Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Uttarakhanda Ke Vanon Men

Sudarshan Singh Rawat · 2011/03

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उत्तराखड के वनो में (निबंध)

प्रस्तुत पुस्तक हिंदी अकादमी, दिल्ली, के
आर्थिक सहयोग से प्रकाशित
ज्ञान भारती
4/14 रूपनगर दिल्ली 110007

उत्तराखंड के
वनों में
सदर्शन सिंह रावत

शान भारती
4/14 रूपनगर
दिल्ली 110007
द्वारा प्रकाशित
सर्वाधिकार
श्री सुदशन सिंह रावत
मूल्य
3000
प्रथम सस्करण
1989
शुक्ला प्रिंटिंग सर्विस
दिल्ली 53 मे मुदित
[387 1 11589/0)
UTTARAKHANDA KE VANON MEIN (Essays)
y Sudarshan Singh Rawat
Rs 3000

प्रस्तावना 7- से भरपूर आध्यात्मिक और धार्मिक तीथस्थलो और ला की पावन भूमि उत्तराखड म ज मे और पले श्री सुदशन की यह पुस्तक 'उत्तराखड के वनो में उनके अथाह ज्ञान- उनके गहन अध्ययन का परिणाम है। बचपन से ही प्रवृत्ति के रहे हैं। सघन जगलो, दुर्गम गिरि दरामा कर प्रकति के नाना प्रकार की वनस्पति के सपक म रहना ता रहा है। इही यानाओ के दौरान इनका सपक । और सिद्ध पुरुषो से भी होता रहा है और उनके सपक में नि अथाह ज्ञान भी अजित किया है । इसी का परिणाम है कि की लेखनी से इस तरह की दुलभ पुस्तक प्रकाश में आ ७ ।। समय ये लोग' एक लेख है, जिसमे आजादी के बाद भारत के बावजूद उत्तराचल के लोगो को ठग विद्या मे माहिर किस प्रकार भ्रमित कर ठग रहे हैं, इसका सटीक । किया गया है। । बोक्साड लेख मे श्री रावत ने काबेट नेशनल पाक और के बारे मे कई रहस्यमय अनूठे और अनजाने तथ्यो का कया है। यह लेख अपने ढग का अनूठा और अद्वितीय है । प्रतिभा और जिज्ञासा इस लेख मे बहुत सुदर ढग से vi] 'शिवारी की मौत' लेस म जो मान लेस ही नहीं, एक कहानी भी है बहुत प्रभावशाली ढग से लेखक ने एक भोटिया फुत्ते या अद्भुत साहस और पराक्रम के साथ दो बाघाये साथ लड़ने की अविस्मरणीय कहानी लिसी है जो रोचक भी है और ज्ञानप्रद भी। हिमपात' लेख म लेखक न वफ पहाडो म क्या-क्या प्रभाव डालती है इमका सटीक और सुदर चित्रण किया है । गीतोष्ण और समगीतोष्ण प्रदेगा म वफ का क्या प्रभाव होता है लेखप न इस पर विशेष खोज को ह और उसके अनुभव इतने सटोर और सजीव है कि लेखक का लोहा मानना पडता है। लुहाचोड वे जगल मे' लेखक की कहानी के रूप म जगलो मे रनवाले अनेक जानवरा की प्रवृत्तियो व उनके क्रिया-कलापो का एक सुदर पत्तात है। यह लेख वालापयोगी भी है और वयस्को के लिए भी समान रूप से नानवद्ध है। अपनत्व की अटूटता' की कहानी बहुत ही मार्मिक है और यह नेपाली डौटियालो के जनजीवन पर आधारित है, जो अपने देश से बहुत प्रेम करते हैं। भारत म रहते और काम करते हुए भी ये हमेशा देश के बारे म सोचते रहत हैं। 'विद्या की जडी' लेख एवं नानपूण और विद्यार्थियो के लिए पथ प्रदशक के रूप मे है । इस लेख मे बहुत सुदर ढग से बताया गया है कि विद्यार्थियो के लिए मेहनत के अलावा कोई विकल्प नहीं है । उह मेह्नत करनी ही होगी। ऐसी कोई जडी नही होती, जिसे पाकर विद्यार्थी पास हो सकें। अपना घर' कहानी मे लेखक ने उन तथ्या को सटीक ढग स उभारा है, जो मानव के साथ उनके जीवन म घटित होती रहती है। कमी कभी गलतफहमिया के कारण या दूसरे लोगो के बहकाये जान के कारण परिवार से दूर रह रहे व्यक्ति के प्रति अपने ही परिवार के लोग गलत धारणा ले बठते हैं । इस कहानी मे यह तथ्य विशेष रूप से उजागर होता है कि कई बार पति-पत्नी के मन में भी सदेह की दरार पड़ जाती है जिसके

VII
कारण उनका सुखमय 'अपना घर' एक दुखमय घर में परिणत हो
जाता है और मानव जीवन के लिए यह स्थिति फिर वहुत घातक सिद्ध
होती है।
श्री रावत की यह पुस्तक निस्सदेह हिंदी जगत् मे अपना स्थान
बनायेगी। सघन जगलो, पवतो, साधु और सतो के बीच रहकर उहाने
अपना अधिकाश समय व्यतीत किया है, और उ ही अनुभवो के आधार
पर यह पुस्तक आधारित है । मैं रावत जी के उज्ज्वल भविष्य की कामना
करता है।
-हॉ० हीरालाल बाछोतिया
प्रवक्ता
सामाजिक विज्ञान एव मानविकी
रा. श० अनुसधान एवं प्रशिक्षण परिषद
नयी दिल्ली

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प्रस्तावना
V
अपनत्व की अटूटता
1
शिकारी की मौत
9
विकाला बोक्साह म
23
39
लुहाचौड के जगल में
हिमपात
57
बदलता समय, ये लोग
6
विद्या नीजही
77
भपना घर
87

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अपनत्व की अटूटता असूज बद्धावस्था के पतिम चरण मे था। स्यू सी के तराई भाग म धान की फसल पक चुकी थी। ग्रामीण युवतिया खेत खलिहाना मे उल्लास और ममभरे गीतो का गान कर रही थी। उनके कोक्लि कठ से प्रसारित लय पहाडी प्रदेश के प्राकृतिक सौदय म नया निखार उमारती थी। गीत सुख और दुखमय जीवन के प्रतार थे। मे भाव- युक्त होकर सड़क के किनारे खडा मधुर लय का रसपान कर रहा था। धीर-धीरे मधुर लय प्राकृतिक सौदय म विलीन हो गयी। युवतिया के गीत मन पर छप गये। मैं उस ओर चल पडा, जहा एक लडका वतुल श्वेत शिला पर बैठा धान काटने वालो की ओर मुह क्यि सिसकिया भर रहा था । मैंने पूछा, "क्या साहब, रोक्यो रहे हो?" लडका मौन रहा। मैंने पुन पुचकारते हुए कहा, "क्यो जो, आप क्यो रो रहे हो लडके ने झट से उत्तर दिया, "नवयुवतिया के मधुर लय और मम- भरे गीनों ने मुझे अपने देश की याद दिला दी। इसलिए मन उदास होकर नयनो मे जल भर आया, बावू जी। " मनुष्य परदेश में स्वतत्र रहकर क्तिना ही एश्वयशाली जीवन न्यतीत कर रहा हो और नित धुपडी राटिया का स्वाद ले रहा हो, परतु उतना मानद कहा जितना स्वदेश मे रहकर सादा जीवन व्यतीत करन, रूपा सूसा खाने व ठडे पानी के पीने से प्राप्त होता है, बाबू जी!"

पुन माह भरते हुए लडके ने लवो सास ली और कहा, "अहा ! प्रकृति की गोद मे सजी मखमली घास से ढमी ऊची नीची डाडी वाठिया, तितलिया के सुदर पखा जसे फूला से सजी मीढीनुमा कदरीली घाटिया वागाना म उगी वेलिया नदी तटा म मछुआरा की लवी ताट व डाडा के सिरा पर सुबह का सपनीली घाम, अहा । गारो के गले म बजती घटिया की मनकार व खेताम दौडते वडे बला के बावरा की रणरणा हट, एकाएक ऐसे दक्ष्य मन को लूटवर आखा के आगे तसवीर से उतरते चले आते हैं, बाबू जी । क्या करू, मे तो अभागा हू जा बिरान मुल्य म आ पहुचा । नसीव नसीव की बात है अपने देश की रखी मूखी रोटी ही सही, जो मन म मीजकर पट भर देती है बाबू जी । वह मनुष्य नही, जिसे अपनी ज मभूमि से मोह नहीं । कुछ भी हो देश तो अपना ही प्यारा लगता है बाबू जी । मता समय मिलिटरी म होता देश की खातिर मरता और लडने मिडनेवाले जवाना के मन म देशप्रेम का जादू भर देता। यहा तो कुछ भी काम नही मिलता सिवाय खेता मे हल चलाने या सडक किनार रोडी इस कूदने के ।" छोटे लडके की बाते सुनकर में धर रह गया। पूछा, घर कहा ? जवाब मिला नेपाल में।" "अच्छा तो दुम छोट डोटी हो हा मैं छोटा डोटी हू । लोग मुझे बूढ़ा पुकारते हैं । सुना है. आपने, नेपाल म कुडल का सेत्रपाल बहुत प्रसिद्ध है। "परिवार म क्तिन सदस्य हो?" मैन पूछा। ' अब मुझे पता नही, जब मैं दस साल का था तापारिवारिक कम- जोरी के कारण एक मेठ के साथ इस मुल्य म आ पहुंचा । मुझे याद नही, सिवाय छाटे भाई के जिसको याद हमेशा मरी आखा म सावन- भादा जैसा नीर यहाती रहती है, बाबू जी मा वाप हाते ता अवश्य मेरी खाज करते।" "यहा क्सिपे साथ रहते हो?" 2 / उत्तरासह वनाम , "देखा, सामनवाला सफेद मकान, खेता मे खडा वह व्यक्ति जो फसल निहार रहा है उसका हईया है।" "अच्छा ता घर जाना चाहते हो" लालसा जागकर दव जाती है, बाबू जी जाकर कैसे, रास्ता भूले हुए कई साल बीत चुके हैं। डोटी नेपाल का रहनवाला जो इलाके के क्मचारिया से तग आकर बहुत दिना के लिए पडिडा म आ वसा था । वह लाह और पीतल के टूटे हुए बतना की मरम्मत मी करता था। उसके सबध मे मैंने लड़के से पूछा "क्या तुम डोटी को जानते हो वह तुम्हारा निकट सधी है। 'नही वाब जी, कहा रहता है डोटी?" "नयार के पास मास्टर जी के मकान म वह लाहार और सुनार का काम करता है । तुम्ह उससे मिला दू ? सुना है वह कल ही नपाल से आया है। जी हा।" लडका बडी उत्सुक्ता से मेरे साथ मुश्किल से चार कदम चला था कि उसे खलिहान से आवाज सुनामी पडी-"बूढे, धान का थैला घर ले चल।" उसके चहरे पर उदासीनता की झलक विषर चुकी थी। 'अच्छा बूढे में चला क्ल दिवस होते ही यहा घूमने आऊंगा।" मैन उसे दिलासा देते हुए कहा। "वाबू जी, नमस्त।" नमस्ते भया । 'वहार में भी घर की राह पर चल पड़ा। दूसरे दिन पौ फटते ही सब लोग चारा आर खलिहाना म धान माडवे दृष्टिगत होने लगे। मैंने सोचा, क्यो न स्यूसी की ओर चला जाऊ शायद कही बूढे लड़के से मुलाकात हा जाय । सूय की लाल रश्मिया से प्राकृतिक वातावरण मनमोहक हो उठा। मैंने स्यूसी की राह ली और चल पडावुछ ही कदम चलाया कि देखा, बूढा लड़का हाथ मे पोतल का बर्तन याम डोटी के मकान की मार अपनत्व को अस्ती अग्नसर हो रहा था। "वाबू जी नमस्ते ।। 72 'नमस्ते वूढे," मैने मुसकराते हुए कहा, "अरे कहा जा रहे हो डाटी के मकान तक।" क्या काम है दखा यह पीतल का टूटा वतन, इसकी मरम्मत करवाने आया हूँ, ?" बाबू जी ॥ . मैंन जोर से आवाज दी, "डोटी, डोटी बहिना, क्या अभी तक स्वप्न की दुनिया म खोये हो टाटी ने चारपाइ से निद्रा अवस्था म अपनी भापा म कहा, मैंई उठि, उठि यह्निा। तुम्हारा भाई बहिना" मैंने कहा। बैठीई बठोई इति, इतना' कहकर डोटी चारपाई से उठकर बाहर भपर के पास आकर वहन लगा वावू जी, मेरे घर में एक लिफाफा आयो है बहिना मैई सोच म पड गया है।" 'क्या लिखा है डोटी? मैंने पूछा । 'बाबू जी लिफाफा वे अदर एक छाटा क्वीलू का टुक्डा और सूसी लकडी का एक टुवडा भेजा है। साथ म लिखा है जिस दिन तुम पर से गये थे उसके दूसर दिन बडा लड काआ भी एक मेठ के साथ इस मुल्य म आयो। मेठ वापिस आ गया है पर लहका न आया । तुम्हारे और लटये ट स म मैं क्वीलू और सूखी लकडी जसी । क्या करू वहिना, भगवान ही मालिकच हा वहिना। वुछ ही क्षणा याद डोटीन अपना भपरा तयार किया और टूटे हुए वतन की मरम्मत वर दा। मैंन बाटी स मूढ लडके या परिचय कराया। डाटा अच्छी तरह हिंदा नहीं जानता था, इसलिए मैं उसकी मान मापा म कहा, हाटी हिना, तुम्हार गाव याआ की नाम प?' यो नामच यहिना''हाटी न पूछा। लोग मुझे बूढा बहत है, डोटी।' सहने न पहा। 4/ उत्तरासर ने यनाम मैंन वहा, "होटी, क्या तुम इसका गाव जानत हासने "की यही बूढा," डोटी विस्मित होरर हस पडा, "यहा बूढा, वहिना।" "जब मैं दस साल का था ता किसी कारणवश यहां आ पहुचें डोटी, मेरी एक कहानी है जा कहानी बनकर रह गयी डोटी विस्मय मे बूढ लडके वे मुह आएवंटल लगा। मानो उसे देखकर डोटी को अपन खाक हए गयी हो और वह उसे जानता हा । पिता की काम परी बहिना?" डाटी न पूछा। 'मैंन नहीं जानता डाटी, सुना है, पिता जी इसी मुल्क म लोहार और सुनार का काम करते है।" डोटी । बूढे लडके के हाथ म पीसल का वतन देते हुए कहा 'बहिना, कही बहिना से मैई आऊ, थेले म धान देई।' बूदा चला गया। दोटी अपने खोय हुए लडके की याद में खा गया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था, मानो वही उमका खोया हुआ लडका हो और वह उसे जानता हो। नाटे कद के डोटी न मुभसे कहा, "वहिना, लडका ऐसा मानो मेरी लडके की सूरत ठम।" मैं सब कुछ समझ रहा था, डाटी उसका देखकर इतना व्याकुल क्यो हुआ। सध्या का वातावरण मन पर जादू सा छा गया। समय बीत चुका था। मैं पैदल पच्चीस मील आगे प्राकृतिक क्षेत्रा का भ्रमण करने निक्ल पड़ा। प्राकृतिक सौदय को निहारन म मैंने काफी समय व्यतीत किया। सौभाग्यवश जब कभी स्यूसी की आर पहुचता तो बूढे लडके की आवाज को बेला च खैता के मध्य गूजता सुनता या शतीर ढोनेवालो के बगल म चिलम पीते देखता। तभी वह कहता, 'बाबू जी, मा गये न, जरूर कुछ लाये होंगे।' मैं उसे एक सिगरेट की डिब्बी देवर टाल देता । बूढा लडका प्रमुदित हा उछ न पडता । बोलता वाबू जी, आप मेर अपन हो न तभी ता मुझे अपनत्व की अटूटता /5 ।

एक सिगरेट की डिब्बी दे जाते हो।" 'नही बूढे, ऐसी बात नही क्या डाटी से मुलाकात को ?" मैने उसकी बात काटते हुए कहा। । अवसर नही मिला बाबू जी, फिर मिलूगा । अब मुझे दृढ विश्वास है कि मैं अपना मुल्क अवश्य देखूगा और मुल्क की खातिर फौज में भर्ती होऊगा ।" उसकी वाणी मे अमत व नयना म दिय ज्योति झलक रही थी। लड़के की भावनाआ व मेरे मन की प्रेमभरी प्राकृतिक भावना के बीच प्रेम का एक अटूट सा तार जुड गया। स्यूसी के तराई भाग म खरक चल रही थी। पसल यही नामांक्ति भी न थी सिवाय पूर्व दिशा के । मोटर मे बैठरर में पडिडा की ओर चल पडा । मैंन प्रमुदित हो मोटर में बाहर दष्टि दौडायो। देषा, बूढा लडका पीठ पर भारी पिटठू से पहिंडा की ओर आ रहा था। मैंन आवाज दी, ' बूढे । ' मोटर की गति म धीमापन आया और तत्क्षण मोटर घूमस्थल पर आ खडी हुई। माटर में उतरकर मैं नीच की ओर जा पहुचा, जहा पर डोटी टूटे हुए बतनो क लिए भपर स आग घाव रहा था। बडा होकर बाला बाय् जी, नमस्ते !" मैं डाटी स याता म गुथा हुआ था, तभी क्षणभर म धूढा लकवा आ पहुचा। उम दसकर डोटी उदाम हो गया। बोला, ब्द यहा जा रहे हा?' आपके पास कुछ दिनाक लिए, मन हैहया का पाम छाड दिया।" निकट मवधी हाता क्या हुआ, यह परदा च विगना मुल्य यहिता।' बूदा मन म गम सा गया। म मय कुछ मुन रग था, मेरवाया जी मी तुम्हारी जमी मूरन है। जर बाया पर म मागा या ना मरीण्य दाटी-गी नसवीर उनकी जेय म रह गयी। 6/ उत्त शराब बनो म तसवीर का नाम लेते ही डोटी की आंत उमरै आयौं। होटी, अदर जावर लोहे तावे व पीनल के टुकड़ों में भरा एस धूल से सेना सदूक खोला और मोम के मेले थैले से एवं मली-मी तसवीर निवाल लाया। परतु तसवीर म चेहरा साफ नजर आया।बाटी न तुस मन ही मन म लडके की शक्ल से तसवीर या मितान पारस लडके की थी, जो कई सालो से उमसे वचित था। अनायास ही बूढे लड़के के मुह में उभर आया, 'डोटी । सी मुल्य मे मिलता है न खूबसूरत हार घुणपाही कोडी का छुम्मा। मेरे बाबा कहा करते थे कि मै तुम्हार लिए भी लाऊगा।" धुणधाडी कोडी का छुम्मा सुनकर डोटी के हृदय में लडके की वात्सल्य जीवन की वह अमिट छाप उभर आयी, जिसके प्रति उसका हृदय अहर्निश सिसक्ता रहता था। उसकी प्रेमत पित दृष्टि लडके में मुख पर टिव गयी। बूढे लडके के हाथ पर बचपन मे आग से जला एक चिह्न भी था । अब डोटी लडके को भली भाति पहचान गया कि यह मेरा खोया हुआ पुत्र है । बूढे लडके को गले मे लगाकर डाटी फूट फूट- कर रोने लगा। बूढे लडके न करण स्वर में कहा, 'बावा मने इस मुल्क में रहकर बहुत दुख पाया। डोटी ने विह्वल होकर कहा, 'बेटा स्वदेश में पूज्य जननी को छोडकर परदेश मे जो दूसरे की मा की नि स्वाथ सेवा करने मे समथ हो, उसका जीवन सघपमय ही नही बल्कि जीवनभेदक भी है।" 'बाबा, अपन स्वाभिमान को भूलकर जो मनुष्य जीवन रूपी संघर्षों मे हारकर परदेश म परदेशी पत्तला पर खाना और स्वजना का छोड- कर परदशी से प्रीति करना सीख गया हो उसका जीवन साथक नही, निरथर है । वह उस जननी का पुन नहीं, कुपुत्र है । मैं तो वच्चा था, इसलिए इस मुल्क मे आ पहुचा।' वार्तालाप का सघप समाप्त हुआ। टाटी ने रोते हुए कहा, बाबू जी ! आप ही तो मेरे ईश्वर हा, जो आपने मुझे मेरे खोये हुए पुत्र से मला दिया। भगवान आपका चिरायु दे, वाबू जी ||" डोटी के मम- । अपनत्व की अटूटतो /7 भरे राज्य यो सुनकर में आत्मलीन होकर उदास हो गया प नारा मपनत्व की अटूटता देखकर नीर पलक्ने लगा। मैन गभीर लवे स्वर से कहा, "सहयोग या योग या डोटी, तुम्हारा मताप तप गया।" डोटी मुझे रोकना पाहता या परतु म रवा नहीं, क्यापि दूर या सपर था और ममय यम था। मैने मुसकरात हुए कहा, "मुझे जाने दो डोटी, देर हो रही है।

पियार शिकारी की मुझे उत्तम नस्ल के कुत्ते पालने का गहरा शौक था। कुत्तों का जाति में सबसे उत्तम नस्ल, भोटिया नस्ल का कुता पाया जाता है । अय नस्ल के पुत्ता वी अपक्षा भोटिया कुत्ता शारीरिक रूप मे बडा खुखार व शक्ति म हिंसक पशु वाघ से कम जबरदस्त नहीं होता । बाघ भोटिया कुत्ते पर चोरी छिपे हमला करता है । अकस्मात् यदि दोना मे धार द्वद्व हो जाये तो यह फैमला करना मुश्किल हो जाता है कि कुत्ता हारेगा या वाघ । भोटिया कुत्ते की खूखार व प्रबल शक्ति के आगे कभी कमी हिंसक पशु वाघ को मात खानी पडती है या जान से हाथ धोने पडते है। भोटिया कुत्ते की आवाज म इतनी गजना होती है कि छोटे छोट कुत्ते ही नहीं बल्कि छोटे बडे जगली जानवर दुम दबाकर भाग खडे होते है। विशेषकर उत्तराखड में पवतीय वन क्षेत्रा के लोग जो सघन जगला के मध्य गाव बनाकर बस है वे लोग अपनी भेड-बकरियो, गाय- बछिया व पसल को हानि पहुचान वाले जगली जानवरों से रक्षा के लिए भोटिया कुता का पानत है । भोटिया लोग--जो पवतीय क्षेत्र में दूर- दूर जहा अब भी माटर-माग नहीं है उन स्थाना तक अपनी भेड वक- रिया की पीठ पर सामान लादकर ले जाते है। ये मोटिया लोग अक्सर अद्धराति म अपना रास्ता नापत है। इसलिए भेड बकरियो की रक्षा हेतु ये लोग भाटिया कुत्तै पालत है । इही भोटिया लोगा से उत्तराखडा के पवतीय लोग भाटिया कुत्ते वे बच्चे खरीदते हैं। 191 मेरा एक अपना मोटिया नस्ल का जवरदस्त कुत्ता था। इस पिल्ले को मैंन ढिकाला बोक्माड म माटिया दादा म पचास रुपये म खरीदा था। उस समय यह छोटा बच्चा था। बचपन से ही मैं उस 'शिकारी' के नाम ग पुकारता था और आखिरकार वाद म शिकारी' के नाम स विख्यात हुआ। शारीरिक शक्ति म शिकारी अद्वितीय और रग म्प बडा भयकर लगता था। दूर दूर के ग्राम्य क्षत्रा म उमके खूख्वारपन की बडी धाक थी। क्या मजाल कोई “यक्ति या जाव रात्रि के मध्य गाव मे था आये । इसलिए मैं इसको हमेशा लाहे की एक मोटी जजीर से बाधकर रखता था। जब कभी मुझे जगली जानवरा का शिकार करना होता तो मे शिकारी को अपन साथ ले जाया करता था। शायद आप उत्तराखड स अपरिचित हा । उत्तराखड म तोलियू डाडा एव पूरली फाट का सघन वन बहुत प्रसिद्ध है। जानवरो म घुईड, कापड, बारहसिंगे शैल जगली सूअर भालू व बाघ बहुतायत स पाये जात हैं घुईड काक्ड, बारहसिंगे वगील इम जगली क्षेत्र म बसे लोगा की फ्मल को अधिक क्षति पहुचाते है । वाघ व भालू का आप जगल म चरते भेड बकरियो व गाय वलियो के मध्य आसानी से देख सक्त है। यह एक अतिशयोक्ति नहीं है। आप वाघ व भालू का इस प्रकार देख सकते हैं, जिस प्रकार आप अपने घर म बिल्ली को भ्रमण करते हुए देखत है । यह बात सत्य । यस क्षेत्र म बस लोग इन हिंसक पशुआ मे नही डरते और न ही हिंसक पतु मनुष्य पर आक्रमण करते है । क्याकि बचपन से इनका परस्पर मेलजाल मनुष्य से होता है । बाघ बरिया का सफाया अवश्य करता है । जगल के मध्य काई भेड बकरी या गाय-बछिया जपने साथ के पशुआ से बिछु' जाय तो उस जानवर को दूढना नहीं पडता । ग्वाला समझ जाता है कि उसे बाघ ने मार दिया है। जगल का विस्तार बडा व सघन हाने से खोय हुए जानवर का ढूढना बडा कठिन है। दक्षिण दिशा म यह जगल कालागढ जगल के तराई भाग से मिला है। आगे मपाट भावर का मदान है । दूसरी ओर पूव म मदरासी व लुहाचौड व जगत में मवधित है, गेप भाग उनर म 10/उत्तराखड के वना म दीवा जगल स मिला है । कालागढ़ म कालागढ डाम के बनन एव डाम में पानी की बढोतरी से ढिकाला वोक्साड के सघन जगला स इस दूरली फाट व तोलियू डाडा की ओर शेर व अ य व य प्राणिया का आगमन शुरू हो गया था। इसी तोलियू डाडा के मध्य वसे लोगा स मेरा एक गहरा संबंध था और अब भी है । एक बार मेरे कुछ सवधिया ने मुझे अपन शुभ काय म सम्मिलित हाने के लिए तालियू डाडा आन का आमनित किया। म उस काल गाव में था । एक सप्ताह पश्चात मैं अपने शिकारी को साथ लेकर तोलियू डाडा की ओर चल पडा। कुतूहलभरी नमदा एव गहरे नीले रंग की पवतमालाना का सौरभमय दिव्य आकार मन को प्राकृतिक सौंदय म डुबा रहा था। प्राकृतिक दृश्या का रसपान करता, नदी. नाला एव भयकर पत्थर घाटिया को पार करता हुआ म सध्याकालीन समय पर तालियू डाडा जा पहुचा । पैदल याना बडी प्रमादमय एव रमणीक थी। मेरे गिकारी में मबसे बडी यह विशेषता थी कि वह दूसरे गाव मे जाकर बहुत अच्छा स्वभाव बरतता था, फिर भी लोग उसके खूरुवारपन से हरत थे। असूज का महीना था। उस समय पवतीय क्षेत्र में मौसम बडा सौरभमय रहता है । प्रकृति का हर जीव उस मौसम मे अपने पूर्ण यौवन मे झूमता दष्टिगोचर होता है । उस मौसम में ग्रामीण कृपक लोग रानि को अपन समस्त पालतू पशुआ के साथ खतो में गोट बनाकर रहते हैं। उत्तराखड के पवतीय इलावा मे गोट बनान का एक बहुत ही पुराना रिवाज है। गोट करने से जानवरा के मलमूत्र स खेतो की उपजाऊ शक्ति बढती है । इस प्रकार गोट बनाने से गहू की फसल म खाद डालने की आवश्यकता नही पड़ती है। दूसरी वात, इस मौसम म धूप बडा तेज पडती है । कडी धूप से बचने के लिए ग्रामीण कृपय लोग अरुणोदय से पहले ही खेतो मे हल जोतकर यथासमय वैला का आराम देत है या साली खेताम चरने के लिए छोड दत ह । तीसरे दिन म और मेरे मित्र श्री तूफान शिवार खेलने के लिए करली पाट के जगल Tी ओर अग्रसर हुए। श्री तुफान अपने जमाने मे शिकारी की मौत / 1 प्रथम श्रेणी के निशानेबाजा मे आ जाते थे। पलक भपक्ने मे ये दौडते हुए जगली जानवग व उडती हुई चीलो को जमीन पर ढेर कर देते थे। हम दोनो व्यक्ति आघा मील आगे जगन मे प्रवेश कर चुके थे। भासा के आगे कंटीली झाडिया थी । भाडियो के पीछे एक घुईड चोर नजरो से करवट बदलने भाग निकलने की कोशिश ही कर रहा था कि श्री तूफान ने गोली दागी और गोली लगते ही घुईड जमीन पर धराशायी हो गया। घुईड के जमीन पर घराशायी होने के उपरात वाघ अपनी भयकर गजना से जगल को रौंदने लगा। कुछ समय पश्चात धीरे धीरे बाघ की भयकर हुकार काना से दूर दूर होती चली गयी। मैने समझा, शायद गोली घुईड के वक्षस्थल को पार करती हुई सीधी बाघ पर जा लगी। कुछ व्याकुलता प्रकट करते हुए हमने मन म विचार किया, अब तो बाघ अवश्य गाव मे कुछ न कुछ अपशकु न करगा । यह बात सत्य है कि यदि बाघ पर बेकसूर प्रहार किया गया तो वह मोघ म आकर भय कर घातक सिद्ध होता है। मतक धुईड को हम दोना महाशया न साल की एक लवी बल्ली पर बाघा और तिरछा लटकाकर ले आय । प्राणमुक्त घुईड को देखकर शिकारी प्रफुल्लित होकर नाचन लगा । सब गणमा य अति थिया न घुईद का शिकार खाया और शिकारी ने पेट भरकर बचे हुए मास का स्वाद लिया। वाघ एक शक्तिशाली हिंसक पशु है। छल कपट विद्या मे बाघ अन्य हिंसय पशुमा की अपेक्षा ज्यादा चतुर है । इसकी घ्राण शक्ति बहो प्रवल होती है। दूसरे दिन बाघ ने अधरात्रि के मध्य गाट म जायर चार पक- रिया व तीन भेडा का मून पोरर मौत के घाट उतार दिया । ।टयारे न एप चकरी का बाप से मुह से मुडा दिया था । मुह मे छूटे हुए पवार को वाघ यमा नही छाडता। वह उसे प्राप्त करन के लिए बार-बार प्रयास करता है चाहे गिवार को प्राप्त करन म भले ही उसरी जान चली जाय। दिन ढन चुका था। निगा सुदरी काला क्वल ओढ़ दूर यही पहाट पंचारिया व नदिया की गहरी सपाट पदरीली पाटिया के ऊपर अपना पाला ओढ़ना विधाती चली आ रही थी। धीर धीरे जगला में । 12/ उत्तरापहवे या म निवास करनेवाले भुनझुनो के अप्रिय शब्दों से निस्तार चुकी थी। वेवल प्राकृतिक सौंदर्य में एक ही दि था। वापुल पाको, कापुल पाको, इस निस्तब्धता, भरी मोठी आवाज वय प्रदेशो मे किसी किस्त चारही की याद दिला रही थी। रजनीकात की शीतल विरक राम के सजीव प्राणियो से आखमिचौनी सेल रही थी, जगलो गाय हान के कारण चारो तरफ गनाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था। रानि मौज करने के पश्चात् मैं और शिकारी बगले मे जाकर सो गये। कुछ ही क्षणाम मै गहरी निद्रा वे स्वप्नलोक में सो गया। अघरानि का पहर रहा होगा । शिकारी भयर र आवाज मे भूक्न लगा । मरी निद्रा टूट गयी और मैं जाग गया। मैन सोचा, शायद बाघ यहा आ पहुचा है। मैंने चारा भार दृष्टि दौडायो। देखा तो चाद की स्वच्छ पिरणे अधरात्रि के युगलगणा के साथ क्लिोलें कर रही थी। निस्तब्धता मे गाटियारो का केवल एक शब्द गूज रहा था-वाह वाह उस रात बाघ ने एक बूढी गाय का खून पिया और गाय को क्ल- मट में ले जाते समय छोड गया था। उत्तर दिशा म भार का तारा अपनी दिव्य ज्याति के साथ उदित हा चुका था। साथ ही रजनीकात मी पवतो के पीछे सुबह होने का आह्वान देन जा छिपा था। रात खुलने मे थोडी देर बाकी थी। गोट से सीन गोटियार मेरे पास बगले मे आये और कहने लगे, 'साहब, आज बाघ को अवश्य मौत के घाट उतार दिया जाय । आपका शिकारी कब काम आयेगा।" कुछ समय पश्चात् पौ फट गयी। भगवान भास्कर भी उदयगिरि पवत स उदित हो चुके थे। गाव के प्रत्येक व्यक्ति के मुह पर उदासी- नता को लहर छा चुकी थी। तब मैंने गाववालो को समझा बुझाकर एक स्थान पर एकत्रित होने को कहा । लोग एकत्रित हुए और मैंने एक योजना बनायी "कलमट के पास जो साल का बडा पेड है, उस पेड पर पच्चीस या रोस र पीऊवाई के वीच मचान लगाया जाय और जिस स्थान में शिकारी की मौत। 13 गाय मरी पडी है, उस स्थान से किसी भी दिशा म दा फुट गहरा, तीन फुट चौडा और पाच फुट लवा एक खडडा बनाया जाये । जब हम मचान पर चढ जायेंगे ती गाव या वाई भी व्यक्ति अपन घर से बाहर आने की कोशिश न सन, जब तक कि हम आप लोगा को घर में बाहर आन कान कहें।" सच प्रामवासी मेरी इस बात पर सहमत हा गय। ग्रामवासिया ने मिलकर कुछ ही क्षणा म साल के वृक्ष पर मचान तैयार कर दिया और भूमि पर ढेर हुई गाय म बीस फुट की दूरी पर खड्डा बनाया, जैसा हम बनाना चाहते थे। भगवान भास्कर पवता की धार पर डगमगा रह थे और मेर दिल की घटना की गति म दुद्धपशका आने लगी कि अब शिवारी की क्या दशा होगी। भगवान न करे शिकारी बाघ की करवट म आ जाये, नहीं तो मारा जायेगा। डर की हीन भावना का मन से हटाने के लिए मैंन अपन मन का सुदढ किया और शिकारी के गले पर एक मजबूत लोह का नुकीला काटेदार मोटे चमडे का पटटा वाघ दिया। इस चमडे के पट्टे को कुत्ते के गले मे बाघने स वाघ कुत्ते को नही मार सकता है और न ही जबरस्त कुत्ते को लडाइ मे परास्त कर सकता है, क्योकि बाघ अपना जवरदस्त हमला क्मिी भी जानवर के गदन पर करता है। इस लिए पटटा कुत्ते का एक प्रकार का जिरह बरतर था। मगवान भास्कर का उदनार विलीन हो चुका था-निशा की आशा बाकी थी। मैंन और मर मित्र श्री तूफान ने समय से पूर्व ही रात्रिभोज का आयोजन पिया और शिकारी को मी पेट भरकर भाजन करवाया। मेरा भाटिया कुत्ता सब कुछ समझता था। मूक पशु होने के नाते वह हमसे यह नही सक्ता था। मैन उसकी पीठ पर थपकी देते हुए कलमट के पास ले जाकर बनाय गये खडडे म रख दिया और ऊपर से सूखी घास व पैड की छोटी छोटी टहनिया से ढक दिया ताकि वाघ यह न समझ सके कि यहा मेरा काई घातक बैठा है। यह काय करने के तत्काल बाद मेरे मित्र थी तूफान ने राइफल म गोली भरी और दोना व्यक्ति पेड के ऊपर बने मचान पर जा बठे। मचान साल की घनी पत्तियो से आच्छा- । 14 | उनराखड के वनो म दित था और मचान पर दुबकी लगाये हमे माफी समय बीत गमा रजनीकात को कर निकर धवल दिव्याति से विपर ची थी। प्रातिक वातावरण मनमोहक था परतु मेरे लिएरएकजीव नीरस दपथा। मैं मन ही-मन आतुर सताप से घुट रहा था था। यदि शिकारी मारा गया तो मरे जीवन की एक लगाघ चोट होगी। मैंन शिकारी का एक बच्चे की तरह पाला है। बस, इतना ही सोच पाया था कि दूर अद्ध अघवारमय गहरे कटीले क्लमट से एक चित- ववरा ढेर सा लुटस्ता दष्टिगत हुआ । मैंने मन मे अनुमान लगाया, शायद वह ग्बूवार बाघ ही हो सकता है । धीरे-धीरे काला चितकबरा ढेर नजदीक आता दिसाया पडन लगा। राशि के समय वाघ की शाखा म चमक की बडी प्रबलता हाती है। इसलिए बाघ से नजर मिलाना मुश्किल हो जाता है। बाघ मरी हुई गाय से पचास फुट की दूरी पर आपर टकटकी लगाय खडा हो गया। मेर मिन श्री तूफान ने मरी ओर आखा मे सकेत किया- गोली मार दू ।' यदि उस काल बाघ को गोली मार दी जाती तो वाघ एक ही गोली सान पर जमीन म ढेर हा जाता। परतु अक्ल और शारारिक माड की कमी से गोली न चल पायी। हमने देखा, याप यडा निर्भीकता स मरी हुई गाय की आर अग्रसर हुआ और नजदीन आवर एकदम रुक गया। शायद उसे कुत्ते की गध महसूस हो गयी थी। बाघ न इधर उधर अपनी दष्टि दौडायो । परतु क्रोध ने नगे म चूर होन के कारण वह मरी गाय पर झपटा और धीरे धीरे उसे गहरे पलमट को ओर लुढकाने लगा। उस समय शिकारी वाघ का साई स दुबकी लगारर निहार रहा था। तब तक वह बाप पर नहीं झपटा। पता नहीं, शिकारी को क्या करना उचित रहा होगा या वह नापद अपना दाव देख रहा हो। वायो मरी गाय का एक जोर का भटका दिया और गाय सोधी खाई के किनारे पर जा पडी। ठीक हुआ विगाय गड्डे में नही गिरी नहीं तो शिकारी को चोट आ जाती। तभी बाप धमारे से गाम ये ऊपर मास साने के लिए चढ़ बैठा। सिकारी ने सई रा बाप के ऊपर घातक छताग लगा दी और पलक झपरते ही गिवारी की मौत | 15 । वाघ पर टूट पडा । वस, फिर क्या था, दोना दैत्याकार पशुओ म धमा सान युद्ध छिड गया । बाघ और शिकारी घातक पराक्रम से लड रहे थे। दोनो का रूप बडा भयकर लग रहा था । मानो दो भूखे बाधा ये चीच शिकार को प्राप्त परने के लिए लडाई छिडी हो। हम कुत्ते को पूण शक्ति से लडत देख रहे थे। मुझे कुत्ते के निडर साहस पर बडी प्रसनता हुई कि कुत्ता बेधडक होकर वाघ का मुकाबला कर रहा है। क्या मजाल कि वाघ उसे जमीन पर चित्त कर दे। कभी-कभी वाघ रणस्थल छाडने का प्रयास करता । परतु कुत्ता उसे अपनी प्रबल शक्ति से गर देता। दोनो का हद वडा आप लेकिन भयभीत करने वाला भी था । जुते खेत म घुटने घुटन तर गहरे खडढे हा गये ५ । कुते का साहस उत्तेजित करने के लिए हम दोना ने मचान ने ऊपर से गोर मचा दिया। शोर सुनकर कुत्ते के अथाह साहस एव शक्ति का ठिकाना न रहा । एक घटे तक बाघ और कुत्ते के मध्य भयकर युद्ध जारी रहा । इस अवस्था मे वाघ पर गोली चलाना उचित न था, क्याकि जिस तरफ निशाना साधा जाता उसी ओर कुत्ता टारगेट बनता । एक बार तो कुत्ते ने बाघ को अपने नीचे दबोच लिया और मुह से गभीर अवस्था में बाघ के ऊपर प्रहार क्यिा परतु बाघ वाघ ही था, उसका मुह व आगे पीछे के पजे लडाई के समय एक्साथ मार करते हैं और कुत्ते का मुह और अगले पजे लडाई मे काम करते हैं। इसलिए बाघ फिर बडी फुर्ती से उठ खडा होता । यह एक आश्चय की बात थी । बाघ ने कुत्ते को ऐसा दाव भारा कि कुत्ता सिर के बल खडडे में जा गिरा और साथ ही वाघ खडडे मे कुत्ते के ऊपर धमक पडा। फिर दोना में भयवर लडाई शुरू हो गयी। मचान के ऊपर से मैं और मेरे साथी श्री तूफार देख रहे थे कि कुत्ता कुछ परास्त-सा होता चला जा रहा था और वाघ का खूस्वारपन भी ढल रहा था। दोना की इस यवस्था को देखकर मेरे मित्र को एक बार खाली फापर करना पड़ा। शायद फायर की आवाज सुनकर वाघ यवरा गया और भाग निकलने के लिए पूरी ताक्त से छलाग लगाने की कोशिश करता जान पडता था। बाघ पद्रह फुट ऊची छलाग मार सक्ता है। ऊची व लवी छलाग लगाने मे बाप कम जबरदस्त नही होता। 16/उत्तराखड के वना में - बाघ ने एक लवी छलाग लगायो और भयकर गणना करता हुआ एव पेड में छायावाल क्लमट म जा गिरा। शिकारी खड्डे से बाहर खेत में चक्कर लगाकर भौवने लगा। प्रकृति का घना व शात वातावरण मन म डर की भावना को उत्तजित कर रहा था । फिर भी हम साहस पर निर्भीक्तापूवर मचान से नीचे उतर जाये । नीचे उतरकर हमन कुते वो वडे प्यार से पुचवारा और देखा कही वाघ न कुत्ते पर अपने जहरीले नासून तो नहीं मार दिये । हमन कुत्ता ठीक अवस्था में पाया। तत्काल हमने घर की राह ली और घर जाकर थाडा धूम्रपान करके लेट गय । पर इस अवस्था म नीद भी कैस आता। विश्राम अवस्था म लेटे लेटे भार हो गया। सुवह पी श्यामल ज्योति न गाव म लागा के मुह की उदासीनता को हटा दिया। बहुत मख्या में लोग हमे और गिवारी को देखने के लिए बगले म एकत्रित हुए, जहा हम तीनो ठहरे हुए थे। फिर भी हमे सदेह था कि बाघ पाखे से मार करेगा। लिए वाघ को मारे विना चन न लिया जाये। दोपहर के भोजन के पश्चात मैं थी तूफान व शिकारी गाय बछिया व बकरिया के साथ बडे चौडे खेता की ओर चल पडे । खेतो की छोर पर घना जगल लगता था। हम भी खेती के उसी छार की तरफ चल पडे । उस तरफ भाडिया म अपने दा वच्चा के साथ छुपी वाघिन न एक बकरी को जोर का भटका देकर कलमट में खीच दिया। शिकारी भी गाली वी तरह बाधिन पर धमर पडा। दोना म भयकर युद्ध छिड गया। बाघिन इस जबरदस्त कुत्ते के साथ युद्ध न करती परतु उम डर था कि कही कुत्ता उसके बच्चा को न मार दे । मा की ममता की कोई सीमा नहीं होती। बच्चो की रक्षा के लिए बाधिन शिकारी से लड रही थी। दुर्भाग्यवश मा को कुत्ते के साथ अवेला लडत देखकर बाघिन के बच्चो से न रहा गया और दोनो बच्चे रणस्थल पर आवर कुत्त से मुकाबला करन लगे। एक बच्चा मागे मे और दूसरा बच्चा पीछे मे कुत्ते पर वार करने लगे। परतु बच्चे हो। वे नाते वे भयकर कुत्ते का मुकावला न कर पाये और लडते लडते वाधिन ग एक यच्चा मर गया। वाधिन एक बच्चे को साथ लेकर गुर्गती हुई जगल गिकारी की मौत / 17 का आरमाग गया। तमा समाप्त हुआ। बाधिन पे मर हुए बच्चे का हम पर ल आये । घर लावर मगूदास मे उसकी माल नियालपर बगल के पास सुसान के लिए वास के एक डडे पर सडा पर दिया। उस रात याय और बाघिन न गाव वाला को इतना अधिक परवान दिया कि सुबह हाने पर भी लोग परा स निगलन में भयभीत हा रह थे। इस अवस्या का निपटान के लिए हमन मजबूर हापर वदूर स हवाई फायर क्यि । तय कही लोग अपन घरा म बाहर निकले। मैन कई बार अनुभव रिया, जब कभी मेरे निजी व्यक्तित्व में उदासीनता आ जाती है, ता मैं समझता ह या तो मेरे ऊपर काई सकट आ गया है या वाई हानि अवश्य होगी। सता म हल चनात कृपा का देखकर मुझे अचानक अपन घर की याद आ गयी और उदासीनता न मन पर अपना अस्तित्व जमा लिया। मैं समझ गया, आज अवश्य काई खतरा सामन आन वाला है। में उदासीनता वी गहराइ में डूब गया। दिन का भोजन करते समय मेर मित्र श्री तूफान न मुझ उदास देखकर कहा 'क्या आज इतन उदास क्या हो ?' मैंन गभीर स्वर म उत्तर दिया, "तवियत कुछ सराव मी लगती है, इसलिए मन उदास हो गया।' सही वात मैन श्री तूफान या नहीं बतायी। मैने उह राइफल मैं गाली मरने को कहा । श्री तूफान न राइफल तैयार की और कहा "चलो खेतो की आर चलें, किसी जगली जानवर का शिकार करेगे। तब मैंने श्री तूफान जा को वास्तविक बात यता दी "आप हाशियार रहिए कही हम जान से हाथ न घोन पडे। मेरी उदासी यही व्यक्त करती है।' मेरे भावात्मक श दा को सुनकर श्री तूफान मद शब्ना म बाल, "यह आप क्या कह रहे है । इस प्रकार की घटना कभी नही घट सक्ती है।' शिकारी हमारे साथ साथ चल रहा था। मैंने फिर श्री तफान को सचेत किया, "आप हाशियार रहिए । दोस्त ! समय समय की बात है, 18 / उत्तराखड के वनो मे - समय के बरावर शक्तिशाली कोई भी नहीं होता है।" लोग खेता में अपने कृषि काय में संलग्न थे। कोई हल चला रहा था तो काई अपनी गाय बछिणे व भैसो के लिए घास काट रहा था। इस उनसे वार्तालाप करते हुए जगल के पी चौडे येतं पर जाखड़े हुए। पता नही, दुश्मन कब से शिकारी को ताक पर झाडियो में घात लगाये, बैठे थे। गलती इतनी हुई कि शिकारी हमस सौ मीटर आगे सीधा-स को छोर पर जा पहुचा। हमारी आखा पर पर्दा पडत ही दोनो वाघ और बाधिन खूरुवार ढग से शिकारी पर टूट पडे । बस, तव पाषाण हृदय वाले दैत्याकार पशुओ मे विकराल युद्ध छिड गया । अब शिकारी दा बापा से लड रहा था। इसलिए शिकारी अपनी जान पर खेलता नजर आ रहा था। हम बघवाउल से हाबका गये और अपने मुखारबिंदु से एक भी गब्द न निकाल सके। आधे घट तक हम वहागी की हालत में तीना हिंसक पशुमा का पार सघपमय अकल्पित तमाशा दख रह थे। कुछ चैत म आने पर मैंने जार का शोर मचाया धा। कृषक लोग अपना कारोबार छाडकर अपने माथ हरियारा का लेकर घटनास्थत नजदीक एकत्रित हो गय मैने चिल्लावर श्री तूफान को गोली चलान का आदश दिया, परतु धीतूफान धबगहट से इतने व्याकुल हा गय थ कि गोली न चला पाये। लोगा न 'वाह वाह' का वडाशार मचाया परतु सब कुछ निरथक था। कुत्ता साहस और प्रवल शक्ति से लड़ रहा था और वाघ व वाधिन अपने मोय हुए बच्चे का बदला लेन में जुटे हुए थे। कई वार बाधिन गिकारी के नीचे दब जाती। कभी बाघ गिरता कभी कुता। वाघ फुर्ती स उठकर फिर भिड जाता । इनकी भयकर लडाई सात सेता तन जारी रही। तमाम छाटो छोटी सभी प्रकार की जगली धासनुमा भाडिया व पौध टूटवर तहस नहस हो गये। एक प्रवल भक्ति दो भयकर शक्तिया स लड रही थी। मैं सब कुछ देख रहा था । कुत्ता परास्त होता चला जा रहा था। मैं सब कुछ समझ रहा या कि गिवारी अब मारा गया। मैने चिल्लाकर प्रोतूफान रो गोली चलाने को कहा। कुत्ते की दुदसा देखते हुए श्री तूफान की आसा में पासू सलर बाम और उहाँने निशाना जमा दिया । गोली बाधिन के पट म शिवारी की मौत | 19 । - - जा लगी और आहत वाघिन अचेत होकर जमीन पर गिर पडी। कुत्ते का दुर्भाग्य इतना ही हुआ कि कुत्ता बाघ के साथ वाघिन के ऊपर से नड रहा था। वदूक की आगज सुनकर बाप भागना चाहता था, किंतु शिकारी के तेज दात बाघ की गदन को बुरी तरह जकड चुवे थे। वह कुत्ते का आखिरी दाव था इसलिए वाघ रणक्षेत्र से भाग न पाया। कुत्ते व नीचे हतचेत पडी प्राधिन न प्राण त्यागते समय अपन तेज नाखूना स शिकारी का पेट फाड डाला। शिकारी वा मुह बाघ के गल से गया और वह करणामय आवाज म कराहता जमीन पर चित हो गया। हिंसक पशु वाघ पायल अवस्था म भाग निकला। गाव के सब लोग मत व वापिन व शिकारी के पास गये। शिकारी की मत्यु कोष म मैं और साथी श्री तूफान भाव विह्वल हाकर रो पडे । मन कहा, ' मैन शिकारी का बच्चे की तरह पाना था । म शिकारी के बिना नहीं रह सकता हूँ।' मेरे ट स की सीमा न रही। करुणापूण मन से गाव वाला ने मुझे दिलासा देते हुए कहा, 'मन म दु ख मत करो साहब जो होना था, हा गया है। आपका गिवारी मरा नही, वह जिंदा है। शिवारी की निर्भीर वीरता अविस्मरणीय रहगी, जब तक उत्तराखड इस तोनियू डाडा व कूरली फाट वे सघन वन म हिंसक पशु बाध विचरण करते रहगे।' हृदय म दुख पौवन म था। उम काल प्रवृति का मौंदयमय शात वातावरण भी काट सान को आता था। उदासीन मन और चक्षु ज्योति स ऐसा प्रतीत होता या मानो प्रकृति भी गिवारी के मृत्यु गोर पर नयन-नीर छोड़ रही हो। अनायास ही मेर दुपित हृदय में उभर आया, अहा ! कुदरत या खेल निराला है। होनी बनवान है प्रकृति की गोद में न अव पियारी मा खेल होगा और 7 अब शिकारी म मेरा मेल होगा।' घटनास्थल पर एकत्रित लागाने दुसये साय नियमो दपना दिया। मैं उस स्थान पर सहा महा पूट फूटवर रोन लगा। पियारीना दफनापर हम मव व्यक्ति गाय की पार चल पह। पर पहुंचकर मने भागा नही दिया। तिवारी के गत्यु नोव मे राषि । 20 | उत्तरागट वे बना म भोज छोडना पडा। गाव वाला न मुझे बहुत समझाया, परतु मरा मन न माना । मेरी आखो के आगे केवल शिकारी का सजीव चिन धूमता नजर माता और मैं शोकाकुल होकर मौन हो जाता। दूसरे दिन मैंने अपने कंधे पर अपना एक लवा थैला लटकाया और खाली हाथ तालियू डाडा से अपन घर की और चल पागाव वाले मुझ शिकारी के बदले में कुछ देना चाहते थे, परतु मैन लैन से इ कार कर दिया। मेरे गाव छोड़ते ही गाव म सन्नाटा छा गया। दो मील तक मुझे छाडन के लिए मेरे साथी श्री तूफान व चाचा कैप्टेन भूपेंद्र आये । वे मुझे नदी पार छोड आय । उह घर वापस जाता देख- कर मैं फूट फूटकर रोने लगा। मन उनसे इतना ही कहा शिकारी का खेल और मरा मेल अब कभी नही होगा।" अक्स्मात अब जब कभी मे उस नस्ल के कुत्ते को दखता हू तो शिकार का मजीव चित्र मेरी आखा के आग दुम हिलाकर नाचने लगता है । तब म मावविभोर होकर नेत्र मूद लेता है । अब केवल एक लालसा है, सफ्द भाटिया घोडा रखन की। । - मिताभोर

टिकाला वोक्साड मे
समय अधिक गुजर चुका था । न भाटिया घोडा ही परीद पाया और न
भोटिया
मुत्ता ही। शिकारी के वियोग मे हृदय म दुख यौवन मे था।
सोचा, हृदय म सुख वा योवन स लाऊ । इसलिए मेरा आपा
विचलित था। सोचा, समय आन दो, एक बार ढिवाला वोक्साह जाकर
सुप्रमिद शिकारी जिम कार्वेट ये एक मात्र याद दिलान वाले बगला को
निहारा जायेगा और साथ ही शिकारी को याद भुलाने के लिए वही से
भोटिया कुत्ते का एक पिल्ला लाया जायेगा।
समय प्रकृति का आचरण करता हुआ धीरे धीरे ढलता गया और
में भी ममय की प्रतीक्षा मे समय ढालता गया। ऋतु गीतकालीन न
थी। पतझड का यौवन भी वद्धावस्था मे आकर समाप्त हो चुका था।
शनै शन यौवनी अपने यौवन यागवल से नव उमगित सौंदय मे विक
सित होने लगी, साथ ही प्राकृतिक सोदय हर प्राणी का अपन यौवन
भोग के लिए विचलित करने लगा था। धरा का योवन यौवनी के यौवन
से मेल कर बैठा और प्रकृति के मनमोहक सौदय को निहारकर मेरा
हृदय यौवनी के यौवन से सपक जोड वठा।
प्रकृति का उभरता यौवन मुझे विचलित कर रहा था। मेरा
विचलितपन एक ही बात का सकता था, केवल ढिकाला बोक्साड
को निहारने का । नियमानुसार धीरे धीरे प्रकृति का यौवन ढलता जा
और मेरे मन में पतझड आता जा रहा था। सोचा, 'समय
आ चुका है । चलू, दिवाला वाक्साड को।
रहा था
| 22 /

समय बीत चुका था। प्रकृति के नियमानुसार ग्रामीण क्षेत्र म खेता की जुताई का काय आरभ हो गया, इसलिए ठिकाला बोक्साह का सिद्धत स्थगित करना पड़ा। समय लौट आया क्यादि खेतो मे जुताई का काम समाप्त हो आया । प्रकृति का सकेत कमयोगमय था इसलिए ढिकाला बोरसाड के लिए यथासमय योजना बनायी। बडे सोच विचार से योजना का योग निकाल सोचर, सिद्धत को सफल बनाने का श्रेय कौन लेगा, परतु श्रेय का मागोदार कोई न बन सका। नयन- लोचन व हृदममोचन प्रकृति का सौंदयरूपी यौवन भी निखरता चला जा रहा था। हृदय में उभार आया। एकात म ही ढिवाला वोक्साड का सिद्धत करना हो श्रेयस्सर होगा। चाह वह सुखमय हो य' दुखमय। मोटरमाग निकट निर्मित होने से दूसरे दिन में प्रात पाल के मोटर में बैठकर तराई भाग वाले वन के चिमठा नामक स्थान के समक्ष उतर गया। अघलोट जगल का नीरस वातावरण निहारन से पाखं के आगे काल रग के प्रतिबिंब छाने लगे। मेरी शारीरिक व मानसिक उतेजना शिथिल होने लगी और मैं मानसिक और शारीरिक सतुल. खो बैठा। कदम आगे बढने से विरत हो गये। मुझे हतोत्साह देखक अचानक पीछे से आपर एक बद्ध महात्मा ने कहा, "आप अभी इतन घबरा गये कि जो समझ से बाहर है और यदि सामने शेर आ खड होता तो? काम हिम्मत का है।" मैं स्वय मन में सोचने लगा होनी होना और मालचक्र दोनों का महयोग कुछ करके मुझे वियाग मे डालन चाहता है। वास्तव में जगल का वातावरण उतना भयकर न था जितना कि जगत में छोटी-छोटी वन कदराओ के अधकारमय खोको म उगे बौन व झपरीली झाडियो का, क्योंकि शेर, बाघ, भालू, चरक चीता और अन्य किस्म के हिंसक पशु एमे स्थानो मे नियति करते है। माल के गगनचुबी दरस्त तो मतयुगी पुरुषांची यादी को निहारने से ऐसा प्रतीत होता थी मानो ये विशाल दर कभी योगी पुरुष रहे हो, जो अपने तपोभूल से धन वृक्षम्प धारण करने ढिकाला बोक्साड में मानव हित कर रहे हैं। मपरीसी माहियो से मागते छोटे व यजीव तो वयोवदो के मुख से सुने जिम काट के अचूर निगान की याद दिलाते थे। मुखामुख पठिनाइयो को परास्त पर हम दुमडा पहुंचे। हिंसक पशुओ म शेर, बाघ, चरक भालू, सूमर व जगली हाथी जगल के सभी भागा में पाये जाते हैं परतु जगली हाथियो के लिए दुमठा बहुत ही प्रसिद्ध है। इस स्थान म रामगगा और मदाल नदी या सगम हाता है इसलिए जल पोदास के कारण जगली हाथिया वा यह स्थान बहुत भाता है। ब्रिटिश शासनकाल म ब्रिटिश सरवार 7 इस स्थान (दुमहा) मे जिम बाट के लिए जगल म निवास करन के लिए एक बगला बनाया था, जिसे भारत सरकार के वन विभाग ने नया रूप देवर बदल दिया है जो अब रेंजर चौकी के नाम से प्रसिद्ध है। जिम काट के साथी कुछ ग्रामीण वयोवद्ध रहते थे कि जिम काट टुमडा और काला दुगी में ही अधिक समय व्यतीत परते थे। दुमडा की रेंजर चौकी में जगलात के कुछ वायरत लोगो म हमारी मेंट हुई। उनके पास रखकर कुछ क्षणा के लिए हमन विधाम किया और बाद मे वन के रास्ते के बारे में पूछताछ करके खि नावली की ओर अग्रसरित हो गये । जसे-जैसे हम आगे बढ़ते जात, आत्मा रोन लगती। शेर, माल, बाघ व चरक के मय से नही बल्वि जगली हाधिया के भय से, जगली हाथी बडे दुष्ट होत हैं । रामगगा पार करके हम बडी चतुराई से डरावने क्ला-कागल करते हुए खिनावली पहुचे । खिनावली पत्थरो से भरपूर एक निजन स्थान है। इसको खि नावली रोखड भी कहा जाता है । इस स्थान की चारो दिशाओ म वक्ष महात्माओ की तरह तप करत जमघट लगाये खडे थे, मानो योगी हजारा वर्षों स योग साधना में लीन एक पाव पर खडे हो। इस स्थान से हिंसक पशुआ की खबर आसानी मे ली जा सक्ती थी क्योकि यह स्थान दूर तक खुला हुआ था और हमारी दष्टि भी हमे प्रत्येक वय जीव से अवगत करा सक्ती थी। वन का विचित्र व भयकर वातावरण हम आग बढ़ने से रोक्ता था, गहरे स्रोत, झपरीली । 241 उत्तराखड के वना में वेलिया, बान दरस्त व मालू, वक्ष की लबी लताओ को निहारकर ऐमा प्रतीत होता था, मानो भगवान दृष्ट मानव को उसकी मत्यु के पश्चात् उसे मजा देने के लिए इही कदराजा म तुच्छ जीव के स्प म ज माता होगा। ममय प्रबल था और हम निवल थ। शारीरिक सुरक्षा करत हुए हम रोखड पार करके जसे ही चढती राह पर चढने वाल थे वि दूर वन- कदरा मे दो शेरो की भयकर देहाड सुनायी दी। शेरो की हुकार से ज्ञात होता था चि पचानना म परस्पर द्वद्व छिटा हुआ था जो एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। विश्वविस्यात शिकारी जिम कार्वेट न इसी जगल मे वामित होन के नात रम बात का निरीक्षण दिया कि जव दो शेरा म परस्पर द्वद्व छिड जाये ता शेर क्रोधवश होकर छत्तीम फुट की ऊची छनाग लगान म मफल हो जाते है। बम, फिर क्या था । हमे अपनी जान के लाले पड़ गय। शरो की भयकर हुकार म जगल का शात वातावरण कोलाहल म बदल गया। जगली जानवरो मे भगदड मच गयी। पक्षिया का कोलाहन मन का और भी भयभीत कर रहा था। स्थिति बडी गभीर व नाजुक थी। सोच विचार हृदय म चल बसा था। दष्टि ने मोच विचार का स्थान ले लिया था। शेरा के मय और जगल के अशात वातावरण स हम ऊची राह पर नेजी से कदम बढाते हुए मानसिक व शारीरिक कष्ट का परास्त कर मुडापाणी ग्राम में पहुचे। भगवान भास्कर का तमतमाता उदकार शात होकर जगलो के ऊचे शिखरा का लाघ चुका था। केवल लालिमा व्योम मे छायी थी। हमन परस्पर विचार विमरा रिया, गत्रि-विधाम इमीग्राम म होगा। जागामी सिद्धात उपाकाल। मध्या की बेला थी, वृद्ध महात्मा ने कहा, 'अब आप सुरक्षित स्थान म पहुच गये हैं। मैं आपके लिए गत्रि विश्राम का गाव म प्रबध करने लिए जा रहा है । आप कुछ देर यही खडे रहें।" बद्ध महात्मा चले गय । मैं अपरिचित स्थान म खडा अपरिचित्त-सा लग रहा था। समय अधिक हो चुका था। वृद्ध महात्मा की प्रतीक्षा म दिकाला बोक्साड म / 25 , मैं बेचन हो रहा था परतु वद्ध महात्मा का कही नाम नही । साचा, अपरिचित से परिचित होना निश्चित था। मन म भाव भरा नही, 'आप कोन?' फिर सोचा, 'कौन-सा भप किमया, मनुष्य का या भगवान का? न जाने किस भेष म मिल जाये भगवान, सकट तो टला । जैसे-जैसे निशा का तम छाता चला आ रहा था, वैसे-वसे मै भा रात्रि विश्राम के लिए वैचन होता जाता, क्योकि जगली क्षेत्र वाले ग्रामो में अनजान व्यक्तियो को राशि विश्राम के लिए स्थान नहीं दिया जाता है। कुछ कारणवश परिचय होने पर तव ग्राम प्रधान ने मेर लिए रहन का विशेष प्रबंध किया आर एक विशेष रात्रिमाज का भा आयाजन किया। धीरे-धीरे भोग काल का समय बीता। बाहर निशा का घना काला तम ममस्त भूखड का घेर चुना था। रात्रि के युगलाण भी सो चुके थे। वार्ता समाप्त कर मैं भी विश्राम करने लगा । जस हो नीद मुझे स्वप्नलोक में भ्रमण के लिए मामनित करन लगी थी कि अचानक जोर से ठोखने की आवाज सुगायी पटी । मरी स्वप्निल नीद सब विलीन हो गयी और मै भ्रम से भयभीत होकर चारपाई पर लटा मय से कापने लगा। में सोचने लगा, 'अजीब तमाशा होता है इन जगली क्षेत्रीय ग्रामा म, क्या ध्यय रहा होगा इन लोगा का यहा वसावट करने या फिर रुक कर कर वही ध्वनि। नात हाता था जस कोई दरवाजे के पास आकर ध्वनि परीक्षण कर रहा हा । अजीब सी आवाजो का था ममावेग, लगता था, माना क्या रह गया है अब शेप । रात भर अनोखी बोलिया विचित आर मानव जसी भी। कौन से जीव होगे, मनुष्य या जगली पशु या कोई रातवसरू चिडिया या रात्रि में योगी पुरुष या रानि के युगलगण? निगा ढलने दो, उपाकाल किसी विद्वान ग्रामीण से इस विषय म नान प्राप्त कर समाधान करना है । भयपूण निशाकाल समाप्त हो गया। तब मुख उपा का देखा। नाश्ता करने के पश्चात मने ग्राम प्रधान में कहा, "क्या आप किमी विद्वान वयोवद्ध स मेरी मुलाकात करवा सक्त है ? म उनसे किसी विपय म विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। कुछही क्षणो म प्रधान जी ने एक वयावृद्ध को लाकर मेर सम्मुख । । 26 / उत्तराखड वे वना म बिठा दिया। मैंने कहा, "वयोवृद्ध, रात्रि काल मे मने मुनी अजीब, बडी विचित्र, बडी डरावनी आवाजें । मापसे क्या कहू, जो वहा नहीं जाता, कई प्रकार की आवाजो का समावेश । मेरी बात सुनकर वयोवृद्ध मुसकराते हुए वोले, "साहब, जगली गाव है। उल्लू, भूत, डायन, चुडेल, अहेडी जिन व फोडू आदि कई प्राणी है जो निशाकाल में अजीब व विचित्र आवाजें निकालत ह । उह रानि- निशाचर भी कहते है। शायद आपने वे आवाज सुनी और टर गये होगे । उनका वास निजन स्थाना मे अधिक रहता है विशेषत घने जगलो म, जैस यहा।" विवादग्रस्त विषय छोडकर मैने कहा, "आदरणीय, आपको मेरे साथ ढिकाला और बोक्साड के सिद्धत पर चलना होगा। मैं उस क्षेत्र से अनमिन हू । विशेष रूप से आप जस विद्वान वयोवृद्ध से उस क्षेत्र के बारे मे मनोवाछित जानकारी प्राप्त करना चाहता हूं। क्योकि आपका समस्त जीवन इसी प्रकृति की लीला म फ्ला फला है इसलिए आपका ज्ञान मेरे लिए श्रेयम्बर होगा।" वयोवृद्ध बोले, "शुभ काय में देर क्या वयावद्ध के स्वस्थ शरीर को निहारकर मेरा चित्त भरमा गया। सोचने लगा कदमलो का देश है तो निजन, परतु रहनेवालो ने अच्छा दिया है अपना स्वास्थ्य-सृजन । मैंने कहा, "आप मुझे प्रत्यय स्थान म अवगत करते हुए हिकाला मे बाक्साड ले चलो, वहा गे दिन भ्रमण कर फिर यथास्थान पर लाट आयेंगे।" वयोवद्ध बोले, "अवश्य । भोजन तैयार है, भोजन कर लो, तत्पश्चात ढिकाला चौट की ओर प्रस्थान करेंगे।" हमने यथासमय भोजन दिया और बडी उत्सुकता से ढिकाना माग नापने लगे। डर से मन विचलित हो रहा था तभी वहरियोपी वहमोग बडा विक्ट है । कोई खतरा ता मोल नहीं लेना पड़ेगा दैत्याकार वन चटटाना का विकृत आहार और रमनराधक ढिकाला बोक्सा " वातावरण म भीमपाय रस्तामा पलाय निहायर अनगिनत वल्प नाआ का मन जननी बार उह जमहाय अबला की तरह मान द रहा पा। लगता था मानो हिमय पशुमा म गासपर र अजगर व जगला हाधियाका यी आनट भवन हा । वयावद बाल हा वास्तव म प्रवृति ने जिना जाम दिया है उनर रहने व साल के लिए सब कुछया है। घबराजो नहीं यहा आप का पहली बार सिद्धत हुआ है एमलिए यापमा पहना उचित है । मुझे ता इस प्रकार महसूस हो रहा है जस जापको अपने ग्रामीण क्षेत्र के स्वाय यातावरण म । साहब गेर व अय हिंमय पगुआ स उतना पतग नहीं है जितना चि जगला हाथिया का। सामना पर लेग, में उपाय साधक है। अक्मर देसा गया है कि जगती क्षेत्र में निवाम बरनवाले ग्रामीण खतरनाय स खतरनान हिंगव पशु वा जामानी म मुकाबला कर लेते हैं। धीर धीरे वन माग तय हाता जाता और वयोवद्ध मुझे जगल व हर स्थान मे परिचित वगत जाते ! म्कयर वाले, " सामन जा गहरा वाली करता है उसके नीचे चौडे स्थान पर एक बार गर और अजगर में घमागान लडाई छिडी हुई थी। मुझे ज्ञान नही है, दाना म लडाई का क्या कारण था। अगर र का सिर अपन मुह में डालकर शेर का साबुत निगलना चाहता या परतु शेर शर ही था। शेर ने अपन तज नापनो रा अजगर के जवडे फाड दिय। परिणाम यह हुआ वि गर और अग पाणस्थल म स्वगवास हा गया । प्राय दखा गया है कि यदि शर और जिगर की अवस्मात जगल म भट हा जाय ता य हिसक पशु जी जान की हिफाजत के लिए एक दूसर वा घातय चाट पहुंचाते है विशेषत जब अजगर को बड जानवर वा शिकार करना हा ता वह जमीन म जपने लव शरीर की कुडलिया बना अपना मुह छिपा देता है जोर दुर्भाग्यवश यति क्सिा जगली जानवर का पाव अजगर के अपन शरीर द्वारा बनाये गये कुडला में पड़ 28 / उत्तराखड व वना म मेंन कहा जाय तो अजगर उस जानवर के पाव को इतनी ताकत से कस देता है विजानवर अपना पाव छुडा नहीं पाता और फिर धीरे धीरे अजगर अपना मुह जानवर क पास ले जाकर उसे साबुत निगल देता है। प्राय ऐसा मा देखा गया है कि हाथी, जिराफ व गेडा को छोडवर अजगर अन्य सभी छोटे जगली जानवरा का अपना शिकार बना देता है। ऐसा भी हाता है जगला मे" क्योवद्ध बोले 'हा, कई बार ऐसी घटनाए देसन म आती है विशेषत धने ज गला मे। जो व्यक्ति जगला के वातावरण स दूर और अनभिज्ञ हा उसे क्या नान कि जगला म किस प्रकार जीवन व्यतीत करना पडता है, जगली जानवरा से अपनी सुरक्षा कसे की जाती है, कौन से हिंसक पशु की क्या प्रवत्ति होती है उमस अपन का कस बचाया जा सकता है । रुका मत, बढत चला। मैं तुम्ह उम स्थान से अवगत पराऊगा जहा मैं एक बार अजगर का शिकार हान से बच गया। काफी भाग चलकर वयावद्ध बताया, सन् 1945 मे यह घटना घटी। सामने जो भाटिया स भरपूर दो घाटिया का सगम चौडे है, उस स्थान पर चिरान या काय चल रहा था । मै काम समाप्त कर वहा से कुछ दूर कुजकठोली भाडियो के पास जा पहुचा। न जाने कब से वहा अजगर अपना मुह खोले पडा था। भाग्यवश मेरी दष्टि अजगर के मुह पर जम गयी। यदि मेरी दष्टि अजगर के खुले मुह पर न पडती तो अजगर अवश्य मुझे निगल देता। मै बडी फुर्ती स जमीन पर पडे छोटे छोटे लक्डी के फटे अजगर के मुह मे डालता गया जब तक अजगर ने अपना मुह बद न कर दिया। फिर पुर्ती से भागकर दूर एक पेड की आड में खड़ा होकर अजगर को निहारता रहा । जगलात के वायरत लोग मुझे देखकर हक्बका गये। मै उनको आवाज देकर कुछ दत्ता न सका क्यादि डर के कारण कुछ समय के लिए मेरी आनाज लोप हा गयी थी। उनके पास जाकर मने बड़ी देर बाद उनको सारी घटना का विवरण दिया जसा मेरे साथ घटित हुआ था। तव पहा मे मव लोग भाग निकले। दूसरे दिन अब चीलें जगलात के उस स्थान से चुछ दूरी पर । डिकाला बोक्साड मे । 29 मडराने लगे तो मुझे ज्ञात हुआ कि अजगर मर गया है क्याकि जब अजगर किसी चीज को निगल लेता है तो उसको पचाने के लिए अजगर पेड पर गोल फदे मारकर अपने शरीर को जोर से क्सता है। निश्चय ही अजगर ने वैसा क्यिा होगा और लक्डी के फटे अजगर का पेट फाड- कर बाहर निकल गये हागे । इसलिए अजगर का मरना स्वाभाविक था। मने कहा आपने तो बडे साहस और वीरता का काय दिया।' वयोवद्ध वोले माहम और वीरता का क्या काय क्यिा । अक्सर जगला मे लोग इसी तरीके को अपनाकर अजगर स अपनी आत्मरक्षा करत है। घने जगलो मे लागा के साथ इस प्रकार की कई घटनाए घटती रहती है।' समय मध्याह्न का या। वयोवृद्ध बोले "निहार लो, यही है ढिकाला चडि। वास्तव मे लगता था विराट वैरागिया का देश, ढिकाला चौड यागिया के योग साधना स्थान-सा विदित होता था। मानो यागियो का योगलाक और देवा का देवलोक यही स्थान हो। सपूर्ण वन म निजनता का वास मन मे अनोखी दुनिया की कल्पना करने का आतुर करता था। कुछ समय पश्चात हम वोक्साड के इलाके में प्रवेश कर ग्राम चौरापाणी पहुचे। मैन वयोवद्ध से कहा, प्राचीनकाल म बाक्साट, वोवसाडी विद्या के लिए ममस्त उत्ताखड में प्रसिद्ध था। कहते हैं, जो मनुष्य यहा आता था, वह अपन घर से हाथ धो बैठता था। इस क्षेत्र मे वोक्मू जाति के लोग बाक्साडी विद्या का जाप क्यिा करते थे। इसलिए इस क्षेत्र का नाम वाक्साड पडा । वयोवृद्ध बोले सभी लोग यही कहते है।' मैन पूछा, ' वयावृद्ध, वोक्साडी विद्या के बारे म कुछ शान है आपयो? वयोवृद्ध वाल, 'ज्ञान तो मुझे नहीं है। वयावृद्धा के मुह से मैने भी ऐसा ही सुना है जैसे आपन सुना है । 30/ उत्तराखड व वना में .

" कहते है, बोक्मू जाति के लाग बोक्साडी विद्या को याग-साधना के बल से अपने बोक्म देवता मे प्राप्त करते थे । इस विद्या के प्रताप से वे लोग अपना रूप बदलवर शेर और बाघ बन जाते थे। इ ही वनाम एक विरोप घास की जडी मिलती है। वे उस घास की जद का वात थे और फिर मनुष्य रूप धारण कर लेते थे। यह भी कहा जाता है कि यदि उनका वह धाम की जडी खाने को न मिली या जडी खाना भूल गये तो दे शेर और वाघ येस्प में जगलो मे विचरण करते रहत थे। धीरे धीरे वना म हिंसक पशुआ के आचरण से उनमे भी हिंसक प्रवृत्ति आ जाती थी और वे नरभक्षी वन जाते थे। कहते हैं, वोक्मू विकार स्त्रिया को ही अपना शिकार बनाते थे और पुम्पा से भय खाते थे। यह भी कहते है कि जो पुरुष उनको मारन की काशिश करत थे, बोक्सू छल कपट से उह भी अपना शिकार बना दते थे। एसा कुछ उन लोगो के विषय म कहा जाता है । यह बात कहा तव सत्य है, इसके विषय म कुछ कहा नहीं जा सकता है। वास्तव म वयावद्धा ये मुह स मैंने भी वोक्रा जाति वे लोगा के विषय में इस तरह की कई कहानिया सुनी है जा सत्य भी हो सकती है इसमें कोई सदेह नही। यह भी कहा जाता ह कि जैसे ही भारत मे अग्रेजी शासन लागू हुआ' वीर धीरे ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकारियो को देख रेस में उत्तरासह में जनता द्वारा होनवाली गतिविधिया का पता लगाया। फिर धीर वीरे ग्रिटिश सरकार ने पवतीय लोगा में सपन सम विद्या के विषय म विशेष जानकारी प्राप्त की और साथ ही पसा या लालच देकर लोगो से उन लोगा का पता लगाया जो बोक्साड विद्या के विशेषज्ञ थे। कुछ अग्रेज अधिकारिया ने वोरमाटी लोगा से बावसाली विद्या की पावित वा प्रदान करने को कहा । वास्तविकता प्रकट होने पर इस विद्या के कारण अग्रेजा के मन म बातमीभी ना पालम अग्रेज सरकार ने यह निर्देश चोकमाही विद्या का गलत उपयोग या कि पकड़ा गया तो उसे मत्युडदे जोगा। अपनी यूटनीति से बाक्साडी सिकारका 4 सरका दिकाला बोषमाई पवतीय क्षेत्र म अग्रेजी शासन प्रणाली पर काई आधान न पहुचे । "एक बार एक सौ पंतीस वर्षीय वयोवद्ध न बताया कि अग्रेज सरकार बोक्माडी विद्या के विशेषज्ञा का मफाया नहीं करती और वे लोग रहते तो देश को स्वतन रवाने म उनना सबसे बडा यागदान होता। बाद म जो कुछ लाग बोक्साडी विद्या के विशेषज्ञ शेप रह गये थे, अग्रेजो के भय स उहोने अपनी वोक्मादी विद्या की पुस्तक जला झाली, जिसके द्वारा वे जाप क्यिा करते थे। 'बाद म जग्रज मरबार न अपनी नीति सुरक्षा के लिए एक अच्छे निशानवाज हाने के नात जिम वाट वो उत्तराखड के टन उगम्य व भयकर जगल। म शिवारी प म रखा जा वतमान पाल म भी है। उस काल भी रामनगर, कोटद्वार व कालागढ, 'गढवाल व कुमाऊ' के प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र थे, इसलिए काबेट इही स्थानो मे अधिक भ्रमण व अपना जीवन व्यतीत करते थे। उत्तराखड के लोगो के सपद मे रहने से कार्बेट गढवाली और कुमाऊनी भाषा का अच्छा वक्ता भी बन गया था। "कुछ वयोवृद्ध जा जिम कार्बेट के सपक म काफी समय तक रहे उनका यहना था कि अंग्रेज सरकार ने जिम कार्बेट वो जिस उद्दश्य से इन स्थाना व जगला म रखा था बाट ठाक उसके विपरीत सिद्ध । वयावद्धा ने यह भी बताया वि कार्बेट पहा करते थे-मैं नहीं चाहता कि मैं शिकारी के रूप म अपना जीवन उत्तराखड के इन अगम्य जगलो मे व्यतीत करू पल्वि एक अद्वितीय निशानेवाज हान के नाते मैं चाहता हूँ कि मैं सैनिका का राइफल व बदूक चलान का प्रशिक्षण दू व प्रशिक्षक बनू ।' " वास्तव में देखा गया कि जिम धाबेट को उत्तराख । प्राकृतिक सौंदय व जनता से अगाध मोह था इमलिए जिम कार्वेट उत्तगखडमा जनता की सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक गतिविधिया में विशेष रुचि रखते थे। वयोवद्ध बोले बोक्साह का इलाका तो बहुत विस्तत है। दष्टि -- 32 / उत्तराखड के वना मे दौडाने से ऐसा प्रतीत होता है मानो यहा योगी ही वास करते हो। कितना भयकर लगता है। केवल निजनता का वास है। वास्तव मे बोक्सुओ ने बोक्माडी विद्या का जाप इसी घनघोर वन में क्यिा होगा। एक बार ढिकाला बोक्साड के इस क्षेत्र मे एक नरभक्षी शेर ने घोर आता मचाकर इन स्थानो को जन धूय कर दिया था। । वास्तव मे कितना भयकर लगता है, नरक जैसा 1 इतना काला कालापन माना निशा का अतवाल तम जैसा। इस प्रकार भी मानो काली नदी का कालापानी। ऐसा क्या ? क्या अवनि म अवर की धनाच्छादित छाया म, अवश्य इमी स्थान म शेर ने स्नी की हत्या की होगी । हा, वन अजब ढका है पवतमालाआ की छाया मे। यही शेर ने पहले एक स्त्री को अपना शिकार बनाया था। बाद मे वन की सघनता के कारण शेर ने कई खरक चराने वाली बालाआ और स्त्रिया यो मौत घाट उतार दिया था। अजब तमाशा दिखायी देता था उस क्या ? काल। “ कई शिकारी शेर की प्रतीक्षा म मचाना पर बैठे वेचन दिखायी देते थे। कही जिवाला का बाजार लगा रहता था कही बकरिया की ताद दिवायी देती, कही कटिया को मार्मिक आवाज सुनायो पडती थी कही मुछ नहीं और कही सब कुछ, फिर भी शेर को किसी से मोह नहीं था। सब करतब बेकार वर देता था शेर । समस्या बडी उलझनमयी वन गयी थी। शेर को मारने के लिए कई योजना के पुल बनत और वही योग- नाओ के बने बनाये पुल यथासमय टूट जाते और शेर हर अवस्था इस दुखात नाटक का अत सपन करने के लिए लाग वाला- दुगी जावर जिम कार्बेट को बुला लाये । काट साहब ने उन स्थाना का निरीक्षण किया, जिन स्थाना मे शेर नि शव भ्रमण किया करता था। कई दिना तक बाट माहब इस काय मे सलग्न रहे। बाद म उहाँने शेर को मारने के लिए कई प्रयत्न क्येि, परतु शेर काट का धोखा देवर वन म लोप हो जाता या और उनको मौत का आह्वान द जाना। जब शेर काट के हर अचूव निगाने को चूर कर देता तव उ होने काठ के पिंजरे म भैस की एक बटिया रखो । कई दिना तक पटिया पिंजरे में मे साफ । दियाला बोक्साह मे /33 " चार वी जर की दिशा ही मुह पर मौत के दिन गिनती रही पर शेर न पि. गयी। और पिंजरे को दूर स दिया। फिर पिंजरे म एक बकरी रखी जाता था। देखकर ही दूसरी दिशा में जाकर लोपार का मारना। और मौका " उस काल बडा मुश्किल हो गया। धन जगल म वादलाने वाच पावर स्त्री की हत्या कर जाता और ना था। गेर के हर परतब न क्टकडाती बिजली के समान लोप हो जा पट भा दु ख म उदास हो गये जगल का श्मशान बना दिया। जिम क घान का वडा सतरा पदा क्याकि उनको स्वय अपने जीवन से हाथ हा गया। कभी जिम कार्वेट अपन जग वयोवद्ध न यह भी बताया, "जब सहरका मोजन करते थे तो उस लात के वगले म दरवाजा बद करके दा ही ताव म वठ जाता था और समय बाहर दरवाजे के पास शर उन म उठाने की कोशिश करत थ जसे ही जिम कार्वेट अपनी वदूक हाथ बेट के साथ इस प्रकार तो शेर एकदम लोप हो जाता था। कई, गिकार करने वाले मनुष्य की घटनाए घटा करती थी। कहते हैं, गे सत्य है। मौत भी शिकारी पशु के द्वारा होती है ज लए कई खड साल दिय परतु फिर कार्बेट ने शेर का मारन के लाप हा जाता था। समस्या शेर काट की गघ महसूस कर जगल' लिए नय नये उपाया व गस्ता वडी गमीर हो गयी । शेर को मारने के स्त्रिास्त्र मफ्ल सिद्ध होता। का परीक्षण दिया जाता परतु शेर सब । व चरान वाले कुछ लोगा का " एक दिन कार्बेट ने जगला म ख बडी भयभीतमय थी। कार्वेट बुलाकर एक योजना बनायी। योजना कि हमला कर रहा है। यदि हसकर बोले- स्त्रिया पर ही शेर आ. र को आसानी से घराशाया पर तुममे से कोई पिंजरे म बैठ जाय तो मैं शायी आग के मरुड म कोई नहीं दूगा।' सब डर गये। जान सबका प्यारी! जाय ता वह दूसरी बात है। पडना चाहता था। दैवयोग से कोई मर दूसरे का मुह तावत रहे तो 'जय सब अचभित अवस्था में एक -म वठन को तो कोई मायक्ति जनायास ही एक वयोवद्ध बोले- पिंजरे पाय दि एक वद्ध यक्ति वा तयार नहीं होगा, साहब, ऐसा क्यिा धना में 34 / उत्तराखंड । ।

पुतला बनाकर उस पुतले को किसी वृद्ध के वस्त्र पहनाकर पिंजरे में रख दिया जाये। उसके साथ एक मैस की कटिया भी रख दी जाये। विशेषत' कटिया की मामिक आवाज सुनकर शेर पिजरे पर आयेगा और आसानी से आपके अचूक निशान का शिकार बन जायेगा।' 'योजना कारगर थी। जिम कार्वेट वाय-सिद्धि के लिए तैयार हो गये। साहब, नीचे जो समतल चौड़ा भाग दिखायी दे रहा है वहा पिंजरा बडी मजबूती स पैड से बाघकर रस दिया गया। सब प्रकार से सुरक्षित। तत्काल बूढे का पुतला और कटिया पिंजरे के अदर रख दिये गया। काट साहब रात दिन शेर वो निशाना बनाने के लिए अवसर तापते रहते परतु शेर इतना होशियार निक्ला कि कई दिन तक पिंजरे के पास पटका तक नही । काफी समय वाद एक रात को कुछ जगली जानवरा ने शेर के आगमन का सकेत दिया। मार्केट निशाना साधे सावधान हो गय । ठीक रानि के मध्य शेर पिंजरे की ओर लपका, कटिया और बूढे के पुतले को देखकर शेर ने एक ऐसी दहाड मारी पि जगल का समस्त वातावरण वेचैन और वय जीवा मे असतोप व्याप्त हो गया। एक घट के बाद शेर फिर दिखायी दिया, शातपन में, फिर तेजी से पिंजरे की ओर लपक्ता और फिर एकदम रुक जाता । अजीव करतब करता था शेर। हिसक पशुआ में एक विशेषता यह भी होती है कि वे जब मारक करतब करते हैं तो या तो सुबह के चार बजे के समय या फिर जब दिन ढल जाने पर गहनतम अधकार छा चुका हो या रात्रि के मध्य म । उपाकाल होन में कुछ समय रहा होगा। शेर ने छलाग लगायी और पिंजरे पर जा धमका। पिंजरा बद हाने के कारण कटिया और बूढे के पुतले के साथ शेर कुछ भी हरक्त करने से वचित रह गया। पिंजरे को तोडकर कटिया को ले जाने का प्रयास जस ही शेर ने क्यिा, अपना कचा मस्तिष्क देवर वाईट के अचूक निगाने को शेर ने सिर बीच ले लिया और भयकर गर्जना के साथ ऊची छलाग लगाकर धराशायी हो गया। बदूर की गोली के धमाके से समस्त जगल के वातारण मे विचलितता छा गयी। " लोग भय से मुक्त हो गये थे। उह यह दढ विश्वास हो गया था 1 दिवाला बोक्साइम | 35 'विनरभक्षी शेर मारा गया है। शांति या वातावरण फिर लौट आया। फिर लोग अपने जगलात के कारोबार मे एक जुट हाम र माय बरन लग। जगला में सरक घराने व बबूल वाटने वाले सोगा के कारोबार में फिर म एकरूपता आने लगी। साहर, एक सप्ताह गुजरा होगा शेर न फिर दो घसियाग्यिा को मौत के घाट उतार दिया। वाट ने फिर शेर के स्वभा५ या निरीक्षण करना शुरू कर दिया। निरीक्षण करने म बाट ने काफी समय व्यतीत किया और यह सिद्ध किया कि नरभक्षा शेर नहीं मारा गया है। उस काल तक शेर ने कई खरक चराने वाली स्त्रिया को मौत के घाट उतार दिया। पायेंट शेर या मारने के लिए योजनाआ के पुल बनाते और यथासमय योजनाओ वे पुल टूट जाते । " समय दुखात नाटक सेल रहा था। फिर एक बार जगलात कारोवार मे नीरसता छा गयी । उस काल जगली हाथिया ने भी घोर उग्रता फैला दी और साथ ही जगली सूअरो ने उग्रता को और भी बढावा दे दिया। जिम कार्बेट हताश हो गये। हिंसक पशुआ के भय से नहीं, बल्कि उनके उग्रवाद के कारण। जो नरमक्षी शेर था वह जगल धे अय क्षेत्र म स्त्रिया की हत्याए वरने लगा। कार्बेट सोचने लगे, क्या बात है, शेर स्त्रियो का ही अधिक दखल पहुचा रहा है । यही अजीब मार कर रहा शेर । क्या करू ? इस दुसात नाटक का समापन क्सि विधि से करना होगा? " समय बहुत गुजर चुका था । काट ने शेर को मारने के लिए बहुत प्रयाम रिये परतु शेर को घोखा न दे सके । तब एक वयोवद्ध ने जिम काट को एक उपाय बताया- साहब, जब शेर स्थियो को ही अधिक दखल पहुचा रहा है तो आप किसी स्त्री के कपडे पहनकर गोत गाते हुए उस दिशा में बढा जहा शेर भ्रमण कर रहा है । जस ही शेर तुम्हे स्त्री तमझकर खान का आयेगा, तुम शेर को गोली मारकर चौक्स बिछा देना।' " काट वोले-'जनावेआला सव सिद्धिया आजमा धुवाहू । क्या परू मेरे सब क्तव्य विफल और शेर हत्याए परने में सफल हो जाता है।' फिर योजना बनायी गयी। काटे एक गायिका घसियारी के पास 36/ उत्तराखड के वना मे ॥ ?" गये और उससे कहा- क्या तुम कुछ समय के लिए मेरा साथ दोगी?" “ गायिका घसियारी ने कार्बेट से पूछा-'कसा साथ, कितने समय के लिए? " पाट ने हसत हुए कहा-'तुम्ह और मुझे मिलकर शेर को मारता है।' 'कसे ?' गायिका घसियारी न पूछा। " कार्बेट ने धृसियारी से कहा- 'जिस दिशा में शेर हुकार मारेगा उस दिशा म हम दोनों भेष बदलकर नायगे । सुनो, भेप इस प्रकार का, तुम्हारे शरीर के कपडे में पहन लूगा और तुम अपने दूसरे कपडा को पहन लेना। इस विधि से शेर मरी गध महसूस नहीं कर पायेगा । तुम आवाज को बिना रोवे गीत गाते हुए आगे बढते रहना। में तुम्हार पीछे स्त्री भेष में तुम्हारे क्धे पर बदूक रखकर तुमसे सटकर चलता रहूगा। जैसे ही गर तुम्ह खान के लिए आयेगा मैं शेर को गाली का निशाना बनाकर धरा पर विछा दूगा । ठीक है न तयार हो " उस काल स निपटन के लिए गायिका घसियारी नाय सिद्ध करने के लिए तत्पर हो गयी। "काफी दिन बीत गये । शेर के विषम में कुछ पता न चला कि शेर विस दिशा मे आराम फरमा रहा है। समय भी बीतता जाता था और समयानुसार वाईट और गायिका घसियारी समय को ताकते रहते थे। माहब, नीचे के समतल भाग मे पानीधार के पास पडा जो भीमकाय चौडा पत्थर है, एक दिन अचानक शेर ने उस पत्थर पर बैठकर भयकर दहाड मारी। सियारी माथ थी। कार्वत समझ गये, आज नरभक्षी की मौर सोच लायी है। मौत का पालवा उसके सिर पर मडरा रहा है । शेर की दहा।से समस्त जगल मे रात जसी नीरसता फैल गयो । काट ने जल्दी से गायिका घसियारी के वस्त्र पहन और गायिका घसियारी के बधे पर बदूव छुपा रखकर उस गीत की लय छोडने का आदेश दकर मेर की ओर बढन का समेत दिया। घसियारी गीता की सुरीली लय छोटती आग बढ़ती जाती और पीछे से काट स्त्री भप मे निशाना माधे घसियारी स मिलवर बढते जाते। ढिकाला बोक्साट म/37 काट और घसियारी शेर से चुछ दूरी पर थे विशेर ने क्रोध म आपर उह अपना भयपर रप दिखाना शुरू किया। गेर मा भयकर रूप देसकर गायिका घसियारी अवरा गयो और गीत की लय छोडवर खड़ी हो गयी। वाईट के इशारे पर गायिका घसियारीन फिर वही गीता का लय छोड दी। शेर ने गुस्से म आवर उनकी और छलाग भरी । शेर नज दीक आ चुका था और जिम काट भी अपना अचूक निशाना साप चुने थे। उस समय नुक्सान इतना हुआ विशेर यो गोली लगते ही शर ने एक लबी छलाग उनके दोस्त के ऊपर मारकर उन्ह मौत के घाट उतार दिया जो अग्रेज थे और घास के गट्ठा के मध्य से शेर की ओर निशाना साधे पडे थे । और चल वसा, साथ में जिम कार्बेट के दोस्त से भी ले गया। उस काल जिम कार्वेट मन में सुख और दुख का अनुभव करने म असमय हो गये। 'शेर मारा गया, पाबेट ने उस क्षेत्र के कई विद्वान वयोवद्धो से र की जाच करवायी । कहते है, शेर रूप मे वह बोक्सू था, जिसके विषय म पहले बताया जा चुका है। उस काल से लेकर वतमान काल में शेर ने इस तरह की कोई हरवत उस क्षेत्र में निवासित लोगो के साथ नही की क्यावि वतमान काल म न इतने शेर ही रहे और न बोक्साडी विद्या के महान प्रकाड बोक्सू लोग जोर न जिम बाट जैसे अचूक निगाने । वाज ही।" यदि वतमान काल मे ढिकाला और बोक्साड वो निहारें तो उपयुक्त सब करपना मानी जायगी, क्याकि ढिकाला बोक्साह आज के वैज्ञानिक युग स मेल खा बैठा है और अपने प्राचीन वातावरण की पाद दिलाने मे पूर्ण रूप से असमथ है। सौ वर्षीय वयावद्ध जब ढिकाला बोक्साइ के वातावरण का अपन आखा से निहारता है तो इतना कहकर धुप हो जाता है कि समय समय की बात है जहा जाने में लोग कापते में आज वहा देश विदेशा के पयटको का ताता लगा रहता है। देवल जिम काट राष्ट्रीय पाक को निहारन के लिए ढिकाला मे भ्रमणाथ जाते हैं। बोक्साह में। 38 / उत्तराखंड के बनाम लुहाचौड के जगल मे हर साल दिसबर माह में ग्रामीण क्षेत्रा के टाठिया लोग लुहाचौड के जगल म चिरान के कार्य पर जाया करते थे। क्याकि उस समय ग्रामीण लाग कृषि के कारोबार से मुक्त हो जाते थे और शेष खाली समय सुहाचोड के विजलित, वन मे चिरान के कार्यों में व्यतीत करते थे। ठाठिया घर लौटते थे फरवरी माह के अत मे, तव ग्रामीण क्षेत्रा मे खेता को जुताई का समय आ जाता है। मुझे उन महाशया से वार्तालाप करने मे अति हप और असीम मानद का अनुभव होता क्याकि ठाठिया जगलो में घटित भयकर घटनाओ का हाल मुझे सुनाया करत और मैं बडी उत्सुकता से ध्यान लगाकर उसे सुना करता था। वे सुनाया करते थे कि जगलो मे शेर, बाघ, भालू, जगली सूअर, बारहसिंगे और काकड आदि अधिकतायत मे विचरण करते दष्टिगोचर होते थे। यही नहीं, कभी कभी तो जगली हाथी भूले भटके व्यक्ति को जान से मार देता था और कमी-कभी तो अजगर के भी दान हो जाते थे 1 "क्या वताण, साहब, जगल मे घुवीड का शिकार करने मे जा आनद प्राप्त होता है शायद ही किसी चीज के मिलने से प्राप्त होता हा । हमने कितने ही शिकार किये । जगली भूगिया को पौन पूछे, हम प्रतिदिन वन मुगिया का शिकार दिया परत थे। एक बार तो हम मर गये थे परतु.खेल, खेल बनकर रह गयी और हम बच निकले। भगवान न करे, कभी फिर ऐसा मौका आये। कुशल यही रिहा कि मनराज को दृष्टि हम पर नही जमी। क्या समय था वह एक तरफ जंगली हाथियों 1391 की भयकर चिंग्याड, और दूसरी ओर सूरुवार शेर की दहाड । और झाडिया के बीच हम थे । जब कभी उस भयकर घटना की ओर ध्यान आकर्षित हो जाता है तो रोगटे खडे हो जाते है और श्रोतागण स्थान छोड देते है। यह कहकर ठाटिया लोग मुझे लुहाचौड के सघा वन में भ्रमण के लिए उत्तेजित करते और मरा मन भी बार-बार सुहाचौड के सघन वन मे भ्रमण के लिए उमड पडता शिकार का असीम आनद प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि सौंदयमय वन के मध्य वन्य जीवा को निहारने के लिए। वन भ्रमण के लिए मन मे बार बार लालसा जागती परतु मौका तभी रित सकता था, जब जगल मे चिरान का समय आता। सौभाग्यवश मन 1968 मे मुझे और चाचा भूपेंद्र को सुहाचौड के सघन वन मे भ्रमण का सुअवसर प्राप्त हुआ। दिसंबर माह के प्रारम मे घर छाडकर हमने लुहाचौड की आर प्रस्थान किया। साथ म चले चाचा पीतावर, चाचा नरेद्र व हरिजन भाई मगू पहलवान । मोटर का बडा अड्डा दो मील दूर सल्डमहादेव में था इसलिए वहा तक पदल गये क्योकि प्रात काल की मोटर ठीक समय पर उस निश्चित स्थान पहचा देती है जहा से लुहाचौड का विक्ट माग नापना पडता है । इस- लिए सुबह की मोटर म वठकर हम पाचा महाशय चिमठा के समक्ष उतर गये। इस स्थान म जगलो म निवास करने वाले व भावर म सरफ चरने वाले लोग झापडी बनाकर निवास करत है। इस स्थान म धन- विभाग के बगले भी विराजमान हैं। मोटर माग निकट हाने के कारण इस स्थान में चाय पानी व राशन की छोटी छोटी दुवान भी हैं । हमें भी जगलात म कुछ समय व्यतीत करने के लिए इही छोटी छोटी दुकाना सामलपत्ताखरीदा था और फिर ती चार मील आगे धनघोर जगत में डेरा डानना था। चाचा भूपेंद्र के पाम दुनाली बदूर थी जो ब्रिटिश शासनकाल से चली आ रही थी। अग्रेना ने इहें इस दुनाली बदूक को नवरदार को हैसियत से दिया था। इसलिए चाचा को इस दुनाली बदूर पर गर्व 40/ उतरासह के वनाम स था और मुझे भी। उस काल चाचा के वधे पर लटकती दुनाली बदूक बडी शोभनीय लगती थी, जिस प्रकार तरकस मे तीर । जगली हिंसक पशुआ के भय से चाचा भूपेंद्र ने ब्रिटिश दुनाली को गालिया से माधा आर मगूदास न जगलात के लिए समलपता । सपूण सामग्री के साथ तब हमन लुहाचोड का विकट माग नापना शुरू किया। कुछ ही क्षणा म ठेकेदार की जीप हम लेने के लिए जगलात की कच्ची सडक पर आ पहुची। ठेकेदार को हमारे उस ओर पधारने की सूचना एक डोटी के द्वारा पहले ही दी जा चुकी थी, इसलिए जीप का आना स्वाभाविक था। जीप म बैठकर हम लुहाचौड के सघन वन म पहुचे । इस सघन वन का देवन या मुझे पहला अवसर प्राप्त हुआ था।। शायद इतना मयकर व उजाड और कोई वन न हो । वन म छोटे-बडे सभी प्रकार के दरख्त घन व भिपलित रूप से उगे हुए थे। छोटी छाटी कटीली झाटिया व कुजवेलिया तो अनगिनत सरया मे फली हुई थी, जि ह देखकर हृदय काप जाता था। वना मे भिपलित कुज भाटिया म ही शेर, भालू बाघ व चरक-जंस हिंसक पशुभा के विश्राम गेह हाते है, इसलिए जगल का वातावरण बडा मयर लगता है । इन बीहड जगला मशेर व जगली हाथिया का शिकार होना तो बाय हाथ का खेल था। धीरे धीरे दिवस का अवसान समीप चला आ रहा था। ठाठिया लोग चिराई का काम ममाप्त कर एकजुट होकर काम काज में जुट गये। यह विशेष जानने योग्य बात है कि यदि ठाट म ठाठिया की सख्या अधिक हा तो ठाठिया पैरा या घुटना के बल आटा गादते हैं । कोई आटा गोदो लगा कोई सब्जी काटन लगा आर कोई पानी लान लगा। कम.. म पम सौ से अधिक ठाठिया लाग रह हागे । व थे दूर मुल्ला ठाठिया लोग । ठाठियाने कामकाज वा ढग और गीता की लय किसी अच्छे बाजार य योलाहलपूपा वातावरण वो याद दिलाता थी। इस वाता- वरण म चारो दिशामा म सध्या को मनमोहर शातल छवि विमुक्त मालूम पड़ती थी। ठाठ मे ठाठिया के ठाठ रढे हैं क्योकि ठाठ म राशन-- पानी टेक्नार वा लगता है ठाठिया का नहीं। ठाठ में टाटिया लोग आग वा रात दिन ज्वलत रपत हैं । यह भी सुहाचोड में जगल म 1 41 एप विशेष जानने योग्य बात है कि ठाठ म ठाठिया जब स जगल म अपना डेरा डालते हैं तो ये सबमे पहले वन दवता की पूजा परत हैं। उस याम से जली आग को ठाठिया तय ही युमाते हैं, जब वे चिरान का काय पूरा करके अपन परा यो लौटत हैं। दूसरी वात, आग और धुए के कारण हिंसव पशु ठाटिया ये नजदीय नहीं पटक्त है । आग से सभी जाति के हिंसय पशु भय सात हैं। इस तरह ठाठिया या राज का कम चलता रहता है। धीरे धीरे समय की गति के अनुसार हम भी जगल के वातावरण में रम गये परतु हर घडी का ध्यान रखना पड़ता था। घटना एक सघ्या की है। सब ठाटिया चिराइ पाय म सलग्न ये। न जाने जगलात के पिम छोर से जगली हाधियो का एक विशाल दल चिरान स्थल तक वेघडव आ घुसा। गायद साथ म उनके घाटे छोट शिशु भी थे। व थे दैत्याचार जगली हाथी, जा आदमिया को अपने सूड स पकडकर चीर देते है । उस समय मैं और मेर चाचा भूपेंद्र व मगूदास हुनका गुडगुडा रह थे। जगली हाथिया का दखकर हम महा शया की काठी वपचा गयी क्यानि पहले कभी हमन इस प्रकार का मौतनी दश्य नही देखा था। भय के कारण चाचा भूपद्र के हाथों से दुनाली बदूक छूट गयो । ठेकेदार व ठाठिया न हम दिलासा देते हुए कहा, 'आप विलकुल न घबराए हम इनको अभी यहा से खदेड देते है । इन जगली हाथिया पर गोली चलाना मौत को न्यौता देना है। साहब यदि इन पर गोली स प्रहार किया जाय तो घातक सिद्ध होते है ।" मैंने पूछा "इन जगली हाथिया को बिना हथियारा के किस तरह यहा से सदड़ा जायेगा?" पद्रह बीस आदमी हाथ म खाली कनस्तर लिय जार जार से बजाने लगे। कनस्तरा की आवाज सुनकर जगली हाथी कुछ हरक्त करके अपने बच्चा समेत नौ दा ग्यारह हो गय। ठेकेदार ने बताया कि कनस्तर वो आवाज से जगली हाथी बहुत डरत है । यह जगला हाधिया में सबस बडी खूबी है। भावर तराई भागा व जगलो में निवास करने वाल जन कनस्तर वजाकर इन दत्याकार हाथिया का खदडते है। यह एक -विशेष जानने योग्य बात है। 421 उत्तरामह क वनो म कुछ समय उपरात विश्राम स्थल से चाचा भूपेंद्र ने बदूब से चार भपफर धमाके किये ताकि दुवारा जगली हाथियो का विशाल झंड चिरान स्थल की मोर बढ़ने का साहस न करें। चिरान स्थल से भागते समय जगली हाथी क्रोध में आकर बहुत नुकसान कर गये। एक तो शाल के मारी भरकम चिरान के लटटो को इधर उधर फेंक गये। दूसरा, पेड के समीपखडी जीप को चार खाने चौरस बिछा गये । यह एक विशेष जानने योग्य बात है कि जगली हाथी चिलदिल पहाडा की चोटियो से उतर जाते हैं, जहा मनुष्य के बस से बाहर की बात है । आपने छोटे बच्चा को पाक म सोमेट की बनी कची सीढ़ियो के सपाट भाग पर खिसकते देखा होगा । ठीक उसी प्रकार हाथी भी अपने आगे के परा के बल दुगम पहाडा की चोटिया से घिस किया सेलकर नीचे उतर जात हैं। निशात्तम ने शन पटता चला जा रहा था। व्योम से रजनीकात की कर निकर बटोही को माग प्रदर्शित करने लगी थी। हमने रात्रि भोज किया परतु भप के कारण नीद खना गयो। पासफूस के बने छप्पर के अदर लेटे सोच रहे थे, कही दुष्ट हाथी दये पाव यहा आने के लिए दुवारा हिम्मत न बाथ लें। हमारे हृदय मे जगली हाथिया का मय तो छाया हुमा था परतु तब हम और भी भयभीत हो गये वनराज के भय से, क्योकि रात्रि में हिंसक पशु अपने शिकार की खोज में वन में विचरण करते हैं। शेर में सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह रात्रि में अपने शिकार पर पजा या दात गाडने के लिए या तो पेड की भाड नेता है या पगडडिया की मोड पर घात लगाकर उस मैदान व सपाट स्थाना म शेर मार वरता कम नजु-जाता औरको राह शक्ति यहत कम हाता है क्यापि शेर के मुह और नाक से बहुत बदडू आती है। बददू के कारण शेर किसी प्राणी को ग जल्दी महमूस नहीं कर पाता है । हिंसर पशुआ म बोर की घोर तिमिया दोन होती है। बहो मुसावत से रात व्यतात को । दारण बेचन प्रतीक्षा दि मुहाचौह के जगत में / 43 सुबह का मुह देखा। भय के कारण ठाठी लोग चिरान स्थल पर जान के लिए दम नही मर रहे थे परतु दुर्भाग्यवदा विश्राम-स्थल के निकट दा साभर और एक बारहसिंगा अपने को गोली का निशाना बनाने की होड में थे। वे बिलकुल हमारे समक्ष आ खडे हुए बिना, आहट । निशाना दागत ही तीना वन प्राणी नजर बचाकर भाग निकले, शायद उनके फुर्तीलेपन से हमारी आखें भिलमिला गयी, इसीलिए निशाना दागते ही निशाना चूक गया। किंतु पास म बडी बडी कास व बबूल के बीच वे फिर दष्टिगत हुए। हम तौना “यक्ति बिना आहट विये उनका पीछा करने लगे, यह सोचकर कि जिस दिशा म वे प्राणी भाग रहे है यदि उस दिशा म मालूलता वृक्ष हो तो उनकी लताआ में बारहसिंगे के विषाण फस जायगे और उनको बिना बदूक की सहायता से मारा जा सकेगा। अक्सर जगला म बारहसिंगा के सीग मालू वक्ष को लबो तारनुमा टह नियो म फस जाते हैं और वे अपने को लताओ के जाल से मुक्त नहीं कर पाते हैं। प्राय जगला में शेर को बारहसिंगा का शिकार करना होता है तो वह इस पाणी को उस दिशा में दौडाता है जहा मालू वक्षा का घना जाल फैला होता है ताकि बारहसिंगा के सोग मालू जाल में फस जायें और उसका शिकार हो सके। परतु जिस दिशा में वे प्राणी भाग जा रहे थे उस दिशा म केवल बडे दररत और कटीली झाडिया विचित्र स्प से उगी हुई थी। उन झाडिया से गरीर पर पहन कपडे चिर गये थे। हम भी उन वय प्राणिया का पीछा करते हुए दूर निकल गये । वहा और भो भय कर खडहर व सडकीले पानी के स्रोत मिले । वन की भयकरता को देख- कर आखा मे अजीव दश्य पलटन लगे । मन म न तो डर ही था और न खुनी ही थी। अगीव सा लगता था परतु गर-गर' शब्द हमारे काना तक पहुंच रहे थे। हमन गर गर' के शब्दा पर ध्यान पलट दिया । रुक कर जागे वढने की कोशिश की। जसे ही हम आगे बढना चाहत थे कि हमारी दृष्टि सूअरो के एक दगल पर पड़ा जो पानी पीने के लिए स्रोत की मार अग्रसर था। कुगल यही रही कि उनकी दट हम महागयो पर नही पडी नही तो वे हमें चीर देते ! उनमा छुर्या सूअर (सूअराका 44 / उत्तराखड के वना मे सरदार) बडा खूरुवार नजर आता था और उनके रूप से आधा भय- कर उसके मुह से बाहर निकले दो पंने दात लगते थे। हमने मांचा, चुपके से पेड पर चढकर छुर्या सूअर को पत्थर मार देना उचित होगा। वह अपने सब साथिया को मौत के घाट उतार देगा । छुर्या सूअर में सबसे बडो विशेषता यह होतो है कि यदि छुर्या सूअरो को कोई व्यक्ति चुपके से पत्थर मार दे तो वह क्रोध में आकर अपने सच साथिया को अपन पैने दाता से मारकर चीर देता है और सूअरोका उसी स्थान में ढेर लग जाता है । अकसर जगली गाव के लोग व जगलो में ठाठिया लोग इसी तग से जगली सूअरी का शिकार करते हैं । मूअर की लबी कतार को दखबर हम उस स्थान से दबे पाव मुड गय। तब खतरा और भी बढ़ गया क्योकि रास्ता विकट था। यह भी भय था किन जाने शेर विस भादी में शिकार के लिए घात लगाये बैठा हो फिर भी आत्मरक्षा के लिए डर से डरावने पला-बौशल करते हुए हम निवास स्थल पर सौट आये। निवास स्थान से कुछ दूर हमने धय धारण करके चार जंगली मुगियो वा बेधडर शिवा दिया। मुगिया चार थी और खाने वाले पे सौ से अधिक, इसलिए मुगिया के शिकार का स्वाद हम तीनो न ही लिया-मैंने, चाचा भूपेंद्र और मगू पहलवान ने । एक सप्ताह हुआ। जगल की अगम्य वन-पदराओ से शेर चिरान. स्थल के निक्ट आ धमया । तब ठाठिया चिरान का काय छाडकर मरडीये वन नठघरे में आवर अपने हैडी हपियारावालिये स्तक हो गये। दो दिन पहत रात मे यनराज की हपार अवश्य सुनी थी परतु पधारने की सबर से सब अनभिज्ञ थे। शायद आपको शान न हो, रात्रि में और पई किस्म की आवाज निवालता है। यमी बन में जाकर परीक्षा परना, र मभी दिल्लीको आवाज निकासता है तो समोधन में सीटी मारनवासी पिहिया की सी और पभी इम पवार गुनापी पढता है माना सोप्पक्ति परस्सर बातें कर रहे हा और इस प्रकार भी हिमानो पानी की धार बह रही हो पिये मध्य शेर की ओयें इस प्रकार पमरती है, मानो यलगाडीमोना सिरा पर जलती सारटेन रसोहोरि लिए एपिपार उठाना मौत को चौता देता है। पचानन रो देसार टाठिया मुहापौर जगत में / 45 हक्वका गये। शेर में सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह तब तक किसी पर हमला नहीं करता, जव तक उस पर किसी का अडप लगे। शेर को खदेडो के लिए मब ठाठियान एडी चोटी का जोर लगा दिया। कास्तरा की भनाहट और वदूक के धमाका से सपूर्ण जगल गूज उठा, पर सब विफल । एक व्यक्ति ने बताया, "यदि मरे जानवरो की हड्डिया को आग म रखकर जलाया जाये तो शेर उस ओर नही माता है। हडिडयो वी बास को शेर अशुभ समभना है। अकसर जगली गाव की घसिया- रिया और जगला में खरक चराने वाले लोग अपने साथ में कुत्ते भी रखत हैं क्योदि कुत्ते को शेर छूत मानता है। कुत्ते का नोच समझकर शेर भाग जाता है और मादमियो पर आक्रमण नहीं करता है । इसलिए लोग भयकर जगलो में अपने साथ कुते रखते हैं । शेर को देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि शेर किमी व्यक्ति को अपना शिकार अवश्य बना लेगा। भगवान ही मालिक था। एक बड़ा सक्ट आ खडा हुआ था। यदि उस काल चाचा भूपेंद्र अनजाने में शेर पर गोली दाग देते और गोली चूक जाती तो हमें क्सि सक्ट से गुजरना पड़ता, शायद पाठव अनुमा लगाने म असमथ होगे। शेर को खदेडने के लिए ठाठियो ने फिर कनस्तरो को बजाना शुरू किया। मैं देख रहा था कनस्तरो की आवाज सुनकर शेर गुरहिट के साथ अपनी पूछ को जमीन पर जोर मे मार रहा था । वास्तव मे क्या सुडौल गरीर व पुठे थे वनराज के । वात सत्य है कि शेर की माला की चमक और भयकर मौही की बलवलाहट व मूछो की मलमलाहट का देखकर लगूर पेडा से नीचे गिर जाते हैं । इतना भयवर रूप किसी अन्य हिंसर पाना नहीं होता जितना कि वाराज कागठियो ने स्वयं को सुरक्षित स्थान मे पाकर वनस्तरो की ध्वनि वरना छोट दिया, तब एक गठिया ने छिपकर जोर जोर से हूबहू कुत्ते को मोक्न की आवाज वाली। शेर ने कुत्ते को भौक्ने की आवाज सुनी और गुस्से में भारर जमीन की ओर मुह पर इतनी जोर से हुवार मारी यि समस्त जगल पाप उठा तय वनराज न लाग लगायी थी जिसका कोई जवाब, नहीं था। 46/उत्तराखड बनाम

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देर बाद सोच-विचारकर एक हल ढूढ निवाला कि शेर को बदूक से न मारा जाये बल्कि उसको अय तरीके से मौत के घाट उतारा जाये ताकि शेर की खाल का उपयोग हो सके। हिंसक दादा भी इमी गाव का रहने वाला था। सूचना पाकर हिंसक दादा भी हमारे सम्मुख उपस्थित हुआ । हिंसक दादा जमाने का हिंसक और अद्वितीय शिकारी था। अब वह वद्ध हा चुका था। हिंसक दादा ने कहा "श्रीमानजी, अगर आपको यह अभिलापा है कि शेर बिना वदूक से मार दिया जाये तो शेर का मारने का दूसरा तरीका मैं आपको सम- झाता हू । इसी विधि से प्राचीन काल मे ग्रामीण लोग शेर और बाघ का शिकार किया करते थे।' इस विषय मे हमने हिंसर दादा का समर्थन किया और कहा, "वताओ दादा।" तब हिंसक दादा ने बताया, सबसे पहले कदार की चार-पाच कडिया लाओ । कडिया का जिवाला बनाना होगा। बीच की कड़ी पर मरे बैल को बाघ दो, जिवाले का वजन बीस मन स कम न हो । जब शेर कोघ मे आकर अपन छूटे हुए शिकार के लिए जिवाले सबैल का भटका देकर ल जान की कोशिश करेगा तो भटका लगत ही वीम मन वजन गिरवर शेर को चार खाने चौक्स बिछा दगा।" बस, फिर क्या था । ग्रामीण जना न मिलकर एव घटे म शेर से बदला लेने के लिए जिवाला तैयार कर दिया। काय म सलग्न रहन पर समय ढल गया। भगवान भास्कर पहाड वी धार पर डगमगात हुए पश्चिम दिशा मे अतर्धान हो चुके थे। सध्या सुदरी विरामदायिनी की प्रतीक्षा म रत थी। रात्रि-भोज के पश्चात हम एक दूसरे मकान के ऊपरी भाग वाले रक्ष मे घात लगाकर बैठ गये। उस वक्ष में शेर के लिए लगाया गया जिवाला प्रत्यक्ष रूप स दृष्टिगत होता था। प्राकृतिक वातावरण तथा और समीर ठही धारा प्रवाहित कर रही थी। मन भय से काप रहा था । कपन के साथ दुनाली वदूक भी हिल रही थी। मध्य रात्रि के गात 48| उतराखड के वनो म वातावरण में सियारा का वासना शुरू हुआ। मैं कुछ समझ रहा था, शायद सियारा का वासना शेर या बाघ को इस ओर आने की सूचना दे रहा है। कुछ भिलमिला सा लगा, आखें बदती कुछ दिखायी पड़ने लगा। एक सफेद सा ढेर मानो कुछ लुढक रहा हो। मैं आखें फाड-फाड- कर उस निहार रहा था और साथीगण डर से थर्रा रहे थे। हो न हो, वह शेर हा और छलाग लगाकर दरवाजे पर मा धमके। मेरी दृष्टि न साबित कर दिया कि वह शेर ही है जो अपने शिकार पर पजा जमाना चाहता है । शायद गुस्से म आवर शेर ने बैल का ले जाने के लिए जोर का झटका दिया और भटवा लगते ही वीस मन शहतीरो का वजन शेर के शरीर पर जम गया। कुछ क्षणी तक मटपटाहट तो अवश्य सुनायी दी परतु फिर एक्दम शात । फिर मन में एकाएक अतद्वद्ध उत्पन्न होन लगा। सोचने लगा यह काना और आखा का भ्रम है। फिर सोचा, हो सकता है वाघ दवा पड़ा है या गेर या कोई अन्य हिंसक पशिधार का लकर भाग निकला। कुछ समय पश्चात् चारा दबे पाव अदर के कक्ष म लौट गये । सोचा, सुवह झटपटाहट और एक्दम गात हाने का परिणाम देखेंगे। क्या चीज थी वह । नीद किस प्रकार आती, सुबह का मुह देसन का तरस रह थे हम। कुछ समय पश्चात भयपूण रात समाप्त हो गयी। मैंन धीरे स खिडकी खोलकर जिवाते की ओर भाया । देखा ता जिवाल से नीचे शर दवा पड़ा था। तब हम चारा व्यक्ति कक्ष से बाहर निक्लकर जिवाल के पास पहुचे । चाचा भूपेंद्र ने बदूप स एक खाली फायर किया। शार मचाया, शेर मर गया है।' तब मृतर शेर के दान करने के लिए ग्रामीणो का ताता जुट गया। लोग मृतक शेर के ऊपर पत्थर फैक्ने लगे। उसे भारन के लिए नहीं अपितु यह जानन के लिए कि शेर जीवित तो नहीं है। कुछ समय पश्चात लोगो ने मिलकर मृतक शेर के ऊपर से शहतीरो का हटाया और निर्जीव शर को खीचकर एक तरफ रख दिया । वृद्ध हिंसक दादा ने दो ज्ञान की बातें हम बतायी। हिसक दादा ने बताया कि शेर की असली मूछे टूटकर जमीन पर पड जायें तो शेर जान जाता है कि मेरी मौत अवश्य हागी या मौत हान वाती है। दूसरी बात यह कि लुहाचोड के जगल में / 49 । ।

यदि शेर को अचानक गोली मार दी जाये और गोली लगते ही शेर घरा- शायी हो भी जाये तो जब तक शेर की असली मूछे न टूट जायें तब तक शेर अपने को मूण शक्तिशाली समझता । शेर की असली मूछे किसी का नही मिलती है। कुछ समय पश्चात् मृतक शेर को हमने गाव के थोक्दार को सौंप दिया और तत्काल दिन का भोजन करने के पश्चात लुहाचौड की ओर अग्रसर हुए । दिन ढलने तक हम चिरान स्थल पर पहुंच गये । साथ म एक घुवीड को मारकर ले गये। घुवीड का शिकार ठाठियो ने आनद से खाया। दूसरा महीना भी गुजर चुका था। धीरे-धीरे चिराई के कारोबार मे ढीलापन आन लगा क्याकि अक्सर ग्रामीण लोग दो माह के लिए जगला म चिराई का काय करते है और फागुन माह के मध्य अपने सेतो भी जुताई करने के लिए पर लौट जाते है । साथ ही जगला मे धीरे धीरे रूखापन आने लगता है । पतझड के कारण कुछ पेडा के ढाचे नजर आने लगे थे। । वहा भालू आर वाघ की लडाई भी देखने को मिली । यह एक जानन योग्य बात है कि मादा मात्र और नर वाघ के मेल से चरव पैदा होता है । शायद तभी वाघ और भालू के बीच लडाई हुई थी। कभी-कभी तो मालू उडे से बाघ को जान स मार देता है। इस प्रकार की कई घटनाए देखने म जाती हैं। सबसे अधिक रोमाचवागे तो शेर और हाथी मा मुखडा भेंट लगा जो देखन मे आकपर तो था परतु भयकर भी। कहावत है जान बची लाखो पाये। उस समय ठेकेदार भी हमारे साथ था। चिरान-स्थल से दा मील दूर पश्चिम दिशा मे सुमेणा नाम का एक पानी का वडा स्रोत था जो चारो आर से बास और जगली भाडियो से भिपलित रूप से घिरा हुआ था। कभी कभी इस गोज पर शेर और हाथी परस्पर दद करते नजर आते हैं । हम भी इस स्रोत की ओर अग्रसर हुए। उधर कुछ मात्रा में पेडो वे पुरातन पत्ते झड चुके थे इसलिए सूखे पत्ता पर पाव पड़ने पर पत्ता से पड-पड' की आवाज निकलती थी। चारा लोग दव पाव मौन 50/उत्तराखड व वना म वाय होकर जलाशय के पास पहुचे । जलाशय पद पड पाधाव भाडिया का दश्य बडा भयभीत कर 'उस दृश्य से अधिक भयकर सूखे बासा की परस्पर रगलेका नाराबाई हर प्राणी का जलागय के पाम आन से रोक रही योग कभी काम बासो के परस्पर टकराव के कारण वनो मे आग लग जाती है । कुछ समय पश्चात हम बब्ल' के वोटा के अदर जा छुपे ताकि किसी हिंसक पशु की दष्टि हम पर न पड जाय । बबूल के बोटो के मध्य से जलाशय के पास की हर वस्तु पर विस्तृत रूप से गाढी दष्टि जमावर अध्ययन किया जा सकता था कि जलाशय की क्सि दिशा में क्या क्या कायक्लाप हो रहा है। जलाशय से कुछ दूरी पर सादण का एक लबा वक्ष था। सोचा, इस वक्ष की ऊचाई तक पहुच जाना चाहिए। यदि शेर प्यास बुझान के लिए इस जलाशय पर आ पहुचा तो सब जिंदगी से हाथ धो वठेंगे । मौका पाकर हम बडी सावधानी स पेड की ऊचाई तक पहुच गये । हम पड़ पर चालीस फुट की ऊचाई पर खतर से वचन के तिए । शायद आपको मालूम न हो, शेर ऊचाई म बाइस फुट की कार- गर छलाग लगाने मे सफल हा जाता है और यदि दो शेरा में घोर लडाई छिडी हो तो शेर उस काल छत्तीस फुट की ऊची छनाग लगान में सफल हो जाता है। ऐसा देखा भी गया है। हमने पेड के ऊपर से दष्टि दौडायो । वहा पानी के स्रोत और वास ता थे हो, परतु सभी प्रकार के छोटे बडे देत्याचार पत्थरो का जमघट भी लगा था। इन पत्थरो के वीच विसी भी व य प्राणी को नजर म लाना बटा विक्ट था। मेरा अपना अनुमान है शायद उ ही पत्थर की ओट म एक हाथी का बच्चा घूमता फिरता निकल आया । हम उसे वदूर का निशाना नहीं बनाना चाहते थे क्यानि वदूक की भयकर ध्वनि सुनयर एक तो वय प्राणियो म मलबली मच जाती है, दूसरे, इस स्रोत म पानी पीन के लिए काइ भी जगली पशु तैयार नहीं होता। तब हमारी दृष्टि उस ओर सिमट गयी जिम भार से जगली हाथिया का एक विशाल दल यास खाने व पानी पीने के लिए सान वी ओर अग्रसर हो रहा था। वास हाथिया का एक सवश्रेष्ठ और स्वादिष्ट लुहाचौड के जगल म/51 आहार है इसलिए वना म हाथी बास खाना अधिक पसद करत है। ईश्वर ही जान, शायद यही कही पत्थरा का आड म शेर हाथी के बच्चे को ताक म छुपा हुआ था या जब हम पेट पर चढ चुके थे, उसके बाद वह वहा आया हो । कुछ बताना कठिन है । हाथी का एक प्यारा बच्चा वास खाने के लिए स्रोत के निकट आवर बास वोटा पर अपनी मूड फेरने ही वाला था कि शेर ने वास बोटा की आट से सीधी हाथी के बच्चे के ऊपर छलाग मार अपन तेज नाखूना से उसको चित कर दिया। बच्चे की करण चिंगधाड सुनकर दत्याकार हाथिया का विशाल दल खोत पर आ पहुचा। हादिया ये घिराव म आन स पूव ही शेर वास- बोटा की दूसरी तरफ से निकल गया। यह सारा दृश्य हम पेड की चोटी स देख रहे थे। बच्चे को मरा दखकर दैत्याकार हाथियो के विशाल दल म सलवली मच गयी। हम मन ही मन सोच रहे थे कि अब क्या होगा। कही हाथा मोधवश बिगड़ गये तो पडा को उखाडना शुरू कर देंगे और हम बमौत हाथिया का शिकार होना पडेगा। परतु फुशल यही रही कि कुछ समय पश्चात शेर हाथियो के घिराव में आ गया। यदि उस स्थान पर सघन रूप से चास-बोट न होत तो शेर अपनी जान से हाथ धो बैठता । परतु चतुर शेर ने हाथियो को अपने फुर्तीलेपन से चक्मा दिया और मौका पाकर छलाग लगायी जिसका कोई अनुमान नही । शेर की भरी छलाग को देखकर हम दग रह गये । शेर हाथिया के विशाल दल पर हमला न कर सका इसलिए दूर झाडियो में जाकर ताप हो गया । तव हाथिया ने श्रोध में आकर अपनी सूड से भारी भरकम पत्थरा को उठाकर इतना तीरता स फेंया कि पई दरस्तो की हरी व सूखी टहनिया टूट टूटकर धरा पर बिखर गयी। कुगल यही रही कि पचानन हमारी दिशा के विदु की ओर नही लपका वल्लि हमारे मुह की सीघ पर कई गज आग की ओर अग्रसर हो गया था । यदि हाथी हमारे दिशा विंदु की ओर उन पत्यरा का फक्ना शुरु कर देत तो हम सब वेमौत मारे जाते। हाथियो में सबस बडी सूची यह भी है कि ये जिस दिशा में शेर की हुकार सुनगे उस दिशा ी बार अपनी सूड से भारी भरकम पत्यरा 52 / उत्तराखड के बना मे को उठाकर बहुत तेजी मे फेंकेंगे ताकि शेर उनकी ओर लपान का साहस न कर सके। कुछ क्षणा के बाद हाथिया का दल उस घनास्थल उस आर. निकल पडा जहा बास-बोट अनगिनत सख्या में फैले। घायद एक हाथी अपने झुड से पीछे रह गया था। तब हमारी दष्टि उम-द्रिा पर अटकी, जिस दिशा म जगली सूअर व हिरण भिन-भि न कतारो म बढते चले आ रहे थे । कही कहीं वन मुगिया की फडफहाहट व चिडियो की चहचहाहट भी सुनायी पड रही थी। कुछ ही क्षण बात, पेड की ऊचाई स गदन घुमाकर देखा तो दो दैत्याकार हाथी अनुचित रूप से लड रहे थे। द्वद्व स्थल कुछ सपाट व पत्थरो से भरी ढलवा जगह थी। यह मेरा पहला मौका था जब मैंने अपनी आखो से हाथिया का घोर द्वद्व देखा। हाथी अपनी सूड से सूड लडाकर एक-दूसरे को करवट मे लाने की कोगिश करते परतु चतुर जानवर अपने बल से एक-दूसरे को चकमा देते । दूर तक उनकी सूडो की घातक चोट सुनायी पड रही थी नयाकि वे अपनी सूडो से ही एक दूसरे का बदा सेक रहे थे। कभी- Tभी हाथी भयकर चिंघाड मारकर अपने साथिया को बुलाते जान पडते थे तो कभी सूड से बडे बडे पत्थरो को उठाने को कोशिश करते, हिंतु सब व्यथ हो जाता था। आखिर एक हाथी ने पेड की विशाल टहनी तोडवर दूसरे हाथी के ऊपर फेव दी। हम यह देखकर चक्ति रह गये वि हाथी ने जिस पेड की टहनी को ताडकर अपने प्रतिद्वन्द्वी हाथी के ऊपर फेंका था उम टहनी पर एक डरपोक रीछ वठा हुआ था जा पेड मे छिपपर दोनो दैत्याकार हाथिया का घोर दर देख रहा था। जमीन पर गिरते ही रीछ नी दा ग्यारह हो गया-अपनी दशा बिगाड- कर। यदि उस काल भालू की कुगत को देखकर हम हस पडते तो हमे हाथ घोन पडते। परतु क्या वणन करें, हमारे दुर्भाग्य से और वान हाथियो के भाग्य से उस दिशा में न जाने शेर कहा से आ धमका । जसे हो शेर ने भयवर हुकार मारी, उसे सुनते ही दोना पहल- वान द्वद छोडकर एकजुट हो गये । ज्ञात होता है कि जगला प्राणी परस्पर लड़ने पर भी खतरेक समय एक्जुट हो जाते हैं । सुहाचौड ये जगल म/53 जान से मगय भयकर प्रबलता म हमे मौत के मुह को मार धकेल रहा था। नौवन ऐसी आ चुकी थी हि आगे पुआ और पीछे साई । भगवान की असीम कृपा से कुछ समय के पश्चात छा सूअर अपने एक दल के साथ उसो घटना स्थल पर आ धममा। तर बचन मन का साथ चैन ने दिया । गाहस किया। याचा भूपद्र दुर्या सूअर को निशाने पर लाना चाहत थे परतु सूअर निशाने से बाहर हो जाता था। दुर्या कभी शेर पी ओर लपक्ता, कभी हाथिया की ओर और कभी अपने साथिया पर विगड पडता। इस दशा म निशाना साधन पर निशाना चूक जाता और हम एक बडी मुसीबत मोल लेनी पडती परतु हुआ यही कि दुर्भाग्यवश छुर्या सूअर शर के पीछे जा पहुचा। शेर ने नजदीक से भयवर दहाह माी आर दरयावार हाथियो ने चिग्घाड मारी। उनकी भयकर गजना से जगल का वातावरण रोघ गया। शायद शेर के भय स हाथी वहा में भाग गय। ऐसा प्रतीत हाता था कि सूअरा का शिकार करन के लिए शेर उनके पीछे हाथ धोकर पडा हुआ था। इसलिए वह वहा तक आ पहुंचा था। हम देख रहे थे कि छुर्या सूजर शेर से मिच्ने का बार बार प्रयास कर रहा था आर बाद म आड लकर वह भिड भी गया। विचित्र तमाशा था। मैंने ठेकेदार का सकेत क्यिा-अब छुर्या सूजर को गाली का निशाना बनाना चाहिए। जो सकट सामने आ खडा होगा, उसका समा- धान कर लगे। चाहे पूरी रात इसी वक्ष के आश्रय मे बिताना पड । उधर जबरदस्त हमलावर शात न होनवाले थे। उनके खूरवारपन में दैत्यवृत्ति छा गयी थी। इसलिए गोली चलाना स्वाभाविक हो गया । सोचा, देखते हैं क्ट किस करवट बठता है। साहसी ठेकेदार ने छुया सूअर को गोली का निशाना बनाया। गोली लगते ही खूस्वार छुर्या सूअर ने शेर की पिछली टाग पर अपने पुरे जैसे पने दाता से जबरदस्त वार किया। तब शेर ने रोष मे आकर प्रसयकर रूप धारण कर लिया। शेर ने जान की परवाह न कर सूअर के चिथड निकालन शुरू कर दिये। छुर्या सूजर के अन्य साथी भयभीत हाकर नौ दो ग्यारह हा गय । तब शेर ने बडे सघप के बाद सूअर का शिकार किया, किंतु शेर के 54/उत्तराखड के यनो म करत पुठे पर गभीर आघात के कारण वह कुछ घायल सा प्रतीत होता था। यह एक विशेष जानने यो ग बात है कि यदि छुर्या सूअर अपने पीछे के हिस्से का क्सिी पत्थर या मिट्टी के वा दुढीयार म छुपा दे और तब शेर छ्या सूअर पर वार करे तो शेर छुर्या सूअर को किसी भी हालत में नहीं मार सकता है बल्कि कभी-पभी तो छुर्या सूअर शेर को फाड देता है। परतु शेर शेर ही था। क्रोध में शिकार दवाकर बैठ गया आर नजर हमारी दिशा मे गाड बैठा । अव मौका जान से हाथ पाने का था । क्या चाचा भूपेद्र ने गोली दाग ही दी। शायद गोली शेर को पिछली टाग पर लगी या गदन पर। हो सकता है, गोली चूक भी गयी हो। गोली को आवाज सुनकर शेर उस पेड की तरफ लपक्कर ऊची छलाग भरने लगा जिस पर हम चारा छुपे बैठे थे। शायद आपका ज्ञान हो या न हा शेर में सबसे बड़ी एक यह भी विशेपता है कि यदि शेर को गोला मार दी जाय ता वह ठीक उस स्थान पर आकर शिकारी पर हमला कर देता है पिस स्थान से शिवारी ने गोली चलायी होगी। इसलिए जमीन स गोली चलाने वाले चतुर शिवारी गोली चलाकर तुरत अपना स्थान बदल दते हैं । परतु हम महाशय तो पेड की शरण मे घुप्पी साधे बैठे थे। पेड की तरफ शेर को छलाग भरत देखकर हमारे होश ही नहीं उड बल्कि हमे अपनी जान के लाल पड गये । इसलिए डर- निवारण का एक ही हल था-घडी-घडी फायर करना ताकि जान तो बचे। शायद वदूर बी आवाज सुनार शेर भी घबरा गया और भयकर गजना करता हुना बीहड जगल म चला गया । मेरा अपना खयाल था कि शेर मरा तो नहीं होगा परतु घायल अवश्य हो गया होगा। हो सकता है गदन पर गोली लग जान से कुछ दिना मे मर गया हो । बाद मे इस विषय मे हम अपना हाथ नहीं डालना चाहते थे क्योकि घायल शेर हमारे प्राण ले बैठता। तदुपरात हमने बदूक से चार पाच खाली फायर क्येि ताकि माग म अडा हिंसक पशु माग से विचलित हा जाये। उस समय कुछ नही लुहाचोड के जगल मे /55 सुभता था । सोचा, पड स पिस विधि से उतरा जाय। पाई सहारा मा नहीं वही रिसी की आवाज भा नहीं सुनायी पडती थी । भाग्यवश कुछ समय उपरात उस आर मोटिया लाग अपनी भड बरिया को चरान के लिए भोटिया कुत्ता के साथ आ पहुचे । तब प्रमुदित होकर हम पर से नीचे उतर आये और मोटिया लोगा या घायल शेर के बारे में अव गत कराया ताकि काई भाटिया शर का शिकार न हो जाय । भोटिया लोग बडे साहसी और निर्भीय हात है । व लोग सघन वना की सघनता में अपा गनमाल जावन व्यतीत करते है । वे लाग जगल म प्रत्येक हिंसक पशु म येसबर रहते है और न काई हिसर पशु इन पर वार करता है। भाटिया लोगास बातचीत करने के पश्चात हम चारा महाशया ने चन की सास ली और लब लधे डग भरत हुए चिगन-स्थल की ओर प्रस्थान किया। चिरान स्थल के समक्ष हमन एक धुवीड का जीवन तारण किया जिसमा रात म डटकर शिकार खाया। समय अधिक गुजर चुका था और जगल में भी चिराई का काय समाप्त हो चुवा था। ग्रामीण क्षना के ठाठिया या अपने घर जान के लिए ताता लग गया। साथ ही हम भी घर लौटना था क्यापि सेता म जुताई का समय निक्ट आ चुका था । दूसरे दिन हम पाचा जनो ने घर जाने के विषय मे विचार विमश किया और सामान बाधा । तासरे दिन हम चिरान-स्थल से मोटर अड्डे तक जीप म वैठकर जा रहे थे कि माग म एक अविस्मरणीय घटना घटी, जिसका वन करना क्लम के बूते से बाहर है। जब भी उस घटना की आर ध्यान आकर्षित हो जाता है तो आखा के आग एव म मा आ वर होते है। महात्मा कोर थे भगवान ही जाये। 56/उत्तराखड के वना में हिमपात में उच्च शिक्षा प्राप्त करन के लिए राजधानी चला आया था और साला के लिए प्राकृतिक सौंदय से नात प्रात पहाडी प्रदेश का आर मे मुह मोड लिया था। जब कभी सौंदयमय पहाडी प्रदेश की स्मति मा जाती थी तो झट से हिमपात वा दश्य आखा मे छा जाता। तब मन प्राकृतिक यौवन भोग के लिए बार बार विचलित हो उठता और मन में बार वार लालसा जागती तो केवल हिमपात से ढकी पवततालाजा को विलोकने की। मौका मिलना वडा मुश्किल था क्यानि परीक्षाआ के दिन नजदीक आ चुके थे। परीक्षा देनी अनियाय थी। समयगत परीक्षाए समाप्त हुई और हृदय खुशी स उमगित हो उठा क्यापि अक्सर पवतीय क्षना मे हिमपात की शुरआत जावरी माह के आरभ से हाने लगती है और कभी- कमी तो समय की हेर फेर से दिमबर माह म ही हिमपात अपनी प्रकोपमय भलर दिखा देता है। समय वलवान था। ईश्वर की असीम कृपा से मेरी मन "च्छा पूर्ण हुई । मौका जनवरी माह वे अतिम सप्ताह मे मिला क्याकि स्वय को योते म आमत्रित किया था इसलिए उस आर का सिद्धत जरूरी था। हुआ वही। कहावत है- एक पथ दो काज ।' दिल्ली से पहली बस रामनगर (ननीताल) को सुबह के पाच बजे जाती थी । म प्रात वाल जागा, विस्तरा बाधा और मोटर अड्डे की ओर प्रस्थान क्यिा ! यथासमय मैं मोटर अड्डे पर पधारकर ठीक पाच बजे मोटर मे विराजमान हो गया। तत्क्षण मोटर रामनगर (नैनीताल) 1,571 पी पार चल पही। यस माग म छोटे बडे शहा ये यसअहा य यात्री विश्राम स्थला के निकट से घूमती पतराती परती । समय की मोटर अनुसार यस ठीक बारह बजे रामनगर पहुच गयी। यहा शीत या प्रकोप अत्यधिक बढ़ा हुआ था ययारि दा दिन पहले पबतीय क्षेत्रा म पोर हिम पात हुआ था। दूगर ठहमा प्रयाप बढा रह थे हरित पवतमालामारे अ गिगगे पर उग पीर के गगन धी व वाम सिसज से यौन दसरा जागा यालीन ऋतु म सदा यफ की योग्नी लिपे रहते हैं। उपर गमनगर मही या पोलारसपूर्ण वातावरण ही समीर में पना ग MAITमय हा गया था। माटर अपर पहाहा प्रामा पी और जा यानी मोटर पर पर पा र परत हुए यात्रिया गी प्रतीदा पर रही थी। मने जो ferri पापात्रापर लिगा और मोटर की पिनी मोट बाहिरपीर पाग आजमावटाठोर मजे मोटर ग्यूमीनीयार पल ।

आदि हिमपात हा भी जाये तो इस जलवायु म पाये जाने वाले फलदार वृक्षा पर हिमपात वा पापी कुप्रभाव पडता है । मुन्यत आम, पपीता व केला के फलदार वक्ष काफी प्रभावित हान हैं । उस साल इन फलदार वक्षा पर बहुत कम मामा म फल दिसायी दते हैं। लोग कहते है, पेड राढे स जल गये हैं। इसके विपरीत शीतोष्ण जलवायु वाले क्षत्रो म पाय जान पाने फलदार वक्षा पर हिमपात का काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है। सेब नासपाती, सुमानी आलबुखार, असराट, दाडिम व आड. शीतोष्ण जलवायु म फूलने फ्लन वाले फ्लदार वक्ष है। हिमपात के हाने स समशीतोष्ण भागा म रबी की फसल उन्नत रूप म पनपती है। केवल शीतोष्ण भागामं रवी की फसल पर हिमपात का कुप्रभाव पडता है, जिस लोग कहते है अधिक ठड के कारण गेहू की फमल पर कुई लग गयी है। मोटर से अलमाडा व नैनीताल की वा-चाटिया पर जब दष्टि पडी ता गगनधुरी डाडा जैम कई अय पवत दूधिया रग म निखर रह थे । सरसराती मलयाचली ममीर उन आगतुब वन चाटिया स टकराकर अमृत रस पी सी महक महका रही थी। मोटर दावा जगल स दूर थी किंतु दीवा दी का जगल मुह के आगे ताज-सा नजर आता था। दूर म निहारने पर ननी डाडाका सपाट पयत और दीवा जगल की गगन चाटिया हिमगिरि के रूप म द प्टिगत होती थी हिमश्वेतमा म दीवा की छवि विमुक्त मालूम पडती थी। प्राकृतिक सौदय के मध्य हिमश्वतमा मानव के हृदय को मोह रही थी। भौगोलिक दृष्टि स दीवा जगल म गुजुडगढी वन-क्षेत्र में उत्तराखड को सर्वोच्च चोटी है, जो समुद्रतल से साठ हजार फुट स भी अधिक ऊची है। उत्तराखड मे गुजुङगढी प्राचीन काल का एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थान है। ग्रीष्मकालीन ऋतु मे पयटक गुजुडगढी की चोटी पर चढकर समस्त गिरिराजाकी छवि का आखा स रसापान करते है। इस चाटी म सैक्डा मील दूर के क्षेत्र, जसे पूरब म समस्त अलमोडा एव नैनीताल, पश्चिम मे दहरादून व मसूरी की पहाडिया, उत्तर में समस्त हिमालय हिमपात / 59 - पवत, दक्षिण मे नगीना, घामपुर एव मुरादाबाद दूरबीन द्वारा आसानी से निहारे जा सकते हैं। सौपरवाल की ओर मडिलाडाडा समेत भियार की चाटिया भी दूधिया रग म निखर रही थी। मेरी दृष्टि उन गलशिखरा पर जा अटकी जो प्रकृति को अपने सौंदय स पोत रहे थे। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा क्याकि मोटर-माग दीवा जगल के मध्य स निर्मित है और मोटर को भी दीवावे जगल स गुजरना था। धीर धीरे मोटर सडक की कीचडली मिट्टी को सडर के किनारो पर छिडकनी जडाऊसाद पहुची। जडाऊखाद मोटर का सब अड्डा है। इस स्थान म राशन, चाय को कई छोटी छोटी दुकानें व भाजनालय भी है । माटर मे वठे यात्री दिन का जलपान इस स्थान म रुककर करत है। प्राकृतिक सौंत्य के मध्य यह एक रमणीय भ्रमण-स्थल भी है। मोटर से उतरकर मैंने देखा तो जडाऊखाद म मोटरा या पडाव लगा हुआ था। यात्रीगण प्रफुल्लित हाकर दीवा की गगनचुयो चाटिया को निहार रहे थे। मैंन लागा से पूछा, "महाशयो, यहा इतनी सख्या में मोट र क्या खनी हैं ? बिगड तो नहीं गयी हैं " भारी माना म हिमपात होने के कारण दीवा स लेकर कुठिजा ग्राम तक सडक पूर्ण रूप से ढक सो गयी थी। आज कुछ आशा है कि मोटर स्यूसी की और प्रस्थान करेगी। सोचा, घर पहुचने के लिए क्या युक्ति ढूढ निकाल । अब स्वय के लिए 'एक वडी मुसीबत उत्प न हो गयो क्यापि मुझ यथासमय मैं पधारना या और स्वय जसे कई अय -यक्ति माटर म विराजमान थे जिनको यथासमय घर पहुचना था। क्या,करते? सभी यात्रिया ने इस जटिल समस्या पर गभीर रूप से विचार विमश क्यिा और एक युक्ति दूढ निकाली। सब यानीगणा न डाइवर महादय से कहा, "सडक पर पडी वफ अब कुछ कम हो गयी हागी। मोटर को लीक नजर तो आ रही होगी । अव माटर मे विठाकर पुलिया को ले चले । सडक वो लीक पर जहा अधिक मात्रा में वफ पडी दिखायो दगी, कुली उस बलचा से महाशयाताया कि यात 60/ उत्तराखड के वा म साफ कर देंग ताकि मोटर के चलन में रकावट न पडे। ड्राइवर महादय इस बात पर सहमत हो गय । कुछ हो क्षणा में मोटर मडक पर बों-पुची वर्फ यो पीसती हुई धुमाकोट को ओर चल पड़ी। राजकीय स्कूल व सरकारी मार्यालयो की चढाती एव अन्य सभी प्रकार की माए उपलब्ध हाने के वारण धुमा- कोट एक प्रसिद्ध व्यापार केंद्र भी है। इस क्षेत्र म ड या प्रकाप और भी अधिक बढा हुआ था क्यावि याम व चीड के पडा म टकराती समीर तीव्र गति स प्रभावित हो रही थी। चोट के पडो म खास सूची यह हाती है विचोट के वृक्ष दूर चलती पवना और बरसती बरखा को अपनी और खीच लेते हैं, चाह वारिश दो मील दूर क्या न बरस रही हो । इसलिए टड इतनी थी कि उसके ठडेपन को कोई आर नहीं सकता था। मैं मोटर मे विषय में मन ही मन विचार-विमदा पर रहा था। यही माटर का गरम गक्तिशाली इजन इस ठड वी मार से चुप हो जाये ताया होगा ? मोटर धीर धीरे वा वे ऊपर म डगमगाती हुई दीवा जगल के मध्य पहुंची। घ यवाद उन माटरचालया के लिए जा व निशान दाग देत हैं । मोटर डगमगा रही थी। मुझे ऐसा प्रतीत होता था, वही माटर वन खडहर में गिर न जाये क्यापि कमी-कभी वफ के बडे-बडे ढेले लुढक-लुढककर वन के दुगम खोका मजा गिरते थे। खटे पहा की दशा देखने व मनन करने योग्य थी। बाझ काफ्ल व तितज के छप्परीले वोने वृक्षो के ऊपर बफ उस काल तब भी इस प्रकार जमी पड़ी थी माना प्रकृति के महान कलाकार ने उन वृक्षा पर अपनी विभिन्न कलाकृतिया का सौदय प्रदशन करके मानव के मान को आरकर सचेत दिया हो । हर विस्म के वृक्षो को काफी हानि पहुची थी। खासकर चीड की विशाल टहनिया टूटकर ढलवाना में विछो दियायी देती थी। इतनी वफ व बर्फानी ठड में पवतीय जन अपने पशुआ के लिए चारा व ईंधन के लिए लकडी एकत्रित करने में व्यस्त थे। एक साधारण सा पहनावा था उन ग्रामीण जनाका पवत्तीय क्षेत्री मे कितनी भी मात्रा मे हिमपात हो जाये परतु ग्रामीण लोगा के स्यवसाय में एकर पता बनी रहती है । वे ठड के आदी होते है। प्राय. हिमपात /61 ।

1 । देगा गया है वि पवतीय साग हिमपात स पृणा परते हैं । मोटर दीया दयी के पवित्र स्थान पर पहची तो दमा, स्यूसी से आने वाली माटर समय पर बची-गुची यफ या सफाया करती रामनगर की आर बढ़ती चली आ रही थी। मागे माटर डेटियाला से भरी हुई थी। नपाली हाटी स्यूमी व बजग की आर अघिय सरया में रहते हैं । य लाग अपना दा नपाल छाडपर मारत में मजदूरी यमान के लिए भाया वरत है । इसलिए पुलिया म अधिक सस्या डाटिया की थी। म उन युलिया या दसकर आश्चम में पट गया। य गरीर पर बुता व बद्दर का रेवदार पायजामा पहाहुए थे । पाय म गम बूट ये स्थान पर एक साधारण सा जूता था। इतनी ठड में भी वे लाग चिना ठिकुराहट के सडय' पर पटा बफ को हटा। म सलग्न थे। उ ह ठड नहीं लगती थी। लगती थी सबम पहले तो गरीवी, जा दुरी बला है। दूसरा देश देश की चाल व रीति है यह भी हर प्राणी पर जलवायु का गहरा प्रभाव पड़ता है। उनम से कुछ कुनी थे डोटी डाटियारा, जा चौमास मे जगलो यी दुगम पदराआ से चिरान वे भारी भरकम शहतीरा यो अपनी पीठ पर रखकर मोटर मार्गों तक पहुचाते हैं । मोटर मुश्किल से दीवा देवी के पवित्र स्थान स दो फ्लांग आगे वढी होगी तव तर गरूडा भेट ये भयकर स्थान पर मोटर वे इजन मे पेटोल सचारक नली की चूडिया घिसकर ढीली हो गयी । जस ही ड्राइवर महोदय माटर (यम) का इजन चालू करते, इजन के जोर लगाने पर पेट्रोल नली से तेज धारा में बाहर वहन लगता और माटर रुव जाती। यानिया के सम्मुख पुन एक वडी कठिनाइ उपस्थित हो गयी। मोटर वफ से घिरी पवतमाताओ के मध्य गात हो गयी। अकसर पवतीय क्षेत्रो मे मोटरा की यही दशा देखन म भाती है। सब यानिया ने अपने दिमाग से पेट्रोल की नली का क्सने मे एडी चोटी का जोर लगाया परतु नली से पेट्रोल का बाहर निकलना बद न हुआ। सब हिम्मत हार बैठे। आखिर- कार मैंने एक बारीक कपडा सीने वाले धागे को पेट्रोल सचारक नली की घिसी चूडियो पर लपेटकर उसके ऊपर नट क्सकर इजन में पेट्रोल का -सचार कराया । एक सूती वारीक धागे न मोटर व शक्तिमान इजन से 62/उत्तरासड के वनो म टक्कर ली, जो किसी ने सोचा तक न था यात्रिया का पतझड हृदय बसत में बदल गया। कुछ विश्राम कर यात्रीगण माटर मे विराजमान हुए, तब माटर स्यूसी की आर अग्रसर हान के लिए ठीक दशा मे खडी थी किंतु तेज चलता वामो अमीरीके मोटर के शक्तिमान इजन को जाम कर पिया। क्या मजाल को चालू करने पर इजन घर-घर का शम्द तय कर दे। मैं स्वय इस विचार म डूब गया कि यदि मोटर इसी हालत मे खडी रह गयी और रात्रि में हिमपात हा गया तो मारे यात्रीगण मोटर समेत वफ से ढक । जायेंगे। यह एक बड़ी उलझन थी। भावविभोर होकर मैंने दूर दृष्टि दौडायी। देखा तो हिमालय पर्वत की उच्च श्रणिया में से घोर हिमपात होने का सकेत मिल रहा था। दूर स निहारन पर नयनाभिराम हिम की श्वेतमा मन को मोह रही थी। लगता था, हाथ पहुचाकर छू लू । मन मे एक परलोक भावना का जागरण हुआ। शायद वही स्वग है। मरकर सिद्ध पुस्पा की आत्माए यति या देव बनकर हिमालय पवत मे निवास करते होगी । कुकर्मी की आत्मा हिमालय परत मे वास नहीं कर सकती है। वहीं शिवजी का कलाश पवत है। भाव मन से विलीन हो चुका था। दीवा जगल की चारो दिशा में दृष्टि दौडायो, प्राकृतिक सौदय के अतस्तल में मैंने टश्वर साक्षात दशन किये। अन म दीवा दवीजी के पवित्र चरणा की असीम कृपा स बस का इजन चालू हुआ और मोटर स्यूसी की ओर चल पडी । मोटर दीवा के मध्य सडक के लबे लबे मोडो पर घूमती कतराती कुठिला ग्राम की आर पहुची। उस क्षेत्र मे हर वस्तु की दुदशा दखने म आयी। वफ से लदे मकानो की छत, पेड, पशुओ का बाहरी स्थान जलाशय पनघट लकडियो के कठघरे व खेत-सब बफ की चपेट से मुक्त न थे। यहा तक कि वफ लोगा के मकान की छतो स घिसकर गिरती जान पड़ती थी। यह भी देखने म आया कि किसी मकान के अदर बफ पिघलकर पानी के रूप मे पमर रही थी। मकानो की छते ढलाऊ होन पर भी बफ छतो के मुडेरो पर अधिक हिमपात / 63 जमी पड़ी थी। पवतीय क्षेत्रा म मवाना की छत ढलाननुमा इसलिए बनायी जाती हैं कि हिमपात काल में हिम मकानो की छता पर न ठहरे और जमीन पर जा गिरे। इस क्षेत्र में गोशालामा स धुआ निक्लता दिखायी दे रहा था। अक्सर शीतोष्ण भाग वाले ग्रामीण लोग हिमपातकालीन समय मे अपनी गोशालाओ में रात दिन आग ज्वलत रखते हैं । आग के ताप से पालतू पशुआ का ठड मे वचाव हाता है। यदि गोगालामा म आग न जलाई जाये तो पशुआ की दशा दखने योग्य हो जाती है और कमजोर पशु मर जाते है। एक कतार में बनाई गयी गोशालाए उस काल इस प्रकार विराजती थी मानो स्टेशन पर मालगाडिया के इजन से धुआ निकल रहा हो। इस क्षेत्र मे मोटर कुठिला ग्राम के मोटर-अड्डे पर रुकी। ठड अधिक सता रही थी। फिर भी मेरा मन हपातिरेक से उमगित था। तब अय यानीगण मोटर स उतरवर एक चाय की दुकान पर गम गम चाय का स्वाद लेन के लिए जा खड़े हुए। अक्स्मात मेरी मुलाकात मेरे एक पुराने मित्र श्री तूफान स हुई जो उच्च लेखक व कलाकार है । मुझे दख- कर तूफान जी आश्चय म पड गये । वार्तालाप के मध्य मने सारी कहानी उह सुनायी । इस मोटर गड्डे पर माटर का कुछ ही देर तक रुकना था इमलिए थी तूफान से विदा लेकर मैं मोटर मे बठ गया । तब मोटर का चलना स्वाभाविक था। जसे जसे माटर आगे की आर बत्ती जा रही थी, धीर-धीर पर्वीनयार वा सपाट भाग मुझे मोटर से दप्टिगत होने लगा। पर्वीनयार गढवाल की सबसे बडी नदी है । वफ से नयार की दुगम घाटिया श्वेत रूप म चमक रही थी। शेरा ग्राम का भावरी भाग जो प्राचीन काल म लोगा के लिए घुडदौड का स्थान था, अब वह अनात्पादन के लिए प्रसिद्ध है। वह स्थान ता संगमरमर के बन पा स्पम पदल गया था। यही नहीं बजराये गगनचुवी डाडे आर थैलीसेण की ऊची चोटिया तो हिमगिरि का स्प ले बैटे थे। मुझे ता पणिडा के रमणीय स्थान म उतरना था और माटर का । 64/उत्तराखड वना म स्यूसी तक पहुंचना था। मोटर पणिडा के डाकघर पर रकी। माटर से उत्तरकर दृष्टि नयार की अतलस्पर्शी जलराशि पर पड़ती है । नयार की अथाह जलराशि पहले हिमशिलाओ के साथ मृदगमय-से क्लिाल कर रही थी। उस काल नयार पर पुल का निर्माण नहीं हुआ था और मुझे नयार पार जाना था किंतु उस पार जाने के लिए नयार का वहता ठडा जल व हिमशिलाए मन का आगे बढन से रोक्ती थी। केवल तैरन घाट पर नयारको निस्तरण किया जा सकता था। उस स्थान पर पानी एक लबी बफ शिला के रूप म जम गया था। उसी शिला पर चढकर मन नयार को पार क्यिा। हिमपात / 65 बदलता समय, ये लोग यो तो छाट बडे शहरा म जाप लोगा न छोटे बडे जादूगग को सडका के किनारे या निम्न स्तर के क्वाटरा के आगे मजमा लगातयातमागा दिसाने देखा होगा । जी हा आपने जादूगर को कहते भी सुना होगा- बाबू जी ठहरना ठहरना वाबू जी-ठहरना । देखो, मेरे हाथ की सफाई नजर का खेल चुरेंट दव्यरी टैट। जादूगर डुगडुगी बजान लगता है डम डम डम । घूत कहकर जादूगर तमाशा देखने वाला के कान चौक न पर दता है और छाटे बडे सभी तमाशा देखने वाले गण खिलखिलाकर हस पडते है। फिर जादूगर खेल दिखाना शुरु करता है। एक हाथ से बासुरी की तान और दूसरे हाथ से डमरू वी डमडमान, केवल जादूगर के हाथ की सफाई से कभी डिबिया गायव तो कमी गिलास गोल , कभी घडा खाली तो कमी घडे म पानी कमी चव नी ता कमी अठनी, कभी तालिया की गड- गडाहट तो कभी ताता मैना की फडफडाट । इस तरह जादूगर तरह तरह के खेल जनता के सम्मुख प्रदगित करके अपनी आजीविधा प्राप्त करता है. केवल हाथ सफाई, नजर का खेल, चुरट ढ यरी टेट स। यह भी एक विद्या है। ठग विद्या नहीं है और न मैं इसका ठग विद्या कहूगा । वास्तव में जादूगर अपने सीखे हुए जादू विद्या स्पी क्ला का प्रदान करता है।हा है भी तो जादूगर एक महान कलाकार जा तमाशा देखन वालो की आखें बाघ देता है और तमाशा देखन वाले एवचित्त होकर जादूगर के हाथ की सफाई वाले कला-कौशलों को विचित्र रूप से देखते रहते हैं। केवल हाय की सफाई, नजर का सेल चुरैट ढव्यरी 1661 टैट स जादूगर थोडा बहुत पसा समेट लेता है। इस तरह पैसा कमाने मे न तो जादूगर को काई आत्मग्लानि होती है, न किसी प्रकार की आपत्ति और न तमाशा देखकर पैसा फेंकने वाला को जादूगर वे बिछे चौपाल पर । जादूगर मागपर नही खाता है और न छल कपट से पैसा कमाता है। दूसरी बात, जादूगर जवरदस्ती किसी भी दशक के साथ नहीं करता है—नही जी मैं तो एक रपया से कम नही लूगा क्या देखा आपने मेरा हाथ की सफाई वाला दिलचस्प खेल । नही खडे होते तमाशा देखन, नहीं जी, आपको एक रुपया देना ही पडेगा। जादूगर के निछे चौपाल पर कोई दस्सी, कोई पजी और वाई भाग्यशाली बनी या अठनी पर देता है और जादूगर सारा पैसा समेटकर दूसरी बार तमाशा दिमान के लिए अग्रसर हो जाता है। परतु इस आधुनिक एवं वैनानिक युग म कुछ साला से इन लागा के दान करने बढे ही दुलम हा गय है और न अब य लाग ही दिखायी दत ह और न इनका कोई दिलचस्प सेल ही जिसके द्वारा य भाजीविका प्राप्त किया करत थे। जादूगरा की दखादेखी म न ता पदरी का नाच दिसा। पाल ही दिखायी देत हैं और न डुगडुगो बजाकर बदरा द्वारा प्रदर्शित दिलचस्प खेल ही जिह वदर वाले सडको के किनारो या गलिया म दिखाते फिरते थे। बदर का रूठना बदरिया का विवाह, बदर का नाराज होकर ससुराल न जाना और कुछ नहीं तो बदर को जबरदस्ती डडे के बल दात दिखलाते हसाना कितना अच्छा लगता था । अब प्राय दखन मे आया है कि तमाशागीरियो ने इस तरह के मजमे प्रदर्शित करके आजी- विया कमाना छोड दिया है शायद किसी कारणवश । यही हाल ठ- पुतलिया का खेल प्रगित करने वाला का है जो काठ के बने निर्जीव कठपुतला को अपनी क्ला द्वारा बारीक धाग के वल से एक नया जीवन प्रदान कर देते हैं । आपन देखा होगा, कठपुतलिया का मनमोहक नत्य, राजाभा की बैठक म नतकी को नाचते क्तिनी सुदर नाचती है काठ की कठपुतली, आपने सुना भी होगा, पल्लो लटके गोरि को पल्लो लटके, जरा टेढा होजा बालमा '' कठपुतली वाला क्तिना महान कलाकार है जो धागे के बल से पाठ की कठपुततिया को नचाकर आप जैस दशकार मन बदलता ममय, य लोग 167 को मत्रमुग्ध कर लेता है परतु फिर भी लाग उगकी कला कीमत नही पुका पात हैं । जा थोडी-बहुत कीमत उसया आप लोगा ये सामन अपनी क्ला प्रदर्शित करवे मिलती नी है उससे वह अपने परिवार का ता दूर रहा, अपना ही गुजारा नही कर पाता है और उसे हताश हाना पड़ता है। मैं ज्यादा विस्तार में नहीं रहना चाहता ह, परतु देखन स विदित होना है कि ये लोग भी इस कला को जनता के सम्मुस प्रदर्शित करने में हिचकते हैं । हिचक्ने की तो बात है ही शायद इन लागा न यह घधा छोड ही दिया है। वास्तव में इस घधे को अपनान से इनको कोई लाभ नही होता है क्याकि इस घधे मे काई इज्जत है और न कमाई ही बदकिस्मत या मारा एय नाघ कोई बिरला ही होगा जो इस घधे के अलावा अन्य उद्यम करन म असमथ हो। गायद इन लोगा ने कुछ घधा करना शुरू कर दिया है जिसके द्वारा इन लागो की आजीविका पूण रूप से निभ रही है। इसम हमे भा खुशी है। कुछ घधा करके अपना पट भी पाल मक्ते हैं और दूसरा की मा आर्थिक मदद कर सकते हैं। साथ ही देश के परोपकार म अपना हाथ वटा सकन हैं । इसम हर व्यक्ति की प्रतिष्ठा वढती है और अ य लोगा की दप्ट मे वह प्रतिष्ठावान यक्ति आका जाता है। शायद आधुनिक एव वज्ञानिक यतीकरण युग को मध्यनजर रखत हुए इन लोगा ने स्वय को समय के अनुसार ढाल दिया है और न अब कोई जादूगर ही नजर आता है और न उसका दिलचस्प खेल हाय की सफाई वाला न बदरा को जबरदस्ती डडे के बल हसान वाल और न कठपुतलिया का मनमा नत्य प्रदर्शित करन वाले ही । वास्तव म मनुष्य को बदलते समय के अनुसार अपना समस्त जीवन चक्र बदल देना जरूरी है । समय के अनुसार चलने वाला व्यक्ति अपन जीवन काल मे घोखा नही खाता है और न विसो के आगे लाचार होता है । जो यक्ति समय का सदुपयाग नही कर पाता है उस मनुप्य का जीवन निरथक है, साथ नहीं। इसका प्रमुख उदाहरण आप वेत के पौधे मे ले जो वहते पानी की तज धारा के अनुसार अपना सीधा अव टपन ढाल देता है। नाय पड पौधो की अपेभा उसका कुछ भी नहीं बिगडता है। समय 68/ उत्तगमड के वनो म । को मध्यनजर रखत हुए प्रत्यय मनुष्य को, चाहे वह जमीर हो या गरीब, वेत में पौधे स शिक्षा लेनी जरूरी है। स्वतत्रता प्राप्ति के बाद देश अवश्य गरीब रहा, इसम कोई सदेह नहीं । देशवासिया पर भी गरीवी का पजा जमा रहा । उस काल लोग कहते थे, सब कुछ ता अग्रेज ले गय है, क्या करें, इसलिए उस समय अपनी आजीविका कमान के लिए जिसके हाथ जो धधा लगा, वह उसी धधे को अपनान लगा। कुछ लग्नशील लाग ता उसी घधे म अपना जीवन सफल वना गये और कुछ लोग रह गये । हुआ यही कुछ पास तो कुछ फेल । परतु धीरे धीरे बदलते ममय के अनुसार जन जागृति म चैत यपन आया, देश के नये कणधार आगे आये जिहान दश की बागडोर अपने हाथा म ली। देश म बुद्धि बल स ान विनान की प्रगति हुई। विज्ञान को प्रगति के साथ साथ देश मे नय-नये कायक्लापा का उद्गम हुआ जमावि आप जाज के युग म दस रहे हैं । गरीवी मिटान के लिए दश के महान वणधारा न भी काफी प्रयास किये है जो देशवासियो को दष्टि मे प्रगति की ज्योति बनकर फल रहे है और भविष्य मे भी पलते रहगे। इस विषय के वई ज्वलन उदा- हरण आपके सम्मुख प्रत्यक्ष रुपम उपस्थित है। देश का समृद्ध बनाने व देशवासिया के लिए सरकार क्या क्या नहीं कर रही है । सरकार न आजकल बरोजगारा पे लिए ही नही अपितु प्रत्येक क्मठ व्यक्ति के लिए अनेको उद्याग घधा का निर्माण गिया है चाहे वह अमीर हो या गरीव, चाहे वह हाथ की सफाई वाला हो या जबरदस्ती डडे के बल बदर को हसान वाला हा औ चाहे वह पाठ की कठपुतलिया का मनमोहक नृत्य प्रगित करन पला तटरे गोरियो' वाला हा । प्रत्यक को वाम दन पे लिए अनय भुटार उद्योग घधा का विस्तार दिया है। सरखार न छोट-बडे सभी प्रकार व सहकारोव-ममितियो व अय पईबेको वा निर्माण पर विस्तार पिया है जहा म प्रत्येक दावासी अपना निजी व्यवमाय व छोटा-वडा घघा सोलन के लिए कम व्याज पर ऋण से सस्ता है। भूमिहीनो का भूमि-वितरण के साथ माय कृषि उनत औजार प्रदान किये है तादि प्रत्यर व्यक्ति कृषि स उत्सादन बदलता समय, ये लोग / 69 घरके अपनी गरीबी दूर करके दश पो समद बनाने मे सरकार का हाथ चटाकर स्वर्गीय प्रधान मनी लालबहादुर शास्त्री व राष्ट्रपिता महात्मा गावी जी का वचन पूरा कर सकें। दूसरा, ताकि खाद्य समस्या के विषय मे हम किसी अय देश पर निभर न होना पडे । यही नहीं सरकार ने अशिक्षितो के लिए भी देश म चाह गाव हो या शहर, कई हजार प्रौढ शिक्षा केंद्र खोले है ताकि देश का हर नागरिक शिक्षित होवर स्वय को पहचानकर स्वावलवी बन सके और अज्ञानता, रूपी अधकार ज्ञान रूपी प्रकाश के माग मे आर अपन भविष्य का सही पथ प्रदशन कर सके ताकि कोई भी व्यक्ति परिवार पर बोझ बनकर मार देश पर भार बनकर न रहे। इतना कुछ करने पर भी सरकार जनता के हित मे फिर भी अनेको महत्त्वपूर्ण कदम उठाकर उनको सफल बनाने का भरसक प्रयत्न कर रही है ताकि देश का जन जन फूले फ्ले और वसत "तु जसी मनमोहक फूतो से लदी खूबसूरत बहार व सुगधित मलयाचली समीर प्रत्यक देशवासी के जीवन को स्पा करे। यह तभी सभव है जब प्रत्यय व्यक्ति कमठ निष्ठावान, माहसी, लगनशील व परोपकारी हो, उजाड व हताश हृदय पान हो । यही दश का प्रत्यक महान बुद्धि जीवी वग चाहता है कि दा किस प्रकार उनति के शिखर पर पहुचे, ताकि काई भी व्यक्ति अपना हाथ दूसग के आगे फ्लान की कोशिश न करे। परतु खेद है सरकार द्वारा उनत विकास करन पर भी देश के कई भागो म ऐसे भी महारया जामन जमाये बैठे है जा रत्तीभर वाम वरना नही चाहत हैं। कामपा नाम लेन और करन मे उनकी हड्डियां दुसती है यदि उनका हराम वा खाना मिल जाये तो वे आनद मनाते हैं। आनद ता दखिए उन मिजाजिया या भाग की चिलम की कालग रही है भाग की पकौडिया चव रही हैं दूध को गाढी चाय का एक हाय भर या गिलास तोता मुह पर लगावर लवी लवी टवार लेयर सरपत या सी घूट मारत रहत हैं। इन लागा को भिक्षा मागने की आदत पही रहती है। यदि आप इन लोगा मे यह, कुछ काम यरोग महाशय व सुना म दर अवश्य करत हैं परंतु जवाब देन म दर नही करत । छूटत 70/ उत्तराखड ये वना म हो मुह फाडकर-दात दिखाकर कहते हैं, हम तो मागन का वरदान है, इसो मे आनद है । जनाव, हींग लगे न फ्टिकरी रग निक्ले चोखा, समझे बाबू जी । मागने का वरदान है जैसे कुम्हार को घडे पाथने का, तेली को तेल अटरने का, नाई को वाल बनाने का, यूटनी को कूटन का और पीसनी को पीसने का। हमे ता भिक्षा मागकर खाना अच्छा लगता है। भिक्षा मागने म हम भले ही भगीरथ परिश्रम कर लेते हैं, परतु काम के मौके पर हम हींग लगे न फिटकरी रंग निकले चाखा' वाला हिसाब करते है । अब आप ही बताए कि इन लोगा को पिस प्रकार समझाया जाय, किस प्रकार इनको सही माग पर लाया जाय। हा, एक बात और भी तो है। अगर कभी इन लोगा को समझाने वाली बात कह भी दो ता ये लोग आख दिखाकर विगड पडत है या घूत कहकर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। क्या करे, समझ समझा अकाल है। यही लोग जा परिश्रम करने म जी चुरात ह, ठग विद्या में इतने माहिर होते हैं कि इनके आगे मुरादाबाद के मशहूर ठग भी नाका चने चबाते है और बहादुरी में ये तीसमारखा से कम नहीं होते है । इन लोगा की जीती जागती चलती फिरती नसवीर प्रस्तुत है । उत्तराखड मे भ्रमण करने वाले य लोग जा स्वय को ज्योतिष विद्या के महान प्रकाड वताते है, जो इस युग मे भी उत्तराखड के गाव-गाव म भिक्षा मागते व लोगा का ठगते फिरते रहते हैं। इन लोगा को हुआ क्या, शायद आधुनिर एव वैज्ञानिक यत्रीकरण युग का सूय इन लोगा के लिए उदय नहीं हुआ है । शायद आप लोगो का इन सागा स वास्ता नहीं पड़ा है। भगवान न करै कभी आपकी मुलाकात इन महाशयो से हा परतु क्या करें, गाव के बुग भी इस युग म क्म अधविश्वास नहीं है जो प्राय इनकी ठगी जबान का शिकार होते रहते हैं। ये लोग अपने को साघे पानी से धुले ज्योतिष विद्या के महान विद्वान बताते हैं। इनकी वरा- भूपा तो दखिए किय जनावेआली विस मिजाज म टरके रहते है । एक हाथ म लवा लठा सिर पर सफेद पगडी पट्टा शरीर पर लबा चोला व रेवनार पाजामा दूसरे हाथ म चादी का बडा खोटा पावा मे डाग या जूता और माथे पर त्रिशूलनुमा तिला वह भी लात-सफेद मिट्टी बदलता समय, ये लोग / 71 मैं वहा या। हा, तो ये जनाबाली क्सि तरह लोगो को अपनी ठगो जवान का शिकार बनाते हैं । इनकी बोली के कूछ नमूने मैं आपके सम्मुस प्रस्तुत मरता हूं ताकि आपका भी इनके बारे मे कुछ पान हा जाय । यदि भिक्षा मागत समय इन लोगा को घर म युद्ध स्त्री के दर्शन हो जाय तो ये देखत ही कहत है, हा, माई, तेरा भाग्य दखू, तेरा लाख दखू, बडी भाग्य वाली, बुडढे की प्यारी, बेटे से यारी, बहू की प्यारी, नाती की दादी, दे माई, द। पिछले साल तून मुझे पाच रुपये दिय थे। कहा था जब तू फिर आयगा ता मै नाती हाने पर तुझे बीस रपय दूगी। दमाई दे, वीस का लाल पत्ता तेरे मायके वाल तो राजा है राजा, भी गया था। उ होने मुझे बीस रपये देकर वृताय किया । मन उनक जम कुडले बनाय थे । अव तरे घर आया हू । दे माई, दे। तेरे घर म लक्ष्मी आन वाली है । एक सप्ताह लगेगा फिर दखना, तरे घर राजाओ घर मोतियो का कल्याण होने वाला है, दे माइ, दे। क्या कहा जाय, लोगा की भी ऐसी मत कटती है कि इन लोगो की गलत वात के पीछे खुश होकर उसका पाच रुपय जोर पाच क्लिो गेहू देकर कृताथ कर देते है । ज्योतिष का प्रकाड भी ऐसा खिसक जाता है जसे छुपकर दूध पीने वाली बिल्ली । और यदि इसी प्रकार दो चार इन लोगो का घर म भिक्षा मागन के लिए जमघट लग जाय ता सुनिए फिर इनकी लचकदार बोली के कुछ नमून । खास कर बुटिया को देखकर बोल पटते है 'माई तरा बुढा जीता रहे, उसकी सौ साल की उम्र हो।' चाह भले ही बूढा तीन साल पहल ही मर गया हो, परतु फिर भी उसकी सौ साल की उम्र हो। तेरा नाती डिप्टी बने, बनने वाला है और बाप पहले से गवनर है। भले ही बुढिया का नाती किसी दफ्तर म चपरासी हो और तडके का बाप दफ्तर में पास हो। माई तू तो राजा की बेटी है । माई दूध वी गाढी चाय पिला दे बिना दूध की मत पिलाना, शकर वाली नहीं, चीनी वाली लपटदार। दूध की गाढी चाय में चीनी इतनी डालना कि चाय पीते समय हाथ भर का गिलासी तोता मुह पर लग और दाना हाठ चिपक जायें ।' सुना ज्योतिष के प्रकाड क्या कह रह है ? भले ही ये लोग दस दिन से चाय पीन को तरस रह हा, परतु शौक तो देखिए इन मिजाजिया 72/ उत्तराखड के वनो में । का क्योकि हराम का मिल रहा है न, इसलिए विना दूध व चीनी के अलावा शववर की चाय नही पायेगे। चाय भी ऐसी जिसके पीने से दोनो हाठ चिपक जाये । यदि उनको पूछ दिया जाय, महाशय, भोजन करोगे?हा वहने में देर नहीं लगाते है । छूटते ही कहत है, 'चावल व दाल के सिवाय हम कुछ नही खात है। कभी कभी रोटी भी, गटी भी चुपडी हुई और माथ म सावुन उडद की दाल ! दाल भी ऐसी बनी हो जिमया थाली से उठाकर दीवार पर फेंक दिया जाय तो दाल दीवार पर ही चिपर जाय । चाहे भले ही इन लागो को भूख मे लगड पडे हा परतु य लाग अपना बनाया गीला भात और दाल ऐसी, जिमम इन लागा की स्रत नजर आ जाय, उसको नहीं खायेंगे दमरो का बनाया हुआ फरफरा भात और दीवार पर चिपकने वाली दाल खात हैं, हराम वा । अगर इन मिजाजियो को फिर पूछा, 'महाशय, प्याज खाओगे?' कहते है, 'हरी हरी।''मास खाओगे?' कहते है सिरी सिरी।' यदि इनको मिक्षा देकर कृताय मी कर दिया जाये तो य द्वार से दो बदम चलकर पिर वापस दरवाजे के आगे सड़े हो जाते है कहत है माइ हम भूल ही गये थे। हम चार चार जने एक्साथ भिक्षा माग रह हैं, उन तीनो के बदले की भिक्षा तू मुझे ही दे दे। समझ गए? जबान के 'जादूगर क्या चालाकी खेल रहे हैं, सुनी उनकी बात ल गया न एक अ य तीना के बदले की भिक्षा भी । यदि कुछ समय बाद दूसरा जवान का जादूगर द्वार पर आ पडा ता उसकी अमृतवाणी से आप यही शब्द दुहराते सुनेंगे। हा यदि कोई इनवे ठगने में न आया तो द्वार को छोडते समय मालूम है य क्या कहते है ? यदि ज्योतिष का प्रकाड अबेला हो तो 'माई सब कुछ तो ठीव है परतु तेरे से एक बात कहना भूल ही गया ह । माई तेरे पीछे राहू हाथ धोकर, सिर मुडाकर, नाखून कटावर, बाल विखराकर नजर लगाकर, घुटन उठाकर व तेरी धोती पक्डकर लगा हुआ है । माई देख लेना तू चुछ दिना वाद बडे सकट में पड जायेगी या पड से गिरकर तेरो टाग टूट जायेगी या तू नदी म वह जायेगी। म उत्तरकाशी, हरिद्वार व बद्रीनाथ का प्रकाड ज्योतिषी हू । यदि तू इस राहू से बचना चाहती है ता वच सकती है। मैं ही. बदलता समय, ये लोग / 73 ?

हू एक ऐसा गुरु, जो तेरे पीछे हा धोकर लग राहू का उतार सक्ता है। अगर उतरवाना चाहती है तो अभी उतरवा ले। इस समय न तो तरा बूढा घर पर है और न तेरा वेटा। जल्दी कर राहू का अभी ठीक कर देता है।' पुरान खयालात के पुराने लोग अधविश्वास की जड हाते है । देखा, पड गयी बुढिया भ्रमत मे चल गया उसकी ठगी जवान का जादू कराने लगी बुढिया अपने धोती का पल्ला पक्डे राहू को ठीक, रोक दिया न बुढिया न ज्योतिष के प्रकाड को! यदि बुढिया ने उसका पूछ दिया, भाई, राहू का ठीक कराने के लिए क्या-क्या सामग्री चाहिए,' तो सुनिए, भ्रमणकारी ज्योतिप के प्रकाड के मुख से माई, मैं ज्योतिषविद्या का महान पडित प्रत्येक पर लगे राहू का करता हू खडित । सामान चाहिए। बुढिया जल्दी कर, जत्दी फिर देर हो जायगी कोई आ जायेगा, यही समय है राहू को उतारन का, सुन-दस किलो गेहू, दस किलो चावल पाच क्लिो उडद की दाल एक किलो चीनी चायपत्तियो समेत दो दिलो नमक, दस रुपये भी, एक परात व कासा की थाली और कोई बूढे की गरम सूट हो ता उसे दे दे। हा भूल गया था, चादी या सोने वा कोई मामूली टुक्डा हो ता सान म सुहागा। बुढिया ने शुरू किया सामान जोडना । सामान जुडा । ज्योतिष के महाप्रवाड न गलत मत्र पढे और दस मिनट म उतार दिया बुढिया पर लग राहू का। सारा सामान लेकर ज्यातिप का प्रकाड चपन | जाते समय पता है ज्योतिष का महाप्रबाड क्या कहता है माई अभी आता है। यदि घुडढा घर पर आये तो वुढे को कहना, अभी आया ढूढन का षष्ट न करना।' अब आप ही सोचिए, वुटिया पर लगा राहू उतर गया या वुढ़िया पर राहू लग गया? कितने ठग होत हैं य भिक्षा मागन वाले स्वय को ज्यातिप वे महान प्रकाड वतात लाग | एक बार जब आपातकालीन समय के जतगत नसबदी या धूमचक्र चला था त उस काल इन जवान के जादूगरा की कोठी कपचा गयी। तय इनकी मूरत देखनी नामुमकिन हो गयी थी। जस हो यापातमान व नसबनी या पूम चक्र समाप्त हुआ इन महारथिया का फिर गे गाव- 74/ उत्तराखरपे यना म - 7 गाव मे जमघट लग गया। इन लोगा का कहना है कि यदि हम मिक्षा नहीं मागेगे तो हम पर देवता का दोप लगता है। देवता का मडारा कोने के लिए हम लागो को भिक्षा मागनी पडती है । ठीक है, मानत भी परतु देवता यह तो नहीं कहता कि तुम झूठी ज्योतिष विद्या से वहां- कर लोगा को गाव गाव मे जाकर ठगो। ऐसा ता किसी भी धमशास्त्र मे नही लिखा है। इन लोगो के कहने पर मुझे एक बात याद आयी। उत्तराखड मे तैलियू डाडा ये कुटरीनाल के अतगत एक गाव है जो चारो दिशाआ से सघन बन से घिरा है। प्राचीन काल म इस गाव के लाग बोक्साडी विद्या के प्रकाड हुआ करते थे। वे मन के बल से वक्सू बनकर हर चीज को खा जाते थे। कहते हैं उनको भी किसी देवता का वरदान था कि यदि तुम बोक्साडी विद्या नही सीखागे तो तुम कोढी हो जाओगे । परतु आधुनिक एव वैज्ञानिक युग म उसकी भावी सतान ने वोक्साडी विद्या सीखनी ही छोड दी है तो वे लोग कोढी क्यो नही हुए इस बात से स्पष्ट होता है कि ये लोग मागने व गावा म लोगो का ठगने के सिवाय कुछ उद्यम नही करना चाहत हैं जार न सरकार द्वारा विक- सित किये गये उद्योग घधा से ही लाभ उठाना चाहते हैं जबकि मर- कार ने पवतीय क्षेत्रा म अनक कुटार उद्योग धधा का विस्तार किया है ताकि प्रत्यय पढा लिखा व अशिक्षित ग्रामीण व्यक्ति अपने ही क्षेत्र में अपनी आजीविका कमा सके । आपको भात है कि पर्वतीय क्षत्रा म वन विभाग के अतगत वई लोगो को काम-काज मिल रहा है। जल प्रमाग द्वारा जल नला द्वारा ऊची-कची पहाडिया से नीची नीची घाटियो की तलहट्टी वाले ग्रामा म पहुचाया जा रहा है। इसक अतगत मी कई ग्रामीण लाग रोजगार प्राप्त कर रहे हैं और भूमि सरक्षण विभाग, उजाड व बजर भूमि की टूट फूट को मरम्मत के साथ वक्षारोपण कर रहा है और वक्षा के बचाव के लिए चारदीवारिया फेर रहा है । यही नही बरिक मरमार से नाव के माध्यम से लोगो को निजी व्यवसाय चलाने या व्यवसाय विस्तार के लिए ऋण मिल रहा है। सरवार बागवानी के लिए अनुदान भी दे रही है। पवतीय क्षेत्रो में नये नये मोटर मार्गों का निमाण हो रहा है । इसके वदलता समय, य लोग / 75 अतगत सैक्डो लोगो को रोजगार मिल रहा है और मिलता रहेगा भविष्य म भी। इतना ही नहीं, सरकार पवतीय क्षेत्रा मे ही नही बल्कि देश के सपूण ग्रामीण क्षेत्रो के लिए नये-नये कुटीर-उद्योगो का निर्माण करके उनका भविष्य विस्तार कर रही है ताकि ग्रामीण क्षेत्रा का पिछडापन दूर हो सके और देश समद्धिशाली वनकर बदलते समय के अनुसार देशवासियो का भविष्य भी बदले, उज्ज्वल भविष्य की ओर । 76/उत्तरासह के वना म विद्या की जडी मुझे बचपन मे वयोवद्धा के मुह से कहानी सुनने की गाढी चाह थी। विशेषत गीतकालीन ऋतु निशाकाल मे रात्रिभोज करने के पश्चात् अगीठी के पास बैठकर जाग तापते समय वयोवद्ध के मुह से ना प्रकार की कहानिया सुनने से एक तो मन मे विशेष आनद का अनुभव होता, साथ ही मानसिक ज्ञान का विकास होता । शीतकालीन ऋतु थी। निशाकाल मे सव वच्चे रात्रिभोज करवे अगोठी के समक्ष जमघट लगाये थे। रात्रिभोज करवे वयावद्ध भी यागी व महात्माआ की कही कहानी सुना रहे थे "महात्माआ के पास सब प्रकार की विद्या होती है। महात्मा बडे विद्वान होते है। हमारे देश मे बडे बडे महात्मा हुए है। मैं मध्य में वोरा पड़ा दादा जी स्वामी विनेकानंद के समान विद्वान ता पोई भी महात्मा न था।" दादा जी बोले । तुम्हे कैस नात हुआ मैंन कहा, 'दादा जी मेंन अपनी पुस्तक म पढ़ा है।" फिर दादा जी बाले, क्या पढा है तुमने स्वामी जी के विषय म मुझे भी उनकी विद्वत्ता के विषय मे कुछ मात करा दो।" मैंन बडी उत्सकुता से यहा । अच्छा सब श्रातागण ध्यान स सुनो। एक बार स्वामी विवेकानद जी पानी के जहाज द्वाग इग्लैट जा रहे थे। उन साथ एक अग्रज उपन्यासकार मी विराजमान थे। अग्रेज उप यास- बार के हाथ में उसके लिये उप यास की पाडुलिपि थी। ' स्वामी विवेकानद जी ने नम्रतापूवर पूछा, आपके हाथ म क्या 7. 1771 है ? अग्रेज उप यासकार ने जबाब दिया मेरे हाथ म मेरे लिसे अग्रेजी उप यास की पाडुलिपि है। " जग्रेज उप यासकार से स्वामी जी न उप यास की पाडुलिपि पढन को मागी । अग्रेज उप यासकार ने स्वामी जी को पढने के लिए अपन उप यास की पाडुलिपि दे दी। स्वामी जी ने प ने पलटने शुरू क्यि और प ने पलटत समय सारा उप यास पढ डाला। कुछ देर म जसे ही स्वामी जी ने उप यास की पाडुलिपि अग्रेज उप यासकार को देनी चाहो, अकस्मात स्वामी जी के हाथा से पाडुलिपि छूटकर समुद्र में गिर गयी। अंग्रेज उप यासकार ने माधवश होकर स्वामी जी से कहा- आप मेर उप यास की पाडुलिपि दे दो, नही तो ठाय नहीं होगा। उग्रज उपन्यासकार की वात सुनकर स्वामी जो मुमकरात हुए बोले, 'मा यवर, आप नाराज न हा। आप पास कागज और कलम है ?' स्वामी जी को यह बात सुन कर अप्रेज उप यासकार ने कहा, क्या क्या करना है आपको कागज और क्लम का?" स्वामी जी बोले में आपका उप यास वैसा ही लिस दूगा, जसा आपन लिखा या। यह सुनकर अग्रेज उप यासकार को बडा आश्चय हुआ आर वह सोचने लगा, दखू इस भारतवासी की विद्वत्ता को । यह भगवान तो नहीं है। कह रहा ह आपका उप यास वसा लिख दूगा जैसा आपने लिखा था । अग्रेज उप यासकार ने स्वामी जी का कागज और कलम दे दिया। उसस कुछ दूर जाकर स्वामी जी ने एक घटे म हूबहू लिखकर उप यास अग्रज उप यासकार के हाथ म दे दिया। जय अग्रेज उप यासकार न स्वामी जी द्वारा लिखे अपने उप यास यी पाडु- लिपि पढी तो वह बडे आश्चय म पड गया । उस उप यासकार ने पूछा श्रीमान आपका शुभ नाम '' " स्वामी जी मुसकराते हुए बोल, भारतवासी स्वामी विवेकानद मेरा नाम है। स्वामी विवेकानद नाम सुनत ही अग्रेज उप यासकार ने स्वामी जी ये घरणा मे अपना सिर भका दिया। मैन कहानी सुनानी समाप्त की और वयोवद दाल बोले, "यह तो । " 78/उत्तरासह वनों में तुमन बडी ज्ञानवद्धक कहानी सुनायी। तुम्ह भी स्वामी जी की इस कहानी से शिक्षा लेनी चाहिए। हमारे देश मे स्वामी जी के समान अय महात्मा भी हुए हैं।" मैंन कहा "दादा जी, आपने कहा कि महात्माआ के पास हर प्रकार की विद्या हाती है। वे कैसे प्राप्त करत हैं हर प्रकार की विद्या को? क्या विद्या की भी कोई जडी हाती है जिसे खान या अपने पास रखने से उनको हर प्रकार की विद्या आ जाती है " दादा जी ने हसकर कहा : बेटा, मुझे तो ज्ञान नही । न किसी से यह जानन की कोशिश की कि विद्या की भी कोई जडी होती है परंतु महात्माआ की माया यारी हो सक्ता है उनके पास विद्या की कोई जडा हो । हा, याद आया। कहते है कि उस समय में तीमरी कक्षा का आठ वर्षीय छात्र था। तब मेरा ध्यान पढाई लिखाई की और न लग- कर महात्माआ के दान हेतु विचलित हा उठा था और महात्माआ की प्रतीक्षा में रत रहता था । सोचता रहता था कि वव गाव मे महात्मा पधारेंगे। " यह स्वाभाविक है, जब विद्यार्थी पुस्तक म लिखे पाठ का ध्यान से अध्ययन ही नहीं करता है ता उसे पाठ याद होगा कैस ? पढाई में कमजोर होता गया और पाठशाला में अध्यापका की डाट साता रहता था। कभी कभी तो घर से पाठशाला जाने का बहाना बनाकर माधी गह म ही छप जाता था। कभी कभी तो एक सप्ताह तक पाठ- शाला से अनुपस्थित रहता था और जब पाठशाला जाता था तो फिर अध्यापक द्वारा दडित किया जाता था । मैं पटाई लिखाई म बिलकुल जीरो हो गया। ऐसा क्या क्योकि मेरा ध्यान चला गया कि महात्माआ के पास विधा की जड़ी होती है। इसी कारण से महात्मा लोग बडे ज्ञानी होत हैं । जब महात्मा भिक्षा मागने के लिए गाव मे आयेंगे तो मैं उनको अधिक भिक्षा देकर उनसे विद्या की जडी ले लूगा और फिर कक्षा में पढाई-लिखाई मे प्रथम स्थान प्राप्त करगा। आगा और विश्वास पर ही भावन जोवन माधारित है। बापो ममय गुजर पुका था। एक दिन " विद्या की जडो / 79 Lama अपस्मात पाच महात्मा भिक्षा मागन के लिए गाव में भ्रमण करते हुए दिसायी दिये । उह देखकर मेरी मुगी या ठिकाना न रहा । मैं प्रमुदित होपर महात्माआ के पीछे हाथ धोकर पड गया चलो मर घर । मैं तुम्ह अघिय भिक्षा दूगा। महात्मा द्वार-द्वार जात और मैं उनमे पीछे पीछे चलता यही दुहराता चला मेर घर म उनस भी अधिक भिक्षा दूगा।' पहने ता महात्मा चुप रहे फिर मेरी आतुरता का निहारते हुए बोले वत्स चलत हैं तुम्हार घर पर । तुम पाल म मिक्षा रखा जाओ अभी पधारत हैं तुम्हारे घर म। मैन बडी उत्सुकता से कहा, वावा, मैं तुम्ह अधिक मिक्षा दूगा ता तुम पया दोगे " महात्मा मुसकरान वरस जो तुम्हारी अभिलाषा है उस पूर्ण करेगे। मैंने यहा ठीर है महात्मा जी क्या आपने पास विद्या की जड़ी है? यह सुनकर पहले तो महात्मा मेरे मुह पा जार एक्टव होकर देखते रहे फिर बोले 'विद्या की जडी, वत्म यह तुम्हारी कसी अभिलाषा | विद्या की जडी होती है क्या?' कुछ उलझन में पडकर मुझे प्रोत्साहित परते हुए महात्मा वाले हा वत्स हमारे पास विद्या की जड़ी है। जिन ग्रामा से हम लोग भ्रमण करते हुए आ रहे हैं, उन ग्रामो के छोटे छोटे तुम-जसे पटन वाले विद्यार्थिया का विद्या की जडा वाटते आ रहे हैं । तुम्ह मी विद्या प्राप्ति की जडी द दग। चलो तुम्हारे हुए बोले द्वारे चलें। . • मैं सुश होकर आगे आगे चलता जार महात्मा मरे पीछे पीछे। घर के द्वार पर पहुचकर महात्माओ ने जलग जगाया। घर म बठे वयोवद्ध दादा बोले, 'बाबा सिद्धात या भ्रमण महात्मा बोले, बावा जैसा आप समभत हा बालक जिद करके हमे अपने द्वारे लाया है । हमसे विद्या की जडी मागता है। मैन दादा जी से कहा, आप ही ने ता कहा था कि महात्माआ की माया यारी | हो सकता है, उनके पास विद्या का कोइ जडो हो । हा याद आया । कहते हैं महात्माआ के पास विद्या का जडी होती है । भिक्षा देकर मैं भी महात्माला से विद्या वी जडी लेना चाहता है। • अनानतावश मैन चुपक स भिक्षा वे रूप म महात्माओ का चावल on IT के वनाम । आटा, दाल व घी दिया। तब मैंने कहा, 'महात्मन् अव आप मुझे विद्या की जडी दो।' 'महात्माओ के पास मोर की पूछ का एक लवा पख था। एक महात्मा ने उसी पख में से एक सुनहरा रेशा तोडकर मुझे दे दिया और कहा, 'वत्स, इसको अपनो पाठय पुस्तक के अदर रस दो। फिर दखो, तुम बहुत बडे विद्वान बन जाआगे।' मैंने बडी उत्सुक्ता से पूछा, 'महात्मन केवल पुस्तक वे अदर इस पख के रेशे का रखकर मैं विद्वान् बन जागा या अन्य उपाय भी करना पडेगा ?' महात्मा बोले 'हा, याद आया,प्रात काल उठकर हाथ मुह धोना, फिर बत्ती जलाकर जिस पाठ को तुम याद करना चाहते हो उसे दो या तीन वार पढना। शाम को भी हाथ-मुह धोकर बत्ती जलाकर अलग कमरे मे पुस्तक पढना। वत्स, तुम्ह सब आ जायेगा।' इतना कहकर महात्मा भिक्षा मागने के लिए ग्रामा की ओर अग्रसर हो गये। "मैंने विद्या अध्ययन के लिए महात्मामा द्वारा बताया माग अप- नाया। धीरे धीरे मैं पढाई में बडा निपुण हा गया और कक्षा म प्रथम स्थान प्राप्त किया। सभी को ज्ञान है, विद्यार्थिया म कुछ विद्यार्थी बडे शरारती, जलनशील और उद्दड होते हैं। पाठशाला के विद्यार्थिया मे यह सनसनी फैल गयी कि उसने मिक्षा देकर महात्माआ से विद्या की जडी ले रखी है इसलिए पढ़ाई मे सबसे होशियार हा गया है । कल तक जीरो था। अब ऐसा काय करा कि उसकी पुस्तक से उस विद्या की जड को चुरा दो। फिर वह पढाई मे जीरा हो जायेगा और कक्षा म जध्यापक की मार खाता रहेगा। पाठशाला स छुट्टी मिल जाने के पश्चात एक दिन मरे कुछ सह- पाठिया ने मुझमे कहा, 'तुम्हारे पास विद्या की जड़ी है दिखाना हम भी देसे महात्माआ की तुम्ह दी हुई विद्या की जडी । जव फिर कभी महात्मा गाव म जायगे तो हम भी खूब मिक्षा दवर विद्या की जडी लेंगे। " मैंने नि स्वाथ भाव से उनको पुस्तक के जदर रखे मोर की एक मुनहरा रेशा दिखावर पुस्तक बद कर दा। तब स मेरे सहपाठी- । पूछ का विद्याकी जडी। 81 - गण ताक म लग गय, कब मैं यस्ता छोडकर कक्षा स वाहर जाक ओर क्व व विद्या की जडी निकाले । इस प्रकार वे तार मे रहते और मम निहारते रहते थे। मुझे इस बात का ज्ञान न था कि मेरे कुछ सहपाठी मेरी विद्या की जड़ी चुराने का ताक में है। । एक दिन पाठशाला के अद्धविथाम काल म क्सिो काय हेतु अघ्या पक ने मुझे पाठशाला स बाहर भेज दिया। लडके ताप म थे। समय ने उनका साथ दिया । उहाने मेरी पुस्तक से वही मोर को पूछ का सुनहरा रेशा निकालकर अपने पास न रखकर फेंक दिया। फेवा इसलिए कि कभी वह दस ले तो अध्यापक से हमारी पिटाई करवा देगा। नित्य की तरह मैंने विद्या अध्ययन के लिए शाम को हाथ-मुह धोकर वही पुस्तक खोली । देखा तो विद्या की जडी गायब थी। मुझे अपने सहपाठिया पर सदह हो गया कि उ होने ही मेरी विद्या की जडी चुरायी है । उम्र मे आठ साल का था इसलिए वालक ही था। " मैं जोर-जोर स रान लगा। मुझे रोते हुए देखकर दादाजी न पूछा, अरे क्या रा रह हो किसने मारा है तुम्हे ?' • मैने रोते हुए दादा जी से कहा, 'मेरे कुछ सहपाठियो न मेरी पुस्तक रे अदर से विद्या की जडी चुरा दी है । अब मुझे विद्या कैसे आयेगी। • मेरे रोने म प्रबलता थी। मुझे शात करने के लिए दादा जी बोले, 'क्ल मैं महात्माओ की खाज म जागा और तुम्हारे लिए वही विद्या की जडी उनके पास से ले आऊगा।' दादा जी की बात मनवर मरा रोना तो बद हो गया लेकिन हृदय न माना । मैने दादा जी से कहा, जब तक तुम विद्या को जही लात हा तब तक मैं क्या करू?' दादा जी बोले, जसा तुम्ह महात्माओ न बताया है, जसा तुम आज तक करते आय हो, वैसा ही सुबह शाम पुस्तक पढ़ते रहा।' मैंन पूटा, फिर मुझे वसे ही विद्या आयेगी?" दादाजी ने कहा, हा। मैं नित्य की तरह सुबह और शाम पढाई म जुट गया परतु दूसरे दिन दादा जी विधा की नही लेने के लिए महात्माओ की खोज म रही नये। 82 / उत्तराखड के वना मे " मैंन कहा, 'दादाजी, कब जाओगे तुम विद्या की जडी के लिए? " दादाजी बोले 'मूर्स, उनके पास कोई विद्या की जडी नहीं होती है। ये तुम्हे येवकूफ बना गये। तुम रोज की तरह अपनी पढाई दिया करो। फिर देग्यो, कैसे तुम्ह विद्या नहीं आनी?' मैं दुविधा म पड गया। मन में कुछ विश्वास और कुछ अविश्वास । फिर एक बार मेरा मन पढाई म विचलित हो गया और मैं धीरे-धीरे पढाई म निम्न स्तर की ओर बढन लगा। बालक बढे हठी होते हैं। इसलिए दादा जी की बात पर मैंन विश्वास नहीं किया।' । " उत्तराखड देवभूमि के नाम में विश्वविख्यात है। समय-समय पर बडे-बडे महात्माओ का उत्तराखड के तीथस्थानो मे आवागमन हुआ करता था। उत्तराखड म सल्ड का महादव एक बहुत प्रसिद्ध तीथ- स्थान है। इस स्थान में प्राचीन काल का बना भगवान शिवजी का मदिर है । शिव मदिर म सवस वडो विशेषता यह है कि यदि काई ढागी महात्मा रात्रि काल में शिव मदिर म निशा-निवारण करना चाहे तो वह पलमर भी वहा ठहर नही सकता है। जो असली योगी और शिवभक्त होगा, वहीं रामि को मदिर मे निशा काल व्यतीत कर सकता है वह भी केवल दस या पद्रह दिन तक । मेरी उम्र नौ साल की रही होगी । मैंने सुना कि सल्ड महादव ये शिव मदिर म ऐसे एक महात्मा निवास कर रहे हैं जिनका शारीरिक रूप बडा विशाल और भयर । कोई भी व्यक्ति उनके पास जाने का साहस नहीं करता। मैंन मन म साचा, महात्मा के दशन करना हित- कर होगा परतु वहा जाने के लिए किसी ने भी मुझे प्रोत्साहित नही किया । अक्स्मात् एक दिन किसी काय हेतु कुछ गाव वालो के साथ मैं सल्ड महादेव जा पहुचा । सल्ड महादेव पहुचत ही मेरा मन महात्मा के दशन हेतु आतुर हा उठा । मैंने एक वयोवृद्ध से कहा, मैं बाजार- भ्रमण पर जा रहा है। कुछ समय पश्चात् लौट आऊगा।' वयोवृद्ध मेरी बात से सहमत हो गये और मैं मन को लालसा नेकर शिव मंदिर में जा पहुचा। विद्या की जही / 83 ? " ?" वास्तव मे जैसा मैंने सुना था, महात्मा का वही रूप देखा। महात्मा को प्रणाम करते हुए जब मैंने महात्मा के नेत्रो मे अपनी नेत्र ज्योति डाली तो मुझे ऐसा दिखायी दिया मानो सारा ससार महात्मा की आखो मे बसा हो । बालर होने के नाते महात्मा वा शारीरिक वण निहारते हुए मैंने पूछा, "बाबा, तुम नगे क्यो? तुम्ह ठड नहीं लग रही है ऋतु शीतकालीन थी। महात्मा मुसकराते हुए बोले, "नही वत्स।" मैंने फिर पूछा, "वावा, तुम क्या खाते हो महात्मा ने मुसकराते हुए उत्तर दिया, "वत्स, में कुछ नही खाता और न किसी का दिया हुआ खाता हू।" मेंन फिर पूछा, "क्व सात हो वाया? यहा तो घास की जडो के अलावा कुछ नही है ।" 'पीने के लिए शिव कुड म पानी है और खाने के लिए घास की ज. ही विद्यमान है, ' महात्मा बोले । रात के बारह बजे घास की ही जडें खाता हू और प्यास बुझाने के लिए शिव कुड से पानी पीता हू।" मैं महात्मा से बातो मे उलझ गया। मेरी बात काटत हुए महात्मा बोले, ' वत्स, मागो तुम क्या खाना चाहते हो ?" मैंने कहा, ' बाबा, तुम कह रहे हो, मैं किसी का दिया किसी भी चीज को ग्रहण नहीं करता हूँ और न खाता हूँ तो आप मुझे वहा से दोगे? तुम्हारे पास तो खाने के लिए कुछ भी नहीं है।" महात्मा बोले, "वत्स मेरे पास सब कुछ है। तुम क्या साना चाहते हो, गुड खानोगे" बालक होन के नात मरा मन गुड खान के लिए ललच पडा। मैन कहा 'हा।" महात्मा ने साली थैले स गुट निकाला और मुझे द दिया। कुछ देर तक आश्चय म पड़ा में महात्मा यो निहारता रहा । मरा अवलो- वनावस्था का दसकर महात्मा न कहा, "बरम चले जाओ। मुझे देस पर तुम्ह डर नहीं लग रहा है।" मन रहा महात्मन आप दान हेतु म यहाजा पदचा और 84/ उत्तरासह व धना म है - आप वह रहे हैं कि तुम चले जाओ।" महात्मा बोले, "तो ठीक है, वत्म, पपीता खाओगे?" मैंन पहा, "हा।" महात्मा जी न अपन पाम म पडे राख के ढेर पर चिमटा मारा और एक पका हुआ छोटा पपीता राख के देर से बाहर निकला। महात्मा ने चाकू स पपीता के दो टुकडे किय । खाने को एक मुझे दिया और दूसरा टुक्डा स्वय साया। मैंन महात्मा से कहा, 'आप तो वहत हो कि में किसी की दी हुई किसी भी खाद्य वस्तु को ग्रहण नहीं करता है तो फिर आपके पास यह पपीता और गुढ रहा मे आया है ?" महात्मा मुसकराते हुए वोले, "वत्स, मैं सब सिद्धि-साधक है। मैं सब विद्याओ का ज्ञाता ह । मने हर प्रकार की विद्या का अपने मन- योग साधना के बल से सिद्ध किया है। कहो, तुम्ह क्या चाहिए।" मैंने नम्रतापूर्वक कहा, ' महात्मन यदि आप मुझे देना चाहते हो तो मुझे एक अनमाल चीज दे दा । है आपके पास ?' अनमाल चोज सुनकर महात्मा मेरे मुह की आर एक्टक होकर देखते हुए बोले, "वत्स, वह जनमोल वस्तु कौन सी है, जिसकी तुम्हे इतनी अमिलापा है ? उसका नाम बताओ अवश्य दूगा।" मैंने फिर नम्रतापूर्वक कहा विद्या की जडो।" विद्या की जडी सुनते ही महात्मा नत्र बद करके शातविलोक्न होकर बड़ी देर बाद बाले, अच्छा, तो तुम्ह सरस्वती से अगाध माह है ? रुपये पंसा से नहीं ? पैस मागते तो मैं तुम्ह पसे देता, बाजार में जाकर चन खरीदकर चने चबात । मैन पहा "महात्मन् चन खरीदने के लिए मेरी जेब मे चार आने है। उनस चने खरीद लूगा आप मुझे विद्या की जडी दो, पैसे नहीं।" महात्मा मुसकरात हुए बोले, तुम कस बालक हो विद्या की जडी भागते हो।" मैंने नम्रता से कहा, "महात्मन, आप ही ने ता कहा कि 'वत्स, मागा, तुम्ह क्या चाहिए। मुझे तो विद्या की जडी चाहिए।" म विद्या की जड़ी ! 85 - । अनायास ही मेरे कण देश में दादा के कहे वाक्य गूजने लगे कि 'महात्माओ की माया यारी हो सकता है, उनके पास विद्या की कोई जडी हो । हा, याद आया। कहते हैं, महात्माओ के पास विद्या की जडी होती है। मेरी बातो का सुनकर महात्मा ने मन ही मन म कुछ विचार किया । वे मेरे मन को सवत्र सक्ल पदार्यों के भाग के लिए विचलित कर रहे ये परतु मैं एक बात पर अटल रहा, 'मुझे विद्या की जडी दो।' मैं महात्मा से जिद कर बैठा और महात्मा न भी मुझे अपना असली रूप दिखा दिया। महात्मा ने नन बद करके कहा "वत्स, मैं तुम्हे विद्या की जडी दे रहा है । जो ने की नहीं है बल्कि ध्यान से सुनने की है। विना साधन के तुम कैसे विद्या की जडी प्राप्त करागे' वत्स साधना गुरु से बढवर है और गुर साधना का दास है । वत्स तुम्हे भी साधना करनी होगी। विद्या प्राप्ति के लिए तुम्ह विसकी साधना करनी होगी, ध्यान से सुनो। चत्स, मन से काम वासना और माया मोह का परित्याग कर भगीरथ प्रयास से विचलित मन को एकाग्र करके उस लक्ष्यस जोडो जिसकी तुम्हें लालसा है । तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। इस योग साधना के प्रताप से हृदय में ज्ञान की एक दिव्य ज्योति उत्पन होती है जो मानव को चराचर म परमारथ बना देता है । वत्स, जो ससार म बडे बडे सिद्ध पुरप हुए हैं, उ होन इसी योग साधना के बल से हर प्रकार की विद्या का जाप कर सिद्धिया प्राप्त की हैं। विद्यार्थी तभी विद्या प्राप्त कर सकता है जब वह अपन हृदय से काम वासना और माया मोह का परि त्याग कर कठार प्रयास से मन को एकाग्र पर विद्या अध्ययन म सम पित करें।जो विद्यार्थी मन म वाम वासना सजन कर अपनी ज्ञान इद्रिया यो सुखमय जीवन स जोडते हैं व विद्या प्राप्त नहीं कर सकते हैं। "वत्स अनान का सागर निगाकाल और मान का मागर आणोदय के समान है । मेरी मानो, विद्या की कोई जड़ी नहीं होती है । तुम मेरे बताये माग पर चलो जिस मैं तुम्ह बता चुका है। विद्या प्राप्ति के लिए माग को अपनाने के लिए अन्य विद्यार्थिया का भी प्रात्साहित नरो वत्स यही विद्या की जही है । . 86 / उत्तरासर ने वनाम प्रपना घर जब बभी मैं कालू के कोल्हू घर से गुजरता तो बालू को कोल्हू पर जोते वैत को कुछ-न-कुछ कहता सुनता "चल बे चल, चल में लल्ले, चल निठल्ले, चल चकाचक, ठेल धकाधक, चल हरियाणे के सडे, नहीं चलेगा तो खायेगा डडे, धत्तेरी की, ऐसी तसी सूरत है मरियल जसी।" तभी मैं कहता 'अरे कालू, तेरी सूरत लडकी-जैसी धत्तरी की ऐसी-तसी ।" तभी कालू भाई बिगडकर योलता लेखक साहब, आप हमेशा उल्टी बात बोलत हो।' मैं कहता, "ठीक तो कह रहा ह उचक्के, सुरेरा-नफगा कही का।"और काफी समय बाद जब कभी मैं उसके काहू घर से गुजरता तो वही शब्द कालू के मुह मे सुनता, “चल के चक्के, चल निठ्ठले ।" तभी मैं फिर स्कवर कहता, 'काल माई, कोल्हू चलाने मे बडे मस्त नजर आ रहे हा । लगता है, बूढा बैल वेच दिया है।" काल हसकर कहता, "लेखक साहब, आपने घाघ की कहावत पढी है' बूगा बैल और टाट पुराना बेच लिया तो वही सियाना' । माड लाया हूँ साड । साह क्या है कि मसरी गाडी का इजन । ' जब कभी मैं जानबूझकर कालू माई के कोल्हू घर से गुजरता तो वह कहता 'देवा नहीं आपने मेरा डीजल इजन? लेखक साहब, जसे ही आप कोल्हू के तख्त पर बैठोगो तो लगेगा कि मैं दाडती मसरी गाडी की छत पर वठा है।' कालू ऐसा हो रहा करता था। एक दिन मैंने कालू से कहा, 'देखू तेरे हरियाणा के साह को।' 187/ कोल्हू घर के अंदर जाकर देखा तो एक तिफुटा ठिंगना बैल बेचारा रघे को तान तानकर कोल्हू को खीच रहा था। बैल की दीन दशा को निहारते हुए मैंने कहा, "कालू तरे कम खोटे हैं । अरे मूक जीव के साथ कभी भी ऐसा नही करना चाहिए । तुझे इसका फल अवश्य मिलेगा। सुन ले कालू इसी बैल की बदौलत तू घर में चैन की वशी बजा रहा है। मया, जैसी करनी, वैसी भरनी।" मैं लिखने और सोचने में व्यस्त रहता था, इसलिए मुझे घर से बाहर जाने का कम ही मौका मिलता था और जब कभी मौका मिलता था तो ग्राम सुधार के विषय म लोगो को ज्ञान बोध करवाता व स्कूल वे बच्चो को पढाई लिखाइ के लिए प्रोत्साहित करता। कभी वमी अपने घर मे बच्चो को निशुल्क शिक्षा भी प्रदान करता था। उनके लिए देश विकास व समाज सुधार के छोटे छोटे नाटक लिखकर उही के द्वारा रगमच पर प्रदर्शित करवाता था। समय के अनुसार उनको फुटबाल व निकेट का खेल खेलन को प्रोत्साहित करता था। बच्चे बहुत खुश रहते थे। जब कमी में किसी काय हेतु गाव से बाहर जाता था तो बच्ने बेचैन हा जाते थे। गाव के सभी ग्रामवासी ग्राम- सुधार मे भाग लेते थे, परतु कालू भाई को अपने घर परिवार व कोल्हू के काय स पुसत नहीं मिलती थी। पूछो तो कहता था, ' अपना घर तो घर ही है, हमे क्या मतलब किसी से । मैं अपने बल का कष्ट देता हू तो किसी का क्या करता हू?"बैल की ओर देखकर बोलता, चल दे धक्के, चल निठुले ।" फिर मुझसे कहता, लेखक साहब, आप बडे अजीव जादमी हो । अगर हम ग्राम सुधार मे भाग नहीं लेग तो गा ग्राम-सुधार नहीं होगा। आप समाज-सुधार की बात समय के अनुसार जब कभी मैं कालू को देखता तो वह कोल्हू के तहत पर बैठा गीत गाता दीखता। कभी तस्त पर बैठकर जोर-जोर से बूढे बैल का डडे मारता। कभी भारी मारी पत्थरो को कोल्हू के तहत पर रखता। कभी छोटे छोटे बच्चो को कोरहू के तस्त पर बठाता। भी तिफुटे बैल की पूछ मरोडता। कभी बैल का गोवर साफ करता। मुझे देखकर बहता, 'सेसर साहब, देस क्या रहे हो ! बैन क्या है 88 / उत्तराखड के पनों मे वस्तए साधारण रूप मउपमय का REMIUM यास्तवम अपना घरम्यग गमाHिAIL लेतापाइसीलिए यह पमटीभीया।बोगस था। तो तम्त भर दस बैंस पिए पदिकपुरमामा111141 ऐसादसा गया है यि जय मागाHI सेभोई मतलब नहीं था। ये पार मा0411 तीसरा वहनावावामय मा भौर Art 1114 कि सूफान एक्सप्रेस है।" इतना कहकर फिर तिटे देर को बार-बार स डहा मारता और बेचारा बैल टढी पीट करके तेजी से धमन लादा एक बार मुझे पास म खडा देवकर कहने लगा, मामाल, अगर मैं कारह घर में मौजूद न भी रहू ता बिना हाक दिदै. आप घूमता रहेगा।" तमी में कहा, "तू है की, दो बार कुछ न कुछ कुक्म किया होगा जिसके कारण दिनाहा आप कोल्हू पर धूमता रहता है।" वह कहता,"न्टा, देखा rets उतर जाता है । यल विना हाद दिय घूमता रहमा" या देखता रहा । जस बल कोल्हू पर घूमना हुआ ग्कर काram से वोल्टू का तस्न वल व पिछले पाव र घुटने पर मायाandh से घूमन लगता। मैं नहीं समझ सवा, तस्न बल में पाव म मा reyal धूमन लगता है। बहुत देर तक मैं मौचना Mrity wit, भने जब कोल्हू के तस्त का निरीक्षण किया नाय frxmi AY के तस्त को आखिरी नाक पर एक नवी माmivari जब वल काल्हू पर घूमत घूमते थक जाताnath A1-1-14.12 धुमन से बचारा बल तजी ग घूमन सगमा। बालू वे काय-वसापाया TEE Ailme पुरमी। उसे दुनियादारी से मामATity th४९ म जाय दुनिया । उममे लिOHITarmins पासप समझता है। अपना पर/89 और एक हाथ का नाकाम भी था। दु स इस बात का था कि उसको रुक रक्कर बोलने की भाषा मी विचित्र थी। इसलिए तीना माइया को पलिया उस लगडे से जलती थी। उसे धक्का देकर गिरा देना तो उनका रोज का धधा ही बन गया था। समय ऐसा आया कि इस कारण तीनो भाइयों की पत्नियो मे आपस में झगडा हा गया। वे अलग अलग परिवार वनापर रहने लगे। वटवारा करते समय बालू के हिस्से में कोल्हू नहीं आया। काल्हू लगडे का दिया गया ताकि अपग हाने पे नाते वह अपनी आजीविका कमा सके । कालू के चेहरे पर उदासीनता की झलक विखर चुकी थी मानो उसका सुखमय घर उसके लिए दुखमय न गया हो । फिर भी वह गाववाला के साथ काम काज करके अपने अलग परिवार के साथ आनदमय जीवन व्यतीत करता था। उस लागा के काम काज करने में विशेष जानद का अनुभव होता था। खेता मे हल चलान का तो वह 'मास्टर' था, इसलिए गाववाले उससे सुश रहते थे। बिना कहे किसी का काम कर देना और बाद मे काम के बदले मजदूरी लना तो उसकी दिनचर्या ही बन गया था। कमी कभी मे उसको देखकर सोचता था, चास्तव में परदेश से तो अपना घर प्यारा लगता है। समय और भाग्य एक दूसरे के पहलू हैं । एक दिन बालू भाई मेरे पास आकर उदासीन स्वर में कहने लगा, लेखक साहब आपका क्या बताऊ, मैं तो घर परिवार से परेशान है।" पूछा, 'क्यो क्या वात है ? तुम तो सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे हो। पहले से भी अच्छा कमा लेते हो । स्वतत्र जीवन व्यतीत भर रहे हो । क्सिी की ताबदारी भी नहीं कर रह हा तो फिर कौन सी ऐसी परेशानी है जा तुम्ह दुख दे रही है " बालू कहन लगा, 'लेखक साहब, मेरी पत्नी मरे पाछे हाथ धोकर 'पड़ी है कि तुम नौकरी करन के लिए दिल्ली चले जाआ। गाव म बढ- वर सुखमय जीवन तो मनुष्य गहरामं व्यतीत करता है । है न औरता का दिमाग सराव । अच्छा भला यहा पर अपना और बच्चा का "पालन-पापण हा रहा है और वह वह रही है, दिल्ली चले जाओ।' 90/ उत्तराखड के बना मे । । एक सप्ताह बाद दिल्ली कुछ नौकर चाकर ठाट वाट के साथ गाव मे आये । उनकी शहरी वेश-भूपा देखकर कालू का मन भरमा गया। कहने लगा "वास्तव में दिल्ली जाकर नौकरी करनी चाहिए । ठीक ही कह रही है पत्नी । दिल्ली के लाग ऐसे लग रहे हैं मानो गवनर हो।" मैंने कहा, ' कालू भाई, तुम भी दिल्ली चले जाओ और बन जाओ गवनर पर काल, तू गवनर नही बन सकता है । अनपढ़ मला गवनर बन सकता है। हा, मन से, पद से नही। में तो आठवी पास हू लेखक साहब ।' मैंने उस चिढाते हुए कहा 'कालू तेरा और इन लोगो का होगा मेल कैसा?" "लेखक साब जाप हमेशा उलटी बात कहते हो । भाग्य और समय-करायेगा मेल जसा।' समय आया। कालू एक मित्र के साथ दिल्ली चला आया । दिन म दिल्ली की सुदरता और रात में बिजली की चकाचौध ने बालू का मन मोह लिया। शायद तब उसन मन म सोचा होगा पत्नी ने ठीक ही वहा था, 'दिल्ली ता अपने सुखमय घर से भी बढ़कर है। अक्सर मैं देखता, कालू अपने मित्र के साथ दिल्ली की ऊची ऊची इमारतो को निहारता रहता। कभी मदारी का खेल देखता, जोर कमी कठपुतलियो का खेल निहारकर भौचक्का रह जाता। कभी सक्स के कलाकारा के अनामे करतबा का देखकर दातो तले अगुली दबाता। कभी बदरी का नाच देखता । इस प्रकार के मनमाहब नत्य दखकर कालू अपना सुखमय घर, जिसे वह दु खमय समभन लगा था, मूल गया। शहरी युवतिया के खूबसूरत चेहगे पर उसका मन इतना रोझ गया वि बेचारा अपनी पत्नी को भी भूल गया और जब कभी वह अकेलापन महसूस करता था तो उसे बच्चो व पत्नी की याद उस मन से होकर उसकी आखो के आगे उनकी तसवीर उतारकर लोप हा जाती। उसे बहुत कुछ करने को सूझती थी परतु भाग्य उसके विपरीत था। फिर भी उसने हिम्मत न हारी। नौकरी की तलाश में बालू अपना घर/91 - । दिल्ली में भ्रमण करता परतु सब ध्यथ । कभी बहुत दुखी होकर सोचता, 'मुझे दिल्ली में काफी समय बीत चुका है। पत्नी और बच्चे मेरे विषय मे क्या सोच रहे होगे ।' यह सोचकर उसका मन दुख से बेचन हो उठता। समय के साथ कालू भी बहता चला गया । एक दिन वह अक्स्मात मुझे मिला। कहने लगा "लेखक साहब, घर से मेरी पली का पत्र आया है । लिखा है, तुम पैसे भेजते हो या नहीं। मेरा और बच्चा का भूख से बुरा हाल हो रहा है। पेट पालने के लिए यदि मने कोई क्दम बठाया तो तब मुझे कुछ न कहना या तुम घर आओ और अपने बच्चा को मभालो। मैं जा रही है।" कालू दुविधा में पड गया, मैं स्वय इस समस्या पर कुछ सोच न सका। वास्तव में भगवान के सिवाय कोई भी व्यक्ति किसी की परिस्थिति नही जानता है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के पीछे-पीछे किन किन परि- स्थितिया से गुजरता है इस विषय मे मनुष्य ज्ञान नही कर सकता है और अनानवश एक दूसरे के प्रति मन म गलत धारणा ले बैठता है। अपने से दूर अपन पति की स्थिति को ठीक से न जानकर कई पलिया अपने पति के विरुद्ध गलत कदम उठा लेती है। प्राय ऐसा देखा गया ह कि दूसरे लोगा वे बहकावे में आकर पति को वास्तविक स्थिति को न जानकर बहुत सी पत्निया ऐसा गलत व्यवहार या कदम उठा लेती हैं जिसके कारण पुरुष को अपना सुखमय घर हमेशा के लिए त्यागना पडता है जबकि सगिनी के लिए यह काय उसके पति घम के विरुद्ध है। और साथ ही ऐसा भी देखा गया है कि पई पलिया कठिन से कठिन परिस्थिति में पुस्प को घेय देती है और डटकर कठिन परिस्थिति का मुकाबला करती हैं। कुछ समय बाद में दिल्ली से दूर चला गया और लवे समय के बाद फिर दिल्ली वापस आया। बाल मुझे मिसा, रोते हुए बोला, 'लेखक साहब वल एक भाई गांव से आया है। उसने कहा कि मेरी पत्नी ने मेरे विषय म कुछ ऐमी चर्चा की है कि जिस सुनकर मेरा दिन का पागना और रात का विधाम भय भ्रम से वेचन हो जायेगा । मुनूगा 92 / उत्तराखंड के धना म तो मेरी मानसिक और शारीरिक अवस्था पर उन बातों का गहरा कुप्रभाव पडेगा और चौबीस घटे साचता रहूगा--यह क्या हो गया, ऐसा क्या . मैंने पूछा, "क्या कहा तुम्हारे विषय मे" कालू कहने लगा, "माई, सुनोगे तो दुख के साथ भयभीत हो जाओगे।" उसकी कही बाता को सुनकर मेरा हृदय भय-भ्रम से काप उठा। कालू की बात सुनकर मेरी तो रात को नीद और दिन का जागना मय-भ्रम से बेचैन हो गया। सोचा ऐसा सुनकर इतना बुरा हाल तो मेरा हो गया, वेचारे इस कालू भैया के मन मे क्या गुजर रही होगी। वास्तव में सही कहा है--'जिस पर गुजरती है, वही जानता है।' उसके हृदय मे भरा दुख उसके शरीर पर झलक रहा था। दुख- मय जीवन के साथ साथ वह मौत का भी पग पग पर सामना कर रहा था । उसका दिमागी सतुलन इतना बिगड चुका था कि कई बार तो वह सडक पर चलते समय दुघटनाग्रस्त होने से बच जाता, शायद सोचते- सोचते--'क्या करू, कहा जाऊ, घर जाम या न जाऊ | या वही दूर चला जाऊ या अपना लापता कर दू या और कुछ।' कालू उठकर चला गया। उसकी कही बातें मेरे हृदय मे घर कर गयी और जब कभी में उसकी कही बातो को भुलाने का प्रयास करता तो वही बातें मेरे कण देश म रुक-रुक गूजने लगती-उसे तू । उसके जीवन के दिन । मैं तुम्हारे लिए ।उस मैं अब वह कितने दिन समय अधिक गुजर गया था। एक दिन राह चलत समय अचानक कालू मुझे मिला । क्न लगा, "लेखक साव, दिल्ली मे सब देखा परतु हवाई जहाज का मैदान नहीं देखा। देखने की लालसा है। देखना चाहता है, क्से हवाई जहाज उडत है और क्मे उतरत है। में अवश्य एयर पोट देखने जाऊगा।' कुछ समय पहले मैंन समाचारपत्र में पढ़ा था कि एयर पाट पर कोई चारी हुई थी। मैंन कालू स कहा, 'यदि तू हवाई अड्डा देखने अपना घर / 93 । जायेगा तो किसी भी चीज की ओर अगुली स इशारा न करना।" दूसरे दिन कालू भाई हवाई अडडा देखने चला गया । उड़ने और उतरत जहाज कालू को बहुत भाये । शायद खुश होकर बेचारे ने जहाजा की ओर अगुली से इशारा कर दिया । पुलिस न उसे चोर समझकर मारा और बाद मे तिहाड जेल भेज दिया। कुछ महानो तक मुझे कालू के विषय मे कुछ भी ज्ञात न हुआ कि वेचारा समय के साथ कहा और कसे जीवन व्यतीत कर रहा है। काफी समय गुजर चुका था। सर्दिया का मौसम था। एक बार एयर पोट पर वाइलोन मेले का आयोजन हुआ। लेखक व सपादक होने के नाते मैं भी मेले में शामिल हुआ। देखन वालो की भारी भीड थी। अचानक एक नवजवान युवक ने अपने देहाती मित्र से कहा, "भाई, किसी भी दस्यु की ओर अगली से इशारा न करो। दो माह पहले इसी तरह अगुली के इशार पर पुलिस ने चोर समभकर एक युवक को पक्ड- कर जेल भेज दिया।' यह सुनकर मेरा ध्यान कालू की तरफ खिंच गया। बहुत पहले उसने मुझे कहा था, एयर पोट जाकर उतरते और उडते हवाई जहाजो को देखन जाऊगा । शायद कालू वहा गया और अगुली के इशारे पर पकडा गया हो। कुछ दिना पश्चात पूछताछ करके मैंने कालू का पता लगा लिया। देखा तो कालू का घर कारागार था। पास जाकर मैंन कालू से पूछा, "क्या हाल है मैया, यहा कैसे पहुच मुझे देखकर कालू फूट फूटकर रोते हुए कहा लगा, "लेखक साहब, परदेश में एक छोटी सी गलती मनुष्य को क्या क्या भोगने को मजबूर कर देती है । मे कितना दुर्भाग्यशाली हू जो पत्नी के कहने पर घर का अच्छा-भला धघा छोडकर नौकरी करने के लिए दिल्ली आया। घर-परिवार वाले तो सोच रहे होंगे नौकरी कर रहा होगा और मैं यहा वास्तव में समय देखकर मानव को चलना चाहिए, तभी मानव का जीवन सुखमय और सार्थक बन सकता है। 7. 94/ उत्तराखड में बना में फिर सिसरिया लेते हुए यह कहने लगा, "लेखक साह्य, कौन मुझे इस नरक बुड स मुक्त करायगा?" मने उसे दिलासा देते हुए कहा, तुम्ह यहा स मुक्त करान आया हू।" मेर ये शब्द सुनकर कालू के उदासीन चेहर पर खुशी की विचित लहर दौड पडी। उसके नयनो से अपनत्व का नीर छलकन लगा। कालू स्वतप्रथा। विह्वल हाकर कहने लगा, 'लेखक साहब, वास्तव मे ऐसी परिस्थिति म गैर मनुष्य भी जो विसी की सहायता करता है, वह उसका सच्चा मित्र कहलाता है।" फिर कालू नौकरी की तलाश में जुट गया । इस क्मयोग मे उसने काफी समय बिता दिया। परतु वालू को नौकरी न मिली, इसी परे- शानी से कालू एक लब समय तक नदारद रहा। समाचारपत्रो के कार्यालया व सपादका से मेरा सबध था और अब भी है । एक बार मैं 'दनिक हिंदुस्तान' समाचारपत्र म अपना लेख प्रकाशित कराने के लिए जा रहा था। कार्यालय के बाहर अचानक मेरी भेंट सपादक जी से हो गयी। मैं बातो म सपादक जी से गुथा हुआ था। अनायास ही मैंन निकटतम हाटल के बाहर कालू को एक प्लेट में दाल व वासी रोटी खाते देखा। उसकी शारीरिक अवस्था बिगड चुकी थी। शरीर पर मैला कुर्ता पाजामा व पाव म टूटी चप्पल उसकी दीन दशा का परिचय दे रही थी। सपादव जी से बातें समाप्त कर जसे ही मैं जाने लगा, कालू मेरे पास आकर कहने लगा, "लेखक साहब, नमस्ते । क्या मुझे भूल गये हो ? मेरे तो कुहाल हो गये हैं। सुबह के चार बजे उठना पड़ता है और रात के वारह बजे सोना पडता है। आराम का नाम ही नहीं। जूठे बतन माजते-माजते तो मेरे हाथ सड गये है। देखो, मेरे हाथ कसे हो गये है | क्या करू ?" यह कहकर फिर फूट- फूटकर रोने लगा। उसकी हीन दशा को देखकर मेरा हृदय भर आया। मैंने कहा, 'भाई, घर चले जाआ।" फिर उसने रोते हुए कहा, "मुझे. एक भाई ने कहा कि मेरा घर की हर चीज से सबध विच्छेद कर दिया जा रहा है।' यह सुनकर मै चौंक गया, पूछा, "ऐसा क्या किया है तुमने? अपना घर /95 कुछ समय पश्चात मैं घर चला गया। काफी दिनो बाद मैं दिल्ली आ गया। पर ये समाचार मालूम करने के लिए कालू मेरे पास आकर कहने लगा, "क्या हाल है मेरे परिवार का कई बातो को काटते हुए मै उसे समभाने लगा। मुझे ऐसा लगा कि उसको भाखा मे उसके मुखमय घर का हृदय तसवीर के रूप में उभरकर विलीन होता जा रहा हो और वह सोचता चला जा रहा हो। काफी समय गुजर चुका था। एक दिन मैं 'नवभारत टाइम्स' समाचारपत्र के दफ्तर म जा रहा था । फुटपाथ पर अखबार वेचते हुए मुझे कालू की आवाज सुनायी पडी, "वाबू जी, ले लो 'अपना घर' पढ लो। अपना घर' सरीद लो बाबू जी, 'अपना घर।' मैं उमी की ओर चल पड़ा। देखा तो कालू खुश नजर आ रहा था। नमस्ते कहते हुए कहने लगा, "लेखक साहब, आज तो मैंने बहुत अखबार बेच दिये हैं, पूरी गाडी। आपको कहानी अपना घर' लोगा को बहुत पसद आयी। मैंने काफी पसा कमा लिया है। अब मैं घर जाना चाहता हूं।" मैने पूछा, कितना पैसा कमा लिया है । घर जाकर पल जायेंगे . पेच्चे?" कमाने की बात सुनकर कालू हमने लगा और कहने लगा, पाच सौ रुपये।" उस काल उसकी खुशी मनमाल था और मेरी उदासीनता उसकी पुगीपन से बेजोड थी। ममय पराट गमा। पाल चक मेर आगे पीछे भौरे की तरह मड राने लगा। सब कुछ होते भी मेरे पास कुछ न रहा। यभी कार्यालय चाय मे भागे पीछे दादा कारें घूमा करती थी, अब वाल चत्र ग्नया स्थान ले धेटा था। फुटपाथ पर खडा म माच रहा या वि जिस प्रारतिय गोदप ग मुझे अगार मोह था वहीं प्राकृतिक सौन्यमय गाद मर लिए मौत मा पर पन गयो । कारण या अपना घर । क्या करता, प्रति का गुगमय जीयन मर लिए ६ समययन गया था। माग्य मुझन दुसान नाटक 96 / उत्तरासह वै बनाम पेल रहा था और में मानव मा ममता और प्रकृति की मौश्यमय गार से बिछुड गया। दुखात समय के साथ म मधप परता रहा । परतु भाग्य मुझे अजीय खेल खिला रहा था । अनायाम ही मुझे काल याग म मिला। उमफे चहर पर उनासीनता भला ही थी। ध्यान एकाग्रनित करके भाव विभोर होकर उदासीन म्वर म वाला लेपन माहब हम स्तिन भाग्यशाली हैं जाहमाग जाम देवभूमि म हुआ है । हमारा घर स्वग धाम है । हम कुड और फूलों की घाटी पितनी अच्छी लगती है । बहत नदियो की कल कल निनाद व म्चे गिरि-कदराआ से गिरते भरना की झर झर ध्वनि प्राकृतिक सौन्य को कसा विचिग मीतमय करती है । सावन व भादो मास के दापहर म नदी-नटो व वन दराला के म य गूजती बुर की गरीली आवाज क्सिका मन नही माह लेती है । अमूज माह में मलिहाना म कृपो की चहल पहल व मोहिनी हरित पाटिया म गीत गात घसियारिया की सुरीली लय, ग्रीष्मकालीन ऋतु म कला ऊची वन चोटिया व नदी-तटा वा छूत माासूनी बाल वितन अच्छे लगते हैं। ग्रीम व गीतमालान ऋतु म जगला म व य जीवा वा विचरण, घराम वच्चा की विलयारिया, चागाहो म पगुआ का च ना भट्ट रिया का मियार स बचाना, मियार के पीछ कुने दौडाना, कुत्ता परस्पर लडाकर की हाजात दखना, चारी छिप एक दूमर मुर्गो म लडाई कराना वेता म बा । म गापले लाना फागुन माह में वेता म हल चलाना व वमत ऋतु म प्रकृति का यौवन बितना माता है मानो वह सब कुछ स्वप्न म दसा हा फिर भाव विभोर होकर उसका ध्यान काल्हू के वैन की आर खिंच गया मानो कोल्हू के बल के साथ किये बम काड उसकी भावो में आग तमवीर के Fप में उभरते चले आ रह हो और उस दुसी हृदय को कोसकर विलीन हात जा रहे हा 1 विचलित मन स फिर कहन लगा के - * लेखन माहब कम तो मेरे बराब रह । मेरी करनी मेरे आगे मामी। इस महीन कादख सिवाय सुख कहा स प्राप्त होगा। अपना घर / 97 "जा मनुप्य दूमगे का पता है, उम नुस पो प्राप्ति सभी ना ही हा मरती है। यह प्रकृति का नियम है अब मुझे इस बात का मान हुआ है। कुछ दिनो बाद में घर ला जाऊगा। बहुत समय बाद समय दखबर में भी गाव चला गया। अमस्माव 4 दिन मैं कालू व कोल्हू घर म गुजर रहा था। मुझे रात को आवाज सुनायी पडी चल बे चस्य चत निठले, धत तरी एमी की तसी सूरत है मरियल जैसी। मन बदम गवत हुए विस्मय स कालू की जार देखा, शालू मुसकरा रहा था । रखते ही रहने लगा, लेखक साहब अब में भय- मुक्त, सुखमय हू । अब परदश जाने का कभी भी नाम न लूगा । नाक रगडता हू । न बैल को सताऊगा। घर तो अपना ही प्यारा लगता है। हैन मबमे मुग्यमय जपना भर ? .

शुद्धि पन्न प०स० पक्ति सख्या अशुद्ध खेत्रपाल 2 छेत्रपाल 4 22 21 10 लडके दुख लडके के दुख मैं 9 8 23 5 6 10 12 25 29 42 42 1 15 3 15 3 17 60 मैंने चल आ आये बाप से भालू चौडे काम पाठी झियार कुठिजा प्रभावित पींनयार पहले लठा पीछे-पीछ दस्यु हृदय ग्रीष्मकालीन आ जाये बाघ के मालू चौड काल कोठी झिमार कुठिला प्रवाहित पूर्वीनयार बहते लट्ठा पीठ-पीछे वस्तु 60 61 64 65 71 92 94 96 97 8 21,22 3 27 13 12 6 14 दृश्य सगरवालीन मोट प्रसकी प्रसावधानी के बारण पुस्तक मे कुछ मशुद्धियां रह गयी है, प्रत पाटको से मनरोध है जिपढने से पहले गुदि पन से पशुद्धिणे को द से परें।

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Uttarakhanda Ke Vanon Men

Author
Sudarshan Singh Rawat
Title
Uttarakhanda Ke Vanon Men
File name
Uttarakhanda Ke Vanon Men
Text
OCR done
Citation
1969
Published
2011/03
Publisher
Gyan Bharati Dehli
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
550998
Barcode
4990010031782.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
qlM5UmtW1SZ
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