Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

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Prem Chand · 2011/02

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गल्प-समुच्चय
[परिवर्द्धित संस्करण]
सम्पादक
स्व० प्रेमचन्द
वनारस,
सरस्वती प्रेस।

तृतीय सस्करण, जुलाई, १९४१
चतुर्थ सस्करण, नवनर, १६४४
पॉचवॉ सस्करण, फरवरी, १९४५
,
मूल्य-२)
मुद्रक
श्रीपतराय, सरस्वती प्रेस,
बनारस।

प्रामुख आधुनिक गल्प लेखन कला हिंदी में अभी बाल्यावस्था में है, इसलिए इससे पाश्चात्य प्रौढ गल्पों की तुलना करना अन्याय होगा। फिर भी इस थोड़े से काल में हिदी गल्प कला ने जो उन्नति की है, उसपर यह गर्व करे, तो अनुचित नहीं । हिदी में अभी टालस्टाय, चेकाम, श्रो, हेनरी डाडे, मोपास! का आविर्भाव नहीं हुआ है, पर विरवा के चिकने पात देवकर कहा जा सकता है, कि यइ होनहार है। इस सग्रह में हमने चेष्टा की है, कि हिन्दी के सर्वमाय गल्रकारों की रचनाओं की बानगी दे दी जाय । हम कहाँ तक सफल हुए है, इसका निर्णय पाठक और समालोचकगण ही कर सकते हैं। हमें खेद है, कि इच्छा रहते हुए भी हम अन्य लेखकों की रचनाओं के लिए स्पान न निकाल सके, पर इतना हम कह सकते है कि हमने जो सामग्री उपस्थित की है वह हिद गल्प कला की वर्तमान परिस्थिति का परिचय देने के लिए काफी है। इसके साथ ही हमने मनोरजकता और शिक्षा का भी [१] भ्यान रखा है। हमें विश्वास है, कि पाठक इस दृष्टि से भी इस समह में कोई श्रमाव न पायेंगे। गल्प लेखन कला की विषद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। सक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है, जिसमें जीवन के किसी एफ श्रग को या किसी एक मनोमाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य होता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका क्या विन्यास, सब उसी एक भाव का पुष्टी करण करते हैं। उपन्यास की भांति उसमें मानव-जीवन का सम्पूर्ण तथा वृष्द् रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता, न उपन्यास की माति उस में समी रसो का सम्मिश्रण होता है। वह रमणीक उद्यान नहीं, जिसमें माति-भांति के फूल, बेल यूटे सजे हुए हैं, वरन् एक गमजा है, जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है। हम उन लेखक महाशयों के कृतज्ञ है, जिन्होंने उदारता पूर्वक में अपनी रचनाओं के उद्धन करने की अनुमति प्रदान की । हम सम्माद : महानुभाश्रो के मी ऋणी हैं जिनकी बहुमूल्य पत्रिकाओं में से हमने कई गल्पे ली है। प्रेमचन्द

अनुक्रमणिका
पडित ज्यालादत्त शर्मा
पृष्ठ
अनाथ बालिका
९
स्व० जयशकर 'प्रमाद'
मधुश्रा
महाशय सुदर्शन
सयासी
विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक
श्रीप्रेमचन्द
शतरन के खिलाड़ी
नशा
रानी सारन्धा
प्रात्माराम
१०२
श्रीपदुमलाल पुन्नालाल बरसी
झलमला
श्रीमती शिवरानीदेवी
मोती यादें
श्रीजैनेन्द्रकुमार
बाहुबली

( ब )
श्रीसियागमशरण गुप्त
काकी
श्रीचन्द्रगुप्त विशालकार
एक सप्ताह
श्रीभगवतीचरण वर्मा
प्रायश्चित्त
श्रीमती कमलादेवी चौधरी
स्वप्न
२५६
श्री 'अज्ञेय'
शनु
श्रीउपेन्द्रनाथ अश्क'
डाची

पडित ज्वालादत्त शर्मा
आप मुरादाबाद के निवासी हैं । सस्कृत, फारसी और उर्दू के अच्छे ज्ञाता है।
आपने उर्दू के कइ सुविख्यात कवियों पर आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी है । आपकी
वर्णन शैलो और भाषा सरस है।
अनाथ पालिका

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परिहत राजनाथ, एम० डी० का व्यवसाय धारण नहीं है। शहर के छोटे बड़े, अमीर गरीब सभी उनको अपनी बीमारी में बुलाते हैं। इसके कई कारण है। एक तो श्राप साधु पुरुप है , दूसरे बड़े स्पष्ट वक्ता है , तीसरे सदाचार की मूर्ति हैं। चालीस वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी प्रापने अपना विवाह नहीं किया। ईश्वर की कृग से श्रापके पास रुपये और मान की कमी नहीं। अतुल धन और अमित सम्मान के अधिकारी होने पर भी श्राप पड़े जितेन्द्रिय, निरभिमान और सदाचारी है। गोरखपुर में श्रापको डाक्टरी शुरू किये सिर्फ सात वर्ष हुए हैं, पर शहर के छोटे-बड़े सरकी जबान पर राजा-बानू का नाम इस तरह चढ गया है , मानों वे जन्म से ही वहां के निवासी है । श्रापका कद ऊँचा, शरीर छरेरा और चेहरा कान्ति पूर्ण गोरा है। मरीज से बात चीत करते ही उसकी तकलीफ आप कम कर देते हैं। इस कारण साधारण लोग आपको जादूगर तक समझते हैं। श्रापके परिवार में सिर्फ वृद्धा माता है। एक भानजे का भरण पोषण भी पार ही करते हैं। भानजा सतीश कालेज में पढ़ता है। डाक्टर राजा यापू ने अनेक मरीजों से फारिंग होकर श्राज का दैनिक उठाया ही था कि उनक सामने एक ११ १२ वर्ष की निरीह बालिका, श्रीखों में श्रीसू भरे हुए,श्रा खड़ी हुई । डाक्टर साहब समझ गये कि इस बालिका पर कोई भारी विपत्ति पाई है। उन्होंने दैनिक को मेन पर रखकर बड़े स्नेह के साथ पूछा- न 'बेटी, क्यों रोती हो। 'डाक्टर साहब कहाँ है, मैं उनके पास आई हूँ। मेरी मा का बुरा हाल है। 'मैं हो डाक्टर साहव हूँ। तुम्हारी मा को क्या शिकायत है। 'डाक्टर साहब, मेरी मा का बड़े जोर का बुतार चढा है। तीन दिन से १०] गल्प-समुच्चय वह बेहोश थी। आज कुछ होश हुआ है, तो नापको बुलाने के लिए मेजा है। श्राप चलकर देख लीजिए। 'मैं अभी चलता हूँ। तुम घबरानो मत । ईश्वर तुम्हारी मा को नीरोग कर देगा। डाक्टर साहब अपना हेड पेग उठाकर लड़की के साथ पैदल ही चल दिये। लड़की के मना करने पर भी उन्होंने नहीं माना और कहा-तुम्हारा मकान बहुत करीब है। मैं भी प्रात काल से गाड़ी में बैठे बैठे यफ-सा गया हूँ , इसलिए योड़ी दर पैदल चलने की तबियत चाहती है । डाक्टर साहब पेचदार गलियों में निकलते हुए एक बहुत छोटे मकान में दाखिल हुए । मकान की अवस्था देखते ही डाक्टर साहब ने समझ लिया कि इसमें रहनेवालों पर चिरफाल से लक्ष्मीजी का कोप मालूम होता है । उन्होंने मकान के भीतर जाकर देखा कि एक छप्पर के नीचे चारपाई पर लड़की की मा लिहाफ़ श्रोढे लेटी हुई है। आँगन में नीम का एक पेड़ है। उसके पत्तों से आंगन भर रहा है। मालूम होता है कि कई दिनों से घर में झाडू तक नहीं लगाई गई । लड़की ने अपनी मा की चारपाई के पास पहले से ही एक मेंढा विधा रसा था, क्योंकि उसने अपनी मा से सुना था कि कोई भी गरीब श्रादमी डाक्टर साहब के घर से निराश नहीं लौटाया जाता। डाक्टर साहले मूढे पर बैठ गये। लड़की ने मा के कान में जोर से श्रावान दी कि डाक्टर साहब या गये। मा ने मुंह पर से लिहाफ उठाया। यद्यपि बीमारी की तकलीफ के कारण उसके चेहरे पर उदासी छाई थी, तथापि उस उदासी के अन्दर से भी डाक्टर साहब ने उसके हृदय की पवित्रता और मानसिक दृढता की निर्मल किरणों को छनते हुए देखा । उहोंने यह भी जान लिया कि भगवाह के अदृष्ट कोप से यद्यपि यह रोगिणी इस छोटे से मकान में टूटे-फूटे सामान के साथ रहने को विवश कर दी गई , किन्तु एक दिन यह जरूर अच्छे घर और बड़े मामान के साथ किसी सुयोग्य पति के हृदय की अधिकारी रही होगी । रोगिणी की अवस्था ४० वर्ष के कार थी। रोग और गरीबी ने मिलकर उसके मुख-कमल को मलिन करने में कोई कसर न छोड़ी यो, परन्तु उसके चेहरे पर जिस स्वर्गीय शान्ति का श्राधिपत्य या, 'उसे । - , अनाथ बालिका [११ विपत्ति नहीं हटा सकी थी । रोगिणी के शान्ति पूर्ण चेहरे को देखते ही डाक्टर के हृदय में उसके विषय में बड़ी भद्धा उत्पन्न हो गई। उन्होंने अपने स्वभाव- सिद्ध मीठे स्वर से पूछा- 'माजी, आपको क्या तकलीफ़ है ! धीरे धीरे अपनी तबियत का हाल कह सुनाइए।" रोगिणी ने कराहते हुए कहा- 'राजा बाबू तुम दीनबन्धु हो, इसलिए ईश्वर-वत् पूज्य हो। मैं आपसे लजा छोड़कर कुछ कहना चाहती हूँ। श्राशा है, इसके लिए तुम मुझको क्षमा करोगे। ससार में मैंने किसी का एहसान नहीं उठाया , पर मरते समय तुम्हारे एहसान के नीचे मुझे दवना पड़ा। इसलिए इश्वर तुम्हारा यह कहते कहते रोगिणी के नेनों में आंसू भर पाये ! राजा-आधू ने बडी नम्रता से कहा- 'माजी, श्राप तबियत को भारी न कीजिए। मैं आपकी सेवा के लिए तैयार हूँ। आप नि सकोच श्राजा कीजिए , पर पहले रोग का हाल तो कहिए । 'डाक्टर साहब, रोग का हाल कुछ नहीं। समय पूरा हो गया है । श्रम मैं श्रापसे जो कुछ कहना चाहती हूँ, उसे सुन लीजिए । सरला-जो आपके पोछे खड़ी हुई है--मेरी एक मान कया है। यह अब अनाथ होती है। इसको मैं आपके सिपुर्द करती हूँ। इसका विवाह में न कर सकी , इसलिए मुझे प्रापसे इतनी बड़ी भिक्षा मांगनी पड़ी। यह घर के काम काज में होशि- यार है । जो कुछ मैं जानती थी और बता सकती थी, उसकी शिक्षा दे दी है। यह आपकी सेवा करेगी । मुझे पूर्ण प्राशा है कि यह श्रापको प्रसन्न रखेगी। समय आने पर श्राप इसका किसी पढे निग्वे ब्राह्मण-वर के साथ विवाह कर दें। बस मेरी यही प्रार्थना है। और, हाँ, एक पैकट है, जिसमें दो निफाफे हैं। इनको श्राप मेरी मृत्यु पे एक वर्ष बाद जब चाहें पढ़ें। उनमें मेरा परिचय है-जिसको बताने की और श्रापको जानने की इस समय जरूरत नहीं। दूसरों का उपकार करनेवाले सदा सकट में ही रहते हैं। श्राप मी परोपकाररत है; इसलिए श्रापको भी वे वास्ते इन सकटों में पड़ना पड़ा।

१२] गल्प-समुच्चय इस प्रकार कहते कहते उसका गला भर पाया। राजा बाबू ने उत्तर दिया- 'माजी, मैं श्रापकी श्राशा को सहर्ष स्वीकार करता हूँ। मैं श्रापकी कन्या फो सन्तान-वत् रखेगा। मेरे घर में कोई बालक नहीं। माताजी सरला को पाकर यथार्थ में बहुत प्रसन्न होंगी। समय आने पर मैं इसका विवाह भी कर दूंगा , पर आप इतना निरारा क्यों होती हैं। मुझे आशा है, श्राप अच्छी हो जायँगी। इसके बाद डाक्टर साहब ने रोगिणी की नब्ज श्रादि देसी। देखने से डाक्टर साहन को मालूम हो गया कि रोगिणी का रोग विषयक वयान बहुत कुछ ठीक है। उसी दिन शाम को रोगिणी इस समार से चल बसी । ( २ ) विस्मति भी बड़े काम की चीज है। यह न होती, तो मनुष्य का जीवन बहुत बुरा हो जाता । जन्म से लेकर अाज तक हमको जिन-जिन दुखों, क्लेशों और सकटों का सामना करना पड़ा है, वे सब के सब यदि हर समय हमारी श्राखो के सामने खड़े रहते, तो हमारा जीवन भयानक हो जाता। श्रपेली विस्मृति दी उनसे हमारी रक्षा करती है । सरला ने मातृ वियोग को सह लिया। माता की याद धीरे धीरे विस्मृति के गर्भ में छिपने लगी। श्रय उसकी जीवन पुस्तक का एक नया, पर चम- चमाता हुश्रा, पृष्ठ खुला। छोटे से झोपडे से निकलकर अव उसने महल को मात करनेवाले डाक्टर राजाबाबू के मकान में प्रवेश किया। माता की छत्र- छाया उठ गई, हास्टर की वृद्ध माता की गोद का आश्रय मिला, पर उसमें भी उसने वही स्नेह-रस परिप्लुत अभय दान पाया । सरला ने पहले तो कुछ सकोच अनुभव किया , पर अनपूर्ण की ममता- पूर्ण और डाक्टर साहब की स्नेह-भरी वातों ने उसको बता दिया कि वह मानों अपने ही घर में है । डाक्टर साहब ने सरला की शिक्षा का भी समुचित प्रबन्ध कर दिया। सरला मी डाक्टर साहब की यया शक्य सेवा करने लगी। पर नौकरों की - अनाथ बालिका I १३ तरह नहीं, घर के बच्चे की तरह । वह डाक्टर साहब को अपने हाथ से भोजा कराती । सनपूर्णाजी यद्यपि अपने देवोपम पुत्र के लिए स्वय ही भोजन तैयार करती , पर सरला फिर भी उनको कुछ कम सहायना न देती। सरला को धीरे धीरे पाक शास्त्र की शिक्षा मिलने लगी। वृद्धा अन्नपूर्णा के निरीक्षण में निरामिषमोनी डाक्टर साहब के लिए विविध प्रकार के शाक, खीर, हलुमा श्रादि अनेक सु-स्वादु और पौष्टिक पदार्थ वह बनाने लगी। प्रात काल होते ही अनपूर्णा की पूजा का सामान भी वह ठीक कर देती। घर के बगीचे से फूल लाकर सजा देती और चन्दन श्रादि सामग्री यथा-स्थान रख देती। अपनी सेवा और सु स्वभाव से-मतलब यह कि-सरला ने डाक्टर साहन और उनकी वृद्धा माता के हृदय में सतान से बढकर स्नेह पैदा कर लिया। बडे दिन की छुधियों में सतीश घर पाया। उसने देखा कि घर में एक देवी स्वरूपिणी कन्या रहती है। उसके बालोक से उसने माना सारा मकान बालोकित पाया । मामा से पूछने पर उसका मालूम हुआ कि वह भी उनकी एक आत्मीया है और कुछ दिनों तक उनके यहां रहने के लिए चली प्राई है। दो-चार दिन तक पतीश को उसके साथ बातचीत करने में सकोच- मालूम हुआ। उधर सलना सरला भी एक नये श्रादमी के साथ बात-चीत करने में झिझकती रही , पर कुछ ही दिनों में दोनों की तबियतें खुल गई। पिर तो वे पारस में सूब अालाप करने लगे। सतीश ने सरला से कभी उसका परिचय न पूछा , क्योंकि वह मामाजी की बात को वेद भगवान की पात समझता था । न सरला ने ही अपना मत परिचय देने की आवश्यकता समझी। इसमें सन्देश नहीं सिरता की योग्यता, गृहकार्य कुशलता और उसके पवित्रता पूर्ण पाचरण पर सतोश मन से मुग्ध हो गया । सरला भी सतीश के कामों का बड़ा ध्यान रखती । सतीश प्राय देसता कि उसके कपड़े तह किये हुए यथास्थान रखे है, वह अपने पलने की पुस्तकें भी जिनको वह इधर-उधर बिखरी और खुली हुई छोड़ गया था-वा की हुई और चुनी हुई पाता। छुट्टियों के अत्यल्प कान में ही सरला ने उसके हृदय में स्थान कर लिया। उसको न मालूम क्यों हर समय सरला का ध्यान रहने लगा। वह अपने मन से भी इसका कारण कई दफे पूछकर कुछ उत्तर पर ।

१४] गल्प-समुच्चय । सका था। परन्तु वह जाने या न जाने-और जानने की जरूरत भी नहीं- प्रेमदेव की पवित्र किरणों से उसका हृदयाकाश अवश्य ही पालोकित रहने लगा। वह कभी सरला को पढाता-बीसियों नई नई बातें बताता-ओर कमी घण्टों साली इधर-उधर की बातें ही करता। मतलब यह कि दोनों की मैत्री दिन-पर दिन मज़बूत होने लगी। छुट्टियां समाप्त होने पर नब सतीश कालेज को जाने लगा, तब उसे मकान छोड़ने में बडा मीठा दर्द रूप मोह मालूम हुया , पर वह तत्काल सॅमल गया और हमेशा की तरह मामाजी और वृद्धा के चरण छूकर सरला से श्राखो ही श्राखों उसने विदा ली। सतीश सेन्ट्रल हिन्दू कालेज में पढता है। इस वर्ष वह एम० ए० की अन्तिम परीक्षा देगा। सतीश बड़ा धार्मिक है। वैसे तो हर लडके को, जो हिन्दू-कालेज के बोर्डिङ्ग हाउस में रहता है, स्नान ध्यान और धार्मिक कृत्य सम्पादन करने पड़ते हैं , किन्तु सतीश ने अपनी बाल्यावस्था के कुल वर्ष अपने मामा डाक्टर राजा बाबू के साथ काटे हैं। इसलिए, नित्य प्रात काल उठना, सध्योपासन करना और परोपकार के लिए दत्त चित्त रहना उसका स्वभाव-सा हो गया है। सतीश छ वर्ष से इस कालेज में पढ़ रहा है और हर वर्ष परीक्षा में बड़ी नामवरी के साथ पास हो रहा है। सतीश अपने देवी गुणों के लिए सब लड़कों में प्रसिद्ध है। हर एक लडका, किसी न-किसी रूप में उसकी कृपा का पात्र बना है। अनेक कमलोर (शरीर में नहीं पढाई में) लड़कों ने उससे पढा है, अनेक गरीब विद्यार्थियों की उसने अार्थिक सहायता की है। किसी लड़के के रोग ग्रस्त होने पर सहोदरवत् उसने उसकी शुश्रूपा भी की है। इसलिए, कालेज का हर लड़का उसको यही पूज्य दृष्टि से देखता है । सतीश के पासवाले कमरे में राममुन्दर नामक एक लड़का रहता है । वह इस कालेज में पढता है। पर, है सतीश का सहाध्यायी ही। यह लड़का घर का मालदार होते हुए भी विद्या का बड़ा प्रेमी है। इसके पिता का हाल में स्वर्गवास हो गया है और यह बहुत बड़ी सम्पत्ति का मालिक हुमा है। पर, फिर भी, इसने पटना नहीं छोड़ा। सतीश के साथ इसकी यही घनिष्ठता है। सतीश और रामसुदर की प्रकृति अनेक अशों में एक सी है। दो वर्ष से अनाय पालिका [१५ इसी लिए इन दोनों में सुर मित्रता है । अतीय और रामसुन्दर हष्टो के समय माय एक ही बाथ रहते हैं। सतीश और राममुदर एक नाव पर बैठे हुए हैं। नाव पुण्यनीया मागी. रथी में घोरे धीरे मह रही है। प्रीष्म ऋतु की सन्ध्या है । यहा तुभावना दृश्य है। तारों का पिम्प गगाजन में पड़कर अजोय यहार दिसा रहा है। सच तो यह कि इस 'शामा रे सामने 'थामे लखनम कुछ भी चीन नही । नायवाला पड़े मोठे स्वर में कोई गीत गा रहा है। उसकी भावान गगा के तट के श्रद्धा लिफा सम ऊँचे स्थानों में टकराकर मातो कई गुनी होकर वापिस पा रही है। ये दोनों मित्र प्रापठ में सूप धुल घुलकर बातें कर रहे हैं। अन्त में सतीश ने कहा- 'मित्र, तुम्हारा हृदय बहुत विशाल है। इस बात को मैं स्वीकार करता हूँ । जहाँ तक मेरी शक्ति है, मैं तुमको इस पुण्य कार्य में सहायता दूँगा । तीन मास याद फालेज बन्द होगा। उस समय तीन मास से अधिक का नाश मिलेगा। उसमें मैं तुम्हारे साथ रहूँगा , जहाँ तुम चमागे, मैं चलूँगा । जहाँ सफ पता लगेगा, मैं तुम्हारे मनोरप के साफल्य के लिए प्रम न करूँगा। इस समय इस काम को घर के ऊपर छोड़ो । परीक्षा के दिन बहुत कम रह गये हैं। इसलिए सब ओर से मन टापर इसी शोर लगाना चाहिए । परीक्षा से निवृत्त होकर अपनी सब शक्तियाँ उघर लगायेंगे। मैं तुम्हारा साथ दूंगा।' रामसुन्दर-माई सतीश, मुझे तुम्हारा बहुत भरोसा है। पूर्ण श्राशा है कि यदि तुम जैसे परोपकार व्रती और देवोपम मित्र ने प्रयत्न किया तो मेरा यह कार्य-जिसके कारण मेरी निद्रा और मेरी भूख, दोनो नए हो गई है- पसर सिद्ध हो जायगा। तुलसीदासजी ने ठीक ही कहा है- 'यद्यपि जग दारुण दुस नाना। सयतें कठिन जाति अपमाना।' नाव धीरे धीरे किनारे पर आ लगी और ये दोनों नवयुवक उससे उतर- कर कालेज की ओर चल दिये। (४) सरला की माता को मरे दो वर्ष बीत गये। सरला निश्चिन्तता पूर्वक गल्प-समुच्चय डाक्टर-बाबू के यहां रहती है। उसको अपनी माता की याद श्राती है जरूर पर डाक्टर और उनको वृद्धा माता के सद्व्यहार से उसको कोई कष्ट नहीं बल्कि यह कहना चाहिए कि कोई ऐसा सुख नहीं, जो उसको प्राप्त न हो राजा बाबू उसको अपनी ही पुत्री समझते हैं। उसने भी अपने गुणों से उनको खूप प्रसन्न कर रखा है। राजा बाबू ने दो वर्ष बाद उस लिफाफे को खोला, जिसको पढने की आशा सरला की माता, मरते समय दे गई थी। उसमें दो लिफाफे थे। जिस पर नम्बर एक पड़ा था, उसको खोलकर डाक्टर साहय पढने लगे। उसमें 1 लिखा था- . 'श्राप मेरे परम हितैयी हैं । जो ऐसा न होता, तो यह लिफाफा अाप न पढते । अब तक यह कब का प्रग्निदेव रे सिपुर्द हो चुका होता । श्राप मेरी कन्या के सरक्षक है । इस कारण मैं श्रारसे नीचे लिखा वृत्तान्त कहती हूँ। सुनिए- मेरे पति दो भाई थे। पति की मृत्यु के बाद मेरे जेठ ने मुझसे अच्छा व्यवहार न किया। उन्होंने एक दिन क्रोधवश मुझे मकान से निकल जाने तक की आज्ञा दे दी। मेरे पति ने मरते समय बिना विचार किये ही, अपने भाई की श्राशा का पालन करने का श्रादेश मुझे दिया था , इसलिए स्वर्ग- गत पतिदेव की श्राधा का स्मरण करके मुझे अपने जेठ की अत्यन्त अनुचित और अकारण दी हुई श्राजा को शिरोधार्य करना पड़ा। मैं अपनी एक मात्र पन्या को लेकर घर से निकल चली। प्रोफ, कैसी भीषण राति थी ! उस समय के दुख का हाल किसी भले और सामान्य घर की स्त्री के मन से ही पूछना चाहिए । मेरे शरीर पर कुछ प्राभूपण थे । उन्हीं के सहारे मैं कई सौ मील की यात्रा करके यहाँ पाई और एक साधारण सा मकान लेकर रहने लगी। मैने जीवन भर प्रतिष्ठा के साथ अपना और अपनी प्यारी बेटी का पेट पाला । मो 'वान को रखा, जान गवाकर' यस मेरा यही रहस्य है । श्रय यदि श्राप मेरा पूरा परिचय प्राप्त करना चाहें, तो दूसरे लिफाफे को खोलिए । उसमें आपको मेरे जेठ का लिखा हुआ एक रजिस्टर्ड एकरारनामा मिलेगा। उसमें उन्होंने मेरे पति की सम्पत्ति को मेरी सम्पत्ति से अलग, अर्थात् विभऊ बताया अनाथ वालिका [१७ हैं । उसमें मेरे पतिदेव का पूरा पता भी प्रसङ्गश भा गया है । उसको श्राप साधारण कागज न समझिए । उसके द्वारा मेरी एकमान कन्या सरला- 1-ईश्वर उसे सानन्द रखे- एक दिन लाख रुपये से अधिक मूल्यवाली सम्पत्ति की अधिकारिणी बन सकती है , पर मैं नहीं चाहती कि उसका प्रयाग किया जाय । मुझे पूर्ण श्राशा है कि मेरी सरला अपने गुणों के कारण ही बहुत बड़ी सम्पत्ति की अधिकारिणी होगी। अन्त में, मैं आपको हृदय मे श्राशीर्वाद देती हूँ कि ईश्वर नापका भला करें, क्योंकि आपने मेरा और मेरी कया का भला किया है।' हास्टर राजनाथ को पत्र पढकर बड़ा श्राश्चर्य हुआ। वे बहुत देर तक ईश्वरीय माया और मरनेवाली सती की दृढ प्रतिज्ञा पर विचार करते रहे। उन्होंने दूसरा लिफाफा पिना पढे ही अपने बाक्स में बद कर दिया। जब डाक्टर गजनाथ ने सतीश के पन में यह पढा कि वह परीक्षा देकर मकान पर न भायेगा, तब उनको बड़ी चिता हुई । उसका विचार कुछ दिनों इधर उधर घूमने का है। और वचे के लिए पांच सौ रुपये उसने मांगे हैं। राजनाथ ने पांच सौ रुपये का नोट नीचे लिखी चिट्ठी के साथ उसरे पास मेज दिया- प्रिय सतीश, मुझे वहा विस्मय है कि तुम घिर जा रहे हो और क्यों ! माताजी तुमको देखने के लिए बडी व्यग्र हैं , पर मुझे भरोसा है कि तुम किसी अच्छे उद्देश्य से ही जा रहे हो । खच भेजता हूँ। यथासाध्य शीघ लौटना। शुभानुध्यायी- राजनाथ । पांचवे छठे दिन इसका उत्तर भा गया । उसमें लिखा था- 'तूज्य मामाजी, प्रणाम । कृपा पर और ५००) का नोट मिला। मेरे मिन परिडत रामसुन्दर को नाप जानते ही हैं। उनका एक बहुत ही श्रावश्यक कार्य है, जिसमें वे मेरी सहायता चाहते हैं। उस कार्य के लिए इधर उधर घूमना पड़ेगा। मैं श्रापको - १८] गल्प समुच्चय पहिले पन में ही वह कार्य बता देता, जिसके लिए यह तैयारी है , पर उसको गुस रखने के लिए उन्होंने ताकीद कर दी है। अब श्राप यदि पागा दें, तो मैं उनके साथ चला जाऊँ। आपके उत्तर की मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ। सेवक- सतीश। पा को पद कर राजा बाबू कुछ देर तक सोचते रहे। फिर उन्होंने नीचे लिसा हुआ प्रत्युत्तर अपने भानजे को भेजा- 'प्रिय सतीश, मैं बड़ी प्रसन्नता से तुमको अपने मित्र के कार्य में सहायता देने की आशा देता हूँ । सर्च के लिए जिस कदर रुपये की और जरूरत हो, निरसकोच मँगा लेना । यात्रा से लौटते समय अपने मित्र को भी एक दिन के लिए इधर लाना । उनको बहुत दिनों से मैंने नहीं देसा। देखने की तबियत चाहती है। श्राशा है, वे मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे। शुभैषी--- राजनाथ राजा बाघू ने पन समात ही किया था कि सरला ने चांदी की तश्तरी में कुछ तराशे हुए फल उनके सामने रख दिये। राजा-बाबू फल खाते खाते सरला से इधर उधर की बातें करने लगे। गरमी की बड़ी छुट्टियों के ११० दिन ही माकी हैं। सतीश ने श्रवकी यार छुट्टी के तीनों महीने बाहर ही काटे। कल उसकी चिट्ठी श्राई कि वह श्रान रात को रामसुन्दर सहित मकान पहुँचेगा। उसका कमरा साफ़ किया गया है। वृद्धा भावा मी श्राज मड़ी खुशी से भोजन मना रही हैं । सरला के मन की श्रान अद्भुत दशा है । कभी तो वह हर्ष के मारे उछलने लगती है और कमी अगात कारण से उसकी गति और भी कम पड़ जाती है। उसका मुस सरोज घड़ी घड़ी पर इन भावों के प्रस्तोदय के साथ सिजता और मुर- भाता है। उसने यह भी मुना है कि सतीश के साथ उसके मित्र भी आयेंगे, अनाय पालिका १९ नके काम में उसने अपनी सारी दुहिया मर्च की है। सरला मन ही मन उतीश के मित्र पर नाराज भी है, क्योकि उसके पारण ही सतीश की दृष्टियों सेपहप्रायदा ही उठा सकी। सतीश रात ६ पजे की ही से मकान पहुँच गया। राजा याय् उसकी प्रतीक्षा कर ही रहे थे। उन्होंने बड़े प्रेम से राममु दर को भरने पास यिठाया और बड़े थामह से पूछा-'मे श्राशा है, तुम अपनी चेपात्रों में अवश्य सफल हुए होगे।' रामदर निराशा भरी भावान में उत्तर दिया-- 'सपलता का कोई चिठनहीं मिला। भविष्यत् ये लिए कोई आया भी बाकी नहीं रही। इसपर सार साप ने उसे ढाढस देकर उसके चित्त क्षोभ को बहुत कुछ कम कर दिया। सतीश मामाजी के चरण छूकर अन्दर गया। सरलाभ देसते हो उसका मुख कमल खिल उठा । उसने देखा कि उसके काम की हर ची टीक रखी हुई है और पट्टी सारधानता से उसके थाने की याट देसी जा रही है । सरला ने मुस्कराकर, पर ताने फे साथ, पूछा- 'अषकी बार आपने कुल छुट्टियां बाहर ही पिता दो.' 'मि पे काम के लिए यह सब करना पड़ा, पर कोई पल न हुआ। इसके लिए मुझे भी दुख है।" 'आपके मित्र का ऐसा क्या काम या जिसमे लिए तीन महीने इधर- उघर घूमना पड़ा और फिर भी काम न हो सका। 'उस काम का जिक्र करने से भी, सरला, मुझे दुख होता है। इसलिए, धनकर तुम भी दुखी हुए बिना न रह सकोगी। भोजन की बात तो कहो, स्या देर है ? भूत लग रही है। "बिलकुल तैयार है। मैं जाकर नौकर से श्रासन बिछाने के लिए कहती हूँ। आप, मामानी और अपने मित्र को साथ लेकर ग्राइए ।' यह कहकर सरला पड़ी पुरती से चली गई। उसने बड़े करीने से भोजन चुनना शुरू किया। तीन थाली में भोजन चुना गया। जिन चीजों को गरम रखने की जरूरत थी, वेअभी तक गरम पानी में रखी हुई थी, भोजन के साथ नहीं परोसी गई थी। थोड़ी देर में डाक्टर साइव सतीश और राममुदर .

२०] गल्प-समुच्चय के साथ ना पहुँचे। भोजन शुरू हुआ, सरला ने बड़ी होशियारी से परोसना श्रारम्भ किया । भोजन करते समय इधर-उधर की बातें होने लगी- सतीश-मामाजी, स्टेशनों पर बहुत बुरा भोजन मिलता है । भाई राम- सुदर, बलिया के स्टेशन को पूड़ियाँ याद है ! राममुन्दर-और लखनऊ के स्टेशन के 'निखालिस दूध' को तो कमी न भूलिएगा। सतीश-पर तरकारी तो किसी स्टेशन की भूलने की नहीं। डा.सा. -ऐसे मौकों पर तो फल खा लेने चाहिए । सतीश-मामाजी, बड़े स्टेशनों को छोड़कर और स्टेशनों पर पल नहीं मिलते। चातें भी जारी थीं, खाना भी जारी था। सरला का परोसना भी जारी था । रामसुन्दर यद्यपि बातों में योग दे रहा था , पर उसका ध्यान सरला ही की पोर था । यह बार बार उसी को देखता था। उसकी इस हरकत से सतीश को थोड़ी सी भीतर जलन पैदा हुई। मानिनी सरला ने भी मन में कुछ बुरा माना । भोजन सान हुश्रा। रामसुन्दर और सतीश ने एक कण्ठ से कहा- तीन महीने में अाज ही तृप्त होकर भोजन किया है। चलते समय रामसुन्दर ने मुड़कर एक बार फिर सरला को देखा । श्रवकी बार तो सतीश जल ही गया। दोनों मित्र बाहर याये । सतीश को गुस्सा श्रा ही रहा था कि रामसुन्दर की इस बेहूदा हरकत पर उसका लानत मलामत दे कि इतने ही में उसने पूछा- 'भाइ, यह लड़की कौन है ? जब मैं पहले तुम्हारे यहाँ वाया था, तम तो यही यह न थी। मानां सतीश की प्रदीस क्रोधाग्नि पर मिष्टी का तेल पड़ा। उसने बड़ी घृणा के साथ कहा- 'रामसुन्दर, तुम बड़े नीच हो । जव तक खाते रहे, तब तक उसकी ओर घूरते रहे । जर खाकर बाहर प्राये, तब फिर फिरकर उसकी ओर देखा किये। अब तुम्हारी नीचता इतनी बढ़ गई कि मुझसे भी उसी प्रकार के प्रश्न करने लगे। मुझे तुम्हारी नैतिक अरस्था पर बड़ा दुख है।"

इस अनाथ यालिका [१ स्तीश की यह यावाद मुनकर रामगुन्दर को जरा भी झोप न पाया। उसने पहे विनीत माय से कहा- 'भाई साहप, ग्राप क्या कह रहे हैं। जो पुष श्रापो मेरे पाचरण के विषय में कहा, ठीक है , पर यह आचरण सि टि से देखना चाहिए, पर अापने विचार नहीं किया। मैं समगा कि हमारा रोकड़ों मील घर- उघर धूमना बेकार मा। जिसको हमको रानाश थी, यह हमारे ही घर में मौजूद है। मैं सच कहता हूँ कि कई बार मेरे जी में पाया कि अपनी नन्दी को हदय से लगा लू । पाप मामाजी से इसके विषय में पूछिए तो, मेरा हृदय कद रहा है। कार्य सिद्ध हो गया। गड़े हो विस्मय और सलजना के साप रवीश ने पूछा-रामसुन्दर, क्या सच फहते हो, यही तुम्हारी यहिन-नन्दी है। मेरी पवस्या आठ वर्ष की थी, जप प्यारी न ही हमसे जुदा हुई थी। मुझे अय तक उसका चेहरा सूर याद है। यह हँसता हुआ स्वर्गीय कान्ति- पूर्ण चेहरा, आज भी मेरी श्राखों पे सामने फिर रहा है। सरला से उसका चेहरा बहुत मिलता है। मुझे सूब याद है, उसके गाल पर दा छाटे छोटे स्यार तिल ये । मरला के चेहरे पर भी वैसे ही है। चलो, मामाजी से इसके विषय में पूछ-ताछ करें। दोनोरि तत्काल डाक्टर साहब के कमरे में आये। डाक्टर साहय श्राराम कुसी पर लेटे कोई व्यवसाय सम्धी पुस्तक पढना ही चाहते थे कि ये दोनों वहाँ पहुँच गये। उन्होने कहा- 'सतीश, अब भागम करो। बहुत थके हो।' सतीश ने धीरे से कहा-मामाजी, रामसु दर सरला के विषय में वापसे कुछ पूछना चाहते हैं? डाक्टर साहब ने भाव-पूर्ण दृष्टि से रामसुन्दर को देसा, जिसका चेहरा हर्ष और विस्मय के मिले हुए भाव से एक विशेष प्रकार का श्राकार धारण कर रहा था। डाक्टर साहब ने कहा- 'सरला के विषय में श्राप क्या और क्यों पूछना चाहते हैं।"

२२ ] गल्प समुधय रामसुन्दर बड़े विनीत भाव से बोला- 'मामाजी ! आज मैं अपने घर का एक रहस्य सुनाता हूँ।' उसी के विषय में मैं और भाई सतीश, इधर उधर सैकड़ों मील घूमा किये । मगर सफलता तो क्या, उसके चिह तक भी नहीं मिले। श्रय मैं उस रहस्य को सुनाता हूँ। मेरे पिता दो भाई ये-रामप्रसाद और शिवप्रसाद । रामप्रसादली मेरे पिता थे। शिवप्रसादजी के एक कन्या थी, जिसको घर के लोग स्नेहवश नन्हीं कहा करते थे। वह मुझसे छ वप छोटी थी। मेरे चाचा-नन्हीं के पिता का देहान्त मेरे पिता के सामने ही हो गया था । मेरी चाचीजी का स्वभाव बड़ा उग्र था। वे अपनी श्रान की बड़ी पकी थीं। एक दिन मेरे पिता ने किसी घरेलू बात पर गुस्सा होकर उनसे घर से निकल जाने की बहुत ही बुरी यात कह दी। उसके लिए उनको सदा पश्चात्ताप रहा। और इस बड़े भारी फलक को साथ लिये ही उन्होंने इह-लोक परित्याग किया । मेरी चाची ने उसी रात को घर छोड़ दिया। नन्हीं को भी वे साथ ले गई । मेरे पिता ने बहुत तलाश की, पर पता न लगा। मरते समय उन्होंने मुझको अन्तिम वसीयत के तौर पर यही कहा कि जिस तरह हो, अपनी चाची और बदिन का पता लगाना । यदि पता लग जाय, तो उनकी सम्पति मय उस दिन तक के सूद के उनको दे देना। इस तरह मेरी प्रात्मा के फलक घोने की चेष्टा करना । मेरा गया श्राद्ध इसे ही समझना । यदि पता न लगे, तो तू भी विवाह मत करना। अपने शरीर के साथ ही वश की समाप्ति कर देना , क्योंकि इस क्लक पे साथ वश वृद्धि करना मानो क्लक निदा रखना है। बेटा, वशनाश ही इस पाप का एक छोटा सा, पर भयानक प्रायश्चित्त है। श्राशा है, तुम इस प्रायश्चित्त द्वारा, मेरे कारण अपने वश पर लगे इस कलक से उसको मुक्त करने का-सरूरत हुई तो-सुप्रयत्न करोगे।' यह कहते-करते मेरे पिता के प्राण पसेरू उड़ गये। उनकी मत्यु के बाद से ही मैं व्यग्र था कि इस विषय में मैं क्या करूँ। भाई सतीशचन्द्र से मैंने अपना रहस्य खोलकर कह दिया था और इन्होंने सदा की तरह मेरे इस दुस में भी भाग लेना स्वीकार कर लिया था। अब जैसा कि आपको मालूम है, हम लोग सैकड़ों मील का चक्कर और न मालूम किन-किन मुसीबतों को । अनाथ वालिका [२ मलकर वापिस ना गये और कार्य सिद्धि न हुई। पर, यहाँ श्राकर--यह सरला को देखकर--मेरी अतरात्मा बार बार यह कह रही है, कि यही मेर बहन नन्हीं है। अब श्राप कृपा करके यह पतलाइए कि सरला के विषय मेरी जो यह धारणा है, उसको श्राप अमूलक तो नहीं समझते । डाक्टर साहब ने बड़ी शान्ति से उत्तर दिया- 'रामसुदर, मैं इसके उत्तर में स्वयं कुछ न कहकर तुमको वे पन दिये देता हूँ, जो सरला की माता ने मरते समय सरला के साथ ही मुझे सिपुर्द क्येि थे। मुझे प्रतीत होता है कि तुम अपनी चेष्टानों में सफल हुश्रा चाहते हो।' क्टर साहब ने बाक्स खोलकर वे दोनों लिफाफे रामसुदर के हाथ में दे दिये, जो सरला की माता ने उनको दिये थे। रामसुन्दर ने दोनों लिफाफों को सोलकर पढा । उनको पढते ही उसको निश्चय हो गया कि उसकी चाची का ही यह पत्र है और उसके पिता का ही वह इकरारनामा है। सरला मी प्यारी नहीं के सिवा और कोई नहीं। रामसुन्दर डाक्टर वायू के चरणों पर गिर पड़ा भोर सतीश, जो इस अभिनय को देखकर आश्चर्य में डूब रहा था, उठकर बाहर चला गया। डाक्टर बाबू ने सरला को चुनाया। वह तुरन्त श्राकर उपस्थित हो गई। रामसुदर भावावेश को न रोक सका और सरला को हृदय से लगाकर अनुवर्षण करने लगा। यदि डाक्टर बाबू सरला से यह न कहते, तो वह अपने को बडो विपत्ति में समझती- 'बेटी, ये तुम्हारे भाई रामसुन्दर हैं । तुम्हारी तलाश में बहुत दूर तक घूम आये हैं। तुम उस दिन कहती थी कि तुम्हारी माता तुमसे कभी-कभी निक किया करती थी कि सरला, तुम्हारे एक भाई है। वह अवश्य एक दिन तुमको मिलेगा। श्राज तुम्हारी स्वर्गीया माता की भविष्यवाणी पूरी हुई ।' . चार मास के बाद डाक्टर राजनाय ने नीचे लिखा हुना निमत्रण पन अपने मित्रों के नाम मेजा- 'प्रिय महोदय, मेरे भानजे श्रीसतीशचन्द्र विद्यानिधि, एम० ए० का विवाह जौनपुर के २४] गल्प-समुच्चय सुप्रसिद्ध रईस स्वर्गीय पण्डित शिवप्रसादजी की कन्या के साप धोना निश्चित हुआ है। आपसे प्रार्थना है कि वसन्त-पचमी के दिन शाम को मेरे निवास- स्थान पर पधारकर भोज में सम्मिलित हुजिए और दूसरे दिन प्रात काल ६ बजे की ट्रेन से पारात में सम्मिलित होकर मेरी मानवृद्ध कीजिए। निवेदक-- राजनाथ कहने की जरूरत नहीं कि सरला का विवाह सतीश के साथ बड़ी धूम- घाम से हो गया। रामसुन्दर ने उसकी कुल समत्ति दहेन में सरला के अर्पण कर दी। श्राज तक रामसुन्दर और सतीश मित्रता के ही नपरदस्त पाश में बद्ध थे। अब वे मिनता और श्रात्मीयता के डवल पाश में बेतरह जकड़ गये!

जयशकर प्रसाद स्व० श्रीजयशकर 'प्रसाद का जन्म 'मुंपनी साहु' नामक एक प्रतिष्ठित तथा धनी वैश्य परिवार में १८८९ ई० में हुआ था। प्रसादजो ने अप्रजो की ८ चे दर्जे तक को शिक्षा घर पर पाई। १५ वर्ष की आयु में ही वे लिसने लगे थे। प्रथम उनको एक कविता १९०६ ई० में 'भारतेन्दु' में प्रकाशित हुई थी। प्रसादजी ने नवीन युग का द्वार हिन्दी में सोला था। वे कविता की नवीन धारा के प्रवर्तक और उसके सर्वमान्य श्रेष्ठ कवि थे। हिन्दी के नाटक साहित्य में उनकी देन सबसे अधिक है और वे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ नाटककार के रूप में भी विख्यात है। कथा-साहित्य भी उनसे कीर्तिवान् बना है। १९११ से, जब हिन्दी के अपने मौलिक कहानी लेखक नहीं थे, तबसे उसके भाण्डार को उन्होंने भरा है। साहित्य के इन विविध अगों की पूर्ति के साथ साथ उन्होंने साहित्य तया खोज सम्बन्धी नियन्ध भी लिख हैं, जिनका स्थान साहित्य में बहुत ऊँचा है। मधुश्रा - 'श्राज सात दिन हो गये पीने की कौन कह, छुमा तक्त नहा । बाज सातवा दिन है सरकार। 'तुम झूठे हो । अभी तो तुम्हारे कपड़े से महक पा रही है।' 'वह वह तो कई दिन हुए। सात दिन से ऊपर-कई दिन हुए- अँधेरे में बोतल उड़ेलने लगा था। कपड़े पर गिर जाने से नशा भी न पाया। और आपको कहने का, क्या कहूँ सच मानिए । सात दिन-ठीक सात दिन से एक बूंद भी नही । ठाकुर सरदारसिंह हँसने लगे। लखनऊ में लड़का पढता था। ठाकुर साहब भी कभी कभी वही श्रा जाते । उनको कहानी सुनने का चसका था। खोजने पर यही शराबी मिला। वह रात को, दोपहर में, कभी-कभी सबेरे भी श्रा जाता । अपनी लच्छेदार कहानी सुनाकर ठाकुर का मनोविनोद करता । ठाकुर ने हँसते हुए कहा-तो प्राज पियोगेन! 'झूठ कैसे कहूँ। आज तो जितना मिलेगा, सबकी पिऊँगा । सात दिन चने चवेने पर बिताये किस लिए! 'अद्भुत ! सात दिन पेट काटकर, श्राज अच्छा भोजन न करके तुम्हें पीने की सूझी है । यह भी 'सरकार : मौज प्रहार की एक घडी, एक लम्वे दु प पूर्ण जीवन से अच्छी है। उसकी खुमारी में रूग्वे दिन काट लिये जा सकते हैं । 'अच्छा, नाज दिन भर तुमने क्या क्या किया है । 'मैने ! अच्छा सुनिए-सवेरे कुहरा पड़ता था। मेरे धुसे कम्बल-सा वह भी सूर्य के चारों ओर लिपटा था। हम दोनों मुंह छिपाये पड़े थे।' ठाकुर साहव ने हँसकर कहा-अच्छा, तो इस मुँह छिपाने का कोई कारण ! 'सात दिन से एक घूद भी गले न उतरी थी। भला मैं कैसे मुंह दिखा सकता था । और जब बारह बजे धूप निकली, तो फिर लाचारी यो। उठा, हाय मुँह धोने में जो इख हुमा सरकार, वह क्या कहने की बात है ! पास , मधुआ [२७ में पैसे पचे थे। चना घसाने से दात माग रहे थे। क्ट कटी लग रही थी। पराठेवाले के यहाँ पहुँचा, धीरे धीरे साता रहा और अपने को संकता भी रहा। फिर गोमती किनारे चला गया। घूमते-घूमते अंधेरा हो गया, यूद पड़ने लगी। तर कदी मागा और आपके पास धा गया।" 'प्रचा, जो उस दिन तुमने गड़ेरियेपाली कहानी सुनाई यी, जिसमें श्रारफुदोला ने उसकी लड़की का अांचल भुने हुए मुद्दे पे दानों के बदले, मोतियों से भर दिया था, वह क्या सच है ? 'सच ! परेषा गरीष लड़की भाव से उसे चाकर थू थू करने लगी! रोने लगी। ऐसी निदय दिल्लगी बड़े लोग कर ही बैठते हैं । मुना है, श्रीराम- चन्द्र ने भी हनुमानजी से ऐसी हो । ठाकुर साइप ठठाकर हँसने लगे। पेट पकड़कर हँसते हँसते लोट गये। सास बटोरते हुए समलार बोले-और बड़प्पन कहते क्सेि हैं ? गाल तो कगाल ! गधी लहकी | मला उसने कभी मोती देसे थे, चबाने लगी होगी। मैं सच कहता हूँ, अाज तक तुमने जितनी कहानियां सुनाई, सर में बड़ी टीस थी। शाहनादों के दुखड़े, रग-महल की अभागिनी बेगमों के निप्पल प्रेम, करण-कथा और पीड़ा से भरी हुई कहानियां ही तुम्हे पाती हैं, पर ऐसी हँसानेवाली कहानी और सुनायो, तो मैं तुम्हें अपने सामने ही पढिया शराब पिला सकता हूँ। 'सरकार! बूढा से सुने हुए वे नवाबी के सोने से दिन | अमीरों की रंग रेलिया ! दुखियों की दर्द भरी 'प्राहे ! रग महलों में घुल-घुलकर मरने वाली बेगमें अपने श्राप सिर में चकर काटती रहती हैं। मैं उनकी पीड़ा से रोने लगता हूँ। श्रमीर कगाल हो जाते हैं । बड़े बड़े घमण्ड चूर होकर धूल में मिल जाते हैं। तय भी दुनिया यही पागल है। मैं उसको, पागलपन का भूलने के लिए शराब पीने लगता हूँ--सरकार ! नहीं तो यह बुरी बला कौन अपने गले लगाता ! ठाकुर साहब ऊँपने लगे थे। अँगीठी में कोयना दहक रहा था। शराबी सरदी से ठिठुरा जा रहा था। वह हाथ सेक्ने लगा । सहसा नींद से चक्कर ठाकुर साहम ने कहा- - २८] गल्प-समुच्चय अच्छा जानो, मुझे नींद लग रही है । वह देखो, एक रुपया पड़ा है, उठा लो । लल्लू को भेजते जायो । शराबी रुपया उठाकर धीरे से सिसका। लल्लू था ठाकुर साहब का जमादार | उसे खोजते हुए जब वह फाटक पर की बगलवाली कोठरी के पास पहुँचा, तो उसे सुकुमार कण्ठ से सिसकने का शब्द सुनाई पड़ा। वह खड़ा होकर सुनने लगा। 'तो सूअर ! रोता क्यों है ? कुँअर साहब ने दो ही लात न लगाई है ! कुछ गोली तो नहीं मार दी:-कश स्वर से लल्लू बोल रहा था , किन्तु उत्तर में सिसकियों के साथ एकाघ हिचको ही सुनाई पड जाती। अन और भी कठोरता से लल्लू ने कहा--मधुश्रा ! जा सो रह ! नजरा न कर, नहीं तो उठूगा तो खाल उधेड़ दूंगा ! समझा न ! शगवी चुपचाप सुन रहा था। बालक की सिसकी और बढने लगी। फिर उसे सुनाई पड़ा-ले, श्रव भागता है कि नहीं ! क्यों मार खाने पर तुला है? भयभीत यालक बाहर चला आ रहा था। शराबी ने उसके छोटे से सुन्दर गोरे मुँह को देखा। श्रीसू की पूदें दुलक रही थीं। बड़े दुलार से पोछते हुए उसे लेकर वह फाटक के बाहर चला पाया। दस यज रहे थे। पड़ाके की सरदी। दोनों चुपचाप चलने लगे। शराबी की मौन सहानुभूति का उस छोटे से सरल हृदय ने स्वीकार कर लिया। वह चुप हो गया । अभी वह एक तग गली पर रुका था कि बालक के फिर से सिसकने की उसे श्राहट लगी। वह भी झिड़कर बोन उठा- 'श्रय क्या रोता है रे छोकरे ।। मैंने दिन भर से कुछ खाया नहीं। 'कुछ खाया नहीं , इतने मड़े अमीर के यहाँ रहता है और दिन भर तुझे साने को नही मिला " 'यही तो मैं कहने गया था जमादार के पास , मार तो रोज़ ही साता हूँ। श्राज तो साना ही नहीं मिला । कुअर साक्ष्य का प्रोपरकोट लिये खेल में दिन-भर साय रहा। सात बजे लौटा, तो और भी ९ मजे तक कुछ काम मधुआ [२९ करना पड़ा। बाटा रस नहीं सका था। रोटी बनती तो कैसे। जमादार से कहने गया था। भूख की बात कहते कहते बालक के ऊपर उसकी दीनता और भूस ने एक साथ ही जैसे अाक्रमण कर दिया। वह फिर हिचकिया लेने लगा। शराबी उसका हाथ पकड़कर घसीटता हुअा गली में ले चला। एक गन्दी कोठरी का दरवाजा सोलकर बालक को लिये हुए वह भीतर पहुंचा। टटोलते हुए सलाई से मिट्टो की ढेबरो जलाकर वह फटे कम्बल के नीचे से कुछ खोजने लगा। एक पराठे का टुकड़ा मिला। शराबी उसे बालक के हाथ में देकर बोला-नब तक तू इसे चबा, मैं तेरा गढा भरने के लिए कुछ और ले श्राऊँ-सुनाता है रे छोकरे । रोना मत, रोयेगा तो खूब पीटू गा! मुझसे रोने से बड़ा और है । पाजी कहीं का, मुझे भी रुलाने का शराबी गली के बाहर भागा। उसके हाथ में एक रुपया था। बारह श्राने का एक देसी श्रद्धा और दो श्राने का चॉप दो आओ की पकौड़ी, नहीं नहीं मालू-मटर अच्छा, न सही। चारों श्राने का मास ही ले लूंगा, पर यह छोकरा ! इसका गढ़ा जो भरना होगा, यह कितना खायगा और क्या खायगा ! श्रोह ! आज तक तो कभी मैंने दूसरों के खाने का सोच किया ही नहीं। तो क्या ले चलूँ । पहले एक श्रद्धा ही ले । इतना सोचते-सोचते उसकी आँखो पर बिजली के प्रकाश की भनक पड़ी। उसने अपने को मिठाई की दुकान पर खड़ा पाया। वह शराब का श्रद्धा लेना भूलकर मिठाई पूरी सरीदने लगा । नमकीन लेना भी न भला । पूरे एक रुपये का सामान लेकर वह दूकान से हटा । जल्द पहुँचो के लिए एक तरह से दौड़ने लगा । अपनी कोठरी में पहुंचकर उसने दोनों की पात बालक के सामने सजा दी। उसकी सुगन्ध से बालक के गले में एक तरह की तरावट पहुँची। वह मुस्कराने लगा। शराबी ने मिट्टी की गगरी से पानी उड़ेलते हुए कहा-नटखट कहीं का, हँसता है ! सोधी वास नाक में पहुँची न ! ले, खूप हूँसकर खा ले, और रोया कि पिटा। दोनों ने बहुत दिन पर मिलनेवाले दो मित्रों की तरह साथ बैठकर मर-पेट ३०] गल्प-समुख्य खाया । सीली जगह में सोते हुए यानक ने शराबी का पुराना बड़ा कोट श्रोड लिया था। जब उसे नीद श्रा गई, तो शरायी भी कम्बल तानकर बड़बड़ाने लगा-सोचा था, आज सात दिन पर भर पेट पीकर सोऊँगा , लेकिन यह छोटा-सा रोना पाजी, न जाने कहा से श्रा धमका! एक चिन्तापूर्ण पालोक में श्राज पहले परन शराबी ने खि सोलकर, फोठरी में विसरी हुई दारिद्रय की विभूति को देखा और देखा उस घुटनों से तुडी लगाये हुए निरीह बालक को । उसने तिलमिलाकर मन ह'-मन प्रश्न क्यिा-किसने ऐसे सुकुमार फूलों को कष्ट देने के लिए निर्दयता की सृष्टि की १ श्राहरी नियति ! तब इसको लेकर मुझे घरबारी बनना पड़ेगा क्या । दुर्भाग्य 1 जिसे मैंने कभी सोचा भी न था। मेरी इतनी माया-ममता--जिस पर श्राज तक केवल बोतल का ही अधिकार था इसका पक्ष क्यों लेने लगी ? इस छोटे से पाजी ने मेरे जीवन के लिए कौन सा इन्द्रजाल रचने का बीडा उठाया है। तब क्या करूँ १ कोई काम करूँ? कैसे दोनों का पेट चलेगा ? नहीं, भगा दूंगा इसे आस तो सोले ! बालक अंगड़ाई ले रहा था। उठ बैठा। शराबी ने कहा-ले, उठ, कुछ खा ले । अभी रात का यचा हुश्रा है, और अपनी राह देख ! तेरा नाम क्या है रे? बालक ने सहज हँसी हँसकर कहा-मधुश्रा। भला हाय मुँह भी न धोऊँ, म्वाने लगूं ! और जाऊँगा कहाँ ? 'श्राह ! कहाँ बताऊँ इसे कि चला जाय ! कह दूं कि भाड़ में जा, किन्तु यह अाज तक दुस की मट्ठी में जलता हो तो रहा है। तो वह चुपचाप घर से भलाकर सोचता हुआ निकला-ले पाजी, अय यहाँ लौहूँगा ही नहीं। तू ही इस कोठरी में रह । शरावी घर से निकला | गोमती किनारे पहुँचने पर उसे स्मरण हुआ कि यह क्तिनी ही बातें सोचता आ रहा था , पर कुछ भी न सोच सका । हाथ- मुँह धोने में लगा। उजली हुई धूप निकल आई थी। वह चुपचाप गोमती - मधुआ [३१ की धारा को देसरहा था। धूप की गरमी से सुखी होकर वह चिन्ता भुलाने का प्रयत्न कर रहा था, कि किसी ने पुकारा- 'भले प्रादमी रहे कहा १ सालों पर दिखाई पड़े। तुमको सोजते खोजते मैं थक गया ।। शरावी ने चोंककर देखा। वह कोई जान पहचान का तो मालूम होता था , पर कौन है, यह ठीक ठीक नहीं जान सका। उसो फिर कहा-तुम्हों से कह रहे है । सुनते हो, उठा ले जायो अपनी सान घरने की कल, नहीं तो सड़क पर फेंक दूंगा। एक ही तो कोठरी, जिसका मैं दो रुपये किराया देता हूँ, उसमें क्या मुझे अपना कुछ रखने के लिए नहीं है। 'श्रो हो । रामजी, तुम हो, भाई मैं तो भूल गया था । तो चलो आज ही उसे उठा लाता हूँ।'--कहते हुए शराबी ने सोचा-अच्छी रही, उसी को बेचकर कुछ दिनों तक काम चलेगा। गोमती नहाकर, रामजी उसका साथी, पास ही अपने घर पर पहुँचा। शराबी को फल देते हुए उसने कहा -ले जाओ, किसी तरह मेरा इससे पिण्ड छूटे। बहुत दिनों पर श्राज उसको कल ढोना पड़ा। किसी तरह अपनी कोठरी में पहुंचकर उसो देखा कि बालक चुपचाप बैठा है। बड़बड़ाते हुए उसने पूछा-श्यों रे, तू ने कुछ सा लिया कि नहीं ? 'भर पेट खा चुका हूँ, और वह देखो तुम्हारे लिए भी रख दिया है। कहकर उसने अपनी स्वामाविक मधुर हँसी से उस रूखी कोठरी को तर कर दिया। शराबी एक क्षण भर चुप रहा । फिर चुपचाप जलपान करने लगा। मन ही मन सोच रहा था-यह भाग्य का सफेत नहीं तो और क्या है? चल, फिर लेकर सान देने का काम चलता करूँ। दोनों का पेट भरेगा। वही पुराना चरखा फिर सिर पड़ा। नहीं तो, दो बातें किस्सा कहानी इधर. उधर को कहकर, अपना काम चना हो लेता था। पर अब तो बिना कुछ किये घर नहीं चलने का। जल पीकर बोला- क्यों रे मधुमा, श्रम कहाँ जायगा ।

३२]
गल्प-समुच्चय
-
'कहीं नहीं।
'यह लो, तो फिर क्या यहाँ जमा गड़ी है, कि मैं खोद खोदकर तुझे
मिठाई खिलाता रहूँगा!
'तब कोई काम करना चाहिए।'
'करेगा।
'जो कहो।'
'अच्छा, तो श्राज से मेरे साथ-साथ घूमना पड़ेगा। यह कल तेरे लिए
लाया हूँ । चल, श्राज से तुझे सान सिखाऊँगा। कहाँ रहूँगा, इसका कुछ ठीक
नहीं। पेड़ के नीचे रात बिता सकेगा न
'कहीं भी रह सकूँगा , पर उस ठाकुर की नौक
न कर सकूँगा।
शरानी ने एक बार स्थिर दृष्टि से उसे देखा। बालक की श्रासें दृढ़
निश्चय की सौगन्ध खा रही थीं।
शराबी ने मन ही मन कहा--बैठे बैठाये यह हत्या कहां से लगी। अब
तो शराब न पीने की मुझे भी सौगन्ध लेनी पड़ी।
वह साथ ले जानेवाली वस्तुओं को बटोरने लगा। एक गट्ठर का और
दूसरा कल का, दो बोझ हुए ।
शराबी ने पूछा-तू किसे उठायेगा ?
'जिसे कहो।
'अच्छा, वेरा बाप जो मुझको पकड़े तो"
'कोई नहीं पकडेगा, चलो अभी । मेरे बाप मर गये !!
शराबी श्राश्चर्य से उसका मुंह देखता हुआ कल उठाकर खड़ा हो
गया । बालक ने गठरी लादी। दोनों कोठरी छोड़कर चल पड़े।

महाशय सुदर्शन भाप पजाय के निवासी है। भाप कई समाचार-पनों का सम्पादन भी कर चुके है। भापका हिदो भौर उर्दू-दोनों छो भाषाओं-पर अधिकार है। आपके गल्प पड़े मनोरजक, शिक्षाप्रद और भाव-पूर्ण होते हैं। आपके गलों के कई समह प्रका- शित हो चुके हैं। आप अच्छे नाटककार भी हैं। आपको दो पार पसाटेक्स्ट-युक कमेटी से पुरस्कार मिल चुके हैं। आपको दौलो यो मर्मस्पशी तथा लालित्य-पूर्ण है। मनोभावों का चित्रण करने में आप निपुण हैं। .

T लखनवाल, जिला गुजरात, का पालू उन मनुष्यों में से था जो गुणों की गुथली कहे जाते हैं। यदि वह गांव में न होता, तो होलियों में झांकियों का, दीवाली पर जुए का, और दशहरे पर गमलीला का प्रबन्ध कठिन हो जाता था। उन दिनों उसे पाने पीने तक की मुधि न रहती और वह तन मन से इन कार्यों में लीन रहता था। गांव में कोई गानेवाला श्रा जाता, तो लोग पालू के पास जाते कि देखो कुछ राग विद्या जानता भी है, या यों ही हमें गवार समझकर हमें धोखा देने आ गया है। पालू अभिमान से सिर दिलाता और उत्तर देता-पालू के रहते हुए तो यह असम्भव है, पीछे की भगवान् जाने । वेवल इतना ही नहीं, वह वासुरी और पड़ा बजाने में भी पूरा उस्ताद था। होर-राम का किस्सा पढने में तो दूर दूर तक कोई उसके जोड़ का न था । दोपहर के समय जब यह पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ऊँचे स्वर से जोगी और सहती के प्रश्नोत्तर पढता, तो सारे गांव के लोग इकट्ठे हो जाते और उसकी प्रशसा के पुल बांध देते । उसके स्वर में जादू था । वह कुछ दिन के लिए भी बाहर चला जाता, तो गाँव में उदासी छा जाती । पर उसके घर के लोग उसके गुणों को नहीं जानते थे। पालू मन ही मन इसपर बहुत कुढता था। तीसरे पहर घर जाता, तो मा ठण्डी रोटियां सामने रख देती। रोटिया ठण्डी होती थी, परन्तु गालियों की भाजी गर्म होती थी , उसपर भावले मीठे तानों से कडवी मिर्चे छिड़क देती थीं, पालू उन मिचों से कभी कभी बिलपिला उठता था, परन्तु लोगों की सहानुभूति मिश्री की डली का काम दे जाती थी। वे तीन भाई थे--सुचालू , बालू और पालू । सुचालू गवर्नमेंट स्कूल गुजरात में व्यायाम का मास्टर था, इसलिए लोग उसे सुचालमल के नाम से पुकारते थे । बालू दूकान फरता था, उसे बालकराम करते थे। परन्तु पालू की रुचि सर्वथा खेल-कूद ही में थी। पिता समझाता, मा उपदेश करती, भाई निष्ठुर दृष्टि से देखते । मगर पालू सुना-अनसुना कर देता और अपने रंग में मस्त रहता।

सन्यासी [३५ इसी प्रकार पालू की श्रायु के ततीय वर्ष बीत गये, परन्तु कोई लड़की देने को तैयार न हुा । मा दुपी होती थी, मगर पालू हंसफर टाल देता और कहता--मैं च्याह करके क्या क्लैंगा! मुझे इस पन्धन से दूर ही रहो दो । परन्तु विधाता फे लेस को कौन मिटा सकता है। पांच मील को दूरी पर डा नामक ग्राम है। यहाँ के एक चौधरी ने पालू को देखा है, तो लट्टू हो गया। रूप रंग में सुदर या, शरीर सुडौल | जात-पात पूछकर उठो अपनी बेटी न्याह दी। पालू के जीवन में पलटा पा गया। पहले यह दिन के बारह घरटे बाहर रहता था और घर से ऐसा पयराता था, जैसे चिड़िया पिंजरे से । पर तु अब वही पिंजरा उसके लिए इनों की वाटिका बन गया, जिससे बाहर पाव रखते हुए उसका चित्त उदास हो जाता था। स्त्री क्या श्राई, उसका ससार बदल गया । श्रय उसे न यांसुरी से प्रेम था, न किस्सों से प्रीति । लेग कहते, यार ! कैसे जोरू दास हो, कभी बाहर ही नहीं निकलवे । हमारे सब साज- समाज उजड़ गये। क्या भाभी कभी कमरे से बाहर निकलने की भी श्रा नहीं देती १ मा कहती, वेटा व्याह सबके होते श्राये हैं , परन्त तेरे सरीखा निर्लज्ज किसी को नहीं देसा कि दिन-रात स्त्री पे पास बैठा ही रहे। पिता उसके मुंह पर उसे कुछ कहना उचित नहीं समझता था, मगर सुनार कह दिया करता था कि जब मेरा ब्याह हुआ था, तब मैंने दिन के समय तीन वर्ष तक स्त्री के साथ बात तक न की थी। पर अब तो समय का रगघी पलट गया है। आज ब्याह होता है, कल घुल घुलकर बातें होने लगती हैं । पालू लाख अनपढ था, परन्तु मूर्स नहीं था कि इन बातों का अर्थ न समझता। पर स्वभाव का बेपरवा था, हँसकर टाल देता। होते होते नौषत यहाँ तक पहुँची, कि भाई-भावजे बात बात में ताने मारने और घृणा की दृष्टि से देखने लगी । मनुष्य सब कुछ सह लेता है, पर अपमान नहीं सह सकता । पालू भी बार-बार के अपमान को देखकर चुप न रह सका । एक दिन पिता के सामने जाकर बोला-यह क्या रोज रोन ऐसा ही होता रहेगा! पिता भी उससे बहुत दुखी था, मल्लाकर बोला- - 125 ३६] गल्प-समुच्चय 'तुम्हारे जैसों के साथ इसी तरह होना चाहिए।' 'पराई बेटी को विष खिला दूँ ? 'नहीं, गले में डाल लो। जगत् में तुम्हारा अनोखा पाह हुया है।' पालू ने कुछ धीरज से पूछा-पाप अपना पिवार प्रकट कर दें। मैं भी तो कुछ जान पाऊँ। 'सारे गांव में तुम्हारी मिट्टी उड़ रही है। अभी बतलाने की बात बाकी रह गई है 'पर मेंने ऐसी कोई बात नहीं की, जिससे मेरी निन्दा हो ।' 'सारा दिन स्त्री के पास बैठे रहते हो, यह क्या कोई थोड़ी निन्दा की बात है ! तुम सुघर जानो, नहीं तो सारी श्रायु रोते रहोगे । हमाग क्या है, नदी- किनारे के रूपव है, आज हैं, कल बह गये , परन्तु इतना तो सन्तोष रहे, कि जीते जी अपने सब पुत्रों को कमाते-खाते देख लिया ।" कहते कहते पिता के नेत्रों में श्रीसू भर पाये। उसकी एक एक बात ऊंची-तुली थी। पालू को अपनी भूल का ज्ञान हो गया, सिर झुकाकर बोला--तो जो कहें वही करने को उद्यत हूँ। इतनी जल्दी काम बन जायगा, पिता को यह श्राशा न थी। प्रसन्न होकर कहने लगा-जो कहूँगा, करोगे ! 'हो करूँगा। 'स्त्री उसके घर भेज दो। पालू को ऐसा प्रतीत हुप्रा मानों किसी ने विप का प्याला सामने रख दिया हो। यदि उसे यह कहा जाता, कि तुम घर से बाहर चले जाओ और एक-दो वर्ष वापस न लौटो, तो वह सिर न हिलाता , परन्तु इस बात से, जो उसकी मूनों की निकृष्टनर स्वीकृति थी, उसके अन्त करण को दारण दुख हुआ। उसे ऐसा प्रतीत हुश्रा, मानों उसका पिता उसे दण्ड दे रहा है और उससे प्रतीकार ले रहा है। वह दण्ड भुगतने को तैयार था, परन्तु उसका पिता इस बात को जान पाये, यह उसे स्वीकार न था। वह इसे अपने ।

सन्यासी [ ३७ लिए अपमान का कारण समझता था, इसलिए कुछ क्षण चुप रहकर उसने कोष से कांपते हुए उत्तर दिया- 'यहन होगा।' 'मेरी कुछ भी परवा न करोगे " 'करूँगा, पर स्त्री को उसके पर न भेजूंगा।' 'तो मैं भी तुम्हें परायठे न खिलाता रहूँगा । फल से किनारा करो ।' जन मनुष्य को क्रोध आता है, तो सबसे पहले जीभ बेकाबू होती है। पालू ने भी उचित-अनुचित का विचार किया और अकड़कर उत्तर दिया- मैं इसी तरह से साऊँगा और देखगा कि मुझे चौरे से कौन उठा देता है। बात साधारण यो , परन्तु हृदय में गांठ बध गइ । पालू को उसको स्त्री ने भी समझाया, मा ने भी , पर उसने किसी की बात पर कान न दिया, और बे परवाई से सबको टाल दिया । दिन को प्रेम के दौर चलते, रात को स्वर्ग वायु के झकोरे श्रावे । पालू की स्त्री की गोद में दो वर्ष का बालक खेलता था, जिसपर माता पिता दोनों न्योछावर थे। एकाएक उजाले में अधिकार ने सिर निकाला। गांव में पिशुचिका का रोग फूट पड़ा, जिसका पहला शिकार पालू की स्त्री हुई। पालू विलक्षण मनुष्य था। धीरता और नम्रता उसके स्वभाव के सर्वथा प्रतिकूल थी । बाल्यावस्था में वह वे परवा था । बे परवाई चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। पाठ आठ दिन घर से बाहर रहना उसके लिए साधा रण बात थी। फिर विवाद हुश्रा, प्रम ने हृदय के साथ पांवों को भी जकष्ट लिया। यह वह समय था, जब उसके नेन एकाएक बाह्य ससार की ओर से बन्द हो गये और वह इस प्रकार प्रेम पाश में फंस गया, जैसे-शहद में मक्खी। मित्र-मण्डली नोंक झोंक करती थी, भाई बधु अाखा में मुसकराते ये, मगर उसके नेन और कान-दोनों बन्द थे । परन्तु जब नी भी मर गई, वो पालू की प्रकृति फिर चचल हो उठी। इस चचलता को न सेल-तमाशे रोक सके, न मनोरसक किस्से कहानियाँ । वह दोनों रास्ते उससे पददलित, किये जा चुके थे। प्राय ऐसा देखा गया है कि पढ़े-लिखे लोगों की अपेक्षा .

३८] गल्प-समुञ्चय अनपढ़ और मूर्ख लोग अपनी टेक का ज्यादा खयाल रखते हैं और इसके लिए तन मन धन तक न्योछावर कर देते हैं। पालू में यह गुण कूट कूटकर भरा हुश्रा था। माता पिता ने दुबारा विवाह करने की ठानी , परन्तु पाल ने स्वीकार न किया और उनके बहुत कहने सुनने पर कहा कि जिस बन्धन से एक बार छूट चुका हूँ, उसमें दुबारा न फैमूगा। गृहस्थ का सुख भोग मेरे प्रारब्ध में न था, यदि होता तो मेरी पहली स्त्री क्यों मरती। अब तो इसी प्रकार जीवन पिता दूंगा , परन्तु यह अवस्था भी अधिक समय तक न रह सकी। तीन मास के अन्दर अन्दर उसके माता पिता-दोनों चल बसे। पालू के हृदय पर दूसरी चोट लगी। मिया फर्म से निवृत्त हुश्रा, ता रोता हुआ पड़ी भावज के पावों में गिर पडा और बोला-अब तो तुम्हीं बचा सकती हो , अन्यथा मेरे मरने में कोई कसर नहीं । भावज ने उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा-मैं तुम्हें पुनों से बढकर चाहूँगी । क्या हुआ, जो तुम्हारे माता-पिता मर गये । हम तो जीते हैं। 'यह नहीं, मेरे बेटे को सँभालो। मैं अब घर में न रहेगा।' उसकी भाभी अवाक रह गई । पालू अब सम्पत्ति बाटने के लिए झगड़ा करेगा, उसे इस बात की शङ्का थी , परन्तु यह सुनकर कि पालू घर पार छोड़ जाने को उद्यत है, उसका हृदय भान द से झूमने लगा। मगर अपने हर्प को छिपाकर बोली- 'यह क्या ! तुम हमें छोड जानोगे, तो हमारा जी यहाँ कैसे लगेगा। 'नहीं, अब यह घर भूत के समान काटने दौड़ता है। मैं यहा रहूँगा, तो जीता न बनूंगा । मेरे बच्चे के सिर पर हाथ रखो । मुझे न धन चाहिए, न सम्पत्ति । में सासारिफ धन्धों से मुक्त होना चाहता हूँ । अब मैं सन्यासी बनू गा। यह कहकर अपने पुत्र सुखदयाल को पकड़कर भावज की गोद में डाल दिया और रोते हुए बोला-इसकी मा मर चुकी है, पिता सन्यासी हो रहा है। परमात्मा के लिए इसका हृदय न दुसाना । बालक ने जय देखा कि पिता रो रहा है, तो वह भी रोने लगा और - सन्यासी [३९ उसके गले लिपट गया, परतु पालू के पाव को यह स्नेह रज्मु भो न पाप सकी। उसने हृदय पर पत्थर रखा और अपने सपा को हद कर लिया। कैठा हृदय वेधक दृश्य था, सापकाल को जप पशु पक्षी अपने अपने पचों पे पास परों को वापस लौट रहे पे, पालू अपने बचे को छोड़कर घर से बाहर जा रहा था। , दो वर्ष बीत गये । पालू की अवस्था में प्राकाश-पाताल का अन्तर पड़ गया। यह पर्वत पर रहता था, पत्थरों पर सोता था, रात्रि को जागता था और प्रति क्षण इश्वर-भक्ति में मग्न रहता था। उसके इस आत्म सयम की, सारे हषीपेश में, धूम मच गई। लोग कहते, यह मनुष्य नहीं देवता है। यात्री लोग जब तक स्वामी विद्यानन्द के दर्शन न कर लेते, अपनी यात्रा को सफल न समभते । उसकी कुटिया यहुत दूर पर्वत की कन्दरा में थी, परन्तु उसके आकर्पण से लोग वहां विचे चले आते थे। उसकी कुटिया में रुपये पैम और पल-मेवे पे ढेर लगे रहते पे , परन्तु वह त्याग का मूर्तिमान रूप उनको श्रोर प्रख भी न उठाता था। दो, इतना लाम अवश्य हुधा कि उनपे निमित्त स्वामीजी पे बीसोचेले बन गये। स्वामीजी के मुखमडल पर तेज बरसता था, जैसे सूरज से किरणे निकलती है। परन्तु, इतना होते हुए भी मन को शाति न थी। यहुधा सोचा करते कि देश-देशान्तर में मेरी भक्ति की धूम मच रही है, दूर दूर मेरे यश के डरे बज रहे हैं, मेरे सयम को देखकर बड़े बड़े महात्मा चकित रह जाते हैं , परन्तु मेरे मन को शान्ति क्यों नहीं । सोता हूँ, तो मुख की निद्रा नहीं पाती, जगता हूँ तो पूजा पाठ में मन एकाग्र नहीं होता । इसका कारण क्या है ? उहे कई बार ऐसा अनुभव हुआ कि चित्त में अशान्ति है , पर वह क्यों है, इसका पता न लगता। इसी प्रकार दो वर्ष व्यतीत हो गये। स्वामी विद्यानन्द की कोत्ति सारे हपोक्श में फैल गई , परन्तु इतना होने पर भी उनका हृदय शान्त न था। प्राय उनके कान में भावान पाती थी कि तू अपने नादर्श से दूर जा रहा है । स्वामीजी बैठे बैठे !क उठते, मानो किसी ने काटा चुमा दिया हो। वार । , ।

- . ४० ] गल्प समुच्चय बार सोचते, परन्तु कारण समझ में न पाता। तब पवराकर रोने लग जाते। इससे मन तो हल्ला हो जाता था , परन्तु चित्त को शान्ति फिर भी न होती। उस समय सोचते-ससार मुझे धर्मावतार समझ रक्षा है, पर कौन जानता है कि यह पाठो पहर श्राग सुलग रही है। पता नहीं, पिछले जन्म में कौन पाप किये थे, जिससे श्रय तक आत्मा को शान्ति नहीं मिलती। अन्त में उन्होंने एक दिन दण्ड हाय में लिया और अपने गुरु स्वामी प्राशानन्द के पास पहुंचे। उस समय वे रामायण की कथा से निवृत्त हुए थे। उन्होंने ज्यों ही स्वामी विद्यानन्द को देसा, फूल की तरह सिल गये। उनको विद्यानन्द पर गर्व था। हँसकर बोले- काहिए, क्या हाल है, शरीर तो अच्छा है । परन्तु स्वामी विद्यानन्द ने कोई उत्तर न दिया, और रोते हुए उनके चरणों से लिपट गये। स्वामी प्रकाशानन्द को बड़ा आश्चर्य हुआ। अपने ससे अधिक मान नीय शिष्य को रोते देसकर उनकी श्रात्मा पर श्राधा सा लगा। उन्हें प्यार से उठाकर बोले-क्यों कुशल तो है ! स्वामी विद्यानन्द ने बालकों की तरह फूट फूटकर रोते हुए कहा- महाराज, में पापण्डी हूँ। ससार मुझे धर्मावतार कह रहा है , परन्तु मेरे मन में अभी तक अशान्ति भरी हुई है। मेरा चित्त श्राठों पहर अशान्त रहता है। जिस प्रकार भलेन्चगे मनुष्य को देखने के कुछ क्षण पश्चात् उसकी मत्यु का समाचार सुनकर विश्वास नहीं होता, उसी प्रकार स्वामी प्रकाशानन्द को अपने सदाचारी शिष्य की बात पर विश्वास न हुश्रा, और उन्होंने व्यग्य से, मानो उनके कानों ने धोखा साया हो, पूछा-क्या कहा ! स्वामी विद्यानन्द ने सिर झुकाकर उत्तर दिया--महाराज, मेरा शरीर दग्ध हो गया है , परन्तु आत्मा अभी तक निर्मल नहीं हुई। 'इससे तुम्हारा अभिप्राय क्या है। 'मैं प्रतिक्षण अशान्त रहता हूँ, मानो कोई फर्चव्य है, जिसे मैं पूरा नहीं रफ रक्षा हूँ।

सन्यासी [४१ इसका कारण क्या हो सकता है, जागते हो।" 'जानता, तो श्रापकी सेवा में क्यों आता !" एकाएक स्वामी प्रकाशानन्द को कोई पात याद भा गई। ये हसकर बोले-तुम्हारी ली है। 'उसकी मृत्यु हो सो सन्यास का कारण हुई यो ।' 'माता" 'वह मीना M "पिता 'वद भी मर चुके हैं। 'कोई यास पच्चा 'ही एक मालक है, वह चार वर्ष का होगा।' 'उसका पालन कौन करता है। 'मेरा माई और उसकी स्त्री।' स्वामी प्रकाशानन्द का मुख मण्डल चमक उठा । हसकर बोले- 'तुम्हारी शान्ति का कारण मालूम हो गया, इम कल तुम्हारे गांव को चलेंगे। विद्यानन्द ने नम्नता से पूछा-- 'मुझे शान्ति मिल जायगी. 'अवश्य , परन्तु कल अपने गांव की तैयारी करो। - पालू के मित्रों में लाना गणपतराय का पुत्र भोनानाय हाडा बड़ा सज्जन पुरुष था । लखनवाल के लोग उसकी सज्जनता पर लट्ट ये । उसे पाल के साय प्रेम था। उसके मन की स्वच्छता, उसका भोलापन, उसकी नि स्वार्यता पर भोलानाय तन मन से न्योछावर था । जब तक पालू लखनवाल में रहा, मोलानाप ने सदैव उसकी सहायता की। वे दोनों जोदड़ के किनारे बैठते, धर्मशाला में जाकर खेलते, मन्दिर में जाकर कथा सुनते । ल ग देखते तो कहते, कृष्ण सुदामा की जोड़ी है । परन्तु कृष्ण के आदर सत्कार करने पर भी ३ ४२] गल्प-समुश्चय जब सुदामा ने वन का रास्ता लिया, तय कृष्ण को यहुत दुख हुश्रा, इसके पश्चात् उनको किसी ने खुलकर हसते नहीं देखा। भोलानाथ ने पालू का पता लगाने की बड़ी चेष्टा की , परन्तु जब यत्न करने पर भी सफलता न हुई, तब उसके पुत्र सुखदयाल को प्रोर ध्यान दिया । प्राय बालकराम के घर चले जाते और सुखदपाल को गोद में उठा लेते, चूमते, प्यार करते, पैसे देते। कभी कभी उठाकर घर भी ले जाते । वहाँ उसे दूध पिलाते, मिठाई सिलाते और बाहर साथ ले जाते । लोगों से कहते- यह अनाप है, इसे देखकर मेरा हृदय वश में नहीं रहता। उनके पैरों की चाप सुनकर सुसदयाल के चेहरे पर रौनक श्रा जाती थी। उसके साथ चाचा-चाची घोर निर्दयता का व्यवहार करते थे। और भोलानाथ का उसे । प्यार करना तो उन्हें और भी बुरा लगता था। प्राय. कहा करते, कैसा निर्दयी श्रादमी है, हमारी कन्याओं के साथ बात भी नहीं करता, कैमी गोरी और सुन्दर हैं, जैसे मक्खन के पेड़े, देखने से भूख मिटती है , परन्तु उसको सुखदयाल के सिवा कोई पसन्द ही नहीं पाता। पसन्द नहीं श्राता, तो न सही , परन्तु क्या यह भी नहीं हो सकता कि कभी-कभी उनके हाथ पर दो पैसे ही रख दे, जिससे मुखदयाल के साथ उसका व्यवहार देखकर उनका हृदय न मुरझा जाय, पर यह यातें भोलानाथ के सामने कहने का उन्हें साहस न होता था। हाँ, उसका क्रोध वेचारे सुखदयाल पर उतरता था , जल नीचे की ओर बहता है । परिणाम यह हुआ कि सुखदयाल सदेव 'उदास रहने लगा। उसका मुख कमल मुरझा गया । प्रेम, जीवन की धूप है, वह उते प्रास न था । जब कभी भोलानाथ अाता, तब उसे पितृ प्रेम के सुख का अनुभव होने लगता था । लोहड़ी का दिन था, साम का समय । बालकराम के द्वार पर पुरुषों की भीड़ थी, बांगन में स्त्रियों का जमघट ! कोई गाती थीं, कोई हँसती थीं, कोई अग्नि में चावल फेंकती थीं, कोइ चिड़वे खाती थी। तीन कन्याओं के पश्चात् परमात्मा ने पुन दिया था। यह उसकी पहली लोहड़ी थी । बालकराम और उसकी स्त्री दोनों आनन्द से प्रफुल्जित थे। बड़े समारोह से त्यौहार मनाया जा रहा था । दस रुपये की मक्की उड़ गई, चिड़वे और रेवड़ी इसके -- । - - सन्यासी [४३ अतिरिक, परन मुखदयाल को और किसी का मी पान न था। यह पर से यादर दीवार के साथ खड़ा लोगों को और जुन्य दृष्टि से देख रहा था कि एकाएक मोलानाथ ने उसके कन्धों पर दाप रण्वकर कहा-सुक्खू ! सूगे धानों में पानी पर गया । सुन्यदयाम ते पुनक्ति होकर उत्तर दिया-चाचा! 'श्राज लोहड़ी है, तुम्हारी ताई ने उन्हें क्या दिया ।" . और क्या दिया । 'और कुछ नहीं। 'और तुम्हारी पहनों को। 'मिठाई भी दी, संगतरे भी दिये, पैसे भी दिये।' भोलानाप के नेत्रा में जल भर भाया । भये हुए स्वर से योजेदमारे घर चलोगे! 'चलूँगा। 'कुछ सायोगे. हो साऊँगा। घर पहुँनकर भोलानाय ने पनी से कदा-इसे कुछ खाने को दो। भोलानाथ की तरह उनकी पत्नी भी मुखदयाल से यहुत प्यार करती थी। उसने बहुत सी मिठाई उसरे सम्मुख रख दी। सुखदयाल रुचि से साने लगा | जय खा चुका, तो चलने को तैयार हुना । भोलानाथ ने कहा- ठहरो, इतनी जल्दो काहे की है। 'ताई मारेगी। 'क्यों मारेगी। 'कहेगी, तू चाचा के घर क्यों था। 'तेरी बहनों को भी मार पड़ती है।" 'नहीं, उन्हें प्यार करती है। भोलानाथ की स्त्री के नेत्र भर पाये। भोलानाथ पोले-जो मिठाई पची है, वह जेब में डाल ले । - ४४] गल्प-समुख्य सुपदयाल ने तृपित नेत्रों से मिठाई की ओर देखा और उत्तर दिया-न। 'क्यों 'ताई मारेगी और मिठाई छीन लेगी। 'पहले भी कभी मारा है" 'हो, मारा है। 'कितनी बार मारा है" 'कई मार मारा है।" 'किस तरह मारा है। 'चिमटे से मारा है। भोलानाथ के हृदय पर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया। उन्होंने ठण्डी सांस भरी और चुप हो गये । सुखदयाल धीरे धीरे अपने घर की पोर खाना हुश्रा , परन्तु उसकी बातें ताई के कानों तक उससे पहले जा पहुँची थी। उसरे मोघ की कोई याद नहीं थी। जब राति प्रधिक चली गई और गली मुहल्ले की स्त्रियां अपने अपने घर चली गई , तो उसने सुखदयाल को पकड़ कर कहा-क्यों वे कलमें है, चाचा से क्या कहता था ? सुग्वदयाल का कलेजा काप गया। डरते डरते बोला-कुछ नहीं फहता था। 'तू तो करता था, ताई मुझे चिमटे से मारती है।' पालकराम पास खड़ा था, प्राधयं से बोला-अच्छा, अब यह छोकरा हमारी मिट्टी उड़ाने पर उतर आया है। सुखदयाल ने आँखों ही आँखो ताक की ओर देखकर प्रार्थना की कि मुझे इस निर्दयी से बचानो , परन्तु वहाँ मोघ बैठा था । श्राशा ने निराशा का रूप धारण कर लिया । ताई ने कर्कश स्वर से काटकर पूछा- 'क्यों, बोलता क्यों नहीं । 'श्रवन कहूँगा। 'श्रवन कहूँगा । न मरता है, न पीछा छोड़ता है। खाने को देते जानो, जैसे इसके याप की जागीर पड़ी है।' यह कहकर उसने पास खड़ा हुआ वेलना उठाया। उसे देखकर सुख .

सन्यासी [४५ दयाल बिलबिला उठा , परन्तु अभी उसके शरीर पर पड़ा न था कि उसकी लड़की दौड़ती हुई भाई और कहने लगी-चाचा पाया है। - मुखदेवी का हृदय काप गया । वह बैठी थी, खड़ी हो गई और बोली- कौन सा चाचा! गुजरातवाला ? नहीं पालू सुखदेवी और बालकराम दोनों स्तम्भित रह गये। जिस प्रकार बिल्ली को सामने देखकर कबूतर सहम जाता है, उसी प्रकार दोनों सहम गये। आज से दो वर्ष पहले जब पालू साधू बनने के लिए विदा शेने पाया था, तब सुखदेवी मन में प्रसन्न हुई थी , परन्तु उसने प्रकट ऐसा किया था, मानों उसका हृदय इस समाचार से टुकड़े टुकडे हो गया है। इस समय उसके मन में भय और व्याकुलता थी , परन्तु मुख पर प्रसन्नता की भनक थी । वह जल्दी से बाहर निकली और बोली-~पाल । परन्तु यहाँ पालू के स्थान में एक साधु महात्मा खड़े थे, जिनके मुख- मएडज से तेज की किरणें झूट फूटकर निकल रही थी । सुखदेवी के मन को धीरज हुआ, परतु एकाएक ख़याल श्राया, यह तो वही है, वही मुंह, वही श्राखें, वही रङ्ग, वही रूप , परन्तु कितना परिवर्तन हो गया है। सुखदेवी ने मुस्कराकर कहा- स्वामीजी, नमस्कार करती है। इतने में बालकराम श्रन्दर से निकमा और रोता हुआ स्वामीजी से लिपट गया । स्वामीजी भी रोने लगे , परन्तु यह रोना दु ख का नहीं, श्रानन्द का था । जब हदय कुछ स्थिर हुआ तो मोला-भाई, तनिक बाल-बच्चों को तो बुलाओ देखने को जी तरस गया। सुखदेवी श्रदर को चली , परन्तु पाव मन मन के भारी हो गये । सोचती यो-यदि बालक सो गये होते, तो कैसा अच्छा होता। सब बाते की रहती । अब क्या करूँ, इस बदमाश सुक्लू के घन इतने मैले है कि सामने करने का साहस नहीं पड़ता । श्राख कैसे मिलाऊँगी। रज में मङ्ग डालने के लिए इसे आज ही पाना या। दो वर्ष बाद पाया है। इतना भी न हुना कि पहले पत्र ही लिख देता।

. - ४६ 1 गल्प-समुच्चय इतने में स्वामी विद्यानन्द अन्दर आ गये। पितृ-वात्सल्य ने लबा को दवा लिया या; परन्तु सुखदयाल और भतीजों के वस्त्र तया उनके रूप र को देखा, तो खड़े फै खड़े रह गये । भतीजिया ऐसी थीं, जैसे चमेली के फूल और सुक्ख, वही सुक्सू जो कभी मैना के समान चहकसा फिरता था, जिसकी बातें सुनने के लिए राह जाते लोग खड़े हो जाते थे, जिसकी नटपटी बातों पर प्यार पाता था, अब उदासीनता की मूर्ति बना हुआ था। उसका मुंह इस प्रकार कुम्हलाया हुआ था, जिस प्रकार जल न मिलने से वृक्ष कुम्हला जाता है । इसके बाल रूखे थे, और मुंह पर दारिद्रय बरसता था। उसके वन मैले कुचले थे, जैसे किसी भिखारी का लड़का हो । स्वामी विद्यानन्द के नेत्रों में मामूला गये। सुसदेवी और बालकराम पर घड़ों पानी पड़ गया, सिसियाने से होकर बोले-पैसा शरारती है, दिन रात धूल में सेलता है । स्वामी विद्यान द सय कुछ समझ गये , पर तु उन्होंने कुछ प्रक्ट नहीं स्यिा और बोले-मैं श्राज अपने पुराने कमरे में सोऊँगा, एक चारपाई डलवा दो। रानि का समय था । स्वामी विद्यानन्द सुक्खू को लिये हुए अपने कमरे में पहुंचे। पुरानी बातें ज्यों की त्यों याद था गई । यही कमरा था, जहाँ प्रेम के पासे सेले ये ! यहीं पर प्रेम के प्याले पिये थे, इसी स्थान पर बैठकर प्रम का पाठ पढ़ा था । यही वाटिका थी, जिसमें प्रम पवन के मस्त झोके चलवे थे। कैसा श्रानन्द था, विचित्र काल था, अद्भुत वसन्त ऋतु भी , जिसने शिशिर के झोंके कभी देसे ही न थे। राज वह वाटिका उजड़ चुकी थी, प्रेम का राज्य सुट चुका था। स्वामी विद्यानन्द के हृदय में हलचल मच गई। परन्तु सुक्खू का मुस इस प्रकार चमकता था, जैते ग्रहण के पश्च त् चन्द्रमा । उसे देसकर स्वामी विद्यानन्द ने सोचा-में कैसा मूर्स हूँ, ताऊ और ताई जब इस पर सख्ती करते होंगे, जब प्रकारण इसको मारने-पीटते होगे; जय इसके सामने अपनी क यात्रों से प्यार करते होंगे, उस समय यह क्या कहता होगा, इसके हृदय में क्या विचार उठते होंगे १- यही कि मेरा पिता नहीं है, वह मर गया, नहीं तो मैं इस दशा में क्यों रहता। यह फूल था जो आज धूल में मिला हुआ है। इसके हृदय में घटकन है, नेत्रा में पास .

सन्यासी [४७ है, मुख पर उदासीनता है । वह चञ्चलता जो बच्चों का विशेष गुण है, इसमें नाम को नहीं। यह 3 जो बालकों की सुन्दरता है, इससे विदा हो चुकी है । यह बाल्यावस्था ही में वृद्धों की नाई गम्भीर बन गया है। इस अनर्थ का उत्तरदायित्व मेरे सिर है, जो इसे यहां छोड़ गया, नहीं तो इश दशा को क्यों पहुँचाता । इन्हीं विचारों में झपकी आ गई, तो क्या देखते हैं कि वही हृषीकेश का पर्वत है, वही कन्दरा। उसमें देवी की मूर्ति है और वे उसके सम्मुख खड़े रो रोकर कह रहे हैं~~-माता, दो वर्ष व्यतीत हो गये, अभी तक शान्ति नहीं मिली । क्या यह जीवन रोने ही में बीत जायगा । एकाएक ऐसा प्रतीत हुश्रा जैसे पत्थर की मूत्ति के होठ हिलते हैं। स्वामी विद्यान द ने अपने कान उधर लगा दिये। भावान भाई-तू क्या मांगता है, यश नहीं, मुझे उसकी पावश्यकता नहीं ।' 'तो फिर जगत् दिसावा क्यों करता है । 'मुझे शान्ति चाहिए। 'शान्ति के लिए सेवा मार्ग की अावश्यकता है। पर्वत छोड़ और नगर में जा । जहाँ दुखी जन रहते हैं, उनके दुख दूर कर । किसी के घाव पर फाक्ष रख, किसी के टूटे हुए मन को धीरज बँधा , परन्तु यह रास्ता भी तेरे लिए उपयुक्त नहीं । वेरा पुन है, तू उसकी सेवा कर । तेरे मन को शान्ति प्राप्त हेगी। यह सुनते ही स्वामीनी के नेत्रों से पर्दा हट गया । जागे तो वास्तविक भेद उनपर खुल चुका था कि मन की शाति कर्तव्य के पालन से मिलती है। उन्होंने सुसदयाल को जोर से गले लगाया और उसके रूखे मुंह को चूम लिया।

विश्वभरनाथ शर्मा कौशिक आप कानपूर के निवासी हैं। आपकी कहानियां प्रायः हिन्दी मासिक पत्रिकाओं में निकलती रहती हैं। 'गत्प-मन्दिर' और 'चित्रशाला'-ये दो सग्रह आपकी कहानियों के प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ दिनों तक मापने 'मनोरजन' मासिक-पत्र का धनी योग्यता से सम्पादन किया। भापकी कहानियों में पहुधा निम्न श्रेणी के चरित्रों का चित्रण होता है। आपकी कला की विशेषता सभाषण है। सभाषणों द्वारा ही भापो कई ड्रामे लिखे हैं । आपका एक उपन्यास धारा-वाहिक रूप में 'सुधा' में निकला था, जो अब पुस्तक रूप में भी छा गया है । ताई 'ताजजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे कहता हुश्रा एक पचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास को ओर दौड़ा। बाबू साहब ने दोनों बाहें फैलाकर कहा-हाँ पेटा, ला देंगे। उनके इतना कहते कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोल-क्या करेगा रेलगाड़ी! बालक बोला-उसमें बैठकर बनी दूल जायेंगे। हम भी जायँगे, चुनी को भी ले जायेंगे । बाबूजी को नहीं ले जायेंगे। हमें लेलगाली नहीं ला देते। तालजी तुम ला दोगे तो तुम्हें ले जायेंगे। यापू-और किसको ले जायगा । बालक दम भर सोचकर बोला-छ, ौल किसी को नहीं ले जायेंगे। पास ही बाबू राम नीदास की श्रद्धांगनी बैठी थीं। बापू साहब ने उनकी ओर इशारा करके कहा- और अपनी साई को नहीं ले जायगा! बालफ कुछ देर अपनी ताई की थोर देखता रहा । ताईजी उस समय कुछ चिढी हुई सी बैठी थीं। पालक को उनके मुख का वह भाव अच्छा न लगा। अतएव वह बोला-ताई को नहीं ले जायेंगे । साईजी सुपारी काटती हुई बोली-अपने ताऊजी हो को ले जा! मेरे ऊपर दया रस। ताई ने यह बात बड़ी साई के साप कही। बालक ताई के शुष्क व्यव- हार को तुरत ताई गया। बाबू साहब ने फिर पूछा-ताई को क्यों नहीं ले जायगा। बालक-ताई हमें प्याल (प्यार) नहीं फलती। याधू--को प्यार करें, तो ले जायण ? बालक को इसमें कुछ सन्देह था। ताई का भाव देखकर उसे यह आशा नहीं थी कि वह प्यार करेंगी। इससे बालक मौन रहा।

-- ५० । गल्प समुच्चय पाबू साहब ने फिर पूछा--क्यों रे, बोलता नहीं ! ताई प्यार करें, तो रेल पर विठाकर ले जायगा ? चालक ने ताऊजी को प्रसन्न करने के लिए केवल सिर हिलाकर स्वीकार कर लिया , परन्तु मुख से कुछ नहीं कहा। बाबू साहब उसे अपनी श्रद्धांगिनीजी के पास ले जाकर उनसे बोले- लो, इसे प्यार कर लो, तो यह तुम्हें भी ले जायगा। परन्तु बच्चे की ताई श्रीमती रामेश्वरी को पति की यह चुहलबाजी अच्छी न लगी। वह तुनककर बोली-तुम्ही रेल पर बैठकर जानो, मुझे नहीं जाना है। बाबू साहब ने रामेश्वरी की बात पर ध्यान नहीं दिया। बच्चे को उनकी गोद में निठाने की चेष्टा करते हुए बोले-प्यार नहीं करोगी, तो फिर रेल में नहीं दिठावेगा। क्यों रे मनोहर ! मनोहर ने ताऊ की बात का उत्तर नहीं दिया । उधर ताई ने मनोहर को अपनी गोद से ढकेल दिया। मनोहर नीचे गिर पड़ा। शरीर में चोट नहीं लगी, पर हृदय में चोट लगी। बालक रो पड़ा। पावू साहब ने बालक को गोद में उठा लिया, चुमकार-पुचकारकर चुप किया, और तत्पश्चात् उसे कुछ पैसे तथा रेलगाडी ला देने का वचन देकर छोड दिया । पालक मनोहर भय पूर्ण दृष्टि से अपनी ताई की भोर ताकता हुया उस स्थान से चला गया। मनोदर के चले जाने पर बाबू रामजीदास रामेश्वरी से योले-तुम्हारा यद कैसा व्यवहार है! बच्चे को ढरेल दिया । जो उसके चोट लग जाती, तो? रामेश्वरी मुंह मटकाकर बोलीं-लग जाती, तो अच्छा होता । क्यों मेरी खोपड़ी पर लाद देते थे। श्राप ही तो उसे मेरे ऊपर डालते थे, और श्राप ही अब ऐसी बातें करते हैं। थाबू साहय कुढकर बोले-इसी को खोपड़ी-पर लादना कहते हैं। रामेश्वरी-ौर नहीं किसे कहते हैं। तुम्हें तो अपने भागे और किसी का दुस-सुख सूफना ही नहीं। न जाने कब किसका जी कैसा होता है। तुम्हें इन बातों की कोई परवा ही नहीं, अपनी चुहल से काम है। - नाई . [५१ पाधू-पच्चों की प्यारी प्यारी बातें सुनकर तो घारे नेता जी हो, प्रसन्न हो जाता है, मगर तुम्हारा पदय न-जाने पिस घातु का या हुआ है। रामेश्वरी-तुम्हारा हो जाता होगा। प्रोर होने को होता भी है, मगर वैसा बच्चा भी तो हो! पराये धन मे भी कही पर मरता है। पायू साध्य कुछ देर चुप रहकर योले- यदि पना Bा भतीमा मी पराया धन कहा जा सकता है, तो फिर मैं नदी समझता कि अपना पा किसे कहेंगे। रामेश्वरी नच उत्तेजित होकर बोली-यातें पनामा पहुत प्राता है। तुम्हारा भतीजा है, तुम पाऐ जो समझो, पर मुझे ये बातें अच्छी नही लगती। हमारे भाग हा फूटे हैं ! नहीं तो ये दिन काहे को देखो पड़ते ! तुम्हारा चलन तो दुनिया स निराना है। श्रादमो सन्तान के लिए न जाने क्या-क्या करते है-पूजा पाठ कराते हैं, प्रत रखते हैं, पर तुम्हें इन बातों से क्या फाम ! रात दिन भाई-भतीजों में मगन रहते हो। याबू साहब के मुख पर घृणा का भाव झलक श्राया । उन्होंने कहा- पूजा, पाठ, अन, एम ढासना है। जो पातु माग में नी, वर पूर्ण पाठ से कभी प्राप्त नहीं हो सकat | मेरा तो यह अटन विश्वास है। भीमनोजी कुछ ऋच पासे स्वर में पानी-इसी विश्वास ने तो सम चौपट पर रखा है। ऐसे ही विश्वास पर सब रैठ जाय, तो काम कैसे चले। सर विश्वास पर ही बैठे रहें, श्रादमी काहे को मिली यात के लिए चेष्टा करे। बाबू साहब ने सोचा, कि मूर्य स्त्री के मुंह लगना ठीक नहीं , श्रतएक वह स्त्री की बात का कुछ उत्तर न देकर वहां से टल गये। . पाबू रामजीदास घनी श्रादमी है। कपड़े की प्राढत का काम करते हैं। लेन देन भी है । इनरे एक छोटा भाई भी है। उसका नाम है कृष्णदास । दोनों भाइयों का परिवार एक हो में है। या रामजीदास की वायु ३५ वर्ष पे लगभग है, और छोटे भाई कृष्णदास की २१ के लगभग । रामजीदाय निस्सन्तान हैं । कृष्णदास के दो सताने हैं। एक पुत्र-यही पुत्र, जिससे ५२] गल्प-समुच्चय पाठक परिचित हो चुके है--और एक कन्या है। कन्या की प्रायु दोवप के लगभग है। रामजीदास अपने छोटे भाई और उनकी सन्तान पर बड़ा स्नेह रखते है-ऐसा स्नेह कि उसके प्रभाव से उन्हें अपनी सन्तान हीनता कभी खटकती ही नही । छोटे भाई की सन्तान को वे अपनी ही सन्तान समझते हैं। दोनों बच्चे भी रामजीदास से इतने दिले हैं कि उन्हें श्रपने पिता से भी अधिक समझते हैं। परन्तु रामजीदास की पनी रामेश्वरी को अपनी सन्तानहीनता का बड़ा दुख है। वह दिन रात सन्तान ही के सोच में घुला करती हैं। छोटे भाई की तान पर पति का प्रम उनकी खिों में याँ 'तरह सटकता है। रात को भाजन इत्यादि से निवृत्त होकर रामजीदास शय्या पर लेटे हुए शीतल और मद वायु का श्रानन्द ले रहे थे। पास ही दूसरी शय्या पर रामेश्वरी, हथेली पर सिर रखे, किसी चिन्ता में डूबी हुई थीं। दोनों बच्चे अभी बाबू साहय के पास से उठकर अपनी मा के पास गये थे। बाबू साहब ने अपनी स्त्री की ओर करवट लेकर कहा-याज तुमने मनोहर को इस बुरी तरह से ढकेला था कि मुझे अब तक उसका दुख है। कभी कभी तो तुम्हारा व्यवहार बिलकुल ही अमानुषिक हो उठता है गमे-बरी चोली--तुम्हीं ने मुझे ऐसा बना रखा है। उस दिन उस पण्डित ने कहा था कि हम दोनों के जन्म-मन में सन्तान का जोग है, और उपाय करने से सन्तान हो भी सक्ती है। उसने उपाय भी बताये थे , पर तुमने उनमें से एक भी उपाय करके न देखा। बस, तुम तो इन्हीं दोनों में मगन हो। तुम्हारी इस बात से रात-दिन मेरा कलेजा सुलगता रहता है। श्रादमी उपाय तो करके देखता है। फिर होना न होना तो भगवान् के अधीन है। बाबू साहय हँसकर बोले-तुम्हारी जैसी सीधी स्त्री भी क्या कहूँ, तुम इन ज्योतिषियों की बातों पर विश्वास करती हो, जो दुनिया भर के झूठे और धूर्त हैं ! ये झूठ बोलने ही की रोटियां साते हैं । रामेश्वरी तुनकर बोली-तुम्हें तो सारा संसार भूठा ही दिखाई पड़ता - ।

ताई [५३ है। ये पोपी पुराण मी सय झूठे है। पण्डित कुछ अपनी तरफ से तो बनाकर कहते ही नहीं हैं। शास्त्र में जो लिखा है, वही ये भी कहते हैं। शास्त्र झूठा है, वो वे मी मूठे हैं। अँगरेजी क्या पढ़ी, अपने आगे किसी को गिनते ही नहीं। जो बातें बाप-दादे के जमाने से चली आई है,उन्हें भी मुठा बताते हैं। याबू साहब-तुम बात तो समझती नहीं, अपनी ही प्रोटे जाती हो। मैं यह नहीं कहता कि ज्योतिष शास्त्र झूठा है । सम्भव है, वह सच्चा हो, परन्तु ज्योतिषियों में अधिकांश मृठे होते हैं। उन्हें ज्योतिष का पूर्ण शान तो होता नहीं, दो-एक छोटी-मोटी पुस्तकें पढकर ज्योतिषी बन बैठते और लोगों को ठाते फिरते हैं। ऐसी दशा में उनकी बातों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है। रामेश्वरी-हूँ, सब झूठे ही है, तुम्ही एक बड़े सच्चे हो । अच्छा, एक पात पूछती हूँ। भला तुम्हारे नी में सन्तान की इच्छा क्या कभी नहीं होती ? इस पार रामेश्वरी ने बाबू साहय के हृदय का कोमल स्थान पकड़ा । वह कुछ देर चुप रहे। तत्पश्चात् एक लम्बी साँस लेकर बोले-भला ऐसा कौन मनुष्य होगा, जिसके हृदय में सन्तान का मुख देसने की इच्छा न हो। परन्तु किया क्या जाय ! जय नहीं है और न होने की कोई श्राशा ही है, तब उसके लिए व्यर्थ चिन्ता करने से क्या लाभ ! इसके सिवा जो बात अपनी सवान से होती, वही भाई की सन्नान से भी तो हो रही है। जितना स्नेह अपनी पर होता, उतना ही इन पर भी है। जो आनन्द उनकी बाल कोड़ा से श्राता, वही इनकी झोडा से भी पा रहा है। फिर मैं नहीं समझता कि चिन्ता क्यों की जाय। रामेश्वरी कुढकर बोली-तुम्हारी समझ को मैं क्या कहूँ। इसी से तो रात दिन जला करती हूँ। मला यह तो बताओ कि तुम्हारे पीछे क्या इन्हीं से तुम्हारा नाम चलेगा? बाबू साहब हँसकर बोले-अरे तुम भी कहाँ की पोच पाते लाई। नाम सन्तान से नहीं चलता। नाम अपनी सुकृति से चलता है। तुलसीदास को देश का बच्चा बच्चा जानता है । सूरदास को मरे कितने दिन हो चुके ? इसी प्रकार जितने महात्मा हो गये हैं उन सबका नाम क्या सन्तान ही की बदौ ६०] गल्प-समुघय हाथ से मुंडेर छूट गई । वह नीचे आ गिरा । रामेश्वरी चीस मारकर छल्ने पर गिर पड़ी। रामेश्वरी एक सप्ताह तक बुखार में रेहोश पड़ी रही। कमी-कमी वह जोर से चिल्ला उठती, और कहती-देसो देखो, यह गिरा जा रहा है-उसे बचायो-दौड़ो-मेरे मनोहर को बचा लो। कभी वह कहती-बेटा मनोदर, मैंने तुझे नहीं बचाया। हो, हो, मैं चाहती, तो बचा सकती थी-मैंने देर कर दी। इसी प्रकार के प्रलाप वह क्यिा करती। मनोहर की टोग उखड़ गई थी। टॉग बिठा दी गई, वह क्रमशः फिर अपनी असली हालत पर श्राने लगा। एक सप्ताह याद रामेश्वरी का ज्वर कम हुआ। श्रच्छी तरह होश श्राने पर उन्होंने पूछा-मनोहर केसा है ? रामजीदास ने उत्तर दिया-अच्छा है। रामेश्वरी--उसे मेरे पास लाभो। मनाहर रामेश्वरी के पास लाया गया। रामेश्वरी ने उसे बड़े प्यार से हृदय से लगाया । श्रासों से श्रासुत्रों की झड़ी लग गई। हिचकियों से गलाउँधगया। रामेश्वरी कुछ दिनों बाद पूण स्वस्थ हो गई , अब यह मनोहर की बहन चुनी से भी द्वीप और घृणा नहीं करती। और, मनोहर तो अब उनका प्राणा- धार हो गया है। उसके बिना उन्हें एक क्षण भी कल नहीं पड़ती।

श्रीप्रेमचन्द प्रेमवाद रवीन्द्रनाय ठाकुर के साथ भारत के सर्वश्रेष्ठ कहानी-रेसक है । भाप काशी के रहनेवाले थे। आपने कानपुर के उपम 'जमाना' में रेस लिराना शुरू किया। भापको 'प्रेम-पचीसी' और 'सोजेयतन' यह दोनों प्रथम जमाना ही से प्रचाशित हुई । सन् १९१४ से आप हिन्दी में लिंग रहे थे। आपके कई उपयास 'सेवा-सदन', 'वरदान', 'कायाकल्प', प्रेमाश्रम', 'रगभूमि', 'प्रतिरा' तथा 'यमन' भादि प्रसिद्ध हो चुके हैं। भापकी कहानियों के कई संग्रह निकल चुके हैं-'प्रेम-पूर्णिमा , 'प्रेम पचीसी', 'प्रेम प्रसून', 'प्रेम-तीर्थ', 'सप्तसरोज', 'नव निधि', 'पाच-फूल, 'मान- सरोवर', 'कफन' आदि। भापकी गल्पों के भावाद भारत की सभी प्रान्तीय भाषाओं में हो चुके हैं, जहां वे पहुत चाव से पढ़ी जाती हैं। कुछ गल्पों के अनुवाद विदेशी भाषाओं, जैसे जापानी, रूसी, जर्मन, टय तथा अमेजी भाषा में भी हो चुके हैं। गई,के आप सबसे बड़े कहानीकार थे। १९३६ ई० में आपकी मृत्यु से दिन्दी-साहित्य को जो क्षति हुई उसका मामान नहीं किया जा सकता। शतरज के खिलाड़ी . वाजिद अली शाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में हूया हुला था। छोटे बड़े, अमीर गरीब सभी विलासिता में हूवे हुए थे | काई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफीम की पीनक ही के मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में श्रामोद प्रमोद का प्राधान्य था। शासन विभाग में, साहित्यक्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में, कला कौशल में, उद्योग-धों में, श्राहार व्यवहार में सर्वत्र विलासिता प्राप्त हो रही थी। राज क्मवारी विषय-वासना में, कवि-गण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलायत्त और चिकन बनाने में, व्यवसायो सुरमे, इत्र, मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में लिप्त थे। समीकी खिो में विलासिता का मद छाया हुश्शा था । ससार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड रहे हैं , तीतरों की लड़ाई के लिए पाली बदी जा रही है। फही चौसर बिछी हुई है , पौ बारह का शोर मचा हुआ है। कहीं शतरंज का धार सग्राम छिड़ा हुश्रा है। राजा से लेकर रङ्क तक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरां को पैसे मिलते, तो वे रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते । शतरज, तारा, गजीता खेलने से बुद्धि तीन होती है, विचार- शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है। ये दलीलें नोरों के माध पेश की जाती थी (इस सम्प्रदाय के लोगों से दुनिया अप भी खाली नहीं है)। इसलिए अगर मिरजा सजाद अली और मीर रोशनअली अपना अधिकाश समय बुद्धि तंत्र करने में व्यतीत करते थे, तो विसी विचारशील पुरुष का क्या श्रापत्ति हो सकती थी १ दोनों के पास मौरूसी जागीरथी , जाविका की काई चिन्ता न थी, पर में बैठे चसौतियां करते थे। अाखिर और करते ही क्या ! प्रात काल दोनों मित्र नाश्ता करके विधात बिछाकर बैठ जाते, मुहरे सज जाते, और लड़ाई रे दाव पेंच होने लगते । फिर सदर न ना थी कि कब दोपहर हुई, कप तीसरा पहर, कय शाम । घर के भीतर से यार-पार बुलाया श्राता र साना तैयार है। यश से जवाब मिलता-चलो, थाते हैं , दस्तररवान विछानी। यहां तक कि , ।

प - . . शतरज के सिलाडी [६३ चावरची विवश होकर कमरे ही में खाना रख जाता था। और दोनों मिन दोनो काम साथ साथ करते थे। मिरजा सजादअली के घर में कोई बड़ा धूढा न था, इसलिए उन्हीं के दवानखाने में बाजिया होती थीं, मगर यह बात न थी कि मिरजा के घर के और लोग उनके इस व्याहार से खुश हो । घरवालों का तो कहना ही क्या, महल्लेवाले, घर के नौकर चाकर तक नित्य द्व पपूर्ण टिप्पणिया किया करते थे- बड़ा मनहूस खेल है। घर को तबाह कर देता है । खुदा न करे, किसी को इसकी चाट पड़े, श्रादमी दीन दुनिया किसी के काम का नहीं रहता। न घर का, न घाट का। बुरा रोग है। यहाँ तक कि मिरजा की बेगम साहया को इससे इतना दूप था कि अवसर खोज खोजकर पति को लताड़ती थी, पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से मिलता था। वह सोती ही रहती थी, तब तक उघर बाजी बिछ जाती थी। और रात को जब सो जाती थी, तब कहीं मिरताजी घर में पाते थे। हां, नौकरों पर यह अपना गुस्सा उतारती रहती थी--क्या पान मांगे हैं १ कह दो श्राकर ले जायँ । खाने की फुरसत नहीं है १ ले जाकर खाना सिर पर पटक दो, खायें चाहे कुत्ते को खिनावें । पर रूबरू वह भी कुछ न कह सकती थी। उनको अपने पति से उतना मलाल न था, जितना मीर साहब से । उन्होंने उनका नाम मोर विगाहू रख छोड़ा था। शायद मिरजाजी अपनी साई देने के लिए सारा इलजाम मीरसाहब ही पे सिर थोप देते थे। एक दिन वेगम साहबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लोडी से कहा-जाकर मिरना साहब को बुन्ना ला। विसी हकीम के यहाँ से दवा लावें । दौड़, जल्दी कर । लौंडी गई तो, मिरमाजी ने कहा-चल अभी आते हैं। वेगम साहबा का मिनाल गरम था। इतनी तात्र कहा कि उनके सिर में दर्द हो, और पति शतरस खेलता रहे। चेहरा सुख दो गया । लोंडी से कहा जाकर कह, अभी चलिए, नहीं तो वह श्राप ही हकीम के यहाँ चली जायेंगी। मिरनाजी पड़ी दिलचस्प बाजी खेल रहे थे, दो ही किश्तों में मीर साहब को मात हुइ जाती यी । मुझनाकर बोले -क्या ऐसे दम लबो पर है ? जरा सन्न नहीं होता। ।

गल्पन्समुजय
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मीर-अरे तो जाकर सुन ही श्राइए न। और नाजुक मिजान
होती ही है।
मिरना--जी हो, चला क्यों न जाऊँ!दो किस्तों में आपको मात होती है।
मीर - जनाब इस भरोसे न रहिएगा। वह चाल सोची है कि श्रापके
मुघरे धरे रहे और मात हो जाय , पर जाइए सुन आहए। क्या खामखाह
उनका दिल दुसाहएगा।
मिरजा--इसी बात पर मात ही करके जाऊँगा।
मीर-मैं सेलूगा ही नहीं । श्राप जाकर सुन पाए ।
मिरजा- अरे यार, जाना पड़ेगा हकीम के यहाँ । सिर दर्द साफ नहीं
है , मुझे परेशान करने का बहाना है।
मीर-कुछ भी हो, उनकी सानिर तो करनी ही पड़ेगी।
मिरमा--अच्छा, एक चाल और चल लूँ।
मीर-हरगिन नहीं । जब तक श्राप सुन न पावेंगे, मैं मुहरे में हाथ हो
न लगाऊँगा।
मिरजा साइव मजबूर होकर अन्दर गये, तो वेगम माहवा ने सीरियाँ
बदलकर, लेकिन कराहते हुए कहा-तुम्हें निगोड़ी शतरज इतनी प्यारी है ?
चाहे कोई मर ही जाय , पर उठने का नाम नहीं लेते ! नौज कोई तुम जैठा
श्रादमी हो!
मिरता-क्या कहूँ, मीर साहब मानते ही न थे । मुश्किल से पीछा छुड़ा
कर पाया है।
वेगम-क्या जैसे वह खुद निखटू है, वैसे ही सबको समझते हैं । उनके
भी तो बान-नच्चे हैं, या सबका सफाया कर डाला !
मिरना-~~वडा लती श्रादमी है । जब श्रा जाता है, तय मजबूर होकर
मुझे भी सेलमा ही पड़ता है।
वेगम-दुत्कार क्यों नहीं देते।
मिरता--बराबर के ग्रादमी हैं, उन में, दर्जे में, मुमसे, दो अगुल ऊँचे ।
मुलाहिजा करना ही पड़ता है।
वेगम- तो मैं ही दुत्कारे देती हूँ। नाराज हो जायेंगे, हो जायें । कौन

दातरज के खिलाड़ी [६५ किसी की रोटियां चला देता है। रानी रूठेंगी, अपना मुहाग लेंगी।-दिरिया, ना, बाहर से शतरज उठा ला! मोर साहब से कहना, मियां अब न पेलेंगे, आप तशरीफ़ ले जाए । मिरजा-हाहा, कही ऐमा गमय भी न करना | जलील करना चाहती दो क्या !-ठहर हिरिया, कहा जाती है। बेगम-जाने क्यों नहीं देते ! मेरा ही खून पिये, जो उसे रोके । अच्छा उसे रोका, मुझे रोका तो जान । यह कहकर वेगम साहा भरनाई हुई दीवानाप्लाने की तरफ़ चली। मिरजा वेचारे का रंग उड़ गया । बीबी की मिन्नतें करने लगे-सुदा ये लिए, तुम्हे इनरत हुसेन की कसम है। मेरी ही मैयत देरो, जो उधर जाय , लेकिन बेगम ने एक न मानी। दीगनखाने के द्वार तक गई, पर एकाएक पर पुरुप के सामने आते हुए पांव बघ से गये। भीतर झांस । सयोग से कमरा साली था । मीर साहब ने दो एक मुहरे इधर उधर कर दिये थे, और अपनी पाई जताने पे लिए बाहर टहल रहे थे। फिर क्या था, वेगम ने अन्दर पहुँचकर बाती उलट दी, मुहरे कुछ तख्त के नीचे फेंक दिये, कुछ बाहर और किवाड़े अन्दर से बन्द करके धु टी लगा दी। मीर साहय दरवाने पर ये ही, मुहरे वाटर जाते देखे, चूड़ियों की झनक कान में पड़ी। फिर दरवाना बन्द हुआ, तो समझ गये, वेगम साहमा गिड़ गई, चुरे से घर की राह ली। मिरजा ने कहा-तुमने गना किया। वेगम-अब मीर साहब इधर पाये, तो खड़े खड़े निकलवा दूंगी। इतनी लौ खुदा से लगाते, तो वली हो जाते। श्राप तो शतरज ग्वेलें, और मैं यहाँ चूल्हे चक्की की पिक में सिर सपाऊँ ! ले जाते हो हकीम साहब के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है। मिरना घर से निकले, तो हकीम के घर जाने के बदले मोर साहय के घर पहुंचे और सारा वृत्तान्त कहा । मीर साहब बोने-मैंने तो जब मुहरे बाहर आते देखे, तभी ताड़ गया। औरन भागा। बड़ी गुस्सेवर मालूम होती है; मगर आपने उन्हें यो सिर चढा रखा है, यह मुनासिब नहीं । उहें इससे । , क्या मतलब कि श्राप बाहर क्या करते हैं। इन्तनाम करना उनका काम है, दूसरी बातों से उन्हें क्या सरोकार ! मिरजा-सरे, यह तो बताइए, श्रव कहा जमाव होगा ! मोर-इसका क्या गम है। इतना बड़ा पर पड़ा हुआ है। बस, यहीं जमे । मिरना-लेकिन वेगम साहया को कैसे मनाऊँगा! जर घर पर बैठा रहता था, तब तो वह इतना बिगड़ती थी, यक्षा बैठक होगी, तो शायद जिन्दा न छोड़ेंगी। मीर-अजी बकने भी दीजिए , दो चार रोग में श्राप हो ठीक हो जायेंगी। हाँ, प्राप इतना कीजिए कि श्राज जरा तन जाइए। (२) मीरसाहब की वेगम किसी अज्ञात कारण से मीर साहप का घर से दूर रहना ही उपयुक्त समझती थी, इसलिए वह उनके शतरज प्रेम की कमी श्रालानना न करती थीं , बहिन कभी-भी मीर साहब को देर हो जाती, तो याद दिला देती थीं। इन कारणों में मौरसाक्ष्य को भ्रम हो गया था कि मेरी स्त्री अत्यन्त विनयशील और गम्भीर है , लेकिन जब दीवानवाने में बिसात बिछने लगी, और मीर साहब दिन भर घर में रहने लगे, तो बेगम साहा को बड़ा कष्ट होने लगा। उनकी स्वाधीनता में बाधा पड गई । दिन- भर दरवाजे पर झांकने को तरस जाती। उधर नौकरों में भी कानाफूसी होने लगी। अब तक दिन भर पड़े पड़े मक्सियाँ मारा करते थे । घर में कोई आये, कोई जाय, उनसे कुछ मतलब न था । अत्र श्राठों पहर की घोंस हो गई। कभी पान लाने का हुक्म होता। कभी मिठाई का। और, हुक्का तो किसी प्रमी के हृदय की भांति जलता ही रहता था । वे बेगम साहना से जा जाकर कहते-हुजूर, मियां की शतरक्ष तो हमारे जी का जजाल हो गई ! दिन भर दौड़ते दौड़ते पैरों में छाने पड़ गये । यह भी कोई खेल है कि सुयह को बैठे तो शाम कर दो ! घड़ी प्राध- पड़ी दिल बदलाव के लिए खेल लेना बहुत है । सेर, हमें तो कोई शिकायत नहीं, हुजूर के गुलाम हैं, जो हुक्म होगा, यना हो लावेंगे, मगर यह खेल मनहूस है । इसका खेलनेवाला कभी पनपता नहीं , घर पर कोई न कोई - । , । शतरज के सिलाडी [६७ आफन जरूर पाती है। यहाँ तक कि एक वे पीछे महल्ले के महल्ले तबाह होते देस गये हैं। सारे महल्ले में यही चरचा होती रहती है। हुजूर का नमक खाते हैं, अपने पाका की बुराई सुन सुनकर रन होता है , मगर क्या करें। इसपर बेगम सादवा कहती- मैं तो खुद इसको पसद नहीं करती, पर यह क्सिी की सुनते ही नहीं, तो क्या किया जाय। महलने में भी जो दो बार पुराने जमाने के लोग थे, वे आपस में माति भौति के अमगन की कल्पनाएँ करने लगे -अब खैरयत नहीं है। जब हमारे रईसों का यह हाल है, तो मुल का खुदा ही हाफ्नि है। यह बादशादत शतरज के हाथो तब ह होगी । श्रासार बुरे है। राज्य में हाहाकार मचा हुश्रा या। प्रजा दिन दहाड़े लूटी जाती थी। कोइ परियाद सुननेवाला न था। देहातों की सारी दौलत लखनऊ में खिंची पाती थी, और वह वेश्याओं में भीड़ा में, और विलान्तिा के अन्य अङ्गों की पूर्ति में उड़ जाती थी। अँगरेज कम्पनी का ऋण दिन दिन बढ़ता जाता था। कमलो दिन दिन भीगकर भारी होती जाती थी। देश में सुयवस्था न होने के कारण वाषिक पर भी न वसूल होता था। रेजीडेंट बार ब र चेतावना पर यहां तो लोग विलासिता के नशे में चूर थे , किसी ने काना पर जूं न रेंगती थी। सैर, मोर साहब के दीवानवाने में शतरज होते कई महीने गुजर गये। नये-नये नक्शे हल किये जावे, नये नये किले बनाये जावे, नित्य नयी व्यूह- रचना होती, कभी कभी खेलते खेलते झौड़ हो जाती, तू-तू मैं मैं तक की नौबत आ जाती, पर शीघ्र ही दोनो मित्रों में मेल हो जाता। कभी कभी ऐसा भी होता, कि बानी उठा दी जाती, मिरजाजी रूठकर अपने घर चले पाते। मीर साहब अपने घर में जा बैठते , पर रात भर की निद्रा के साथ सारा मनोमालि य शान हो जाता था। प्रात काल दोनों मिन दीवानाने में श्रा पहुँचते थे। एक दिन दोनों मित्र बैठे हुए शतरस के दल दल में गोते खा रहे थे कि इतने घोडे पर सवार एक बादशाही शोज का अफसर भीरमाहब का नाम पूछता हुश्रा आ पहुँचा । मीर साहब रे होश उड़ गये! यह क्या बला देता था

६८]
गल्प-समुच्चय
सिर पर श्राई ! यह तलबी किस लिए हुई है। अब खौरियत नहीं नजर
श्राती! घर के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकरों से बोले-कह दो, घर
में नहीं है।
.
सवार-घर में नहीं, तो कहाँ है?
नौकर-यह मैं नहीं जानता। क्या काम है !
सवार-काम तुझे क्या बतलाऊँ । हुजूर में तलबी हैं-शायद फौज
के लिए कुछ सिपाही मागे गये हैं। जागीरदार है कि दिल्लगी! मोरचे पर
जाना पड़ेगा, तो श्राटे दाल का भाव मालूम हो जायगा ।
नौकर-अच्छा, तो जाइए, कह दिया जायगा।
सवार-कहने की बात नहीं है। मैं कल खुद श्राऊँगा, साथ ले पाने
का हुक्म हुश्रा है।
सवार चला गया। मीर साहब की आत्मा काप उठी। मिरजाजी से
योले-कहिए जनाब, अब क्या होगा?
मिरना--बड़ी मुसीबत है, कहीं मेरी तलबी भी न हो ।
मीर-कम्बखन कल फिर पाने को कह गया है।
मिरना-ग्राफत है और क्या। कहीं मोरचे पर जाना पड़ा तो वे
मौत मरे।
मीर-बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलो ही नहीं। कल से
गोमती पर कहीं वीराने में नक्शा जमे। यहाँ किसे खबर दोगी। हजरत
श्राकर श्राप लोट जायंगे।
मिरजा यल्लाह, श्रापको सूप सूझी। इसके सिवा और कोई तदबीर
ही नहीं है।
इधर मीर साहब की बेगम उस सवार से कह रही थी, तुमने सूब धता
बताई। उसने जवाब दिया-ऐसे गावदियों को तो घुटकियों पर नचाता
हूँ। इनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरस ने चर ली। अव भूलकर
भी घर पर न रहेंगे।
-

शतरज के खिलाडी [६९ (३) दूसरे दिन से दोनों मित्र मुँह अंधेरे घर से निकल सड़े होते । बगल में एक छोटी सी दरी दयाये, डिब्बे में गिलौरियाँ भरे, गोमतीपार की एक पुरानी वीरान मसजिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब शासफउद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तम्बाकू, चिलम और मदरिया ले लेते और मसजिद में पहुँच, दरी बिछा, हुका भरकर शतरज खेलने बैठ जाते थे ! फिर उन्हें दोन दुनिया की फिक्र न रहती थी। किश्त, शह श्रादि दो एक शब्दों के सिवा उनके मुंह से और कोई वाक्ष्य नहीं निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाम न होता होगा। दोपहर को जब भूख मालूम होती, तो दोनों मिन किसी नानबाई की दुकान पर जाकर खाना सा पाते, और एक चिलम हुका पीकर फिर सग्राम क्षेत्र में डट जाते । कमी कमी तो उन्हें भोजन का भी खयाल न रहता था। इधर देश की राजनीतिक दशा भयकर होती जा रही थी। कम्पनी की पौने लखनऊ की तरफ बढी चली श्राती थीं। शहर में हलचल मची हुई थी। लोग बाल बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे, पर हमारे दोनों खिलाडियों को इसकी जरा भी मिक न थी। वे घर से आते, तो गलियों में होकर । डर था, कि कहीं, किसी बादशाही मुलाजिम की निगाह न पड जाय, जो बेगार में पकड़ जाय। हजारों रुपये सालाना की जागीर मुमन ही में हजम करना चाहते थे। एक दिन दोनों मित्र मसजिद के सँडहर में बैठे हुए शतरज खेल रहे ये । मिरजा की बाजी कुछ कमजोर थी । मीर साहब उन्हें विश्त पर किश्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक पाते हुए दिखाई दिये। यह गारा की मौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार जमाने के लिए पा रही थी। मीरसाहब बोले-अँगरेजी फौज श्रा रही है, खुदा ख़र करे। मिरजा-पाने दीजिए, किश्त बचाइए। यह विश्त ! मीर-भरा देखना चाहिए, यही भाड़ में खड़े हो जाय । मिरजा-देख लीजिएगा, जल्दी क्या है, किश्त !

७० 1 गल्प-समुच्चय मीर- तोपताना भी है। कोई पाँच हजार प्रादमी होंगे। कैसे कै जवान हैं | लाल बन्दरों के से मुंह । सूरत देखकर लौफ मालूम होता है। मिरना-जनाय, हीने न कीजिए । ये चकमे किसी और को दीजिएगा- यह किश्त ! मीर-श्राप भी अजीव प्रादमी है। यहाँ तो शहर पर श्राफ़त पाई हु है, और श्रापका विश्त की सूझी है ! कुछ इसकी भी गबर है, कि शहर घिर गया, तो घर कैसे चलेंगे। मिरजा~जब घर चलने का वक्त श्रायेगा, तो देवी जायगो-यह किश्त पस, श्रमकी शह में मात है। फौज निकल गई। दस बजे का समय था ? फिर बाजी बिछ गई। मिरजा बोले-बाज साने की फैसे ठहरेगी। मीर-श्रजी, आज तो रोना है । क्या श्रापको ज्यादा भूख मालूम होती है। मिरजा-जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है। मीर-शहर में कुछ न हो रहा होगा । लोग खाना खाकर श्राराम से से रहे होंगे । हुजूर नवारसाहब भी ऐशगाह में होंगे। दोनों सज्जन फिर जो सेन ने बैठे, तो तीन बज गये । अबकी मिरनाजी की बाजी कमजोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फ़ौज की वापस की श्राइट मिली । नवाब वाजिदअली पकड़ लिये गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार काट | एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शाति से, इस तरह खून यहे बिना, न हुई होगी यह वह अहिंसा न थी, जिसपर देवगण प्रसन्न होते है, यह वह कायरपन था, जिसपर बड़े से बड़े कायर भी श्रासू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नयाय यन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नींद में मस्त था । यह राजनीतिक अघ पतन की चरम सीमा थी। मिरज़ा ने कहा- हुजूर नवायमान को जालिमों ने कैद कर लिया है। मीर-होगा, यह लीजिए शह! .

शतरंज के पिलाड़ी [७१ मिरजा-मनाय, जरा ठहरिए । इस पक पर सपियर नही लगती। बेचारे नवामहास्य रस या पूरा पे र रो रहे होग। मोर-नोया ही चाहे । यह ऐश यहाँ की नसोय होगा यह किश्त ! मिरना-किसी पे दिन यगर नही जाते । पितनी दर्दनाक हालत है। मीर--हो सो सोही-पह लो फिर मिश्त ! 47, असी वित में मात है, वन नही सकते। मिरता-गुदा की कसम, बार बड़े बेदर्द है । इराना पड़ा सादा देख कर भी श्रापका दुख नहीं होता। हाय, गरीय पाजिदअली शाह । भीर-पदले प्रपो पादशाह को तोयनाइए, पिर वायसाहस का मातम कोगिरगा। यह रिश्त और मात ! लाना हाय ! पादण को लिये हुए सेना सामने से निकल गई। उनके जाने की मिरता ने पर पानी विधा दी। सर की चोट पुरी होती है । मीर ने कहा- नाहए, नवायसाहय के मातम में एक मरण्या कह डालें , लेकिन मिरज़ा की राज-भक्ति अपनी हार के साथ तुस हा चुकी थी । वह हार का बदला चुकाने के लिए अधीर हा रहे । . ग्राम हो गई । सँडहर में चमगादड़ों ने चीखना शुरू किया। अवाविले प्रा पाकर अपने-अपने घोसलों में चिमटी। पर दोनों पिलाही हटे हुए थे, मानो दो सून घे प्यासे सूरमा नापस में लड़ रहे हो। मिरजाजी तीन बाजिया लगातार हार चुके थे , इस चौपी यानी का रंग भी अच्छा न था । वह पार यार जीतने का दृढ निश्रय करप संभालकर सेलते थे , लकिन एक न एक चाल ऐसी बेदर या पड़ती थी, जिससे बाजीराव हो जाती थी। हर मार हार के साम प्रतिकार की भावना और भी उग्र हो जाती थी। उधर मीर साहस मारे उमग के गजाले गाते थे, चुटदिन्या लेते थे,मानो काई गुप्त धन पा गये हो। मिरजाजी सुन सुनकर मुमलाते और हार की भैो मिटाने के लिए उनकी दाद देते थे। पर ज्यों-ज्यो बानी मिजोर पडती थी, धैर्य हाप से निकला जाता था। यहां तक कि वह पात-बात पर अमलाने लगे-- नाय, श्राप चाल न बदला कीनिए । यह क्या कि एक चाल चले, और -- , ७२] गल्प-समुच्चय फिर उसे बदल दिया । जो कुछ चलना हो, एक बार चल लीजिए । यह श्राप मुहरे पर हाथ क्यों रसे रहते हैं ? मुहरे को छोड़ दीजिए, जब तक आपको चाल न सूझे, छूइए ही नहीं । आप एक-एक चाल श्राध-बाघ घटे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं। जिसे एक चाल चलने में पांच मिनट से ज्यादा लगे, उसको मात समझी जाय । पिर यापने चाल बदली। चुपके से मुहरा वही रस दीजिए। मीर साहब का फरजी पिटता था। बोले--मैंने चाल चली ही की थी। मिरना--पाप चाल चन चुके हैं। मुहरा वहीं रख दीजिए---उसी घर में। मीर-उस घर में क्यों रतूं । मैंने हाथ से मुहरा छोड़ा ही कप था ? मिरजा-मुहरा ग्राप कयामत तक न छोड़े, तो क्या चाल ही न होगी ? फरजी पिटते देखा, तो धांधली करने लगे ? मीर-धाधली श्राप करते हैं। हार-नीत तकदीर से होती है , धाधली करने से कोई नहीं जीतता ? मिरजा-तो इस बाजी में श्रापको मात हो गई। मीर-मुझे क्यों मात होने लगी। मिरज़ा-तो श्राप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रखा था । मीर-वहां क्यों रम्वू ! नहीं रसता ! मिरना-क्यों न रखिएगा! श्रापको रखना होगा। तक्रार बढने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दवता था, न वह अप्रासगिक बावे होने लगी। मिरना बोले--किसी ने खानदान में शतरज खेली होती, तब तो इसरे कायदे जानते। वे तो हमेशा धास छीला किये, श्राप शतरआ क्या खेलिएगा। रियासत और ही चीज है। जागीर मिल जाने से ही कोई रईस नहीं हो जाता। मीर-क्या ! घास श्रापके अन्याजान छोलते होंगे। यहाँ तो पीढ़ियों से शतरआ खेलते चले ला रहे हैं। मिरजा-अनी, जाइए भी, गाजिउद्दीन हैदर के यहां बाबरची का काम !

शतरज के सिलाडी [७३ करते करते उम्र गुजर गई, आज रईस वनने चने हैं । रईस बनना कुछ दिलागी नहीं है। मीर-ययों अपने बुजुगों के मुँह में कालिख लगावे हो-वे ही बावरको का काम करते होंगे। यी तो हमेशा बादशाह के दस्तरख्वान पर खाना खाते चले आये हैं। मिरजा-अरे चल चरकटे, बहुत बढ-चढकर बातें न कर । मीर-जवान सँभालिए, वरना पूरा होगा। मैं ऐसी बातें सुनने का श्रादी नहीं हूँ। यहाँ तो किसी ने अखें दिखाई कि उसकी प्रास निकाली। है होला ? मिरज्ञा-पाप मेरा हौसला देखना चाहते हैं, तो फिर पाइए, आज दो. दो हाथ हो जायँ, इधर या उघर ! मीर-तो यहाँ तुमसे दयनेवाला कौन है ? दोनों दोस्तों ने कमर से तलवारें निकाल ली। नवाबी जमाना था , सभी तलवार, पेशकब्ज, कटार वगैरह बाँधते थे। दोनों विलासी थे , कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावों का अध पतन हो गया था-बादशाह के लिए, बादशाहत के लिए क्यों मरें, पर व्यक्तिगत वीरता का प्रभाव न था। दोनों ने पैंतरे बदले, तलवारें चमकी, छपाछप की आवाजें श्राई। दोनों जख्म खाकर गिरे, और दोनों ने वहां तड़प तड़पकर नाने दे दी। अपने मादशाह के लिए जिनकी आँखों से एक पूँद आँसू न निकला, उन्हों दोनों प्राणियों ने शतरज के वज़ीर की रक्षा में प्राण दे दिये । अँधेरा हो चला था । बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानों इन वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। सडहर की टूटी हुई मेहरावे, गिरी हुई दीवारें ओर धूल-धूसरित मीनार इन लाशों को देखती और सिर धुनती थीं। पर । नशा , ईश्वरी एक बड़े जमीदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्फ का, जिसके पास मेहनत मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थी। मैं जमींदारों की बुराई ,करता, उन्हें हिंसक पशु पौर खून चूसनेवाली जोक और वृक्षों की चोटी पर फूलनेवाला बँझा कहता । वह जमींदारों का पक्ष लेता पर स्वभावत उसका पहलू कुछ कमजोर होता था, क्योंकि उसके पास जमींदारों के अनुकून कोई दलील न थी। यह कहना कि सभी मनुष्य बरापर नहीं होते, छोटे बड़े हमेशा होते रहे है और होते रहेंगे, लचर दलील थी। किसी मानुपाय या नैतिक नियम से इस व्यवस्था का औचित्य सिद्ध करना कठिन था। मैं इस वाद-विवाद की गर्मा-गर्मा में अक्सर तेज़ हो जाता और लगनेवाली बातें कह जाता, लेकिन ईश्वरी हारकर भी मुस्कराता रहता था। मैंने उसे कमी गर्म होते नही देसा। शायद इसका कारण यक्ष-या कि वह अपने पक्ष की कमजोरी को समझाता था। नौकरों से वह सीधे मुंह बात न करता था। अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्डता होती है, इसमें उसे भी प्रचुर भाग मिला था। नौकर ने बिस्तर लगाने में जरा भी देर की, दूध जरूरत से ज्यादा गर्म या ठण्डा हुश्रा, साह- क्लि अच्छी तरह साफ नहीं हुई, तो वह श्रापे से बाहर हो जाता । सुस्ती या बदतमोनी उसे जरा भी बर्दाश्त न थी, पर दोस्तों से और विशेषकर मुझमे उसका व्यवहार सौहार्द और नम्रता से भरा होता था। शायद उसकी जगह मैं होता, तो मुझमें भी वही कठोरताएँ पैदा हो जाती, जो उसमें थीं। क्योंकि मेरा लोक प्रेम सिदान्तों पर नहीं, निजी दशाओं पर टिका हुआ था। लेकिन वह मेरी जगह होकर भी शायद अमीर ही रहता , क्योंकि वह प्रकृति से ही विलासी और ऐश्वर्यप्रिय पा। अबको दशहरे की छुट्टियों में मैंने निश्चय किया कि घर न जाऊँगा। मेरे पास किराये के लिए रुपये न थे और न मैं घरवालों को तकलीफ देना चाहता नशा [७५ था। मैं जानता हूँ, वे मुझे जो कुछ देते हैं यह उनकी हैसियत से बहुत प्यादा है। इसके साथ ही परीक्षा का मी सयाल या। प्रभी बहुत-कुछ पदना माफी था और पर जाकर कौन पठता है। योडिंगहाउस में भव की तरह प्रफेशे पड़े रहने को गी जीन चाहता था। इसलिए जब ईश्वरी ने मुझे अपने पर चलने का नेयता दिया, तो मैं विना प्रामह के हो राजी हो गया। इधरी के साप परीक्षा की तैयारी सूप हो जायगी। यह अमीर होकर भी मेहनती और नहीन है। उसने इसके साथ ही कहा-जेकिन भाई, एक पात का खयाल रखना। वहाँ अगर नमीदारों को निन्दा की वो मुग्रामला बिगड़ जायगा और मेरे घरवालों को बुरा लगेगा। वह लोग तो असामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि ईश्वर ने असामियों को उनकी सेवा के लिए ही पैदा किया है। असामी भी वही समझना है। अगर उसे सुम्मा दिया जाय कि जमींदार और असामी में कोई मौशिक भेद नहीं है, तो नींदारों का कर्दी पता न लगे। मैंने कहा-तो क्या तुम समझते हो कि मैं वहाँ जाकर कुछ और हो जाऊँगा? 'हो, मैं तो यही समझता हूँ। F 'तो तुम गलत समझते हो।' ईश्वरी ने इसका काई जवाब न दिया। कदाचित् उसने इस मामले को मेरे षिवेक पर छोड़ दिया और बहुत अच्छा किया। अगर यह अपनी बात पर अड़ता, तो मैं भी जिद पकड़ लेता। (२) सेपेण्ड क्नास तो क्या, मैंने कभी इटर क्लास में भी सफर न किया । अब की सेकेण्ड क्लास में सफर करने का सौभाग्य प्राप्त हुना। गाड़ी मोनी बजे रात को प्राती थी, पर याना के हर्ष में हम शाम को ही स्टेशन ना पहुँचे । कुछ देर इधर-उधर सैर करने के बाद रिमोशमेएट-रूम में जाकर हम लोगों ने भोजन किया । मेरी वेष भूषा और रज ढङ्ग से पारखी खान- गमानों को यह पहचानने में देर न लगी कि मालिक कौन है और पिछ- जग्गू कौर, लेकिन न जाने क्यों मुझे उनकी गुस्तासी पुरी लग रही थी।

७६ ] गल्प-समुख्य पैसे ईश्वरी के जेब से गये। शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज्यादा इन सानसामाओं को इनाम इकराम में मिल जाता हो। एफ अठन्नी तो चलते समय ईश्वरी ही ने दी। फिर भी मैं उन समों से उसी तत्परता और विनय की प्रतीक्षा करता था, जिससे वे ईश्वरी की सेवा कर रहे थे? क्यों ईश्वरी के हुक्म पर सब के सब दौड़ते हैं, लेकिन मैं कोई चीज मांगता हूँ तो उतना उत्साह नहीं दिखाते ? मुझे भोजन में कुछ स्वाद न मिला। यह भेद मेरे ध्यान को सम्पूर्ण रूप से अपनी ओर ग्वीचे हुए था। गाड़ी आई, हम दोनों सवार हुए। खानसामानों ने ईश्वरी को सलाम किया। मेरी ओर देखा भी नहीं। ईश्वरी ने कहा--कितने तमीजदार हैं ये सब । एक हमारे नौकर है कि कोई काम करने का दङ्ग नहीं। मैंने खट्टे मन से कहा-इसी तरह अगर तुम अपने नौकरों को भी पाठ श्राने रोज इनाम दिया करो तो शायद इससे ज्यादा तमीजदार हो जाय । 'तो क्या तुम समझते हो, यह सब केवल इनाम के लालच से इतना अदब करते हैं ? 'जी नहीं, कदापि नही । तमीज और श्रदर तो इनके रक्त में मिल गया है। गाडी चली । डाक थी। प्रयाग से चली तो प्रतापगढ जाकर रुकी। एक श्रादमी ने हमारा कमरा खोला । मैं तुरन्त चिल्ला उठा--दुसरा दरजा है- सेकेण्ड क्लास है। उस मुसाफिर ने डम्ये के अन्दर श्राफर मेरी श्रोर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहा-जी हो, सेवक मी इतना समझता है, और बीच घाले वर्ष पर बैठ गया । मुझे कितनी लज्जा आई, कह नहीं सकता। भोर होते-होते हम लोग मुरादाबाद पहुँचे। स्टेशन पर कई श्रादमी हमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे। दोभद्र पुरुप थे । पाँच वेगार । बेगारों ने हमारा लगेज उठाया । दोनों भद्र पुरुष पीछे-पीछे चले । एक मुसलमान था, रियासतमली , दूसरा ब्राह्मण या, रामहरख । दोनों ने मेरी श्रोर अपरि- चित नेनों से देखा, मानों कह रहे हो तुम कौवे होकर हस के साथ कैसे ?, - नशा [७७ रियासतअली ने ईश्वरी से पूछा-यह बापू साहब क्या आपके साथ पढते हैं। ईश्वरी ने जवाब दिया-हो, साथ पढते भी हैं, और साथ रहते मी है। यों कहिए कि श्राप ही की बदौलत मैं इलाहाबाद पड़ा हुश्रा हूँ, नहीं कप का लखनऊ चला पाया होता । अबकी मैं इन्हें घसीट लाया । इनके घर से कई तार श्रा चुके थे , मगर मैंने इन्कारी जवाब दिलवा दिये। आखिरी तार तो अजेंट था, जिसकी फीस चार पाने प्रतिशब्द है , पर यहाँ से भी उसका जवाब इन्कारी ही गया। दोनों सज्जनों ने मेरी योर चकित नेत्रों से देखा । प्रातहित हो जाने की चेष्टा करते हुए जान पड़े। रियासत गली ने श्रद्धशका के स्वर में कहा -लेकिन श्राप बड़े सादे लिवास में रहते हैं। ईश्वरी ने शका निवारण की-महात्मा गाँधी के भक हे माहब ! खद्दर के सिवा कुछ पहनते नहीं, पुराने सारे कपड़े जला डाले । यों कहो कि राग है । ढाई लाख सालाना की रियासत है , पर श्रापकी सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय से पकड़कर पाये हैं। रामहरख बोले-अमीरों का ऐसा स्वभाव बहुत कम देखने में श्राता है। कोई भार ही नहीं सकता। रियासत नली ने समर्थन दिया-प्रापने महाराज चांगली को देखा होता, तो दांतो तले उंगली दबाते । एक गाढे की मिजई और चमरौधे जूते पहने बाजारों में घूमा करते थे। मुनते हैं, एक बार बेगार में पकड़ गये थे और उही ने दस लाख से कॉलेज खोल दिया। मैं मन में कटा जा रहा था, पर न जाने क्या बात थी कि वह सफेद भूठ उस वक्त मुझे हास्यास्पद न जान पड़ा। उसके प्रत्येक वाक्य के साथ मानो मैं उस कल्पित वैभव के समीपतर श्राता जाता था। मैं शहसवार नहीं हूँ। हा, लड़कपन में कई बार लद्दु घोड़ों पर सवार सुश्रा हूँ। यहाँ देखा तो दो कला-रास घोड़े हमारे लिए तैयार खड़े थे। मेरी तो जान ही निकल गई । सवार तो दुश्रा , पर वोटियाँ कांप रही थी। मैंने ७८] गल्प-समुच्चय चेहरे पर शिकन न पड़ने दीया । घोड़े को ईश्वरी के पीछे डाल दिया। मैरियत यह हुई फि ईश्वरी ने घोड़े को तेज न किया, वरना शायद मैं हाय पाव तुड़वाकर लौटता । सम्भव है, ईश्वरी ने समझ लिया हो कि यह कितने पानी में है। . ईश्वरी का पर क्या था, किला था । इमामबाड़े का सा फाटक, द्वार पर । पहरेदार टहलता हुआ, नोकरी का कोई हिसाब नहीं, एक हाथी बँधा हुआ । ईश्वरी ने अपने पिता, चाचा, ताऊ, श्रादि सबसे मेरा परिचय कराया और उसी अतिशयोक्ति के साथ । ऐसी हवा बाधी कि कुछ न पूछिए । नौकर- चाकर ही घर के लोग भी मेरा सम्मान करने लगे। देहात के जमी- दार, लाखों का मुनाफा , मगर पुलिस कान्टेबिल को भी अफसर समझने वाले । कई महाशय तो मुझे हुजूर हुजूर कहने लगे। जब जरा एकान्त हुआ, तो मैंने ईश्वरी से कहा-तुम बड़े शैतान हो यार, मेरी मिट्टी क्यों पलीद कर रहे हो! ईश्वरी ने सुदृढ मुस्कान के साथ कहा-इन गघों के सामने यही चाल जरूरी थी , वरना सीधे मुँह बोलते भी नहीं। जरा देर बाद एक नाई हमारे पाव दवाने श्राया। घर लोग स्टेशन से पाये हैं, थक गये होंगे। इश्वरी ने मेरी ओर इशारा करके कहा--पहले कुँवर साक्ष्य के पांव दवा। मैं चारपाई पर लेटा हुश्रा था । जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुश्रा हो कि किसी ने मेरे पाव दवाये हो । मैं इसे अमीरों के चोचले, रईसों का गधा- पर और बड़े आदमियों की मुटमरदी और जाने क्या-क्या कहकर ईश्वरी का परिहास किया करता और श्राज मैं पौतड़ो का रईस बनो का स्वांग भर रहा था। इतने में दस मज गये । पुरानी सभ्यता के लोग ये । नई रोशनी श्रमी फेवल पहाड़ की चोटी तक पहुँच पाई थी। अन्दर से भोजन का बुलावा श्राया। हम स्नान करने चले । मैं हमेशा अपनी धोती खुद छांट लिया करता हूँ, मगर यहां मैंने ईश्वरी की ही भांति अपनी पोती भी छोड़ दी। अपने - नशा [७९ हार्यों अपनी धोती घोटते पड़ी शर्म आ रही थी। अन्दर भोजन करने चले। होस्टल में जूते पहने मेज पर ना घटते थे। यह पाव घोना आवश्यक था। कहार पानी लिये खडा या| ईश्वरी ने पाव बढ़ा दिये । कहार ने उसके पाप घोये । मैंने भी पाव बढ़ा दिये । कहार ने मेरे पाव भी घोये । मेरा यह विचार न जाने कहां चला गया था। सोचा था, वह देहात में एकाम होकर सूख पढेंगे, पर यहाँ सारा दिन सैर सपाटे में कट जाता था। कहो नदी में सनरे पर सैर पर रहे हैं, कहीं मनियों या चिड़ियों का शिकार खेल रहे हैं, कहीं पहलवानों की कुश्ती देख रहे हैं, कही रातरज पर जमे है। ईश्वरी सूप अएडे मैंगवाता और कमरे में 'स्टोव पर श्रामलेट बनते। नौकरों का एक जत्था हमेशा घेरे रहता। अपने हाप-पौर को हिलाने की कोई जरूरत नहीं। फेरल जवान हिला देना काफी है। नहाने बैठे तो दो श्रादमी नहलाने को हातिर, लेटे तो दो आदमी पहा झनने को खड़े। मैं मक्षत्मा गांधी का कुँअर चेना मशहर या। भीतर से बाहर तक मेरी पाक यी | नाश्वे में जरा भी देर न होने पाये, कहीं कुबर साहब नाराज न हो जायँ, विछापन ठीक समय पर लग जाय, पर साहम पे सोने का समय आ गया । मैं ईश्वरी से भी ज्यादा नाजुक- दिमाग बन गया था, या पनने पर मजपूर किया गया था। ईश्वरी अपने हाय से विस्तर विद्या ले, लेकिन कुँअर मेहमान अपने हाथों कैसे अपना पिछावन बिछा सकते हैं। उनकी महानता में बट्टा लग जायगा । एक दिन सचमुच यही बात हो गई। ईश्वरी घर में ये शायद अपनी माता से कुछ बातचीत करने में देर हो गई। यहाँ दस बज गये । मेरी से नौद से झपक रही थी। मगर बिस्तर कैसे लगा। कुंथर जो ठहरा। कोई साढे ग्यारह बजे महरा पाया। बड़ा मुँह लगा नौकर था। घर के धन्धों में मेरा विस्तर लगाने को उसे सुधि ही न रही। अब जो याद आई, तो भागा हुश्रा श्राया । मैंने ऐसी डोट यताई कि उसने भी याद किया होगा। ईश्वरी मेरी डोट सुनकर बाहर निकल पाया और बोला-तुमने बहुत अच्छा किया। यह सब हरामखोर इसी व्यवहार के योग्य हैं।

८०] गल्प-समुख्य इसी तरह ईश्वरी एक दिन दक जगह दावत में गया हुआ था। शाम हो गई, मगर लैम्प न जला । लैम्प मेज पर रखा हुआ था। दीयासलाई भी वही थी, लेकिन ईश्वरी खुद फभी लैम्प नहीं जलाता। फिर कुँअर साहब कैसे जलायें ! मैं मुँझला रहा था। समाचारपत्र अाया रखा हुआ था। जी उघर लगा हुआ था, पर लैम्प नदारद । देवयोग से उसी वक्त मुन्शी रियासतनली या निकले। मैं उन्हीं पर उबल पहा । ऐसी फटकार बनाई कि बेचारा उल्लू हो गया-तुम लोगों को इतनी फिक्र भी नहीं कि लेम्प तो जलवा दो ! मालूम नहीं, ऐसे कामचोर आदमियों का यहाँ कैसे गुजर दोता है। मेरे यही घण्टे भर निर्वाह न हो । रियासत अली ने कांपते हुए हाथों से लैम्प जला दिया। वहाँ एक ठाकुर असर पाया करता था। कुछ मनचला आदमी था, महात्मा गांधी का परम भक्त । मुझे महात्माजी का चेला समझकर मेरा बड़ा लिहाज करता था, पर मुझसे कुछ पूछते सकोच करता था । एक दिन मुझे अकेला देखकर श्राया और हाथ बांधकर बोला- सरकार तो गांधी बाबा के चेले है न ? लोग कहते हैं कि यहाँ सुराज हो जायगा तो जमीदार न रहेंगे। मैंने शान जमाई-जमीदारों के रहने की जरूरत ही क्या है ? यह लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और क्या करते हैं ? ठाकुर ने फिर पूछा-तो क्यों सरकार, सब जमींदारों की जमीन छीन ली जायगी। -बहुत से लोग तो खुशी से दे देंगे। जो लोग खुशी से न देंगे, उनकी जमीन छीननी ही पडेगी। हम लोग तो तैयार बैठे हुए है। प्यों ही स्वराज्य हुश्रा, अपने सारे इलाके असामियों के नाम दिया कर देंगे। मैं कुरसी पर पाष लटकाये बैठा था। ठाकुर मेरे पाव दवाने लगा। पिर बोला-श्राजक्ल जमीदार लोग यहा जुलुम करते है सरकार ! हमें भी हुनर अपने इलाके में थोड़ी-सी जमीन दे दें, तो चलकर यहीं श्रापको सेवा मैंने कहा- में रहें। मैंने कहा-प्रभी तो मेरा कोई अख्तियार नहीं है माई, लेकिन ज्यों ही नशा [८१ अरिनयार मिना, मैं सबसे पहले तुम्हें मुलाऊँगा। तुम्हें मोटर ड्राइवरी सिसाकर अपना दाइपर बना लूंगा। सुना, उस दिन ठाकुर ने खूब मन पी और अपनी स्त्री को खूब पीटा और गांव के महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया। छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले । गांव के बहुत से लोग हम लोगों को पहुँचाने आये। ठाकुर तो हमारे साथ स्टेशन तक श्राया। मैंने भी अपना पार्ट खूब सफाई से खेला और अपनी कुरोचित विनय और देवरस की मुहर हर एक पे हदय पर लगा दी। जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूं, लेकिन वह सामर्थ्य कहाँ थी। वापसी टिकट था ही, केवल गाड़ी में बैठना था, पर गाड़ी श्राई तो ठसाठस भरी हुई। दुर्गापूजा की छुष्टिया भोगकर सभी लोग लौट रहे थे । सेकेण्ड कनास में तिल रसो की जगह नहीं। इण्टर क्लास की हालत उससे भी बदतर । यह अाखिरी गाड़ी थी। किसी तरह रुकन सफते थे। बड़ी मुश्किल से तीसरे दरजे में जगह मिली। हमारे ऐश्वर्य ने वा अपना रङ्ग जमा लिया, मगर मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था। श्राये ये आराम से लेटे-लेटे, जा रहे पे सिकुडे हुए । पहलू बदलने की भी जगह न थी। कई श्रादमी पढे लिखे भी ये । वे आपस में अमरेनी स्वराज्य की तारीफ करते जा रहे थे। एक महाशय बाले-ऐसा न्याय तो किसी राज्य में नहीं देखा । हाटे बडे सत्र परायर । राजा मी किसी पर अयाय करे,तो श्रदा लत उसकी भी गर्दन दवा देती है। दूसरे सजन ने समर्थन किया-अरे साहब, श्राप खुद यादशाह पर दावा कर सकते है। अदालत में बादशाह पर भी डिग्री हो जाती है। एक श्रादमी, जिसकी पीठ पर बड़ा-सा गट्ठर बँधा था, फलकत्ते जा रहा था। यही गठरी रखने की जगह न मिलती थी। पीठ पर बांधे हुए था। इससे वेचैन होकर बार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता। मैं द्वार के पास ही बैठा था। उसका बार-बार श्राफर मेरे मुंह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा लग रहा था । एक ता हवा यो ही कम थी, दूसरे उस गँवार

८२]
गल्प-समुच्चय
का पाकर मेरे मुंह पर खड़ा हो जाना, मानों मेरा गला दबाना था। मैं कुछ
देर तक लन्त किये बैठा रहा । एकाएक मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे पकड़-
कर पीछे ढोल दिया और दो तमाचे नोर जोर से लगाये।
उसने श्रर्सि निकालकर फहा-पों मारते हो, बापूजी, हमने भी
किराया दिया है।
मैंने उठकर दो-तीन तमाचे और जड़ दिये।
गाड़ी में तूफान श्रा गया। चारों ओर से पौछारें पड़ने लगी।
'अगर इतने नाजुक मिजाज हो तो अब्बल दर्जे में क्यों नहीं बैठे!
'कोई यहा आदमी होगा तो अपने घर का होगा । मुझे इस तरह मारते,
तो दिखा देता।
'क्या कसूर किया था वेचारे ने । गाड़ी में सांस लेने की जगह नहीं,
खिड़की पर भरा सांस लेने सहा हो गया तो उसपर इतना क्रोध ! अमीर
होकर क्या श्रादमी अपनी इसानियत बिलकुल खो देता है।
'यह भी अंग्रेजी राज है, जिसका आप बखान कर रहे थे।
एक ग्रामीण बोला-दफतरन मा घुसन तो पावन नहीं, उसपर इत्ता
मिजाज!
ईश्वरी ने अंग्रेजी में कहा -What an idiot you are Br और
मेरा नशा अब कुछ-इछ उतरता हुमा मालूम होता था।

रानी सारन्धा (१) अंधेरी रात फे सन्नाटे में पान नदी महानों से टकराती हुई ऐसी मुहावनी मालूम होती थी से पुर शुभर करती हुई नकिता। नदी पे दाहने तट पर एक टीला है। उसपर एक पुराना दुग यना हुआ है, जिसको जगली पक्षों ने घेर रखा है। रोले ऐ पूर्व की ओर एक छोटा सा गांव है। यह गदी और गाय दोनों एक देला सरदार ये कीर्ति चिह है। यतान्दिया व्यतीत होगा, मुन्देलपए में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ, मुसलमान आये और गये, पुदेला राजा उठे और गिरे, कोर गांव, कोई इलाका ऐसा न था, जो इन दुव्यवस्थाओं से पीड़ित न हो, मगर इस गं पर किसी शत्रु की विजय पताका न लहराई और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदाणण न हुआ। यह उसका सोमाग्य था । अनिरुद्धसिंह पीर राजपूत था। यह माना ही ऐसा था, जब मनुष्य मात्र को अपने पाहु-बल और पराम हो का भरोसा था। एक ओर मुसलमान सेनाएँ पैर जमाये सही रहती थी, दूसरी ओर पलवान् राजा अपने निर्वल भाइयों का गला घोटने पर तत्पर रहते थे । अनिरुद्धसिंह के पास सवारों और पियादों का एक छोटा-सा, मगर सनीव दल था। इससे वह अपने कुल और मर्यादा की रक्षा किया करता था। उसे कमी चैन से बैठना नसीय न होता था। तीन वर्ष पहले उसका विवाद शीतलादेवी से हुआ, मगर अनिरुद्ध विहार के दिन और विलास की रातें पहाड़ों में काटता या और शीतला उसकी जान की सैर मनाने में। यह कितनी बार पति से अनुरोध पर चुकी थी, कितनी बार उसके पैरों पर गिरकर रोई थी कि तुम मेरो आँखों से दूर न हो, मुझे हरिद्वार ले चलो। मुझे तुम्हारे साथ वन-वास अच्छा है, यह वियोग नहीं सहा जाता । उसने प्यार से कहा, जिद्द से कहा, विनय की, मगर अनिरुद्ध बुदेला था, शीतला अपने किसी इथियार से उसे परास्त न कर सकी। .

८६] गल्प समुच्चय देहली को चला गया। यह शाहजहाँ के शासन काल का अन्तिम भाग था। शहजादा दारा शिकोह राजकीय कार्यों को सँभालते थे। युवराज की श्राखों में शील था और चित्त में उदारता। उन्होंने चम्पतराय की वीरता की कथाएँ सुनी थी, इसलिए उसका बहुत श्रादर सम्मान किया और कालपी की बहुमूल्य जागीर उसके भेंट की, जिसकी आमदनी नौ लाख थी। यह पहला अवसर था कि चम्पतराय को श्राये दिन की लड़ाई-झगडे से निवृत्ति मिली और उसके साथ ही भोग विलास का प्राबल्य हुश्रा । रात-दिन श्रामोद प्रमोद की चर्चा रहने लगी । राजा विलास में दूबे, रानियाँ जड़ाऊ गहनों पर रीझी । मगर सारन्धा इन दिनों बहुत उदास और सकुचित रहती । वह इन रहस्यों से दूर दूर रहती, ये नृत्य और गान की सभाएँ उसे सूनी प्रतीत होती। एक दिन चम्पतराय ने सारन्धा से कहा-सारन, तुम उदास क्यों रहती हो ? मैं तुम्हें कभी हँसते नहीं देखता। क्या मुझसे नाराज हो ? सारन्धा की घाखों में जल भर पाया । बोली-मामीजी। श्राप क्यों ऐसा विचार करते हैं । जहाँ श्राप प्रसन्न हैं, वहाँ मैं भी खुश हूँ। चम्मतराय-मैं जबसे यहां आया हूँ, मैंने तुम्हारे मुख कमल पर भी मनोहारिणी मुसकिराहट नहीं देखी । तुमने कभी अपने हाथों से मुझे बीड़ा नदी पिलाया । कभी मेरी पाग नहीं सॅवारी, कभी मेरे शरीर पर शस्त्र नहीं सजाये। कहीं प्रेमलता मुरझाने तो नहीं लगी ? सारन्धा-प्राणनाथ ! श्राप मुझसे बातें पूछते हैं, जिनका उत्तर मेरे पास नहीं है । ययार्थ में इन दिनों मेरा चित्त कुछ उदास रहता है । मैं बहुत चाहती हूँ कि खुश रहूँ , मगर एक बोझ-सा हृदय पर घरा रहता है। चम्पतराय स्वय आनन्द में मम ये । इसलिए उनके विचार में सारन्धा को असन्तुष्ट रहने का कोई उचित कारण नहीं हो सकता था। वे महें सिकोड़कर वोले-मुझे तुम्हें उदास रहने का कोई विशेष कारण नहीं मालूम होता । श्रीरछे में कौन सा सुग्व था, जो यहाँ नहीं है ? सारधा का चेहरा लाल हो गया । बोली-मैं कुछ कहूँ, श्राप नारान तो न होंगे ! चमतराय-नहीं, शौफ से कहो। A , - रानी सारन्या [८७ सारन्धा-सोरठा में मैं एक राजा की रानी थी । यहाँ मैं एक जागीरदार की चेरी हूँ। ओरछा में मैं यह यो जो अवध में कौशल्या थीं, परन्तु यहाँ मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज श्राप आदर से सिर झुकावे हैं, वह कल आपके नाम से कांपता था। रानी से चेरी होकर भी प्रसन चित्त होना मेरे वरा में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियाँ बड़े महंगे दाम में मोल ली है। चमतराय के नेनों से एक पर्दा सा हट गया। वे अब तक सारन्या की श्रामिक उच्चता को न जानते थे। जैसे ये मा-बाप का बालक मा की चर्चा सुनकर रोने लगता है, उसी तरह ओरछा की याद से चमतराय की अखि सजल हो गई। उन्होंने श्रादर युक अनुराग के साथ सारन्धा को हृदय से लगा लिया। श्राज से उन्हें फिर उसी उजड़ी वरती को फ्रिक हुई, जहाँ से धन और कीर्ति की अभिलाषाएँ सींच लाई थी। मा अपने खोये हुए बालक को पाकर निहाल हो जाती है। चम्पतराय के श्राने से बुन्देलखण्ड निहाल हो गया। श्रीरछा के भाग जागे। नौवते झड़ने लगी और फिर पारन्धा वे कमल नेत्रों में जातीय अभिमान का आभास दिखाई देने लगा। यहाँ रहते कई महीने बीत गये। इसी बीच में शाहजहाँ बीमार पड़ा। शाहजादाना में पहले से ईर्ष्या की अग्नि दहक रही थी। यह खबर सुनते ही ज्वाला प्रचण्ड हुई । सग्राम की तैयारियां होने लगी। शाहजादा मुराद और मुहीउद्दीन अपने अपने दल सजाकर दस्खिन से चले। वर्षा के दिन थे। उर्वरा भूमि रग विरग के रूप भरकर अपने सौन्दर्य को दिखाती थी। मुराद और मुहीउद्दीन उमगों से मरे हुए कदम बढाते चले श्राते थे। यहाँ तक कि वे धौलपुर के निकट चम्मल के तट पर श्रा पहुंचे, परन्तु यहाँ, उशेने बादशाही सेना को अपने शुभागमन के निमित्त तैयार पाया। शाहनदे अब बड़ी चिन्ता में पड़े। सामने अगम्य नदी लहर मार रही थी, लोम से भी अधिक विस्तारवाली। घाट पर लोहे की दीवार खड़ी थी, ८८ गल्प-समुञ्चय किसी योगी के त्याग के सदृश सुदृढ । विवश होकर चमतराय के पास संदेशा मेजा कि खुदा के लिए श्राकर इमारी हूबती हुई नाव को पार लगाइए । राजा ने भवन में जाकर सारन्धा से पूछा-इसका क्या उत्तर ! सारन्धा-अापको मदद करनी होगी। चम्पतराय उनकी मदद करना दाराशिकोह से पैर लेना है। सारन्धा-यह सत्य है, परन्तु हाथ फैजाने की मर्यादा भी तो निमानी चाहिए। चम्पतराय-प्रिये ! तुमने सोचकर जवार नहीं दिया। सारन्धा-प्राणनाथ 1 मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि यह मार्ग कठिन है और हमें अपने योद्धाओं का रक्त पानी के समान वहाना पड़ेगा, परन्तु हम अपना रक्त बहायेंगे और चम्बन की लहरों को लाल कर देंगे। विश्वास रखिए कि जय तक नदी की धारा यहती रहेगी, वह हमारे वीरों का कीर्ति- गान करती रहेगी। जब तक युन्देलों का एक भी नामलेवा रहेगा, यह रक्त- पिन्दु उसके माये पर केशर का तिलक बनकर चमकेगा । वायुमएहल में मेघराज को सेनाएँ उमड़ रही थी। श्रोरछे के फिले से बुन्देलों की एक काली घटा उठो और वेग के साथ चम्बन की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारन्धा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा देकर कहा-भुन्देलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है। श्राज उसका एक एक श्रग मुखकिरा रहा है और हृदय हुलसित है। बुन्देलों की यह सेना देखकर शाहजादे फूले न समाये । राजा वहाँ की अगुल; अगुल भूमि से परिचित थे। उन्होंने बुदेलों को तो एक आड़ में छिपा दिया पार वे शाहजादों की फौज को सजाकर नदी के किनारे-किनारे पश्चिम की ओर चले । दाराशिकोह को भ्रम हुआ कि शत्रु किसी अन्य घाट से नर्द उतरना चाहता है। उन्होंने घाट पर से मोर्चे हटा लिये। घाट में बैठे हुप बुन्देले इसी ताक में थे। बाहर निकल पड़े और तुरन्त ही नदी में घोड़े डार दिये। चम्पतराय ने शाहनादा दागशिकोह को भुलावा देकर अपनी फौज घुम दी और वह बुन्देलो के पीछे पाता हुश्रा उसे पार उतार पाया । इस कठिन - रानी सारन्धा [८९ घाल में सात घटों का विलम्ब हुश्रा, परन्तु जाकर देखा, तो सात सौ बुन्देला योदानों की लाशें फड़क रही थी। राजा को देखते ही बुन्देलों की हिम्मत बंध गई । शाहजादा की सेना ने भी 'अल्लाहो अकबर' की घनी के साथ धावा किया। बादशाही सेना में इलचल मच गई । उनको पछिया छिन्न भिन्न हो गई, हाथों हाथ लड़ाई होने लगी, यहाँ तक कि शाम हो गई । रण-भूमि रुधिर से लाल हो गई और श्राकाश मे अँधेरा हो गया। घमासान की मार हो रही । बादशाही सेना शाहजादों को दवाये पाती थी। अकस्मात् पच्छिम से फिर बुन्देलों की एक लहर उठी और इस वेग से बादशाही सेना की पुश्त पर टकराई कि उसके कदम उखड़ गये । मीता हुश्रा मैदान हाथ से निकल गया। लोगों को कौत्- हल था कि यह देवी सहायता कहां से प्राई । सरल स्वभाव के लोगो की धारणा थी कि यह फतह के रिश्ते हैं, शाहजादों की मदद के लिए आये है, परन्तु जब राजा चम्पतराय निकट गये, तो सारन्धा ने घोड़े से उतरकर उनके पद पर सिर झुका दिया । राजा को असीम शानद हुा । यह सारन्धा थी। समर भूमि का दृश्य इस समय अत्यन्त दुखमय था। थोड़ी देर पहले ना सजे हुए वीरों के दल थे, वहाँ अब ये जान लाशें फहक रही थी । मनुष्य ने अपने स्वार्य के लिए श्रादि से ही माइयों की हत्या की है। श्रय विजयी सेना लूट पर टूटी। पहले मर्द मर्दो से लड़ते थे, अब वे मुदों से लड़ रहे थे । वह वीरता और पराक्रम का चित्र या, यह नीचता और दुबलता की ग्लानि पद तसवीर थी। उस समय मनुष्य पशु बना हुश्रा था, श्रय वह पशु से मी बढ गया था। इस नोच खसोट में लोगों को बादशाही सेना के सेनापति वनी बहादुर. खा की लाश दिखाई दी। उसके निकट उसका घोड़ा खड़ा हुआ अपनी दुम से मक्खियों उड़ा रहा था । राजा को घोड़ों का शौक था। देखते ही वह उस पर मोहित हो गया। यह एराकी जाति का अति सुन्दर घोडा था। एक-एक अग साँचे में ढला हुआ, सिंह की सी छाती, चीते की सी कमर । उसका यह प्रेम और स्वामिमति देखकर लोगों को बध कौतूहल हुना। राजा ने हुस्म ६ ९० ] गिल्प समुच्चय दिया- खबरदार ! इस प्रेमी पर कोई हथियार न चलाये, इसे जीता पकड़ ले, यह मेरे अस्तबल की शोभा बढायेगा । जो इसे मेरे पास लायेगा-उसे धन से निहाल कर दूंगा। योद्धागण चारों ओर से लपके, परन्तु किसी को साहस न होता था कि उसपे निकट जा सके । कोई चुमकारता था, कोई फन्दे में फंसाने की फिक में था, पर कोई उपाय सफल न होता था। वह सिपाहियों का एक मेलामा लगा हुया था। तब सारन्या अपने खेमे से निकली और निर्भय होकर घोड़े के पास चली गई । उसकी आँखों में प्रेम का प्रकाश था, छल का नहीं । घोड़े ने सिर मुका दिया । रानी ने उसकी गर्दन पर हाथ रखा और वह उसकी पीठ सुह- लाने लगी। पाडे ने उसके श्रञ्चन में मुंह छिपा लिया। गनी उसकी रास पकड़कर खेमे की शोर चली । घोड़ा इस तरह चुपचाप उसके पीछे चला, मानों सदेव से उसका सेवक है। पर बहुत अच्छा होता कि घोड़े ने सारन्धा से भी निष्पुरता की होती। यह सुन्दर घोडा आगे चलकर इस राज्य परिवार के निमित्त रत्न जटित मृग प्रीत हुथा। समार एक रण क्षेत्र है। इस मैदान में उसी सेनापति को विजय-लाभ होता है, जो अवसर को पहचानता है । वह अवसर देखकर जितने उत्साह से घटता है, उतने ही उत्साह से आपत्ति के समय पर पीछे हट जाता है। घह वीर पुरुष राष्ट्र का निर्माता होता है, और इतिहास उसके नाम पर यश के फूलों की वर्षा करता है। पर इस मैदान में कमी-कभी ऐसे सिपाही भी पा जाते हैं, जो अवसर पर कदम बढाना चाहते है, लेकिन सकट में पीछे हटना नहीं जानते। यह रणधीर पुरुष विजय को नीति भेंट कर देता है। वह अपनी सेना का नाम मिटा देगा, किन्तु जहा पर एक बार पहुँच गया है, वहां से कदम पीछे न हटायेगा। उनमें कोई विरला ही ससार क्षेत्र में विजय प्राप्त करता है, किन्तु उसकी हार विजय से भी गौरवात्मक होती है। अगर यह अनुमपशील ३ प्राय ।

रानी सारन्धा और बनारस [ ९१ सेनापति राष्ट्रों की नीव डालता है, तो यह आप जान देनेवाला, यह मुँह न मोड़नेवाला सिपाही राष्ट्र के भावों को उच्च करता है और उसके हृदय पर नैतिक गौरव को अकित कर देता है। उसे इस कार्य क्षेत्र में चाहे सफलता न हो, किन्तु जर किमी वाक्य या समा में उसका नाम नवान पर श्रा जाता है, तो श्रोतागण एक स्वर से उसके कीति गौरव को प्रतिवनित कर देते हैं । सारन्धा इन्हीं 'पान पर जान देनेवालों में थी। शहजादा मुहीउद्दीन चम्बल के किनारे से श्रागरे की ओर चला तो सौभाग्य उसके सिर पर मोर्छ हिलाता था। जब वह श्रागरे पहुँचा तो विजयदेवी ने उसके लिए सिक्षासन सता दिया । औरगजेब गुणज्ञ था। उसने बादशाही सरदारों के अपराध क्षमा कर दिये, उनरे राज्यपद लौटा दिये और राजा चम्पतराय को उसके बहुमूल्य कृल्यों के उपलक्ष्य में 'बारह हजारी मन्सब' प्रदान किया। श्रोरछा से बनारस यमुना तक उसकी जागीर नियत की गई। बुदेला राजा फिर राज्य सेवक बना, वह फिर सुख विलास में डूबा और रानी सारन्धा फिर पराधीनता के शोक से घुलने लगी। पलीवहादुरखा बड़ा वाक्यचतुर मनुष्य पा। उसकी मृदुलता ने शीघ्र ही उसे मादशाह श्रालमगीर का विश्वास पात्र बना दिया। उस पर रान समा में सम्मान की दृष्टि पडने लगी। खाँसाहस के मन में अपने घोड़े के हाथ से निकल जाने का बड़ा शोक था। एक दिन भर छत्रसाल उसी घोडे पर सवार होकर सैर को गया था। वह खासाहब के महल की तरफ जा निकला। वलीबहादुर ऐसे ही अवसर की ताक में था। उसने तुरत अपने सेवको को इशारा किया। राजकुमार अवेला क्या करना। पाव पाव घर आया और उसने सारन्धा से सब समा- चार बयान किया। रानी का चेहरा तमतमा गया । बोली-मुझे इसका शोक नहीं कि घोड़ा हाथ से गया, शोक इसका है कि तू उसे खोकर जीता क्यों लौय, स्पा सेरे शरीर में बुदेलों का रस नहीं है १ घोहन मिलता, न सही, किन्तु तुझे दिखा देना चाहिए था कि एक बुन्देला बालक से उसका घोड़ा छीन लेना हसी नहीं है।

९२] गल्प-समुन्वय यह कहकर उसने अपने पच्चीस योद्धाओं को तैयार होने की थाज्ञा दी, स्वय अस्त्र धारण किये और योद्धाओं के साथ वलीवहादुरखों के निवास. स्थान पर जा पहुंची। खासाहब उसी घोडे पर सवार होकर दरवार चले गये थे । सारन्धा दरबार की तरफ चली और एक क्षण में किसी वेगवती नदी के सदृश बादशाही दरबार के सामने जा पहुंची। यह कैफियत देखते ही दरबार में हलचल मच गई। अधिकारी वर्ग घर उधर से श्राकर जमा हो गये। श्रालमगीर भी सहन से निकल पाये। लोग अपनी अपनी तलवारें सँभालने लगे और चारों तरफ शोर मच गया। कितने ही नेनों ने इसी दरबार में अमरसिंह की तलवार की चमक देखी थी। उन्हें वही घटना फिर याद आ गई। सारन्धा ने उच्च स्वर से कहा-खाँसाहब 1 बड़ी लजा की बात है कि आपने यह वीरता जो चम्पल के तट पर दिखानी चाहिए थी, आज एक अबोध बालक के सम्मुस दिखाई है। क्या यह उचित था कि आप उससे घोड़ा छीन लेते। वलीबहादुरखा की नाखों से श्रमि ज्वाला निकल रही थी। वे कडी श्रावास से बोले-किसी गैर को क्या मजाप है कि मेरी चीज्ञ अपने काम में लाये। सारन्धा -वह श्रापकी चीज नहीं, मेरी है। मैंने उसे रण-ममि में पाया है और उसपर मेरा अधिकार है। क्या रणनीति की इतनी मोटी बात भी आप नहीं जानते। खाँसाहब-वह घोड़ा मैं नहीं दे सकता, उसके पदले में साग अस्तबल आपको नज़ार है। रानी में अपना घोड़ा लूंगी। खाँसाहर-मैं उसके बराबर जवाहरात दे सकता हूँ। पर तु घोड़ा नहीं दे सकता। रानी-तो फिर इसका निश्चय तलवारो से होगा। बुन्देला योद्धाओं ने तलवारें मौत ली और निकट या कि दरबार की भूमि रक से प्लावित हो जाय कि बादशाह श्रालमगीर ने बीच में आकर रानी सारल्या ८ ९३ कश-रानी साहया! साप सिपाहियों को रोकें। घोड़ा आपको मिल नायगा, परन्तु उसका मूल्य बहुत देना पड़ेगा। रानी-में उसके लिए अपना सर्वस स्पागने पर तैयार हूँ। बादशाह-जागीर और मनसय भो! रानी-जागीर और मनसब कोई चीज नही। पादशाह-अपना राज्य भी! रानी-हाँ राज्य भी। यादशाह-एक घोड़े के लिए? रानी-हो, उस पदार्य के लिए, जो संसार में सबसे अधिक मूल्य- वान् है। पादशाह-यह क्या है? रानी-अपनी पान। इस भाति रानी ने एक घोड़े के लिए अपनी विस्तृत जागीर, उप राज्य- पद और राज-सम्मान सय दाय से सोया और पेवल इतना हो नहों, भविष्य के लिए काटे पोये। इस पड़ी से प्रत दण तक चतराय को यान्ति न मिली। राना चम्पतराय ने फिर धोरछे के किले में पदार्पण किया । उहे मनसव और जागीर के हाथ से निकल जाने का प्रत्य व शोक हुप्रा, किन्तु उन्होंने अपने मुंह से शिकायत का एक शन्द मी नहीं निकाला। वे सारन्धा के स्वभाव को भलीभांति जानते थे। शिकायत इस समय उसके श्रात्मगौरव पर कुठार का काम करती। कुछ दिन यहाँ शान्ति-पूर्वक व्यतीत हुए, लेकिन बादशाह सारन्धा की कठोर बातें भला न था। वह क्षमा करना जानता ही नया। ज्यों ही भाइयों की श्रोर से निश्चिन्त हुना, उसने एक बड़ी सेना चम्मतराय का गर्व चूर्ण करने के निमित्र भेजी और बाईस अनुमवशील सरदार इस मुहीम पर नियुक किये । शुभकरण बुन्देला बादशाह का सूबेदार था। वह चम्मतराय का बचपन का मित्र और छहपाठी था। उसने चम्मत- राय को परास्त करने का बीड़ा उठाया। और भी कितने बुदेला ही सरदार गल्प-समुच्चय राजा से विमुख होकर बादशाही सूवेदार से श्रा मिले । एक घोर सग्राम हुा । भाइयों की तलवारें रक से लाल हुई । यद्यपि इस समर में राजा को विजय प्राप्त हुई, लेकिन उनकी शक्ति सदा के लिए क्षीण हो गई। निकटवर्ती बुन्देला राजा, जो चम्पतराय के याहु चल थे, बादशाह के कृपा- काक्षी बन बैठे ! साथियों में कुछ तो काम थाये, कुछ दगा कर गये । यहाँ तक कि निज सम्बन्धियों ने भी श्रासे चुरा ली, परन्तु इन कठिनाइयों में भी चम्पतराय ने हिम्मत नहीं हारी। धीरज को न छोड़ा। उन्होंने ओरछा छोड़ दिया और तीन वर्ष तक बुन्देलखण्ड के सघन पर्वतों पर छिपे फिरते रहे। बादशाही सेनाएँ शिकारी जानवरों की भांति सारे देश में मँडरा रही थी। आये दिन राजा का किसी न किसी से सामना हो जाता था । सारन्धा सदैव उनके साथ रहती और उनका उत्साह बढाया करती । बड़ी बड़ी लाप त्तियों में भी, जय कि धैर्य लुप्त हो जाता --ौर प्राशा साथ छोड देती- श्रात्मरक्षा का धर्म उसे संभाले रहता था। तीन साल के बाद अन्त में बादशाह के सूबेदारों ने श्रालमगीर को सूचना दी कि इस शेर का शिकार श्राप सियाय और किसी से न होगा। उत्तर पाया कि सेना को हटा लो और घेरा उठा लो । राजा ने समझा, सकट से निवृत्ति हुई , पर यह बात शीम ही भ्रमात्मक सिद्ध हो गई। तीन सप्ताह से बादशाही सेना ने ओरछा घेर रखा है। जिस तरह कठोर वचन हृदय को छेद डालते हैं, उसी तरह तोपों के गोलों ने दीवारों को छेद डाला है। किले में २० हजार श्रादमी घिरे हुए हैं, लेकिन उनमें प्राधे से अधिक स्त्रियां और उनसे कुछ ही कम बालक हैं । मदों की संख्या दिनोदिन न्यून होती जाती है, श्राने जाने के मार्ग चारों तरफ से बन्द हैं । हवा का भी गुज़र नहीं। रसद का सामान बहुत कम रह गया है । स्त्रियाँ पुरुपों और बालकों को जीवित रखने के लिए श्राप उपवास करती हैं । लोग बहुत हताश शे रहे है । औरतें सूर्यनारायण की और हाथ उठा-उठाकर शनु को कोसती है। बालकवृन्द मारे शोध के दीवारों की श्राह से उनपर पत्थर पंकते हैं, जो मुश्किल से दीवार के उस पार जाते हैं । राजा चम्पतराय स्वयम राना- - रानी सारन्या [९५ स्वर से पीड़ित हैं। उन्होंने कई दिन से चारपाई नहीं छोड़ी। उन्हें देसकर लोगों को कुछ ढारस होता था, लेकिन उनकी बीमारी से सारे किले में नैराश्य छाया हुश्रा है। राजा ने सारन्धा से कहा-बाज शनु जरूर किले में घुस पायेंगे । सारन्धा-ईश्वर न करे कि इन खिों से वह दिन देखना पड़े। -मुझे बही चिन्वा इन अनाय स्त्रियों और बालों की है। गेहूँ के साप यह धुन भी पिस जायेंगे। सारन्धा--हम लोग यहां से निकल जाये, तो कैसा ? राजा-इन अनाथों को छोड़कर ! सारन्धा-इस समय इन्हें छोड़ देने ही में कुशल है । हम न होंगे, तो शनु इनपर कुछ दया अवश्य ही करेंगे। राजा-नहीं, यह लोग मुझसे न छोडे जायेंगे। जिन मदों ने अपनी जान हमारी सेवा में अर्पण कर दी है, उनकी स्त्रियों और बच्चों को मैं यो कदापि नहीं छोड़ सकता। सारन्धा- लेकिन यहाँ रहकर हम उनकी कुछ मदद भी तो नहीं कर सकते। राजा-उनके साथ प्राण तो दे सकते हैं । मैं उनकी रक्षा में अपनी जान लड़ा दूंगा। उनके लिए बादशाही सेना की खुशामद फरूँगा । कारावास की कठिनाइयां सहूँगा , किन्तु इस सकट में उसे छोड़ नहीं सकता। सारन्धा ने लज्जित होकर सिर झुका लिया और सोचने लगी-निस्सन्देश अपने प्रिय साथियों को आग की आंच में छोड़कर अपनी जान बचाना घार नीचता है । मैं ऐसी स्वाध क्यों हो गई हूँ ? लेकिन फिर एकाएक विचार उत्पन्न हुश्रा । बोली- यदि प्रापको विश्वास हो जाय कि इन श्रादमियों के साथ कोई अयाय न किया जायगा, तव तो आपको चलने में कोई बाधा न होगी। राजा-(सोचकर ) कौन विश्वास दिलायेगा ! सारन्या-बादशाह के सेनापति का पतिज्ञापन। राजा-तब मैं सानन्द चलूँगा।

९६ ] गल्प-समुच्चय सारन्धा विचार-सागर में डूबी। बादशाह के सेनापति से क्योंकर यह प्रतिज्ञा कराऊँ! कौन यह प्रस्ताव लेकर वहाँ जायगा और वे निर्दयी ऐसी प्रतिज्ञा करने ही क्यों लगे । उन्हें तो अपनी विजय की पूरी श्राशा है। मेरे यहाँ ऐसा नीति-कुशल, वाक्पटु, चतुर कौन है, जो इस दुस्तर कार्य को सिद्ध फरे । छत्रसाल चाहे तो कर सकता है। उसमें ये सब गुण मौजूद हैं। इस तरह मन में निश्चित कर रानी ने छत्रसाल को बुलाया। यह उसके चारा पुत्रों में सबसे बुद्धिमान और साहसी था। रानी उसे सबसे अधिक प्यार करती थी। जब छत्रसाल ने श्राफर रानी को प्रणाम किया, तो उसके कमलनेत्र सजल हो गये और हृदय से दीर्घ नि.श्वास निकल पाया। छत्रसाल-माता, मेरे लिए क्या प्राज्ञा है । रानी-पाज लड़ाई का क्या ढग है ? छनसाल-हमारे पचास योद्धा अब तक काम था चुके हैं। रानी-बुन्देलों की लाज श्रम ईश्वर के हाथ है। छत्रगल-६म श्राज रात को छापा मारेंगे रानी ने सक्षेप में अपना प्रस्ताव छत्रसाल के सामने उपस्थित किया और कहा-यह काम किसको सौंपा जाये ! छत्रसाल-मुझको। 'तुम इसे पूरा कर दिखायोगे' हा, मुझे पूर्ण विश्वास है। 'अच्छा जाश्रो, परमात्मा तुम्हारा मनोरथ पूरा करे ।' छत्रसाल जब चला, तो रानी ने उसे हृदय से लगा लिया और तय प्राकाश की और दोनों हाथ उठाकर कहा-दयानिधे, मैंने अपना तरुण और होनहार पुभ बुदेलो की श्नान के आगे भेंट कर दिया। अब इस पान को निभाना तुम्हारा काम है। मैंने यही मूल्यवान वस्तु अर्पित की है। इसे स्वीकार करो। . 4 न दूसरे दिन प्रात काल सारन्धा स्नान करके थाल में पूजा की सामग्री लिये मदिर को चली। उसका चेहरा पीला पड़ गया था और खिो-तले अंधरा रानी सारन्धा पाया जाता था। वह मन्दिर के द्वार पर पहुंची थी कि उसके यान में साहर से प्रापर एक तीर गिरा। तीर की नोक पर एक पागन का पुर्मा लिमय सुया था। सारधा ने थाल मदिर पे चबूतरे पर रख दिया और पुर्जे को खोलकर देखा, तो प्रानन्द से चेहरा खिल गया, लेकिन यह मानन्द क्षण- भर का मेहमान पा ! हाय ! इस पुजे के लिए मैंने अपना प्रिय पुत्र क्षय से खो दिया है । फागत पे टुकष्ट को इतने महगे दामो किसने लिया होगा? मन्दिर से लौटकर सारा राजा चम्मतराय के पास गई और बोली- प्राणनाथ ! अापने जो वचन दिया था, उसे पूरा कीजिए । राजा ने चौककर पूछा-तुमने अपना वादा पूरा कर लिया। रानी ने यह प्रतिज्ञा-पत्र राना को दे दिया । चम्मतराय । उसे गौरव से देखा, फिर गोले -अब मैं चलूँग और ईश्वर चाहा, तो एक बेर पिर शत्रुओं की स्वर लूँगा, लेकिन सारन ! सच बतायो, इस पत्र के लिए क्या देना पड़ा। रानी ने कुण्ठित स्वर से कहा-बहुत छ । राजा-मुर। रानी--एक जवान पुत्र राजा को वाण सा लगा। पूछा-कौन ? अगदराय ? राजा-रतनसाहर रानी-नहीं। राजा-छत्रपाल ! रानी-हो। जैसे कोई पक्षी गोली साकर परों को फड़फड़ाता है और तर बेदम होकर गिर पड़ता है, उसी भांति चम्पनराय पलग से उछले और फिर अचेत होकर गिर पड़े। छनसान उनका परमप्रिय पुत्र था। उनरे भविष्य की सारी कामनाएँ उसी पर अवलम्बित थी। जब चेव हुआ, तो बोले---सारन, तुमने बुरा किया , अगर घनसाल मारा गया, तो बुदेला-वश का नाश हो जायगा । अंधेरी रात थी। रानी सारधा घोडे पर सवार चम्पतराय को पालकी - ९८] गल्प-समुच्चय में बैठाये किले के गुप्त मार्ग से निकली जाती थी। श्राज से बहुत काल पहले जप एक दिन ऐसी ही अंधेरी, दुःखमय रात्रि थी, तब सारन्धा ने शीतलादेवी को कुछ कठोर वचन कहे थे। शीतलादेवी ने उस समय जो भविष्यवाणी की थी, वह आज पूरी हुई | क्या सारन्धा ने उसका जो उत्तर दिया था, वह भी पूरा होकर रहेगा? । . मध्याह था । सूर्यनारायण सिर पर पाकर अग्नि की वर्षा कर रहे थे। शरीर को मुलसानेवाली प्रचण्ड, प्रखर वायु, वन और पर्वतों में भाग लगाती फिरती थी। ऐसा विदित होता था, मानों अमिदेव की समस्त सेना गरजती हुई चली श्रा रही है। गगन मण्डल इस भय से कांप रहा था। रानी सारन्धा घोड़े पर सवार, चम्पतराय को लिये, पच्छिम की तरफ चली जाती थी। नोरछा दस कोस पीछे छूट चुका था और प्रतिक्षण यह अनुमान स्थिर होता जाता कि अब हम भय के क्षेत्र से बाहर निकल आये। राजा पालकी में श्रचेत पड़े हुए थे। और कहार पसीने में शराबोर थे । पालकी के पीछे पांच सवार घोड़ा बढ़ाये चले श्राते थे । प्यास के मारे समका बुरा हाल था । तालू सूखा जाता था । किसी वृक्ष की छह और कुएँ की तलाश में से चारों ओर दौड़ रही थीं। अचानक सारन्धा ने पीछे की तरफ फिरफर देसा, तो उसे सवारों का एक दल श्राता हुश्रा दिखाई दिया। उसका माथा ठनका कि अब कुशल नही है । ये लोग अवश्य हमारे शनु हैं। फिर विचार हुना कि शायद मेरे राजकुमार अपने आदमियों को लिये हमारी सहायता को पा रहे हैं। नैराश्य में भी आशा साथ नहीं छोड़ती। कई मिनट तक वह इसी श्राशा और भय की अवस्था में रही। यहाँ तक कि वह दल निकट पा गया और सिपाहियों के वस्त्र साफ नजर आने लगे। रानी ने एक ठण्डी सांस ली, उसका शरीर तृणवत् कापने लगा । यह बादशाही सेना के लोग थे। सारन्धा ने कहारों से कहा- डोली रोक लो। बुन्देला सिपाहियों ने भी तलवारें खींच ली । राजा की अवस्था बहुत शोचनीय थी, कि तु जैसे दवी हुई भाग हवा लगते ही प्रदीप्त हो जाती है, उसी प्रकार इस सकट का, 7 . रानी सारन्धा [९९ जान होते ही उनके जर्जर शरीर में वीरात्मा चमक उठी।वे पालकी का पर्दा उठाकर बाहर निकल आये । धनुष वाण हाथ में ले लिया, किन्तु वह धनुष जो उनके हाथ मेंद्र का वज्र बन जाता था, इस समय जरा भी न झुका । सिर में चकर श्राया, पैर थर्राये और वे धरती पर गिर पड़े। भावी श्रमगल की सूचना मिल गई। उस पख रहित पक्षी फै सदृश, जो सांप को अपनी तरफ याते देखकर ऊपर को उचकता और फिर गिर पडता है, राजा चम्पतराय फिर सॅमलकर उठे और फिर गिर पड़े। सारन्धा ने संभालकर बैठाया और राकर बोजने की चेष्टा की, परन्तु मुँह से केवल इतना निकला--प्राणनाथ--- इसके आगे उसके मुंह से एक शब्द भी न निकल सका। पान पर मरनेवाली सारन्धा इस समय साधारण स्त्रियों की भांति शक्तिहीन हो गई, लेकिन एक श्रश तक यह निर्बलता स्त्री जाति की शोभा है। चम्पतराय बोले-~सारन ! देखो, हमारा एक और वीर नमीन पर गिरा। शोक जिस श्रापत्ति से यावज्जीवन डरता रहा, उसने इस अतिम समय श्रा घेरा । मेरी आँखों के सामने शत्रु तुम्हारे फोमल शरीर में हाथ लगायेंगे, और मैं जगह से दिल मी न सकूँगा । हाय ! मृत्यु तू कब श्रायगी। यह कहते- कहते उहें एक विचार श्राया। तलवार की तरफ हाय बढाया, मगर हाथों में दम न था । तब धारन्धा से बोले-प्रिये ! तुमने कितने ही अवसरों पर मेरी श्रान निभाई है। इतना सुनते ही सारन्धा वे मुरझाये हुए मुख पर लाली दौड़ गई, घासू सूख गये । इस श्राशा ने कि मैं अब भी पति के कुछ काम आ सकती हूँ, उसके हृदय में बल का सवार कर दिया। वह राजा की और विश्वासोत्पादक भाव से देखकर बोली-ईश्वर ने चाहा, तो मरते दम तक निगाहूँगी। रानी ने समझा, राजा मुझे प्राण दे देने का सकेत कर रहे हैं ? चम्पतराय-तुमने मेरी बात कभी नहीं टाली। सारन्धा-मरते दम तक न टालूंगी। राजा-यह मेरी अतिम याचना है। इसे अस्वीकार न करना । मगरधा ने तलवार को निकालकर अपने वक्ष स्थल पर रख लिया और १०० ] गल्प-समुचय कहा- यह श्रापकी आजा नहीं है, मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि मरूँ, तो यह मस्तक आपके पद कमलों पर हो। चम्पतराय-तुमने मेरा मतलब नहीं समझा । क्या तुम मुझे इसलिए शत्रुत्रों के हाथ में छोड़ जाबोगी कि मैं वेड़ियां पहने हुए दिल्ली की गलियों में निन्दा का पान मयूँ ? रानी ने जिज्ञासा दृष्टि से राजा को देखा । वह उनका मतलब न समझी। राजा-मैं तुमसे एक वरदान मांगता हूँ। रानी-सहर्ष मागिए। राजा-यह मेरी अन्तिम प्रार्थना है । जो कुछ कहूँगा, करोगी? रानी--सिर के बल करूँगी। राजा-देखो, तुमने वचन दिया है। इनकार न करना। रानी--(कापकर ) श्रापके कहने की देर है। राजा-अपनी तलवार मेरी छाती में चुभा दो। रानी के हृदय पर वज्रपात-ठा हो गया । बोली-जीवन-नाय!--इसके आगे वह और कुछ न बोल सकी-श्राखों में नैराश्य छा गया। राजा-मैं पेडियो पहनने के लिए जीवित रहना नहीं चाहता। रानी-हाय, यह मुझसे कैसे होगा ? पांचवा और अन्तिम सिपाही धरती पर गिरा। राजा ने मुँझलाकर कहा-इसी जीवट पर धान निमाने का गर्व था? पादशाह के सिपाही राजा की तरफ लपके । राजा ने नैराश्य-पूर्ण भाव से रानी की ओर देखा। रानी क्षण भर अनिश्चित रूप से खड़ी रही, लेकिन सक्ट में हमारी निश्चयात्मक शक्ति बलवान हो जाती है। निकट था कि 'सिपाही लोग राजा को पकड़ लें कि सारन्धा ने दामिनी की भांति लपककर अपनी तशवार राजा के हृदय में चुभा दी ! प्रेम की नाय प्रेम के सागर में डूब गई। राजा के हृदय से रुधिर की धारा निकल रही थी, पर चेहरे पर शान्ति छाई हुई यी, कैसा करुण दृश्य है ! वह स्त्री जो अपने पति पर प्राण देती थी, श्राज उसकी प्राणघातिका है। जिस हृदय से प्रालिङ्गित होकर उसने यौषन सुख लूटा, जो हृदय उसकी रानी सारस्था [१०१ अभिलाषाओं का केद्र था, जो हृदय उसके अभिमान का पोषक था, उसी हृदय को आज सारधा की तलवार छेद रही है। किस स्त्री की तलवार से ऐसा काम हुश्रा है! श्राह ! आत्माभिमान का कैसा विषादमय श्रत है। उदयपुर और मार- वाड़ के इतिहास में भी श्रात्म गौरव की ऐसी घटनाएँ नहीं मिलती। बादशाही सिपाही मारन्धा का यह माहस और धैर्य देखकर दंग रह गये । सरदार ने आगे बढकर कहा--रानी साहबा! खुदा गवाह है, हम सब आपके गुलाम हैं ! आपका जो हुक्म हो, उसे ब सरोचश्म बजा लायेंगे। मारन्धा ने कहा--अगर हमारे पुनों में से कोई जीवित हो, तो ये दोनों लाशें उसे सौंप देना। यह कहकर उसने वही तलवार अपने हृदय में चुभा ली। जब वह अचेत होकर धरती पर गिरी तो उसका सिर राजा चम्पतराय की छाती पर था।

। आत्माराम 1 वेदों ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने साययान में प्रात से सन्ध्या तफ अँगीठी के सामने बैठा हुआ सटसट किया करता था। यह लगातार धनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण वह बन्द हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीन ग्रायव हो गई है। वह नित्य प्रति एक बार प्रात काल अपने तोते का जिरा लिये कोई भजन गाता दृश्या तालाब की ओर जाता था। उस धुंधले प्रकाश में उसका जर्जर शरीर, पोपला मुंह और झुकी हुई कमर देखकर किसी अपरि- चित मनुष्य को उसके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था। ज्यों ही लोगों के कानों में श्रावान श्राती-'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता' लोग समझ जावे फिभोर हो गया। महादेव का पारिवारिक जीवन सुखमय न था। उसके तीन पुन थे, तीन बहुएँ थीं, दर्जनों नाती पोते थे, लेकिन उसके बोझ को हल्का करनेवाला कोई न था। लड़के कहते-जब तक दादा जीते हैं, हम जीवन का श्रानन्द भोग ले, फिर तो यह टोल गले पड़ेगा ही। बेचारे महादेव को कमी-कमी निराधार ही रहना पड़ता। भोजन के समय उसके घर में साम्यवाद का ऐसा गगनभेदी निघोंप होता कि वह भूखा ही उठ श्राता ओर नारियल का हुदा पीता हुआ सो जाता। उसका व्यावसायिक जीवन और भी शान्तिकारक था। यद्यपि वह अपने काम में निपुण था, उसकी खटाई औरों से कहीं ज्यादा शुद्धिकारक और उसकी रासायनिक क्रियाएँ कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं, तथापि उसे आये दिन शकी और धैर्यशून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़ते थे, पर महादेव अविचलित गाम्भीर्य से सिर मुकाये सब कुछ सुना करता। ज्यों ही यह कलह शान्त होता, वह अपने तोते की शोर देखकर पुकार, उठता--'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।' इस मन्त्र के अपने ही उसके चित्र, को पूर्ण शान्ति प्रास हो जाती थी। ।

आत्माराम [१०३ ( २ ) एक दिन सयोगवश किसी लड़के ने पिंजरे का द्वार खोल दिया। तोता उड गया। महादेव ने सिर उठाकर जो पिंजरे श्रोर देखा, तो उसका कलेजा सन से हो गया । तोता कहाँ गया ! उसने फिर पिंजरे को देखा, तोता गायब था। महादेव घबराकर उठा और इधर उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा। उसे सहार में कोई वस्तु प्यारी थो, तो वह यही तोता था। लड़ये पालों, नाती पोतों से उसका जी भर गया था। सड़कों की चुलबुन से उसके काम में विघ्न पड़ता था, वेटों से उमे प्रम न था, इसलिए नहीं कि वे निकम्मे थे , बल्कि इसलिए कि इनके कारण वह अपने प्रान ददायी कुल्हों को नियमित सरपा से वचित रह जाता था। पड़ोसियों से उसे विढ थी, इसलिए कि वह उसकी अँगीठी से भाग निकाल ले जाते थे। इन समस्त विघ्नबाधामों से उसके लिए कोई पनाह थी, तो वह यही तोता था। इससे उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था। यह अब उस अवस्था में था, जम मनुष्य को शान्तिमोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती। तोता एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने पिंजरा उतार लिया और उसे दिखाकर कहने लगा-'श्रा, श्रा, सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता। लेकिन गांव और घर के लड़के एकत्र होकर चिल्लाने और तालियां बजाने लगे, कार से कौवों ने काव काव को रट लग्मई । तोता उभा और गांव से बाहर निकज्ञ पर एक पेड़ पर जा बैठा । महादेव खाली पिंजरा लिये उसके पीछे दौड़ा, हा दौडा। लोगों को उसकी द्रुतगामिता पर अचम्भा हो रहा था। मोह की इससे मुदर, इससे सजीव, इससे मावमय कल्पना नहीं की जा सकती। दोपहर हो गया था। किसान लोग खेतों से चले ला रहे थे, उन्हें विनोद का अच्छा अवसर मिला। महादेव को चिढाने में सभी को मना श्राता था, किसी ने ककर फेंक, किसी ने तालियां बजाई, तोता फिर उड़ा और यहाँ से दूर ग्राम के माग में एक पेड़ का फुनगी पर जा बैठा। महादेव फिर खाली पिजरा लिये मेढक की भात उचकता हुअा चला । बाग में पहुंचा, तो पैर के तलुत्रों से भाग निकल रही थी, सिर चकर खा रहा था। जब जरा सावधान हुना, तो फिर पिंजरा उठाकर कहने लगा, 'मत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता'। .

- २०४] गल्प समुच्चय तोता फुनगी से उतरकर नीचे की एक डाल पर आ बैठा, किन्तु महादेव की ओर सशक नेनो से ताक रहा था। महादेव ने समझा-~-हर रहा है। वह पिंजरे को छोड़कर श्राप एक दूसरे पेड़ की श्राड़ में छिप गया । तोते ने चारों श्रोर गौर से देखा, निश्शफ हो गया, उतरा और पाकर पिंजरे के ऊपर पैठ गया । महादेव का हृदय उछलने लगा। 'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता' का मन्त्र जपता हुआ धीरे धीरे तोते के समीप श्राया, और लपका कि तोते को पकड ले , किन्तु जोता हाथ न पाया, फिर पेड़ पर जा बैठा । साम तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता, कमी उस डाल पर। कभी पिंजरे पर आ बैठता, कभी पिंजरे के द्वार पर बैठ अपने दाना-पानी की प्यालियों को देखता, फिर उड़ जाता । नुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था , तो तोता मूर्तिमती माया। यहां तक कि शाम हो गई, माया और मोह का यह समाम अन्धकार में विलीन हो गया। (३) रात हो गई । चारों ओर निविड़ अन्धकार छा गया। तोता न-जाने पत्तों में कहा छिपा बैठा था। महादेव जानता था कि रात को तोता कहीं उडकर नहीं जा सकता और न पिजरे ही में आ सकता है, तिसपर भी वह इस जगह से हिलने का नाम न लेता था, श्राज उसने दिन भर कुछ नहीं खाया। रात के भोजन का समय भी निकल गया, पानी की एक धूद भी उसके कण्ठ में न गई, लेकिन उसे न भूख पी, न प्यास । तोते के बिना उसे अपना जीवन निस्सार, शुष्क और सूना जान पड़ता था। वह दिन रात काम करता था, इसलिए कि यह उसकी अन्त प्रेरणा थी, जीवन के और काम इसलिए करता था कि यादत थी। इन कामों में उसे अपनी सजीवता का लेशमात्र भी शान न होता था। तोता हो वह वस्तु था, जो उस चेतना की याद दिलाता था। उसका हाथ से जाना जीव का देहत्याग करना था। महादेव दिन-भर का भूखा प्यासा, यका-मादा, रह रहकर, झपकिया ले लेता था, कि तु एक क्षण में फिर चोंककर आँख खोल देता और उस विस्तृत अन्धकार में उसकी आवाज सुनाई देती--'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता। , श्राधी रात गुजर गई थी। सहसा वह कोई प्राइट पाकर चौका, तो देखा आत्माराम [ १०५ कि दूसरे एक वृक्ष के नीचे एक घुधना दीपक जल रहा है और कई आदमी बैठे हुए आपस में कुछ यातें कर रहे हैं । यह सब चिलम पी रहे थे। तमार की महक ने उसे अधोर कर दिया। उघ घर से बोला-'सत्त गुरुदन शिवदत्त दाता' और उन आदमियों की ओर चिलम पीने चला, चिन्तु जिस प्रकार मद की धापान सुनते हो हिरा भाग जाते हैं, उसी प्रकार उसे पाते देख वह सब रे-सप उठकर भागे। कोई घर गया, कोई उधर । महादेव चिल्लाने लगा-ठहरो-ठहरो।' एकाएक उसे ध्यान आ गया, यह उप चोर है। यह जोर से चिला उठा '-'चोर-चोर, पकड़ो, पकड़ो -चोरों ने पोछे रिकर भी न देखा। महादेव दीपक के पास गया, तो उसे एक कनय रखा हुया मिना । मोरचे से काला हो रहा था। महादेव का हृदय उछलने लगा। उसने नशे में हाथ डाला तो माहरे थी। उसने एक मोहर पाएर निकाली और दीपक फे उजाले में देया-ही, मोहर थी। उसने तुरन्त कनया उठा लिया, दीपर बुझा दिया और पेड़ के नीचे छिपकर बैठ रहा । साहु से चोर बन गया । उसे फिर शका हुई, ऐसा न हो, चोर लौट आयें और मुझे अकेना देस कर मोहरें छीन लें। उसने कुछ मोहरे कमर में घी, फिर एक सूखी लकड़ी से जमीन की मिट्टी हटाकर कई गड्ढे बनाये, उहें मोहरों से भरकर मिट्टो से देंक दिया। (४) महादेव पे अन्त नेत्रों के सामने अब एक दूसरा ही जगत् था, चिन्ताओं और कल्पनाओं से परिपूर्ण । यद्यपि श्रमी कोष के हाथ से निकल जाने का भय था, पर अमिलापाओं ने अपना काम शुरू कर दिया। एक पका मकान बन गया, सराफे को एक मारी दूकान खुल गई, निज सम्बन्धियों से फिर नाता जुड़ गया, विलास की सामग्रियों एकत्र हो गई, तव तीर्थयाना करने चले और वहां से लौटकर बड़े समारोह से यश-ब्रशमोज हुआ। इसके पश्चात् एक शिवालय और ना बन गया, एक उद्यान भी पारोपित हो गया और वहां वह नित्य प्रति कथा पुराण सुनने लगा, साधु सन्तों का आदर- सत्कार होपे लगा। ७ । १०६7 गल्प-समुच्चय . - - . अकस्मात् उसे ध्यान श्राया, कहीं चोर पा जाये तो मैं भागूंगा क्योंकर । उसने परीक्षा करने के लिए कलशा उठाया और दो सौ पग तक वेताशा भागा हुधा चला गया। जान पड़ता था, उसके पैरों में पर लग गये हैं। चिन्ता शान्त हो गई। इन्हीं कत्सनायों में रात व्यतीत हो गई। उपा का श्रागमन हुना, हवा जगी, चिडियो गाने लगी। सहसा महादेव के कानों में यावाज आई- 'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता, राम के चरन में चित्त लागा।' यह बोल सदैव महादेव को जिहा पर रहता था, दिन में सहसा ही बार ये शब्द उसके मुख से निकलते ग्रे पर उसका धार्मिक भाव कभी उसके श्रन्त करण को स्पर्श न करता था। जैसे किसी गाजे से राग निकलता है, उसी प्रकार उसके मुँह से यह बोल निकलता या, निरर्थक और प्रभावश य । तब उसका हृदय रूपी वृक्ष पा पल्लव विहीन था। यह निर्मल वायु उसे गुजारित न कर सकती थी , पर प्रम उस वृत में कोपलें गौर शाखाएँ निकल प्राई थी। इस वायु प्रमाह से वह झूम उठा-गुजित हो गया । श्रमणोदय का समय पा। प्रकृति एक अनुरागमय प्रकाश में डूबी हुई थी। उसी समय तोता परों को जाडे-ऊँची डाली से उतरा, से कोई तारा टूटे, और श्राफर पिंजरे में बैठ गया। महादेव प्रफुलित होकर दौड़ा और पिंजरे को उठाकर बोला-याश्रो आत्माराम, तुमने कष्ट तो बहुत दिया, पर मेरा जीवन भी सुफन कर दिया। अब तुम्हे चांदी के पिंजरे में रखू गा और सोने से मढ़ दूंगा- उसके रोम रोम से परमात्मा के गुणानुवाद की ध्वनि निकलने लगी। प्रभु, तुम कितने दयावान् हो, यह तुम्हारा प्रयीम वात्सल्य है, नहीं तो मुझ जैसा पापी, पतित प्राणी, कव इस कृपा के योग्य था। इन पविन गानों से उसपी श्रात्मा विहल हो गई, यह अनुरत होकर योल उठा- 'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाना, राम के चरण में चित्त लागा।" जैसे श्राकाश .

आत्माराम [ १०७ उसने एक हाथ में पिंजरा लटकाया, बगल में कलशा दवाया और घर चला। महादेव घर पहुंचा, तो अभी कुछ अँधेरा था। रास्ते में एक कुत्ते के सिवाय और किसी से भेंट न हुई और कुत्ते को मोहरों से विशेष प्रेम नहीं होता। उसने कलशे को एक नाद में छिग दिया और उसे कोयले से अच्छी तरह ढककर अपनी कोठरी में रख पाया। जब दिन निकल श्राया, तो वह सीधे पुरोहितजी के घर जा पहुँचा । पुरोहितजी पूजा पर बैठे सोच रहे थे. कल ही मुकदमे की पेशी है और अभी तक हाथ में कौड़ी भी नहीं, जजमानों में कोई मास भी नहीं लेता। इतने में महादेव ने पालागन किया। पण्डितजी ने मुँह फेर लिया, यह श्रमगलमूति कहाँ से आ पहुँची, मालूम नहीं दाना भी मयस्सर होगा या नहीं। रुष्ट होकर पूछा-क्या है जी, क्या चाहते हो, जानते नहीं कि हम इस बेला पूजा पर रहते हैं ? महादेव ने कहा-महाराज, नाज मेरे यहाँ सत्यनारायन की कथा है । पुरोहितजी विस्मित हो गये, कानों पर विश्वास न हुआ । महादेव के घर पर क्था होना उतनी ही असाधारण घटना थी, जितनी अपने घर से किसी भिखारी के लिए भीख निकालना । पूछा-श्राज क्या है ? महादेव बोला-कुछ नहीं, ऐसी ही इच्छा हुई कि अाज भगवान् की क्या सुन लूँ। प्रमात ही से तैयारी होने लगी। बेंदो और अन्य निकटवर्ती गावों में सुपारी फिरी । कथा वे उपरान्त भोज का भी नेवता या । जो सुनता, श्राधर्य करता-यह प्राज रेत में दूब कैसे जमी! सन्ध्या समय जब सब लोग जमा हो गये, पण्डितजो अपने सिंहासन पर विराजमान हुए, तो महादेव खडा होकर उच्चस्वर से बोला-भाइयो, मेरी सारी उम्न छल-कपट में कट गई । मैंने न जाने कितने श्रादमियों को दगा दिया, कितना खरे को खोटा किया, पर अब भावान् ने मुझपर दया की है, वह मेरे मुँह की कालिख को मिटाना चाहते हैं। मैं आप सभी भाइयों से ललकारकर कहता हूँ कि जिसका मेरे जिम्मे जो कुछ पाता हो, जिसकी १०८] गल्प-समुच्चय जमा मैंने मार ली हो, जिसके चोखे माल को खोटा कर दिया हो, वह श्राकर अपनी एक एक कौड़ी चुका ले, अगर कोई यहाँ न था सका हो, वो श्राप लोग उससे जाकर कह दीजिए, कल से एक महीने तक जब जी चाहे श्रावे और अपना हिसाब चुकता कर ले, गवाही साखी का काम नहीं।-सब लोग सन्नाटे में श्रा गये। कोई मामिक भाव से सिर हिलाकर बोला-हम कहते न थे १ किसी ने अविश्वास से कहा-क्या खाके भरेगा १ हजारों का टोटल हो जायगा । एक ठाकुर ने ठठोली की-और जो लोग सुरधाम चले गये ? महादेव ने उत्तर दिया-उनके घरवाले तो हांगे। किन्तु इस समय लोगों को वसूली की इतनी इच्छा न थी, जितनी यह जानने की कि इसे इतना धन मिल कहाँ से गया। किसी को महादेव के पास आने का साहस न हुथा। देहात के श्रादमी थे, गड़े मुर्दे उखादना क्या जाने। फिर प्राय लोगों को याद भी न था कि उन्हें महादेव से क्या पाना है और ऐसे पविन अवसर पर भूल-चूक हो जाने का भय उनका मुंह बाद किये हुए था। सबसे बड़ी बात यह थी कि महादेव की साधुता ने उन्हें वशीभूत कर लिया था। अचानक पुरोहितजी बोले-तुम्हें याद है, मैंने तुम्हे एक कठा बनाने के लिए सोना दिया था और तुमने पर माशे तौल में उड़ा दिये थे। महादेव-हा, याद है, श्रापका कितना नुकसान हुया होगा ! पुरोहित-५०) से कम न होगा। महादेव ने कमर से दो मोहरें निकाली और पुरोहितजी के सामने रख दी। पुरोहित की लोलुपता पर टीकाएँ होने लगी। यह बेईमानी है, बहुत तो दो-चार रुपये का नुकसान हुआ होगा । बेचारे से ५०)पैठ लिये । नारायण का मी हर नहीं । बनने को पडित, पर नीयत ऐसी खराब ! राम राम ! लोगों को महादेव से एक श्रद्धा-सी हो गई। एक घटा बीत गया, पर उन सहसो मनुष्यों में से एक भी न खड़ा हुया । तर महादेव ने फिर कहा- मालूम होता है, आप लोग अपना-अपना हिसाव भूल गये है , इसलिए श्राम कथा होने दीजिए, मैं एक महीने तक अापकी राह देखू गा। इसके पीछे , आत्माराम [१०९ तीर्थ यात्रा करने चना जाऊँगा! आप सब भाइयों से मेरी विनती है कि श्राप मेरा उदार करें। एक महीने तक मादेव लेनदारों की राह देखा रहा । रात को चोरों के मय से नींद न ग्रावी थी। अप यह कोई काम न करता । शराब का चसक भी छूटा। साधु अभ्यागत जो द्वार पर आ जाते, उनका यथायोग्य छत्कार करता । दूर दूर उसका मुयश पैल गया। यहाँ तक कि महीना पूरा हो गया और एफ श्रादमी भी हिसाब चुकाने नहीं पाया । श्रय महादेव को ज्ञात हुआ कि ससार में कितना धर्म, कितना सव्यवहार है। अब उसे मालूम हुश्रा कि ससार बुरों के लिए बुरा है , पर अच्छों पे लिए अच्छा है। , . इस पटना को हुर ५० वष बीत चुरे हैं। आप वेदो लाइए, तो दूर ही से एक सुनहला कलश दिखाई देता है। यह ठाकुरद्वारे का कलश है। उससे मिमा हुमा एक पका तालाय है, जिसमें खूप कमल खिले रहते हैं। उसकी मलिया कोई नहीं पड़ता। तालाब के किनारे एक विशाल समाधि है। यही मात्माराम का स्मति चिह है। उसरे सम्बध में विभिन्न किंवदन्तियां प्रच- लित हैं। कोई कहता है--उनका रत्नजटित पिंजरा स्वर्ग को चला गया कोई कहता है-वह 'सत्त गुरुदत्त' करते हुए अन्तर्धान हो गये, पर यथार्थ • यह है कि उस पक्षीरूपी चद्र को किसी विल्लीरूपी राहु ने ग्रस लिया। लोग कहते हैं, श्राधी रात को अभी तफ तालाब के निकारे प्रावान आती है- 'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता, राम के चरन में चित्त लागा।' महादेव के विषय में भी कितनी जन-श्रुतियाँ हैं। उनमें सबसे मान्य यह है कि प्रात्माराम ये समाधिस्थ होने के बाद वह कई सन्यासियों के साथ हिमालय चले गये और वहां से लौटकर न पाये। उनका नाम आत्माराम प्रसिद्ध हो गया।

श्रीपदुमलाल पुन्नालाल बख्शी बी० ए० आप मध्यप्रदेश के निवासी और प्रसिद्ध मासिक-पत्रिका 'सरस्वती' के सम्पादक थे। आपकी शैली बहुत ही प्रौढ़ विचारशील और कटाक्ष पूर्ण है। आपने प्राच्य और पाश्चात्य साहित्य का गहरा अध्ययन किया है। 'साहित्य विमर्श' में आपने ससार-साहित्य की मार्मिक विवेचना की है। आप सुकवि भी हैं। - - मैं बरामदे में टहल रहा था। इतने में मैंने देखा कि विमला दासी अपने आंचल रे नीचे एक प्रदीप लेकर बड़ी भाभी के कमरे की ओर जा रही है। मैंने पूछा-क्यारी। यह क्या है ? वह बोली-मनमला। मैंने फिर पूछा-इससे क्या होगा? उसने उत्तर दिया-नहीं जानते हो वायू, श्राज तुम्शरी बड़ी भाभी परिहतजी की बहू की सती होकर आई है, इसी लिए मैं उन्हें झलमला दिखाने जा रही हूँ। तब तो मैं भी किताब फेंककर घर के भीतर दौड़ गया। दीदी मे जाकर कहने लगा--दीदी, थोड़ा तेल तो दो। दीदी ने कहा-जा, अभी में काम में लगी हूँ। मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट पाया। फिर मैं सोचने लगा- यह अवसर जाने न देना चाहिए, अच्छी दिल्लगी होगी। इधर उधर देसने लगा। इतने में मेरी दृष्टि एक मोमबत्ती के टुकड़े पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया और दियासलाई का बक्स लेकर भाभी के कमरे की ओर गया। मुझे देखकर भाभी ने पूछा-कैसे पाये यासू !-मैंने बिना उत्तर दिये ही मोमबत्ती फे टुकड़े को जलाकर सामने रख दिया। भाभी ने हँसकर पूछा--यह क्या है। मैंने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया--झलमला। भाभी ने कुछ न कहकर मेरे हाथ पर पौध रुपये रख दिये। मैं कहने लगा-मामी, क्या तुम्हारे मेम के आलोक का इतना ही मूल्य है। भाभी ने हंसकर कहा-तो क्तिना चाहिए ! मैंने कहा- कम से कम एक गिनी। मामी कहने लगी-~-अच्छा, इसपर लिख दो , मैं श्रमी देती हूँ। मैंने तुरन्त ही चाकू से मोमबत्ती के टुकडे पर लिख दिया--'मूल्य एक गिनी। भाभी ने गिनी निकालकर मुझे दे दी और मैं अपने कमरे में चला आया। कुछ दिनों बाद गिनी के खर्च हो जाने पर मैं यह घटना बिलकुल मल गया।

११२ ] गल्प-समुच्चय (२) । , ८ वर्ष व्यतीत हो गये । मैं बी० ए०, एल एल० बी० होकर इलाहाबाद से घर लौटा। घर की वैसी दशा न थी जैसी पाठ वर्ष पहले थी, न भाभी थी, न विमला दासी हो । भाभी हम लोगों को सदा के लिए छोड़कर स्वर्ग चली गई थी, और विमला कटङ्गो में खेती करती थी। सन्ध्या का समय था। मैं अपने कमरे में बैठा न जाने क्या सोच रहा था। पास ही कमरे में पड़ोस की कुछ स्त्रियों के साथ दोदो बैठी थी। कुछ । बातें हो रही थीं, इतने में मैंने सुना, दीदी किसी स्त्री से कह रही हैं-कुछ भी हो बहिन, मेरी बड़ी बहू घर की लक्ष्मी थी। उस स्त्री ने कक्षा-हो बहिन खूब याद आई, मैं तुमसे पूछनेवाली थी। उस दिन तुमने मेरे पास सखी का सन्दूक मेजा था न ? दीदी ने उचर दिया-हाँ बहिन, यह कह गई थी, उसे रोहिणी को दे देना। उस स्त्री ने कहा--उसमें सब तो ठीक था , पर एक विचिन यात थी । दीदी ने पूछा-कैसी विचित्र वात? वह कहने लगी- उसे मैंने सोलकर एक दिन देखा तो उसमें एक जगह खूब हिफाजत से रेशमी रूमाल में कुछ बँधा हुआ मिला। मैं सोचने लगी वह क्या है। कौतूहलवश उसे सोलकर मैंने देखा। बहिन, कहो तो उसमें भला क्या रहा होगा। दीदी ने उत्तर दिया-गहना रहा होगा । उसने हँसकर कहा-नहीं, गहना न था-वह तो एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उसपर लिखा हुआ था-'मूल्य एक गिनी।। क्षय-भर के लिए मैं ज्ञान शून्य हो गया, फिर अपने हृदय के श्रावेग को न रोककर मैं उस कमरे में घुस पडा और चिल्लाकर कहने लगा-वह मेरी है, मुझे दे दो! कुछ स्त्रियां मुझे देखकर भागने लगी। कुछ इधर उधर देखने लगीं। उस स्त्री ने अपना सिर तापवे ढापते कहा-अच्छा बापू, मैं कल उसे भेज दूंगी, पर मैंने रात को ही एक दासी मेगफर उस टुकड़े को मँगा लिया। उस दिन मुझमे कुछ नहीं साया गया। पूछे जाने पर मैंने यह कहकर टाल दिया कि सिर में दर्द है। बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता रहा। जब सब सोने के लिए गये तब मैं अपने कमरे में आया। मुझे उदास देखकर कमला पूछने लगी-सिर का ,

झलमला
[११३
दर्द ऐसा है ! पर मैंने कुछ उत्तर न दिया, चुपचाप जेब से मोमबत्ती को
निकालकर उसे जलाया और उसे एक कोने में रख दिया।
कमला ने पूछा-यह क्या है ?
मैंने उत्तर दिया-भलमला।
कमला कुछ न समझ सको। मैंने देखा कि थोड़ी देर में मेरे मामले
का क्षुद्र पालोक रात्रि के अन्धकार में विलीन हो गया।

श्रीमती शिवरानीदेवी श्रीमती शिवरानीदेवी का जन्म १८९० ई० में फतेहपुर जिले के एक ग्राम में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। पचपन में कुछ विशेष शिक्षा तो नहीं पाई, पर अपने माता पिता से एफ दृढ़ता और विशाल हृदयता पाई जो उनके जीवन की सयसे पड़ी निधियों हैं। विवाह आपका स्व. प्रेमचन्द से हुआ और उन्हीं की प्रेरणा से आपने कहानियां लिखना शुरू किया जिसमें से पहली रचना १९२७ ई० में प्रकाशित हुई। तयसे आप निरन्तर कहानियां लिसती जाती हैं। प्रधानत आप एक कहानी लेखिका है। आपकी कहानियाँ अधिकतर भारत के नारी-जीवन से ही सम्पन्ध रखती हैं और आपकी पानियां बड़ी दृढ़ चरित्र को तथा निभीक और वात्सल्यपूर्ण होती हैं। सामाजिक कुरीतियों के चित्रण में श्रीमती शिरानोदेवी को बड़ी सफलता मिली है। सभी कहानियों के अन्दर किसी सामाजिक भवगुण के खिलाफ आवाज़ उठाई गई होती है। प्रस्तुत कहानी में ऐसा नहीं है। यह एक भावना प्रधान कहानी का उत्कृष्ट उदाहरण है। आपकी कहानियों के दो सग्रह 'नारी हदय' तथा 'कौमुदी' प्रकाशित हुए हैं। पीती यादें ११६ ] गल्प-समुच्चय है कि तुम स्त्रियों पर शासन करना। पात दोनों की एक ही निकलती है। मसलहत दोनों की एक है। फिर बाद को श्राकर अाखिर वही हुआ, जैसे कि होना चाहिए था। पाको वही तू-तू मैं मैं की वात । शायद खुदा के यहा सहनशीलता जब बॅट रही थी, उस समय भी दो पुरुष मिलकर श्रापस में तू तू में मैं ही करते रह गये होंगे। पतिदेव महाशय बोले तो उसमे तुम कौन तू तू मैं मैं करने में कम हो!-तो इसका मतलब यह कि जब खुदा के यहाँ चॅट रही थी सहन- शीलता, तो उसे फ़िरिश्तों ने ही पाया होगा, स्यांकि यहां स्त्री-पुरुषों में तो किसी ने नहीं पाया। महेशा-अच्छा साहन, मेरा किस्सा सुनिए, मैं क्यों नहीं पाई। बाढ के लिए बिहार मशहूर जगह है। पानी इस कदर वरसा, कि सड़कों पर नार्वे चलती थी । उसमें जिस रोज़ पानी परसा, उस रोज़ मेरे मायके में मेरे भाई और भावजों को ऐसी नोंद आई थी, जैसी मौत की नींद हो। मौतवाली नोंद पहूँ कि शराबी के नशेवाली। हम सब पानी में भीग गये। फिर भी किसी ने उठने का नाम न लिया। पानी में भीगने की वजह से जैसे सारी बदन ठही हो गई थी। मैंने चारपाई में पड़े पड़े अपनी भावज से खाने की तम्बाकू मांगी। शायद से खोले तम्बाक् मांगी होती, तो कहीं और उड लग जाती!-यही खयाल रहा होगा। क्योंकि श्राख बन्द ही थी मेरी। भावज तो वहां मौजूद नहीं थी। भाई को तो दो तीन पावा देने के बाद, मेरे बड़े भाइ बोले-अरे, तू देखती नहीं है मारे घर में पानी ही पानी तो भर गया है। भावज तेरी ऊपर है, छत पर। सब नालियाँ बन्द पड़ी है, और पानी चारों तरफ मकान में भरा हुआ है। मैंने यह सुन करके अखेिं खोली। यह, वहाँ की घटना देखती हूँ, तो पानी पानी भरा हुआ है। वह तो, फो, ऊँचा बरामदा या, नहीं तो मैं भी उतरा चली होती। दूसरी तरफ के बराडे में पानी ही पानी था । सप सामान उसी में फैल गया था। मैंने घबराकर भैया से पूछा-अाखिर यह पानी कहाँ से श्रा गया है। माई बोले-अरे, पानी घरमा, देवकूफ, पोर कहाँ से आ गया है ! ।

भादो का महीना था। महेया अपने मैके गई। दो तीन बचों को । पति के पास छोड़कर वह परेनी गई। वहीं गई तो यी चार-पांच रोन का वादा करके, लग गये तेरह दिन । जब वह तेरह दिन बाद घर आई, तो पतिदेव बोले-भल्लाये हुए बैठे थे~क्यों जी, तुम्हारी क्या श्रादत है। जाती हो तीन दिन को कहके, लगा देती हो तेरद दिनमहेशा उनके इस तरह नादिरशाही हुक्म पर बोली-साव मैं गई थी। मैं ही तो परेली गई थी, तेरह दिन नहीं, तेरह महीने लगा देती। पति-श्ररे बाबा, तो तुम अपने बच्चे छोड़ गई थी मेरे मत्ये। कैदी बनाकर मुझे गई थी। हमेशा-बच्चे मेने कही ते लाकर पटक दिये हैं। बच्चे! 'तुम्हारे बच्चे ! तुम्हारे बच्चे। बच्चों का मैंने ही ठेका ले रखा है। पति-तो फिर कह तो गई होती कि मैं बच्चे ही पालता बैठे बैठे। महेशा -जब में काम नही करती थी, तो मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं। नब में यदा यी ही नदी-तो मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी भी नहीं ! जर मदेशा बहुत गर्मा चुकी तो पतिदेव कुछ नर्म पड़े। बोले-महेश, तुम नहीं जानती हो, बच्चे पुरुषों के पालने की चीन नहीं । तुम्हारे चले जाने की वजह से बच्चों को भी तकलीफ हुई, मुझे भी। और फिर तुम्ही ने तो सारे घर का काम अपने निम्मे लेकर मुझे निकम्मा बना दिया है। एक तरह से, दफ्तर के अलावा मुझसे और कोई काम हो ही नहीं सकता। इस पर डर भी रहा था कि बच्चे शिकायत करेंगे कि हमें तकलीफ हुई, और इमें पीटा। यह भी डर ऊपर से था। जब पतिदेव अपनी परवशता बता चुके, तब महेशा ने भी अपने न श्राने का कारण बताया, और बोली, कि आखिर अगर शुरू से ही तुम साधारण तरह से बात करते, तो क्यों यह उलझन होती हम दोनों में। एक दूसरे से क्यों हम उलझ पड़ते । पुरुषों का स्वभाव कुछ लठा होता ही है, और क्यों न हो। उनकी छठी की धुरी में यह बालकर पिला दिया जाता

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यीतो यादें [११९ फिर प्राजकल इन लागों का नियम हो गया है, उसी तरह नौकर इन लोगो को चाहवे मी तो नही है। मैं बोली-भैया, वह जमाना की दुसरा था। अब मा बाप का लिहाज वा करते ही नहीं, नौकरी का लिहान कौन करता है ! इन सिलसिलो में बात हो रही थी कि उसी में भाई ने कहा- 'तुम को याद है न, जब एक नलका यूधा नाहणी थी। उसके लिए हम पैसा चोरी करते थे। जिसके पीछे अम्मा ने एक दश हम दोनों को पीटा था।" मैं बोली-व्यर्थ ही पीटा था अम्मा ने | कौन हमने अपने लिए पैसे चुराये थे। भाई-श्रासिर नलका चूना से हम लोगों को क्या स्नेह था। वह - बुड्डो औरत 1 अरे भैया-में बोली-वह बड़ी अच्छी प्रच्छी बातें बताती थी। में तो उन दिनों को अय याद करती हूँ, सोचती हूँ, वक्षी दिन अगर फिर श्रा जाते, बड़ा अच्छा होता। भाई बोले- अरे पागल है, वे दिन श्रावे हैं कहीं से । गये दिन कही लौटकर पाते हैं फिर से। मैं बोली-पहले के जमाने की औरतों का किस्सा नलका पूना पता ले जाती थी, किस समय स्त्रियाँ चरसा कातती थी, किस समय गोवर पायती थी, किस समय खाना पकाती थीं, किस समय क्या करती थी, दिनभर की दिनचर्या वह बताती थी। भैया पाले-अरे पागल, कोई कहानी तो रहती नहीं थी। मैं बोली-~अरे भैया, कहानी न हाते हुए भी, कहानी से ज्यादा मना अाता था। बीती हुई यातें कहानी से भी ज्यादे मनोरजक हो जाती है। भैया बोले--अरे भाई, वजह यह है, न पहली सी श्रादमी की उम्र रह जाय, न पहली सी कहानी। क्योंकि जो उम्र बीत गई, वह तो वापिस नहीं श्राती। उसी की कहानी सुन करके इन्सान का मनोरजन होता है। मैं बोली-भैपा, वही समय फिर पा जाय, तो मैं तो वही खुश हूँ। भैया बोले-अरे बेवकूफ, वह समय था कैसे जाय ! नपरदस्ती ! सब १२०.] गल्प-समुच्चय कुछ रहते हुए वह समझ तो नहीं रहेगी, और न वह उत्साह रहेगा। जब ये । दो ची वे नहीं हैं, तो कैसे वह समय था सकता है ! वह नौकर धीरे से श्राफर-फिर भी वहीं श्राकर-हम लोगों की बातें सुन रहा था। और यही सुनते-सुनते उसकी श्राखो से ग्राम गिरने लगे। मैं बोली-चन्दर भैया, तू क्यों रोने लगा ? बोला--कुछ नही, बिटिया, सोचता हूँ कि इस जिन्दगी में मेरी अँधि यारी रात है। जैसे श्राप लोग बैठे अपने बचपन की कहानी कह रहे हैं, मेरे तो तीन पन बीत चुके, चौथा है। उन्हों की याद करते करवे सोचता हूँ कि अब जीवन है क्या ! हरियाली तो कभी थाने की नहीं। सुनसान निर्जन । यही जीवन का लेखा हो गया है। अब तो मैं मालिक से यही प्रार्थना करता हूँ, कि जब तक जिदारहूँ तब तक इन्हीं के दुआरे पडा रहूँ। जो कुछ मुझसे सेवा हो सके, करता रहूँ। यही कहता हुया वह भैया के पैरों पर गिरना चाहा। भैया खुद रो पड़े । घूढा बोला-सरकार श्राप काहे का रोक्त है ? भैया बोले-श्ररे भाई, वही अँधियारी रातें हम लोगों के लिए भी तो तैयार हो रही हैं। महेशा का पति सुनकर बोला- सच है बूढे का कहना ! जो दुनिया में जम लेता है, वह एक दिन सबके लिए वही अँधियारी रात है। यही कहते कहते महेशा और महेशा के पति दोनों रो पड़े। बोले-जो जम लेता है, एक दिन अंधियारा उसके लिए जरूर आता है। है सची घटना के आधार पर) , १२०.] गल्प-समुच्चय बुध रहते हुए वह समझ तो नहीं रहेगी, और न वह उत्साह रहेगा । जब ये दो चीजें वे नहीं है, तो कैसे वह समय आ सकता है । वह नौकर धीरे से श्राकर-फिर भी वहीं प्राकर-हम लोगों की बातें सुन रहा था। और यही सुनते-सुनते उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे। मैं मोली-चन्दर भैया, तू क्यों रोने लगा? बोला-कुछ नहीं, विटिया, सोचता हूँ कि इस जिन्दगी में मेरी अँधि यारी रात है। जैसे आप लोग बैठे अपने बचपन की कहानी कह रहे हैं, मेरे तो तीन पन बीत चुके, चौथा है। उन्हीं को याद करते करते सोचता हूँ कि अब जीवन है क्या ! हरियाली तो कभी पाने की नहीं। सुनसान निर्जन । यही जीवन का लेसा हो गया है। अब तो मैं मालिक से यही प्रार्थना करता हुँ, कि जब तक ज़िन्दारहूँ तब तक इन्हीं के दुबारे पटा रहूँ | जो कुछ मुझसे सेवा हो सके, करता रहूँ। यही कहता हुआ वह मैया के पैरों पर गिरना चाहा। भैया खुद रो पड़े। घूढा बोला-सरकार श्राप काहे का रोवत हैं ? भैया बोले-अरे भाई, वही अँधियारी रातें हम लोगों के लिए भी तो तैयार हो रही है। महेशा का पति सुनकर बोला--सच है बूढे का कहना । जो दुनिया में जन्म लेता है, यह एक दिन सबके लिए वही अंधियारी रात है। यही कहते कहते महेशा और महेशा के पति दोनों रो पड़े। बोले- जो नम लेता है, एक दिन अंधियारा उसके लिए जरूर पाता है।

श्री जैनेन्द्रकुमार आपका जम १९०५ में एक प्रतिष्ठित जैन परिवार में हुआ। आपने सबसे पहिले १६२८ में कहानियां लिखनी प्रारम्भ की, जिहें जनता ने बहुत आदर से लिया। सचमुच ही कहानी कहने को आपम असाधारण प्रतिभा है। हिन्दी के प्रमुख कलाकारों में इस समय आपका स्थान बहुत ऊँचा है। भाषा का इतना सुन्दर गठाव भी कम ही देखने में आता है। आप मुग्यतया मनोवैज्ञानिक कहानियों के लेखक है। इस म्प में आप बेजोड़ है। आपके कई उपन्यास 'परस', 'सुनीता', "त्याग पन', 'कल्याणी' तथा कहानी सग्रह जैसे 'पाताया', 'एक रात', 'नीलमदेश की राजकन्या', दो निवध और विचार सग्रह 'जैनेन्द्र के विचार' और 'प्रस्तुत प्रश्न' प्रकाशित हो चुके हैं। कहानीकार, उपन्यास रेस और विचारक के रूप में आप हिंदी भाषा के लिए एक स्थायो देन है। पाहुयली बहुत पहले की बात कहते हैं। तम दो युगों का सन्धि-काल था | भोग- युग के अस्त में से कर्म युग फट रहा था। भोग-काल में जीवन मार मोग था । पाप पुण्य की रेसा का उदय न हुया था। कुछ निविद्ध न था, न विधेय । अतः पाप असभव था, पुण्य अनावश्यक । जीवन बस रहना था। मनुष्य इतर प्रकृति के प्रति अपने श्रापमें स्वत्व का अनुभव नहीं परने लगा था और प्रकृति भी उसके प्रति पूर्ण वदान्य थी। वृक्ष पाल्परक्ष थे । पुरुप तन ढकने को वरकल उनसे पा लेता, पेट भरने को फल । उसकी हर बात प्रकृति श्रोढ लेती। विवाह न था और परस्पर सम्बन्धों में नातों का ग्रारोप न हुआ था । त्री, माता, यहा, पत्नी, पुनी न थी वह माघमादा थी। और पुरुप नर । अनेक थलचर प्राणियों में मनुष्य भी एक था और उन्हों की भांति जीता था। उस युग के तिरोभाव में से नवीन युग का प्राविर्भाव हो रहा था। प्रकृति अपने दाक्षिण्य में मानों कृपण होती लगती थी। उस समय विवाह हदा गया। परिवार बनने लगे और परिवारों से समाज | नियम-कानून भी उठे । 'चाहिए' का प्रादुर्भार हुआ और मनुष्य को शत हुया कि जीना रहना नहीं है, जीना करना है । भोग से अधिक जीवन कर्म है और प्रकृति को प्यो का त्यों लेकर बैठने से नहीं चलेगा। कुछ उसपर सशोधन, परिवर्तन, कुछ उसपर अपनी इच्छा का आरोप भी आवश्यक है। बीज उगा होगा। कपडे बनाने होंगे, जीवन सचालन के लिए नियम स्थिर करने होंगे और जीवन सद्धि के निमित्त उपादानों का भी निर्माण और समह कर लेना होगा। अवेला व्यक्ति अपूर्ण है, प्रक्षम है, असत्य है। सहयोग स्थापित करके परिवार, नगर, समान बनाकर पूर्णता, क्षमता और सत्यता को पाना होगा। ठीक जब की बात कहते हैं तब व्यक्ति व्यष्टि सत्ता से उमष्टि सिद्धि की ओर बढ चला था। राजा जैसी वस्तु की आवश्यकता हो चली थी। पर राजा जो राजस्व की सस्था पर न खड़ा हो। यह तो पीछे से हुना कि राजस्व सस्था बनी और शिक्षा और न्याय, विभाग रूप में, शासन से पृषक हुए। .

बाहुबली १२३ नगर बन चले पे और जीवन-यापन नितान्त स्वामाविक फर्म न रह गया था। उसके लिए उद्यम को प्रावश्यकता थी। (२) इस मोति प्रपम राज्य पना और प्रपम राजा हुए भी यादिनाथ । उनरे दो पुत्र थे, दो पुत्रियां । पुन मरत और पाहुवनी , पुत्रियो ब्राझी . और मुदरी। - अवस्था के चतुर्थ पए में येष्ठ पुत्र को बुलाकर भी शादिनाप ने कहा-पुन, भार तुम यह पद लो। मुझे पर दीक्षा लेनी चाहिए। भरत ने कहा-महाराज ! धादिनाथ ने कहा-तुमको पहला चक्राता होना है। इस राज्य से मार भी बहुत से प्राल हैं, जिनको व्यरस्थित शासन नुम्हें देना है । मैं तो लोगों के मान लेने से उनका मुतिया हो गया था। उसने मुझे राजा कहो सुख मिला। मैंने कहा, अच्छा! लेकिन तुमको साम्राज्य बनाना है। प्रपने लिए नी, लोगों में एकता लाने के लिए। तुमको विजय प्रसार का कर्तव्य भी परना होगा। भरत ने कहा-महाराज, श्राप दीक्षा क्या लेंगे। मैं विजयध्वज फहरा न श्राऊँ और अपने को समय न समझ लू , तब तक भार अपना आशीर्वाद मुझपर से न उठायें। श्रादिताय ने कहा- पुत्र, भय समय प्राता जाता है कि राजा शासक अधिक हो, प्रजा का हमजोली उतना हो । राज्यैश्वर्य से युक्त राजा को देखकर प्रजा समझती है कि उसो कुछ पाया है। तब तक उसका चित्त तुष्ट नहीं होता। मैं तो प्रजा के निम्नातिनिम्न जन से अपना हमजोलीपन नही तग सकता। फितु तुम्हारे लिए यह अनिवार्य नहीं है। तुम राजपुन हो। मैं तो साधारण पिता का पुन हूँ और जिस पद से शासन की प्राथा है, उसके सर्वथा अयोग्य बन जाना चाहता हूँ। मुझे लोगों क दु ख में जाना चाहिए और मुझे उस मार्ग में से चलकर अपना फैवल्य पा लेना चाहिए । भरत ने निरुत्तर होकर सिर झुमा लिया । अगले दिन आदिनाथ ने दीक्षा ले ली। समस्त पत्राभरण और नगर - - १२४ ] गल्प समुचय त्यागकर वे नित्य विहार कर गये। और मरत, चुप मन, जय यात्रा पर चल दिये। पृथिवी के छहो खण्डों पर विजय स्थापित कर और बहुमांति के मणि मुला, हय गज और क या सुदरियों की भेंट से युक्त भरत धूम धाम के साथ नगर को लौटकर आये। किन्तु जब भरत नगर में प्रवेश करने लगे तब विचित्र घटना हुई। चावती का शासन चक नगर के भीतर प्रविष्ट नहीं होता। प्रत्येक द्वार से नगर में प्रवेश करने के यन किये गये, किन्तु शासन-चक्र ने साथ न दिया। इसपर लोगों को बहुत अचरज हुश्रा। राजगुरु की शरण में जाकर इसके कारण के विषय में उन्होंने जिज्ञासा की। गुरु ने बताया कि इस नगर में एक व्यक्कि है जो अविजित है। उसपर जब तक विजय न पा ली जाय, तववक चक्रवतित्व अखण्ड नहीं होता। और उस समय तक यह शासन चक्र नगर में प्रवेश न करेगा । राजगुरु ने यह भी बताया कि अभी तक जिन पर किसी ने विजय नहीं पाई है, ऐसे व्यक्ति राजकुमार बाहुबली हैं। भरत ने पूछा-गुरुदेव, तब क्या बाहुबली से मुझे युद्ध करना होगा ? राजगुरु ने कहा--राजन् , तब तक चकार्तित्व प्रसिद्ध है। भरत ने कहा-किन्तु मैं चक्रवर्ती नहीं होना चाहता। राजगुरु ने कहा--राजपि, यह आपकी व्यक्तिगत इच्छा अनिच्छा का। प्रश्न नहीं है। यह राजकारण का प्रश्न है। भरत ने कहा--गुरुदेव, क्या माई से भाई को लड़ना होगा? गुरुदेव ने कहा-राजन् , राजकारण गहन है। राजकारण धर्मी का कौन भाई है, कौन माई नहीं है ? भरत नतमस्तक हुए। - . . पाँच युद्धों द्वारा शक्ति परीक्षण का निश्चय हुना। दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध आदि, और अन्त में मल्लयुद्ध । प्रारम्भ के चारों युद्धों में गिना प्रयास बाहुवली ही जयी हुए। बाहुपली इस विजय से विशेष उल्लसित नहीं दिखाई देते पे, भरत विशेप उदास। . ।

बाहुबली १२५ मलयुद्ध अत्तिम युद्ध था और उसके समर प्रजा को उत्सुकता इस माई- भाई के द्वेष दीन युद्ध में बहुत बढ़ गई थी। मल्लयुद्ध में कुछ देर के पाद यापनो ने भरत को दोनों हाथों पर ऊपर उठा लिया। इस समय दर्शकों के प्राण कराठ में आ बसे थे। वे प्रति- पल पाशका करने लगे कि चक्राती भरत अब घरती पर चित या पड़वे हैं। किन्तु पाहुयजी ने धीमे धीमे अपने हार्यों को नीचे किया और मरत पृथिवी पर सावधान रहे दिखाई दिये । तदनन्तर नतथिर होकर बाहुबली ने दोनों हार्यों से अपने बड़े भाई के चरण धुए। भरत ने भी पाहुबली को अपनी छाती से लगा लिया, कहा-बाहुवली, विजयी होनी । मुझे तुमपर गर्व है और मैं तुम्हारी विजय पर हर्षित हूँ। तुम सामर्थ्यशाली बनो। पाहुबली ने कहा- यह श्राप क्या कहते हैं। श्रार ज्येष्ठ है, योग्य है और मैं एक क्षण फै निर भी राज्य नहीं चाहता। भरत ने कहा--भाई पाहुबली, यह तुम्हारा है । तुम उसके विजेता हो, उसके पात्र हो। और में अपना हृदय दिखा सकें तो तुम जानो, मैं कितना मसन हूँ। तुम राजा बनो, मुझे अमात्य पनामा, सेनापति बनायो, अथवा नो चाहो, सेवा लो। बाहुवली ने हाथ जोड़कर कहा-भाई, मुझे राज्य की इच्छा नहीं है। इस विषय में श्राप राज्य पालन का कर्तव्य मुझपर न डालें । मैं दीक्षा लेना चाहता हूँ। मुझे राज्य आदि नहीं चाहिए । मरत ने पहुत कहा परन्तु बाहुबली दीक्षा लेकर वन की ओर चले गये। भरत चुपचाप राज्य-रक्षा और राजस्व पालन में लग गये। बाहुवल ने घोर तपश्चरण किया--अति दुर्द्धर्ष, अति कठोर, अति निर्मम । वर्षों वे एक पैर से खड़े रहे । महीनो निराहार यापन किये । सुदीर्घ काल तक असएड मौन साधे रसा। परसो बाहर की ओर आँख खोजकर देखा तक नहीं।

र १२६.] गल्प-समुभय उनकी इस तपस्या की कीति दिग्दिगन्त में फैल गई। देश देश से लोग उनके दर्शन को प्राने लगे। मलों की संख्या नयी। उनकी महिमा और पूजा का परिमाण न था। किन्तु' पाहुयली भलों और उनकी पूजा से रिमुग्न होकर घोर से घोरतर निर्जन दुष्प्राप्य एकान में चले आते थे। एक स्थान पर एक बार अहिंग, एकस्प, एकाकी इतने फाल तक सडे रहे कि उनके सहारे परमी जम गये, वेलें उठकर शरीर को लपटने लगी। उन धल्मीकों में कीड़े मकोड़े ने घर बना लिये। इस कामदेवोपम सर्वा सुन्दर बलिष्ठ पुरुष ने निदारुण कायक्लेश में वर्ष के वर्ष बिता हाले । लोग देखकर हा हा सावे थे और शिस्तब्ध रह जाते ये। उसकी स्पृहणीय काया मिट्टी बनी जा रही थी। स्त्रिया उस निमालित- नेत्र, मग्न-मौन, शिला की मांति प्रडे हुए पुरुप पु गव के चरणों को घो- घोकर वह पानी श्रीखोलगाती शी। उसके चरणों के पास की मिट्टी औपची समझी जाती थी। पर वह सब ओर से विलग, अनपेक्ष, पन्द अस्ति, बन्द मुख, मलि त देह, क्श गात, तपस्या में लीन था। यह था, पर कैवल्य उसे नहीं प्राप्त हुना, ज्ञानी लोग इसपर कि विमूढ़ थे। * * . जीवन्मुक्त भगवान् श्रादिनाथ से लोगों ने पूछा-भगवन्, दीर्घकाल से कुमार बाहुबली अतिशय कठोर तपश्चर्या कर रहे हैं। आपको शात तो है। भगवान् बोले- हाँ शात है। 'उससे हमारा हृदय कापता है। आप उन्हें इससे विरत करेंगे! भगवान् ने कहा-नहीं। एक निष्टा के साथ जो किया जाता है उससे किसी का अपकार नहीं होता। लोगों ने पूछा--किन्तु भगवन, कुमार बाहुबली को अब तक कैवल्य. सिद्धि क्यों नहीं हो सकी! . भगवान् ने कहा-यह तुम पीछे जानोगे।

याहुबली [ १२७ भरत राज्यशापन चला रहे थे। प्रपम चक्रवती भरत के ऐश्वर्य का पार न या मणि माणिक-मुक्का की दीप्ति से उनका परिच्छद जगमग होता था। उनके नाम का प्रावध दिन्दिगन्त में छाया था। सब प्रकार के सुख विलास और ग्रामोद प्रमोद के साधन के सकेत पर प्रस्तुत थे । और ये अपने अपए निष्पएटरचमतिरव का उपभोग कर रहे थे। इसको भी वर्ण के वर्ष हो गये। एक दित भगवान् शादिनाथ के पास पहुँचकर भरत ने कहा--भगवर, भाई बाहुबली को यह अधिकार मिला कि वह मुझको छोड़कर और राज्य को छोड़कर स्वाधीन रहे और सत्य को पायें। जो मेरे अधिकार में नहीं आता था, जो याहुवली का हो गया था, उस राज्य को लेने को मैं रह गया। मेरे लिए अस्वीकार करने को तनिक भी अवकाश नहीं छोड़ा गया। मुझे शिकायत नहीं है । लेकिन मैं नापसे पूछता हूँ, क्या मैं अब दीक्षा नहीं सकता। भगवान ने कक्षा-ले सकते हो। अगर सत्य की खोज और सत्य की उपलब्धि राजत्व के द्वारा तुम्हारे निकट अगम्य बन गई है, तो तुम उसे अवश्य तज सकते हो। और मैं कह सकता हूँ -अगम्य बन जाना भी चाहिए । तुम पचास वष से ऊपर के हुए न ! भरत सतुष्ट-चित्त महलों को लौट आये। और दो दिन बाद घोपणा हो गई कि चक्र प्रब दीक्षा लेंगे। नगरवासियों में विकलता गई। साम्राज्य के प्रान्त मान्त से विरोध में अनुनय प्रार्थनाएँ श्राई । किन्तु भरत ने एक प्रतिनिधि सभा को अपना उचराधिकार देकर दीक्षा ले ली। और, राज्याभरण उतारते-उतारते मुहूर्त के अन्दर में उन्हें निर्मग वैवल्य की उपलब्धि हो गई। ले लोगों ने क्लिष्ट भाव से भगवान् श्रादिनाथ की शरण में जाकर पूछा- १९६] गल्प-समुच्चय उनकी इस तपस्या की कौति दिग्दिगन्त में फैल गई। देश देश से लोग उनके दर्शन को श्नाने लगे। भलों की संख्या न थी। उनकी महिमा और पूना का परिमाण न था। किन्तु' याहुबली भकों और उनकी पूजा से विमुख होकर घोर से धोरतर निर्जन दुष्प्राप्य एकान में चले जाते थे । एक स्थान पर एक बार अहिंग, एकस्य, एकाकी इतने काल तक खड़े रहे कि उनके सहारे वरमीक जम गये, चेलें उठकर शरीर को लपटने लगी। उन वल्मीकों में कीडे मकोडे ने घर बना लिये। इस कामदेवोपम सक्ष सुन्दर बलिष्ठ पुरुप ने निदारण कायशेश में वर्ष के वर्ष बिता डाले। लोग देखकर हा हा खाते थे और नि स्तब्ध रह जाते ये। उसकी स्पृहणीय काया मिट्टी बनी जा रही थी। स्त्रियाँ उस निमीलित- नेत्र, मग्न-मौन, शिला की भाति प्रड़े हुए पुरुष पु गव के चरणों को धो- धोकर वह पानी श्राखो लगाती थी। उसके चरणों के पास की मिट्टी प्रोपनी समझी जाती थी। पर वह सब शोर से विलग, अनपेक्ष, बन्द अाँख, बन्द मुख, मलिन देह, कृश गात, तपस्या में लीन था। यह था, पर कैवल्य उसे नहीं प्राप्त हुना, ज्ञानी लोग इसपर कि विमूढ थे। में जीव मुक्त भगवान् श्रादिनाथ से लोगों ने पूछा--भगवन् , दीर्घकाल से कुमार बाहुबली अतिशय कठोर तपश्चर्या कर रहे हैं। श्रापको ज्ञात तो है। भगवान् बोले-- ज्ञात है। 'उससे हमारा हृदय कापता है। आप उन्हें इससे विरक्त करेंगे? भगवान् ने कहा-नहीं। एक निष्टा के साथ जो किया जाता है उससे क्सिी का अपकार नहीं होता। लोगों ने पूछा-किन्तु भगवन्, कुमार बाहुबली को अब तक कैवल्य- सिद्धि क्यों नहीं हो सकी। मावान् ने कहा-यह तुम पीछे जानोगे।

कैवल्य की उपलब्धि हो गई। चाहिए। तुम पचास वर्ष से ऊपर के हुए न! बाहुबली [ १२७ भरत राज्यशासन चला रहे थे। प्रथम चकरी भरत के ऐश्वर्य का पार न या । मणि माणिक मुक्ता की दीशि से उनका परिच्छद जगमग होता था। उनके नाम का अाता दिग्दिगन्त में छाया था। सब प्रकार के सुख विलास और श्रामोद प्रमोद के साधन उनके सकेत पर प्रस्तुत थे । और वे अपने असण्ड निष्कपटक चकार्तित्व का उपभोग कर रहे थे। इसको भी वर्ष के वर्ष हो गये। एक दिन भगवान् श्रादिनाथ के पास पहुँचकर भरत ने पाहा--भगवन्, भाई बाहुबली को यह अधिकार मिला कि वह मुझको छोड़कर और राज्य को छोड़कर स्वाधीन रहें और सत्य को पायें । जो मेरे अधिकार में नहीं आता था, जो बाहुवली का हो गया था, उस राज्य को लेने को मैं रह गया। मेरे लिए अस्वीकार करने को तनिक भी अवकाश नहीं छोड़ा गया। मुझे शिकायत नहीं है । लेकिन में प्रापसे पूछता हूँ, क्या मैं प्रय दीक्षा नहीं भगवान ने कहा-ले सकते हो। अगर सत्य की खोज धौर सत्य की उपलब्धि राजत्व फे द्वारा तुम्हारे निकट अगम्य बन गई है, तो तुम उसे अवश्य तज सकते हो। और मैं कह सकता हूँ-अगम्य बन जाना भी ले सकता । भरत सतुष्ट-चित्त महलों को लौट आये। और दो दिन बाद घोपणा हो गई कि चक्रवर्ती अब दीक्षा लेंगे। नगरवासियों में विकलता छा गई। साम्राज्य के प्रात प्रान्त से विरोध अनुनय प्रार्थनाएँ श्राई । कि तु भरत ने एक प्रतिनिवि सभा को अपना उत्तराधिकार देकर दीक्षा ले ली। और, राज्याभरण उतारते-उतारते मुहूर्त के अन्तर में उन्हें निर्मज्ञ में की शरण में जाकर लोगों ने विजष्ट भाव से । - - श्री सियारामशरण गुप्त आपका जन्म १८९५ ई० में हुआ। मापने पहले-पहल कहानियाँ १९२८ ई० में लिखना प्रारम्भ किया। आप प्रभात फयि है और आपका जन्म भी एक ऐसे परिवार में हुआ है जिसे श्री मैथिलीशरण गुप्त जैसे प्रथम श्रेणी के कवि को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त है। कहानी टेराक भी आप कवि की ही भांति सफल है। इसके अतिरिक्त मापने उपन्यास भी लिग्मे ह । आपके नियन्धों का भी एक सग्रह प्रकाशित हो चुका है । मार्मिक रघु कथा लिखने में आप विशेप सिद्ध हस्त है। आपरी कहानियों को सादगी और उनकी मामिाता ही परपस पाठक को अपनी और सोचती है। आपकी कविताओं के सग्रह 'अतिम आकाक्षा' 'पुण्यपर्व' आदि , उपन्यास 'गोद' 'नारी' आदि , नियन्ध-सग्रह 'झठ-सच' प्रकाशित हुए ह। काकी । + उस दिन बड़े सवेरे जर श्यामू की नींद खुली तब उसो देसा-घर भर में कुहराम मचा हुया है। उसकी काकी-उमा-एक कम्पल पर नीचे से ऊपर तक एक कपड़ा श्रोटे हुए भूमि-रायन कर रही है, और घर के सब लोग उसे घेरकर बड़े करण स्वर में विलाप कर रहे हैं। लोग जब उमा को श्मशान ले जाने के लिए उठाने लगे तब श्यामू ने बड़ा उपद्रव मचाया। लोगों के हाथों से छूटकर वह उमा पे उपर जा गिरा । योला-काफी तो सो रही है। उन्हें इस तरह उठाकर कक्षा लिये जा रहे हो ? मैं न ले जाने दूंगा। लोगों ने बड़ी कठिनता से उसे हटा पाया। दादी के प्रग सरकार में भी वह न जा सका । एक दामी राम राम रके उसे घर पर ही संभाले रही। यद्यपि बुद्धिमागुरुजनों ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी काकी उसरे मामा के यहाँ गई है, परन्तु असत्य के प्रावरण में सत्य बहुत समय तक छिपा न रह सका। आसपास के अन्य अवोध बालकों के मुँह से ही वह प्रकट हो गया । यह बात उससे छिपी न रह सकी कि काकी और छही नहीं, ऊपर राम के यहो गई है। काकी के लिए कई दिन तक लगातार रोते रोते उसका रुदन तो क्रमश शान्त हो गया, परतु शोक शात न हो सका। जिस तरह वर्षा के अनन्तर एक ही दो दिन में पृथ्वी के ऊपर का पानी अगो- चर हो जाता है, पर तु बहुत भीतर तक उसकी श्रार्द्रता बहुत दिन तक बनी । रहती है, उसी प्रकार वह शोक उसके अन्तस्तल में जाकर बस गया । वह भाय अकेला पैठा बैठा शून्य मन से आकाश की ओर ताका करता। एक दिन उसने ऊपर एक पतग उड़ती देखी। न जाने क्या सोचकर उसका हृदय एकदम लिल उठा। श्वेिशर पे पास जाकर बोला-काका, मुझे एक पतग मॅगा दो। पत्नी की मृत्यु के बाद से विश्वर पहुव मन्यमनस्क से रहते । मॅगा दूंमार--कहकर ये उदास भाग से पावर पो गये श्याम पतग के लिए पहुत उपपिउरा उगम पनीर परहन रोक सका। एक पर शिरकाको १३२ ] गल्प-समुचय इधर उधर देखकर उसने पास एक स्टूल सरकाकर रखा और ऊपर चढकर फोट की जेबें टटोली। उनमें से एक चवनी का आविष्कार करके चातुरन्त ही वहां से भाग गया। सुखिया दासी का लड़का-भोला-श्याम का समवयस्क साथी था। श्यामू ने उसे चवन्नी देकर कहा-अपनी जीजी से कहकर गुपचुप एक पतग और डोर मंगा दो । देखो, खूब अकेले में लाना, कोई जान न पाये। पतग आई । एक अंधेरे घर में उसमें डोर बांधी जाने लगी। श्यामू ने धीरे से कहा--भोला, किसी से न कहे तो एक यात कहूँ। भोला ने सिर हिलाकर कहा-नहीं, किसी से न कहूँगा। श्यामू ने रहस्य खोला । कहा-मैं यह पतग कपर राम के यहाँ मेनूंगा। इसे पकड़कर काकी नीचे उतरेगी। मैं लिसना नहीं जानता। नहीं तो इस. पर उसका नाम लिख देता। भोला श्यामू से अधिक समझदार था। उसने कहा-तुमने बात तो बड़ी अच्छी सोची, परन्तु एक कठिनता है । यह होर पतली है। इसे पकडकर काकी उतर नहीं सकती। इसके टूट जाने का डर है। पतग में मोटी रस्सी हो तो सब ठीक हो जाय । श्यामू गम्भीर हो गया। मतलब यह-बात लाख रुपये की सुझाई गई है। परन्तु कठिनता यह थी कि मोटी रस्सी कैसे मँगाई जाय । पास में दाम है नहीं और घर के जो श्रादमी उसकी काकी को बिना दया-मया के जला आये हैं, वे उसे इस काम के लिए कुछ नहीं देंगे। उस दिन श्यामू को चिन्ता के मारे बड़ी रात तक नींद नहीं आई। पहले दिन की ही तरकीब से दूसरे दिन फिर उसने विश्वेश्वर के कोट से एक रुपया निकाला । ले जाकर भोला को दिया और बोला-देख भोला किसी को मालूम न होने पाये। अच्छी-अच्छी दो रस्सियां मैंगा दे। एक रस्सी ओछी पडेगी। जवाहिर भैया से मैं एक कागज पर काफी लिखवा रगा । नाम की चिट रहेगी तो पतग ठीक उन्हीं के पास पहुँच जायगी। दो घण्टे बाद प्रफुल्ल मन से श्यामू और भोला अँधेरी कोठरी में बैठे. बैठे पतग में रस्सी बांध रहे थे। अकस्मात् शुभ-कार्य में विघ्न की तरह उम काकी [१३३ मूर्ति धारण किये हुए विश्वेश्वर वा मा घुसे । भोला और श्यामू को पमका कर बोले--तुमने हमारे कोट से रुपया निकाला है। भोला सकपकाकर एक ही बार में मुखबिर पन गया। पोला-~-श्यामू भैया ने रस्सी और पतग मगाने के लिए निकाला था। विश्वेश्वर ने श्याम को दो समाचे जहार कहा-चोरी सीसकर जेन जायगा ! अन्या, तुझे बाज अच्छी तरह समझाता हूँ|--कहकर दो चार थप्पड़ और जड़कर पतग फाईडाली। अप रस्सियों की ओर देखकर उन्दगी पूछा-ये किसने मंगाई ? भोला ने कहा-दहीने मॅगाई थी। कहते थे, इससे पतग तानकर काकी को राम के यहाँ से नीचे उतारेंगे। विश्वेश्वर एक क्षण के लिए हतबुद्धि होकर राड़े रह गये। उन्होंने फटी हुई पतग उठाकर देती। उसपर एक कागज चिपका था, जिसपर लिसा हुधा या 'काकी

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श्री चन्द्रगुप्त विद्यालंकार
श्री च दगुप्त विद्यार कार का जन्म १९०५ ३० में हुआ। कहानियाँ मापने सबसे
पहिले ई० १९०८ लिसना प्रारम्भ की। श्री चन्द्रगुप्त विद्यालय की कहानिया लिराने
की प्रतिभा बहुत ही मुन्दर है। कहानी के टेकनिक का ज्ञान तो आपका बहुत ही
अच्छा है। आपकी कहानियाँ गठी हुई, उनको गापा विषय के भतुल एर डाका
चरिन विनण पहुन ही स्वाभाविक है।
आपकी कहानियों का एक राग्रह 'अमानस' और नाटक 'रेवा' अभी ह ल में ही
प्रमाशित हुए हैं।
एक सप्ताह

गुलमर्ग १३ावण प्पारे काम 1 मुझे मार करना, उस दिशाम को पाप से समय तुम मेरा इन्तनार परते रहे होगे और में पर सिक पाया। पान मसे ११०० मील की पूरी पर और गुम्दारी गरी से ६.०० पीट प्रधिक ऊँचाद पर बैठकर में मुम्हें स८ m । म जानते ही हो कि मैं सि तयीयत पा भादमी, यह तिना दोझ था । काम, काम, हर परत काम । मेरी सपीयर या एगई और गुम्दे मी सूचना दिये विया में अपनी कार पर इतने लम्बे हार लिए पिस भाया । उस दिन पाप फे परत मुझे मौजूद न पाकर सपि 37 गुर काशी तिज को लिये ही होगे, फिर भी उस अमुविधा लिए मुझे माफ कर देगा। हिमालय की यह विशाल पारी पड़ी मुशायनी है। घने जगल, निर्मल झरने, विस्तृत मैदान, चारी तोर पर से टकी पहायो ऊँची-ऊँची चोटिया और दूर पर दिखाई देनेवाली चुनर मील । इस स्थान से मैं सचमुच प्यार परता हूँ। यो एक सताए पिन कुल किम्मा रहकर काहूँगा। कुछ नहीं करूँगा । वही पत्र निरर्गा और तुम्हारे पन्ना को बाहर और कुछ नदी पगा। যা কম, मैं अपना हूँ। तुमने श्रोफ चार मेरे इस अवेलेपन की बालाचना की है, मगर यहा पाकर मैं अतुमर परता हूँ कि जैसे प्रति मेरी मा है। मैं अपेला कक्षा है, मैं तो अपगी मा की गोद में हूँ। चितान परना। मैं यहां एक सप्ताह से अधिक नहीं ठहरूँगा। २२ श्रावण की शाम को तुम मुफे अपनी चाय की रेबिल पर ही पायोगे । बाहर एक कसा हुमा घोड़ा मेरा इतनार कर रहा है, अत बाकी क्ल। तुम्हारा- स १३८] गल्प-समुच्चय मैं चौंका, और उधर उसी समय उस लड़की की निगाह मुझपर पड़ी। शायद मिलकुल ही अकस्मात् । वह भी चौक गई। क्षण भर के लिए सहसा उसकी और मेरी भासे नापस में मिल गई । यस, भाई कमल, बात इतनी ही है, और कुछ भी नहीं। मैं उसी क्षण वापस लौट पड़ा था, और जान पड़ता है, वह लड़की भी यहाँ से चल दी थी , मगर इस जरा सी बात ने न-जाने क्यों मेरे दिल पर बहुत अजीब सा प्रभाव डाला है। इस यात को हुए अप ६ घण्टे बीत चुके हैं, और इन ६ घण्टों में चौंकी हुई हरिण की सी वे अासे मेरे मानसिक नेत्रों के सामने बीसियों बार धूम गई हैं। तुम सोचते होगे, इस सबमें कोई खास बात जरूर है। और नहीं तो कम-से-कम यह लड़की कोई असाधारण सुन्दरी तो अपश्य होगी, मगर वास्तविकता यह नहीं है। उस लड़की के चेहरे में असाधारणता जरा भी नहीं थी । लम्बा कद, मामूली चेहरा, गेहुँप्रा रग। और मी कोई बात उसमें ऐसी नहीं थी, जिसे असाधारण कहा जा सके । अपनी नगरी में हम लोग इस कन्या से अत्यधिक रूप-सौन्दर्यवाली पीसियों युवतियों को रोन देखते हैं । मेरो परिचित कुमारियों में भी कितनी ही सौन्दर्य की दृष्टि से उससे कहीं बढ-चढकर है। यहाँ गुलमर्ग में भी उससे बहुत अधिक सुन्दरियों को मैंने काफी बड़ी संख्या में देखा है। फिर भी , कुछ समझ में नहीं पाता कि इस 'फिर भी' का कारण क्या है ! श्राज इतना ही। तुम्हारा- । गुलमर्ग १६ श्रावण प्रात.५ बजे 4 कमल, नींद से उठते ही सबसे पहले मेरी निगाह रात के पत्र पर गई है। रात मैं क्या खुराफात सी लिख गया | दिल में आता है, वह पत्र फाड़ डाले। -- . एक सप्ताह [१३९ जी कुछ भारी सा है। कुछ लिखने की मी इच्छा नहीं होती। और इस तरह निश्चेष्ट भाव से यहां चुपचाप पड़े रहना तो श्राज मुझे सह्य भी नहीं हो सकता। तुम जानते हो, अपर की दो लाइनें लिखने में कितना समय लगाया है। पूरे २२ मिनट । इस समय दूसरा पर लिख सकना मेरे लिए असम्भव है। चलो, अय कहीं आवारागर्दी करने जाऊँगा। सायवाल || बजे। मेरा जी इस समय बहुत प्रसन्न है। मेरी टाँगें, मेरा सम्पूर्ण शरीर विल- कुल यकी हुई हालत में है, परन्तु जी चाहता है कि मैं इस समय भी नाचू , करें, और इधर-उधर दौड़ता पिसँ। मेरे हृदय में इस समय उत्साह का जो अघड़-सा चल रहा है, मुझे मालूम है कि उसकी प्रतिक्रिया भी ज़रूर होगी। अपने जी के इस व्यर्य उत्साह को बहकाने का मुझे इससे बढार अधिक अच्छा और कोई उपाय नहीं मिला कि सुबह पत्र पूरा करने बैठ जाऊँ। साफ हो पाई है। श्राज का सारा दिन मैंने सैर-सपाटे में काटा है। थोड़ी देर पहले घर वापस आया हूँ। तुम्हारी चिट्ठी बीच में छोड़कर मैं एक मनभूत घोड़े पर सैर करने के लिए निकल गया था। यहां के सभी मार्ग मेरे जाने पहचाने हैं, इससे कोई मार्ग-दर्शक भी मैंने अपने साथ नहीं लिया था। मेरे निवास स्थान से करीव ८ मील की दूरी पर एक बड़ा पहाड़ी झरना है। इस करने को या निंगली नाला' कहते हैं। मैं अाज इसी निंगली नाले वक गया था। खूप टेदी-मेटी राह है। कहीं पहाड़ों के चक्कर हैं, कहीं पास से मढे मैदान, कही उँचाई निचाई, कहो पेचदार मोड़ और कहीं घने जगल । रास्ता स्या है, ऊबड़-खाबड़-सी एक पगडडी है। इस रास्ते पर अपना घोड़ा खूप निश्चिन्तता के साप दौड़ाया। ऊपर अप्सरय पक्षियों का मधुर कलरव या। राह के दोनों ओर फूल पत्तियां थीं। हवा में सुगन्ध थी, प्रासमान में सूरज बादलों के साथ खिमिचौनी खेल रहा था। कभी सरदी बढ़ जाती थी और कभी हल्की हल्की धूप निकल पाती थी । शीघ्र ही मैं निगली नाले पर जा पहुंचा। भरने के दोनों ओर घना जगल है । बीच में बड़ी बड़ी चट्टानें पड़ी हैं। एक- १४० ] गल्प-समुच्चय एक चधान सेकड़ों-हजारों टन की होगी। झरने का स्वच्छ नल इन भीमकाय पट्टानो से टकराकर शोर मचाता है, फिसलता है और फिर उछल-उछलकर इन्हें गीला करता है। झरने की शीतलता, झाग, सफेदी और शोर-ये सब निरन्तर बने रहते हैं । सदा ताजे, उत्साहपूर्ण । घोड़े को घास चरने के लिए खुला छोड़ार में दो तीन घण्टों तक भरने की चट्टानों पर स्वच्छन्दतापूर्वक कूदता फांदता रहा। अपने कैमरे से इस मरने के मैंने अनेक फोटो भी लिये । साया, पीया और उसके बाद वापस लौट चला। वापसी में मैंने अपने घोड़े को सरपट नहीं दौड़ाया। राह के दृश्यों ने मेरा सम्पूर्ण ध्यान अपनी ओर खीच लिया था, प्रत घोड़े पर मैंने किसी तरह का शासन नहीं किया। वह आजादी के साथ, चाहे जिस चाल से, चलता रहा। सहसा सामने की ओर से मुझे एक चीस-सी सुनाई दो। मेरी तन्मयता भग हो गई। मैंने देखा, सामने के मैदान में एक घोड़ा वे वहाथा दौड़ा चला जा रहा है, और उसपर एक स्त्री सवार है। घोड़े की जीन को लेटी सी दशा में कसकर पकड़े हुए वह नारी सहायता के लिए गरसक चिल्ला रही थी। उसी निगाह में मुझे यह भी दिखाई दिया कि पग डण्डी पर तीन-चार अन्य घुड़सवार भी मौजूद हैं। सब की सब लडकिया हो। वे सब असमर्थों का सा भाव धारण किये अपने काश्मीरी कुलियों को वह घोड़ा पकड़ने का श्रादेश दे रही थीं। एक ही क्षण में मैंने अपना घोड़ा उसी ओर दौड़ा दिया और शीम ही उस स्त्री सवार के निकट ना पहुंचा । अपने घोड़े पर से कूदकर मैंने उस घोड़े की लगाम पकड़ ली। फिर वही श्राखें। मैं सहसा घबरा सा गया। मुझे यह भी नहीं सूझा कि मैं क्या कहकर उस कन्या को आश्वासन दूं। मगर मेरी घबराहट की ओर उसका धान नहीं गया। वह स्वय ही बहुत अधिक सक्टापन्न दशा में जो थी। पहले उनी ने मुझे धन्यवाद दिया। मालूम होता है, उसने मुझे पहचाना - एक सप्ताह [१४१ नही। पयवाद देकर उसने शीना से का-बसा नटपट पोता है। मैं पहले ही कह रही थी कि मैं इसपर सवार न हाऊगी। उसकी पायात अभी तक भय की कंपकंपी थी। मैंने कहा-मापने यही हिम्मत दिखाई है। पोहे की चाल इतनी तेज हो आने पर भी आप गिरी नहीं। वह इसपर लगा दी गई । उसने कहा- हयपारी तो क्या जान । सुना था, इधर फे पोड़े बड़े सीधे होते हैं। इसी समय उसके साथ की अय सभी लड़कियां और घोडेवाले कुलो भी बदा आ पहुँचे। पोहे की लगाम अभी तक मेरे हाथों में थी, और यह लहकी भी अभी तक घोड़े की पीठ पर ही थी। एक काश्मीरी ने लगाम अपने दापों में थाम ली और दूसरे से जीन को सँभाला, वह लड़को नीचे उतर आई । उसपे साथ की सब लड़कियों ने मुझे धमवाद दिया, और मैंने कहा कि इसमें धन्यवाद की मात दी क्या है। उन्दोंने मुझसे पूछा-पाप किस जगह ठहरे हुए हैं। मैंने अपना पता पता दिया ! मेरे निवासस्थान का पता मुनकर जैसे उस लड़की ने मुझे पहचान लिया । उसरे मुँह से एठार निकला-'पोहो' परन्तु उसी क्षण अपने को पूर्णत सयत करपे उसने पड़ी शान्ति पे साप कहा-मैं समझ गई। इसके बाद दो चार मामूली सी और पाते भी हुई, और तम वे लोग निंगली नाले की ओर बढ़ गये। जाते हुए कल मात के लिए मुझे अपने यहां चाय के लिए निमनित भी करते गये। उस नटखट घोहे की रास अब एक काश्मीरी पे हाथ में थी। वे सब पोड़े अय महुत धीमी चाल से जा रहे थे, और यह घोड़ा सबसे पीछे कर दिया गया था। मेरी नज़र अभी तक उसी ओर थी कि कुछ ही दूर जाकर उस लड़की ने पीछे की ओर घूमार देसा। अचानक एक बार पुन मेरी और उसकी नजर मिल गई। श्रोह, फिर वही निष्पाप, लजामरी, स्वच्छ प्रा। भाई कमल, मुझे नहीं मालूम कि वे लडकिया कौन है । सभी नव- - १४२] गल्प-समुच्चय युवतियां हैं। मेरा अनुमान है कि उनमें से अभी तक किसी का विवाह नहीं हुश्रा । मैं उनमें से किसी का नाम भी नहीं जानता, मकान का पता देने के लिए केवल एक पुरुष का नाम ही उन्होंने मुझे बताया है। मैं यह भी नहीं जानता कि वे श्रापस में बहनें है, सहेलियाँ है, एक साथ पढनेवाली है या रिश्तेदार हैं। मुझे कुछ भी नहीं मालूम । परन्तु एक बार मैंने अच्छी तरह देख ली। वह यह कि उस लड़की के गेहुएँ चेहरे में असाधारणता जरा भी नहीं है। उसकी आँखों में, उसकी पलको या भौंहों में ऐसी कोई बात नहीं है, जिसके सम्बन्ध में कवि लोग यही-बड़ी उपमाएँ खोज-खोजकर दिया करते है। फिर भी उसकी निगाह में कुछ है। क्या है-यह मैं नहीं कह सकता, मगर कुछ हजरूर । बाहर अंधेरा हो गया है। सरदो भी अब अनुभव होने लगी है, अत: प्रयामा अभिन्न- स (५) गुलमर्ग १७ श्रावण .. प्यारे कमल, श्राज जाकर मुझे तुम्हारा पहला पत्र मिला है। तुम सच मानो, गुलमर्ग के छोटे-से बाजारों के साइनबोर्डों के अतिरिक्त यही एक पहली चीन है, जिसे मैंने इन पांच छ दिनों में पदा है। मेरा श्राज का दिन भी बड़े अानन्द से गुजरा है। सुबह-सुबह मैं उन लोगों के यही चाय पीने गया था। उसके बाद हम लोग एक साय खिलन- मर्ग की सैर के लिए निकल गये । यहाँ घटों तक उस खुले मैदान में बैठकर ताश खेला किये । सैर की, खेले कूदे और फिर वापस लौट आये । सब लोग मेरे निवास स्थान पर प्रायै । शाम की चाय यहाँ ही हुई, और अभी अभी मैं उन्हें उनके घर तक छोड़कर पा रहा हूँ । मुझे उनका परिचय भी मिल गया है। वह लड़की अपने भाई और एक , एक सप्ताह [१४३ चचेरी बहन के साथ काफी दिन हुए यहाँ आई थी। उसके पिता एक सम्पन्न व्यापारी हैं, उनका कारोबार सूब चलता हुआ है। वह लड़की लाहौर के एक महिला-कालेज में पढ़ती है, और बाकी तीनों लड़कियां उसके प्रास की है, उसकी मित्र हैं, और उसी के निमन्त्रण पर यहाँ श्राई है। उसके भाई का स्वभाव भी पड़ा मधुर है। गुलमर्ग में उसके दोस्तों को इतनी अधिकता है कि उनकी पोर से छुटकारा पा सकना ही उसके लिए कठिन हो जाता है, हम लोग आपस में खूब हिलमिल गये हैं। मैंने उन लोगों के अनेक फोटो भी लिये है। श्राज जल्दी ही सो जाने को जी चाहता है। तुम्हारा पर इस समय मेरी आँखों के सामने नहीं है। कुछ याद नहीं पा रहा है कि तुमने उसमें कोई बात पूछी भी या नहीं ? चलो, जाने दो। यह तो मुझे मालूम ही है कि तुम कोई खास काम की बात तो पूछ ही नहीं सकते ! यह भी नामुमकिन नहीं कि मैं यहां कुछ दिन और ठहर जाऊँ। स्नेही गुलमर्ग १८श्रावण कमल, साँझ हूबने को है। दिन भर से श्रासमान में बादल छाये हुए थे। इस समय मूसलधार वर्षा हो रही है। मेरे कमरे की सब खिड़कियां दन्द हैं। कमरे में बत्ती जल रही है। मेरे कानों में एक सगीत गूंज रहा है- बहुत करुण, बहुत पवित्र और बहुत ही मधुर । इस सगीत मे शब्द नही, वेवल स्वर है। स्वर भी क्या, केवल गूंज है। छत की टीन पर वर्षा पढ़ने की जो एक-सा श्रावाज हो रही है, वह इस गूंजमय संगीत का साज है और दएडी, गीली हवा की धू धू इस सगीत की तान का काम कर रही है। मैं अकेला हूँ। दिन भर अकेला नहीं या, परन्तु इस समय फिर से अवेला ही हूँ। वह अपने भाई और छोटी बहन को साथ लेकर यहाँ आई , - १५०] गल्प-समुन्जय एक दिन राम की बहू ने राम के लिए खीर पनाई। पिस्ता, बादाम, मसाने और तरह तरह के मेवे दूध में प्रोटे गये, सोने का वर्क चिपकाया गया और तीर से भरफर कटोरा कमरे पे एक ऐसे ऊँचे ताक पर रखा गया, जहाँ मिल्ली न पहुँच सके। राम की बहू इसके बाद पान लगाने में लग गई। उधर कमरे में बिल्ली आई, ताक के नीचे खड़े होकर उसने ऊपर कटोरे की ओर देखा, सू पा माल अच्छा है, वाक की ऊँचाई अन्दाजी और राम की यह पान लगा रही है। पान लगाकर रामू की बहू सासजी को पान देने चली गई और कवरी ने छलांग मारी, पजा कटोरे में लगा और फटोरा झन झनाहट की आवाज के साथ पर्श पर । श्रावाज रामू की बह' के कान में पहुँची, सास के सामने पान फेंककर वह दौड़ी, क्या देखती है कि फून का कटोरा टुकड़े-टुकड़े, खीर फर्श पर और मिली डटकर खीर उड़ा रही है। रामू की यह को देखते ही कवरी चम्पत । रामू की बहू पर सून सवार हो गया, न रहे यास न बजे बाँसुरी । राम की बहू ने कवरी की हत्या पर कमर कस ली। रात भर उसे नोंद न आई, किस दाव से कयरी पर वार किया लाय कि फिर जिन्दा न बचे, यही पड़े पड़े सोचती रही। सुबह हुई और वह देखती है कि कबरी देहरी पर बैठी पड़े प्रम से उसे देख रही है। राम की बहू ने कुछ सोचा, इसके बाद मुसकराती हुई वह उठी, कबरी राम की बटू के उठते ही खिसक गई। राम को बहू एक क्टोरा कमरे के दरवाने की देहरी पर रखकर चली गई। हाथ में पाटा लेकर वह लौटी तो देखती है कि कपरी दूध पर जुटी हुई है। मौका हाथ में आ गया। धारा बल लगाकर पाटा उसने बिल्ली पर पटक दिया। कबरी न हिली न डुली, न चीखी न चिल्लाई, यस एकदम उलट गई। अावाज जो हुई तो महरी भाइ छोड़कर, मिसरानी रसोई छोड़कर और सास पूजा छोड़कर घटनास्थल पर उपस्थित हो गई । राम की बहू सर झुकाये हुए अपराधिनी की मांति मातें सुन रही है। .

६ प्रायश्चित्त [१५१ महरी बोली-अरे राम, बिल्नी वो मर गई। माजी बिल्ली की हत्या रह से हो गई, यह तो पुरा हुना। मिसरानी बोली-माजी, दिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या वरावर है । हम तो रसोई न वनावेगी, जय तक पहू पे सिर हत्या रदेगी। सासजी बोली-हा, ठीक रहती हो, थम नब तक बहू के सिर से हत्या न उतर जाय, तब तक न कोई पानी पी सकता है, न खाना खा सकता है। यह, यह क्या कर डाला! महरी ने कहा- -पिर क्या हो, कहो तो पण्डितजी को बुला लाऊँ। सास की जान में जान आई-अरे ६, जल्दी दौड़ के परिहतजी को दुलाला। पिजी की हत्या की सबर बिजली की तरह पड़ोस में फैल गई। पड़ोस की औरतो पा राम के घर में ताता बँध गया। चारों तरफ से प्रश्नों की बौछार और राम की बहू सिर झुकाये बैठी। पण्डित परमसुख को जब यह पर मिली उस समय वे पूजा कर रहे थे। गबर पाते ही थे उठ पड़े-पाएहतान से मुसकराते हुए बोले-भोजन न मनाना । लाला घासीराम की पतोह ने विरली मार डाली। प्रायश्चित्त होगा, पकवानों पर दाथ लगेगा। परिहत परमसुख चौरे छोटे-से मोटे से, श्रादमी थे। लम्बाई चार फ्रीट दस इन्च, और तोंद पा घेरा अठ्ठावन इच्च । चेहरा गोल मटोल, मछ बड़ी पड़ी, रंग गोरा, चोटी कमर तक पहुँचती हुई। कहा जाता है कि मथुरा में जब पसेरी खुराकवाले पण्डितों को हूँढा नाता था तो पण्डित परमसुखजी को इस लीस्ट में प्रथम स्थान दिया नाता था। . परिहत परमसुख पहुँचे, और कोरम पूरा हुा । पचाइत बैठी-सासजी, मिसरानी, किसनू की मा, छन्नू की दादी और पण्डित परमसुख । बाकी स्त्रियो बहू से सहानुभूति प्रकट कर रही थी। किसनू की मा ने कहा-पण्डितजी, बिल्ली की हत्या करने से कौन नरक मिलता है। wo . १५२] गल्प समुच्चय पण्डित परमसुख ने पना देखते हुए कहा-बिल्ली की हत्या अवेले से तो नरक का नाम नहीं बतलाया जा सकता, वह महूरत मी जब मालूम हो जाय नय बिल्ली की हत्या हुई तब नरक का पता लग सकता है। 'यह कोई सात बजे सुबह-मिसरानीजी ने कहा। पण्डित परमसुख ने पन्ने के पन्ने उलटे, अक्षरों पर उँगलियां चलाई मध्ये पर हाथ लगाया और कुछ साचा । चेहरे पर धुंधलापन पाया। माथे पर पल पड़े, नाक छ सिकुड़ी और स्वर गम्भीर हो गया, हरे कृष्ण । हरे कृष्ण ! बड़ा बुरा हुश्रा, प्रात काल बाहा मुहूर्त में बिल्ली की हत्या ! पोर कुम्भीपाफ नरक का विधान ! रामू की मा, यह तो बड़ा बुरा हुआ। रामू की मा की आँखों में प्रारा गये तो फिर पण्डितजी, अब क्या होगा, आप ही बतलायें। पण्डित परमसुख मुस्कराये-रामू की मा, चिन्ता की कौन सी बात है, हम पुरोहित फिर कौन दिन के लिए हैं ? शास्त्रों में प्रायश्चित्त का विधान है, खो प्रायश्चित से सब कुछ ठीक हो जायगा । राम की मा ने कहा-पण्डितजी, उसी लिए तो श्रापको बुलवाया था, श्रम आगे बतलानो कि क्या किया जाय ! 'किया क्या जाय-यही एक सोने की दिल्ली बनवाकर बहू से दान करवा दी जाय-जब तक बिल्ली न दे दी नायगी तब तक तो घर अपवित्र रहेगा, दिल्ली दान देने के बाद एस्कीस दिन का पाठ हो जाय ।' छन्नू की दादी-हो, और क्या, पण्डितजी तो ठीक कहते हैं, बिल्ली अभी दान दे दी जाय और पाठ फिर हो जाय । राम की मा ने कहा-तो पण्डितजी कितने तोले की बिल्ली बनवाई जाय। परिहत परमसुख मुस्कराये, अपनी नोंद पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा-बिल्ली कितो तोले को बनपाई जाय ? अरे राम की मा, शास्त्रों में तो लिखा है कि दिल्ली के वजन भर सोने की दिल्ली बनवाई जाय । लेकिन श्रय कलियुग श्रा गया है, धर्म-कर्म का नाश गया है, श्रद्धा नहीं रही। सो रामू की मा, दिल्ली के तौल भर की बिल्ली तो क्या बनेगी, क्योंकि - .

प्रायश्चित्त [ १५३ बिल्ली बीस इक्कीस सेर से कम की क्या होगी, हो, कम से कम एक्कीस तोले की चिल्ली बनवा के दान करवा दो, और श्रागे तो अपनी अपनी श्रद्धा राम की मा ने श्रास फाडकर पण्डित परमसुख को देसा -अरे बाप रे । एक्कीस तोला सोना ! पण्डितजी, यह तो बहुत है, तोला भर की बिल्ली से काम निकलेगा। परिडत परमसुख हँस पड़े-राम की मा ! एक तोला सोने की बिल्ली! अरे रुपये का लोभ यहू से बढ गया ? बहू के सिर बड़ा पाप है-इसमें इतना लोभ ठीक नहीं। मोल-तोल शुरू हुआ और माममा ग्यारह तोले की दिल्ली पर ठीक हो गया। इसके बाद पूजा पाठ की बात श्राई । पण्डित परमसुख ने कहा-उसमें क्या मुश्किल है, हम लोग किस दिन के लिए हैं। रामू की मा, मैं पाठ कर दिया करूंगा, पूजा की सामग्री आप हमारे घर भिजवा देना। 'पूजा का सामान कितना लगेगा। 'अरे कम से कम सामान में हम पूजा कर देंगे दान के लिए करीब दस मन गेहूँ, एक मन चावल, एक मन दाल, मन भर तिल, पाच मन जी और पांच मन चना, चार पसेरी घो, और मन भर नमक भी लगेगा। बस इतने से काम चल जायगा ।' 'अरे बाप रे ! इतना सामान, पण्डितजी, इसमें तो सौ डेढ़-सौ रुपया ख़र्च हो जायगा।-रामू की मा ने रुग्रासी होकर पहा । "फिर इससे कम में तो काम न चलेगा। बिल्ली की हत्या कितना बड़ा पाप है, गम् की मा ! खर्च को देखते वक पहिले बहू के पाप को तो देख लो! यह तो प्रायश्चित है, कोई हँसी खेल थोडे ही है- और जैसी जिसकी मरजादा, प्रायश्चित्त में उसे वैसा सर्च भी करना पड़ता है । श्राप लाग कोई ऐसे वैसे थोडे है, अरे सौ डेढ सौ रुपया आप लोग रे हाथ का मैल है।' पण्डित परमसुख की बात से पच प्रभावित हुए, किसन को मा ने कहा- १५४ ] गल्प समुच्चय पण्डितजी ठोक तो कहते हैं, बिल्ली की हत्या कोई ऐसा पैसा पाप तो है नहीं-बड़े पाप के लिए बड़ा सर्च भी चाहिए । हनू की दादी ने कहा-और नहीं तो क्या, दान पुल से ही पाप कटते है। दान पुत्र में किफ़ायत ठीक नहीं। मिसरानी ने कहा-और फिर माजी, श्राप लोग बडे श्रादमी ठहरे। इतना सर्च कौन श्राप लोगों को श्रसरेगा। रामू को मा ने अपने चारों ओर देखा-सभी पच पण्डितनी रे साथ। पण्डित परमसुपजी मुसकरा रहे थे। उन्होंने कहा-राम की मा, एक तरफ तो पर के लिए पुमीपाक नरक है और दूसरी तरफ तुम्हारे जिम्मे योठा मा सर्च है। सो उससे मुंह न मोड़ो। एक ठढी सस लेते हुए रामू को मा ने कहा, अब तो जो नाच नचायोगे, नाचना ही पड़ेगा। पण्डित परमसुख जरा कुछ विगहकर बोले-राम की मा । यह तो खुशी की बात है, अगर तुम्हें यह श्रखरता है तो न फरो-मैं चला। इतना कहकर पण्डितजी ने पोथी-पना बटोरा। 'अरे पण्डितजी, रामू की मा को कुछ नहीं अखरता-चेचारी को किराना दुख है-निगड़ो न ।'-मिसरानी, छन्नू की दादी और किसा की मा ने एक घर में कहा । राम की मा ने पण्डितजी के पैर पकडे-और परिडतजी ने अब जमकर श्रासन जमाया। 'और क्या हो "एकोस दिन के पाठ के एकोस रुपये और एकोस दिन तक दोनों बखत पाच-पांच माहाणों को भोजन करवाना पड़ेगा। कुछ रुककर पण्डित परमसुख ने कहा-सो इसकी चिन्ता न करो, मैं अकेले दोनों समय भोजन कर लूंगा और मेरे अकेले भोजन करने से पांच ब्राह्मण के भोजन का फल मिल जायगा। 'यह तो पण्डितनी ठीक कहते हैं, पण्डितजी की तोद तो देखी-- मिस- रानी ने मुसकराते हुए पापाजी पर व्यग किया । । ।

प्रायश्चित्त [१५५ 'अच्छा तो फिर मायश्चित्त का प्रबन्ध करवाओ रामू की मा, ग्यारह तोला सोना निकालो, मैं उसकी बिल्ली बनवा लाऊँ-दो घण्टे में मैं बनवाकर लौ, गा तब तक सब पूजा का प्रबन्ध कर रखो-और देखो, पूजा के लिए पण्डितजी की बात खतम भी न हुई थी कि महरी शंफती हुई कमरे में घुस आई और सब लोग चौंक उठे। गभू की माने घबड़ाकर कहा- श्ररी क्या हुयारी महरी ने लड़खड़ाते स्वर में कहा~माजी, बिल्ली तो उठकर भाग गई। " श्रीमती कमलादेवी चौधरी हिन्दी की कहानी रेसिकाओं में श्रीमती कमलादेवी चौधरी का स्थान अद्वितीय है। उनकी कहानियों की स्वाभाविकना , भाषा को भोजस्विता , चरित्रों का मार्मिक चित्रण एवं उनकी सभी कहानियों में महतो एक नारी के हृदय को ममता उनके विशेष गुण है। इतने गुणों के साथ सभव न था कि वे एक प्रथम श्रेणी को यहानी- लेखिका न होती। उनकी कला का यद प्रस्तुत कहानी उचित प्रतिनिधित्व करती है। भापकी कहानियों के दो सप्रह 'उन्माद' और 'पिकनिक' प्रकाशित हो चुके हैं। स्वप्न - 'महामाजी, सुरीला की जीवन नौका को पतवार श्रय में प्रापरे हापों में देता हूँ। धारको कृपा पे सिवा स बार में इस दुखिया के लिए दूसरा शान्ति का साधन नहीं है।' 'प्रपनी एकमात्र कन्या को अपने समीप न रखकर श्रापम में छोड़ने के के लिए विकल क्यों हो महात्माजी, कभी आप मेरे मित्र ये, मेरी गिदगो श्राप से छिपी नही है। श्राप महान आत्मा हो , आपने अपने जीवन में पोर परिवर्तन कर लिया है। आज तपस्वी हो। किन्तु मैं-मैं जो प्राज से बीस वर्ष पहले था, बिलकुल वही हूँ। फेरल इतना अन्तर हुआ है कि जिस दिन से सुरीला विधवा हुई है, मुझे अपो दुर्व्यसन नरकाग्नि फे समान जना रहे हैं। 'महात्माजी, मैं मानीच हूँ, पापी हूँ, दुराचारी हूँ, व्यभिचारी है, किंतु मेरी पुत्री मुरीला देवी है, लदमी है, पवित्रता को प्रतिमा है। गुरुदेव, उस पर दया करा । मुझे भय है कि मुझ पामर के दुर्व्यसना का प्रभाव कही उसके पुनीत विचारों को दूषित न कर दे। अब तक पा पूर्णत समार के समर्ग में नही पाई है, यह करि है, और किसी और लोक में विचरण करती रहती है , कि तु यौवन का विकास उसे इस पापी सहार से परिचित करा दे रहेगा। देव, उसकी पवित्रता की रक्षा करो । वह विधवा है । मैं उसका पतित पिता उसकी आत्मोनति का इच्छुक हूँ। मेरी अतिम अभिलाषा है, मेरी देवी समान पुत्री देवी ही बनकर रहै।" महात्मा ने सुरीला को अाश्रम में रखना स्वीकार कर लिया। x x x महात्मा कमी । उनकी स्त्री लक्ष्मी ने अन्तिम समय में कहा या दूसरा विवाह न करना, वरना मेरे बच्चों की दुर्गति हो जायगी । दूसरी मा प्यार के बदले इनसे फ़र काल ने लक्ष्मी को अपना धास्य पूरा नहीं करने दिया, किन्तु यह अधूरा वाक्य हो वैरिस्टर दोदित के इदय पर अमर छाप डाल गया। लक्ष्मी . १५८ ] गल्प-समुच्चय की उन्मीलित प्रसेिं जाने कैसो व्यथा छोड़ गई थीं, वे टूटते हुए शब्द विनय की ऐसी अनन्त सीमा का दिग्दर्शन करा गये थे कि वैरिस्टर दीक्षित ने अनेक विपत्तियों का सामना दिया, फिन्तु दूसरा विवाह नहीं किया। उस दिन से उनके कार्यक्रम में बच्चों का लालन पालन और मृत लक्ष्मी के चिन का पूजन सम्मिलित हो गया। स्त्री के देशवसान के समा बैरिस्टर दीक्षित नवयुवक ही थे। नवीन सभ्यता, पश्चिमीय शिक्षा और फैशनेविल सोसाइटी का रंग उनमें भी पूर्ण माना में व्याप्त था । और शायद उनके वे ही पूर्वसस्कार चेष्टा करने पर भी उनके मन को चलायमान करते थे। हमेशा उनके हृदय में देवासुर-सग्राम छिड़ा रहता। कितनी ही बार श्रादुरी वृत्तियों ने अपनी विजय घोषणा करने का निश्चय कर लिया, लेकिन लक्ष्मी की उन आँखों और शब्दा ने सदा उनकी रक्षा की। सयम के श्राराधना हेतु ना-जाति से सर्वथा दूर रहने का उन्होंने निश्चय किया । उनके कई मिन ऐसे थे, जिनकी स्त्रियों से भी उनकी काफी घनिष्ठता थी । लक्ष्मी की मृत्यु के बाद उन लोगों ने वैरिस्टर दीक्षित को पूर्ण सहानु- भृति के साथ बच्चों के लालन पालन में सहायता भी दो , किन्तु वैरिस्टर दाक्षित ने उन लोगों की सरा भी परवाह न करके उनसे मिलना-जुलना तक याद कर दिया। वे अपने चारों श्रोर के वायुमडल में अप स्त्री के नाम को भी स्थान देना नहीं चाहते थे। बच्चों को पालनेवाली पुरानी बाया से भी क६ दिया गया कि श्रय घर नानो तुम्हारी पेशन प्रतिमास मनीश्रार्डर द्वारा पहुँचती रहेगी। इस मामले में बैरिस्टर दीक्षित ने न पाया के शीशों की चिन्ता की, न बच्चों के मान- सिक क्लेश की। हां, बच्चों को स्वतन्त्रता थी कि जब इच्छा हो, प्राया के पर जाकर उससे मिल पाया करें। उनके अन्य धर्मचारियों में जो सपत्नीक थे, उनके वेतन में वृद्धि के साथ उन्हें श्राशा हुई कि अलग घर लेकर अपने परिवार को रखें। यहाँ तक कि बैरिस्टर साहब ने किसी स्त्री-मुवक्किल का पेस भी लेना छोड़ दिया। अपनी कन्या सुनीता से बोडिङ्ग हाउस में मिलने तक न जाते, [१५९ क्योंकि मुरय अध्यापिका से मुलाकात किये बिना लड़कियों में मिल सकना बोर्डिङ्ग हाउस के नियमानुसार सम्भव नहीं था। छुट्टियों में सुनीता का बड़ा भाई उसे लिया लाता, तभी पिता पुनी एक दूसरे को देख सकते थे इस प्रकार अनेक कठिन नियमों के श्रावरण में वे अपने को छिपाकर रखने लगे। X x x बैरिस्टर दीक्षित अपने साथ इतनी रानी करो पर भी मानसिक सयम न रख पाते। हर समय मानसिक भारनामों के साथ उनको घोर युद्ध करना पड़ता। दिन भर किसी प्रकार विभिन्न कार्यों में चित्त को उलझाये रखते , गत में गीता पाठ के साथ निद्रादेवी का श्राहान करते, फिर भी स्वप्न में अतीतकाल के हास विलास के दृश्य अपनी छाया डाल हो जाते । श्यामाचरण कील के यहाँ पार्टी है। कैलाशविहारी प्राग्रा की स्त्री रागिणी श्राज कैसी सज धजकर पाई है । रागिणी के रूप को बराबरी करने बाली फेशनेबिल स्त्री जगत में दूसरी नहीं है । घानी साडी मुख पर कैसी खिन रही है। ऐसे स्वप्न उनके चित्त को उद्विग्न कर जाने । बैरिस्टर माहय प्राधिस में कानून का अध्ययन कर रहे हैं, और बाहर बराएढे में कोई नया मुवक्किन मुइरिर मे गुफ्तगू करता है, तो बैरिस्टर साहब की नितेरी कल्पना सब कुछ भुलाकर स्त्री का विा उनके सम्मुख खींचती । कोइ सफेद साड़ी पहने विधा होगी। पति को सम्पत्ति पर किसी ने अधिकार कर लिया होगा और अब रोटी देना भी अस्वीकार करता होगा। लाचार मुकदमे की बात सोचकर श्राइ है। भनि से भी स्त्री प्रतीत होती है, सकोच से धीरे धीरे बोल रही है। महरि के द्वारा मराविरा तो दे दूंगा, कि तु केस अग्ने हाथ में नहीं लूंगा । उसो समय मुहर्रिर कमरे में आता, बैरिस्टर साहब को निमग्नता में बाधा पड़ती वे कुछ कम्पित हृदय से फ्लनानुसार सुनने की प्रतीक्षा करते। मुहरिर कहना-माहा छदम्मीचाल नामक एक मुस्किल पाया है। लज्जा और ग्नानि से चित्त च चन दो उठना । वे सोचवे--यह क्या है। पहले तो मेरी मानसिक स्थिति ऐसो दुर्वन नहीं थी। कुप्रवृत्तियों के १६० ] गल्प-समुख्य पराजित करने के साधन उल्टे मुझे ही पराजित कर रहे हैं और मानसिक उन्नति के मार्ग से विमुख करके पतन के मार्ग की ओर अकृष्ट घरते हैं। क्या उपाय करूँ भगवान् X x x पुरा पुगियों रे वर्तव्य से निवृत्त होकर पैरिस्टर दीक्षित ने सन्यास ले लिया। हिमालय की पहाड़ियों में भ्रमण करते हुए एक पहुँचे हुए महात्मा से उनका साक्षात् हुना। उसी दिन वे उनके शिष्य हो गये। महात्मा वास्तव में एक दिव्य पुरुष थे। ससार से विरक्त होकर वर्षों उन्होंने कठिन तपस्या की थी। बहुत दिनों तक मानव समाज से परे भयानक जगनों और दुर्गम पहाड़ों में विचरण करते रहे थे , किन्तु अपनी सावना को सफलीभत करके प्ररि मानव समाज के उपकार की कामना मे इस और 'या गये थे। योगिराज की इच्छा एक श्राश्रम ननाो की थी, जिससे भटकते हुए प्राणियो का शान्ति 'पौर अध्यात्मवाद का अध्ययन करने का अवसर मिले , साथ ही निर्धनों के लिए वे एक चिकित्सालय मी बोला चाहते थे। उन्हें अनेक सजीवनी जड़ी बूटियों का शान था। बैरिस्टर दीक्षित ने अपनी सम्पत्ति का आधा भाग देकर योगिराज की इच्छा पूरी की और स्वय भी उनके साथ श्राश्रम में रहकर सेवा और उपा सना में तन्मय हो गये। योगिरान की कृपादृष्टि से उन्हें पूर्ण शान्ति भी प्राप्त हुई, और घोडे ही दिनों में कठिन अभ्यास और तपस्या के द्वारा वे एक महान तपस्वी पन गये। योगिराज के अनेक शिष्यो में बैरिस्टर दीक्षित का स्थान सर्वप्रथम था। चारों ओर उनकी ख्याति पल रही थी। उनपर भी लोगों की श्रद्धा भक्ति उनके गुरु से कम न थी। योगिराज के शरीर छोड़ देने पर ग्राश्रम में गुरुदेव के पद पे योग्य वैरिस्टर दीक्षित को ही साझा और उसी दिन से उन्हें महात्मा की पदवी भी मिल गई। अब वे वैरिस्टर दीक्षित नहीं, एक प्रसिद्ध महात्मा * * सुगला को ग्राश्रम की सीढियों पर बिठाकर उसके पिता गुरुदेव के - । स्वप्न [१६१ दर्शन करने गये थे। सुरीला सुदूर तक गंगा की उज्ज्वल जलधारा का अवलोकन करती हुई अपने विचारों में निमग्न पी-पिता मुझे सन्यास लियाना चाहते हैं, कहते हैं, इन मामा की कग से मुझे कृष्ण भगान् के दर्शन हो जायँगे, मुझे शान्ति मिलेगी। जिन नट नागर के स्वप्न में अपनी कविताओं में अकित परती रहती हूँ, उनके दर्शन पाने से बढ़कर और क्या सौमाग्य हो सकता है, किन्तु पिता से मिलग होना भी ता पासान नहीं है। और प्रपोपदर प्रशान्ति तो मुझे कुछ प्रतीत होती नहीं । लोग मुझे दुसिया समझकर मुझपर करुणा वा गाव दिग्वलाते है, मेरे दुख पर श्रास् दाने हैं, पर मैं तो बहुत मुरी हूँ। पिता मुझे कितना प्यार परते हैं। मेरे मा नहीं है, माई यहन भी नहीं है, मैं अली हूँ , लेकिन यह अपेलापन अब तक ता कुछ शतरता नहीं है । किसने तो काम है, मुझे यह सोचने की फुसत ही कर मिनती है कि मैं अकेली हूँ। पति पे मैने दशन ही नरी किये। कभी कभी मन दुखी वश होने लगता है। मेरा रिवाह पिता ने इतनी छोटी उम्र में क्यों कर दिया ! विलायत गावे समय पतिदेव मुझसे मिलने श्राये थे, पर लजावश उनरे समीप गइ ही नहीं। वे नाराज होकर प्रात ही चले गये, और विदेश की में उनकी मृत्यु हो गई । यह खयाल अवश्य हृदय को ठेस पहुंचाता है। पिता को छोडकर यहाँ कैसे रहूँगी ? यह आश्रम तो मेरे घर जैसा भी नहीं है । गङ्गा का किनारा होने से कुछ सुहावना अवश्य जान पड़ता है। मुझे पहा फुजयारी लगाने का कहा मिलेगी ! करिताएँ भी शायद ही लिख स । महात्मा की प्राशा पर ही तो चलना होगा न ! और फिर पिताजी को कितना कष्ट होगा ! अधियाले ही चाय पीते हैं । कोई नौकर भी इतना सबेरे न उठ सकेगा। और मेरी मैना मुझे न देखकर व्याकुल हो जायगी। मदनगौर बिना मेरे खिलाये श्राधा चारा भी नहीं खामगा। कहीं नौकरों ने सध्या समय कबूतरों को बन्द न किया तो उन्हें दिल्ली खा जायगी। मेरे पीछे मेरी फुलवारी उजड जायगी । मेरी गरी चिड़ियां मर - १६२ ] गल्प-समुख्य , करेंगे। परमात्मा जायेंगी। मिसरानी के बनाये खाने से पिताजी या पेट भी नहीं भरेगा। वे और भी दुबले हो जायेंगे, खाँसी भी पट जायगी। सम्भव है, हर समय शराब पी पीवे रहें। अभी तो मैं बहुत देर तक उन्हें बातों में लगा लेती हूँ, ताश खेलती हूँ, गाना मुनाती हूँ और सध्या को विष्टियासाने की सैर कराती हूँ। फिर सध्या से ही बोतल लेकर बैठ जाया क्या होगा? मैं तो चुपके से शराब में पानी मिला देती हूँ, मेरे पीछे पालिस शराब की पूरी योतल ही पी गये, तो फिर मुँह से सून गिरने लगेगा। कुछ भी हो, मैं यहां नहीं रहूँगी । मेरे पिता शराब पीते हैं, तो क्या हुया ! उनके बराबर मेरे लिए कौन हो सकता है ? कौन मुझे वैसा प्यार करेगा ? मैं यहां किसी प्रकार भी नहीं रहूँगी, किन्तु पिता को कैसे समझाऊँ, वे नाराज हो जायेंगे | साचते सोचते सुरीला के सुन्दर नेत्रों से बडे बड़े मोता जेसे आंसू टपकने लगे। महात्मा का शिष्य शेसर स्नान करके पा रहा था । दूर से सुरीला उसे श्वेत संगमरमर की प्रतिमा मी जान पडी। सीटी पर वर ठिठक गया--कोई दुखिया है, रो रही है। उसने मीठी वाणी से पूछा-देवी, रोती क्यों हो? क्या में तुम्हारी कुछ स्वा कर सकता हूँ ! सुरीला पुरुषों के ससर्ग में नहीं रही थी, लेकिा प्रकृति से ही वह निर्भीक थी। लजाफे वातावरण में वह पड़ी ही न थी। उसने पालकों की भांति प्रासू पोंछते हुए पूछा-तुम महात्मा के पुन हो? 'मैं महात्माजी का शिष्य हूँ। वे मुझपर पुत्र की भाति ही स्नेह करते हैं। 'तो तुम कुछ न कर सकोगे, इसी श्राश्रम के होन" 'श्राश्रमवासी होने से क्या हुश्रा ! कुछ कहो भी तो। सम्भव है, मैं तुम्हारा कुत्र उपकार कर सकें । हम लोगा का ध्येय ही तो परोपकार है ।' सुरीला ने क्षण भर पहले सोची हुई सारी बातें शेखर को सुना दी, और बोली --क्या अब तुम मेरे पिता से सिफारिश कर सकोगे। यो तो मेरे पिता मेरी प्रत्येक इच्छा पूरी करते हैं। मगर उनका विचार जम गया है कि इस श्राश्रम में रहने से मेरा कल्याण होगा।

स्वप्न [१६३ शेतर ने अत्यत मधुर शन्दों में सुरीला के पिता के विचारो का सम- र्थन किया और अनेक प्रकार से सान्त्वना देते हुए उससे कहा-इसमें क्या हर्ज है। पिता के अाशानुसार कुछ दिन यहाँ रह देखो। यदि मन न लगे तो चलो जाना । यहाँ पिसी प्रकार का वधन थोड़े ही है। तुम्हारी स्वतनता में भी पाधा नहीं पड़ेगी। अपने इच्छानुसार कविता भी कर सकागी, फुल- वारी में विचरण भी कर सकोगी। यहाँ शिक्षा श्रादि के अनेक साधन हैं। चलो, तुम्हें वहां का पुस्तकालय, और चित्रशाला दिखा लाऊँ। वहाँ तुम चिपकला, चिकित्सा, सगीत कला श्रादि का भी अध्ययन कर सकता हो । सुरीना को यह जानकर बहुत सान्त्वना मिली कि शेखर भी कवि है। वहा उसे सहानुभूति भी मिल सकती है। शेखर शब्दों में जाने कैसी मोहनी थी कि सुरीला प्राश्रम में रहने को तैयार हो गई। पिता शीम शीघ्र पाने का वादा करके चले गये। * सुरीला और शेसर में मित्रता हो गई। श्राश्रम में स्त्री पुरुष के परस्पर मिशने- जुलने के लिए काइ लास नियम नहीं था । सबका पूर्ण स्वतन्त्रता थी। दोनों प्राश्रम के कार्य, पूना उपासना श्रादि मे निवृत्त होकर कलकल नादिनी गगा के तट पर बैठकर कविता लिखते, मी वार्तालाप करते और कमो अध्यात्म- वाद का विषय लेकर वाद विवाद करते। दोनों रे विचारों में किसी प्रकार की अपवित्रता नहीं थी। वे यथाशक्ति गुरुदेव के मताये मार्ग पर चलते । गुरु के उपदेशानुसार ही प्रध्ययन, उपासना तथा अन्याय करत । किन्तु गुरु को यह मैत्री म्वटको। एक नवयुवक और नवयुवती का इस प्रकार हर समय का साथ, एक का दूसरे के प्रति इतना अनुराग, उचित नहीं है। सयम में विन्न पड़ सकता है। शेखर श्रमी अभ्यास ही कर रहा है, तपस्यों नहीं बन पाया है, और मुरीला को तो श्राश्रम में प्रविष्ट हुए अभी कुछ ही दिन हुए हैं। गुरुदेव ने अपने ये विचार किसी पर प्रकट तो नहीं किये, पर इन दोनों पर कड़ी दृष्टि रखना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने शेखर से कहा-पुन, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। भगवान् तुम पर शीघ्र प्रसन्न होंगे। अब वह समय आ गया है कि तुम कुछ दिनों तक - १६४] गल्प-समुञ्चय एकान्तवास में तपस्या करो। एक सप्ताह बाद तुम्हें एक पहाड़ की कन्दरा में जाना होगा। शेखर ने मस्तक नत करके गुरुदेव की श्राचा स्वीकार की। गुरु ने सुरीला का स्थान नीचे से बदलकर छत पर अपने कमरे के समीप एक स्थान दे दिया। सुरीला के मन में शका हुई-क्या गुरु मेरे ऊपर सन्देह करते हैं :- किन्तु उसने स्वयं ही अपने विचार की निन्दा की और गुरु को श्रद्धा-भक्ति में किसी प्रकार का अन्तर नहीं थाने दिया । उस दिन रजनी दुग्ध-स्नान पर रही थी। उसके शरीर से दुग्ध धारा ने वरकर सार। प्रकृ त को श्वेत बना दिया था। उसी श्वेत वातावरण में हरी सुकोमल शय्या पर बैठे सुरीला और शेखर वार्तालाप कर रहे थे। शेखर ने कहा-सुरीला, गुरुदेव की श्राज्ञा से अब मैं एक मास के लिए एकान्तवास करने जाऊँगा। सुरीला पर वनगत हुप्रा । उमे ऐसा जान पड़ा, मानो हृदय की धड़- कन बन्द हुई जाती है। वेदना उसके हृदय को मसलने लगी। वह भयभीत हिरणी की नाई छलकते श्रासुत्रों से शेखर का मुंह निहारती रह गई। सुरीला की यह दशा देखकर शेखर का मन भी जाने कैसा होने लगा, शिन्तु उन्हाने हृदय को दृढ करके पहा-घराती क्यों हो? शान्ति से चित्त को एकाग्र करके रहो । गुरु के उपदेशों पर मनन करना, तुम्हारा चित्त साव धान हो जायगा। सुरीला ने कहा शेखर, तुम चले जानोगे, तो मैं किसी प्रकार भी यहाँ न रह सकेंगी। मुझे पिता के यहां पहुंचा दो। 'मी, सुरीला, इतने दिनों के अभ्यास को इस प्रकार न तोड़ो। मैं गुरु. देव मे प्रार्थना करूँगा कि वे अब तुम्हें अधिक समय दें। गुरु के उपदेशों से तुम्हे शान्ति मिलेगी। घराफर सुरीला ने कहा-नहीं, शेसर ऐसा न करना, बल्कि गुरु से कहो, मुझे भी एकान्तवास की बाग दें 'ऐसा तो नहीं हो सकेगा, भुरीला | गुरुदेव तुम्हें एकान्तवास में जाने की आशा नहीं देंगे। अभी तुम उस कठिन तपस्या में सफल न हो सकोगी।' ।

" स्वप्न [१६५ 'तो शेनर, मैं यहां नहीं रहूँगी। मुझे क्षमा करना शेखर, गुरु से मुझे एक प्रकार का मर लगता है। उनसे अधिक मुझे तुमपर योच ही में बात काटकर शेसर ने साडना के शब्दों में कहा-कैसी पातें करती हो सुरीला ! गुरुदेव पर भक्ति करा। कापते हुए स्वर से मुरीला ने कश-शेपर, मैंने अनेक बार देखा है, गुरु छिपार हम दो की बातें सुनते हैं। 'तो दोष क्या है ? हम लोगों पर दृष्टि रखना गुरु का कर्तव्य है।' मिसकते हुए सुरीला योनी-इतना ही नहीं, शेखर, राति में मुझे कर बार शुपहा प्रा, विवाह की दरान में से कोई मेरे कमरे में झांका है। तुमने जो अपना चित्र बनाकर मुझे दिया था, वह मेरे कमरे से कोई चुराकर ले गया। मुझे यद काम गुरु का ही जान पड़ता है। मैं यहाँ नहीं रहूँगी, या फिर तुम कुन दिनों याद जाना । सुरीला सिराफ सिछककर रोने लगी। क्षण भर मौन रहने के बाद उसने शेखर से कहा-शेपर, मेरा मन तुमसे भय नहीं खाता। इस सरलता पर शेखर हँस दिया । और इस समय इस प्रसग को भुलाने के लिए उसने कहा-श्रानो, कुछ देर रामायण का पाठ करें। x x x सुरीला रामायण गाने लगी। शेम्वर पाधा लेटा हुआ सुनने लगा। पुष्पवाटिका का मनोरम प्रसा चल रहा था। दोनों तुरासीदास के भक्ति रस का स्वाद ले रहे थे, बिलकुल रामायण में तन्मय थे। और गुरु १ गुरु छत की खिड़की पर आधी रात में दोनों के बीच का भेद लेने बैठे थे। जाग्रत अवस्था में ही गुरु को स्वप्न सा भान हुभ-यह सुरीला किननी सुन्दर है, मानो सौन्दय स्वय देवीरूप में प्रकट हुआ है। रागिणी का रूप इसकी छाया के बराबर भी न था। गुरु चौंर पड़े। श्राज वर्षों बाद अतीत काल की स्मृति क्यों हिलोरें लेने लगी? 'हरि ओ३म्' उच्चारण करके गुरु ने श्राकाश पर हंसते हुए चन्द्रमा को देखा और फिर क्षितिज पर बैठी हुई सुरीला पर दृष्टि डाली। उन्हें ऐसा जान पड़ा, मानो चन्द्रमा का कुछ भाग टूटकर सुरीला बन गया है । उहें , १६६ ] गल्प-समुच्चय प्रतीत होने लगा कि भगवान ने प्रसन्न होकर उ है दिव्य दृष्टि प्रदान की है। सुरीला चन्द्रमा का अश ही नहीं, रामायण की सीता मी है, विष्णु को लक्ष्मी भी है, कृष्ण की राधिका भी है और कामदेव की सौन्दयवती रति भी है। गुरु येसुध होकर, भक्तिसागर में सूपकर, राधा, लक्ष्मी, सीता के दर्शना मृत का पान करने लगे। इस समाधिस्थ अवस्था में कितना समय व्यतीत हो गया, गुफ जान ही न सके | कुक्कुट ने मदमाती बाग से ऊपा के प्रागमन की सूचना दी, तो शेसर ने कहा-सुरीला, उठो, पान आमम की धुलाई करने की हम लोगों की पारी है। मैं पानी लाता है, तुम चनकर पहले गुरुदेव का कमरा भाड़ दो। गुरु खिड़की पर सर रखे निद्रा में निमग्न थे। यह समय तो उनका वायु-सेवन के लिए श्राश्रम से बाहर जाने का है। सुरीला झाडू लिये गुरु के जागने की प्रतीक्षा में द्वार पर सड़ी रही। गुरु मनोरजक स्वप्न देख रहे थे-दावन विना वन मे चन्द्रदेव पूर्ण कलाओं से शोभायमान हैं। मनोमुग्धकारी रजतचन्द्रिका विपिन को सौरभ दान कर रही है, और उसी विमल चादनी की शय्या पर सौ चन्द्रमा की कान्ति को लज्जित करनेवाले भगवान कृष्ण दाहने कर में मुरलिका लिये नृत्य कर रहे हैं, और उनके बायें 'पार्श्व में प्रियतमा राधिका शोमा पा रही है। अनेक देवताओं के साथ गुरु भी विमान पर बैठे पुष्प वर्षा कर रहे हैं। भक्तवत्सल भगवान् कृष्ण ने मुरलिका ऊपर उठाकर गुरु को समीप माने का सक्त किया। भक्ति में उन्मत्त होकर गुरु विमान से कूद पडे पीर भग वान् ने उन्हें अपने में लीन कर लिया। अब भगवान् कृष्ण और गुरु जुदा नहीं थे। फिर एक बार राधिका के मुख पर दृष्टि डालकर मुरलीमनोहर ने कहा- प्रिये, ससार में तुम सुरीला थी और में महात्मा था। अभी मृत्युलोक में फिर चलकर प्राणियों का उद्धार करना है। इतना कहकर भगवान् पूर्ण गति से नृत्य करने लगे। रासलीला समाप्त स्वप्न [१६७ कर वे राधिका को लेकर फिर ससार में चले श्राये। अभी पृथ्वी का पूर्णो द्धार नहीं हुया था। राधिका बोली-प्राणेश, क्या मुझे अभी और बिलग रहना होगा? इस बार की जुदाई तो सीता वनवास से भी अधिक हो गई, देव । कृष्ण ने राधिका को श्रालिगन कर लिया और बोले-नहीं प्रिये, श्रब हम तुम साथ रहकर ही पृथ्वी का उद्धार करेंगे। जागकर भी गुरु का चेतना नहीं हुई। उन्मत्त की भाति सुरीला का हाथ पकडकर बोले-राधिका, प्रिये ! सुरीला गुरु का हाथ झटककर चीखती हुई भागी-मुझे बचानो, शेखर ! शेखर जल की बाल्टी लेकर सीढियां पार कर चुका था। यह दृश्य देख कर अप्रतिम सा रह गया। उसी समय मुरीला बिजली की भांति टूटकर उसरे पैरों के समीप गिर पड़ी । बाल्टी की कोर माये में भुक गई और सून की धार बह निकली। बेसुध सी सुरीला को गोद में लेकर शेखर श्राश्रम से बाहर हो गया। सारे आश्रम में कोलाहल मच गया। घटना का पता लगाने के लिए ग्राश्रम- वासी गुरु के समीप गये , लेकिन दरवाजे बन्द थे। सयों ने समझा, गुरु समाधि म है । शेखर ने बिना कुछ कहे ही साथियों से विदा मांग ली। * ४ * पिता से चिमटकर सुरीला सूब रोई । पिता भी रोने लगे। 'अच्छा किया, मा गई सुरीज्ञा ! अब मेरा अन्तिम समय निकट जान पड़ता है। बात करते-करते उनके मुँह से लाल लाल रक वह लगा। शेखर उपचार में लग गया। सुरीला और भी बिलख उठी-मुम अपने से जुदा करके तुमने अपनी मा गति कर ली सिताजी! * नौकर ने शेखर के नाम एक पन लाकर दिया-- 'शेखर, सुरीना ने मेरी बासें खोल दी। मैं भ्रम में था। जिसे अब १६६] गरपन्समुच्चय प्रतीत होने लगा कि भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की है। सुरीला चन्द्रमा का अश ही नहीं, रामायण की सीता भी है, विष्णु की लक्ष्मी भी है, कृष्ण की राधिका भी है और कामदेव की सौन्दयवती रति भी है। गुरु येसुध होकर, भक्तियागर में दूधकर, राधा, नक्ष्मी, सीता के दर्शना मृत का पान करने लगे। इस समाधिस्थ अवस्था में कितना समय व्यतीत हो गया, गुरु जान दी न सके । कुक्कुट ने मदमाती बाग से उपा के प्रागमन की सूचना दी, तो शेखर ने कहा-सुरीला, उठो, प्राज आश्रम की धुलाई करने की हम लोगों की पारी है। मैं पानी लाता हूँ, तुम चलकर पहले गुरुदेव का कमरा झाड़ दो। गुरु सिड़की पर सर र निद्रा में निमग्न थे। यह समय तो उनका वायु सेवन के लिए श्राश्रम से बाहर जाने का है। सुरीला झालू लिये गुरु क जागने की प्रतीक्षा में द्वार पर खड़ी रही। गुरु मनोरजक स्वप्न देख रहे थे----गृन्दावन विजन वन में चन्द्रदेव पूर्ण कलात्रों से शोभायमान हैं। मनोमुग्धकारी रजतचन्द्रिका विपिन को सोरम दान कर रही है, और उसी विमल चादनी की शय्या पर सौ चन्द्रमा की कान्ति को लज्जित करनेवाले भगवान कृष्ण दाहने कर में मुरलिका लिये नृत्य कर रहे हैं, और उनके पायें पाव में प्रियतमा राधिका शोभा पा रही हैं। अनेक देवताओं के साथ गुरु भी विमान पर बैठे पुष्प वर्षा कर रहे हैं। भक्तवत्सल भगवान् कृष्ण मुरलिया ऊपर उठाकर गुरु को समीप आने का सक्त किया। भक्ति में उन्मत्त होकर गुरु विमान से कूद पड़े और भग यान् ने उन्हें अपने में लीन कर लिया। अव भगवान कृष्ण और गुरु जुदा नहीं थे। फिर एक बार राधिका के मुख पर दृष्टि डाल कर मुरलीमनोहर ने कहा- प्रिये, ससार में तुम सुरीला यी और मैं महात्मा था। अभी मृत्युलोक में फिर चलकर प्राणियों का उदार करना है। इतना कहकर भगवान् पूर्ण गति से नृत्य करने लगे। रासलीला समाप्त -- स्वप्न [१६७ कर वे राधिका को लेकर फिर ससार में चले आये। अभी पृथ्वी का पूर्णो द्वार नहीं हुया था। राधिका बोनी-प्राणेश, क्या मुझे अभी और विलग रहना होगा? इस यार की पुदाई तो सीता वनवास से भी अधिक हो गई, देव ! कृष्ण ने राधिका को श्रालिगन कर लिया और बोले-नहीं प्रिये, श्रम हम तुम साथ रहकर ही पृथ्वी का उद्धार करेंगे। जागकर भी गुरु की चेतना नहीं हुई। उ मत्त की भाति सुरीला का हाथ पकडकर बोले-राधिका, प्रिये ! सुरीला गुरु का हाथ झटककर चीखती हुई भागी~-मुझे बचानो, शेखर ! शेखर जल की बाल्टी लेकर मीडिया पार कर चुका था। यह दृश्य देस कर अप्रतिभ-सा रह गया। उसी समय सुरीला बिजली की भाँति टूटकर उसके पैर के समीप गिर पड़ी । बाल्टी की कोर माये में भुक गई और सून की धार बह निकली। वेसुध सी सुरीला को गोद में लेकर शेखर श्राश्रम से बाहर हो गया। सारे श्राश्रम में कोलाहल मच गया। घटना का पता लगाने के लिए श्राश्रम वासी गुरु के समीप गये , लेकिन दरवाजे बद थे। सबों ने समझा, गुरु समाधि में है । शेखर ने बिना कुछ कहे ही साथियों से विदा मांग ली * * पिता से चिमटकर सुरीला सूप राई । पिता भी रोने लग। 'अच्छा किया, श्रा गई सुरीशा ! अब मेरा अन्तिम समय निकट जान पड़ता है। बात करते-करते उनके मुँह से लाल लाल रक बहने लगा। शेखर उपचार में लग गया । सुरीला और भी बिलख उठी-मुम अपने से जुदा करके तुमने अपनी च्या गति कर लो पिताजी। 23 * नौकर ने शेखर के नाम एक पत्र लाकर दिया-- 'शेखर, सुरीला ने मेरी श्रा खोल दी। मैं भ्रम में था। जिसे अब १६८ ] गल्प-समुच्चय तक स्वप्न समझा था, वास्तव में हकीकत यी, और जिसे हकीकत समझी थी, वही स्वप्न था। मुझे अपने मार्ग का दिग्दर्शन अब हुा । मैं जावा हूँ और आश्रम का भार तुम दोनों पर छोडता हूँ। तुम सुरीला से विवाह कर लो, तुम्हारा कल्याण होगा। मानुषिक प्रेम द्वारा हो तुम्हें दिव्य प्रम का परिचय मिलेगा। प्रवृत्तियों के दमन करने से नहीं, बल्कि उन्हें प्राधात्मिक रूप में परिवर्तित करने से ही वास्तविक शान्ति की प्राति होगी। यही तुम्हारे गुरु का अन्तिम उपदेश है।'

श्रो 'अजेया श्रीसचिदानन्द होरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञ य' का जन्म एक बहुत ही प्रतिष्ठित एव सभ्रान्त ब्राह्मणकुल में १९११ ई. में हुआ। और जब पहले-पहल १९३२ में वे अपनी रचनाएँ लेकर हिन्दी ससार में प्रविष्ट हुए तो लोगों को उनकी मेधा और प्रतिभा पर भाश्वर्य हुआ। सचमुच हो श्रीअज्ञेय का हिन्दी ससार में आगमन एक विशेष घटना है। उनको प्रतिभा सवतोमुसो है-एक कवि, कहानी- लेसक, उपन्यास-लेसक, निग्ध लेसक, शिल्पी, चित्रकार सभी के रूप में वे बहुत ही सफल हैं । अग्रेजी पर भी अच्छा अधिकार है और अग्रेजी में बहुत-सी कविताएँ लिसी हैं। कहानियों के अन्दर आपके इतनी गहरी वेदना होती है जो किसी को हिलाये बिना नहीं रह सकती। आपका एक उप यास 'शेखर एक जीवनी, कहानिया के दो सग्रह 'विपथगा' और 'परपरा' और कविताओं के दो सग्रह 'भग्नदूत' और 'चिन्ता' प्रकाशित हो चुके हैं। ११ ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान् ने स्वप्न में दर्शन दिये, और कहा-शान, मैंने तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर ससार में मेजा है। उठो, ससार का पुनर्निर्माण करो। ज्ञान जाग पड़ा। उसने देखा, ससार अधिकार में पड़ा है। और मानवजाति उस अन्धकार में पथभ्रष्ट होकर विनाश की भोर यढती चली जा रही है। वह ईश्वर का प्रतिनिधि है, तो उसे मानव-जाति को पथ पर लाना होगा, अन्धकार से बाहर खींचना होगा, उसका नेता बनकर उसके शनु से युद्ध करना होगा। और वह जाकर चौराहे पर खड़ा हो गया और सबको सुनाकर कहने लगा-मैं मसाह हूँ, पैगम्बर हूँ। भगवान् का प्रतिनिधि हूँ ! मेरे पास तुम्हारे उद्धार के लिए एक सदेश है। लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। कुछ उसको श्रोर देवकर हँस पहते , कुछ कहते, पागल है , अधिकांश कहते, यह हमारे धर्म के विरुद्ध शिक्षा देता है, नास्तिक है, इसे मारो ! और बच्चे उसे पत्थर मारा करने । 3 है श्रातिर तग पाकर वह एक अंधेरी गली में छिपकर बैठ गया, और सोचने लगा। उसने निश्चय किया कि मानव जाति का सबसे बडा शनु धर्म, उसी से लाना होगा। तभी पास कही से उसने स्त्री के करुण कदन की श्रावान सुनी। उसने देसा, एक स्त्री भूमि पर लेटी है, उसके पास एक बहुत छोटा सा बचा पता है, जो या तो बेहोश हे या मर चुका है, क्योंकि उसके शरीर में किसी प्रकार की गति नहीं है। ज्ञान ने पूछा-यहन क्यों रोती हो। उस स्त्री ने कहा-मैं एक विधर्मी से विवाह किया था। जब लोगों को इसका पता चला, तब उन्होंने उसे मार डाला और मुझे निकाल दिया। मेरा मचा मी भय से मर रहा है।

शत्रु [१७१ शान का निश्चय और दृढ हो गया। उसने कहा- तुम मेरे साथ प्रायो, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। और उसे अपो साथ ले गया। शान ने धर्म के विरुद्ध प्रचार करना शुरू किया। उसने कहा-धम मूला पन्धन है । परमात्मा एक है, बाघ है और धर्म से परे है। धर्म हमें सीमा में रसवा है, रोकता है, परमात्मा से अलग रखता है, श्रत हमारा है। लेकिन किसी ने कहा-जो व्यक्ति पराई और बहिष्कृता औरत को अपने साथ रखता है, उसकी बात हम क्यों सुनेंवह समाज से पतित है, नीच है। तब लोगों ने उसे समाजव्युत कररे बाहर निकाल दिया। शान ने देखा कि धर्म से लड़ने के पहले समाज से लड़ना है। जब तक समाज पर विजय नहीं मिलती, तब तक धर्म का खण्डन नहीं हो सकता। तब वह इसी मकार प्रचार करने लगा-वह कहने लगा-ये धर्मध्वजी, ये पुगी पुरोहित, मुल्ला, ये कौन हैं ? इन्हें क्या अधिकार है हमारे जीवन को बाघ रखने का ? श्राओ, हम इन्हें दूर कर दें, एक स्वतन्त्र समाज की रचना करें, ताकि हम उन्नति के पथ पर बढ सक । तब एक दिन विदेशी सरकार के दो सिपाही पाकर उसे पकड ले गये, क्योंकि यह वर्गों में परस्पर विरोध जगा रहा था। ज्ञान जब जेल काटकर बाहर निकला, तव उसकी छाती में इन विदेशियों के प्रति विद्रोह धधक रहा था। वही तो हमारी तुद्रताओं को स्थायी बनाये रखते हैं, और उससे लाभ उठाते हैं। पहले अपने को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करना होगा, तब, गुप्त और वह गुप्त रूप से विदेशियों के विरुद्ध लड़ाई का श्रायोजन करने लगा। एक दिन उसके पास एक विदेशी श्रादमी प्राया। वह मैले कुचैले फटे पुराने खाकी कपडे पहने हुए था। मुत्र पर झुर्रियां पड़ी थी, आँखों में एक तोखा दद था। उसने शान से कहा-श्राप मुझे कुछ काम दें, ताकि मैं अपनी रोबो कमा सकूँ। मैं विदेशी हूँ। पापके देश में भूखा मर रहा हूँ।

श्री उपेन्द्रनाथ 'अश्क' आपका जन्म १९१० में जालन्धर में हुआ था। परिवार गरोप था और बच्चे अनेक थे। इस कारण श्री अश्क' का धयपन गरीबी में बीता और बड़े होते ही उनको अपनी नोविका को फिक्र करनी पड़ी। प्रारम्भ में आपने उर्दू में कहानियाँ लिखी, कविताएँ लिखों और पत्रकार भी रहे। बाद में आपने अपना ध्यान हिन्दी की ओर खींचा और १९३३ ई. से हिन्दी में आपकी कहानियां प्रकाशित होना शुरू हुई । आप एक सफल फवि और नाटककार और उपन्यास लेखक भी है। भापकी कहानियों की स्वाभाविकता और जीवन से उनका सामीप्य उनके विशेष गुण हैं । आपकी कविताओं के दो सग्रह 'प्रात प्रदीप', 'कमियो', कई नाटक, कहानी-सग्रह और उपन्यास 'सितारों के खेल' प्रकाशित हुए हैं। ।

-- " फाट' पी सिकदर पे मुसलमान जाट पाकर को श्री माल की ओर लालसा-मरी निगाहों से ताकवे देखकर चौधरी नन्द वृक्ष की छाद में बैठे-बैठे अपनी ऊँनी परपराती भावाज में ललकार उठा- -रेरे, अ पे करे है। और उसको र फुट लम्बी सुगठित दे६, जो वृक्ष के तने के साथ श्राराम कर रही थी, तन गई और स्टन टूटे हाने के कारण मोरी सादी के कुत्ते से उसका विशाल पक्ष स्थल और उसकी बलिष्ठ भुजाएँ हिंगाचर हो उठी। बाकर तनिक समीप श्रा गया। गर्द से भी हुई छोटी नुकीली दाढी और शरद में छो के ऊपर गदों में धंसी हुई दो बाखी में निमिष मात्र क लिए चमक पैदा हुई और जरा मुसकराकर उसने कहा-हाचीर देख रहा था चौधरी, कैसी खूबसूरत और जवान है, देखकर भूख मिटती है। अपने माल की प्रशमा मुनकर चौधरी का तनाव कर कम हुघा, खुश होकर बोला-किसी साह यह पहली-तरफ से चौथी -वाकर ने इशारा करते हुए कहा। श्रोकादके एक घने पेड़ की छाया में आठ दस ऊँट बंधे थे, उन्ही में वह जवान साहनी अपनी लम्बी सुधौल और सुदर गर्दन बढाये घने पत्तो में मुंह मार रही थी। माल मढी में, दूर जहाँ तक नजर जानी थी, बड़े बड़े ऊँचे ऊँटो, सुन्दर साहनियों, काली मोटी बेडौल भैंसी, सुदर नागोरी सोंगोवाले चैलों के सिवा कुछ न दिखाई देता था। गधे भी थे, पर न होने के परामर । अधिकांश तो ऊँट ही थे। बहावलनगर के मकस्थल में होनेवाली माल मडी में उनका आधिक्य है भी स्वाभाविक ! ऊँट रेगिस्तान का जहाज है, इस रेतीले इलाके में श्रामदरफ्त, सेती बारी और बारबरदारी का काम उसी से होता है। पुराने समय में जब गायें दस दस और बैल पन्द्रह पन्द्रह रुपये में मिल जाते थे, तब भी अच्छा ऊँट पचास से कम में हाय न पाता था। अब भी जब इस इलाके में नहर श्रा गई है और पानी की इतनी १ काट-गाँव । २ डाची साडनी । ३ कौनसी डाची १ ४ भोकाद एक - १७६ ] गल्प-समुन्वय किल्लत नहीं रही, ऊँट का महत्त्व कम नहीं हुअा, बल्कि बदा ही है। सवारी के ऊँट दो-दो सौ से तीन तीन सौ तक पाये जाते है और माही रथा पारबर- दारी के भी अस्सी-सौ से कम में हाथ नहीं पाते। तनिक और श्रागे बटकर पाकर ने कहा-सच कहता हूँ चौधरी, इस जैसी सुन्दरी साहनी मुझे सारी मही में दिखाई नहीं दी। हर्ष से नन्दू का सीना दुगना हो गया, बोला---प्रा एफ ही के, इह तो सगली फूटरी है । हूँ तो इन्हें चारा फल्सी नीरिया करूँ धीरे से बाकर ने पूछा-वेचोगे हर्से । नन्दू ने कहा-येचने लई तो मडी मा आऊँ हूँ। 'तो फिर बताओ कितने को दोगे -पाकर ने पूछा । नन्दू ने नख शिख तक बाफर पर एक दृष्टि डाली और हसते बोला- तन्ने चाहीजे का तेरे धनी बेई मोल लेसी, 'मुझे चाहिए'--वाकर ने दृढता से कहा। नन्द ने उपेक्षा से सिर हिलाया। इस मजदूर की यह विशात कि ऐसी सुन्दर साहनी मोल ले, बोला-त् कि लेसी! पाकर की जेप में पड़े हुए डेढ सौ के नोट जैसे बाहर उछल पड़ने को व्यग्र हो उठे तनिक जोश के साथ उसने कहा-तुम्हें इससे क्या, कोई ले , तुम्हें अपनी कीमत से गरज़ है, तुम मोन यताश्रो! न दू ने उसके जीर्ण-शीणं कपड़ों, घुटनों से उठे हुए तहमद और जैसे नूह के वक्त से भी पुराने जूते को देखते हुए टालने की गरज से कहा- जा-जा तू इसी विशी ले पाई, इगों मोल तो श्राठ बीसी टू घाट के नाही। एक निमिप के लिए वाकर के थफे हुए व्यथित चेहरे पर श्राहाद की रेखा सी झलक उठी। उसे डर था कि चौधरी कहीं ऐसा मूल्य न बता दे, १ यह एक हो क्या, यह तो सब ही सुन्दर हैं, में इन्हें पारा फलसी ( गवारा और मोट ) देता हूँ। २ तुझे चाहिए, या तू अपने मालिक के लिए मोल ले रहा है? ३ जा जा, तू कोई ऐसो-वैसी साड खरीद ले, इसका मूल्य तो १६.) से कम नहीं।

डाची [१७७ जो उसकी विसात से बाहर हो, पर जब अपनी जशन से उसने १६०) बताये, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। १५०) तो उसके पास ये ही । यदि इतने पर भी चौधरी न माना, तो दस रुपये वह उधार कर लेगा । भाव-ताय तो उसे करना न श्राता था, झट से उसने डेढ सौ के नोट निकाले और नन्दू के आगे फेंक दिये । बोला--गिन लो, इनसे अधिक मेरे पास नहीं, अब पागे तुम्हारी मर्जी। नदू ने श्रन्यमनस्कता से नोट गिनने श्रारम्भ कर दिये , पर गिनती खत्म करते ही उसकी श्राखें चमक उठी। उसने तो बाकर को टालने के लिए हो मूल्य १६०) बता दिया था। नहीं मडी में अच्छी से अच्छी डाची भी डेढ सौ में मिल जाती और इसके तो १४०) पाने की भी उसने स्वप्न तक में कल्पना न की थी। पर शीघ्र ही मन के भावों को मन ही में छिपाकर और जैसे भाकर पर अहसान का बोझ लादते हुए नन्दू बोला-साह तो मेरी दो सौ की है , पण जा सागी मोल मिया तन्ने दस छाड़िया। और यह कहते कहते उठकर उसने साडनी की रस्सी बाकर के हाथ में दे दी। क्षण भर के लिए उस कठोर व्यक्ति का जी भर आया। यह सडनी उसके यहाँ ही पैदा हुई और पली थी, आज पाल पोस कर उसे दूसरे के हाथ में सौंपते हुए उसके मन को कुछ ऐसी हालत हुई, जो लड़की को ससु राल भेजते समय पिता की होती है। जरा कापती अावाज में, स्वर को तनिक नर्म करते हुए, उसने कहा-आ सोड सोरी रहेड़ी है, तू इन्हें रहेड़ में इस गेर दे६२ ।' ऐसे ही, जैसे श्वसुर दामाद से कह रहा है मेरी लडकी लाड़ों पली है, देखना इसे कष्ट न होने देना। श्राहाद के परों पर उड़ते हुए याकर ने कहा--तुर मरा भी चिन्ता न परो, जान देकर पालूंगा। न्दू ने नोट अटी में संभालते हुए जैसे सूखे हुए गले को जरा तर करने के लिए घड़े में से मिट्टी का प्याला भरा-मही में चारों ओर धूल उड . १ सांडनी तो मेरी २००) की है , पर जा सारी कीमत म से तुम्हें दस रुपये छोड़ दिये। २ सांडनी अच्छी तरह रखी गई है, तू इसे ये हौ मिट्टी में न रोल देना ।

x x x १७८] गल्प-समुच्चय रही थी। शहरों की माल मडियो में भी-नदी बीसियां अस्थाई नल के लग जाते हैं और सारा सारा दिन छिडकाव होता रहता है-धूल की कमी नहीं हाती , फिर रगिस्तान की मही पर तो धूल का ही साम्राज्य था। गन्नेवाले की गडेरिया पर, हलवाई के हलवे और जलबियों पर और खोंचेवाले के दही- पकौड़ी पर, सब जगह धूल का पूर्वाधिकार था। यह वह सर्वव्यापक थी, सर्वशक्तिमान थी। घड़े का पानी टोकियों द्वारा नहर से लाया गया था, पर यही आते नाते काचद हो गया था। नन्दू का ख्याल था कि निधरने पर पोयेगा , पर गला कुछ सूस रहा था। एक ही धूट में प्य ले को खत्म करके नन्दू ने याकर से भी पानी पीने के लिए कहा । बार आया था तो उसे ग़जय की प्यास लगी हुई थी, पर अब उसे पानी पीने की फुर्सत कहाँ ? वह रात हाने से पहले पहल गांव पहुँचना चाहता था, डाची की रस्सी पकड़े हुए वह धूल को जैसे चीरता हुआ चल पड़ा। x पाकर के दिल में बड़ी देर मे एक सुन्दर और युवा डाची खरीदने की लालसा यी । जाति से वह कमीन था। उसके पूर्वज कुम्हारों का काम करते थे, कितु उसके पिता ने अपना पैत्रिक काम छोडकर मजदूरी करना ही शुरू कर दिया था, और उसके बाद बाकर भी इसी से अपना और अपने छोटे-से युटुम्ब का पेट पालता पाता था। वह काम अधिक करता हो, यह बात न यी , काम से उसने सदेव जी चुराया था, और चुराता भी क्यों न जब कि उसकी पत्नी उससे दुगुना काम करके उसके भार को बांटने और उसे पागम पहुँचाने के लिए मौजूद थी। कुटुम्प बड़ा नहीं था-एक वह एक उसकी पत्नी और एक नन्ही सी बच्ची। रिक्सिलिए वह जी हलाकान करता ? पर क्रूर और वेपीर विधाता-उसने उसे उस विस्मृति से, सुख की उस नीद से जगाकर अपना उत्तरदायित्व महसूस करने पर बाधित कर दिया, उसे बता दिया कि जीवन में सुख ही नहीं, दुख भी है, परिश्रम भी है। पाँच वर्ष हुए उसकी वही आराम देनेवाली प्यारी पत्नी सुन्दर गुड़िया- सी लड़की को छोड़कर परलोक विधार गई थी। मरते समय अपनी सारी करुणा को अपनी फीकी और श्रीहीन श्राखों में बटोरकर उसने बाकर से डाची [१७९ कहा था-मेरी रजिया अब तुम्हारे हवाले है, इसे कष्ट न होने देना।- और इसी एक वाक्य ने पाकर के समस्त जीवन के रुख को पलट दिया या। उसकी मृत्यु के बाद ही वह अपनी विधवा बहन को उसके गांव से ले पाया था और अपने बालस्य तथा प्रमाद को छोड़कर अपनो मृत पत्नी की अन्तिम अभिलाषा को पूरा करने में सलम हो गया था। यह सभव भो कैसे था कि अपनी पत्नी को-जिसे वह दिलोजान से प्यार करता था, जिसके निधन का ग्रम इसके हृदय के अशात पदों तक छा गया था, जिसके बाद उम्र होने पर भी उसने दूसरा विवाह न किया था-अपनी उसी प्यारी पत्नी की अतिम अभिलाषा की अवहेलना करता ? वह दिन-रात काम करता था, ताकि अपनी मृत पदो की उस धरोहर को, अपनी उस नन्हीं सी गुड़िया को मांति भाति की चीजें लाकर प्रसन्न रख सके । जब भी कभी वह मडो को श्राता, ता नन्हीं सी रजिया उसकी टांगों से जिपट जाती और अपनी बड़ी-बड़ी से उसके गर्द से भरे हुए चेहरे पर जमाकर पूछती-अम्बा, मेरे लिए क्या लाये हो ! तो वह उसे अपनी गोद में ले लेता और कभी मिठाई और कभी खिलौनों से उसकी झोली भर देता। तव रजिया उसकी गोद से उतर जाता और अपनी सहेलियों को खिलौने या मिठाई दिखाने के लिए भाग जाती । यही गुड़िया जब श्राठ वर्ष की हुई तो एक दिन मचलकर अपने अब्बा से कहने लगी-श्रव्या, हम तो डाची लेंगे। अन्ना, हमें डाची ले दो। भोली भाली निरीह बालिका | उसे क्या मालूम कि वह एक विपन्न गरीय मजदूर की बेटी है, जिसके लिए डाची खरीदना तो दूर रहा, डाची की कल्पना करना भी गुनाह है । रूखी हँसो हँसकर पाकर ने उसे अपनी गोद में ले लिया और बोला-जो, तू तो खुद डाची है। पर रजिया न मानी। उस दिन मशीर माल अपनी साड़नी पर चढकर अपनी छोरी लड़की को अपने आगे पिठाये दो चार मजदूर लेने के लिए स्वभूमि- स्थित उस कोट में आये थे। तभी रजिया के नहे-से मन में डाची पर सवार होने की प्रबल श्राकाक्षा पैदा हो उठी थी, और उसी दिन से बाकर का रहा- सहा प्रमाद भी दूर हो गया था। उसने रजिया को टाल तो दिया था, पर मन ही मन उसने प्रतिज्ञा कर

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सरस्वती प्रेस के कुछ और रन
मूल्य २॥)
मूल्य २॥
मूल्य १॥
* लीवन की मुस्कान-धोमतो उपादेवो मित्रा
का नवीनतम उपन्यास।
* पिया-श्रीमती उषादेनो मित्रा का क्रान्तिकारी
उपन्यास।
* बचम का मोल-श्रीमती उषादेवी मित्रा का
सर्वप्रथम उपन्यास ।
* परम्परा-अज्ञेय' का कहानी समद । मूल्य ३)
*फोटरी की बात-फहानी साह । मूल्य ३)
* मां-मैक्सिम पोकों का सर्वश्रेष्ठ एक अपार
सर्व उप यासों में से एक ।
* गाडीघालो का कटग-ययुमिन का सर्वो
उपन्यास एवं संसार के सर्वश्रेष उप मासों
मूल्य ५)
में से एक।
[से सूचीपत्र के लिए कार्ड लिख मेजिए ]
सरस्वती प्रेस, बनारस।
शाखाएँ-बाँस फाटक, बनारस बाहर ।
१-रो रोड, इलाहाबाद ।
1-अमौनुहोला पाक, लखनन ।।
४-शेष कला, दिल्ली।

Glp Samuchey

Author
Prem Chand
Title
Glp Samuchey
File name
Glp Samuchey
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2011/02
Publisher
Saraswati Press Banaras
Language
Sanskrit
Pages
166
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548666
Barcode
4990010028711.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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r7AlnMuswIL
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