Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Ek Kriti Vyaktitva
Front matter
प्रदीप कुमार
: सम्पादक निदेशक
पूर्वो द य प्र का श न
7/8, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
प्रेमचन्द
एक
कृती व्यक्तित्व
IBSN: 81-7037-40
मूल्य : साठ रूपये
.
प्रकाशक : पूर्वोदय प्रकाशन, D संचालक : पूर्वोदय प्रा० लि07/3r
दरियागन, नई दिल्ली-2© प्रदीपकुमार संस्करण : 1989, कलापदर :
रिफार्मा स्टूडियो मुद्रक : नवचेतन प्रेस प्रा. लि. (लोजिज ऑफ अर्जुन प्रेस)
नया बाजार, दिस्सी-6
PREMCIJAND: EK KRITI VYAKTITVA (Collection of
Reminences, Critical Essays etc.) by JAINENDRA RUMAR
Price Rs.60.00.
अनुक्रम
आमुख ।
७
प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना
और पाया :
६
प्रेमचन्द की कला :
चिट्ठी-पत्री :
प्रेमचन्द का गोदान
यदि मैं लिखता । १६५
७७
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आमुख प्रमचन्द पर जब-तब मुझे कुछ कहना-लिखना हुआ है। उस सबका यह संकलन छापते समय प्रकाशक मांगते हैं कि आदि में मैं फिर कुछ शब्द दूं । यह अदया है। कारण, प्रेमचन्द की स्मृति मेरे लिए निजीय और घनिष्ट है और कष्टकर होता है यह कि वह छिड़े और उमड़े। प्रेमचन्द जब थे जाहिर में ऐसी कोई बात न थी कि उन पर निगाह जाती। वह साधारण बने रहने में विश्वास रखते थे। आगे आते हुए जमाने में इस तनिक-सी वात का महत्व पहचान में आता जायगा । प्रगट होता जायगा कि हठात् अप- नाया गया बड़प्पन अहम्मन्यता का ही रूप है। औरों से छिटककर ही कोई अपने में बड़ा होना चाह सकता है । गहरे मिथ्यात्व में से ऐसी चेष्टा को जन्म मिलता है । यह नहीं कि इस प्रवृत्ति और प्रयास में आज कमी आ गई है, लोग अव भी बढ़ चढ़कर वाग्मी, विद्वान और विजेता बने दीखना चाहते है । लेकिन समय बढ़ रहा है, समझ भी उसके साथ गहरी होती जा रही है और सामान्य ज्ञान की तरह यह वोध सुलभ हो गया है कि विशिष्ट बनने के यत्न के पीछे मन का दैन्य ही काम करता है । महिमा-गरिमा व्यक्तित्व में यदि हो तो शरीर पर नहीं पा छलकती, भीतर
की दीप्ति के रूप में ही वह रहती है, और साहित्य
उसी अन्तरंग की अभिव्यंजना है।
जिस प्रेमचन्द पर निगाह नहीं जा सकती
थी वह तो कुछेक साल जिये और चले गये ।
लेकिन अन्तर्भावनाएं उनकी अक्षर रूप में हमारे
पास बची रह गई हैं । उनकी आयु की अवधि
नहीं है । इतिहास उनको मिटा नही पाएगा,
शायद है कि वह उनके मूल्य को वढ़ा ही जाए।
सद्भाग्य कि मुझे उनका संग-साथ भी मिल सका
था । उनकी मूरत जरा में मन, के सामने उतर
आती है और बड़ा अजब लगता है। मुझे नहीं
पता कि कौन उन्हें क्या जगह देता है या देगा।
वे बातें वैसे भी ऊपरी हैं। मैं स्वयं साहित्या-
लोचन के मूल्य को वेहद सापेक्ष मानता हूं । इन
पृष्ठों में कदाचित् उसका आभास भी नहीं
मिलेगा। पर यदि इस पुस्तक से उस निपट, निरीह
इंसान की किंचित भी झलक पाठक को मिल सकी
कि जो जीवन भर जूझता रहा, पाने की लिप्सा
या न पाने की कुंठा जिसे नहीं रही और अपने
को लेकर अभाव अभियोग का भाव जिसको कभी
काट नहीं सका तो मैं सन्तोष मानूंगा।
१ जनवरी '६७
-जैनेन्द्र कुमार
录,
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में भनक पड़ों या प्रादही उछाह में भरकर
कारी लिये बड़ा बालककपरप्रान पहुंचा। जाने का mar
प्रेमचन्द :
मैंने क्या जाना और पाया
[एक]
इस साल की होली को गए दिन अभी ज्यादा नहीं हुए। इस बार
उस दिन हमारे यहाँ रंग-गुलाल कुछ नहीं हुआ । मुन्नी घर में बीमार
थी । मैं अपने कमरे में अकेला वैठा था । मामूली तौर पर होली का
दिन फीका नहीं गुज़रा करता । पर मुझे पिछले बरस का वह दिन
खास तौर से याद आ रहा था। मैं सोच रहा था कि वह दिन तो
अव ऐसा गया कि लौटनेवाला नहीं है । ये वीतते हुए दिन आखिर
चले कहाँ जाते हैं ? क्या कहीं ये इकट्ठे होते जाते हैं ? इस भांति उन
जाते हुए दिनों के पीछे पड़कर मैं खुद खोया-मा हो रहा था।
तभी सहसा पत्नी ने आकर कहा : पारमाल इस दिन यानी
यहीं थे...
-
कहते-कहते बीच ही में रहकर वह सामने मन में देखनी हुई
रह गई। मैं भी कुछ कह नहीं सका। उम वानी नगी पोर,
देखना भी मुझे कठिन हुआ।
थोड़ी देर बाद बोली में ग्रात्रिर्ग वक्त उन्हें देय भी न राणी-
अम्माजी से अब तक मिलना न हुना।
यह कहकर फिर मान नायर, वह बड़ी हो गई।
तव मैने कहा कि इस बात को छोड़ी । पर बगायो, मुन्नी का
क्या हाल है ? सो गई है।
"हाँ, बड़ी मुश्किल में मुमा प्रा।"
इतने में ही रंग-बिरंग मुंह, नर-दार, कपड़े और
।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व ' बाबाजी आएँगे? कब आएंगे? अम्मा ने पूछा : कौन वावाजी? बालक ने कहा : हाँ, मैं जानता हूँ-पारसाल जो होली पर थे नही, वही बावाजी ! मैं सब जानता हूँ। अम्मा, वह कब आएंगे? उस समय मैंने उसे डपटकर कहा : जाओ, नीचे वालकों में सेलो। इस पर वह बालक मुझसे भी पूछ उठा : वावूजी, बनारस- चाले बाबाजी पानेवाले है ? वह कब आएँगे? मैने भी डपटकर कहा : मुझे नहीं मालूम । जाओ, तुम खेलो। बालक चला तो गया था। हो सकता है कि नीचे खेला भी हो, लेकिन इस तरह उस पारसाल के होली के दिन को याद के छिड़ जाने से मन की तकलीफ़ बढ़ गई। पत्नी मेरी ओर देखती रही, मै उनकी ओर देखता रहा । बोल कुछ सूझता ही न था, आखिर काफी देर बाद वह बोली : तुम बनारस कब जानोगे ? मैं भी जरूर चलूंगी। मैने इतना ही कहा कि देखो- बात यह थी कि पारसाल इसी होली के दिन प्रेमचन्दजी नीम की सींक से दाँत कुरेदते हुए धूप में खाट पर बैठे थे। नाश्ता हो चुका था और पूरी निश्चिन्तता थी । वदन पर धोती के अलावा बस एक बनियान था जिसमें उनकी दुबली और लाल-पीली देह छिपती न थी । वक्त साढे नौ का होगा । ऐसे ही समय होलीवालों का एक दल घर में अनायास घुस आया और वीसियों पिचकारियों की धार से और गुलाल से उस दल ने उनका ऐसा सम्मान किया कि एक बार तो प्रेमचन्दजी भी चौक गए। पलक मारते वह तो सिर से पांव तक कई रंग के पानी से भीग चुके थे। हड़बड़ाकर उठे, क्षण-इक रुके, स्थिति पहचानी, और फिर वह कहकहा लगा कि मुझे अब तक याद है । वोले : अरे भाई जैनेन्द्र, हम तो मेहमान है ! मंने आगत सज्जनों से, जिनमें पाठ बरस के बच्चों से लगा- कर पचास वरस के बुजुर्ग भी थे, परिचय कराते हुए कहा : पाप प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया .. प्रेमचन्दजी हैं। यह जानकर सब लोग बहुत प्रसन्न हुए। प्रेमचन्दजी बोले : भाई, अब तो खैर है न ? या कि अभी जहमत वाक़ी है ? "लेकिन इस दिन खैरियत का भरोसा क्या कीजिए! और होली के दिन का तो और भी ठिकाना नहीं है।" इस पर प्रेमचन्दजी ने फिर कहक़हा लगाया । बोले : तो कौन कपड़े बदले ! हम तो यहीं बैठते हैं खाट पर कि पाए जो चाहे । ''सच, यकीन करना मुश्किल होता है कि वह दिन अभी एक बरस पहले था और प्रेमचन्दजी अब नही हैं । फिर भी, प्रेमचन्द जी तो नहीं ही हैं । इतने दूर हो गए है कि जीते-जी उन्हे नहीं पाया जा सकता । इस सत्य को जैसे भी चाहे हम समझे, चाहें तो उसके प्रति विद्रोही ही बने रहें, पर किसी भी उपाय से उसे अन्यथा नही कर सकते । [२] छुटपन से प्रेमचन्द का नाम सुनता-पढ़ता आया हूँ । वह नाम कुछ-कुछ इस तरह मन में बस गया था जैसे पुराण-पुरुपों के नाम। मानो वह मनोलोक के ही वासी हैं । सदेह भी वह है और इस कर्म- कलाप-संकुलित जगत् में हम-तुम की भाँति कर्म करते हुए जी रहे हैं---ऐसी सम्भावना मन में नहीं होती थी। बचपन का मन था, कल्पनाओं में रस लेता था। उन्हीं पर पल-झूलकर वह पक रहा था । सन् '२६ में शायद, या सन् '२७ में, 'रंगभूमि' हाथों पड़ी। तभी चिपटकर उसे पढ़ गया । कदाचित् एक ही भाग मिला था, वह भी दूसरा । पर उससे क्या ! प्रेमचन्दजी की पुस्तक थी, और शुरू करने पर छूटना दुष्कर था । उसे पढ़ने पर मेरे लिए प्रेमचन्दजी और भी बाध्यता से मनोलोक के वासी हो गए।
१२ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व । पर दिन निकलते गए और इधर मेरा मन भी पकता गया । इधर-उधर की सूचनामों से वोध हुया कि प्रेमचन्दजी लेखक ही नहीं हैं और आकाशलोक में ही नहीं रहते, वह हम-तुम जैसे आदमी भी हैं । यह जानकर प्रसन्नता बढ़ी, यह तो नहीं कह सकता । पर यह नया ज्ञान विचित्र मालूम हुआ और मेरा कौतूहल बढ़ गया । सन '२६ आते-आते मै अकस्मात् कुछ लिख बैठा । यो कहिए कि अघटनीय ही घटित हुआ। जिस बात से सबसे अधिक डरता रहा था यानी, लिखना-वही सामने आ रहा । इस अपने दुस्साहस पर मै पहले-पहल तो बहुत ही संकुचित हुआ। में, और लिखू---यह बहुत ही अनहोनी बात मेरे लिए थी। पर विधि पर किसका बस ! जब मुझ पर यह आविष्कार प्रकट हुआ कि मै लिखता हूँ, तब यह ज्ञान भी मुझे था कि वही प्रेमचन्द जो पूरी 'रंगभूमि' को अपने भीतर से प्रगट कर सकते है, लखनऊ से निकलनेवाली 'माधुरी' के सम्पादक हैं । सो कुछ दिनों बाद एक रचना बड़ी हिम्मत बांधकर डाक से मैंने उन्हें भेज दी । लिख दिया कि यह सम्पादक के लिए नहीं है, ग्रंथकर्ता प्रेमचन्द के लिए है । छापे में आने योग्य तो मैं हो सकता ही नही हूँ, पर लेखक प्रेमचन्द उन पक्तियों को एक निगाह देख सकें और मुझे कुछ बता सके तो मै अपने को धन्य मानूंगा । कुछ दिनों के बाद वह रचना ठीक-ठीक तौर पर लौट आई। साथ ही एक कार्ड भी मिला जिस पर छपा हुआ था कि यह रचना धन्यवाद के साथ वापस की जाती है। यह मेरे दुस्साहस के योग्य ही था, फिर भी मन कुछ बैठने-सा लगा । मैं उस अपनी कहानी को तभी एक बार फिर पढ़ गया । आखिरी स्लिप समाप्त करके उसे पलटता हूं कि पढता हूँ, पीठ पर फीको लाल स्याही में अंग्रेजी में लिखा है--'प्लीज़ आस्क इफ दिस इज ए ट्रान्सलेशन ।' जाने किस प्रतक्यं पद्धति से यह प्रतीति उस समय मेरे मन में असंदिग्ध रूप में वस गई कि, हो न हो, ये प्रेम- चन्दजी के गब्द हैं, उन्हीं के हस्ताक्षर हैं । उस समय मैं एक ही प्रेमचन्द : मैने क्या जाना मोर पापा साथ मानो कृतज्ञता में नहा उठा । मेरा मन तो एक प्रकार से मुर्भा ही चला था, लेकिन इस छोटे-से वाक्य ने मुझे संजीवन दिया। तब से में खूब समझ गया हूं कि सच्ची सहानुभूति का एक कण भी कितना प्राणदायक होता है और हृदय को निमंल रसना अपने- पाप में कितना बड़ा उपकार है। पर मैंने न प्रेमचन्दजी को कुछ लिसा, न माधुरी को लिखा । फिर भी तब से अलक्ष्य भाव से प्रेमचन्दजी के प्रति मैं एक ऐसे अनिवार्य वन्धन से बंध गया कि उससे छुटकारा न था । कुछ दिनों बाद एक और कहानी' उन्हें भेजी । पहली कहानी का कोई उल्लेख नहीं किया । यह फिर लिख दिया कि लेखक प्रेमचन्द को उस पर सम्मति पाऊँ, यही अभीष्ट है, छपने लायक तो यह होगी ही नहीं । उत्तर में मुझे एक कार्ड मिला। उसमें दो-तीन पंक्तियों से अधिक न थी। स्वयं प्रेमचन्दजी ने --'प्रिय महोदय, दो (या तीन) महीने में माधुरी का विशेषांक निकलने वाला है। आपकी कहानी उसके लिए चुन ली लिखा था--- इस पत्र पर मैं विस्मित होकर रह गया । पत्र में प्रोत्साहन का, वधाई का, प्रशंसा का एक शब्द भी नहीं था। लेकिन जो था वह ऐसे प्रोत्साहनों से भारी था । प्रेमचन्दजी को अन्त.प्रकृति की झलक पहली ही वार मुझे उस पत्र में मिल गई । वह जितने सद्भावनाशील थे, उतने ही उन सद्भावनाओं के प्रदर्शन में संकोची थे। नेकी हो तो कर देना, पर कहना नहीं यह उनकी आदत हो गई थी। मैंने उस पत्र को कई बार पढ़ा था और मैं दंग रह गया था कि यह व्यक्ति कोन हो सकता है जो एक अनजान लड़के के प्रति इतनी बड़ी दया का, उपकार का, काम कर सकता है, फिर भी उसका तनिक श्रेय लेना नहीं चाहता । अगर उस पत्र के साथ १. 'अन्धों का भेद।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व चाहिए और क्यों वह 'ऐसी' ही होनी चाहिए । छोटे मुंह बड़ी बात करते मुझे शर्म पानी चाहिए थी । पर प्रेमचन्दजी ने ज़रा भी वह शर्म मेरे पास न आने दी। इतना ही नहीं, बल्कि मुझे मालूम होता है कि उस प्रकार की निर्लज्ज शंका के कारण तो मानो और भी उन्होंने मुझे अपने पास ले लिया । शंकाओं के उत्तर में एक प्रकार से उन्होंने यह भी मुझे सुझाया और याद रखने को कहा कि 'मुझे निर्धान्त न मानना। कहानी हृदय की वस्तु है, नियम की वस्तु नही है । नियम है और वे उपयोगी होने के लिए है। हृदय के दान में जब वे अनुपयोगी हो जायँ तब बेशक उन्हे उल्लं- घनीय मानना चाहिए।' उनका जोर इस अन्तिम 'लेकिन' पर अवश्य रहता था । नियम बदलेंगे, वे टूटेंगे भी, पर इस 'लेकिन' से सावधान रहना होगा । प्रेमचन्दजी इस 'लेकिन' की, और उससे आगे की, जिम्मेदारी स्वय न लेकर मानो निर्णायक के ऊपर ही छोड़ देते थे । जैसे कहते हों : 'उधर वहुत खतरा है, बहुत खटका है। मेरी सलाह तो यही है, यही होगी, कि उधर न बढ़ा जाय । फिर भी यदि कोई बढ़ना चाहता है तो वह जाने, उसका अन्तः- करण जाने । कौन जाने मुझे खुशी हो हो कि कोई है तो, जो खतरा देखकर भी (या ही) उधर वढ़ना चाहता है ।' कई वार उन्होंने कहा है : 'जैनेन्द्र, हम समाज के साथ है, समाज में है ।' यह इस भाव से कहा है कि मानो व्यक्त कर देना चाहते हों कि जो हीन-दृष्टि इतना तक नहीं देखता उसे तर्क में पड़ने की मेरी ओर से पूरी छुट्टी है ! [३] इस भांति दूर-दूर रहकर भी चिट्ठी-पत्री द्वारा परस्पर का अपरिचय बिलकुल जाता रहा था । कुंभ के मेले पर इलाहाबाद जाना हुआ। वहाँ प्रेमचन्दजी का जवाब भी मिल गया। लिखा था : 'अमीनुदौला पार्क के पास लाल मकान है । लौटते वक्त प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया 1 आयोगे ही । जरूर प्रायो।' सन '३० को जनवरी थी । खासे जाड़े थे। बनारस से गा लखनऊ रात के कोई चार बजे ही जा पहुंची थी। अंधेरा था शीत भी कम न था । ऐसे वक्त अमीनुदौला पार्क के पासवान लाल मकान मिल तो जायगा ही, पर मुमकिन है असुविधा : कुछ हो । लेकिन दरअसल जो परेशानी उठानी पड़ी, उसके हि में विल्कुल तैयार न था। क्या मैं जानता न था कि मैं प्रेमचन्दजी के यहां जा रहा हूँ जी हाँ, वही जो साहित्य के सम्राट् हैं, घर-घर जिनके नाम । चर्चा है । उनके-से मशहूर आदमी हैं कितने ! मैं जानता था अं... बड़ी खुशी से हर किसी को जतलाने को उत्सुक था कि मैं उनके, उन्हीं के, यहाँ जा रहा हूँ। लेकिन मैं अपने को कितना भी ज्ञानी जानता होऊँ और अखबार में छपने लायक दो-एक कहानियाँ भी लिख चुका होऊ, पर यह जानना मुझे वाकी था कि मैं कितना भूला, भोला, कितना मूर्ख हूँ । महत्ता के साथ मेरे दिमाग़ में जैसे अगले कदम पर ही महल पा जाता था । जो महल में प्रतिष्ठित नहीं है, क्या ऐसी भी कोई महत्ता हो सकती है ? पर मुझे जानना शेप था कि महल और चीज है, महत्ता और चीज है। उन दोनों में कोई वहुत सगा सम्बन्ध नहीं है । महत्ता मन से बनती है, महल पत्थर का बनता है । अतः इन दोनों तत्त्वों में मित्रता अनिवार्य नहीं । किन्तु इस सदशाल से मैं तब तक सर्वथा सूप था। पाँच बजे के लगभग अमीनुदौला पार्क की सड़क के बीचोंबीच आ खड़ा हो गया हूँ, सामान सामने एक निर्जन दूकान के तख्तों पर रखा है । इक्का-दुक्का शरीफ़ आदमी टहलने के लिए प्रा-जा रहे है । मै लगभग प्रत्येक से पूछता : जी, माफ़ कीजिएगा । प्रेम- चन्दजी का मकान आप बतला सकते हैं ? नज़दीक ही कहीं है । जी हाँ, प्रेमचन्द !
प्रेमचन्द ; एक कृती व्यक्तित्व सज्जन विनम्र, कुछ सोच में पड़ गए । माथा खुजलाया, बोले : प्रेमचन्द ! कौन प्रेमचन्द ? "जी, वही आला मुसन्निफ़ । नावलिस्ट । वह ऐडिटर भी तो है, साहब । मशहूर आदमी है।" 'ऐं-ऐं, पि...रे...म...च...न्द !' और सज्जन विनीत अस- मजस में पड़कर मुझसे क्षमा मांग उठे । क्षमा मांग, विदा ले, छड़ी उठा, मुझे छोड़, वह अपनी सर पर वढ गए। उस सड़क पर ही मुझे छः बज पाए । साढ़े छ: भी वजने लगे । तव तक दर्जनों सज्जनों को मैंने क्षमा किया। लगभग सभी को मैने अपने अनुसधान का लक्ष्य बनाया था । लेकिन मेरे मामले में सभी ने अपने को निपट असमर्थ प्रगट किया। मैं उनकी अस- मर्थता पर खीझ तक भी तो न सका, क्योकि वे सचमुच ही अस- मर्थ थे। आस-पास मकान कम न थे और लाल भी कम न थे । और जहाँ मैं खड़ा था वहाँ से प्रेमचन्दजी का मकान मुश्किल से बीस गज निकला । लेकिन उस रोज़ मुझे सभ्रान्त श्रेणी से प्रेमचन्दजी तक के उस वीस गज के दुर्लध्य अन्तर को लॉधने में काफ़ी देर लगी। और क्या इसे एक संयोग ही कहूँ कि अन्त में जिस व्यक्ति के नेतृत्व का सहारा थामकर मैं उन वीस गजों को पारकर प्रेम- चन्दजी के घर पर पा लगा, वह कुल-शील की दृष्टि से समाज का उच्छिष्ट ही था। मैंने अचानक ही उससे पूछा था : भाई, प्रेमचन्दजी का घर बता सकते हो? उसने कहा : मुशी प्रेमचन्द ? किन्तु मैं किसी प्रकार के मुंशीपन की मार्फत तो प्रेमचन्दजी को जानता न था। मैंने कहा : अच्छा, मुंशी ही सही । 'वह तो है' यह कहकर वह आदमी उठा और मेरे साथ बताने चल दिया। मैंने कहा : ठहरो, जरा सामान ले लूं। वह व्यक्ति प्रेमचन्द : मने क्या जाना और पाया १६ इस पर मेरे साथ-साथ आया, विना कुछ कहे-सुने मेरे हाथ से सामान उसने ले लिया । और प्रेमचन्दजी के मकान के जीने के आगे उसे रखकर बोला : घर यह है । अब गुहार लो मैंने आवाज दी । वह आवाज़ इस योग्य न रही होगी कि दूसरी मंजिल पर चढ़कर द्वार-दीवार लांघती हुई भीतर तक पहुँच जाय । इसलिए उस व्यक्ति ने तत्पर होकर पुकारा-बाबूजी ! बाबूजी! थोड़ी देर बाद जीने के ऊपर से आवाज़ आई-~कौन साहब "मैं जैनेन्द्र।" "ग्रानो भाई !" जीने के नीचे से झांकने पर मुझे जो कुछ ऊपर दीखा उससे मुझे बहुत धक्का लगा । जो सज्जन ऊपर खड़े थे उनकी बड़ी धनी मूंछे थी, पाँच रुपये वाली लाल इमली की चादर प्रोढ़े थे जो काफ़ी पुरानी और चिकनी थी, वालों ने आगे आकर माथे को कुछ ढंक- सा लिया था और माथा छोटा मालूम होता था। सिर जरूरत से छोटा प्रतीत हुना । मामूली धोती पहने थे जो घुटनों से जरा नीचे तक आ गई थी । आँखों में खुमारी भरी दीखी। मैंने जान लिया कि प्रेमचन्द यही हैं । इस परिज्ञान से बचने का अवकाश न था। प्रेमचन्द उन्हें ही जानकर मेरे मन को कुछ सुख उस समय नहीं हुा । क्या जीते-जी प्रेमचन्द इनको ही मानना होगा ? इतनी दूर से इतनी आस वाँध कर क्या इन्ही मूर्ति के दर्शन करने मैं आया हूँ ? एक बार तो जी में आया कि अपने मन के असली रमणीक प्रेमचन्द के प्रति आस्था कायम रखनी हो तो मैं यहाँ से लोट ही क्यों न जाऊँ । प्रेमचन्द के नाम पर वह सामने खड़ा व्यक्ति साधारण, इतना स्वल्प, इतना देहाती मालूम हुआ कि---- २० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व इतने में उस व्यक्ति ने फिर कहा : अायो भाई, आ जायो । मै एक हाथ में बक्स उठा जीने पर चढ़ने को हुआ कि उस व्यक्ति ने झटपट आकर उस वक्स को अपने हाथ में ले लेना चाहा। वक्स तो खैर मैने छिनने न दिया, लेकिन तब वह और दो-एक छोटी-मोटी चीजों को अपने हाथ में थामकर जीने से मुझे ऊपर ले गए। घर मुव्यवस्थित नहीं था। आँगन में पानी निरुद्देश्य फैला था। चीजें भी ठीक अपने-अपने स्थान पर नही थी । पर पहली निगाह ही यह जो कुछ दीखा, दीख सका। आगे तो मेरी निगाह इन बातों को देखने के लिए खाली ही नहीं रही। थोड़ी ही देर में मुझे भूल चला कि यह तनिक भी पराई जगह है । मेरे भीतर की बालोचनाशक्ति न-कुछ देर में मुरझा सोई । सब काम छोड़ प्रेमचन्दजी मुझे लेकर बैठ गए । सात बज गए, साढे सात बज गए, आठ होने आए, वातों का सिलसिला टूटता ही न था। इस बीच में बहुत कुछ भूल गया। यह भूल गया कि यह प्रेमचन्द हैं, हिन्दी के साहित्य-सम्राट् है । यह भी भूल गया कि मै उसी साहित्य के तट पर भौचक खड़ा अनजान वालक हूँ। यह भी भूल गया कि क्षण भर पहले इस व्यक्ति की मुद्रा पर मेरे मन में अप्रीति, अनास्था उत्पन्न हुई थी। देखते-देखते वातों-बातों में में एक अत्यन्त घनिष्ठ प्रकार की आत्मीयता में घिरकर ऊपरी सब बातों को भूल गया। उस व्यक्ति की बाहरी अनाकर्पकता उस क्षण से जाने किस प्रकार मुझे अपने-आप में सार्थक वस्तु जान पड़ने लगी । उनके ध्ययितत्व का बहुत-कुछ आकर्षण उसी अ-कोमल आन-बान में था। अपने ही जीवन-इतिहास की वह प्रतिमा थे। उनके चेहरे पर बहुत- कुछ लिसा था जो पढने-योग्य था। मैं सोचा करता हूँ कि वादाम में गिरी के लिए, उस गिरी में मिठास के लिए, उस मिठास की रक्षा के लिए क्या यह नितांत उचित और अनिवार्य है कि उसके प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया ऊपर का छिलका खूब सख्त हो । मैं मानता हूँ कि उस छिलके को कड़ा होने का अवकाश, वैसी सुविधा, न हो तो वादाम की गिरी को कभी वैसा उपादेय वनने का सौभाग्य भी नसीब न हो ! इस जगह आकर प्रेमचन्द की मेरी अपनी काल्पनिक मूर्तियाँ, जो अतिशय छटामयी और प्रियदर्शन थीं, एकदम ढहकर चूर हो गईं और मुझे तनिक भी दु:ख नहीं होने पाया । माया सत्य के प्रकाश पर टूट बिखरे तो दुःख कैसा ! आते ही एक-डेढ़ घण्टे के करीब बातचीत हुई और फलतः प्रेमचन्द के प्रति मेरी आस्था इतनी पुष्ट हो गई कि उसके बाद किसी भी वेशभूपा में, रंग-रूप में वह उपस्थित क्यों न होते, अकुंठित भाव से उनके चरण छुए बिना मे न रहता। मैं यह देखकर विस्मित हुआ कि आधुनिक साहित्य की प्रवृत्ति से वह कितने घनिष्ठ रूप में अवगत हैं। योरोपीय साहित्य में जानने-योग्य उन्होंने जाना है । जानकर ही नहीं छोड़ दिया, भीतर से उसे पहचाना भी है और फिर विवेक से छानकर आत्मसात् किया है । वह अपने प्रति सचेत हैं, तत्पर है । साथ, स्थिति के प्रति सावधान और उद्यत है। मैने कहा : बँगला-साहित्य हृदय को अधिक छूता है-इससे आप सहमत है ? तो इसका कारण क्या है ? प्रेमचन्दजी ने कहा : सहमत तो हूँ। कारण, उसमें स्त्री- भावना अधिक है । मुझमें वह काफी नही है । सुनकर मैं उनकी ओर देख उठा । पूछा : स्त्रीत्व है, इसीसे वह साहित्य हृदय को अधिक छूता है ? वोले : हाँ तो। वह जगह-जगह 'रिमिनिसेंट' (स्मरणशील) हो जाता है । स्मृति में भावना की तरलता अधिक होती है, संकल्प में भावना का काठिन्य अधिक । विधायकता के लिए दोनों चाहिए--- कहते-कहते उनकी आँखें मुझसे पार कही देखने लगी थीं।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व - . उस समय उन आँसों को मुर्षी एकदम गायव होकर उनमें एक प्रकार की पारदर्शी नीलिमा भर गई थी। मानो अब उनकी आँखों के सामने जो हो स्वप्न हो । उनकी वाणी में एक प्रकार को भीगी कातरता बज पाई थी। वह स्वर मानो उच्छ्वास में निवेदन करता हो कि "मैं कह तो रहा हूँ, पर जानता अंत में मैं भी नहीं हूँ । शब्द तो शब्द है, तुम उन पर मत रुकना । उनके अगोचर में जो भाव ध्वनित होता हो उसी में पहुंचकर जो पायोगे, पाओगे । वही पहुँचो, हम-तुम पर रुको नहीं । राह में जो है, वाधा है। लांघते जानो, लांघते जानो । उल्लंपित होने में ही वाधा की सार्थकता है।' वोले : जैनेन्द्र, मुझे कुछ ठीक नहीं मालूम । में बंगाली नहीं हूँ । वे लोग भावुक हैं । भावुकता में जहां पहुंच सकते हैं, वहाँ मेरी पहुँच नही । मुझमें उतनी देन कहाँ ? ज्ञान से जहां नही पहुँचा जाता, वहाँ भी भावना से पहुंचा जाता है। वहाँ भावना से ही पहुंचा जाता है । लेकिन जैनेन्द्र, मैं सोचता हूँ, काठिन्य भी चाहिए- कहकर प्रेमचन्द जैसे कन्या की भाँति लजा उठे । उनकी मूंछे इतनी घनी थी कि वेहद । उनमें सफेद बाल तब भी रहे होंगे। फिर भी मैं कहता हूँ, वह कन्या की भाँति लज्जा में घिर गए । वोले : जैनेन्द्र, रवीन्द्र-शरत् दोनों महान् है । पर हिन्दी के लिए क्या वही रास्ता है ? शायद नही । हिन्दी राष्ट्रभाषा है । मेरे लिए तो वह राह नही ही है । उनकी वाणी में उस समय स्वीकारोक्ति ही बजती मुझे सुन पड़ी। गर्वोक्ति की तो वहाँ सम्भावना ही न थी। बातों का सिलसिला अभी और भी चलता, लेकिन भीतर से खबर आई कि अभी डॉक्टर के यहाँ से दवा तक लाकर नही रखी गई है, ऐसा हो क्या रहा है ? दिन कितना चढ़ गया, क्या इसकी भी खबर नही है !
प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया २३ । .. प्रेमचन्द अप्रत्याशित भाव उठ खड़े हुए। बोले : जरा दवा ले पाऊँ, जैनेन्द्र । देखो, वातों में कुछ खयाल ही न रहा । कहकर इतने ज़ोर से कहकहा लगाकर हँसे कि छत के कोनों में लगे मकड़ी के जाले हिल उठे। मै तो भौचक रहा ही। मैने इतनी खुली हँसी जीवन में शायद ही कभी सुनी थी। वोले : और तुम्हें भी तो अभी नित्यकर्म से निवृत्त होना होगा ! वाह, यह खूब रही ! और हंसी का वह कहक़हा और भी द्विगुणित वेग से घर-भर में गूंज गया । अनन्तर मेरे देखते-देखते लपककर स्लीपर पहने, पाले में से शीशी उठाई और उन्हीं कपड़ों दवाई लेने बाहर निकल गए। मेरे मन पर प्रेमचन्द के साक्षात्कार की पहली छाप यह पड़ी। याने कि यह व्यक्ति जो भी है, उससे तनिक भी अन्यथा दीखने का इच्छुक नहीं है । इसे अपने महत्त्व या दूसरों के मान में आसक्ति नहीं है । इस व्यक्ति को अपने सम्बन्ध में इतना ही पता है कि कोटि-कोटि आदमियों के बीच में वह भी एक आदमी है । उससे अधिक कुछ होने का, या पाने का वह दावेदार नही है । मानवोचित प्राप्य का हकदार वह है । और वस, उससे न कम न ज्यादा। उन दिनों अपने सरस्वती प्रेस, काशी, से 'हंस' निकालने का निश्चय हो रहा था। मैंने पूछा : कि प्रेस छोड़कर, अपने गांव का घर छोड़कर, यहाँ लखनऊ में नौकरी करें, ऐसी क्या आपके साथ कोई मजबूरी है ? उनसे यह मेरी पहली मुलाकात थी । हममें कोई समानता न थी। मेरा यह प्रश्न धृष्टतापूर्ण समझा जा सकता था। लेकिन मैने कहा न कि पहले ही अवसर पर उनके प्रति में अपनी सब दूरी खो बैठा था । मैं लाख छोटा होऊपर प्रमचन्दजी, इतने बड़े थे कि अपनी उपस्थिति में वह मुमतिनिक भी अपनर तई हीन अनुभव नहीं होने देते थे। प्रश्न के उत्तर में निस्संकोचे और अंक ठित भाव २४ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व - से अपनी प्रार्थिक अवस्था, अयवा दुरवस्था, सब कह सुनाई । तव मुझे पता चला कि यह प्रेमचन्द जो लिखते हैं वह केवल लिखते ही नहीं हैं, उसको मानते भी हैं, उसपर जीते भी है । असहयोग में उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। कुछ दिनों तो वह असहयोग ही एक काम रहा । फिर क्या करें ? कुछ दिनों कानपुर-विद्यालय में अध्यापको की। फिर काशी-विद्यापीठ में पाये । आन्दोलन तव मद्धिम पड़ गया था । सोचने लगे, कही ऐसा तो नहीं है कि मैं और मेरा वेतन विद्यापीठ पर बोझ हो रहा है। इस तरह के सोच-विचार में उसे छोड़ दिया। अब क्या करें ? क्यों, मैने कहा, आपके हाथ में तो कलम थी। फिर प्रश्न कैसा कि क्या करें? नहीं जैनेन्द्र, वह वोले, तुम्हारा ख्याल ठोक नहीं है । यह मुल्क विलायत नही है। विलायत हो जाय, यह भी शायद मैं नहीं चाहूँगा। फिर बताया कि लिखने पर निर्भर रहकर काम नही चलता। मन भी नहीं भरता, खर्च भी पूरा नहीं होता । तबीयत वेचैन हो जाती है । फिर किन-किन हालतों में से गुजरना पड़ा, यह भी सुनाया । आखिर यहाँ-वहाँ से कुछ पूंजी बटोरकर प्रेस खोला । परवाज़ारवालों से निपटना न पाता था। प्रेस गले का ऐसा कौर वन गया, जो न निगला जाय, न उगलते ही वने । अपना लेना पटे नहीं, देनदारों को देना सो पड़े हो । ऐसी हालत में प्रेमचन्दजी जैसे व्यक्ति की गति अकथनीय हो गई । और कुछ न सूझा तो प्रेस में ताला डाल घर बैठ रहे । प्रेस न चले तो न सही, पर जान को कब तक घुलाया जाय ! पर ऐसी हालत में पैसे का अभाव ही चारों ओर दीखने लगा। और उस प्रभाव से घिरकर तवीत घुटने लगी। अब बताओ जैनेन्द्र, वह वोले, क्या तव भी नौकरी न करता? अब पह है कि रोटो तो चल जाती है । प्रेस प्रवासीलाल चलाते प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया २५ है । और बोले कि प्रेस से एक मासिक पत्र निकालना तय किया है, 'हंस' । क्या राय है ? मैंने पूछा : क्यों तय किया है ? 'प्रेस का पेट भरना है कि नहीं ! छपाई का काम काफ़ी नही आता और फिर हमारा यह साहित्य का शगल भी चलता रहेगा।' मैंने कहा : अच्छा तो है। वोले, 'हंस' को कहानियों का अखवार बनाने का इरादा है। उम्मीद तो है कि चल जाना चाहिए । ईश्वरीप्रसादजी को तो जानते ही होगे। नहीं ? खैर, शाम को 'हंस' का कवर-डिजा- इन लाएंगे। जिन्दादिल आदमी हैं, मिलकर खुश होगे । कहानियों का एक अखबार हिन्दी में हो, इसका वक्त आ गया है । क्यों ? 'हंस' के सम्बन्ध में उनको मिथ्या आशाएँ न थीं, पर वह उत्साहशील थे । 'हंस' के समारम्भ को लेकर वह उस समय नव- युवक की ही भांति अपने में वेग अनुभव करते थे । पहली बार में वहाँ ज्यादा नही ठहर पाया। सवेरे गया, शाम चल दिया। लेकिन इसी बीच प्रेमचन्दजी की अपनी निजता और आत्मीयता पूरी तरह प्रस्फुटित होकर मेरे भाग्य में आ गई । । । + खाना खा-पीकर बोले : जैनेन्द्र, चलो दफ्तर चलते हो? मैं चलने को उद्यत था ही । वाहर आकर जिस ढग से उन्होने इक्केवाले को पुकारा, उसको पटाया, इक्के में बैठते-बैठते उसके कुशल-क्षेम की भी कुछ खवर ले ली, जिस सहज भाव से उन्होंने उससे एक प्रकार की अपनी समकक्षता ही स्थापित कर ली-वह सब कहने की यह जगह शायद न हो, लेकिन मेरे मन पर वह वहुत सुन्दर रूप में अंकित है । इसलिए और भी कि तभी और उसी लखनऊ में एक मित्र के साथ का अनुभव था कि वह तो इक्के में बैठ न सकते थे; तांगा करता तो उनका नौकर, और प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व मजाल कि वह एक लफ्ज़ इस-उसने वोलना गवारा करें! रास्ते में एकाएक बोले : कहो जनेन्द्र, सामुद्रिक शास्त्र के बारे में तुम्हारी क्या राय है ? मैने पूछा : श्राप विश्वास करते हैं ? बोले, क्या बताऊँ ! लेकिन दफ्तरी एक दोस्त हैं, अच्छा हाथ देखना जानते हैं । भाई, उनकी बताई कई बातें ऐसी सही बैठी हैं कि मैं नहीं कह सकता, यह सारा शास्त्र पाखण्ड है। मैने कहा, तो आप विश्वास करते है ! मैं तो कभी नहीं कर पाया। वोले, इतने लोग इतने काल से ईमानदारी के साथ इस ओर अनुसन्धान में लगे रहे हैं, उनके परिणामों की हम अवज्ञा कर सकते है ? मुझे सुनकर विस्मय हुआ । मैंने कहा, तो विश्वास करना ही होगा आप परमात्मा में जो विश्वास नहीं करते हैं । प्रेमचन्दजी गम्भीर हो गए। बोले, जैनेन्द्र, मैं कह चुका हूँ, मैं परमात्मा तक नहीं पहुँच सकता । मैं उतना विश्वास नहीं कर सकता । कैसे विश्वास करूं जब देखता हूँ, वच्चा विलख रहा है, रोगी तड़प रहा है ? यहाँ भूख है, क्लेश है, ताप है, वह ताप इस दुनिया में कम नहीं है । तब उस दुनिया में मुझे ईश्वर का साम्राज्य नही दीखे, तो यह मेरा कसूर है ? मुश्किल तो यह है कि ईश्वर को मानकर उसे दयालु भी मानना होगा। मुझे वह दयालुता नहीं दीखती। तब उस दयासागर में विश्वास कैसे हो ? जैनेन्द्र, तुम विश्वास करते हो? मैंने कहा, उससे बचने का रास्ता मुझे कहीं नजर नहीं आता। प्रेमचन्दजी मौन हो गए। उनकी आँखों की पुतलियाँ स्थिर हो गई और कही दूर गड़ गई । मग्न मौन की वह गम्भीरता ऐसी थी कि हम सब उसमें दव ही जायें। आफ़िस पहुंचकर उन मित्र को मेरा हाथ दिखलाया गया।
प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया उन्होंने काफ़ी युक्तिपूर्ण वातें कही । मेरे लिए दुष्कर था कि कह डालूं कि जो कुछ बताया गया, वह गलत है । आफ़िस से लौटते वक्त प्रेमचन्दजी ने पूछा- कहो जैनेन्द्र, अब क्या कहते हो? मैंने कहा, सामुद्रिक शास्त्र पर मेरी आस्था की वात पूछते है ? वह ज्यों-की-त्यों है, यानी दृढ़ नही हुई । यह बात सुनकर जैसे प्रेमचन्दजी को दु.ख हुया । दूसरों के अनुभव-ज्ञान की यह उन्हें अवज्ञा ही प्रतीत हुई । प्रेमचन्दजी के मन में यों मूलतत्व, अर्थात् ईश्वर, के सम्बन्ध मे चाहे अनास्था ही हो, लेकिन मानव-जाति द्वारा अजित वैज्ञानिक हेतुवाद पर और उसके परिणामों पर उनको पूरी आस्था थी । असम्मान उनके मन में नही था । वह कुछ भी हों, कट्टर नही थे । दूसरों के अनुभवों के प्रति उनमें ग्रहण-शील वृत्ति थी । धर्म के प्रति उपेक्षा और सामुद्रिक शास्त्र में उनका यथा-किचित् विश्वास-~-ये दोनों वृत्ति उनमें युगपत् देखकर मेरे मन में कभी-कभी कुतूहल और जिज्ञासा भी हुई है । लेकिन मैंने उनके जीवन में अंत तक इन दोनों परस्पर विरोधात्मक तत्त्वों को निभते देखा है । वह अत्यन्त स-प्रश्न थे, किन्तु तभी अत्यन्त श्रद्धालु भी थे। कई छोटी-मोटी बातों को ज्यों- का-त्यों मानते और पालते थे, कई बड़ी-बड़ी बातों में साहसी सुधारक थे। उसी शाम रुद्रनारायणजी भी पाए थे । टॉल्स्टाय के लगभग सभी ग्रन्थ उन्होंने अनुवाद कर डाले थे । पर छापने को कोई प्रका- शक न मिलता था । इतनी लगन और मेहनत अकारथ जा रही थी। साधारण प्रकाशक तो इस काम को उठाता किस भरोसे पर, पर साधन-सम्पन्न बड़े प्रकाशक भी किनारा दे रहे थे । इस स्थिति पर प्रेमचन्द भी खिन्न थे । उनका मन वहाँ था जहाँ साहित्य की असल नब्ज है। बाजार की यथार्थतामों पर उनका मन मलिन हो पाता था।
२८ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व भी दोगे ? मैं सोचे बैठा था, कुछ रोज व्हरोगे। उनके शब्दों में कोई स्पष्ट पाग्रह नहीं था । प्राग्रह उनके स्वभाव में ही नहीं था। किसी के जाने-माने को मुविधा-व्यवस्था के बीच में वह कभी अपनी इच्छाओं को नहीं डालते थे। किसी के काम में अड़चन बनने से वह बचते थे । यहाँ तक कि लोगों से मिलते-जुलते असमंजस होता था कि कही में उनका हर्ज न कर रहा होऊँ । आज के कर्मव्यस्त युग में यह उनके स्वभाव को विशेषता बहुत ही मूल्यवान् थी-चाहे साहित्य-रसिकों को यह थोड़ी बहुत अम्बरे भी। फिर सन् '३० का राष्ट्रीय आन्दोलन पा गया जिसमें बहुत लोग जेल पहुंचे। इस बीच 'हस' निकल गया ही था। प्रेमचन्द जी उसके तो सपादक ही थे, इधर-उधर भी लिखते थे, आंदोलन में योग देते थे, और 'गवन' उपन्यास तैयार कर रहे थे। यह भाग्य ही हुमा कि वह जेल नहीं गए । पर उनका जेल के बाहर रहना ज्यादा कठिन तपस्या थी। जेल में मैंने जो उनके पत्र पाए, उनसे मैंने जाना कि प्रेमचन्दजी में मैंने क्या निधि पाई है। प्रारम्भ में ही प्रेमचन्दजी ने सूचना दी-'मेरी पत्नीजी भी पिकेटिंग के जुर्म में दो महीने की सजा पा गई है। कल फैसला हुआ है। इधर पन्द्रह दिन से इसी में परेशान रहा । मैं जाने का इरादा ही कर रहा था पर उन्होंने खुद जाकर मेरा रास्ता बन्द कर दिया।' उनके पत्रों में हिन्दी-साहित्य की विहगम पालोचना रहा करती थी, कुछ अपने मन की, स्थिति की, सुख-दुःख की बातें रहा करती थीं । एक पत्र में लिखा-- ....गबन' अभी तैयार नहीं हुआ, अभी सौ पृष्ठ और होंगे । यह एक सामाजिक घटना है । मैं पुराना हो गया हूँ और पुरानी शैली को निभाए जाता हूँ। कथा को बीच से शुरू करना या इस प्रेमचन्द :मने क्या जाना और पाया प्रकार शुरू करना कि जिसमें ड्रामा का चमत्कार पैदा हो जाय, मेरे लिए मुश्किल है।' मंगलाप्रसाद पारितोषिक पर लिखा-'पुरस्कारों का विचार करना मैने छोड़ दिया । अगर मिल जाय तो ले लूंगा, पर इस तरह जैसे पड़ा हुआ धन मिल जाय । (अमुक) को या (अमुक) पा 'जायें, मुझे समान हर्ष होगा।' आगे लिखा--'म तो कोई स्कूल नहीं मानता । आपने ही एक वार प्रसाद-स्कूल प्रेमचन्द-स्कूल की चर्चा की थी। शैली में ज़रूर कुछ अन्तर है; मगर वह अन्तर कहाँ है, यह मेरी समझ में कुछ नहीं पाता । "प्रसादजी के यहाँ गम्भीरता और कवित्व अधिक है। रीअलिस्ट हममें से कोई भी नहीं है । हममें से कोई भी जीवन को उसके यथार्थ रूप में नहीं दिखाता, बल्कि उसके वांछित रूप में ही दिखाता है । मैं नग्न यथार्थवाद का प्रेमी भी नही हूँ।' . x x x किसी को अपनाने का उनका तरीका अलग था। इस पत्र में मुझे अपनाया क्या बनाया ही गया है। पर सम्पादकीय रवादारी देखते ही बनती है । मैं तो इस पर पानी-पानी होकर रह गया था। तिस पर यह कि पहली ही मुलाकात के बाद यह लिखा गया था: प्रिय जैनेन्द्रजी! में थर-थर कॉप रहा हूँ कि आप 'हंस' में पुस्तकों की पाली- चना न पावेगे तो क्या कहेगे । मैने आलोचना भेज दी थी। कह दिया था, इसे अवश्य छापना। पर मैनेजर ने पहले तो कई लेख इधर-उधर के छाप डाले और पीछे से स्थान की कमी पड़ गई। मेरी एक कहानी जो राष्ट्रीय रंग में थी, रह गई । आपकी कहानी भी रह गई । अब वे सब फरवरी के अंक में जा रही हैं, क्षमा कीजिएगा।
30 प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व 'गवन' छप गया है । वाइंडिंग होते ही पहुँचेगा । उस पर मैं आपकी दोस्ताना राय चाहूँगा। भवदीय धनपत राय x उनकी व्यावसायिक स्थिति और मानसिक चिन्ता का अन्दाज इस पत्र से कीजिए- प्रिय जैनेन्द्र, तुम्हारा पत्र कई दिन हुए, मिला । में आशा कर रहा था देहली (घर) से आ रहा होगा, पर आया लाहौर (जेल) से ! खैर, लाहौर (जेल) मुलतान (जेल) से कुछ कम दूर है । उससे कई दिन पहले मुलतान मैने एक पत्र भेजा था। शायद वह लौट कर आ गया हो, तुम्हें मिल गया हो । अच्छा मेरीगाथा सुनो । 'हंस' पर जमानत लगी। मैने समझा था, आडिनेंस के साथ जमानत भी समाप्त हो जायगी । पर नया प्राडिनेन्स आ गया और उसी के साथ जमानत भी बहाल कर दी गई । जून और जुलाई का अंक हमने छापना शुरू कर दिया है, पर मैनेजर साहब जब नया डिक्ले. रेशन देने गए तो मजिस्ट्रेट ने पत्र जारी करने की प्राज्ञा न दी, जमानत मॉगी। अब मैंने गवर्मेट को एक स्टेटमेंट लिखकर भेजा है । अगर जमानत उठ गई तो पत्रिका तुरन्त ही निकल जायगी। छप, कट, सिलकर तैयार रखी है । अगर आज्ञा न दी गई नो नमस्या टेढी हो जाएगी। मेरे पास न रुपये है, न प्रॉमेसरी नोट, न सिक्योरिटी । किसी से कर्ज लेना नहीं चाहता । यह शुरू माल है, चार-पांच सौ वी० पी० जाते, कुछ रुपये हाथ आते । लेकिन वह नहीं होना है । इस बीच मैने 'जागरण' को ले लिया है । जागरण के बारह अंक निकले लेकिन ग्राहक-संख्या दो सौ से आगे न बढी । विज्ञापन प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया P तो व्यासजी ने वहुत किया, लेकिन किसी वहद मात्र न चला. उन्हें उस पर लगभग पन्द्रह सौ का घाटा रहामा देह प्रखे खाली जा रहे थे । मुझसे वोले, यदि आप इसे निकालना चाहे तो निकाला मैंने उसे ले लिया । साप्ताहिक रूप में निकालने का निश्चय कर लिया है। पहला अंक जन्माष्टमी से निकलेगा। तुम्हारा इरादा भी एक साप्ताहिक निकालने का था। यह तुम्हारे लिए ही सामान है ! मैं जब तक इसे चलाता हूँ। फिर यह तुम्हारी ही चीज है । धन का अभाव है, 'हंस' में कई हजार का घाटा उठा चुका हूँ। लेकिन साप्ताहिक के प्रलोभन को न रोक सका । कोशिश कर रहा हूँ कि सर्वसाधारण के अनुकूल पत्र हो। इसमें भी कई हज़ारों का घाटा ही होगा । पर करूं क्या ! यहां तो जीवन ही एक लम्बा घाटा है । यह कुछ चल जायगा तो प्रेस के लिए काम की कमी की शिकायत न रहेगी। अभी तो मुझे ही पिसना पड़ेगा, लेकिन आम- दनी होने पर एक सम्पादक रख लूंगा। अपना काम केवल एडि- टोरियल लिखना होगा! 'कर्मभूमि' के तीस फ़ॉर्म छप चुके हैं, अभी करीव छ: फ़ॉर्म वाक़ी हैं । अब उसे जल्द समाप्त करता हूँ । सबसे पहले तुम्हारे पास भेजी जायगी और तुम्हारे ही ममताशून्य फैसले पर मेरी कामयावी या नाकामी का निर्णय है। राम शर्मा का शिकार, स्वामी सत्यदेव जो की कहानियों का संग्रह, डॉ. रवीन्द्रनाथ की 'पोडशी' आदि पुस्तकें निकली हैं । वायू वृन्दावनलालजी का 'कुण्डली-चक्र' बड़े शोक से पढ़ा । लेकिन पढ़कर मन उभरा नहीं । गर्मी नही मिली, न चुटकी, न खटक । शायद मुझमें भावनाशून्यता का दोप हो। एक उलहने का पत्र देखिए- प्रिय जैनेन्द्र, पादाव अर्ज ! भाई वाह ! मानता हूँ। जून गया, जुलाई "इधर पण्डि x x प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व अच्छा, गया और अगस्त का मैटर भी जाने वाला है। जुलाई वीस तक निकल जायगा । लेकिन हजूर को याद ही नहीं । क्यों याद आये ! बड़े आदमी होने में यही तो ऐव है । रुपए तो अभी कहीं मिले नहीं। लेकिन यश तो मिल ही गया है । और यश के धनी क्या कुछ (कम) मगरूर और भुलक्कड़ होते हैं ? दिल्लगी छोड़ो। यह वात क्या है ? तुम क्यों मुझसे सने बैठे हो ? न कहानी भेजते हो, न खत भेजते हो। कहानी न भेजो, खत तो भेजते रहो । मैं तो इधर बहुत परेशान रहा । याद नहीं पाता अपनी कथा कह चुका हूँ। बेटी के पुत्र हुआ और उसे प्रसूति-ज्वर ने पकड़ लिया । मरते-मरते बची। अभी तक अधमरी- सी है । बच्चा भी किसी तरह वच गया। आज बीस दिन हुए, यहाँ आ गई है। उसको माँ भी दो महीने उसके साथ रही । मै अकेला रह गया था। वीमार पड़ा, दाँतों ने कष्ट दिया, महीनों उसमें लगे । दस्त आए और अभी तक कुछ-न-कुछ शिकायत वाक़ी है । दाँतों के दर्द से भी गला नहीं छूटा । वुढ़ापा स्वयं रोग है । और अब मुझे उसने स्वीकार करा दिया कि अब में उसके पंजे में आ गया हूँ। काम की कुछ न पूछो । बेहूदा काम कर रहा हूँ। कहानियाँ केवल दो लिखीं है, उर्दू और हिन्दी में । हाँ, कुछ अनुवाद का काम किया है। तुमने क्या कर डाला, अब यह बतानो । (वह प्रवन्ध) निभा जाता है या नहीं ? कोई नई चीज कव पा रही है ? वच्चा कसा है, भगवतीदेवी कैसी हैं, माताजी कैसी हैं ? महात्माजी कैसे है ? सारी दुनिया लिखने को पड़ी है, तुम खामोश हो ! 'सरस्वती' में वह नोट तुमने देखा ? आज" यह (अमुक) जी की दया है । ठीक है। मैं तो खैर बूढा हो गया हैं और जो कुछ लिख सकता था लिख चुका, और मित्रों ने मुझे प्रास्मान पर भी चढ़ा दिया । लेकिन तुम्हारे साथ यह क्या मालूम हुआ कि प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया व्यवहार ! भगवती प्रसाद वाजपेयी की कहानी बहुत सुन्दर थी। और इन (चतुरसेन) को हो क्या गया है कि 'इस्लाम का विप-वृक्ष' लिख डाला । उसकी एक पालोचना तुम लिखो और वह पुस्तक मेरे पास भेजो । इस कम्युनल प्रॉपेगेंडा का जोरों से मुकाबला करना होगा। X x x उनकी कैसी ही अवस्था हो, पर साहित्य में कदर्य और कदर्थ का विरोध करने में उन्हें हिचक न होती थी। परिस्थितियों ने उन पर कभी रहम नही किया । प्रेमचन्दजी ने भी कभी उनसे रहम नहीं माँगा । वह जूझते ही रहे । सारी उम्र इसी में गुजारी, फिर भी नई विपत्तियों का सामना करते उन्हें डर न होता था । वह बचते न थे, कर्तव्य से कतराते न थे । उन्हें पैसे का लोभ न था । हाँ, घाटे का डर तो था ही । आमदनी चाहे कौड़ी न हो, पर ऊपर से घाटे का भूत तो मुंह फाड़ कर खाने न दौड़े। इतना ही चाहिए । पर इतना भी नहीं हुआ। इस घाटे ने उनकी कमर तोड़ दी। 'हंस' चलाया, 'जागरण' चलाया। दोनों में भावना सेवा की भी थी । मैं कह सकता हूँ कि उनमें व्यवसाय की भावना नहीं के बराबर थी । पर दोनों उनका मन और तन तो लेते ही रहे, तिस पर उनसे धन भी मांगते रहे । धन उनके पास देने और देते रहने को कहाँ था ! आखिर सिनेमा की ओर से आए निमन्त्रण को उन्हें मुनना पड़ा । २०-४-३४ को उन्होंने पत्र लिखा- - प्रिय जैनेन्द्र, तुम्हारा पत्र ऐन इन्तजार की हालत में मिला । तुमसे सलाह करने की खास जरूरत आ पड़ी है। अभी न बताऊँगा, जव प्रानोगे, तभी उस विपय में बातें होंगी। मगर तुम्हें क्यों सस्पेंस की हालत में रक्खू ! बम्बई की एक फ़िल्म-कम्पनी मुझे बुला रही - ३४ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व है । वेतन की बात नहीं, कण्ट्राक्ट की बात है-~-८,०००) साल । मैं उस अवस्था को पहुँच गया हूँ जब मेरे लिए इसके सिवा कोई उपाय नहीं रह गया है कि या तो वहाँ चला जाऊँ या अपने उप- न्यास को वाजार में बेचूं । मैं इस विषय में तुम्हारी राय जरूरी समझता हूँ। कम्पनी वाले हाजिरी की कोई कैद नही रखते । मैं जो चाहे लिखू , जहाँ चाहे लिखू, उनके लिए चार-पाँच सिनेरियो तैयार कर दूं। मैं सोचता हूँ कि मैं एक साल के लिए चला जाऊँ। वहाँ साल-भर रहने के बाद कुछ ऐसा कण्ट्राक्ट कर लूंगा कि मैं यहीं बैठे-बैठे तीन-चार कहानियाँ लिख दिया करूँ और चार-पाँच हजार रुपये मिल जाया करें। उससे 'जागरण-हंस' दोनों मजे में चलेंगे और पैसों का संकट कट जायगा । फिर हमारी दोनों की चीजें धडल्ले से निकलेंगी । लेकिन तुम यहाँ आ जानो तव क़तई राय होगी। अभी तो मन दौड़ा रहा हूँ।'' इसके कुछ ही दिन बाद दूसरा पत्र मिला-~-'भले आदमी, मकान छोड़ा था तो डाकिए से इतना तो कह दिया होता कि मेरी चिट्ठियाँ फलाँ पते पर भेज देना । बस, बोरिया-बकचा सँभाला और चल खड़े हुए। मैंने तुम्हारे जवाब में एक बड़ा-सा डिटेल्ड खत लिखा था । वह शायद मुर्दा चिट्ठियों के दफ्तर में पड़ा होगा।" (मैंने शायद तुम्हें लिखा है, कि) मुझे वम्बई कम्पनी बुला रही है । क्या सलाह है ? मुझे तो कोई हरज नहीं मालूम होता अगर वेतन सात-आठ सौ मिले । साल-दो साल करके चला आऊंगा। मगर मैंने अभी जवाब नहीं दिया है। उनके दो तार आ चुके हैं। प्रसादजी की सलाह है, 'आप बम्बई न जायँ ।' तुम्हारी भी अगर यही राय है तो मैं न जाऊँगा । जौहरीजी कहते हैं, जरूर जाइये । और चिरमंगिनी दरिद्रता भी कहती है कि जरूर चलो। जीवन का यह भी अनुभव है।' अाखिर फ़िल्मी लाइन में गए ही। लेकिन अनुभव ने बताया x x प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया ३५ कि वहाँ के योग्य वह न थे। फ़िल्म और प्रेमचन्द, दोनों में पटना संभव न हुआ । वहाँ से उन्होंने लिसा- 'मैं जिन इरादों से पाया था उनमें एक भी पूरा होता नजर नहीं आता । ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियाँ वनाते आये है, उस लीक से जी-भर नहीं हट सकते | Vulgarity को ये Entertainment Value कहते है । अद्भुत में ही इनका विश्वास है । राजा-रानी, उनके मन्त्रियों के पड्यन्त्र, नकली लड़ाई, बोसेवाजी- ये ही उनके मुख्य साधन है । मैने सामाजिक कहानियां लिखी है जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे । लेकिन उनको फिल्म करते इन लागा का सन्देह होता है कि चलें या न चलें । यह साल तो पूरा करना है ही। कर्जदार हो गया था, कर्ज पटा दूंगा, मगर और कोई लाभ नहीं । उपन्यास (गोदान) के अन्तिम पृष्ठ लिखने बाकी हैं । उधर मन ही नहीं जाता । (जी चाहता है) यहाँ से छुट्टी पाकर अपने पुराने अड्डे पर जा बहू । वहां धन नहीं है, मगर सन्तोप अवश्य है । यहाँ तो जान पड़ता है, जीवन नष्ट कर उनका एक फ़िल्म निकला था, 'मजदूर'। उसका जिक्र करते हुए एक पत्र में लिखा-- 'मजदूर तुम्हें पसन्द न आया । यह मैं जानता था । मैं इसे अपना कह भी सकता हूँ, नहीं भी कह सकता । इसके बाद ही एक रोमांस जा रहा है । वह भी मेरा नही है । मैं उसमें बहुत थोड़ा- सा हूँ । 'मजदूर' में भी इतना जरा-सा आया हूँ कि नहीं के वरा- वर । फ़िल्म में डाइरेक्टर सव-कुछ है । लेखक क़लम का वादशाह ही क्यों न हो, यहाँ डायरेक्टर की अमलदारी है । और उसके राज्य में उसकी हुकूमत नही चल सकती । हुकूमत माने तभी वह रह सकता है । वह यह कहने का साहस नहीं रखता, 'मैं जनरुचि को जानता हूँ, आप नही जानते ।' इसके विरुद्ध डायरेक्टर जोर से कहता है, 'मैं जानता हूँ, जनता क्या चाहती है । और हम यहाँ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व , - जनता की इसलाह करने नहीं आए है। हमने व्यवसाय खोला है, धन कमाना हमारी गरज है । जो चीज जनता मांगेगी वह हम देंगे।' इसका जवाब यही है--'अच्छा साहब, हमारा सलाम लीजिए। हम घर जाते है ।' वही मैं कर रहा हूँ । मई के अन्त में काशी में बन्दा उपन्यास लिख रहा होगा । और कुछ मुझमें नई कला न सीख सकने की भी सिफ़त है । फ़िल्म में मेरे मन को सन्तोप नहीं मिला। सन्तोष डाइरेक्टरों को नहीं मिलता, लेकिन वे और कुछ नहीं कर सकते, झख मारकर पड़े हुए है । मैं और कुछ कर सकता हूँ, चाहे वह बैगार ही क्यों न हो। इसलिए चला जा रहा हूँ। मैं जो प्लान सोचता हूँ, उसमें आदर्शवाद घुस आता है और कहा जाता है उसमें Entertainment Value नहीं होता। इसे मैं स्वीकार करता हूँ। मुझे आदमी ऐसे मिले जो न हिन्दी जानें न उर्दू । अंग्रेजी में अनु- वाद करके उन्हें कथा का मर्म समझाना पड़ता है और काम कुछ नहीं वनता । मेरे लिए अपनी वही पुरानी लाइन मजे की है । जो चाहा लिखा। ' • मेरा जीवन यहाँ भी वैसा ही है जैसा काशी में था । न किसी से दोस्ती, न किसी से मुलाकात । मुल्ला की दौड़ मस्जिद । स्टूडियो गये, घर आये । हिन्दी के दो-चार प्रेमी कभी-कभी पा जाते है । बस।..' इस भांति फ़िल्म-लाइन से किनारा लेकर उन्हें लौट आना पड़ा। इसके बाद कुछ बहुत ज्यादा दिन उन्हें इस दुनिया में रहने के लिए नहीं मिले । [७]] मुझे याद है, मुल्तान-जेल में उनका एक पत्र मिला था। तिखा पा-'कभी-कभी यहाँ वहुत सूना मालूम होता है, जैनेन्द्र । जी होता है, तुम कुछ लोगों से गले मिल लूं और फिर जिन्दगी से रुखसत हो जाऊँ । तुम बाहर कव प्रायोगे ? तुम इतनी दूर खड़े , प्रमचन्द : मैने क्या जाना और पाया - हो कि मैं तड़फड़ा कर रह जाता हूँ। इस पत्र को पढ़कर मुझे सुख नहीं हुआ था । मालूम हुआ था जैसे जीवन में रसानुभूति उन्हे स्वल्प रह गई है। धन की, प्रतिष्ठा की, पद-मर्यादा की उन्हें लालसा नहीं थी; फिर भी साहित्यिक दिशा में उनकी आकांक्षाएँ उड़ती ही थी । साहित्य को लेकर लोक- सग्रहात्मक कार्यों और योजनानों की ओर रह-रहकर उनकी रुचि जाती थी। पर व्यवहार-क्षमता का उनमें अभाव था और वाता- बरण इतना जाग्रत न था कि उनका आवाहन करे, उनका उप- योग ले ले । अत: इच्छाएँ उनमें उठती और वती न हो पाती। परिणामतः एक व्यर्थता, निष्फलता, पराजय का भाव उनमें घर करता जाता था। यह अनुभव करके उनको साहित्य के सार्वजनिक कार्यों की ओर खींचकर लाने की कुछ विधि की गई । पर वह प्रयोग भी विशेष सफल नही हुआ । इधर शरीर में रोग घर कर चला था। जीवन के इस ह्रास ने उसमें योग दिया। वह धीमे-धीमे जीवन के उस किनारे जा लगने लगे । न कह सकूँगा कि मन की साध उनमें बुझ गई थी । वुझी न थी, पर उस पर अविश्वास की, जैने एक परा- भव के भाव की, राख छा गई थी । जिन्दगी के हाथों कम थपेड़े उन्होंने नहीं खाए थे । वे सब उनके चेहरे पर, उनकी देह पर लिखे थे । वे चोटें जिस हद तक हो सकी प्रेमचन्द के मानस में से शुद्ध (सब्लिमेट) होकर साहित्य के रूप में प्रस्फुट हुई थी। पर तलछट भी अवशेप वचा ही था । उसी ने उनके मन को किसी कदर खट्टा बना दिया था । अन्त समय में भी वह खटास पूरी तरह उनको नहीं छोड़ सकी। किन्तु इस सम्बन्ध की चर्चा इस स्थल पर विशेष न हो सकेगी। यहाँ मैं उनके एक पत्र का उल्लेख करने का लोभ संवरण नहीं कर सकता जो उनके मन के उद्विग्न स्नेह को फुहार की भांति ऊपर खिला देता है । यह माताजी के देहान्त पर उन्होंने मुझे लिखा था। ।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व माताजी की मृत्यु पर तो शायद मैं नहीं भी रोया, पर इस पत्र पर ऑखें भीग ही पाई- प्रिय जनेन्द्र, - कल तुम्हारा पत्र मिला ! मुझे यह शंका पहले ही थी। इस मर्ज में शायद ही कोई बचता है। पहले ऐसी इच्छा उठी कि दिल्ली पाऊँ । लेकिन मेरे दामाद तीन दिन से आए हुए है और शायद वेटी जा रही है। फिर यह भी सोचा कि तुम्हें समझाने की तो कोई बात है नही । यह तो एक दिन होना ही था। हाँ, जब यह सोचता हूँ कि वह तुम्हारे लिए क्या थीं, और तुम उनके काल में आज भी लड़के-से वने फिरते थे, तब जी चाहता है तुम्हारे गले मिलकर रोऊँ । उनका वह स्नेह, वह तुम्हारे लिए जो-कुछ थीं वह तो थी ही, मगर उनके लिए तो तुम प्राण थे, अाँख थे, सव-कुछ थे। बिरले ही भागवानों को ऐसी माताएँ मिलती हैं । मैं देख रहा हूँ, तुम दुःसी हो, तुम्हारा मुंह मूखा हुआ है, संसार सूना-सूना-सा लग रहा है और चाहता हूँ यह दुःख प्राधा-आधा बॉट लूं, अगर तुम दो। मगर तुम दोगे नही । उस देवी का इतना ही तो तुम्हारे पास है, मुझे देकर कहाँ जानोगे ? इसे तो तुम सारे-का-सारा अपने मयमे निकट के स्थान में सुरक्षित रखोगे । काम से छुट्टी पाते ही अगर पा सको तो जरूर पा जायो । मिने बहुत दिन हो गए। मन तो मेरा ही प्राने को चाहता है, लेकिन मं पाया तो तीगरे दिन रम्सी तुड़ाकर भागूंगा । तुम--मगर प्रय तो तुम भी मेरे जैसे हो, भाई । अय वे वेफ़िकी के मजे फहाँ ! पौर मच पूछो तो मेरी ईर्या ने तुम्हे प्रनाय कर दिया । क्यों नईयां फग्ना ! में सात वर्ष का था तब माताजी चली गई। गम मनाइंग यर्प के होकर मातायाले बने रहो, यह मुझमे कब देगा जाता ! पर जगे हम, यगे नुम । बल्कि में तुमगे अच्छा । मुझे माता पी मूग भी याद नहीं पाती । तुम्हारी माता तुम्हारे मागने प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया .. हैं और घोलती नहीं, मिलती नहीं ! और तो सब ठीक है । चतुर्वेदीजी ने कलकत्ते बुलाया था कि जापानी कवि नोगुची का भापण सुन जायो । यहाँ नोगुची हिन्दू- यूनिसिटी पाए, उनका व्याख्यान भी हो गया। मगर मैं न जा सका । अक्ल की बातें सुनते और पढ़ते उम्र बीत गई । ईश्वर पर विश्वास नही आता, कसे श्रद्धा होती है । तुम आस्तिकता की ओर जा रहे हो । जा नहीं रहे, पक्के भगत बन रहे हो । मैं सन्देह से पक्का नास्तिक होता जा रहा हूँ। बेचारी भगवती अकेली हो गई । 'सुनीता' जाने कहाँ रास्ते में रह गई । यहाँ कही बाजार में भी नही । चित्रपट के पुराने अक उठाकर पड़े, पर मुश्किल से तीन अध्याय मिले । तुमने बड़ा जबरदस्त आईडियल रख दिया। महात्मा- जी के एक साल में स्वराज्य पानेवाले आन्दोलन की तरह । मगर तलवार पर पाँव रखना है। तुम्हारा-धनपतराय [इस पत्र के अन्तिम पैरे के कारण यह कह देना आवश्यक है कि 'सुनीता' पूरी पढने पर प्रेमचन्दजी उससे सहमत न हो सके थे।] [] प्रेमचन्दजी के स्वभाव में बहिर्मुखता जरूरत से कम थी। उनके जीवन का सार्वजनिक पक्ष इसलिए अन्त समय तक कुछ अक्षम ही बना रहा । अन्तर्मुखता भी धार्मिक प्रकार की न थी; उसके प्रकार को कुछ बौद्धिक कहना होगा । वह शंका से प्रारम्भ करते थे और इस भाँति एक समस्या खड़ी करके उसका समाधान पाने आगे बढ़ते थे । फिर भी लोक-जीवन में जिन मूलभूत नैतिक धारणाओं की स्वीकृति उन्होंने देखी, उन धारणाओं पर प्रेमचन्दजी अडिग विश्वास से डटे रहे। बातचीत में उनके साथ अत्यन्त घनिष्ठ बातों का प्रसंग भी ४० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व अक्सर आ गया है । पारिवारिक अथवा व्यक्तिगत वृत्तों को ऐसे समय उन्होंने निश्छल विश्वास के साथ खोलकर कह दिया है । उस सबके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि उनका जीवन लगभग एक श्रादर्श सदाशय का जीवन था । बुद्धि द्वारा उन्होंने स्वतन्त्र और निधि चिन्तन के जीवन-व्यवसाय को अपनाया सही, पर कर्म में वह अत्यन्त मर्यादाशील रहे । आर्टिस्ट के संकुचित पच्छिमी अर्थो में उन्होंने आर्टिस्ट बनने की स्पर्धा नहीं की । यही मर्यादाशील प्रामाणिकता उनके साहित्य की धुरी है । उनके साहित्य में जीवन की पालोचना तीव्र है, चहुंमुखी है । किन्तु एक सर्वसम्मत आधार- शिला है जिसको उन्होंने मजबूती से पकड़े रखा और जिस पर एक भी चोट उन्होंने नही लगने दी। जीवन को, विशेप कर लोक-जीवन की समस्याओं को, सर्वथा बौद्धिक और नैतिक-मानसिक रूप देने का परिणाम ही यह हुआ कि जब कि वह जीवन के सफल चित्रकार, भाप्यकार, व्याख्याकार हो सके तब उस जीवन को यान्दोलित करके उसमें नवचेतन और निर्माण-प्रेरणा डालने में उतने सफल नही हो सके । वह जननायक, लोकसंयोजक नही हो सके । बात यह है कि उनके साहित्य में लोक- पक्ष की जितनी प्रधानता मालूम होती है, ठीक उतनी ही गौणता उस पक्ष को उनके जीवन में प्राप्त थी । वह अन्त तक अपने-आप में एक सस्था नहीं बने, उन्होंने कोई संस्था नहीं बनाई । उनके उपन्यासों में ('गोदान' को छोड़कर लगभग सब में) संस्थाएँ बनी है और उन संस्थाओं द्वारा लोक-जीवन के प्रश्नों उनके सुधार का, समाधान दिया गया है । पर प्रेमचन्दजी के जीवन के प्रकाश्य पक्ष में उसका प्रभाव नजर आता है। अागामी साहित्य-समीक्षक और इतिहास-विवेचक को भीतरी कारण के प्रकाश में इस गाँठ को समझना और खोलना होगा। वह भीड़ से बचते थे । भीड़ को दिशा देने की उनमें क्षमता ग थी । वात यह थी कि भीड़ में पड़कर वह उस भीड़ को सम- का, ॥ . ---- - प्रेमचन्द :मने क्या जाना और पाया ४१ झते रह जाते थे। वह भीड़ के नहीं थे। सभा-सम्मेलनों में वह मुश्किल से ही जाते थे। वे सभा और सम्मेलन उनको पाकर भी विगेप लाभान्वित होते थे, यह नहीं कहा जा सकता । उनकी उप- स्थिति अवश्य किसी भी सभा और किसी भी सम्मेलन के लिए गौरव का विपय थी; पर ऐसा लगता था कि प्रेमचन्दजी उस सभा में भाग क्या ले रहे हैं, मानो उस सभा का तमाशा देख रहे है। दिल्ली में प्रान्तीय साहित्य-सम्मेलन किया और सभापति बनाया प्रेमचन्दजी को । पर वह पाने को ही राजी न हों । चिट्ठी- पर-चिट्ठी दी, तार दिए । आखिर माने ही तो तार में लिखा--- Well, I accept with protest. सार्वजनिक सभाओं के प्रति जब यह रुख था तव उधर उलटा ही हाल था। इससे कुछ ज्यादा रोज़ पहले की बात न थी। एक सवेरे गली में दीखता क्या है कि कन्धे पर कम्बल डाले, खरामा- खरामा चले आ रहे है प्रेमचन्दजी । महात्मा भगवानदीनजी और पण्डित सुन्दरलालजी भी तव घर पर थे । सुन्दरलालजी चबूतरे पर से दातन करते-करते वोले, देखना जैनेन्द्र, यह प्रेमचन्दजी तो नहीं पा रहे है। मैंने कहा, वही तो हैं ! प्रेमचन्दजी के पास आने पर मैंने अचरज से पूछा-यह क्या किस्सा है ! न तार, न चिट्ठी, और आप करिश्मे की भाँति प्रावि- भूत हो पड़े ! बोले, तार की क्या जरूरत थी, बारह आने पैसे कोई फालतू हैं ! और देखो, तुम्हारे मकान का पता लग गया कि नहीं ! बात यह थी कि मैंने एक कार्ड में लिखा था कि क्या आप या सकेंगे? पाएँ तो अच्छा रहे । सो प्रेमचन्दजी ने सुनाया कि-भई ! तुम्हारी चिट्टी प्रेस पहुंचने पर कोई दो बजे मिली । टाइमटेविल देखा, ट्रेन पांच बजे जाती थी। इससे पहले और कोई गाड़ी थी नहीं । उसो से चला आ रहा हूँ। . - प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व ४२ । मैंने कहा, यह क्या ग़ज़व करते है ! पहले से कुछ खवर तो दी होती । इस तरह से तो आपको बड़ी दिक्कत हुई होगी। गनी- मत मानिए कि दिल्ली, वम्बई नही है । और ऐसे क्या आप दिल्ली से बेहद वाकिफ़ है ? वोले, नही जी, सोचा, तुम्हारा मकान मिल ही जाएगा, सो बारह पाने वचारो क्यों ना ! और मकान मिल गया कि नही ! और दिल्ली-जिन्दगी में पहली मर्तबा आया हूँ। जिन्दगी में पहली बार ! मैने अविश्वास के भाव से कहा- आप कहते क्या हैं ! तिस पर आप है सम्राट् ! प्रेमचन्दजी कहकहा लगा उठे । यह वात सच थी। नौकरी के सिलसिले में वह अपने इर्द-गिर्द के जिलों में ही घूमे थे । दूर जाने का न कुछ काम पड़ा, न कुछ पड़ने दिया । सैर की धुन उनमें कभी थी नही । अपने सामने के ही कर्तव्य को वह महत्त्व देते रहे थे और उसी के पालन में अपनी सिद्धि मानते थे। यह बात मेरे लिए अभूतपूर्व और अत्यन्त आश्चर्यकारक थी । इक्यावन-बावन वर्ष की अवस्था में प्रेमचन्दजी-जैसा सर्वविश्रुत व्यक्ति दिल्ली में प्राकर यह कहे कि वह पहली बार यहाँ पाया है-यह अनहोनी वात नहीं तो और क्या है ! तय चार-पांच रोज प्रेमचन्दजी यहाँ रहे । उन दिनों लिखना- लिखाना तो होना क्या था ! पण्डित सुन्दरलालजी थे, महात्मा भगवानदीनजी थे। प्रेमचन्दजी को चाहनेवाले और मांगनेवाले उर्दू- हिन्दी के और लोगों की कमी न थी। चर्चानों में और पाटियों में वे दिन ऐगे बीते कि पता भी न लगा । उन्ही दिनों की और यहाँ की ही तो बात है कि वह पंजाबी मज्जन मिले जिन्होंने प्रेमचन्दजी को पाकर पफट हो तो लिया । उनकी कहानी दिलचस्प है और शिक्षाप्रद है। म्यानीय हिन्दी-मभा की ओर से प्रेमचन्दजी के सम्मान में ममा पी जा रही थी। उन्हें प्रभिनन्दनपत्र भेंट होने वाला था। उस वक्त ।
प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया एक पंजाबी सज्जन बड़े परेशान मालम होते थे । वह कभी सभा के मंत्री के पास जाते थे, कभी इधर-उधर जाते थे। प्रेमचन्दजी के पास जाने की शायद हिम्मत न होती थी। प्रेमचन्दजी को उसी रात दिल्ली से जाना था । सभा का काम जल्दी हो जाना चाहिए और वह जल्दी किया जा रहा था। प्रेमचन्दजी ने अपना वक्तव्य कहने मैं शायद दो मिनट लगाए । सभा की कार्रवाई समाप्तप्राय थी। तभी वह पंजावी सज्जन उठे और सभा के सामने हाथ जोड़कर बोले- मैं प्रेमचन्दजी को आज रात किसो हालत में नहीं जाने दूंगा । उनके साथ इस सारी सभा को मैं कल अपने यहाँ आमन्त्रित करना चाहता हूँ। लोंगों को बड़ा विचित्र मालूम हुआ । तैयारी सब हो चुकी थी और प्रेमचन्दजी का इरादा निश्चित था। लेकिन वह सज्जन अपनी प्रार्थना से बाज न आए। वह वार-बार हाथ जोड़ते थे और अपनी बात सुनाना चाहते थे। किन्तु सभा के लोग इस विघ्न पर कुछ अधीर थे और उन सज्जन के साथ शायद ही किसी को सहानुभूति थी । प्रेमचन्दजी इस भावुकता के प्रदर्शन से बहुत प्रभावित नहीं थे। फिन्तु उन सज्जन को कोई चीज न रोक सकी । उन्होंने हाथ जोडकर कहा कि मेरी अरदास आप लोग सुन लीजे, फिर जो चाहे आप कीजिएगा। जव से अखबार में प्रेमचन्दजी के यहाँ पाने की खवर पढ़ी तभी से उनके ठहरने की जगह पाने की कोशिश करता हूँ। वह जगह नहीं मिली । अव इस सभा में मैं उनको पा सका हूँ। मैं उनकी तलाश करता हुआ दर्शनों की इच्छा से लखनऊ दो बार गया। एक बार बनारस भी गया। तीनों बार वह न मिल सके। कई बरस पहले की बात है । मैं कमाने के ख्याल से पूरव की तरफ़ गया था। पर भाग्य की बात कि मेरे पास जो था सब खत्म हो गया । मैं घूमता-घामता स्टेशन पर आया । मुझे कुछ सूझता न था, आगे क्या होगा । सब अंधेरा मालूम होता था । जेब में दो रुपए और कुछ पैसे बचे थे। प्रेमचन्दजी के अफ़सानों को मैं शौक प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व से पढ़ा करता था। यूं ही टहलता हुअा व्हीलर की दूकान पर एक रिसाले के स्पेशल नम्बर के सफ़े लौटने-पलटने लगा। उसमें प्रेम- चन्दजी का एक अफसाना नजर आया। मैंने रुपया फेंक रिसाला रारीद लिया और प्रेमचन्दजी की उस 'मन्त्र' कहानी को पढ़ गया। पढकर मेरे दित की पस्ती जाती रही। हौसला खुल गया । मैं लौटकर आया और हार न मानने का इरादा कर लिया । तब से मेरी तरपनी ही होती गई है और आज यहाँ आपकी खिदमत में हूँ। तभी से मैं उस 'मन्त्र' कहानी के मन्त्रदाता प्रेमचन्द की तलाश में हूँ। अब यहाँ पा गया हूं तो किसी तरह छोड़ नहीं सकता। मेरी बीवी बीमार हैं, वह उठ-बैठ नहीं सकतीं, चल-फिर नही सकतीं। वह कब से प्रेमचन्दजी के दर्शन की प्रास बांधे बैठी हैं। और फिर हाथ जोड़कर उन्होंने कहा-अब फैसला आप सब साहयान के हाथ है। प्रेमचन्दजी की वृत्ति रुकने की नहीं थी, लेकिन उनको एकना पड़ा । यह घटना मेरे लिए तो प्रांस सोल देनेवाली ही थी। यह और इस तरह की और-और बातों से प्रेमचन्दजी के दिल्ली-प्रवास ग: दिन सहज में बीत गए। प्रेमचन्दजी प्रसन्न मालूम होते थे । मेकिन एक बात जानकर मैं साश्चर्य परामंजस में पड़ गया । बातों- थाना में प्रगट हुप्रा कि इधर ने योग-तीस वर्ष में यह पहले गाग दिन गए हैं जब उन्होंने गुष्ट काम नहीं किया। मने मत्पन्न विस्मयापन माय में पूछा-माप हर रोज विला गागा काम करते?
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प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व तकलीफ में दिन काटें। क्या यह मेरे लिए ठीक है ? और सबको ले चलूं, इतना पैसा कहाँ है ? और जनेन्द्र, महाकवि रवीन्द्रनाथ तो अपनी रचनात्रों द्वारा यहाँ भी हमें प्राप्त हैं । क्या वहाँ मैं उन्हें अधिक पाऊँगा? मैंने फिर भी कहा, शान्तिनिकेतन को अधिकार हो सकता है कि वह आपको चाहे । आपने कर्म ऐसे किए हैं कि पाप मशहूर हों। तव आप कर्मफल से बच नहीं सकते । चलिए न ! वोले, हाँ, जैनेन्द्र, यह सब ठीक है । लेकिन मैं अपने यही पड़ा हूँ, तुम जानो। मैंने कहा, हाँ, मैं तो जाऊँगा। वोले, जरूर-जरूर जानो। मैं तो खुद कहनेवाला था कि तुम्हें जाना चाहिए । जैनेन्द्र, जवान और बूढ़े में यही तो फ़र्क है ! इधर जीवन के अन्तिम पर्व की ओर उन्हें थोड़ा-बहुत साहि- त्यिक उद्देश्य के नाते से सभा-समाजों में जाने को उकसाया जा सका था । यहाँ दिल्ली साहित्य-सम्मेलन के जलसे में वह आ गए थे। या तो गए थे लेकिन अपने को पूरी तरह निरुपयोगी भी अनुभव कर रहे थे । बोले, जैनेन्द्र, सम्मेलन के जलसे में मैं आ गया । अव वतारो, क्या करूँ? मैं उनको क्या कहता, चुप रह जाता था ।क्या उनको में बताता कि उनका स्थान क्या है और कहाँ है, और लोगों की क्या-क्या आशाएं उनके साथ बंधी है ? लेकिन सच यह है कि ऐसे मौकों पर अपनी उपस्थिति वह अयाचित अनुभव करते थे । जव लोग शब्दों को लेकर या पदों को लेकर आपस में बहस-तहस और छीन-झपट करते थे तव उनका कहीं थोड़ी ठण्डी हवा खाने का जी होता था । कहा करते थे कि इनको भी इस समय थोड़ी ठण्डी हवा खा लेना चाहिए। साहित्य के भविष्य के बारे में बातें हुआ करती थी । सोचा, कुछ बौद्धिक आदान-प्रदान का, परस्पर के सहयोग-क्षेत्र का विस्तार होना चाहिए । प्रान्तीय मर्यादाएँ ऐक्य-विकास पर वन्धन न होनी M - प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया चाहिएँ । राष्ट्र एक है, उस ऐक्य को गहराई में अनुभूत करार होगा । इस ओर जो प्रयत्न हुए (यथा, भारतीय साहित्य-परिषद् उनके समारंभ में प्रेमचन्दजी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। पर उसमें भी उन्हें रस कम हो गया । वह अपने सहयोगियों से आशाएँ ऊँची रखते थे। वह मानव-प्रकृति का मूल्य यथार्थ से कुछ अधिक ऊँचा ऑकते थे । परिणामत. जव-जब वह समाज में आए, तभी- तव विरक्ति की भावना लेकर उन्हें फिर अपने में ही लौट जाना पड़ा। [] साधारणतया कोमलता की धारा उनमें अन्तःसलिला सरस्वती के समान प्रप्रकाश्य ही बहती थी। वह रचनाओं में जिस स्पष्टता से दीखती थी, व्यवहार में उतनी ही अगोचर हो जाती थी। फिर भी हठात् वह फूटकर ऐसे प्रगट हो उठी है कि प्रेमचन्दजी को भी चकित रह जाना पड़ा है। एक वार की बात है । दिन अधिक नहीं हुए । सन्' ३४ का साल होगा। बनारस मै वेनिया-पार्क वाले मकान में रहते थे । सवेरे का वक्त था। जाड़े ढल रहे थे। नीचे के कमरे में धूप की किरनें तिरछी पड़ रही थी । मैं जल्दी निवृत्त हो चुका था और उनकी एक पाण्डुलिपि देख रहा था । इतने ही में प्रेमचन्दजी ऊपर से पाए । पूछा, तुम नहा चुके ? मैंने कहा, नहा चुका । मुझे आज देर हो गई। कहते-कहते वह नीचे फ़र्श पर बैठ गए। शाम को रात तक चर्चा चलती रही थी कि सत्य का स्वरूप कहाँ तक स्थिर मानना होगा और कहां तक निरन्तर परि- वर्तनीय । उस थिरता और परिणमन में परस्पर क्या अपेक्षा है ? लोकाचार विकासशील है या नहीं, अथवा उसको निश्चित मर्यादा- - ४८ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व रेखाएँ और निश्चित आधार-तत्त्व हैं ? वही चर्चा किसी न किसी रूप में अब भी उठ पाई। वात-बात में प्रेमचन्दजी बोले, भाई जैनेन्द्र, यह किताव powerful (जबर्दस्त) है । कुछ दिन हुए रूसी उपन्यास 'यामा' उनके यहाँ देखा था। उसी की ओर संकेत था । मैंने तब तक वह पढ़ा न था । बोले, कही-कही तो जैनेन्द्र, मुझसे पढ़ा नहीं गया। दिल इतना बेकाबू हो गया । एक जगह आँसू रुकना मुश्किल हुया ।" देखता हूँ कि जैसे वह प्रंसग अव भी उनके भीतर छिड़ गया है और उसी प्रकार आँसू रुकना किसी क़दर मुश्किल हो रहा है । वोले, उस जगह मुझसे आगे पढ़ा ही न गया, जैनेन्द्र, किताव हाथ से छूट गई । और पुस्तक के उस प्रंसग का वह अनायास ही वर्णन करने लगे। मैं सुनता रहा। धूप कमरे में तिरछी आ रही थी। उनके चेहरे पर सीधो तो नहीं पड़ रही थी फिर भी वह चेहरा सामने पड़ता था और उजला दीखता था । मैं कानों से सुनने से अधिक उस कथा को आँखों से देख रहा था । प्रसग बेहद मार्मिक था। प्रेमचन्दजी, मानो अवश- भाव से, आपा खोए-से कहते जा रहे थे। सहसा देखता हूँ, वाक्य अधूरा रह गया है । वाणी काँपकर मूक हो गई है । आँस उठाकर देखा-उनका चेहरा एकाएक मानो राख की भाँति सफेद हो आया है । क्षण-भर में सन्नाटा हो गया। मुझे जाने क्या चीज छू गई । पल-भर में मानो एक मूर्छा व्याप गई । और पल बीते-न-बीते मैंने देखा, प्रेमचन्द का सौम्य मुख एकाएक बिगड़ उठा है । जैसे भीतर से कोई उसे मरोड़ रहा हो । जबड़े जकड़ पाए, मानो कोई भूचाल उन्हे हिला गया। सारा चेहरा तुड़-मरुड़कर जाने कैसा हो चला। और फिर देखते-देखते उन प्रांपों मे तार-तार प्रामू भर उठे ! अांसू पाने के साथ चेहरा फिर गान्त हो गया था, पर भामू भर-भर कर रहे थे ।
प्रमचन्द : मैंने यथा जाना और पाया यह क्या काण्ड हो गया ! मानो प्रेमचन्दजी बहुत ही लज्जित थे । लड़खड़ाती वाणी में बोले, जैनेन्द्र..! आगे उनसे वोला न गया। मानो वह जैनेन्द्र से क्षमा मांगना चाहते थे । उनका अपने ऊपर से काबू विल्कुल टूट चुका था । आंसू रुकना न चाहते थे। मोह, कहीं हिचकी ही न बंध जाए । किन्तु मिनट-दो मिनट में वह प्रकृतिस्थ हुए । गालों और मूंछों पर से टपकते अाँसुओं को उन्होंने पोंछा नही । एक क्षण लज्जित मुस्कान में मुस्काए । कठिनाई से बोले, मुझसे आगे नहीं पढ़ा गया, जैनेन्द्र ! यह व्यक्ति, जो जाने किन-किन मुसीबतों से हंसता हुआ निकल आया है, जो अपने ही दुःख के प्रति इतना निर्मम रहा है, वह पुस्तक के कवि-कल्पित पात्र के दुःख के प्रति इतना तादात्म्य अनुभव कर सकता है कि ऐसी अवशता से रो उठे ! मेरे लिए यह अनुभव अनूठा था । इसके प्रकाश में में देख सका कि प्रेमचन्द की अन्तःस्थ वृत्तियां कितनी सूक्ष्मस्पर्शी है । जो काल के दुर्धर्ष थपेड़ों में अचल रहेगा यही किसी की सच्ची वेदना, सच्चे त्याग पर एकाएक गल- कर किस भांति वह भी सकता है-मैंने तब जाना । पुस्तक के उस प्रसंग की बात यहां न हो सकेगी। साधारणतया वह इतना बीभत्स, इतना अश्लील मालूम होता था ! पर उस प्रकार की विपम स्थिति में घिरी हुई, ढंकी हुई वहाँ थी एक प्रकार की आध्यात्मिक सौन्दर्य को झलक । अंधेरे में थी इसलिए मानो उसकी चमक और भी उज्ज्वल थी। प्रेमचन्दजी की आँख उसी पर पहुंची और मुग्ध हो गई। मानवीय भावनाओं का, परनिमित स्नेह का, दैन्य प्रेमचन्दजी में न था। जिसको कलाकार समझा और जाना जाता है उसमें इसकी सम्भावना ही रहती है । कलाकार इतना आत्म-ग्रस्त हो जाता है कि औरों के प्रति निरपेक्ष वृत्ति धारण कर ले । प्रेमचन्दजी प्रात्म- ग्रस्त न थे । वह वल्कि परव्यस्त थे ।
५० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व प्रेमचन्दजी ने एक बड़ी दिलचस्प प्रापबीती सुनाई। एक निरं- कुश युवक ने किस प्रकार उन्हें ठगा और किस सहज भाव से वह उसकी ठगाई में आते रहे, इसका वृत्तान्त बहुत ही दिलचस्प है । पहले-पहल तो मुझे सुनकर अचरज हुआ कि मानव-प्रकृति के भेदों को इतनी सूक्ष्मता से जानने और जताने वाला व्यक्ति ऐसा अजब धोखा कैसे खा गया। लेकिन मैंने देखा कि जो उनके भीतर कोमल है, वही कमजोर है । उसको छूकर आसानी से उन्हें ऐंठा जा सकता । उसी उनकी रग को पकड़ कर उस चालाक युवक ने प्रेमचन्द- जी को ऐसा मुंडा कि कहने की बात नहीं । सीधे-सादे रहने वाले प्रेमचन्दजी के पैसे के वल पर ऐन उन्हीं की आँखों के नीचे उस जवान ने ऐसे ऐश किए कि प्रेमचन्दजी आँख खुलने पर स्वयं विश्वास न कर सके थे। प्रेमचन्दजी से उसने अपना विवाह तक करवाया, वहू के लिए जेवर वनवाए, और प्रेमचन्दजी सीधे तौर पर सब-कुछ करते गए। कहते थे, भई जैनेन्द्र, सर्राफ़ को अभी पैसे देने वाली हैं । उससे जो सोने की चूड़ियाँ बहू के लिए दिलाई थी, उनका पता तो शिव- रानी देवी को भी नही है । अब पता देकर अपनी शामत ही बुलाना है । पर देखो न जैनेन्द्र, यह सव फ़रेव था । वह लड़का ठग निकला। अव ऊपर-ही-ऊपर जो दो-एक कहानियों के रुपये पाता हूँ उससे सर्राफ़ का देना चुकता करता जाता हूँ ! देखना, कही घर में न कह देना । मुफ्त की अाफ़त मोल लेनी होगी । बेवकूफ़ बने तो उस वेवकूफ़ी का दण्ड भी हमें ही भरना होगा ! उस चतुर युवक ने प्रेमचन्दजी की मनुष्यता को ऐसे झांसे में लिया और उसे ऐसा निचोड़ा कि और कोई होता तो उसका हृदय हमेशा के लिए हीन और कठिन और छूछा पड़ गया होता । पर प्रेमचन्दजी का हृदय इस धोखे के बाद भी मानो और धोखा खाने की क्षमता रखता था। उस हृदय में मानवता के लिए सहज विश्वास प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया की इतनी अधिक मात्रा थी। सन्देह नहीं कि कड़वे और तीखे अनुभव-पर-अनुभव पाते रहने के कारण स्वभाव में वह कुछ कठिन और अनुदार और शंकाशील भी हो चले थे । फिर भी मानो उनका सहज प्रौदार्य अनायास उनकी अनुभव-कठिन समझदारी पर विजय पा लेता था। यहाँ उनके साहित्य की विवेचना अभीष्ट नहीं है । उस साहित्य के स्रष्टा साहित्यकार को ही समझने की इच्छा है। हरेक के लिए एक चीज़ ज़रूरी है । वह है, असंलग्नता । काल का जो प्रवाह हमारे सामने होकर चीजों को अदलता-बदलता चला जा रहा है, मनुष्य उस प्रवाह का शिकार ही नही है, वह उसके प्रति यत्किचित् असंलग्नता धारण करके कुछ निर्माण भी करता है। अर्थात्, अपनी ओर से उस प्रवाह को कुछ दिशा भी प्रदान करता है। मनुष्य इसी शक्ति के कारण मनुष्य है। अन्यथा वह पूर्णतः प्राणी ही रहता । तटस्थ होकर घटनाओं को और व्यक्तियों को और तत्वों को देखने की यह शक्ति प्रेमचन्द में प्रचुर मात्रा में थी। उनके विश्वास नुकीले न थे । वह दूसरों पर अपना आरोप करके देखने के मोह में न थे । जो जहाँ था उसको वहीं रहने देते थे । मानो उसको उसी की आंखों से देखना चाहते थे । कलाकार का यही इष्ट है । वह सवको उन्ही के भीतर से देख सके तो और क्या चाहिए ! प्रेमचन्द जी इस इष्ट की साधना में असावधान न थे। इसी दृष्टि का विकास अध्यात्म की समत्व-दृष्टि है । .... 'ब्राह्मणे गवि हस्तिनि, शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।' काल में रहकर भी कालातीत स्थिति में अपने को अनुभव करने की यह साधना बहुत हितकारी है। मर्त्यलोक में भी यही साधना अमरता की ओर ले जाती है । प्रेमचन्दजी के साहित्य में प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व पाई जानेवाली विविधता; सव पायों के प्रति लगभग समान भाव से होनेवाला न्याय; उसमें व्याप्त सहानुभूति ; उस साहित्य की प्रासादिकता और मनोरंजकता-सव इसी साधना के फल हैं । इस साधना के अभाव में स्वप्न निरा स्वप्न हो जाता है और यथार्थता के साथ उसका विरोध तीव्र से तीव्रतर होता चला जाता है । वैसी साधनाहीन कल्पना में से रोमांटिक (रंगीन) साहित्य का जन्म होता है, उसके मूल में यथार्थ को कठोरता, अप्रियता से हठात् कटने की प्रवृति है । वह दुर्वलता की द्योतक है । मैं मानता हूँ कि आधु- निक हिन्दी-साहित्य में प्रेमचन्द पहले प्रणेता हैं जो यत्नपूर्वक यथा- र्थता से बचने के लिए रोमांस को गली में भूलकर मौज करने नहीं गए । रोमांस को उन्होंने छोड़ ही दिया, सो भी नहीं । उस अर्थ में रोमांस कभी छूटता भी नहीं । कोई लेखक कल्पना को कैसे छोड़ सकता है ? कल्पना बिना लेखक क्या? लेकिन अपने हृद्गत रोमास को उन्होंने व्यवहार पर, वास्तव पर, घटाकर देखा और दिखाया। उन्होंने यथार्थ को ही आदर्श की अोर उभारने की कोशिश को । उनके साहित्य की खूबी यह नहीं है कि उनका प्रादर्श अंतिम है, अथवा सर्वथा स्वर्गीय है । उसको विशेषता तो यह है कि उस आदर्श के साथ व्यवहार का लगाव है, निरी निरपेक्षता नही है । वह आदर्श स्वय में कम ऊँचा है तो इसलिए भी कम ऊँचा है कि वह नीचे वालों को ऊपर उठाकर उनके साथ-साथ रहना चाहता है । इस समन्वय की पुष्टता के कारण वह पुष्ट है। एक बात और याद रखने की है । प्रेमचन्द जब साहित्य में पाए तो वह साहित्य, सर्वथा नहीं तो अधिकांश अवश्य, व्यक्ति के लिए एक शगल था, मनोविनोद का एक साधन और व्यापार था । प्रेमचन्दजी प्रारम्भ में उसके प्रति इसी नाते की धारणा पर साहित्य में प्रविष्ट हुए। शनैः-शनैः ही साहित्य के प्रति उनके मनोभाव उत्तरोत्तर गम्भीर और दायित्वपूर्ण होते गए। अपने साथ वे हिन्दी पाठक को भी उस प्रकार की मनोवृत्ति में उठाते चले गए। हमको त प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया यह याद रखना चाहिए कि 'चन्द्रकान्ता-संतति' या नरेन्द्रमोहिन।। के पाठक से उन्होंने प्रारम्भ किया था। उस पाठक के भरोसे वह लेखक बने । पर उसके विकास के लिए ही था कि उन्हें लेखक बने रहना था । पाठक वही था लेकिन उसे 'भूतनाथ' से 'गोदान' तक ले चलना था । प्रेमचन्द के इस ऐतिहासिक दायित्व को भूलने से न चलेगा। महावीरप्रसाद द्विवेदी को विवेचक पाठक से काम पड़ा। वह काम इतना गुरु-गम्भीर न था। उसमें विवाद से और तर्क से और योग्यता से काम चल सकता था। अधिक-से-अधिक वह इस या उस तर्क-धारा, विचार-धारा को मोड़ने का काम था। पर प्रेम- चन्द के जिम्मे तो समूचे व्यक्तित्व को, समूचे हिन्दी-वर्ग को, एक तल से उठाकर दूसरे संस्कारी तल तक ले चलने का काम आया। वह काम समूचे व्यक्तित्व, समूची आत्मा, को माँगता था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी को एक विशेष परम्परा प्रदान की । रूढ़ शिथि- लता से उवारकर भारतेन्दु ने हिन्दी को कुछ खुली हवा लगने दी। पर उन परम्परागों की अपर्याप्तता, अनुपयुक्तता इधर प्रकट हो चली थी । भारतेन्दु के साहित्य में जीवन मानो नाटकीय रंगस्थली है । पर बीसवीं सदी का विज्ञान और वितर्क-संकुल जीवन उससे अधिक जटिल चीज़ हो चली। हिन्दी को उस भारतेन्दु की साहित्य- परम्परा से आगे बढ़कर इस जीवन-जटिलता का और उसके वैविध्य-वैषम्य का आकलन करने में समर्थ होना था । यह काम परम्परा को तोड़ने से न होता । परम्परा टूटती नही है, टूट सकती ही नहीं है : उसको पचाकर आगे बढ़ा जाता है। उसी को विस्तृत किया जाता है, उभारा जाता है। यह काम आलोचना-विलोचना के बस का नहीं है । यह काम स्रष्टा का है, उसके लिए है। साहित्यिक परम्पराओं का निर्माण और संस्कार इतना अधिक विधायक कर्म है कि ध्वसेच्छा अयवा सुधाराग्रह उसके लिए असंगत वृत्ति है । उसके लिए तो अपने सम्पूर्ण जीवन का निवेदन ही चाहिए । इस युग में प्रेमचन्दजी के ऊपर यह दायित्व पाया और प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व उन्होंने निवाहा, ऐसा मेरा विश्वास है । मनोविनोद से उठते-उठते हम साहित्य के प्रति एक अधिक घनिष्ठ-भाव, एक दायित्व-भाव तक आ गए है और प्रेमचन्दजी ने हिन्दी पाठक-लेखक के इस मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण योग दिया है । उनको रचनाओं को निर्माणकाल के अनुक्रम से देखने पर स्पष्टता से पता चलता है कि वह आगे बढ़ते हुए समय का साथ देने में अपने को लांघने से भी नही चूके । कहीं वह राह में ठहर नहीं गए, साथ देते ही गए । जो उनकी पहली कहानियां और पहले उपन्यास है, वह पिछली कहानियां और पिछले उपन्यास नहीं हैं- इसका कारण यही है कि वह प्रगति से पिछड़ने को तैयार न थे । जब कहानियों में मनोविज्ञान की धुन प्रारम्भ हुई तब वह उस नई मांग और नये फैशन के प्रति अवज्ञाशील नहीं हुए । जव और जिस तरह की नई जिज्ञासा, नई मांग, पाठक में जगी तव प्रेमचन्द भी उसके प्रति जागरूक और उत्तर में तत्पर दीखे । युग के प्रतिनिधि लेखक के यही लक्षण हैं । वह निरन्तर वर्द्धमान, निरन्तर परिण- मनशील है । उन्होंने पाठक को बिछुड़ने नहीं दिया, उसको सँभाले ही रखा । इसमें पाठक असन्तुष्ट भी हुआ तो हो, प्रेमचन्दजी उसके हित को अपने मन से भुलाने वाले न थे। यही कारण है कि 'सेवासदन' की सुसम्पूर्णता और सुसम्बद्धता 'गोदान' में नहीं है । 'गोदान' चित्र की भाँति असमाप्त और काल-प्रवाह के समान थोड़ा- वहुत अनिर्दिष्ट है । पिछली रचनाएँ पहली की भाँति नैतिक उद्देश्य के ढंकने से ढंकी सुरक्षित और वन्द नही है, मानो कही अनāकी और खुली रह गई है. इसका कारण यही है । पाठक आदेश नही चाहता, निर्देश नहीं चाहता, विस्तृति और जागृति केवल चाहता है । तो प्रेमचन्दजी भी पिछली रचनाओं में निर्देश नहीं देंगे, उन्मुक्त विस्तार देंगे। 'सब्जेक्टिव' प्रात्मलक्षी, दृष्टि से प्रेमचन्दजी अपनी साहित्य- सृष्टि में निरन्तर गतिमान और प्रगतिशील रहे है । अपने भीतर प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया जीवन का प्रवाह उन्होंने रुकने नहीं दिया। ऑब्जेक्टिव, पदार्थापेक्षी, दृष्टि से मैं उनके साहित्य पर विचार भी नहीं करना चाहता हूँ। इस लिहाज से किसी को कोई रचना अच्छी लग सकती है और दूसरा किसी दूसरी रचना पर अटक सकता है। लेकिन उस माप से प्रेमचन्द के साहित्य का विभाजन उपयोगितापूर्वक किया जाएगा सही, पर उस भाँति उस प्रेमचन्द के तत्त्व को पहुंचना दुप्कर होगा जो उस समूचे साहित्य को एकता की सम्भावना देता है और जो उस सृष्टि का मूल है। [११] प्रेमचन्दजी भौतिकवादी नहीं, बुद्धिवादी थे। उनका आधार विवेक अर्थात् विभेदविज्ञान था । फिर भी आज के युग की पच्छिमी प्रवृत्ति से उनको आशंका थी। उनके जीवन में, उनके साहित्य में, उस आशंका के लक्षण अति प्रगट हैं, और उसके प्रति खुली चेता- वनी और खुली चुनौती है । उसमें घोपित है कि प्राण शक्ति में नहीं, सेवा में है । महिमा उद्दण्ड विभूति में नही, शान्त समर्पण में है । सिद्धि सुख पर ईर्ष्या करने में नहीं, वेदना के साथ सहानुभूति करने में है । सोशल पॉलिटी का समाधान शहर में नही, गाँव में है। बहुत-कुछ चारों ओर बटोर कर संग्रह करने से जीवन का स्वास्थ्य बढ़ेगा नहीं, घटेगा । उपयोगिता भी बढ़ेगी नहीं, घटेगी। और प्रान्तरिक मानन्द तो इस भांति घिरकर, घुटकर, पीला और निष्प्राण हो ही जाएगा। [१२] मुझे एक अफ़सोरा है । वह अफ़सोस यह है कि मैं उन्हें पूरे अर्थों में शहीद क्यों नहीं कह पाता हूँ। मरते सभी है। यहां वचना किमको है ! भागे-पीछे सवको जाना है । पर मौत शहीद की ही सार्थक है, क्योंकि वह जीवन की विजय को घोपित करती है। । ।
५६ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व आज यही ग्लानि मन में घुट-घुटकर रह जाती है कि प्रेमचन्द शहादत से क्यों वंचित रह गए ? मैं मानता हूँ कि प्रेमचन्द शहीद होने योग्य थे। उन्हें शहीद ही बनना था। और यदि नहीं बन पाए हैं वह शहीद, तो मेरा मन तो इसका दोप हिन्दी-संसार को भी देता है। मरने से एक सवा महीने पहले की बात है। प्रेमचन्द खाट पर पड़े थे । रोग बढ गया था, उठ-चल न सकते थे । देह पीली, पेट फूला, पर चेहरे पर शान्ति थी। मैं तव उनकी खाट के वरावर काफ़ी-काफ़ी देर बैठा रहा हूँ। उनके मन के भीतर कोई खीझ, कोई कड़वाहट, कोई मैल उस समय करकराता मैंने नहीं देखा। देखते तो उस समय वह अपने समस्त अतीत जीवन पर पीछे की ओर भी होगे, और आगे अज्ञात में कुछ तो कल्पना बढ़ाकर भी देखते ही होंगे। लेकिन दोनों को देखते हुए वह सम्पूर्ण शान्त भाव से खाट पर चुपचाप पड़े थे । शारीरिक व्यथा थी, पर मन निर्विकार था । ऐसी अवस्था में भी (वल्कि, ही) उन्होंने कहा : जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय याद किया करते है ईश्वर । मुझे भी याद दिलाई जाती है । पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम . शब्द हौले-हौले थिरता से कहे गए थे और मैं इस अत्यन्त शान्त नास्तिक सन्त की शक्ति पर विस्मित था। मौत से पहली रात को मैं उनकी खटिया के बराबर बैठा था। सवेरे सात बजे उन्हें इस दुनिया पर अाँख मीच लेनी थी । उसी सवेरे तीन बजे मुझसे बातें होती थी। चारो ओर सन्नाटा था। कमरा छोटा और अंधेरा था। सव सोए पड़े थे । शब्द उनके मुंह से फुसफुसाहट में निकलकर खो जाते थे। उन्हें कान से अधिक मन से सुनना पड़ा था। तभी उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरे सामने कर दिया । बोले, பு
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५७ , लगा। - बोलकर, चुप, मुझे देखते रहे । मैंने उनके हाथ को अपने दोनों हायों से दवाया । उनको देखते हुए कहा, आप कुछ फिकर भव मुझे देखते रहे, देखते रहे । फिर बोले, प्रादर्श से काम वाल, वहस न करो-वाकर करवट लेकर मां मींच ली। प्रसार-प्रकार की चिन्ता-दुश्चिन्ता उस समय प्रेमचन्दजी मेमाणों उस समय मेरे मन पर व्यया का पत्थर ही मानो र गया। परामदालकर बैठी हुई थी। में या कोई उसको उस समय पिगी नाह नहीं बंटा सकता था । चिन्ता का केन्द्रयही था कि हम में बामान उनके मन में थी मोर 'हंस ने शियेगा, महमपना' मेगा? नहीं चलेगा तो मया होगा ? 'हंग' के लिए राम मौनीने प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया दाव दो। हाथ पीला क्या, सफेद था और फूला हुआ था । मैं दावने वह बोले नहीं, आँख मीचे पड़े रहे । रात के बारह बजे 'हंस' की बात होकर चुकी थी। अपनी आशाएँ, अपनी अभिलापाएँ, कुछ शब्दों से और अधिक आँखों से वह उस समय मुझ पर प्रगट कर चुके थे । 'हंस' को और साहित्य की चिन्ता उन्हें तब भी दवाए यो । अपने बच्चों का भविष्य भी उनकी चेतना पर दबाव डाले हुए था । मुझमें उन्हें कुछ ढारस था । अब तीन बजे उनके फूले हाथ को अपने हाथ में लिये मैं सोच रहा था कि क्या मुझ पर उनका ढारस ठीक है। रात के बारह बजे मैंने उनसे कुछ तर्क करने की धृष्टता भी की थी। वह चुभन मुझे चुभ रही थी । मैं क्या कहूँ ? क्या करूँ ? इतने में प्रेमचन्दजी बोले : जैनेन्द्र ! में वोजिए बाबूजी । आप अब अच्छे हुए । और काम के लिए हम कहना चाहा, आदर्श- : सब लोग हैं ही। नहीं चलेगा-
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
असह्य थी। पर हिन्दी-संसार का अनुभव उन्हें आश्वस्त न करता
था । 'हंस' के लिए जाने उस समय वह कितना न झुक-गिरने को
तैयार थे।
मुझे योग्य जान पड़ा था कि कहूं, 'हंस' मरेगा नहीं। लेकिन
वह विना झुके भी क्यों न जिए ? वह आपका अखवार है, तब वह
बिना झुके ही जियेगा।
लेकिन मैं कुछ भी न कह सका और कोई प्राश्वासन उस
साहित्य-सम्राट को पाश्चस्त न कर सका।
थोड़े देर में बोले, गरमी बहुत है, पंखा करो।
मै पंखा करने लगा। उन्हें नीद न पाती थी, तकलीफ बेहद
थी। पर कराहते न थे, चुपचाप आँख खोलकर पड़े थे ।
दस-पन्द्रह मिनट बाद वोले, जैनेन्द्र, जामो, सोयो !
क्या पता था अब घड़ियाँ गिनती की शेप है । मैं जा सोया ।
और सवेरा होते-होते ऐसी मूर्छा उन्हें आई कि फिर उससे
जगना न हुआ।
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हिन्दी-संसार उन्हें तव आश्वस्त कर सकता था, और तब नहीं
तो अब भी आश्वस्त कर सकता है । मुझे प्रतीत होता है, प्रेमचन्द
जी का इतना ऋण है कि हिन्दी संसार सोचे, कैसे वह आश्वासन
उस स्वर्गीय आत्मा तक पहुँचाया जावे !
[दो]
प्रेमचन्द को गए अब पन्द्रह वर्ष होते हैं । लेकिन मन को यह
समझाना मुश्किल है कि वह अब स्वर्ग के हैं, हमारे समाज और
जमाने के नही है । सच तो यह है कि उन्हें उठाकर काल ने ग़लती
ही की है। न उनकी उम्र इतनी थी, न किसी तरह वह समय से
पीछे थे । थे तो एक कदम आगे थे और मौजूदा हालतों में शायद
वह अाज पहले से भी ज्यादा सही और जरूरी सावित होते ।
: प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया मेरी पहली मुलाकात उनसे सन् '२६ में हुई । जाड़ों के दिन थे । कुम्भ का मेला पूरा हुआ ही था । वनारस से गाड़ी लखनऊ- स्टेशन पर कोई चार वजे पा लगी थी। तड़का फूटते-फूटते में उनके लाल मकान पर जा पहुंचा, लेकिन यह पहुँचना आसान न हुआ । सोचता था कि नामवर आदमी है । लाल मकान का पता अपने पास है ही । एक बच्चा तक जगह बता देगा । पर यात उतनी सीधी न निकली । एक डेढ़ घण्टा मुझे लगा अमीनाबाद के पास के उस लाल मकान को पाने में और मालूम हुआ कि आत्मा की और हृदय की और दिमाग की ऊँचाई और दुनियादारी की वड़ाई एक चीज नहीं है । शायद दोनों अलग और समानान्तर है। मकान के जीने के नीचे से आवाज देने पर जब ऊपर प्रेमचन्द प्रकट हुए तो सहसा मन को धक्का लगा । वह रूप देवोपम नहीं मालूम हुआ, और मैं कुछ वैसी ही आस बाँधे था। आगे आए बालों से माथा ढका हुआ, धनी बड़ी मूंछे, करीब घुटनों तक बँधी धोती, कन्धों पर लाल किनारी की घिसी-पिटी चादर । कुल मिलाकर जो दृश्य आँखों के सामने पड़ा वह निश्चय ही मनोहारीन था। लेकिन देखते-देखते वह व्यक्ति लपककर जीने से नीचे आया, फौरन मेरे हाथ से सामान की छोटी-मोटी चीज छीनी, और मुझे इस तरह ऊपर ले चला कि मैं समझ ही न सका कि मैं यहाँ अजनबी हूँ, या क्या । ऊपर दालान में एक तरफ मिट्टी का ढेर था, पानी की एक मोटी लकीर कर्ण वनाती हुई इस कोने से उस कोने को मिला रही थी। सहन के बराबर वाले कमरे में, जिसमें हम दाखिल हुए और बैठे, किताबें और कापियाँ मैज-मूढ़ों पर वे-तरतीब खड़ी या पड़ी थीं और स्याही के धब्बे भी वहाँ होने के लिए हर प्रकार स्वतन्त्र थे। कितावों को झट इधर-उधर सरकाकर मेरे लिए मूढ़े पर जगह हुई और हम लोग गप करने बैठ गए ऐसे कि जैसे कल के दोस्त हैं । मैं कच्ची उम्र का अनाड़ी लड़का, वह एक पहुंचे हुए बुजुर्ग । साहित्य के वह सम्राट्, उसी के तट पर आकर झिझक के साथ - प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व झाँकने वाला उत्सुक में । पर प्रेमचन्द की सहृदयता में काल-वय का यह फर्क कोई अन्तर नहीं डाल सका । मैं तक अपनी हीनता भूल गया, और असम्भव नही कि चर्चा में उस समय कुछ अनधि- कृत वात तक में कह गया होऊँ । कव नौ बज गए, पता न चला । आखिर अन्दर से आवाज़ आई कि दिन इतना चढ़ गया, दवा नहीं लाकर दी जाएगी! तव वह दुनिया की तरफ़ जागे और जल्दी से पैरों में स्लीपर डाल, ताक से शीशी खीच, नुस्खा तलाश दवा लेने दौड़े। कहा, तुम इतने में हाथ-मुंह धोयो, मैं अभी पाया । प्रेमचन्द का रूप यह था और सब जगह, सब समय, शायद यही रहता था । दुनिया में कुछ कृत्रिमता भी चाहिए, ज्यादा खुले और हार्दिक रहने का यहाँ कायदा नही है । जान पड़ता है प्रेमचन्द को दुनिया के इस जरूरी कायदे का खयाल नहीं था और दिमागी तौर पर अगर था भी तो अमल में वह उसे साथ नहीं रख पाते थे। खा-पीकर बोले, चलो जैनेन्द्र, दपतर चलें । मकान से उतर कर मैने देखा कि हजरत ने अमीनावाद से तांगा नहीं लिया, इक्का किया । मै एक अच्छे से तांगे को देखकर बातचीत करना चाहता था, पर वह बोले-नहीं, इक्के से चलेंगे । तांगा हमें खीचता है, इक्के पर हम सवार होते है । कोई वात हुई कि मुंह हमारा इधर है और खिच हम पीठ की तरफ रहे हैं । अपनी चीज तो इक्का है । कहकर कहक़हा लगाया और एक इवके वाले को इस तरह सम्बोधन किया मानो वह इनका कोई जिगरी दोस्त है । दफ्तर में पहुंचकर और बैठकर भी कोई दफ्तरीपन उन ने चढ़ा नहै, हम भी प्रेमचन्द : मने क्या जाना और पाया . था, ईश्वरीप्रसाद उसके लिए चित्र तैयार करके लाए थे, और उसी दिन टॉल्स्टॉय के ग्रन्थों का अनुवाद लेकर रुद्रनारायण वहाँ पाए थे। दोनों के प्रति उनका व्यवहार देखकर मुझे अचम्भा हुआ। मानो कि प्रेमचन्द दूसरे के प्रति अपने बर्ताव में अपनी खुदी को बाद दे देते थे । याद पड़ता है, इस पहले ही मौके पर मैं उनसे पूछ बैठा कि अखवार को नौकरी में पड़ने की ऐसी क्या मजबूरी उन्हें थी ? छोड़िए, छुट्टी लीजिए। आप की कलम क्या आपके लिए सब-कुछ नहीं हो सकती ? इस सवाल पर वह ताज्जुब से मेरी तरफ़ देखने लगे । समझ गये कि में अनुभव से कोरा हूँ। पर नाराज नहीं हुए, जिन्दगी की अपनी लम्बी दास्तान ले बैठे । बताया कि कैसे एक नौकरी से दूसरी नौकरी में गए, इस मुरिसी से वह मास्टरी की। आखिर प्रेस खोला; प्रेस से तंग आकर उसमें ताला डाल घर बैठे। बोले, सुनो एक जगह से पांच सौ रुपये आने वाले थे, पर दिन इन्त- जार दिखाए जाते थे । अाखिर एक दिन ढाई सौ रुपये पहुँच ही गए । सव नोट ज्यों-के-त्यों मैने श्रीमती के हाथ में दिए । उन्होंने पूछा, कितने है ? मैने कहा, ढाई सौ। झल्लाकर बोली, ढाई सौ ! और जोर से हाथ को झटककर उन्होंने सारे नोट दालान में फेंक दिये, और मुझे उस वक्त वह खरी-खरी सुनाई कि क्या बताऊँ । तंगी में दिन गुजर रहे थे, सो तो था। लेकिन तव पास तो लगी थी पांच सौ की रकम पर। उसकी जगह जो पाये ढाई-सौ तो पत्नी का धीरज छूट गया । पब्लिशर को कोई क्या कहता, सब तीखा-तुर्श मुझको सुनना पड़ा। उसके बाद जो इस जगह का माफ़र मिला तो मैंने झट क़बूल कर लिया । बताओ, तुम क्या नहीं करते ? अब रोज़-रोज का तो रोना नहीं है ! दिल्ली लौटने के बाद फिर खतो-किताबत का सिलसिला शुरू हो गया । दूसरी मर्तबा मिलना हुआ तो कुछ बड़ी मजेदार बातें - प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व । - हुई। उस समय उन्होंने मकान वदल लिया था । एक दूसरे मित्र भी तव लखनऊ में रहते थे। उनसे वात हुई कि चलो, प्रेमचन्द के यहाँ चलें। नौकर को हुक्म हुग्रा कि सवारी लाये। उसने इक्का लाकर खड़ा किया। मित्र ने डांटकर कहा कि वदशऊर, देख के सवारी ला। दुवारा अच्छा समझकर एक तांगा ले आया । मित्र की रुचि के लायक वह भी न निकला। आखिर एक फेन्सी रईसी वग्धी लाई गई। मित्र ने रेशमी शेरवानी पहनी, उसकी जोड़ का चुस्त पाजामा, बढ़िया पालिश की शू और सफेद झकझकी टोपी वॉकी करके लगाई । अव चले प्रेमचन्द के यहाँ । वहाँ दरवाजे के पास आते है तो देखते क्या है कि वग़ल से उसी वक्त दबादव लपके चले आ रहे है प्रेमचन्द । वग़ल में छतरी है, दूसरे हाथ में झोला। झोले में से ताजा साग-सब्जी झांक रही हैं । बदन पर खाली एक कुर्ता, धोती उसी नमूने की ऊँची बँधी हुई । साफ़ था कि क़दमों से लम्बी राह नापते आ रहे है । उस दृश्य के ये दो विरोधी नमूने मुझे भूलते नहीं है ! उसी कयाम में मैने पूछा, यह वताइये कि आपको कभी अप- घात की भी सूझी है ? या सूझती है ? वोले, कई वार । और एक तो अभी कुछ महीने की बात है। फिर आपने अपने जीवन का एक किस्सा सुनाया । सवेरे बीवी से कुछ कहा-सुनी हो गई और तय किया कि प्राज मर जाना होगा। दिन-भर घूमते रहे कि आज किसी तरह घर वापस लौटना नहीं है, मरके छोड़ना है। मगर यों नहीं, वालंटियर जो पिकेटिंग करते है वही चुपचाप किसी जत्थे में घुसकर पुलिस की लाठी से सिर तुड़वाकर मरना ठीक होगा। दिन-भर इस कोशिश में भटके, पर सिर कहीं टूटा ही नही। शाम होने के बाद तीन घण्टे अकेले सन्नाटा मार एक बाग में बैठे रहे । पर मौत बेशर्म आई ही नहीं। आखिर देसा कि ग्यारह बज रहा है और वह उन्हीं क़दम घर वापस आ प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया प्रेमचन्द की हस्ती की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह हर तरफ़ से साधारण थे । इस तरह वह जनता और जैन के प्रतिनिधि थे। खास तो हर कोई बनना चाहता है, आम लोगों में मिलकर खुद उन-जैसा रह पाना कोई नहीं चाहता । प्रेमचन्द की जैसे वही साधना थी। और इसके लिए मेरे जैसा आदमी उनका जितना कृतज्ञ हो, थोड़ा ही जान पड़ता है। [तीन ] प्रेमचन्दजी पहली बार दिल्ली प्राए शायद सन् १६३१ में उससे पहले इकठे साथ रहने का मौका हमें नहीं आया था। लखनऊ एक-दो बार मिलना हुआ था या वनारस एक-आध रोज साथ रह लिए थे। अब तक मेरी निगाह में वह लेखक थे । यहाँ जब साथ रहे तो यह ऊपरी रूप कही बीच में नहीं रह गया । खाना खाने साथ बैठते और बाद में भी नीम की सींक से दाँत कुरेदते हुए वे मेरे साथ ही बैठकर बात करते रहते । उस वक्त दो बुजुर्ग घर में और थे। प्रेमचन्दजी की जगह उनके साथ थी। वे ऊँचे ख्याल के लोग थे और छोटी बातें अक्सर उनके पास नहीं फटक पाती थीं। वार्ते देश की और दुनिया की होती, सुधार की और उद्धार की, या किसी नीति के या तत्त्व के मसले की । मैं उन वातों के वीच अक्सर अजनबी रहता । अव्वल तो वहाँ रहता ही न था, पास हुआ तो वहस सुनता-भर रह जाता था। प्रेमचन्द का भी मैने यही हाल देखा । वात गहरी हो रही है और वजनदार, लेकिन प्रेमचन्द को सिर्फ़ सुनना है । कहने को उनके पास गोया कुछ है ही नहीं । इससे ज्यादातर वह उन बुजुर्गों में शामिल न होते और हम दो अलंग-थलग बैठे गपशप किया करते। कोई अनजान उन दिनों घर पहुँचता तो किसी तरह मालूम न कर सकता था कि प्रेमचन्द कौन हैं । उनका लिबास और उठने-बैठने, रहने-सहने, का तरीका इस कदर घरेलू था कि कोई उन्हें अलग से पहचान ही न सकता था।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
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से पूछने लगे-
"क्यों भई, वह बुखारी थे ?"
"हाँ।"
"बुखारी ! पतरस !!"
"नही।"
"तो फिर कौन थे?"
मैंने कहा, "आप तो इस क़दर तड़प के उनके साथ हमागोश
हुए और अब पूछते है !"
"मैंने समझा, वुखारी होंगे । लेकिन..." कहते-कहते वह रुके ।
मैंने हँसकर कहा, "लेकिन क्या ?"
बोले, "कोई अजव हजरत थे ! देखो न, ऐसे बढ़े चले आए
कि मैं उनका लॅगोटिया हूँ !"
मैंने कहा, "आपने उन्हीं से पूछा क्यों नही ?"
वोले, "क्या कहते भलेमानस से ! पर जी में तो पाया कि-"
इस तरह मौके को प्रेमचन्द हमेशा निभा लेते थे। लेकिन
दिमाग उनका इस किस्म की हर ग़फ़लत को बारीकी से रजिस्टर
करता रहता था। पर सिफ़त यह कि उसमें फंसते न थे। माना-
पमान अपना नहीं मानते थे और इस तरह की घड़ियाँ उनमें कोई
रंजिश या तपिश नही पैदा कर पाती थी। सिर्फ उनकी याद के
खाने में दर्ज होकर रह जाती थीं।
द्रष्टा और भोक्ता की यह भिन्नता थोड़ी-बहुत तो सबके लिए
जरूरी है । नही तो हम सदा शिकार बने रहें और खुद अपने तई
जी न पाएँ । हर चीज को मन में बसा लें और उस पर कुढ़ते रहें
तो घायल की-सी हमारी हालत रहे और जिन्दगी हमें रस न दे
पाए । लेकिन यह भिन्नता अक्सर काफ़ी हम में नहीं हो पाती।
प्रेमचन्द में वह पर्याप्त मात्रा में थी। दिमाग़ उनका चौकन्ना रहता
था और दिल भीतर सुरक्षित । सुरक्षित से मतलव निष्क्रिय नहीं।
बल्कि सहानुभूति उनमें हर समय जगी रहती थी। पर दिमाग बीच
प्रेमपन्द : मैंने क्या जाना और पाया में जवाब देकर झट हर चीज को शिकायत के तौर पर नीचे उतार भेजे, यह इजाजत वह दिमाग को न देते थे। इस तरह दुनिया में रहते भी उससे किसी सदर अलग-थलग रहे जाना उन्हें उतना मुश्किल न था । कहावत है : 'जल में कमल के समान' । यह योगी के लिए कहा जाता है । योगी का तो मुझे पता नहीं, पर प्रेमचन्द के साथ बहुत-कुछ मैंने घटता हुआ यह देखा है। यहाँ दिल्ली में हिन्दी के साहित्य सम्मेलन का जल्सा हुआ । बड़े-बड़े दिग्गज पधारे। प्रेमचन्द भी आए। यह अनहोनी बात थी, पर सच यह है कि असल सम्मेलन के लिए वह पाए न थे । मैंने लिखा था, इससे वात रखने को मागए थे। खैर, आ गए और जहाँ जिस ढव से ठहरा दिया गया ठहर गए । यानी पचासेक खाटों की लम्बी कतार के बीच एक उन्हें भी मयस्सर हुई । खासे रिफ्यूजी अस्पताल का-सा दृश्य था । अव रह रहे है तो रह रहे हैं । यहाँ कौन किसको शकल से पहचानने को बैठा है । आखिर नहाए-धोए और जहाँ मालूम हुआ कि खाने- पीने का इन्तजाम है, उधर बढ़कर गए तो वालंटियर ने कहा, "टिकट !" पर प्रेमचन्द के पास टिकट न था। उन्होंने पूछा, "कहाँ से मिलता है, भई टिकट ?" "पैसे से लेना हो तो उस खिड़की से मिलता है। वैसे दप्तर प्रेमचन्द खिड़की से टिकट ले आए और क्यू में खड़े हो गए। ठीक ऐसे ही वक्त मेरा उधर पहुँचना हुआ और उन पर निगाह गई । मैंने कहा, "हजरत, यह क्या ?" बोले, "क्यू में खड़े हैं टिकट लेकर।" मैंने उनको बाँह पकड़ कर वाहर खींचा कि जरा ती रहम कीजिए। वह वोले, "क्यों-क्यों ?" गोमा वह इसी लायक हैं कि अपार समझ जायें पोर टिकट- प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व पूर्वक खाना पायें। इसमें कहीं तनिक भी जैसे अयुक्त वात न हो! इस कथा के तीनों दृश्य जब चाहूँ मैं आँखों के सामने ले लेता हूँ और याद करता हूँ कि प्रेमचन्द क्या खूब आदमी थे ! [चार] प्रेमचन्दजी पर इतना लिखा गया है कि नया कुछ पाना और कहना मुश्किल है । लोगों ने किताबें लिखी हैं और प्रेमचन्दजी के बारे में भरसक ज्यादा-से-ज्यादा वातें मालूम करने की कोशिश की है। शोध और भी आगे होगी और वह जल्दी खत्म नहीं हो सकेगी। पर इस तरह वाहर से तरह-तरह की बहुत-सी बातों को जोड़कर वह व्यक्तित्व प्रत्यक्ष हो सकेगा जो प्रेमचन्द था, इसमें संदेह ही है । बात यह है कि हम वह वनाते हैं जो चाहते है । वही हमारा बनाया हुआ आदमी अपने वने हुए रूप में जीवित रखा जाता है। एक तरह यह अच्छा है । लेकिन अच्छाई ख़त्म हो जाती है जव उस टुकड़े-टुकड़े जोड़े हुए चित्र को हम बेहद यथार्थ कह कर पेश करना चाहते है। हमारी कृतज्ञता स्मरणीय व्यक्ति को तरह-तरह की महिमा से मण्डित करे तो अचरज नही है; यहाँ तक कि व्यक्तित्व घट जाए और उठाया आडम्बर ऊपर दीखने को रह जाए । निश्चय समाप्त होने पर व्यक्ति की उपयोगिता बढ़ती जाती है। वह स्वयं नही कह सकता, इससे सब-कुछ उनके नाम पर कहा जा सकता है । प्रतिष्ठित व्यक्ति, ऐसा जो बोल नही सकता, हमारी अपनी मत- मान्यताओं के लिए अच्छा प्राश्रय बन सकता है। हम जीवित लोग अपने स्वर्गीय महानुभावों को इस काम में लाएँ तो यह कुछ अन- होना न होगा। पर इसका श्रेय हम अपनी आसक्तियों को देते रहे तो ज्यादा अच्छा है। मन् '२६ में मेरा उनसे प्रत्यक्ष परिचय हुआ । सन् '३६ में निमचन्द : मैने क्या जाना और पाया उनका देहान्त हो गया। यह सात वर्ष का काल बहुत बड़ा नहीं कहा जा सकता । फिर जवकि दोनों के स्थानों में सैकड़ों मील का अन्तर हो । लेकिन यह कहना ग़लत न होगा कि इस वीच वह परिचय गाढ़ा होता गया और उसमें इतनी हार्दिकता रही कि कभी तो वह अभिन्नता-जैसी लग आई । भिन्नता थी और हर तरह का अन्तर था, लेकिन अभिन्नता की भूमि दूसरी है और ऊपरी बातें उसके लिए असंगत होकर अलग ही छूट जाती हैं । कभी ऐसा नहीं हुआ कि हमें असहमत न होने, या सहमत होने, की आवश्यकता जान पड़ी हो। कभी नहीं हुआ कि साहित्य की चर्चा या उसके तत्त्वों का प्रतिपादन बीच में आवश्यक हुअा हो । मति और सम्मति सदा उनके निकट ऐसी चीज रही जो सबकी अपनी-अपनी हो सकती है और होनी चाहिए। कभी उन्होंने अपनी सम्मति थोपी नहीं । न कभी उसका प्रकाश करने में उन्होंने मुलाहिजा बरता। यह वात ही थी जो मुझे प्रेमचन्दजी के इतने निकट तक ले गई । वह जैसे अपेक्षा में किसी को न लेते थे । एकाएक को स्वयं रहने देने के लिए तैयार और उसको उसी के अपने रूप में समग्र भाव से स्वीकार करने को तत्पर थे। साहित्य में उनका जीवन था । उस क्षेत्र में गुटबन्दियाँ थीं और वहाँ राज्य पाने को कोई न हो फिर भी राजनीति चलती थी। पर प्रेमचन्द को मैंने कभी अखाड़े का आदमी न पाया । उनकी जैसे अलग राह थी और लिखने के नाते चाहे वह लेखक और साहित्य- कार हों, जीने के नाते वह सिर्फ इन्सान थे। उससे विशिष्ट न अधिकार जानते थे, न दावा करते थे। किसी खास साहित्यिक विरादरी का सदस्य मैने उन्हें कभी न पाया । इसलिए जब देखा उन्हें निवृत्त देखा, जैसे उनके कन्धों पर कोई बोझ न हो । उपन्यास-सम्राट् कहलाते थे, पर चेहरे में, चाल में या कहीं आसपास उस साम्राज्य का चिह्न न था। मुझे कभी यह अटपटा भी लगता था कि लीजिए चल रहे है और आप लपक- ७० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व - कर पानवाले के आगे जा खड़े हुए और एक वीड़ा मुंह में और एक हाथ में दवाए उसी तपाक से वापस चले पाए और बोले-"लो यार, हटानो, पान खायो।" वह सम्राट् थे और मैं किसी तरह उनका यार न था, क्योंकि कोई चौथाई सदी उनसे छोटा था । पर यह अदना-सी वात उन्हें भूल जाती थी । इसकी वजह से जिन्दगी की वह कामयावी उन्हें हाथ न आई जो उनकी हो सकती थी। रुतवा नहीं मिला, मोहदा नहीं मिला । इनाम भी जो ख़ासी तादाद में इधर-उधर वटा किए, उनके पल्ले न आए । तंगी ने आखिर तक साथ न छोड़ा और समाज में मध्य स्तर से कभी वह अपना सिर ऊंचा न उठा पाए । और यह बहुत मुश्किल काम न था । हर किसी से न मिलते, समझ-बूझकर दोस्त बनाते, नफ़े पर निगाह रखते, हमदर्दी को बखेरते नहीं मानो अन्दर बंद और बांधे रखते-तो यों बहुत-कुछ हो सकता था। तरक्की भी हो सकती थी और ऊँचे भी जा सकते थे। पर जैसे आँख खोलकर उन्होने यह सौदा न किया। उनसे यह सौदा असल में हो नहीं सका । वह कर नहीं सकते थे। तव जरूरी न होता कि इतनी किताबें लिखते । एक-दो लिखकर भी उससे ज्यादा यश और मान पा सकते थे। पर कहिए कि श्रम उनके स्वभाव में था । श्रम से शुरू किया और अन्त तक श्रम करना न छोड़ा । जैसे अपने लिए श्रमिक श्रेणी उन्होंने चुन ली। यों व्यवसाय में हाथ दिया, पर पर-धर्म में मुक्ति कहाँ ! इसलिए जो कमाया श्रम से कमा पाया । श्रम की कमाई कितनी होती है ? प्रसिद्ध है कि लक्ष्मी का वास व्यापार में है। पर प्रेमचन्दजी ने व्यापार में सरस्वती को पूजा, अतः श्रम की कमाई ही उन्हें पहुँच और पच सकी। मुझे प्रसन्नता है कि लेखक सब उन-जैसे नहीं होते । कुछ लिखना जानते हैं, पर उससे ज्यादा बेचना जानते हैं । और सिर्फ लिखे को नहीं बेचते, और भी चीजों को बेचना और उनके खासे दाम खड़े कर लेना उन्हे आता है । प्रेमचन्द उससे कोरे रहे और 1 ७१ प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया सच पूछिए तो इस निपट अनाड़ीपन के लिए मुझे उनमें श्रद्धा होती है, और जितना सोचता हूँ, बढ़ती ही जाती है । उनके साहित्य में भी इसका समर्थन देखा जा सकता है । सफल और सम्पन्न को उन्होंने ऊँचा नहीं चढ़ाया है । यहाँ तक कि कहा जा सकता है कि कुछ गिराया ही है । मैं धन को उतना बुरा नहीं समझ पाता । लेकिन प्रेमचन्दजी ने तो खुले शब्दों में मुझसे कहा कि 'धन की दुश्मनी' साहित्य-रचना में उनकी मुख्य प्रेरणा रही है। धन की जहाँ कमी है वहीं उन्हें सहृदयता दीखी है । धन हो जाने पर उसकी जगह विलास ले लेता है । तव प्रादमी को अपनी सूझती है, दूसरे की परवा नहीं रहती। ये जो सभ्य-सुसंस्कृत लोग अच्छी और भलाई की बात करते हैं, धर्म और आदर्श की, उसके मूल में उनकी खुदी छिपी रहती है । उनके अहंभाव को सेक मिलता रहे तो वे शिप्ट और आदर्श पुरुप बन जाते है। लेकिन ऊपर की सतह अगर जरा खुरच खा गई और उन पर तनिक दबाव पड़ गया तो उनका हिंस्र और वीभत्स रूप सामने आ जाता है । इस अपने दर्शन में प्रेमचन्दजी अन्त तक नहीं डिगे, यद्यपि उनका लिखना विकास पाता गया । 'सप्तसरोज' और 'प्रेमाश्रम' से 'गोदान' में काफ़ी अन्तर है। पहली पुस्तकों में समाधान है और जो आदर्श-वद्ध है । 'गोदान' जीवन की भांति खुला है और अनिर्दिष्ट- सा प्रतीत होता है । मानो उपदेश और उपचार का उत्साह आगे जाकर उनमें प्रकृत मानव-सहानुभूति के विस्तार में खो जाता है । पहले अगर वह बताने चले थे तो पीछे पाकर मानी पाने और समझने के लिए आगे बढ़ना चाहते हैं । यह अन्तर छोटा अन्तर नहीं है । उससे भी पहले या तो वह अनुरंजक थे या क्रान्तिकारी सुधारक । पर इस सारे विकास में कहीं उनसे यह एक चीज-'धन को दुश्मनी नहीं छूटी है। मेरा मानने को जी होता है कि जिस तरह वह बढ रहे थे उस हिसाव से दस साल उन्हें और रचना का अककारा मिलता तो ७२ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व यह दुश्मनी उनसे छूट जाती । 'धन की दुश्मनी' कुछ धनिक की दुश्मनी भी हो जाती है । जान पड़ता है कि धनिक की दुश्मनी की उनके अन्दर कुछ ज़रूरत वाकी थी। कारण वह गृहस्थ थे । पैसे पर उन्हे जीना होता था, व्याह पर खर्चना होता था। इसलिए पैसे को सिर्फ वहने न देकर उस पर मुट्ठी बाँध रखने की भी उनके लिए आवश्यकता थी। बैंक में 'फिक्स्ड डिपॉजिट' था, वीमे की 'पालि- सीज' थीं। इस तरह वह धन की दुश्मनी बाहर की प्रतिक्रिया के स्वरूप नहीं अपना ली गई थी, बल्कि प्रात्मालोचन और आत्म- निरीक्षण में से प्राप्त की गई थी। इसलिए वह दुश्मनी सर्वथा सहानु भूति से हीन या रिक्त नही है। फिर भी है वह दुश्मनी और मै उसे साहित्यकार प्रेमचन्द का भूषण नहीं मान पाता हूँ। वह यदि अनु- कम्पा में घुल जाती तो हो सकता था कि वह दुनिया के महान् लेखकों की पंक्ति में न आ पाते । पर अनुकम्पा में वह घुल इस लिए न सकी कि स्वयं में वह उस अवस्था से उत्तीर्ण न हो सके थे । प्रगतिवाद यहीं उनसे प्रश्रय पा गया है । उलट-कामों के भीतर रहने वाली प्रगति कड़वी होने में विश्वास रखती थी। प्रेमचन्द स्वभाव में कड़वे न थे । अन्त की ओर, और कह सकता हूँ तक, वह कड़वे नही बने । फिर भी कड़वाहट को उनका दिमाग इसलिए अपनाने को तैयार हो जाता था कि उनमें अन्तर-विरोध था और अपनी मजबूरी परिस्थितियों पर डालकर वह दिमाग को समझा लेते थे। मेरा विश्वास है कि प्रेमचन्द आदर्श को कभी नहीं छोड़ सके। यही कारण है कि अपने लेखन में अन्त तक वह असफल नहीं हो पाए । यथार्थ के साथ जीवन में उन्होने जितना भी चाहे समझौता किया, लिखने में आदर्श की टेक को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। 'प्रगति' यथार्थ को लेने में स्वयं गिरी तो गिरी, प्रेमचन्द प्रगति- सम्मेलन के कर्णधार बनाए जाकर भी अपनी जगह से नीचे न लाए जा सके । यानी यथार्थ को ज्यों-का-त्यों समर्थन उनसे कभी न मिल अन्त
awara
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श्री जैनेन्द्र कुमार, चित्रकार ओयामा
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निगेहा रिजनीनी दयनीय समन्त्री जाए, पर rani : एक-आध काम निपटाते चलें। प्रेमचन्द ने कहा, 'ठीक'; और वह जगह ढूंढने लगे कि जहाँ कुछ देर के लिए सामान हिफाजत से रह जाए। इक्का मामान से सदा पाँच-सात-दस मिनट तक यहाँ-न वहीं घूमता रहा और प्रेमचन्द दूकान-दूकान मामान रखवाने की कोशिश करते रहे। पर सामान स्सा मरने की जगह प्रेमचन्द की न मिली। मित्र के माय उनकी पत्नी दी और अजब दृश्य बह रहा होगा कि दम्पतीने पर कदम-कदम मरकते हैं और प्रेमचन्द दूकानन्दूकान में इस जगमा वान के लिए इन्कार पा जाते है। मित्र ने अन्न म कहा कि यह है माहब, नापके प्रेमचन्द, चन्द के यहाँ ठहरने के लिए कहा था । परमैं मानता उन्होंने हमीम कहा और कुछ इसलिए भी कि मैंने प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाना सका। कोई दल उनके निकट सवाई का अनम-बरदार होकर नहीं जम सका । उन्होंने हर एक को व्यक्ति-रूप में देखा मोर परसा, और किसी साम्प्रदायिक विल्ले को अवसर नहीं दिया कि वह व्यक्ति को मोट दे सके। प्रेमचन्द को यह निपट व्यक्तिमत्ता उनके सारे जीवन पर गुनी लिखी है । यही उस व्यक्ति की महानता है कि इसमें चाहे यह अकेला हो गया, लेकिन सदा वेलीत रहा । जहाँ मैंने देखा, उन्हें अपनी सचाई और ईमानदारी में अलग देसा, पांत में बंधा गदा कभी नही देखा । क्या लसनक के प्रगतिशील सम्मेलन में, दिल्ली के साहित्य सम्मेलन में, क्या नागपुर की भारतीय माहित्य- परिषद् में-सब जगह वही नितांत ईमानदार-प्रकले, स्वयं अपना अवलम्ब बनकर रहनेवाले, पुरप के रूप में वह दिसाई दिए । एक मित्र ने उनकी इस निरीहता का हाल बनारस ने पाकर मुनाया बोले- मैं सीया स्टेशन से सामान के माथ प्रेस में पहुंच गया। प्रेमचन्द झट मेरे साथ हुए कि चलिए, पर चलेंगे। रास्ते में हमने कहा कि इस सामान को जरा वहीं रख दें और गहर में लगे हाय मय - ७४ । प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व है जहां से वही महानता के रूप में देखी जा सकती है। यानी संसार में, इस स्वार्थ की धरती पर, उनके पंजे गड़े न थे, जमे न थे। कारण, वह उससे कुछ उठी आदर्श की हवा में रह सकना अपने लिए संभव वना पाए थे । मान नहीं है, प्रतिष्ठा नहीं है, बाहर से जो होना चाहिए लगभग उस सवका अभाव है; पर अन्दर आस्था है तो सब है और उसको लिये-लिये प्रेमचन्द स्वस्थ हैं, प्रसन्न हैं और तनिक भी परास्त और क्षुब्ध नही है । एक घटना याद अाती है । प्रेमचन्द वोले, “जनेन्द्र, कल जा रहे हो ?" मैंने कहा, "हाँ, कहिए।" बोले, "न जानो तो एक बात है। चलो, कल गाँव चलें।" मैंने कहा-"ठीक, चलिए।" अगले रोज इक्का पाया जिसका घोड़ा खासा मरियल था। वड़ा-सा लकड़ी का बक्स वीच में रखा गया। ऊपर बिस्तर, उसके इधर प्रेमचन्द बैठे, उधर शिवरानी । अब मैं कहाँ बैलूं ? बोले-"अायो जैनेन्द्र, इधर आ जाओ।" खाक आ जाऊँ। चार इंच भी वहाँ कहाँ जगह बची थी ! पर जैसे प्यार में पलथी मारकर बैठने की जगह भी वन आती हो ! मैंने कहा-"यह बताइए, कोई साइकिल है ?" बोले-"हाँ, यह ठीक है, तुम साइकिल पर आ जाओ।" साइकिल ली और हम चले और सारनाथ आए । सामान सड़क पर उतर गया । शिवरानी वक्स पर के बिस्तर पर बैठीं, मैं साइकिल के सहारे खड़ा हुआ और प्रेमचन्द मुस्तैदी से बोले- "अभी आता हूँ, इतने आदमी खेतों पर काम कर रहे हैं, ले आता हूँ किसी को, खासी मजूरी उसे दी जाएगी।" गए और जल्दी नही आए। वीस-एक मिनट लगाकर लौट सके । देखा कि रोप में हैं कि ये गांव के लोग इतने जाहिल क्यों होते हैं ! बोले, "देखो जनेन्द्र, धेली-रुपया हाथ लग ही जाता।
७५ प्रेमचन्द : मैने क्या जाना और पाया गाँव होगा एक मील या बहुत-से-बहुत डेढ़ मील । पर जाहिलों को समझ हो तब न !" और भी सारगर्भित भापण समक्ष आया । किन्तु सार वस्तु यह कि मजदूर नहीं हैं । क्या किया जाए ? उस रोज़ सारनाथ पर कुछ मेला-सा था। हम लोग उदर में कुछ संक्षिप्त द्रव्य ही डालकर चले थे। मैंने कहा-"अम्मा (शिवरानीजी) मेला देख पाएँ । हम लोग यहाँ ठहरते हैं । वहीं से कुछ टिचन भी हो पाएँ । पाने पर फिर हम लोग जरा धूम लेंगे । तब तक सामान ले जाने का भी कुछ उपाय निकल पाए तो देखिए। बात पक्की रही । शिवरानीजी गई। फिर हम लोग गए। यह-वह कुछ पेट में डाला । इसमें डेढ़ या दो घण्टे सरक गए। फिर मजदूर की तलाश हुई जो फिर बेकार हुई और सारांश प्राप्त हुआ कि देहातियों की जहालत दूर होगी तब सामान उठ पाएगा। ये प्रयत्न शाम तक चले । जहालत इतनी निविड़ थी कि इस स्वल्प समय में कैसे दूर हो सकती थी ! खेत की डौल पर बैठकर चिलम पीना छोड़ पैसा कमाना श्रेष्ठतर है, यह उन गँवारों की समझ में न आया । समझाने का कोई यत्न छोड़ा न गया। पर दीख पड़ा कि तीसरा पहर बीत रहा है, शाम आ रही है, मेला छोज रहा है । अभी इक्कों की भीड़ थी और जाने क्या-क्या सवा- रियाँ थी । देखते-देखते वे खिसकी जा रही हैं। लोग लद रहे हैं और लौटे जा रहे हैं । धूप वेहद तिरछी हो गई है । ज़रा और कि सूरज डूबा देखिए । सवारियों जल्दी में हैं कि सूरज जाए, इससे पहले वे निकल जायँ। मैंने कहा-"बाबूजी, अव गांव-!" बोले-"नहीं जी, आए हैं तो गाँव चलना ही चाहिए । एक मोल तो जगह होगी। मैं फिर देखता हूँ।" अब पालम यह है कि सड़क पर सामान लिये हम बैठे है ।
७६ प्रेमचन्द : एक कुली पशिल धूल से सासे सफेद हो पाए हैं और जिन पर उम्मीद है वे इक्के एक-एक कर सिराके जा रहे हैं। पाए प्रेमचन्द, कहते हुए कि कम्वस्त देहाती क्या देहकानी है इत्यादि-इत्यादि-इत्यादि । मैंने कहा-"देसिए, शाम हो पाई । एकाध बचा है, जाने यह इक्का भी हाय से कय निकल जाए । कहिए, कर लूं और चलें हम बनारस?" प्रेमचन्द का मन न था। पर शाम और रात वहीं सड़क पर गुजारने का मन था, यह भी नहीं कहा जा सकता । उपसंहार यह कि इक्का आखिरी रह गया तो उस पर सामान लदा और दो इन्सानी अदद लदे और मैंने साइकिल सम्हाली। इक्का चल दिया, पर साइकिल में हवा कम थी और मालूम हुआ पंक्चर है । पर सकट पाते है तो पार होने के लिए और साहस के साथ उन्हें एक- पर-एक पार करते हुए हम रात दस बजे वीते वेनिया पाकं वाले उनके लाल मकान पर जाकर लगे । तव खिचड़ी चढ़ी जो खाने में वेहद स्वाद मालूम हुई । और इस प्रकार सानन्द प्रेमचन्द के जन्म के ग्राम के अभियान का प्रकरण-समापन हुआ। इसको आप क्या कहना चाहते हैं ? मै इसको प्रेमचन्द का व्यक्तित्व कहता हूँ । निरीह, निपट असहाय लेकिन स्पष्ट, सरल और अत्यन्त मानवीय !
प्रेमचन्द की कला [दो] थी प्रेमचन्दजी का ताजा उपन्यास 'ग़वन' हाल में ही निकला है । निकला तभी मैंने उसे पढ़ लिया । लेकिन जो मुझे वक्तव्य हो सकता है, वह लिखता अव हूँ। चीज को समझने और पुस्तक के असर को ठंडा होने देने के लिए मैंने कुछ समय ले लिया है । तटस्थ होकर बात कहना ठीक होता है,--जब व्यक्ति पुस्तक से अपने को अलहदा खड़ा करके मानो उस पर सर्वभक्षी निगाह डाल सके । प्रेमचन्दजी हिन्दी के सबसे बड़े लेखक हैं । हम हिन्दी भाषा- भापी उनके मूल्य को ठीक आँक नही सकते । हम चित्र के इतने निकट हैं कि उसकी विविधता, उसका रंग-वैपम्य हमें आच्छन्न कर देता है, उसमें निवास करती हुई और उस चित्र को सजीवता प्रदान करती हुई एकता हमारी पकड़ में नही आती। जो एक-दो दशाव्दी अथवा एकाध भापा का अन्तर बीच में डाल कर प्रेमचन्द को देखेंगे वे, मेरा अनुमान है, प्रेमचन्द को अधिक समझेगे, अधिक सराहेंगे । वर्तमान की अपेक्षा भविष्य में और हिन्दी को छोड़कर जहाँ अनुवादों द्वारा अन्य भापात्रों में पहुंचेंगे वहाँ उनको विशेष सराहना प्राप्त होगी। लेकिन यत्न द्वारा हम अपनी दृष्टि में कुछ वैसी क्षमता ला सकते हैं कि बहुत पास की चीज़ को मानो इतनी दूर से देख सकें कि वह हमें अपनी सम्पूर्णता में, अपनी एकता में, दीखे । अगर रच. नामों के भीतर पेठकर, मानों उन्हें नसनी बनाकर, हम रचना- कार के हृदय में पहुंच जायें जहां से कि उसकी रचनाओं का उद्- गम है और जहां उसे एकता प्राप्त होती है तो हम रस में डूब जायें। अपने भीतर के स्नेह और सहानुभूति को विविध कौशल से 1
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प्रेमचन्द की कला [दो] श्री प्रेमचन्दजी का ताजा उपन्यास 'गवन' हाल में ही निकला है । निकला तभी मैंने उसे पढ़ लिया। लेकिन जो मुझे वक्तव्य हो के सकता है, वह लिखता अव हूं। चीज़ को समझने और पुस्तक असर को ठंडा होने देने के लिए मैंने कुछ समय ले लिया है। तटस्थ होकर बात कहना ठीक होता है, जब व्यक्ति पुस्तक से अपने को अलहदा खड़ा करके मानो उस पर सर्वभक्षी निगाह डाल सके । प्रेमचन्दजी हिन्दी के सबसे बड़े लेखक है । हम हिन्दी भाषा- भापी उनके मूल्य को ठीक आंक नहीं सकते। हम चित्र के इतने निकट है कि उसकी विविधता, उसका रंग-वैषम्य हमें प्राच्छन्न कर देता है, उसमें निवास करती हुई और उस चित्र को सजीवता प्रदान करती हुई एकता हमारी पकड़ में नही पाती। जो एक-दो दशाब्दी अथवा एकाध भाषा का अन्तर वीच में डाल कर प्रेमचन्द को देखेंगे वै, मेरा अनुमान है, प्रेमचन्द को अधिक समझेगे, अधिक सराहेंगे । वर्तमान की अपेक्षा भविष्य में और हिन्दी को छोड़कर जहाँ अनुवादों द्वारा अन्य भाषाओं में पहुंचेगे वहाँ उनको विशेष सराहना प्राप्त होगी। लेकिन यत्न द्वारा हम अपनी दृष्टि में कुछ वैसी क्षमता ला सकते हैं कि बहुत पास की चीज को मानो इतनी दूर से देख सकें कि वह हमें अपनी सम्पूर्णता में, अपनी एकता मैं, दोखे । अगर रच- नामों के भीतर पेठकर, मानों उन्हें नसैनी बनाकर, हम रचना- कार के हृदय में पहुंच जायें जहाँ से कि उसकी रचनाओं का उद्- गम है और जहाँ उसे एकता प्राप्त होती है तो हम रस में डूब जायें । अपने भीतर के स्नेह और सहानुभूति को विविध कौशल से ।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व कलम की राह उतार कर कलाकार ने तुम्हारे सामने ला रखा है। तुम उन शब्दों का, भाषा, प्लाट और प्लाट के पात्रों का मानो सहारा-भर लेकर यदि हृदय में से फूटते हुए झरनों तक पहुँच जा सकते हो तो वहाँ स्नान करके आनन्दित और धन्य हो जानोगे । नही तो परीक्षोपयुक्त विद्वान् की तरह उसकी भापा की खूबी और त्रुटि और उसके व्याकरण की निर्दोपता-सदोपता में फंसे रहकर उसकी छानबीन का मजा ले सकते हो। मुझे व्याकरण की चिन्ता पढ़ते समय वहुत नही रहती । भाषा की चुस्ती का या शिथिलता का ध्यान उसी के ध्यान की गरज से मैं नही रख पाता । भापा की खूबी या कमी को सम्पूर्ण वस्तु के मर्म के साथ उसका किसी न किसी प्रकार सामजस्य, या वैपम्य विठा कर मैं देख लेना चाहता हूँ । अतः यह नहीं कि मैं उस ओर नितांत उदासीन या क्षमाशील हो रहता हूँ, किन्तु वहाँ समाप्त करके नही बैठ रहता। प्रेमचन्दजी की कलम की धूम है । वेशक वह धूम के लायक है । उनकी चुस्त भाषा पर, उनके सुजड़ित वाक्यों पर, मै किसी से कम मुग्ध नहीं हूँ । वात को ऐसा सुलझा कर कहने की आदत, मैं नहीं जानता, मैंने और कहीं देखी है। बड़ी से बड़ी बात को बहुत उलझन के अवसर पर ऐसे सुलझाकर थोड़े से शब्दों में भर कर, कुछ इस तरह से कह जाते है, जैसे यह गूढ़, गहरी, अप्रत्यक्ष वात उनके लिए नित्यप्रति घरेलू व्यवहार की जानी-पहचानी चीज़ हो । इस तरह जगह-जगह उनकी रचनाओं में ऐसे वाक्यांश विखरे पड़े है जिन्हें जी चाहता है कि आदमी कण्ठस्थ कर ले । उनमें ऐसा कुछ अनुभव का मर्म भरा रहता है । प्रेमचन्दजी तत्त्व की उलझन खोलने का काम भी करते हैं, और वह खुली सफाई और सहजपन के साथ । उनकी भापा का क्षेत्र व्यापक है । उनकी कलम सब जगह पहुंचती है, लेकिन अंधेरे में भी वह घोखा नहीं देती। वह वहाँ भी सरलता से अपना मार्ग प्रेमचन्द की कला बनाती चली जाती है । सुदर्शनजी और कौशिकजी की भी कलम बड़े मजे-मज़े में चलती है, लेकिन जैसे वह सड़कों पर चलती है, उलझनों से भरे विश्लेपण के जंगल में भी उसी तरह सफाई से अपना रास्ता काटती हुई चली चलेगी, इसका मुझे परिचय नहीं है। स्पष्टता के मैदान में प्रेमचन्द सहज अविजेय हैं । उनकी वात निर्णीत, खुली, निश्चित होती है । अपने पात्रों को भी सुस्पष्ट, चारों ओर से सम्पूर्ण बनाकर वह सामने लाते हैं । उनकी पूरी मूर्ति सामने आ जाती है । अपने पात्रो की भावनाओं के उत्थान- पतन, घात-प्रतिधात का पूरा-पूरा नक्शा वह पाठक के सामने रख देते हैं । तद्गत कारण, परिणाम, उसका औचित्य, उसकी अनि- वार्यता प्रादि के सम्बन्ध में पाठक के हृदय में संशय की गुंजाइश नहीं रह जाती । इसलिए कोई वस्तु उनकी रचना में ऐसी नहीं प्राती जिसे अलौकिक कहने को जी चाहे, जिस पर विस्मय हो, झंझलाहट हो, बलात् श्रद्धा हो । सवका परिपाक इस तरह कमिक होता है, ऐसा लगता है, कि मानो बिल्कुल अवश्यभायी है । अपने पाठक के साथ मानो वे अपने भेद को बांटते चलते हैं । अंग्रेजी में यों कहेंगे कि वह पाठक को कॉन्फीडेंस में, विश्वास में ले लेते है । अमुक पान क्यों अब ऐसी अवस्था में है, पाठक को इस बारे में असमंजस में नहीं रहने दिया जाता, सव-कुछ उसे सोल-सोल कर बतला दिया जाता है । इस तरह पाठक मुगम रूप में पुस्तक की यहानी के साथ मागे बढ़ता जाता है, इसमें उसे अपनी भोर से बुद्धि- प्रयोग की भावश्यकता नही होती, पात्रों के साप मानो उसकी सहज जान-पहनान रहती है । इसलिए पुस्तक में ऐसा स्थल नहीं माता जहाँ पाठक अनुभव फरे कि वह पान के साथ नहीं चल रहा है,-भोर जरा रककर उसके साथ होने का प्रयास करे। यह पुस्तक पड़ने को उरा पामगर पपने को नभालने की जरूरत में नहीं पड़ता । ऐसा स्थान नही माता जरा पार गौच कर यह पुस्तक पो ८० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व बन्द करके पटक दे और कुछ देर आँसू ढालने या कुछ सोचने में उसे लगाना पड़े और फिर तुरन्त ही फिर पढ़ना शुरू करना पड़े। पाठक बड़ी दिलचस्पी के साथ पुस्तक पढ़ता है और उसके इतने साथ-साथ होकर चलता है कि कभी उसके जी को जोर का आघात नहीं लगता जो बरबस उसे रुला दे । 'ग़वन' में मार्मिक स्थल कम नहीं है। पर प्रेमचन्दजी ऐसे विश्वास, ऐसी मंत्री और परिचय के साथ सब कुछ बतलाते हुए पाठक को वहाँ तक ले जाते है कि उसे धक्का-सा कुछ भी नही लगता । वह सारे रास्ते-भर प्रसन्न होता हुआ चलता है और अपने साथी ग्रन्थकार की जानकारी पर, कुशलता पर और उसके प्रति विश्वास पर जगह-जगह मुग्ध हो जाता है । पग-पग पर उसे पता चलता रहता है कि इस कहानी के स्वर्ग में से उसका हाथ पकड़- कर ले जाता हुआ उसका पथदर्शक बड़ा सहृदय और विचक्षण पुरुप है । पाठक विलकुल उसका होकर रहने को तैयार होता है । वह बहुत सतर्क और उबुद्ध होकर नहीं चलता, क्योंकि उसे भरोसा रहता है कि ग्रन्थकार उसे छोड़कर इधर-उधर भाग नही जायेगा, उसको साथ लिये चलेगा । इसलिए ग्रन्थकार को भागकर छूने का अभ्यास करके उसके साथ होने और इस प्रकार अपरिचित रास्ते पर झटकों-अचंभों के हिलकोरे खाते, कभी उन पर हँसते और कभी रोते हुए चलने का मजा पाठक को नहीं मिलता और पाठक इस स्वाद को भी चाहता है। मैं 'शवन' बढ़ते हुए कहीं भी रो नही पड़ा। रवीन्द्र की एकाध किताव पढते हुए, बंकिम पढ़ते हुए कई वार वरवस आँखों में आँसू फूट आये हैं । फिर भी, प्रेमचन्द की कृतियों से जान पड़ता है कि मैं उनके निकट पा जाता हूँ, उन पर विश्वास करने लगता हूँ। शरत् पढ़ते हुए कई वार गुस्से में मैंने उसकी कृतियों को पटक दिया है और रोते-रोते उसे कोसने को जी किया है। 'कम्बख्त न जाने हमें कितना और तंग करेगा!' इस भाव से फिर उसकी पुस्तक पहले ढंग की किताब को नालायला, दनी हम कर सी लगेगी। प्रेमचन्दड़ी विदाटकालकर प्रेमचन्द की कला को उठा कर पढ़ना शुरू कर दिया है । ऐसा मेरे साथ हुआ है । इसके प्रतिकूल प्रेमचन्द की कृतियों से उनके प्रति अनजाने सम्मान और परिचय का भाव उत्पन्न होता है । उससे आगे वाली प्रात्मी- यता नहीं होती। शरत् और अन्य की रचनाएँ पढ़ते वक्त जान पड़ता है जैसे इनके लेखक हमसे परिचय बनाना नहीं चाहते, हम-तुम की मत- मान्यताओं की इन्हें बिल्कुल पर्वाह नहीं है, हमारे भावों की रक्षा करने की इन्हें बिल्कुल चिन्ता नही है । जैसे हमारा जी दुखता है या नहीं दुखता, हम नाराज़ होते हैं या खुश, हमें अच्छा लगता है या बुरा, इसका खयाल रखने का ज़रा भी जिम्मा उन पर नहीं है। हमारे लिए उनके पास जरा दया नही है । वे लेखक निरपेक्ष और निश्चित होकर हमें जी चाहे जितना रुला सकते है। परन्तु प्रेम- चन्द हमारे प्रति निरपेक्ष नहीं हो सकते। शायद इसी निरपेक्षता की आवश्यकता को विचार करनी की उक्ति बन गई थी, 'पार्ट फ़ॉर पार्ट्स सेक', अर्थात् 'कला, कला के लिए।' किन्तु यह वचन मेरी समझ में सत्य को दट्ट अवर दंग में प्रकट करता है । या कहे, सत्य को खोल कर नहीं करना, उसे मानो बाँधकर बन्द करने की चेष्टा करता है। कहना हो तो कहूँ, 'आर्ट फ़ॉरगॉड्स सेक',अर्थात 'कला परमात्मा के लिए। रवीन्द्र आदि की कृति में शिनी स्थल पर ऊँगली कर कहना कठिन है कि 'कसा अच्छा है!" मन की न्यूद्री नमन में नहीं पाती कि किस खान बढ़ा है। एक वाक्य करके देदो तो कोई विशेष विस्मयकारी दान नहीं मानून हनीपरमचन्द में से कहीं कोई वाक्य वा दो, बान पहना कि मादी स्वयं वपूर्ण है, चुस्त, कसा हमा, अध। देखने लग जायगे । चालिनी ही बाहर ८२ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व , पढ़ने की तबीअत कम शेष रहती है। मैंने कहा है : पार्ट फॉर गॉड्स सेक, अर्थात् परमात्मा के प्रति, सत्य के प्रति कलाकार का दायित्व है । इसको कलाकार जव सम- झेगा तो पायेगा कि उसका अपने अंतःस्थ के प्रति दायित्व है । इस- लिए वह पाठकवर्ग की धारणाओं की ओर से निश्शक और निश्चिन्त होकर, अपने प्रति सच्चा रहकर, अपने को प्रकट कर सकता है । एक व्यक्ति, समाज या पुस्तक के पात्र की भावनाओं की रक्षा के निमित्त अत्यन्त आतुर हो उठने का कलाकार को अधिकार नहीं है । इस सम्बन्ध में उसे अत्यन्त निरंकुश होकर चलना पड़ता है । लगभग जिस प्रकार कि परमात्मा अपने विश्व का संचालन हमारी- तुम्हारी परिमित समझ को देखते हुए, अत्यन्त निरंकुश होकर करते है । विश्व को वह जरा-व्याधि, रोग-शोक और जन्म-मृत्यु से भरा वनाये रखते है, किसी खास व्यक्ति या समूह की कोई विशेष चिन्ता करते नहीं मालूम होते । इतना होने पर भी मानना होता है वे परम दयालु है । उनको दयालुता किसी विशेष वस्तु या प्राणी के अच्छा लगने न लगने पर निर्भर होकर नहीं रहती। वह इतनी मर्मगत, इतनी व्याप्त और इतनी बृहत् है कि उसका कार्य-परिणमन हम छोटी बुद्धि वालों को निरकुश जंचता है। उसी सबके पिता सिर- जनहार के अनुरूप सर्जन का अधिकार रखने वाले कलाकार को रहना पड़ता है । वह रचना में अत्यन्त निर्मम होगा, किसी के प्रति उसमें विशेष ममता-भाव है, ऐसा वह नहीं दिखला सकेगा। विद्वान् पर मौत आयेगी तो उसे स्वीकार लेगा; शठ समृद्धिवान् बनता होगा तो उसे बनने देगा। फिर भी सहानुभूति और प्रेम से उसका हृदय भरा होना ही चाहिए । वह सहानुभूति या स्नेह इतना न हो कि छलकता फिरे। संसार में प्रकट दीखने वाली निरंकुशता के मार्ग से एक बृहद् सत्य को लीला सम्पन्न हो रही है । हम नहीं जानते, इसलिए रोते- झीकते हैं । हम जिन छोटी-मोटी बातों को सिद्धान्त बनाकर काम प्रेमचन्द की कला चलाते हैं उनको ज्यों-की-त्यों रक्षा जब हम होती नहीं दीखेती-तत हम दुःखी होते और अस्थिर होते हैं । इस तरह अपने अहंन्सान की बीच में डालकर हम, जिस परमात्मा का विश्वास हमारे लिए सहज होना चाहिए था, उसी को अपने लिए दुप्प्राप्य और दुरधिगम्य बना लेते 1 सबमें निवास करती हुई उसकी दयालुता हम नहीं देख पाते, इसलिए कहते हैं कि वह है नही, है तो दयालु नहीं है, मन- मौजी और लीलामय है । हमारा तर्क यह होता है कि 'हम भले- मानस हैं फिर भी गरीब हैं; इसलिए ईश्वर नहीं है, है तो ठीक नही है।' इसी तरह कलाकार को वृत्ति में किसी अन्तरतर सत्य को पाने और सम्पन्न करने की निष्ठा रहती है, दुनिया की बनाई धार- मानों की रक्षा करने की चिन्ता उसे नहीं होती । सदाचार के और अन्य भौति के अपने नियम-कानून बनाकर जीती रहने वाली दुनिया अपनी सब धारणाओं का समर्थन वहाँ पाये ही, ऐसा नहीं होने पाता । ऊपर के तर्क से चलने वाली दुनिया की तुष्टि के लिए और उसके अहं के समर्थन के लिए कलाकार नहीं लिखता । इसी से कहा गया : पार्ट फॉर पार्ट्स सेक-अर्थात्, कला का हेतु स्वयं कला है । कितु इसका ही सम्पूर्ण परिप्कृत रूप है, पार्ट फ़ॉर गॉड्स सेक; और इसका अभिप्राय है कि कला अहंवादी, वुद्धिवादी दुनिया को खुश करने या रखने की खातिर नही होती; वह परमेश्वर, अर्थात् सत्य की प्रतिष्ठा, के लिए होती है। प्रेमचन्दजी में उक्त प्रकार की निरपेक्षता पूरे तौर पर नहीं आई है । वे पाठक की अलग से चिंता करते हुए चलते हैं और अपनी किसी बात से सहसा दुनिया को दर्द या चोट दे रहने के विचार से वचते हैं । उन्होने कोशिश करके जिसे सुन्दर और शिवरूप समझा है, लोगों की वर्तमान स्थिति को किसी विशेप गड़बड़ में न डालने की चिन्ता रखते हुए, वह उसी को लिखते हैं। उनमें पात्र अश- रीरी नहीं होते, सूक्ष्म-शरीरी भी नहीं होते, वे अतर्य नहीं हो पाते । वे जो कुछ भी होते हैं, सामान्य साधारण बुद्धि के मार्ग से - प्रेमचन्द : एफ वृती व्यक्तित्व A - ही होते हैं । असाधारणता उनमें यदि प्रेमचन्द कहीं कुछ रसते भी हैं तो मानो साधारणता के मार्ग से ही उसे प्राप्त और गम्य बना लेते हैं । पाठक के मन में प्रेमचन्दजी के पात्रों से एक प्रकार का संतोप होता है; कोई गहरी बेचनी नहीं जाग उठती। कोई गहरा खिंचाव जो मित्रता से आगे हो, एक गंभीर तृप्ति जो संतोष से गहरी हो, नहीं होती । प्रेमचन्दजी पाठक का मन रख लेते है, अपना ही मन पाठक के सामने रख दें, यह नहीं करते । मैं फिर भी प्रेमचन्दजी को हिन्दी का नहीं, संसार का लेखक मानता हूँ। बहुत जल्दी संसार भी यह मान लेगा, चाहे फिर अपने शीर्ष पर न भी ले। सामयिकता को लांघ कर, मानो सामयिकता का प्राधार थाम गहरे उतर कर, जो कृति जितनी ही सत्य के अनुरूप होकर चलती है, वह उतने ही अंश में सर्वकालीन और सर्वदेशीय होती है। वह उतने ही अंश में अनायास काल को चुनौती देती हुई चिरजीवी और देश और भापा की परिधियों को पीछे छोड़ती हुई विश्वव्यापी हो जाती है। सत् है एक, अर्थात् सत्य है ऐक्य । संपूर्ण सत्ता को सचेतन एकमय देखो, वही है परमात्मा । इस सनातन ऐक्य को पाने की चेष्टा का नाम है : प्रेम । पर वह प्रेम सहज सम्पन्न नहीं होता। यह जो चारों ओर लुभाती हुई, भरमाती हुई, भिन्नता फैली है,- उस सब लोभ और भ्रम और माया के समुद्र में आँख-कान मूंद- कर गहरी डुबकी लगा कर पठने से वह प्रेम कुछ-कुछ दिखाई पड़ सकता है । इसके लिए गहरी साधना की आवश्यकता है। परन्तु इस ऐक्य को पाने को भूख भी प्राणी में कम गहरी नही है । पर बहुत-कुछ उसकी तृप्ति में आड़े आता है और वह भूख वहुत तरफ़ से परिमित, संकुचित रहती है । और तो क्या, यह शरीर ही रुका- वट बनकर सामना करता है। यह हमको सबसे एकाकार तो होने दे सकता ही नहीं । फिर भी, इसकी सहायता से भी, हम आगे प्रेमचन्द की कला ८५ 4 , कुछ नहीं बढ़ते हैं । स्त्री, माँ, भाई, बहिन, पिता आदि नातों द्वारा, जो इस शरीर के कारण वन जाते हैं, हम अपने प्रेम का विस्तार साधते हैं । वह प्रेम नाना स्थानों पर नाना रूपों में प्रकट होता है। वह प्रेम तत्काल को पारकर जितना चिरस्थायी और शरीर के प्रतिवन्ध को लांघकर जितना अखिलव्यापी और सूक्ष्मजीवी होता है, और इस कारण तात्क्षणिक स्थूल तृप्ति में न जीकर वह जितना उत्सर्ग- जीवी होता है, उतना ही वह सत्य के अनुरूप अर्थात् स्वस्थ, गंभीर और प्रानन्दमय होता है । लेकिन काल और प्रदेश की रेखाओं से प्राकार पाकर ही तो जीव की जीवन-यात्रा चलती है, इसलिए उसका प्रेम सर्वथा निर्विकार सत्यानुरूपी नहीं हो पाता । इस तरह व्यक्ति के जीवन में सदा ही द्वन्द्व चलता है। इस दृष्टि से देखा जाय तो कलुपित-कुत्सित प्रेम होता । विस्तृत ऐक्य के जिस तल तक मनुष्य उठ आया है उस तल से नीचे की चेष्टाएँ जब किसी में देखता है तो उसे कुत्सित आदि कहने लगता है। तो, नानारूपिणी माया जव व्यक्ति को अन्य सबके प्रति एक प्रकार के विरोध से उकसा कर उसे अहं-भाव में रूढ़ रखने का आयोजन करती है, तब उसके भीतर का गूढ़ सच्चिदानन्द इस आयोजन को तोड़-फोड़कर स्वयं प्रतिष्ठित होने को सतत उत्सुक रहता है । यह द्वन्द्वावस्था ही जीवन की चेष्टा का और उपन्यास का मूल है । यही साहित्य का क्षेत्र है। प्रेमचन्दजी इस द्वन्द्वावस्था को सूक्ष्म नहीं तो सरल दृष्टि और सहानुभूति के साथ चित्रित करते हैं। फिर इस द्वन्द्व में वह जिस निर्मल प्रेमभाव की प्रतिष्ठा करते है, वह देहातीत होता है वह बीतते हुए क्षण के साथ मिटता नहीं। वह सेवामय प्रेम दुनिया- दारी की, ग़लतफ़हमियों की, अज्ञानता की, विफलता की, हीनता की कितनी ही कठिनाइयों के साथ लड़ता-झगड़ता हुआ भी अक्षुण्ण और उत्सर्ग-तत्पर रहता और रह सकता है । इस प्रात्मयुद्ध, धर्म- , - प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व युद्ध, का चित्र प्रेमचन्दजी सजीव बना पाते हैं । वही सजीव प्रेम, अर्थात् सत्य, जो स्वयं टिकाऊ है, उनकी कृति को भी चलते समय के साथ मरने नहीं देगा। मैं कहता हूँ कि प्रेमचन्दजी ने अपनी कृति में जो चिरस्थायी और व्यथाशील प्रेम का वीज रख दिया है। यह निरा सामयिक नहीं है, उसमें स्थायित्व है। सामयिकता से प्राण सींचकर कइयों ने रचनाएं की है जो रंगीन होकर सामने आ गई हैं । पर अगर ग्राज यह हाथों-हाय विकती है तो हमने देखा है कल वे मर भी जाती हैं । जो रचना शाश्वत सत्य के श्वास से जितनी अनुप्राणित होगी, वह उतनी ही गाश्वत और अमर होगी । माया में से रस खींचकर, देश और काल के प्रतिक्षण और प्रतिपग बदलते जाते हुए मतों और वासनाओं को प्राधार बनाकर, सामयिकता को लहर पर नाचती हुई जो कृति हमें लुभाने प्राती है, वह आज हमें लुभा ले सही, पर कल हमें ही उसकी याद भूल जायगी, इसका हम विश्वास रखें। प्रेमचन्दजी की कृति सामयिकता की परिधि को लांघकर और हिन्दी भापा की परिधि को लाँधकर किसी न किसी हद तक अना- गत व्याप्ति की ओर बढ़ेगी, निस्संदेह उसमें ऐसा वीज है।
चिट्ठी-पत्री पहाड़ी धीरज, दिल्ली २० फरवरी, १६३० वावूजी, आपका पत्र मिला । वह कूचा पातीराम वाला भी बस एक डिलीवरी-देर से मुझे मिल गया। कहानी मैंने १४ को शुरू की थी, पर खतम अव भी नहीं हुई । शुरू करने के बाद ही मैं तो उलझन में पड़ गया । इधर आपके उलाहने के बाद भी देर लगाना पाप जान पड़ा । ये दो कहानियाँ भेज रहा हूँ। नाथूरामजी प्रेमी (बम्बई) से वापस मँगा ली है। 'दिल्ली में' आपके लिए और 'फोटोग्राफी' 'माधुरी' के लिए । इसी से अभी तो संतोष मान लें, ऐसी प्रार्थना है । इच्छा तो थी, कोई अपूर्व चीज भेजूं; पर इच्छा पूरी न हुई । खैर, आगे देखूगा । यह भी, अगरचे पूरे मन की नहीं है फिर भी, उम्मीद है बुरी नहीं है । अंतिम (वाला) पैराग्राफ़ यदि आप सहमत हों तो काट दीजिए । विल्कुल व्यर्थ है । वास्तव में जोड़ा भी वाद में गया है । आप यदि खास तौर पर उसे रखना चाहें तो वात दूसरी, नहीं तो उड़ा ही दें। उसमें ऐसा लगता है जैसे लेखक जल-भुन रहा है । लेखक की यह 'मण्टेलिटी' हठात् क्यों प्रकट हो ? 'फोटोग्राफी' मेरी पहली कहानी है । तो भी 'माधुरी' के लिए काफ़ी से ज्यादा ही अच्छी है, ऐसा विश्वास है । न भी पसंद आये तो खेद न होगा। 'मेरी मेग्डलीन' की आपने सिफ़ारिश ही की। मुझे भी ऐसी ही आशा थी। निर्णय का कव तक पता चलेगा ? ।
प्रेमचन्द : एक गती व्यक्तित्व मया श्राप सम्मेलन में गायेंगे ? और क्या मुझे वहां जाने को सलाह देंगे? परिचय का लाभ ही यदि लाम समझा जाय तो यात दूसरी, नहीं तो सम्मेलन में मेरे लिए क्या है ? उन (सम्मेलनी) लोगों में से किसी के दर्शन की उत्कट चाह हो, सो भी बात नहीं है । सलाह दें। आपका उपन्यास कसा चल रहा है ? मुझे भी बहुा और बरावर लिसने का मन्तर बताइए न! जब से पाया हूँ, क्या कहूँ, एक कहानी भी न की। शुरू ही न हुई तमीमत नहीं हाजिर हुई । कोई इलाज अवश्य बताइए । विशेष मेरे योग्य सेवा लिखिए। अापका ही जैनेन्द्र सरस्वती प्रेस २५ नवम्बर, १९३० 'प्रिय मित्रवर, वन्दे ! पत्र मिला। सच्चा मानन्द हुआ । 'परख' मैंने पढ़ लिया था और पढ़कर मुग्ध हो गया था। इसको पालोचना दिसंबर के 'हंस' में कर रहा हूँ जो विशेषांक होगा। 'परख' के चारों चित्र- सत्य, कट्टो, बिहारी और गरिमा-खूब हुए है । सत्य का गंभीर, मानसिक संग्राम । बिहारी का उससे भी पवित्र किन्तु सरल और विनोदमय लगा। कट्टो तो देवी है। आपको शैली और चरित्र- प्रदर्शन का ढंग मुझे बहुत पसंद आया। मैंने सरस्वती वाली आलो- चना नहीं देखी, लेकिन आपके उपन्यास की तारीफ़ तो उन्हें करता ही चाहिए थी। मैं ऐसी रचना पर आपको बधाई देता हूँ। अन्य प्रकाशकों की स्थिति इस समय अच्छी नहीं है । मौलिक उपन्यास तो कई अच्छे निकले है। प्रसादजी का 'कंकाल', "उग्न' सर्वश्री प्रेमचन्द, ऋषभचरण जैन, जनेद्र कुमार, गन् १९३३ -
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- चिट्ठी-पत्री जी का 'शरावी', वृंदावनलाल वर्मा का 'गड़कुंडार । गाउँबार. तो रोमांस है पर 'कंकाल' बहुत ही सुन्दर है । लेकिन मौलिक उपन्यासों को छोड़कर अनुवादों का बाज़ार ठंडा पड़ा है। 'मैग्डली खुद अपने प्रेस में छपवाने का इरादा कर रहा हूँ। आजकल मेरा 'गवन' छप रहा है, वह निकल जाय तो इसे शुरू करूं। 'हंस' के छ: अंक निकल चुके । सितंवर और अक्टूबर में प्रेस और पत्रिका ज़मानत मांगे जाने के कारण वन्द पड़े रहे। प्रेस वे आर्डीनेंस उठ जाने पर फिर निकले हैं। मेरी पत्नीजी पिकेटिंग के जुर्म में दो महीने की सजा प गईं। कल फैसला हुआ है । इधर पन्द्रह दिन से इसी में परेशान रहा । मैं जाने का इरादा ही कर रहा था, पर उन्होंने खुद जाकर मेरा रास्ता बंद कर दिया। और क्या लिखू ? मुझे यह जानकर हर्ष हुग्रा कि आप गुज- रात में स्वस्थ और प्रसन्न हैं । हम लोग भी अच्छी तरह हैं । एक बार फिर 'परख' के लिए वधाई लीजिए। हिन्दी-उप- न्यास अव चेतेगा, इसमें सन्देह नहीं । एक साल के अन्दर 'कंकाल', 'परख', 'गढ़कुंडार', 'शरावी'-जैसी पुस्तकें निकल चुकी, यह भविष्य के लिए शुभ लक्षण है । न जाने आप से कब मुलाक़ात होगी ! मालूम होता है, युग बीत गया। भवदीय धनपतराय स्पेशल जेल, गुजरात (पंजाब) ४ दिसम्बर, १६३० बाबूजी, आपका खत समय पर मिल गया था। मैंने सोचा विशेषांक निकलने में अवकाश हो, एक कहानी लिख ६० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व । साथ ही पत्र का जवाब दे दूंगा। लेकिन यहाँ को धूमधाम में कहानी तो लिखी न जा सकी और वह वक़्त पा गया कि खत के जवाब को और टालना धृष्टता हो जाती। इससे इतनी देर बाद भी, साली सत ही भेज रहा हूँ। क्षमा करें! क्या विशेषांक निकल गया ? एक (मेरी) प्रति शेख मुहम्मद अली साहब, मिल-प्रॉनर, गुजरात के पते पर भिजवा दें । मेरा नाम न लिखें । वह मुझे यहां पहुंच जायगी। जेल के पते पर भेजे गये असवार नहीं मिलने दिये जाते । कृपा कर ध्यान रखकर जरूरी सूचना बनारस दे दें। क्या आपकी पत्नी के जेल जाने पर धन्यवाद दूं? यह इस- लिए भी धन्यवाद का विषय हो सकता है कि आपकी इस तरह जेल पाने की राह और आवश्यकता रुक गयी। कितने पतियों ने पत्नियों को रोक रखा है। लेकिन वे पति धन्य है जिनकी पत्नियाँ आगे बढ़कर जेल में पहुंच गयी और उनको रुकने को लाचार कर गयी। 'कंकाल' की अर्द्धप्रकाशित प्रति मैंने देखी थी । प्रसादजी की कृति है, बुरी कैसे होती ? 'उग्र' जी के 'शराबी' का नमूना 'मतवाला' के पृष्ठों में देखा याद पड़ता है । 'गढ़कुंडार' बिल्कुल ही नया नाम और नया काम मालूम होता है । मैं नहीं जानता, मैं यहाँ किसी से कोई चीज मॅगा सकता हूँ। हाँ, 'शरावी' और 'गढ- कुंडार' पढ़ना जरूर चाहूँगा । आपके पास काहे को कोई प्रति होगी? अगर 'हस' के लिए प्राप्त हुई दो प्रतियों में से एक यहाँ (अर्थात् ऊपर दिये पते पर) भेजी जा सके तो मैं आलोचना 'हंस' में भेज दूंगा। ऋपभचरण का खत मिला कि आप 'परख' को प्रसाद-स्कूल के अधिक निकट समझते है । आपने लिखा है कि आपको वह पसद आयी है और आप समालोचना 'हंस' के इसी अंक में दे रहे हैं। 'हंस' मिला तो पालोचना में देखूगा ही। पर 'परख' में आपके चिट्टी-पत्री ६१ अनुसार कहाँ क्या अधिक और कहाँ क्या कम होना चाहिए था, यह मैं आपसे जाने बिना संतुष्ट न हूँगा। परीक्षक के ढंग से मैं उसे आपको सौंपना चाहता हूँ; अंतर केवल इतना ही कि परीक्षार्थी परीक्षक के नम्बर देने के ढंग को भी समझना चाहता है । ऋपभ- चरण ने जो स्कूल की बात लिखी, उसका भी खुलासा मैं जानना चाहूँगा। पता चला है कि अवध उपाध्यायजी की आलोचना देवीदत्तजी ने 'सरस्वती' में नही छापी । सच बात तो यह है कि वह थी भी इस लायक नहीं । लेकिन आलोचना उन्हें पसन्द नहीं आयी, इतना ही होता तो अचरज की बात न थी। सुनते हैं किताव उन्हें और भी नापसन्द है । एक और मित्र के सम्बन्ध में मालूम हुआ है कि उन्हें 'परख मेरी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं जची; गोया कि लिखने से पहले ही मेरी लेखनी की प्रतिष्ठा बन गयी थी । इन सब ऊटपटांग सम्म- तियों का क्या बनाया जाय ! और मैं समझता हूँ कि अगर लोग आपको और प्रसादजी को मंगलाप्रसाद पारितोपिक नहीं देते और फिर भी योग्य व्यक्ति को ही देना चाहते है तो वह मुझे ही दे सकते है । पारितोपिक का सम्मान इसी में है। तो 'मेरी मेग्डलीन' पाप छापेगे? यह ठीक है । 'शवन' कब तक सत्म होगा ? कितनी मोटी चीज है ? कोई 'रंगभूमि' के टक्कर की दूसरी चीज़ भी लिखिए न ? अाप और क्या लिख रहे जाने कौन कहता था कि एकेडमी के लिए 'गाल्सवर्दी का अनुवाद करना आपने शुरू किया है । क्या यह ठीक है ? मुझसे आप पूछे, और नाराज न हों तो मैं कहूँगा कि गाल्सवर्दी के अनु- वादक तो बहुतेरे निकल पायेगे, प्रेमचन्द इस काम को करते हैं तो हिन्दी का दुर्भाग्य है ! गाल्सवर्दी फी चीज़ों को मैंने दिल्ली-जेल में चख देसा था, विलायतीपन और दिलायती भापा के अजीवपन के अाकर्षण को दूर रखने के बाद क्या मैं जरा देर के लिए भी गाल्स- वर्दी को प्रेमचन्द से ऊंचा मान सकता हूं? आप कहानियां लिखें,
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
रंगभूमियाँ लिख, पर मेरा निवेदन है कि गाल्सवर्दी के अनुवाद
में
फंसकर प्रेमचन्द से वंचित रखने का अनुपकार हिन्दी-साहित्य पर
न करें।
'माधुरी' वालों ने मेरा पुरस्कार पर भेज ही दिया होगा।
'माधुरी' में 'परख' की समालोचना निकली या नहीं ? 'माधुरी'
को भी मेरी प्रति शेख मुहम्मद अली के पते पर भेजने को कह दें
तो कृपा हो।
आपसे मिलने को कैसा जी चाहता है ! स-देह साक्षात् और
वार्तालाप नहीं होता, तब तक पत्र से ही सही ।
मैं यहाँ सर्वथा कुशल और आनन्द से हूँ। आपकी बधाइयों
पर प्रसन्न और कृतज्ञ हूँ। शायद आप इस बात पर एक और
बधाई भेज दें कि अभी कुछ दिन हुए, परमात्मा ने मुझे एक पुत्र
का पिता बना दिया है।
प्रापका
जैनेन्द्रकुमार
नवलकिशोर प्रसा
प्रकाशन विभाग,
लखनऊ
१७ दिसम्बर, १६३०
प्रिय जैनेन्द्रजी,
वन्दे ! पत्र मिला । वाह ! आपने कहानी लिसदी होती तो क्या
पूछना । मैंने तो इस वजह से नहीं कहा था कि आपको कप्ट पर
कप्ट क्या दूं। अभी तक समय है, हालांकि छपाई शुरू हो गयी
है। पर आपकी कहानी मिल जाती तो आखिर वक़्त भी दे देता।
क्या अब भी मुश्किल है ?
'परल' की आलोचना में 'माधुरी' या 'हम' में करूंगा। मेरे
पाम दो प्रतियों में से एक भी नहीं बची। एक तो जेल भेज ही दी
चिट्ठी-पत्री थी, दूसरी एक महिला ले गयीं और अभी तक लौटा रही हैं। इसलिए उसका असर जो दिल पर पड़ा था वही लिखूगा । 'गढ़- कुंडार' तो नई चीज है, मगर मेरा मन उसके पढ़ने में न लगा। दो-एक चरित्रों का चित्रण उसमें अच्छा हुआ है । उसकी आलोचना भी करूंगा। 'गवन' अभी तैयार नहीं हुआ । तीन सौ पृष्ठ छप चुके है। अभी एक सौ पृष्ठ और होंगे । यह एक सामाजिक घटना है। मैं पुराना हो गया हूँ और पुरानी शैली निभायें जाता हूँ । कथा को बीच में शुरू करना या इस तरह शुरू करना, कि उसमें ड्रामा का चमत्कार पैदा हो जाये, मेरे लिए मुश्किल है । पुरस्कारों का विचार करना मैने छोड़ दिया । अगर मिल जाय तो ले लूंगा, पर इस तरह जिस तरह पड़ा हुमा धन मिल जाय । श्राप या प्रसादजी पा जाये तो मुझे समान हर्ष होगा। आपको ज्यादा ज़रूरत है इसलिए ज्यादा खुश हूँगा। पुत्र मुवारक ! ईश्वर चिरायु करे । या यों कहूँ, चिरायु हो। मैं तो पुराने खयाल का आदमी हूँ। दो पुत्रों तक तो बधाई दूंगा। इसके बाद जरा सोचूंगा। 'हंस' और 'माधुरी' दोनों ही यथास्थान भेज दी जाएंगी। 'शरावी' और 'गढ़कुंडार' दोनों ही को एक-एक प्रति मिली थी। वे दोनों भी मैंने पढ़कर जेल भेज दीं। अब तो उनके आने पर किताबें वापस होंगी। आखिर आप कब तक आवेगे? 'माधुरी' में दो में से एक भी मालोचना के लिए नहीं आयी। अब आपके उस प्रश्न का जवाब कि 'परख' को मैं प्रसाद-स्कूल के निकट क्यों समझता हूँ। मैं तो कोई स्कूल नहीं मानता; प्रामने हो एक बार 'प्रसाद स्कूल', 'प्रेमचन्द स्कूल' की चर्चा की थी। शैली में ज़रूर कुछ अन्तर है, मगर वह अन्तर कहाँ है, यह मेरी समझ में खुद नहीं आता । आपकी शैली में स्फूर्ति-सजीवता--- कहीं अधिक है । चुटकियाँ, चुलबुलापन कहीं अधिक है । प्रसादजी - प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व के यहाँ गम्भीरता और कवित्व अधिक है । Realist हम में से कोई भी नहीं है । हममें से कोई भी जीवन को उसके यथार्थ रूप में नहीं दिखाता, बल्कि उसके वांछित रूप में ही दिखाता है । मैं नग्न यथार्थवाद का प्रेमी भी नहीं हूँ। आपसे मिलने पर 'परख' के विपय में बातें होंगी --तव तक ग़वन भी तैयार हो जायगी। श्राशा है, आप प्रसन्न होंगे। भवदीय । धनपतराय P.S. अगर हो सका तो मैं 'शरावी' और 'गढकुंडार' और 'कंकाल' तीनों ही किसी तरह मँगवाकर भेजूंगा। समालोचना अवश्य कीजियेगा, 'हंस' के लिए। स्पेशल जेल, गुजरात (पंजाब) १७ दिसम्बर, १६३० बाबूजी, बहुत दिन हुए, यहाँ से आपको अमीनुद्दौला पार्क के पते पर एक खत डाला था। मालूम नही, आपको वह मिला भी या नहीं। आपका खत न पाने से जान पड़ता है, नहीं मिला। 'परख' हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर ने ही छापी है । आपको अवश्य मिल गयी होगी । वह आपको कैसी लगी? आपकी खुली सम्मति सुनने की बड़ी इच्छा है । नाथूरामजी प्रेमी ने उस पर अवध उपा- ध्यायजी की विस्तृत समालोचना की एक प्रति मेरे पास भेजी है । वह उपाध्यायजी ने सरस्वती में भेजी थी। मुझे अख़बार तो मिल पाते नहीं, इससे मालूम नही रहता, कहाँ क्या निकलता है। क्या आपने भी उसके सम्बन्ध में 'हंस' या 'माधुरी' में कुछ लिखा है ? उपाध्यायजी ने तो किताव की बेहद तारीफ़ कर दी है। आप चिट्ठी-पत्रो जानते हैं मुझे उनको परख पर बहुत भरोसा नहीं है । विज्ञान की तराजू पर तोल कर साहित्य पर जो निर्णय दिया जाता है, उसके मोह में मैं नहीं पड़ना चाहता, लेकिन आपको और दो-एक सज्जनों की अच्छी सम्मति मुझे चाहिए ही। आपको और उनकी निगाहों में पास समझा गया तो यही मेरे लिए सब-कुछ है । शेप से तारीफ़ पाने की इच्छा या चिन्ता जैसे मुझे विल्कुल भी नहीं है । सापको मैं 'मेरी मैग्डलीन' दे आया था । नौ-दस महीने हुए होंगे। उसके प्रकाशित होने का अब क्या हाल है ? जैसे और जहाँ से उचित समझे, छपवा दें और पैसा घर भिजवा दें। मैं जेल में हूँ, घर पर हर तांबे के पैसे की ज़रूरत है। इस सम्बन्ध में मैं यह भी प्रापकी मार्फत 'माधुरी' के व्यवस्थापकजी जो याद दिलवाना चाहता हूँ कि शायद अप्रैल (या पास-पास के) महीने की 'माधुरी' में प्रका- शित कहानी ('दिल्ली में') का पुरस्कार मुझे नहीं मिला है । वह कृपा कर भेज दिया जाना चाहिए । थोड़ा कष्ट उठाकर यह काम श्राप करा सकेंगे तो बड़ी कृपा होगी और 'मेरी मेग्डलीन' का भी ध्यान रखेंगे तो आभार होगा । आपने इस वीच क्या लिखा है ? नई छपी चीजों की एक-एक प्रति अवश्य भिजवा दीजिए। जेल में किताबों की कीमत और जरूरत और चाह कितनी रहती है, यह हमीं जान सकते हैं। और पाप कसे है, यह अवश्य लिखें। यहाँ दो-एक आपके जबर्दस्त मुरीद है। जब उन्हें पता चला कि मैं आपसे राइटिंग टर्स पर होने का सौभाग्य रखता हूँ, तो उन्होंने मुझे शतशः अनुरोधपूर्वक आपको उनकी Respects लिख भेजने को कहा । वे आपकी कुशलता सुनने के बड़े आकांक्षी है । मैं उन्हें उन आठ-दस घंटों का हाल मुना चुका हूँ जो मुझे अब तक आपके साथ विताने के लिए मिले है । उनकी याद मेरे भीतर बसी है। बड़े मजे की वह याद है । लेकिन वह में आपको नहीं सुनाऊँगा। प्राशा है, आप प्रसन्न और स्वस्थ होंगे और पत्र देंगे।
प्रेमचन्द : एम. पृती व्यवसाय में यहां इतनी अच्छी तरह हूँ कि पया यहूँ । साना बहुत अच्छा मिलता है, जेल के अन्दर पूमने को और मेलने को सूब मिलता है। बस, असबार नही मिलते, यही जरा कमी है। सो यह भी कुछ नहीं, यदि नई-नई फिता मिलती रहें । विशेष नमस्कार और मादर के साथ, आपका जैनेन्द्रकुमार स्पताल जेल, गुजरात ७ जनवरी, १६३१ श्रद्धेय बाबूजी, प्रापका पर समय पर मिल गया था। उत्तर आज इसलिए दे रहा हूँ कि जनवरी का पहला हफ्ता खतम हो जाता है और 'हंस' के लिए कहानी भेजने के खयाल को पास रखने की गुंजाइश भी विल- कुल खत्म हो जाती है । बात तो असल में यह है कि कहानियां हो गई हैं पर भेजी नहीं । प्रेस-आडिनेन्स की खबर पाते ही डर हुआ कि 'हंस' का यह अंक भी निकल गया तो आगे नहीं निकलने दिया जायगा। और क्या मालूम विशेषांक भी निकल पाये या नहीं। फिर संभा- वना थी कि उन कहानियों को जल्दी ही हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर भेजना पड़ जाय । वह संग्रह छापते हैं और कुछ नयी अप्रकाशित कहानियाँ चाहते हैं । बात जनवरी तक संग्रह के निकल जाने की थी। आपको कहानी भेजी गई और अखबार बन्द हो गया या विशेषांक में उसके निकलने की संभावना न रही तो इस तरह : उसके फिर जल्दो बम्बई जाने में गड़बड़ पड़ जाती । इस तरह जो चार कहानियाँ इस बीच लिख डाली गयी हैं, मेरे पास हैं । पुरानी प्रकाशित कहानियों को उनसे (नाथूरामजी प्रेमी) पाने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ ताकि उनको एक बार फिर देखकर उनके साथ ही इन ६७ चिट्ठी-पत्री नयी को भी रवाना कर दूं। कृपा कर लिखिये कि आडिनेन्स की कृपा आपके प्रेस और पत्र पर तो नहीं हो गई ? पत्र निकलता हो तो कृपाकर मेरी भूल को क्षमा कर दीजिए । पत्र निकले तो, अगर पहले लिखे पते पर न भेजा गया हो तो जेल के पते पर ही भिजवा दीजिएगा। 'माधुरी' भी ! 'माधुरी' की उस कहानी के मेरे पुरस्कार के बारे में क्या हुआ, सो आपने नही लिखा था । 'माधुरी' के नाम पर वह वात भी याद आ गयी है तो आपको भी याद दिला देता हूँ। 'गढ़कुंडार' और 'शरावी' अगर आपको प्राप्त हो गये हैं तो मैं देखना चाहूँगा । समालोचना, जहाँ लिखेंगे, भेज दूंगा। 'ग़वन' तैयार हो गया ? इसके वाद' ही 'मेरी मैग्डलीन' प्रेस में जायगा न ? तैयार हो गया हो तो पिछली किताबों के साथ 'गवन' की एक प्रति भी भेजिएगा। मार्च के अन्त तक मैं छूटूंगा । लिखित नहीं तो सेवा में उप- स्थित होकर मौखिक ही आपसे अपनी रचना के सम्बन्ध में आदेश और आलोचना प्राप्त करूँगा। लेकिन इतना जरूर लिखिए कि आपकी राय में 'चुलबुलाहट' कम होनी चाहिए न ? शायद मेरी कृति में यह पर्याप्त से अधिक मात्रा में होती है। अभी ठीक पारखी और आलोचक-दृष्टि से साहित्य को जाँचना और जमाना नही सीखा। श्रेणी और 'स्कूल-विभाजन' का काम मैं अपने लिए मनचाहे जैसा कर भी सकूँ, दूसरे के लिए और छपने के लिए नहीं कर सकता, लेकिन 'प्रसाद-स्कूल' शब्द काशी में सुन पड़ा था। स्वभावतः दूसरा स्कूल प्रापका ही होगा । खैर, जो हो । मैं तो चाहता हूं, यह काम सब अपने लिए कर लिया करें। मैं बिल्कुल प्रसन्न और स्वस्थ हूँ। प्रापका जैनेन्द्रकुमार प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व सरस्वती,प्रेस, १२ जनवरी, १६३१ प्रिय जनेन्द्रजी, कल पत्र पाकर बड़ा आनन्द हुअा । आपको भ्रम हुआ। पाड़ि- नेन्स तो फिर जारी हुआ लेकिन अभी मुझसे जमानत नहीं माँगी गयी, इसलिए 'हंस' का विशेषांक छप.रहा है। आप :यदि अपनी कहानी भेज दें तो तुरन्त छपवाऊँ और आपका लाखों यश मानूं.. फिर तो पत्रिका सज उठे । सुदर्शनजी ने कहानी भेज दी है । राजे- श्वरी ने भी भेजी है । कौशिकजी आजकल इतना लिख रहे हैं, कि मैने उन्हें कष्ट.देना व्यर्थ समझा। वह बहाना करके दाल जाते । आपकी कहानी आ जाय.तो क्या पूछना ! हमारे प्रोप्राइटर वाबू विष्णुनारायण भार्गव का मद्रास में स्वर्गवास हो गया। धुड़दौड़ में गए, प्राणों की वाजी हार गए । अब देखना है कि यहाँ कैसे काम होता है, 'माधुरी' बंद होती है या चलती है, मुझे तो इसके चलने की आशा नहीं है । 'गबन' के तीन फ़ॉर्म और बाकी हैं। वेचैन. हूँ कि कब छ 'और कब आपके पास भेजू । 'गढ़कुंडार' और 'शरावी' आज भेज रहा हूँ। मुझे तो 'गढ़कुंडार' कुछ (नहीं जंचा) । 'शराबी' अपने ढंग की बुरी चीज नहीं । आप इन दोनों की आलोचना कर सकें तो 'हंस' में छाप दूंगा। हाँ, 'गवन' के बाद 'मैग्डलीन' छपेगी । तब तक मेरा दूसरा उपन्यास भी लिखा जा चुकेगा। हाँ, पत्नीजी तो आ गई, मगर शायद फिर जायें । अभी उन्हें 'सन्तोप नहीं । सारा स्वराज्य एक वार ही ले लेंगी। किस्तों में नहीं चाहतीं। मैंने 'परम' को पालोचना 'हंस' में कर दी है । 'माधुरी' का पुरस्कार तो भेजा जा चुका है । बहुत पहले ही । अब कुछ बाकी
चिट्ठी-पत्री
नहीं।
और तो नई बात नहीं । आप वाहर आ जाएँ तो फिर बातें
होंगी। उस थोड़ी देर की मुलाक़ात से तो प्यास और भी बढ़ गई
थी।
पापका
धनपतराय
हाँ, उपन्यास हो या कहानी, उसमें चुलबुलाहट न हो तो
वेचटनी-सा भोजन है । जरूर चाहिए । जराफ़त तो उपन्यास को
जान है।
[]
२० जनवरी, १६३१
बाबूजी,
पन्द्रह ता० को मैंने आपको कहानी भेजी थी। रजिस्ट्री से
भेजता कैसे, इससे वैरंग भेजी ताकि पैसे वसूल करने की वजह से
पोस्ट आफ़िस को उसे ठीक जगह पहुँचाने की चिन्ता रहे । वह
आपको मिल गई न ? वह लिखी तो चौदह को गयी थी लेकिन
खत्म नहीं हुई थी । जब आपको भेजी, दोबारा देख भी न पाया।
एक जगह एक शब्द सूझ नही रहा था इससे खाली छोड़ दिया गया
था। मुझे पीछे उसका खयाल आया । खैर । जहां-तहां की गलतियों
को आपने सँभाल दिया होगा । 'हंस' कब तक आयेगा, लिखिए ।
अापकी किताबें अब तक नहीं मिली । शायद भेजने में भूल हो
गयी, अव तक भेज नही पाये ।
मापका
जैनेन्द्रकुमार
१०० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व [६] नवलकिशोर बुक-डिपो, लखनऊ १८ फरवरी, १६३१ प्रिय जैनेन्द्र, आपकी आलोचनाएँ मुझे पहले ही मिल गई थीं, पर जवाब की ऐसी कोई बात न थी। इससे विलम्ब से लिख रहा हूँ । सभी आलोचनाएँ 'हंस' में जा रही हैं । आपने ‘गढ़कुडार' को पसन्द किया है । मैं तो पढ न सका था । कारण यह है कि उसमें आगे चलकर कुछ रस आता है और मैं आदि के दस-वीस पन्ने पढ़कर ही अधीर हो गया, आगे पढ़ने का धैर्य न रहा । 'हंस' अभी तक नही आया । शायद आज मिल जाय । इधर काशी में बुधवार से बहुत बड़ा दंगा हो रहा है, सभी कारोवर बंद हैं, प्रेस भी बंद है, यहाँ तक कि x x भी बंद है । शायद दो रोज में सामान्य स्थिति या जाय । इस बीच में निरालाजी की 'अप्सरा' भी प्रकाशित हो गई। यह उनका पहता उपन्यास है, मिलने पर भेजूंगा । आप कब तक बाहर पावेंगे ? एक बार हम लोगों का मिलना ज़रूरी है । मैं दिल्ली आ जाऊँगा। पूज्य वहनजी से भी जल्दी में कुछ बातें न 'गवन' की एक प्रति भी शीघ्र ही भेजूंगा । इस पर जो कुछ लिसना हो, वह 'माधुरी' के लिए लिखिएगा । 'माधुरी' से अब मेरा सम्बन्ध नहीं रहा । में युवा-डिपो में आ गया। या तो पहले ही गया था, अब पूर्ण रूप से पा गया। अप्रैल तक शायद यहाँ और रहेगा, फिर काशी चला जाऊँगा और कही देहात में बैठकर कुछ लिसवा-पटता रहेगा । 'हंस' तो अापके सिर डाल दूंगा। क्या बताऊं, अभी एक हजार भी ग्राहक नही है। प्राप लिपट जाएंगे तो छ: महीने में दो हजार छपेगा । उसके लिए प्रति मास एक गल्प लिखते जादए और जो कुछ मिजाज में पाये, लिसिए ।
चिट्ठी-पत्री १०१ 'कल्याण' का कृष्णाक निकल रहा है । कुछ उसमें भी लिखिए । वह पैसे अच्छे देता है, हिन्दी में सबसे ज्यादा छपता है । इधर उर्दू की उन्नति देखकर आश्चर्य हो रहा है । लाहौर से एक पत्रिका ने पाठ सौ पचास पृष्ठों का विशेषांक निकाला है। शेप कुशल है। शुभेच्छु धनपतराय [१०] स्पेशल जेल, गुजरात २२ फरवरी, १६३१ बाबूजो, आपका पत्र मिला । उससे एक ही रोज पहले एक कार्ड मैंने लिखा था । 'हंस' को और किताबों की प्रतीक्षा में हूँ। मै स्वयं आपसे मिलने को भूखा हूँ । पाप ही घर पर दिल्ली आ सकेंगे, इससे तो बढ़कर भाग्य ही क्या होगा ! मैं अगले महीने की समाप्ति तक छूटुंगा । ठीक तिथि लिखना तो सभव नहीं । 'कल्याण' का विशेपाक कब निकलता है ? मै अवश्य उसके लिए लिखूगा लेकिन जान पड़ता है अभी जल्दी नहीं है। अापकी सेवा और पाजा-पालन के लिए मैं तैयार हूँ हो । जव और जैसी आज्ञा होगी, "हंग के लिए, लिखने का यत्न पारगा। आपका फ़रवरी का अंक मदद निक- लेगा, क्योंकि उस कहानी की, हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर मंग मंह, निकाल रहे है, उसके लिए ग्रावश्यकता है। कार हा कि उसकी प्रतिलिपि बम्बई पहुँच जाय ? और आप क्या नवलकिशोर नमनन्त कागदा रखते हैं जो गांव में बैठ जादे बालित है ? 'माधुरी का क्या हाल है ? विशेष न्द्र रई।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
[१०]
लखनऊ
प्रिय जैनेन्द्रजी,
मैं थर-थर कांप रहा हूँ कि आप 'हंस' में पुस्तकों को पालो-
चना न पावेगे तो मुझे क्या कहेंगे । मैंने पालोचना भेज दी थी।
कह दिया था इसे अवश्य छापना। पर मैनेजर ने पहले तो कई लेख
इधर-उधर के छाप डाले और पीछे से स्थान की कमी पड़ गई।
मेरी एक कहानी जो राष्ट्रीय रंग में थी रह गई । पालोचनाएं रह
गई । आपकी कहानी रह गई । अव वह सब फरवरी के अंक में
जा रही हैं । क्षमा कीजियेगा।
'रावन' छप गया हैं । वाइंडिंग होते ही पहुंचेगा। उस पर मैं
आपकी दोस्ताना राय चाहूँगा।
'हंस' कैसा रहा?
इस तरफ़ तो और कोई पुस्तक नही आई । कल्याण के लिए
यदि आप बाहर आकर भी लिखेंगे तो विलम्ब न होगा । १५०००
छपता है । मैं उसकी लेख-सूची भेज रहा हूँ। विषय चुन लीजिए।
शेप कुशल ।
भवदीय
धनपतराय
7
।
7.
[११]
अजमेर कैम्प कांग्रेस, करांची
२३ मार्च, १६३१
श्रद्धेय,
आपका पत्र दिल्ली मिला था। 'गवन' भी मिल गया था, पढ़
भी न पाया कि ऋपभचरण उठा ले गया । अव दिल्ली जाकर पढ़गा
पौर अपनी सम्मति लिखूगा । सम्मति अच्छी के बजाय और कुछ
चिट्ठी-पत्री तो होने से रही । कुछ पृष्ठ न पढ़ लेता, इतना तो तब भी कह सकता था। यहां कल आया, पहली या दूसरी को बम्बई जाऊंगा। इस पत्र का उत्तर जो आप लिखें, बम्बई प्रेमीजी के पते पर दें। 'हंस' का फरवरी का अंक भी वहीं भिजवा दें। आपने 'कंकाल' और 'शराबी' का जिक्र तो किया, भेजा नहीं। मिल जाय तो उन्हें बम्बई भिजवा सकते हैं, रास्ता काटने को कुछ सामान मिलेगा, क्योंकि साथ में मेरे कोई किताव नहीं है । विशेष कुशल है। यहाँ चहल-पहल है । नौजवानों ने मौका देखा है, उठ रहे हैं और गांधीजी को वंठा देना चाहते हैं । यह जानते नहीं कि गांधी मरकर ही बैठेगा । पढ़े-लिखे अहम्मन्य नौजवानों की बात थोड़ा- बहुत तमाशा अवश्य दिखायेगी । देखें, क्या होता है । विशेप युगल प्रापका जैनेन्द्र [१२] हिन्दी-अन्य रत्नाकर कार्यालय, गिरगांव, बम्बई ६ अप्रैल, १६३१ वाबूजी, मैं करांची से परसों यहाँ पहुंचा । 'गवन' जब चलनेवाला ही था कि दिल्ली में मिला था। कुछ सफ़ पढ़ पाता हूँ कि ऋपभ उसे उठा ले गया । सम्मति अब दिल्ली से ही लिखूगा। फरवरी मा 'हंस' का अंक मुझे यहाँ मिला । 'परख' की आपकी आलोगना तो चलती-सी रही जैसे बहुत भीड़ के वक्त लिखी गयी हो । Met दो-एक रोज में चलूंगा । झांसी भी ठहरने का गिधारमा सोचता हूँ, सीधा वृन्दावनलालजी वर्मा के Titin ur ठहरूँ । जानता नहीं तो क्या ! आपकी 'हग rithin ke
१०४
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
आप दिल्ली के पते पर लिखिएगा कि आप दिल्ली कब पधारिएगा।
मैं नौ-दस तक दिल्ली अवश्य पहुँच जाऊँगा।
विशेप ।
आपका
जैनेन्द्रकुमार
[१३]
साहित्य-सुमनमाला कार्यालय
नवलकिशोर प्रेस बुक-डिपो, लखनऊ
१३ अप्रैल, १६३१
प्रिय जैनेन्द्रजी,
आपका पत्र मिला । मै लाहौर गया, पर आप दिल्ली न थे,
इसलिए मैं सीधा लौट आया। आशा है अव श्राप दिल्ली आ गए
होंगे । आपको कहानी का पुरस्कार भेजने के लिए मैने ताकीद कर
दी है । आशा है, जल्द पहुँचेगा । 'गबन' आप पढ़ लें और में कुछ
आपकी राय जान लूं तो मुझे सन्तोप हो। 'परख' की आलोचना
जल्दी में तो नहीं की, लेकिन अपनी दानिश्त में मुझे जो कुछ कहना
चाहिए था वह कह चुका । मै समालोचक वहुत खराब हूँ। पुस्तक
पर पाठक की दृष्टि से निगाह डालता हूँ। और जो भाव जम
जाता है वहीं लिखता हूँ।xxxx आयी तो थी पर एक साहब
लेकर मुरादाबाद चले गए, वे लौट कर आवे तो भेजूं ।
आशा है आप (सानन्द) हैं ।
भवदीय
धनपतराय
[१४]
पहाड़ी धीरज, दिल्ली
१६ प्रल, १६३१
बाबूजी,
प्रापका पत्र मिला । म यहाँ तेरह तारीस की सुबह पहुंचा।
चट्टी-पनी उसी दिन श्री स्वामी आनन्द भिक्षुजी से मिलना हुआ था। उनसे मालूम हुआ था कि आप देवशर्माजी को लाहौर जाते हुए सहारन- पुर के स्टेशन पर मिल गये थे। मैं इससे यह समझता था कि आप अभी लाहौर ही होंगे और लौटते हुए जरूर दिल्ली उतरेंगे। और मैं हर रोज आपके यहाँ पाने की आशा कर रहा था । उसके बदले में मिला प्रापका खत जिससे मालूम हुआ कि ग्राप लखनऊ पहुंच गए और अब जल्दी इधर आनेवाले है नहीं । यह तो कुछ बात ही न हुई । मैं यहाँ आपकी सलाह और मदद से कुछ अपनी जिन्दगी की समस्याओं को हल करने की सोच रहा था । खैर ! पुरस्कार के बीस रु० मुझे परसों मिल गये । 'रावन' अव पड़ रहा हूँ। कल तक पढ़ चुकंगा । पसंद न पाये यह तो हो ही कैसे सकता है ! ज्यादा खत्म करने पर लिखूगा। स्वामीजी, प्राज मालूम हुआ, लखनऊ ही गये है । यह शायद आपको मिलें । उनसे आप जानेंगे कि यहाँ न पाकर आपने कैसा अत्याचार किया । मैं आखिर दिल्ली पाता था ही। स्टेशन पर ही नहीं तो एक दिन बाद सही, मैं यहाँ हाजिर हो ही जाता । मेरा अापको देखने को वड़ा जी है । 'परख की पापको पालोचना से मैं असहमत हूँ, सो बात नहीं । उस विलक्षण विवाह के बारे में तो मुझे अब खयाल होता है कि शायद कुछ एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी के मोह में पड़कर, कि पुस्तक जिससे असाधारण ऊँचे, मैंने यह बात उस तरह लिखी । अव सचमुच लगता है कि वह अयथार्थ मोह था और मेरी कमी थी। और पुस्तक का परिचय देते-देते जो प्रापपुस्तककार पर कुछ शब्द लिख गये, यह मुझे बड़ा प्रिय लगा। जैसे आप उस लेखक को पाठक के निकर पहुंचा देना चाहते है और उनमें आपस में मेलजोल हो जाय । लेकिन पहले कार्ड में जो मैंने लिखा, उसका आशय यह था कि पुस्तक पर आपका वक्तव्य इतना संक्षिप्त है कि पुस्तककार, जिसे प्रापसे उसके गुण-दोषों की समीक्षा और आलोचना सुनने की उत्कण्ठा थी, संतुष्ट नहीं हो सकता । ।
. प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व और वह भी जो आपसे खरी बात सुनने की जिद करने का अपना अधिकार समझने लग गया है। आप चाहें तो 'माधुरी' या और किसी में या उससे भी अच्छा मुझे, समीक्षात्मक अपनी विस्तृत सम्मति भेज सकते हैं और इस 'चलित-चित्त' के बारे में भी अपनी राय लिखें । मेरे मन में हो रहा है, न जाने कैसी है, कैसी नहीं । दुवारा पढ़ी तो वीच-बीच में कुछ गड़बड़-सी लगने लगती है । प्राप इस पर समीक्षक नहीं, उस्ताद की हैसियत से मुझे कुछ लिखें। आपको याद हो कि उस मुलाकात के वक्त मैंने जब आपसे इस कहानी के थीम का जिक्र किया था तो आपने कुछ संदेह-सा प्रकट किया था । सो ही समझाकर आप मुझे लिखें। मैं यहाँ बिलकुल स्वस्थ और प्रसन्न हूँ। और माताजी अच्छी तरह है । और सब कुशलपूर्वक हैं । मेरे योग्य सेवा लिखें। आपका विनीत जैनेन्द्रकुमार - . [१५] पहाड़ी धीरज, दिल्ली २६ जून, १६३१ बाबूजी, आपके पत्र का जवाव मैंने परसों दिया है या फल । मिला होगा । 'वातायन' वाली कहानी कल ही रवाना कर चुका हूँ। आज गवन' की आलोचना लिखता था कि नन्ददुलारे वाजपेयी का बहुत- बहुत अनुरोध का पत्र आ पहुंचा । 'भारत' के लिए कहानी चाहते हैं । क्योंकि ऐसी पालोचना लिख चुके हैं जो मेरे बहुत अनुकूल न थी, इसलिए भी उनके अनुरोध को मानना जरूरी हो गया है, कहीं वह पोर न समझे। इसलिए अब वही लिप रहा हूँ। यह इसलिए मापको लिखता हूँ कि भाप 'भारत' में कहानी देखकर मुझे उला-
चिट्ठी-पत्री
१०७
हना न दें। कल आपकी आलोचना और फिर जल्दी ही कहानी
लिखूगा । 'भारत' में आज हिन्दुस्तानी एकेडमी की पुरस्कार-मूचना
दीख पड़ी । 'परख' और नये छपते हुए संग्रह 'वातायन' की यथा-
वश्यक प्रतियां यथास्थान भेजने के लिए बम्बई लिख रहा हूँ।
मुझे विश्वास है, यह दुस्साहस नहीं है । 'वातायन' छपते ही आपके
पास आयगा । जल्दी ही छप जायगा ।
विशेष कुशल है।
विनीत
जैनेन्द्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
१६ जुलाई, १९३२
वाजी,
आपका पत्र भुल्तान में मिला था। .याल था कि जवाव दूं
तो कहानी के साथ दूं। कहानी जो शुरू की थी, शुरू करते न करते
छूट गई । और जब आपका पर आया, तब उन कुछ लिखे पन्नों
का भी पता न चला । दूसरी कहानी या वही कहानी दूसरी वार
लिखने का फिर न मन हुआ, न मौक़ा हुआ। यह भी ध्यान
हुआ कि नया आडिनेंस लग गया है, और अब आपका विशेषांक
क्या निकलेगा । क्या विशेषांक निकल रहा है ? और क्या उसमें
कुछ देर है ? सूचना मिली, और अंक निकलता हुआ और उसके
निकलने और आपके पत्र में काफ़ी से कम वक्त भी हुमा, तो भी
यहाँ से कहानी अवश्य भेजूंगा । यहाँ मुलतान-जैसा जमघट नहीं है।
१३ ता० को मैं यहाँ आया । राजनैतिक कैदियों को, रिहाई
की तिथि निकट पाते ही यहां भंज देते हैं, मुस्तान में रिहा नहीं
करते । यो मेरो तिथि अट्ठारह है; पर जुर्माने का और डेढ़ महीना
यही काटना होगा । सामान कुर्क करके, जुर्माना वसूल कर लिया
।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्त्वित .. जाय तो बात दूसरी, पर इसकी प्राशा कम है । आपका 'कर्मभूमि' कितना हो गया? जल्दी देखने की उत्सु. कता है । आपको जाननेवाले हर जगह मिल जाते हैं । पर कृतियों से, दूर-दूर से ऐसा जानते हैं कि यथार्थ ही आपको जाननेवाले किसी को सामने पाकर उन्हें हर्षमय विस्मय होता है । तव आपके प्रति उनके आदर-भाव का कुछ प्रतिविम्बित अंश अनायास उस जानहार को भी पाना होता है। इस पर उसे गर्व भी होता है, लज्जा भी । मुफ्त आदर क्या बुरा ? मुफ्त है, इसलिए क्यों अच्छा नहीं ? पर, मुफ्त है इसलिए वह कठिन है, भारी लगता है। ऐसे ही एक महाशय अपना लिफ़ाफ़ा और कागज पेश करके हठात् मुझसे आपको यह पत्र लिखवा रहे हैं । नवयुवक है, वम्ब-केस में है और आपको जानने के मेरे सौभाग्य के वधाई-स्वरूप मेरे प्रति अत्यन्त सेवोद्यत हो गये हैं। मुझे लिखते हुए अपने पत्र में आप उन्हें अवश्य याद करें। जेल में लिफ़ाफ़ा कीमती लीज है और मैं आपको लिख-पढ रहा हूँ, इसका तमाम श्रेय उनको है। अब आप गाँव में रहते हैं, या शहर ?मकान ले लिया है ? दोनों बच्चे कहाँ हैं ? शहर में ही रहना होता होगा उन्हे तो । अगर 'हंस' बंद है तो क्या आप नया कुछ नहीं लिख रहे ? 'मेरी मैग्डलीन' क्या छपना प्रारम्भ हो गया? औ रमैंने 'स्पर्द्धा' कहानी ठीक करके राय साहब को भिजवायी थी, क्योंकि उन्होने मुझसे एक बार सानुरोध कहा था । क्या वह उन्हें मिल गयी? पुछवाकर अवश्य सूचित कीजिएगा । क्योंकि इस काम के लिए एक आदमी की तत्परता के विश्वास पर निर्भर करना हुआ था । और कुशल-समाचार और साहित्य-समाचार लिखिएगा । श्री कृपाराम मिश्च की जिस किताव का जिक्र किया था, वह भेज सकें तो अवश्य भेजें । विशेष सब ठीक है। यापका जनेन्द्र ।
- १०६ चिट्ठी-पत्री [१७] सरस्वती प्रेस, काशी १५ अगस्त, १६३२ प्रिय जैनेन्द्र, तुम्हारा पत्र कई दिन हुए मिला । मैं आशा कर रहा था कि पहाड़ी धीरज से आ रहा होगा, पर आया लाहौर से । खैर, लाहौर मुल्तान से कुछ कम है । उससे कई दिन पहले मुल्तान मैंने एक पत्र भेजा था । शायद वह लौटकर पा गया हो । अच्छा, मेरी गाथा सुनो । 'हंस' पर ज़मानत लगी। मैंने समझा था ग्राडिनेंस के साथ जमानत भी समाप्त हो जायगी। पर नया साडिनेन्स आ गया और उसी के साथ जमानत भी वहाल कर दी गई । जून और जुलाई का अंक हमने छापना शुरू कर दिया है। पर मैनेजर साहब जब नया डिक्लेरेशन देने गए तो मजिस्ट्रेट ने पत्र जारी करने की प्राज्ञा न दी, जमानत माँगी। अव मैंने गवर्नमेंट को एक स्टेटमेंट लिख- कर भेजा है । अगर जमानत उठं गई तो पत्रिका तुरन्त ही निकल जायगी। छप-कट-सितकर तैयार रखी है। अगर आज्ञा न दी गई तो समस्या टेढी हो जायगी। मेरे पास न रुपये हैं, न प्रॉमेसरी नोट, न सिक्योरिटी । किसी से कर्ज लेना नहीं चाहता । यह शुरू साल है, चार-पाँच सौ बी० पी० जाते, रुपये हाथ पाते। लेकिन वह नही होना है। इस वीच मैंने 'जागरण' को ले लिया है । 'जागरण' के वारह अंक निकले, लेकिन ग्राहक संख्या दो सौ से आगे न बढ़ी! विज्ञापन तो व्यासजी ने बहुत किया, लेकिन किसी वजह से पत्र न चला। उन्हें उस पर लगभग पन्द्रह सौ का घाटा रहा । वह अब बंद करने जा रहे थे । मुझसे बोले, यदि आप इसे निकालना चाहें तो निकालें; मैंने उसे ले लिया । साप्ताहिक रूप में निकालने का निश्चय कर लिया है । पहला अंक जन्माष्टमी से निकलेगा । तुम्हारा इरादा भी एक साप्ताहिक निकालने का था । यह तुम्हारे लिए ही सामान प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व है । मैं जब तक इसे चलाता हूँ; फिर यह तुम्हारी ही चीज है । धन का अभाव है । 'हंस' में कई हजार का घाटा उठा चुका हूँ। लेकिन साप्ताहिक के प्रलोभन को न रोक सका । कोशिश कर रहा हूँ कि सर्वसाधारण के अनुकूल पत्र हो । इसमें भी हजारों का घाटा ही होगा । पर करूँ क्या ! यहाँ तो जीवन ही एक लम्बा घाटा है । यह कुछ चल जायगा तो प्रेस के लिए काम की कमी की शिका- यत न रहेगी। अभी तो मुझे ही पिसना पड़ेगा, लेकिन आमदनी होने पर एक सम्पादक रख लूंगा । अपना काम केवल एडिटोरियल लिखना होगा। तुम्हारी कहानी 'स्पर्द्धा' छप रही है । रायसाहब छपवा रहे है । 'मैग्डलीन' भी छपवाने वाले हैं। 'कर्मभूमि' के तीस फॉर्म छप चुके हैं । अभी करीव छ: फॉर्म वाकी है । 'हंस' में हाथ लगा दिया । प्रेस को अवकाश न मिला। इसलिए अब तक पुस्तक तैयार न हुई। अब उसे जल्द समाप्त करता हूँ। सबसे पहले तुम्हारे पास भेजी जायगी और तुम्हारे ममताशून्य फैसले पर मेरी कामयावी या नाकामी का निर्णय है। दो कहानियों के छोटे-छोटे संग्रह और छापे है । पं० कृपानाथ मिथ को 'प्यास' भेज रहा हूँ। संभव हो तो इसकी आलोचना करना । अव में शहर में रह रहा हूँ। लड़के पढ़ने जाते हैं। मैं भी प्रेस में घड़ी-आध घड़ी के लिए चला पाता हूँ। जिन भाई का आपने अपने पत्र में जिक्र किया है, उन्हें मेरा बड़े प्रेम से यंदे कहिएगा। मेरे हृदय में उनकी सच्ची शुभ-कामना है । उनका नाम न लिसा । मैं अपना नया उपन्यास उनके पास भेजूंगा। अभी श्री प्रानन्दभिक्षु गरस्वती का पम पाया। उन्हें मध्य- मान्न मोर ग्वालियर गोगादिप-गमायाँ गी पोरमे 'भावना' पर पुरगार मिले हैं । 'भावना भी तो अच्छी नीम ! पर पं० मीराम मांगा मिर', यामी गापानीको
-
चिट्ठी-पत्री
कहानियों का संग्रह, डा० रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 'पोडशी' आदि
पुस्तकें निकली है । डा. वृन्दावनलालजी का 'कुंडलीचक्र' मैंने बड़े
शौक़ से पढ़ा । लेकिन पढ़कर मन फीका पड़ गया । यहीं गर्मी नहीं
मिली, न चुटकी, न खटक । शायद मुझमें भावशून्यता का दोप है।
और तो सब कुशाल है । ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि तुम
सुखी रहो।
तुम्हार, सच्चा भाई
धनपतराय
सरस्वती प्रेस, काशी
७ दिसम्बर, १९३२
प्रिय जनेन्द्र, वन्दे !
कार्ड मिला था। सरस्वती प्रेस और 'जागरण' से २६-१०-३२
को 'उसका.अंत' नाम की कहानी के दंड में दो हजार की जमानत
मॉगी । वहृत-परेशान हुना, भागा हुआ लखनऊ पहुँचा, वहाँ चीफ
सैक्रेटरी से मिलकर कहानी का आशय समझाया और अपनी
लॉयल्टी के प्रमाण दिये । अव आशा है जमानत मंसूख हो जायगी।
जरा-जरा-सी बात में गर्दन पर छुरी चल जाती है।
. . 'कर्मभूमि' तुम्हें बहुत बुरी नहीं लगी, इससे खुशी हुई। इसकी
कही आलोचना कर दो।
तुम्हारी परेशानियों की कहानी पढ़कर बड़ी चिन्ता में हूँ।
इस मास कुछ भेजूंगा ज़रूर । 'जागरण' बड़ा पेटू है और 'हंस'
पैसे खाने में शेर ।
बच्चों को आशीर्वाद !
.
ve
सप्रेम
धनपतराय
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व [१६] सरस्वती प्रेस, काशी १० जनवरी, १९३३ प्रिय जैनेन्द्र, प्रेम ! पत्र मिला । छोटे दिलीप की बीमारी की बुरी खबर सुनी है। सर्दी यहाँ भी जोरों को है । दिल्ली का क्या पूछना ! ईश्वर उसे जल्द अच्छा कर दे । पं० वनारसीदासजी यहाँ रविवार को पा रहे हैं। माखन- लालजी कल यहाँ आये थे । तुम्हारी कहानी मैंने कही नहीं भेजी। यहाँ प्रसादजी से उस पर मेरी बातचीत हुई । एक दल तो उसे अवश्य ही धासलेटी कहेगा । ये लोग उसी दल में हैं । मैंने समझा, यदि कोई उस पर कुछ लिखेगा तो उसका जवाब दिया जायगा । अपनी तरफ से नाहक क्यों तूफ़ान खड़ा किया जाय ! हाँ, मैं भी चाहता हूँ, 'परख' पर कुछ लिखवाऊँ। मुझे आलोचना नहीं करनी आती । यहाँ आलोचना के लिए (जनार्दन- प्रसाद झा 'द्विज') सबसे अच्छे है । वह परीक्षा में लगे हुए हैं; और तो मुझे कोई आतोचक नहीं दिखता। 'कर्मभूमि' को आलोचना जल्द निकलनी चाहिए। सुभद्राकुमारीजी को बधाई तो दे दी थी। 'हंस' में आलोचना कर रहा हूँ। रपये नहीं जा सके, मगर दो-एक दिन में अवश्य ही जाएंगे। हजारों रुपये वाकी पड़े हुए हैं, लेकिन जब तक अपने हाथ में न आ जायें, क्या कहा जाय ? शिवपूजन प्रयाग हैं । ज्यों ही पायेंगे, कहानी तेतूंगा। और सब मुशल है। तुम्हारा धनपतराय चिट्ठी-पत्री [२०] सरस्वती प्रेस, १७ जनवरी, १९३३ प्रिय जैनेन्द्र, आशीर्वाद ! तुम्हारे दोनों पत्र मिले । उसके दो दिन पहले मैंने एक कहानी 'भारत' के लिए लिखी थी। बड़ी मनहूस कहानी निकली। कुछ इसी तरह का उसका विपय था । वच्चा चला गया । खत पढ़ते ही पहले तो कलेजा सन्न हो गया, लेकिन फिर मन शांत हो गया । यही जीवन के कड़वे अनुभव हैं । इन्हें झेले जाओ तो सब-कुछ सरल हो जाता है। फिर रोयें भी तो किसके सामने ? कौन देखनेवाला है ? किसी को अपना समझे क्यों ? अपना केवल इतने ही के लिए समझो कि उसके प्रति हमारे कर्तव्य हैं । ज्ञान-वान तो मैं जानता नहीं । ऐसे आघाती से कलेजे पर पाच लगता ही है । लेकिन लगना चाहिए नहीं । तुम रोये नहीं, इससे मेरा चित्त बहुत शान्त हुा । तुम यहाँ होते तो तुम्हारी पीठ ठोंकता । यही तो परीक्षा के अवसर हैं । भगवती और माताजी को बहुत समझाना । देवियों का हृदय कोमल होता है । बच्चा उनके अंग का एक भाग-सा था । होते ही उसी के झगड़ों में लग जाती थीं। अब उन्हें कितना सूना-सूना लगता होगा। माताजी ने दुनिया के सुख-दुःख देखे है । उनको मैं मया समझाऊँ ! लेकिन भगवती से कहूंगा धैर्य से काम लो। बच्चे को तुमने पाला-पोसा, फिर भी वह तुमसे रूठ कर चला गया । उसकी स्मृति क्या उससे कम प्यारी है ! मैं तो समझता हूँ वह और भी प्यारा हो गया है; समझो कि अब तुम्हारी गोद में खेल रहा है । वल्कि तुम्हारे हृदय के अंदर है। कहीं गया नहीं, भीतर जो बंठा है, अब बाहर की गर्मी, सर्दी, रोग, व्याधि का इस पर शुछ असर न होगा। फिर क्यों रोते हो? .
११४
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
चतुर्वेदी भी आये थे। दो दिन खूब बातें हुईं। प्रसादजी से
भी भेंट हुई । मैं समझता हूँ उनमें बहुत-कुछ सफ़ाई हो गयी है ।
कहानी के विषय में मेरी उनसे बातचीत हुई, मैंने उन्हें समझाने की
चेप्टा को । वह अपनी तरफ़ से अड़े रहे । लेकिन उसे इधर-उधर
भेजकर एक झगड़ा खड़ा करना उन्हें भी पसन्द नहीं है ।...
चैक से बीस रुपये भेजता हूँ । रुपये मँगवाने में डाक का समय
निकल गया।
अभी शिवपूजन सहायजी घर से नहीं लौटे । पाते ही कहानी
ले लूंगा । सुदर्शनजी एक फ़िल्म कम्पनी में छ: सौ रुपये पर नौकर
हो गये।
और तो सब कुशल है।
तुम्हारा
धनपतराय
[२१]
सरस्वती प्रेस,
४ मार्च, १९३३
प्रिय जैनेन्द्र,
मैंने कई दिनों से तुम्हें पत्र नहीं लिसा । कोई बात लिखने की
ऐसी थी भी नहीं । तुम्हारा लेस शिवपूजन सहायजी से मिल गया
भौर एप भी गया, मगर है बहुत नन्हा-सा । मेरा लेरा भी इतना
ही बड़ा होगा।
तुम्हारा उपन्यास चल रहा है, या पाराम करने लगा? मैं
समझता हूँ, अब तुम हर तरह से स्वस्थ हो ।
तीन-चार दिन इलाहाबाद रहा और(वहाँ)तुम्हारी गूब चर्चा
रही । इंडियन प्रेमवाले तुम्हें पन लिसंगे।
पुन्नू की अम्मा की फिताव को भूलना नहीं । तुम्हारा (लिरा
देना) ही उन्हें मागमान पर रहा देगा।
चिट्ठी-पत्री और तो नई बात नहीं। धनपतराय तुम अपना तौलिया यहाँ छोड़ गये जिससे बंदा देह पोंटता है। [२२] सरस्वती प्रस, बनारस ६ मई, १९३३ प्रिय जैनेन्द्र, पत्र मिला । मैं सागर गया था। कल शाम को लौटा हूँ। चेटी के चालक हुअा, पर चौथे दिन उसे ज्वर पा गया और प्रसूत- ज्वर के लक्षण मालूम हुए। यहाँ तार पाया। हम दोनों प्राणी भागे हुए गये । मैं तो लोट प्राया, तुम्हारी भाभी अभी यहीं हैं। 'हंस' निकल गया । कल रवाना होगा। नव के बड़ी देर हो गयी। तस्वीरों का इन्तजार था । तस्वीरें तो न पायौं, देर हो गई। यह सुनकर खुशी हुई कि 'रंगभूमि' वालों से तुम्हारा मामला हो गया। बड़ी अच्छी बात हुई । मगर भाई, 'हंस' को महीने में एक मोती न दोगे तो बेचारा जियेगा कैसे ? यह अंक भी बिना तुम्हारी कहानी के गया। और तो सब कुशल है । 'जागरण' अभी तक खड़ा नहीं हुआ, घिसट रहा है। भगवती को मेरा आशीर्वाद कहना और महात्माजी को प्रणाग । दिलीप को प्यार। ताभ ११६ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व [२३] सरस्वती प्रेस, २७ मई, १९३३ प्रिय जैनेन्द्र, कई लेख, आलोचना और पत्र मिले । धन्यवाद ! तुम्हारी कहानी अव के जरूर रहे। पुस्तकों का हाल न पूछो । 'प्रेम की वेदी' और 'फाँसी' का महीनों से विज्ञापन हो रहा है, पर मुश्किल से दस पार्डर आये होंगे । यह हाल है पुस्तकों का ! एक एजेंट रखा है, पर वह लिखता है, पाठशाला और बालकों की पुस्तकों की माँग अधिक है । 'फांसी' वहाँ किसी बुकसेलर की दूकान पर रख दो, कुछ न कुछ विकती रहेगी। आजकल पुस्तकों का वाज़ार ठंडा है । सन्तानशास्त्र कुछ विकता है, या वह जिससे जीवन का कोई प्रश्न हल होता है। दैनिक 'जागरण' के विषय में मैं इससे अधिक और कुछ नहीं जानता कि वे लोग उद्योग कर रहे है । ज्यादा परवाह भी नहीं कमला को प्रसूत-ज्वर है । धुन्नू की अम्माँ अभी वही है । एक खत से मालूम होता है हालत अच्छी है, दूसरा पत्र आकर चिंता में डाल देता है । चि० दिलीप तो अब स्वस्थ है । मैं समझा था, महात्माजी आ गये होंगे । भगवती को यहाँ भेजोगे? एक-दो महीना हमें भोजन दे दो। मगर तुम सोचोगे, वहाँ क्या होगा ? संसार स्वार्थी है ही। कहानियों की सेल तो आजकल बहुत कम है । मेरी वीस कहानियां पड़ी हुई हैं, छापने की हिम्मत नहीं पड़ती। अभी तो 'मैग्डलीन' निकालने दो। कहानी अवश्य । मई अाज तयार हो गया । मई का मई में! कितनी तारीफ़ की बात है। तुम्हारा धनपतराय चिट्ठी-पत्री बनारस सिटी, १७ जुलाई, १९३३ प्रिय जैनेन्द्र, आदावअर्ज । भई वाह ! मानता हूँ । जून गया, जुलाई गया और अगस्त का मैटर भी जानेवाला है 1 जुलाई वीस तक निकल जायगा । लेकिन हुजूर को याद ही नहीं। क्यों याद आये ! बड़े आदमी होने में यही तो ऐव है । रुपये तो अभी कहीं मिले नहीं। लेकिन यश तो मिल ही गया है और यश के धनी धन के धनी से क्या कुछ कम मग़रूर और भुलक्कड़ होते हैं ! अच्छा दिल्लगी छोड़ो। यह बात क्या है ? तुम क्यों मुझसे तने बैठे हो ? न कहानी भेजते हो, न खत भेजते हो। मैं तो इधर बहुत परेशान रहा । याद नहीं आता, अपनी कथा कह चुका हूँ। बेटी के पुत्र हुया और उसे प्रसूतज्वर ने पकड़ लिया। मरते-मरते वची। अभी तक अधमरी-सी है । बच्चा भी किसी तरह बच गया। आज वीस दिन हुए यहाँ आ गयी है । उसकी मां भी दो महीने उसके साथ रही । मैं अकेला रह गया था । बीमार पड़ा, दांतों ने कप्ट दिया । महीनों उसमें लग गये । दस्त भाये और अभी तक कुछ न कुछ शिकायत वाली है । दांतों के दर्द से भी गला न छूटा। बुढापा स्वयं रोग है और अब मुझे उसने स्वीकार करा दिया कि अब मैं उसके पंजे में आ गया हूँ। काम को कुछ न पूछो । बेहूदा काम कर रहा हूं। कहानियां केवल दो लिखी हैं, उर्दू और हिन्दी में । हां, कुछ अनुवाद का काम लिया है। तुमने क्या कर डाला, अव यह बतायो ! 'रंगभूमि' से यया रहा ? निमा जाता है या नहीं? कोई नयी चीज़ पाय पा रही है ? बच्चा कसा है? भगवती देवी कोसी हैं ? माताजी पसी?
११८
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
महात्माजी कसे हैं ? सारी दुनिया लिसने को पड़ी है, तुम खामोश
हो।
-
'सरस्वती' में यह नोट तुमने देखा ? अाज पं० बनारसीदास
जी के पत्र से मालूम हुआ कि यह शास्त्रीजी की दया है । ठीक है ।
मैं तो संर बूढ़ा हो गया हूँ और जो कुछ लिख सकता था लिख
चुका और मित्रों ने मुझे आसमान पर भी चढ़ा दिया। लेकिन
तुम्हारे साथ यह क्या व्यवहार ? भगवतीप्रसाद वाजपेयी की कहानी
बहुत सुन्दर थी और इन चतुरसेन को क्या हो गया है कि 'इस्लाम
का विप-वृक्ष' लिख डाला ! इसकी एक आलोचना तुम लिखो
और वह पुस्तक मेरे पास भेजो। मैने चतुर्वेदीजी से प्रस्ताव मांगा
है । इस कम्युनल प्रोपेगेंडा का जोरों
मुकाबला करना होगा
और यह ऋपभ भला आदमी भी इन चालों से धन कमाना चाहता
यहाँ एक कवि-सम्मेलन कल हुआ । आज दूसरा है । शीघ्र पत्र
लिखो। कहानी पीछे भेजना।
तुम्हारा
धनपतराय
सरस्वती प्रेस,
१ अगस्त, १६३३
प्रिय जैनेन्द्र,
तुम्हारा पत्र मिला । (बच्चे) का हाल सुनकर चिंता हुई ।
अब तो अच्छा हो रहा होगा । इधर मैं भी स्वस्थ नहीं हूँ, लेकिन
काम किये जाता हूँ।
आजकल हिन्दी में अजीव घाँधली है। जिसकी पुस्तक की बुरी
आलोचना कर दो वह लड़ने पर तैयार हो जाता है। इसलिए मैने
इरादा किया है कि कहानी और उपन्यासों की आलोचना करना
चिट्ठी-पत्री ११६ ही छोड़ दूं । जिसकी तारीफ़ कर सकूँगा, उसकी आलोचना करूँगा; जिसकी तारीफ़ न कर सकूँगा, उसे किनारे रख दूंगा । 'सरस्वती' ने तो वह (लेख) छापा ही था, अब 'सुधा' और 'माधुरी' भी टिप्पणियाँ करते जाते हैं। पुस्तकों की खपत बहुत कम है। फिर भी 'अज्ञेय' जी की पुस्तकें भिजवा देना । 'हस्त रेखा' की आलोचना अच्छी हो तो करवा देना। बच्चा अच्छा होगा। भगवती को आशीर्वाद कहना। बेटी अच्छी है, और सभी चले जा रहे हैं। तुम्हारा धनपतराय [२६] जागरण कार्यालय, १ सितम्बर, १६३३ प्रिय जैनेन्द्र, तुम्हारा पत्र मिला । हाँ भाई, तुम्हारी कहानी बहुत देर में पहुँची । अब सितम्बर में तुम्हारी और 'अज्ञेय' जी की, दोनों ही जा रही है। जुलाई में 'क्रांतिकारी की माँ' नाम की कहानी 'हंस' में छपी थी, उस पर सरकार ने जमानत की धमकी दी। भाजकाल इतनी मंदी है कि समझ में नहीं आता, काम कैसे चलेगा । मजदूरों को वेतन चुकाने में कठिनाई पड़ रही है। इस- लिए तुम्हारे पास कुछ न भेज सका । जिनके जिम्मे बाकी है वे सांस ही नहीं लेते । रुपये मिलते ही महावीर के खर्च के लिए भी रुपये भेजूंगा और तुम उन्हें ताकीद कर देना कि मेरठ और दो- तीन शहरों का दौरा करते और एजेंटों से बातचीत करते हुए आ। यहां आने पर मैं उन्हें विहार की ओर भेजूंगा । 'मोडलीन" तुम्हारे आदेशानुसार कार्यालय में पहले ही लगा देता हूँ।
१२० प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व मेरा जी इतने छोटे-से काम में हार नहीं मानना चाहता । 'जागरण' अव तक नफ़ा देता यदि मैं 'हंस' को और सुंदर निकाल सकता, इसकी सामग्री और सुंदर बना सकता, इसमें दो-बार चित्र दे सकता । लेकिन धन का काम अब समय से लेना पड़ेगा। मैं चाहता हूँ कि तुम यह समझो कि तुम्हीं यह पत्र निकाल रहे हो और इसके नुकसान में नहीं, नफ़े में भी उतने ही शरीक हो जितना मैं । मैं तो चाहता हूँ कि यहाँ कार्यालय इतना सम्पन्न हो जाये कि हमें किसी प्रकाशक का मुंह न देखना पड़े। हम दोनों मिलकर इसे सफल न बना सके तो खेद की बात होगी। 'स्टेट्समैन', 'नेश- नल कॉल' और कितने ही अंग्रेजी पत्र वहाँ मिल सकते हैं, उनमें से इनफॉर्मेटिव सामग्री दी जा सकती है । दो-चार नोट लिखना मुश्किल नहीं । हाँ, इच्छा होनी चाहिए। मैटर अच्छा होने पर इस पर जनता की निगाह जमेगी। मैं एक पृष्ठ चित्रों का देने की फिक्र में भी हूँ । पुस्तकें लगातार लिखते रहना अपने बस की बात नहीं है । कभी-कभी महीनों काम नहीं होता और न पुस्तकों से इतने रुपये मिल सकते हैं कि उन पर डिपेण्ड किया जा सके । यह भी तो चिन्ता रहती है कि कोई ऊटपटांग चीज न लिख दी जाय । समाचारपत्र तो दूकान है । एक बार चल निकले तो उससे थोड़े परिश्रम में आमदनी हो सकती है, और तव पुस्तक भी लिखी जा सकती है । यह (ठीक वात) है कि मेरी उम्र एक नये व्यवसाय में पड़ने की नहीं है, लेकिन मैं उम्र को और स्वास्थ्य को बाधक नहीं बनाना चाहता । तुम कम से कम दो कॉलम का एक लेख अवश्य दे दिया करो। किसी मामले पर टिप्पणियाँ करना चाहो तो वह भी वरंग वृहस्पति तक मुझे दे दो। समाचारपत्रों की आमदनी का दारोमदार विज्ञापनों पर है । मैंने बिड़ला से मिलने को कहा था। अपनी गरज से मत मिलो, मेरी गरज से मिलो, पन दिखाओ, उसको चर्चा करो। और उनसे खैरात तो कुछ मांगते नहीं । विज्ञापन दिला देने का अनुरोध करो। यह कह सकते हो,
चिट्ठी-पत्री
कि इस पत्र को घाटा हो रहा है, और थोड़े से सहारे से यह बहुत
उपयोगी हो सकता है। उनके पास कई मिलें हैं, एकाध पृष्ठ का
विज्ञापन उनके लिए तो कुछ नहीं है, लेकिन मेरे और तुम्हारे लिए
वह बावन रुपये महीना का सहारा है । भाई, यह संसार चुपके-से
राम-भरोसे बैठनेवालों के लिए नहीं है। यहां तो अंत समय तक
(खटना) और लड़ना है । उनसे कुछ मदद पा सकते हो। यहाँ
भेंपू और मेरे-जैसे शर्मीले आदमियों का गुजारा नहीं । उनके लिए
तो कोई स्थान ही नहीं । तुम अपने में यह ऐव न आने दो। है भी
नहीं । मैं तो कौड़ी दाम का नहीं हूँ। अखवार निकालना मेरी
(हठधर्मी) है । कुछ (जिद्दो) हूँ और हार नहीं (मानना)चाहता।
खेती करता तो उसमें भी इसी तरह चिमटता ।
यहाँ वर्षा कम हुई है । घर के और सब लोग मजे में हैं । दिलीप
तो अच्छा है । भगवती से मेरा आशीर्वाद बाहना।
बद्रीय
--
AKा प्रत,
सितम्बर, १९३३
प्रिय जैनेन्द्र,
पत्र मिला । कहानी फिर न भेजी। जून का अंक छप रहा
है । तीन दिन के अंदर कहानी आ जानी चाहिए।
'चित्रपट' देखा । अच्छा है। बेटी अच्छी हो रही है। दस दिन
में यहाँ आ जायगी।xxx तैयार हो रहा है । बड़े हर्ष की बात
है । कब देखूगा? 'प्रेम की वेदी' की जिल्द बन रही है।
तुम्हारा
।
धनपतराय
सोमवार को भेजा जायगा।
१२२ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तिल [२८] सरस्वती प्रेस, बनारस सिटी २७ सितम्बर, १६३३ प्रिय जनेन्द्र, . तुम विगड़ रहे होगे कि पत्र क्यों नहीं लिखा। मैंने सोचा था महावीर के लिए ग्राहक-सूची से एक प्रोग्राम बनाकर कुछ रुपये के साथ पत्र लिखूगा । पर न सूची देखने का अवसर मिला, न रुपये कहीं से आये और मैं एक सप्ताह के लिए प्रयाग चला गया। वहाँ से आया तो घर के लोग प्रयाग चले गये। मैं प्रेस न पा सका । 'चाँद' के लिए एक कहानी लिखनी थी, इधर-उधर के झंझट । रह गया। महावीर आ गये हैं। अभी तो मेरा विचार है उन्हें आसपास के शहरों में भेजने का । जरा बाहर जाने का अभ्यास हो जाय तो सी० पी०, बिहार की ओर भेजूं । आजकल, न जाने क्यों, पुस्तकों की बिक्री बंद है । अव अजमेर में जो मेला लगनेवाला है, उसके कारण दो एक xxx मिले हैं । 'हंस' का 'काशी-ग्रंक' निकल रहा है । सितम्बर के अंक में फिर देर हो गयी । अव अक्टू- बर के पहले सप्ताह में जायगा । दो दिन से प्रेस बन्द है। अज्ञेय की यह कहानी बहुत अच्छी थी। उनकी कविताओं के विपय में यहाँ यह राय है कि भाव तो उत्कृष्ट हैं, पर हाथ मजा हुमा नहीं है । लोग कहते है कविताओं से उनकी कहानियाँ और गद्य-काव्य बढ़कर हैं। धनपतराय [२६] जागरण-कार्यालय, २४ अक्तूबर, १९३३ प्रिय जनेन्द्र, मालूम नहीं, महावीर ने तुम्हारे पास कोई खत लिखा था या नहीं, यहां तो उनकी कोई खबर नहीं। जिस दिन यहाँ से गए, चिट्ठी-पत्री उसके तीसरे दिन प्रयाग से खत पाया था, फिर कुछ न मालूम हुया, वहाँ से गये या वहीं हैं । आज चौबीस दिन हो गए, कपड़े- सत्ते सव यहाँ हैं । पुस्तकें जो वह दिल्ली से लाये थे सब यहाँ रखी हुई है । विचित्र आदमी हैं । अगर, ईश्वर न करे, कहीं बीमार हो गए तो एक कार्ड तो लिख देना था । मुझे तो मालूम होता है वह सफल न हुए, और शर्म के मारे चुप साध वैठे है। इस काम में सफल होने के लिए बड़े अनुभव और बेहयाई की जरूरत है और आदमी भी ऐसा चाहिए जो गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास सह सके । इतना बड़ा कार्यालय तो है नहीं कि अपने एजेंटों को अच्छा अलाउंस या वेतन दे सके, और जितना वह दे सकता है, उससे रोज़ परदेश में नहीं रहा जा सकता । होटल तो छोटे शहरों में होते नहीं और अक्सर पूरियों पर गुजारा करना पड़ता है । महावीर का स्वास्थ्य शायद इन दिक्कतों को न झेल सके । तुमने कई बार रुपये के लिए लिखा है । मैं दिल मसोस कर रह गया । जो झुछ आमदनी होती है वह ऊपर उड़ जाती है। वेतन तो पूरा नहीं पड़ता । काराज के कई सौ रुपये बाक़ी पड़े हुए हैं। खर्च पांच सौ रुपये महीने का, आमदनी कुल मिलाकर चार सो रुपये से ज्यादा नहीं। मैं अपनी खामियों को समझ रहा हूँ। अपनी गलतियों को देस रहा हूँ। पर यह आशा है कि शायद कुछ हो जाय । हिम्मत बाँधे हुए हूँ। इधर एक महा- भय फिर एक लिमिटेड प्रकाशन संघ खोलने का विचार धार रहे हैं । मैं भी शरीक हो गया । कुछ लोगों ने हिस्से लेने का वचन भी दिया। मगर वे ऐसे गायब हुए कि कुछ पता ही नहीं, कहाँ है 1 अक्टूबर का 'हंस' काशी-ग्रंक होगा। मगर वीस फ़ॉर्म का निकालना पड़ा और नवम्बर का अंक भी उसमें मिलाना पड़ेगा। इन दोनों अंकों से नाम में दम है। मगर प्रथा ऐसी चलती है कि मोटों के साथ दुर्वल भी पिसे जा रहे हैं । 'चांद' और 'सरस्वती' विशेषांक निकाल सकते हैं । 'हंस' में दम नहीं है, पर फिर भी प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व शहीदों में शामिल होना चाहता है । मैंने सोच लिया है जनवरी तक और देखूगा । अगर उस वक्त 'जागरण' कुछ ढंग पर न आया तो इसे बन्द कर दूंगा । जी तो चाहता है कि 'हंस' का दाम बढ़ा- कर पाँच रुपये कर दूं और एक सौ पृष्ठों का निकालूं और तुम उसका सम्पादन करो। मैं अलग बैठकर पुस्तकें लिखू । ज्यादा काम भी तो नहीं कर सकता। लेकिन शायद मेरी कामनाएँ सब यों ही रह जायेंगी । मुस्किल तो यह है कि व्यवसाय में जितना मैं कच्चा हूँ उतने ही तुम भी कच्चे हो! वरना क्या बात है कि ऋपभचरण तो सफल हों और हम लोग असफल रहें। उपन्यास लिखता था, वह भी बन्द है। लेकिन अब ज़्यादा प्रतीक्षा न करूँगा। जनवरी तक और देखता हूँ। तुम्हारी सलाह न मानी, वरना इतना घाटा क्यों उठाता! लेकिन कोई काम बंद करते बदनामी होती है और वही लाज ढो रहा हूँ। 'हंस' का विशेपांक निकल रहा है। शायद कुछ रुपये बच जायेंगे । उस वक़्त जो भी कुछ हो सकेगा तुम्हारे पास भेजूंगा । मैं तुमसे सच कहता हूँ, प्रेस और पत्रों पर मैं मरा जा रहा हूँ। कुछ लेखों से, कुछ रॉयल्टियों से, कुछ उर्दू-पुस्तकों से अपना गुजर कर रहा हूँ। लेकिन बहुत देख चुका, अब यह तमाम वन्द करूंगा। घर में सब लोग कुशल से हैं । 'कर्मभूमि' का उर्दू-अनुवाद जामिया मिल्लिया से शायद निकल जाय । और क्या लिखू ! अाशा है तुम प्रसन्न हो । सप्रेम तुम्हारा धनपतराय सरस्थती प्रेस २८ नवम्बर, १९३३ प्रिय जनेन्द्र, तुम्हारा पर प्रभी मिला । प्रयाग से तुमने क्या याद में पत्र
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१२६
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
[३१]
सरस्वती प्रेस, बनारस सिटी
१२ दिसम्बर, १९३३
प्रिय जैनेन्द्र,
कल एक पत्र लिख चुका हूँ। प्रसादजी के एक मित्र यह जानने
के लिए बड़े उत्सुक हैं कि 'घावर्पण' निकल रहा है या नहीं, और
यदि नहीं निकल रहा है तो क्यों ? पहले अंक में उसका कैसा स्वागत
हुआ? क्या उसके संचालक उसे निकालना चाहते हैं ? अगर किसी
कारण से वे न निकालना चाहते हो तो क्या वे उसके निकालने का
अधिकार किसी दूसरे को देंगे?
कृपा करके इसका जवाव लोटती डाक से दे देना । वह महा-
शय दिल्ली से एक पत्रिका निकालने की बात सोच रहे है और
'घावर्पण' मिल जाय तो उसे ही ले लेंगे।
भवदीय
धनपतराय
[३२]
सरस्वती प्रेस,
१६ दिसम्बर, १६३३
प्रिय जैनेन्द्र,
तुम्हारा पत्र कई दिन हुए, मिल गया था। उसके पहले वाला
इलाहाबाद का पत्र भी कागजों में खोजने से मिल गया ।
'जागरण' साविक दस्तूर चल रहा है । वा० सम्पूर्णानन्द को
शायद उनके मित्रों ने मदद नहीं दी। अब मैं उसको बन्द करने
की फिक्र में हूँ। उसके पृष्ठ घटा दिये 1 इस रूप में शायद इससे
ज्यादा नुकसान नहीं है । फिर भी झंझट तो है ही।
'हंस' की तुम्हारी स्कोम साहस चाहती है, और जो इस वक्त
गलत है उसमें वह स्कोम बड़ी मुश्किल से चलेगी। काग़जवालों
। - चिट्ठी-पत्री १२७ के काफ़ी रुपये वाक़ी हैं और कोई (नयी) चाल चलने की हिम्मत नहीं पड़ती। नयी स्कीम के अनुसार तुरन्त ही तीन हजार रुपये महीने का खर्च बढ़ जाता है । पहले से पाठकों को कुछ कहा भी नहीं गया, और एक बार के कहने से कोई असर भी न पड़ेगा। वार-बार कहने की ज़रूरत है । इसलिए इन छ. महीनों में तो हमें जमीन तैयार करनी चाहिए । अभी मुझे कोई स्कीम पेश करने का मुंह भी तो नहीं है । अक्टूबर-नवम्बर का संयुक्त अंक अभी नहीं निकला, आज छः दिसम्बर भी हो गई, अभी पांच-छ: दिन से कम न लगेंगे। मेरी दशा में पाठकों से सहानुभूति सहयोग की आशा मैं नहीं करता । प्राधे वी० पी० कहीं लोट पावें, भय तो यह है । सारा दारोमदार वी० पी० पर है। अगर इससे कुछ वोझ हलका होगा तो फिर साहस बढ़ेगा। दिसम्बर का अंक अधिक से अधिक दस तक निकाल देना चाहता हूँ। यह सब हो जाय तो अप्रैल से प्राकार बढ़ाने की बात चले। महावीर अभी पटने में ही है। उसने पुस्तकों के आर्डर भेजे थे; पर सब वाहर की पुस्तकें हैं और कितनी ही यहां मिलती भी नहीं। और उन पर कमीशन भी बहुत कम मिलता है । मैंने उनसे पूछा है कि क्या कमीशन देने का वचन दे चुके है । जवाब पाने पर पुस्तकें जमा करके भेजी जायेगी। 'सेवासदन' के विषय में तुमने पूछा । वम्बई की एक कम्पनी ने कुछ बातचीत की थी। उसी का यह तूमार बांध दिया। उन्होंने मुझ सात सौ पचास प्राफ़र भी किया था। मैंने सात सौ पचास हो बहुत समझा, मंजूर कर लिया, लेकिन रुपये नहीं मिले । 'कर्मभूमि' के अनुवाद के चार सौ रुपये एक गुजराती प्रकाशक से तय हुए थे । दीवाली के बाद रुपये भेजने का वायदा था। मगर वह भी चुप साध गया । दो खत भी लिखे, जवाब नदारद । और भी कई जगह से रुपया मिलने की प्राशा थी। पर कहीं से कोई खबर नहीं है । इससे कोई रिस्की काम करते और भी .
१२८ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व हिचकता हूँ। और तो कोई नई बात नहीं है । सटर-पटर चला जाता है। तुम्हारा धनपतराय [३३] जागरण-माफिस १४ फरवरी, १६३४ प्रिय जैनेन्द्र, नहीं जानता तुमसे किन शब्दों में क्षमा माँगू और अपनी चुप्पी का क्या बहाना करूं ! काशी-अंक निकला, चार सौ वी० पी० गये, एक सौ पचहत्तर वसूल हुए, दो सौ पच्चीस वापस आये। बस, बधिया बैठ गयी। मेरा अन्दाज़ा था कि तीन सौ वी०पी० ज़रूर वमूल होंगे । इस वापसी का नतीजा यह कि काग़जवाले को तेरह सौ में कुल तीन सौ दे सका । एक हजार पूरे उसके सर पर सवार हैं । 'जागरण' के काग़ज़वाले का भी एक हजार रुपये से कुछ ऊपर ही चढ़ा हुआ है; जो-जो वातें सोची थीं, वे सब गायब हो गई। ऐसी माली हालत में क्या कोई प्रोग्राम वाँधूं, क्या करूँ ? तुम्हें मालूम होगा, कुछ दिनों से लीडर प्रेसवालों से इस सारे संकट को मिटा देने का प्रस्ताव था । बीच में वह प्रस्ताव स्थगित कर दिया था । पर जब ऐसी परिस्थिति आ पड़ी है तो अब इसके सिवा कोई राह नहीं है कि किसी तरह इस झगड़े से गला छुड़ाकर भाग निकलूं । लीडर को एक प्रस्ताव लिख भेजा है, वे यहाँ १८ को भानेवाले है । आशा करता हूँ कि उस दिन यह मामला तय हो जायगा । पहले इरादा था कि 'हंस' उन्हें दे दूं योर प्रेस चलाता रहूं। लेकिन सारी विपत्ति की जड़ तो यह प्रेस है। न जाने किस बुरी साइत में इसकी बुनियाद पड़ी थी। दस हजार रुपये और ग्यारह साल की मेहनत और परेशानियां अकारथ हो गयीं। इसी चिट्ठी-पत्री प्रेस के पीछे कितने मित्रों से बुरा बना, कितनों से वायदा-खिलाफ़ी की, कितना बहुमूल्य समय जो लिखने-पढ़ने में कटता, बेकार प्रूफ़ देखने में कटा । मेरी ज़िन्दगी की यह सबसे बड़ी ग़लती है । महावीर प्रसाद ने कुछ कितायें बेचीं। १३०) लाये भी थे, फिर पटना वापस गये और इधर कुछ हाल-हवाल नहीं लिखा । मालूम हुआ कि दिलीप के काम में शरीक है । तीन सौ की नयी किताबें बुकसेलरों को दे चुके हैं । वसूल भी कर पाते है या वह भी डूबता है, राम जाने ! लाहौर में मेरे लगभग १००० रु० उर्दू-कितावों के बाक़ी थे। वरसों के तकाजे के बाद अब मालूम हुआ है कि उनसे रुपये वसूल नहीं हो सकते । नालिश करने पर शायद कुछ निकले। एक खुशखबरी यही है कि सेवासदन का फिल्म हो रहा है । उस पर मुझे ७५०) मिले । अगर इस तंगी में ये रुपये न मिल जाते तो न जाने क्या दशा होती, ईश्वर ही जाने । लेकिन तंगी में जव कोई रकम हाथ आ जाती है तो वे सारी जरूरतें जो मुंह दवायें पड़ी थीं, यकायक चीख मारने लगती है । किसी के पास कपड़े नहीं हैं, किसी के पास जूते नही हैं । किसी की लड़की की शादी के लिए कुछ देना चाहिए। ग़रज, वे रुपये दो-चार दिन में हवा हो जाते हैं । वही यहाँ हो रहा है । उसी में तुम्हारा भी थोड़ा-सा हिस्सा है । लीडर से अगर बातचीत तय हो गयी तो मैं प्रस्ताव करूँगा कि वह तुम्हें 'हंस' का एडीटर बना दें। वे लोग इसे ज्यादा शान के साथ निकाल सकेंगे और तुम्हें अपने विचारों को कार्यरूप में लाने का अवसर मिल जायगा । मैं एकान्त में बैठकर कुछ थोड़ा- वहुत लिख लिया करूंगा। इस झमेले में तो लिखना एक तरह से बन्द ही हो गया । तव तुम्हारी पुस्तकें झट से निकलेंगी और उन पर रॉयल्टी मिलेगी। और क्या लिखू ! बारह दिन बम्बई रहा । प्रेमीजी से मिला। उनके यहां भोजन किया । बेचारे बहुत बीमार थे । मर कर जिये।
प्रमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व अव भी बहुत कमजोर हैं । इसके बाद जो पत्र लिखूगा, उसमें यहाँ के डिवलपमेंट का पूरा वृत्तान्त होगा। भुवनेश्वरजी खूब लिखते हैं और साहित्य के रसिक हैं। तुम्हारा धनपतराय [३४] सरस्वती प्रेस, बनारस सिटी १६ अप्रैल, १९३४ प्रिय जैनेन्द्र, पत्र लिखने ही जा रहा था कि तुम्हारा खत मिल गया । मैंने xxx जी को पत्र लिखा था और जिस रूप में उन्होंने स्कीम को मेरे सामने रखा था वह मुझे इस वजह से पसंद आयी थी कि उसमें xxx की कोई परेशानी नहीं थी। जमा-जमाया काम था । केवल ज़िम्मेदारी मेरे सर से हट जाती थी, लेकिन उनका जो जवाब आया है वह कुछ सन्तोप के लायक नहीं है । खैर ! मैं तो (इस काम से) तंग आ गया हूँ और कोई सहयोगी खोज रहा हूँ। केवल साहित्यिक सहयोगी नहीं, बल्कि कारोबारी भी। अगर तुम्हें साहित्यिक और किसी विजनेसमैन या कारोवारी का सहयोग प्राप्त हो जाय तो मैं अपने सर से बोझ टालकर हट जाऊँ । अगर 'वात्स्यायनजी भी मिल जायें तो और भी अच्छा । डरता यही हूँ कि यहाँ से (भागकर) दिल्ली पहुंचूं और वहाँ भी यही रोना रहे, लो अफसोस हो कि नाहक पाये। देशवन्धुजी वाले प्रपोज़ल को क्यों तुमने अस्वीकार कर दिया? अगर पक्के (कागज) को शर्तों पर काम किया जाय तो कोई वजह नहीं कि हमें धोखा हो । किसी को पर्सनैलिटी से क्यों झिझक ? हमें तो काम करने के लिए सहयोग चाहिए । वह जहाँ से भी मिले, उसे ले लो। देशवन्धु विजनेसमैन हैं, इसमें तो संदेह है ही नहीं ।
चिट्ठी-पत्री लीडरवालों ने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया। यही २० तारीख उनके फैसले की है । अगर डाइरेक्टरों ने अनुकूल राय दी तो काम हो जायगा । इसीलिए अभी तक मैंने अप्रैल का 'हंस' प्रेस में नहीं दिया। उनका जवाब मिल जाने पर 'हंस' प्रेस में जायगा। अलीगढ़ में दावतें खाने के सिवाय और कुछ न हुआ। हमारी स्कीम को लोगों ने पसन्द तो बहुत किया मगर उन दिनों यूनिव- सिटी बन्द थी और ओल्ड व्वायज़ ऐसोसिशएन के जल्से हो रहे थे। इससे कुछ बोलने का अवसर न मिला । उन लोगों ने जिस तरह मेरा स्वागत किया, उससे मेरा चित्त बहुत प्रसन्न हुआ । मुझे आश्चर्य हुआ कि वहाँ कितनी ही मुस्लिम लड़कियाँ परदा नहीं करती और वे सब मेरी नयी से नयी उर्दू में प्रकाशित किताब 'रावन' पढ़ चुकी थी। मैंने पुलाव और गोश्त खाया, उन्हीं के दस्तरख्वान पर, और यहाँ आकर दो-तीन दिन चूरन खाना पड़ा । और क्या लिखू, काम चला जा रहा है। 'हंस' के लिए कुछ लिख भेजो। अगर यहाँ से निकला तो दे दूंगा । प्रयाग से निकला तो वहाँ भेज दूंगा। महावीर प्रसाद का कोई पत्र नहीं आया। चार महीने हो गये। कई सौ की पुस्तकें इधर-उधर डाल दी हैं । न कुछ पता लिखा, कि याद-दिहानी करता। कुछ किताबें पटने में डाल दी हैं, कुछ कहीं। उन्हीं किताबों के लिए पटने से यहाँ आये थे । यहाँ से प्रयाग गये थे। फिर पटने गये थे। जल्दी-जल्दी कितावें जमा की, लेकिन वह खामोश हो गये। रिलीफ़ वर्क तो बहुत अच्छा है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी का खयाल भी तो होना चाहिए। मेरे रुपये 'चांद' पर पाते हैं, कुछ उनसे तक़ाज़ा करता, लेकिन अब उल्टे में उनका देनदार हूँ। तुम उन्हें एक पत्र लिखकर ताकीद कर दो कि जो पुस्तकें न विक सकी हों, उनका हिसाव लिख भेजें। हिसाव बड़ा गोलमाल है । ३००) से ऊपर की पुस्तकें उनके पास होंगी। आशा थी, कुछ उधर से आयेगा तो काराज का बिल कम होगा, मगर व्यर्थ । ।
प्रेमचन्द : ': एक कृती व्यक्तित्व लाजपत राय को मैंने खत लिखा । उसने जवाब नहीं दिया। मैंने यहां तक लिखा था कि थोड़ा-थोड़ा दे दो; लेकिन जब कोई पत्रों का जवाब ही न दे तो क्या किया जाय ? अगर तुम जानो तो पत्र दिखाकर उनसे साफ़-साफ़ जवाब लेना, वह किस तरह सफ़ाई चाहते हैं । ८०० रु० का मामला है । यहाँ मेरे सर पर क़र्ज है और वहाँ एक-एक आसामी इतनी-इतनी रक़में दवाये बैठा है। क्या वह यही चाहता है कि हम लोग अदालत में आमने-सामने खड़े हों भला आदमी खत का जवाव नहीं देता । मजबूर होकर रजिस्टर्ड नोटिस देना पड़ेगा। शेष कुशल । तुम्हारा - धनपतराय [३५] हंस-माफिस ३० अप्रैल, १९३४ प्रिय जैनेन्द्र, तुम्हारा पत्र ऐन इन्तजार की हालत में मिला । तुमसे सलाह करने की एक खास जरूरत आ पड़ी है । अभी न बताऊँगा । जब प्रायोगे, तभी इस विषय में बातें होंगी। मगर अब तुम्हें क्यों सस- पेन्स की हालत में रखू । बम्बई की एक फ़िल्म कम्पनी मुझे बुला रही है । वेतन को बात नहीं, कंट्रैक्ट की बात है-~-८०००) साल। मैं उस अवस्था को पहुँच गया हूँ जब मेरे लिए हाँ के सिवा कोई उपाय नहीं रह गया कि या तो वहां चला जाऊँ या अपने उपन्यास को बाजार में बेचूं । मैं इस विषय में तुम्हारी राय जरूरी समझता हूँ। कम्पनीवाले हाजरी की कोई कैद नहीं रखते। मैं जो चाहे लिखू, उनके लिए चार-पांच सीनरियो तैयार कर दूं। मैं सोचता हूँ, क्यों न एक साल के लिए चला जाऊँ ! वहां साल भर रहने के बाद युछ ऐसा कंट्रेक्ट कर लूंगा कि मैं यही बैठे-बैठे तीन चार वहा- नियो लिस दिया करूँ और चार-पांच हजार रुपये मिल जाया करें।
चिट्ठी-पत्री उससे 'जागरण' और 'हंस' दोनों मजे से चलेंगे और पंसों का संकट कट जायगा । फिर हमारी दोनों की चीजें धड़ल्ले से निकलेंगी, लेकिन तुम यहाँ आ जानोगे तो क़तई राय होगी। अभी तो मन दौड़ा रहा हूँ। तुम्हारी स्कीम मुझे विलकुल पसन्द है। खूब पसन्द है । लीडर से जवाब मिल गया, वे लोग हिन्दी काम को नहीं बढ़ाना चाहते । उनके जवाव के इन्तजार में अप्रैल का 'हंस' २२ तक रुका रहा। २४ को जवाब मिला, तब लेख जुटाये गए और अब अप्रैल और मई का 'हंस' एक साथ छपकर १५-२० मई तक रवाना होगा। लीडरवालों से बातचीत इस आधार पर थी कि 'हंस' का और पुस्तकों का मूल्य जोड़ लिया जाय और उतने ही हिस्से मुझे लीडर कम्पनी में मिल जायें । 'हंस' के लिए मैंने दो हजार मांगे थे, हालांकि इस पर मै ४०००) से ज्यादा भेंट कर चुका हूँ। पुस्तकों का मामला साफ़ है । पुस्तकों की असली लागत निकाल ली जाय । 'जागरण' को चलाना मंजूर हो तो इसे चलाया जाय । अच्छा सोशलिस्ट पत्र बना दिया जाय । रहा प्रेस, यहाँ रहे या कहीं और, मुझे इसमें कोई ऐतराज नहीं । हाँ, काम ऐसे हाथों में हो जो महज़ ड्रीमर्स न हों, जैसा मैं हूँ और तुम हो, बल्कि कुछ व्यावसायिक बुद्धि भी रखते हों । काशी में भी सुभीता है, क्योंकि प्रेस चला चलाया है। वहाँ लोगों से बड़ी आसानी से सहयोग मिल सकता है। कुछ बँधे-बंधाए ग्राहक भी हैं । सम्भव है, धन पाते देख कर यहाँ भी कुछ लोग रुपये लगाने पर तैयार हो जायें। अगर हम तीन आदमी और कृष्णचन्द्रजी ही मिल जाय तो घया कहना ! मैं हर तरह से सहयोग देने को तैयार हूँ । शेप कुशल है, बच्चे मजे में हैं। बच्चों को नशीवाद ! तुम्हारा धनपतराय प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व [३६] सरस्वती प्रेस, मई, १९३४ प्रिय जैनेन्द्र, भले आदमी, मकान छोड़ा था तो डाकिए से इतना तो कह दिया होता कि मेरी चिट्ठियाँ फलां पते पर भेज देना । बस, बोरिया- विस्तर संभाला और चल खड़े हुए। मैने तुम्हारे जवाव में एक बड़ा-सा डिटेल्ड खत लिखा था । वह शायद मुर्दा चिट्ठियों के दफ्तर में पड़ा होगा। लीडरवालों से सौदा ठीक नहीं हुआ। वे लोग हिन्दी का काम लाभ की बात नहीं समझते, और कारोबार बढ़ाना नहीं चाहते। 'हंस' को (रोके) रहा। मगर अब अप्रैल और मई का, संयुक्त अंक, निकल रहा है । तुम्हारी कहानी का इन्तजार है । मैं वात्स्यायनजी के प्रस्ताव को दिल से स्वीकार करता हूँ। अगर ५०००) और वात्स्यायनजी और तुम आ मिलो तो बहुत बड़ा काम हो जाय । मैं हर तरह से तैयार हूँ। यही चाहता हूँ कि जो काम शुरू किया गया है वह वन्द न हो, उसकी उपयोगिता बढ़े और वह एक संस्था बन जाए । तुमने पाने की बात लिखी थी। बहुत जरूरी है । लिखा-पढ़ी से तय न होगी। मेरी तरफ़ से बिल्कुल हिचक नहीं है। हाँ, अगर काशी से काम चले तो कई तरह से सुभीता है । यहां प्रेस चला-चलाया है । कुछ पत्रों का प्रचार यढ़ जाय, और आमदनी ज्यादा हो जाय, तो प्रेस को बाहरी काम करने की ज्यादा फुरसत ही न रहेगी और प्रेस को बढ़ान' पड़ेगा । 'हंस' अगर २००० छपे और 'जाग" तोप्रेसको और कोई काम करने की जरूरत नहीं । में ५०-६० फ्रॉम छाप लेगा। हां, बिजली काम हो सकेगा। यहां सह्योग भी की एक प्राइवेट लिमिटेड हिस्से का काम करें लि भर पया वस,
चिट्ठी-पत्री
में रहूँगा। प्रानो जल्द । लेकिन कुछ निश्चय हो गया हो तव ।
मुफ्त में किराया देने के पक्ष में मैं नहीं हूँ। मुलाक़ात तो पत्रों से
ही हो जाती है और पत्र न भी आये तो भी मैं तुम्हें अपने समीप
पाता हूँ।
मुझे एक बम्बई की कम्पनी बुला रही है । क्या सलाह है ?
मुझे तो कोई हरज नहीं मालूम होता, अगर वेतन सात-आठ सौ
मिले । साल-दो साल करके चला पाऊँगा । मगर अभी मैंने जवाव
नहीं दिया है। । उसके दो तार आ चुके हैं । प्रसादजी की सलाह
है, पाप बम्बई न जायें । तुम्हारी भी अगर यही राय है तो मैं न
जाऊँगा । जौहरीजी कहते है ज़रूर जाइए और चिरसंगिनी दरिद्रता
भी कहती है, चलो । जीवन का यह भी एक अनुभव है ।
महावीर का कोई पत्र नहीं । एक वम्बई के सज्जन भी xxx
से यहाँ आए थे। महावीर से उनका सम्पर्क रहता था। वह तो
उनसे कुछ इम्प्रेस्ड नहीं हुए ।
मुझे कल बुखार पा गया । आज भी थोड़ा है। मगर यों चंगा
हूँ। चिन्ता की बात नहीं।
और तो कोई नई बात नहीं 1 x x ने सलाह-मशविरा xx
उस मुग्रामले को तूल दिया। खैर, तुम्हारी x x मुझे पसंद आई।
तुम्हारा
।
धनपतराय
[३७]
प्रजंटा सिनेटोन लि०, परेल, बम्बई
१५ जून, १९३४
प्रिय जैनेन्द्र,
कार्ड मिला 1 मैं कुछ ऐसा परेशान रहा कि इच्छा होने पर
भी पत्र न लिख सका । पहली को आ गया, मकान ले लिया,-
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व में होटल में खाता हूँ और पड़ा हूँ। यहां दुनिया दूसरी है, यहाँ की कसोटी दूसरी है । अभी तो समझने की कोशिश कर रहा हूँ, इस विषय की किताबें पढ़ रहा हूँ। लिखा कुछ नहीं । जुलाई में घर के लोग, धुन्नू को छोड़कर, आ जायेंगे। साल भर किसी तरह काढूंगा, आगे देखी जायगी। तुमने तो जैसे लिखने की कसम खा ली । 'हंस' में कुछ न लिखा । महीने में दो-तीन कहानियां लिखना तुम्हारे लिए क्या मुश्किल है ! एक 'हंस' को दे दो, एक 'भारती' को दे दो और एक 'चाँद' या 'विशाल भारत' को। भाई ! आइडियलिस्ट बनने से काम न चलेगा। चिड़ियां उड़ती आसमान पर हैं, लेकिन भोजन के लिए धरती पर ही आती है । जुलाई के लिए कहानी अवश्य भेजो । यहाँ वर्षा हो गई है और बड़ा अच्छा मौसम है । हाँ ! 'हंस' के लिए कुछ साहित्यिक नोट क्यों नहीं लिख दिया करते ! हिन्दुस्तान टाइम्स में सारी दुनिया की पत्र-पत्रिकाएँ आती हैं, उनमें साहित्योत्तेजक चीजें मिल सकती है । छः-सात पृष्ठों की कहानी, तीन-चार पृष्ठों की टिप्पणियाँ । इतना 'हंस' के लिए करते जागो और माहवार हिसाव साफ़ कर दिया करूँगा । आज नहीं तो कल, यह पन तुम्हारे हाथ में जायगा ही । शेष कुशल । । धनपतराय [३८] प्रजटा सिनेटोन लि०, परेल, बंबई १२, १ जुलाई, १६३४ प्रिय जैनेन्द्र, पत्र मिला था । प्राशा है, तुमने अपनी और 'अज्ञेय' जी की कहानियां भेज दी होंगी। अगर नहीं भेजी हों तो अव जुलाई-नंबर के लिए जल्द से जल्द भेज दो। विलम्ब भी उन कारणों में एक है 'जो 'हंस' को उठने नहीं देते।
॥ -- दाई पोर मे क्रमश : सर्वथी जनेन्द्र (सिर का पृष्ट भाग) प्रेमचन्द, रामचन्द्र शुक्ल, कृष्णदेव प्रसाद गौड़, सम्पूर्णानन्द, उदाहरलाल नेहरू, कमला नेहरू, जयशंकर प्रसाद, सन् १९३४
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चिट्ठी-पत्री मैं मजे में । एक स्टोरी लिख डाली । जा रही है। दूसरी शुरू कर रहा हूँ। तुम्हारे जेहन में कोई प्लाट हो तो एक खुलासा भेज दो। यहाँ कई डाइरेक्टरों से जान-पहचान हो गई है । संभव है, कहीं निकल जाय । वहुत-से सड़ियल लोगों की चीजें निकलती हैं तो फिर तुम्हारी क्यों न निकलेंगी? रात-दिन वर्षा ! नाकों दम है । महावीर पहुँच गया या नहीं ? प्रवासीलाल ने लिखा था, कोई हिसाब नहीं दिया। ज़रा याद दिला देना । कागज का पेट तो भरना ही चाहिए। सप्रेम धनपतराय [३६] अजंटा सिनेटोन, परेल, बम्बई १२ ३ अगस्त, १६३४ प्रिय जनेन्द्र, पत्र मिला । मैं २३ को बनारस गया था। ३१ को वापस पाया । बेटी और उसकी मां को लेता पाया। लड़कों को प्रयाग, कायस्थ पाठशाला में भरती करा दिया। तुम्हारा लेख, कहानी, 'अगेय' जी की कहानी और मेरी कहानी-सब छप रही हैं। सिनेमा के लिए कहानियां लिखना मुश्किल हो रहा है, लेकिन जरूरत ऐसी कहानियों की है जो सेली भी जा सकें, जो ऐक्टरों के लिए सुलभ हो । कितनी ही अच्छी कहानी हो, अगर योग्य पात्र न मिलें तो वह कौन सेलेगा ? अद्भुत की जरूरत में नहीं सम- भता । मेरी दोनों कहानियां साधारण हैं । अगर तुम (कोई) चीज़ लियो तो यहाँ (कुछ प्रवन्ध) हो सकता है। पहले सिनोपसिस ही लिख भेजो। उससे कहानी के प्लाट का अन्दाजा हो जायगा । 'जागरण' (सोशलिस्ट) पेपर हो गया है। काशी में था.
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व सम्पूर्णानन्द से जो बातें हुई उनसे मालूम हुआ कि वह एक (पत्र) निकालना चाहते हैं । वड़ा अच्छा है किसी तरह (निकल) जाय, तो मेरे सर से एक बला टले । तुमने 'अज्ञेय' जी के साथ पत्र निकालने का विचार क्यों छोड़ दिया ? मैं सकुशल हूँ। तुम्हारा धनपतराय [४०] अजंटा सिनेटोन, परेल, बम्बई १२ ८ सितम्बर, १९३४ प्रिय जैनेन्द्र, आशा है, तुम कुशल से हो । आज कल क्या कर रहे हो ? लिखने-पढ़ने की क्या खबर है ? मैं तो जैसे (अपाहिज) हो गया हूँ । 'हंस' के लिए एक चीज लिखना भी मुश्किल है । तुमने अपनी कहानी और मि० अज्ञेय को भेज दी होगी। सितम्बर का अंक १५ तक निकाल देने का इरादा है । एक दिन प्रेमीजी के वेटे हेमचन्द आए थे । अच्छी-अच्छी पुस्तकों के बहुत सस्ते एडीशन निकालने की स्कीम सोच रहे है। चार-पांच पाने में दस फ़ॉर्म की किताव देंगे और दस हज़ार के एडीशन निकालेंगे। देखें, स्कीम पूरी होती है या यूं ही रह जाती है । मैंने सुना है, जोशी-बन्धुओं ने विश्व- मित्र' से सम्बन्ध तोड़ लिया है। अगर तुमने अपनी कहानी न भेजी हो तो अब अवश्य भेज दो। और तो कुशल है। नापका धनपतराय
चिट्ठी-पत्री
अजंटा सिनेटोन, बम्बई १२
२६ सितम्बर, १९३४
प्रिय जैनेन्द्र,
अभी तुम्हारा पत्र मिला । जबाव दे दिया है । नाहक पसे
खराव किये । मैं तुम्हारी राय के बगैर कभी यह मोटा न करता।
वात यों है कि प्रेस में घाटा तो है हो । तीन महीनों की प्रेमवालों
की मजदूरी वाकी पड़ी है । जून की नो प्रगम्न में और
जुलाई-अगस्त के लिए अक्तूबर का वायदा या, अगर
पी० जायेंगे। इसी दौत्र में नद्राली नमार,
पाकर हड़ताल कर दी। मैंने बाचा, दीदह M
१००० २० में कम न होगी। काजवा 4-6576१२।
क्यों नहस और मोकिमी कीटकरी, पीर,
सब बकाया चुनाकर प्रेम ना imprममी
दो-तीन बगह पर
निक,
लेना तो मुवनन्दाकारांच्यावर परकीचमा हाइम
वोच में हडताल इट मदन मर गद काम
करने या गर्ने । द टोनहन करा कागदालों
को भी वृष्ट पटेरि दिया। अब प्रामा
है, काम माघार र
... दी० पी०
जाएँग । अगर ३४४ बाय दोभी पार हो जाय और
कुछ काउबालों को कम से कम
रोमान्टी टन अंदर का मन्टूबर-अंक निरत
रहा है। दुन्दरीदी और कहानी अब दरहीं
-
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बिट्ठी-पत्री रुद्रनारायण अग्रवाल को तो जानते हो, वही युवक जो दिल्ली में कई बार मुझसे मिलने आया था, जिसके घर एक दिन मैं न्योता खाने भी गया था, परसों उसका पत्र मिला । तपेदिक हो गया और लखनऊ के टी०वी० अस्पताल में पड़ा है । कोई सहायक नहीं, कोई हमदर्द नही । ऐसे मेहनती और प्रतिभा के धनी आदमी कम होंगे। वार एंड पीस, रिजरेक्शन, वेनिटी फेयर आदि पुस्तकों के अनुवाद कर डाले, लेकिन रिजरेक्शन के सिवा कोई पुस्तक न छपी, प्रकाशकों के पास पड़ी हुई हैं, और आज वह ग़रीब मर रहा है । यह है अभागे साहित्य-सेवियों का हाल ! प्रयाग में 'लेखक संघ' का विवरण तुम्हें मिला होगा । बहुत- से साहित्यिक उसमें मिल गये हैं, लेकिन कोई दिमाग वाला आदमी अभी नजर नहीं आता । यूं हमारे यहां दिमाग वाले आदमी हैं ही कितने ! तुम इस संघ में आ मिलो और ऐक्टिव इंट्रेस्ट लो तो शायद कुछ हो । मेरा नाम सभापति के लिए पेश किया गया है। मेरे-जैसा सभापति जिस संस्था का हो, यह क्या होगी ! मैंने डा० भगवानदास, पं० वेंकटेशनारायण तिवारी या पं० नरेन्द्रदेवजी का नाम प्रपोज किया है। फ़िल्मी हाल क्या लिखू ! 'मिल' यहाँ पास न हुआ । लाहौर में पास हो गया और दिखाया जा रहा है । मैं जिन इरादों से पाया था, उनमें एक भी पूरा होता नजर नही पाता । ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियाँ बनाते आये है उसकी लीक से जो भर भी नहीं हट सकते । वल्गरिटी को ये लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं । अद्भुत ही में इनका विश्वास है । राजा-रानी, उनके मंत्रियों के पड्यंत्र, नक़ली लड़ाई, बोसेवाजी यही इनके मुख्य साधन हैं । मैंने सामा- जिक कहानियाँ लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे; लेकिन उनको फ़िल्म करते इन लोगों को सदेह होता है कि चले या न चले । यह साल तो पूरा करना है हो । कर्जदार हो गया था। कर्जा पटा दूंगा । मगर और कोई लाभ नहीं । उपन्यास के अंतिम
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
चाहिए। अगर एक हजार ग्राहक ५ रु० के हो जाये तो फिर उधर
से निश्चित हो जाऊँ। दिल्ली में कई महिलाएं भी लिखती हैं;
एकाध से 'हंस' के लिए लेख लो।
यहाँ कांग्रेस में आ रहे हो न ? कांग्रेस तो अब वेजान-सी चीज़
होती जा रही है । मगर तमाशा तो रहेगा ही।
एक दिन हिमांशु राय से मिला था। वह कोई स्टोरी चाहते
थे-पौराणिक हो या सामाजिक । अगर कोई स्टोरी खयाल में हो
तो उसका दो पेज का सिनॉपसिस लिख भेजो । मैं उनसे जाकर
मिलूंगा और दे दूंगा। अगर जंच गयी तो बड़ा काम हो जायगा ।
शेप कुशल । बच्चों को प्यार । भगवती देवी से मेरा आशी-
दि कहना । और कहानी जरूर बिल ज़रूर लिखना । प्रसादजी
से भी कहानी मांगी है । शायद दे भी दें।
तुम्हारा
धनपतराय
।
[४२]
अजंटा सिनेटोन, परेल, बम्बई १२
२८ नवम्बर, १९३४
प्रिय जैनेन्द्र,
इधर वहुत दिनों से तुम्हारा कोई पत्र नहीं मिला । आशा है,
अब तुम स्वस्थ हो । प्रवासीलालजी से मालूम हुमा, तुम्हारी कोई
कहानी 'हंस' के लिए आई है । बड़ी खुशी हुई।
साहित्य सम्मेलनवालों ने मुझसे उपन्यास-कला पर एक लेप
लिखने को कहा है, जो साहित्य-परिपद् में पढा जाय । मैंने तो
लिख दिया, मुझे ऐसे लेखों की उपयोगिता में विश्वास नहीं ।
जिनमें प्रतिभा है वे भाप लिसने लगते हैं, जैसे बतख का बच्चा
तैरने लगता है । जिनमें प्रतिभा नहीं, उन्हें लास कला का उपदेश
कोजिये, कुछ नहीं कर सकते ।
चिट्ठी-पत्री रुद्रनारायण अग्रवाल को तो जानते हो, वही युवक जो दिल्ली में कई बार मुझसे मिलने आया था, जिसके घर एक दिन मैं न्योता खाने भी गया था, परसों उसका पत्र मिला । तपेदिक हो गया और लखनऊ के टी० वी० अस्पताल में पड़ा है । कोई सहायक नहीं, कोई हमदर्द नहीं । ऐसे मेहनती और प्रतिभा के धनी आदमी कम होंगे। वार एंड पीस, रिजरेक्शन, वेनिटी फ़ेयर आदि पुस्तकों के अनुवाद कर डाले, लेकिन रिजरेक्शन के सिवा कोई पुस्तक न छपी, प्रकाशकों के पास पड़ी हुई हैं, और आज वह गरीब मर रहा है । यह है अभागे साहित्य-सेवियों का हाल ! प्रयाग में 'लेखक संघ' का विवरण तुम्हें मिला होगा । वहुत- से साहित्यिक उसमें मिल गये हैं, लेकिन कोई दिमाग़ वाला आदमी अभी नजर नहीं आता । यूं हमारे यहाँ दिमाग वाले आदमी हैं ही कितने ! तुम इस संघ में आ मिलो और ऐक्टिव इंट्रेस्ट लो तो शायद कुछ हो । मेरा नाम सभापति के लिए पेश किया गया है। मेरे-जैसा सभापति जिस संस्था का हो, वह क्या होगी ! मैंने डा० भगवानदास, पं० वेंकटेशनारायण तिवारी या पं० नरेन्द्रदेवजी का नाम प्रपोज़ किया है। फ़िल्मी हाल क्या लिखू ! 'मिल' यहाँ पास न हुआ । लाहौर में पास हो गया और दिखाया जा रहा है । मैं जिन इरादों से प्राया था, उनमें एक भी पूरा होता नज़र नहीं पाता । ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियाँ बनाते आये हैं उसकी लीक से जी भर भी नहीं हट सकते । वल्गरिटी को ये लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं । अद्भुत ही में इनका विश्वास है । राजा-रानी, उनके मंत्रियों के पड्यंत्र, नकली लड़ाई, बोसेवाजी यही इनके मुख्य साधन हैं । मैंने सामा- जिक कहानियां लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे; लेकिन उनको फिल्म करते इन लोगों को संदेह होता है कि चले या न चले । यह साल तो पूरा करना है ही। फ़जंदार हो गया था । कर्जा पटा दूंगा । मगर और कोई लाभ नहीं । उपन्यास के अंतिम ।
१४२
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व
'पृष्ठ लिखने वाली हैं, उधर मन ही नहीं जाता । यहाँ से छुट्टी पाकर
अपने पुराने अड्डे पर जा बैलूं । वहाँ धन नहीं है मगर संतोप अवश्य
है । यहाँ तो जान पड़ता है कि जीवन नष्ट कर रहा हूँ।
सेठ गोविन्ददासजी यहाँ आये हुए हैं। उनकी भी सिनेमा
कम्पनी खुली है । महावीर कहाँ हैं ?
और सब कुशल है।
सप्रेम
धनपत
[४३]
१८६, सरस्वती-सदन, दादर, बम्बई १४
७ फरवरी, १६३५
प्रिय जैनेन्द्र,
तुम्हारा पत्र मिला । हाँ, इधर मैंने तुम्हें कोई पत्र न लिखा।
ऋषभजी आये थे । उनसे तुम्हारी खैरियत का हाल मिल गया
था। कुछ ऐसा व्यस्त तो नही रहता । हां, काम नहीं करता।
सात बजे उठता हूँ। साढ़े आठ पर धूमकर आता हूँ। नाश्ता करता
हूँ । नौ बजे अखबार पढ़ता हूँ । कभी घण्टा भर, कभी इससे ज्यादा
समय लग जाता है । कभी कोई मिलने आ जाता है । ग्यारह वज
जाते हैं । नहा-खाकर स्टूडियो जाता हूँ। कुछ काम हुआ तो किया,
नहीं उपन्यास पढ़ा। पांच बजे लौटता हूँ। हिन्दी के पत्रों-पत्रिकाओं
को उलटता-पलटता हूँ। चिट्ठी-पत्र लिखता हूँ, खाता हूँ, और सो
जाता हूँ । यही दिनचर्या है । एकाध कहानी महीने में लिखता हूँ
और दो-एक पृष्ठ के नोट 'हंस' के लिए-वस !
'मजदूर' तुम्हें पसन्द न आया । यह मैं जानता था। मैं इसे
अपना कह भी सकता हूँ, नहीं भी कह सकता । इसके बाद एक
रोमांस जा रहा है । वह भी मेरा नहीं है । मैं उसमें बहुत थोड़ा-सा
हूँ। 'मजदूर' में भी में इतना थोड़ा-सा पाया हूँ कि नहीं के बराबर ।
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चिट्ठी-पत्री १४३ फ़िल्म में डायरेक्टर सब-कुछ है । लेखक कलम का बादशाह क्यों न हो, यहाँ डायरेक्टर को अमलदारी है और उसके राज्य में उसकी हकूमत नहीं चल सकती । हकूमत माने, तभी वह रह सकता है। वह यह कहने का साहस नहीं रखता, 'मैं जनरुचि को जानता हूँ।' इसके विरुद्ध डाइरेक्टर जोर से कहता है, 'आप नहीं जानते, मैं जानता हूँ, जनता क्या चाहती है और हम जनता को इसलाह करने नहीं आए हैं । हमने व्यवसाय खोला है, धन कमाना हमारी ग़रज़ है । जो चीज जनता मांगेगी, वह हम देंगे।' इसका जवाब यही है. 'अच्छा साहब ! हमारा सलाम लीजिए । हम घर जाते हैं।' वही में कर रहा हूँ। मई के अंत में काशी में बन्दा उपन्यास लिख रहा होगा। और कुछ मुझमें नयी कला न सीख सकने की भी सिफ़त है । फ़िल्म में मेरे मन को संतोष नही मिला । संतोष डायरेक्टरों को भी नहीं मिलता, लेकिन वे और कुछ नहीं कर सकते, झख मारकर पड़े हुए हैं । मैं और कुछ कर सकता हूँ, चाहे वह बेगार ही क्यों न हो, इसलिए चला जा रहा हूँ। मैं जो प्लाट सोचता हूँ उसमें आदर्श- वाद घुस आता है और कहा जाता है उसमें एंटरटेनमेंट वैल्यू नहीं होता । इसे मैं स्वीकार करता हूँ। मुझे आदमी भी ऐसे मिले जो न हिन्दी जानते हैं और उर्दू । अंग्रेजी में अनुवाद करके उन्हें कथा का मर्म समझाना पड़ता है और काम कुछ नहीं बनता । मेरे लिए अपनी वही पुरानी लाइन मजे की है । जो चाहा लिखा । 'हंस' बदस्तूर चला जाता है । जून से अब तक ८००) प्रेस की नज़र कर चुका हूँ । व्यापार जानता नहीं, खोल बैठा दूकान, घाटा पाप होगा । न किसी ऐसे आदमी का सहयोग ही पा सका जो व्यापार जानता हो। ऋपभजी आये थे। वह ऐसी कोई आयोजना बना रहे हैं जिसके तुम, हम, वह और अन्य कुछ लोग मिलकर एक लिमिटेड फ़र्म वना लें। ऐसे ही एक सज्जन कहते हैं, मैं अपनी दूकान उठाकर प्रयाग लाऊँ । मेरी समझ में कुछ नहीं आता । जैसे चलता है वैसे चला ।
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चिट्ठी-पी १४५ मोहल्ले मोहल्ले में स्त्रियों के समाज हैं और प्रायः सभी में हिन्दी की क्लासिज है । मैं बुद्ध की तरह माला पहनकर रह गया । बोल न सकने की कमी उस वक्त मालूम हुई । जनता समझती है कि हिन्दी का एक बड़ा लेखक है; जाने क्या-क्या मोती उगलेगा और यहाँ है कि कुछ समझ में नहीं पाता, क्या कहूँ। खैर ! ट्रिप अच्छा रहा । प्रेमीजी भी साथ थे । वे बेचारे भी इसी मरज में मुन्तिला है । और क्या लिखू, मेरा जीवन यहाँ भी वैसा ही है, जैसा काशी में था । न किसी से दोस्ती, न किसी से मुलाकात । मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक । स्टूडियो गये, घर आ गये । हिन्दी के दो-चार प्रेमी कभी-कभी पा जाते हैं । यस । भगवती देवी को मेरा आशीर्वाद कहना । तुम्हारा । धनपतराय [४५] ७दरियागंज १ मार्च, १९३५ वाबूजी, पत्र का उत्तर देना जान-बूझकर टालता रहा । उसका कारण था । एक जगह से कुछ सुनने की आशा थी, और सोचता था वहाँ से पत्र आ जाय, तभी ग्रापको लिखू। अव मुना है आपकी कम्पनी टूट गयी और अब इस पत्र को यदि पायगे भी तो पाने की तैयारी में । ऐसी क्या बात हुई, यह शायद आप खुलासा लिखेंगे ही। क्या आप वर्षा जा रहे हैं ? क्या वहां से इस ओर पायेंगे? मेरी कल्पना है कि बनारसीदासजी प्रापको उस और मिलेंगे। वह फिर शांति- निकेतन में उसी तरह का जमाव करने की धुन में हैं, क्या माप जावेंगे? हंस से एक कहानी (एक रात) आपको मिली होगी। जरा ।
१४४ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व जाता हूँ। लेखक संघ की नियमावली तुम्हें मिली होगी । काम की बात कोई नहीं । सहयोग सिद्धान्त पर प्रकाशन किया जाय और साहित्य का प्रचार बढ़ाया जाय तभी लेखकों को रोटी मिल सकती है। जव तक प्रचार नहीं बढ़ता, न प्रकाशक ही पनप सकेगा, न लेखक हो । मगर कोआपरेटिव पब्लिकेशन के लिए धन कहाँ है ? अगर संघ यह न कर सके तो कुछ न कर सकेगा। तुम्हारी कई चीजें पढ़ीं । 'ग्रामोफोन का रिकार्ड' तो हाल में पढ़ा है । वह दिमाग़ में है । पुरानी शराव चमकदार शीशी में ज्यादा मोहक हो गयी है । मगर वह औरत घर क्यों चली गयी, यह मेरी समझ में नहीं आया । शायद वह वेपढ़ी-लिखी थी। मगर वेपढ़ी-लिखी औरतों को समय काटने का रोग नहीं होता । यह रोग तो उन अंग्रेजी या नयी रोशनी की देवियों को है, जिनके लिए जीवन में रात-दिन कुछ न कुछ कंपन और सनसनी चाहिए, जो क्षण भर भी घर में नहीं बैठ सकती । अगर इसी तरह सभी औरतों का समय काटना दूभर हो जाय और मनमोदन की वैरिस्टरों की दुनिया में कमी है ही नहीं, तब तो सभी आत्माएँ विश्वात्मा में मिल जाये और कहीं वह (मर्यादा) रहे ही नहीं जो मनुष्य को मनुष्य बनाये हुए है । खुलासा यह है कि इस कहानी का क्या मत- लब है, यह मैं न समझ सका । शायद कोई मतलब समझने की बात ही मेरी मूल है । एक युवती के मनोभावों का गहरा सजीव चित्रण है । बस ! मद्रास गया था, वहाँ से मंसूर और बैंगलौर भी गया । अपना यात्रा-वृत्तांत लिख रहा हूँ | कुछ नोट तो किया नहीं। जो कुछ याद है वही लिखता हूँ। हिन्दी का प्रचार बढ रहा है, यह देखकर खुशी हुई । जो लोग राष्ट्र की और कोई सेवा नहीं कर सकते, वे इसी खयाल में मगन हैं कि वे राष्ट्रभाषा सीख रहे हैं । मुझे वह प्रदेश बड़ा सुन्दर लगा । गाने-बजाने का घर-घर प्रचार है।
विट्टी-पत्री मोहल्ले मोहल्ले में स्त्रियों के समाज हैं और प्रायः सभी में हिन्दी की पलासिक है । मैं बुद्ध की तरह माला पहनकर रह गया । कोल न मरने की कभी उस वक्त मालूम हुई । जनता समझती है कि हिन्दी का एक बड़ा लेखक है; जाने क्या-क्या मोती उगलेगा और यहाँ है कि कुछ समझ में नहीं आता, क्या कहूँ। और ! ट्रिप अच्छा रहा । प्रेमीजी भी साथ थे । वे वेचारे भी इसी मरज में मुन्तिला हैं । और क्या लिखू, मेरा जीवन यहाँ भी वैसा ही है, जैसा काशी में था । न किसी से दोस्ती, न किसी से मुलाकात । मुल्ला को दौड़ मस्जिद तक । स्टूडियो गये, घर आ गये । हिन्दी के दो-चार प्रेमी कभी-कभी आ जाते हैं । वस । भगवती देवी को मेरा आशीर्वाद कहना । तुम्हारा धनपतराय . बाबूजी, ७ दरियागंज १ मार्च, १९३५ पत्र का उत्तर देना जान-बूझकर टालता रहा । उसका कारण था । एक जगह में कुछ सुनने की प्राशा थी, और सोचता था वहाँ ने पत्र प्रा जाय, तभी प्रापको लिखू । अब सुना है आपकी कम्पनी टूट गयी और अब इस पत्र को यदि पायगे भी तो पाने की तैयारी में ऐसी क्या बात हुई, यह शायद आप खुलासा लिखेंगे हो । क्या पाप वर्षा जा रहे हैं ? क्या वहां से इस ओर पावेंगे? मेरी कल्पना है शिदनारसोदामजी आपको उस ओर मिलेंगे। वह फिर शांति- निनन में सभी तरह का जमाव करने की धुन में हैं, क्या आप आपने? इंन में एक कहानी (एक रात) अापको मिली होगी। जरा १४६ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व लम्बी हो गयी । लेकिन गौर से पढ़ें और मुझे अपनी राय लिखें। और वह छपनी भी चाहिए। आपके पत्र में 'ग्रामोफ़ोन का रेकार्ड' कहानी का ज़िक्र था। उस स्त्री के फिसलने के चारों ओर जो एक वायव्य और वातावरण कहानी में भर दिया गया है उसमें क्या स्त्री की ओर से सेल्फ़- डिसेप्शन को गध प्रापको बिल्कुल नहीं मिली ? उसे वहाँ से विल्कुल अनुपस्थित करने का मेरा अभिप्राय न था। बल्कि मुझे मालूम होता है, वह ध्वनि है । वह ध्वनि न हो तो संपूर्ण कृत्य नितांत जस्टिफाइड ठहरता है । लेकिन वह मेरा अभिप्राय नहीं है । मेरा तो इप्ट मात्र इतना है कि कहानी में उस नारी के स्खलन पर घृणा से न भर जायँ प्रत्युत हमें करुणा हो, और वह नारी हमारी सहानुभूति से सर्वथा वंचित न हो जाय ! 'विश्वात्मा' प्रादि- आदि बातों के समावेश की इतनी ही सार्थकता है । कहानी में यह तो स्पष्ट ही है कि नारी में अपराध-चेतना (गिलटी कौन्सिएन्स) हो जाती है । फिर यह गिलटी कौन्सिएन्स ही उसे अपने पति के प्रेम और संरक्षण की छाया के नीचे से हटकर चले जाने को लाचार करती है । लेकिन क्या वह अपना ग्लानि भरा हृदय वाहर की ओर खुलने दे ? यह वह नही कर सकती, इसी से पति से झगड़ा मोत लेने को उतावली और तत्पर वह दिखायी देती है । मैं समझता हूँ, इन मेरी ऊपर की बातों के प्रकाश में वह कहानी आपको असंयम का समर्थन करती न जान पड़ेगी, जैसी कि इस समय आपको लगी खैर, अाप अपने सम्बन्ध में खुलासा लिखियेगा । अभी तक किसी भी भाँति 'हंस' के बारे में वे पुरानी बातें नहीं छोड़ सका हूँ। मैं अब भी यही सोचता हूँ कि 'हंस' का सम्पादन आप विल- कुल मुझ पर छोड़ दें। एक ऑरगन की बड़ी सख्त जरूरत जान पड़ती है। कहानी महीने में कितना खप सकती है, मुश्किल से तीन । तीन कहानियां मेरा कुछ भी समय नहीं भरती और न चिट्ठी-पत्री तीन कहानियों का प्रोडक्शन कोई मन में परपज की भांति जम पाता है । उस परपज को सामने पा लें, उसी के सहारे कोई बड़ी किताब उपन्यास-प्रादि हाथ में ली जा सकती है, अन्यथा साली-सा लगता है । अभी यों भी जितने हिन्दी में पत्र हैं, मन कोई भी नहीं चढ़ता । एक बढ़िया, ठोस, स्टैण्डर्ड पत्र की कमी हिन्दी में सलती मैं इधर मध्य मार्च में आपकी मोर जरा सैर करने के मन्सूवे बनाने में लगा था कि पाप ही चल दिए । वर्धा जाये और गांधीजी से मिलें तो मेरा प्रणाम कहिएगा कि जैनेन्द्र को पापका पत्र मिला है और वह साहस संग्रह कर लेंगा, तब उन्हें उत्तर लिखेगा । पत्र दीजिएगा। अापका जैनेन्द्र प्रयाग ४ मई, १९३५ प्रिय जनेन्द्र, मैं तो इंदौर जाते-जाते रह गया। सबसे वायदे कर लिये थे, एक भी पूरा न कर सका । इस उम्मीद से कि तुमसे इंदौर में गप- शप होगी, तुम्हें खत भी नही लिखा । जव पूरा भोजन मिलने की आशा हो तो पानी पी-पीकर क्यों भूख को दुर्बल बनाया जाय ! लेकिन कुछ तो प्रेमीजी के न आने और खुछ नातेदारियों में जाकर मिलने-मिलाने के कारण सारा प्रोग्राम भ्रष्ट हो गया । अव धुन्नू को चेचक निकल आयी है, और २७ से वह पड़े हुए है। हम भी उसके साथ है। यात्रा करने के लायक हो जाय तो सात को यहाँ से उसे लेकर चले जायें। चेचक हल्की है, यही कुशल है । दाने मुरझा १४८ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व गए हैं । मगर अभी मफ़र करने में गर्मी लगने से मुमकिन है उनके अच्छे होने में ज्यादा समय लग जाय । परसों श्री कन्हैयालाल मुंशी के पत्र से मालूम हुआ कि सम्मे- लन ने राष्ट्र-साहित्य-बोर्ड-निर्माण के सम्बन्ध में एक प्रस्ताव पास किया है । यह तो मुश्किल न था, मगर उस प्रस्ताव को कार्य-रूप देने का भार किस पर सौपा गया ? मुंशी साहब से तुम्हारी क्या वातचीत हुई और कार्यक्रम का क्या ढंग रहेगा ? 'हंस' तो इस काम के लिए यहाँ तक तैयार है कि अन्य प्रान्तीय लेखकों से पत्र- व्यवहार करके उनसे हिन्दी में लेख और कहानियां लिखवाकर छापे, मगर क्या इतना ही उस संस्था को सजीव बनाने के लिए काफ़ी होगा ? (विस्तार से) लिखना। मैंने 'भारत' में तुम्हारे भाषण की रिपोर्ट पढी, बहुत अच्छी है । मैने इरादा किया है कि जून से हंस को और प्रेस को प्रयाग लाऊँ और खुद भी यहीं रहूँ। काशी में न तो काम है और न साहित्य चालों का सहयोग । वहाँ जितने है, वे सभी सम्राट् है; कोई कवि- मम्राट्, कोई आलोचना-सम्राट्, कोई प्रहसन-सम्राट् । यह गौरव तो काशी ही को है कि वहाँ सभी सम्राट् मौजूद है, मगर सम्राटों की सम्राटों से पटेगी? शिष्टाचार की बात और है, हादिक सहयोग की वात और । मुझे डर लग रहा है कि कहीं तुम भी साल-छ: महीने में सम्राट हो जानो तो मेरा काम ही तमाम हो जाय ! फिर तुमसे कोई लेख मांगने का साहस भी न कर सकूँ। इसलिए अब प्रयाग पा रहा हूँ जहाँ सम्राट् कम हैं । अगर कोई कहानी भेज सको तो बहुत अच्छा, मगर उस आखिरी कहानी की तरह पूरा उपन्यास नहीं । और क्या लिखू ! प्रेमीजी तो नहीं पाए थे । हां, सम्मेलन पर अपने इम्प्रेगन्स लिख दो तो 'हंस' में निकाल दूं। तुम्हारी क्या सलाह है, 'हंस' को विल्कुल कहानी-पत्र वना दूं, और आधी अनु- चिट्ठी-पत्री १४६ वादित और प्राधी मौलिक कहानियाँ दिया करूं? माताजी को मेरा प्रणाम कहना और भगवती को पाशीर्वाद । तुम्हारा धनपतराय । [४७] ७, दरियागंज ७ मई, १९३३ बाबूजी, पत्र मिला । कितनी मुद्दत वाद मिला है ! इन्दौर में मैंने पहली बात यह पूछी कि आप आये हैं ? पता लगा, नहीं आये। तब सोचा, तार दूं। लेकिन प्रेमीजी, जो स्टेशन पर ही मिल गये थे, बोले--पाप आ न सकेंगे, तार देना फिजूल होगा। इससे रह गया । जरा भी जानता कि आप इन्दौर जाने के लिए उद्यत बैठे हैं तो जरूर आपको बुला ही लिया जाता । वहाँ आपको मिलने को बहुत ही जी भटकता रहा । हाँ, मुंशीजी वहाँ मिले थे । वातें भी हुई। जो सोचा था वह तो न हुआ ! उसका भी इतिहास है । एक सीधा-सादा-सा प्रस्ताव अवश्य हुआ है । कमेटी बनी है जिसमें मुशी संयोजक है । अव सब उन पर है। काम का क्या ढंग हो । आने-जाने में खर्च तो बहुत पड़ता है लेफिन पाँच पादमियों को मिल लेना चाहिए तव काम आगे बढ़ सकता है । गांधीजी, मुशी, कालेलकर, आप और मैं, ये सब लोग वर्धा में ही यथाशीघ्र सुविधानुसार मिल लें, लेकिन यह मुंशी पर है। उनका पत्र प्राया था। लेकिन मैंने इधर उसका जवाब भी नहीं दिया है, अब दूंगा। यह भी वात हुई थी कि अपना अलग पत्र न निकालकर आपसे 'हंस' ही देने के लिए कहा जाय । मैं समझता हूँ इसमें आपके लिए भी प्रयुक्त कुछ नहीं है । जव तक इस सम्बन्ध में आगे बातें
होगा. मी प्रामा प्रारमिन नही है किन्तु हिर
घन है, प्रयाग भी यदि नहीं वो कालिका इतर
मेरे पाग नहीं है । दिल्ली ! मैं एकाएक नई कार, भोले
धन प्रादि का भी मवाल है । इन्दर मरेका पारित
प्रमोगी का कारोवार भी कुछ इंस्टीट्यूशन की सल में नहीं है न
प्रापया ही, तब ययों न दोनों को मिलाकर एक निति (निर्मि-
टिक) प्रमं को सकल में ढाल दिया जाये और चलाया जा !
लेकिन यह सब दौड़-धूप के बिना कैसे हो ? वह कौन परे? मैं
इधर बहुत हैंटीसेप्ट हो रहा हूँ, चलना-फिरना भी सरल नहीं
होता । फिर भी यह देखता हूँ कि आगे कोई रास्ता नही है।
जानता नहीं, आप बम्बई से कितना पैसा जमा करके लाये हैं
लेकिन जितना भी मुझे दीखता है सब इस कारोबार में ही झुकेगा।
मैने प्रवासीलालजी को लिखा था कि मंटर की जब जरूरत
हो, यो रोग का नोटिस देकर मुझे लिख दें । सोलह सफ़े तक की
मारटी ने दी थी। अब मेरा इसमें दोष नहीं है कि वह वसूल ने
किया जब तर्क पास हो तो मैटर देने में कठिनाई क्या
होती ! NEस दिनों से चल रही भा, इससे काम सब ठप्प
था। पब है तो मेट की मागिता ?
कहानी भेज रहा हूँ।
हाँ, साहित्य परिषद् (it) माता धा पर 'भारत' में
तो भापण का कनूमर था } THE MIN तो मै बोला हूँगा।
और 'भारत' में जो था !
हाँ
ध्वनि उसमें मुझे अवश्य अपनी
में बनता था,
। गाग पड़ता है,
चिट्टोपनी मॉर्टहैण्ड की रिपोर्ट उसकी ली गयी है 1 भाप उन्हें लिखिये न कि यदि रिपोर्ट हो तो उसकी प्रति वह पापको भेज दें; मैं भी यहां से लिखूगा । यहाँ सम्मेलन के बारे में एक ने इंटरव्यू ली थी। वह मैं कल या परसों प्रापको भिजवा दूंगा। इलाहाबाद में क्या आपने मकान आदि पक्का कर लिया है ? यदि दिल्ली की बात किसी तरह भी व्यवहार्य जान पड़े और सब वन्दोवस्त शिफ्ट का न हुआ हो तो उस पर सोचियेगा । मैं आपका वहुत-कुछ, लगभग सभी कुछ वोझ हलका कर सकता हूँ, ऐसा मुझे लगता है। और, पाप पत्र देने के बारे में ऐसा प्रमाद न किया कीजिये । इस बीच आपके पत्र न पाने से सच जानिये, मुझे बहुत सोच रहा। वाको ठीक ही-सा है। आपका जैनेन्द्र सरस्वती प्रेस, १४ मई, १९३५ प्रिय जनेन्द्र, तुम्हारी कहानी, छपा हुग्रा भाषण और सम्मेलन पर प्रश्नोत्तर सब मिले । धन्यवाद ! पत्र तैयार हो गया है। अगले महीने काम आयेंगे। वम्बई से क्या लाया? कुल ६३०० रु० मिले। इसमें १५०० २० लड़कों ने लिये, ४०० रु० लड़की ने, ५००रु० प्रेस ने । दस महीने में बम्बई का खर्च घड़ी किफ़ायत से भी २५०० रु० से कम न हो सका। वहाँ से कुल १४०० ६० लेकर अपना-सा मुंह लिये चले आये । अब ये यहां से प्रेस के उठाने में खर्च हो जायेगे । प्रयाग में शायद यहाँ से अच्छी तरह काम चले । लेखक संघ के दो-एक सज्जन कुछ मदद करेंगे । एकेडमी से कुछ काम मिल जायगा और बाहर का कुछ काम १५२ प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व मिलने की उम्मीद है। अगर वह विचार पूरा हो गया तो यह वला सर से टल गयी । इसके सिवा मुझे तो कोई दूसरा उपाय नहीं सूझता । अगर दो-एक साझेदार मिल जायें, जो दस-पाँच हजार रुपये लगायें और काम अपने हाथ में ले लें, मुझसे केवल ऊपरी सलाह का काम लेते रहें, तो और भी अच्छा नहीं लिमिटेड ही सही। इन सभी बातों के लिए प्रयाग अच्छा क्षेत्र है। बनारस तो केवल xxx जानता है । अगर ऐसी कोई सूरत निकल आये तो मेरी हार्दिक इच्छा है कि हम लोग साथ रहते । अभी तो यह हाल है कि आज प्रेस पर मकान के किराये की नालिश हुई है। ३००० रु० बाकी है । जिस कार्यालय में मजदूरों की मजदूरी और मकान का किराया भी न निकल सके, उसकी हालत का अनुमान कर सकते हो। किसे दोप दूं? प्रवासीलालजी से जो हो सकता है करते हैं । इससे ज्यादा एक आदमी और क्या कर सकता है ? अगर वह ज्यादा दौड़-धूप कर सकते तो शायद दशा इतनी खराब न होती । लेकिन जो काम उनसे नहीं हो सकता तो शायद उन्हें उसके लिए मजबूर भी तो नहीं किया जा सकता। मैंने श्री के० एम० मुशी को पत्र लिखा है । देखो । क्या जवाब देते हैं। इधर धुन्नू को चेचक निकली थी। उन्हें प्रयाग से यहां लाये। यहाँ वन्नू को भी निकल आई, और छः दिन से यह पड़ा हुआ है। मैं तो शहर गया भी नहीं । घर बैठा-वठा केवल चिट्ठी-पत्र लिस लेता हूँ। प्रयाग से मुझे कुछ समानों की राय है कि 'हंस' केवल कहा- नियों का पत्र बना दिया जाय । तुम्हारी क्या राय है ? इस विषय में शायद हमारी बातचीत हो चुकी है । लेकिन याद नहीं पाता कि नुमने क्या राय दी थी। शेप कुशल है । तुम्हारा धनपतराय चिट्ठी-पत्री [४६] ५ मई, १९३५ । वाबूजी, पत्र मिला। मैने तो समझा था कि आपने चिट्ठी लिखी है, इससे तुरन्त ही कहानी की जरूरत होगी सो भेज दी थी। डर है, वह अगले महीने तक पुरानी न हो जाय, क्योंकि बम्बई से छपने- वाले संग्रह में भी उसे भेजा है। 'हंस' कहानियों का ही हो, इसमें क्या बुरा है; बल्कि एक स्पेशलाइजेशन की दिशा ही बनेगी । लेकिन इतनी अच्छी कहा- नियां मिलेंगी ? और तब जब कि 'हस' की हालत पैसा देने की नहीं है ? न 'हंस' स्टाफ़ ही अच्छा रख सकता है। मेरा तो खयाल है कि मुशी की स्कीम कुछ बने तो 'हंस' छोड़कर आप छूटिये । छूटना मात्र केवल झंझट से होगा । क्योंकि तव भी पत्र तो सम्पा- दन के लिहाज से आपका ही होगा । मुझसे पूछे तो मेरे मन में यह भी है कि कहूँ कि 'हंस' का सम्पादन मुझे दे दें इलाहावाद जा ही रहे है, तो जाकर देखिये । मुझे तो वहाँ का ज्यादा भरोसा नहीं होता। भारतीयजी को मैं नहीं जानता। अच्छा ही है कि उनसे आपको सहायता मिले । बम्बई से पाये पैरो में रो इतना भी वचा कि एक तजुर्वा किया जाय तो क्या बुरा है ! यह कहाँ जमने का ठीक किया है ? इस चेचक से मुझे बड़ा डर लगता है । अव वन्नू की पगा हात है, जरूर लिखियेगा ! क्या एक्यूट केस है ? यों तो सास-मा रोग में दाने मुरझा आते और झड़ने लगते हैं। क्या यहाँ एगी तो पड़ा था चेचक का? यहाँ यो सब ठीक-ठाक है । इधर आप मुदत से " कभी दो रोज की छुट्टी निकाल सकेंगे कि यहाँ भागें।
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व पड़ने लगी है । पहाड़ याद आता है लेकिन जाना कहाँ होता है ! अम्माजी को मेरा प्रणाम ! श्रापका जैनेन्द्र बनारस २७ सितम्बर, १९३५ प्रिय जैनेन्द्र, तुम्हारा कार्ड मिला । चिन्ता हो रही थी कि क्यों कोई पत्र नहीं पा रहा है । माताजी बीमार हैं, यह तो बुरी खबर है । अब तो तुम वहाँ पहुँच गये। शीघ्र लिखना, उनकी तबीयत का क्या हाल है। क्लर्क का रोग तुमने बुरा पाल लिया । दिल्ली के लेखकों को ही मुश्किल पड़ रही है, क्लकों के लिए कहाँ से प्रबन्ध हो ? मेरी ग्रामदनी तो समाचार-पत्रों से प्रायः बन्द हो गई। छ: महीने में कुल ३५ रु० का काम किया } 'चांद' में एक कहानी लिसी, मगर रुपये यह भी नहीं दे रहे हैं । कहते हैं 'चाँद' की माली हालत खराव है, और मैंने कही कुछ नहीं लिसा । हंस तो अपना है, और अपने तो लेते हैं, देते कभी नहीं। रुपये के विषय में मैं क्या लिखू ! तुमने कुछ टेढ़ा-सीधा काम किया भी । मैं तो पांच महीने में एक पंसा न कमा सका । बम्बई से थोड़े-से पंसे लाया था, वह पांच महीने में सा गया और कुछ कर्ज चुमा दिया। और ऐसा था ही क्या ! अव इसी चिन्ता में धुल रहा हूँ कि प्रागे पपा होगा । 'कर्मभूमि' और 'गुवन' दोनों करीय- करीव समाप्त है । मुझे कौड़ी न मिली। उन्हें दोबारा छपवाने को चिन्ता अलवता हो रही है । क्या ऐमा नहीं हो सकता कि तुम यहाँ चिट्ठी-पक्षी आकर 'जागरण' को पाक्षिक रूप में निकाली और में रवा वास्तव 'जागरण' के नाम को चरितार्थ करे। मेरा खयाल है, बत्तीस पृष्ठों का पाक्षिक मय जिस्यान्दमि एक आना हो और तुम्हारे सम्पादकत्व में निकले, तो छः महीने में उसमें कुछ न कुछ निकलने लगेगा । मैंने जो तखमीना किया है उसके हिसाव से प्रति संख्या १०० रु. खर्च पड़ेगा और आमदनी का अनुमान १३० रु० प्रति संख्या है । १००० छपेगा। अगर छः महीने चल जाय तो आशा है कि उससे ६०-७० रु० माहवार निकलने लगें । जव प्रचार वढ़ेगा और २००० तक पहुँच जायगा, तब तो और भी मिल सकते हैं। मुझे केवल काग़ज और पोस्टेज खर्च करना पड़ेगा। इतनी ग्रामदनी विज्ञापनों से हो सकती है । लेकिन अभी तो तुम परेशान हो, माताजी अच्छी हो जाये तो इस विषय पर कुछ सोचना पड़ेगा। पत्रों से आमदनी के भरोसे पर तो एकादशी से सिवा और कुछ नहीं है। 'भारत' की दशा अच्छी नहीं है । 'चांद' का हाल कह ही चुका । अव रहे, 'विशाल भारत', 'माधुरी' और 'सरस्वती' । इनसे २० रु० महीना मिलना भी मुश्किल है। 'हंस' शायद पहली तक तैयार हो जाय । भवदीय , धनपतराय [५१] हंस कार्यालय, बनारस ६ दिसम्बर, १६३५ प्रिय जैनेन्द्र, कल तुम्हारा पत्र मिला । मुझे यह गंका पहले ही थी। इस मर्ज मैं शायद ही कोई वचता है। पहले ऐसी इच्छा थी कि दिल्ली आऊं, लेकिन मेरे दामाद तीन दिन से आये हुए है, और शायद प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व बेटी जा रही है। फिर यह भी सोचा कि तुम्हें समझाने की तो कोई बात है ही नहीं। यह तो एक दिन होना ही था। हाँ, जव यह सोचता हूँ कि यह तुम्हारे लिए क्या थीं, और तुम उनके काल में आज भी लड़के-से बने फिरते थे, तव जी चाहता है तुम्हारे गले मिलकर रोऊँ । उनका वह स्नेह ! वह तुम्हारे लिए जो कुछ थी, वह तो थी ही, मगर उनके लिए तो तुम प्राण थे । प्राय थे । सव कुछ थे। विरले ही भाग्यवानों को ऐसी माता मिलती है। मैं देख रहा हूँ तुम दुःखी हो, और चाहता हूँ, यह दु.ख आधा-याधा बाट लूं अगर तुम दो। मगर तुम दोगे नहीं। इसे तो तुम सारे का सारा अपने सबसे निकट स्थान में स्वरक्षित रखोगे । काम से छुट्टी पाते ही अगर पा सको तो जरूर आ जायो। मिले बहुत दिन हो गये । मन तो मेरा भी पाने को चाहता है, लेकिन मैं पाया तो तीसरे दिन रस्सी तुड़ाकर भागूंगा। तुम--- मगर अब तो तुम भी मेरे-जैसे हो, भाई । अव वे वेफ़िक्री के मजे कहाँ ! . और सच पूछो तो मेरी ईर्ष्या ने तुम्हे अनाथ कर दिया । क्यों न ईर्ष्या करता, मैं सात वर्प का था जव माताजी चली गयी। तुम २७ के होकर मातावाले बने रहे। यह मुझसे कब देखा जाता ! अव जैसे हम, वैसे तुम । वल्कि मैं तुमसे अच्छा हूँ। मुझे माता की मूरत भी याद नहीं पाती । तुम्हारी माता तुम्हारे सामने है और वोलती नहीं, मिलती नहीं । महात्माजी तो वहाँ होंगे? और तो सब ठीक है । चतुर्वेदीजी ने कलकत्ते बुलाया था कि प्राकर नोगूची जापानी कवि का भाषण सुन जायो । यहाँ नोगूची हिन्दू यूनिवर्सिटी आये, उनका व्याख्यान भी हो गया, मगर मैं न जा सका । अक्ल की बातें सुनते और पढते उम्र बीत गयी। ईश्वर पर विश्वास नही आता, कैसे श्रद्धा होती? तुम आस्तिकता की ओर जा रहे हो । जा नहीं रहे, पक्के भक्त वन रहे हो । मैं संदेह ।
चिट्ठी-पत्री से पक्का नास्तिक होता जा रहा हूँ। वेचारी भगवती अकेली हो गयी ! 'मुनीता' जाने कहाँ रास्ते में रह गयी । यहाँ कहीं बाज़ार में भी नहीं । चित्रपट के पुराने अंक उठाकर पढ़े पर मुश्किल से तीन अध्याय मिले । तुमने बड़ा जवरदस्त आइडल रख दिया, महात्माजी के एक साल में स्वराज्य पानेवाले आन्दोलन की तरह । मगरतल- वार पर पाँव रखना है। तुम्हारा धनपतराय [५२] हंस कार्यालय, बनारस २४ दिसम्बर, १९३५ प्रिय जैनेन्द्र, 'सुनीता' पढ़ गया । अाधी दूर तक तो कुछ रस न पाया, लेकिन पिछला आधा सुंदर है । नारीत्व का जो आदर्श तुमने रखा है, वही सच्चा आदर्श है । नारी केवल गृहिणी क्यों हो, गृहिणी ने अलग भी उसका जीवन है । अगर उसमें गृहिणीत्व से आगे बढ़ने की सामर्थ्य है तो यह क्यों न आगे बढ़े ! सुनीता के मन में इस नये क्षेत्र में आने से जो संघर्ष हुआ है, वह उसके रक्त में सने हुए गृहिणी-जीवन के अनुकूल है । मगर तुम्हारा हरिप्रसन्न अंत में जाकर मुझे कुछ xxx होता जान पड़ता है। शायद मुझे भ्रम हो, लेकिन श्रीकान्त से छिपकर वह कृत्य क्यों किया गया ? इसमें मुझे नैतिक दुर्वलता का भय होता है। श्रीकान्त की पूरी अनुमति से यह काम किया जा सकता था। श्रीकान्त-जैसा उदारचेता मनुष्य सुनीता के इस नये मार्ग में वाधक न होता; और होता तो सुनीता को अपने निश्चय पर दृढ़ रहना और उसके नतीजे (बर्दाश्त कर) लेना चाहिए था । हरिप्रसन्न ने सुनीता को सिड्यूस किया, कुछ ऐसा प्रेमवन्द : एक कृती व्यक्तित्व भासित होता है । मुनीता ध्वजाधारिणी बने, इसमें कोई हर्ज नहीं; नहीं वह गौरव की बात है। उसके लिए भी और देश के लिए भी। लेकिन हरिप्रसन्न के मन में यह कुत्सित भावना क्यों ? ध्वजा- धारिणी के पद से गिराकर उसे व्यभिचारिणी के पद पर क्यों लाना चाहता है ? अगर सुनीता विवाहित न होती, अगर यह प्रेम सत्या के साथ निभाता तो कोई बात न थी। लेकिन जब श्रीकान्त और सुनीता में एक मुमाहिदा हो चुका है और वह मुग्राहिदा उसे स्वीकार है तो फिर यह व्यवहार क्यों ? अगर सुनीता हरिप्रसन्न को जी से चाहती है, तो उसे अपने पति से स्वयं कह देना चाहिए था । यह धोखा और फ़रेव क्यों ? मगर सुनीता कहीं भी हरिप्रसन्न को चाहती नहीं दिखायी दी। विद्रोह या असंतोप की वहां गंध भी नहीं, फिर वह क्यों हरिप्रसन्न के सामने इस तरह नत हो जाती है ? क्या हरिप्रसन्न का पर्सनल मैग्नीटिपम उस पर असर करता है ? अगर ऐसा है तो यह भी हरिप्रसन्न की नीचता और लापरवाही है. मित्र के साथ दगा है उस मित्र के साथ जो उसे अपने भाई से भो प्रिय रखता हो । क्रान्तिकारी नीति में विवाह हेच वस्तु हो सकता है। मगर इस सामाजिक (बंधन) का महत्त्व क्यों भूल जायें ? स्त्रा पत्नी रहते हुए भी अभिनेत्री बन सकती है, और अगर पति दुरा- चार करे तो उसे लेकर मार सकती है । लेकिन इस तरह एक युवक के पंजे में फंस जाना न उस क्रांतिकारी युवक को गोभा देता है न नारी को। अगर मेरे समझने में गलती हो तो मुधार देना । मेरे 'कर्मभूमि' का उर्दू-एडीशन जामिया मिल्लिया ने निकाला हो सके तो काशी-नम्बर 'हंस' के लिए कुछ लिखना । तुम्हारा धनपतराय
१५६
चिट्ठी-पत्री
[५३]
हंस-कार्यालय,
बनारस फैट
१० जून, १६३६
-
प्रिय जैनेन्द्र,
तुम दिल्ली कव पहुँच गये ? मैं तो समझ रहा था कि अभी
चिरगांव में ही हो । हाँ, वह राष्ट्रभाषावाला कटिंग था तो, मगर
न जाने कहाँ रह गया। मिल नहीं रहा है ।
'गोदान' निकल गया । कल तुम्हारे पास जायगा । खूध मोटा
हो गया है, ६०० से (ऊपर) गया । अपना विचार लिखना ।
परिपद् तो साविक दस्तूर (घिसट) रहा है। परिपद् का
निर्माण हो जाने से इसमें कुछ नया जीवन तो आया नहीं।
आजकल 'हंस' में ४५० रु० महीने की कमी पड़ रही है ।
६०० रु० का खर्च और १५० रु० की आमदनी । सोचा था काका-
साहब के आने से इसकी दशा संभलेगी, मगर अभी तो कोई फल
नही हुआ । आज जून को संख्या निकल गयी, कल भेजी जायगी।
हाँ, सीरियल नाविल शौक़ से लिखो। मुझे डर यही है कि
'हंस' की माली हालत खराब है । खैर । लिखना शुरू करो । कुछ
न कुछ करना चाहिए । वेकार बैठने से कैसे काम चलेगा ! मैं ऐसा
करूँगा कि दो हजार हर महीने छापता जाऊँ । इस तरह (उसके)
प्रकाशन में सुविधा हो जायगी । पुस्तक वहुत कम खर्च में तैयार
हो जायगी । हाँ यह चाहता हूँ कि मुंशीजी का उपन्यास खत्म हो
जाय तो शुरू करो।
।
तुम्हारा
धनपतराय
१६० प्रेमचन्द : एफ. कृती व्यक्तित्व [५४] बनारसबंट, २२ जून, १९३६ प्रिय जनेन्द्र, यह लेरा तो अगस्त में जायगा। देर में पाया और हिन्दी के चारों फार्म भर गये । राष्ट्र-भापावाला लेख क्या कोई प्रिंट था ? याद नहीं पा रहा है, कव पाया। यहां तो मिलता ही नहीं। 'हंस' का पैसेवाला भार कम्पनी पर है, मुझ पर नहीं । हाँ, कम्पनी इसके सचं से xxx हुई है । ४ जुलाई को वर्धा में भार- तीय परिपद् की कार्य-कमेटी की बैठक है। इसमें फैसला किया जायगा कि 'हंस' का क्या किया जाय । शायद मैं भी जाऊँ। आज भी बम्बई में काका और मुंशी वैठे कुछ सलाह कर रहे हैं । मुझे तार दिया था, लेकिन अभी वम्बई जाता और ४ को वर्धा । वर्धा जाना ही मुश्किल हो रहा है । तबीयत भी अच्छी नहीं है । बंगलावालों का यह (रोग) किसी तरह दूर हो जाय तो क्या कहना काम मिलने-मिलाने का है और यहां किसी को फुरसत नही । जव तक कोई एक आदमी पीछे न पड़ जाय तो जीवन कहाँ से पाये? आज 'गोदान' भेज रहा हूँ। पढ़ना और अच्छा लगे तो कही 'अर्जुन' या 'विशाल भारत' या 'हंस' में आलोचना करना । अच्छा न लगे तो मुझे लिख देना, पालोचना मत लिखना...... [५५] बनारस, २ जुलाई, १६३६ प्रिय जैनेन्द्र, 'सुनीता' मै छापूंगा । जिस वक्त तुम यहाँ आयोगे, टाइप, काग़ज़, दाम आदि का निश्चय किया जायगा।
चिट्ठी-पत्री ४ को वर्धा में भारतीय साहित्य परिपद् की मीटिंग है। हंस लिमिटेड 'हंस' को परिपद् के हाथ सौंपेगा । छपाई श्रादि का प्रवन्ध काका खुद करेंगे, मेरा फेवल नाम रहेगा सम्पादकों में । यहाँ छापने में उन लोगों के विचार में खर्च ज्यादा पड़ता है । अब तक कम्पनी ने मुझे कुल १४०० रु० दिये हैं । मगर मुझे झंझट से निजात मिल जायगी। (लोपामुद्रा) समाप्त हो गई। अगस्त में तुम्हारा उपन्यास जा सकता है । मुंशी को एक पत्र लिख दो। अगर 'हंस' यहाँ रहा तो कोई बात नहीं, लेकिन वहां गया तो वे लोग फ़ैसला करेंगे । मैं तो जनवरी से एक और पत्र निकालूंगा। तुम प्रायोगे तो सारी बातें तय होंगी । भगवती को साथ लाना। मैं पन्द्रह दिनों से दस्तों में मुन्तिला हूँ। तुम्हारा धनपतराय [५६] बनारस १६ प्रगस्त, १६३३ प्रिय जैनेन्द्र, कहानियां और पत्र ठीक-ठीक पहुँच गये । धन्यवाद ! ठाकुर श्रीनाथसिंहजी वाली इण्टरव्यू कुरुचिपूर्ण थी और अत्युक्तियों से भरी हुई । मैंने हंस में एक टिप्पणी दी है। ये लोग सस्ती ख्याति के पीछे पड़े हैं और सनसनीखेज पत्रकारिता उसके लिए राजमार्ग है । मुझे उम्मीद है कि श्रीनाथसिंह इस शरारत को दोहरायेंगे नहीं। मुझे यह जानकर अफ़सोस हुआ कि तुम्हारे मामले काफ़ी परे- शान कर रहे हैं, ऐसा लगता है कि रंगभूमि का कारवार ठीक से नहीं चला । साहित्यिक उद्योग से तुम आशा भी और क्या कर सकते , । प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व थे? हर जगह वही पुरानी कहानी है। कितावों की बिक्री इतनी निराशाजनक है कि भविष्य की बात सोचकर कलेजा थाम लेना पड़ता है । तुम मुझसे जागरण बन्द करने को कहते हो। एक से प्यादा मर्तबा उसके बारे में सोच चुका हूँ। लेकिन चूंकि मैं उस पत्र पर करीव तीन हजार घाटा उठा चुका हूँ, उसे बंद कर देने में मुझे कठिनाई हो रही है । साहित्य-सृष्टि अनिश्चित-सी चीज है । उस पर भरोसा नही किया जा सकता । अलावा इसके, उसके लिए मानसिक शान्ति और वातावरण की शान्ति अपेक्षित है जो कि वर्तमान स्थितियों में हाथ नहीं आती। प्रेस को चलाना ही पड़ेगा। मैने अपने भाई का रुपया उसमें लगा दिया है और अपनी जिम्मे- दारियों से अब नहीं बच सकता । यहाँ पर काम बहुत कम है। थोड़ा-बहुत जो है, वह ज्यादा सस्ते प्रेस हथिया लेते है। प्रेस को काम देना है । जागरण से औसतन करीव चार सौ रुपये वसूल होते हैं । इसका मतलब है कि उससे प्रेस का खर्चा निकल आता है । जागरण में जो काग़ज़ इस्तेमाल होता है उसकी कीमत लग- भग डेढ़ सौ रुपये होती है । यह रकम हर महीने हंस से और कितावों की विक्री से पूरी करनी पड़ती है । विक्री अगर संतोपजनक होती तो सब ठीक-ठीक रहता । हमने 'फांसी', 'रूपराशि', 'विसरे फूल' और 'प्रेम की वेदी' छापी है । अव हम 'प्रतिज्ञा' छाप रहे हैं और उसके खत्म होते ही 'कायाकल्प' शुरू करेंगे। इस तरह तुम देखोगे कि जहां तक असासे की बात है, हम नफे में काम कर रहे हैं लेकिन रुपये का सम्पूर्ण अभाव है। कोई भी किताव नहीं विक रही है। मेरे एक-दो संग्रह जो स्कूलों में मंजूर हैं, वही किसी तरह स्थिति को सम्हाले हुए हैं । कर्मभूमि भी काफी अच्छी विक रही है । जाग- रण बड़े मजे में मुनाफ़े की चीज़ हो सकती है, अगर मैं धीरज के साथ उसमें लगा रह सकूँ । उससे अगर मुझे महीने में सौ रुपये की भी आमदनी हो जाय तो मैं सन्तुष्ट हूं। मुझे उम्मीद है कि दूसरे वर्ष के अन्त तक यह मेरे लिए वोग न रह जायगा।
। चिट्ठी-पत्री 'कायाकल्प' के खत्म होते ही मैं तुम्हारी 'मैग्डलीन' हाथ में लूंगा । मैं कितना चाहता हूँ कि तुम्हारी सब रचनाएँ प्रकाशित करूँ और तुमको तुम्हारी छोटी-छोटी चिन्ताओं से मुक्त कर दूं । तुमने 'यामा' का अनुवाद शुरू किया है, बहुत अच्छी बात है । विश्व का मेरा इतिहास समाप्त हो गया है। अब मैं फिर अपना 'गोदान' उठाऊँगा। मुझे उम्मीद है कि मै बहुत जल्द ही तुमको कुछ भेजूंगा । जहाँ तक महावीर की बात है, अगर तुम सोचते हो कि वह अच्छा सेल्समैन हो सकता है, और अच्छा विजनेस ला सकता है तो मुझे उसको अपने पास रखकर खुशी होगी। मेज पर बैठकर करने लायक कोई काम नहीं है । उसको विहार, राजपूताना आदि का दौरा करना पड़ेगा । अगर वह अच्छा काम करता है तो कोई वजह नहीं है कि वह क्यों हमारा स्थायी सेल्समैन न वने । शुरू में मैं उसके कच्चे- पन के लिए छूट देने को तैयार हूँ और करीव छ: महीने तक का ट्रायल उसको दूंगा । अगर वह महीने में दो सौ रुपये की विक्री कर सके या 'हंस' और 'जागरण' के वीस-बीस ग्राहक ला सके और एक सौ रुपये की कितावें वेच सके तो उसकी तनख्वाह और सफ़र खर्च निकल आयेगा और वह एक कमाऊ आदमी सावित होगा, वोझ नहीं बनेगा । अगर तुम संतुष्ट हो कि वह इतना सब कर सकता है तो तुम उसको मेरे पास भेज दो, या रुके रहो जव तक कि मै तुमको रुपया नहीं भेजता । तुम मेरी कुछ मदद क्यों नहीं करते ? साप्ताहिक पत्र को मुनाफ़े की चीज़ बनाया जा सकता है और अब भी एक-दो ऐसे पत्र है । अगर हम और भी अच्छी सामग्री दे सकें और विज्ञापन हासिल करने के लिए अपना कुछ ज़ोर लगा सकें तो हम अपने प्रकाशनों को आगे बढ़ा लकते हैं और फिर प्रकाशकों की टोह में जाने की जरूरत न होगी। दुनिया वेधड़क उत्साही लोगों के लिए बनी है जो अपने मौकों का अधिक से अधिक लाभ उठा सकते हैं । तुम ८.
प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व रोज़मर्रा की चीजों पर टिप्पणियों के रूप में कॉलम दो कॉलम बड़े मजे में पसीट सकते हो। बड़े अफ़सोस की बात है कि इतना सब दिमाग रखकर भी हम एक साप्ताहिक को कामयाबी के साथ नहीं चला सकते ! तुम मिस्टर विरला से मिलो और उनको हम लोगों के काम का महत्त्व समझाओ और बतलाओ कि हम कैसी-कैसी परेशानियां उठाते हैं । यह एक बड़े विज्ञापनदाता है। वह अपनी कपड़े की मिलों, जूट केट-उद्योग और वीमे के व्यवसाय का विज्ञापन करते हैं । हमको भी अपना संरक्षण वह क्यों नहीं दे सकते ? अगर तुम सोचते हो कि सुख-सुविधा और धन-सम्पत्ति अपने आप प्रा जायगी और लक्ष्मी तुम्हारो प्रतिभा के कारण तुम पर इतनी रीझ जायेंगी कि माकर तुम्हारे पैरों पर गिर पड़ेंगी तो तुम धोखे में हो । या तो संन्यासी हो जाओ और सांसारिक अभिलाषाएँ त्याग दो। गृहस्थ होकर जवकि एक परिवार का बोझ हमारे कंधों पर है, हमें कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा 1 जय मेरे-जैसा एक टूटा-फूटा बुड्ढा श्रादमी, जिसके सर पर घर की तुमसे ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियाँ है, अकेले-दम इतना सब कर सकता है, तो फिर तुम्हारे-जैसा प्रतिभाशाली व्यक्ति तो चमत्कार कर सकता है। शुभकामनाएँ लो! हम सब कुशलपूर्वक है। सस्नेह- तुम्हारा घनपतराय प्रेमचन्द का गोदान : यदि मैं लिखता [तीन] अगर मैं गोदान लिखता? लेकिन निश्चय है मैं नहीं लिखसकता था, लिखने की सोच नहीं सकता था । पहला कारण कि मैं प्रेम- चन्द नहीं हूँ, और अन्तिम कारण भी यही कि प्रेमचन्द मैं नहीं हूँ। वह साहस नहीं, वह विस्तार नहीं। गोदान आस-पास पॉच-सौ पृष्ठों का उपन्यास है। उसके लिए धारणा में ज्यादा क्षमता चाहिए, और कल्पना में प्यादा सूझ-बूझ । वह न होने से मेरा कोई उपन्यास ढाई सो पन्नों से ज्यादा नहीं गया। मैं लिखताही तोगोदान करीब दो सौ पन्नों का हो जाता । गोदान का एक संक्षिप्त संस्करण भी निकला है और मानने की इच्छा होती है कि उसमें मूल का सार सुरक्षित रह गया है । यानी दो सौ-ढाई सौ में भी गोदान पा सकता था । और क्या विस्मय, मोटापा कम होने से उसका प्रभाव कम के बजाय और बढ़ जाता, अव यदि फैला है तो तब तीखा हो जाता। पुस्तक जब शुरू में निकली थी तभी मैंने पढ़ी थी। याद पड़ता है, प्रेमचन्द ने एक अगाऊ प्रति भेज दी थी। यह कोई अठारह वर्ष पहले की बात है । तब से पुस्तक की कथा मन पर कुछ धुंधली हो आई थी। उस समय मैंने लिखा था कि गाँव की कथा पर उसमें शहर कुछ थोपा हुआ-सा है, वह अनिवार्य नहीं है, पुस्तक की कथा के साथ एक नही है । हो सकता था कि होरी को कथा के केन्द्र में रहने के लिए, और ऐसे कि सब प्रकाश उसी पर पड़े, दूसरे व्यौरे ध्यान को खींचकर अपनी ओर न ले जायँ, शहर को पुस्तक से मैं अनुपस्थित हो जाने देता। ऐसे सम्भव था कि शहरी जीवन के प्रति विरोध और अनास्था प्रकट करने का सुभीता न रहता, महर की प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व ग्रामीण जीवन के प्रति रुचि और सहानुभूति को उबारने का उस प्रकार सुगम अवसर । लेकिन में उसका लोभ न करता । कैसे कहूँ कि प्रेमचन्दजी को लोभ का संवरण पारना चाहिए था ? क्योंकि यह प्रतिपादन तो कदाचित् प्रेमचन्द की प्रेरणा में मुख्य तत्व बन- कर रहा है । लेकिन मेरी फिर भी मेरी धारणा है कि गाँव और तुलना और जय-पराजय से अलग करको होरी का चित्रण उतना विविधतापूर्ण और रंग-विरंग चाहे न वनता, फिर भी उसमें अधिक व्यक्तित्व और एकत्व हो सकता था। अठारह वर्षों के बाद वह पुस्तक अब फिर जहां-तहाँ से देख गया । तब की धारणा नष्ट नहीं हुई, बल्कि पुष्ट ही हुई। हठात् शहर ने पाकर पुस्तक के गाँव को चमकाया नहीं है, बल्कि कहीं कुछ बखेरने और ढकने का प्रयास किया है, ऐसा प्रतीत हुआ। किताव में एक-पर-एक पात्र आते गये है। उनकी संख्या पर विस्मय होता है । होरी, धनिया, झुनिया, गोवर, होरा, सोमा, सोना और रूपा तो एक परिवार के ही हैं । भोला, दुलारी, झिगुरी साहू, दातादीन, मंगरू साह, पटेश्वरी, मातादीन वगैरह भी पास- पास के लोग हैं । शहर के राय साहब, मेहता, खन्ना, तनखा, मिर्जा, मालती मादि आज की नई सभ्यता के लोग हैं। मानना होगा कि खासा मेला है, अगर्चे सवका उसमें अपना-अपना रंग और अपनी व्यक्तिमत्ता है, उनका चित्र सामने आ जाता है। लेकिन शायद मैं होता तो सबको न छूता, दो-चार को लेकर ही काम चला लेता। कुछ तो इसलिए कि मेरा वस उतना नहीं है; कुछ इसलिए भी कि संख्या को अधिकता अवगाहन में सहायक नहीं भी होती, गहनता विस्तार में छिप जाती है, और दृश्य रूप अदृश्य गुण से प्रधान हो जाता है। उससे समाज का और समय का चित्र तो मिलता है, पर प्रात्म को उतनी गहरी अनुभूति कदाचित् प्राप्त नहीं होती । मुझे टोक मालूम नहीं कि साहित्य का क्या लक्ष्य है, वह हमें वस्तु-बोच देने के लिए है कि प्रात्म-प्रकाश देने के लिए? साहित्य - प्रेमचन्द का गोदान : यदि मैं लिखता का जो भी इष्ट और उद्दिष्ट हो, स्वीकार करना चाहिए कि मेरी अपनी रुचि विविध जानकारियों के प्रति उतनी नहीं है, न परिचय के विस्तार के प्रति । परिचय अधिक से न हो किन्तु अभिन्नता कुछ से भी हो, तो मुझे यह बड़ा लाभ जान पड़ता है । गहरा मित्र एक हो तो उसकी कीमत सौ जान-पहचान वालों से मेरे लिए ज्यादा हो जाती है। निश्चय प्रेमचन्द हमें बहुत देते हैं, इतनी तरह-तरह की जानकारियाँ देते है कि हम समा नहीं सकते । लेकिन एक दूसरे तरह की उपलब्धि भी है । वौद्धिक से उसे यात्मिक कहा जा सकता है । वह व्यथा की सघनता के रूप में मिलती है। मैं लिखता तो मेरी इच्छा रहती कि मैं उसका ध्यान विशेष रखू । प्रेमचन्द भापा के जादूगर हैं, मुहाविरे उन्हें सिद्ध है । भापा का यह खेल और यह प्रभाव जैसे उन्हें याद से नहीं उतरता है। इससे जगह-जगह प्रयोग ऐसे आ जाते हैं जो अपने खातिर और सिर्फ़ चमक के लिए आये लगते है । जैसे एक जगह है-- "पुन्नी हाय-हाय करती जाती और कोसती जाती थी, तेरी मिट्टी उठे तुझे हैजा हो जाय, तुझे मरीआ जाय, देवी मैया तुझे लील जाय, तुझे इनफलुन्जा हो जाय, तू कोढ़ी हो जाय, हाथ-पाव कट-कट गिरें..." दूसरी जगह : "होरी मिनका तक नहीं, झुंझलाहट हुई, क्रोध आया, खून खौला, अाँख जली, दाँत पिसे" इत्यादि । ऐसे प्रयोग बहुत है। यह उनके वर्णन की ही शैली है । जैसे शब्द अपनी खूवी के जोर से बाहर आते और बैठते जाते हैं। मैं होता तो संकेत से काम लेता । 'पुन्नी हाय-हाय करती जाती और कोसती जाती थी', इसके बाद बिना कुछ कहे रह जाता । इसमें निश्चय ही हानि हो जाती, चित्र को यथार्थता उतनी न खिलती, लेकिन वह मुझे स्वीकार होता । 'पुन्नी ने हाय-हाय की और कोसा', यह कहने के बाद उस विलाप को फिर और नाना दुर्वचनों से सचित्र और सांगोपांग प्रेमचन्द : एक कृती व्यक्तित्व करने से मैं किनारा ले जाता । मनोदर्शन और विश्लेषण में मैं कुछ निश्चित कहने और प्रतिपादन करने से बचता । ज्ञान अाखिर हमारा अनुमान है । क्या उसके आगे प्रश्न-चिह्न नहीं है ? इससे कैफियत- भर देता, निदान नहीं। रायसाहब के पीछे होरी चलता है और रायसाहब वैठकर अपनी गाथा शुरू करते हैं । कहते-कहते वह अपनी स्थिति की बखिया खोलते चले जाते हैं, "हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है । हमारे लोग मिलेंगे तो इतने प्रेम से जैसे हमारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार हों। अरे और तो और, हमारे चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई तो इसी रियासत के बल पर मौज उड़ा रहे हैं, कविता कर रहे हैं, और जुए खेल रहे हैं, शरावें पी रहे हैं, और ऐयाशी कर रहे हैं। ""आज मर जाऊँतो घी के चिराग जलायें। मेरे दुःख को दुःख समझनेवाला कोई नहीं है। उनकी नजरों में मुझे दुःखी होने के कोई अधिकार ही नहीं हैं। मैं अगर रोता हूँ तो दुःख की हँसी उड़ाता हूँ। अगर मैं बीमार होता हूँ तो मुझे सुख होता है। अगर अपना व्याह करके घर में कलह नहीं बढ़ाता तो यह मेरी नीच स्वार्थपरता है । व्याह कर लूं तो विलासान्धता होगी। अगर शराव नहीं पीता तो यह मेरी कमजोरी है, शराब पीने लगू तो वह प्रजा का रक्त होगी। अगर ऐयाशी नहीं करता तो अरसिक हूँ। ऐयाशी करने लगे तो फिर कहना ही क्या है ! इन लोगों ने मुझे भोग-विलास में फंसाने के लिए कम चालें नहीं चली और अब तक चलते जाते हैं। उनकी यही इच्छा है कि मैं अन्धा हो जाऊँ, और ये मुझे लूट लें। और मेरा धर्म यह है कि सब-कुछ देखकर भी कुछ न देखू, सव-कुछ जानकर भी अन्धा बना रहूँ।" इस तरह रायसाहब कहते ही जाते हैं। रायसाहब कौंसिल के मेम्बर हैं, बड़े आदमी हैं । होरी रैयत नाचीज है, लेकिन दो पनों तक वह नहीं रुकते, और मुंह पान से भरकर फिर आगे कहते हैं, "हमारे नाम बड़े हैं पर दर्शन थोड़े हैं। और इस तरह काफ़ी प्रेमचन्द का गोदान : यदि मैं लिखता समाज-शास्त्र और तत्त्व-शास्त्र की सी चर्चा करते चले जाते हैं। कहते हैं, "दुनिया समझती है, हम बड़े सुखी हैं, हमारे पास इलाक़, महल, सवारियां, नौकर-चाकर, कर्ज, वेश्याएं, क्या नहीं है? लेकिन जिसकी आत्मा में बल नहीं और चाहे कुछ हो, आदमी नहीं है। जिसे दुश्मन के भय के मारे रात को नींद भी न आती हो, जिसके दुःख पर सब हँसे और रोनेवाला कोई न हो, जिसकी चोटी दूसरों के पैर के नीचे दबी हो, जो भोग-विलास के नशे में अपने को भूल गया हो, जो हुक्काम के तलवे चाटता हो और अपने अधीनों का खून चूसता हो, उसे मैं सुखी नहीं कह सकता।"."रायसाहब कहते ही जाते हैं कि दो पन्ने और भर जाते हैं ! इस लम्बे उद्गार का प्रयोजन यह है कि आगे उन्हीं को गुस्सा होते और उससे बिल्कुल उल्टा प्राचरण करते दिसाया जाय । मुझे लगता है कि शब्दों को उतना सोच न पाता, उनके प्रयोगों से. मैं जल्दी हार जाता । मैं मानता भी हूँ कि शब्दों को कहीं चुक जाना चाहिए । बुद्धि की भाषा ही शाब्दिक है, व्यया मौन द्वारा बोलती है। प्रेमचन्द में वहां भी शब्द मुखर हैं, जहां मैं उनसे हार मान बैठता और शब्दहीनता में सहारा ले रहता । प्रेमचन्द में प्रेम फा व्यापार भी शब्दों से उतना मुक्त नहीं है। गोवर किशोर है और सामने झुनियाको पाता है । झुनिया छोटी सी थी तभी गाहकों के घर दूध ले जाया करती थी। सुस- राल में भी उसे गाहकों के घर दूध पहुंचाना पड़ता था।माजकल भी दही बेचने का भार उसी पर था । उसे तरह-तरह के मनुष्यों से सारिका पड़ चुका पा। दो-चार रुपये हाय लग जाते थे, घड़ी- भर के लिए मनोरंजन भी हो जाता था। मगर यह मानन्द जैसे मंगनी को पीज हो; इसमें टिकाव न पा, समपंग न पा, अधिकार नपा । पह ऐसा प्रेम पाहती थी जिसके लिए यह जिये पौर मरे, जिस पर यह अपने पो समर्पित कर दें। यह केवल जूगनू की धमरा नहीं, दीपक का स्पामो प्रकाग पाहती है। यह मुनिया सूब बात १७० प्रेमचन्द : एक कृत्ती व्यक्तित्व करती है । कहती हैं, 'तुम मेरे हो चुके, कैसे जानूं ? गोवर ने कहा 'तुम जान भी चाहो तो दे दूं।' 'जान देने का अर्थ भी समझते हो?' 'तुम समझा भी दो ना', 'जान देने का अर्थ है साथ रहकर निवाह करना । एक बार हाथ पकड़कर उमर-भर निवाह करके रहना। चाहे दुनिया कुछ कहे, चाहे मां-बाप, भाई-बन्द, घर-द्वार सब कुछ छोड़ना पड़े। मुंह से जान देनेवाले बहुतों को देख चुकी, भौरों की भाँति फूल का रस लेकर उड़ जाते है । तुम भी वैसे ही न उड़ जायोगे' आगे भी वह कहती जाती है, 'एक-से-एक ठाकुर, महाराज, वावा, वकील, अमले, अफसर अपना रसियापन दिखाकर मुझे फंसा लेना चाहते हैं। कोई छाती पर हाथ रखकर कहता है, 'झुनिया, तरसा मत ।' कोई मुझे रसीली-नसोली चितवन से पूरता है, मानो मारे प्रेम, के बेहोश हो गया है। कोई रुपये दिखाता है, कोई गहने । सब मेरी गुलामी करने को तैयार रहते हैं, उमर-भर, बल्कि उस जन्म भी । लेकिन मैं उन सबों की नस पहचानती हूँ, सव-के-सव भौरे हैं, रस लेकर उड़ जानेवाले । मैं भी उन्हें ललचाती हूँ, तिरछी नजरों से देखती हूँ, मुस्कराती हूँ। वे मुझे गधी बनाते है, मैं उन्हें उल्लू बनाती.हूँ।' - नहीं, निश्चय ही कैशोर प्रेम को मैं किसी भी प्रकार इतना प्रगल्भ, इतना हिसावी, इतना मुखर न बना सकता। प्रेम की विवशता और स्वच्छन्दता में और कितना ही आगे में बढ़ता, लेकिन किसी भी प्रकार इतना सशब्द न हो सकता । जीवन के पहले प्रेम में ये शब्द यदि किसी और से सुन मिलले कि 'वह गधी बनाते हैं उल्लू बनाती हूँ, तो मेरी कलम फिर किसी तरह वहां प्रेम को टिका न पाती। मत-मान्यताओं से भी लिसने का सम्बन्ध रहता है। शायद वह सम्बन्ध सोपा तो नहीं होतापर चरित्र-चित्रण में भा ही जाता है। होरी के गांव के जितने नेता हैं, सब धूतं हैं और सब पार्मिक प्रेमचन्द का गोदान : यदि मैं लिखता - है । धर्म का और धूर्तता का वैसा गठजोड़मेरे मन में उतना निश्चित नहीं है । धूर्तता सव में है और धर्म की आवश्यकता भी सब में है। इसलिए एक में दोनों चीजें मिलें, इसमें कुछ भी अनहोनी बात नहीं है। लेकिन उसमें कार्य-कारण का सम्बन्ध देख लेना मेरे बस का न हो पाता । प्रेमचन्दजी जैसे इसी आविष्कार तक जा पहुंचे हैं। पंडित दातादीन, लाला पटेश्वरी, ठाकुर झिंगुरीसिंह, पं० नोखेराम सब ही एक-न-एक रूप में भक्ति-उपासना में समय देते है। लेकिन उसी कारण जैसे दुखिया के दुख के प्रति वे और भी हृदयहीन हो जाते है। मैं उनके स्वभाव को ज्यों-का-त्यों रखकर भी शायद प्रेमचन्द के निदान से सहमत न होता । धर्म सोधा धूर्तता उपजाता हो तो जैसे समस्या बहुत सीधी हो जाती है और उतने सीधे चलकर मुझे नहीं मालूम होता कि मुझे संतोष हो सकता है। संक्षेप में गोदान में जो होरी निपट भाग्य के सामने अकेला जूझता हुआ फिर भी निरुपाय-सा दिखाया गया है, मैं उसको तो न छूता और ज्यों-का-त्यों सुरक्षित रखता । फिर भी भाग्य को किन्हीं तात्कालिक परिस्थितियों अथवा व्यक्तियों से परिभाषा देने का प्रयत्न न करता कि जैसे होरी शिकार हो, शिकारी दूसरे हों। मेरी कोशिश होती कि दिखाता कि सव जैसे शिकार ही हैं और वृथा ही एक-दूसरे को शिकार बनाने का प्रयल करते हैं । असल में शक्तियां निर्वैयक्तिक हैं और उनमें सत् के साथ रहने और असत् के साथ लड़ने के लिए सहानुभूतियों का बँटवारा करने की जरूरत नहीं है। वैसा में कर सकता तो मानता कि मेरा 'गोदान' सफल है।
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