Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Prachin Bharat Ke Aadhunik Itihaskar

Dr. Hiralal Gupta · 2011/03

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प्राचीन भारत
के
आधुनिक इतिहासकार
लेखक
डॉ० हीरालाल गुप्त
एम० ए०, पी एच०डी०
प्राध्यापक, बाबा राघवदास भगवानदास स्नातकोतर महाविद्यालय,
आश्रम बरहज, देवरिया ( उ० प्र०)
आमुख
प्रो० डॉ० शिवाजी सिंह
एम०००, पी
प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एव सस्कृति विभाग,
गोरखपुर विश्वविद्यालय, गारखपुर ( उ० प्र०)
एच०डी०
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी

PRACHIN BHARAT KE ADHUNIK ITIHASLAR
Modern Historians of Ancient India
by
Dr HL Gupta
1991
ISBN 81-7124-073-9
प्रथम सस्करण
१९९० इ०
मूल्य तोस रुपये
प्रकाशक
विश्वविद्याप प्रकाशा, चौक, वाराणसी
मुद्रक
घोरा प्रिण्टम, एहरतारा याराणसी

आमुख इतिहास अतठ इतिहासकार की मानसिक सृष्टि होता है । पिसी देश-काल क मदभ में वास्तविक जगत में जो घटनाएं और प्रक्रियाएं घटित एवं प्रतिफलित होती है उनसे ऐतिहासिक यथाथ का निर्माण होता है । इतिहासकार इसी ऐतिहासिक यथाथ के तानो रानो से इतिहास का निर्माण करता है । ऐतिहासिक यथाय में किसी पैटन, प्रणाली या प्रतिमान की तलाश पर इतिहासकार उसे पाठन के सम्मस बाधगम्य और फलप्रद बनाता है । अत यह स्वीकार करने में तनिक भी सबोध नही होना चाहिए कि इतिहास के निर्माण में एतिहासिक यथार्थ के मौन से कही अधिक महत्त्वपूण इतिहासकार की वाणी हाती है। यही कारण है कि अब इतिहास का अध्येता इतिहास क साथ साय इतिहासकार का भी अध्ययन करने में अधिकाधिक सचेट है। ऐतिहासिक यथार्य इतिहासकार के मन मस्तिष्क स गुजर कर ही इतिहास का स्वरूप ग्रहण करता है । इस प्रक्रिया में इतिहासकार की भूमिका उस दपण के तुल्प हाती है जिसमें वास्तविक जगत की वस्तुओ ये प्रतिबिम्ब बनते हैं । दर्पण जितना हो सुटिहीन बना होता है, प्रतिबिम्ब उतने ही अधिक स्पष्ट और वस्तु के अधिकाधिक समरूप बनते है जबकि दर्पण के त्रुटिपूर्ण होने पर प्रतिबिम्ब विकृत हो जाते हैं। इसी प्रकार इतिहामवार का काय ऐतिहासिक यथाय का अथपूण चित्र प्रतिविम्बित करना होता ह कितु इस स दभ में उसका दायित्व दर्पण वे काय से कही अधिक दुष्कर ह । दपण का कार्य तो मात्र वस्तु को अधिकाधिक यथावत रूप में प्रतिबिम्बित करना है कि तु इतिहासकार जिस ऐतिहासिक यथाथ का पुननिर्माण करता है उसका अपना काई मौलिक स्वरूप नहीं होता जिसे वह यथावत अभिव्यक्त कर सके । वर्षा के पश्चात आकाश में छितराये मेघो में जसे हम विभिन्न आकृतियां तलाशते हों बहुत कुछ उसी प्रकार इतिहासकार ऐतिहासिक यथाथ के विसरे और असगठित सामग्री के वीच एक अथपूर्ण धारावाहिता की खोज में लगा रहता है । आकाश में छाये बादलो में हमें क्सिी पशु की आकृति दिखाई देती है या पवन की, यह बादलो की स्थिति से अधिक हमारे मानसिव प्रक्षेपण पर निभर करता है । लगभग उसी प्रकार ऐतिहासिक यथाथ का क्या स्प ह और वह किस दष्टि से अथपूण है, यह ऐतिहासिक यथाथ की अनगढ कच्ची सामग्री से अधिक इतिहासकार को अपना सोच और सूझ पर आधित है । यही कारण ह कि किसी देश और काल क ऐतिहासिक यथाथ एक हाते हुए भी उसके तिहास के पुननिर्माण के प्रयास अनेक और बहुपा परस्परविरोधी रूपो मे उपलब्ध होते हैं । इतिहास की यह अनेकता वस्तुत इतिहासकार को इतिहास दष्टि के विभेद से उत्पन्न होती है। अतएव किसी इतिहासकार की कृति अर्यात उसके द्वारा रचित इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए उस इतिहासकार के व्यक्तित्व और इतिहास बोध का समयना आवश्यक हो जाता है। इतिहास की रचना प्रक्रिया में इतिहासकार के यक्तित्व की भूमिका सर्वा- यि महत्त्वपूर्ण है । इतिहामकार की अपनी इतिहास-दष्टि भी उसके इसी यक्तित्व का अविभाज्य जग है जो एक अत्य त सलिष्ट प्रक्रिया से निर्मित हाती है। जम लेने से बटे होने और इतिहासकार बनने तक व्यक्ति एक विशिष्ट प्राकृतिक एव सास्कृतिक परिवश स होकर गुजरता ह । वह कब और कहाँ पैदा हुआ, उसे रिस प्रकार की शारीरिक और बौद्धिक विरासत प्राप्त हुई किस प्रकार के मित्रा के बीच वह खेला और बडा हुआ, उसे कैम शिक्षक मिले, उसने किस प्रकार की पुस्तको का अध्ययन किया, किन सामाजिक हलचलो और वैचारिक उहापाहा से वह आ दोरित हुआ, इन और इसी प्रकार की समस्त परिस्थितियो की उसके मन मस्तिष्क से हुई किया प्रतिक्रिया की अत्यात सलिष्ट प्रक्रिया के फ्लम्वरूप ही किसी व्यक्ति का पनित्व निर्मित होता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व और ऐतिहासिक यथाथ के बीच भी क्रिया प्रतिक्रिया का एक गतिशील स तुलन स्थापित रहता ह जो उसकी अपनी इतिहाम दष्टि वा सृजन करता है । क्सिी भी लेखक की रचना प्रक्रिया के समान इतिहासकार की रचना प्रक्रिया भी बहुस्तरीय होती है। जिा तथ्यो का वह अपनी कृति म व्यक्त या रेवाकित करता ह उमवा एक अश वह होता है जो उसने पूवमुरियो या अप्रजों से प्राप्त क्यिा होता है । उसको कृति का यह भाग काल की दृष्टि से सामा यत उसा पूर्ववता होता है । कृति का एक दूसरा अश समकालीन होता है जो उसकी अपनी और अपने समकालीन इतिहासकारो की दृष्टि का प्रविफल होता है । भूत और वतमान क माघ साय भविष्य भी उसकी पृति की सरचना का प्रभावित परता है । इतिहास वा पुननिर्माण करते समय इतिहासकार लेखक के साथ साप एर पाठक की भी भूमिका निभाता चरता है। उसकी कृति का पंसा प्रभाव -- पडेगा, यह पाठय वर्ग द्वारा क्तिना स्वागत योग्य होगा, इस प्रकार की कल्पित सम्भावनाओं के रूप में भविष्य भी उसकी रचना प्रक्रिया को निर्धारित करता है। इतिहासकार के व्यक्तित्व, उसको इतिहास दृष्टि तथा उसके पूर्ववर्ती सम- फालीन एव परवर्ती चितनो के अतिरिक्त पई अय कारक भी उसकी रचना. प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं । इतिहासकार को शोघ पद्धति आगमिक है अथवा निर्गमिक, उसके गोप को व्याप्ति व्यापक है अथवा सूक्ष्म, वह घटना की व्याख्या पर रहा है या प्रक्रिया का विश्लेषण, उसके प्रतिमान सचेतन है या अवचेतन, उसको सामाजिक दष्टि व्यक्ति-परक है या समष्टि परक, उसकी राजनीतिक प्रतिवद्धता क्या और कितनी कम या अधिक है, ये और इन जैसी कतिपय अय स्थितियां इतिहास रचना प्रक्रिया को निर्धारित एव नियत्रित करती हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास का पुननिर्माण करनेवाले इतिहासकार भी विविध सास्कृतिक परिस्थितियो, विचार सरणियो और राजनीतिक प्रतिबद्धतामो का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुझे यह देखकर अत्यत प्रसनता होती है कि डॉ० हीरालाल गुम ने प्रस्तुत पुस्तक में प्राचीन भारत का इतिहास लिखनेवाले जिन आधुनिक इतिहासकारो के व्यक्तित्व एव कृतित्व की विवेचना की है, ये सख्या में सीमित होते हुए भी लगभग सभी ज्ञात प्रमुख विघार-सरगियो एव ऐतिहासिक दष्टियों का सम्यक रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं। यह एक स्तरीय कृति है जिसको भाषा स्पष्ट तथा दौली विश्लेषणात्मक है । इस विषय पर हिंदी में पुस्तक की रचना कर डॉ० गुप्त ने एक बड़े अभाव की पूर्ति की है । मुझे विश्वास ह कि हा० गुप्त की इस कृति का इतिहास के विद्याथियो एव विद्वानो द्वारा समुचित स्वागत किया जायेगा। २८-१२-१९९० २३, हीरापुरी, शिवाजी सिंह गो० वि० वि, गोरखपुर

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प्राक्कथन इतिहास को आधुनिक अवधारणा मुख्यत योरोपीय है जिसकी जडें यूनानी- ईसाई परम्परा में और विकास १८ वी शती के योरोपीय परिवेश में दृष्टिगत होता है । इसके अनुरूप प्राचीन भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन १८ वी शती के अतिम दशको में योरोपीय विद्वानों द्वारा प्रारम्भ किया गया । १७९४ में सर विलियम जो स द्वारा मनुस्मृति का भूमिका सहित किया गया अनुवाद सम्भवत इस प्रकार का प्रथम महत्त्वपूण प्रयास था। स्वत बता के पूर्व प्राचीन भारतीय इतिहास का यह पुनर्लेखन मुख्यत दो दरिकाणो से प्रभावित रहा । प्रथम, विश्व की-विशेषत यारोप की विभिन्न प्राचोन सस्कृतियो एव सभ्यताओ से प्राचीन भारतीय संस्कृति एव सभ्यता को हीन एव अपेक्षाकृत वाद की घापित करना जिसमें भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को औचित्य का सिद्ध करना भी सम्मिलित था तथा द्वितीय, रस दृष्टिकाण के प्रतिक्रिया म्वाप प्राचीन भारतीय संस्कृति और सभ्यता के उदात्त पक्षी का प्रस्तुत कर उसका गौरवगान करना था। इन दृष्टिकोणा को पुष्ट करने के लिए खोजी गयी सामग्री एव लिखे गये प्रयो ने निश्चित रूप से प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन एव अनमधान के लिए प्रचुर मौलिक सामग्री प्रदान की। स्वतत्रता के पश्चात प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनलेपन में अनेक दष्टिकोणों का प्रवेश हुआ। एशिया महाद्वीप के विभिन खण्डो-मध्य, पश्चिमी एव दक्षिण-पूर्व या सुदूरपूर्व-को ऐतिहासिक अध्ययन की इकाई मानकर भारतीय इतिहास का अध्ययन दमिण पूर्व एशिया के परिप्रेष्य में परना और माक्स एव ऐंजल द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्ता के आधार पर प्राचीन भारतीय इतिहास का चरित्र प्रस्तुत करना स्वात ग्यात्तर काल के प्रमुख दष्टिकोण है । इन दृष्टिकोणो के अतिरिक्त आधुनिक प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन में समय-समय पर सामाजिक आवश्यकताओं व्यत्तिगत मा यतामा एव इतिहास दानिश के विभिन्न विचारो से प्रभाविन अन्य विभिन्न शिौण भी प्रचलित हुए है। उदाहरणाय, १९वी शती का समाज सुधारवादी दष्टिकोण, अप्रिय सस्य तक को प्रकाश में लाने का दृष्टिमाण आदि । वस्तुत किसी भी इतिहासकार सी मानसिक बनावट उसके समय एवं तलालीन समाज से प्रभाषित हावी है ।

ड अतएव किसी भी इतिहास लेखन में विभिम दाटकोणो का प्रचलित होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रस्तुत पुस्तक में पहले से सातवें अध्याय तक प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन सम्बधी उपयुक्त दष्टिकोणो या प्रवृत्तियो को रेखाक्ति करनेवाले सात प्रतिनिधि इतिहासकारो के इतिहास लेखन से परिचित कराया गया है। इनमें रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर प्राचीन भारतीय इतिहास की मारत खडी करते वाले वस्तुनिष्ठा समथक राष्टीय इतिहासकार है, जनरल अलेक्जेण्डर कनिंघम विशेषत भारत की पुरा सम्पदा को प्रकाशित करनेवाले मागदशक इतिहासकार है, विसण्ट आथर स्मिथ पर साम्राज्यवादी इतिहासकार होने का आरोप लगाया जा सकता ह, काशीप्रसाद जायसवाल उग्र राष्टीय इतिहासकारो में अग्रगण्य हैं रमेशचन्द्र मजूमदार कटु सत्य तक को प्रस्तुत करने में न हिचक्नेवाले इतिहासकार ह, आन द पतिश कुमारस्वामो अपने मौलिक पाशनिक सिखा तो पर आधारित आदशवादी, मुख्यत कला के इतिहासकार है और दामोदर धर्मान द कोसम्बी माक्सवादी पद्धति पर प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक चरित्र को प्रस्तुत करनेवाले इतिहासकार हैं। इसके आगे दो परिशिष्ट जोडे गये हैं । प्रथम परिशिष्ट में बारहवी शतादी के इतिहासकार क्ल्हण पर विवेचन प्रस्तुत किया गया है । प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकारो के साथ प्राचीन भारत के इस प्राचीन इतिहासकार का परिचय यहा अनावश्यक नहीं ह क्योकि उसके इतिहास लेखन में इतिहास को आधुनिक अवधारणा क तत्व परिलक्षित होते ह । द्वितीय परिशिष्ट में म्वत त्रतापूर्व प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास के लेखन पर प्रकाश डाला गया है। एक विशिष्ट राजनीतिक परिवेश में इति- हासकारा म विभि न प्रवृत्तिया का विकास और इनवे पोषण के लिए साधनो का प्रयोग कसे होता है इस परिशिष्ट से अच्छी प्रकार से समझा जा सकता है । अत में प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहास लेखन से परिचित करानेवाले महत्त्वपूर्ण म यो पो सक्षिप्त सूची प्रस्तुत की गयी है । पुस्तक के प्रणयन में यथाशक्य प्रामाणिक स्रोता से ही सामग्री सकलित की गयी है । किमी इतिहासकार के इतिहास रेग्वन का परिचय प्राय उसके जीवन वृत्त प्रमुख कृतिया, इतिहास लेखन पद्धति एव प्रमुख एतिहासिक मा यताएँ तथा उनके महत्व पर प्रकाश डालते हुए कराया गया ह । विद्यार्थियो क उपयाग हेतु विभिन स्थानों पर अग्रेजी काटेगन दिपे गय है । इस पुस्ता क प्रणयन की प्ररणा एम० ए० ( उत्तराख ) कक्षा में अध्ययन एवं डॉ. हेतु हिंदी-भाषा भाषी विद्याथियों की कठिनाईया से मिली। इस दिशा में शिष्य (एम० ए०, १९८५) एव मित्र श्री खडगबहादुर यादव ( अब प्राध्यापक, बाबा गयादास इ० का०, बरहज ) का विशेष आग्रह रहा। महाविद्यालय के प्राचाय श्री राजनारायण पाठक के उत्साहवद्धन और गुरुवर डॉक्टर शिवाजी सिंह (प्रोफेसर, प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व एव सस्कृति विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय ) ये मागदशन से यह काय सम्पन हुआ। प्रो. सिंह ने विभिन्न व्यस्तताओं एवं स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद इसका आमुख लिखार इसको उपयोगिता को निश्चित रूप से बढ़ा दिया ह । एतदथ इनके प्रति कृतनता. नापन हेतु शब्दो का अभाव-सा प्रतीत होता है। दिवाकरप्रसाद तिवारी (प्राध्यापक, राजकीय महाविद्यालय, मोहम्मदाबाद गोहना, मऊ विनोदकुमार दीमित { प्राध्यापक, सस्कृत मिभाग) ने पुस्तक लेखन में विभिन प्रकार के महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान कर और डॉ० गगाधर मिथ (प्राध्यापन, सस्त विभाग ) ने पुस्तक में भाषा सम्बधी त्रुटियो को सुधार कर अनुगृहीत किया है । महाविद्यालय के पुस्तकालयाध्यम श्री प्रसिद्धनाथ दीक्षित और सहायक श्री हरिशर पाण्डेय ने इस पुस्तक लेखन में प्रयुक्त प्रथा को उपलब्ध कराने में महत्त्वपूण सहयाग दिया है । विभिन्न शोघ सस्थानों, जिनमें भण्डारवर रिसच इस्टीट्यूट, पूना उल्लेख्य है से पुस्तक में प्रयुक्त विभिन इतिहासकारो ५ चित्र प्राप्त किये गये हैं। एतदय लेखक इनके प्रति मामार प्रकट करते हुए उन विद्वानो के प्रति भी कृतज्ञता प्रकट करता है जिनकी कृतियो के माध्यम से यह पुस्तक लिखी जा सकी। विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी के सचालक श्री पुरुषोत्तमदाम मोदी जी के प्रति यामार प्रकट करते हुए, जिहोंन पुस्तक के प्रकाशन का काय महप स्वीकार पिया, अन्तत कितु प्राथमिक रूप से रेखफ मन त महाप्रभु के चरणो में प्रति निवेदन करता है जिनकी असीम अनुकम्पा से ही यह काय मम्पन हुआ। आशा है इस पुस्ता से प्राचीन भारतीय इतिहास विद्याविया को प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहास लेपन को एक सामा य गानकारी हा सकेगी। इस थाना की पूर्ति से रेपा अपने श्रम को सापक समझेगा। इसम क्मिी सुज्ञाप हेतु यह सदय प्रस्तुत रहेगा। १ जनवरी, १९९१ माधम याहा, देवरिया हीरालाल गुप्त

दो शब्द
मानव जीवन की विविधताएं और चितन के
विभिन्न आधार इतिहासकारों को भिन्न भिन्न दृष्टिया
प्रदान करते हैं। इसी कारण प्राचीन भारत का आधुनिक
इतिहास लेखन भी विभिन्न दष्टिकोणों को प्रस्तुत करता
है। इनके अध्ययन के बिना प्राचीन भारतीय इतिहास
का अध्ययन अधूरा है । इसको दष्टि में रखपर विभिन्न
विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में प्राचीन भारत के
आधुनिक इतिहास लेखन के इतिहास का अध्ययन
सम्मिलित क्यिा गया है। फितु प्राचीन भारत के
आधुनिक इतिहास लेखन के इतिहास पर प्रकाश डालने
वाली सरल एव हिवी माध्यम की प्रामाणिक पुस्तकों
का सवथा अभाव है। इस दष्टि से डॉ० हीरालाल गुप्त
द्वारा प्रणीत प्रस्तुत पुस्तफ 'प्राचीन भारत के आधु
निक इतिहासकार अत्यत महत्त्वपूर्ण है। यह प्राचीन
भारत के आधुनिक इतिहास लेखन में प्रचलित विभिन्न
दष्टिकोणों का परिचय विभिन्न प्रतिनिधि इतिहासकारों
के इतिहास लेखन के माध्यम से कराती है। प्राचीन
भारत के आधुनिक इतिहास लेखन पर लिखित यह
पुस्तक निश्चित रूप से एक बडे अभाव की पूति
करती है।
-राजनारायण पाठक
आश्रम बरहज,
देवरिया

अनुक्रम
भामुख
प्राक्कथन
दो शब्द
१७-२४
अध्याय
रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ( १८३७-१९२५)
दो जनरल अलॅपजेण्डर नियम (१८१४-१८९३)
तीन विसेण्ट आथर स्मिय ( १८४-१९२०)
चार काशीप्रसाद जायसवाल ( १८८१-१९३७)
पांच रमेशच द्र मजूमदार ( १८८८-१९८०)
आन द फैतिश कुमारस्वामी ( १८७७-१९४७)
सात दामोदर धर्मानद कोसम्बो ( १९०७-१९६६)
परिनिष्ट १ फल्हण
परिशिष्ट २ स्वतनता पूर्व प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास
२५-३०
४०-४८
का लेखन
सक्षिप्त प्रय सूची

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अध्याय एप
रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ( १८३७-१९२५)
रामकृष्ण गोपाल भण्डारफर पाम १८३७ ई० में महाराष्ट्र प्रान्त के रत्ना
गिरि जिले में हुमा या । इनरे पिता राजस्व विभाग में लिपिक के पद पर नियुक्त
ये। इन्होन अपनी प्रारम्मिा शिक्षा एल्पिस्टन कालेज, बम्बई में ग्रहण की।
पहले इन्होंने यहीं सिपिक के रप में और बाद में अध्यापप के रूप में काय पिया ।
बम्बईविश्वविद्यालय की स्थापना
होने पर उहीन यहां से पी०
ए० १८६२) एव एम० ए०
(१८६३) की परीक्षाएं उत्तीण
पी। इसक पश्चात् भण्डारकर
राजस्व विभाग में नियुक्ति चाहते
थे किन्तु तत्वालीन पब्लिास.
ट्रक्टर हावट ने उनकी प्रतिमा
यो परम्प पर उहें रत्नागिरि
हाई स्कूल में हेड मास्टर के रूप
में नियुक्त कराया जहां ये १८६५
से १८६७ सप वायरत रहे ।
१८६७ से १८७२ तक वे एल्फि
स्टन कारेज बम्बई में सस्कृत
के एक्टिग प्रोफेसर रहे और १८७२ से १८७९ तक वही उहोने सहायक
प्रोफेसर ये एप में फाय क्यिा। १८७९ में भण्डारवर देवेन पालेज, पूना में
एक्टिग प्रोफेसर होकर आ गये और वही १८८१ में प्रोफेसर बन गये । यही
से ये १८९३ में सेवानिवृत्त हुए । इसके पश्चात मण्डारकर बम्बई विश्वविद्यालय
के वाइस चा सलर बनाये गये। देय विभिन्न संस्थाओ द्वारा भी सम्मानित
किये गये । १९२५ में उनकी यश कोति योप रह गयी।
भण्डारकर को महत्त्वपूर्ण कृतियाँ
भण्डारकर की समस्त कृतियों-महवपूर्ण पुस्तको, लेखा एव यास्यानो-
का सग्रह २४८२ पृष्ठो में 'क्लेटेड वस गॉफ सर आर० जी० भण्डारकर'

२ प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार शीषक से 'भण्डारपर ओरियण्टल रिसच इस्टीट्यूट, पूना' द्वारा किया गया है जिसका सक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है- १ प्रारम्भ में भण्डारकर ने सस्कृत साहित्य को अपनी सेवायें प्रदान की थी । उ होंने ऐतरेय ब्राह्मण के मार्टिन हॉग के संस्करण की समालोचना एव अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त उन्होने 'मालतीमाधव' के एक महत्वपूर्ण सस्करण का सम्पादन भूमिका के साथ किया। २ इतिहास के ग्रथो में 'अली हिस्ट्री ऑफ डेकन' भण्डारकर का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रथ है जो सवप्रथम १८८४ म प्रकाशित हुआ था। इस ग्रथ में प्रारम्भिक काल से मुस्लिम आक्रमण तक का दान का इतिहास प्रस्तुत किया गया है । इस ग्रन्थ के प्रणयन में उस समय तक उपलब्ध प्राय सभी प्रकार के साक्ष्यों का उपयोग किया गया है। मौयों के काल से लेकर इसमें सातवाहनों, प्रार म्भिक चालुक्यो, राष्ट्रकूटो, परवर्ती चालुक्यो, कलचुरियो, प्रारम्भिक एव परवर्ती यादवो और शिलाहारो के इतिहास का महत्त्वपूण ढग से विवेचन किया गया है । इस प्रथ की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें न केवल राजनीतिक इतिहास को सम्मिलित किया गया है वरन विभिन्न कालो पर उपलब्ध प्रमाणो के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि सास्कृतिक इतिहास को भी प्रस्तुत किया गया है। इस ग्रथ में परिशिष्ट के रूप म 'ए नोट आन द गुप्ता एरा', 'ए नोट ऑन द शक डेटस' और 'इट्रोडक्शन टू हेमाद्रिज व्रतकाण्ड' जसे शीषको का विवेचन भी सम्मिलित किया गया है । बाद में इस ग्रथ को भण्डारकर के सुपुत्र देवदत्त रामकृष्ण भण्डारकर ने सशोधित कर भी प्रकाशित कराया। इतिहास सम्बधी भण्डारकर की दूसरी महत्वपूर्ण कृति 'ए पीप इन टूद अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया' है जो १८९० में प्रकाशित हुआ था। यह प्रथ उत्तर भारत के इतिहास का सक्षिप्त विवेचन उपस्थित करता है। एसमें मौर्यों, शुगो कण्वों, इण्डो वक्ट्रियन यूनानियो, शको, क्षत्रपो तथा गुप्तो के इतिहास का विवेचन किया गया है । इस विवेचन में गुप्तो के इतिहास को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। भण्डारकर की इतिहास सम्बधी तीसरी महत्त्वपूण कृति 'वष्णविज्म, शैयिज्म एण्ड माइनर रिलिजियस सिस्टम्स' है। इसका प्रकाशन १९१३ में हुआ था। इस प्रय में भण्डारकर ने षष्णव, शेव और कतिपय अय रघु धर्मों का क्रमबद्ध इतिहास सर्वप्रथम उपलब्ध कराया था। इसकी रचना में उन्होंने साहित्य, अभिलेख, मुदा तपा शिल्प आदि सभी उपलबधापनों का उपयोग रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ३ - किया है । वस्तुत भण्डारकर को यह कृति भारती विद्या ( Indology ) के क्षेत्र में अप्रतिम महत्त्व रखती है । ३ भण्डारकर ने प्राचीन भारतीय इतिहास से सम्बधित विभिन लेख लिखे जो तत्कालीन लब्धप्रतिष्ठित शोष पत्रिकाओं-यया, 'जनल ऑफ ६ बाम्बे बान्ध आफ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी', 'इण्डियन एण्टीक्वेरी', 'एपिग्रफिया इण्डिका' और 'प्रोसिडिग्स ऑफ द इण्टरनेशनल कांग्रेस आफ ओरिपाटलिस्टस' आदि में प्रकाशित हुए। उनके ऐसे लेखो में विभिन प्राचीन अभिलेखो का सम्पादन और पतञ्जलि की तिथि पर प्रकाश आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अयशक्षिक उपलब्धियां १ १८७६ में भण्डारकर लदन के 'इण्टरनेशनल काग्रेस आफ मोरियट- लिस्टस' द्वारा आमन्त्रित किये गये। कि तु कतिपय कारणो से वे इसमें सम्मिलित न हो सके तथापि उन्होने इसमें 'नासिक केव इसक्रिप्सन' शीर्षक से लेख प्रेषित किया। १८८६ में इस सस्था द्वारा भण्डारकर को पुन आमन्त्रित किये जाने पर उहोने 'रामानुज एण्ड द भागवत और पाचरात्र सिस्टम' लेख प्रस्तुत किया। २ अपनी योग्यता के कारण भण्डारकर देश विदेश की विभिन्न शैक्षिक सस्थाओ द्वारा सम्मानित किये गये । १८८५ में वे रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, लदन, १८८७ में जर्मन ओरियटल सोसाइटी, १८८७ में ही अमेरिकन बोरि- यटल सोसाइटी और १८९० में फ्रेंच इन्स्टीट्यूट की मानद सदस्यता हेतु निर्वाचित किये गये। ये गाटिगन ( Gottingn ) ( १८८५) और कलकत्ता ( १९०९) विश्वविद्यालयों द्वारा पी एच० डी० और बम्बई (१९०४ ) विश्वविद्यालय द्वारा एल एल० डी० की मानद उपाधियों से भी सम्मानित फ्येि गये। ३ अपने जीवन के ८० वप पूण किये जाने पर १९१७ में 'भण्डारकर रिसच इस्टीट्यूट' की स्थापना की गयी जिसे बम्बई के तत्कालीन गवनर लार्ड विलिंगटन ने सम्बोधित किया। इस अवसर पर उनके सम्मान में एक स्मारिका का भी प्रकाशन हुआ जिसमें एस० के० मायगर, जी० ए० प्रियमन, गगानाप झा, एस० लेवी, ए० ए० मैकडॉनेल, ई० एफ० पाजिटर, टी० हन्त्य और श्रीमती रीज डेविडस, एच० पी० शास्त्री, वी० ए० स्मिप मादि उनके मित्रों एव शिष्यो जैसे प्रसिद्ध विद्वानों के लेख थे। भण्डारकर ने इस सस्पा को अपनी दुलम पुस्तको तपा लेखो आदि का दान कर दिया।

४ प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार ४ एक शिक्षक, अनुस घानकर्ता और लेखक होने के साथ साथ भण्डारकर तत्कालीन समाज सुधार यादोलनो में भी सक्रिय रूप से जुड़े थे। वे महाराष्ट्र के 'प्राथना समाज' के सक्रिय सदस्यो में से एक थे । ऐतिहासिक पद्धति एव विचार रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर की ऐतिहासिक कृतियो को मीमासा कर उनकी ऐतिहासिक पद्धति एव विचारो पर प्रकाश डाला जा सकता है। उनकी ऐति हासिक कृतियो की मीमासा करने से विदित होता ह कि वे वास्तविक इतिहास प्रस्तुत करने के पक्षपर थे । भण्डारकर ने अपने इस दष्टिकोण का स्पष्ट करते हुए एक स्थान पर स्वय कहा है कि, "इतिहासकार को सवप्रथम निष्पक्ष होना चाहिए । उसका लक्ष्य शुष्क सत्य के अतिरिक्त कुछ नही होना चाहिए। उसे हर मामले में प्रस्तुत साक्ष्य को विश्वसनीयता जांचनी चाहिए एव देखना चाहिए कि वह जो कुछ कह रहा है वह सम्भवत ह या नही।" भण्डारकर इतिहास- दाशनिक राके के इस मत-य से सहमत थे कि इतिहासकार का काय भूतकाल का उस रूप में वणन करना है जैसा कि वह पा । उनके विचार से प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्येता के सम्मुख यह मुख्य प्रश्न होना चाहिए कि क्या और कर हुआ। इतिहास लेखन सम्बन्धी भण्डारवर की इस दष्टि को क्षरण उनके द्वारा 'भण्डारकर रिसच इस्टीटयूट' में १९१९ में मायाजित 'ओरिय टल का फरेन्स' में दिये गये भाषण के इस अश में भी मिलती है- 'म अपन जीवन के सक्रिय वर्षों को इस निश्चित विश्वास के साथ विराम दता हूँ कि हमारे बीच विकसित तकमगत समालाचनात्मक पाण्डित्य लाछनो और प्रहारों के विरुद्ध सम्भाले रखा जायेगा।" इतिहास सम्बधी अपने विशिष्ट दृष्टिकोण के कारण भण्डारकर किसी भी विषय पर लिम्बन से पूर्व रस विषय पर उपरबर समस्स साक्ष्यो की परीक्षा तो परत ही है, विभिन्न साम्यो के तुलनात्मक महत्व पर भी ध्यान देते है। इसी पारण अपन ऐतिहासिक रेषनों में भण्डारकर एक अधिवक्ता की भाति म्यवहार हुए न रियाई देकर एक यायाधीश के रूप में व्यवहार करते हुए दृष्टिगठ होते है। इस वाद घे अपन लेखन को पाश्चात्य दानि एव एतिहासिक वियि में दालने का प्रयास परत है । इस सम्बर में ए• • पुसल्फर निसते है fr'वे मस्त और मारतीय प्राचीन मालीन अवरोपों में अध्ययन में पश्चिमी पवियों को प्रपत्त वरन में अप्रगीचे और उनका नाम पूध और परिपम के दो रायो साप मदत या मेस प्रस्तुत करता है।" महारपर भी रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ५ ऐतिहासिक पद्धति एव विचार उनके 'क्रिटिक्ल एण्ड पम्परेटिव मेघड्स' विषयक सेखों से भी स्पष्ट होता है। भण्डारफर का यह मानना था कि इतिहास का अय फेवल राजनीतिर इतिहास नहीं है वरन् आधुनिक अर्थों में मानव की समस्त गतिविधियों इसमें समाहित होती है । अपनी इस मा यता के कारण ही भण्डारकर ने जिस काल के इतिहास पर लिखा है उस काल के सामाजिक, धार्मिक, आधिक मादि दशाओं पर भी प्रकाश डाला है। भण्डारपर केवल ऐतिहासिक घटनाओ को ही प्रस्तुत करना पर्याप्त नही समाते पे अपितु उनके कारण और प्रभाव को भी प्रस्तुत करना महत्त्वपूण समझते थे। रितु वे घटनाओ के देवो विधान में विश्वास नहीं रखते थे। इसीलिए ए० एल० वैशम ने लिखा है कि, "उहोने ( भण्डारवर ने) ऐति- हासिफ घटनामो पे पारण में देयो विधान को स्वीकार नही दिया है। और यही कारण है कि उनकी ऐतिहासिक पद्धति सदैव निरपेग बनी रही।" ए• डी० पुमलार का भी स्थन है fr "भण्डारपर भारतीय इतिहास में प्रापीन माल बगानिस ऐतिहासिक पाण्डित्य में पिता थे जिस प्रकार सर यदुनाप सरकार मध्यकालीन और प्रारम्भिक ब्रिटिशकाल में ये ।" ( Dhandarkar was the father of scientific historical scholar. ship in the ancient period of Indian history as Sir Jadunath Sarlor was in medieval and early British period ) इसरे आगे पुसलपर भण्डारपर सम्बप में लिसने है कि- "Bhandarkar is rigidly objective, matter of fact, in his historical writings There are no observations he does not look sideways He has slud edly excluded his personality from his writings Though it is said that historical writing reflects as much of the period of the writer as of the period on mbich he writes ooc would yainly search for en glimpses of Bhandarkar in his writings He would cas ly have passed muster as a historian in the Vict of Ranke who condemned the approach to the study of history from any sandpoint of sub,ective bias, and who, according to Acca, taught us to be critical and colourless" ६ प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार भण्डारवर को उक्त ऐतिहासिक पद्धति एव विचारो ने उनके समकालीन और बाद के इतिहासकारो को बहुत प्रभावित किया। उनके समकालीन राजा राजेद्रलाल मित्र ने उनके जैसी हो ऐतिहासिक रेसन पद्धति ग्रहण की थी। बाद के इतिहासकारो में सवप्रथम उनके सुपुत्र देवदत्त रामकृष्ण (डी. आर०) भण्डारकर पर उनका प्रत्यन प्रभाव रहा। यहां यह कहना अति- शयोनिपूण नहीं है कि अपनी पद्धति एव विचारो से बाद के इतिहासकारो को व्यापक रूप से प्रभावित करने वाले इतिहासकारों में भण्डारकर अग्रगण्य है। उनके बाद किन महत्त्वपूण इतिहासकारों पर उनका प्रभाव रहा, पुसलकर ए° एल० बैशम के इस मत को उद्धत करते है कि- Raichaudhari 15 a historian of the school of Bhandarkar attempting to discover the dry truth और वे आगे इस पक्ति में के. ए. नीलकण्ठ शास्त्री, पी० वी० काणे, आर० सी० मजमदार, वी० वी० मिराशी और ए० एस० अल्टेकर आदि इतिहासकारो को सम्मिलित करते हैं। इस प्रकार प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन के इतिहास में रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर का अप्रतिम महत्त्व है। उनकी वैज्ञानिक ऐतिहासिक पद्धति एव विचारो ने बाद के इतिहासकारो को बहुत अधिक प्रभावित क्यिा । " अध्याय दो जनरल अलेक्जेण्डर कनिंघम ( १८१४-१८९३ जनरल अलेक्जेण्डर कनिंघम स्कॉटलंण्ड के कवि एलन बनिघम के द्विती' पुत्र थे। इनका जन्म २३ जनवरी, १८१४ को हुआ था। लदन के विभिन्न स्कूलों में इन्होने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की। १८३१ में बगाल इजीनियस में सेकेण्ड लेफ्टीनेन्ट बनने पर १८३३ में कनिंघम का भारत आगमन हुआ। इसके बाद वे रॉयल इजीनियस के कनल बने और १८३६ से १८४० तक भारत के गवनर जनरल लाड आकलैण्ड के उच्च सेनानायक (एडज्यूटेट जनरल) रहे । माच १८४० में ही उनका विवाह एलिसिया मोरिया के साथ हुआ। १८४५४६ में कनिंघम सतलज सेना के साथ थे। १८४७ में डा० थामसन भोर कैप्टन स्टैची के साथ वे लददाख तिब्बत कमीशन के अध्यक्ष थे। इस दौरान उहोंने कश्मीर के मन्दिरों का परिभ्रमण किया तथा कश्मीर के मदिरों एव लदास पर ही अपनी प्रथम दो पुस्तकों का प्रणयन किया। इसके बाद फनिधम १८६१ तक पी० डब्ल्यू० डी० में अनेक पदो पर कायरत रहे । १८६१ से १८६५ तर फनिघम ने भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के सर्वेक्षक ( सर्वेयर ) के रूप में काय किया । १८६६ में वे इग्लैण्ड वापस लौट गये । यहां उन्होने १८७० तक लन्दन में एक बैंक के डायरेक्टर के रूप में काय किया । १८७१ में वै पुन भारत लौटे और यहां पुरातत्त्व विभाग के डाइरेक्टर जनरल बनाये गये । भारत में प्राय ५० वर्षों तक सेवा करने के पश्चात १८८५ में निंघम सेवानिवृत्त हुए । इसके पश्चात् अपनी मृत्यु १८९३ तक उन्होने सदन में रहते हुए अनेक पुस्तकों का प्रणयन किया। अपनी उपलब्धियो के कारण कनिंघम विभिन्न उपाधियों से सम्मानित किये गये । १८७१ में उन्हें 'चार्टड सयस इस्टीटयूगन' ( सी० एस० आई०) तया १८८७ में माहट कमाण्डर ऑफ द इण्डियन इम्पायर' (० सी० आई० ई.) जैसी उपाधियां प्रदान की गयी। भारतीय इतिहास में कनिधमा योगदान भारत में अंग्रेजो के आगमन से भारतीय इतिहास लेखन को एक नवीन दिशा प्राप्त हुई थी। इस दष्टि से रिपत्ते में १५ जनवरी, १८८४ को ८ माघी भारत के आधुनिक इतिहासकार एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना एक महत्वपूण धरण था। १८३३ में जेम्स प्रिसेप ने इस सोसाइटी के सचिव के रूप में वाय परला प्रारम्भ किया था। सेना में नियुक्त होकर आये जनरल अलॅपजेण्डर कनिश्म ने छहों के प्रमोगी फे रूप में अपने ऐतिहासिक क्रियाकलापों को प्रारम्भ किया था और इस दौत्र में काय करते हुए विशेषत भारतीय पुरातत्त्व के क्षेत्र में अपना सत्यत महत्त्व पूण योगदान प्रदान किया । अपने इस योगदान के कारण ही कनिषम भारतीय पुरातत्व पे जनक के रूप में जाने जाते है। अपने पुरातात्विक खोजों के माध्यम से जनरल कनिंघम ने भारतीय इतिहास की अभूतपूव सेवा की। होंने न केवल पुरावावि उत्पनन हो पराये अपितु अपने पुरातात्विक सर्वेक्षणो की टिप्पणियो और व्याख्याओ सहिठ याख्यायें (रिपोट् स ) भी प्रस्तुत की जिसस असरूप प्राचीन ऐतिहासिक तथ्य प्रकाश में आये । इसके अतिरिक्त पनिंघम ने अपनी अन्य विभिन्न ऐतिहासिक हतियो के माध्यम से भी भारतीय इतिहास की श्रीवृद्धि को। उनके कार्यों की सक्षिप्त रूप रेखा निम्नलिपित ह- पुरातात्त्विक कार्य क-पुरातात्विक ससफ के रूप में। १८६१-१८६५) १८४० में रायल एशियाटिक सोसाइटी के सचिव जेम्स प्रिंसेप के देहावसान के पश्चात जनरल कनिघम ने १८५१ तक भारत के पुरातात्विक वैभव का मथन व्यक्तिगत रूप से किया। १८६१ में अहाने तत्कालीन वायसराय लाड वेनिंग के समक्ष भारत की विपुल पुरातात्विक धरोहर के सुव्यवस्थित अध्ययन के लिए एक स्मरण पत्र ( Memorandum ) दिया । उनके इस स्मरण पत्र को वायसराय ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। नियम को ही इस महत्वपूर्ण काय को सम्पन करने का दायित्व भी सौंपा गया और उन्हें पुरातात्विक सर्वेक्षक नियुक्त किया गया। उनके इस काय को व्याख्यायित करते हुए कहा गया था कि, "महत्त्वपूर्ण स्मारको की रूप रेखा, नाप जोख, रेखाचित्रो, छाया चित्रो 'एव अभिलेखों के माध्यम से यथासम्भव तथ्यपरक वर्णन तयार करना एवं उनके इतिहास तथा परम्पराओ का निरूपण एव सकलन करना।' पनिधम ने पुरातात्विक सर्वेक्षक के रूप में १८६१ से लेकर १८६५ के मध्य तर पूर्व में गया जिरे से रेपर पश्चिम में सिधु नदी तफ तथा उत्तर में वारसी (देहारदून ) से लेकर दक्षिण म नमदा नदी के मध्यवर्ती क्षेत्रों के प्राचीन स्थलो की यात्रा एवं स्मारको का सर्वेक्षण किया और एतिहासिक महत्त्व फे रथलो की विस्तत आख्यायें ( Reports) भी तयार किया। उन्होंने अपने जनरल अलेक्जेण्डर कनिंघम ९ इस सर्वेक्षण के लिए चीनी यात्री ह्वेनसाग (Hiuen Tsang ) के यात्रा विवरण को अपने पथप्रदशक के रूप में प्रयोग किया। कनिंघम का यह मानना था कि, "जिस प्रकार प्लिनी ने सिक दर महान के पद चिह्नो का अनुसरण करते हुए अपनी रचना को उसी प्रकार में चीनी यात्री ह्वेनसाग के पद चिह्नों का अनुगमन करते हुए काय करूंगा।" कितु कनिंघम को अपने पुरातात्विक सर्वेक्षण सम्बन्धो इस महत्त्वपूर्ण कार्य को १८६६ में अचानक बद कर देना पड़ा क्योकि इसी वर्ष पुरातत्त्व विभाग को बफर दिया गया था। (स) मायालॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के डाइरेक्टर जनरलोप में (१८७०-१८८१) १८७० में एक बार पुन ई० सी० बेली नामक गृह सचिव ने तत्कालीन भारत सरकार से पुरानिधियो और पुरावशेषो की ओर ध्यान देने का आग्रह किया। उनके इस अनुरोष का अनुकूल प्रभाव पड़ा और जनरल कनिंघम को भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (Archacological Survey of India ) नाम से गठित एक स्वन विभाग का महानिदेशक ( Director General ) नियुक्त किया गया। उनकी यह नियुक्ति दो हजार माषिक पर की गयी थी। साथ ही ऐतिहासिक दष्टि से महत्त्वपूर्ण एव अय स्मारकों की देश व्यापी खोज एव रेखा जोखा ( Record ) तैयार करने की महत्वाकाक्षी योजना भी तैयार की गयी। १८७१ में जनरल कनिंघम ने अपना कायभार सम्भाला। इसके बाद सव. प्रथम उ होने मुगल साम्राज्य की दो महत्त्वपूर्ण राजयानियों-दिल्ली एव आगरा- या सर्वेक्षण किया । १८७२ का अगला वप राजपूताना, बन्दलम्बण्ड, मथुरा, बोधगया एवं गोड अर्थात् बगाल के दौरे में व्यतीत किया। १८७३ में पजाव पे पतिपय चुने हुए क्षेत्रो का दौरा किया तथा पश्चिम भारत के विभिन्न क्षेत्रो से बहुसख्यक हि द यवन ( Indo-Greek ) प्रतिमाएं एकत्र की गयो । १८७३ से १४७७ के मध्य रा अपना समय पनिंघम ने मयुक्त प्रान्त (वतमान उत्तर- प्रश), बुदेलखण्ड और माल्या आदि क्षेत्रो में सर्वेक्षण में व्यतीत किया । इसी दौरान उ होन भरहुत के प्रसिद्ध स्तूप की खोज की। १८७८-७९ पा थप पनिंघम ने पुन पजाव क्षेत्र के दौरे में व्यतीत किया। उनसे इसी दौरे में तक्षशिला केटीरे प्राय सिकदर काल के भारतीय सिपको का एष भाण्ड ( Hoard ) प्राप्त हुआ था। इसके बाद अगला वप कनिंघम ने बगाल एव बिहार से क्षेत्रों में खोज पाय में म्यतीत पिया। १८८०-८१ का १० प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार उनका वप बोध गया के बौद्ध मदिर की सफाई कराने तथा छैन साग द्वारा वर्णित सीमावर्ती स्थलो की खोज म बीता। १८८२-८५ के मध्य राजपूताना, बुदेलखण्ड एव रीवा के क्षेत्रो के अनेक ऐतिहासिक स्थलो की जांच पडताल एव विस्तत आख्याय तयार करन का काय सम्पन किया गया । सक्रिय एष अविराम सेवा के पश्चात जनरल कनिंघम ने अवकाश ग्रहण करने का निश्चय किया और १८८५ में सेवानिवृत्त हो गये । पुरालिपि ( PALAEOGRAPHY ) सम्बन्धी काय खोज एव सर्वेक्षण के अतिरिक्त जनरल कनिंघम ने पुरालिपि के महत्त्व को भी समया था। १८७२ में जेम्स बर्गेस ने 'इण्डियन एण्टीक्वेरी' नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया था। इस पत्रिका में प्राचीन अभिलेखो के मूलपाठ, अनुवाद और कभी कभी अभिलेखो को छाया का भी प्रकाशन किया जाता था। कि तु वस्तुत इस प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करन की यह योजना जनरल कनिधम के मस्तिष्क की ही उपज थी। उनके समय के प्रसिद्ध पुरालिपि शास्त्रियों में ब्यूहलर पलीट, एग्गलिंग, राइस, डी० आर० भण्डारकर, भगवान लाल इन्द्रजी और हुल्श आदि के नाम उल्लेखनीय है । १८७७ में कनिंघम की योजना के अनुरूप 'कापस इ सक्रिप्सनम इण्डिकेरम' की पहली जिल्द का प्रकाशन हुआ जिसमें अशोफ एव उसो पौत्र दशरथ के उस समय तक के उपलब्ध सभी अभिलेखो का मूलपाठ, अनुवाद एव प्रतिकृतियो का अत्यत सुचारु ढग से प्रकाशन किया गया । जनरल कनिंघम की ही अनुशसा पर फ्लीट को १८८३ में राजकीय पुरालिपिवेत्ता के रूप में १० वर्षों के लिए नियुक्त किया गया । पलीट को राजाओ के अभिलेखों का एक कापस (अभिलेख संग्रह) प्रकाशित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया। १८८८ में पलीट ने कापस इसद्रिप्सनम इण्डिके रम के तृतीय जिल्द का प्रकाशन कराया। नियम को ऐतिहासिक कृतियाँ भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की २३ जिल्दों वाली विमल रिपोटों के अति- रिक्त कनिंघम ने अपनी अ य अनेक कृतियां भी प्राचीन भारतीय इतिहास को प्रदान की । उनको इन ऐतिहासिक कृतियों में निम्नलिखित प्रमुख है- १ मिट ज्याप्रफी ऑफ इण्डिया २ ८ स्तुप आफ भरहुत ३६दुब ऑफ इण्डियन एराज ४ पवायम्स माफ शियेण्ट इण्डिया जनरल अलॅक्जेण्डर कनिंघम ११ कनियम को पुरातात्विक दृष्टि एव देन उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट ह कि जनरल कनिंघम का काय क्षेत्र मुख्यत पुरातत्व था । उनका पुरातत्व सम्बधी दष्टिकोण भी अत्यत व्यापक था। एक बार सर्वेक्षण काय के सम्बध में अपने सहयोगियो को निर्देश देते हुए उ होने कहा था कि, "पुरातत्व मात्र टूटी हुई मूर्तिया, पुराने भवनो तथा टोलो के ध्वसा- वशेषा तक ही सीमित नहीं है बल्कि विश्व इतिहास से सम्बद्ध वह सभी वस्तुओं को समेटता ह । हमारे शोध का उद्देश्य अतीत के व्यवहारो, प्रथाओ आदि को उदघाटित करने से सम्बद्ध होना चाहिए।" पुरातत्त्व के सम्बध में कनिंघम का यह दृष्टिकोण केवल सैद्धातिक ही नहीं था वरन् इसको पूर्ण करने के लिए वे सदैव प्रयत्नशील भी रहे । यह तथ्य इसी बात से स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपने पुरातत्त्व सम्बधी काय जिन परिस्थितियो में सम्पादित किये उनमें अन्य किसी व्यक्ति के लिए असम्भव तो नही, अत्यन्त कठिन अवश्य था। उस समय देश में परिवहन और संचार के माध्यम अत्यन्त अविकसित अवस्था में थे। कनिधम को अपने सर्वेक्षण के लिए अधिकाश यात्रायें घाडे पर सवार होकर करनी पड़ी थी। कुछ स्थानो पर बैलगाडी से और कही कही पर तो उहें पैदल भी यात्रा करनी पड़ी थी। जनरल फनिधम के पुरातत्त्व सम्बधी सर्वेक्षणो एव उनकी विस्तृत रिपोटौ सहित अन्य ऐतिहासिक कृतियो से प्राचीन भारतीय इतिहास पर प्लाघनीय प्रकाश पडा। प्राचीन भारतीय अभिलेखो के प्रकाशन में उनकी रुचि के परिणाम स्वरूप परीट ने जो उच्च प्रतिमान स्थापित किये उसका अनुकरण भारतीय पुरालिपिवेत्ता आज भी करते हैं। आर्केयालाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के डाइरेक्टर जनरल के पद से अवकाश प्रहण करने पर जनरल कनिंघम ने इस पद को समाप्त करने की संस्तुति की और सम्पूण उत्तर भारत को तीन सकिलों-पजाब, उत्तर पश्चिम सीमान्त प्रान्त (यतमान उत्तर प्रदेश) या मध्य प्रान्त में विभाजित करने की सलाह दी। इसके परिणामस्वरूप प्रत्येक सकिल के पुरातात्विक कार्यों को व्यवस्था के लिए एक सर्वेसक ( सर्वेयर ), उसके दो सहायको तथा दो ड्राफ्टमनों को व्यवस्था हुई । इस प्रकार भारतीय पुरातत्त्व विभाग के पुनगठन में भी पनिंघम ने महत्त्व. पूर्ण भूमिका निभाई। स्पष्ट है भारतीय पुरातत्त्व के क्षेत्र में जनरल पनिंघम ने अस्य व महत्त्वपूर्ण काय किये । इस कारण कतिपय विद्वानों ने विशेषत भारतीय पुरातत्व के १२. प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार विकास में कनिंघम के योगदान को मुक्त कण्ठ से प्रशसा की है। इन विद्वानो में भनुप्तार भारतीय पुरातत्त्व को सुदृढ़ आधार प्रदान करने से कारण पनिंघम को भारतीय पुरातत्त्व मा जनक (Father of Indian Archaeology) महा मा सकता है । प्रसिद्ध भारतीय पुरातात्विक एच० डी० सामलिया ने भारतीय पुरातत्त्व के विकास के इतिहास का जो काल विभाजन किया ह उसके प्रथम युग ( १८६१-१९०२) में जनरल पनिंघम का विशेष योगदान होने के कारण इस युग को 'कनिधम मुग' नाम से सम्बोधित किया है। कित्तु पतिपय विद्वान जनरल कनिंघम के पुरातत्त्व सम्बधी कार्यों की मालोचना भी करते हैं । इनके अनुसार कनिंघम ने भौतिक अवशेषों के याघार पर मानव के समा इतिहास रचना की घोर तपेपा को थी। उहोंने सुव्यवस्थित एव विस्तत उत्खनन ( Deep excavation ) की विधियो का भी सहारा नही लिया। यह भी विशेष ध्यान देने योग्य बात है फि कनिंघम ने पाषाणयुगीन शोध की पूण उपेक्षा की। १८७३ में हडप्पा के प्रसिद्ध टीले से उन्हें चित्राक्षर लिपि से अकित एक मुहर प्राप्त हुई थी। लेकिन वे यह समझने में पूर्णतया असमथ रहे कि उम मुहर का सम्ब घ एक महान परतु अज्ञात सम्मता से पा । कि कनिंघम की इन असफलताओ के सम्बघ में ये आक्षेप सत्य से परे और निराधार है । वस्तुत भारतीय पुरानिधियो एव पुरावशेषो के महत्त्व के विषय में विद्वानो का ध्यान कनिंघम के खोजो एव सर्वेक्षणो के फलस्वरूप ही आकर्षित हो सका था । उनके समय तक उत्खनन की विधियो का समुचित विकास न हो पाने के कारण ही इस दिशा में विशेष प्रगति नहीं हो सकी थी। समग्र रूप से भारतीय पुरातत्त्व एव इतिहास को जनरल कनिंघम की देन अप्रत्याख्येय है । उनके बाद के पुरातत्त्वविदो ने उनके कार्यों को एक आदश के रूप में समझा और ग्रहण किया।

भन्याय तीन विसेण्ट आर्थर स्मिथ (१८४३-१९२०) उनीसवी शताब्दी में सर विलियम जोस, एच. डी• कोलबुक, चाल्स विल्किस, एच० एच० विल्सन, जेम्स प्रिंसेप, एफ० मैक्समलर और जनरल कनिधम आदि योरोपीय विद्वानों द्वारा भारतीय इतिहास के लेखन का काम प्रारम्भ किया गया। इसके पश्चात कमल टाड, जी० ४फ, एल्फिस्टन और पी० ए• स्मिथ आदि ने इसमें अभिवृद्धि की । स्मिथ ने १९०४ में अपने प्रसिद्ध प्रय 'भलो हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' को प्रकाशित कराया। इसमें १०० ई० पू० से लेकर मुस्लिम आक्रमण ता का राजनीतिक इतिहास प्रस्तुत किया गया था। इतने लम्बे कालखण्ड का राजनीतिक इतिहास प्रस्तुत करने वाली यह प्रथम रचना थी। इसमें स्मिथ ने उस समय तक के उपल ध सभी पुरातात्विक, मौद्रिक, आभिलेखिक एव साहिरियर साक्ष्यो मा विद्वत्तापूर्ण उपयोग किया था। इसके अतिरिक्त स्मिथ ने भारतीय इतिहास की जा सवा को उसके कारण माचीन भारत के एयप्रतिष्ठ आधुनिक इतिहासकार पे प में जाने जात है । विसेण्ट आर्थर स्मिथ का जम १८४३ ई० में डयलिन में हुआ था। प्राचीन वस्तुओ के खोजी मायरिस पिता ये तेरह बच्चो में से के पांचवें थे। उ होने स्वस्नि और आक्सफोड से अत्यात योग्यतापूर्ण मास्टर डिग्री लेने के पश्चात दालन विश्वविद्यालय से डी० लिट् की उपाधि ली। इस प पात् १८७१ मे ये इण्डियन सिविल सर्विस (बाई. सी. एस०)मी सेवा में मा गये। अपने उत्तरदायित्यो का सफल निर्वाह करते हुए स्मिथ ने भारतीय इतिहास के अध्ययन एवं अनुमधान में भी सलग्न रहकर अपन को एक भारतीय इतिहासकार में कर में भी प्रतिक्षित पिया। देण्दन में रायर एशियाटिक सोसाइटी के सदस्य, इलाहाबा विश्वविद्यालय के पेसो और आरसफार इण्डियन इनस्टीटयूट से भी सम्बद्ध रहे। सिमपरो मत्यपूणातियों स्पिन गभा ५. वर्षों सर मारती विद्या (होली)ो महास- एम मया । परिणामस्वरूप उनके मना प्रय एव रेरा sindनिमें निम्नरिमित प्रमुप है- १४ प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार १ अशोक, व युद्धिस्ट इम्परर ऑफ इण्डिया (१९०१)-स्मिथ का यह प्रथम प्रकाशित प्रथ था। १९०९ ओर १९२० में यह ग्रन्थ पुनप्रकाशित भी हुआ। किसी भारतीय शासक की उपलब्धियो से सम्बन्धित यह प्रथम प्राय था। अशोक के अभिलेखों के अग्रेजी अनुवाद, अशोक और ग्रीक राजाओ के बीच पारस्परिक सम्बधो का विवचन तथा अशोक के धम्म की प्रकृति का विवेचन इस प्रथ की प्रमुख विशेषतायें थी। स्मिथ ये पश्चात अशोक के इतिहास पर डी. आर० भण्डारकर, आर० के० मुकर्जी और रोमिला थापर आदि विद्वानो ने अथ लिखे और सभी ने स्मिथ के इस प्राय का उपयोग किया। २ दि भी हिस्ट्री आफ इण्डिया ( १९०४ )-इस प्रथ में स्मिथ ने ६०० ई० पू० से मुस्लिम आक्रमण तक का इतिहास प्रस्तुत किया । यह भारतीय इतिहास से सम्बन्धित प्रथम प्राय था जिसमें अट्ठारह शताब्दियो का इतिहास एक साथ प्रस्तुत किया गया था। स्वय स्मिथ ने इस ग्रन्थ में लिखा है कि- • The first attempt to present a parrative of the leading events in Indian political history for eighteen centuries इस ग्रन्थ में स्मिथ ने एलफिस्टन द्वारा १८३९ में कही गयी बात को दुहराया ह, कि "भारतीय इतिहास में सिकदर के आक्रमण के पूर्व किसी सावजनिक घटना की तिथि निश्चित नही की जा सकती और न तो मुस्लिम विजय के पूर्व राष्ट्रीय कापवाहियो के क्रमबद्ध सम्बघ ढूढने का प्रयास हो किया जा सकता है।" इस ग्रन्थ में स्मिथ ने सिक दर की विजय को अत्यात महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है और ५०० पष्ठों के इस प्रथ में ७२ पठ उसके भारत पर आक्रमण के वर्णन को ही प्रदान किया है । कि तु स्मिथ ने इस प्रथ में भारतवष की आधारभूत एक्ता में पूर्ण विश्वास व्यक्त किया है। ३ द माक्सफोर्ड हिन्दी आफ इण्डिया ( १९१८)-इस प्रथ में प्रारम्भ से १९११ तक का इतिहास प्रस्तुत किया गया है। प्राचीन, मध्यकालीन एव आधुनिक इतिहास को एक माथ प्रस्तुत करने वाला यह प्रथम प्रथ था। इसमें 'द अर्ली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' की सामग्री को सशाधित रूप में प्रस्तुत किया गया है। ४ अध्यप्रन्य (क) कैटेलाग ऑफ द क्वाय स इन इण्डियन म्यूजियम ( १९०६ ) (ख) ए हिस्ट्री ऑफ फाइन आट इन इण्डिया एण्ड सिलोन ( १९११) (ग) अकबर द ग्रेट मुगल १५४२-१६०५ ( १९१७) विसेण्ट पर स्मिथ १५ ५ महत्त्वपूर्ण लेख (1) ग्रीको-रोमन इन्पटू एस आन द सिविल्जेिशन ऑफ शयेष्ट इण्डिया (ख) मवायनेज ऑफ ६ भीमार इम्पीरियल गुप्तान (ग) समुद्रगुप्त (घ) जैन शिप्स एण्ड अदर एण्टीपवीटीज झाम मथुरा ह) आधा हिस्ट्री एण्ड क्वायनेज (1) कुषाण और इण्डो सिथियन पीरिएड मॉफ इण्डियन हिस्ट्री छ)६ इण्डो-पापियन हायनेस्टीज (ज) हिस्ट्री ऑफ द सीटी ऑफ नौज एण्ड ऑफ किंग यशोवर्मा (4) ए नोट आन पिपरहवा स्तूप (अ) सल्पचर ऑफ सिलोन (2) द मोनोलिथिक पिलस और कॉलम्स ( Columns ) ऑफ अशोक आदि। ऐतिहासिक पद्धति एव मा यतायें स्मिथ के इतिहास सम्बधी विचार समकालीन इतिहास दाशनिको रके (१७९५-१८८६ ), मामसेन ( १८१७-१९०३), प्रोटे ( १७९४-१८७१) और बरी ( १८६१-१९२७ ) की धारणाओ से सम्बद्ध थे। इस प्रकार उनकी ऐतिहासिक पद्धति निश्चित रूप से आधुनिक थी। यद्यपि इतिहास लेखन का उनका क्षेत्र विस्तृत था तथापि उन्होने स्थाओं, परम्पराओ, मिथको आदि से हटकर मुख्यत प्राचीन भारत के यथार्थ इतिहास के निर्माण का प्रयास किया। घटनाओं को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में मा यता प्रदान करने के पूर्व उन्होंने उनका परीक्षण किया है। इतिहास सरचना में इतिहासकार की भूमिका के सम्बन्ध में वे अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'माक्सफोड हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' में कालिंगवुड की इस मा यता को स्वीकृति प्रदान करते है कि, 'इतिहासकार का कार्य न तो अतीत से प्रेम करना होता ह और न ही अतीत को अपने से मुक्त करना ही होता ह अपितु उसे वतमान को समझने के लिए अतीत को उसकी फुजी बनाना होता है।" स्मिथ ने न केवल ऐतिहासिक तथ्यो का संग्रह किया अपितु उनका विश्लेषण भी प्रस्तुत किया। उहोने प्राचीन भारतीय इतिहास का अध्ययन कर यह मायता व्यक्त की कि- (क) भारतीयों ने कोई राजनीतिक क्रान्ति नहीं की।

१६ प्राचीन भारत के आपनिक इतिहासकार (स) प्राचीन भारतीय गणतत्र महत्त्वहीन थे । वास्तव में भारत में समर द्वारा राजनीतिक गतिविधियो का संचालन कभी भी नहीं हुना। (ग) भारतवासी सदव आपस में झगड़ने वाले निरकुट मासन में अभ्यासी ह। प्राचीन भारतीय इतिहास सम्बन्धी स्मिथ को 3 मा यता उनके साम्राज्यवादी रष्टिकोण को व्यक्त करती है। डा० बी० के० मजमदार नै स्मिथ को ऐतिहासिक पद्धति और मा यतामो पर अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि- "As a historian he was a scientist and an artist rolled into one He was a true investigator and his chief merit 1: sobriety - qualities which are absolutely necessary for the bistorian who has to dig laboriously into the obscure past इस सम्बम में ए० एल० बैशम ने भी लिखा है कि- 'That Smith's attempt at ob jectively was such a lamentable failure and that te himselt was apparently unaware of the fact, throw much light on the character of the man himself") डा० बी० के० मज्मनार स्मिथ को उनीसवी शती के उत्तराद्ध में राज- नीतिक इतिहास लिखने वाले राजा राजे द्रलाल मित्र, आर. जी. भण्डारफर मौर रमशच द्र दत्त जसे भारतीय इतिहासकारो की श्रणी म रखते हैं जो उनके समकालीन पे। इसके पश्चात राजनातिक इतिहास प्रस्तुत करने वाले प्रायः सभी इतिहासकारो ने जिनमें सी० पी० वद्य, एच० सी० रायचौधरी एच. सी० रे, के० ए० नीलकण्ठ शास्त्री आदि प्रमुख है स्मिथ द्वारा प्रस्तुत इतिहास को नवीन तथ्यो एव दष्टिकोणो के साथ प्रस्तुत क्यिा । वस्तुत डा. बी. के. मजमदार न ठीक ही लिखा है कि, 'प्राचीन भारतीय इतिहास के किसी भी भाग पर काय करने वाले लोगो न स्मिथ के ऋण को अवश्य स्वीकार किया है चाहे किसी ने उनकी मायताओ का समथन क्यिा हो अथवा उनकी मा यताओं की आलोचना की हो।" इस प्रकार प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में बी. ए. स्मिथ का महत्व ह । डॉ० बी० के० मजूमदार ने उनके द्वारा भारतीय इतिहास को दिये गय यागतान का मूल्याकन करते हुए उन्हें 'आधुनिक भारत का एक स्याति- न घ इतिहासकार कहा ह जो समीचीन ह । किन्तु उनके मम्ब व में यह कहना कि उोंने अपने इतिहास लेखन के माध्यम से साम्राज्यवादी दष्टिकोण का पोषण किया अनुचित नहीं। पूर्ण योगदान अध्याय चार काशीप्रसाद जायसवाल (१८८१-१९३७) काशीप्रसाद जायसवाल का ज म १८८१ ई० में मानभूम (Manbhum) जिले के झाल्दा ( Jbalda ) नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता उत्तर- प्रदेश के मिर्जापुर जिले के एक बड़े व्यापारी थे। १९३७ ई० अपनी इहलीला समाप्त करने के पूर्व जायसवाल ने भारती विद्या की जो सेवा की उसपे सम्बघ में डॉ० बी० पी० सिनहा का कथन है कि--- "During a moderately short life of 57 years K P Jayaswal had carved for himself a respectable niche in the temple of Indological research" सम्पन परिवार में उत्पन्न होने के कारण जायसवाल के लिए शिक्षा ग्रहण बरने का उत्तम पवघ हुआ । मिर्जापुर के ल दन मिशन स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात उहोने आवसफोड से इतिहास विषय में एम० ए० की उपाधि प्राप्त की और वहीं से बार एट ला भी किया। १९०९ में भारत लौटकर उहोने पलवत्ता विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता क रूप में फाय करना चाहा किन्तु एक सच्चे देशभक्त के रूप में तत्कालीन राजनीति से निरपेशन रहने के रहने पे कारण सरकारी हस्तक्षेप से वे नियुक्ति प्राप्त करने में असफल रहे । सरकार ने उन्हें एक 'खतरनाक क्रातिकारी' ( Dangerous revolu tionist ) घोषित कर दिया था क्योकि यह मानती थी कि जब जायसवाल इग्लैण्ड में कानून का अध्ययन कर रहे थे, तब थे वहीं भारत में ब्रिटिश शासन का विरोध करनेवाले इण्डिया हाउस वे क्रासिकारियों के गग में सम्मिलित हो गपे थे। किन्तु वास्तव में यह पूर्णत सत्य नही या जैसा कि उनके सम्बध में सरकार ने समझा था। डॉ० वी० पी० सिनहा का क्यन है कि- 'He was a bright intell ctual anxious to serve the Goddess of learning and make researches to illuminate the dark corners of the country's ancient history " १८ प्राचीन भारत रे आपुनिए इतिहासकार भरपत्ता विश्वविद्यालय में नियनि । पाने पर जायमवाल ने १९११६० में वरारत के पेशे में रहने का निश्चय किया और पलता हाईकोट में एडवो पेट ये रूप में कार्य परने लगे। रितु यहाँ भी राजनीतिक रियारलापों से सम्पर यतापर सरकार द्वारा प्रताड़ित किये जाने से यि प्रिया बलापों के लिए मानसिक शाति अमाय ये पारण शीघ्र ही जायमपाल पटना आ गये और यहाँ के हाईकोट में पायरस हा गपे । यहां भी उन्हें शीघ्र पाति नहीं मिली। परन्तु म तत १९१४ ई० में सर चाल्स कीवलगड हस्त रेप से सरकार द्वारा जायसवाल ये प्रति उदार दष्टिकोण अपनाना स्वीकार किया गया और उहोंने भो स्वय पो सक्रिय राजनीति से पृथक रखने का निश्चय किया । इस दौरान उनके पेशे मोर देश के ऐतिहासिक अध्ययन को गम्भीर क्षति पहुंची। प्रमुख कृतित्व सक्रिय राजनीति से पृषक रहने पर राष्ट्रीय आदोलन को जो भी क्षति पहुची उसकी पूर्ति जायसवाल ने शक्षिर एव सांस्कृतिक जगत को समृद्ध कर की । उनके कृतित्व का सक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है- १ बिहार और उडीसा रिसच सोसाइटी की स्थापना-१९१४ ई० में जायसवाल ने बिहार और उडीसा ( अब फेवल बिहार ) रिसर्च सोसाइटी की स्थापना की जिसने प्राचीन भारतीय इतिहास और सस्कृति के अनुसघात में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी ह । 'जनल आफ दि बिहार एण्ड भोडीसा रिसच सोसाइटी नामक शोध पत्रिका का भी प्रारम्भ किया जिसका प्रथम प्रकाशन १९१५ ई० में हुआ। जायसवाल ने अनेक वर्षों तक न केवल इसका सम्पादन ही क्यिा अपितु अपने अधिकाश लेख भी इसी में प्रकाशित कराये । मृत्युपयन्त वे इस शोघ सस्थान के सचालक मण्डल के सदस्य रहे। २ पटना सग्रहालय की स्थापना-पटना संग्रहालय की स्थापना में जाय सवाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। प्रारम्भ में कुछ पुरावशेषो के साथ इसकी स्थापना गवनमेंट हाउस के एक कमर में हुई जो बाद में हाईकोट में स्थानात- रित हो गया। जायसवाल के कुशल निर्देशन एवं आग्रहयुक्त प्रयास से इस सग्रहालय को न केवल प्रसिद्धि मिली अपितु उसे स्वत व भ य भवन भी प्राप्त हो गया। आज यह सग्रहालय न केवल बिहार राज्य का प्रधान सग्रहालय है वरन् अत्यत समृद्ध भी है। जायसवाल इस सग्रहालय की प्रबंध समिति के सदस्य के साथ-साथ बाद में इसके अध्यक्ष भी रहे। १९२४ में जब बोध गया मागीप्रसाद जायसवाल बोट मन्दिर पार समिति का गठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और हि महासभा की मोर से लिया गया तम हॉ० राजेद्र प्रसाद के साथ जायसवाल भी इसको सदस्य थे। ३ ऐतिहासिक प्रतियो-भारती विद्या सम्वषो जायसवाल पे अनुमचान विविध है । १९१३ में उनका प्रथम रेख 'माहा रिव्यू' में 'ऐन इट्रोडकगन टू हिंदू पालिटी' नीपक से प्रभाशित हुमा । याद म इम पीपक के उन विभिन्न रेख १९२४ में हिन्दू पालिटी' नामक प्रप में सगृहीत पर प्रकागित हुए । १९११ से १९१३ के मध्य जायसवाल ने पत्ता वीकली नोटम' में प्राचीन हिंदू विधि से सम्बधित पुछ लस लिसे मिनकी प्रशसा देश विदेश के विद्वानो द्वारा हुई । इन लेखो के कारण ही १९१७ में परबत्ता विश्वविद्यालय ने उनको प्राचीन हिंदू विधि के विभि न पणा पर व्याख्यान दन हेतु आमन्त्रित रिया । जायसवाल ने इम निमित्त टैगोर ला रेवचस के अतगत मनु एण्ड पानवल्क्य' गोषक स १२ व्याख्यान दिये । यह १९१९ में प्रकाशित हुआ । कि तु जायसवाल ने अपने अध्ययन और मोघ का क्षेत्र सविधान एव विधि को ही नही रसा वरन् उहीन भारतीय इतिहास और सस्कृति के विस्तत क्षेत्र भी विभिन्न शाखाओं पर काय कर, जनल ऑफ दि बिहार रिसच सोसाइटी' में प्रकागित कराया। शगुनाग एण्ड मौयन क्रोनोलॉजी एण्ड दि डेट ऑफ दि युद्धाज निर्वाण , इम्पायर माफ वि दुसार' 'मोनोलॉजिकल समरी इन पुरानिक क्रोनिकल्स एण्ड किलि युग परा', दि वृहद्य क्रोनोलाजी १७२७ बी० सी०- ७२७ वी० सी०' रिवाइज्ड डेट ऑन दि ब्राह्मण इम्पायर', 'वेम कफिसेस एण्ड कुषाण क्रोनोलॉजी', 'क्ट्रीब्यूश स टु दि हिस्ट्री आफ मिथिला' 'ऑन दि रूल आफ पुष्यमित्र शुग', 'एक सातवाहन हिस्ट्री' विषय उनके लेख प्रमुख है। राजनीतिक इतिहास के क्षेत्र में जायसवाल का महत्वपूर्ण योगदान 'हिस्ट्री ऑफ इण्डिया १५० ए. डी. टू ३५० ए० डी०' है। भारतीय इतिहास में अधकार युग माने जानेवाल इस काल को उन्होंने नाग-वाकाटर युग से प्रकाशित किया । राजनीतिर इतिहास से सम्बधित उन अतिम लेख क्रोना- लाजी एण्ड हिस्ट्रो आफ ६०० बी० सी०-८८० ए० हो' और च द्रगुप्त II विक्रमादित्य एण्ड हिज प्रेससर' विषयक रहे । ४ अभिलेखो से सम्बधित काय-प्राचीन भारतीय अभिलेख के अध्ययन में जायसवाल का योगदान महत्त्वपूर्ण है । खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलख और अशोक के अभिलेखो पर उन्होंने कई महत्त्वपूण लेस रिसे। भुवनेश्वर मंदिर के . , २०. प्राचीन भारत के माधुनिक इतिहासकार मिसेसों, अयोध्या का शंग अभिलेस, समुद्रगुप्त का इलाहायाद अमिरेस, राजगीर का प्रतिमा ममिलेस आदि अमिलेगों का प्रध्ययन भी उन्होंने प्रस्तुत किया। ५. मुद्रातत्त्व सम्बन्धी कार्य-~मदातत्य के अध्ययन में भी जायसवाल का महत्वपूर्ण योगदान है । 'पुराण ययायन एण्ड दि डेट ऑफ मानव धर्मशास्त्र'; 'सिक्स यूनिक सिल्वर क्यायन्स ऑफ दि गुंग'; 'सम हिन्दू पवायन्स ऑफ प्री- क्रिश्चियन सेन्पुरीज'; 'न्यू स्वायन्स ऑफ दि नाग याकाटक पोरिएर'; 'न्य मिस्मेटिक नोटम आन सम हिन्दू पवायन्स ऑफ प्री क्रिश्चियन सेन्चुरीज' विषयक लेख मुदातत्य पर लिखे गये उनके महत्त्वपूर्ण लेख है। राजनीतिक इतिहास से सम्वन्धित अपने प्रमुख प्रन्य हिस्ट्री ऑफ इण्डिया १५० ए० डी० १ ३५० ए° डी' में भी उन्होंने गंगा घाटी को अनगिनत मुद्राओं का विवेचन किया है। जायसवाल ने कुछ आहत मुद्राओं ( Punch marked coins ) को मौयों से सम्बन्धित कर एक सर्वथा अभिनव मत का प्रतिपादन पिया जिसका तत्कालीन एशियाटिक सोसाइटी के विद्वानों द्वारा आलोचना की गयी। किन्तु माज यह मत मुद्रातत्त्व के प्रख्यात् विद्वानों जिनमें डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त आदि का नाम उल्लेखनीय है, द्वारा श्रद्धेय एवं मान्य किया गया है । ६. अप्रकाशित ग्रन्थों का सम्पादन-जायसवाल ने अनेक अप्रकाशित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को पाण्डुलिपियों का सम्पादन भी विद्वत्तापूर्ण व्याख्याओं सहित किया । 'चण्डेश्वर कृत राजनीतिरत्नाकर', 'कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर भट्टस्वामी को टीका' और 'गागी सहिता' उनके द्वारा सम्पादित प्रमुख ग्रन्थ है । किन्तु इस क्षेत्र में महापण्डित राहुल सांकृत्यायन के साथ 'मार्य मंजुश्री मूलकल्प' का सम्पादन उनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। उन्होंने लासन के 'हिस्ट्री भॉफ इण्डियन कामर्स' का अनुवाद भी प्रकाशित कराया। ७. अन्य कृतियो-अपने देशभक्तिपूर्ण ग्रन्थ 'हिन्दू पॉलिटी' से नायसवाल को प्रसिद्धि प्राप्त हुई। उन्होंने इस क्षेत्र में अपना अनुसंधान जारी रखते हुए 'न्यू लाइट ऑन हिन्दू पोलिटिकल साइन्स लिटरेचर' शीर्षक से लेख लिखा। उन्होने एतद्विषयक अपने एक अन्य लेख में यह मत प्रतिपादित किया था कि चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के एक मन्त्री शिखर ने राजशास्त्र पर एक पन्थ लिखा था। इनके अतिरिक्त जायसवाल ने 'ए हिन्दू टेक्स्ट वान पेंटिंग' और 'ए नोट ऑन सरटेन संस्कृत ज्याप्रैफिकल एण्ड इथिक टर्मस्' विषयक लेख भी लिखा।

काशीप्रसाद नापसूपात: ३१, इस प्रकार जायसवाल की कृतियां उनके प्राचीन भारतीयावहास और स्कृति सम्बन्धी विस्तृत अध्ययन एवं ज्ञान को सूचित करती है NOR तिहासिक शोष पद्धति एवं विचार पेशे से एवोकेट होने के कारण जायसवाल ने अपने इतिहास लेखन में भी क एडवोकेट की पद्धति को अपनाया है। इसमें वे पहले किसी समस्या को वयं एक प्रश्न के रूप में उठाते है और तदनन्तर एक चतुर एडवोकेट की भांति पने पक्ष में उसका समाधान समस्त सम्भावित सशक्त-असशक्त प्रमाणों द्वारा करते हैं। प्रायः जायसवाल अपनी समस्त कृतियों का प्रारम्म लम्बी ऐतिहासिक भूमिका के द्वारा करते है । इसके बाद क्रमशः अपने विषय के मुख्य भाग पर हुंध कर निष्कर्ष निकालते है । जायसवाल ने अपने इतिहास लेखप में तुलनात्मक पद्धति का भी प्रयोग किया है । इसी पद्धति का प्रयोग 'मनु एण्ड पाज्ञवल्क्य' के प्रथम व्याख्यान हिन्दू ला विफोर दि कोड ऑफ मनु' में कर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि याशवल्क्य स्मृति मनुस्मृति के बाद की है। जायसवाल ने अपनी कृतियों में कहीं भी अपने ऐतिहासिक दृष्टिकोण पर विचार नहीं किया है । किन्तु डॉ० बी० पी० सिनहा प्रभृति विद्वानों ने उनकी कृतियों का विस्तृत अध्ययन कर उन्हें राष्ट्रीय इतिहासकार ( Nationalist Historian ) कहा है । डॉ. सिनहा के अनुसार एक उत्कट राष्ट्रवादी के रूप में जायसवाल को राजनीतिक गतिविधियों और संगठनों के अतीत ( इतिहास ) के प्रति स्याभिमान था। इसे वह राष्ट्रीय धरोहर समझते थे। वे विदेशी शासन से घृणा करते थे जिसके कारण उन्होंने प्राचीन भारत के विदेशी शासनों की तीन निन्दा की। उन्होंने यह कभी भी स्वीकार नहीं किया कि कभी भी कोई विदेशी शासन किसी भी स्थिति में ग्राह्य हो सकता है। प्राचीन भारत के साम्राज्यवादी इतिहासकारों ( वी० ए० स्मिथ आदि) के मतों का खण्डन करते हुए जायसवाल ने अपने पाठकों को यह दिखाना चाहा कि भारत में किसी भी विदेशी शासन का कोई भी योगदान नहीं रहा है (हिस्ट्री ऑफ इण्डिया १५० ए. डी० टू ३५० ए० डी०)। जायसवाल के समय राष्ट्रीय जोश और मान्दोलन अपनी परम सीमा पर था। इसी समय पी० ए० स्मिथ जैसे अंग्रेज इतिहासकार भारत के सम्बन्ध में यह सिद्ध कर रहे थे कि वह सदैव से आपस में झगड़नेपाले वंशानुगत निरंकुश शासन से प्रशासित रहा है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पास आकर्षक विस्तृत चरित्र एवं संसदीय और प्रतिनिधित्व प्रणालीवाली सबसे अच्छी जनतान्त्रिक २२ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार संस्थाएं हैं । ऐसी धारणाओं का खण्डन करना भारत के बुद्धिजीवियों के लिए भावश्यक हो गया था। जायसवाल ने यह सिद्ध किया कि भारत में अत्यन्त प्राचीन काल से ही सफल गणतन्त्रों एवं सीमित राजतन्त्रों का अस्तित्व रहा है। उनके अनुसार भारत में गणराज्य कम से कम उत्तर वैदिक काल से ही अस्तित्व में रहे और वे निश्चित रूप से यूनानी गणराज्यों से अत्यन्त शक्तिशाली और बड़े (विस्तृत) थे। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में राजतन्त्र वैदिक काल से ही स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश नहीं वरन् सीमित एवं उत्तरदायी ये (हिन्दू पॉलिटी)। जायसवाल के उपर्युक्त ऐतिहासिक दृष्टिकोण की विस्तृत मीमांसा कर हॉ० वी० पी० सिनहा लिखते है कि-"If the British boasted of having their large empire and haviog brought the whole lodian subcontinent under one empire, there was the great Naga-Vakataka empire, succeeded by the greater Gupta empire which had its sway not only over very large parts of India but over the islands of the sea as well. Jayaswal's writings tend to show that we had, all and in good measure, what the British mas. ters claim to bave or to bestow. We had our large empires, successful and long-lived republics,........and a constitutionally limited monarchy." अपने समय के सन्दर्भ में जायसवाल की ऐतिहासिक कृतियां अत्यन्त महत्व- पूर्ण थी। उन्होंने इनके माध्यम से भारतीय स्रोतों द्वारा कार्य करनेवाले विद्वानों के लिए अत्यन्त व्यापक क्षेत्र तैयार कर दिया इसी कारण उनकी मुख्य कृति 'हिन्दू पॉलिटी' इस क्षेत्र के इतिहासकारों के लिए मार्गदर्शक ग्रन्थ (Pio. eering work ) माना जाता है । बाद के भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों द्वारा उनके द्वारा स्थापित सिद्धान्तों की मीमांसा एवं परीक्षण किया गया और कुछ निष्कर्ष निर्मूल सिद्ध किये गये अथवा संदेह की दृष्टि से देखे गये (यथा, पौर-जानाद सिद्धान्त, भारशिवों और वाकाटकों का सम्पूर्ण भारत का शासक होना आदि )। इसका कारण बताते हुए डॉ० बी० पी० सिन्हा लिखते है कि, "जायसवाल की मुख्य कमजोरी प्राचीन हिन्दुओं के राजनीतिक और संवैधानिक क्षेत्र में शानदार घरोहर के सम्बन्ध में अपने मनचाहे सिद्धान्तों को निर्मित करने में उनके अत्युल्लास और आधुनिक पूर्ण विकसित संवैधानिक विचारों एवं राजनीतिक संगठनों को प्राचीन भारत में सोजने में दृष्टिगत होठी उनके काशीप्रसाद जायसयाल : २२ है। इसके लिए वे प्रति वित भा परीक्षण किये ही दुर्वलतम प्रमाणों का प्रयोग बड़े निष्कर्षों की आधारशिला रखने के लिए करते हुए दिखाई देते है।" इन त्रुटियों के होते हुए भी काशीप्रसाद जायसवाल का ऐतिहासिक लेखन अपना अप्रतिम महत्व रखता है। प्राचीन भारतीय गणराज्यों का क्रमबद्ध अध्ययन सर्वप्रथम उन्होंने ही प्रस्तुत किया । राजा के राज्याभिषेक के संवैधानिक महत्व आदि पर भी सर्वप्रथम उन्हों ने विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया । वस्तृतः यहाँ यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि उन्होंने प्राचीन भारतीय संवैधानिक एवं राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन की आधारशिला रखी जिसका उपयोग बाद के इतिहासकारों द्वारा किया गया । राजनीतिक इतिहास के क्षेत्र में भी उनका योगदान उपेक्ष्य नहीं है । यद्यपि उत्तर भारत में नाग-वाकाटक साम्राज्य के अस्तित्व सम्बन्धी उनको मान्यता स्वीकृत नहीं हुई तथापि इस सम्बन्ध में उन्होंने अभिलेखों, साहित्य एवं मुद्राओं आदि का जो सर्वप्रथम विवेचन किया वह गुप्तों के उदय के पूर्व भारशिव नागों एवं अन्य नागों के इतिहास के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। वे वी० ए० स्मिथ जैसे इतिहासकारों के इस मत को खण्डित करने में सर्वथा सफल रहे कि कुषाणों एवं आन्नों ( सातवाहनों ) के बाद तथा गुणों के उदय के पूर्व का भारत का इतिहास अन्धकार युग ( One of the darkest in the whole range of Indian history ) है। इनके अतिरिक्त आयं मंजुश्री मूलकल्प को प्रकाश में लाने, नेपाल और मिपिला का इतिहास मये साक्ष्यों के आलोक में प्रस्तुत करने तथा अभिलेखों एवं मुद्राओं के क्षेत्र में किये गये उनके कार्यों की गणना मी उनके अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदानों में की जा सकती है । अन्ततः डॉ० बी० पी० सिनहा ने काशीप्रसाद जायसवाल का मूल्यांकन करते हुए ठीक ही लिखा है कि-"In the short span of twenty-five years of his scholarly activities K. P. Jayaswal has left usa large volume of original research material. Some may often wonder whether if he had waited a little more to evaluate his sources more critically, he could have bequeathed such varied and pioneering contributions. His was the original spade which removed the first earth from the then almost virgin soil, and in this he was naturally a more enthusiastic pioneer than a carcful meticulous researcher who waits long to examin:

२४ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार his sources by all canons of scholarly criticism, K.P. Jayaswal appears to be in a hurry to place his ideas, some of them very original and exciting, before the learned peoplc. As a clever advocate he was aoxious to stress upon the arguments for his brief, and was not acting as a judge who hears both sides and comes to his conclusions."

अध्याय : पाच .. रमेशचन्द्र मजूमदार ( १८८८-१९८०) साथ स्नातक भारत के इतिहास लेखन के इतिहास में रमेशचन्द्र मजूमदार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत के प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास में समान रूप से गहरी पैठ रखनेवाले कतिपय इतिहासकारों में वे एक है। उनका जन्म ४ दिसम्बर, १८८८ को फरीदपुर जिले (अब बंगला देश में ) के खण्डपारा नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता हलघर मजूमदार थे। छात्र जीवन में मजूमदार अत्यन्त मेघावी थे । कटक में इन्ट्रेन्स परीक्षा प्रपम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के पश्चात् इन्होंने प्रेसीडेन्सी कालेज, कलकत्ता से इतिहास विषय में मानर्स के परीक्षा उत्तीर्ण की। १९०९ में परास्नातक छात्रवृत्ति प्राम फर मजूमदार ने यहीं से १९११ में प्रथम श्रेणी में ही इतिहास विषय में एम० ए० किया । १९१२ में इन्हें 'आन्ध्र-कुषाण युग' विषयक लेख पर 'प्रेमचन्द रामचन्द छात्रवृत्ति' प्राम हुई। १९०३ में मजूमदार की नियुक्ति ढाका गवर्नमेन्ट ट्रेनिंग कालेज में प्रवक्ता के पद पर हो गयो किन्तु १९१४ में ही ये कलकत्ता विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में आ गये । यहीं उन्होंने अपना शोध-प्रबन्ध 'कारपोरेट लाइफ इन ऐंशियेण्ट इण्डिया' पी-एच० डी० उपाधि हेतु प्रस्तुत किया। इस पर उन्हें "ग्रिफिथ मेमोरियल पुरस्कार' भी प्राप्त हुआ। १९२१ में मजूमदार ढाका विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर बन कर चले गये। यहीं वे १९३७ में कुलपति ( Vice-chancellor ) बनाये गये और १९४२ में सेवा निवृत्त हुए । १९२८ में मजूमदार ने ग्रेट ब्रिटेन, हालण्ड, फ्रान्स, जर्मनी, इटली, और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को यात्राएं की। इन यात्राओं के दौरान ही उन्हें सर्वप्रथम सुमात्रा, अनाम, कम्बोडिया, स्याम, मलाया आदि देशों में प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रसार की जानकारी प्राप्त हुई थी। मित्र २६ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार १९५० में मजूमदार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के इण्डोलॉजी विभाग के प्रिंसिपल नियुक्त हुए। १९५३-५५ के बीच उन्होंने भारत सरकार द्वारा भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष के इतिहास लेखन के लिए बनायी गयी परियोजना का निर्देशन किया । १९५१ में उन्होंने २३३ इण्टरनेशनल कांग्रेस ऑफ मोरियन्ट- लिस्ट्स के इण्डोलॉजी प्रभाग की अध्यक्षता की। १९५५ में उनकी नियुक्ति नागपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग में प्रोफेसर के पद पर हुई जहाँ वे १९५५-५९ तक रहे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो और पैनसेल्वानिया विश्वविद्यालयों में भारतीय इतिहास के विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे । भारतीय विद्याभवन, बम्बई से भी वे सम्बद्ध रहे ! मजूमदार को उनकी योग्यताओं के कारण एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता; एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बाम्बे रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयरलैण्ड, लन्दन भण्डारकर रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना आदि संस्थानों की मानद सदस्यता भी प्राप्त हुई। १९६५ में संस्कृत कालेज, कलकत्ता ने उन्हें 'भारतत्वभाष्कर' की उपाधि से सम्मानित किया। १९६७ में कलकत्ता और जादवपुर विश्वविद्यालयों ने इन्हें डी० लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित किया। प्रमुख कृतियां जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि मजूमदार को भारतीय इतिहास के सभी कालों में गहरी पैठ थी । ऐसी स्थिति में उन्होंने विभिन्न कालों से सम्बन्धित ऐतिहासिक कृतियों की रचना की। उनकी मुख्य ऐतिहासिक कृतियाँ निम्न- लिखित हैं : १. कारपोरेट लाइफ इन ऐंशियेण्ट इण्डिया-प्राचीन भारतीय इतिहास से सम्बन्धित मजूमदार की यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कृति है । उन्होने इसकी रचना १९१८ में कलकत्ता विश्वविद्यालय की डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी उपाधि के लिए की थी। इसमें मजूमदार यह दावा करते है कि, "सभ्यता की वर्तमान अति- विकसित स्थिति में जो बात सबसे अधिक प्रभावोत्पादक रही है वह है सहकारिता की भावना ।..."संस्कृति के इस पक्ष में वर्तमान भारत बहुत पिछड़ा हुआ है, परन्तु" 'प्राचीन काल में परिस्थिति बिल्कुल भिन्न थी। सहकारिता की भावना प्राचीन भारत के प्रायः सभी क्षेत्रों में बहुत स्पष्ट रूप से विद्यमान थी और सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में ही नहीं, राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन में भी वह व्याप्त थी।" इस प्रन्य में मजमदार अपने इस दावे के निर्वाह में रमेशचन्द्र मजूमदार : २७ पूर्णतः सफल हुए हैं। अन्य की महत्ता को देखते हुए प्रोफेसर कृष्णदत्त बाज- पेयीजी ने 'प्राचीन भारत में संघटित जीवन' शीर्षक से इसको आधिकारिक दंग से हिन्दी में अनूदित किया है। २. ऐंशियेण्ट इण्डिया ३. दि वाकाटक गुरु एज (ए० एस० अल्टेकर के साथ ) -यह पुस्तक 'ए न्य हिस्ट्री ऑफ दि इण्डियन पीपुल' का छठा खण्ड है। अब यह पुस्तक- माला भारतीय इतिहास कांग्रेस द्वारा नियोजित १२ खण्डवाले इतिहास के साथ सम्मिलित कर दी गयी है। . ४.दि क्लासिकल अकाउन्ट्स ऑफ इण्डिया । ५. दि हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दि इण्डियन पीपुल-ए० डी० पुसलकर आदि के सहसम्पादकत्व में १० खण्डों में प्रकाशित भारत का विस्तृत इतिहास इस पुस्तक-माला में सम्मिलित है यह योजना भारतीय इतिहास समिति, बम्बई की है। ६. ऐंशियेण्ट इण्डियन कॉलोनीज इन दि फार ईस्ट ७. हिन्दू कॉलोनीज इन दि फार ईस्ट ८. ऐंशियेण्ट इण्डियन कॉलोनोज इन साउथ ईस्ट एशिया ९. इन्सक्रिप्सन्स ऑफ कम्बुज देश १०. हिस्ट्री ऑफ ऐंशियेण्ट बंगाल एण्ड ऑफ मेडिवल बंगाल ११. दि अरव इन्वेजन ऑफ इण्डिया १२. एक्सपेंशन ऑफ आर्यन कल्चर इन ईस्टर्न इण्डिया १३. हिस्ट्री ऑफ फोडम मूबमेन्ट इन इण्डिया १४. श्री फेसेज ऑफ इण्डियाज स्ट्रगल ऑफ फ्रीडम १५. दि रिवोल्ट ऑफ १८५७ १६. हिस्टोरियोग्राफी इन माडर्न इण्डिया ( उनके हेरास मेमोरियल लेक्चसं का संग्रह जिनमें उन्होंने अपनी इतिहास सम्बन्धी मान्यताओं को स्पष्ट किया है।) १७. 'इण्डियन हिस्टोरियोग्राफी : सम रीसेन्ट ट्रेन्ड्स' (इन्स्टीट्यूट ऑफ हिस्टारिकल स्टडीज, कलकत्ता द्वारा श्रीनगर में १९६८ में आयोजित वापिक सम्मेलन में दिया गया अध्यक्षीय भाषण) आदि ।

२८ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार शोध पद्धति एवं ऐतिहासिक विचार ए० डी० पुसलकर ने रमेशचन्द्र मजमदार को मार० जी० भण्डारकर, डो० आर० भण्डारकर, एच० सी० रायचौधरी आदि इतिहासकारों की श्रेणी में परिगणित किया है जिन्होंने कटु सत्य (Dry Truth ) तक को उजागर करने में हिचक नहीं दिखाया है। इन इतिहासकारों की ही भांति मजूमदार की भी ऐतिहासिक पद्धति वैज्ञानिक है। साक्ष्यों पर सूक्ष्म दृष्टि एवं उनके सापेक्षिक महत्व पर उन्होंने ध्यान दिया है । मजूमदार के 'हेरास मेमोरियल लेक्चर्स' तथा 'इण्डियन हिस्टोरियोग्राफी : सम रीसेन्ट ट्रेन्ड्स्' शीर्षक लेख से उनके ऐतिहासिक दृष्टिकोण एवं विचारों पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। इनमें से दूसरा इस दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने इतिहास के सम्बन्ध में कहा है कि, "इतिहास का सम्बन्ध सत्य के प्रति आन्तरिक जिज्ञासा है। यह इतिहास के अध्ययन का मौलिक आधार है।" इतिहास की उनकी यह अवधारणा आधुनिक इतिहास लेखन के दो महान दार्शनिकों-नेबूर और रांके के विचारों से प्रभावित है जिनके मतों को वे स्वयं उद्धृत करते हैं । मजूमदार इतिहास को दार्शनिक व्याख्या करते हुए कहते है कि, "सत्य, केवल सत्य और पूर्ण सत्य ही इतिहास का लौह-कवच होना चाहिए तथा इसी के आधार पर विभिन्न योजनाओं या प्रतिमानों के विन्यास निमित किये जा सकते हैं।" ( I take all this to mean that truth, nothing but the truth and the whole truth as far as it may, be ascertained, should form the steel-frame of history, on which you may build a structure according to different plans or patterns. ) इस दृष्टिकोण के पोषक प्राचीन भारत के एकमात्र इतिहास- कार कल्हण को अपना आदर्श मानते हुए इस दिशा में मजूमदार आधुनिक काल के महान इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार को पाते है और उनके द्वारा विभिन्न अवसरों पर व्यक्त किये गये इतिहास सम्बन्धी विचारों से सहमत होते हुए उन्हें उदत करते हैं । १९१५ में सर यदुनाथ सरकार ने कहा था कि, "मैं इस बात को चिन्ता नहीं करता कि सत्य प्रिय है या अप्रिय और आधुनिक घटनाचक्र से सामंजस्य रखता है या नहीं। मैं इस बात की भी जरा सी चिन्ता नहीं करता कि सत्य मेरे देश के यश के लिए आपात है या नहीं। यदि आवश्यकता हुई तो मै अपने मित्रों और समाज के उपहास एवं आक्षेप को सत्य का उपदेश देने के लिए धैर्यपूर्वक सहन करूंगा। लेकिन फिर भी मैं सत्य का अन्वेषण करूंगा, सत्य को समझूगा और प्रत्य को स्वीकार करूंगा। यही एक इतिहासकार का दृढ़ रमेशचन्द्र मजूमदार : २९ संकल्प होना चाहिए।" (I would not care whether truth is pleasant or uppleasant, and in consonance with or opposed to current views. I would not mind in the least whetber truth is or is not a biow to the glory of my country. If necessary, I shall bear a patience the ridicul and slander of friends and society for the sake of preaching truth. But still I shall seek truth, understand truth and accept truth. This. should be the firm resolve of a historian.) इसी प्रकार १९३७ में राष्ट्रीय इतिहास के सम्बन्ध में व्यक्त किये गये यदुनाथ सरकार के इस कथन से मजमदार सहमति व्यक्त करते है कि, "राष्ट्रीय इतिहास प्रत्येक अन्य इतिहास की भांति नाम की सार्थकता के साथ और सहज- शीलता के योग्य होते हुए, जहाँ तक तथ्यों का सम्बन्ध है सत्य होने चाहिए और उनको व्याख्या में ताकिक औचित्य होना चाहिए । इसका राष्ट्रीय होना इस बात में निहित नहीं है कि यह अपने देश के अतीत के ऐसे प्रत्येक तथ्य को जो अपशकर हो समाप्त कर डालने का प्रयास करे अपितु इस बात में निहित है कि यह उन्हें अंगीकार करे और उसी समय संकेत करे कि हमारे देश के उद्गम के अवसरों पर ऐमे दूसरे और अच्छे रूप रहे है जो पहले के रूपों को ढक कर यागे बढ़ जाते हैं।"""इस कार्य में एक इतिहासकार को अवश्य ही एक न्यायाधीश के रूप में होना चाहिए । उसे राष्ट्रीय चरित्र के किसी दोष को छिपाना नहीं चाहिए, बल्कि उसे अपने चित्रांकन में उन उच्चस्तरीय विशिष्टताओं को सम्मिलित करना चाहिए जो पूर्व तथ्यों के साथ मिलकर समग्र व्यक्तित्व के निर्माण में सहायता कर सके ।" (National history, like every other history worthy of the name and deserving to codure, must be true as regards the facts and reasonable in the interpretation of them. It will be pational pot in the sense that it will try to suppress or whitewash everything in our country's past that is disgracefull, but because it will admit them and at the same time point out that there were other and nobler aspects in the stage of our nation's evolution which offset the former........ In this task the Sistorian must be a judge. He will not suppress any defect ३०: प्राचीन भारत के माधुनिक इतिहासकार of the national character, but add to his portraiture thosc higher qualities wich, taken together with the former, help to constitute the entire individual. ) स्वतन्त्रता के पूर्व और पश्चात् के कई दशकों के इतिहाग लेखन को मजूम• दार ने देखा था। इस बात से दुःखित ये कि स्वतन्त्रता के बाद भी इतिहास लेसन उपर्युक्त आदशों से हटता जा रहा है तथा प्रशासन भी इतिहासकारों को पद और प्रतिष्ठा से आकर्षित कर रहा है। वे इसका उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहते है कि स्वतन्त्रता के बाद शामन द्वारा महात्मा गांधी के अहिंसा दर्शन पर आधारित इतिहास लेखन को प्रेरित किया जा रहा है। परन्तु हम भारतीय इतिहास में 'अश्वमेघ', 'दिग्विजय' और 'समरशतविजय' जैसे धार्मिक सिद्धान्तों से अनुमोदित युद्धों की कसे उपेक्षा कर सकते है। इतिहास के ऐसे अंशों को महात्मा गांधी के दर्शन के आधार पर कभी भी व्याख्यायित नहीं किया जा सकता । इस सम्बन्ध में आगे मजूमदार लिखते है- "The net result has been that the oft-quoted phrase this. tory is past politics' is likely to be substituted soon by a new phrase "history is present polítics'." एक लम्बे विवेचन के पश्चात् मजूमदार इतिहास सम्बन्धी अपनी अवधारणा को व्यक्त करते हुए लिखते है कि- .history divorced from truth, does not help a nation, its future should be laid on the stable foundations of truth and not on the quick sands of falsehood honever alluring it may appear at present." और अन्ततः मजमदार इतिहासकारों को सचेत करते लिखते हैं कि- "India is now at the cross-roads and I urge my young friends to choose carefully the path they would like to tread upon." इस प्रकार राष्ट्रीय और वस्तुनिष्ठा के अनन्य समर्थक ( जो स्वयं भी लिखते हैं कि, "I belong to the old school which regards objectivity as the soul of history......." ) रमेशचन्द्र मजूमदार का भारत के आधुनिक इतिहास लेखन के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। ।

अध्याय:छः आनन्द केंतिश कुमारस्वामी ( १८७७--१९४१ ) प्राचीन भारतीय कला के इतिहास लेखन में आनन्द कॅतिश कुमारस्वामी पथिकृत अग्रणी विचारक के रूप में स्थान रखते हैं। पूर्व एवं पश्चिम के फला- विषयक तुलनात्मक अध्ययन को गाम्भीर्य प्रदान करने का सर्वाधिक श्रेय भी उन्हीं को है । मंसार को उन्होंने भारतीय कला के अनिर्वचनीय सौन्दर्य का बोध कराया और भारतीय सांस्कृतिक निधि की गरिमा का उन्नयन किया। आनन्द केतिश कुमारस्वामी का जन्म कोलम्बो (श्रीलंका ) में १८७७ में हुआ था। इनके पिता श्री मुन्तुकुमारस्वामी भार- तीय मूल के तमिल और माता एलिजावेथ क्ले बीबी अंग्रेज थीं। जन्म के मात्र दो वर्ष बाद ही पिता की मृत्यु हो जाने पर उनकी मो उनको लेकर इंग्लण्ड चली गयौं । इंग्लण्ड में ही प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर कुमारस्वामी ने लन्दन विश्वविद्यालय से भूगर्भ विज्ञान और वनस्पति विज्ञान में वी० एस-सी० (आनर्स ) की डिग्री सन् १९०० में ली। बाद में उन्होंने यहीं से भूगर्भ विज्ञान में डी० एस-सी० को उपाधि भी प्राप्त की। इसी दौरान ( १९०३-१९०६) उन्होंने श्रीलंका में मिनरलॉजिकल सय के डाइरेक्टर के रूप में भी कार्य किया । इस प्रकार आनन्द कुमारस्वामी ने एक भूगर्भशास्त्री के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ किया। इसके बाद वे राज. नौतिक सुधारक बने, तत्पश्चात् कला के इतिहासकार और अन्ततः कला में 'शाश्वत दर्शन' (फिलोसोफिया पेरेमिस ) के व्याख्याकार हो गये। श्रीलंका सरकार की नौकरी करते हुए आनन्द कुमारस्वामी ने उस दीप की सांस्कृतिक एवं सामाजिक सेवा भी की। १९०६ में मानन्द कुमारस्वामी एक अवकाश में भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष मोर कला सम्बन्धी संस्थानों का निरीक्षण

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आनन्द तिश कुमारस्वामी : ३३ १. हिस्ट्री ऑफ इण्डियन एण्ड इन्डोनेशियन आर्ट-कुमारस्वामी ने इस ग्रन्थ की रचना १९२० में घोस्टन से पूर्वी देशों-जापान, इण्डोनेशिया, कम्बो. डिया आदि का व्यक्तिगत रूप से भ्रमण कर की थी। इन देशों के भ्रमण से उनको यह अनुभव हुआ था कि इन देशों की कलाओं के विकास में भारतीय कला-पादों का बहुत अधिक प्रभाव रहा है। यह अन्य १९२७ में लन्दन से प्रकाशित हुआ। भारत और इण्डोनेशिया को कला के इतिहास में यह अन्य अत्यन्त प्रामाणिक एवं महत्त्वपूर्ण समझा जाता है । २. डान्स ऑफ शिव-कुमारस्वामी ने अपने कला सम्बन्धी १४ निवन्धों का संग्रह इस शीर्षक के अन्तर्गत १९२४ में लन्दन से प्रकाशित कराया था। इनमें उन्होंने न केवल शिव के ताण्डव नृत्य का प्रदर्शन ही किया है अथवा नटराज की मूर्ति का वर्णन या उसके लक्षण दिये है वरन् उन्होंने चित्रकला, मूर्तिकला आदि सम्बन्धी विभिन्न विवेचन भी प्रस्तुत किया है जो भारतीय कला को समझने के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इस ग्रन्थ के आमुख में रोम्या रोली ने लिखा है कि, "आनन्द कुमारस्वामी रवीन्द्रनाथ ठाकुर के समान उन प्रमुख भारतीयों में से एक है जो पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता से पूर्णतया अवगत है पर जिनको एशियाई तथा भारतीय सम्यता पर गौरव है। उन्होंने इस बात का बीड़ा उठाया है कि वह पाश्चात्य और पूर्वी विचारधारा का समन्वय कर पाश्चात्य और पूर्वी विचारों का प्रादुर्भाव करें, जिससे संसार की मानव जाति का कल्याण हो ।...""मानन्द कुमारस्वामी की इस पुस्तक 'डान्स ऑफ शिव' का ध्येय है-आत्मा की महानता बताना और भारतवर्ष की निधि विचारधारा की महानता बताना जी वहां अब तक सुरक्षित है और जिस निधि से सारे संसार का कल्याण हो सकता है, उसको संसार के सामने रखा।" ३. ट्रान्सफार्मेशन ऑफ नेचर इन इण्डियन आर्ट-यह ग्रन्थ आनन्द कुमारस्वामी द्वारा हा विश्वविद्यालय ( अमेरिका ) में समय-समय पर दिये गये व्याख्यानों का मंग्रह है जिन्हें इसी विश्वविद्यालय ने १९३६ में प्रकाशित कराया था । इनमें आनन्द कुमारस्वामी ने भारतीय कला सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण विचारों को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया है। भारतीय कला सिद्धान्तों से मिलने पाले जर्मन विद्वान् एकार्ट के चित्रकला सम्बन्धी विचार, भारतीय चित्रकला का विवेचन, शुक्रनीति के कला सम्बन्धी सिद्धान्त, भारत में मूर्तिकला की उत्पत्ति और कला के स्रोत का इतिहास इसके मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। कुमारस्वामी की यह कृति तुलनात्मक सौन्दर्यशास्त्र के अध्ययन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । इसमें उन्होंने पाश्चात्य कला-सिद्धान्तों के साथ भारतीय, चीनी और ३४ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार जापानी कला-सिद्धान्तों की समानताओं और असमानताओं का निर्देश करते हुए कला विषयक सार्वभौम चिन्तन-पद्धति की रूपरेखा प्रस्तुत की है । पुस्तक के प्रारम्भ में ही उन्होंने लिखा भी है कि, "पूर्वी और पश्चिमी दृष्टिकोणों को परस्पर सम्बद्ध करते हुए कला-विषयक एक सामान्य सिद्धान्त के लिए आधार प्रस्तुत किया जा रहा है।" उक्त ग्रन्यों के अतिरिक्त आनन्द कुमारस्वामी के निम्नलिखित ग्रन्थ भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है- १. मिरर ऑफ जेस्चर २. एलिमेन्टस् ऑफ बुद्धिस्ट आइकोनोग्राफी ३. फोगर्स ऑफ स्पीच और फीगर्स ऑफ थाट ४. दि लिविंग थाट्स ऑफ गौतम दि बुद्धा ५. बुद्धा एण्ड गोस्पल ऑफ बुद्धिज्म ६. मिथ्स् ऑफ दि हिन्दूज एण्ड बुद्धिस्ट्स ७. बंगाल स्कूल ऑफ पेंटिंग ८. रिफ्लेक्शन ऑफ इण्डियन एण्ड प्लेटोनिक ट्रेसमाईट ९. रिलिजियस बेसिस ऑफ इण्डियन मोसाइटी १०. कृष्ण एण्ड ओरियन्टल फिलॉसफी ऑफ आर्ट ११. दि एम ऑफ इण्डियन आर्ट १२. इण्डियन ड्राइंग्स १३. आर्ट एण्ड स्वदेशी १४. राजपूत पेटिंग १५. दि हिन्दू न्यू ऑफ आर्ट १६. कैटेलोंग ऑफ इण्डियन आर्ट १७. यक्षा १८. ए न्यू अप्रोच टू दि वेदाज १९. एशियाटिक आर्ट २०.दि मेसेज ऑफ दि ईस्ट शोध पद्धति एवं ऐतिहासिक विचार कुमारस्वामी की शोध पद्धति एवं ऐतिहासिक विचारों पर समुचित प्रकाश डाल पाना अत्यन्त कठिन है । वस्तुतः इसके लिए एक स्वतन्त्र शोध-प्रबन्ध और सम्भवतः इससे भी कुछ अधिक की आवश्यकता होगी। इसका कारण आनन्द कैतिश कुमारस्वामी एरिक गिल द्वारा उनकी ७०यौं वर्षगांठ पर उनके प्रति कहे ग इस कपन स्पष्ट होता है कि, "औरों ने भी साहित्य, जीवन, धर्म और लक्ष्य के कार्यों के विषय में लिखा है; मोरों ने भी शुद्ध और बहुत अच्छी अंग्रेजी में लिखा है; मोरों ने भी सुचारू रूप से अंग्रेजी में भाव व्यक्त किये है; औरों ने क्रिश्चियनिटी, हिन्दू धर्म और बौद्धधर्म की व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं, औरों ने भी चित्रकला, मूर्तिकला और सौन्दर्यशास्त्र पर लिखा है, औरों ने भी अच्छी और बुरो कला फे भेद पर प्रकाश डाला है; औरों का भी ज्ञान भण्डार बहुत बड़ा है; औरों ने भी प्रेम किया है और लोग भी दयालु और उदार हुए है, किन्तु मैने ऐसा कोई मनुष्य नहीं देखा जिस एक व्यक्ति में उपर्युक्त सभी गुण, प्रतिमाएं और पक्तियां एक साथ मौजूद हों।"""मैं यह पुरजोर शब्दों में कहता हूँ कि आनन्द कुमारस्वामी के सिवाय और किसी दूसरे व्यक्ति ने सत्य (इ.य), कला (आर्ट ), जीवन ( लाइफ), धर्म (रिलीजन ), पामिक आचरण (पाइटी) के विषय में इतना गढ ज्ञान और इतनी समझदारी के साप व्यक्त नहीं किया है।" फिर भी जानन्द कुमारस्वामी को शोष पद्धति पर एक सतही दृष्टि एवं उनके कतिपय महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक विचारों का परिगणन किया जा सकता है। उनकी ऐतिहासिक पद्धति के सम्बन्ध में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही लिखा है कि, "आनन्द कुमारस्वामी की बड़ी भारी विशेषता यह है कि वह आलोच्य विषय के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ उसकी निर्माण प्रक्रिया की गहराई में जाते है । वह उस तत्त्व दर्शन और श्रद्धामक्ति को नहीं भुलाते जो ऐसी अपूर्व कृतियों के निर्माण के मुख्य प्रेरणा स्रोत है। हिन्दू और वौद्ध शास्त्रों का उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया था और यह अध्ययन तटस्थ आलोचक का अध्ययन नहीं था। उनमें विचार और रचना प्रदान करने वालों के साथ आन्तरिक सहानुभूति और विश्वास था। भारतीय कला को उन्होंने विश्व में उसकी महिमा के साथ उजागर किया । अद्भुत सूक्ष्म दृष्टि के साथ ही गहरी आध्यात्मिक चेतना ने उन्हें कला का अप्रतिम साधक बना दिया था।" जैसा कि पहले संकेत किया गया है कि आनन्द कुमारस्वामी के ऐतिहासिक विचारों पर समुचित प्रकाश डाल पाना कठिन है किन्तु उनके कतिपय महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक विचारों का संकेत किया जा सकता है। यहां उनके एक शिष्य मुकन्दौलाल के इस कथन को सदैव ध्यान में रखना पड़ेगा कि, "आनन्द कुमारस्वामी ने जितनी पुस्तकें लिखीं और व्याख्यान दिये उनकी आधारशिला उनका स्वदेश प्रेम और राष्ट्रीय विचारधारा थी।"

३६ : प्राचीन भारत के मानिक इतिहासकार आनन्द कुमारस्वामी जर्मन फला दानिफ एकाट को पला परिमापा को स्वीकार करते हुए लिगते है कि-"कला (पित्र) पिसी यस्तु या विषय का गुण निर्देश, व्याख्या, तात्पर्य और सारांग है। यह चित्र यथावत, लाक्षणिक अथया दृष्टांत या रूपक और रहस्यारमक है ।" कुमारस्वामी का यह भी मानना है कि-"कला की कई यिपियो और लिया है किन्तु कला सार्वभौम पाणी है । लिया तो कलाकार को अभियान का माध्यम मात्र है।" एक स्थल पर उन्होंने यह भी लिखा है कि-"इम जगत् में केवल एक ही पुराण विज्ञान, एक ही प्रतिमा विशान तथा एक ही सत्य है जो अपोस्पेय बुद्धि द्वारा अज्ञात फाल से हस्तानन्तरित होता आया है।" "There is only one mythology, onc Iconography and opc truth, that of an uncreated wisdom that has been banded down from time immemorial.) आनन्द कुमारस्वामी के अनुसार भारतीय कला परम्परागत धर्म सम्बन्धी है और वह शिल्पाचार्यों द्वारा बनाये गये नियमों पर आधारित है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार उसका सृजन होता है। किन्तु इसके साथ ही कुमारस्वामी कला में नवीन विघारपारा और परिवर्तित परिवेश को महत्त्व प्रदान करते हैं । कुमारस्वामी के अनुसार, "एशियाई विचारों को बिना विकृत किये योरोपीय शब्दावली में प्रस्तुत करना कठिन है।" यही कारण है कि उन्होंने तुलना के उत्साह मे एशियाई कला संकल्पनाओं को विकृत करने की अपेक्षा बौद्धिक ईमानदारी के साथ एशियाई और प्रासंगिक योरोपीय विचारों को इस . प्रकार साथ-साथ रखा है कि वे कुतूहलपूर्ण मात्र प्रतीत न हों। इस प्रयास में दृष्टि वास्तविक तथ्यों पर हो रही है । तर्को का वितंडा खड़ा कर किसी मठ को साग्रह स्थापित करन की प्रवृत्ति से उन्होने सदैव बचने का प्रयास किया है । वे स्पष्टतः इस बात में विश्वास करते हैं कि-'सचेतसा अनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम् ।' संस्कृत अलंकारशास्त्र को व्यापकता पर विचार करते हुए आनन्द कुमार स्वामी ने यह महत्त्वपूर्ण धारणा व्यक्त की है कि अलंकार सिद्धान्त मुख्यतः काव्य, नाटक, नृत्य और संगीत के प्रसंग में निरूपित होते हुए भी समस्त कलाओं के लिए उपयुक्त सिद्ध हुआ । इसका कारण बताते हुए वे लिखते है कि इसकी पारिभाषिक शब्दावली का अधिकांश रंग विषयक अवधारणाओं से युक्त है और इस बात के पर्याप्त प्रमाण है कि अलंकार सिद्धान्त वस्तुतः चित्रकला पर लागू होता है।

आनन्द फैतिश कुमारस्वामी : ३७ रस और ध्वनि के मूल आधार को स्पष्ट करते हुए आनन्द कुमारस्वामी ने यह मान्यता व्यक्त की है कि ये दोनों सिद्धान्त मूलतः आध्यात्मिक हैं और अपनी पद्धति और निष्कर्ष में वेदान्ती है, यद्यपि उन दोनों सिद्धान्तों को शुद्ध वेदान्त को अपेक्षा परवती वेदान्त एवं योग की भाषा में व्यक्त किया गया है । परवर्ती विचारकों ने यह संकेत किया है कि कुमारस्वामी की सौन्दर्य दृष्टि पर अध्यात्म का गहरा रंग था। इसीलिए उन्हें भारतीय कला सिद्धान्तों में प्रायः आध्यात्मरंजित तथ्य ही दृष्टिगत हुए। यहाँ तक कि तत्कालीन बौद्धिक वातावरण के अनुकूल पाश्चात्य अध्येताओं की रुचि को तुष्ट करने के लिए उन्होंने प्राच्य कला को पूर्णतः आध्यात्मिक व्याख्या को। इसीलिए उन्होंने प्राच्य कला शास्त्र की तुलना के लिए योरोप से ईसाई कला-सिद्धान्तों एवं शास्त्रवादी (स्कालेस्टिक ) सम्प्रदाय के कला-चिन्तन को प्रस्तुत किया। सम्भवतः उनको धारणा थी कि दोनों में समानता का आधार धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति है। इसीलिए उन्होंने पुनर्जागरण की तर्कनिष्ठ ऐहिक और मानववादी परम्परा के आधार पर विकसित आधुनिक सौन्दर्य सिद्धान्तों को प्राच्य कला शास्त्र के साथ तुलनीय नहीं माना और उनके साथ समानता के किसी आधार को ढूंढने का प्रयास नहीं किया । इस विषय में यदि अपवादस्वरूप कोई तथ्य है तो भारतीय साधारणीकरण की तुलना में प्रस्तुत योरोपीय समानु- भूति ( एम्पेथी ) सिद्धान्त है। आनन्द कुमारस्वामी ने रसानुभूति की व्याख्या भी अध्यात्मप्रधान हो की है । इसी कारण यह आकस्मिक नहीं है कि रसानुभूति के स्वरूप की व्याख्या करने के लिए उन्होंने मुख्य आधार के रूप में अभिनव गुप्त को स्वीकार न करके साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ को ही चुना है, जिनका रस विवेचन अपेक्षाकृत अध्यात्मोन्मुख है। आनन्द कुमारस्वामी ने एशियाई कला सम्बन्धी अपने गहन परिचय के आधार पर अध्येताओं के सम्मुख यह भली-भांति प्रमाणित कर दिया है कि पूर्वी देशों में भी चीन और जापान की अपेक्षा भारत में सौन्दर्यशास्त्रीय समस्याओं का व्यवस्थित चिन्तन अत्यधिक विकसित था। इनके अतिरिक्त कुमारस्वामी के कुछ अन्य प्रमुख ऐतिहासिक विचार निम्न• लिखित है- १. प्राचीन भारतीय ऋषियों के समान ही आनन्द कुमारस्वामी तिथियों को निर्धारण को महत्वहीन समझते है। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है कि, २८. प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार "तिथियों के निर्धारण में क्या रखा है कि कब कौन पैदा हुआ । देखना तो यह है कि अमुक व्यक्ति या अवतार ने क्या किया, उसके विचार क्या थे, धर्म क्या था और मानव समाज के लिए उसने क्या किया।" २. आनन्द कुमारस्वामी उन इतिहासकारों के इस विचार से सहमत है कि मिथकों एवं सच्ची कथाओं में कोई विरोधी नहीं है । उदाहरणार्थ, उनके अनुसार महाभारत की कथा केवल दो चचेरे भाईयों के बीच के युद्ध मात्र की कथा नही है । वास्तव में उसमें वैदिक और पौराणिक कथाओं का संकलन है । ३. कला सम्बन्धी अपनी धारणा के अनुरूप ही कुमारस्वामी कला इतिहास- कारों के सीमित कर्तव्य बताते हैं। उनका कथन है कि, "कला निरीक्षक और कला इतिहासकारों का कर्तव्य साधारण है । उनका काम अपनी योग्यता दिखाना नहीं है अपितु उनका कर्तव्य है कि कलाकार की सेवा अच्छी तरह से करें। उनका कर्तव्य कला उपासकों की कला समझने में सहायता करना है।" इस प्रकार भारतीय इतिहास विशेषतः भारतीय कला इतिहास को आनन्द कुमारस्वामी की देन अप्रतिम है। श्रीयुत् श्रीप्रकाश के अनुसार, "आनन्द कुमारस्वामी उन महान भारतीयों में से थे, जिन्होंने हमारे इतिहास के एक अन्धकारपूर्ण युग में प्रकट होकर सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में अपने ऐश्वर्य- शाली अतीत का गौरव पहचानने और उस पर गर्व करने का अवसर प्रदान किया जिससे कि हम अपने अतीत के कीर्तिमानों के आधार पर वैसे ही उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकें।" डॉ. रिचर्ड एटिंघसन का कथन है कि, "आनन्द कुमारस्वामी के...""समान विभिन्न विषयों पर इतने प्रकाशन संसार भर में और किसी एक व्यक्ति के नहीं है । उनकी खोज और अध्ययन दर्शन शास्त्र, अध्यात्म विद्या, धर्म, प्रतिमा विज्ञान, भारतीय साहित्य, भारतीय कला, इस्लामी कला, मध्यकालीन कला, गन्धर्व विद्या, भू-विज्ञान और विशेषकर समाज में कला का स्थान आदि विषयों पर है"..."" बड़ौदा संग्रहालय के क्यूरेटर डॉ. मोयट्स ने उनके विषय में लिखा है कि, "आनन्द कुमारस्वामी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने एशिया की कला और संस्कृति की ओर संसार का ध्यान दिलाया और बताया कि मनुष्य का सांस्कृतिक जीवन आदिम काल से कैसे परिपक्व हुआ और एशिया की कला एवं संस्कृति पाश्चात्य देशों को कला एवं संस्कृति से कम नहीं है"""" हैवेल का कथन है कि, "आनन्द कुमारस्वामी ने इस अपरिष्कृत भौतिकतावादी सभ्यता के युग में भारतीय कला-आदशों और विज्ञान की व्याख्या करने में और भारतीय कला के आध्यात्मिक रूप को प्रस्तुत करने में सबसे आनन्द तिश कुमारस्वामी । ३९ . . अधिक भाग लिया है ।" कैप्टन इयूलविक का विचार है कि, "आनन्द कुमार स्वामी के द्वारा प्राचीन भारतवासियों के पूर्वजों के कला आदर्शों तथा उनकी चित्रकला और मूर्तिकला उनके बुद्धि विकास और आध्यात्मिक भावों का प्रकटी- करण हुआ है । उन्होंने प्राचीन भारतीय मान्यताओं को पुनर्स्थापित किया है कि किसी भी राष्ट्र के निर्माता व्यवसायी और राजनीतिज्ञ नहीं अपितु कलाकार और कवि होते हैं ।" सापूर्जी सोरावजी ने लिखा है लिखा है कि, "आनन्द कुमारस्वामी ने भारतीय संस्कृति को प्राचीन काल को वंशानुगत परम्परा से जोड़ा है ।" अलबर्ट ग्लाइज का कथन है कि, "पूर्वी सभ्यता और खासकर हिन्दू विचार के प्रचार में कुमारस्वामी की बहुत बड़ी देन है।" आनन्द कुमारस्वामी के भारतीय कला सम्बन्धी निरीक्षण, संशोधन, अनु. संधान और परिश्रम का फल यह हुआ कि भारत में कला के प्रति नवोन अमि- रुचि और कला आदर्शों के पोषण का नवयुग प्रारम्भ हुमा । तुलनात्मक सौन्दर्य- शास्त्र के क्षेत्र में उनका ऐतिहासिक महत्त्व असदिग्घ है। सर विलियम रोथेन्स टाइन ने लिखा है कि, "आज भारत को प्रथम श्रेणी की कलात्मक शक्ति के रूप में जो स्थान प्राप्त है उसका बहुत कुछ श्रेय आनन्द कुमारस्वामी को है।" तुलनात्मक सौन्दर्यशास्त्र के लिए आनन्द कुमारस्वामी के निबन्ध कितने प्रेरणा- दायी रहे इसका प्रमाण टामस मुनरो का यह कथन है कि इस शताब्दी के तीसरे दशक में जब उसने भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का व्यवस्थित अध्ययन प्रारम्भ किया वो आनन्द कुमारस्वामी के निबन्ध ही उसके मुख्य मार्गदर्शक बने । उसने लिखा है कि, "...""जब भी वे भारतीय कला और उसके मूल में निहित विचारों के सम्बन्ध में लिखते थे तो मुझे एक गहन अध्ययन से युक्त विद्वान और फलामर्मज्ञ के अधिकार का अनुभव होता था। भारतीय कला सम्बन्धी उनका शान दीर्घ और प्रत्यक्ष अनुभव तथा तीक्ष्ण पर्यवेक्षण पर आधारित था ......." मानन्द कुमारस्वामी के कला सम्बन्धी अध्ययन का परिणाम यह हुआ कि इंग्लैण्ड में भारत सचिव लार्ड बरकन हेड (इण्डियन सोसाइटी, लन्दन, १९१०) जैसे व्यक्ति को यह स्वीकार करना पड़ा कि, "भारतीय कला संसार में सर्वाधिक समृद्ध है । भारतीय कला के समान सौन्दर्य, उदात्त भाव और विपुलता प्राचीन फाल से अब तक अन्य किसी देश की कला में नहीं पायी जाती।" अन्ततः उनके शिष्य मुकन्दीलाल का यह कथन सर्वथा समीचीन है कि, "वास्तव में आनन्द कुमारस्वामी भारतीय कला, संस्कृति और बादशों के प्रनार के लिए इस संसार में पधारे थे।" कर दामोदर धर्मानन्द कोसम्वी ( १९०७-१९६६ ) अध्याय: सात प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकारों में दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी का एक विशिष्ट स्थान है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्राचीन भारत सम्बन्धी हमारी सैद्धान्तिक समझ को प्रभूत सामग्री प्रदान की है और ऐतिहासिक अनुसंधान को नये आयाम प्रदान किये हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन को एक नवीन दिशा प्रदान करने वाले दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी का जन्म सन् १९०७ में गोवा के एक ऐसे परिवार में हुआ था जो ज्ञान और सामाजिक व्यवहार के ऊंचे प्रतिमानों के लिए विख्यात था। उनके पिता धर्मानन्द कोसम्बी सुप्रसिद्ध बौद्ध विद्वान थे, जिनसे उन्हें धुमक्कड़ी मनोवृत्ति के साथ- साथ विलक्षण मेधा भी विरासत में प्राप्त हुई थी। इनकी प्रार- म्भिक शिक्षा भारत मे हुई, लेकिन उन्हीं दिनों १९१८ में उनके पिता ने संयुक्त राज्य अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य स्वीकार कर लिया और इसलिए उनकी आगे की शिक्षा कैम्ब्रिज लैटिनस्कूल में हुई। हार्वर्ड विश्वविद्यालय से इन्होंने गणित, इतिहास और भाषाओं में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। १९२० में भारत लौटने पर उन्होंने कुछ समय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में और तत्पश्चात् अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कार्य किया। १९३२ में उनकी नियुक्ति गणित के प्रोफेसर के रूप में फर्ग्युसन कालेज, पुना में हुई जहाँ उन्होंने चौदह वर्षों तक कार्य किया। यही वह काल था जब उन्होंने ज्ञान के दामोवर धर्मानन्द कौसम्बी : ४१ विविध क्षेत्रों (गणित, सास्पिको, आनुवंशिको, मुद्रातत्त्व, मार्क्सवादी विचार एवं सिद्धान्त, सामाजिक प्राधिक इतिहास, बौद्ध संस्कृति, संस्कृत साहित्य की परम्परा, भारतविद्या सम्बन्धो सामान्य अध्ययन, मानवशास्त्र, पुरातत्व और प्रागितिहास आदि ) में अधिकार प्राप्त करने को अनवरत साधना के साथ एक चितक और विद्वान के रूप में अपनी महानता की आधारशिला रखी। १९४७ में वे टाटा इन्स्टीट्यूट भारु फन्डामेंटल रिसर्च, बम्बई द्वारा गणित के अधिकारी (Chair for Mathematics ) पद पर आये जहाँ उन्होंने बाद के सोलह वर्ष व्यतीत किये । विश्व शान्ति समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने पूर्व और पश्चिम के साम्यवादी देशों का भ्रमण भी किया। आधुनिक भारत की यह जाज्ज्वल्यमान मेया २९ जून, १९६६ को कीतिशेष हो गयी। कोसम्धी की प्रमुख कृतिया जैसा कि कार कहा गया है कि कोसम्वी ने विभिन्न विषयों में दक्षता प्राप्त की थी। तदनुरूप उन्होंने विभिन्न विषयों से सम्बन्धित कृतियों का प्रणयन किया। कुल मिलाकर उन्होंने ४ प्रन्यों, ५ सम्पादित अन्यों और १२७ लेखों की रचना की। उनको कृठियों का विस्तृत विवरण वो० वी० गोखले ने 'इण्डियन सोसाइटी : हिस्टॉरिकल प्रॉविग्स ( इन मेमोरी ऑफ डो० डी० कोसम्बी)' नामक ग्रन्थ में 'दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी' शीपंक अपने लेख में दिया है । किन्तु इतिहास सम्बन्धी उनको प्रमुख कृतियो निम्नलिखित है- (क) प्रमुख ग्रन्य १. 'ऐन इन्द्रोडक्शन टू दि स्टडी ऑफ इण्डियन हिस्ट्री' (१९५६ )- कोसम्बो का यह प्रथम प्रमुख अन्य है । इसमें उन्होंने भारतीय इतिहास सम्बन्धी अपने दृष्टिकोणों को स्पष्ट किया है। इस अन्य के सम्बन्ध में ए० एल० वैशम का कथन है कि-"His 'An Introduction to the Study of Indian History' is in many respects an epoch-making work, containing brilliantly original ideas on almost every page: if it contains errors and mis.nterpretations here and there, if now and again its author attempts to force his data joto a rather doctrinaire pattera, this do:s not appreciably lessen the sigai. ficance of this very exciting book, which has stimulated the thought of thousands of students throughout the world." २. 'दि कल्चर एण्ड सिविलिजेशन ऑफ ऍशियेण्ट इण्डिया इन हिस्टॉरिकल आउटलाइन' ( १९६५ /-कोसम्धी का यह अन्तिम महत्वपूर्ण प्रत्य है। इसमें ४२: प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार उन्होंने भारतीय इतिहास की विभिन्न परम्पराओं के विकास का विवेचन किया है । इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में वी वी० गोखले ने लिखा है कि-......", set the seal of recognition on his vast en dition, bis atilliy to discover basic motives of buman civilization and his brilliant powers of exposition." ३. 'एक्सआसप्रेटिंग एसेज : एक्सरसाइज इन दि डाइएलेक्टिकल मेथड' (१९५७)। ४. 'मिथ एण्ड रीयलिटी : स्टडीज इन दि फार्मेशन ऑफ इण्डियन कल्चर' ( १९६२ )। (ख) प्रमुख सम्पादित ग्रन्थ १. 'दि इपीग्राम्स एट्रीब्यूटेड टू मर्तृहरि' ( १९४८) २. "दि सुभाषित रनकोश ऑफ विद्याकर', इन कोलेबरेशन विथ वी० 'गोखले (१९५७) ३. 'दि चिन्तामणि-सारणिका ऑफ दशबल' ( १९५२ ) (ग) प्रमुख लेख अ-मुद्रातत्त्व सम्बन्धी- १. 'ए स्टैटिस्टिकल स्टडी ऑफ दि वेट्स ऑफ दि ओल्ड इण्डियन पंच-माक्र्ड क्वायन्स' (१९४०) २. 'ए नोट ऑन होर्डस ऑफ पंच-मायर्ड क्वायन्स फाउन्ड एट तक्ष- शिला' ( १९४०) ३. 'ऑन दि स्टडी एण्ड मेट्रोलॉजी ऑफ सिल्वर पंच-मावर्ड बवायन्स' ( १९४१) ४. 'ऑन दि ओरिजिन एण्ड डेवलपमेन्ट ऑफ सिल्वर क्वायन्स इन इण्डिया' ( १९४१) ५. "सिल्वर पंच-मार्ड बवायन्स विथ स्पेशल रिफरेन्स टू दि इस्ट खान- देश होई' (१९४६) ६. 'क्रोनोलॉजिकल आर्डर ऑफ पंच-मावर्ड पवायास-I: ए री-एक्जा- 'मिनेशन ऑफ दि बोल्डर तक्षशिला होर्ड' ( १९४८-४९) ७. 'क्रोनोलोजिकल आर्डर ऑफ पंच-माक्र्ड क्वायन्स-II: दि बोडनाया- फनूर होई' (१९५१) वामोदर पर्मानन्द कोसम्मी:४३ ८. 'क्रोनोलॉजिकल आर्डर ऑफ पंच-मापर्ड पवायन्स-III : दिपला होई' (१९५२) ९. 'न्यूमिस्मेटिक्स ऐज ए साइन्स' ( १९६६ ) बी० डी० चट्टोपाध्याय ने कोसम्वी के मुद्रातत्त्व से सम्बन्धित इन सेखों का प्रकाशन 'इण्डियन न्यूमिस्मेटिक्स' शोपंक ग्रन्य में कराया है ( १९८१ ) (4 अन्य- 'फास्ट एण्ड क्लास इन इण्डिया' (१९४४) २. 'अर्ली ब्राह्मण एण्ड ग्रााणिज्म' (१९४७) ३. "दि अवतार सन्क्रेटिग्म एण्ड पासिबुल सोर्सेज ऑफ दि भगवद्गीता' ( १९४८-४९) ४. माक्सिज्म एण्ड ऍसियेण्ट इण्डियन कल्चर' (१९४९) ५. 'ऑन दि ओरिजिन ऑफ ग्राह्मण गोत्राज' ( १९५०) ६. 'ऍशिण्ट कोसल एण्ड मगध' ( १९५२) ७. 'ग्राह्मण क्लान्स' ( १९५३) ८.दि पोरियडाइजेशन ऑफ इण्डियन हिस्ट्री' ( १९५४ ) ९. 'व्हाट कान्सटीट्यूट्स इण्डियन हिस्ट्री ?' ( १९५५ ) १०. "दि वेसिस ऑफ ऍशियेण्ट इण्डियन हिस्ट्री' ( १९५५) ११. 'ऑन दि डेवलपमेन्ट ऑफ फ्यूडलिज्म इन इण्डिया' (१९५६) १२. 'धेनुकाकट' (१९५७) १३. "दि टेक्स्ट ऑफ दि अर्थशास्त्र' ( १९५८) १४. 'इण्डियन फ्यूडल ट्रेड चाटरस् ( १९५९ ) १५. प्रिमिटिव कम्यूनिजम' (१९५९) १६. 'एट दि कासरोड्स: मदर गाडेस कल्ट साइड्स इन ऐंशियेण्ट इण्डिया' (१९६०) १७. 'सोसल एण्ड इकोनॉमिक आस्पेक्टस् ऑफ दि भगवद्गीता' (१९६१) १८. 'कनिष्क एण्ड दि शक एरा' (१९६२) १९. 'पियसंड् माइक्रोलित्यस माम दि वेस्टर्न डेकन प्लाटेयू' (१९६२) २०. 'मेगालित्य्स इन दि पूना डिस्ट्रिक्ट' (१९६२) २१. कम्बाइन्ड मेषड्स इन इण्डोलॉजी' (१९६३) २२. 'प्रीहिस्टॉरिक रॉक इन्प्रेविंग्स् नियर पना' (१९६३) २३. 'दि बिगिनिंग ऑफ दि आइरन एज इन इण्डिया' ( १९६३) २४. 'दि ऑटोक्यनस एलीमेन्ट इन दि महाभारत' ( १९६४ ) ४४ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार २५. 'दि हिस्टॉरिकल कृष्ण' (१९६५) २६. 'लिविंग प्रीहिस्ट्री इन इण्डिया' (१९६७)। किन्तु कोसम्बी के प्रायः सभी ऐतिहासिक अनुसंधानों के परिणामों का समाहार ऊपर उल्लिखित उनके प्रथम दो ग्रन्थों में देखा जा सकता है। शोध पद्धति एवं ऐतिहासिक विचार बहुमुखी प्रतिभा के धनी दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी मानव समाज की व्याख्या करने और उसमें होनेवाले परिवर्तनों के लिए माक्र्सवादी सिद्धान्त में विश्वास करते थे। इसी कारण इतिहास को पारिभाषित करते हुए उन्होंने कहा है कि-"उत्पादन के साधनों और सम्बन्धों में होनेवाले परिवर्तनों का कालक्रम से प्रस्तुत किया गया विवरण ही इतिहास है।" ( History is the presentation in chronological order of successive changes in the means and relations of production. ) कोसम्बी के अनुसार प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में अकस्मात् दृष्टिगत होने वाले वैयक्तिक एवं घटनामूलक विवरणों को 'एक रोमानी कल्पित कथानक' या 'भारतीय रेलों की समय-सारिणी' के रूप में देखना चाहिए। इस बात पर वे जोर देकर कहते है कि, “यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कौन राजा था या किसी क्षेत्र में कोई राजा था अथवा नहीं, अपितु महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी क्षेत्र में रहने वाली जनता के द्वारा उस समय भारी या हल्के हल का प्रयोग किया जाता था अथवा नहीं। शासन परिवर्तनों का अध्ययन केवल इस दृष्टि से किया जाना चाहिए कि उससे उत्पादन के आधारों में किस प्रकार शक्तिशाली परिवर्तन हुए।" किन्तु माक्र्सवादी सिद्धान्त में विश्वास करने वाले कोसम्बी की इतिहास पद्धति डांगे, हुसैनी आदि माक्सवादी इतिहासकारों से भिन्न है जिन्होंने मार्स और एजेल द्वारा स्थापित सिद्धान्त के आधार पर भारतीय इतिहास की स्पष्टतः एकसूत्रीय ( Unilinear ) व्याख्या की है। कोसम्बी का कथन है कि, "भारतीय इतिहास को एक सुनिश्चित ढांचे में ठीक-ठीक प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है ।" ( Indian history does not fit precisely into this rigid framework.) उदाहरणार्थ उनके अनुसार प्राचीन भारतीय समाज को यूनान और रोम के दासता वाले चरित्र के आधार पर व्याख्यायित नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार कोसम्बी की ऐतिहासिक पद्धति माक्सवादी इतिहासकारों की पति से कई प्रकार से भिन्नता रखती है। वस्तुत: उनको ऐतिहासिक दामोवर धर्मानन्द कोसम्बी : ४५ पद्धति के सम्बन्ध में द्विजेन्द्रनारायणशा का यह कथन अत्यन्त समीचीन है कि उन्होंने ( कोसम्बी ने ) माक्र्सवाद को 'विचार के विकल्प' ( Substitute of thinking ) के रूप में न ग्रहणकर 'विश्लेषण के हथियार' (tool of analysis) के रूप में ग्रहण किया है जैसा कि गार्डेन चाइल्ड ने विशाल पुरा- तात्त्विक सामग्री की व्याख्या के लिए किया था। अपनी पद्धति के अनुरूप कोसम्बी प्राचीन भारतीय इतिहास की पुनरंचना करने में अत्यन्त कठिनाई का अनुभव करते हैं क्योकि उनके अनुसार "भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में लिखित स्रोत नहीं के बराबर है।" उनके विचार से मारतीय इतिहास से सम्बन्धित जो भी लिखित साक्ष्य विद्यमान है वे धार्मिक एवं फर्मकाण्डीय विवरणों से इतने आवृत है कि उनसे इतिहास निर्माण के लिए तत्कालीन भारतीय समाज की वास्तविक संरचना का ज्ञान करना आवश्यक हो जाता है। उनका यह मानना है कि पुरातत्त्वविज्ञान और नृतत्वविज्ञान से ही ऐसा सम्भव हो सकता है। पुरातत्त्व से लिखित साक्ष्यों को पुष्टि होती है तथा उनसे तत्कालीन समाज के वास्तविक जीवन का ज्ञान होता है। किन्तु भारतीय सन्दर्भ में वे इस दिशा में भी कठिनाई का अनुभव करते हैं, क्योंकि भारत में पुरातत्त्व के पूर्ण विकास का अभाव है । लेकिन वे यह विश्वास करते हैं कि भारत में उपलब्य नृतत्वशास्त्रीय साक्ष्यों से इतिहास का वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । नृतत्वशास्त्रीय साक्ष्यों पर कोसम्वी ने अत्यधिक बल दिया है। इस प्रकार कोसम्बो अपने इतिहास निर्माण के लिए लिखित साक्ष्यों का उपयोग पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ तथा इनका निरीक्षण नृतत्वशास्त्रीय साक्ष्यों से करते है। कोसम्दी ने भारत के प्राचीनतम प्राप्त सिपकों-आहत सिक्कों | Punch. marked coins) के अध्ययन के लिए अन्तरानुशासनिक ( inter-discipli• nary) दृष्टिकोण का भी प्रयोग किया है। गणित के विद्वान होने के कारण उन्होंने इनका अध्ययन सांख्यिकी के आधार पर किया है। उनके इस अध्ययन के महत्त्व के सम्बन्ध में द्विजेन्द्र नारायण झा ने लिखा है कि, "............, he has opened up a strikingly new and original line of cnquiry for future numismatists of India." इस प्रकार वी० पी० गोखले ने कोसम्बी को ऐतिहासिक दृष्टि एवं पद्धति के सम्बन्ध में ठीक ही लिखा है कि- "He believed in the marxist metliod of interpreting and " ४६ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार changing tho human society, but did not hesitate to revise tha data of Marx himself in the light of modern research. As an independent thinker with a passionate devotion to scientific research, he seemed to be almost exelusively preoccupied with his own intellectual pursuits," अपनी विचारधारा और पद्धति के आधार पर कोमम्बी ने प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक चरित्रों की व्याख्या की है। इन चरित्रों में निम्नलिखित प्रमुख है- . १. आदिम समाज और कबीलाई जीवन । २. सिन्धु घाटी को सम्यता। ३. आर्यों का आक्रमण जिससे सिन्धु घाटी की सभ्यता के नगरों का नाश हुआ परन्तु जिसके फलस्वरूप पूरब को और बस्तियां स्थापित हुई। ४. जाति-ज्यवस्था, लोहे के उपकरण, और हल की सहायता से गंगा पाटी का उद्घाटन। ५. भगघ और बौद्ध धर्म का उत्कर्ष । ६. मीयों की सम्पूर्ण देश पर विजय और ग्रामीण कृषि व्यवस्था पर आधा- रित एक साम्राज्य की स्थापना । ७. मौर्य साम्राज्य का पतन, दक्षिणापथ में राज्यों का उदय और समुद्रतट- वर्ती पट्टियों में बस्तियों को स्थापना । ८. उद्गामी सामन्तवाद का लम्बा दौर और बौद्ध धर्म की अवनति । कोसम्बी ने प्राचीन भारतीय इतिहास के उक्त चरित्रों की व्याख्या अपनी ऐतिहासिक दृष्टि के आधार पर किस प्रकार की है, इसको एक उदाहरण द्वारा यहाँ स्पष्ट करना संगत होगा : कोसम्बी के अनुसार आर्य भारत के बाहर से आये थे और उन्होंने सिन्धु घाटी को सभ्यता के नारों को नष्ट किया। आर्य घुमक्कड़, पशुचारक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाले थे। वे युद्ध के लिए घोड़ों के रथों तथा भार ढोने के लिए बैलों की गाड़ी का प्रयोग करते थे । कालान्तर में इन्होंने हल और लोहे के प्रयोग में दक्षता प्राप्त कर लो। इस तकनीकी ज्ञान के कारण हो वे जंगलों को साफ करते हुए पूरब की ओर बढ़े। लौह-प्रविधि के ज्ञान के कारण हो वे अपने पहले के निवासियों से उत्पादन और युद्ध में श्रेष्ठ रहे ।

दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी : ४७ प्राचीन मारतीय इतिहास के उपर्यन परित्रों की व्याख्या के अतिरिक्त कोमम्वी ने अपने प्रन्यों में अन्य अनेक ऐतिहासिक निष्कयों को भी प्रस्तुत किया है । उदाहरणार्प, उनके अनुसार मौर्य शासक मोर टोटम ( peacock totem ) से सम्बन्धित है। अन्य माक्र्सवादी इतिहासकारों को ही भौति कोमम्वी के ऐतिहासिक दृष्टिकोण घोर नियों को भी आलोचना हुई है। किन्तु यदि हम यहाँ कोमम्बी के माधर्मवादी दृष्टि को समीक्षा करना छोड़ दें, जो पिसानों के बीच वियाद का अत्यन्त व्यापक विषय है तो भी उनकी ऐतिहासिक व्याख्याओं का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इस सम्बन्ध में द्विजेन्द्रनारायण झा ने ठीक ही लिखा "His conclusions remain a sct of valuable hypatheses which future researchers will do well to test in the light of data available through diversification of sources." इनके अतिरिक्त भर्तृहरि के काव्य और सुभाषितरत्नकोश का सम्पादन उनको इस दौर में प्रतिष्ठित तो करता ही है वरन् लघुपाषाणोपकरण ( microliths ) और वृहत्वापाणोपकरण ( megaliths ) के सम्बन्ध में उनका कार्य उनको एक प्राणितिहास के रूप में भी प्रतिष्ठित करता है। कोसम्बी की ऐतिहासिक शोष-पद्धति का प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन को इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । उन्होंने अपनी इस पद्धति के द्वारा अपनी इतिहास-पुनर्रचना को वस्तुनिष्ठता प्रदान की है। इसी कारण डाल रिपे ( Dale Rieps ) ने उन्हें 'Father of Scientific Indian History' के रूप में प्रतिक्षित करते हुए लिखा है कि- "Indologists will come to appreciate D.D. Kosambi more cach derate for he set Indian history on a scientific path." इस प्रकार स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी का महत्त्वपूर्ण स्थान है । घे माक्र्सवादी दृष्टिकोण की परम्परा को रेखांकित करनेवाले प्रमुख इतिहासकारों में से एक है किन्तु अन्य अनेक इतिहासकारों को ही भांति वे इन तथ्यों को स्वीकार करते हुए लिखते .

४८: प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार "इतिहासकार का कार्य न तो अतीत से प्रेम करना है, न अतीत से छुटकारा पाना, बल्कि वर्तमान को स्पष्ट करने वाली एक पंजी के रूप में अतीत की गहराई में जाकर उसे खोलकर समझाना है । इतिहासकार का अतीत सम्बन्धी चित्र जब वर्तमान की समस्याओं को समझनेपाली अन्तर्दृष्टि से मालोषित होता है, तभी महान इतिहास रचा जाता है ।"इतिहास से सीखना केवल एकतरफा प्रक्रिया नहीं है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान को समझने का अर्थ वर्तमान के प्रकाश में अतीत को समझना भी है। इतिहास का प्रयोजन है-अतीत और वर्तमान के बीच अन्ततः सम्बाध द्वारा इन दोनों के बारे में अधिकाधिक गहन जानकारी प्राप्त करते रहना।"

परिशिष्ट: १ कल्हण कल्हण प्राचीन भारत (वारहवीं शती ई० ) का एकमात्र रचनाकार है जिसकी कृति राजतरंगिणी में इतिहास की आधुनिक अवधारणा ( modern concept of history ) के तत्त्व परिलक्षित होते हैं । इस कारण वह आधुनिक इतिहासकारों के लिए अद्वितीय महत्त्व रखता है। उसकी पद्धति वैज्ञानिक एवं तथ्यपरक थी जिसको ओर इंगित करते हुए उसने लिखा भी है कि- इलाध्यः स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता । भूताऽयंकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती ।। अर्थात् यही गुणवान् कवि प्रशंसा का पात्र है जो राग-द्वेष से ऊपर उठकर एकमात्र सत्य निरूपण में ही अपनी भाषा का प्रयोग करता है । जीवन-वृत्त कल्हण के जीवन-वृत्त के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है । किन्तु उसकी कृति राजतरंगिणी एवं कतिपय अन्य साक्ष्यों के आधार पर इसकी एक धुंधली झलक प्रस्तुत की जा सकती है । उसका जन्म बारहवी शती के प्रारम्भ में कश्मीर के एक याह्मण परिवार में हुआ था जिसका उल्लेख उसने गर्व के साथ किया है । सम्भवतः उसका परिवार ब्राह्मणों के मार्ग परम्परा से सम्बद्ध था जिसका प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन परम्परा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है । इस परम्परा के विभिन्न तत्त्व उसकी कृति में दृष्टिगत होते हैं । उसके पिता चम्पक एक उच्चस्तरीय राज्याधिकारी थे और सम्भवतः वे कश्मीर के लोहारा वंश के शासक हर्ष (१०८९-११०१ ई.) के सलाहकार थे । कल्हण नै संस्कृत एवं विभिन्न शास्त्रों की उच्च शिक्षा ग्रहण की पो और काव्य-रचना में अद्भुत कुशलता प्राप्त कर ली थी। बाणभट्ट का 'हर्षचरित' ओर बिल्हण का "विकमांकदेवचरित' उसे अत्यन्त प्रिय थे। 'पोक चरित' के रचयिता कवि मंख ने एक कल्याण नामक लेखक के काव्य कौशल और इतिहास-प्रेम की बड़ी प्रशंसा की है । स्टाइन महोदय ने इस कल्याण का तादात्म्य कल्हण के साय स्थापित किया है।

५० :प्राचीन.भारत के आधुनिक इतिहासकार राजतरंगिणी का रचनाकाल एवं उसके स्रोत विभिन्न विद्वानों ने अन्तः साक्ष्य के आधार पर राजतरंगिणी का रचनाकाल ११४८-४९ ई० से ११४९-५० ई. के मध्य निर्धारित किया है। कल्हण ने इसकी रचना में प्रयुक्त विभिन्न स्रोतों का भी विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है । उसने अपने पूर्ववर्ती ११ इतिहास लेखकों में से ५ के नाम लिये है-सुव्रत, क्षेमेन्द्र, हेलाराज, पद्ममिहिर और छविल्लाकर तथा उनकी विवेचन पद्धति एवं उसको त्रुटियों पर प्रकाश डाला है। इनके अतिरिक्त उसने अनुसूतियों ( legends ), परम्पराओं ( traditions ) और अपने क्षेत्र कश्मीर पर लिखी गयी प्रमुख रचनाओं, जिसमें नीलमत पुराण प्रमुख है, का उपयोग किया है। किन्तु मन्दिरों एवं अन्य भवनों में उडित अभिलेखों ( inscriptions) का उसने युगान्तकारी उपयोग किया है जो इतिहास लेखन की दृष्टि से निश्चित रूप से प्रगति का सूचक था। अभिलेखों में पूर्ववर्ती राजाओं द्वारा किये गये भूमिदान ( landgrants) तथा धर्मदाय ( endowments ) सम्बन्धी सूचनाएं भी सम्मिलित है । इतिहास के तर्कसंगत स्रोत के रूप में अभिलेखों का उपयोग निश्चय ही कल्हण का एक एक अभिनव प्रयोग था। राजतरंगिणी की विषय-वस्तु कल्हण ने अपनी रचना राजतरंगिणी मे भू-वैज्ञानिक ( Geology ) युग से लेकर स्वयं अपने युग तक के कश्मीर के इतिहास का विवरण प्रस्तुत किया है। इसमें लगभग ८००० श्लोक है तथा यह आठ तरंगों (सर्गों) में विभक्त है। सर ऑरल स्टाइन तथा ए० एल० बैशम ने इतिहास पद्धति की दृष्टि से राजतरंगिणी को विषयवस्तु को तीन वर्गों में विभक्त किया है । टाइन ने प्रथम वर्ग में पहले, दूसरे और तीसरे तरंग; द्वितीय वर्ग में चौथे तरंग तथा तृतीय वर्ग में पांचवें, छठवें, सातवें एवं आठवें तरंग को रखा है जब कि वैशम प्रथम वर्ग में पहले, दूसरे और तीसरे तरंग; द्वितीय वर्ग में चौथे, पांचवें एवं छठवें तरंग तथा तृतीय वर्ग में सातवें एवं आठवें तरंग को रखते है। किन्तु बैशम का वर्गीकरण अधिक संगत है जो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है : प्रथम इस वर्ग में ३००० से अधिक वर्षों के इतिहास को सम्मिलित किया गया है । इसमें केवल राजवंशों को सूचियां ही प्रापः दी गयी हैं । इस युग के इतिहास- निर्माण के लिए कल्हण ने पौराणिक स्रोतों, अनुश्रुतियों तथा मिथकों ( Myths) परिशिष्ट : एक: ५९ का उपयोग किया है । इस युग राजाओं को उसने प्राचीन महाफाप्यों-- रामायण एवं महाभारत के परित नायकों के सम्बन्धित किया है तथा ऐतिहासिक परम्पराओं को अतिप्राकृतिक तत्वों के साथ भी सम्बद्ध कर दिया है । द्वितीय वर्ग इस या में कारकोटका तथा उत्पल राजयंगों का इतिहास विवृत्त है । इसे कल्हण ने अपने पूर्वकालीन इतिहासकारों के आधार पर लिखा है जो घटनाओं फे समकालीन थे। इस वर्ग से ववित ऐतिहासिक वृत्त उभरना प्रारम्भ होता है। इस युग के बारे में उसकी पकड़ निश्चय ही ऐतिहासिक अभिलेखों तक और मधिक सम्भावना यह है कि बौद्ध स्रोतों तक पहुंची थी। तृतीय वर्ग इस वर्ग में लोहारा राजवंश का इतिहास वर्णित है। इतिहास विवेचन को दृष्टि से यह वर्ग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । इसमें कल्हण ने प्रत्यक्ष दर्शन के आधार पर घटनाओं का आलोचनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है। कल्हण के इतिहास विवेचन का स्वरूप राजतरगिणी के अध्ययन से कल्हण के इतिहास लेखन का निम्नलिखित स्वरूप ज्ञात होता है : १. तिथि का प्रयोग-कल्हण घटनाओं का विवेचन तिथि के साप करता है । उसने इसके लिए लौकिक संवत् का प्रयोग किया है। वस्तुतः कल्हण प्राचीन भारत का एकमात्र इतिहासकार है जिसने घटनाओं को तिथि के साथ प्रस्तुत किया है। २. अनुश्रुतियों पर विश्वास--अपनी रचना के प्रारम्भ में कल्हण, लोक प्रचलित अनुश्रुतियों के आलोचना दृष्टिविहीन संग्रहकर्ता के रूप में हमारे समक्ष आता है । सम्भवतः अन्य किसी साक्ष्य के अभाव में वह ऐसा करने के लिए विवशथा। ३. घटनाओं का सतर्क विवेचन--किन्तु जैसे-जैसे कल्हण अपने युग के निकट माता जाता है वैसे-वैसे उसकी घटनाओं के प्रति आलोचना-दृष्टि स्पष्ट होती जाती है और वह घटनाओं का सतर्क विवेचन करता है। उदाहरणार्थ, हर्ष को मृत्यु के बाद उसने एक ऐसे युग का अनुभव किया था जिसमें राजनीतिक अस्थिरता का बोलबाला था। शक्तिशाली सामन्त डामर ( Damara ) राजाओं के सबसे बड़े विरोधी थे। प्रो० बी० एन० एस० यादव ने डामरों ५२ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार , के इस विरोध को कृपक विद्रोह सिद्ध करने का प्रयास किया है। कल्हण के राजनीतिक विचारों से यह स्पष्ट होता है कि उसे इस तथ्य की जानकारी थी। इसलिए उसका कथन है कि एक अच्छे राजा को इतना अधिक शक्तिशाली होना चाहिए कि वह समाज के विविध तत्त्वों को नियन्त्रण में रख सके। उसे यह निश्चित कर लेना चाहिए कि कोई भी क्षेत्र, चाहे वह गांव ही क्यों न हो, सम्पत्ति एकत्र न करने पाये क्योंकि सम्पत्ति राजनीतिक विद्रोह को प्रेरणा देती है । उसने यह भी अनुभव किया था कि भू-स्वामियों की आर्थिक शक्ति ने ही उन्हें इतना शक्तिशाली बना दिया है कि वे राजा को चुनौती दे सकें। उसने नौकरशाही को निन्दा की है. जिसमें अधिकांशतः कायस्थ थे और वे प्रशासन के प्रमुख पदों पर आसीन थे। वह बताता है कि अधिकांश राजनीतिक षड्यन्त्रों के पीछे इन्ही कायस्थों का हाथ था। इसी प्रकार कल्हण राजतन्त्र में आमात्यों का विशेष महत्त्व स्वीकार करता है । साम्राज्ञी दिद्दा को वह घोर आलोचना करता है क्योंकि वह तत्कालीन आचार की दृष्टि से उचित नहीं था। राजा के निर्वाचन की बात का तो वह खिल्ली उड़ाता है । इस प्रकार कल्हण तत्कालीन परिवेश में घटनाओं का सतर्क विवेचन करता है और साथ ही अपने स्वतन्त्र विचारों को भी प्रस्तुत करता है । कल्हण के इतिहास-विवेचन के दोष उपर्युक्त विशेषताओं के होते हुए भी कल्हण के इतिहास विवेचन में कतिपय दोष दृष्टिगत होते हैं १. तिथियों के सम्बन्ध में सतर्क नहीं-कल्हण के इतिहास-लेखन का एक मुख्य दोष उसका तिथियों के सम्बन्ध में सतर्क न होना है। स्टाइन ने यह सिद्ध किया है कि कल्हण की काल गणना के अनुसार ( अशोक, कनिष्क, मिहिरकुल, तोरमाण का काल क्रमशः ११८२ ई० पू०, ७०४-६३४ ई० पू०, प्रथम शताब्दी ई० और २०९-२२२ ई० ठहरता है । इसी प्रकार कहीं-कही वह अपने कालक्रम निर्धारण को अनुपयुक्तता की सीमा तक खींचता है। उदाहरणार्थ, उसके अनुसार ५२ राजाओं का राज्य काल १५६६ वर्ष था। तिथियों के सम्बन्ध में कल्हण की इस प्रकार को असतर्कता सम्भवतः इसलिए है कि ऐसा उसकी रचना के प्रारम्भिक भाग में है जिसके लिए उसे अनैतिःासिक स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ा था । परन्तु अपनी शेष रचना में भी वह विभिन्न शासन कालों के प्रारम्भ तथा अन्त की तिथियां तो देता है जबकि सम्बद्धकाल को प्रमुख घटनाओं की तिथि का उल्लेख नहीं करता। - ५४ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार धर्म को जड़ें गहरी और दीर्घकालीन थीं। कल्हण के बाद उसकी परम्परा का अनुसरण करने वाले जोनराज की यह सूचना है कि जैनुलाबदीन ! १५वीं शती ई०) ने बौद्ध धर्मावलम्बी सौगत तिलकाचार्य को महत्तम के उच्च पद पर नियुक्त किया था ' तृतीय राजतरंगिणी, श्लोक १०९६ ) । वस्तुतः यहाँ यह कहना अधिक समीचीन प्रतीत होता है कि कल्हण के इतिहास वैशिट्य के लिए कश्मीर पर चीनी-तिब्बती प्रभाव और बौद्धधर्म का प्रभाव सहायक कारक थे। इसके लिए निम्नलिखित कारणों को विशेष रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है- १. भारतवर्ष में कश्मीर ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहां इतिहास लेखन की अपनी विशिष्ट अवधारणा पहले से विद्यमान थी। कल्हण ने अपने पूर्ववर्ती इतिहासकारों एवं उनकी कृतियों का उल्लेख किया है । दुर्भाग्यवश इन पूर्ववर्ती इतिहासकारों की कृतियां आज उपलब्ध नहीं है । सम्भव है कि कल्हण ने इन्हीं को समायोजित कर अपनी इतिहास कृति को प्रस्तुत किया । उसका कथन भी है कि-'पूर्वद्धं कथावस्तु मयि भूयो निबध्नति' । (पूर्वकालीन रचनाकारों द्वारा जो कथा वस्तुएं निबद्ध कर दी गयो हैं उनका मैं पुनर्लेखन कर रहा हूँ।) इसके बाद उसका यह भी कथन है कि- 'दाक्ष्यं कियदि तस्मादस्मिन् भूतार्थवर्णने। सर्वप्रकार स्खलिते योजनाय ममोद्यमः ॥ ( इस ग्रन्थ के लिखने की मेरी योजना यह है कि में सर्वागीण पूर्ण क्रमबद्ध इतिहास उपस्थित करू जहाँ पुरातन इतिहास लेखकों को रचनाएं विशृंखलित है।) वास्तव में भौगोलिक दृष्टि से कश्मीर क्षेत्र शेष भारत से कुछ अलगाव लिये हुए था और इस तत्व ने उस क्षेत्र के लोगों को अपनी कुछ निजी विशेषताएं प्रदान की थी जिनमें विशिष्ट इतिहास चेतना भी एक थी। २. कल्हण का परिवार राजसत्ता से सम्बन्धित था। उसके पिता चम्पक कामीर के शासक हर्प ( १०८९-११०१ ई० ) के सलाहकार थे। इससे उसे राजनीतिक गतिविधियों के सूक्ष्म अवलोकन का अवसर मिला था। इसके अति- रिक्त उसका परिवार सम्भवतः भार्गव कुल सम्बद्ध था जिसका प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में विशिष्ट स्थान है। ऐमा प्रतीत होता है कि हर्ष के बाद कश्मीर में जो शासक आये उनके शासन काल में कल्हण को कोई राजकीय पद नहीं मिला और न ही उनकी ओर से उसे कोई विशेष सहायता ही मिली।

परिशिष्ट : एक: ५५ इस कारण भी उसकी कृति अन्य प्रशस्तिपरक कृतियों यया वाण के हपंचरित आदि से ऊपर उठ सकी। ३. कल्हन के युग का अशान्त होना भी उसकी रचना के वैशिट्य का एक कारण हो सकता है । हर्ष को मृत्यु के पश्चात् कश्मीर में गृहयुद्ध और संघर्ष का युग था। इस अनिश्चय और अव्यवस्था के युग के वातावरण ने कल्हण को इतिहास लिखने के लिए प्रेरित किया होगा। सम्भवतः उसकी इच्छा थी कि लोग अपने अतीत की श्रुटियों से शिक्षा लें। अतीत से शिक्षा देने के लिए उसे परिस्थितियों एवं घटनाओं का विश्लेषण करना पड़ा। इस विश्लेषण ने ही उसकी कृति को भारत की अन्य कृतियों से विशिष्ट बना दिया । यही कारण है कि अपनी रचना के लिए काव्य विधा को अपनाते हुए और उसके रसात्मक गुणों में दिल- चस्पी रखते हुए भी वह उसमें ऐतिहासिक सत्य का संयोग भी करना चाहता था। उसने एक कवि को न्यायाधीश के रूप में देखा ! ध्यातव्य है कि कवियों के इतिहास लेखन से सम्बद्ध होने की परम्परा भारतवर्ष में पहले से ही विद्यमान थो। उदाहरणार्थ तालगुण्डा अभिलेख का कवि कुब्ज कदम्ब वंश के वर्णन को काव्य की संज्ञा देता है । इसी प्रकार समुद्रगुप्त को प्रयाग प्रशस्ति का रचयिता हरिपेण अपने को कवि और प्रशस्ति को काव्य की संज्ञा प्रदान करता है इस प्रकार कल्हण के इतिहास वैशिट्य का मुख्य कारण कश्मीर में उस प्रकार के इतिहास लेखन परम्परा का विद्यमान होना था। इसके अतिरिक्त कश्मीर पर चीनी-तिब्बतो प्रभाव एवं बौद्ध धर्म का प्रभाव, कल्हण का राजसत्ता से असम्बद्ध होना तथा तत्कालीन युग का अशान्त होना आदि उसकी रचना के वैशिष्ट्य के सहायक कारक थे। कल्हण के बाद कश्मीर में जोनराज, श्रीवर, प्राज्यभट्ट और शुक ने उसको परम्परा को आगे बढ़ाया। किन्तु इनमें से कोई भी सूक्ष्म अन्तष्टि या महत्ता को दृष्टि से कल्हण को बराबरी न कर सका।

परिशिष्ट: २ स्वतन्त्रता-पूर्व प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास का लेखन इतिहास को आधुनिक संकल्पना, जो योरोपीय है, के अनुरूप ( प्राचीन ) भारतीय इतिहास की पुनर्रचना का कार्य अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों से प्रारम्भ हुआ। तब से सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार इसका क्षेत्र सदैव विकसित होता रहा जिसमें इतिहासकारों को महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यह उसी प्रकार हुआ जैसे प्रत्येक कवि अपने युग का कवि होता है, वैसे ही प्रत्येक इतिहासकार अपने युग का इतिहासकार होता है । दूसरे शब्दों में कवि को ही भांति इतिहासकार की वाणी युग की वाणी होती है। परिणाम-स्वरूप इतिहास की आधुनिक संकल्पना के अनुरूप प्राचीन भारतीय समाज से सम्बन्धित महत्व- पूर्ण क्षेत्रों--भौगोलिक दशा, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृ. तिक, संवैधानिक व्यवस्था आदि का विवरण प्रस्तुत किया गया है।' यहाँ हमारा उद्देश्य इतिहास को आधुनिक संकल्पना के अनुरूप प्राचीन भारतीय इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र सामाजिक इतिहास के स्वतन्त्रतापूर्व लेखन को उसमें आयी विभिन्न प्रवृत्तियों के आधार पर रेखांकित करना है। इतिहास दार्शनिक कोम्ते, रेनियर और टॉयन्धी आदि ने सामाजिक इतिहास को इतिहास की आधारशिला के रूप में देखा है। किन्तु इस इतिहास को सर्वाधिक लोकप्रिय बनाने का श्रेय अंग्रेज इतिहास दार्शनिक ट्रेवेलियन को है । उसके अनुसार, "अतीत में मनुष्यों का दैनिक जीवन, विभिन्न वर्गों का पारस्परिक मार्थिक सम्बन्ध, परिवार का स्वरूप, गृहस्थ जीवन, श्रमिकों की दशा, प्रकृति के प्रति मानवीय दृष्टिकोण, सांस्कृतिक जीवन, तथा सामान्य परिस्थितियों से उत्पन्न धर्म, साहित्य, संगीत, वास्तुकला, शिक्षा तथा साहित्य सामाजिक इति- हाय के विषय है। संक्षेप में ट्रेवेलियन के अनुसार, "सामाजिक इतिहास वह इतिहास है जिसमें राजनीतिक इतिहास को छोड़ दिया जाता है।" अपने विवेचन पर आने के पूर्व यह भी जान लेना आवश्यक है कि प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास के विभिन्न पक्षों पर एक साथ प्रकाश डालने वाले अन्य नगण्य से हैं। सामाजिक इतिहास के प्रायः सभी पक्षों पर प्रकाश डालने वाले पी० वी० काणे के 'हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र' जैसे अन्य दुर्लभ है । सामाजिक परिशिष्ट दो: ५७ इतिहास के विभिन्न पक्षों पर अलग-अलग प्रकाश डालने वाले प्रन्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है किन्तु सभी पक्षों के ग्रन्यों में सन्तुलन नहीं है। उदाहरणार्थ, प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास के एक पक्ष जाति प्रथा पर जितने ग्रन्थ उपलब्ध है उतने अन्य किसी अन्य पक्ष पर नहीं । जे० एच० हटन ने तो अपने अन्य 'कास्ट इन इण्डिया' में जातिप्रथा-विषयक ग्रन्थों की संख्या पांच हजार तक गिना दी है। प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास के विशाल साहित्य के प्रणयन में इतिहासकारों के अतिरिक्त मानवजातिविदों, समाजशास्त्रियों, सांख्यिकी, विदों, अर्थशास्त्रियों, धर्मप्रचारकों, समाजसुधारकों, प्रशासकों, विधिवेत्ताओं आदि ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। अब हम यहाँ प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास के विभिन्न पक्षों पर लिखे गये महत्त्वपूर्ण ग्रन्यों के आधार पर उनमें कालक्रमानुसार आये विभिन्न दृष्टिकोणों या प्रवृत्तियों को आधार बनाकर स्वतन्त्रता-पूर्व उसका इतिहास निम्नलिखित रूप से रेखांकित कर सकते हैं- प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास लेखन का प्रारम्भः प्रशासनिक आवश्यकता इतिहास की आधुनिक संकल्पना के अनुसार प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास के लेखन का प्रारम्भ प्रशासनिक आवश्यक्ता के कारण हुआ । भारत में नाये अंग्रेजों के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वे यहां के समाज से परिचित हों क्योंकि वे यहां की विधि-व्यवस्थाओं से परिचित हुए बिना यहाँ ठीक ढंग से शासन नहीं कर सकते थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नीतियों में यह बात स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होती है । प्राचीन भारतीय इतिहास पर अंग्रेजी भाषा में लिखी गयो एक पुस्तक 'ए कोड ऑफ जेन्ट लाज' जो १७७६ में लन्दन से प्रकाशित हुई, की भूमिका में यह बात स्पष्ट रूप से कही गयी है कि, "भारतीय वाणिज्य के महत्व और वंगाल में राज्य की स्थापना के लाभों को इस देश की विधि संहिताएं अपनाकर ही फायम रखा जा सकता है जिनका विजेताओं की विधियों या हितों से आन्तरिक विरोध नहीं हो। आधुनिक भारतीय विद्या ( इण्डोलांजी) के जनक स्वीकार किये जानेवाले सर विलियम जोन्स ने १७९४ में मनुस्मृति के अंग्रेजी अनुवाद की भूनिका में भी प्रशासनिक आवश्यकता की दृष्टि से प्राचीन भारतीय सामाजिक नियमों का अध्ययन आव• श्यक बताया। उनका यह मानना था कि, "यदि इस नीति का पालन किया जाय तो हिन्दु प्रजा के सुनियोजित परिश्रम से ब्रिटेन की सम्पत्ति में भारी वृद्धि हो सकेगी।

५८: प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार इस समय बंगाल में गवर्नर के साथ-साथ अंग्रेज न्यायाधीशों की भी नियुक्ति हुई। इन न्यायाधीशों के लिए भी यह आवश्यक था कि वे भारतीय विधि का अध्ययन करें। एक अंग्रेज न्यायाधीश एच० टी० कोलवुक ने सर विलियम जोन्स की उपर्युक्त कृति के चार वर्ष बाद ही 'भारत की सर्वोत्कृष्ट विधि संहि- ताओं के आधार पर प्राचीन भारतीय समाज का अपना एक अध्ययन विभिन्न लेखों के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रकार प्रारम्भ में प्रशासनिक दृष्टिकोण ही प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास के लेखन का आधार बना था। प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास लेखन का अगला चरण : साम्राज्यवादी दृष्टिकोण प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास लेखन प्रशासनिक आवश्यकता से प्रारम्भ हुआ और शीघ्र ही उसमें साम्राज्यवादी दृष्टिकोण का प्रवेश हुआ । ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नीव को मुदृढ़ करने के लिए अंग्रेज इतिहासकारों ने प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास को साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया। इस दृष्टिकोण से उन्होने भारतीय साहित्य और संस्थाओं की प्राचीनता पर आक्षेप तो किया ही, साथ ही साथ उन्होंने यह भी दिखाने का प्रयास किया कि भारतीय संस्कृति के उदास पक्ष योरोपीय सभ्यताओं से लिये गये है । इनके अतिरिक्त उन्होंने भारतीय समाज के कतिपय कुत्सित पक्षों को उछालना और उज्ज्वल पक्षों को छिपाना भी प्रारम्भ कर दिया। प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास में साम्राज्यवादी दृष्टिकोण का समा- वेश करने वाले इतिहासकारों में सर्वप्रथम नाम जेम्स मिल का आता है । यह घोर साम्राज्यवादी था और भारतीयों के प्रति घोर दुराग्रह रखता था । इसने कोलबुक द्वारा प्रस्तुत किये गये भारतीय स्रोतों का उपयोग करके 'दि हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' की रचना को जो १८२० में प्रकाशित हुई। इसमें उसने लिखा है कि, "नपुंसकों के समान हिन्दु केवल दासत्व के गुणों में अग्रसर होता रहा है उन्नति के स्तर पर उन गुणों के सम्बन्ध में जिन्हें हम नैतिक चरिय कहते है, हिन्दुओं का स्थान अत्यन्त नीचा है।" वह शूद्रों की अधिकारहीनता का विवेचन करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि, "जातिगत ऊँच-नीच को बुरी भावना हिन्दुओं में जैसो विनाशकारी सीमा तक पहुँच गयो है वैसी अन्यय कहीं नहीं है ।" और वह यह भी बताता है कि, "हिन्दुओं की यह दकियानूसी समाज-व्यवस्था उसके समय भी मौजूद है ।“ जेम्स मिल के पश्चात् उन्हो स्रोतों के आधार पर एल्फिसटन ने भी साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से 'दि हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' की रचना की जो १८८१ में प्रकाशित हुआ ।

परिशिष्ट : दो: ५९ किन्तु साम्राज्यवादी होते हुए भी वह भारतीय समाज के प्रति उतना दुराग्रही नहीं था जितना कि जेम्स मिल । फिर भी अपनी साम्राज्यवादी दृष्टि के कारण भारतीय समाज के कतिपय पक्षों के प्रति वह न्याय नहीं कर सका। उदाहरणार्थ, उसका निष्कर्ष है कि, "प्राचीन भारतीय व्यापार यूनानियों और अरबों के माध्यम से होता था।" तथापि वह यह भी कहता है कि, "कुछ प्राचीन गणराज्यों के सार्वजनिक दासों की अपेक्षा, और वास्तव में मध्ययुगीन कृषि दासों या यथाज्ञात अन्य किसी भी दास वर्ग की अपेक्षा शूद्रों की स्थिति बहुत ही अच्छी थी।" उसने यह भी स्वीकार किया है कि, "उस प्रकार का कोई भी दास वर्ग उसके समय में वर्तमान नहीं रह गया है।" साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के विरुद्ध प्रतिक्रिया : राष्ट्रीय दृष्टिकोण का उपय प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास में साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूा उसमें राष्ट्रीय दृष्टिकोण का जन्म हुआ। यहाँ ( भारत में ) प्राचीनकाल की अनेक सामाजिक प्रथाएँ उन्नीसवीं शती में भी प्रचलित थीं जो विश्व, विशेषतः ब्रिटेन के उदीयमान औद्योगिक समाज के समक्ष क्षयोन्मुख एवं जीर्ण प्रतीत हो रही थी। ये सामाजिक प्रथाएँ राष्ट्रीय प्रगति में भी बाधक सिद्ध हो रही थीं। साम्राज्यवादी इतिहासकार प्रायः इन्हीं क्षयोन्मुख एवं जीर्ण प्रथाओं का वर्णन कर भारतवासियों को उनकी हीनता का ज्ञान करा रहे थे। इन सामाजिक प्रथाओं में सती होने की प्रथा, आजीवन वैधव्य, बाल-विवाह, सवर्ण विवाह आदि प्रमुख थे। फलतः इस ओर राष्ट्रीयता की भावना से भारत के शिक्षित 'बुद्धिजीवियों का ध्यान आकर्षित हुआ । इन्होंने कुछ भयोन्मुख एवं जीर्ण सामाजिक प्रथाओं को ठो स्वीकार कर लिया, किन्तु उनके विशिष्ट कारण बताये। साथ ही साथ इन्होंने प्राचोन भारतीय समाज का गौरवपूर्ण और कहीं-कहीं अतिरंजित गौरव- पूर्ण वर्णन किया । अपने इस प्रयास के साथ इन्होंने वर्तमान में प्रचलित प्राचीन- काल की सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने का प्रयास किया। उनका यह प्रयास मुख्यतः दो सिद्धान्तों-समाज सुधारवादी और अतीत का पुनरावर्तनवादी- पर आधारित रहा। समाज सुधारवादी सिद्धान्त और प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास का लेखन समाज मुधारवादी सिद्धान्त के पोषक प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास का अध्ययन प्रस्तुत करने वाले इतिहासकारों का यह मानना था कि जो प्राचीन कालीन सामाजिक प्रथाएं इस समय तक वर्तमान है और राष्ट्रीय प्रगति में , ६० । प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार बाधक सिद्ध हो रही है, वे प्राचीन धर्मशास्त्रीय व्यवस्थाबों पर बाधृत हैं । इनमे किसी भी प्रकार का सुधार तभी सरलतापूर्वक हो सकता है जबकि इन सुधारों को भी धर्मसम्मत ही सिद्ध किया जाय । ऐसे समाजवादी राष्ट्रीय सामा- जिक इतिहासकारों में राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, रमेशचन्द्र दत्त और रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर आदि के नाम उल्लेखनीय है। १८१८ में राजा राममोहनराय ने स्त्रियों के सती होने की प्रथा के विरोध में अपना प्रथम लेख प्रकाशित कराया। इस प्रथा के सम्बन्ध में उन्होंने अपना मत प्रकट करते हुए कहा कि प्रारम्भ में भारतवर्ष में सती प्रथा का प्रचलन नहीं था। यही कारण है कि वेदों एवं उपनिषदों में इस प्रथा का कोई उल्लेख नहीं मिलता । बाद में विदेशियों के आधिपत्य के साथ यह प्रथा भारत में प्रचलित हुई और धर्मशास्त्रों ने इसे मान्यता प्रदान की। फिर भी अनेक धर्मशास्त्रकार इसका विरोध करते रहे। अतः धर्मशास्त्रों के ही अनुसार सती होना विधवा स्त्री की मुक्ति का उत्तम मार्ग नहीं है। इसी प्रकार कुछ समय पश्चात् ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने विधवा विवाह को प्रचलित कराने के पक्ष में अपना मत प्रकट किया। उन्होंने धर्मशास्त्र साहित्य का मंथन कर विधवा विवाह के पक्ष में प्रमाण उपस्थित किया। उनके अनुसार भारतवर्ष में पहले विधवाओं का पुनर्विवाह प्रचलित था, किन्तु कालान्तर में विशेष कारणों से अप्रचलित हो गया।" रमेशचन्द्र दत्त ने अपनी तीन खण्डों की कृति 'ए हिस्ट्री ऑफ सिविलाइ- जेशन इन ऐंशियेंट इण्डिया' जो १८८९-९० मे प्रकाशित हुई, के माध्यम से समाज सुधारवादी सिद्धान्त के आधार पर सामाजिक इतिहास के लेखन को आगे बढाया । इन्होने यह कहते हुए कि आज के हिन्दू अपने प्राचीन धर्म का ममं नहीं समझते हैं, खेद व्यक्त किया है कि माज मदिरापान और दण्ड्य-अपराध करने पर भी कोई जाति-च्युत नहीं होता; किन्तु विधवा विवाह, असवर्ण विवाह, समुद्र-यात्रा और विदेश-यात्रा आदि के लिए दण्डित किया जाता है । दत महोदय ने यह दृढ़तापूर्वक प्रतिपादित किया है कि, "किसी भी प्राचीन जाति ने हिन्दुओं से बढ़कर स्त्रियों को सम्मान नहीं दिया । १२ "आर्यों को उनकी वर्णव्यवस्था ने आपस में विभाजित नहीं किया अपितु उन्हें स्थानीय निवासियों के साथ एक राष्ट्र के रूप में संगठित कर दिया ।। १८९१ में आर० भण्डारकर ने बाल- विवाह के विरुद्ध प्राचीन भारतीय साहित्य से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए यह प्रतिपादित किया कि, "कन्या का विवाह पूर्ण युवती होने पर ही किया जाना चाहिए।" उन्होंने प्राचीन काल से चली आ रही विभिन्न सामाजिक बुराइयों परिशिष्ट : दो।६१ . को समाप्त करने के लिए धर्मशास्त्रों से प्रमाण प्रस्तुत किया। इनके सम्बन्ध में उनका कहना था कि, "प्राचीन काल में कन्याओं का विवाह पूर्ण यौवन प्राप्त करने के पश्चात होता था, जब उनका विवाह पहले ही हो जाता है। उन दिनों विधवाओं का विवाह प्रचलित था, अब यह बिल्कुल बन्द हो गया है। पहले समान वर्गों के बीच खान-पान वजित नहीं था, अब असंख्य जातियों उस प्रकार के पारस्परिक सम्बन्ध नहीं रख सकती हैं।"१५ अतीत के पुनरावर्तनवादी सिद्धान्त और प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास का लेखन अतीत के पुनरावर्तनवादी सिद्धान्त के पोपक प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास का अध्ययन प्रस्तुत करने वाले राष्ट्रीय इतिहासकारों का यह मानना या कि वर्तमान की सामाजिक बुराइयों को समास करने के लिए अतीत कालीन समाज की मान्यताओं की प्रतिष्ठा वर्तमान में करनी होगी। इस सिद्धान्त के जन्मदाता महर्षि दयानन्द सरस्वती थे। उन्होंने 'आर्य समाज की स्थापना की और प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों पर आधारित अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश' की रचना की। इस अन्य का उद्देश्य विधवा विवाह और जन्म । आधार पर जाति का खण्डन तथा शूद्रों के वेदाध्ययन के अधिकार का मण्डन आदि करना था।" अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु दयानन्द सरस्वती ने धर्मशास्त्रों के वचन उद्धृत नहीं किये, अपितु उनका यह मानना था कि वर्तमान को इन सामाजिक बुराइयों को दूर करन के लिए वैदिक कालीन समाज की मान्यताओं की स्थापना वतमान में करनी पड़गी। क्योकि उनका यह मानना था कि वेदों के समय भारतीय समाज व्यवस्था एक आदर्श समाज व्यवस्था थी जिसमे कोई भी बुराई नही पो। धीरे-धीरे विभिन्न कारणों से उसमें अनेक बुराइयां आती गयों जिनमें से यनेक वर्तमान समय में भी प्रचलित है । पार टिप्पणिया १. कालिंगवुद्ध, भार० जी० :दिपआईडिया ऑफ हिस्ट्री, खण्ड १-३ । २. इतिहास के क्षेत्र का यह वर्गीकरण भी बाधुनिक है। ३. देवलियन, सी० एम० : ए० एल० राउन द्वारा द यूज बफ हिस्ट्री' में दधत, पृ० ६२-६३। ४. हटन, जे० एप.: कास्ट इन इण्डिया ।

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६२ : प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकार
५. हैल्हेड, एन० बी० : 'विवादार्णवसेतु' के अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका
में उद्धत, पृ० ९.
६. जोन्स, सर विलियम : इंस्टिट्यूट्स ऑफ हिन्दू ला, भूमिका, पृ० १९ ।
७. कोलबुक, एच० टी० : मिस्लेनियस एसेज ।
८. मिल, जेम्स : दि हिस्ट्री बॉफ इण्डिया, पृ० १६६-१६९ ।
९. एल्फिसदन, एम० : दि हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, पृ० ३४ और १०७ ॥
१०. राय, राजा राममोहन : दि इंगलिश वर्स, जे० सी० घोप द्वारा
सम्पादित, भूमिका और पृ० १२३-९२ ।
११. भण्डारकर, आर० जी० : कलेक्टेड वक्त, भाग २, पृ० ४९८ पर
उद्धत।
१२. दत्त, आर० सी० : ए हिस्ट्री ऑफ सिविलाइजेशन इन ऍशियेंट
इण्डिया, खण्ड १, पृ० २५६-५७ ।
१३. तत्रैव, पृ० २४०-४१ ।
१४. भण्डारकर, आर० जी० : कलेक्टेड वस, भाग २, पृ० ५३८-८३ ।
३. १. तत्रव, पृ. ५२२-२३ ।
१६. सरस्वती, दयानन्द : सत्यार्थ प्रकाश, अजमेर, संवत् १९६६ ।

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Prachin Bharat Ke Aadhunik Itihaskar

Author
Dr. Hiralal Gupta
Title
Prachin Bharat Ke Aadhunik Itihaskar
File name
Prachin Bharat Ke Aadhunik Itihaskar
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Vishvavidhalaya Prakashan Varanasi
Language
Sanskrit
Pages
77
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551246
Barcode
4990010032006.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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