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Reet Ka Virandawan

Devi Ashapurana · 2011/03

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रेत
का
वृन्दावन

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रेतका
वृन्दावन
आशापूर्णा देवी

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वगला की कया-महिणी
आशापूर्णा देवी
में एक भेंट
मुशील गुप्ता

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'दाद की याद में ' पहने आप मुझ डाद लीजिए। मैंने बदल देर कर दीन' मन ही मन यह 'मुआफी' दुहगते हुए, मैं आगा दी के यहा गाम को मारे पाच के बजाय साई यह वजे पहुची हू। एक बच्ची खवर दे गई है, 'टारमा पूजा-घर में हैं । बाप वैटिग ।' मैं उनके पिनार-घर में सो जाती है। दो मजिले पर, गोने में एक पमरा, जिसमें कितारें भी है, बिनौने भी । आशापूर्णा देवी-लगभग १६५ पुग्नकों की गजिया हजारो कहानियो यी लेविका, नारी-म्या- तभ्यता की दुदंपं हिमायती-वयोवृद्ध लेखिरा भागापूर्णा देवी । वाहर में अतिगय गरल, विनम्र और ममतामयी, अदर से अन्याय-अत्याचार के खिलाफ अगारे उगलती हुई, इस साया लेविया ने आधुनिक बगला- साहित्य के कई-पई पालो और युगो को अपने में गमेट लिया है, उन्होंने अवरोधों में जाती नागे वी व्यथा-नया को दापी दी, पुम्प-गानित समाज की तानाशाही के गिलाफ विद्रोह उन्साया । 'प्रथम-प्रनिथुनि', 'सुवर्णलना', 'ययुल-कया'-पे तीन वृहद् उपन्याम, उनको माहित्य-यामा वे तीन आयाम हैं, जो अपने में आदि, मध्य और वर्तमान गालबड़ी का इतिहास ममाहित किए हुए, समूचे युग का एवः विगट चित्र प्रस्तुत करते हैं। 'माफ करना, सुगील, जरा देर हो गई ।' उनकी विनम्र आवाज मुनकर मैं चौंकी है और हठात चुप हो आई है। जिनके प्रति अपराध- बोध मन को मय रहा था, वह स्वय विनम्रता की मूर्ति बनी, मदनद रेन का बन्दावन ०७ 4 - । - भाव से करीब आ वैठी थीं। सफाई वहां दी जाती है, जहां कोई दूरी हो । मेरे सामने जो महीयसी महिला थीं, वह तो शायद इस ख्याल में ही उमग आई थीं कि कोई कितनी दूर से उनके पास आए, यही बहुत काफी है। १६७७ के 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित, 'प्रथम-प्रतिश्रुति' की लेखिका आशापूर्णा देवी, उस वक्त अपनी ममतामयी आंखों और सदाबहार हंसी के पीछे जा छुपी थीं। उनमें लेखिका.तो तव सजग हुई, जब मैंने उनका अभिनंदन किया। मेरे अभिनंदन पर उन्होंने सरल मुस्कान बिखेरते हुए कहा, '१३ साल की उम मे लिखना शुरू किया। पहले कई सालों तक कविता लिखी, फिर अट्ठाईस साल की उम्र तक केवल बच्चों के लिए कहानियां लिखती रही। इसके बाद दो-एक हास्य कहानियां भी लिखीं। इसी दौर में खेल- मेल में लिखी कविता-कहानियों ने ही जाने कब बड़ा कर दिया। खेल- खिलवाड में लिखते-लिखते अचानक में सीरियस हो गई और सीरियस मनलों प- मीरियम कहानियां लिम्बने लगी। 'राजू की मां' मेरी पहली कहानी थी, उसके बाद तो ढेरों कहानियां फिर उपन्यास । बाहर की दुनिया से तो जान-पहनान थी नहीं, बस लिख-लिखकर डाक से भेज देती थी। शिक्षा-दीक्षा के सवाल पर उन्होंने उसी सहजता से स्वीकारा है 'मैं जिस मध्य-वित्त समाज की लड़की थी वह पुरुष-शासित समाज था। औरतें पर्दे में रहती थीं। खवरदार ! जो लड़की जात होकर स्कूल- कालेज जाए । नाक कटाए। हरगिज़ नहीं!-दादी का कड़ा हुक्म था और मेरे फरमाबरदार मां-बाप ने उसका अक्षरशः पालन करते हुए स्कूल का मुह ही नहीं देखने दिया। तुम्हें बताऊं, मैंने अपने जीवन में पहली बार स्कूल का मुंह तव देखा था जब मैं अघेड़ होने के बाद किसी स्कूल में सभानेत्री की हैसियत से पुरस्कार-वितरण के लिए गई थी। सो, हमेशा पर की चहारदीवारी के अंदर कंद, बाहरी दुनिया की आहट-भर सुनती- सुनती में जवान हुई। मेरे सामने आम औरत की जो तस्वीर थी, वह बेहद निरुपाय, असहाय, पुरुष की चढ़ी हुई त्योरियों से कांपती-थर्राती अबला-भर थी। अत: स्कूल न जा पाना, पढ़ने-लिखने से वंचित रह ८. रेत का वृन्दावन वाला-मंग पता प्रना। उन दिनों पर पानी-मिगे पाना मागे बागी गमती भोर पहरी मेरे गोमारामश:मेर मेरेगन, मनरेगीगा हो पाती र पपी र पारो पुगे पी। हमें तमाम गमगीन परतिमापनेनागने मनी पी, पहली वर्मग निमगारपत्र मोर पारिपिर मारे गये। पेटी गिरि और.पामार-मारिणी यंपामगरीरमा पा? गरोगीली am-मरे गालोग पार पापी २ri पारमा-गोडी म मामिनदी।' मोम-रोपको गरगा। इन fair in पर ना पापा, rifrat Tim itr पार निमाi.पा. मा श्री उपहमी पापा । म प्राव भीमा : rim गोपी मागियर में एर नापी कायम मापिरगीमारिगीमाisit fuी मईयो गानो माम माम गिरा गेर मदिरापा। पानी, गारगो, उन लो पारे माती पर भी पुरी गोलार माग पारोमोसोल मे भारी माता arfrett राना far" आमादी की पहलीन मामन ममा शिमप मानी frमामीतिराभानी imनी में परम निर्मम भी माती गमलाई गभर पोट पारपार र मापी भार भी गांर औरत! मेगन गिन में ही मिमा, मिी गमापा मपी पिति श्रीमही, -rn भानी मनसमा मोर गाभा समपा पर गमः मा-गालि पर गर। 'emoir पीनाप, मालदी। मुझ अनुरमा दे, नियमा यी मानिस भी गदी। रेलमारन । . - लेकिन उनकी नारी आदर्श की होती थीं। मुझे लगा, आदर्श से भी बड़ी वह वास्तविकता है जिसकी मार इंसान को कुछ का कुछ बन जाने को विवश कर देती है। अतः मैंने अपने लेखन में उस क्रूर यथार्थ को अभि- व्यक्ति दी।' 'अच्छा, आप आदमी की वेसिक ईमानदारी पर विश्वास करती हैं ? आपको क्या यह नहीं लगता कि वेसिक ईमानदारी अब अजायवघर में दर्ज करने वाली बात हो गई है ? आदमी ही आदमी का विश्वास छलता है और नुकसान पहुंचाता है ?'-मेरे सवाल पर उनकी आंखों में अछोर ममता झलक आई है----'नहीं, मैं आज भी इंसान की शुभ-बुद्धि में विश्वास करती हूं। हर बुरे से बुरे इंसान में मैंने कोई न कोई खूबी पाई है। ईमानदारी छली जाए, यह किसी एक की बदकिस्मती हो सकती है, हर किसी की नहीं । आदमी ध्वंस से अधिक सृजन करता है । तभी तो यह सृष्टि कायम है। औरत की तेजी से बदलती हुई स्थिति की हर वारीकी को मैंने अपने लेखन में पकड़ने की कोशिश की है । कल तक घर की चहारदीवारी में कैद औरत, आज बाहर निकलकर हर मुश्किल से मुश्किल कार्यक्षेत्र में भी न सिर्फ पहुंचती है, बल्कि छा गई है, पुरुष के समान ही सफल साबित हुई है । यह क्या कम गौरव की बात है ? मैंने पिछला ज़माना भी देखा है, मैंने आज का ज़माना भी देखा है । औरत ने हर कदम पर पुरानी ज़मीन तोड़ी है और पुरुप-शासन से अपने को क्रमश: मुक्त किया किया है । लेकिन जानती हो, ट्रेजेडी क्या है ? औरत आज भी बंदी है, अपने रचे कटघरे में खुद ही बंदी । वह बाहरी तीर पर स्वतंत्र हो गई है, लेकिन अंदर से वही औरत की औरत। इसकी दो वजहें हैं-नारी के प्रति पुरुष की दृष्टिभंगी में कोई खास बदलाव नहीं आया है। उसने समाज, परिवेश, वक्त के तकाज़े के 'चाप' से विवश होकर औरत को आजाद तो कर दिया, लेकिन मन ही मन वह अब भी क्रुद्ध और क्षुब्ध है । वह औरत की मुक्ति को मन से स्वीकार नहीं पाया है। दुमरे, औरत स्वयं भी अपनी आत्मिक परतंत्रता के लिए जिम्मेदार । वह आज भी हर तरह से पुरुप की प्रशंसा की प्रत्याशी है । आज भी उसका मकसद अपने बनाव-शृंगार से पुरुष को रिझाना-भर है। इसके - १०० रेत का वृन्दावन । अलावा उसगी अतिशय ममता उसे मार गई है। नहीं, मैं यह नहीं कहती कि ममता बुरी चीज है, लेकिन मनता मे वह इतना इन्वाल्व हो जाती है कि वह हर कही, हर किमी के संदर्भ में इस बुरी तरह जुड़ी हुई है कि उसके मन में हर पल, बहुत-सी संभव-असंभव अपेक्षाएं जन्म लेती है-- बस, यही वह मानसिक तौर पर आश्रित हो जाती है । देखो न, पुरुष प्रत्याशी नहीं, इसीलिए उन्मुक्त रहता है, औरत फौरन प्रत्याशी हो उठती है, इसलिए मानसिक रूप से आज भी परतंत्र है । आत्मिक मुक्ति के लिए उसे अपने मानमिक स्तर से ऊपर उठना ही होगा।' मैंने उनके सामने कुछ और सवाल रख रख दिए हैं । उन्होंने उगी मासूमियत से स्वीकारा है-'हा, तुम्हारे सवाल जायज हैं। मैं अपनी समकालीन परिस्थितियों-दुर्भिक्ष, शरणार्थी, राजनीति वगैरह मसलों पर चुप लगा गई है। दरअसल दुनिया इतनी बड़ी है, सुमील, कि हर मसले पर लिखना, हर दुख से कराहना असभव-सा है। मेरे लेखन में ये विषय लगभग नहीं आए। सो बात की एक बात यह है कि जो मन मे आता है, वही लिखने को विवश होती हूं। मैं लिख डालतो हूं । अपने हिसाब से मैंने भी साहित्य में प्रयोग किए हैं, और मेरे पाठकों की अम्पर्यना भी मिली है। 'प्रयम-प्रतिथुति' की सत्यवती प्रतिवाद की प्रतिमूर्ति है । यही एक ऐसी कथा है जो बस रन से ही मेरे दिमाग में पनप रही थी। इनके पात्र बचपन में ही मुझे उद्विग्न और आलोड़ित करते रहे। मुझमे मैकड़ो सवाल जगाते रहे । मुझमे एक पागल जिद भरते रहे कि पुरुष की नाइसाफी बग्दाश्त करती हुई औरत क्या हमेमा हारती ही रहेगी । वह कभी जीतेगी नही ? और कुछ मतोप है कि मैंने उसके माध्यम से जो कुछ कहना चाहा था, कह दिया । बदलते हुए समाज, बदलती हुई मान्यताओं के साय में भी बदली हू । मेरा लेखन भी बदला है । कही विवाह तोड़ने की सहजता पर प्रश्नचिह लगाया है, कहीं विवाह तोड़ने की छटपटाहट है। लेकिन वेसिक बात यह है कि मैं शायद बहुत झगड़ालू हो उठती हू, अपने लेखन मे । मेरी दृष्टि मे जो उचित नही है, मैं उसका जबरदस्त प्रतिकार करती हू । असल में समाज अपने अनुसार चलता रहेगा, हमारा लेखन वस इतना-भर ही कर सकता है कि रेत का वृन्दावन ०११ उस समाज की मानसिकता, रूढ़िगत परंपराओं को बदलने की कोशिश करे। मेरे लेखन ने अपने समय की मध्यवित्त परिस्थितियों, संस्कारों के मागे कहीं हार नही मानी, कभी आत्मसमर्पण भी नहीं किया। लेकिन मुझे जो कहना था, कह लिया; जो देना था, दे लिया। अव तक काफी कुछ लिख लिया। अव क्लांति आने लगी है। लेकिन अगर वक्त मिले तो खूप-खूब लिखने का मन करता है। अब उम्र के साथ-साथ व्यस्तताएं ज़िम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं । अब तो जो लिखती हूं, वह प्रेरणा से नहीं, ताड़ना से लिखती हूं। संपादकों, प्रकाशकों, पाठकों की ताड़ना और प्रीतिवश लिखती हूं । अतः रोज लिखना नहीं हो पाता । लेकिन तमाम व्यतस्ताओं और भरे-पूरे पलों के बावजूद न लिखने पर खालीपन घेरता है। मैंने घर-गृहस्थी की चहारदीवारी के भीतर से ही जो कुछ देखा- सुना-महसूस किया, वह इतना विशद है कि वहुत कुछ लिखने को उक- साता है, लेकिन जैसे अपने लेखन से प्रतिवद्ध हूं, वैसे ही अपनी घर- गृहस्थी और परिवार से भी। मुझे लेखन के लिए घर-गृहस्थी से वक्त नहीं चुराना पड़ा, घर-गृहस्थी भी कभी मेरे लेखन में वाधक नहीं बनी। सो अभी तो लगता है, मैं जो कहना चाहती थी, कह लिया। भविष्य की नहीं जानती, वह तो प्रभु की इच्छा पर निर्भर है । फिर किसी नयी बात ने मन को कुरेदा, तो फिर लिखूगी । मैंने कहा न, मैं कहानी स्वयं नहीं लिखती, कहानी ही मुझे बहकाकर अपने अनुभव को वाणी देने को विवश करती है। हां, पाठकों की अटूट प्रीति मुझे मिली है। उपन्यासों का कई-कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है । हिंदी-बंगला में फिल्में भी बनी हैं । 'प्रथम-प्रतिश्रुति' को ही बंगला का 'रवीन्द्र-पुरस्कार' भी मिल चुका है. लेकिन, अब सोचती हूं, इस पुरस्कार की जगह अगर तिरस्कार भी मिला होता तो भी मैं स्वीकार करती, क्योंकि मुझे जो कहना था, कह लिया ! मैं तर्क के झमेले में कभी नहीं पड़ती। मेरे पुत्र-पुत्री, नाती-पोते-भांजे वगैरह अगर कभी मेरे लेखन के संबंध में कोई मत प्रकाशित करते हैं, तो मैं अपनी राय को ही सही ठहराने की जिद कतई नहीं करती। मैं लेखन में जितनी उन हूं, व्यवहार में उतनी ही चुप, अतः मेरा कभी किसी से मतभेद नहीं होता।' १२0 रेत का वृन्दावन वक्त काफी गुजर चुका है । घुधलाई याम ने रात की काली चादर मोड़ ली है । कमरे के बाहर बहुत-से अभ्यागत-मेहमान प्रतीक्षा में हैं- कुछ गृहिणी से मिलने के लिए, कुछ लेखिका मे। मैं सोडियो मे उतर रही हूं। याद आ रहा है, इसी तरह उनका एक उपन्याम पदकर कुछ लड़के उन्हें सिर्फ यह बताने के लिए दौड़े आए थे कि उन्होंने फलां टपन्यास में कमरे का जो चित्र खीचा है वह बिल्कुल उनके कमरे का है, और उसमें जिम पिता की तस्वीर है वह उनके पिता की है। घर की चहार- दीवारी में रहती हुई यह महीयसी लेखिका जाने किस दिव्य दृष्टि से, उन अनदेखे घर-मरो का रेखाचित्र अपने लेखन में आंका करती है ! यह सब तो आम लोगो के सुख-दुग से एकातर हुए बिना जाना नही जा सक्ता । 'एइ, फिर थाना जरूर!' आगा दो ऊपर दी सीहियों पर खडी विदा दे रही थी। 'आऊंगी !' मैंने कृतन मन से मिर हिलाया है और बाहर निकलकर महसूम दिया है--धरती कुछ और ममतामयी हो आई है। आवारा कुछ और घना हो आया है। पंड कुछ और हरे-भरे हो माए हैं । अजनवी भीड़ बहुत जानी-पहचानी लग रही है ! -मुशील गुप्ता रैन का वृन्दावन । १३

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रेत का वृन्दावन

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एनामल के गमले में पड़ी हुई अमरूद को जेली काठ वी चम्मच से निकाल-निकालकर, शीशे के मतवान में भरते हुए निवेदिता के चेहरे पर खुशो और परितृप्ति को जो आभा झलक उठी थी, वह देसने लायक थी। हालांकि इससे यह राय बना लेने को कतई कोई वजह नहीं है कि वह अमरूद को जेलो को परम भक्त है । उसको तरफ गौर से देखने से ही पता चल जाता है कि पाल-भर वड़ियों को धूप दिखाते समय, भंडार को शीशो-बोतलो को झाड़-पोछकर चमकाते समय या तकिये पर सफेद-बुर्राक गिलाफ चढ़ाते समय, निवेदिता के चेहरे पर वही परितृप्ति और प्रसन्नता सेलती रहती है । वैसे जब उसे सीज होती है, तब त्योरियां चढ़ाने में भी पल-छिन देर नहीं करती। पति या पुत्र ने जूते खोलकर जहा के तहां रसने के बजाय, एकाघ इंच इधर-उधर रसे हैं या नौकर ने सब्जी के छिलके घर के बाहर फेंकने की बजाय आंगन में ही डाल दिए हैं-इन पर निगाह पड़ते हो वह एक- रेत का वन्दावन०१७

दम से भड़क जाती है।
सुव्यवस्था और सफाई, निवेदिता के जीवन की एकमात्र
साधना है। छोटी-सी गृहस्थी और इस गृहस्थी को गढ़ने-
सजाने का सारा श्रेय निवेदिता को हो जाता है।
यहां की हर छोटी से छोटी चोज में उसी की
छुअन
पंद्रह साल की उम्र में जब वह व्याहकर आई थी तब
उसके पति सत्यशरण लगभग नाबालिग थे। वह अपनी विधवा
मां के अंचलधन थे और अपने मामा के घर पढ़-लिखकर
इंसान बने थे।
मां की तकलीफें कम करने के साधु-संकल्प के अलावा
उनके मन में तव तक और कोई चाह नहीं जगी थी। बीस
साल की उम्र में वी० ए० पास करके किसी व्यापारी दफ्तर
में नौकरी कर ली और मां की इच्छा पूरी करने के लिए उस
मामूली-सी कमाई के भरोसे व्याह करने में रंचमात्र भी
दुविधा नहीं की।
हालांकि निवेदिता ही ऐसी कौन असाधारण घर की बेटी
थी? क्लर्क पिता के घर में वचपन निहायत उपेक्षित-सा
बीता था । मां को फुरसत नहीं मिलती-इस वहाने आठ साल
की उम्र से ही नन्हे-नन्हे भाई-बहनों की लगभग सारी ज़िम्मे-
दारी उसके सिर मढ़ दी गई थी।
वैसे 'वहाना' कहना शायद सरासर अन्याय जान पड़े,
लेकिन जो जरा खोज-भरी, सूक्ष्म दृष्टि से देखता उसकी राय
विल्कुल भिन्न होती । खैर, अब वह जिंदगी भी याद नहीं
जव उसे अपने ममिया श्वसुर के यहां तीन-चार साल तक
१८ 0 रेत का वृन्दावन
--

दूसरों पर बोझ बनकर जीना पड़ा था। अब निवेदिता को अपनी गृहस्थी है, जिसे उसने खुद गढ़ा है । सास की मृत्यु के बाद से ही वह सत्यशरण के बिल्कुल पीछे ही पड़ गई और उस विशाल परिवार के कैदखाने से वाहर निकलकर ही दम लिया था। गुरु-शुरू मे डरपोक सत्यशरण निवेदिता का यह दुःसाहस देवकर दिमाहारा हो उठे थे । उन्हें यह पक्का यकीन था कि एक न एक दिन उन्हे लाज-शमं छोड़कर, दुवारा उसी मामा के घर, उनकी जटिल गृहस्थी के भंवर में लौट आना पड़ेगा। यह बात तो वह सोच भी नहीं सकते थे कि वह भी कहीं अपनी अलग दुनिया वसा सकते है। उन्होंने तो सोचा था, 'अच्छा, कोई बात नहीं। जरा अक्ल ठिकाने आ जाएगी !' लेकिन निवेदिता ने सबको हैरत में डाल दिया। उसने ऐसी-वसी गृहस्थी ही नही रची, उस गृहस्थी को तस्वीर की तरह सजा भी लिया । विल्कुल फिटफाट, सुरुचिपूर्ण, सुव्य- वस्थित, सुदर। हालाकि अपनी ज़िद से अलग होने के अपराध-बोध की वजह से उसने पति पर कभी रचमात्र भी किसी तरह का दवाव नही डाला । इतना सब कहां से हो रहा है, इस बारे में सत्यशरण को कभी कुछ पता नहीं लगने दिया, उन्होने भी कभी खोज नही की । पति ने भी अपने को पूरी तरह निवे. दिता के हाथों में सौप दिया था। यह बात भी विल्कुल अलग है कि उन लोगों ने अपनी जिंदगी को अधिक जटिल बनाया भी नहीं । सीमित गृहस्थी । सीमित जरूरते । रेत का वृन्दावन ०१६ चार-पांच साल पहले बेटी का व्याह कर दिया । दामाद लायक था। दूर बसे होने की वजह से कभी-कभार ही आता था। लेकिन निवेदिता को कोई मतलब नहीं था। वेटी सुखी है, यही तो चाहिए था। वैसे यह व्याह भी निवेदिता के ही अथक परिश्रम का पुरस्कार था। वरना ऐसा दामाद जुटाना क्या सत्यशरण के वश की वात थी ? और एक बेटा है- गौतम । यथासमय उसके मनलायक खाने-पहनने की फरमाइशें पूरी करने के अलावा और कुछ करने को नहीं था। उसकी अपनी ही तेज़ धार उसे तराशती जा रही थी। वह खुद ही टपाटप आगे बढ़ता गया था और अन्य लड़कों की तुलना में काफी कम उम्र में हो एम० ए० में पढ़ रहा था। उसे गढ़ने के लिए निवेदिता को और कुछ भी नहीं करना था। इतने दिनों बाद युद्ध-स्तर पर काम करने की जरूरत मानो खत्म हुई ! अव उनकी जिंदगी में परम निश्छल शांति आ विराजी थी। अव तो नरम-कोमल राह पर जिंदगी के पहिये को लुढ़का- भर देना है । हालांकि निवेदिता आज भी निःशेष नहीं हुई। इसीलिए अटूट स्वास्थ्य और अक्लांत मन लिये वह रोज़मर्रा के काम-काज में इस कदर डूब गई है कि वे कभी खत्म होने को ही नहीं आते। वह साफ-सुथरे विस्तर को फिर से झाड़ती, वुहारे हुए घर को फिर वुहारने बैठ जाती। पति, पुत्र और नौकर- इन तीनों प्राणियों में छोटे-मोटे नुक्स निकालकर, हर वक्त २०। रेत का वृन्दावन

चखचख मचाए रहती।
वह कभी वड़ियां डालती, कभी अचार बनाती और कभी
अखवार या रेडियो से नये-नये व्यंजन सीखने में व्यस्त रहती।
सत्यशरण ने जिसको नाम दिया है. सन am
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JAIPUR-302004
1689)
1636
सत्यशरण किसी काम से कमरे के अदर आकर एकदम
ठिठक गए, 'अव आज फिर क्या करने वैठ गई ? कौन-सी
नयी सनक सवार हुई ?'
'नयी नही जी, पुरानी !' निवेदिता हस पड़ी, 'देखो न,
कैसा खूबसूरत सोने जैसा रंग निकल आया है ? अमरूद
अच्छे
निवेदिता अक्सर ही ऐसी सुनहरे रंग की जेली बनाया
करती है, लेकिन हर बार जैसे अपनी खूबी पर खुद ही मुग्ध
और पुलकित हो उठती है। हर मामले में उसका यही स्वभाव
रेत का वृन्दावन ०२१

- है । सत्यशरण को प्रायः हर हफ्ते ही यह सुनना पड़ता था, 'एइ, देखो विस्तर कैसा उजला लग रहा है ? तुम्हारे धोबी से बेहतर !' सत्यशरण अगर अनजाने भी कभी नौकर की तारीफ कर बैठते, तो निवेदिता हंसते-हंसते लोटपोट हो जाती, 'हाँ! हां ! उसी मुगालते में रहो । अरे, फटिक क्या, फ़टिक के बाप के भी बूते की बात है कि एक भी तकिये का गिलाफ इतना धधव सफेद धो सके ? यह श्रीमती निवेदिता देवी ने धोया है, समझे?' 'वेशक, वेशक ! तुम जरा ऊंचे किस्म की. रसोईदारिन या घोबिन रही होगी !' दोनों में प्रायः इसी तरह की बातचीत । इसी तरह की हंसी-दिल्लगी। वस्स। वातचीत या वहस-मुबाहसे में किसी तरह की विचित्रता लाना, सत्यशरण-जैसे सीधे-सादे इंसान के वश की बात नहीं । थी। निवेदिता में यह खूवी थी या नहीं, इसकी खोज-खवर किसी ने नहीं ली । आत्मीय स्वजन तो उन्हें एक ही थैली के चट्ट-बट्टे समझते थे। वैसे निवेदिता का बहुत मन करता था कि गौतम से वह स्कूल-कालेज के बारे में बात करे । वह उसे कुरेदकर यह जानना चाहती थी कि सारे दिन वह क्या करता है, किससे मिलता-जुलता है, वगैरह-वगैरह । जज की तरह नहीं, दोस्त की तरह। लेकिन गौतम काफी गंभीर स्वभाव का लड़का है, उससे बहुत दूर तक वातचीत आगे नहीं बढ़ पाती। - । - । २२ । रेत का वृन्दावन

इसीलिए मन के काम जैसे-जैसे खत्म होते जा रहे है,
वैसे-वैसे हाथ के काम बढ़ते जा रहे है ।" कौन जाने, मन
अभी भी नि.शेप नहीं हुआ, यह शायद उसी की अभिव्यक्ति है।
सत्यशरण निवेदिता की वात पर दुवारा हंस पड़े, 'मैं कह
रहा था, अपना सोने जैसा रंग काला करके, सुनहली-सुनहली
जेली बनाकर क्या होगा? इतना सारा खाएगा कौन ?'
'तुम्हारी भी जैसी वात होती है न! इत्ती-सी तो है !
खत्म होते कितने दिन लगेंगे ? वोतल में लगता है वहुत
ज्यादा है । पिछली बार तो इससे भी ज्यादा बनाई थी !'
दम्पती की आपसी बातचीत की सीमा लगभग यही तक
थी।
मुमकिन है, निवेदिता की बाकी जिंदगी भी इसी तरह
बीत जाती। मुमकिन है, नये के नाम पर, चालीस की उम्र
पार करते ही गुरुमंत्र ले लेती, थोड़ा बहुत पूजा-पाठ करते
हुए उम्र और आचरण में तालमेल वनाए रखती। हां, अपने
ईहलोक और परलोक में सामंजस्य बनाए रखती।
"मुमकिन है, कुछ दिनों बाद वेटे का व्याह करके, बहू
को सुशिक्षा देने की कोशिश में जरा और चिडचिड़ी हो
जाती, और धीरे-धीरे निःशेप हो जाती, अगर ..
रेत का वृन्दावन ०२३

है. हां, दुर्गा-पूजा के समय अगर वह पुरी घूमने न आती। हालांकि घूमने आना भी निवेदिता की ही कोशिशों का नतीजा था। सत्यशरण ने जव उसका प्रस्ताव सुना तब हजारों असुवि- धाओं की फेहरिश्त गिनाकर उसे टालना चाहा था, लेकिन सव वेकार। निवेदिता ने जवाब दिया, 'जिंदगी-भर तो सुविधा-सुव्य- वस्था ही करती आई । अब जरा असुविधा-अव्यवस्था का भी स्वाद लेकर देख लूं'एक बहुत बड़ी सुविधा तो मिल ही रही -घर की । घर भी क्या हर वक्त मिल सकता है ? गौतम काफी गंभीर लड़का था। प्रस्ताव जब तक उसके पास नहीं पहुचा था, वह खामोश रहा । प्रस्ताव सुनते ही उसने कहा, 'मेरी पढ़ाई का नुकसान होगा। सोचा है इन छुट्टियों में...' निवेदिता ने कहा, 'वहां तुझे पढ़ने को कौन मना करता है ? अपनी किताब-कापी साथ ले चल ।' 'यह कैसे हो सकता है ? मैं और एक और लड़के ने मिलकर तय किया है कि एक प्रोफेसर के यहां पढ़ने जाया करेंगे।' निवेदिता ने किंचित आहत होकर कहा, 'इतना सब २४ 0 रेत का वृन्दावन

ठीक-ठाक कर लिया, लेकिन मुझे बताया तक नही ?'
गौतम ने मुस्कराते हुए कहा, 'इसमें बताने की क्या
बात है ? फीस तो लगेगी नहीं...'
निवेदिता ने पति से कहा, 'तव उसे रहने दो । आखिर
वह मर्द है । लडका है, जिंदगी में जाने कितने मौके आएंगे।
लेकिन मैं जाऊंगी ही..."
मैं यानी हम दोनों
बेटे को आपत्ति सुनकर सत्यशरण के मन में उम्मीद
बंधी थी कि जाना स्थगित करने का यह एक जबर्दस्त कारण
मिल गया।
लेकिन निवेदिता का संकल्प सुनकर अवाक रह गए।
उन्होंने पूछा, 'वह रह जाए ! खाएगा क्या ?
'फटिक रहेगा । जो कर सकेगा, करेगा। दोनों जन
खा लिया करेंगे । मैंने तो सोचा था कि चारों जन चलेंगे ।
लेकिन जब यह संभव नहीं है, तो और किया भी क्या जाए ?
उस छोकरे फटिक की किस्मत में ही नहीं है...'
आखिर सत्यशरण नै निरुपाय होकर अपने को नियति
के हाथों सौंप दिया।
कई दिनों बाद काफी लंबे-चौड़े माल-असबाव और एक
अदद पति को लेकर निवेदिता पुरी आ पहुंची।
हालांकि पति विचारे को काफी डरा-धमकाकर लाई
थी कि वह असुविधा और अव्यवस्था का स्वाद पाने के लिए
जा रही है. लेकिन असल में व्यवस्था और सुविधा के
आगे 'अ' बिठाने का मौका ही नहीं दिया उन्होंने । यह भी
उनकी एक किस्म की सनक थी।
रेत का वृन्दावन - २५

उनकी तैयारी में कोई त्रुटि रह जाए, इतनी सहन-शत्ति
निवेदिता के स्वभाव में ही नहीं थी--खास कर सत्यशरण वे
मामले में।
AK
लेकिन यहां आकर निवेदिता मानो अचानक ही बदल गई।
मानो उम्र का बहुत बड़ा हिस्सा उसके हाथों से फिसल
गया।
-
निवेदिता यहां आकर समय का ज्ञान जैसे भूल ही गई।
वह तन्मय होकर सीपियां बटोरती, रेत में पांव धंसाकर
अपने पंगु रूप पर स्वयं ही हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाती,
जरा-सा एकांत पाते ही दौड़-धूप के खेल में मगन हो जाती।
सत्यशरण ने कहा, 'यहां आकर तो तुम निरी वच्ची वन
गई हो!'
यह बात सच भी थी। केवल उम्र के लिहाज़ से नहीं,
अपने गुरु-गंभीर बेटे गौतम के बड़े होने के साथ-साथ, बेहद
स्वाभाविक ढंग से निवेदिता के भी स्वभाव पर गंभीरता की
एक 'कोटिंग' चढ़ती गई थी। वह गांभीर्य मानो यहां सागर
की उद्दाम हवाओं में चिदियां वनकर उड़ गया था।
२६ 0 रेत का वृन्दावन

सत्यारण मानो उसे पकड़ नहीं पाते ।
मानो वह कुछ बौखला गए थे।
वहां का कांसा बहुत बढ़िया होता है, इसीलिए निवेदिता
वर्तन खरीदने के लिए काफी सारे रुपये अलग से लाई थी।
लेकिन उनका सदुपयोग करने का चाव आखिर कहां चला
वह
तो
दुकान-घाट की ओर जाना ही नहीं चाहती।
घूमने जाने के नाम पर ने-देकर यह समुद्र-तट । यह रेत का
वृदावन क्या उसे इतना पसंद आ गया?
गया?
उस दिन शाम हो आई, लेकिन निवेदिता सीपिया बटोरने में ही
व्यस्त थी।
सत्यशरण के हाथ में एक झोला था। निवेदिता विना
कुछ सोचे-समझे छोटी-बड़ी मंझोली-सभी साइज़ की सोपियां
चुन-चुनकर झोले में भरती जा रही थी।
सत्यशरण ने वेसुध होकर पूछा, 'अच्छा, पागलों की तरह
रेत का वृन्दावन । २७

-
सिर्फ सीपियां ही बटोरे जा रही हो ! इतनी सोपियों का
आखिर होगा क्या ?'
निवेदिता वोली, 'जव जाने लगूंगी, समुद्र की चीज समुद्र
के ही हवाले कर जाऊंगी !'
सत्यशरण तो विल्कुल दिशाहारा हो उठे। पूछा, 'इतने
दिनों इतनी मेहनत से चुनती रहोगी, सव फेंक दोगी?'
'और नहीं तो क्या? चुनी हैं, इसलिए वस्ता-भर सीपियां
लादकर कलकत्ता ले जाऊं?'
'तव इतनी सारी सीपियां इकट्ठी क्यों की ?'
'क्यों की ?' निवेदिता ने हाथों में लगी रेत झाड़ते हुए
कहा, 'तव तो कलकत्ता छोड़कर पुरो आने की क्या जरूरत
थी ?
!
"अच्छा, अब बहुत हुआ ! देखो, अंधेरा हो आया,
दिख भी नहीं रहा है। चलो
अचानक पीछे से किसी ने गंभीर लेकिन कौतूकी लहजे
में आवाज़ दी, 'वगैर अनुमति के वात कर रहा हूं, कृपया
गलत न समझे ! लेकिन विचारे इस समुद्र-तट को बिल्कुल
दिवालिया कर जाने को कसम खाकर आई हैं ?'
दोनों ने चौंककर पीछे की तरफ देखा।
सौम्य कांति, मंझोली उम्र के एक सज्जन ।
सिर पर हल्का-सा गंजापन । आंखों में काले फ्रेम का
चश्मा । वदन पर ढीला-ढाला सफेद महीन कुर्ता । सद्यः संध्या
के झुटपुटे ने मानो हर किसी पर स्निग्धता विखेर दी थी।
तीनों में नमस्कार का आदान-प्रदान हुआ।
अब नवागंतुक ने ही दुवारा कहा, 'चार दिन हुए, यहां
२८ 0 रेत का वृन्दावन

आया हूं। आपने सरकारी दफ्तर से यह पता कर लिया है
कि सीपियों पर कही कोई टैक्स तो नहीं लगता ?'
इस वार सत्यशरण ने ही निवेदिता की तरफ से जवाब
दिया, 'इसकी जरूरत ही नही पड़ेगी, साहब ! उन्होंने पहले
से फैसला कर रखा है, जाते समय समुद्र की संपत्ति समुद्र
को ही लौटा जाएंगी !'
उनके उत्तर ने नवागंतुक को किंचित विस्मय में डाल
दिया, जो उनकी आवाज से साफ जाहिर हो उठा, 'अच्छा,
यह वात है ? लेकिन ऐसा क्यों ?'
इस वार सोधे-सीधे निवेदिता ने ही जवाब दिया, 'इसमें
बुरा क्या है ? खुशी भी मिल गई और टैक्स का भी डर
नही रहा !'
'वाकई, आपकी परिकल्पना तो नई किस्म की है ! इस
की तो आध्यात्मिक व्याख्या भी की जा सकती है।'
सत्यशरण ने कहा, 'तव फिर चलिए न हमारे यहा ?
एकाध पल बैठकर जितनी कुछ व्याख्या-वाख्या है सब हो
जाएगी।'
आगंतुक ने हसकर पूछा, 'कहां है आपका घर ?'
'यही 'वस, जरा-सी दूर',
'इस रेत को तरह-जरा-सी दूर ?'
सत्यशरण हस पड़े, 'आपने ठीक ही कहा ! रेत का रास्ता
बड़ा दगावाज होता है ! आधा मील दूर से ही लगता है-
यह रहा ! विल्कुल सामने ही तो! आप कहा ठहरे हैं ?'
सज्जन ने एक मशहूर होटल का नाम लिया।
'अरे, वाह ! वह तो हमारे घर के विल्कुल करीव है !
--
रेत का वृन्दावन O २६

! आपने 'तीर्थ कुटीर' नहीं देखा ? तब फिर क्या है ? चलिए, चला जाए ! इस गरीव के गरीबखाने में चरण-धूलि देकर, अपने दौलतखाने में लौट जाइएगा ! "बात यह है, जनाव, कि हम लोग ठहरे कलकत्ते के लोग ! जहां भी जाएं, दो ही दिनों में हांफ उठते हैं।' 'समुद्र-तट पर आकर आप हांफ उठे, क्या कह रहे हैं ? लगता है, विज्ञान तक को आप उड़ा देना चाहते हैं ?' उन्होंने मोहक-सा ठहाका लगाया । सचमुच उनकी हंसी बेहद मोहक और उन्मुक्त निवेदिता पति के इस कांडज्ञान के अभाव पर मन ही मन संकोच-बोध किए बिना नहीं रह पाई। "अरे, भई, रास्ते में मुलाकात हुई, दो बंगाली आपस में बात कर लें, वस्स... किस्सा खत्म ! उसे घेर-घारकर घर ले जाने का क्या तुक थी। उसने पति से कहना भी चाहा, तुम तो अजीब आदमी हो ! वह शायद अभी-अभी घर से निकले हैं, अभी घूमना वाकी हो और तुम उन्हें पकड़कर घर ले जाना चाहते हो ? लेकिन बोलना चाहकर भी वह रुक गई । कौन जाने, अगर उसकी अनिच्छा पकड़ में आ जाए ? अतः उसने अपने ही ख्याल को कैंसिल करते हुए कहा, 'अरे, उनकी वात छोड़िए ! वह तो प्रति वार विज्ञान को अज्ञान करके ही दम लेते हैं। लेकिन अगर हांफते न भी हों, तो बंधु-लाभ का मौका भी क्यों खोएं?' यह कहते हुए निवेदिता के चेहरे पर संतोष झलक आया । मानो वह बहुत बढ़िया बात कह गई थी। ३० ॥ रेत का वृन्दावन

उन सज्जन ने भी पलटकर जवाब दिया, 'खैर, यह तो
दोनों पक्षों के लिए लागू होता है, लेकिन भई, यह तो आपकी
नीति से मेल नहीं खाता?'
निवेदिता ने नीति की वात पर उसकी तरफ अवाक्
होकर देखा।
अंधेरा हो चुका था। चेहरे के भाव अव ठीक-ठीक
दिखाई नहीं दे रहे थे, लेकिन फिर भी उन सज्जन ने कुछ
अंदाज़ लगाते हुए कहा, 'खुशी के मुआवजे में अहसान चुकाना
तो आपकी आदत के खिलाफ है ?'
'ओह, यह वात है ! लेकिन अहसान कैसा ? दोस्ती पर
टैक्स देने की जरूरत नहीं पड़ती !'
'लेकिन चाय की जरूरत पड़ती है ! देख लीजिए, कहीं
ऐसा न हो कि बैठे-विठाए मुसीबत मोल लेनी पड़े।'
सत्यशरण को भी ये सरस बातें काफी पसद आने लगी।
वह स्वयं विल्कुल वाक्पटु नही है, लेकिन हंसी-दिल्लगी,
मंत्री-परिचय उन्हें काफी प्रिय थे। वह निवेदिता की कुंठा-
हीन पटुता पर भी मुग्ध हो उठे
यह उनकी आज की नहीं, हमेशा को आदत थी।
घर पर भी मेहमान-कुटुव, समघी-दामाद, औरत-मर्द
चाहे जो आए, उनके स्वागत-सत्कार का भार निवेदिता पर
हो रहता था। उसे ही अपने काम में हर्ज करके, उनकी
सम्मान-रक्षा के लिए उनके पास बैठना होता ।
सत्यशरण अनाड़ी थे। गौतम तटस्थ ।
सचमुच वह हर किसो से उनके मन-मुताविक निर्वाह
कर लेती थी।
रेत का वृन्दावन ०३१

इस दिन वह सज्जन आए तो सही लेकिन वैठे नहीं। अगले दिन चाय का निमंत्रण हथियाकर उन्होंने विदा ली। उन्होंने जाते-जाते कहा, 'खैर, अब तो घर पहचान गया, अव भला कौन ठग सकता है ?' वल्व की रोशनी में उस इंसान को एक बार फिर आपाद- मस्तक परखने का मौका मिल गया। अधेड़ उम्र । निवेदिता से शायद दो-एक साल बड़ा । मुमकिन है, उसकी उतनी उम्र न हो, लेकिन चेहरे पर फैली हुई सौम्यता के कारण वह कुछ बड़ा लग रहा था। लेकिन स्वभाव से काफी सरल । गंभीर स्वर, लेकिन भाषा में सरस कौतृक की होरक- धार। . राह चलते-चलते ही उन लोगों ने एक-दूसरे का परिचय जान लिया। वह एक गैर-सरकारी कालेज में प्रोफेसर थे। विवाह . नहीं किया। साल की दोनों लंबी छुट्टियों में कहीं आस- पास घूमने निकल जाना उनका शौक था। नशे के नाम पर पढ़ना और पढ़ाना । जो किताब अच्छी लगती, दस बार पढ़ डालते, जो जगह अच्छी लगती पांच बार घूमने जाते । पुरी भी इस बार को मिलाकर चार वार आ चुके हैं। उनकी बातें सुनकर निवेदिता की आंखें हैरत से फैल गईं, 'भला वताइए तो, ऐसा क्यों ? हिंदुस्तान के वाकी सब प्रदेशों ने क्या गुनाह किया है ?' प्रोफेसर हंस पड़े, 'साल में दो नये प्रदेश देख डालूं तो भी क्या समूचा हिंदुस्तान देख पाऊंगा ?' ३२ । रेत का वृन्दावन . 'फिर भी, कमोवेश अच्छी-अच्छी जगहें तो देख लेंगे?' 'नहीं, फिर यह ख्याल सालता रहेगा कि अभी क्या देखा ! दुनिया की कितनी-कितनी खूबसूरत जगहे अदेखी रह गई !' सत्यशरण ने शायद इस बातचीत में हिस्सा लेने की गरज से, प्रोफेसर को इस बात पर छूटते ही कहा, 'हां, और क्या ? ऐसे उम्मीद-अरमानों पर तो खाक डाल देना ही बेहतर है ! क्यों, आपका क्या ख्याल है ?' अपने घर से निकलकर, उन्हें होटल तक पहुंचाने के लिए, वे लोग कुछ दूर तक साथ-साथ आए थे। उनसे अगले दिन आने का बार-बार आग्रह भी किया। प्रोफेसर ने कहा, 'भई, आप दोनों प्राणियों के बीच में तीसरा व्यक्ति बनकर, आपका अभिशाप क्यों बटोरू?' उन्होंने मुस्कराते हुए निवेदिता की ओर देखा। निवेदिता कोई उत्तर दे, इससे पहले ही सत्यशरण को अपने कर्ता होने का दायित्व-बोध याद आ गया । उन्होने छूटते ही कहा, 'अरे, नही ! नहीं ! यह क्या बात है ? आप ऐसा कुछ भी मत सोचिए । दरअसल, यह मन की बहुत भली हैं।' 'अच्छा ? तब तो आप काफी खुशकिस्मत है ।' प्रोफेसर की उन्मुक्त हंसी से समूची निर्जन वालुका-भूमि मुखर हो उठी। निवेदिता मन ही मन रुष्ट हो उठो, 'ठहरो ! घर लौट- कर तुम्हें मजा चखाती हूं। जहां-तहां ऐसी बेवकूफी की बातें न करो, तो क्या काम नहीं चलता ?' रेत का वृन्दावन ०३३

घर लौटने तक निवेदिता अपने पर काबू नहीं रख पाई।
उसने रास्ते में ही डांटना शुरू कर दिया, 'तुम क्या समझते
हो ? तुमने क्या बड़ो बुद्धिमानी की बात की है ?'
'क्यों ? क्यों ? कौन-सी वात, जी !'
'मन की बहुत भली हैं'--पति को नकल उतारते हुए
उसने कहा, 'वाह ! वाह ! भले आदमी कैसे हंस दिए थे !
सत्यशरण ने सिर खुजलाते हुए जवाव दिया, 'वाह !
इसमें हंसी की क्या बात थी ? जो भला है, उसे भला नहीं
कहूंगा ?'
'नहीं, जरूरत नहीं है । काश, तुम्हारी किसी बात का
सिर-पैर होता ! मैं पूछती हूं, चट् से उन्हें घर ले आने की
ही क्या जरूरत थी ? हम दोनों मजे में थे, अब वह घर
आ-आकर उत्पात मचाएं !'
सत्यशरण ने असहाय भाव से समझाने की कोशिश की,
'अहा, तुम समझ नहीं रहे हो ! विचारे भले मानस ने खुद
आगे बढ़कर परिचय किया ! हम लोगों की तरफ से भी
आग्रह दिखाना क्या उचित नहीं था ?'
'अच्छा ! लगता है, समुद्र की हवा खाकर तुम्हारा
औचित्य-ज्ञान अचानक खुल गया ! तुम्हें तो इस बला से
कभी कोई मतलब नहीं था ?'
'लो ! तुम तो हर बात में मज़ाक करने लगती हो !
लेकिन, उस समय तो तुम भी खास नाराज़ नहीं दिखी थीं,
देवी! अव क्यों इतना विगड़ रही हो ?'
'और क्या मैं गलत कहती हूं कि तुम्हारी बुद्धि की
वजह से कभी-कभी मर जाने की तबीयत होती है । अरे, तुम
३४ 0 रेत का वृन्दावन

जिससे भद्रता निभाते हुए 'आइए जनाव' कह रहे हो, अगर मैं भी उसको थोड़ी-बहुत इज्जत न दूं, तो वह आदमी आखिर क्या सोचेगा "अरे अरे"यह क्या कर रहे हो ?' अपना कुर्ता उतारकर बरामदे की अरगनी पर फैलाते हुए सत्यशरण सिटपिटा गए। पुरी की विश्रामहीन तूफानी हवा में वह किसी तरह भी कुर्ता नहीं फेला पाए । आखिर हारकर उन्होंने अपना मुड़ा-तुड़ा कुर्ता निवेदिता को सौंपते हुए कहा, 'असंभव ! मुझसे नही होगा । पुरी का वाकी सब कुछ ठीक है, लेकिन वावा, दिन-रात का यह आंधी-तूफान असहनीय है।' निवेदिता ने कुशल हाथों से कुर्ते को डोरी पर फैला दिया और अपनी चेन में से दो सेफ्टी पिन निकालकर कुर्ते में लगाते हुए कहा, मुझे तो वस, इसीलिए सब कुछ इतना अच्छा लग रहा है, तूफान ही तूफान । सारे-सारे दिन-रात तूफान की झकोर । जैसा सागर, वैसी हवा। विरामहीन ! विधामहीन !' 'यहा आकर तो तुम कवि वन गई हो !' सत्यशरण यह कहते-कहते हाथ-मुंह धोने चले गए। सच बात तो यह थी कि निवेदिता का यह नया रूप उन्हें विल्कुल अच्छा नहीं लगा था । कहीं से असुविधाजनक लगा था और किंचित भय- भीत कर गया था। हुंहः, आंधी-तूफान अच्छा लगता है--- मह सुनते ही सारे शरीर में झुरझुरी फैल गई थी। वात दर- असल यह है कि--'दुनिया भर में एकमात्र प्रिया और मैं'-- ऐसी निःसंग स्थिति को कल्पना कभी उनके दिमाग में ही नहीं आई थी। रेत का वृन्दावन ०३५ सारा गुस्सा गौतम पर जा पड़ता है। काश, वह भी साथ आ जाता । उसके आने से फटिक भी आता। यानी तव घर विल्कुल घर-जैसा लगता ।... एकदम से विल्कुल अकेले-अकेले ! ऐसे में बातचीत के लिए एक भला मानस जुटा भी, जिससे दो-एक बातें करके जान में जान आए, तो निवेदिता को अखर गया। हैरत है ! हुंहः, सिर्फ वीवी से बातें? बातें भी आखिर कब तक की जा सकती हैं ? उन भले मानस का नाम था-यतिश्वर मुखर्जी । घर पर मां और दो भाई-भाभियां हैं । खुद व्याह नहीं किया । हल्की-फुल्की जिंदगी, मजे में थे। हालांकि किताव- विताव में ही डूवे रहना अच्छा लगता था, लेकिन अड्डेवाज़ भी थे। सौ बात की एक वात यह थी कि वह हर किस्म के आदमी से दोस्ती गांठ सकते थे। वैसे बुद्धिमान जीव थे। इन लोगों से ज़रा-सी ही मुलाकात में पूरी स्थिति का ३६ रेत का वृन्दावन

अंदाजा लगा लिया। उन्होंने मन ही मन तारीफ की, गिन्नी
(गृहिणी) तो खासी होगियार है, लेकिन वचारा कर्ता !
बुद्धू-बुद्ध-सा, भलामानस ! कल उनके यहां जाना ही होगा !
तूफान ! और तूफान !
नहीं, ठीक तूफान कहना भी गलत है "तूफानी हवा ।
मुट्ठी-मुट्ठी भर गीली नमकीन रेत उड़ उड़कर बाल, कपड़े
और घरों के मोने-कोने में जमा होतो जा रही थी । अरगनी
पर लटकता हुआ सत्यशरण का कुर्ता अभी तक झूल रहा था,
मानो वह शून्य में सिर पटक-पटककर प्राण दे देने को आमादा
हो।
बरामद में समुद्र दिखाई नहीं पड़ता, उसे देखने के लिए
छत पर जाना पड़ता है । यहां से तो सिर्फ गर्जन ! अतहीन,
अविश्रांत!
शायद वह कृष्णपक्ष की रात थी। आकाश में सिर्फ तारे
ही तारे।
निवेदिता, शाम से ही खाली पड़ी आराम-कुर्सी पर
आकर बैठ गई। जाने कितनी रात वाकी थी। दो या टाई
बजे होंगे।
रेत का वृन्दावन

यूं चुपचाप, अकेले-अकेले पड़े रहना खूब भला लग रहा
sic
रोज़मर्रा की जिंदगी से जमीन-आसमान का फर्क !
यहां वह कलकत्ते वाली जानी-पहचानी निवेदिता बिल्कुल
नहीं लगती। वैठे-बैठे समूचे शरीर में झुरझुरी फैल गई, देह
जैसे अकड़ गई, लेकिन फिर भी उसे उठने की कोई जल्दी
नहीं है। उसने सिर्फ अपना आंचल खींचकर गले तक लपेट
लिया।
जाने क्यों नींद नहीं आ रही है।
उसे खुद अपने पर हैरानी होने लगी।
कलकत्ते वाले घर में कभी वह कल्पना भी कर सकती
थो कि इस तरह आधी रात तक जगी हुई खुले आकाश के
नीचे चुपचाप बैठी रहे !
कलकत्ते में समुद्र न सही, हवा तो है ?
समुद्र की उत्ताल तरंगों के थपेड़े सहती-सहती जो हवा
समुद्रहीन नीरवता के देश पर विखर जाती है, किसी-किसी
वैसाखी शाम या आश्विन की रातों में वही हवा अपने साथ
सागर-गर्जन भी
वहा लाती है, और समुद्र
की
पागल होकर सारे-सारे दिन, सारी-सारो रात सिर धुनती
रहती है । निवेदिता ने तूफानी हवाओं का यह पागलपन तो
बहुत बार देखा है।
लेकिन उसने अपने को कभी इतना असहाय महसूस
नहीं किया !
अपने को कभी इस तरह गुम नहीं होने दिया !
ऐसे विखरे-विखरे दिनों में तो वह अपने बाल-बच्चों
तरह ही दर्द से
३८ । रेत का वृन्दावन

को खांसी के नाम पर डराया-धमकाया है, हाथ-पैर-गले तक
मोटे-मोटे कपड़े पहनने को विवश किया है।
दिन हो या रात, अपने भरसक कभी भी खिड़की-दर.
वाजे खुले नहीं छोड़े, ताकि धूल की वजह से घर न गंदा हो ।
धूल से खौफ खानेवाली इस सनक के कारण, समशरण से
कई बार झगड़ा तक हो गया है।
यहां हर और भीगी हुई नमकीन रेत ।
लेकिन निवेदिता का इस ओर ध्यान ही नहीं जाता।
यह निवेदिता आखिर कौन है ?
बहुत दिनों पहले अपने नन्हे-नन्हे अंटे भाई-बहनों का
रोना-विसूरना सभालते हुए, बीच-बीच में जो खुद रो देती
थी, वह ?
या वह जो विशाल परिवार को भीड में खोई हुई चूंघट
वाली दुलहन, जो हर घड़ी दूसरों को खुश करने में दिन
गुजार रही थी और हर वक्त भविष्य की रंगीन तस्वीर
आंका करती थी? क्या उसी का नाम निवेदिता है ?
और यह जो, अपने ही परिमंडल में दीप्त, उपवल,
अपने ही आत्मबोध से संयत, सचेतन, महिमामयी निवेदिता
है ? जो बहुत से लोगों के भय या सम्मान या ईयां की पात्र
बनकर राज कर रही है, यह कौन है ?
इतने दिनों से वह जिसे सचमुच ही 'निवेदिता' समझती
आई है, उसके अलावा और भी कही कोई है, जिसका नाम
'निवेदिता है?
अच्छा, वह निवेदिता क्या वाकई जिंदा थी?
या उसने नया जन्म लिया है ?
रेत का वृन्दापन ०३

उसकी सूरत-शक्ल कैसी है ? सुना है, इंसान बार-बार जन्म लेता है, बार-बार मरता है ! देहांतर के स्वीकृत नियमों के अनुसार ही जन्म-मृत्यु का यह सिलसिला चल रहा है ! लेकिन कभी-कभी देहांत के बिना ही, इंसान एक ही शरीर में कई-कई मौतें नहीं मरता? या एक ही जन्म में कई- कई वार जन्म नहीं लेता ? इंसान तो हर पल मरता है, हर पल नये रूप में जन्म लेता है ! इतने ढेर सारे जन्म-मृत्यु से गढ़े हुए इंसान को आखिर 'एक-अकेला' कैसे कहा जाए ? आखिर उसके हर रूप को कैसे पहचाना जा सकता है ? 'यह क्या? तुम कव उठकर, इस तूफानी हवा में आ बैठी ?' सत्यशरण डेक-चेयर के पास आकर खड़े हो गए । निवेदिता भी शिथिलता छोड़कर उठ बैठी। 'जरा देर पहले ही तो आई हूं, और तुम यहां भी हाजिर ? क्या लगा, मैं तुम्हें छोड़कर कहीं भाग तो नहीं गई ?' 'हां, ऐसा ही कोई ख्याल आया था ! तभी तो बौख- लाया हुआ तुम्हें खोजने निकला ! अच्छा, अव चलो, अंदर चलो। काफी हवा खा ली !' 'तुम चलो न, मैं आती हूं, या तुम भी बैठोगे जरा देर ?' 'मेहरवानी रखो ! घर का जो हाल है ! खूटी पर टंगे हुए सारे कपड़े जमीन पर लोट रहे हैं और तुम्हारे मेज़पोश का कोना उड़-उड़कर पंखे से टकरा रहा है और लग रहा है, जैसे कोई चप्पल पहनकर सारे कमरे में घिसट रहा हो गए । ४० रेत का वृन्दावन है ! "मैं तो काफी देर का जगा हुआ हूं। तुम्हें ही हवा खाते-खाते वक्त का अहसास नहीं है !' निवेदिता उठ गई, 'चलो, तुम सो जाओ ! मैं यह कुर्सी और तुम्हारा कुर्ता समेटकर आती हूं।' अरे? यह कुर्ता अभी तक यहीं है ? कमाल है ! पिन का खोंच लगकर कहीं फटफुटा तो नहीं गया ?' फट जाए तो वला टले ! तुम्हारा कंधों-लटकता कुर्ता है न?' निवेदिता अभ्यस्त भाव से लौट आई थी । अभ्यस्त कुशलता से पलक झपकते ही कुर्सी और कुर्ता यथास्थान रख- कर वह विस्तर पर आकर लेट गई ! सत्यशरण ने कहा, 'यहां आकर, तुम जाने कहा से बदल गई हो !' निवेदिता भी हंस दी, 'बदल तो जाना ही चाहिए। वरना 'चेंज' का मतलब क्या हुआ ? इतना रुपया खर्च करके आने को ही क्या जरूरत थी?' रेत का वृन्दावन ०४१ । सुवह आमंत्रित अतिथि के कारण चाय के साथ नाश्ते का आयोजन कुछ बढ़ गया। निवेदिता ने काफी कुछ बना डाला था। अचानक बरामदे में आकर पति से कहा, 'तुम्हारे मेह- मान तो खूब आए ! कल शराफत के मारे आने का वादा तो कर लिया। मेरे लिए कर्मभोग !' 'वाह ! यह कैसे हो सकता है ! हम लोगों ने इतना- इतना कहा ! और वह खुद भी-लेकिन अभी कोई खास देर नहीं हुई ! आते ही होंगे !' 'रात के समय देखा है, घर तो पहचान लेंगे? यहां आकर तो मेरे सामने सारे रास्ते गडमड हो गए हैं।' 'तुम अपनी बात तो रहने दो ! सुना नहीं, वह महाशय • यहां चार-चार बार आ चुके हैं ! क्या-क्या बना डाला ?' 'हाथी-घोड़ा बहुत कुछ ! जैसी तुम्हारी. आदत ! समाज-घर-गृहस्थी दो दिन के लिए हवा खाने आई तो यहां भी जाने कहां-कहां से झमेला जुटा लिया ।' सत्यशरण किंचित आहत हो उठे। ४२ । रेत का वृन्दावन

निवेदिता को सचमुच कोई परेशानी होगी, उन्हे यह
स्वप्न में आशंका नही थी। वह तो लोगों को खिला-पिला-
कर सुश ही होती है।
वह कुछ बोलने ही जा रहे थे कि उन्होंने देखा, निवेदिता
की चढ़ी हुई नाक-भौंह की जगह, अचानक उसके चेहरे पर
अनुपम उजली आभा चमक उठी। वह दोनों हाथ जोड़कर
किसी का स्वागत कर रही थी, 'अरे, आइए । इतनी देर से
आपकी खूब-खूब बुराइया कर रही थी।
सत्यशरण ने राहत की सांस ली।
यानी अभी तक वह मजाक कर रही थी।
सचमुच यतिश्वर काफी दिलचस्प इंसान है।
खाने के मामले में ऐसा एक खुश-युग माहौल भी
रचा जा सकता है, निवेदिता सच ही नहीं जानती थी ।
जिंदगी में अनेक बार खाना तैयार किया है, बढिया-
बढिया डिगेज बना-बनाकर, लोगो को बुलाकर खिलाया-
रेत का वृन्दावन ० ४३

पिलाया भी है। वैसे भी उसके खाने की कहीं तारीफ नहीं की जाती, यह वात भी नहीं थी। उसके देवर-नंदोई वगैरह कितना हो-हुल्लड़ मचाते हुए, हर चीज खूब स्वाद ले-लेकर खाते-पीते हैं, लेकिन ऐसी परिमार्जित, शिष्ट, सरस तारीफ और किसी ने कभी की थी ? ऐसी तारीफ भला किसे आती है ? वे सव तो जाने कैसे स्थूल लगते हैं। यतिश्वर ने कहा, 'आप तो चेंज में आई हैं न ? इतना सारा जुगाड़-पानी कहां से कर लाई ?' निवेदिता ने झंपते हुए जवाव दिया, 'आपने ऐसा कौन- सा जुगाड़-पानी देख लिया ?' 'भई, इस मामले में मैं क्या खाक जानता हूं ? खाना बनाने में बहुत-सी चीजों की जरूरत पड़ती है। बस, इतना-भर ही जानता हूं। अच्छा, आपको एक निहायत घरेलू वात बताऊं! यूं मैं हमेशा अकेला हो निकलता हूं, लेकिन एक बार मेरे मंझले भैया को भी शौक चर्राया । सो वह सपरिवार मेरे ४४ 0 रेत का वृन्दावन

संग हो लिये । अच्छा, भई, चलो! ज्यादा दूर नहीं, बिल्कुल
करीब ही, घाशिला तक । वहां मेरे एक छात्र का मकान था;
माली किस्म का एक नौकर भी मिल गया । सो हम सब
काफी खुश थे। लेकिन सामान समेटने-जुटाने को तैयारियों
का क्या कहना ! स्टोव आया, कुकर भी आया । मंझले भैया
ने और कुछ नहीं तो कांच, एल्यूमिनियम, एनामल के एक ढेरी
वर्तन ही खरीद डाले। हरेक तरह की शीशी-बोतल-डिव्वे ।
आखिर मुझसे जब नहीं रहा गया तब पूछ हो वैठा---'मंझले
दा, यह सब आखिर क्या कर रहे हो? तुम क्या समूचा
कलकत्ता हो उठाकर ले जाना चाहते हो ?
' मझले भैया ने कहा-तू कुछ नहीं समझता ! औरतें
किसी किस्म की अव्यवस्था या असुविधा वरदाश्त नहीं कर
सकती। भई, तेरी मंझली भाभी की फरमाइश है। जरा भी
इधर-उधर होने का उपाय नही । सारा कुछ ठीक-ठाक होना
जरूरी है।
' मैंने भी मन ही मन स्वीकार किया है, औरतो के मामले
मैं वाकई में कोई दावा नहीं कर सकता ! और जरा-सा
इधर-उधर होने से ऐसा क्या सर्वनाश हो सकता है, यह भी
मुझे नहीं मालूम था ! खैर, साहव, दिन बड़े आराम से बीतेंगे,
बस, इसी मौज में डूवे हुए थे। जा वावा ! पहली ही रात
से सुव्यवस्था का जो नमूना पेश आया "वाह ! आश्विन के
आखिरी दिन। कलकत्ते में खासी गर्मी थी। लेकिन बाहर
हल्की-हल्की ठंड पड़ने लगी थी-खास तौर से रात के समय ।
'अपने दोनों बच्चों को सुलाकर, मंझले भैया ने हुक्म
दिया--इनको एक चादर-वादर उढा दो ! ठड लगेगी।
रेत का वृन्दावन ।

, ' मंझली भाभी ने अवाक होकर कहा-ओढ़ने की चादर ? वह कहां मिलेगी ? मैं तो अधिक चादरें लाई ही नहीं। ' मंझले भैया दहाड़ उठे-बहुत अच्छा किया ! अपने लिए साड़ियां तो तीन दर्जन लई हो ना ! अब यह वताना फिजूल है कि भद्र महिला भी भड़क गई। 'और नहीं तो क्या ? साड़ी का ताना देने पर भला कौन औरत नहीं भड़क उठेगी ?' निवेदिता ने अपनी राय दी। 'हूं, उन्होंने फौरन जवाब जड़ा-शिमला-टिमला नहीं आई हूं ! मुझे क्या मालूम था कि यहां रजाई-कंवल समेत आना चाहिए था ! फिर भी मैं अपनी बुद्धि से बच्ची के छोटे- मोटे स्वेटर लेती आई थी कि सुबह-सवेरे घूमने-फिरने जाएंगे। इतना कुछ सोच-समझकर तो सारा सामान लाई-खैर, साहब, मेरे पास यूं भी दो-एक चादरें अधिक रहती हैं । अतः यह मोर्चा तो किसी हुआ ! अगली सुवह फिर शुरू-कर्ता-गिन्नी में उच्च स्वर में प्रेमालाप सुनकर मैंने दरियाफ्त किया कि मामला क्या है ? पता चला, मंझले भैया का सावुन, टूथपेस्ट, आईना, कंघी और सेविंग-सेट भाभी लाना भूल गई थीं। 'जाइए, आप बना रहे हैं ! ये सब चीजें क्या कोई भूल' सकता है ?' निवेदिता ने कहा। 'अजीव वात है ! भई, मैं क्यों बनाने लगा मंझली भाभी ही क्या यह नहीं जानती थीं कि ये चीजें भूलने लायक नहीं हैं ? कहीं भूल न जाएं, इसीलिए उन्होंने ये सारी तरह शांत ? भला ४६ 0 रेत का वृन्दावन चीजें एक छोटी-सी अटैची में भर ली थीं, लेकिन बस, उमे लाना ही भूल गई। 'वहरहाल, वह झंझट भी किसी तरह मिटाया गया। मंझले भैया ने कहा-एक काम करो! दोनों स्टोव जला लिये जाएं । मैं चाय-वाय बना लेता है, तुम दो-चार पूरियां और मालू को सजो उतार लो। बस, खा-पीकर घूमने निकल पड़े।"लौटकर बाकी काम फटाफट समेट लिया जाएगा! और कुछ नही "वस, मांस और भात ! क्यों, तू क्या कहता है, यति ? 'मैंने कहा, काफी है !-बगल के कमरे में स्टोव जलने की आवाजें आने लगीं। अचानक समुद्र-गर्जन से भी ऊपर एक और गर्जना सुनाई दी यानी वही दापत्य प्रेमालाप ! 'लो, पूरी नहीं बन सकती ! चकलाबेलन नहीं आया। 'भूख लगने पर मंझले भैया को यूं भी होग नहीं रहता। वह पूरी तरह भड़क गए और ऊची आवाज में दहाडने लगे- तव दस दिन से क्या तुम घोड़े का अडा समेट रही थी ? येवो लाने में मेरी जेव तो साफ हो गई। परदेश आकर रसोई-पानी करने के लिए एक चकले चलन की भी जरूरत पड़ती है, तुम्हें इतना भी नहीं मालूम ? 'उफ ! महा मुदिकल में पड़ गया ! अव यह चीज तो मेरे सूटकेस में खोजने पर मिलने से रही। नतीजा यह हुआ कि बच्चों के लिए लाए दो डट्वे विस्कुटो में से पाच जनों ने मिल- कर एक डब्बे का उसी क्षण सदुपयोग कर डाला । अब कल की बात कल देसी जाएगी! लेकिन दोपहर के वक्त नाटक जरा और जम उठा। घूमकर लौटने के बाद बच्चे भूख-भूख रेत का वृदावन 7.४.

चिल्लाने लगे । मंझले भैया की भी करीब-करीव वही हालत । लौटते समय उन्होंने हम लोगों को आगे भेज दिया और खुद अपनी धोती के खोंचे में आलू-प्याज़ और मांस खरीदते हुए घर लौटे । अव यह तय हुआ कि कल से घूमने जाते समय बाजार-हाट करने के लिए एक थैला भी साथ चलेगा। ' मझले भैया बड़े उत्साह से रसोई में लग गए। 'भाभी एक नहीं दो-दो बोटियां (एक प्रकार की छुरी, जिसे पांव में फंसाकर सब्जी काटी जाती है) लाई हैं, इसके लिए भैया ने उनकी तारीफ का पुल ही बांध दिया ! निवेदिता ने हंसकर सवाल किया, 'आप न खूब नमक- मिर्च लगाकर बातें सुनाते हैं ! अब दो-दो बोटियां किस लिए ? दोनों प्राणी मिलकर सब्जी काटते ?' 'नहीं, नहीं, यह कौन कहता है ? भई, एक फलों को काटने के लिए नहीं थी। खैर, कुछ फिर वह बंदूक की धांय-धांय ! उस समय चिलचिलाती हुई धूप थी। रात की ठंडक का लेशमात्र भी नहीं था। अब मुझसे नहीं रहा गया, मैंने जाकर कहा-उफ मंझले दा, यह सब क्या कर रहे हो? भूख बढ़ाने का क्या यह कोई नया तरीका है ? किस कदर चीख रहे हो ? मंझले भैया बोले-चीखूगा नहीं ? तुझे पता भी है ? सब कुछ अपने हाथों से ठीकठाक करके, मांस चढ़ाकर, जैसे ही गरम मसाला मांगा, तेरी भाभी जैसे आसमान से गिरी ! कहती है -गरम मसाला! गरम मसाला! गरम मशाला लाने की किसको पड़ी थी ! सुना ? सुन लिया न तूने ? 'मैं उनका मिजाज़ ठंडा करने के लिए हंस पड़ा, ऐसा है देर बाद . ? ४८ रेत का वृन्दावन कि गरम मसाले के बिना मांस नहीं पकाया जाता, ऐसा कोई कानून है ? आज वैसे ही बनाकर देखो न ! 'नहीं! ऐसा-वसा खाना मैं नहीं पकाता । उसका मन हो तो पकाए । यह कहकर वह सोधं विस्तर पर जा लेटे । • उफ ! उस भरी दोपहरी में गरम मसाले की खोज में कितनी दौड़-धूप करनी पड़ी! 'क्या कह रहे हैं ? आपको दौड़ना पड़ा ?' 'अरे, वाह ! इसके अलावा और कोई उपाय था? गांव का मामला "आसानी से कुछ मिलना ही मुश्किल ! और उसी दिन से वह कमवस्त माली मुझ गरम मसाला वाबू कह- कर बुलाने लगा।' अब तक सत्यशरण खुशी के मारे मंद-मंद मुस्करा रहे थे। इतनी देर बार उन्होंने भी उत्साहित होकर छौंक लगाया, 'और यह ? आप अगर आधी रात को वाघिन का दूध भी मांगे तो आपको निराश नहीं होना होगा।' 'तुम रुको तो।' निवेदिता ने झंकारती हुई आवाज में कहा, 'हर बात जरा सोच-समझकर मुंह से निकाला करो।' सत्यारण ईपत् सकपका गए, लेकिन अपनी इज्जत की खातिर अड़े रहे, 'वाह, मैं कोई झूठ बोल रहा हूं ? ट्रेन से उतरते ही जब सिर-दर्द शुरू हुआ, तब क्या हुआ था ? ... वात यह है, जनाब, मुझे एक बहुत बुरी वीमारी है। जरा भी इधर-उधर हुआ नही कि मेरे आधे सिर मे दर्द शुरू हो जाता है । समय-असमय कुछ नहीं, बस, शुरू हो गया तो गए काम से ! मेरी मां लाल चंदन घिसकर लगा देती थी, आ भी हमेशा वही लगाता हूं, और सिर-दर्द ठीक हो जाता है। रेत का वृन्दावन DX

अरे साहब, मैं तो आश्चर्य में पड़ गया जब घर में कदम
रखते ही घिसा हुआ लाल चंदन लिए-दिए यह हाज़िर हो
गई। अभी मैंने ट्रेन वाले कपड़े भी नहीं बदले थे ।'
हंसते हुए यतिश्वर के
शुभ्र दांत चमक उठे, 'जितना-
जितना मैं सुन रहा हूं उतना ही आपके सौभाग्य पर मुग्ध
हो रहा हूं, सत्यनारायण वावू !'
--
देख लिया न अपने सुपुत्र को ! एक चिट्ठी टिकाकर वस्स,
'वावू साहब ने सारे कर्तव्यों से छुट्टी पा ली।'
निवेदिता किताव का पन्ना मोड़ते हुए चौंक उठी,
'चिट्ठी ? कहां? किसने भेजी ?'
सत्यशरण ठठाकर हंस पड़े, 'तुम तो विल्कुल नासमझ
बच्चों-जैसी वातें कर रही हो ! अरे, और कौन चिट्ठी
लिखेगा ? चिट्ठो नहीं भेजी, इसीलिए तो गुस्सा आ रहा है।
मैं श्रीमान गौतम बाबू की अक्ल की बात कर रहा था ! और
क्या होगा ? खाने-पीने की तकलीफ पा रहा है। इसीलिए
बाबू साहब गुस्से के मारे मान किए बैठे हैं।'
निवेदिता बुरी तरह सकपका गई। वह सत्यशरण को
हां में हां मिलाते हुए, न तो वेटे की अक्ल को रो सकती है,
५०. रेत का वृन्दावन

न उसका पक्ष ही ले सकती है।
वैसे पति की मनःस्थिति उनकी समझ में आ रहा है।
बेटे के लिए उनका मन कचोट रहा था। उसके खाने-पीने को
लेकर उन्हें जो तकलीफ हो रही थी, उसे ही गुस्सा और मान
के नाम पर वह बेटे के सिर मटने की कोशिश कर रहे थे।
अचरज है, निवेदिता के बजाय सत्यशरण उदास हो रहे
थे। इधर कुछ दिनों में उसे तो गौतम एक बार भी याद
नही आया? उसे कलकत्ते की ही कितनी बार याद आई
है ? अनाड़ी फटिक ने क्या पकाया-खिलाया, घर-द्वार कितना
गंदा पड़ा होगा--यह सब सोच-सोचकर किसी दिन वह
अस्थिर हुई है ?
शुरू-शुरू में तो खैर, उसे अपने बेटे पर ही भयंकर मान
हो आया। कभी कही जाना नहीं होता। इस बार सत्यशरण
के दोस्त की मेहरवानी से यह घर मिला था। इसीलिए तो
उसका इतना मन हो आया कि पति-पुत्र समेत वह कुछ दिनों
की छुट्टियां मना आए । लेकिन वेटे ने उसकी इच्छा को ठुकरा
...
दिया।
लेकिन फिर भी, वह मां थी। उसके मन में यह मान
कभी अहम् हो सकता था? बेटे के लिए उसका मन उदास
नहीं होगा? उसे तकलीफ-असुविधा में छोड़ आई है ! यहां
आकर ऐसी निश्चित हो गई कि उसे भूल ही बैठी।
निवेदिता का स्वभाव तो ऐसा नहीं था।
उसे चुप देखकर सत्यशरण ने दुवारा पूछा, 'अच्छा बताओ
हमें यहां आए कितने दिन हुए हैं ?'
निवेदिता को वह दिन याद है !
रेत का वृन्दावन A.

उन्होंने खुद महसूस किया है कि ये तमाम दिन कितनी
तेजी से गुज़रते जा रहे हैं। जाने कहां, किसी गहरे स्वप्न के नशे
की तरह"
'हमें आए आज तेईस दिन हो गए !"
'इतने दिनों फटिक के हाथ का खाना खाते-खाते, वच्चू की
सारी पढ़ाई-लिखाई ताक पर उठ गई होगी ! क्यों ?'
यानी सत्यशरण बेटे की बातें करना चाहते थे। निंदा के
बहाने स्तुति की तरह।
'अरे, नहीं, इस मुगालते में न रहना । तुम्हारा बेटा ऐसा-
वैसा नहीं है । वह टूट जाएगा, लेकिन झुकेगा हरगिज़ नहीं !'
निवेदिता मानो किसी और दुनिया से अपनी दुनिया मे
लौट आई।
सत्यशरण ने कहा, 'एक काम किया जाए तो कैसा रहे ?
उसको जरा खास तौर पर एक खत दूं कि वह चला आए।
छुट्टी के वाकी दिन यहां बिताकर, हम लोग एकसाथ ही
निवेदिता ने सहसा सख्त लहजे में अपनी राय दे डाली,
'नहीं ! हमीं लोग लौट चलने की सोचें ! अब यहां रहने की
जरूरत ही क्या है ?'
सत्यशरण अचकचा गए। उन्हें समझ नहीं आया कि
यह सख्ती किसके ऊपर है । पति पर ? या पुत्र पर ? लेकिन
क्यों? वेटे के प्रति जो नाराज़गी या मान था, यहां आने पर
तो उसका नामोनिशान तक नहीं दिखाई पड़ा ! 'जरूरत ही
वया है'-इस वाक्य में कोई गहरा अर्थ है ?
अरे, भई, तब आने की ही क्या जरूरत थी?
इतनी कोशिश करके पूजा की छुट्टियों के साथ और एक
-
५२ 0 रेत का वृन्दावन

.
महीने की छुट्टी गढ़ाने की ही क्या जरूरत थी?
लेकिन डर के मारे उन्होंने कुछ भी नहीं पूछा।
आजकल अक्सर उन्हें निवेदिता को समझने में दिक्कत
होने लगी है।
लेकिन खुद निवेदिता हो क्या समझ पाई है कि उसकी
यह सस्ती खुद अपने ऊपर ही है ! अचानक जैसे उसे अपनी
किसी गलती का अहसास हो गया हो, यह उसी को ग्लानि है ।
यहां आकर भला उन्होंने ही घबराहट में ऐसी कौन-सी
चिट्ठी लिख डाली गौतम को ? परदेश-बसी बेटी को तो एक
भी खत नहीं डाला !
सत्यशरण से यतिश्वर के परिचय के बाद से ही जैसे एक
-अलिखित नियम बन गया। घूमने निकलकर यतिश्वर पहले
उनके घर हाजिर होते, फिर चाय-वाय पीकर तीनों एकसाथ
निकलते ।
हालांकि यह नियम कहीं से भी उचित नही लगता।
यतिश्वर भी अगर सपत्नीक होते, तो सव शोभन लगता।
रेत का वृन्दावन - ५३

।
लेकिन एक युगल-दंपती के बीच में तीसरा व्यक्ति बिल्कुल
अनमेल नहीं लगता। दो-एक दिन बाद यतिश्वर ने इस
व्यवस्था से बचने की काफी कोशिश की, लेकिन बच नहीं पाए।
उनको आग्रह-मिन्नतों की वजह से ही मना नहीं कर पाए।
वाकई, सत्यशरण बेतरह आग्रह करने लगते हैं ।
दरअसल, वह घर-गृहस्थी वाले सामाजिक इंसान हैं।
अपना चिरपरिचित परिवेश, कार्यालय के अभ्यस्त काम-काज,
दोस्तों का साथ-सब कुछ छोड़-छाड़कर, यहां महज़ एक
अदद बीवी की संगति में मानो बुरी तरह हांफ उठे थे। इसके
अलावा पति-पत्नी के बीच बातचीत के जो परिचित विषय
थे, यहां वे कुछ भी नहीं हैं। और जो कुछ है भी, उसमें
निवेदिता का मन साथ नहीं देता ।
ऐसी हालत में किसी तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति
विल्कुल आशीर्वाद-सरीखी लगी थी।
हां, सत्यशरण ने यतिश्वर का आश्रय थामा था।
उसकी आरजू-मिन्नत ठुकराना बहुत मुश्किल हो आता
है।
और निवेदिता?
वह तो अजीबोगरीब रहस्य है।
वह मानो किसी अकल्पित संशय का रूप धरकर
यतिश्वर के सामने आकर खड़ी हो गई है।
यतिश्वर के संग-लाभ के प्रति सत्यशरण जो आग्रह प्रकट
करते हैं, निवेदिता तो उसके शतांश का एकांश भी नहीं
करती। बल्कि बहुत बार वह पति की बातों का विरोध
करती है। यतिश्वर की सुविधा-असुविधा का सवाल उठाकर
:५४ रेत का वृन्दावन

पति को रोकने की कोशिश करती है। लेकिन यह क्या सव
यतिश्वर के आते ही उनकी आंखों और चेहरे पर जो
रोशनी फैल जाती है, वह क्या नजर अंदाज किया जा सकता
है ? सत्यशरण जैसे 'भोले बाबा' की आंखों में अगर वह
नागवार न भी गुजरे, लेकिन यतिश्वर की तीखी दृष्टि की
परिधि से वह अपने को कैसे छुपा सकती है ?
जुबानी विरोध के साथ आंखों के अनुयन की भाषा में
कही कोई तालमेल खोज पाना असंभव था।
यतिश्वर अवाक् हो उठे ! उन्होने अविश्वास करना
चाहा है, अपनी राय को महज़ गलतफहमी कहकर उड़ा देने
की कोशिश की है, लेकिन सव वेकार | यतिश्वर के प्रति
निवेदिता को असावधान, मुग्ध दृष्टि सच बात का पता दे
जाती है।
जब वह एक गंभीर विचारक की हैसियत से अपने इस
अकल्पित संशय का विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं तो
वेहद निरुपाय हो जाते हैं।
लेकिन क्या यह संभव है ?
सचमुच, क्या यह मुमकिन है ?
उफ ! कैसे वेचन कर जाते हैं ये ख्यात!
हालांकि इस बारे में सोचने का मन भी करता है, लेकिन
सोचते हुए शर्म भी आती है। हां, अपनी ही नजर में अपने
प्रति शर्मिन्दगी होती है। कभी-कभी यह आशंका भी होती
है कि कहीं वुद्धि तो भ्रष्ट नहीं हो गई, वरना मन में ऐसे-
ऐसे संदेह जागते । ऐसा नामुमकिन-सा, अवास्तविक संदेह !
रेत का वृन्दावन ०५५

इसके बजाय जब वह उनके साथ घूमते-फिरते रहते बातें होती या वहस में उलझे रहते, उस वक्त ऐसे ख्याल उन्हें कम परेशान करते थे । कैसा हास्यास्पद लगता है यह संदेह । लेकिन जब वह लौट आते हैं ? अकेले होते हैं ? तब ? तब निवेदिता की उम्र का कतई कोई लिहाज़ या ख्याल नहीं रहता । उसका गृहिणी-रूप भी याद नहीं आता। उन्हें तो यह भी याद नहीं रहता कि अभी उसी दिन सत्य- शरण से बातों-बातों में उम्र का भी हिसाब-किताब हो गया था ! यतिश्वर उम्र में निवेदिता से कुछेक महीने छोटे सावित हुए थे। उन्हें तो लगता है, मानो निवेदिता ही एक छोटी-सो, नन्ही-सी लड़की है। EGE यतिश्वर अपनी दीर्घ, अविवाहित जिंदगी में कभी ऐसी असहाय स्थिति में नहीं पड़े थे। अपने को किसी दिन भी यूं हारा हुआ महसूस नहीं किया था। उन्होंने खूब-खूब सोचा, सब कुछ को हंसकर उड़ा देने की अजहद कोशिश की। लेकिन कहां कुछ हो पाया ? ५६ । रेत का वृन्दावन । दोनों वक्त किसी का वेहद आकर्षण उन्हें अपनी ओर ग्वींचता रहता था। वहां जाने के अलावा और कोई राह नहीं बचती। वह हर दिन फैसला करते हैं, अच्छा, बाज बस, आखिरी बार ! आज के बाद चाहे कुछ भी हो ! लेकिन अगले दिन फिर वही हाल । जाए विना गति ही नहीं थी। और कुछ नहीं तो कहीं नयी जगह साथ चलने की धुन मवार हो जाती । नयी जगह ले जाने की मारी जिम्मेदारी मानो यतिश्वर की ही थी। सत्यशरण तो खैर, चिरनाबालिग थे। अगर यतिश्वर न मिलते तो महज जगन्नाथ जी के अलावा, दूसरी नयी-नयी जगहें देखना क्या संभव हो पाता? कही किसी अनजानी जगह जाने की बात उठते हो, सत्यगरण की परेशानियों का अंत नहीं रहता। मानो पुरी कोई बहुत असाधारण जगह है। जो भी देखने लायक जगहें हैं, सभी तो विल्कुल आस- पास है । वहां तक जाना दुर्लभ भी नही था. दुःसाध्य भी नही। दरअसल पुरी में जो सचमुच देखने लायक चीज है, उसे तो किसी भी कोने में, रेत के टीले में फंसकर देखा जा सकता है । इसके लिए न दौड़-धूप की जरूरत है, न अफरातफरी की। वहां के लिए टिकट भी नहीं कटाना पडता, चढावे वगैरह नहीं चढ़ाने पड़ते । और तो और, उस विराट महान देवता के, ममय के जरा से हेर-फेर के कारण दर्शन न हो पाने का भी भय नहीं ! उनके पट कभी बद नही होते थे- न भोग के लिए, न गायन के लिए । वहां तो हर वक्त अनत- रेत वा वृन्दावन कालीन आरती की धूम फिर भी जब 'सिद्ध वकुल' या 'गौरांग को फटी कथरी' देखने जाते समय, उनके बगैर ही जाना पड़ता था । अव ये सब जगहें विना देखे लौट गए, तो लोग क्या कहेंगे ? गाल पर हाथ रखकर हैरत-अंगेज़ निगाहों से धूरेंगे नहीं ? - अब तो 'फटी कथरी मठ', मंदिर वगैरह देखने जाने का सिलसिला भी खत्म हुआ । अव निवेदिता ने एक नयो फर- माइश जड़ दी। इतनी दूर आकर भी, अगर कोणार्क नहीं देखा, तो जिंदगी ही वेकार ! उसकी बात सुनकर सत्यशरण पर जो मानो आकाश टूट पड़ा। निवेदिता को क्या नहीं मालूम कि कोणार्क के रास्ते में हर झाड़ी-झुरमुट में वाघ और हर खोह-गह्वर में डाकू छिपे रहते हैं, जो मौका पाते ही गर्दन पर सवार हो जाते हैं ! ५८ 0 रेत का वृन्दावन

अरे मई, पुरी आए, बहुत अच्छा दिया । जगन्नाथ जी
के दगंन करो, सागर-स्नान करो, दो-एक कटको माड़ियां और
खेत्तर-कांसा के बर्तन खरीदी । यहां-वहां घूम-फिर नो! वन,
और क्या?
फिर लौटने के लिए बोरिया-विस्तर वांप लो! वस्स !
अब यह कंसी दुःसाहसी माघ ?
उनकी बातें सुनकर निवेदिता ने स्वयं सवाल किया,
'पुराने जमाने से लेकर आज तक जो लोग कोणार्क नानक
विजन, जंगली पय पर मां-मां करते बाए हैं, लगता है, वे
सभी अपनी यात्रा में वाघ के दांत या डाकुओं के हायों
'महायात्रा' के पयिक वन गए हैं न ?'
उस दिन कर्ता-गिन्नो की तू-तू, मैं-में के बीच जाने कहां
से यतिश्वर ना पड़े।
सत्यशरण उल्लास से भर उठे, "अरे भया, तुम आ
गए ? मैं पूछता हूं, कल तो तुम बीच राह में पटाखे में
माचिस दिखाकर, आराम से खिसक लिए ? इधर यह
पटाखा ऐसा फूटा कि मेरी तो जान पर बन आई।'
सरस और वाक्पटु यतिश्वर में उसी की तरह जरा
रसीले लहजे में बात करने की गरज से आजकल सत्यगरण
भी, काफी कोशिशों के बाद, इस तरह की हसी-दिल्लगी
करना सीख गए हैं ।
यतिस्वर ने अचकचाकर बारी-बारी में दोनो की तरफ
देना और पूरी स्थिति का जायजा भी ले लिया। बात यह
यो कि कोणार्क की बात कल उन्होंने ही छेड़ी थी।
खर, सत्यगरण की बातों के उत्तर में उन्होंने हंसते हुए
रेत का वृन्दावन ०५९

पूछा, 'क्यों, क्या हुआ ?' 'होगा क्या ? वही कोणार्क ! कल से दिमाग में घूम रहा है। सारी रात नींद हराम । आधी रात को आंख खुली तो खिड़की के पास तनकर बैठी हुई ! निवेदिता झंप गई। उसने झंझलाकर कहा, 'हां ! हां ! आधी रात को कोणार्क की चिंता में तो घुलती हुई बैठी थी खिड़की पर ? ऐसी आलतू-फालतू बातें करते हो न !' 'अच्छा, तो तुम ही बताओ, खामख्वाह नींद क्यों नहीं आई ? 'नहीं आई-तो नहीं आई ! तुम्हारी तरह सब कुंभकर्ण तो हैं नहीं कि तकिये पर सिर रखते ही नींद में बेहोश !' यतिश्वर भी हंस पड़े, 'वैसे वहां जाने में दिक्कत क्या है ? अपने होटल से बहुत से लोग जा रहे हैं । प्रायः रोज ही एक न एक दल तैयार हो जाता है।' 'जो जाता है जाए, भैया ! मुझे यह ठीक नहीं लगा। नाहक हो भले-चंगे शरीर को कष्ट देना ! अरे, भैया, दुनिया में तो बहुत-बहुत-सी चीजें हैं देखने लायक, लेकिन कितनी चीजें लोग देख पाते हैं ?' यतिश्वर ने हंसते हुए कहा, 'वैसे मेरी भी राय बहुत- कुछ आपसे मिलती-जुलती है । लेकिन...' लेकिन ? मेरे घर में आग लगाकर अब मज़ा देखने के लिए मुकर रहे हो ! क्यों ? --सत्यशरण अपने मज़ाक पर खुद ही हंस पड़े। निवेदिता ने यतिश्वर की तरफ देखते हुए कहा, 'इस ६०० रेत का वृन्दावन वक्त तो खूब बातें बना रहे हैं । उस दिन तो कह रहे थे कि आप दो-दो बार कोणार्क हो आए हैं ? 'अरे, वह तो किसी दल-बल के चक्कर में और क्या ?' .. आज म चुप 'इस्स ! लेकिन उस दिन तो आप कह रहे थे कि आपको कोणार्क बेहद पसंद है ?' 'अच्छा ! मैंने यह कहा था? लेकिन, ऐसी कोई बात नहीं। असल बात यह है कि...' सत्यशरण ने कहा, 'ओह अब तुम लोग फिर असल बात पर उतर आए? तब तो पहले चाय-बाय का इंतजाम कर लेना चाहिए, जी ! जरा गला तर करके शुरू होना ही बेह- तर है ! " बहस एक बार शुरू हुई, तो घंटों चलेगी ! तुम भी तो वहस का मौका पाते ही फिर... निवेदिता ने कहा, "ठीक है, !' यतिश्वर की निगाहें निवेदिता को पढ़ती रही, अचानक उन्होने मुस्कराते हुए शांत स्वर में कहा, 'वह भी तो वर. दास्त नहीं होगा ! सागर अगर यह आश्वासन दे बैठे- अच्छा, अव मैं एक चुप, हजार चुप-तो आप उसे सह 'पाएंगी?' पल-भर के लिए निवेदिता के चेहरे का रंग उड गया । लगा उसके पास इसका कोई जवाब नही । लेकिन अगले हो पल वह हंस पड़ी, 'अच्छा, तो बात धुमाकर कही जा रही है ! मेरी बातों की तुलना सागर-गर्जन से की जा रही है क्यों! 'भई, यह भी वही बता सकते हैं, जो उस गर्जन का 7 रेत का वादावन D स्वाद विलक्षण भाव से पाते हैं !' कहते हुए यतिश्वर ने सत्यशरण की तरफ कौतुकी निगाहों से देखा । सत्यशरण अपनी बनियान खिसकाकर, दीवाल से अपनी पीठ रगड़ते-रगड़ते बोले, 'अरे, भइया, अब इन सब बातों का जवाव दूं, इतनी ताव मुझमें कहां ! तुम ठहरे प्रोफेसर आदमी ! लेक्चर देना तुम्हारा पेशा ही है ! और ये तो महज़ नाटक-नावेल पढ़कर सीखी हुई विद्या से तुम्हें हरा देती हैं । मैं विचारा तो तुम लोगों की आधी बातों का मत- लव भी नहीं समझ पाता ! हुंहः, कैसी बहकी-बहकी बातें करते हैं लोग यहां निवेदिता ने अचानक हंसते-हंसते पेट पकड़ लिया, 'सुन रहे हैं न, प्रोफेसर साहव, देख लोजिए ! इन बुड्ढे-खूसट के हाथों में पड़कर मेरी समुची जिंदगी ही मिट्टी हो गई ।' सत्यशरण ने भी मनुहार से हंसते हुए कहा, 'हां-हां; खुद तो विल्कुल आधुनिका तरुणी हा न ! क्यों, कितने दिन हुए. तुम्हें दुनिया में आए ?' 'अरे, पुराने जमाने की हूं या नये ज़माने की-इसके फैसले में क्या सिर्फ साल या तारीख की जरूरत पड़ती है ? इन सबका हिसाव विल्कुल अलग है, समझे ? क्यों, आपका क्या ख्याल है प्रोफेसर साहब ?' सत्यशरण ने हताश लहजे में कहा, 'देख लिया न, भैया, फिर वही बहकी-बहकी खामख्याली । लेकिन सच्ची, तुमने इतनी सारी बातें कहां से सीखीं, यह भी मेरी समझ के वाहर है । समंदर की खुली हवा में तुम्हारा दिमाग और खुल गया शायद ! वीच-बीच में तो मुझे यह आशंका होती है कि - है , ६२ 0 रेत का वृन्दावन

तुम्हारी उम्र कही दस साल कम तो नही हो गई।'
किसी बाहरी आदमी के सामने कोई वात कितनी दूर
तक खींचनी चाहिए और कहां फुलस्टाप लगा देना चाहिए,
इतनी अक्लमंदी का विचारे सत्यशरण में निहायत हो अभाव
निवेदिता ने किंचित खीझकर कहा, 'अच्छा, बहुत
हुआ ! अव चुप करो ! और कोई बात करने को नही है ?...
हां, तो अब जरा असली वात पर तो आएं, प्रोफेसर साहब !
कोणार्क जाने का क्या वना ? अगर ये बूढे हजरत जाने को
राजी न हों, तो चलिए, हम लोग हो हो आएं । वाघ
खाएगा, तो हमें ही खाएगा न ! बस-वस का क्या इंतजाम
है ? फो आदमी कितना किराया है ?'
काफी हुज्जत-हंगामे के बाद जाना पक्का हो गया।
आखिरकार सत्यशरण को राजी होना ही पड़ा। हालाकि
निवेदिता ने उनकी कसकर खवर लेने की कोशिश की, 'क्यों,
तुम्हें साथ चलने की क्या जरूरत है ? तुम्हे तो किसी ने
चलने को कहा नहीं। अरे, नहीं जाओगे, तो खुद पछताओगे !
और अगर म बाध के पेट में चले ही गए, तो सावित हो
जाएगा कि तुम जीत गए ।'
रेत का वृन्दावन । ६३

स्वाद विलक्षण भाव से पाते हैं !' कहते हुए यतिश्वर ने सत्यशरण की तरफ कौतुकी निगाहों से देखा। सत्यशरण अपनी बनियान खिसकाकर, दीवाल से अपनी पोठ रगड़ते-रगड़ते बोले, 'अरे, भइया, अब इन सब बातों का जवाब दूं, इतनी ताब मुझमें कहां! तुम ठहरे प्रोफेसर आदमी ! लेक्चर देना तुम्हारा पेशा ही है ! और ये तो महज़ नाटक-नावेल पढ़कर सीखी हुई विद्या से तुम्हें हरा देती हैं । मैं विचारा तो तुम लोगों की आधी बातों का मत- लव भी नहीं समझ पाता ! हुंहः, कैसी बहकी-बहकी बातें करते हैं लोग यहां निवेदिता ने अचानक हंसते-हंसते पेट पकड़ लिया, 'सुन रहे हैं न, प्रोफेसर साहब, देख लोजिए ! इन बुड्ढे-खूसट के हाथों में पड़कर मेरी समुची जिंदगी ही मिट्टी हो गई।' सत्यशरण ने भी मनुहार से हंसते हुए कहा, 'हां-हां; खुद तो बिल्कुल आधुनिका तरुणी हा न ! क्यों, कितने दिन हुए. तुम्हें दुनिया में आए ? 'अरे, पुराने जमाने की हूं या नये ज़माने की-इसके फैसले में क्या सिर्फ साल या तारीख की जरूरत पड़ती है ? इन सवका हिसाव विल्कुल अलग है, समझे ? क्यों, आपका क्या ख्याल है प्रोफेसर साहब ?' सत्यशरण ने हताश लहजे में कहा, 'देख लिया 'देख लिया न, भैया, फिर वही बहकी-बहकी खामख्याली । लेकिन सच्ची, तुमने इतनी सारी बातें कहां से सीखीं, यह भी मेरी समझ के वाहर है । समंदर की खुली हवा में तुम्हारा दिमाग और खुल गया है, शायद ! बीच-बीच में तो मुझे यह आशंका होती है कि ६२ - रेत का वृन्दावन

तुम्हारी उन कहीं दस साल कम तो नही हो गई।'
किसी बाहरी आदमी के सामने कोई बात कितनी दूर
तक खींचनी चाहिए और कहां फुलस्टाप लगा देना चाहिए,
इतनी अक्लमंदी का विचारे सत्यशरण में निहायत हो अभाव
निवेदिता ने किचित खीझकर कहा, 'अच्छा, बहुत
हुआ ! अब चुप करो ! और कोई वात करने को नहीं है ?...
हां, तो अब जरा असली वात पर तो आएं, प्रोफेसर साहब
कोणार्क जाने का क्या वना? अगर ये बूढ़े हजरत जाने को
राजी न हों, तो चलिए, हम लोग ही हो आएं । वाघ
खाएगा, तो हमें ही खाएगा न ! वस-वस का क्या इंतजाम
है ? फो आदमी कितना किराया है ?'
काफी हुज्जत-हंगामे के बाद जाना पक्का हो गया।
आखिरकार सत्यशरण को राजी होना ही पडा। हालांकि
निवेदिता ने उनकी कसकर खवर लेने की कोशिश की, 'क्यों,
तुम्हें साथ चलने की क्या जरूरत है ? तुम्हे तो किसी ने
चलने को कहा नहीं। अरे, नही जाओगे, तो खुद पछताओगे !
और अगर हम वाघ के पेट में चले ही गए, तो सावित हो
जाएगा कि तुम जीत गए।'
रेत का वृन्दावन ०६३

सत्यशरण ने गंभीर होकर कहा, 'देखो, बार-बार ऐसी
अपशकुन की वातें मुंह से निकालना ठीक नहीं है। हां, तो
भैया, कुछ कर ही डालो ! इस पार या उस पार ! आज तक
तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि जो सनक इन पर सवार हुई उसे
पूरा किए बिना मान जाएं ! तो ठीक है, तुम दोनों सारी
वातें तय कर डालो, तव तक मैं जरा बाहर घूम आऊं !'
निवेदिता ने टोका, 'अभी कहां घूमने जा रहे हो ?'
'अरे नहीं, भई, नहीं ! कहीं घूमने-भटकने नहीं जा रहा ।
जरा, दुकान तक जा रहा हूं।'
'दुकान ?' यतिश्वर ने पूछा, 'रात तो काफी हो गई है,
इस वक्त कौन-सी दुकान ? अच्छा, चलिए, मैं भी चलता
04.
।'
'अरे, नहीं ! नहीं ! ऐसी कौन-सी रात हुई है ? मैं बस
गया और आया। अभी आया !
'वात क्या है ?
'यहां एक उड़िया पान वाले की दुकान है-बढ़िया पान
लगाता है । दो-चार वीड़े ले आऊं, तो जमकर बैठा जाए
अचानक यतिश्वर ने पूछा, 'अच्छा, आपका वह उड़िया,
भाभी से बेहतर पान लगाता है ?'
'भाभी' शब्द आज पहली बार उनके मुंह से निकला था।
सत्यशरण के कानों को यह शब्द नया लगा या नहीं, कौन
जाने। वह तो थे अपनी ही धुन में मस्त । पैरों में चप्पल
पहनते हुए उत्तर दिया, 'भई, मुझे कहना तो नहीं चाहिए।
मेम साहब भड़क जाएंगी। लेकिन, इस पान का स्वाद बहुत
मज़ेदार होता है। कमबख्त क्या-क्या गुंडी-मुंडी डालते हैं !'
६४ 0 रेत का वृन्दावन

सत्यशरण के जाते ही निवेदिता ने छूटते ही सवाल किया, अचानक यह नया संबोधन क्यों?' 'कहां ?' यतिश्वर अनमने हो उठे, 'ओ'"भाभी' कहा, इसलिए ? अच्छा ही तो है । वात करने में मुविधा होगी।' 'इतने दिन गायद बहुत असुविधा हो रही थी ?' 'नहीं, नहीं, यह कौन कहता है ?' वाक्पटु यतिश्वर भी इस वक्त वेहद अकेला और नर्वस हो आया । काा ! सत्य- शरण को जरा भी अक्ल होती। निवेदिता ने एक अजीव-सी हंसी हंसकर कहा, 'अपने को यूं किसी रिश्ते में बांधे विना, आप निश्चित नहीं हो पा रहे हैं न ? सिर्फ दोस्ती विल्कुल असंभव बात है न ? यतिश्वर ने गंभीर आवाज में कहा, 'कौन जाने, इस 'असंभव' शब्द का कोई अर्थ है भी या नहीं। शायद नहीं होता। लेकिन मुश्किल तो यह है कि आप-जंसों को क्या कहकर पुकारा जाए, यह ठीक-ठीक समझ में नहीं आता। रेत का वृन्दावन ०५

'मिसेज फलां बोलने में भी तो बुरा लगता है।'
'तो फिर
कुछ भी मत कहिए।'
'क्यों ? आपको ही भला किसी खास संवोधन से आपत्ति
क्यों है?'
'नहीं, आपत्ति भला क्या हो सकती है ?'
'बातों के लहजे से तो लग रहा है, बेतरह आपत्ति है।
कोई बात नहीं, आज से वह कैंसिल । बताइए, आपको क्या
कहकर बुलाया करूं ? मिसेज के बाद दूसरे का नाम न
चलाकर, आपके नाम के साथ 'देवी' लगाकर बुलाए
जाने
में तो एतराज नहीं है ? लेकिन मुझे तो आपका नाम भी नहीं
मालूम।'
'नाम तक नहीं जानते ? अचरज है !
निवेदिता ने अस्फुट स्वर में अचरज प्रकट किया।
लेकिन इसमें उसे हैरत की ऐसी कौन-सी बात लगी ?
उसका नाम जानना क्या यतिश्वर का आवश्यक कर्त्तव्य था ?
यतिश्वर ने कहा, 'नाम जानने का मौका ही कब
मिला ? वह तो 'एजी, सुनती हो' कहकर काम चला लेते
'इसीलिए आप भी यह 'भाभी-टाभी' कहकर काम
चलाना चाहते थे, यही न ?
'इसके अलावा और किसी बड़े हक की मांग किस
भरोसे पर करूं,
बताइए
!"
महज़ वातों के लिए वातें होती रहीं। तलवार की बीच
धार से अचानक ही फिसल पड़ी थीं वे बातें..'धार की नोक
तक जाने का साहस नहीं कर पाई।
६६ 0 रेत का वृन्दावन

हालांकि यह शिष्टता के खिलाफ है, फिर भी अगर मैं आपका
नाम पूछू तो आप मुझे गलत तो नहीं समझेगी ?'
'नाम जानने से लाभ ?'
'क्यों ? लाभ-नुकसान के हिसाब-किताब के अलावा क्या
कही कुछ नहीं होता ? अक्सर सोचता हूं कि आपका क्या
नाम हो सकता है ? मेरा मतलब है कि आप पर कौन-सा
नाम फिट बैठता होगा ! लेकिन कभी पूछने का साहस नहीं
कर पाया।'
'इसमें साहस की क्या बात है? मेरा नाम निवेदिता है।'
यहां अस्त-व्यस्त हवाओं में तिलमात्र भी कमी नहीं है।
वाल, साड़ी का आंचल हवा में उड़ा जाता है । समुद्र भी
-
रेत का वृन्दावन

दिखाई नहीं देता, सिर्फ उसका कल्लोल-भर सुनाई देता है।
नीचे रास्ते पर सत्यशरण आते हुए दिख गए । ढीला-
ढाला चेहरा । देह पर सिर्फ एक गंजी।
'क्यों जी, प्रोफेसर, काम की बातें कहां तक बढ़ी ?'
प्रोफेसर के जवाब देने के पहले निवेदिता ने ही उत्तर
दे डाला, 'यह बात तो पक्की हो गई। मेरी इच्छा ही तय
बात है !
'खैर, वह तो मैं जानता हूं। जब ज़िद चढ़ गई है तब ।
इसी इसी छोकरे ने मेरी बीवी का दिमाग खराब किया ।
मेरे घर की गिन्नी को क्या तो कहते हैं-तुम लोगों में"
हां', 'तरुणी' बनाकर ही छोड़ा !'
कोणार्क जाने के लिए इतना हुज्जत-हंगामा, इतनी उठा-पटक
हुई, और वहीं मिट्टी हो गया।
निवेदिता अपने बिस्तर-कपड़े समेटने में जुट गई ।
६८० रेत का वृन्दावन

गौतम का सत आया है-फटिक को बुखार आ रहा है
और स्टीव जलाते हुए उसने अपनी मंगुलियां जला ली है।
'तुम लोग लौट आओ ।' 'मुझे तकलीफ हो रही है, यह उसने
नहीं लिखा। कलकत्ता को इधर-उधर की खबरों में, महज
मूचना के लिए यह सवर भी दे दी गई थी।
लेकिन इसके कारण कोई मान ठानना मां-बाप को
शोभा नहीं देता । मुझे तुम लोगों की जरूरत है-यह कहना
तो दूर की बात है, बच्चे अगर स्पष्ट भाव से यह भी जाहिर
कर दें कि मुझे तुम लोगों की बिल्कुल जरूरत नहीं है, फिर
भी मां-बाप भला चैन से रह सकते हैं ?
निवेदिता ने उस खत को दो-तीन वार उलट-पलटकर
पढा । पति से पूछा, 'तुम तो कह रहे थे, गौतम ने लोट आने
को लिखा है ? कहां लिखा है ?'
'एक ही बात है। वे लोग इसी तरह कहते हैं। तुम
अपने बेटे को नही पहचानती? वह क्या मान त्यागकर
कहेगा, तुम लोग चले आओ ?'
'मान सोने का फर्ज हमेशा हमी लोगो को निभाना
चाहिए, क्यों?'
'उफ ! क्या मुश्किल है । अव तुम यह सब आय-बांय
क्या बकने लगी ? फटिक को चुसार है, उमका हाय जल
गया है-यह सब सुनकर भी तुम निश्चित रह सकती हो?'
'हां, कैसे रह सकती है ? खेर, जा तो रही हूं।"
रेत का वृन्दावन D६६

।" यतिश्वर यह सूचना देने आए थे कि बस का इंतज़ाम हो गया है। अगले दिन भोर में वस रवाना होगी। रात के अंतिम प्रहर तक तैयारी पूरी कर लेनी होगी। कमरे में कदम रखते ही उनकी निगाहें खुले हुए बक्से के सामने चुपचाप बैठी हुई निवेदिता पर अटक गईं । सत्य- शरण घर में नहीं थे। मेन गेट, सीढ़ी के दरवाजे, सबके सव खुले पड़े थे। उनके चेहरे पर एक हंसी खेल गई, 'क्या बात है ? अचानक चोरों के प्रति इतनी सहानुभूति क्यों ? लगता है, अपना सब कुछ उनके हाथों सौंप देने को प्रस्तुत हो उठी ! आहट पाकर निवेदिता ने पीछे मुड़कर देखा । सिर का पल्ला ठीक करते हुए कहा, 'ओ''आप हैं ! वह तो अभी- अभी बाहर चले गए। यानी दरवाजा खुला होने की वस इतनी-सी कैफियत देकर, निवेदिता ने छुट्टी पा ली । ऐसा लग रहा था, मानो ७० 0 रेत का वृन्दावन

वह बेहद थक गई है, ज्यादा कुछ बोलने को भी ताकत चुक
गई है।
यतिश्वर ने इधर-उधर नजरें दौड़ाते हुए चकित आवाज
में पूछा, 'यह क्या? इतना कुछ क्यों फैला लिया ? घर-घर
वदल रही हैं ?'
'घर नहीं, देश ही बदल रही हूं। कलकता वापस जा
रही हूं?'
'वापस जा रही हैं ?'
'हां।'
'कब?'
'आज रात को ही।'
मिनट-भर को चुप्पी छा गई।
यतिश्वर ने लगभग अस्फुट आवाज में पूछा, 'इतना"
अचानक...?'
'जिंदगी में सभी कुछ तो विल्कुल अचानया ही घटता है
न, प्रोफेसर साहब !' निवेदिता मृदुल-सी हंसी हस पड़ी।
लेकिन क्यों?'
यतिश्वर की सासें तेज हो उठों । मर्द होते हुए भी छाती
धड़कने लगती है।
सत्यशरण को क्या कोई शक हो गया है ? निवेदिता को
लेकर कोणार्क जाने के प्रस्ताव के प्रति क्या उन्होंने जरूरत से
ज्यादा आग्रह दिखाया था ? अतः शंकित आवाज में पूछा,
'लेकिन "क्यों?'
गौतम का खत आया है। नौकर बीमार, सुद पूड़ियां
उतारते हुए हाप जला बैठा है.'
रेत का वृन्दावन ०७१

,
'ओ'यह बात है !
यतिश्वर की धड़कनें कुछ सहज हो आई । भय की जगह
अव हताशा ने ले ली।
'लेकिन "एकदम से आज ही ? ज्यादा जल गया है
क्या ?'
'साफ-साफ कुछ नहीं लिखा । लेकिन अव आज या कल
जाना जव निश्चित है, तव इसे लेकर मैंने वहस नहीं की।'
'नहीं। मैं कह रहा था, कोणार्क हो आतीं, फिर परसों
रात की गाड़ी से लौट सकती थीं।'
'नहीं, यह नहीं हो सकता।'
अचानक यतिश्वर का स्वर अतिशय व्यग्र हो उठा, 'क्यों
नहीं हो सकता ? एक दिन में ऐसा क्या आता-जाता है ?
आप साथ होंगी, यह सोच-सोचकर मैं कल से ही...'
'कल से ही क्या ?'
'नहीं, कुछ नहीं । मैं कह रहा था, एक दिन के फर्क से
क्या आता-जाता है ?'
'नहीं, शायद कुछ भी नहीं आता-जाता । लेकिन फिर भी
असंभव है।
'विल्कुल असंभव ?'
'हां, विल्कुल असंभव । आपके यह भोले शंकर दादा हर
वात को प्रश्रय दे सकते हैं, लेकिन मातृ-स्नेह की त्रुटि वह
कभी माफ नहीं करेंगे !
७२ । रेत का वृन्दावन

'जिंदगी में अव दुवारा कभी पुरी नही आएंगी न ?
'उम्मीद तो नहीं है.'
'पुरी के बारे में सब कुछ भूल जाएंगी न ?'
'हां, असंभव क्या है ? "इंसान क्या कुछ नही भूल
सकता ?' कहते हुए वह हस दी है, 'नहीं, मैंने योड़ा-सा गलत
कहा । कहना चाहिए था, औरतें क्या कुछ नहीं कर सकती।
''खैर, छोड़िए ! आप बताइए, आप कब लौट रहे हैं ?'
'कौन जाने, आज ही..'
निवेदिता शंकित हो उठी, 'अरे !'
'क्यों, साथ चलूँ तो गुनाह है ?'
निवेदिता के होंठों पर सूसी-सी हंसी तरंगई, 'गुनाह की
वात नहीं है । लेकिन आप भला अभी क्यों जाएंगे? आपके
जाने की तो कोई वजह नहीं पैदा हुई !'
.
रेत का वृन्दावन D.

. यतिश्वर ने अपना चश्मा उतारकर, रूमाल से पोंछते हुए कहा, 'अगर मैं कहूं, वजह है !' 'आप न क्रमशः अजीब रहस्यमय होते जा रहे हैं ! वह हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुई और एकबारगी कह उठी, 'नहीं, नहीं, यह बहुत गंदा लगेगा। अचानक आज ही आप क्यों जाएंगे ?' 'आप मना कर रही हैं ?' 'अजीव बात है। आपकी सारी गतिविधियां क्या मेरी अनुमति से नियंत्रित हैं ? अचानक आज ही आप भी चल दें, तो कहीं कुछ अजीव लगेगा, शायद इसीलिए कहा था।' उसने अपनी बात पूरी की ही थी कि दरवाजे के बाहर से सत्यशरण की आवाज सुनाई दी। 'भैया, तुम यहां हो ? और मैं तुम्हें होटल तक खोज आया।' यतिश्वर चौंक उठे, 'खोज आए ! क्यों ?' 'अरे, वाह ! यह नयी खवर जो देनी थी, और क्यों ? तुमने क्या सारा कांड सुना नहीं ?' यतिश्वर जाने क्या जवाब देने जा रहे थे कि अचानक उन्हें स्तंभित करते हुए, उनकी बात छीनकर बेहद सहज स्वर में निवेदिता ने कहा, 'अब रहने भी दो ! तुम्हारी नयी खबर की तारोफ अब होने से रही। यतिश्वर वाबू अचानक आने का कारण मालूम है ? वह यह कहने आए थे कि कल वह कोणार्क नहीं जा सकेंगे।' आज रात ही उन्हें कलकत्ता वापस लौटना है।" 'अरे...!' " . के ७४ 0 रेत का वृन्दावन -----utnenews 'अरे क्या ? मैं भी सुनकर अचकचा गई थी। मैंने मन ही मन सोचा-बाप रे, यह सब क्या ? लगता है, हम लोग कोई नजरबंद आसामी है और ये साहव पुलिस-अफसर । सचमुच, अजीव संयोग है !' सत्यशरण ने पसीने में तर-ब-तर कमीज उतारते हुए कहा, 'चलो, अच्छा ही हुआ। लेकिन भई, तुम्हारा चक्कर क्या है ? वीवी-बच्चे "कुछ भी तो नहीं है। किसकी जरूरत आन पड़ी?' यतिश्वर ने बमुश्किल जवाब दिया, 'कल कालेज को बोर्ड मीटिंग है । आज ही खबर मिली।' निवेदिता ने जल्दी-जल्दी काम निपटाते हुए कहा, 'अरे, कहते हैं न "भगवान "भगत के राखनहार ! अकेले-अकेले इतना सारा ताम-झाम समेटकर कैसे पहुंचोगे, अकेले टिकट- विकट कैसे कटाओगे, ट्रेन कैसे पकड़ पाओगे—यह सब सोच- सोचकर तुम परेशान हो रहे थे न, भगवान ने मददगार भेज दिया। आप एक काम कीजिए यतिश्वर बाबू, आपका जो सामान-वामान है, सव ले-वेकर शाम को यही चले आइए-- यहा से एकसाथ हो...' सत्यशरण ने भी खुशी-खुशी उसकी बात की हिमायत करते हुए कहा, 'हां-हा, ठीक । यही ठीक होगा! देखा न भैया, हमारी गिन्नी कैसी चालाक है, अपनी सुविधा के लिए उनकी बुद्धि कितनी तेज दौड़ती है !' यू सचमुच, सत्यशरण चिंता के मारे परेशान थे। इसी परेशानी की वजह से ही तो वह यतिश्वर के पास यह कहने को दौड़े गए थे कि वह उन लोगों को स्टेशन तक रेत का वृन्दाव

यतिश्वर ने अपना चश्मा उतारकर, रूमाल से पोंछते
हुए कहा, 'अगर मैं कहूं, वजह है !'
'आप न क्रमशः अजीव रहस्यमय होते जा रहे हैं !'
वह हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुई और एकवारगी कह उठी,
'नहीं, नहीं, यह बहुत गंदा लगेगा। अचानक आज ही आप
क्यों जाएंगे ?'
'आप मना कर रही हैं ?
'अजीव वात है। आपकी सारी गतिविधियां क्या मेरी
अनुमति से नियंत्रित हैं ? अचानक आज ही आप भी चल दें,
तो कहीं कुछ अजीब लगेगा, शायद इसीलिए कहा था।'
उसने अपनी बात पूरी की ही थी कि दरवाजे के बाहर
से सत्यशरण की आवाज सुनाई दी।
'भैया, तुम यहां हो ? और मैं तुम्हें होटल तक खोज
आया।
यतिश्वर चौंक उठे, 'खोज आए ! क्यों ?'
'अरे, वाह ! यह नयी खबर जो देनी थी, और क्यों ?
तुमने क्या सारा कांड सुना नहीं ?'
यतिश्वर जाने क्या जवाब देने जा रहे थे कि अचानक उन्हें
स्तंभित करते हुए, उनकी वात छीनकर बेहद सहज स्वर में
निवेदिता ने कहा, 'अब रहने भी दो! तुम्हारी नयी खबर की
तारोफ अव होने से रही। यतिश्वर बाबू
के अचानक आने
का कारण मालूम है ? वह यह कहने आए थे कि कल वह
कोणार्क नहीं जा सकेंगे ।' आज रात ही उन्हें कलकत्ता वापस
लौटना है।'
'अरे...!'
७४ 0 रेत का वृन्दावन

'अरे क्या ? मैं भी सुनकर अचकचा गई थी। मैंने मन ही मन सोचा-बाप रे, यह सब क्या ? लगता है, हम लोग कोई नजरबंद आसामी है और ये साहब पुलिस-अफसर । सचमुच, अजीव संयोग है !' सत्यशरण ने पसीने में तर-ब-तर कमीज उतारते हुए कहा, 'चलो, अच्छा ही हुआ। लेकिन भई, तुम्हारा चक्कर क्या है ? बीवी-बच्चे कुछ भी तो नहीं हैं। किसको जरूरत आन पड़ी?' यतिश्वर ने बमुश्किल जवाव दिया, 'कल कालेज की वोर्ड मीटिंग है । आज ही खबर मिली।' निवेदिता ने जल्दी-जल्दी काम निपटाते हुए कहा, 'अरे, कहते हैं न "भगवान"भगत के राखनहार ! अकेले-अकेले इतना सारा ताम-झाम समेटकर कैसे पहुंचोगे, अकेले टिकट- विकट कैसे कटाओगे, ट्रेन कैसे पकड़ पाओगे—यह सब सोच- सोचकर तुम परेशान हो रहे थे न, भगवान ने मददगार भेज दिया । आप एक काम कीजिए यतिश्वर बाबू, आपका जी सामान-बामान है, सब ले-बेकर शाम को यही चले आइए- यहां से एकसाथ ही..' सत्यशरण ने भी खुमी-बुगी उसकी बात की हिमायत करते हुए कहा, 'हां-हा, ठीक । यही ठीक होगा! देखा न भया, हमारी गिन्नी कमी चालाक है, अपनी मुविधा के लिए उनकी बुद्धि कितनी तेज दौड़ती है !' यूं सचमुच, सत्यशरण चिंता के मारे परेशान थे। इसी परेशानी की वजह ही तो वह यतिस्वर के पास यह कहने को दौड़े गए थे कि वह उन लोगों को स्टेशन तक रेत का वृन्दावन ०७५ छोड़ आएं । यह तो वहुत ही अच्छा हुआ। । गिन्नी की चालाक बुद्धि का परिचय पाकर, आनंद में डूबे हुए सत्यशरण सफर के समय खुद ही एक मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव कर बैठे। उन्होंने कहा कि टिकट के रुपये, सामान और निवेदिता को लेकर यतिश्वर जरा पहले ही स्टेशन चले जाएं । सत्य- शरण घर में ताला लगाकर, उसकी चावी सौंपने के लिए, घर के मालिक के एक रिश्तेदार के पास 'चटक पहाड़' जाएंगे, फिर वहां से सीधे स्टेशन पहुंच जाएंगे। विल्कुल सीधा-सादा हल था। यतिश्वर ने असहाय होकर कहा, 'उन रिश्तेदार का घर कहां है ? मुझे बता दीजिए, न हो, मैं ही चावी दे आऊंगा। तव तक आप गाड़ी में..." 'ओ, नहीं, नहीं। अच्छा नहीं लगेगा। हमारे लिए वह लोग चौकी, दरी, वाल्टी, चूल्हा-जाने क्या-क्या पहुंचा गए थे, इसके लिए उन्हें धन्यवाद तो दे आऊं। असल में यूं अचानक चले जाने का प्रोग्राम नहीं था न ! मैंने तो सोचा था कि उन सज्जन को एक दिन अपने यहां दावत दूंगा लेकिन ? ७६ ॥ रेत का वृन्दावन

नहीं हो पाया।"तुम गाड़ी की चिंता मत करो। मैं पैदल तो
जा नहीं रहा हूं। एक सायकिल-रिक्शा ले लूगा । लेकिन तुम
लोग वस चल दो।"कहां हो जी, लो, चटपट तैयार हो
जाओ। तुम लोगों को घोड़ा-गाड़ी पर चढाकर, तभी तो
ताला लगाऊंगा।'
निवेदिता ने इशारे से पति को अलग ले जाकर विपन्न लहजे
में कहा, 'अच्छा, तुम में साधारण-सी बुद्धि की भी इतनी
कमी क्यों है, बताओ तो ! तुम अचानक इस तरह का
प्रस्ताव क्यों कर बैठे?'
सत्यशरण ने हड़बड़ाते हुए कहा, 'कैसा प्रस्ताव ?'
'यही-जितना सारा निर्जीव-सजीव सामान था, सब
यतिश्वर बाबू के सिर पर थोपकर, खुद हाथ-पांव काड़कर
मजे में..."
सत्यशरण ने जोर का ठहाका लगाकर कहा, 'ओ, यह
बात है ! सो, तुम उसकी चिंता मत करो। वपना प्रोफेसर
बुरा नहीं मानेगा । असल में बहुत मला लड़का है !'
'हूं, भला होने की वजह से उस भलेमानस को काफी
रेत का वृन्दावन D७७

सुविधा उठानी पड़ रही है । लेकिन मैं 'मेरा मतलव था,
ह क्या बहुत अच्छा लगेगा ? अकेली मैं उनके साथ खट-खट्
करती चली जाऊं, तुम अलग जाओ ? यह क्या शोभन
होगा ?'
सत्यशरण ने फिर एक ठहाका लगाया, 'राम-राम !
इत्ती-सी बात के लिए तुम इतनी परेशान हो रही हो ! नन्ही-
मुन्नी वच्ची हो न ! अरे, कोई कुछ कहकर तो देखे, किसके
सिर पर काल नाच रहा है ?'
'हुंहः वोलने के लिए यहां कोई बैठा नहीं है ! लेकिन
'मान लो, मैं ही उसके साथ भाग जाऊं?'
निवेदिता की छाती तेज-तेज धड़क उठी। उसके चेहरे
का रंग भी अस्वाभाविक रूप से लाल हो आया।
'हां, चाहो तो भाग जाना ! लेकिन जहां भी जाना,
पता-ठिकाना देती जाना !'
सत्यशरण की निगाहों में ऐसा कुछ भी नहीं आया। वह
अपनी ही धुन में फिर एक बार हंस पड़े।
७८ 0 रेत का वृन्दावन

निवेदिता का चेहरा विरक्ति से सिकुड़ आया। मानो पति के
इस बचपने और नासमझी पर वह मुश्किल में पड़ गई हो।
लेकिन उस विरक्ति की छाया तले कहीं एक खुशी की आभा
चमक उठी थी। किसी किशोरी के चेहरे पर जैसे किसी
प्रत्याशित संभावना को रोशनी झिलमिला उटी हो ।
घर से स्टेशन तक का रास्ता आखिर कितना-सा होता
है ? सवारी से जाते हुए, बहुत अधिक हुआ, तो यही कोई
आठेक मिनट ।
लेकिन इत्ती-सी देर में क्या समूची दुनिया एक बार
उलट-पलट नहीं सकती?
लेकिन उलट-पलट की क्या जरूरत है ? यह समूची
दुनिया निश्चिह्न हो सकती है, अगर महासागर के मन में
किसी पागल पुकार का तूफान जाग उठे।
आठ मिनट का समय क्या कम होता है ?
रेत का वृन्दावन Ce

शायद, कम होता हो! हां, हिम्मत जुटाने में ही तो आधा वक्त गुजर जाता phoo tara stone- चलती हुई गाड़ी और तूफानी हवा में, किसी मृदुल उच्छ्वास की तरह, कुछेक शब्दों के टुकड़े सुनाई पड़े, 'जानती हैं, मेरी जिंदगी में ऐसा भयंकर मुहूर्त कभी नहीं आया !' 'भयंकर ! भयंकर किसके लिए ?' निवेदिता मानो अपने में वापस लौट आई और चकित निगाहों से चारों तरफ देखा। वह क्या उन वर्तन-भांड़ों या वक्से-विछौने से ही ताकत बटोरने की कोशिश कर रही थी ? कौन जाने, उसे क्या हो गया था ! यों तो वह हंस रही थी। 'भयंकर नहीं, शोचनीय कहिए ! कर्ता-गिन्नी ने मिल- कर आपको कैसा सबक सिखाया ? उफ ! लेकिन उस समय वाकई मुझे बहुत मज़ा आया। आप शायद मेरी चालाकी ८० रेत का वृन्दावन देखकर बिल्कुल सकते में आ गए थे ! लेकिन जाना विल्कुल पक्का करके ही दम लिया। दोहरे लेकिन मन ही मन डर रही थी निहीं कर जाहिर न कर दें ! कहीं आप मह न रह कलकत्ते लौट रहा हूं, मैं यह कहो तो नहीं कर सचमुच वचा लिया!' यतिश्वर में रुद्ध कंठ से कहा, 'हां. २ नहीं कहा, आपको बचा लिया । तेनिन अब मैं पूछू, आपने मुमते वै वा क्यों नाम मैं क्यों जाऊं आपके साय? अपनी इच्छा खोकर, क्या मेरा यह अवश जानन अवश-सा अपनी ओर खींचकर बार- 'वाह. लाभ नहीं है !' निकविता - तरफ गड़ी थीं। उसने उनी द. आवाज में कहा, 'देखिए न, रिवन, सोबा, दो-चार दिन बादशात्री एकसाथ ही लो! दो बान सहसा वह धीर-गंभीर, सिर गरीव हरकत कर बैठा।

?
लेकिन दुःसाहसिक क्यों ?
तुम्हारा हृदय, अपने हृदय-आलोक में
पल-पल देखा, जाने कितनी वार !
सचमुच, अपने हृदय के आलोक में निवेदिता के भी हृदय
के पल-पल साथी नहीं रहे हैं वह ? यह आलोक भी. उनके
मन में स्वयं निवेदिता ने ही अपने हाथों जलाया था न ?
अत: दुःसाहसिक भला क्यों ?
यतिश्वर के तरंगहीन चिरकुमार जीवन में, जिसने
इतनी सारी अनजान अनुभूतियों का आवेग जगा दिया था,
उसे भी तो इन लहरों के व्याकुल थपेड़े सहने होंगे न ?
लेकिन इन आकुल पुकारों के प्रतिउत्तर से निवेदिता
में कहीं कोई कंपन, कोई सिहरन नहीं हुई। वह तो पागलों
की तरह हंस पड़ो। उसने आहत-अपमानित यतिश्वर को
अपनी निर्मम हंसी की धार से टुकड़े-टुकड़े करते हुए कहा,
'यह क्या बचपना है ! लगता है, आपको कोई बीमारी लग
गई है । सारा कुछ मिट्टी कर दिया।'
'निवेदिता ! ...प्लीज़ 'ऐसे मत हंसो.."
'अरे, अरे, यह क्या हरकत है ! आपकी बातों पर कोई
हंसे विना रह सकता है ?"
और उसने धोरे-धीरे अपना हाथ यतिश्वर के हाथ से
...
छुड़ा लिया।
१२० रेत का वृन्दावन

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छुड़ा लेने के अलावा और राह भी क्या थी ?
उसे न छोड़ती तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ता न !
अगर वह असावधान हो जाती, तो गृहिणी निवेदिता के
अंतर्मन में छुपी हुई असली निवेदिता प्रकट हो जाती । अगर
यह वाकई सच हो जाता, तो उसका अपना ही किया-धरा
सव मिट्टी हो जाता !
गौरव "सम्मान"पद-मर्यादा विश्वास !
लेकिन असली निवेदिता, क्या आज के बाद भी कही
किसी ओने कोने में जिंदा बच जाएगी? वह सचमुच की
निवेदिता, जो खुद किसी चेतना की आड़ में रहकर, गृह स्थिन
निवेदिता को असीम ताकत देती रही है, क्या आज के बाद
कहीं जी पाएगी?
रेत का वृन्दावन ० ८३

शायद अब निवेदिता के रसोईघर में धूल-जाले, तेल की पर्ते
जमती रहें, या भंडार की शीशी-बोतलों पर धूल की मोटी
तह चढ़ जाए, या उसके तकिये के गिलाफों पर तेल के बदनुमा
धवे नज़र आने लगें. लेकिन निवेदिता उदासी और अवसाद
में डूबी हुई, हाथ पर हाथ धरे, चुपचाप बैठी रहेगी।
अचानक वह निःशेष हो जाएगी ! चुकी हुई !
जिन जिम्मेदारियों को
वह
जिंदगी की अनिवार्य शर्त की
तरह, अनायास ही संग-संग लिये फिरती थी, मुमकिन है, अब
वह किसी भारी-भरकम पहाड़ की तरह हो आएं !
निवेदिता के मन में भी हठात् जो वृदावन उभर आया
था, जिसने उसके भीतर सोए हुए प्यार और डूबी हुई साधों
को हिलोर दिया था, जिंदगी की रेत ने उसे सोख लिया।
बच रहा था महज़ रेत का वृदावन !
-
[६२२७८]

Reet Ka Virandawan

Author
Devi Ashapurana
Title
Reet Ka Virandawan
File name
Reet Ka Virandawan
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Poetry
DLI number
552109
Barcode
4990010032834.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
r4xoZ0gMHbC
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