Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Shri Shidant Parkarn Shghar
Front matter
१३५ .... .... ... विषय. पृष्ट विषय. पृष्ट. १ए योनी पद १३२ | २६ पट् अव्यना बोल २५ज २० तेर बोल १३३ २७ रुपीअरुपीना बोल १६६ २१ बकायना नव २ पचीस वोलनो थोकको २६४ २२ लेस्या १३६ | एए वाटे वहेता जीवना.बोल १७ २३ चार कषाय १३ए ३० प्रमाण वोधनो थोकको १०ज २४ संज्याना बोल १४० ३१ चौद बोलनो अल्प बहुत्व २०३ २५ नियंगना वोल १४ ३२ श्वासोश्वासनो थोकको १७३ आ पुस्तक अमदावाद प्रसिक कर्ता पासेथी तेमज निचेना ठेकाणेथी मळशे. जैनस्थानकवासी विद्यालय सी. पी. टेंकरोम नं. ५३-५७ मुंबाइ. श्रावक लोमसी माणेक- मांमवी बंदर-मुंवा. शा. वालाना उगनलाल कीकानटनी पोळ-अमदावाद. संघवी- वामीलाल काकुना सारंगपर तळीयानी पोळ-अमदावाद.
ARTS इंजियादिक घमनाले बिकरी । कर्म पापरूप जलनो प्रवाह यावे । तेहने आश्रवतत्व कहिये ॥५॥ संवरतत्व ते जीवरूप तलावने विषे॥ कर्मरूप जल आवतां तपच्चखाणादिक छार देवेकरी रोकीये ॥ तेहने संवरतत्व कहिये ॥६॥ निर्जरातत्व ते ॥ आत्माना प्रदेशथि बार दे तपस्याये करी देशथकि कर्मनुं निर्जर करीने सुर श्रावु ॥ तेहने निर्ज- रातत्व कहिये ॥ ७ ॥ बंधतत्व ते । आत्माना प्रदेशने कर्मपुजलना दल खीरनीरनी परे ॥ लोहपिंम अग्निनी परे । लोलीत यश्बंधाय ॥ तेहने बंधतत्व कहिये ॥७॥ मोक्त- त्व ते सकल आत्माना प्रदेशथि सकल कर्मर्नु बुटवु ॥सकल बंधनुं मुकावq ॥ सकल कार्यनि सिद्धि थाय ॥ तेहने मोदतत्व कहिये ॥ए। ए नव पदार्थनुं जाणपणुं ॥ तेहने तत्व कहिये ॥ हवे जीवनो एक नेद . ॥ सकल जीवोनुं चैतन्य लक्षण एक ॥ माटे संग्रहनये करि एक नेदे जीव कहिये ॥ तथा वे प्रकारे पण जीव कहिये ॥त्रस ॥२॥ थावर ॥॥ तथा ॥ सिह ॥१॥ ने संसारी ॥२॥ तथा त्रण नेदे जीव ॥ स्त्री वेद ॥ १॥ पुरुषवेद ॥२॥ नपुंसकवेद ॥३॥ तथा नवसिद्धिया ॥१॥ अनवसिझिया ॥२॥ नोजवसिछिया नोअनवसिखिया ॥३॥ तथा- च्यार नेदे जीव ॥ नारकी ॥१॥ तिर्यच ॥ ५॥ मनुष्य ॥ ३ ॥ देवता ॥ ४ ॥ तथा ए ५ ना अप्रजाप्ता । ने। प्रजाप्ता । एवं ॥१॥ तथा ॥ इग्यार नेदे जीव ॥ एकेंख्यि ॥२॥ बेइंजिय ॥२॥ तेइंडिय ॥३॥ चरिंजिय ॥४॥ नारकी ॥५॥ तिर्यच ॥६॥ मनुष्य ॥ ७ ॥ जवनपति ॥ ७॥ वाणव्यंतर ॥ ए ॥ ज्योतिषी ॥ १० ॥ वैमानिक ॥ ११ ॥ तथा ॥ १२ ॥ लेदे जीव ॥ पृथवी ॥१॥ अप ॥२॥ तेज ॥३॥ वाउ ॥४॥ वनस्पति ॥५॥ त्रसकाय ॥६॥ ए उना अप्रजाप्ता ने प्रजाप्ता ॥ एवं ॥ १२ ॥ तथा तेरनेदे जीव ॥ कृष्णलेशी ॥१॥निल- लेशी ॥२॥ कापुतलेशी ॥३॥ तेजुलेशी ॥४॥ पद्मलेशी ॥५॥ शुकललेशी ॥६॥ ए। बना अप्रजाता ने प्रजाप्ता एवं ॥ १२ ॥ ने । एक अलेशी ॥ १३ ॥ एवं ॥ १३ ॥ हवे जीवना ॥ १४ ॥ नेद कहे जे ॥ सुक्ष्म एकेजियनो अप्रजाप्तो ॥१॥ ने प्रजातो ॥२॥ वादर एकेजियनो अप्रजातो ॥३॥ ने प्रजाप्तो ॥ ४॥ बेजियनो । अप्रजातो ॥५॥ ने । प्रजातो ॥६॥ तेइंपियनो । अप्रजातो ॥॥ ने। प्रजातो ॥जा चरिंडियनो अप्रजाप्तो ॥ ए ॥ ने प्रजाप्तो ॥ १० ॥ असंझी पंचेंजियनो अप्रजातो ॥११॥ ने प्रजातो ॥१२॥ संझी पंचेंजियनो अप्रजातो ॥१३॥ ने प्रजातो ॥१४॥ हवे व्यवहार विस्तार नये करीने पांचसेंत्रे- .२ प्रस्तावना श्रीजिनवरेंद्रायनमः ॥ श्री जैनधर्मी साधु साध्वी श्रावक श्राविकारूप चतुर्विध संघने ज्ञान दर्शन चारित्र तप ए४ मोक्ष मार्गना हेतु छे तेहमां पण ज्ञान ए मुख्य हेतु छे, केमके दशवैकालिक अध्ययन चोथे पढमनाणं तओदया कहां के वळि नंदिमूत्रमा नवपूर्वना भणनार यां सभ्यक्त्व अनना कहि छे, ने उपरना पूर्व भणनारमा नियमां सम्यकत्व का छे. तेमज भगवतीमां एकला शीलसंपन्न ने देशआराधक कन्या छे, ने एकला श्रुतसंपन्न ने देश विराधक कया के माटे सूत्र सिद्धांत तपासतां जैनमा ज्ञान विशेप छे. ते ज्ञान भणवाथि हेय ज्ञेय ने उपादेय पदार्थ- जाणपणु थाय छे, जेथि जिवने वैराग्य दशा प्राप्त थाय छे. ने परंपराए मोक्षनि गतिनो लाभ थाय छे, एबुं ज्ञान- महातभ्य जाणिने आजना अल्प बुद्धि जिवोने थोडा काळमां विशेष ज्ञान थवा माटे श्री सिद्धांत प्रकरण संग्रह ३२ थोकडानुं पुस्तक मर्हम श्रीमन्मंगलजी महाराजना शिष्य मुनि करसनजी महाराज पासे शुद्ध करावी छपाविप्रसिद्ध कर्यु छे तेमां कोइ भूल चुक रहि गइ होय तो पंडित जन अमारा उपर कृपा करि सिद्धांत तथा ग्रंथ जोइ सुधारिलेशो ए अमारि विज्ञप्ति छे आ पुस्तक उघाडे मुखे तथा दिवाने अजवाळे यांचवु नहि जेथि ज्ञाननि असातना न थाय. कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा सोम संवत १९७८. ली. त्रीसोवनदास रुगनाथदास शाह. आकाशेठना कुवानी पोळ-अमदावाद्. १९७८.१ तेहने फरतो ॥॥ लाख जोजननो । अईपुष्कर। हिप डे ॥ तेहमां ॥ जरत ॥२ इवत॥ महाविदेह ले ॥ एवं । बहु॥१॥ ने ॥३॥ पनर कर्मनूमिना मनुष्य कह्या ।हवे ३० अकर्मजू- मिना मनुष्य कहेजे॥अकर्मभूमि ते केहने कहिये ॥३ कर्मरहित दशप्रकारना कल्पवृदेकरीने जीवे.तेहने अकर्मनूमिना मनुष्य कहिये ॥ ते केटला ॥५॥ हेमवय ॥५ हिरणवय ॥एहरि- वास. ॥ ५ रमकवास ॥५ देवकुंरु ॥५ उतरकुरु ॥ एवं ॥३॥ अकर्मनूमिना मनुष्य जाणवा ॥ हवे जंबुछिपमां ॥ १ हेमवय ॥ १ हिरणवय ॥ १ हरिवास ॥१ रमकवास ॥ १ देवकुरु ॥? उतरकुरु ॥ एवं ॥ ६॥ देवजंबुछिपमा ॥ धातकिखंझमां बवे जाणवा ॥ एवं ॥ १७ ॥ अर्धपुष्करद्विपमा बबे जाणवा ॥ एवं ॥३०॥ अकर्मनूमिना मनुष्य कह्या ॥ हवे उपनअं- तरहिपनामनुष्य कद्दे ॥जंबुछिपना चरतक्षेत्रनि मर्यादानो करणहार। चुल हिमवंतनामा पर्वत ॥ ते पीला सोनामय ॥ते सो जोजननो उंचो।सो गानो उमो जे । एकहजार बावन जोजन ने बार कलानो पहोलो ॥ चोविशहजार नवशेब त्रिश जोजननो लांबो २ ॥ तेहने पूर्व पश्चिमने बेहझे बवे माढा निकलि जे ॥ एकेकि माढा चोरासीशें चोरासीशें जोजननी तरन जाणवा॥ अंतरछिपाना मनुष्य त कहन काहय ।। हर समुझ ० ॥ अन उपर अथर माढामां द्विपाना रहेनार ॥माटे अंतर छिपाना मनुष्य कहिये । हवे १५१ देवना समुर्विम मनुष्य ॥१४ स्थानकमा उपजे जे ते कहे ॥ उच्चारेसुवा ते बनिनितमां उपजे ॥२॥ पासवणे- सुवा ते लघुनितमां उपजे ॥२॥ खेले सुवा ते बलखामां उपजे ॥३॥ संघाणेसुवा ते लिंटमां नपजे ॥४॥ बंतेसुवा ते वमनमां उपजे ॥५॥ पीतेसुवा ते निलापिला पीतमा उपजे ॥६॥ पुश्एसुवा ते परुमा उपजे ॥७॥ सोणिएसुवा ते रुछिरमां उपजे ॥॥ सुक्केसुवा ते विर्यमा उपजे ए॥ सुक्कपोगलपरिसामिएसुवा ते विर्यादिकना पुजलसुकाणा ते फिरि निना थाय तेहमां उपजे ॥ १० ॥ विगयजीव कलेवरेसुबा ते मनुष्यना कलेवरमा उपजे ॥ ११ ॥ नियुरिस संजोगेसुवा ते स्त्रीपुरुषना संजोगमां उपजे ॥ १२ ॥ नगरनिधमणेसुवा ते नगरनी खालोमां उपजे ॥१३॥ सवेसुचेवअसुश्वगणेसुवा ते सर्वमनुष्य संबंधिअशुचिस्थानकोमा उपजे ॥१४॥ एवं ॥ १०१ क्षेत्रनासमुर्बिम मनुष्यना अप्रजाप्ता ॥ एवं सर्व मिली ॥३॥३॥ नेद मनुष्यना कह्या ॥ हवे देवताना ॥ १७ ॥ नेद कहे ॥ तेहमां । दश नवनपतिना नाम ॥ असुर ॥४ informat मनष्य ने केटने कहिये| देते समुद्र ते ॥ अन उपर अधर || स्थिर ते अढि हिपबाहिर ॥ एवं ॥१॥ हवे ॥३॥ किदिवपिना नाम ॥ त्रण पलिया ॥१॥ त्रण सागरिया ॥॥ तेर सागरिया ॥३॥ नव लोकांतिकना नाम ॥ सारस्वत ॥१॥ आदित्य ॥२॥ विन्हि ॥३॥ वरुण ॥४॥ गर्दतोया ॥५॥ तोपिया ॥६॥ अव्यावाधा ॥७॥ अगिच्चा ॥ ७॥ रिग ॥ बार देवलोकना नाम ॥ सुधर्म ॥१॥ शान ॥॥ सनत्कुमार ॥३॥ माहें ॥४॥ ब्रह्मलोक ॥५॥ दंतक ॥६॥ महाशुक्र ॥ ७॥ सहसार ॥ ७॥ आणत ॥॥ प्राणत ॥१०॥ आरण ॥ ११॥ अच्चुय ॥ १२॥ नव ग्रीवेकना नाम ॥ नद्दे ॥ १ ॥ सुनद्दे ॥२॥ सुजाए ॥३॥ सुमाणसे ॥४॥ प्रियदर्शणे ॥ ५॥ सुदर्शने ॥ ६॥ आमोहे ॥७॥ सुपमिबद्धे ॥॥ जशोधरे ॥ ए॥ पांच अनुत्तर विमानना नाम ॥ विजय ॥ १॥ वि- जयंत ॥२॥ जयंत ॥३॥ अपराजित ॥॥ सर्वार्थ सिद्ध ॥ ५॥ एएए जातना देवता अप्र- जाप्ता ने ॥ एए जातना प्रजाता । एवं ॥१ए॥ नेद देवताना कह्या ॥ हवे तिर्यचना॥४॥ नेद कहे ॥ पृथवी ॥१॥ पाणि ॥॥ तेल ॥३॥ वाज॥ ४ ॥ ए॥४ सुक्ष्म ने ॥ ४ वाद- र ॥ एवं गए ना अप्रजाप्ता ने ॥ ना प्रजाप्ता ॥ एवं ॥१६॥ वनस्पतिना ॥३॥ नेद ॥
होने समऽ वे ॥ अन उपर अधर . देश ॥ ५॥ प्रदेश ॥६॥ आकाशास्ति कायनो स्कंध ॥ ७ ॥ देश ॥ ७ ॥ प्रदेश ॥ ए॥ अहासमयकाल ॥१॥ ए ॥१॥ जेद अरूपि अजीवना कह्या ॥ हवे रूपि अजीवना ॥ ४ नेद कहे ॥ पुजलास्तिकाय नो स्कंध ॥ ११ ॥ देश ॥ १५ ॥ प्रदेश ॥ १३ ॥ परमाणु पुजल ॥ १४ ॥ एवं ॥ २४ ॥ हवे व्यवहार विस्तारनयेकरी ॥ ५६० ॥ नेद अजीवतत्वना कहे ॥ तेहमां ॥३॥ नेद । अरूपि अजीवना कहे ॥ धर्मास्तिकाय व्यथकि एक॥१॥ देवय किं आखा लोक प्रमाणे ॥२॥ कालथकि अनादिअनंत ॥३॥ नावथ कि । अवर्णे अगंधे । अरसे । अफासे । अमूर्ति ॥४॥ गुणथकि चलणसहाय ॥ ५ ॥ अधर्मास्तिकाय अव्यथ कि एक ॥६॥ क्षेत्रथकि आखा लोकप्रमाणे ॥७॥ कालथ कि अनादिअनंत ॥ ७॥ नावथकि । अवर्णे । अगंधे । अरसे । अफासे । मूर्ति ॥ए। गुणथ कि स्थिर सहाय ॥१॥ आकाशा- स्तिकाय अव्यय कि एक ॥११॥ देवथकि लोकालोक प्रमाणे ॥ १२॥ कालयकि अनादि अनंत ॥ १३ ॥ नावथ कि । अवणे । अगंधे । अरसे । अफासे । अमूर्ति ॥ १४॥ गुणथ कि ॥ अवगाहनादान ॥१५॥ हवे काल अव्यथकि अनेक ॥१६॥ देवथ कि । अढिद्विपप्रमाणे॥१७॥ .
सो.॥ हवे या स्पर्श । खरखरो ॥१॥ सुहालो ॥२॥ नारि ॥३॥ हलवो ॥४॥ टाढो ॥५॥ उन्हो ॥६॥ चोपमयो ॥ ॥ लुखो ॥ ७॥ एकेका स्पर्शमां । विश त्रेवीश नंद लाने ॥ वर्ण ॥२॥ गंध ॥५॥ रस ॥५॥ संगण ॥६॥ स्पर्श ॥ एवं ॥ २३॥ नेद लाने । खरख- रामा खरखरो ने सुंहालो वे वर्जवा ॥एम बबे स्पर्श वर्जवा ॥ एवं ॥ २३ अठा १७४ ॥ एवं सर्व मिलिंने ॥५३॥ नेदरूपि अजीवना कह्या ॥ एवं सर्व मिलिने ॥५६॥ लेद ।अजीवना जाण वां ॥ इति अजीवतत्वं समाप्तं ॥५॥ हवे नव नेदे पुण्यउपराजे ते कहे बे॥ अन्नपुन्ने ॥१॥ पाणं पुन्नेः ॥२॥ लयणपुन्ने ॥३॥ शयणपुन्ने ॥४॥ वबपुन्ने ॥ ५॥ मनपुन्ने ॥६॥ वचन पुन्ने ॥७॥ कायपुन्ने ॥॥ नमस्कार पुन्ने ॥॥ ए ॥ए। नेदे पुण्य उपराजे ॥ तेहना शुन फलः ॥४२॥ नेदे लोगवे ॥ शातावेदनिय ॥१॥ उंच गोत्र ॥२॥ मनुष्यगति ॥३॥ मनुष्यानु पूवीं ॥४॥ देवतानि गति॥५॥ देवानुपूर्वी ॥६॥ पंचेजियनि जाति ॥७॥ उदारिक शरिर॥॥ वैक्रेय शरिर॥णा अहारक शरिर ॥१०॥ तैजस शरिर ॥११॥ कार्मण शरिर ॥१॥ उदारिकना अंग उपांग ॥१३॥ वैकैयना अंग उपांग ॥१४॥ आहारकना अंग उपांग ॥१५॥ वरिषन-
मानार्य श्री विनयवन्द्र ज्ञान
diamicbiacicele
rrrrr.VVVMr.rrrrrrr
bio
UNrvNr
etcoic
श्री सिद्धांत प्रकरण संग्रह ॥
सुधारा वधारा सहित,
इ.१ प्रतिष्ठान
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का मान, जयपुर
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छपावी प्रसिद्ध करनार,
त्रीजोवनदास रुगनाथदास शाह,
आकाशेठना कुवानी पोळ-अमदावाद.
प्रत १०००. संवत १९७८. सने १९२१.
किम्मत बे रुपैया पाका पुंठाना २-४-०
22 JUN 1967
आप
वृत्ति १ली.
Karmeromoooooooooooooooooooooo 12 I DIDICIT
Jiinnnnnnnnnnnnnnnnnn.in
UODULUKDIODIA
परिग्रह ते आ॥१॥श्रोडियअसंवरे ते आ॥२१॥ चतुइंडियायागारशा घाणेजियप आप ॥१३॥ रसेंजियअण्आ० ॥१४॥ स्पर्शेजियअण्ण ॥१५॥ मनअण्ा ॥ १६ ॥ वचन अण्याप ॥१७॥ कायअण्ाण ॥१॥ नंमउपगरणउपधिजिमतिमलियेमुके ते आम् ॥१॥ शुचिकुसग्गं करे ते आप ॥ २० ॥ हवे विशेषे ।। ४२॥ नेद कहे ॥ ५ ॥ आश्रव ॥ ५.॥ इंडिय मोकलि मुके एवं ॥ १० ॥ ने ॥ ४ ॥ कषाय ॥ एवं ॥ १४ ॥ ने त्रण अशुल जोग । एवं ॥ १७ ॥ ने ॥ २५ ॥ क्रिया ते ॥ कायिकी क्रिया ॥ १॥ अधिकरणकी क्रिया ॥२॥ पानसिया ॥३॥ पारितावणिया ॥ ४ ॥ पाणाश्वाय ॥ ५॥ आरंजिया ॥ ६॥ परिग्ग- हिया ॥ ॥ मायावतिया ॥ ७ ॥ अपञ्चखाणवतिया ॥ ए॥ मिबादंशणवतिया ॥ १७ ॥ दिठीया. ॥११॥ पुठिया ॥१२॥ पासुचिया ॥ १३॥ सामतोगणिया ॥ १४ ॥ नेसथिया ॥१५॥ सहथिया ॥१६॥ अणवणिया ॥१७॥ विदारणिया ॥१७॥ अणालोगी ॥ १५॥ अणवकंख- वतिया ॥ २०॥ अनापनगी ॥ १ ॥ सामुदाणी ॥ २५॥ पेजवतिया ॥२३॥ दोसवतिया -॥ २४ ॥ इरियावहिया क्रिया ॥ २५ ॥ एवं ॥२५॥ ने ॥१॥ बेतालीश नेद आश्रय तत्वना. 1 ॥१३॥ जाचवानो ॥१४॥ अलाननो० ॥ १५ ॥ रागनो० ॥ १६ ॥ तृणस्पर्शना० ॥ १७ ॥ मेलनो ॥ १७ ॥ सरकार पुरस्कारनो० ॥ १७ ॥ प्रज्ञानो ॥५॥ अज्ञाननो ॥२१॥ दंशण परिसह ॥ २२ ॥ ए ॥ २२ ॥ ने ॥ ७॥ पूर्वे कह्या ते । एवं ॥ ३० ॥ खंति ॥ ३१ ॥ मुत्ति ॥ ३२ ॥ अजावे ॥ ३३॥ मदवे ॥ ३४ ॥ लाघवे ॥ ३५ ॥ सच्चे ॥३६॥ संजमे ॥ ३४ ॥ तवे ॥३॥ चियाए ॥ ३५॥ वनचरवासे ॥४॥ ए॥ १० ॥ प्रकारे जतिधर्म आराधवो ने ॥१॥ नावना नाववी । तेहना नाम ॥ अनित्यत्नावना ॥ १ ॥ अशरणना ॥२॥ संसारना ॥३॥ एकत्वना ॥ ४ ॥ अन्यत्वना ॥५॥ अशुचिना ॥६॥ आश्रवना ॥७॥ संवरना ॥॥ निर्जराना ॥ ए ॥ लोकना ॥१०॥ बोधना० ॥ ११॥ धर्मना ॥ १२ ॥ ए॥ ४० ॥ ने ॥ १५ ॥ बावन । शामायकचारित्र ॥५३॥ दोपस्थापनिय० चा ॥ २४ ॥ परिहारविशुद्ध ॥५५॥ सुदमसंपरायण ॥ ५६ ॥ जथाख्यात ॥५७॥ ए॥७॥ नेद संवरतत्वना जाणवा ॥ इति संवरतत्वं समाप्तं ॥६॥ हवे निर्जराना ॥१२॥ नेद कहेठे ॥ अनशन ॥१॥णोदरि॥२॥ वृत्तिसंदेप ॥ ३ ॥ रसपरित्याग ॥४॥ कायक्वेश ॥५॥ पमिसंलिणया ॥६॥ ए ब नेद वाहा- ॥२ तन बंधतत्वं समाप्तं ॥ ७ ॥ हवे मोदतत्व ते ॥ १५ ॥ नेदे सिद्ध श्राय ते कठे ॥ तिर्थ सिखा ? अतिर्थ सिझा ॥२॥ तिर्थकर सिका ॥३॥ अतिर्थकर सिझा ॥धा ग्रहस्थलिंग सिकाए॥ अन्यालिंग सिझा ॥६॥ स्वलिंग सिझा ॥७॥ स्त्रीलिंग सिद्धा जा पुरुषलिंग सिधा ए॥ नपुंसकलिंग सिका ॥ १० ॥ स्वयंबु सिझा ॥ ११ ॥ प्रत्येकवुझ सिका ॥ १२ ॥ बुरूवोहि- सिहा ॥ १३ ॥ एक सिका ॥ १४ ॥ अनेक सिका ॥ १५ ॥ तथा ॥४॥ प्रकारे जीवमोद जाय ते कहे ॥ ज्ञानेकरि ॥१॥ दर्शनेकरि ॥२॥ चारित्रेकरि ॥३॥ तपेकरि ॥४॥ तथा ॥ ए॥ छार मोदना कहे ॥ सत्प्रदरूपणा ते॥ मोदगति पूर्वकाले हति हमणा पण । आगमिये काले हशे ते ति अस्ति । पण आकाशना फुलनिपरे नास्ति नाथ ॥१॥ प्रव्यप्रमाणे ते सिझ अनंता ॥अन्नव्य जीवथि अनंतगुणा अधिक है। वनस्पति वर्जिने॥२३॥ दंगकथि सिझना जीव अनंतगुणा अधिक ॥२॥ देवछार ते सिहशिला प्रमाणे देते। सिहशिला पिशतालिस लाख जोजननी लांवि पहोलि ॥ अने त्रिगुणि जारि परिधि ॥ अंने उंचपणे ॥ ३३३ ॥धनूष ने ॥३५॥ आंगुलप्रमाणे ॥ एटला क्षेत्रमा सिझ रह्या ॥२ धणि होयते मोद जाय ॥ जघन्य वे हायनि अवघणावालो ॥ उत्कृष्टि पांचशे धनुपनि अवघेणावालो । जघन्य नव वरसनो ॥ उत्कृष्ट पूर्वको मिना आयुषवालो कर्मनूमिनो होय ते मोदमा जाय ॥ इति मोदतत्वं समाप्तं ॥ ए ॥ इति नव तत्वना बोल संपूर्ण ॥ ॥ अथ श्री छकायना बोलनो थोकडो.॥ अथश्री कायना वोल लिख्यते ॥ पहेले बोले इंजी थावरकाय ॥॥ वीजे बोले बनी थावरकाय ॥३॥ सपि थावरकाय ॥ ४ ॥ सुमति थावरकाय ॥ ५ ॥ पयावच्च थावरकाय ॥६॥ जंगमकाय ए बकायनां नाम कह्यां ॥ हवे गोत्र कहे ॥ पृथवी काय ॥१॥ अपकाय ॥२॥ तेजकाय ॥ ३॥ वाउकाय ॥४॥ वनस्पतिकाय ॥५॥ त्रसकाय ॥६॥ हवे पृथ्वीका- यना वे नेद ॥ सुक्ष्म अने चादर ॥ सुक्ष्म ते आखा लोकमां नरयां ॥ते आपणी नजरे न आवे॥ ज्ञानी जाणे देखे ॥ हवे वादरपृथ्वीकायनां नाम कहे ॥ पहेले बोले माटीने मीगनी जात ॥शा खमीने खारानी जात ॥३॥ कालमिंद मरमीया पाहणा ने सिल्लानी जात ॥॥ हिं S मतिज्ञानावरणिय ॥१॥ श्रुतझानावरणिय ॥२॥ अवधिज्ञानावरणिय ॥३॥ मनपर्जवज्ञा- नावरणिय ॥ ४ ॥ केवलज्ञानावरणिय ॥५॥ दानांतराय ॥६॥ लानांतराय ॥७॥ नोगांतराय ॥ ७॥ उपनोगातराय ॥ ए ॥ वीर्यातराय ॥ १० ॥ निझा ॥ २१ ॥ निजा- निसा ॥ १५ ॥ प्रचला ॥ १३ ॥ प्रचलाप्रचला ॥ १४ ॥ थीणहिनियां ॥१५॥ चकुदर्शना- वरणिय ॥ १६ ॥ अचकुदर्शनावरणिय ॥ १७ ॥ अवधिदर्शनावरणिय ॥ १७ ॥ केवलदर्श- नावरणिय ॥१५॥ निच्चगोत्र ॥२०॥ अशातावेदनीय ॥२१॥ मिथ्यात्वमोहनिय ॥२॥ स्थावरपणुं ॥३३॥ सूमपणुं ॥२४॥ अप्रजातपणुं ॥२५॥ साधारपणुं ॥२६॥ अस्थिरनाम ॥२॥ अशुजनाम ॥ २७ ॥ दौाग्यनाम ॥ २॥ ॥ मुःस्वरनाम ॥ ३० ॥ अनादेयनाम ॥ ३१ ॥ अजशोकीर्तिनाम ॥ ३५ ॥ 'नरकनिगति ॥ ३३ ॥ नरकनुंआउखुं ॥ ३४ ॥ नरकानुपूर्वी । ३५ ॥ अनंतानुवंधि क्रोध ॥ ३६ ॥ मान ॥ ३७॥ माया ॥ ३० ॥ लोन ॥ ३ ॥ अपच्चखाणावरणिय ॥ क्रोध ॥ ४ ॥ मान ॥४१॥ माया ॥ ४२ ॥ लोज ॥ ४३ ॥ पञ्चखा- णावरणिय ॥ क्रोध ॥ ४४ ॥ सान ॥४५॥ माया ॥ ४६ ॥ लोन ॥ ४ ॥ संजलनो ॥ क्रोध ।।
लाख जोजनना जंबुछिपमा समाय नहीं ॥ तेना कुल सात लाख कोमठे ॥ तेनुं आउखुं
जघन्य ॥ अंतर्मुहुर्तन ॥ उत्कृष्टुं सातहजार वर्षतुं तेनी दया पालीये तो ॥ अनंता मोदनां
सुख पामीये ॥शा हवे. तेल काय ते अग्नी तेना वे नेद । सुदम ने वादर ॥ सुम ते आखा
लोकमां जरयां ले ॥ ते आपणी नजरे न आवे ॥ हवे वादर अग्नीनां नाम कहे ॥ पहले
वोले चूला ने जीनी अग्नि ॥२॥ धुमामी तापणीनी अनि ॥३॥ चकमक ने वीजलीनी
अंनि ॥ ४ ॥ दीवाने उमामानी अग्नि ॥५॥ लोढा धगधगता ने अरणीनी अग्नि ॥६॥
ए आदिलेश्ने घणी जातिनी अग्नि. ॥ तेना एक तणखामां ॥असंख्याताजीव श्रीनगवंते
कह्याने ॥ तेमांथी.. एकेको जीव नीकलीने । खसखसना दाणा जेवमी ॥ काया करे तो
जंबुछिपमा समाय नहि। तेना कुल ॥ त्रण लाख क्रोम ॥ तेनुं आज । जघन्य ॥ अंतर्मु-
हुर्तनुं ॥ उत्कृष्टुं ॥त्रण अहोरात्रनुं तेनी दया पालीये तो ॥अनंता मोदनां सुख पामीय॥३॥
हवे वाउकायना वे नेद । सुदम ने वादर ॥ सुमते आखा लोकमां नरयां । ते आपण
नजरे न आवेहवे वादर वायराना नाम कहेठे.॥ पहेले वोले उगमणो ने आथमणो वा ॥२॥
गुलमनी जात॥३॥एरमा आकमा धतुरानी जात॥४॥दामम सेलमीने केलातीजात ॥५॥ध्रो- केवमो दानमो ने तरणानी जात ॥ ६॥ फूल कमल ने नागरवेलनी जात ॥ ७ ॥ बोरमी केरमो ने कसेलानी जात ॥ ८ ॥ जुवार वाजरो मठ मकाश्नी जात ॥ ९ ॥ तांजलजो सूवा मोघरी वालोर फलीनी जात ॥ १० ॥ ए आदि लेख्ने घणी जातिनी प्रत्येक वनस्पति ॥ तेमांजगवाने वेप्रकारना जीव कह्या संख्याता॥ अ- संख्याता तेनी दया पालीये तो अनंता मोदना सुख पामीए तेनुयाउखुंजण्यंत उत्७ दशह- जार वर्षमुं।हवे साधारण वनस्पतिना नाम कहेले ॥पहेले बोले लीलफूल सेवालनी जात॥गाजर मूलानी जात ॥ हुंगली लसणनी जात ॥ आउने गरमरनी जात ॥रतानु पिंमाबुनी जात॥ कंटालो थोर खुरसाणी कुंवार सेलरानी जात ॥ मोथ लुणीनी जात ॥ उगता अंकुरा अने कुणी काकमीप्रमुखनी जात ॥ ए आदि लेश्ने घणी जातिनी साधारण वनस्पति ॥ एक कंद मुलना ककमामां अनंताजीव ॥तेनुंआउखुंजघन्याउत्पअंतर्मुहुर्त मुंबहुनाकुलश्लाख क्रोम तेनी दया पालीये तो अनंता मोदना सुख पामीये॥ हवे त्रसकायना चार नेद वे इंजीय जमरो । तीम। पतंग ।करोलीयो । कंसारी । वीबी। खममांकमी । वगा। धुमीया । फूदा ॥ एयादि लेंड्ने घणी जातिना॥चौरंजीय जीव ॥ तेना कुल नवलाख क्रोमडे । तेनुंआउखुं। जघन्य । अंतर्मुहुर्तनुं ॥ उत्कृष्टु ॥'मासर्नु ॥ तेनी दया पालीये तो अनंता मोक्षना सुख पामीये ॥ हवे पंजीय ते कोने कहीये । जेने काया । मुख नासिका । आंख । कान । ए प्रमाणे होय । तेने पंचेंजीय कहीये ॥ तेना बे नेद ॥ अप्रजाप्ता । अने प्रजाप्ता । तेनी ॥४॥ जाति ॥ नारकी । तिर्यच । मनुष्य । देवता। तेमां ॥१४ जेद नारकीना॥ध नेद तिर्यंचना ॥ ३८३ नेद मनुष्यना ॥ १ए नेद देवताना ॥ वली तेमां देवताना चार नेद ॥ जवनपंति॥ वाणव्यंतर ॥ जोतिषी ॥ वैमानिक ॥ मनुष्यना चार नेद ॥ १५ ॥ कर्मजूमीना मनुष्य ॥ ३० अकर्म जूमीना मनुष्य ॥ ५६ अंतरछिपना मनुष्य ॥ १४ स्थानकना समूीम मनुष्य ॥ हवे नारकीने देवतानी स्थिती ॥ जघन्य दशहजार वर्षनी । उत्कृष्टी तेत्रीस साग- रोपमनी ॥ तिर्यंचने मनुष्यनी स्थिती । जघन्य अंतर्मुहूर्तनी । उत्कृष्टी त्रण पढ्योपमनी तेनी दया पालीये तो अनंता मोक्षना सुख पामीये ॥ इतिश्री बकायना बोल सम्पूर्ण ॥ ॥ LASTI JIME जमरा । तीम। पतंग । करोलीया । कंसारी । वींटी। खममांकमी । बंगा। धुमीया । दा॥ एमआदि लेश्ने घणी जातिना॥चौइंशीय जीव ॥तेना कुल नवलाख क्रोम । तेनुंआउ। जंघन्य । अंतर्मुहुर्तनुं ॥ उत्कृष्टु ॥ उमासनुं ॥ तेनी दया पालीये तो अनंता मोदना सुख पामीये । हवे पंचेंजीय ते कोने कहीये । जेने काया । मुख नासिका । आंख । कान । ए प्रमाणे होय । तेने पंचेंद्रीय कहीये ॥ तेना वे नेद ॥ अप्रजाप्ता । अने प्रजाप्ता । तेनी ॥४॥ जाति ॥ नारंकी । तिर्यच । मनुष्य । देवता। तेमां ॥ १४ जेद नारकीना॥ध नेद तिर्यंचना ॥ ३५३ नेद मनुष्यना ॥ १ए नेद देवताना ॥ वली तेमां देवताना चार नेद ॥ नवनपतिः।। वाणव्यंतर ॥ जोतिषी ॥ वैमानिक ॥ मनुष्यना चार नेद ॥ १५ ॥ कर्मजूमीना मनुष्य ॥ ३० अकर्म मीना मनुष्य ॥ ५६ अंतरछिपना मनुष्य ॥ १४ स्थानकना समूीम मनुष्य ॥ हवे नारकीने देवतानी स्थिती ॥ जघन्य दशहजार वर्षनी । उत्कृष्टी तेत्रीस सांग- रोपमनी ॥ तिर्यंचने मनुष्यनी स्थिती । जघन्य अंतर्मुहूर्तनी । उत्कृष्टी त्रण पख्योपमनी तेनी दया पालीये तो अनंता मोदना सुख पामीये ॥ इतिश्री बकायना बोल सम्पूर्ण ॥
हाथनी ॥ तेजस कार्मण सरीरनी अवघेणा जगन्य अंगुलनो असख्यातमानाग । उत्कृष्टी चौद राजलोक प्रमाणे ॥ केवल समुद्घातनी अपेक्षाये ॥ तथा पोतपोताना सरीर प्रमाणे जाणवी ॥ एम अवघेणा जाणवी ॥ ॥ संघयण कहेता संघयण व वज्रषननाराचसंघयण ॥१॥ झषजनाराचसंघयण ॥२॥ नाराचसंघयण ॥३॥ अर्धनाराचसंघयण ॥ ४॥ किलकु- संघयण ॥५॥ वटुसंघयण ॥ ६॥३॥ संगण कहेता संगण उ समचउरंस संगण ॥ १ ॥ निगोहपरिमंगल संगण ॥२॥ सादि संगण ॥३॥ वामन संगण ॥४॥ कुवज संगण॥५॥ संगण ॥६॥ ४ ॥ कसाय कहेता कषाय च्यार ॥४॥ क्रोध ? मान ५ माया ३ लोन ॥४॥५॥ तहहुंति कहेता तिमज होय ॥ सणार्ड कहेता संझा च्यार ॥ आहा- रसंझा ॥१॥ जयसंझा ॥२॥ मैथुनसंझा ॥३॥ परिग्रहसंझा ॥ ॥ ६ ॥ लेसा कहेता लेस्या छ ॥ कृष्णलेस्या ॥१॥ नीललेस्या ॥२॥ कापोतलेस्या ॥ ३ ॥ तेजुलेस्या ॥४॥ पद्मलेस्या ॥ ५ ॥ सुकललेस्था ॥६॥७॥ इंदिय कहता।इंजिय पांच श्रोतें- जिय ॥१॥ चकुजिय ॥२॥ नाणेजिय ॥३॥ रसेंजिय ॥४॥ फरसेंजिय ॥५॥ समुघाए - ॥ अनुक्रमणिका ॥ विषय. पृष्ट. जर १५ .. ६ ए३. १०ज १ नन तत्व २ कायना बोल ३ लघु दंसक ४ गतागत ५ गुण्ठाणा ६ महोटो वासठीयो ७ अगणु बोलनो बासठीयो Gठ आराना बोल.. ए चोवीश जीनांतरा ३४ ३ज विषय १० कर्म प्रकृतिना बोल ११ धर्म ध्यान १२ पांच बोल १३ पदवीना बोल २४ सीजणा छार १५ विरह छार १६ पांच देवना वोल. १७ देसाणुवा १० खंमा जोयण १११ .... .... ११४ १२५ ११७ ४ ११॥
- द हवेसातना गोत्र कहेठे। पहेली रतनप्रना॥वीजी सकरप्रनाात्रीजी वावुप्रना। चाय। पकप्रना ॥ पांच मी धुमप्रना ॥ उठी तमप्रना ॥ सातमी तमतमाना ॥ ए सात मलिने एक दंगक थयो ।॥१॥ हवे दश नवनपतिना दस दमक ॥ तेहना नाम कहेठे ॥ पहेला असुरकुमार ॥ बीजा नागकुमार ॥ त्रीजा सोवनकूमार ॥ चोथा विजुकुमार ॥ पांचमा अग्निकुमार ॥ उठा दिपकुमार ॥ सातमा उदहिकुमार ॥ आठमा दिसाकुमार ॥ नौमा पवनकुमार ॥ दशमा थणितकुमार ॥ एवं अगियार दंझक थया ॥११॥ हवे पांच थावरना पांच दंगक कहेले ॥ इंदिथावरकाय॥बंनीथांवरकाय ॥सपीथावरकाय ॥ सुमतिथावरकाय ॥ पयावचथावरकाया। ए नाम कह्या ॥ हवे गोत्र कहे प्रथवीकाय ॥ अपकाय ॥ तेउकाय ॥ वाउकाय ॥वणसर काय एवं सोल दंगक थंया ॥ १६॥ हवेत्रण विगलेंजीयना त्रण दंझक कहे ॥ बेझंडीय। तेरिंखीय ॥ चरिंडीयाएवं उंगणीस दंझक थया॥रणा हवे विसमो तिर्यंच पचेंडीयनो दमक कहे ॥ तिर्यंच पंचेंजीयना पांच नेद ॥जलचर ॥ थलचर ॥ उरपर ॥ जुजपर। खेचर । हवे. जलचर ते केहंने कहिये।।जे जलमां चाले तेहने जलचर कहिये ॥तेहना अनेक नेद ॥ मल पंखी ते मावमानीपरे बोकीरहे पांखजेहनी ते समुग पंखीए वे पंखी अढी हिप बाहारेज ॥ ए पांच तिर्यंच पचेंडी ते पांच समुर्बिम ने पांच गर्नज जाणवा ए विसमो तिर्यंच पचेंक्षिो दंगक थयो॥२०॥ हवे एकविसमो मनुष्य पचेंजीयनो दमक कहे॥ ते मनुष्य पचेंडीना च्यार जेद ॥ पनर कमजुमि ना मनुष्य ॥ १ ॥ त्रीस अकर्मभुमि ना मनुष्य ॥५॥ उपन्न अंतर छीप ना मनुष्य ॥ ३॥ चजद थानकना समुर्बिम मनुष्य ॥ ४ ॥ ते एकसो एक क्षेत्रना गरनज मनुष्य अपर्याप्ता॥ ने एकसो एक पर्याप्ता एवं २०२ ने एक सो एक क्षेत्रना समुर्लिम मनुष्य अपर्याप्ता । एवं त्रणसें त्रण नेदनो एकविसमो मनुष्यनो दंमक थयो ॥ २१ ॥ हवे वाविसमो वाणव्यंतर नो दंमक कहे ॥ तेहनी सोल जाति । पिशाच ॥१॥ नूत ॥२॥ जद ॥ ३ ॥ रादास ॥४॥ किनर ॥ ५॥ किंपुष ॥ ६ ॥ महोरग ॥ ७॥ गंधर्व ॥ ७ ॥ आणपनी ॥ ए॥ पाणपनी ॥ १० ॥ इसीवाश् ॥ ११ ॥ नूश्वा ॥ १२ ॥ कंदिय ॥ १३ ॥ महाकंदिय ॥१४॥ कोहंम् ॥ १५ ॥ पयंगदेव ॥ १६ ॥ इति वाविसमो वाणव्यंतर नो दंगक संपूर्ण ॥ २२ ॥ ढ्वे नेविसमो जोतीषी नो दंगक कहे। ॥ तेहनी दस जाति चंउमा ॥ १ ॥ S महासुक्र ॥ ॥ सहसार ॥७॥ आणत ॥ ए॥ प्राणत ॥१०॥ आरण ॥ ११॥ अचुय ॥ १५ ॥ ए बार देवलोक ना नाम कह्या ॥ हवे नवौवेयक ना नाम कहे ॥ नदे ॥१॥ सुनदे ॥२॥ सुजाए ॥३॥ सुमाणसे ॥४॥.प्रीयदसणे ॥५॥ सुदंसणे ॥ ६॥ आमोहे ॥७॥ सुपमिबधे ॥७॥ जसोधरे ॥ ए॥ए नव ग्रैवेयक ना नाम कह्या ॥ हवे पांच अनुत्तर विमान ना नाम कहे । विजय ॥ १ ॥ विजयंत ॥॥ जयंत ॥ ३ ॥ अपराजित ॥४॥ सर्वार्थ सिद्ध ॥ ५ ॥ ए पांच अनुत्तर विमान ना नाम कह्या । ए बविस जेदनो वैमानीक नो दमक थयो ॥ २४ ॥ हवे पनर परमाधामी ना नाम कहे। अंव ॥१॥ अंबरस ॥ २ ॥ साम ॥ ३ ॥ सबल ॥४॥ रुष ॥५॥ वैरुज ॥ ६ ॥ काल ॥ ७॥ महाकाल ॥ ७॥ असी- पत्रः ॥णा धनुषः ॥ १० ॥ कुंनः ॥ ११ ॥ वालु ॥ १२ ॥ वेतरणी ॥ १३ ॥ खरस्वर ॥ १४ ॥ महाघोष ॥१५॥ ए पनर परमाधामी ते असुरकुमार मां नव्या । हवे दस जातिना जनका तेहंना नाम कहेछे ॥ आणजनका ॥ १॥ पाणजनका ॥२॥ लयणजनका ॥३॥ सयण जंजका ॥ ४ ॥ वजनका ॥५॥ पुष्पजनका ॥६॥ फलजनका ॥७॥ वीयजनका ॥ सिधितिवा ॥ ५॥ सिकालएतिवा ॥६॥मुत्तितिबा ॥ ७॥ मुत्तालएतिवा ॥ ७ ॥ लोयगे- तिवा ॥ ए ॥ लोगथुजियातिवां ॥ १० ॥ लोगपमिवोहेतिवा ॥२१॥ सवपाणजुयजीवसत्त- सुहावहेतिवा ॥ १५ ॥ ए बार मोदना नाम कह्या ॥ ए नामवार किंचित्मात्र संपूर्ण ॥१॥ हवे चोविस ज्वार ते चोविस दंमक उपरें उतारवा ते कहे ॥ पेहलो नारकीनो दमक ॥ ते मांहे सरीर त्रण ॥ वैक्रेय ॥ तेजस ॥ कार्मण ॥ अवघेणा नवधारणि सरीरनी जण अंगुण असं ॥ ज० पांचसे धनुषनी ॥ अने उत्तरवैकेय सरीरनी ॥जण अंगुण संख्या॥ न हजार धनुषनी ॥ पेहेली नरके नवधारणी जण अंगुण असं० ॥ ज पोणा आठ धनुष ने उ आंगुलनी ॥ अने उत्तरवैकेय करे तोजण् अंगुण संख्या॥ ज साढापनर धनुष ने वार अंगुलनी ॥ बीजी नरके जण अंगुण असं० ॥ ज साढापनर धनुष ने बार अंगुलनी ॥ अने उत्तरवैक्रेय करे तो जण अंगुण संख्या॥ज सवाएकत्रिस धनुषनी॥त्रीजि नरकेज अंगुण असं ॥ उन सवाएकत्रिस धनुषनी ॥ अने उत्तरवैक्रेय करे तो जण अंगुण संख्या ॥ जप सामावासठ धनुपनी । चोथी नरके जण अंगुण असं ॥ उ सामावासठ धनुपन। ॥ अने सत्यवचनजोग ॥ १ ॥ असत्यवचनजोग ॥ २॥ मिश्रवचनजोग ॥ ३ ॥ व्यवहारवचनजोग ॥४॥ हवे सात कायाना कहे ॥ उदारिक ॥१॥ जदा रिकनो मिश्र ॥२॥ वैक्रेय ॥३॥ वैक्रेयनो मिश्र ॥ ४ ॥ आहारक ॥५॥ आहारकनो मिश्र ॥६॥ कार्मणकायजोग ॥ ७ ॥ एवं पनर जोग ॥ १७ ॥ उवयोग कहेता उपयोग वार ॥ पांच ज्ञान ॥ त्रणअज्ञान ॥ च्यार दर्शन ॥ एवं बार ॥१॥ तहाकिमाहारे कहेता ॥ तिमज अनुक्रमे आहार लीए ॥ जघन्य त्रण दिसनो ॥ उत्कृष्टो ब दिसनो ॥त्रण दिस ते कर॥ उंची नीची ने त्रीबी॥ ए त्रण दिशनो लीए ॥ बदिस ते कश् ॥ पूर्व ॥१॥ पब्मि ॥२॥ उत्तर॥३॥दक्षण ॥४॥ उंची॥५॥ नीची ॥६॥ ए ब दिसनो आहार लीए ॥ तथा वलि त्रण प्रकारनो आहार । सचेत ॥अचे- त ने मिश्र । उंज ॥१॥ रोम ॥२॥ कवलें ॥३॥ ए त्रण प्रकारनो आहार ॥१५॥ उववाय कहेताआवीने उपजे चोविस दमक नो ते आगल कहेवासे ॥२०॥ विश् कहेता. थिति जघन्य अंतर्मुहुर्तनी ॥ अने उत्कृष्टी तेत्रीस सागरोपमनी ॥ ते आगल कहेवासे ॥२१॥ समुहाए कहेता । समोहियामरण ॥२॥ असमोहियामरण ॥२॥ समोहियामरण ते केहने कहिये । सनि कहेता पहेली नरके संझी असंही वे होय॥वीजीथी मांझी सातमी नरक सुधी एकला संझी ॥ वेद एक नपुंसकवेद ॥५पर्या लाने ते नाषा मन नेला बांधे। अष्टी त्रण ॥ समकी- तदृष्टी॥ मिथ्यातदृष्टीसमा मिथ्यादृष्टी॥दर्शण त्रण॥चकुदर्शन।अचकुदर्शन । अवधिदर्शन। ज्ञान त्रण । मतिज्ञान । श्रुतझान ॥ अवधिज्ञान॥ अज्ञान त्रण ।मतिअज्ञान ॥ श्रुतअज्ञान। विनंग अझान ॥ जोग. ग्यार ॥ च्यार मनना। च्यार वचनना। त्रण कायाना ॥ ते वैक्रेय वैक्रेयनो मिश्र ने कार्मणकाय जोग ॥ एवं ग्यार जोग ॥ उपयोग नव ॥त्रण ज्ञान त्रण अज्ञान । त्रण दर्शन एवं नव ॥ तहा तेमज आहार लेतो जघन्य उत्कृष्टो र दिसनो। आहार ले ॥ ते वे प्रकारनो॥ ज आहार ने रोम आहार ॥ तेपण असुन ते अचेत ॥ उववाय ते आवीने उपजे पहेलीनकें वे दंगकना ते मनुष्य गर्जज ॥ ने तिर्यंचगर्नजने समुर्बिम ॥ ए वे दमकना श्राविने उपजे अने बीजीथी मामीने सातमी सुधी गर्नजतिर्यच ने गर्भज मनुष्यना आवी उपजे । स्थिति पहेली नरके जघन्य दस हजार वरसनी ॥ उत्कृष्टी एक सागरनी॥ वीजी नरके जग एक सागरनी ॥ ज त्रण सागरनी त्रीजी नरके ज० त्रणसागरनी ॥ ॥
संगण एक समचरंस संगण ॥ कषाय च्यारे पण देवताने लोन घणो ॥ संज्ञान्यारे पाण देवताने परिग्रह संज्ञा घणी । लेस्या च्यार कृष्णलेस्या । नीललेस्या । कापुतलेस्था । तेजुलेस्या । इंजी पांच ॥ समुद्घात पांच ॥ वेदनी कषाय मारणांतिक वैकेय ने तेजस संझी असंज्ञी बे जाणवा ॥ वेद वे स्त्री ने पुरुष । प्रजा ५ नाषामन लेला बांधे ॥ उष्टी त्रण ॥ दर्शण त्रण ॥ केवल दर्शन एक नही ॥ ज्ञान त्रण ॥ मति झान श्रुत ज्ञानने अवधि ज्ञान ॥ अज्ञान त्रण ॥ मतिअज्ञान । श्रुतअज्ञान ॥ विनंगअज्ञान ॥ जोग ग्यार ॥ च्यार मनना। च्यार वचनना त्रण कायाना । वैक्रेय वैकेयनो मिश्र ॥ कार्मण कायजोग । एवं इग्यार ॥ उपयोग नव ॥ त्रणं ज्ञान ॥त्रण अज्ञान ॥ त्रण दर्शन ॥ एवं नव ॥ तहा तिमज आहार ले। जघन्य ने उत्कृष्टो ब दिसनो आहार ले । वली चे प्रकारे आहार ले । उजाहार ने रोम आहार ॥ ते पण सुन्न ने अचेत आहार ॥ उबवाय ते आवीने उपजे वे दंगकनो॥ मनुष्यने तिर्यंचनो॥ स्थिति नबनपतिमां ददाण दिसना। असुरकुमारनी। ज दस हजार वरसनी ॥ जा एक सागरनी ॥ तेहनी ॥ देवीनी जण् दस हजार वरसनी। उ साढा त्रण पथ्योपमनी ॥ ॥
rama Lam. || कषाय च्यारे पास ढवतान लात वणा॥ सहान्यार पण ।
वाज ए च्यारेनी ॥ जघन्य ने उत्कृष्टी अंगुलनो असंष्यातमो नाग ॥ अने बनस्पतिनी
जघन्य अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥ उत्कृष्टी हजार जोजननी जाफेरी कमल प्रमुखनी ॥
संघेण एक बेवटु ॥ संगण एक हुंम । पांचे ना संगण कहेडे ॥ अथवीन संगण मसुरनी
दाल तथा चंडमाने आकारे ॥ १ ॥ पाणी, संगण पाणीना परपोटाने आकारे ॥२॥
तेउनुं संगण सोयना नाराने आकारे ॥३॥ वायरानुं संठाण धजापताकाने आकारे ॥ ४ ॥
वनस्पतिनुं संगणनाना प्रकारचें ॥५॥ कषाय च्यारे ॥ संज्ञा च्यारे ॥ लेस्या पृथवी पाणी
वनस्पीत ने अपर्याप्ता वेला च्यार पेहेली ॥ अने पांचे ने लेस्या त्रण पेहेली ॥ जी एक
कायानी । समुद्घात पृथवी पाणी तेल वनस्पीत ने ॥ ३ ॥ वेदनी कषायमारणांतिक ॥
अने वायराने समुद्घात च्यार वैक्रेयनी वधी ॥ संझी ते पांचे स्थावर असंझी ॥ वेद एक
नपुंसक ॥ पर्या च्यार ॥ आहार पर्या ॥ सरीरपर्या ॥ इंडीपर्या ॥ स्वासो स्वासपर्या ॥
अष्टीएकमिथ्यात ॥ दर्शन एक अचकुदर्शन । झान नथी। अझान बे। मतीअज्ञान ॥ श्रुत
अज्ञान । जोग पृथ्वी पाणी तेज वनस्पति ने त्रण ॥ उदारीक ॥१॥ उदारिकनो मिश्रः ॥२॥
२ ॥ नवः ॥ गेम ते मरीने पृथ्वी पाणी ने बनस्पति वे गतिमां जाय मनुष्य ने तिर्यंचमां ॥ अने तेज वाज: एकगतिमा जाय तिर्यंचमां ॥ आग ते आवे पृथ्वी पाणी ने वनस्पतिसा त्रण गतिनो आवे॥ देवता मनुष्यने तिर्यंचनो ॥ अने तेज वाउमां वेगतिनो आवे । मनुष्य ने तिर्यंचनो । प्राणः पांचे ने च्यार ॥ एकेंजिपणुं ॥१॥ कायवल ॥२॥ स्वासोस्वास ॥३॥ आउखु ॥ ४ ॥ जोग एक कायजोग ॥ इति पांच स्थावरना पांच दंगक संपूर्ण ॥ १६॥ हवे त्रण विगछियना ३ दंझक कहेले बेइंति ॥ तेरंजी॥ चोरिंजीमां सरीर त्रण ॥ उदारिक । तेजसः । कार्मण । अवघेणा बेइंजीनी जण अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥ ज वार जोजननी ॥ तेरिंजीनी जग अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥ जत्रण गाजनी॥चजरिंडीनी ज. अंगुलनो असंख्यातमो नाग । उ० च्यार गाउनी ॥ संघेण एक डेवटु ॥ संगण एक हुंग ॥ कषाय च्यारे ॥ संज्ञा च्यारे ॥ लेस्या त्रण पेहेली ॥ इंसी बेरिंजीने ॥ बे॥ काया ॥२॥ जिन ॥२॥ तेरिंडीने इंडी त्रण । नासिकावधी॥ चरिंडीने इंडीचार॥ आंख वधि॥ समु. दद्यात त्रण वेदनी कपायने मारणांतिक ए त्रण ॥.संझी के ते असंझी ॥ वेद एक नपुंसक ॥
m TrDMAAT TIM Chal.1 Tara nाती नकली अंगलनो असंष्यातमा नाग ॥ अने वनस्पतिनी ने मनुष्य ने त्रिजंघमां ॥ आग ते आवे पण बेगतिनो मनुष्यने त्रिचनो ॥ प्राण वेरिजी ने ब प्राण । बेसीना बे प्राण ॥ कायबल ॥ स्वासोस्वास ॥ श्राजखू । वचन । ए ब । तेरिंडी सात प्राण । ते नासिका वधी। चलरिजीने आठप्राण आंख वधी॥जोगवे ॥ वचनजोग ने । कायजोग ॥ इति त्रण विगोजीना त्रण दमक संपूर्ण ॥ १७ ॥ हवे विसमो तिर्यच पंचेंडीनो दंझक कहे। हवे पांचे समुर्बिमने सरीर त्रण ॥ उदारिक ॥ तेजस ॥ मे कार्मण ॥ अने गर्नजने च्यार सरीर वैकेय वध्युं ॥ अवघेणा पांचेनी कहे जे ॥ हवे जलचर समुर्छिम ने गर्नजनी । जण अंगु० असं ॥ ज० हजार जोजननी ॥ थखचर समुर्बिमनी ज० अंगुण असं ॥ ज० । प्रत्येक गाजनि ॥ गर्भजनी जण अंगुण असं०॥ उण्ड गाउनी। उरपर सर्प समुर्छिमनी जण अंगुण असं ॥ ज० प्रत्येक जोजननी ॥ अने गर्नजनी जग अंगुण असं ॥ न हजार जोजननी ॥ जुजपर समुर्बिमनी । ज० अंगुअसं ॥ ज प्रत्येक धनुषनी। गर्जजनी । ज० अंगुण असं० ॥ जप प्रत्येक गाउनी ॥ खेचर समूर्जिमने गर्नजनी जण अंगुण असं । जग प्रत्येक धनुषनी ॥ उत्तर वैकेय करे तो ॥ जण अंगुल संख्या० । ० नवसें ॥ अथ श्री नवतत्वना थोकडो ॥ 2772 श्रीपार्श्वनाथाय नमः ॥ अथ श्री नवतत्व लिख्यते॥ हवे विवेकि सम्यक्त्वदृष्टि जीवने । नव पदार्थ जेहवा । तेहवा । तथारूप बुद्धिप्रमाणे गुरु आम्नायथि धारवा ॥ ते नवपदार्थना नाम कहेठे ॥जीवतत्व ॥१॥ अजीवतत्व ॥२॥ पुण्यतत्व ॥ ३॥ पापतत्व ॥४॥ आश्रव तत्व ॥५॥ संवरतत्व ॥ ६ ॥ निर्जरातत्व ॥ ॥ वंधतत्व ॥ ७ ॥ मोहतत्व ॥ ए ॥ हवे जीवतत्व ते केहने कहिये ॥ चैतन्यलक्षण ॥ सदासउपयोगी ॥ असंख्यात प्रदेशी । सुख पुःखनो जाण ॥ सुखःखनो वेदक तेढ्ने जीवतत्व कहिये ॥ १ ॥ अजीवतत्व ते केहने कहिये जमलक्षण ॥ चैतन्यरहित ॥ तेहने अजीवतत्व कहिये ॥२॥ पुण्यतत्व ते शुन कमाणिये करी ॥ शुज कर्मने उदथे करी ॥ जेहना फल आत्माने नोगवतां मीनं लागे तेहने पुण्यतत्व कहिये ॥३॥ पापतत्व ते अशुन्न कमाणिये करी ॥ अशुन्न कर्मने उदये करी ॥ जेहना फल आत्माने नोगवता कवां लागे । तेहने पापतत्व कहिये॥॥ आश्रव- तत्व ते । अवतने आपच्चखाणे करी । विषय कषायने सेववेकरी ॥आत्मारूपतलावने विषे॥ रा "l.
वैकेय करे तो ॥ ज अंगुण संख्या ज. लाख जोजन काफेरी ॥ हेमवय रणवयमां ज० अंगु० असं ॥ ज एक गाउनी ॥ हरिवास रमकवासमां ॥ ज० अंगुण असं ॥ जप गाउनी । देवकुरु उत्तरकुरुमांज। अंगु० असं । जात्रण गाजनी॥ हवे उपन्न अंतर छिपामां ज अंगु असं ॥ज आठसें धनुषनी ॥ संघयण ॥ समुर्बिम ने एक वटु ॥ जुगलियाने एक बज्रषजनाराचसंघयण ॥ पन्नर कर्मजुमिना गर्नज मनुष्यने उ संघयण ॥ संगण समुर्बिमने एक हुंम ॥ जुगलियाने। एक समचउरंस ॥ कर्मजुमिना गर्नज मनुष्यने उ संगण । कषाय च्यारे पण मनुष्यने मानघणुं ॥ संझा च्यारे पण मनुष्यने मैथुन संझा घणी॥ लेस्यासमुर्बिमने त्रण पेहेली ॥ जुगलीयाने लेस्या च्यार पेहेली॥ गर्नज ने ब लेस्या। इंजी पांचे ॥ समुद्घात समुर्बिमने त्रण ॥ वेदनी कषाय ने मारणांतिक ॥ जूगलियाने समुद्घात त्रण तेहीज ॥ कर्मचुमीना गर्नज मनुष्यने ॥ सात समुद्घात ॥ समुर्बिम असंझी ॥ गर्नज संझी ॥ वेद समुर्बिमने एक नपुंसक ॥ जुगलियामां वेद बे । स्त्री ने पुरुष । कर्मनुमिना गर्नज मनुष्यमांत्रण वेद ॥ स्त्री पुरुष ने नपुंसक ॥ पर्या समुर्बिमने द ले उंज रोमने कवलः । ते पण सचेत अचेतने मिश्र ॥ उबवाय ते आवीने उपजे । समु. बिममा आठ दमकना ॥ पृथ्वी पाणी वनस्पति त्रण विगलेंडी ॥ मनुष्यने तिर्यंच ॥ ए आउनो ।। जुगलीयामां दमकनो ते मनुष्य ने तिर्यचनो ॥ गर्नज मनुष्यमां वाविस दंग- कना उपजे ते तेउ वाउना नही ॥ स्थिति समुर्बिमनी जघन्यने उत्कृष्टी अंतर्मुहूर्त्तनी ॥ गर्नजनी आरानी परे जाणवी ॥ पेहेले आरे बेसतां त्रण पट्योपमनी । उतरतां वे पट्यो- पमनी ॥ बीजे आरे बेसतां बे पट्योपमनी ॥ जतरतां एक पल्योपमनी ॥ त्रीजे आरे सतां एक पट्योपमनी ॥ उतरतां पूर्व क्रोमनी ॥ चोथे आरे बेसतां पूर्व क्रोमनी ॥ उतरतां सो वरस काफेरानी। पांचमे आरे बेसतांसोवरस काफेरानी जतरते आरे विस वरसनी॥बने आरे वेसतां वीस वरसनी । उतरते आरे सोल वरसनी॥ एम चमतां उतरतां अवला सवली जाणवी । हिमवय रणवयमा एक पट्योपमनी ॥ हरिवास रमकवासमां । बे पट्योपमनी॥ देवकुरू उतरकुरूमांत्रण पट्योपमनी । बपन्न अंतरछिपामां । पट्योपमनो । असंख्यातमो नाग । ५ महाविदेहमा पूर्व क्रोमनी ॥ समोदिया ने असमोहिया ए वे मरण ॥ चवण तेमज आहार जोग अगीयार ॥ च्यार मनना च्यार वचनना ॥त्रण कायाना ते वैक्रेय॥ वैकेयनो. मिश्रा कार्मण कायजोग । एवं अगीयार । उपयोग नव ऋणं ज्ञान ऋण अज्ञान । त्रण दर्शन ॥ एवं नव।। ले तो जघन्य ने उत्कृष्टो ब दिसनो ॥ तथा वे प्रकारे उज ने रोम ते पणा सुन ते पण अचेत आहार । उववाय ते अावीने उपजे वे दंझकना ॥ मनुष्यने तिर्य- चना । स्थिति वाणव्यंतरनी । जदस हजार वरसनी ॥ ज एक पट्योपमनी ॥ तेहनी देवीनी जप दस हजार वरसनी ॥ उ अरध पट्योपमनी ॥ समोहिया ने असमोहिया ए मरण डे ॥ चवण ते चविने जाय पांच दंकमां ॥ पृथ्वी पाणी ने वनस्पति मनुष्य तिर्यच ए पांच ॥ गइ ते मरीने वे गतिमां जाय ॥ मनुष्य ने तिर्यंचमां ॥आग ते आवे पण वेगतिना मनुष्य ने तिर्यचना ॥ प्राण दस ॥ जोग त्रण । मन वचन ने कायाना ॥ इति चाविसमो वाणव्यंतरनो दंगक-संपूर्ण ॥२२॥ हवे त्रेविसमो जोतिषीनो दंगक तेहमां सरीर त्रण ॥ वैकेय तेजस।ने कार्मण। अवघेणा जण अंगुण असं जा सातहाथनी अने उत्तर बैक्रेय करे तो ॥ ज० अंगुण संख्या ज । लाख जोजननी ॥ संघयण नथी ॥ संवाण एक जण पट्यनो आवमो नाग ॥ ज० पा पदयनी ॥ तारानादेवतानी ज० पट्यनो आठमो नाग। ज० पा पल्यनी ॥ तेहनी देवीनी ॥ ज पट्यनो आग्मो नाग ॥ ज० पट्यनो आवमो नाग काफेरी ॥समोहिया ने असमोहिया ए वे मरण २ ॥ चवण ते चविने जाय । पांच दंगकर्मा । पृथ्वी पाणी वनस्पति मनुष्य ने तिर्यंचमां ॥ गइ ते मरीने वे गतिमां जाय ॥ मनुष्य ने तिर्यंचमां ।. आग ते मनुष्य ने तिर्थचनो आवे ॥ प्राण दस ॥ जोग त्रण ॥इति त्रेविसमो ज्योतिषीनो दंरुक संपूर्ण ॥२३॥ हवे चोविसमो वैमानिकनो दमक ॥ तेहमां सरीर त्रण॥ क्रेय तेजस ने कार्मण ॥ अवघेणा सुधर्म शान ए वे देवलोके ज० अंगुण असंग ॥ जप सात हायनी। बीजे चोथे देवलोके छ हायनी ॥पांचमे बचे देवलोके पांच हाथनी ॥सातमे आठमे देवलोके.च्यार हायनी ॥ नवमे दशमे ग्यारमे । बारमे दे। त्रण हाथनी ॥ नव प्रैवेयकें वे हाथनी ॥ च्यार अनुत्तर विमानमा एक हाथनी ॥ सर्वार्थसीजमां मुंढा हाथनी॥ अने उत्तरवैकेय करे तो। बार देवलोक सुधी जरा अंगुण संख्या ॥ उत्कृष्टी लाख जोजननी॥ संघयण नयी ॥ संगण एक समचऊरंस ॥ कषाय च्यारे पण लोन घणो ॥ संझा चारे पण ॥३२ उत्कृष्टो दिसनोश्राहारले ॥ तथा ऋण प्रकारे आहार ले । उंज रोमने कवल आदार लें ते पण सचेत अचेतने मिश्र॥ उववाय ते । आवीने उपजे ॥ समुर्बिममां दस दमकना ॥ पांच स्थावर त्रण विगलेंजी ॥ मनुष्यने त्रिजंच ॥ गर्जजमां चोविसे दमकना आविने उपजे स्थिति जलचर समुर्बिमने गर्भजनी । जण अंत० । उ पूर्व क्रोमनी । थलचर समुर्बिमनी ज० अंत ॥ न चोरासी हजार वर्षनी । अने गर्नजनी जण अंत॥उत्रण पट्योपमनी ॥ जरपर सर्प समुर्बिमनी जा अंत । न त्रेपन हजार वरसनी ॥ अने गर्जजनो जण अंत ॥ उ पूर्वक्रोमनी ॥ जुजपर समुर्बिमनी । ज० अंत ॥ उ० बेतालिस हजार वरसनी अने गर्नजनी जण अंत । जप पूर्व क्रोमनी ॥ खेचर समुर्बिमनी ज0 अंत उ० बोहोतेर हजार वरसनी ॥ अने गर्नजनी जण अंत न पल्योपमनो असंख्यातमो नाग । समोहि- यामरण ने असमोहियामरण ॥ ए बे मरण ॥ चवण के चवीने ॥ समुर्बिम जाय तो वाविस दमकमां। जोतिषीने विमानीकमां जाय नही ॥ अने गर्नज चोविसे दंगकमां गश् ते समुर्बिम ॥ अने गळूज मरीने च्यार गतिमां जाय । ॥२ ॥ ब दिसनो तथा वे प्रकारे उंज ने रोम ते पण अचेत ने सुत्न आहार ॥ उववाय ते आवीन उपजे पेहेला देवलोकथी मामीने थाउमा देवलोक सुधी बे दंगकना मनुष्य ने तिर्यंचना । अने नवमेथी ते सर्वार्थसिद्ध लगे एक मनुष्यनो आवे ॥ स्थिति पेहेले देवलोके जघन्य एक पव्यनी ॥ जस्कृष्टी बे सागरनी ॥ तेहनी परिग्रहीत देवीनी ज० एक पट्यनी । उ० सात पल्यनी ॥ अने अपरिग्रहीत देवीनी ॥ ज एक पल्यनी । उ० पचास पट्यनी ॥ वीजे देवलोके जण एक पक्ष्यनी जारी ॥ ज बे सा काफेरी ॥ तेहनी परिग्रहीत देवीनी जण एक पदयनी जारी । उ नव पदयनी ॥ अने अपरिग्रहीत देवीनी ज० एक पक्ष्यनी काफेरी ॥ ज पंचावन पत्यनी ॥ त्रीजे देवलोके जण बे सा ॥ उ सात साग तिहां देवी नथी पण तेमावी जाय ॥ चोथे देवलोके ज वे सा जाफरी ॥ ज सात साए फाफेरी ॥ पांचमे देवलोके जण सात सा॥ उप दस सा॥ बठे देवलोके ज० दस सा जा चजद सा ॥ सातमे देवलोके जा चजद सा न सतरण सा ॥ आपमें देवलोके जप सतरण सा ॥ ज० अढार सा ॥ नवमे देवलोके । ज० अढार साप । ला miri एक दमकमां जाय मनुष्यमां ॥ गइ ते मरीने पेहेलाथी मामीने आवमा देवलोकना देवता बे गतिमां जाय । अने नवमाथी मामीने सर्वार्थसिक सुधिना एक मनुष्यनी गतिमा जाय। आग ते पेहेलाथी मांझीने आठमां देवलोक लगे वे गतिनो आवे । मनुष्य ने त्रिचनो । अने नवमाथी मामीने सर्वार्थ सिह लगे एक मनुष्य नो आवे ॥प्राण दस ॥ जोग त्रण ॥ इतिश्री चोविसमो वैमानिकनो दमक संपूर्ण ॥ २४ ॥ हवे सिझनो हार कहेठे। सीने सरीर नथी ॥ अवघेणा सीजनी अरूपि जीवना प्रदेशना बननी । जण एक हाथने आठ अंगुलनी । मझम च्यार हाथ ने सोल अंगुलनी। अने उत्कृष्टी त्रणसें तेत्रीस धनुष ने वत्रीस अंगुलनी ॥ सिहने संघयण नथी॥ सिसने संगण नथी । सिकने कषाय नथी । सिद्धने संझा नथी। सिकने लेस्या नथी॥ सिझने इंजीय नथी॥ सिझने समुद्रात नथी। सिद्धसंझी असंझी नयी ॥ सिडने वेद नथी । सिडने प्रजा नथी॥सिसम कितअष्टी डे॥ सिझने एक केवल दर्शन दे ॥ सिझने एक केवल ज्ञान ॥ सिझने अज्ञान नथी । सिझने जोग नथी। सिझने उपयोग वे ॥केवलझान। केवल दर्शन ॥ सिझने आहार नथी॥उववाय AGAR त पूर्वे १ए कह्या तेहमाथि ॥ १ खेचर वा । गत ४० नि पूर्ववत् ॥ ४ ॥ पांचमी नर्के आगत १७ नेदनि ते । पूर्वे १७ कह्या तेहमांथि ॥ १ थलचर वा ॥ गत नि पूर्ववत् ॥ ५ ॥ बठी नर्के आगत ॥ १६ ॥ नेदनि ते ॥ १७ ॥ पूर्वे कह्या तेहमा थि ॥ र उरपर वा ॥ गत ॥ ४० ॥ नि पूर्ववत् ॥ ६॥ सातमी नर्के आगत १६ नेदनि ते ॥१५॥ कर्मनूमी ने ॥ १ जलचरम ॥ ए १६ ना प्रजाता तेमां स्त्री वर्जीने । गत ॥ १० नेदनि ते ॥ ५ संझीतिर्थचना अप्रजासा ने प्रजातानि ॥ ॥ दश नवनपति ॥ १५ ॥ पर्माधामी ॥ १६ ॥ वाणव्यंतर ॥ १० ॥ जंनका । ए ॥ ५१ जातिना देवतामां ॥ आगत १११ नेद- नि ते ॥ १५१ क्षेत्रना संझीमनुष्य ॥ ५ संझीतिर्यच ॥ ५ असंझीतियच । ए २११ ना प्रजातानि । गत ४६ नि ते ॥ १५ कर्मनूमी ॥ ५ संकीतिर्यंच ए ॥ २० ॥ने पृथ्वी ॥२॥ पाणि ॥५॥ वनस्पति ॥३॥ ए ॥ २३ ॥ ना छाप्र ने प्रजातानि ॥॥ दस ज्योतषी ने पहिला देवलोकमां ॥ आगत ॥ ५० नेदनि ते ॥ १५ कर्मनूमी ॥ ५ संझी तिर्यंच ने ३० अकर्मजूमी। ए ५० ना प्रजाप्तानि । गत ॥ ४६ नि पूर्ववत् ॥ए॥ विजा देवलोकमां आगत जनका ॥ १० ज्यातष।। एवं ६१ ने ॥२ देवलोक ॥ एक किदिवषी॥ एवं ॥ ६४ ना प्रजा- प्तानि ॥ एवं १४३ नि ॥ गत १७ए लटनि ॥ १४ ॥ तेज ॥१॥ वाज ॥२॥ ए २ मां आगत ॥१७ए लटनि॥ गत ॥४७ नेदतिर्थचनी ॥१५॥ त्रण विगलेंजियमां आगत ॥रए लटनि । गत पण १७ए लटनि ॥ १६ ॥ असंझीतियंचमां आगत ॥ १७ए बटनी ॥ गत ॥३५ नेदनि ते॥५६ अंतरछिपा ने॥५१ जातिना देवता।ते॥१० जवनपति ॥१५ परमा- धामी ॥ १६ वाणव्यंतर ॥ १० जनका ए. ॥ ५१ जातिना देवता ॥ एवं सर्व मिलि १७ जेद थया अने ॥ १ पहिली नर्क ॥ एवं ॥ १०७ ना अप्र ने प्रजाप्ता एवं ११६ अने १७ए लट । सर्वमिली ॥ ३५ नेदनि ॥ १७ ॥ संझीतियंचमां आगत ॥ २६७ नेदनि ॥ ते ७१. नेद देवताना । ते एए मांहिथि ॥४ देवलोक ॥ ए. ग्रैवेयक ॥ ५ अनुत्तरविमान । ए॥१७ वर्ध्या ने १७ए लट । एवं सर्व मिलि ॥ २६० ने नर्कना प्रजाप्ता ॥ एवं ॥ २६७ नि ॥ पांचे त्रीयंचनी गत जुदी जुदी कहे जे ॥ जलचरनी ५२७ नी ते ५६३ मांहिथि नवमा देवलोकथी सर्वार्थ सिफ सुधि ॥ ए २७ ना अपने प्रजा एवं ३६ वा ॥ शेष ५२७ ते - ॥ १५ देवलोक ॥ए लोकांतिक ॥ ए ग्रैवेयक ॥ ५ अनुत्तर विमान । एवं ॥३५ ना अप्रणा प्रजाप्ता । एवं ॥50 नी ॥ ॥ श्रावकमां आगत ॥६॥दनि । ते । पूर्वे २७५ कह्या ते । अने॥ १ठी नर्कवधि । ए २७६ नि ॥ गत नेदनिते॥१२ देवलोक ने ॥ ए लोकां- तिक । ए २१ ना अप्र । प्रजाप्तानि ॥vण॥ समष्टिमां आगत ॥ ३६३ नेदनि ते ॥ एए जाति देवताना प्रजाता ॥ १०१ समुर्बिम मनुष्यना अप्रजाप्ता ॥ १०१ संझी मनुष्यना प्रजाप्ता ॥ २५ कर्मजूमीना अप्रजाप्ता ॥ ७ नरकना प्रजाप्ता ।अने ॥ तिर्यंचमांहिथि तेज वाजना ७ वा । शेष ४० रह्या ते । एवं सर्व थइने ॥ ३६३ नि ॥ गत २२२ नि ते ॥र जातिना देवता ते एए मांहीथिं १५ परमाधामि ने ३ किदिवषि ए १७ नेद वा ॥ ने १५ कर्मनूमी ॥५संझी तिर्यंच ने ६ नरक। एवं ॥ १०७ ना अपप्रजाप्ता बसें चन्द अने॥३ विगलेंजिना। अप्र । अने ॥ ५ असंझीतिर्यंचना अप्र० । एवं २२२ निः॥ ३० ॥ मिथ्यातिमा आगत ॥ ३७१ जेदनि ते। पूर्वे ॥ ३६३ कह्यां तेहमां तेन वाउना ॥७॥ वध्या ॥ गत ५५३ जेदनि ते ५६३ नेदमांदीथि॥ ५ अनुत्तर विमानना अप्र ने प्रजाप्ता । ए ॥ १० वा ।। शेप ५५३ ।
चकुदर्शनी ॥ १ ॥ अचकुदर्शिनी ॥ २ ॥ अवधि दर्शनी ॥३॥ केवलदर्शनी ॥४॥ तथा पांच
प्रकारे जीव ॥ एकेडिय ॥१॥ वे इंजिय ॥२॥ तेईजिय ॥३॥ चरिंजिय ॥४॥ पंचेंजिय ॥५॥
तथा । सजोगी॥१॥ मनजोगी ॥२॥ वचनजोगी ॥३॥ कायजोगी ॥४॥ अजोगी ॥५॥
तथा । ठ प्रकारे जीव ॥ पृथवीकाय ॥१॥ अण्काय ॥२॥ तेजकोय ॥३॥ वाउकाय ॥४॥
वनस्पतिकाय ॥ ५॥ त्रसकाय ॥ ६ ॥ तथा ॥ संकषायी ॥१॥ कोहकषायी॥२॥ मानक-
पायी ॥३॥ मायाकषायी ॥४॥ लोनकषायी ॥५॥ अकषायी ॥६॥ तथा सात प्रकारे
जीव । नारकी ॥१॥तिर्यच ॥ २ ॥ र्तियचणी ॥३॥ मनुष्य ॥ ४ ॥ मनुष्यणी ॥५॥
देवता ॥ ६ ॥ देवी ॥७॥ तथा। आठ प्रकारे जीव सलेशी ॥१॥ कृष्णदेशी ॥॥ निल-
लेंशी ॥ ३॥ कापुतलेशी ॥ ४ ॥ तेजुलेशी ॥ ५॥ पद्मलेशी ॥ ६॥ शुकललेशी ॥७॥
अलेशी ॥७॥ तथा नव । प्रकारे जीव ॥ पृथवी ॥१॥ अप ॥॥ तेज ॥३॥ वाज ॥४॥
वनस्पति ॥५॥ बेइंडिय ॥६॥ तेजिय॥॥ चरिंडिय॥७॥ पंचेंद्रिय ॥ ए॥ तथा दश
नेदे जीव ॥ एकेडिय ॥१॥ बेइंज्यि ॥२॥ ते इंजिय ॥३॥ चलरिंडिय ॥४॥ पंचेंजिय ॥५॥
॥ विचमां बे॥ तिहांसुधिसास्वादान समकित कहिय॥अने जीवारे धरतीये आवि पम्यु। तिबारे मिथ्यात्व ॥३॥ तिवारे गौतमस्वामि हाथ जोमि मान मोमि श्रीनगवंतने पुरता. हवा । स्वामिनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो ॥ तिवारे श्रीनगवंत कहे । कृष्णपदी हतो ते शुकलपदी थयो । अर्ब पुजल संसार जोगववो रह्यो । जिम को पुरुषने माथे लाख क्रोमनुं देणुं हतुं ते परदेश जश्ने कमाई आव्यो देणुं देतां एक अधेलिनु देणुं रघु तेहनुं व्याज थयुं । तेटलो संसार नोगववो रह्यो । सास्वादान समकित पांचवार आवे ॥२॥ हवे त्रिजा गुणगणानां लक्षण कहे जे ॥ त्रिजुं मिश्रगुणगणुं । ते बे वस्तु मिलिने मिश्र श्रीखंमनो दृष्टांत ॥ श्रीखंम जिम खाटो ने मिगे। मिठास समान समकित ने खटास समान मिथ्यात्व ॥ ते. जिनमार्ग पण रुमो जाणे तथा अन्य मार्ग पण रुमो जाणे जिम कोश्क नगर वाहिर साधु महापुरुष पधारया ॥ तेहने श्रावक वांदवा जाय ॥ तेहवामां मिश्रह- प्टिवालो मित्र मिल्यो॥ तिणे पुबयुं जे किहां जाओगे ॥ तिवारे श्रावक कहे जे । साधु महा पुरुपने वांदवा जश्येसै। तिवारे मिश्रदृष्टिवालो कहे ॥ एहने वांदे सुं थाय ॥ तिवारे KEE ०॥ ॥ दयोपशमावे । अनंतानुबंधि क्रोध ॥ १॥ मान ॥ २॥ माया ॥३॥ लोन ॥४॥ सम्यक्त्व- मोहनीय ॥५॥ मिथ्यात्वमोहनीय ॥६॥ मिश्रमोहनीय ॥७॥ ए ७ प्रकृतिने कांश्क उदय आवे तेहने कय करे ॥ अने सत्तामा दल बे तेहने उपशमावे तेहने दायोपशमसम्यक्त्व कहिये ॥ ते सम्यक्त्व असंख्याति वार आवे ॥ अने ७ प्रकृतिना दलने सर्वथा उपशमा- वे ढांके तेहने उपशमसम्यक्त्व कहिये। ते समकित पांच वार आवे ॥ अने ७ प्रकृतिना दलने सर्वथा दय करे तिवारे दायकसम कित कहिये ॥ ते सम्यक्त्व १ वार आवे ॥ चोथे गुणगणे आव्यो थको जीवादिक पदार्थ ॥अव्यथकि र क्षेत्रथकि कालथ कि ३ जावयकि४ नोकार- सी आदि बमासी तप जाणे सरदहे परुपे पण फरसि शके नहि ॥ तिवारे गौतमस्वामि हाथ जोमि मान मोमि श्रीजगवंतने पुबंता हवा ॥ स्वामिनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो ॥ तिवारे श्रीजगवंत कहे ॥ गौतम ते जीव समकिंतव्यवहारपणे शुक्र प्रवर्ततो ॥ ते जीव जघन्य त्रीजे नवे मोद जाय ॥ उत्कृष्टो पंदर जवे मोद जाय ॥ वेदक समकित एकवार आवे ॥ एक समयनि स्थिती छे । पूर्वे जो आयुष नो वंध पमथो न होय तो ॥७॥बो- कारसी आदि देश्ने उमासीतप जाणे सरदहे परूपे शक्तिप्रमाणे फरसे । एक पञ्चरत्राणथि मांमिने ॥१५ व्रत ॥११ श्रावकनि पमिमां आदरे जावत् संलेखणासुधि अनशन करि आराधे तिवारे गौतमस्वामी हाथ जोमि मान मोमि श्रीनगवंतने पुरताहवा । ते जीवने सुं गुण निपनो । तिवार श्रीनगवंते कह्यं ॥ ज त्रिजे नवे मोद जाय॥॥१५ नवे मोद जायज पहिले देवलोके उपजे ॥ उत्॥ १५ मे देवलोके उपजे। तेने साधुना व्रतनि अपेदाये देशविरति कहिये॥पण परिणामथि अवतनि क्रिया उतरि ग ॥ अल्पश्वा ॥ अल्प आरंन ॥ अल्प परिग्रही ॥ सुशिल । सुवति ॥ धर्मिष्ट । धर्मवति । कल्पग्रविहारी । महासंवेगविहारी ॥ उदासी ॥ वैराग्यवंत ॥ एकांतआर्य ॥ सम्यगमार्गी॥सुसाधु । सुपात्र ॥ उत्तम । क्रियावादि। आस्तिक्य । आराधक। जैनमार्गप्रन्नावक ॥ अरिहंतना शिष्य वर्णव्याडे । गीतार्थ जाणे॥ सिद्धांतनि शाख ठे । श्रावकपणुं । एक नवमां प्रत्येक हजारवार आवे ॥ ५॥ प्रमत- संजतिगुणगणुं तेहनुं सुं लक्षण ॥ २५ प्रकृतिने दयोपशमावे ते ११ प्रकृति पुर्वे कहि ते अने पच्चखाणावरणीय क्रोध ॥१॥ मान ॥२॥ माया ॥३॥ लोन ॥॥ एवं ॥ २५ प्रकृतिने पंचमा नणिया। एए पंच पमाया। जोवापमंति संसार ॥२॥ ए ॥ ५॥ प्रमाद बांझे अने १६ प्रकृतिने उपशमावे ॥१५॥ पूर्वे कहि ते अने संजलनो क्रोध । एवं १६ ॥ प्रकृतिने क्षयोप शमावे ॥ तेहग्ने सुं गुण निपनो। ते जीव जीवादि पदार्थ व्यथि क्षेत्रथि कालथि जावथि तथा नोकार सि आदि देश्ने उमासी तपध्यान जुगतपणे जाणे सरदहे परुपे फरसे । ते जीव जघन्य। तेज नावे मोद जाय ॥ उत्कृष्टो त्रिजे नवे मोद जाय ॥ गति तोप्राये कल्पा- तीतनि थाय ॥ ध्यानने विषे ॥ अनुष्टानने विषे । अप्रमत्त उद्यत थका रहे । तथा शुन लेश्यापणेज करिने नयि प्रमत्त कषाय जेहने तेहने अप्रमत्त संजतिगुणगणुं कहिये ॥आठ- मुं नियहि वाद्रगुणगणुं तेहलुं सुं लक्षण ॥ २७ प्रकृति ने क्षयोपशमावे॥ १६ पूर्वे कहि ते। अने संजलनो मान । ए॥१७॥ प्रकृति ने दयोपशमावे। तिवारे गौतमस्वामी ।हाथ जोमि मान मोमि । श्रीनगवंतने पुढता हवा । स्वामीनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो। तिवारे श्रीनगवंते कयुं ॥ परिणामधारा । अपूर्व करण ॥ जे कोश् काले जीवने कोइ दिने याव्यु नथि । ते श्रेणि जुगत जीवादिक पदार्थ । व्यथि। देवथि कालथि लावति । नो पर पांच, देश विरति गुण ॥ ५॥ तुं प्रमत्तसंज त गुण ॥ ६॥ सातमुं अप्रमत्तसंजति गु० ॥७॥ आठमुं नियहिबादर गु० ॥ ॥ नवमुं अनियट्टिवादर गु० ॥ ए ॥ दशमुं सुदम- संपराय गु० ॥ १० ॥ श्ग्यारमुं उपशांतमोह गु० ॥११॥ बारमुं दिणमोह गुण ॥ २ ॥ तेरमुं. सजोगि केवलि गुण ॥ १३ ॥ चउदमुं अजोगि केवलि गुणगणुं । ए नामहार समाप्त हवे लदणगुणधार कहे जे ॥ पहेला मिथ्यात्व गुणगणाना लक्षण कहे ॥ श्रीवीतरांगनि वाणिथि उबुं। अधिक । विपरीत शर्बहे परुपे फरसे तेहने मिथ्यात्व कहिये । बि परुपणा ते केहने कहिये । जिम कोइ कहे जे जीव अंगुग मात्र ले । तंमुल मात्र डे ॥ शामा मात्र दीपक मात्र बे तेहने उलि परुपणा कहिये ॥२॥ अधिकी परुपणा ते केहने कहिये ॥ एक जीव सर्व लोक ब्रह्मांम मात्रमा व्यापि रह्यो । तेहने अधिकी परुपणा कहिये ॥२॥ वि- परीत. परुपणा ते केहने कहिये ॥ कोइ कहे जे पंच नूत थकि आत्मा उपनो ॥ अने एहने विनाशे जीव पण विणशे ॥ ते जम । ते थकि चैतन्य उपजे विणशे। श्म कहे तेहने वि- परीत परुपणा कहिये ॥३॥ ए मीथ्यात्व श्म नव पदार्थy विपरीतपणुं सरदहे परुपे फरसे बे एण० ४३॥ ॥ प्रकृति पुर्वे कहि ते अने संजल नि माया ॥ १॥ स्त्रीवेद ॥२॥ पुरुषवेद ॥३॥ नपुसक वेद ॥ ४ ॥ एवं ॥ २१ ॥ प्रकृतिने दायोपशमावे ॥ तिवारे गौतमस्वामि हाथ जोमी मान मोमी श्रीनगवंतने पुनता हवा । स्वामिनाथ ते जीवने सुंगुण निपनो ॥ तिवारे जगवते का । ते जीव जीवादिक पदार्थ तथा नोकारसी आदि देश्ने बमासी तप ॥ अव्यथि देवधि : कालथि नावधि निर्विकार अमायी ॥ विषयनिरवंतापणे । जाणे सरदहे पझपे फरसे ते जीव ॥ जघन्य नेज नवे मोदाजाय । उत्त । त्रीजे नवे मोदा जाय ॥ हवे अनियहि बादर ते । सर्वथा कारे निवयों नथि अंश मात्र हजि बादरसंपराय क्रिया रहि माटे अनियहिवादर गुणगाणं कहिये ॥ तया अानमा नवमा गुणगणाना शब्दार्थ घाणा गनिर ठे ॥ ते अन्य पंचसंग्रहादिक ग्रंथ तथा सिंहांतथि समजवा ॥ ॥ ॥ दशमुं सूदम संपरायगुणगाणुं तेहy सुं लक्षण ॥ २७ प्रकृति ने क्षयोपशमावे ॥ २१ प्रकृति पूर्वे काहि ते अने । हास्य ॥१॥ रनि ।। २॥ अरति ॥३॥ नच ॥४॥ शोक ॥५॥ गंठा ॥६॥ एवं॥ २ प्रकृति ने दयो- पशमात्र ॥ तिवारे गौतमस्वामि हाथ जोमि मान मोमि ॥ श्रीनगवंतने पुठता हवा स्वामि SALAM . ३॥ प्रकृति पुर्वे कहि ते अने संजलनि माया ॥ १ ॥ स्त्रीवेद ॥ २॥ पुरुषवेद ॥ ३॥ नपुसक वेद ॥ ४ ॥ एवं ॥ २१ ॥ प्रकृतिने दायोपशमावे ॥ तिवारे गौतमस्वामि हाथ जोमी मान मोनी श्रीनगवंतने पुबता हवा । स्वामिनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो ॥ तिबारे जगवते का । ने जीव जीवादिक पदार्थ तथा नोकारसी आदि देश्ने बमासी तप ॥ अव्यथि क्षेत्रथि कालथि नावधि निर्विकार असायी॥ विषयनिरवंगपणे । जाणे सरदहे पझपे फरसे ते जीव ॥ जघन्य लेज नवे मोदजाय । उत्त । त्रीजे नवे मोद जाय ॥ हवे अनियहि बादर ते । सर्वथा प्रकारे निवत्या नथि अंश मात्र हजि वादरसंपराय क्रिया रहि माटे अनियट्टिवादर गुणगणुं कहिये ॥ तथा अाउमा नवमा गुणगणाना शब्दार्थ घणा गंजिर ठे ॥ ते अन्य पंचसंग्रहादिक ग्रंथ तथा सिंहांतथि समजवा १ ॥ ॥ दशमुं सूदम संपरायगुणगाणुं तेहy सुं लक्षण ॥ २७ प्रकृति ने दयोपशमावे ॥ ५१ प्रति पूर्वे कहि ते अने । हास्य ॥ १ ॥ रति ॥ २ ॥ अरति ॥३॥ जय ॥४॥ शोक ॥५॥ गंगा ॥६॥ एव। २७ प्रकृति ने दायो- पक्षमावे ॥ तिबारे गौतमस्वामि हाथ जोमि मान मोमि ॥ श्रीनगवंतने पुतता हवा स्वामि ॥ पछि पमे दशमांथि पमे तो पहिला गुणगाणासुधि जाय । पण इग्यारमेथि चढवू तो नथि। उपशांत ते उपशम्यो के मोह सर्वथा जले करिअग्नि जलव्यानिप.रे टाल्यो नहि ढाक्योठे माटे नपशांतमोह गुणगणुं कहिये ॥११॥ बारमुं कोणमोह गुणगणुं तेहy मुलकण जे ॥ शत प्रकृति ने सर्वथा खपावे । हपकश्रेणि। दायकनाव । दायक समकित ॥ दायकजयाख्या- तचारित्र ॥ करणसत्य । जोगसत्य । नावसत्य अमायी पकषायी वीतरागी ।नावनिग्रंथ। संपूर्ण संबुम ॥ संपूर्ण जावितात्मा ॥ महातपस्वी । महा सुशिल । अमोही। अविकारी । महाझानी ॥ महाध्यानी ॥ वर्षमान परिणामी । अपमिवाश्थश्वेतर्मुहुर्त रहे । ए गुणठाणे काल करवो नथि। पुनर्नव ने नहि । हले समये पांच ज्ञानावरणिय ॥ नव दर्शनावरणिय ॥ पंचविध अंतरायदयकरणोद्यमकरि॥ तेरमा गुणगणाने पहिले समये दयकरि। केवल ज्योति प्रकटे माटे कोणतेदायकरयोठे मोहसर्वथाजेगुणगाणे तेहने की णमोह गुणगणुं कहिये ॥२॥ तेरसुं सजोगी केवलि गुणगणुं तेहy सुं लक्षण । दश बोल सहित तेरमे गुणगणे विचरे ॥ सजोगी ॥२॥ सशरिरी ॥२॥ सलेशी ॥३॥ शुकललेशी ॥ ॥ जथाख्यातचारिन ॥५॥ AAVA
नाम ॥ ३॥ गोत्र ॥४॥ ए॥ ४॥ कर्म दीण करिने मुक्तिपद पामे ॥ शरिर नदारिक ।
तेजस कार्मण। सर्वथा गमिने समश्रेणि जुगति अन्य आकाशप्रदेशने अवगाहतो अणफर-
सतो । एक समय मात्रमां। उहंगति ।अविग्रहगतिये तिहां जाय। एरंगवीज बंधन मुक्तवत् ।
निर्लेप तुंबिवत् । कोदंग मुक्तवाणवत्॥धनवह्निमुक्तधुवत् । तिहांसिकोत्रे जश् साकारो
पयोगे सिफ थाय । बुद्ध थाय॥पारांगत थाय। परंपरगत थाय । सकल कार्य अर्थसाधि ॥
कृतकृतार्थ । निष्टितार्थ । अतुल शुखसागर निर्मग्न ॥ सादिअनंत जागे सिझ थाय ॥ ए सिद्ध
पदनो नावस्मरण ॥ चिंतन मनन कदा काले मुझने होशे । सो घटि पल धन्य सफल
होशे ॥ हवे अजोगी ते । जोगरहित केवलसहित विचरे ॥ तेहने अजोगी केवली गुणगणुं
कहिये ॥ १४ ॥ इति लक्षण गुणहार बीजो संपूर्ण ॥५॥ हवे त्रिजो स्थितिहार कहेठे॥
पहिला गुणगाणानि स्थिति ३ प्रकार नि ठे ॥ अणादिया अपंडावसिया ते जे मिथ्यात्वनि
आदि नथि ने अंतपण नथि ते अन्नव्यजीव ना मिथ्यात्व आश्रि॥१॥अणादिया सपजाव-
सिया ते जे मिथ्यात्वनि आदि नथि पण अंत ते नव्यजीवना मिथ्यात्व आश्रि ॥ ५॥
- - हवे चोथो क्रियाछार कहे । पहिले ने विजे गुणगाणे ॥२४॥ क्रिया लाने । इरियावहिया क्रिया वर्जिने ॥ विजे। चोथेगुण ॥ २३ क्रिया लाने रियावहिया ॥ १॥ ने मिथ्यात्वनि ॥२॥ ए॥२॥ वर्जिने ॥ पांचमे गुण ॥ २२ क्रिया लाने मिथ्यात्व ॥१॥अविरति ॥२॥ इरियावहिया ॥३॥ ए ॥३॥ वर्जिने ॥ठे गुणगणे ॥ २॥ क्रिया। आरंनिया ॥ १ ॥ मायावत्तिया ॥२॥ ए॥२॥ लाने । सातमे गुणगणेथी त दशमा गुणगणा सुधा ॥१॥ मायावत्तिया क्रिया लाने ॥ ग्यारमे वारमे तेरमे गुणगणे ॥१॥ इरियाव दिया क्रिया लाने । चन्दमे गुण को क्रिया लाने नहि ॥इति ४ थो॥ क्रियाहार समाप्तं ॥४॥ हवे पांचमो सत्ताधार कहेठे ॥ पहिलागुणगणाथिते ग्यारमा गुणगणा सुधि। आठ कर्मनि सत्ता । बारमे ॥७॥ कर्मनि सत्ता ? मोहनियकर्म वर्जिने ॥ तेरमे चउदमे गुण ॥॥कर्मनि सत्ता। वेदनीय ॥१॥ आयुष ॥२॥नाम ॥३॥ गोत्र ॥४॥इति पांचमो सत्ताहार समाप्तं ॥ ५ ॥ हवे हो बंधहार कहेले ॥ पहिला गुणगणाथि ते सातमा गुणगणासुधि त्रिजु गुणगणुं वर्जिने ॥ कर्म बांधे । अने जो ॥ ७ बांधे तो आयुष वर्जिने । त्रिजे आग्मे न- MUVA सठ नेद जीवना कहे ते ॥ तेहमांत्रणसेनेत्रणनेद मनुष्यना ॥ एकसोअगणुनेद देवताना॥ अमतालीस लेद तिर्यचना ॥ चन्दनेद नारकीना ॥एवं ॥५६३॥ नेद जीवना कह्या ॥ हवे तेहमां॥ मनुष्यना ॥३०३॥ जेद कहे ॥ ते ॥१५ कर्म चूमिना मनुष्य ॥३०॥ अकर्मनूमिना मनुष्य ॥ ५६ ॥ अंतर छिपना मनुष्य ॥ एवं ॥ १०१ क्षेत्रना गर्नज मनुष्यना ॥ अप्रजाप्ता ने प्रजाप्ता ॥ एवं ॥२०॥ ने एकसोने एक देवना समुर्बिम मनुष्यना अप्रजाप्ता एवं ॥३०३ नेद मनुष्यना ॥ हवे कर्मचूमि ते केहने कहिये ॥ असी ॥ १ ॥ मसी ॥२॥ कृषी ॥३॥ ए ॥ ३ ॥ प्रकारना व्यापारे करी जीवे तेहने कर्मचूमिनां मनुष्य कहिये ॥ ते कर्मचूमिना देत्र केटलाठे ॥५॥ चरत ॥५॥ इवत ने ॥ ५ महाविदेह । एवं ॥१५॥ ते कर्मचूमि किहां ठे ॥ एकलाख जोजननो जंबुछिप डे ॥ तेहमां ॥१॥नरत ॥ १॥ श्रवत ॥१॥ महाविदेह ए ॥३॥ देत्र कर्मचूमिनां जंबुहिपमा डे ॥ तेहने फरतो ॥ वे दाख जोजननो लवण समुख ठे ॥ तेहने फरतो चारलाख जोजननो धातकीखंमछिप ॥ तेहमां ॥२॥ नरत ॥ ५ ॥ रवत ॥ २ ॥ महाविदेह ठे ॥ तेहने फरतो ॥॥ लाख जोजननो । कालोदधि समुह ठे॥ IR ILIHIT . . हि॥ ताफ्नो तिहाँ टाढनो नहिचालवानो तिहां वेसवानी नहि ॥ वेसवानो . " चालवानी नहि ॥ दशमे ग्यारमे बारमे ॥१४॥ परिसह लाने॥याउ जे मोहनीय कर्मने उदये हता ते वा ॥ ते कहे ॥ अचेलनो ॥१॥ अरतिनो ॥ २ ॥ स्त्रीनो ॥ ३॥ वेशवानो ॥ ४ ॥ आक्रोशनो ॥ ५॥ मेलनो॥६॥ सत्कार पुरस्कारनो ॥७॥ ए ॥ चारित्र मोहनीय कर्मने उदय हता ते ॥ ने ७.मो दंशण परिसह दर्शन मोहनीयने उदय हतो ते ॥ ए ७ वर्जिने शेष ॥१४ रह्या ते माहिला एक लमये ॥१२ वेदे॥टाढनो तिहां तापनो नहि । तापनो तिहां टाढनो नहि ॥चालवानो तिहां स्थानकनो नहि । स्थानकनो तिहां चालवानो नहातेरमे चउदभे गुणगणे ॥ ११ परिसह लाने ॥ पूर्वं ॥ १४ कह्या तेहमांथि ॥ प्रज्ञानो ॥ १ ॥ अज्ञाननो ॥ २॥ ॥ २ झालावरणियः कर्मने उदय हता ते. ॥ अने ॥१अलाननो अंतराय कर्मने उदय हतो ते। ए ३ वर्जिने शेष ११. रह्या ॥ ते माहिला.॥१ समये ए वेदे ॥ टाढनो तिहां तापनी नहि। तापनो तिहां टाढनो नहि। चालवानो तिहां स्थानकनो नहि। स्थानकनों तिहां चालवानो नहि ॥ इति १३ मा परिसहछार समाप्त ॥ १३॥ हवे ॥ १४ मो मार्गणांछार - 2
क्रोमि लाने माटे॥६॥ तेथि पांचमा गुणगणावाला असंख्यातगुणा। तिर्यंच श्रावक जल्या
माटे ॥७॥ तेथि बिजा गुणगणावाला असंख्यातगुणा ४ गतिमा लाने माटे ॥ ७ ॥ तेथि
त्रिजा गुणगणावाला असंख्यातगुणाध गतिमा विशेष डे माटे॥॥ तेथी चोथा गुणगणा
वाला असंख्यातगुणा घणि स्थिति ले माटे॥१॥तेथि चौदमां गुणगणावाला ने सिझनग-
वंतजि अनंतगुणा ॥११॥ तेथि पहेला गुणगणावाला अनंतगुणा एकेंख्यि प्रमुख सर्व मिथ्या-
दृष्टि माटे ॥१२॥ इति २२ मो अल्पबहुत्वंहार समाप्तं ॥२२॥ इतिगुणगणाना २२ द्वार
समाप्तं ॥ हवे नाव ६ कहेडे ॥ उदयनाव ॥१॥ उपशम नावं ॥ २॥ दायकन्नाव ॥३॥
दयोपशमन्नाव ॥४॥ परिणामिकत्ताव ॥५॥ सन्निवाश्नाव ॥६॥ हवे उदयत्नावनामा ॥२॥
नेद ॥ जीवउदय निष्पन्न ॥ १॥ ने आजीवउदय निष्पन्न ॥२॥ जीवउदयनिष्पन्नमा ॥ ३३
बोल पामे ॥४॥ गति ॥६॥ काय ॥६॥ लेश्या ॥४॥ कषाय ॥३॥ वेद । एवं ॥ २३ ने
मिथ्यात्व ॥१॥ अज्ञान ॥२॥ अविरति ॥३॥ असंझिपणुं ॥४॥ आहारकपणुं ॥५॥
ठद्मस्थपणुं ॥ ६॥ शजोगिपणुं ॥७॥ संसार परियणा ॥Gअसिझ॥णाअकेवलि ॥१॥
प्रथमना ॥३अज्ञान ॥ ३ दर्शन ॥ ३ दृष्टि॥४ चारित्र प्रथमना ॥१चरिसाचरित ते श्रावकपणु पामे ॥१ आचार्यगणिनि पदवी ॥१ चौद पूर्व ज्ञाननी प्राप्ति ॥५ इंडिया निवधि ॥५ दाना- दिलब्धि । एवं सर्व मिली ॥३० बोल ॥४॥ हवे परिणामिक नावनाना र नेद। सादिपरि- णामिक ॥१॥ अनादिपरिणामिक ॥२॥सादि विणशे॥अनादि विणशे नहि । सादिपरि- णामिकना अनेक नेद । जुनी सुरा मदिरा जुनो गोल तंदुल ए आदि ०३ बोल नगवतीनि शाखे ठे॥अनादिपरिणाभिकनावना १० ॥ बोल ॥धर्मा स्तिकाय ॥ १ ॥ अधर्मा स्तिकाय ॥२॥ आकाशास्तीकाय ॥३॥ पुजलास्तिकाय ॥४॥ जीवास्तिकाय ॥५॥ काल ॥६॥ लोक ॥७॥ अलोक ॥७॥ नव्य ॥ ए॥ अनव्य ॥ १० ॥ एवं १० ॥५॥ हवेसन्निवाश्ना- वना २६ नांगा ॥ १० ॥ हिकसंजोगीना १० ॥ त्रिकसंजोगीना ॥ ५ चोकसंजोगीना ॥१ पंचसंजोगिनो । एवं २६ नांगा। एहनो विचार श्रीअनुयोगहार सिद्धांतथि जाणवो ॥६॥ हवे ॥ १४ गुणगणा उपर ॥ १० देपकछार उतारेले । तेहमां प्रथम हेतुधार कहे ॥ २५ कपाय ॥ १५ जोग॥ एवं ४ ने ॥ ६ काय॥५इंडिय॥ १ मन॥ ए १२ अवत। एवं ५२ ने ५ २५ हेतु ॥७॥ नवमे गुण० १६ हेतु ते पूर्वे २२ कह्या तेहमांथि । हाश्य १ ॥ रति ५॥ अरति ३॥ नय ४ ॥ शोक ५॥ गंगा ६॥ एब वा । शेष १६ हेतु ॥ए॥ दशमे गुणण १० हेतु ते ॥ ए जोग ने ॥ १ संजलनो लोन । एवं १० हेतु ॥ १० ॥ग्यारमे वारमे गुण ॥ए हेतु ते ए जोग जाणवा ॥ ११ ॥ १२ ॥ तेरमे गुण ७ हेतु ते ७ जोग जाणवा ॥ १३॥ चौबे गुण हेतु नथि ॥१४॥ इति पहिलो हेतुछार समाप्त ॥१॥ हवे बीजो दंगक छार कहे । पहिले गुण २४ दमक । बिजे गुण १ए दंगकते ५ स्थावरना वा । विजे चोथे गुण १६ दमक ते ३ विकलें जिय वा । पांचमे गुण ५ दंगक संझिमनुष्य १ संझितिर्यंच ॥२॥ ए २ ॥ गथि ते चौदमा गुणग सुधि १ मनुष्यनो दमक । इति २ दमकछार समाप्त ॥२॥ हवे त्रिजो जीवाजोनिद्वार कहेडे । पहेले गुण ८४ लाख जीवा जोनि ॥ बिजे गुण ३२ लाख ते एकेंछियनि वर्जि ।। विजे चोथे गुण २६ लाख जीवा जोनि ॥पांचमे गुण ॥१७ लाख जीवा जोनि । उगथि ते २४ मा गुणगणासुधि १४ लाख जीवा जोनि । इति त्रिजो जोनिधार समातं ॥३॥ हवे ४ थो अंतरद्वार कहे। पहिले गुणप जघ० अंतरमुहूर्त्तउत्० ६६ ... 411 . म ॥२॥ आयुष ॥ १ ॥ मोहनीय ॥२॥ वेदनीय । ए ३ वर्जिने । तया शनि करें तो। गोत्र ॥॥ ए २ निातेरमे गुणगणे ॥२ कर्मलि.उदीरणा । नाम ॥१॥ गोत्र ॥२॥ ए २ नि॥ चउदमे गुण उदीरणा करे नहि ॥ इति ॥ ए॥मो उदीरणाहार समातं ॥ ए॥ चेवक निश्चे ॥ हवे ॥ १॥ मो निर्जराछार कहे ॥ पहिलाथि ते ११ मा गुणगणा सुधि ॥ ७ कर्म नि निर्जरा ॥ बारमे ॥ ७ कर्मनि निर्जरा मोहनीय वर्जिने ॥ तेरले चउदमे ४ कर्मनि निर्जरा। वेदनीय ॥१॥ आयुष ॥२॥ नाम ॥३॥ गोत्र ॥४॥ ए ४ नि । इति ॥ १७ मो निर्जराहार समाप्तं ॥ १० ॥ हवे ग्यारमा नावहार कहे जे ॥ उदयत्नाव ॥ १ ॥ उपशमन्नाव ॥२॥ दायकनाव ॥ ३ ॥ दयोपशमन्नाव ॥४॥ परिणामिकन्नाव ॥५॥ संनिवाश्नाव ॥६॥ पहिले ने विजे गुणगणे ॥ ३ नाव । उदय ॥१॥ योपशम ॥२॥ परिणामिक ॥ ३ ॥ विजे गुण चोथे गुण पांचमे गुण बठे गु० सातमे गुण आठमेथि ते ग्यारसा गुणवाणा सुधि उपशम श्रेणिवालाने ॥ ४ नाव उदय ॥ १ ॥ उपशम ॥५॥ क्षयोपशम ॥ ३॥ परिणा- मिक ॥ ४ ॥ तथा कोश्क उपशमने ठेकाणे दायकपण कठे ॥ अने उ माथि मांमिने ।।
S ते इग्यारमा गुणगाणावाला अघोगाम विजयथि ५ अनुत्तर विमानसुधि फरसे ॥ बार, गुण लोकनो असंख्यातमो नाग फरसे। तेरमुं गुण सर्व लोक फरसे । चौदमुं गुण लो- कनो असंख्यातमो नाग फरसे ॥ इति ६ ठगे फरसनाहार समाप्तं ॥ ६॥ हवे तिर्थंकर गोत्र ४ गुणगणे बांधे ॥ चोथे पांचमे ठे ने सातमे ॥ ए ४ गुणगणे बांधे । शेष गुण- गणे न बांधे ॥ तिर्थकर देव ए गुणगणा फरसे ते । ४।६।७।७। ए । १० । १२ । १३ ॥ १४ ॥ ए ए फरसे इति । मो छार समाप्तं ॥ ७॥ गुणगणा १४ मां।१।४।५।६। १३ । ए ५ शास्वता । शेष ए गुण अशास्वता।इति आठमो घार समां ॥॥ गुणगणा १४ मा ।१।।३।४।५।६।७। ए ७ गुण ६ संघयण । आउमाथि ते १४ मा गुणगणा सुधि एकवज्रऋषन नाराचसंघयण । इति ए मोछार समातं ॥ ए॥ आर्याजी ॥१॥अवेदि ॥ ५ ॥ परिहार विशुद्धचारित्रवंत ॥ ३ ॥ पुलाक लब्धिवंत ॥ ४ ॥ अप्रमादि साधु ॥५॥ चौद पुर्वी साधु ॥ ६॥ आहारकशरीरि ॥ ७॥ ए॥ ७॥र्नु कोइ देवता साहारणकरि शके नहि। इति १० मोछार समाप्तं ॥२॥ इति १० देपक हार समातं इति गुणगणाधार समाप्त। ।
३तिर्यचणीमांजीवनानेदश् सझानाअप्र० ने प्रजाप्तो गुण ५ प्रथमनाजोग१३॥ज- पए ज्ञान ३अज्ञान३ दर्श०३ ॥लेशा ४ मनुष्यनि गतिमा जीवना नेद ३संझीनो अप्र ने प्रजातो॥२॥ समुर्बिम मनुष्य असंझीनो अप्र॥ ३॥ ए ३॥ गुण १४ । जोग० १५॥ उप०१२। लेशा ६॥ ५ मनुष्यणीमा जीवना जेद २ संझीना ॥ गुण १॥जोग १३ आहारकना ३ वर्जिने ॥ जप० १२॥ लेशा ६ ॥ ६ देवतानि गतिमांजीवना नेद ३ संझीनो अप्र०१ ने प्रजातोश्यसंझीनो अप्र०३॥ गुण०४ पहिला॥जोग २१॥४ मनना ४॥ वचनना। २ वैक्रयना॥१ कार्मणनो ॥ एवं ११॥जप- ए लेशा ६॥. ७ देवांगनामां जीवनानेद संझीनो अप्र- जातो॥ने प्रजातोगुण ४प्रथमना। जोग ११।४ मनना ४ वचनना ॥२ वैके- यना ने १ कार्मणनो॥एवं ११॥ उपयोग एए॥ लेशा ४ प्रथमनी सिगतिमा जीवनानेद नथि॥ गुणा- णा नथि.॥जोग नथि।।उपयोग केवल- झान १॥ केवलदर्शन । लेशा नथि ॥ पहनो अल्पबहुत्व।सर्वथि योकि मनुष्य- व १ अचलुदर्शन एवं.५॥अने चरिंजियमां ६ ते १. चलुदर्शन वध्यु.एवं.६॥ लेशा३॥ ६ पंचेंजियमा जीवना नेद ४ ॥ संझिनो अप्रजाप्तो ? ने प्रजाप्तो २ असंझीनो अप्रजातो३ ने प्रजाप्तोध एवंागुण १५ प्रथमना॥जोग१५॥उपयोगरण्केवलज्ञान १ केवलदर्शन ए २ वा ॥ लेशा ६॥ आणिंदियामांजीवनोद र संझिनोप्रजा- तो ॥ गुणगाणा २ तेरमुंने चउदमुं॥ जो- ग ७ । २ मनना ते सत्य :मन १ व्यव- हार मन २ वे वचनना ते सत्यवचन १ व्यवहारवचन २ एवं ॥अने उदा- रिकनो.५ उदारिकनो मिश्र ६कार्मण- कायजोग ए.७ ॥उपयोग॥ केवलझान १ केवलदर्शन । लेशा १ शुकल ॥ एह- नोअल्पबहुत्व ॥ सर्वथि थोमा पंचेंजिया १। तेहथिचरिंजिया विशेषाहिया । तेहथि. तेइंख्यिा विशेषाहिया ३ तेह- थि बेइंडिया विशेषादिया । । तेहथि अणिं दिया अनंतगुणा ५।तेहथि एकें- प्रिया अनंतगुणा ६॥ तेहथि सइंडिया विशेषाहिया ७॥इति त्रिजोछार समातं. १ सकायामां जीवनानेद १४ ॥ गुणा १४ ॥ जोग १५ ॥ उप० १२ ॥ लेशा ६॥ S ते ग्यारस २ मनोगीमां जीवनो नेद १॥ संझीनो प्रजाप्तो ॥ गुण १३ जोग १४ एक कार्म- पनो वर्जिने ॥ उपयोग १२॥लेशा ६॥ ३ वचनजोगीमा जीवना जेद ॥५॥ बे- जिय १ तेइंडिय २ चरिंघिय ३ अ- संदीपंचेंजिय ४ संझिपंचेंप्रिय ५ ए ५ ना प्रजाप्ता ॥ गुणण १३ जोग १४ का- मण वर्जिने ॥ उप० १२॥ लेशा ६॥ ४ कायजोगीमांजीवनानेद १४॥गुण०१३॥ जोग १५ उप० १२ ॥ लेशा ६॥ ५ अजोगीमां जीवनो नेद १ संझीनो प्र- जातो ॥ गुणवाणुं ॥१॥ चौदमुं ॥ जोग नहि । उपयोग २ केवल दान ने केवल- दर्शन ॥ लेशा नथि॥ एहनो अस्प- बहुत्व ॥ सर्वथि थोमा मन जोगी १॥ तेहथि वचन जोगी असंख्यातगुणा २॥ तेहथि अजोगी अनंतगुणा ३॥ तेहथि कायजोगी अनंतगुणा ४॥तोहथी सजोगी विशेषाहिया ५॥ इति पांचमो घार ॥ १सवेदीमांजीवनानेद १४ गुणा एप्रथमना ॥ जोग १५।उ० १० केवलझान ने केवल- दर्शन ए बे वर्जिने ॥ लेशा ६॥ ३ स्त्रीवेद १ पुरुषवेद २ ए २ मां।जीवना नेद २ संझीना ॥ गुण ए ॥ जोग ते इग्यारमा गुणगणावाला अघोगाम विजयथि ५ अनुत्तर विमानसधि फरसे ॥ वारम ३ अकयायीमा जीवनो नेद॥ १। संझीनो जोग १५ । उप १२॥ लेशा ६।। प्रजाप्तो ॥ गुण ४ जपरना ॥जोग २१।। ४ कृष्ण ? निल २ कापुत ३ ए ३ लेशामां॥ मनना ॥४ वचनना ॥२ उदारिकना ।। जीवना नेद १४॥ गुणगणा प्रथमना॥ कामणनो। एवं २॥ जपयोग ए।५झान जोग १५॥उपयोग १० वे केवलना वा ४ दर्शन । एवं पालेशा । एहनो अस्प । लेशा पोतपोतानि ॥ बहुत्व सर्वथि योमा अकषायी ॥तेहथि ५ तेजुण्लेशामा जीवनानेद३ संझिनो अप्र- मानकसायी अनंतगुणा२॥ तेहथि कोह जातो १॥प्रजातो॥वादर एकेजियनो कपायी विशेषाहिया ३ तेहथिमायाक अप्रजातो३॥गुणप्रथमनाजोग २५. पायी विशेषाहिया ४॥ तेह थि लोजक उपयोग १०॥ लेशा १ तेजु ॥ पायी विशेषाहिया ५ तेहथि सकषायी ६ पद्मलेशामा जीवना नेद २ संझिना । विशेषाहिया. ६ इति सातमो झार ॥ गुणप्रथमना॥जोग १५ उपयोग १० १ सलेशीमा-जीवना नेद १४ ॥ गुण १३॥ लेशा १ पद्म ॥
फाफेरी लांचि ॥ते एके कि माढाउपरेसातसात अंतरछिपाने॥ तेअंतरछिपा किहां॥ जग- तिना कोटथकि ॥३०॥ जोजनलवणसमुडमां जाश्ये । तिवारे पहेलो अंतरछिपो आवे ॥ते।। ३॥जोजननो लांवो ने पहोलो ॥ तिहांथि ॥४०॥जोजन जाश्ये ॥ तिवारे बिजो अंतर द्विपो आवे ते ॥ ४० ॥ जोजननो लांबो ने पहोलो ॥ तिहांथि ॥ ५० ॥ जोजन जाश्ये तिवारे ॥ त्रिजो अंतरहिपो आवे॥ ते॥५०॥ जोजननो लांबो ने पहोलो ॥तिहां श्रि उसे जोजन जाश्ये तिवारे ॥ चोथो अंतरहिपो आवे ते ॥६००॥ जोजननो लांबो ने पहो लो ॥ तिहांथि ॥॥ जोजन जाश्ये तिवारे । पांचमो अंतरहिपो आवे ॥ ते ॥ ७ ॥ जोजननो लांबो ने पहोलो रे ॥ तिहांथि ॥॥ जोजन जाश्ये तिवारे गो अंतरछिपो आवे ॥ ते ॥॥ जोजननो लांबो ने पहोलो ३ ॥ तिहांथि ॥ए॥ जोजन जाश्ये तिवारे सातमो अंतरहिपो आवे ते ॥ए॥ जोजननो लांबो ने पोहोलो ॥ एवं । सात चोकुं॥श्ज॥ अंतरछिपा जाणवा ॥ एमजवतदेवनी मर्यादानो करणहार शिखरीनामे पर्वत ॥ते चुल हिमवंत शरिखो जाणवो ॥ तिहां पण ॥२॥ अंतरछिपा ॥अगविश 5॥५६॥ अंतर छिपा गूण २ पहेलुं ने त्रिजुं॥ जोग १३॥जप- योग ६॥ लेशाए ६॥ १० घिनंग अंझानीमांजीवना नेद २ संझी ना॥ गूण २ पहेलुं ने त्रिजुं॥जोग १३॥ नप०६॥ लेशा०६॥एहनो अल्पबहुत्व ॥ सर्वथि थोमा मनपर्यवज्ञानी॥ तेहथि वधिज्ञानी असंख्यात गूणा॥तेहथि मतिज्ञानी ने श्रुतज्ञानी माहोमांहि तुल्य ने विशेषाहियाधातेहथि विनंग अज्ञानी असंख्यात गूणा ५ । तेहथि केवलझानी अनंतगुणा ॥ तेहथि ज्ञानीविशेषाहिया ॥ तेहथि मति श्रुतअज्ञानी माहोमां- हितुख्यने अनंतगूणाएगातेहथि अज्ञानी विशेषाहिया ॥ १० ॥शति १० मोछार ॥ १ चकुदर्शनीमा जीवना नेद ६॥ चनरिति य१॥असंझिपंचेजियासंझी पंचेंजिय ३॥ए ३ ना अंप्रजाप्ताने प्रजाप्ता।गुण १२ प्रथमना॥जोग २४ कार्मणनोवर्जिने। उप०१० केवलना श्वा ॥ लेशा ६॥ २ अचकुदर्शनीमा जीवना नेद १४ गूण १२ । जोग १५ उप १० लेशा ६॥ ३ अवधिदर्शनीमा जीवना नेद २ ॥गूण १२ । जोग १५ उप० १० खेशा ६ ॥ ४ केवलदर्शनीमां जीवनो नेद॥१॥गूण २ गूण २ पहेलु ने त्रिजुं॥ जोग १३॥जप- ॥ 8 ॥ हितुव्यने अनंतगूणाणातेहथि अज्ञानी विशेषाहिया ॥ १७ ॥इति १० मोछार ॥ .॥ उपगए। ३ अझान वर्जिने ॥ लेशा १॥ ७ संजतासंजतिमांजीवनो लेद १. संझीनो प्रण्गुण १पांचमुंजोग१२ आहारकना नेर कार्मणनोवर्जिने॥ उपयोग ६।३झा नने । ३ दर्शन । लेशा ६ ॥ 5 असंजतिमा जीवना लेद १४ । गुण ४ प्रथमना ॥जोग १३ आहारकना २ वर्जि ने ॥ उपाए ।३ ज्ञान ॥ ३ अज्ञान ॥ ३ दर्शन ॥ लेशा ६ ॥ । नोसंजतिनोअसंजतिनोसंजतासंजतिमा जीवनो नेद नथी । गुण नथी ॥ जोग नथि॥ ने । नप २ ॥ लेशा नथि॥ एह नो अल्पवहुत्व ॥ सर्वथि थोमा सुदम संपरायचारित्रिया १॥ तेहथि परिहार- विशुद्धचारित्रिया संख्यात गुणा ॥ ते- हथि यथाख्यातचारित्रियासंख्यातगुणा ३ ॥ तेह थि बेदोपस्थापनीयचारित्रिया संख्यातगुणा ॥ तेहथि सामायकचारि- त्रिया संख्यातगुणा ५॥ तेहथि संजति विशेषाहिया ६ ॥ तहथि संजतासंजति असंख्यातगुणा ७॥ तेहथि नोसंजति ॥ नोअसंजति नोसंजातासंजति ॥ अनंत गुणा ॥ तेहथि अंसंजति वनस्पति नेळवतां अनंतगुणााति १२ मोकार हार गूण २ पहेलु ने त्रिजुं॥ जोग १३॥जप- हितुट्यने अनंतगूणाए। तेहथि अज्ञानी विशेषाहिया ॥ १० ॥इति १० मोछार ॥ टो व । णनो वर्जिने ॥ उपयोग १२॥ लेशा ६॥ २ अनासकामां जीवना नेद १०॥ ते १४ मांथि।बेइंडियर तेइंडिय श् चरिंजिय ३ असंज्ञी पंचेंजिय ५ ए ४ वा ॥ गुण ५ ते पहिलु १ बिजु २ चोथु ३ तेरमुं ४ चौदमुं ५॥ ए ५ ॥ जोग ५॥ २ उदारिकना ५ वैक्रेयना । ने। १ । कार्मणनो ॥ उपम् । ११ ते ॥ मनपर्यव- झान नहि ॥ लेशा ६॥ एहनो अप- बहुत्व ॥ सर्वथि थोमा नासका १ ॥ तेह थि अन्नासका अनंतगुणा ॥ इति १५ मोहार ॥ १ परीत संसारिमा जीवना नेद १०० गुण १४ ॥ जोग १५ ॥ जप १२ ॥ वेशा ६ २ अपरीत संसारीमा जीवना नेद १४ ॥ गुण १॥ पहच।जोग १३ आहारकना २ वर्जिने ॥ उप०६॥अझान ३॥ दर्शन ३॥ लेशा ६॥ ३ नोपरितनो अपरीतमा जीवना नेद न- थी गुण नथी॥ जोग नथि ॥ उपग २ केवलज्ञान केवलदर्शन ॥ लेशानथि ॥ एहनो अल्पवहुत्व ॥ सर्वथि थोमा परी- त २ ॥ तेहथि नोपरीतनो अपरीत अ-. नंत गुणा २ ॥ तेहथि ॥ अपरीत अ- ॥
LF
Puro
ठाण
.६॥
४५ चरिंजिय प्रजाप्ता संस्कलगुणा
४६ पंचेडीय प्रजाप्ता विसेषाहीया
४७ वेंडिंय प्रजाप्ता विसेषाहीया
७ तेंडीय प्रजाप्ता विसेषाहीया
Yए पंचेंघीय प्रजाप्ता असंख्यातगुणा
५० चरिंडीय अप्रजाप्ता विसेषाहीया
५१ तेशीय अप्रजाप्ता विसेषाहीया
५२ वेंडीय अप्रजाप्ता विसेषाहीया
५३ बादर प्रत्येक शरीरि वनस्पति प्रजा-
प्ता असंख्यातगुणा
५४ वादर निगोदीया प्रजाप्ता असं
५५ वादर पृथ्वी काया प्रजाप्ता अण
५६ बादर अपकाया प्रजाप्ता असं०
५७ बांदर वानकाया प्रजाप्ता असं
५७ बादर तेज काया अप्रजाप्ता अग
एए बादर प्रत्येक शरीरि बनस्पति
अप्रजाता असंख्यातगुणा
६० बादर निगोंदीया प्रजातां अप
६१ बादर पृथ्वी अप्रजातां असं
६२ बादर अपकाया अप्रजाप्ता अ॥
६३ बादर वाजकाया अप्रजाता असंग
६४ सुदा तेजुकाया अप्रजाता असं
६५ सुदम पृथ्वी अप्रजाता विसे०
६६ सुदम अपकाया अप्रजाता बिसेषा
.. टो ९॥ दशन ॥ लशा ६॥ ३ उपशम सम्यकदृष्टिमा जीवना नेद सं- झीना ॥ गुण ७ चोथाथि ११ मां सुधि ॥ जोग १५ उपयोग ॥४ ज्ञान ॥ ३ दर्शन ॥ लेशा ६॥ ५ क्षयोपशम ने वेदकसम्यक्तदृष्टिमांजीवना नेद २ संझीना ॥गुण. दयोपशम सम्य- कदृष्टिमांथीनवमांसुधि॥अने वेदकमां ४थी सातमांसुधि जोग१५ उपज लेशा ६ ६ दायक सम्यण्जीवनानेदश्संझीना ॥गु- ण०१२॥चोथाथि ते१४ मां सुधिजोग१५ उपयोग ए ॥ अज्ञानवर्जिनेलेशा ६॥ मिथ्यात्व हाष्टमा जीवनानंद १४ गुण प्रथम ॥जोग १३ थाहारकना २ वर्जिने॥ उपयोग६।३अज्ञान॥३दर्शनलेशा६॥ ७ समामिथ्यात्व दृष्टिमां ॥ जीवनो नेदर संझिनोप्रजातो॥गुण १ त्रिजुंजोग १॥ धमनना ॥ ४ वचनना १ उदारिकनो॥१ कार्मणनो । एवं १० ॥ उप० ६ लेशा॥ एहनो. अल्पबहुत्व ॥ सर्वथि थोमासा- स्वादान.समकिति? तेह थि उपसम सम- किति संख्यातगुणा ॥तेहथि मिश्रदृष्टी संख्यातगुणा३॥ तेहथि दयोपशम सम- कितिअसंख्यातगुणाधातहथिवेदकसम- सारा JAUN एए१ तिर्यंच जीव विसेंषाहीया ए५ बदमस्त जीव विसेंषाहीया ए मिथ्यादृष्टी जीव वीसेषाहीया ए६ सजोगी जीव विसेंषाहीया ए३ अवर ति जीव विसेषाहीया ए७ संसारीक जीव विसेंषाहीया ए। सकसाया जीव वीसेषाहीया ए सर्व जीव विसेषाहीया ॥ इतिश्री अवाणुं बोलनो अल्प बहुत्व संपूर्ण ॥ ।। अथ श्री छ' आराना बोल. ॥ दसकोमा क्रोमि सागरोपमना ब्यारा जाणवा । तेहमा पहेलो आरो ॥४॥ कोमाकोमि सागरोपमनो जाणवो । ए आरो सुसम सुसमनामा जाणवो । एकबुं सुखमा सुख जाणवू ॥ ए आराने विष ३ गाउनुं देहमान । अने ३ पक्ष्योपमनुं आउखुं । उत्तरते यारे २ गाउनुं देहमान अने २ पट्योपमनुं आज जाणवू ॥ ए आरे बसे बपन पांसली। उतरने यारे एकसो अगाविस पांसखी जाणवी ॥ ए श्राराने विषे ॥ १ ॥ वजः षनmin.
A गणाउँ का॥ रलजमाव नाकने वायरेउमे एहवा वस्त्रना।क० १०॥ए १०। प्रकारना कल्पवृद मनवंडित सुखं आपे। ए आराने विषे ब्रेक थाकता जुगलना आउखा आमा ६ मास रहे। तेवारे जुगल परनवर्नु उखुं बांधे। तेवारे जुगलीणी एक जोमलु प्रसवे । ते बोरुनी प्रति पालना ४दिन करे । जुगलजुगलीणी ने कण मात्रनों विजोग न पसे । एकने बीक ने एकने वगासुं आवे मरिने देवता थाय । एहना शरीरनो निहरण देवता करे। गति तो ? देवनी जाणवी ॥ए आराने विष जुगलीया ने वेर विरोध र्षा केहेर नही॥ति पहेलो आरो संपूर्ण ॥ १ ॥ हवे पहेलो आरो उतरीने । बीजो आरो बेगे। तेवारे अनंता वर्ण गंध रस स्फर्सना पर्यव ॥ अनंता अनंता हीणा थया। ए आरो ३ त्रण क्रोमाक्रोम सागरोपमनो। सूसमनामे जाणवो। एकदुं सुख जाणवू । ए आराने विषेश बे गाउनुं देहमान अने २ पट्यो- पमर्नु आउखुं । उत्तरते आरे ॥ १ एक गाग्नुं देहमान ने एक पट्योपमनुं आउखुं । ए याराने विपे वज्ररूपन नाराच संघयण ॥ समचरंस संवाण ॥ ए आरे ॥२॥ एकसो अनावीस पांसत ।। उतरते श्रार ६३ पासली जाणवि। ए.आरे उग जक्ते श्रादारनी वा उपजे।।
रा आहारनी वा नपजे ॥ तिवारे शरीर प्रमाणे आहार करे। धरतिनि सरसाई गोल सरखि जाणवि ॥ उतरते आरे थोमेरी जाण वि॥ए आरे दस प्रकारना कल्पवृक्ष मनवंबीत सूख पहोंचामे। बेक थाकतां जूगलनाआनखा आमा मास रहे। तेवारे जूगल परनवर्नु आजऱ्या बांधे । तेवारे जूगलिणी एक जोमवं प्रसवे ॥ ते बोरुनी प्रतिपालणा आए दिन करे। जूगल जूगलिणीने दणमात्रनो विजोग न पर्छ । एकने बीक ने एकने बगासूं आवे तेवारे मरीने देवता थाय एहना शरीरनो निहरण देवता करे । ए ३ आरा जूगलना जाणवा एकलो जूगल धर्म जाणवो । ए आराने विषे । जरा रोग कुरुप नहि प्रतिपूर्ण अंग उपांग विषय सुख जोगवे ते दान पुन्यना फल जाणवा ॥ ए आराने विषे बेक थाकता चोरासि लाख पूर्व त्रण वर्ष नेसामा आठ महीना बाकी रह्या । तेवारे सर्वार्थ सिध महाविमान थकी तेत्रीस सागरो- पमनुं यान लोगवीने चविने । वनिता नगरी । नानी कुलगर राजापिता । मरुदेवी मातानी कुंखे झपन देवस्वामी उपना । सवानव मासे जन्म्या ॥ प्रथम ऋषननु स्वप्न देन्धि रुपनदेव नाम दिधुं । ऋपनदेव स्वामीये जूगला धर्म निवारीने । असि मसि कसि म % आरे सात हाथर्नु देहमान ने सो वर्ष आज ।। ए आरान विष ठसंघयण ने ६ संगण जाणवा। ए आराने विषे ३२ बत्रिस उतरते आरे १६ सोल पांसलीजाणवी। प. आराने विषे दिन दिन प्रते आहारनि वा उपजे । तेवारे ३२ कवळनो आहार करे । धरतिनि सरसाइसारेरि॥उतरते आरे थोमेरी जाण वि।ए आरोकथाकतां पंच्योतेर वर्ष ने सामाआठ महिना वाकी रह्या । तेबारे दशमा देवलोकथि बीस सागरोपमनुं आवरवू नोगविने चविने। माहणकुंम गाम नगरने विषे । झषनदत्त ब्राह्मणने घेर देवानंदाजीनी कुंखे । महाविरस्वामी नपना ॥ तिहां स्वामी सामीव्यासी रात रह्या। त्या सिमी राते शक्रेऽनो आसन चल्यो । तेवारे शकें उपयोग मुकीने जोयुं प्रजुने नोकुक कुले उपना दीग अनंते काले अरु थयुं । तेवारे हरण गमेयी देवताने कर्वा । जे जाओ जश्ने महाविरस्वामिनो गर्न साहरो । सा- हरीने दत्रीकुंम गाम नगरने विषे । सिद्धार्थ राजाने घेर । त्रिसला देवी दत्रियाणीनी कुंखे मुको । अने त्रिसलादेवि राणीनी कुंखे । पुत्रिपणे गर्ज ते देवानंदाजीनी कुंखे मुको ॥ तेवारे हरणगमेषी देवता तेहतप्रमाण करी । तेज बेलाए: आव्यो । आविने जग- ।
. - प्रवर्जा पालिने निर्वाण पधार्या । तेहज वेलाए जंबुस्वामिने केवलझान उपर्नु ॥ ते ॥४४॥ चुमालिस वर्ष सूधि केवल प्रवर्जा पालिने नीर्वाण पधार्या । महाविरस्वामि पढी । नर्त- क्षेत्रमा ॥ ६४ चोसठ वर्ष सुधि केवल ज्ञान रहुं । चोथा आरानो जन्मेलो होय ते पांचमा आरामां मोद जाय।पांचमा आरानो जन्मेलो पांचमा आरामां मोद जाय नही।जंबुस्खामि मोक्ष पहोंता परी॥ १० ॥ दश बोल वीद गया ते। परम अवधि ज्ञान ॥ १॥ मनपर्यव ज्ञान ॥ २ ॥केवलज्ञान ॥३॥ परिहारविसुध चारित्र ॥४॥ सुक्ष्म संपराय चारित्र ॥५॥ जथाख्यात चारित्र ॥६॥ पूलाक लब्धी ॥७॥ दायक समकीत ॥७॥आहरक शरिर ॥णा जिनकल्पी साधु ॥ १०॥ ए ॥ १० ॥ बोल इति चोथो आरो संपूर्ण ॥४॥ हवे चोथो आरो उतरीने पांचमो आरों वेगे। तेवारे अनंता वर्ण गंध रस फर्सना पर्यव हीणा थया । ए यारो ऽसमनामा एकबुं मुख जाणवू । ए आरो २१ हजार वर्षनो जाणवो । ए आराने विपे । उ हाथर्नु देह मान ने १ सो वर्ष काफेरानुं आज । उतरते आरे ॥१॥ हाथर्नु देदमान ने २० वर्पनुं आज ।। ए आराने विषे ॥६॥ संघयण ने। उ संगण जाणवा।
कुमार ॥१॥ नागकुमार ॥२॥ सुवर्णकुमार ॥ ३॥ विज्जुकुमार ॥४॥ अग्निकुमार ॥५॥ ठिपकुमार ॥ ६ ॥ उदधिकुमार ॥ ७॥ दिशाकुमार ॥ ७॥ पवनकुमार ॥ ॥ थणितकु- मार ॥१॥ हवे ॥१५॥ परमाधामिना नाम कहे ॥ अंब ॥१॥ अंवरिस ॥२॥ शाम ॥३॥ सबल ॥ ४ ॥ रुड़ ॥५॥ वैरुज ॥ ६ ॥ काल ॥ ७॥ महाकाल ॥ ॥ अशिपत्र ॥ ५ ॥ धनुष्य ॥१॥ कुंन ॥१२॥ वालु ॥१॥ वेतरण। ॥ १३ ॥ खरस्वर ॥ १४ ॥ महाघोष ॥१५॥ सोल वाणव्यतरना नाम पिशाच ॥१॥ नूत ॥२॥ जद ॥३॥ राक्षस ॥४॥ किन्नर ॥५॥ किंपुरिस ॥ ६ ॥ महोरग ॥ ७॥ गंधर्व ॥ ॥ आणपन्नी ॥ ए॥ पाणपन्नी ॥ १०॥ इसि- वाश् ॥ ११ ॥ नूश्वा ॥१॥ कंदिय ॥ १३ ॥ महाकंदिय ॥ १४ ॥ कोहंक ॥ १५॥ पयंग- देव ॥१६॥ दश जनकाना नाम ॥ आणजनका ॥१॥ पाणजंजका ॥२॥ लयणजनका ॥३॥ शयणजनका ॥४॥ वबजनका ॥५॥ पुष्पजनका ॥ ६ ॥ फलजंजका ॥ ७॥ बीय जनका ॥॥ विज्जुनका ॥॥ अवियत जंनका ॥१॥ दश ज्योतिषीना नाम ॥ चंप्रमा॥१॥ सूर्य ॥२॥ ग्रह ॥३॥ नदात्र ॥॥ तारा ॥५॥ ए ॥५॥ चल ते अढि छियमा । ने ॥ ५ भारा १३|| विठेदज़ाशे ॥३॥ चोथे पोहरे बादर अग्नि विवेद जाशे ॥॥ एआरे बसंता गति ॥५॥ जाणवी उतरता, गति ते मोद अटकी इति पांचमो आरोसंपूर्ण।हवे पांचमो आरोउतरीने बो आरो वेससे । तेवारे अनंता वर्ण गंध रस स्फर्सना पर्यव हीणा थसें । ए आरो २१ एकवीस हजार वर्पनो जाणवो । ए आरो ऽसम उसमनामा एकबुं बुःखमां दुःख जाणवू । ए आरे ॥ र एक हाथर्नु देहमान ने वर्षतुं आउखुं । उतरतेआरे मूंढा हाथनी काया ने १६ सोल वर्षमुंआउखुं जाणवू । ए आराने विषे १ वटुं संघयण ने हुंम संगण जाणवू । उतरते आरे पणं एमज़ जाणवू । ए आराने विषे॥ आउ पांसली॥उतरते आरे ॥४ चार पांसली जाणवी ॥ ए आराने विष। ठ वर्पनी स्त्री गर्न धरशे।ते काला कुदर्शनी रोगी ने रिसाल नखने मोवाला घणां एवा ठोकरा घणा जणशे। ते कुतरीनी परे परीवार चेलो फेरवशे। ए आराने विर्षे गंगा सिंधु नदि रहशे ॥ तेमा ३२ बील ॥ तेमांत्रण त्रण माल । तेमां मनुष्य त्रीयंच पंखी बीज मात्र रईश ॥ गंगा सिंधुनो सामीवासठ जोजननो पट ठे ॥ तेमां रथना चिला प्रमाणे पदोलु ने गामानि धुरि बेमे एटबुं हुं पाणि रदेशे । तेहमां मठ कठ घणा थाशे । ते V..!. ७४॥ प्रवा लीधा पनि एक हजार. वरसे । केवल ज्ञान उपर्नु । साधु । साधवी । श्रावक । श्रावीकारूप । चतुर्विध संघतिर्थ थापीने। द्वादशांगी गणीनी पेटी आपीने ॥त्रीजा आराना । त्रण वरसने सामाआठ महिना । ब्रेक थाकता बाकी रह्या ॥ तेवारे महा वद तेरसने दहामे । दस हजार साधु संघाते अष्टापद पर्वत उपरे स्वामी निर्वाण मोक्ष पधार्या॥१॥ पहेला श्री आदीनाथ तिर्थकर निर्वाण मोद पोहोंता पनि । पचास लाख क्रोमि सागरने आंतरे ॥ वीजा अजितनाथ तिर्थकर थया।अयोध्या नगरीने विषे। जीत सत्रुराजा पिता ॥ विजयादेवी राणी माता ॥ हेमवणे ॥ गज कहेता हस्तिनुं लंबन ॥ सामाचारसें,धनुषर्नु हमान ॥ बहोतेर लाख पूर्व- उखुं ॥ तेमां अढार लाख पूर्व कुंवरपणे रह्या । त्रेपन लाख पूर्व- राज पाट्यु। एक लाख पूर्वनीप्रवा पाली ॥ प्रवा लीधापडी बार वरसे केवल- ज्ञान उपमुं। साधु साधवी श्रावक श्रावीकारूप चतुर्विध संघतिर्थ थापीने। हादसांगी गणीनी पेटीयापीने ॥ एक हजार साधु संघाते स्वामी निर्वाण मोक्षने विषे पहोंता ॥२॥हवे वीजा थजितनाथ तिर्थकर मोक्ष पहोंता पठि ॥ त्रीस लाख क्रोमि सागरने श्रांतरे । त्रीजा संनव- ५ - स्न-माल !! तोस १५|| जिन मोदने विषे पोहोंता ॥४॥ हुवे चोथा अजीनंदन तिर्थकर मोक्ष पोहोंता पनि ॥ नवलाख क्रोमि सागरने आंतरे। पांचमा सुमत्तिनाथ तिर्थकर यया कुसलपुरी नगरीने विषे। मेघस्थ राजा पिता । सुमंगला देवी राणी माता । हेमवणे । कोंच पंखीनुं लंडन । त्रणसें धनुपर्नु देहमान । चालीस लाख पूर्व- आयुष । तेमा दश लांख पूर्व कुंवरपणे रह्या ॥ जंगणवीस लाख पूर्व- राज पाट्युं । एक लाख पूर्वनी प्रवा पाली । प्रवा लीधा पनि । वीस वर्षे केवल झान उपर्नु । साधुसाधवी श्रावक श्रावीकारूप ॥ चतुर्विध संघतिर्थ थापीने । छाद- पांचमा सुमतिनाथ तिर्थकर निरवाण मोद पोहोंता पनि। नेहजार कोडि सागरने आंतरे। उठा पद्म प्रन तिर्थकर थया । कोसंबी नगरीने वीषे । धर राजा पिता सुसिमा देवी राणी माता। राते वणे। पद्म कमलनुं लंबन। अढीसो धनुष, देहमान । त्रीश लाख पूर्व- आयुष। सामासात लाख पूर्व कुंवरपणे रह्या । सामीएकविस लाख पूर्वनुं राज पाट्युं ॥ एक लाख पूर्वनी प्रवा पाली । प्रवा लीधा पठी। वे महीने केवल कान जपतं। मनं साती वीम ७३|| पठि महिने केवल ज्ञान नपर्नु।साधु साधवी श्रावक श्राविकारूप चतुर्विध संघतिर्थ थापी ने। हादसांगी गणीनी पेटी आपीने। एक हजार साधु संघाते स्वामी निर्वाण मोद पधार्या ॥७॥ हवे आठमा श्री चंप्रन तिर्थकर निर्वाण मोद पोहोंता पनि। नेवू क्रोमि सागरने आंतरे ॥ नवमां श्री सुविधीनाथ तिर्थकर श्रया। काकंमी नगरीने विधे ॥ सुग्रीव राजा पिता। रामादेवि राणी माता। उज्वल वर्णे। मघर मउनुं लंबन॥ सो धनुष्यनुं देहमान ॥ वे लाख पूर्व- आउखुं तेमां अर्ध लाख पूर्व कुंवरपणे रह्या । अर्ध लाख पूर्वतुं राज पाठ्यु ॥ एक लाख पूर्वनी प्रवा पाली। प्रवा लीधा पनि। चार महीने केवल ज्ञान उप॥ साधु साधवी श्रावक श्रावीका झप चतुर्विध संघ तिर्थ थापीने ॥ हादशांगी गणीनी। पेटी आपीने एक हजार साधु संगाते । स्वामी निर्वाण मोदने विषे पधार्या ॥ ए ॥ हवे नवमा सुविधीनाथ तिर्थकर निर्वाण मोद पोहोंता पनि॥ नव क्रोमिसागरने आंतरे ॥ दशमा श्री सितलनाथ तिर्थकर थया। जदलपुर नगरीने विषे प्रढरथ राजा पिता। नंदा देवी राणी माता ॥ हेम वर्णे ॥ श्रीवन साथीयानुं लंदन ॥ ने धनुष्य- देहमाना एक लाख पूर्वमुं.
E सारा १२॥ न थाशे ॥ १५॥ विद्याधरनी विद्याना प्रत्नाव थोमा थाशे ॥२०॥ गो रस ध दहिमां सरसा थोमी हरशे ॥ २१॥ बलाद प्रमुखनां बलं आउखा थोमां थाशे ॥ २५॥ साधु साध्धिने मांस कल्प तथा चोमासां को जेवां खेत्र थोमां थाशे ॥२३॥ श्रावकनि ११ पमिमा ॥ साधुनी १२ पमिमा विबेद जाशे ॥ २४ ॥ गुरु शिष्यने नणावशे नहि ॥ २५ ॥ शिष्य अविनित कबहकारी थाशे ॥ २६ ॥ अधर्मकारिं ऊंगमाकारी कुमाणस घणा थाशे ॥ सुमाणस थोमा थाशे ॥ २७ ॥ आचार्य आप आपणा गबनी परंपरा सामाचारि जूदि जूदि प्रव- विसे । तथा मूढ मूर्ख जनने मोहने मिथ्यात्वं पासमां पामशे ॥ उत् सूत्र नाखशे आप आपणी प्रसंसामां राचसे निंदक कुबुद्धि होशे ॥ २७ ॥ सरल नजिक न्याय प्रमाणिक माणस थोमा थाशे ॥ ए॥ म्लेबनां राज घणा याशे ॥३०॥ हिंदु राजा अल्प शधिया थोमा याशे ॥ ३१॥ मोटा कुलना राजा थाशे ते निच काम करशे । अन्याय अधर्म कुविसनमा घणा राचसे ॥३२ ए ॥ ३२ ॥ लदण जाणवां। ए आराने विषे धातु सर्वे विडेद जांशे । लोढानी धातु रहेशे चाममानी मोहरों चालशे । जेने घेर सवाशेर कांसु रहेशे ते धनवंत कहेवाशे - 91 पिता । जया देवी राणी माता। राते वणे । सानुलंबन। सिंतेर धनुष्यनुं । देहमान बोहोतेर लाख वर्षतुं आयुष ॥ तेमा अढार लाख वरस कुंवरपणे रह्या । चोपन लाख वरसनी प्रा पाली॥ प्रवा लीधा पठि एक मासे केवल ज्ञान उपर्नु। साधु साधवी । श्रावक श्रावी- का रूप चतुर्विध संघ तिर्थ थापी॥ हादसांगी गणीनी पेटीआपीने। बसें साधु संघाते स्वा- मी नीर्वाण मोक्ष पधार्या ॥ १५॥ हवे बारमा वासुपुज्य तिर्थकर निर्वाण मोक्ष पोहोंता पनि त्रीस सागरने आंतरे ॥ तेरमा श्री बीमलनाथ तिर्थकर थया। कंपीलपूर नगरने विषे ॥ कृ- तवर्म राजा पिता॥ सामा देवि राणी माता॥हेम वर्णे। वराह के सुवरनुलंबन॥साठ धनुष्यनुं देहमाना॥ ६० लाख वर्षनु आउखु पनर लाख वरस कुंवरपणे रह्या ॥ त्रीस लाख वरसनुं राज्य पाट्युं ॥ १५ ॥ लाख वरसनी प्रवा पाली। प्रवा लीधा पनि ॥ वे महीने केवल झान उपनुं । साधु साधवी । श्रावक श्रावीकारूप । चतुर्विध संघतिर्थ थापीने । छा- दसांगी गणीनी पेटी आपीने ॥ ६०० साधु संघाते स्वामी निर्वाण मोद पोहोंता ॥ १३ ॥ हवे तेरमा विमलनाथ तिर्थकर मोद पोहोता पठी ए सागरने आंतरे ॥ चौदमां अनंत- ܢ . ॥७७ ॥ MARY स्वामी नीवाण मोदने विषे पधार्या ॥ १५ ॥ हवे पन्नरमा धर्मनाथ. तिर्थकर निर्वाण मोक्ष पोहोंता पड़ी॥त्रण सागर तेमां पोणा पट्यने उणे आंतरे.॥ सोलमा श्रीशांतिनाथ तिर्थकर यया ॥ हस्तीनापूर नगरने विषे ॥ विश्वसेन राजा पीता ॥अचिरा देवी राणी माता ॥ हेम वर्ण ॥ मृगनुं लंदन ॥ चालीस धनुष्य- देहमान । एक लाख वर्षतुं आउखुं॥ तेमां पा लाख वर्प कुंवरपणे रह्या ॥ पा लाख वरसनुं राज पाट्युं ॥पा लाख वर्षनि चक्रवतीनि पदवी जोगवी ॥ पा लाख वरसनी प्रवा पाली॥ प्रवा लीधा पड़ी। एक महीने केवल ज्ञान उपतुं । साधु साधवी श्रावक श्रावीकारूप चतुर्विध संघतिर्थ थापीने ॥ हादसांगी गणीनी. पेटी आपीने ॥ नवसें साधु संघाते स्वामी नीर्वाण मोदने विवे पधार्या ॥ १६ ॥ हवे सोलमा शांतिनाथ तिर्थकर निर्वाण मोद पोहोंता पली॥अर्ब पल्यने आंतरे॥सतरमांश्री कुंथुनाथः तिर्थकर यया॥ गजपुर नगरीने वीपे ॥सुर राजा पीता॥सुरा देवी राणी माता ॥ हेम वणे ॥ उंगल कहेता बोकमार्नुलंठन॥पांत्रीस धनुपर्नु देहमान॥ पंचाएं हजार वरसनुं याउलूँ ॥ तेमां पोणी चोवीस हजार वरस. कुंवरपणे. रह्या ॥ पोणी चोवीस.. हजार. वरसतुं राज ..TA.--- लघु-पाए चारना ।। जघन्य न उत्कृष्टा अगलना प्रसष्यातमा ताग ॥ अनं वनम्पतिन), जोनीम ॥७॥ AMAN वरसने आंतरे ॥रए मां महीनाथ तिर्थकर थया॥ निथिला नगरीने विषे॥ कुंजा राजा पिता॥ प्रनावति राणी माता ॥ निल वर्णे ॥ कलसानुं लंड ॥पचविल धनुषनुं देहमान ॥ पंचावन हजार वर्पनुं आउखुं ॥ तेमा सो वरस तो कुंवरी पणे रह्या ॥ बाकी प्रवर्ध्या पालि ॥ प्रवर्ध्या लिधापठि त्रीजे पोहोरे केवलज्ञान उपन्यु ॥ साधु साधवी । श्रावक श्रावीकारुप चतुर्विध संघतिर्थ स्थापिने छादसांगी गणीनी पेटी आपिने ॥ पांचतें साधु ॥अने पांचसे साधवी संघाते ॥ स्वामी निर्वाण मोद पधार्या ॥ १७ ॥ हवे अंगणीसमां. मल्लिनाथ तिर्थकर मोद पोहोंता पठी ॥५४ चोपन लाख वरसने आंतरे ॥२० मां मुनिसुवृत तिर्थकर यया॥राजग्रहीं नगरीने विप ॥ सुमित्र राजा पीता ॥ पद्मावति राणी माता ॥ साम वर्णे ॥ काबबानुं लंबन॥ विस धनुपर्नु देहमान ॥ त्रीस हजार वर्षनुं आन ॥ तेमां. सामासात हजार वरस कुंवर पणे रया ॥ पनर हजार वर्पनुं राज पाट्युं । सामासात हजार वर्षनी प्रवा पालि ॥ प्रवा विधा पठी ग्यार महीने केवलझान उपन्युं । साधु साधवी । श्रावक श्राविकारुप चतुर्विध संघतिर्थ श्रापीने। हादसांगी गणीनी पेटी थापिने ॥ एक हजार साधु संघाते. ॥ स्वामी निर्वाण वान ए च्यारन। ॥ जघन्य न उत्कृष्ट| अगलना असण्यातमा ताग ॥ प्रन वनम्पादन स५- चोवीस ॥८॥ तरे ॥२३ मा पार्श्वनाथ तिर्थकर थया॥वणारसी नगरीने विषे॥अश्वसेन राजा पिता॥ वामादेवी राणी माता ॥ निल वर्णे ॥ सर्पनुं लंबन ॥ नव हाथy देहमान ॥ सो वर्षनुं याउ ॥ तेमा ३० वर्ष कुंवरपणे रह्या सिंतेर वर्षनी प्रवर्ध्या पाली ॥ प्रवा लिधा पनि चोरासी दहामे केवलज्ञान उपन्युं ॥ साधु एक हजार साधु संघाते स्वामी निर्वाण मोद पधार्या ॥ २३ ॥ हवे त्रेवीसमां श्रीपार्श्वनाथ तिर्थकर मोद पोहोंता पड़ी ॥ अढिसें वर्षने अांतरे ॥ चोवीसमा श्रीमहावीर तिर्थकर यया ॥क्षत्रीकुंमग्राम नगरने विषे ॥ सिद्धार्थ राजा पिता ॥ त्रिसलादेवी राणी माता ॥ हेम वर्णे ॥ सिंहy लंबन ॥ सात हाथ, देहमान ॥ बोहोतेर वर्षनुं यान ॥ तेमां ॥ ३० वर्ष कुंवरपणे रह्या ॥ ४२ बेतालिस वर्षनी प्रवर्जा पाली ॥ प्रवर्जा लिधा पठी ॥ सामावार वर्ष ने पन्नर दहामे केवलझान उपन्युं । साधु साधवी । श्रावक श्रावीका रूप चतुर्विध संघ तिर्थ थापिने ॥ हादसांगो गणीनी पेटी आ- पिने ॥ कारतक वद अमावास्यानी रात्रे लोकिक पदे आसो बद अमावास्यानी रात्रे पा- वापुरी नगरीने विपे । चोथा याराना त्रण वर्ष ने सामाआठ महीना बाकी रह्या ॥ त्यारे - वान ए च्यारेनी ॥ जघन्य ने उत्कृष्टी अंगलनो असंष्यातमो नाग ॥ अने वनस्पतिनी गुण ढाक्यो ठे ॥२॥ वेदनीय कमें अनंत अव्यांबांध आत्मिक सुख रोक्युं जे ॥३॥ मो- हनीय कमें दायक समकित गुण रोक्यो छे ॥ ४॥ आयुष कमें अक्षय स्थिति गुण रो- क्यो ठे ॥ ५॥ नाम कमें अमूर्ति गुण रोक्यो २ ॥ ६॥ गात्र कर्मे अशुरु लघु गुण रोक्यो ठे ॥ ७ ॥ अंतराय करें अनंत आत्मिकशक्ति गुण रोक्यो २ ॥७॥ ज्ञानावरणीय कर्म ते ६ प्रकारे बांधे ॥ पहेले बोले नाणपमिणीयाए ते ज्ञानीना वांका बोले ॥ १॥ विजे बोले नाणनिन्हवणयाए ते शानिनो उपकार उलवे ॥ २॥ त्रिजे बोले नाणासायणाए ते ज्ञा- निनि आशातना करे ॥ ३॥ चोथे वोले नाणअंतराएण. ते ज्ञाननि अंतराय पमावे ॥४॥ पांचमे बोले नाणपउसेणं ते झानि उपर लेप करे ॥ ५ ॥ बठे बोले नाणा विसंवायणा जो- गेणं ते झानि साथे खोटा ऊगमा विखवाद करे ॥ ६॥ एक प्रकारे वांधे ते ॥ पांच तथा १० प्रकारे लोगवे ॥ ते पांच किया ते कहे ठे। मति ज्ञानावरणीय ॥ १ ॥ श्रुत ज्ञानावरणीय ॥२॥थवधि दाना वरणीय ॥३॥ मनपर्यव ज्ञानावरणीय ॥४॥ केवल झानावरणीय ॥५॥ ए.५ ज्ञान प्रगट यावा ये नहि ॥ तथा १० प्रकारे लोगवे ते कहे ठे॥ सोया वरणे ॥१॥ सोय वि- सुक्ष्म ॥१॥ प्रत्येक ॥२॥ ने । साधारण ॥३॥ ए ॥३॥ ना । अप्रजाप्ता ने ॥३॥ ना। प्रजाप्ता ॥ ए ॥६॥ एवं ॥२२॥ एकेंड्रियना ॥त्रण विकलेंजिय ॥ वे इंडिय ॥१॥ ते इंज्यि ॥॥ चरिंजिय ॥३॥ ए ॥३॥ ना अप्रजाप्ता ने ॥३॥ ना । प्रजाप्ता । ए॥६॥ एवं ॥२॥ जलचर ॥२॥ थलचर ॥२॥ उरपर ॥ ३ ॥ तुजपर ॥ ४ ॥ खेचर ॥ ५ ॥ए ॥ ५॥ समु- र्विम ने ॥५॥ गर्नज ॥ एवं ॥१॥ ना । अप्रजाप्ता ने ॥ १० ॥ ना । प्रजासा ॥ ए॥ २० ॥ एवं ॥४०॥ नेद तिर्यंचना कह्या । हवे ॥१४॥ नेद नारकिना कहे ॥ सात नरकना नाम। घमा ॥१॥ वंशा ॥२॥ शिला ॥३॥ अंजणा ॥४॥ रिग ॥५॥ मघा ॥६॥ माघव ॥७॥ हवे ए ॥ ७ ॥ ना गोत्र कहेवे रत्नप्रना ॥ १ ॥ शर्करप्रना ॥ ॥ वासुप्रना ॥ ३ ॥ पंकप्रना ॥४॥ धुमप्रना ॥५॥ तमप्रना ॥ ६॥ तमतमाप्रना ॥ ७ ॥ ए ॥3॥ना अप्रजाता। || ना प्रजाप्ता । एवं ॥१४॥ नेद नारकिना कह्या ॥ एवं । सर्व मिलीने ॥५६३॥ नेद जाणवा ॥ इति जीवतत्त्व समाप्तं ॥१॥ हवे अजीवतत्वना ॥ १४ ॥ नेद कहेठे ॥ स्कंध ॥१॥ देश । २॥ प्रदेश ॥३॥ अधर्मास्तिकायनो ॥ स्कंध ॥४॥ .
1:TT1-1 Hna " 1a. बात करे देश वृतीनी ॥७॥पचखाणावरणीय क्रोधते वेधुनि लिटि समान॥१॥पचखाणावरणीय मान तेलाकमाना स्तंन समान ॥२॥ पचखाणावरणीय माया ते गोमुत्रिका समान॥३॥ पच- खाणा वरणीय लोन ते गामाना खंजन समान ॥मा ए चारे गति करे मनुष्यनि॥ स्थिति करे च्यार मासनि । घात करे सर्व वृतीनि॥१शा संज्वलनो क्रोध ते पाणिनि लिटि समान ॥२॥सं. ज्वलनोमानते नेत्रना स्तंन समान ॥२॥ संज्वलनी माया ते वांसनि बोइ समान ॥३॥ संज्व- सनो लोन ते । पतंग तथा हलिजना रंग समान ॥४॥ ए॥४ गति करे देवतानि। स्थिति करे पनर दिननि । घात करे केवल ज्ञाननि ॥१६॥ ए १६ कषाय । हवे ॥ए नो कषाय कहे। हाश्य ॥१७॥ रति॥ १७ ॥ अरति ॥ १५॥ जय ॥ २० ॥ शोग ॥ २१॥ गंग ॥२॥ वी वेद ॥२३॥ पुरुप वेद ॥२४॥ नपुंसक वेद ॥२५॥ ए चारित्र मोहनीयनी २५ प्रकृति ॥ वे दंसण मोहनीयनि ॥ ३ प्रकृति कहे ठे । समकित मोहनीय १॥ मिथ्यात्व मोहनीय ॥ समामिथ्यात्व मोहनीय ३॥ ए ३ दर्शन मोहनीयनि । एवं सर्व मलि ॥ २७ प्रकृति । हवे पनि स्थिति जघा अंतर्मुहुर्त्तनी । उत् ॥ ७० क्रोमाकोमि सागरोपमनी । अबाधा काल ।
वो ते॥ १४ प्रकारे जोगवे । श्या सदा १ श्वा रुवा २ श्या गंधा ३ श्वा रसा ४श्वा फासा ॥५॥ श्वा ग॥६॥ठा गी३॥७॥ श्ग लावणे ॥७॥ श्ठा जसो कित्ती ॥॥ श्ग उगण कम्मब- लवी रियपुरिसाकारपरक्रमे ॥१॥ व सरया ॥११॥ कंत सरया ॥ १२ ॥ पियसरया ॥२३॥ मणुणा सरया ॥१४॥ ए ॥ १४ प्रकारे लोगवे ॥ अशुन नाम कर्म ॥ ४ प्रकारे बांधे। कायस- गुजुयाए ॥२॥ नासाणुजुयाए ॥२॥ नावाणुजुयाए ॥३॥ विसंवायणा जोगेणं ॥४॥ते॥ १४ प्रकार लोगवे । अणिवा सदा ॥१॥ अपिठा रुवा ॥२॥ अणिठा गंधा ॥३॥ अणिग रसा ॥ ४ ॥ अपिग फासा ॥ ५॥ अणिग गश् ॥ ६॥ अणिमा विश्॥७॥ अणि लावणे ॥ ७॥ अपिठा जसोकित्तिाए। अणिग उगण कम्मबलवीरिय पुरिसा- कारपरकमे॥१०॥ हिण सरया ॥११॥ दिण सरया ॥१२॥ अणि सरया ॥१३॥ अकंत सरया ॥ १४॥ १४ प्रकारे नोगवे ॥ हवे नाम कर्मनि ॥ए३ प्रकृति कहे ॥ नरक गति ॥१॥ तियेच गति ॥२॥ मनुष्य गति ॥३॥ देव गति ॥४॥ एकेजिय जाति ॥५॥ वेजियःजाति ॥६॥ तेइंजिय जाति ॥७॥ चरिंजिय जाति ॥जा पंचेंजिय जाति ॥॥ उदारिक सरिर,॥१०॥ ॥८ शा "0 वोल. ॥ स्पर्स ॥५ना सुखो स्पर्स ॥५ए ॥ नरकानुं पूर्वी ॥ ६॥ तिर्यंचानुं पूर्वी ॥६१ ॥ मनुष्यानुं पूर्वी ॥६॥ देवतार्नुपूर्वी ॥६३॥ शुज विहाय गति ॥६॥ अशुज विहाय गति॥६॥ए॥६५ पिंक प्रकृति यश् । पराघात नाम ॥६६॥ उस्वास नाम ॥६॥ अगुरु लघु नाम ॥६॥ आताप नाम ॥६॥ उद्योत नाम ॥७॥ उपघात नाम ॥३१॥ तिर्थकर नाम ॥७॥ निर्माण नाम ॥७३॥ श नाम ॥७॥ वादर नाम ॥३५॥ प्रत्येक नाम ॥७॥ पर्याप्त नाम ॥ ७॥ स्थिर नाम ॥७॥ शुन नाम ॥णा सौजाग्य नाम ॥ण॥ सुस्वर नाम ॥२॥ आदेय नाम ॥२॥ जशी कीर्ति नाम ॥७३॥ स्थावर नाम ॥धा सुदम नाम ॥ ५ ॥ साधारण नाम ॥ ६ ॥ अप्रजाप्त नाम ॥॥ अस्थिर नाम ॥७॥ अशुल नाम ॥ ए ॥ दो ग्य' नाम ॥ ए० ॥ कुःस्वर नाम ॥१॥ अनादेय नाम ॥ए॥अजशो कीर्ति नाम ॥५३॥ ए॥ ए३ प्रकृति थ॥ तेहमां ।। १० बंधननि अधिक नेलवतां ॥ १०३ प्रकृति पण ग्रंथवाळा कहे ठे अथवा नाम कर्म नि॥ ४२ पण ग्वरि । गति॥१॥ जाति ॥ ॥ शरीर ॥३॥अंगोपांग ॥४॥ बंधन ॥५॥ संघानन ॥ ६ ॥ वर्ण ॥ ॥ गंध ॥ ॥ रस ॥ए ॥ स्पर्स ॥ १० ॥ संघया ॥ ११॥ संग- ५॥
क० LIA इस्सारय मएणं जाए मद करवे करि निच गोत्र बांधे। ते॥७प्रकारे लोगवे॥जाइ विहिणया १.१ ॥ कुल विहिणया ॥२॥ वल विहिणया ॥३॥ रुपविहिणया ॥४॥ तपविहिणया ॥५॥ सूयविहिणया ॥६॥ लानविहिणया ॥ ॥ इस्सरिय विहिणया ॥ ए ॥ ॥ गोत्र कर्मनि स्थिति । जघ० ॥ मुहुर्त्तनि ॥ नत् । विश क्रोमाक्रोमि सागरोपमनि ॥ अबाधा काल करे तो वे हजार वर्षनो ॥ ७ ॥ हवे - मुं। अंतराय कर्म । पांच प्रकारे बांध ॥ दानांतराय ॥१॥ लालांतराय ॥ २॥ जोगांतराय ॥३॥ उवनोगांतराय ॥ ४॥ वीर्यातराय ॥ ५ ॥ ए॥ ५ अंतराय पामवे करि अंतराय कर्म वांधे । ते पांच प्रकारे जोगवे ॥ दानांतराय ॥ १ ॥ लानांतराय ।। २ ।। नोगांतराय ॥३॥ जवमोगांतराय ॥ ४॥ वीर्यातराय ॥ ५ ॥ ए ५॥ पामे नहि। ए अंतराय कर्मनि स्थिति ॥ जघन्य । अंतर्मुहुर्त्तनि। नत् । विश क्रोमाको मिसागरोपमनि॥ यवाधा काल करे तो ॥३हजार वर्षनो ॥णा बांध्यानि ॥ १५ प्रकृति ॥ ज्ञानावरणीयनि ॥ ६॥ दर्शनावरणीयनि ॥ ६॥ वेदनीयनि ॥ १२॥ मो- हनीयनि ॥६॥ यायुपनि ॥१६॥ नामनि ॥७॥ गोत्रनि ॥१६॥ अंतरायनि ॥ ५॥ एवं तेहमांसात्तावेदनीय दश प्रकारे बांधे ते कहे ॥ पाणाणु कंपयाए ॥१॥ जुयाणु कंपयाए॥२॥ जीवाणु कंपयाए॥ ३ ॥ सत्ताणु कंपयाए ॥४॥ बहुणं पाणाणं जुयाणं जीवाणं सत्ताणं अधुख- गयाए ॥५॥ असोयण याए ॥६॥ अजुरणयाए ॥७॥ अतिप्पणयाए ॥॥ अपिटणयाए गए। अपरियावणयाएः ॥ १०॥ ए १०॥ प्रकारे बांधे ते ७ प्रकारे लोगवे। मणुणा सदा ॥१॥मणुषा म्या ॥२॥मगुणा गंधा ॥३॥ मणुणा रसा ॥४॥मणुणा फासा ॥५॥मणसुहया॥६॥ वयसुहया ॥3॥ कायसुद्या ॥॥ ए ७ प्रकारे नोगवे । हवे एहनी स्थिति । जघ० ॥ २ समयनि उत्त ॥ १५ कोमाकोम सागरोपमनि । अवाधा काल करे तो । जघा अंतर्मुहुर्त्तनि । उत्त दोढ हजार वरसनी स्थिति । हवे अप्लाता वेदनीय ॥ १५ प्रकारे बांधे ते कहे । परऽखणयाए ॥१॥ परसोयणयाए ॥२॥ परजुरणयाए॥३॥ परतिप्पणयाए ॥४॥ परपिटणयाए ॥५॥ पर परियावणयाए ॥ ६॥बहुणं पाणाणं नुधाणं जीवाणं सत्ताणं उखणयाए॥७॥ सोयणयाए ॥ 6 ॥ फुरणयाए ॥ ए॥ तिप्पणयाए ॥१०॥ पिटणयाए ॥ ११॥ परियावणयाए॥ए॥१५ प्रकारे यांधे ते॥७प्रकारे नोगवे । अमणुणा. सदा ॥ १॥ अमणुणा रुवा ॥२॥ अमणुणा । आथा श्री धर्म ध्यान ॥ जववाई सूत्रपाठ-सेकिंतं ॥धम्मकाणे॥चठविहेचउपमयारेपन्नते॥तंजाहा॥आणा विजाएँ ॥१॥ अवाय विकए ॥२॥ विवागविकए ॥३॥ संगण विकए ॥॥धम्मस्सणंफाणस्स चत्तारिल- कणा पन्नत्ता॥तंजहा॥आणारुश्॥२॥ निसग्गरु ॥॥ सूतरुश् ॥३॥ जवएसरुः ॥४॥ धम्म- स्सणंकापरस॥ चत्तारि आलंवणापन्नता ॥ तंजाहा ॥.वायणा ॥१॥ पुठणा ॥२॥ परियणा ॥ ॥३॥ धम्म कहा ॥४॥ धम्मस्सणंजाणस्स ॥चत्तारिअणुप्पेहा पन्नता ॥तंजहा ॥ एगचाणुप्पेहा ॥ १ ॥ अणिचाणुप्पेहा ॥२॥ असरणाणुप्पेहा ॥ ३ ॥ संसाराणुप्पेहा ॥४॥ ए. सूत्र पाठ कह्यो। हवे सूत्रनो यर्थ कहे ठे॥ धर्म ध्यानना चार नेद ॥ तें मांहि पहेला नेदनो अर्थ कहे ॥ आणा विजाप कहेता वीतरागनी याज्ञानो. विचार चीतववो ॥ तें। वीतरागनी आज्ञा जे समकिन सहिन बार बत॥श्रावकनी ग्यार पमिमा ॥पंच महावृत । जीखुनीवार पमिमा गुज ध्यान ॥ गुन योग ।।झान दर्सण चारित्र तप ॥ कायनी रक्षा ॥ ए॥ वीतरागनी यात्रा ॥८७ ध्य ॥. आथः श्री धर्म ध्यान ॥ उववा सूत्रपाठ-सेकिंतं॥धम्मेजाणे..॥चनविहेचउपमयारेपन्नते॥तंजाहा॥आणा विजएं ॥सा अवायविजए. ॥३॥ विवागविजए ॥३॥ संवाण विकए ॥॥धम्मस्सणंजाणस्स चत्तारिल- कणाः पन्नत्ता॥तंजहा ॥आणारुश्॥१॥ निसग्गरु॥२॥ सूतरुश् ॥३॥ उवएसरु॥४॥ धम्म- स्सणंजाणस्सः॥ चत्तारि आलंबणापन्नता॥ तंजाहा वायणा ॥१॥ पुबणा ॥२॥ परियट्टणा ॥ ॥३॥ धम्म कहा ॥॥ धम्मस्सणंजाणस्स॥चत्तारिअणुप्पेहा पन्नता ॥तंजहा ॥ एगच्चाणुप्पेहा ॥१॥ अणिचाणुप्पेहा ॥२॥ असरणाणुप्पेहा ॥३॥ संसाराणुप्पेहा ॥४॥ ए. सूत्र पाठ कह्यो। हवे सूत्रनो अर्थ कहे ॥ धर्म ध्यानना चार नेद ॥ तें मांहि पहेला नेदनो अर्थ कहे ॥ आणा विजाए कहता वीतरागनी आझानो विचार चीतववो ॥ ते. । वीतरागनी आझा जे समकित सहितःचार व्रत ॥श्रावकनी ग्यार पमिमा ॥पंच महावृत । जीखुनीवार पमिमा शुल ध्यान ॥ शुभ योग ॥ ज्ञान दर्सण चारित्र तप ॥ कायनी रदा ॥ ए॥वीतरागनी आशा .
बोर ध्यान - वे चिंतवीए॥ तेनुं ए स्वरुप ॥ ए लोक सुपश्चकने आकार बं॥ जीव अजीवे संपूर्ण नों ठे ॥ असंख्यात जोजननी क्रोमाक्रोमिप्रमाणे त्रीबो लोक ॥ तिहां असंख्याता बीप समु॥ तथा असंख्याता वाणव्यंतरना नगर ॥तथा असंख्याता ज्योतिषीना विमान तथा असं- ख्याती ज्योतिषीनी राजधानी ।तीहांअढी छीपमांहि तिर्थकर जघन्य २०॥उत्कृष्टा एकसो सितेर होय ॥ तथा केवळी जघन्य बे क्रोमि ॥ उत्कृष्टा नव कोमि तथा साधु जघन्य हजार क्रोमि । उत्कृष्टा नत्र हजार क्रोमि ॥ तेहने वंदामि ॥ नमसामि ॥ सकारेमि ॥ समाणे मि ॥ कल्लाणं ॥ मंगलं ॥ देवयं ॥ चेश्यं ॥ पजुवासामि ॥ तथा त्रिबा लोकमांहि॥ असंख्याता श्रावक श्राविका ॥तेहना गुणग्राम करिये ॥ ते त्रिला लोक थकी असंख्यात गुणो अधिको उर्स लोक बे॥ तिहां वार देव लोक ॥ नव ग्रैवेयक पांच अनुत्तर विमान सर्व थश्ने ॥चोरासी लाख सत्ताणु हजार त्रेवील विमान ॥तथा ते उपर सिद्ध सिला ले ॥ तिहां सिरूनगवंत विराजे ॥ तेहने वंदामि॥जाव पजुवासामि ॥ ते उई लोकथी काश्क विशेष अधिक अधो लोक ॥तिहां चोरासी लाख नरकावासा ॥ सात कोमि व्होंतेर लाख नवन- ।।
लिन व्य ॥ सूत्र ॥ तथा उववाशप्रमुख उत्कालिक सूत्र सांजलवा तथानणवानी रुचि उपजे ॥ तेह्ने सूत्र रुचि कहिए ॥ एधर्म ध्यान- त्रिजुं लदण कह्यु ॥३॥ हवे धर्म ध्याननुं चोथु लदाण कहे ठे उवएसरुः ॥ उपएससई कहेतां आझाने करी उपाळ कर्म ॥ ते ज्ञाने करी खपावीए॥ ज्ञाने करी नवा कर्म न बांधीए। मिथ्याते करी उपाळकर्म ते समकिते करी खपावीए ॥ समकिते करी नवा कर्म न बांधीए ॥२॥ अव्रते करी उपााकर्म ते व्रते करी खपावीए ॥ व्रते करी नवा कर्म न बांधीए॥३॥प्रमादे करी उपार्ष्या कर्म ते अप्रमादे करी खपावीए॥अप्रमादे करी नवा कर्म न बांधीए ॥४॥ कषाये करी जपाा कर्म ते कषायने अणकरवे करीने खपावीए । कषायने अणकरवे करीने नवा कर्म न बांधीए ॥५॥असुन योगे करी उपाळ कर्म ते सुत्न योगे करी खपा- वीए॥शुल योगे करी नवा कर्म न बांधीए॥६॥पांच इंडीयना स्वादरूप आश्रवेकरी उपाा कर्म ते तपरूप संवरे करी खपावीए॥ तपझप संवरे करी नवा कर्म न बांधीए॥माटे अज्ञानादिका- श्रव मार्ग बांमीने झानादिक संवर मार्ग आदरवो॥ एहवो तीर्थकरनो उपदेश सांसलवानी रुचि उपजे ॥तेहने उपदेशरुचि कहीए॥ तथा उगाढ रुचि पण कहीए।ए धर्म ध्यान- चोथु लक्षण ॥८ ध्यान तेहवा लहीने ग्रहीने विशेषे निश्चय करीने शंका कंखा वितिगिठा रहित पणे पोतानी निर्ज- राने अर्थे परना उपगारने अर्थे सन्ना मध्ये ते नाव तेहवा परुपीए तेहने धर्मकथा कहीए ॥ एहवी धर्मकथा कहेता थकां अने सांजलीने सरदहता थकांत वने वीतरागनीआझाना आरा- धक होय ॥ ते धर्मकथा संवररूपी वृक्ष सेवीए ॥जेम भनवंबित सुखपामीए॥ते संवररुपी वृद वखाणीए बश्ए ॥ते संवररूपी वृक्ष केहवो बे॥ विशुद्ध समकितझप मूल ले जेहनु.॥१॥ धीर्यरूप कंद ठे जेहनो॥२॥ विनयझप वेदिका जेहनी ॥३॥ तीर्थकर तथा चार तीर्थना गुण कीर्तन झप खंध ने जेहनो॥॥पांच महाव्रतक्षप मोटी शाखा डे जेहनी ॥५॥ पचीस लावनारुप त्वचा के जेहनी ॥६॥ शुन्न ध्यानने शुल योगरूप प्रधान पदव पत्र ले. जेहनां ॥७॥ गुणझप फूल ठे जेहनां.॥७॥ सीयलरूप सुगंध वासना जे जेहनी ॥ ए॥आश्रवरहीत फल ले जेहनां ॥१०॥ मोदरूप प्रधान बीज जेह॥११॥ मेरु गिरिना शिखर उपरे जेम चूलिका बिराजेजे तेम समकितीना हृदयमांसंवरझपिठे वृक्ष वीराजे ॥१२॥ एहवा संवररुप वृदनी शीतल ठांया जेहनें परिणमे तेहना नवोनवना पाप टळे॥ने ते परम अतुल सुख. पामे इत्यादिकः॥३॥ ॥९.
कालय कि अनादिअनंत ॥१७॥ नावथकि । अवर्णे । अगंधे।अरसे। अफासे । अमूर्ति॥रए। गुण था कि वर्त्तनालदण ॥२०॥ एवं ॥ २० ॥ ने ॥ १० ॥ पूर्वे कह्या ते ॥ एवं ॥ ३० ॥ नेद अरूपि अजीवना जाणवा ॥ हवे ॥५३॥ नेदरूपि अजीवना कहे तेहमां । वर्ण ॥ ५ ॥ कालो ॥१॥ निलो ॥२॥ रातो ॥३॥ पिलो ॥४॥ धोलो ॥५॥ एकेका वर्णमाहि वीश वीश नेद लाने ॥ ते ॥२॥ गंध ॥ ५॥ रस ॥५॥ संगण ॥ ७॥ स्पर्श ॥ एवं । विश पंचा सो ॥ हवे ॥२॥ गंध ते । सुरनिगंध ॥१॥ पुरनिगंध ॥ २ ॥ एकेका गंधमांहि त्रेविश त्रे- विश नेद लाने ॥५॥ वर्ण ॥५॥ रस ॥५॥ संगण ॥ ७ ॥ स्पर्श । एवं ॥ २३ उतालिश नेद जाणवा ॥ हवे ॥५॥ रस ते ॥ तिखो ॥१॥ कवो ॥२॥ कसायलो ॥३॥ खाटो ॥४॥ मिगे ॥ ५॥ एकेका रसमां वीश वीश नेद लाने ॥५॥ वर्ण ॥२॥ गंध ॥ ५॥ संगण ॥॥ स्पर्श । एवं । वीश पंचा सो ॥ हवे ॥५॥ संगण ॥ परिमंमल संगण ॥१॥ वटसंगण ॥२॥ त्रंश संगण ॥३॥ चजरस संगण ॥४॥ आयतसंगण ॥५॥ एकेका संवाणमां वीश वीश नेद लाने ॥५॥ वर्ण ॥२॥ गंध ॥५॥ रस ॥॥ स्पर्श। एवं । वीश पंचा पणे स्त्री पुरुषनो अवतार पूरो न थयो ॥ वली तीर्यच श्रीय जलचरा दिः ५ मध्ये स्त्री वेदे पुरुष वेदे प्रवयों ॥ वली ते जीव साता नरक ॥ पांच एकेंडीय ॥ त्रण विकलेंडीय तथा असंझी तिर्यच मनुष्य मध्ये नियम नपुंसक वेद होय अने संज्ञी तिर्यंच मनुष्य मध्ये पण नपुंसक होय ते सर्वे नपुंसक वेदे जीव प्रवयों ॥ परमार्थे लागठ स्त्री वेदे प्रव- त्यों ते उत्कृष्टा एकसो दस पक्ष्य अने अथक पूर्व क्रोम सुधी स्त्री वेदे खेट्यो ॥ जघन्य आउखा नोगव्या आश्री अंतर्मुहुर्त ॥ पुरुष वेदे उत्कृष्टो पृथक् सो सागर काफेरा सुधी पुरुष वेद मध्ये खेट्यो ॥ जघन्य आउखा जोगव्या आश्री अंतर्मुहुर्त ॥ नपुंसक वेदे उ- कष्टो अनंता कालचक्र ॥ असंख्याता पुाल परावर्तन सुधी नपुंसक वेदे खेल्यो । जघन्य आउखा जोगव्या आश्री अंतर्मुहुर्त ॥ जिहां गयो तिहां एकलो पुजलने संयोगे अनेक रुप परावर्तन कीधां ए सर्व व्यवहार नय जीमने विषे जाणवो॥ एवा प्रवर्तननों मिटावणहार ते श्री जैन धर्मने विषे सुझ सदहणा सहित सुझ उद्यम पराक्रमनुं फोरव ॥ एहवा शुद्ध जैनमते करी आत्मानुं साधन थाय ॥ ते वारे सिद्धपणुं पामे ॥ तत्र एकलोज. निश्चय ॥
वो .३॥ जेम परम सुख उपजे ॥ ए धर्मध्याननी त्रीजी अणुप्पेहा कही ॥३॥ हवे धर्म ध्याननी चोथी अणुप्पेहा कहे . ॥ संसाराणुप्पेहा ते केहने कहिये ॥ स्वार्थरुप संसार समुड माहे ॥ जन्म जरा मरण संयोग वियोग सारीरी मानसी उख कषाय मिथ्यात्व तृष्णारूप घणा जल कबोलादिकनी लहेरे करी ॥ चार गति चोवीस दंगकने विषे परिमण करतां जगत जीवने श्री जैन धर्मरुप छिपानो आधार ॥ तथा संजमरूप नावा तिहां सुछ स- मकितरुप निर्जामक नावानो खेमणहार २ ॥ एहवी नावाये करी जीव सिद्धिरुप महा नगरने विषे पहोंचे ॥ तिहां अनंत अतुल विमल सिंझना सुख जीव पामे ॥ ए धर्म ध्या- ननी चोथी अणुप्पेहा कही ॥ ४ ॥ एहवा धर्म ध्यानना गुण जाणिने सदा धर्म ध्यान ध्याश्ये जेम परम सुख पामीये ॥ इति धर्मध्यान संपूर्ण ॥ अथ श्री पांच बोल. पहेलो नार किनो छार ॥१॥ विजो जवनपतिनो छार ॥२॥ त्रिजो वाणव्यंतरनो ॥९ पांच- १९४॥ ननुं जामपणे २ ॥ वळ्या कोयला शरिखा । तेमांहि ७० हजार जोजननो आन बलं ॥ अने ॥ ४ हजार जोजननो पंक बल के एम त्रणे काम यश्ने ।एक लाख. ने एंशी हजार जोजननो पृथ्वीनो पिंक जाणवो ॥२॥ विजे अर्थ कहे ठे ॥ रत्न प्रजा ते रत्ननो पिंम ने रत्ननि पिविका । ते रत्न केहवा छे । श्याम वर्णा बल्या कोयला सरिखां ॥१॥शर्कर प्रना ते कांकरानो पिंम ने कांकरानि पिठिका ते कांकरा केहवा । लुखा निरस गोखरुना कांटा सरिखो स्परसडे ॥२॥वालु प्रचाते वेलुनो पिंक ने वेबुनि विविका ते वेलु केह विडे । उन्हि धगधगति।अग्निनि परे जाज्वल्यमान ॥३॥ पंक प्रना ते कादवनो पिम ने कादवनि पिठिका ते कादव केहवो ।लोहिमय परुमय ने वज्रनय कांटा ॥४॥धूमना ते धुमामानो पिंकने धूमामानि पिरिका । ते धूमामो केहवो डे तिखो तमतमो ने दरदरो ॥५॥ तम प्रता.ते अंध- कारनो पिझने अंधकारनी पिठिका॥६॥ तसतमा प्रनाते विशेष अंधकारनोपिंग ने अंधकारनी पिपिका ॥॥३॥ चोयो पिंमने पांचमो पोलार एवे.छार नेळा कहे। पहेली नरके । एक लाख ने एंशी हजार जोजननो पृथ्वीनो पिंक ठे। तेहमांथि । एक हजार जोजन उचं मुकियेः ।। . ॥
च- ९५॥ व १ जननि पोलार ॥ तेहमांहि ॥ ५ पाथमा ने ॥ ३ लाख नरकावासा ठे ॥५॥ उठी नरके एक लाख ने॥ १६ हजार जोजननो पृथ्वीनो पिंम ॥ तेहमांथि । एक हजार जोजन उंचुं मुकिये ॥एक हजार जोजन निचुं मुकिये वचे ॥१ लाख ने ॥ १४ हजार जोजननि पोलार ठे ॥ तेहमांहि ॥ ३ पाथमा ने १ लाखमां ॥ ५ जणां ॥ नरकावासा ॥६॥ सातमी नरके ॥१ लाख ने ॥ हजार जोजननो पृथ्वीनो पिम डे ॥ तेहमाथि । सामाबावन हजार जोजन उंचुं मुकिये ॥ सामावावन हजार जोजन निचुं मुकिये। वचे ३ हजार जोजननो जामो एक पाथमो ठे तेहमांहि ॥५ नरकावासा ले ॥७॥५॥ बठे अलोक कहे ॥ पहेली नरकथि ॥ १२ जोजन जश्ये तिवारे त्रिगे अलोक आवे ॥१॥ बिजी नरकथि ॥ १२ जोजन ने ॥ त्रिया जागे त्रिो अलोक यावे ॥२॥ त्रिजी नरकथि ॥ १३ जोजन ने ॥ १ त्रिया नागे त्रिलो अलोक आवे ॥३॥चोथि नरकथि॥१५ जोजन त्रिो अलोक आवे॥४॥ पांचमि थी ॥२४ जोजन ने ५ त्रियानागे त्रिो अलोक आवे ॥५॥ठीथि ॥ २५ जोजन ने १ त्रिया जागे त्रिगे अलोक आवे ॥६॥ सातमी नरके ॥ १६ जोजने विठो अलोक आवे ॥७॥६॥ सातमे ।
ध्य तेहवा लहीने ग्रहीने विशेषे निश्चय करीने शंका कंखा वितिगिडा रहित पणे पोतानी निर्ज- राने अर्थे परना उपगारने अर्थे सत्ता मध्ये ते नाव तेहवा परुपीए तेहने धर्मकथा कहीए ॥ एहवी धर्मकथा कहेता थकां अने सांजलीने सरदहता थकांत बंने वीतरागनीआज्ञाना आरा- धक होय ॥ ते धर्मकथा संवररूपी वृक्ष सेवीए ॥जेम भनवंबित सुखपामीए॥ते संवररुपीठे वृद वखाणीए बश्ए ॥ ते संवररूपी वृक्ष केहवो बे॥ विशुद्ध समकितझपमूल डे जेहनुं ॥१॥ धीर्यरूप कंद ले जेहनो॥॥ विनयझप वेदिका जेहनी ॥३॥ तीर्थकर तथा चार तीर्थना गुण कीर्तन रुप खंध जेहनो॥॥पांच महावतझप मोटी शाखा जेहनी॥५॥ पचीस लावनाझप त्वचा के जेहनी ॥६॥ शुन्न ध्यानने शुन योगरूप प्रधान पदव पत्र ले. जेहनां ॥७॥ गुणझप फूल जेहनां.॥७॥ सीयलरुप सुगंध वासना जे जेहनी ॥ ए॥आश्रवरहीत फल जे जेहनां ॥१०॥ मोक्षरूप प्रधान बीज जेहनुं ॥११॥ मेरु गिरिना शिखर उपरे जेम चूलिका बिराजे तेम समकितीना हृदयमांसंवरझपिर्छ वृद बीराजे ॥१५॥ एहवा संवररुप वृदनी शीतल गया जेहनें परिणमे तेहना नवोनवना पाप टळे॥नेते परम अतुल सुख पामे त्या दिकः॥॥ ॥
बोल to नरके सवा पांच जोजननो घनवाय ॥४॥ पांचमी नरके सामा पांच जोजननो. घनवाय ठे ॥५॥ी नरके पोणा जोजननो धनवाय ॥६॥ सातमी नरके ६ जोजननो घनवाय ॥७॥ असंख्याता जोजननों तनुवाय डे हो जाता दोढ जोजननो रह्यो । पहेली नरके दोड जोजननो तनुवाय ॥१॥ बिजी नरके दोंढ जोजन ने १ वारियो नाग ॥२॥ त्रिजी नरके दोड जोजन ने । बारिया नाग ॥३॥ चोथी नरके दोढ जोजन ने ३ बारिया नाग ॥४॥ पांचमी नरके दोढ जोजन ने ४ बारिया नाग॥५॥ नरके दोढ जोजन ने ५ वारिया नाग ॥ ६॥ सातमी नरने श् जोजननो तनुवाय ॥॥तेहने आधारे नरक रहि ॥॥आठमे आंतरा कहे गपहेली नरके॥१३ पार्थमा नें ॥१२ आंतराजे॥एकेका पाथमाने ॥ ११५३ ॥ ग्यार हजार पांचंसें त्यासी जोजन ने ॥ १ त्रिया नागर्नु आंतरं ॥१॥ बिजी नरके ॥ ११ पाथमा ने ॥ १० आंतरा। एकेका पार्थमाने एyou संतागुंसें जोजनन- आंतरं ॥२॥ त्रिजी नरके ए पाथमा ने ॥ ॥ आंतरां । एकेका पाथमाने ॥ १५३७५ ॥ बार हजार त्रणसें पंचोतेर जोजन, आंतरं ॥ ३॥ चोथी नरके ॥ ७ पाथमा ने ६ आंतरा । एकेका पाथमा ने ॥ । ॥९६ हजार बसें त्राणुं पुष्पाविकीर्ण नरकावासा ले । अने ७०७ सातसें सात पंक्तिबंध नर- कावासा जे ॥ एवं सर्व मळीने ॥ १० लाख ॥४॥ पांचमी नरके ॥ एए७३५ ॥ वे लाख नवाणु हजार सातसें पांत्रीस पुष्पा विकीर्ण नरकावासा ॥ अने ॥ २६५ वसे पांसठ पंक्ति- बंध नरकावासा २ ॥ एवं सर्व मलिने ॥३ लाख ॥५॥ बवि नरके ॥ एए३२ नवाणुं हजार नवसें बत्रीस पुष्पाविकीर्ण नरकावासा ॥ अने ६३ पंक्ति बंध नरकावासा ॥ सर्व मली एएएएए॥६॥सातमी नरके ॥५ पंक्ति बंध ॥साते नरकना ७३ए॥३४॥ त्यासी लाख ने, हजार त्रणसें समतालीस पुष्पाविकीर्ण नरकावासा ॥ अनेसाते नरकना ए६५३॥ नव हजार उसें त्रेपन पंक्ति बंध नरकावासा ॥ सर्व मळी ७४ लाख नरकावासा जाणवा ॥ ए॥ दशमे अंधकार कहे जे ॥ नरकनो अंधकार ॥१॥अशुन पुजलनो अंधकार ॥ २॥ १ ॥ श्ग्यारमे नारकिने उपजवाना स्थानक कहे २ ॥ कुंनिने आकारे ॥ १ ॥ घमाने आकारे ॥ २॥ पेटिने आकारे ॥३॥ कुंमाने श्राकारे ॥ एवं नाना विध विषम स्थानके उपजे ॥११॥ बारमे क्षेत्र वेदना कहे ठे ॥ हुधा ॥ १ ॥ तृपा ॥ २ ॥ शित ॥ ३ ॥ जपण Exay दाद 37 त्रिजीना जघ अढि गाज । उत्ण त्रण गाउ देखे ॥३॥ चोथिना । जघ । वे गाउ । उत्त अढि गाउ देखे ॥४॥ पांचमीना जघ० दोढ गाउ। उत्॥ ॥ गाउ देखे ॥५॥ बठिना जघन्? गाउ। उत्० दोढ गाउ देखे ॥६॥ सातमीना जघ । अर्ड गाज ॥ उत्॥ ॥१ गाउ देखे ॥७॥ ॥१५॥ सोलमे संघयण कहे जे॥ पहेली बिजी नरके उ संघयणनो धणि जाय ॥ त्रिजी नरके वटु वर्जिने पांच संघयणनो धणि जाय ॥ चोथिये किलकु॥१ ने डेवटु ॥२॥ ए॥२ वर्जिने ॥४ संघयणनो धणि जाय ॥ पांचमी नरके॥३ संघयणनो धणि जाय ते किलकु ॥१॥बेबटु ॥२॥ अर्ज नाराच ए३ वर्जिने ॥ी नरके । वज्र षन्न नाराच संघयण ॥१॥ ने रुषन नाराच संघयण ॥२॥ए॥ नो धणि जाय। सातमीये॥ १ वज्र झपन नाराच संघयणनो धणि जाय ॥१६॥ सत्तरमे कोण जीव केश् नरके उपजे ते कहे जे ॥ असंही तिर्यच पहेली नरक सुधि उपजे ॥१॥ जुजपर बीजी सुधि उपजे ॥२॥ खेचर तियेच त्रिजी नरक सुधि उपजे ॥३॥ थलचर तिर्यच चोथि नरक सुधि उपजे ॥४॥ जरपर तिर्यंच पांचमी नरक सुधि उपजे ॥५॥ स्त्री ठगी नरक सुधि उपजे ॥६॥सातमी नरके जलचर मठ ने संझि मनुष्य
चिन्ह पायणित कुमारने संपुष्टर्नु चिन्ह ॥१०॥२॥हवे त्रिजे वर्ण कहे ॥ असुर कुमा-
रनो श्यामवर्ण ॥ नाग कुमार ने उदधि कुमारनोधोलो वर्ण ॥ विज्जु कुमार अग्नि कुमार ने छिप
कुमारनो रातोवर्ण ॥ सुवर्ण कुमार दिशा कुमार ने थणित कुमारनो पीलो वर्ण ॥ पवन कुमारनो
निलोप्तल कमल सरिखो निलो वर्ण ॥३॥ हवे चोथे वस्त्र कहे ।। राता निला पिला धोळा
विविध प्रकारना ते पण संध्याना रंग सरिखा जाणवा ॥४॥ हवे पांचमे सामानिक कहे ॥
दक्षिण दिशना चमरेंडने चोसठ हजार सामानिक ॥उत्तर दिशाना बलेंडने॥६० साठ
हजार सामानिक ॥ धरणेबादिक ॥ १७॥ इंडने उ हजार सामानिक डे ॥ ५ ॥ब आ-
स्मरदक ते सामानिक थि चोगुणा जाणवा ॥६॥सातमे देवांगना कहे जे ॥ चमरे तथा बलें-
उने पांच पांच देवीओ जाणवी ॥ एकेकि देवी आठ आठ हजार झप वैक्रेय करे धणि नोग-
ववाने अर्थे धणि पण एटला रूप वैक्रेय करे॥ धरणेंडादिक १०इंडने ब बदेवियो जाणवि॥
एकेकी देवी उठ हजार रुप वैक्रेय करे धणि जोगववाने अर्थे धणि पण एटला झप
वैकेय करे ॥ ७ ॥ हने ाठमे अणिका ॥ ७ कहे ॥ गंधर्व ॥ १॥ नट ॥२॥ हय ॥३॥
॥ २५ ॥ देवी ॥३॥ हवे एहना न
जा देवता वीनि ॥ ३ परिषद तेमांहि
अत्यंतरनि ॥ १७५ देवी॥१॥ मऊमनि । देवी ॥२॥वाहिरलीनि॥ १२५ देवी
॥३॥ए सर्व परिवार दक्षिण दिशना चमरेंजनो जाणवो ॥ एमज उत्तर दिशना बलेंअनि ३
परिषद जाणवी पण एटलो फेर ॥ पहेलीना ॥ २० हजार देवता ॥१॥ बिजीना ॥ २४
हजार देवता ॥२॥ त्रिजीना ॥२० हजार देवता ॥३॥हवे एहना नवनी कायना देवतानि
॥३ परिषद ते पहेलीना ॥५० हजार ॥ १॥ बिजीना ॥ ६० हजार ॥ २ ॥ त्रिजीना ॥ ७॥
हजार ॥३॥ बलेंअनि देवीउनी ॥३ परिषद ॥ पहिली नि ॥ ४५० देवी ॥१॥ बिजीनि
४०० देवी ॥२॥ त्रिजीनि ॥ ३५० देवी ॥३॥ हवे एहना नवनी कायना देवतानि देवीनि
॥३ परिषद ॥ पहेलीनि ॥ २२५ देवीउँ ॥१॥ बिजीनि ॥ २०० देवी ॥२॥ त्रिजीनि
॥ १७५ देवी ॥३॥ ११ ॥ बारमे लोक पाल कहे । सोम ॥१॥ जम ॥२॥ वरुण ॥३॥
वेसमण ॥४॥ सोमनो वारो पूर्व दिशे ॥१॥ जमनो वारो दक्षिण दिशे ॥२॥ वरुणनो वारो
पश्चिम दिशे ॥३॥ वेसमणनो वारो उत्तर दिशे ॥४॥ सोमने वारे सुख शाता होय ॥१॥
नाराचसंघयण ॥ १६ ॥ समचरंशसंगण ॥ १७ ॥ शुनवर्ण ॥ १७ ॥ शुनगंध ॥ १ए ।। शुन्नरस ॥ २०॥ शुनस्पर्श ॥ २१॥ अगुरु लघुनाम ॥ २२ ॥ पराघातनाम ॥ २३॥ जस्वास नाम ॥ २४ ॥ आतापनाम ॥ २५ ॥ उद्योतनाम ॥ २६ ॥ शुनचालवानि गतिः॥ २७ ॥ निर्माण नाम ॥श्जा उसनाम ॥२॥ बादरनाम ॥३०॥ प्रजातनाम ॥३२॥ प्रत्येकनाम ॥३२॥ स्थिरनाम ॥ ३३ ॥ शुजनाम ॥ ३४ ॥ सौजाश्यनाम ॥ ३५ ॥ सुस्वरनाम ॥३६॥ आदेय नाम ॥ ३० ॥ जशोकीर्तिनाम ॥ ३० ॥ देवतार्नु आजप्य ॥३॥ मनुष्यतुं आजष्य ॥४॥ तिर्यंचनुं आजष्य जुगलबत् ॥ १ ॥ तिर्थकरनामकर्म ॥ ४२ ॥ एवं ॥४२॥द पुण्यना जाणवा इति पुण्यतत्वं समाप्तं ॥ ३ ॥ हवे ॥ १७॥ प्रकारे पाप जपराजे ते कोठे ।। प्राणा- तिपात ॥१॥ मृषावाद ॥ २ ॥ अदत्तादान ॥ ३ ॥ मैथुन ॥॥ परिग्रह ॥५॥ क्रोध ॥६॥ मान ॥ ७ ॥ माया ॥ ७ ॥ लोन ॥॥ राग ॥ १० ॥ वेष ॥११॥ कलह ॥ १२ ॥ अज्या ख्यान ॥१३॥ पैशून्य ॥१॥ परपरिवाद ॥ २५ ॥ रतिअरति ॥ १६ ॥ मायामोसो ॥ १७ ॥ मिबादसणसव ॥ एवं ॥१॥ हवे तेहना अशुभ फल ॥ २ ॥ प्रकारे जोगवे ते कहे ॥
परिषद ॥३॥ समीयाना ॥ हजार देवता ॥१॥ चंमाना ॥ १० हजार देवता ॥ २॥जा- याना ॥ १२ हजार देवता ॥३॥ आवq जावं प्रथमनि रिते जाणवू ॥३ परिपदनुं ॥११॥ बारमे शुज वर्ण ॥ गंध ॥ रस ॥ स्पर्श ॥ नोगवता थका वाणव्यंतर विचरे ठे ॥ १२ ॥ इति वाणव्यंतरनो छार समाप्तं ॥ ३ ॥ हवे चोयो ज्योतिषीनो छार कहे ठे। पहेले नाम ॥१॥ विजे वाहक ॥ २ ॥ त्रिजे वर्ण ॥३॥ चोथे वस्त्र ॥ ४ ॥ पांचमे सामानिक ॥ ५॥ठे आत्म रदक ॥ ६॥ सातमे लांबपणुं ने पहोलपणुं ॥ ७ ॥ आम्मे उंचपणुं ने जामपणुं ॥ ७ ॥ नवमे पंक्ति ॥ ॥ दशमे परिपद ॥ १० ॥ ग्यारमे उद्योत ॥ ११ ॥ वारमे दे- वीजे ॥ १५ ॥ तेरमे नित्य राहु ने पर्व राहु ॥ १३ ॥ चौदमे परिवार ॥ १४ ॥ पनरमे अ- अणिकाना अधिपति ॥ १६ ॥ सतरमे संघयण ॥ १७ ॥अढारमे गणिसमे निर्व्याघात ॥ १५ ॥ विशमे देखq ॥२०॥ एकविशमे चाल पq ॥ २२ ॥ विशमे उंचपणुं ॥ २३ ॥ चोविशमे आंतरं ॥ २४ ॥ जी २५ ॥ पहेले नाम ते चंद्र ॥ १ ॥ सूर्य ॥२॥ ग्रह ॥३॥ नदात्र ॥ ४ ॥ मान ॥ ४ ॥ माया. ॥ ५० ॥ लोन ॥५२॥ हास्य ॥५५॥ रति ॥ ५३ ॥ अरति ॥ ५५ ॥ जय ॥ ५५ ॥ शोक ॥ ५६ ॥ उगंबा ॥ ५७ ॥ स्त्रीवेद ॥ ५७ ॥ पुरुषवेद ॥ पणा नपुंसकवेद ॥ ६० ॥ तिर्यंचनी गति ॥६१॥ तिर्यंचनी अनुपूर्वी ॥ ६ ॥ एकेंजियपणुं ॥३३॥ वेजियपणुं ॥ ६ ॥ तेप्रियपणुं ॥ ६५ ॥ चरिंजियपणुं ॥६६॥ अशुन चालवानि. गति ॥६॥ जपघातनामकर्म ॥६॥ अशुनवर्ण ॥ ६॥ ॥ अशुनगंध ॥ ७० ॥ अशुनरस ॥७१ ॥ अशुलस्पर्श ॥ ३२ ॥ रुपननाराच संघयण ॥ ७३ ॥ नाराचसंघयण ॥ ४ ॥ अईनाराचसं- घयण ॥ ४५ ॥ किलकुसंघयण ॥ ७६ ॥ वटुसंघयण ॥ ७ ॥ निगोहपरिमंगलसंगण ॥ ॥ सादिसंगण | ए ॥ वामनसंगण ॥ ॥ कुब्जसंगण ॥ ७ ॥ हुंमसंगण ॥ २ ॥ एवं ॥७॥ वेद पापतत्वना जाणवा ॥ इति पापतत्वं समाप्तं ॥४॥ हवेआश्रवना सामान्य प्रकारे ॥२०॥ जेद कहेले ॥ मिथ्यात्व ते आश्रव ॥ १॥ अव्रत ते आश्रव ॥२॥ प्रमाद ते आश्रव ॥३॥ कषाय ते आश्रव ॥४॥ अशुनजोग ते आश्रव ॥ ५॥ प्राणातिपात ते आश्रव ॥ ६॥ मृषावाद ते आ ॥७॥ अदत्तादान ते आ ॥॥ मैथुन ते आण ॥ ए॥
. जाणवा ॥ इति आश्रवतत्वं समाप्तं ॥५॥ हवेसंवरना सामान्य प्रकारे ॥२॥ लेद कहे ।। समकित ते संवर ॥१॥ तपच्चखाण ते सं० ॥२॥अप्रमाद ते सं० ॥३॥ अकषाय ते संग ॥॥ शुनजोग ते सं० ॥५॥ जीवदया पालवी ते सं० ॥६॥ सत्यवचन बोलवू ते संग ॥७॥ दत्तवत ग्रहण ते सं० ॥७॥ शियल पालवू ते सं० ॥ ए ॥अपरिग्रह ते सं० ॥ १० ॥ इंडिय ॥५॥जोग ॥३॥ ए ॥७॥ नुं संवर ते संग । एवं ॥ १७॥ नंमउपगरणउपधि जतनाये लिये मुके ते सं० ॥१॥ शुचिकुसग्ग न करे ते सं० ॥२॥ हवे विशेषे ॥५॥ नेद कहे। यासुमतिः ॥१॥ नापासुमति ॥२॥ एषणासुमति ॥ ३ ॥ आयाणममत्तनिखेवणासुमति ॥४॥ उच्चारपासवणखेलजलसिंबाणपारिवावणीया सुमति ॥५॥ ए ॥५॥ सुमति ने ॥३॥ गुप्ति ते ॥ मनगुप्ति ॥ १॥ वचनगुति ॥२॥ कायगुप्ति ॥३॥ ए प्रवचनमाता आदरवा ने ॥ २२ परिसह सहेवा ॥ ते कहेछे ॥ क्रुधानो परिसह ॥१॥ तृपानो ॥२॥ टाढनो ॥ ३ तापनो० ॥ ४ ॥ दंशमंशनो० ॥५॥ अचेलनो० ॥ ६ ॥ अरतिनो ॥ ७॥ स्त्रीनो ॥ ७ ॥ चरियानो ॥ए॥ बेसवानो० ॥१॥ सेजानो ॥ ११॥ आक्रोश वचननो ॥ १५ ॥ वधनो A- ज्यना कह्या ।हवे उन्नेद अभ्यंतरना कहे ॥प्रायडिताशाविनय ॥॥ वेयावञ्च ॥ संकाय ॥१०॥ ध्यान ॥११॥ काउसग्ग ॥१॥ एवं ॥२२॥ नेद निर्जरातत्वना कहा ॥ति निर्जरातत्व समाप्त ॥णा हवे बंधतत्वना ॥४॥नेद कहे॥प्रकृतिबंध ॥१॥ स्थितिबंधाशाअनुनागबंध॥३॥ प्रदेशबंध ॥४॥ प्रकृतिबंध ते कर्मनो स्वन्नाव तथा परिणाम ॥१॥ स्थितिबंध ते जे कर्मनि जेटलि स्थिति के तेटलि ॥२॥ अनुनागबंध ते रस तित्र मंद रसादि कर्मनो ॥३॥ प्रदेशबंध ते कर्म पुजलना दल ॥ ४ ॥ए ॥४॥ बंधनुं स्वरूप मोदकने दृष्टांते करी वतावेठे ॥ जिम को मोदक घणा प्रकारना ऽव्यने संजोगे निपनो ॥वायुने तथा पीतने तथा श्लेष्मने जेणे स्वरूपे करि हणे तेने स्वनाव कहिये ॥ १ ॥ तथा तेज मोदक । पद । मास । वेमास त्रणमास चारमाससुधि ते रूपे कर रहे तेने स्थिति कहिये ॥२॥ जिम वलि तेज मोदक को कम्यो होय कोई तीखो होय तेने रस कहिये ॥३॥ जीम वलि तेज मोदक को अल्प दलने परिमाणे निपनो । कोश् वलि बहु दलने परिमाणे निपनो॥ एमज मोदकने विषे दलनुं परिमाण तेहने प्रदेशवंध कहिये ॥४॥ एणीपरे कर्मनो बंध ॥ ४ ॥ प्रकारे जाणवो ॥ इती :-J711 .
ठे ॥३॥ स्पर्शना हार ते सिहदेवथि कांश्क अधिकी सिझनिस्पर्शना ॥४॥ कालकार ते॥ एक सिरू आश्रि सादिअनंत सर्व सिक आश्रि अनादिअनंत ॥५॥ अंतरकार ते फरि सिडने संसारमा अवतरवू नयि ॥ अने एक सिह तिहां अनंता सिह अने अनंता सिद्ध तिहां एक सिरूठे॥एटले सिरू सिहमा अंतर नथि ॥६॥ नागहार ते सघला जीवने सिद्धना जीव अनंतमे नागे ले । लोकने असंख्यातमे नागे ॥ नावहार ते सिमां दायकनाव ॥ केवलज्ञान । केवलदर्शन । दायकसमकित । अने परिणामिकनाव ते सिद्धपणो जाणवी ॥ ७॥ अल्प. बहुत्व हार ते ॥ सर्वथि थोमा नपुंसक सि ॥ तेथि स्त्री संख्यातगुणि सिझ॥ तेथि पुरुष संख्यातगुणा सिह ॥ एक समये नपुंसक ॥ १० ॥ सिह थाय ॥ स्त्री ॥ २० ॥ सिरू थाय ॥ पुरुष ॥ १७ ॥ सिह थाय ॥ ए ॥ त्रसपणे ॥ १ ॥ बादरपणे ॥२॥ संझि पणे ॥३॥ वज्रषजनाराचसंघयणपणे ॥ ४ ॥ शुकलध्यानपणे ॥ ५॥ मनुष्यगति ॥ ६ ॥ दायकसम कित ॥॥ जथाख्यातचारित्र ॥॥ पंमितवीर्य ॥ ए ॥ केवलझान ॥ १०॥ केवल- दर्शन ॥२॥ नव्य सिकिक ॥१॥ परमशुकललेशी ॥१३॥ चरमशरीरि॥रा ए॥१४॥ बोलनो 3 ॥ गलो ने हमतालनी जात ॥५॥ गेरु ने गोपीचंदननी जात ॥६॥ रत्न पर वालानी जात॥७॥ सोल जातिना रत्न आदि लेश्ने तेंतालीस जातनी पृथ्वीकाय॥ तेना एक ककमामां॥असं- ख्याता जीव । श्रीनगवंते कह्याते॥ ते जुवार ॥ तथा पीलु ॥जेटली पृथ्वीकाय लश्ये ॥ तेमां थी।एकेको जीव निकलीने। पारेवा जेवमी काया करे तो॥ एक लाख जोजननो जंबुछिपने॥ तेमा समाय नही ॥ तेना कुलबारलाख क्रोम ॥ तेनुं आउखुं ॥ जघन्य ॥ अंतर्मुहुर्त्तनुं उत्कृष्टुं २२ हजार वर्षानुं ॥ तेनी दया पालीये तो अनंता मोक्षनां सुख पामीये ॥१॥ हवे अप्काय ते पाणी ॥ तेना वे जेद ॥ सुदम ॥ अने वादर ॥ सुदमते ॥ आखा लोकमां नरयांठे ते आपणी नजरे न आवे ॥ बादर पाणीना नाम कहे जे ॥ पहेले बोले ॥ वरसादने कराना पाणी ॥ २ ॥'काकल ने धुमरना पाणी ॥३॥ कुवा नदी तलावना पाणी ॥ ४ ॥ दरिया करणना पाणी ॥५॥ खारां । खाटां। पाणी ॥६॥ मीगं मोलां पाणी ॥७॥ ए आदिलेश्ने घणी जातिनां पाणी २ ।। तेना एक बिंफुमा असंख्याता जीव श्रीनगवंते कह्याठे ॥ तेमाथी एकेको जीव नीकलीने ॥ सरसवना दाणा जेवमी ॥ काया करे तो एक 3 . उतर ने दहीणनो वा ॥३॥ ऊंचो निचो ने त्रिो वा ॥॥ वंतोलियो ने मंगलीयो वा ॥५॥ गुंजवा ने सुधवा ॥६॥ एआदिलेश्ने घणी जातिनो वायरो डे॥ ते सुंकरवे करी हणायबे॥ उघामे मोढे वोट्ये ॥ जापट नांखवे ॥ सुपमे सोवे फाटकवे ॥ कांतवे । विवे ॥ तालोटा वगामवे ॥ विकणे विझवे ॥ हींचोले हींचकवे ॥ आदिलेश्ने घणी जातिना शस्त्रेकरी हणाय ॥ एकवार उघामे मोढे बोल्ये ॥ असंख्याता जीव हणाय. ॥ तेमाथी एकेको जीव निकलीने ॥ वमना वीज जेवमी काया करेतो ॥ जंबुछिपमा समाय नहि ॥ तेना कुलः सात लाख क्रोम ते ॥ तेनुं आउखु । जघन्य । अंतर्मुहुर्तनुं ॥उत्कृष्टुं ॥त्रणहजार वर्षतुं ॥तेनी दया. पालीयेतो अनंता मोदनां सुख पामीये ॥४॥.पांचमे बोले वनस्पतिकाय. तेना बे नेद सुक्ष्म ॥ अने॥ बादर ॥ सुदम ते आखा लोकमां नरयां ॥ तेआपणी नजरे न आव। बादरवनस्पतिकायना बे नेद ॥ प्रत्येक अने साधारण प्रत्येक कोने कहीये । सरीरे सरीरे एकेको जीव होय ॥ तेने प्रत्येक कहीये॥अने एक सरीरे अनंता जीव होय । तेने साधारण कहीये ॥ हवे प्रत्येकनां नाम कहे॥ पहेले बोले बृद ने वेलानी जात॥शारिंगणी तलसी ने तेश्यीय चौरंजीय पंचेशीय हवे वे इंजीयनाबेनेद।अप्रजाताने प्रजाता॥वेडीय तेकोने क- हीये जेनेकाया जीच्या वेखीय होय तेने बेइंशीय कहीये तेनांनाम॥जलोकिमा पोरा।करमीया सरमिया मामणमुंमा। अलसीया।लटालाल । संख बीप।कोमा|आदिलेश्ने घणी जातिना बेइंशीय जीव ठे॥ तेनांकुलसातलाखकोमठे॥तेनुं आउखुं जघन्य॥अंतर्मुहुर्तनुंउत्कृष्टुं।वार वर्षy.॥ तेनी दया पालीये तो अनंता मोदना सुख पामीये।तेखीयनावे नेद।अप्रजाप्ता। ने प्रजाता ॥तेइंडीय ते कोने कहीये ॥ काया भूख ने नासिका होय तेने। तेइंडीय कहिये तेनां नाम ॥ जु । लीख । चांचम । मांकम । कीमी। कंथुवा ।माटला। धनेमा । जूवा।ईतमी। गींगोमा ॥ घीमेल । गधैया । कानखजुरा॥मंकोमा ॥एआदिलेश्ने घणीजातिना ॥ तेश्यीय जीव ॥ तेना. कुल ॥ आठलाख क्रोम ठे॥तेनुं आउखुं ॥ जघन्य । अंतर्मुहुर्तनुं ॥ उत्कृष्टुं । गणपंचास दिवसनुं ॥तेनी दया पालीये तो अनंता मोदना सुख पामीये॥हवे चौरिंजीयना वे जेद । ते अप्रजाप्ता । ने प्रजाप्ता । चौइंडीय ते कोने कहीये॥जेहने काया। मुख । नासिका अने आंख । होय तेने चौशीय जीव कहीये । तेना नाम माखी मसला ॥ मांस । मवर । ।
" ॥ अथ श्री लघु दंडक. ॥ ॥ ॐनमः सिहं ॥ अथश्री २४ दंझकना बोल लिख्यते ॥ गाथा ॥ सरीरोगाहण संघयण ॥ संगणकसाय तहहुँतिसन्नार्ड ॥ लोसं दियसमुघाए । सन्निवेदेयपजाती ॥१॥ दिग्दिसणनाण अनाणे ॥ जोगुवउंगेतहाकिमाहारे ॥ उववायविश्समुहाए । चवणगश् रागश्चेव ॥२॥ ए बे गाथा सूत्रपाठे कही ॥ हवे अर्थ कहेजे ॥ सरीर कहेता सरीर पांच॥ उदारीक सरीर ॥१॥ वैक्रेय सरीर ॥॥आहारक सरीर ॥३॥ तैजस सरीर ॥॥ कार्मण सरीर ॥५॥१॥ उगाहण कहेता । अवघेणा ॥उदारिक सरीरनी अवघेणा जघन्य अंगुलना असं- ख्यातमो नाग ॥ उत्कृष्टी एक हजार जोजन नी फाफेरी ॥ कमलनामोमानेन्याये ॥ वैक्रेय सरीरनिनवधारणि अवघेणा।जघन्य अंगुलनो असंख्यातमोजाग॥उत्कृष्टी पांचसे धनुषनी ॥ अने उत्तर वैक्रेय सरीरनी अवघेणा ॥ जघन्य अंगुलनो संख्यातमो नाग॥ उत्कृष्टीलाख जोजननि फाफेरी ॥ आहारक सरीरनी अवघेणा जघन्य । मुंढा हाथनी ॥ उत्कृष्टी एक ॥ अथ श्री लघु दंडक. ॥ ॥ ॐनमः सिहं ॥ अथश्री ५४ दमकना बोल लिख्यते ॥ गाथा ॥ सरीरोगाहण संघयण ॥ संगणकसाय तहहुंतिसन्नार्ड ॥ लोर्स दियसमुघाए । सन्निवेदेयपजाती ॥१॥ दिदिसणनाण अनाणे ॥ जोगुवढंगेतहाकिमाहारे ॥ उववायविश्समुहाए । चवणगश् रागश्चेव ॥२॥ ए बे गाथा सूत्रपाठे कही ॥ हवे अर्थ कहेले ॥ सरीर कहेता सरीर पांच॥ उदारीक सरीर ॥१॥वैक्रेय सरीर ॥२॥आहारक सरीर ॥३॥ तैजस सरीर ॥॥ कार्मण सरीर ॥५॥१॥ उगाहण कहेता । अवघेणा ॥उदारिक सरीरनी अवघेणा जघन्य अंगुलना असं- ख्यातमो नाग ॥ उत्कृष्टी एक हजार जोजन नी काफेरी ॥ कमलनामोमानेन्याये ॥ वैक्रेय सरीरनिनवधारणि अवघेणा । जघन्य अंगुलनो असंख्यातमो नाग॥ उत्कृष्टी पांचसे धनुषनी ॥ अने उत्तर वैकेय सरीरनी अवघेणा ॥ जघन्य अंगुलनो संख्यातमो नाग॥ उत्कृष्टीलाख जोजननि जारी ॥ आहारक सरीरनी अवघेणा जघन्य । मुंढा हाथनी ॥ उत्कृष्टी एक ... कहेता ॥ समुद्घात सात । वेदनी ॥१॥ कषाय ॥२॥ मारणांतिक ॥ ३ ॥ वैक्रेयः॥४॥ तैजस ॥ ५॥ आहारक ॥६॥ केवल ॥ आए ॥ सन्नी कहेता संज्ञी असंज्ञी। मन होय ते संज्ञी । मन न होय ते असंझी ॥१॥ वेदेय कहेता वेद त्रण ॥ स्त्रीवेद ॥१॥ पुरुषवेद॥२॥ नपुंसकवेद ॥ ३॥११ ॥ पङति कहेतां पर्याप्ति ब आहारपर्याति ॥१॥ सरीरपर्याप्ति ॥ २॥ इंडीयपर्याप्ति ॥ ३॥ स्वासोस्वासपर्याप्ति ॥४॥ नाषापर्याप्ति ॥५॥ मनपर्याप्ति ॥ ६ ॥१२॥ दिवि कहेता दृष्टि ॥३॥ समकितष्टि ॥१॥ मिथ्यातद्रष्टी ॥२॥ समामिथ्यातदृष्टी ॥३॥१३॥ दसण कहेता दर्शनच्यार । चकुदर्शन ॥ १ ॥ अचकुदर्शन ॥२॥ अवधिदर्शन ॥३॥ केवल दर्शन ॥ ॥१४॥ नाण कहेता ज्ञान ॥५॥ मतिज्ञान ॥१॥ श्रुतज्ञान ॥॥अवधिज्ञान॥३॥ मनपर्थवज्ञान ॥४॥ केवलज्ञान ॥५॥१५॥ अनाणे कहेता ॥ अज्ञान त्रण । मतिअज्ञान ॥१॥ श्रुतअज्ञान ॥२॥ विनंगझान ॥ ३॥१६॥ जोग कहेता जोगपनर । च्यार मनना । च्यार वचनना । सात कायाना ॥ हवे च्यार मनना कहे। सत्य मनजोग ॥१॥ असत्यमन जोग ॥ २ ॥ मिश्रमनजोग ॥३॥ व्यवहारमनजोग ॥३॥ हवे च्यार वचनना कहे ठे ॥
+ कीमीनीलारनीपरे जीवना परदेसबुटाबुटा नीकले ॥ तेहने संमोहिया मरण कहिये ॥ १॥ असमोहियामरण ते केहने कहिये वंकना नमाकानीपरे जीवना प्रदेश सामटा नीकले ॥ तेहने असमोहियामरण कहिय ॥ शाश्॥ चवण कहेता चविने जाय जेटला दमकमां ते आगल केहे वासे. ॥२३॥ गइ कहेता गति पांच ॥ नरकनी गति तिर्यचनी गति ॥ मनुष्यनी गति । देवतानी गति । सिधनी गति। एहमांजे जावं ते गति ॥अने आग कहेता जेमांथी। आवq ते. आगति च्यार ॥ नरकनी। तिर्यंचनी ॥ मनुष्यनी॥ देवतानी ॥ २४॥चेव कहेता निश्चे ए वे गायानो । अर्थ कह्यो । हवे प्राणदश पांच इंडीयना पांच प्राण ॥श्रोतेंडीया॥१॥ चकुशनीय ॥२॥ घ्राणेंजीय ॥३॥ रसइंडीय ॥॥ फरसरंजीय ॥५॥ मनवल ॥६॥ वचन- बल ॥ ॥ कायवल ॥॥ स्वासोवास ॥ए॥ आउ ए ॥ १० ॥ ए पचीस वार कह्या. श्या हवे चोविस दमकना नाम कहे ॥ पेहेलो नारकीनो दंमक ॥ ते सात नरकना नाम रहे ॥ पहेली घमां ॥१॥ बीजी वंसा ॥२॥ त्रीजि सीला ॥३॥ चोथी अंजणा ॥४॥ रांचामी रिग ॥५॥ बठी मघा ॥६॥ सातमी माघवश्॥६॥ ए सात नरकना नाम कह्या ॥
कई गाहा । मगर सुसुमार प्रमुख ॥१॥ हवे थलचर ते केहने कहिए॥जे थल पृथ्वी ए चाले ॥ तेदने थलचर कहिये ॥ तेहना च्यार लेद ॥एकखुरा उखुरा । गंमीपया ॥सणपयां ॥ एकखुरा ते घोमा खर प्रमुख ॥ उखुराते गाय जेसप्रमुख ॥गंमीपया ते सुंहाला पग ॥ सोनीनी अहिर- ण ने घाटे पग होय ते हाथी गेंमा प्रमुख ॥ सणपया ते नोहोराला जीव ॥ ते सिंह वाघ चित्रा कुतरा विलामा प्रमुख ॥ २ ॥ उरपर ते केहने कहिये । हश्यानर चाले ते सर्पनी जात ॥ तेहना वे नेद ॥ एक फेण मांझे ने ॥ एक फेण न मांगे ॥३॥ जुजपर ते केहने कहिये । जुजाए तथा हश्यानर चाले ते जुजपर ॥ तेहना अनेक नेद । नोल कोल काकीमा । गोह । बंदर ॥ खीसकोली प्रमुख ॥ ४ ॥ खेंचर ते केहने कहीये ॥ जे आकासे चाले ते पंखीनी जाति ॥ ते पंखीना च्यार नेद । चरमपंखी १ । रोमपंखी । विततपंखी। समुगपंखी ४ ॥ चरमपंखी ते चाममानी पांख ॥ ते बापा ॥ वागुल प्रमुख ॥१॥ रोमपंखी ते रोमरायनी पांख ॥ ते सुमा चरकला पारेवा प्रमुख ॥२॥ एबे पंखी अढी दीप माहे अनें बाहिर ने ॥ वितत पंखी ते जेहनी पांख पोहोली रहे ते वितत पंखी कहिए ॥३॥ समुग
ला
।
सूर्य ॥२॥ ग्रह ॥३॥ नदात्र ॥४॥ तारा ॥५।। ए पांच चल ते अदिछीप मध्ये ते ॥अने
पांच स्थिर ते अदिछीप बाहीर ॥ एवं दस जात ॥ बे चंडमाने बे सूर्य जंबूद्वीप मध्ये ॥
च्यार चंपमा च्यार सूर्य लवण समुल मध्ये जे ॥ बार चंझमा बार सूर्य धातकीपंग मध्ये ॥
वेतालिस चंद्रमा । बेतालिस सूर्य कालोदधि समुल मध्ये डे॥ बहुत्तेर चंद्रमा ॥बहुत्तेर सूर्य
पुष्करा: हिप मध्ये २ ॥ एवं सर्व मलीने मनुष्य देत्रमा । एकसो वत्रीस चंद्रमा । एकसो
बत्रीस सूर्य ॥ परिवार सहित चल ॥परिवारते जिहां एक चंघमा एक सूर्य तिहां अठासी
ग्रह ॥ अगविस नदात्र ॥ बासठहजार नवसें पंच्यातेर कोमा कोमी तारा वे ॥ एवं सर्व
चंडमा सूर्यनो परिवार गणवो॥असंख्याता चंद्रमा असंख्याता सूर्य परिवार सहित मनुष्यक्षेत्र
बाहेर असंख्याता छिपसमुछ मांहि स्थिर ॥ एवं दस जातनोत्रेविसमो ज्योतिषी नो दमक
थयो ॥ २३ ॥ हवे चोविसमो वैमानिक नो दमक कहेले ॥ तेहना बबिस नेद जे ॥ वार
देवलोक ॥ नव ग्रीवेयक ॥ पांच अनुत्तर विमान । एवं बविस । हवे तेहना नाम कहेले ॥
सुधर्म ॥१॥ इसान ॥२॥ सनंतकुमार ॥३॥ माहें ॥४॥ ब्रह्मलोक ॥५॥ लंतक ॥६॥
॥ ७॥ विजुजनका ॥ए ॥ अवीयतजनका ॥ १० ॥ ए दस जातिना जंजका ते वाण
व्यंतरमा नल्या ॥ ३ किल्विषीना नाम ॥ त्रण पलिया ॥ १ ॥त्रण सागरिया ॥२॥ तेर
सागरिया ॥ ३॥ एत्रणकिल विषी देवलोक अंतर निवासी माटे विमानीक मां नल्या । नव
लोकांतिकना नाम कहे ॥ सारस्वत ॥ १ ॥ आदित्य ॥२॥ विन्ही ॥ ३ ॥ वरुण ॥४॥
गर्दतोया ॥५॥ तोसीया ॥ ६ ॥ अवाबाहा ॥ ॥ अगीचा ॥ ७ ॥ रिग ॥ ए ॥ ए नव
लोकांतिक बनलोकवासी माटे उत्तम वैमानिकमां नल्या ॥ इति चोविस दंझकना नाम
कह्या ॥२४॥ हवे सात कोमी वोहोत्तेर लाख नवनपतिना नवन डे । चोरासी लाख नरका-
वासा ले । असंख्याता वाणव्यंतरना नगर ॥ असंख्याता जोतिषीना विमान ॥ असं-
ख्याती राज्यधानी छीपा जोतिषीना छे । चोरासी लाख सताणु हजार त्रेवीस विमान वेमा-
निकना डे ॥ संख्याता वास मनुष्यना । सेष दमक नवना असंख्याता असंख्याता वास
॥ ते सर्व वर्णव अन्य सिझांतादिकथि जाणवो ॥ २४ ॥ हवे सिझसिलाना बार नाम
कहेठे. ॥ इसितिवा ॥ १ ॥ इसिपनारातिवा ॥२॥ तणुतिवा ॥ ३ ॥ तणुतणु तिवा ॥४॥
उत्तरवैक्रेय करे तो । जय अंगु संष्याण ॥ ज० सवासो धनुषनी ॥ पांचमी नरके जप अंगुण असं० ॥ ज० सवासो धनुषनी ॥ अने उत्तरवैक्रेय करे तो जप अंगुण संख्या ॥ जप अढीसे धनुषनी ॥बपि नरकेजण अंगुण असं जा अढिसे धनुषनी ॥ अने उत्तरवैकेय करे तो जण अंगु० संप्या ना पांचसे धनुषनी ॥ सातमी नरके जण अंगुण असं ॥ ज पांचसे धनुषनी ॥ अने उत्तर वैकेय करे तो ज० अंगुण संख्या ॥ज हजार धनुषेनी। संघयण कण॥ नारकीयसंघेणी ॥ संगण एक हुंमसंगण ॥ कषाय च्यारे । क्रोध मान माया ने लोन ॥ पण नारकीने क्रोध घणो ॥ संझा च्यारे आहारसंझा । नयसंझा। मैथुनसंझा । परिग्रहसंझा। पण नारकीने नय घणो । लेस्या नारकीने त्रण समुचे ॥ पेहेली ने बीजी नरके एक कापुत लेसा॥ त्रीजी नरके वे लेस्या॥ कापुत घणी अने नील थोमी॥चोथी नरके एक नील लेस्या ॥ पांचमी नरके वे लेस्या नील घणी अने कृष्ण थोकी ॥ बी नरके एकली कृष्ण लेस्या ॥ सातमी नरके महाकृष्ण लेस्या ॥ इंघीय पांच । श्रोतेंघिय ॥१॥ चनुरंजीय ॥२॥ घाणइंडीय ॥३॥ रसखीय ॥४॥ फरसनीय ॥ ५॥ समुद्घात च्यार ॥ वेदनी कषाय मारणांतिक चक्रेया॥
: जा सात सागरनी ॥ चोथी नरके ज० सात सागरनी न० दस सागरनी ॥ पांचमी नरके ज० दस सागरनी ॥ न सतर सागरनी ॥ बठी नरके जप सतर सागरनी । उ बावीस सागरनी ॥सातमी नरके ज० वावीस सागरनी ॥ज तेत्रीस सागरनी॥समोहिया मरण ने असमोहिया मरण । वे मरण ।चवण ते नारकी चविने पेहेलीथी ब्ठी सुधिना वे दमकमां जाय मनुष्यने तिर्यंचमां ॥ अने सातमी नरकनो एक दंझकमां ते तिर्यंचमां जाय ॥ गश् कहेतां । पेहेलीथी मामी बठी सुधिना नारकी मरीने बेगतीमा जाय ते ॥ मनुष्यने तिर्यंचमां जाय ॥ आवे पण बेगतिनो [॥ मनुष्य ने तिर्थचनो सातमी नरकना नारकी वे गतिमाथी आवे मनुष्य ने तिर्यंचना ने जाय एक तिर्यंचनिगतिमा ॥प्राणदस लाने॥जोग त्रण मन वचन ने कायाना । ए त्रण ॥ ए प्रथम दमक नारकीनो संपूर्ण ॥ १ ॥ हवे दस जवनपतिना दस दंझक कहे ॥तेहमी सरीर त्रण ॥ वैक्रेय ॥ तेजसा। कार्मण ॥ अवघेणा नवनपतिनी ॥ जघन्य अंगुलनो असंप्यातमो नाग ॥ उत्कृष्टी सात हायनी । अने उत्तर वैक्रेय करे तो जघन्य अंगुलनो संख्यातमो नाग ॥ उत्कृष्टीलाख जोजननी । संघेण नथी।
VA तेहना नवनी कायना देवतानी । ज० दस हजारवरसनी । उा दोढ पट्योपमनी ॥ तेहनी देवोनी जप दस हजार वरसनी ॥ उ0 पोणा पट्यनी ॥ उत्तर दिसना असुरकुमारनी स्थिति ॥ ज० दस हजार बरसनी ॥ ज० एक सागर जाफेरानी ॥ तेहनी देवीनी जण दश हजार वर्षनी । जण सामा च्यार पट्योपमनी । तेहना नवनिकायना देवतानी जण दसहजार उरसनी । ज० वे पट्योपम देसे गंणी ॥ तेहनी देवीनी जण दस हजार वरसनी। न एक पट्योपम देसे जंणीनी ॥ समोहिया मरण अने असमोहिया मरण ॥ ए वे मरण लाने । चवण ते चविने पांच दंककमां जाय ॥प्रथ्वी ॥ पाणी ॥ वनस्पति ॥ मनुष्य ने तिर्यंच ए पाचमां जाय ॥ गश्कहे । मरिने वे गतिमां जाय मनुष्यने तिर्यंचमां ॥ आग ते आवे पण बंगतिनो ॥ मनुष्यने तिर्यंचनो ॥ प्राण दस लाने। जोग त्रण ॥ इति दस नवनपतिना दुस दंमक संपूर्ण ॥ ११ ॥ हवे पांचस्थावरना पांचदंझक कहे पृथवी ॥१॥ पाणी ॥५॥ तेज ॥३॥ वनस्पति ॥४॥ ए च्यार ने सरीर त्रण ॥ उदारिक ॥ तेजस ने कार्मण ॥ अने वायराने सरीर च्यार । उदारिक । वैक्रय । तेजस ने कार्मण ॥ अवघेणा प्रथ्वी पाणि तेज कार्मण कायजोग ॥३॥ अने वायराने पांच ते ॥ वैकेय ॥ वैकेयनो मिश्र ॥ ए वे. वंध्या । उपयोग त्रण ॥ वे अज्ञान ॥ एक अचक्षु दर्शन ॥ एवं त्रण । तहा तिमज आहार ले जा त्रण दिसनो जन्म दिसनो ॥ ते वलि बे प्रकारनो.उज १ ने रोम ॥ कवलवर्जिने ॥ तथा ३ प्रकारको ते सचेत ॥अचेतने मिश्र ॥ उववाय ते श्रावीने उपजे । पृथ्वी पाणीने वनस्पतिमां॥ त्रेविस दंझकना एक नारकी वरजीने ॥अने तेल वाउमां दस दंकना आवीने उपजे ॥पांचं स्थावर ॥ त्रण विगलेंगी॥ मनुष्यने.तिर्यंच॥ एवं दसना ॥ स्थितिं पृथ्वीनी जण अंतर्मुहु- र्तनी । उ बाविस हजार वरसनी ॥ १ ॥ पाणीनी ज अंतर्मुहुर्त्तनी । न सात हजार वरसनी ॥२॥ तेउनी ज० अंतर्मुहुर्तनी उप्रण अहोरात्रीनी ॥ ३ ॥ वायरानी । जा अंतर्मुहुर्तनी ॥ जत्रण हजार वरसनी ॥४॥ यनस्पतिनी जण । अंतर्मुहुर्तनी ॥ उ० दस हजार वर्षनी ॥५॥समोदियामरण अने असमोहियामरण । ए बे मरणं ॥ चवणं ते चविने। पृथ्वी पाणी ने वनस्पति ॥दस दंगकर्मा जाय ॥ पांच स्थावर त्रण विंगलेंजि॥ मनुष्य ने तिर्य- चमा जाय । अने तेज़ वा नव दमकमां जाय ॥ पांच स्थावर त्रण विगलेंदीने तियच ।
पर्या पांच मन नही । अष्टी बे ॥ समकित अष्टीने मिथ्यातजष्टी ॥ दर्शन बेडीतीने एक अचहूदर्शन ॥ चरिंखीने वे दर्शन ॥ चकूदर्शन ने। अचकूदर्शन ॥ ज्ञान । वे मतिज्ञान ने । श्रुतझान ॥ अझान वे मतिअज्ञान । श्रुतअझान ॥ जोग च्यार ऊदारिक ॥२॥ ऊदा- रिकनो मिश्र ॥२॥कार्मणकाय जोग ॥३॥ व्यवहार वचन ॥४॥ ऊपयोग वेइंद्री तेइंद्री ने पांच ॥ वे ज्ञान वे अज्ञान । एक अचकूदर्शन ए पांच ॥ चऊरिंद्रीने ऊपयोग ॥बे झान ॥ वे अज्ञान । वे दर्शन ए ब। तहां कहेता तिमज आहार ले ॥ जघन्य अने उत्कृष्टो दिसनो॥तथा त्रण प्रकारनो आहार ले ।उज ॥१॥ रोम ॥२॥ ने कवल ॥३॥ ऊववाय ते आवीने ऊपजे दस दंझकना। पांच स्थावर त्रण विगलेंगी मनुष्यने तिर्यच॥ ए दस ॥ स्थिति बेरिंजीनी जघन्य अंतर्मुहूर्त्तनी ऊत्कृष्टी बार वरसनी ॥ तेइंजीनी जघन्य अंतर्मुहूर्त्तनी। उत्कृष्टी उंगण पचास दिवसनी।चरिंजीनी जघन्य अंतर्मुहुर्त्तनी उत्कृष्टी उमहिनानी ।। समोहिया मरण । अने असमोहिया मरण वे जे ॥ चवण ते चविने जाय दस दंगकमां॥ पांच स्थावर त्रण विगोजी ॥ मनुष्य ने तिर्यंचमा जाय । ग ते मरीने वेगतिमां जाय ।।
जोजननी ॥ संघेण समुर्विमने एक वटु ॥ गर्नजने 8 संघेण । संगणसमुर्बिमने । एक हुंम । गर्नजने ठ संगण ॥ कषाय च्यारे पण त्रिजंचने माया घणी ॥ संझा च्यारे पण विजंचने आहार संज्ञा घणी ॥ लेस्या समुर्बिमने त्रण पेहेली । गर्जज ने ब लेस्या ॥ इंजी पांचे ठे ॥ समुदघात समुर्तिमने त्रण ॥ वेदनी कषाय ने मारणांतिक अने गर्नज ने समुदघात पांच वेदनी कषाय मारणांतिकवैक्रेय ने तेजस ॥ समुर्बिम असंझी ॥ गर्नजसंझी॥ समुर्तिममां वेद एक नपुंसक ॥ गर्नजने त्रण वेदः ॥ पर्यासमुर्बिमने पांच मन नही । अने गर्नजने पर्या छ । अष्टी समुर्छिमने बे॥ समकितने मिथ्यात ॥ गर्नजने त्रण अष्टी ॥ दर्शन समुर्छिमने वे चकूदर्शनने । अचकूदर्शन ॥ गर्नजने त्रण दर्शन ॥ ज्ञानसमुर्बिमने वे मतिज्ञान॥श्रुतज्ञान।गर्नजनेत्रण शान।।अज्ञानसमुर्विमने थे। मति अझान ने श्रुतअज्ञान॥ गर्जजने त्रण अज्ञान ॥जोग समुर्विमने च्यार उदारिकना वे॥कार्मण ३।व्यवहार वचन ४॥ गर्नजने तेर जोग आहारकना बे नही। उपयोगसमुर्बिमने ब । वे ज्ञान बे अज्ञान बे दर्शन। गर्नजने नव उपयोग ॥त्रण ज्ञान ॥त्रण अज्ञान ॥ त्रण दर्शन। तिमज ॥आहार ले ॥जघन्य जाय । आगश्ते आवे समुर्बिममां बे गतिनों। मनुष्य ने तिर्यंचनो ॥ अने गर्नजमांच्यारे गतिनो आवे ॥ प्राण समुर्बिमने नव । मन नही । अने गर्नजने प्राण दशे लाने ॥ जोग समुर्बिमने बे ॥ कायजोग ने वचनजोग ॥ अने गर्नजने त्रण जोग । मन वचन ने काय- जोग ॥ इति विसमो तिर्यंचपंचेंजीनो दंक संपूर्ण ॥२॥ हवे एकविसमो मनुष्यनो दमक कहे ॥ तेमां समुर्बिम मनुष्यमा शरीर त्रण । उदारिक तेजस ने कार्मण । जुगलीयामां सरीर त्रण तेहीज ॥ कर्मजुमि मनुष्यमां सरीर पांच लाने ॥ अवघेणा समुर्बिमनि जघन्य ने उत्कृष्टी अंगुलनो असंख्यातमो नाग ॥ अने गर्नज मनुष्यनी नरत ईश्वतमां आरानी परे जाणवी ॥ पेहेले आरे बेसता त्रण गाउनी ॥ उतरता वे गाउनी ॥ बीजे आरे बेसता ये गाजनी ॥ उतरता एक गाजनी॥त्रीजे आरे बेसता एक गाउनी॥ उतरतां पांचसें धनुषनी । चोथे आरे बेसता पांचसें धनुषनी ॥ उतरतां सात हायनी ॥ पांचमे आरे वेसतां सात हाथनी ॥ उतरतां एक हाथनी ॥ बठे आरे बेसतां एक हाथनी ॥ उतरतां मुंढा हायनी ॥ पडे चमतां अवलासवली जाणवी ॥ ५ महाविदेहमां पांचसें । धनुषनी ॥ उत्तर च्यार ॥ जापाने मन नही॥ गर्नजने पर्या ॥ दृष्टी समुर्बिमने एक मिथ्यात ॥ दस अकर्म- जुमीमां चे दृष्टी । समकित ने मिथ्यात ॥ वीस अकर्मनुमीने बंपन्न अंतरधीपामां ॥ एक मिथ्यात दृष्टी ॥ कर्मनुमिना मनुष्यमांत्रणे दृष्टी ॥ दर्शन समुर्बिम अने जूगलोयाने ॥ बे । चकुदर्शन ने अचदुदर्शन । गर्नजने दर्शन च्यारे लाने । दसअकर्मजुमीमा ज्ञान घे ॥ अने वीसकर्म नूमी ने बपन्न अंतर छीपा ने समुर्बिममां नथी ॥ गर्नजने झान पांच । अज्ञान समुर्बिमने बे मति अज्ञानने श्रुतअज्ञान । गर्नजने त्रण । जोग समुर्बिमने त्रण । उदारिकना बे ने १ कार्मणकायजोग ए त्रण ॥ जूगलीयाने जोग ।। ११ ते मनना ॥ ४ ॥ वचनना ॥४॥ उदारिकना ॥२॥ कार्मण ॥१॥ एवं जोग ॥ ११ ॥ गर्नजने पनर जोग ॥ दश अकर्मनूमी ते पांच देवकुरु पांच उत्तरकुरु ए दशमां ॥ उपयोग ६॥ ते वे ज्ञान ॥२॥ अज्ञान ॥२॥ दर्शन ए॥६॥ अने वीस अकर्म- नूमी ॥ ५६ ॥ अंतरछीपामां ने समुर्बिमने च्यार ॥ वे अज्ञान वे दर्शन । गर्जजने बार उपयोग ॥ तिमज आहार ले तो । जघन्यने उत्कृष्टो उ दिसनो. ॥ तथा त्रण प्रकारे आहार ते चवीने समुर्बिम दस दमकमां जाय ॥ पांच स्थावर नेत्रण विगलेंडी।मनुष्य ने तिर्यंच॥ एवं दस ॥जुगलीया एक देवगतिमांजाय॥ गर्नज चोविसे दमकमांजाय ॥ गश्ते मरीने समु- लिम चे गतिमां मनुष्य ने तिर्यंचमां जाय ॥ गर्नज मनुष्य पांच गतिमां. जाय ॥ आगश् ते समुर्बिमने जुगलीयामां आवे तो वे गतिनो । मनुष्य ने तिर्यंचनो ॥गर्जजमांच्यार गति नो आवे ॥ प्राण समुर्बिमने आठ लाषा ने मन नही ॥ गर्नजने दस प्राण ॥ जोगसमु- लिमने एक कायानो ॥ गर्नजने त्रण जोग ॥ इति एकविसमो मनुष्यनो दंगक संपूर्ण ॥२१॥ हवे बाक्सिमो वाणव्यंतरनो दंमक ॥ तेमां सरीर त्रण ॥ वैक्रेय ॥ तेजस ने कार्मण ॥ अवघेणा जण अंगुण असं जा सात हाथनी॥ अने उत्तर वैकेय करे तो जण अंगुण संख्या । ज० लाख जोजननी । संघयण नथी । संगण एक समचरंस ॥ कषाय च्यारे पण देवता लोग घणो । संज्ञा च्यारे पण देवताने ॥ परिग्रह संज्ञा घणी ॥ लेस्या च्यार पेहेली। इंत्री पांचे । समुद्घात पांच । आहारकने केवल नही ॥ संज्ञी असंझी बे ॥ वेद वे ॥ स्त्रीने पुरुप ॥ पर्या ५ नाषा मन नेलाबांधे । दृष्टी त्रण ॥ दर्शन त्रण । ज्ञान त्रण । अज्ञान त्रण॥
समचनरंस । कषाय च्यारे ॥ संज्ञा च्यारे लेस्या एक तेजु । इंशी पांचे ॥ समुद्घात पांच आहारकने केवल नह। । संज्ञी ले ॥ वेद वे । पर्या ५ नाषा मन नेला बांधे ॥ दृष्टी त्रण ॥ दर्शण त्रण । ज्ञान त्रण ॥अज्ञान त्रण ॥ जोग अगीयार । च्यार मनना च्यार वचनना त्रण कायाना ते वैक्रेय । वैक्रेयनो मिश्र ने कार्मण कायजोग॥ एवं अगीयार ॥ उपयोग नव । त्रण ज्ञान ॥त्रण अज्ञान । त्रण दर्शन ॥ एवं नव ॥ तिमज आहार ले तो जघन्य ने उत्कृष्टो बदिसनी ॥ तथा बे प्रकारे॥ज ने रोम ते पण सुन्न ने अचेत आहार ॥ नववाय ते आविने उपजे ॥ वे दंगकना ॥ मनुष्य ने तिर्यंचना । स्थिति चंडमाना देवतानी जा पा पल्यनी। जा एक पल ने लाख वरसनी ॥ तेहनी देवीनी ज पा पल्यनी ॥ ज० अरध पट्य ने पचास हजार वरसनी ॥ सूर्यना देवतानी जा पा पट्यनी ॥ ज० एक पट्य ने हज़ार वरसनी ॥ तेहनी देवीनी जा पा पदयनी ॥ ज० अरध पट्य ने पांचसे वरसनी ॥ ग्रहनादेव- तानी जण पा पल्यनी ॥ ज० एक पदयनी ॥ तेहनी देवीनी जा पा पट्यनी जा अरध पट्यनी ॥ नदात्रना देवतानी । ज पा पदयनी ॥ ज० अरध पट्यनी ॥ तेंहनी देवीनी ॥
- परिग्रहसंज्ञा घणी । लेस्या पेहेले बीजे देवलोके एक तेजु लेस्या । त्रीजे चोथे पांचमे एक पदम लेस्या । बताथी मांझी नव ग्रैवेयकमां ॥एक सुकल लेस्या । अने पांच अनुत्तर विमा- नमा १ परमसुकल लेस्या ॥शी पांचे ॥ समुद्घात बार देवलोकमां पांच ॥ आहारक ने केवल नही ॥ नव ग्रैवेयक ने पांच अनुत्तर विमानमा त्रण ॥ वेदनी कषाय ने मारणांतिक॥ संझी एकला ॥ वेद पेहेले बीजे देवलोके वे स्त्रीवेद । पुरुप वेद ॥ त्रीजाथी ते सर्वार्थ- सीक लगे एक पुरुष वेद ॥ पर्या ५ नाषा मन जेला बांधे ॥दृष्टी बार देवलोकमांत्रण दृष्टी॥ नव ग्रैवेयकमां बे दृष्टी समकित ने मिथ्यात ॥ पांच अनुत्तर विमानमां एक दृष्टी सम- कित ॥ बार देवलोक ने नव ग्रैवेयकमांत्रण ज्ञान त्रण अझान त्रण दर्शन ॥ पांच अनुत्तर विमानमा अज्ञान नथी । जोग अगीयार च्यार मनना च्यार वचनना त्रण कायाना ते वैकेय वैकेयनो मिश्र ने कार्मण कायजोग ॥ एवं अगीयार ॥ जपयोग वार देवलोक ने नव ग्रैवेयकमां नव ॥त्रण ज्ञान ॥त्रण अज्ञान ॥त्रण दर्शन एवं नव ॥ पांच अनुत्तर विमानमां ब उपयोग ॥ त्रण ज्ञान ॥ त्रण दर्शन ए. ॥ तिमज आहार ले तो जघन्य ने ॥ उत्कृष्टो सा ॥ दसमे देवलोके जण जंगणीस सा० । ज० वीस सा० ॥ अग्यारमे देवलोके जप वीस सा ॥ ज एकविस सा ॥ बारमे देवलोके जग एक विस सा । उ बाविस सा० ॥प्रथम प्रैवेयके ज बाविस सा । जत्रेविस सा॥ बीजी ग्रैवेयके ज० त्रेविस साजन चोविस सा । त्रीजी ग्रैवेयके जा चोविस सा० ॥ ज पचीस सा चोथी ग्रैवैयके ज पचीस सा । उ बविस सा । पांचमी ग्रैवेयके ज बविस सा । न सत्याविस सा ॥ बठि ग्रैवेयके ज सताविस साज अगाविस सा ॥ सातमी अवेयके जण अगविस साण । न जंगण त्रिस सा० ॥ आग्मी ग्रैवेयके ज जंगण त्रिस सा । जप त्रिस सा० । नवमी प्रैवेयके जण त्रीस सा नी । उ एकत्रिस सा । च्यार अनुत्तर विमानमा जण एकःत्रीस सा । उ तेत्रिस सा ॥ सर्वार्थसिकमां जग ने ज तेत्रीस सा। समोहिया ने असमोहिया ए वे मरण लाने । चवण ते चविने पेहेला बीजा देवलोकना देवता पांच दंगकमां जाय । पृथ्वी पाणी वनस्पति मनुष्य ने तिर्यंच ए पांच ॥ त्रीजाथी ते आठमा देवलोकना देवता बे दंगकमां जाय मनुष्य ने त्रिजंचमां ॥ नवमेथी मामीने सर्वार्थसीकलागेना देवता।
", ते यात्रीने उपजे । एक दंझक ते मनुष्यनो। सिद्धनी स्थितिनो मो नयी ॥ सिझने मरण नयी ॥ सिझने चबवू नथी । गश् ते मरीने सिझने को गतिमा जावू नयी आगश्ते सिमां एक मनुष्यनोआवे॥ सिझने प्राण नथी। पण नाव प्राण बे केवल ज्ञान केवल दर्शन। सिद्धने जोग नथी॥ इति सिद्धनो धार इतिश्री लघुदंगकना वोल संपूर्ण. ॥ अथ श्री गतागतना बोल.॥ पहेलीन। आगत ॥ २५ नेदनि ते ॥ १५ ॥ कर्मजूमी ॥ ५ :संज्ञीतिर्यंच ने ॥ ॥ ५ ॥ असंज्ञीतिर्यच ॥ ए ॥ २५॥ ना प्रजाप्तानि ॥ गत ॥ ४॥ नेदनि ते ॥ १५ कर्मजूमी ने ॥ ५॥ संज्ञीतिर्यच । ए॥२०॥ ना अप्रजाप्ता । ने प्रजाप्तानि ॥१॥ विजी नर्के आगत ॥ २० नेदनि ते ॥ ५॥ असंज्ञीतिर्थचना प्रजाता वा । गत ॥ ४० ॥ नि पूर्ववत् ॥२॥ त्रिजीन आगत ॥ १५ ॥ जेदनि ते । पूर्वे ॥ २० ॥ कह्या तेहमांथि ॥ ? नूजपर वा । गत ॥ ४० ॥ नि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ चोथी नर्के आगत १७ नेदनि । ते ।
TA ४० नेदनि ॥ ते पूर्वे ५० नेद कह्या तेहमांथि ॥ ५ हेमवय ने ॥ ५ एरणवय । ए १० ना प्र- जाप्ता वा । गत ॥ ४६ ॥ नि पूर्ववत् ॥ १०॥ पहिला किदिवषीमां आगत ॥ ३७ नेदनि ते । पूर्वे ४० कह्या ॥ तेहमांथि ॥ ५ हरिवास ॥५ रमक वास । ए १० प्रजाप्ता वा । गत ४६ नि पूर्ववत् ॥ ११॥ त्रिजा देवलोकथि आठमा देवलोकसुधि ॥६ देवलोक ।। ए लोकांतिक ॥ २ किदिवषी । ए १७ जातिना देवतामा आगत ॥ २० नेदनि ते ॥ २५ कर्मनूमी ॥५ संझीतियच । ए २० ना प्रजातानि ॥ गत ४० नि ते पनर कर्मनूमी पांच संझीतिर्यच ए वीशना अप्र प्रजा एवं ४० ॥ १२॥ नवमा देवलोकथि ते सर्वार्थसिम्लगे ४ देवलोक ॥ ए ग्रैवेयक ॥ ५ अनुत्तर विमान ॥ ए १७ मां आगत ॥ १५ कर्मनूमीना प्रजातानि । गत ३० नि ते पनर कमजूमीना अप्र० प्रजा एवं ३० ॥ १३ ॥ पृथ्वि ॥१॥ पाणि ॥२॥ वनस्पति ॥३॥ ए ३ मां आगतः ॥ २४३ नेदनि ते ॥ १०१ समुर्बिम मनुष्यना अप्रजाता ॥१५॥ कर्मनूमीना अप्र ने प्रजाप्ता । एवं ॥ १३१ ने ॥ ४ नेदतिर्यंचना । एवं १७ए लट ने ॥ ६४ लेद देवताना ते ॥१० नवनपति ॥ १५ परमाधामी ॥ १६ वाणव्यंतर ॥ १० 11 रह्या ॥ अलचरनी गत ॥ ५२१ नी ते ५२७ मांहिथी ॥ पांचमी २ बळी ५.सातमी ३॥ ए. त्रण नर्कना अप्र प्रजा ए उ वा ॥ शेष ५२१ रह्या ॥ उरपरनी गत ५२३ नी ते ॥ ५५७ मांदिथि उठी १ सातमी ५ ए बे नर्कना अश्र० प्रजा ए च्यार बा शेष ५५३ रह्या॥ नुजपरनी गत ५१७ नी ते त्रीजी १ वोथी ५ पांचमी ३ बगी। सातमी ५ ए पांचना अप्र० प्रजा ए दस वा शेष ५१७ रह्या ॥ खेचरनी गत ५१ए नी ते ५२७ मांहिथि चोथी १ पांचमीठी ३ सातमी ४ ए च्यारना या प्रजा ए आठ वर्ध्या शेष ५१ए रह्या॥ ॥ १७ ॥ समुर्बिम मनुष्यमां आगत १७१ नेदनि ते ॥ १७ए लटमाथि ॥ तेन वानना वा । शेष १७१ नि । गत ॥ १७ए लटनि ॥ १० ॥ संज्ञीमनुष्यनि आगत २७६ ने- दनि ॥ ते १७ए लटमाहिथि तेउ वाउना ७ वा । शेष १७१ रह्या अने ॥ एए जातिना देवताना प्रजाक्षा एवं ॥ ॥ ने ६ नर्कना प्रजाता ॥ सर्व मिली श६ नि । गत-। ५६३ नेदनि ॥२०॥ ३० अकर्मचूमीमां आगत २० चेदनि ते ॥१५ काबली ॥ ५ संकीतिर्यच । ए ॥ २॥ ना प्रजातानि॥ गत जुदी जुदी कहेले ॥५ देवकुरु ॥ ५ उत्तरकु.रुनि गत ॥ १२ ॥ هر یکم به جاهای مکه
नि ॥३२॥ स्त्रीवेद ॥१॥ पुरुषवेद ॥ २ ॥ ए ॥ बेमा आगत ३७१ लेदनि ते मिथ्यातिनी
परे । गतपुरुपनि ५६३ नि । स्त्रीवेदनि ॥ ५६१ नि ते सातमी नरकना नेद वा ॥३॥
नपुंसकवेदमां आगत ॥ २७५ नेदनि ते ॥ एए जाति देवताना प्रजाप्ता॥१७नि लट ॥७॥
नारकी। ए ॥ २५ ॥ नि ॥ गत ॥ ५६३ ॥ नेदनि ॥ ३३ ॥ नारकी देवता अपर्याप्ता मरे
नहि माटे अपर्याप्ता मरती वखते गणवा नहि ॥ इति गतागतना बोल संपूर्ण ॥
॥ अथ श्री गुणस्थानद्वार, ॥
गाथा॥नाम? लखगुणविश्॥किरिया सत्ता५बंध क्ष्वेदेय उदय जदिरणाएचेव ॥निजारा
१० नाव ११ कारणा १२ ॥१॥परिसह १३ मग्ग १४ आयाय १५॥जीवाय नेदे १६ जोग १७नवि-
जंग रणा लेस्सा रएचरण २० सम्मत्तं २२॥अप्पाबहुञ्च २२ गुणगणेहिं।शाऐ द्वार २२ नीगाथा
कहि । हवे पहेलो नामधार कहे जे ॥ पहे, मिथ्यात्व गुणगणुं ॥१॥ बिजु सास्वा-
दान गु० ॥ २ ॥ त्रिजुं समामिथ्यात्व गुण ॥ ३॥ चोयुं अविरति सम्यक्त्वदृष्टि गु० ॥ ४ ॥
तेहने मीश्यात्व कहिये॥अने जैनमार्गे आत्मा अकृतिम अखंग अविनाशी नित्य ठे शरिर मात्र व्यापक डे ॥ तिवारे गौतम स्वामि । हाथ जोकि मान मोमी वंदणा नमस्कार करीने श्रीनगवंतने पूढता हवा । स्वामिनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो ॥ तिवारे श्रीजगवते कडं जे । जीवरूप दमि ने । कर्मरुप ॥ गेमिये करि ॥ ५ गति ॥ २४ दंगक ४ लाख जीवाजोनि मांहि वारंवार परिचमण करे पण संसारनो पार पामे नहि ॥ १ ॥ हवे विजा गुणगणाना लक्षण कहे डे ॥ जिम कोइ पुरुष खिरखांमनुं लोजन जम्यो तिवारपनि वमन कर्यु ॥ तिवारे कोश्क पुरुषे पुब्यु लाइ काश् स्वाद रह्यो । तिवारे कहे जे थोमो स्वाद रह्यो । ते समान समकित अने वम्यो ते समान मिथ्यात्व ॥ १॥ बिजो दृष्टांत कहे । जेहवो घंटानो नाद पहेलो गहेर गंजीर । पडि रणको रहि गयो । गहेर गंजीर समान समकित ने रणको रहि गयो ते समान मिथ्यात्व ॥२॥ हवे त्रिजो दृष्टांत आंबानो । जीवरूप आंबो ने प्रणामरूप माल । समकितरूप फल । ते मोहरूपवायरे करि॥प्रणामरूप मालथि । समकितरूप फल त्रुटयुं। मिथ्यात्वरूप धरतीये आवि पमयुं नथि ५. श्रावक कहे जे महालान थाय॥ तिवारे कहे जे हुं पण वांदवा आq । श्म कदिने मिश्रगुणग- णावाले ॥ वांदवाने पग उपामयो ॥ तेहवामां विजो महामिथ्यात्वी मित्र मिल्यो॥ तेणे पुवयु के स्यानणि जावो । तिवारे मिश्रगुणगणावालो कहे जे । साधु महापुरुषने वांदवा जश्ये वै ॥ तिवारे महामिथ्याति कहे जे । एहने वांदे सुं थाय । ए तो मेला घे- ला ठे ॥ श्म कहिने नोलवि नांख्यो पालो बेगे ॥तिवारे साधुझानिने श्रावके वांदिने पुब्युं जे स्वामि वांदवा पग उपायो तेहने सुं गुण निपनो। तिवारे शानिगुरु कहे। जे काला अमद सरिखो हतो ते ॥ बमिदाल सरिखो थयो । कृष्णपदी टलिने शुक्लपदी थयो । अनादि कालनो उलटो हतो ते सुलटो थयो । समकित सन्मुख थयो पण पग जरवा सम- रथ नहि ॥ तिवारे गौतम स्वामि हाथ जोमी मान मोमि वंदणा नमस्कार करिने श्रीजगवंतने पुठता हवा । स्वामिनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो। तिवारे श्रीनगवंत कहे ते ॥ जीव ४ गती ॥ २४ ॥ दमकमां नमिने पण देशे जणो अर्ड पुल परावर्तनमा उत्कृष्टो संसारनो पार पामसे ॥३॥ चोयुं अविरतिसम्यक्त्व दृष्टिगुणगणुं तेहना सुं लक्षण ॥ ७ प्रकृति ने - وا समां बंध पामे नहि ॥ नरकनुं आयुष ॥ १॥ नवनपतिनुं आयुष ॥ २ ॥ तिर्यचतुं श्रा- युप ॥ ३ ॥ वाणव्यंतरतुं आयुष ॥ ४ ॥ ज्योतिषीनुं आयुष ॥ ५ ॥ स्त्रीवेद ॥ ६ ॥ नपुं- सकवेद ॥ ७॥ ए ॥ ७॥ बोलमां आयुषनो बंध पामे नहि ॥ ते जीव ॥ ७॥ आचार सम कितना आराधि । चतुर्विधसंघनि वाढलका परमहर्ष जक्तिनर थको जघन्य पहेले देव- लोके उपजे ॥ उत् । वारमे देवलोके जपजे । पन्नवणानि शाखे ॥ पूर्व कर्मने उदये करिने बत पञ्चखाण करि न शके । पण अनेक वरसनि श्रमणोपाशकनि प्रवानो पालक कहिये। दशाश्रुतस्कंधे श्रावक कह्याठे ते माटे ॥ दर्शन श्रावकने अविरय समष्टी कहिये ॥४॥ पांचमुं देशविरतिगुणगणुं तेहना सुं लक्षण । ग्यार प्रकृतिने दयोपशमावे । ते ॥ ७ पूर्वे कहि ते । अने अप्रत्याख्यानी क्रोध ॥१॥ मान ॥२॥ माया ॥३॥ लोन ॥ ४ ॥ एवं ॥ ११ प्रकृतिने कय करे तो दायकसम कित कहिये॥ अने ११ प्रकृत ढांके उपशमावे तो उपशम सम कित कहिये । अने ११ प्रकृतिने कांश्क ढांके कांश्क क्षय करे तेहने दयोपशम समकित कहिये ॥ पांचमे गुणगणे आव्योथकोजीबादिक पदार्थ अव्यथि देत्रथि कालथि नावथि नो- कयकरे तो दायिकसमकित कहिये । अने १५ प्रकृतिने ढांके तो उपशमसमकित कहिये। अंने कां ढांके ने कांश दय करे तो क्योपशमसमकित कहिये ॥तिवारे गौतमस्वामि हाथ जोमि मान मोमि श्रीनगवंतने पुबता हवा । ते जीवने सुं गुण निपनो । तेवारे श्रीनगवंते कडं जे। ते जीवजव्यथि क्षेत्रथि कालथि नाव थिजीवादिक नव पदार्थने तथा नोकारसीआदि उमासि तप जाणे सरदहे परूपे फरसे ॥ साधुपणुं एक नवमां नवसेंवार आवे। ते जीव जघन्य विजे नवे मोद जाय॥ उत्० १५ नवे मोढ़ जाय ॥ आराधीक जीव । जघ पहिले देवलोके उपजे। उत्। अनुत्तर विमाने उपजे॥१७नेदे संजम निर्मल पाले॥१५ जेदे तपस्या करे पण जोग चपल । कषाय चपल ॥ वचन चपल दृष्टि चपलताना अंश । तेणे करिने यद्यपि उतम अप्रमादिथका रहेठे।तोपण प्रमाद रहे माटे प्रमादपणे करि॥तथा कृष्णादिक लेशा॥अशुन जोगकोश्क काले प्रणति प्रणमे माटे ॥ कषाय प्रकृष्टमत्त यश् जाय तेहने प्रमत्त संजति- गुणटाणुं कहिये ॥६॥ सातमुं अप्रमत्त संजतिगुणगणुं तेह- सुं लवण । पांच प्रमाद बांके तिवारे सातमे गुणगणे आवे । ते ॥ ५ प्रमादना नाम ॥ मद विसय कसाया । निदा विगहा । आदि दर ठमासी तप जाणे। सरदहे परुपे फरसे। ते जीव । जघन्य। तेज नवे मोदजाय ॥ उत् । त्रिजे नवे मोद जाय।हांथि श्रेणि ॥२ करे। उपशमश्रेणि॥१॥ने दपक श्रेणि॥२॥ उपशम श्रेणिवालोजीव ते मोहनीय कर्मनि अतिना दलने उपशमावतो इग्यारमा गुणगणा सुधिजाय।पमिवाइ पण थाय । हायमान परिणामपण परिणमे ॥ अने पकश्रेणिवालो जीव. ते । मोहनीय कर्मनि प्रकृतिना दलने खपावतो शुरू मुलमाथि निर्जरा करतो। नवमे दशमे गुणगणे अश्ने बारमे गुणगणे जाय। अपमिवाइज होय।वर्षमान परिणाम परिणमोहवे निय- द्विवादरनो अर्थ ते निवत्यो बादर कषाय थि। बादर संपराय क्रियाथि श्रेणि करके। अन्यंतर परिणामे । अध्यवसाय स्थिरयते वादर चपलताथि निर्धत्योठे । माटे नियतिवादरगुणगणुं कहिये । तथा विजु नाम । अपूर्व करणगुणगाणुं पण कहिये ॥ सामाटे जे ॥ को काले जीवे पुर्व श्रेणि करि नहति । अने ए गुणगणे पहिबुंज करण ते ॥ पंमितवीर्यनु आवरण दयकरणझप करणपरिणामधारा वर्जनझप श्रेणि करे॥ तेहने अपूर्वकरण गुणगणुं कहिये।।। हवं नवमुं अनियहिबादरगुणगएं तेहर्नुसुंबकण ॥ एक विश प्र.तिने दायोपशमावे ते॥१७ ८ नाय । ते जीवने सुं गुण निपनो। तिबारे जगवंते कडुं । ते जीव ॥ व्यथि केत्रथि कालथि नावश्रिजीवादिक पदार्थ तथा नोकारसी आदी देईने ठमाती तय निरजिलाप निर्वउक निर्वे- दकतापणे निराशी अव्यामोह अविन्त्रमपणे जाणे सरदहे पकने फरसे ते जीव। जघन्य तेज नवे मांक जाय । उत् । त्रीजे नवे मोद जाय ॥ सूक्ष्म थोकिक लगारेक पातलीसी संपराय- किया रहिवे तेहने सुक्ष्मसंपराय गुणवाणुं कहिये ॥ १०॥ श्यारभु नपशांतमोहगुणगणु तेहतुं सुं लक्षण ॥ २७ प्रकृति ने उपशमावे ते २७ प्रकृति पूर्वे कहि ते । अने संजलनो लोन ॥१॥ एवं ॥२७॥ मोहनीय कर्मनि प्रकृतिने उपशामावे सर्वथा ढांके। नस्म नारि प्रवन्न अभिवत् । तिवार गौतमस्वामि हाथ जोमि मान मोमि श्रीजगवंतने पुरता हवा। स्वामिनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो। तिवारे श्रीनगवंते कह्यं । ते जीव जीवादिक पदार्थ अव्यथि देवथि कालथि लावथि नोकारसीआदिदेश्ने बमासी तप वीतराग नावे जथाख्यात चारित्रपणे ॥ जाणे सरदहे परूप फरस । एहवानां जो काल करे तो । अनुत्तर वीमानमा जाय पवि मनुष्य यश् मोद जाय । अने जो सूक्ष्म लोजन उदय थाय तो कपाय अभिप्रकटे नाय । ते जीवने सुं गुण निपनो। तिबारे जगवंते कयुं । ते जीव ॥ अव्यथि क्षेत्रयि कालथि नावधिजीवादिक पदार्थ तथा नोकारसी आदी देईने माती तप निरनिलाय निर्वउक निर्वे- दकतापणे निराशी अव्यामोह अविनमपणे जाणे सरदहे पकाने फरसे ते जीव । जघन्य तेज नवे माद जाय। उत् । त्रीजे नवे मोद जाय ॥ सूक्ष्म थोमिक लगारेक पातलीली संपराय- क्रिया रहि ले तेहने सुदमसंपराय गुणगणुं कहिये ॥ १० ॥ श्यारमुं जपशांतमोहगुणगणुं तेहy सुं लक्षण ॥ २७ प्रकृति ने उपशमावे ते २७ प्रकृति पूर्वे कहि ते । अने संजलनो लोन ॥१॥ एवं ॥ २७ ॥ सोहनीय कर्मनि प्रकृतिने उपनामावे सर्वथा ढांके । जस्म चारि प्रउन्न अभिवत् । तिवारे गौतमस्वामि हाथ जोमि मान मोकि श्रीनगवंतने पुढता हवा। स्वामिनाथ ते जीवने सुं गुण निपनो। तिवारे श्रीनगवंते का । ते जीव जीवादिक पदार्थ मुख्य विदेत्रथि कालयि नावथि नोकारसी आदि देश्ने बमासी तप वीतराग नावे जथाख्यात चारित्रपणे ॥ जाणे सरदह परूप फरस । एहवानां जो काल करे तो । अनुत्तर वीमानमा जाय पवि मनुष्य थश्मोद जाय। अने जो सूक्ष्म लोजन उदय थाय तो कपाय अग्नि प्रकटे
दायकसमकित ॥६॥ पंमितवीर्य ॥७॥ शुकलध्यान ॥७॥ केवलज्ञान ॥ ए॥ केवलदर्शन
॥ १० ॥ ए. ॥ १० ॥ वालसहित ॥ जघन्य । अंतर्मुहुर्त । उत्। । देशेनणी पुर्वक्रोमिसुधि ।
विचरे घणा जीवने तारि प्रतियोधि निहाल करिने ॥ विजा त्रिजा शुकलध्यानना पायाने
ध्याइने चनदमे जाय ॥ सजोगी ते गुन मन वचन कायाना जोगसहित ठे वाहाज्य चलोप
करण ठे । गमनागमनादिक चेष्टा शुन सहित छे । केवलज्ञान केवलदर्शन । नपयोग लम-
यांतर । अविछिन्नपणे शुरू प्रणम माटे सजोगि केवलिगुणवाणुं कहिये ॥१३॥ हवे चन्दमुं
अजोगी केवली गुणगणुं तेहy सुंलक्षण । शुक्रध्याननो चोथो पायो समुबिन्न क्रिय अनंतर
अप्रतिपाती। अनिवृतिध्याता मनजोग संधि वचनजोग संधि कायजोग संधि आन प्राण निरोध
करि रूपातीत परमशुकलध्यान ध्याता ॥ ॥ बोलसहित विचरे। तेरमे ॥१७॥ बोल कह्या
तेहमाथि । सजोगी ॥१॥ सलेशी ॥२॥ शुकल लेशी ॥३॥ एत्रण वर्जीने शेष ॥७॥
वोलसहित सकल गिरीनो राजा मेरुतेहनि परे । अमोल । अचल । स्थिर अवस्याने पामे
शैलेशी पणे रहि पंचल वुअदरचार प्रमाण काल रहि॥शेष वेदनीय ॥१॥ आयुध ॥२॥
सादियासपजावसिया ते जे मिथ्यात्वनि आदि पण ते ने अंत पण ते ते पमिवार समष्टीना
मिथ्यात्वाश्रि ॥ तेहनी स्थिति जघन्य अंतर्मुहूर्त ॥ उत्प अर्ब पुजल परावर्तन देशे जणी
पछि अवश्य समकित पामिने मोद जाय ॥३॥१॥बिजा गुणगणानि स्थिति। जघ० ॥१॥
समय । उत्० ॥ ६ आवलिकाने ७ समयनि ॥२॥ त्रिजा गुणगणानि स्थिति । ज ।
ज० अंतर्मुहूर्लनी ॥ ३ ॥ चोथागुणगणानि स्थिति ज० अंतर्मुहर्त्त । ज० ॥ ६६ सागरोपम
काफेरानि ते २२ सागरोपमनि स्थितिये ३ वार बारमे देवलोके उपजे । त्रण पूर्वक्रोमि
अधिक मनुष्यना नव आश्रि जाणवि ॥ तथा बेवार अनुतर विमानमा ३३ सागरोपमनि
स्थितिये उपजे ॥ ३३ सुबासठ सागरोपम ने पूर्वक्रोमि ३ अधिक मनुष्यना नव आश्रि
जाणवि ॥४॥ पाँचमा ना तेरमा गुणगणानि स्थिति ज० अंत जन् देशेजणि ते साडाआठ
वर्षे आणि पूर्वक्रोमनि ॥ सातमाथि ते ग्यारमा गुग सुधि ज० ॥ १ समयण ॥ ज० अंत ।
बारमा गुत । स्थिति ज। । । ठांत० ॥ चनदमा गुणगणानि स्थिति पांच हस्व अकर
अ।।।काल । बोलवा प्रमाणे जाणवि । इति त्रिजो स्थितिहार समाप्तं ॥३॥
वम गु० ॥ ॥ कर्म बांधे आयुष वर्जिने ॥ दशमे गुण ॥ ६ कर्म वांधे । आयुप ॥ १ ॥ ने मोहनीय । ए ॥ २ ॥ वर्जिने ॥ ग्यारमे बारमे तेरमे गुण ॥ १ सातावेदनीय बांधे।। चजदमे गुण । अवंध० ॥ इति ६ गे ॥ बंधधार समाप्तं ॥ ६॥ हवे॥ मो वेद द्वारने १७ मो उदयहार नेला कहे ॥ पहिला गुणगणाथि ते दशमा गुणगणासुधि ॥ कर्म वेदे ने ।। ७ नो उदय ग्यारमे बारमे ॥ ७ कर्म वेदे ने ॥ ७ नो उद्घ मोहनीय वर्जिने ॥ तेरमे चजदमे ॥ ४ ॥ कर्म वेदे ने ॥४ नो उदय ॥ वेदनीय ॥२॥ आयुष ॥२॥ नाम ॥ ३ ॥ गोत्र ॥४॥ इति ॥ ७ मो वेदने मो उदयद्वार समाप्तं ॥७॥७॥ हवे नवमो उदीरणाकार कहेले । पहिला गुणगणाथि मामिने ॥ ७ मा गुणवाणासुधि ।। ७ कर्मनि उदीरणा। तया : नी करतो आयुष वर्जिने ॥ आठमे नवमे गुणगणे ॥ ३ कर्मनि उदीरणा ते आयुष वर्जिने । तथा ६ नि करे तो। आयुष ॥१॥ मोहनीय ॥२॥ ए ॥२॥ वर्जिने । दशमे ॥ ६ नि नदी- रणा करे ॥ आयुष ॥१॥ मोहनीय ॥२॥ ए ॥२॥ वर्जिने । अने ५ नि करे तो । आयुष ॥१॥ मोहनीय ॥२॥ वेदनीय ॥३॥ ए ३ वर्जिने।ग्यारमे बारमे गु०५ नि उदीरणा। E वारमा सुधि पकणि वालाने ॥ ४ नाव उदय ॥ १॥ क्षयोपशम ॥ ॥ दायक ॥३॥ परिणामिक ॥॥ तेरमे चजदमे गुण ॥ ३ नाव । उदय ॥ १ ॥ दायक ॥ २ ॥ परिणामिक ॥३॥ सिङमां ॥ ५ जाव । दायक ॥१॥ परिणामिक ॥२॥ इति ?? मो नावहार समातं ॥ हवे ॥ १२ मो कारणहार कहे जे ॥ कारण ॥ ५ कर्मबंधना ॥ मिश्यात्व ॥ १ ॥ अविरति ॥२॥ प्रमाद ॥३॥ कपाय ॥४॥ जोग ॥ ५॥ पहिले। विजे गु० ॥ ५ कारण लाचे ॥ वीजे चौथे ॥ ४ कारण लाने॥ मिथ्यात्व वर्जिने । पांचो बठे गुण ॥ ३ कारण लाने ॥ मिथ्यात्व ॥ १ ॥ अविरति ॥ ३॥ ए ॥२ वर्जिने ॥ सातमेथि ते दशमा गुणगणासुधि ॥ ५ कारण लाने ॥ कषाय ॥ १ ॥जोग ॥ ॥ ए॥२ लाने ॥ ग्यारमे बारमे तेरमे १ कारण लाने ते ॥ जोग १ ॥ चउदमे कोई कारण नथि । इति १२ मो कारणछार समाप्तं ॥१२॥ हवे १३ मो परिसहछार कहे॥ पहिलागि ते चोथा गुणगणा सुधि यद्यपि परिसह २५ लाने पण फुःख रूप ले । निर्जरारूप प्रणमे नहि ॥ पांचमाथि ते ए मा गुणगणासुधि २५ परिसह लाने ॥ एक समये २० बेदे । टाढनो तिहां तापनो कहे ॥ पहेले गूणवाणे मार्गणा ॥ ४ ॥ त्रीजे चोथे पांचमे सातमे जाय ॥ बिजे गूण मार्गणा ॥१॥ पमे तो पहेले. आवे पण चमबुं नथि ॥ विजे मार्गणा ॥४॥पमे तो पहेले आवे । अने चमे तो चोथे पांचमे अने सातमे जाय ॥ चोथे मार्गणा ॥ ५ पझे तो पहेले विजे निजे आवे । अने चमे तो पांचमे सातमे जाय ॥ पांचमे मार्गणा ॥ ५ पमे तो पहेले बिजे बिजे चोथे आवे । अने चमे तो सातमे जाय ॥ 3 मार्गणाः ॥ ६ पके तो पहेले विने विजे चोथे पांचमे आवे । अने चमे तो सातमे जाय ॥ सातमे मार्गणा ॥ ३ पम्तो बडे चोथे आवे । अने चझे तो उसे जाय ॥ आग्मे मार्गणा ॥ ३ पमे तो सातमे चोथे आवे । चमे तो नवमे जाय ॥ नवमे मार्गणा ॥३पमे तो आग्मे चोथे आवे ॥ अने चमे तो दशमे जाय ॥ दशमे मार्गणा ॥ ४ पमे तो नवमे चोथे आवे । चमे तो ग्यारमे बारमे जाय ॥ ग्यारमे मार्गणा ॥२ काल करे तो अनुंतर विमाने जाय ॥ पके तो दशमाथी पहेलासुधि आवे । चम नथि ॥ बारमे मार्गणा ॥ ? तेरमे जाय ॥ पम नथि तेरमे मार्गणा १ ॥ चौदमे जाय । पम नथि । चजदमे मार्गणा एके नथि मोद जाय । -इति ऐवं ॥ ३३॥ हवे अजीव उदय निष्पन्नना ३० बोल पामे ॥५॥ वर्ण ॥२॥ गंध ॥५॥ रस ॥॥ स्पर्श ॥५॥ शरीर ॥५॥ शरीरना व्यापार । एवं ॥३०॥ एवं उन्नय मलिने ॥३३ ।। ने ॥ ३० ॥ त्रेशठ नेद उन्नयनावना कह्या ॥ १॥ हवे उपशमनावे ॥ ११ बोल रे । च्यार कषायनो उपशम ॥ ४॥ रागनो उपशम ॥ ५ ॥ शेषनो उपशम ॥ ६ ॥ दर्शनमोहनीयनो उपशम ॥ ७ ॥ चारित्रमोहनियनो उपशम ॥ ७ ॥ एवं ॥ ७ मोहनियनि प्रकृति ॥ अने जवस मिया दंशणलफि ते समकित ॥॥ उवसमियाचरित्तलहि ॥१॥ जवसमियाअकपा- यबलमबवीतरागलहि ॥ ११ ॥ एवं ॥ ११ ॥ हवे दायक नावे ३७ बोल ॥ ५ ज्ञानावर णिय ॥ ए दर्शनावरणिय ॥२॥ वेदनीयनि ॥१॥रागनि॥१॥ द्वेषनि ॥४ कपायनि ॥१ दर्शनमोहनीयनि ॥ १ चारित्रमोहनीयनि ॥ ४ आयुषनि ॥ नामनि ॥ गोत्रनि ५ अंत रायनि । एवं ३७ ॥ प्रकृतिने दय करे तेहने दायकन्नाव कहिये ते ए बोल पाने ॥दायकस- मकितः ॥ १॥ दायकजथाख्यातचारित्र ॥२॥ केवलज्ञान ॥३॥ केवलदर्शन ॥४॥ अने कायकंदानादिलब्धि ५॥एवं ए बोल ॥३॥दवे कयोपासताने ॥30 बोल वे ॥४ ज्ञान . क . 59: 3RD मिथ्यात्व । एवं ५७ हेतु ॥ पहेले गुणगणे॥५५ हेतु ते आहारकना ५ वर्जिने ॥ १॥ बिजे गुण ५० हेतु ते ५५ मांथि ५ मिथ्यात्व टदया ॥२॥ त्रिजे गु०४३ हेतु ते ५७ मांथि अनंता- नुवंधि ४ ॥ उदारिकनो मिश्र १ वैक्रेयनो मिश्र २ ॥ आहारकना २ मिथ्यात्व ५ एवं १४ वा ॥ शेष ४३ ॥३॥ चोथे गुण ४६ हेतु ते पूर्वे कह्या ४३ ते अने उदारिकनो मिश्र ॥ वैक्रे- यनो मिश्र २ ॥ कार्मण कायजोग ३ ॥ ए ३ वध्या ॥ सर्व मलिने ४६ ॥ ॥ पांचमे गुण- गणे ४० हेतु ते पूर्वे ४६ कह्या तेहमांथि अप्रत्याख्यानीनि चोकमि ४॥शकायनोअग्रत १॥ कार्मणकायजोग १ ॥ एवं ६ घटया ॥ शेष ४० हेतु ॥५॥ बठे गुण २७ हेतु पूर्वे ४० कह्या तेहमांथि प्रत्याख्यानावरणियनि चोकमि ॥पांच स्थावरनो अबत ५॥ इंडिय ५ नो अव्रत ॥५॥ने एक मननो अव्रत ॥१॥ एवं १५ वा ॥ शेष २५ रह्या ने ॥ आहारकना २॥ वध्या । एवं सर्व मलि २७ हेतु ॥६॥ सातमे गुण २४ हेतु ते पूर्वे ५७ कह्या तेहमांथि ॥ उदारिकमिश्र १ ॥ वैक्रेय मिश्र २॥ आहारकमिश्र । ए ३ वा । शेष २४ हेतु ॥७॥ आग्मे गुण २२ हेतु तेपूर्वेश्व कह्या तेहमांथि । वैकेयनो १॥ आहारकनो ॥ए २ वा । शेष । अशE3% सागर काफेरॉर्नु अथवा १३२ सागर काफेरानुं ते ६७ सागर चौथे गुण रहे ॥अंतण्त्रीजे गुण रहिं पाबो चौथे गुणण ६६ सागर रहि मिथ्यात्वे आवे ॥बीजाथि मांमिने इग्यारमा गुणग- णासुधिजण अंतण्अथवा पल्यनो असंख्यातमो नाग ते एटला काल विना उपसम श्रेणीकरि ने पझे नहीं उत्प अर्डपुजल देशे जणुं । बारमे तेरमे ने चौदमे गुण आंतरं नथि । ए एक जीवआश्रि इति ४ अंतरछार समातं ॥४॥ हवे एमो ध्यानधार कहे पहेले विजे त्रिजे गुण र ध्यान पहेला।चोथे पांचमे गुण०३ ध्यान पहेला॥ बठे गुण २ ध्यान आर्त ? ने धर्म ध्यान ॥२॥सातमे गुणधर्मध्यान । आठमेथि मांझिने चौदमा गुण १ शुकलध्यान । इति ५ मो ध्यानछार समातं ॥ ५ ॥ हवे बगे फरसनाद्वार कहे । पहेबुं गुणगणुं १४ राजलोक स्पर्श ॥ बिजु गुण हेतु पंरुगवनथि ते६ वि नरक लगे फरसे तथा जचुं अधोगाम विजयथि ते एग्रैवेयकसुधि फरसे ॥२॥ त्रिजु गुण लोकनो असंख्यातमो नाग फरसे॥३॥चोथु गुण अधोगाम विजयथि १५मा देवलोकसुधि फरसे अथवा पंगवनथि बगी नरक सुधी फरसे ॥४॥ पांचमु गुण पण इसज अधोगक्षम विजयशि १५ मा देवलोक सुधि फरसे ॥ ५ ॥ उठाथि ॥ अथ श्री महोटो बासठियो, ॥ गाथा ॥ जीव १ ग २ दिय ३ काए ४॥ जोग ५ वेय ६ कसाय लेस्सा सम्मत्तं ए माण १० दंसण ११ संजय १२ उवउँग १३ आहारे १४ ॥१॥ जासग १५ परित्त १६ पजाती १७ सुहूम १७ सन्नि ?ए नवनि २० चरिमेय २१॥जीवेयखेत्ते बंधे । पुग्गलए महादंमएचेव ॥२॥ उपली २ गाथानो अर्थ विस्तारी कहे ३ ॥ १ समुच्चय जीवमा जीवना जेद १४॥गुण यनो मिश्र।कार्मणकायजोग । एवं ११। गणा ॥२४॥ जोग ॥१५॥ उपयोग ॥१॥ उपयोगाए॥३ज्ञान।३। अज्ञान ३ दर्शन लेशा ॥६॥ इति प्रथम कार॥ १ नरक ग लेशा३प्रथमनी तिमा जीवना नेद ३ । संझीनो अप्रण ? शतिर्यचनिगतिमांजोवना नेद १४॥ गुण ने प्राजाप्तो॥। असंझी पहेली नरकनो ५.॥प्रथमना॥जोग १३आहारकनाश्व- अप्र० ३॥ गुण ४ प्रथम । जोग । ११ । र्जिने॥जपा ए॥३ज्ञान.३यान.३ दर्श- ते ४ मनना ४ वचनना र वैक्रेय । वैके न ॥ लेशा ६॥ . . ० णी १ ॥ तेहथि मनुष्य समुर्बिम नेलवता असंख्यातगुणाशातेहथीनारकिअसंख्या- तगुणाातेह थि तिर्यचणी असंख्यातगु- णि ॥ तेहथि देवता असंख्यातगुणाय॥ तेहथिदेवीसंख्यातगुणि दातेहथि सिह- जगवंत अनंतगुणा 3 । तेहथि तिर्यच वनस्पति लवतां अनंतगुणा ७॥ इति बिजो हार ॥ ए सशंदियामांजीवनानेद १५ ॥ गुण १२ प्रथमना॥ जोग १५ उपयोग राकेवल:- झानकेवलदर्शनश् एश्वर्जीने॥लेशा॥ एकेंशियमा जीवना जेद ॥ सूदम पकें- जियनो अप्रजाप्तोरने प्रजातोशावादर- एकेडियनो अप्रजातो.३ नेप्रजाप्तो ४ ॥ गुण १ प्रथमचें ॥ जोग ५ उदारिक र उदारिकनो मिश्र श्वैक्रेयश्चक्रेयनोमिश्र ४ कार्मणकायजोग ५ ॥उपयोग ३॥ बे अझान ने ॥ १ अचक्कु दर्शन।लेशा.॥ ५ बेणिय र तेजियश् चरिंजिय ए३ मां ॥जीवना नेद २ पोतपोतानो अप्रजातोर ने प्रणाप्तो २॥ गुण २ पहेला । जोगधा २ उदारिकनार कार्मणनो॥ने॥१.व्य- वहार वचननो। एवं ४ा उपयोग वेजिय तेजियमां५।रज्ञान॥ अज्ञान ने॥
४ पृथ्वीकाय १ अपकाय २. वनस्पतिकाय ३॥ ए ३ मां जीवना नेद ।।गुण ? जोग ३ ॥ उप ३ । लेशा ४ ॥ ६ तेउकायः १ वाजकाय.२॥ ए २ मां जी- वना छेद ५ ॥ गुण १ ॥ जोग तेजमां ३ ने॥ वाउमा ५ ते वैकेयना वध्या॥ उप ३॥ लेशा ३॥ त्रशकायमांजीवनानेद १० ते ४ एकेंजि- यना वा ॥ गुण॥ १४ ॥ जोग १५ ॥ उपयोग १२ ॥ लेशा ६॥ ७ अकायामां जीवना नेद नथि गुण न- थि। जोग नथि उप०.२ लेशानथि ए. हनो अल्प बहुत्व । सर्वथी थोमा स- काया । तेहथि तेजुकाया असंख्यात- गुणा । तेहथि पृथ्वीकाया विशेषाहिया ३ ॥ तेहथि अपकाया विशेषाहियां ॥ तेहथि वाउकाया विशेषाहियाः ५ ॥ तें- हथि अकाया अनंतगुणा ६ ॥ तेहथि वनस्पतिकाया अनंतगुणा ७ ॥ तेहंथि सकाया विशेषाहिया छ ॥ इति चौथो छार ॥ १ सजोगीमा जीवनानंद १५ गुण १३ ज- पच्या वे नहीं । जोग १५॥ उप० १२ ॥ लेशा ६॥
1 । पुरुषवेदमा १५ ॥ अने स्त्रीवेदमा १३ ते आहारकना बे वर्जिनेउप० १णालेशा ४ नपुंसकवेदमा जीवना छेद १४ । गुण. ए॥ जोग १५ ॥ उपयोग १० केवलझा- न ? केवलदर्शनवर्जिने ॥ लेशा ६॥ ५अवेदीमां जीवनो नेदर संहीनो प्रजातो। गुण ६ नवमाथि ते १४ मांसुधि जोग ११।४ मनना ४ वचनना ने ५ उदारिक ना॥१कार्मणनो एवं ॥१९॥उपयोग ए।३ अज्ञान वर्जिने॥लेशा १ शुकल ॥ एहनो अल्पबहुत्वासर्वथि थोमा पूरुषवेदी॥१॥ तेहथि स्त्रीवेदी संख्यातग्रणी२॥ तेहथि अवेदी अनंतगुणाातेहथि नपुंसकवेदी अनंतगुणा ४ ॥ तेहथि सवेदी विशेषा- हिया ५ ॥ इति बठो हार ॥ १ सकषायीमांजीवना नेद १४ ॥ गुण १० प्रथमना ॥जोग १५॥ उपयोग राकेवल- ज्ञान ? केवलदर्शन वर्जिने ॥ लेशा ६॥ ४ क्रोध ? मानश्माया३ ए३ मां जीवनानेद १४॥ गुण ए॥ जोग १५॥ उपयोग १०॥ लेशा ६॥ ५ लोनकषायीमा जीवना नेद १४ ॥ गुण- गणा १० पहेला ॥ जोग १५ ॥ उप- योग १० ॥ लेशा ६॥
Kok *.. शुकललेशीमा जीवना नेद ॥संझिना गुण-२३ प्रथमना । जोग १५॥ उपयोग १२ ॥ लेशा १ शुकल ॥ अलेशीमा जीवनो जेद र संझिनो प्रजा- सो ॥ गुण र चौदमुं॥ जोग नथि॥ उ- पयोग ॥ केवल ज्ञान ? ने केवलदर्शन २॥ लेशा नथि ॥ एहनो अल्पबहुत्व ॥ सर्वथि थोमा शुकल लेशा॥तहाथ पद्म- लेशी संख्यातगूणा २॥ तेहथि तेजुले- शीसंख्यातगुणा ३॥ तेहथि अलेशी अनंत * गुणाातेह थि कापुतलेशी अनंतगुणा५॥ । तेहथि निललेशी वीशेषाहिया हातहथि कृष्णलेशी विशेषाहिया ७॥ तेहथि सले- शी विशेषाहियात॥ इति मो हार ॥ १ समुचय सम्यकदृष्टिमां जीवना दाबे इंपिय॥ तेइंडियाचनारंडियाअसं- झीपंचेंजिय ॥ए ४ नाअप्रजाता॥ अने संझीपंचेंडियनो अप्रजाप्तो ॥ नेप्रजातो एवं ६॥ गुण०१२ पहेलु त्रिजुं वरजीने॥ जोग १५॥ उपयोग ए॥३ अझान वर्जि ने ॥ लेशा ६॥ २ सास्वादान सम्यकदृष्टिमा जीवना जेद ६॥ गुणबिर्जु ॥ जोग॥१३ आहारकना २ वर्जिने ॥ उपयोग ६ ॥ ३ ज्ञान ॥३ 4 . .
१ किति संख्यातगूणायातहथिदायकसम- किति अनंतगूणा६॥ तेहथिसमुचयसम- किति विशेषाहिया ७ तेहथि मिथ्यात्व- दृष्टि अनंतगूणा इति ए मो द्वार ॥ १ समुचयज्ञानिमांजीवना नेद६॥इंघिय ते इजियशचरिंघिय ३।असंझीपं- चेंजिय भएपना अप्रजाप्ता ने प्रजाता॥ एवं६॥गुण १२ पहेलुं त्रिनुं वर्जिने ॥जोग १५॥उपयोग ए५५ ज्ञानने दर्शनालेशा६ ३ मतिझानी। श्रुतझानीमा जीवनानेद ६॥ गुणण रप पहेछु त्रिजुं तेरमुं चौदमुं वर्जिने ॥ जोग १५॥ उपए कालेशा ६॥ ४ अवधिज्ञानीमजीवना नेद शसंझीना। गुणराजोग १५॥उपयोग लेशा॥६॥ ५ मनपर्यवज्ञानीमांजीवनोद १ संझीनो प्रजातो॥ गुणा बघाथि वारमांसुधि । जागर४ कार्मणनो वर्जिनेउपालेशाद ६ केवलज्ञानीमां जीवनो नेद १ संझिनो प्रजाप्तो ॥ गुण २ तेरमुं ने १४ मुं॥ जोग ॥ उपयोग ॥लेशा १ परम शुकल ॥ अज्ञानीमांजीवना नेदर। गुण श्पहेझुं ने त्रिजु॥जोग १३आहारकनाश्वर्जिने॥ उप० ६।३ अझान ३ दर्शन ॥ वेशा ६॥ एमतिश्रुतयज्ञानीमा जीवना जेद १४ ॥
पहनो अल्पबहुत सर्व थियोमा अवधि दर्शनी १॥ तेहथि चकुदर्शनी असंख्या- तगूणा २॥ तेहथि केवलदर्शनी अनंत गूणा ३॥तेहथि अचकुदर्शनी अनंतगूणा ४ ॥ इति ११ मो हार ॥ १ संजतिमा जीवनो नेदरसंझीनो प्रजाप्तो॥ गूणा एग्गथि ते १५मा सुधि॥जोग १५॥ उप० ।। ३ अज्ञानवर्जिनेलेशा॥ ६॥ ३ सामायक १ दोपस्थापनीय ५ ए बे चारित्रमा जीवनो नेद १ संझिनो प्रजा- तो ॥ गूण ४ ठायी ए मां सुधि॥जो- झान ने ३ दर्शन एवं ॥ लेशा० ६॥ ५ परिहार विशुरुचारित्रमा जीवनोनेद सं- झी प्र०१॥ गूण न्यु ने सातमुं॥जोगए। ४ मनना ४ वचनना ॥ने॥२॥ उदारिकनो ॥ एवं ए॥ उप० ॥ लेशा०३ उपलि॥ ५ सुवासंपरायचारित्रमा जीयनो नेद ? संझीनो प्र० ॥ गुण १ दशमुं ॥ जोग ए ॥ उपयोग ॥ लेशा ? शुकल ॥ ६ यथाख्यातचारित्रमा जीवनो बेदरसंझी- नोप्रागुण उपल्या॥जोग११४मनना ४ वचनना २ उदा रिकना नेरकार्मणनो। 1.2 ॥ १ सागरोवउत्तामा जीवना नेद १४ । गुण १४ । जोग १५ । उप० १२ । लेशा ६ अणागारोवउत्तामा जीवना नेद १४ ॥ गुण १३ दशमुं वर्जिने ॥ जोग १५ ॥ जप० १२ ॥ लेशा ६ ॥ एहनो अपब- हुत्व ॥ सर्वथि थोमा अणागारोवउत्ता १ ॥तेह थि सागारोवउत्ता संख्यातगुणा इति १३ मो हार ॥ १ आहारकमां जीवना नेद १४ ॥ गुण १३ पहेला ॥ जोग १४ कार्मणनो वर्जि- ॥ उप० १२ ॥ लेशा०६॥ २ अण्णाहारका ॥ जीवना नेद ॥ सात अप्रजाप्ता ने १ संझिनो प्रजातो। एवं ७॥ गुण ५ पहिर्बु विजुं चोथु तेरमुं ने चौदमुं ए ५॥ जोग ? कार्मणनो ॥ उपयोग १० ॥ मनपर्यवज्ञान ? ने चक्कु दर्शन २ ए २ वर्जिने ॥ लेशा ६ ॥ एहनो अल्पबहुत्व ॥ सर्वथि थोमा अ- पाहारक १ ॥ तेह थि आहारक असं- ख्यातगुणा ५ ॥ इति १४ मो द्वार ॥ १ तासगामा जीवना नेद ५ ॥ बेइंजिय १ । तेइंजिय शचरिंजिय ३। असंझी- पंचेंजिय ।। संझीपंचेंजिय५ । ए ५.ना प्रजाप्ता॥गुण०१३प्रथमनाजोगर कार्म- , -- नंतगुणा ३ ॥ इति १६ मो हार ।। १ प्रजातामां जीवना लेद ॥ गुणण १४॥ जोग १५ । जप १२ । लेशा। ६॥ २ अप्रजाप्तामा जीवनानेद ७ ।। गुण०३। ते । पहेलु ॥ विजुं । ने चोडुं ॥ जोग ५॥ते । २ उदारिकना ॥२ वैक्रेयना ने १॥ कार्मणनो ॥ उप० ए ॥३ झान ॥३ अझान ३ दर्शन ॥ एवं ए॥ लेशा॥ ३ नोप्रजाप्ता नोअप्रजातामां । जीवना नेद नयी।गुण नथी॥जोग नथी।जप ५ केवलझानने केवलदर्शन॥ लेशा नथि ॥ पहनो अल्पबहुत्व ॥ सर्वयि थोमानो प्र- जाप्तानो अप्रजाप्ता १॥ तेहथि अप्र- जाप्ता अनंतगुणा २॥ तेहथि प्रजाता संख्यात गुणा ३॥ इति १७ मो घार । १ सुममा जीवना नेद २॥ सुक्ष्म एकें- जियनो अप्रजातो १ ने प्रजातो ॥ गुण १ प्रथमचें ॥जोग ३ वे उदारिकना ने। १। कार्मणनो । उप० ३ बे अज्ञा- न ॥१॥ अचकुदर्शन ॥ ए ३ ॥ लेशा३॥ २ वादरमा जीवना जेद १५ ॥ ते २ सुदम नावा । गुण १४ । जोग २५.॥ उपण योग १२॥ लेशा ६॥ ३ नोसुक्ष्मनोवादरमा जीवना जेद नथी ।
६७ सुदम बाउकाया अप्रजाप्ता विसपाही
६७ सुदम तेउकाया प्रजाता संख्यातगुणाo
६ए सुक्ष्म पृश्वीकाया प्रजाप्ता विसेषाही
30 सुम अपकाया पर्याप्ता विसेंषाहीया
११ सुक्ष्म वाजकाया पर्याप्ता विसेषाहीया
७२ सुक्ष्म निगोदीया अपर्याप्ता अ०
७३ सुक्ष्म निगोदीया प्रजाप्ता संग
४ अनव्य अनंतगुणा
७५ पभिवाइ समष्टी अनंतगुणा
७६ सिकनगवंतजी अनंतगुणा
७ वादर वनस्पति प्रजाप्ता अनंत
बादर प्रजाप्ता विसपाहीया
जए वादर वनस्पति अपर्याप्ता असंच
Gu बादर अप्रजाप्ता बिसेषाहीया
१ समुचय वादर बिसेषाहीया
२ सुक्ष्म वनस्पति अपर्याप्ता असं
७३ सुक्ष्म अपर्याप्ता विसेषाहीया
७४ सुक्ष्म वनस्पति पर्याता संख्यात
७५ सुक्ष्म पर्याप्ता विसेषाहीया
७६ समुचय सुक्ष्म विप्लेषाहिया
७ नव्य सिझीया विसेषाहीया
निगोदीया जीव विसेषाहीया
जए वनस्पति जीव विसेषाहीया
एएकेंजीयां जीव विसेषाहीया
नाराच संघयण ने ॥ १ ॥ समचतरंस संगण जाणवू ॥ स्त्री पुरुषना रूप सोजाग्य । घणा । दिपे । ए आराने विये अमिनक्ते आहारनी श्वा उपजे। तेवारे शरीर प्रमाणे आहार करें। धरतिनी सरसा साकर सरखी जाणवी । उतरते आरे खांम सरखि जाणवि । ए आराने विपे ॥ १० ॥ दश प्रकारना कल्पवृक्ष मनवंबीत सुख पहोचामे। ते कल्पवृदनां नाम गाथा । कहे वे मतं गायनिंगा तुमियंगा। दिव जो चित्तगा। चित्तरसा मणंवेगा। गिहगारा अणियगणा ॥१॥ ए गाथा सूत्र पाठे कही तेनो अर्थ कहे ॥ मतंगाय कहेता । मिग मधुरा रसना कल्पवृक्ष यश् आवे ॥ १ ॥ निंगा कहेता। रत्नजमाव नाजनना कल्पवृक्ष यश् आवे ॥ २॥ तुमियंगा कहेता ॥ ४ए ॥ गणपचास जातिनां वाजिंत्रना । क थ० ॥ ३॥ दिव कहेता । रत्नजमाव दीवीऊना क॥ ४ ॥जोइ कहेता। सूर्यनी जोतिना कण् ॥ ५ ॥ चित्तगा कहेता। चित्रामणसहित फूलनो मालाना का ॥६॥ चितरसा का चितने गमे तेवा रसवति जोजनना । कम् ॥ ७॥ मणवेगा क० । रत्नजमाव आजरणना । क० ॥७॥ गिहगारा का । बेतालीस नोमिया अवासना । कण्या अनिय- +----- 1 तेवारे शरीर प्रमाणे आहार करे। धरतिनि सरसाई खांग सरखि । उतरते आरे गोल सरखि जाणवी।ए आरे १० प्रकारना कल्पवृक्ष मनवंबीत सूख पोचामेोक थाकतांजूगलना आउखा आमा ॥ उ मास रहे। तेबारे जुगल परनवर्नु आउखुं वांधे। तेवारे जूगलिणी एक जोमवँ प्रसवे। ठोरुनी प्रतिपालण ॥६४ दिन करे। जुगल जुगलीणीने। क्षण मात्रनो विजोग न पके। एकने ठीक ने एकने बगासूं आवे । मरिने देवता थाय। एना शरीरनुं निहरण देवता करे। गति १ देवतानि जाणवि । इति बिजो आरो संपूर्ण ॥हवे बीजो आरो उतरीने।विजो आरो वेगे तिवारे। अनंता वर्ण गंध रस स्फर्सना पर्यव अनंताहीणा थया। ए आरो॥ क्रोमाक्रोम सागरोपमनो जाणवो । ए आरो सूखम उखम नामा जाणवो । सुख घणुं ने मुख थोड़ें जाणवू ॥ ए आराने विषे एक गाउनुं देहमान ने ॥ १ एक पठ्योपमनुं आज जाणवू ॥ उत्तरते आरे ५०० पांचसें धनुष, देहमान ने क्रोम पूर्व- आजवू जाणवू । ए आराने विषे वजऋपननाराच संघयण । ने समचरंस संगण जाणवू । ए आराने विषे ॥ ६४ चोसठ, पांसली जाणवी । उत्तरते आरे ३२ बत्रिस पासली जाणवि । ए आराने विष चौथ जक्ते 1 आदि देईने ७२ बोतेर कला सिखवि । अनुकंपा निमिते ॥ २० विस लाख पूर्वलगे कुवरपणे रह्या ॥ ६३ त्रेसठ लाख पूर्वलगे राज्य लोगव्युं । नरतने राज्य आपिने । चार हजार पुरुष संघाते संजम लिधो । एक लाख पूर्व लगे संजम पाल्यो । केनल पामिने । अष्टापद पर्वत उपरे । पद्मासने बेसीने। दसहजार साधु संघाते स्वामि निर्वाण पधार्या । ते स्वामिना ६ कल्याणिक थया। पेहेले कल्याणीके उत्तरासाढा नक्षत्रमा सर्वार्थसिध विमान यकी चविने मातानि कुंखे उपना ॥१॥ बीजे क उ जन्म्या ॥२॥त्रीजे का उस राज्य वेग ॥३॥ चोथे क ज संजम लिधो ॥४॥ पांचमे का न केवल ज्ञान उपर्नु ॥५॥ए ५ ने ६ कुं का अनीच नक्षत्रमा मोद पधार्या । ए ६॥ ए आराने विषे गति यांच जाणवि मोक्षवधी । इति त्रीजो आरो संपूर्ण ॥३॥ हवे त्रीजो आरोउतरीने चोथो अारो धेठगे। तेवारे अनंता वर्ण गंध रस स्फर्सना पर्यवहीणा थया । ए आरो १ क्रोमाक्रोम सागरोपमानां बेतालीस हजार वर्ष उणो जाणवो । ए आरो ऽसम सूसम नामे जाणवो। मुख घणुं ने सूख थोड़ें जाणवु। ए आराने विष ५०० पांचसे धनुपर्नु देहमान ने। कोक पूर्व- आज ॥ उतरते - बंतन बंदणा नमस्कार करीने कडं जे स्वामी रुहुँ जाणजो हुं तमारो गर्न साहरुं हुं । ते बारे माता देवानंदाजीने अवस्थापिनी निजा मुकिने नानिथि गर्न साहरीने त्रिसलादे- बीजीनी कुस्खे मुक्यां तिहां स्वामि सर्वे थईने सवानव मासे जन्म्या । बिस वर्ष घरमां रह्या । एकाकी पणे संयम लिधो । संयम लेईने सामावार वष ने एक पखवामिया सुधि । आकरा तप जप ज्ञान ध्यान करिने । स्वामि केवलझान केवलदर्शन पाम्या । बहोतेर वर्षनुं याउ जोगविने । चोथा आराना ३ वर्ष ने सामा आठ महिना बाकी रह्या । तेवारे महा- विरस्वामि निर्वाण पधार्या । ते स्वामिना उ कल्याणिक थया । तेमां ५ कल्याणिक तो उतराफाल्गुनी नक्षत्रमा थया । ते चवण क० ॥ १ ॥ गर्न साहारण कण ॥ ॥ जन्म का ॥३॥ दिदा का ॥ ४ ॥ केवलज्ञान क० ॥ ५॥ ए पांचने । स्वांतिनदात्रमा निर्वाण पधार्या ॥ ६ ॥ ए आराने विये गति ५ जाणवि ॥ महाविरस्वामि निर्वाण पधार्या तेज वखते गौतमस्वामिने केवलज्ञान उपनुं । ने ते १५ बार वर्ष केवल प्रवर्जा पालिने निर्वाण पधार्या । तेहज वेलाए सुधर्मास्वामिने केवल कान उपनुं । ते ॥ आठ वर्ष सुधि केवल ESES होलीगाशे ॥२५॥हिंसा धर्मना परूपक घणाथाशे ॥१५॥एकधर्मनां घणानेद थाशे ॥१६ ॥ शिष्यातिदेवता घणा पूजाः ॥२७ ॥ मिथ्याति लोक घणा वाशे ॥१॥माणसने देवदर्शन दुर्ल- --- . उतरते आरे १ वेवटुं संघयण ने ॥१॥ हुंग संगण जाणवू । ए आराने वि। ॥ १६ ॥ सोल पांसली ॥ उतरते आरे ॥ आठ पांसलिजाणवि । ए आराने विषे। दिन दिन प्रते आहारनि वा उपजे । तेवारे शरीर प्रमाणे आहार करे । धरतिनी सरसा।कांश्क सारेरि जाणवि । उतरते आरे कुंजारना निनामानी बार सरखि जाणवी । हवे पांचमा आरानां लक्षण ३२ कहेंठे मोटा नगर ते गाममा सरिखा थाशे ॥१॥ गाम ते मसाण स- रिखा थासे ॥२॥ लला कुलनां बोरु ते दास दासीपणा करशे ॥३॥ प्रधान ते लालचि 'पाशे ॥ ४॥ राजा ते जम म सरिखा थाशे ॥५॥नला कुलनी स्त्री ते लजा रहित थाशे ॥६॥ कमा कुलनी स्त्री वेस्या सरिखि थाशे ॥ ७॥ पोताना पुत्र पोताने बांदे चालशे ॥ ७॥ शिष्य माना अपवाद बोलशे ॥ ए॥ पुर्जन लोक सुखि थाशे ॥१०॥ सजन लोक ऽखि थाशे ॥११॥ पूर्णता उकास घणा पम॥१५॥दर सादीकनी दाढ घणी थाशे ॥ १३॥ ब्राह्मण अर्थना V ૧૩ . । एम्याराने विष।। र एक उपवास करशे ते मास खमण सरिखो था।।। ए आराने विये ज्ञान तथा सूत्र सर्वे विवेद जाशे । तेमां दसवैकालिकना ॥ अध्ययन ॥४॥ पहेला रहेशे । ते उपरे ॥धाजीव एका अवतारि थाशे । तेनां नाम । उपसह नामा साधु ॥१॥ फल्गुणि नामा साध्वि ॥२॥ नागील श्रावक ॥ ३ ॥ नागश्रि श्राविका ॥४॥ ते आषाम सुद १५ पूनमने दिने शक्रेऽनुं आसन चलसे। तेबारे शकें उपयोग मुकि जोसे जे आज पांचमो आरो उतरीने काले ठगे आरो वेससे। तेवारे शक्रेज आवशे । ते ॥ ४ ॥ जीवने कसे जे काले बगे यारो वेससे । माटे आलवो पमिकमो निसलथा । ते ४ जीव सर्व जीवने खमाविने संथारो करशे । ते वारे संवर्तक वायरो याशे । तेणे करिने पहाम । पर्वत । गढ कोग वाव कुवा सरोवर सर्वे वीसराल थाशे ॥ वैताढ पर्वत १ गंगा २ सिंधु ३ झपनकुट ४ लवण समुज निखामी ए ५ वर्जिने शेष सर्व स्थानक त्रुटी पमशे॥ ते ४ जीव समाधि प्रणामे काल करीने देवलोकमा जाशे तेवारे ४ बोल विठेद जाशे पेहले पोहरे । जैन धर्म विनेद जसे ॥१॥ बीजे पोहरे ॥ ३६३ ॥ पाखंमि मिथ्यातिनो धर्म विछेद जाशे ॥२॥ त्रीजे पोहरे राज नीति १ ૧૩ ७२ बीलनां मनुष्य सांके ने प्रनाते । मठ कठ काढीने वेलुमा नारसे । सूर्य घणो तपसे टाढ घणी पमशे। तेणे करी सोक बाइ रहेशे। तेहनो आहार करशे। तेना हामका चांममा तिर्यच चाटीने रहेशे ॥ मानवीना माथानि तुंवलीमां पाणी लाविने पिशे । एणिपरे २१ एकविस हजार वर्ष पुरा करसे।पांचमा आराना प्राणी नवकार रहित समकित रहित बत पच: खाण रहित हो ते पहा उग आराने विषे आविने अवतरशे । माटे एहबु जाणिने जे जीव जैन धर्म करशे ते जीव सुखी थाशे ॥ इति व आराना वोल संपुर्ण ॥ ॥ अथ श्री चोविस जिनांतरा. ॥ अढार क्रोमाको मि सागरने आंतरे ॥ पेहेला श्री आदिनाथ तिर्थकर थया ॥ विनिता नगरीने विपे ॥ नानी राजा पिता। मरुदेवा राणी माता ॥ हेमवणे ॥ वृषन लंठन । पांचसे धनुपर्नु देहमान । चोरासी लाख पूर्वनुं आउखुं ॥ वीस लाख पूर्व कुंवर पणे रखा । बेसन लाख पूर्वनुं राज्य पाठ्युं । एक लाख पूर्वनी प्रवा पाली । 1 नाथ तिर्थकर यया॥ सावर्थी नगरीने विपे जीतार्थ राजा पिता ॥सेन्यादेवी राणी माता ॥ हेमवणे ॥ अस्व कहेतां घोमानुं लंठन । चारसें धनुषनुं देहमान । साठ लाख पूर्वनुं आयुष्य पनर लाख पूर्व कुंवरपणे रह्या । चुमालीस लाख पूर्व- राज पाट्युं ॥ एक लाख पूर्वनी प्रवर्ध्या पाली ॥ प्रवा लीधा पठि। चौद वर्षे केवल झान उपनुं । साधु साधवी । आवक श्रावीकारूप । चतुर्विध संघ तिर्थ थापीने ॥ हादसांगी गणीनी पेटी आपीने । एक हजार साधु संघाते स्वामी निर्वाण मोक्ष पधार्या ॥ ३ ॥ त्रीजासंनवनाथ तिर्थकर मोद पोहोंता पठि । दस लाख क्रोमि सागरोपमने आंतरे । चोथा अनीनंदन तिर्थकर थया । विनीता नगरीने विपे । संवर राजा पिता । सीधार्था राणी माता । हेमवणे ॥ वानर, लंठन । सामा त्रणसे धनुपर्नु देहमान । पचास लाख पूर्वनुं आयुष्य ॥ तेमां सामा बार लाख पूर्व कुंवरपणे रया । सामी ठत्रीस लाख पूर्व- राज पाट्युं । एक लाख पूर्वनी प्रवर्ध्या पाली ॥ प्रवर्ध्या लीधा पठि अढार वर्षे केवल ज्ञान उपर्नु । साधु साधवी । श्रावक श्रावीकारूप चतुर्विध संघ तिर्थ यापी ॥ हादसांगी गणीनी पेटीआपीने एक हजार साधु संघाते स्वामी निरवाण .
श्रावक श्रावीकाश्य चतुर्विध संघ तिर्ष थापीने हादसांगी गणीनी पेटी आपीने। त्रोंहोंतेर साधु संघाते स्वामी नीर्वाण मोक्ष पधार्या ॥ ६ ॥ उग पद्म प्रन तिर्थकर निर्वाण मोद पोहोंता पनि ॥ नव हजार क्रोमि सागरने आंतरे । सातमा सुपार्श्वनाथ तिर्थकर यया ॥ वाणारसी नगरीने विपे। पञ्च राजा पिता। पृश्चि देवि राणी माता। हेमवणे ॥ साथीयानुं लंदन । बसे धनुपर्नु देहमान । विस लाख पूर्वनुं आयूप ॥ तेमां पांच लाख पूर्व कुंवरपणे रह्या ॥ चौद लाख पूर्व- राज पाट्युं। एक लाख पूर्वनी प्रवर्ध्या पाली । प्रवा लीधा पठि॥ नव मासे केवल ज्ञान उपर्नु । साधु साधवी श्रावक श्राविकारुप चतुर्विध संघ तिर्थ यापीने॥ छादसांगी गणीनी पेटी आपीने । पांचसे साधु संघाते स्वामी नीर्वाण मोद पधार्या ॥ ७ ॥ सातमासुपार्श्वनाथ तिर्थकर मोक्ष पोहोंता पड़े। नवसें क्रोमिसागरने आंतरे। आठमा चंप्रच तिर्थकर यया। चंदनपुरी नगरीनेविये।महासेनराजा पिता॥लखमणादेवी राणी माताजज्वल मार्ग। चंप्रमार्नु लग्नदोढसो धनुष्य, देहमान। दशलाख पूर्वनुं आप तेहमां अढीलाख पूर्व कुंवरपागे गया। सामाठ लाख पूर्व- राज पादयुं । एक लाख पूर्वनी प्रवा पाली । प्रवासीधा आउखं। तेमां पा लाख पुवे कुंवरपणं रहा। अधे लाख पूर्वनु राज पाल्यु ।। पा लाख पूवन। प्रवा पाली॥ प्रवा लीधा पडे। त्रण मासे केवल ज्ञान उपमुं। साधु साधवी। श्रावक श्रावीकारुप चतुर्विध संघतिर्थ थापी हादसांगी गणीनी पेटी आपीने । एक हजार साधु संघाते स्वामी निर्वाण मोद पधार्या ॥१॥ हवे दशमा सितलनाथ तिर्थकर। निर्वाण मोद पोहोंता पनि॥एक क्रोमिसागर तेमां ॥१०॥सागर। बासठ लाख बविस हजार वरसने उणे- आंतरे॥ग्यारमा श्रेयांसनाथ तिर्थकर थया।सिंहपुरी नगरीनेविषे। विश्नु राजा पिता॥ विश्नु देवी राणी माता।हेमवणे। गेंमानुं लंबन॥ एसी धनुष्यनुं देहमान। चोरासी लाख वर्ष, आयूष। तेमां॥१ लाख वरस कुवरपणे रह्या॥ ४२ लाख वरसनुं राज पाट्युं ॥२१ लाख वरसनी प्रवा पाली॥प्रवा लीधा पनि मासे केवल ज्ञान उपमुं। साधु साधवी। श्रावक श्रावीका रूप चतुर्विधसंघ तिर्थ थापीने॥ हादसांगी गणीनी पेटी आपीने । एक हजार साधुसंघाते निर्वाण : मोक्षने विपे पोहोंता ॥१॥ हवे ग्यारमा श्रेयांसनाथ तिर्थकर मोक्ष पोहोंता पड़ी ॥ ५४ सागरने आंतरे। चारमां श्री वासुपूज्य तिर्थंकर थया चंपापुरी नगरीने विषे। वसुपुज्य राजा -- । -- नाथ तिर्थकर यया ॥ अयोध्या नगरीने विषे ॥ संघेसन राजा पिता । सुजसा देवी राणी माता । हेम वर्णे ॥ सकरातुं लंबन अने पचास धनुष्यनुं देहमान ॥ ३० ॥ लाख वरस- नुं आयुष । तेमां सामासात लाख बरस कुंवरपणे रह्या । पन्नर लाख वरसनुं राज पा- युं । सामासात लाख वरसनी प्रवर्ध्या पाली। प्रवा लीधा पनि ॥ ३ महीने केवल- झात उपर्नु । साधु साधवी । श्रावक श्राविकारुप चतुर्विध संघ तिर्थ थापी हादसांगी गणीनी पेटी आपीने । सातसें साधु संघाते स्वामी नीर्वाण मोद पधार्या ॥ १७ ॥ हवे चौदमा अंनतनाथ तिर्थकर निर्वाण मोक्ष पोहोंता पनि ॥ चार सागरने आंतरे ॥ पंदरमा धर्मनाथ तिर्थकर थया॥ रत्नपुरी नगरीने वीषे ॥ नानु राजा पीता ॥सुवृता देवी राणी माता। हेम वर्णे ॥ बज्रनुं लंदन। पिस्तालिस धनुष्य- देहमान ॥ दस लाख वर्षमुंआउखुं॥तेमा अढी लाख वर्ष कुंवरपणे रहा ॥ सामा उ लाख वरसनुं राज पाट्युं ॥ एक लाख वर्षनी. प्रवा पाल। ॥ अवा लीधा पठी वे महिने केवल झान पाम्यां । साधु साधवी ॥ श्रावक श्रावीका रूप ॥ चतुर्विध संघतिर्थ थापीने ।। छादसांगी गणी नि पेटी थापिने ॥ आठसें साधु संघाते -- नाथ पाट्यु॥ पाणी चोवीस हजार वरस चक्रवृत्तिनी पदवी लोगवी ॥ पोणी चोवीस हजार वरसनी प्रवा पाली ॥प्रवा लिधा पठि सोल महीने केवलझानउपन्यु॥ साधु साधवो। श्रावक श्रावीकारूप चतुर्विध संघतिर्थ थापिने ॥ हादसांगी गणीनी पेटी आपिने ॥ एक हजार साधु संघाते। स्वामी निवाण मोक्ष पधार्या ॥ १७ ॥ हवे सतरमा कुंथुनाथ तिर्थकर: निर्वाण मोक्ष पोहोंता पनी॥पा पथ्यमांथी एक क्रोमने १ हजार वर्षने जणे आंतरे॥१७ मांश्री अर- तिर्थकर थया॥नागपुर नगरीने विषे॥ सुदर्सण राजा पिता ॥ देवकी देवी राणी माता॥ हिम वणे ॥ नंदावत साथीयानुं लंबन ॥ त्रीस धनुषनुं देहमान ॥ चोरासी हजार वरसनु आउखुं ॥ तेमा ५१ हजार वरस कुंवरपणे रह्या ॥ १ हजार वर्षतुं राज पाठ्यु ॥ १ हजार वर्षनी चक्रवृत्तीनी पदवी पाली ॥२१ हजार वर्षनी प्रवर्ध्या पाली॥ प्रवा लीधा पली॥त्रण वर्षे केवलज्ञान उपन्युं ॥ साधु साधव।। श्रावक श्राविकारूप चतुर्विध संघतिर्थ थापीने । छादसांगी गणीनी पेटी आपिने ॥ एक हजार साधुसंघाते स्वामी ॥ नीर्वाण मोक्ष पधार्या ॥१७॥हवे अढारमा अरनाथ तिर्थकर निर्वाण मोद पोहोंता पड़ी। एक कोमने एक हजार स्वामीनाथ एका किपणे ॥ वे दीवसनुं अणसण करी निर्वाण मोदने विषे पहोंता ॥ २४ ॥ पहेला तिथंकर श्री' झपनदेव स्वामी ॥ अने चोविसमा तिर्थकर श्री महा- विरस्वामी ए बेहू बचे। एक क्रोमाकोम सागरोपम काफेलं ॥ तेहमा ४२ बेंतालिस हजार वर्ष उणातुं प्रांतरं जाणवू ॥ इति श्रीचोविप्त तिर्थकरना आंतरा संपूर्ण ॥ ॥ अथ श्री कर्मप्रकृतिना बोल. ॥ पहेऱ्या झानावरणीय कर्म ते आंखना पाटा समान ॥ १ ॥ बिर्जु दर्शनावरणीय कर्म ते राजाना पोळिया समान ॥२॥ त्रिजु वेदनीय कर्म ते मध तथा अफिणे खरमया ख- मग समान ॥ ३ ॥ चोयुं मोहनीय कर्म ते मदिरापान समान ॥ ४ ॥ पांचहुं आयूष कर्म ते हेम समान ॥ ५ ॥j नाम कर्म ते चितारा समान ॥ ६॥ सातमुं गोत्र कर्म ते कु- नारना चाकमा समान ॥ ॥ आतुं अंतराय कर्न ते राजाना नंमारी समान ॥७॥ ज्ञानावरणीय कर्मे अनंत ज्ञान गुण ढांक्यो-२ ॥ १॥ दर्शना वरणीय कर्मे अनंत दर्शन
नाणा वरणे ॥२॥ नेत्ता वरणे ॥३॥ नेत्त विनाणा वरणे ॥४॥ घाणा वरणे ॥५॥ घाण वि-
नाणा वरणे ॥६॥रसा वरणे ॥ ७॥ रस विन्नाणा वरणे ॥ ॥ फासा वरणे ॥॥ फास वि-
नाणा वरणे १० ए १०॥प्रकारे जोगवे । हवे ज्ञानावरणीय कर्मनि स्थिति ॥ जघरा अंतर्मुहुर्त-
नि।उत्ण त्रिश क्रोमाक्रोमि सागरोपमनी। अनें अबाधा काल करे तो। त्रण हजार वरसनि
स्थिति ॥१॥ हवे दर्शना वरणीय कर्म ॥६ प्रकारे बांधे ते कहे ॥पहेले बोले दंशण परिणी-
याए ॥ १॥ दंशण निन्हवणयाए ॥२॥ दंशण आसायणाए॥३॥ दंशण अंतराएणं ॥धा दंशण
पउसेणं ॥५॥ दंशण विसंवायणा जोगेणं ॥६॥ ए॥६प्रकारे बांधे ते॥एा प्रकारे लोगवे ते कहे ॥
चक्षु दर्शना वरणीय ॥२॥ अचगु दर्शना वरणीय ॥२॥ अवधि दर्शना वरणीय ॥३॥ केवल
दर्शना वरणीय ॥॥ निसा ॥५॥ निमा निजा ॥६॥ प्रचला ॥७॥प्रचला प्रचला ॥७॥ थिण-
हिनिला ए॥ ए ए प्रकारे लोगवे ॥ दर्शना वरणीय कर्मनि स्थिति जघण अंतमुहुर्त्तनि ।
उत्० ३० कोमाक्रोमिसागरोपमनि। अने अबाधाकाल करे तो स्थिति त्रण हजार वरसनि ॥
॥२॥ त्रिजु वेदनीय कर्म तेहना ५ नेद ॥ सातावेदनीय ॥१॥ असाता वेदनीय ॥५॥
गंधा ॥३॥अमणुणा रसा ॥४॥ अमणुणा फासा ॥५॥ मणउहया ॥६॥ वयहया ॥७॥ कायया ॥७॥ ए॥ ७ प्रकारे लोगवे । हवे एहनि स्थिति ॥ जय० ॥ १ सागरना ॥ नाग करिये एहवा ॥ ३ नाग एक पट्य ने असंख्यातमे नागे उणानि ॥उत्। त्रिश कोमा- क्रोमि सागरोपमनि । एहनो अवाधा काल ॥ ३ हजार वरसनो ॥३॥ हवे चोथु मोहनीय कर्म ते ठ प्रकारे वांधे ॥ तिव्वकोहे ॥१॥ तिवमाणे ॥२॥ तिवमायाए ॥३॥ तिवलोहे ॥४॥ तिवदंसण मोहणिडो॥५॥ तिवचरित्त मोहणिडो॥६॥ ए ६ प्रकारे वांधे ते २७ प्रकारे जोगवे । अनंतानुवंधि क्रोध ते पर्वतनि राश् समान ॥१॥ अनंतानुबंधि मान ते पथरना स्तंन समान ॥२॥ अनंतानुवंधि माया ते वांशनि गांठ समान ॥३॥अनंताबंधि लोन ते किर- मजनारंग समान ॥॥॥ गति करे नरकनि। स्थिति करे जावजीवनि।घात करे सम कितनि ॥४॥ अप्रत्याख्यानी क्रोध ते तलावना खोट समान ॥१॥ अप्रत्याख्यानी मान ते हामकाना स्तंन समान ॥२॥ अप्रत्याख्यानी माया ते घेटाना शृंग समान ॥३॥ अप्रत्याख्यानी लोन ते नगरनि खालना कादव समान ॥॥ ए चारे गति करे तिर्यचनि । स्थिति करे वरस एकनि।
करे तो । जघा अंतर्मुहुर्त्तनी । उत् ॥७ हजार वरसनि ॥४॥ हवे पांचमुं आयुषः कर्म ।।
सोल प्रकारे वांधे । तेहमांहि । नारकिनुं आयुष ॥ ४ प्रकारे वांधे ते महारंनयाए ॥१॥
महापरिग्गदियाए. ॥२॥ कुणिमाहारेणं ॥ ३॥ पंचिंदियवहेणं ॥४॥ तिर्यचनुं आयुष ॥
प्रकारे बांधे ॥माश्लयाए ॥१॥ नियमिलयाए॥॥अलियवयणेणं ॥३॥कुमतोले कुममाणे॥४॥
मनुष्यनुं आयुष ॥४ प्रकारे वांधे। पगनदयाए ॥२॥ पगविणीयाए । साणुकोसयाए ॥३॥
अमरियाए ॥४॥ देवतानुं आयुष ॥४ प्रकारे बांधे । सराग संजमेणं ॥१॥ संजमा संजमेणं
॥2॥ वालतवोकमेणं ॥३॥ अकाम निजराए ॥णा ए १६ प्रकारे बांधे । ते ॥४ प्रकारे नो-
गवे । नारकि देवतानुं आयुष ॥जघ० ॥ १० हजार वर्ष ने अंतर्मुहुर्त अधिक, उत्० ॥३३
सागर ने पूर्व क्रोमिनो विजो नाग अधिक ॥ मनुष्य ॥ १॥ तिर्यंच ॥२॥ ए २ नुं आयुष ॥
जघा अंतर्मुहूर्तनुं । उत् ॥ ३ पट्यने पूर्व कोमिनो विजो नाग अधिक ॥५॥ हवे ब्लु नाम-
कर्म तेहना २ नेद ॥ शुन नाम ॥१॥ अशुल नाम ॥२॥. तेमां शुज नाम कर्म ।। ४ प्रकारे
वांधे ॥ कायुजुयाए ॥ १ ॥ नासुजुयाए ॥२॥ नावुजुयाण ॥३॥ अविसंवायणा जोगेणं ॥४॥
वैक्रेय शरिर ॥ १९ ॥ आहारक शरिर ॥ १२ ॥ तेजस शरिर ॥ १३ ॥ कार्मणः शरिर ॥ ॥१४॥ उदारिक अंगोपांग ॥१५॥ वैक्रेय अंगोपांग ॥१६॥ आहारक अंगोपांग ॥१७॥ उदा- रिक बंधन ॥रजा वैक्रेय बंधन ॥१ए ॥ आहारक बंधन ॥ २० ॥ तेजस बंधन ॥२१॥ कार्मण बंधन ॥२॥ उदारिक संघातन ॥२३॥ वैक्रेय संघातन ॥२४॥ आहारक संघातन ॥२५॥ तेजस संघातन ॥२६॥ कार्मण संघातन ॥२॥ वज्र षन्न नाराच संघयण ॥श्जा झपन ना- राच संघयण ॥ए ॥ नाराच संघयण ॥३॥ अर्ब नाराच संघयण ॥३१॥ किलकु संघयण ॥३॥ वटु संघयण ॥३३॥ समचौरश संगण ॥ ३४ ॥ निगोह परिमंगल संगण ॥३५॥ सादि संगण ॥३६॥ वामन संगण ॥ ३० ॥ कुज संगण ॥ ३० ॥ हुंम संगण ॥३७॥ कालो वर्ण ॥४०॥ निलो वर्ण ॥४२॥ रातो वर्ण ॥ ४२ ॥ पिलो वर्ण ॥४३॥ धोलो वर्ण ॥४४॥ सुरनि गंध ॥४५॥ दुरनि गंध ॥४६॥ तिखो रस ॥४७॥ कमवो रस ॥8॥ कसायलो रस ॥४॥ खाटो रस ॥५॥ मिगे रस ॥५१॥ खरखरो स्पर्श ॥५५॥ सुंहालो स्पर्स ॥५३॥ जारे स्पर्स ॥ ५५ ॥ हलुवो स्पर्स ॥५५॥ टाढो स्पसे ॥५६॥ उन्हो स्पर्स -॥५७॥ चोपमयो ૧૫
।
ण ॥१॥ अनुपूर्वी ॥ २३ ॥ विहाय गति ॥ १४ ॥ए ॥१४ अने प्रत्येक प्रकृति ॥ त्रशनो
दशको १५ ॥ स्थावरनो दशको १०॥ एवं ४२ थ। तथा विस्तारे चौदनि ६५ तथा प्रत्येक
प्रकृति ॥ त्रशनोदशको १० ॥ स्थावरनो दशको १०॥ एवं विस्तारे ए३ प्रकृति थ॥ नाम
कर्मनि स्थिति । जघन्य । आठ मुहुर्त्तनि । उत् । विश क्रोमाक्रोमि सागरोपमनि॥ अबाधा
काल करे तो॥५ हजार वरसनो॥६॥ हवे गोत्र कर्मना ॥ नेद ॥ उंच गोत्र ॥१॥ निच गोत्र ॥२॥
तहमा उंच गोत्र ॥ प्रकारे बांधे ॥ जाश् अमदेणं ॥१॥ कुल अमदेणं ॥शा बल अमदेणं ॥३॥
रुव अमदेणं ॥॥ तव अमदेणं ॥५॥ सूय अमदेणं ॥६॥लान अमदेणं ॥७॥इसरिय अम-
देणं जाए आठ मद अणकरवे करि जंच गोत्र वांधे। ते ७ प्रकारे जोगवे ॥ जाइ विसिवि-
या ॥१॥ कुल विसिठिया ॥२॥ बल विसिठिया ॥३॥ रुव विसिठिया ॥४॥ तव विसिव्यिा
॥५॥ सूय विसिविया ॥६॥ लाल विसिविया ॥७॥ इस्सरिय विसिठिया ॥ ७॥ ए॥७ प्रकारे
जोगवे ॥१॥ हवे तिच गोत्र ॥ प्रकारे बांधे ते। जाइ मएणं ॥१॥ कुल मएणं ॥५
बल्ल मएणं ॥३॥ रुप.मएणं ॥४॥ तप.मएणं ॥५॥ सूय म्रएणं ॥६॥ लाल मएणं ॥४॥
1 सर्व मलि ॥५॥ प्रकृति बाध्यानि जाणवि ॥ लोगव्यानि ए३ प्रकृति ते ज्ञानावरणीयनि ॥१॥ दर्शनावरणीयनि ॥ए। वेदनीयनि ॥१६॥ मोहनीयनि ॥५॥ते सम्मत्तवेयणिजे ॥१॥ मिबत्त वेयणिडो॥॥ सम्मामिबत्त वेयणिडो॥३॥ कसाय वेयणिडो॥४॥नोकसाय वेयणिजो ॥५॥ए५॥ आयुषनि ॥४॥ नामनि ॥२०॥ गोत्रनि ॥१६॥अंतरायनि ॥५॥ ए सर्व मली ॥५३॥ प्रकृति जोगव्यानि जाणवी॥ अथवा ॥१४॥ प्रकारे पण नोगवे ते ॥पांच ज्ञाना- वरणीयनि ॥ दर्शना वरणीयनि ॥ए॥ वेदनीयनि ॥२॥ मोहनीयनि ॥२०॥ आयुषनि ॥४॥ नाम कर्मनि ॥५३॥ गोत्र कर्मनि ॥२॥ अंतराय नि॥५॥ एवं सर्व मलिने ॥१४ना प्रकृति जा- णवि तथा बंधन नामकर्मनि ॥१॥ प्रकृति ग्रंथांतरे कहि ले ते नेलवतां ॥१५॥प्रकृति पण थाय॥ अथवा मुल प्रकृति ॥७॥ तेहनि उत्तर प्रकृति ॥३१॥ झाना वरणीयनी॥५॥ दर्शना- वरणीयनि ए॥ वेदनीयनि ॥२॥ मोहनीयनि ॥२॥ आयुषनि ॥४॥ नामनि ॥२॥ गोत्रनि ॥॥ अंतराय नि ॥५॥ एवं ॥ ३१ प्रकृति थाय तेहनो विस्तार ॥१४ कर्म प्रकृति जाणवि। ए बोल सिहांत प्रमाणे ३ ॥ इति कर्म प्रकृतिना बोल समाप्तं ॥
RATE आराघवीतिहांसमय मात्रनो प्रमाद न करवो ॥चतुर्विध तीर्थनां गुण कीर्तन करवां ॥ए धर्म ध्याननो पहेलो नेद कह्यो॥॥हवे धर्म ध्याननो बीजो नेद कहे ॥ अवायविजए, कहेतां संसा- रमांहि जीवाजेह थाकि पुःख पामे तेहनो विचार चीतववो ॥ तेहनो। ए विचार ॥ मिथ्यात्व ॥ अंनत ॥प्रमाद ॥ कषाय ॥ असुन्नयोग॥ तथा अढार पाप. स्थानक ॥बकायनी हिंसा । एह उखना कारण जाणी॥ एहवो आश्रव मार्गबांमीने॥संवर मार्ग दरवो॥जेहथी जीव फुःख न पामे॥ए धर्मध्याननो बीजो नेद कह्यो।शाहवे धर्म ध्याननोत्रीजो नेद कहे बे॥विवागविजाए। कहेतां ॥जीव जे सुख दुःख जोगवे बे॥ते स्याथकी तेहनो विचार चिंतवत्रो ॥ तेहनो एह वि- चार ॥जीवे जेहवे रसे करि पूर्वे ॥जेहवा शुनाशुल ज्ञाना वरणीयादिक कर्म उपाया॑ ॥ ते. शुनाशुल कर्मनाउदयथी जीव तेहवांसुख दुःख अनुनवे ॥ ते अनुभवता थका॥ कोश् उपर राग द्वेष न आणीये॥समतालाव आणीए॥मन वचन कायानाशुल योग सहित श्री जैनधर्मने विपे प्रवर्तिये ॥ जेमनिराबाध परम सुख पामीए॥ए धर्मध्याननो त्रीजो नेद कह्यो॥३॥ हवे धर्म ध्याननो चोयो नेद कहे जे ॥ संगण विजए कहेता ॥ त्रण लोकना आकारनुं स्वरुप आराघवीतिहां समय मात्रनो प्रमाद न करवो ॥चतुर्विध तीर्थनां गुण कीर्तन करवा ॥ए धर्म ध्याननो पहेलो दा कयो॥॥हवे धर्म ध्याननो बीजो जेद कहे॥ अवाय विजए, कहेतां संसा- रमांहि जीवाजेह था कि मुःख पामे तेहनो विचार चीतववो ॥तेहनो। ए विचार ॥ मिथ्यात्व ॥ अंबत ॥ प्रमाद ॥ कषाय ॥ असुजयोग॥ तथा अढार पाप. स्थानकः॥कायनी हिंसा । एह मुखना कारण जाणी॥ एहवो आश्रव मार्ग बांमीने॥संवर मार्ग आदरबो॥जेहथी जीव दुःख न पामेशए धर्म ध्यानना बीजो नेद कह्यो।शाहवे धर्म ध्याननोत्रीजो नेद कहे ॥विवागविजाए। कहेतां॥ जीव जे सुख पुःख जोगवे ॥ते स्याथकी तेहनो विचार चिंतववो ॥ तेहनो एह वि- चार ॥जीवे जेहवे रसे करि पूर्वे ॥ जेहवा शुनाशुन झाना वरणीयादिक कर्म उपाळ ॥ ते. शुनाशुन कर्मना उदयथी जीव तेहवां सुख दुःख अंनुनवे २॥ ते अनुभवता थका॥ को उपर. राग द्वेष न आणीये॥समता नाव आणीए॥मन वचन कायानाशुज योग सहित श्री जैनधर्मने विषे प्रवर्तिये ॥ जेमनिराबाध परम सुख पामीए॥ए धर्मध्याननो त्रीजो नेद कह्यो ॥३॥ हवे धर्म ध्याननो चोथो नेद कहे जे ॥ संवाण विजए कदेता ॥ त्रण लोकना आकारनुं स्वरुप पतिना नवन एहवा त्रण लोकनां सर्व स्थानक समकित रहित करणी विना सर्व जीवे अनं- ती वार जन्म मरणे करी फरसी मूक्या ॥एम जाणी समकित सहित श्रुत अने चारित्र धर्मनी आराधना करीये ॥जेम अजरामर पद पामीये॥ए धर्म ध्याननोचोथो नेद कह्यो ॥४॥ हवे धर्म ध्यानना ४ लदण ॥तेमां धर्म ध्यान- पहेवू लदण कहे जे ॥ आणारुश् कहेतां बीतरा-. गनी आझा अंगीकार करवानी रुचि उपजे तेहने आणारु कहिये ॥ ए धर्म ध्यान- पहेवू लक्षण कयुं ॥ १॥ हवे धर्म ध्याननुं वीजुं लक्षण कहे जे ॥ निसर्गरु कहेता ॥ जीवने स्वनावेज तथा जाति स्मरणादिक झाने करी श्रुत सहित चारित्रधर्म करवानी रुचि उपजे ॥ तेहने निसर्ग रुचि कहिये ॥ ए धर्म ध्याननुं वीजु लक्षण कर्तुं ॥हवे धर्म ध्यान, त्रीजूलदण कहे जे ॥ सूत्तरुश् कहेतां॥ सूत्रनावे नेद ॥ अंग पविठ ॥१॥ अने अंग बाहिर ॥२॥ अंग पविठ ते आचारांगादि १२ अंग ॥ तेमां ॥११ अंग ॥ कालिक॥अने बारमुंअंग दृष्टिवाद | ॥ते। उत्कालिक र अंग बाहिरनां नेद ॥आवश्यक १ अने ॥ आवश्यक व्यतिरिक्त ।। आवश्यक ते सामायकादिक व अध्ययन ते उत् कालिका तथा उत्तराध्ययनादिक कालिक . ...
। कयुं ।। हवे धर्म ध्यानना चार आलंबन कहें जे ॥वायणा ॥१॥ पूणा ॥२॥ परियाणा ॥३॥ धर्म कथा ॥४॥ हवें धर्म ध्यान- पहेवू आलंबन कहे वायणा ते केहने कहिए। विनय सहित ज्ञान तथा निर्जराने अर्थे ॥ सूत्रना अर्थना जाणः गुर्वा दिकः समीपे सूत्र तथा अर्थनी वांचणी लेवी॥तेहने वायणा कहीए॥ए धर्म ध्याननुपहेढुंआलंबनकयुं ॥ १॥ हवे धर्म ध्यान, बीजू बालंबन कहे जे ॥ पूणा ते केहनें कहिए ॥ अपूर्वज्ञान पामवाने अर्थे ॥ तथा जैनमत दीपाववाने अर्थे ॥ तथा संदेह निवारवाने अर्थे ॥ तथा परनी परीक्षा लेवाने अर्थे यथा योग्य विनय सहित गुर्वादिकने प्रश्न पूबीए ॥तेहने पूजणां कहिए॥एधर्म ध्यान बीजू आलंवन कयुं ॥२॥ हवे धर्म ध्याननुं त्रीजूं आलंबन कहे जे ॥ परियट्टणा ते केहने कहिए॥ पूर्वे जे जिनजाषित सूत्र अर्थ नण्या ॥ ते असखलित करवाने अर्थे । तथा निर्जराने अर्थे सुरू उपयोग सहित सुरू सूत्र अर्थनी वारंवार सकाय करे तेहने परिय- दृणा कहिए ॥ ए धर्मध्याननूं त्रीजुं आलंवन कह्यं ॥ ३ ॥ हवे धर्मध्याननूं चोथु आलंबन कहे ॥ धर्मकथा ते केहने कहिए ॥ वीतरागे जे नाव जेहवा परुप्या २ ॥ ते नाव पोते प्रकारनी कथा अंदेवणी ॥१॥ विदेवणी ॥२॥ संवेगणी ॥३॥ निगणी ॥४॥ ए चार कथा विस्तारपणे कहे तेहने धर्मकथा कहीए ॥ ए धर्मध्याननु चोधुंआलंबन कह्यं ॥ ४ ॥ अदेवणी प्रमुख ४ कथानो विस्तार ॥ चोथे गणे उद्देशे बीजे सूत्र ५७ मां मध्ये २॥ हवे धर्म: ध्याननी चार अणुप्पेहा कहे ठे॥ अणुप्पेहा ते केहने कहिए ॥जीवजव्य अने अजीव व्य तेहनो स्वन्नाव स्वरूप जाणवाने अर्थे सूत्रना अर्थ विस्तारे चीतवीए ॥ तेहने अणुप्पेहा कहिए ॥ हवे धर्मध्याननी पहेली अणुप्पेहां कहेः॥ एकच्चाणुप्पेहा ते केहने कहिए॥जीव असंख्यात प्रदेसी अरुपी सदा स उपयोगी ते ॥ चैतन्यरूप एहवो एक माहरो आत्मा नि- अंय नये वे ॥ तेम सर्व आत्मा निश्चय नये एहवाज बे॥ अने व्यवहार नये एहवो आत्मा अनादि कालनो ते अचेतन जम वर्णादि २० रूप सहित पुजलनो संयोगी थको ॥ त्रस ने स्थावर रूप लेश्ने अनेक नृत्यकार नटुयानीपरे अनेक रूप ॥ अनेक गंदे प्रवर्ते ॥ ते त्रसनों सरूपे प्रवत्तें तो जघन्य अंतर्मुहुर्त उत्कृष्टो बे हजार सागर काफेरा सुधी रहे ॥ अने स्थावरनो स्थावरपणे प्रवर्ते तो जघन्य अंतर्मुहुर्त उत्कृष्टो अनंती उत्सर्पणी अवसर्पणी॥ ॥ १६ अव्यावीस क्रोम सतावन लाख चौद' हजार बसे अग्यासी उपर पांच पट्यनी ७ ए- टली देवि जोगवी तोपण तृप्ति न पाम्यो ॥ मनुष्य मध्ये स्त्रीवेद पुरुषवेद देव कुरु उत्तर- कुरु मध्ये युगल युगलणी थयो ॥ तिहाँ महा मनोहर झप मनवंगित सुख जोगव्यां ॥ दस प्रकारना कल्पवृक्ष मनवंवित सुख लिधां ॥ स्त्री पुरुषने क्षिण मात्रनो वियोग न पके ॥ ३ पक्ष्योपम निरंतर सुख विलस्यां ॥ हरिवास रमकवास मध्ये ५ पट्योपम ॥ हे- मवय क्षेत्र एरणवय देत्र मध्ये १ पदय ॥ बपन अंतरदीपा मध्ये पढ्योपमनो असंख्यात- मो नाग ॥ युगल युगलणी पणे यानंती वार ॥ स्त्री वेद पुरुष वेदनां रुप ले खेल्यो पण आत्मा तृप्ति न पाम्यो ॥ वली चक्रवर्तिने घरे स्त्री रत्नपणे लदमी सरिखा रूप अनं- तीवार ॥ स्त्री वेद पुरुष वेदना रुप जीव लेश् खेल्यो॥पण तृप्ति न पाम्यो ॥ वासुदेव मंगलीक राजा ॥ प्रधान व्यवहारीयाने घरे॥स्त्री वेद॥ मनोज्ञ सुख वंबित नोग ॥ दीर्घ पूर्वक्रोमा- दिकनां आउखा पणे प्रवत्यों ॥ वलि तेह ज जीव मनुष्य मध्ये कुरुपवान पुर्जागी निच कुल॥ दरीजी चर्तार ॥ स्त्री पण अलबरुप कुन गिणी पणे जीव नटवापणे प्रवत्यो । तोहि मनुष्य- ...
नय आत्मा जाणवो ॥ ते माटे शुक्र व्यवहारे प्रवर्ते ॥ अशुद्ध व्यवहार मटामे ॥ तेवारे सिक होय एहवो माहरो एक आत्मा बे॥ जे नणी अपर परिवार ते स्वार्थ रूपी ॥अने पनगसा ? मीससा २ वीससा ३ पुजल ते वर्ण पर्यवे करी जे जेहवे स्वनावे जे ॥ ते तेहवे स्वनावे न रहे ते पण असास्वता ते माटे एक माहरो पोतानो आत्मा पोताना कार्यनो साधक सास्वतो जाणीने पोताना आत्मानुं साधन करीये ॥ ए धर्म ध्याननी पहेलो अणु- प्पेहा कही ॥ हवे धर्मध्याननी वीजी अणुप्पेहा कहे २ ॥ अणी चाणुप्पेहा ते केहने क- हिये रूपी पुजलने अनेक प्रकारे यतना करिए ॥ तोपण अनित्य ॥ नित्य एक श्री जैनधर्म परम सुखदायक पोताना आत्माने ॥ ते माटे आत्मा नित्य जाणीने समकिता- दिक संवरे करि पुष्टो करीये ॥ ए धर्म ध्याननी वीजी अणुप्पेहा कही ॥२॥ हवे धर्म ध्याननी त्रीजी अणुप्पेहा कहे वे ॥ असरणाणुप्पेहा ते केहने कहिये आ जवने विषे अने परजव पहोंचतां जीवने एक समकित पूर्वक जैन धर्म विना जन्म जरा मरणना सुख निवारवा बीजो को सरण समर्थ नथी ॥ एम जाणी श्री जैन धर्मनुं सरण करीये ।।
छार ॥३॥ चोयो ज्योतिषीनो हार ॥ ४ ॥ पांचमो वैमानिकनो द्वार ॥ ५॥ हवे पहेलो नरकनो हार कहे २॥ पहेले नाम ॥१॥ बिजे गोत्र ॥२॥ त्रिजे अर्थ ॥३॥ चोथे पिंग ॥ ४ ॥ पांचमे पोलार ॥ ५॥ अलोक ॥६॥ सातमे आधार ॥ ७॥ आपमे आंतरा ॥ ७॥ नवमे पुष्फाविकीर्ण ने आवलिका बंध ॥ ए॥ दशमे अंधकार ॥ १० ॥ ग्यारमे नारकि ने उपजवाना स्थानक ॥ ११ ॥ वारमे क्षेत्र वेदना ॥ १५ ॥ तेरमे पनर परमाधामिना नाम ॥ १३ ॥ चौदमे जीव अजीवना परिणाम ॥ १४ ॥ पनरमे नारकि ने अवधिनुं देखवू ॥१५॥ सोलमे संघयण ॥ १६ ॥ सतरमे कोण जीव कश् नरके उपजे ॥ १७ ॥ अढारमे ॥४॥ बोल कहेवाशे ॥ पहेले नाम कहे ॥ घमा ॥१॥ वंशा ॥२॥ शिला ॥३॥ अंजणा ॥ ४॥ रिग ॥५॥ मघा ॥६॥ माघव ॥७॥ ए साते Gधा उत्रने आकारे ॥१॥बीजे गोत्र कहे ते ॥ रत्न प्रना ॥ १॥ शर्कर प्रत्ना ॥ २॥ वालु प्रना ॥ ३॥ पंक प्रना ॥४॥ धूम प्रजा ॥ ५॥ तम प्रजा ॥ ६॥ तमतमा प्रना ॥ ७॥ रत्न प्रना ते स्यामाटे सोल हजार जोजननो खरकांम ठे ॥ते ॥ सोल जातिना रत्नमय छे । एकेकुं रत्न हजार हजार जोज- एक हजार जोजन निचुं मुकिये ॥ वचे १ लाख ने अठोत्तर हजार जोजननी पोलार ॥ ते मांहि ॥१३ पाथमा ने ३० लाख नरकावासा ले ॥१॥ बीजी नरके एक लाख ने वत्रिश हजार जोजननो पृश्चीनो पिंम । तेहमांथि एक हजार जोजन ऊंचु मुकिये ॥ एक हजार जोजन निचुं मुकिये ॥ वचे एक लाख ने ३० हजार जोजननि पोलार ॥ तेमांहि ११ पाथमा ने ॥२५ लाख नरकावासा ठे॥२॥ त्रिजी नरके एक लाख ने अग्याविश हजार जोजननों पृथ्वी पिंम ठे। तेहमांहि ॥ १ हजार जोजन गंधु मुकिये ॥ १ हजार जोजन निचुं मुकिये वचे ॥ एक लाख ने विश हजार जोजननो पृश्विनो पिमठे । तेमांहि ॥ ए पाथमा ने १५ लाख नरकावासा वे ॥३॥ चोथि नरके एक लाख ने २० हजार जोजननो पृथ्वीनो पिंम ले ॥ तेदमाथि ॥ १ हजार जोजन उचं मुकिये ॥ १ हजार जोजन निचुं मुकिये वचे ॥ एक लाख ने २७ हजार जोजन नि पोलार ठे। तेमांहि ॥ ७ पाथमा ने ॥ १० लाख नरका वासा ठे॥४॥यांचमि नरके एक लाख ने अढार हजार जोजननो पृथ्वीनो पिंम ठे। तेहमाथि एक हजार जोजन चंचु मुकिये एक हजार जोजन निचुं मुकिये ॥वचे एक लाख ने १६ हजार जो- .
. ॥ ५.Ltd.v...- आधार कहे ठे। साते नरक सेने आधार रहि ॥ २० हजार जोजननो घनोदधि जामपणे ठे॥ असंख्याता जोजननो लांब पणे पहोल पणे ठे॥ असंख्याता जोजननि परिधि ले ॥ ते थिणा घी सरिखो जाणवो ॥असंख्याता जोजननो घनवाय ॥ ते विर्या घी सरिखो जा- णवो ॥ असंख्याता जोजननो तनुवाय ॥ते तपाव्याघी सरिखो जाणवो॥ तेहने आधारे ७ नर्क रहि ॥ एकेकि नरके त्रण त्रण वळाका॥असंख्याता जोजननो आकाशास्तिकाय । विश हजार जोजननो घनोदधि जाळपणे ठे व्हमे जाता ब जोजननो रह्यो॥ पेहली नरके व जोजननो घनोदधि ॥१॥ बिजी नरके ब जोजन ने ॥१त्रियोनाग ॥२॥ त्रिजो नरके ब जोजन ने ॥२ त्रियानागे ॥ चोयी नरके॥ जोजननो घनोदधि ॥ ४ ॥ पांचमी नरके I जोजन ने ॥२ त्रियोनाग ॥ ५ ॥ी नरके ॥ जोजन ने॥ त्रियानाग ॥ ६ ॥ सातमी नरके ॥जोजननो घनोदधि ॥ ७ ॥ असंख्याता जोजननो धनवाय ने हमे जातां सामा- चार जोजननो रह्यो पहेलि नरके सामा चार जोजननो धनवाय ॥१॥ विजी नरके पोणा पांच जोजननो धनवाय ॥२॥ त्रिजी नरके ॥ ५ जोजननो घनवाय ॥३॥चोथी IA १६१६६ ।। सोल हजार गकसो ठासठ जोजन ने ॥२ त्रिया नागर्नु आंतरं ॥४॥.पांचमी नरके ॥ ५ पाथमा ने ॥ ४ आंतरा ॥ अकेका पाथमाने २५२५७ ॥ सवा पचीश हजार जोजननुं यांतलं ॥ ५॥ ठगी नरके ॥ ३ पाथमा ने ॥ २ आंतरा ॥ एकेका पाथमाने ॥ ५२५०० ॥ सामा वावन हजार जोजन, आंतरं ॥ ६ ॥ सातमी नरके ? पायमो ठे॥ आंतरं नथि ॥७॥ हवे नवमे पुष्पाविकीर्ण ने शावलिका बंध नरका वासा कहे ठे॥ पहेली नरके एए५५६७ ॥ गणत्रीश लाख पंचाणु हजार पाचसें समसठ पुष्पाविकीर्ण नरका- वासा ठे॥ अने ४४३३ चुमालिसें तेत्रीस पंक्तिबंध नरकावासा ठे ॥ एवं सर्व मळीने ३० लाख ॥ १ ॥ विजी नरके २४ए७३०५ ॥ चोविस लाख सताणु हजार त्रणसें पांच पुष्पावि. कीर्ण नरका वासा ठे। अने ६ए५ गविसें पंचाणु पंक्ति बंध नरकावासा वे ॥ एवं सर्व मळीने ॥ २५ लाख ॥२॥ त्रिजी नरके २४ए०५१५ चौद लाख अहाणुं हजार पांचसें पंदर पुष्पाविकीर्ण नरकावासा ठे । अने १४५ चौदसें पंच्यासी पंक्ति बंध नरकावासा ने ॥ एवं सर्व मळीने ॥ १५ लाख ॥३॥ चोथी नरके एएएए३ ॥ नव लाख नवाएं
॥५॥ ज्वर ॥ ६॥ जय ॥ ॥ शोक ॥७॥ खरज ॥ ए॥ परवश ॥१०॥ ए १० प्रकारनि
अनंति वेदना ठे ॥ १५॥ तेरमे ॥ १५ परमाधामिना नाम कहे ॥ अंब ॥ १ ॥ अंबरिस
॥ ॥ शाम ॥ ३ ॥ सवल ॥ ४ ॥ रुम ॥ ५॥ वैरुज ॥६॥ काल ॥७॥ महा काल ॥७॥
यशि पत्र ॥॥ धनूप ॥२॥ कुंन ॥१२॥ वावु ॥१२॥ वेतरणी ॥१३॥ खर स्वर ॥१॥ महा-
घोप ॥१५॥ ॥१३॥ हवे चौदमे जीव अजीवना परिणाम कहे ॥ जीव परिणामना ॥१० नेद
ते ॥गति परिणाम ॥१॥इंघिय परिणाम॥२॥ कसाय परिणाम ॥३॥ लेसा परिणाम ॥॥जोग
परिणाम उपयोग परिणाम ॥६॥ नाण परिणाम जासण परिणाम जा चरित्त परिणाम
॥॥ वेद परिणाम॥१॥ हवे अजीव परिणामना १० नेद कहे ॥बंधन परिणाम ॥१॥गति-
परिणाम ॥२॥ संगण परिणाम ॥३॥द परिणाम ॥४॥ वर्ण परिणाम ॥५॥गंध परिणाम ॥६॥
रस परिणाम ॥७॥ स्पर्स परिणाम ॥॥ अगुरु लघु परिणाम आए। शब्द परिणाम ॥१०॥ १४ ॥
पनरमे अवधिझाने देखg कहे ठे॥ पहेली नरकना नारकि । जघा सामा त्रण गाउ देखे ।
उत् चार गाउ देखे ॥ १ ॥ विजीना । जघण् ३ गाउ । उता सामा त्रण गाउ देखे ॥२॥
यावि उपजे ॥७॥१७॥ अढारमे अशुन वर्ण ॥१॥ गंध ॥२॥ रस ॥३॥ स्पर्स जोगवता श्रका नारकि विचरे ठे ॥ १७ ॥ इति नार किनो बोल समाप्तं ॥१॥ हवे बिजो नवनपतिनो द्वार कहे ठे॥ पहेले नाम ॥१॥ विजे चिन्ह ॥२॥ त्रिजे वर्ण ॥३॥ चोथे वस्त्र ॥४॥ पांचमे सामानिक ॥५॥ठे आत्म रक्षक ॥६॥ सातमे देवांगना ॥७॥ आपमे अणिका ॥ ७ ॥ नवमे अणिकाना अधिपति ॥ए॥ दशमे उद्योत ॥१०॥ ग्यारमे परिषद ॥ ११ ॥ वारमे लोकपाल ॥१२॥ तेरमे त्रायत्रिंशक ॥१३॥ चौदमे ५ बोल ॥ १४ ॥ पहेले नाम कहे ले ॥ असुर कुमार ॥१॥ नाग कुमार ॥२॥ सुवर्ण कुमार ॥३॥ विज्जु कुमार ॥ ४ ॥ अग्नि कुमार ॥५॥ हिप कुमार ॥६॥ उदधि कुमार ॥७॥ दिशा कुमार ॥ ॥ पवन कुमार ॥॥ थणित कुमार ॥१०॥१॥ बिजे चिन्ह कहे जे॥असुर कुमारने चुमामणि मुगटर्नु चिन्ह ॥१॥ नाग कुमारने फेणर्नु चिन्ह ॥२॥ सुवर्ण कुमारने गरुमर्नु चिन्ह ॥३॥ विज्जु कुमारने वज्रनुं चिन्ह ॥४॥ अग्नि कुमारने कलशनुं चिन्ह ॥५॥ द्विप कुमारने सिंहनुं चिन्ह ॥६॥ उदधि कुमारने घोमार्नु चिन्ह ।।७॥ दिशा कुमारने गजनुं चिन्ह ॥७॥ पंवन कुमारने मगरमगर्नु गय ॥४॥ रथ ॥ ५॥ सुनट ॥ ६॥ महीप ॥ ७॥७॥ नवमे बोले अणिकाना अधिपति एमज जाणवा ॥ ए ॥ हवे १० मे उद्योत कहे ॥ देवतानो उद्योत ॥१॥ देवी/नो उद्योत ॥२॥ आनरणनो उद्योत ॥ ३ ॥ शुज पुजलनो उद्योत ॥४॥ १० ॥ हवे ११ मे त्रण परिषद कहे ॥ दक्षिण दिशाना चमरेंउनी ३ परिषद । समीया ॥१॥ चंमा ॥ ॥ जाया ॥३॥ समीयानो ॥ २४ हजारनो परिवार ॥ १ ॥ चंमानो ॥ २७ हजारनो परिवार ॥२॥ जायानो॥३२ हजारनो परिवार ॥३॥ समीया तेमया आवे ने मोकल्या जाय ते साये गुऊ बात करे ॥१॥ मातेच्या आवे ने अणमोकल्या जाय ते साथे गुरु वात न करे अने करणकरावण करे ॥२॥ जाया अण तेमया आवे ने अणमोकल्या जाय एहने कामकाज दिये ॥ ३ ॥ एहना नवनी कायमा देवतानि ॥ ३ परिपद तेमांहि अन्यंतर परिपदना ॥ ६०००० ॥ साठ हजार ॥ १ ॥ मऊम परिपदना ॥ soooo ॥ सितेर हजार ॥ ॥ वाहिर लि परिपदना ॥ Guuuu || ऐसी हजार ॥३॥ दक्षिण दिशना चमेरअनि देवीनी ॥३ परिषद तेमांहि अन्यंतरनि ॥ ३५० देवो १ मऊम परिषदनी ॥ ३७॥ देवी ॥२॥ बाहिरली परिघदनी
॥ २५॥ ॥ देवी ॥३॥ हवे एहना नवनी कायना देवतानि देवोनि ॥ ३ परिषद तेमाहि
अन्यंतरनि ॥ १७५ देवी॥१॥ मऊमनि ॥१५० देवी ॥२॥ वाहिरलीनि ॥१२५ देवी
॥३॥ए सर्व परिवार दक्षिण दिशना चमरेंजनो जाणवो ॥ एमज उत्तर दिशना वलेंअनि ३
परिषद जाणवी पण एटलो फेर ॥ पहेलीना ॥ २० हजार देवता ॥१॥ बिजीना ॥ २४
हजार देवता ॥ २ ॥ त्रिजीना॥२ हजार देवता ॥३॥हवे एहना नवनी कायना देवतानि
॥३ परिषद ते पहेलीना ॥ ५७ हजार ॥ १ ॥ बिजीना ॥ ६० हजार ॥ २॥ त्रिजीना ॥ ७॥
हजार ॥३॥ वलेंअनि देवीनी ॥३ परिषद ॥ पहिली नि ॥४५० देवी ॥१॥ बिजीनि
४०७ देवी ॥२॥विजीनि ॥ ३५० देवी ॥३॥ हवे एहना नवनी कायना देवतानि देवी नि
॥ ३ परिषद ॥ पहेलीनि ॥ १२५ देवी ॥१॥ बिजीनि ॥ २०० देवी ॥२॥ त्रिजीनि
॥ १७५ देवी ॥ ३ ॥ ११ ॥ बारमे लोक पाल कहे जे । सोम ॥१॥ जम ॥२॥ वरुण ॥३॥
वेसगण ॥४॥ सोमनो वारो पूर्व दिशे ॥१॥ जमनो वारो दक्षिण दिशे ॥२॥ वरुणनो वारो
पश्चिम दिशे ॥३॥ वेसमणनो वारो उत्तर दिशे ॥४॥ सोमने वारे सुख शाता होय ॥१॥