Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

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Singh,rajeswar · 2011/04

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फिर मिलेंगे लेखक- श्री राजेश्वरप्रसाद सिंह मूल्य-याठ थाना

रा-रिसीन्द्रमोहन मित्र,
माया कार्यालय,
इलारापादा
Copyelght reserved with the publisher
सुश्क-चोरेग्ननाम,
माया प्रेस,
इलाहाबाद।

चूड़ियाँ
"बहूजी ! चूड़ी पहिनोगी, बहूजी ?"
उत्तर नहीं मिला।
"यहूजी ! प्रो यहगी !"
"चुड़िहारिन !"
"धरछा।"
दरवाजा खुला।
"चूदी पहितोगी, बहूजी ?"
"हो, को, आयो, चुदिहारिन," वृद्धा ने उत्तर दिया--"तुम्हारा तो
इन्तजार ही हो रहा था। न पाती, सो नौकर भेज कर धुलवाती।"
"ग्राती ये गहूनी ?" घर में प्रवेश करते हुये चुदिहारिन ने
RE-"साल माल भर का त्योहार टहरा। महीनों से श्रारा जगा
था। यों तो जा ही रहता है, लेकिन त्योहार पर चार पैसे जरूर मिल
जाते हैं।"
"यह तो हई है। वैसे तो बहुत जरूरत पड़ने पर नई चूदियों
पहिनी जाती है, लेकिन स्योहार पर तो सब को नई चूड़िया पहिननी दी
पड़ती है।"
"हां, यहूजी, और क्या"
प्रांगन में पहुँच कर सुदिहारिन में कमर से टोकरी उतार कर फर्श पर
रख दी, और टोकरी की बराल में धैड कर सुस्ताने बगी।
"मसी गर्मी है, बहूजी"
"दा, दो गर्मी है। सावन का महीना ठहरा, और इधर कई दिन
से पानी नहीं परसा।"
"जल्दी करो, शी। अभी बहुत जगह गाना है । कन्न
गुदिया है। जहाँ न पाचूगी, पहीं उसहना मिलेगा।"
"पी बहू!" वृवान नावा लगाई।
"क्या है, धम्मोनी "आर से प्राधा माई ।

"मामी, दो भुरिग माई।httri
stt. REE या मोमै निकर में
*काही दिनात या"
"arti मही
"यो मी सराहो?"
"सोनीको भान नमि।"
"पाई जान पाम भाकर पर को
पर मैं और दालान | TREET की।
गुलि मे शाम it hai
anita ar-सादो की, माति के नियमों की गली
में रो पड़ी थी।
" मी, विक्षम नपे प्रशन को tar
PA से ही मैं दुख पाई।"
"शधारीकी"
चामे "
"हो, Agn हारे यहा दाग 4 महीillery
कयासी है।"
"क्या ये काम, पुरिन !" पुरा सास ने कहा-
पामे ! मनोज t"
"मोती धात मनावर में होती है, हमी । येसे सो माया
और
कोती है।दनो, इसकी बनाव, सी सीमा
रंग।जिस हाथ में से बह चमक उठे।"
"पदसतो ट"मी ने कहा--"alte TRE
हापानिमा साहिये।"
धरने मया शिश की गोद में प्रिय हुने यो बह भी मा ।
या देखी जाती रही, मोर भारोता रहा।

पू चूड़ियाँ पाहर से दौरती हुई लना भी आ पहुँची। उसकी याद बिल "दादी, दादी ! मैं भी चूड़ी पहिनूंगी।" "हा, हाँ, पद्दिन, जरूर पहिन । न पहिनेगी, तो पुरसिन कैसे बनेगी?" "मैं यह लाल चूड़ी पहिगी। श्री हो-हो ! कैसी अच्छी चूड़ी है!" लपक कर एक यही-सी.लाल चूडी लबा ने अपने हाथ में डाल "रहने दो, मिटिया," चुदिहारिन ने कहा-"वह यहुत बड़ी है। टूट जायगी।" तेजा हँस कर आँगन में नाच उठी। "री, लड़की बड़ी बहू योली-"देखो, तो इसका दीदा ! दक्ष इधर ।" "रख दो उसे, बिटिया," वृद्धा ने कहा-"तुम्हारे लायक बह चूड़ी नहीं है। देग्यो, यह है तुम्हारे लायक ।" "कौन-सी कौन-सी ?" ऊपर के एक कमरे की खिड़की से एक नवयुवती योगन का यह ५श्य देख रही भी। उसके केश रूखे थे, उसकी माँग सूनी थी, उपके हाधों में चूदियों नहीं थी । उसके हाथ मूने थे, पर सूने थे, गला सूना था, कानों में ईयर-रिंग भी नहीं थे, न क में कील भी नहीं थी। केचन एक साफ साड़ी और एक साफ जम्पर उसके शरीर पर था। किन्तु उसके लम्बे, दुपले, सुडौल शरीर से यौवा फूटा पड़ रहा था, सौदर्य बिखरा जा रहा था। उसके शुष्क घेप में उसं पर परदा डालने कासामथ्र्य नहीं थी! मौंदर्य प्रकृति की देश है, वेप मानव का आविष्कार । तब मानव के विद्रोह के सम्मुख प्रकृति कैमे मुके ? उसका मन ममवेदना के भार से भारी ही उरा। एक दीय-नि.रवास खींच कर, उस खिड़को से हट कर, दूसरी और की खिड़की के सामने फर्श पर पड़ी हुई घटाई पर जा कर यह असष्यन्त थैठ गई । एक वह दिन भी था जब इस घर की अन्य बहुधों की तरह ऐसे अवसरों पर चूड़ियों पहिनने के लिये यह भी बुलाई जाती थी। लेकिन माज? श्रोह ! आज कैसा विकट, कैमा भयानक, कैमा दुखदायक अन्तर उसकी स्थिति में पा गया है। ये चूड़ियाँ । काँच की इन चूदियों को क्या कीमत है, क्या दिसात है। लेकिन इन मामूली-सी चूदियों को पहिनने के लिये भी स्त्री के पास एक विशेष फिर मिलेंगे प्रकार का अधिकार होना चाहिये। कहा है प्राश उसके पास ar घधिकार हाय रे अन्या भाग्य! माकारा में पाइन उमड़ने लगे थे।दवा बन्द थी । प्रकृति मौन थी, मानो अन्दर उटते हुए तूफान को दायने का प्रयत्न कर यो हो। शश के लिये वहपती दुई पट्टखाई हरिपाली दर तक फैली हुई थी। उभा दीदती हुई यायकों को भाया को और वा देख रहा थी! लेकिन या देख रही थी कुछ नहीं। फा सुन्दर था यह समय जब उसे भी यह अधिकार प्रास हुया था! एम.ए. पास कर थुकने के बार एल.एल.बी. झाइन में : रहे थे। एक दिन अपने एक मित्र के साथ, जो उसके पिता के भी मित्र थे,से उसके घर गये थे। रिता मे पदर जा कर वसे पान खाने की शादीपीसर पिता के पादेशानुसार एक सुश्तरो में पान देकर या उसमें गई यो प्रतारने से माय भाकर देखा था। उसने भी धम्हें देखापा एक बार हिनने म सगे थे !रतरी में रख कराटा से खोर भाई भी, लेकिन बौटने की जो मही चाहता था। सदिन मन में एक सारा गई थी, और भागेका पारधी 1 एक पखवारे के बाद उसके रिवा मार के पिता के पाप विवाद का मरना हर गये थे, मोर मार के पिता ने शिया- पूर्वक इनकार कर दिया यातिने सोकर उसके पिता घरबौ मेसिपत में प्रजापति पराक कम थे, किन उनी Finarपा, यही भदवा पर अपनी पुत्री पागा मानस गों को मार की स्त्रीति से गहरी चोट पो भयर सब सुगरमनार में शिकोह का RTET या दिम होने अपने में सारा दिया था कि या तो बार कर की माता के साथ farगे । आपन भर कौमारा *गे। गुमाह पुरीले पर खानेरिया मेर भयकोले TEET निरासादिया था। र मारगुपदाप को पुराने माना Auratioमार मरमोहन THE TRare मामी वयाची हमें परति genामों को मुERSEE मा finar NITIN माई दी और प्रतिद्वनीसगीशी mait चूड़ियाँ दोनों का पारस्परिक सुख अपनो पराकाष्ठा को पहुँच गया था। पथिक मंजिल पर पहुँच कर मानन्द से विभोर हो गये थे। उसी वर्ष वकालत की परीक्षा में भी ये उत्तीर्ण हो गये थे। घे असे कितना प्यार करते थे ! वह अपने को धन्य मानती थी, और कामना करती थी कि प्रत्येक स्त्री को प्रताप जैसा ही पति मिले। लेकिन अकसर एकान्त में उसके मन में यह विचार उटसा कि उसकी रस भरी गागर कहीं झूला न जाय, गिर कर टूट न जाय । तप किसी अशात भाशंका के पातंक से उसका मन मर जाता। नागपंचमी का ही वह भी दिन था। साधारण नियम के विपरीत कारणवश उसे ससुराल में ही रुकी रहना पड़ा था। वह सारे दिन हवा में उद्दतो रही थी। उसका हृदय रल्लास से उछला पड़ रहा था। अन्तर्दश में किसी चिन्ता को, किसी अशान्ति को छापा नहीं थी। प्रामोद किलकारियो मार रहा था, जीवन रस घोल रहा था-रंगीन, मदमाती तितनी की तरह उस रहा था पळ-पक्ष । दिन चीता । रात भाई । ग्यारह बजे । उसने शयनागार में प्रवेश किया । प्रताप ने उसे सपल भुजाओं में भर लिया। फिर उन्होंने उसका नख से शिख तक अपने हाथों से भंगार किया और पूड़ियाँ पहिनाई, जो खुद मातार से ननरीद कर लाये थे। "इस समय परी लग रही हो तुम!" "रहने भी दो" "सच कहता हूँ, चाया।" "परियाँ इन्द्रपुरी में रहती है। यह तो मानव-लोक है।" वे हस पड़े। "उतना सिलानो, जितना हजम हो सके !" "बदहजमो से दरती हो।" "त, खरती हूँ।" और- ओस् मर-मर गिरने लगे उसकी प्रॉखों से। x X x दरवाजा खखड़ा उठा। "बोठी चाची" ६ फिर मिलेंगे । प्रकार का अधिकार होना चाहिये। कहाँ है ग्रास उसके पास वह अधिकार हाय रेजना भाग्य! माकाश में बादल उमड़ने लगे थे । हश बन्द यो । प्रकृति मौन थो, मानो अन्दर उठते हुए तूझान को दायने का प्रयत्न कर रही हो। अल के लिये तदपठी हुई कुम्हलाई हरियाजी दूर तक फैली हुई थी। उधर दौसी हुई बादलों को छाया की और यह देख रहा थी ! लेकिन यह देख रही थी कुछ नहीं। कैसा सुन्दर था यह समय जब उसे भी वह अधिकार प्राक्ष हुधा था! एम० ए० पास कर चुकने के बाद वे एल एल. पी. फाइनल में पद रहे थे। एक दिन अपने एक मित्र के साथ, जो उसके पिता के भी मित्र थे, घे उसके घर गये थे। पिता ने अन्दर आ कर उसे पान खाने की धाज्ञा दी थी। तब पिता के आदेशानुसार एक तरतरों में पान ले कर वह बैठक में गई थी ! प्रताप ने उसे आँख भर कर देखा था। उसने भी सन्हें देखा या एक बार कितने अच्छे लगे थे ये तश्तरी मे पर रस कर यह बैठक से लौट भाई थी, लेकिन लौटने को तो नहीं चाहता था। उस दिन उसके मन में एक साय यस गई थी, भोर भागे बद्ध कर वह साथ पूरी हुई थी। एक पखवारे के बाद उसके पिता प्राप के पिता के पास विवाद का प्रस्ताव दे कर गये थे, और प्रताप के पिता मे शिष्टता पूर्वक इनकार कर दिया था। कितने उदास होकर उसके पिता पर जोर थे। सिपत में प्रताप के पिता से वे येशक कम थे, लेकिन उन्हें अपना कुमानता पर, अपनी भद्रता पर, अपनी पुत्री पर गर्व था। उनके उस ग को प्रचार के पिता की मस्वीकृति से गहरी चोट पहुंची थी। यह सा सुन कर मनार ने विद्रोह का डा उठाया था। एक दिन उन्होंने अपने पिता से साफ साफ कह दिया था कि वे या तो बाबू कमलदिशोर की पुत्री भाशालता के साथ विवाह करेंगे या जीवन भर कौमार्य-यन धारण यि रहेंगे । गुमाद पुत्र को टीक रास्ते पर खाने को पिता ने हर शाहकोशिश की थी, लेकिन उसका निश्चय भद्र सावित हुमा था। साय ममयूर होकर बापू गुरसहाय को पुत्र के दुरामह के सामने झुकन पड़ा था। उसी वर्ष शुम लग्न में उसके मनमोहन से उसका शुभ विवाह सम्परा प्राभारा एक प्रतिष्ठित स्थानीय देने में वर-वधू का चित्र प्रकाशित माशा दोनों का भूरि-भूरि प्रशसा हुई थी। माप से विवाह कर पद समुराख प्राई थी।चौर अधम मिलन की उम रंगीली राती उन चूड़ियाँ दोनों का पारस्परिक सुख अपनो पराकाष्ठा को पहुँच गया था। पथिक मंजिल पर पहुँच कर मानन्द से विभोर हो गये थे । उसो वर्ष बहालत की परीघा में भी वे उत्तीर्ण हो गये थे। धे उसे कितना प्यार करते थे ! वह अपने को धन्य मानती थी, और कामना करती थी कि प्रत्येक स्त्रों को प्रताप-जैसा ही पति मिखे। लेकिन अकसर एकान्त में इसके मन में यह विचार उठता कि उसकी रस-भरी गागर कहीं छलक न जाय, गिर कर टूट न जाय । सय किसी अज्ञात पाशंका के अातंक से उसका मन मर जाता। नाग-पंचमी का ही यह भी दिन मा। साधारण नियम के विपरीत कारणवश उसे ससुराल में ही रुकी रहना पड़ा था। यह सारे दिन हवा में उड़ती रही थी। उसका हृदय उल्लास से उछला पड़ रहा था। .अन्तर्देश में किसी चिन्ता की, किसी अशान्ति की छाया नहीं थी। आमोद किलकारियां मार रहा था, जीवन रस घोल रहा था-रंगीन, मदमाती तितली की तरह उड़ रहा था पल-पल । दिन पीता । रात थाई । ग्यारह मजे । उसने शयनागार में प्रवेश किया । प्रताप ने उसे सयल भुजामों में भर लिया। फिर उन्होंने उसका नख से शिक्षा सक अपने हायों से शृंगार किया और चूड़ियाँ पहिनाई, जो नुद पाजार से खरीद कर खाये थे। "इस समय परी लग रही हो तुम!" "रहने भी दो" "सच कहता हूँ, पाशा।" "परियों एनपुरी में रहती हैं। यह तो मानव-लोक है।" वे इस पदे। "उतना खियाभो, जितना काम हो सके!" "पदमामी से दरती हो?" "हां, बरती हूँ।" और- मास् मर-मर गिरने लगे उसकी आँखों से। x x x मरवाशाखड़ा उठा। "छोटी साधी

८
"दरयामा स्रोखो, यो पानी!"
है
.
रहमोकादायमा NRew
EXPERT दराई।
मने दिया परना है, पोरी पात्रो,"सा में -
"मी"
माई पर पेट गई। गौर में भाग हो गई।
"मने भूनियाँ महा महिनी, मोरी पाधी !"
"asanी चाची।"
"मुझे चरियों नहीं दिनमी चाहिए।
"पदयों
"मी तुमपोटी हो, की ही जागी, शव वह हार
को मालूम हो जाया
"दीपाची"
सर नहीं मिक्षाला मे उसकी पर देखा ।
"मरे, सुम रो रही हो, छोटी चाची!"
प्राशा यावदने यो । सभा उससे लिपट गई।
"न रोधी, कोशाचीन रोमो !" रोनी भाषा में AFT में
अनुनय किया।
"महा, यिडिया, रोसी नदी है," मराये हुए पठ में पाशा ने कहा
और समसेच उसकी कार पर किया देनेखनी।
रात भीग चुकी थी। पानी परस र निषश गया था पाका के
काळे परदे में हारे महमा रहे थे, पर हर जिबी मा रही
यो । शीतल, माद क्यार बह रही यौ। अपने कमरे में निकी के सामने

फर्श पर विधी हुई घटाई पर पड़ी हुई पाशा प्रकाश की भोर शाक रही. मी विधार चल रहे थे उसके मस्तिष्क में । वह अधिकार क्या उसे पुन: प्रास नहीं हो सस्ता हो क्यों नही सकता ? बस, इस घर को कैद से निकलने भर की देर है। बया वह इस द से निकला नहीं सकती? निकल क्यों नहीं सकती? उसे कौन रोक सकता है? लेकिन इस कैद से निकल कर यह कहा जायगी? प्रमोद के पास पागल प्रमोद कल्पना का रंगीन चश्मा लगा कर देखने से जो वस्तु रंगीन दीखती है, यह सचमुच रंगीन हो तो नहीं जाती। पचा सिलीना देख कर मचलता है, किन्तु उस खिलौने के प्रति. उसका श्राफर्पण सदैव यना तो नहीं रहता' पुरुष स्त्री के प्रति प्राकृष्ट होता है, किन्तु केवल उम नी का शरीर पा कर यह सन्तुए नहीं रह सकता ! सन्तुष्ट रहने के लिये उस प्री से उसे और कुछ चाहिये ।, प्रमोद को देने के लिये उसके पास और कुछ कहाँ है ? यह तो उस. ग्यन्धि के साथ चला गया, जिसने पहले-पहल उसके जीवन में श्रा कर उसके हृदय को झंकृत किया और समस्त बाधाओं से लड़ कर उसे अपनी धनाया। इस परिवार से प्रमोद का दूर का सम्बन्ध था। धनी पिता का यह पुग्न था, स्वरूपवान् था, सुशिक्षित था, सभ्य था, हंसमुष्ट था, गम्भीर था, भावुक था, दिलवाला था, और दिल की कद्र कर सकता था। अक- सर वह इस घर में प्राता और उससे मिलता। कभी कोई भी बाते उसने नहीं की। लेकिन प्रताप की मृत्यु के एक वर्ष के बाद एक दिन उसने अपना हृदय उसके सामने खोल कर रख दिया। वह उसके कमरे में पाया, नमस्कार किया, और उसके सामने एक पत्र फेंक कर चला गया । अनाप-शनाप बातें भरी थीं उस पत्र में। उसके प्रति अपने अगाध प्रणय की चर्चा उसने की थी, और याचना की थी उससे उसकी प्रीति की ...सुम्हें में क्यों चाहता हूँ, यह मैं नहीं जानता । प्रणय सर्क पर आधारित नहीं होता। उसकी जद जिस गहराई में होती है, यही तर्य की पहुँच नहीं हो सकती । मैं तो सिर्फ यह जानता हूँ कि तुम जैसी स्त्री मैंने घाज तक नहीं देखी। मैं देखता हूँ तुम में सम्पूर्ण नीराव का रूप, और उसकी आराधना करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरा यह निरर्थक जीवन सुन्हें पा कर सार्थक हो जायगा। मेरी बन सकोगी, पाशा? मेरी ओर कोई बाधा नहीं है। अपनी इच्छा-अनिरमा, मधि- - रिमिगे भरुषि, विश्वास अविश्वास का स्वामी मैं स्वर है, और मेरे को पर किसी अन्य व्यक्ति का नियत्रण नहीं है। इस मामले में किसी के विधारों की परवाह में नहीं करूंगा। म्हारी भोरमो कोई सधन पद सकेगा, यदि म सहमत हो सको। तुम भी स्वाय हो चौर में भी स्थान है। मुधारयादी दर से इम विवाह के सूत्र में कर यह मा कहाँबयन स्वतनवा-पूर्वक र सश्ते हैं। नीयन माग रहाका चाहने में पग पग पर दियाँ हैं, किता के साथ दो लेने से पता आसा से कर सकता है | बो मुझ परना , अनुरोध करता है, बिनय करता ह, मिया मांगता है। कभी साथ नहीं छोदूंगा, धन देता हूँ ! कमी इस पवन से हटते देखना, तो मरा काम तमाम बरमा । मेवा पन कर जी11 में स्वय पसन्द करूंगा। "ऐसी ही बात उस पर में भरी थी। इसे पद कर यह प्रसन्न नहीं हुई। उसने उसे मार डालना पाहा, जया दालमा पाहा, लेकिन यह सम या कुछ नहीं कर सकी। तीन दिन के बाद यह पाया। “तर माँगने पाया हूँ मानी।" "उत्तर "हा, उत्तर " "मो कुछ चाहते हो, लाला, मह मेरे पास नहीं है।' ' यमही मान सका।" 'न मानना चाहो, तो न मानो।' सब कुछ उपहार पास है। न देना चाहो, सो नदो।' "खाली घोर से सन्तुष्ट रह सकोगे? “चिदिया भी है घोसले में। यह भूख है तुम्हारी । यह तो उदगई। "लेकिन मैं दो उसे देख रहा हूँ।' 'यह तुम्हारी दृष्टि का भ्रम है। 'और अगर उन्हें ही नम हो रहा हो तो!" 4 - वह विचारों में इष गई। दुविधा सामने ब्रा खड़ी हुई। "खूब सोच-विचार कर उसा देना । कोई जल्दी नहीं है। में प्रीचा कर सता हूँ।'

चूड़ियाँ प्रमोद चला गया। वह चिन्न-लिखित-सी बैठी रही। एक पखवारे के बाद वह फिर घाया, लेकिन उत्तर न पा सका। यह बराबर माता और निराश होकर लौट जाता। वह प्रतीक्षा करता रहा-करता रहा। प्रमोद का कथन सत्य है । वह स्वयं भ्रम में है ? नहीं, नहीं। किन्तु यह दुःख का भारी बोझ लिये क्यों जी रही है ? उसके मन में कामनायें क्यों उठतो हैं ! उसे संसार से उठ जाने की प्रेरणा नहीं हुई। कठोर अनुशासन को प्रतिक्रिया कामनामों को जन्म दे रही है। किन्तु प्रमोद दीवाना प्रमोद ! भयावनी रात थी। रोग-शयया पर थचेन पहे थे प्रताप । चालीस दिन बीत चुके थे, लेकिन ना उतरने का नाम नहीं लेता था। उनका सुन्दर, पलिन् शरीर सूख कर कोसा हो गया था। कमरे में मोमबत्ती का मन्द प्रकाश फैजा था। एक कुरसी पर बैठी हुई चिन्तित न्टि से वह उनके मुमाये चेहरे की भोर देख रहो या। सहसा उन्होंने बखें खोली। "माशा !" “जीदों।" "उजड़ा जा रहा है मेरा संसार ! विवश हूँ, धाशा।" "यह क्या कह रहे है भार" "विलकुल ठीक कह रहा हूँ।" "शाम्त रहिए । उत्तेमित न होइये । मादा बात न कीजिए। दादर ने मना किया है।" "यादा बात करने की मुझे इच्छा भी नहीं है । श्रम, तुमसे एक मात कहना चाहता है। अभी मोका है। थोड़ी देर के बाद निकला जायमा मौका आशा को प्रोतों में आँसू न पाये। "मय में जा रहा हूँ, पाशा । दुःख से लड़ना । मुख से रहने को कोशिश करना । मुझे भूल न जाना ।" भाशा की घाखों से प्रास् पहने लगे। "रोमो नहीं प्राशा, रोयो नहीं ! मुझे कष्ट हो रहा है। यो..." ये अचेत हो गये। उनका शरीर प्रकाने लगाया चीत

३२
पर समास सोग र प|mai REET BEIR ।
A EYE PY Exit या ईम:
सभी मी, Ri! Reो ! म में भो ।
minई मागी मनाए ।
ग योग पो ! माघर में रह गई। उसे मोकामपा मा,
किग सो इमकार र दिमा का एक और कोई
गा, रहमी "
"मेरा एक काम का दोगी !"
"पों न कही।"
"मेरे लिए दिया हो।"
कर बया करोगी, बी!"
TRI, मुझे।"
"हो माता दूंगी।"
"मो बुदिहातिम यह पाती है धनी के नाम से बना
Frमई मामबली मया दो। यह क्षोपया।"
"श्रमीयामास पीके पार"
"अभी पी जामो, भूरे की मला दाल पीसना ।
इमाम Fatहिमी से यह पास मकहना।
"महामो, इतमीनार मो, यिो मे कुप म कमी। मेनी
भारत मी नहीं है।मी होती, तो मरे भादसियों को बीच से
रिकती?" यह चली गई।
प्राध घटेरे बाद मही पास पाई। पूरिया मा पाली
KRIT ने दो इनाम दिया, औr for ताका कि इस बात थी
भी यह रिपीसेम करे।
दिन पीला । रातभाषी । ग्या ये काम धधे से लिपट कर
भाशर अपने कमरे में पहुँसी । उसने अपना
दान किया, और
और जमाया । फिर ४ चपना गार करने लगी। शो, पो में
महावर लगाया, हाथों में धूपियो पहिलो, माग में सिन्दूर भा, हो र

चूड़ियाँ फ्रोम और पाउडर मक्षा, नाखून और यौट रंगे, गहने पहिने, रेशमी साही घारण की, रेशमी जर पहिना, इत्र लगाया, पाग खाया। इस सरह सम-धम कर वह उधर रस्से हुए दर्पण के सामने जा खड़ी हुई। 'इस समय परी लग रही हो तुम ! म रठे प्रतार के ये शब्द उसके कानों में । उसका रोम-रोम पुखकायमान हो उठा। बड़ी सावधानी से उसने सेज विमाई, और उस पर पूज बिखेरे । फिर एक सन्जून से पति का एक फोटो निकाल कर यह सेज पर जा बैठी। यह उस चित्र को मंगमुग्ध-सी देखने लगी। यह उसे देर तक पेटो देखती रही। उसके चेहरे पर थगणित भाव यायेगये। सहसा उठ कर उसने एक सन्दूक खोली, और उसमें से कुछ निकाल कर खाया। फिर पति के चित्र को सीने से चिपका कर वह सेज पर लेट गई। उसके पाठों पर अद्भुत मुस्कान नृत्य करने लगी। उसके चेहरे पर विजय-गर्व व्यक्त हो गया। रात बीती । सवेरा हुधा । दिन चढ़ा। "छोटी बहू ! यो छोटो यह !" सास ने आवाज लगाई-"यान सोती ही रहेगी पया ? साना का यनेगा ? अाज भी छुट्टी का दिन है कोई उत्तर नहीं मिला। “चाइजी थाह ! देखो तो दोदा ! सादे सात बज गये, अभी सक सो रही है ! काम में जी ही नहीं लगता।" "रहने दो, अम्मा जी " ममली यहू ने जमा-"माती होंगी।" "रहने क्या दूं? यह बच्चन मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं तो साफ यात करती हूँ, चाहे किसी को अच्छी खगे या पुरी।" "शेज़ तो यह सड़के हो उठती हैं। देखो, में जा कर देखती हूँ क्या बात है।" मैंझली बहू थाशा के कमरे के सामने पहुंची। "दुलहिन ! दुलहिन !" कोई उत्तर नहीं मिला। दरवाजा खटखटाया। कोई नतीजा नहीं हुधा। उनका माथा ठनका। "जीजी! जीजी" "क्या है" "जरा यहाँ तो भाभो । अम्माजी को भी पुराना" क्या?"

1
के प्रोमो भी मा
kar भगाई गई। दराडा पोटा
ITI कोई often RATHI मरो' को प्रमादी गई।
माग में
फोटो को सीने में गाय दुपा मी पनी मे पापों
थी। Rence वा कोहराम मच गम' में सलाद
एका साया गयाारसने गरी
"ER से कम परे पर मर जी, मेरादी-
"Eri मा प्रा प्राम-डाया।"
"मणा माना तो टीका होगा, र साम," प शुरु
महापा
.
"
महिए, सार य:" दम-दम के कई मोदार के
दाय में देते हुए वापू माह में यहा।
"बेहता," मद में रखते हुए सरर गे रनिया--"तुझे
कोई नहीं है। मैं मागको सकिरदेगा।"
"मोहनायत होगी।"
मदं पार चले गये।माधोगा कि महो गया।
"ऐसा ना Har, से गुस की भी हो रही हो
भर कर एक भी में कहा- ऐसी सुबहता, भी जयानी यौ। ऐसा
धन्त !दायरे माय"
एक घटा मोसा अर्थो अन्दर पाई।
"भुशा की माँ !" माये हुए शश में मायू. गुरसहाय ने कहा-
"मह जिस साह है उसी घर से भी गयो। उसको कोई
चीन उतारी आई देवी थी, सती भी !"
।

भूल पर भूल
१७
नहीं। काम हो कर रही थी। कह रही हूँ कि
घात-बात पर विग दिना तो तुमसे रहा हो
है, और सुम सीधी-सादी हो"
पता चलता। दिन भर काम में लगी रहती
मही रहता"
तो हो, पौर में बलवा रहता हूँ!"
से पाई, मेरी किस्मत फूट गई !"
करके मैंने भी सस्त गलती की!"
न्ति क्यों नहीं देते"
खदायेगी, तो भी मजा यस्या दूंगा।"
भयावह समारा पा गया। दोनों मन ही मन अपने
जसमे लगे। पान पति के सामने रख कर, किमोन
पर, बबिता सेगी मे कमरे के बाहर निकल गई।
कर, एदी ने का, महेश पता चला गया।
साधारण घटना की पाया, यह भाकार धारण कर,
। योमकी सब बदी रही। सनपा समय जय
लोटा न भी यह दहिया । उसे देराद ही समझी
दावाशी ! मुना?"
र, मशिनता को पाया इट गई । प्रसन्न होकर

भूल पर भूल महेश दाहता है कि क्यों हो या भोजन या मागा करके रहे, अजिता तुरन्त पाम पेश को। काजता पानोप्य सायाधि से अनमित नहीं है, व्यनिष्ठा का उपेश भी यह नहीं करती। भी जय किसी न किसी कारण, कमी विखम्म हो जाता है भौर महेश भाये से यादर होने लगता है, तब युग-युग से प्रतादित गारोप को स्यमा मानो उसके व्यक्तित्व के द्वारा मिनार का ऊँचा कर देती है। उसे समय एक साधारण सी प्रतीत होने वाली घटना भयंकर रूप धारण कर उन दोनों के बीच एक दुर्जेय ग को रचना का देता है। एक पान को ही यात क्या, ओक ऐसी ही मामूली या उन दोनों के सम्बन्ध के बन्धन पर नियही माघाम करती रहती है। एकता पिंजड़े में बन्द दो विभिध घमाव याो पहियों की भांति शान्तिपूर्वक एकसाथ रहने में घे घाममर्थ है। किन्तु उस कारागार से निकल कर स्पनर हो जाने के लिए जिप नीति की भावश्यकता है, उसका दोनों में अभाव है। श्राम की ही बात को क्षीजिये। समेरे जब महेश ने ट्रक से धुली दुई कमी निकाली थी, तब उसने देखा था कि कई घटन हर गये है। उसी समय ललिता से नये बटन लगा देने की उसने ताकीद कर दी थी. किन्तु भोजन कर चुकने के बाद अब पहिलने के लिए उसने कमौत सठाई सय बटन नही बगे थे। बस, उसके दिमाग का पारा चढ़ने लगा। एक चोर घटाई पर बैठी हुई ललिता पान जगा रही थी। उसकी प्रार असतोपपूर्ण दृष्टि से देख कर मरचाई हुई प्राIF में उसने कहा- "यटन तुमने अभी तक नहीं लगा!" "श्रमी लगाये देती हूँ।" "बगाये देती है ! यहा देर हो रही है, और तुम्हें कोई कही नहीं है। इसीलिए मैंने सवेरे कह दिया था, लेकिन तुम्हारी तो हर काम को राज देने की

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भूल पर भूल यो तो जब कभी उसे कहीं जाना होता था, वह रेलवे स्टेशन पर ठीक वक्त ही पर पहुँचता था। किन्तु श्राज या प्राध-घण्टा पहले ही स्टेशन पर पहुँच गया। रेलवे स्टेशन पर मनोरंजन तथा अध्ययन के सामान का प्रभाव नहीं रहता। देखने वाली श्रॉखों को वहाँ बहुत कुछ देखने को मिल जाता है। विद्युत् प्रकाश से भालोकित प्लेटफार्म पर पूरी चहल-पहल थी। विमिन सम्प्रदाय, जाति तथा रंग के यात्री, खाँचवाले, फेरीवाले, कुलो और अपने बड़प्पन में चूर कर्मचारी गाड़ी का इन्तज़ार कर रहे थे। किन्तु महेश को मनोरञ्जन के किसी धाला साधन की श्रावश्यकता न थी। यह तो एक ही चिन्न अपने भीतर- बाहर, चारों ओर देख रहा था। और वह चिन्न था उसी का, जिसका स्वागत करने के लिये यह इस समय वहाँ उपस्थित था। उस चित्र को लेकर भाँति-भांति की जो कल्पनायें उसके मस्तिष्क में उठ रही थीं, उन्हीं में यह तल्लीन था । सीटी देवी, भक-भक, झक-झक करती हुई गाड़ी भा पहुंची। प्रखं चेतना की दशा भंग हो गई । कल्पना-लोक से उसे प्रत्यक्ष जगन में आना पड़ा। पाक कर, बैंच छोड़ कर, यह उठ खड़ा हुा । गाड़ी रुकी। सब झपटे । वह भी लपका। कर्ण कटु शोर मच गया। चढ़ते-उतरते हुए मुसाफिरों की रेल पेल, धकम-धका सहता हा वह एक-एक दिया देखने लगा । आगे के सारे दिबे देख अाया, किन्तु वा दिखाई नदी। तम यह मुड़ कर तेजी से पीछे चला। उसे दूर जाना नहीं पदा । इंटर के एक डिब्ये के सामने यह खड़ी थी। एक नवयुवक कुली से सामान उतरवा रहा था। वह डिव्चे की ओर देख रही था । समीप पहुँच कर वह योला--"माधुरी !" सिहर कर, भुद कर, माधुरी ने उसकी और देखा, और हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। उसने मी हाथ जोड़े। "मजे में रहीं ? एक तण रुक कर, अबरुद्ध करठ से वह बोली-“जी...हाँ।" महेश को ऐसा जान पड़ा, जैसे उससे कोई भारी भूल, कोई भारी अपराध हो गया है। माधुरी के चेहरे की ओर वह ध्यान से देखने "और श्राप ?" - .

१८ रि मिलेंगे मद्देश भी हँसने लगा। "अच्छा, बाला जी, जरा स्टेशन जा कर उसे लिया लाना ।" "अरदा।" मुस्कराता हुधा यह सीढ़ियों को प्रोर बदा। यह भा रही है-पही, जिसने योपन के भारम्भ काल में उस ध्यसिस्व पर अपने व्यक्तित्व का अमिट प्रभाव छोड़ दिया था। किसने साल बीत गये, कितनी मुएं पाई और चली गई, वह स्वयं भी कितना बदल गया है, किन्तु शान्त रप और सरल स्वभाव पाली पह माधुरी अाज भी उसके हृदय के सर्वोच्च प्रासन पर मासीन है। उसकी प्रौदता, उसका ज्ञान उसे उस घासन से हटा नहीं सका। यही श्रान भा रही है। उसका मन मस्ती में थिरक रहा था मयूर की भाँति, जा गगन मण्डल में उमड़ती हुई घटायों को देख कर, पर फैला कर, मस्ती से नाचने लगता है। ऊपर अपने कमरे में पहुँच कर उसने देखा, एक कोने में घटाई पर विषाद की मूर्ति बनी हुई ललिता निश्चल बैठी हुई है। उपेक्षा का जो भाव मन में लिये हुए वह घर लौटा था, वह अब दूर हो चुका था। कुरसी पर बैठ कर मीठे स्वर में उसने कहा--"मेरी धोती कहाँ है?" ललिता निस्तब्ध रही। "लदली!" "जदा हो, ले न लो।" "तुम्ही दे दोगी तो क्या कोई हर्ज हो जायगा?" "मैं तो कोई काम हो नहीं करती! फिर मुझमे कोई कम करने को क्यों करते हो" "मैंने तो यह नहीं कहा था कि मुम कोई काम ही नहीं करती ?" "तुम हर काम को टालती हो, यह कहने का मतलब क्या है?" "इसका मतलब चुछ नहीं है।" "कहने के समय जो मन में आता है दक जाते हो, और बाद कहते हो कि मैंने तो कुछ कहा नहीं था " "अरे बाबा, तुम जीती, मैं हारा ! अर तो सुश हो?" "मेरी खुशी या नातुशी से तुम्हें क्या मतलब है ? महेश ने कोई उत्तान दिया। तब बलिता रठी, और दूसरे कमरे से धोती ले पाई। कुरसी के हाथ पर घोती रस बह गिर चटाई पर जा बैठो। सुखद हो गई।

भूल पर भूल यो तो जब कभी उसे कहीं जाना होता था, वह रेलये-स्टेशन पर हीक बन ही पर पहुँचता था। किन्तु आज यह प्राध-घण्टा पहले हो स्टेशन पर पहुंच गया। रेलवे स्टेशन पर मनोरंजन तथा अध्ययन के सामान का प्रभाव नहीं रहता। देखने वाली प्रायों को यहाँ बहुत-कुछ देखने को मिल जाता है। विद्युत् प्रकाश से भालोकित प्लेटफार्म पर पूरी चहल-पहल थी। विभिन्न सम्प्रदाय, जाति तथा रंग के यात्री, साँधेवाले, फेरीवाले, कुली और अपने बड़प्पन में धूर कर्मचारी गाड़ी का इन्तजार कर रहे थे। किन्तु महेश को मनोरञ्जग किसी बाहर साधन की श्रावश्यकता न थी। वह सो एक ही चित्र अपने भीतर- याहर, चारों ओर देख रहा था। और यह चित्र या उसी का, जिसका स्वागत करने के लिये यह इस समय यहाँ उपस्थित था। उस चित्र को ले कर माँति-भांति की जो कल्पनाये उसके मस्तिष्क में उठ रही थी, उन्हीं में यह तल्लीन था। सीटी देती, भक-भक, मक-मक करती हुई गाड़ी आ पहुंची । अर्द्ध चेतना की दशा भंग हो गई। कल्पना-लोक से उसे प्रत्यस जगत् में थाना पड़ा। चौक कर, बैंच छोड़ कर, वह उठ खदा हुअा। गाड़ी रुकी। सब मपटे । वह भी लपका। कर्ण-कटु शोर मच गया। चढ़ते-उतरते हुए मुसाफिरों की रेल-पेल, धक्कम-धका सहना हुआ वह एक-एक डिम्या देखने लगा। आगे के सारे दिवे देख पाया, किन्तु वह दिखाई नदी। तब यह मुड़ कर तेजी से पीछे चला। उसे दूर जाना नहीं पड़ा। इंटर के एक डिव्ये के सामने यह खड़ी थी। एक नवयुवक कुली से सामान उतावा रहा था। वह दिव्ये की घोर देख रही था। समीप पहुँच कर वह बोला--"माधुरी !" सिहर कर, मुड़ कर, माधुरी ने उसकी ओर देखा, और हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। उसने भी हाथ जोड़े। "मजे में रहीं ?" एक क्षण रुक कर, अपस्द काठ से वह बोली--"जी...हा।" महेश को ऐसा जान पड़ा, जैसे उससे कोई भारी भूल, कोई भारी अपराध हो गया है। माधुरी के चेहरे की ओर वह ज्यान से देखने "और प्राप" लगा।

र मिलगे
एक भी नि.रवास मायका, पहाती ई पाया में शससे
कहा-"किसी......मांगा ।"
"माय" मयुराक मे समोर प्रारकहा।
"पा मेरे देवा है," मागी मे परिचय दिया।
"प्रया पार पढ़ते है"
"किस पर में।"
" पर में।"
"को मुशी की यात है।"
कुलीने सामान उठाया सव फाटक की भोर चो। पादानित
पर पकान पर सवार हुए। मवयुवक सॉगे धाले के पास में
महेश माधुरी फे। तागा पा पड़ा। महेश ने कहा -"मारह
गया,
मानीत गये।
१ "सुम तो यह सब भूच गई होगी।"
"जो यात असम्भय है, यह सम्मय कैसे हो सकती है?"
"यह तो कहती हो।"
सतोष को सास वींच पर यह निस्ताप हो गया। माधुरी मी
निस्तब्ध बैठी रही।
पचीस मिनट में ये घर पहुँच गये। मिलने मेटने को महत्वपूर्ण
किया भारम्भ हुई। थोड़ी देर में जप सप शान्त हो कर बैठ गई, तब
महेश ने कहा-"देखो, भाभी, नरियत से लिया लाया न !"
"धन्यवाद ! मैं सो दर रही थी कि इसे लेकर कहो......
"इरादा सो था, मामी. "
"फिर क्यों पुक गये"
"मुम्हारे हर से।"
सुमित्रा हंस पड़ी। यह भी हमने लगा। माधुरो मुस्कराई । ललिता
को यह दिल्लगी पसन्द नहीं पाई। महेश ऊपर चला गया।
ऊपर अपने कमरे में पहुँच कर, सिगरेट जज्ञा कर, धारामकुरसी पर
लेट कर, वह उसी मजाक की बात सोचने लगा। भाभी की चोट बड़े

मौके की थी, लेकिन उसके जवाय में यह बात न थी। हाज़िर-जवादी हर श्रादमी में कहाँ होती है ? शायद यह भी एक ईश्वरीय देन है। कैसी शक्ति है इस गुण में ! कमरे में श्रा कर ललिता पति के उत्फुल्ल मुखमण्डल की ओर गम्भीर भाव से देखने लगी। दो-तीन पयों में जब उसे उसके श्रागमन का ज्ञान हुआ तब महेश ने मुस्कराती हुई आँखों से उसकी घोर देखा। "श्राज तो ऐसे खुश हो, जैसे कहीं गड़ा हुआ सजाना पा गये चोट खा कर, गम्भोर हो कर, ललिता के चेहरे की ओर प्रश्नसूचक रष्टि से देख कर, वह बोला-"इसका मतलब ?" "इसका मतलब क्या तुम नहीं समझते?" "तुम्हारा इशारा माधुरी की तरफ़ है न?" "हा, हा, उसी की साफ है, जिसकी तारीफ करते तुम्हारी जयान नहीं थकती।" "जो तारीफ के खायक है उसकी तारीफ करनी ही पड़ती है।" "सारा जमाना तारीफ़ के लायक है। अगर कोई नहीं है तो यह "तुम तारीफ के लायक नहीं हो, इसका एक सबूत तो यही है कि सुम एक ऐसी खी से बात करती हो, जिसे तुम अभी नहीं जानती।" "इसमें क्या शक है ! मैं नालापक हूँ, मैं साह करती है, मुझ में सारे संसार के अवगुण भरे हैं ! फिर जब मैं ऐसी युरो हूँ, सब मेरे साथ शादी करने की क्या जरूरत थी ?" "यह मेरे वश की बात नहीं थी।" "तम जो पात तुम्हारे परा की हो, उसे अव कर डालो।" "वस, नामोश रहो!" सोध से कॉपती हुई ललिता तेजी से कमरे के बाहर चली गई। नया सिगरेट जला कर महेश कश पर कश खींचने लगा। एक मगढ़ा समास होते ही दूसरा भारम्न हो गया। इस तरह कैसे काम चलेगा? निस्य की इस कुवन, इस अनन का कहाँ अन्त होगा! जिम स्त्री में सहनशीलता का ऐसा श्रमाव है, उसके सायं किस तरह निवांद किया जायगा गहन धेदना उसके मन में उमड़ पड़ी। ग्यारह साल पहले की स्मृतियाँ जाग पड़ी। एक श्य सामने RAKHNATunari at Tan मैं भी नई गनिमा मारो मोदी भी मामी harst Ragni में एक net पोर ", भाit1" महंग में गा! "न"RErani रिदिन माई" र नमुनी र ख गरि oner सरा भार " म" "यम पम खाई हो, TREATRA " सार " "मरगा "वपन दे रहे amat, पीये नाम कर माला )" "Kare avataiमो में महा।" "en, ira! मापुरी! मी गो इस पर। इनमा समाने मे काम म पगा माgit मिमद कर दीवार मे पिगई। पुमित्रा ममे । मोग भी गरमाने am | TREkी-रका में किया गया पर HAIR Rin हिममें पाकर गया । इसी दिन एकान्त में गा माधुरी से मिना ! माधुरी मी मोमिने के लिए कम करमुकाम घो। यही कार में दोनो मिन गये! उसने कहा-"मेरे साप शारीरोगी, मारी!" "पया मेरे पशी यार" "fe यदि यह तुम्हारे पराकी पान लोगो?" "तो में क्यों इनकार करती?" अपप के इस आयासन से उसे दिलना मसाप मारा था! दिन प्रति दिन एक-दुसरे के प्रति दोनों की प्रामा, यसो गई। माधुरी को मदेश में शादर्श पुरुष का दर्शन मास मा या, और महेश को माधुरी में प्रदर्श नारी का उन दोनों के पररिक माओ मे Int भूल पर मूल २३ सुमित्रा अनभिज्ञ न थी। भविष्य के विचार से बड़ी हुई अपनी कीम को सफल होती देख का यह अत्यन्त प्रसन्ना पी। अन्त में बिदाई-जुदाई का दुर्दिन पा ही पहुँचा । अनिर्वचनीय मनोभ्यया के धौंसू यहा कर, एक-दूसरे को पत्र लिखने का वचन दे कर, दोनों जुदा हुए। माधुरी अपने घर धनी गई। महेश के दुःख का पारावार न था । कई दिनों के बाद जब उसे माधुरी का प्रथम पत्र प्राप्त हुना, तय उसे कुछ शान्ति मिली। उसने भी तुरन्त उत्तर दिया । पन-व्यवहार जारी रहा। दो मास के बाद माधुरी के पिता ने मद्देश के पिता को पत्र लिख कर माधुरी के साय महेश के विवाह का प्रस्ताव किया।पूरी तरह जाँच-पड़ताल करके, महेश के पिता ने माधुरी के पिता को लिखा-"पारकी लड़की के साथ अपने लड़के की शादी करने में मुझे कोई उन नहीं है, लेकिन भाप यह तो लिखिए कि पाप कितना इंगे।" माधुरी के पिता ने धन्यवाद देकर पूछ। कि ये कितना लेंगे। महेश के पिता ने तीन हजार मांगे। माधुरी के पिता दो हजार देने को राजी हुए। महेश के पिता इतने पर राजी नहीं हुए। माधुरी के पिता ने अधिक देने में अपनी असमर्थता प्रकट की। महेश के पिता ने लिखा-"जितना कह चुका है, उससे कम न लूंगा। थापने शिगूल मेरा और अपना समय नष्ट किया।" माधुरी विता ने उत्तर दिया-"मैं नहीं जानता था कि जनाय का वक्त इतना कीमती है, यनों उसे नष्ट करने का हर्गिज़ साहस न करता ! क्या रुपया- पैसा ही सब कुछ है, ईमानिपत, मुरीवत कोई चीज नहीं ?" बस, दो- एक कड़े खत और भाये गये, और प्रस्ताव रद हो गया। मद्देश और माधुरी के ऊपर दुःख का पहाइ टूद पड़ा।महेश ने माधुरी को लिखा- "पिता जी यद्दे जिद्दी आदमी है। और ये नहीं मानते तो न मानें । मुझे इसकी परवाह नहीं है। मेरी राय तो यह है कि हम दोनों कहीं निकल चले। इतने बड़े संसार में हमें कहीं न कहीं आध्रय अवश्य मिल जायगा । बोलो, माधुरी, तुम में साहस है ?" माधुरी ने उत्तर दिया-- "आपका प्रस्ताव तो विल्कुल टीक है, किन्तु श्राप पुरुष हैं, और मैं स्त्री है। समाज में स्त्री की स्थिति पुरुप से भिन्न होती है। पुरुष को हमारा समाज प्रासानी से माफ कर देता है, किन्तु सो के प्रति ऐसी उदारता दिखाना उचित नहीं समझता। समाज की उपेक्षा और निन्दा सहन कर सकने की शक्ति में अपने में नहीं पाती। फिर, हमारे उस कृस्प के कारण हमारे कुटुम्बवालों को जिस विकट अपमान का सामना करना रि मिलेंगे पहेगा, उसकी वयना करती है, तो लोप war है। धाके बिना मुझे भी RRE inार मुमा शिवाई देता , यदि मेरे माम्य में मेरमा मातो मुझे इसे शासिक भेषनागारिए प्रार अब मुझे भूख जाने की कोशिश कीजिए। मैं भी आपको मानेका प्रयम" मह जब महेश को मिला, तो उसको सीमी माशा भी जाती रही । रापुरी को उसमे पिन कोई मालिसा धीरे-धी माधुरी के आदेश के प्रोचिप को उसे स्वीकार करना पड़ा। ज्योज्यो समय भागने लगा, उसकी मनोवेदना का भार मी का होने . महेश 1 . या मीर, शुष्क, जारा नीवन ! यह 'भमाइत को संग! या रवत्रा एवं जीका में किन्तु यदि मारी उस समय उसके मरवा का विरोध न करतो, उसमें सहमत हो जायो, हो कैसा सुन्दर होता या जीवन-शैल-शिखर की मोति उथ, गंगा-शंख को भाति पवित्र! ममा सौय तो उम दोनों की उपेचा कर न सकता "पादूमी " कमरे में भा कर नौकर ने कहा। "खाना खाने सजिए।" "जा कर कह दो कि सक्षम मैं माना नागा" "बहुत था।"भीकर चला गया। " पिर विचारों में मग्न हो गया। दो मिनट के बाद सुमित्रा को कमरे में प्रवेश किया। "साना साने असो, खाना" "मैं इस वक्त नहीं खाऊँगा।" "सपीश्रत ठीक नहीं है।" "तबीयत ठीक नहीं है, या और कोई बात है?" यह निस्तब्ध रहा। "मैं पहले ही समझ गई थी। इस वकषयों झगड़ा क्यों भूल पर भूल २५ - "एक थेमराजय की शान पर । उसका मिजास ऐसा खराय है कि मैं तो हैरान हो गया हूँ।" "तो क्या तुम्हारे भोजन न करने से उसका मिज़ाज ठीक हो जायगा ?" "तुम समझदार हो, यह मासमम है। मौके पर थोड़ी दौर-फटकार और बाद में समझाने-बुझाने से ही यह सुधर सकती है। लड़ कर, रूड 'आने से यह काम नहीं हो सकता।" "पया मैं समझाता श्रुझासा नहीं ? लेकिन उसके दिमाग में तो कूड़ा "कूदे को देख कर महाने से तो वह साफ नहीं हो सकता ! सत्र से शुट कर साफ करने से ही वह साफ हो सकता है । उठो, चलो।" महेश उठकर सुमित्रा के साथ नीचे चला गया। ने भरा है।" पह बोला। दूसरे दिन की बात है। सवेरे का समय था! धारामकुरसी पर महेश समाचार-पत्र पड़ रहा था। माधुरी ने कमरे में प्रवेश किया । उसे देख कर महेश उठ बैठा। "प्रायो, धैठो।" माधुरी पदाई की और बदी। "नहीं, नहीं, इस पर धैठो,' एक कुरसी की भोर संकेत करके माधुरी कुरसी पर बैठ गई। "यहिन कहाँ है ?" "नीचे होगी।" उसके माथे पर सिकुड़न पड़ गई। महेश के चेहरे की ओर देख कर माधुरी ने कहा---' ---"उन से आपकी नहीं पटती क्या ?" "नहीं । मुम्हें कैसे मालूम हुअा ?" "दीदी कहती थी।" "ऐसी बदमिजाज औरत से किसी की नहीं पट सकती।" माधुरी निस्तब्ध रहो। "कल की ही यात ले लो। जनती हो, कल रात को क्यों झगड़ा हुआ था" पर मिलने y माधुरो ने उराई जहरे को और अनिकाल देना। "मसिए मेिं शुम्हारे जाने से मुश धा!" समता की धाया माधुरी के मुगमएल पर आई और आई गई। कई पोषक गुप रह कर यह बोली-"अपनी पूरी भर महोने देते, तो श्पा हो जाता " "अपनी शुशी की कोई पात मैंने उससे नही यही थी।" सभाप पारे में कह दिया होगा। "मुझे पूरा देख कर हमे पिने को तो Tarai?" "टनका माखुश होना बिलकु स्वाभाविकमा!" "माँ" "हए कि कोई भी यह नहीं चाहती कि Tut मई किमी दूसरीनी को देखकर एशो!" गम्भीर Eि से वह पर चहरे को और देखने लminनी उपचार हरया माधुरी। "एक भारा पूर, माधुरी" "पूदिए।" "तुम यहा क्यों भाई हो" "सच कहूँ?" "बिलकुल सध।" "भापको एक बार देखने के लिए" "धन्यवाद" "क्या देखा तुमने " "देख रहा है कि थाप बहुत दुःखी है।" " मशीन की तरह शारीरिक धावश्यतायें पूरी करने को यदि मुख कह सकते है. सो में सुखी है। किन्तु शास्तव में क्या यद मुरा है।" दोनों कई छयां तक खोये हुए से बैटे रहे। "माधुरो !" "एक थान में परसा सोचना है।" "कौन सी बात" "यही कि यदि भाज से ग्यारह साल पहले मुमने मेरे इस प्रनाम "जी" गई थी।" । भूल पर भूल का विरोध न किया होता, मो कदाचित् हमारे जीवन की धाराये पुक हो कर सुख के निस्सीम मार्ग पर यहती होती!" "यह तो मैं मानता हूँ कि उस समय मुझसे भयकर भूल हो भी जागतो हो कि हमारी फठिनाइयाँ कैसे हल हो सकती है।" "जानती हूँ।" "मापके उसी प्रस्ताय से।" "सप क्या कहती हो, माधुरी !" "थापके प्रश्न का उत्तर यासानी से नहीं दिया जा सकता।" "इसलिये कि हम दोनों के बीच में दो अन्य व्यक्ति था गये हैं।" "तय" "विचार करने के लिये समय चाहिए।" "कय तक जवाब दे सकोगी?" "कल तक" "अच्छी बात है, विचार कर लो। मैं तो बहुत विचार कर चुका है, और पूरी तरह तैयार हूँ।" अच्छा, अय जाती हूँ।" "जायो।" माधुरी की दशा उस समय उस मटके हुए पयिक की-सी हो गई थी, जो अन्धकार में मार्ग खोज रहा हो! सन्ध्या के समय पार से घर लौट कर जब महेश अपने कमरे में पहुँथा, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । बलिसा बेहद खुश थी। पति के हाथ से छड़ी ले कर तेजी से कोने में रखकर, यह धोती ले बाई । महेश उसकी और प्रश्न-मूचा रहि से देवता रहा। जब वह धोती पहिनने लगा, तो ललिता ने मुस्करा फर कहा -"बड़ी अच्छी खी है, माधुरी !" "यह तुम्हे कैसे मालूम हुना?" "भाज दोपहर में बड़ी देर तक यह मुझसे बातें करती रही। उसके विचार बड़े ऊँचे है। मैंने उसके यारे में जो कुछ सोचा था या पिताकुल पालत था।" । ।

।
5
पिर मिलेंगे
"मय थातों को अच्छी शाह तौलने के बाद किमी के बारे में
छायम करनी चाहिए।"
"ठीक कहते हो।"
दूसरे दिन सबेरे पिर माधुरी इस कमरे में भाई। उसका चे
उतरा दुधा था, चा माल धौं। महेश ने चिन्तित स्वर में पूजा-
"मत प्रराव है क्या ?"
"नहीं," कुरसी पर बैठकर उसने कहा ।
"तय या रात में देर मशागती रही ?"
'रात भर जागती थी।"
"क्यों"
"विचार करती रही। इस समप थापको उसर देने भाई हूँ।"
"तैयार हो?"
.
"क्यों
"इसलिए कि दो पसे हुए घरों में भाग लगा देना मैं उचित नहीं
सममती।"
"माधुरी ! माधुरी !"
"उस समय हमारा अपराध मा करने के योग्य होता, किन्तु
भय सो पद अधन्य हो जायगा।"
"अाज फिर भारी भूख कर रही हो, माधुरी!"
"जानती हूँ कि भूष कर रही हूँ, और इसके लिए हम दोनों को
भारी मूल्य चुकाना होगा।"
"मैं क्या करू
"पत्थर के बन जामो"
"माधुरी, इस हार-मांस के शरीर में एक दिल भी तो अान्दोशन कर
रहा है।

भूल पर भूल २६ . "अभ्यास से यह भी काबू में प्रा जायगा।" "और तुम क्या करोगी?" "किसी न किसी तरह दिन कट ही जायेंगे।" "माधुरी ! माधुरी !" प्रबळ.धेग से खिों में प्राते हुए आँसुओं को रोकती हुई उठ कर' वह तेजी से कमरे के बाहर चली गई । महेश ने हाथों में मुरू छिपा लेया। अकथनीय वेदना उसके हृदय में हाहाकार कर रही थी। सन्या के समय जब वह दफ्तर से वापस आया, तम सुमित्रा ने कहा-"माधुरी तो चली गई, लाना।" "चली गई ! कहाँ ?" "मायके।" "क्यों ?" . "कहती थी कि जी घबरा रहा है, जाऊँगी। मैंने बहुत रोका, लेकिन वह नहीं मानी।" "कर गई " "पीस मिनट हुए होंगे।" तुरन्त मुद कर महेश तेजी से सदर दरवाजे की भोर चला। "कही जाते हो, लाला ?" "अभी आता हूँ।"दो पण में बह गली में था। सड़क पर पहुँच कर एक इक्के पर सवार हो कर उसने इक्केवाले से कहा-"तेजी मे स्टेशन पलो।" "कौन टेसन चलू, वायू जी? कछपुरवा?" "हा जल्दी चलो।" इसका तेजी से चल पड़ा। स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुँच कर महेश ने देखा, माधुरी एक ओर अपने ट्रंक पर येटी है, और उसका देवर अमरनाथ पास ही सड़ा है।

ॐ
समीप पर अमरगाय को को देकर उसने कहा-"रा पानी
से पाइप, पाम् अमरनाय ।"
"यस LI" मानाय पान खामे पना गया।
"जा रहीदो, माधुरी"
.
5
"मी"
"मुझे मे ?"
"arपस अधिक अपने रो।"
"प कश्यामोगी ?"
"अद आप मुझे यह लिखेंगे कि अपने दिल पर धापने पूरी तरह
प्राबू पा लिया
"अच्छी बात है, यही सही।"
अमराय पान व कर या गया। गाड़ी भी आ गई। गादी पर
सवार हो कर, हाय जाद कर, मयुरी ने कहा-"पमा मांगी है।"
"पमा ! सुमने कौन-सा अपराध किया है, माधुरी "
मुख मोड़ कर माधुरी रूमाल से अपनी श्रोस पोछने लगी।
गाहा चल पड़ी। महेश की प्रोतों से मासूमों की सदियों वह
निदली

अनुराग ललित से कमला दरती थी, किन्तु उसका आदर करती थी। आदर ही नहीं, वह उसे प्यार भी करती थी। इसी प्यार ने तो एक दिन उससे कहा था, 'बलिस को पाने के लिए सारे संसार की अवहेलना करने से तुझे कोई पाप न लगेगा ! जब एकाएक उसका सुहाग लुट गया, तो अनेक स्वजातीय विधुर बैठको के प्रस्ताव ले कर उसके पास आये, किन्तु यह किसी को स्वीकृति न दे सकी । एक दिन विजातीय लबित भी आया, मानों भक के घर भगवान् ने पदार्पण किया ! कमला यानन्द से विभोर हो गयो । ललित ने मुस्करा कर पूछा-"मेरी हो सकती हो, कमला ?" सिर मुका कर, मुस्करा कर, कमला ने तुरन्त उत्तर दिया-"क्यों नहीं " "लेकिन जानती हो, विरादरी से बाहर कर दी जायोगी ?" "पिरादती गलती करे, तो क्या मैं भी करूं? नहीं, मुझ से यह न होगा । श्रापकी क्या कम बदनामी होगी?" "मैं तो तुम्हें चाहता हूँ, दुनिया की नेकनामी मुझे नहीं चाहिए !" बस, उसी दिन कमला ललित के घर जा बसी। लोगों ने सुना और चकित रह गये। फिर सारे समाज का क्रोध, भौति-भाँति के रूप धारण कर, दोनों के ऊपर बरसने लगा । कमला के घर वालों ने नालिश दायर की। उन लोगों ने कहा, 'मलित ने कमला को बहकाने और भगाने के जुर्म किये हैं, और कमला नायालिग है।' ललित ने कहा, 'कमला मेरे पास स्वेच्छा से पायी है। यह नावालिग नहीं है, और मैंने उसे बहकाने और भगाने के जुर्म नहीं किये।' कमला ने कहा, 'लक्षित के पास में स्वेच्छा से आयी हूँ। मैं नाबालिग नहीं है, और बलित ने मुझे बहकाने और भगाने के जुर्म नहीं किये । दाक्टर ने कहा, 'कमला नायलिग नही है। अन्य गवाह पेश हुए। वकीलों को चाँचे लड़ी। अदालत ने फैसला किया, 'कमला बालिग है। किसी के पास जाने के लिये वह स्वतन्त्र है । कमला को यइकाने और भगाने के जुर्म ललित .

पर मामिल नहीं हुए। बदरी दिया गया।गको प्रमाणे मात्र मागसता बहाना है आप क्षिा योदामही मोहात में मौर सिर र, उमयिकीशीगदी रखा को करया एक दूर शहर को सामना पर पाने गरे। सपे शहर में पुष ने पाया था। दोनों भामम्द-सागर में बोरखगे। बरस और पो गया दोनो सोझगड़ते थे, रिन एक-दूसरे पर जान देने थे। पादरी दगीको पात बजने पर लोग इन दोनों की मिपान दो पदोनों का एक छोटा-सा मार पा राज यहाँ रम गर्ष थे। मी सारो थे, कि उसी समय यता गट करने में असमर्थ होर पटे यात जीवन रसके कण-कर में मस्ती से रिकता माघाशा पूजती पहनी थी। गुम्ब का मारा मा कमा मुख की घual में दिर माया, किन्तु गा का हटना ही पता था। माamrat at समय या! भारामलामी पर खेटामा ललित दुका गुगुल रहा था। सहसा कमरे में प्रोग करके हमला करर-कोई सापायभामा नहीं है। पान क्या पहिन पर मानोगे। "श्री तरह देशा या" "सारे मसाले।एक भी नहीं है।" "इस समप धोबिन मा पानी, साबत भया होगा।" "धोरिन आउदित से पहले नहीं पाती । धान पयो दिन है। इस समय यह कैसे भाजायगी ?" "यह तो तुम महतो हो। मा घोता ही पदिन का दप्तर खा आऊँगा।" "इतने दिनों से कह रही कि कपड़ा खरीद कर पायजामें सिया खो, लेकिन तुम सो माकन मरी काई पात नहीं मुनते।" इस उलाहने में उसके लिये जो फ्रिकथी, उसे उसने पसन्द किया, किन्तु कममा के मुख से अपनी प्रतिभालोचना सुनना उसे सरत नापसन्द था। सरक पैदा हो गयी। घोर से दुका गुमाने लगा। कमला कमरे से बाहर हो गयो।

अनुराग साढ़े नौ बज धुके थे । स्नान करके ललित भोजन करने के लिये तयार बैठा या, किन्तु खाना श्रमी तैयार न था। खरक रोप में परिणत हो रही थी। उठ कर, कमरे में दहल कर, बाहर निकल कर, उस ओर जाकर उसने रसोई-घर में प्रवेश किया । कमला घाटा गूंध रही थी। "अमी नक खाना तैयार नहीं हुमा" "अभी तैयार हुमा जाता है।" "क्या ग्यारह बजे दफ्तर जाऊँगा? न जाने कौन-सा पकवान बना रही हो कि अभी तक...!" "देर हो गयी. तो क्या करूँ ? सवेरे से इमी में लगी हूँ।" "देर होगी, तो तुम्हारा क्या बिगड़ेगा ? श्राफत तो मेरे पिर पर भायेगी।" "कौन ऐसी शामत आ जायगी ? बहुत दोगा, गैरहाजिर कर दिये जायोगे।" "जपान लदाना कोई तुममे सीखे। जितना बकती हो, उतना ही काम भी करो, तो ऐसी नौयत क्यों प्राये?" "elहाँ, मैं तो पकी हुई हूँ। जरा-सी यात के लिए जान खाये जा रहे हैं। गोया मैं पैठी हूँ।" उसका गला भरी गया । आँसू को बूंदे आँखों से निकल कर गालों पर दुलकने लगी। ललित फ्रोध से उबलता हुमा कमरे से बाहर हो गया। दस मिनट में दस्तर जाने के लिए तैयार हो कर, यह अपने कमरे से बाहर निकला। जूतों की श्रावाज सुन कर, रसोई-घर से बाहर निकल फर कमढा ने देखा, वह सीदियों पर था। "विना खाये चले जानोगे क्या? एको, रुको ! खाना तैयार है।" किन्तु बिना कोई उसर दिये, यह तेजी से नीचे उतर गया। वह दौड़ी, लेकिन उसे रोक नहीं सकी । वह घर से बाहर हो गया। तब रसोई-घर में लोट फर, उसने चूलहं में पानी डाल दिया। फिर शयनागार में जा कर वह अपने बिस्तर पर गिर पड़ी। अब खाना पना कर या होगा ? हि गये तो बिगड़ गये ! कितनी बुरी है उनकी प्रादत ! कितने घुद्धिमान हैं, कि अब क्रोध या जाता है, तो उनकी दशा बिलकुन पञ्चों की-सी हो जाती है । उस समय उनको इष्टि में उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। कोई दूसरी स्त्री होती, तो पता चलता। एक न्याहा भी तो थी, लेकिन अब तक उसके फूहड़पन की, पदमिजाजी फि०-३ .

फिर मिलेंगे की, सुस्ती की शिकायत करते हैं। एक अह है कि पैर धो धो कर पीठ है। फिर भी मच हो जाती है वाय सोपा । सेविका मनको मायी, और रसोई घर में गयो। उसका माया उनका सय वहश्यनागार में गभी कमया खेिं बन्द रिये पड़ी थी। साइम करके यह पोजी-"git!" फमक्षा ने श्राखोला। "कैसा जी, यही ?" "साना ठा लेना, ननकी" "धापन सायगी क्या ?" "श्यों, यहगी।" "ला यहाँ से। फिजूल अकया मत कर।" सहम कर ननकी चली गयी। ढाई बजे ललित घर लौटा ! अपने कमरे में जाकर यह धाराम- कुरसी पर घट गया, और कराहने लगा। रह रह कर धोके या रही थी। कमला भायी, और प्राशकापूर्ण दृष्टि से पति के चेहरे की और साने लगी। मुख फेर कर घह दीवार की ओर नाकने लगा । कराहना उसने बन्द कर दिया। "कैसी तबीयत है" उसने कोई उनर नहीं दिया। कई छोके एक साथ भार्थी । उसे उट बैठना पड़ा। रूमाल निकालने के लिए उसने शेरवानी की जेब में हाथ डाना कमला ने भुक कर उसके माथे पर हाथ रखा। "माप रे । तुम्हें तो यदे जोर का पुखार है। उठो, चल कर बिस्तर पर लेटो । उठो, उठो!" विवश होकर षड् उहा। उसका हाथ पका कर वह उसे शयनागार में लिवा ले गयी। उसके बिस्तर पर इसे आराम से बेटा कर, बार बाहर निकली। "रामदीन रामदीन" "क्या है, बहुजी?" नीचे से सेवक ने उत्तर दिया। "जल्दी ऊपर प्रायो। "अम्छा, बहूजी।" रामदीन दौड़ता हुआ पाया।

अनुराग ३५ "फौरन डाक्टर साहब के पास जाओ, और उन्हें अपने साथ लिवा सायो।" रामदीन नीचे भागा। हास्टर साहब प्राये, परोता की, नुस्खा लिखा, फीस ली, और चले गये । दवाखाने से दवाइयाँ आयीं । इलाज शुरू हो गया। बिस्तर के समीप कुरसी पर थैठी हुई फमना ललित के. माथे पर 'बाम' मल रही थी। "कमला!" "प्राज सुमने खाना नहीं खाया" कमला निस्तब्ध रही। "ननकी से मैंने खाना बनाने के लिए कह दिया है। दर्द बहुत कम हो गया, अब रहने दो । जा कर खाना खा खो।" कमना चुपचाप दवा मलती रही। "जामो, कमला।" "नहीं, मैं खाना न खाऊँगी।" "क्यों" "तुम भूखे रहो, और मैं साना खाऊँ ! मुम्म से यह नहीं हो सकता।" "भूखा तो में नहीं रहुँगा । दुध तो मुझे पीना ही पड़ेगा।" "दूध पीने से क्या होता है?" " जाने के दिन तक मुझे खाना न मिलेगा। तय तक क्या भूसी हो रहोगी, कमला ?" "भूखी क्यों रहूँगी ? जो कुछ तुम खायोगे, यही मैं मी खाऊंगी।" "कमला! आज मैंने जानवर का-सा बर्ताव किया था। मैं भाग में वास रहा हूँ!" "कैसी बातें करते हो ? कसूर तो मेरा था।" "कसूर तुम्हारा था ! नहीं, कमला, जो आदमी अपने सुन्दर छिपे हुए जानवर को काबू में नहीं रख सकता, यह भादमी नहीं है।" "ऐसी बातें न करो। सीयत ज्यादा खराब हो जायगी।" "जब तक खाना म लामोगो, मेरा मन शान्त नहीं होगा। उठो, खामो।" .

ता, पर मेसर का समक्षा कमरे बाहर पी गयी प्रति शान्ति की सांस ली। दुसका प सामान्य र निमोनिया में परिपत हो गया । हमारे पारारम था। दवाय अली, सटर भी पदो, लेकिन रोग काबू में गाया। दिन प्रति दिन रोगी की दशा गिदमी ही गयी। मक्षपालथा परियामा । म प्रकार के 4 में uary विलीन होने लगा। बसपार हाहाकार कर उठा। त हो गयी थी। येदना ही मूर्ति बनी हुई कमजा लिन के सीने पर 'मायरा मेयर' मन रमी थी। अति प्रोल पदस्येि पदाधा। "बस रहने दो, कमला," जाने सोच कर सचिस ने कहा। "दर्द आम कैसा है" "बहुत कम हो गया है।" "लामो, पोट पर भी मल ढूँ। उसने करपट दापोड पर धोर-धीरे या मखने समी। "कमला" "यों का समय निक मारहा है।" "क डोर होगी!" "सिर्फ दो महीने बाकी है। फिट सुम ने कहा रा है?" "शायद राबनूपयाचे पन्नूक में।" "कल बोल कर देख लेना कि उसमें है कि नहीं।" "अच्छा।" "गुझे ऐसा मान पदसा है कि इस साल मेरी जीत असर होगी।" "देखो, उम्मीद तो हर साज्ञ ही रहनो है, लेकिन, जब पीत हो सरसो" "मही, कमला, इस साल में जरूर जोगा।" "इस से अच्छी बात और क्या हो सकती " 'कहीं एक श्रौषन इनाम मिज गया, तो जिन्दगी सफल हो जायगो । एक अच्छा सा बगला बनवा लूंगा, मोटर सरोदरंगा, बहत धनुराग १७ से नौकर रख लूंगा, कोई तिजारत शुरू कर दूंगा। दिन-रात चैन ही चैन रहेगा !" "ज्यादा बात न करो। डाक्टर ने मना किया है।" "तुम्हारे लिए गहनों के ढेर लगा दूंगा-एक सेट सोने के गहने, एक सेट मोतियों के, एक सेट जवाहरात के । सैकड़ों साड़ियाँ खरीदूंगा, सैको जम्पर, और जूते, और लेवेएटर, और नीम, और रूहा, और लिप-स्टिक, और कहाँ तक गिनाऊँ। सच कहता हूँ, कमला, उन्हें रानी बना दूंगा, रानी" "इस समय भी मैं अपने को किसी रानी से कम नहीं समझती!" "याज तुम समझती हो, उस समय सचमुच हो जानोगी।" "अपने लिए क्या-क्या खरीदोगे?" "अपने लिए! क्या बताऊँ ? यस, तुम इतना समझ लो कि एक 'अप-टु-हेट' सभ्य पुरुष के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है, वे सभी चीजें ढेरों खरीदूंगा।" "लेकिन यह सब ठाट-बाट यना कर क्या होगा ?" "क्या होगा, कमला! क्या तुम नहीं जानती कि जिस श्रादमी के पास धन है और जो ठाट-बाट से रहता है, दुनिया में हर जगह उसकी भावमगत होती है?" "जानती हूँ, लेकिन अपने से ज्यादा दूसरों का प्रयाल रखना चाहिए !" "यह मैं का कहता हूँ कि दूसरों का ख्याल नहीं रखेंगा ? जी खोल कर दान करूंगा। लेकिन मन्दिरों के महन्तों को दान नहीं दूंगा, सन लोगों को दूंगा, जिन्हें सचमुच दान की जरूरत है। अनायालयों को दूंगा, स्कूलों को दूंगा, उन सारी संस्थानों को दूंगा, जो देश और समाज की मेवा कर रही हैं। यह भी समझ लो, कमजा, कि अन्त में एक दिन सप कुछ त्याग कर किसी जाल में धूनी रमाऊँगा । " तुम अपने हौसलों को मात करने लगते हो, तो मुझे बहुत अच्छे लगते हो!" "किसी समय बुरा भी लगता हूँ!" "तुम भूलती हो । या उस समय मैं बुरा नहीं लगता, जय मुझे क्रोध या जाता है?"

पिर मिलेंगे "पुरे सो तुम उस समय भी नहीं लगते, लेकिन मैं र जाती हूँ। ललित हंसने लगा। सोली मा गयो । तुरन्त मुकर कमला पीकदान उठाया। "कहती है कि ज्यादा बात न करो, बेकिन तुम सो मानते है नहीं!" "आज मेरी तबीमत बहुत हलकी है," दम लेकर शलिस ने कहा- "बात करने में बड़ा मजा या रहा है।" "बेकिन, ज्यादा मात करने से सकलीफ यद जाने का घर भो जाऊँगा।" . "तुम फिजूल डर रही हो, कमला ! अब में पहुत जल्द अच्छा “ईश्वर करे, वह दिन जल्द पाये" "कमला, जानती हो, माज-कल ससार के अनेक धुरन्धर वैज्ञानिक मृत्यु को पराजित करने में लगे "यह कैसे" "मुद को जिन्दा करने के और जीवन की अवधि बढ़ाने के अनेक प्रयोग हो रहे हैं।" "तब क्या मनुष्य एक दिन ईश्वर से उसके सारे अधिकार छीन लेगा" "ईश्वर तो ईश्वर ही रहेगा। लेकिन गीता में भगवान कृष्ण ने जो कुछ कहा है, उससे तो यही जान पढता है कि मनुष्य को सारी नहीं तो अपनी अधिकांश जिम्मेदारियाँ दे देने में ईश्वर को कोई आपसि न होगी! दे तो शायद यह पहले ही चुके है, किन्तु बहुत थारे मनुष्यों ने उन अधिकारों से लाभ उठाना सीखा है" "गीता में कितने मुन्दर है भगवान् के वचन ! जान पड़ता है, मानो अमृत की एक नदी गम्मार गति से बह रही है!" "और मजा यह है कि सममें कितना भी स्नान करो, जीन भरेगा! जय खोजोगे, नयी चीज़ पानोगे !" जिन्दगी बढ़ाने की कोई दवा यनी है" “दवायें तो पहुस-सी बनी है, जिनके विज्ञापन पत्रों में निकला करते है, लेकिन अभी तक कोई ऐसी दवा नहीं बनी, जिसे दड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने लाभदायक माना हो।"

ननुराग
२९
"अगर कोई दया बन जाय, तो मंगा लेना।"
"जिन्दगो पदा कर क्या होगा?"
"जो संसार का उपकार करना चाहता है, उसे अपनी ज़िन्दगी
जरूर यदानी चाहिये ।
"यह सो ठीक ही है। लेकिन मुझे किसी दवा की जरूरत ने
पड़ेगी। मैं तो योगाभ्यास करूंगा।"
"योगाम्यास से क्या जिन्दगी यद जाती है।"
"हाँ, योगी जय तक चाहता है, जोता रहता है; और जय चाहता
है, प्राण त्याग देता है।"
"तम तो योगाभ्यास जरूर करना । मुझे भी सिखलाना।"
"जरूर लिखवाऊँगा। तुम्हारे बगैर तो शायद जंगल में भी में न
रह सकूँगा।"
"थोड़ा-सा दूध पियोगे ?"
"ले पायो"
कमला चारपाई से उतरी।
.
दूसरे दिन एकाएक रोग यहुत यद गया। धुखार बढ़ गया । खाँसी
यह गयी । रह-रह कर बेहोशी थाने लगी।
कमला को अलग ले जा कर डाक्टर ने कहा-"इनकी हालत बहुत
नाजुक है। यही सावधानी रखने की जरूरत है। ज्यादा हिलने.
ढोलने न पायें, ज्यादा बात न करने पायें। अगर अगले चौबीस घण्टे
पार कर ले गये, तो शर्तिया चंगे हो जायेंगे।"
तीन घेग से उही हुई मनोवेदना से बढ़ती हुई, निश्चल पड़ी रह
गयी वह।
इंजेक्शन दे कर डाक्टर चला गया। रोग-शय्या पर बैठ कर, पति

म रसिंग "हरे गोपुन उस समय मां नहीं , देहिम मनमा है। आखित दस ! तिी मागपी मुष्कर कमला पकान उठाया। "कवी उपाश पाट मो, किन तुम तो मानो को "er मेरी बीमत पद्धत इसी "दम र लसिंग मे का "चार करने में बड़ा मामा" "बेकिन, ज्यादा पात रमे से हामीफ का जाने हामी "म फिल र दी हो, कमशा! मैं बहुत जपणाने साऊंगा।" "रवा को, यह दिन जद धाये!" "कमला, जाननी हो, पान- संसार के अनेक घरधर वैज्ञानिक मायु को पराजित करने में लगे हुए हैं।" "मुवी को मिन्दा करने के और जीवन की प्राधि पाने के अनेक प्रयोग हो रहे है। "सर श्या मनुष्य एक दिन ईश्वर में उसके मारे अधिकार भीन "इंसा तो था ही रहेगा। लेकिन गीता में भगवान कृष्ण ने जो वेगा" - .. .. अधिकारों से बाम उठाना सीसा है" "गीता में कितने सुन्दर है भगवान् के पचन ! जाम पता, मानो अमृत की एक नदी गम्मोर गति से बह रही है।" "श्रीर मजा यह है कि हम कितना भी स्नान करो, मी न भरेगा! अब खोमोगे, नयी चीज़ पानोगे !" जिन्दगी बढ़ाने की कोई दवा यनी है" "दवायें तो बहुत-सी पनी है, जिनके विज्ञापन पत्रों में निकला करते है, लेकिन अभी तक कोई ऐसी दवा नहीं बनी, जिसे पढ़े-बड़े वैज्ञानिकों ने बामदायक माना हो

।
"अगर कोई दवा बन जाय, तो मंगा लेना।"
"जिन्दगी पढ़ा कर क्या होगा ?"
"जो संसार का उपकार काना चाहता है, उसे अपनी जिन्दगी
जरूर यदानी चाहिये।"
"यह तो ठीक ही है। लेकिन मुझे किसी दवा की जरूरत न
पड़ेगी। मैं तो योगाभ्यास करूंगा।"
"योगाभ्यास से क्या जिन्दगी बढ़ जाती है।"
"हो, योगी जय तक चाहता है, जोता रहता है, और जब चाहता
है, प्राण त्याग देता है।"
"तप तो योगाभ्यास जरूर करना । मुझे भी सिखलाना।"
"जरूर सिखलाऊँगा। तुम्हारे बगेर तो शायद जंगल में भी मैं न
रह सकूँगा।"
"थोड़ा-सा दूध पियोगे?"
"ले पायो।"
कमला चारपाई से उतरी।
.
दूसरे दिन एकाएक रोग यहुत यद गया। धुखार बढ़ गया। खाँसी
यद गयी। रह-रह कर बेहोशी श्राने लगी।
कमला को अलग ले जा कर डाक्टर ने कहा-"इनकी हालत यहुत
नाजुक है। बड़ी सावधानी रखने की जरूरत है। ज्यादा हिलने-
डोलने न पायें, ज्यादा बातें न करने पायें । अगर अगले चौबीस घण्टे
पार कर ले गये, तो शर्तिया चंगे हो जायेंगे।"
तीन धेग से उठी हुई मनोवेदना से लड़नी हुई, निश्चल खड़ी रह
गया वह।
इजेशन देकर दाक्टर चला गया । रोग-शय्या पर बैठ
कर,

हिर मियो
का पैर गोद में करवा परे ने सगी ! 'घर ये क्या न रहेंगे। इनके
विमा संसार कैसा बगेगा मंमार में या समा मडेगा! ही,
नही ! किन्नु अभी गिराग होने की जरूरत महा। शुद भी मो काले
कि को भाने को पूतीमा।'
raपेत प्रामा। थोड़ी देर बाद कर उसने माग पोळी
द्वान्न पारपाई से इटहर, सिरहाने जा कर, मुर पर उसनेनिन
र में पूछा-"कैमा मी?"
"जरा...पानी...दो"
शारीगिलास में पानी से कर, सहारा देकर उसने उसे उठाया।
उद कर, यो पानी पीकर, यह फिर खेट गया। खाती धागयो ।
बाम गोमते उसका सारा शरीर मम्मोर उठा। मासी नीर
रुकी, सो उसने दवा पिलायी। दवा पीकर, उसने घोस पद कर ली।
"कमला!"
"भरसक ला रहा है, लेकिन यह नहीं सकता कि जीगा ! अम
साजरा भी भाशा रहे, तुम धीरज म सोना।"
कमला अपने को रोक न सी, फूट-फूट कर रोने लगी।
"परे! गुम तो रो रही हो! चुप रहो . कमला...! मैं यह...
बरदाश्त नहीं कर सकता"
उसे चुप कराने के लिए कहनियों टेक कर यह कुछ उठा, बेकिन गिर
पदा । फिर यह अचेत हो गया।
रात भा गयी । रोग घटा नहीं । कई बार पाये। दवायें बदली
गयी । इमेक्शन दिया गया । दायटर चले गये।
आधी रात पीत चुकी थी। लहिन अचेत पड़ा था। पत्थर की मूर्ति
धनी हुई कमना सेवा में लगी थी। सहसा ललित हिकियाँ लेने

श्रनुराग
लगा। शरीर ऐंठने लगा । दाँत बैठ गये । कमला वषा लेकर दोषी,
लेकिन पिला न सकी । तब दवा एक ओर फेंक कर, चीख कर, पति के
पैरों से लिपट कर, वह फफक-फफक कर रोने लगी।
महमा वह चारपाई से उतरी और एक आलमारी के समीप गयी।
एक शीशी उठा कर, कार्क खोल कर, यह उस में भरी हुई जहरीली दवा
पी गयी। सिर चकराया। सदसड़ा का यह फर्श पर गिरी । योड़ी देर
तक ऐंठ कर, शरीर निर्जीव हो गया।
मृत्यु की सीमा तक पहुंच कर, ललित फिर लौटा । शरीर की ऐंठन
बन्द हो गयी। हिचकियाँ बन्द हो गयीं। पीय स्वर में उसने पुकारा---
"कमजा"
फिर जवाब न मिला । तव, श्रखेिं खोल कर, वह इधर-उधर स्टि
दीदाने लगा। उसने देखा, दाहिने हाथ में खाली
शीशी पकड़े हुये
कमला प्रर्श पर पड़ी है।
"कमला! कमला!"
ध्यान से देख कर, सप कुछ समझ कर, उछल कर, वह चारपाई से
उतरा। लहसड़ा कर, वह कमला के शव पर गिरा, और लिपट गया।
बुझते हुये दीपक के समान जीवन शक्ति फड़फड़ा कर समाप्त हो गयी।
उसने भी दम तोड़ दिया।

एक स्त्री की डायरी । अपनी दुख भरी कहानी धान बिख रही हूँ। कपों नामुकम, मासिक हदय कसा है, न विस | पश्चाताप-द्रवित मस्तिष्क प्रेरित करता है, अवश्य जिस मामा मूल इश्य!? ही कारण हो मेरी कदानी दुखान्त है। यहकावे में न पाती, तो मेरी जोवन-गामा पास कुछ और ही होनी । कल तक तुम से प्रेम करतो पाई है। पुद्धि- मान मस्तिक! कल तक मेरी अपहेलना करती आई हूँ, किन्तु धाम, विश्वास कर, तेरे सामने मक्ति भाव से नत-मरता हूँ। जिस विधावा ने मुझे हिन्दू समान में जन्म दिया, उसने मुझे उसकी पतित पावन मर्यादा पालन करने की समता क्यों नहीं दी! सीता, सुलोधमा, सावित्री ये सभी देवियों भी तो, मे ही तरह, हाइ-मोस की पुलिया धी १ फिर, जो उनके लिये सम्मा पा, मेरे लिये असम्भव पयों हो गया? दुर्वलता ! उधर खड़ी हँस रही है ? हसले, जी भर के हेस ले ! रे हाल में उपहास है, प्रलोभन भी। आज किसी तरह तेरे पंजे से मुक्त होकर तेरे प्रलोमन में न फंसने का प्रण कर चुकी हूँ। हंस, जी भर कर स! मायावी रूप ! तेरा मादक उदमास, तेरी मोहन-शक्ति ! एक बार तेरा दर्शन कर, संसल कर पैरों पर खड़ा रहना अत्यन्त कठिन मेरे प्रबोध शैशव ने माँ के कमरे में जब पहले-पहल तुझे दपंण में देखा था, तो तुरन्त वशीकरण मन्त्र पद कर, मोहिनी दृष्टि से जादू चला कर, कितने समय तक श्राम-विग्मृति के इन्द्रमान में चूने उसे बन्दी रमा पा: शायद पाध-घटा, शायद घंटा मर । धारम-विस्मृति की दशा तब भद हुई यो जब कमरे में पाई हुई माँ की आवाज कान में पड़ी थी। शैशव सेरा बन्दो हो गया । योवन तेरे पीछे पागल रे हो लिये में शव नक जीवित रही। मैं कैसे धोखे में थी । जितने बलिदान मैंने सेरे लिये किये हैं, उतने पदि भावान के लिये करती, ता, मुझे विश्वास है, यह मुझे प्रवश्य मिल जाते ! किन्तु यह तो साज ज्ञात हुआ कि तू देवता के रूप में दानव था ! दुर्भाग्य !

एक स्त्री की डायरी घद दिन, वह मधुर क्टु दिवस! अव मानती हूँ। पद गरल ले कर आया था, किन्तु सब तो उसमें सुधा के स्वाद का अनुमान हुआ था! उसी दिन कमलाकान्त थाया था। दूर के रिश्ते से वह भाभी का भाई लगता पा । लम्बे इदका, भरे पदन का, वह स्वरूपवान जयान था। पाते ही उसने मुझे मिस रष्टि से देखा था, उसे साख कोशिश करने पर भी था तक न भूल सकी। उसे देखते ही मेरे बदन में बिजली-सी दौड़ गई। अपनी उस समय की दशा का वर्णन करना मेरे लिये कठिन है। दालान में पड़ी हुई चारपाई पर बैठ कर, यह मामी से पातें करने गा। भाभी के निकट मूसिंवत् बैठ कर, मैं उसकी पातें सुनने लगी। रहनह कर वह मेरी घोर देखता, मैं उमको मोर । बड़ी देर के बाद जब वह बाहर चला गया, तो उठ कर मैं ऊपर अपने कमरे में गई। दीवार पर लगे हुये शोये के सामने खड़ी हो कर, मैं अपने सौंदर्य तथा यौवन की छवि अवलोकन करने लगी। सहसा उसकी छाया मूर्ति यात्रों के सामने था कर खड़ी हो गई । एक दोघं-निःश्वास खींच कर, विस्तर पर कोट कर, विकट अशान्ति की वेदना सहती हुई, कावटें बदलने लगी। दिन भर मुझे चैन न मिला, रात भर नोंद नहीं आई । अशान्ति प्रति पण बढ़ती गई । उपा की रक्तिम लालिमा जप धोकाश मण्डल में फैल गई, और पक्षियों का स्वागत-गान प्रारम्भ हो गया, निद्रा देवी ने कृपा की। सवेरे जब मेरी शाँखें खुली, तो दिन पद पाया था। सामने की खिड़की से अन्दर प्राकर एक प्रकाश-स्तम्भ प्रसं पर लेटा हुया था। खिों में कटुवाइट थी, पलकें भारी यौँ । एक मिनट तक मैं दीवार की योर साकी रही, फिर अखि धन्द कर ली। "बीबी ! बीबी !" भाभी ने नीचे से आवाज लगाई। "छटो, दिन धद आया । कय तक सोती रहोगी?" "भासी हूँ, भाभी।" मैं फिर दीवार की ओर ताकने लगी। सहसा कमज्ञाकान्त की याथा सुनाई दी। यह नीचे भामी से बात कर रहा था। तुरन्त उठ कर नीचे जाने की उत्कट प्रेरणा होने लगी, किन्तु मैं उठन की। करवट बदल कर मैं फर्श की ओर ताकने लगी। जिस शक्ति ने मुझे उस समय शेका था, यदि मैं उससे बरावर काम ने सस्ती...! किन्तु । तो किसी तरह रि सिगे दिम का तीसरा पहर या। समर कर मैं शोरी के मामले सही हुई, सौंदर्य-गुधा पान काही भी सहसा कमरे में प्रियंग करने की यामिनों ने गुरु कर दावा की घोर रेखा, कान मूसिवा हा दुधा मेरी ओर एकटक देख रहा था। मैंने मान मोदी कर ली, जिम मेरे घोठों पर मुस्कान यह हो गई। मेरा साप धेग में घकने am समक्ष र सही रहना असम्भव हो गया। यह मेरी ओर पाने लगा। किसी ने मन में का, 'an" fra, मैं मान सकी, मभिवम् सदी रह गई। समीर यार, यक कर, 'शकुन्तला!" उन्माद मेरी रणनग में ममकर वेग में दौड़ने फवासी हुई शाखा से उसकी धार पर, मैं फिर पर्श की भोर साकने लगी। "म किरानी मुन्दर हो शकुन्तला !" मेरे रोमनोम में यात्रा निकलने लगी। उसने मेरा हाथ पर लिया। किसी ने तिर मन में कहा, 'भाग" में दायराने की कोशिश करने लगी। उसने मुझे कर-पाश में बाध लिया । मैं निरवेष्ट हो गई। प्राम-समय हो गया ! उस समय का पद उत्तर मिधित सुज! भाग उससे घृणा करती हूँ. किन्तु उसे भूल नहीं सकती ! दुष्यन्त चौर शकुनामा का प्रेमामिनय कई मसारक पद्धता रहा। फिर एकाएक दुष्यन्त को विदा हो जाना पड़ा। कारण, भाभी को हम लोगों के प्रेम की बात मालूम हो गई। हम दोनों को फटकार भुगनी पषी मी मज्जा और जानि की भाग में शकुन्तला निरंतर अझने लगी। किन्तु दुष्यन्त को सूरत हर धड़ोसी में यसो रहती ! x कु. मास याद मेरा विवाह हो गया, किन्तु उसके माप नही, जो मेरे मन में घस गया था। जो होना चाहिये, वह नहीं हो पाता जो न होना चाहिये, यह अवश्य हो जाता है! यही वियना सो समाश की जर काट रही है ! भूगों की घोर निदासे जाग कर, समाज प्रान अगदा. इयों देता हुआ दिगोचर हो रहा है। किन्तु अकर्मण्यता के इन्द्र-माल से शीघ्र मुक्त हो जाना सहज नहीं । कुएं में गिरा दुधा मनुष्य, विकट घंटा करन पर भी, क्या शाम याहर निकल सकता है। समुराल गई, यौर पतिदेव से साचात्कार हुना, तो मेरी दशा एक स्त्री की डायरी ५ उस बालक की मी हो गई, जो पहले पहल अध्यारक के सामने गया हो! मन में कौतूहल उत्पस हुया, मय मिश्रित श्रद्धा भी। किन्तु प्राय क्या कभी निमंत्रण देने में आया है ! पतिदेव मुझसे ३ घर्प पड़े तो अवश्य थे, किन्तु यह स्वस्थ थे और कुरूप न थे। उनके समीप जाकर जान पड़ता था, मानो किमी शान्त, गग्मीर, अटल पर्वत के सामने खड़ी हूँ ! वह धार्मिक व्यक्ति थे और विद्या-प्रेमा । दिन भर वह किमी दातर में काम करते, और साँझ सवेरे अध्ययन तथा अाराधना में रत रहते । उनको स्वामाविक गम्भीरता, विवेकशीलता तथा सरलता के सम्मुख मैं भक्तिभाव से मत मस्तक हुई; किन्तु इजार बार कोशिश करने पर भी उन्हें प्यार न कर सकी। प्यार करने से प्यार मिल सकता है। किन्त जहाँ गाभीर्य का एकमन्न राज्य हो, यहाँ भावुकता पनप नहीं सकती! फिर मेरा हृदय भी तो अपना न था ! कैसी विषम परिस्थिति थी! केवल उत्तम वस्त्र, उत्तम भोजन पाने और अन्य किसी स्त्री के शासन से मुक्त होने ही में मुख होता. तो ससुराल में में अवश्य सुखी रहती। पतिदेव के अनिरिक्त वहाँ और कोई न था, और वह यथेष्ट वेतन पाते थे । इमन्निये शरीर के पोपण के लिये वहाँ सप-कुछ था। किन्नु मनुष्य के हाद-मांप के शरीर में मांस का एक छोटा-सा टुकड़ा है, जिसे हृदय कहते हैं। और हृदय जब मस्तिष्ठ को पराजित कर लेता है, तो उसकी शक्ति अजेय-सी हो जाती है। दृश्य प्रणय मांगता है। प्रणय की मारक क्रीड़ा ही में उसे सुख की अनुभूति प्राप्त होती है-और यह क्रीड़ा जिसके सहारे उन्माद के उच्चतम शिखर पर पहुँच कर, मुन्ध हो कर वह गिर पड़ता है ! ससार के काम-धंधे से झुरमत पा कर रात में पति- देव जब मेरे निकट अपना नीरस शुल्क प्रणय ले कर पाते, तो उस समय हृदय की सम्पूर्ण शक्ति से मैं उनमे घृणा करती। उनके उस व्यवहार को प्रणय कहने में भाज भी गुमे आपत्ति है । साँझ-सवेरे शरीर को घर के काम-धंधे में लगाए रख कर, मैं हृदय को बहलाये रहती; किन्तु दोप- हर की अलस नीरयता में अब वृद्धा महरी मी थपने घर चली जाती और रात्रि की भयङ्कर निस्तब्धता में जब पतिदेव सर्राटे लेने लगते, हृदय आपे से थाइर हो कर हाहाकार करता । उस समय वियोगिनी शकुन्तला समस्त देवियों तथा देवताओं के समक्ष रो-रो कर दुप्पन्त को पाने की कामना करती! मनुष्य के ललाट पर विधि-देव जो कुछ मजा-बुरा लिए देने हैं, उसे सिर मिलेंगे কার্থি বধু হই । মিগ্ন মা! ব!কি বীময়, पनिहोना मारी। मोोना था, वो का रहा। मेरे इग्मार-मसित की काममा गयो । माल मोसोम घड़ी भोलि इस समय तो मेरा पंचापे में मरह समारोह का समय पार दालान में येटा हुई में मदरो में शामें कर रही थी। सहमा हमीर यारकादरकामा साम्याया। "दयो तो, सोतस की मौ, कौन है?" "मा, बहमी।शी का और मा गया!" मृदा पर दामा की घोर ली। n সময়ে এ মা ধা। বাধ্য ৪ গ্লামা মী एकीया किरण मिमिक्षाने लगी। कहो यही तो नहीं पाल मिनट के बाद महरी मे बोरकर कहा-"एक पायभाये है, यहभी। मापके कोई मातेदार है।" शायर बही! पण भर निम्नस्य रद करने-जा कर पूषो सीतक्ष की माँ, नाम क्या है?" "मा, मी " मी फिर थाहर चली गई। हाँ, यही है, अयश्य यही है। भव महरो, पापस या कर मोक्षी-- "अपना नाम क्मनाकान बताते हैं।" यह मा गया! इस अनुभूति के रस मरोवर में मेरा पप गा) पा गया, याया गया ! सहमा भीतर किसो मे कहा, 'कहलाये, पता जाय। इस थावान के भादेशानुसार उस समय यती, तो भाज यह दिन क्यों देखना परसा! किन्तु उस समय तो शकुन्तजा के द्वार पर एक अतिधि पाया था, और यह अतिथि कोई और नहीं दुष्यन्त यार दुष्यन्त का निरादर शान्तबा कैसे करती? मैंने ज्यरता से कहा- "उन्हें अन्दर पुखा लामो, शीतज की माँ।" "धरणा, पहनी। बड़े भले मनई जान पड़ते हैं।" विविध भावनामों से धान्दोलित हो कर, मेरा हुदय वेग से धडकले लगा। साधी ठाट-बाट से जित, पान चबाता हुषा, हाय में बमदे का बबस लिये हुए, यह सामने भाया । मुस्कराकर, हैट उतार कर, सिर मुका कर, उसने गमस्कार किया । मुस्करा कर, हाय शोर कर, मैंने नमस्कार का उत्तर दिया। "माधो" एक स्त्री की डायरी ४७ . दालान में श्राफर, मेरे सामने खड़े हो कर उसने कहा-"अच्छी तो हो, शकुन्तला?" "हा ! बैठो।"-चारपाई की ओर संकेत करके मैंने कहा। फर्श पर एक और यक्स रख कर, वह चारपाई पर बैठ गया, धौर मेरी भोर एकटक देखने लगा। एक बार उसकी ओर देख कर, सिर भुका कर, मैं कई क्षणों तक खड़ी रही, फिर सामने के कमरे में चली गई। एक संदूक खोल कर, एक रुपया निकाल कर मैंने पुकारा-"सीतल की माँ!" "हाँ, बहुजी !" रसोई-घर से महरी ने उत्तर दिया। “यहाँ श्रायो, सीतल की माँ।" "आती हूँ, यहूजी।" दो मिनट के बाद सीतल की माँ कमरे में पाई । उसे रुपया दे कर मैंने कहा-"याज़ार जा कर ताजी पूरी, मिठाई और नमकीन चे पात्रो, सीतल की मा।" "किसे कित्ते का जाऊँगी, बहुजी ?" "एक रुपये में सव ले लेना । श्राध सेर पूरी ले लेना, डेद पाय मिठाई, याकी पैसों की नमकीन । लेकिन बिलकुल ताजी चीजें खाना, सीतल की माँ।" "बहुत अच्छा, बहूजी ।" महरी चली गई। कमरे से पाहर निकल कर, मैंने अपने दुप्यन्त से पूछा-"कहाँ से श्रा रहे हो?" "घर से।" "कह कर आये हो." "क्यों ?" कोई उत्तर न दे कर, सिर मुका कर, बद फर्श की ओर माकने लगा। "यहाँ क्यों पाये हो?...योलो!" किन्तु वह निस्तब्ध, मूर्तिवत् बैठा रहा। उसकी और करणापूर्ण आँखों से देख कर मैं फर्श पर बैठ गई। खाने का सामान बेकर महरी भा गई। कपड़े यदस्त कर, हाय- मुंद धो कर, कमलाकान्त ने भोजन किया। नीचे के एक कमरे में मैंने समाEिN IIT का, गिरेमा t.. मे गया। प म मे "प में मा. "मसीतकी मोद भामोजी" "जर मागी ! TT STET" "urn.नो.. मानो।" महापटी गई। शहर RRARAM करके गर में गई. दरवायी दाई, चोर पक्षा पर मेर मान शान की दशा में, करक बदमने aiamari अति पाने लगा जमकी या चोहार करने लगी। यह किलो गे कमरे के दरपा दो मॉक टा भाई से भारोहुए हश्य को रिपोरस रोडकर, में चुपचार बार RTER RETई गई। " शबनमा यात्रा योदो।" "माका भयो Anxhi" "बस एक पास गुगलो, माना कि मैं जा "वही से हो।" "हारे पोप, शसला, दयारामोश हो।" पर मुझे उठना मा । तरत में किसी ने गायनी पी, 'मत गोल, प्रभागिमी !" किन्तु सामने पाया जाना देसर, कोभी मनुष्य को रोकने से रुक सकता है ! मग दुपा को Ir शकुनबा के दानों में पढ़ चौर मंद विफल हो ! Rawat दरा खोल दिया । उसने कमरे में प्रवेश किया। दीयार समारे माहोपर, पर मेरी भोर एकटक देखने लगा। उसके चेहरे को और दते हुये, मैंने कहा-तुमने मेरे सपरख कामयाय वो नही दिया। "कौन सा सवाल" "यही कि मेरे घर क्यों माये हो" "क्यों पाया है। शकुन्तला, विश्वास को, थगर मैं न प्राता, तो पागल जाता "न प्रारो, तो पाग हो जाते ?" "हा, शकुन्तजा, रूर पागल हो जाता !" आ" एक स्त्री की डायरी लगा। "तो यह कहो कि अपनी रश के निमित्त मेरा सर्वनाश करने माये हो!" "तुम्हारा सर्वनाश करने आया हूँ ! असम्भव! तुम्हारा सर्वनाय करने की कामना मैं स्वम में भी नहीं कर सकता।" "तुम सत्य कह रहे हो या अमत्य यह मैं नहीं जानती। किन्तु, यह तो जानते ही होगे, नहीं जानते तो सुन खो, पुरुष के हतार प्रय. गुणों को समान हंस कर उड़ा देता है; लेकिन स्त्री अगर एक बार पथ- प्रष्ट हो गई, तो ससे रसातल में ही शरण मिल सकती है।" श्रय यह खदा न रह सका, चारपाई पर बैठ गया, और कुहनियों को घुटनों पर टेक कर, हाथों से सिर पकड़ कर फर्श की और खाने "तुम मई हो, थायू साहय, स्त्रियों की मर्म-वेदना और असहायता की बात क्यों समझोगे" धीरे-धीरे सिर उठा कर, उसने मेरी मोर देसा। उसकी शाखा में धाँसू छलक रहे थे ! एक धण यह मेरी ओर एकटक देखता रहा। मसी माला से भासू की धारायें यहने लगी। मेरा हृदय आप में न रह सका। पुरन्त उसके समीप जा कर, में चल से उसके ऑम् पोछने लगी। मेरी अखि भी प्रासू यहाने लगी। मुस्करा कर, उसने मुझे कर-पाश में बाँध लिया। उसकी यह बाद मुस्कान मेरे स्मृति पटल पर लोहे की नोकीली सलाई से अंकित की गई थी! आज उसे देखती है, तो जी जल उठना है, किन्तु उस समय तो एक ठोकर लगाकर उसने मेरे सत्र का याँध तोड़ दिया था! दुप्यन्त और शकुन्तला का यह प्रेमाभिनय फिर आरम्म हो गया, और कई दिनों तक जारी रहा। फिर एक दिन एकाएक भंटा फूट गया । उस दिन पतिदेय, कुछ अस्वस्थ होने के कारण, दातर नहीं गये थे। वह ऊपर शयनागार में श्राराम कर रहे थे। मैं नीचे कमलाकाना के कमरे में थी। वह मेरे हाथ पकड़े हुए था। हम दोनों घुल घुल कर बातें कर रहे थे। सहसा कमरे में किसी ने प्रवेश किया और ठिठकर खड़ा हो गया। चौक कर, हाय छुड़ा कर, मुख मोड़ कर, मैंने देखा, उधर दरवाजे के पास सड़े हुये पतिदेव हम दोनों की मोर विचित्र इष्टि से देख रहे थे। उनकी उस दृष्टि में कठोरता न थी, झोप न या, कृष्णा न थी, कदाचिन् दया यो! मैंने अाखे नीची कर ली। मेरा हृदय लमा F . निर मिलेंगे सया मय से मर गया, शरीर पसीने मे हा हो गया ! उस समय पर धरती फट जाती, तो में उसमें सहर्ष समा जाती। धीरे धीरे के कुरामा कमरे के पार चले गये। कई पण हम दोनों नितम्भ, भूशियन् बैठे रह गये। फिर किस सरह होरा समाल पर मैंने कहा-"जय हो गया !" "यह तो एक दिन होने ही को था" "अय क्या होगा।" "होगा श्या, यमन के मरक से निकल कर मुक्ति के स्वर्ग की और चलना होगा "ti, महामहोगा।" "क्यों " "नहीं जानती पयाँ ।” "सोध कर देखो, शकुन्तला, हम लोगों के लिये और कोई मार्ग भी तो मही। मैंने कोई असर न दिया, मन मारे हुये, मित्र लिस्त्रित सी, फर्श की और ताकती हुई निस्तम्ध धैठी रह गई। यह भी पामोश होगा। हम दोनों किसनी देर तक इस तरह बैठे रहे, नहीं सकती। एकाएक कोई चीज मेरे सामने गिरी । चौंक कर मैंने देखा, एक EिTE था। झिमक कर, उपकर, मने कमरे के बाहर दृष्टि धामी, पतिदेव पर से पाहर चले जा रहे थे। भुक कर, लिETRI उठा कर मैंने उसे खोला। उसमें पतिदेव का लिखा हुधा पत्र या पत्र में लिखा था--"जो कुछ इसने दिनों से जानना चाहता था, मास ज्ञात हुथा। मेरी पापा सत्य निकली। मैं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता कायम हूँ। यदि तुम पहले यता देती, सो मैं तुम्हें पहले ही मुक्त कर देता। किन्तु अपना भेद हिपामे रहना गुम्हारे लिये स्वागाविक हो यार, श्रम में मुम्हे मुक्त करता हूँ। तुम हो बाहो, जा सकती हो ! रुपये, गहने, कपर, जो कुछ बाहो, अपने साथ ले गायो। मैं तुम्हें सहप धाज्ञा देता हूँ। में घर से थाहर चला ना रहा हूँ और आज न लौटूंगा। इतना समय तुम्हारे लिये काकी है। हाँ, याद रखना, मेरा दरवाजा तुम्हारे लिये हमेशा खुला रहेगा!" पत्र पद कर मैंने उसे हमलाकान्त को दे दिया। उसे पढ़ते पढ़ते उसका चेहरा खिल उठा। मेरे र प्रदेश में भाँति भाति की भावनाओं एक स्त्री की डायरी का सूझान उठ खड़ा हुमा । उस पत्र का एक-एक शब्द मेरे मस्तिष्क में चकर काट कर वर्षा की तरह चोटें करने लगा। यदि वह साइना देते, तो कदाचित् मुझे इतनी पीड़ा न सहनी पड़ती ! 'अब " पत्र मुझे खोटाते हुये उसने पूछा। "इसी को सर्वनाश होना कहते हैं।" "मुक्ति में असीम सुख है ! उससे तुम्हारा सर्वनाश कैसे होगा?" "तुम्हारे अन्दर नारी का हृदय होता, वो तुम समझ पाते ! किन्तु तुम तो मदं हो, कैसे समगोगे ?" निरुत्तर हो कर, वह कई पण निस्तब्ध बैठा रहा। फिर उसने कहा-"जो कुछ हो, अब तो रास्ता पाप हो मा हो गया है। इसलिये इस स्वर्ण सुयोग से अवश्य लाम उठाना चाहिये" "इसके अतिरिक्त और उपाय ही क्या है।" उसी दिन गोधून्धि के समय मी रस्ये, गहने और यो से कपड़े घर छोड़ कर मैं अपने दुष्यन्त के साथ मादर चली गई । खेल का यथेट भाग हो चुका था, इसलिये उसका अन्त देखना भी श्रावश्यक कर, x x दूसरे दिन हम दोनों कलकत्ता पहुँचे, और एक धर्मशाला में ठहर गये। एक समाह बाद धर्मशाला छोड़ कर एक बड़े मकान में कुछ कमरे ले कर रहने लगे। दिन सैर-सपाटे में बीतने लगे, रातें रंगरेलिया में। एक RTE में नाद समारोगा। शव गहने बेचे जाने खगे। मैंने कमलामान को नौकरी करने की मनाह दी। गौकी तलाश करने के बहाने या दिन-दिन-भर गायब रहने लगा। एक दिन जा यह साया समय घर लौदा, सो सराय में चूर था। यह देख कर, मुझे घोर पा गया । उप समीप मा बर, मैंने रोषपूर्ण स्वर में कहा-"तुमने शराब क्यों पी ?" "इसमे मुझे क्या मतलब है परजी चाहेगा, पीऊँगा!" "यहो दुर्गति करने के खिपे मुळे या रसाये हो ?" "तू अपने मन से प्राई! मैं तुमे जबरदस्ती नहीं लाया!" "धोखा देकर, मसा का, ऐसा व्यवहार रना, मखे शादमी का काम नहीं है।

कर दूंगा।" + किर मिलंग "पुप रह हरामजादी, नहीं तो प्रमी भूते झगा कर RETY पहा में घट र, रसोई घर में जाकर, अचिन में मुहिर में प्र.पू कर रोने लगा। इस समय प्रति मेरे हरप में परमार गया हुई थी। दो मास में ईपागिरका, मेरे सारे गाने मिक गर्थे । कम काम्न हर समय शराब के नशे में वरमस्त रहने भगा दिम मासोक, शापय रहमा ही था, ए दिन वह रात को भीनही सारी शमीम मम-येदना सहती दुई, में घरवटे बसमा रही। दूसरे दिन को अब वह माया, तो गरी में घर था। "रात भर कहाँ रहे" "एक जगह।" कहा "नहीं बताऊंगा!" "इतना जानने का भी मुझे अधिकार नहीं है।" "गहीं, मुझे मेरे उपर कोई अधिकार नहीं है" "शायरगुहारा मन कहीं और शग गया है। खा गया है तो तुझमे क्या मतलब? जिससे मन लगाक्षे MEN. नीयत यहाँ तक पहुँच गई " हो, यहाँ सक मौवर पहुँच गई ! थक्ष में तुझसे कोई सरोकार रखमा नहीं चाहता।" "हो, पर यहा कहना मुम्हें शोमा देता है। अनाग्य जो कुछ दिखाये, या है।" "ईयर रिंग उतार कर दे दे।" "नही दूंगा। जप मुझसे कोई सरोकार रखना नहीं चाहने, तो ईयर रिंग मांगने का मुम्हें क्या अधिकार है।" "अधिकार वैपे नहीं है। धुपचाप दे २, हरामजाद', नहीं तो प्रमा सिर कोई दूंगा मेरा नामों से शामू को धारायें बहने लगी। "उतार, हरामजादी, जल्दी उतार " एक स्त्री की डायरी ईया-रिंग उतार कर मैंने उसके सामने फेंक दिये । उकर, ईपर-रिंग से कर, यह वायदाता हुमा चला गया। इस से कमरे में जा कर, घटाई मैं फफफ फफक कर रोने लगी। कमलामान्त के प्रति मेरे में घृणा प्रतिया बढ़ने लगी। दिन को वह नहीं खोटा, रात को भी वह नहीं चाया। मेरा भविष्य प्रगाद धन्धकार के परदे की तरह मेरे सामने था सदा हुधा । महमा टम परदे पर अलौकिक ज्योति से जगमगाती हुई टिगोचर हुई एक मूर्ति, शान्त, गम्भीर, प्रविन ! यह मूति पतिदेव की थी ! उस समय मेरी ग्रारम-ग्जानि का पारावार न था। प्रताड़ित हदय ने कहा, 'अमो भारम-हरया कर डाल !' मस्तिष्क ने सान्त्वना देते हुये कहा, 'अभी ठहर, शीघ्रता न कर, घर पल' हृदय पराजित हो चुका था। मस्तिष्क के आदेशानुसार चलना ही उचित जान पड़ा। किसी तरह समेरा हुप्रा। महा धो कर, मैं दो-एक चीज खरीद बाई । मैंने २०) मचा रखे थे, इसलिये रुपयों की चिन्ता न थी। दोपहर के समय केवल एक धोती ले कर, स्टेशन की ओर चल पड़ी। किमी सरह स्टेशन पहुंच कर, टिकट ले कर, मैं घर की मोर जानेवाली गाड़ी पर सवार हो गई। मय मैंने मंतोप की सास ली। x दूसरे दिन सिर से पैर तक धार योदे हुए, मैं घर के द्वार पर पहुंची । दरवाजा खुला हुआ था। मैंने उरते डरते अन्दर प्रवेश किया। प्रोगन में सीतज की माँ अंगीठी में कोयले मुलगा रही थी। "मीतल की माँ!" "घरे...यह जी!" "हा, सीतल की माँ ! अपना काला मुँह तुम्हें दिखाने आई हूँ।" मीतल फी माँ की प्रखिों से आंसू यहने लगे। मेरी प्रॉस भी वृष्टि करने लगी । वह उठ कर, मेरे समीप आई, और मुझ से लिपट कर फफक-फपाक कर रोने लगी। श्रावेग जव कम हुग्रा, तो उसने मुझे दालान में ले जाकर टाला । आँखें पॉच कर, मैंने पूला--"वह का?" "कार...हैं, वह जी । कई महीने से बहुत बीमार हैं !" "यहुत सीमार है"

मिर मिलेंगे
भदा को कभी हम नहीं देखा। प्राने-पीने का भी उनको
महीं रहता था। धीरे-धीरे दा विगहती गई प्रा लोहान बहुन ससा
है। भाया उट कर रहे हो जाएँ, तो जान !"
"मी राय है ! या कमी होती की माँ"
Mr.एक सटर भाकर देष जाता है, उसी के यार से दवाई,
"सेवा तुदी कर रही हो, सौराक्ष की माँ !"
"हा, यह जी, धौर कौन करें। मैंने कहा था, एक नरस सो,
भइया, गुदा भइया ने मंजूर नहीं किया, या, सुम्हारे सिराय में और
किसी को भपने पास न आने दूंगा!"
"शेगा, सोमन को मो"
"यह सो में नहीं जानती, वह गो, कोई कर कहता है, कोई करा !
शुमार हमेशा पदा रखा है।"
"तप तो कोई बड़ा प्राय रोग है, सीतल की मो"
"हा, यह जी"
"इस समय क्या यह सो रहे ४१"
"नहीं, यह जी, कोई किनार पद है।"
"वहाँ मौर कोई नोनही "
"नहीं, पहली माटोंगी क्या है, माधो, देख पायो। गुहारी
यात यशपर किया करते है"
डट का, सीदियों पर चा पर, ऊपर पहुँच कर, टनके कमरे में प्रवेश
मैं उन्हें पश्चातापपूर्ण दृष्टि से देखने बगी। धमई से महोई
हड्डियों की एक टढरी धारर प्रौद पर पर पड़ी थी। यही वह है,
जिनका शरीर कैसा वशिष्ट या, सुगठित था!
कौन सीतल की मो॥
"कौन "
पुस्तके के टों से टष्टि हटा कर, करवट बदल कर, वह मेरी और
विस्मयपूर्व दृष्टि से देखने लगे।
"तुम..हो?"
मेरी और देखते-देखते, इनकी पदे में घुमी प्रतिा से आँसू बहने

एक स्त्री को डायरी
संगें। पक्ष के समीप बैठ कर, उनके पैर पद कर, में फूट-फूट कर रोने
खगी।
"रोमो मस, शकुनमा ! मुझे...कट होता है।"
"समा...समा!"
"जो-कुछ तुम ने किया...उसके खिए...मै...तुम्हें...दोषी
उनके चरण पकड़े हुए, मैं रोती रही।
"रठो...नहा-धो धोखो । सानो-पीयो; यकी माँदी पत्री भारही
.
.
किन्तु मैं उन सकी।
"सीतल की माँ.1ो सीतल की माँ!"
"शासी है, भया !"
"मनुष्य का शरीर...गुण अवगुण का घर है! जय जो भार प्रबल
होता है। उसी के वशीभूत हो कर...मनुष्य कार्य करता है। मन को
शान्त करो।"
सोतख की माँ ने कमरे में प्रवेश किया।
"क्या है, मइया ?"
"इन्हें ले जाकर गहलामो...साना खिलाओ !"
"अच्छा, भइया । उदो बहूजी, चलो।"
तर उठ कर, मैं पृद्धा के साथ नीचे गई।
फेवल दो दिन उनकी सेवा करने का मुझे सौमाग्य प्राप्त हुमा ।
ये ही कदाचित मेरे जीवन के सर्वोत्तम दिवस थे! इसी भय समय में
मेरा नारीव सार्थक हुश्रा!
भाज सारे दिन वह अचेत पड़े रहे। डाटर पाया, सुई लगा कर
और फीस कर चला गया । गोधूलि के समय दो-तीन मिनट के लिये
उन्हें होश आया था। उस समय मुझे पास घुला कर, मेरा हाथ पकड़

५६ पिर मिलेंगे कर, उन्होंने कहा था-"शान्तबा थय...पर समायो! मैं...जाता तुम से...मैं अत्यन्त...सन्तुष्ट हूँ । पानी !" मैं तुरन्त पानी लाई और पिलाने लगी, किन्तु यह पी न सके, पिर येहोश हो गये । एक घण्टे के बाद उनका देहान्त हो गयी। मैं जी भर के रो-धो चुकी । अब रो कर क्या होगा? उधर उनका शव पका हुआ है। संसार में अब मेरा कौन है, मेरे लिये क्या है ? कोई नहीं, कुछ नहीं ! हो, केवल यंत्रणाएँ है ! किन्तु यंत्रणाएँ सहने के लिये भय में तैयार नहीं है। सामने शादी के गिलास में यह चीज घुली रक्सी है, जो मुझे मेरी यनयाथों से मुक्त कर देगी। पम मुझे सपे पो लेने दो! पो की । पौषधि काम करने लगी है, जरा देर में काम समान हो, माया | संसार हाट का छेना देना समाप्त हो चुका । अब इसोक से नाता टूटने को है। क्या दे कर यहाँ भाई थी, यह नहीं कह सकती। किन्तु यहा से लेकर जा रही हूँ सुख और शान्ति ! इससे अधिक मनुष्य किस वस्तु की कामना कर सकता है? पाकाया में सारे टूट रहे हैं। और मेरे शरीर के अन्दर मेरा दिक्ष एप रहा है, चक्कर आ रहे हैं। जीवन की पारा दोर हाथ से निकलती जा रही है। अन्धकार; निविद अन्धकार मुझे निगलने के लिये दौड़ा मारहा है ! पतिदेव ! पनि ..देव ! I हार दो साल की सस्त कैद भुगतने के बाद भाजपायिद घर लौट रहा. था। गाड़ी आने के घरटी पहले में नगर-निवासियों के मुण्ट के मुण्ड -Pra-Amiratna . . . - . हितेपी थे। समी गर्व और भनिर्वचनीय माहाद से फूले न समाते थे। केवल एक इन्चा उस विराट समूह को आन्दोलित कर रही थी, और घर यी प्राविद का यथोचित सम्मान करने की हत्या । ऐसे प्रारम-स्यागी युवक का स्वागत करने में किसे गर्व न होगा, जिसने अपने सारे सुखों को देश के लिये तिमि दे दिया हो? गादी याते ही जयकारों की मंगल ध्वनिं गूंजने लगी। याषिद मुस्कराता हुमा उतरा । पुष्प-या होने लगी! हार पहिनाये जाने कगे। भय हाय मिखाने और हृदय-से-हृदय लगा कर भेंटने की लोकप्रिय क्रियाएँ समाठ हो गई, तो प्राबिद स्टेशन से बाहर लाया गया। फिर एक शानदार शुलूस शहर को ओर रवाना हुमा । कई घपटों के बाद जय भविद घर पहुंचा और बाहर लोगों से मिल का अन्दर गया, तो माँ ने कलेजे से लगा लिया, और माया चूमा । अपने पिछुके हुए लाल को पा कर माँ को जितनी खुशी हुई, ययान नहीं हो सकती । अपने खोये हुए पछड़े को पाकर गाय को जितना हर्ष होता है, उससे कहीं ज्यादा हर्ष प्राषिद की माँ को था । बलाएँ लेती जाती धी और जेल की बातें पूछती जाती थी। इतने में एक सुन्दर नवयुवती पाई और दरवाजे के समीप ठिठक गई। युवती के हाथ में बार का एक मुन्दर हार था । युवती ने प्राधिद को देखा, धाविद ने युवती को । युवती का चेहरा समझने लगा, अखि स्वतः नीचे झुक गई। 'युवती की ओर देख कर श्राविद की माँ ने कहा-"श्राश्रो. प्रेरी मीना है

हिर मिलेंगे
माधो | ToR AIR की है। पेशावर, ये मुस्ता साइर को
सारा इन्हें समय से पी हमाद है।"
अमीमा एक गाती हुई भागे महो। अबिद के ममोर पहुँच कर रही
tran दिना देने के लिए कामों को करने
स्वी Tanा के भार से हाथ कार न उसके बाहो में
रहागमा । प्राय गांची शिये, जमीन की भोर साहनी हुई, मोना सी
"हिमा, मीना! नी से शर्म नही जाते. पेटी।"
चाखिरजी करणे, धमीना ने सावि के गरे में चार दान
दिया। हार गले में परीकी प्रापिरकेशरी में विविध सन.
सनाहट पैदा हो गई।
दो तोगविद ने अमाना को अमर देगा , किन उपके
एमा साधारण में रमीना का रयाल मी आधिरथ नहीं जमा
साया कि यह दिन प्राया, गर अमीना अग्नी अनुगम
राशि और भकिका उपहार लेकर उसके दप-र पर पास
मर में मियास का पाएकाना मेवी 34हा कि दिला
न सा सैकदी भावनाएँ, पण धीर शममें शादी पर
परियतित যুগ্ধা, তম ব্রাদ যা মন া নয়। খ মাম
शायासे ऐमा आन पड़ने लगा, मानो गहरी नीद के
qी हो।
रात के नौ बज चुके थे। याविन पाने कमरे में ग्राम विस्त
की दशा में एक भारामसी पर लैदा हुया पाश्रमीना का करिश
विध साखी में सिरहामा ।
बूढे नोकर अम्बास ने कमरे में प्रवेश करके कहा-"मियों चलिये,
साना वैयार है"
"मामा, चनो, सभी पाता हूँ।"
"जली भाइयेगा, भैया।"
प्रयास चला गया। फिर यही प्र-तना की दशा हो गई।
अमीना फिर मा-या कर छेड़ने लगी । उसकी वही नाजुक नाम:
कलाइयो, उसरी वही ज्ञान भी प्रदि, सका वहीं पा से घास

४ 3 बदना, काना और घोस नीग्रो कर ना बार-बार मूर्तिमा होर भाविद के चोट खाये हुए दिल में पुहियों ने गा। मोदी दैर मै अध्यास ने फिर पा कर कहा-"चलिए मैया, सामा सराव हुआ बारा है।" "जा पा कर दो, मैं इस पर खरा नहीं मा " "क्यों, भया" "इस पत्त कुछ खाने की सलाहिश नही है।" "तीमत अच्छी नहीं है क्या, मियाँ ।" "नही, सबीयत तो बरामी है।" "फिर थोड़ा सा सान माहिए, भैपा?" भाविद ने कोई उत्तर मही दिया। थोड़ी देर तक परमास शुपाल सदा रहा, पिर कुछ उदास हो कर कमरे के बाहर चला गया। या यह यही धाविद है, जिस पहले परने शासमा पारख रखा था कि जेल में सामा प्रराब मिलने के कारण अधिकारियों से PAT बदा था, घनशत चत किया था? उस दिन जर अमीना प्राविद को हार पहिनाने गई थी, ली दिल में उस या देश पेय का सम्मान करने की का पारा । जय बार राजपूत सैनिक रणनी थोर जाने के पार लगते थे, पा रणराय से विमम AIR कर घर त गो . बिया अपने हाथों में उशिराब तर पहिगानी थी, पेगार लगाती थी, मुदत से आरती करती थमीमा ने ई भायों की प्रेरणा से भाविद को हार पहिमाया पा, को THIS दमियों को भान्दोलित करते थे । म प्रापिए की रिस करती थी। पाप्रपा उस पर पता हुमा पा, अज थाति के महान को पुलिस ने घेर लिया या अमीना ने अपने nortant देखा था, कि भाविद ने किम प्रमंसा में घर से निकपुर अग का पुलिस के हवाले कर दिया पारस ममम ME YATRE कैया मफुत था। वही पित अमीशा हदप में प्राण या। एकान्त में उसी तिकी छाया क्योEिRtrik के सामने या जातीभी. mantril की गुरुचि पती थी! पद है रि मिमी घर पुगठित सम्दा शरीर, भीगती दरों, गुलं-सफेद रंग और का मरल विनोद ! ममीमा मगमती नी, पति भारमी महा सरिता है। मानाय में भी राष्ट्रीय भाषा का विकास होने या रमने उखा कातमा और मर पहिगना रास शिपाईसियों के माने, पार की नाराजगो, मा की गिदको मादि उसने सम शुन्य सा लिया किम गार के सिपा और पुप पदिनमा मंजूर म किया। भातिर मामिद की रिहाई का समय निश्चमा गया। मीमा मे अपने ज्य के कासे दुए मृत से एक बार बनाया। यह यही हार था, जो भाविद के गले में पड़ा था, जिसने उसके विस को किसी के दिल का नेद मुनाया था। अममा की सयाग धगर पयाग करती, तो शायद इस सूफी से बयान मकर सकती। उस दिन की मुलाकात के बाद अमीमा के मन पर वे भावनाएं খিবা আমাই না, কিন্তু যঃ গল্পী ব য় ই গল্প ৪ दयाये रखने का प्रथम करती रहती घी, मिनकी उपस्थिति के ज्ञान ही से उसका नारी हदय एक प्रकार की बमा से भर जाता था।हा। यमके सरता, भावुक हदय पर ही मादक भाषमानों का रंग सदने लगा। . शापिद के हृदय में एक विचित्र समाम दिदा हुमाया। एक ओर या फष्य दूसरी मोर प्रेम । कम्य कहता या-यह सौंदर्य और प्रेम के राग भतारने का समय नहीं, काल की गति और देश की परिस्थिति देख कर चखना ही प्राणिमान का धर्म । प्रेम की जहर को दयामो, चौर शपने अरमानों को देश की बलि-वेदी पर भेट दा दो। किन्तु प्रेम यह जादूगर है, जिस पर कोई मन्त्र नहीं चलता! यह जिसकेमागे चिराग नही जमता। कांग्रेस के कार्य प्रम-सम्बन्धी प्रचार के सिलपिजे में, इन दिन हाविद देहाती में दौरा कर रहा था। सारे दिन एक ग्राम से दूसरे प्रामा कर अन्याय-पादित ग्रामीणों को दुस्न गाथा सुनना, उन्हें स्गनयना देना, काग्रेस के नियम समझाना, मेयर मनाना, चना कात और शहर पहिनने का आदेश देना, यही उसका निस्य का कार्यक्रम था। दिन तो इस तरह पीत जाता था, लेकिन रात काटे नहीं करती भी। एकान्त सुखा अवश्य होता है, किन्नु वा परिस्थियों में नहीं । एकान्त से करना को यदी उत्तेजना मिलती है। सोई हुई कामनाएं नाग पड़ती हैं, और फिर उनसे जान छुहाना कठिन हो जाता है। रात के ग्यारह बज चुके थे । गरों और निर्मक घाँदनी दिएको हुई थी 1 घोभर से चारपाई पर पहा प्राविद करवटें बदले रहा था, लेकिन उसकी आँखों के लिये नींद कहाँ थी ? बहुत देर से एक ही प्रकार की यात सोचते-सोचते भब उस जो ऊब गया, तो ३६ उठ खडा हुआ, और सामने के बात की और चज दिया। ग्राम के पेड़ों की छाया में श्रापिद धीरे-धीरे हलने लगा। सारा बांरा थाम के दौर की भीनी- भीनी सुगन्ध से बसा हुआ था । एक ओर एक कोयल कूफ उठी। वह मुगन्ध-सिक यायु-मएल कोयल के मधुर कण्ठ-स्वर को विकल नहरों से भर गया । उसी को प्रतिध्वनि आविद के हृदय में भी गूंज उठी। इतने में किसी ने यह चैती गाना पड़ा-'नाहीं भूल सुरदारी सुरतिया हो रामा!...दिन थाम कर प्राविद एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसे ऐसा ज्ञात होने लगा, मानो उसी के दिल से यह प्रावाज निकल रही हो- 'मा भूले.... उसका हृदय उस पी की भाति फड़फड़ा रहा था, जिसे ग्याध ने पर काट कर छोड़ दिया हो! बसे धारों और नराश्य पर विवशता नजर माने लगी। वही देर तक धूल-गई-मरी जमीन पर आम के पेड़ के सहारे, प्रारम-विस्मृति की दशा में प्राविद थेठा रहा । सहसा बह उठ कर स्टेशन की ओर चल दिया । उसने सोचा- देवी का दर्शन म पा सकूँगा, न सही, उसके दरवाजे पर माथा ती टेक ही था। दो मील का रास्ता काट कर जय भाविद स्टेशन पहुँचा, तो हा विलकुल मुनसान था। स्टेशन के परामरे में केरोसिन का पीर प्रकाश ना हुमा या!ह, बुकिंग-माफिस के अधखुले दरवाजे से से रोशनी निकर के प्रार्श पर पड़ रही थी। दावा के सामने लाकर मामिद ने देखा, अन्दर नाक की नोक पर अश्मा लगाये हुये एक बापू कुछ लिख रहे थे। "मैं अन्दर था सस्ता है. जना !" मार का कर यूगे प्रापिद को ध्यान से देखा, और परन किया- भावित ने कमरे में प्रवेश किया। "aria-ri" फिर मिलेंगे "भाद" या प्राविद के चेहरे की घोर भरन-एचकरधि से देखने लगे। "इस पर शहर की जानिय जाने वाली कोई गादी मिल सकेगी, "इस बार नहीं साहब, भय इस वक्त तो कोई गाफी न जाणी अब पाप को मुह मात बजे गायी मिलेगी।" सामने सुखे हुए रजिस्टर पर दृष्टि जमा कर पाय साहब ने दाबात में कसम दुधोई। प्राविद ने सामने दीवार पर लगी हुई थी पर रटाची-एक माने में पांच मिनट वाशी ये "तो फिर--अरदा, पादाव-प्र!" "प्रादान-प्र!" कमरे से निकल कर धाविद एक खंभे के सहारे, ऐननाशून्य-सा, बदा हो गया । इसे चारों थोर नैराश्य हो नैराश्य मजार भाने लगा। AISTAT पली - प्राविद प्लेटफार्म पर पारे-धीरे टहलने लगा। इस तरह वह कितनी दर दहलता रहा, इसका से ज्ञान न था। उसकी यह पद चतना की दशा, उस समय भग हुई जब पश्चिम से धानेवाली एक मालगाड़ी का प्रतिसाता हुभा घड-धड़ शब्द दिशाओं में गूंजने लगा | गाली रुक गई । एक हाथ में लालटेन बिये हुए, गाढे साहब प्लेटफार्म पर स्तर पढ़े। शपिद मे समीप जा कर सलाम किया। सलाम का जवा देते हुए, रुक कर, गाई ने प्राविद को सिर से पैर तक ध्यान से देखा। "मैं यही मुश्किल में पड़ गया हूँ । जनाव, क्या मेरी मदद करेंगे। मुझे एक बड़े जरूरी काम से इसी वक्त इलाहाबाद जागा है। अगर मार मुझे भी अपने साप देते घले, तो ही इनायत होगी।". "को भी लेता च ! प्रया...देखिये...अच्छी बात है, बैठ "किया ! जनाय ने दाइ ई इस धक मेरे अर बड़ी इनायत की।" भाविद ने लपक कर 'मेक धान में प्रवेश किया, शांति को सासनी फिर एक और बंब पर बैठ गया। दश घेदना कुछ कम हो गई। मादा से - थोड़ी देर में गाड़ी चलने लगी । गाई साहब प्रेक-यान में श्रद कर, दरवाजे के सहारे पार पटक कर, लालटेन हिलाने लगे। जय स्टेगन दूर निकल गया, वो उन्होंने लालटेन एक ओर रख दी, और यच पर धेरते हुए कहा--"आप तो शायर कांग्रेस में काम करते है " "इधर कैसे पाना हुआ था?" "कांग्रेस के काम से।" "क्यों अनाप, जैसा गांधीजी कहते हैं, क्या सचमुच साल भर में स्वराज्य मिल जायगा" "इस पात का फैसला तो हमारे सापके ऊपर ही मुनहसर है। गांधीजी ने तो सिर्फ यह कहा था, कि अगर हमारे देश में रहनेवाला हर राक्षस तर्कमवालान करने को तैयार हो जाय, तो हमें एक साल में स्वराज्य जरूर हासिल हो जायगा।" "अदा नब तो.. समझने में रानी हुई।" जेब से दियासलाई, और सिगरेट की डिबी निकाल कर, गाई महो. दय ने एक मिगरेट जलाई, और धुएँ के गुब्बारे फेंकने लगे। आविद मी. अपने विचारों में मन हो गया। गाड़ी जय इलाहाबाद स्टेशन पर पहुंची, तो घार या चुके थे। गादी से उतर कर, गाई माइय को एक बार फिर धन्यवाद देकर, আৱিন্তু घर की भोर रवाना हुधा । जब वह घर पहुंचा, तो अरुणोदय की सालमा दिशाओं में फैले रही थी। सामने युसुफ जंग का मकान था। पाविद टकटकी बाध कर देखने लगा। एकाएक खिड़की खुली, और किसी मुंदरी ने अपना गुलायमा चेहरा बाहर निकाल कर पूर्व की चोर देखा । सूर्य देव धमी तक चितिज के प्रदय अंचल में मुख किराये हुए थे! चंचल समीर सुंदरी के केशों से अठरोलियों करने लगा। यह एप देख कर प्राबिंद के दिन पर खॉप लोट गया। सुन्दरी ने प्राबिद की ओर देख कर मुस्करा कर, गरदन मुना ली। मुन्दरी कोई और नहीं, अमीना थी। श्रादिद अभी अपनी प्यासी धावों को मृप्त करने में ही लगा हुमाया जिमका मित्र वाशिद वायु सेवन के लिये उस और पा निकला, और श्राविद को देर र उसके समीर गया। सहाम-ग्रजेश के बाद वाजिद ने पूछा-"क्यों, भाई श्रापित, स्वैरिपतनो मे परेशान नारा रहे हो?"

मादि केनी में तो मामाको सारी हामी सुनाई और उमेर मा सार में मुष पा मगर का दीविना अशा हो । शरा-पर गया 11 ही पाया है।" शत्रुमरे पाले में होने वार शमा की रोशनी से दो भाती शाम है, मेन राम ने गुमति, हिदि के पदर को न मुम्म मात्र पर मामपाशित गया कि इस विना के परदे में ही में अवरो पिर যা খাকি খাবি খ্য ঘব করা হয়। * ঘন ” । शिकार हो गया है। विरका मेरा लिये उसने कई र इधर-उमर के भरन रिये, किन्तु कुछ ने जान पात्रों मिल साधी थे। दोनों की समीकी एमोस सालम" पायी, एक साथ ही गजेनरें। सपने दोस्त को शोधनीय दशा देगा, पाजिर को यहा पदमा हुया । उसने TR R से पता लगामा यह किया । परार प्रापिद अनाना मकान की मार करता, और कमी कमी सुग से aisa भी निजाती पर देश का शिल कोपीन हो गपाकिहोरको ' गार पर होगा। एक दिन पाजिद मावि के कमरे में ा मा थाभावित गुरुवागने में था। मेज पर पाविर की गरी को भी पारित ने वाशी उठा ची। दिख ने कहा-~किसी की प्राय: चीन देषना मुना मिप नही, किन्तु कोहल या यानि पन्ने धनग्ने ms स्थान पर क्षिसा याबाद मुहरा केसी तालिम लिना है अपने को उसके प में दुजाना चाहता हूँ, चमकी मिरा मान होती जाती है ! अमीना, यारी अमीना, तेरी आँखों में कैसा जार या... पामिद ने शायरी बन्द कर दी। उसे ऐसा ज्ञात होने का मानो उसने कोई जमाया हो । मामिद रमान का भाया, सो रस यो मिला र यात करमा गुनिया दीवार पर लटकी हुई एक तस्वीर देखते-देखते, बाशि से हमारास कोका, बाजिद कमरे में बाहर निकल गया । उसे यार का यही मालम होने उसने गुनाह किया है। वाजिद भी ना T पास भी 'लिया। उसने भी प्रमोना को देखा था। यह मो उसको सौम्य मूति का उपासक था। एक बार तो वह ईपी से जल उठी, किन्तु उसके हृदय में मिल के लिये जो स्वामाविक स्नेह था, यह प्रक्ष सिख हुमा) मिय के लिये वह अपने परमानों का बलिदान कर बना था। घर सोधता, 'मैं गुनहगा हूँ। किसी के भेद से मुझे क्या मतलबगर भाविद स्वयं पताना नहीं चाहता था, तो मुझे जानने की क्या जरूरत थी ? अपने मित्र के सरल विश्वास से मैंने अनुषित खाम उठाया है। माय. शिचत कैसे हो? हाँ, एक तरीका है। अपने प्रागनों को मित्रता की पलि. बेदी पर भेंट चढ़ा है, और मिय के खाम के लिये भरसक प्रया करूं।" जब उसका निश्चय हो गया, तो एक दिन उसने यूसुफजंग साहब के पास जा कर सारी कहानी कह सुनाई, और उनसे प्रार्थना की किये उन दोनों के मार्ग में बाधा न उपस्थित करें। यूसुफजंग साहब के होश उड़ गये । पाप एक सरकारी मुलाजिम थे, असहयोगियों के साये से भागते थे। पहले प्राविद के पिता से अापकी को घनिष्ठना थो; किन्तु जिस दिन भाषिक्ष असहयोग मान्दोलन में सम्मिलित हुआ, उसी दिन से प्रापने उसके घर आना-जाना छोड़ दिया। उन्हें भय था कि अगर अमीना का प्राविद के साथ निकाह हो माय, तो कहीं उन्हें मौकरी से हाथ न धोना पड़े। "तो धापने क्या नाय कायम की " यूसुफजंग साहय सोचने लगे कि क्या उत्तर दें। पद कई सय चुप-चाप फर्श की ओर ताकत हुए बैठे रहे, फिर वाभिड के चेहरे की और देखते हुए योले-"वाजिद साहय, मैं आपके खयालात को इजत करता हूँ। मैं मानता हूँ, पाप मुझे जो राय दे रहे हैं, यह निहायत दुरुस्त राय है, लेकिन मैं इस मामले में मजबूर हूँ । विक्षा भाई साहब की इमामत के मैं कुछ नहीं कर सकता। श्री जहाँ तक मेरा स्थान है, वह कहीं भोर यातचीत कर रहे हैं। "तो क्या बिलकुल उम्मीद न की जाय?" "जी हाँ, विलकुद मजबूरी है।" वाजिद निराश वापस गया । थमीना को शादी के बारे में यूसुफ- जा साहब अभी तक शिलकुल जामोश थे, लेकिन अब यह नई क्रिक समार हो । 'ममीना की शादी बहुत जल्द कर देनी चाहिये ना तो पेश प्राये। अन्दाजा का न जाने पिर मिलेंगे किया। अमीना की मी ने कहा--"धीर सो है। सदशी मी ही रहेगी। भाषिक्ष भी सीमा नाका है। यहाँ गायक ही शादी हो जाप, सो पया पुरा है।" लेकिन मुफ साहब को यह दाम पसन्द नही पाई । पोडे." अमीना का यहाँ रहना मुनासिब नहीं।" फौरन से हर पाप माना को सहारनपुर अपने बड़े भाई पहा पहुँधा धाये । अमीना की माता महुन रोती चिल्लाती रही । किर धमकी यात सुननेवाला कौन था? x X x कई मास मीत गये । प्राचिद की दशा दिन प्रतिदिन बिगड़ने लगी। पकसी जेल ही में प्य म हो गया था, दूसरे शहर ग्राने ही पह सौदा सवार घामाने पीने से भरपि हो गई. दुर्वलता पड़ने लगी। दर समय को परेशानी और क्रिक ने और भी घुसा दाला र रहने हगा इशा गुरू दुधा किन मरज पढ़ता गया यो-पोवा की मां कुछ और या, और दया कुछ और हो रही थी। दो महीने गुजर गये, लेकिन रोग किसी तरह म भटा । और घरता तो कैसे प्रेम- रोग का इलाज ही कुछ और है। पहले सो कभी-कभी दर्शन ही प्राम हो जाता था, लेकिन अब उसकी भी कोई सूरत में भी । समाम दवाइर्यो में वक्ष एक ऐसी दया थी, जिससे कुछ म वृक्ष लाम श्रावश्य होता था। और यह दवा थी अमीरा के हाय का हार । इसी से हदय की दारुण, असा पीड़ा का कम हो जाती। घमना की शादी तय हो गई । सवार दस्तखार मली के यहाँ से मानी पापी । यूसुफ साइड ने भन्दूर कर लिया अमीना की माँ इस शादी के मिलाफ थी। उनके दिल में बार-बार यही माता कि इसका भतीजा धुरा होगा। उन्होंने बहुत लोर मारा, समझाया, लेकिन उनकी पान किसी ने न सुमी विवरा हो का प्रमोश हो गई, और दिन-रात टी की रिपत की दुपा करने हों। शादी की तारीख नि भा गई, बैकिन अमीना खुश न थी। अरविद की याद ही उसके विरह व्यमित हृदय संपति सहारन- पुर आने पर उस दिन बहुम बेचैन रहता था। उसी यहादुर की सूरत हर समम उसकी माँसों में फिरा करती थी। शादी की बात , ६७ सोच कर अमीना घबरा उस्ती।बह सोचती-'शादी हो जाने के बाद भी क्या में भाविद के बयान को इसी तरह दिल में जगह दे सकती है?" जितना गौर करती, सिवाय नहीं के उसे कोई जवाब न मिलता। किसी की विवाहिता स्त्री किसी दूसरे पुरुष को, चाहे वह कैसा ही सचरिम व्यक्ति क्यों न हो, अपने दिल में जगह नहीं दे सकती। यह सोचने लगी कि प्राविद को छोड़ कर यह किसी दूसरे की उपासना कैसे कर सकेगी। कभी जी में श्राता, वालिद से माफ इनकार कर दे, किन्तु सजा मुखन खोलने देती। शादी का दिन भा गया। सहारनपुर ही में बारात पाने वाली थी। बड़ी धूम थी। मीना के चाचा सहारनपुर के प्रतिष्ठित रईस थे। घरे में थी पहल-पहल थी। सभी खुश दिखाई देते थे। लेकिन मीना को कोई खुशी न थी । श्राज उसका चित्त बहुत विकन था। आज ही उसकी परीक्षा का दिन था। रात के घाट बज गये । यारात दावाजे पर बाई । सय खियों बारात देखने के लिये घर के बाहरी भाग में ली गई । अमीमा के लिये यह अति उत्तम सुयोग था। संदूक खोल कर उसने कुछ रुपये और गहने निकाले, और पीछे के दरवाजे से मकान के बाहर निकल गई । अमीना मुशिहिता नवयुवती थी। उसे अपने ऊपर पूरा भरोसा था लेकिन पर' की अकेले बाहर नहीं निकली थी। बाहर निकलते ही उसका दिल घरको लगा किन्तु उसके हृदय में इस समय वह उत्साह, था, जो विकट-से-विकट बाधा की परवाह नहीं करता।सकी दशा इस समय उस निरपराध पी की-सी थी, जो अत की दीधार पार कर बाहर आ गया हो, और जरा-सी पाहट से परा उता हो ! तर, यह सब होते हुए भी अमीना पहरी प्रसस यी । वह ऐमी तेजी से चली जा रही थी कि अपनी रोजी पर'उसे स्ययं पारश्य था। - पिर मिलेंगे अस्पद पास के जिस को सूत्र से प्राविरका रोगी मान लोक से बंधा हुमा था, भमोना को शादी की पर मुनते हो । म टूट गया। यह भीरा-शाएं प्रीपन-सी उसशिन बाकी असं करने जगी, जो उसे घने 47 में भाभय देकर शान्ति प्रदान कर मरे से शाम सक श्रादि के घर पर उसके पियों और शुमतिको की भीइ-मो लगी रहती । नगर के मरयेश हिन्दू और मुसलमान के fre से उसके जियें दुधा निकल रही थी। रात के नौ या मुके थे। पूरे दो पदे को मूगम के बाद पारिते आँखें शोशी । यानिद सिरहाने देवा माया। हाय से इशारा करके भावित ने पानी माँगा। वाजिद में एक शोरी के गिलास में पानी दिया। पानी पी कर भाविद में सोया स्वर में कहा-~"वाशिद, तुम मेरे दिलो दोस्त हो। इसझिये मरने से पहले सुमको उमरा से सुरक्षा करता है, जिसके माTIT से मेरी जिन्दगा और मौत को कशमकश शुरू हुई। मैं अमीना को पार करता हूँ। मेरा मावि माया दे। देखो, याहर अमीना ने मुझे अपने हाथ से पहनाया था। मेरी यह समझा है कि अन में यह हार मेरे गले में हो। मुझे उम्मीद है कि तुम अपने मरने- धाले दोस्त की समसा जरूर पूरी करोगे। भाई, मायो एक बार मुझ से मिनल " वाजिद को प्रोतों से बार जारी थे। दोनों दोस लिपट का मे लगे। फिर एक हिवकी पाई, और श्राविद हमेशा के लिये प्रामोश हो गया। प्रा ज्योतिहीन हो गई, सॉस द गई, शरीर एडा हो गया। साधी रात बीत चुकी थी। किन्तु मिलान नै सुनसान स्थान पर इस समय विचित्र भीड़ थी। जो भुगता मगे सिर, जगे पैर पहुँच भावा । प्राविद की बाश दान कर दी गई, जातिहा पढ़ा गया ! लोग चासोस करते हए घर लौटने जगे। .

हार निस्तान में फिर निरतब्धता छा गई। प्राविद की याद टिमटिमाती हुई शमा बासू यहा रही थी। इसी घेदनापूर्ण समाटे में एक सुन्दरी केश बिखराये हुए आई, और श्राविद की क्रय से लिपट कर बेहोश हो गई। यह कोई और नहीं, यही अभागी अमीना थी। एक माना गुजर गया। लेकिन अगर आज भी कोई सयरे के समय कमस्तान के बाल वाली सड़क पर निकल जाय, तो श्रानिद की क्रय पर कुछ मुआये हुए फूल और एक घुझी हुई शमा हर रोज़ नजर सायेगी। जन-साधारण का खयाल है कि धाघिद की पय पर रात को परिया भाकर नाचती है, और वे ही फूल चढ़ा जाती हैं। लेकिन बात कुछ और है। यधार्य तो यह है कि यह काम गरीय अमीना का है। शाबिद के देहावसान के बाद उसने अपना नैराश्यपूर्ण जीवन देश-सेवा में लगा दिया। दिन-भर सेवा-कार्य में रत रहती है, और रात के समय ऋनिस्तान में जा कर प्राविद की कय पर अपने हाथ का गूंथा हुमा हार धदाती है, शमा रोशन करती है, और कभी-कभी दर्द से भरी हुई कोई गजल गाती है।

घर
.
जैश में उस कोही जमने आने के दिन
माग विसाये थे, पानिमा पार हमाग में देवर से IAS
भेट कर दी मेरे को प्रो धा-या wrम ने जगे
हुए कैदी उ
ROrali हिदासमेत
पास यह
पापा-जोमाने समेत
दना था, जो उन मेरा में, हम-4 में, मैंने
ranा से लियाra साधी से मिलाने का भर की या।
म समान काम था, पर मनमा गाभा !
मारहा था उसे मानो उम मोटे-रे संपार मारी विभूसिया, मिरे
शीशा सेनने दिनों पुश मिज कर मानारन पापित रनि
धा, पाय फायरिया मे देख कर पीके मार को पाको हो।
एकदोन वाम घोडकर, पिडा का ग कमरे
में प्रवेश कार को कटोरमदा म स गायरको
एक सिर से देश, जेजा ने भारही बीस?
"तुमने मेरी यही दिमत की है।"
धीरू का सिर में गया। समीन की रसरशने
कर-"हुनर माद क्या कहा है.."
"महीं थारू, मुंह देथे की बात नही है। गुलाम ri
मुझे २१ साल हो गये। इस परम में मुझे हमारा Malो निगर
करनी पदा!etत पाने पर मैंने बहुतों से काम लिया, लेकिन
जिस मुमत से तुमने मेरो निमत की है, किसी सो नहों को।'
"जा, मैंने तो यही किया, जो मुझे करना चाहिये था!"
"अब मेरो खिदमत कौन करेगा मोस?"
सिरहा कर योरू बोबा-"हुनर बिरमत काने के लिये में
से ममि भायंगे"

घर ७१ "महीं, मुम्हारा स्या त है।" दो-सीम एप चुप रह का, जेजर ने फिर कहा-"अब तुम भागार हो । तुम जहाँ पाहो, मा सम्ते हो; जो फुप चाहो, कर सकते हो। इसलिये उन्हें एक सलाह देना चाहता हूँ। देखो, दुनिया में बाहर भमन को जिन्दगी बसर करना । जेल में रह कर इन्सान इन्सान नहीं मह जाता इसलिये कैद से निकल कर उसकी तपोयत श्राम तौर से जुर्म करने की तरफ हो झुकता है । लेकिन दरमन बहादुरी जुर्म करने में नहीं है, यहादुरी है योग्रत को रोकने में !" "हुभर, ठीक कहते हैं।" "तो तुम वादा करते हो कि यहाँ से जा कर भजे भादमियों को घरहरहोगे?" "प्रया, तो अय तुम्हें जाना चाहिये । देर हो रही है । यह लो।" ओर से दो रुपये निकाश कर जेजर ने वीरू की पोर या दिये। "हुए ! सार-सचं तो मिल ही चुका है......' "सकर-खर्च तो सरकार की तरह से मिला है । यह तो मैं तुम्हें दे "हुजूर ने पहिनने के लिये यह सब करड़े दिये हैं । अम रूपये भी दे रहे हैं। आपके रिन से मैं कभी डरिन न होऊँगा।" "ले लो, सकोस न करो । यों हो दे रहा हूँ, इसे कर्ज न समझो।" रुपये स्ने कर, हाथ जोड़ कर, वीरू ने कहा -"हुनर, मुझ से जो भालती हुई हो, उसके द्धिये माफी चाहता हूँ।" बीरू के चेहरे की ओर देख कर, जेलर ने सिर झुका लिया । उस समय कुछ कहने की उनमें शक्ति न थी । जेकर के पर कर, प्रथाम का, जप पीरू बाहर निकला, तो उसकी माने डबडबाई हुई थी। फाटक खोलते हुए, संतरी ने कहा-"जाते हो, बोरू" "हाँ, भइया ।" "अब तुमसे काहे को मेंट होगी ?" "भगवान जाने, ठाकुर!'मन चीती नहिं होत .ही पीती ताल!" "ठीक कहते हो, बीरू।" फाटक खुल गया। यह बाहर निकला। .

. + " "हर पलें र ! ज्ञप राम" शम राम, महमा ! यो, हमें भूनम शामर!" "यह पाते हो टाहर सथियो हो भना, कोई भूक सकता है" मागे पढ़कर, रक का, मुरकर, उपने एक बार जेल के फाटक को ओर देपा, और विदानी रिक्षर के घर में प्रवेश किया। मीगर' सहन में शामू सज रही था। बारू को देखते ही इसकी भोर पा वरन गोद में उठा पर, यह उमें प्यार करने साधारू को देख कर, कमरे से निकल कर, शामू को माँ ने एखा-"तैयार हो गये पारू" "तुम सो जा रहे हो, अब शाम को कौन खेनामेगा?" पीर के पास कोई उत्तर म या सिर भुजा कर, अपने हमरमशान- से मन की सारी ममता लेकर यह शामू के डरपुरा मुख-माल की पोर देखने लगा। काम् उसकी दादी के रालोको सपनी नन्ही नही अंगुलियों में लगने की कोशिश कर रहा था। वीरू की मासा में प्रार एखक पाये। "रास्ते के वाले कुछ साना ते जाओ।" "क्या होगा, परजी" "नहीं, ते सामो।" रसोई घर में जाकर शामू की माँ एक साफ कपड़े में धौदी माशी और पूरियो घाँध खाई। "यक्ष कर भागे, चोर" 'कह नहीं सकता, यहगी।" "कमा कमी भाका हा पायदे जाना। "हो, यही, जरूर पाऊँगा | रक्षा, अब धतूं।" सामू को गोद से उतार कर, बीरू पोटली ले ली। शाम रोने अगा। उसकी माँ से फुसलाने का पेक्षा करने लगी। "सलाम, बनो।"पीरू शीरता से बाहर निकल गया। धाज्ञादी की हवा में सांस लेसा दुधा पटोही घर आने वाले मार्ग पर सुरियत गति से चला जा रहा था। साधारण प्रयास से यहा के जीवन में घुस मिल जाने के कारण, परदेस में उसे मुख सो यथेट था, किन घर घर ई, परदेस 'पास' 1 'परदस' घर को रायरी घर ' - 1 फैसे कर सकता है। घर की वे सारी विभूतियों, जिन से प्रारम्ध ने उसे अनायास हो अलग कर दिया था, आज अपने सम्पूर्ण भाषण से उसे अपनी ओर खींचने लगी। टिमटिमाता हुघा दोरक फडक-फदक कर रोशनी फेंकने लगा ! मुमाता हुश्रा हृदय खिल उठा । शिन्तु मायाविनी नियति अदृष्ट के परदे में बैठी हुई, बटोही का उद्वेग देख कर, मुस्करा रही थी। दस साज,पाले की स्मृतियों आँखों के सामने थाने लगी--- शाम हो चली थी। अपने लिष्ट सिर पर मधेशियों के लिये करयों का एक बड़ा योम याद हुए, यीरू अपने उस छोटे से झोपड़े के द्वार पर बाया गटर एक और पटक कर, सिर से अंगौछा उतार कर उसने पसीमा पौछा । उस समय यह ऐसा दिखाई देता था, मानो कोई पहलवान अभी- अभी अखाड़े से निकला हो! उसके उभरे हुये सीने, घदे हुये पल्लों और भरी हुई रानों से असाधारण पुरुषार्थ का प्रमाण मिलता था। उसका वह स्वस्थ शरीर दरिद्र तो अवश्य था, किन्तु सुसी था। उस गुड़ियासी सुन्दर भोली-भाली स्त्री-रन को पाकर, किसी और परतु की उसे क्या परवाह था? अंगौछा कंधे पर रख कर, उसने घर के भीतर प्रवेश किया। ऑगन में टाट के एक छोटे-से टुकड़े पर बैठी हुई उसकी स्री रूपा सामने फूल की चमकती हुई थाली में रग्वे हुये चायल बीन रही थी। काली, महीन माही से उसके सुकुमार शरीर का कुन्दनी रंग छुन छन कर बाहर निकल रहा था। सिर उठा का एक बार पति की भोर देख . फर, सिर झुका कर, यह फिर चावल बीनने लगी। धीरू का माथा उनका । रूपा के सुन्दर चेहरे पर विपाद की छाया थी, मानो चपनी सम्पूर्ण आभा से चमकते हुये चन्द्रमा पर काले बादल का एक टुकड़ा या गया हो! "केसाजी रे" रूपा ने कोई उत्तर न दिया। सब वीरू उसके बाल में जा बैठा, चौर उसके गले में बाँह डाल कर, अपने उप्त सावन की नदी के समान भरे हुये हृदय का मारा प्यार, सारा उन्माद आँखों में भर कर, उसकी भोर देखता हुया, बोला-"इसीलिये कहता है, ज्यादा मेहनत न किया. कर सिर में पीरा है क्या " NEKHEL पाव करुणा की चोट खा कर जलने आँखों फिर मिलेंगे A में सपक पाये । माद कप से कोई कसर न मस: पोहा से सबर कर, दीरू ने उसे अपनी सब मुभा में योध जिया ! रूपा की बातों से प्रासू बहने सगे। "किपा से कुछ कहा-सुना भई है या "गी से उस भास् पोपत हुये, वीरू में पूछा। चित कुछ ममा का, पति की गोद में पकी हुई मे भाईये तुमे कराठ से कहा-"तुम मे कोई यात कहते हारता है." "बता रे, पाकात "मुम्हारा गुस्मा पास है। कभी कुछ . कर धै. तो मुफुर प्राफर मैं मसना हो।" "गुस्मा उस्सा रहने । यता तो, क्या बात है?" "अभी अलावा के कमां पर पानी भरने गई थी, तो उनका करिन्दा बोली बोलता रहा।" पीरू को ऐमा जान पामानो मुनमान में समा किसी ने पो से समिर पर साठी मार दीको किन्तु, मरे पण या क्रोध से होपने खा, भुना हकने लगों, ने भाग्नेय हो गये। पति से अलग हो कर, उसके पैर पर कर. रुग ने कहा--- "दे, गुस्सा न करी । विप्त समाजो इसीलिये कहता धी, कुन लो।" पैर पुराते हुये बोरू बोला-"उसने क्या कहा १ सय हाल यता "मैं अपनी कोज कुइयाँ में दाब रही थी, उसी पयत यह एक गगरा जिये हुये नगत पर दयामा, और मेरो रस्सो पकड़ कर कहा---लायो, मा हूँ। तुम्हारे नाजुक हाथ पक जायगे। मुझे गुस्सा भा गया! मैंने कहा- सा, रस्सी घोड़ दो, नहीं तो प्रधान हो! घर में मा- बहिन नहीं है क्या मेरे मुंह से यह सुन कर, उसने एक ऐसी सराय यात कही, हिम कहो मुझे शरम प्राती है। मैंने मो इसे स्वरी. खोटी सुनाई, और जल्दी जल्दी पानी माकर घर चली आईना कह कर पति के घेरे कर मार देश का, सहम कर, उसने फिर उसके पैर 'पा छोड़ दे रे" "नहीं, मैं तुम्हें कहाँ जाने दूंगी। इस प्रक्षा तुम अपने आप में घर . "देख, छोड़ दे। जरा, झारी दादा के घर जाऊँ। उस साले कारिन्दे से भभी मैं कुछ न बोलूंगा!" "मेरी सौगंध सा कर कहो।" हृदय की उन उत्तेजना को रोक कर, परधर के समान बन कर, बीरू ने कहा-"तेरी सौगंध, कोई ऐसा-वैमा काम न करूंगा।" तब रूपा ने पति के पैर छोड़ दिये । नशे में चूर शराबी की तरह जइसाता हुआ वीरू घर से बाहर निकल गया। दस दिन बाद की बात है। उस समय पूर्व में तारिका जटित विराटु गगन की झलमलानी हुई चादर को कोर उठा कर उपा मुस्कराने बगी थी। गांव के तालाब के किनारे शौचादि से निवृत्त हो कर जय “श्रीरू घर पहुँचा, तो उसे बाहर का दरवाजा म्युजा मिला । पाहर जाते -समय उसने रूपा से किवाद बन्द कर लेने को कहा था। फिर उसने बन्द क्यों नहीं किया ? शायद सो गई, उस समय वह नींद में थी। उसने अन्दर जा कर देखा, रूपा को खाट खाली पड़ी थी। घर में यह कहीं न थी। इतने सवेरे वह कहाँ चली गई । शायद वह भी शौचादि के लिये गई हो। रूपा की खाट पर बैठ कर यह उसकी प्रतीक्षा करने जगा । निद्रा का फिर आक्रमण हुमा, झपफियाँ थाने लगों। तब वह खाट पर पैर फैला कर सो गया। जब उसकी नींद टूटी, तो दिन चढ़ पाया था। लेकिन रूपा उस -समय भी घर नहीं लौटी थी। वीरू का हृदय अज्ञात धाशंका से कार गया तुरन्त घर का दरवाजा चन्द करके वह उसे ढूंदने निकला। गांव में गली-गली घूम कर उसे खोजा, पर उसका कहीं पता न था। चारों 'ओर खलबली मच गई । अन्य प्रामों में रहनेवाले अपने नातेदारों के घरों पर जाकर उसने पूछ-ताछ की, लेकिन रूप कही न मिली। तब अपने हितषियों की सलाह से थाने पर जाकर उसने रिपोर्ट लिखाई । रिपोर्ट लिख कर पाने वाले निश्चिन्त हो गये। उपयुक्त घटना के एक सप्ताह याद एक दिन सबेरे मुरादपुर तहसीज के थाने में पी भीड़-माद श्री। थाने का महावा दशकों से भरा पड़ा था। बीच में थाने के दोनों दारोगे, बर्दियों पहिने, कुरसियों पर बैठे थे । सामने धीरू रस्सी से बंधा पैठा था। उसके समीप घट काटे, सिर झुकाये, रूपा बैठी हुई यो । एक ओर सरद बदर से डेको हुई एक सारा रखी थी। इधर-उधर कांस्टेचिन और मास-पास के ग्रामों में तिमिलेंगे लेमा कर रखा भिवानी सड़े इये धे। योरू ने अपने बयान में कहा-"अब मेरी घरवाली मेरी और हाजिरी में घर से गायर हो गई, तो मुझे लाला (मुखी हशमतराय) के जिलेदार, रधुनाथ सहाय, के ऊपर शक हुअा था । उस दिन थाने में मैंने जो पोजिसाई थी, उसमें मैंने यह भाग जाहिर का दी थी। जिनेदार साहब का पता बया कर, जब मैं उनके पाय पहुँचा, और उसके पैर पर पी रख कर विनती की कि मेरी जोरू मुझ लोग दी जाय तो यह कहकर कि मैं उनके अपर भूरा इलाम लगा रहा हूँ. मेरे ऊपर बहुत सफा हुये और मुफे मारने की धमकी दी। को-पोट कर मैं चला थाया, लेकिन मेरा शक रमा न हुभा । तब से टोह लगाना हुभा, में पराया धा मारा मारा फिरता रहा। फल शाम को मुझे पता लगा कि जिदार मे मेरी जोर को सदायार में । यह सबर पाते ही मैं अपने एक साथी को लेकर माद के लिये रवाना हुअा। रात दस धने का थमन होगा, अब हम मैदावाद पहुँथे। उस समय गाँव में सोना पड़ गया था। विपत हम उस मकान के पास पहुँचे, जा मेरी लुगाई रूपा बन्द थी। उस मकान के मामने शिलेदार के दोनों सिपाही तम्बाकू पी रहे थे । सामने से घुसना मुमकिन न था, इसलिये हम दोनों मकान के पीछे गये। पी दीवार से लगा हुमा एक नीम का पेड़ मिला । अपने साथी को नाचे मुस्तैद सड़े रहने की साझीद करके, मैं उस नीम के पेड़ पर चढ़ने लगा। कुछ ऊपर पाकर सामने एक बाल पर से थो रासले पर पली हुई दिखाई दी। उस दाम पर ना का, मैं धीरे से इस पर उतर पड़ा। फिर ये पाव चप्पर के किनारे तक जा कर आँगन में कूद पधा । आँगन में खड़े होकर मैंने देना, सामने दालान में एक लालटेन जल रही है, और हिलेदार साहब एक साद पर बैठे हुये मेरी पूरकर देख रहे हैं। खाली कर यह मेरे ऊपर झपटे । उन्होंने पार किया। मैंने काली दिमा, श्रीर पारे बार कमर पकड़ कर उन्हें जमीन पर पटक दिया। फिर बाटी छीन कर तरफ पैक दी। हम दोनों गुथ गये । एकाएक उन्होंने मेरी पीठ में क्षत भुमो दिये । पंच झगा घर में उनके सीने पर सवार हो गया। उन्होंने मेरे उपर थूक दिया ! सब टेंट से पुरा निकाल कर मैंने उनका रखा कार दासी या सामने की कोटी से रूपा के कराने की भावान भाई कोटरी में बाहर से साकल लगी हुई थी। सालटेन पक घर ७३ F ने दावाजा खोज कर, मैं कोनी में युपा, सामने एक घाट पर रूमा पड़ी यो । उसको हालत बिजकुन बिगड़ी हुई थी। मुझे देख कर वह रोने लगी। उसे साथ लेकर मैं कोठरी से बाहर निक| सामने दरवा. पर धमाधम चोटें हो रही थीं। शोर भी हो रहा था। लाओ समास कर, मैंने दरवाजा खोल दिया। कई आदमी एकनाथ अन्दर घुस थाये। वह मेरी ताक पहे, मैंने भी लाठी तानी । फिर में गिरतार हो गया। इस करज का मैं यकेले जिम्मेदार हूँ । मेरे साथी का उसमें कोई हाथ नहीं है। उस नाम में नहीं बता सकता। रूपा से मुझे मालूम हुश्रा, 'कि उस दिन तहके सत्र में घर से बाहर चला गया, तो दरयाना पन्द. करके वह खाद पर पड़ रही और सो गई। एकाएक इमे ऐसा मान पहा कि कोई टप्सकी खाट के पास सहा है। उसने अलि खोल कर देखा, खाट के पास कई थादमी सदं हुए काना-फूमी कर रहे थे। हाय- पैर याँध कर, मुंह में कालाप कर ये उसे उठा ले गये । वीरू के बाद रूपा और अन्य कई पहियों के ध्यान लिये गये। टसो दिन चाखान हुआ । मैजिस्ट्रेट में उसे सेशंस मुपुर्द किया । सेशंस मग गे का पानी की सजा दी। हाई कोर्ट में सजा घट कर दस वर्ष की सात कैद रह गई। . 'जेन में रूपावन धार धार बोरू से मिलने पाई थी। पहले साल एक यार, दूसरे वर्ष दो बार, सीसरे साल एक सार । तप से वीरू को उसकी कोई नबर नहीं मिली थी। उसे तो यह भी पता न या कि रूपा जीवित भी है कि नहीं, किन्तु उस मन विश्वास दिलाना या, रूमा जीवित है। पता नहीं, उस से भेंट होगी कि नहीं। प्रयाग रखये स्टेशन की भोर जाते समय, वहा पहुँच कर टिकट लेकर गाड़ी की प्रतीक्षा करने समय, रेता के उस भोगी दर के समर में दोरू. बराबर रूपा की बात सोच रहा था। घर का स्टेशन पा गया गाली से उतर कर, टिकट याव को टिकट देर, स्टेशन से बाहर निकला व पप गौर की और उस समय को सरदी मश: धसी होती जा रही थी। बसेरा खेते हुए परिषों का घर पडत जापा। तार बाँध पर पीर पीपर ने लगा। HITT प्रतानि खेतों और दागों में गाते हुए उसे यहादसा जैसा उस समय प्राप्त होता था, पर काम में - अनुभव दोने whi . मागोद में लेकर उस पार करने लगती थी! उग सेना और बागों में कोई परिवर्तन नहीं हुमाया। यह सामने का तालाय मा-का- तमा दिखाई देता था | उपर या राबर पा पुगे भी समयमा की मौजूर पापा दस वर्ष पहले तो घर में क्या कोई परिवर्तन मदुधा होगा ? रूमा पया पदी न होगी। उसके बायको अयश्य पकोगे । पाखीम कब पहुँचा होगी। रूपा घर पर मिलेगी कि नहीं, कौन जाने । उसने हरम से कर दिये। गाँव सामने प्रा गया। साधो हीघा के सामने एक सार पर दो तीन भादमी बरे हुए पर शप पर रदं थे। बावने रग का यह जपाम कौन है ? शायद साधो का सदा का है । यदुत दवा हो गया! इधर से भागा तो टीकम होगा। दूपी पगारी पर गुरु का पर अपने घर की चार पक्षा। उसमय पेग से धरने गायक पर, दिश भाकाब फिर धागे चढ़ा। घर के निकट पहुँच कर उमा ईना, बाहर भेगमायाया था। घर के सामने का या नीम का पे, जैमा या वैपाही खाया। पतरा भी वैया ही था। हाँ, इश उधर मिस सिक गई । संभाल- धागे बद कर,रोल का, उसने देखा, घर के दरवाजे पर ताला लटकहा है ! उस कोर आयाम से पाहत होकर पहबदी दाज्ञान में जमीन पर बैठ गया। दो सिमगाद उसके कान के पास से उप फर निकल गई। रूा कहा बी गई? इसी अग्नि प्रश्न पर उसका भविष्य निर्भर था, किन्तु इमरे इष करने में उस मस्तिक चममयं सिद हुआ। थोड़ी देर त यहीं मूनियत् पटा रहा, फिर उठफर मारी धरी के घर कीपोर चला। अपने सार-सुधर झोपई के सामने नारियल में खगाये हुए भारी बौधरी एक खाट पर मै हुए धे। धोती के अतिरिक चौधरी के शरीर पर और दिन या। मिर और मयों क या मन को शरद मोद हो गये थे। चेहरे पर मुरियों पर गई थी। बातों की रोशनी घट चली थी। "चौधरी दादा, जय राम!" नारियड मुंह से हटा कर, स्मृते पर जोर देते हुए मा पार कर रंडी के तेल के उस मद प्रकाश में चौधरी उसे पहचानने की कोशिश करने लगा। समाज पर ।

घर "जय राम! कौन हो, माया ! शुम्हे पहिचान नहीं सका। सराय मेंरा कम दिखाई देता है।" "मैं हूँ..दादा, बीरू।" "धीरू ! छायो मेटा, पात्रो, मैठो। जेहल से कय हटे ?" "बाम हो तो छूटा हूँ, दादा । सीधे घना पा रहा हूँ।" "बहुत अरछा किया, धेटा । सुम तो पहिचाने ही नहीं जाते हो! दादी क्यों रख ली, बेटा " "ऐसे ही, दादा। और सब कुशल-मंगल है?" "सय कुशल मंगल है, भइया । अपना हाम-पान कहो । नीमर को माई रे ! चल देख, पीरू टूट कर भा गया।" एक पण में एक वृद्धा सिर हिलातो हुई बाहर निकली, और अपनी निस्तेज बालों से पीरू का भोर देखने लगी । बीरू ने तुरन्त उठ कर वृद्धा के पैर छुए। “जीते रहो, बेटा ! अभी चले श्रा रहे हो क्या ?" "हा, दादी, प्रमो भा रहा हूँ।" बोरू खाट पर जा बैश । वृद्धा पाट के समीप जमीन पर बैठ कर हाल-चाल पूछने लगी। बीरू उन दोनों के सवालों का जवाय तो दे रहा था, किन्तु उसका मस्तिष्क एक दूसरे ही प्रश्न में उलझा हुआया । रूमा का हाल इन लोगों से कैसे पहूँ | सहसा वृद्धा योनी--"अपने घर भी गये थे, मेटा" "हा, गया तो था, दीदी; मुदा यहाँ तो ताला ला है।" "हा, पेटा ! क्या करोगे, जो भाग में लिखा होता है; यह हो कर वीरू का हृदय कॉप उठा । उद्वेगपूर्ण कौतूहल से उत्तेजित होकर उसने कहा--"सारा हाल साफ-साफ बता दे, दादी। बड़ा जस मानूंगा।" "व६ सय पीछे सुन लेना, पेटा," चौधरी ने कहा-"पहले शा-पीलो।" "नहीं, दादा, अभी भूस नहीं है । सहर से खा कर बना था। हो, दादी बता दे।" वृद्धा ने सिर हिलाते हुए कहा- कुछ न पुस, बेटा ! तेरे घर पर पाच परिस से सासा मूल रहा है। रूपिया चैबनाम के नीचे बैठ गई।

फिर मिलेंगे . जिसके लिये तूने इतना कह सहा, जेहल काटा, वह ऐसी कुजरिछनी निकली ! कैसा कलयुग लगा है! हे मगरान् ! हे भगवान् !" योरू को ऐसा जान पड़ा, मानो किसी ने खोजता या विष उसके कानों में डाल दिया हो। उसके बीहा उर-प्रदेश में एक कान भयंकर वैग से उठ खड़ा हुआ । उसकी वह चिर-पंचित ममता सूकान में हिलोरें जे-जे का पोरकार करती हुई ताण्डव-मस्य करने लगी। "जाने दो, बेटा ! क्या करोगे ? दुनिया की यही रीति है । अथ श्रा गये हो । घर समाजो, दूसरो सगाई कर लो।' वृद्धा के शपयुंफ पाग्यों का एक शब्द भी धरून सुन पाया। स्तम्भित, चित्र-लिखित-सा वह थोड़ी देर तक निस्तब्य बैठा रहा। फिर उसने किसी खोये हुए की तरह धौरे से "वैजनाय भाज-कला कहाँ रहता है, दीदी?" "मीसमपुर में रहता है, येा । तुम था गो, भया, यह बहुत अरछा हुमायब पुरुषों के घर में चिराग तो अलेगा हम लोगों का मन भी लगा रहता था । जब तक जियेंगे, तुम्हें माखों से देख वो लिया करेंगे।" मोरू उठ कर खड़ा हो गया। चौधरी ने तुरंत कहा-"कहाँ जो रहे हो, बेटा? चलो, भोजन बना कर खा-पी लो। फिर जहाँ जाना हो, "हा, बेटा, मैं अभी सब ठीक किये देती हूँ। भोजन घटपट पन "नहीं, वीदी, मुझे भूस नहीं है और लोगों से मिल पाऊँ।" चौधरी ने वीम के मुख की ओर देख कर कहा--"-या, मानो, भया । गदी लौटकर आना।" अन्दी-सादी दम बढ़ाता हुमा यो सामने अंधकार में शोर हो गया । मारी चौधरी ने सिर हिलाते हुए कहा-"भीमर को भाई, योर बड़ा श्रमाया है। माना।" वायगा" ..."सत्र धान वाईस पपेरी नहीं होता!" -- घर . दोपहर का समय था। बोरू ने भीखमपुर में प्रवेश किया। इस समय उसकी दशा बिलकुल बावजे की-सी हो गई थी। कल रात से प्रय तर उसने केवल दो बार जज पिया था, किन्तु वध का एक दाना भी उसके मुख में न गया था। शामू की माता ने परियों को जो पोटली दी थी, वह उसके घर के बाहर दाज्ञान में पड़ी हुई थी। नोंद का भी कहीं पना न था। उसे ऐसा जान पड़ता था, मानो ज़ोरों का नशा चढ़ा हो। मिट्टी के एक साधारण झोपड़े के सामने पहुँच कर पीरू ने अावाज लगाई--"बैजनाय महतो हो!" किमी मे उत्सर न दिया। उसने फिर मावाज लगाई, लेकिन फिर माय न मिला । तब वह इधर-उधर देखने लगा । सहसा असे ऐसा जान पदा, मानो कोई उसकी ओर देख रहा हो । उसने मुझ कर देखा-अधाधुले दरवाजे की थाइ से कोई उसकी ओर देख रहा था। आगे यह कर उसने गौर से देखा, यह रूपा थी। सिहर कर, भय से कॉपती हुई, रूपा दरवाजे से हद कर भीतर चली गई । तयं धड़ाके से दरवाजा खोल कर उसने अन्दर प्रवेश किया। चाँगन में एक ओर खडे हो कर उसने देखा-एक खटोले पर सनी के ऊपर दो वर्ष का एक बालक सो रहा था। खोले के समीप सको हुई रूपा उसकी घोर भयातुर अखिों से देखती हुई थर-थर कॉप रही थी। "रूपा!" उसके प्रान्दोलिन हृदय का सारा रोष, सारी या. हेलना, सारी पृणा, सारी वेदना, मानो इस एक शब्द में अंतरित हो गई थी। मट कर रूरा मीरू के पैर से लिस्ट गई, और फूट-फूट कर रोने लगी। "पर छोद दे। अब रोने से क्या होगा? मेरे कलेजे में तो तुने धाव कर ही दिया !" ने पैर न छोगा, और जोर-शोर से रोने लगी। "रूमा, देख, भय पैर छोड़ दे।" जेर में पड़ी हुई धरी ने सहसा फिर मिलेंगे पैर छोड़ कर, अक्षरा हट घर, रूपा सिर झुकाये हुये प्रोस् बहाने "तूने ऐसा क्या नया रे ? क्या मैं मर गया था?" रूपा कुछ न योद्धमकीहरकाश में घटाएं अनि तीम से उमड़ने लगी । अधु घृष्टि जोर पकड़ गई। "योलती क्यों नहीं रे ? जान क्या कट गई है" चुप रहना चाचित न था। रूपाने थवर करड से कहा- "अगर मैं...मैं ऐसा न करती...तो मुझे बजार में बैठना पदमा मत बचाने का...और कोई...उपाय न था!" नये में चूर शरावी के ऊपर घदी जा पड़ गया! जेए में पड़ा हुधा हाय बाहर निकल आया। वीरू मंत्र मुग्ध सा सहा रह गया। उसकी पाखों के सामने से एक परदा-सा हो गया। उसकी घाख सहसा खटोशे पर सोते हुए शिशु की भोर गई। वह स्वर देसता हुभा मुस्करा रहा था। उदासीन संध्या की भौति उसका हृदय भी मुस्कराने लगा ! जो सुष का अधिकारी मही, उसे -.-:-..---------------.असे हस्तक्षेप . था, जिसने ." . थी। उसने इसके साथ विश्वासघात अवश्य किया। रूस ने भी उसे धोखा दिया। उन दोनों से बदला लेने के विचार से ही वह यहाँ भाया था, किन्तु प्रतिकार अर उचित म जान परा। छुरी साप कर रह गई। पके-अधपके बालों से घिरे हुए अधेष रूरा के विषादपूर्ण मुखमपन की और एक बार देख कर, मुड़ कर, यह दरवाजे की ओर चला। "टहरी, कहा जा रहे हो?" वह शीघ्रता से बाहर निकल गया। दरवाजे के पास जाकर, रूमा यासू बहाती हुई इस ओर तेजी से जाते हुए अपने भूतपूर्व पति की घोर देखती रह गई। इसकी अखेिं रो रही थी, हृदय मी रो रहा था। उसका यह खोया हुया, मुन्दर, मनोमुग्धकारी अनीत मूर्तिमान होकर अाज पौ अनायास ही उसके जीवन में धाकर चला जा रहा था। फिर उसका हदय श्यों न रोता? उपर्युक्त घटना के पाँच दिन पाद की बात है। रिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रे- घर । के इजलास में वीरू, हथकड़ी पहिने, सिर झुकाये. कठघरे में था। इसके चेहरे पर शांति व्यक्त थी, प्रससता भी अभियोग-पन्न मुम कर थदालत ने सवाल :-"तुमने चोरी की है? तुम तसलीम करते हो?" "जी हाँ, हुमूर!" अभियुक्त ने सिर मुका कर कहा। "तुमने चोरी क्यों की" पीरू चुराधार खड़ा रहा। "अभी हाल ही में, तुम इस यरस की सजा काट कर टूटे हो ?" "श्री ह. हुजूर ।" "तुम्हें और कुछ कहना है ?" "जी नहीं।' जाते की माग कार्यवाही शीघ्र ही समाप्त हो गई। सरकारी गवाही से बीरू ने सिरह नहीं की। उसकी ओर से न कोई गवाह था, नवकील । अदालत भी उसने वकील की दरखास्त न की। श्राध- घटे में अदालत ने तजबी सुना दी। अभियुक्त को ढाई वर्ष की सस्त मजा मिनी । कटघरे से उतर कर, सिपाहियों से घिरा हुआ, योरू सुश- खुश बाहर निकया। संध्या के समय जब व अन्य कैदियों के साथ जैज पहुँधा और जेलर के सामने पेश हुआ, तो जेवर सादय के भाश्चर्य का ठिकाना म था। "सुम यहाँ फिर मा गये ?" "हुजूर की खिदमत करने के लिये "मेरी खिदमत के लिये तुम्हारे-जैसे दम मिल जाते !" "नहीं, हुमूर, जैसी स्विदमत प्रापक्री में कर सकता है, और कोई नहीं कर सकता!" "लेकिन, तुमने तो मुझसे वादा किया था कि अमन को जिन्दगी तुमने जुर्म क्यों किया " के लिये ! हुजूर, अगर मैं याहर रहता, तो मुझे निध करना पड़ता नाम में सजा मिली है? P चपर गिर मिलेगे "जी" "किनना मात्र हा जगा" "नही, हुन । मैंने सारा गाय टस दिया। जा माह को फिर पारचर्य हुआ। "पदा, यहाँ से जाने के बाद सारा दाज मुनायो।" सपनी का कहकर, बीरू ने सर पेहरे ही धार देवानको भारों पाया गई थी । म प्रति हमके घर में सहानुभूति उना रही थी। अशर के कमरे से निकल कर, जब उसने महाते में प्रवेश किया, तो उसके साथी को उसे देख कर आगत-नाद करने लगे। उस समय थारू की ऐमा जान प्रहने लगा, मानो एक गुहा के मा विदेश से पर लौटा हो।स्वनम्नता के संसार में बंद भरमार भरा दिश लेकर गपा था, लेकिन वहाँ उसके सारे अरमानों का खून गया। चार दिनों की पद प्रासादी पार हो गई। वह घर, जहाँ से घर की सारी विभूतियों गई हों, पर कहलाने योग्य नहीं रह जाता ! यहाँ इस परतत्रता में एसे मिध जायगा, जिनकी उसे प्रापश्यकता है। यहाँ परिश्रम है, कठिनाइयों भी है। किन्तु यहाँ धे सिम्ताएँ नहीं हैं, जिनका स्वतन संसार में इसे सामना करना पडा था। अब बस की यहाँ कमी नही मनोविनोद के लिये संगी-साधी है, शामू है। हो, उसके ममास इत्य में एक ऐसा प्रभाव अवश्य है, जिसकी पूर्ति यहाँ नहीं हो सकी। लेकिन जाने दो उसकी यात ! वह जो माप्त करने के योग्य नहीं, उसकी बात जा कर क्या होगा ! चिता मकर राख हो गई ! श्रय नाक थाने से क्या मिलेगा। + चार दिन का सुख मालती फूलों के बीच रहती थी, और फूलों-सी सुन्दर थी। उसके मझोले, मुगठित शरीर में वेला की-सी मधुर सदी थी, पोलों में गुलाब की सो अरयाई, और आँखों में उस सुन्दर सरोवर. की-सी गहराई, जिसमें कमल खिनम्विला रहे हों ! यौवन चम्पक की भीमी सुगन्ध को मोति उसके इस लायययमय शरीर में प्रभुत मादकता भर रहा था । वह अपना मूल्य जनती थी, किन्नु संसार को मी पहिचानती थी। ब्दी माँ के अतिरिक्त उसके कोई न या फूलों का एक छोटा-सा याग सन दोनों की जीविका का साधन था । मुहल्ले के रसिकों की सतृष्णा रहिया मानती पर पड़ती थी, किन्तु उसके पास उनके लिए उपेक्षा के सिवाय कुछ न था। ऐसी परिस्थिति में पड़ी हुई नवयुवती के लिये पेशा अमूल्य कवच है। लेकिन मनुष्य जश्च हार जाता है, तो उपेधा के भाव का भी अन्त हो कर ही रहता है। था दुर्दिन या सुदिग पा ही हुँचा । श्रावण का मधुर मास था, सधेरे का सुहावना समय । शाकारा में घटाएं झूम रही थी । अपने बाग में मालती फूल धुन रहो यो, और गुनगुना रही थी अपनी एक प्रिय कजली-'बाजी, बाजी, बंसी माशी मधुवन के कुंजन में ना, लालित्य- पूर्ण स्वासहरिया, मन्द, मधुर समीर से दिल-मिल कर, मदमत्त भ्रमरों को गुन-गुनाइट की माति, फूलों से अपेलियाँ करने लगों ! अंतरा भाषा--'गूज उठी बहुँ और मधुर भनि, बन कन कम में ना-आशी' उस समय ऐसा जान पड़ने लगा, मानो अतीत के वर से निकल कर मधुवन में कूछनेवाली मटयर मोहन की वह भादूभरी घरी मालतो के उस छोटे से बात में सुधा-वर्षा करने लगो हो । दलिया में येया, चमेजी और गुलाब के फूलों का देर लग गया था। उधर लगी हुई देव की मादी की और बह चली । एकाएक सामने की सरक की और उसकी रष्टि गई । गुनगुना-ना बन्द हो गया, पैरों ने भागे बने से इनकार कर दिया । एक स्वरूपमान युवक मंत्रमुग्ध-सा सका हया ८५ उसकी घर देख रहा था। वह भी उसे एकटक देखने लगी । सहसा दबदन में पैर पड़ जाने पर मनुष्य प्रारचर्य से शौक पड़ता है, और अपना वास्तविक अवस्या का मान उसै तब होता है, जब उसके धेसन लगते हैं । युERAI | चेतना नोट पाई। माता की माख मुक गई। किसी तरह यह मामी की ओर पदी की, नी/ दीवार पोदकर युवक धारा में पा गया, और उसको और नहीं। समार पहुँच कर, र का, मुस्कराते हुए उसने पह-- "तुम क्या कर बेचती हो?" बहसकोच में पड़ गई, कुछ कह न सकी। दुवक को किंचित प्रवडेलना का अनुभव हुआ। शिकायत भरे स्वर में यह बोला--"Ent दे देने में कोई है" "नही मो," विवश हो कर उसे मोलना पड़ा। "यह पारा तुम्हारा हो?" "तुम्हारा घर कहाँ है" या के एक कोने में बने हुए झापद की और मालती ने 33 करपत किया। "मो यार" "शेजी कैसी प्राती है फुल से?' "यह सब पूष कर आप क्या करेंगे।" "कुछ नहीं । यों ही पल रहा था, मा करो।" गम्भीर हो कर, वह शमोन को भोर ताकने लगा। मालप्ती ने उस के चेहरे की भोर देखा। दिल-पर ठेस लगी। वह बोली-"और हार बेच कर ही हमारी रोजी बजती है।" युवक का मुख- मन प्रसन्नता से खिल उटा । पोम अनुरोधः, मरे घर में यह बोला--"एक बार मेरे लिए बना दोगी?' "इस वक्त नहीं। काकी समय सगा।" " तक मन आया?" "IT तक" "अली शान है। मैं शाम को हार लेने के लिए पाऊँगा। धना रखना, चार दिन का सुख निकल गया, 'यहुत अरहा।" "एक थान और बता दो। तुम्हारा नाम क्या है। "माजती।" "अच्छा, मालती, जाता हूँ। मेरे कारण तुम्हारे काम में हज हुघा है, माफ करना।" जमीन की और ताकनी हुई, पैर के अंगूठे से मिट्टो कुरेदती हुई, यह खड़ी रही। मुड़ कर यह चला गया। जब तक का दिखाई देना रहा, वह उसकी भोर तारुती हुई खड़ी रही। जब वह वारा के बाहर तो एक दीर्घ-निःश्वास पीच कर, फूल तोड़ने के लिए उसने हाथ उठाया, किन्तु वह तोड़ न सकी। फूल टूट कर, मानो उसका उपहार करता हुधा, भूमने लगा। हाय नीचे गिर गया। यह कि पड़ी। कोई सुन्दर सम देखते-देखते जाग पड़ने पर मनुष्य की जैसी दंशा हो जाती है, उस समय उसकी भी वैसी ही दशा गई थी! प्रयत करके भी वह अपने को रोक न सकी। टूटे हुए सुखद स्वर को फिर देखने के लिए जगा हुआ मनुष्य प्राय धन्द करके मोने को चेष्टा करना है। विवश हो कर, २६ चहारदीवारी की और चली। समीप पहुँच कर, चहारदीवारी से सट कर, यह बाहर इधर-उधर देखने लगी। उधर जहाँ की सड़क परको सड़क से मिली थी, पकी सहक पर पड़ी हुई मोटर की और वह युवक धीरे-धीरे चला जा रहा था। पास पहुँस कर, मुड़ कर, एक बार बारा की थोर देख कर, यह मोडर में घट गया । मोटर चल पड़ी, और मश्य हो गई । स्वप्न फिर टूट गया। फूलों से भरी दलिया कमर से सरक कर, हाथ से छूट कर, गिर पड़ा। फूल पास पर बिखर कर खिलखिजाने लगे। किम्नु उसने उन्हें उठाने को घेष्टान को। एक लम्बी साँस खींच कर वह जमीन पर प्रस्तार व्यरत बैठ गई, और अन्य रष्टि से सामने ताकने लगी। कितने ही परि- चित युवक पाये, और मुंह को साकर चले गए; किन्तु श्राजा एक भए- रिचित पाया, और इसे इस तरह आन्दोलित का गया ! उसमें ऐसी कौन-सी बात थी, जिसने उसे उसकी दृष्टि में इतने ऊँचे थासन पर बैठा दिया ? रू? नहीं, नहीं । स्वभाव ? नहीं, नहीं ! चरित्र ? इसके बारे में अभी वह क्या जानती है ? जो हो, कोई ऐसी थी जहर है, जो के शरीर में उसी तरह निवास करती है, जैसे फूख में . उसके हार द पिर मिलेंगे "मायतो! चो माय"मार से प्रामाजमाई। यह मतमा की दशा भंग हो गई। "मानी है, मम्मो " उसने पिला कर उत्तर दिया। "जादी पक्षा" " यसी-मिशा जाग्रत हो गई। समन कर, वह सिरे हुए पूतों को एकत्र करने और किया में भरने लगी। मों से भरी हुई रूपा को कर पहझोपड़े की ओर तेजी मे चली। घर के दरवाजे पर खड़ी हुई घटा अगी की ती । पोली। "हमने से फूल सुनने में इतनी देर लग गई" "देर हो गई, तो क्या ! बाम ही हो कर रही थी।" "जय मैं मेरी उमिर को यो, सो पाक मिनट में आलिया भर खेती थी। लेकिन तुझे घीधा भावे!" "माज कलयुग जोक्षा गnt,म!" मुस्करा . मानसी "एस, प, कयुग की मानी ! सारा काम धया भभी पाहै, और मेमसमरी सूमी है। "मी मिनों में सारा काम लिये दाक्षसो ,, सम्मा बम देखती वोरहो" "जरूर कर लेगी। इसी माय होती, तो मुझे क्यों भीखन सकर माखती भीतर भाग गई। सगी रमाए हुए पाया पर बैठ गई। उनिया एक ओर रखकर, यह माद थे पर जुट गई। देखते देखते कोरिया चमकने लगी। जम्गी का चेहरा प्रसन्नता से खि राहकर भीतर गई, और रात के जूठे परवन हटा कर पार मा हने दो, मो, मैं प्रभो मोज हालगी।" "तुम सो मार लगा रही हो, मिरिया । एक काम सोकर बाल "उसे भी फर बालगी।" म), यिरिया, मही। मुझे भी सो कुप करमा पारिए।" बाहर बैठ कर युद्धायातम मनाने लगी। माइहारू से सृष्टी पाकर चार दिन का सुस- धुएं से एक होल पानी खाँध कर, मालतो मी उसको सहायता करने श्रा पहुँधी। बरतनों की सफाई की महत्वपूर्ण क्रिया सम्पादित हो गई। मालती हार गूंपने लगी, वृद्धा चावल बीनने । एक-एक फूल सावधानी से उठा कर वह धागे में इस तरह पिरो रही थी, मानो कोई सिद्धहस्त कारीगर स्वरां-अभूषण में नगीने जा रहा . हो ! प्रमशः चतुर हाय मानो बिना उसके प्रयास अयवा आदेश के स्वयं चलने लगे, और उसके सामने अभी थोड़ी ही देर पहले काश्य मा उपस्थित हुआ। याज अनायास ही जिन मधुर-कटु भावों का सूत्रपात हुधा या, वे ही उसके हृदय में हिलार लेने लगे। घंटे पर घंटा यीतने लगे। हार-रचना की क्रिया सुव्यस्थित गति से चलती रही। एक बज गया। कुएं पर नहा कर वृद्धा घर लौट याई । "इतना पडा हार फिजूल बना रही हो, विटिया ! पैसे-दो पैसे पाने तो पहुस विकते हैं, लेकिन इतना यदा आसानी से नहीं दिकता।" "पना जाता है, तो विक भी जायगा।" "रोटी नहीं बनायोगी।" "तुम चूल्हा जलामो, अम्माँ । मैं अभी भाती है।" " जग्गी दूसरी कोठरी में पक्षी गई। फिर यही सन्मयता की गई,. कापना की यही चित्रकारी प्रारम्भ हो गई। अपनी तन्मयता की सारी शकि, भायों का सारा माधुर्य, कल्पना की मरी रंगोनी मानो वह हार में भरे दे रही थी। माध-घंश बीत गया । "मैं रोटी बना रही है," वृद्धा ने विष्टा कर कहा-' महा पायो, विरिया "अछा, धम्मों।" हार करीब-करीव पर गया था, दस मिनट का काम पाकी था। यह मीदो गया। उसने संमोपको सास लीरपडे में उसे सावधानी सेबपेट कर रख कर, पर उटी, और खोटा, दोष भोर धोती र एं की भोर पढ़ी गई। भाना-पीना समाप्त हो जाने के बाद पृद्धा ने कहा-"पोदे से छोटे- विटिया।" मा "बन्दी ना कर - फिर मिनी "पएर बर महरा होगा।" 'पपिना, तो देशा जाणा!" "देगा मायगा! मेरी पह पास मुझे धीमी गी| भावान ही कामे सभी में दायर घन में सुर मे हार का साना शुझे या परवाह है "रयर बनाने ।' बगी। , मालती हमने फिर यह भी हार बनाने की माने यह उस इलाके विपर था, कि माँ की रक्षा के सामने करनी माया कोदा काही विनमान पक्ष। पार कर गए | प्रीता का एक एक पल साने । यह पायेगा हिनहीं पायदा, यहीं। लेकिन यह भूटा तो नहीं पना मागी हा चने लिए दावार जाने की पारी काने. लगी। " भी सो न " "सर मीम की चोरी तक सो चली गई। यहुन त है?" "योगी देर और हर भामो।" सादर गटी पर रह गई। दो-तीन पय बाप ही युधक दराने के सामने पासा हुआ। माती घेहरे से मेराश्य का वाया उठ गई, मामो चन्द्रमा पर पाया “हुभा यादव र गया हो । उसले उठी, यु की गति से मिजी और सतोमर का भुई। "क्या चाहिये, पायूमी " वृद्धा ने पर। "प्ररथा" "नया, अन्दर घाजानो।" आप सार फर, उसने कार में प्रवेश किया। उसने सायद अपनी माता से मुछ नहीं कहा। वृदाने दलिया पर पड़ा हुमा का इरा दिया। • सपसे अपर पेजा और गुलाब के पूजओ का बड़ी मुन्दर हार रखा हुअा था, जिसके बनाने में माती ने अपनी सम्पूर्ण निपुणता लेगा दी थी। कर युवक ने उसे उठा लिया, और मुस्ता gमा मंत्र मुग्ध देखने लगा चार दिन का मुख "हा, बाबू, इसे यनाने में कई घंटे लगे हैं। जिसे दोगे, निहाल हो सायमा "देना तो किसी को नहीं है, अपने लिए ही चाहता हूँ।" " नो, यावू । पाठ पाने का है।" वेष्ट-कोट की जेब में उमका हाथ पहले ही पहुँच गया था। दाम देने के लिए वह मुका । वृद्धा की फैजी हुई हथेली में धीरे से खनक कर दो नए रुपये चमकने लगे । उसको बा खिल गई, और वह आश्चर्य से चकित रह गई। "हार तो भइया, माठ माने ही का है!" "मैं तो इसे दो रुपये से कम का नहीं समझता !' मुस्करा कर, युवक ने उत्तर दिया-"ले लो, माई, आए हुए माल को हाथ से न जाने देना चाहिए।" "जैसी नुम्हारी मर्जी हो, मइया । खुश रहो। बड़े आदमी ऐसे ही होते हैं। ये हार भी ले लो, भइया ।" ढलिया में बाकी बचे हुए हार उठा कर वह इसे देने लगी। "मही, मेरे लिए एक बहुत है।" "मही, नहीं, ले लो।" "प्रया, लाओ।" हार लेकर, उसने फिर जेब में हाथ डाला। 'नहीं, माया, यव में कुछ न लूंगी। चौगुना तो पहले ही दे चुके हो। और ये है भी किसने के ? चार पाने से ज्यादा के नहीं।" "मेरे लिए एक हार रोज बनवा दिया करो, माई।" "बहुत अच्छा, भया ।" "तयार रखना। मैं कल इसी वा थाऊंगा।" "रूर पाना, तैयार रहेगा। य दयावान हो, पुरा रहो". मनोभावों से पान्दोलित, घुटनों को हाथों से कसे हुए, जमीन की और ताकती हुई मालती बैठी यो । उसकी और एक बार विविध माघ- मानी से भरी हुई रष्टि से देख कर, वह चला गया। नियमित रूप से नित्य वह हार लेने भाने लगा और यह जय धाता, तो मालती या जागी के लिए कोई न कोई उपहार अवश्य खाता। धे घनिष्ठता हो गई थी। किन्नु यह बात जो उसके मन में सघ से पर थी, अभी तक व्यक्त नहीं हो सकी थी। इसका कारण या-प्रप्तर १२ M काममा परम धारा, जाग र स्पिन रहती रा. पिन मामी उपे मासोको यो। यह म प, for wei कामनानाभा। एक दिन पर सो हावा, टीकम समय माटो पास में पुना हा या पने देना, मागी मोदने में छगों पोखिमा हारमोकाशे पार कर आग में आना या रमेश देना मारिया पहें सामने झाकर उसने ऐसा, दर पर सका था। सद वा उस मोरया RE मामी काम में जगी भीगाकर समी भोर देकर दो नि स्यात सौच कर, यह रिर PA सोने पिना ने ही उसे जान पाममोर पर हो गया। माजही शरीर में विचित्र मनमनाहर दौड़ने लगी। "मालती" "एक मासेदार घर गई है।" या कामा पारिए, यह सोपाहुमा २१ सहारा ज्य में सराको ठिनाई इन दो गई । एकाएक सुर पर, उसके चेहरे को गोरखा, वह बोली "एक यात भार से प" "माप महा यो भातेहै?" दो-तीन पप सोच कर, असने मुस्कराते हुए कहा-हार देने के शिए" "क्या सचमुबहार ने ही के लिए" "मपया समझती हो" 'मैं तो भाप से पूष ही 10 "मालती, या मुम्द सचमुच मेरे पाने का असतो कारण ममी सनही मालमहुधा ?" माजसी के घोड़ी पर मुस्कान व्यक्त हो गई। किन्तु उसने कोई उपर नहीं दिया, जमीन को घोर ताकती हुई धुपचाप सदी रही। "मगर मैं साफ-साफ बता को दम पुरा तो मही मानोnity "थुरा. क्यों . मागी ?"

चार दिन का मुख --- ६३ प "मैं यहाँ प्राता हूँ...तुम्हें देखने के लिये, सुमसे दो बातें करने के लिए!" घड निस्तब्ध खड़ी रही। "और मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, सचे दिल से प्यार करता हूँ !" वह सिहर उठी। प्रयाह उलाम उसके कण कण में तीर गति से आन्दोलन करने लगा। उसकी प्रासं उठी, और युवक की आँखों से मिली। उनमें प्रारम-समर्पण धंकित था । झपट कर युवक ने उसे का. पाश में बाँध लिया। थोड़ी देर के बाद ये दोनों एक पेड़ के नीचे बैठे हुए थे। मालती का हाथ अपने हाथ में लेकर युवक ने कहा-"मेरे साप ब्याह करोगी, मालती?" "क्यों न करूंगी। लेकिन.. मा..." "उसे मैं राजी कर लूँगा।" "अगर यह राजी न हुई, तो?" "मानती! म के मामले में क्या किसी की रोक-टोक बज सस्ती है" "फिर क्या डर है ! लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि माई जरूर राजी हो जायगी।" "तय, टीक है।" "वह कब तक पायेगी" "दोपहर तक या जायगी।" "मया, मैं दो-तीन बजे तक पाकर कोशिश करूंगा।" "बहुत चदा।" वृध देर के पार विजयोल्लास से झूमता हुआ वह चला गया। चार बजे के करीब यह कि पापा । जगी मोर मानी हार बनाने में लगी हुई थी। प्रममता से सिर हिलाते हुए जागी ने कहा-"शात्रो, भल्या प्रायो। तुम्हारा हार संपार हो गया है।" मालती ने उठकर दाई विद्या दी। युवक इनमीनान से येठ गया। मालती घर से बाहर सी गई। वह मुस्कराता हुदा योला--"यहाँ जय पाता हूँ. माई. तो मे। वित्त मसम को पाता है । जान पड़ता है, जैसे अपने घर में '- "मानी को मैं सगी बेटी से अधिक मानती है, लेकिन मी उससे कम नहीं समझती। हर दम दारा पास ना रहता है।" "माती या सुम्हारी सगी बेटी नहीं है।" उसने चकित होकर "जदी में नो नहीं " "नहीं, मुझे कहीं जाना नही है।" "अच्छा, तो तुम्हें श्राम सारा हाल ६ सुनाऊँगी। शमी तक किसी मे नहा कहा था, लेकिन सुममे कहने में कोई हर्ज नहीं है। कई दिन से करने की बात सोच रही थी।" "जरूर सुनायो, माई ! मैं भी पास गुमसे यातें करने ही के लिए "शारदा मुनो। मालती मेरे पर की जन्मी नहीं है। उन दिनों अपने भादमी के साय में एक दूसरे शहर में रहती थी। बाद से हमारे दिन बीत रहे थे। हम दोनों यही मेहनत करते थे। फिर भी का का बोम इमेशा सिर पर लदा रहता था। कोई सन्तान भी न थी। इसका दुस अलग था। हमारे पड़ोस में एक या सादव रहते थे।बरे मढे भादमी थे। उनके घर में जुज देने जाया करती थी। एक दिन के समय पर हमारे यहाँ पाये। बहुत घबराये हुए थे । मेरे पादमी ने कारण पूछा, तो पोले-'मैं बही शामत में हूँ। मेरी सहायता करोगे?' मेरे प्रादमी ने कहा-'पापकी मदद कर गपंगा, तो जरूर करूंगा, घायूमीतच पायू साह बोले-'परशा या वादा सो कर ही दो कि इस वन की बात भी किमी मेम कहोगे। रासन याकर, उन्होंने हा-में मानता हूँ कि निस्सन्नान होने का सुरें बहुत दुख है और से की भी सुम्हें पी रहती है। मैं तुम्हें दोनों में करना चाहता हूँ। अमीदतीनही दिन कोजन्मी एक बाकी है। मही सुन्दर है, और भले आदमियों की बेटी है। उनके माता पिता का नाम में न बताऊँगा, कमोकि यह इजात का मामला है। लेकिन विश्वास रखो, ये सुमसे इसे कभी छोड़ने की कोशिश करेंगे। उसे लेकर अपनी बेटी की तरह पात्रो पोमो । इसके लिए जितना पया कहो, देने को तैयार हूँ। हो, एक थान धौर है, यह शहर मोड़ का तुम्हें धो जाना होगा, क्योकि तुम्हारे यहाँ रहने से भेद सुन जाने का है। बोलो, क्या कहते हो। गन्धे को क्या चाहिये १ दो ओख ! सन्तान भी मिलेगी, धन मी प्यार 4 चार दिन का सुस मिलेगा ! बस, इम नुरन्त राजी हो गए । कर्ज वेबाक करके, दूसरे ही दिन, रात के समय उस लड़की को लेकर हम इस शहर में चले आये, थौर यह दाग नरीद कर धस गए । मजे में जिन्दगी फटने लगी। सचमुच वह लड़की चौदसी सुन्दर थी। उसे हम जी-मान से करने लगे। दूज का चाँद जैपेनिस्य निसरता हुमा बढ़ता है, यह भी वैसे। ही बड़ी होने लगी ! लब वह दस साल की हुई, तो मेरे भादमी का', देहान्त हो गया । तब से उसके पालन का भार मेरे ही अपर प्रा पड़ा। घर के काम-धन्धे, सीना-पिरोना, कादना जो कुछ मुझसे घन पदा, मैंने उसे सिखाया। कई साल तक स्कूज भी भेजता रहा। यह कोई और नहीं मालनी ही है।" युवक ने एक दीर्घ-नि:श्वास छोड़ा। "मालती सयानी हो गई है। अब इस फ्रिक में हूँ कि कोई योग्य पर मिल जाय, तो इसकी शादी कर दूं। तुम्हारी जान-पहिचान तो बहुत लोगों से होगी। किसी भने आदमी का इसके लायक लड़का हो, तो "बहुत लदके हैं।" "कौन है ? कहाँ रहते है " "ए तो तुम्हारे सामने ही बैठा है," उसने सिर झुका कर कहा। तुम १ तुम्हारे साप मालती का ब्याह हो जाय, तो इससे यदर क्या यात हो सकती है। लेकिन, तुम्हारे माँ-धार तो शायद इस तरह से जन्मी हुई लड़की के साथ सुम्हारी शादी करने को रानी न होगे" "मेरे माँ-बाप नहीं है। मैं अपना मालिक खुद हूँ। मालती के साथ मेरी शादी कर दोगी, तो अपने को वा भाग्यवान सममूंगा!" "जरूर करूंगी, भइया, जरूर करूंगी ! मालती को जिन्दगी यन, जायगी, और मैं भी अपने को धन्य समदूंगी।" थोड़ी देर में विवाह सम्बन्धी सारी यात पक्की हो गई । भावी समु- राल से जब वह विदा हुघा, तो उसके पैर जमीन पर म पड़ते थे। पताना।" x x अत्यन्त गुप्त रीति से मालती का रतनचन्द के साथ विवाह हो. गया । झोपड़े से मालती महल में जा पहुँची । जग्गी ने पहले तो से इनकार किया, किन्तु रतन के कार्यक्रम के जिपा अपना घर पिर मिलेंगे उसका भरनी बेगे के साथ रहना आवश्यक था। इसलिए मजबूर हा कर, उसे उसके साथ लाना ही पड़ा। रसन धावान या । एक सेट का मेगा था। पुरतेनी और लामा कारशर था, बहुत बड़ी जमींदारी थी, पचासों घंगले थाम क्षों के लिए बंगला सन गया, नौकर लग गए, एक मोटर हर समय हाजिर रहने लगी, पन माभूषणों का ढेर लग गया । इन सब को उसने इस तरह अपना बिया, मानो यह इनकी सदा से शादी रही हो। मालती और रतन के लिए धान के एक छोटे पे सपार की स हो गई। दोनों एक-दूसरे में रमने लगे। सैर-सपास, सिनेमा, जज बिहार, मनोरजन का नित्य नया साधन खोजा भाने लगा। मानन्द की सीमा न थी-~-प्रधाह, पार, सनियंचनाय ! किन्तु उस्मान की चोटी पर पहुँघ आने पर पतन का प्रारम्भ होना धनियाय है। । ऐसी बात छिपाए नहीं दिपती। जगह जगह चर्चा होने लगी, सरह-तरह की अफवाहें उड़ने लगी । यार दोस्त मजाक उड़ाने लगे, श्रामीय हिंसपी चिन्तित हो उठे। सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए रतन को समझायाधुझाया जाने लगा, किन्तु यह कर्तव्य पथ से विचलित नहीं हुआ। रात फासीसरा पहा था। दोनों प्रगार निद्रा में मग्न थे। एकाएक मालसी पास पड़ो। रतन को पास तुरन्त शुद्ध गई। चिन्तित स्वर में उसने पूछा--"क्या यात है, माजतो" मावती का हृदय तेनी से धड़क रहा था। दो-तीन पण के पद ससने कहा--'परा सपना देख रही थी।" हाय से लगा कर, यह उसे शान्त करने की चेष्टा करने लगा। जब वह काफी शान्त हो गई, हो रसन ने पूसा--"क्या देखा था तुमने !" "मैंने देखा कि एक कमरे में मैं अकेली बैठी हूँ। सहसा एक भयकर पूरत याजा पादमो कमरे में घुम प्राया। उसे देख कर मैं वर गई। घर मुझे पकड़ने के लिए पटा । मैं चीन कर भागी । बस मेरी नीटूर गई।" "शोध सपना या ! खैर, कोई बात नहीं है। सपने वो दिखाई

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"Ek!"
"मीत! पति गई।
“हा, दिन, दुपारी रन से मेरी शारे.
हो गई थी। यह सा मा it.
मालनी को ऐगा बाम पने मग, मानो बनायो
"तुम्हारे स्वभाव की तारो मेन गुन शुका है, हरि म
में १८ दिनसी कर पाई है।"
भारती विनय
"मगर माघ प्यार करने की बात पर सोको मातम हो गई
। दमकी पयो पदमा रही विरोपाजे बिरादरी से शरिर
कर देने की धमकी
देन याले भादमी की
पनी पुन या मोरम मस नही होले, सिम
माहो, तो भागे पाने मान से हमारा सी हो।"
भकिस साहिल "
"उन्हें बोरकर मी पी लामो जितमा पर कहो में
पद देने को रोवार है। मेरा कहना मान कर तुम हमारा महान कार
मालती भूसिवर बैठी रही।
"बोयो, पदिम, मा जपा को हो"
"जदाच पापको मिशापगा।"
"चत जपर।"
"रया, बहिन, अप मैं जाती है। कि कही यह भान
जाय। मेरे यहाँ थाने की दात इन्दै म बहशामा ।"
"मया, पदिन ।"
दोनों रख पदी हुई। फिर मामा मेगळे Hि का, या पको
कटे हुए यूपको भौति मालती सोफे पर गिर पड़ी। सगुयो
का प्रागरसमस कर मिस मूर्षि की या पूजा करने की घो, साम
यह इस तरह गिर कर घर-घा हो गई। मादा! स्वार्थी !
माह! कौन जानता था कि रक्षकों को कालो यह धीज
.

"कई दोस्त सिनेमा चलने के लिए जिद हैं। कई जण दोनों निस्तब्ध रहे। फिर माडी पूछ- चार दिन का सुप नहीं, एक मामूली पायर है । बोध से उसका शरीर काँपने लगा। फिर यह रोने लगी-फूट-फूट कर रोने लगी, अपने दुर्भाग्य पर, अपनी भसहायता पर। उर-देश में उठे हुए सूझान का वेग अब कम हो गया, तो वह चोख पोल कर उठ बैठी विमाव-निहित उसको उदारता फिर लामत हो गई । दूसरे पहलू से यह विचार करने लगी। रतन के स्थान पर यदि यह खुद होती, तो क्या यही न करतो? जरूर करती ! शायद न करती । शायद करती। मोहवश यदि ऐसा अपराध हो जाय, तो. क्या घर पम्प नहीं है ? अवश्य है। फिर सौत की छाया मूर्ति सामने या कर खड़ी हो गई । अपार अनुरोध-मरा या उसकी माँखों में । और उसकी गोद का यह नन्हा-सा बालक मो मानो माता के का समर्थन कर रहा था। उठ कर, गुसलनाने में जा कर उसने मुंह धोया। फिर गपनागर में जाकर वह पलंग पर लेट गई, और गहन विचारों में सो गई। सहसा रसन ने प्रवेश किया। चौक कर वह उठ बैठो । समीप ना कर, रतन ने चिन्तित स्वर में पूछा --कैसी नीयत है "चहरा क्यों उतरा हुआ है ?" "सिर में कुछ दर्द है।" "कफ्रिएरप्रीन खाया था?" "हा लो। थोड़ी देर के बाद दर्द जाता रहेगा। "अच्छा।" पलंग पर पैठ कर उसने पूछा--"कहीं घूमने जो "क्यों " "भाराम करने की जरूरत है।" प्रस्ताव . "सोचले जायो। "नहीं, अब न जाऊँगा।"

पिर मिलेंगे "श्यों।" "वम्हारी तबीयत ठीक नहीं है।" "अमी दया सा लंगी, समीमत डोक हो जायगी। यह लोग क्य करेंगे। चले जायो।" "अच्छा, जाता है। दवा जरूर खा लेना" "धरछा।" वह चला गया। माती पिर विचार सागर में इस गई। घंधेरा हो चला था। उठ कर, शयनागार से निकल कर वह सदर दरवाजे की ओर चली। प्रोगन में जग्गी एक दासी से बातें कर रही थी। "कही जाती हो बिटिया ?" "गगा के किनारे।" "क्यो?" "जी ऊप रहा है। जरा सैर करेगी।" "मैं भी च" "तुम चमकर क्या करोगी" "नहीं, मैं भी चलूंगी।" "सदा, लो।" दोनों बाहर पहुंची। प्राज्ञा दी गई, क्रौरन मोटर सामने आ खड़ी हुई। दोनों सवार हो गई, मोटर पक्ष दी। मनोहर महल में 'पण्डीदास' नामक फिल्म दिखाया का रहा था। अपने मित्रों के साथ रतन अम्बल दर्जे में बैठा हुधा था। प्रकृति की एक सुन्दर मोड़ा-स्थली में नायिका नायक के विरह में व्याकुल धूम रही थी। सहसा रतन ने देखा, वह कुसुम-कुज अहरय हो गया, नायिका अवश्य हो गई। मालती का मुख मण्डल परदे पर थकित हो गया। असीम व्यथा भरी घाखों से वह उसे देख रही थी। यज्ञात शाशका से या कॉप उठा। तुरन्त उठ कर बाहर चना । एक मित्र ने पूछा--"कहीं जा रहे हो, रतन ?" "अभी शाता हूँ।" तेजी से बाहर निकल कर, मोटर पर सवार हो कर, वह घर की भोर रवाना हो गया।

चार दिन का सुख
१०१
तट पर पहुँच कर, मोटर से उतर कर, दोनों जल की ओर चली ।
माँझी मातामोख सामने आ कर खड़ा हो गया।
"क्या हुकुम है, बहूजी "
"घूमना है।"
"अच्छा, बहूजी !"
उस सजी हुई नाव में दोनों जा बैठों, जिसे रतन ने मालती के लिए
खास तौर से बनवाया था। मातामोड ने नाव खोल दी।
घर पहुँचते ही रतन को मालूम हुआ कि मालेती अपनी माता के
साम गंगा-तट की थोर गई है। उसने शोफर को सुरन्त प्राज्ञा दी।
मोटर गंगा-तट की ओर चल पड़ी।
जाह्नवी के विद्यान स्थल पर माजती की ढोंगी मंद गति से पनी
जा रही थी। पंचमी के चंद्रमा का मन्द, रहस्यमय प्रकाश पारों ओर
फैला हुआ था। गहरा जल पा गया । बग्गी रख कर, भाताभीख दाह,
चनाने लगा। ऊपर, नीचे, चारों ओर एक यार देख कर, मुस्करा कर,
मानती सहसा जल में कृद पदी।
"अरे बिटिया ! भरे विटिया" कहती हुई जग्गी भी कूद पड़ी।
"अरे ! अरे ! अरे!'द छोड़ कर माताभीख मी कूद पड़ा।
उसने यकी कोशिश की, किन्तु किसी को यचा न सका । तब हार
कर, यह डॉगी में बदमाया और विज्ञाने लगा-"परे, दौलो ! दीयो!
गाजर हो गया।
"पाए! माए ! प्राए !" कई डोंगियों खुल कर तेजी से घटना-
स्था की ओर चली।
कई मल्लाद कई और इधर-उधर तर कर, सुरक्रिया अगा कर, सोमने
'सगे शिस्तु मया निफा सिद्ध हुमा! तद एक ने कहा "मावामीप,
बाकर सेट गो को तो प्रवर दो।"
41

र निजी
"arm, मदया। मामी को चोरी से प्रचा।
किनारे पहुँचमार धमाको और भागा।
रतन की मोर RTE पापोदर शान र रस
की ओर पड़ा।
"राजय हो गया, मरार! शाह या!"
"क्या मा"
"दोनों प गई।"
।
"पहनी और माई। एक पंामा पो माई । गुममे धुमाने को
हा। में पुमा रहा था । एकाएक महनी जम में पर ऐसा
करमाई भी दी। मैं भी कुछ खोजने बगा, किन कोई सीधा
महीमा और डोग अमीगोत्र है।"
रसन के चारों और राि गया। वह गिरा चौर देहोश है
गया।

अन्तिम चित्र "प्यारी सुलोचना, मानिक घर लौट पाया है। हम सब तो उसकी ओर से निराश हो चुके थे । इसलिए तुम समझ सकती हो कि हमें कितमी सुशी हुई है उसके वापस पाने से। यह कहता है कि एक यार तुमसे यह मिलना चाहता है-केवल एक पार । मैं समझता हूँ कि यह उसको भूल है, लेकिन उससे मैं नहीं न कर सकी। स्वप्न-जगत् में विचरण करने ही में जो अपने अस्तित्व की सार्थकता देखता हो, उसे दुनियादार बनने की सलाह देना कोरी मूर्खता है। जो हो चुका है, यह मिट नहीं सकता, और जो हो नहीं सकता, उसकी कामना करना बेकार है । इस विकट सस्य से वह अपरि. चित नही है। फिर भी वह उस मार्ग पर जाना चाहता है, जिस पर असे न जाना जाहिए। किन्तु मैं उसे रोक नहीं सकती। मैं उसकी पतिम हूँ,पय प्रदर्शक नहीं। किसी पथ प्रदर्शक की सेवाएँ वह स्वीकार मी नहीं कर सकता । यदि सुम इसे नितान्त अनुचित्त न समझो, तो उससे मित लेना, जरूर मिल लेना। मैं तुम से यह अनुरोध न करती, लेकिन मानिक के प्रति मेरे हृदय में जो ममता है, उसने विवश कर दिया है मुझे । ईश्वर तुम्हारी सहायता करे, और तुम्हारा कल्याण हो! यदि इस पत्र में कोई अनुचित वात हो, सो मुझे जमा करना। संस्नेह तुम्हारी- रामेश्वरी देवी।" एक दीर्थ नि:श्यास सीचा मुञोधनाने पनपद कर । चित्र थाने लगे उसकीमाश के सामने अतीत के चित्र । दिम न रहा था, और वह रामेश्यी के घर पर उसके कमरे में बैठी हुई उससे बात कर रही थी। दोनों एक ही पाठशाला में पढ़ती घी, दोनों में घनिष्ठता हो गई थी, और दोनों एक-दूसरे के घर धाने- बाने लगी थी। इस दिन भी अपनी इस प्रिय सखी के विशेष धामह पर बह गई थी उसके घर । रामेश्वरी दिखा रही थी उसे यह पुखोवर, १.३ शिरमिलगे जिसे पा पुन रही थी उन दिनों सदमा प्रवेश किया किपीने कमरे में।ष्टि उटा कर देखा उसने, और शान्त या मोची काही । एक तस्वीर उतर कर मे गई उसके दिल में-चमा चपन, साफ धोनी, साफ कुरता, सम्मा कद, सिजा हुमा सुन्दर चेहरा । दस गई यर । "रामी दीदी" "क्या है मानिक " "वह...यह कितार जो मैंने तुम्हें फज दी थी, कहाँ है?" "इस मालमारी पर है। ले ली।" वह पढ़ा उस भालमारी को मोर । . "क्या है, दोदी" "देखो, यही है मेरी सखी मुखोचना, जिसका मि तुममे कई बार कर चुकी है। सुखोचना, यही है मेरे छोटे भाई मानिकचन्द । यी.. में पढ़ रहे हैं इस माल।" "भाप से परिचित हो कर मुझे बदी खुशी दुई।" नमस्कार कर के साचाते हुए मानिक ने कहा। सय लमा से लड़ते लड़ते हाथ जोड़ने पढ़े उसे भी, लेकिन किसो तरह वह कुछ का नहीं सकी मुख से । पुस्तक ले कर चला गया असे पान्दोलित कर देने वाला यह नवयुवक । सोईसी बैठी रह गई वह। रामेश्वरी कहती जा रही थी न जाने क्या क्या किन्तु यह तो... घर खोटी वह । चित्त भारी हो गया था उसका विचित्र विकलता भर गई थी मन में। घीत गये कई दिन । पद फिर गई रामेश्वरी के घर उसके धाग्रह करने पर । याज एक छोटी-सी इच्छा थी उसके मन में-काश, पई सुन्दर चेहरे पाला नवयुवक फिर दिखाई दे नाता प्राज मी ! पहुँधी का रामेश्वरी के कमरे में होने लगी इधर-उधर की बातें । रामेश्वरी धनी गई उठ कर किसी काम से । सहसा हो गई इसके मन की बात-मानिक झापा कमरे में, यहा उसकी थोर । सिहर उठी यह । हृदय पदकने लगा उसका धेग से । रुका वह उसके सामने पहुँच कर । टिमहीं उठा सकी घा एक पत्र भाया उसके सामने । "ने लीजिये इसे," अनुरोध किया सानिक ने। सय कोफ्ते हुए ले लिया उसने यह पत्र ।

अन्तिम चित्र अपने घर, । "उत्तर दीजियेगा इसका," फिर कहा मानिक ने, धौर चला गया वह तेजी से कमरे के बाहर । विश लिया उसने यह पत्र अपनी साड़ी में। ध्यान हो उठी वह घर लौटने को। रामेश्वरी यापस आई कमरे में नाश्ते का सामान ले कर । खाना पढ़ा उसे भी अनिच्छापूर्वक 1 कुछ देर के बाद किसी तरह रामेश्वरी से पीछा छुड़ा कर बह वापस भाई और सीधे पहुँची अपने कमरे में। उस एकान्त में पढ़ने लगी यह मानिक का पत्र । अपना हृदय खोज कर रख दिया या मानिक ने उस पत्र में । प्रतिध्वनित होने लगा मानिक का एफ-एक शन्द उसके हृदय में । समदने लगा उसके हृदय में विचित्र मानन्द । कई वार पदा उसने यह पत्र, लेकिन नहीं भरा जी। माँ ने आवाज दी। तब पत्र सन्दूक में बन्द कर के चली गई वह नीचे। मौका पाते ही फिर पहुँची वह अपने कमरे में, और फिर पदा उसने यह पन एक बार । रात के समय लिखा उसने पड़े परिश्रम से उस पन का उत्तर । प्रतिध्वनि थी. उसके उत्तर में मानिक के भावों को । उचित था उत्तर देना। लेकिन क्या होगा अब यह सोच कर ? रचित रहा हो या अनुचित उत्तर दिये बिना रह नहीं समची थी वह । न देतो सत्तर, तो न जाने कैसी दशा हो जाती इसकी। खैर अपना पत्र देकर, मनोभावों से दुवी-दपी यह गई पाठशाला दूसरे दिन । रामेश्वरी नहीं पाई थी उस दिन । घड़ी निराशा हुई उसे । सीसरे दिन भी नहीं भाई रामेश्वरी । तप कर रह गई यह । चौथे दिन थाई रामेश्वरी । पता लगा उससे कि तबीयत राय हो गई थी उसकी निमंत्रित नहीं किया रामेश्वरी ने उसे अपने घर चलने को। सोच में पड़ गई बह । रीसेस का घंटा बना। पहुँची बह रामेश्वरी के पास। "माज मेरे घर चलो, रामेश्वरी," मसंग छेड़ा उसने । जानती थी यह कि रामेश्वरी मुश्किल से रानी होगी। "नहीं, मुसोधना, भाव नहीं चल सकती। मेरी सीयत अभी पूरी तरह रोक नहीं हुई है।" "पहाँ तो आई हो" "घर पर भी नहीं लगता था, इसलिए चली आई। मुम्हारे घर हल, तो माँ नारा होगी। उन की आज्ञा बिना धद्धना उचित नहीं। सुम्ही यसो ग्राम मेरे घर । सुम्हारे घर किसी दूसरे दिन धलगी।"

a "बेकिन मैंने भी सो अम्मा से पाशा भीखी है।" "अरे, मा सो पी सीपी मादाई से कह दूंगी। पर येणे मुम्हारे पा । रातो मा, मुनोचना, जो, जसमा साय रहूँगी, तो धीमत शिक्षा को लायगी। मैं शिकारी माखने अगी है। दिवाऊँगी अपना बनाया TRIitary गहो, यकिन हुन् पिताऊँगी शलाप सोनी तुम उसे देखकर योगी, चोगी" "धन्दा चलगी। पतोप की लेस की रमने । मन ही मारा । भाई को भुभोधना के पर सूचना देने का आदेश देकर रामेश्वरी का भैठी उसके पास अपनी गाड़ी में दी गाया गया पर गा कर सीधे पहुंची दोनों रामेश्वरी के कमरे में। अधर मेम पर पड़ा या चित्रकारी का मामान-गों का एक गुजा वास, कई प्यालियो, कई मरा! घर बैट गई एक भारामकरसी पर । रामेश्वरी निकाल पाई प्रासमारी से अपनी पहली रन सपो ममुह से देश कर। इसने लगी रामेश्यरी भी। एक पहा मोटा आदमी बैटया एक सस्त पर! शसके सामने या एक हुला, और हुके पर जमो यी चिजमक की निगाजी यी उसके हाथ में, मुख ऊपर उठा कर फेंक रहा था वह धुये का सुरसुरा, और उसको टोपी सिसको दस सिर से। उत्तको बालों के भाव से, भरपे की सिकुन से, योठों से, मुषों से और ही से टपक रही थी विचार-मग्नता विधा थी उस की प्राति हैसा देने वाली । सनाई मही यो चित्र में, रगों का चुनाव और मिश्रण भी ठीक नहीं था, रेखा भी नहीं यी दोप-रहित, किन्तु भाव था उसा "वा! रामेश्वरी ! या सुन्दर धारग्म है।" "रहने भी दो । क्या रखा है महे चित्र में" 'किमसे सीख रही हो" "मानिक से। यह सीख रहा है एक प्रसिद्ध चित्रकार से, और मैं सीख रही हैं उससे" "अहा!" "हायची तरक्की कर रहा है मानिक । चनो, दिखाऊँ, तुम्हें उसके बनाये हुये चित्र।" मौखिका .

अन्तिम चित्र दोनों पहुँची मानिक के कमरे में बड़ी सुरुचि और सादगी से सजा था वह कमरा । वह बैठ गई तस्त पर । रामेश्वरी निकाश नाई अालमारी से एक अलयम । अनेक चित्र थे उसमें। कोई था किसी जल-भपात का हश्य, कोई हिमाच्छादित पर्वत का, कोई बन का, कोई देहाती बाजार का, कोई ग्राम का, कोई खेतों का। उलम गई उसकी दृष्टि एक चिन में। चाँद निकल पाया था। एक निर्जन टीला था, और उसके नीचे नदी यह रही थी। चन्द्रमा को रश्मियाँ खेल रही थी नदी के जल से सीखे पर एक वृक्ष के समीप पड़े हुए पत्थर पर बैठा था एक नवयुवक खोया हुआ-सा चित्र के नीचे हाथ से लिसा था 'मौन व्यमा । अपनी संपूर्ण एकाग्रता से पीने लगी वह इस चित्र में बहता हुधा रस । "सा है यह चित्र" "यदा अच्छा है," सचेत हो कर उत्तर दिया उसने । "माज ही तैयार हुआ है यह । कई दिन से मानिक लगा था इसमें । उसके उस्ताद ने मी तारीफ की है इसचिन की।" "रामेश्वरी!" अावाज भाई नीचे से । "यही बैठी रहो, सुलोचना । मैं अमी आती हूँ । अम्मा युला उट कर चली गई रामेश्वरी । ना गया वह अवसर, जिसकी खोज में थी यह उठी वह लड़खड़ा गये उसके पैर। इधर-उधर देख कर बढ़ी यह पड़ी हुई मेज़ की घोर । वेग से धड़क रहा था उसका हृदय । कई पुस्तक रखी थी मेज पर | सादी से निकाल कर अपना पर रख दिया उसने ऊपर वाली पुस्तक के अन्दर । लौट कर आ बैठी यह फिर सरश पर हो गया उसका काम निर्विघ्न रूप से संतोष की साँस ली उसने । लौट आई रामेश्वरी। दोनों फिर जा पहुँची रामेश्वरी के कमरे में। बीत गये कई दिन । पाठशाला में एक दिन कहा उससे रामेश्वरी ने-"सुखोचना, एक मित्र के लिए मानिक को मादेन की जरूरत है। माडेल" क्या करना होगा। बैंड कर चित्र खिंचनाना होगा।

मिर मिलेंगे कमरे के बाहर। चुपही पह। "योलो, राजी हो" "अम्मों से पूरा कर पताऊँगी।" "उनसे पएना तो ठीक न होगा । मुमकिन है यह मना कर दें।" "व" "इसमें कोई बुराई नहीं है, और फिर किसी को कुछ सपर भी न होने पायेगी । कख छुट्टी है। में गाड़ी भेग दूंगी का सपेरे तुम्हारे घर पर । तुम आ जाना मेरे साथ पदने के महाने से दिन में मानिक चित्र बना लेगा। शाम को अपने घर वापस चली जाना।" "यायो बात है।" दूसरे दिन मानिक के कमरे में गेरु रंगधी सादी धारण किए, फूलों के याभूपण पहिने, घुटनों पर हाय बधि, विषाद की मूर्ति बनी बैठी भी एक थोर कुरसी पर । कुछ देर के बाद रामेश्वरी उठ कर चली गई "सुम्हारा पत्र मुझे मिल गया था, सुलोचना," मानिक ने कहा धीरे से, धन्य मानता हूँ अपने को। चुप रही वह। “दुष्यन्त और शवन्तता भी इसी तरह एक दिन प्यार करने लगे थे। एक-दूसरे को। मैं क्यों प्यार करने लगा तुम्हें, यह मैं नहीं जानता। और शायद तुम भी नहीं जानता कि तुम क्यों चाहने लगी मुझे। अगर पा सका तुम्हें तो सार्थक हो जायगा मेरा जीवन । किन अगर न पा सका, तो मी कमी भूल नहीं सकूँगा मुम्हें ।" चाहा उसने कि दोहराये पर भी उसके अमृत में सने शब्द जयान नहीं खुल सकी उसकी। "जीवन एक महान् विडम्बना है। जो चाहो यह नहीं होता, जो न पाहो पा होकर रहता है। मैं दहला यह सोच कर बाधायें पा सकती है हमारे सामने, और मुमकिन..... फिर भी पाया तो इस कर ही सकते हैं।" दिन भर चलती रही चित्रकारी । अवसर कहीं मानो माटो पाते। शाम को का कितनी ही बाते ।

अन्तिम चित्र वापस गई वह अपने घर । उस समय प्रसन्नता थी उसके मनु में और वेदना की हलकी टीस। तीसरे दिन तैयार हो गया वह चित्र । कितना सुन्दर था ,यद । तपोवन का एक मनोरम कुंज था। लतामों और वृक्षों के बीच धास के हरे सुकोमल फर्श पर बैटो थी वियोगिनी शकुन्तला विकल, प्रशांत उहेक्षित । एक मृग-शाधक षदा था उसके समीप असीम सहानुभूति से 'देखता हुथा उसकी ओर । फितनी मनी लग रही थी वह शकुन्तला को भूमिका में! और बीत गये कई दिन । एक दिन रामेश्वरी की माँ ने उसकी उपस्थिति में रामेश्वरी से कहा-"कितनी सुन्दर और सीधी लगती है तुम्हारी यह सखी ! मेरी बहू बनने लायक है यह।" लजा कर मुख फेर लिया उसने । दूसरे दिन रामेश्वरी ने कही अपनी माता की यह वास उसकी माता से। उसकी माता ने कही वह यात उसके पिता और भाई से । उस यात से उत्साहित होकर एक दिन । पहुँचे उसके पिता मानिक के पिता के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर । पा उपस्थित हुई विषम परिस्थिति । फिर गया पानी ससकी और भनिक को धाशापों पर । इनकार कर दिया मानिक के पिता ने बह थे रईस, धनी, जमादार और उसके पिता थे एक साधारण अर्क । स्थिति का विभेद बन गया भयानक रोड़ा। निराश घापस थाये उसके पिता । ममा दुःख हुमा उसे । बन्द हो गया रामेश्वरी के घर उसका माना-जाना। बीत गये कई मास । एक दिन सुना उसमे कि मानिक को शादी रुप हो गई है, और तिक्षक शीघदने वाला है। मो में पाया उसके कि भाम-हत्या कर ले। लेकिन मर नहीं सकी बह । निज का दिन मापा और बीत गया। कहा उसके पिता ने उसकी माता से--"कुछ मुगा तुम ने । रंग में भंग हो गया! रायसाहय के घर तिधक मचा सका। सिलक पाने के एक घंटा पहले मानिक पायू भर से वापता हो गये। सारे शहर में उनकी उलाश की गई, लेकिन कशी पता नहीं लगा। हितमा नेक बदल है यह कितनी कोशिश की उस बेचारे ने हमारे पा सम्बन्ध करने की। लेकिन राप साहा टस मे मस नहीं हुये । मर सिर पर हाथ रख कर रो रहे हैं मात ऐसा ११० फिर मिलेंगे येवकूफ शम्स मैने कहीं नहीं देखा । धनसे है नई रोशनी के इन्सान, लेकिन काम करते हैं दकियान्सा के-से" यीन गये और कई मास । सय हो गई उसकी शादी भी। चाहा उसने फिर कि भर जाय, लेकिन मर नहीं सकी। बाइ री पेहया जिन्दगी ! एक दिन बारास प्रावगी दरवाजे पर । दूल्हा बन कर पाया एक अभनयी और ब्याह ले गया उसे । चाहा उसने कि मर साय, लेकिन मर नहीं सकी। यह धजनधी थम गया उसके शरीर का स्वामी। बन सका वह उसके हृदय का स्वामी भी कैसे बन पाता यह हृदय का स्वामी भी ? यह तो हो नुका या कय का दूसरे का। पदली हो गई उसके पति की इस शहर में । और मय रहती है वह इस साधारण घर में उसके साथ । सरकारी नौकर उसका पति । भला आदमी है, यह मानता है उसे, सुखी रखने की कोशिश भी करता है उसको । लेकिन प्यास नहीं थुझा सकता यह उसके दिल की। कोई दोष नहीं सका । यह तो विडम्बना है लीवन की। और अय पा रहा है मानिक उससे भेंट करने के लिये मिलेगी यह उससे ? क्यों न मिलेगी यह उस से मिलेगी, जरूर मिलेगी। हृदय-मन्दिर में जिसकी मूर्ति विराजमान है, जिसको चाराधना करती पा रही है यह इतने दिनों से । उससे न मिले वह ! यह हो कैसे सकता है ? किन्त, किन्न । पमोत्व की जिम्मेदारियाँ, समाग की मर्यादाएँ ? हृदय की पुकार, उसका अनुरोध, उसका श्रादेश ! सब को मानेगी वह जितना मानना चाहिये उसे। दूसरे दिन दफ्तर से लौट कर कहा राजेन्द्र कुमार ने-"मुनती हो?" "क्या है।" "तुम्हारे एक रिश्तेदार भाये है। उनका नाम मानिक चन्द्र है। दातर में मुझ से मिले थे। हे मेक यादमी मालूम होते हैं।' "एक होटल में ठहरे हैं। मैंने उनसे अनुरोध किया कि यहाँ नाकर रहा, लेकिन यह राशो नहीं हुए । अमी आते होंगे। खाना इस वक्त यहीं खायेंगे । बदिया खाना तैयार करना।" "अच्छा।" और यह तुरन्त शुट गई खाना पनाने में उसका ही इतना कभी अन्तिम चित्र १५ . नहीं लगा था इस काम में । बड़े प्रेम से, पड़ी सावधानी से तैयार करने नगी वह भोजन। सात बजे ! मानिक प्रापा । राजेन्द्र ने स्वागत किया उसका भासन विखे । बैठ गये राजेन्द्र और मानिक । साना परोसा सुलोचना ने । यही स्वादिष्ट थीं तमाम चीज़। कमी इतना मज़ा नहीं मिला था मानिक को भोजन में। समाप्त हुआ भोजन । बैठक में आये राजेन्द्र और मानिक । मानिक बैठ गया एक प्राररामकुरसी पर । राजेन्द्र चले गये कमरे के बाहर । पान लेकर पाई सुलोचना जरा देर के बाद । नमस्कार किया उसने । उत्तर दिया मानिक ने । सश्तरी पहाई सुलोचना ने उसकी भोर । "कल दोपहर के समय पाऊँगा, सुलोचना," पान लेते हुए धीरे से कहा मनिक ने। "अच्छी बात है।" चली गई वह । वापस भाये राजेन्द्र । कुछ देर तक यातें होती रही इधर-उधर की। फिर विदा ली मानिक ने। रात पोती। दिन चढ़ा। नौ बजे । राजेन्द्र घले गये दातर खा. पीकर । तैयार होने लगी सुलोचना । गहने उतार साले उसने, जोगिये रंग की साड़ी पहिनी, केश विखेर लिये और यह करने लगी प्रतीक्षा अपने दुप्यन्त की। कमी ऊपर जाती, कभी नीचे आती, कमी सदर दरवाजे के सीखचों से याहर झांकती। यारह बजे । जंजीर खटकी, तुरन्त दरवाजा खोखा उसने । मानिक पाया अन्दर । दरवाजा बन्द कर दिया सुलोचना ने । दोनों पहुँचे बैठक में कई पणों तक चुप खड़े रहे दोनों। "वैठिये।" बैठ गया था। "अही तो हो सुजोचना " "हा, अशी ही हूँ और आप?" "जी रहा हूँ किसी तरह।" दूक उठी सुलोचना के हृदय में। "सुखी हो, सुलोचना, इस जीवन से ?" टपकने लगे आँसू मुलोचना की मांगों से। मुख फेर कर प्रति पोछने लगी यह ।

शिर मिलेंगे . "रोधो नही, रानी ! बायो गुमे साइनसा" "शरीर को कोई दूर नहीं है", भाए हुए स्वर में उसने सा. "किम मन..." चुप बैठा रहा या कपए । "मेरे साप बन्न सकेगा?" "फिसा ऐमी जगह, जहा हमें कोई दोष देने याखा न होगा।" सुपरही पहा “बोलो, मुखोचना " "मैं मजबूर हूँ। मेरा हदय प्रापका जरूर है किन...इस पर दूसरे का अधिकार है। र सहादुधाबह । "ठीक कहती हो, सुलोचना ! मेरे लिए आप कोई प्राथा मही है।" "सहरिये।" "नहीं, गाउँगा।" "फिर कर भाइयेगा!" "कम इसी समय एक बार चौरमाऊँगा।" चला गया यह तेजी से । देखने लगा यह उसे दरवाजे की मार से । चना जा रहा था यह सदसदाता हुधा धीरे-धीरे । ओमन हो गया यह टि से । दरवाजा मन्द किया उसने । किमी तरह पहुँची पर ऊपर शयनागार में और गिर पड़ी पलंग पर । झर-झर गिर रहे थे मासू उसको चोखों से। रात के तीन पज धुके थे चौर मानिक होटल के अपने कमरे में एक धिन बीच रहा था । सवेरा हो गया, और यह लगा रहा चित्र बनाने में। दिन बदमाया । काम यासी या अय भी चिन्न में दिन समाप्त हुआ सादे दस बजे । तब स्नान और भोजन किया उसने । बारह बजने में दस मिनट याही थे। उस चिनको काम में लपेट कर और रीज से बाँध कर, वह निकला होटेल से बाहर, भौर सवार हुभा एक तांगे पर। राजेन्द्र के द्वार पर पहुँच कर संबीर खरसटाई इसने दरवाजा सुला सामने खड़ी थी सुवोधना, शिमले दिन वामे देष में। पद बहा दिया उसने उसकी ओर । ले लिया उसे मुखोचना ने ।

अन्तिम चित्र "श्या है इसमें " "देख लेना अमी।" "अन्दर भाइये।" "बस, इसे देने हो के लिए आया था।" मुड़ पड़ा वह । "मुनिये तो।" नहीं रुका यह । तेजी से चल कर मोरल हो गया यह दृष्टि से। 'एक दीर्घ-निःश्वास स्वींच कर दरवाजा बन्द कर दिया उसने । फिर पहुंची यह मन मारे हुए शयनागार में । पैकेट खोता उसने । वही चित्र था उसमें । एक सुसजिन कमरे के 'फर्श पर चित पड़ा था एक नवयुवक । उसके सीने से हट रहाथा खून का फौवारा, और उसके एक हाथ में था एक धुआँ देता हुआ रिवाल्वर और दूसरे हाथ में था शकुन्तला का चिन । नवयुवक या मानिक, शकुन्तला थी वह । चित्र के नीचे लिखा था 'अन्तिम चित्र' । 'श्या मतनम है इस चित्र का ? योह! क्या मतलब...?' दिन भर घासू यहा-यहा कर वह हल करती रही यही पहेली। संध्या के समय कहा राजेन्द्र ने-"मेरे लिए खाना मन बनाना।" "क्यों ?" "मानिक बाबू ने दायत दी है।" "होटल में ।" चुप रही यह । किंचित् शान्ति मिली उसे । "प्रय जाता हूँ। सात बजे होटल पहुँचना है। शिनलाल से भी मिलना है। .. "अया!" "अरे लिए साना पना लेना-रूर।" कुछ नहीं कहा उसने । पले गये राजेन्द्र । निमूत है उसको माशंका ! यौन कह सकता है ? दावत ? साधारण शिष्टाचार की वार हो सकती तप? होकर रहेगा मो होना है। प्राइ ! वह चित्र! शायना कर साना ? भूष कहा है । होटल के एक कमरे में एक फिर मिलेंगे * श्रासीन थे राजेन्द्र और मानिक । प्लेटें, ह्विस्को, और सोहा की बोतलें और गिलास रसे थे मेज पर । बड़े प्रसन्न थे राजेन्द्र | उनमे भी अधिक प्रसा था मानिक । स्किी को घेतल उठा कर मानिक भाने लगा राजेन्द्र का गिलास। "नहीं, नहीं," चाप का टुकड़ा मुस में रखते हुए कहा राजेन्द्र ने, "क्स कीजिए, यस कीजिए।" "योची-सी और लीजिए।" "मैं पहुव कम पीता हूँ।" "ज्यादा नहीं दे रहा हूँ श्रापको।" "बड़े नेक हैं श्राप !" "यह थापकी उदारता है। मैं तो अपने को पतित ही समझता हूँ।" "यह क्या कह रहे हैं यार? अापका-सा नेक दिल इनसान मैंने माज सक नहीं देखा।" "हमेशा रहेगी धापको यही राय ?" "बेशक " "अगर मुझमे कभी कोई ऐसी बान हो जाय, जो दुनिया की नजर में उचित न हो, सो भी षया श्राप मुझे बुरा न समझेगे ? कोई कारण तो अवश्य मानिक मायू ! नहीं, किसी AM . शुक्रिया! एक घण्टे के बाद राजेन्द्र को सवार कराया गानिक ने एक तोगे पर चल पड़ा तागा। घर आ गया । जंजीर खटपटाई राजेन्द्र ने। दरवाजा खोला सुलो- धना ने । ऊपर चले गये राजेन्द्र दरवाजा बन्द करके । वह भी पहुंची शयनागार में! "साना बनाया था तुमने ?" "सय क्या साया ? "पामार मै पूड़ियों मैंगवा दी थी। कैसी रही दावत ?" "यहुत अमी। पड़ा महा आया। यहा शरीफ इन्सान है मानिक बमा नेक दिन ! वा! मादमी हो तो ऐमा दो!"

भासाठ.
है
वीणातिर।
अन्तिम चित्र
दस मिनट के बाद खर्राटे भर रहे थे राजेन्द्र । गुमसुम पड़ी हुई
थी सुलोचना अपने बिस्तर पर । तूफान उठा था उसके हृदय में 1 घना
श्रन्धकार छाया था उसके चारों ओर । थालोक की एक रेखा भी नहीं
थी कहीं। दम युट रहा था उसका । बीसने लगा घटे पर घंटा।
दो बज गये। पीटने लगा कोई सदर-दरवारे की जंजीर । राजेन्द्र
को जगाया सुलोचना ने । जाकर दरवाजा खोला राजेन्द्र ने । सुलोचना
सपी यो सहन में कौतृहल की मूर्ति पनी ।
"वायू साहब," होटल के उस पादमी ने कहा-"यापके जो
रिश्तेदार हमारे होटल में ठहरे थे..."
"कौन, मानिकचन्द ?"
"हा, मानिकचन्द । उन्होंने प्रारम-हत्या कर लो।"
"भाग्म-हत्या कर ली! कब? कहाँ?"
"एक घश पहले । अपने कमरे में । पुलिस को इत्तला दे दी गई
है। मैनेजर साहब ने श्रापको बुलाया है।"
"अच्छा रुको, चलता हूँ !"
मुड़ कर पहुँचे यह सहन में।
"कहाँ से भाया है वह आदमी ?"
"होटल से । गजय हो गया ! मानिक याबू ने प्रात्म-हत्या कर ली।
मैं जा रहा हूँ।"
शीघ्रता से कपड़े पहन कर चले गये यह । मूर्तिवत् खड़ी थी वह
आँगन में।
होटल के उस कमरे में प्रवेश किया राजेन्द्र ने । अन्दर-शहर मौजूद
थे पुलिस थाले । कमरे में कश पर चित पड़ा था मानिक । जीवन का
कोई लक्षण शेप नहीं था उसके शरीर में । सीना उसका तर पा सून
से। एक हाथ में था रिवाल्वर, दूसरे में शकुन्तला का एक चित्र । शान्ति

र मिोंगे भावन को धार देलो पोम में में I rt किया I निमो माया दूर या पदभायमुत्र पहा नाम - गुहार करना , पार माता। मारे far पीना REM'मुझे जीवन-दान दो मौसममा गया। मने मुझे नियमित कर होने में धी गुहार माया, २३ मैने शरने को धार में रक्षा के पर मेने उसे RITAITई, उसको हम मन की याद दिलाई गुम कंर कर पा गया I मुझे मालूम हुमायद गनुको कामे म या बन गप की दम ना मा यम का भी शामा रमा ! मसुरामानों ने मुझे मार दिया । भैया मी मेरे निट पाने का मापन र म प है, ६न, मेरे अरमान, पान की कया।" वउदय से जगाका गरने पर मे उम प्रोम्छा सुगीना ने 4-"fearal को काप का कभी किसी को कुछ नही विमा, घश मोदिन पर अपना हो इटना है, तो ऐसा करता +am मा मायद संधी ray Eम नारयों क' दुःख झेलना ही सदा तो हमें उमे पाप भंज सोना चाहिये।" "यह सा में नहीं मान सम्सी, हिन । न्याय नुरमा सजेगा, पन्याप यो प्रोमाइन देना है ! पुरयों को अगर हमारे मा शुभम करने मा धिता है, तो हमें भी उनके विरद विनोद कर देने का अधिकार है गा चाहिये । मेरा धार यश च जे, तो मम पुरुष गाति से अपने इम भापमान और अधोगति का पदमा क्षेवर मोह ।' "द करने का अधिकार हमें अवश्य है, और ऐसा में करना भी धाईये, अगर इसके द्वारा इमर हा लेकिन पहले को भावना तो कोई भी माना नहीं। इस भावना की सहायता से प्रगर हमारी जीत भी हो जाय, तो भी हमारी यह जीन हार से भी नयहरेगी। सिर एक या अनेक पुरे पुरुषों के कारण समस्त पुश-माति तो पूरी नहीं दी जा सकती" "जी हो, महिन, मेरे दिल में मोटीस है, यह तो तभी मिटेगी जय मैं अपनी ही तरह पुरुषों को भी दुःखी होने देगी।"

फिर मिलेंगे "मैं भी सोनो ही हूँ, धम्मा, और तुम्हारे दिल पर जो कुछ पीत रही है उसे कुछ कुछ समझ रही हैं। लेकिन मैं अगर तुम्हारे स्थान पर होती, तो यह भी समझ लेने की कोशिश करती कि मुझ से भी कुछ भूल हुई. या नहीं।" "भूल तो सरासर मेरी ही थी, बहिन । अगर ऐसा न होता, तो क्या मेरे मुख में कालिख लगती, मैं कहीं की न रहती, और आज इस तरह ओचन पसार कर मुझे सुम्हारे दरवाजे पाना पड़ता ?" "मुझे उमा करो, चम्पा, अगर मेरी बात से तुम्हारा दिल दुखा हो तो! मेरा मतलय कुछ और था। लेकिन जाने दो उस बात को। इस घर को अपना ही घर समको । मैं हर तरह तुम्हारी सेवा करने को तैयार हूँ। थाखिर तुम मेरी बहिन ही हो न?" "तुम मुझ से बड़ी हो, अहिन । दो कड़ी बात भी कह दो, तो मुझे बुरा मानना न चाहिए। लेकिन तुमने तो मुझे कुछ कहा नहीं, उलटे मेरे आँसू ही पोंछ रही हो । यात यह है, बहिन, कि इस समय में अपने थापे में नहीं हूँ। मुझमे नादानी हुई । बुरा मत मानो। मैं जानती हूँ कि तुम यही उदार हो, दयावती हो, देवी हो ! इमीलिये तो तुम्हारे सामने अपना यह काला मुख लेकर थाने का साहस कर सकी हूँ। मुझे उबारो, बहिन, उयारो !" तय उसे अपनी ओर खींच कर, हृदय से लगा कर, उसकी पीठ पर सपकियाँ देकर, मासू बहा कर, सरल हृदया सुशीला उसे फिर. फिर आश्वासन देने लगी और उसने मान लिया कि चम्पा सर्वथा निहाप है, युग-युग से प्रताड़ित नारीत्य का यह भी एक रूप है, और उसको मेघा कर सकना उसके लिए गौरव की बात होगी। यही कहा उसने अपने पति, ललित कुमार, से जम यह सन्ध्या के समय घर याया। किन्तु ललित अपनी सरल हृदया पनी से सहमत नहीं हो सका। अनुभव-सम्पन्न उसकी सुबुद्धि यह स्वीकार नहीं कर सकी कि चम्पा जैसी, प्रौद युवती की अधोगति का उत्तरदायित्व एकमात्र उसके प्रेमी पर है। "मैं यह मानता हूँ, मुसी," ललित ने कहा-"कि उहाम काम के वशीभूत हो जाने पर पुरुष जानवर से भी बदतर हो जाता है। लेकिन मैं पह नहीं मान सकता कि ऐसे पुरुर से भी यदि कोई अनुभी स्त्री बचना चाहे, तो पच नहीं सकती।"

मिर मिलेंगे "पल के प्रयोग से क्या वह भ्रष्ट नहीं की जा सकती।" "की जा सकती है, लेकिन इस तरह मष्ट की गई भारी को में भ्रा नहीं कह सकता। चम्पा का जो हाल तुमने मुझे बताया है, उस से तो यह जाहिर नहीं होता कि उसके प्रति बल का प्रयोग किया गया " 'यत्र प्रयोग को यदि हमके ठोस अर्थ में बेरह हो, तब तो म्हारी ही बात ठीक है। लेकिन और तरीकों से भी तो बल प्रयोग किया जा पता है" "शक किन मार्ग को पहिचान सक्नेवाला व्यास यदि अपनी मासे मार्ग पर चलने नगे, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसके साथ किसी तरह का बल प्रयोग किया गया है।" "जो हो, मैं तो समझती हूँ कि हमें चम्पा के प्रति दया-भार रखना और उसे श्राश्रय देना ही चाहिये । उसे दुप है, पता है, और कहीं और उसके खिये टिकाना भी नहीं है।" "यह मैं भी मानना हूँ, सूसी । लेकिन हमें यह भी सोच लेना चाहिये कि समाज हमारे इस काम का समर्थन नहीं करेगा, उलटे हमारी मिन्दाही करेगा। "किया परे। लेकिन कोई निष्पक्ष व्यति समाज के उस च्यवहार के लिये हमें दोषी मही टहरायेगा।" "यह तो टीकही है।" धमा ने सन्तोष की सांस ली। नाव किनारे लग गई ! साधी. पानी से बच कर दोधड़ी टिक रहने का टिकाना मिल गय! x प्रस्य का समय था गया। कुशल बेडी साटरों थौरनों की देख. रेख में एक सार्वजनिक अस्पताल में चम्पा में एक पुत्र को जन्म दिया। स्पं हुया उसे, किन्तु दुख भी । पुन को जन्म दे पर कौन मासा मानन्दित नहीं होनी । लेकिन धम्पा की सी स्थिति में पड़ी हुई सी पदि दुखी भी हो, तो वह स्वाभाविक ही है । एकाकीपन में बक्षक के घुल जाने की जितनी सम्भावना थी, सनी अब इस दुजेपन में न थी। सुशीला उसे निश्य देख पाती। बक्षित भी रोज उसका हाज-धात प.बाना । स दिन के शाद नपा अपने इन मित्रो के पास ala थाई। उसे और उम के च को दोनों ने पूरी तरह अपना लिया। x * फिर मिलेंगे . निगल लेगा, अपनाने की क्रिया में स्खलित इतना भागे बढ़ गया कि उसे भय होने लगा कि शायद अय बह पीछे नहीं खौट सकेगा। लेकिन लौटे बिना काम कैसे चलेगा। जीवन के विशाल पथ के अगल-बगल अनेक सुन्दर, सुरम्य रंग स्थल रहते हैं । किन्तु प्रत्येक ऐसी जगह पथिक का उलझ रहना क्या टसे शोमा दे सकता है उसमाना उसने चाहा तो नहीं १ फिर भी उसका उत्तरदायित्व कम तो नहीं हो जाता ? उत्तर- दायित्व कम हो तो मी परिणाम मिन तो नहीं हो सकता ? और कितना भयंकर हो सकता है वह परिणाम ! यह चम्पा कौन है उसकी ? बहुत दूर के रिश्ते से साली लगती है । सुशिक्षता भी यह नहीं है, अप्सरा मी नहीं और वह स्वेच्छा से गढे में गिरी, और उसके उस वृत्य की समाज सराहना भी नहीं कर सकता। सुशीला उससे कहीं अधिक रूप. वती है, सरलता के समानसरल, उदारता के समान उदार, भक्ति के समान पवित्र । फिर भी पा उसे अपनी थोर खींच रही है, खींचती जा रही है और फिसलता हुश्रा, लुढ़कता हुधा घई बढ़ा जा रहा है। किधर । शायद एक ऐसे अंधकूप की और, जो उसे समूचा इसके अस्तित्व का कोई चिह्न बाकी न रहने देगा । क्या उस में चल नहीं, युद्धि नहीं, साहस नहीं है क्यों नहीं ? लेकिन.... नहीं, नहीं, उसे रुकना ही पड़ेगा, बचना ही पड़ेगा। इसी में तो उसका और सुशीला का कल्याण है। और रकने और यचने की प्रिया पारम्भ भी हो गई । मधेरा होते ही वह गंगा-स्नान के लिये चला गया । स्नान करके लौटा, तो धाइर धैठक में बैठ कर समाचार पत्र पढ़ने लगा। मुशीला पान देने यांई, तो कई पण त उसके चेहरे की ओर देखती ही सदा रह गई। "श्राज अनमने क्यों हो?" "धूप में पंदल पल कर पाया हूँ, शायद इसी से।" "हा, शायद इसी से । चाय बना हूँ ?" "नहीं । रहने दो । नौ यजने में दस मिनट बाकी हैं। खाना खाने का समय आ रहा है।" साना हाकर वह दर चला गया । चम्पा कई बार उसके सामने आई, किन्तु ललित उससे घोला मही । फंसता हुआ शिकार क्या निकल भागेगा। नहीं भाग सकेगा पह, अगर शिकारी की सतर्कता, उसकी

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फिर मिलेंगे
चतुराई, उसका कौशल चल गया नहीं, नहीं बच सावा, जब तक
उसके तर्कश में एक तीर भी याको रहेगा अन्यथा कैसे मिटेगी धमा
के दिल की टीस, केपे मिलेगी उसे यह विकट शान्ति, जो तूझान के रथ
पर चढ़ कर ही उसके निम्रा पकेगी विनाश तायध-त्य करेगा,
दुःख हम हँस कर साज देगा होने दो वह सब । उसे तो यह शान्ति
धाहिये, लो.!
शाम था गई थी। बैठक में ललिन पारामासी पर लेटा हुभा
एक पुस्तक देख रहा । हलुये की तश्तरी और जन-भरा मिजास हायों में
लिये हुये घमा प्राई, और दावा के समीर खड़ी होकर उसको घोर
देखने लगी । उसका पाना नलित से दिम नहीं रहा, लेकिन उसने
उसकी घोर टि नहीं डाली पाने तश्तरी घोर गिलास फरों
पर रख दिया। एक छोटी-सी मेधारामकरसी के सामने ले गई। फिर
उस पर तश्तरी और गिलास ला कर यड़ी साधानी से रखा।
"नावा कर लीजिये, जीजा !"
"या"
"यो ही।"
"मुझ से नाराज है क्या?"
"नहीं"
"फिर नाश्ता क्यों नहीं करना प्राहते ?"
"भूख नहीं है।"
"यदिन को बुला?"
"घे क्या भूख पैदा कर देंगी ?"
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• "लेकिन पुरुषों को पुरुष ही ज्यादा समझ सकने है !"
लेकिन यह क्या कर रहा है वह फिर उसी दलदल की ओर ?
उसका वह निश्चय ! खरम कर देना चाहिये इस खतरनाक बातचीत
को। तब एक पण हा कर, यह नारता करने लगा। चा की बाई

फिर मिलेंगे विज गई। मुस्कराती हुई यह कमरे के बाहर चली गई। क्या यह सवमुच उसे चाहती है ? पाइती नहीं, तो इस तरह भागे क्यों यदी या रही है और भी कारण हो सकते हैं ! शायद उसे प्रसन्न करके अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहती है। नहीं, यह यान नहीं हो सकी। अगर यही बात होती, तो उसके अस्तित्व से निकल कर वह उसे इस तरघाने न लगती । किन्तु क्यों सोच रहा है पर यह सब ? उमे तो धरने निश्चय पर डटे रहना है । डरा न रहेगा, तो क्या अपनी सुबुद्धि का अपमान करेगा वह ? किन्तु वे लहेरे प्राणों को छु तू कर भागने वाली, शरीर के एक-एक तार को प्रान्दोलित कर देने वाली लहरें ! नय जमे सुबुद्धि उसका हाथ पकड़ कर उसे घर से बाहर खींच कई गालियाँ भागे थाई, और पाये छुट गई। एक पार्क मामने शाया, और उसे निमंत्रित करने लगा। वह अन्दर घुमा, और पेर के नीचे पहुँध कर बेंच पर अस्त-व्यस्त बैठ गया। कैमी भयानक अशान्ति वह औदम शन्नर्देश में घाँधी की तरह इहरा रही थी! कैमा द-सर था घर, जो लाइलाज हो जाने का सामान करता नजर याता था ! मन की गहराई में कहीं क्या कोई ऐसी शक्ति नहीं, जो इस आड़े वक्त पर निकल कर उस याँधी को शान्त कर दे, इस दर्दै सर को खम से गई। चौंक कर इसने देखा। उसका एक मित्र गोकुलचन्द उसकी ओर घजा पा रहा । दूर ही से उसने सलाम किया । ललित ने उत्तर दिया। गोकुल प्राया, उसकी बगल में बैठ गया, और विनोदपूर्ण दृष्टि से उसके चेहरे की ओर देख कर मुस्कराता हुमा घोचा-"इस तरह यहाँ बैठे दो, जैसे घर से निकाज दिए गए हो !" लळित हंस पड़ा। "एक औरत ही इस काम के लिए काफी होती है। लेकिन अब एक के बजाय दो सर पर सवार हों, तो ईश्वर ही मालिक है !" खलित गम्मीर हो गया। इसी उसके मोदी से उड़ गई। "यों, यार ललित, वह कौन है, जो भाज-कल तुम्हारे यहाँ प्राई "मेरी साजी" "यानी" र मिलेंगे "सद तो टीक!" "हम का मतलब "मगर यह कि जो कुछ हुमा, सही हुमा!" "उन्दे हमने एक से दो कर दिया ! हमसे बार कौन-सा पास हो सकता है?" "वो कर दिया " "येधारी असा पी। नहारी चोखत उसकी रानो गोद में एक दिसा पाया गया। इनकी सीधी-सी पात नहीं समभरी ?" "गोकुन, मैं जानता है कि गुम ई दिखाया हो, कोकिन मजाक की मी एक हम होता है। गाली मा तुम जैसे भले प्रादमी को शोभा नहीं देगा।" "गामी चकी मेमे ?" "चार क्या किया तुमने !" "मची बायरी भी होती है।" "मची नहीं, बिलकुल मृठी पान वही है तुमने ।" "अपनी जान-पहचान RTER TER लोमही कह रहा है, भो मैवे । मूला है, तो सारा जमाना सूटा है।" साबित कर एक घोर शेतीसे चल दिया। मा विकट लाइन था. यह ! उसका प्रतिवाद कर सो दिया उसने प्रतिवाद एक हंग से। किन्तु या दग शायद सोच न था! दूसरा दंग ! प्रतिवाद तो पास्तर में एक ही ताकि से हो सकता है, और यह यह कि सारा काम सात सा बचान कर दिया जाय । यया यह उचित होगा। नही नही, यह इससे नहीं हो सकेगा, हरगिज नहीं। किन्तु वह जान ! वह अमत्य सिद्ध हो कर रहेगा। जीरन के इस यूल पर हा सग्य को सरय सिज करने ही में माप अपना गौरवक्ष्य रहा है, क्या सत्य की विजय हो सकेंगी? और ये लहरें सो रह रह कर उसे घर घेर कर भयानक भैरों की और खींच ले जाना चाहती है? काटते रहना रात के इस पज सुके थे। ललित बिस्तर पर लेटामा था, और सुशीला टसयों पर दाम रही थी। सुशीला ने कहा-"दो बदममी हो रही है हम लोगों की फिर मिलेंगे १२५ "यह तो होने ही को था।" "उस दिन रान घायू के यहाँ से हमारे यहाँ दावस क्यों नहीं पाई, जानते हो" "अाज प्रेमा के घर गई थी। उसने कहा, 'उस दिन राम या के घर नहीं पाई ?" मैने उत्तर दिया, "एमी बेशर्म तो नहीं हूँ. वहिन, कि मिना धुलाए किसी दावत में चजी जाऊँ। सब प्रेमा ने कहा, 'तुम्हारी चर्चा जर वहाँ दिधी, तो राम बाबू की स्त्री योली, एक गर्भवती विधया को जो कोई अपने घर में जगह दे, उपके यहाँ पानी भी न पीना चाहिये। मैं तो उन लोगों से कोई मतलब नहीं रम्बना चाहती। मैंने कहा, 'श्रगर कोई मेरे यहाँ पानी न पीना चाहे, तो उसे जबरदस्ती पानी पिलाने की कोशिश करके में घेवकूफ नही बनूंगी। लेकिन अगर कोई दुःखी श्रादमी मेरे दरवाजे पर आए और मुझ से सहायना माँगे, तो उसे दुस्कार देने का साहस मुझ में नहीं है, यहिन !" "बहुत ठीक कहा तुमने।" "लेकिन अब तो मैं सोचती हूँ कि चम्मा को अपने घर में रख कर शायद हम लोगों ने अच्छा नहीं किया।" "लोक-निन्दा से डर गई?" "नहीं, यह यान नहीं । मुझे इस बात का जरा भी अफसोस नहीं है कि हमारी बदनामी हो रही है। फिर भी न जाने क्यों मेरे मन में रह-रह कर २६ बात उठ रही है कि दमा को यहाँ रसना ठीक " ललित निस्तब्ध रहा। "उसे दूर रख कर भी तो हम उसकी सहायता कर सकते है?" "कर सकते हैं । बेकिन यहाँ पनाह दे देने के बाद शव उसे दूर करने से उसका अपमान होगा और हमारी हँसी उद्देगी।" "यह तो ठीक है।" सुशीला के मायके से उसका दोरा भाई उसे दुलाने आया । वह • जाने के लिये तैयार हो गई। "नहीं, इस समय तुम्हारा जाना उचित नहीं," ललित ने विरोध x x किया।

frein इमा पर यह पा? मे Farme? मेरो यो tush RA दोन 6 मे अना मोनोगी मानो।" "EPAL, मानो," र मायकर विमेदार शिोध असे ना? मग तिमाही में MEANI HITR परिपत्र वा गुगम) को ना! 'arnitiat मुर्गा!imi Man मिट मविधान पप समतो. नाक भी विकसी कीममाहारीमा महीRT, भाग भीमही मtralaya TV पो कोरगाह ATTERNों महापापन munा, at RAINALI ससी दिन गुशीता मात्र नो गई। और या लिस alifair at मामना करने के लिए, जिसकी Wint पाती जा रही थी। पमा जिय महान मा मा1 परे शिER Rr gir भादी के RIN गने से रोकने पासी घर की मरमधी। और शिका? a perसा हुआ, किकमा हुमा, कापता हुध किन्न जाए में कराया, उसके । न पायेगा, तो जाकर सहा मोर उम मारने । भानन्द का , tp i का प्रयो। सुगीसा उसे रोकने पानीकोन है ? क्या रोकगी या चारी उले! विश्वासपान ? मिERE है यह पारसा। भूगता मा गायादारी ! विश्वासपात की मागे हुई मो यह भी है। Aai का सकार बज रहा है। बिहती गगा में घर मी पो म दाप पाया बनाने की इमारमा प्रागन, किन्तु पत्थर पम जाना कठिन । कटन ही ही, बक्षित घेखिए तो यह असम्भव सिद्ध हो रहा फिर मिलेंगे १२८ था। कितनी निरीहता, कितनी दयनीयता अनुमय कर रहा था ! सन्त- देश में जो द्वंद छिड़ा हुआ था, उसमें खर्च होती रहने के कारण भेष उसके पास उसी शक्ति नहीं बची थी, तिनी प्रायश्यक थी। इस समय उसके यात्मरक्षा अग्रमो कुन्द होने नगर पाते थे। सुशीला की उपस्थिति एक हाल थी, किन्तु वह भी इस समय निकट न प्री। क्या होगा तय? उसके अन्दर दहाहता हुया उसका पशु माद से पाहर निकलेगा, और उसके सुन्दर, छोटे से संसार में विनाश के भयावइ एश्य उपस्थित करेगा और उसका मनुष्यस्य सिर धुनेगा, पहनायेगा, कोसेगा अपने को, इसको, उसको । उसके अस्तित्व के विकास-क्रम का शायद यह अध्याय भी एक श्रावश्यक अंग है ? नहीं है यह पान, तो क्यों होने जा रहा है यह सब ? पूर्वजन्म के दुष्कृत्यों का दण्ड ? किन्तु यह भी तो श्री जाता है विकास-रम में ? कैसा विचिन दे यह क्रम ! कैसे ऊँचे, नीचे,. सुन्दर, असुन्दर, स्वच्छ, मलिन स्थानों में होता हुआ यह चलता जाता है ! इस रथ में घोड़े की तरह जुता हुमा बह चल रहा है । सारथी यह नहीं बन सकता क्या ? यम साता, तो इतना असहाय क्यों पाता अपने को? बीत गये दो दिन । श्रा गया तीसरा दिन । और प्रतीत हुश्रा ललित को कि केवल दुष्कलपना ही निर्मूल प्राशंकाओं को जन्म दे कर उसे सता रही है। उन प्राशंसायों की पूर्ति के लिए कुछ कम न थे दो दिन ? मनुष्य स्वयं अपने दुःप और सुख का सृजन करता है। कितना सत्य है यह कथन ! कितना दुखी रहा यह इन दिनों, और अपने ही कारण, अपनी ही प्रेरणा से! और अब कोई कारण नहीं किसी चिन्ता का। तय जाती रही उसकी सतर्कता। बल गया दिन। बीत गई संध्या। भा गई रात । जय भोजन करने बैठा ललित, तो अनेक स्वादिष्ट पदार्थ उसके सामने लाए । और बड़े स्नेह से आग्रह कर-कर के घमा खिलाने लगी उसे। किस प्रसंग की भूमिका है यह ? जाग्रत हो गई फिर दुष्कराना? साधारण शिष्टाचार ही की तो यह यात है ? किसी हेय कामनाका हाय खोजना इस में कदापि उचित नहीं। यह अनुचित ही नहीं, अपनी ही कुटिल मनोवृत्ति प्रकट होनी है इससे । यही मनोवृत्ति तो सता रही है उसे इतने दिनों से। यायें हाथ का खेल है इसके लिए नरक के वीभरस दृश्यों की रचना कर देना । अब मचते रक्षमा होगा उसे इसके पड्यंत्र से, इसके बाल से।

१२८ पिर मिलेंगे भोजन कर चुका लक्षित पान दिया इसे धारा में पान माया उसने । भर गया उसका मुख कहे और इजापधी को भुग से। फिर या गया उसे नशा, और माती मे खगी उसके मन में। मुमता हुमा चला गया यह घूमने के लिए। दो घटे के बाद यह पाप माया र सरपटाई उसने । गुरम्न श्रा सदरमामा प्रोना थापा ने। अन्दर गया पर और पम्पा को देख कर दग रह गया 1 मिर से पैर सहमती हुई थी पह, और हिना की मादच मुगर की लहरें चार कार रही थी उसके चारों और यह मशीली लहरें घरने लगी सभा । ति ष्टि से देखा उसने भग के उत्तुल पेहरे की भोर। पान की लाली में रंगे हुए चाग के मोठी पर यह हुई एक मादक गुयान, और मन्त्र पड़ी मोनियों को दो जदया। खदादा गया जिन। धीरे धीरे यह कर पहुंचा यह अपने शयनागार में । बड़ी सई से विदा एषा या उमका बिस्तर । दूध यो समान चमकती हुई चादर में पमान या शिकन । यदे काय? मे रखे हुए थे किए। और यह गुवं घी क्या है जो कहा है तयिों के नीचे सेवा कर, मुक र, तकिए हा र दया उसने । गुत्ताय के वाले पृद्ध में । क्या होगा श्रय! भा गई क्या यह कठिन घा, पागका घी जिसके धाने की ? दुपहरा ही नहीं। किन्तु यया है इन बातों का मसलय? मतला! गृह स्वामी की समुचित सेवा समुचित या अत्यधिक ? निज पार्शका और यह वसा असाधारगार ? कई अधिकार नही उसे गार करने का-अपने को मुश करने के लिए भी नहीं ? कष्ट माध्य, अनुचित, अवाछनीय नियम समाज के ! कपड़े और जो उतारे उपने । और ले गया वह पलग पर । अनि प्यक्ति है, समान समारटीरता से शासन करने का वादी समान। दिन विद्रोह कर उठना भी कामाविक है ध्यान के लिए विद्रोह का महाया है घाराने, और ऐमा करना स्वाभाकि भी है उस लिए। क्या मिजा उसे समाज में एक भूल के कारण ? सहानुभूति के प्राय साइना और लाहा। उसी की तो यह प्रति किया है। उसकी भून की पसन्द नहीं किया उसने हम्म करना । तब क्यों इन करे यह उसके दण्ड को कैसा ििचत्र व्यापार है यह, वैया करुण और दृश्य सायक'

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++ १ मसीहीदोशनी गई HITRE haru हम मिाामना म सही, सोया साया सासमा खाना हा पहना हो मा माहीं, मेमा महोहोर तो है महोबा। किम कमा नहीं पा उRE ऐमा SATIRE Im मारा? চাই না কবি। "कहाँ मापदे" "मरा है।" "समान की बागेम गंगे।" "मर्नेगा या नही " रिपोपयों ना हो "पाना से काम नहीं माप नी इम ला पाने पर राम प्राया करता था" अनियनिहरार हो कर गया। शोभाकार निराधार भाकाम रखी गधा, मासानी 2 गाना था, और मान-सपने की मामी धीमी उस माग हिन्दु परमार के। अस मले में 3 बडो प्रमोशन NिTERT Arror कारण पा जाने की दया का । पुरी पी यह शरीधी. प्री पी दूसरी करने लगी सीखा गाथा | मुममें क्षमा अक्षित प्रायमनस्का से। दिपी नहीं रही पर बाद भी मुशात्रा की मार जरिन हो गया भेद और भी। सपा में भी दिखाई दिया ये किचित परिवर्तन । यस पEnt में किचित् गयं मया घधिकार का मामास मिला उसे, और पुषित धी पर असाधारण रूप से । क्यों है ऐसा प्रस्थामाविक ऐसा होगा। किन्ध पहले तो ऐसा न था ! समय ज्यों-ज्यों बीतता है, ग्योरयों कम होता है दुल का भार, और खोदने लगती है शान्ति, जिसके पौधे लगी रहती है पता। किन्तु गर्व तया अधिकार की भाषा उपकी पनुः पस्थिति में गृह-स्वामिनी के पद पर प्रारद हो जाने के कारण मी तो ला सकती है यात्रा में ये बात। फिर भी न जाने को भापति सके मम को पद सहाई स्वीकार करने में। ।

फिर मिलेंगे । बीत चुकी थी माधी सन । लेटी हुई थी सुशीला अपनी चारपाई पर अपने शयनागार में धान की चारपाई पर लेटा हुधा या उसका पति । वह सो रहा था। लेकिन जाग रही थी वह । जो अशान्ति . भाज यहाँ लौटने पर प्रा गई थी उसके मन में वह प्रबन यी आय भी। भेद नहीं खुला था अभी तक । और वह छटपटा रही थी उससे परिचित होने के लिए। सुरक्षित है उप का पति, उसका घर, उमझी सम्पति, किन्तु कुछ खो गया है उसका । क्या है वह धीज ? कुछ भी हो, वह मानती है कि कोई मामूली चीज नहीं है यह । मामूली चीज होती, तो उपका अभाव सारे घर में व्यास हो कर उसकी छाती पर बोस की ताह न लद जाता । और आन पड़ने लगा उसे जैसे यह विकर, विकराल प्रभाव स्सा लेगा बसे । क्या है, यह क्या है ? लैप के मन्द प्रकाश में देखा उसने-कोई श्राया दवे-पाव कमरे में । कौन यह ! एक स्त्री । ऐं ! यह तो चम्पा है ! क्यों आई है यह यहाँ इस समय ? किसी चीज़ की जरूरत होगी? जरूरत किसी चीज़ को थी, तो बाहर से क्यों नहीं श्रावात दी इसने ? पूछना चाहिए १ नहीं देखना चाहिये । अधमुंदी कर ली उसने अपनी चखें। देखा ध्यान से चम्पा ने उसकी भोर । इनमीनान हुमा । बही वह धीरे-धीरे ललित की चारपाई की भोर । रुकी, मुकी, फिर ललित का एक पैर पकड़ कर हिलाया उसने धीरे से । अंगड़ाई लेकर करवट बदली ललित ने । नहीं जागेंगे यह एक बार और प्रयव करना चाहिए। फिर उसने हिलाया उसे धीरे से । चाँखें खोली ललित ने, देखा उसकी ओर, लेकिन फिर बंद कर ली पाखें । तब निराश होकर दबे पाँव चली गई चम्पा । खुल गया भेद । बज्रपात हुमा सुशीला के ऊर । कापने लगा उसका शरीर क्रोध के श्रावेग से। कुजटा, कज्ञमैंही, पतिता! और कितना पाक-सा बतलाती है वह अपने को ! क्यों न होती उसकी दुर्गति ? किसी भयानक भून की उसने उसे अपने घर में जगह दे कर ! निकास माहर करे क्यों न वह उसे इमी समय १ किन्तु उचित होगा इस तरह इस समय शोर-शरामा काना? वह गए नहीं इस समय उसके पास, किन्तु यह स्पष्ट है कि वह भी निर्दोष नहीं। अगर वह निर्दोष होते, सो कैसे साहस होता घमा को ऐसी हरकत करने का इतने उप विचारों वाला व्यन्ति मी इम हद तक गिर सकता है ! कैसे धारचर्य और दुःख की बात है ! क्यों देखना पड़ा उसे यह दिन ! क्या बिगाहा सिर मिलेंगे था उसने किसी का । यहने लगी उसकी बातों से प्राँग की धारें मां कयनीय थेदना योहन धोमुधों में ! राम भर सो नहीं सकी मुशीखा। सोती ! शन पिर प्राता के प्रकाश में और करने लगता है मयर हायायाय, मर कि घासती देनी उस समय समान या रेन्द्रीभूत हो जाती है अपनी र करने में। सोरे ही उसने कहा जित से-"चम्पा को अपने साथ ले आर रेखगादी पर पधार पर प्रायो। यह जहाँ घाई पक्षी जाय।" "इसलिए कि उमय इस घर में रहना पक्ष में पदारत मही कर सो मनुष्य "क्या?" "मपने बंधन से हटना तो टोक महीं !" मैंने पद यश्चन नहीं दिया था कि जीवन भर माथय दिप रहूँगी उसे । और फिर घर में अब बाग लगी हो, तो उसे घुमाने की कोशिश भ करना पया मूसा नहीं।" "भाग?" "गत कया है मैंने ?" तो यह मुशीबा और घमा के बीच के किसी साधारण मतभेद को भात नहीं। नहीं, उसका इशारा है शायद उस भयानक मेद की भोर, जिसे छिपाये रखने के लिये यह प्रयमोक्ष है। "उस पात के बारे में मुम गुमसे ज्यादा जानते हो। इसलिए यह मावश्यक महा कि मैं साफ-साफ हूँ। इवनी अप्रिय है पास कि उसे अचान पर खाना मुझे जरा भी पसन्द नहीं।" फ्रक हो गया बलिव का घेरा। निष्फल हो गया उसका प्रयत? ज्ञात हो गया उसे यह विष्ट भेद , या अनर्थ हुधा। किन्तु कर सक छिपी रह सकती थी ऐसी पार! सुशीला की और देखने का पद साहस नहीं कर सका। निस्वम्ध बैठा हुधा यह कुछ समय तक प्रशे की ओर धाश्ता रहा, फिर उठ कर कमरे के बाहर चला गया। बह पहुँचा चम्पा के कमरे में। मुस्कराई पापा उसी थोर देख कर । किन्तु यह गम्मौर बना रहा। धारधर्य हुमा घम्पा को। "तयारी सरा फिर मिलेंगे "किस बात की तैयारी ?" "यहाँ से जाने की।" हमारे सम्बन्ध की बात सुशीला को मालूम हो गई, और अब तुम्हारा यहाँ रहना वह गधारा नहीं कर सकनी।" "यह तो यहा बुरा हुया।" "येशक।" "मैं कहाँ जाऊँ?" "रेल पर मैं तुम्हें सवार करा दूंगा। तुम जहाँ चाहो चली क्षाओ।" "लेकिन मैं तो यहाँ से जाना नहीं चाहती?" "नहीं, यहाँ तुम्हारा रह सकना अब नामुमकिन है।" "अगर श्राप चाहे तो कोई मुझे यहाँ से हटा नहीं सकता।" "लेकिन ऐसी बात मैं चाह कैसे सकता हूँ ?" "ऐसा चाहना थाप का फर्ज है।' "चम्पा ! सुशीला के साथ में एक बहुत बड़ा अन्याय कर चुका है, जिसका प्रायश्चित्त शायद इस जन्म में न कर सकूँगा। अब में उसके साथ कोई दूसरा अन्याय नहीं कर सकता।" "सब तो मेरे लिए कोई धाशा नहीं।" निकलने लगे चम्पा की प्रास्तों से ग्रामू । यह देख कर पढ़ा ललित दरवाजे की ओर । दरवाज़ के समीप एक कर उसने कहा-"तैयारी करो। थोड़ी देर में सौगाया जायगा।" जलित चला गया। अखें पॉख कर मुस्कराने बगी चम्पा । फिर या मामान याँधने लगी। एक घण्टे के बाद एक तांगे पर सवार होकर चम्पा और खलित रवाना हुए स्टेशन की ओर । सुशीला नै भेट नहीं की उस से। उसे भी साहम नहीं हुमा उसके सामने लाने का। प्रा गया स्टेशन में उतरे साँगे से। सामान उतारा एक कुली ने। ताँगे पाबे को पैसे देकर पूछा ललित ने-“कहाँ जानोगी, चम्पा !" "मैं कहीं जाना नहीं चाहती।" "यह क्या कह रही हो तुम!"

गरिसकुन ठीक कर रही हूँ। बारको छोड़ कर में कही महीमा सकती हो, अगर माप भी मेरे साय बना स्वीकार करें, तो दूसरी यात है।" जानिए" "सम्भव असम्म में कुछ नही जामती | भार मे पूर में नहीं रह सकती। लेकिन अगर आप मुझे दूर करमे हो पर सो मुझे मार "मार दासम् १" "हो, मरने का सवार हूँ।" "तूप बहामने तुम चुपया सोचता रहा। फिर उसने एक दुसरा मामा पुलाया। कुशी ने सामान कामे पर रख दिया । उसे पैसे देकर पेपर सवार हो गए। "कहाँ पर्ने, पानी " alगे वाले ने पूछा। “सिमक्षा होटख ।" " सिरहाको पहुँच कर पम्पा को कमरे में सहरा र अलित ने WEt-"यो सार दिन यही हो । सब स सुन्दा रहने के लिए कोई मकान ओक कर लूंगा। यह लम्हें कोई तकलीफ न होगी। रोज सुबह- माम मेमालापागा।" "ठीक है। कितने नेक है भार! आपको पाकर शितना मुन्न मिल रहा है मुझे, उतमा कभी नहीं मिला था।" चम्पा से विदा होकर घर पहुंघा ललित । अवसराता थकित थी सुशीना के चेहरे पर । लक्षित बैठ गया दालान में पड़े हुए यह पर। "सवार करा पाए उसे " "कहाँ गई बद्द" "अपने मायके।" "कुछ कहती थी यह भी बैठ गई सात पर। एक दीर्घ नि श्वास पींच कर उसने -"मेरे हृदय में बड़ा गहरा पाय गा" ।

फिर मिलेंगे "जानता हूँ, सूती!" "यह अच्छा नहीं हो सकेगा कमी" "नहीं, अरश हो जायगा धीरे-धीरे ।" "तुम्हें मैं बड़ा बलवान सममतो यी । लेकिन मुझे अब मालूम हुधा कि एक बलवान श्रादमी भी कमी-कभी कमजोरी दिखा सकते हैं।" "मैं मानता हूँ कि मुझ से भूल हुई।" "साधारण नहीं, भयंकर भूल हुई।" "इस से इनकार करने का मुझे कोई हक नहीं, यह मैं जानता हूँ। लेकिन तुम्हें यह भी सोचना चाहिए कि इस मामले में थोड़ी बहुत जिम्मेदारी तो तुम्हारी भी है।" "यह मैं जानती हूँ, और सम से अधिक रोद मुझे इसी बात का है। जब मैंने चम्पा को इस घर में श्राश्रय देने का प्रस्ताव किया था, तोफेवजनिःस्वार्थ सेवा-माव ही मेरे मन में था। और उस समय मैं भूल गई थी कि होम करते समय कभी-कमी हाथ भी जल जाता है !" उठी उसके मन में, और घासू टपकने लगे उसकी आँखों से । जेब से रूमाल निकाल कर उसके आँसू पोछ ललित ने। इसकी भी धोखें उपहया आई। जो अगाध ममता सुशीला के हृदय में थी वह ललित को धमा किए बिना कैसे रहती । इससे क्या वह कमी विमुख हो सकती थी ? असम्भव । वह उसका परित्याग कर देता, तो भी कभी संकट के समय यदि वह उसे आवाज़ देता, तो क्या वह उसके पास दौड़ कर न जाती! जाती-अवश्य जाती! जाये विना उससे रहा कैसे जाता? यह तो अपना सर्वस्व उसे समर्पित कर चुकी थी, और उससे कुछ पाने की बावसा से ऊपर उठ चुकी था । ऐसी दशा में गुंजाइशः कहाँ थी धृया के लिए, तिरस्कार के लिए, उपेक्षा के लिए धीरे-धीरे भर रहा था उसका घाव । पापा अब उस में यरायर नहीं बनी रहती थी । हो, रोस कभी-कभी उती थी, और उसका भविष्य उस समय अंधकारपूर्ण होकर ये सत्यन्त भयावह प्रतीत होता था। के समय भोजन के उपरान्त लक्षित नित्य धमने .

र मिलने निकल जाता और वही रा] गये घाबरता कमी कमी या सारी शा गायक रहना । मुशोमा जय प्रश्न करती, तो वह कोई न कोई बहाना बना देता इस मित्र के पर दापत थी, सभासर के यहां जमा था, मुशायरा था, कवि-सम्मेखन या, यह या, यक्ष पा! चौर मुगामा शुर- चाप उसी सहाई स्वीकार कर लेती। एक दिन उसमे मही ने कहा -"पहजी! चार तो तो पाकि थापकी यहिन मायके सी गई" "का, टीफ तो कहा थामने।" "मगर मैंने तो उन्हें बचा देखा था।" "कही देखापा तुमने " "मैं पोर को बरक अपने एक मासेमार के घर जा रही थी। परी रास्ते में चापकी बहिन दिखाई पड़ी। बापूजी भी उनके साथ थे। पर बर को लिये हुए थे। मुझे देख कर में लोग बन्दी शादी भागे पर गये। मैं सचर में पड़ गई।" "सुम्हें विश्वास है महरी, कि तुमने ठीक देखा था!" "बिलकुल ठीक देखा था मैने । ये लोग दूर भी नहीं थे, और मेरी पास भी सभी खाद नहीं हुई है।" सुशीला निस्तब्ध बैठी रही । उस समय बदल दुई थी उस पत्राघात के कुप्रभाव को रोकने में, जो अभी उसके ऊपर हुमाया। उत्तर नहीं दिया सुशीला ने। उसके चेहरे को और देखा महरी ने और उसे साहस नहीं हुआ मागे पुद कहने का । पधार उठ कर यह बरतन मलने के लिए चली गई। मुशीला उठी। उसके पैर खा गये । संमत कर यह शयनागार की भोर धनी । उस कमरे में पहुँस कर, दरवाजा भेड़ कर, पर अपने पलग पर गिर पड़ी और बिलख-बिलख कर रोने लगी। और यह निकला उसके उन घाँसुओं की धारों में उसका बचा खुचा अपमान, मोह, उसका गौरव, उसका मान । फट गया फिर उसके हत्या का धाय और घेरने लगी उस धारों से गहन उदासीनता। ललित घर चापम माया एक घटे के हाइधार रसने पूछा महरी से-"कहाँ है?" उसका फिर मिलेंगे 7 "यहाँ पाबूजी," मसाला पोसना रोक कर, शयनागार की ओर इशारा करके महरी ने उत्तर दिया । शयनागार इस समय ! और दरवाजा भी बन्द है ! क्या मामला है सहम कर वह यदा धीरे-धीरे शयनागार की योर । एक क्षण रुक धीरे से दरवाजा खोल कर उसने प्रवेश किया उस कमरे में सुशीला चित लेटी हुई थी अपने बिस्तर पर और ताक रही थी एकटक सामने दीवार की घोर । "सूसी!" कोई उत्सर नहीं दिया सुशीला ने । ज्यों की क्यों पड़ी रही यह । "इस तरह क्यों पड़ी हो, सूसी ?" फिर कोई उसर नहीं मिला उसे । तप धीरे-धीरे यहा वह पलंग की भोर। "सूसी!" पलंग के समीप पहुँच ! उसके मुख पर ष्टि गहा फर उसने कहा। तब देखा सुशीला ने उसके चेहरे की ओर । ललित दहल गया उसकी पाखों का भाव देख कर। "क्या बात है, सूसी" 'कुछ नहीं।" "नहीं, कोई यात तो जरूर है," पलंग पर बैठ कर यह योला । "बात यह है कि अब मुझे इस ज़िन्दगी की ज़रा भी परवाह नहीं "यह क्या कह रही हो मुम" "बिलकुल ठीक कह रही हूँ मैं। तुम्हारी दुर्दशा इन बातों से देखने के लिए में जिन्दा नहीं रहना चाहती।" सिर मुका कर ललित फर्श की और साफने लगा। "तुममे एफ भूल हुई । मैंने सोचा भूल हर यादमी से हो जानी है। फिर मैंने सममा, म समद गये, मामला रफा-दफा हो गया। चेकिन मुझे आम मालूम हुआ कि मेरा प्याज गहत था। तुम धरित्र- वाम थे, सधे थे, सीधे सादे थे। फिर तुम गिरे, गिरते ही चले गये, और धाज गुग्दै म और कपट का सहारा लेना पड़ रहा है।"

रि मिलेंगे "अपने मायके।" "ver हुशा, अशी गई। लेकिन मुझे तो ऐसा मालूम पड़ता है कि उसके पाने या न जाने से भय मुझे कोई सरोकार नहीं रखना चाहिए।" जलिस के दिल पर चोट लगी । राप गया यह। दूसरा दिन भाया । रोग घठा नहीं। वलित को चिन्ता पद गई। उसे सावना दीदार ने। दिन हल का था। शाम सा गई पी। मुशीबा कुप शान्त पी। खलित गा मा पा उसको सेवा-सुथुपा में। "मुनते हो" "मैं अय मचूगी नहीं!" "मत कहो ऐपो थात।" "नहीं, सच कहती हैं।" "अपने मन से निकाल डालो पइयान।" "फिजूल होगी यह कोशिश । मैं तुई घोसे में नहीं रखना चाहती।" "सूसी ! सूमी" "दिल जय टूट जाता है, तो शुदता नहीं । ज भी जाता है, तो बहुत दिनों तक टहर नहीं सकता।' "तुम देवो हो सूसी, मैं दुराचारी हूँ ! मैं तुम्हारे योग्य नहीं है। से पृथा करो, सूसी, मुझे धाप दो!" "नहीं, नहीं, तुम मेरे स्वामी हो, धाराध्य देव हो! मैं तुम्हें स्मार करती हूँ, दिल से प्यार करती है। मुम्हारे अनिष्ट की में करपना भी नहीं कर सकती ! इस जन्म का हमारा नाता अब टूटने को है, लेकिन मुझे विश्वास है कि हम फिर मिलेंगे।" पहने ली शलित को घाखों से घासू की अविरल धारें । उठ कर उसे धीरे से अपनी ओर खींच कर, मुशीला पोछने बागी अपने आँचल से उसकी शाखा सत्य निकली मुशीला की भविष्यवाणी । यह बद्ध यसी उसी दिन रात के तीसरे पहर । यमपात हुधा ललित के ऊपर । मुझ

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रि मिमिंगे "कौन है वह इसने पुसा था से मले में। 'एक मेहमान।" "कोई रिश्तेदार हैं मुम्हारे " "यह मेरे यही है, सो भार हैं!" "पानी ?" "मी!" और वह हंस कर धनी गई। कैसी मयार दे यह सी, ऐसी निर्मा, दुष्य, दुराचारिणी ! मम कर सकेगा यह ऐसा भयानक दुराचारी नहीं, नहीं। अमर ! खा लिया उसने येघारी मुशीशा छो। अब या सेगी वह उसे भी ! साने दो इस अयि पयर का। चौर बसा ही क्या है य यही! ममम्मव प्रतीत होने लगा उसे उस दूपित, विषाक्त पातावरण में सांस लेना ! इना. ज्ञार नहीं कर सका यह नारते का। माग निाला यह सपने उस घर से। घटों पैटा रहा यह अदया एक पाई के निर्जन कोमे में हम कर सकेगा यह ऐपा विकर दुराधार । भ्रसम्म। कौन है यह उसकी ? प्रेमिका ! प्रेमिका होने के योग्य है यह उसकी नहीं, नहीं । रसैन ! निकाल बाहर करे क्यों म यह रसे नहीं, यह नहीं हो सहेगा। कहा है उसमें माहम अपने व्यनिय की अयहबना कामे का। अगर होता उस वह साक्षर, तो पया पानातो सुशीया इसे धो कर मुशीला! देवी सुशीला ! यादा हो गया निशा का अन्धकार । उठ पर धीरे धीरे चला यह घर की थोर । क्यों जा रहा है पहबहा! दो पात करने के लिये चम्पा मे। क्या होगा इससे साम? शायद कुछ नहीं। सामने आ गया घर । ठिठक गया यह एक पतली गली की मोर पर। दरममा खुला था घर का । बाहर निकज्ञा एक व्यक्ति । दरवाजे के समीप खदा यी चम्पा सजी धनी । कुछ कहा इस व्यक्ति ने गुस्करा कर । ईम पदी चम्पा । चल पड़ा का दरवाजा मन्द पर लिया चम्ण ने । कीन है यह व्यति! था तो रहा है इधर ही घटी मेहमान नहीं, नही, कोई और है यह तो। एक नही, दो। दो नहीं, माने कितने ! घिर भाया भयानक अन्धकार ललित के चारों ओर पकराने लगा उसका सिर । सूमी ! सूसी ! कहाँ हो सूसी! मलमला उठी प्रकाश के 1

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. 'माया सीरीज' की पुस्तकें- 1-ससार की भेषरहानियाँ 18-प्रेम-मयानो (प्रथम भाग) २.-मांस को प्रेम कहानियाँ २--पूर्ति (कहानी संमह) নয় * ছানি ---यगला को धेष्ठ कहानियाँ । २२-मोणों की श्रेष्ठ कहानिय । ४-प्यार (कहानी-संग्रह) २३-उपवन (कहानी-संग्रह) ५-प्रभुन कहानियाँ २१-संसार की प्रेक कहानियाँ ६-गुनीम श्यामलाल चिर्चा भाग) (कहानी-सRE) २५ इन्स्पेक्टर थोर (उपन्यास) -~याप्त (उपन्यास) ।२-रूस की श्रेष्ठ कहानियाँ -संसार की कहानियाँ २. बहजो (कहानी-संग्रह) (दूसरा माग) २८-संसार की श्रेष्ठ महानियों ५-उर्दू की श्रेष्ठ कहानिया (एटा भाग) V-पार की श्रेष्ठ कहानियाँ २५-फिर मिखेंगे (पहानी-संग्रह) ३०-यमानुपिक हत्या (एनीय भाग) ३१-मंजरी (कहानी-संग्रह) 11-कान्ता (उपन्यास) ३२~-अधूरा स्यम् (बहानी सप्रह) १२-फुलयारी (कहानी-संग्रह) ३३-मादि और अन्त (उपन्यास) १३-निकोदा (उपन्यास) ३४-समाटा (कहानी-सग्रह) 1-संसार को थेफ कहानिया । ३५-जीवन-मम (कहानी-संग्रा) (चौथा भाग) ३६-मौलाना को पड़ोसिन १५-- रहस्यमयी (उपन्यास) (दास्यरस की कहानियाँ) १६-गृतियों के चित्र ३.कामना (महामी संमा) (कानी-सह) | --जवाहरातों की चोरी 1.-शानिश (कहानी-संग्रह) (कहानी-संग्रह) १५-लेश (उपन्यास) ३६- पदला (कहानी-संग्रह) । ta . *******

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Fir Milange

Author
Singh,rajeswar
Title
Fir Milange
File name
Fir Milange
Text
OCR done
Citation
1938
Published
2011/04
Publisher
Allahbad Maya Press
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552317
Barcode
4990010033060.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
r3QgpNyPjZH
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