरे शरीर का स्पर्श मात्र कर लो। अशोक : रानी पद्मिनी, बेकार जिद करने से कोई फायदा नही है । वैसे भी अब मैं यहाँ का शासक हूँ."जहाँ तक तुम्हारे पति की बात है अगर उसमें गैरत नाम की चीज होती तो अवश्य ही तुम्हारी रक्षा के लिए आता और इस प्रकार पीठ दिखाकर न भागता। 'पद्मिनी : हाँ.. मुझे अपने पति की इस क्रिया पर अफसोस तो था... "लेकिन अब नहीं। जानते हो यह चिता किसकी जल रही है। अशोक : मैं स्वयं उत्सुक हूं रानी पद्मिनी। 'पद्मिनी : नेपाल नरेश भृगेन्द्र अर्थात मेरे देवतुल्य पति की मेरे पति ने आत्महत्या कर ली है । जहाँ तक रणभूमि से भागने की बात है 'चूंकि आपके सैनिक उन्हें जिन्दा गिरफ्तार करना चाहते थे और वे उनके हाथ में आना नहीं चाहते थे, इसीलिए उन्होने महल मे आकर अपने हाथों से अपना सिर काट डाला। 'अशोक : (हंसते हुए) यह तो और भी अच्छी बात है । जो काम में स्वयं करना चाहता था वह उसने ही कर डाला । अव तो हमारे और तुम्हारे बीच कोई दीवार नहीं रह गई है। 'पद्मिनी : यही तो तुम्हारा भ्रम है सम्राट अशोक । अशोक : भ्रम नही यथार्थ है रानी! कहते हुए अशोक रथ से उतरकर उसकी ओर बढ़ने लगा। 'पद्मिनी : जिसे तुम यथार्थ समझ रहे हो सम्राट अशोकवही तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप सिद्ध होगा'"आ रहे होतो आओ"हम भी देखें कि तुम्हारी भुजाओं में कितनी ताकत है कलिंग की रानी को सोने से लगाने की। अशोक : तुम मेरे पुरुषत्व को चुनौती दे रही हो । पद्मिनी : हा "हा"हा. वुजदिल और हत्यारे सम्राट का पुरुषत्व सुनकर तरस आता है सम्राट अशोक पर"आओ"आगे बढ़ो"हा"हा"हा । ..

22 / सम्राट के आंसू अशोक : घबड़ाओ नहीं कलिंग, सुन्दरी मेरो बाहो में इतनी ताकत है कि तुम जैसी सैकडों रानियो को अपने सीने से लगा सकू। पद्मिनी . ठीक है तो लगाओ सीने से । कहते हुए जैसे रानी पद्मावती ने कोई निर्णय लिया और पागलों के समान ठहाके लगाने लगी। जैसे ही सम्राट अशोक उसके निकट आए और रानी को पकड़ने का प्रयास किया, रानी पद्मिनी ने अचानक कलाबाजी खाई और देखते-ही-देखते अपने पति की जल रही चिता की गोद में जा समाई । चूंकि सम्राट अशोक उसकी इस क्रिया के लिए तैयार नहीं थे, अतः कुछ क्षणी तक तो वह हतप्रभ से देखते रहे । उन्हे यही समझ में नहीं आ रहा था कि कि वह जो कुछ देख रहे हैं वह यथार्थ है अथवा स्वप्न । इसी समय कलिंग की रानी पद्मिनी की आवाज सुनकर चौंक उठे। पद्मिनी : सम्राट अशोक रुक क्यो गएआओ न" मैं तुम्हारे लिए तैयार पडी हूं." क्या मेरी चुनौती पूरी नही करोगे और इसका परिणाम नही देखोगे। कम-से-कम एक बार तो अपने दिल की रानी को स्पर्श कर लो। अशोक : हाँ रानी पद्मिनी, तुम्हारी बात सही है । मैं तुम्हारी चुनौती को पूरा नहीं कर सकता."धिक्कार है मेरे जीवन पर''मेरे यश और वैभव पर जिसने कलिंग की रानी और कलिंग की जनता को जीतने में सफलता नहीं प्राप्त की। जयदत्त : सम्राट, अब यहाँ रुकने से कोई फायदा नही है... अशोक : नही जयदत्त' यहाँ पर कलिंग को स्वप्नसुन्दरी पद्मिनी की राख है, उसकी राख जिसे मैं अपने सीने से लगाने के लिए सदियों से तड़प रहा हूँ। भले ही उसका शरीर में स्पर्श नही कर सका लेकिन उसकी राख को तो सीने से लगाऊंगा ही। इसी समय सम्राट अशोक को पुनः चौंकना पड़ा। चारो दिशाओं से रानी पद्मिनी की कर्कश आवाज उठती हुई प्रतीत हो रही थी-~'मूर्ख सम्राट, तूने यह भावना दिल में लाई कसे । क्या तू समझता है कि मेरे शरीर की राख तू स्पर्श कर सकेगा। तेरी यह इच्छा भी पूर्ण नहीं हो सकेगी। ले देख...।' इसी के साथ ही एकाएक तेज हवाएं चलने लगी। धीरे-धीरे इन हवाओं ने तूफान का रूप धारण कर लिया। वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखो के सामने वरवस ही अंधेरा छा गया। यह स्थिति लगभग आधे घण्टे तक रही। जब तूफान शान्त हुआ तो सम्राट अशोक के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । क्योकि जिस स्थान पर चिता जल रही थी, वहां पर अव निर्मल हरी-हरी घास लहलहा रही थी। अशोक : सनापति यही परतो आश्चर्य पर आश्चर्य हो रहे है ! आखिर यह सब क्या जयदत्त : महान माश्चयं । ऐसा तो मैंने जीवन में कभी नहीं देखा। अशोक : सेनापति, जीवन मे में पहली बार हारा हूं और मह हार मेरे जीवन में नासूर बनकर जाती जा रही है । पता नहीं क्यों क्यो मेरी आँखो के सामने अन्धकार के One सम्राट के मासू/२३ बादल छाते जा रहे हैं "ए कलिंग को स्वप्नसुन्दरी मुझे दी है, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता। जयदत्तः राजन्, अब यहाँ रुकना बेकार है ''इस समय आपको आराम की सख्त जरूरत है। अब आप वापस चलिए। अशोक : ठीक कहते हो सेनापति । अब यहाँ क्या रखा है। जो कुछ था सब तो स्वाहा हो गया। लेकिन मेनापति आज जो कुछ इस महल के प्रांगण में हुआ है उसने मेरी आँखें खोल दी है । निश्चय ही जितनी महान यहाँ की रानी थी उससे कहीं अधिक महान यहां की जनता भी है। ऐ कलिंग की रानी "यदि तेरी आत्मा यहां मौजूद है तो मुन ले मान से मैं सोगन्ध खाता हूँ कि अब कोई खूनी संघर्ष नही करूंगा और कलिंग की जनता को अपने पुत्रवत् प्यार करूंगा। ऐ कलिंग की रानी, भले ही तू दूसरे लोक में चली गई जहाँ पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, परन्तु तेरी आत्मा सदेर तस्वीर बनकर मेरे दिल में कैद रहेगी जिसकी पूजा में दिन-रात काँगा। 1 [इसी के साथ सम्राट अशोक निराश भाव से कलिंग महल में वापस हो लिए । रास्ते में पुनः वही हृदय विदारक दृश्य देखने को मिला। रणभूमि में कहीं चील-कौओ के झुण्ड के झुण्ड मंडराते हुए दिखाई पड़ रहे थे, तो कहीं जंगली जानवर लाश को नोचते-खसोटते दिखाई दे रहे थे। अशोक : सेनापति, देख रहे हो. मैं कितना बड़ा विजेता बन गया हूँ सम्पूर्ण भारत में मेरा एकछत्र राज्य है। है न । जयदत्त : बिल्कुल सच है महाराज "अब इस भूमि पर असम राज्य को छोड़कर सारा देया आपका है। अशोक नहीं सेनापति, नहीं ऐसा नहीं है। "क्या तुम देख नही रहे हो..'चारों ओर क्षत-विछत लाशें क्या कह रही है क्या तुम सुन नही रहे हो कि यह मासूम अबलाएं क्या कह रही है 'बोलो सेनापति, क्या यह विजय मुझे इन लाशों पर शासन करने के लिए मिली है" मैं पूझता हूँ सेनापति ऐसा तुमने क्यों किया? जयदत्त : महाराज यदि ऐसा न करता तो जीती हुई बाजी हार जाता। भशोक : अरे अव जीत हो गया है तो क्या मिला 'आत्मग्लानि पश्चाताप "स्वप्न- सुन्दरी रानी की आत्मबलि'"छोटे-छोटे मासूम देशप्रेमी बालकों के क्षत-विक्षत शव "लेकिन इसमें तुम्हारा भी दोष कहाँ है "वास्तविक दोषी मैं हूँ"खर, अब इसका प्रायश्चित भी तो मुझे ही करना है सेनापति "तुम शासकीय स्तर पर इन लाशो का दाह-संस्कार करने की विधिवत व्यवस्था करो जिससे इनकी आत्मा को और अधिक प्रताड़ित न होना पड़े।

24 / सम्राट के यांसू जयदत्त : राजन् इस प्रकार आपको पश्चाताप नही करना चाहिए। यह युद्ध है और मुद्ध मे। अशोक : नही सेनापति, यह युद्ध है लेकिन इस युद्ध में मुझे बड़ी हार का सामना करना पड़ा है । विक्रमसिंह ठीक ही कहता था यदि मेरे हृदय में दिल नाम की चीज है तो"खैर भले ही मेरी आँखों में आंसू नहीं आ सके लेकिन वास्तविकता यह है कि मैं रोना चाहता हूं लेकिन रो नही सकता क्योंकि मैं सम्राट अशोक हूँ। जयतत्त: यह आप क्या कह रहे है. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है । अशोक : न ही समझो जयदत्त तो अच्छा है अन्यथा तुम भी मैरी तरह आत्मग्लानि और पश्चाताप की आग मे जलने लगोगे। द्वितीय दृश्य - [सम्राट अशोक राजमहल में अपने विशेष कक्ष में लेटे हुए थे। इस समय उनका चेहरा अत्यन्त गम्भीर है एवं आँखों मे विद्यमान सूनापन इस बात का संकेत कर रहा था कि वह भावुकता के शिकार हो गए थे। उनके निकट ही उनकी रानियाँ व पुत्रगण बैठे हुए थे। उनके चेहरे पर परेशानी एवं आश्चर्य के भाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे थे क्योकि आज तक सम्राट अशोक इतने गम्भीर एवं भावुक कभी नहीं हुए थे। उनकी सबसे बडी रानी असन्धिमित्रा जो राजकार्य में सम्राट अशोक को सहयोग करती थी, सम्राट अशोक के चेहरे को इस प्रकार देख रही थी, मानो उनके अन्तर्मन की व्यथा को जानने का प्रयास कर रही हो।] असन्धिमित्रा : राजन्, समझ मे नही आता कि आपको आज अकस्मात् रूप से क्या हो गया है। यदि आपका स्वास्थ्य ठीक न हो तो राजवैद्य को बुलवाकर अपना परीक्षण करवा लें। अशोक : नही मित्रा, मेरा स्वास्थ्य खराब नहीं है। असन्धिमित्रा: तब आखिर वह कौन-सा कारण है, जिससे आपकी आँखों मे सूनापन और चेहरे पर मलिनता के भाव परिलक्षित हो रहे है। ऐसा तो आज मैं पहली बार देख रही हूँ। विदिशा : आश्चर्य है, आखिर कभी निराश न होने वाले सम्राट की आँखों में सूनापन और चेहरे पर विराजमान गम्भीरता कही आने वाले किसी तूफान का द्योतक तो नही है। तिष्यरिक्षता : पाश्चर्य तो मुझे भी है. 'कामी-क्रोधी और मानव रक्त से अपनी प्यास सम्राट के 25 बुझाने वाले सम्राट." ."वून को गंगा बहाने की क्षमता रखेने वाले या भोट और चाँद-सितारों पर अपने अधिकार का दिवास्वप्न देखने वाले सम्राट अशोक, आंखों में विराजमान गम्भीरता निश्चय ही किसी आने वाले भयानक तूफान. द्योतक है। अशोक : (कानों पर हाथ रखते हुए) बस करो"वस करो"तुम लोगो का विचार सही है. मेरे जीवन में भयानक तूफान प्रवेश कर चुका है मिया, जिसके थपेड़ों ने मेरे दिलो-दिमाग की चूलों को हिलाकर रख दिया है। असन्धिमित्रा : आखिर ऐसा कौन-सा तूफान है, जिसके कारण अशोक : मित्रा, मैं आज अपने जीवन की सबसे बडी हार का मुंह देखकर पश्चाताप की अग्नि मे जल रहा हूँ। असन्धिमित्राः (आश्चर्य से) हार "यह आप क्या कह रहे है ? अशोक : मैं सच कह रहा हूँ मित्रा"कलिंग युद्ध ने जो करारी मात मुझे दी है, उसने मेरे अन्तर्मन को झिंझोर कर रख दिया है। असन्धिमित्रा : लेकिन हमें मिली सूचना के अनुमार तो हमारी सेना ने कलिंग पर विजय प्राप्त करके आपके नाम की पताका फहरा दी है और वहां का नरेश रणभूमि छोडकर भाग निकला है। तिष्यरक्षिता : यही नहीं वहाँ एक लाख से अधिक व्यक्तियों का कत्ल किया गया एवं डेढ-दो लाख व्यक्ति गिरफ्तार हुए है । मुझे मिली सूचना के अनुसार तो लाखों व्यक्ति इस युद्ध में घायल हो गए हैं जो जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं। अशोक : तुम लोगों को प्राप्त सूचनाएँ यद्यपि सही है, तथापि इस युद्ध में मुझे सबसे बड़ी हार का मुह देखना पड़ा है। असन्धिमित्रा :हार"हार.."हार समझ में नहीं आता कि आप किस हार की वात कर रहे हैं। अशोक : यदि तुम जानना चाहती हो तो सुनो 'कलिंग के योद्धाओं ने जहां देश की रक्षा करते हुए अपनी बलि दी वही वहाँ के साधारण नागरिक, यहां तक कि अल्पायु के बच्चे भी देश-रक्षा का दायित्व अपने ऊपर लेकर शहीद हो गए"जहाँ तक भृगेन्द्र के भागने की बात है वह हमारे सैनिकों की आँख मे धूल झोंककर राजमहल में पहुंच गया जहां उसने आत्महत्या कर ली। यही नही भृगेन्द्र की स्वप्नसुन्दरी रानी पद्मिनी ने, जिसे मैं पाना चाहता था, मेरे सामने ही मुझे चुनौती देते हुए अपने आपको जलती चिता में झोक दिया। "तिष्यरक्षिता: ओह तो रानी पद्मावती का प्यार राजा को ले डूवा असन्धिमित्रा : लेकिन राजन् इसमें तो कोई विशेष बात नही हुई. यह तो युद्ध है और मे खून की नदियां वहती ही है । इतिहास गवाह है कि कोई भी युद्ध बिना रक्त बहाए समाप्त नहीं हुआ है। मेरे विचार से तो रणभूमि को रक्तपिपामा की ..

26/ सम्राट के आंसू पूर्ति के लिए युद्ध होता है और इस युद्ध के कारण ही खून की नदियां वहती है । अशोक : मित्रा, सवाल यहाँ रक्त का नही है "वल्कि "उफ कुछ समझ में नही आता क्या कहूं."फिलहाल मुझे आराम की सख्त जरूरत है। (कहते हुए सम्राट अशोक ने आंखे बन्द कर लीं।) सम्राट अशोक की इस क्रिया से सभी लोग बाहर चले गए परन्तु रानी पद्मावती जो अभी तक शान्त वैठी हुई थी, वही बैठी रही और सम्राट अशोक के पैर दबाने लगी। सम्राट अशोक अपनी सभी रानियो में रानी पद्मावती को बहुत अधिक चाहते थे। जब सभी लोग बाहर चले गए तो सम्राट अशोक ने पद्मावती से कहा-मुझे शराब पिलाओ, शायद उससे मन को कोई शान्ति प्राप्त हो। रानी पद्मावती ने एक दासी को शराब लाने तथा नृत्यगान की व्यवस्था करने का आदेश दिया तथा सम्राट अशोक का सिर दबाने लगी। कुछ ही देर मे कुछ दासियाँ मदिरा लिए हुए कक्ष मे दाखिल हुई तथा कुछ नर्तकियों एव वाद्य संगीतिज्ञों ने कक्ष मे प्रवेश किया। रानी पद्मावती अपने हाथों से सम्राट अशोक को मदिरा पिलाने लगी। देखते-ही-देखते वाद्य संगीत की मधुर ध्वनि के साथ ही नृत्य शुरू हो गया। परन्तु मदिरा पान व मनोरजन से भी सम्राट अशोक की मनःस्थिति ठीक न हो सकी। फलतः उन्होने इसे बन्द करने का आदेश दे दिया। कुछ ही देर मे कक्ष खाली हो गया और वहाँ शाति हो गई। पदमावती : राजन् ऐसा प्रतीत होता है कि आपके दिल को काफी ज्यादा आघात पहुंचा है। ऐसी स्थिति मे आपको आराम करने को सख्त जरूरत है। अब आप कृपया सो लें। इससे अपकी मनःस्थिति स्वस्थ हो जाएगी। अशोक : तुम ठीक कहती हो पद्मावती। तृतीय दृश्य [राज दरबार मे गणमान्य सदस्यों के साथ पार्षद (मंत्रिगण) भी उपस्थित थे। सभी केवल एक ही विषय पर चर्चा कर रहे थे, जिमका शीर्षक था कलिंग विजय । सभी लोग सम्राट अशोक और उनके बहादुर सेनापति की यहादुरी की प्रशंमा कर रहे थे, जिन्होंने कलिंग भूमि पर विजय पताका फहरामी थी। अभी वहाँ चर्चा चल ही रही पी कि चौबदार को कर्कश आवाज दरबार में गूंज उठी-"महाराजाधिरान मम्राट अशोक राज दरबार मे पधार रहे हैं।"

आ चोवदार की आवाज सुनते ही सम्पूर्ण सभा में भान्ति निगाहें प्रमुख द्वार की और उठ गई । प्रमुख द्वार : - पहने हुए प्रवेश किया। परन्तु सदेव की तरह गम्भीरता ने ले रखा था। सम्राट अशोक धीरे-धार पन्त हुए राज सहासन के निकट पहुंचे और फिर उस पर बैठकर कुछ सोचने लगे। विक्रम : महाराजाधिराज का स्वास्थ्य ठीक नहीं प्रतीत होता है। यदि आज्ञा हो तो आज की कार्यवाही स्थगित कर दी जाए। अशोक : नहीं नहीं सभा की कार्यवाही शुरू की जाए। विकम : जैसा कि महाराज अवगत ही हैं कि हमने कलिंग पर विजय पताका फहरा दी है। इसी के साथ हम उस दिन के अपने कृत्य के लिए अपना खेद व्यक्त करते हैं, जिसके कारण महाराज को अशोक : नहीं विक्रम "उस दिन तुम्हारे कृत्य से ही मेरी आँखें खुली है इसलिए सेद प्रकापा की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक कलिंग विजय का प्रश्न है, निश्चय ही हमने पूरे कलिंग पर अपना राज्य स्थापित कर लिया है लेकिन मुझे मिला क्या केवल लाशों के ढेर, देश प्रेमियो की सिसकती आवाजे...विधवाओं के श्राप.... मां-बहनों की दर्दनाक चोरकारें"क्या तुम चाहते हो कि सम्राट अशोक इन लाशों पर शासन धारे उन दुःखी और निराश बेसहारा औरतों पर अपना पुरुषत्व दिखाए। विकम : लेकिन महाराज युद्ध में तो यही राब होता रहा है आज तक जितने भी युद्ध लडे गए हैं, सभी में ऐसे ही दृश्य देखने को मिलते हैं । अशोक : हाँ मिला है. लेकिन ऐसी अभिमानी जनता नही मिली और न ही ऐसी स्वाभिमानी महारानी जिसने मेरे सामने ही अपने जिन्दा शरीर को जलती चिता में झोंक दिया हो। विक्रम उस समय तुम मौजूद नहीं थे लेकिन जयदत्त मे पूछों उसने वहाँ क्या देखा । उस स्वाभिमानी स्वप्न सुन्दरी के शरीर की बात छोड़ो" उसकी राख तक हम स्पर्श नहीं कर सके । मैं पूछता हूँ आखिर ऐसा क्यो हुआ जबकि हमने वहाँ अपनी विजय पताका फहरा दी। जयदत्त : महाराज ! वह जो कुछ हुआ था, वह एक करिश्मा था। लेकिन इस छोटे से प्रकृति के करिश्मे के कारण अपनी हार स्वीकर लें, यह उचित नहीं है। अशोक : ठीक है यथार्थ में मैंने कलिंग पर दिनम पा ली है लेकिन इसके साथ ही मेरा यह कर्तव्य हो जाता है कि अब पुनः ऐगी स्थिति न दोहराई जाए जिससे उन घटनाओं की पुनरावृत्ति हो। विक्रम : मैं समझा नहीं महाराज! अशोक : अब मैंने यह निश्चय किया है कि हमारे राज्य में न तो अब कोई युद्ध होगा और न ही नरसंहार होगा। विक्रम : लेकिन यह निर्णय लेने के पूर्व अभी इस बात पर भी निर्णय लेना है कि हमारा -28/सम्राट के आंसू एक शत्रु और है और उस पर विजय पताका फहराना हमारा अन्तिम लक्ष्य है। अशोक : मैं जानता हूं, आसाम ही एक ऐसा राज्य है, जिस पर हमें विजय प्राप्त करना है, लेकिन अब मैं इसकी आवश्यकता नहीं समझता। विक्रम : महाराज के इस निर्णय का तात्पर्य यह है कि अब राज्य मे सैनिकों की कोई आवश्यकता नहीं है। अशोक : विक्रम, विना सैनिक के राज्य नही चला करता। मैंने केवल यह कहा है कि अब हम कोई युद्ध अथवा नरसंहार नहीं करेंगे, लेकिन यदि हमारी ओर कोई आँख उठाकर भी देखेगा तो उसका जवाब देने के लिए क्या तुम कम हो । विक्रम : वह तो ठीक है महाराज, लेकिन इस तरह हमारी तलवारों में जग लग जाएगी। अशोक : नही विक्रम तलवारों में यदि जंग लग भी गई तो कोई बात नहीं परन्तु यदि इससे हमारे दिलो में लगी जंग घुल जाती है तो वही सबसे बडे युद्ध की विजय है । विक्रम अब हम केवल वही कार्य करेंगे जो जन मेवा से सम्बन्धित हों और इसके लिए हमें अपने कर्मरूपी तलवार को चमकाना है, जिससे जनता के 'में व्याप्त भय व नफरत रूपी जंग को धोकर उनके प्रति अपने प्रेम मे परिणत कर सके विक्रम : जैसी आज्ञा महाराज ! हम सभी मंत्रिगण आपको विश्वास दिलाते हैं कि आज से ही आपके आदेशों का पालन सुनिश्चित कर दिया जाएगा। दृश्य परिवर्तन [राजमहल के कक्ष मे सम्राट अशोक आराम कर रहे थे परन्तु उनके चेहरे पर व्याप्त चिन्ता के लक्षण स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे थे। रह-रहकर वह उठकर कक्ष में टहलने लगते थे और बार-बार एक ही बात उनके मुख से निकलती थी- "रानी पदमिनी तुम्हारा यह बलिदान मैं कभी भी भूल नहीं सकता। चलते-चलते जब वह थक जाते तो पुनः मसहरी पर जा बैठते। अभी उन्हें वैठे हुए कुछ ही देर हुई थी कि उनके कानों में एक मधुर सुगम संगीत की धारा प्रवाहित होती चली गयी। इस सगीत में इतनी मधुर मिठास घुली हुई थी कि वह कुछ क्षण के लिए अपना सारा दुःख-दर्द भूल से गए। वरबस ही वह मसहरी से उठ खडे हुए और खिड़की को ओर बढ लिए। खिड़की के निकट पहुँचकर उन्होने बाहर जो कुछ देखा उससे वह आश्चर्य से उछल पड़े और शीघ्रता से राजमहल में बाहर जाने के लिए बढ़ लिए।] दृश्य परिवर्तन [राजमहल के सामने कुछ साधू कतार में खड़े हुए मृदंग व वीणा बजा रहे थे। अग्र पंक्ति मे खड़ा युवक (साधू) एक सुन्दर-सा गीत गा रहा था तथा पीछे के अन्य 129 साधू मृदंग व वीणा बजाते हुए नृत्य कर रहे थे। उन संधुओं ने मशीaner कर रखा था तथा सिर के बाल बिल्कुल साफ थे। सम्राट अशोक बाहर आकर उस अग्रपक्ति में खड़े एक साधू के पास जा पहने और निविभाव एकाग्र मुद्रा में गीत गा रहे आश्चर्य से उस युवक के चेहरे को देखने लगे। अशोक : अरे वीतशोक, क्या तुम अपने भाई को नहीं पहचानते । वीतशोक : भाई नहीं, सम्राट अशोक कहिए राजन। सभी भाइयो को तो मापने मरवा दिया था. केवल में ही किसी प्रकार बच निकला था। अशोक : लेकिन यह साधू की वेशभूषा''हाय में वीणा मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता रहा है कि वीतशोक : यह सब आपके समझने की चीजें नहीं हैं सम्राट अशोक। हम एक साधू है और हमारा लक्ष्य भगवान बुद्ध को शिक्षा का प्रचार घर-घर जाकर करना है। अशोक : लेकिन एक क्षत्रिय होकर साधू बनना...! वीतशोक : क्यों क्षत्रिय होकर अपने क्रूर भाई के हाथों अपने को बलि चढवा देता। अशोक : क्यो बार-बार इस तरह थप्पड मार रहे हो वीतशोक''मैं तो खुद ही पश्चाताप की आग में जला जा रहा हूँ। धीतशोक : आप और पश्चाताप'संसार का महान आश्चर्य (कहते हुए वह ठठाकर हंस . .. अशोक : हाँ माई यह सत्य है, जबसे कलिंग का युद्ध हुआ है। वीतशोक : मैं सब जानता हूँ सम्राट अशोक "जब से कलिंग का युद्ध जीता है और जबसे वहाँ की महारानी ने अपनी बलि दे दी है तभी से आपके मन में एक तूफान हल- चल मचाए हुए है "हा"हा"हा। अशोक : क्या तुम ज्योतिषी हो। वीतशोक : सम्राट अशोक साधू बनने के लिए अनेक विद्याओं का ज्ञाता होना पड़ता है फिर हम तो भगवान बुद्ध के उपासक हैं, जिसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सभी का ज्ञान होता है। अशोक : लेकिन तुम्हारा इस प्रकार हँसना'! वातशोक :हाँ सम्राट अशोक "हंस रहा हूं अपने उस तथाकथित क्रूर और चाण्डाल भाई पर, जिसने अपने सभी भाइयों को मरवा दिया"हंस रहा हूं उस निरंकुश और आत्मघाती भाई पर जिसने अपने 500 मत्रियों को जिन्दा आग में झोंक दिया... हंस रहा हूँ उस नरसंहारक भाई पर जो अपने आतंक से जनता को भयभीत करके उसके रक्त से अपनी प्यास बुझाता है"हा"हा"हा। अशोक : बस करो"बस करो 'नही तो मैं पागल हो जाऊंगा वीतशोक ।

30/ सम्राट के आंसू वीतशोक : नहीं राजन, आप पागल कैसे होंगे "सम्राट कभी भी पागल नहीं हो सकता। अशोक : चलो भाई.. मेरी कुटिया को पवित्र करो और भगवान बुद्ध के बारे में मुझे कुछ बताओ। वीतशोक : नहीं राजन्, यह नही हो सकता। अशोक : क्यो नहीं हो सकता मेरे भाई। धोतशोक : मैं जानता है कि आपको इम भाई को जीवित देखकर आश्चर्य हो रहा होगा। और ऐमी अवस्था में आप उसका वध करवाना चाहते होगे। वैसे महाराज आप निश्चित रहे' 'मुझे शासन और गद्दी से कोई लगाव नहीं हैं. यह खून-परावा हमारी धर्मनीति के विरुद्ध है"मुझे तो अब मौत से भी कोई योफ नहीं है. मैंने केवल जो व्रत लिया है उसको पूर्ण करने में ही.."। अशोक : वीतशोक'" तेरे यह शब्द जहरीले तीर बनकर मेरे हृदय को छेदे दे रहे हैं। यदि तुझे सन्देह है तो यह ले तलवार और अपने भाइयों को मौत का बदला अपने इम क्रूर और निरंकुश शासक भाई से ले । चिन्ता मत कर यहां कोई भी मेरे तेरे बीच मे नही बोलेगा। बीतशोक : राजन्, हमने अहिंसा का व्रत ले रखा है जो भगवान बुद्ध का प्रमुख संदेश है । इसके अतिरिक्त हमारी शिक्षा में बदले की भावना रखने को सबसे बड़ा पाप माना गया है। अशोक : तब तुम्हें मेरा विश्वास करना चाहिए वीतशोक । यदि तू कहेगा तो मैं तेरे स्थान पर साधू बन जाऊँगा और तुझे राजगद्दी सौप दूंगा। वीतशोक : राजगद्दी हा हा हा."राजन उस राजगद्दी पर जिस पर लाखों विधवाओ की आहें भरी हुई हैं, कितनी ममताओं का अभिशाप प्राप्त है."कितनी बहनों के श्रापों से ग्रस्त है उस राजगद्दी के लिए मैं तुम्हें अपना स्थान दूंगा' क्षमा करें महाराज वह राजगद्दी आप ही को मुबारक हो। हाँ अगर आपकी इच्छा है तो चलिए मैं आपके राजमहल में चलकर भिक्षा अवश्य ग्रहण करूंगा। दृश्य परिवर्तन .. अशोक : आओ मेरे भाई.."इस गद्दी पर बैठकर! वीतशोक : क्षमा करें राजन् 'मैंने पहले ही बता दिया है कि इस गद्दी से मुझे कोई मोह नहीं है। मेरा स्थान तो यह है कहते हुए वीतशोक जमीन पर बैठ जाता है। उसके पीछे ही अन्य साधू भी बैठ जाते हैं। अशोक जैसी इच्छा । आप लोगो के लिए भोजनादि...! योतशोक : राजन्, मारा तो धर्म ही भिक्षा प्राप्त करके पेट भरना है। लेकिन हम लोग केवल फल ही भोजन के रूप मे ग्रहण करते हैं ।

सम्राट के आँसू /31 [सम्राट अशोक एक मैनिक को फलादि लाने का आदेश देता है।] योतशोक : महाराज, आपमें इस प्रकार का आकस्मिक परितन मेरी समझ में नहीं आ रहा है। वैसे भी मुझे आश्चर्य है कि आपमे केवल एक नारी के कारण इतना भारी परिवर्तन आया है जबकि मेरी जानकारी के अनुसार आपके पास एक से एक बडकर मुन्दरिया दामी के रूप में कार्यरत हैं। अशोक : हो.'वह नारी नहीं बल्कि देवी थी। उसके पतिग्रता धर्म और त्याग की कहानी मेरे दिलोदिमाग पर छा गई है। विशेष रूप से वहां की जनता के मात- भूमि के लिए बलिदान ने मुझ पर काफी प्रभावी परिवर्तन लाकर रख दिया है। अब तो राजकाज से मन इतना खिन्न हो चुका है कि कभी-कभी मही इच्छा होती है कि आत्महत्या करके इस जीवन मे मुक्ति पा लूं। योतशोरु : मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार तो आप कलिंग की रानी पदमिनी को अपनी अंकशा यनी बनाना चाहते थे परन्तु अब इसमें मफल न होने के कारण आप रोग- ग्रस्त हो गए हैं। अशोक : हाँ भाई, तुम्हारा विचार सही है । मैं उसे कई वर्षों से पाना चाहता था परन्तु यहां का नरेश इस कार्य मे अत्यन्त बाधक सिद्ध हो रहा था। उसने सदैव मेरी संनिक शक्ति का मखौल उड़ाया परन्तु इस बार मैंने विजय तो प्राप्त कर ली परन्तु ऐन मौके पर जब मैं उसे पाने को लालायित हो उठा था, तभी उसने मेरे पुरुषत्व को चुनौती देते हुए आत्मदाह कर लिया। सबसे आश्चर्यजनक घटना तो उस समय घटित हुई, जब उसकी चिता की राख को आकस्मिक रूप से आए तुफान अपने साथ उड़ा ले गए और उसके स्थान पर वहाँ निर्मल हरी घास पैदा हो गई। बोलशोक : राजन्, आपके इम रोग का कारण स्पष्ट रूप से कलिंग की रानी है। आपको उसे अपने हृदय से निकाल देना चाहिए। अशोक : मैंने बहुत प्रयास किया बीतशोक लेकिन...! [इसी समय सैनिक फलों से भरा थाल लाकर वीतशोक के आगे रख देते हैं । सभी माधू मिलकर एक साथ फलों का भोजन ग्रहण करते हैं, उसके बाद शर्बत पीते अशोक : मेरा अन्तर्मन बहुत व्यथित हो उठा था, परन्तु जब से आपके गीत के मधुर स्वर मेरे कानों में पड़े तो मुझे मजीव-सी शान्ति की अनुभूति हुई। पोतशोक : यह सब भगवान बुद्ध की कृपा है राजन् । अशोक : वीतशोक, अब मेरा मन राजगद्दी से ऊब चुका है और मैं शान्तिमय जीवन- यापन करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मैं भी तुम्हारी तरह ही साधू बनकर भिक्षाटन करके पोप जीवन भगवान बुद्ध की सेवा मे अर्पित कर दूं।

32/ सम्राट के आँसू - वीतशोक : इसका निर्णय हम आप नहीं कर सकते । वैसे भी राजा और साधू का सम्बन्ध परस्पर विरोधी है। अशोक : लेकिन वीतशोक : राजन्, क्षणिक भावावेश में कोई निर्णय लेना राजहित में नहीं है। आप राजा हैं और आपके ऊपर पूरे देश का भविष्य निर्भर है। इसके विपरीत साधू पर न तो कोई भविष्य निर्भर होता है और न ही उसके भूतकाल का कोई महत्त्व होता है। यदि होता है तो केवल वर्तमान मे हो रही घटनाओं का जनहित में मूल्यांकन । अशोक : लेकिन अपने मन को कैसे समझाऊँ। वोतशोक : आप भगवान बुद्ध के उपदेशो को ग्रहण करें। वही आपको शान्ति प्रदान करेंगे। अशोक : मैं भी उनकी शिक्षा ग्रहण करना चाहता हूं वीतशोक। तुम आज से ही मुझे भगवान बुद्ध के उपदेशो की शिक्षा देने का कार्य शुरू कर दो। बीतशोक : राजन्, मेरे लिए तो यह सम्भव नहीं है। आपको इसकी उत्तम शिक्षा गुरु तिस्स मोगलिपुत्त ही दे सकेंगे। मैं आपका मन्देश उन तक पहुंचा दूंगा । आशा है वे शीघ्र ही आपको दर्शन देगे। अशोक : लेकिन उनके आने में तो काफी समय लग सकता है तब तक... ! वीतशोक : इस उद्देश्य के लिए मैं अपने शिष्य बाल पण्डित को छोड़े जा रहा हूँ। यह आपको बौद्ध धर्म की शिक्षा एवं उपदेशों से अवगत कराएंगे। अशोक : (बाल पण्डित को देखते हुए) क्या इतना छोटा लड़का हमे शिक्षा दे सकेगा। धीतशोक : राजन्, शिक्षा के क्षेत्र मे छोटे बड़े का महत्त्व नहीं होता बल्कि उसके ज्ञान से उसकी विद्वता का मूल्याकन किया जाता है। जब आप इसके उपदेशो को सुनेंगे तो आप स्वय समझ जाएंगे कि यह आपको शिक्षा दे सकता है अथवा नही । अशोक :जैसी आज्ञा! बीतशोक : राजन् हम लोग आज्ञा नहीं बल्कि परामर्श देते हैं। आज्ञा देने का कार्य तो आपका है। अशोक : मानना पड़ेगा भाई, बौद्ध धर्म के ज्ञान ने तुझे बड़ा ही चापलूस बना दिया है । वीतशोक : यह सब गुरु तिस्स की कृपा है राजन् अन्यथा मैं किस योग्य हूँ। अशोक : खंर बहुत देर हो गई है, अब तुम्हें आराम की आवश्यकता होगी। चौतमोक: निःसन्देह अगर आपकी आज्ञा हो। अशोक : बहुत खूब''अरे भाई."तुम्हारे लिए तो अब मैं जान तक देने को तैयार हूं." फिर आशा कंसी। (इसके साथ एक सैनिक को ओर देखते हुए) रामसिंह इनके आराम की व्यवस्था कर दी जाए।

सम्राट के आंसू /33 दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक वाल पण्डित, जिसकी उम्र लगभग 12 वर्ष थी, के साथ देवालय में बैठे हुए। बाल पण्डित योगासन की मुद्रा में ध्यानमग्न बैठा हुआ था, उसके शरीर पर मात्र गेरुए रंग एक चोंगा है तथा सर के बाल मुंडे हुए थे। इसके विपरीत सम्राट अशोक उत्सुकता के साथ बाल पण्डित के चेहरे पर माते-जाते भावों को देख रहा था। अशोया : बाल पण्डित जी, यह अवस्था कब तक रहेगी। कब तक हमें आपके उपदेशो के लिए इन्तजार करना पड़ेगा। बाल पंडित : मैं सोच रहा हूं कि आपको नये मार्ग में प्रवेश करने के लिए कहाँ से उपदेश दूं। मेरे विचार से सबसे पहले भगवान बुद्ध के जीवन पर कुछ प्रकाश डाल दूं, क्योंकि आज आपकी भी वही अवस्था है, जो भगवान बुद्ध के बचपन में थी। भगवान बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था, और वह क्षत्रिय घराने से सम्बन्धित थे। उनके पिता लुंबिनी के राजा थे। उन्होंने सिद्धार्थ का पालन पोषण बड़े ही उत्तम ढंग से किया परन्तु सिद्धार्थ का अन्तर्मन मानव दुःखों को देखकर व्यथित हो उठता था। अक्सर वह सुख, दुख और जीवन मृत्यु के सम्बन्ध में ही सोचा करते थे । उसकी उस स्थिति से राजा चिन्तित हो उठे और उन्होने उसका विवाह कर दिया । परन्तु इसका भी कोई विशेप असर सिद्धार्थ पर न पड़ा और एक रात्रि में उन्होंने सब कुछ छोड़कर माया मोह से मुक्ति पा ली और अज्ञात वास को चले गए। वह कहाँ गए, किसी को कुछ पता ही न लग सका । परन्तु जब वह पुनः में थाए तो बुद्ध के नाम से प्रख्यात हो चुके थे। उनकी शिक्षा और उपदेशो के फलस्वरूप ही उन्हें भगवान बुद्ध की उपाधि से विभूपित किया गया। अशोक : आश्चर्य है, सम्पूर्ण राजकाज छोड़कर उन्होंने अल्पायु में ही एकान्तवास ले लिया। इतनी अवधि तक वह कहाँ रहे और उनके उपदेश क्या हैं । मालपंडित : जहाँ तक उनके एकान्तवास की अवधि में रहने का प्रश्न है, इसकी संक्षेप में व्याख्या कर सकना सम्भव नहीं है। हाँ उनके उपदेश के मुख्य मार्ग हैं । राजन् वैसे तो जीवन के दो प्रमुख मार्ग हैं, प्रथम अत्यन्त भोग विलास और दूसरा अत्यन्त क्लेशपूर्ण तपस्या। यदि इन दोनों मार्गों को देखा जाए तो यह स्पष्ट रूप से विदित होगा कि अब तक आप प्रथम मार्ग को प्रशस्त करते रहे, परन्तु अब आपको दूसरे मार्ग से होकर गुजरना है। यह मार्ग अत्यन्त दुःखदायी, क्लेशपूर्ण होता है, अतः इस अवस्था मे अनेकानेक बीमारियां पीछे लग जाती हैं। राजन् यह मार्ग इतना कष्ट- दायी होता है कि इम अवस्था मे आदमी जीना नही चाहता। परतु इस श्रेणी मे भी दो प्रकार के लोग होते हैं। प्रथम वर्ग के लोग न जीना चाहते हुए भी जीने की अभिलापा रखते है क्योंकि वह माया मोह के जाल से मुक्त नही हो पाते परन्तु प्रकाश 34/राम्राट के आंसू दूसरे वर्ग के लोग इस अयम्या को महन न कर गकने ये. कारण मारमहत्या करके इस कष्टमय जीयन से मुक्ति पाने का प्रयास करते हैं। अशोक : निश्चय ही तुम्हारा ज्ञान अमीमित है। हो इस मार्ग से मुक्ति का भी तो कोई उपाय होगा। थाल पण्डित : अवश्य है राजन् । भगवान बुद्ध ने इसी मार्ग की योज में अपना मम्पूर्ण जीवन बिता दिया था। अन्ततः जब उन्हें जान का प्रकाश प्राप्त हुआ तब उन्हें विदित हुआ कि इन दोनों मागों के अतिरिक्त तीसरा मार्ग भी है, जिम मध्यम कहा जाता है । मध्यम मागं ही जीवन का ऐगा मार्ग है, जिमको अपनाने के बाद न तो मुख बोध होता है और न ही दुःय का पश्चाताप। भगवान बुद्ध मार्ग को अपनाने के लिए 8 उपमार्ग बताए हैं। (1) मम्यक दृष्टि (2) मम्पक गंकल्प (३) सम्यक वचन (4) सम्यक कर्म (२) सम्यक जीविका (6) सम्यक प्रयत्न (7) सम्यक स्मृति, तथा (8) मम्यक समाधि अशोक : लेकिन आपके इन मार्गों तथा उपमागों से मेरी ममस्या का समाधान नही हो पा रहा है । मैं राजा हूँ और इस स्थिति मे इन मार्गों को अपनाने में सफल हो पाऊँगा, इसमें सन्देह है। बाल पण्डित : आपका कपन कुछ हद तक सही है। लेकिन यह भी सत्य है कि आपके अन्दर दुःख, क्षोभ, आक्रोश और व्यया भी है और उसका कारण भी है। यदि दुःख का परिहार है तो दुःख परिहार के उपाय भी हैं। भगवान बुद्ध ने कहा था- "इन्द्रियों का अत्यन्त सन्तप्त होना और अत्यन्त लालच करना, दोनों ही अत्यन्त बुरे हैं । सन्तप्त से जहां चेतना का ह्रास होता है, वही लालच से लिप्सा का आवरण चेतना को ढक लेता है । यह दोनो ही स्थितियां अत्यन्त दुःखदायी हैं । ऐसी स्थिति में यदि आपको मध्यम मार्ग अपनाना है तो उसके लिए सन्तप्त और लालच दोनों का ही त्याग करना होगा और इसके लिए यह आवश्यक है कि अपनी इन्द्रियो को अपने अधीन रखें न कि इन्द्रियों की दासता को स्वीकार करें। अशोक : इसका मतलब अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करने के लिए अपनी चेतना को जागृत करना होगा। बाल पण्डित : चेतना सोयी ही कब है राजन् । यदि चेतना विलुप्त हो जाए अथवा सो जाए तो समस्त जीवन अचेतन अवस्था में आकर मिट्टी के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। आपको केवल उस पर सन्तप्त और लालच से ढके आवरणो को हटाकर स्वच्छ करना है और तभी मध्यम मार्ग को अपनाना सम्भव हो सकेगा। अशोक : धन्य हैं आप, जिसने इतनी अल्पायु मे ही जीवन को सही मार्ग मे ढालने का मार्ग खोज निकाला।

: सीट के आंसू आल पण्डित : राजन् यह मार्ग भगवान बुद्ध ने घोर तपस्या टकारक जीवन यापन के बाद खोजे है। मैं तो एक तुच्छ सेवक हूँ, बताए माग महत्त्व को प्रचारित कर रहा हूं। अशोक : मेरे मन में एक जिज्ञासा है। बाल पण्डित : कैसी जिज्ञासा राजन् । अशोक : तुम्हारे माता पिता। बालपण्डित : ओह "मैं समझ गया राजन् मेरे पिता व्यापारी हैं और माँ गृहिणी। उन्होंने बौद्ध धर्म को शिक्षाओं से प्रभावित होकर न केवल इसे अपनाया वरन् इसके प्रचार के लिए 100 सहस्र मुद्राएं दान में प्रदान की। बौद्ध धर्म के प्रचार की प्रेरणा उन्ही से मुझे प्राप्त हुई है। जब मैं मात्र 4 वर्ष का था, तभी उन्होंने मुझे गुरु मोगलिपुत्त तिस्स की मेवा के लिए मुझे भी दान मे दे दिया। गुरु जी की छत्रछाया मे पलकर जो ज्ञान मैंने अजित किया, अब उसी का प्रचार कर रहा हूँ। अशोक : आश्चर्य है...100 सहस्र मुद्राएँ दान देने के बाद भी। बालपण्डित : राजन् मह सच है कि अब हमारे पिता के पास धन नहीं है, लेकिन इसका कोई दुःख उन्हें नही है । भगवान बुद्ध की शिक्षा के प्रताप न ही अब धन पाने की लालसा है और न ही धन जाने का दुःख है। उन्हें अब पहले से ज्यादा शान्ति है। मेरे माता-पिता दोनो ही प्रेमपूर्ण शान्तिपूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं। अशोक : सच ही कह रहे हो भिक्षु । मेरे मन से भी माया मोह का पर्दा हटता जा रहा है । ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों मन के अन्दर धर गया दुःखों का विशाल पहाड़ पिघलता जा रहा है। चारो ओर शान्ति ही शान्ति नजर आ रही है। अब मेरी भी यही इच्छा हो रही है कि मैं अपना सब कुछ भगवान बुद्ध की सेवा में अर्पित करके भिक्षु बनकर भगवान बुद्ध के उपदेशो का अनुसरण करते हुए जीवन यापन करूं। बोलो बाल पण्डित क्या मैं भी भिक्षु बन सकता हूँ। बालपण्डित : इस सम्बन्ध में उचित परामर्श गुरु तिस्स ही दे सकते हैं। अशोक : ठीक है, मैं उनसे मिलने के लिए उत्सुक हूँ। बोलो तुम्हारे इस उपकार के लिए क्या पुरस्कार दूं। बालपण्डित : राजन् मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार यही होगा कि आप भगवान बुद्ध के उपदेशों का प्रचार अपने स्तर से करें। अशोक : धन्य है आप, जो इतनी अल्पायु में ही माया-मोह के जाल से मुक्त हो गए। में तो अभी तक इसी चक्कर में पड़ा रहा। ठीक है बाल पण्डित मैं तुम्हारी इस इच्छा की पूर्ति अवश्य करूंगा।

36/ सम्राट के आंसू चतुर्थ दृश्य [राजदरबार में सम्राट अशोक सिंहासनारूढ थे। उनके चेहरे पर विद्यमान गम्भीरता ने राजदरबार में उपस्थित पार्षदों एवं गणमान्य सदस्यों को चौंका-सा रखा है । यह किसी गहनतम सोच-विचार में डूबे हुए थे।] विक्रम सिंह : महाराज हम लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि ऐसी कौन-सी बात है, जिसके कारण महाराज के चेहरे पर मलिनता के बादल गहराते जा रहे हैं। अशोक : विक्रम सिंह पता नहीं क्यों मेरा मन डूबता सा प्रतीत हो रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मुझमे कोई बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं। विक्रम सिंह : आप फिलहाल राजवैद्य से अपनी चिकित्सा करवाइएं और आराम कीजिए। अशोक : लेकिन जब मुझे कोई बीमारी हो तब न। मेरा मन अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति से गुजर रहा है। मेरा हृदय युद्ध से नफरत करता जा रहा है, वहते हुए रक्त बिन्दुओं को देखकर मन ममता से परिपूर्ण सा हो उठा है, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? .. विक्रम सिंह : इस सम्बन्ध में मैं राजवैद्य से जानकारी चाहूंगा। राजवंद्य : मैंने महाराज का अच्छी तरह परीक्षण किया है। इन्हें कोई बीमारी नहीं है, जिसका आयुर्वेदिक दवाओ से इलाज किया जा सके। मेरे विचार से इनके अन्तर्मन पर कोई ऐसा आघात हुआ है, जिसके कारण इनका हृदय परिवर्तित हो रहा है। यह परिवर्तन किस रूप में होगा यह तो आने वाला समय ही बता सकता है। विक्रम सिंह : महाराज मैं जानता हूं कि कलिंग की रानी का बलिदान ही आपके दिल का सबसे बड़ा आघात है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उससे सुन्दर नारी आपके घरणो पर लाकर डाल दूंगा। अशोक : सबाल कलिंग की स्वप्नसुन्दरी का नहीं है विक्रम। सवाल तो उन मासूम अवोध बालको का है--सवाल उन पीडित माताओं का है जिन्होंने युद्ध की विभीपिका में अपनी गोद मूनी कर डाली है सवाल उन बहनों का है, जिन्होंने इम युद्ध में अपने भाइयो को खो दिया है और सवाल उन नव यौवनाओं का है, जिन्होंने अपने पति की अकाल मौत के साथ ही अपने को भी अग्नि देवता की शारण में अपित कर दिया है या फिर रो-रोकर एक ही शब्द कहती हैं-"सम्राट अगीक तेरा नाश हो।" विक्रम सिंह : महाराज मवालों को शृधला तो कभी खत्म होने की नहीं । आप एक मासक है अर्थात युट के पुजारी। ऐसे युद्ध के पुजारी का इस तरह गमगीन होना सम्राट के आंसू / 37 शोभा नहीं देता। यदि महाराज की इस कमजोरी का मान असम राज्य को हो गया तो वह इसका पूरा लाभ उठा सकता है। अशोक : यही मोच-विचार कर मैंने यह निर्णय लिया है कि अब मुझे राजगद्दी को त्याग देना चाहिए। विक्रम सिंह : यह आप क्या कह रहे हैं राजन् । अशोक : में ठीक कह रहा हूं विक्रम। अब मुझे इस गद्दी से कोई मोह नहीं है। मुझे ऐमा प्रतीत हो रहा है कि इस गद्दी से रखतवीनों को उत्पत्ति हो रही है, ऐमे रक्त- बोज, जिनसे लहू की गगा बह रही है । नही विक्रम अव में इस पद का भार वहन करने में अपने को असमर्थ पा रहा हूँ। विक्रम सिंह : लेकिन महाराज ऐमी अवस्था में एक योग्य शासक का तलाशना संभव ." अशोक : विक्रम यह कोई कठिन कार्य नहीं है। मुझे विश्वास है कि मेरा पुत्र महेन्द्र राजकाज को भली प्रकार सम्भाल सकने में समर्थ है। मैं शीघ्र ही उसे राजगद्दी का भार सौंपकर सन्यास ले लूंगा और इसके बाद एकान्तवास में रहकर अपने पापी का प्रायश्चित करूंगा। 'विक्रम सिंह : लेकिन महाराज अभी महेन्द्र की उम्र हो क्या है। अशोक : विक्रम राजा उम्र के आधार पर नहीं बल्कि अपनी बुद्धि के आधार पर होता है और यह बुद्धि उसके पार्षद और सेनापति होते हैं। तुम जैसे योग्य पाद और जयदत्त जैसे योग्य मेनापति के रहते महेन्द्र को कोई परेशानी हो ऐसो तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। विक्रम सिंह : राजन् यह आपको महानता है जो हम लोगों को इस योग्य समझा है, मन्मथा हम जो कुछ बने हैं. वह सब आपकी बदौलत ही बने है। अशोक : मेरी बदोलत नहीं विक्रम बल्कि अपनी योग्यता और साहस की बदौलत । हाँ मैं इतना अवश्य चाहता हूँ कि अब हमारे राज्य में खूनी होली न खेली जाए बल्कि ऐसी होली खेली जाए जिसमें आपसी प्रेम और वन्धुत्व की भावना का विकास हो। जनता में भाईचारे को नीति को अपनाया जाए तथा जनता को पुत्रवत समझकर उसके सुख-दुःख में अपने को समर्पित कर दिया जाए। आम जनता को शिक्षा व्यवस्था एवं अन्य सुविधाएँ राज्य की ओर से निःशुल्क प्रदान की जाए। यह मेरी अन्तिम और आखिरी इच्छा है। विक्रम सिंह : जैसी आज्ञा। अशोक : हां एक बात और''कल हमारे राज दरबार में गुरु महाराज तिस्स मोगलि- पुत्त पधार रहे हैं। वह वौद्ध धर्म के बहुत बड़े ज्ञाता है और मैं चाहता हूँ कि उनके आगमन के अवसर पर उनका भव्य स्वागत किया जाए। जगह-जगह पर भगवान बुद्ध के उपदेशों को लिखकर टांगा जाए और उनके उपदेशों का प्रवचन ..

किया जाए । जगह-जगह गेरुए रंग की पताकाएं फहराई जाएँ। विक्रम सिंह : महाराज के आदेशों का पालन सुनिश्चित कर दिया जाएगा। दृश्य परिवर्तन [राजधानी पाटलीपुत्र को बड़े ही सुन्दर ढंग से सजाया गया था। जगह-जगह फूलो के स्वागत द्वार बनाए गए थे, जिन पर गेरुए रंग की पताकाएं फहरा रही है। इन द्वारों पर भगवान बुद्ध के उपदेशों को सूचीबद्ध करके लगाया गया था, जिसे साधारण जनता पढ़ रही थी। इसके अतिरिक्त जगह-जगह बौद्ध भिक्षु भगवान बुद्ध के उपदेशों एवं उनकी शिक्षाओं का प्रवचन कर रहे थे। कही-कही गीतों व वाद्य संगीतों के स्वर गुंजरित हो रहे थे। दृश्य परिवर्तन के [राजधानी से बाहर दूर-दूर तक खुला मैदान पड़ा था। उसके एक ओर एक छोटी सी पगडंडी निकटवर्ती जंगल में जाकर समाप्त हो जाती थी। कुछ बौद्ध भिक्षुओं का दल उन जंगलों से बाहर आता हुआ दिखाई दे रहा था। भगवान बुद्ध उपदेशों को गीतबद्ध करके एवं वाद्य यंत्रों की मधुर गुंजन के साथ यह दल शनैः शनैः पाटलीपुत्र की ओर बढ़ता जा रहा था। इस दल की अग्रपंक्ति में गुरु महाराज तिस्स मोगलिपुत्त मौजूद थे और उनके दाएं-बाएं दो बौद्ध भिक्षु हाथ वीणा लिए हुए मधुर स्वर में बजा रहे थे। उनके पीछे लगभग 10 अन्य भिक्षु पंक्तिबद्ध होकर आगे बढ़ रहे थे।] दृश्य परिवर्त राजधानी के मुख्य द्वार के बाहरी प्रांगण में सम्राट अशोक एक सुन्दर से फूल से सजे रथ पर सवार थे। उन्होंने आज राजसी वस्त्र के स्थान पर गेरुए रग के वस्त्र धारण कर रखे थे और कमर मे तलवार के स्थान पर हाथ में फूलो की माला ले रखी थी। गले में कीमती रत्नजटित हार एवं मालाओ का स्थान आज रुद्राक्ष माला ने ले रखा था। जैसे ही गुरू मोगलिपुत्त रप के निकट आए, सम्राट अशोक ने रप से उतरकर उनके चरण स्पर्श करते हुए उनके गले में माला डालकर उनका अभिनन्दन किया। इसके बाद उन्होंने तिस्स मोगलिपुत्त को रथ पर बैठने का अनुरोध किया। उनके रथ पर बैठते ही रथ राजमहल को और तीन गति से भाग लेता है। दृश्य परिवर्तन [राजमहल में एक विशेष रूप से सजाए गए कक्ष में सम्राट अशोक तिस्स रिपोप- मोगलिपुत्त के साथ प्रविष्ट हुए । राजगद्दी मिक पहुंचकर सम्राट अशोक खड़े हो गए।] अशोक : विराजिए गुरु महाराज। तिस : राजन् ! मुझ साधू सन्यासी का राजगद्दी से क्या वास्तो। मुझे तीचठने के लिए शेर की खाल अथवा मग चर्म ही काफी है। राजन् आप ही इस पर विराजिए। अशोक : लेकिन गुरु महाराज अब इस गद्दी का मालिक कोई राजा नही बल्कि आप ही की तरह एक साधू है। कल का राजा आज साधू के रूप में आपके सामने खड़ा तिस्स : (हसते हुए) राजन् अभी तो राजा ही है, इसलिए आप ही गद्दी की शोभा बढ़ाइए । जव कोई दूसरा राजा बन जाएगा तो"| अशोक : लेकिन गुरु के समक्ष मैं राजगद्दी पर बैठू यह। तिस्स : राजन् अभी न तो मैं गुरु हूं और न ही आप शिष्य । अभी तो केवल यह मेरी औपचारिक भेंट है । यह सत्य है कि आप बौद्ध धर्म की नीतियों से प्रभावित हैं लेकिन अभी इस बात का निर्णय नहीं हुआ है कि आप उन नीतियों को अपनाने में कहाँ तक समर्थ हो सकेंगे। अतएव अभी से कोई रिश्ता स्थापित करना उचित नहीं 1 अशोक : जैसी आपकी इच्छा। दृश्य परिवर्तन [राजमहल के विशेष कक्ष में सम्राट अशोक और गुरु मोगलिपुत्त तिस्स बैठे हुए आपस में विचार-विमर्श कर रहे थे।] अशोक : गुरु महाराज इस कलिंग युद्ध के दर्दनाक अंत एवं करुण दृश्य के बाद से मेरे हृदय में परिवर्तन होना शुरू हुआ है । पहले तो मेरी इच्छा थी कि इस पाप से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या कर लूं परन्तु इसी समय मुझे अपने बिछुड़े हुए भाई वीतशोक ने जो नई किरण प्रदान की है, उसी से मैं आपके दर्शनों के लिए लालायित हो उठा था। फिर भी मैंने निश्चय किया है कि अब इस राजगद्दी को त्याग कर अपना शेष जीवन भगवान बुद्ध के चरणों में अर्पित कर दूंगा। तिस्स : विचार तो शुभ है राजन्, लेकिन यह संदेह की बात है कि एक क्रूर और लोभी शासक के रूप विख्यात विश्व विजेता बनने की लालसा रखने वाला राजा साधू बनकर अपना शेप जीवन भगवान बुद्ध की मेवा में व्यतीत कर भी सकेगा अथवा नहीं। अशोक : आप विश्वास कीजिए, मैंने ऐसा ही निश्चय कर लिया है और इस कार्य हेतु अपने पुत्र महेन्द्र को राजा बनाने की अनुमति भी अपने पार्पदो से प्राप्त कर ली है।

40/ सम्राट के आंसू : तिस्स : (कुछ देर तक वह सम्राट अशोक को आँखों में कुछ पढ़ते रहे)-राजन आपकी आँखों से तो यही विदित हो रहा है कि आपने दृढ़ निश्चय किया है, लेकिन मुझे सन्देह है कि आपने जो धारणा बनायी है, वह आपके लिए लाभकारी सिद्ध होगी अयवा हानिकारक। अशोक : मैं आपका मतलब नहीं समझा। तिस्स : राजन् मतलब साफ है । एक राजा साधू नहीं बन सकता और न ही एक-एक साधू राजगद्दी का भार सम्हाल सकता है। साधू का जीवन बड़ा ही विकट और कष्टकारी होता है । मुझे तो सन्देह है कि कहीं आप न तो शासक ही रहे और न ही साधू बन पाए । यह भी हो सकता है कि अशोक : माप सम्पूर्ण स्थिति स्पष्ट कर दें तो समीचीन होगा। तिस्स : राजन् साधू बनने के लिए साधना चाहिए, नंगी जमीन चाहिए और भोजन के रूप मे भिक्षा और फलादि चाहिए । स्पष्ट है कि एक शासक कभी भी न तो नंगी जमीन पर सो सकता है और न ही मिक्षा मांगकर पेट भर सकता है। अशोक : आपके दृष्टिकोण मे मैं साधू नहीं बन सकता। तिस्स : हाँ. "एक कारण इसका और भी है। आप एक उग्र स्वभाव के क्रोधी शामक रह चुके हैं । इसके विपरीत साधू नम्र स्वभाव का होता हैं । तमाम वैदिक ग्रंथों एवं पुराणों का ज्ञाता होता है । समाज सेवा ही उसका सर्वप्रथम धर्म होता है । समाज को शिक्षित करके उसके रोग का निवारण करना ही एक साधू का जीवन लक्ष्य होता है। अशोक : लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार भगवान बुद्ध भी तो क्षत्रिय थे और राजकुमार थे। फिर उन्होंने कैसे माधू के रूप मे अपना जीवन व्यतीत किया। तिस्स : आपकी जिज्ञासा उचित है राजन् । जिस समय भगवान बुद्ध अल्पायु के थे, वह मानव दुःख के कारणो को जानने व उनके दूर करने के उपाय के सम्बन्ध में सोचा करते थे। किसी दुर्वल को देखकर उनका हृदय तड़फ उठता था तो किसी रोगी को देखकर उनका मन व्यथित हो उठता था। किसी मृत व्यक्ति को देखकर उनका मन करुणा से चीत्कार कर उठना था कि आखिर इन्सान इतने दुःख क्यों पाता है और इनके निवारण के उपाय क्या हैं । यही कारण था कि वह इन विचारधाराओं मे डूबे रहते थे और राजकाज में रुचि नही लेते थे । प्रायः एकान्त में रहकर इन्हीं दिपमों पर चिन्तन मनन किया करते । उनके पिता ने इसी कारण उनका विवाह भी कर दिया और कुछ ही समय बाद वह एक बालक पिता भी बन गए परन्तु इसके बावजूद समस्त माया मोह से मुक्त होकर एकान्तवास में चले गए। राजन्, किसी को भी यह पता ही नहीं चला कि वह कहां गए और किस स्थिति में रहे। वयाँ तक वह विना अन्न जल के माधना करते रहे तब कही उन्हें इस समस्या के समाधान के रूप में निर्वाण प्राप्त हुआ। राजन् यदि वह राजगद्दी ग्रहण करने के - बाद जाते तो शायद वह कभी भगवान का दजान प्राप्त र पारजए याद वह सबकी जानकारी में जाते तो उनके शत्रु इसका पदो उमले और सम्भव था कि वह उन्हें बहुत पहले ही समाप्त कर देते। अशोक : ओह। तिस्स : राजन्, आप एक राजा हैं और निश्चय ही आपके हजारो शत्रु होंगे। जब उन्हें इस बात की जानकारी मिलेगी कि सम्राट अशोक साधू हो गया है तो वह आपके राज्य में विद्रोह भडकाने का प्रयास करेंगे। इसके साथ ही मौका पाते ही आपको भी समाप्त कर देंगे। अतः इस दृष्टि से भी आपका साधू बन सकना नितान्त अमम्भव है और इस अवस्था मे जिस उद्देश्य से आप साधू बनना चाहते हैं, वह भी पूर्ण नहीं हो सकेगा। अशोक : यह बात सत्य है कि हमारे शत्रुओं की कमी नही है । लेकिन यह भी सत्य है कि मैं इस गद्दी को अपनाना नहीं चाहता। चूंकि मैं माधू बन नही सकता अतः एक मार्ग ही शेष बचता है और वह है आत्महत्या । 'तिस्स : राजन् आत्महत्या करना सबसे बड़ा पाप है । यदि आप आत्महत्या करना ही चाहते हैं तो इसके कारणों पर भी विचार करना जरूरी होगा। एक तो इसका फायदा आपके विपक्षी उठाएंगे और उन्हें यह कहने का मौका मिल जाएगा कि सम्राट अशोक पागल हो गया था, अतः उसके पुत्रों ने राजगद्दी के लोभ में उसकी हत्या कर दी । दूसरे राजगद्दी पाने के लिए आपके पुत्रों मे होड लगेगी और पुनः वही कत्लेआम शुरू होगा जो आप कर चुके हैं। तीसरा यह है कि जिस उद्देश्य से आप आत्महत्या करना चाहते है, वह आपको मृत्योपरान्त भी नहीं मिल सकेगा। केवल आपकी आत्मा कलिंग राजमहल के इर्द-गिर्द मंडराती रहेगी और उस स्थिति में आपको मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकेगा। अशोक : उफ। मेरी तो कुछ समझ में नही आता क्या करूं। 'तिस्स : राजन् आपके हृदय में कलिंग की महारानी के लिए जो स्थान है, उससे मैं परिचित हूं और यही आपके दुःख का मूल कारण है। जैसाकि आप स्वयं कहते हैं, वह आपसे नफरत करती थी और इसीलिए उसने अपने को अग्नि देव को मर्पित कर दिया। राजन् मेरे विचार में तो रानी पद्मावती का यह बलिदान निरर्थक नहीं जाना चाहिए और आपको कुछ बनाने में सहायक होना चाहिए। अशोक : नही गुरु महाराज अब मैं कुछ नहीं बनना चाहता। मैं केवल कलिंग की महारानी के पास जाना चाहता हूँ उससे माफी मांगने के लिए। तिस्स : राजन् मृतात्मा के पास जाना कदापि सम्भव नहीं है । यदि महारानी से तुम्हें इतना ही लगाव है तो उसका प्रायश्चित तुम्हें इसी जन्म में करना होगा। अशोक : वही तो मैं जानना चाहता हूं। साधू बनना सम्भव नही, आत्महत्या करना पाप 42 / सम्नाट के आंसू है, राजगद्दी पर बैठना अभिशाप है, फिर आप ही बताइए किस प्रकार प्रायश्चित करूं। तिस्स : (मुस्कराते हुए) राजन् बहुत से माध्यम हैं । परम पिता परमेश्वर ने यदि पाप का माध्यम बनाया है तो उससे मुक्ति का रास्ता भी बताया है। भगवान बुद्ध ने भी इसी समस्या के निदान पर अपना सम्पूर्ण जीवन बिता दिया और अन्ततः उन्होंने वह मार्ग तलाश ही लिया जिसे मध्यम मार्ग कहा जाता है। इस मार्ग को अपनाने के बाद काम, क्रोध व दुःख का विनाश हो जाता है और मानव देवतुल्य बन जाता अशोक : इस बात का उल्लेख पाल पण्डित ने भी किया था, परन्तु उन उपदेशों को सुन- कर भी अपने मन को मायाजाल से मुक्त नहीं कर पा रहा हूँ। तिस्स : केवल उपदेश सुनने से ही दुख का निवारण नहीं हो जाता बल्कि इनको यथार्थ जीवन में उतारना एवं उनका पालन करना अशोक : इसीलिए तो मैंने साधू बनने की जिज्ञासा व्यक्त की थी। इससे न दुःख का कारण रहेगा और न ही दुःख । लेकिन आपके अनुसार यह भी सम्भव नहीं है । एक दूसरा मार्ग आत्महत्या है, उसे भी आप स्वीकार नहीं कर रहे है । तिस्स : राजन् इसके अतिरिक्त एक अन्य मार्ग भी है, जिसे आप पूर्ण करने मे सक्षम है तथा इस मार्ग में आप भगवान बुद्ध की सेवा भी ज्यादा कर सकते हैं। अशोक : बताइए गुरु महाराज, मैं जानने को उत्सुक तिस्स : राजन् इस तीसरे मार्ग के अन्तर्गत आपको राजगद्दी पर अपना अधिकार बरकरार रखना है । दूसरा यह कि पूरे देश में खून की होली खेलना, युद्ध करना आदि बन्द करवा दें। अशोक : इसे तो पहले ही स्वीकार कर चुका हूँ तथा आदेश भी दे दिया है। तिस्म : अतिशुभ । चूंकि आप पूरे देश में एक क्रूर और लोभी शामक के रूप में विख्यात हैं और जनता में आपके प्रति अविश्वास, भय एवं उत्तेजना की भावना व्याप्त है। अतः आप जनहित के ऐसे काम करें, जिससे जनता में आपकी छवि उत्तम हो तथा वे अपने दुःख दर्द को आप तक पहुंचाने में मक्षम हों। अशोक : आपके परामर्शानुमार आज ही आदेश दे दूंगा। तिस्स : इसके साथ ही आप जनकार्यों को करने का बीड़ा उठा लें। इस हेतु जगह-जगह धर्मशालाएँ. चिकित्सालय, वाचनालय, विद्यालय, गौशालाएं, आदि बनवाएं, जिससे आने जाने वाले यात्रियों को सुविधा हो एवं शिक्षा के प्रसार के साथ भगवान बुद्ध की शिक्षाओ एवं उपदेशो का प्रसार हो। इसके साथ ही जगह-जगह छायादार वृक्षों, फलदार वृक्षों आदि का युद्धस्तर पर आरोपण करवाएं। इसके साथ ही जनता को इस बात का पूर्ण अवसर दें कि वह आपसे किसी भी समय निःसंकोच मिलकर अपने दुःप दर्द को आप तक पहुँचा सके ।

अशोक : ऐसा ही होगा। तिस्स : सबसे अहम कार्य अपने अन्दर विद्यमान काम, कर एवं नष्ट कर दें। उत्तम तो यह होगा कि यदि आप यह समान की चिता में ही आपकी वह भावनाएं जलकर राख हो चुकी हैं। विशप रूप कलिंग की जनता को पुत्रवत प्यार देकर उसके मन में व्याप्त भय, क्रोध एवं आवेश पर विजय प्राप्त करें। यही सही रूप में कलिंग की विजय होगी। इसके साथ ही तीर्थस्थलो के निर्माण एव उनके पुनरुद्वार के कार्य मे विशेष रुचि लें। अशोक : इस सम्बन्ध में भी आपके परामर्श के अनुसार आदेश प्रसारित कर दूंगा। तिस्स : अब यदि आपके हृदय में भगवान बुद्ध के प्रति प्रेम, आदर व श्रद्धा है तो आप भगवान बुद्ध के उपदेशों का प्रचार राजकीय स्तर से करवाएं। यदि आपका राजकोप सक्षम हो तो आप देश-विदेश में बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ ही 84000 स्तूपों का निर्माण करवाएं। इसके अतिरिक्त भगवान बुद्ध के उपदेशों को जगह- जगह चिह्नित करवाकर शिलालेखो के रूप में स्थापित करवाने का कष्ट करें। अशोक : मैं इस सम्बन्ध में शीघ्र ही उचित कार्यवाही करने का पूरा आश्वासन देता । तिस्स : मैं एक बात को विनय रूप मे स्पष्ट करना चाहता हूं। जैसाकि आपको भी विदित है कि तीर्थ स्थलों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। विशेष रूप से बौद्ध गया के विकास एवं पुनरुद्धार पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इस सम्बन्ध में यदि राजकोप से उचित दान दे दें तो ज्यादा उपयुक्त होगा। अशोक :कितना दान देना होगा। तिस्स : इसका मूल्यांकन तो आपको ही करना है। : अशोक : तथास्तु । [इसी समय कक्षा में एक सैनिक प्रवेश करता है ।] सैनिक : महाराज उप सेनापति वीरगुप्त जी आपसे मिलना चाहते हैं। अशोक : ठीक है, उन्हें भेज दो। [वीरगुप्त प्रवेश करता है और सम्राट अशोक के ममक्ष अभिवादनोपरांत खड़ा हो जाता है। अशोक : क्या कोई विशेष खबर है ? थोरगुप्त : महाराजाधिराज पाटलीपुत्र में कुछ उग्रवादी लोगो ने विद्रोह की स्थिति पदा कर दी है, जगह-जगह सभाएं करके उतेजक भाषण दिए जा रहे हैं, स्थिति किसी भी समय विस्फोटक हो सकती है। आपके आदेश को ध्यान में रखते हुए अभी तक हम लोगो ने किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं की है।

44/ सम्राट के आंसू अशोक : आश्चर्य है, राजधानी में विद्रोह । तिस्स : ऐसा प्रतीत होता है कि आपके शत्रुओं को इस बात की जानकारी प्राप्त हो गयी है कि आप राजगद्दी छोड़ने जा रहे है। अशोक : लेकिन अभी गद्दी छोड़ी तो नहीं है । हो आप ही बताइए कि जब मैंने भगवान बुद्ध के अहिंसा का व्रत ले रखा है तो फिर कैसे विद्रोह को रोका जाए। [अशोक की बात सुनकर तिस्म हम पड़े और कुछ देर तक हमते रहे।] लिस्म : राजन् आपने अहिंसा पालन का व्रत लिया है। लेकिन ऐसे भी उपाय है जिससे आप शत्रुओं को नाको चने चबवा सकते हैं । अशोक : आप ही बताएँ, मुझे क्या करना चाहिए। -तिस्स : राजन् मैं आपको इसी क्रम में एक कहानी सुनाता हूं: एक जंगल में एक साधू था। उसने भगवान बुद्ध के उपदेश का पालन करते अहिंसा का व्रत ले रखा था। जिस पेड़ के नीचे वह साधना करता था, उसी पेड पर एक साँप रहता था । जब साधू साधना में लीन जाता तो सांप उसे काट लेता था जिससे साघ की साधना भग हो जाती थी। बार-बार उपचार करने के बावजूद उसकी हालत मृतप्राय हो गयी। एक दिन भगवान बुद्ध जब उधर से गुजरे तो साधू ने अपनी समस्या बतायी। इस पर भगवान बुद्ध कहा--"ने जीव को मारना पाप बताया है न कि उसको डराने को। यदि साँप को आते हुए या जाते हुए आप देखते हैं तो उसे मारें नहीं बल्कि लाठी की ठक ठक करके उसे भगा दें। वो तीन बार ऐसा करोगे तो वह साँप डरकर भाग जाएगा और फिर कभी नहीं आएगा।' इसके बाद साधू ने वैसा ही किया। इससे न तो उसको हत्या का पाप मोल लेना पड़ा और न ही दुबारा सांप उसके निकट आया । अशोक : मोह समझ गया गुरु महाराज । हाँ सुनो बोरगुप्त तुम सैनिकों की टुकड़ियो को जगह-जगह तैनात कर दो तथा विद्रोहियों के नेताओं को गिरफ्तार करके कारागार में डाल दो। धोरगुप्त : जैसी माज्ञा सम्राट । - दृश्य परिवर्तन [राजदरबार में पापंदगण एवं अन्य मम्मानित सदस्यगण मौजूद हैं। इसी समय सम्राट अशोक मभाकक्ष में प्रवेश करते हुए और चलते हुए सीधे राजमिहामन पर जा बैठे। राजदरवार मे पूर्ण सन्नाटा छाया हुआ था। कुछ ही देर में सेनापति जयदत्त कुछ बन्दियों को लेकर राजदरवार में प्रवेश करते हैं। सेनापति : महाराजाधिराज की जय महाराज के आदेशों को ध्यान में रखते बिना किसी प्रकार का रक्तपात किए हुए पाटलीपुत्र के विद्रोह को शान्त कर दिया गया है तथा इन लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वह इस विद्रोह के संचालक अमरजीत हैं। इन्होंने ही विद्रोह को फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। अशोक : क्यों अमरजीत सेनापति का आरोप क्या सही है। अमरजीत : जो हो। अशोक - क्या तुम इनके परिणाम से परिचित नही थे? अमरजीत : जी हाँ परिचित था। लेकिन राजन् मौत का भय दिखाकर हमारी जनता के उद्देश्य का समाधान नहीं किया जा सकता। वैसे भी इस कार्य मे कूदने के बाद हम लोगों को मौत का कोई भय नहीं रह गया है। अशोक : आश्चर्य है लेकिन तुम्हारा और तुम्हारी जनता का उद्देश्य क्या है। अमरजीत : राजन् हमें अपने क्रूर शासक और उनके क्रूर मैनिकों को क्रूरता के कारण यह रास्ता अख्तियार करना पड़ा है। जनता के प्रति हो रहे अन्याय को समाप्त करना मेरा परम् कर्तव्य है, बहू बेटियों की इज्जत बचाना ही हमारा परम धर्म अशोक : तो इसका मतलब यह है कि तुम्हें जनता का पूर्ण समर्थन प्राप्त होगा। अमरजीत :निश्चय ही जनता ने मुझे इसीलिए अपना नेता चुना है और जब तक इस पद पर रहूंगा अथवा जीवित रहूंगा, तब तक इस विद्रोह की भाग को शान्त करना नामुमकिन है । मुझे विश्वास है कि यदि मुझे फांसी हो भी जाती है, तो मेरा स्थान कोई दूसरा अमरजीत लेगा। हाँ मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि जनता आपकी प्रजा है और प्रजा के सुख-दुःख का मूल्यांकन करना ही राजा का कर्तव्य होता है, यदि राजा का यह कर्तव्य न होता तो हमारा मानव समाज कभी भी विकसित नहीं होता और आज भी हम लोग जानवरो की तरह ही अपना जीवन निर्वाह कर रहे होते। अशोफ : बहुत खूब अमरजीत । हम तुम्हारी बातो से प्रसन्न है और तुम्हें यह सूचित करना चाहता हूँ कि मैंने पहले ही धोपणा कर दी है कि हमारे देश की सम्पूर्ण जनता पुत्रवत है और अब उस पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया जाएगा। साथ ही यह भी आदेश दे दिया है कि यदि कोई सैनिक अथवा कर्मचारी जनता के साथ, उनकी बहू-बेटियों के साथ कोई अश्लील, आपत्तिजनक कार्य करते हुए पाया जाता है तो उसे तत्काल फांसी पर लटका दिया जाए। अमरजीत :आश्चर्य है राजन् ! मुझे तो विश्वास नहीं होता। अशोक :विश्वास करना ही पड़ेगा अमरजीत ।पहले वाला अशोक मर चुका है और अब जो अशोक तुम्हारे सामने खड़ा है वह दूसरा है । [अशोक की बात सुनकर अमरजीत व उसके साथी सम्राट अशोक की जय-जयकार करने लगते हैं।

-46/ सम्राट के आंसू अशोक : मैं अपने देश को सम्पूर्ण जनता को विश्यास दिलाता हूं कि अब उनके माय कोई अत्याचार न होगा और उन्हें जीने का समान हक मिलेगा। हमारे वीर मनिकों को वीरता की कहानी जग जाहिर है किन अब जो जनमेवा का प्रत लिया गया है, उमके लिए उन्हें युद्धस्तर पर काम करके जनता का विश्वास प्राप्त करना होगा । मुझे विश्वास है कि सेनापति, पार्षदगण एवं सैनिक मेरे उद्देश्यों की पूर्ति युद्धस्तर पर करेंगे। .. सेनापति : महाराज आपके आदेश का पालन करने का पूरा प्रयास किया जाएगा। अशोक : मेनापति, मबसे पहता कायं तो यह करना है कि अब जनता के प्रति कोई अन्याय न होने पाए। रणयुद्ध के स्थान पर जनसेवा का कार्य युद्धस्तर पर किया जाए। इसके लिए जगह-जगह धर्मशालाएं, याचनालय, गौशाला, विद्यालय, चिकित्सालय आदि का निर्माण युद्धस्तर पर कराया जाए। इसके साथ छायादार एवं फलदार वृक्षों का आरोपण करके उनकी देवरेख के लिए कर्मचारियो की नियुक्ति की जाए। जहाँ सूधा, अतिवृष्टि एव अन्य प्राकृतिक आपदाओ से ग्रस्त क्षेत्र हैं, वहाँ को कर वसूली स्थगित कर दी जाए तथा जनता को इस बात का पूरा अवसर प्रदान किया जाए कि वह अपनी बात हम तक पहुंचा सके। [सम्नाट अशोक के इस निर्णय को सुनकर सभा कक्ष में पुनः जय-जयकार के स्वर गूंज उठे। अशोक : सेनापति, जैसा कि तुम्हें विदित है कि मैंने भगवान बुद्ध को दासताको स्वीकार कर लिया है । इस हेतु भी तुम्हें युद्धस्तर पर कार्य करना है। सर्वप्रथम इसके लिए 84000 स्तूपों का निर्माण देश के विभिन्न भागों में कराना हमारा प्रमुख लक्ष्य है। इसके अतिरिक्त जगह-जगह, पहाड़ों, पठारों, पत्थरों एव अन्य जगहों पर भगवान बुद्ध के उपदेशो को खुदवाया जाए, जिससे भगवान बुद्ध के उपदेशों का अधिक-से-अधिक प्रचार किया जा सके । इस कार्य में तुम्हे मेरे अन्य पार्षदगण पूर्ण महयोग प्रदान करेंगे। सेनापति : आपके आदेश का पालन युद्धस्तर पर किया जाएगा। अशोक : अमरजीत, क्या मैं अब आशा करूं कि तुम विद्रोही कार्य करना बन्द कर दोगे। अमरजीत : महाराज, अब तो आपके लिए सब कुछ बन्द कर सकता हूँ ।यदि किसी शुभ कार्य के लिए मेरी जान भी जाती है, तो मुझे खुशी होगी। अशोक : नही अमरजीत, जान देने की आवश्यकता नहीं है । मैं चाहता हूँ कि नेतृत्व में शिक्षा-दीक्षा का कार्य शुरू कर दो। अमरजीत: यह तो मेरे लिए खुशी की बात है। मैं निश्चय ही इसे पूर्ण करूंगा। तुम अपने सम्राट के आंसू 147 अशोक : इस कार्य के लिए जो धन की आवश्यकता पड़, उसे तुम राजकोष मे ले सकते हो। अमर गीत : राजन्, समस्त व्यय भार मैं एवं जनता हो वहन करेंगे । आपके आशिर्वाद से धन दौलत की कमी नहीं है। [इसके बाद अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा की ओर देखते हुए] अशोक : बेटे तुम लोगो को कुछ कार्य सौंपना चाहता हूँ। महेन्द्र : आज्ञा कीजिए पिताश्री। अशोक : वेटे याद है तुम्हे, राजा दशरथ ने कैकेयी के कारण राम को 14 वर्ष का वनवाम दिया था। महेन्द्र : जी हां पिताश्री। अशोक : बेटे, यहाँ कोई कैकेयी नहीं है, लेकिन मुझे मेरे द्वारा किए गए पापों का प्रायश्चित ही मेरे लिए कैकेयी है। मैं चाहता हूँ कि तुम और संघमित्रा श्रीलंका व धीन चले जाओ तथा वहां भगवान बुद्ध के उपदेशों का प्रचार करो। जगह-जगह शिलालेखो पर भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को खुदवाकर आने जाने वाले मार्गों पर लगवाओ, जिससे जनसाधारण में इसका प्रचार हो सके। महेन्द्र : पिताश्री, मुझे इस शुभ कार्य को करने में खुशी होगी। अशोक : बेटे, मुझे यही आशा थी कि तुम मेरे पापो प्रायश्चित में अपना योगदान अवश्य दोगे। महेन्द्र : योगदान नही पिताश्री यदि आवश्यकता पड़ी तो जान भी दे सकता हूँ। अशोक : बेटी सगमित्रा, तुम्हें कोई आपत्ति है। संघमित्रा : नही पिताश्री, मुझे तो खुशी है कि आपने नारी को इस योग्य तो समझा । अशोक : बेटी, नारी छोटी कब हुई है, यह तो समाज के उन ढोंगी विद्वानों की कल्पना है, जिन्होंने नारो को अपने स्वार्थ के लिए छोटी बना दिया, अन्यथा नारी में तो पुरुप से ज्यादा शक्ति होती है, फिर पुरुष की जननी भी तो नारी ही है। संघमित्रा : पिताश्री, हम लोगों को कब जाना होगा। अशोक : बेटी मन में छिपी ममता इस कार्य को आज्ञा नहीं दे रहे हैं कि अपनी मासूम बेटी को इतने जोखिम भरे एवं जटिल कार्य पर भेजूं परन्तु मन में छिपी कैकेयी रूपी पापिष्ठा मुझे उद्यत कर रही है कि तुम दोनों को वनवास हूँ। संघमित्रा : पिताश्री, इतनी दुर्बलता ठीक नही है । जो शुभ कार्य हाथ में लिया है, उसके लिए त्याग करना ही होगा। त्याग में ममता आदि का कोई महत्त्व नही होता पिताश्री। अशोक : तुम ठीक ही कह रही हो । तुम दोनों कल प्रात: सूर्योदय होने के पूर्व ही रवाना हो जाओ। सेनापति तुम्हारी यात्रा का यथोचित प्रबन्ध कर देंगे।

48/मग्राट के आंसू दृश्य परिवर्तन [मम्राट अशोक वपने फस में बैठे हए थे। रहरहकर मामने टंग टन वित्र को देखकर उनके चेहरे पर गम्भीरता का आवरण छाठा चला गया। यह तेल चित्र कलिंग माम्रानी पदमिनी का था।) अशोक : कलिंग मानाजी तुम्हारे दाग का प्रायश्चित मुझे कब तक करना होगा। सा मुझे मेरे द्वारा किए गए पार्टी मे मुक्ति मिलगी भी या नहीं। [एकाएक तेल चित्र माकार हो रहता है] तम्बार : मम्राट. हर पार का प्रायश्वित है। मुझे मानून है कि मुझे सोकर तुमने जो बुध पाया है, उसके कारण ही तुम्हारे मन में बनी राक्षसी प्रवृत्ति का अन्त हो .. : .. सगोक: लेकिन तुमने मुझे अभी तक माफ नहीं किया है। तस्वीर : राजन, मैं तो कभी माफ नहीं कर सकती। तुमने एक पविदवा नारी पर कुदृष्टि डाली थी। यह तो अन्ठा हुआ जो तुम्हारी रामती नोदिनों का अन्व हो गया अन्यथा मम्राट तेरा जीवन बड़ा ही कप्टमर होवा, ऐका जीवन वित्तसे तेरे परिवार के मदम्य ही तुझमे नफरत करने लगते। अशोक :काश में आत्महत्या कर लेता तो शायद तुम्हारे पास पहुंच जाहा। तम्बार : श्रम है राजन् ! मृत्यु के बाद तुम्हें पोर नर्क बाद मिलता और समर्क से निकलकर मेरे पास पहुंचना तुम्हारे लिए सम्भव नहीं था। मगोक : देखी साम्राज्ञी, अब तुम इस दुनिया में तो हो नहीं और न ही पर सारे प्रति मेरे मन में कोई कुविचार है । कम-से-कम अब तो तुम्हें माना। सम्वीर : मैं पहले ही कह चुकी हूं कि मैं तुम्हें कभी माफ नही होसाफी कलिंग को मामूम जनता से मांगनी चाहिए वो आज भी जीविका प्रायश्चित कर रही है। सशोक : मैं ममझा नहीं साम्राज्ञी। मैंने तो यहाँ को बनताको सुख-सुविधा का पूरा प्रबन्ध कर दिया है। तस्वीर : मुख-मुविधा की व्यवस्था तो कर दी है लेकिन उस युरको सहाध से बनी महामारी के रोकथाम की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं की है। तुम तो हो हो जबकि वहां की जनता महामारी की शिकार हो रही है। जब तक समय 70000 लोग महामारी के शिकार हो चुके हैं। मगोक: मोह लेकिन मुझे इस बात को कोई जानकारी नहीं है। तस्वीर इसकी जानकारी आप तक पहुंचने वाली है राजन् ! वहाँ से दूर पल पुगा है। अशोक : आश्चर्य है."तुम तो मर चुको हो फिर मूचनाएँ। : ..

तस्वीर : यह सत्य है लेकिन मैं अपनी जनता का मोह त्याग सकीत मेरे आत्मा कलिंग की जनता के आस-पास ही मण्डरा रही है और तब तक मेदाती रहेगी जेवतिया वहां की जनता सकुशल व सानन्द नहीं हो जाती है। अशोक : ओह "वहां की जनता को अनावश्यक रूप से हुई परेशानी के लिए मुझे खेद है । मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि वहाँ से महामारी का प्रकोप दूर करने के लिए में अपनी पूरी सेना को लगा दंगा। तस्वीर : राजन्, महामारी तलवार से दूर नही की जा सकती। उसके लिए सैनिक नही बल्कि वैद्यों की सेना चाहिए, जो युद्धस्तर पर इसका निराकरण कर सके। अशोक : हो..हो."मैं भी यही कह रहा था। तस्वीर : मैं तुम्हे विश्वास दिलाती हूँ सम्राट, जिस दिन कलिंग को जनता सुख समृद्ध व स्वस्थ हो जावेगी और जनता अपने स्वच्छ मन से तुम्हें स्वीकार कर लेगी, उसी दिन मैं तुम्हे माफ कर दूंगी। अशोक : मैं इस बात का पूरा प्रयास करूंगा। [इसी समय एक सैनिक कक्ष में प्रवेश करता है। संनिक : महाराज, पार्षद ब्रह्मदेव सिंह आपसे तुरन्त मिलना चाहते है । अशोक : उन्हें यहीं भेज दो। [पार्पद ब्रह्मदेव ने कुछ ही देर में कक्ष में प्रवेश किया और सम्राट अशोक का अभिवादन करते हुए एक ओर खडा हो गया। अशोक : ब्रह्मदेव मुझे अत्यन्त अफसोस है कि कलिंग की भयंकर महामारी की सूचना तुमने अभी तक मुझे उपलब्ध नहीं करायी है। ब्रह्मदेव : महाराज, मुझे भी अभी ही दूत से जानकारी मिली है। उसने बताया कि अभी तक वह लोग प्रयत्नशील थे कि किसी तरह महामारी को समाप्त किया जा सके परन्तु जब कोई फल न निकला तो हमे सूचना भेजी गई है, जिससे वहाँ उचित सहायता पहुंचायी जा सके। अशोक : ब्रह्मदेव यह बहुत गलत बात है। मुझे जनता की असुविधा की छोटी-से-छोटी सूचना भी तुरन्त मिलनी चाहिए। ब्रह्मदेव :जैसी आज्ञा। अशोक : इस समय कलिंग की क्या स्थिति है ? ब्रह्मदेव : दूत ने अवगत कराया है कि वहाँ हैजा, कालरा, चेचक आदि जैसी महामारी तीन गति से फैल रही है। प्राप्त सूचना के अनुसार अब तक 70 हजार व्यक्ति अकाल मौत के शिकार हो चुके हैं। अशोक : हाँ, मुझे भी यही सूचना मिली है। ब्रह्मदेव यदि यही स्थिति रही तो कलिंग .

50/ सम्राट के आंसू ककालों का देश बनकर रह जाएगी। क्या में इन कंकालों पर शासन करूंगा । उफ मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूं। ब्रह्मदेव : राजन्, मैंने निश्चय किया है कि इसी समय विद्वान एवं योग्य वैद्यों का दल वहाँ भेज दं जो इन महामारियो पर नियंत्रण प्राप्त कर सकें। अशोक : इसमें किसी प्रकार को देरी नहीं होनी चाहिए। ब्रह्मदेव हमें किसी भी स्थिति में इन मौतों को तत्काल रोकना है। अभी तक हम लोगो ने मरते-तडफते लोगों को देखा है और उन पर ठहाके लगाए हैं परन्तु अब ऐसा नहीं होना चाहिए। अब मरते एवं तड़फते लोगों को जीवन देना मेरा प्रमुख लक्ष्य है। ब्रह्मदेव महाराज प्रयास करना हमारा काम है लेकिन मौत पर विजय पाना। अशोक : क्यों 'जब हम मौत दे सकते थे तो क्या अब जीवन-दान नहीं दे सकते। ब्रह्मदेव हर स्थिति में मुझे मौत पर विजय प्राप्त करनी ही होगी चाहे इसके लिए भी क्यो न करना पडे। ब्रह्मदेव : क्षमा करें महाराज, ऐसा कदापि सम्भव नहीं है। अशोक : लेकिन इसे सम्भव करना होगा ब्रह्मदेव । अब तो भगवान बुद्ध हमारे साथ हैं ''उनका आशीर्वाद मेरे साथ है तब क्यों नही हम मौत पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। मुझे विश्वास है शीघ्र ही कलिंग को मरती जनता को जीवन दान प्राप्त होगा। ब्रह्मदेव : ईश्वर करे ऐसा ही हो। अशोक : जागो और देश के मशहूर एवं अनुभवी वैद्यो के दल को कलिंग को ओर रवाना कर दो । उनसे यह कह दिया जाए कि उन्हें हर हालत में कलिंग की जनता को स्वस्थ करना है, भले ही इसके लिए चाहे कितना ही धन क्यों न खर्च हो जाए। ब्रह्मदेव : महाराज मैंने पाटलीपुत्र के मशहूर व योग्य वैद्यों को बुलवा भेजा है। फिलहाल पाटलीपुत्र के योग्य एवं अनुभवी वैद्यों को कलिंग के लिए रवाना किए दे रहे हैं । शेप वैद्यों को हाजिर होने के लिए आदेश भेजे जा रहे हैं। अशोक : ठीक है, लेकिन यह कार्य अतिशीघ्र होना चाहिए। पांचवां दृश्य [हिमालम की तलहटी के विधावान जंगल में एक कुटिमा बनी हुई थी। उस कुटिया को पारों ओर बासों से घेरा बना दिया गया था, जिससे जंगली जानवर अन्दर न आ सके । जगह-जगह क्यारियों में सुन्दर फूलों से सुसज्जित पौधे लहलहा सम्राट के आंसू / 51 रहे थे। कुटिया के एक ओर कुछ गाय और भैसे बंधी हुई थी जिसे कामिनी नाम की एक मोटी औरत चारा पानी दे रही थी। इस कुटिया के बाहर एक छप्पर पड़ा था, जिसके नीचे 8-9 साधू बैठे हुए थे। सभी साधुओं के हाथ में विलम थी और चिलमों से रह-रहकर वे लोग गहरे कश ले रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वे सभी किसी गहरे सोच-विचार में मग्न हों। एकाएक अभिलाष ने चुप्पी तोडते हुए कहा- अरे अब तो घोर कलिजुग आ गयो भाई। देखो न सम्राट कैसा दान दे रहे हैं।] ब्रह्मचारी: अरे यह छोडो भाइ साध सम्राट अशोक है न पहिले कतल करिके आनन्द पावत रहे अब देखों न कईस चोला बदले हैं। अभिलाप : कुछ भी हो भाई सियार रंगने से बाप तो निहै नाही" "इ नाटक कित्ते दिन चलिहै रामानुज : अरे छोड साधो "भले ही ई नाटक होये लेकिन अपन की फिक्र कर पियारा : अपन कू काहे की फिकर "हम तो साधो ठहरे 'जहाँ रोटी दाना मिले वहीं हेरा बनावे। रामानुज : और जब रोटी दाना न मिले तब ! सन्तो: यह सम्भव नाही साधो भगवान के भक्तन का रोटी न मिले...! रामानुज : घबड़ा मत साधो "जरा शहर जाकर देख सब जगह लोगन ने साधू का दान-पुण्य करना पुण्य करना बन्द कर दिई हैं। सन्तोः हम तोहरी वातन का नहीं समझेन साधो। रामानुज : बरे अबहीं कल की बात है हम लोगन सेठ गरीब चन्द के पास गए रहेन । क जो हमार उपासक ठहा न । जब हम गयेन तो ऊ उल्टे हमका शिक्षा देन लगा। वोला''हमार राजा बौद्ध बन गया है "पुण्य के काम कर रहा है "हमहूं बौद्ध बन गयेन है और सम्राट अशोक को दान कई रहेन हैं । जब हम पूछेन कित्ता दान दिये हो तो बोला 10 सहस्र मुद्रा दई चुका है। ब्रह्मचारी: अरे ई सेठन का भरोसा साघो। पहिले विपदा मई हो गरीबन का खून चुसिहै अपनी डेगची कई हां मरिहैं और जब मौका देखिहैं तो मंत्री और राजन् की चमचागिरी करिके पुण्य कमइहै । लेकिन तू चिन्ता न कर हमहूँ अपना उल्लू सीधा करव जानित हैं । तोहका इन सबसे कोई मतलब नाही रखे का। रामानुज : मतलब (कहते हुए हंस देता है) अरे मूरख साधो उसने हमका दान देव से इंकार कर दिया है। सन्तो: का बकत हो। रामानुजः अरे भाई साधो "तुम्हका का पता जब हम कहेज "भई हमहूँ का तो दान दक्षिणा तो बोला रहे कि अरे मूरख तुम्हका काहे दान देई. 'सम्राट को देंगे तो पुण्य मिलिहै । इस पर जब हमने कहा कि अगर दान न दिया तो मैं अपने श्राप से 52/ सम्राट के आंसू तुम्हें भस्म कर दूंगा"तो जानत हो साधो का किहसि रहे..! सन्तो: का किहिस रहे"! रामानुज : हमरे इत्ता कहत ही ऊ अपना मोटा तेल मा डुबोया सोटा उठाई लिहिस और बोला भाग जाओ इहां से नहीं तो मारे सोटन के तुम्हका श्रापग्रस्त कर देवे । अब तुमका का बताइ अगर हम भागेन न होत तो ॐ दोई चार तो रसीद ही कर देत। केसरिया : हाँ भई साधो, यही कुछ हादसा हमरे साथ भी गुजरा रहे। सन्तो : तो क्या तुझे भी अंगूठा दिखा दिया गया। केसरिया : हाँ भाई. 'और वह भी अंगूठे में पहनी अंगूठी उतारकर साले ने दिखाया। जब मैंने श्राप देने की बात कही तो सेठ पकोड़ी मल ने अपने पहलवान नोकर से मुझे बाहर उठवाकर फिकवा दिया । उफ कमर मईहो तो अबहूँ तक दरद होई रहा .. रामानुज : अरे तुम्हका का मालूम एक साधो को नो जनता ने ऐसाधना ऐसा धुना कि बेचारे की टेंबीत गई। सन्तो: यार साधो, मुझे तो विश्वास नहीं होता। फेसरिया : तो ऐसा कर तू सेठ पकोड़ी मल या चिरौंजीलाल के पास जाकर एक धेला ले आ। राजकुमार : तुम हम लोगन का चुनौती देत हो । केसरिया : हाँ, अगर तुम ले आए तो जिन्दगी भर तेरे पैर दवाऊंगा। राजकुमार : ठीक है । पहले भोगादि लगा लूं। {कामिनी भैस का दूध दुह रही थी। अचानक भैस को गुस्सा आ गया और अपना पिछला पर रसीद कर दिया। कामिनी इस अचानक प्रहार के लिए तैयार नही थी अतः लुढककर एक और गिर गई। उसके हाथ में पकड़ी दूध से भरी बाल्टी लुढ़क गई और सारा दूध जमीन पर फैल गया।] महतो : साली मोटी अक्ल के जानवरो को बुद्धि होती हो नाहीं। रामानुज : इसीलिए तो कहा गया है, मईम के आगे बीन बजाओ भइंस ठाई बौराए । सन्तो: और महूं ताक कहा नवा है कि बुद्धि नहीं भंस बडी होती है । अभिलाप : तुम ठीक कह रहे हो साधो, देखो न साली ने सारा दूध गिरा दिया। अब हम लोग भोगादि का करेंगे। सन्तो : अरे देखो तो साधो, कामिनी देवी हायन बनी हुई मेरी तरफ ही आ रही हैं । अभिलाम: पा कहावत है धोवी से न जीते गदहा के कान उमेठ। भैस से मार पाकर हमे पाने का इरादा बनाए हैं.""साधो, मगर पर चाहते हो तो भाग लो। सन्तो: मैं गयो भाभागो तुम । - सन्नाट के आंसू / 53 [अब तक वह मोटी काली औरत कामिनी उनके निकट आ चुकी थी।] कामिनी : (चोखते हुए) हां तो मैं मोटी भंस हूं." अभिलाप : यह क्या कह रही हो गुरुवाईन''मैंने कब कहा था" कामिनी : एक तो चोरी उस पर से सीनाजोरी"एक तो मुझे भंस कहा 'बुद्धिहीन कहा और अब.. "कहते हुए उसने अभिलाप के बडे-बड़े वालों को पकड़कर खीचना शुरू कर दिया। अभिलाष : (गिड़गिड़ाते हुए) गुरुवाईन हम सौगन्ध खाई के कहित है कि मैंने कुछ नहीं कहा था वह जो साला सन्तो है उसने कहा था भैस के आगे बीन बजाओ भंस छाड़ बोराए। सन्तो : देखो साधो ठीक न होगा अगर हमें बीच में घसीटा''मैंने कब कहा था। रामानुज : काहे झूठ बोलत हो साधो "तुमने ही तो कहा था भैस बड़ी होती है बुद्धि नाही। अभिलाप : अव तुम खुद सुन लो गुरुवाइन, तुम्हारे मुंह के सामने ही कहते है 'साले का इत्ता साहम बढ गवा है । सन्तो: लेकिन हमने क्या कहा था। कामिनी : अच्छा तो सब झगड़े की जड़ तू है। कहते हुए झपटकर सन्तो के वाल पकड़कर खीचने लगी। सन्तो : (पीड़ा से चीखते हुए) बचइयो गुरु महाराज महन्त जी। [इसी समय कुटिया से एक साधू वाहर निकलते है ।] महन्त : क्या बात है साधो, काहे को शोर मचावत हो । सन्तो : अरे महन्त जी, हमका वचइही नहीं तो हमार क्रिया-करम तुम्हका ही करना पडिहै। महन्त : अरी भागवान ऊका काहे को मारे डालत हो । कामिनी : तुम चुप रहो. इसने हमको भैस कहा 'काली भैस । सन्तो: महन्त जी, हमने ऐसा नहीं कहा था मुझे बचईयो। महन्त : अगर तुमने नहीं कहा तो किसने कहा था ‘सन्तो: (अभिलाष की ओर इशारा करते हुए) उसने । अभिलाप : झूठ बोलता है। कामिनी : तुझे शर्म नहीं आती गुरुवाइन को अपवचन कहते हुए। 'सन्तो : अच्छा अब तो क्षमा कर दो 'अव नही कहेगे "भगवान कसम तुम्हका तो क्या भैस को भी भैस नही कहेंगे, गुरुजी हमको बचइयो । महन्त : अरे भाई साधो 'जो किया है भुगता। हम तोहका दुनिया मा सबसे तो बचाय सकित है लेकिन ई आफत की पुड़िया से नाहीं । ..

54 / सम्राट के आंसू कामिनी : (सन्तो के बाल छोड़कर क्रोध से फुफकारती हुई महन्त को ओर चढ़ दौड़ती है) क्या कहा मैं आफत की पुड़िया हूँ"अभी देख मजा विखाती हूँ। [महन्त उसको इस तरह गुस्से में आते देखकर एक ओर भाग लेता है और कामिनी किसी काल के समान उसका पीछा करती है। सन्तो : बड़ी मुश्किल से पीछा छोडा है गुरुवाईन ने। अभिलाप : लेकिन अब महन्त जी."बेचारे। .. दृश्य परिवर्तन [पाटलीपुत्र की आबादी में सेठ चिरौंजीलाल का मालीशान बंगला बना था। उस बंगले के सामने वही साधू राजकुमार खड़ा हुआ अलख निरंजन का आह्वान कर रहा था। उसकी आवाज सुनकर सेठ चिरौंजीलाल बाहर आए।] चिरौंजीलाल : अरे साधू महाराज भाप"कब पधारे । साधू अभी आ रहा हूँ। चिरौंजीलाल : आइए अन्दर आइए । [इसके साथ ही वह उसे लेकर अन्दर चले गए और एक कक्ष में मसनद पर बैठते हुए साधू को भी आसन ग्रहण करने को कहा। चिरौंजीलाल और सुनाइए साधू महाराज, कैसे आना हुआ । साधू : सुना है आपने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया है। चिरौंजीलाल : हाँ साधू महाराज! भगवान बुद्ध की अनुकम्पा से हमारे महाराज अशोक को सद्बुद्धि आ गई । उन्होने जनता को अपना पुत्र मानकर उनकी सेवा का वचन दिया है। साधू : यह तो बहुत खुशी की बात है सेठ । सुना है उन्हे दान बहुत दिया जा रहा है। चिरोंजीलाल : उन्हें नहीं साधू जी, बल्कि बौद्ध मठों के निर्माण हेतु, स्तूपो के निर्माण हेतु एवं जनता की सुविधा के लिए वाचनालय, चिकित्सालय, विद्यालय, पोशालाओं के निर्माण के लिए। साधू : मेठ जी, कितना आश्चर्य है कि सम्राट अशोक जैसे क्रूर शासक ने चिरौंजीलाल : यह सब भगवान बुद्ध की कृपा है साधू महाराज । अव यही देख लोन एक सहर मुद्राएं मैं दान कर चुका हूं, जेब मे टका नहीं बचा है, लेकिन भगवान बुद्ध की कृपा से मुझे न तो किसी चीज की कमी महसूम होती है और न ही मुद्राओं की आवश्यक्ता। साधु : यह तो शुभ कार्य है। इधर हम लोगों पर भी तंगी आ गई है। हम लोग बहुत बड़ा यज करने जा रहे हैं इसलिए दान-दक्षिणा एकत्रित करने का हम लोग प्रयास : कर रहे हैं। चिरौंजीलाल : देखिए साधू महाराज, मुझे अब इन कर्मकारों पर विश्वास नहीं रही। बेकार में लाखों मन अनाज, घी, तेल, पूजन सामग्री भादि पर लाखोमुिद्राए व्यर्थ व्यय करने से क्या फायदा है। वही सम्राट अशोक के कोप में देने से गरीबों के कल्याणार्थ चलाई जा रही योजआओ को पूर्ति हो सकेगी और देश से गरीबी, भुखमरी का विनाश हो सकेगा। साधू : मैं आपका मतलब नहीं समझा। चिरौंजीलाल : मतलब साफ है साधू महाराज, जब मुझे इन कर्मकाण्डों पर विश्वास ही नहीं रह गया है तो दान देने का प्रश्न ही नहीं उठता। साधू : सेठ आप घर आए मेहमान का अपमान कर रहे हैं इसके साथ ही भगवान का भी। चिरौंजीलाल : महाराज अपमान उसका किया जाता है, जिसे बुलाया जाए। आप तो बिन बुलाए पधारे है । आज्ञा कीजिए आपके भोगादि की व्यवस्था की जाए। साधू : भोगादि की आवश्यकता नहीं है मुझे यज्ञ एवं हवन के लिए मुद्राएँ चाहिए। चिरौंजीलाल : इस सम्बन्ध में तो मैं क्षमा चाहूंगा क्योंकि अब मेरे पास धन है भी नही। साधू : सोच लो सेठ, आज जो कुछ बने हो हमारे शुभ वचनों एवं आशीर्वाद से ही बने हो और अब कहते हुए साधू क्रोधित हो उठा। चिरोंजीलाल : (हंसते हुए) मैं नही मानता। यह बात दूसरी थी कि जब तक मुझे आपमें एवं कर्मकाण्डो में आस्था थी, मैंने आपको दिल खोलकर दान दिया परन्तु वह शान्ति मुझे हासिल नहीं हो सकी जो भगवान बुद्ध के उपदेशों से प्राप्त हुई साधू : ठीक है.. देखता हूँ भगवान बुद्ध तुम्हें कैसे बचाते हैं। कहते हुए साधू कोई मन्त्र बुदबुदाने लगा। फिर कुछ देर बाद पुनः बोला--सेठ अब भी सम्भल जा अन्यथा मेरे श्राप से तू भस्म हो जाएगा तेरा धर्म तुझे बचा न सकेगा। चिरौंजीलाल : अच्छा भई संभल गया'ओरे कलुआ ओ कलुआ। कलुआ: माया सेठ जी। [इसी के साथ ही एक पहलवान टाइप का युवक अन्दर आया।] चिरोंजीलाल : अरे कलुआ, यह साधू महाराज हमें अपने श्राप से भस्म करने जा रहे हैं: "भस्म करने से पहले मैं चाहता हूँ कि इन्हें कुछ दान दक्षिणा दे दी जाए। फलमा : अवश्य सेठ जी । बहुत दिन बाद ऐसे पहुंचे हुए महात्मा के दर्शन हुए हैं। कहते हुए अपने हाथों को आपस में रगड़ने लगा। चिरौंजीलाल : देख कलुआ जरा ध्यान रखना । इन्हें कहने का मौका न मिले कि इन्हें 56 / सम्राट के आंसू कम दान-दक्षिणा प्राप्त हुई है। कलुआ : बिल्कुल नही सेठ जी। [इसके साथ ही जय बजरंग बली' का उद्घोष करते हुए उसने साधू को अपनी बांहो में उठा लिया। साधू: : अरे "अरे''यह क्या करते हो छोड़ी. "मुझे ऐसी हरकत बिल्कुल पसन्द नहीं : चिरोंजीलाल : अरे दान-दक्षिणा तो ले तो। साधू : क्या दान-दक्षिणा देने का यही ढंग है । मैं कहता हूँ मुझे छोड़ दो अन्यथा अभी इसी वक्त अपने श्राप से तुम्हें भस्म कर दूंगा। [साधू का इतना कहना ही था कि कलुआ ने उमे धम्म से जमीन पर पटक दिया जिससे साधू की चीख उसके कंठ से निकलती चली गई।] साधू : सेठ, मेरा इस तरह अपमान करके तुमने अपनी मौत को दावत दी है मैं अभी ही. चिरौंजीलाल : साधू महाराज, क्या चोट ज्यादा आ गई है। क्षमा करना भई मैं तो तुम्हारे श्राप से भस्म होने से पहले कुछ दान-दक्षिणा देना चाहता था लेकिन क्या वताएं मोटी बुद्धि का कलुआ समझ हो न सका कि दान-दक्षिणा कैसे दी जाती कलुआ: समझ गया सेठजी" समझ गया" 'कहते हुए उसने पुनः साधू को बांही में उठाकर जमीन पर पटक दिया। साधू : सेठ अब मुझे तुम्हारी दान-दक्षिणा नहीं चाहिए । कहते हुए वह द्वार की और भाग खड़ा हुआ । परन्तु इसी समय कलुआ ने बीच मे पैर लगा दिया जिससे एक बार पुनः वह लड़खड़ा कर द्वार के निकट गिर पड़ा। दृश्य परिवर्तन {राजदरवार में सभी पार्षद एवं गणमान्य सदस्य उपस्थित थे। भाज सम्राट के साथ उनके बगल में रानी असन्धिमित्रा भी बैठी हुई थी । ऐसा मालूम हो रहा या जैसे आज किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार-विमर्श किया जाना हो। अशोक : ब्रह्मदेव, कलिग से कोई सूचना प्राप्त हुई है। महादेव : जी हा महाराज ! हमारे योग्य वैद्यों की टोली ने वहाँ पर फैली महामारी पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया है। आशा है शोघ ही कलिंग स्वस्थ हो जाएगा। गोर:इम महामारी में कितने लोगो को अकाल मौत का ग्रास बनना पड़ा। बहादेव : अनुमानतः 90 हजार लोगो को मृत्य हुई परन्तु अब महामारी से मरने वालों को मृत्यु दर शून्य हो गई है।

सम्राट के आंसू 1 57 अशोक : सुता असन्धिमित्रा ! इस युद्ध में मुझे कितनी क्षति हुई है । कलिंग राज्य के रूप में नहीं बल्कि श्मशान के रूप मे प्राप्त हुआ है। तुम्हारा क्या विचार है, क्या हमे कलिंगवासियों को इसी अवस्था मे छोड देना चाहिए। असन्धिमित्रा : आप राजा हैं और यह अच्छी प्रकार जानते हैं कि जनता का हित किसमें अशोक : फिर मेरे कार्यकलापो की राजमहत में आलोचना क्यों की जा रही है । असन्धिमित्रा : इस सम्बन्ध मे मुझे कोई जानकारी नहीं है, लेकिन जो थोड़ी बहुत जान- कारी विशेष सूत्रों से प्राप्त हुई है, उससे मैंने यही निष्कर्ष निकाला है कि कुछ लोग नही चाहते कि बौद्ध धर्म के विकास के लिए इतना धन बर्वाद किया जाए। अशोक : आश्चर्य है कि मेरे धन व्यय पर आपत्ति है, जबकि जनता हमसे कही अधिक दान कर रही है। विक्रमसिंह बौद्ध धर्म की प्रगति का विवरण सुनाओ। विक्रसिंह : : राजन् आपके आदेशानुसार जनता की सुख-सुविधा की पूरी व्यवस्था की जा चुकी है, जगह-जगह पोशालाओ, चिकित्सालय, वाचनालय एवं छायादार वृक्षों के आरोपण का कार्य लगभग समाप्त हो चुका है । सेनापति जयदत्त के प्रयासों से लगभग 40 हजार स्तूपों का निर्माण विभिन्न स्थलों पर पूर्ण हो चुका है तथा अन्य स्तूपों का निर्माण शीघ्र ही पूर्ण होने की सम्भावना है । इस समय शिक्षा व्यवस्था पर विशेष बल दिए जाने के उद्देश्य से निःशुल्क शिक्षा हेतु जगह-जगह विद्यालय खोलने पर विचार किया जा रहा है। अशोक : इस शुभ कार्य में देरी किस बात की है । विक्रमसिंह जनता का विकास राज्य का विकास होता है और विकास कार्य मे पूर्ण योगदान प्रदान करने के लिए जनता का शिक्षित होना नितान्त आवश्यक है। जनता के साथ अब किसी प्रकार का अत्याचार तो नहीं हो रहा है। विक्रमसिंह : राजन् अब तक प्राप्त सूचनाओ के अनुसार लगभग 40 सैनिको को मृत्यु- दण्ड दिया जा चुका है, जिन्होने जनता के साथ ज्यादती की एवं लूटमार के कार्यों मै योगदान प्रदान किया। लगभग 150 सैनिको को कारावास का दण्ड दिया गया है जिन्होने बहू-बेटियो की इज्जत को लूटने का प्रयास किया। आपके आदेशानुसार इस बात का पूरा प्रयास किया जा रहा है कि जनता पर किसी प्रकार का अन्याय या अत्याचार न हो सके। अशोक : जनता की शासक के प्रति क्या अवधारणा है । क्या वह बौद्ध धर्म के विकास एवं उसकी शिक्षाओं के प्रचार से सहमत है ? 'विक्रमसिंह : जनता अब खुश है कि उसके राजा ने बौद्ध धर्म को स्वीकार करके क्रूरता. पूर्ण नीति को त्याग दिया है। जनता के विशिष्ट गणो ने बौद्ध धर्म के विकास एवं उनकी शिक्षाओ के प्रचार मे अपना पूर्ण सहयोग देना प्रारम्भ कर दिया है । राज्य की योजनाओ को पूर्ण करने के लिए जनता ने नि:शुल्क श्रमदान करना शुरू कर 58/ सम्राट के आंसू दिया है। अब तक जनता से दान के रूप में 10 सहस्र मुद्राएं राजकोश में जमा हो चुकी हैं। जो लोग मुद्रा के रूप मे दान देने में असमर्थ हैं वे निःशुल्क श्रमदान करके जनसेवा का कार्य शुरू कर चुके है । इस कार्य हेतु अनेक समाजसेवी संगठनों का गठन भी हो चुका है जिसका कर्ता-धर्ता अमरजीत है। अशोक : यह तो अच्छी खबर है। विक्रम, इसका भी पूरा ध्यान रहे कि जनता की गाढी कमाई के धन का दुरुपयोग न किया जाए। विक्रमसिंह : आप निश्चित रहें राजन् । मैं जनता की तरफ से एक सूचना आप तक पहुँचाना चाहता हूँ। अशोक : कसी सूचना ! विक्रमसिंह : जनता के विशिष्ट वर्गों एव सगठनो के लोगों ने आपका अभिनन्दन करने का आयोजन किया है, जिसमे स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैलियां दान के रूप में भेंट करने का निर्णय लिया गया है। आशा है आप जनता को इस इच्छा को पूर्ण करेंगे। अशोक : मुझे खुशी होगी विक्रम ! हाँ सेनापति जयदत्त, शहर मे शान्ति व्यवस्था की स्थिति क्या है ? जयदत्त : राजन् शहर मे सर्वत्र शान्ति है । जनता तो आपको प्रशंसा करते हुए नही थकती। विशेष रूप से जबसे जनता पर अत्याचार एवं लूटपाट करने वाले सैनिकों को फॉसी पर लटकाया गया है, जनता के मन में आपके प्रति प्रेम और उमड आया है। अब तो छोटी-मोटी दुर्घटनाएं भी राज्य मे नगण्य हो चुकी है। अशोक : बहुत खूब ! सुना असन्धिमित्रा, कितना परिवर्तन आया है हमारी जनता के हृदय मे । एक वह समय था जबकि जनता हमारे नाम से कांपती थी, हमसे नफरत करती थी तथा हमारे खौफ से उनके घर के दरवाजे बन्द हो जाया करते थे। परन्तु आज जनता का हमारे प्रति असीम प्रेम उमड़ रहा है। वह हमारा अभिनन्दन करना चाहती है, हमारे उद्देश्यो की पूर्ति के लिए एवं हमारे पापो के प्रायश्चित में हमे कन्धे-से-कन्धा मिलाकर योगदान देना चाहती है। असन्धिमित्रा: मुझे कम हर्ष नही है यह सुनकर राजन् ! मुझे आशा है कि आपका यह प्रेम जनता को और भी अधिक आकर्षित करेगा और आपके उद्देश्यो की पूर्ति में आने वाली बाधाएं स्वतः ही दूर हो जाएंगी। अशोक : असन्धिमित्रा । अब में कुछ दिनो के लिए बौद्ध गया तथा अन्य बौद्ध तीर्थ- स्थलों पर दर्शन के लिए जा रहा हूँ। अपनी अनुपस्थिति में जनता की सेवा का भार तुम्हारे कन्धो पर डाल रहा हूँ । आशा है तुम इस कार्य में मुझे योगदान प्रदान करोगी असन्धिमित्रा : अहोभाग्य ! आपने मुझे इस योग्य तो समझा। आप यकीन मानिए मैं अपने कर्तव्य से कभी उन्मुस नहीं हूंगी। जनता की सेवा ही सर्वसेवा है।

सम्राट के आंसू / 59 अशोक : मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया मित्रा । मुझे विश्वास है हमारे योग्य पार्षद एव अनुभवी सेनापति तुम्हें किसी प्रकार की परेशानी का अनुभव नहीं होने देंगे। विक्रमसिंह : आप निश्चित रहें राजन्, मेरा पूर्ण सह्योग महारानी के साथ रहेगा तथा उनके परामर्श के बाद ही कोई कार्य करूंगा। अशोक : मैं तुम लोगों के कार्यों एवं आचरण से अत्यन्त खुश हूं तथा इसके लिए मैं तुम लोगों को पुरस्कृत करूंगा। अब आप लोग मेरी तीर्थ यात्रा को तुरन्त व्यवस्था कर दें। दृश्य परिवर्तन [जंगल का वही स्थल। कुटिया के निकट 8 साधू गम्भीर मुद्रा मे बैठे हुए थे। उनके चेहरे पर गहन उदासी के बादल लहरा रहे थे । बार-बार वे मुख्य द्वार की ओर देख लेते थे मानो किसी का बड़ी ही बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे। अन्ततः इन्तजार की घड़ियों समाप्त हो गयीं। द्वार से एक साधू ने प्रवेश किया, जिसके जगह-जगह पट्टी बंधी हुई थी। मुंह से कराह निकल रही थी।] अभिलाप : अरे साघों यह तोहार का हाल हो गया। राजकुमार : अरे पूछो मत साधो "ऊ दिन ऊ दोनों साधो सच कहिन रहे कि अब हम लोगन का चूल्हा-चक्की बन्द । अरे उनका इतनी सी लाज भी नहीं आयी कि एक भगवान भक्त पर वो लोग हाथ उठाए रहे है । रामानुज : हम तो पहले ही कहत रहन मगर तोहार बुद्धि तो घास चरे चली गयी रहे। जादा चोट तो नहीं लाग है। राजकुमार : अरे चोट की पूछत है साधो, यह पूछ की जिन्दा कैसे बच गया "भगवान का लाख-लाख शुकर "जान बची लाखो पाए, लौट के बुद्ध घर आए। अभिलाप हूँ"यह तो बहुत गम्भीर स्थिति पैदा हो गयी है। देखो ना इस साल विरवा भी फल नहीं दिहिन है । सूखा अलग से पड़ा हुआ है, केवल कुछ गाय-भैसन से इत्ते लोगन का पेट तो भरना नाही। प्रह्मचारी : निश्चित है साधो, अब तो बस कही मेहनत-मजूरी करिक ही पेट पालना फेसरिया : वह दिन जाने दो साधो जब मेहनत-मजूरी मिल जात रहे। अब तो शहर मईहां निःशुल्कः श्रमदान चल रहा है, जहां लोग मजूरी लेत नाही और जी-जान एक कईके मेहनत करत हैं। अभिलाष : अरे भई लोग नहीं लेत उनका छोड़ो हम तो लेख। रामानुन : अजीब घोंचू हो या। जब वहाँ कोई मजूरी देने वाला होगा तभी तो लेंगे। वहाँ तो केवल एक मुयिया होत है और बहुत मजूर होत हैं, जिसके जेब मे दमदी माही होत । :

60/ सम्राट के आंसू अभिलाष : तब क्या किया जाए। [सभी लोग गम्भीर होकर सोचने लगते हैं। कुछ देर बाद राजकुमार साप चौक- सा उठता है। राजकुमार : अरे साधो, हम सबै मूपानन्द हो गए हैं का । सारा शान घरा रहि गया जो इतनी छोटी बात समझ में नाही आपी। अभिलाप : क्या बात नहीं समझ मा आई रहे साधी। राजकुमार : अरे हम सबहू का बौद्ध धरम का साधु बन जायेक रहे । अमिलाप : क्या मूरख हो गया है, हम और बौद्ध भिक्षुक । तेरा दिमाग कहीं घास तो नहीं वरने गया है। सन्तो : मूरख राजकुमार नही तू है रे। अरे जब तक पेट भरा है, तब तक भले ही ज्ञान वधार ले, जहाँ भूख लगो तो सारी शेषी धरी रह जाएगी। अभिलाष : लेकिन हमने तो वेद पुराण का ज्ञान प्राप्त किया है, बौद्ध धर्म का तो हमई का ज्ञान नाही है, फिर कईसे बौद्ध भिक्षु पनि सकित है। ब्रह्मचारो : इसके अतिरिक्त उनकी वेष-भूषा भी तो अजीव ढंग की है। सर पर नाम मात्र को बाल नहीं होत, भला हम अपने बाल कईसे बनाए सकित है, यह तो अधर्म होईहै। राजकुमार : अधर्म "मूर्ख "आज लाखो आदमी बौद्ध धर्म को अपना रहे हैं तो वे सब अधर्मी हो गए । अरे मूरख समय के अनुसार ही अपने को ढालना ही मुख्य विशेषता अष्टम दृश्य सभी तीर्थों के दर्शनोपरात सम्राट अशोक पाटलीपुत्र वापस आए तो उन्होंने प्रतिदिन एक गाडी रत्न बौद्ध गया में तीर्थस्थलो के पुनरुद्धार हेतु भेजने का आदेश दे दिया । इस आदेश का तुरन्त अनुपालन सुनिश्चित हुआ तथा प्रतिदिन एक गाड़ी रत्न बौद्ध गया को भेजने का क्रम चालू हो गभा । इसके साथ ही सम्राट अशोक ने जगह-जगह चिकित्सालयों की स्थापना, छायादार वृक्षो के आरोपण एवं गरीबों को यथोषित आपिक एवं न्यायिक सहायता प्रदान किए जाने के आदेश दिए। इसके साथ ही उन्होंने जानवरों को चिकित्सा की व्यवस्था किए जाने हेतु पशु चिकित्सालमों की स्थापना का आदेश दे दिया।

सम्राट के आंसू / 60 धन के इस प्रकार दुरुपयोग से राजमहल में खलबली-सी बच गयो। दिन पर दिन राजकोष खाली होता जा रहा था। जहां एक ओर सम्राट अशोक दिन खोलकर दान दे रहे थे, जनकार्यों को बढ़ावा दे रहे थे, नयी-नयी योजनाओं को मंजूरी दे रहे थे, वहीं राजमहल के कुछ सदस्य इसके विरुद्ध थे। लेकिन अशोक के सामने कुछ कहने अथवा उनके कार्यों में विरोध करने का साहस किसी में नहीं था। एक दिन रानी तिष्यरक्षिता ने इसी विन्दु पर विचार-विमर्श करने के उद्दश्य से बात छेडते हुए कहा-"राजन्, मैं बहुत दिनो से कुछ कहना चाहती लेकिन""] अशोक : कहो तिष्य " इसमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। तिष्य : मुझे आशंका है कहीं महाराज बुरा न मान जाएँ। अशोक : तुम यकीन मानो, मैं तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं मानूंगा। हां यदि उचित होगा तो उसका अनुपालन सुनिश्चित करूंगा परन्तु विपरीत होने की दशा मे भी मैं कुछ नहीं कहूंगा। तिज्य : इसीलिए तो बात कहते मेरा अन्तमंन कांप रहा है। अशोक : तिष्य तुम्हें विदित होना चाहिए कि मैंने काम, क्रोध और पश्चाताप जैसी भावनाओं को त्याग दिया है और अब तो मैं भगवान बुद्ध का उपासक बन चुका हूँ। यही कारण है कि मैंने अपनी प्रजा को इस बात का पूर्ण अधिकार दे रखा है कि बेहिचक अपनी बात मेरे सम्मुख प्रस्तुत करे । अतएव इसमें तुम्हें घबड़ाने अथवा भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। तिष्य : यह तो मैं भी जानती हूँ कि आप राजा से सन्यासी बन चुके हैं। अशोक : नही तिघ्य, पहले अवश्य मेरा विचार सन्यासी बनने का था परन्तु अब मैंने अपना इरादा बदल दिया है । हाँ, अब राजा के साथ बौद्ध धर्म का उपासक अवश्य वन गया हूँ। दूसरे शब्दों मे यह भी कह सकती हो कि अब मैं राजा के साथ ही सन्यासी को भूमिका भी निभा रहा हूँ। तिष्य : यही तो आश्चर्य है राजन् कि एक राजा का सन्यास से क्ण सम्बन्ध । राजन्, राजा का धर्म है राज करना और अपने राज का विस्तार करना और मेरे विचार से यही सृष्टि का चक्र भी है। राजा का तो मुख्य कर्तव्य अपनी जनता के हित के साथ ही अपने राज्य का विस्तार करना होता है, भले ही इसके लिए खून की नदियां ही क्यों न बहानी पड़े । हर राजा अपने राजकोष को अनमोल रत्नों से भरा रखना चाहता है तथा उसको यही अभिलाषा रहती है कि वह अपने राजकोष में निरंतर वृद्धि करे। अशोक : तुम्हारा कहना अपनी जगह सही है तिध्य । लेकिन मेरा हृदय युद्ध और रक्त से विरक्त हो चुका है। हाँ, अब तो जनता को भलाई ही हमारा एकमात्र उद्देश्य है •62 / सम्राट के आंसू और इसी उद्देश्य को पूर्ति के लिए मैंने बौद्ध धर्म को ग्रहण किया है। तिष्य मैं इस बात को नही मानती। मेरे विचार मे तो जो कुछ भी आप कर रहे हैं, केवल कुछ लोगों के बहकावे में आकर कर रहे हैं । अशोक : आश्चर्य है "तुम्हें कैसे भ्रम हो गया कि नरसंहारक अशोक को कोई बहका भी सकता है। तिष्य : आपसे ज्यादा आश्चर्य तो मुझे है कि एक नरसंहारक अशोक आज किस प्रकार दरियादिली से अपने राजकोष को लुटाते हुए रत्नों से भरी गाड़ियो को मिट्टी की तरह भेज रहा है। अशोक : (हंसकर) ओह तो यह बात है। तिष्य : यह हंसने का समय नहीं है राजन् । भले ही आपके लिए यह छोटी-सी बात हो लेकिन हम लोगों के तो जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित हो गया है । अशोक : तिष्परक्षिता, इस सम्बन्ध मे तुम्हें चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है । तुम्हारा पेट भरने के लिए अभी मेरा राजकोप खाली नही हुआ है और यदि भगवान बुद्ध को अनुकम्पा रही तो राजकोष कभी खाली भी नही होगा । फिर तिष्य यह राजकोप तो जनता का है, उन अभागे स्वर्गवासियो का, जिनके लहू से यह खजाना सीच कर भरा गया है। चूंकि यह हिंसा का कमाई है और अब मुझे हिंसा से नफरत हो गयी है, अतः निश्चय ही अब इस पर मेरा कोई अधिकार नही है और इमे जनसेवा एवं वौद्ध शिक्षाओ के प्रचार एवं प्रसार पर ही व्यय करना न्यायोचित ममझता हूँ। [इसी समय अशोक के पुत्र जलोका का प्रवेश हुआ।] जलोका : शुभ प्रणाम पिताश्री। अशोक : खुश रहो बेटे । जलोका : शायद किसी गंभीर ममस्या पर विचार-विमर्श चल रहा है। तिष्य : हां बेटे, अच्छा तुम्हीं बताओ राजकोप का इस तरह दुरुपयोग क्या राजहित में है । क्या राजा को अधिकार है कि वह राजकोप को जिस तरह चाहे बर्बाद करे। जलोका : मांश्री ! जहाँ तक राजकोप पर अधिकार का प्रश्न है, वास्तविक रूप में उसका उत्तराधिकारी तो जनता होती है और जहां तक राजा का प्रश्न है, वह केवल संरक्षक होता है । अर्थात् उक्त राजकोप के धन की सुरक्षा के भार के साथ ही राजा को इस बात का अधिकार प्राप्त होता है कि वह जनता के खजाने का जनता के विकास कार्यों पर व्यय करे। चूंकि पिताश्री उक्त धन को जनता एवं देश के विकास कार्यों में व्यप कर रहे हैं, इसलिए वही इस खजाने के अधिकारी समझे जाएंगे।

सम्राट के आंसू / 63 तिप्य : इसका मतलब हमें राजा के कार्यों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है । जलोका : क्षमा करें मांजी। दखल देने का कार्य तो है परन्तु न्यायोचित कार्यों में नहीं। तिष्य : तुम लोग आखिर मेरी बात को समझने का प्रयास नहीं कर रहे हो। यदि राजकोष का धन इसी तरह बर्बाद होता रहा तो। जलोका : बैसे मांधी अभी तक मुझे तो ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है । तिष्य : तुम्हारे पिताश्री रत्नों से भरी गाड़ियां पता नही कहाँ भेज रहे हैं और इसकी तुम्हें जानकारी नहीं। जलोका : माँश्री ! यह गाडियां बौद्ध, गया तथा अन्य तीर्थस्थानो के पुनरोद्धार के लिए भेजी जा रही हैं। हम लोग तो इसे जनकार्य समझते हैं फिर इसमें धन की बर्बादी कैसी। तिष्य : ठीक है.."धर्म और अधर्म के बीच ही तुम लोग डूबते-उतराते रहो। लेकिन एक बात याद रखना राजन् 'न तो तुम सम्राट रह पाओगे और न ही सन्यासी बन पाओगे। अशोक : (हसकर) तिप्य यह तो आने वाला इतिहास ही बताएगा कि नरसंहारक अशोक न केवल एक राजा की भांति राज्य करता रहा वरन् एक सन्यासी की भांति जनता को सवा के साथ बौद्ध भिक्षु के रूप में भगवान बुद्ध की सेवा भी करता रहा। तिष्य : ठीक है देखूगी आने वाले इतिहास को भी कि वह क्या कहता है । [इसके साथ ही तिष्यरक्षिता गुस्से से कक्ष से बाहर चली गयी। कुछ ही देर बाद रानी पद्मावती आती है। इस समय राजा गम्भीर अवस्था में बैठे हुए थे। कुछ देर बैठने के बाद उनका पुत्र जलोका भी कक्ष से बाहर चला गया।] मावती : क्या बात है राजन्, यह चेहरे पर मायूसी क्यों छायी हुई है "कही आपकी तबियत अशोक : नहीं पद्मावत् ऐसी, कोई बात नहीं है। बरबस ही बीते दिनो की यादें जब ताजा हो उठती हैं तब पता नही क्यों मन डूबने-सा लगता है। पद्मावती : राजन जो गुजर गया, उसे याद रखने से क्या फायदा। अब तो आपने पश्चाताप करना भी शुरू कर दिया है फिर अशोक : लेकिन इसमे भी हमारी रानियां व्यवधान उत्पन्न कर रही हैं और इसे धन का दुरुपयोग बता रही हैं । कही तुम भी तो ऐसा नही सोचती हो ? पद्मावती : यह क्या बात कह रहे हैं."मला मैं ऐसा क्यों सोचूंगी."मुझे तो अपने पति 'अपने सुहाग पर गर्व है, जिसने निर्दोपों पर जुल्म ढाना ही नही बन्द किया वरन् मन को निर्मल बनाकर स्वर्गवासियों की आत्माओं की शान्ति के लिए उनके ..

64 / सम्राट के आंसू : आश्रितों को भरपूर सहायता देने का कार्य भी शुरू कर दिया है । अशोक : एक तुम्ही हो जो मेरे हर सुख-दुःख में साथ देती हो अन्यथा अन्य रानियां तो इमे दुरुपयोग कहते हुए विद्रोह करने पर उद्यत हो रही है। पद्मावती: (हंसकर) नादान हैं। उन्हें अच्छे-बुरे का ज्ञान ही नहीं है। अशोक : अच्छा पद्मावती, एक बात बताओ। पद्मावती: एक क्या हजार बातों का उत्तर दूंगी। अशोक : नही, केवल एक बात जब मेरे राजकोप का धन समाप्त हो जाएगा तब भी तुम क्या इसी प्रकार का सहयोग प्रदान करती रहोगी। पद्मावती : राजन् सुहाग का राजकोष से क्या मतलब । आप मेरे मुहाग है मेरे देवता हैं। मेरे लिए तो सभी कुछ आप है "राजकोप रहे या न रहें. आप रहे यही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है "आप जहाँ भी जिस स्थिति में रहेंगे ''मैं सदैव उसी प्रकार आपकी सेवा करती रहूंगी जैसे सती सावित्री ने अपने पति की सेवा की थी। अशोक : बहुत खूब "आज मालूम हुआ कि वास्तव में मेरा भी यहां कोई अपना है." अन्यथा मैं तो यही समझ बैठा था कि धीरे-धीरे सभी मेरे वैरी हो जाएंगे "रानी, आज मैं तुमसे प्रसन्न हूँ 'बोलो तुम्हे क्या चाहिए तुम जो मांगोगी हम देंगे। पद्मावती : राजन् "बस मै तो यही मागूंगी कि आप सदैव खुश रहें और मेरा प्यार, मेरा सुहाग आने वाले इतिहास मे करिश्मा बनकर उभरे । अशोक : यह क्या मांग रही हो अरे सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात धन दौलत मांगो तो है भी। पद्मावती : राजन् सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात, अथवा धन-दौलत से पति का प्यार नहीं खरीदा जा सकता है । मैं तो केवल पति का प्यार चाहती हूं और यही मेरी अन्तिम इच्छा है। अशोक : ओह निश्चय ही तुम समस्त नारी जगत में एक महान नारी हो'""मैं तुमसे अत्यन्त खुश हूं और वचन देता हूँ कि मैं तुम्हें सदैव प्यार करता रहूंगा चाहे कैसी भी विडम्बना क्यों न हो "अरे हाँ तुमने यह तो बताया नही कि आने वाले शिशु में अभी और कितनी देरी है। पद्मावती : मैं क्या बता सकती हूँ"यह तो ऊपर वाले की मर्जी पर है । अशोक : अच्छा बताओ अपने शिशु का नाम क्या रखोगी। पद्मावती : (शमति हुए) इसका फैसला तो आप ही करेंगे। दृश्य परिवर्तन [जंगल में विद्यमान उसी कुटिया में सभी साधूगण वैटे हुए । सभी के चेहरों पर चिन्ता के लक्षण दिखायी दे रहे थे। उनके पास ही एक नाई बैठा हुआ उस्तरे की सम्राट के आँसू /65 धार बना रहा था। अभिलाष : ओ केसरिया, देख हम लोगन के ई बलवा बन जईह और हम सबही बौद घरम के भिक्षुक बन जइवें । उहके बाद तो मजा ही मजा है। न काम करना न घाम करना, घर बैठे आराम करना। फेसरिया : लेकिन साधो, यह तो अनर्थ है, यह अपने धरम को बेचना है। हम तो कहते हैं कि अवहूँ समय है और अपन धरम की रक्षा करना ही हमारा परम कर्तव्य महतो : अरे मूरख तू अपनी जुबान पर लगाम दई ले नाही तो अनर्य होई जइहै । तोहका नाही मालूम कि आज जब हमार राजा भगवान बुद्ध का दास होई गया है, तो हमरे दास होये मा कौन सा अनर्थ होई जइहै । चन्द्रश: महतो का कहना सही है केसरिया । फिर हमार शरम का है। हमने भगवान की साधना की लेकिन उसने मुझे इस योग्य भी नहीं रखा कि दो जून की रोटी नसीब होई जाय । सवाल यहाँ पेट का है, अगर पेट मा अन्न न जइहै तो का भूखे जान दई देव। अभिलाप : अरे केसरिया, अभी तू भोला है भोला "जब बात समझ में अइहै तो पता लग जइहै कि हम लोगन ने धरम परिवर्तन करके कितना अच्छा काम किया है। तुहका शाइद न मालूम होई कि क नज्जू और महतू अपने साथियों के साथ बौद्ध भिक्षु पनि गए हैं और अव सुख चंन की जिन्दगी बिताए रहे है । न मेहनत न मजूरी और न ही दर-दर की ठोकरे । घर बैठे भोजन मिलता है और मौका लगत है तो दारू और शकर भगवान के प्रसाद का भी भोग लगाई लेत है । तुहका शाइद नाही मालूम होय कि उहाँ औरतें भी भिक्षुणी वन के भाई गयी है और। फेसरिया: इसका मतलब तो यही है कि अब हम लोगन को आपन चरित्र भी बेचना पड़िहै। अभिलाय : कैसा चरित्र रे केसरिया । हमार कौन-सा चरित्र है । दर-दर भीख मांग के खाना । अब देख न सभे लोग की उमर पार होई गए लेकिन औरत के लिए तरस रहेन हैं । एक ससुरी वही पतुरिया मिल गयी है, जिससे हम लोगन का काम चल जात है अन्यथा कऊन हमका पूछे। केसरिया :तो का उहाँ औरतन की भरमार है। अमिलाप : अरे मूरख बुद्धि से काम लेबे तो काहे न औरत मिलिहै । फिर अपन तो सिद्ध पुरुष है, जोन औरत पर नजर डाल देबे वहे हमार होई जाय । केसरिया : ठीक है, जस तोहर मर्जी होए कर। [इसके साथ अभिलाप उठकर नाई के पास चला गया और अपने सारे बालो को .. 66/ सम्राट के आंसू उतरवा दिया। जब बाल उतर गए तो सभी साधूगण उसके चेहरे को देखकर ठहाका लगा उठे। अभिलाप : अरे तू लोग हसंत काहे को रे । केसरिया : अरे साधो, जरा आपन चेहरा तो देखो कस होई गा है। अभिलाप : अरे हमार चेहरा तो बस पहले रहे उससे ज्यादा मुन्दर होई गवा है अब तू भी चलकर अपना चेहरा सुन्दर बनवा ले । केसरिया : न वाबा''हम अपने इतने खूबसूरत वालों का मत्यानाश न होने देंगे। अभिलाप : हाँ हाँ 'काहे नाही तू तो इनकी चोटी बनाई के "लकुटिया पहिन के आंखन मटकाये के "हम लोगन का रिझइहै न.."चल उठ जल्दी से और केसरिया : अरे साधो, कोई ऐसा उपाय नहीं है कि इ बालन की रक्षा की जाय । अभिलाष : नई अब कोई उपाय नही बचा है। अब उठ जल्दी से और वाल बनवाई ले । बहुत देर होई गई है। आरती होए के पहिले ही हमका वहां पहुंच जाना : . केसरिया : जाइत है साधो लेकिन अभिलाप: लेकिन 'वेकिन कछु नाही. "जल्दी कर । [कुछ ही देर में सभी साधुगणों के सिर घुट गए और उनके सिर पर नाममात्र की छोटी-सी चुटिया रह गयी थी। इसके बाद नहा-धोकर सभी वीणा उठाकर भजन गाते हुए शहर की ओर प्रस्थान कर दिए। सप्तम दृश्य [दरवार मे सभी पार्षद मौजूद थे। सम्राट अशोक राजगद्दी पर आसीन थे। अगल वगल मे दो युवतियां मोरपंख से बने सुन्दर पंखे झल रही थी। इसी समय सेनापति जयदत्त राजदरबार में प्रवेश करते हैं । जयदत्त सम्राट के सम्मुख पहुंचकर उनका अभिवादन करते हुए हाथ बांधकर एक ओर खड़े हो गए।] अशोक : कहो सेनापति, कोई नवीन समाचार है क्या। जयदत्त : हा महाराज । आपने जो कार्य मुझे सौंपा था, वह लगभग पूर्ण हो चुका है। सभी तीर्थस्थलों पर धर्मशालाओं, पोशालाओं के साथ हो तीयों के पुनरोद्धार हेतु निकटवर्ती क्षेत्रो में तरह-तरह के छायादार एवं फलदार वृक्षों का आरोपण कार्य पूरा किया जा चुका है। ..

सम्राट के आंसू /67 अशोक : बहुत पूब, लेकिन इतनी जल्दी तुमने इतनी बड़ी विजय कैसे हासिल कर ली? जयदत्त : महाराज आपको शुभकामनाएं जो हमारे साथ हैं। यही नही महाराज पूरे देश में जगह-जगह चिकित्सालयों का निर्माण कराया जा चुका है, जहां गरीबों को मुफ्त दवाएं देने की व्यवस्था की गयी है। इसके साथ ही पशुओं की चिकित्सा के लिए भी जगह-जगह चिकित्सालयों की व्यवस्था की जा चुकी है। आपके आदेशानुसार भगवान बुद्ध के उपदेशों एवं शिक्षाओं को शिलालेखों के रूप में जगह-जगह स्थापित किया जा चुका है। देश के विभिन्न स्थलों पर पाठशालाओं का निर्माण कराया जा चुका है। इन पाठशालाओं में शिक्षकों की नियुक्ति की जा चुकी है तथा छात्रगण शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। अशोक : निश्चय ही जयदत, तुम्हारे कार्य सराहनीय हैं। जो सेनापति जंग के मैदान में शत्रुओं के छक्के छुड़ा देता था, उसी ने शांति युद्ध में भी सवको पीछे छोड़ दिया जयदत्त : यह सब तो महाराज एवं भगवान के आशीर्वाद का फल है। एक अन्य विशिष्ट सूचना यह है कि देश में 84000 स्तूपों का निर्माण भी पूर्ण हो चुका अशोक : (आश्चर्य से) क्या यह सच है कि मात्र 5 वर्ष की अवधि में ही." जयदत्त : महाराज, मैं कभी गलत सूचना नहीं देता हूँ। जहां तक इतनी जल्दी कार्य को पूर्ति का प्रश्न है, इस सम्बन्ध में जन सगठनों के आभारी हैं जिन्होंने अपना पूरा योगदान इस कार्य पूर्ति हेतु निःशुल्क श्रमदान करके दिया है। अशोक : ओह जयदत्त"यह तुम क्या कह रहे हो। मैं यह सूचना सुनकर अत्यन्त खुश हूँ कि मेरे लक्ष्य की पूर्ति में जनता अपना पूरा योगदान प्रदान कर रही है । तुम्हारे ही कारण आज मैंने जीवन का सबमे बड़ा लक्ष्य पूर्ण कर लिया है "बोलो आज तुम जो भी मांगोगे हम तुम्हें देंगे। जयदत्त : (हंसते हुए) लेकिन महाराज अभी तो एक सूचना देना शेष रह गयी है। अशोक : क्या अभी और कोई सूचना बाकी है। जयदत्त : हो महाराज''जब मैं यहां आ रहा था तभी मुझे राजमहल से यह सूचना प्राप्त हुई कि रानी पद्मावती जी ने 84000 स्तूपों के निर्माण के उपलक्ष्य में पुत्र रत्न का जन्म दिया है। अशोक : (हर्षातिरेक से) यह क्या कह रहे हो सेनापति । क्या यह सच है ? जयदत्त : (हसते हए) महाराज स्वयं राजमहल चलकर देख लें। दृश्य परिवर्तन [राजमहल मे चारों ओर हर्ष छाया हुआ था। जगह-जगह बाजे-गाजों के साथ ही भजन-कीर्तन को ध्वनियां गुजरित हो रही थी। सम्राट अशोक तीव्र गति से रानी 68 / सम्राट के आंसू पद्मावती के कक्ष की ओर बढे जा रहे थे। सम्राट अशोक को देखकर मुस्कुराती दासियां एक ओर हटती जा रही थी। सम्राट अशोक सभी दासियो को कुछ न कुछ भेंट करते हुए जा रहे थे। कक्ष में प्रवेश करने के साथ ही वह शीघ्रता से रानी पद्मावती के पास चले गए और उनके बगल में लेटे शिशु को गोद में उठा लिया। शिशु को गोद में लेते ही उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्हें अपार शान्ति मिल रही हो । सम्राट अशोक एकटक उस नवजात शिशु को देखते रहे मानो वह उसे पहचानने की कोशिश कर रहे हैं । बरबस ही उनक सम्मुख भगवान बुद्ध की तस्वीर नाच उठी। उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान बुद्ध ने उनके यहाँ जन्म लिया हो।] पद्मावती : राजन, इस तरह क्या देख रहे है बच्चे मे । कहिए तो काला टीका लगा हूँ अपने लाल को कहीं नजर न लग जाए । अशोक : (चर्चीककर) 'ओह यह तो मैं भूल ही गया था। निश्चय ही इसे काला टीका लगा दो नही तो कही मेरी नजर लग गयी तो, कहते हुए अशोक पद्मावती के वगल मे बैठ गया। अशोक : पद्मावती, आज मैं तुम्हारे इस अभूतपूर्व उपहार को पाकर खुशी से पागल हुआ जा रहा हूँ। पद्मावती : राजन्, इसकी नीव तो आप ही ने डाली है और यह उपहार भी आपका है। यह तो मेरा सौभाग्य है जो इतने सुन्दर शिशु को मां बनी हूँ। अशोक : जानती हो इसका जन्म कब हुआ है। पद्मावती : भला मैं क्या जानूं । अशोक : तुम्हे यह सुनकर आश्चर्य होगा कि आज हो 84000 स्तूपों का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ है और आज ही हमे पुत्ररत्न प्राप्त हुआ है। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता मानो भगवान बुद्ध ने ही तुम्हारे गर्भ से जन्म लिया। पद्मावती: (हर्ष से) क्या सच ! अशोक : विलकुल सच और इस पूबसूरत उपहार के बदले में मैं तुम्हें दुनिया का सबसे बेशकीमती होरों का हार उपहार में देता हूँ। [कहते हुए सम्राट अशोक ने अपने गले में पढी हीरों की माला उतारकर रानी पद्मावती के गले में डाल दी।] दृश्य परिवर्तन [सभाकक्ष मे गुरु तिस्म मोगनिपुत्त अन्य मिझुगणो के माप बैठे हुए वार्तालाप कर रहे थे । इमो समय सम्राट अशोक का गमाका में प्रवेश होता है । सम्राट अशोक को देखते ही गमी मिशुगण उनके सम्मान में उठ रहे हए । सम्राट अशोक उनके सम्राट के मासू / 69 .. .. अभिवादन का जवाब देते हुए तिस्स मोगलिपुत्त के पास जाकर बैठ गए।] तिस्स : बधाई हो राजन् । अशोक : वधाई तो मुझे देना चाहिए महाराज। आपके आशीर्वाद से मुझे पुनरल प्राप्त हुआ है। तिस्स: नहीं राजन्, मैं तो एक साधारण आदमी हूँ, यह सब भगवान बुद्ध की कृपा है। अशोक : महाराज हमने तो जो कुछ सीखा है, आपके माध्यम से सीखा है, इसलिए हमारे भगवान तो आप ही हैं। तिस्स . नहीं राजन्, यह अधर्म मत कीजिए । मैं और भगवान । अशोक : इसमें कोई सन्देह नहीं है कि वास्तविक रूप में आप भगवान बुद्ध से भी 'बढ़कर हैं। वैसे भी गुरु भगवान से बढ़कर होता है, क्योकि गुरु के ही माध्यम से भगवान के दर्शन हो सकते हैं। तिस्स : (हंसते हुए) निश्चय ही अब आप केवल राजा ही नही धर्माचार्य भी बन गए हैं । एक दार्शनिक के लक्षण भी आपमै दृष्टिगोचर होने लगे हैं। अशोक : आपके समक्ष तो मैं तुच्छ आदमी हूं। महाराज मैंने जीवन में बहुत पाप किए है परन्तु आपका आशीर्वाद पाकर अब मैं अपने को उन पापों से मुक्त महसूस कर तिस्स · राजन्, यह सब भगवान की कृपा है। मुझे विश्वाम है कि भगवान बुद्ध की अनुकम्पा से एक दिन आप विश्व में चक्रवर्ती सम्राट के रूप में विख्यात होंगे। अशोक : नही महाराज । अब मुझे चक्रवर्ती सम्राट बनने की कोई अभिलापा नहीं है। मैं तो केवल अपने पापो से मुक्ति एवं जनता की सेवा के साथ ही भगवान बुद्ध की आराधना करना चाहता हूँ। अपने पापों के प्रायश्चित के लिए ही मैंने अपने जवान पुत्र एवं पुत्रियों को बलि का बकरा बना दिया है । ईश्वर जाने वे किस हाल में और कहां होगे। तिस्स : राजन्, घबडाने की कोई बात नहीं है, वे जहाँ भी होगे, भगवान बुद्ध के आशीर्वाद से स्वस्थ एव सकुशल होकर मापके उद्देश्यों की पूर्ति कर रहे होंगे। राजन, आपने जो त्याग किया है, उसका पुरस्कार भगवान बुद्ध अवश्य देंगे। 'अशोक : महाराज, पुरस्कार तो मुझे प्राप्त हो चुका है। भगवान बुद्ध को अनुकम्पा से मुझे जो पुरस्कार मिला है, निश्चय ही वह अद्भुत शक्तियों का मालिक प्रतीत होता है । आश्चर्य तो यह है कि जिस दिन मैंने 84000 स्तुपो निर्माण का पूरा कराया उसी दिन मुझे यह पुत्ररत्न प्राप्त हुआ है। बाकी तिस्स : यह अत्यन्त हर्ष का विषय है राजन् । मेरा अशिीर्वाद आपने अवश्य रहेगा। अशोक : ऐसे नहीं महाराज आप स्वयं चलकर उसे आशीर्वाद दीजिसनान- करण कीजिए।

70/ सम्राट के आंसू दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक आदर सहित मोर्गालपुत्त तिस्स को राजमहल में ले गए एवं अभी हाल ही में निर्मित अपने विशेष कक्ष में विठाया, जहाँ पर भगवान बुद्ध को एक प्रतिमा स्थापित थी । मूर्ति के पास ही पूजा-अर्चना की सामग्री रखी हुई थी । सम्राट अशोक एक सेवक को रानी पद्मावती के साथ नवजात शिशु को भेजने का आदेश देते हुए स्वयं भोगलिपुत्त तिस्स के पास बैठ गए। कुछ ही क्षणोपरान्त रानी पद्मावती नवजात शिशु को लेकर आई और गुरु मोगलिपुत्त तिस्स का अभिवादन करते हुए सम्राट अशोक के निकट ही बैठ गयो । सम्राट अशोक ने शिशु को लेते हुए मोगलिपुत्त के चरणो मे रख दिया, जिसे मोगलिपुत्त उठाकर अपने सीने से लगाते हुए उसके ललाट को देखने लगे।] तिस्स : राजन, यह शिशु आगे चलकर बडा ही ज्ञानी एवं गुणवान होगा। यह शिशु । परिस्थितियो को अपने अनुकूत बनाने मे दक्ष होगा। अस्त्र-शस्त्र में निपुणता के साथ ही यह अत्यन्त बुद्धिमान होगा। अशोक : अहो भाग्य ! तिस्स : राजन्, चूंकि इस बच्चे का जन्म धर्म और अधर्म के बीच हो रहे शीत युद्ध के बीच हुआ है, अत. मेरे विचार से इसका नाम धर्म विवर्धन रखना उचित होगा। अशोक : जैसी आज्ञा । मैं इसका नामकरण धर्म विवधन करने की घोषणा करता हूँ। पद्मावती : जैसा शिशु वैसा नाम कितना खूबसूरत नामकरण किया है गुरु महाराज अशोक : रानी यह वही गुरु हैं, जिनके उपदेशो को सुनकर मेरा मन हिंसा से विरक्त हुआ और मेरे मन में जनमानस के प्रति श्रद्धा के भाव उभरे। इन्होंने ही मुझे जनसेवा की भावना से ओतप्रोत करते हुए राजा और संन्यासी-सा जीवन बिताने का उपदेश दिया है। पद्मावती : राजन्, इतने महान और ज्ञानी महापुरुष से आज प्रथम वार मिलकर मुझे अपार गर्व की अनुभूति हो रही है। मेरे लायक कोई सेवा हो तो... तिस्स : रानी इसमे गर्व महसूस करने का प्रश्न कहाँ उत्पन्न होता है। मैं तो एक साधारण दरिद्र मानव हूँ, जिसने भगवान बुद्ध की सेवा को अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित किया है। राजन् अकारण मेरी प्रशंसा मत करें। मैं तो मात्र एक तुच्छ इन्सान हूँ, अन्यथा आपमे जो भी परिवर्तन हुए हैं, वह सब भगवान बुद्ध को कृपा से : ने अशोक : महाराज मुझे शमिन्दा कर रहे हैं. 'कलिंग युद्ध के बाद से अब तक जो कुछ हुआ है, उसमें सबसे महत्वपूर्ण योगदान माप हो का है। तिस : (हसते हुए) जबकि मेरे विचार से भगवान बुद्ध के उपदेशो एवं शिक्षाओं का सम्राट के आंसू 171 : व्यापक प्रचार एवं प्रमार आपके अनुकरणीय सहयोग से हुआ अन्यथा इतना धन- दौलत मुझे कहां से मिलता जो मैं भगवान बुद्ध की सेवा इतने व्यापक स्तर पर करने में समर्थ हो पाता."अतः इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आप राजा होते हुए भी एक महान उपासक है। अशोक : नही महाराज ! यह सब आपके दुर्लभ ज्ञान का ही प्रतिफल है, अन्यथा आपके अभाव में तो शायद आज मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो चुका होता। लिस्स: निश्चय ही राजन् अव आप दार्शनिक बन चुके हैं और किसी भी दार्शनिक से तर्क में जीत सकना सम्भव नहीं है. चलो हम यह मानकर चलते है कि हम दोनों अपने-अपने क्षेत्र में भगवान बुद्ध की सेवा मे बराबर के भागीदार हैं । पद्मावती : आप दोनों में कौन महान है, इसे आने वाले भविष्य पर छोड़ दीजिए और अब आप लोग अन्न-जल ग्रहण कीजिए। तिस्स : वेटी, आने वाला भविष्य यही चह रहा है कि सम्राट अशोक एक महान सम्राट और ज्ञानी पुरुष के रूप में विख्यात होगे। जहाँ तक अन्न-जल ग्रहण करने की बात है "सो फिर कभी ग्रहण करूंगा'"क्योकि आज मेरा व्रत है और व्रत को अवस्था में अन्न एवं जल दोनो का ही त्याग कर देता हूँ।"अच्छा राजन्, अब मैं आज्ञा चाहूँगा। अशोक : जैसी आज्ञा महाराज । अष्टम दृश्य - [सम्राट अशोक राजगद्दी पर विराजमान थे। राजसभा में सभी पार्षद अपने- अपने स्थान पर बैठे हुए आज की कार्यवाही के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर रहे थे। इसी समय सम्राट अशोक के ज्येष्ठ पुत्र महेन्द्र बौद्ध भिक्षु के रूप मे अन्दर आए और सम्राट अशोक के चरणोस्पर्श उपरान्त निकट ही एक ओर खडे हो गए। अशोक : आओ महेन्द्र, तुम्हारे इस रंग-रूप, पहनावे और चेहरे पर विराजमान अभूत- पूर्व शान्ति देखकर मुझे कितनी खुशी हो रही है, इसका वर्णन कर सकना मेरे लिए सम्भव नहीं है। महेन्द्र : पिताश्री, यह सब आपका आशीर्वाद एवं भगवान बुद्ध की सेवा का फल है, अन्यथा मैं किस योग्य हूँ अशोक : यह तो मेरे दिल से पूछो महेन्द्र"जिस शान्ति को पाने के लिए मैं दर-दर भटक रहा हूँ, उसे तुमने इतनी अल्पायु मे ही प्राप्त कर लिया "अरे मैं तो भूल - 72 / सम्राट के आंसू ही गया. 'असन्धिमित्रा नहीं आई है। महेन्द्र : पिताथी, यह सब आपका ही तो आशीर्वाद है. जिस शुभ कार्य के लिए आपने मेरा व मेरी बहन का चुनाव किया, उसको पूर्ण करने में यदि हम लोग सफल नहीं हुए तो असफल भी नहीं हुए। श्रीलंका, जम्बू द्वीप, आसाम, गोहाटी, सिंगापुर तथा जहाँ-जहां पहुंचने मे में सक्षम हो सका, वहां भगवान बुद्ध के उपदेशो का प्रचार व प्रसार किया। भगवान बुद्ध को अनुकम्पा से वहां की अशान्त जनता ने न केवल मुझे गले से लगाया वरन् मेरे कार्य में पूरा सहयोग भी प्रदान किया। पिताश्री आपके आदेशानुसार मैंने इन सभी स्थलों पर भगवान बुद्ध को सहसों प्रतिमाएं बनवाकर प्रतिस्थापित करवाई हैं, जहां प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा अर्चना होती है। वहां की जनता एवं सरकार के सहयोग से सहस्रों स्तूपों व स्मारिकाओ का निर्माण करवाया तथा भगवान बुद्ध के उपदेशों एवं शिक्षाओं को पत्थरों, पहाडों पर खुदवाकर एवं जगह-जगह पर शिलालेखो की स्थापना करवाई है जिससे भगवान बुद्ध के उपदेशो एवं शिक्षाओ का जनमाधारण मे प्रचार हो । जहाँ तक असन्धिमित्रा का सवाल है."पिताश्री वह तो भगवान बुद्ध मे ऐसा रम गई है कि अब कोई भी माया-मोह का जाल उसे पथविचलित नहीं कर सकता है। ताजी सूचना के अनुसार असन्धिमित्रा इस समय चीन, तिब्बत एवं उसके निकटवर्ती देशो मे भगवान बुद्ध के उपदेशो एवं शिक्षाओं का प्रचार व प्रसार करने में संलग्न । अशोक : निश्चय ही बेटा, तुमने और तुम्हारी बहन ने जीवन का अमली सत्य मार्ग खोज निकाला है । धेटा, आज दुनिया यही कह रही है कि मैं कितना निर्दयी पिता हूँ जिसने अपने मासूम बच्चों को जो वनवास दिया है उसके कारण ! महेन्द्र : पिताश्री, यह आप क्या कह रहे हैं । अशोक : बेटे, मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वही सत्य है । वास्तव में मैंने तुम दोनो के प्रति घोर अन्याय किया है । अब मुझे उसका प्रायश्चित भी करना होगा। महेन्द्र : पितीधी. 'आपके ऐसे वचन मेरे हृदय को वेधे डाल रहे हैं । मुझे तो खुशी है कि पिताथी ने एक आत्मविश्वास के साथ मुझे जो कार्य सौंपा था, उसे पूरा करने मे मैंने आंशिक सफलता पाई है, परन्तु आपके वचनो मे मुझे घोर निराशा हुई है। अशोक : बेटे, ऐसा मत बोलो। वास्तविकता यह है कि मुझे अत्यन्त घोर दुःख एवं पश्चाताप सता रहा है। अब मैं तुमको इस राजगद्दी को सौंपने जा रहा हूँ और स्वयं भगवान बुद्ध को मैवा में अपना जीवन अर्पित करना चाहता हूं। महेन्द्र : पिताश्री, यह आप क्या कह रहे हैं। अशोक : मैं सच कह रहा हूँ, अब मुझे इस गद्दी मे तनिक भी मोह नहीं रह गया है । महेन्द्र :पिताथी, क्षणिक भावावेश में कोई ऐमा निर्णय लेना देश, राज्य व उगमे बा. कर जनता के प्रति विश्वासघात होगा।

सम्राट के आंसू / 73 .. अशोक: क्या मतलब"। महेन्द्र :: पिताश्री, मेरा कहने का तात्पर्य यही है कि आपका यह निर्णय इस भरे-पूरे राष्ट्र को रसातल में मिलाकर रख देगा । मैं तो ठहरा साधू स्वभाव का आदमी भला जनता के साथ मैं क्या न्याय कर सकूँगा'"जबकि मुझे तो यही नहीं मालूम है कि न्याय और अन्याय है क्या। ऐसे शान्त चित्त वाले साधू स्वभाव के व्यक्ति को शासक बनकर जनता पर शासन करने का ज्ञान कहां से उपलब्ध हो सकेगा। युद्ध की विभीपिका को मेरे जैसे अहिंसा प्रेमी साधू कैसे महन कर सकेंगे। नही पिताश्री नहीं, यह निर्णय न केवल देश के प्रति आघात करना होगा वरन् स्वयं मेरे साथ अन्याय होगा। अशोक : तुम कहना क्या चाहते हो...? महेन्द्र : पिताधी इसमें ऐसी कोई बात नहीं है, जो आपकी समझ में आई हो। आपको तो याद ही होगा कि जब भगवान बुद्ध निर्वाण प्राप्त करने के बाद पुनः राजमहल में अपने पिता, पत्नी व बच्चों से मिलने गए थे तो उनके पिता ने उन्हें गद्दी प्रदान करने की पेशकश की थी, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। अशोक : जबकि ऐसा करना चाहिए था। तुम्हें भी याद होगा कि जब भगवान राम 14 वर्ष का वनवास पूरा करके वापस लौटे थे तब उन्होने राजगद्दी का भार सम्हाल लिया था। महेन्द्र : निश्चय ही भगवान राम ने राजगद्दी का भार सम्भाला था, लेकिन पिताश्री वह तो भगवान विष्णु के अवतार थे, जिनका मूल उद्देश्य अत्याचारी राक्षसो का वध करना था । फिर उन्होने वन मे रहकर साधू नही बल्कि एक क्षत्रिय वंश की परम्पराओं का पालन करते हुए वही कार्य किया जो राजा को करना चाहिए । जहाँ उन्होने राक्षसों का वध किया वहीं उन्होने गरीबो एवं असहाय लोगों को अत्याचारियो से मुक्ति दिलाई। इससे स्पष्ट है कि उन्होने वन में रहकर कभी भी साधुओ को भांति जीवन का निर्वाह नही किया और न ही माया-मोह के जाल से मुक्त हुए। जबकि न तो मैं कभी वन में रहा और न ही किसी राक्षस का वध किया। अतः इस दिशा में कोई ज्ञान मुझे उपलब्ध नहीं है । अशोक :टीक है मैं तुम्हारी बात मान लेता हूँ। लेकिन यहाँ दूसरा पहलू यह भी है कि यदि तुम इस गद्दी का भार संभाल लेते हो तो भगवान बुद्ध की सेवा तन-मन के माय ही धन से भी करने में सक्षम हो सकोगे। महेन्द्र : नहीं पिताश्री, यह भी सम्भव न हो मकेगा। जिस व्यक्ति ने अपना सम्पूर्ण जीवन सतमार्ग की खोज मे लगा दिया हो, एकान्तवास में रहकर निर्वाण प्राप्ति में लगा दिया हो, उसे भला राजकाज से क्या मतलब ! फिर जव उसे राजकाज का ज्ञान ही नहीं होगा तो उस स्थिति में राज्य मे अशान्ति, असन्तोप, विद्रोह के साथ ही अन्य समस्याओं का जन्म होगा। नही पिताधी यह सब मुझसे सम्भव न 74 सम्राट के आंसू हो सकेगा । निश्चय ही मुझे अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए धन की आवश्यकता होगी, लेकिन मुझे विश्वास है कि इस शुभ कार्य में आपका एवं जनता का सहयोग मुझे बरावर मिलता रहेगा। अशोक : ओह ''आज मालूम हुआ कि जिस गद्दी के चक्कर में फंसकर मैं खून की होली खेलता रहा जिस धन-दौलत लिए लाशों के बीच ठहाके लगाता रहा ..'वह मब बेकार था लेकिन सच क्या था.. "वेटे, आज उसका वास्तविक ज्ञान तुमसे प्राप्त हुआ है। महेन्द्र : पिताश्री ऐसा अधर्म मत करें। जो बीत चुका है, आज के लिए वह अत्यन्त आवश्यक था पिताश्री । यदि बीता हुआ समय इतना दर्दीला न होता तो न आज आप सम्राट अशोक होते और न मैं भगवान बुद्ध का उपासक महेन्द्र होता। पिताश्री बीता हुआ काल ही, चाहे वह जितना ही वीभत्स क्यो न हो, आने वाले काल के लिए ज्योति बनकर उभरता रहता है । पिताश्री कल जो हुआ था वह एक सपना था, आज जो हो रहा है, वह यथार्थ है और कल जो होगा वह भविष्य है । मेरा आपसे यही निवेदन है कि आप बीते हुए कल की भांति ही गद्दी पर आसीन रहे और भगवान बुद्ध के उपदेशों का प्रचार करने मे अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें। जनता को पुत्रवत प्यार करें, उनकी समस्याओ को सुनें और उनके निराकरण के उपाय खोजें, यही भगवान बुद्ध की सबसे बड़ी सेवा होगी। अशोक : ठीक है बेटे . आज मैं एक बार पुनः हार गया। विचारों की इस लम्बी लड़ाई मे तुम ही विजयी हुए। लेकिन महेन्द्र अब तुम्हें कही जाने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हे गुरु तिस्स मोगलिपुत्त की सेवा मे अर्पित कर दूंगा, जिससे तुम ज्यादा से ज्यादा भगवान बुद्ध की सेवा कर सको। महेन्द्र : पिताश्री, मुझे खुशी होगी गुरुजी की सेवा मे जाकर । [इसी समय राजदरवार में 12 वर्ष का एक खूबसूरत लडका प्रवेश करता है। उसके चेहरे पर अजीब-सी आभा झलक रही है। आँखों में अजीब-सा आकर्षण विद्यमान है। होठों पर मन्द-मन्द मुस्कान थिरक रही थी। मानों उसके होठ कुछ गुनगुना रहे हो । उसके हाथो में एक छोटी-सी वीणा थी, जिसके महीन तारों पर उसकी उंगलियां थिरक रही थी। महेन्द्र : (बालक को देखकर हंसते हुए) पिताश्री क्या यह दरबारी संगीतज्ञ है । अशोक : नही महेन्द्र, यह हमारा सबसे छोटा पुत्र एवं तुम्हारा छोटा भाई है। इसका जन्म उस दिन हुआ था जब 84000 स्तूपो का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था। [महेन्द्र आगे बढकर उसे गोदी में उठाते हुए-"आओ मेरे लघु भ्राता। तुम्हें देखकर तो मैं सभी कुछ भूल बैठा हूं।"]

सम्राट के आंसू /75. : बालक : पिताश्री, यह कोन हैं। अशोक : बेटा, धर्म विवर्धन, यह तुम्हारे सबसे बड़े भाई महेन्द्र हैं। धर्म विवर्धन : क्या वही जो भगवान बुद्ध के उपदेशों के प्रचार के लिए बाहर गए हुए थे। अशोक : हाँ बेटा, यह वही तुम्हारे बड़े भाई हैं । धर्म विवर्धन : अरे तो पहले क्यों नहीं बताया। [इसके साथ ही वह मचल कर गोदी से उतरता है और महेन्द्र को दण्डवत प्रणाम करते हुए चरण स्पर्श कर वोला-"मुझे तो पता नहीं था, कम से कम बड़के भईया का आशीर्वाद तो ले लूं।"] महेन्द्र : (भाव विह्वल होकर) सदा सुखी रहो"भगवान बुद्ध तुम्हारी कीर्ति की पताका चारो ओर फैलाते रहे। [इसके बाद धर्म विवर्धन योगासन की मुद्रा मे बैठ जाता है और हाथों मे वीणा उठाकर उसके तारो को छेड़ देता है। इसके साथ ही उसके कण्ठ से मधुर स्वर गुंजरित हो उठे । जब उसका गीत समाप्त हो गया तो उसने एक बार पुनः महेन्द्र के चरण स्पर्श किए।] महेन्द्र : सुन्दर अति सुन्दर कहते हुए उन्होने पुनः धर्म विवर्धन को गोद में उठा कर अपने सीने से लगा लिया। अशोक : बेटे, तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि जितना आकर्षण इसकी आँखों में है उससे कहीं अधिक जादू इसकी आवाज में है । महेन्द्र : पिताश्री, आपका कहना काफी हद तक सही है। मेरे विचार से तो इसका नाम धर्म विवर्धन के स्थान पर कुणाल होना चाहिए। अशोक : मेरा भी यही विचार है। मैं इस सम्बन्ध में गुरु तिस्स से बात करूंगा और गुरु जी की सहमति के इसके नाम का परिवर्तन करूंगा। दृश्य परिवर्तन [राजमहल के एक कक्ष मे महेन्द्र गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए योगासन की मुद्रा मे बैठा हुआ था। उसके पास ही तिष्यरक्षिता, असन्धिमित्रा, कारुवाली, विदिशा एवं पद्मावती बैठी हुई है। तिप्यरक्षिता : बेटा, तुम्हारे आ जाने से हम लोगो की समस्या का समाधान हो गया है। अन्यथा हम लोग तो यही समझ रही थी कि वह दिन दूर नहीं जब हम लोगो को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होना पड़ता। असन्धिमित्रा : यही नही बेटा, स्थिति तो यहां तक पहुंच चुकी है कि राजकोप पूरा का 761 मम्राट के आंसू पूरा खाली होता जा रहा है और सम्राट को इस बात की जरा भी चिन्ता नहीं है। वस वह तो प्रतिदिन लाखों मुद्राएं भगवान बुद्ध के भक्तों को दान कर रहे हैं। तिप्यरक्षिता : (हंसते हुए)अरे करें भी क्यों न आखिर अपने पापों का प्रायश्चित जो करना है। विदिशा : मेरी तो यही समझ में नहीं आता कि राजा ने कौन-सा पाप किया है। फिर वह तो क्षत्रिय है और क्षत्रिय को धर्म कर्म केवल राज्य एवं राज्य की जनता के लिए होता है। निश्चय ही इस उद्देश्य के लिए एवं राज्य की सीमा विस्तार के लिए राजा युद्ध करेगा और उसमे खून-खराबा होगा फिर कैसा पाप और कैसा प्रायश्चित । मैं तो कहती हूं कि महाराज के ऊपर जादू टोना कर दिया गया है। महेन्द्र : मांश्री, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि आप लोग कहना क्या चाहती तिष्परक्षिता : इसमें न समझने वाली बात नहीं है बेटे । देखो न भगवान बुद्ध का ऐसा नशा सम्राट पर छा चुका है कि उन्हें राज काज की कोई चिन्ता नही है। अब तुम ही इस राजगद्दी का भार सम्भालो अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हम सभी को दरिद्रता का जीवन बिताने को बाध्य होना पड़ेगा। महेन्द्र : तो यह बात है, आप लोगो में पिताश्री के विरुद्ध विद्रोह को भावना विकसित होती जा रही है। 'तिप्यरक्षिता : अगर यह हमारा विद्रोह है तो तुम्हारी दृष्टि में सम्राट जो कुछ कर रहे वह राजहित में उचित है। महेन्द्र : मैं इस सम्बन्ध में अपना कोई मत व्यक्त करने मे असमर्थ हूँ। हां इतना अवश्य कहूंगा कि चूंकि मैं भी बौद्ध भिक्षुक हूँ अतः पिताश्री के कार्यों की आलोचना नही कर सकता। वैसे सामान्य दृष्टिकोण से तो मेरी विचाराधारा यही है कि पिताश्री जो कुछ कर रहे हैं, वह जनता के लिए कर रहे हैं और भगवान बुद्ध की शिक्षा भी यही कहती है कि जनता के कल्याण के लिए किया गया कार्य हो सबसे बड़ा राज- .. कार्य है। 'तिप्यरक्षिता : चलो मैं तुम्हारी वात मान लेती हूं। लेकिन अब हम लोगों का उद्देश्य यह है कि तुम यह भगुआ वस्त्र उतार कर राजसी वस्त्र धारण करके राजगद्दी का भार सम्भाल लो। महेन्द्र : नही माथी अब मैं अपने को इस योग्य नहीं पा रहा हूं कि इस राज्य की राज- गद्दी का हकदार बन सकू। भगवान बुद्ध की उपासना ही मेरे जीवन का मात्र ध्येय है। इस सम्बन्ध मे मैंने अपना फैमला पहले ही पिताश्री को सुना दिया है। तिप्यरक्षिता : वही हुआ जिसकी मुझे पहले से ही आशंका पी। महेन्द्र : क्या मतलब । ‘तिष्यरक्षिता : अरे यही तो तेरे पिता चाहते थे कि तुम राजगद्दी का भार ग्रहण करने सम्राट के आंसू /77 में असमर्थता प्रगट कर दो, जिससे वह अपनी मनमानी करते रहे। यही कारण था कि उन्होने तुम्हें बाल्यावस्था मे ही इतना कठोर दण्ड दिया। महेन्द्र : दण्ड ! मेरे तो कुछ समझ में ही नही आ रहा है कि आप किम दण्ड की बात कर रही हैं। तिप्यरक्षिता : स्पष्ट है कि बाल्यावस्था में जबकि बच्चो को उम्र खेलने खाने की होती है, तुम्हें ऐसे मुहिम पर भेज दिया, जिससे तुम्हारे मन मे राजगद्दी की चाहत न रहे और तुम इस राजगद्दी का भार सम्हालने में असमर्थता व्यक्त कर सको। महेन्द्र : मांधी, आपका दृष्टिकोण मुझे उचित नही प्रतीत होता है। पिताश्री ने जो कार्य मुझे सौंपा मैंने पूरी निष्ठा से उसको पूरा किया। मैंने भगवान बुद्ध की सेवा करके जो शिक्षा पायी है, उससे राजकाज की ओर से मेरा आकर्षण खत्म हो चुका है । मैं एक भिक्षु हूँ और भिक्षाटन करके भगवान बुद्ध को सेवा करते हुए ही जीवन यापन करना मेरा मूल उद्देश्य है। [इसी समय महेन्द्र के छोटा भाई उज्जनी व तिवाला का कक्ष में प्रवेश हुआ और वह भी महेन्द्र के निकट आकर उसके चरण-स्पर्श करते हुए उसके निकट बैठ गए। .. : असन्धिमित्रा: तो इसका मतलब यही है कि तुम राजगद्दी का भार सम्हालने में असमर्थ हो। महेन्द्र : मांश्री, असमर्थ नही बल्कि अयोग्य हूँ। असन्धिमित्रा : ठीक है, यदि तुम नहीं सम्हालना चाहते तो तुमसे छोटे भाई इस कार्य को करें तो तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं होगी। उज्जैनी : कौन-सा कार्य मांश्री। असन्धिमित्रा : अरे बेटा, इन्होने राजगद्दी का भार सम्हालने में असमर्थता व्यक्त कर दी है। तेरे पिता की दान-प्रवृत्ति के कारण राजकोप खाली होता जा रहा है । इसलिए हम लोग चाहते है कि सम्राट अशोक को पदच्युत करके तुम लोगों में से कोई भी राजगद्दी का भार ग्रहण करे । चूंकि महेन्द्र से छोटे तुम हो, अतः तुम्ही राजगद्दी के सर्वप्रथम अधिकारी बनते हो। उज्जैनी : मांश्री, आपके मुंह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते। पिताश्री के रहते मैं राजा बनूं यह नियमाविरुद्ध ही नही बल्कि घोर अन्याय है। तिष्यरक्षिता : तेरे पिता ने ही कौन-सा अच्छा काम किया है और अव भी जो कर रहे हैं वह कौन-सा अच्छा कार्य है ? उज्जनी : मांश्री इस बात का फैसला करने के अधिकारी हम तुम नही बल्कि देश की जनता है । आज जनता को जुबान पर एक ही नाम है"हर धर्म चार बार केवल एक ही नाम दोहराता है और वह नाम है सम्राट अशोक। फिर ऐसे समर्थन 78/ सम्राट के आंसू .. प्राप्त शासक को आप क्यों पदच्युत करना पाहती हैं ? असन्धिमिमाः सवाल जनसमर्थन का नहीं बल्कि राग्य का है और उममे बढ़कर राज- कोप का है। राज्य की सेना की जंग लग रही तलयारों का है."राग्य की गिरती अर्थव्यवस्था का है 'क्या तुम नहीं देख रहे हो कि राजकोर को क्या स्थिति है। उज्जनी : माथी, इसकी चिन्ता आपको नहीं बल्कि पिताश्री को करना है। यह जितना सुख-वैभव एवं धन सम्पदा है, पिताश्री को ही देन है । उन्होने इस यजाने को संग्रहीत करने के लिए जनता पर जो जुल्म ढाए थे, उमका अहमास जब उन्हें हुआ तो उन्होंने जनता को अपना समझकर जनता के हितों के लिए राजकोष से धन व्यय किया जिमे किसी भी दशा में अपव्यय नहीं कहा जा सकता है । असन्धिमित्रा : तो इसका तात्पर्य यह है कि तुम सभी लोग अपने पिताश्री द्वारा किए जा रहे कार्यों का पूरा समर्थन करते हो। वैसे जनहित मे किए जा रहे कार्यों का तो मैं भी समर्थन करती हूं लेकिन बौद्ध धर्म पर जो व्यय किया जा रहा है, उसे जनहित का कार्य नहीं कहा जा सकता है। उज्जनी : मैं आपके इस विचार से थोड़ा बहुत सहमत हूँ लेकिन केवल इस बात के लिए पिताश्री के विरुद्ध आवाज उठाने का कोई उद्देश्य नही प्रतीत होता है। हम लोगो को तो चाहिए कि हम सभी लोग पिताश्री के कार्यों में अपना पूर्ण योगदान प्रदान करें । फिर महेन्द्र भइया को ही देखिए न."बौद्ध धर्म को ग्रहण करने के पश्चात अब वह तन-मन-धन आदि सभी प्रकार के माया-मोह के जाल से मुक्त होकर पिताश्री के शुभ कार्यों मे अपना किस कदर योगदान प्रदान कर रहे हैं। तिष्यरक्षिता : तुम सभी लोग मूर्ख हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग गद्दी पर बैठना नहीं चाहते । लेकिन मैं इतना बतला दूं कि एक दिन तुम सभी लोग हाथ मलते रह जाओगे और धर्म विवर्धन इस गद्दी को हथिया कर। उज्जैनी : मांश्री, इसमें पछताने की क्या बात है। यदि वास्तव मे धर्म विवर्धन इतने वड़े राष्ट्र को चलाने में सक्षम हैं तो हम लोगो को कोई आपत्ति नहीं है । फिर वह मेरा भाई ही है कोई दुश्मन नही । महेन्द्र : निश्चय ही धर्म विवर्धन मे अद्भुत शक्तियां है, जिनका विवेचन करना असंभव है। उन अद्भुत शक्तियो को देखते हुए ही मैंने पिताश्री को यह सुझाव दिया है कि धर्म विवर्धन का नाम बदलकर कुणाल कर दिया जाए। तिप्यरक्षिता : ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों पर ऐसा जादू कर दिया गया है जिससे तुम लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है और कुछ सोचने-समझने की क्षमता नही रह गयी है। विदिशा : दीदी.."मेरे विचार से तो महेन्द्र की शादी कर दी जाए तभी वह राज-काज के बारे मे सोचने में सक्षम हो पाएगा। महेन्द्र : शादी और मैं "राम"राम""राम"मुझे तो अब कुंआरा रहकर ही भगवान .. सम्राट के आंसू 179 वुद्ध को सेवा करनी है"हाँ इस उज्जैनी को अवश्य शादी कर दीजिए, जिससे इसमें सोचने समझने की शक्ति आ जाए। तिष्यरक्षिता : अरे, तो तू क्या शादी भी नहीं करेगा। महेन्द्र : सवाल ही नही उठता मां "अगर शादी हो गयी तो मेरा व्रत विखण्डित हो जाएगा। असन्धिमित्रा: महेन्द्र, अब तक मैं बहुत बर्दाश्त करती रही हूं लेकिन अब मुझसे तेरा यह नाटक बर्दाश्त नहीं हो रहा है । तू कान खोलकर सुन ले, मैं अपने जीते-जी ऐसा नहीं होने दूंगी । तुझे तो क्या तेरे बाप को भी शादी करनी पड़ेगी। महेन्द्र : (हसते हए) मा, पिताश्री की एक नहीं कई शादी हो चुकी हैं. “क्या अब फिर उन्हें दूल्हा बनाने का इरादा है। असन्धिमित्रा: ठीक है, तू खूब बातें बना ले "इस समय तो मैं जा रही हूं लेकिन इतना बतलाए दे रही हूँ कि तुझे शीघ्र ही शादी करनी पड़ेगी। तिष्यरक्षिता : बेटे, मां को इस तरह नाराज नही करना चाहिए। महेन्द्र : मैंने कहां नाराज किया है, वह तो खुद ही नाराज हो गयी। तिष्यरक्षिता : बेटा हम लोग जो भी कहेंगी तेरे भले के लिए ही कहेंगी। एक तो 15 वर्ष से अधिक का वनवास भोगा है और अव हाथ आ रही राजगद्दी को भी ठुकरा रहा है और अब जब तेरी माँ तेरी शादी करना चाहती है तब तू उसे भी इन्कार कर रहा है । तू तो भगवान राम से भी आगे निकल रहा है । उन्होंने 14 वर्ष के वनवास के बाद राजगद्दी का भार ग्रहण कर लिया था। महेन्द्र : मोश्री, मैं भगवान राम नही हूँ। वह तो भगवान विष्णु के अवतार थे। उन्होंने जन्म हो इसलिए लिया था कि इस पृथ्वी एवं पृथ्वी पर बसने वाले दीन-दुखियो के दुःखों का हरण करके राक्षसों का वध करें। मांश्री यही कारण था कि वन में रहकर भी उन्होने संन्यासी-सा जीवन न बिताकर राजकुमारों जैसा जीवन व्यतीत किया और राक्षसो का नाश किया। जबकि मां मैं भगवान बुद्ध की शिक्षाओ और उपदेशो का उपासक हूँ जिनका मुख्य उपदेश अहिंसा है। इस उपदेश के अन्तर्गत किसी को मारने की अपेक्षा उसे सुधारने मे विश्वास रखा जाता है। उसे इस बात की शिक्षा दी जाती है कि ऐसे कार्य जो मानव विरोधी हैं, जो करना पाप है और ऐसे कार्यों से केवल अपना नुकसान होता है वरन् सम्पूर्ण मानव जाति के तिरस्कार का भागी बनना पडता है। तिष्परक्षिता : निश्चय ही तू ज्ञानी महात्मा बन गया है । फिर भी एक अनुभवी नारी होने के नाते में इतना अवश्य कहूंगी कि महाराज अशोक का दिमाग खराव हो गया है। महेन्द्र : पिताश्री के प्रति ऐसी भावना रखना उचित नहीं है। पिताश्री ने अपनी मेहनत, दूरदर्शिता, शौर्यता एवं बाहुबल की ताकत से ही यह सब कुछ पाया है। अतः उनके

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सम्राट के आंसू/81 महेन्द्र : गुरु महाराज, मेरा भी यही निवेदन है कि आप मुझे अपने सरक्षण में रखने को अनुमति प्रदान करें, जिससे मैं भगवान बुद्ध के उपदेशो को भली-भांति समझकर उनकी सेवा कर सक। तिस्स : ठीक है, यदि तुम लोग मुझे इस योग्य समझते हो तो निश्चय ही मैं तुम्हें अपना पूरा संरक्षण प्रदान करने को तैयार हूँ। महेन्द्र : महाराज, मैं एक और निवेदन करना चाहता हूँ। तिस्स : बोलो वेटे। महेन्द्र : मैं अपने लघु भ्राता का नाम धर्म विवर्धन के स्थान पर कुणाल रखना चाहता हूँ। तिस्स : निश्चय ही तुम्हारे द्वारा दर्शाया गया नाम अति उत्तम है । यह नाम इस बालक अनुरूप है । मैं तुम्हारी इच्छा से सहमत हूं। अशोक : मेरी इच्छा है कि पाटलीपुत्र में भगवान बुद्ध का एक विशाल मठ बनवाया जाए, जिसमे भगवान बुद्ध को विशाल प्रतिमा स्थापित करवायी जाए । तिस्स : राजन्, निश्चय ही आपका प्रस्ताव जनहित मे है लेकिन । अशोक : लेकिन क्या । तिस्स : राजन्, जब से राजकोप से बौद्ध धर्म के प्रचार एवं प्रसार हेतु दान देने की प्रथा विकसित हुई है, बौद्ध धर्म के पुजारियो मे अनुशासनहीनता आती जा रही है। विलासिता अपनी चरम सीमा पर पहुंच गयी है । भगवान बुद्ध के नाम पर यह लोग राजकीय धन का दुरुपयोग सुरा एवं सुन्दरी पर कर रहे है। अशोक : मुझे भी इसी प्रकार की शिकायतें सुनने में मिली है । लेकिन भगवान बुद्ध का भक्त होते हुए मैं इस दिशा में कोई कठोर कार्यवाही विना आपके परामर्श के करने में सक्षम नहीं हूँ। फिर भी मैं यही चाहता हूं कि ऐसी कुप्रथा का विकास बौद्ध धर्म मे न हो अन्यथा आने वाला इतिहास हमे कदापि माफ नहीं करेगा । इस दिशा में आपको प्रभावी प्रयास करना चाहिए। तिस्स : राजन्, मैं एक मन्यासी हूँ और सन्यासी कोई भी कठोर कार्यवाही करने में सक्षम नही होता, लेकिन जब राजा का संरक्षण किसी धर्म को मिलता है तो उस धर्म मे आ रही विस गतियो पर अकुश लगाने का दायित्व भी राजा का ही होता है । अशोक : मैं आपकी बात से सहमत हूं। आप जैसा भी सुझाव इस दिशा में देंगे, मैं उसका स्वागत करूंगा। आप ऐसा करें कि आप और महेन्द्र मिलकर एक संगठन बना लें और उस संगठन के माध्यम से आप सभी प्रकार की दण्डात्मक, मुधारात्मक कार्यवाही करने में सक्षम होगे। इस संगठन को पूरी राजकीय मान्यता प्रदान की जाएगी और मुझे विश्वास है कि यह संगठन बौद्ध धर्म में आ रही विसंगतियों को दूर करने में सफल सिद्ध होगा। महेन्द्र : गुरु महाराज, मैं पिताश्री के प्रस्ताव से सहमत हूं। अब हम दोनों मिलकर इस दिशा में कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे। ..

.. 80/ सम्राट के आंसू कार्य में किसी प्रकार का दखल देने का अधिकार हम लोगों को नहीं है। तिप्परक्षिता : ठीक है, जब तुम लोगों की धारणा यही है तो मुझे ही क्या पड़ी है। हाँ, मैं इतना अवश्य कहूँगी कि तुम धर्म विवर्धन से बचकर रहना अन्यथा" महेन्द्र : वह क्यो माँधी? तिष्यरक्षिता : वह जादूगर है वेटा। उसकी आंखों में जितना आकर्षण है, उससे कहीं अधिक उसकी आवाज मे जादू है। महेन्द्र : यह तो और भी अच्छी बात है। कहते हुए महेन्द्र ठठाकर हंस पड़ा। दृश्य परिवर्तन अशोक : गुरु महाराज ! महेन्द्र के आ जाने से मुझे अपार शान्ति का अनुभव हो रहा है लेकिन इसने मेरी सारी आशाओं पर पानी फेर दिया है। मैंने सोचा था कि अब मैं सन्यास ग्रहण करके भगवान बुद्ध की सेवा करूंगा. परन्तु मुझे काफी दुःप है कि महेन्द्र ने मेरे प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। तिस्स : राजहित ही सर्वहित है राजन् । फिर महेन्द्र मे अब वह गुण है भी कहाँ जो वह राज काज के दायित्व को निभा सके। मुझे महेन्द्र जैसे बौद्ध अनुयायी पर तो अभिमान है, जिसने भगवान बुद्ध की सेवा के लिए राजगद्दी तक को त्याग दिया" तमाम माया मोह के जाल से मुक्ति पाकर भगवान बुद्ध की सेवा ही सच्ची मेवा : अशोक : तो आप भी महेन्द्र के प्रस्ताव से सहमत हैं। तिस्स : क्षमा करें राजन् महेन्द्र का प्रस्ताव जनकल्याण की दिशा के माथ ही भगवान बुद्ध को शिक्षाओं के प्रसार के लिए एक नया ही नहीं वरन् एक साहसी कदम है। मैं महेन्द्र द्वारा लिए गए निर्णय से पूर्णतया सहमत हूँ। अशोक : आपका आदेश मेरे लिए सर्वोपरि है । अब मेरी एक प्रार्थना है । आशा है आप स्वीकार करेंगे। तिस्स : राजन्, आप मुझे लज्जित कर रहे हैं। मेरे लायक जो भी सेवा हो निःसंकोच अशोक : मैं चाहता हूं कि आप महेन्द्र को अपना पूरा संरक्षण प्रदान करें। तिस : राजन्, 'मैं मात्र एक तुच्छ प्रचारक हूँ। महेन्द्र ने इस दिशा में न केवल अच्छा अनुभव प्राप्त किया है, वरन् मान भी हामिल किया है। अतः मेरे विचार से महेन्द्र को स्वयं अपनी इच्छा से कार्य करने दिया जाए। मैं सदैव उन्हें पूरा सहयोग देने का आश्वासन देता हूँ। अगोक: लेकिन.. तिम : राजन्, आप निश्चित रहिए । महेन्द्र की योग्यतामों पर आपको पूरा विश्वास करना चाहिए। कहिए।

: सम्राट के आंसू /81 महेन्द्र : गुरु महाराज, मेरा भी यही निवेदन है कि आप मुझे अपने संरक्षण में रखने की अनुमति प्रदान करें, जिससे मैं भगवान बुद्ध के उपदेशों को भली-भांति समझकर उनकी सेवा कर सकें। तिस्स : ठीक है, यदि तुम लोग मुझे इस योग्य समझते हो तो निश्चय ही मैं तुम्हें अपना पूरा संरक्षण प्रदान करने को तैयार हूँ। महेन्द्र : महाराज, में एक और निवेदन करना चाहता हूं। तिस्स : बोलो वेटे। महेन्द्र : मैं अपने लघु भ्राता का नाम धर्म विवर्धन के स्थान पर कुणाल रखना चाहता हूँ। तिस्स : निश्चय ही तुम्हारे द्वारा दर्शाया गया नाम अति उत्तम है । यह नाम इस बालक के अनुरूप है । मैं तुम्हारी इच्छा से सहमत हूं। अशोक : मेरी इच्छा है कि पाटलीपुत्र में भगवान बुद्ध का एक विशाल मठ बनवाया जाए, जिसमें भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्थापित करवायी जाए । तिस्स : राजन्, निश्चय ही आपका प्रस्ताव जनहित मे है लेकिन । अशोक : लेकिन क्या । तिस्स : राजन्, जब से राजकोप से बौद्ध धर्म के प्रचार एव प्रसार हेतु दान देने की प्रथा विकसित हुई है, बौद्ध धर्म के पुजारियों में अनुशासनहीनता आती जा रही है। विलासिता अपनी चरम सीमा पर पहुंच गयी है । भगवान बुद्ध के नाम पर यह लोग राजकीय धन का दुरुपयोग सुरा एवं सुन्दरी पर कर रहे है । अशोक : मुझे भी इसी प्रकार की शिकायतें सुनने मे मिली है । लेकिन भगवान बुद्ध का भक्त होते हुए मैं इस दिशा में कोई कठोर कार्यवाही बिना आपके परामर्श के करने में सक्षम नही हूँ। फिर भी मैं यही चाहता हूँ कि ऐमी कुप्रथा का विकास बौद्ध धर्म में न हो अन्यथा आने वाला इतिहास हमे कदापि माफ नहीं करेगा । इम दिशा में आपको प्रभावी प्रयास करना चाहिए। तिस्स : राजन्, मैं एक सन्यासी हूं और सन्यासी कोई भी कठोर कार्यवाही करने में सक्षम नहीं होता, लेकिन जब राजा का संरक्षण किसी धर्म को मिलता है तो उस धर्म मे आ रही विसंगतियों पर अंकुश लगाने का दायित्व भी राजा का ही होता है। अशोक : मैं आपकी बात से सहमत हूँ। आप जैसा भी सुझाव इस दिशा मे देंगे, उसका स्वागत करूंगा। आप ऐसा करें कि आप और महेन्द्र मिलकर एक संगठन बना लें और उस संगठन के माध्यम से आप सभी प्रकार की दण्डात्मक, सुधारात्मक कार्यवाही करने में सक्षम होगे। इस संगठन को पूरी राजकीय मान्यता प्रदान की जाएगी और मुझे विश्वास है कि यह संगठन बौद्ध धर्म में आ रही विसंगतियों को दूर करने में सफल सिद्ध होगा। महेन्द्र : गुरु महाराज, मैं पिताश्री के प्रस्ताव से सहमत हूँ। अब हम दोनों मिलकर इस दिशा में कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे।

82 / सम्राट के आँसू नवम् दृश्य [राजदरबार मे सम्राट अशोक सिंहासनारूढ़ थे। राजदरवार के विशाल कक्ष मे मान्य पापंदगण अपने-अपने स्थान पर विराजमान थे तथा द्वार रक्षक एवं अन्य प्रहरी हाथो मे नंगी तलवारें लिए हुए कतार मे पड़े हुए थे। इसी समय सेनापति जयदत्त अपने स्थान पर खड़े हो गए।] दयदत्त : महाराज, हमारे राज्य की जनता के कुछ वर्ग हममे असन्तुष्ट हैं। उनके कुछ चुने हुए प्रतिनिधि आपसे वार्ता करना चाहते हैं । अशोक : आश्चर्य महान आश्चर्य हमारे राज्य की जनता और असन्तुष्ट आखिर ऐसा कौन-सा कारण है, जिससे यह प्रतिनिधि मिलना चाहते हैं। क्या जनसेवा में कुछ कमी आ गयी है अथवा। जयदत्त : नही महाराज, ऐमी कोई बात नहीं है। कुछ धामिक विरोधाभास को लेकर यह प्रतिनिधि आपकी सेवा में अपनी कुछ समस्याएं आपके सम्मुख रखना चाहते अशोक : ठीक है। उन्हें राजदरवार मे उपस्थित किया जाए। [कुछ ही क्षणों बाद कुछ व्यक्ति कक्ष मे प्रवेश करते हैं। इनमे अधिकाशवः साधु वर्ग के लोग हैं परन्तु कुछ इन साधुओं से भिन्न धर्मों के अनुयायी जैसे ब्राह्मण, जैन आदि हैं। : अशोक : तो आप लोगों की अपनी धार्मिक समस्याएं हैं, जिनको आप मेरे समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हैं। साधू : राजन् ! आप हमारे अन्नदाता हैं । एक राजा का धर्म होता है कि वह अपने राज्य मे सभी वर्गों एवं धर्मों को समान रूप से पालन करने में अपना योगदान दे। अशोक : क्या किसी धर्म को विधर्म करने का भी प्रयास हमारे राज्य मे चल रहा है । अनुयायो : निश्चय ही प्रत्यक्ष रूप में नही लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से एक विशेष धर्म को छोड़कर सभी धर्म पतनमार्ग की ओर अग्रसर हो रहे हैं । ग्राह्मण : हाँ राजन्, इममे कोई सन्देह नहीं है कि आज स्थिति यह आ गयी है कि राज्य की जनता का ब्राह्मणों पर से विश्वास ही उठ गया है। सामाजिक संस्कारों में प्राह्मणों के योगदान को भावना को ठेस लगी है। आज सिर्फ एक ही धर्म हर जुबान पर है और वह है बौद्ध धर्म। साधू : यही नही राजन्, आज जनता की धार्मिक भावनाओं में जो परिवर्तन आ रहे हैं उनमे हमारे देवी-देवताओं का रूठना स्वाभाविक प्रतीत हो रहा है । आज न तो यज हो रहा है और न हवन । पूजा-पाठ पर से तो लोगों का विश्वाम ही उठ गया है। यही नहीं साधुओ को आज जनता भिक्षा तक देने से कतरा रही है।

सम्राट के आँसू /83 अनुयायी : और इसका कारण सिर्फ बौद्ध धर्म को राजनीतिक संरक्षण का प्राप्त होना है। बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में जो राजकीय मान्यता के साथ प्रचुर मात्रा में धन उपलब्ध कराया जा रहा है, उसी कारण सिर्फ यह धर्म फूल रहा है, अन्यथा इसके पूर्व इस देश मे सभी धर्मों का बोलबाला था। अशोक : तो यह बात है। निश्चय ही मैंने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया है, जानते हो क्यों ...इसलिए कि बौद्ध धर्म की शिक्षाओं से मुझे काफी शान्ति मिली है इसलिए यह मेरा अपना व्यक्तिगत धर्म है। जहां तक बौद्ध धर्म को राजकीय मान्यता देने का प्रश्न है."राजकीय स्तर पर किमी को बाध्य नहीं किया गया है कि वह बौद्ध धर्म अथवा उमकी शिक्षाओं को ग्रहण करें बल्कि उसको शिक्षाओं एवं उपदेशो के प्रचार में राजकीय कोप से कुछ आर्थिक योगदान अवश्य दिया गया है। चूंकि बौद्ध धर्म हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है और उसी की शिक्षाओ के अनुरूप मैंने जनहित में जनता के कार्यों के लिए अपना पूरा जीवन अर्पित कर दिया है। इसके बावजूद मैंने ऐसा कोई आदेश नही दिया है कि किसी अन्य धर्म के साथ कोई शोषणात्मक नीति अपनायी जाए अथवा उसके प्रचार मे कोई बाधा पहुंचाई जाए। ब्राह्मण : निश्चय ही एक राजा को किसी धर्म विशेष को प्रोत्साहन अथवा उसे राज- नीतिक स्तर से मान्यता देने का कोई औचित्य नही है। अनुयायो : यदि राजा ही किमी धर्म विशेष का अनुयायी बन जाएगा तो वह प्रजा की सेवा निःस्वार्थ भाव से करने मे कभी सक्षम सिद्ध नहीं हो सकेगा। मैं आपके पास इस उद्देश्य से आया हूं कि जिस तरह का राजनीतिक संरक्षण आपने बौद्ध धर्म को दिया है, उसी प्रकार का राजनीतिक संरक्षण अन्य धर्मों को भी प्रदान किया जाए। अन्यथा हो सकता है कि आपके राज्य में विद्रोह की भावना को जागृत। अशोक : सम्राट अशोक इस प्रकार की चेतावनी सुनने का आदी नहीं है। यह भगवान बुद्ध की शिक्षा का ही फल है, जो तुम्हारी चेतावनी का तुम्हें दण्ड नहीं मिल सका और सम्राट अशोक तुम्हारी भावनाओं का आदर करते हुए इस बात की स्पष्ट घोषणा करता है कि सम्राट अशोक के राज्य में केवल वही धर्म रहेगा जिसका मूल उद्देश्य मानव-सेवा के साथ ही मानव को सही दिशा दिखाने में सक्षम हो । यदि तुम लोगों का आरोप बौद्ध धर्म को राजनीतिक संरक्षण देने का है, तो यह भी सुन लो कि सम्राट अशोक के राज्य अब केवल एक ही धर्म है और वह धर्म है मानव धर्म। इसी मानव धर्म के अन्तर्गत समस्त जीव-जन्तुओं को संरक्षण देना, उनकी सुख-सुविधाओं को देखना भी हमारा कर्तव्य है क्योंकि पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीव-मानव के समान ही है । हमारे राज्य में मानव- हत्या जैसा ही अपराध जीव हत्या को भी समझा गया है। भगवान बुद्ध की इन्ही शिक्षाओ से प्रभावित होकर भले ही मैंने राजकीय कोप से सहायता दी हो परन्तु 84/ सम्राट के आँसू .. अभी तक उमे राजकीय मान्यता नहीं प्रदान की गयी है। अनुयायी : राजन्, यही सब तो हमारा धर्म भी कहता है। हमारे धर्म मे भी जीव हत्या को पाप समझा गया है, मांस-मदिरा के मेवन को जित किया गया है। ब्राह्मण : हाँ राजन्, हमारे ब्राह्मण धर्म में तो इससे भी बढ़कर धर्म का विवरण दिया गया है। चल और अचल दोनो को ही जीवाश्म के रूप में देखा गया है। जल, वायु, सूर्य और चाँद आदि को हमने देवताओं के रूप में पूज्यनीय पाया है। जन्म से मृत्यु तक मानव की सेवा करने के साथ ही मत्मार्ग दिखाने मे इसी सम्बन्ध मे उपदेश देने का भी प्राविधान हमारे ग्रन्थों में किया गया है। फिर मदसे प्राचीन धर्म ग्राह्मणवाद का परिहास उड़ाना क्या उचित है। अशोक : अर्थात् तुम्हारा धर्म भी वही कहता है, जो बौद्ध धर्म कहता है । जब सभी को शिक्षाओं एवं उपदेशो का सार एक ही है, फिर यह विद्रोह कैसा । अनुयायी : निश्चय ही हमारी शिक्षाएँ अधिकाशतः बौद्ध धर्म के अनुरूप है, लेकिन कुछ असमानताएँ भी है, जिसके कारण विद्रोह की उत्पत्ति हुई है। अशोक : मैं जानता हूँ वह असमानता क्या है। अर्थात तुम कहना चाहते हो कि हमारे राज्य मे वस्त्र धारण की प्रथा समाप्त कर दी जाए. हर स्त्री-पुरुष वस्त्रहीन हो जाए''ब्राह्मणवाद यह चाहता है कि स्त्रियों का शोपण पूर्व की भांति होता रहे और उसे पुरुषों के समान अधिकार प्रदान न किए जाए.. जन्म से लेकर मृत्यु तर विभिन्न अवसरों पर ब्राह्मण अपने कर्मकाण्डी प्रवचनों की बदौलत जनता को चूमते रहे 'यदि तुम लोगों का उद्देश्य यही है तो निश्चय ही में इसका विरोधी हूं। फिर भी मैं किमी धर्म विशेष पर प्रतिबन्ध नही लगाता यदि कोई वौद्ध धर्म ग्रहण करना नहीं चाहता तो उसे राजनीतिक स्तर से वाध्य नही किया जाएगा। यदि तुम अपने धर्म के प्रचार के लिए जन समर्थन जुटाने में समर्थ हो तो निश्चय ही तुम्हें पूरी छूट है । लेकिन यदि धर्म की आड़ लेकर किसी प्रकार की साम्प्रदायिक भावना विकसित करने का प्रयास करोगे तो न तो इस देश का शामक तुम्हें माफ करेगा और न ही इस देश को जागरूक जनता ऐसे किसी विद्रोही तत्वों को बर्दाश करेगी। अनुपायो : लेकिन महाराज, हम लोग भी बौद्ध धर्म की तरह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त करना चाहते हैं, जिसमें हम अपने धर्म की शिक्षाओ एव उपदेशों का प्रचार व प्रमार कर मक। अशोक : मैं पहले ही कह चुका हूं कि हमारे देश में हर धर्म, हर सम्प्रदाय एवं हर वर्ग का पूरा राजनीतिक मराण प्राप्त है और यदि उनका उद्देश्य राजहित में उपदेश देना एवं दिशाओ का प्रगार करना है तो हमारा पूरा महयोग प्राप्त होगा। जह तक बोट धर्म को राजकीय सहायता प्रदान करने का प्रश्न है इस सम्बन्ध में मार सोगों को सूचनायं यतला किन केवल इन्हें राजकीय स्तर में सहायता उपलध सम्राट के आंसू / 85 करायी जा रही है वरन् अनेकानेक सामाजिक संस्थाएं भी स्थापित हो गयी है जो स्वयं धन की व्यवस्था करके बौद्ध धर्म के विकास को बल दे रही हैं। बौद्ध धर्म का प्रत्येक भिक्षक आज हमारे राज्य के सामाजिक आर्थिक विकास में निःशुल्क श्रम- दान करके पूरा सहयोग दे रहा है। अनुयायो : मैं आपकी इस बात से सहमत नही हूँ। जब आपने पहले राजकीय स्तर से अरबो रुपयों की सहायता उपलब्ध करा दी है तब कही जाकर जनता के कुछ वर्गों ने ऐमी सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि वह आपको आपके द्वारा किए जा रहे कार्यों के प्रति अपना योगदान इसलिए प्रदान कर रहे थे कि वह अन्य स्रोतों से अधिक-से-अधिक लाभार्जन करते रहे। प्रायः ऐते वर्गों में व्यापारिक वर्ग ही आता है अन्यथा साधारण जनता के पास इतना पैसा कहाँ है जो वह इस प्रकार की संस्थाओं को अनावश्यक रूप दान दे सके। अशोक : निश्चय ही मैं इस धर्म पर अरबों रुपया व्यय कर चुका हूँ और अभी और कितना व्यय होगा, इसका मूल्याकन करना सम्भव नहीं है। लेकिन जो भी रुपया व्यय हुआ है, वह निहित स्वार्यों पर नहीं व्यय हुआ बल्कि उमका अधिकांश भाग जनहित के कार्यों पर व्यय हुआ है । जैसे अस्पतालों, स्कूलों, सराय निर्माण, छायादार वृक्षों का आरोपण, निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था, पशु चिकित्सालयों आदि के निर्माण पर जो भी धन व्यय हुआ है, भले ही भगवान बुद्ध की शिक्षाओं मे प्रेरित होकर व्यय हुआ हो, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से यह मब जनता के लिए, जनता की सुख-सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए व्यय किया गया है । मैं आप लोगों को यह भी सूचनार्थ बतला दूं कि सूखे आदि से निपटने, देश का खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई की उत्तम व्यवस्था के उद्देश्य मे जगह-जगह नगरों, तालाबों का निर्माण कराए जाने की वृहद योजना तैयार की जा चुकी है और इस योजना में हमारे बौद्ध भिक्षुगण निःशुल्क श्रमदान करके इसे पूरा करने के लिए वचनबद्ध हो चुके हैं। अनुयायो : ठीक है, निश्चय ही यह कार्य जनहित मे किए गए हैं, लेकिन बौद्ध मठों के निर्माण, शिलालेखों द्वारा बौद्ध धर्म के उपदेशों का प्रचार, स्तूपो आदि का निर्माण एवं शैक्षणिक सस्थाओ मे बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रसार आदि में कहाँ जनता का हित-निहित प्रतीत होता है। अशोक : तुम्हारे इस प्रकार के सवाल हमारी क्रोधाग्नि को भडकाने मे सक्षम हैं और मैं जानता भी हूँ कि यही तुम्हारा उद्देश्य है, जिससे क्रोध में आकर कुछ ऐसा दण्ड देबठू जिमसे जनता का समर्थन तुम्हे प्राप्त हो जाए। लेकिन बौद्ध शिक्षा एवं उपदेशो का ही फल है, जिसमे मुझे क्रोध नही बल्कि तुम लोगों की बुद्धि पर तरस आ रहा है । खैर, भले ही प्रत्यक्ष रूप से बौद्ध मठों, शिलालेखों एवं स्तूपों से जनता .

86/ सम्राट के आंसू का भला न हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जनता को शिक्षित करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम अवश्य है । इससे जनता को इस बात का अहसास हो सकता है कि मानव धर्म क्या है और उसका किस प्रकार पालन किया जाना चाहिए। अनुयायो : आपकी इन बातों से साफ अहसास हो रहा है कि आप अन्य किसी धर्म के विकास में अपना कोई योगदान नहीं देना चाहते हैं। अशोक : सवाल ही नहीं उठता । यदि तुम्हारा धर्म मानवता का पुजारी है तो आर्थिक और राजनीतिक दोनो प्रकार का योगदान मेरी ओर से प्रदान किया जाएगा। परन्तु यदि इसके पीछे साम्प्रदायिकता की गन्ध आती प्रतीत होगी तो हमारे राज्य के नियम भी बडे ही कठोर हैं। अनुयायी : ठीक है, आपकी चेतावनी मुझे याद रहेगी। सम्भावना है कि शीघ्र ही हमारी मुलाकात पुनः होगी। अशोक : मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा। लेकिन अब जब कभी आना तो अपने गुरू को लेकर आना। वैसे मेरी सलाह यही है कि हमारे मानवतावादी धर्म को स्वीकार कर लो। यह किसी व्यक्ति विशेप का धर्म नही बल्कि यह एक राष्ट्रीय धर्म है और मेरा उद्देश्य भी राष्ट्र के सभी धर्मों की उत्कृष्ट शिक्षाओ एवं उपदेशों को एक सूत्र में पिरोकर एक नये धर्म का विकास करना है, जिससे हमारे राष्ट्र में किसी भी प्रकार का धार्मिक मनमुटाव अथवा साम्प्रदायिक भावना विकसित न हो सके। दशम् दृश्य [राजकुमार कुणाल (धर्म विवर्धन) अब 16 वर्ष की उम्र पार करके 17वो में पहुंच चुका था। उम्र के साथ हो उसको आँखो का जादुई आकर्षण और भी बढ़ गया था। जो भी उसकी आँखों को देखता, उसी का हो जाना चाहता था। उम्र के साथ ही उसकी आवाज मे विशेष आकर्षण आ गया था। उनकी वाणी में अमृत घुला प्रतीत होता था। विशेष रूप से जब वह वाद्य यंत्रो के साथ खेलता हुआ किसी सुगम गीत का गायन करता था तो स्त्री-पुरुषो की बात तो दूर, पशु-पक्षी उसके सम्मोहन मे बिंध जाते थे। उसकी आंखो के भवर जाल मे सुर को सम्मोहिनी आवाज से सम्मोहित कितनी ही नौयौवनाओने उसे अपना सर्वस्व निछावर करना चाहा.परन्तु राजकुमार कुणाल से ऐसा करने से इन्कार करते हुए उपदेशो के माध्यम से उन नवयौवनाओं की जागृत इच्छाओं को सुप्त कर दिया। उसी राजकुमार कुणाल को जादूभरी आवाज इस समय उसके कक्ष से - सम्राट के आंसू/87 गुंजरित होकर वातावरण में विखर रही थी। द्वार के निकट कितनी ही दासियां खड़ी उसकी सम्मोहिनी जादुई आवाज से सम्मोहित होकर मूर्तिवत्-सी हो गयी थी। जब राजकुमार कुणाल का सुगम संगीत अपने यौवन पर पहुंच चुका था, वीणा के तारों पर अंगुलियों थिरक रही थी, तभी रानी तिष्यरक्षिता ने कक्ष मे प्रवेश किया। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी जादुई शक्ति से सम्मोहित होकर उसके पैर अनायास ही राजकुमार कुणाल की ओर बढ़ते जा रहे हों। उसकी आँखों में लाल डोरे पैदा हो चुके तथा पैरों में कम्पन का आभास स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा था । वह स्वप्निल भाव से निरन्तर आगे बढ़ती हुई कुणाल के पीछे जा पहुँची। परन्तु कुणाल इन सब बातो से बेखबर अपने संगीत में इस कदर खोया हुआ था कि उसे आभास ही नहीं हो सका कि कोई नारी उसकी दासी बनकर उसके पीछे खड़ी हुई है। चौंका तब जब उसने अपने गले में किसी की बांहों का स्पर्श पाया। उसने जब मुड़कर पीछे की ओर देखा तो अवाक-सा बैठा का बैठा रह गया । कुणाल : मश्रिी, आप और इम समय । तिथ्यरक्षिता : नही कुणाल, मैं तुम्हारी मां नही। कुणाल : माश्री, यह आप क्या कह रही है "आप तो। तिष्यरक्षिता : मैं सच कह रही हूँ प्रिये । तुम्हारी मोहिनी जादूगरी वाणी और आँखों के सम्मोहन ने मेरे शरीर को अंगारों से दहका दिया है। अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी। .. कुणाल :मा..। तिष्यरक्षिता : मां नहीं."प्रिये कहो. अब मैं तुम्हारी माँ नहीं तुम्हारे चरणों की दासी हूँ'कहते हुए उसने कुणाल को अपने आगोश में भरना चाहा। कुणाल : मांश्री, आपका स्वास्थ्य ठीक नही प्रतीत होता है, आपका शरीर तप रहा है। आपको माराम की सख्त जरूरत है । आप आराम कीजिए मैं वैद्य जी को बुलाकर लाता हूँ। तिघ्यरक्षिता : हाँ प्रिये"मेरा शरीर आग का शोला बन चुका है और इस आग को केवल तुम्ही शान्त कर सकते हो आओ प्रिये .."अब और विलम्ब न करो.."समय बहुत कम है। कुणाल : मांधी, भला इस तपते शरीर को मैं कैमे शान कर सकता हूं। मैं ठहरा एक गायक वैद्य तोहूँ नही."आपकी बीमारी का ! तिघ्यरक्षिता : (हसते हए)""अरे बुद्ध इस आग को तुम जसा पुरुष ही शान्त कर सकता है "वैद्य तो क्या भगवान भी आ जाए, वह भी इस आग को शान्त करने में सक्षम नहीं होंगे।

88 / सम्राट के आंसू .. कुणाल : (असमंजसपूर्ण मुद्रा में) मांधी, मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है कि आप कहना क्या चाहती है। तिघ्यरक्षिता : (हसते हए) ऐसा मालूम पड़ता है कि तू निरा वुद्ध ही है, कहते हुए तिघ्यरक्षिता खिलखिलाकर हंस पड़ो और अपने वस्त्र को उतारते हुए बोली- "ठीक है मैं ही तुझे बताती हूं।" कुणाल : माँश्री "यह आप क्या कर रही है, कहते हुए बरबस ही उसकी आँखें बंद हो उठी। तिष्यरक्षिता : अरे अब तुम बार-बार मां क्यों कहते हो अब तो मैं तुम्हारी अर्धांगिनी बनने जा रही हूं. अर्थात तुम्हारे चरणो की दासी। कुणाल : नही माँ" ऐसा मत कहिए"आप मेरी माँ है देवी है और एक देवी''। तिष्परक्षिता : प्रिये, मैंने मां-बाप के मारे रिश्ते-नातों को तोडकर ही तुम्हारे कक्ष में प्रवेश किया है । अब मैं तुम्हारी मां नहीं बल्कि अपने प्रीतम की दासी हूँ। कहते हुए तिष्यरक्षिता ने कुणाल का हाथ पकड़ कर इस प्रकार खीचा कि वह सीधा तिप्यरक्षिता की बांहो मे समाता चला गया। कुणाल : अरे.. आप यह क्या कर रही हैं। तिष्यरक्षिता : प्रिये "अब मुझसे बर्दाश्त नही हो रहा है. मैं "मैं तुम्हारे जिस्म का एक अंग बन जाना चाहती हूँ."तुम्हारे साथ दूर चाँद-सितारो मे विचरण करने के लिए मेग शरीर तड़फ रहा है। कुणाल : (विदककर अलग होते हए) नही माँ'नहो "यह पाप है. मैं ऐसा नहीं कर सकता। तिष्यरक्षिता: प्रिये, ऐसा मत कहो. इस रात के अंधेरे में हम तुम दोनो अन्धकार मे खो जाना चाहते है बस एक बार"हम तुम कुणाल : मांश्री, पाप, पाप ही कहलाता है, चाहे वह रात के अंधेरे मे किया जाए या दिन के उजाले मे फिर माँ "आप मेरे पिता को सबसे प्रिय रानी हैं."और अपने ही बेटे के साथ ऐसा करना क्या शोभा देता है। तिध्यरक्षिता :प्रिये, यह समय उपदेश देने का नही बल्कि मेरे जिस्म मे लगी आग को शान्त करने का है। कुणाल : मैं आपको उपदेश नहीं दे रहा हूं.''जाइए आपको इस समय आराम की मस्त जरूरत है."यदि नीद न आए तो पिताश्री के पास चली जाएँ. मेरे पिताथी इतने सक्षम हैं कि वह आपके जिस्म की आग को ठण्डा कर मकें। तिप्यरक्षिता ; समझते क्यो नही प्रिये "क्या मैं खूबसूरत नही हूं.""क्या मैं नारी नहीं हूँ ...क्या मुझमे आकर्षण नहीं है आखिर मुझमे क्या कमी है ? कुणाल : माश्री, इसमें कोई सन्देह नही है कि आप एक स्वप्न सुन्दरी हैं और एक नारी भी हैं। परन्तु आपके नारी के रूप मे इस समय मेरे समक्ष एक मां खडी हुई है और .. सम्राट के आँसू / 89 एक मां का इस तरह वासना के अधीन हो जाना उसके नारीत्व को कलकित करके रख देता है। मां, आप मेरी बात मान जाइए और। तिष्यरक्षिता: तो क्या मुझे ऐसे ही प्यासी रहकर वापस जाना होगा। कुणाल : मांश्री, अच्छा होता कि आप पिताश्री के पास चली जाइए। तिष्यरक्षिता : कुणाल अपनी सुन्दरता, अपने आकर्पण और अपनी आवाज के जादू पर इतना घमण्ड हानिकर भी हो सकता है । पता नहीं तुम अपने आपको क्या समझ रहे हो 'आज तुमने मेरा नही बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति का अपमान किया है। कुणाल : नही मां, मैंने नारी जाति की रक्षा की है। यही नहीं एक बेटा होने के नाते अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूँ। तिध्यरक्षिता : अरे मूर्ख' "एक अद्वितीय सुन्दरी अपना सब कुछ देने को तत्पर हो रही है वह दे रही है जिसे पाने के लिए लोग तरसते है और एक तुम हो कि उस अद्वितीय अप्सरा का ही अपमान कर रहे हो। कुणाल : मांश्री, मैं आपका अपमान नहीं कर रहा हूँ। फिर जो कुछ आप मुझे देना चाहती है, वही आप पिताश्री को क्यों नहीं दे रही हैं। फिर उस चीज को पाने के अधिकारी भी तो पिताश्री ही है । तिष्यरक्षिता : हैं नही, थे. अब उनमें इतनी शक्ति कहां रह गयो है जो...। कुणाल : माश्री, आप मेरे पिता का अपमान कर रही हैं...। तिष्यरक्षिता : ठीक है मैं समझ गयो कि तुम वास्तव में पुरुष नहीं हो। यह जो सुन्दरता का आवरण तुमने पहन रखा है, वह मात्र दिखावा है। ठीक है जिस प्याम को लेकर आयी थी, यही सोचकर बिना बुझाए जा तो रही है लेकिन याद रखना एक प्यासी नारी और एक घायल नागिन का क्रोध बड़ा ही भयानक होता है । कुणाल : लेकिन आप नारी से बढकर एक मां हैं। फिर मां तो अपने बच्चों पर क्रोध करने का पूरा अधिकार रखती है। तिष्यरक्षिता : तुम निरन्तर जितना अपमानित करना चाहो कर लो लेकिन मैंने भी तुम्हारी इन जादुई आँखों को तुम्हारे अंग से निकाल कर न फेंक दिया तो मेरा नाम तिप्यरक्षिता नहीं है । कुणाल : यदि मेरी आंखों से आपको इतनी ही चिढ़ है तो निश्चय ही उन्हे निकलवा कर फेंकने का अधिकार भी मां को है। आखिर यह शरीर भी तो माँ ही ने बनाया है, अतः अंग-भंग का अधिकार सदैव ही उसके पास सुरक्षित रहना चाहिए। तिप्यरक्षिता : ओह आंखों से भयानक तो जुबान है इमे भी समान फेंकना ही पड़ेगा अन्यथा [इसके साथ ही क्रोध मे फुफकारते हुए-तिप्रीक्षिताका स बाहर तो गयो स 90/सम्राट के मांस ग्याहरवा दृश्य [इधर कई दिनो से सम्राट अशोक अस्वस्थ चल रहे थे, परन्तु उन्होंने इस बात का आभास तक नहीं होने दिया और जनहित में अपने को राजकार्यों में लिप्त रखा। भगवान बुद्ध की मेवा मे इतने मग्न हो गए थे कि उन्हें स्वयं भी इस बात का आभास नहीं हो रहा था कि वास्तव में वह बीमार भी हैं। परन्तु बीमारी खामोश नहीं रहती । जिसको लग जाती है, उसके शरीर को इतना जर्जर कर देती है कि उसका शरीर स्वय चीख उठता है कि वह बीमार है। यही स्थिति सम्राट अशोक के माय उस समय हुई जब वह महेन्द्र के साथ बैठे हुए बौद्ध धर्म में आ रही कुरीतियों को दूर करने के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर रहे थे।] महेन्द्र : पिताश्री, आपका स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता जा रहा है, आखिर इसका क्या कारण है। अशोक : बेटे, मुझे कुछ नहीं हुआ है, तुम आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करो। महेन्द्र : नही पिताश्री, आप मुझसे छुपा रहे हैं. आपको अवश्य कोई बीमारी लग गई है जिसे आप छुपाना चाहते हैं...पिताश्री, आपको अपना विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योकि न केवल पूरे देश का भार आप पर है वरन वर्तमान समय मे बौद्ध धर्म की नीव आप पर ही टिकी है। अशोक : लेकिन मुझे कुछ हुआ हो तब न । महेन्द्र : पिताश्री, आपका चेहरा बता रहा है कि आप बीमार हैं। पिताश्री बीमारी कभी भी खामोश नही रहती है चाहे रोगी कितना ही उसे छिपाने का प्रयास .. करे। ." अशोक : बेटे, तुम्हें इस सम्बन्ध में चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है। यह एक यथार्थ और सत्य है कि जो भी जीव पृथ्वी पर जन्मता है, उसे एक दिन मरना भी होता है। और यह मौत बीमारी के ही कारण होती हैं। मुझे इस बात का स्पष्ट आभास हो रहा है कि मेरा अन्तिम समय निकट आ गया है । अतएव इस सम्बन्ध में तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। महेन्द्र : पिताधी, यह तो आत्महत्या का प्रयास है... अशोक : नहीं, यह आत्महत्या का प्रयास नहीं बल्कि मुझे ऐमी बीमारी लग चुकी है जो कि लाइलाज है और ऐमी बीमारी से ग्रस्त मानव का अन्त भी कम भयानक नहीं होता। फिर मृत्यु तो एक सत्य है और बीमारी मात्र एक कारण होता है। चूंकि इस बीमारी का कोई इलाज नही है अत. इसके इलाज पर पैसा व्यय करना निरर्थक- है। मेरा विचार तो यह है कि जो पैसा इस लाइलाज बीमारी पर खर्च किया जाए यदि उसी को बौद्ध धर्म के प्रचार में लगाया जाए तो महेन्द्र : पिताश्री, आप बौद्ध धर्म के प्रचार अथवा उसकी प्रगति की चिन्ता छोड़ दें।

सम्राट के आँसू/91 .. इसके लिए मैं अपने स्तर से प्रयास कर रहा हूं, आप नि:संकोच होकर अपना इलाज कराइए ""जहां तक मुझे ज्ञान है ऐसी कोई बीमारी नहीं है जिसका इलाज सम्भव' न हो । मैं अभी तत्काल राजकीय वैद्य को बुलवाता हूँ । यदि इसके लिए देश-विदेश के वैद्यों को बुलाने की आवश्यकता हुई तो अशोक : गुरु महाराज, आप ही महेन्द्र को समझाइए. तिस्स : राजन् ! मैंने आपकी पूरी बातें सुन ली हैं और महेन्द्र द्वारा कही गयी बातों का मैं पूरा समर्थन करता हूं। यदि आप इस विचार से कि भगवान बुद्ध की शिक्षाओं एवं उपदेशों के प्रचार से वशीभूत होकर अपना इलाज नही करवाना चाहते है तो इससे न केवल भगवान बुद्ध को कलकित होना पड़ेगा वरन् स्वयं बौद्ध धर्म के माय ही मुझे भी अपयश प्राप्त होना। यदि पैसे की ही बात है तो आप निश्चित मानिए कि अब बौद्ध धर्म के नाम पर आपसे एक पैसा नहीं लिया जाएगा। अशोक : यह आप क्या कह रहे हैं महाराज। तिस्स : मैं सच कह रहा हूँ"हम सभी भिक्षुगण भिक्षा मांग कर धन एकत्र करेंगे। आप केवल बौद्ध धर्म के लिए हत्या न करें। अशोक : मैं आत्महत्या नहीं कर रहा हूं बल्कि "। तिस्स : भले ही प्रत्यक्ष रूप में आप आत्महत्या नही कर रहे है लेकिन वास्तविकता यही है कि आप आत्महत्या करना चाहते है और इसी कारण आप अपना इलाज नहीं करवाना चाहते है । भगवान बुद्ध ने आत्महत्या करना अथवा आत्महत्या के लिए किसी माध्यम को तलाश करना दोनों ही स्थितियों को पाप बताया है। अशोक : गुरु महाराज, आप समझने का प्रयास क्यों नहीं करते। मुझे वास्तव मे जो रोग लगा है, उसका कोई इलाज है ही नहीं। तिस्स : मैं भी जानता हूँ राजन् कि आपको व्याधि का रोग लग चुका है, लेकि यह कहना कि उसका कोई इलाज नहीं है, गलत है। कोई भी रोग इलाज योग्य है अथवा नहीं इसका फैसला वैद्य ही कर सकता है, रोगी नही । अतः आपको सर्वप्रथम इसका परीक्षण कराना चाहिए था। परन्तु इस विलम्ब के कारण मुझे आशंका है कि आपको महाव्याधि का रोग लग चुका है अथवा लगने वाला है। {इसी समय कक्ष में महेन्द्र ने राजवैद्य को लेकर प्रवेश किया।] महेन्द्र : वैद्यराज, देखिए पिताश्री को क्या हो गया है। दिन पर दिन इनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा है । इन्हे तो इसका कोई खयाल ही नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है पिताश्री स्वय अपने को मौत के हवाले कर देना चाहते हैं । वैद्य : (सम्राट अशोक का परीक्षण करने के बाद) बेटा, अब तो बहुत देर हो चुकी है। राजन् को महाव्याधि का रोग हो गया है। यदि इसका समय से उपचार करवाया .92 /सम्राट के आंसू गया होता तो ठीक हो सकता था परन्तु अब यह वीमारी लगभग लाइलाज हो चुकी है। महेन्द्र 'क्या मतलब। वैद्य : क्षमा करना बेटे "बहुत विलम्ब से मुझे खबर भिजवाई गई है अन्यथा अब तक मैं इस रोग पर नियत्रण पा चुका होता। महेन्द्र : तो इसका मतलव अब पिताश्री को। वैद्य : नही वेटे, ऐसा मत कहो। मैं पूरा प्रयाम करूंगा कि इस बीमारी का कोई इलाज सोचा जा सके । वैसे इस बीमारी का एक इलाज अवश्य है। महेन्द्र : वह क्या । वैद्य : यदि महाराज प्याज एवं उसके अर्क का सेवन करें तो इस रोग का निदान सम्भव ': अशोक : नही वैद्यजी। मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रिय प्याज-लहसुन नही खाते । मैं अपने जीवन के अन्तिम क्षणो में भी ऐसा अधर्म नहीं होने दूंगा। महेन्द्र : लेकिन पिताश्री यह तो दवा है। अशोक : नही, यह दवा नही बल्कि धर्म को विधर्म करने का एक माध्यम है। मैं ऐसा कदापि नहीं कर सकता। महेन्द्र : ठीक है वैद्यजी, आप कोई दूसरा इलाज ढूंढिए भले ही कितना ही धन क्यो न व्यय हो । पिताश्री का स्वस्थ होना नितान्त आवश्यक है। .. दृश्य परिवर्तन [धीरे-धीरे सम्राट अशोक का स्वास्थ्य गिरता ही चला गया। अब तो उन्हें उठने- बैठने चलने-फिरने तक में काफी अमुविधा होती थी परन्तु अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के माध्यम से वह अब भी राजकाज में अपना पूरा योगदान दे रहे थे। इस समय सम्राट अशोक अपने कक्ष में लेटे हुए आराम कर रहे थे। उनके पाम रानी पद्मावती, तिष्यरक्षिता, असन्धिमित्रा के बाद ही महेन्द्र, दशलथ तथा अन्य पुत्र- गण बैठे हुए थे। अशोक : महेन्द्र, अब मेरा अन्त समय निकट आ गया है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मेरे ठीक सामने मौत खड़ी हुई मुझे बुला रही है । वेटा मैंने जहां पापों से अपनी झोली भर रखी है, वही कुछ पुष्य भी किए है । पता नही मुझे उस पुण्य का कोई फल मिलेगा भी या नहीं। महेन्द्र : पिताश्री आप इतना विचलित न हो, मुझे विश्वास है कि आपको कुछ नहीं होगा। फिर पद्मावती जैसी मां, तिघ्यरक्षिता जैसी पतिव्रता नारी मौजूद हो, वहाँ मौत को मो आने में भय लगेगा। मेरी सलाह तो यही है कि आप बिलकुल निश्चित सम्राट के आंसू / 93. होकर आराम कीजिए । इस रोग के उपचार के लिए मैंने दूर-दूर से वैद्यों को बुलाया है। पद्मावती : यही तो मैं भी कहती हैं लेकिन इन्हें तो बम एक ही तिघ्यरक्षिता : मैं तो कहती हूँ कि ऐसी कोई बीमारी नही है जिसका इलाज न हो। भले ही इसका इलाज दवा से न हो लेकिन एक पतिव्रता नारी अपने तप से मौत पर भी विजय पा सकती है। मैं महाराज की कुशलता एव उनके जीवन के लिए तप करूंगी तथा इनकी मौत से संघर्ष करके इन्हे मौत के शिकंजे से मुक्त कराने का पूरा वायदा करती हूँ। महेन्द्र : धन्य हो मां । जहाँ आप जैसी सती नारी मौजूद हो वहाँ मौत का आना सम्भव ही नहीं है। अशोक : बेटे आने वाले कल पर कोई भविष्यवाणी करना असम्भव है। मेरे सामने तो बस एक ही चिन्ता है। पद्मावती चिन्ता कैसी चिन्ता। अशोक : कुणाल "हाँ कुणाल को ही चिन्ता है 'मैं चाहता हूँ कि अपने जीते-जी उसका विवाह करके अपने समस्त दायित्वों से मुक्ति पा लूं। महेन्द्र : आप बिल्कुल बेफिक्र रहें पिताधी । मैं आज ही पुरोहित से बात करूंगा। अशोक : राजपुरोहित से बात हो चुकी है । लगन तिथि भी निश्चित हो चुकी है परन्तु घोषणा होना शेष । चूंकि मुझे ऐसी बीमारी लग चुकी है, जिसके कारण मैं इस शुभ कार्य को सम्पन्न करा सकने मे पूर्णरूपेण असमर्थ हूँ। अत: मैं चाहता हूँ कि तुम इस कार्य को जितनी जल्द सम्भव हो सके पूरा करा दो। तिप्यरक्षिता: महाराज अभी कुणाल की शादी की इतनी क्या जल्दी है। फिर आपके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कुणाल की शादी करना उचित नहीं होगा। जब आप स्वस्थ हो जाएं तभी इस कार्य को पूरा कराएं। अशोक : हो सकता है, तुम्हारा विचार सही हो, लेकिन मान मर्यादा भी तो कुछ होती है मैंने बहुत पहले ही कुणाल के लिए एक लड़की ढूंढ ली है। उसका नाम कोवनलता है । काचन अत्यन्त सुन्दरी ही नही बल्कि साधू स्वभाव की घरेलू नारी है। इस सम्बन्ध मे मैंने लगभग मभी मौपचारिकताएं पूर्ण कर दी ही है । तिष्यरक्षिताः आश्चर्य है"कुणाल की शादी की रस्म इतने गुपचुप तरीके से आपने कर ली और मुझे इसको खबर तक नहीं लगी। अशोक : हो' 'यह इसलिए किया गया क्योकि राजकुमार कुणाल की आयु छोटी होते हुए भी उसके आकर्षण से कुछ लडकियां उसे पथ विचलित कर सकती हैं... इसीलिए यह कार्य शीघ्रता से करने के उद्देश्य से किया गया। मैं नहीं चाहता कि मेरे पुत्र पर कोई किसी प्रकार का माक्षेप करे। महेन्द्र : मानो पिताजी ने जो कुछ किया है उचित ही है। मैं पिताश्री की बात से सहमत : ।

94/ सम्राट के आंसू हूं अतः अब इस मामले में किसी प्रकार के तर्क-वितर्क की आवश्यकता नहीं महसूस होती है। पद्मावती : लेकिन तिष्यरक्षिता मैंने तो तुमसे बतला दिया था कि राजकुमार कुणाल के लिए लडकी देख ली गयी है और शीघ्र ही शादी होने वाली है। महेन्द्र : पिताश्री, आप निश्चित होकर आराम कीजिए। हम लोग निर्धारित तिथि पर ही इस कार्य को सम्पन्न करा देंगे और वर-वधू आपसे आशीर्वाद प्राप्त करने आएंगे। अशोक : बस अब मुझे कोई चिन्ता नही रह गयी है । [निर्धारित तिथि पर राजकुमार कुणाल का विवाह सम्पन्न हो गया। इस अवसर पर पूरे राज्य मे जहां खुशियां मनाई गई वही राजमहल मे हजारों वौद्ध भिक्षुओं को भोजन एवं दान दिया गया। विवाहोपरान्त राजकुमार कुणाल अपनी पत्नी कांचनलता के साथ अपने पिताजी सम्राट अशोक से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके कक्ष मे गए जहाँ सम्राट अशोक, रानी तिष्यरक्षिता एव परिवार के अन्य सदस्यो के साथ मौजूद थे। कुणाल : पिताश्री, आप इस अवसर पर भी नहीं आए । कम-से-कम अपनी बहू को आशीर्वाद देने के लिए ही आ जाते हैं। अशोक : (रुग्ण स्वर में) वेटे मैं अब इस योग्य नहीं रह गया हूं कि किसी भी सामाजिक कार्य में भाग ले सकूँ। तुम दोनों एक सूत्र मे बंध गए, यह मेरे लिए अत्यन्त खुशी की बात है । जहाँ तक मेरे आशीर्वाद का प्रश्न है, मेरा सदैव यही आशीर्वाद है कि तुम दोनो सदा सुखी रहो" फलोफूलो और अपना यश चारो दिशाओं में सम्राट अशोक के समान ही फैलाओ । भगवान बुद्ध सदैव तुम्हारी हर इच्छा को पूर्ति करें यही मेरी भगवान बुद्ध से प्रार्थना है। फुणाल : पिताश्री, अब आपका स्वास्थ्य कैसा है ? अशोक बेटे "शीघ्र ही भगवान बुद्ध को शरणं गच्छामि मे जाने वाला हूँ। कुणाल ::पिताश्री, ऐसे शब्द नही बोलने चाहिए। भगवान बुद्ध से तो मेरी यही प्रार्थना है कि मेरी पूरी आयु आपको देकर मुझे अपनी शरण मे बुला ले। फांचनलताः (सम्राट अशोक के चरण स्पर्श करते हुए) पिताजी ध्रष्टता के लिए क्षमा चाहूंगी. मेरी भी यही प्रार्थना है कि हम दोनो की आयु को लेकर आपको स्वास्थ्य प्रदान करने में योगदान दें। अशोक : बेटी, अभी से तुम लोगों को ऐसा व्रत नही लेना चाहिए. यह तो मेरे पापों का दण्ड है। हर इन्सान को चाहे वह राजा हो या रंक, अपने कर्म के अनुरूप किए पाप एवं पुण्य का फल भोगना ही पड़ता है । इसलिए तुम लोग मेरी चिन्ता मत करो। अपने वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने की दिशा में उत्कृष्ट कार्य करो... जिससे आने वाला इतिहास यह बता सके कि सम्राट अशोक से महान उसका बेटा - सम्राट के आंसू / 95 कुणाल एवं कांचनलता थी। कुणाल : पिताश्री, आपके आदेश का पालन करना मेरा परम कर्तव्य है। लेकिन आप भी वायदा कीजिए कि भविष्य में कभी भी ऐसी बात नही कहेंगे जिससे हम लोगों को दुःख एवं क्लेश पहुँचे । पिताश्री आप जैसे महान और पराक्रमी शासक, जिससे चांद और सूरज तक थर्राते हैं, जिसने जनकल्याग के कार्यों के लिए अपना सारा राजकोप निछावर कर दिया एव भगवान बुद्ध के उपदेशों के प्रचार के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन को उसकी सेवा में अपित कर दिया हो, वह कभी भी पापी नहीं हो मकता है । यदि अनजाने में कोई पाप हो भी गया हो तो भी इतने जनहित कार्यों को दृष्टिगत रखते हुए उनका कोई अस्तित्व नही रह जाता। कांचनलता:फिर पिताश्री आप जैसे पराक्रमी शासक के मुंह से ऐसी बातें विशेष रूप मे पाप-पुण्य वाली बातें कदापि शोभा नहीं देती। अशोक : बेटी तुम्हारा कथन मही है, लेकिन मन में छिपी चिन्गारी रह-रहकर सुलगती रहती है, जिसमे मुझे शान्ति नहीं मिल पाती । खैर, यह लो अपना उपहार। कहते हुए सम्राट अशोक ने रत्नजटित हार निकालकर कांचनलता को दे दिया। कांचनलता : पिताजी, इसकी क्या आवश्यकता है । मैं तो सिर्फ आपका आशीर्वाद ही चाहती हूँ, एक महान पराक्रमी और वीर शासक का आशीर्वाद जिसने । अशोक : बेटी, इसे मैंने इसीलिए संभालकर रख छोड़ा था कि कुणाल की होने वाली पत्नी को भेंट करूंगा । इसे अपने गले में पहन लो। तिप्यरक्षिता : कुणाल, महाराज को आराम की सख्त आवश्यकता है । मैं चाहती हूँ कि अब तुम लोग जाओ। भगवान बुद्ध ने चाहा तो महाराज शीघ्र ही स्वस्थ हो जाएंगे। कुणाल : जैसी आज्ञा मांश्री। बारहवाँ दृश्य इरानो तिघ्यरक्षिता अपने कक्ष मे आदमकद शीशे के सामने बैठी हुई किसी गहन सोच-विचार में डूबी हुई थी। यदा-कदा अपने चेहरे पर आते जाते भावो को शीशे मे देख लेती थी। अपने चेहरे पर आए भावों को आदमकद शीशे मे देखते हुए बरबस ही बडबड़ा उठी"कुणाल "कुणाल "तुझसे मैं ऐसा भयंकर बदला लूंगी कि तभी तिष्यरक्षिता का प्रतिबिम्व शीशे मे उभरता है"हा हा हा हा "तू कुणाल से कब से बदला लेना चाहती है "हा" हा "ऐसी प्रतिज्ञा करने से क्या फायदा तिष्यरक्षिता जो एक दिन तेरे लिए ही अभिशाप बन जाए।

96/ सम्राट के आँसू तिष्यरक्षिता : काश मैं यहां की शासक होती तो! प्रतिबिम्ब : जव शासक होती तब न अब नो कुणाल तेरी सौतन भी ले आया है... हा हा हाअब देखना जब कुणाल तेरी करतूत उसे बताएगा। तिप्यरक्षिता : नही 'नही' कुणाल ऐसा नहीं कर सकता। ऐसा होने के पहले ही मैं उमे मरवा दूंगी। प्रतिबिम्ब : अरे मूर्ख 'तू तो ऐसे कह रही है जैसे तूने उसे मरवा ही दिया फिर कुणाल को ऐसा करने में कौन रोक सकता है खैर मना जो तेरी काली करतूत उसने सम्राट अशोक को अभी तक नहीं बताई। देख तिष्य रक्षिता, अभी भी समय है तुझे कुणाल से माफी मांग लेनी चाहिए । और उस काली रात मे जो कुछ हुआ उसे भूल जाना ही तेरे लिए हितकर है। तिष्यरक्षिता :माफी और मैं "हा हा "हा.'तू तो ऐसे कह रही है जैसे मैं कोई अपराधिनी हूँ जो उस मामूली से छोकरे से माफी माँ । देख, तू भी कान खोलकर सुन ले फिर कभी ऐसी सलाह देने की कोशिश की तो तेरा सर कलम कर दूंगी, ममझी। रहा कुणाल का प्रश्न उसे अपनी सुन्दरता पर बड़ा ही गर्व है. उसे अपने यौवन पर बडा घमण्ड है''देख लेना एक दिन उमे अपने कर्मों की सजा भुगतनी ही पडेगी। प्रतिबिम्ब : उसे या तुझे वास्तविकता तो यह है कि तुझे अपनी सुन्दरता अपने रूप ...और विशेष रूप में अपने यौवन पर बडा अभिमान था''चूंकि उमने इस घमण्ड को तोड़ दिया है इसलिए। तिष्परक्षिता: हाँ. उसने मेरे रूप मेरी सुन्दरता और मेरे यौवन का उपहास उडाया है ''उसने मेरा ही नही सम्पूर्ण नारी जाति का अपमान किया है । और इस : अपमान का बदला""" प्रतिविम्ब : लेकिन तिप्यरक्षिता, यह क्यो भूलती हो कि उसने एक मां की ममता एक मां की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए तुम्हे देवी का स्तर भी प्रदान कर दिया तिघ्यरक्षिता : देवी''नही.."नही."उसने मुझे प्रतिविम्ब : तिष्य भूल जा उस अपमान को मेरी सलाह मान और कुणाल से माफी मांग ले अन्यथा कही ऐसा न हो कि इस सुलगती आग में तू ही जलकर भस्म हो जाए। तिप्यरक्षिता: नही.. मैं उससे कभी भी माफी नहीं मागूंगी बल्कि एक दिन यह पद ही गिड़गिड़ाता हुआ माफी मांगेगा। प्रतिविम्ब : ठीक है.. मैं उस दिन का इन्तजार करूंगी।

सम्राट के मासू/97 दृश्य पारवर्तन [रानी तिप्यरक्षिता दिन-रात सम्राट अशोक की एक पतिव्रता नारी की तरह सेवा करती रही। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह सती सावित्री की तरह सम्राट और मृत्यु के साथ सघर्ष कर रही हो। इसके बावजूद विजय किसकी होगी, इसका निर्णय अभी तक नहीं हो सका था क्योंकि सम्राट अशोक की हालत दिन-पर-दिन गिरती ही जा रही थी। रानी तिष्यरक्षिता ने देश-विदेश से वैद्य, हकीमो को बुला- कर सम्राट अशोक के रोग का परीक्षण कराया । जहाँ वह वद्य एवं हकीमों द्वारा बताए गए मागों को प्रशस्त करती थी, वही भगवान बुद्ध से सम्राट के प्राणो की भीख मांगती हुई घण्टों भूपी प्यासी स्तुति करती रहती थी। धीरे-धीरे समय बीतता गया, उसी के साथ रानी तिष्यरक्षिता की तपस्या और त्याग रंग लाती गई। इसे रानी तिप्य रक्षिता की तपस्या कहा जाए या वैद्य, हकीमों के परिश्रम का फल कि महाराज अशोक के स्वास्थ्य में एकाएक सुधार होना शुरू हो गया। एक दिन सम्राट अशोक के कक्ष में रानी तिध्यरक्षिता बैठी हुई भगवान बुद्ध की उपासना कर रही थी, तभी द्वारपाल ने आकर सूचना दी कि पाद विक्रमसिंह मम्राट अशोक से तत्काल मिलना चाहते है । तिण्यरक्षिता : विक्रमसिंह से कह दो कि सम्राट इस समय सो रहे हैं । द्वारपाल : मैंने कहा था, परन्तुं विक्रमसिंह कोई महत्त्वपूर्ण सूचना देने आए हुए हैं। तिष्यरक्षिता : ठीक है, विक्रमसिंह से कहो कि मैं आ रही हूं। [इसके साथ ही उसने अपने वस्त्रो को ठीक किया और विक्रमसिंह से मिलने के लिए चल पड़ी। रानी तिप्यरक्षिता को देखते ही विक्रमसिंह उठकर खड़े हो गए और अभिवादनोपरान्त बोले- इस समय मुझे सम्राट अशोक को एक अत्यन्त आवश्यक एवं गुप्त सूचना देने के लिए आना पडा है ।] तिप्यरक्षिता ऐसी कौन-सी गुप्त सूचना है, यदि आप उचित समझें तो मुझे बतला दें मैं सम्राट के जगते ही उन्हें अवगत करा दूंगी। विक्रमसिंह : तक्षशिला में आज ही विद्रोह फैलने की सूचना प्राप्त हुई है। इसी सम्बन्ध में सम्राट से सलाह-मशविरा करनी थी। तिप्यरक्षिता: ठीक है, महाराज के जगते ही उन्हें अवगत करा दूंगी तथा उनके द्वारा लिए गए निर्णय से तुम्हे कल प्रातःकाल अवगत करा दूंगी। विक्रमसिंह : चूंकि स्थिति अत्यन्त नाजुक है, अतः आप इस मामले को शीघ्र से शीघ्र महाराज के समक्ष प्रस्तुत कर दें। [जब विक्रमसिंह उक्त सूचना देकर चला गया तव रानी तिप्यरक्षिता पुनः कक्ष में .. 98/समाट के आंसू आ गई और सम्राट अशोक के पर दबाने लगी। कुछ ही देर बाद सम्राट अशोक ने कराहते हुए आँखें खोल दी।] अशोक : अरे तुम अभी तक सोयी नही । तिष्यरक्षिता : राजन्, अब आपकी तबीयत कैसी है ? अशोक : थोड़ा-बहुत आराम है । अब तुम जाकर सो जाओ । तिष्यरक्षिता : आपको इस हाल मे छोडकर में कही नहीं जा सकती 'आप बस आराम कीजिए''अरे हो.. अभी विक्रमसिंह एक आवश्यक सूचना देने आया था। अशोक : कैसी सूचना ? तिप्यरक्षिता : विक्रमसिंह ने बताया है कि तक्षशिला में विद्रोह होने की खबर प्राप्त हुई .. अशोक : (आश्चर्य से) तक्षशिला में विद्रोह ! तिष्यरक्षिता : आश्चर्य तो मुझे भी है, लेकिन विक्रमसिंह को सूचना के गलत होने का कोई कारण भी प्रतीत नहीं होता। अशोक : तुम दशलथ को तक्षशिला भेज दो और उससे कह दो कि हर स्थिति मे विद्रोह शान्त होना चाहिए। हाँ प्रयास यही हो कि ज्यादा खून-खराबा न हो । तिध्यरक्षिता : मेरे विचार से तो दशलथ इस विद्रोह को शान्त करने में सफल न हो सकेगा। अशोक : फिर तुम्हारे विचार में किसे भेजना चाहिए । तिष्परक्षिता : मेरे विचार से तो कुणाल इस विद्रोह को शान्त करने में सफल हो सकता अशोक : कुणाल "लेकिन अभी उसकी उम्र हो गया है. फिर अभी तो उसका विवाह हुआ है"इतनी जल्दी इस प्रकार की जिम्मेदारियां उस पर डालना उचित नहीं लगता है। तिप्यरक्षिता : महाराज, कुणाल एक बुद्धिमान युवक है तथा राजकाज के मामलों में अपने अन्य भाइयों से काफी अनुभवी भी है । मुझे तो पूरा विश्वास है कि वह शीघ्र ही अपनी आवाज के सम्मोहन एवं आँखो के आकर्षण से वहां की जनता को अपने वश में करके विद्रोह को शान्त कर देगा। अशोक: लेकिन 1 तिप्यरक्षिता: राजन्, कुणाल दूध पीता बच्चा नहीं । फिर अभी से जब वह अनुभव प्राप्त नही करेगा तो आगे राज कैसे करेगा। फिर मैं उसकी दुश्मन तो हूँ नहीं। जो कहूंगी, आपके, कुणाल और राज के हित में कहूंगी । वैमे आपको जैसी इच्छा हो वैसा ही कीजिए। अशोक : वैसे तुम्हारा परामर्श गलत नहीं है. 'अन्य भाइयों की अपेक्षा कुणाल निश्चय सम्राट के आंसू / 99 ही इस विद्रोह को शान्त करने में कामयाब हो सकता है। लेकिन यदि वह विद्रोह को शान्त करने में असफल हुआ तो"। तिष्यरक्षिता : महाराज, सफलता-असफलता की भविष्यवाणी करना हमारे वश की बात नहीं है."वैसे मुझे पूरा विश्वास है कि कुणाल को सम्मोहिनी जादू भरी आवाज निश्चय ही उसकी विजयपताका फहराने में कामयाब होगी । अशोक : ठीक है. मैं तुम्हारे विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। तुम कुणाल को तक्षशिला जाने का आदेश दे दो। साथ ही वहां के सामन्त को राजपत्र भेज दो कि जव तक वहां की स्थिति शान्त नही हो जाती राजकुमार कुणाल की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाए। तिष्यरक्षिता: आप निश्चित रहें, मैं अभी ही सेनापति जयदत्त एवं विक्रमसिंह को स्थिति से अवगत करा देती हूँ। दृश्य परिवर्तन [प्रातःकाल के 8 बज चुके थे। राजकुमार कुणाल अपनी पत्नी कांचनलता के साथ अपने कक्ष में बैठा हुआ था। तभी दरबान ने सेनापति जयदत्त एवं विक्रमसिंह के आने की सूचना दी। कुणाल सेनापति जी, आप और इस समय । क्या कोई विशेष बात तो नहीं है। पिताश्री का स्वास्थ्य तो ठीक है। विक्रमसिंह : महाराज अब स्वस्थ हो रहे हैं राजकुमार । सम्राट अशोक ने आदेश दिया है कि आप तत्काल तक्षशिला के लिए रवाना हो जाइए। कणाल : तक्षशिला 'क्या बात है ? विक्रमसिंह : तक्षशिला में विद्रोह हो गया है। इस विद्रोह को शान्त करने के लिए आपको उपयुक्त समझा गया है। मृणाल : ओह"तब तो निश्चय ही मुझे जाना होगा। कांचनलता : निश्चय ही पिताथी के आदेश का पालन करना आपका कर्तव्य है। परन्तु इस कार्य में अपना योगदान देने के लिए मैं भी आपके साथ चलूंगी। कुणाल : नही कांचन "यह विद्रोह है और ऐसे विद्रोहों में स्त्रियां नहीं जाया करतीं। कांचनलता : क्यों नहीं जाया करती "शायद आप उन्हें कमजोर हृदय वाली समझते हैं. लेकिन यह क्यों भूल रहे हैं कि मैं जादूगर कुणाल की पत्नी हूँ और उससे भी बढ़कर सम्राट अशोक की पुत्रवधू हूँ। जयदत्त : बेटी.."मेरे विचार से आपको इस गृहयुद्ध में नहीं जाना चाहिए। पता नहीं वहां की स्थिति कैसी हो। कांचनलता : जैसी भी स्थिति होगी मैं अपने पति के साथ मिलकर देख लूंगी। मैं कायर ..

100/सम्राट के आंसू या बुजदिल औरत नहीं हूं जो अपने सुहाग को खतरे में डालकर नाता तोड़ लूँ। अब हम दोनो का जीना-मरना एक साथ है। इसलिए आप लोग कृपया यथोचित परामर्श ही दें जिससे में एक पतिव्रता नारी की तरह अपने पति की सेवा का अवसर प्राप्त कर सकू। कुणाल : तुम समझती क्यों नहीं कांचन "मैं शीघ्र ही वापस आ जाऊंगा। विक्रमसिंह हां बेटो''जैसे ही विद्रोह शान्त हो जाएगा 'राजकुमार वापस आ जाएगा। कांचनलता : मैं इन सब बातों को नहीं सुनना चाहती। मैं भी इस गृहयुद्ध में अपने पति के साथ ही भाग लूंगी और विद्रोह को शान्त करने में हम दोनो मिलकर कार्य करेंगे। कुणाल : ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा । दृश्य परिवर्तन [राजकुमार कुणाल के सपन्नीक तक्षशिला जाने की सूचना प्राप्त होते ही रानी तिष्यरक्षिता खुशी से पागल हो उठी। इधर कई दिनों से सम्राट की बीमारी के कारण वह अपने को ही ठीक से संवार नही सकी थी। हर समय केवल एक ही चिन्ता थी कि सम्राट को हर स्थिति मे जीवित रखना है भले ही उसके लिए कितनी तपस्या क्यो न करनी पड़े। चूंकि अब सम्राट अशोक का स्वास्थ्य ठीक था अतः वह अपने शृंगार कक्ष में जा पहुंची और उसी आदमकद शीशे के सामने जा खड़ी हुई । अपने चेहरे को शीशे मे देखकर बरवस ही उसके होठो पर मुस्कान थिरक उठी । इसी के साथ ही शीशे मे उसका प्रतिविम्व साकार हो उठा। प्रतिविम्ब : माज तो रानी साहिबा बहुत खुश हैं । सिध्यरक्षिता: हाँ बहुत खुश "जानती हो एक दिन मैंने तुमसे कहा था कि कुणाल की मौत मेरे हाथो निश्चित है। प्रतिबिम्ब : याद है रानी साहिवा। तिध्यरक्षिता: तो सुन "मैंने उसे ही नही बल्कि उसको सुन्दरी को भी विद्रोह की आग में झोक दिया है । देखना कुछ ही दिन बाद सूचना आएगी कि राजकुमार गुणाल की सुन्दर आंखें और जादुई आवाज सदैव-सदैव के लिए विद्रोह की आग में झुलस गई हैं। प्रतिविम्ब : हा "हा"हा"बडा सुन्दर स्वप्न है."काश यह साकार हो सकता। तिघ्यरक्षिता:क्या मतलब। प्रतियिम्य : मरे मूखं"जिसको सुन्दर आँखों के भंवर जाल में फंसकर मो जैसी देवी उसके आगोश में सामने को उद्यत हो उठे.. यदि उसी आवाज ने वहाँ को विद्रोही जनता को अपने भवर जाल में फंसाकर शान्त कर दिया, तब क्या करोगी।

सम्राट के आँसू / 101 तिघ्यरक्षिता : यह असम्भव है "कुणाल जैसा अनुभवहीन कभी भी वहां के विद्रोह की आग को शान्त करने में सक्षम नहीं हो सकता। प्रतिबिम्ब : सम्भव और असम्भव का फैसला तो आने वाला कल करेगा. लेकिन मान लो यदि वह विद्रोह को शान्त करने में सफल हो गया तब कौन-सा षड्यन्त्र करोगी। तिघ्यरक्षिता : अभी मैंने इस सम्बन्ध में कुछ नही सोचा है"यदि ऐसा हो भी गया तो भी मैं हार मानने वाली नही हूँ बल्कि मरते दम तक कुणाल से अपने अपमान का बदला लेकर ही रहूंगी। प्रतिबिम्ब : कही ऐसा न हो कि इस बदले की आग के कारण तुम्हें स्वयं ही इम आग मे झुलसना पड़े। तिष्यरक्षिता : ऐसा कभी नहीं हो सकता 'मैं सम्राट अशोक की सबसे प्रिय रानी बन चुकी हूं."हा "हा"हा। दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक लगभग पूर्णतया स्वस्थ हो चुके थे। परन्तु शारीरिक कमजोरी अभी भी काफी अधिक थी। राजकीय वैद्यों ने अभी उन्हें पूर्ण विश्राम का परामर्श दे रखा था परन्तु इसके वावजूद वह राज कार्यों मे अपना पूरा योगदान देते रहते यही कारण था कि महत्त्वपूर्ण मामलों में मेनापति एवं अर्थ मंत्री के साथ अन्य पार्षदगण परामर्श लेने के लिए आया करते थे। आज अर्थ मंत्री विक्रम सिंह कुछ विशेष सूचना लेकर सम्राट अशोक से मिलने आए थे।] अशोक : कहो विक्रमसिंह राज्य मे सब कुछ ठीक-ठाक तो है । विक्रम सिंह : हाँ महाराज। आपके आशीर्वाद एवं पराक्रम से सम्पूर्ण राष्ट्र का राज कार्य ठीक ढंग से चल रहा है । देश की पूरी जनता महाराज के स्वास्थ्य लाभ से प्रसन्न है तथा वह आपके दर्शनों के लिए लालायित हो रही है। अशोक : विक्रम सिंह, यह सब तुम लोगों का परिश्रम, त्याग और जनता का आशीर्वाद ही है, जो मैंने दूसरी जिन्दगी पायी है। विशेष रूप से रानी तिष्यरक्षिता भी धन्यवाद की पात्र हैं, जिन्होने अपने अथक परिश्रम, त्याग एवं तप के बल पर न केवल मेरी मृत्यु से संघर्ष किया बल्कि मुझे एक नया जीवन दिया है । हां राजकुमार कुणाल की कोई सूचना प्राप्त हुई अथवा नहीं। तक्षशिला का विद्रोह। विक्रम सिंह : महाराज, उसी की सूचना तो लेकर आया हूँ। अशोक : तो जल्दी बताओ, उसने क्या सूचना भेजी है । विक्रम सिंह : राजकुमार कुणाल एवं उसकी पत्नी ने यह जानकारी चाही है कि पिताथी का स्वास्थ्य कैसा है, इसकी जानकारी उन्हें तत्काल दी जाए। जहाँ तक तक्षशिला 102/सम्राट के आंसू मे विद्रोह का प्रश्न है"राजकुमार कुणाल एवं कांचनलता ने मिलकर बिना किसी खून-खराबे के वहां के विद्रोह को ही शान्त नही किया है बल्कि वहां की जनता का सरताज भी बन गया है । अब वहाँ की स्थिति पूर्णतया सामान्य है तथा वहाँ की जनता का पूरा समर्थन आपके साथ है । राजकुमार कुणाल ने यह भी सूचना भेजी है कि वहां की जनता सम्राट अशोक के दर्शन करना चाहती है । अशोक : (निकट ही बैठी तिप्यरक्षिता की ओर उन्मुख होकर) देखा प्रिये तुम्हारा विश्वास कितना सच था" हालांकि मैं तो कुणाल को इतने जोखिम भरे कार्य पर भेजने के लिए घबड़ा रहा था, परन्तु जिस आत्मविश्वास के साथ रानी तिष्परक्षिता ने राजकुमार पर यह भार डाला तथा जिस प्रकार राजकुमार कुणाल ने अपनी जिम्मेदारी को निभाया, उसके लिए मैं एक बार पुनः रानी तिप्यरक्षिता को धन्यवाद देता हूँ। दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक इस समय अपने कक्ष में विश्राम कर रहे है। उनके निकट ही उनकी प्रिय रानी तिष्यरक्षिता वैठी हुई उनके पैर दबा रही थी।] अशोक : प्रिये, निश्चय ही तुम्हारा त्याग, तप प्रशंसनीय है। मैं अब स्वस्थ हो चुका हूँ। बोलो तुम्हे क्या चाहिए जो भी मांगोगी मैं तुम्हे दूंगा। तिथ्यरक्षिता : महाराज, निश्चय ही स्वस्थ तो हो गए हैं लेकिन अभी इस योग्य नहीं है कि आप शारीरिक अथवा मानसिक रूप से कार्य करें। राजकीय वैद्यों ने सलाह दी है कि अभी आप आराम कीजिए। अशोक : भई, आराम करते-करते तो मैं पस्त हो गया हूँ। अब मैं कुछ काम-काज भी करना चाहता हूँ। लेकिन यहाँ प्रश्न आराम का नही बल्कि मैं तुम्हारे तप, त्याग एवं परिश्रम के पुरस्कार स्वरूप कुछ देना चाहता हूं। तिघ्यरक्षिता : क्या मांगू महाराज । आपके आशीर्वाद से सभी कुछ तो मेरे पास मौजूद है। हां एक इच्छा अवश्य है । लेकिन। अशोक : लेकिन क्या मैं सम्राट अशोक हूँ."यदि तुम चाद-सूरज भी चाहोगी तो उसे भी लाकर तुम्हारे कदमो पर डाल दूंगा। तिप्यरक्षिता : नही महाराज.."चांद-सूरज की आवश्यकता नहीं है. मेरी केवल एक ही इच्छा है और वह भी काफी पुरानी है। परन्तु कहते हुए भय महसूस होता अशोक : अरे भय कसा । तुम अपनी इच्छा बताओ। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि तुम्हारी हर इच्छा की पूर्ति मैं करूंगा। तिघ्यरक्षिता : राजन्, मेरी काफी समय से यह इच्छा है कि मैं भी कुछ दिन राजा :

सम्राट के आंसू /103 बनकर कुछ अनुभव प्राप्त करूं। यदि आप देना चाहते हैं तो मुझे एक सप्ताह के लिए इस देश का शासक बनने का सौभाग्य प्रदान करने का कष्ट करें। अशोक : (हंसते हुए) बस इतनी-सी बात। तिप्यरक्षिता : तो क्या आप मुझे शासक वनने का सौभाग्य प्रदान कर देंगे। अशोक : निश्चय ही.. मैं तुम्हे एक सप्ताह के लिए पूरे देश का शासक नियुक्त करता हूं तथा इस अवधि में तुम्हें वह सब अधिकार प्राप्त होंगे जो सम्राट अशोक को प्राप्त हैं। .. . तेरहवाँ दृश्य [महारानी तिष्यरक्षिता सम्राट अशोक के स्थान पर राजगद्दी पर आरुढ हो चुकी थी। यदाकदा लोग अपनी समस्याएं लेकर महारानी तिष्यरक्षिता के पास जाते तो वह इस सम्बन्ध मे विना मत्रिगणो से परामर्श प्राप्त किए अपना निर्णय सुना देती थी । जब दरवार से जनता के लोग चले गए तब उसने एक भरपूर नजर दरबार पर एवं वहाँ उपस्थित मथिगणो पर डाली।] तिप्यरक्षिता : सेनापति, सुना है कि तक्षशिला मे विद्रोह शान्त हो गया। सेनापति : जी हां महारानी जी, वहां तो राजकुमार ने ऐसा जादू किया है कि बिना किसी खून-खराबे अथवा युद्ध लड़े ही विद्रोह को ऐसे शान्त कर दिया मानो वहाँ कभी विद्रोह हुआ ही न हो। तिष्यरक्षिता : अच्छा "तब तो वहां की जनता का सरताज बन चुका होगा। क्या तुमने इम सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की इतना बड़ा विद्रोह उसने इतनी आसानी के कैसे शान्त कर दिया। सेनापति : आपका विचार सही है। हमारे जासूसो ने सूचना दी थी कि राजकुमार कुणाल ने अपनी जादुई आवाज की बदौलत ही वह विद्रोह शान्त कर कर दिया है। तिप्यरक्षिता : ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग अपने नाक-कान और आँखें बंद करके काम करते हो । यही कारण है कि तुम लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है। सेनापति :यह आप क्या कह रही हैं ? तिष्यरक्षिता : मैं जो कह रही हूँ वह सत्य है. अन्यथा इसके पीछे क्या रहस्य छिपा है, इसका पता तुम्हें बहुत पहले ही चल गया होता । मुझे गुप्त रूप से सूचना मिली है कि राजकुमार कुणाल विद्रोही शक्तियों से मिलकर वहां की शासन व्यवस्था स्वयं संभालना चाहता है तथा राज्य की संगठन शक्ति को छिन्न-भिन्न करके।

104 / सम्राट के आंसू सेनापति : लेकिन महारानी जी, मेरे जासूसी संगठन ने ऐसी कोई सूचना मुझे नही दी .. तिष्यरक्षिता : तुम्हारा जासूसी संगठन है ही कहाँ जो तुम्हें स्थिति से अवगत कराए। वास्तविकता तो यह है कि सम्राट अशोक ने सबको इतनी छूट दे रखी है कि वह अपने दायित्व का निर्वहन करने में असमर्थ हो चुके हैं । यही कारण है कि हमारे सैनिकों की तलवारों मे जंग लग चुकी है। सेनापति : महारानी जी, आप हुक्म करें"तलवारें चमकने में देर नहीं लगेगी। तिष्यरक्षिता : जो गुप्त सूचनाएँ मुझे एवं सम्राट अशोक को प्राप्त हुई हैं, उसमे यह स्पष्ट हो चुका है कि राजकुमार कुणाल देशद्रोही हो चुका है तथा वह एक अलग राज्य स्थापना का पड्यत्र रच रहा है । वास्तविकता यह है कि वह विद्रोही शक्तियों मे मिलकर तक्षशिला में एक अलग राज्य की स्थापना करना चाहता है, जिसका वही शासक होगा। इसका स्पष्ट प्रमाण यही है कि इतने बड़े विद्रोह को बिना किसी युद्ध अथवा खून-खराबे के शान्त कर दिया, जिसे संसार का एक महान आश्चर्य ही कहा जाएगा । तमाम परिस्थितियों को देखते हुए इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिल चुके हैं कि राजकुमार कुणाल विद्रोही शक्तियों से मिलकर उनके विद्रोह में हाथ बटा रहा है । अतः सम्राट अशोक से परामर्श के पश्चात् राष्ट्र हित को दृष्टिगत रखते हुए यह आदेश देती हूं कि राजकुमार कुणाल की आँखें निकाल कर उसे राज्य की सीमा से बाहर खदेड दिया जाए तथा यदि पुनः राज्य की सीमा में प्रवेश करता हुआ पाया जाए तो उसे एवं उसकी पत्नी काचनलता को फांसी पर चढा दिया जाए। सेनापति : महारानी जी, बिना किसी प्रमाण के इस प्रकार का दण्ड । तिष्यरक्षिता : इस सम्बन्ध में तुम्हें प्रमाण की आवश्यकता नहीं बल्कि सम्राट अशोक एवं मेरे आदेश का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए तथा इसके क्रियान्वयन की सूचना मुझे तत्काल उपलब्ध करायी जाए। सेनापति :जैसी आज्ञा। .. दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक इस समय अपने कक्ष में बैठे हुए थे। चूंकि राजकाज का सारा भार उन्होंने तिष्यरक्षिता को सौंप रखा था, इसलिए उनके पास कोई विशेष काम नहीं थे। उनके पास गुरु तिस्स मोगलिपुत्त तथा उनका पुत्र महेन्द्र कुछ अन्य बौद्ध भिक्षुगणों के साथ बैठे हुए थे। महेन्द्र : पिताश्री, अब आपका स्वास्थ्य कैसा है ? अशोक : बेटे, तुम्हारी मा तिप्यरक्षिता के तप एवं त्याग से मुझे यह स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हुआ है। निश्चय ही तिघ्यरक्षिता ने हमारे जीवन और मृत्यु के लिए जो संघर्ष सम्राट के आंसू /105 किया, उसके लिए वह विजय की पात्र हैं। महेन्द्र : हम सभी लोग भी मां जी के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। अशोक : उनकी सेवाओं को देखते हुए ही उनकी इच्छानुसार मैंने उसे इस देश का एक सप्ताह के लिए शासक नियुक्त कर दिया है। 'महेन्द्र : यह तो और भी अच्छी बात है । हाँ, राजकुमार कुणाल का क्या हाल है ? अशोक : निश्चय ही राजकुमार की आँखों एवं आवाज में जादू है । उसे तक्षशिला विद्रोह शान्त करने के लिए भेजा गया था । अनुमान तो यही था कि वहां खून की नदियाँ बह जाएंगी इस विद्रोह को शान्त करने के लिए, परन्तु मुझे प्राप्त सूचना के अनुसार विना युद्ध किए अथवा किसी प्रकार का खून-खराबा किए उसने तक्षशिला का विद्रोह शान्त कर दिया । महेन्द्र : यह तो सच है पिताश्री क्योंकि मैं उससे जाकर तक्षशिला मे मिला था। मुझे तो वहाँ विद्रोह जैसा कोई वातावरण ही नहीं देखने को मिला। राजकुमार कुणाल वहाँ भगवान बुद्ध का एक विशाल मन्दिर बनवा रहा है । जनता ने इस कार्य हेतु खुले दिल से दान देना शुरू कर दिया है। उस समय तक मिली सूचना के अनुसार 150 सहस्र मुद्राएं केवल जनता से दान के रूप में प्राप्त हो चुकी थीं। अशोक : तुम्हारी बात सुनकर मुझे अत्यन्त खुशी हुई है । हाँ, कावनलता का क्या हाल महेन्द्र : स्वस्थ है। पिताश्री आपने बहुत अच्छी बहू का चुनाव किया है। बिना किसी भेदभाव के उसने हम सभी की सेवा की तथा अपने हाथो से भोजन बनाकर खिलाया। अब तो वह मां भी बनने वाली है। अशोक क्या मां बनने वाली है ? महेन्द्र : हो पिताश्री। अशोक : लेकिन मुझे तो इसकी कोई खबर नहीं है। महेन्द्र : तिप्यरक्षिता मा श्री ने बताया नहीं क्या? अशोक :नहीं बेटे। शायद राजकाज में व्यस्तता के कारण उसे समय ही नहीं मिला होगा अथवा हो सकता है कि वह भूल गयी हो। खर बौद्ध धर्म की प्रगति तो चल ही रही होगी। राजकोष से दान आदि। तिस्स : राजन्, राजकोप से भरपूर दान तो मिल रहा है कि लेकिन जब से बौद्ध धर्म मे भिक्षुणियों का आना शुरू हुआ है. बौद्ध धर्म का स्तर गिरता जा रहा है। अब तो स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि बौद्ध धर्म के अनुयायी सुरा एवं सुन्दरी के व्यसनी बनते जा रहे हैं। अशोक : मैंने तो पूरा भार भाप पर छोड़ रखा है। मैं स्पष्ट रूप से आदेश दे चुका हूं कि आप भ्रष्टाचार को रोकने में जैसी भी राजकीय सहायता चाहते हो प्राप्त करें।

106/सम्राट के और चूंकि मैं काफी समय तक अस्वस्थ रहा हूँ, अतः मुझे कोई ऐसी जानकारी नहीं मिल सकी है। - तिस्स : मैंने अपने स्तर से पूरा प्रयास किया है लेकिन बौद्ध भिक्षु के रूप में तरह-तरह के अराजक तत्वों के प्रवेश हो जाने से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं एवं उपदेशों का पतन होता जा रहा है। अभी हाल ही में एक बौद्ध भिक्षु एक भिक्षुणी की मदद मे पूरे मठ के धन को लूट ले गया। काफी खोज-बीन करने पर भी अभी तक उसका पता नहीं चल सका है। महेन्द्र : पिताश्री, इधर स्थिति अत्यन्त संदिग्ध होती जा रही है। पता नहीं वे कौन से तत्व है, जो बौद्ध धर्म की प्रगति मे वाधक बनते जा रहे है । जव मे आप अस्वस्थ हुए हैं, बौद्ध धर्म सस्थान को राजकोप से बहुत कम मात्रा मे दान प्राप्त हुआ है, जिसके कारण बौद्ध धर्म के संचालकों को काफी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति यह हो गयी है कि बौद्ध धर्म सस्थान के पास इतना ही नहीं है कि वह इसकी प्रगति की दिशा में कोई कार्य कर सके । अशोक : लेकिन हमने तो ऐसा आदेश दिया नहीं फिर वह कौन लोग हो सकते हैं । ठीक है, मैं अब स्वस्थ हो चुका हूँ और इस दिशा में जांच कराकर उचित कार्यवाही करूंगा। इसके साथ ही मैं आज ही आदेश भेज रहा हूँ कि संस्थान को पूर्ववत दान मिलता रहे। तिस्स : प्रश्न यहाँ केवल धन का नहीं बल्कि बौद्ध धर्म की गिरती छवि का है। प्रश्न यहाँ यह है कि वह कौन लोग है, जो बौद्ध धर्म प्रचार में बाधक बन रहे है। धन तो हम लोग जन सहयोग से भी प्राप्त करने का प्रयास कर रहे है लेकिन अशोक : आप इस दिशा में कार्यवाही करें और जो तथ्य प्रकाश में आए उनसे हमे भी अवगत कराएं। जहां तक ऐसे तत्वों का प्रश्न है, आप दोनों मिलकर ऐसे लोगों का पता लगाएं तथा दोषी व्यक्ति को दण्डित कराएं । मुझे स्वयं आश्चर्य है कि ऐसे तत्व कोन हो सकते है, यदि यह मान लिया जाए कि यह किसी दूसरे धर्म अथवा धर्मों के सयुक्त सगठन की साजिश है, तो इस सम्बन्ध में अभी तक मैंने ऐसी कोई कार्यवाही नहीं की है, जिससे इन धर्मो को मर्यादा को देस पहुंचे। मैं मी धर्मों की उच्च शिक्षाओं का मानवीय दृष्टिकोण से अध्ययन करते हुए उनके प्रचार एवं प्रसार में सहयोग देता रहा हूँ। महेन्द्र यही नीति हमारी भी रही है। मैं किसी धर्म विशेष को अपने पद का दुरुपयोग हुए किसी पर थोपने के पक्ष में नही हूँ। परन्तु जो समर्थन आपके आशीर्वाद एव संरक्षण से बोर धर्म को मिला है, उससे दूसरे धर्मावलंबियों का उत्कठित होना म्वाभाविक ही है । मेरे विचार से यह किसी दूसरे धर्मावलंदियों की चाल ही है, जो बौद्ध धर्म को रिसाओं एवं उपदेशों को कलुपित करना चाहते हैं । अशोक : यदि तुम्हारी वात को सब भी मान लिया जाए, तो यह प्रश्न उपस्थित होता - ।

सम्राट के आंसू /107 है कि आखिर वह कौन से लोग हैं जो ऐसी कार्यवाही करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। तिस्स : मैं किसी धर्म विशेष पर आरोप नहीं लगाना चाहता हूँ क्योकि यदि सभी धर्मों की वस्तुस्थिति देखी जाए तो स्पष्ट विदित होगा कि सभी धर्म मानव हित के लिए ही बनाए गए हैं और हर धर्म मास मदिरा का विरोधी है। हर धर्म का उद्देश्य मत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाना है, इसलिए किसी धर्म अथवा उनके धर्मावलंबियों की आलोचना करना अथवा उन पर दोषारोपण करना उचित नहीं है । जहाँ तक बौद्ध धर्म की वर्तमान आन्तरिक विसंगतियों का प्रश्न है, यह निश्चय ही शोचनीय है और इस बात का आभास करा रही है कि कही-न-कहीं हमारी कमी अवश्य है । राजन् बौद्ध धर्म के अन्दर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरा चुकी हैं कि उनका एकदम नष्ट किया जाना कदापि सम्भव नहीं है। जिन बौद्ध भिक्षुओ ने मांस-मदिरा का सेवन शुरू कर दिया है, उन्हें कडा दण्ड देने की व्यवस्था की जाए। चूंकि पूर्व की भांति अब संस्थान को उस मात्रा में धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है अत: बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रसार एव उपदेशो का प्रचार बाधित हो गया है । यदि उपरोक्त भ्रष्टाचार को समाप्त करना है तो निश्चय ही संस्थान के पास धन के साथ ही शक्ति का होना अनिवार्य है। अशोक : आप पैसे के प्रति निश्चिन्त रहिए। मैं आज ही तिष्यरक्षिता को आदेश भेज रहा हूं कि पूर्व की भांति ही बौद्ध धर्म के विकास, प्रचार एवं प्रसार के लिए तत्काल यथोचित मात्रा मे धन उपलब्ध करा दें। वैसे भी मात्र एक मप्ताह की बात है। मैं भी भगवान बुद्ध के आशीर्वाद से स्वस्थ हो गया हूं, अतः आप चिन्तित न हो। मैं पूरा प्रयास करूंगा कि न केवल धन सुलभ कराया जाए वरन् ऐसे असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही भी सुनिश्चित की जाए। तिस्स : राजन्, केवल धन से ही विकास नहीं हो सकता, इसके लिए यह भी आवश्यक है कि आप समय-समय पर बौद्ध मठो, मन्दिरों आदि का निरीक्षण करें तथा बौद्ध धर्म के प्रवचनों एवं सगोष्ठियो में उपस्थित होने का कष्ट करें। आपकी उपस्थिति का ऐसे असामाजिक तत्वों पर यथोचित प्रभाव पड़ सकता है। अशोक : गुरु महाराज, वौद्ध धर्म के उत्यान, विकास, प्रगति के लिए मैं सदेव ही तत्पर रहा हूँ और जैसा भी आप आदेश देंगे उसका पालन करने को मैं सदैव तैयार रहूंगा। दृश्य परिवर्तन [राजदरबार लगा हुआ था। महारानी तिष्परक्षिता राजगद्दी पर विराजमान थी। सेनापति जयदत्त उनके ठीक सामने सर झुकाये खड़ा हुआ था । दरबार मे गहन नौरवता छायी हुई थी। मंत्रिगण एवं दरबारियों को नजरें बार-बार महारानी पर केन्द्रित हो उठती थी। ।

108/सम्राट के आंसू तिष्यरक्षिता : जयदत्त, मेरे आदेश का पालन हुआ अथवा नहीं। जयदत्त : जी हां ! महारानी के आदेश के अनुसार राजकुमार कुणाल की आँखें निकाल दी गई हैं तथा उसे एवं उसकी पत्नी कांचनलता को राज्य की सीमा के बाहर घने जंगलों में खदेड दिया गया है । लेकिन ! तिष्यरक्षिता : लेकिन क्या। जयदत्त : जब सम्राट अशोक को पता चलेगा...। तिष्यरक्षिता : जयदत्त, मत भूलो कि मैं इस देश की शासक हूं और इस समय सम्राट अशोक शासक नही हैं। वैसे यह जो आदेश दिए गए हैं, वह सम्राट अशोक के परामर्श से ही दिए गए हैं । खैर राज्य की स्थिति क्या है ? जयदत : देश की आन्तरिक स्थिति ठीक नहीं है। इस वर्ष देश में सूखा पड जाने के कारण खेत-खलिहान निर्जन पडे हुए हैं । इस प्राकृतिक विपदा को देखते हुए इस वर्ष राजस्व कर माफ कर दिया गया है। तिष्यरक्षिता : क्या तुमने इस सम्बन्ध मे मुझसे सलाह-मशविरा करना आवश्यक नही समझा। जयदत्त : क्षमा करें, सम्राट अशोक ने यह अधिकार मुझे दे रखा है। फिर अभी आपने दो दिन पूर्व ही राजगद्दी को ग्रहण किया है, जबकि यह आदेश बहुत पहले ही एक सभा के माध्यम से पारित किए जा चुके हैं। तिष्यरक्षिता : जयदत्त, तुम जानते ही हो कि राजकोष की स्थिति क्या है । राजकोष में धन नाम मात्र को ही है, जिससे जनहित के कार्य करना मुश्किल हो गया है । यही नही तुम लोगों की तनख्वाह का व्यय भार वहन करने में भी अब राजकोप समर्थ नहीं है। ऐसे समय मे हम यदि इस प्रकार करों को माफ करते रहे तो यह राजहित में नहीं होगा। अतः मैं यह आदेश देती हूँ कि राजस्व कर की पूरी वमूली की जाए और जो आदेश पूर्व में सभा के माध्यम से पारित किया गया है, निरस्त कर दिया जाय। 'जयदत्त:लेकिन ..! तिष्यरक्षिता : जयदत्त, तुम्हारी हर बात मे 'लेकिन' लगाने की आदत बहुत बुरी है। मैं जो कुछ करूंगी राजहित और तुम लोगो के हित मे करूंगी। अतः मैं यह आशा करूंगी कि तुम सब लोग मुझे इस कार्य में सहयोग दोगे। 'जयदत्त:जैसी आज्ञा। [इसी समय अर्थ मंत्री विक्रम सिंह उठकर खड़े हो गए।] तिप्यरक्षिताः विक्रम सिंह, क्या कोई खास खबर है। विक्रम सिंह जी हाँ ! सम्राट अशोक ने एक सन्देश भेजा है। तिभ्यरक्षिता : क्या सन्देश है ?

सम्राट के आंसू 1 109 .. विक्रम सिंह ः सम्राट ने यह आदेश दिया है कि बौद्ध धर्म के संरक्षक गुरु मोगलिपुत्त तिस्स एवं सम्राट अशोक के ज्येष्ठ पुत्र महेन्द्र को एक-एक सहस्र स्वर्ण मुद्राएं तत्काल दान रूप में भेज दी जाएं। तिघ्यरक्षिता : विक्रम सिंह, अब तक कितनी मुद्राएं दान मे दी जा चुकी हैं। विक्रम सिंह : सर तो विदित नहीं है । अनुमानतः अरवों मुद्राएँ तो दी ही जा चुकी : तिष्परक्षिता : विक्रम सिंह, तुम्हारे विचार में क्या अशोक द्वारा अपेक्षित धन दिया जाना चाहिए। विक्रम सिंह : क्षमा करें। इस सम्बन्ध में मैं अपना कोई मत नहीं दे सकता। तिष्यरक्षिता : जब तुम अपना मत नहीं दे सकते तो क्या तुम्हें राजदरबार की शोभा बढ़ाने के लिए मत्री बनाया गया है । विक्रम सिंह : आपका अनुमान सही है, यदि आप कहें तो अपना इस्तीफा इसी समय प्रस्तुत कर दूं। तिप्यरक्षिता : बात इस्तीफे को नहीं बल्कि बात धन के अपव्यय की है। विक्रम सिंह : क्षमा करें, सम्राट अशोक के आदेश का पालन करना ही हमारा सबसे वडा धर्म है। : तिरिक्षता. तो इसका तात्पर्य यह धन राशि दे दी जानी चाहिए। विक्रम सिंह : निश्चय ही दी जानी चाहिए। तिप्यरक्षिता : इसका मतलब तो यही हुआ कि तुम मुझे सम्राट नहीं मानते। विक्रम सिंह ऐसी बात नही है । आप तो वैसे भी मेरे लिए सम्राट से कम नहीं हैं । जहाँ तक सम्राट अशोक के आदेशो का प्रश्न है, उनका आदर किया जाना आपका सबसे बड़ा धर्म है। तिष्परक्षिता : मैं तुम्हारी भावनाओ की कद्र करती हूं। लेकिन यहां मूल प्रश्न राजकीय कोप की गिरती स्थिति का है । यदि इमी प्रकार दान-दक्षिणा में धन लुटता रहा तो निश्चय ही एक वक्त ऐसा भी आ सकता है जबकि राजकोप खाली हो जाएगा और तुम तोगों का वेतन...! विक्रम सिंह : उसकी हमे कोई चिन्ता नहीं है। फिर भगवान बुद्ध का आशीर्वाद हमारे साथ है। तिप्यरक्षिता: मैं सब समझती हूं। तुम लोगों के मन में क्या है। यह क्यों नहीं कहते कि तुम लोगों ने इतना धन जमा कर रखा है कि तुम्हें वेतन को आवश्यकता नहीं .. विक्रम सिंह : महारानी जी, यह मेरे चरित्र पर आरोप है । आप कृपया मेरा त्याग-पत्र स्वीकार करके किसी ईमानदार मंत्री की नियुक्ति कर लीजिए। तिष्यरक्षिता: ऐसा ही करती विक्रम सिंह। परन्त मैं तो गाना irr 110/ सम्राट के मांसू .. शासक हूं। हालांकि मैं तुम्हारा त्याग पत्र तो स्वीकार नहीं कर सकती परन्तु मेरा आदेश है कि जब तक मैं इस पद पर विराजमान हूं, किसी भी धर्म, सम्प्रदाय अथवा धर्मार्थ उद्देश्य के लिए अथवा इस प्रकार के कार्यों के लिए किसी प्रकार की दान दक्षिणा नहीं दी जाएगी। मेरे इस आदेश से अशोक जी को भी अवगत करा दिया जाए। विक्रम सिंह : लेकिन महारानी जी अशोक आपके पति और इस देश के शासक हैं। तिघ्यरक्षिता : तुम्हारा विचार सही है । लेकिन राजगद्दी पर बैठने वाले शासक का किसी से कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता। यदि उसका कोई सम्बन्ध होता है तो केवल न्याय से न्याय के आगे सभी सम्बन्ध नगण्य हैं। चूंकि राजकोप का धन बौद्ध धर्म की आड मे लूटा जा रहा है, अतः यह अन्याय है और इस अन्याय के विरुद्ध निर्णय लेना इस देश का शासक होने के नाते मेरा परम् कर्तव्य है। विक्रम सिंहः जैसी आज्ञा। दृश्य परिवर्तन [जब विक्रम सिंह ने सम्राट अशोक को महारानी तिष्यरक्षिता द्वारा लिए गए निर्णय की सूचना दी तो उनको भृकुटियों में बल पड गए। चूंकि इस समय शासक पद पर तिष्यरक्षिता मौजूद थी, अत: उन्होने कुछ कहना उचित नहीं समझा । धीरे- धीरे एक सप्ताह का समय व्यतीत हो गया और वह समय भी आ गया जब तिष्यरक्षिता को अपने पद का पूरा भार सम्राट अशोक को सौंपना पड़ा। अब साम्राज्ञी कही जाने वाली तिष्यरक्षिता एक साधारण रानी मात्र रह गई थी। इस समय राजदरबार लगा हुआ था। सभाकक्ष मे सभी सांसद मौजूद थे। सम्राट अशोक चिन्तित अवस्था में राजगद्दी पर विराजमान थे। सभी सांसदों के चेहरे पर चिन्ता व्याप्त थी। निकट ही महेन्द्र गम्भीर मुद्रा मे बैठा हुआ था। अशोक : महेन्द्र, तुमने गुरु महाराज को जाने क्यों दिया। केवल कुछ ही दिनों की तो वात थी। महेन्द्र : पिताश्री गुरु महाराज कव एकान्तवास में चले गए, किसी को कोई खबर ही न लग सकी। अशोक : लेकिन गुरु महाराज जा कहां सकते हैं ? महेन्द्र : मेरा अनुमान तो यही है कि वह हिमालय की ओर कही एकान्त स्थान पर चले गए हैं। अशोक : तुम्हें ठीक मालूम है । महेन्द्र : वैसे पिताथी इस सम्बन्ध मे निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है । पिताश्री इधर जबसे बौद्ध धर्म में प्रष्टाचार बढा है, तब से वह काफी उदास और सम्राट के आंसू / 111 .. परेशान रहने लगे थे। अक्सर वह कहते थे कि अब मेरा यहां रहना बेकार है। भिक्षुगण मांस-मदिरा का सेवन करने लगे हैं। ऐसी स्थिति मे हिमालय की गोद में जाकर भगवान बुद्ध के यक्ष को कीर्तिमान करने का उल्लेख अक्सर किया करते थे। अशोक : लेकिन उस दिन हुई वार्ता में उन्होंने इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया था। महेन्द्र : पिताश्री, गुरुनो का अनुमान था कि राजकोप से यथोचित मात्रा में धन मिल जाने पर वह इस दिशा में कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे। चूंकि धन समाप्त हो चुका था तथा बौद्ध भिक्षुओं के भोजनादि का प्रवन्ध तक करना मुश्किल हो गया था, इसलिए वह और भी चिन्तित रहने लगे थे। यहां तक कि बौद्ध भिक्षुओं ने उन पर यह आरोप भी लगाना शुरू कर दिया था कि यह राजकीय कोप से प्राप्त धन का दुरुपयोग कर रहे हैं । यह गम्भीर समस्या उस समय और उग्र स्वर धारण गई जब मांश्री ने यह स्पष्ट आदेश भिजवा दिया कि अब किसी प्रकार का कोई दान बौद्ध धर्म को नहीं दिया जाएगा। अशोक : इसकी जानकारी मुझे भी मिली थी और मैंने यह सूचना भिजवा दी थी कि गुरु महाराज कुछ दिन और प्रतीक्षा कर लें। महेन्द्र : परन्तु जब अवसर होता तब न । वास्तविकता तो यह भी कि वहाँ की आन्तरिक स्थिति इनती कलहपूर्ण हो गई थी कि एक क्षण को चैन नहीं मिल रहा था। अशोक : खैर जो होना था, हो गया। रानी तिष्यरक्षिता ने मेरे साथ जो तप, त्याग और परिश्रम किया है, उसको देखते हुए उसे कोई दण्ड देना उपयुक्त नहीं है, फिर भी चेतावनी अवश्य दूंगा। अब तुम गुरु महाराज को पुनः वापस बुलवाने का प्रयास करो। उनसे मेरा सन्देश कहला दो कि उन्हें जितने भी धन की आवश्यकता है, उसकी पूर्ति में सुरन्त करने को तैयार हूँ। और हाँ, जब तक गुरु महाराज वापस नहीं आते, तुम बौद्ध धर्म के प्रसार का कार्य अपने हाथ में ले लो। भ्रष्टाचार फैलाने वाले मिशुओं को दण्डित करने के लिए विशेष न्यायालयों का गठन करके न्याया- धीशों की नियुक्ति कर लो। महेन्द्र : जैसी आज्ञा पित्ताश्री। अशोक : विक्रम सिंह, इस अवधि में रानी तिघ्यरक्षिताने जो भी आदेश पारित किए हैं, उन्हें निरस्त कर दिया जाए तथा सूखे से पीड़ित किसानों का लगान माफ कर दिया जाए। विक्रम सिंह : आपके आदेश का पालन तत्काल सुनिश्चित किया जाएगा । परन्तु! अशोक परन्तु क्या। विक्रम सिंह : साम्राज्ञी जी के आदेशों के अनुपालन मे अनेक किसानों के खेत-खलिहानों को विकवाकर लगान वसूली की गई है । सूखा पीड़ित किसानों के दुधारू जानवरों : .. ..

112/ सम्राट के आंसू को नीलाम कर दिया है, जिसमें उनके यहाँ भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है। अशोक : ऐसे सभी कृपको को यथोचित राजकीय सहायता प्रदान की जाए तथा उनके सेतों एवं जानवरों को वापस दिलाया जाए । भूमिहीन किसानों को खेती योग्य भूमि दी जाए। इसके साथ ही सूसे से प्रभावित क्षेत्रों में मिचाई की समुचित व्यवस्था को जाए। चौदहवां दृश्य - रात्रि का प्रथम पहर बीत चुका था। चारों ओर गहनतम अन्धकार भरी नीरवता छायी हुई थी। राजमहल के द्वार पर आसपास के स्थानों के अन्धकार को दूर करने के लिए जगह-जगह मशालें जल रही थी। ऐसे समय मे दो छायाएं सुदूर पूर्व से आती हुई प्रकट हुई और राजमहल के मुख्य द्वार के निकट आकर बैठ गयी। कुछ दूर तक तो वह दोनो छायाएँ मौन बैठी रही परन्तु कुछ ही देर बाद एक छाया ने कंधे पर टंगी वीणा को उतारकर हाथ मे पकड़ा और उसके तारों को छेड़ दिया। इसी के साथ उसने एक गीत गाना शुरू कर दिया।] दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक इस समय अपने शयन कक्ष मे विश्राम कर रहे थे । एकाएक उनके कानो में मधुर स्वर में गाए जा रहे मामिक गीत को ध्वनि गुजरित हो उठी, धीरे- धीरे यह ध्वनि तीन होती जा रही थी। अशोक : (बुदबुदाते हुए) अरे यह गीत "कितना मार्मिक है. लेकिन स्वर' “ऐसा प्रतीत होता है, मानो यह स्वर पहले भी सुना है । पता नही कौन दुखियारा है... चलकर उसकी करुण व्यथा सुनना चाहिए "शायद किसी सहायता की जरूरत हो। [इसके साथ ही सम्राट अशोक उठ खड़े हुए और तीन कदमो से राजमहल के मुख्य द्वार की और चल दिए। सतरी से मुख्य द्वार खुलवा कर वह बाहर आ गए और अपने बायीं ओर की दिशा में दो छायाओ मे से एक को ही मार्मिक गीत गाते हुए देखा। निकट पहुंचने पर विदित होता है कि उनमें से एक पुरुष है और एक स्त्री। दोनो के शरीर पर नाम मात्र को ही वस्त्र है एवं दोनो ही अत्यन्त निर्धन अवस्था में दिखाई देते हैं ।

सम्राट के आंसू/113 .. अशोक : कौन हो तुम लोग और इतनी रात में यहाँ यह मामिक गीत क्यों गा रहे हो? जानते नहीं यह मम्राट अशोक का राजमहल है। युवक : जानता हूं सम्राट अशोक "लेकिन अब हम इस नारकीय जिन्दगी को जीने में असमर्थ हो गए हैं और आपके आदेशानुसार हम दोनों फांसी के फन्दे पर लटकना चाहते हैं। अशोक : क्या तुम लोग कौन हो और तुमने ऐसा कौन-सा अपराध किया है जो तुम लोग फांसी के फन्दे पर लटकना चाहते हो? युवक : पिताश्री, आपका वही अभागा पुत्र कुणाल जिसे आपने तक्षशिला में विद्रोह को शान्त करने के लिए भेजा था। हमने और कांचन ने मिलकर बिना किसी प्रकार के खूनखराबे के विद्रोह को शान्त कर दिया था, परन्तु पता नहीं मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हो गया जिसके कारण आपने मेरी आँखों को निकलवाकर मुझे राज्य की सीमा के बाहर खदेड़ दिया था। अशोक : क्या' 'क्या'"तुम कुणाल हो। युवक : हां पिताश्री"चूंकि आपका यह आदेश था कि यदि मैं अथवा मेरी पत्नी कांचन राज्य की सीमा में प्रवेश करे तो इन्हें मृत्युदण्ड दिया जाए इसलिए मैंने पुनः राज्य की सीमा में घुसने का अपराध किया है और इसलिए मैं मृत्युदण्ड का भागी हूँ। युवती : हाँ पिताश्री, हम दोनों इसीलिए आए हैं कि आपके आदेशानुसार हम दोनों को मृत्युदण्ड दे दिया जाए, जिससे हम दोनों इस नारकीय जीवन से मुक्ति पा सकें। युवक : पिताश्री, जो जिन्दगी आपने मुझे जीने के लिए दी है, उसका और बोझ सहन करने में मैं अब असमर्थ हूँ। मैंने आत्महत्या करने का प्रयास किया था परन्तु कांचन ने ऐसा करने से रोक दिया और कहा कि आत्महत्या करना पाप है। इससे अच्छा तो पिताश्री के हाथो मृत्युदण्ड प्राप्त करना उचित होगा। युवती : पिताश्री, मुझे आपके द्वारा दिए गए दण्ड के सम्बन्ध कोई शिकायत नहीं है। परन्तु क्लेश केवल इस बात का है कि आप जैसा न्यायप्रिय शासक का कम-से-कम हम दोनो को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर तो देना चाहिए था। अशोक : बस करो"बस करो"आखिर मैं यह क्या सुन रहा हूं: अपने सबसे प्रिय पुत्र को मैं आंख निकलवाने का आदेश दूंगा मैं उसे प्राणदण्ड की सजा दूंगा." नहीं"नही.."यह झूठ हैतुम लोग झूठ बोलते हो""तुम लोग कुणाल और कांचन नहीं हो सकते। युवती : पिताश्री, आप यकीन मानिए यह मेरे पति और आपके पुत्र कुणाल हो हैं और में आपकी पुत्रवधू अशोक : उफ "कुछ समझ में नही आता"ऐसा अनर्थ भरा कार्य किसने और किसलिए किया है और "तुम लोग महल के अन्दर आओ मैं अभी इसी वक्त पूरे मामले की जानकारी करता हूँ कि"। ..

114/ सम्राट के आंसू [इसके साथ ही सम्राट अशोक कुणाल को सहारा देकर अपने राजमहल स्थित कक्ष में ले आए 1 सर्वप्रथम उन्होने उन दोनों के नहाने-धोने का प्रबन्ध किया और उसके बाद भोजनादि को व्यवस्था की।] कुणाल : पिताश्री, हम यहां भोजन ग्रहण करने नहीं बल्कि अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए मृत्युदण्ड पाने के लिए आए हैं। कांचन : हां पिताश्री, अब तो हम लोगों को खाने-पीने की इच्छा भी मर चुकी है । भूखे- पासे रह-रहकर पेट को आते इतनी सिकुड गयी हैं कि अब खाने-पीने का प्रश्न ही नही उठता । चूंकि आत्महत्या करना पाप है. इसलिए हम लोग स्वयं अपनी इच्छा से आपकी शरण में मौत को आलिंगन करने के लिए आ गए हैं। अशोक : कांचन''मैं भगवान बुद्ध की सौगन्ध साकर कहता हूँ कि मैंने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था। कुणाल : पिताश्री, आश्चर्य है यदि आपका यह आदेश नहीं या तो सम्राट अशोक के रहते किसने ऐसा साहस कर दिया है, जो उनके पुत्र को इस दुर्गति पर पहुंचाने का कार्य कर सकता है। अशोक : बेटे, मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि जिसने भी ऐसा साहस किया है, मैं उसे जिन्दा नहीं छोडगा "उसे ऐसी मौत दूंगा कि मौत भी मौत के उस विकराल रूप को देखकर कांप उठेगी.. काचन तुम निश्चिन्त रहो अब तुम सम्राट अशोक को छत्रछाया मे आ गयी हो और सम्राट अशोक की सबसे प्यारी पुत्रवधू हो, जिसके साहस का मैं सदैव प्रशंसक रहा हूं। मैं तो महो समझ रहा था कि काचन मां बनने वाली होगी.. लेकिन ऐसे अनर्थ की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। "कुणाल अब तुम दोनों खाना वाओ "तुम लोगों को मेरी कसम है... भगवान बुद्ध की सौगन्ध "यदि तुम लोगो ने अन्नादि ग्रहण न किया तो मैं इसी समय अपनी गर्दन तलवार से अलग कर दूंगा। कांचन : ठीक है पिताश्री "मैं आपके आदेश का पालन कर रही हूं लेकिन । अशोक : तुम निश्चित रही कांचन अब आगे क्या होता है, तुम स्वयं अपनी यांखों से देखना। भले ही कुणाल को आँखें तो वापस मैं दिलवा नही सकता परन्तु कुणाल की आंखें निकलवाने वाले को जो दुर्दशा होगी उसका वर्णन तुम कुणाल से कर देना। [इसके साथ ही सम्राट अशोक चीखकर द्वारपाल को आदेश देता है द्वारपाल "सेनापति जयदत्त को तत्काल मेरे समक्ष उपस्थित किया जाए। दृश्य परिवर्तन [लगभग एक घण्टे बाद सेनापति जयदत्त ने सम्राट अशोक के कक्ष में प्रवेश किया। उस समय सम्राट अशोक किसी गहन विचारधारा में डूबे हुए इधर-उधर टहल रहे थे। जैसे ही उनकी नजर जयदत्त पर पड़ी वह एक गए और क्रोध भरी नजरों ।

। सम्राट के आंसू/115 से उसे देखते रहे। इसके विपरीत जैसे ही इस सेनापति की नजर कुणाल और कांचनलता पर पड़ी वह हड़बड़ा-सा उठा। जयदत्त : महाराज, क्षमा चाहूंगा। महारानी तिघ्यरशिता ने सही ही कहा था कि हमारा जासूसी संगठन निष्क्रिय हो चुका है, अन्यथा कुणाल और कांचनलता यहां तक पहुंच गए और मुझे खबर तक न लगी। मैं अभी अंगरक्षकों को बुलाकर इसे गिरफ्तार करवाता हूँ और आदेशानुसार आज प्रातः काल ही इन दोनों को फांसी के फन्दे पर लटका दिया जाएगा। अशोक : (चिंघाड़कर)क्या बकते हो जयदत "क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है...। जयदत्त : (आश्चर्य से) यह क्या कह रहे हैं महाराज''जो गलती मुझसे हुई है, वह मेरे गुप्तचरों द्वारा सूचना न मिल सकने के कारण हुई है, ''मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि भविष्य में शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। अशोक: पूछता हूँ कि कुणाल की आंखें निकालने का आदेश किसने और क्यों दिया था? जयदत्त : आश्चर्य है."आपने ही तो यह आदेश दिया था कि राजकुमार विद्रोही हो गया है और तक्षशिला में विद्रोही सगठन से मिलकर वहां का शासक बनना चाहता है, इसलिए आपके परामर्श के बाद रानी तिष्यरक्षिता ने शासक पद पर रहते हुए राजकुमार कुणाल को आंखें निकालने का आदेश देते हुए कहा था कि इसे राज्य की सीमा के बाहर खदेड़ दिया जाए और यदि पुनः राज्य की सीमा में प्रवेश करे तो इसे तथा इसकी पत्नी को फांसी के फन्दे पर लटका दिया जाए। अशोक : मैंने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था। यदि रानी तिष्यरक्षिता ने ऐसा दण्ड दिया भी था तो कम-से-कम तुम्हें परामर्श तो करना चाहिए था। जयदत्त : महाराज, मैंने यह बात कही थी इस पर महारानी जी नाराज हो उठी थी और कहा था कि जो दण्ड उन्होने दिया है, सम्राट अशोक के परामर्श से दिया है। उन्होंने इस सम्बन्ध में यह भी आदेश दिया था कि चूंकि सम्राट अशोक का स्वास्थ्य पुनः खराब हो गया है अतः उन्हें फिलहाल कष्ट देने की आवश्यकता नहीं अशोक : ओह लेकिन तिष्यरक्षिता ने ऐसा क्यों किया? बोलो कुणाल, रानी तिघ्यरक्षिता से तुम्हारा क्या कोई बैर था। कुणाल : नही पिताश्री'वह मेरी मां हैं और मां ने जो कुछ किया है, वह सही ही किया है। मैं वास्तव में विद्रोही शक्तियों से मिल गया था और इसी कारण विद्रोह को शान्त करने में सफलता प्राप्त की थी। कांचनलता : यह आप क्या कहे रहे हैं"नही नहीं... "आप ऐसा नहीं कर सकते.. मैं कहती हूं कि आप स्पष्ट कर दें कि आप देशद्रोही नही हैं: "आपका विद्रोही 116/ सम्राट के आंसू शक्तियों से कोई वास्ता नहीं है। कुणाल : नहीं कांचन माथी को जो सूचना मिली थी वह सही थी और उसने मुझे जो भी दण्ड दिया न्याय की दृष्टि से उचित ही था। अशोक : देखो कुणाल "मैं तुम्हारा पिता हूँ और पिता से झूठ बोलना पाप है। तुम भगवान बुद्ध की सौगन्ध खाकर कहो कि तुम विद्रोही शक्ति से मिल गए थे"नहीं ""कुणाल यह नहीं हो मकता"इसके पीछे अवश्य कोई राज है और राज पर मे में पर्दा उठाकर हो मैं चन लूंगा।"उस एक सप्ताह में उसने क्या-क्या गुल खिलाए इसकी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था "जयदत्त, तिप्यरक्षिता ने न तो इस सम्बन्ध मे मुझसे कोई परामर्श किया और न ही मेरे गुप्तचर विभाग ने ऐमी कोई सूचना ही दी थी कि कुणाल देशद्रोही हो गया है अथवा विद्रोही शक्ति से मिल गया है। जयदत : तब महाराज"रानी तिघ्यरक्षिता ने ऐसा दण्ड क्यो दिया''आश्चर्य तो यह है कि जब हम लोगों ने इम सजा को कम करने की अपील की तो उसने हम लोगों को भ्रष्टाचारी बताते हुए कहा कि तुम लोग नमकहराम हो गए हो। अशोक : ओह..यह बड़े ही आश्चर्य का विषय है जयदत्त निश्चय ही यदि उसे एक माह के लिए शासक बना दिया जाता तो वह मुझे भी फांसी पर लटकाने मे न हिचकती। कुणाल : नही पिताश्री, मश्रिी ऐसी नही है । मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, माँधी ने जो भी दण्ड दिया है वह। अशोक : मैं इस सम्बन्ध मे फिलहाल कुछ नही सुनना चाहता' "मैं अपने स्तर से जांच करूंगा और जो भी दोपी पाया जाएगा, वह दण्ड का भागीदार होगा। [इसी समय कक्ष में एक दासी प्रवेश करते हुए बोली-महाराज, यदि मुझे क्षमा प्रदान किया जाए तो मैं वास्तविकता से अवगत करा सकती हूं। अशोक : तुम निश्चित होकर सारी स्थिति स्पष्ट करो। दासो : यह घटना महाराज एक काली व डरावनी रात्रि की है जबकि राजकुमार कुणाल वीणा वादन के साथ ही एक मधुर गीत गा रहा था तभी... कुणाल : (चीखते हुए) नहीं नहीं ""मैं कहता हूं चुप रहो."भगवान के लिए मां पर ऐसा दोपोरोपण मत करो"वह मां ही नही देवी है पिताश्री देवी है। अशोक : तुम खामोश रहो कुणाल''हाँ दासी पूरी वात वताओ। दृश्य परिवर्तन । [सम्राट अशोक राजगद्दी पर विराजमान थे। निकट ही नेत्रहीन कुणाल एवं उनकी पत्नी कांचनलता बैठे हुए थे। सम्पूर्ण दरबार में उत्तेजना एवं भय का सम्राट के आंसू / 117 मिला-जुला वातावरण बना हुआ था। वर्षों बाद आज पुनः सम्राट अशोक का चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था। उनकी आंखो से चिनगारियां फूट रही थी तथा शरीर में कंपकपाहट स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही थी। इसी समय जयदत्त राजदरबार में प्रवेश करते हुए सम्राट अशोक के सामने हाथ बांधकर खड़ा हो गया।] अशोक : सेनापति, अभियुक्ता तिष्यरक्षिता को तत्काल दरबार मे हाजिर किया जाए । जयदत्त : जैसी आज्ञा। [इसके साथ ही वह पुनः राजदरबार के बाहर चला गया और जब वापस लौटा तो तिष्यरक्षिता को बन्दी अवस्था में साथ लेता भाया । तिप्यरक्षिता : महाराज | मैं पूछती हूं कि मुझे इस प्रकार वन्दी बनाकर लाने का आदेश आपने क्यो दिया है? अशोक : जयदत्त, मैंने इसे पकडी बेडी के साथ राजदरबार में प्रस्तुत करने का हुक्म दिया था। तिण्यरक्षिता : महाराज, यह आप क्या कह रहे है । अशोक : तिष्यरक्षिता"तुमने बीमारी की अवस्था मे जिस प्रकार मेरी सेवा की थी, उसी से वशीभूत होकर मैंने तुम्हें एक सप्ताह के लिए इस देश का शासक नियुक्त कर दिया था। तिप्यरक्षिता : लेकिन मैंने इस अवधि में ऐसा कौन-सा अपराध किया है जो कि...! अशोक : मैं पूछता हूं, तुमने ऐसा कौन-सा कार्य किया है जिससे जनता अथवा राज- दरबार में सम्मान प्रदान किया जाए सूखे की भीषण मार से ग्रस्त किसानों पर जुल्म ढाने के आदेश देकर उनका शोपण किया."बौद्ध धर्म को दान देने से इन्कार कर दिया"तुम्हारे ही आवरण के कारण हमारे गुरु तिस्स महाराज गुप्त स्थान पर चले गए। तिष्यरक्षिता : लेकिन महाराज, मैंने जो कुछ किया है वह राजहित में किया । राजकोप को स्थिति अत्यन्त दयनीय होने के कारण ही मैंने ऐसा किया था। इसमें मेरा कोई भी व्यक्तिगत स्वार्थ निहित नहीं था। अशोक : और हमारे मत्रिगणो, पार्षदों तथा गणमान्य सदस्यों को भी अपमानित करना राजहित मे था। तिघ्यरक्षिता: मैंने किसी मन्त्री, पार्षद अथवा गणमान्य नागरिक को परेशान करने अथवा अपमानित करने का कोई कार्य नहीं किया। हाँ इन्होंने मेरे आदेशों के पालन में अनेकानेक तर्क पेश किए, जिसके कारण मुझे कठोर रुख अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। अशोक : ओह और कुणाल की आंखें निकालने के पीछे कौन-सा राजहित था ?

118/सम्राट के आँसू तिष्यरक्षिता: (चौंककर कुणाल एवं उसकी पत्नी कांचनलता को देखते हुए) ओह" महाराज मुझे गुप्त रूप से यह सूचना मिली थी कि कुणाल देशद्रोही हो गया है। उसने तक्षशिला की शासन व्यवस्था अपने हाथ में लेने का पड्यन्त्र रचना शुरू कर दिया था । मुझे यह भी सूचना प्राप्त हुई थी कि वास्तव में विद्रोह को शान्त करने के पीछे रहस्य यह है कि यह विद्रोही शक्तियों से मिल गया है। अशोक : तुम झूठ बोलती हो तिष्यरक्षिता। वास्तविकता तो यह है कि कुणाल ही एक ऐसा कुमार था, जो तुम्हारी राहों का कांटा बन गया था। तुम्हें यह भय था कि यह तुम्हारे भेद को हमारे सामने न खोल दे। तिष्यरक्षिता :नही महाराज, ऐसा कोई भेद नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे विद्रोहियों द्वारा रचा गया यह मात्र एक आरोप है। अशोक : आरोप नही सत्य है । जबसे तुमने शासन व्यवस्था संभाली है, राज्य में त्राहि- त्राहि मच गई है । तुम्हारे ही आचरण के कारण गुरु महाराज से मुझे विलग होना पड़ा और तुम्हारे ही कारण युवा कुमार कुणाल। तिप्यरक्षिता : मैंने जो कुछ भी किया है, राजहित में किया है और यही मेरा धर्म भी था। अशोक : बहुत खूब "तुमने जो कुछ किया है राजहित में किया है। राजकुमार कुणाल की आँखें राजहित में निकलवा दी "बौद्ध धर्म को दान राजहित में रुकवा दिया "सूखे से पीड़ित किसानों की जमीन और मवेशियों को राजहित मे बिकवा दिया और इसके साथ राज्य का विकास कार्य भी इसलिए रुकवा दिया कि उसमे राजहित निहित था। तिष्परक्षिताः हाँ "हो. मैंने जो कुछ किया राजहित में किया। अशोक : बहुत अच्छा राजहित किया है तुमने तिष्यरक्षिता । अपने पार को छुपाने के लिए मेरी दिन-रात सेवा करके मुझे मरने से बचाया था। इसी बीच तक्षशिला में विद्रोह का नाटक रचाकर मासूम राजकुमार को विद्रोह शान्त करने के लिए भेज दिया"परन्तु हमारी आशा के विपरीत कुणाल न केवल विद्रोह शान्त करने में सफल हो गया वरन् वहां की जनता का मन मोह लिया। जब तुम्हे इसको खवर मिली तो तुमने दूसरा नाटक किया, मेरे स्वस्थ होते ही शासन व्यवस्था संभालने की जिद की और मैंने तुम्हारी सेवाओं के वशीभूत होकर तुम्हे राजगद्दी का भार सौंप दिया। राजगद्दी पर बैठते ही तुमने राजकुमार से पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए न केवल आँखें निकालने का आदेश दिया वरन् राज्य-सीमा में पुनः प्रवेश करने पर उसे फांसी पर लटकाने की सजा भी दे दी। परन्तु यहाँ भी तुम्हारा स्वप्न पूरा न हो सका और राजकुमार कुणाल तुम्हारे आदेशानुसार फांसी पर झूलने के लिए मेरे पास चला आया। परन्तु तिष्यरक्षिता यह तुम्हारी बदकिस्मती ही कही जाएगी कि उसके माते ही वर्षों से पड़े राज पर से पर्दा उठ चुका है।

सम्राट के आंसू / 119 तिप्यरक्षिता : यह झूठ है महाराज ! मेरी राजकुमार कुणाल से कोई दुश्मनी नहीं है बल्कि अशोक :झूठ और सच का पता चल चुका है । मुझे नहीं पता था वासना की गुड़िया कि तू एक माँ होकर भी ऐसा अधर्मी कार्य करने में भी नहीं हिचकेगी। मुझे पता लग चुका है कि तू चाहती थी कि राजकुमार कुणाल तुम्हारी वासना की आग को शान्त करे परन्तु। तिघ्यरक्षिता : नहीं नहीं नही.."महाराज, यह मेरे ऊपर लगाया आरोप बिल्कुल झूठा है."कुणाल ने अपना अपराध छुपाने के लिए ही ऐमा झूठा और मनगढन्त आरोप लगाया है। अशोक : यही तो अफसोस है कि यह बात राजकुमार ने नही बल्कि उन दासियों ने बताई है, जो उस समय राजकुमार के गीत में डूबी हुई थी और जब तुमने अपनी वासना के ज्वर को शान्त करने के लिए वहां पहुंचकर गीत में व्यवधान उत्पन्न कर दिया था। तिष्यरक्षिता : नही महाराज, यह झूठ है. मैं एक पतिव्रता नारी हूं और मैंने आपकी बीमारी अशोक : काश.. "मुझे अगर यह बात पहले पता चल गई होती तो मैं तेरे गन्दे हाथों से जहर पीना भी पसन्द न करता। तिप्यरक्षिता:महाराज अशोक : तिष्यरक्षिता, जिस कुमार की तू जान लेना चाहती थी, आज से उसी कुणाल को मैंने स्वतन्त्र रूप से शासक नियुक्त कर दिया है। चूंकि उसकी आँखें नही है, इसलिए राजकार्य में कांचनलता सहयोग करेगी और तुम्हें अर्थात तिष्यरक्षिता को पडयन्त्र रचने एवं राजकुमार कुणाल की आँखें निकालने के आरोप मे जलती चिता में जिन्दा झोंकने का आदेश दिया जाता है। तिष्यरक्षिता : महाराज, इतना क्रूर निर्णयः। कहते-कहते वह रो पड़ी। अशोक : तिघ्यरक्षिता तू शायद यह भूल गई है कि मैं बहुत ही क्रूर शासक था। परन्तु आज तूने अपने कर्मों से मेरी सोयी हुई क्रूरता जो जगा दिया है। सेनापति, मेरे निर्णय का इसी समय अनुपालन सुनिश्चित किया जाए । तिष्यरक्षिता के इस दण्ड के साथ ही उन पौरो को जिन्होने राजकुमार कुणाल की आँखें निकाली हैं, उन्हे मृत्यु दण्ड दिए जाने की सजा दी जाए। कुणाल : पिताश्री'"मांधी को क्षमा कर दें। आखिर उसके मरने से मेरी आँखें तो वापस नही आ जाएंगी। " जिसे तू मां कह रहा है वह एक जहरीली नागिन है"वासना की गर्त में डूबी हुई एक ऐसी नारी"जिसने मां के पवित्र रिश्ते को भी कलंकित कर अशोक : कुणाल" 120/ सम्राट के आंसू दिया है । अतः उसके अपराध को देखते हुए तो यह सजा भी कम ही प्रतीत होती [इस समय सम्राट अशोक का चेहरा अत्यन्त क्रूरता से भर चुका था। उसके चेहरे को देखकर किसी की भी हिम्मत नही पड़ रही थी कि रानी तिघ्यरक्षिता को दिए गए दण्ड के सम्बन्ध में अपना कोई विचार व्यक्त कर सके । अन्ततः कुछ ही देर मे लकड़ियां एकत्रित कर ली गई और राजदरबार के बाहर पड़ी रिक्त भूमि पर चिता बना दी गई। इसके साथ ही रानी तिघ्यरक्षिता को पकड़कर राज- दरवार के बाहर ले जाया जाने लगा। तिष्यरक्षिता : (विलाप करते हुए) महाराज, मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूँ बस "बस मुझे एक बार माफ कर दीजिए''मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि मैं सदैव आपकी पतिव्रता नारी की तरह सेवा करतो रहूंगी."मैं राजकुमार कुणाल से भी अपने द्वारा किए गए पाप के लिए क्षमा-याचना करती हूँ.. बस मुझे एक अवसर अशोक : सेनापति मेरे आदेश का तुरन्त पालन किया जाए। मम्राट अशोक की आवाज गूंजते ही तिष्यरक्षिता को पकड़ने के लिए सेनापति के आदेश पर चार सिपाही आगे बढ़ लिए और उसे उठाकर राजदरबार के बाहर जलती चिता के पास ले गए। उनके पीछे ही सम्राट अशोक भी ला खड़े हुए थे और नजरो से तिष्य रक्षिता को घूरते जा रहे थे। कुछ ही क्षणों के अन्तराल मे विलाप करती तिष्यरक्षिता को उठाकर सिपाहियों ने जलती चिता मे झोक दिया। कुछ देर तक तिप्य रक्षिता की मार्मिक आवाज वातावरण मे गूंजती रही और अन्ततः सब कुछ शान्त हो गया। पन्द्रहवाँ दृश्य [सम्राट अशोक इस समय अपने विशेष कक्ष मे बैठे हुए थे । इस कक्ष में एक ओर भगवान बुद्ध की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई थी। सम्राट अशोक के पास उनका पुत्र महेन्द्र तथा अन्य बौद्ध भिक्षुगण बैठे हुए बौद्ध धर्म के आगामी कार्यक्रमो पर विचार-विमर्श कर रहे थे। अशोक : महेन्द्र ""सात वर्ष से अधिक व्यतीत हो चुके हैं। मैंने बौद्ध धर्म के विकास एवं प्रमार मे काफी कार्य किए हैं तथा इसमें पैदा हो गई विसंगतियों को दूर करने का सम्राट के आंसू / 121 .. भी जो प्रयास किया है, उसमे तुम्हारे सहयोग एवं बौद्ध मठों मे नियुक्त न्यायाधीशों के माध्यम से काफी सफलता मिली है । लेकिन... महेन्द्र : लेकिन क्या पिताश्री. आप इस तरह उदास मत रहा कीजिए"मुझे बताइए "यदि कोई कमी रह गई हो तो मैं उसका निराकरण करने का प्रयास करूं । अशोक : बैटा, भूल तो मुझसे हुई है। न मैं तिप्यरक्षिता को इस देश का शासक बनाता और न ही गुरु महाराज हमें इस प्रकार बीच मझधार मे छोड़कर चले जाते। महेन्द्र : पिताश्री, जो कुछ हो चुका है, उस पर अब और पश्चाताप करने से कोई फायदा भी तो नहीं है । मैंने अनेकानेक बौद्ध भिक्षुओं को उनके पास इस आशय मे भेजा था कि वे वापस आकर बौद्ध धर्म की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करें, परन्तु इनका तो यही कहना है कि अब वह मोक्ष प्राप्ति के निकट हैं और अब कोई योग- दान करने में न तो शारीरिक दृष्टि में सक्षम हैं और न ही मानसिक दृष्टि से । अशोक : लेकिन महेन्द्र, उन्हें किसी भी प्रकार लाना है। बिना गुरु महाराज मोलिपुत्त तिस्स के बौद्ध धर्म की प्रगति के द्वार बन्द हो चुके हैं । यदि तुम लोग सच्चे हृदय से बौद्ध धर्म की युग-युगान्तर तक प्रगति के पथ को प्रशस्त करना चाहते हो तो इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्हें पाटलीपुत्र में लाना ही होगा, भले ही इसके लिए कोई भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। इन्ही तमाम बातों को दृष्टिगत रखते हुए मैंने अब अन्तिम निर्णय ले लिया है । इसलिए तुम इस बार 101 बौद्ध भिक्षुओ और पापंदों को साथ लेकर अन्तिम बार जाकर मेरा अन्तिम सन्देश उन तक पहुंचा दो। महेन्द्र : अन्तिम सन्देश ! आप कहना क्या चाहते हैं । अशोक : महेन्द्र, मैं उनकी हर इच्छा की पूर्ति करने के लिए तैयार हूँ। बस मैं उन्हें एक बार सिर्फ एक बार और पाटलीपुत्र मे लाना चाहता हूँ। महेन्द्र : लेकिन पिताधी, गुरु महाराज की भी मजबूरी है, वह इतने कमजोर हो चुके हैं."शरीर इतना जर्जर हो उठा है कि अब वह चल-फिर सकने में भी असमर्थ हो चुके हैं। अशोक : नहीं महेन्द्र "वास्तविकता तो यह है कि अब वह आना नहीं चाहते हैं "यदि वास्तव में उनकी कमजोरी की बात मान ली जाए तो उनके लिए रप भेजा जा सकता था अथवा उन्हें गोदी मे उठाकर लाया जा सकता था। महेन्द्र : यह प्रस्ताव मैंने भी रखा पा पिताश्री, लेकिन उनका कपन है कि जहां उनका अपमान होता हो, जहाँ पर उप पर आक्षेप लगाए जाते हों, वहाँ वह कैसे जा सकते हैं। उनका कहना है कि उन्हें धन-दौलत का कोई मोह नहीं है। वह बस भगवान बुद्ध के बताए रास्ते पर चलकर मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं । अशोक : इसीलिए तो मैं कह रहा हूं कि उन्हें हर स्थिति में पाटलीपुत्र लाना है। महेन्द्र इस बार अपने साथ मंत्रिगणों को एवं बौद्ध भिक्षुओं को लेकर रप सहित जाओ और मेरा अन्तिम सन्देश उन तक पहुंचा दो।

122 / सम्राट के आसू महेन्द्र : लेकिन अन्तिम संदेश। अशोक : वही मैं तुम्हें बता रहा हूँ। सर्वप्रथम तो तुम उन्हें यह अवगत करा दो कि बौद्ध मठों एवं बौद्ध भिक्षुओं के लिए एक अलग कोष की स्थापना की गई है, जिममें राज्य की जनता से प्राप्त धन एवं राज्य से प्राप्त सहायता को पूरा लेखा- जोखा रखा जाता है। दूसरी स्थिति से भी अवगत कराते हुए उन्हें सूचित कर दो कि बौद्ध धर्म मे आ गई विकृतियो को दूर किया जा चुका है तथा उनके लिए एक अलग न्यायिक कोष्ठ की स्थापना कर दी गई है जो ऐसे असामाजिक तत्वों को दण्डित करती है। इस प्रकार उन्हें सम्पूर्ण स्थिति से अवगत कराते हुए अनुरोध करो कि अब वे आकर बौद्ध धर्म के सरक्षक का पदभार ग्रहण कर लें। महेन्द्र : जैसी आज्ञा पिताश्री। वैसे इस स्थिति से गुरु महाराज को पहले भी अवगत कराया जा चुका है। अशोक : ठीक है यदि गुरु महाराज इसके बाद भी आने को तैयार ही होते हैं तो उन्हें मेरा अन्तिम सन्देश दे देना। महेन्द्र : वह क्या पिताश्री? अशोक : यदि गुरु महाराज इस पर भी आने को तैयार नही होते तो उन्हें अवगत करा देना कि सम्राट अशोक अर्थात् उनका शिष्य गंगा तट पर खडा हुआ बडी बेसब्री से उनको प्रतीक्षा कर रहा है। यदि वह चलने को तैयार नहीं होते और यह दल खाली हाथ वापस लौटता है तो सम्राट अशोक गंगा मां की गोद में अपने को अपित करके सदा-सदा के लिए दुनिया से विदा ले लेंगे। महेन्द्र : पिताश्री. 'यह आप क्या कह रहे है : अशोक : यही मेरा अन्तिम सन्देश है और यही अन्तिम फैसला भी। महेन्द्र : लेकिन पिताश्री, आपको ऐसा निर्णय नहीं लेना चाहिए अन्यथा बौद्ध धर्म... अशोक : बेटा, सम्राट अशोक का निर्णय अडिग होता है। जहां तक बौद्ध धर्म की प्रगति एवं उसके भविष्य का प्रश्न है, इसका सारा श्रेय गुरु महाराज के निर्णय पर निर्भर करता है। वैसे भी बिना गुरु महाराज के योगदान के बौद्ध धर्म की प्रगति की आशा करना निरर्थक ही होगा। महेन्द्र : नही पिताश्री, आपको भविष्य मे बौद्ध धर्म की प्रगति के लिए एवं राजहित को दृष्टिगत रखते हुए अपना निर्णय बदलना ही होगा। अशोक : हां, बदलना तो होगा लेकिन जब गुरु महाराज अपना निर्णय बदलकर वापस पाटलीपुत्र आ जाते हैं। दृश्य परिवर्तन [महेन्द्र, मंत्रिगणों एवं हजारों बौद्ध भिक्षुओं के साथ हिमघाटी में स्थित एक जंगल मे जा पहुंचे। बर्फ से घिरे क्षेत्र में स्थित एक जंगल मे एक कुटिया बनी हुई सम्राट के आंसू / 123 थी। कुटिया जंगली घास-फूस से बनाई गई थी। कुटिया के आसपास कुछ बौद्ध भिक्षु क्यारियों में पानी दे रहे थे तथा कुछ बौद्ध भिक्षु उपासना में लीन थे। जैसे ही इन बौद्ध भिक्षुओं की नजर महेन्द्र आदि पर पड़ी, वे उनके निकट आकर उनका अभिवादन करते हुए कुटिया के अन्दर लेकर चले गए। कुटिया के अन्दर मोगलिपुत्त तिस्स ध्यानमग्न मुद्रा में बैठे हुए थे। महेन्द्र तथा कुछ मंत्रिगण उनके निकट जाकर शांतिपूर्वक बैठ गए जबकि अन्य सभी बौद्ध भिक्षुगण कुटिया के बाहर बैठकर आराम करने लगे थे। कुछ देर बाद गुरु महाराज ने आँखें खोलकर उन सभी को देखा तथा उनके अभिवादन को स्वीकार किया। .. मोगलिपुत्त : बेटा महेन्द्र, सब कुशल मंगल तो है। महेन्द्र : जी हाँ गुरु महाराज । लेकिन शीघ्र ही बौद्ध धर्म की नीव पर वन गिरने की संभावना बलवती हो उठी है। मोगलिपुत्त : यह तुम क्या कह रहे हो। सम्राट अशोक तो कुशल मंगल से हैं। महेन्द्र : महाराज, वैसे तो ठीक हैं, परन्तु आपकी याद में तड़प रहे हैं । मोगलिपुत: यह तो उनकी महानता है बेटे, अन्यथा मैं किस योग्य हूँ। महेन्द्र : महाराज, आप कितने महान एवं योग्य हैं, इस बात को पिताश्री अथवा मैं ही जानता हूँ। सात वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन शायद ही कोई क्षण ऐसा जाता हो, जिसमें वह आपकी स्तुति न करते हों। मोगसिपुत : बेटा, सम्राट अशोक के आग्रह पर ही मैंने इतनी बडी वीणा उठाई थी। परन्तु मेरी सारी आशाओ पर पानी फिर गया। सोचा था "भगवान बुद्ध के उपदेशों से दुनिया को नई दिशा दंगा "सुख-दुःख के बीच मौजूद गहरी खाई को समूल नष्ट कर दूंगा."अमीर-गरीब की भावना को जड़ से नष्ट करके एक स्वच्छ समाज की रचना करने में सम्राट अशोक का योगदान प्राप्त करूंगा... "सुरा और मांस का सेवन करने वाले लोगों में इसके प्रति नफरत की आग भरके जीवों के दया-भावना का संचार प्रत्येक मानवो के अन्दर कर दूंगा परन्तु बेटे, मैं ऐसा करने में नाकामयाब रहा। महेन्द्र : आप ऐसा क्यों सोचते हैं गुरु महाराज। इस अवधि में पिताथी ने बहुत से परिवर्तन किए हैं। भगवान बुद्ध के उपदेशों की अवहेलना करने वाले बौद्ध भिक्षुओं एवं अन्य असामाजिक तत्त्वों जो बौद्ध मत के विरोधी हैं, का समूल नाश कर दिया गया है। पूरे राज्य में मौस-मदिरा पर रोक लगा दी गई है । जीवो की सुरक्षा एवं उनकी बीमारियों के निवारण के लिए जगह-जगह चिकित्सालय खुलवा दिए गएहैं । जीव हत्या को अपराध घोषित कर दिया गया है। अब तक अपराधिक गतिविधियो में लीन लगभग 600 लोगों को मृत्यु दण्ड दिया जा चुका है तथा मुर, सुरा एवं अन्य दुष्प्रवृत्ति में लिप्त लोगों को दण्डित किया जा चुका है।

124 | सम्राट के आंसू मोगलिपुत्त : यह तो अतिसुन्दर है । लेकिन बेटे.. अब मेरे जीवन का दीप सदैव के लिए बुझने वाला है। मेरी तुमसे यही प्रार्थना है कि तुम सम्राट अशोक के माध्यम से महेन्द्र : गुरुजी, यह आप क्या कह रहे हैं। आपको तो आदेश। मोगलिपुत्त : नही बेटे, में आदेश देने की तो कल्पना भी नहीं कर सकता। आदेश तो राजा दे सकता है। साधू तो केवल माने वाले काल के प्रति सचेत करने के लिए अनुनय-विनय एवं सलाह ही दे सकता है । अब तो बस मेरी अन्तिम इच्छा यही है कि मेरी मृत्यु के बाद भी बौद्ध धर्म दिन-दूनी रात चौगुनी गति से फले-फूले और इसका प्रसार तीव्र गति मे हो । मैं चाहता हूं कि तुम इस दिशा में अपना सक्रिय योगदान प्रदान करो। महेन्द्र : गुरुजी, मैं बौद्ध धर्म की प्रगति के लिए यदि आवश्यकता पड़ी तो अपने जीवन की आहूति तक चढा दूंगा। परन्तु हर स्थिति में आपको अपने आशीर्वाद के साथ ही आपका योगदान भी काफी जरूरी है। इसके अतिरिक्त अबकी बार तो पिताश्री ने भी बडा ही कठोर एवं भयंकर निर्णय लिया है। मोगलिपुत्त : कैसा निर्णय बेटे? 'महेन्द्र : पिताश्री आपकी प्रतीक्षा गंगा तट पर कर रहे हैं। उन्होंने अन्न-जल तक त्याग दिया है। उन्होने अपना अन्तिम सन्देश भेजते हुए कहा है कि यदि आप दल के साथ वापस नही आते हैं, तो गंगा नदी मे कूदकर आत्महत्या कर लेंगे। मोगलिपुत्त : नहीं बेटा, वह ऐसा नही कर सकते। भगवान बुद्ध की सौगन्ध खाकर कहो कि वह ऐसा कदापि नहीं कर सकते। महेन्द्र : गुरु महाराज "पिताश्री के निर्णय हमेशा अडिग रहा करते है । मोगलिपुत्त : समझ में नहीं आता कि इस जर्जर शरीर, जो अब मात्र एक चलती फिरती लाश की तरह मालूम हो रहा है, के लिए सम्राट अशोक ने ऐसी प्रतिज्ञा क्यों : . की है। बिक्रम सिंह : महाराज''यह आपका भ्रम है, हम लोगों की दृष्टि में तो आप जैसा महान व्यक्तित्व सदियों में कहीं एक बार देखने को मिलता है जैसे महेन्द्र ने सही ही कहा है यदि आप इस बार भी चलने से इन्कार करते हैं तो निश्चय ही सम्राट अशोक का अस्तित्व सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। मोगलिपुत्त : यह तो बडी विकट समस्या उठ खड़ी हुई है। सम्राट अशोक का जीवन बहुत कीमती है, न केवल बौद्ध धर्म के लिए वरन् देश के लिए भी। तुम लोग देख ही रहे हो कि मेरा शरीर अब इस योग्य नहीं रह गया है कि मैं कही आ-जा सकूँ। मेरी समझ मे नहीं आता कि मैं क्या करूं। महेन्द्र : गुरुजी, उसकी व्यवस्था पिताश्री ने करवा कर भेजी है। बाहर रय खड़ा है। हमलोग आपको गोदी में उठाकर रप में बिठा देते हैं और आप"।

- सम्राट के आंसू / 125 मोगलिपुत: ओह"ठीक है"तुम्हारे पिताधी की जान मेरे इस मोल शरीर से ज्यादा कीमती है। यदि उनकी यही इच्छा है तो मैं अपनी प्रतिज्ञा भंग करता महेन्द्र : धन्य हैं गुरुदेव । हम सभी आपके अत्यन्त आभारी हैं । मोगलिपुत : इसमें आभारी होने की क्या बात है । साधू का तो धर्म ही मानवता की रक्षा करना है। महेन्द्र : चलिए गुरु महाराज, रथ तैयार है"आपको गोदी में उठाकर उसमें विठाल देता हूँ। मोगलिपुत्त : नहीं बेटे, मैं भी तुम लोगों को तरह पैदल चलूंगा, मुझे बस तुम्हारा सहारा चाहिए। महेन्द्र : आपका शरीर इस योग्य नहीं कि आप पैदल सफर करें। मोगलिपुत: नहीं बेटे "जहाँ तुम्हारे जैसे त्यागी पुरुष का सहारा हो 'सम्राट अशोक जैसे राजा का साया हो"वहां तो मैं विकट से विकट सफर तय करने में भी नहीं हिचकूँगा। चलो सम्राट अशोक वैसबी से इन्तजार कर रहे होगे। दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक गंगा तट पर खड़े हुए थे। निकट ही उनके अंगरक्षक भी खडे हुए थे। सम्राट अशोक बार-बार चहलकदमी करते और फिर रुक कर गंगा नदी के उस पार देखने लगते थे, जहाँ एक विशाल क्षेत्र में जंगल फैला हुआ था । आज उन्ई 4 दिन गंगा तट पर व्यतीत हो चुके थे, परन्तु न तो उन्होंने अन्न ग्रहण किया था और न ही जल पिया था। ऐसा प्रतीत होता था जैसे इस बार सम्राट अशोक ने अपने जीवन का आखिरी फैसला कर लिया हो। अशोक : (बड़बड़ाते हुए) कितना समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक वह लोग नहीं आएकही ऐसा तो नहीं कि गुरु महाराज ने आने से फिर इन्कार कर दिया हो और इसी कारण वह लोग आने मे विलम्ब कर रहे हों. कुछ भी हो "चाहे जितना विलम्व करेंमैं यहीं इसी तरह प्रतीक्षा करता रहूंगा''यदि इस बार भी गुरु महाराज करने से इन्कार कर देते हैं तो आज नहीं तो कल' अथवा किसी भी दिन "जब भी वे लोग वापस आएंगे"मेरा शरीर गंगा माँ की चरणों मे समर्पित हो जाएगा। इसी प्रकार प्रतीक्षा करते-करते दो दिन और बीत गए। भूख-प्यास से उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया था। परन्तु वह बार-बार चहलकदमी कर रहे थे, ऐसा प्रतीत होता था मानो उन्हें अब अपने जीवन से कोई मोह नहीं रह गया हो । बार-बार उनकी आंखें गंगा के उस पार दूर-दूर फैले उपवन में कुछ तलाशती चली जाती थी फिर पुनःनिराशा भाव से चहलकदमी करने लगते थे।

126/ सम्राट के आंसू अचानक उनके कानों में गगन भेदी नारे पड़े तो वह चौंक कर इधर-उधर देखने लगे। नारे अस्पष्ट थे परंतु उनकी आवाज से उन्हें अनुमान लगाते देर न लगी कि यह नारे गंगा के उस पार से आ रहे हैं । धीरे-धीरे नारों के स्वर स्पष्ट होने लगे थे"गुरु महाराज की जय"गुरु महाराज दीर्घायु हों. "सम्राट अशोक "" चहलकदमी करते हुए सम्राट अशोक अचानक रुक गए और गगा के उस पार उनकी नजरें स्थिर हो गयी। बरबस ही वह बड़बड़ा उठे..."गुरु महाराज आ रहे हैं.."गंगा मां ने मेरी बिनती सुन ली. ..." इसके साथ ही गंगा मां के निर्मल जल को हाथ में लेकर मस्तक से लगाया और इसी के साथ ही उन्होने जल पीकर अपना उपवास भंग किया। इसके बाद अपनी भूख-प्यास से कमजोर हो गई आवाज में वहाँ उपस्थित सैनिकों को आदेश दिया-"तुम लोग खड़े-खड़े क्या देख रहे हो जाओ सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दो कि गुरू महाराज वापस आ गए हैं. "उनके आगमन के उपलक्ष्य मे जोर-शोर से उनके स्वागत की तैयारियां की जायें, सारे नगर को सजाया जाए." इसी समय उनकी नजर गंगा तट के उस पार सामने खड़े गुरु मोगलिपुत्त तिस्स पर पड़ी तो हर्षातिरेक से पागल हो उठे। गुरु महाराज को एक नाव में स्वयं बिठाकर महेन्द्र एवं अन्य नियंत्रक उसे खेने लगे थे। जैसे ही गुरु महाराज की नाव गंगा तट के निकट पहुंची, सम्राट अशोक गंगा नदी मे कूद पडे और कमर तक पानी में पहुंचकर गुरु महाराज की अगवानी करते हुए उन्हें अपनी बाँहों में उठा लिया और गोदी में लेकर गगा नदी के तट पर आ गए। दृश्य परिवर्तन [राजमहल के विशेष कक्ष में सम्राट अशोक मोगलिपुत तिस्स के साथ बैठे थे। इस कक्ष में एक ओर भगवान बुद्ध की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई थी। उस प्रतिमा को आज फूल माला से विशेष रूप सजाया गया था। सम्राट अशोक और मोगलिपुत्त तिस्स इसी प्रतिभा के ठीक सामने बैठे हुए थे। उनके बगल में महेन्द्र तथा महेन्द्र के पीछे कुछ अन्य गणमान्य बौद्ध भिक्षुगण बैठे हुए ये।] भोगलिपुत्त : सम्राट अशोक, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आपने इन सात वर्षों मे बौद्ध धर्म की प्रगति के लिए जो कार्य किये हैं, उससे भगवान बुद्ध निश्चय ही प्रसन्न हो रहे होगे । आपके इन कार्यों के लिए हम किस प्रकार अपना आभार प्रदर्शित करें। अशोक : आप मुझे शमिन्दा कर रहे हैं गुरु महाराज। मैंने जो कुछ भी किया है, आपकी प्रेरणा और आपके आशीर्वाद से ही किया है। इसलिए इसमे मेरा आभार प्रकट सम्राट के आंसू / 127 करने का प्रश्न ही नहीं उठता है। भोगलिपुत्त : यही तो आपकी सबसे बड़ी महानता है। निश्चय ही आपने इस अवधि में बौद्ध भिक्षुओं में व्याप्त विसंगतियों को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, अन्यथा मैं तो निराश हो चुका था। इसके साथ ही भगवान बुद्ध के उपदेशों एवं शिक्षाओं के प्रचार एवं प्रसार में काफी सक्रिय योगदान प्रदान किया है । अशोक : यह सब तो आपके आशीर्वाद का फल है, अन्यथा मैंने तो कुछ भी नहीं किया है। आपकी अनुपस्थिति में मार्गदर्शन के अभाव में यदि मुझसे कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मैं क्षमा चाहूंगा। मोगलिपुत्त : गलती भी इन्सान से होती है और यह गलती तब होती है जब इन्सान क्रोध अथवा पश्चाताप के कारण अपना मानसिक सन्तुलन खो देता है। जैसे आपने रानी तिष्यरक्षिता को जिन्दा ही अग्निदेव की सेवा में समर्पित करके जघन्य पाप किया है। असोक : लेकिन महाराज उसका आचरण ही ऐसा था कि मुझे उक्त दण्ड देना पड़ा। उसके ही कारण मुझे आपका वियोग सहना पड़ा, यही नहीं उसने..! मोगलिपुत: मैं सब जानता हूँ राजन् "लेकिन इन्सान चाहे जितना पतित इन्सान क्यों न हो भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के अनुसार उसमें सुधार लाने का अवसर देना चाहिए । भगवान बुद्ध के मुख्य उपदेशों में एक उपदेश यह भी है कि पापी इन्सान को क्षमा प्रदान करना ही सबसे बड़ा दण्ड है। अशोक : महाराज, मैं उस समय क्रोधाग्नि में इतना अंधा हो चुका था कि मुझे...! मोगलिपुत्त : राजन्, मैंने पहले भी आपसे कहा था कि क्रोध और पश्चाताप ऐसे कारक हैं, जो अनेकानेक दुःखों का जन्म देते हैं। अशोक : इसीलिए मुझे आपसे विलग होकर असह्य दुःखों का सामना करना पड़ा। मोगलिपुत्त : राजन्, मुझसे ऐसी कोई विशेषता नहीं है, बल्कि यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं आपके दुःखों का कारक बना। अशोक : महाराज, ऐसा मत कहें । मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ और उस गलती के लिए क्षमा मांगता हूँ। अब मैं निश्छल भाव से अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान बुद्ध के कदमो मे अर्पित करते हुए उनके उपदेशों के पालन की सौगन्ध खाता हूँ। मोगलिपुत्त : राजन्, पश्चाताप करना भी दुःख का एक कारक है, अत: इसके लिए आवश्यक है कि आप उन सभी न्याय अन्यायों को अपने हृदय से निकाल दें तभी आप भगवान बुद्ध के उपदेशों और शिक्षाओ का अनुपालन सुनिश्चित कर सकेंगे। अशोक : ठीक है महाराज ! मैं अपने मन से पश्चाताप को जड़ से समाप्त करते हुए भगवान बुद्ध के उपदेशो के प्रचार एवं प्रसार की नई योजनात्मक रूपरेखा प्राप्त करने के लिए आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ। मोगलिपुत्त : निश्चय ही राजन्, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आपने बौद्ध धर्म की 128/ सम्राट के आंसू शिक्षाओं के प्रचार एवं प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इस दिशा में आपने उत्कृष्ट कार्य करके सम्पूर्ण भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों जैसे चीन, तिब्बत, मेघालय, श्रीलंका, कोरिया आदि मे भी भगवान बुद्ध के उपदेशो का प्रचार करवाया एवं बौद्ध मठो एवं स्तूपो का निर्माण करवाया, जिसके लिए बौद्ध धर्म आपका सदैव आभारी रहेगा। अशोक : महाराज, इस प्रकार के छोटे-मोटे कार्यों के लिए मेरी प्रशंसा करने का कोई भौचित्य नहीं है । मैंने जो कुछ किया है, उसका मूल उद्देश्य केवल राष्ट्र हित ही नहीं वरन् भगवान बुद्ध के उपदेशो के प्रचार एवं प्रसार के लिए यथोचित काय करना है। चूंकि भगवान बुद्ध के उपदेश एक नये समाज के निर्माण में सहायक सिद्ध हुए हैं, इसीलिए मैंने उसको स्वीकारा है । चंकि मेरे पास धन का विशाल भण्डार है, इसलिए मैंने उम धन का सदुपयोग किया। लेकिन महाराज क्या आपने यह कभी मोचा है कि वास्तविक रूप में प्रशंसा का पात्र मैं नही बल्कि वे अभागे हैं, जिनके ऊपर अत्याचार करके, कतले आम करके, खून की नदियाँ बहाकर इस धन को सचित किया था। चूंकि जो धन मेरे पास था एवं इस समय है, वह उन्ही अभागों का है, इसलिए निरर्थक मेरी प्रशंसा करके मेरा सम्मान न बढ़ाएँ बल्कि उन अभागों की आत्माओं की शान्ति प्रदान करने के लिए भगवान बुद्ध प्रार्थना करें। मोगलिपत : अब मुझे विश्वास हो गया है कि निश्चय ही आप भगवान बुद्ध के सच्चे अनुयायी बन गए है । निश्चय ही हमें उन अभागों की आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। लेकिन इसके बावजूद भी राजन् आपका महत्व कम नहीं हो जाता। जिस प्रकार एक साधु का यह कर्तव्य होता है कि वह नये युग के निर्माण के लिए बीते हुए युग की उपलब्धियों एवं परिलब्धियों का मूल्यांकन करते हुए वर्तमान के लिए एक ऐसी शिक्षा नीति का विकास करे, जिससे मानव में न केवल पाप पुण्य का ज्ञान हो सके वरन् एक सुखद भविष्य का निर्माण भी कर सके । राजन् प्राचीन काल मे मानव नरभक्षी था, लेकिन आज नही है । केवल इसलिए कि साधु महात्माओ ने तब और ज्ञान के माध्यम से ऐमे माध्यमों की खोज करने में अपना सम्पूर्ण जीवन इसीलिए अर्पित कर दिया कि मानवो का विकास हो, उसका बौद्धिक स्तर बढे, सोचने विचारने की क्षमता विकसित हो, पाप-पुण्य के सम्बन्ध में चिन्तन मनन करे। परिणामतः मानवो में सभ्यता का विकास हुआ और इमी के साथ राजा पद की स्थापना हुई। राजा का मूल उद्देश्य जनता की रक्षा करना उसे समान रूप से जीने का अवसर प्रदान करना एवं समाज में आ रही विकृतियों को दूर करने का प्रयास करना था। चूंकि राजा का उद्देश्य समाज में आ रही विकृतियों को दूर करना था इसलिए राजा के साथ ही साधु का महत्व कम नहीं था क्योंकि समाज का वास्तविक अध्ययन एव एक भावी स्वच्छ समाज सम्राट के आंसू / 129 की रूपरेखा साधु ही तप और बल से प्रदान कर सकता है। परन्तु धीरे-धीरे राजा के अधिकारो में वृद्धि होती गयी, जिसके कारण राजा का जीवन विलासितापूर्ण हो गया। राजा सिर्फ धन को महत्त्व देने लगान कि समाज की सुरक्षा का । समाज मे क्या हो रहा है, इससे राजा का कोई सम्बन्ध नहीं रह गया । फलस्वरूप समाज कई भागों में विभक्त हो गया और हर वर्ग में एक राजा के पद को स्थापना होने लगी। राजन् राजा का मूल उद्देश्य मात्र खून की नदियाँ बहाना, कत्ले आम करके जनता को लूटना, दूसरे राज्य को जीतकर वहां की जनता का शोषण करना ही रह गया । आप भी उसी में से एक थे । इसलिए आपने जो कुछ किया वह निश्चय ही पाप की परिभाषा में नहीं आना चाहिए क्योंकि साधुओं का मत है कि राजा जब अपना यही धर्म समझने लगता है तो वह पाप नहीं कहलाता। परन्तु आपने एक नये युग की स्थापना की दिशा में पाप पुण्य की जो परिभाषा की है, आपने जिस प्रकार राजा एवं संन्यासी पद का भार एक साथ ग्रहण किया एवं राज कार्य के साथ ही जनहित में कार्य किया है, उससे निश्चय ही आप प्रशंसा के पात्र ही नही बल्कि आने वाले नये युग निर्माण के प्रवर्तक भी बन चुके हैं । अशोक : महाराज, तर्क बल पर आपसे जीतना मेरे लिए सम्भव नहीं है। अब आप आ गए हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप बौद्ध धर्म को और प्रगति की राह पर अग्रसर करने में अपना योगदान प्रदान करें। मोगलिपुत्त : राजन्, अब तक बौद्ध धर्म की प्रगति के लिए जो कुछ भी किया गया है, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। लेकिन मेरी एक अन्तिम इच्छा भी है। अन्तिम इच्छा का तात्पर्य यह है कि चूंकि अब मैं मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करने वाला हूँ अतः अपनी इच्छा पूर्ति से आपके योगदान की कामना करता हूँ। अशोक महाराज, आप ऐसा न कहें । आप अपनी इच्छा बताएं। मोगलिपुत्त : राजन्, मेरी अन्तिम इच्छा काफी कठिन है । और इसलिए मेरा यह उद्देश्य नहीं है कि आप मेरी इस अन्तिम इच्छा की पूर्ति करने के प्रस्ताव को स्वीकार ही कर लें। चूंकि इस इच्छा पूर्ति में काफी धन व्यय होगा, काफी परिश्रम करना होगा इसलिए आप जो भी निर्णय लें, वह जनहित एव राजहित को दृष्टिगत रखते हुए ही लें! अशोक : महाराज, आप बिल्कुल निश्चित होकर अपनी इच्छा का वर्णन करें। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं आपकी इच्छा पूर्ण करने का पूरा प्रयास ही नहीं करूंगा, बल्कि इस बात का भी पूरा प्रयास करूंगा कि आपकी इच्छा पूर्ति मे किसी भी प्रकार का जनता का शोपण न हो और राष्ट्र की आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति पूर्ववत सुदृढ़ रहे। भोलिपुत: नहीं राजन्, ऐसा नहीं होगा। फिर भी आपके आग्रह को देखते हुए अपनी 130 / सम्राट के आंसू इच्छा बता रहा हूँ। मेरी अन्तिम इच्छा वौद्ध संगीत के आयोजन की है। अब तक बौद्ध सगीत काफी अन्तराल पर हुए हैं तथा अब तक दो बोद्ध संगीतों का ही आयोजन हो सका है। यह संगीत 9 माह तक चलता है, जिसमें देश-विदेश से बौद्ध भिक्षु आकर भाग लेते हैं। इसमें काफी धन व्यय होता है । इस प्रकार के संगीत का उद्देश्य बौद्ध धम्म में व्याप्त हो गई विसंगतियो को दूर करने के साथ ही भगवान् बुद्ध के दर्शन करना होता है। कहा जाता है कि इस अवसर पर भगवान बुद्ध स्वयं आकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। राजन्, द्वितीय बौद्ध सगीत का आयोजन सैकडों वर्ष पूर्व हुआ था। चूंकि अब मैं इस योग्य नहीं हूं कि इतने विशाल संगीत का आयोजन कर सकू और न ही मेरे पास इतना धन है कि इसको कल्पना भी कर सकें। यही नहीं मुझे कब मोक्ष प्राप्त हो जाए, इस सम्बन्ध में भी कोई भविष्यवागी कर सकना सम्भव नहीं है। अतः मेरी अन्तिम इच्छा यही है कि आप तृतीय बौद्ध संगीत का आयोजन कराएं परन्तु इसके लिए किसी प्रकार का जनशोषण अथवा जनाधार न हो। मुझे विश्वास है राजन् कि इस अवसर पर भगवान बुद्ध आपको दर्शन देंगे। अशोक : महाराज, बस इतनी छोटी-सी बात के लिए आप इतना परेशान हो रहे हैं। अरे 9 माह तो क्या 9 वर्ष का कार्यक्रम हो तो भी मैं उसे पूरा करा सकता हूँ। भोगलिपुत्त : राजन्, आप शासक हैं, इसलिए आपके लिए यह छोटी-सी बात है, जबकि मेरे जैसे व्यक्तियो के लिए यह कल्पना मात्र ही है । वैसे मैं फिर यही कहूंगा कि राजन्, इस मामले में काफी सोच-विचार के वाद ही जनहित एवं राजहित में अपना निर्णय लें। अशोक : कैसी बात करते हैं महाराज ! आपका आदेश और मैं इन्कार करू, ऐसी तो मैं कल्पना भी नही कर सकता । फिर ऐसे मामलों में किसी प्रकार के सोच-विचार का प्रश्न ही कहीं उठता है । मोगलिपुत: भगवान बुद्ध इस आयोजन में आपको अवश्य सहायता करेंगे। अशोक भगवान बुद्ध सहायता करें या न करें लेकिन बिना आपके सहयोग के यह आयोजन कर मकना संभव नहीं है । अतः आपको इस तृतीय बौद्ध संगीत के आयोजन के लिए अध्यक्ष बनाया जाता है। मोगलिपुत: राजन्, यह उचित नहीं है। मेरी मृत्यु का कोई भरोसा नहीं है, इमलिए उचित यही होगा कि आप अध्यक्ष पद संभालें अन्यथा महेन्द्र को पना दें। महेन्द्र : गुरु महाराज, मैं इतने बड़े पद के योग्य नहीं हूँ। मेरी तो प्रार्थना यही है आप ही इस पद का भार संभालें। मैं आपको हर तरह का सहयोग एवं सेवा करने के लिए नहार रहूंगा। अशोक : गुरु महाराज, इम पद को आप ही मुशोभित कीजिए। जहां तक मेरा प्रश्न है, मारने पहले मे ही इतना बड़ा दायित्व गौर रया है। शासन के साप इस पद का सम्राट के आंसू / 131 भार संभालना मेरे लिए अत्यन्त दुष्कर होगा और ऐसी स्थिति में तृतीय संगीत सफल भी होगा, इसमें सन्देह पैदा हो जाता है। मोगलिपुत्त: : लेकिन राजन्, यदि इस बीच मेरी मृत्यु हो गयी तो अशोक : मुझे विश्वाम है कि आपको कुछ नहीं होगा। भगवान बुद्ध का आशीर्वाद आपके साथ रहेगा। मोगलिपुत्त : ठीक है । जैसी आपकी इच्छा । : सोलहवां दृश्य [सम्राट अशोक ने तृतीय बौद्ध संगीत का विशाल आयोजन वैशाली नामक नगर में किया। इस अवसर पर पूरे वैशाली नगर को सजाया गया एवं जगह- जगह अस्थायी एवं स्थायी आवासों की व्यवस्था की गयी थी। चैशाली नगर की एक दिशा में विशाल पाण्डाल बनवाया गया, जिसके अन्दर कम-से-कम 50,000 व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी। इसी पाण्डाल के अन्दर एक बड़ा-सा स्टेज बनवाया गया था, जिस पर भगवान बुद्ध की आदमकद अष्ट धातु की प्रतिमा स्थापित की गयी थी । इस अवसर पर वैशाली नगर में जगह-जगह धर्मशालाओं का निर्माण करवाया गया एवं विभिन्न स्थलों पर जलपान आदि की व्यवस्था निःशुल्क करवायी गयी थी, जिससे आने-जाने वाले अतिथियों एवं यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। जव तृतीय संगीत के आयोजन की व्यवस्था पूर्ण हो गयी, तब देश-विदेश से हजारो दर्शनार्थी वैशाली नगर में एकत्रित होने लगे। बौद्ध भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों से वैशाली नगर भर उठा । चारों ओर भगवान बुद्ध के उपदेशो पर आधारित भजनों का गान होने लगा। अन्ततः वह दिन भी आ गया, जिस समय उक्त तृतीय संगीत के आयोजन का शुभारम्भ होना था । पूरा पाण्डाल बौद्ध भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के साथ अनेकानेक सम्प्रदाय के बौद्ध धर्म के अनुयायी एवं अन्य अतिथियों से खचाखच भर चुका था। मोगलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में इस कार्यक्रम की शुरुआत होनी थी । एक दिशा में भगवान बुद्ध की आदमकद प्रतिमा के पास मोगलिपुत्त तिस्स बैठे थे। उनके दायें और सम्राट अशोक बैठे थे तथा बायी ओर महेन्द्र योगासन की मुद्रा मे बैठे थे। मोगलिपुत्त तिस्स ने कार्यक्रम आरम्भ करने की घोषणा करते हुए भगवान युद्ध की विशाल प्रतिमा के समक्ष रखे जल कलश से कुछ जल अंजुलि मे भरा और ।

132 / सम्राट के आंसू उसे भगवान बुद्ध को प्रतिमा पर छिड़कते हुए मंत्रोच्चारण करने लगे । इसके बाद फूल माला से भगवान बुद्ध की प्रतिमा को सुशोभित करते हुए उन्होंने प्रकाश दीप जलाया। चूंकि इस दीप को अबाध गति से नौ माह तक जलते रहना था, अतः इस दीप को विशेष तौर से बनाया गया था। भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना के बाद मोगलिपुत तिस्स ने सभा पर एक दृष्टिपात किया, तदोपरान्त बोले-"देश-विदेश से आए भगवान बुद्ध एवं उनकी शिक्षाओं में आस्था रखने वाले उनके अनुयायियो एवं बौद्ध भिक्षुगणो का स्वागत करते हुए हम अपने को धन्य पा रहे हैं । जिन्होने इस ऐतिहासिक महत्त्व के तृतीय संगीत कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए यहां अपनी उपस्थिति प्रदान की। इसके साथ ही हम उन सभी लोगों के प्रति भी आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए तन-मन-धन से अपने को समर्पित किया। इस कार्यक्रम की शुरुआत करने के पूर्व हम भगवान बुद्ध के जीवन पर एक संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत कर देना चाहते हैं । भगवान बुद्ध, जिनका वास्तविक नाम सिद्धार्थ था, का जन्म बड़े ही आश्चर्यजनक ढंग से हुआ था। उस समय जबकि उनकी मां वन विहार के लिए निकली थी, तभी उन्हें प्रसव पीडा हुई और उन्होंने जिस पुत्र रत्न को जन्म दिया, उसका नाम ही आगे चलकर सिद्धार्थ पडा । सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन लुम्बिनी नामक देश के राजा थे, जो कि नेपाल में स्थित है। सिद्धार्थ बाल्यकाल से ही विचारशील रहा करते थे। उनका राजकाज से कोई लगाव नहीं था। जब वे किसी दुःखी, पीड़ित व्यक्ति को देखते तो उन्हें काफी दुःख होता और वे अक्सर सोचा करते कि आखिर मानव को दु.ख और पीडा क्यों होती है, उसके रोगों का कारण क्या है। वह अक्सर सोचा करता कि आखिर इन्सान मरता क्यो है, क्या वह अमर नही हो सकता । स्थिति यह थी कि जैसे- जैसे उसकी उम्र बढ़ती जा रही थी, उसका ध्यानाकर्षण इन्ही रहस्यों के प्रति बढ़ता जा रहा था। राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को हस्तरेखाओं का परीक्षण राजज्योतिषियो से कराया । उन्होने अनेकों ग्रहो पर नजर डालकर एवं उनकी स्थितियों पर विचार करने के बाद बताया कि सिद्धार्थ या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा अथवा बहुत बड़ा संन्यासी। जहाँ राजा शुद्धोधन को उसके चक्रवर्ती सम्राट बनने की भविष्यवाणी से सुख की अनुभूति हुई, वही संन्यासी बनने की बात को लेकर उनका मन विचलित हो उठा। क्योकि बालक सिद्धार्य की प्रकृति सन्यास जीवन में प्रवेश को सूचक यो। उन्होने बालक मिद्धार्य की प्रकृति को बदलने के लिए काफी प्रयास किए परन्तु जब वह निष्फल हो गए तो उन्होंने बालक सिद्धार्थ का विवाह चौदह वर्ष को मायु में ही कर दिया। विवाहोपरान्त भी उनकी प्रकृति में कोई परिवर्तन नही सम्राट के आंसू / 133 आया और पूर्व की तरह वह उन्हीं समस्याओं पर चिन्तन मनन किया करते थे। इसी अवधि में उन्हें एक पुत्र रत्न भी प्राप्त हुआ। जब पारिवारिक जीवन से उनकी शंका का समाधान नहीं हो सका एवं पुत्र रल प्राप्ति के बाद भी उन्हें शान्ति न मिल सकी, तब उन्होने एक भयानक फैसला किया। हाँ, इसे भयानक फैसला ही तो कहा जाएगा कि एक काली रात को वह अपनी सुन्दर पत्नी और फूल जैसे कोमल पुत्र का मोह त्याग कर अज्ञातवास में चले गए। वह कहां गए, इसकी किसी को कोई जानकारी नहीं थी। राजा शुद्धोधन ने उन्हे ढुंढवाने का काफी प्रयल भी किया परन्तु वह तो तमाम माया मोह से विरक्त होकर जंगलों और पहाड़ों का भ्रमण कर रहे थे, यह जानने के लिए कि आखिर दु.ख है क्या, रोग के कारण क्या हैं और इन्सान की मृत्यु क्यों होती है। वह कब तक जंगलों, पहाड़ो आदि में घूमते रहे इसका तो कोई विस्तृत उल्लेख उपलब्ध नहीं है, परन्तु जब वह प्रकाश आए तो उन्हें उपरोक्त बातों का पूरा ज्ञान हो चुका था और इसी ज्ञान के माध्यम मे उन्होने मानव दु:ख के कारणों एव उनके निवारण के उपायों पर कुल सात मागं बताए । अब हम इस आयोजन के मुखिया का भी परिचय देना चाहते हैं । इस कार्य- क्रम के आयोजक है मम्राट अशोक । सम्राट अशोक कौन हैं, इससे आप सभी लोग परिचित ही होगे। यह सम्राट अशोक ही है, जिन्होने अपना सब कुछ त्याग कर बौद्ध धर्म को न केवल अपने जीवन में अगीकार किया वरन् उन्होंने इसके पुन- रुत्थान के लिए जो संघर्ष किया है, उसके लिए बौद्ध धर्म उनका सदैव आभारी रहेगा। उन्होने जहां अपने पुत्र को बौद्ध भिक्षु बनाकर बौद्ध धर्म के इतिहास को स्वणिम बनाने में योगदान दिया है वही अपनी जवान पुत्री को भिक्षुणी बनाकर जो संकल्प लिया है, उसके लिए भी बौद्ध धर्म सदा के लिए उनका आभारी रहेगा। हालांकि हम बौद्ध भिक्षु इतने विशाल कार्यक्रम का आयोजन करने में सक्षम नहीं थे, परन्तु यह सम्राट अशोक ही हैं, जिन्होने इतने विशाल कार्यक्रम की न केवल रूपरेखा ही तैयार की वरन् इसको पूर्ण कराने मे तन-मन-धन से अपने को समर्पित किया है । मैं ऐसे महान व्यक्तित्व के स्वामी एवं भगवान बुद्ध के अनुयायी सम्राट अशोक से आग्रह करना चाहूंगा कि वह अपने बहुमूल्य विचार इस आयोजन के प्रति रखने का कष्ट करें।] अशोक : देश-विदेश से आए सम्मानित अतिथिगण एवं भगवान बुद्ध के भक्तों का मैं हृदय से आभारी हूं, जिन्होंने इस आयोजन मे भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए इतना लम्बा सफर तय किया है । जहाँ तक भगवान बुद्ध के जीवन का प्रश्न है, उसे तो मैं नहीं जानता परन्तु उनके संघर्षमय जीवन को जो कहानी गुरु महाराज मोगलिपुत्त तिस्स से सुनी है, उससे मैं उनका अनन्य भक्त बन गया हूँ । गुरु महाराज मोगलिपुत्त तिस्स की शिक्षा-दीक्षा मे मुझे जो नया ज्ञान मिला है, जीने 134/ सम्राट के आंसू का जो माध्यम मिला है, उसके लिए मैं उनका हृदय से आभारी हूँ। जहां तक मेरा प्रश्न है, मैंने जीवन उन क्षणों में भगवान बुद्ध के उपदेशों को अपने जीवन में अंगीकार किया, जबकि मैं अपने जीवन से निराश हो चुका था। मेरा मन दुःख, कलेश और पश्चात्ताप से इतना व्यथित हो चुका था कि मैं स्वयं अपने को नष्ट कर देना चाहता था। परन्तु ऐसे नाजुक क्षण में भगवान के रूप मे गुरु मोगलिपुत्त तिस्स ने मेरे जीवन में प्रवेश किया। गुरु तिस्स ने जहाँ मुझे जीवन के अनेकानेक रहस्यों से अवगत कराया, वही मुझे जीने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने ही मुझे भगवान बुद्ध के उपदेशो से जनसेवा की नयी एवं सही दिशा का ज्ञान कराया, अन्यथा मुझे तो इस बात का ज्ञान ही नही था कि जनसेवा होती क्या है। मैंने सदा खून की होली खेली थी, खून की नदियाँ बहायी थीं और रोते-गिड़गिड़ाते लोगों के सीने पर चढ़कर ठहाके लगाए और उनकी सम्पदाओं को लूटा था। परन्तु एक समय ऐसा आया जबकि इन रोते- गिड़गिड़ाते मानवों के प्रति मेरे मन में ऐसी दया उमड़ी कि मुझे स्वयं अपने से नफरत-सी हो उठी और मुझे केवल एक मार्ग दिखाई दे रहा था कि इस जीवन से मुक्ति पा लूं। परन्तु जब मैंने महायोगिराज मोगलिपुत्त तिस्स द्वारा बताए गए सात मार्गों को अपने जीवन मे अंगीकार किया तो मुझमे एक अजीब से परिवर्तन की अनुभूति हुई । फलतः मैंने बौद्ध धर्म को अपनाकर मानव ही नहीं बल्कि समस्त जीवों के हित में अनेकानेक कार्य कराए तथा विदेशों में बौद्ध धर्म की लोकप्रियता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रचार एव प्रसार कराया एवं इसके लिए अपने पुत्र एवं पुत्री को विदेशों में भेजा। प्रायः लोगो में यह चर्चा होती रही है कि सम्राट अशोक केवल बौद्ध धर्म का अनुयायी है तथा अन्य धर्मों के प्रति उसमें कोई आस्था नहीं है । बन्धुवर इसमें कोई दो राय नहीं है कि मैं बौद्ध धर्म का अनुयायी हूँ एवं भगवान बुद्ध का अनन्य भक्त हूं, क्योकि जीवन के अन्तिम क्षणों में इसी धर्म में मुझे जीने की नई दिशा ही प्रदान नहीं की बल्कि जनता के प्रति दया, भावना और ममता का विकास भी किया। लेकिन इसका तात्पर्य यह भी नहीं है कि मुझे अन्य धर्मों मे कोई आस्था नहीं है अथवा उनकी प्रगति में मैं वाधक हूँ । बौद्ध धर्म का अनुयायी होते हुए भी मैं यहाँ केवल यही कहना चाहूंगा कि सब धर्मों में केवल वही धर्म श्रेष्ठ है, जो मानवता की सेवा के साथ ही मानवों के विकास के लिए सही दिशा का ज्ञान कराता हो। चूंकि बौद्ध धर्म के उपदेशो मे मानवता को बल दिया गया है, मानवो के दुःखों के कारणो पर विस्तृत व्याख्या ही नही की गयी है वरन् उसके निवारण के उपाय भी बताए गए हैं। बौद्ध धर्म की इन्ही तमाम विशेषताओं के कारण मैं बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। इसके बावजूद मैं अन्य धर्मों का अनादर नहीं करता। हर धर्म, जो मानवता की रक्षा करने में सक्षम है तथा उनके उपदेश सम्राट के आंसू / 135 एवं शिक्षाएं मानवता प्रगति की द्योतक हैं, उनके लिए न केवल मेरे मन में आस्था है बल्कि उनकी प्रगति के लिए तन-मन-धन से योगदान करने को सदैव तैयार एवं तत्पर हूं। जहाँ तक इस संगीत का प्रश्न है, इस ऐतिहासिक बौद्ध संगीत का आयोजन ऐसे समय में किया गया है, जबकि मानव स्वयं मानव का ही नहीं बल्कि अपने का भी दुश्मन बन चुका है और यही कारण है कि आज मानव प्रगति रुकती-सी प्रतीत हो रही है। दिन पर दिन काम, लोभ, मोह से ग्रस्त मानव अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को भूलता जा रहा है। वह भूल गया है कि कितने परिश्रम के बाद उसने यह प्रगति हासिल की है और उसका मूल ध्येय मानव विनाश नही बल्कि उसकी प्रगति को सही दिशा प्रदान करना है। अतः यह आवश्यक है कि मानव को उसके अन्दर व्याप्त दुःख, भय, पश्चाताप के परिणामों से अवगत कराया जाए। इसीलिए इस संगीत का आयोजन करते हुए मैं आशा करता हूं कि आप सभी लोग मानवों में मानव के प्रति ही नहीं बल्कि समस्त जीवों के प्रति दया भावना पैदा करते हुए इस बात का विश्वास दिलाएंगे कि वह भी उनके जीवन के एक महत्त्वपूर्ण अंग है। मैं यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि कई धर्म-मानवों को विभक्त कर देते हैं जिससे मानव की एकता वाधित हो जाती है और इससे एक धार्मिक द्वन्द्व की शुरुआत हो जाती है। जैसा कि वर्तमान में प्रचलित है कि हर धर्म अपने को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास कर रहा है, भले ही उसके लिए उसे हिंसा का भी प्रयोग क्यों न करना पड़े। हर धर्म के अनुयायी अपने को सर्वोपरि समझ रहे हैं और वह नहीं चाहते कि उनके धर्म के समक्ष कोई अन्य धर्म पनप सके। अतः इस विकृति से बचने के लिए एक विकल्प है कि सभी धर्मों को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया जाए। मेरे विचार से इस विकल्प को चुनने में किसी विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। यदि आज के युग में मानव जाति के बीच विद्यमान सभी धर्मों का सार देखा जाए तो स्पष्ट विदित होगा कि सभी धर्म इस मत के हैं कि जो भी कार्य किए जाएं, वह मानव हित मे हो। मांस-मदिरा के मेवन का सभी धर्म विरोध करते हैं। मेरी तो यही समझ में नहीं आता कि जब मभी धर्मों की शिक्षाएं और उपदेश एक समान हैं तो आपस में यह विरोधाभास क्यो। अतः यदि इन सभी धर्मों को एकीकृत करके उनकी शिक्षाओं एवं उपदेशों को एक सूत्र में पिरोकर एक नये धर्म की संरचना की जाए, इसमे न केवल मानव कल्याण निहित होगा वरन् मानव प्रगति के द्वार सदैव खुलते रहेंगे । ऐसे धर्म को हम आप सभी की सहमति से मानवता के धर्म संज्ञा देते हैं और याशा करते हैं कि आप सभी मेरे इस प्रस्ताव से सहमत होंगे। अन्त मे मैं पुनः अपने अतिपिगणों का आभारी हूँ, जिन्होंने इस विशाल और 136/ सम्राट के मासू लम्बे समय तक चलते रहने वाले कार्यक्रम में भाग लिया है। हां, मैं इतना अवश्य चाहता हूँ कि जब आप स्वदेश वापस जाएं तो अपने साथ एक प्रत लेकर जाएं कि आपको बौद्ध धर्म की शिक्षाओं एवं उपदेशों का प्रचार ही नहीं करना है वरन इसी माध्यम से मानवता धर्म की एक नयी संरचना करनी है। अन्त में मैं यही चाहता हूँ कि भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में बन्धुत्व, सहयोग, आत्मनिर्भरता एवं समस्त जीवों के प्रति दया भावना का विकास हो तथा मानव विनाश के लिए जा रहे कार्यों पर मानवता धर्म के माध्यम से रोक लगाने का प्रयास किया जाए। मोगलिपुत्त तिस्स : अभी आप लोगों ने सम्राट अशोक की मृदुवाणी को सुना । विश्व के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई शासक हो, जिसने साधू एव राजा का दायित्व एक साथ संभाला हो। जहां एक ओर सम्राट अशोक ने शासन व्यवस्था का संचालन किया है, वही उन्होंने मानवता के लिए ही नहीं वरन् समस्त जीवों के हित में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। कितना आश्चर्य है कि जहां उन्होंने एक राजा के रूप में इतने विशाल राष्ट्र की शासन-व्यवस्था का संचालन किया, वहीं उन्होंने सन्यासियो की भांति भगवान बुद्ध को छत्रछाया में न केवल भगवान बुद्ध की शिक्षाओं एवं उपदेशों का प्रचार एवं प्रसार किया है वरन् समस्त धर्मों को एक- सूत्र में पिरोने की जो वीणा उठाई है तथा सभी धर्मों से इस कार्य में योगदान का जो उद्घोष किया है, उसके लिए आने वाला इतिहास उनका आभारी रहेगा। जैसा कि आप भी परिचित हैं कि शासक और संन्यासी यदि एक-दूसरे शत्रु नही तो मित्र भी नही कहलाते। जहाँ शासक हिंसा मे आस्था रखते हैं और इसके लिए तरह-तरह से युद्ध, लूट-मार, नारियों का अपहरण, बलात्कार आदि के पुजारी हैं वही अपने कोप को हीरे-जवाहरात से सदाबहार हरा-भरा बनाए रखना चाहते हैं। सुरा और सुन्दरी के शिकार शासक वर्ग साधू-सन्यासी की शिक्षाओं का सदा विरोधी रहा है। इसके विपरीत साधू-संन्यासी मायामोह के जाल से मुक्त एक ऐसा प्राणी होता है, जिसका उद्देश्य मानव हित की दिशा में तप और संघर्ष करके प्रेरणात्मक शिक्षाओ का प्रचार एवं प्रसार करना होता है, जिससे मानव का शोषण न हो सके और मानवों को चाहे वह जिस जाति अथवा जिस वर्ग का हो, समान रूप से जीने का अधिकार मिले। परन्तु आज हमारे बीच में ऐसे भी साधू-सन्यासी आ गए है, जो पाखण्डवाद को जन्म देकर राजा को गुमराह करने का भी प्रयास करते है और मायामोह के जाल में फंसकर मुंह में राम और बगल में पुरी का सिद्धान्त मानते हैं। जबकि एक सच्चा साधू-संन्यासी कठोर-से-कठोर तप इसलिए करता है कि वह मानव दुःखों के कारणो के निवारण के लिए उपाय खोजे जिससे मानवों के बीच आ गयो कुरीतियो का समूल नाश किया जा सके। सच्चे संन्यासी के मानव हित में किए जा रहे तप के आगे राजा इन्द्र तो क्या कामदेव तक नत. मस्तक हो जाते हैं । परन्तु सम्राट अशोक ने राजा इन्द्र और कामदेव की उपस्थिति सम्राट के आंसू 1137 में भी एक संन्यासी-सा जीवन व्यतीत किया। आपको जानकर आश्चयं तो होगा ही कि सम्राट अशोक के महल में एक से एक सुन्दर अप्सराएं मौजूद हैं, जिनके आगे बड़े से बड़े ऋषि-मुनियों तक की तपस्या भंग हो सकती है, वहीं दूसरी ओर सम्राट अशोक हैं, जिन्होने इन दोनों के मध्य रहते हुए जो तप किया है, उसका ही परिणाम है कि हम इस विशाल संगीत का आयोजन करने में सक्षम हो सके हैं। अन्त में हम आशा करते हैं कि आप सभी सम्राट अशोक के विचारों से सहमत होंगे और विश्व में बंधुत्व की भावना विकास की दिशा में कार्य करके एक नये युग के निर्माण में अपना योगदान प्रदान करेंगे। माप लोग इस सगीत समापन के बाद जब अपने देश वापस लौटें तो एक संकल्प के साथ जाएं और आपसी धार्मिक लड़ाई, वर्ग भेद आदि के विनाश के लिए कृत संकल्प होकर जाएँ, जिससे आने वाले इतिहास में यह संगीत सदियों तक याद किया जाता रहे। सत्रहवाँ दृश्य [राजमहल के सभाकक्ष में सम्राट अशोक अपने विश्वस्त मत्रिगणो के साथ ही सम्मानित पार्षदों के साथ बैठे हुए थे। आज की यह महत्त्वपूर्ण बैठक सम्राट अशोक ने आपातकालीन परिस्थिति मे बुलायी थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो आज कोई बहुत ही महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया जाने वाला था क्योकि सम्राट अशोक के चेहरे पर गहनतम चिन्ता के भाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे थे। अशोक जैसा कि आप सभी को विदित है कि मैंने इस देश की शासन व्यवस्था का संचालन पूर्ण कर्तव्यपरायणता के साथ किया है। मैंने इस अवधि में अनेकानेक परिवर्तन अनुभव किए हैं। मेरे राजकार्य संचालन मे आप लोगों ने जो योगदान दिया, उसके लिए मैं आभारी हूँ। वैसे वह भी एक युग था, जब मेरे नाम से लोग दहल उठते थे और उस समय मेरी भी इच्छा थी कि मैं सम्पूर्ण पृथ्वी का शासक बनूं परन्तु मेरी यह महत्त्वाकांक्षा अपूर्ण ही रह गयी। इसी बीच में परिस्थितियों 'ने ऐसा पलटा खाया कि मैं खून-खराबे से सख्त नफरत करने लगा और जनसेवा का एक नया व्रत लेकर जो कार्य किया, उससे भाप सभी परिचित ही हैं। परन्तु अब मैं थक चुका हूँ, राजकाज मे मेरा कोई आकर्षण नहीं रह गया है। इसके साथ ही मेरी जिन्दगी का भी अब कोई भरोसा नही है। अत: अब यह आवश्यक हो गया है कि मैं अपने समस्त पुत्रों में किसी योग्य पुत्र को युवराज चुन लूं जो मेरे बाद इस देश का राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक संचालन न्यायप्रिय ढंग से कर सके ।

138 / सम्राट के आंसू इसी सम्बन्ध में मैंने आप लोगों को यह आपातकालीन बैठक बुलाई है। विक्रमसिंह : महाराज, मेरे विचार से तो अभी आपको कुछ और प्रतीक्षा करनी चाहिए। विशेष रूप से उस समय तक जब यह बौद्ध संगीत समाप्त नहीं हो जाता है। अशोक : मैं भी पहले यही मोच रहा था, लेकिन जब से मैं बौद्ध संगीत में व्यस्त हुआ हूँ, कुछ विद्रोही ताकत सर उठाने लगी हैं और उन्होंने विद्रोह पैदा करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। मुझे विदित हुआ है कि इस अवधि में देश की राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था गिरती जा रही है। मुझे स्पष्ट आभास हो रहा है कि वे लोग मेरी व्यस्तता का नाजायज फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं। अत: मैं यह भी चाहता हूं कि मेरी अनुपस्थिति में आप लोगों के परामर्श से चयनित उत्तराधिकारी इस देश की बागडोर को अभी से ही संभाल ले और विद्रोही शक्तियों को मुंहतोड़ जवाब दे। जयदत : महाराज का विचार सही है। मेरे गुप्तचरों ने सूचना दी है कि इन विद्रोहों का उद्देश्य धार्मिक संप्रभुता कायम करना है। जनता जनार्दन को धर्म के आधार पर विभिन्न धार्मिक संस्थाओं द्वारा भड़काने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे यह संगीत पूर्ण न हो सके। मेरे गुप्तचरो के अनुसार ऐसी धार्मिक संस्थाएं जनता को गुमराह करने के उद्देश्य से भड़का रही है कि सम्राट अशोक ने जनता के धन का दुरुपयोग करके इस संगीत का आयोजन किया है। विक्रमसिंह : चूंकि महाराज का आदेश है कि राज्य में खून-खराबे की स्थिति न लाई जाए, इसका भी लोग लाभ उठा रहे हैं। यही कारण है कि जहां जनता में आपके विरुद्ध विद्रोह को भड़काया जा रहा है, वही राजमहल में विद्रोह पनप रहा है। सम्भावना है कि इस बौद्ध संगीत का समापन अधूरा ही रह जाए। अशोक : नही विक्रमसिंह "बौद्ध संगीत अवश्य पूर्ण होगा। लेकिन देश की स्थिति को देखते हुए युवराज का चयनित होना भी आवश्यक है। यदि इस अवधि में मेरा देहान्त हो गया तो तुम्हे यह वचन देना होगा कि तुम लोग इस संगीत को पूर्ण कराने में पीछे नहीं हटोगे। जयदत्त : महाराज, आप ऐसा मत कहिए। हम लोग तो चाहते हैं कि हम लोगों की उम्र आपको लग जाए। फिर महाराज अभी तो एक और नया इतिहास लिखा जाना है। अशोक : जयदत, तुम लोगो के अमूल्य योगदान, अनुभव से जो कुछ मैंने हासिल किया है, जनसेवा मे वशीभूत होकर जो कार्य किया है एवं बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार एव प्रसार मे जो योगदान आप लोगों से मिला है, वही इतिहास होगा। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपने आगामी शासक का चुनाव अभी से कर लो, जो मेरे द्वारा डाली गयी नीव को और मजबूत करके आने वाले इतिहास को स्वणिम बना सके।

: .. सम्राट के आंसू / 139 जयदत्त : ठीक है महाराज "यदि आप मेरा परामर्श चाहते हैं तो मेरे विचार से कुणाल के पुत्र संप्रति युवराज बनाए जाने योग्य हैं। अशोक : आश्चर्य है कि मेरे सभी पुत्रों को छोड़कर तुमने संप्रति को ही क्यों योग्य पाया। विक्रमसिंह : राजहित एवं जनहित को दृष्टिगत रखते हुए मैं भी जयदत्त के प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ। अशोक : आश्चर्य है। विक्रमसिंह : महाराज, इसमें आश्चर्य करने का कोई प्रश्न नहीं है। वैसे कारण स्पष्ट है कि यदि आपके पुत्रों में से किसी को युवराज बनाया जाता है तो इसमे अनेकानेक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। पहली समस्या तो यह है कि किसी एक पुत्र को युवराज बनाए जाने की अवस्था में सभी पुत्रो में टकराव हो सकता है। दूसरी बात यह है कि सभी पुत्रों को शासन व्यवस्था का पर्याप्त अनुभव नहीं है और किसी अनुभवहीन को राजगद्दी पर बिठाकर प्रगति की कामना निरर्थक ही होगा। ऐसी अवस्था में सम्भावना है कि हर पुत्र अपना अलग राज्य बनाने का प्रयास करे और "हर भाई एक दूसरे का दुश्मन बन जाए। अशोक : हो सकता है तुम्हारी बात सत्य हो लेकिन जहाँ तक राज कार्य के अनुभव का प्रश्न है, उन्हें इस बात का ज्ञान तो होगा ही कि शासन व्यवस्था का संचालन कैसे होता है और एक राजा क्या कर्तव्य है... विक्रमसिंह : शायद आपको याद होगा कि महारानी तिष्यरक्षिता ने भी शासन चलाने का प्रयास किया था और उसके क्या परिणाम सामने आए थे। हालांकि हम लोगों को महारानी जी के दर्दनाक अन्त पर अत्यन्त पीड़ा पहुंची है लेकिन अब हमारा प्रयास यही होना चाहिए कि राजगद्दी का भार ऐसे व्यक्ति को दिया जाए जो वास्तव में इस योग्य है और वह बिना किसी स्वार्थ के इस देश को शासन व्यवस्था को चलाने में सक्षम है। अशोक : यदि तुम्हारी बात को मान लिया जाए कि किसी अनुभवी राजकुमार, जिसे शासन तंत्र के नियमों का पूर्ण ज्ञान हो, को ही गद्दी पर बिठाया जाए तो भी यही प्रश्न उपस्थित होता है कि संप्रति में यह अनुभव कहाँ है ? विक्रमसिंह : निश्चम ही संप्रति भी न तो अनुभवी है और न ही उसे शासन तंत्रों का पूर्ण ज्ञान है । न्याय अन्याय की परिभाषा भी शायद ही उसे मालूम हो लेकिन यदि इन चीजों का ज्ञान उसे उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है तो निश्चय ही वह इस मामले मे शोघ्र निपुण हो सकता है महाराज यदि किसी नौसिखिए को तलवार दे दी जाए तो वह मित्र और दुश्मन की पहचान नहीं कर सकेगा परन्तु किसी ऐसे व्यक्ति को तलवार दे दी जाए, जो उसे सोखने में रुचि रखता है एवं वह इस पोग्य समझा जाता है कि वह वास्तव में तलवार चलाने के योग्य है तो उसे वह सभी : - 140/ सम्राट के आंसू कलाएं सिखाई जानी उचित होंगी, जिससे वह अपनी कला का ज्ञान तो प्राप्त कर ले परन्तु वह उसका दुरुपयोग न करें। चूंकि संप्रति अभी युवा है, उसमें वैभव है एवं सीखने की लालसा है तो उसे ही राजगद्दी का भार सौंपना चाहिए । इसके अतिरिक्त यहाँ मुख्य प्रश्न यह भी है कि राजगद्दी प्राप्त करने के बाद अपने प्रियजनों के मध्य कटुता न पैदा हो और गद्दी के लिए आपस में खून-खराबे की स्थिति न आए । चूंकि राजकुमार सप्रति को सभी प्यार करते हैं, अत: ऐसी स्थिति को सम्भावना नहीं है। जयदत्त : महाराज राजगद्दी के मामले मे वरिष्ठता क्रम को निर्धारित न करके योग्यता और अनुभव के आधार पर ही भावी शासक की नियुक्ति की जानी चाहिए। हालांकि आपके पुत्र वरिष्ठ तो हैं लेकिन उनको इस पद का भार सौपना किसी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। इसके अतिरिक्त भी राजगद्दी का भार ऐसे व्यक्ति को सौंपना उपयुक्त होगा जिसके कारण किसी प्रकार का वैमनस्य अथवा आपसी कटुता पदान हो और उसे सभी शासक के रूप में स्वीकार करने के समर्थन में हो । यदि इस सम्बन्ध मे जन समर्थन एकत्र कर लिया जाए, तो ज्यादा उचित होगा। .. 'विक्रमसिंह ः महाराज अभी जनसमर्थन एकत्र करने मे अनेकानेक समस्यायें हैं, फिर इसके लिए कोई ठोस तकनीक अपनानी होगी, जिस पर शासकीय व्यय भी काफी हो सकता है । फिर अभी हम किसी को शासक नहीं चुन रहे हैं, जिसके लिए जनसमर्थन की आवश्यकता महसूस हो। अभी तो हम केवल उत्तराधिकारी का मनोनयन कर रहे हैं। यदि संप्रति इस अवधि में अयोग्य पाया जाता है तो उसके स्थान पर किसी अन्य को उत्तराधिकारी चुना जा सकता है। अशोक : हाँ, यह बात सही है। फिलहाल मैं तुम लोगों के प्रस्ताव से सहमत हूँ और प्रयोग के तौर पर सप्रति को उत्तराधिकारी बना रहा हूं, इस अवधि में आप लोग उसे शिक्षित करने का प्रयास करें तथा शासन तंत्रों, नियमों, अर्थव्यवस्था सम्बन्धी नियम, जनहित की परिभाषाएं एवं उनके कार्यकलापों को समझाने का प्रयास करें। यदि 6 माह की अवधि मे वह इस योग्य हो जाता है तो उसका राजतिलक कर दिया जाएगा और यदि नहीं हो पाता है तो जन समर्थन के आधार पर मनोनीत व्यक्ति को राजगद्दी का भार सौंप दिया जाएगा। 'विक्रमसिंह : महाराज आप निश्चित रहिए । मुझे पूरा विश्वास है कि संप्रति एक योग्य शासक सिद्ध होगा और ऐसा शासक जो आपके इतिहास को गौरवान्वित करने में पूरा योगदान प्रदान करेगा। अशोक : अब मुझे अपने इतिहास की कोई चिन्ता नहीं है और यदि कोई चिन्ता है तो केवल इस बौद्ध संगीत को पूरा करने की और अपने स्थान पर ऐसा शासक नियुक्त करने की जो बौद्ध धर्म की शिक्षाओ के अनुसार शासन व्यवस्था का संचालन करते सम्राट के आंसू । 14 हुए जनहित में शासन व्यवस्था का संचालन करे। दृश्य परिवर्तन [संप्रति को पूरे सम्मान एवं बहुमत के साथ सम्राट अशोक का उत्तराधिकारी मनो. नीत कर लिया गया था । संप्रति अपने पिता कुणाल के समान ही शांत एवं विचारक प्रकृति का था । वह अनेकानेक विद्याओ का ज्ञाता था तथा राजकाज के संचालन में यदा-कदा योगदान भी किया करता था। हालांकि संप्रति के उत्तराधिकारी बनाए जाने पर सम्राट अशोक के पुत्रों को आश्चर्य तो हुआ परन्तु आपसी विचार विमर्श के बाद उन्होंने अपनी कोई आपत्ति नहीं प्रस्तुत की। परन्तु सप्रति के उत्तराधिकारी मनोनीत होते ही उन्होंने संप्रति के समक्ष समस्याओ का एक विशाल भण्डार प्रस्तुत कर दिया । इस समय उन्ही तमाम समस्याओं पर विचार विमर्श के लिए सम्राट अशोक के पुत्रगण एव पौत्र दशलथ राजमहल के सभाकक्ष में मौजूद थे। उनके साथ ही उनकी मातायें एवं पुत्रगणो की पलियां भी उपस्थित उज्जैनी : संप्रति हम सभी तुम्हारे उत्तराधिकारी मनोनयन किए जाने पर अपनी शुभ-- कामनाएं देते हैं और आशा करते हैं कि तुम एक अच्छे शासक सिद्ध होंगे। परन्तु सप्रति, शासन कार्य सचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है जबकि आज राजकोप को स्थिति क्या है, इसे तुम स्वयं देख चुके हो। किसी समय यह राजकोष अनेकानेक बहुमूल्य हीरे-जवाहातो से भरा-पूरा था। हमारे राजकोप की तुलना में विश्व का शायद ही कोई राजकोप रहा हो, जहाँ इतने बहुमूल्य हीरे-जवाहरात मौजूद हों। लेकिन पिताश्री ने भगवान बुद्ध के नाम पर जिस तरह से राजकोप को लुटाया है, उससे सभी परिचित है। माता तिष्यरक्षिता का बलिदान इसी राजकोष को बचाने के सम्बन्ध में किए गए प्रयामो का ही फल था। वे नहीं चाहती थी कि राजकोप का सारा धन बुद्ध के भिखारियों को तुटा दिया जाए। चूंकि वे नहीं चाहती थी कि हमारे राजकोप का सारा धन टूटी-फूटी इमारतों को बनवाने में बर्बाद कर दिया जाए, इसलिए उन्होंने कुछ नियम बनाए जिससे कुपित होकर पिताश्री ने उन्हें मृत्युदण्ड की सजा सुनायो, अब तो स्थिति और भी बदतर हो चुकी है और राजकोप में नाम मात्र को ही धन है । यदि पिताश्री पर किसी प्रकार का अकुश लगाने का प्रयास न किया गया तो बौद्ध संगीत समाप्त होते-होते राजकोप में फूटी कोड़ी भी नहीं बचेगी और तब इसके सिवा कोई चारा न रहेगा कि हम लोग भी भगवान बुद्ध के भिषारियों की भांति भिक्षा ग्रहण करके अपना जीवन यापन करें। ला. 17 142/ सम्राट के आंसू .. पर नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयास किया जाए । जहाँ तक मेरा विचार है, इस दिशा में संप्रति ही कोई न कोई ऐसा माध्यम खोज सकता है। पद्मावती : मेरे विचार से संप्रति को अभी से वीच में खींचना उचित नहीं है। जहां तक तिप्यरक्षिता को दण्ड दिए जाने की बात है, दुःख हमें भी कम नहीं है, लेकिन यह कहना कि उसे दण्ड राजकोप के कारण मिला, मैं इसका विरोध करती हूँ। शायद तुम्हे याद नहीं होगा कि उसने मेरे पुत्र कुणाल को आंखें निकाल ली थी और उसे उसको नवविवाहिता पत्नी के साथ अर्थात संप्रति की मां को भिखारियों- सा जीवन बिताने को बाध्य कर दिया था। दशलय : हो सकता, यह भी एक कारण हो, लेकिन इस सम्बन्ध में यह भी भूलना नही चाहिए कि केवल इस अपराध मे उसको मृत्युदण्ड देने का कोई औचित्य नहीं था। यदि उसने ऐसा अपराध किया था तो उसकी भी आंखें निकलवा देनी चाहिए थी, परन्तु वास्तविकता यह है कि उमने बौद्ध धर्म के तथाकथित भिखारियों को राज- कोप से धन देने पर पाबंदी लगा दी थी तथा राजकोप की दयनीय स्थिति को देखते हुए ही उसने जनता से कर वसूलने के आदेश दे दिये थे । इन्ही कारणों से विक्षुब्ध होकर सम्राट ने उसे मृत्यु दण्ड दिया था। तिवाला : पुरानी बातो को उठाकर हम आपस में क्लेश की भावना पैदा करें, यह उचित नहीं है। यदि हम ऐसी बातों के माध्यम से सम्राट अशोक को दोषी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तो हम विभाजित हो जाएंगे और जिस उद्देश्य के लिए हम लोग एकत्रित हुए हैं, वह कभी पूरा नहीं हो सकेगा । हमारा मन्तव्य केवल यह है कि पिताश्री जिस तरह से धन का अपव्यय कर रहे हैं, उस पर नियंत्रण लगाया जाए तथा देश की आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ किया जाए । सवाल यहाँ केवल राजकोष का नहीं है । सबसे अहम सवाल यह भी है कि देश में जो राज- नीतिक वातावरण पैदा हो गया है उसकी ओर पिताश्री का ध्यान दिलाना है । हमें पिताश्री की आलोचना नहीं बल्कि उन्हें देश की बिगडती स्थिति से अवगत कराते हुए यह अपेक्षा करनी है कि राजकोप के धन को अपव्यय से रोका जाए तथा सैनिक शक्ति को बढाया जाए, जिससे देश के विभिन्न स्थानों पर हो रहे विद्रोहों को शान्त किया जाए। दशलय : तिवाला का कथन सही है । मैं मां श्री से माफी मांगता हूं, जिससे उनके अन्तर्मन को ठेस लगी है। वास्तविकता यह है कि देश के आधिक ह्रास एवं राजनीतिक स्थिति को देखते हुए मैं अपना मानसिक संतुलन खो बैठा हूँ। अभी दो दिन पूर्व ही मुझे सूचना मिली थी कि कुछ राज्यों को आन्तरिक स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। कितना आश्चर्य है कि आज हम इस स्थिति में नहीं है कि हम लोग इम बगावत को शान्त करने का प्रयास कर सके। पद्मावती : बगावत और विद्रोह एक ऐसा प्रश्न है, जिसके कारण आप भटक रहे हैं, सम्राट के आंसू / 143 आश्चर्य तो मुझे भी है कि जहाँ दूसरे राज्यों मे विद्रोह हो रहे हैं, वहीं आज सम्राट अशोक के पुत्र ही उनके विरुद्ध विद्रोह की आवाज बुलन्द कर रहे हैं। अन्यथा सम्राट अशोक ने कभी भी ऐसे निर्देश नहीं दिए हैं कि इन विद्रोहों को शान्त करने के लिए आप लोग कुछ न करें। यदि आप लोग चाहते हैं तो खुद जाकर इन विद्रोहों को शान्त कर सकते हैं। उज्जनी : आपका विचार सही है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि सैनिक शक्ति इतनी अधिक क्षीण हो चुकी है कि हम लोग जाकर वहां करेंगे भी क्या। हमारी मेना के हथियार तो जंग खा चुके हैं और उनमें अब वह दिलेरी भी नहीं दिखाई देती है। सेनापति जयदत्त तो केवल बौद्ध संगीत का ही संचालन कर रहे हैं, उन्हें कोई चिन्ता नहीं है, विक्रमसिंह उस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए धन उपलब्ध करा रहे हैं, उन्हें जनता की परेशानियों को समझने एवं देश की आर्थिक समस्याओं की ओर ध्यान देने का समय नहीं है । फिर हम किस प्रकार वहाँ जाएँ ? जलोका : निश्चय ही सम्पूर्ण स्थिति का मूल्यांकन करके हम सभी जहां पहुंचते है वहाँ अपने आपको असहाय ही पाते हैं । इसका कारण यह है कि हम कुछ करने में सक्षम नहीं हैं। न तो हमारे पास अधिकार है और न ही जनसमस्याओं को समझने की बुद्धि। हम लोग पूरी तरह से भटक चुके हैं और आज पुनः भटक रहे हैं, क्योकि हम जिस समस्या पर विचार करने आए हैं, वह हमसे अलग होती जा रही है । दशलय : नही जलोका, हम जिन समस्याओं पर विचार करने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं, उसका सार एक ही है । यदि हम समस्या के आधारभूत सिद्धान्तों एवं मूलभूत बिन्दुओं पर परामर्श नही करते है तो उस समस्या को सही रूप में प्रस्तुत कर सकना संभव नहीं है। सवाल यहां पर राजकोष का है, लेकिन इस सम्बन्ध में इस बिन्दु पर भी विचार करना है कि राजकोष की आवश्यकता मुझे क्यो है। इसके लिए यह आवश्यक है कि देश की आन्तरिक स्थिति का मूल्यांकन किया जाए एवं इस बात का पिताश्री को एहसास दिलाया जाए कि देश की आन्तरिक स्थिति अत्यन्त विस्फोटक है और इससे निबटने के लिए सेना का आधुनिकीकरण किया जाना अनिवार्य है । इसके अतिरिक्त अन्य जनहित के कार्यों के लिए धन की आवश्यकता है और ऐसी स्थिति में राजकोष में मौजूद धन का दुरुपयोग न किया जाए एवं राजकोप को सुदृढ़ करने की दिशा में प्रयास किया जाए। जलोका : फिर वही सवाल पैदा होता है कि जब हमारे पास कोई अधिकार ही नही है तो हम समस्या को कैसे प्रस्तुत करेंगे। परन्तु अब जबकि युवराज संप्रति को उत्तराधिकारी बना दिया गया है, तब हम उन्ही के माध्यम से इन समस्याओ को पिताश्री के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं । संप्रति : लेकिन अभी मुझे ऐसा कोई अधिकार नहीं मिला है, जिससे मैं आपकी एवं राष्ट्र की समस्याओं को सम्राट अशोक के सामने रख सकूँ । फिर आप लोग बड़े 144/ सम्राट के आंसू हैं, मेरे सम्मानित हैं, आप लोग स्वयं सम्राट अशोक के समक्ष इन समस्याओं को प्रस्तुत कर मकते हैं। फिर यह समस्याएं राष्ट्र हित से संबंधित हैं अत: आप लोग इस मामले में किसी प्रकार का संकोच न करें। दशलय : युवराज संप्रति, यदि मेरे पास अधिकार होता तो निश्चय ही में सम्राट अशोक के कार्यकलापों का विरोध ही नहीं करता वरन् उनपर अंकुश लगाने का भी प्रयास करता । अव चूंकि अन्तिम रूप से तुम्हें युवराज घोषित कर दिया है, अतः अब अधिकार तुम्हारे पास सुरक्षित हो गया है कि तुम राष्ट्रहित में अपना परामर्श ही प्रस्तुत न करो वरन् उनके कार्यों पर अंकुश लगाने की दिशा में यथोचित कार्यवाही करो। संप्रति : लेकिन जब तक सम्राट अशोक जीवित हैं, मैं उनके कार्यों में दखल देने का अधिकारी नही हूँ । जहाँ तक अधिकार का प्रश्न है, हमारे परिवार के सभी सदस्य सम्मानित हैं और उन्हें अपनी समस्याएं रखने का पूरा अधिकार है। जलोका : तुम्हारा विचार गलत नहीं है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि हमारे अन्दर इतनी शक्ति नहीं है कि हम लोग इन समस्याओं को पिताधी के समक्ष प्रस्तुत करें। वैसे भी तुम्हें शासक बनना है और अब तुम्हे ही देश का आयिक एवं राजनीतिक भार संभालना है । मैं तुमसे पूछना चाहता हूं कि क्या तुम विरासत में ऐसा राज्य चाहते हो जहाँ न तो पैमा और न ही शान्ति अर्थात् पूरा राष्ट्र विद्रोह की आग में सुलग रहा हो। दशलय : वास्तविकता तो यह है कि हम लोगों के हाथ कट चुके हैं । अब इस देश की बागडोर तुम्हारे हाय में पिताश्री ने सौंप दी है । अतः पूरे तौर पर तुम्ही इस देश के भविष्य हो और तुम्ही इस देश निर्माता हो। हम लोग तो केवल तुम्हें राप दे सकते हैं। राज्य के हित और अहित का मूल्यांकन करने का कार्य तुम्हारा है। आगे जैसी तुम्हारी इच्छा । संप्रति : मैं आप लोगों के बहुमूल्य परामर्श से सहमत हूँ लेकिन आप लोगो के रहते मैं यदि इन समस्याओं को सम्राट के समक्ष रखता भी हूं तो हो सकता है कि न केवल वे मुझे पद्यत कर दें वरन् दण्ड भी दें। दरालय देखो संप्रति, इस प्रकार भयभीत होने से कुछ होने वाला नहीं है । सर्वप्रथम तुम पिताश्री को राजकीय की स्थिति से अवगत कराते हुए उन्हें समझाने का प्रयास करो कि राज्य को आपिक एवं राजनीतिक स्थिति अत्यन्त दयनीय हो चुकी है, जिमका फायदा पड़ोसी राज्य उठा रहे हैं । अनेकानेक राज्यो में विद्रोह की स्थिति पैदा हो चुकी है, जिसके कारण देश के विभाजित होने की संभावना बढती जा रही है । अतः इम बौद्ध संगीत पर हो रहे फिजूल घर्च को बद करके सैनिक व्ययस्या को मुह रनाया जाए तथा जनहित के कार्यों के लिए धन उपलब्ध कराया सम्राट के आंसू /145 संप्रति ठीक है। मैं आपके परामर्श अनुसार ऐसा करूंगा। लेकिन यदि पिताश्रीन माने अथवा उसके फलस्वरूप मुझे दण्डित किया अथवा जलोका : वेटे, इससे तुम निश्चिन्त रहो। हम सभी तुम्हारे साथ हैं । राज्य का पूरा प्रबुद्ध वर्ग तुम्हारे साथ है । यदि पिताश्री ने ऐसा कुछ किया तो एक बार पुनः वही पुराना इतिहास दुहराया जाएगा और राजमहल के इसी कक्ष में खून की नदियों वह उठेंगी। संप्रति : ठीक है । यदि आप लोगो का आशीर्वाद मेरे साथ है तो हम सब मिलकर पिताश्री को समझाएं। हो सकता है बहुमत के समक्ष वह झुक जाएँ और दशलथ : हाँ, यह टीक रहेगा। हम सभी सम्राट अशोक के समक्ष युवराज संप्रति के नेतृत्व में अपनी समस्याएं रखेंगे। इसके बाद जो कुछ होगा, उसका हम लोग सामना : . करेंगे। दृश्य परिवर्तन . . : [राजमहल के सभाकक्ष में सम्राट अशोक अपने सभी पुनगणों एवं पोत्रों के साथ मौजूद थे। कक्ष में उपस्थित सभी लोग मोन थे। सबके चेहरे पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों सभी कुछ कहना चाहते हो परन्तु पता नही क्यो उनकी जुबान पर ताले लगे हुए थे।] अशोक : आखिर तुम सभी लोग मौन क्यों हो? इस बैठक में मुझे क्यो आमंत्रित किया गया है तथा इसके पीछे क्या उद्देश्य है ? संप्रति : महाराज, हम सभी लोग बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थितियों से घिर गए है ? कुछ कहना चाहकर भी हम लोग कुछ कहने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं। अशोक : तुम लोग जो भी कहना चाहते हो निर्भय होकर कहो। फिर अब तो तुम राजगद्दी के उत्तराधिकारी मनोनीत कर लिए गए हो, फिर भय किस बात का है। संप्रति : महाराज, हमारे मध्य जो बातें फैली हुई हैं, वह अत्यन्त कड़वी हैं। परन्तु उनके पीछे राष्ट्रहित और जनहित भी निहित है। अशोक : जहाँ देशहित एवं जनहित हो, वहाँ संकोच कसा। तुम लोग अपने परामर्श प्रस्तुत कर सकते हो। संप्रति : महाराज, हम लोग देश की वर्तमान स्थिति को देखकर अत्यन्त दुःखी हो उठे हैं। देश के विभिन्न भागों मे विद्रोह हो रहे हैं, परन्तु हमारे पास न तो शक्ति है और न ही साधन है, जिससे इन विद्रोहों को शान्त करने की दिशा में कोई सक्रिय कदम उठाया जा सके। हमारी सेना की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई है। उसके पास जो हथियार हैं, वह जंग लगे हुए पुराने हथियार हैं। चूंकि हमारे सभी मंत्रि- गण एवं सेनानायक बौद्ध संगीत के समापन में व्यस्त है इसलिए हमारी सेना पितृविहीन एवं दिशाविहीन हो चुकी है और उन्हें निर्देश देने वाला कोई नहीं है।

146/ सम्राट के आंसू : अशोक : इसकी मुझे भी खबर मिल चुकी है, लेकिन मैंने वोद धर्म की शिक्षाओं और उपदेशो के पालन का व्रत ले रखा है, इसलिए किसी प्रकार का खून खरावा करने की स्थिति में नहीं हूं। फिर भी यदि तुम लोगों के पास कोई ऐमी योजना है कि बिना खून खरावे के इन विद्रोहों को शान्त किया जाय तो मैं अपनी सहमति प्रदान करता हूँ। संप्रति : मूल समस्या योजना की नहीं है। योजनाएं तो हमारे पास बहुत हैं, परन्तु समस्या धन की है। राजकोष की स्थिति अत्यन्त शोचनीय है । जो धन उसमें बचा भी है, उमे भी बौद्ध सगीत के आयोजन में व्यय किया जा रहा है । अतः हम लोगों का विचार है कि इन योजनाओं के क्रियान्वयन के उद्देश्य से एवं राष्ट्रहित मे बौद्ध संगीत का समापन करा दिया जाए तथा उससे बचे धन से सेना का आधुनिकीकरण करके इन विद्रोहों को शान्त किया जाए। अशोक : नही संप्रति, ऐसा कभी नही हो सकता। यह संगीत समारोह अपनी अवधि के बाद ही समाप्त होगा। संप्रति : लेकिन महाराज, तब तक राजकोष खाली चुका होगा और राष्ट्र की आन्तरिक स्थिति। अशोक : बेटे, चाहे राजकोष खाली हो जाए या हम लोग भिखारी बन जाएं, यह कदापि नही बन्द हो सकता। संप्रति : ठीक है, यदि संगीत नही बन्द हो सकता तो बकाया राजस्व की वसूली तो हो सकती है । जैसा आपको स्वयं भी विदित हो चुका होगा कि पड़ोसी राज्य आपकी इस कमजोरी का पूरा फायदा उठा रहे हैं। इस समय हर स्थिति में धन चाहिए जिससे राष्ट्र की संप्रभुता की सुरक्षा की जा सके। अशोक : मैं सब जानता हूँ, इसीलिए मैंने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है। अब तुम्हारा यह कर्तव्य है कि तुम इस देश की रक्षा करो तथा जहाँ-जहाँ विद्रोह हो रहे हैं, वहां अपने पिता कुणाल के आदर्शों का पालन करते हुए उन्हें शान्त कराने का प्रयास करो। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं एक ऐसी सीमा के अधीन 'कि मैं कुछ कर सकने की स्थिति मे नही हूँ। राजस्व वसूली, जो कि राष्ट्र की आय का एक प्रमुख साधन है, के प्रश्न पर भी जनहित को दृष्टिगत रखते हुए ही विचार करना है। इधर गत वर्षों से देश के विभिन्न भागो में सूखे एवं अतिवृष्टि से स्थिति अत्यन्त भयावह हो उठी है। इसलिए गरीब जनता पर अत्याचार करके राजस्व वसूली की अनुमति हम कदापि नहीं दे सकते हैं, विशेष रूप से ऐसी स्थिति में जबकि देश के नागरिक बौद्ध सगीत मे तन-मन-धन से पूरा योगदान दे रहे हैं। दशलय : बडी ही असमंजस पूर्ण स्थिति पैदा हो गई है दादाजी। न तो आप बौद सगीत का समापन करवाने के पक्ष में हैं और न ही बकाया राजस्व की वसूली के .. कैद हो चुका सम्राट के आंसू -147 पक्ष में हैं, फिर किस प्रकार हम अपनी सुरक्षा सम्बन्धी योजनाओं का क्रियान्वयन करें । मुझे तो यही लग रहा है कि अब इस देश को तबाही से बचाने के प्रयास निरर्थक हैं। अशोक : (गरजते हुए) दशलथ । दशलय : क्यों चीख रहे हैं अब आप? यह चीख न तो अब एक शासक की है और न ही संन्यासी की। आपने अपने ही परिवार के सदस्यों को कैदियो की भांति रख रखा है, जिन्हें न तो कुछ कहने का अधिकार है और न ही करने का। आप ही इस परिवार के सर्वेसर्वा हैं। लेकिन दादाजी, आप भी याद रखिए कि भले ही आप हमारी आवाज दबा दें, परन्तु उन विद्रोही शक्तियों की आवाज अब नही दब सकेगी। अशोक : ओह तो तुम लोग भी विद्रोह पर आमादा हो उठे हो। दशलथ : विद्रोह तो देश में हो रहा है महाराज । यही कारण है कि आज की चिन्ताजनक स्थिति को देखते हुए आपने हम लोगों को विद्रोह करने लिए बाध्य कर दिया .. अशोक : देखो, अब केवल दो माह की ही बात है, इसके बाद मैं स्वयं संप्रति का राज्या- भिषेक कराकर संन्यासी बन जाऊंगा। दशलय : लेकिन जब राजकोष मे धन ही नहीं रहेगा तो संप्रति क्या करेगा? धनविहीन राज्य का शासक कभी भी देश की रक्षा करने में सक्षम नही हो सकता। अशोक : नही दशलथ, संप्रति तुम लोगों के सहयोग से सम्राट अशोक की ही तरह शासन करेगा। अपने देश एवं प्रजा की भलाई के लिए वह एक अच्छा शासक सिद्ध होगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह भगवान बुद्ध के उपदेशों में आस्था रखते हुए जनहित के कार्यों को प्राथमिकता देगा। संप्रति : महाराज, मैं भी बौद्ध धर्म का अनुयायी हूँ और उनकी शिक्षाओं में मेरी पूर्ण आस्था है। लेकिन अशोक : लेकिन क्या। संप्रति :महाराज, एक राजा के अधिकार की सीमा होती है । एक अच्छे राजा के ऊपर जनता एवं राज्य की संप्रभुता बनाए रखने का एक महान दायित्व होता है । इसलिए राजा का प्रथम कर्तव्य यही है कि वह देश की सप्रभुता की रक्षा करते हुए उसके विकास को महत्त्व दे एवं जनता के सुख-दुख में अपने को सदैव तत्पर रखे । इसी के साथ ही राज्य को सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ बनाए रखने के लिए संगठित सेना का होना भी अनिवार्य है। यदि राज्य की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है और सैनिकों के पास हथियारो को कमी है तो वह राज्य कभी भी शान्त नहीं रह सकता। जहाँ तक धार्मिक अनुष्ठानों एवं कार्यक्रमों के संचालन का प्रश्न है, इसके लिए राजकोप लुटाना जनता.के साथ अन्याय करना है। किसी भी शासक ।

148/ सम्राट के धांसू .. का धर्म निरपेक्ष होना जरूरी है। किसी एक धर्म को मान्यता देकर उसका प्रसार करना एवं उस पर धन व्यय करना जनहित में नहीं हो सकता। अतः एक राजा का यह भी कर्तव्य हो जाता है कि वह अपने देश के सभी धर्मों को समान रूप से मान्यता प्रदान करे। अशोक : मेरे विचार से भी एक आदर्श राजा में यह सभी गुण होना अनिवार्य है । जहाँ तक धर्मों को मान्यता देने की वात है मैंने किसी धर्म को मान्यता नही दी है बल्कि बौद्ध धर्म के माध्यम से सभी धर्मों को एक सूत्र में पिरोकर एक आदर्शवादी धर्म की नीव डाल रहा हूं, जिसका मूल मंत्र मानवता की रक्षा करना, समस्त जीव जन्तुओं के प्रति दया भावना रखना, अहिंसावादी नीतियों को अपनाकर सत्य पर विजय पाना एव मास-मदिरा का त्याग करना है। बेटे, मैंने जिन्दगी में जो कुछ देखा है एवं जैसा किया है, उसका सार यही ज्ञात हुआ है कि मानवों के बीच जितने भी युद्ध होते हैं, दगे-फसाद होते है, विद्रोह सर उठाकर खून की नदियां बहाने को लालायित हो उठते हैं । बेटे, शान्ति के यह दुश्मन मदेव गरीब जनता को ही अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए बलि का बकरा बनाते है । न केवल ऐसे व्यक्ति गरीबों के रक्त मे अपनी प्यास बुझाते है वरन् उनका तरह-तरह का शोषण करते हैं एवं उनकी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। शायद तुमको इस बात का ज्ञान न हो, लेकिन मुझे मालूम है कि यह सब तभी होता है जव अनेकानेक धर्मों का आपसी टकराव होता है । यह लोग एक धर्म को दूसरे धर्म से सर्वोच्च स्तर प्रदान करने के लिए सब कुछ करते हैं । इसीलिए मैं इस बौद्ध संगीत के माध्यम से विश्व के सभी धर्मों के अनुयायियो को यह बता देना चाहता हूँ कि जब सभी धर्मों का निर्माता मानव है, तब यह धार्मिक लडाई क्यों ? बेटे, एक बात हमेशा याद रखना कि अगर तुम धर्म के दास हो गए तो वहाँ विद्रोहात्मक स्थिति पैदा होगी, और वही कुछ आज हमारे राज्य में भी हो रहा है। तथ्यात्मक स्थिति यह है कि जहाँ मानव धर्म का दास हो गया, वहाँ विद्रोहात्मक स्थिति पैदा हो जाएगी । भले ही इससे धर्म को विजय मिल जाए परन्तु मानवता सदैव सिमकती रहेगी। इसके विपरीत यदि धर्म मानव का दास हो जाए तो वहां कर्म को विजय मिलती है। वास्तविकता तो यह है कि धर्म सदैव कर्म की पूजा करता है न कि कर्म धर्म को। जहाँ धर्म अधर्म हो जाता है, वहां कम ही धर्म को नियत्रित करके पुन: उमे वास्तविक रूप में लाता है । अत: आज हमारा उद्देश्य धर्म का दास न बनकर धर्म को दास बनाना है, जिससे हम अपने कर्म रूपी धर्म से मानवतावादी धर्म की नीव डाल कर जनसेवा की भावना को जागृत कर सकें। संप्रति : हम आपके विचारों का आदर करते हैं। लेकिन क्षमा करें महाराज, राजकाज मे दार्शनिकता से कार्य चल सकना संभव नही है । जब तक आप सभी धर्मों को एक सूत्र में पिरोकर एक नये धर्म के निर्माण की कल्पना को साकार रूप प्रदान करेंगे, सम्राट के आँसू /.149 " तब तक यह देश विखंडित हो चुका होगा और तव फिर न यहाँ सम्राट अशोक मम्राट रहेगा और न ही उसकी कल्पना का साकार रूप देखने को मिलेगा । राजन् हमारा उद्देश्य शासन करना है, इसलिए शासन करना है कि गरीबों को न्याय मिले, असहाय को मंरक्षण मिले और देश के सभी राज्यों को एक सूत्र में पिरोकर एक आदर्श राष्ट्र की स्थापना की जा मके। दशलय : महाराज, हम सभी आपके विचारों से सहमत है और उसमे हम लोगों की पूरी आस्था भी है। भगवान बुद्ध के विचारों से हम भी सहमत हैं और इसलिए हम सभी उनके मतों का प्रचार करना अपना धर्म समझते हैं। इसका ज्वलन्त उदाहरण यही है कि आपके मभी पुत्रों को राजगद्दी में कोई मोह नहीं था और न है। हमारे परिवार के किसी सदस्य ने कभी भी आपकी आलोचना नहीं की है। लेकिन देश की जो स्थिति वर्तमान समय में देखने को मिल रही है, उससे इस बात का स्पष्ट आभास मिलता है कि इस स्थिति का एकमात्र कारण केवल एक धर्म का प्रचार एवं उमके पुनरुत्थान के लिए देश की प्रजा का धन बर्बाद किया जाना है । महाराज, राजनीति का तात्पर्य यह नहीं है कि किसी एक समूह या एक मंप्रदाय सयवा एक धर्म को संरक्षण देकर देश का सम्पूर्ण धन उसी पर बलिदान कर दिया जाए और वह भी केवल इसलिए कि पूर्व कर्म का प्रायश्चित करना है। पिताश्री, राजनीति का तात्पर्य यह नहीं है कि चन्द लोगों के बहकावे में आकर विचारों की दासता को स्वीकार कर लें बल्कि राजनीति का तात्पर्य कर्म से नहीं अथवा अपने कर्मों के प्रायश्चित से नहीं। देश की जनता के विचारों में समानता माने के लिए होता है। एक राजा का कर्तव्य है कि वह अपने देश की सीमा के अन्दर रहने वाली जनता को सुख-सुविधा का पूरा ख्याल रखे और यह तभी मम्भव है जबकि राजा धर्म निरपेक्ष हो और समस्त धर्म एवं संप्रदायों को अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अवसर प्राप्त हो। केवल यह आधार मान लेना कि बौद्ध धर्म की शिक्षाएं जनहित मे है तो इसका तात्पर्य यही होगा कि अन्य सभी धर्मों की शिक्षाएं मानवता विरोधी हैं। अर्थात् आपके दृष्टिकोण के आधार पर कहा जा सकता है कि हर धर्म की शिक्षाओ में कुछ-न-कुछ विकार है। यही पर राज- नीति अपना कार्य करके एक निर्धारित लक्ष्य प्रस्तुत करती है और इन राजनीतिक सिद्धान्तों के तहत राजा का यह पहला धर्म बन जाता है कि वह ऐसी शिक्षा नीति का निर्माण करे, जिससे इन धर्मों के उपदेशों में मौजूद विकारों को हटाकर एक नई नीति निर्धारित की जाए, जिसमें हमारे समाज का चतुर्मुखी विकास हो सके। अशोक : निश्चय ही तुमने जो राजनीति की व्याख्या की है, उसमे में अपने को सहमत पाता हूं और इस बात को प्रशंसा भी करता हूं कि तुमने राजनीतिक क्षेत्र मे इतनी प्रगति हासिल कर ली है। लेकिन मैं यह जानता हूं कि इस राजनीति का उद्देश्य 150) सम्राट के आंसू इस संगीत को बंद करना है। लेकिन मैं तुम्हें इतना स्पष्ट कर दूं कि यह संगीत अपनी अवधि समाप्त करने के बाद ही समाप्त होगा। यही मेरा अन्तिम निर्णय है । मैं जानता हूं कि राजमहल के अन्दर पड्यन्त्र रचा जा रहा है और यही कारण है कि पहले जिन स्वर्ण बर्तनों में बौद्ध पुजारियों को भोजन दिया था, बाद मे उनका स्थान चांदी के बर्तनों ने लिया। लेकिन इस पर भी तुम लोगों को संतोय न हुआ और उन्हें कांस्य के बर्तनों में भोजन देने को बाध्य कर दिया। परन्तु जब में मैंने संप्रति को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है, तुम लोगों का पड्यन्त्र तीव्र हो उठा है और अब स्थिति यह है कि कांस्य के बर्तनों के स्थान पर अपने अतिथि बौद्ध पुजारियों को पत्तल में भोजन देने के लिए बाध्य हो गया हूं। लेकिन अब यह कहना कि इस कार्यक्रम का समापन कर, यह कदापि सम्भव नहीं है। हाँ कार्यक्रम समाप्त होते ही में विधिवत् संप्रति का राज्याभिषेक कर दूंगा तब तुम लोग अपने इस राजनीतिक दर्शन का उपयोग करना। संप्रति : पिताश्री, आपका यह निर्णय राजहित में उचित नहीं है। हमारे देश की जनता इस ममय संकट में है। देश की शान्ति व्यवस्था दांव पर लगी हुई है। जगह-जगह विद्रोहियों के सिर उठ रहे हैं और करले आम हो रहा है। चूंकि मैं इस देश का भावी शासक हूँ अत: यह सब देख सकने में असमर्थ हूँ हालाकि आपके निर्णय के विरुद्ध तो हम नहीं जा सकते लेकिन मेरा आज अन्तिम निर्णय यह है कि माज से बौद्ध भिक्षुओं के भोजन आदि पर ध्यम की जाने वाली राशि माघी कर दी जाए और यदि एक माह की अवधि के अन्दर यह कार्यक्रम समाप्त नही किया जाता है तो इस समारोह का व्यय भार वहन करने में राज्य अपने को असमर्थ पाते हुए आर्थिक सहायता देना बन्द कर दें। अशोक : मत भूलो संप्रति, कि मैं इस देश का शासक हूँ और तुम्हें पदच्युत करने का अधिकार अभी मेरे पास सुरक्षित है। संप्रति : निश्चय ही आप मुझे पदच्युत कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए आपको बहुमत एकत्रित करना पड़ेगा। अशोक : (धोखते हुए) संप्रति । संप्रति : चीखने चिल्लाने से अब कोई काम चलने वाला नहीं है। यह रहमत से लिया गया मेरा अन्तिम फैसला है। अशोक : (सलयार म्यान से निकालते हुए) संप्रति मेरा वहमत यह सिद्ध करेगी। उज्जनी : पिताश्री, जंग लगी तलवारों से बहुमत सिद्ध नहीं होता। जहाँ तक रहा इम नंगी सलवार का प्रश्न, पिताश्री, हम आज और इसी वक्त से संप्रति को अपना राजा स्वीकार करते हैं और आपका बहिष्कार करते हैं। ..

सम्राट के आंसू / 151 अट्ठारहवां दृश्य [सम्राट अशोक अपने कक्ष में बैठे हुए थे। उनके चेहरे पर आते-जाते भावों से स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता था कि वह किसी गहनतम सोच-विचार में मग्न थे। कभी तो उनके चेहरे पर क्रोध की भाभा झलकने लगती तो कभी उनका चेहरा बेबसी के कारण सिकुड उठता था। इस समय उनके समक्ष मोगलिपुत्त तिस्स और महेन्द्र बैठे हुए थे एव चेहरे पर आते-जाते भावों का अवलोकन कर रहे थे। अशोक : गुरु महाराज, अब तो मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? राजकोप से धन आना बिल्कुल बन्द हो गया और इस संगीत को पूरा होने मे अभी 15 दिन की अवधि और शेष है। तिस्स मोगलिपुत्त : राजन्, आपको चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है। हम लोग भिक्षुक हैं और जनता जनार्दन से मिक्षाटन करके एव दान प्राप्त करके धन एकत्र करेंगे और इस संगीत को अवश्य पूरा करेंगे। अशोक : नही ऐसा कभी नहीं हो सकता । मेरे जीते-जी आप भिक्षाटन करें, यह मेरा नहीं सम्राट अशोक का अपमान है । यह संगीत अवश्य पूरा होगा चाहे इसके लिए अपने ही पुत्रो के खून से। मोगलिपुत्त : नही राजन् "ऐसा अनर्थ मत कीजिएगा अन्यथा यह संगीत अधर्मी हो जाएगा और जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने इस विशाल आयोजन को अन्तिम चरण तक पहुंचा दिया है, वह विखंडित हो जाएगा। अब आपको काम-क्रोध, मान-अपमान, यश-अपयश सभी कुछ त्यागकर केवल भगवान बुद्ध के उपदेशों पर ही चिन्तन करना चाहिए । अशोक : आपका, विचार सही है । लेकिन एक सम्राट के बुलावे पर आए दूर-दराज क्षेत्रो के अतिथियों को जब हम पत्तल मे भोजन परोस रहे हैं तो वे क्या सोच रहे होगे। मोगलिपुत्तः राजन् पत्तल मानव का जन्म-जन्मांतर का साथी रहा है। जब मानव सभ्यता की सीढ़ी पर चढ़ रहा था, तो सर्वप्रथम पत्तलों में ही भोजन परोसकर खाता था। इसलिए आप निराश न हो;"हम लोग भिक्षु हैं और हमे सुख-दुःख का कोई बोध नही है चाहे हमे अन्न-जल मिले अथवा न मिले । अशोक : लेकिन इसके बावजूद भी मेरा मन मुझे क्षमा करने को तैयार नहीं है गुरु महाराज । कितने गौरव के साथ मैंने बौद्ध संगीत के आयोजन को सफलता की अन्तिम सीढ़ी तक पहुंचाने के लिए दूर-दराज देश-विदेशो तक से बौद्ध भिक्षुओ एवं अतिथियो को आमत्रित किया। लेकिन । महेन्द्र : पिताश्री, आप अपने मन को इतना छोटा मत कीजिए। हम भिक्षुगण तो भिक्षा- ‘टन करके भोजन करने के आदी हैं और यही हमारा कर्तव्य भी है। यदि भिक्षाटन 152 / सम्राट के आंसू से भोजन न प्राप्त हो तो हम लोग भूखे रहने के भी आदी हैं । भार मेरे भाई मुझे और हमारे श्रद्धालुओं को भोजन नहीं देते हैं तो आप इसमें परेशान मत हो। हम हर स्थिति में बिना अन्न-जल ग्रहण किए भी इस संगीत को पूरा करने में कोई कमर नही रखेंगे और आपको किसी प्रकार की शिकायत का अवसर नहीं देंगे। अशोक : ठीक है. "आप कहते हैं तो मैं चिन्तामुक्त होने का प्रयाम करता हूं। लेकिन इस संगीत का हर स्थिति में अपने समय पर ही समापन होना चाहिए। दृश्य परिवर्तन [राजमहल के सभा कक्ष में संप्रति की अध्यक्षता में एक आपातकालीन बैठक आहूत की गयी थी। इसमे लगभग परिवार के सभी सदस्य मौजूद थे। सेनापति जयदत्त एवं अर्थ मंत्री विक्रम सिंह को इस बैठक में मुख्य अतिथि के रूप मे विशेष रूप से वैशाली से बुलाया गया था। संप्रति : मैंने आप सभी गणमान्य लोगों को विभिन्न राज्यों में विद्रोह शान्त करने के लिए भेजा था। हमें मिली सूचना के अनुसार हमारी सेना ने जिस तरह इन विद्रोहों को शान्त करने का प्रयाम किया है, उसमे मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि हमारी सेना आज भी वही है जो पहले थी । मैं अपने उन सभी बुजुर्ग एवं सम्मानित परिवार के सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होने इस महत्त्वपूर्ण कार्य के समापन मे अपना योगदान दिया तथा देश की अर्थव्यवस्था को ऊँचा उठाने में सक्रिय भूमिका निभायी है । मैं सेनापति जयदत्त का आभारी हूँ, जिन्होने अपने सैनिकों को प्रशिक्षित करके इन विद्रोही को शान्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। दशलप : यह समय आभार व्यक्त करने का नहीं है बल्कि इस पिछड चुके देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करना है। भले ही हमने विद्रोह को शान्त कर दिया है लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इसका स्थायी समाधान हो गया। यह भी हो सकता सकता है कि ऐमे विद्रोही तत्व छिप गए हों इसलिए यह संभव है कि वे पुनः विद्रोह करें और हमारे बीच पड़ रही विद्रोह की दीवार के प्रकाश मे आते ही वे पुनः इसका फायदा उठाने का प्रयास करें। उज्जनो: दगलय की बात सही है। मैंने अपने क्षेत्र में विद्रोह को शान्त कर दिया है। इसी के साथ ही राजस्व वसूली की दिशा में भी सक्रिय योगदान किया है। जब मुझे विदित हुआ कि पिताश्री की कमजोरी का कुछ विधीलिए फायदा उठा रहे हैं .. सम्राट के आंसू / 153 तथा देश में संकट की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं तब मैंने इन विचौलियों के गोदामों, परोपर छापे मारे जहाँ से काफी धनराशि वरामद हुई है। परन्तु इसके बावजूद विद्रोही तत्व गिरफ्त मे नही आ सके हैं । अतः इस सभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि समय आने पर यह पुनः विद्रोहों का संचालन करेंगे। जलोका : यहां मूल प्रश्न विद्रोह को दबाने का नही बल्कि देश की जनता मे शासन और शासक के प्रति आस्था पैदा करने का भी है। जब तक हम जनता का विश्वास एवं समर्थन अपने पक्ष में नहीं कर लेते, तय तक यह विद्रोह बार-बार होते रहेंगे और सभावना है कि देश विखडित हो जाए। हम केवल विद्रोही शक्तियो पर दोप मढ़कर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो जाते । यदि शरीर के किसी भाग को कोई रोग हो जाता है और उसका उपचार समय से नहीं किया जाता तो वही रोग पूरे शरीर के विनाश का कारण बन जाता है । अतः हम सभी को सम्पूर्ण तथ्यो पर विचार करना होगा। यदि हम पूर्व की राजनीतिक स्थिति पर सूक्ष्म दृष्टिपात करें तो स्पष्ट विदित होगा कि इन विद्रोहो के जनक कर्ता पिताश्री ही है । उन्होने केवल एक धर्म को प्रथय देकर अन्य धर्मों को विद्रोह करने को बाध्य किया है। अतः हमारा सर्वप्रथम यह कर्तव्य है कि हम देश को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र मे परिवर्तित करने की घोषणा करें। उसके बाद जनता के आर्थिक एवं सामाजिक स्तर को उठाने की दिशा में प्रयाम किया जाए। संप्रति : मैं आपके विचारों का आदर करता हूँ। आपने जो सुझाव दिए हैं, वह राष्ट्रहित में हैं और उन्हें लागू करने में कोई कठिनाई नही है । यहाँ मूल प्रश्न धन है, राज- कोप तो महाराज ने अपने अधीन कर रखा है और वहाँ भी इतना धन नहीं है कि हम जनता के आर्थिक स्तर को उठाने के लिए प्रयास कर सकें। मेरे विचार से उचित तो यह होगा कि आप मब लोग अपने क्षेत्र मे जांच करके इम प्रकार के भ्रष्ट व्यवसायियों, बिचौलियों के यहां छापे मारकर धन एकत्रित करें और उस धन को जनकार्यों में व्यय करें, जिससे हम जनता के विश्वास को जीतने में सफल हो सकें। आप सभी लोग इस सम्बन्ध मे रक्षामंत्री एव अर्थमंत्री मे परामर्श कर लें और जैसा वह कहें उसी के अनुसार कार्यवाही करें। हमे आशा ही नही पूर्ण विश्वास है कि हमारे पुराने एव अनुभवी मंत्री आपको पूरा सहयोग देंगे, जिससे इस देश की सप्रभुता की रक्षा की जा सके। जयदत्त : मैं अपने भावी शासक के आदेशों का पालन करने के लिए कृतसंकल्प हूँ! । लेकिन आप लोगों ने बौद्ध संगीत को जो धन देना बन्द कर दिया है, वह उचित नहीं है। मेरे विचार से वौद्ध संगीत को पर्याप्त मात्रा में धन उपलब्ध कराया जाना उचित प्रतीत होता है क्योकि अब सगीत समापन में मात्र 14 दिन शेष है और इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि यह सम्राट अशोक की अन्तिम इच्छा है। संप्रति : अन्तिम इच्छा ..

पवाद 154/ सम्राट के आंसू विक्रम सिंह : हो. "राम्राट का स्वारप्य प्रतिदिन गिरता जा रहा है परन्तु यह दिन-रात पौर संगीत को पूरा कराने में व्यस्त है। यदि मुझे धमा प्रदान करें तो में भी कुछ तथ्य आपके सम्मुर प्रस्तुत कर। संप्रति : यह आप यया कह रहे हैं। आप मेरे सम्मानित सदस्य हैं फिर इस प्रकार का मंकोच यों ? आप जो कुछ पहना चाहते है, निःसंकोच कहिए। विक्रम सिंह : मैं देप रहा हूँ कि आप मभी लोग सम्राट अशोक की आलोचना करके सारा दीप उन्ही पर मना रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सम्राट अशोक जमा मामी और पराक्रमी सम्राट ने तो आज तक हुआ है और न ही भविष्य में हो सकता है । सम्राट अशोक एक न्यायप्रिय, विभिन्न धर्मों में मास्था रखने वाले शासक हैं । इस देश को एक मूत्र में पिरोने का जो प्रयास उन्होंने किया है, उसके लिए हम सभी उनके ऋणी हैं। पहले यह एक विद्वान थे परन्तु बाद में उन्हें नरसंहारक बनाने के लिए बाध्य कर दिया गया। लेकिन कुछ ही वह दयालु और जनता को न्याय प्रदान करने वाले शासक बन गए । यह सही है कि उन्होंने भगवान युद्ध की सेवा का प्रत्त तो लिया परन्तु उन्होंने सभी धर्मों को पूरा प्रथय दिया है और किसी भी धर्म के विरुद्ध उन्होंने ऐसा कोई कार्य नही किया जिससे अन्य धर्मो की भावनाओं को ठेस सगे। उनकी न्यायप्रियता का मूल्यांकन इसी से किया जा सकता है कि उन्होंने चापलूस धर्मावलंबियों को इसलिए सहायता नहीं प्रदान की षयोकि उनका उद्देश्य धर्म के नाम पर राजकोप से धन प्राप्त करके विलासिता पर खर्च करना या । उन्होंने स्पष्ट रूप में यह पोषणा कर दी थी कि जो भी धर्म मानव हित के लिए मानव विकास की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है, सामने आए । यदि उनकी शिक्षाएं बौद्ध धर्म की शिक्षाओं से मिलती-जुलती हैं तो उनके लिए राजकोप सदैव खुला रहेगा परन्तु मूल्यांकन एव जाच करने पर विदित हुआ कि सभी धर्मों की शिक्षाएं तो एक-सी हैं परन्तु उनके प्रवर्तक अलग-अलग हैं । हर प्रवर्तक के अलग-अलग अनुयायी हैं और हर अनुयायी यही चाहता है कि उनके धर्म के प्रवर्तक को महत्व प्रदान किया जाए। आप लोग बाज जो कुछ भी देख रहे हैं, वह पहले नहीं थी। यहां ब्राह्मण- वाद के पाखण्ड प्रवर्तको ने देश की जनता को अपने चंगुल में बांध रखा था। जन-- शोषण के साथ नारी का शोषण उनका मुख्य उद्देश्य था । देश की राजनीति में उनका पर्याप्त हस्तक्षेप था। ढोंगी साधू-संन्यासी भगवान के नाम पर जनता को लूट रहे थे। वहीसाधू-सन्यासी जो समाज के सामने यज्ञ, महायज्ञ आदि के प्रस्ताव रखकर भगवान के नाम पर जनता को लूट रहे थे, स्त्री की आलोचना करते थे तथा उन्हे ऐसे पुनीत कार्यों में भाग लेने से मना करते थे, यही पाखण्डी आश्रम मे रासलीला करते थे। उस समय पर्दा-प्रथा इतनी विकृत थी कि आज के समान आप नारियों को स्वच्हंद' विचरण करते नही देख सकते थे। इसी पाखण्डवाद ने मानव समाज को कई भागों । सम्राट के आंसू / 155 में विभक्त कर रखा है। क्या मजाल थी कि कोई शूद्र पर तरस खाकर उसे प्रश्रय देने का साहस कर दे। यहां तक कि शूद्रों का बस्ती तक में प्रवेश वजित था और उन्हें समाज का कोढ़ समझा जाता था। इस प्रकार के कितने उदाहरण दूं आप लोगों को। परन्तु हमारे सम्राट अशोक ने देश को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करने के उद्देश्य से ही समस्त धर्मों को एक सूत्र मे पिरोने का संकल्प लिया। जहां तक विद्रोह की बात है, यह पाखण्डवाद नहीं चाहता कि राज्य में खुश- हाली हो। आज से एक वर्ष पूर्व तक यह विद्रोही शक्ति न के बराबर थे। उज्जनी और जलोका को याद होगा कि जब पाटलीपुत्र मे विद्रोह हुआ था तो संप्रति के पिता ने ही जनता को अपनी ओर करके इन विद्रोही शक्तियों को कुचल दिया था। अब जब उन्हें यह पता लग चुका है कि सम्राट अशोक संगीत समारोह में व्यस्त हैं, तव' फिर उन्हें मौका मिल गया है । परन्तु आप लोगों ने विद्रोह को जिस प्रकार शान्त किया है, उसके लिए हम और हमारे देश की जनता आपके प्रति आभारी है। मेरा आप लोगो से यही निवेदन है कि आप आलोचना न करके विकास की दिशा में कार्य करें। जहां तक बौद्ध संगीत की बात है, मात्र 14 दिन की अवधि और शेष रह गई है, अतः आप लोग उसे पूर्ण करने में अपना पूर्ण योगदान प्रदान करें। संप्रति : हम सभी आपके विचारों से सहमत हैं, परन्तु स्थिति तो यह है कि राजकोष में नाममात्र को धन वचा है । देश की स्थिति को देखते हुए हालांकि इस संगीत का और व्यय भार वहन करने की स्थिति में हम लोग नहीं है फिर भी मैं अपने बुजुर्ग साथियों से आग्रह करना चाहूंगा कि 15 दिन तक और आर्थिक सहायता प्रदान की जाए । संगीत समापन के साथ ही राजकोप से किसी प्रकार की आर्थिक महायता न दिए जाने का संकल्प ले लिया जाए। इसी के साथ हम सभी लोगो मे आशा करते है कि सभी लोग अपने राज्यों - मे वापस चले जाएं और न केवल विद्रोही शक्तियों को खोज कर दण्डित करें वरन्. जनता का विश्वास प्राप्त करने का भी पूरा प्रयास करें। यदि जनता का विश्वास हमने प्राप्त कर लिया तो यह विद्रोह स्वय ही नष्ट हो जाएंगे और इनके संचालन- कर्ताओं से जनता स्वयं ही निपट लेगी। । अन्तिम समापन दृश्य [आज बौद्ध संगीत का समापन समारोह था। इस अवसर पर सम्राट अशोक के साथ ही अन्य गणमान्य मत्रिगणो के माथ पार्षद भी इस समारोह में सम्मिलित हुए थे। रानी पद्मावती के साथ ही संप्रति भी समारोह में उपस्थित था। चूंकि आज प्रसाद वितरण होना था, इसलिए देश के दूर-दूर भागो से अनेकानेक वर्ग और धर्म के लोग उपस्थित । समारोह मण्डप मे बने संगीत स्थल पर भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा के निकट मोगलिपुत्त तिस्स, सम्राट अशोक, महेन्द्र एवं रानी पद्मावती के साथ ही संप्रति बैठा हुआ था।]

156/ सम्राट के आंसू तिस्स : दूर-दूर से आए सम्मानित अतिथिगण एवं भिक्षुगण, हमें हर्ष है कि यह संगीत अपनी अवधि पूर्ण कर चुका है और आज इसका समापन समारोह मनाया जा रहा है। इस संगीत को सफल बनाने में आप लोगो ने तन-मन-धन से जो योगदान दिया, उसके लिए हम मभी लोग आपके आभारी रहेगे। मुझे विश्वास है कि आप लोगों के सहयोग से अबाध गति से चलते रहने वाला यह सगीत समारोह आने वाले इतिहास में सदियों तक याद किया जाता रहेगा । इसी के साथ ही भगवान बुद्ध के साथ ही सम्राट अशोक की कीति पताका सदियों तक उसी प्रकार प्रकाश- मान रहेगी जैसे कि सूरज और चाँद का लहराता प्रकाश जग के अन्धकार को दूर करने में सहायक होता है, उसी प्रकार आज इस संगीत के माध्यम मे विश्व में जो प्रकाश फैला वह आने वाले युग में व्याप्त होने वाले अन्धकार को सदैव दूर करता रहेगा । विशेष रूप से सम्राट अशोक का आभारी हूं जिन्होंने अपना सारा राजसी सुरा और वैभव त्याग कर न केवल बौद्ध धर्म को ग्रहण किया वरन् उनके योगदान और साहस से ही इस संगीत का समापन हो सका । यदि सम्राट अशोक के व्यक्तित्व की कल्पना उस दिव्य प्रकाशमान सूर्य से करें तो विदित होगा कि वह दावानल उगलने वाला एक शासक है और जब उसकी उपमा हम चांद से करते है तो वह पूरे विश्व को निर्मल और शातिमय प्रकाश देकर मानव जगत को भाव- विभोर कर देता है । मम्राट जैसे व्यक्तित्व की कितनी उपमाएं दी जाएं, यह तो सम्भव नहीं है। हां, मैं सम्राट अशोक से यह अवश्य अपेक्षा करता हूं कि वह अपने विचार रखकर इस संगीत समारोह का समापन करें। अशोक : मैं आप सबका किस प्रकार आभार प्रकट करूं। मुझे तो विश्वास ही नहीं होता कि इतना बड़ा ऐतिहासिक कार्यक्रम सफल बनाने में सक्षम भी हुआ है । हाँ, भगवान बुद्ध के महान उपासक मोगलिपुत्त तिसरा के योगदान एवं उनके मार्गदर्शन का आभारी हूं, जिन्होंने मुझ जैसे र दरिन्दे शासक का मानवीय जीवन में प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त किया और जो बहुमूल्य परामशं गुरु महाराज मोगलिपुत्त तिस्स द्वारा इस संगीत के आयोजन के सम्बन्ध में दिया गया. उनकी अध्यक्षता में मैंने इसे पूरा करने का प्रयास किया। लेकिन इसके वावजुद मुझं दुःख और पश्चाताप भी है। यह कितने खेद को बाद है कि मैं एक सम्राट होते हुए भी भगवान वुद के उपासको और दूर-दूर राज्यों से आए सम्मानित अतिपि गणो की मेवा करने में वह सफलता नहीं हासिल कर सका जिसकी मैंने कल्पना की थी। हो, मैंने प्रयास किया और इस प्रयास में जो अवधान उत्पन्न हुआ, उसके फलस्वरूप उपस्थित परेशानियों के लिए मैं बापमे क्षमा मांगता हूँ और माशा करते हैं कि आने वाले युग-युगान्तर तक हम भगवान बुद्ध की पवित्र शिक्षाओ का प्रसार एवं प्रचार इमी प्रकार करते रहेंगे, जिमके लिए आप गव यहां एकत्रित हुए हैं। इसी के माय मैं इस समारोह का समापन करते हुए अन्तिम विदाई लेता हूँ। तिस्म:मैं अपने भिक्षुगणों की ओर से सम्राट अशोक को विश्वास दिलाता हूँ कि उनका यह त्याग निरर्थक नहीं जाएगा और हम ही नहीं आने वाली पीढ़ी-दर-पीढी भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करते हुए उनके उपदेशों के प्रचार व प्रसार के लिए संकल्प रहेगी। - सम्राट के आंसू / 15T दृश्य परिवर्तन [सम्राट अशोक वैशाली स्थित महल के कक्ष में चिन्तामग्न अवस्था में बैठे हुए थे। उन्होने अपने दायें हाथ में आधे आँवले को ले रखा था। आज उन्होंने भोजन तक ग्रहण करने से इन्कार कर दिया था। इसका मुख्य कारण ही ऐसा था कि सम्राट अशोक को भावी कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने को बाध्य होना पड़ा था। चूंकि संगीत समाप्त हो चुका था और अभी भी कुछ गणमान्य अतिथि एवं बौद्ध भिक्षु वैशाली में मौजूद थे, जिनके आदर-सत्कार एव दान-दक्षिणा का कार्य अभी शेप था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए धन की आवश्यकता थी, जबकि स्थिति यह थी राजकोष से धन आना विल्कुल बन्द हो चुका था तथा सम्राट अशोक द्वारा बार-बार किए गए आग्रह को ठुकरा दिया गया था । वह अभी आगे के कार्यक्रम के विषय में विचार कर ही रहे थे कि मोगलिपुत्त तिस्स एवं महेन्द्र के आने की सूचना द्वारपाल ने दी । सम्राट अशोक ने उन्हें सादर-सत्कार के साथ कक्ष मे हो लाने का आदेश दे दिया। कुछ ही देर मे मोलिपुत्त तिस्स एव महेन्द्र ने कक्ष प्रवेश किया और चिन्तामग्न सम्राट अशोक के निकट ही बैठ गए। मोगलिपुत्त : सम्राट अशोक, शायद किसी चिन्ता मे खोए हुए से लगते हैं । अशोक : आपका विचार मही है। कैसी धोर विडम्बना है कि इतने प्रयासों के बावजूद भी आप जैसा चिन्तामुक्त प्राणी नहीं हो सका। मोगलिपुत्त : राजन्, चिन्तन-मनन करना तो मानव की प्रवृत्ति है। चिन्तन-मनन की बदौलत ही मानव समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए इसमें आपके परेशान होने की आवश्यकता क्या है ? अशोक : परेशान होने वाली तो बात ही है गुरु महाराज । खैर आप बताइए कैसे आना F हुआ? मोगलिपुत्त : ऐसी कोई खास बात नहीं है । आपके दर्शनों के लिए चला आया। हाँ कुछ अतिथि एवं भिक्षुगण अतिथि गृह में रुके हुए हैं। उनके खान-पान एवं दान- दक्षिणा के लिए भी आपको कष्ट देना पड़ा है। अशोक : (आधे आंवले को घूरते हुए) दान-दक्षिणा "खान-पान कहते हुए बरबस ही उनकी आंखो से आँसुओ को धार बह निकली और आवाज रुंधती-सी चली गई। महेन्द्र : पिताश्री, मैं यह क्या देख रहा हूँ"सिंह को भांति सिंहनाद करने वाले... कड़कते बादलों की भांति गर्जन करने वाले सम्राट अशोक की आंखों में आंसू.. नहीं पिताश्री, ऐसा नहीं हो सकता": अशोक : नही बेटे, आज जो तुम देख रहे हो, यथार्थ है । एक दिन विक्रमसिंह ने सत्य ही कहा था कि आंसू किसी की अमानत नही होती और न ही यह राजा और रंक को देखती है। जब इन्सान क्रोध, पश्चाताप, भय और वासना का शिकार होकर ध्यथित हो उठता है तब यही आंसू उसके अन्तर्मन की व्यथा को शान्त करने में सहायक होते है 'वेटे, आंसू बहुत हो कीमती तत्त्व है, जिसे ऐसे ही मौके के लिए इन्सान अपने शरीर के अन्दर संजोकर रखता है । भले ही मैं शासक हूँ और मेरे 458/सम्राट के आंसू पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं है परन्तु भगवान बुद्ध की शिक्षा रूपी हथकड़ी और उपदेश रूपी बेड़ी ने मुझे इस कदर व्यथित कर दिया है कि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। मोगलिपुत्त : मेरी समझ में नही आ रहा है कि आखिर ऐसा कौन-सा कारण है, जिसके कारण आप इतने व्यथित हो उठे हैं। अशोक : गुरु महाराज, आप मुझे भगवान बुद्ध के मन्दिर ले चलिए और वहीं सभी गणमान्य अतिथियों को बुलवा लीजिए। आखिर शासक होने के नाते उन्हें कुछ दान-दक्षिणा भी तो देनी है। मोगलिपुत : जैसी आज्ञा राजन् । दृश्य परिवर्तन [वैशाली स्थित भगवान बुद्ध के मन्दिर के प्रांगण में हजारों बौद्ध भिक्षुगण योगासन की मुद्रा में बैठे हुए थे। सभी के चेहरों पर जिज्ञासा के भाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे थे। सभी को उत्सुक नजर बार-बार मुख्य द्वार पर केन्द्रित हो उठती थी। कुछ ही क्षणोपरान्त सम्राट अशोक, मोगलिपुत्त तिस्स एवं महेन्द्र के साथ मन्दिर के प्रागण मे प्रवेश करते हुए भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा के निकट जाकर बैठ गए। तिस्स : प्रिय गणमान्य अतिथिगण एव भिक्षुगण "आज हमारे समक्ष भगवान बुद्ध के महान उपासक एवं बौद्ध धर्म के अनुयायी सम्राट अशोक आपकी सेवा मे अन्तिम रूप से गहनतम चिन्ताओं के माथ उपस्थित हुए हैं। सम्राट अशोक ने जिस भावना से ओत-प्रोत होकर बौद्ध धर्म के उपदेशो कोन केवल ग्रहण किया परन् उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रसार मे तन-मन-धन से जैसे भी सम्भव हो सका, उन्होंने इसके प्रचार एवं प्रसार की दिशा में जो महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, उसी का फल है कि एक बार पुनः बौद्ध धर्म का अस्तित्व स्थिर हो सका है। यही वह सम्राट अशोक हैं, जिन्होने बौद्ध सगीत के शुभारम्भ से अन्त तक बिना किमी की परवाह किए जिस तरह से धन व्यय किया है, उससे राजकोप बुरी तरह प्रभावित हो गया है। हालांकि सम्राट अशोक माया-मोह से विरक्त होकर इसके लिए चिन्तित नहीं हैं, लेकिन राजमहल के अन्दर एक ऐसा तूफान उठ खडा हुआ है, जिससे अब सम्राट अशोक नाममात्र के ही शासक हैं। मैं तथा बौद्ध धर्म के समस्त उपस्थित उपासको की ओर से सम्राट अशोक को इस बात का पूर्ण आश्वासन देता हूँ कि हम लोग किसी भी प्रकार से असन्तुष्ट नहीं हैं । हमें उनसे किसी प्रकार की शिकायत नहीं है और न ही बौद्ध धर्म अथवा उनके अनुयायी उनसे विलग हुए हैं । मेरा सम्राट अशोक से विनम्र निवेदन है कि वह जो कुछ भी कहना चाहते हैं, स्पष्ट कहें और जो भी सहयोग अपेक्षित है, हम लोगो से निःसंकोच कहे। अशोक : (कुछ देर तक हाय में पकड़े आधे आंवले को देखते एवं आंसू बहाते हुए) आदरणीय भिक्षुगण, मुझे यह जानकर हार्दिक पीड़ा हो रही है कि हमारे शासन- काल में आज बौद्ध भिक्षुओं एवं गणमान्य अतिथियों को भोजन तक सुलभ नही हो सका है । भगवान बुद्ध के उपदेशों से काम-क्रोध, पश्चाताप से मुक्ति पाने के फल- सम्राट के आँसू / 159 स्वरूप आज मुझे यह प्रसाद मिला है। परमादरणीय, आज मेरे पास केवल यही सम्पदा है। यह सम्पदा आज मेरे पास मौजूद है, जिससे मैं अपने पेट की ज्वाला शान्त कर सकू। परन्तु अपने प्यारे बन्धुओ को भूखा देखकर मैं इसे नहीं ग्रहण कर सकता। अतः मै अपनी इस अनमोल सम्पदा को बौद्ध धर्म के महान अनुयायी एवं भगवान बुद्ध के परम उपासक को दान करता हूँ, कृपया वे इसे ग्रहण करें। इसके साथ ही उन्होंने अथ धारा बहाते हुए उम आधे आंवले को मोगलिपुत्त तिस्स के हाथो में दे दिया। भोगलिपुत्त तिस्स ने आंवले को ग्रहण किया और उसे भगवान बुद्ध के चरणों पर भोगादि के लिए रख दिया। परन्तु अभी कुछ ही पल बीते थे कि भगवान बुद्ध की अष्टधातु से बनी प्रतिमा साकार हो उठी और उसके होंठ हिल उठे- "सम्राट अशोक "तुम्हारे त्याग, तप और प्रेम से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुमने मेरे उपदेशो और शिक्षाओं को विश्व के विभिन्न देशों मे फैलाकर जी मानवता का संदेश भेजा है, वह युग-युगान्तर तक नहीं भूला जा सकेगा । तुम्हारे इस त्याग, तप, परिश्रम और जनता के प्रति प्रेम के साथ ही मानवता धर्म के प्रवर्तक के रूप में तुम्हारा नाम स्वर्णाक्षरों मे लिखा जाएगा और आने वाला इतिहास सदियो तक तुम्हें चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि से सुशोभित करता रहेगा।" इसी के साथ ही सम्राट अशोक को आशीर्वाद देते हुए प्रतिमा पूर्व अवस्था मे आ गई। तिस्स : (अथ पूरित नेत्रों से) धन्य हो सम्राट, तुम्हारे कार्यों से आज मुझे भी भगवान बुद्ध के दर्शन प्राप्त हो गए । इसके लिए मैं आपका अत्यन्त आभारी हूँ। अशोक : गुरु महाराज, ऐसा अनर्थ मत करें। मुझे जो कुछ भी हासिल हुआ है, आपके कारण प्राप्त हुआ है, अतः इसका सारा श्रेय आपको ही जाता है। तिस्स : धन्य है, राजन् आप, जिसने राजा और संन्यासी के रूप में एक साथ दो पदों को सुशोभित किया । निश्चय ही आप चक्रवर्ती सम्राट हैं। दृश्य परिवर्तन [इधर कई दिनों से सम्राट अशोक का स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरता जा रहा था। कई बड़े चिकित्सकों एव वैद्यों ने उनकी चिकित्सा की परन्तु कोई लाभ दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सम्राट अशोक का अन्त समय निकट आ गया है। आज सम्राट अशोक का स्वास्थ्य काफी बिगड़ उठा था। वह भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा के निकट लेटे हुए थे। उनके निकट परिवार के मदस्यगण बैठे हुए थे, जबकि मोगलिपुत्त तिस्स और महेन्द्र उनके दायें-वायें बैठे हुए थे। सेनापति जयदत्त और अर्थमंत्री विक्रमसिंह एक ओर खड़े हुए थे।] अशोक : गुरु महाराज "मेरा अन्तिम समय निकट आ गया है"वह देखो "भगवान बुद्ध मुझे स्वयं लेने के लिए आए हैं - वेटा महेन्द्र, जाते-जाते मेरी एक ही विनती महेन्द्र : पिताश्री, आप ऐसा मत वोलें"भगवान बुद्ध से मेरी यही प्रार्थना है कि वह मेरी उम्र।

पुत्र महेन्द्र 160/ सम्राट के मासू अशोक : नही बेटा ऐमा मत बोलो अभी तुम्हें बहुत कुछ करना है."भगवान बुद्ध के लिए.."उनकी शिक्षामों और उपदेशो के लिए तुम्हें बहुत बड़ी कुर्बानी देनी है "बेटा, अब मैं थक चुका हूँ"मेरा शरीर निष्क्रिय व जर्जर हो चुका है."एक जिन्दा लाश बनकर जीने से तो भगवान बुद्ध की शरण में जाना ज्यादा उपयुक्त होगा। मोगलिपुत : नही सम्राट “मैं ऐसा कभी नही होने दूंगा'"आपसे ज्यादा तो मेरा शरीर जर्जर हो चुका है · मात्र हड्डियों का ढांचा कब तक इस निर्जीव शरीर और बेजान हड्डियों का बोझ ढोता रहूंगा सम्राट अत: पहले मैं भगवान बुद्ध की शरणं गच्छामि में जाऊँगा। अशोक : नहीं महाराज "आपको ऐसा नहीं करना चाहिए. भले ही आपका शरीर मात्र हड्डियो का ढाँचा बनकर रह गया है लेकिन इन हड्डियों में से जो ज्ञान का प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा है, उसे मैं स्पष्ट रूप से देख रहा हूँ."गुरु महाराज, आप मुझे वचन दीजिए कि जब तक आप जीवित रहेंगे, तब तक मेरे को अपनी छत्रछाया में रखकर, उमे बौद्ध धर्म की शिक्षाओं एवं उपदेशो की प्रेरणा देते रहेंगे। मोगलिपुत्त : राजन, आप बिल्कुल निश्चित रहें। महेन्द्र मेरा सच्चा शिष्य ही नही, बल्कि मेरा पुत्र भी है। अशोक : धन्यवाद हा विक्रमसिंह। विक्रमसिंह : जी महाराज | अशोक : विक्रमसिंह, अव मैं एक लम्बे सफर पर जा रहा हूँ, जहाँ से वापस लौटना सम्भव नहीं है । अतः अब तुम मेरी वसीयत लिख दो। विक्रमसिंह : महाराज, आप बेकार परेशान हो रहे हैं, आपको कुछ ही होगा। अशोक : यह तो माने वाला क्षण बताएगा विक्रमसिंह "मेरा एक-एक पल कीमती है ..'अतः तुम तत्काल वसीयत लिख दो...। विक्रमसिंह जैसी आज्ञा महाराज। अशोक : हो तो विक्रमसिंह लिखो- "मैं सम्राट अशोक अपने सभी राज्यों, चल एवं अचल सम्पदा को बौद्ध धर्म को दान करता हूँ। मेरे राजकोष मे मौजूद सम्पूर्ण राशि बौद्ध धर्म के प्रचार एव प्रसार के लिए गुरु मोलिपुत्त तिस्स एवं महेन्द्र को दे दी जाए। इसके साय ही सम्राट अशोक अपने उत्तराधिकारी संप्रति को देश का शासक घोपित करते हुए यह आदेश देता है कि वह मोगलिपुत्त तिस्स एवं महेन्द्र के परामर्श एवं भगवान बुद्ध की शिक्षाओं एव उपदेशों के आधार पर ही शासन-व्यवस्था का सचालन करते हुए जनहित के कार्यों में रुचि ले।" इसके बाद सम्राट अशोक ने वसीयतनामे पर हस्ताक्षर किए और इसके साप हो उन्होने सदा-सदा के लिए आंखें मूंद ली और उनके प्राण-पखेरू उड गए। ..

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Samrat Ke Aansoo

Author
K. K. Shri Vastava
Title
Samrat Ke Aansoo
File name
Samrat Ke Aansoo
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2011/03
Publisher
Aatma Ram & Sons Dehli
Language
Sanskrit
Pages
166
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551129
Barcode
4990010031901.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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