Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner Kk

Ramchandrika

Lala Bagwandeen · 2011/07

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भूमिका
लीजिये यह 'केशवः' की रामचंद्रिका का संक्षिप्तरूप
उपस्थित है। इसे संकलन करने में विश्शेषविचार इन-बातो.
का; रक्खा गया है-६१) कोई उत्तमांश छूटने न. पाने.
(२:):अनावश्यक, कम आवश्यक और कठिन अंश छोड़ दिये.
जावें, (३) यथासंभव सरसः और सरलः अंश: अवश्य लिये.
जावे, (४.) जिनके पढ़ने पढ़ाने में अथवा किसी को समझाने,
में संकोच हो ऐसे अंशः सरल और सरस, होने पर भी छोड़,
दिये जावे और ( ५ ) यथासंभव वर्णित विषयों का क्रम भी
भंग न होने पावे। इन सव. कारणों से: इस काव्य का वहुत.
ही थोड़ा अंश छुटने पाया है.।
इन उपरोक्त विचारों, सहित यह संग्रह प्रस्तुत किया गया.
है। कुछ त्रुटियां हो जाना संभव ही है, क्योंकि.मनुष्य की
बुद्धि निभीत हो ही नहीं सकती। हम भी मनुष्य ही हैं।
अतएव पाठकों.से. निवेदन है कि उन्हें जहां कहीं कोई त्रुदि
जान पड़े, वे कृपा करके सभा के. मंत्री को उस त्रुटि की.
सूचना दें। हमें पूर्ण श्राशा है कि मंत्री महाशय उनकी सूचना
पर विशेष ध्यान देकर उस त्रुटि को आगामी संस्करण में
संशोधन कराने का उद्योग अवश्य करेंगे।
केशया बुंदेलखंड के निवासी थे। अतएव इस कविता में
सहज भाव से ही कुछ ऐसे ठेठ युदेलखंडी शब्द पा गए

जिनका अर्थ अन्य प्रांत निवासी नहीं समझ सकते। यथा- संभव ऐसे शब्दों के अर्थ पाद टिप्पनियों में दिए गए हैं। केशव की कविता कठिनता के लिये प्रसिद्ध है। अलंकारों से परिपूर्ण है। लेप अलंकारों की भरमार है । किसी किसी छंद में भिन्न पद श्लेष की ऐसी कठिन योजना है कि पदच्छेद करना सरल काम नहीं है। हमने यथाशक्तिपदच्छेद करने में अपनी सतर्क बुद्धि से काम लिया है । पर तो भी बहुत संभव है कि हमसे बहुत सी अशुद्धियां हुई हो। इस लिये पाठकों से क्षमा के प्रार्थी हैं। पाठकों को चाहिये कि ऐसे छंदों के पढ़ने में अपनी सतर्क वुद्धि से.मी कुछ काम ते, केवल हमारे ही पदच्छेद पर पाठ को निर्मरन रखें। रामवंद्रिका के इस संग्रह में हमने एक विशेष परिवर्तन किया है। केशव ने कथाप्रसंग को प्रकाशों में विभक किया है। हमने प्रकार्यों को हटाकर तुलसीरुत रामायण के माम की भांति संपूर्ण कथाप्रसंग को कांड फ्रम से रफ्ना है। इसका कारण यही है कि आजकल के पाठक और सर्व- साधारण श्रोता इसी क्रम से अधिक परिचित हैं और सीको पसंद भी करते हैं। केशय की रामचंद्रिका पर कई टीकाएं हैं और अच्छी है। पर दोप उनमें यह है कि वे प्राचीन दंग की है। नवीन ढंग के प्रेमी पाउकगण ऐसी टोका से कुछ मी साम नहीं उठा सकते । कान्य की कठिनता तथा टीकाओं के प्रभाव से । केशव की उत्तम कविता का पठन पाठन प्रायः लुप्त सा हो गया है । इस काव्य के समझनेवाले तथा पढ़ानेवाले दूढे नहीं मिलते। यदि हैं भी तो इने गिने । इस काव्य के पठन पाठन के लोप हो जाने से हिंदी साहित्य की बड़ी भारी हानि हो सकती है। इसलिये हम हिंदी साहित्य प्रेमियों का ध्यान इस बात की ओर खींचना चाहते हैं कि केशव की कविता का प्रचार बढ़ाया जाय और प्रचार तभी बढ़ सकता है जब इन ग्रंथों पर सरल भाषा में नवीन ढंग की टीकाएँ रची जायँ । विहारी और तुलसी की कविता की अनेक टीकाएँ हो जायँ और केशव ऐसे धुरंधर कवि के ग्रंथों की कोई खबर ही न ले, यह कैसे आश्चर्य की बात है। केवल आश्चर्य ही क्यों, हिंदीवालों के लिये निंदा की भी बात है । अस्तु हिंदी प्रेमियों को इस ओर ध्यान देना चाहिये। रंगपंचमी विनीत- भगवानदीन, संग्रहकर्ता सं० १६७६, काशी।

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। केशवदास का परिचय केशवदासजी ओड़छानिवासी सनाढ्य ब्राह्मण थे । शीघ्रबोध" नामक ज्योतिष-ग्रंथ के बनानेवाले पंडित काशीनाथजी इनके पिता थे। शिखनखवाले प्रसिद्ध कवि बलभद्र' इनके बड़े भाई थे और अटपटांग कविता करने वाले कल्याणदास इनके छोटे भाई थे। कहने का तात्पर्य यह कि इनका घर भर कवि, कविताप्रेमी और विद्वान था। केशव ने अपने ग्रंथों में अपना पूर्ण परिचय भली भांति लिखा है। कविप्रिया ग्रंथ में अपना परिचय देते हुए अपने आश्रय- दाता राजा तथा उनके समाज का भी पूर्ण परिचय दिया है। रामचंद्रिका में ब्राह्मणों, और विशेष कर सनाढ्य ब्राह्मणों की बड़ी प्रशंसा की है और बड़ा माहात्म्य गाया है। बुंदेलखंड में कहीं कहीं इनके वंशधर अब तक पाए जाते हैं। केशव का जन्म, संवत १५४४ में हुआ था। इनके बनाये पांच ग्रंथ हमने देखे हैं अर्थात् (१) रसिकप्रिया (सं० १६४८ ), (२) रामचंद्रिका (सं० १६५८), (३) फविप्रिया (सं० १६५८), (४) विज्ञान गीता (सं० १६६७) (५) वीरसिंहदेव चरित्र (सं० १६६४)। केशवदासजी केवल श्रीड़छानरेश के दर्धार कवि वा मंत्रगुरु ही न थे, वरन उनके मंत्री और मुसाहेव मी थे।

ज्योतिषी और पुरोहित का भी काम करते थे। कई एक किंवदंतियों से यह भी प्रगट होता है कि केशवदासजी अश्वारोहण और शस्त्रसंचालन में भी कुशल थे। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। राजाओं के निकटवर्ती लोगों को प्रायः सयही प्रकार को कुशलता दर्कार हुआ करती है, और वे लोग सब यातों में कुशल होते भी हैं। चंद बरदाई भी तो पृथ्वीराज के सामंतों में गिना जाता था। वह भी तो दार ,कवि ही था। एक बार अकबर ने थोड़छा दर्यार पर एक करोड़ रुपया जुर्माना किया था। उस जुर्माने को माफ कराने के लिये केशवदास श्रागरे भेजे गये थे। केशवं ने अपनी काव्यकुश- लता से वीरयर को और नीतिकुशलता तथा समाचातुरी से अकयर को प्रसन्न करके यह जुर्माना माफ.ही करा लिया था। इस कार्य के उपलक्ष में प्रोडछा दर से केशवदास को जागीर मिली थी जो बहुत दिनों तक उनके वंशज भागते रहे। अप क्या हाल है सो हम नहीं कह सकते। मोड़छानरेश मधुकरशाहजी के सबसे पड़े पुत्र रामशाह थे। इन्होंने कुछ दिन योड़ला में राज्य किया। तदनंतर चंदेरी में जा घसे और ओड़छा का राज्यमार अपने छोटे भाई योर. सिंहदेव के सिर छोड़ा। बीरसिंहदेव यड़े युद्धप्रिय. व्यक्ति थे। इसी कारण बहुधा राजधानी से बाहर ही रहा करते थे। राज्यकाज मी,मनी भांति न देख सकते थे। इस कारण राज्य.

( ३ ) काज सँभालने का भार इन्होंने अपने छोटे भाई इंद्रजीत पर छोड़ा था। इन्हीं इंद्रजीत के दर्वार में केशवदास ने बड़ा सम्मान पाया था। सुनते हैं रामशाह जी के लिये केशव ने " राम अलंकृत मंजरी" नामक एक ग्रंथ अलग ही बनाया था, पर हमें उस ग्रंध के देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। मधुकरशाह का सबसे छोटा पुत्र कु. रतनसिंह था। मधुकरशाह के जीवन- काल ही में इस वीर वालक ने केवल १६ वर्ष की अवस्था में अकवर की सेना से युद्ध किया था। यद्यपि यह वालक उस युद्ध में मारा गया, पर उसने वीरता अच्छी दिखलाई थी। इसी कुवर रतनसिंह की वीरता की प्रशंसा में, सुनते हैं, केशवदास ने " रतनवावनी " नामक ५२ छंदों की एक छोटी सी पुस्तक रची है। परंतु इस पुस्तक को भी हमने नहीं देखा । तात्पर्य यह कि केशव के रचे हुए ७ ग्रंथों का पता चलता है, जिनमें से पहले कहे हुए पांच तो छप चुके हैं और अंतिम दो अभी तक अप्रकाशित हैं। शायद बुंदेलखंड में उनकी हस्त- लिखित प्रतियां मिल सके। हमने सुना है कि ओड़छा के राज्य पुस्तकालय में इन दोनों ग्रंथों की हस्तलिखित प्रतियां मौजूद हैं। अनुमान होता है कि इसी रतनवावनी को देखकर भूषण कवि ने "शिवावावनी" का रचना की होगी। ऐसा प्रसिद्ध है कि तुलसीदास जी के जीवनकाल ही में केशव की मृत्यु हो चुकी थी। केशव ने सं० १६६७ में विज्ञान भोता यनाई । तुलसीदास को मृत्यु सं० १६८० में हुई, मत- एय अनुमान सिद्ध है कि सं० १६६७ और १६८० के बीच में किसी वर्ष केशव की मृत्यु हुई होगी। इस अनुमान से सिख है कि केशवदास ने कम से कम ७५ वर्ष को श्रायु भोगी होगी। केशय की कविता पर कुछ विचार प्रस्ट करना केवल पृष्टपेषण ही होगा, क्योंकि इस विषय में मिभयंधुओं ने "हिंदी नपरन' में विस्तृत समालोचना की है, उससे अधिक हम और क्या लिखेंगे ; पर हां इतना अवश्य कहेंगे कि जिन पाठकों को कविता से रुचि हो वे केशव के ग्रंथ अवश्य देखें । प्रथम तीन ग्रंथों को पूर्णतः समझ लेने से फिर कोई भी कान्य ग्रंप कठिन नहीं रह सकता। जो लोग हिंदी-भापा को भाषा ही नहीं समझते और कहते हैं कि हिंदी के शब्दों में मनोमाय प्रगट करने की शक्ति बहुत ही अल्प है, उनसे हमारा निवेदन है कि ये केशव के 'ग्रंथ पढ़ें और देखें कि इस भाषा में क्या चमत्कार है । जिस माषा याले को अपनी भाषा की समृद्धि और पूर्णता का अहं. कार हो यह उस भाषा का सर्वोत्तम छंद लेकर केराय के धुनिदा छंदों से मिलान करे तो मालूम हो जायगा कि उसको भाषा हिंदी भाषा के सामने तुच्छातितुच्छ है। क्या किसी भाग का कधि अपने किसी छंद के चार चार और पांच पांच तरह के शब्दार्थ लगा सकता है? केशव की कविता में ऐसे छंद यहुत हैं जिनका अर्थ तीन तीन तरह से होता है। इतना

( ५ )
ही नहीं, कुछ छंद ऐसे भी हैं जिनका शब्दार्थ पांच पांच तरह
का होता है। इसी कठिनता के कारण लोग केशव की कविता
कम पढ़ते हैं। हम दावे और अहंकार के साथ कह सकते हैं
कि केशव ने हिंदी को वह गौरव प्रदान किया है जो आजतक
अन्य किसी भाषा को नहीं प्राप्त हो सका। जिस प्रकार तुलसी
अपनी सरलता
और सूर अपनी गंभीरता के हेतु सराहनीय
हैं, वैसे ही वरन् उससे भी बढ़कर केशव अपनी भाषा की
परिपुष्टता के लिये प्रशंसनीय हैं

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रामचंद्रिका
कांड-सूची
पृष्ठ
१
પર
...
न
७४
१.-चाल कांड
२-अयोध्या कांड
३-अरण्य कांड
४-किप्किधा कांड
५-सुंदर कांड
६-लंका कांड
७-उत्तर कांड
६४
... १०६
...
...
१२३
...
...
१७२
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रामचन्द्रिका
वाल कांड
,
गणेश-बंदना
[मनहरण छन्द ]
बालक मृणालनि ज्यों तारि डारै सब काल
कठिन कराल त्यों अकाल-दीह- दुख को ।
विपति हरत हठि पशिनी के पात सम ,
ह पंक-ज्यों पताल पेलि पठवै कलुपै को।
दूरि कै कलंक अंक भवशीश शशि सम ,
राखत है केशोदास दास के वपुष को।
साँकर, को साँकरन सन्मुख होत तोरै,
दशमुख मुख जोवे गजमुख मुख को॥१
सरस्वती वंदना
यानी जगरानी को उदारता बखानी जाय ,
ऐसी मति कही धौं उदार कौन की भई।
देवता प्रसिद्ध सिद्ध ऋषिराज तपवृद्ध ,
कहि कहि हारे सब कहिं न केहूँ लई।
भावी भूत वर्तमान जगत रखानत है,
कशोदास कई न पखानी काह पै गई।

घणे पति चारिमुख पूत वर्षे पाँच मुख, नाती वर्षे पट मुख तदपि नई नई ॥२॥ राम वंदना and पुरण पुराण अरु पुरए पुराण परि पूरण बतायें न यतायें और उक्ति की। दरशन देत जिन्हें दान "समुमैं न, नेति नेति कहै वेद छाँडि भेद युक्ति को। जानि यह केशोदास अनुदिन राम राम , न , डरत पुनिरुक्ति को। रूप देहि अणिमाहि गुण देहि गरिमादि, भक्ति देहि महिमाहि नाम देहि मुक्ति को ॥३॥ कवि परिचय [सुगीतछंद] सनाढय जाति गुनाड्य है जग सिद्ध शुद्ध स्वभाव । कृष्णदत्त प्रसिद्ध है महि .मिश्न पंडितराव। गणेश सो मुत पाइयो बुध काशिनाय अगाय। Fruc अशेष शास्त्र विचारिक जिन जानियो मत साध ॥४॥ [दाहा] उपज्या त्यहि कुल मंदमति, शटकवि केशवदास। रामचन्द्र की चन्द्रिका, भाषा करी प्रकाश nan सारह से अढायने, कार्तिकशुदि युधशाराहार रामचन्द्र की चन्द्रिका, तब लोन्हीं पतार

6
ह
म महिमा
[पटपद]
बोलिन वोल्यो बोल दयो फिर ताहि न दोन्हों।
मारि न माख्यो शत्रु क्रोध मन वृथा न कोन्हों।
जुरि न मुरे संग्राम लोक की लोक, न .लोपी।
दान सत्य सम्मान सुयश दिशि विदिशा ओपी।
मन लोभ मोह मद काम वश भये न केशवदास भणि।
सोइ परब्रह्म श्रीराम हैं अवतारी अवतार मणि ॥७॥
[चतुष्पदी छंद]
जिनको यहा-हंसा जगत प्रशंसा, मुनिजन-मानस रंता। ए.
लोचन अनुरूपनि श्याम स्वरूपनि अंजन अंजित संता।
कालत्रयदर्शी निर्गुणपर्शी होत विलम्ब न लागै।
तिनके गुण कहिहीं सब सुख लहिही पाप पुरातन भागै ।।
[ दोहा]
जागतिजाको ज्योति जग, एक रूप स्वच्छंद ।
रामचंद्रकी चन्द्रिका, वरणत बहुछंद ॥६॥
[ोला छंद]
शुभ सूरजकुल कलश नृपति दशरथ भये भूपति ।
तिनके सुत भये चारि चतुर चितचारु चारुमति ।
रामचन्द्र भुवचन्द्र भरत
भारतभुव-भपण।
लक्ष्मण अरु शत्रुघ्न दीह दानव-दल-दूषण ॥ १० ॥

011 (४) [धत्ता छन्द] सरयू सरिता तट नगर यसै! अवधनाम यश धाम पर। 'यश्रोष विनायी सब पुरवासी अमरलोक मानहुँ नगर । विश्वामित्र श्रागमन [पटपद् गाधिराज को पुत्र साधि सब मित्र शत्रु चल । दान कृपान विधान. वश्य कान्हों भुवमंडल। के मन अपने हाथ, जोति जग. इन्द्रियगन अति । तप यल याही देह भये क्षत्रिय ते ऋषिपति । तेहि पुर प्रसिद्ध फेशब' सुमति काल-अतीतागतनि गुनि । । वह अगुन गति पगु धारिया विश्वामित्र पवित्र मुनि॥ १२ ॥ A -- यंत्रक सरञ् वर्णन [प्रमटिका छन्द] पुनि पाये सरयू सरित तोर। तह देधे उज्ज्वल यमल नौर। नय निरखि निरखि द्युति गति गंभीर । फदु धरणन लागे सुमति धीर ॥ १३ ॥ अति निपट कुटिल गति यदपि श्राप । यह देन शुद्ध गति छुवत कछु पोपुन अध.अध गति चलन्ति। फल पतितन कहूँ ऊरय फलन्ति ॥१४॥ प्राप।

( ५ )
मदमत्त यदपि मातंग
संग।
अति तदपि पतितपावन । तरंग।
बहु न्हाइ न्हाइ जेहि जल सनेह ।
सब जात स्वर्ग सूकर सुदेह ॥ १५ ॥
আহানা বহন
[नवपदो छंद]
जहँ तहँ लसत महामदमत्त । वर बारन बार न दल दत्त।
अंग अंग चरचे अति चंदन । मुंडन भुरके देखिय बंदन ॥१६॥ :
[ दोहा]
दोह दोह दिग्गजन के, केशव'
मनहुँ कुमार।
दीन्हे राजा दशरथहिं, दिगपालन उपहार ।।१७।।
M
याग वर्णन
GAD...00
[अरिल्ल छंद]
देखि बाग अनुराग उपजिय।
वोलत कलध्वनि कोकिल सजिय।
RE
राजति रतिकी सखी सुवेपनि ।
• मनहुँ वहति मनमथ संदेशनि ॥ १८ ॥
फूलि फूलि तरु फूल चढ़ावत ।
मोद्त महा मोद उपजायत।
उड़त पराग न चित्त उड़ावत।
भ्रमर भ्रमत नहिं जीव भ्रमावत ॥ १६॥

लोमा चोलें। [पादाकुलक छंद] शुम सर शोभै । मुनिमन सरसिज फुले। अलि रस भूले ॥ जलचर डोलें । बहुस्खग वरणि न जाही। उर अरमाहीं ॥२०॥ [ हाकलिका छंद] संगलिये ऋषि शिप्यन यने। पायक से तपसेजनि सने। देखत सरिता उपयन भले । देखन अवधपुरी का चले ॥२१॥ अवधपुरी वर्णन [मधुभार इंद] ऊंचे श्रवास । यहु विज प्रकाश। शोभा विलास । शोभ प्रकाश ॥२२॥ [श्रामीर इन्द] अति सुन्दर अति साधु । थिर न रहत पल अाधु 'परम तपोमय मानि । दण्ड धारिनी जानि। roon हरिगीत छन्द शुभद्रोण गिरिगण शिपर ऊपर उदित श्रीपधि सी : यह पाय यश पारिद यहोरहिं अमि-दामिनि-धुति म अति किधी रुचिर प्रताप पात्रक प्रगट मुरपुर को च यह किधी सरित मुदेश मेरो करो विधि खेलति भयो ।

--
wwe
देखि सय
[दोहा]
जौतिजोति कोरति लई, शत्रुनको पहुँभाँति ।
पुर पर बाँधी शोभिजै, मानो तिनकी पाँति ॥२५॥
[त्रिभंगी छन्द
सम सब घर शोमैं मुनि मन लो0 ,
रिपुगण छो) देखि
यहु दुंदुभि वाजें जनु धन गाऊँ,
दिग्गज लाजै. सुनत जवें ।।
जहँ तहँ श्रुति पढ़हीं विधन न बढ़ही,
जै जस मढ़हीं सकल दिशा । ५
सवई सब विधि छम वसत यथाक्रम,
देवपुरी सम दिवस निशा ॥२०॥
[दंडकला छंद
जविकुल विद्याधर सकल कलाधर राजरोज वर वेप बने।
न गणपति सुखदायक पशुपति लायक सूर सहायक कौन गने।
सेनापति युधजन मंगल गुरु गण धर्मराज मन बुद्धि घनी ।
बहु शुभ मनसोकर करमामय पर सुरतरंगिनी शोभसनी॥२७॥
i
[हीरक छन्द
पंडितगण मंडितगुण दंडित-मत्ति देखिये।
क्षत्रिय वर धर्म प्रवर क्रुद्ध समर लेखिये
वैश्य सहित सत्य,रहित पाप प्रगट मानिये ।
शुद्र कति विम भगति जोवं जगत जानिये ॥ २० ॥

- [सिंहविलोकित छंद] अति मुनि तन मन तहँ मोहि रह्यो। कटु युधिवल वचन न जाइ कहो। पशु पति नारि नर निरखि तवै। दिन रामचन्द्र गुण गनत सवै ॥२६॥ न [मरहट्टा छन्द] अति उच्य अगारनि बनी पगारनि जनु चिंतामणि नारि बहु सत मम धूपनि धूपित अंगनि हरि की सी अनुहारि चित्री बहु चित्रनि परम विचित्रनि केशवदास निहारि। जनु विश्वरूप को श्रमत पारसी रची विरंचि विचारि॥३०॥ [सोरटा] जग यशवन्त विशाल, राजा दशरथ की पुरी ।। चंद्र सहित सव काल, भालथली अनु ईशकी।। ३१ ॥ [कुंडलिया] माती पंडित अति सिगरी पुरी, मना गिरा गति गूढ़।' सिंह्न युत जनु चंडिका, माहति मृद अमू ।' अमूह, देव सँगादिति सी साह। शृंगार सदेह, मनी रति मन्मथ माह ।। ('सव सँगार सदेह सकल मुख मुखमा मंडित । मनो शची विधि रची विविधि विधि यरणत पंडित | -[ काव्य छंद] मूलन ही की जहां अधोगति केशय गाइय। होमहु ताशनधूम नगर एवं मलिनाइय ।। ~ . मोहति मूद सब - (६) दुर्गति दुर्गन हो जो कुटिलगति सरितन ही में। श्रीफल को अभिलाष प्रगट कविकुल के जीमें ॥ ३३ ॥ दोहा] अति चंचल जहँ चलद्लै, विधवा बनी न नारि । मन मोह्यो ऋपिराज को, अद्भुतनगर निहारि ॥३४॥ [सोरठा] । नागर नगर अपार, महामोहतम मित्र ले। तृप्णालता कुठार, लोभसमुद्र अगस्त्य से ।। ३५ ॥ [दोहा ] विश्वामिन पवित्र मुनि, केशव बुद्धिउदार। देखत शोभा नगर की, गये राजदरवार ॥३६॥ शोभित चैठे तेहि सभा, सात द्वीप के भूप। तहँ राजा दशरथ लसै, देवदेव अनुरूप ॥३७॥ देखि तिन्हें तब दूर ते, गुदरानो प्रतिहार । प्राये विश्वामित्रजू, जनु दूजो करतार ॥ ३८ : उठि दौरे नृप सुनत ही, जाइ गहे तब पाइ ! लै प्राये भीतर भवन, ज्यों सुरगुरु सुरराइ ॥ ३६ ।। [सोरठा] सभा मध्य वैताल, ताहि समय सो पढ़िउठ्यो। केशव बुद्धि विशाल, सुंदरः सूरो भूप सो॥ ४० ॥ १-गुदरानो निवेदन किया। २-ताल-भार, वंदो। , TION [घनाक्षरी] चैताल-विध के समान है विमानीकृत राजहंस , विविध विबुधयुत मेरु सो अचल है। दीपति दिपति अति साती दीप दीपियतु, र दुसरो दिलीप सो मुदक्षिणा को वल है। सागर उजागर को बहु चाहिनी को पति, : छुनुदान प्रिय किधी सूरज अमल है! सब विधि समरथ राजे राजा दशरथ, भगीरथपथगामी गंगा फैसो जल है। [ दोहा।] यद्यपि इंधन जरि गये, अरिगण केशवदास । तदपि प्रतापानलन के, पत पल बढ़त प्रकाश ॥ १२॥ [ तोमर छन्द] याटु भाँति पूजि सुराइ । कर जोरिक पर पाई। हँसिके को ऋपिमित्र । अब घेट राजपवित्र ॥४३॥ मुनि -मुनु दानमानसइंस । रघुवंश के अवतंस ।। मन माँह जो अति नेहु । यकु यात माँगे देहु nि [ दोधक छंद] राम गये जयते वन माहीं । राक्षस वैर फर पहुधाही । रामकुमार हम नृप दीजै । ती परिपूरण यज्ञ करीजै ।

( ११ ) [ तोटक छंद] यह वात सुनी नृप नाथ जवै । शर से लगे पाखर चित्त सवै। मुख ते कछु यात न जाइ कही। अपराध विना ऋषि देह दही ॥४६॥ राजा-अति कोमल केशव बालकता। वहु दुप्झर राक्षस घालकता। हमही चलिहें ऋषि संग अवै। सजि सैन चलै चतुरंग सवै॥ ४७ ॥ विश्वामित्र [षट्पद] जिन हाथन हठि हरपि हनत हरिणीरिपु-नन्दा तिन न करत संहार कहा मदमत्त गयन्दनि । जिन वेधत सुख लक्ष लक्ष नृपवर कुचरमनि । तिन वाणनि वाराह वाघ मारत नहिं सिंहनि। नृपनाथनाथ दशरथ सुनिय अकथ कथा यह मानिये। मृगराजराजकुलकलश अव वालक वृद्ध न जानिये।४॥ [ मोदक छंद] राजा-मैं जो कयो ऋपि देन सो लौजिय। काज करो हठ भूलि न कीजिय ॥ प्राण दिये धन जाहिं दिये सव । केशव राम न जाहिं दिये श्रय ॥ ४६॥ ऋपि-राज तज्यो धन धाम तज्यो सव । नारि तजी सुत शोच तज्यो तव ।।

( १२ )
श्रापनपी जो तज्यो जगयंद है।
सत्य न एक तज्यौ हरिचंद है ॥५०॥
[दोहा ]
जान्यो विश्वामित्र के, कोप पढ्यो उर आइ ।
राजादशरथ से कहो, वचन वशिष्ठ बनाइ ॥ ११ ॥
पशिष्ट-
[पटपद]
इनहीं के तपतेज या की रक्षा करिहें ।
इनहीं के तपतेज सकन राक्षस यल इरिद ।
इनहो के नपनेज तेज यदिदं तन तूरण ।
इनहो
के तपतेज होहिंगे मंगल पूरण ।
कहि केराय जयुन भाइ, इनहीं के तपतेज घर ।
नृप वैगि राम लक्ष्मण दोऊ सीपी विश्वामित्र कर ॥५२॥
[दोहा]
गृप पे यरन वशिष्ट का, कैसे
मेट्योजाइ।
साध्या विश्वामित्र कर, रामचन्द्र
अकुलाह:५३॥
[पंकजयाटिका छंद]
राम चलत नृप के युग लोचन ।
यारिमरित भये पारिदरोचनार
पायन परि ऋषि के सजि मौनहिं ।
केराय उठि गये भीतर भीमहि ॥ ५॥

[चामर छन्द ] वेद मंत्र तंत्र शोधि अस्त्र शस्त्र दे भले । रामचन्द्र लक्ष्मणे सो विप्र क्षिप्र लैचले। लोभ क्षोभ मोह गर्व काम कामना हई। नींद भूख प्यास त्रास वासना सबै गई ।। ५५ ।। [निशिपालिका छन्द] कामवन राम सव वास तरु देखियो। नैन सुखदैन मन मैनमय लेखियो। ईश जहँ कामतनु के अतनु डारियो । छोड़ि वह यज्ञथल केशव निहारियो । ५६ ॥ [दोहा रामचंद्र लक्ष्मण सहित, तन मन अति सुख पाइ । देख्यो विश्वामित्र को, परम तपोवन जाइ॥७ तपोवन वर्णन क [पट्पद] तरु तालीस तमाल ताल हिताल मनोहर । मंजुल चंजल तिलक लकुच कुल नारिकेर वर । पला ललित लवंग संग पुंगीफल सारी शुक कुल कलित चित्त कोकिल अलि मोहें। शुभ राजहंस कलहंस कुल नाचत मत्त मयूरगन । अति प्रफुलित फलित सदा रहै केशवदास विचित्र वन ॥५॥ सोहैं।

[सुप्रिया छंद] फहुँ द्विजगण मिलि सुख श्रुति पढ़हीं। कहुँ हरिहरि हरहर रटे रटहीं। कहुँ मृगपति मृगशिशु पय पियहीं । कहुँ मुनिगण चितयत हरि हियहीं ॥ १६॥ [नराच छंद] विचारमान ब्रह्म देव अर्चमान मानिये । अदीयमान दुःख सुःख दीयमान जानिये । अदंडमान दीन गर्व दंडमान भेदये। अपद्धमान पापग्रन्थ पटुमान वेदय ॥ ६०॥ [चंचला] विवे को यथल बैटे यार न लागे होम के जहां तहां सवै विधान । भीमभाँति ताडुफा सो भंग लागि कर्न पाइ। घान तानि राम पै न नारि जानि छाँडि जाइ ।। ६॥ [सोरटा] पि-कर्म करति यह घोर, विप्रन को दशह दिशा। मत्त सहस गज जोद नारी जानि नछोड़िये ।। १२ ॥ [दोहा] द्विजदोषी न पिचारिय, कहा पुरुष कह नारि। राम यिराम न कीजिये, याम ताडुका तारि॥ ३ ॥ सावधान। .

(१५) ताडका सुवाहु बध [ मरहट्टा छंद] यह सुनि गुरुवानी धनु गुन तानी जानी द्विज दुखदानि । ताडुका सँहारी दारुण भारी नारी अति वल जानि ।। मारीच विडायो जलधि उताखो माखो लवल सुबाहु । देवनि गुन पर्यो पुप्पाने बर्यो हो अति सुरनाहु ॥ २४ ॥ [दोहा] पूरण यज्ञ भयो जहीं, जान्यो विश्वामित्र । धनुषयज्ञ को शुभ कथा, लागे सुनन विचित्र ॥ ३५॥ विप्र कथित स्वयंवर कथा [दोहा] खण्डपरस' को शोभिजे, सभामध्य कोदंड। मानहुँ शेष अशेष धर, धरनहार परिवंड ॥६६॥ [सवैया] शोभित मंचन की अवली गजदंतमई छवि उज्ज्वल छाई । ईश मनौ वसुधा में सुधारि सुधाधरमंडल मंडि जोन्हाई। तामहँ केशवदास विराजत राजकुमार सवै सुखदाई। देवन स्यों जनु देवसभा शुभ सीयस्वयम्वर देखन आई ।.६७॥ । सोरठा॥ सभामध्य गुणग्राम, बंदी सुत द्वै शोभहीं। सुमति विमति यह नाम, राजन को वर्णन करें ॥६॥ -- १राएर परसम्महादेव । २ स्यों सहित । Lowerowe M (१६ ) [दोहा] सुमति-को यह निरखत श्रापनी, पुलकित याहु विशाल । सुरमि' स्वयंवर अनुकरी, मुकुलित शास्त्र रसाल IMER [सोरठा] विमति-ज्यहि यशपरिमलमत्त, चंचरोक चारण फिरत । दिशि विदिशन अनुरक्त, सो ती मलिकापीढ़नृप ।।०॥ [ दोहा] सुनति-जाके सुखमुखर यास ने, पासित होत दिगंत । सो पुनि कहु यह कोन नृप, शमित शाम अनंत ॥३१॥ [सोरठा विमति- राजराजदिनयाम, माल लाल लामी सदा । अति प्रसिद्ध जग नाम, काशमार को तिलक [दोहा] सुमति-निज प्रताप दिनकर करत, लोचन कमल प्रकाय । पान खात मुसुकात मृदु, को यह केरावदास ॥७३|| [सोरटा] विमति-नृप मारिफ्य सुदेश, दक्षिण तिय जिय भावतो। कटितट सुपट सुश, कल कांची शुम मंडा ॥m १माभिमा मुनमुटस! | THOR=गुवर।

[दोहा] सुमति-कुण्डल परसन मिस कहत, कहौ कौन यह राज । शंभुशरासन गुन करों, करनालम्बित भाज।७।। [सोरठा] विमति-जानहिं वुद्धिनिधान, मत्स्यराज यहि राज को। समर समुद्र समान, जानत सब अवगाहि के ॥७॥ [दोहा समति-अंगराग रंजित रुचिर, भूषण भूपित देह । कहत विदूषक सों कछू , सो पुनि को नृप येह ॥७७॥ [सोरठा] चिमति-चन्दनचित्रित रंग, सिंधुराज यह जानिये । पहुत वाहिनी संग, मुक्तामाल विशाल उर ॥ ७ ॥ [ दोहा] लिगरे राज समाज के, कहे गोत्र गुण ग्राम । देश सुभाव प्रभाव अरु, कुल बल विक्रम नाम ॥ ७४ [घनाक्षरी] पावक पवन मणिपन्नग पतंग पितृ, । जेते ज्योतिवंत जग ज्योतिपिन गाये हैं। असुर प्रसिद्ध सिद्ध तीरथ सहित सिंधु, केशव चराचर जे वेदन बताये हैं। अजर अमर अज अंगी श्री अनंगी सब, परणि सुनावै ऐसे कोने गुण पाये हैं। wor74 10 सीता के स्वयंवर को रूप अवलोकिवे को, भूपन को रूप धरि विश्वरूप आये हैं ॥ २० ॥ [विजय] दिकपालन की भुवपालन की शोकपालन की किन मातु गई छ। ठाद भये उठि श्रासन ते फहि फेशव शम्भुशरासन को छ् । काह चढ़ाया न काहू नयायो न काह उठायो न आँगुर दै। स्वारय भो न भयो परमारथ भाये रे घोर चले पनिता है | रामचन्द्र का जनकपुर में प्रागमन [ दोहा] फाह को न भयो फह, पेसो सगुन न होत । पुर पैठत श्रीराम के, भयो मित्र उहोत ।। ८२॥ सूर्योदय वर्णन [चौपाई] कडु राजत सूरज अयन परे । जनु लक्ष्मण के अनुराग भरे। चितपतचित्तकुमुदिनी प्रस। चार चकोर चिता सोलसै ।।३।। [पटपद] लक्ष्मण 1-अरुण गात अति प्रात पसिनीप्राणनाथ भय । मानहुं करावदास कोकनद कोकप्रेममय 11 hoon परिपूरण सिंदूरपूर कैयौं मंगलबट। किधी शक्र को छत्र मढ्यो मानिकमय्पपट ।। कै श्रोणितकलित कपाल यह किले कपालिका काल को। यह ललित लाल कधी लसत दिग्भामिनि के माल को (२६ ) [ तोटक छन्द] पसरे कर कुमुदिनि काज मनो। किधौं पद्मिनि को सुखदेन घनो। जनु ऋत सवै यहि त्रास भगे। जिय जानि चकोर फंदान ठगे॥ ५ ॥ [चंचरीछन्द रामचन्द्र-न्योम में मुनि देखिये तिलाल श्रीमुख साजहीं। सिंधुमें बड़वाग्नि की जनु ज्वालमाल विराजहीं। पद्मरागनि की किधौं दिवि धूरि पूरित सी भई । सूर वाजिन की खुरी अति तिक्षता तिनकी हई ॥६॥ [सोरठा] विश्वामित्र-चढ्यो गगनतरु धाइ, दिनकर-वानर अरुणमुख । कीन्हो कि महराइ, सकल तारका कुसुम विन 19il [दोहा] लक्ष्मण-जही वारुणी को करी, रंचक रुचि द्विजराज । तहीं कियो भगवन्त बिन, संपति शोभा साज ! | [ तोमर छन्द] चहुँभाग वाग तड़ाग ! श्रव देखिये बड़भाग ।। फल फूल से संयुक्त । अलि यो रमै जनु मुक्त || [दोहा] रामचन्द्र-ते न नगरि ना नागरी, प्रतिप जलजहार शोभित न जहँ, प्रगट पयाधर पान IEDil ar woman ( २० ) [सबैया] सातहुदीपन के अवनीपति हारि रहे जियमें अब जाने । यीसयिसे ग्रत भंगमयो सो कही भय केशव को धनु ताने । शोक की आगि लगी परिपूरण प्राइगये धन श्याम बिहाने । जानकि के जनकादिक के सय फूलिउठे तरूपुण्य पुराने ॥६॥ विश्वामित्र और जनक की मेंट [ दोघकदन्द] माइगये ऋषिराजहि लीने । मुख्य सतानंद विप्र प्रयीने। देखि दुयी भये पांयनि लाने । अाशिष शीरपयामुलै दोहर [सबैया] विश्वामित्र-- केशव ये मिथिलाधिप है जग में जिन कीरतियेलि आई है। दानहपान विधानन से सिगरी ,यमुघा जिन हाथ लई है। ५ अंग छु सानक पाठक स म तीनिष्टु लोक में सिद्धि मई है। 'घेदप्रयी अरु राजसिरी परिपूरणता शुम यागमई है।। ६३ ।। [सोरटा] जनक-जिन अपनो तनस्वर, मेलि तपोमय अग्निमें । कान्हा उत्तमवणं, तेई विश्वामित्र ये ॥४॥ [मोहन इंद] लबमए-जनपजयंत । बगयोगयंत। तिनको उदोन । केहि भौति होत । ६५॥ १-बीस रिमेम्बोमा शिता, निपक्ष ।

-- विजय]] श्रीराम सय छत्रिन आदि दै काहु छुई न छुये विजनादिक वात डगै। न घटै न वटै निशि वासर केशव लोकन को तमतेज भगै। भवभूपण भूपित होत नहीं मदमत्त गजादि मसी न लगे। जलहूं थलहूं परिपूरण श्री निमि के कुल अद्भुत ज्योति जगे ॥६॥ [ तारक छन्द जनक-यह कीरति और नरेशन सोहै। सुनिदेव अदेवन को मन मोहै। हम को बपुरा सुनिये ऋऋषिराई । सब गांउ छ सातक की ठकुराई ।। ६७ ॥ [विजय छन्द] विश्वामित्र- आपने श्रापने टौरनि.तो भुवपाल सवै भुव केवल नामहि के भुवपाल कहावत हैं भुव पालि न जाई। भूपति की तुमहीं धरि देह विदेहन में कल कीरति गाई । केशव भूपन को भव भूषण भू तन ते तनया उपजाई ।। - ॥ [ दोहा जनक-इहि विधि की चित चातुरी, तिनको कहा अकत्य । लोकन को रचना रुचिर, रचिये को समरत्य ।। ६६ । [सवैया] (लोकन की रचना रचिये को जहीं परिपूरण बुद्धि विचारी। हँगई फेशवदास तहसव भूमि प्रकाश प्रकाशित भारी। पाले सदाई।

( २२ ) शुद्ध सलाफ समान लसी अति रोष मई गदीठि विहारी। होत मये तय सूर सुधाधर पायक शुभ्र सुधारंगधारी ।। [दोहा] केशव विश्वामित्र के, रोपाई दृगजानि। संध्यासी तिहुँ लोक में, केहि न पासी पानि [दोधक छन्द] जनक--ए मुत फोन के शोभहिं साजे। सुंदर श्यामल गौर विराजे । जानत है। जिय सोदर दोऊ। के कमला विमला पति कोऊ ॥ १०२ ।। [चौपाई] पश्वामित्र- सुंदर श्यामल राम सुजानों । गौर सुलम्मण नाम बखानों ।। आशिष देष्टु इन्हें सय कोऊ । सूरज के कुलमंडन दोऊ ॥१०३|| [ दोहा नृपमणि दशरथ नृपति के, प्रगटे चारि कुमार। राम भरत लन्मण खलित, अम शत्रम उदार ॥३०॥ [ घनाक्षरी]. पति दानिन के शोल पर दान के प्रहारी दिन, दानवारि ज्यों निदान देखिये सुभाय के। १-गुह-तीर । २-समाय-बाय । ३-विमला सरस्वती ।

देख्यो। ( २३ ) दोप दोप हूं के अवनीपन के अवनीप पृथु सम केशोदास दास द्विज गाय के। श्रानँद के कंद सुरपालक से थालक ये, परदारप्रिय साधु मन वच काय. के देहधर्मधारी पै विदेहराज जू से राज राजत कुमार ऐसे दशरथ राय के ।। १०५॥ [तार छन्द ] रघुनाथ शरासन चाहत अति दुष्कर दुपकर राजसमाजनि लेख्यो। जनक-ऋषि है वह मन्दिर माँझ मँगाऊं। गहिल्यावहिं जनयूथ बुलाऊं ।। १०६ ॥ [दंडक छंद] वज्रते कठोर है कैलास ते विशाल काल- दंड ते कराल सव काल काल गावई। केशव त्रिलोक के विलोक हारे देव सब , छोड चंद्रचूड़ एक और को चढ़ावई । पन्नग प्रचंड प्रति प्रभु की पनच पीन, पर्वतारि पर्वत प्रभा न मान पाई। विनायक एकह पै श्रावै न पिनाक ताहिं, कोमल कमलपाणि राम कैसे ल्यावई [ तोमर] विश्वामित्र--सुनि रामचन्द्र कुमार । धनु मानिये यहि यार || मनि चेगि ताहि चढ़ाव । यश लोक लोक बढ़ाय ॥१०॥ mprove- Hernatak .

( २४ ) घनुष मंग [दोहा] ऋषिहि देखि हरप हिया, राम देखि कुम्हलाइ । धनुष देखि डरपै महा, चिन्ता चित्त डोलाइ ॥१०॥ [स्वागता छन्द रामचन्द्र कटिसों पटुवांध्या । लीलय हर को धनु साध्या ।। 'नेताहिकरपल्लयसांच्दै ।। फूलमूल जिमि टूक कत्रो द्वै ॥१०॥ [सर्वया) उत्तम गाय सनाय जवै धनु श्री रघुनाथ जु हाय के लीना। निगुण ते गुणवंत किया मुस केशव संत अनंतन दीना। एचा जही तवहीं किया संयुत तिच्छ कटाक्ष नराच नवीना। राजकुमारनिहारिसनेहसाशंमु को सांचा शासन कीन्हे॥११॥ [विजया छंद ] प्रथम टंकोर मुकि मारि संसार मद चंह को दंड रहो मंडि नव मंड. को। चालि अचला अचल यालि दिगपाल यल पालि ऋषिराज के वचन परचंड को। साधु दै इंश का योधु जगदी को मोधु उपजाई, भूगुनंद परिवंड को। यांधि पर स्वर्ग को साधि अपवर्ग धनु. मंग को शब्द गयो मेदि ब्रांड को ।।

---- --- ( २५ ) [दोहा] जनक-सतानंद आनंद मति, तुम जो हुते उन साथ। परज्यो काहे न धनुष जब, तोयो श्रीरघुनाथ ॥११३।। [ तोमर] सतानंद-सुनु राजराज विदेह । जब हों गयो वहि गेह। कछु मैंन जानी वात। कव तोरियो धनु तात ॥११४॥ [ दोहा] सीताजू रघुनाथ को, अमल कमल की माल। पहिराई जनु सवन की, हृदयावलि भूपाल ॥११॥ [चित्रपदाछंद] सीय जही पहिराई । रामहि माल सुहाई। दुंदुभि देव बजाये । फूल. तहीं बरसाये ॥१६॥ बरात आगमन [दोहा] पठई तवहीं लगन लिखि, अवधपुरी सव वात । राजा दशरथ सुनतहीं, चाह्यो चली वरात ॥११॥ [मोटनक छंद] आये दशरत्य घरात सजे। दिगपाल गयंदनि देखि लजे। चाखों दल दूलह चारु बने । मोहे सुर औरनि कोन गर्ने ॥११॥ [तारकछंद पनि चारि बरात चहूँदिशि आई। चम् अगवान पठाई ॥ नप चारि ( २६ जनु सागर को सरिता पगुधारी। तिनके मिलिये कह पाहँ पसारी ॥११॥ [ दोहा] ना the । थारोठे को चार फरि, कहि केशव अनुरूप । द्विज दूलह पहिराइयो, पहिराये सब भूप ॥२०॥ [भिंगी छंद] दशरत्य सँघाती सकल बराती यनि पनि मंडप माहे गये। आकाश पिलासी प्रभा प्रकाशी जलज गुच्छ जनु नखत नये । अति सुंदर नारी सब सुखकारी मंगल गारी देन लगी। याजे पहुयाजत जन धन गाजत जहांतहां गुम शाम जगी ॥१२॥ [दोहा रामचन्द्र सीता सहित, शोभत हैं त्यहिं ठौर । मुपरणमय मणिमय खचित, शुभ सुंदर शिर मीर॥१२२॥ विवाह पिट्पद बैठे मागध मत विविध विद्याधर चारण। केशवदास प्रसिद्ध सिद्ध शुम श्रशुमनिवारण । भरद्धाज आवालि अत्रि गोतम कश्यप मुनि । विश्वामित्र पवित्र चित्र मति वामदेय पुनि । सय मांति प्रतिष्ठित निष्टमति नहँ धशिष्ठ पूजत कलश ! शुभ सतानंद मिलि उच्चरत शासोच्चार सय सरस ॥१२॥ १-मारोठेको चार दरवाया चार, द्वार पूना।

[अनुकूल छंद] पावक पूज्यो पूज्यो समिध सुधारो.। आहुति दीनो सव सुख कारो। तब कन्या बहु धन दोन्हों। भावरि पारि जगत यश लीन्हों ॥१२॥ [स्वागता छन्द] राजपुत्रिकनि सों छवि छाये। राज राज सब डेरहि श्राये । हीर चीर गज वाजि लुटाये । सुंदरीन बहु मंगल गाये ॥१२॥ शिष्टाचार [सोरठा] वासर चौथे याम, सतानंद अागू दिये। दशरथ नृप के धाम, आये सकल विदेह पनि ॥ १२६ ॥ [दोहा] आगेह दशरथ लियो, भूपति श्रावत देखि । राजराज मिलि वैठियो, ब्रह्मब्रह्म ऋपि लेखि ॥ १२७ ॥ [ सवैया] - सिद्ध समाज सजे अजहूँ न कहूँ जग योगिन देखन पाई। "रुद्र के चित्त समुद्र बस नित ब्रह्महु पै चरणी जो न जाई । रूप न रङ्ग न रेप विशेष अनादि अनन्त जो चेदन गाई। केवल गाधि के नन्द हमें वह ज्योति सो मूरतिवंत देखाई॥१२॥ --

(२८)
[तारक छंद]
जिनके पुरिण भुव गंगहि ल्याये।
नगरी शुभ स्वर्ग सदेह सिधाये।
जिनके सुत पाइन ते तिय कीनी।
हर को धनुभंग भ्रमें पुर तीनी ॥ १२६ ॥
'पापु प्रदेव अनेक सँहारे।
सप काल पुरन्दर के रखवारे ।
जिनकी महिमाहि अनंत न पायो।
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हम को वपुरा यश येदि गायो। १३०॥
यिनती करिये जन जो जिय लेखो।
दुखदेण्यायोकाहित्याचाज देखो।
यह जानि हिये दिठई मुख मापी ।
हम हैं चरणादक के अमिलापी ॥ १३ ॥
[तामरस छन्द]
जय ऋपिराज विनय करि लीनों।
मुनि सय के करुणा रस भीनों।
दशरय राय यह जिय जानी।
यह यह
एक भई रजधानी ॥ १३२
[दोहा]
दशरय-हमको तुम से नृपति को, दासी दुर्लभ राज ।
पुनि तुम दीनी कन्यका, निभुवन की रताज ॥ १३३॥

- *- ( २ ) [विजय छंद] पशिष्ठ- एक सुखी यहिालोक विलोकिये हैं वहि लोक निरै पगुधारी। एक इहां दुख देखत केशव होत वहां सुरलोक विहारी । एक इहांऊ उहां अति दीन सो देत दुहूं दिशि के जन गारी । एकहि भाँति सदा सवलोकनि है प्रभुता मिथिलेश तिहारो॥१३४॥ जावालि- ज्यों मणि में अति.ज्योति हुती रवि ते कछु और महाछवि छाई । चंद्रहि चंदत हैं सब केशव ईश ते चंदनता श्रति पाई। भागीरथी हुतिय अति पावन पावन ते अति पावनताई ।। त्यों निमिवंश बड़ोई हुतो भइसीय संयोग बड़ीये बड़ाई ॥१३५॥ [ दोहा पूजि राज ऋषि ब्रह्म ऋपि, दुंदुभि दीन्हि बजाइ । जनक कनक मन्दिर गये, गुरु समेत सुख पाइ॥१३६ ।। जेंवनार [चामर छद] श्रासमुद्र के क्षितीश और जाति को गने। राजभोन भोज को सवै जने गये। बने। भाँति भाँति अन्नपान व्यंजनादि जेंवहीं। देत नारि गारि पूरि भूरि भूरिभेवहीं ॥ १३७ ।। १-चंदनसा-वंदनीयता, वंदन किये जाने की योग्यता ।

( ३० ) । हरिगीत छंद] *अय गारि तुम कहँ देहिं हम कहि कहा दुलह, राम । कटु थाप प्रिय परदार सुनियत करी कहत फुयाम । को गर्ने कितने पुरुष कीन्हें कहत सब संसार जू। मुनि कुंयरचित वरणि ताको कहिय सय व्योहार ॥१३८ बहु रूप सां नययोवना यहु रत्नमय यपु मानिये । पुनि पंश रिनाकर यन्या प्रति चित्त चंचल जानिये ॥ शुभ शेष फण मणिमाल पलिका परति करति अंबध जू। करि शीश पश्चिम पॉय पूरव गात सहज सुगंध जू ॥१३॥ वह हरी हठि हिरनाक्ष दयत देखि सुंदर देह सां। वरवीर यमवराह पर ही लई दोनि सनेह स॥ गई विघल अंग पृथु फिरि सजे सफल गारज् । - पुनि कटुक दिन वश ताके लिया सरयस सारजू॥४०॥ वह गयो प्रभु परलोक कीन्हों हिरणकश्यप नाथ जू। तेहि भांति भाँतिन भोगियो भ्रमि पल न छोड्यो साथ जू॥ यह असुर श्रीनरसिंह माखो लई प्रबल छड़ार के। ले दई हरि हरिचंद राजहिं यहुत जो मुख पाइ कै ॥ १४ ॥ हरिचन्द्र विश्वामित्र को दई दुष्टता लिय जानि के। तेहि यरी लि यरिवंड यर ही विम तपसी जानि के। *पमा करते है कि केशवदास के कहने से यह गारी प्रवीणराय पानुरी ने बना दी थी।

- ( ३१ ) बलि बांधि छल बल लई बावन दई इंद्रहि आनिकै तेहि इन्द्र तजि पति कस्खो अर्जुन सहस भुज कोजानिकै ॥१४२॥ तव तासु मदछवि छक्यो अर्जुन हत्या ऋषि जमदग्नि जू। परशुराम सो सकुल जाखो प्रबल बल की अग्नि जू । तेहि बेर तवहीं सकल क्षत्रिन मारि मारि बनाइ के इकवीस वेरा दई विप्रन रुधिर जल अन्हवाइ कै ॥ १४३ ॥ वह रावरे पितु करी पत्नी तजी विप्रन थंकि के अरु कहत हैं सब रावणादिक रहे ताकहँ दूंकि कै १ ॥ यहि लाज मरियत ताहि तुम सों भयो नातो नाथ जू। अव और मुख निरखें न ज्यों त्यों राखियो रघुनाथ जू ॥१४४॥ वरात विदाई [सोरठा] प्रात भये सय भूप, बनि बनि मंडप में गये। जहाँ रूप अनुरूप, ठौर ठौर सव शोभिजे ॥ ४५ ॥ [नाराच छन्द] रची विरचि वास सी निथम्बराजिका भली जहाँ तहाँ विछावने बने धने थली थली । वितान श्वेत श्याम पीत लाल नीलका रंगे मना दुहूँ दिशान के समान विम्ब से जगे ॥ १४६॥ -- १-रदे ताकहँ दुकि फै-उसकी ताफ लगाये हैं। दप्ते सोने की ताफ में हैं। - ( ३२ ) 1 [पद्धटिका छन्द] गज मोतिन की अवली अपार । तहँ फलशन पर उरमति सुढार।' शुभ पूरित रति जनु रुचिर धार । जहँ तहँ प्रकाश गंगा उदार॥१४७॥ गंज दन्तन' को अवली सुदेश । तह कुसुमराजि राजति सुवेश। शुभ नृप कुमारिका फरति गान । जनु देविन के पुष्पक विमान ॥ १४ ॥ [तामरस छन्द] इत उत शोभित सुन्दरि डोलें । अर्थ अनेकनि बोलनि बोलें। मुखमुख मंडल चित्तनि मोहैं। मनहुँ अनेक फलानिधि सोह ॥ १४६ ॥ प्रकुटि विलास प्रकाशित देखें। धनुप मनोज मनामय लेने चरचित हास चन्द्रिकनि मानो। 65 मुखमुख यासनि वासित जानो ॥ १५० ।। [ दोहा] "अमल कपोले पारसी, याह चम्पक मार। अवलोकन विलोकिये, मृगमद मय धनसार ॥ १५ ॥ १-दंतन-टोड़ा। .

पलकाचार [सवैया] बैठे जराय जरे पलिफा पर रामसिया लव को मन मोहे। ज्योति समूह रहे मढिकै सुर भूलि रहे वपुरे नर को हैं। केशव तीनिहुं लोकन की अवलोकि वृथा उपमा कवि टोहैं। शोभन सूरजमंडल मांझ मनो कमला-कमलापीत सोहे ॥१५२|| राम का शिवनख [ दोहा] गगाजल' की पाग शिर, सोहत श्रीरघुनाथ । शिव शिर गाजल किधी, चन्द्र चन्द्रिका साथ ॥१५३॥ [तोमर छन्द] । कछु नकुटि कुटिल सुवेश । अति अमल सुमिल सुदेश। विधि लिख्यो शोधि तुतंत्र । जनु जया जयं के मंत्र ॥५४|| [दोहा यपि भ्रकुटि रघुनाथ की, कुटिल देखियत ज्योति । तदपि सुरासुरनरल फी,निरखि शुद्धगति होति ॥१५॥ श्रवण मकर कुडल लसत, मुख सुखमा एकम । शशि समीप सोहत मनो, श्रवण मकर नक्षन ॥१५॥ - १-गाजत-रकार का कपड़ा। ३ ( ३२ ) ४- [परटिका पन्द] गजमोतिन की अयली अपार। तहँ कलशन पर उरमति सुदार ।। शुम पूरित रति जनु रुचिर धार। जहँ तहँ अकाश गंगा उदार ॥ १४७॥ गंज दन्तन' की अपली सुदेश । तहँ कुसुमराजि राजति सुवेश । शुभ नृप कुमारिका फरति गान । जनु देविन के पुष्पक विमान ॥ १४ ॥ [सामरस छन्द] इत उत शोभित सुन्दरि डोलैं । अर्थ अनेकनि योलनि चोलें। सुखमुख मंडल चित्तनि मोह। मनहुँ अनेक कलानिधि सोहैं । १४६ ॥ भ्रकुटि पिलास प्रकाशित देखे। धनुष मनोज मनोमय लेखे। चरचित हास चन्द्रिकनि मानो। मुग्यमुख यासनि यासित जानो ॥ १५० ॥ [दाहा] अमल कपाले पारसी, याह चम्पक मार। - अवलोकन विलोकिये, मृगमद मय धनसार । १५१ १-दंतन टोड़ा।

२२ । पलकाचार [सवैया] बैठे जराय जरे पलिफा पर रामसिया सव को मन माहे। ज्योति समूह रहे मढ़िके सुर भूलि रहे वपुरे नर को हैं। केशव तीनिहुं लोकन की अवलोकि वृथा उपमा कवि टोहैं । शोभन सूरजमंडल मांझ मनो कमला-कमलापीत सोहें ॥१५२॥ राम का शिरखनख [दोहा] गगाजल की पाग शिर, सोहत श्रीरघुनाथ । शिव शिर गङ्गाजल किधौं, चन्द्र चन्द्रिका साथ ॥१५३॥ [ तोमर छन्द ] पार्छ भ्रकुटि कुटिल सुवेश । श्रति अमल सुमिल सुदेश । विधि लिख्यो शोधि सुतंत्र । जनु जया जयं के मंत्र ॥१५॥ [दोहा] यदपि भ्रकुटि रघुनाथ की, कुटिल देखियत ज्योति । तदपि सुरासुर नरन की,निरखि शुद्धनति होति ॥५५॥ श्रवण मफर कुंडल लसत, मुख सुखमा एकन। शशि समीप सोहत मनो, श्रवंग मकर नक्षत्र ॥१५॥ गाजरक प्रकार का कपड़ा। Pune [पद्धटिका छन्द] अनि बदन शाम सरसी मुरग। नह कमल नयन नामा तरंग। जनु युवनि चिन्न विभ्रम बिलास । तेर भ्रमर भंवत ग्स उप श्रास ॥ १५ ॥ [निशिपालिका छन्द गाभिजति दन्तचि' शुन उरानिये । सत्य ननु कप अनुरूपक यखानिये । प्राट चि ग मधिशेष शुभ श्रीग्ये । माधि ननु श शुभ लक्षागा मये दये ॥iya | देहा7 दीत वाण ग्राया श्रीरघुनाथ की लमति कम्युबर प। माधु मना यच काय की साना लिम्वी त्रिरंप || 1488 [मुन्दरी छन्द सामन विगनन । दर मिगत श्रत लानन। का नागिन पानह। है नमाग्न नी ध्वन र म गुलान अम्मान। । मरमीर माना। मानन1170" - याम्नाशय-1-सान्नि।

जनु वेदन के ( ३५ ) सोहति है उर में मणि यों जनु । जानकी को अनुरागि रह्यो मनु ॥ १६१ ।। [ दोहा] ..ाहत जनरत रामवर, देखत जिनको भाग। श्राइ गयो ऊपर मनो, अन्तर को अनुराग ॥ १६२ ॥ [.पद्धटिका छन्द] शुभ मोतिन की दुलरी सुदेश । अक्षर सुवेश। गजमोतिन की माला विशाल । मन मानहुँ सन्तन के मराल ॥ १६३ ॥ [विशेषक छन्द ] श्याम दुवौ पग लाल लस द्युति यों तल की। मानहुँ सेवति ज्योति गिरा यमुनाजल की। पाट जटी प्रति श्वेत सो हीरन की प्रवली। देवनदी कन मानहुँ लेवत भाँति भली ।। १६४ ॥ [ दोहा को बरणे रघुनाथ छथि, फेशव बुद्धि उदार। जाकी किरपा शोभिजति, शोभासय संसार ॥ १६५ ॥ २-जनरत-मतदसलता।

29 ( ३६ ) सीता का रूप वर्णन [दंडक] को है दमयन्ती इन्दुमती रति राति दिन, होहिं न छबीलो छथि इन जो भंगारिये। केशव तजात जलजात जातवेद प्रोप, जातरूप यापुरो विरुप सो निहारिये। मदन निरूपम निरूपन निरूप भयो, चन्द बहुरूप अनुरूपके विचारिय। सीता जू के रूप पर देवता फुरुप को हैं, रुपही के रूपक तौ पारिवारि सारिये ॥१६॥ [गीतिका बन्द] श्री शमिजै सखि सुन्दरी अनु दामिनी यपु मंडिके। धन श्याम को जनु सेवहीं जड मेघ योधन इंडिक। यक अंग चर्चित चार नन्दन चन्द्रिका तलिचन्द को। जनु राहु के भय सेवहीं रघुनाथ पानँदफंदको ॥१६७५ मुख एक है नत लोकलोचन लोत तोचन को हरे। जनु जानकीसँग शोभिजे शुम लाज देहम को धरे।। तहँ एक फूसन के विभूपण एक मोतिन के किये। जनु क्षीरसागर देवता तन क्षीर छोउनि को छिये l [सोरठा] .. - पहिरे घसन सुरंग, पायक युत स्याहा मनो। सहज सुगन्धित अंग, देयी मलय की ।।१६६॥

। maavatmak दायज वर्णन [चामर छंद] मत्त दन्तिराज. राजि बाजिराज राजि के हेम हीर मुक्त चीर चार साज साजि के वेप वेष वाहिनी अशेष वस्तु सोधियो। दाइजो विदेहराज भांति भांति को दियो ।। १७० ।। वस्त्र भौन स्यों१ वितान आसने बिछावने। अस्त्र शस्त्र अंगत्राण भाजनादि को मने। दासि दास वालि बासरोम पॉट कोकियो। दाइजो' विदेहराज भांति भांति को दियो । १७१॥ परशुराम संवाद [ दोहा] विश्वामिन बिदा भये, जनक फिरे पाहुँचाइ । मिले नागिली फौज को, परशुराम अकुलाइ ॥ १७२ ॥ [चंचरी छन्द] भत्तदन्ति अमत्त होगये देखि देखि न गजहीं। .ठौर ठौर सुदेश केशव दुन्दुभी नहिं बजही !! डारि डारि हथ्यार शरज जीव लै लै भजही। काटि के तनत्राण एकै नारि लेपन सजही ।। १७३ ॥ १-त्येांसहित । २-यासितुगंध से सुवातित करके । ३- बास घसा ४---दाइजो-दहेज।

. [दोहा ] वामदेव ऋपि सों कहो, परशुराम रणधीय परशुराम महादेव को धनुप यह, कोतारेउ बलवीर ।। १७४ ।। घामदेघ-महादेव को धनुप यह, परशुराम ऋषिराज । कहतही, समुझेउ रावण राज ॥ १७ ॥ चन्द्रकला छन्द] १ परशुराम--पर घाण-शिस्तीन अरोप समुद्रहि, सेोधि सखा मुख ही तरिही। पुनि संकहि श्रीटि फलंकित के, फिरि पंक कनंकहि को मरिहीं। मल मुजि के राख मुम्ने करिक, दुख दीरथ देवन को हरिही ।। शितकंठ के फंटन को कठुला, दशकंट के कंटन को करिहों ।। १७६ ॥ [सयुना छन्द] परशुराम-यह कौन को दल देखिये । धामदेव-यह राम को प्रभु लेखिये। परशुराम-काहि कौन राम न जानियो। वामदेव-शर ताड़का जिन मारियो ।। १७७॥ १-मुख-महा हो।

( ३६ ) अरु गने। [विजय छन्द] परशुराम-ताड़का संहारी तिय न विचारो कौन घड़ाई ताहि हने॥ वामदेव-मारीच हुते सँग प्रबल सकल खल सुबाहु काहू करि क्रतु रखवारी गुरु सुखकारी गौतम की तिय शुद्ध करी। जिन रघुकुल मंड्यो हरधनु खंडयो सोय स्वयंवर मांझ वरी॥ १७ ॥ परशुराम [दोहा] हर हु होतो दंड द्वै, धनुप चढ़ावत कष्ट । देखो महिमा काल की, फियो सो नरशिशु नष्ट ||१७६॥ [विजय छंद] :- थोरो सवै रघुवंश कुठार को धार में वारन वाजि सरत्यहि । वाण फी वायु उड़ाइ कै लक्षन लक्ष करौं नरिहा समरत्यहि । रामहि चाम समेत पठे वन कोप के भार में मुंजों भरत्यहि । जो धनुहाथ धरै रघुनाथ तो आजु अनाथ करौं दशरत्यहि॥१०॥ [लोरठा] राम देखि रघुनाथ, रथ ते उतरे वेगि दे। गहे भरत को हाथ, पावत राम विलोकियो ।। ११ ॥ : -तु-दा।

.४ (४०) [दंडक छन्द] परशुराम-अमल सजल घनश्याम वपु केशोदास चंद्र ते चारु मुख सुखमा को ग्रामहै। कोमल कमल दल दीरय विलोचननि सोदर समान रूप न्यारो म्यारो नामहै। पालक पिलोफियत पूरण पुरुष गुण मेरो मन मोहियत पेसो एक याम है। वैर मान वामदेय को धनुष तोरो इन जानत हो योसविसे राम वेप काम है ॥ १२॥ पती [गीतिका छन्द] भरत-कुश मुद्रिका समिधं नुया कुश श्री कमंडल को लिये। करमूल धनु तर्कसी भृगुलात सी दशै हिये। धनु याण तिक्ष फुठार केशव मेखला मृग चर्म सों। रघुवीर को यह देखिये रसबीर सात्विक धर्मसो॥१८॥ [ नाराच छन्द] राम-प्रचंड हैहयाधिराज -दंडमान जानिये। अखंड फीति लेय भूमि देद्यमान मानिये ॥ अदेय देव जेय मीन रक्षमान लेखिये। प्रमेय तेज भर्गभक्त मार्गवेश देखिये ॥ १४॥ परशुराम-मुनि रामचन्द्र कुमार । मन वचन कीर्ति उदार॥ राम-भृगुवंश के अयतंश । मनवृत्ति है त्यहि अंश ॥१८॥ -- ..

( ४१ ) परशुराम- [मदिरा छन्द] तोरि शरासन शंकर को शुभ सीय स्वयंवर मांझवरी। ताते वयो अभिमानमहा मन मेरीयो नेकन शंक फरी॥ | राम--सो अपराध परो हम सों अब क्यों सुधरै तुमहूंधों कहो। चाहुदै दोउ कुठारहि केशव आपने धाम को पंथ गहो।१८६॥ [ कुंडलिया] :-टूटै टूटनहार तरु वायुहि दोजत दोष । को हम पर कीजत रोष। हम पर कीजत रोप कालगति जानि न जाई। होनहार द्वै रहै मिटे मेटी न मिटाई। होनहार है रहै मोह मद सब को छूट। हो तिनूका वज्र वज तिनुका है दूदै ॥१८७॥ चाहु त्यों श्रय हर के धनुष [विजय छन्द] परशुराम-केवश हैहय राज को मांस हलाहल कौरन खाइ लियोरे। तालगि मेद महीपन को घृत घोरि दियो न सिराना हियो रे। षडानन को तो पल में करि पान लियो रे। तौलों नहीं.. सुख जो लहुं तू रघुवंश को शान सुधा न पियो रे ॥ १८ ॥ १-खोरम(तोर) दुध । खीर मद केशव (१२) [तंत्री छन्द] भरत-योलत कैसे भृगुपति सुनिये सो कहिये तन मन यनि श्रायो। ) श्रादि यड़े ही यष्टपन पत्री जाते तुम सय जग यश पायो । चन्दनहूं में अति तन घसिये आगि उठे यह गुनि सब लोजे । मारे नृपति संहारे सो यश लै किन युग युग जोजै ॥ १८६ ॥ [माराच छन्द] -मली कही भरत्य ते उठाय यागि अंगते । चढ़ाउ चोपि चाप नाप याण ले निपंगते । प्रभाउ आपनो देसाउ छोड़ि याल मारके। रिझाउ राजपुत्र मोहिं राम लै छुड़ाई के ॥ १० ॥ [सोरठा] लियो चाप जय हाथ, तीनिहु भैयन रोप करि। राम-चरज्यो श्री रघुनाथ, नुम बालक ज्ञानत कहा ॥ १६॥ [ दोहा मगवन्तन सों जीतिये, कय? न कीने शक्ति । जीती पकै यात में, केवल कोने मति।। २६२ - ( ४३ ) हरिगीत छंद] जय हयो हैहयराज इन विन क्षत्र क्षितिमण्डल कयो । गिरिवेध पटमुख जीति तारक नंद को जब ज्यो हस्यो | सुत में न जायो राम सो यह कयो पर्वतनंदनी।। घह रेणुका तिय धन्य धरणो में भई जगवंदिनी ॥ १६३ ॥ [ तोमर छन्द ] परशुराम-सुनु राम शील समुद्र । तव बंधु हैं अति क्षुद्र। मम वाडवानल कोप । अँगु कियो चाहत लोप॥१४॥ [दोधफ छंद] भृगुनंद बली जग माहीं, राम विदा करिये घर जाही, हो तुमसों फिरि युद्धहि मांडो क्षत्रिय वंश को वैर लै छाड़ों ॥ १६५ ॥ [ तोटक द] यह बात सुनी भृगुनाथ जवै । परशुराम-कहि रामहि लै घर जाहु अवै ॥ इन पै जग जोवत जो पचिहाँ। रण हैं। तुमसों फिरिकै रचिहाँ ।। १६६ ॥ [दोहा] निज अपराधी क्यों हतों, गुरुअपराधी छांड़ि। ताते फठिन कुठार भय, रामहिं सारण मांडि ॥ १६७ ।। शत्रुम-हो . ८ ( ४४ ) [विजय छंद] भूतल के सब भूपन को मद भोजन तो यहु भांति कियाई । मोद सा तारक नंद को भेद पद्दपावरि पान सिरायो हियो। खीर पडानन को मद फेराव सो पल में करि पान लियाई । राम तिहारे कंठ को श्रोणित पान को चाहे कुठार कियो । १६॥ [तोटक छन्द] लक्ष्मण-जिनकोहि अनुग्रह पृद्धि करै। तिनको किमि निग्रह चित्तपर। जिनको जग अच्छत प्रोश धरै। ५२ तिनको तन सहत फोन करे ॥ १ ॥ [विशेषक छंद] .२७.म-हाथ धरे हथियार सयै तुम शोमत हो। मारनहारहि देखि कद्दा मन तोमत हो । क्षत्रिय के पुत्त है किमि यैनन दीन रची। कोटि करो उपचार न कैसे हुमीचु यची ॥ २० ॥ १-पमयावरिशिबान । २-निपहदह।

( ४५ ) लक्ष्मण-क्षत्रिय है गुरु लोगन के प्रतिपाल करें भूलिहु तो तिनके गुण श्रीगुण जो न धरें। तौमको गुरुदोष नहीं श्रव एक रती । जो अपनी जननी तुमही सुख पाइ हती ।। २०१ ॥ [विजय छन्द परशुराम-लक्ष्मण के पुरिषान कियो पुरुपारथ सो न कधो परई। वेप बनाइ कियो बनितान को देखत केशव यो हरई। कूर कुठार निहारि तजै फल ताको यहै जो हियो जरई। आजु ते केवल तोको महाधिक क्षत्रिन पै [गीतिका छन्द] तव एक विंशति और मैं विन क्षत्र की पृथिवी रची। बहु कुंड श्रोणित सों भरे पितु तर्पणादि क्रिया सची ॥ उबरे जे क्षत्रिय क्षुद्र भूतल शोधि शोधि संहारि है।। अव याल इद्ध न ज्वान छाँडहुँ धर्म निर्दय पारि हो ॥२०॥ [दोहा] राम-भृगुकुल कमल दिनेश सुनि, ज्योति सफल संसार! क्यों चलिहै इन शिशुन पै, डारत हो यशभार ॥२०॥ जो दया करई ॥

(४६ ) [सोरठा] परशुराम-राम मुन्धु सँमारि, छोड़त हैं। शर पाएहर।। हथ्यारन डारि, हाय समेतिन येगि ॥२०॥ [पद्धटिका छंद] राम-सुनि सफल लोक गुरु जामदनि । तप घिशिप अशेषन की जो अग्नि । सप विशिष छोड़ि सहिदी असंह। हर धनुष कस्रो जिन पंड खंड।।२०।। [सवैया] परशुराम- हमारन के तनयाय पिचारि विचारि रिंचि करे हैं। इल ब्राह्मण नारि नपुंसक जे जग दीन मुभाव भरे हैं। । कद्दा करिहा तिनको तुम पालक देय अदेय घरे हैं। धे के नंद तिहारे गुरु जिनते ऋषिवेष किये उपर हैं ॥२०33 [पटपद] -मगन भयो हर धनुप शाल तुमको अब शाले। पृथा होइ विधि सृष्टि शासन ते चाले। सक्त ताक संहरट शेप शिर ते घर रहा। सप्त सिंधु मिलि जाहि होहिं सपही तम भार । थति अमल ज्याति नारायणी कहि केशव बुड़ि जाहि भृगुनंद संभार कुटार में किया शरासन युक्त शर १-मिगता में।

आपुन आये। ( ४७ ) [स्वागता छंद] राम राम जब कोप कस्यो । लोक लोक भय भूरि भयो जू वामदेव तय राम देव दोऊ समुझाये ।। २०६ ।। [ दोहा] महादेव को देखि कै, दोऊ राम विश् कीन्ही परम प्रणाम उन, पाशिप दियो अशे [चतुप्पदी] महादेव-भृगुनंदन सुनिये मन महँ गुनिये रघुनंदन निदापा। निक्षु ये अविकारी सब सुखकारी सबही विधि संतापी। एकै तुम दोऊ और न कोऊ एकै नाम कहायो। आयुर्वल खूट्योधनुप जो दूट्यो मैं तनमन सुख पायो २११ [पद्धटिका छंद] तुम अमल अनंत अनादि देव । नहिं वेद वखानत सकल भेव ।। सब को समान नहिं वैर नेह । सय भक्तन कारन धरत देह ॥ २१२॥ अव श्रापनपी पहिचानि विप्र । सब करहु नागिलो काज शिम ॥ -------- १-निजु-निश्य।

. तय नारायण को धनुष जानि । भृगुनाथ दियो रघुनाथ पानि ॥ १३ ॥ [मोटनक छंद] नारायण को धनुयाण. लिया। ऐच्यो हँसि देवन मोद किया। रघुनाथ कहेउ अय काहि ह नो। त्रैलोक्य कैंप्यो भय मान घनो ॥ २१४ ॥ दिग्देघ दहे बहु पात बहे। भूकम्प भये गिरिराज दहे। श्राकाश चिमान अमान छये। हा हा सयही यह शब्द रये ॥ २१५ ॥ [शशिवदना छंद] परशुराम-जग गुरु जान्यो । त्रिभुवन मान्यो। मम गति मारी। हदय विचारी ॥ २१६ ॥ [ दोहा] द्वार विषयो की ज्यों पुष्पशर, गति को हनत अनंग। रामदेव त्योंही किया, परशुराम गति भंग H २१७ ॥ [चतुप्पी छंद] सुर पुर गति भानो शासनमानी भृगुपति को सुप भारो। आशिप रसभोने सव सुख श्रय दशकंठहि मारो ॥२१॥ .

( ४६ ) [दोहा] सोवत सीतानाथ के, भृगुमुनि दोन्ही लात । भृगुकुलपति को गति हरी, मनो सुमिरि वह यात ॥२१॥ [सवैया] ताड़का तारि सुयाहु सँहार कै गौतम नारि के पातक टारे। :, चाप हत्यो हर को हँसि के तव देव अदेव हुते सब हारे । सीतहि व्याहि अभीत चल्यो गिरि गर्व चढे भृगुनंद उतारे। श्रीगण्डभ्वज को धनु लै रघुनन्दन औधपुरी पगुधारे ॥ २२० । अयोध्या श्रागमन [सुमुखी छंद] व नगरी बहु शोभ रये । जहँ तहँ मंगल चार ठये बरणतहकविराजयने । तन मन बुद्धि विवेक सने ।। २२१ ।। [मोटनक छंद] ऊंची बहु वर्ण पताक लसैं । मानो पुर दीपति सी दरसें ।। देवी गण व्योम विमान लसैं । शोभै तिनके मुख अंचल ॥२२॥ [तामरस छंद] घर घर घंटन के रव घा। विच विच शंख जु झालरि साजै। पटह पखाउजश्नावझ' सोहै। मिलि सहनाइन सोमनमोह।२२॥ [हीरक छंद] सुंदरि सय सुंदर प्रति मंदिर पर यों बनी। मोहन गिरि गन पर मानहुँ महि मोहनी ॥ ॥ ॥ - १-माधम-वाशा।

( ५० ) भूपनगन भूपित तन भूरि चितन चारही। देखत्ति जनु रेखति तनु यान नयन फोरही ॥ २४॥ {संदरी छंद] कर शल चढ़ी मन मोहति । Jसिद्धन की तनया जनु साहति ॥ ऊपर पनिनि मानहुँ। कपन ऊपर दीपति जानहुं ॥ २२५ ॥ [विशेषक छंद] एक लिये कर दर्पण चंदन चित्र करे। मोहति है मन मानहुँ चांदनि चंद घरे । नेन विशालनि अंयर लालनि ज्योति जगी। मानहुं रागिनि राजति है अनुराग रंगी ॥ २२६ ॥ नील निचोलन को पहिरे यक चित्त हरे। मेघन की युति मानहुं दामिनि देहधरे ॥ पकन के तन सूक्षम सारि जराय जरी। सूर करावलि सी जनु पनिनि देह घरी ॥ २२॥ [ताटक छंद] घरपै कुसुमावलि पकयनी शुभ शोमन कामलता सी यनी। घर फल फूलन लायक' की। जनु है तरुणी रति नायक की ॥ २२८ । 1-पर-द्वाशनाश धारीवी।

( ५१ ) [ दोहा] भीर भये गज पर चढ़े, श्रीरघुनाथ विचारि॥ तिनहिं देखि घरणत सबै, नगर नागरी नारि ॥ २२६ ।। [तोटक छंद] तम पुंज लियो गहि भानु मनो। गिरि अंजन ऊपर सोम भनो । मनमत्य विराजत शोभ तरे • 1 जनु भासत लोभहि दान करे ॥ २३० ॥ [मरहट्टा छंद ] आनंद प्रकासी सब पुरवासी करत ते दौरा दौरी । आरती उतारै सरवस वारें अपनी अपनी पोरी॥ पदि मंत्र अशेपनि करि अभिषेकनि आशिष देसविशेषै। कुंकुम कर्पूरनि मृगमद चूरनि वर्षति वर्षा वेपै ॥२३१॥ [आभीर छंद] यहि विधि श्रीरघुनाथ । गहे भरत को हाथ ॥ पूजत लोग अपार । गये दरयार ॥२३२॥ गये एकही बार। चारों राज कुमार ॥ सहित वधूनि सनेह । कोशल्या सनेह । कोशल्या के गेह ॥ २३३ ॥ राज १-शोभतर=शृगार के नीचे। (पागातर) 'जनुरागत काम सिंगार तरे।

( ५२ ) [त्रिभंगी छंद] पाजे बहु या तारनि सार्ज सुनि सुर लाजै दुख मानें। नाचं नव नारी सुमन अँगारी गति मनुहारी सुख साजै। पीनानि यजा गीतनि गाउँ मुनिन रिमा मन भावें। भूषण पट दीजै सय रस भीजै देखत जाजै'छवि छावें ॥२३३१ [सोरठा] रघुपति पूरण चंद, देखि देखि सब सुख महें। दिन दूने पानंद, ता दिन ते तेहि पुर यढ़े ॥ २३४ ॥ ॥ इति चातकांड।

. अयोध्या कांड रामवनगमनवर [ दोहा] रामचंद्र लक्ष्मण सहित, घर राखे दशरत्य । विदा कियो ननसार को, सँग शत्रुघ्न भरत्थ ॥ १ ॥ [तोटक छंद] दशरथ महा मन मोद् रये । तिन चोलि वशिष्ठहि मंत्र लये ॥ दन एक कहो शुभ शोभरयो। हम चाहत रामहि राज दयो ॥२॥ यह बात भरत्थ की मातु सुनी। पठऊं वन रामहि बुद्धि गुनी ॥ तेहिं मंदिर में नृपसों विनयो । वर देहु हतो हमको जो दयो ॥३॥ नृप बात कही हँसि हेरि हियो। दशरथ--वर मांगि सुलोचनि में जो दियो। कैकेयी- "नृपता मुविशेष भरत्य लहैं। वर वन चौदह राम रहें ॥४॥ [पद्धटिकाछंद] यह बात लगी उर वज्र तूल । हिय फाट्यो ज्यों जीरण दुकूल ॥ उठि चले विपिन कहँ सुनत राम । तजि तात मात तिय बंधु धाम ॥५॥ १-गनसारननहाल।

न ( ५४ ) कौशिल्या और राम [मौकिकदाम छंद] गये तहँ राम जहां निज मात । राम--कही यह बात कि हैं बन जात । फलू जनि जो दुख पायहु माइ । सो देहु अशीप मिली फिरि पार॥६॥ कोशल्या-रही चुप है सुत क्यों यन जाहु । न देखि सके तिनके उर दाहु । लगी अब पाप तुम्हारहि याइ । कर उलटी विधि क्यों कहि जाह ।। ७॥ [ग्रह्मरूपक छंद] राम-अन्न देर सीख देर राखि लेइ प्राण जात् । राज पाप मोल ले कर जो दीद पोपि गात । दास होर पुत्र होर शिष्य हो। फोर मार। शासना' न मानई तो कोटि जन्म नर्क जाद= I [हरनी छंद] कौशल्या-मोहिं चली यन संग लियें । पुत्र तुम्हें हम देखि जियेंग - श्रीधपुरी महँ गाज पर । के अब राज भरत्य करे ॥६ [तोमर छंद] राम-तुम क्यों चलो बनानुजिन शीश राजत राज॥ जिय जानिये पति देव। करि सर्वमोतिन सेव ॥१०॥ १-शामना-प्रामा।

। ( ५५ ) 'यति देह जो अति दुःख । मन मानि लोजै लुःख ॥ सब जक्त' जानि अमित्र। पति जानि केवल मित्र ॥११॥ [अमृतगति छंद] नित पति पंथहि चलिये । दुख सुख को दलु दलिये। तन मन सेवहु पति को। तवं लहिये शुभ गति को ।। १२ ॥ [स्वागता छंद] योग याग व्रत आदि जो कीजै । न्हान गानगुन२ दान जो दीजै । धर्म कर्म सब निष्फल देवा। होहिं एक फल के पति सेवा ॥ १३ ॥ तात मातु जन सोदर जानी। देवर जेठ सगे सो बखानों। पुत्र पुत्रसुत श्री छवि छाई। विहीन भरता दुख दाई ॥१४॥ [ कुंडलिया] नारी तजैन आपनो, सपने हूं भरतार। पंगु गुंग धौरा बधिर, अंध ननाथ अपार ॥ अंध अनाथ अपार वृद्ध धावन अति रोगी। पालक पंडु कुरूप सदा कुवचन जड़ योगी ।। कलही कोढ़ी भोर चोर ज्वारी व्यभिचारी। अधम अभागी कुटिल कुपति पति तजै न नारी ॥ १५ ॥ २-तमगत, संसार । २ानगुण गान, इरिकीर्तम।

. ( ५६ ) पंकजवाटिका छंद] नारित न मरे भरतारहि । तासंग सहति धनंजय भारहि ॥ जो कोई करतार जियायत । तौ ताको यह यात सुनावत.॥१६॥ [निशिपालिका छंद] गान बिन मान यिन हास यिन जीयहीं। तप्त नहिं खार जल शीत नहिं पीवहीं। तेल तजि खेल तजि पाट तजि सोवहीं। शीत जल न्हाइ नहिं उष्ण जल जोवहीं ॥ १७॥ खाय मधुरान नहिं पाय पनही धरै। काय मन वाच सत्र धर्म करियो करें। कृच्छ उपवास सव इद्रियनि जीतही। पुषशिपलीन तन जोलगि अतीतही ॥१॥ [दोहा] पति हित पितु पर तनु तज्या, सती साखि दै देव । लोक लोक पूजित भई, तुलसी पति की सेय ॥ १६ मनसा याचा कर्मणा, हम सों छोड़ा नेहु । राजा को विपदा परी, तुम तिनकी सुधि लेहु । २० ५पनगर-पग्नि। २-कृष्ट्रपयासचंद्रापण प्रत। ३-मतीता मरे, परपु को माता ( ५७ ) सीता प्रति राम का उपदेश [ पद्धटिका छंद] उठि रामचन्द्र लक्ष्मण समेत । तब गये जनक तनया निकेत ॥ राम--सुनु राजपुत्रिके एक बात। हम वन पठये हैं नृपति तात ॥२१॥ तुम जननि सेव कहँ रहहु वाम। कै जाहु श्राजुही जनक सुनु चन्द्रवदनि गजगमनि ऐनि। मन रुचै सो कीजै जलजनैनि ॥ २२ ॥ [नाराच छंद] सीता-न हो रहों न जाहुँजू विदेह धाम को अवै। कही जो बात मातु ये सो श्राजु मैं सुनी सबै ।। लगे क्षुधाहि मा भली विपत्ति मांझ नारिये । पियास त्रास नीर वीर युद्धमें लम्हारिये १२३ ॥ [सुप्रिया छंद ] लक्ष्मण-वन महँ विकट विविध दुख सुनिये। गिरि गहवर मंग अगमहि गुनिये ॥ कहुं अहिं हरि कटुं निशिचर चरही। कई दव दहन दुसह दुख दहहीं ॥ २४ ।। [दंडक] सीता-केशोदास नींद भूख प्यास उपहास त्रास दुख को निवास विप मुखह गयो परै।..

(५८) वायु को वहन दिन दावा को दहन बड़ी याड़या अनल ज्याल जाल में रह्यो परे। जीरन जनम जात जोर सुर' घोर पीर पूरण प्रकट परिताप क्यों कह्यो पर। सहिही तपन ताप पति के प्रताप रघु धीर को विाह पीर मोसो न साधो पूरै ॥ २५ ॥ लक्ष्मण प्रति राम का उपदेश [विशेषक छंद] राम-धाम रहो तुम लक्ष्मण राज की सेव करो। भातनि के सुनि तात सो दीरय दुःस हरी। श्राइ भरत्थ कहा धीं करे जिय माय गुनी। जो दुख दाँतो ले उरगी यह यात मुनी ॥ २६ ॥ [दोहा] -सदमण-शासन मेटो जाय क्यों, जीवन मेरे हाथ। पेसी कैसे झिये घर सेयक वन नाथ ॥ २७ ॥ यनयात्रा हितयिलंबित छंद] विपिन मारग राम पिराजहीं। सुखद मुन्दरि सोदर माजही। विविध श्रीफल सिद्धि मनो फल्यो। सफल साधन सिद्धिहि ले चल्यो॥२॥ -भुरकवर, ३गीकार करो, सो।

( 8 ) [ दोहा] राम चलत सव पुर चल्यो, जहँ तहँ सहित उछाह । मनो भगीरथ, पथ चल्यो, भागीरथी प्रवाह ॥ २६ ॥ [चंचला छंद] रामचन्द्र धाम ते चले सुने जवै नृपाल । चात को फहै सुनै सो है गये महा विहाल ॥ ब्रह्मरंध्र फेरि जीव यों मिल्यो द्युलोक जाइ। गेह चूरि ज्यों चकोर चंद्गमै मिलै उड़ाइ ॥ ३० ॥ [चंचरी छंद] कौनही कित ते चले कित जात हो केहि काम जू। कौनको दुहिता बहू कहि कौन की यह वाम जू ॥ एक गाँउँ रही कि साजन मित्र बंधु पखानिये। देश के परदेश के किंधों पंथ की पहिचानि ये ।। ३१ ।। [जगमोहन दंडक] किधौं यह राजपुत्री वरहीं वस्यो है किधौं, उपदि वलो है यहि शोभा अभिरत हो। किधी रति रतिनाथ जस साथ केशोदास जात. तपोवन शिव वैर सुमिरत हो। किधों मुनि शापहत किधौं ब्रह्मदोपरत किधौं सिद्धियुत सिद्ध परम विरत हो। १-गेह-पिंजड़ा। २-उपदिन्शुरुनन को रक्षा के विरुद्ध अपनी दवा से।

किधी कोऊग हौ ठगोरी लीन्हे किधी तुम हरि हर श्री ही शिवा चाहत फिरत हो ।। ३२ ।। [मत्त-मातंग-लीला-फरन दंडक] मेघ मंदाकिनी' चार सौदामिनी रूप करे लस देह धारी मनो। भूरि भागीरथी भारतो हंसजा अंश के हैं मनो भाग भारे मनो ॥ देवराजा लिये देवरानी मनो पुत्र संयुक्त भूलोक में सोहिये। पक्ष दु संधि संध्या सधी है मना लक्षि ये स्वच्छ प्रत्यक्ष ही मोहिये ॥१३॥ [अनंगशेखर दंडक तड़ाग नीर हीन ते सनीर होत केशोदास पुंडरीफ झुंड मौर मंडलीन मंडही। तमाल पल्लरी समेति सूखि सूसि के रहे ते याग फुलि फूलि के समूल शूल खंडही. चित चफोरनी चकोर मोर मोरनी समेत "हंस हंसिनी समेत शारिका सये पढ़ें। जही जही विराम लेत रामजू तही तही अनेक भांति के अनेक भोग भाग सो पदें ॥ १-मंदाकिनी आकारामंगा।

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( ६१ )
[सुंदरी छंद]
घाम को राम समीप महाबल ।
सीतहि लागत है अति शीतल ॥
ज्यों धन संयुत दामिनि के तन ।'
होत है पूप
भूपन ।। ३५॥
मारग की रज तापित है अति ।
केशव सीतहि शीतल लागति ।।
ज्यों पद पङ्कज ऊपर पायनि ।
दैजो चलै तेहि ते सुखदायनि ।। ३६ ॥
[दोहा]
प्रति पुर औ प्रति ग्राम की, प्रति नगरन की नारि।
सीताजू को देखि के, वर्णत हैं सुखकारि ॥ ३७ ।।
[जगमोहन दंडफ]
वासों मृग अङ्क कहें तोसों सृगनैनी सब
वह सुधाधर तुहूं सुधाधर मानिये।
वह द्विजराज तेरे द्विजराजि राजेंवह
कलानिधि तुहं कला कलित चखानिये।
रताकर के हैं दोऊ केशव प्रकाश कर
अंबर विलास कुवलय हित मानिये
वाफे अति शीत कर तुहूं सीता शीतफर
चंद्रमा सी चंद्रमुखी सब जग जानिये ।।३।।
१- पपन गो फर-सूर्य की किरणें।

किलित कलंक केतु केतु अरि सेत गात भोग योग को श्रयोग रोग हो को थलसों। पन्याई को पूरन पै प्रति दिन दुनो सुनो क्षण क्षण क्षीण होत छोलर' को जलसों।, चंद्रसा जो धरणत रामचंद्र की दोहाई साई मति मंद कवि केशय कुशल सों। सुंदर सुवास अरु कोमल अमल अति सीताज को मुख्न सखि केवल कमल सा ।। एके फहैं अमल कमल मुस्न सीता को एक कई चन्द्रसम आनंद को कंद री। होह जो कमल तौरयनि में न सकुचे री चंद जो तो यासर न होर द्युतिमंदरी।। सासर ही कमल रजनि ही में चंद्र मुख बासर रजनि विराजै जगवंद रो। देखें मुख भायै अन देखेई कमल चंद ताते मुख मुम्बै सखी कमली न चंद री ॥ ४० ॥ [दाहा। गतानयन चकोर सखि, रवियंशी रघुनाथ । रामचंद्र सिप कमल मुख, भला यन्या है साथ ॥४१॥ १-खोडाचुराष्ट्र, अंजुली । २-ताते......चंदरी इससे बस मुखके समान महो मुन्ध है. कमल और चंद्र इसके समान नहीं है।

( ६३ ) [विजय छन्द] बहु वागतड़ाग तरंगनि तोर तमाल की छांह विलोकि भली। घटिका यक बैठत हैं सुख पाय बिछाय तहां कुश काश थलो । मग को श्रम श्रीपति दुरि करें सिय के शुभ बाकला अंचल सों। श्रम तेऊ हरे तिन को कहि केशव चंचल चार दृगंचल सो॥४२॥ [ सोरठा] श्रीरघुवर के इष्ट, अश्रु वलित सीता नयन । सांची करी अदृष्ट, झूठी उपमा मीन की ॥ ४३ ॥ [ दोहा] मारग यों रघुनाथ जू, दुख सुख सवही देत । चित्रकूट पर्वत गये, सोदर सिया समेत ॥४४॥ भरत का आना [दोधक छंद] आनि भरत्त पुरी अवलोकी। स्थावर जंगम जीच सशोकी। भाट नहीं विरदावलि सार्ज कंजर गाजे न दुंदुभि ' याजै ॥ ४५ ॥ --- राज समान विलोकिय को। शोक गई तय सांदर दोऊ ॥ मंदिर मातु बिलोकि अकेली। ज्यों यिन वृक्ष विराजति वेली ॥४६॥ [वोटक छंद] तब दीरष देखि प्रणाम किया। उठि के उन कंठ लगाइ लियो । न पियो जल संत्रम भूलि रहे। तब मातु सों न मररथ कहे ।।23 भरत केकयी का प्रश्नोत्तर [विजया छंद] स्तु कहां नृप तात गये सुर लोकहि,पयो मुत शोक लये। उत कोनीमुराम कहां है अथैयन लक्ष्मण सीय समेत गये नि काज कद्दा कहि फेवल मो सुननाको कहा मुन्न याम भये एमको प्रमुताधिक तोको कहा अपराध विनासिगरेईहये mal [दाहा मन मुत विद्धपिनी, मयही को दुरादार। यह कहि देने भरत तय, कौशल्या के पार ||४|| मरत कौशल्या पार्ता [तोटफ छंद] तय पायन जार भरत्य पर। उन भेटि उटाह के अंक मरे।। , . d शिर संधि विलोकि बलाइ लई ।:. सुत तो पिन या विपरीत भई ॥ ५० ॥ [तारक छंद] सरत-सुनु मातु भई यह बात श्रनैसी। जु करी सुत भर्तृविनाशिनि जैसी ॥ यह बात भई श्रव जानत जाके। द्विज दोप परें सिगरे शिर ताके ।। ५१ ॥ जिनके रघुनाथ विरोध वसै जू। मठधारिन के तिन पाप असे जू॥ रस राम रस्यो मन नाहिं न जाको। रण में नित होइ पराजय ताको ॥ ५२ ॥ कौशल्या-जनि सौंह करौ तुम पुत्र सयाने। अति साधुचरित्र तुम्हें हम जाने ।। सवको सब काल सदा सुखदाई । जिय जानति है। तुत ज्यो रघुराई ॥ ५३॥ दशरथ दाह [चंचरी छंद] हाइ हाइ जहां वहां सब है रही सिगरी पुरो। धाम धामनि सुन्दरी प्रगटी सवै जे दुती दुरी॥

. ले गये नृपनाय को शब लोग श्रीसरयू तटी। राजपति समेत पुवन विप्रलाप गढ़ी रटी ॥५४॥ [सोमरामी छंद] करी अग्नि अर्चा। मिटी प्रेत चर्चा ॥ ~~ राजधानी ।भई दीन वानी ।। ५ ।। [कुमारललिता छंद] फिया भरत कोनी । वियोग रस मीनी ॥ सजी गति नानी । मुकुंद पद लीनी । ५६ ॥ भरत का चित्रकूट गमन [तारक छन्द) पहिरे यकला सु जटा घरि के। निज पायनि पंथ चले अरि के। तरि गंग गये गुह संग लिये । चित्रकूट विलोकन छाँड़ि दिये ॥ ५ ॥ [मदनमोदक छन्द] सद सारस हंस भये मग खेचर वारिद ज्यां यहयानागाजे । घन के नर घानर किमर वालक ले मृग ज्यों मृगनायक माजे॥ तजि सिद्ध समाधिन फेशव दीरय दौरि दरीन में आसन साजे । भूतल भूधर हाल अचानक आइ भरण्य के दुंदुमि था । १-विवार गढ़ी सीम्याप का समूह रटकर,मन सा प्रवास + ( ६७ ) [दोहा] रामचन्द्र लक्ष्मण सहित, शोभित सीता संग। केशवदास सहास उठि, चढ़े धरणिधर टंग ।। ५६ ॥ [मोहन छन्द] लक्ष्मण-देखहु भरत चमू सजि श्राये। जानि अवल हमको उठि धाये।। हीसत हय बहु वारन गाजे। जहँ तहँ दीरघ दुंदुभि वाजे ॥ ६०॥ [तारक छंद] गजराजनि ऊपर पाखर सोहें। अति सुंदर शीश शिरोमणि मोहे ।। मणि धुंधुर घंटन के रख वाजै । तड़िता युत मानहुँ वारिद गाजै ॥६ [विजय छंद] युद्धको आजु भरत्थ चढ़े धुनि दुंदुभि की दशहूँ दिाश धाहे । ग्रात चलो चतुरंग चमू वरणी सो न केशव कैसेहुँ जाई ।। यो सवके तनत्राननि में झलकी अरुणोदय की अरुणाई । अंतर ते जनु रंजन को रजपूतन की रज ऊपर आई ।। ६२ ।। . [ तोटक छंद] उठिकै धर धारि अकाश चलो । बहु चंचल वाजि खुरोन दली । .

भुव हालति जानि अकाश हिये । जनु थंभन टौरनि ठौर किये ॥ १३॥ [तारक छंद] रण राजकुमार अरुमहिंगे जू । अतिसम्मुख घायनि जूझहिंगे जू ।। जनु ठोरनि टौरनि भूमि नवीने। तिनके चढ़िये कहूँ मारग कीने ।। ६४ ।। [तोटक छंद] ता-रहिपूर्ति विमाननि प्योम थली। तिनको जनु टारन धूरि चली ।। परिपूरि अफाशहि धूरि रही। सुगयो मिटि सूर प्रकाश सही ॥५॥ [ दोहा] अपने कुल को कलह क्यों, देखहि रवि भगवंत । यह, जानि अंतर किया, मानो मही अनंत ॥ ६६ । [तोटफ छंद यदु तामहं दीह पताक लसैं। जनु धूम में अग्नि की ज्वाल यस ॥ रसना किंधी काल कराल घनी। किधी मीचु नचे चहुँ ओर बनी।। ६७ ॥

यहि सुख ( ६६ ) [दोहा] देखिभरतकी चल ध्वजा, धूरिन में युद्ध जुरन को मनहुँ प्रति योधन, दाल पत ॥ ५ ॥ लक्ष्मण का कोप [ दंडक छंद] दमण-मारि डारौं अनुज समेत यहि खेत आजु मेटि पारौं दीरघ वचन निज गुरको। सीतानाथ सोता साथ बैठे देखि छनतर शोपों शोक सवही के उर को। केशोदाल सविलास वीस विसे पास होइ कैकेयो के अंग अंग शोक पुत्रजुरको ॥ रघुराज जू को साज सफल छिड़ाइ लेउँ भरतहि आजु राज देउँ प्रेत पुर को १६ ॥ [दोहा ] एकराज में प्रगट जहँ, प्रभु केशवदास ॥ तहां बसत है रैनदिन, मूरतिवंत विनास ॥ ७० ॥ राम भरत मिलन [कुसुमविचित्रा छंद] तब सबै सैना वहि थल राखी । मुनि जन लीन्हे सँग अभिलापी ।। रघुपति के चरणन शिर नाये। उन हँसि कै गहि कंठ लगाये ॥१॥ द्वै . [दायक छंद] मरत-मातु सवै मिलिये कहूँ आई। ज्यों सुत को सुरभी सुलवाई। लक्ष्मण स्यों उठिकै रघुराई। पायन जाय परे दोउ भाई ॥७२॥ मातनि कंठ उठाय लगाये। प्राण मनो मृत देहनि पाये। पाइ मिली तय सीय समागी। देवर सामुन पग लागी॥२॥ [तोमर छंद] तय पूछियो रघुराइ । सुख है पिता तन मा । तब पुत्र को मुख जोइ । म ते उठों सप रोइ ॥ ७ ॥ [ दोधक छंद] सुन सौ सय पर्वत धोये । जंगम को जड़ जीयहु रोये ॥ सिद्ध वधू सिगरी मुनि आई । राजयधू सई समुझाई ॥ ५ ॥ [ मोहन छंद] धरि चित्त धीर । गये गंग तीर गृधि है शरीर । पितु तपि नीर । ७६ ॥ [तारक छंद] भरत-घर को चलिये अय धीरघुपई। जनहीं तुम राज सदा मुसदा। न 1 ( ७१ ) यह बात कही जलसो गल भीन्यौ। उठि सोदर पाइँ परे तब तीन्यो ॥ ७७ ॥ [दोधक छंद] श्रीराम-राज दियो हमको वन रूरो। राज दियो तुमको श्रद पूरो॥ सो हमहूं तुमहूं मिलि कीजै। बापको बोलु न नेकहु छीजै॥ ७ ॥ [ दोहा राजा को अरु चाप को, बचन न मेट कोह। जो न मानिये भरत तौ, मारे को फल होइ॥ ७६ ॥ [स्वागता छंद] भरत-सद्यपानरत स्त्रीजित होई। सन्निपातयुत वातुल जोई॥ देखि देखि तिनको सय भाग । तासु यात हति पाप न लागे । ०॥ ईश ईश जगदीश बखान्यो। वेदवाक्य चल ते पहिचान्यो॥ ताहि मेटि हठिकै रहिहो तौ गंग तीर तन को तजिहों तौ ॥१॥ [दोहा] मौन गही यह यात कहि, छोडो सबै विकल्प। भरत जाइ सागीरथी, तीर फखो संकल्प || २ || १-ईश-विष्णु । २-जगदीशत्रदा । ३-गंग-मंदाकिनो। ४.--विकरूप-विचार ।

in En मंदाकिनी कृत भरताबोधन [न्दयता छंद]' मागीरयी रूप अनूप कारी1. चंद्राननो लोचन पंज धारी।। वाणी यत्रानी मुख तत्व सोध्यो । रामानुजे पानि प्रयाध दोध्यो। [ उपेन्द्रयना इंद अनेक ब्रह्मादि न अंत पाया। अनेकधा वेदन गीत गायो। तिन्ह न रामानुज यंधु जानी। सुनी सुधी केवल ग्रह मानौ ॥८॥ निजेच्या भूतल देह धारी । अधर्म संहारक धर्म चारी !! दशावहि मारिये को। तपी प्रती केवल पारि' को | उठो ही होहु न कान की। कहे कटू राम सो मानि लीजै ।। प्रदीप तेरी सुत .मातु सोई। सो कौन माया इनको न मोह ॥६॥ चले १-पारिवाना।

(३)
[दोहा]
यह कहि के भागीरथी, केशव भी कर
मरन को तब राम मां, देह पादुका
भरत का लौटनाः
{ पेटवडा छद]
बन्द दही पायन
प्रतिमा मम मियाहु को है
गये है नदीपुर बास बोला।
सबंधु श्रीरामहि चित्त दीना
दिहा]
कंगन मरतादि आदि दे सकल नगर के लोग
चन समान वरपर बसे सफल विगत भाग
न : पादुका
-
अयोधा

( ७२ ) मंदाकिनी कृत भरतोबोधन [इन्द्रयज्रा छंद भागीरथी रूप अनूप कारी। चंद्राननी लोचन कंज ‘धारी।। वाणी वखानो मुख तत्त्व सोध्यो। रामानुजै पानि प्रयोध वाध्यौ ॥ ३॥ [उपेन्द्रवज्रा छंद ] अनेक ब्रह्मादि न अंत पायो। अनेकधा वेदन गीत गायो॥ तिन्हें न रामानुज यंधु जानी । सुनी सुधी केवल ग्रह मानो॥४॥ निजेच्छया भूतल देह धारी। अधर्म संहारक धर्म चारी।। चले दशग्रीवहि मारिये को। तपी प्रती केवल पारिये को॥५॥ उठो हठी होहु न काज कीजै। कहें कडू राम सो मानि लीजै ।। प्रदोष तेरी सुत मातु साह ।

( ७३ )
[दोहा ]
यह कहि के भागीरथी, केशव भई अदृष्ट ।
भरत कहो तव राम सों, देहु पाटुका इष्ट ।। ८७ ॥
भरत का लौटना
[ उपेंद्रवज्रा छंद]
चले बली पावन पादुका है।
प्रदक्षिणा राम सियाहु को दै॥
गये ते नंदीपुर बास कीनो।
सबंधु श्रीरामहि चित्त दीनो !!I
[ दोहा]
केशव भरतहि श्रादि दै, सकल नगर के लोग।
वन समान घर घर बसे, सकल विगत संभोग।।
॥ इति अयोध्या कांड ।।

राम . । अरण्य कांड राम अत्रि मिलन [भरतोडता छंद] चित्रकूट तय रामजू तज्यो । जाइ यथल अत्रि को भज्यो ।। लक्ष्मण समेत देखियो। आपनो सफल जन्म लेखियो॥१॥ [चन्द्रवम छंद ]. स्नान दान तप जाप जो करियो। शोधि शोधि पन जो उर धरियो। योग याग हम जालगि गहियो । रामचन्द्र सप को फल सहियो ॥२॥ [पंशस्या छंद अनेकथा पूजन अत्रिजू करयो। कृपालु कै श्रीरघुनाथजू धयो॥ पतिव्रता देषि महर्षि की जहां। सुयुद्धि सीता सुखदा गई तदा ॥३॥ १-परयो पहन की, स्वीकार की।

. ( ७५ ) सीता-अनुसूया-मिलन [ दोहा] पतिव्रतन की देवता, अनसूया शुभ गात । सीताजू अवलोकियो, जरा सखी के साथ ॥४॥ [चतुप्पदी छंद] शर श्वेत विराजे कीरति राजै जनु केशव तप-बल की। नुवलित पलित जनु सकल वासना निकरिगई थलथल की। कांपति शुभ ग्रीवा सेब अँग सींवा देखत चित्त भुलाहीं। जनु अपने मन प्रति यह उपदेशति या जग में कछु नाहीं ॥५॥ [प्रमिताक्षरा छंद] हरवाई जाय सिय पाई परी। ऋषि नारि सूंघि शिर गोद धरी। चटु अंगराग अंग अंग रये। बहु भाँति ताहि उपदेश दये ॥ ६॥ [स्रग्विनी छंद] राम श्रागे चले मध्य सीता चली। पंधु पाछे भये सोभ सोमै भली ॥ देखि देही सवै कोटिधा के भनो । जीव जीवेश के बीच माया मनो॥७॥ १-दरवादशीघ्रता से विराध पध [मालती चंद] विपिन विराध यलिष्ठ देखियो। नृप तनया भयमीत लेखियो । तय रघुनाथ पाए के हया। निज निर्वाण पथ को टया ।। ।। [दोहा] रघुनायफ सायक धर्ष, सफल लोक शिरमौर । गये कृपा करि भक्ति यश, अपि अगस्त्य के ठौर॥8॥ अगस्त्य मिलन [पसंततिलकाछंद ] श्रीराम लक्ष्मण अगस्त्य सनारि देण्या। स्वाहा समेत शुम पावक रूप लेख्यो । साष्टांग क्षिप्र अभियंदन जाइ कीन्हों ।। सानंद आशिष अशेष ऋपीश दीन्हों॥ १०॥ बैठारि आसन सर्व अभिलाप पूजे । सीता समेत रधुनाथ सबन्धु पूजे ।। जाके निमित्त हम यह यज्या' सो पायो। ब्रह्मांडमंडन खरूप जो वेद गाया । ११॥ १-या यम्पो-पज किये।

7 ( ७७ ) [पद्धटिकाछंद]. ब्रह्मादि देव जय विनय कीन । तट क्षीरसिंधु के परम दीन । तुम कहो देव अवतरहु जाइ । सुत हों दशरथ को होतु आइ ॥ १२॥ हम तब ते मन श्रानन्द मानि । मन चितवत तव श्रागमन जानि । याँ रहिजे करिजै देव फाजु । भम फूलि फल्यो तप वृक्ष श्राजु ॥ १३ ॥ [पृथ्वी छंद] श्रीराम-अगस्त्य ऋपिराज जू वचन एक मेरो सुनौ । प्रशस्त सय भांति भूतल सुदेश जी में गुनौ ।। सनीर तर खंड मंडित समृद्ध शोभा धरें। तहां हम निवास की विमल पर्णशाला करें ॥ १४ ॥ [पद्मावतीचंद] यद्यपि जग कर्ता पालक हर्ता परिपूरण वेदन गाये। श्रति तदपि कृपा फरिमानुप वपु धरि थल पूछन हमसों आये ।। सुनि सुर वर नायक राक्षस-धायक रक्षतु मुनि जन यश लीजे शुभ गोदावरि तट विशद पंचवट पर्णकुटी तहँ प्रभु कीजै ॥१५॥ [दोहा ] केशव कहे अगस्त्य के पंचवटी के तीर। पर्णकुटी पावन करी, रामचन्द्र रण धीर ॥ १६॥ . अगस्त्य- 1 पा [ हाकलिका छदै (5) पंचवटी चन वर्णन [त्रिमंगीचंद] फल फूलन पूरे तरु वर करे, कोकिल कुल कलरव बालें। अति मत्त मयूरी पियरस पूरी, वन वन प्रति नाचति डोलें । सारो शुक पंडित, गुणगण मंडित, भावनि में श्ररथ यात्राने । ) देखे रघुनायक,सीय सहायक, मदनसरति मधु सब जाने Uts [सवैया] 'सब जाति फटी दुख की दुपटी कपटी न रहे जहँ एक घड़ी। निघटी रुचि माचघटी घटी जग जीप यतीन की छूटी तटी अब ओघ की वेरी कटी विकस निकटी प्रकटी गुरुनान गटी। चहुंओरन नाचति मुक्किनटी गुण धूरजी वनपञ्चवटी ॥ १६ ॥ ga mपीचर स शामत दंडक की रचियनी। माँतिन मांतिन सुन्दर धनी ॥ सेव बड़े नृप की जनु लसै ।श्रीफल भूरि माप जहँ यस ॥१६॥ वर भयानक सी अति लगे । अर्क समूह जहाँ जगमगे । नेनन को बहुरूपन प्रसै । श्रीहरि कीजनुमूरतिलसे ॥ २० ॥ [दधिकछंद] राम-पांडव की प्रतिमा सम लेखो। अर्जुन भीम महामति देखो ॥ १-तटी-समाधि २-बाटी-चाउरी -भीम प्रम्सदेतह, Awar ( 8 ) सुभगा सम दीपति पूरी। सिंदुर की तिलकावलि रूरी ॥ २१ ॥ राजति है यह ज्यों कुलकन्या। धाइ विराजति है संग धन्या॥ केलि थलो जनु श्री गिरिजा की। शोभ धरे शितकंठ' प्रभा की॥२२॥ गोदावरी वर्णन [मनहरनछंद] अति निकट गोदावरी पाप संहारिणी। चल तरंग तुंगावली चारु संचारिणी ।। अलि कमल सौगंध लीला मनोहारिणी। बहु नयन देवेश शोभा मनोधारिणी ॥ २३ ॥ [ दोधक छंद) रीति मनो अविवेक को थापी। साधुन की गति पावत पापी । कंजज की मति सी बड़ भागी। श्री हरिमंदिर सो अनुरागी ॥ २४ ॥ [अमृतगति छंद] निपट पतिव्रत धरणी । जग जन के दुख हरणी ।। निगम् सदा गति सुनिये। अगति महापति-गुनिये ॥ २५ ॥ १-शितकंठ-मयूर, महादेव २-कमग-त्रया । ३-हरिमंदिर समुद, विष्णुस्थान।

[दोहा] घिपमय यह गोदावरी, अमृतन को फल देति । केशव जीवनहार को, दुख अशेष हरि लेति ॥ २६ ॥ वन विलास वर्णन [त्रिमंगी छंद] जय जय धरि वीना प्रगट प्रवीना, यह गुण लीना 'सुख' सीता। पिय जियहि रिमाय दुखनि मजाये, विविध यजावै गुण गोता। तजि मति संसारी विपिन विहारी, दुख सुखकारी घिरि आवै । तय तव जगभूपण रिपुकुल दूषण, सव को भूपण पहिरावै ॥२७॥ [ तोटक छंद] कवरी कुसुमालि सिखीन दई। गज कुंभनि हारनि शाम मई ।। मुकुता शुक सारिक नाक रचे। कटि केहरि किंकिणि शेमसचे ॥ २८॥ दुलरी कल कोफिल कंठ बनी। मृग संजन अंजन भौति टनी । . १-विषमय (विशजल)। अपांव जल से परिपूर्ण।

( १ ) नृप हंसनि नूपुर शोस भिरी। कल हंसनि कंउनि कंठसिरी ॥२६॥ मुख वासनि वासित कीन तबै। तृण गुल्म लता तरु शैल सवै॥ जलहू थलहू यहि रीति रमैं। वन जीव जहां तहँ संग भ्रम ॥ ३०॥ [दोहा] सहज सुगंधि शरीर की, दिशि विदिशन श्रवगाहि। दूती ज्यों आई लिये, केशव शूर्पनखाहि ॥ ३१ ॥ शूर्पणखा राम संचाद [मरहट्टा छंद ] यक दिन रघुनायक सीय सहायक रतिनायक अनुहारी। शुभ गोदावरि तट विमल पंचवट बैठे हुते मुरारी ॥ छवि देखत ही मन मदन मथ्यो तनु शूर्पणखा तेहि काल । अति सुन्दर तनु करि कछु धीरज धरि चोली वचन रसाल ॥३२॥ शूर्पणखा- [सवैया] किन्नर हो नर रूप विचक्षण यच्छ कि स्वच्छ शरीरनि सोह।। चित्त चकोर के चंद फिधौं भृग लोचन चारु विमाननि रोही अंग धरे कि अनंग ही केशव अंगी अनेकन के मन मोही। धीर जटानि धरे धनुयाण लिये वनिता वन में तुम को हो ॥३३॥ -- १-रो सारोहण करते हो, सवार हो जाते दौ - ur ( २ ) [मनोरमा छंद] राम-हम हैं दशरत्य महोपति के सुद! गुम राम सुलश्मए नामन संयुत । यह शासन दे पठये नृप कानन । मुनि पालहु मारहु राक्षस के गन ॥ ३४ ॥ शूर्पलखा-नृप राबर की भगिनी गनि मोकहूँ। जिन की ठकुराइति दीनहु लोकहँ । सुनिजे दुस्ख मोचन पंकज लोचन । अब मोहिं करो पतिनी मन रोचन ॥३५॥ [मर वंद] तर यों को हिँसि गम । अब मोहिं जानि साम । विय जाय लमण देसि । सम रुप योयन लेखि ३६॥ [दोधक इंद] शर्पपसाराम सहोदर मो वन देखा। रापए की भगिनी जिय लेखा। राजकुमार रमो सँग मेरे। होहि सयै सुख संपति तेरे । ३७ ॥ सदमल-यै प्रभु ही जन जानि सदाई। दासि भये मह कौनि घड़ाई। जौ मजिये प्रमु. ती प्रभुताई। सि मये उपहास सदाई।

-- Horrorist... [मल्लिकाछंद] हास के विलास जानि । दीह मानखंड' मानि। भतिवे को चित्त चाहि । सामुहे भई सियाहि ॥ ३६॥ [तोमर छंद] तब रामचन्द्र प्रवीन । हँसि बंधु त्यों हग दीन ॥ गुनि दुष्टता सह लोन । श्रुति नासिका चिनु कीन ॥ ४०॥ [दोहा] शोन छिछि छूटत वदन, भीम भई तेहि काल । मानो कृत्या कुटिल युत, पावक ज्वाल कराल ॥४१॥ खरदूषण वध [ तोटक छंद ] गइ शूर्पणखा खरदूपण पै । सजि ल्याई तिन्हें जगभूपण पै॥ शरएक अनेक ते दूरि किये। रवि के करज्यो तम पुंज पिये॥४२॥ [मनोरमा छंद] वृप के खरदूपण ज्यों स्पू५५ । तब दूरि किये रवि के कुल भूपण ॥ गदशनु त्रिदोष ज्यों दूरि फरै 'वर।' त्रिशिरा शिर त्यों रघुनंदन के शर॥ ४३ ॥ भजि शूर्पणखा गइ रावण पै तव । त्रिशिरा खरदूषण नाश फहे सव ॥ १-मान-मपमान । २-घरदूपण-सूर्य । ३-~गदशत्रु-पैय। । 1- P4 तय शूर्पणखा मुख यात सबै मुनि । उटि रावण गो मारीच जहाँ मुनि ॥४४॥ रावण मारोच संवाद [मनोरमा छंद रावण यात फही सिगरी त्यों। शूर्पणखाहिं विरूप फरी ज्यों ॥ रावण-एकहि राम अनेक सँहारे। दूपण स्यां विशिरा खर मारे ॥४५ तू अय होहि सहायक मेरो । है यहुते गुण मानिहीं तेरो। जो हरि सीतहि ल्यायन पैहैं। यै भ्रमि शोकन ही मरि जैहैं ॥ ४६॥ मारीच-रामहिं मानुष के जनि जाना। पूरण चौदह लोक यखानो। आहु जहाँ तिय लै सुन देखें। हो हरि को जलहूं थल लेखी ॥ १७॥ [सुन्दरीलंद] रावण-तू अय मोहि सिखायत है शठ। मैं यश जक्क कियो हठ ही हट। बेगि चले अप देहि न ऊतरु । देव सय जन एक नहीं हरु :

( ८५ ) [दोहा] जांचि चल्यो मारीच मन, हरण दुहूं विधि प्रासु ॥ रावण के कर नरक है; हरि कर हरिपुर वासु ॥ ४६॥ सीताराम मंत्रणा [ सुंदरी छंद] राम-राज सुता इक मंत्र सुनो अव । चाहत हौं भुव भार हरेउ सय । पावक में निज देहहिं राखहु । छाय शरीर मृगै अभिलापहु ॥ ५० [चामरछंद ] भाइयो कुरंग एक चारु हेमहीर को। जानकी समेत चित्त मोहि राम वीरको राजपुत्रिका समीप साधु बंधु राखिकै । : हाथ चाप वाण ले गये गिरीश नांखिकै । ५१॥ मारीचवध [दोहा] रघुनायक जय ही हन्यो, सायक शठ मारीच । हा लक्ष्मण यह कहि गिरेउ, श्रीपति के स्वर नीच ॥५२॥ [निशिपालिका छंद] सीता-राजतनया तबहिं चोल सुनि यों कहेउ । आहु चलि देवर न जात हमपै रहे । । .

- पतिराजनचंचला छंद] ( ६ ) हेम मृग होहि नहिं रैनिचर जानिये। दीन स्वर राम केहि भांति मुख प्रानिये ॥ ५३॥ लक्ष्मण-शोच अति पोच उर मोव दुख दानिये। मातु यह यात अवदात मम मानिये ॥ रेनिचर छद्म पहु भाँति अमिलापहीं। दीन स्वर राम कयहूंन मुख मापही ॥ ५॥ यम 'यशराज प्रेतराज यातुधान । देवता अदेवता नदेयता जिते जहान । पर्वतारि अर्व सर्व सर्व सर्वथा पपानि । कोटि कोटि सूर चन्द्र रामवन्द्र दास मानि ॥ ५५ ॥ [चामरहन्द] राजपुत्रिका को सो और को कह सुने। कान मंदि पार यार शीश पीसधा धुने । चापकीय रेखांचि देव सास्त्रि चले। नांघिई ते मस्म होहिं जीव जे बुरे भले ॥५॥ सीताहरण छिद्र दाकि जुद्रराज लंकनाथ पाइयो । मितु जानि जानकी सो भीख को पोलाइयो । शोच पोच मोचि सकोच मीम येप को। अंतरिक्षही करी ज्यों राहु चंद्ररेस को। ५७॥ १-मदास-सस्य, कपट रदिन। २- सापकीरन्यनुप से बनाई Miya (८७) [दण्डक छन्द ] धूमपुर के निकेत मानो धूमकेतु को शिखा की धूमयोनि. मध्य रेखा सुधाधाम की। चित्र की सी पुत्रिका की लरे वगरूरे मांहिं. शम्बर छोडाइ 'लई कामिनि की कामकी । पाखंड की श्रद्धों की, मठेश यश एकादशी , लीन्ही के श्वपचराज शाखा शुद्ध सामकी। केशव अदृष्ट साथ जीवजोति जैसी तैसी, लंकनाथ ET परी छाया जाया राम की ॥ ५M सोता विलाप [हरिलीलाछंद] vulता-हा राम हा रमन हा रघुनाथ धीर । लंकाधिनाय वश जानहु मोहि वीर ।। हा पुत्र लक्ष्मण छोड़ावहु वेगि मोहिं । मातंडवंश यश की सब लाज तोहि ॥५॥ पक्षी जटायु यह बात सुनंत धाइ। रोफ्यो तुरंत बलरावण दुष्ट जाइ । कीन्हाँ प्रचंड रथ छत्र ध्वजा विहीन । छोड्यो विपक्षि तव भो जय पक्षहीन ॥ ६० ॥ [संयुताछंद] दशकंठ सीतहि लैचल्यो । अति वृद्ध गीधहि यों दल्यो । चित जानकी अधकोंकियो। हरितीनिद्वै अवलोकियो । ६१॥

पद पन की शुम धुंधरी। मणिनील-हाटक से अरी। जुत उत्तरीय विचारिक। शुभ डारि दीन गठारि कै ॥१२॥ [दोहा] सीता के पद पद्म को, नूपुर पट जनि जानु । मनहुँ कखो सुग्रीव घिर, राजश्री प्रस्थातु ॥३॥ राम-विलाप [सवैया ] मेज देखों नहीं शुम गीतहि सीतहि कारण कौनकायहीं । प्रति मोहित के यन मांझ गई सुर मारग मैं मृग माखो जहीर कटु यात फछू तुम स कहि श्राई किधी तेहि पास डेपर रही। प्रवह यह पर्णकुटी क्रियों और किधी यह लक्ष्मणहोइनही ॥४॥ स राम जटायु संवाद [देोषक छन्द] धोरज सों अपनो मना रोक्यो। गीध जटायु पयो अपलोक्यो । छन ध्वजा रथ देखि कै युझेउ गीध कहाँ रण कौन सों जूझेउ ।। ६५ । अटायु-रावण लै गयो राघय सीता। हा रघुनाय रटे शुभ गीता । " 1-उत्तरीय प्रोनी। .

( 8 ) मैं विन छत्र ध्वजा रथ कीन्हों। है गयो - बल पक्ष विहीनो ॥६६॥ राम--साधु जटायु सदा वड़ भागी। तो मन मो वपु सों अनुरागी।। छूटयो शरीर सुनी यह बानी। रामहि तब ज्योति समानी ॥ ६७ ।। [तोटक छंद] दिशि दक्षिण को करि दाह चले। सरिता गिरि देखत वृक्ष भले ॥ वन अंध कवंध विलोकतहीं। दोउ सोदर बैंच लिये तवहीं ॥ ६॥ कवंध वध जब खैवेहि को जिय बुद्धि गुनी । दुटुं चाणनि लै दोउ धार्हि हनी ।। वहँ छाड़ि के देह चल्यो जवहीं। यह व्योम में बात फहो तवहीं ॥६६॥ [तोटक छंद] पोछे मघवा मोहिं शाप दई । गंधर्व ते राक्षस देह भई॥ फिरि के मघवा सह युद्ध भयो। उन क्रोध के शीश में वन इयो ।। ७०॥

[दोहा] गयो शीश गरेट में, पखो धरणि पर प्राय । का करुणा जियमा भई, दीन्ही पाहु पढ़ाय ॥७१ ॥ पाहु दई दै कोश की, प्रायै तेहि गहि साउँ। राम रूप सीता हरण, उधरहु गहन उपाउ, ७२ सुरसरि ते भागे चले, मिलि है कपि सुग्रीय ! देहं सीता की लवरि, यादै मुख अति जीव ॥ ७३ ॥ चिरहजन्य प्रलाप [तोटक छंद] सरिता एक केशव सोम ई। अवलोकि तहां कया चई.।। उरमें सिय प्रीति समाइ रही। तिन सों रघुनायक यात कही ।। ७४ ।। अवलोकत हो जयही जयहीं। दुख होत तुम्हें तवहीं तवहीं ।। यह पैर न चित्त फलू धरिये। सिप देहु यताइ कृपा करिये ॥७५ ॥ शशि के अवलोकन दूरि किये । जिनके मुख की छवि देखि जिये। कृत' चित्त चकोर कछूफ सिय देहु यताय सहाय करी॥७६ ।। घरी। १-कृतम्पकार।

है सवैया] कहि केशव याचक के अरि चंपक शोक अशोक लिये हरि के। लखि केतक केतकि जाति गुलाव तेतीक्षण जानि तजे डरिके। सुनि साधु तुम्हें हम बूझन आये रहे मन मौन कहा धरि के। सिय को कछु साधु कहाकरुणामय सो करुणा करुणा करिक।७।। [नाराच छंद] हिमांशु सूर सो लगै सो पात वज्र सो वहै। दिशा लगे कृशानु ज्यों विलेप अंग को दहै। विशेपि कालराति सो कराल राति, मानिये। वियोग सीय को न काल लोकहार जानिये ॥ ७ ॥ राम शवरी मिलन [ पद्धटिका छंद] यहि भाँति विलोके सकल ठौर। गये शबरी पै दोउ देव मौर॥ लियो पादोदक त्यहि पद पखारि। पुनि अादिक दीन्हें सुधारि ।। ७६ ।। हर देत मंत्र जिनको विशाल । शुभ काशी में पुनि मरण काल ।। ते आये मेरे धाम जी । सव सफल करन जप तप समाज||2011- फल भोजन को तेहि धरे धानि । भपे यज्ञपुरुष अति प्रीति मानि । तिन रामवन्द्र लक्ष्मण स्वरूप । तय धरे चित्त जग जोति रूप ॥ १॥ [दोहा शबरी पायक पंथ तय, हरखि गई हरि लोक । वनन विलोफत हरि गये, पंपा तीर सशोक ॥२॥ पंपासर वर्णन [तोटक छंद] अति सुन्दर शीतल शेम यसै। जहँ रूप अनेकनि लाम लसै। बहु पंकज पक्षि विराजत है। रघुनाथ पिलोकत लाजत है।।३।। सिगरी ऋतु शोभित सुन जही। लहै प्रीपम पैन प्रवेश सही ।। नप नीरज नीर तहाँ सरस। सिय के शुभ लोचन से दरसे ॥४॥ [विजय छंद] सुन्दर सेत सरोव्ह में करहाटक' हाटकर की युति को है। वापर मौंर मले मन रोचन लोक विलोचन की रुचि रोहै ।। १-कर कमर पुरुष के बीच को 11-हाटकाना।

(३ ) देखि दुई उपमा जलदेविन दीरय देवन के मन मोहै। केशव केशवराय मनो कमलासन के शिर ऊपर सोहै ।। ५ ॥ लक्ष्मण- [सवैया] मिलि चक्रिन चंदन वात वहै अति मोहत न्यायन हीमतिको। मृगमित्र पिलोकत चित्त जरैलिये चन्द निशाचर पद्धति को। प्रतिकूल शुफादिक होहिं सवै जिय जानै नहीं इनकी गति को। दुख देत तडाग तुम्हें न वनै कमलाकर हे कमलापति को॥६॥ ॥ इति अरण्य कांड। १-कमलासन ब्रह्मा । २-चमिन सर्प । ३--मृगमित्र-चंद्रमा।

किष्किंधा कांड
[दोहा]
ऋष्यमूक पर्वत गये, केशव श्रीरघुनाथ ।
देने धानर पंच विभु, मानो दतिण हाय ॥ १॥
[कुसुमयिचित्रा छंद]
तय कपि राजा रघुपति देखे।
मन नरनारायण सम लेखे॥
द्विज वपु धरि तहँ हनुमत पाये।
यहु विधि शाशिष दै मन माये ॥२॥
राम हनुमान संवाद
हनुमान-सब विधि हरे घन महँ को हो।
तन मन सूरे मनमय मोही।
शिरसि जटा चकला यपुधारी।
हरिहर मानहुं विपिनविहारी॥३
परम पियोगी सम रस भीने।
) तन मन एवं युग तन कीने ॥
तुम को ही का लगि धन पाये।
क्यहि कुल ही कोने पुनि जाये ॥४॥

( ५ ) [चर.. राम-पुत्र श्री दशरथ के वन राज शासन भाइयो सीय सुन्दरि संग ही चिछुरी सोसोधन पाइयो । राम लक्ष्मण नाम संयुत सूरवंश चखानिये। रावर वन कौन हो क्यहि काज क्यों पहिचानिये ॥५॥ [ दोहा ] इनुमान-था गिरि पर सुग्रीव नृप, ता सँग मंत्री चारि वानर लई छडाइ तिय, दीन्हो वालि निकारि॥६॥ [दोधक छंद] या कहूँ जो अपनो करि जानो। मारह वालि विनै यह मानो ।। राज देहु जो वाकी तिया को। तो हम देहि वताय सिया को॥७॥ राम सुग्रीव मिताई [दोहा] उठे राज सुग्रीव तब, तन मन अति सुख पाइ । सीता जू के पट सहित, पुर दीन्हे श्राह || [दंडक] NA राम-पंजर को खंजरीट नैनन को किधों मीन मानस को केशोदास जलु है फि जाए है।

ग्रंग को कि अंगराग गेंदुआ की गलमुई केया कोटि जेव ही को उर को कि हार है ।। धन हमारो फामफेलि को कि ताडिचे को गजनो विचार को को चमर विचार है। पान की जमनिका की कंजमुख दिवे को जीताजू को उत्तरीय सय मुखसार है। [स्वागता ईद यानरेन्द्र तय यों हैसि योल्यो। भीति भेद जिय को सप खोल्यो। अमी यारि पुरतक्ष करी । रामचन्द्र हँसि याहूँ घरी जू ॥१०॥ सुर पुत्र तप जीवन जान्यो । पालि जोर यहु भाँति पखान्यो । नारि छोनि जेहि भाँति लई । सो अशेष विनती यिनई जू ॥ ११ ॥ सप्त ताल वेधन एक यार शर एक हना जो। सात ताल बलवंत गर्ना तो॥ रामचन्द्र हँसि याण चलायो। ताल वेधि फिरि के कर पायो।। १२॥ १-डमालकिण । ३-गलसुई-गाल के नीचे लगाने को पेटी कमल तकिया:-सामनोम्डा। -जमनिकापरदा,क्नान।

(७) [तारक छंद] यह अद्भुत कर्म और पै. होई। सुर सिद्ध प्रसिद्धन में तुम कोई ।। निकरी मन ते सिगरी दुचिताई। तुम सो प्रभु पाय सदा सुखदाई ॥ १३ ॥ [विजय छंद] बावन को पद लोकन मापि ज्यों वावन के वपुमाँह सिधाया। केशव सूरसुता जल सिंधुहि पूरिकै सूरहि को पद पायो । काम केवाण त्वचा सववेधिकै काम पै श्रावत ज्यों जग गायो। राम को शायक सातहु तालनि वेधिकै रामहि के कर भायो १४ सोरठा] जिन के नाम विलास, अखिल लोक वेधत पतित । तिनको केशव दास, सात ताल वेधन, कहा ।। १५ ।। २ घालि वध [पद्धतिका छंद) रवि पुत्र वालि सों होत युद्ध । रघुनाथ भये मन माहँ क्रुद्ध ॥ शर एक हन्यो उर मित्र काम। तब भूमि गिखो कहि राम राम ।। १६ ॥ कटु चेत. भये तेहि बलनिधान । रघुनाथ विलोके हाथ वान ।। .

. A ( 8 ) शुभ चीर जटा शिर श्याम गात । धनमाल हिये उर विमलात ॥१७॥ वालि-तुम आदि मध्य अवसान एक। जग मोहत ही वपु धरि अनेक। तुम सदा शुद्ध सबको समान । फेहि हेतु हत्यो करुणानिधान ॥१॥ -सुनि घासवसुत वुधि यल निधान । मैं शरणागत हित हते प्रान ।। यह साटो कृष्णावतार। न तय है हो तुम संसार पार ॥ १६ ॥ रघुधीर रंक ते राज कीन। युवराज विरद अंगदहि दीन । तय फिकिया तारा समेत सुग्रीय गये अपने निकेत ॥२०॥ [दोहा] फियो नृपत्ति सुप्रीय हति, घालि पली रणधीर । गये प्रवर्पण अद्रि को, लक्ष्मण श्री रघुपीर ।। २१ ॥ प्रवणगिरि वर्णन [भिंगी छंद] देख्यो शुभ गिरिवर सकल सोम घर। पहु फलनि फरे। १-सांरो-बदला। . फूल परन Man भानो हर धरे॥२२॥ सँग सरभक्ष जन केशरि के गण, मनह धरणि सुग्रीव धरे॥ संग शिवा. विराजे गज मुख गाजैसे परभृत: चोले चित्त शिर शुभ चन्द्रकधर परम दिगंयर, अहिराज [ तोमर छंद] शिशु सो लसै सँग धाइ । वनमाल ज्यों सुरराइ । अहिराज, सो.यहि काल । बहु शीश शोभनि माल : [स्वागता छन्द] चंद्र मंद द्युति वासर देखो। भूमि हीन भुवपाल विशेषौ ॥ मित्र देखि यह शोभत है यौं । राजसाज बिनुसीतहि हैं। ज्यो । २४ [दोहा] तिनी पति विनु दीन पति, पति पतिनी चिनु मंद । चंद्र विना ज्यों यामिनी, ज्यों विन यामिनि चंद ॥ २५ ॥ वर्षा वर्णन है [स्वागता छन्द] देखि राम वरपा मृतु भाई । रोम रोम बहुधा दुखदाई॥ आसपास तम की छवि छाई । राति दिवस कछु जानि न जाई॥२६ १-~परभूत-कोकिल ।

- मंद मंद धुनि सो धन गाजै । तूर तार जनु आवम यानें। Vठौर ठौर चपला चमकै यो । इंद्र लोक तिय नाचति हैं ज्योधन [मोटनक छन्द) 'साहैं धन श्यामल घोर.धनें । मोहे तिन बकपांति म शंखावलि पी बहुधाजल सोमानो तिनको उगिले बल सों ॥२८ शोभा अति शुक्र शरासन में। नाना द्युति दीसति है धन में। रत्लायलिसी दिवि द्वारभनो । वर्षागम यांघिय देव मनो RS [तारक छन्द] धन घोर घने दशहूं दिशि छाये। मघवा जनु सूरज पै चढ़ि आये। अपराध बिना दिति के तन ताये। तिन पोड़न पीड़ित है उठि धाये ॥३०॥ अति गाजत घाजत दुंदुभि मानो। निरघात सयै पचिपात यखानो घनु है यह गौरमदानि नाही। शर जाल यहै जलधार वृथा ही ॥३ भट चातक दादुर मोर न थाले। चपला चमकै न फिरै अँग खोले ।। धुतिवंतन को विपदा पटु कीन्हीं। धरती कहँ चंद्ध धरि दीन्हीं ॥ ३२॥ १-तर-नगाड़ा । गौरमदाइनि-पनुष । ३-चंदवणू-पीरटरद . AA उर में म 0 ( १०१.) तरुनी यह अत्रि ऋषीश्वर की सी। हम- चन्द्रकला सम दीसी ॥ वरपा न सुनें किलकै किल काली । सब जानत हैं महिमा अहिमाली ॥ ३३ ॥ [वनावरी] भौहे सुरचाप, चार प्रमुदित पयोधर, भूखन, जराय जोति तड़ित रलाई है। दूरि करी सुख मुख सुखमा शशी की नैन, श्रमल कमल दल दलित निकाई है ॥ केशोदास प्रचल, करेनुका गमन हर, मुक्त सु हंसक सबद सुखदाई है। भंवर अलित मति माहै नील कंजू की, फालिका कि वरखा हरखि हिय आई है ।। ३ [ दोहा ] वर्णत केराध सकल कवि, विपम गाढ़ तम सृष्टि । कुपुरुष सेवा ज्यों भई, संतत मिथ्या दृष्टि ॥ ३५ ॥ [चंद्रकला छन्द] एकल हंस कलानिधि खंजन कंज कछू दिन केशव देनि जिये। गति आनन लोचन के अनुरूपक से मन मानि लिये ॥ यहि काल कराल ते शोधि सबै हठिकै वरषा मिस दूरि किये। अवधी दिनमाणमिया रहिह कहि कौनहिअवलम्बिहिये ॥३६॥ पायन ( १०२ ) शरद वर्णन M [दाहा] योते यर्या काल यां, आई शरद मुजाति। गये अँध्यारी होति ज्यों, चार चांदनी राति ॥३७॥ [मोटनक दंद दंतावलि कुन्द समान गनी । चंद्रानन कुन्तल चौर भनी । मोहैं धनु खंजन नैन मनो राजीवनि ज्यों पद पानि मना। ३ हारावलि नीरज'दीय रमैं । हैं लीन पयोधर अम्बर में। पाटीर' जोन्हाइहि अंग धरे ! हंसोगति केशय चिंत्त हरे॥३६॥ श्रीनारद को दरसे मतिमी । लोप तसता अपकीरति-सी । मानी पतिदेवन की रति को।सतमारगकी समुझ गतिको ४४०१ [ दोहा लन्मण दासी वृद्ध सी, आई शरद सुजाति । मन जगावन को इमहि, यीते वर्षा राति ११ ॥ सुग्रोय पर क्रोध V [कुंडलिया] ताते नृप सुग्रीव पं, जैये सत्वर तात । कहिया पचन घुमाइ के, कुशल न चाही गात ॥ कुशल न चाहो गात चद्दत हो यालिहि देखा। करटुन सीता शोष काम घश राम न लेखो। १-जीरन मातो।२-पाटीपंदन । .

( १०३ ) राम न लेखो चित्त लही सुख संपति जाते। मित्र कह्यो गहि बाँह कानि कीजत है ताते॥४२॥ दोहा लक्ष्मण किष्किंधा गये, वचन कहे करि क्रोध तारा तव समुझाइयो, कीन्हों बहुत प्रबोध ।। ४३ ॥ [दोधक छंद ]. वोलि लये हनुमान तवै जू। ल्यावहु वानर बोलि सबैज ॥ चार लगे न कह विरमाहीं । एक न कोउ रहै घर माहीं ॥४४॥ [विसंगी छंद] सुग्रीव सँघाती मुख. दुति राती, केशव साथहि सूर नये ॥ आकाश विलासी सूरप्रकाशी, तव ही वानर श्राइ गये ॥ दिशि दिशि अवगाहन सीतहि चाहन यूथप यूथ सबै पठये ॥ नलनील ऋच्छपति अंगद के सँग दक्षिण दिशि को विदा भये ॥ ४५ ॥ सीताखाजहित वानर सेना का प्रस्थान दोहा] बुधि विक्रम व्यवसाय युत, साधु समुझि रघुनाथ । अनंत हनुमंत के, मुंदरी दीन्ही हाथ ॥ ४६॥ -- पल अनंत . होहु सवै (१०४) [हीरक छंद] चण्ड चरण चण्डि धरणि मंडि गगन धापहीं। तत्क्षण है दक्षिण दिशि लक्ष्य नहीं पायहीं॥ धीर धरन वीर घरण सिंधु तटं सुभायहीं। नाम परमधाम धरम राम करम गायहीं ॥ ४ ॥ [अनुकूल छंद] अंगद-सोय न पाई अवध विनासी। सागरतटवासी॥ जो घर जैये सकुच अनंता । मोहि न छोड़े जनकनिहंता ॥ ४ ॥ हनूमान-अंगद रक्षा रथुपति कीन्हों। सोध न सीता जल थल लीन्हों। आलस छाडौं क्षत उर पानी। होहु कृतघ्नी जनि शिख मानौ ॥ ४ ॥ [दंडक] अंगद-जोरण जटायु गीध धन्य एक जिन रोकि, रावण विरथ कोन्हों सहि निज प्राण हानि । हुते हनुमंत पलवंत तहां पांचजन,' दीने हुते भूपण कळूक जानि। गवरूप भारत पुकारत ही राम राम चार यार, लीन्हों।न छंडाइ तुम सीता अति भीत मानि ।

demanner ( १०५ ) गाइ द्विजराज तिय काज न पुकार लागै, भोगवै नरक घोर चोर को अभयदानि ॥ ५० ॥ दोहा] सुनि संपाति सपक्ष ह्र, रामचरित सुख पाय । सीता लंका मांझ हैं, खगपति दई बताय ॥ ५१ ।। [दंडक] हरि कैसो। वाहन की विधि, कैसो हेम हंस , लीक सी लिखत नभ पाहन के अंक को॥ तेज को निधान राम मुद्रिका विमान कैधौ , लक्षण को बाण छूट्यो रावण निशंक को ॥ गिरि गजगंड ते उड़ान्यो सुवरण अलि , सीता पद पंकज सदा कलंक रंक को। हवाई सी छूटी केशोदास आसमान में, कमान फैसो गोला हनुमान चल्यो लंक को ॥ ५२ ॥ ॥ इति किष्किधा कांड।

सुंदर कांड हनुमान लंका गमन [दोहा] उदधि नाकपतिशत्रु को, उदित जानियलवंत। अंतरिक्ष ही लक्षि पद, अच्छ छुयो हनुमंत ॥ १ ॥ पांच गये सुरसा मिली, और सिंहिका नारि । लोलि लिया हनुमंत तेहि, कढ़े उदर कह फारि ॥२॥ [तारक छंद] -~कछु राति गये करि दश दशा सी। पुरमांम चले वनराजि विलासी ॥ जय ही हनुमंत चले तजि शंका। मग रोकि रही तिय है तव संका ॥३॥ हनुमान लंका संवाद लंका-कहि मोहिं उलंधि चले तुम को हो। अति सूतम रूप धरे मन मोही। पठये क्यहि कारण कौन चले हो। सुर हो किधों कोऊ सुरंश भलेही ॥४॥ १-नाकपतिराना। ।

( १०७ )
हनूमान-हम वानर है
रघुनाथ पठाये।
तिनकी तरुणी अवलोकन आये।
लंका-हति मोहिं महामति भीतर-जैये
हनूमान-तरुणीहिं
हते कवलों सुख पैये ॥५॥
लंका-तुम मारेहि पैं
पैठन पैहो।
हठ कोटि. करौ घरही फिरि जैहो ।
हनुमंत बली तेहि थापर मारी।
तजि देह भई तव ही वर नारी ॥ ६॥
। चौपाई]
लंका-धनदपुरी
है। रावण · लीन्ही।
घहु
विधि पापन के रस भीनी ।।
चतुरानन चित चिंतन कीन्हों।
वरु करुणा करि मो कह दीन्हो ॥ ७ ॥
जब दशकंठ सिया हरि लैहैं।
हरि हनुमंत विलोकन ऐहें।
जब वह तोहि हतै तजि शंका।
तय प्रभु होइ विभीषण लंका॥"
चलन लगो जवही तय कीजो।
मृतक शरीरहि पावक दीजो॥
यह फहि जात सई पद नारी।
सब नगरी हनुमंत निहारी ॥६॥

- रावपशयनागार तष हरि रापण सोधत देख्यो। मणिमय पलका की छवि लेख्यो। तर तरुणी बहु भाँतिन गावें। विच विच श्रापम घीन घजा ॥१०॥ मृतक चिता पर मानहु सोहै। चहुं दिशि प्रेतवधू मन मोह ॥ जह जहँ जाइ तहाँ दुख दूनो! सिय यिन है सिगरो घर सूनो ॥ ११ ॥ [भुजंगप्रयात छंद ] कहूँ किन्नरी किनरी लै बजावै । सुरी प्रासुरी यांसुरी गीत गावै । कडू यक्षिणी पक्षिणी को पढ़ायें। नगी.फन्यका पुनगी को नचा ॥ १२ पियै एक हाला गुहे एक माला। यनी एक याला नच चित्रशाला । कई कोकिला कोक की कारिका को। पढ़ायै सुन्नाले शुकी शारिका को फिखो देखिकै राजशाला समा' को रह्यो रीमिक वाटिका की प्रभा को में - २-किरीसारगी।

( १०६ ) फिखो ओर चौहूं चित शुद्ध गीता । विलोकी भली सिंसिपा मूल सीता ॥ १४ ॥ सीता दर्शन धरे एक बेनी मिली मैल सारी। मृणाली मनो पंक सों कादि डारी || सदा रामनामै ररै दीन बानी । चहुँ ओर है ए सी दुःखदानी ॥ १५ ॥ ग्रसी बुद्धि सीचित्तचितानि मानों। किधौं जीभ दंतावली में वखाना ॥ किधौं घेरिकै राटु नारीन लीनी। कला चंद्र की चारु पीयूप भीनी ॥ १६ ॥ किधों जीव कीजोति मायान लीनी। अविद्यान के मध्य विद्या प्रवीनी॥ मनो संवरलीन मैं काम वामा । हनूमान ऐसी लखी राम-रामा ॥१७॥ तहाँ देव-जेपी दशग्रीव आयो। सुन्यो देवि सीतामहा दुःख पायो । सबै अंग ले अंग ही में दुरायो। अधोदृष्टि के अश्रुधारा वहायो ॥ १८ ॥ रावण सीता संवाद रावण-सुनो देवि मोपै कछु दृष्टि दीजे । इतो शोच तो राम काजेन कीजै। animunman.

HI . धसै दंडकारण्य देखे न कोऊ। ओ देख महा पावरो होय सोऊ ॥ १६ ॥ कृतनी कुदाता. कुकन्याहि चाहै। हितू नग्न मुंडीन ही को सदा है। श्रनाथ सुन्यो मैं ननाथानुसारी। यसै चित्त दंडी जटी मुंडधारी ॥ २० ॥ तुम्हें देवि दूप हितू ताहि माने। उदासीन तोसों सदा ताहि जाने ॥ 96 महानिर्गुणी नाम ताको न लीजै। सदा दास मोपै कृपाक्यों न कीजै ॥ २१ प्रदेषी नृदेवीन की होहु रानी। करें सेव वानी मोनी मृडानी ॥ लिये किन्नरी किन्नरी गीत गाई । सुकेशी 'नचें उर्वशी मान पावै ॥ २२ । [मालिनी छन्द] सीता-तृण विच दै घोली सीय गंभीर वानी। दशमुखशठ को तू कौन की राजधानी ॥ दशरपमुतद्वेषी रुद्र ब्रह्मा न भासै। निशिचर धपुरा तू क्यों न स्यों मुल नासै ॥ २३ ॥ अति तनु धनुरेखा नेक नाकी न जाकी। स्खल खरशर धारा क्यों सहै तिच्छ ताकी ॥

( १११ ) विड़कन' धन धूरे भति क्यों वाज जीवै। शिवशिर शशि श्री को राहु कैसे सो छोवै ॥ २४ । उठि उठि शउ ह्यां ते भागु तोले अभागे । मम वचन विसी सर्प जौलों न लागे। विकल सकुल देखों श्रासु ही नाश तेरो। निष्ट मृतक तोकों रोप मारै न मेरो ॥ २५ । [दोहा] अवधि दई द्वैमास की, कयो राक्षसिन चोलि। ज्यों समुझे समुझाइयो, युक्ति छुरी सौ छोलि ॥२ मुद्रिका प्रदान [चामर छन्द] देखि देखि कै अशोक राज पुत्रिका कयो। देहि मोहि भागितें जो अंग भागि है रह्यो। ठोर पाइ पौनपुत्र डारि मुद्रिका दई । आस पास देखि के उठाय हाथ कै लई ॥२७॥ । तोमर छंद] सियरी हाथ । यह ागि कैसी नाथ ॥ यह कहो लपि तव ताहि । मणि जटित मुंदरो पाहि ॥२८॥ वांचि देख्यौ नाउ । मन पखो संभ्रम भाउ ! ते रघुनाथ । यह धरी अपने हाथ ॥ २६ ॥ जय लगी জন त्रावाल १-चिड़-विष्टा। २-विसी फैलने वाले।

तहँ शाख ( ११२ ) बिबुरी सो कौन उपाउ । केहि श्रानियो महि ठाउ । सुधि लहाँ कौन उपाउँ । अब काहि वूमन झाउँ ॥ ३० ॥ चहुँ ओर चितै सत्रास । अवलोकियो प्राकास. यैटो नोटितय पखो यानर हाठि ॥ ३॥ सीता हनुमान संवाद १ तब कह्यो को तू श्राहि । सुर असुर मोतन चाहि । यक्ष पक्ष विरूप। दशकंठ वानर रूप ॥ ३२ ॥ कहि श्रापनो तू भेद । नतु चित्त उपजत खेद ॥ कहि घेगि यानर पाप । नतु तोहिं देही शाप ॥ डरि वृक्ष शाखा भूमि । कपि उतरि आयो भूमि [पद्धटिका छंद कर जोरि को ही पवन पूत । जिय जननि जानु रघुनाथ दूत रघुनाथ कौन दशरत्य नंद। दशरत्य कौन अज तनय चंद ॥ ३३ ॥ केहि कारण पठये यहि निकेत। निज देन लेन संदेश हेत ॥ गुण रूप शील शोमा सुभाउ । कछु रघुपति के लक्षण बताउ ॥ ३४॥ अति यदपि सुमित्रा नंद भक्त । अति सेवक हैं अति शूर शक । १-मीटिबड़ी मुश्किल से। ॥

अरु यदपि अनुज तीन्यो समान । पै तदपि भरत भावत निदान ॥३५.।। ज्यों नारायण उर श्री वसंति। त्यों रघुपति उर कछु द्युति लसंति ॥ जग जितने हैं सब भूमि भूप । सुर असुर न पूर्जे राम रूप ॥ ३६॥ निशिपालिका छंद] सीता-मोहिंः परतीति यहि भाँति नहिं आवई । प्रोति कहि धो सुनर वानरनि क्यों भई ॥ सब वर्णि परतीति हरि त्यों दई आंसु अन्हवाइ उर लाइ मुदरी लई ।। ३७ ।। [ दोहा] आंसु वरपि हियरे हरपि, सीता सुखद सुभाइ। निरखि निरखि पिय मुद्रिकहि, वरणति है बहु भाइ ॥३॥ चात मुद्रिका वर्णन [पद्धटिका छन्द] यह सूरकिरण तम दुःखहारि। शशिकला किधी उर शीतकारि।। कल कीरति सी शुभ सहित नाम । के राज्यश्री यह तजी राम ।। ३8 ।। के नारायण उर सम लसंति। शुभ अंकन ऊपर भी घसंति।।

MPC . - पर विद्यासी पानंद दानि । युत अष्टापद' मनु शिवा मानि ॥१०॥ जनु माया अच्टर सहित देखि। के पत्रो निश्चयदानि - लेखि । प्रिय प्रतीहारनी सी निहारि। श्री रामोजय उच्चारकारि ॥११॥ पिय पठई मानी सखि सुजान । जगभूषण को - भूषण निधान । निवाई हमको सीख देन । यह किया हमारो मरम लेन ॥४२॥ [दोहा ] सुखदा शिसदा अर्यदा, यशदा रसदातारि। रामचन्द्र की मुद्रिका, किधों परम गुरु नारि ।। ४३ ॥ बहु बरणा सहज प्रिया, तमगुनहरा प्रमान । जग मारग दरशावनी, सूरज किरण समान ॥४॥ श्री पुर में वन मध्य हौं, तू मग करी अनोति । कहि मुंदरी अथ नियन को, को पारि है परतोति ॥४५॥ [पद्धटिका छंद] कहि कुगल मुद्रिके रामगात। पुनि लन्मए सहित समान तात। १- मदापरम्परा, माना । २-निमुनिकाय ( ११५ ) यह उत्तर देति न बुद्धिवंत । केहि कारण घौं हनुमंत संत ॥ ४६॥ [दोहा] हनूमान-तुम पूंछत कहि मुद्रिके, मौन होति यहि नाम । कंकन की पदवी दई, तुम बिन याकहँ राम ॥४७॥ राम बिरह व [ दंडक] 'दीरघ दरीन बर्से केशोदास केशरी ज्यों, केशरी को देखि वन करी ज्यों कँपत हैं। यासर की संपति उलूक ज्यों न चितवत, चकवा ज्यों चंद चिते चौगुनो कैको सुनि व्याल ज्यों बिलात जात घनश्याम , वन की घोरनि जपासो ज्थे, तपत हैं। भौर ज्यों भँवत वन योगो ज्यों जगत नि, सात ज्यो राम नाम तेरोई जपत हैं ॥४॥ [दोहा] दुख देखे सुख होहिगो, सुक्ख न दुःख विहीन । जैसे तपली तप तपे, होत परमपद लीन ॥ ४६॥ घरपा वैभव देखिकै, देखी शरद सकाम । जैसे रण में फाल भट, भेटि भेटियत वाम ॥ ५० ॥ दुःख देखिकै देखिहौ, तब मुख आनंदकंद । तपन ताप तपि द्यौस निशि, जैसे शीतल चंद ।। ५१ ॥ चंपत हैं। - ( ११६ ) अपनी दशा कहा कहाँ, दीप दशा सी देह। जरत जाति यासर निशा, केशव सहित सनेह ।। ५२॥ +सुगति मुकेसि सुननि मुनि, समुखि सुदंति सुनोणि । का दरशावै गो बेगिही, तुमको सरसिजयोनि ॥ ५३॥ [हरिगीत छन्द] कछु जननि दे परतीति जास रामचन्द्रहि श्रावई। शुम शीश की मणि दई यह कहि सुयश तव जग गावई। सब काल के ही अमर अरु तुम समर जयपद पाइहा। सुत नाजु ते रघुनाथ के तुम परम भक्त कहाइहा ॥ ५४॥ कर जोरि पगपरितोरि उपवन कोरि किंकर मारियो। पुनि जंबुमाली मंत्रिसुत श्रर पंच मंत्रि सहारियो। रण मारि अक्षकुमार बहु विधि इंद्रजित से युद्धकै । अति ग्रहशस्त्र प्रमाण मानि सो वश्य भोमन शुद्ध के ॥ ५५ ॥ हनुमान रावण संवाद [विजय छन्द] रेकपि फोन तु अक्ष को घातक ? दूत बली रघुनंदन जो को। को रघुनंदन रे? त्रिशिरा खरदूषण दूपण भूपण भू को। सागर कैसे तखो?जैसे गोपद, काज कहा ? सियचोरहि देखो। कैसे यघायो ? जो सुंदरि तेरी दुई हग सोवत पातक लेखो।' [चामर छन्द राए-कोरिकोरि यातनानि फोरि फारि मारियां काटिकाटि फारि माँसु बांटि बाटि सारिये। -

( ११७ )
खाल बैंचि बैंचि हाड़ भूजि भुजि साहुरे।
पौरि टांगि एंड मुंड ले उड़ाइ जाहु रे ॥ ५७ ॥
विभीषण-दूत मारिये न राजराज छोड़ि दीजई ।
मंत्रि मित्र पूछि कै सो और दंड कीजई।
एक रंक मारि क्यों बड़ो कलंक लीजई ।
खुद
सोवि गो कहा महा समुद्र छीजई ।।५।।
तूल तेल वोरि वोरि जोरि जोरि वाससी।
लै अपार रार ऊन दून सूत सों कसी।
पूछ पोनपूत की सँवारि वारि दी जहीं।
" अंग को घटाइ के उड़ाइ जात भो तहीं ॥ ५॥
[चंचरी छंद]
धाम धामनि आगिकी बहु ज्वाल माल विराजहीं।
पौन के झकझोर ते झंझरी झरोखन भ्राजहीं ॥
बाजि धारण शारिका शुक मोर जोरन भाजहीं।
ज्यों विपदाहि श्रावत छोड़ि जात न लाजहीं 1,६०॥
लंका दाह
--
[भुजंगप्रयात छंद
जटी अग्निज्वाला अटा सेत है ज्यों।
शरत्काल के मेघ संध्या समैज्यों।
. लगी ज्वाल-धूमावली नील राजे ।
मनो स्वर्ण की किंकिणी नाग साजै ॥६॥

कह रैनिचारी गहे ज्योति गाढ़े।
मनो ईश रोयाग्नि में काम डाड़े ।।
कट्टकामिनी ज्याल मातानि भोर।
बजे लाल सारी अलंकार तारें ।। ६२ ।।
कहू भीन राने रचे धूम छाहीं।
श्यो सूर माना लस मेघ माहों।
जर शस्त्रशाला मिली गंधमाला।
मलै अदि मानी लगी दाव ज्याला ॥ ३ ॥
चली भागि चौहूं दिशा राजरानी।
मिली ज्याल माला फिरै दुःखदानी ।
मनो इंश बानायली लाल लोलें ।
सवै दैत्यमायान के संग डॉलें ॥१४॥
.
[सवैया]
लंक लगाइ दहनुमंत विमान यचे अति. उच्चरखी है।
पावक में उच, बहुधा मनि रानी र पानी पानी दुखी है।
कंचन को पघिल्या पुर पूर पयोनिधि में पसरी सा मुखी है।
गंग हजारमुखी गुनिकेशोगिय मिलोमानी अपार मुम्सोहा।
[दोहा
हनुमत लाई लंक सय, यच्या विभीपय धाम !
ज्यों अक्षयोदय येर में, पंक्षा पूरर याम ॥ ६ ॥

( १९६ ) के। [संयुता छंद हनुमंत लंक लगाइ के। पुनि पूछ सिंधु बुझाइ शुभ देख सीतहि पाँपरे । मनि पाय श्रानंद जी भरे ॥२७॥ रघुनाथ पै जव ही गये । उठिक लावन को भये प्रभु मैं कहा करणी करी । शिर पाय की धरणी धरी ।।६।। [दाहा] चिन्तामणि ली मणि दई, रघुपति कर हनुमंत । सीतामू को मन रँग्यो, जनु अनुराग अनंत ॥ ६ ॥ सीता संदेश [घनाक्षरी] भारनी ज्यों भ्रमति रहति वनवीथिकानि, हंसिनी ज्यों मृदुल मृणालिका चहति है। हरिगी ज्यों हेरति न केदारी के काननहिं, केका सुनि व्याली ज्यों पिलानहीं चहति है। पीउ पीउ रटत रहति चित चातकी ज्यों, चंद चितै चकई ज्यों चुप ह रहति है। सुनहु नृपति राम विरह तिहारे ऐसी , सूरतिनर से ताजू की भूरति गहति है ॥ ७० ॥ [दोहा] श्रीनृसिंह प्रह्लाद की, वेद जो गावत गाथ। गये मास दिन नाशु ही, झूठी हहै नाथ ॥ ७१ ॥ १- सूरितन-सूरते. दशाओं।

( १२० ) [दंडक] राम-सांचा एक नाम हरि लीन्हे सब दुःख हरि, और नाम परिहरि नरहरि ठाये हो। पानर नहीं हो तुम मेरे याण रोप सम, यलीमुख शूर वली मुख निनु गाये हो। शाखामृग नाही बुद्धि यलनके शाखा भूग, कैघों वेद शाखामृग केशव को भाये हो। साधु हनुमंत घलपंत यशवंत तुम, गये एफ काज को अनेक करि आये हो ॥७२॥ [तोमर छंद] हनूमान-गइ मुद्रिका लै पार । मनि मोहि ल्याई धार। कह करयो मैं यलरंक । अतिमृतक जारी लंक।७३५ राम पयान विधि विजय दशमी पाइ । उठि चले श्री रघुरादा हरि यूय यूथप संग । बिन पच्छ के ते पतंग 1sen [दंडक] सुप्रीव-कहे केशोदास तुम सुनौ राजा रामचन्द्र, रावरी जयहिं सैन उचफ चलति है। पूरति है भरि धूरि रोदसिहि पास पास, दिशि दिशि घरपा ज्यों यलनि यलति है। १-दसिरिभूमि और प्राकाय ।

( १२१ ) पनग पतंग तर गिरि गिरिराज गन , বাসন मृगराज · राजनि दलति है। जहां तहां ऊपर पताल पय प्राइ जात , पुरइनि के से पात पुहुमी हलति है ॥ ५ ॥ लक्ष्मण-भार के उतारिवे को अवतरे रामचन्द्र, किधों केशोदास भूरि भरत प्रवल दल । टूटत हैं तरुवर गिरे गण गिरिवर सूखे सव सरवर सरिता सकल जल। उचकि चलत हरि दचकनि दचकत , मंच ऐसे मचकत भूतल के थल थल । लचकि लचकि जात शेष के अशेष फण, भागि गई भोगवती अतल वितल तल ॥ ७६ ॥ [दोहा] बलसागर लक्ष्मण सहित, कपिसागर रणधीर । यश सागर रघुनाथ जू, मेले सागर तीर ॥ ७॥ समुद्र वर्णन [विजया छंद] भूति विभूति पियूषहु की विप, ईश सरीर कि पाप वियोहै। है किधों केशव कश्यप को घर , देव अदेवन . के मन मोहै।

चन्दन नीर
.
( १२२ )
संत हियो कि वस हरि सन्तत;
शोभ अनन्त फहै कवि को है।
तरंग तरंगित,
नागर कोउ कि सागर सोहै ।। ७८ ॥
[गीतिका छंद]
जलजाल फाल कराल माल तिमिगिलादिक सौ बसे ।
उर लोभ क्षोम विमोह फोह सकाम ज्यों खल को लसै॥
बहु संपदा युत जानिये प्रति पातकी सम लेखिये।
कोर मांगना' श्रम पाहुनो नहिँ नीर पीयत देखियो ।
॥ इति सुदर फांड।
-
१-मांगना-मंगन, भिधुक । पाहुनो मेहमान, अतिथि।

लंका काड
रावण प्रति मंदोदरी का उपदेश
[विजय छंद]
मंदोदरी-राम को वाम जो पानी चोराइ
सो लंक में भीचु की बेलि वई जू ॥
क्यों रण जीतहुगे तिनसों जिन
की धनु रेख न नांघि गई सू॥
बीसविसे यलचन्त
हुते जो
हुती ग . केशव, रूपरई जू ॥
तोरि शरासन शंकर को पिय
सीय स्वयंवर क्यों न लई जू ॥१॥
वालि वली न बच्यो पर खोरहि
क्यों बचिही तुम श्रापनि खारहि ॥
जा लगि क्षीर' समुंद्र मय्यो कहि
कैसे न यांधि है वारिधि थोरहि ॥
श्री रघुनाथ गनौ असमर्थ न
देखि विना रथ हाथिन घोरहि ॥
ताखो शरासन शंकर को जेहि
सोऽव कहा तुष लंक न तोरहि ॥२॥

( १२४ ) विभीषण शरणागमन [सधैया] दीनदवालु कहावत केशप ही अति दीन दशा गहौ गादी रावण के अय ओघ समुद्र में बूडत है कर ही गहि काढ़ो। ज्यों गज की प्रसाद की कीरति त्योही विभीषण को यश यादो। भारत बंधु पुकार सुनो किन भारत हो तो पुकारत ठाढ़ो ॥३॥ केशव पापु सदा सद्यो दुःख पै दासन देखि सके न दुखारे । जाको भयो जेहि भाँति जहाँ दुख त्याही तहाँतिहि भौतिपधारे॥ मेरिय यार अयार कहा कहूँ नाहिं तू कादु के दोष बिवारे । चूड़त हैं। महामोह समुद्र में राखत काहे न राखनहारे ॥४॥ [हरिलीला छंद] श्री रामचंद्र अति आरतवंत जानि । लीन्हों योलाय शरणागत सुःखदानि । लंकेश पाउ चिरजीवहि लंक धाम । राजा कहाउ जौलगि जग राम नाम 1. सेतुबंध [दोहा जहँ तहँ यानर सिंधु मैं, गिरि गण डारत पानि ।। शब्द होभरितिमहि, रावण को दुखदानि ॥ ६॥ [तोटक छन्द उछल जल उच्च प्रकाश चहै। अल जोर दिया विदिशान महे॥

( १२५ ) जनु सिंधु प्रकाशनदी रि को चहु भाँत्ति मनाचत पाँ परि के || ७ ॥ बहु व्योम विमान ते मीजि गये। - जल जोर भये अँगरागमये। . : सुर' सागर मानहु युद्ध जये। सिगरे पट भूपण लूटि लये ॥ ८ ॥ अति उच्छलि छिछि त्रिकूट ध्या। 'पुर रावण के जल जोर भयो। तब लंक हनूमत लाइ' दई। नल मानहु प्राइ बुझाइ लई 1811 लगि सेतु जहाँ तहँ शाम गई। सरितानि के फेरि प्रवाह ह । पति देवनदी रति देखि मली। पितु के घर को जनु ससि चली ॥ १० ॥ सव सागर नागर सेतु रची। धरणे बहुधा युत शक शची ॥ तिलकावलि सी शुभ शीश लस। मणिमाल किधी उर में विलसे ॥ ११ ॥ [तारक छन्द] उरते शिवमूरतिः श्रीपति लीन्ही । शुभ सेतु के मूल अधिष्ठित कीन्हीं ॥ १-सा-अग्नि। .

इनके दररों परशै पग जोई। भय सागर के तरि पार सा हाई ॥१२॥ [दोहा सेतु मूल शिव शोभिजे, केशव परम प्रकाश । सागर जगत जहाजको, फरिया केशवदास ॥१३॥ रामचम् वर्णन [दंउफ] कुंतल ललित नील भृकुटी धनुष नैन , कुमुद फटाक्ष याए सयज्ञ सदाई है मुग्रीव सहित तार अंगदादि भूपण र, मध्य देश केशरी सुगजगति माई है। विग्रहानुकूल सव सवलत ऋक्षाल, ऋक्षराज मुखी मुख फेशी दास गाई है। रामचन्द्र जू को धम् राज्यश्री विमीपण को, रायण की मीयु दरकूच चलि आई है ॥१४॥ [चंचला छुद] ताम्रकाट लाहकार स्वर्णकोट आसपास । देव की पुरी घिरी कि पर्वतार के विलास ॥ बीच बीच हैं कपीश बीच यीच भूत जाल । लंक कन्यका गरे कि पीत मील कंठमाल ॥ १५॥ १-करिया कथ) पनवार।

( १२७ ) रावण अंगद संवाद [दोहा] अंगद कृदि गये जहाँ, आसनगत लंकेश । मनु मधुकर करहाट' पर, शोभित श्यामल वेष ॥१६॥ [नाराच छंद] प्रतीहार-पढ़ो विरंचि मौन वेद जीव सेोर छडि रे। कुबेर बेर के कहीं न यक्ष भीर मंडि रे। दिनेश जाइ दुरि वैछु नारदादि संगहीं। न बोलु चंद मंदबुद्धि इंद्र की सभा नहीं ॥ १७ ॥ [चित्रपदा छंद] अंगद यों सुनि बानो । चित्त महारिस श्रानी ॥ ठेलि के लोग अनैसे । जाइ सभा महँ वैसें ॥ १८ ॥ [चित्रपदा छंद] रावण-कौन हो पठये सो फौने त्या तुम्हें कह काम है। अंगद-जाति वानर लंकनायक दूत अंगद नाम है। रावण-कौन है वह बांधि के हम देह पूछि सवै दही। लेक जारि सँहारि अक्ष गयो सोवात वृथा कही ॥१६॥ कौन के मुत वालि के वह कौन वालि न जानिये। कांख चापि तुम्हें जो सागर सातन्हात बखानिये ।। है कहां वह वीर अंगद देवलोक वताइयो। क्यों गयो रघुनाथ वान विमान बैठि सिधाइयो ॥२०॥ १-करदार-कमल की छतरीर-से-बैठे।

[सधैया]. ( १२८ ) लंकनायक को विमीपण देव दूषण को दहै। मोहि जीवत होहिं क्यों जग तोहि जीवत को कई मोहिं को जग मारि है दुर्बुद्धि तेरिय जानित। फोन यात पठाइयो कहि पीर वैगि वखानित ॥२१॥ अंगद- श्री रघुनाथ को धानर केशव पायो हो एकुन काह हा । सागर को मद झारि चिकारि त्रिकूट को देह विहार लाजू। सीय निहारि संहारि कै राक्षस शोक अयोक याहि दला। अनकुमारहि मारि कै लंकहि जारि कैनौकेहि जात मयाजू श [गंगोदक छंद] राम राजान के राज आये इहां धाम तेरे महा भाग जागे अथे। देषि मंदोदरी कुंमकादि दे मित्र मंत्री जिते पूछि देखो सदै। रासिज जाति को भांति' को वंशको साधिजे लोक में लोक पाक को। पानि के पाँ परो देसले कोशल प्रामुहीं ईश सोता चलें ओकको ॥ २३॥ रावण लोक लोकेश स्यों छोचि ग्रह्मा रचे यापनी पापनी सींच सो सो रहै। १-मविनाम । १२६) चारि चाहे धरे विष्णु रक्षा करें यात सांची यहै वेदवाणी कहै। ताहि भ्रूभंग ही देव देवेश स्यों विष्णु ब्रह्मादि दै रुद्रजू संहरै। ताहि हैछोड़ि के पायँ काके परौं श्राजु संसार तो पायँ मेरे परै २४ ॥ [मदिरा छंद] राम को काम कहा ? रिपु जीतहिं कौन फवै रिपु जीत्यो कहाँ ? वालि वली, छल सों, भृगुनंदन गर्व हो, द्विज दीन महा ।। दीन सो क्यों ? छिति छत्र हत्या दिन प्राणनि हैहयराज हैहयराज कियो। हैहय कौन ? बहे विसयो जिन खेलत ही तुम्हें बांधि लियो ॥ २५ ॥ अंगद- [विजय छंद] सिंधु तखो उनको वनरा तुम पै धनुरेख गई न तरो। बांध्योइ बांधत सो न बध्यो उन वारिधि बांधि के चाट करी ॥ अजहूं रघनाथ प्रताप की यात तुम्हें दशकंठ न जानि परी। तेलनि ठूलनि पूंछ जरी' न जरी जरी लंक जराइ जरी ॥ २६ ॥ १-जरी-गड़ी हुई, युक्त। ६ ( १३० ) रावण- नील सुखेन हनू उनके नल और सबै कपि पुंज तिहारे । पाठहु पाठ दिशा बलि दै अपनी पदु लै पितु जालगि मारे । तास सपूतहि जाइ कै वालि अपूतन की पदवो पगु धार । अंगद संग ले मेरो सबै दल आजुहि क्यान इनै चपमारे ४२३.५ [दाहा] जो सुत अपने बाप को, वैर न लेह प्रकाश । तासों जीवत ही मस्खो, लोग कह सजि पास ॥ २८ ॥ अंगद-इनको बिलगु न मानिये, सुनि रावण पल श्राधु । पानी पावक पयन प्रभु, ज्या असाधुत्यों साधु ॥२६॥ रावण- [द्रुतविलंबित छंद उरसि अंगद लाज कछू गह। । जनक घातक बात वृथा कही। सहित लक्ष्मण रामहि संह। सकल यानर राज तुम्हें कर॥३०॥ [निशिपालिका छंद] अंगद- शत्रु सम मित्र हम चित्त पहिचानहीं। दूत विधि नूत' कयहूं न उर आनहीं । आपमुख देखि अभिलाप अमिलाप । राखि मुज शीश तब और कहँ राबत् ॥ ३१॥ [भुजंगप्रयात छंद रायण-महामोचु दासी सदा पाई धोये। प्रतीहार है के कृपा सूर जोवे । १-नूतन्तन, नदीन।

( १३१ ) '. क्षपानाथ लीन्हें रहै छत्र जाको। करैगो कहा शत्रु सुग्रीव ताको ॥ ३२ ॥ "सका मेघमाला शिखी पाककारी। करै कोतवाली महादंडधारी ॥ पढ़े वेद ब्रह्मा सदा द्वार जाके । कहा यापुरो शत्रु सुग्रोव ताके ॥ ३३ ॥ [विजय छंद] अंगद-पेट चढ़यों पलना पलिका चढ़ि पालकि हु चढ़ि माह मढ्यो रे। चौक चढ़यो चित्रसारो चढ़यो गज वाजि चढ़यो गढ़ गर्व चढ़यो रे। व्योम विमान चढ़यो ई रह्यो कहि केशव सो कवहूं न पढ़यो रे। चेतत नाहीं रह्यो चढ़ि चित्त सों चाहत मूढ़ चिताह चढ़यो रे॥३४॥ [भुजंगप्रयात छंद] रावण-निकायो जो भैया लियो राज जाको। दियो कादिकै जू कहा त्रास ताको । लिये वानरालो कहाँ पात तासों। सो कैसे लरै राम संग्राम मोसों ॥ ३५ ॥ १.--सकाहा, पानी भरनेवाला । २~-शिस्त्र अग्नि।

( १३२ ) अंगद- [विजय ईद] हाथी न साथी न घोरेन चेरेन गाउँन ठाउँ को टायलहै। तात न मात न पुत्र न मित्र न वित्त न तोय कहीं संग है। केशव काम को राम पिसारत और निकाम न कामहि पेई चेनिरे चेति श्री चित अन्तर अंतकलोक अकेलाई जैहै ॥३६ [भुजंगप्रयात छंद] रायण-डर गाय विर्य बनाये जो भाजै। पप छोड़ परस्त्रीहि लाजै॥ परदाह जासों न होवे रतीको । सु कैसे लर वेप कीन्हें यती को ।। ३७ ॥ [दोहा] गेंद करउँ मैं खेल को, हरगिरि केशोदास । शीश चढ़ाये आपने, कमल समान सहास ॥ [दंडक] अंगद-जैसो तुम कहन उटायो एक गिरिवर, ऐसे कोटि फपिन के पालक उठापहीं। फाटे जो फहत शीश फाटत घनेरे घा', भगर के पेले कहा भट पद पारहीं। जोत्यो जो सुरेश रण शाप पि नारि हो को, समुझ म द्विज नाते समुझावहीं। १-घाघम्इंन्द्र माली। २-भगरगाद ।

H - ( १३३ ) गहो । राम पायँ सुख पाइ करें तपी तप, सीताजू को देहु देवं दुंदुभी बजावहीं ॥ ३६॥ [ वंशस्थ छंद] रावण-तपी जपी विप्रनि छिप ही हरों। अदेव द्वेपी सय देव संहरौं । सिया न देह। यह नेम जो धरौं। अमानुपी' भूमि अवानरी करौं ॥ ४० ॥ अंगद- [विजय छंद] पाहन ने पतिनो करि पावन ढूंक कियो हर को धनु को रे॥ छत्र विहीन करी क्षण में क्षिति गर्व हखौ तिनके पल को रे॥ पर्वतपंज दुरैनि. के पात समान तरे अजहूँ धरको रे हाइँ नरायण पैन ये गुण कौन इहां नर वानर को रे॥४१॥ [चंचरी छंद] रावण-देहि अंगद राज तोकहं मारि वानरराज को। यांधि देहि विभोपणो अरु फोरि सेतु समाज को ॥ पूंछ जारहिं अनरिपु की पाई लागाह रुद्र के। सीय को तव देहूं रामहि पार जाई संमुद्र के । ४२॥ अंगद-लंक लाई गयो बली हनुमंत संतन गाइयो। सिंधु बांधत शोधि के नल क्षीर छीट यहाइयो । ताहि ताहि समेत अंध उसारि हों उलटी.करौं। आजु राज कहां विभीषण चैरिह तेहिते. डरौं ।। ४३ ॥

( १३४ ) [दोहा] अंगद रावण को मुकुट, लेकरि उड्यो मुजान । मनोचला यमलोक को, दशशिर को प्रस्थान ॥४४॥ अंगद लै था मुकुट फो, परे राम के पार। राम विभीषण के शिरसि, भूपित क्रियो यना ॥५॥ (लंकावरोध) [पद्धटिका छंद] दिशि दक्षिण अंगद पूर्व नील । पुनि हनूमंत पश्चिम सुशील ।। दिशि उत्तर लक्ष्मण सहित राम। सुग्रीव मध्य कीन्हे विराम ॥४॥ सँग यूथप यूथप यल विलास। पुर फिरत विमीपरा आस पास ॥ निशि यासर सय को लेत साधु । यहि भांति भयो लंका निरोधु ॥ ४॥ नय रायए मुनि लंका निरोध । उपजो तन मन अति परम क्रोध । राख्यो प्रहस्त हठि पूर्व पौरि । दतिपहिं महोदर गयो दौरि भयो इन्द्रजीत पधिम दुपार। है उत्तर रावण . यल उदार . , ( १३५. ) कियो विरूपाक्ष थित मध्यदेश । फरै नारान्तक' चहुंघा प्रवेश ॥ ४६॥ [प्रमिताक्षरा छंद ] :: : अति द्वार द्वार महँ युद्ध भये । बहु ऋच्छ कंगरन लागि गये ।। तव स्वर्ण लंक मह शोभ भई । जनु अग्निज्वाल महँ धूममई ॥५०॥ (मेघनाद युद्ध). [दोहा] मरकत मणि के शोभिजे, सबै कँगूरा चारु ॥ आइ गयो जनु घात को, पातक को परिवारु ॥५६॥ (कुसुमविचित्रा छंद) तब निकसो रावणसुत शूरो। जेहि रन जीत्या हरि' बलपूरो ।। तपबल माया तम उपजाया। फपिदल के मन संभ्रम छायो॥५२॥ [दोधक छन्द ] फाहु न देखि परै वह बोधा। यद्यपि है सिगरे बुधि बोधा॥ शायक सो अहिनायक साध्यो। सोदर स्यों रघुनायक यांध्यो ।। ५३ ।। रामहिं बांधि. गयो जय लंका। रावण की सिगरी गई शंका। देखि बँधे तव सोदर दोऊ । यूथप यूथ से सव कोऊ ॥ ५४॥ १-दरि-इन्द।

..
( १३६ )
[स्वागता छंद:
इंदर्जात हि ले उर लागे। आज काज सब मो मन मा.
कै विमान अधिदिति धाये । जानकीहि रघुनाय दिना।
[दाहा]
कालसर्प के कयल ते, छोरत जिनको नाम ।
बंधे ते ग्राहए वचन पश, माया सपंहि राम ।
[स्वागता दंद]
पन्नगारि तवहीं तहँ आये । व्याल जाल सव मारि मगये।
लंक मांझ वहीं गइ सीता । गुन्द्र देह अबलोकि मुगांता :438
(रावण प्रति महोदर का उपदेश)
महादर-कहै जो कोऊ हितवंत वानी।
कहा सो ठास अति दुःखदानी ।।
गुनो न दावै
सुपी तबै साधत मौन मात्रै ।। ५ ।
कहो गुकावायं मु ही कहीं जू।
सदा तुम्हारी हित संग्रही ।
नृपाल भूमें विधि चारि जाना।
मुनो महाराज सबै यखानों: ५
[मुजंगप्रयात इंद]
यह लोक एकै सदा साथि जान।
पली वैनु ज्यां प्रापही देश माने
यहुमा कुदाये।

- ( १३७ ) करें साधना एक परलोकही को। हरिश्चन्द्र जैसे गये दै मही को ।। ६० ।। दुहूं लोक को एक साधैं सयाने। विदेहीन ज्यों वेद यानी वखाने ॥ न लोक दोऊ हठी एक ऐसे। त्रिशंकै हँसें ज्यों भलेऊ अनैसे ॥ ६ ॥ [ दोहा] चह राज को मैं कहूँ, तुमसों राजचरित्र । रुचे सो को चित्तमें, चिंतहु मित्र अमित्र ॥ ६२ १. चारि भांति मंत्री कहे, चारि भांति के मंत्र॥ मोहिं सुनायो शुक्रजू, सोधिसोधि सब तंत्र ॥ ३ ॥ [छप्पै] एक राज के काजहत निज कारज काजे । जैसे सुरथं निकारि सबै मंत्री सुख साजे । राज के काज' श्रापने काज विगारत । जैसे लोचन हानि सही कवि बलिहि नियारत । एक प्रभुसमेत अपनो भलो करत दाशरथि दूत ज्यो । एक अपनो अरु प्रभु को वुरो करत रावरो पूत ज्यों ॥४॥ [दोहा ] मंत्र जो चारि प्रकार के मंत्रिन के मान ।। विष से दाडिमयीज से, गुड़ से नींब समान ।। ६५ ।। १-नट-नट करें

[चंद्रवर्म छंदः]
राजनीति मत तत्व समुझिये।
देश काल गुणि युद्ध अरमिये
मंत्रि मित्र अरि को गुण गहिये।
लोक लोक अपलोक न पहिये ।। ६६ ॥
रायण-चारि मांति नृपता नुम कहियो ।
चारिमैत्रि मत मैं मन गहियो ।
राम मारि मुर एक
न थचिहैं।
इंद्रलोक सो यासहि रचि ॥ ६ ॥
[प्रमितातरा छन्द]
उटि के प्रहस्त सजि सैन चले।
बहु भांति जाह कपि पुंज दले ।
तय दौरि नील उठि मुष्टि हन्या।
अमुहीन गियो मुघ मुंड सन्यो ॥ ६ ॥
[यंशस्या छन्द]
महावली जूझत ही प्रहस्त को।
चयो तही रावण मीडि हस्त को ।
अनेक मेरी पहु दुदुमी पर्ज।.
गयंद मोघांध जहां तहां गर्ज ॥ ६॥

( १३६ )
[सवैया]
देखि विभीषण को रण रावण शक्ति गही कर रोष रई है।
छूटतही हनुमंत सो बीचहिं पूछ लपेटि के डारि दई है।
दृसरी ब्रह्म की शक्ति अमोघ. चलावतही हाइ हाइ भई है।
गयोभले.शरणागत लक्ष्मण फूलि के फूलली श्रोडि लई है। ७०।
[दोधक छन्द]
यद्यपि है अति निर्गुणताई । मानुप देह धरे रघुराई ।
लक्ष्मण राम जहीं अवलोक्यो । नैनन ते न रह्यो जलरोक्यो ।
राम विलाप
लोचन याहु तुहीं धनु मेरो।
तू बल विक्रम चारक हेरो॥
तूविन ही पल प्राण न राखों।
सत्य फही कछु झूठ न भाखौ ।। ७२ ।।
मोहिं रही यतनी मन शंका।
देन न पाई विभीषण लंका ।।
चोलि उठौ प्रभु को प्रण पारो।
नातरु होत है मो मुख कारो।। ७३ ॥
[पट्पद ]
राम-करि प्रादित्यं अंदृष्ट नष्ट यम करौं अष्ट वसु ।
रुद्रन योरि समुद्र करी गंधर्व सर्व पसु ॥
यलित अधेर कुबेर यलिहि गहि देउ इद् अव ।
विद्याधरनि अविध करौं दिन सिद सिद्धि सव ।।
,

।'
(१४०)
निजु होहि दासिदिति की अदिति अनिल अनल मिटजाइ जल।
सुनि मुरज सूरज उदत ही-करौं असुर संसार चल ॥ ७ ॥
हनुमंत पैज
[ भुजंगप्रयात छंद ]
हन्यो यिनकारी पली वीर यामैं।
गयो शोधूगामी गये एक याम ।।
चल्यो लै सवै पर्वत के प्रणाम ।।
न जान्यो विशल्यौपधी कौन तामैं ॥५॥
द्रोणगिरि पानयन
लसें औषधी चारु भोध्योमचारी।
कह देखि यों देव देवाधिकारी॥
पुरी भौम की सी लिये शीशराज।
महामंगलार्थी हनूमन्त गाजे ॥६॥
लगी शक्ति रामानुजैरामसाथी ।
जड़े द्वैगये ज्यों गिरै हेम हाथो॥
तिन्हें ज्याइवे को सुनो प्रेमपाली ।
चल्योज्याल मालीहिले कीर्तिमाली॥७॥
किधी प्रातहीकाल जी में विचारयो।
चल्या अंशु लै अंशुमाली सँहायो॥
किधी जात ज्यालामुखीजोर लीन्हें ।
महामृत्यु जामें मिदै होम कीन्हें ॥ ७ ॥

( १४१ ) विनापत्र हैं यत्र पालाश फूले । र कोकिलाली भ्रमैं भौंर भूले ॥ सदानंद राम महानंद को ले। हनूमंत आये वसंतै मनो ले ॥ ७ ॥ [मोटनक छंद ] ठाढ़े भये लक्ष्मण मूरि छिये । दूनी शुभ शोभ शरीर लिये ॥ कोदंड लिये यह वात लंकेश न जीवत जाइ घरै॥०॥ श्रीराम तहीं उर लाइ लियो। सूंध्यो शिर नाशिप कोटि दियो । कोलाहल यूथप यूथ • लंका हहली दशकंठ हियो॥१॥ रायणप्रति कुंभकर्ण का उपदेश [मनोरमा छंद ] कुंभकर्ण-सुनिये कुलभूपण देव विदूषण । यहु आजिविराजिन' के तुम पूपण ॥ भवभूप जे चारि पदारथ तिनको फयह नहिं बाधक. याधत ॥२॥ कियो। साधता १-भानि = समर + मिरानी = शोभा पाने वाले शब लोग (१४२ ) [पंकजवाटिका छंदः] .. धर्म करत अति अर्थ यदायत । संतति हित रति कोविंद गावत। संतति उपजत ही निशि यासर। साधत तन मन मुक्ति महाधर ॥३॥ [दोहा] राजा अरु युवराज जग, प्रोहित मंत्री मित्र । कामो कुटिल न सेइये, कृपण कृतन अमित्र [घनाक्षरी] कामी वामी मूंड क्रोधो कोढ़ी कुलद्धपी सलु कातर .कतनी मित्रदापी द्विजद्रोहिये । कुपुरुष किंपुरुष काहली कलही क्रूर कुटिल कुमंत्री कुलहीन केशी ढाहिये । पापी लामी शट अंघ यापरी यधिर गंगा बौना अविवेकी हटी छली निरमोहिये। सूम सर्वभक्षी दवयादी जो कुवादी जड़ अपयशी ऐसे भूमि भूपति न सेाहिये । [निशिपालिका छंद] वानरन जानु मुर जानु गुमगाय हैं। मानुप न जानु रघुनाय जगनाय है। १--महीधर-रामा।

-
जानकिहि देहु करि “नेहु कुल देह सो।
श्राजु रण साज पुमि गाजु हँसि मेह सो E६॥
.: [ दोहा']
रावण-कुंभकरण करि युद्ध के, साइरहै। घर जाइ।
वेगि विभीषण ज्यों मिल्यो, गही शत्रु के पाइ ॥ ८७ ।
कुंभकर्ण-युद्ध
[चामर छंद]
कुंभकर्ण रावणे प्रदक्षिणाहि दे चल्यो।
हाइ हाइ है रह्यो श्रकाश श्राही हल्यो।
मध्य जुद्रघंटिका किरीट शीश शोभनो ।
लक्ष पक्ष सो कलिन्द्र इन्द्र पै चढ्यो मनों || !
[नाराच छंद]
उड़ें दिशा दिशा कपीश कोरि कोरि श्वासहीं।
चर्पे चपेट पेट वाहु जानु जंघ सो तहीं ॥
लिये हैं और ऐचि ऐचि वीर वाहु यातहीं।
भपे ते अन्तरिक्ष रिक्ष लक्ष लक्ष जातहीं ॥ ६ ॥
[भुजंगप्रयात छन्द]
कुभकर्ण-न ताडुका
हैं। सुवाहै न मानों।
न हो शंभु कोदंड सांचो वखानों ।।
न हो ताल वाली खरे जाहि मारो।
न हैं। दूषणो सिन्धु सूधो - निहारो॥ १० ॥

(२४६ ) कछु माँगिये यर वीर सत्वरभक्ति श्री रघुनाथ को। पहिराइमाल विशाल अर्चहि के गये शुभ गाय को १०० [ कलहंस छंद] हति इंद्रजीत कहूँ लन्मण थाये। हँसि रामचन्द्र पहुधा उरलाये । मुनि मित्र पुत्र शुम सोदर मेरे। कहि कौन कौन सुमिरी गुण तेरे ।। १० । [दोहा] नींद भूख अरु प्यास को, जो न साधते वीर। सीतहिं क्यों हम पायते, अनु लन्मण रणधीर ॥ १०२॥ रावण विलाप [दंडक] रावण-आजु श्रादित्य जल पवन पावक प्रवल, चंद आनंद मय ताप जग को हो। गान किन्नर करहु नृत्य यह विधि लक्ष उर यक्षकदम । रुद्रादि दै देव त्रैलोक के, राज को जाय अमिक इन्द्रहि करी। माजु सिय राम दै लंक कुल दूपणहिं , यह को जाय सर्व विप्रनवरी ॥ १०३ ॥ १-यकर्दमक प्रकार का अंग झंप जो परों का प्रतिषियो। "करा गुरु कम्नुराककानेरकरम.। गंधर्व फुल, - ब्रह्म

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गाढ़ांधकार दिवि भूतल लीलि लीन्हों।
पस्त मानहुँ शशी करा.कान्हो
( १४७ )
मकराक्ष वध
[भुजंगप्रयात छंद]
मकराक्ष-महाराज लंका सदा राज कीजै।
करौं युद्ध मेरो विदा चेगि कीजै ॥
हतो राम स्यों बंधु सुग्रीव मारौं ।
अयोध्याहि लै राजधानी सुधारौं ॥१०४॥
[वसंततिलका छंद]
विभीपण-कोदंड हाथ रघुनाथ सँभारि लीजै ।
भागे सवै समर यूथप दृष्टि दीजै ॥
बेटा बलिष्ट खर को मकराक्ष आयो।
संहार काल जनु काल कगल धायो।। १०५ ॥
सुग्रीव अंगद बली हनुमंत रोक्यो।
रोक्यो रह्यो न रघुवीर जहीं विलोक्यो ।
मात्यो विभीपण गदा उर जोर ठेली।
काली समान भुज लक्ष्मण कंठ मेली ॥ १०६॥
गाढ़े गहे प्रवल अंगनि अंग भार।
काटे कटें न बहु भांतिन काटि हारे॥
ब्रह्मा दियो वरहि अनन. शस्त्र लागें।
से ही चल्यो समर सिंहहि जोर जांग ॥ १० ॥

हाहादि शब्द सब लोग जही पुकारे।
वादे अशेप अँग राक्षस के विदारे॥
श्री रामचन्द्र पग लागत चिच ह ।
देवाधिदेव मिलि सिद्धन पुष्प वर्षे ॥ १०॥
रावण कृत संधि-प्रस्ताव
[ दोहा
जूझतही मकरात के, रावण अति दुख पाइ ।
सत्वर श्रीरघुनाय पे, दियो वसोठ पठार ॥ १० ॥
[सुंदरी छंद]
दूतहि देखतही रघुनायक । तापहँ बोलि उठे सुखदायक ।
रावण के कुशलीसुत सोद । कारज कौन कर अपने घर ॥११॥
दूत-
[विजय छन्द]
पूजि उठे जयहीं शिव को तवहीं विधि शुक्र वृहस्पति पाये।
के विनती मिस पश्यप के तिन देव प्रदेव सबै वफसाये ॥
होम कीरीति नई सिखई फछु मंत्र दियो श्रुति लागि सिपाये।
होइत को पटया उनको उतले प्रभु मंदिर मांझसिधाये ॥२१॥
[संदेश]
शूर्पणखा जो विरूप करी तुम तात किया हम दुख भारो।
वारिधि बंधन कीन्हों तो तुम मोमुत पंधन कीन्हों तिहारो।
होइ जो होनी सोही रहै न मिटै जिय कोटि विचार विचारो
दै भृगुनंदन को परशा रयुनदग सीतहि ले पगुधारो ॥ १२ ॥

। ( १४६ ) [दोहा] प्रति उत्तर दूतहि दियो, यह कहि श्री रघुनाथ ॥ कहियो रायण होहिं जव, मंदोदरि के साथ ॥ ११३ ॥ [संयुता छंद] रावण-कहि धौ विलंब कहा भयो । रघुनाथ पै जब तू गयो । केहि भांति तू अवलोकियो । कहु तोहिं उत्सरका दियो॥११४॥ [दंडक] दूत-भूतल के इँद्र भूमि पाढ़े हुते रामचन्द्र, मारिच कनकमृगछालहि बिछाये जू । कुंभहर कुंभकर्णनाशाहर गोद शीश चरण अकंप अक्ष श्ररि उर लाये । देवांतक नारांतक अंशक त्या मुसक्यात, विभीपण चैन तन कानन एमआये जु। मेघनाद मकराक्ष महोदर प्राणहर, याण त्यों विलोकत परम सुख पाये ज ॥ १५ ॥ रामसंदेश [विजय छंद] भूमि दई भुवदेवन को भृगुनंदन भूपन सौ घर लैके। धामन स्वर्ग दियो मय सो वली बलि बांधि पताल पठे के। संधिको वातन को प्रतिउत्तर प्रापुम्ही कहिये हित कैकै दीन्हीं है लंक विभीषण को अब देहि कहा तुमको यह दैकै ॥११६।। ।

। १५० ) मंदोदपे [मालिनी छंद ] तय सब कहि हारे राम को दूत आयो। श्रय समुझि परो जो पुत्र भैया जुझायो । दशमुख सुख जीजै राम से ही लरों यों। हरि हर सय हारे देविदुर्गा लरी ज्यों ।। ११७ ॥ रावण-छल करि पठयो तो पावतो जो कुठारे। रघुपति बपुरा को धावता सिंधु पारे। हति सुरपति भर्ता विष्णु मायाविलासी । सुनहि सुमुखि तोको ल्यावतो लक्षिदासी ॥ ११ ॥ रावण यज्ञ विध्वंस [चामर छंद] प्रौढरूढिकोश' मूढ़ गूढ़ गेह में गया। शुक्रमंत्र शोधि शोधि होम कोजही भयो। वायुपुत्र वालिपुत्र जामवंत धाइया। लंक में निशंक कलंक नाथ पाइयो ।। ११६ ।। मत्तदंति पंक्ति याजिराजि छोरिक दई। भांति भांति पक्षि राजि भाजि माजिकै गई। आसने बिछावने बितान तान तुरियो। यत्रतत्र छप चार चौर चार चूरियो । १२० ।। १-प्रोददिकोशम्पको दिवाई का समूहम्पतिवाट । २-याम चिन्दादि।

( १५१ )
[भुजंगप्रयात छंद]
. देखिकै शंकि लंकेश वाला।
दुरी दौरि मंदोदरी चित्रशाला।।
तहां दौरिगो वालि को पूत फूल्यो।
सर्व चित्रको पुत्रिका देखि भूल्यो ।। २२१ ।।
गहै दौरि जाको तजै ताकि ताको।
तजे जा दिशा को भजे वाम ताको ।
भली के निहारी सवै चित्रसारी।
लहै सुंदरी क्यों दरी को विहारी ॥ १२२ ॥
तजै दृष्टि को चित्र की सृष्टि धन्या ।
हंसी एक ताको तहीं देव कन्या ॥
तही हासही देव कन्या दिखाई।
गही शंकि के लंकरानी बताई ॥ १२३ ।।
सुश्रानी गहे केश लंकेश रानी।
तमश्री मनों सूर शोभानि सानी ।।
गहे पाहँ ऐंचे चहूं ओर ताको।
मनो हंस लीन्हे मृणाली लता को ।। १२४ ।।
बुटी कंठमाला लुरैं हार टूटे।
खसैं फूल फूले लसे केशछूट ।।
फटी कंचुकी किंकिणी चार छूटी।
पुरी काम की सो मनो रुद्र लूटी ॥ १२५ ॥

१.२) सुनी लंक रानीन की दोन वानी। तही छांडि दीन्हो महा मौन मानी। उठ्यो सो गदा लै यदा लंकचासौ। गये भागि कै सर्व शाखा विसासी॥ १२६ ॥ मंदोदरी- [दोहा] सीतहि दीन्हो दुस पृथा, सांचो देखो भानु। फर जो जैसी त्यों लहै, कहा रंक कह राज ॥ १२७ ॥ रावण- [विजय छंद] कोयपुरा जो मिल्या है विभीषण है कुलदूषण जीवंगो कोलौं । कुंभकरन मस्यो मघवारिपु तौरी कहा न उसे यम सौली । श्री रघुनाथ के गातनि सुंदरि जाने न तू कुशली तनु तौलौं । शाल सबै दिगपालन के कर रावण के फरवाल है जोली ॥१२॥ राम रावण युद्ध [चामर छंद रावणे चले चले ते धाम धाम ते सबै । साजि साजि साज सूर गाजि गाजिकै तथै । दीह दुंदुभी अपार भांतिभांति घाजहीं। युद्ध भूमि मध्य युद्ध मत्त दंति राजहीं ॥ १२ ॥ [चंचरी छन्द] इन्द्र श्रीरघुनाथ को रथहीन भूतल देखिकै। वेगि सारथि से कहेउ रथ जाहि ले मुविशेपि के।

. ( १५३ ) तूण अक्षय घाण स्वच्छ अभेद लै तनत्राण को। आइयो रणभूमि में करिअप्रमेय प्रणाम को ॥ १३०॥ कोटि भांतिन पौन ते मन ते महा लघुता लसै। चैठिकै ध्वज अन श्रीहनुमंत अंतक ज्यों हँसे ।। रामचन्द्र प्रदक्षिणा करि दक्ष के जवहीं चढ़े। पुष्प चर्षि बजाय दुंदुभि देवता बहुधा बढ़े ॥ १३१ ॥ राम को रथ मध्य देखत क्रोध रावण के बढ्यो। वीलवाहुन को शरावलि व्योम भूतल सो मढ़यो । शैल है सिकता गये सब दृष्टि के वल संहरे। ऋक्ष वानर भेदि तत्तण लक्षधा छतना करे ॥१३२।। [सुंदरी छंद] याएन साथ विधे सब वानर । जाय पर मलयाचल की धर।। सूरज मंडल में एक रोक्त । एक अकाशनदी बुख धोचत ।। १३३ ।। एक गये यमलोक सहे दुख । एक कहैं भव भूतन तो रुख ॥ एक ते सागर मांक परे मरि। एक गये पड़वानल में जरि॥१३४ | १-अममेय-बहुत, पसंख्य। २-लपुतागीप्रता।

( १५४ )
[मोदनक छंद
श्रीलक्ष्मण कोप को जयहीं।
छोड्यो शर पावफ को तयहीं।
जाखो शर पंजर छार कखो।
नैऋत्यन' को अति चित्त डस्यो । १३५ ।।
दौर हनुमंत यली थलसों।
लै अंगद संग सबै दल से।
मानो गिरिराज तजे डर को।
धेरै चहुं ओर पुरंदर को
(हरिच्छंद]
अंगद रणभंगन सय
अंगन मुरझार के।
ऋक्षपतिहिँ अतरिपुहि लक्षगति वुझार के ।।
वानर गण पाएन सन केशव जवही मुखो।
रावण दुखदावन जगपायन समुहे जुनो।।१३७ ॥
[ब्रह्मरूपक छंद]
इंद्रजीत-जीत पानि रोकियो मुवाण तानि ।
छोडिदीन वीरवानि कान के प्रमान श्रानि ।।
स्यों पताक काटि चाप चर्म वर्म मर्म वेदि।
जातमा रसातल अशेष कंठमाल भेदि ।।१३८ ।
१-नैऋत्यात

( १५५ ) [दंडक छंद] सूरज 'मुसल नील पट्टशि परिघ नल जामवंत असि हनू तोमर प्रहारे हैं। परशा सुखेन कुंत केशरी गवय शूल विभीषण गदा गज भिंदिपाल तारे हैं मोगरा द्विविद तीर कटरा कुमुद नेजा अंगद शिला गवाक्ष विटप विदारे हैं। अंकुश शरभ चक्र धिमुख शेष शक्ति याण तिन रावण श्रीरामचंद्र मारे हैं ॥ १३ ॥ [ दोहा] द्वैभुज श्रीरघुनाथ सों, विरचे युद्ध विलास । वाहु अठारह यूथपनि, मारे केशोदास ॥ १४० ॥ [गंगोदक छंद] युद्ध जोई जहां भांति जैली करे ताहि ताही दिशा रोकि राखै तहीं। अस्त्र आपने ले शस्त्र काटे सर्व ताहि कहूं फहूं घाव लागे नहीं। दौरि सौमित्र लै बाण कोदंड ज्यों खंड खंडी ध्वजा धीर छत्रायली। शैल शृंगावली छोड़ि मानों उड़ी एक ही बेर के हंस वंशावली ॥१४१ ॥ १-सूरज-सुग्रीव [निमंगी छंद] लक्ष्मण गुम लक्षण बुद्धि विचक्षण रापण सों रिस छोड़ दो। पहु यागनि एंड जे सिर खंडे ते फिर संह सोम नई । यद्यपिरणपंडित गुण गण मंडित रिपु दल संचित भूलएं। तजि मन वय कायक सूरसहायक रघुनायक सौ पवन कहै ।१४ ठाढ़ी रण गाजत हुँन भाजत तन मन लाजत सपलायका सुनि श्रीरघुनंदन मुनिजन चंदन दुष्ट निकंदन मुबदायक। अब टर न दाखो मरैन माखो ही हठि हाखो धरि शायक। रायण नहिं मारत देव पुकारत अति भारत जगनाय ॥१४३३५ राघए यय छम्म राम-जहि शरमधु मद मरदि महामुर मईन दोन्हंउ। मारेहु कर्कश नर्फ शंखहति शंख जो लीन्हें । निष्कंटक नुर कटक करयो कैटम यपु संयो। सर दूपर निशिरा कबंध तर पंठ विहंन्यो। घुमकरण जेहि संहत्यो पल न प्रतिक्षा ते टरों। तेहि वाण प्रारा दशकंट के कंट दीपंडित करी ॥ १४ ॥ [दोहा] रघुपति पयो प्राइही, अशहर दुद्धिनिधान । दरशिर दशहू दिशन को, यलि दे पाया पान १४५.

( १५७ ) [मदनमनोरमा छंद] भुव भारहि संयुत संयुत राकस को गण जाइ रसातल में अनुराग्यो। जग में जय शब्द समेतिहि केशव राज विभीषण के सिर जाग्यो। मय दानव नंदिनि के सुख सों मिलि फैसिय के हिय को दुखभाग्यो। सुरदुंदुभी सीस गजा' शर राम को रावण के शिर साथहि लाग्शे ॥ १४६ ॥ [विजय छंद] मंदोदरी-जीति लिये दिगपाल शची के उसालन देवनदी सब सूखी । वासरह निशि देवन नर देवन फी रहे संपति दकी। तीनहुँ लोकन की तरुणीन की धारी बँधो हुती दंड दुहू की। सेवत श्वान शृगाल सो रावण सोबत सेज परे अव भू की ॥ १४७॥ [तारक छंद] राम-अब जादु विभीषण रावण लैके। सफल सबंधु किया सब फैक। १-गगा-चोच (मगाड़ा बनाने को) , . जन सेवक संपति कोप समारो। मयनंदिनि के सिगरे दुख टारी १४-1 सीता की अग्निपरीचा [तारक इंद] राम-उय जाय कही हनुमंत हमारो। मुख देवहु दीरत्र दुख बिदारी। सब नूगन भूपित के गुन गीता। हमको तुम वेगि दिखाबहु सोता ॥१६॥ हनुमंत गये तवहीं वह सोता । नवजाप कही जय की सब गाना। पग लागि कहां जननी पगु धारो। मग चाहत हैं रघुनाय तिहारो। १५० । सिगर तन भूमण भूपिन कोने। धरि के कुमुमारलि अंग नर्वाने । द्विज देवनि बन्दि पड़ीं गुमगीता। तव पारक अंक वली चढ़ि सौदा ॥ १५ ॥ [मग प्रयात द] सपना सबै अङ्क भंगार साई। विलोके रमा देव देवा बिमोहे। पिता अंकज्यों कन्यका गुनगीता। अग्नि केकत्वाँगुर सीता : १५२ ॥

( . १५६.. )" महादेव के नेत्र की पुत्रिका सी। कि संग्राम की भूमि में चंडिका सी।। मनो रत्नसिंहासनस्था शची है। किधी रागिनी राग पूरे रची है ॥ १५३ ।। गिरापूर में है पयोदेवता सी। किधी कंज की मंजु शोभा प्रकाशी। किधों पर ही में सिफाकंद सोहै। किधी पन के कोप पद्मा विमोहै ॥ १५४ ॥ किं सिन्दूरशैलाग्रं में सिद्ध कन्या । किधौं पशिनी सूर संयुक्तं धन्या ॥ सरोजासना है मनो चार बानी। जपा पुप्प के बीच बैठी भवानी ॥ १५५ ॥ मनो श्रीपधी वृन्द में रोहिणी सी। कि दिग्दाह में देखिये योगिनी सी। धरापुत्र ज्यों स्वर्ण माला प्रकाशै । मनोज्योति सी तच्छकाभोग' भासै ॥१५॥ [सुरेन्द्रवजा छंद] श्रासावरी माणिक कुंभ शोमै अशोक लग्ना वन देवता सी॥ पालाशमाला कुमुसालि मध्ये वसन्तलक्ष्मी शुभ लक्षणासी ॥ श्रारक पत्रा शुभि विन पुत्री मनो विराजे अति चारु वेषा ।। संपूर्ण सिंदूर प्रभा सुमंडी गणेश भाल स्थल चंद्ररेखा ॥ १५७ ।। - तरसकाभोगाच्छक+भाभोग-तरछुक नामक सर्प का फण।

( १६० ) [विजय छंद] है मणिदर्पण में प्रतिबिंब कि प्रीति हिये अनुरक प्रभोता। पुज प्रताप में कोरति सो तप तेजन में मनों सिद्ध विनीता ॥ ज्यों रघुनाथ तिहारिये भक्ति लस उर केशय के शुभ गोता। त्यो अवलोक्रिय भानंदकंद हुताशन मध्य समासन सीता ॥१५॥ [दोहा] इन्द्र वरुण यम सिद्ध सब, धर्म सहित धनपाल । ब्रह्म रुद्रले दशरथहि, माय गये तेहि काल ॥ १५६ ।। [वसंततिलका छंद] अग्नि-श्री रामचन्द्र यह संतत शुद्ध सोता। ब्रह्मादि देव सव गावत शुन्न' गोता ।। हजै रुपाल गहिजे जनकात्मजा या। योगीश ईश तुम हो यह योगमाया ॥१६० ।। श्रीरामचन्द्र हँसि अंक लगाय लीन्हा । संसार साक्षि शुभ पायक श्रानि दीन्हों। देवान दुंदुभि वजाय सुगीत गाये। प्रलोक्य लोवन चकोरनि चित्र भाये ॥१६१ ।। व्रत्माकृत रामस्तुति [दोधक छंद] ग्रहा-राम सदा तुम अन्तर्यामी। लाइ चतुर्दश के अमिरामी।

( १६१ ) निर्गुण एक तुम्हें जग जाने । एक सदा गुणवन्त वखाने ।। १६२ ।। ज्योति जगे जगमध्य तिहारी। जाइ कही न सुनी न निहारी॥ कोउ कहै परिमान न ताको। श्रादि न अंत न रूपन जाको ॥१३॥ [तारक छंद तुम ही गुणरूप गुणी तुम ठाये। तुम एक ते रूप अनेक बनाये ।। एक है जो रजोगुण रूप तिहारो। तेहि सृष्टि रची विधिनाम विहारो ॥ १६४ ॥ गुणसत्त्व धरे तुम रक्षत जाको। अव विष्णु कहें सिगरे जग ताको ॥ तुमहीं जग रुद्र स्वरूप सँहारो। कहिये तिन मध्य तमोगुण भारो।। १६५ ॥ तुमहीं जग ही जग है तुमही मैं। तुमहीं विरची मर्याद दुनी मैं ॥ मर्यादहि छोड़त जानत जाको। तवहीं अवतार धरो तुम ताको ॥ १६६ ॥ तुमहीं धर कच्छप वेष धरे जू।. तुम मीन है चेदन को उधर जू॥..

तुमही जग यश्वराह भये । निति होनितई हिरण्यात ये जू ॥ १६ ॥ नुमही नरसिंह को रूप संवरायो। प्रहलाद को दीरघ दुःख यिदायो। तुमही यलि वामन घेष छल्यो । भृगुनंदन हूँ क्षिति छत्र दल्यो जू । १८८ तुमही यह परए दुष्ट संहायो। धरती महं वूडन धन्न उवायो। नुमही पुनि हर को रूप धरांगे। हनि दुष्टन को भुव मार हाने तुम बौद्ध स्वरूप दयाहि घयंगे। पुनि कल्कि हन्लेसमूह हरांगे। यहि माँति अनेक स्वरूप निहार। अपनी मय्यांद के कर्य सँवार । १० स्वदेश प्रत्यागम [दाहा] वानर रातम ऋन सब, मित्र कलत्र समेत। पुष्पक चढ़ि रघुनाथ ज, चले ऋयपि के इंतजा [चंवरी इंद] सेतु सीतहिं शोमना दणार पचवटी गये। पाालागि अगस्य के पुनि अप्रियो ते विदा मये।

यक कोहै। नीको। चित्रकूट विलोकि कै तव ही प्रयाग बिलोकियो। भरद्वाज बसें जहां जिनते न पावन है वियो।। १७२ ॥ त्रिवेणी वर्णन [तारक छंद] राम-चिलकै द्युति सूक्षम शोभति शोमति वारू। तनु है जनु सेवत सेवत हैं सुर सुर चारू॥ प्रतिविम्वत दीप्ति दिप जल माही। जनु ज्वालमुखीन के जाल नहाहीं ॥ १७३ ॥ जल की धुति पीत सितासित साहै। चहुँपातक घात करें मदएण मलै घति कुंकम नृप भारतखंड दियो जनु टीको ।। १७४॥ [दंडक] लक्ष्मण---चतुरवदन पंचवदन पटवदन, सहस बदन हू सहसगति गाई है। सातलोक सातद्वीप सातहू रसातलनि गंगाजी की शोभा सवही को सुखदाई है। यमुना को जल रह्यो फैलि के प्रवाह पर, केशोदास वीचचीच गिरा की गौराई है। शोभन शरीर पर कुंकुम विलेपन को श्यामल दुकूल झोन झलकति भाई है ॥ १७५ ।। १-मदएण-एयंमद, कस्तूगे। , -- ----

गात है।
(१६५ )
मुग्रीय--
[चंद्रकला]
भरमागर को जनु सेतु उजागर सुंदरता सिगरी दम थी।
निहुँ देवन की धुति सी दरसे गति शोथै शिदोपन के रसी।
कहि कंशय वेदत्रयी मति सी परितापत्रयो तल को मसकी
भय बंदे त्रिकाल त्रिलोक त्रिवेणिहि केतु त्रिविक्रम के जमकी
विभीषण
[दंडक]
भूनल की वेणी सी त्रिवेणी शुम शोमिजति ,
एक कहें मुरपुर मारग विभान है।
एक कहें पूरण अनादि जो अनंत कोऊ,
नाको यह केशोदास द्रवरूप
मुखकर सय शोभाकर मेरे जान
कानो यह अद्भुत सुगंध अयदात है।
दरश परश ६ ते थिर चर जीवन को,
काटि कोटि जन्म को कुगंध मिटि जात है ॥ १७
परताज अाश्रम वर्णन
[भुजंगप्रयात छंद]
मरद्वाज की वाटिका राम देखी।
महादेष कैसी वनी चित्तलेखी ॥
मंदारहते मले हैं।
छह काल के फूल फूले फले हैं21
काहं हंसिनी हंस स्यां चित चौरें।
चुन ओस के बंद मुकानि मोरें ।
सबै वृक्ष

( १६५ ) शुकाली कहूँ सारिकाली विराजें। पढ़े वेद मंत्रावली · भेद साजै ॥ १७६ ॥ कहूं वृक्षमूलस्थली तोय पोवें। महामत्त मातंग सीमा न छीचें ॥ कहूं विप्र पूजा कह देव अर्चा । कह योगशिक्षा कहूँ, वेदचर्चा ॥ १० ॥ कहूं साधु पौराणकी गाथ गावें। कहूं यज्ञ की शुभ्र शाला बनावें ।। कहुं होम मंत्रादि के धर्म धारें। कहूं वैडि के ब्रह्मविद्या विचारें ॥ १६ ॥ सुवाई जहां देखिये बक्त रागी। चलै पिप्पलै तिच्छ वुध्यै सभागी ॥ कैंपें श्रीफले पत्र हैं पत्र नीके। सुरामानुरागी सवै राम ही के ॥ १८२ ।। जहां वारिदै वृन्द वाजानि साजै। मयूरै जहां नृत्यकारी विराजै ॥ भरद्वाज वैठे तहां विप्र मोहैं। मनो एकही वक्त लोकेश सोहें ॥ १३ ॥ लक्ष्मण- [ दंडक] केशोदास मृगजवछेरू चूर्षे बाघिनीन , चाटत सुरभि वाघ चालक वदन है।

सिंहन की सदा एचे कलम करनि करि, सिंहनको श्रासन गयंद को ग्दन है। फपी के फणन पर नाचन मुदित मोर, क्रोध न विरोध जहां मद न मदन है। यानर फिरत डोरे डोरे अंघ तापसनि , शिव को समाज कैपी ऋषि को सदन है ।। [भुजंगप्रयात इंद] जहां कोमले यत्कले यास माह । जिन्हें अल्पधी पल्पसापो विमाह । धरे सता दुःख दाह दुरंते। मनों शंमुजी संग लौने अनंते ॥ १५॥ [मालिनी छद] प्रथमित रज राजै हर्ष वा समै से। विरल जटन शाखा स्वर्नदो कूल कैसे ॥ जगमग दरशाई सूर के अंशु ऐसे। स्वर्ग नरक हता नाम श्रीराम कैसे ॥ [भुजंगप्रयात छद] गहे केश पा मियासी खानों । पैशाप के पास में गान मानों। १-सरा-दिन वान, भाल:-रगडोरिलाय, साप दिये।

मनों चंद्रमा : चंद्रिका
चारु सार्जें।
जरा सों मिले यों भरद्वाज राजै ॥ १-७॥
[दोहा]
भस्मत्रिपुंडक शोभिजे, वरणत बुद्धि उदार ।
मनो त्रिस्रोतासोत घुति, वंदत लगी लिलार ॥ १८ ॥
[भुजंगप्रयात छन्द]
मनों अंकुराली लसै सत्य की सी।
किधी वेदविद्या प्रभाई भ्रमी सी॥
रमै गंग की ज्योति ज्यों जह्न नीकी।
विराजे सदा शोभ दंतावली . की॥१६॥
[गीतिका छन्द]
चुकुटो विराजति श्वेत मानहुँ मंत्र अद्भुत साम के।
जिनके बिलोकत ही विलात अशेष कर्मज काम के॥
मुखवास आश प्रकाश केशव भौंर भीरन साजहीं।
जनु साम के शुभ स्वच्छ अतरह सपक्ष विराजहीं ॥१०॥
तनु कम्बु करठ त्रिरेख राजति रज्जु सी उनमानिये।
अविनीत इंद्रिय निग्रही तिनके निबंधन जानिये ।।
उपवीत उज्ज्वल शोभिजे उर देखि यों वर सधै।
सुर आपगा तपसिंधु में जस श्वेतश्री दशै अवै ॥
[दोहा]
फटिकमाल शुभ शोभिज, उर ऋषिराज उदार।
अमल सफल भ्रतिवरणमय, मने गिरा को हार ॥ ९४२॥

( १७०) विपन दीजत हीन विधाने । जानहु ताकहँ तामस दाने । विप्रन जानहु ये नर रूपै । जानहुये सब विष्णु स्वरूपै २०५ [तोमर छद] द्विज धाम देहिं जो जाइ । यहु भाँति पूजि सुरा ॥ कछु नाहिंन परिमान । कहिये सो उतम दान ॥२०१॥ द्विज को जो देत घाला । कहिये सो मध्यम राइ । गुनि याचना मिस दानु । अति हीन नाकहँ जानु ॥२०६३ [ दोहा] प्रतिदिन दीजत नेम सों, ताकह नित्य वखान ॥ फालहिं पाई जो दीजिये, सोनैमित्तिक दान ॥२०॥ [ तोटक छद] पहिले निजपतिन देष्टु अथै। पुनि पाहिं नागर लोग सवै ॥ पुनि देहु सवै निज देशिन को। उवरोधन देहु विदेशिन को२०८|| [दोधक छंद] दान सकाम अकाम कहे हैं। पूरि सबै जग मांझ रहे हैं। इच्छित ही फल होत सकामै |राम निमित्त तेजानभकाम२०६॥ दान ते दक्षिण याम यखानो । धर्म निमित्त ते दक्षिण जानो। धर्म विरुद्ध ते याम गुनी जू । दान कुदान सवै ते सुनी जू२१०॥ देह सुदान ते उत्तम लेखो । देहु कुदान तिन्है जनि देखो। सांडि सबै दिन दानहिं दीजै । दानहिं ते सय मत लोड।२११॥ ,

( १७१ )
[दोहा]
केशव दान अनंत है, वर्ने न काहू देत ॥
यहै जानि भुव भूप सव, भूमि दान ही देत ॥ २१२ ।।
[तोटक छंद ]
राम-हनुमंत वली तुम जाहु तहां ।
मुनि वेप भरत्य वसंत जहां ॥
आजु
करें
पुनि प्रात भरथहिं अंक भएँ । २१३ ॥
ऋषि के
हम भोजन
॥ इति लंका कांड ॥

. उत्तर कांड [चतुष्पदी छंद ] हनुमंत विलोके भरत सशके अंग सफल मलधारी। यकला पहिरे तन शीश जरा गण हैं फल मूल अहारी।। । बहु मंत्रिनगण में राज काज में सब सुख सो हित तोरे। रघुनाथ पादुका तन मन प्रभु करि सेवत अंजुलि जोरे ॥१॥ हनुमान भरत प्रति राम संदेश सब शोकनि लांड़ी भूपण मांडी कीजे विधिधि बधाये। सुर काज सँवारे रावण मारे रघुनन्दन घर आये। सुप्रोव सुयोधन सहित विभीपण सुनहुँ भरत शुम गीना । जय कीरति ज्यांसंग अमल सकल अँग सोहत लदमण सीता॥२॥ [पद्धटिका छंद] सुनि परम भावती भरत बात। भये सुख समुद्र में मगन गात ६ यह सत्य किधी कछु स्याम ईश। अय कहा कहो मोसन कपीश ॥३॥ जैसे चकोर लीले अँगार। त्यहि भूलि जाति सिगरी संभार । जी उठत उक्त ज्यों उदधिनंद। त्यों भरत भये सुनि रामचन्द्र ॥४॥ १-वधिनद बदमा।

। ( १७३ ) ज्यों सोइ रहत सब सूरहीन । प्रति ह अचेत यद्यपि प्रवीन । ज्यों उवत उठत हँसि करत भोग । त्यों रामचन्द्र सुनि अवध लोग ॥ ५ ॥ [मालिनी छंद] 'जहँ तहँ गज गाजें दुंदुभी दीह था । वहु वरण पताका स्यंदनाश्वादि राजै ॥ भरत सकल सेना मध्य यों वेप कीने। सुरपति जनु आये मेघमालानि लीने ॥६॥ सफल नगरवासी भिन्न सेनानि साजै। रथ सुगज पताका झुंडमुंडानि राजै ॥ थलथल सब शोभे शुभ्र शोभानि छाई। रघुपति सुनि मानों श्राधि सी आज आई ॥ ७ ॥ [चामर छंद] यत्र तत्र दास ईश व्योम ते विलोकहीं। चानरालि रीछराजि दृष्टि सृष्टि रोकहीं। ज्यों चकोर मेघ श्रोघ मध्य चंद्र लेखहीं। भानु के समान जान त्यों विमान देखहीं ॥ ८ ॥ राम भरत मिलाप [मदनमनोहर दंडक] श्रावत विलोकि रघुवीर लघु वीर तजि व्योम गति भूतल विमान तब आइयो।

राम पद पद्म सुख सम कहें बंधु युग
दौरि तय पट्पद समान मुख पाइयो ।
चूमि मुख संधि शिरक रघुनाय धरि
अश्रु जल लोचननि पेखि उर माइयो ।
देव मुनि वृद्ध परसिद्ध सय सिद्ध जन
हर्षि तन पुष्प वरपानि बरपाय MET
[दाहा]
भरत चरण लदमण पर, लद्रमण के शत्रुम ।
सांता पग लागत दिया, प्राशिप शुम शत्रुम ॥ १०॥
मिले भरत अरु शत्रुहन, मुग्रीवहि अकुसार।
बहुरि विमीपण को मिले, अंगद को सुख पार ॥ ११ ॥
[श्रामीर छंद
जामवंत नल नोल। मिले भरत शुम शील ।।
गवय गवान गयंद । कपिकुल सथ सुखकद । १२॥
ऋषि यशिष्ट को देखि। जन्म सफल करि लंधि
राम परे उठि पाय | लक्ष्मण सहित सुभाय ॥ १३ ॥
[ दोहा
त सुग्रीव विमीपणदि, करि करि विनय अनंत ।
पायन परे पशिष्ट के, करिकुल युधि बलवत ॥१४॥
[पद्धटिका एंद]
सुनिजे वशिष्ठ फुलइष्टदेघ । इन कपिनायक के सकलमेय ॥
हम दृढ़तहे विपदा समुद्र निरामिलियोसंग्राम य ॥१५॥

( १७५ ) अवध प्रवेश [सुंदरी छंद] अवधपुरी कहँ राम चले जव । ठौरहिँ ठौर विराजत हैं सय ॥ भरत भये शुभ सारथि शोभन । चमर धरे रविपुत्र विभीपन१६॥ [तोमर छंद] लीनी छरी दुहुँ वीर । शत्रुघ्न लक्ष्मण धीर ॥ टारें जहां तहँ भीर। श्रानंदयुक्त शरीर ॥ १७ ॥ [ दोधक छंद] भूतल ह दिवि भीर विराजै । दीह दुई दिशि दुन्दुभि बाजै ॥ भाट भले विरदावलि गावें । मोद मनो प्रतिविम्ब बढ़ावें ॥१॥ भूतल की रज देव नशा । फूलन की बरपा वरपावें ॥ हीन निमेप सबै अवलोक। होड़ परी बहुधा दुहुँ लोके ॥२६॥ अवध वर्णन [तारक छंद] सिगरे दल औधपुरी तव देखी। अमरावति ते अति सुंदर लेखी । चहुं और विराजति दीरघ खाई। शुभ देवतरंगिनि सी फिरि आई ॥ २० ॥ अति दीरघ कंचन कोट विराजें। मणि लाल कँगूरन की रुचि राजै ॥

देहधरे, पुर मुंदर माय लस छवि धाया। परिवेष मनो रवि को फिरि आया । [दोहा] यिविधि पताका शामिज, ऊँचे केशोदास। दिवि देवन के शोभिज, मानहुँ म्यजन विलास ॥२२ [विजय छंट चढ़ी प्रतिमंदिर शाम बदी, नरुणी अवलोकन को रघुनन्दनु । मनों गृहढीपति मुभिधों गृहदेवि विमोहति है मनु । किधी कुलदेवि दिये अति केशव , के पुरदेबिन को हुलम्यो गनु।। नहीं मा नहीं यहि भांति लस, दिवि देचिन को मद घालति, मनु ॥२३॥ [दाहा] अनि ऊँचे मंदिग्नपर, चढ़ी संदरी साधु ।। दिवि देवन को करनि है, मनु प्रातिथ्य अगाधु ॥ २४ ॥ [नोटक छद] नग्नारि भली सुग्नारि सवै । निनकी न परे पहिचानि नौ । मिलि फलन की यर बरपा । अागायति जय के करपा ६२५५ . - पाश्वप-घेगा t- (.१७७ ) [पद्मावती छंद रघुनंदन आये. सुनि. सब धाये पुर जन जैसे जैसे ॥ दर्शन रस भूले तन मन फुले · चरणे जाहि. न जैसे। पति के सँग नारी सब सुखकारी रामहि यों उग जोरी।। जहँ तहँ चहुँोरनि मिली कोरनि चाहति चंद चकोरी॥२६ [पद्धटिका छंद] बहु भांति राम प्रति द्वार द्वार। अति पूजत . लोग सबै उदार ।। यहि भांति गये नृपनाथ गेह । युत सुंदरि सोदर स्यों सनेह ॥ २७ ॥ दोहा] मिले जाय जननीन को, जवही श्री रघुराह ॥ करुणा रस अद्भुत भयो, भोपै फह्यो न जाइ ॥२॥ सीता सीतानाथ जू , लक्ष्मण सहित उदार । सवन.मिले सब के किये, भोजन एकहि बार ॥ २६ ॥ [सोरठा] पुरजन लोग अपार, यहई सव. जानत,भये ॥ हमहीं मिले अगार , आये प्रथम हमारही ॥३०॥ [मदनहरा छंद] सीता ..लन्द्रमण श्रीरघुनंदन मातन के शुभ.पाइ.परे सब दुःख हरे॥ . १-नृपनामा दशरथ। -मगार-सप से भगाही (पाने)।

अाँसुन अहवाये भागनि भाये। - 'जीवन पाये अँक भरे अरु अँक घरे। ते पदन निहारें सरपसु वारे । देहिं सवै सवहीन घनो अरु लेहिं धनो। तनमन न सँभार यह बिचारै । भाग बड़ो यह है अपनो किया है सपनो ॥ ३ ॥ [स्वागता छंद] भाम प्रति होति बधाई । लेक लोक तिनकी धुनि धा दास देखि कपि अद्भुत लेखें । जाहिं यत्र तित रामहिं देखें। ३६ दारिदौरि कपिरावर आवै। बार बार प्रति धामनि धावे देखि देखि तिनको दै तारी । भांति मांति विहर्से पुरनारी राम सुमित्रां संवाद [दोहा] राम-न सुप्रीव विभीषण, अंगद् अरु हनुमान ॥ सदा भरत शत्रुम सम, माता जी में जान ॥ ३४ सोरठा सुमित्रा-प्राणनाथ रधुनाथ, जिय की जीवनति हो । सदमण हे तुम साथ, क्षमियह चूक परी जो कछु ॥३॥ [दंडक] -पौरिया कहीं कि प्रतीहार कहीं किधों प्रभु, पुत्र कही मित्र कियौ मंत्री सुखदानि ये। .. ३-बावरकरनधास।

रद अगस्त्य- - सुमट कहीं कि शिष्य दास कहीं कि! दूत, केशोदास हाथ.को हथ्यार र भानिये। नैन कहीं किधौं तन. मन किधी तनत्रास्य , बुद्धि कहैं किधों वल विक्रम वखानिये। देखिये को एक हैं अनेक भांति कीन्ही सेवा, लखन के मात कौन कौन गुख मानिये ॥ ३६॥ श्रीराम कथित राज्यश्री-निंदा [दोहा] मारे अरि पारे हितू , कौन हेत रघुनंद ॥ निरानंद से देखियत , यद्यपि परमानंद ॥ ३७॥ श्रीराम- [तोमर छंद] सुनि ज्ञान मानसहंस । जप योग जाग प्रशंस ।। जग मांझ है दुखजाल । सुख है कहां यहि फाल ॥ ३ ॥ तहँ राज है दुख मूल । सव पाप को अनुकूल ॥ अव ताहि ले पिराय । कहि कौन नर्कहि जाय ॥३६॥ [चौपाई] सोदर मंत्रिन के तु चरित्र । इनके हमपै. सुनि मखमिन इनहीं लगे राज के काज । इनहीं ते सब होत अकाज ॥१०॥ राजभार नल भैयनि दयो । छल वल छोनि सबै तिन लयो। जब लीन्हों सब राज विचारि । नलदमयंतीदियोनिकारि ॥४१॥ १-खमित्रापि २-इनहीं लगेइन्हीं के वास्ते।

. (1) पजा मुरंप पेज को गाय । सौंपी सर्व मंदिन के हाथ । संतत मृगया सीन विचार मंत्रिन राजा दियो निशारिस राजनी अति चंचल तात। ताह की मृनि लीजै दात। यौवन अरु अयिकी रंग। यिनस्यौ कौन राजधी मंगा शास्त्र सुजलहूँ घोषत तात मलिन होते मति तोके गाल। यद्यपि है अति उज्ज्वल दृष्टि।तदपि सृजति रागन की सृष्टि महापुरुष' सौ जाकी प्रीति । हरति सो मैंमा मारत रीति। विषय मरीचिकानि को ज्योति ।इंद्रीहरिस हारिणी होनि १ गुरु के वचन अमल अनुकूल ।सुनत होत थवएन को इन वलित नववसन मुदेश । मिदत नहीं जलज्यों उपदेश ६ मित्रन हू को मतो न लेवि । प्रतिशब्दक' ज्या उत्तर देति। पहिले मुनै न गोर मुनति । माती करनी ज्या न गर्नति (251 [दोहा] धर्मवीरता विनयता; सत्यशील प्राचार। राजयी न गने कडू, वेद पुपर विचार ॥४॥ - चौपाई] सागर में बहुकाल जो रही। सीत पक्रता शशि ते नहीं। सूर तुरंग घरपनि ते तात । सोषी चंचलता की यात !! पापुरदर। -न-मोन, मैन यषित पसन मोमा मोमकपड़।।--प्रतिशब्द चौरकर आई हुई भाशत (नैस आती।

। ( १८१. ). कालकूट ते मोहन रीति । मणिगण ते अति मिष्ठुर प्रीति ।। मदिरा ते मादकता लई । मंदर उदर भई भ्रममई ॥ ५० ॥ .[दोहा] शेष दई बहुजिह्वता, बहुलोचनता चार॥ अप्सरानि तें सीखियो, अपर पुरुष संचारु। ५१ ।। [चौपाई] दृढ गुन वाँधेह बहुभाँति । को जानै केहि भाँति विलातिः॥ गज घोटक भट कोटिन अरें। खद्ग लता पंजर हप-।। ५२॥ अपनाइति कीन्हे वहुभाँति । को जाने कित ह मजिजातिः।। धर्मकोस मंडित शुभ देश । तजति भ्रमरिज्यों कमल. नरेश ॥५३॥ यद्यपि होइ शुद्धमति सत्तु । फिरै पिशाची ज्यौं उनमत्तु ।। गुनवंतनि आलिंगति नहीं । अपवित्रनि ज्यों छाँइति तहीं ॥५॥ गरनि नाशति ज्यो अहि देखि । कंटक ज्यों बहु साधुन लेखि॥ सुधासादरा यद्यपि आप । सवहीं ते अति कटुक प्रताप ॥ ५५॥ यद्यपि पुरुपोत्तम की नारि । तदपि सकल खलजन अनुहारि ॥ हितकारिन को अति द्वेपिनी । अहित लोग की अन्वैपिनी ॥५६॥ मन मृग को सुबधिक की गीति । विषयवेलि को वारिद रीति॥ मद पिशाचिका को सो अलो। मोह नींद की शय्याभली ॥१७॥ प्राशोविपर दोपन को दरो। गुण सतपुरुषन कारण छरी॥ कल इंसन को मेवावलो । कपट नृत्यकारी को थली | Ft! 2-अपनाइति सपनपौ, गादा मेम। २-सत्तु-पाणी, मनुष्य। ३.- माशीविर-सर्प। ४-फल-चैन,.: पाराम ।

(१२ - [दोहा] याम काम फरि की किधी, कोमल कदलि सुवेप। धौर धर्म द्विजराज को, मनो राहु की रेप ॥५॥ [चौपाई]. मुखरोगी ज्यों मौने रहै । यात बलाय बंधुपर्ग पहिचाने नहीं। मानों सन्निपात है गही ॥ ६ ॥ महामंत्रहू होत न बोध । उसी काल अहि करि जनु कोष । पान बिलास उदित अातुरी । परदारा गमनै चातुरी ३६.। मृगया यह शूरता बढ़ी। घंदी मुखनि चायसो पदी। जो के चितवै यह दया । पात कहे तो बड़िये मया । ६. दयान दीयोई अतिदान । हँसियोले तो बढ़ सनमान । जो केहू से अपनो कहै । सपने को सौ पदवी लहै ॥६३ [दोहा] जोई अति हित को कहै, साई परम अमित्र । सुखक्ताई जानिये, संतत मंत्री मित्र ६४० [चौपाई] कहाँ कहां लगि ताके साज ! तुम सब जानतदा ऋषिराज असी शिप भूरति मानिये। देसी राजधी जानिये ॥ ५ ॥ सापमान है सेवै जाहि । सांची देव परम पद वाहि । नितने नप याके यश मये। पेलि स्वर्गमग नहि गये । ६६ ॥

( १८३ ) राम विरक्ति-वर्णन [अमृतगति छंद सुमतिमहाऋषि सुनिये । जगमह सुक्ख न गुनिये। मरहिं जीव न तजहीं। मरिमरि जन्मन भनहीं ॥ ६७॥ उदरनि जीवपरत है । वहु दुख सों निसरत है। अंतहु पीर अनँतहीं। तन उपचार सहतहीं ॥६॥ [दोधक छंद] पोच मलीन कळू जिय आने । लै सब वस्तुन आनन आने । शैशव ते फछु होत बड़ेई। खेलत है ते अयान चढ़ेई ।। ६६॥ है पितुमातनि ते दुख भारे। श्रीगुरु ते अति होत दुखारे॥ भूख न प्यास न नींद न जोवें। खेलन को बहुभाँतिन रोवें ॥७॥ जारति चित्त चिता दुचिताई। दोह त्वचा अहि कोप चयाई ।। झकोरनि भूल्यो। योक्न जोर महाप्रभु भूल्यो॥ ७१॥ धूम सो नील निचोल मैं सोहै। जाइ दुई न पिलोकत मोह।। काम समुद्र .

( १४ ) पावक पाप शिखा बनचाये। जारति है नर को परंनारी ७२ ॥ बंक हियेन प्रमा सरसी सी। कर्दम काम कछु परसी सी॥ कामिनि काम की डोरि प्रसी सी। मीन मनुप्यन को . बनसी सी । ७३ ॥ [विजय छंद]. बैंचत लोम दर्णी दिशि को महि मोह महा इत पासि के.डारे। ऊंचे ते गर्व गिरावत को सो जीवहि लहर' लावत भार। पेस मा कोढ़ की सानु' ज्यों केशव मारत काम के घाण निनारे । मारत पाँच करे पंचफूटहि कासों कई जगजीव विचारे॥ ७४॥ भूलत है कुलधर्म सबै तयही जवहीं यह प्रानिग्रसज। . . १-पदम-पितान वा चारा ना बंसी में लगाया जाता है। २- बार- दूगर, लुबाठ । ३ को की मान्य को और अधिक जानेवाली वस्तु । -निनारे सारेही। ५-पंचर-पांच जनों का गुट वा मर।

बिलसै जू। यौवन काम ( १८५) केशव वेद पुराणन कोन सुने ? समुझ न बसै न हँसै जू ॥ देवनि ते नरदेवनि ते नर ते बर वानर ज्यों यत्र न मँत्र मूरि गर्ने जग पिशाच घसैंजू ।। ७५ ॥ शाननि के तनत्राननि को कहि के बाणनि बेधत को तो। बाइ लगाह विवेकन को वह साधक को कहि वाधक हो तो। और को केशव लूटतो जन्म अनेकन के तपसान को पोतो' । तौ मम लोक सबै जग जातो जो फाम बड़ो चटपार न होतो ॥७६ ॥ [मकरंद विजया छंद] कंप घर बानी डगै उर डीठि तुचाति कुचै सकुचै मति वेली। नवे नव ग्रीव थकै गति केशव वालक..ते सँगही सँग खेली। . १-पोतो- (पोत ) जहाज । २-बटपारराइजन, डाक्, लुटेरा। ३-कुचै-सिकुड़ती है। *1

( १८६)
लिये सब प्राधिन व्याधिन संग
जरा जर पाच की सहेली।
मगे सब देह दशा जिय साय
रहे दुरि दौरि दुराया अकेली ॥७
चिलोकि शिरोरुह श्वेत समेत
तनारह कोविद या गुण गायो।
उटे किया
पायु के आधि के अंकुर
सल कि शुष्क समूल नसायो ।
जरें किधी केशव च्याधिन की क्रियों
आधि के आखर अंत न पायो।
जरा शरपंजर जीव जरउ कि
जरा जरकंचर मी पहिरायो |||
[मनोहर विजया द]
दिनही दिन यादव जाइ हिये
जरि जाइ समूल सो औषधि है।
किधी माहिसाय अनाय ज्यों फेराव
आवत जात सदा दुख है।
जग जाको ज्योति जगे जड़ जीव
रे कैसेटु ता पहँ जान न पैहै।
मुनि यासदरा गई ज्यानी गई
अरिदै जप दुरागान है | En
१-मामापु। २-जरा दुसाना -

( १८७ ) [दोहा] जहां भामिनी भोग तह, विन भामिनि कह भोग। भग्रामिमि छूटे जग छुटै, जग छूटे सुखयोग । ० ॥ जोई जोई जो करे, अहँकार के साथ । स्नान दान तप होम जप, निष्फल जानौ नाथ ॥ १ ॥ [तोटकछंद] जिय मांझ अहंपद, जो दमिये । जिनहीं जिनहीं गुण श्रीरमिये । तिनहीं तिनहीं लखि लोभ डसै। पट तंतुनि उंदुरर ज्यों तरसै२ ॥ २ ॥ [विजयछंद] दान सयाननि के कलपद्रुम टूटत ज्यो ऋण ईश के मांगे। सूखत सागर से सुख केशव ज्यों के अनुरागे॥ पुण्य विलात पहारन ले पल ज्यो अघ राघव की निशि जागे ज्या द्विजदोष ते संतति नाशति त्यों गुण भाजत लोभ के आगे ॥ ३ ॥ । दुख श्रीहरि १- लंदुर-चूहा, मुसा । २-तरासता है-कारता है। ३- राघर की निशिरामनवमी की रात्रि ।

दान दया रामगोख सखा दिमु गुरा मिनुक को विमुका। साधु मुधी मुरमी सय केशव माजि गई भ्रम भरि मजा । सजन संग यईर डर विडर यूपमादि प्रवेश न पायें। बार' बढ़े.अवयाव बंधे उरमंदिर बाल गोविन्द न पाये । [दोहा] निन पाहत पांघरो, जीव कर बहुमांति ॥ घारन पीरज विन क तृष्णा कृष्णा राति ॥2॥ तृप्या छा पट्पदी, हृदय कमत में वाम || मत्त दंति गलगंडयुग, नर्क अनकं विज्ञास ॥६॥ [विजय द] कौन गनै यहि लोक तरीन बिलोकि विताकि जहाजन वारे। लाज विशाल लता लपटी ठन धीरज सत्य तमालनि तोरे॥ पंचकता अपमान अयान अलाम भुजंग भयानक कृया पाटु वड़ो कहुँबाटुन केशव क्योंतरिजाइ तरंगिनि तृप्तामा पैरत पापपयोनिधि में मन मूढ़ मनोज जहाज चढ़ाई। पेलन ऊन तो जड़ जीव जऊ यड्यानन क्रोध दाई । भूठ नरंगिनि में उरम मु इते पर लोम प्रवाह बढ़ों। दत है तेहि ते टवर कहि कतर काहे न पाठ पढ़ाई -नाना। -पर-नोदाई ( भाको । कोरेजवाइमा है।

१ ( १८६) [दोहा.] जो कंह सुखभावना, काहू को जग होति । काल श्राखु परतंतु ज्यों, तवहीं काटत ज्योति ॥६॥ ब्रह्म विष्णु शिव आदि दे, जेतने दृश्य शरीर । नाशहेतु धावत सबै, ज्यो बड़वानल नीर ॥६० ॥ [ सुंदरी छंद] दोपमयी जो दवारि लगी अति । देखतही त्यहि ते .जो जरी. मति ॥ भोग की श्राश न गूढ़ उजागर । ज्यों रज सागर में मुनि नागर ॥ ११ ॥ [विजया छंद] माछी कहै अपनो घर माछरु मूलो फहै अपना घर ऐसो। कोने घुसी कहै घूसि घिरौरी विलारिश्रो व्याल चिले महँ वैसो॥ कीटक श्वान सो पति औ भितुक.भूत कहें भ्रमजाल है जैसो। होई कहीं अपनो घर तैस्यहि ता घर-सौ अपनो घर कैसो ॥२॥ [ सुंदरी छंद] जैसहि हो अब तैसहि हों जग। श्रापद सम्पद के न चलौं मग ॥ 'एकहि देह तियाग विना मुनि । हो न कछू अभिलाप करौं मुनि ॥ १३ ॥ १-याखु-वृहा । २- मार-मच्छई। ३-घिरोरी घरों के कोनों पर मटी का घर बनाने वाली एक प्रकार का भूगी वाछिपकली, विस्तुइया ।

यच
( १६० )
जो कछु जीवउधारण फो मत।
जानत हो तो कही तनु है रत ॥
यो कहि । मौन गही जमनायक।
केशवदास मनो कायका
वशिष्ट कथित मुक्तिमार्ग
[पद्धटिका छंद]
वशिष्ठ-तुम आदि मध अवसान एक ।
पर जीव जन्म समुमो अनेक ॥
तुमही जो रची रचना - विचारि ।
त्यहि कौन मांति समुझो मुरारि ॥ ५ ॥
सय जानि वृझियत मोहिं राम ।
सुनिये सो ही जग ब्रह्म नाम॥
तिनके अशेष प्रतिविम्य जाल।
त्या जीव जानि जग में कृपाल ॥६६॥
[निशिपालिका छंद ]
लोम मद मोह वश काम जवहीं भयो।
भूलि गये रुप निज वीधि तिनसो गयो ।
राम-चूमियत यात यह कौन विधि उद्धरै।
पशिष्ट-चैद विधि शोधि बुध यत्न बहुधा कर ॥१७॥
[दोहा]
राम-जित लैहे यासना, तित तित है? सीन ।
यस कहाँ कैसे करें, जोय यापुरो दोन ॥ ६ ॥

यतन सों ( १६१ ) [दोधक छंद] वशिष्ठ-जीवन की युग भांति दुराया। होति शुभाशुभ रूप प्रकाशा॥ शुभपन्थ लगावै। तो अपनो तवहीं पद पावै ॥ १६६ ।। हो मन ते विधि पुत्र उपायो। जीव उधारण मंत्र बतायो। है परिपूरण ज्योति तिहारी। जाइ फही न सुनी ननिहारी॥१०॥ [ दोहा] ताकी इच्छा ते भये, नारायण मतिनिष्ठ । तिनते चतुरानन भये, तिनते जगत प्रतिष्ठ ।। १०१ ।। [ दोधक छंद] जीव सबै अवलोकि आपन चित्त प्रयोग विचारे॥ मोहिं सुनाये तुम्हें ते सुनाऊं। जीव उधारण गीति सु गाऊं ॥ १०२ ।। [दोहा] मुक्तिपुरी दरवार फे, चारि चतुर प्रतिहार। साधुन को सतसंग सम, अरु संतोष विचार ॥१०३१ दुसारे। 1-प्रतिहार दरबान ।२---सम-समता।

१२) यह जग चकाव्यूह किय, कज्जल फलित अगाधु । तामह पैटि जो नीकस, अकलंकित सोसाधु । १०४ ॥ [दायक छंद ] देखतहूं एक काल छियेहूं। यात कई मुनै भोग कियेहूं। सोबत जागत नेक न शोभा सो समता सबही माहँ शोमै ॥ १५ ॥ जी अमिलाप न काटु को प्रात्रै। गये सुख दुःख न पाच लै परमानंद सां मनला। सो सव मांझ सँतोष कहा। २०६३ आयो कहाँ अव ही कहि को हो। ज्यों अपना पढ़ पाऊं सो टोही । पंधु अबंधु हिये महँ जान । .ता.क.लोग विचार पखान १०७n चारि में एकहु जो अपनावै॥ तो तुम पै ममु आवन पाये। राम-ज्योति निरोह निरंजन मानी। तामह क्यों पिच्छ.यखानी ॥ १०॥ पदोहा] वशिष्ट-सफल शक्ति अनुमानिये, अद्भुत ज्योति प्रकारा। जाते जग को होत है, उत्पति पिति अस्नाश ॥ १०६ ।

[दोधक छंद] श्रीराम-जीव धंधे सव श्रापनि माया। कीन्हें कुफर्म मनो वच काया । जीवन चित्त प्रबोधन आनो। जीवनमुक्त के भेद भेद यखानो ॥ ११० ॥ वशिष्ट-चाहेरहूं अति शुद्ध हियेहूं। जाहि न लागत क कियेहूं॥ बाहर मूढ. सो अंत सयानो। ताकहूँ जीवनमुक्त वखाना ॥ १११ ॥ [दोहा] आपुन सो अवलोकिये, सवही युक्तायुक्त अहं भाव मिटिजाहि जो, कौन बद्ध को मुक्त ॥ ११२ ॥ [ दोधक छंद] धीराम-सो सिगरे गुण होत सो जानो। स्थावर जीवनमुक्त वसानो॥ वशिष्ट-जानि सवै गुण दोपन छ । जीवनमुक्तन के पद मंडै ॥ ११३॥ । दोहा] राम-साधु कहावत करत हैं, जंग में सव न्यौहार। तिनको मीच न वै सकै, फहि.प्रभु कौन विचार १११४॥

। [पवाटिका छंद] पशिष्ठ-जग जिनको मन तव चरण लीन । सन तिनको मृत्यु न करति क्षीन। तेहि क्षणही क्षण दुख क्षीण होत । जिय करत अमित आनंद उदोत ॥ ११५ जो चाहै जीवन अति अनंत । सो साथै प्राणायाम यंत्र शुभ रेचक पूरक नाम जानि । अब कुम्भकादि सुखदानि मानि ॥ ११६ ।। जो क्रमक्रम साथै साधु धीर । सो तुमहिं मिले याही शरीर॥ राम-जरा तुमते नहि सर्वच भान । प्रय कही देय पूजा विधान ॥ ११७ ॥ [तारक छंद] वशिष्ठ-हम एक समय निफसे तपसा को। तब जाइ भजे हिमवंतरसा' को। पाभांति कखो तप क्यों फाहियावै । शितकण्ठ प्रसन्न भये जग गावै ॥ ११ ॥ [दंडक छंद] ऊजरे उदार उर यासुफी विराजमान, द्वारके समान पान उपमा न टोहिये। १-हिमवंतरसा=हिमालय भूमि ।

. ( १६५ ) शोभिजे जटान बीच गंगाजू के जल बंद, कुंद कीसी कली केशोदास मन मोहिये ।। नख कीसी रेखा चद्र चन्दन सीचारज, अंजन श्रृंगार हू गरल रुचि रोहिये। सब सुखसिद्धि शिवा सोहै शिव के साथ, जावक सोपावक लिलार लाग्यो सोहिये ।। ११ ।। [तारक छंद ] महादेव-वरमाँगि कछ ऋषिराज सयाने। बहुभांति चले तपपंथ पयाने ॥ पशिष्ठ-पुजवो परमेश्वर मो मन इच्छा। सिखवो प्रभु देवप्रपूजन प्रभु देवप्रपूजन शिक्षा ॥ १२० ॥ [दोहा] शिव-रामरमापति देव नहिं, रंग न रूप न भेव । देव कहत ऋषि कौन को, सिखऊंजाको सेव ॥ १२॥ [तोमर छंद] पशिष्ठ-हम कहा जानहिं अश । तुम सर्वदा सर्वश ।। अव देव देहु बताइ । पूजा कहा समुझाइ ॥ १२२ ॥ शिव-सतचित्प्रकाश प्रमेव । तेहि वेद मानत देव ॥ तेहि पूजि ऋषि रुचिमंडि । सव प्राकृतन को छडि ॥१२३ पूजा यहै उर श्रानु । निर्व्याज धरिये ध्यानु । यों पूजि घटिका एक । मनु किया याज अनेक ।। १२४ ॥ ।

जिय जान यहई योग । सब धर्म कर्म प्रयोग।
सय रूप पूजि प्रकाशा तय भये हमसे दास ।
यह वचन करि परमान । मभु भये अंतर्धान ॥ १२५ ॥
[दोहा]
यह पूजा अद्भुत अगिनि, 'मुनि प्रभु निमुवन नाथ ।
सर्य शुभाशुभ वासना, में जारी निज हाय ॥ १२६ ॥
[भूलना छंद]
यहि मांति पूजा पूजि जीव जो भक्त परम कहा।
भव भक्तिरस भागीरथी महँ देहि दुखनि यहाइ ।
पुनि महाकर्ता महान्यागी महामोगी होइ ।
अति शुद्ध भाव रमै रमापति पूजिह सब कोह ॥ १२७ ।।
[दोहा]
राग द्वेष विन कैसहूं, धर्माधर्म जो होह ॥
हर्ष शोक उपजे न मन, कर्ता महा सोलोइ ॥ १२८ ।।
मोज अभोजन रत विरत,नीरस सरस समान ।
भोग होइ अमिलाप दिन, महामोगता मान ॥१२॥
जो कछु नांखिन देखिये, वाणी वाया जाहि ।।
महातियागी जानिये, झूटो जानै ताहि ॥ १३० ॥
[तोमर छंद]
जिय शान बहु व्यौहार । अरु योग भोग विचार ।।
यहि मांति होइ जो राम 1 मिलिहँ सो तेरे धाम ॥ ११॥

[सवैया ] निशिवासर वस्तुविचार करै मुख सांच हिये करुणा धनु है। अघ निग्रह संग्रह धर्मकथ परिग्रह साधन को गनु है। कहि केशव योग जगै हिय भीतर बाहेर भौगन सो तनु है मनु हाथ सदा जिनके तिनको बनहीं घरहै घर ही वनु है ॥१३२॥ [दोहा] लेइ जो कहिये साधु अन-लीन्हे फहिये वामः ।। सवको साधन एक जग, राम तिहारो नाम ।। १३३ ।। राम-मोहिं न हुतो जनाइवे, सवही जान्यौ आजु ॥ अव जो कही सो करि चने, कहे तुम्हारे काज ।। १३४ ॥ रामनाम महिमा वशिष्ठ- [ स्वागता छंद] चित्त मांझ जब पानि अरूझी। वात तात कहँ मैं यह यूझी। योगयाग करि जाहि न पावै । स्नान दान विधि मर्म न पावै । है अशक्त सव भांति विचारो। कौन भांति प्रभु ताहि उधारो१३५ [भुजंगप्रयात छंद] ब्रह्मा-जहीं सच्चिदानन्द रूप धरेंगे ॥ सुत्रैलोक्य को ताप तीन्यों हरेंगे। कहंगो सवै नाम श्रीराम ताको । सदा सिद्ध है शुद्ध उच्चार जाको ॥ १३६ ।। कहै नाम श्राधो सो श्राधो नशावै । कहै नाम पूरो सो वैकुट पावै ॥

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सुधारै दुहूँ लोक को पर्ण दोऊ।
हिये छम छांई कहै वर्ण कोऊ ॥ १३७ ॥
मुनावै सुनै साधु संगी रहावै ।
कहावै कह पाप पुंजे नशावै ॥
स्मरावै स्मर यासना जारि डार।
तजै छद्म को देवलोक सिधारै ।। १३८ ।
[तामरस छंद ]
जय सय वेद पुराण नहैं । जप तप तीरथहू मिटिजैहैं ।
द्विज सुरमी नहिं कोउ विचार। तब जग केवल नाम उधारे १३६
[दाहा]
मरणफाल काशी विपे, महादेव निजधाम ।।
जीवन को उपदेशिहै, रामचन्द्र को नाम ॥ १० ॥
मरणकाल कोऊ कहै, पापी होइ पुनीत ॥
मुखही हरिपुर जाइहै, सब जग गाये गीत ॥ १४ ॥
रामनाम के नस्य को, जानत वेद प्रभाव ॥
गंगाधर के घरणियर, वालमीकि मुनिराय ॥ १४२ ।।
रामतिलकोत्सव
[दोधक द]
साता सिधुन के जल करे। नौरथजालनि के पय पूरे।
कंचन के घट वानर लीने । पार गये हरिधानंदभीने ॥१४॥

( १६४ ) E दोहा] सकल रत्नमय मृत्तिका, शुभा औषधी अशेष ॥ सातद्वीप के पुष्प फल, पल्लक रस सविशेष ।। १४४ ॥ [दोधफ छंद] आंगन हीरन को मनमोहै । कुंकुम. चन्दन चर्चित सोहै ॥ है सरली सम शोभप्रकाशी। लोचन मीन मनोज विलासी ॥१४॥ [दोहा] गजमोतिनयुत शोभिजे, मरकतमणि के थार ॥ उदक बुन्द सौं जनु लसत, पुरइनिपत्र अपार ॥ १४६ ।। [विशेषक छंद] भांतिन' भांतिन भाजनराजत कौन गर्ने । ठौरहिं ठौर रहे जनु फूलि सरोज घनै ॥ भूपन के प्रतिबिम्ब विलोकत रूप रसे। खेलत है जल मांझ मनो जलदेव बसे ॥१४७ ॥ [पद्धटिका छंद मृगमद मिलि कुंकुम सुरभिनीर । घनसार सहित अम्बर उसीर । घसि केशरि सों यहु विविध नीर । तिति छिरके चरथावर शरीर ॥१४॥ बहुवर्ण फूल फल दल उदार । तहँ भरि राखे भाजन अपार ॥ तहँ पुष्प वृक्ष शोमैं अनेक ।

( २०० } मणिवृक्ष स्वर्णकेवृक्ष पफ ॥ १४ ॥ त्यहिं उपर रच्यो एकै वितान । दिवि देखत देवन के विमान । दुहुँलोक होत पूजा विधान । अरु नृत्य गीत पादिन गान ॥ १५० ॥ तरु ऊमरि को आसन अनूप । बहु रचित हेममय विश्वरूप ॥ तहँ बैठे आपुन पाइ राम । सियसहित मनो रतिरुचिरकाम ॥ १५१ ॥ जनु धनदामिनि थानन्द देत । तरकल्प कल्पपल्ली समेत है कैचों विद्या सहित शान । के तपसंयुत मन सिद्धि जान ॥ १५२ ।। के विक्रम युत कीरति प्रवीन । के श्रीनारायण शोमलीन के अति शोभित स्याहा सनाथ । गार साथ ॥१५३॥ [मुंदरी छंद] केशव शोमन छन विराजत । जा कह देखि मुधाधर लाजत ॥ - के सुन्दरता १-एक-अपूर्व । २-उमरि गरि। .

- ( २०१ ). शोभित मोतिन केमति के गन। लोकन के जनु लागि रहे मन ॥ १५४ ॥ [दोहा] शीतलता शुभता सबै, सुंदरता के साथ ॥ अपनी रवि को अंशु लै, सेवत जनु निशिनाथ ॥ १५ ॥ [सुंदरी छंद] ताहि लिये रविपुत्र सदा रत । चमर विभीपण अंगद ढारत कीरति लै जग की जनु वारत । चन्द्रक' चंदन चंद सदारतरे ॥ १५६ ॥ लक्ष्मण दर्पण को देखरावत । पाननि लक्ष्मण बंधु खवावत ॥ भर्थ लै लै नरदेव सदारत । देव अदेवनि पायन पारत॥१५७॥ [ दोहा] जामवंत हनुमंत नल, नील मरातिब साथ ।। छरो छवीली शोभिजे, दिगपालन के हाथ ।। १५ ।। रूप वहिक्रम सुरभिसम, बचन रचन बहु भेव ॥ सभा मध्य पहिचानिये, नर नरदेव न देव ॥१५॥ १-चंदक% कपूर। २-सदारत = सदा पात नित्य दुसी ? 1-मराति माहोमरातिय शाहंशाही मंडा।

.( २०२ ) आई जय अभिक की, घटिका केशवदास II, याजे एकहिघार घटु, दुंदुभि दीह श्रकाश ॥ १६० ।। [झूलना छंद] तव लोकनाथ विलोकि के रघुनाथ को निज हाय। सविशेष साँ अभिषेक की पुनि उच्चरी शुभगाय । ऋषिराज इष्ट वशिष्ठ सौ मिलि गाधिनन्दन आइ । पुनि यालमीकि वियास आदि जिते हुते मुनिराइ ।।१६।। रघुनाय शभु स्वयमु' को निज भक्ति दी मुखपाइ। मुरलोक को सुरराज को किय दीह निर्मय राह । विधि सौ ऋषीशन सो विनय करि पूजियौ परि पार । यहुधा दई तपवृक्ष की सय सिद्धि सिद्ध सुमार ॥ १२ ॥ [दोहा] दीन्हों मुकुट विमीपणे, अपनो अपने हाय ॥ कंठमाल सुग्रीच को, दोन्ही श्रीरघुनाथ ।। १५३ ॥ [चंवरो छद] माल श्रीरघुनाथ के उर शुम्र सीतहि सोदा। अरपियो हनुमन्त को तिन दृष्टि के फरणाम। और देव श्रदेव यानर याचकादिक पाइयो । एक अङ्गद छोड़ि के ज्वर जासु के मन भाइयो । १६४ ॥ अंगद-देव हा नरदेव- वानर नभृतादिक धीर हो । भरत लक्ष्मण श्रादि दै रघुवंश के सय घीर हो । १-स्वयमुना।

( २०३ ) प्राजु मोसन युद्ध माड्ड्डः एकएक अनेक के। बाप को तब हो तिलोदक दीह देहुविवेक के ॥ १६५ ॥ [दोहा राम-कोऊ मेरे वंश में, करिहै तोसों युद्ध । तब तेरो मन होइगों, अंगद मास शुद्धः ॥ १६६ ॥ देवस्तुति [झूलना छंद लक्षा-तुम हो अनन्त अनादि सर्वग सर्वदा सर्वत्र । अब एफही किं अनेक होमहिमा नजानतःअह॥ भ्रमियो करें जग लोक चोदह लोभ मोह-समुद्र । रचना रची तुम ताहि जानत हो न ब्रह्म न रुद्र ॥ १६ ॥ [ दंडक छंद] शिव-अमल चरित तुम घेरिन मलिन करौं. साधु कहैं साधु परदारप्रिय अति हो। एक थल स्थित बसत जगजन प्रिय फेशोदास द्विपद पै यहुपद गति हो। भूषण सफल युत शीश धरेंभूमिभार, भूतल फिरत पै अभूत भुवपति हो। राखौ गाइ ब्राह्मणन राज सिंह साथ चिर, रामचन्द्र राज करो अदभुत गति हो ॥ १६ ॥ इन्द्र-वैरी गाइ घालण को ग्रन्थन में सुनियतु, कविकुलही के सुबरण हर काज - ( २०४ ) गुरुशय्यागामी एकोलकै विलोफियतु , मातंगनहीं के मतवारे कैसो साज है। अरिनगरीन प्रति होत है अगम्यागौन , दुर्गनहिं केशोदास दुर्गति सी आज है। देवताई देखियतु गदनि गढ़ाई जीयो, चिरु चिरु रामचन्द्र जाको ऐसो राजहै ॥ १६ ॥ पितर-थैठे एक छत्र तर छाँह सय छिति पर, सकूलकलश राहु हित मति हो । त्यक्त घामलोचन कहन सब केशोदास , विद्यमान लोचन बैदेस्त्रियतु अति हो। अकर कहावत धनुष धरे देखियतु , परम कृपालु पै रुपाणकरपति हो । चिरुचिरु राज करो राजा रामचंद्र सय, लोक कई नरदेष देवदेवति है। १७० ।। अग्नि-चित्रही में आज वर्णसंकर विलोफियतु, ब्याह हो में नारिन के गारिन सो काज है। ग्वजे कंपयोगी निशि चक्र है वियोगी, द्विजराज मित्र द्वेषो एक जलद समाज है। मेधै तो गगन पर गाजत नगर घरि, अपयश डर यशही को लोम प्राज है। दुःखी ही को खंडन है मंडन सकल जग , चिक चिरू राज करो जाको ऐसो राज है।

( २०५ ) वायु-राजा रामचंद्र तुम राजटु सुयश जाको भूतल के श्रास पास सागर को पास सो। सागर में वड़ भाग वेप शेषनाग जू को जपै सुखदानि सोई विष्णु को निवास सो॥ विप्णुजू में भूरिभाव भाव को प्रभाव जैसो भवजू के भाल में विभूति को विलास सो। भूतिमाहिं चंद्रमा सो चंद्र में सुधा कोअंशु, अंशुनि में केशोदास चंद्रिका प्रकाश सो॥ १७२ ॥ देवगण-राजा रामचंद्र तुम राज करो सव काल दीरघ दुसह दुख दीनन को दारिये। केशोदास मित्रदोष मंत्रदीप ब्रह्मदोप देवदाप राजदोष देश ते निकारिये ॥ कलह कृतघ्न महिमंडल के परिवंड पाखड अखंड खंड खंड करि डारिये। वंचक कठोर ठेलि कीजै वाराबाट पाठ, , झूठ पाठकंठ पाठकारी काठ मारिये ॥ १७३ ॥ ऋपिगण-भोगभार भागभार केशव विभूतिभार भूमिभार भूरि अभिपेकन के जल से। दानभार गानभार सकल सयानभार धनभार धर्मभार अक्षत 'श्रमल से ॥ 1-मारना-काट पर डालकर कैद कर देना।

( २०६ ) जयमार यशमार राजभार जतई रामशिर आशिष अशेष मंत्रवल से। देश देशपत्र तत्र देखि देखि तेहि दुख फाटत है दुष्टन के श्रीरा दामोफ़ल से १४॥ केशव- [विजयचंद जार नहीं करतूति कही सव श्री सविता कविता करि हारो। याही ते फेयपदास अशीप मढ़े अपनो करि मेकु निहारो। कोरति देशनि की दुलही यश दूलहू श्रीरघुनाथ तिहारो। सातौ रसातल सातहु लोकन-सातासागर पार विहारो ॥१७ -रामलाला ईद] किन्नर, यक्ष, गन्धर्व- अजर अमर अनन्त जय जय चरित श्रीरघुनाथ । करत मुरमर सिर अचरज श्रवण मुनि मुनि गाय ॥ काय मन यच नेम जानत शिला सम पर नारि। शिला ते पुनि परम मुन्दरि करत नेक निहारि ॥ १७६ ॥ चमर दारत मातु ऊपर पाणि पौड़ा हो । विशदंड ज्यों कोदंड हर को दूक कीन्हो देश । साधु होइ असाधु राखत द्विजन ही को मान । सकल मुनिगण मुकुटमणि को मर्दिया अमिमान ॥ १७ ॥ सूर मुन्दर सरस रवि रति करत रति कह लालि। एक पत्नीव्रत निबाहत मदन को मद घालि ।। १-दायोफसदादिम फन, मनार। २-विशदरकमकी जा। 1 .

( २०७ )
सुखद सुहद सपूत सोदर
हनत नृप जा काज।
पलक में सोइराज छोड्यो मातु पितु की लाज ॥१७॥
मंथरा सों मोद मानत विपिन पठयो -प्रेलि।
सूर्पनखा की नाक काटी करन आई केलि ॥
चंचु चापत अंगुरी शुक ऐचि लेत डेराइ ।
बन्धु सहित कवन्ध के उर मध्य पैठे धार ॥१७॥
सर्वथा सर्वश सर्वग
सर्वदा रस
अश ज्यों सीता विलोकी व्यन भ्रमत अनेक.॥
वाण चूकत लक्ष्य को को गनै केतिक वार।
ताल सातों वेधियो शर एक एकहि बार ॥१०॥
सापराध असाधु अति सुग्रीव कीन्हों मित्र ।
अपराध विन अति साधु बालिहि हन्यो जानि अमिन।।
चलत जय चौगान को ले चलत दुल'चतुरंग।
देवशत्रुहि चले जीतन ऋक्ष वानर संग ॥११॥
भूलिहू जा तन निहारत गुरु सो गिरिन समान ।
निगरु देखो भये गिरिगण जलधि में ज्यों पान ॥
यतन यतननि तरत सरयू डरत लोलत डीठि।
गये सागर पार दै पगु प्रगट पाहन पीठि ॥१२॥
वाजि गज रथ वाहिनी चढ़ि चलत श्रमित सुभाय ।
लंक में विन पानहीं निज गये अपने पाय ।
यश को फल गहत यलनि यज्ञपुरुष कहाय ।
बेर जूठे दियो सेवरी भक्षियो सुख पाय ॥ १३ ॥

( २०० ) कुमुम कन्दुक लगत काँपत मंदि लोचन मूल । शत्रु सन्मुख सहे हैंसि हँसि शैल असि शर शूल ॥ दूरि करत न दया दर्शन देह दंशत वंश। भईयार न करत रावण वंश को नियंश ॥२८॥ याण येमहि श्रान को लगि नाम अपनो लेत। काल से रिपु पापु हति जयपन औरहिं देठ ।। पुण्यकालन देत 'विप्रन तौलि तौलि कनंक। शत्रुसोदर को दई सब स्वर्ण ही को लंक ॥ १५ ॥ होइ मुक्त सो जाहि इनको मरत आवै नाम । मुक्त एक न मये वानर मरे। 'करि संग्राम ॥ एक पल बिन पान बाये बार बार जम्हात। वर्ष चौदह नींद भूख पिपास छोड़ी गात ॥१६॥ क्षमै वरु अपराध अपने कोटि कोटि कराल । अपराध पक नक्षम्या गो द्विज दीन को सब काल । यदपि लन्मण करी सेवा सर्व माँति सभेव । नदपि मानत सर्वथा करि मरन ही की सेव ॥१७॥ कहत इनको सर्व साँचे सफल राना राय। तनक मेवा दास की कहैं कोटिगुणित बनाय ॥ डरत यक अपलोफर ते ये जीव चौदह लोक । टौर जाकह कहुँ न ताफहँ देत अपनो श्रोक ॥ १ ॥ १-मा-निशाना। २-प्रलापबदनामी, संक। ३-धीर-धान, धाप।

( २०४ ) छाँड़ि ऋपि द्विज देवऋषि ऋषिराज सब सुसंपाद । प्रगट सकलसनौढियन के प्रथम पूजे पाइ॥ छोड़ि पितर त्रिशंकु है विपरीत "यद्यपि देह । अवध केशव जात शूकर श्वान स्वर्ग संदेह ॥ १८६ ।। एक पल उर मांझ' आये हरत' सब संसार। श्रायंकै संसार में इन हरेउ भूतल भार ॥ शेप शम्भु स्वयम्भुभापत निगम नेतिन जासु । ताहि लघुमति वरणि कैसे सकतं केशवदास ॥ १० ॥ [ दोहा ] यहि विधि चौदह भुवन के, गावत मुनि यश गाथ । प्रेम सहित पहिराइ सव, विदा किये रघुनाथ ॥१६१।। [झूलना छंद] अभिषेक की यह गाथ श्रीरघुनाथ की नर कोइ। पल एक गावत पाइहै वह पुत्र- सम्पति सोइ ॥ जरि जाहिगी सब वासना भव विष्णु भक्त कहाइ ! यमराज के शिर पाउँदै सुरलोक लोकनि जाइ ॥१२॥ [ रामराज्य वर्णन) [ भुजंगप्रयात छंद] अनन्ता सवै सर्वदा शस्ययुक्ता। समुद्रावधिः सप्त ईती विमुक्ता - १-अनंता-पृथ्वी ।

( २१०.): , सदा. वृत श्ले फले तत्र सोहै।, ..जिन्हें अल्पधौ कल्प साखी विमाहे ॥ २६॥ सबै निम्नगातीर के पूर पूरी। मई कामगो सी सबै धेनु करी ॥ सबै वाजि स्वाजि ते तेज पूरे। सर्व दन्ति स्वर्दन्ति ते दर्प रे ॥ १६४ । सबै जीव हैं सर्वदानन्द पूरे। क्षमी संयमी विक्रमी साधु शूरे। युवा सर्वदा सर्व विद्या विलासी। सदा सर्व सम्पत्ति शोमा प्रकाशी ॥ १५ ॥ चिरंजीव संयोग योगी अरोगी। सदा एकपत्नीवती भोग भोगी। सबै शील सौंदर्य सौगन्ध धारी। सबै ब्रह्मज्ञानी गुणी धर्मचारी ॥ १६ ॥ सवै न्हान दानादि कर्माधिकारी। सबै वित्त चातुर्य चिंतामहारी । सबै पुत्र पौत्रादि के सुक्ख साजै । सवै भक्त माता पिता के विराजै ॥ १६॥ सबै सुन्दरी मुन्दरी साघु साह । शची सौ सतीसी जिन्हें देखि माई । १--शिनगानदी।

(२१९ ) सबै प्रेम की पुण्य की सशिनी सी। सबै चिविली पुत्रिणी पशिनी सी ॥ १६ fi भ्रमै संभ्रमी यत्र शोक सशोकी। अधमै अधर्मी अलोक प्रलोकी३ ।। दुखै तो दुस्खी ताप तापाधिकारी। दरिदै दरिद्री विकार विकारी ॥ १६ ॥ [चौपाई] होम धूम मलिनाई जशी अति चंचल चल दल है तहां । पाल नाश है चूडाकर्म । तीक्षणता आयुध के धर्म ॥ २०० लेत जनेऊ भिक्षा दानु । कुटिल चाल सरितानि यखानु ! व्याकरण द्विज वृत्तिन हरै। कोकिलकुल पुत्रन परिहरै ॥२०१६ फागुहि निलज लोग देखिये । जुवा देवारी को लेखिये । नित उठि झोई मारिये । खेलत में कहूँ हारि रे ।.. [दंडक] भाव जहां विभिचारी वैद्य रमै परनारी, द्विजगन दंडधारी चोरी परपोर की। मानिनीन ही के मन मानियत मान मंग सिंधुहि उलंधि जाति कीरति शरीर की । मुले तो अधोगतिन पावत हैं केशोदास , मी ही सो है वियोग इच्छा गंगानोर की। १-समिनी हवेली, पर। २-मलोक-अपलोक, बदनामी, भए । । १ (१२१२ .), बंग्या मासनानि जानु:विघषा : सुमाटिकाई , पेसी रीति राजनीति राजे रघुबीर-की ॥ २०३ ॥ [दोहा]. कविकुल ही केलीफलन, उर अमिलाप समाज । तिथि ही कोतप होत है, रामचंद्र के राज ॥२०॥ [दंडक] टिवे के नाते पाप: पहने तो लूटियतु तोरि को मोहतर तारि डारियतु; है। घालिबे के नाते.गर्व थालियतु देयन के जारिये के नाते,अघ)ोध- ज़ारियतु है । यांधिये के नाते ताल यांधिमतु: केशोदास -- मारिवे के नाते,तो दरिद मारियतु है। राजा रामचन्द्र के नाम जगा जीतियतु हारिये के नाते आन जन्म हारियतु है ॥ २० ॥ [चंद्रकला छंद.1. के कल्पगुम के. वन हैं सब के घर, यारन गाजत हैं। सब के घर शोमति देवसमा सव के जय दुंदुभि पाजत है ॥ निधि सिद्धि विशेष अशेपनि सौ सय लोग सबै मुख साजत है। कहि केशव श्रीरघुराज के राज सबै सुरराज से राजंत हैं ।२०६ [दंडक] जूझहि में कलह कलहप्रिय नारद, पुस्प है कुबेरै लोम सब के चयन को।

(२१३ ) पापन की हानि डर गुरुन को.बैरी काम , आगि सर्वमती दुखदायक' श्रयन को। विद्या ही में चादु बहुनायक है वारिनीधि, "जारज है हनुमंत मीता उदयन को। श्रोखिन छत अंध 'नारिकर कश कटि, ऐसा राजरोज राम राजिवनयन को॥ २७ [दोहा "कुटिल कटाक्ष कठोर'कुच, एकै दुःख"अदेय । द्विस्वभाव 'अश्लप में, बाहर जाति अजेय ॥२०॥ [तोमर छंद] बहु शब्द वंचक जानि । अलि पश्यताहर मानि नर यांहई अपवित्र । शर खंग निर्दयं मित्र ॥२०॥ (सारंठा] गुण तजि श्रीगुरणंजाल, गहत नित्यति चालिनी पुंश्चली ति तेहिकाल, एकै कीरति जानिये ॥ २१० [दोहा] धनद लोक मुरलोकमय, सप्तलोक के साज। सप्तद्वीपवति महि बसी, रामचंद्र के राज ॥२११ दशसहस्र दशसै बरस, रसा वसी यहि साज ॥ स्वर्ग नर्क के मग थके, रामचन्द्र के राज ।। २१२। ..-पश्यताहर-देखते देखते गने वाला। २ तिलतिय भी।

(:२१४,) चौगान वर्णन , [चौपाई ]. यहि विधि गये राम चौमान । सावकाश सयभूमि समान।। शोभन एक कोश,परिमान । रचो रुचिरतापर चीगान ।।२१३॥ एक कोद' रघुनाथ उदार । भरत दूसरे कोद विचार ।। सोहत हाये लोन्हें छरी । कारी पीरो राती हरी ॥२१४ ॥ देखन लायो सये जग जाल । डारिदियो भुव गोला हाल' । गोला जाह जहाँ जहँ अवै । होत तही तितही तित सवै ॥२१५॥ मनो रसिक लोचन रुचि रचे । कंप संग यहु नाचनि नचे ।। सोक लाज छांडे अंग अंग । डोलत जनु जन मन के सँग॥२१॥ उत ते इत इत ते उत होई । नेकउ ढील न पाये सोई॥ फाम मोध मद मदयो अपार । मानो जीव भ्रमै संसार ।। २१७॥ जहां तहां मार सब को न्यो नर पंच विरोधी होइ ।। घरी घरी प्रति ठाकुर सबै । यदलत वासन' पाहन तये ॥२१॥ [दोहा] जब जय जीत हाल हरि, तय तय पजत निशान ॥ इय गय भूपस भूरि पट, दोजत लोगलि दान ॥२६॥ .[चौपाई] सब तेहि समय एक बेताल । पदयो गीत गुनि युद्धि विशाल ॥ गोलन की विनती सुखपाई। रामचन्द्र सों कीन्ही आई ॥२२०॥ १-सावाश-पून जमा चौड़ा-कोद तरफ, ओर। -- देबामाकीपाती । १...वासम-पछ ।

,
(२१५' )
[दंडक छंद]
पूरव को पुरी पूरी पापर पुरी से तन
यापुरी वै दूरिही ते पायन परति है।
दक्षिण की पक्षिनी सीगच्छे अंतरिक्ष मग,
पक्षिम की पनहीन पक्षी ज्यों उरति हैं।
उत्तर की देती हैं उतारि शरणागतनि ,
बातन उतायली उतार उतरति हैं।
गोलन की भूरतिन दीजिये जू अभैदान ,
रामवैर कहां जाई विनती करति हैं ॥ २२१ ॥
चंद्रोदय वर्णन
[ दोहा ]
भाचीदिशि ताही समय, प्रगट भयो निशिनाथ ।
वर्जत ताहि विलोकि कै, सीता सीतानाथ ॥ २२२ ।।
[हरिणी छंद]
फूलन की शुभ गेंद नई । संधि सची जनु डारि दई ।
दर्पण सोशशि श्रीरति को। आसन काम महीपति को ॥२२३॥
मोतिन को श्रुति भूपण भनो । भूलि गई रवि की तिय मनो।
अंगद को पितु सो सुनिये । सोहत तारहिं संग लिये।
भूप मनो भव छत्र धरेउ । लोक वियोगिन को विडरेउ ॥२७॥
देवनदी जल राम काहो । मान( फूलि सरोज रह्यो।
फेन किधी नभसिंधु लसै । देवनदी जल हंस बसै ॥२॥

( २१६ ) दोहा] चार चंद्रिका सिंधु में,शीतल.स्वच्छ सठेन । मनो शेषमय 'शोभिजे, हरिणाधिष्ठित नेत्र -[दंडक छंद] केशोदास है उदास कमलाकर सो कर , जोपक प्रदार ताप तमोगुर ठारिये। अमृत अरोग के विशेष मात्र वरपत , कोकनद माद चण्ड नगडन विचारिये। परमपुरुषपदविमुख समुख मुखद विदुपन उर धारिये । हरि है री हिये में न हरिस हरिननी, ..पन्द्रमा न चन्दमुनी नारद निहारिये ॥ २२ ॥ याग वर्णन [सुदरी,जंद] समस.रामप्रिया कहो यो हाँस। , याग देखावहु लोकनस्यति॥ राम: विलौकत बाग.अनन्तहि । अन्यों अवलोकन कामद .सन्तहि ॥ २२ ॥ दालत -मोर यहाँ मुख संयुन । ज्या विरदावति भाटन के सुत ।। ।

(.:२१७ ) . .कोमल. कोकिलः के कुल बोलत ! शानकपाटः कुची जनु. खोलत ॥ २२६ ।। फूल तजै बहु वृक्षन को गनु । छोड़त आनँद आँसुन को जनु । दाडिम की कलिका मन मोहति । हेम कुपी जनु बन्दन सोहति ॥ २३०॥ [दोधक छंद] वेल के फूल लसँ अतिफूले। भोर भवै तिनके रस भूले ।। यों करवीर करी वन राजै। मन्मथ बाणन की गति साजै ।। २३१ ।। केतकपुंज प्रफुल्लित भौर उडै तिनमें अति मोहे ॥ श्रीरघुनाथहिं जे अपलोक हुते अनुरागे ॥ २३२॥ [ दोहा] श्याम शोण द्युति फूल की, फूले बहुत पलास । जरै कामकला मनो, मधुऋतु वात विलास ॥ २३३ ।। [तोटक छंद] बहु पंकज की कलिका हुलसी। तिनमें अलि श्यामल ज्योति लसीप: सोहै। श्रावत भागे। १-कुची संजी, ताली, उघली। २-करी कली।

( २१८ ) उपमा शुक सारिक चित्तधरी। जनु हेमकुपी रस सांध भरी ।। २३४ ॥ [ताफ टुंद] उरे उर दाडिम दोह विचारे। सुदतीन के शोभन दन्त निहारे । अति मंजुल पंजुल कुंज विराज। बहु गुंजनिकेतन' पुंजनि साजै ॥ नर अन्म मये दरणे तर मौर। तिनके जनु लोचन है यठौरे ।। २३५ ॥ थल शीतल तप्त स्वभावनि साजे । शशि सूरज के जनु लोक विराजै ॥ जलयंत्र विराजत भाँति भली है। घर ते अलधार अफारा चली है । यमुना जल सूक्षम वेप सँवारंट जनु चाहत है रविलोक विहारेउ ॥२३॥ [चंचरी छंद] ति भाँनि कहाँ कहाँ लगि याटिका बहुधा मली। ब्रह्मयोप धने तहाँ जनु है गिरावन की पली । नीलकंट न बने जनु जानिये गिरिजा यनी। रोमिजै बहुभा सुगन्ध मनों मलैयन की धनी ॥२३॥ ए-म निकेतन मौरा। २-पनी पत्नी (२१६ ) [चौपाई] करुणामय बटु कामनि फली । जनु कमला की वासस्थली। शोभे रम्भा शोभासनी । मनो शची की श्रानंदवनी ॥ २३८ ॥ - [कमल छंद] तरु चन्दन उज्वलता तन धरे। लपटी नव नागलता मन,हरे॥ नृप देखि दिगम्बर वन्दन करे। चित चन्द्रकलाधर रूपनि भरे ।। २३६ ।। अति उज्ज्वलता सब कालदु बसे। शुक केकि पिकादिक कंह लसै रजनीदिन श्रानंदकंदनि रहै। मुखचन्दन की जनु चंदनि अहै।।२४०॥ [तोटक छंद] सब जीवन को बहु सुक्ख जहां । विरही जनहीं कहँ दुःख तहाँ॥ जहँ भागम पौनहिं को सुनिये। नित हानि सौंधहि को गुनिये ॥ २४१ ।। [दोहा तप ही को ताड़न जहां, तृप चातक के चित्त । पात फूल फल दलनि को, भ्रम अमरनि के मित्त ॥२ 1 (1२२०.) [तारक छंद] तिनमें यक कृत्रिम पर्वत - राजे। .-मृग पतिन की सब शामहि साजै॥ बहु भाँति सुगंध मलयगिरि मानों। कलधौत स्वरूप मुमेरु बसानों ।। २४३ ।। अति शीतल शंकर को गिरि जैसा। शुम 'श्वेत लसै उदयाचल ऐसो।। द्युतिसागर में मैनाकु मना है। अजलोक' मनां अजलोक' बनो है ॥ २४ ॥ [तोटक छंद] सरिता तिनते 'शुम तीनि चली। सिगरी सरितान की शोम दली। इक चंदन के जल उज्ज्वल है। जग जहुसुता “शुमशील गहै ॥ २४ ॥ [चौपाई] सुरगज कोमारग छयिछायो । जनु दिविवे भूतल पर आयो। जनुधरबी में लसति विशाल त्रुटित जुही को धन यनमाल: [दोहा] तन्यो न मावै एक पल, केशव मुखद समीप । जासों सोहत तिनक सो, दोन्हें जंबूद्वीप ।। २४७ ।। १-अवलोकअरेया।-प्रलोकबखोक।

- ( २२१. :) [दोधक छंद] एणन के मदकै : जनु दूजी। है यमुनाद्युति के जनु : पूंजी ।। धार मनो- रसराज - विशाला-1. . . पंकजजालमई 'जनुः माला ॥२८॥ [दोहा दुखखंडन तरवारि सी, किधी शृंखला 'चारु । क्रीड़ागिरि मातंग की, यहै कहै संसारू ॥ २४ ॥ क्रोडागिरि ते अलिन की, अवली चली प्रकाश ॥ किधी प्रतापानलन की, पदवी केशवदास ॥ २५०॥ । [ दोधक छंद] और नदी जल कुंकुम सोहै । शुद्ध गिरा मन मानहुँ मोहै । कंचन के उपचीतहि साजै। ब्राह्मण सोयह खंड विराजै ॥२५॥ स्वागता छंद] लौंगफूलमय सेवटि लेखी। एलबीजबहु बालक देखी। केरफूलदल नावन माहीं । श्रीसुगन्ध तहँ है बहुधाहीं ॥२५२॥ [ दोहा ] खेवत मत्त मलाह अलि, को वरण वह ज्योति ॥ तीन्यो सरिता मिलित जहँ, तहाँ त्रिवेणी होति ॥२५३॥ १-कोड़ागिरि-बनावटी पर्वत । २-पदवा मार्ग।३-सेवटि सेडटा, नदी की मिट्टी का कीचड़।

( २२२ ) तड़ाग वर्णन [ दोहा] सीता श्रीरघुनाथजू , देखी थमित शरीर। द्रुम अवलोफन छोड़ि के, गये जलाशय तीर ॥२५॥ [ चौपाई] आई कमलवासु सुखदैन । मुखवासन आगे ह लेन । देख्यो जाइ जलाशय चारु। शीतल सुखद सुगन्ध अपार ॥२१५ [मरहट्टा छंद] बनश्री को दर्पण चन्द्रातप' जनु किधी शरद आवास । मुनिजन गण मन सों विरही जन सों विशवलयानि विलास ।। प्रतिविम्वित थिरचर जीव मनोहर मनु हरिउदर अनन्त । यन्धनयुत सोहै त्रिभुवन माहै मानों थलि यशवन्त ॥ २५६॥ -[चौपाई विषमय पे सब सुख को धाम । शम्वररूप यढ़ावै काम ॥ कमलन मध्य भ्रमर सुखदेत । सन्तहृदय जनु हरिहि समेत २५७, बीवयोचसोहैं जलजात । तिनते अलिकुल उडिउड़ि जात ॥ सन्तहियन से मानदुभाजि । चञ्चल चली अशुभ की राजि २५० सीता त्याग [सुंदरी छंद] एक समय रधुनाथ महामति । सीतहिं देख सगर्भ बढ़ी रति ॥ १-चंद्रातप-पादनी। ...

( २२३-) सुन्दरि माँगु जो जीमहँ भावत। मो मन तो निरखे सुख पाषत । २५६ ॥ सीता-जो तुम होत प्रसन्न महामति। मेरे बढ़े तुमहीं सों सदा रति ।। अंतर की सब वात निरंतर। जानत हो सच की सवते पर ।। २६०॥ [दोहा]] राम-निर्गण ते मैं सगुण भो, सुनु सुंदरि तव हेत। और कछू मांगो सुमुखि, रुचै जो तुम्हरे चेत ॥ २६१ ॥ [सुंदरी छंद] सीता-जो सवते हित मोकहँ कीजत । ईश दया करिकै बरु दीजत॥ है जितने ऋषि देवनदी तट। है तिनको पहिराय फिरौं पट ॥ २६२ ।। [दोहा] राम--प्रथम दोहदे क्यो करौं, निष्फल मुनि यह वात । पट पहिरावन ऋषिन को, जैयो सुन्दरि प्रात ।। २६३ ।। [सुंदरी छंद] भोजन के तब श्रीरघुनंदन। पाढ़ि रहे बहु दुष्पनिकंदन। १-चेत-चित्त। २-दोहद-गर्भ (गवती)।

( २२४..) बाजायजे 'अघरात भई जय। दूतन श्राइ' प्रणामा फरी तय ॥ २६४ ॥ [चंचला छंद] भूत' भावना कही कहीन जाय वैन । कोटिधा विचारियो"पर फछू विचार मैं न ॥ सूर के उदोत होत पंधु श्राइयो सुजान। रामचंद्र देखियो प्रभात चंद्र के समान ॥ २६५ ॥ [संयुता छंद] बहुभाँति चंदनता-करी। हंसि पोलियो न दयाधरी । हमते कळू द्विजदीप है। जेहिते कि प्रभु रोपहै ॥ २६६ ॥ [दोहा] मनसा धाचा कमणा, हम सेवक सुनु तात । कौन दोप नहिं बोलियतु, ज्यों कहि श्राय यात ॥ २६७ ॥ [संयुता छंद] राम-फहिये कहा न कही परै । कहिये तो ज्या बहुतै टर। तब दूत पात सबै कही। बहुमाँतिदेह दशा दही ।। २६८ ॥ [दोहा] भरत-सदा शुद्ध प्रति जानकी, निन्दत त्यां खलजाल । जैसे श्रुतिहि सुभाव ही, पाखण्डी सब काल ॥ २६ ॥ भव अपवादनि तेतज्यो, त्यों चाहत सीताहि । ज्यों जगके संयोग ते, योगीर्जन समताहि ॥ २७ ।। १-मूत भावनाको मोव विचार ( २२५ ) [भूलना छंद] मनमानि के अति शुद्धःसोहि श्रानियो निज धाम । अवलोकि पाचक अंक ज्यों रविशंक पंकजदाम ॥ क्यहि भाँति ताहि निकारिही अपवाद वादि वखानि । शिव ब्रह्म धर्म समेत श्रोपितु साखियोल्योहु पानि ॥२७१ ॥ यमनादि के अपवाद क्यों द्विज छोड़िहें कपिलाहि । विरहीन को दुख देत क्यों हर डारि चंद्रकलाहि ।। यह है असत्य जो होइगो अपवाद सत्य सुनाथ । प्रभु छोडि शुद्ध सुधा न पीवहु आपने विप हाथ ॥ २७२ ॥ [ दोहा] प्रिय पावनि प्रियवादिनी, पतित्रता अति-शुद्ध । जग को गुरु अरु गुर्विशी' छाँडत वेदविरुद्ध ॥ २७३ ।। वे माता वैसे पिता, तुमसों :भैया.पार । भरत भये अपवाद को, भाजन भूतल श्राइ-॥ २४ ॥ [हरिलीला छंद] राम-सांची कही भरत यात सयै सुजान । सोता सदा परम शुद्ध कृपानिधान । मेरी कछ. अपहिं इच्छ यहै सो हेरि। मोको हतौ चाहुरि यात काही जो फेरि ॥ २७५ ॥ .. -~-गुणिो-गर्भवती। -- ( २२६ ) -[दोधक इंद] सदमप-दूपट सैन सदा शुम गंगा। छोइङगे वह तुंग तरंगा। मायहि निन्दत है सद योगी। क्यों तजिहें मर भूपति मोगो ॥ २६॥ ग्यारसि निन्दत है मठधारी। मावति है. हरिभक्तनि मारी। निन्दत है तव नामनि वामा । का कहिये नुम अन्तामो : २७॥ [दोहा] तुलसी को मामत प्रिया, गीतमतिय प्रति अम। सौता को छोड़न कही, कैसे के सर्वश ॥ २०॥ [रूपमाला दंद] शत्रुधर-स्वर नहिं छोड़िये तिय गुन्दिती पल दो। छोड़ियो तव गुद सीतहि गर्ममोचन होड पुत्र होह कि पुत्रिका यह बात जानि न जाद। सोक लाकन में अलोक न लीजिये रघुराइ ॥२॥ [दोहा] रामचन्द्र जगचन्द तुम, फल दल फूल समेत ।। सीता या वन पगिनी, न्यार नहीं दुख देत ॥ २०॥ १-मारसिम्पादरी । २-बापोवाममार्गो।

बहुधा सव। ( २२७ ) घर घर प्रति सव जग सुखी, राम तुम्हारे राज ॥ अपनेहि घर कत करत हो,शोक अशोफसमाज ॥२१॥ [ तोटक छंद] राम-तुम बालक हो प्रतिउत्तर देहु न फेरि हमें ॥ जो कहें हम वात सो जाइ करी मन मध्य न और विचार धरौ ॥ २२॥ [ दोहा] और होइ ताजानिज, प्रभु सों कहा बसाइ । शत्रुहा, भरत उठे अकुलाइ ॥ २८३ [ दोधक छंद] राम-सीतहि लै अव सत्वर जये। राखि महावन में पुनि ऐये। लक्ष्मण जो फिरि उत्तर देही । शासन भंग को पातक पैही ॥२३॥ लदमय ले वन सीतहिं धाये। स्थावर जंगम ह दुख पाये ॥ गंगहि देखि कहो यह सीता। श्रीरघुनायक को जनु गीता ॥२८४ ॥ यह विचारिकै १-जानिन समझ लेते, लड़कर होश ठिकाने कर देते । २-सत्वर- शीत्र।

( २२ ) पार भये - अबही जन दोऊ । ; भीम यनी अन अन्तु न कोऊ । निर्जल निर्जन कानन देख्यो । भूत पिशाचन को घर लेख्या ॥ २५ ॥ [नगस्वरूपिणी छंद] सोता-पुनों न शानकारिका ।शुको पर्दैन सारिका । न होमधूम देखिये । सुगन्ध यन्धु लेखिये ॥२६॥ सुनो न वेद की गिरा। न धुद्धि होति है थिरा। पीन को कुटी कहाँ। पतिता यस जहाँ २८GR मिलै न कोउ एकहूं । न अायते न जातहूं । चले हमें कहाँ लिये । डेपति हैं महा हिये ॥२८ [दोहा] मुनि सुनि लक्ष्मण मीत अति, सीताजू के बैन । उत्तर मुख प्रायो नहीं, जल मंरिश्राये नैन : २४ [नाराच छंद] विलोकि लक्ष्मणै भई विदेहजा विदेह सी। गिरी अचेत है मनो यनै यनै विडीत सी ।। करी जो छाँह एक हाथ एक यात' वास मां। सिंच्या शरीर धीर नैननीर ही प्रकाश सौ २१०॥ . १-पात-इवा-बास-पष।

सीता-हीं मुता ( २२६ ) [रूपमाला छंद] राम की जपसिद्धि सी सिय को चले घन छांड़ि। बांह एक फनी करों फन दीह मालनि मांडि॥ बालमीकि विलोकियो वन देवता जनु जानि । कल्पवृक्षलता किधौं दिवि ते गिरी भुव श्रानि ॥ २६॥ सोचि मंत्र सजीव जीवन जी उठी तेहि काल। पंछियो मुनि कौन की दुहिता बहू अरु बाल ॥ मिथिलेश की दशरथपुत्रकलन । कौन दोष तजी न जानति कौन आपुन अत्र ॥२६२॥ मुनि-पुत्रिके सुनि मोहिं जानहि बालमोकि द्विजाति। सर्वथा मिथिलेश को गुरु सर्वदा शुभ भाँति ॥ होहिंगे सुत द्वै सुधी पगुधारिये मम ओक। रामचन्द्र क्षितीश के सुत जानिहै सुत जानिहै तिहुँलोक ॥ २६३॥ सर्वथा गुणि शुद्ध सीतहिं लैगये मुनिराइ । श्रापनी तपसान की शुभ सिद्धि सी सुख पाइ॥ एक श्रीकुश दूसरो लव जानि। जातकर्महि श्रादि दे किय वेद भेद चखानि ॥२६॥ [दोहा] वेद पढ़ायो प्रथमही, धनुर्वेद सविशेष । अस्त्र शस्त्र दीन्हे घने, दीन्दे मंत्र अशेष ॥ २५ ॥ . पुत्र है भये । ( २३० ) कुत्ते की नालिय [दोधक छंद] समय हरि धर्मसभा में। बैठे दुते नरदेव प्रमा में। संग सबै ऋषिराज विराज सादर मंघिन मित्रन साजै ॥ २६६ ।। कुफर एफ फिरादिहि आयो। दुंदुभी धर्मदुवार बजायो । याजतही उठि लक्ष्मण धाये। श्वानहि कारण वूमन आये ॥ २६ ॥ फूकुरु-काटुके क्रोध विरोध न देख्यो। राम को राज तपोमय लेख्यो।' सामहँ मैं दुख, दीरय पाया। रामहिं हाँसो निवेदन आयो ।।२।। सदमण-धर्मसमा महँ रामहिं जाना। श्चान चलो निज पीर यखानो।। श्वान-ही अब राजसमा नहिं पाऊं। आऊं तो फेशष शोम न पाऊं ॥२६॥ [दोहा] देष अदेव नृदेय घर, पावन थल सुन दाइ । बिन योले आनंदमति, कुत्सित जीयन जार ॥ ३०० 1-फिरादिहि-पर्याद, नालिय।

(. २३१ ) [ दोधक छंद] राजसमा महँ श्वान चोलायो। रामहिं देखतही शिस्नायो। राम कयो जो कछु दुख तेरे । श्वान निशंक कहो पुर' मेरी।३०१ [ तारक छंद] श्वान-तुम है। सर्वज्ञ सदा सुखदाई । अरु हो सबको समरूप सदाई ।। जग सोवत है जगतीपति जागे। अपने अपने सब मारग लागे ॥ ३०२ ।। नरदेवन पाप पर परजा को। निशि वासर होइन रक्षक ताको। गुण दोपन को जव होइन दी । तवहीं नृप होइ निरयपद पर्शी ।। ३०३॥ [दोहा निज स्वारथही सिद्धि द्विज, मोकों कयो प्रहार ॥ विन अपराध अगाधमति, ताको कहा विचार ॥३०४॥ [तारक छंद] लेन तहीं जन धाये। तवहीं नगरी महँ ते गहि ल्याये ॥ राम-यह कूकर क्यों बिन दोपहि माखो। अपने जिय त्रास कळू न विचायो॥३०५ ।। . - तव ताकहूँ १-पुर-सामने।

( २३२ ) [दोहा] मम यह सोवत है। पंथ में, ही मोजन को जात ॥ 'मैं अकुलाइ अगाधमति, याको कीन्हा घात ॥ ३०६ ।। [स्वागता छंद] राम-ब्रह्म ब्रह्म ऋषिराज बसानो। धर्म' कर्म बहुधा तुम जानो। कौन' दंड द्विज को दिज दीजै। चित्तचेति कहिये सोइ कीजै ॥३०॥ कश्यप- है अदएब्य मुवदेव सदाई । यत्र तत्र मुनिय रघुराई ईश शोख अत्र याकह दीजै। चूकहीन परिकोउ न कीजे ॥३०० [तोमर छंद] सम-सुमि श्वान कहि तू दंड। हम देहिं याहि अखंड। कहि यात तू डर डारि । जिय मध्य प्रापु बिचारि ॥३०६ [दाहा] श्वान-मेरो मायो करहु जी, रामचन्द्र हितमंडि । को द्विज यहि मउपती, और दंड सब छडि ।। ३१०॥ [निशिपालिका छंद] पोत पहिरोइ पट यांधि शिर सौ पटो।' वोरि अनुराग अरु जोरि बहुधा गटी' । १-गौसमूह।

( २३३ ) पूजि परि पायँ महु ताहि तपहीं दयौ । मत्त गजराज चढ़ि विप्र मठ को गयो ॥ ३११ ।। [ दोहा] भयो रंक ते राज द्विज, श्वान कीन करतार । भोगन लाग्यो भोगवै, दुंदुभि वाजत द्वार ।। ३१२ ॥ [ सुंदरी छंद] वूझत लोग सभा महँ श्वानहिं। जानत नाहिन या परिमानहिं ।। विहि तें जो दई पदवी वह ! है यह निग्रह कैधौं अनुग्रह ॥ ३१३ ॥ -- श्वान कथित मठपति निंदा श्वान-- [दोधक छंद] एक कनोज हुतो मठधारी । देव चतुर्भुज को अधिकारी। मन्दिर कोउ बड़ो जव श्रावै । अंग भली रचनानि वनावै ३१४॥ जादिन केशव कोउ न आवै। तादिन पलिका ते न उठावै ॥ भेटनि लै बहुधा धन कीनो । नित्य करै बहुभोग नवोनो ॥३१५ एक दिना यक पाहुन पायो। भोजन सो वहुभांति बनायो। ताहि परोसनको पितु मेरो। योलि लिया हित हो सब केरो३१६॥ साहि तहां बहु भांति परोसो। कह कहूं नख माहँ रहो खो॥ ताहि परोसि जहीं धर अयो। रोवत है। हँसि कण्ठ लगायो३१७ ( २३४ । [चामर छंद ]. मोहिं मानु दा दूधभात भोज को दियो। यात सॉसिराइ तात छीर अंगुली छियो । ध्यो यो मप्योंगयों अनेक नकवान में। हाँसम्यो अनेक योनि श्रीध शानि श्वान भो ॥३१॥ [दोहा] याको थोरी दाप में, दीन्हों दण्ड अगाध ॥ राम चराचर ईश तुम, क्षमियो यह अपराध ॥ ३१६ ॥ लोफ करेउ अपवित्र यहि, लोक नरक को यास॥ छुवै जो कोऊ मठपतिहि, ताको पुण्य विनाश ॥ ३२० ॥ औरी एक कथा कही, विकल भूपं की राम ॥ यही अयोध्या वसत है, वंशकार के धाम ॥ ३२ ॥ [वसंततिलका छंद] राजा हुतो प्रज्ञ दुष्ट अनेकहारी । धाराणसी विमल क्षेत्र निवासकारी ॥ सो सत्यकेतु यह नाम प्रसिद्ध शरी। विद्याविनोदरत धर्मविधान पूरी ॥ ३२२ ॥ धर्माधिकार पै एक द्विजाति कीन्हा। संकल्पदव्य पटुथा त्यहि चोरि लोन्हों। १-शकारम्पमार,प्रेम

( २३५ )
बंदी विनोद गणिकादि विलासकर्ता ।
पावें दशांश द्विज दान अोष हर्ता ॥ ३२३ ॥
राजा विदेश वह साजि चमू गये हो।
जूझेउ तहाँ समर योधन सो भयो हो।
श्राये
कराल किलदूत कलेशकारी ।
लोन्हे गये नृपति को जहँ दण्डधारी ॥ ३२४ ॥
[भुजंगप्रयात छंद]
धर्मराज-कहा भोगवै गो महाराज दू में ।
कि पापै कि पुण्य करेउं भूरि भू मैं ॥
राजा-सुनौ देव मोको कळू सुद्धि नाहीं ।
कही पापही पाप जो मोहिं माहीं ॥ ३२५ ॥
धर्मराज-कियो तै द्विजाती जो धर्माधिकारी।
सुतो नित्य सङ्कएपवित्तापहारी ॥
दियो दुष्ट रण्डानि मुण्डानि लै लै।
महापाप माथे तिहारे सोदै दे॥ ३२६॥
हुतो नै सबै देश ही को नियन्ता ।
भले की बुरे की करी तें न चिन्ता ।।
महा सूक्ष्म है धर्म की बात देखो।
जितो दान दीन्हा तितो पाप लेखो ॥ ३२७ ।।
[ दोहा]
कालसर्प से समुझिये, सवै राज के कर्म ।।
ताह ते अति कठिन है, नपति दान के धर्म ॥ ३२८ ॥

[भुजंगप्रयात छंद] भयो फोटिया नर्क संपर्क ताको। हुते दोष संसर्ग के शुद्ध जाको ॥ सबै पाप मे क्षीण मो मुक लेखो। रहो श्रीध में प्रानि के कोलयेखो ॥ ३२६॥ लवणासुरवध [भुजंगप्रयात छंद] विदा ६ चले रामपं शत्रुहंता । चले साथ हायो रयो युद्धरंता ।। चतुर्दा चम् चारितु और गाजें। यजे दुन्दुमी दोह दिन्देव लाजै ॥ ३३० ॥ [ दोहा केशव वासर बारहें, प्युपति केशव बोर । लवणासुर के यमनि ज्यों, मेते यमुना तीर ॥ ३३१ ॥ [मनोरमा छंद लवणामुर प्राइगयो यमुनानद । अवलोकि हँस्यो रघुनन्दन के भट। धनुवाण लिये निकसे रघुनन्दन । मद के गज को सुन केहरि को जनु : ३३२ ।। [भुजंगप्रयात छंद] लवणासुर-सुन्यो तें नहीं जो इहाँ भूलि पाया। यड़ा भाग मेरो पड़ी भज्ञ पायो ।

। + ( २३७ ) शानुन-' महाराज श्रीराम है बुद्ध तोस । तजै देश को कै सजे युद्ध मोसों ॥ ३३३॥ लवणासुर-चहै राम राजा दशग्रीवहंता । सो तो बन्धु मेरो सुरस्त्रीन रंता ।। हतो तोहि वाको करौं चित्त भायो। महादेव की सों बड़ो भक्ष पायो । ३३४ भये क्रुद्ध दोऊ दुवो युद्धरंता । दुवो अस्त्र शस्त्र प्रयोगी निहंता॥ वली विक्रमी धीर शोभा प्रकाशी। नश्यो हर्ष दोऊ सवर्षे विनाशी ।। ३३५ ॥ [दोहा] शत्रुघ्न-लवणासुर शिवशल विन, श्रीर न लागे मोहि । शूल लिये विन भूलिहूं, हाँ न मारिहा तोहिं ।। ३३६ ॥ [मोटनक छंद] लीन्हा लघणासुर शूल अहीं । मारेउ रघुनन्दन बार तहीं। काट्यो शिर शूल समेत गयो । शूली कर सुःख त्रिलोक भयो ३३७ बाजे दिवि दुन्दुभि दोह तवै । आये सुर इंद्र समेत सबै देव- कान्हा बहु विक्रम या रण में । माँगी वरदान रुचै मन में ॥३३॥ [प्रमाणिका छंद] शत्रुघ्न-सनाळ्यवृत्ति जो हरै। सदा समूल सो जरै। अकालमृत्यु सौ मरे। अनेक नर्क मा परै॥ ३३४ ॥ -- --

( २३८)
सनाय जाति सर्वदा। यया पुनीत नर्मदा।
भई सर्जे संपदा । विरुद्ध तं असंपदा ।। ३४० ॥
[दोहा
मयुरामंडल मधुपुणे, केशव स्यवश वसाह 11
देखें तब शत्रुम, रामचंद्र के पार ॥ ३४॥
रामाश्वमेघ
विश्वामित्र वसिष्ठ सां, एक समय रधुनाथ ॥
धारमा केराव करन, अश्वमेघ को गाय ॥ ३४२।
[चामर छंद
राम-मैथिली समेति तो अनेक दान में दिया ।
राजस्य प्रादि दे अनेक जन में किया।
सीय त्याग पाप ते हिये सो ही महा डरी।
और एक अश्वमेय ज्ञानको यिना करौं ॥ ३१३॥
[दोहा]
कश्यप-धर्म कर्म कधु कीजई, सफल तरुणि के साथ ।
ता यिन जो कछु कीजई, निफल साई नाथ ॥ ३४॥
[ोटक छंद]
करिये युतभूषण रूपरयो ।
मिथिलेशमुता इक स्वर्वमयी ॥
ऋपिराज सबै ऋषि वालि लिये।
अचि सांसव यत्र विधान किये ॥३४५॥

(२३६ ) हयशालन ते हय छोरि लियो । शशिवर्ण सो केशव शोम रयो॥ श्रुति श्यामल एक विराजतु है ॥ अलि स्यों सरसीरुह लाजतु है ॥२४६ ।। [रूपमाला छंद] पूजि रोचन स्वच्छ अक्षत पट्ट बांधिय माल ॥ भूपि भूपण शत्रुदूपण छोड़ियो तेहि काल ॥ संग लै चतुरंग सैनहि शत्रुहंता साथ । भाँति भाँतिन मान दै पठये सो श्रीरघुनाथ ।। ३४७ ।। जात है जित वाजि केशव जात हैं तित लोग। वोलि विप्रन दान दीजत यत्र तत्र सभोग । वेणु वीण मृदंग बाजत दुंदुभी बहु भेव । भाँति भाँतिन होत मंगल देव से नरदेव ॥ ३४ ॥ सेनावर्णन [कमल छंद] राघव की चतुरंग चमू चय को गनै केशव राज समाजनि ।। खुरतुरंगन के उर: पग तुंग पताकन की पट साजनि ! (टि पर तिनते मुकुता धरणी उपमा वरणी कविराजनि । विदुकिधौमुखफेनन केकिधोराजशिरोश्रवमंगललामनि ॥३४६५ -रामव की चतुरंग बम् अपि भूरि उडी अतह पल लाई । मानौ प्रताप हुताशन धूम सेो केशवदास प्रकाशन माई ॥

.
की।
शत्रुन को जिविकाऽति
( २४० )
मेटिक पंच प्रभूत किधी विधि रेणुमयो नय रीति
दुःख निवेदन को भवमारको भूमि किधी भुर
[दंडक छंद]
नाद पूरि धूरि पूरि तुरि बन चूरि गिरि ,
शापि शोषि जल भूरि भूरि थल गाय की।
केशोदास श्रासपास ठौर टौर राखि जन ,
तिनकी संपति सय श्रापनेही हाथ
उन्नत नवाइ नत उन्नत
बनाइ भूप,
मित्रन के हाथ की।
मुद्रित समुद्र सात मुद्रा निज मुद्रित के,
आई दिश दिशि जाति सेना रघुनाथ को ॥ ३५१
[दोहा]
दिशि विदिशनि अयगाहि के, मुख ही केशवदास ।
यालमीकि के आश्रमहि, गयो तुरंग प्रकाश ॥ ३५२ ।
[दोधकछंद]
दूरहि ते मुनि वातक धाये ।
पूजित वाजि -विलोकन प्राये।
माल को पट्ट ब्रहीं तय बाँच्यो।
दाँघि तुरंगम जयरस राँच्यो । ३५॥
'[लोक]
एकवीरा चौपाया तस्याः पुत्री रपटहः ।
तेन रामेष मुखोसौ बाजी गृहात्विमं वली ॥२४॥

. (. २४१ ) [दोधक छंद] घोर चम् चहुँ ओर ते गाजी। कौनेहि रे यह बाँधिय पाजी।' वोलि उठे लव में यह धाँध्यो। यो कहिकै धनुसायक' साँध्यो। मारि भगाइ दिये सिगरे यों। । मन्मथ के शर ज्ञान घने ज्यों ।। ३५५॥ लव शत्रन युद्ध [धीर छंद] : योधा भगे धीर' शत्रुघ्न पाये। कोदंड लोन्हे महा रोप छाये ॥ ठाढ़ो तहाँ एक पालै विलोक्यो। रोक्यो तही जोर नाराच मोक्यो ॥ ३५६ ॥ [सुंदरी छंद] शत्रुभ-चालक छाँडि दे छाँडि तुरंगम। तोसों कहा करौं संगर संगम ॥ ऊपर वीर हिये करुणा रस । चीरहि विप्र हते न कहूँ यश ।। ३५७ ।। [तारक छंद] लव-कछु वात बड़ी न फही थोरै १-मोक्यों (माथ्यो) छोड़ा।

(२४२ ) लष सो न जुरी लपणासुर भोरे। द्विजदोपन ही बल ताको संहायो। मरिही जोरदा सो कदा तुम, माखो ॥ ३५ ॥ ', [चामरछंद] रामयंधु पाए तीनि छोड़ियो त्रिशूल से। माल में विशाल ताहि लागियो ते फल से। लप-यात कीन राजतात गात ते कि पूजियो। कौन शत्रु ते हत्यौ जो नाम शत्रुहालियो । ३५४ [निशिपालिका छंद] रोप करि याण यह मांति सब छंडियो। एक ध्वज भूत युग तोनि रथ खंडियो। शस्त्र दशरत्य सुत अन्न कर जो घरे। ताहि सियपुत्र तिल तूल सम खंडर ॥ ३६० ।। [तारक द] रिपुहा सय वाण घहै कर लीन्हो । लवणासुर को रघुनंदन दीन्हो । लय के उर में उरझयो यह पत्री । मुरझार गियो धरणी । महँ सत्री ॥ ३६१ ॥ [मोटनक छंद] मोहे लव भूमि परे अपहीं। जय दुंदुभि वाशि उठे तबही। १-पत्री-पाए। .

( २४३ )
भुव ते रथ ऊपर पानि धरे।
शत्रुघ्न सों यों करुणानि भरे ॥ ३६२ ।।
घोड़ों तवहीं तिन छोरि लयो ।
शत्रुघ्नहि आनंद चित्त भयो ।
लैके लव को ते चले जवहीं।
सीता पहँ बाल गये तवहीं ॥ ३६३ ।।
बालक-
[झूलना छंद ]
सुनु मैथिली नृप एक को लव बाँधियो पर बालि।
चतुरंग, सैन भगाइकै तब जीतियो वह आजि ।
उर लागि गो शर एक को भुव में गिनो मुरझाइ ।
वह वाजि लै लव लै चल्यो नृप दुंदुभीन बजाइ ॥ ३६४ ॥
[दोहा]
सीता गीता पुत्र की, सुनि सुनि भई अचेत ।
मनों चित्र की पुत्रिका, मन क्रम वचन समेत ३६५ ।।
[झूलनाछंद]
सीता-रिपु हाथ श्रीरघुनाथ को सुत क्यों पर करतार ।
पति देवता सब काल तो लव जी उठे यहि बार।
ऋषि है नहीं, कुश है नहीं लव लेइ कौन छड़ाइ ।
यन माँझ टेर सुनी जहीं कुश पाइयो अकुलाइ ॥ ३६६ ।।
[दोहा।
कुश-रिपुहि मारि संहारि दल, यम ते लेउँ छुड़ाई ।
लयहि मिलेहाँ देखिहा, माता तेरे पार ॥ ३६७ ॥

[सवैया].
गाहियो सिंधु सरोवर सो जेहि पालि यली घर सोर
राहि दिये शिर रावण के गिरि से गुरु जात न जातन
शल समूल उखारि लिया लवणासुर पीछे ते पार से
राधव को दल मतकरी सुर अंकुश दे
[दोहा]
कुश की टेर मुनी जहीं, फूलि फिरे शाम ।
दीपविला कि पतंगज्यों, यदपिमया पधु विन ३
[मनोरमा छंद]
रघुनन्दन को अबलोकतहीं कुश।
उरमाम हया शर शुद्ध निरंकुश ।
ते गिरे रथ ऊपर लागतही शर।
गिरि ऊपर ज्यों गजराज कलेवर son
[मुंदरी छंद]
जूमि गिरे जवहीं अरिहा रन ।
माजि गये तयही भट के गन ।
फादि लिया जयहीं लय को शर।
कंठ लग्या तयही उटि सादर ।। ३ ।।
[दोहा]
मिले जो कुश लव कुशल सां, वाजि बाँघि तरमूल ।
रपमहि ठाढ़े शामिर्ज, पशुपति गएपति तूल ।। ३७२ ।।
१-बार -बाचल से। -मुम्बजकार,रेर ।

( २४५ ) . [रूपमाला छंदा यज्ञमंडल में हुते रघुनाथ जू तेहि काल । चर्म अंग कुरंग को शुभ स्वर्ण की सँग वाल ॥ आस पास अपीश शोभित शूर सोदर साथ। आइ भग्गुल . लोग धरणे युद्ध की सब गाथ ॥ ३७३ ॥ [स्वागता छंद] भग्गुल वालमोकि थल वाजि गयो जू। विप्र बालकन धेरि लयो जू॥ एक वांचि पट घोटक बाँध्यो। दौरि दोह धनुसायक साँध्यो ।। ३७४ ।। भौति भाँति सच सैन सँहायो। आपु हाथ जनु ईश सँवारखो। अस्त्र शस्त्र तव बंधु जो धारयो। खंड खंड करि ताकहं डाखो॥ रोप वेप वह वाण लयो जू । इन्द्रजीत लगि श्रापु दयो जू ।। काल रूप उर माँह हयो जू। धीर मूर्छि तव भूमि भयो जू ॥ ३७५ ॥ [ तोमर छंद] वह वीर लै अरु बाजि । जवहीं चल्यो दल साजि ॥ तब और बालक आनि । मग रोकियो तजि कानि ॥३७६ ॥ १-मरगुल भगेत ।

तेहि मारियो तुप पंधु । तय है गयो सब अंधु ॥
वह वाजि लै अरवीरशरण में रहो रपि धीर ॥ ३७७
[दोहा ]
बुधि थल विक्रम रूप गुण, शील तुम्हारे राम ॥
काफपक्षधर पाल मै, जीते सब संग्राम ॥३७॥
चतुप्पदी छंद)
गुणगण प्रतिपालक रिपुकुलधालक यालक ते रनरंता।
दशरथ नृप को सुत मेरो सोदर लवणासुर को हंता ।।
कोऊ द्वै मुनिसुत काकपक्षयुत सुमियत हैं जिन मारे।
यहि जगतजाल के करम काल के कुटिल भयानक भारे॥३४
[ मरहट्टा छंद ]
लक्ष्मण शुभलक्षण धुद्धि विचक्षण लेहु बाजि को शोधु ।
मुनि शिशु जनि मारेहु पंधु उधारे? फ्रोध न करेहु प्रयोधु ।
बहु सहित दक्षिणा दै प्रदक्षिणा चल्यो परम रणधीर ।
देख्यो मुनियालक सोदर उपज्यो करुणा अद्भुत धीर ॥३०
[दोधक छंद]
लक्ष्मण को दल दीरघ देख्यो ।
कालहु ते अति भीम विशेख्यो ।
कुश-दो मैं कही सो कहा लव कीजै ।
आयुध लेहो कि. घोटक दीजै ॥ ३१ ॥

। ( २४७ ) लक्ष्मणं सह लवकुश युद्ध लव-बूझत हो तो यहै प्रभु फीज मो असु दें वरु अश्व न दीजै ।। लक्ष्मण को दल सिंधु निहारो। 'ताकहँ धारण अंगस्त्य तिहारों ॥ ३२॥ कौन यहै घटिहैं अंरि धेरें । नाहिंन हाथ शरासन मेरे मेरे ॥ नेकु जही दुचितो चित कीन्हों। सूर बड़ो इषुधी धनुः दीन्हीं।। ३८३ ।। धनु वाण बली तब. धायो। पल्लव ज्यों दल मारि उड़ायो॥ यों दोउ सोदर सैन सँहारें। ज्यों बन पावफ पौन विहारें ॥३४॥ भागत हैं भट यों लव आगे। राम के नाम तेज्यों श्रघ भार्ग। यूथपं यूथ यों मारि भगायों। बात बड़े जनु मेघ उड़ायो॥ ३५ ॥ [सवैया] अति रोप रसे कुश केशव श्रीरघुनायक सो रणरीति एधैं । त्यहिं बार न वार भई बहु पारन खग हनै न गनै पिर। -- १-असुम्माण । २-पुधी तरकश। ३-विरच झुद्ध होते है 1 . राह कुम्म फट गजमोदी कट ते चले या भोषित ऐचि परिपूरण पूर' पनारेन ते जनु पीक कपूरन को किरा ।। .[नाराच छंद] भगे चपे चम् चम्प छोड़ि छोड़ि लक्ष्मण । भगे रवी महारथी गयंद वृन्द को गणे॥ कुशे लवै निरंकुशै विलोकि पंधु राम को। उठ्योरिसाई कैघली यंध्यो सोलाज दाम को nas [मौक्तिकदाम छंद] कुश-न हो मकरात न है। इंद्रजीत । विलोकि तुम्हें रए होईन मौत ॥ सदा तुम लक्ष्मण उत्तमगाय । फरी जनि आपनि मातु अनाय ॥ ३८८ ।। सदमण-कही कुश जो कहि श्रावति यात । विलोकत ही उपयोतहि गात ॥ इते पर बालवयक्रमः जानि । हिये करुणा उपजे अति प्रानि ॥३६॥ पिलोचन लोचत हैं लखि ताहिं। तजी हठ आनि भजी किन मोहिं । २-मानवपत्रमन्धान भवस्था। १-परम्पार। गडुपाते।

(२४६ ) क्षम्यों अपराध अजौं घर जाहु । हिये. उपजाउन मातहि दाहु ।। ३६० ।। [ दोधक छंद] हौं इतिहाँ कबहूं नहिं तोही । तू बरु वाणन वेधहि माहीं। बालक विप्र कहा हनिये जू । लोक अलोकन में गनिये जू ॥३६१।। [हरणी छंद] लक्ष्मण हाथ हथ्यार धरौ। यज्ञ वृथा प्रभु.को न करो ॥ हय को कबहूं न तजौं । पट्ट लिख्यौ सोइ वांचि लजौं । ३६२। [स्वागता छंद] काण एक तय लक्ष्मण छंड्यो । चर्म बर्म बहुधा तिन खंड्यो । ताहि हीन कुश चित्तहि मोहै। धूमभिन्न जनु पावक सोहै ३६३ रोपवेष कुश बाण चलायो । पौनचक्र जिमि चित्तभ्रमायो ।। मोह मोहि रथ ऊपर सोये । ताहि देखि जड़ जंगम रोये॥३६॥ [नाराच छंद] विराम राम जानि के भरत्थ सों कथा कहें । विचारि चित्तमांझ वीर वीर वे कहां रहैं ।। सरोप देखि लक्ष्मणे त्रिलोक तो विलुप्त है। प्रदेव देवता प्रसे कहा ते बाल दीन द्वै ॥ ३६५ ।। [रूपमाला छंद] सम-जाहु सत्वर दूत लक्ष्मण हैं जहां यहि धार । जाइ के. यह वात वर्णहु रक्षियो मुनिवार ॥ १-विराम देर। २-वार-शल । :

. ( २५०) हैं समर्थ सनाथ चै असमर्थ श्रीरं 'अनाथ । देखिये कहँ ल्याइयो मुनिपाल उत्तम गाय ।। ३६६ [सुदरी छंद ] भग्गुल आइ गये तपही यहु । यार' पुकारत भारत रक्षा । वे बहुभांतिन सैन सँहारत । लक्ष्मण तो तिनको नहिं मारत ।। ३६७ ॥ वालक जानि तर्जे करुणा करि । वे अति ढीठ भये दल संहरि ॥ केहुँ न भाजत गाजत हैं रण । वीर अनाथ भये विन लक्ष्मण ॥ ३६८ ॥ जैर जानहु उनको मुनियालक । वे कोउ हैं जगती प्रतिपालक ॥ है कोउ रावण के कि सहायक । लपणासुर के हित लायक ।। ३६६ ॥ भरत-यालक रावण के न सहायक । ना लवणासुर के हित लायक। हैं निज पातक वृक्षन के फल । मोहत हैं रघुवंशिन' के यल ।।४०० ।। जीतहि को रणमांम रिपुमहि । को कर लक्ष्मण के यल · विनाहि ॥ १-वारद्वार। २-जै-जिन, मत -- . ( २५२ ) लक्ष्मण सीय तजी जवते बन । लोक अलोकन पूरि रहे तन ॥४०१ ॥ छोड़ोइ चाहत ते तव ते तन । पाइ निमित्त करेउ मन पाचन ॥ शत्रुघ्न तज्यो तन सोदर लाजनि पूत भये तजि पाप समाजनि ।। ४०२।। [ दोधक छंद ] पातक कौन तजो तुम सीता । पावन होत सुने जग गीता ॥ दोष विहीनहि दोप लगावै । सो प्रभु ये फल काहे न पावै ॥ ४०३ । हमहूं त्यही तीरथ जाइ मरेंगे। सतसंगति दोष अशेप हरेंगे। राक्षस क्ष तिहारे। गर्व चढ़े रघुवंशहि भारे ।। तालगि के यह बात विचारी। हो प्रभु संतत गर्व प्रहारी॥ ४०४ ॥ [चंचरी छंद] क्रोध कै अति भरत अंगद संग संगर को चले। जामवन्त चले विभीषण और वीर भले भले । को गनै चतुरंग सेनहिं रोदसी नृपता भरी । जाइकै अवलोकियो रण में गिरेगिरि सेफरी ॥४०५॥ १-रोदसी भमि और श्रोकाश । २-नूपता-राजाओं के समूह । वानर ( २५२ ) लव भरत युद्ध [रूपमाला इंद] जामवंत विलोकि के रस मीम हनुमंत । श्रोण की सरितापही सुअनंत रूप दुरत ॥ यत्र तत्र ध्वजा पताका दाह देहनि भूप । टूटि टूटि परे मनों बहु यात वृक्ष अनूप ।। ४०६ ॥ पुंज कुंजर गुन्न स्पंदन शोभिजे शुटि शूर ।। ठेलि टेलिचले गिरोशनि पेलिश्रोणित प्र।। माहतुंग तुरंग कच्छप चार चर्म विशाल ।। चक्र से रथचक्र पैरत गृद्ध वृद्ध मराल ॥४०॥ केकरे कर वाहु मीन गदगुंड मुजंग। चीरचीर मुदंश राशियाल जानि मुरंग। दानुकायहुमाँति है मणिमाल जालप्रकारा। पैरि पार भये ते वै मुनिवाल केशवदास || ४८ ॥ [दोहा ] नामवरण लघु वेप लघु, कहत रीमि हनुमन्त ।। दो बड़ो क्किम किया, जीते युद्ध अनंत ॥ ४०६ [तारक इंद] भरत-हनुमंत दुरंत नदी प्रय नाग। रघुनाय सहोदर जी अमिलाप ।

( २५३ ). तव जो तुम सिंधुहि नाँघि गये। श्रव नाँघहु ..काहे न भीत. भयेजू ॥ ४१०॥ [ दोहा ] हनुमान-सीतापद संमुख हुते, गये सिंधु के पार । विमुख भये क्यों जाहुँ तरि, सुनो भरत यहीवार॥४११॥ [तारक छंद धनु वाण लिये मुनिवालक आये। जनु मन्मथ के युगः रूप सुहाये ॥ करिवे कह शूरन के मंद होने। रघुनायक मानहुँ द्वै. वपु. कीने ॥ ४१२ ॥ भरत-मुनिवालक: है। तुम यज्ञ करावा। सु किधौं वर वाजिहिं वांधन धावो । अपराध क्षमी सव आशिष दीजै। वर वाजि तजौ जिय रोष न कीजै ॥ ४१३ ॥ [ दोहा] यांध्यो पट्ट जो शीश यह, क्षत्रिन काज प्रकाश । रोप करेउ चिन काज तुम, हम विप्रन के दास ।। ४१४ ॥ [दोधक छंद] कुश-बालक वृद्ध कहो तुम काको। देहनि को किधों जीवप्रभा को॥ कहै सब कोई। . जीव सो बालक वृद्ध न होई ॥४१५ ॥ " - । जड़. देह ( २५४ ) जीय- जरै न' मरै नहिं छीजै। ताफह: शोक कहा करि कीजै ।। जीवहि विन न क्षत्रिय जानी। केवल ब्रह्म हिये महँ पानी ॥ ४१६ जो तुम देहुं हमैं कछु शिक्षा। तो हम देहिं तुम्हें हय मिक्षा ।। चित्त विचार पर सोह कीजै। दोष का न हमें अय दीजै ॥ ४१७ ।। [स्वागता छंद] विप्र बालकन की सुनि पानी। कुछ सूरसुत भो। अभिमानी ॥ ४२ ॥ सुप्रीष-विप्र पुत्र तुम शीश सँमारो। राखि लेहि अय ताहि पुकारो ॥ ४१६ 11 लच के कटु वचन [गौरी छंद] लव-सुग्रीव कहा तुम से रण मांडी। तो अति कायर जानि के छोड़ी। यालि तुम्हें पहु नाच नचायो। कहा रणमंहन मोसन आयो । ४२०॥ .

( २५५. )
[ तामर छंद]
फलहीन सो ताकहँ बाण चलायो।
अति वात भ्रम्यो बहुधा मुरझायो॥
तर दौरिकै बाण विभीपण लीन्हों।
लव ताहि विलोकतहीं हँसि दीन्हों ।।४२१ ।।
[सुंदरी छंद]
विभीषण तू रणदूषण।
एक तुहीं कुल को किलभूपण ।।
जूझ जुरे जे भले भय जी के।
शत्रुहि श्राइ मिले तुम
नीके।। ४२२॥
[ दोधक इंद]
देववधू जवहीं हरि ल्यायो।
क्यों तवहीं तजि ताहि न पायो ।
यों अपने जिय के डरायो ।
छुद्र
सबै कुलछिद्र बतायो । ४२३ ॥
[दोहा]
जेठो भैया अन्नदा, राजा पिता समान ।
ताकी पत्नी तू करी, पत्नी मातु समान ॥ ४२४ ॥
को जाने के चार तू, कही न है है माइ ।
सोई ते पती करी , सुनु पापिन के राइ ॥ ४२५ ॥

₹ ( २५६ ) [ोटक छंद] सिगर अग मॉम हंसावत है। रघुषंशिन . पाप, नशावत. हैं। धिक तोकहूँ तू ,अजहूं जो जिये। मल जार हलाहल क्यों न पिये । ४२६ ॥ कटु है अब तोकहँ लाज हिये । कहि कौन विचार हथ्यार लिये। अय जाइ करोप की प्रागिरी। गरु थाँधि के सागर हि मरी ॥ ४२७ ॥ [दोहा] कहा कही ही भरत को, जानत है सब कोय । तोसो पापी सग है, क्यों न पराजय होय ॥ ४२ ॥ यहुत युद्ध मो भरत सों, देव प्रदेव समान । मोहि महारय पर गिरे मारे मोहन पान । ४२६, राम-कृय संवाद भरतहि भयो. विलंब कछु, .आये औरघुनाथ ।। देख्यो वह संग्रामयल, जूमि परे सब साय ॥ ४३०॥ [तोटक छंद] रघुनायहि आपत आइ गये । रए में मुनिबालक सपरये । गुण रूप मुशीलन सौरप में प्रतिविंद मनो निज दर्पण में|४३१॥ १-री-जागनी करे, करसी।

.
( २५७ )
[ मधुतिलक छंद]
सीता समान मुखचंद्र विलोकि राम ।
बूझ्यो कहां चसत हो तुम कौन ग्राम ।।
.. माता पिता कवन कौन्यहि कर्म : कीन ।
विद्यांविनोद शिष कौन्यहि अस्त्र दीन ॥ ४३२ ॥
[रूपमाला छंद]
कुश-राजराज तुम्हें कहा ममवंश सों अव काम ।
झि लीन्हेहु ईश लोगन जीतिकै संग्राम ॥
राम-हो न युद्ध करौं कहे विन विप्रवेष विलोकि ।
वेगि वीर कथा कही तुम आपनी रिस रोकि ।। ४३३ ॥
कुश-कन्यका मिथिलेश की हम पुत्र जाये दोइ ।
बालमीक अशेष कर्म करे कृपारस भोइ ।।
अस्त्र शस्त्र सवै दिये अरु वेद मेद पढाइ ।
बाप को नहिं नाम जानत आजुलो रघुराइ ॥ ४३४ ॥
[दोधक छंद]
जानकि के मुख अक्षर आने । राम तहीं अपने सुत जाने ॥
विक्रम साहस शील विचारे । युद्ध कथा कहि श्रायुध डारे ४३५
राम-अंगद जीति इन्हें गहि ल्यायो।
के अपने बल मारि भगायो।
गि वुझावहु चित्त चिता को ।।
पाजु तिलोदक देहु पिता को ॥ ४३६॥

{ २१ ) अंगद तो अंग अंगनि फूले । पान के पुत्र को अति मूते ।। आए जुरे लव सों तहले के। वात कही शतखंडन के कै॥४३७ अंगद लव संग्राम लव-अंगद जो तुम पै पल हो तो। तो यह सूरज को सुन को तो ॥ देखत ही जननी जो तिहारी । या सँग सोवति ज्यों धरनारी ४३८ । जादिन ते युवराज पाहाये ।। विक्रम युदि विवेक बहाये ।। जीयत पे कि मरे पह है । कौन पिताहि तिलोदक वह ॥ ३८ ॥ अंगद हाथ मई तर जोह । जात तही विल सो कटि सोई।। पर्वत पुज जिते उन मेले । फूल के तूल लै याणन मेले ॥१०॥ पाणन वेघि रही सब देवी । पानर तेजो भये अब सही। १-सही-सपाही नामक रन जन्तु स्वकी।

( .२५६ )
भूतल ते शर मारि उड़ायो ।
खेल के कंदुक को फल पायो ॥ ४४१॥
सोहत है अध ऊरध ऐसे ।
होत बटा नत को नम जैसे ॥
जान कहूं न इतै उत पावै ॥
गोवल चित्त दशो दिश धावै ॥४४२ ।।
वोल घट्यो सो भयो सुरभंगी ।
है गयो अंग त्रिशंकु को संगी।
हा रघुनायक हौ जन तेरो ।
रक्षा गर्व गयो
सब
मेरो॥४॥३॥
दीन सुनी जन की जब पानी ।
जी करुणा लव घाएन प्रानी।
छाडि दियो गिरि भूमि पखोई।
विह्वल है श्रति मानों मखोई ॥४४४॥
[विजय छंद]
भैरघ से भट भूरि भिर बल खेत खड़े करतार करे के।
भारे भिरे रणभूधर भूप न टारे टरे इभ कोटि अरे के।
रोष सो खङ्ग हने कुश केशव भूमि गिरेन टरो गरे के।
राम विलोकि कहें रस अद्भुत खाये मरेनग नाग मरे क ४syn
[दोधक छंद]
वानर क्ष जिते निशिचारी । सेन.सबै इक पाण संहारी।
पाण विधे सब ही जब जोये । स्यंदन में रघुनंदन सोये ॥४६॥

( २६० )
[गीतिका छंद]
रण जोह के सय शीशा भूपण संग्रहे जे मले मले।
हनुमंत को पर जामवंतहिं चाजिस्यों ग्रसि ले चले।
रण जीति कै लय साथ ले करि मातु के कुश पो परे।
शिर संधि कंठ लगाय पानम चूमि गोद यौ
सीता शोक
[रुपमाला इंद]
ग्रीन्हि देवर को विभूपण देखि के हनुमंत ॥
पुष ही विधंया करी तुम कर्म कीन दुरंत ।।
बाप को रण मारिया या पितृम्रातृ मैंहारि ।
आनिया हनुमंत बाँधिन श्रानिया मोहिं गारि । ४४०
[ दोहा
माता सब काफी करी, विधवा एकहि यार।
में से और न पापिनी, जाये चराकुठार ॥ ४ER
[दोधक छंद]
पाप कहाँ इति धापहि जैहो । लोक चतुर्दश टौरन पैहा।
राजकुमार कई नहि कोऊ ! जारज जाइ कहाबहु दोऊ reef
कुश-मा , कहूँ दोष कहा सुनु माता ।,
बाँधि लिया जो मुन्यो उन माता।
- ही तुमहीं: तेहि यार पठायो । } . "
यम पिता काय, माहिं सुनायो । ४५ . .
.
.
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, (२६१ ). दोहा] मोहि विलोकि विलोकि कै, रथ पर पौढ़े राम ।। जीवतः छोड़यो युद्ध में, माता कर विश्राम ॥ ४५२ ।। [सुंदरी छंद] श्राइ गये ; तवहीं मुनिनायक । . श्री रघुनंदन के गुणगायक ॥ वात विचारि कही सिगरी कुश। दुःख किया मन में कलिअंकुश । ४५३ । : [रूपवती छंद] कीजै न विडंयन संतति सीते । भावी न मिट सुकहूं जगगीते ॥.. तू, तो पतिदेवन की गुरु बेटी । तेरी जग मृत्यु कहावति चेटी ॥ ४४५॥ [ तोटक छंद] सिगरे रणमंडल मांझ गये । अवलोकतहीं अति भीत भये ॥;. दुहुँ बालन को अति अद्भुत विक्रम... अवलोकि भयो मुनि के.मन संभ्रम ॥ ४५५ ।। सीता राम सम्मेलन दंडक छंद] श्रोणित 'सलिल नर वानर सलिलचर, गिरि वालिसुत विष विभीषण डारे हैं। .:. -" । २६२ ) चमर पताका गुड़ी यड़या अनल सम, रोगरिपु जामयंत केशप विचारे हैं। याजि सुरवाजि सुरगज से अनेक गज, भरत सयंधु इंदु अंमत निहारे हैं। सोहत सहित शेष रामचंद्र कुश लष, जीति के समरसिंधु साँचे सुधारे हैं ॥ ४५६ ॥ [दोहा ] सीता-मनसा वाचा कर्मणा, जो मेरे मन राम । सौ सय सेना जी उडे, हेहि घरी न पिराम । दोधक छंद] सोय उठी सब सेन संभागी। केशय सोवत ते जनु जागी। स्यों सुत सीतहि लै सुखकारी।राघव के मुनि पाँपन पारी १.५८ [मनोरमा द] शुभ संदरि सोदर पुत्र मिले जहूँ । था धर्षे सुर फूलन की तह ॥ पहुधा दियि दुंदुभी के गण पाजत। दिगपाल गयंदन के गण लाजत ॥ ४॥ [रूपमाला धंद] सुंदरी सुत लै सहोदर पाजि ले मुखपार । साथ ले मुनि पालमीकहि दीह दुस्ख नशाद । राम धाम चले भले यश लोकलोक पदाइ । भौति भाँति सुदेश केशव दुंदुभीन बजार ॥४६॥ . .

( २६३ ) भरत लक्ष्मण शत्रुहा पुरभीर टारत जात। चौर दारत हैं दुवौ दिशि पुत्र उत्तमगातः॥ छत्र है कर इन्द्र के शुभ शोभिजे यह भेव ! मत्तदंति चढ़े पर्दै जय शब्द देव नदेव । ४६१ ॥ [दोधक छंद] यहथली रघुनंदन आये । धामनि धामनि होत पधाये। भी मिथिलेशसुताबड़भागी। स्यों सुत सासुन के पगलागी ४६२ [दोहा चारि पुत्र है पुत्र सुत, कौशल्या तब देखि ।। पायो परमानंद मन, दिगपालन सम लखि ।। ४६३ ।। . [रूपमाला छंद] यश पूरण के रमापति दान देत अशेप । हीर नीरज चीर मानिक वर्षि वर्षा वेप। अंगराग तडाग बाग फले भले यह भाँति । भवन भूपण भूमि भाजन भूरि बासर राति ॥ ४६४ ॥ [दोहा] एक अयुत गज वाजि है, तीनि सुरभि शुभवर्ण ॥ एक एफ विहि दई, केशव सहित सुवर्ण ॥४६॥ देव अदेव मृदेव अरु, जितने जीव त्रिलोक ॥ : मन मामो पायो सबन, कीन्हें सवन भशोक ॥ ४६६ ॥ -- . ( २६४ ) राज्य वितरण अपने नर सादरन के, पुत्र विलोकि समान भ्यारे न्यारे देश दै. नृपति कर भगवान ।। कुश लव अपने भरत के, नन्दन पुष्कर तत ॥ लक्ष्मण के अंगद भये, चित्रफेतु रणपत ॥१ [भुजंगप्रयात छंद] भले पुत्र शत्रुम दै दीप जाये । .. सदा साधु पूरे पड़े भाग पाये। सदा मित्रपोपी हनें शत्रु छाती। मुवाहै बड़ी दूसरो शत्रुधाती ।। ४६५ [ दोहा कुश को दई कुशावती, नगरी कोशलदेश ॥ लय को दई अचंतिका, उत्तर उत्तम वेप।। ४७० ॥ पश्चिम पुष्कर को दई, पुप्फरवति तक्षशिला ततहि दई लई जीति संग्राम ॥ घंगद कहं अंगदनगर, दीन्हो पश्चिम और ।। चंद्रकेतु चन्द्रायती, लोन्हों उत्तर जोर ॥२७॥ मथुरा दई सुवाहु को, पूरण पाचनगाथ शत्रुधात को नृप करयो, देशहि को रघुनाथ ॥ ४७२ [तोटक छंद] यहि मौति से रक्षित भमि । सम पुत्र भतीजन' बॉट'ई। . नाम॥

( २६५ ) सब पुत्र महाप्रभु योलि लिये। बहु भाँतिन के उपदेश दिये । ४७३ ॥ सम कथित नीति शिक्षा [चामर छंद] चोलिये न झूठ ईठि' मूढ़ पैन कीजई। दीजिये जो वात हाथ भूलिहू न लीजई ॥ नेहु तोरिये न देहु दुःख मंत्रि मित्र को। यत्र तत्र जाहुपै पत्याहु जै अमित्र को ॥ ४७४ ॥ [नारावचंद] लुवा न खेलिये कहूँ जुवान वेद रतिये । अमित्रभूमि माह जै अभक्ष भक्ष भक्षिये ॥ करौ न मंत्र मुढ़ सौ न गूढ़ मंत्र खोलिये। सुपुत्र होहु जै हठीमठीन से नवोलिये ॥ ४७५ ॥ वृथान पीड़िये प्रजाहिपुत्रमान पारिये । असाधु साधुवूमि के यथापराध मारिये । कुदेव देव नारिको:न वालवित लीजिये। विरोध विप्रवंश सों सो स्वमह न कीजिये ४७६॥ [भुजंगप्रयात छंद] परद्रव्य को तो विषप्राय लेखो। परस्त्रीन सों ज्यों गुरुलीन देखौ ॥ - .१-ठिमित्रता। २-जै-गिन, मत। ३-पुत्रमार-मेटे की तरह पारिये पालिश ५- कुदेव (फु देय) भूमिदेव,मान।

( २६६ ) तनी काम मोधी महा मोह लोमा। तजी गर्व को सर्वदा चित्त क्षामा ।। ५७७ ।। यो संग्रदो निग्रही युद्ध योया ।। करी साधु संसर्ग जो बुद्धियोधा ।। हि होइ सो देह जो धर्मशिक्षा। अधीन को देहु जे चाकभिक्षा ॥४॥ कृतनी फुवादी परसीविहारी । करी विन लामी न धर्माधिकारी। सदाव्य संकल्प को रक्षि ली। द्विजातीन को भापुही दात दीजे १५४६ [सबैया ] तेरहमंडलमंछितभूतल भूपति जो प्रमही क्रम साध कैसेहु नाकहँ शत्रु न मित्र मुकेशवदास उदासन पाथै शत्रु समीप परे तेहि मित्र से तामु पर जो उदास के जावे विग्रह संधिनदाननिसिंघुलीले यहुँोरनि ती मुम्न सोय [दोहा] राजधोत्रश कसे, होहु न उर अवदात ।। जैसे तैसे आपुवार, तारुहँ कोज तात ।। ४.१ . . Priated and pablished by Brisloss Ras Metta sf the Leader Press, 14-A South Road Allahabad..

Ramchandrika

Author
Lala Bagwandeen
Title
Ramchandrika
File name
Ramchandrika
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/07
Publisher
Ellahabad.bhrti-bhandar
Language
Sanskrit
Pages
279
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner Kk
DLI number
314046
Barcode
99999990310854.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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