Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Sulee Aur Singhasan
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सूली और सिंहासन
[गतिक आस्था की जीवन्तगाथा]..
निग्नक
श्री देवेन्द्रमुनि शास्त्री
गम्पादक
श्री ज्ञानचन्द्र भारिल्ल
तारक गुरु जैन ग्रन्थालय
उदयपुर
उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी स्वर्ण जयन्ती समारोह
के उपलक्ष्य में प्रकाशित
"] प्रकाशक एवं प्राप्ति केन्द्र
तारक गुरु जैन ग्रन्थालय
शास्त्री सर्कल, उदयपुर (राजस्थान)
7 प्रथम बार
वि० सं० २०३४ चैत्र सुदी १३
महावीर जयन्ती
अप्रैल, १३७७
U मुद्रक
श्रीचन्द
सुराना
के लिए
शैल प्रिन्टर्स
१८१२०३ एमाईथान, आगरा-३
7 मृल्य
दो गपये पचास पस
प्रकाशकीय श्री नाग्या गुग जन ग्रन्थालय का महान सद्भाग्य है कि उपाध्याय अध्यात्मयोगी राजस्थान केसरी प्रसिद्ध वका सद्गुम्वर्य वी पुष्कर मुनिजी महाराज की असीम कृपा से उसने अपने स्वल्प जीवन काल में माहित्य की प्रत्येक विधा में महनीय ग्रन्थ रत्न माणित कर जन-जन के अन्लमांना में अपना गौरवपूर्ण स्थान बनाया है । उसी लड़ी की कड़ी में प्रस्तुत पुस्तक भी है। प्रस्तुत पुस्तक भी अन्य पुस्तकों की तरह अत्यधिक लोकप्रिय पनेगी, गोंकि यह उपन्यास की गोली में लिखी गयी है । पुस्तक की प्रत्येक पंत्ति में देवेन्द्र मुनि जी की प्रतिभा को सहज दर्शन होते है। नवाचार की प्रेरणा के मंगुलन्दर मुगर हो रहे हैं । आज मे युग में जहां नैतिक निष्ठा और गदाचार की भक्ति क्षीण होती जा रही है. वन उपचार की कथावस्तु हमें ननिकता की, गदागार की और अधिक बात्मवल को प्रेरणा दे की है। हमें विश्वास है कि यह रोचक उपन्यान आज के युवक- गुवतियों का मार्ग दर्शन पर उनके गिरते हुए मनोबल को सहारा नेने में एक माह स्तम्भ गा गाम करेगा। - - तारक गुर जैन ग्रन्यालय लेखक की कलम से NAL जैन साहित्य के इतिहास में श्रेष्ठी सुदर्शन का पविन न अन्यन्त दिलचस्प रहा है । प्राचीन युग से ही मनीपी लेया महनीर जीवन पर लिखते रहे है । आज तक अनेक ने उसके को चित्रित किया है । बड़ा अद्भुत है उसका जीवन । जो एक नहीं अपितु अनेक बार परीक्षण प्रस्तर पर कसा गया है, ज्यों उन कसा जाता है, त्यों-त्यों उसमें अधिक निखार आता गुदर्शन सेठ का चरित्र जैन काथा साहित्य में एक जगमग पृष्ठ का है। इस पर लोकभापा-गुजराती एवं राजस्थानी अनेक राग तथा चौपाई मिलती है। प्राचीन संस्कृत-प्रा माहिल में दम कथा का मूल स्रोत कहाँ है ? यह अभी अनुगः का विषय है। पिछले दिनों गुरुदेव श्री द्वारा लिखित 'जैन काय का गम्भावन करते समय मुदर्शन चरिम के विषय में भी अनुसन्धान चला था, अनेक ग्रन्थों को टटोलने पर भी जुननीय पुष्ट योत तो नहीं मिला, पर यह पता चला पूणिमागच्न के मानतुंगगरि गल 'जयन्ती चरित' की वृत्ति जो कि उन्हीं में गिप्य श्री मनवप्रम ने (वि० सं० १२६० निगी है, उसमें शील पालन पर मुदर्शन मेट-मनारगा का कया दिया है । गम्भवतः यह कया-गय भी प्राचीन ग्रन्थों में ही दो अनुभूति में गुदर्शन गेट नी कथा काफी प्रसिद्ध है।
एक और सच्चरित्र की जीति-जागती प्रतिमा है तो दूसरी
र वामना के दल-दल में फंसी हुई आत्माएँ हैं जो हाव-भाव
र कटाक्ष में उसे फंगाने का प्रयास करती हैं किन्तु उनके
सि विफल हो जाते है । मकड़ी की तरह वे स्वयं ही जाल में
[ जाती हैं । वामना पर सदाचार की अपूर्व विजय की रोचक
है यह । सच्चरित्र की अद्भुत गति में तीक्ष्ण मूली भी
गों को गुकुमार सिंहामन के प में परिवर्तित हो जाती है ।
मुदगन का अद्भुत मनोबल, चरित्रवल एक और आकाश
ऊँचाल्यों को छूता है तो दूसरी ओर कपिला और अभया की
चता और वासना की निकृष्टतम भूमिका पाताल नी नीची
से भी नीची चली गयी है । उच्चता और नीचता, सदाचार
र चामना के एम इन्द्र में सदाचार की चमत्कार पूर्ण विजय की
नक गाधा छिपी है।
आधुनिक युग
में उपन्यास, साहित्य वी एक अत्यन्त लोकप्रिय
शा रही है।ग विधा में लिगने का मेरा यह प्रथम प्रयाम
मैं इस विधा में यहाँ तक मफल हो सका है उसका निर्णय
पाठयों पर छोड़ता है।
प्रस्तुत उपन्यास यो उपन्यासकाला की दृष्टि मे स्नेहमति
जी भारिल्ल ने देखकर आवयमः परिकार किया तदर्थ
इन मावाद प्रदान करना।
परम प्रवेष सद्गुग्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी
पान गरी पुष्पर मुनिजी महाराज नी अगीम गापा ने दी
।
( ६ )
मैं साहित्य के क्षेत्र में प्रगति कर रहा हूँ अतः उनके म
उपकार को मैं कैसे विस्मृत हो सकता हूँ।
साथ ही पुस्तक को मुद्रणकला की दृष्टि से स्नेह
श्रीचन्द जी सुराना ने निखारने का प्रयास किया है। अतः :
स्नेहपूर्ण व्यवहार
को भी
भुला नहीं सकता।
आशा करता हूँ, पाठक इस पुस्तक से सदाचार की
प्रेरणा लेंगे।
-देवेन्द्र
म
मैसूर (कर्नाटक)
सन् १९७७
अनुक्रम
:
१
६
१४
१६
३१
४३
१. वह मंत्र क्या था
२. रहस्यलोक
३. परिवर्तन
४. विकास
५. नागिन ने फन उठाया
६. दो सहेलियाँ
७. पड्यन्त्र
८. रानी या राक्षसी
१. अभियोग और दण्ड
१०. सूली से सिंहासन
११. मुक्ति की राह पर
१२. अन्तिम चरण--मुक्ति
५३
१
१०१
१२२
* नया प्रकाशन : पढ़िये *
जैन आगम साहित्य : मनन और मीमांसा
समस्त जैन साहित्य का तुलनात्मक परिचय । एक ही ग्रन्य पः
से समूचे जैन वाङ्मय का रहस्य, विवरण और
सैद्धान्तिक-स्वरूप का परिचय प्राप्त
किया जा सकता है।
लेखक
श्री देवेन्द्रमुनि शास्त्री
पृष्ठ : लगभग ८००
मूल्य : चालीस रुपये
जैन कथाएँ
(भाग १ से २५ तक)
जैन इतिहास, साहित्य, काव्य और पुराण ग्रन्थों को
सैकड़ों रोचक कथाएँ।
प्रत्येक भाग का मूल्य-तीन रुपया
वह मन्त्र क्या था? सुवह का सुहावना समय है। आकाश नीला और च्छ है । सूर्य की चमचमाती किरणे पर्वतों के शिखरों पर ना विखेर कर अव वन के सघन वृक्षों से आँखमिचौनी ल रही थीं। उस समय एक तेजस्वी वालक वहुत-सी यों को लिए धीरे-धीरे जंगल की ओर चला जा रहा था। इ उसका प्रतिदिन का कार्यक्रम था। सुबह वह उन गायों । चराने के लिए इस जंगल में आता था और शाम तक, ब गायें भरपेट घास चर चुकती थीं, तब वह घर की ओर रेट आता था। वह बालक वैमे तो अपढ़ था, किन्तु उसके हरे से एक सौम्य प्रभाव अभिव्यक्त होता था, जो उसके लोकित भविष्य की सूचना देता था। हरे-हरे और मखमल से मुलायम घास में इधर-उधर हि मारती हुई वे स्वस्थ व मस्त गायें धीरे-धीरे जंगल की और बढ़ रही थीं। उनके गले में बंधी हुई मधुर मधुर सावाज करती हुई घंटियाँ मानों उनको आन्तरिक निश्चि- तता और आनन्द को ही प्रकट कर रही थीं। वे इसलिए नश्चिन्त थी कि उनका सजग रखवाला-वह वालक उनके साथ है, और आज के लिए पेट भर घास उस वन- नों .
२ सूली और सिंहासन
--
प्रांतर में खूब लहलहा रहा है। कल की चिन्ता उन्हें नहीं
है। और निश्चिन्तता का यदि कोई रहस्य है तो यही है ।
जिस युग की यह कथा है, वह युग भारत के इतिहास
में स्वर्णयुग के नाम से उदृङ्कित है। क्योंकि उस युग में-
लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व-भारत अपनी समृद्धि के
शिखर पर था। समृद्धि केवल धन-धान्य और सांसारिक
सुख-वैभव की ही नहीं, उस समय भारत के निवासी अपने
पवित्र चरित्र की दृष्टि से भी उच्च तथा समृद्ध थे। इस
कारण वे सुखी भी थे।
हमारी कथा का नायक-वह सुखी और निश्चिन्त
-चम्पानगरी का निवासी था। भारतवर्ष के अंगदेश
। वह राजनगरी अपने वैभव तथा शोभा से इन्द्र के लिए
। यदि ईर्ष्या का नहीं तो कम से कम स्पर्धा का कारण
तो बनी हुई थी। उस नगरी में क्या नहीं था ? ऋद्धि और
समृद्धि से चम्पानगरी भरी हुई थी। स्वस्थ, सुखो और
चरित्रवान नागरिकों के अनन्त आकाश को छूते हुए भवन
और उच्च अट्टालिकाएं तया उन पर फहराती ध्वजाएं इस
गर के आनन्दमय पवित्र जीवन का यशोगान करती थीं।
हाट बाजारों में हीरे-पन्ने, माणक और मोतियों के विखरे
हुए ढर रात को भी दिन का प्रकाश दिया करते थे । अभाव
नाम की कोई वस्तु उस नगरी में थी ही नहीं। उस नगर
के पुरुष और स्त्रियाँ देवों और देवियों के समान सुरु
से विहार करते थे और राजा दधिवाहन इन्द्र के समान
वह मन्त्र क्या था? उनकी रक्षा किया करता था। सच है, पराक्रमी और प्रजावत्सल राजा की शीतल व सुखद छाया में प्रजा सुख की सांस लेती है, आनन्द का अमृत पिया करती है। ऐसे युग में, ऐसी नगरी का निवासी, हमारा चरित्र- नायक वह बालक, जिसका नाम सुभग था, अपनी गायों को लिए वन में आ पहुँचा । गायें इधर-उधर बिखर कर चरने लगीं और सुभग उनका ध्यान रखता हुआ कभी मिट्टी के घरोंदे से, कभी किसी वृक्ष की शाखाओं से और कभी कंकड़-पत्थरों से खेलता रहा । कभी प्रकृति-नटी की सौन्दर्य सुषमा को निहार कर आनन्द से झूम उठता था। दोपहर होने पर बालक ने कुछ देर स्वयं विश्राम करने तथा बहुत देर से चिलचिलाती धूप में चरती हुई गायों को विश्राम देने का विचार किया। वह उन्हें एकत्र करके कुछ अधिक छायादार और सघन स्थल की ओर वढ़ा। समीप ही शीतल और स्वच्छ जल से प्रवाहित झरना था। उसके किनारे बड़े-बड़े छायादार वृक्ष थे । वहाँ पहुँच फिर गायों ने पानी पिया और तृप्त हो कर इधर-उधर बैठ- कर वे अधमुदी आँखों को वन की शोभा से देखती हुई भी और न देखती हुई भी जुगाली में रत हो गई। वालक ने सी हाथों को अंजलि बना कर पानी पिया और फिर विश्राम हारने के लिए वह एक बड़े-से वृक्ष की ओर गया। वह ४ सूली और सिंहासन वृक्ष के समीप पहुँचा ही था कि उसने देखा--एक तरुण- तपस्वी महात्मा उस वृक्ष के नीचे शान्त मुद्रा में ध्यानस्य बैठे हैं । महात्मा के चेहरे से एक अलौकिक तेज फूट रहा है, जिसे देख कर वह वालक मुग्ध हो गया और टकटकी लगा कर देखता ही रह गया" कुछ क्षण वाद बालक ने दोनों हाथ नम्रता से जोड़ कर उन महात्मा को प्रणाम किया। किन्तु महात्मा ध्यान लीन थे । उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। बालक विस्मय और श्रद्धा में डूबा हुआ चुपचाप समीप ही बैठ गया और मुनिराज के ध्यान पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा। मुनिराज के चेहरे की कान्ति इतनी प्रभावोत्पादक थी कि गलक देखता ही रहा....."वालक देखता हो रहा और यह भी भूल गया कि समय कितना व्यतीत हो गया है। अन्त में मुनिराज ने अपना ध्यान पूर्ण किया । एक नेह और करुणा से आप्लावित दृष्टि उस बालक की ओर उन्होंने फेंकी। उस करुणामयी दृष्टि ने उस भोले और होनहार बालक के मन में एक विचित्र और अजानी भावना को जन्म दिया। वालक भोला था, वालक ही तो या । अतः वह उस दृष्टि के मर्म को पूरा जान नहीं पाया, केन्तु आकाश और पृथ्वी ने उस दृष्टि में छिपी हुई उस वालक की महान् भविष्य-कथा को पढ़ लिया। हम उसी कथा की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।
वह मन्त्र क्या था? ५
वालक
ने
महात्मा को ध्यान से निवृत्त हुआ देख कर
फिर से हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया ही था कि दे
महात्मा एक मन्त्र का जाप करते हुए पक्षी की भांति
अनन्त आकाश में उड़ गये"
.
यह देखकर उस बालक के विस्मय का कोई पार ही
नहीं रहा। वह आश्चर्यचकित होकर उन महात्मा को
आकाशमार्ग से उड़कर जाते हुए देखता रह गया.......
कुछ देर बाद जब बालक को संज्ञा लीटी, तव उसने
देखा कि अन्धकार घिर चला है। उसकी गायें आसपास
कहीं नहीं हैं। वे सन्ध्या को घर लौटने का समय हुआ
जानकर स्वयं ही लौट गई थीं। बालक की दृष्टि अव भी
शून्य आकाश में उस दिशा में बार-बार उड़ जाती थीं,
जिधर वे आकाशगामी महात्मा अपने मन्त्र की शक्ति से
उड़कर चले गये थे।
-और वालक निरन्तर विचार कर रहा था-वे
महात्मा कौन थे? वह मन्त्र क्या था ?
रहस्यलोक
साँझ को लाली धीरे-धीरे सुरमई होकर अन्धकार की
कालिमा में परिवर्तित हो गई थी। गायें तो घर लौट
आई थीं, लेकिन उनके साथ सुभग नहीं था । यह देखकर
सेठ जिनदास को आश्चर्य और चिन्ता हुई । कुछ देर
उन्होंने सुभग की प्रतीक्षा की, किन्तु जब बहुत देर हो चली
और सुभग का कहीं पता न चला तो उनको चिन्ता सीमा
को पार कर गई।
सेठ जिनदास चम्पापुरी का 'नगरसेठ' था। उसकी
समृद्धि और ऐश्वर्य का कोई पार नहीं था। जिस प्रकार
वह अपार धन-सम्पत्ति का स्वामी था, उसी प्रकार वह
धामिकता और नैतिकता में भी किसी व्यक्ति से कम नहीं
था। उसके इन्हीं गुणों के कारण राज्य में उसका बड़ा
सम्मान और प्रतिष्ठा थी।
यह सब होते हुए भी सेठ जिनदास के जीवन में एक
अभाव था। अभाव यह था कि उसके कोई सन्तान नहीं
थी । अहंदासी नामकी उसकी अत्यन्त सुन्दर, गुणवती और
पतिपरायणा पत्नी थी। उनका दाम्पत्य जीवन सुखी बोर
६
रहस्यलोक ७
मादर्श था, किन्तु पुत्र का अभाव एक अभिशाप के रूप में
उन पर छाया हुआ था। यही कारण था कि उन्होंने
उस ग्वाल-पुत्र सुभग पर, जो कि उनकी गायों की देखभाल
किया करता था, अपना सारा सन्तान-प्रेम उड़ेल रखा था।
वे उसी होनहार और गुणवान वालक को अपना पुत्र
मानने लगे थे।
और यही कारण था कि जब उस सन्ध्या को गायें
अकेली लौटीं और सुभग नहीं आया तो सेठ जिनदास के
प्राण चिन्ता के कारण उसके कंठ तक आ गए। उसके मन
में अनेक विचार उठने लगे-कहीं जंगल में वह बालक
भटक तो नहीं गया ? कहीं किसी वन्य पशु ने सुभग को
अपना शिकार तो नहीं बना लिया? आखिर बालक अव
तक लोटा क्यों नहीं ?
इन्हीं चिन्ताओं में पड़े हुए जिनदास ने अपने अनेकों
सेवकों को सुभग को खोज करके लाने का आदेश दिया।
सेवक चिन्तित होकर जिनदास के प्रासाद से बालक की
खोज के लिए निकल ही रहे थे कि सुभग वालक आ पहुँचा ।
उसे सुरक्षित लौट आया देखकर जिनदास और अहंदासी
की चिन्ता दूर हुई । शीघ्र उसे अपने पास बुलाकर जिनदास
ने
पूछा-
"अरे तू कहाँ रह गया था सुभग ? इतनी देर कर दी
आज तूने ! गायें अकेली लौटी और तू अव तक नहीं आया
८ सूली और सिंहासन
?
था तो हम तो चिन्ता के मारे मरे ही जा रहे थे। क्या
हुआ था ? कैसे हुई इतनी देर ?"
इतने सारे प्रश्न एक साथ करते हुए सेठ जिनदास ने
सुभग को अपनी छाती से लगा लिया था। धीरे-से उनके
आलिंगन से अलग हाकर सेठ के चरण छूते हुए सुभगने
उत्तर दिया-
-
"पिताजी ! आज मेरे आश्चर्य और आनन्द की सीमा
नहीं है । मैं उस आनन्द में इतना विभोर हो गया था कि
मुझ समय और स्थिति का कोई ज्ञान ही नहीं रहा...."।"
जिनदास भी विस्मित और प्रसन्न होते हुए बोले-
"ओहो ! आज हमारे वेटे को ऐसी कौन-सी आनन्द की
वात देखने को मिली? जरा हम भी तो सुन ।"
तव सुभग ने बताया-
"पिताजी ! मैं उस आनन्द का वर्णन कर ही नहीं
सकता । आज दोपहर को जब मैं विश्राम के लिए एक बड़े.
से
वृक्ष के नीचे गया तो मैंने वहाँ एक महात्मा को बैठे हुए
देखा । वे महात्मा ध्यान में मग्न थे और उनके चेहरे से
एक अलौकिक तेज प्रकट हो रहा था। मैं तो उन्हें देखकर
विस्मय में डूब गया। थोड़ी देर बाद मैंने क्या देखा कि उन
महात्मा ने अपनी आँखें खोली और एक मन्त्र पढ़ते हुए वे
आकाश में उड़ गये। पिताजी ! यह कितने आश्चर्य की
!
रहस्यलोक ६. बात है ? वे महात्मा कौन थे ? वे आकाश में कैसे उड़ गए".....?" भोलाभाला बालक अपने आनन्द और विस्मय को इस प्रकार व्यक्त कर रहा था और प्रश्न कर रहा था, किन्तु. इतना सुनकर जैसे जिनदास किसी और लोक में पहुँच गए थे। वस्तुतः वे बालक के सौभाग्य पर विचार कर रहे थे और उस विचार में डूब गए थे। कुछ देर में उन्होंने कहा- "वेटा सुभग ! तू बड़ा भाग्यशाली है। तुझे आज एक ऐसे महात्मा के दर्शन करने का अवसर मिला है, जिनके दर्शन से जन्म-जन्म के पाप धुल जाते हैं । बड़ी तपस्या और पुण्य के बाद ही ऐसे महात्माओं के दर्शन होते हैं। मुझे तो तेरे से आज ईर्ष्या हो रही है। मैंने भी जीवन भर धर्म का पालन किया है, किन्तु मुझे आज तक ऐसे महान् और पुण्य- वान मुनिवर के दर्शन प्राप्त नहीं हो सके। तू सचमुच बड़ा ही पुण्यवान है। "लेकिन वे महात्मा कौन थे पिताजी? वह मंत्र क्या था, जिसे पढ़ते हुए वे आकाश में उड़ गए ? वे आकाश में उड़ कैसे गए ?" "वेटा ! वे आकाशगामी जैन मुनिवर थे। उन्होंने घोर तपस्या करके यह शक्ति प्राप्त की होगी। और वे अवश्य ही नवकार मंत्र का जाप करते हुए आकाश में उड़ गए होंगे। इस मंत्र में बड़ी अद्भुत शक्ति है, वेटा! शुद्ध हृदय से इस १० सूली और सिंहासन मंत्र का जाप अरने से बड़े से बड़े संकट दूर हो जाते। और कितना भी कठिन कार्य हो, वह इस मंत्र की शक्ति सिद्ध हो जाता है। -जिनदास ने सुभग को बताया। सुभग ध्यानपूर्वक जिनदास की बात को सुन रहा था उसने कहा- । "पिताजी ! यदि ऐसी बात है तो आप मुझे भी व मंत्र सिखाइये न ! मैं श्रद्धापूर्वक उस मंत्र का पाठ किय करूंगा। बालक की धर्मभावना से जिनदास को बड़ी प्रसन्नत हुई । उन्होंने कहा- "अवश्य वेटा ! तुझे मैं वह मंत्र अवश्य ही बताऊँगा तु उसे याद कर लेना । बोल, मेरे साथ-साथ वोल- णमो अरिहंताणं । णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं सुभग ने जिनदास के साथ-साथ इस मंत्र का कई वा पाठ किया। धीरे-धीरे उसे यह मंत्र कंठस्य हो गया । जिन दास ने इस मंत्र का अर्य भी सुभग को अच्छी तरह -समझा दिया। पहले पद का अर्थ उन्होंने बताया--: ।
रहस्यलोक ११
संसार में जिनका कोई शत्रु नहीं है, जो पूर्ण परिग्रह-रहित
और वीतराग हैं, जो इन्द्रों के लिए भी पूज्य हैं, जिनसे इस
सृष्टि का कोई भी रहस्य छिपा हुआ नहीं है-उन अरिहन्तों
को नमस्कार करता हूँ।
दूसरे पद का अर्थ उन्होंने बताया-जिन्होंने अष्ट कर्मों
को नष्ट कर दिया है, जिन्होंने ऐसी परम सिद्धि प्राप्त कर
ली है, जहाँ से लौट कर फिर आना नहीं होता, अथवा
'जिनके सव कार्य सिद्ध हो चुके हैं, जिनके गुण और कार्य
संसार के लिए मंगलरूप हैं, जिनके गुणों का स्मरण करने
से भव्यजीव मुक्ति को प्राप्त करते हैं-ऐसे सिद्ध भगवन्तों
को नमस्कार करता हूँ।
तीसरे पद का अर्थ उन्होंने बताया-जो मर्यादा वाँधने
वाले तथा मर्यादा का पालन करने वाले हैं, जो भव्य
प्राणियों द्वारा मर्यादा-पूर्वक सेवित हैं, जो सूत्र का परमार्थ
जानने और बताने के अधिकारी है, जो ज्ञानाचार, दर्शना-
चार, चारित्राचार, तपाचार, और वीर्याचार में रमण
करते हैं, जो चतुर्विध साधुसंध के शिरोमणि हैं-ऐसे
आचार्यों को नमस्कार करता हूँ।
-
चौथे पद पद का अर्थ उन्होंने बताया-जो स्वाध्याय
तथा शास्त्र की शिक्षा देते हैं, जो सूत्रशिक्षा के लिए साक्षी
दाता हैं, जिनके समीप कुपठन अथवा दुर्ध्यान नहीं है,
योग्यता के कारण जो चतुर्विध संघ द्वारा 'उपाध्याय' के
१२ सूली और सिंहासन
पद से विभूषित हैं-ऐसे उपाध्यायों को नमस्कार करत
thes
"
पाँचवें पद का अर्थ उन्होंने बताया- जो अपने ज्ञान
की शक्ति से मोक्ष-साधन में लगे हए हैं, जो ज्ञान, दर्शन
और चारित्र की आराधना करते हैं, जो सब प्राणियों के
आत्मतुल्य मानकर सब पर समानरूप से करुणा करते हैं
सवको कल्याण की भावना से सदुपदेश देते हैं-ऐसे इस
लोक के समस्त साधुजनों को नमस्कार करता हूँ।
नवकार मंत्र के इन पांचों प्रमुख पदों का अर्थ भली
प्रकार सुभग को समझाकर जिनदास ने कहा-
"इस मंत्र का फल क्या है यह बताने के लिए मंत्र वे
साथ ही यह कहा जाता है कि-
एसो पंच णमुक्कारो, सव्व पाव-प्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसि, पढमं हवई मंगलं ।।
अर्थात्-ये पाँचों नमस्कार सव पापों के नाशक हैं। इन
सब प्रकार का मंगल होता है और यही प्रथम मंगल है।
इस प्रकार सेठ जिनदास ने सुभग को वह मंत्र तथा
उसका अर्थ समझा दिया। किन्तु साय ही उन्होंने उसे
कहा-
"सुभग ! तुम अभी वालक हो । अतः मैंने तुम्हें इस
महामंत्र का सामान्य अर्थ ही अभी बताया है। यदि इतना
हो तुम स्मरण रखोगे तो तुम्हारा कल्याण । होगा वैसे यह
रहस्यलोक १३ : मंत्र वड़ा गहन है। इसका वास्तविक मर्म तो धोरे-धीरे ज्ञान तथा सदाचार की साधना के साथ-साथ समझ में आता है। बड़े-बड़े ज्ञानी भी इस मंत्र के पूर्ण अर्थ तथा प्रभाव को कठिनाई से ही समझ पाते हैं। यह अपनी-अपनी योग्यता पर निर्भर करता है। ज्यों-ज्यों व्यक्ति अपना ज्ञान, संयम और आचार बढ़ाता जाता है, वह इस मंत्र के रहस्य-लोक में प्रवेश पाता जाता है। तुम होनहार हो बेटा ! तुममें प्रतिभा है, श्रद्धा है। श्रद्धापूर्वक इस मंत्र का स्मरण किया करो, तुम्हारा कल्याण होगा।' -- सेठ जिनदास से यह सुनकर सुभग के हृदय में एक विचित्र प्रकार का आन्दोलन आरम्भ हो गया । उसे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे सहसा वह प्रकाश के एक नए लोक में आ पहुँचा है। ज्ञान और प्रकाश से परिपूर्ण यह रहस्य- लोक उस बालक को बड़ा विस्मय-जनक तथा आकर्षक लगा। .
परिवर्तन ~ था तो सुभग बालक ही, किन्तु था प्रतिभाशाली। काल- चक्र उसे चुपचाप एक निश्चित स्थान पर लिए चला जा रहा था। उस मन्त्र के ज्ञान ने उसके वैचारिक तथा भावनामय जीवन में एक बड़ा परिवतन ला दिया था। किन्तु कालचक्र को यहीं नहीं रुकना था। वह अपनी अबाध गति से घूम रहा था और न केवल सुभग के भावनामय जीवन में ही, बल्कि उसके दैहिक और सांसा. रिक जीवन में भी एक बड़ा परिवर्तन आने वाला था यह घटना इस प्रकार हुई- सुभग अब पूर्णतया निर्भय हो चुका था। जंगल है अथवा नगर, दिन हो या रात, वह अकेला हो या दुकेला सुख आए या दुःख-सुभग को कोई भय नहीं था, कोई चिन्ता नहीं थी। उसके पास अव एक ऐसी शक्ति थी जो इन तमाम वाधाओं पर विजय पा सकती थी, और पाठक अब जानते हैं कि वह शक्ति क्या थी ? और एक दिन उस परिवर्तन का क्षण भी उपस्थित हुआ, जो सुभग के जीवन को ही बदल देने वाला था। १४ परिवर्तन १५. काफी समय व्यतीत हो चुका था। एक वार सुभग जंगल में गायें चरा रहा था। आकाश के एक छोर से धीरे-धीरे कुछ वादल उमड़े। देखते ही देखते वे थोड़े-से बादल धन- घोर घटाओं में बदल गए । सारा आकाश काली-कजरारी घटाओं से घिर गया। आकाश और पृथ्वी को अपनी तीक्षण कड़कड़ाहट से कंपाती हुई विजली चमक उठी और फिर हजार हजार धारा के रूप में वर्षा होने लगी । वर्षा ऐसी हुई कि उसके थमने का कोई लक्षण ही नहीं दीख रहा था। सारी सृष्टि में जैसे केवल यही चीजें रह गई: आँधी, विजली और मूसलधार वर्षा । कल्पना कीजिए-गहन वन । तूफानी आँधी, कड़- कड़ाती हुई बिजली और मूसलाधार वर्षा, चारों ओर अन्धकार । प्रलय जैसी भयंकर स्थिति । और ऐसी विषम स्थिति में एक छोटा-सा बालक--अकेला । ऐसी स्थिति में बड़े-बड़े साहसी व्यक्तियों का भी धीरज छूट जाना स्वाभाविक है। किन्तु पाठक विश्वास करें, हमारा चरित्रनायक वालक सुभग ऐसी विषम परि- स्थिति में भी निर्भय था। उसे अपने मन्त्र की शक्ति पर विश्वास और श्रद्धा थी। वह निरन्तर उस मन्त्र का जाप कर रहा था और निर्भय होकर समय की प्रतीक्षा कर रहा था। धीरे-धीरे सन्ध्या होने पर, वर्षा कुछ धीमी हुई । तब सुभग ने अपनी गायों को इकट्ठा किया और वह घर की है
१६ सूली और सिंहासन
ओर लौटा। मार्ग में एक नदी थी। वर्षा के कारण वह
पहाड़ी नदी समुद्र की तरह उफन पड़ी थी। अब उसे पार
करके जाना एक विकट समस्या थी। अन्धकार धीरे-धीरे
बढ़ता जा रहा था। गायें तो अपने बच्चों का स्मरण
करती हुई नदी में उतर पड़ी और किसी प्रकार उस पार
पहुँच गईं, किन्तु सुभग क्या करे ? अन्त में उसने विचार
किया कि यदि मैं घर नहीं पहुँचूंगा तो सेठ जिनदास
अत्यन्त चिन्तित होंगे। इसके अतिरिक्त उसे नवकार मंत्र
की शक्ति पर भी असीम विश्वास था। वह जानता था कि
इस मन्त्र के प्रभाव से उसका अकल्याण हो ही नहीं
सकता ।
यह विचार करके सुभग नदी के किनारे के एक वृक्ष
'पर चढ़कर नवकार मन्त्र का पाठ करते हुए नदी में बाद
पड़ा।
नदी में कूदने पर किसी चट्टान या वृक्ष से टकराकर
सुभग मर गया। इस जीवन के अन्तिम क्षण तक गुभग
नमस्कार महामन्त्र का जाप करता रहा था।
पाठक चकित होंगे कि यह क्या हुआ ? हमारा चरित्र
नायक तो मर गया, अव कथा आगे कैसे चलेगी? और
यदि उस मन्त्र में शक्ति थी, उसका स्मरण वालक मुभम
पूरी श्रद्धापूर्वक कर रहा था तो उसे मृत्यु के मुख
क्यों जाना पड़ा? वह उस विपत्ति से पार क्यों नही
?
में
?
हुआ?
परिवर्तन १७ उधर हुए मन्त्र की शक्ति कहीं लुप्त नहीं हुई। कथा भी आगे चलेगी। और हमारा चरित्रनायक भी अपने परिवर्तित रूप में उपस्थित होगा। तथ्य यह है कि कालचक्र नियमित रूप से अपनी धुरी पर घूम रहा था। ठीक समय पर, एक भी क्षण इधर या विना बालक सुभग को इस मृत्यु के माध्यम से एक नया जन्म ग्रहण करना था। उसका भावनामय जीवन परिवर्तित हो चुका था, किन्तु उसके दैहिक जीवन में भी एक परिवर्तन आना था, और वह आया। इस परिवर्तन को ही हम जन्म या मृत्यु का नाम देते हैं । वस्तुनः जीवन अबाध और अखण्ड है। सुभग के पूर्व- कृत पुण्यकर्म उसे एक विशिष्ट जीवन और सिद्धि की ओर ले जा रहे थे। नवकार महामन्त्र का स्मरण करते हुए सुभग ने यह शरीर त्याग दिया और उसके शुभ परिणामस्वरूप वह उसी रात्रि को जिनदास की पत्नी अहंदासी के गर्भ में आया। उस समय अहदासी ने स्वप्न में एक फूला-फला कल्पवृक्ष देखा। इसी प्रकार के अनेक लक्षणों से जिनदास और अर्हद्द सो को यह विश्वास हो गया कि सुभग की मृत्यु हो गई है और वह अव अहदासी के मर्भ में आया यह प्रसंग उन दोनों के लिए दुःख और मानन्द का एक मिश्रित प्रसग था। बालक सुभग के स्मरण से उन्हें
१८ सूली और सिंहासन
दुःख था, लेकिन अब उसके उन्हीं के पुत्र के रूप में उत्पन्न
होने के विश्वास से उन्हें आनन्द भी था।
दूसरे दिन सुभग के शव की अन्वेषणा की गई। उसे
सोज कर सम्मानपूर्वक उसकी अन्त्येष्टि कर दी गई। सेठ
जिनदास और अहंदासी ने अन्त्येष्टि से पूर्व हसरतभरी
निगाहों से सुभग के शव को देखा--उसके चेहरे पर एक
आनन्द और शान्ति का भाव था और ऐसा प्रकट होता था
जैसे बालक बोल रहा हो- 'माँ ! मैं तुम्हारे पास आ
रहा हूँ।
विकास
अर्हद्दासो का गर्भ धीरे-धीरे बढ़ने लगा। उसके गर्भ
में
पुण्यवान और धर्मात्मा सुभग का जीव आया था, अतः
अर्हदासी की इच्छाएं भी वैसी होने लगी। गर्भ के बालक
का जीव जिस स्वभाव का होता है, उसी के अनुसार गर्भवती
नाता की इच्छाएं और कार्य भी होने लगते हैं। अहंदासी
की इच्छाएँ धर्म और पुण्य के कार्य करने की होने लगी।
इस प्रकार धर्म-पुण्य के कार्य करती हुई अहंदासी बड़ी
सावधानी से अपने गर्भ का रक्षण करने लगी। समय आने
पर उसने एक सर्वांगसुन्दर वालक को जन्म दिया।
इस वालक का जन्म सेठ जिनदास और अहंदासी के
जीवन में एक महान् आनन्द का अवसर था। उनकी वर्षों
की साध पूरी हुई थी। उनका आनन्द इसलिए और भी
शतगुना हो गया था; क्योंकि वह वालक वास्तव में सुभग
ही था, अथवा यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वह
सुभग का ही जीव था-दूसरे जन्म में । अतः जिनदास ने
बड़ी धूमधाम से पुत्र-जन्मोत्सव ममाया। मुक्त हस्त से
उसने दान दिया। राजा ने भी इस आनन्द के अवसर पर
१६
२० सूली और सिंहासन अनेकों वन्दियों को मुक्त करके अपनी प्रसन्नता प्रकट की तथा सेठ जिनदास को बधाई दी। एक पुण्यात्मा के जन्म से अनेकों पीड़ित व्यक्तियों को सुख प्राप्त हुआ। सेठ जिनदास ने वालक के नामकरण के लिए बहुत से पंड़ितों से सलाह ली। पंड़ितों ने अनेक प्रकार से विचार करके तथा यह देखकर कि उस वालक का जन्म तथा दर्शन सबके लिए अत्यन्त आनन्दकारी हुआ है, उस बालक का नाम सुदर्शन' रखने को सम्मति प्रकट की। सेठ जिनदास ने पंड़ितों की सम्मति का आदर कदते हुए बालक का नाम सुदर्शन ही रखा। अब वालक सुदर्शन धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। जिनदास के वैभव का कोइ पार नहीं था। उसने बालक के लालन- पालन के लिए पांच धायों तथा दासियों देश की दासियों को नियुक्त किया। इन धायों तथा अठारह में से प्रत्येक अपना-अपना विशिष्ट गुण रखती थी । बालक को आरम्भ से ही सब प्रकार से योग्य वनाने की दृष्टि से ही जिनदास ने ऐसी व्यवस्था की थी। इस प्रकार समुचित संरक्षण में वालक का विकास होने लगा। धीरे-धीरे सुदर्शन आठ वर्ष का हो गया। तब जिन. दास ने उसके लिए विभिन्न कलाओं तथा विद्याओं के आचार्यों को व्यवस्था की । सुदर्शन पुण्यवान था। प्रतिभा वान था। उसके पूर्व जन्म के संस्कार उत्तम थे। अतः वह विकास २१ पथ बहुत थोड़े ही समय में ७२ कलाओं में निपुण हो गया। नम्र, सरल, शिक्षित और प्रतिभाशाली सुदर्शन को देखकर सेठ जिनदास के आनन्द की अब कोई सीमा न रही थी। उसने जी खोल कर कलाचार्यों को सम्मानित तथा पुरस्कृत किया। सभी कलाओं में पारंगत सुदर्शन ने किशोरावस्था को पार करके यौवन में प्रवेश किया। युवक सुदर्शन की छवि देखते ही बनती थी । स्वस्थ, सवल और सुन्दर उसकी देह- यष्टी चमक रही थी तथा वैसा ही सुन्दर, नम्र तथा शुद्ध उसका मन भी था। युवावस्था एक प्रकार से मनुष्य के जीवन में परीक्षा का अवसर होती है। देखा जाता है कि अनेक युवक अपने यौवन के उन्माद में जीवन के शुभ से भटक कर कुमार्ग पर चले जाते हैं । यौवनकाल में भी जो समर्थ व्यक्ति अपने मन को संयम में रखकर चलते हैं, वे ही इस संसार में धन्य हैं सुदर्शन अव युवक था। युवक ही नहीं, उसके पास उसके पिता की अपार सम्पत्ति तथा वैभव भी था। यदि मन असंयमी हो तो सम्पत्ति तथा वैभव तीव्रता से विप का कार्य करते हैं। यौवन तथा सम्पत्ति का संयोग बड़े-बड़े समर्थ व्यक्तियों को भी विचलित कर देता है। किन्तु सुदर्शन इसका अपवाद सिद्ध हुआ। उसका संयमी मन इस दुर्धर्ष संयोग में भी अडिग ही रहा। बल्कि वाल्यकाल में जो गुण उसमें प्रकट हो रहे थे, वे अव यौवनकाल में अधिक विकसित होकर प्रकट होने लगे।
२२ सूली और सिंहासन
सुदर्शन को युवक हुआ जान कर तथा सर्वगुणसम्पन्न
देखकर चम्पानगरी में अनेक सम्पन्न तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति
अपनी-अपनी कन्याओं का विवाह उसके साथ करने के लिए
सेठ जिनदास के समीप आने लगे। सेहर जनदास भी उचित
अवसर देखकर सुदर्शन का विवाह क ना चाहते थे, किन्तु
उन्हें सुदर्शन के लिए उसी के योग्य, गुणवती, सुशील तथा
सुन्दरी कन्या की तलाश थी । अन्त में मनोरमा नामकी एक
कन्या उन्हें योग्य प्रतीत हुई और उसके पिता को उन्होंने
उत्तर दिया-
"श्रेष्ठी ! आपकी कन्या बड़ी योग्य है । मुझे भी वह
अत्यधिक प्रिय है। मैं सुदर्शन के समक्ष, आज ही यह
प्रस्ताव रखूगा और उसकी सम्मति जान कर आपको
सूचना दूंगा।"
,
मनोरमा के पिता ने प्रसन्न होकर कहा-
"नगरसेठ ! आपके उत्तर से मुझे संतोष हुआ है। यह
उचित ही है कि आप इस विषय में सुदर्शन की सम्मति ले
लें। मैं आपके उत्तर की प्रतीक्षा करूँगा।"
मनोरमा के पिता अपने आवास को लौट गए। सेठ
जिनदास ने पहले अपनी पत्नी अर्हदासी को अपना विचार
वताया-
-
"अनेक लोग आए
थे
| किन्तु मुझे मनोरमा ही सुदर्शन
के लिए उपयुक्त कन्या लगती है। तुम्हारा क्या विचार है ?"
विकास २३
-
"आपका निर्णय ठीक ही है आर्यपुत्र ! मैं उस कन्या
को जानती हूँ । प्रत्येक दृष्टि से वह सुदर्शन की पत्नी बनने
योग्य है।"-अर्हदासी ने अपनी सम्मति दी।
संध्या को सुदर्शन के सुसज्जित कक्ष में जिनदास के
सेषक ने जा कर निवेदन किया-
"स्वामी ! महाधष्ठि आपको स्मरण कर रहे हैं।
"बहुत अच्छा । पिताजी को जा कर कहो कि मैं शीघ्र
ही उपस्थित हो रहा हूँ।" सुदर्शन ने उत्तर दिया। सेवक
प्रणाम करके चला गया।
सुदर्शन अपने पिता के कक्ष में पहुँचा। वहाँ उसको
माता भी उपस्थित थी । उसने माता-पिता के चरण छूते
हुए कहा-
"देवतातुल्य पूज्य माता-पिता के चरणों में प्रणाम !
पिताजी ! आपने मुझे बुलाया था ?"
"हाँ बेटा! आज तुमसे एक महत्व की बात हमें पूछनी
है। तुमने हमारे यहाँ जन्म लेकर हमारे अन्धेरे घर को
प्रकाशित किया है। हमारे सूने संसार को पुष्पित करके
तुमने हमारे जीवन को सार्थक किया है। वत्स सुदर्शन !
अव तुम युवक हो गए हो । हमारी एक और अभिलाषा है,
उसे पूर्ण करके तुम हमें अपने जीवन का सुफल दो।"
सुदर्शन चतर था । वह कुछ समझा और कुछ संशय में
भी रहा । उसने नम्रतापूर्वक कहा-
--
.
२४ सूली और सिंहासन
"पिताजी ! आपका वचन मेरे लिए अटल आज्ञा है।
कहिए मेरे लिए क्या आदेश हैं ?
"सुदर्शन! हम चाहते हैं कि इस घर में एक लक्ष्मी जैसी
पुत्रवधू आए । तुम अव विवाह कर लो। हमने तुम्हारे लिए
एक उपयुक्त वधू की खोज की है। केवल तुम्हारी सम्मति
चाहिए । मनोरमा सर्वगुणसम्पन्न कन्या है."
विवाह की बात सुनकर सुदर्शन स्वाभाविक रूप से
माता-पिता के सामने कुछ लज्जित हुआ। उसने जिनदास
की वात काटते हुए कहा
"इतनी जल्दी क्या है, पिताजी ! अभी तो....'
"यह हमारे विचार करने की वात है, वेटा!” जिनदास
ने भी सुदर्शन को बात पूरी नहीं करने दी, "तुम यह बतायो
कि मनोरमा तुम्हें पसन्द है कि नहीं? शेष बात तुम हम पर
ही छोड़ दो। अथवा क्या कोई अन्य आपत्ति है तुम्हें ?"
"नहीं पिताजी ! आपत्ति क्या हो सकती है मुझे ?
लेकिन...
"लेकिन-वेकिन को छोड़ो। मनोरमा तुम्हें पसन्द है न ?'
मनोरमा के विषय में सुदर्शन बहुत कुछ सुन चुका था।
उसने केवल यही उत्तर दिया-'जैसी आपकी आज्ञा' और
वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
अपने पुत्र की विनम्रता तथा शील को देखकर सेठ
जिनदास तथा अर्हदासी बड़े प्रसन्न हुए। और जब वह
विकास २५
हुए कक्ष.
से
विवाह की बात सुनकर
लड़कियों की
तरह लजाते
वाहर भाग गया तो पति-पत्नी मानन्द से मुक्त हास्य कर
उठे । अर्हदासी ने चुटकी लेते हुए कहा-
"लो, बेटा राजी है तुम्हारा । अव करो विवाह की
जल्दी से तैयारी।
"हाँ हाँ, अब देर क्या है ? कल ही मनोरमा के पिता
को बुलाकर यह शुभ सूचना उन्हें देता हूँ। और अव तुम
भी तैयार हो जाओ अपनी चांद-सी बहू का मुंह देखने
के लिए।
X
एक बार फिर से सन्तुष्ट पति-पत्नी खिलखिला कर
हंस पड़े।
अभूतपूर्व धूमधाम के साथ सुदर्शन और मनोरमा का
विवाह, सानन्द सम्पन्न हुआ। सारा नगर पति-पत्नी के इस
योग्य युगल को देखकर प्रसन्न था । नगर के वयोवृद्ध पुरुषों
के आशीर्वाद प्राप्त करके वह युगल प्रसन्नतापूर्वक अपना
समय व्यतीत करने लगा। मनोरमा सुदर्शन के ही समान
सरल, विनम्र तथा धार्मिक विचार रखने वाली थी । अतः
उन दोनों के जीवन में किसी भी प्रकार के क्लेश को कोई
स्थान नहीं था। जिनदास तथा अहंदासी भी अपने पुत्र
तथा पुत्रवधू के इस सुखमय जीवन को देखकर परम सन्तुष्ट
तथा प्रसन्न थे।
समय व्यतीत होता चला गया। सेठ जिनदास के घर
में छोटे-छोटे पौत्र खेलने लगे। किसी समय जो विशाल
२६ सूली और सिंहासन
आवास सुना प्रतीत होता था, वह अव बालकों की मीठो,
तोतली वोली और उनकी सरल सरस क्रीड़ाओं से भरापूरा
हो गया।
तव एक दिन जिनदास ने अहदासी से कहा-
"प्रिये ! प्रभुकृपा से हमने जीवन के सब कुछ सुख देस
लिए हमारी अवस्था भी अव बढ़ चली है । जीवन का बहुत
थोड़ा समय शेष है । पुत्र और पुत्रवधू सब प्रकार से योग्य
और सुखी हैं। अतः हमें अब अपना समय आत्मकल्याण में
लगाना चाहिए।
अर्हदासो ने उत्तर दिया-
"आप ठीक कहते हैं, आर्यपुत्र ! जीवन बरसाती नदी
की तरह जा रहा है। हम लोग अब आखिर कब तक संसार
व्यवहार में फंसे रहेंगे ? गृह-ससार का कार्यभार हमें अ
पुत्र तथा पुत्रवधू को सोंप ही देना चाहिए।"
यह निश्चय करके जिनदास ने अपना सब कुछ-अपन
अपार सम्पदा, ऐश्वर्य, आवास इत्यादि सुदर्शन को सौ
दिया और वे स्वयं तथा अर्हदासी निश्चिन्त होकर धर्म
ध्यान में लग गये।
जिनदास ने अपने नगरसेठ के पद से भी त्यागपत्र दे दि.
था । अतः राजा दधिवाहन तथा प्रजाजन यह विचार कर
लगे कि अब वह पद किस योग्य पुरुष को सोंपा जाय । पूरै
तरह विचार करने के बाद वे सभी इसी निर्णय पर पहें
..
विकास २७ --- कि 'भूतपूर्व नगरसेठ के पुत्र सुदर्शन ही सर्वगुणसम्पन्न हैं, तथा इस गौरवपूर्ण पद के लिए वे ही सर्वाधिक उपयुक्त हैं। वे बुद्धिमान, व्यवहार-कुशल तथा सर्वप्रिय हैं, एवं पैतृक संस्कारों के कारण भी वे इस दायित्वपूर्ण पद का निर्वाह करने में समर्थ हैं। वह निर्णय हो जाने पर राजा दधिवाहन ने सम्मान- 'पूर्वक सुदर्शन को राजदरवार में निमंत्रित किया। विशिष्ट प्रजाजन के सन्मुख राजा ने सुदर्शन से कहा "सुदर्शन सेठ ! तुम्हारे पिता चम्पानगरी के नगरसेठ थे। उन्होंने अपने पद से अब त्यागपत्र दे दिया है और वे आत्मकल्याण में रत हो गए हैं। उनकी वर्षों की सेवाओं के लिए राजा और प्रजा उनकी आभारी रहेगी। किन्तु अव 'प्रश्न इस पद पर अन्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने का है । हम सब लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है, और हम इस निर्णय पर पहुँचे हैं कि अपने पिता के स्थान पर अब तुम्हों इस पद के गौरव को वहन करने के योग्य हो। हमें आशा है कि तुम प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने से इन्कार नहीं करोगे । सुदर्शन ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया "महाराज ! आपकी तथा प्रजा की आज्ञा मानना मेरा 'परम कर्तव्य है। किन्तु मैं इस पद के योग्य कहाँ हूँ ? अच्छा हो, यदि आप यह गौरव और भार किसी अन्य अधिक योग्य व्यक्ति को सौंपें । - ?
२८ सूली और सिंहासन यह कहकर सुदर्शन ने तो अपनी विनम्रता तथा शाली. नता बताई, किन्तु राजा तथा प्रजा के आग्रह के सम्मुरू आखिर उसे झुकना ही पड़ा। विशिष्ट समारोह के सार सारी प्रजा की साक्षी में सेठ सुदर्शन को चम्पानगरी में नगरसेठ की पदवी से विभूषित कर दिया गया । X X X अपने विशाल आवास के हरे-भरे उद्यान में सुदर्शन घूम रहे थे। उनकी मुखमुद्रा कुछ चिन्ताग्रस्त थी। प्रतीत होता था कि वे किसी गहरे विचार में निमग्न हैं। अब वे केवल युवक सुदर्शन ही नहीं, नगरसेठ सुदर्शन थे । और यही उनकी चिन्ता का कारण था। वे विचार कर रहे थे-नगरसेठ के पद का दायित्व महान है। नगरसेठ राजा तथा प्रजा के बीच का व्यक्ति होता है। उस पर राजा भी विश्वास करता और प्रजा भी। उसे राजा के हित का भी ध्यान रखना होता है तथा प्रजा के हित का भी। प्रजा के हित के साथ- साथ उसे राज्य व्यवस्था की भी रक्षा करनी होती है। उसे यह प्रयत्न करना होता है कि प्रजा पर राजा की ओर से कोई अत्याचार न हो, तया यह भी देखना होता है कि प्रजा किसी भी प्रकार से राज्यव्यवस्था को भंग न करे। इतने उत्तरदायित्वपूर्ण पद का निर्वाह कैसे किया जाय, यही सुदर्शन सोच रहे थे। वे विचार कर रहे थे कि मैं अपनी अमीम सम्पत्ति तथा पद का अधिक से अधिक सदुपयोग किस प्रकार करूं ?
विकास २६
चिन्तन में उलझे हुए सुदर्शन ने एकाएक देखा-अशोक
वृक्ष पर एक माधवी लता झूल रही है । वृक्ष से लिपटी उस
लता में फूल खिले हैं और भ्रमर उन फूलों पर मंडरा रहे हैं।
मधुमक्खियाँ मीठी गुनगुनाहट करती हुई फूलों का रस
संचित कर रही हैं."
यह दृश्य देखकर सुदर्शन को अपनी समस्या का समा
वान मिल गया । ये लताए भूमि से जल लेती है, इनका
जीवन उसी पर निर्भर है । पृथ्वी के गर्भ से प्राप्त अपने
जीवन को वे फूलों और फलों के रूप में प्रगट करती हैं।
वृक्ष और लताएं अपने फलों और फूलों का फिर क्या करती
है ? क्या वे अपने ही लिए उन्हें रख लेती हैं ? मधु तथा
'फलों का संचित कोष क्या वे स्वयं तक ही सीमित रखती हैं ?
नहीं, ये वृक्ष और लताएं अपना समस्त संचित कोष
अन्य के उपयोग के लिए लुटा देती हैं । अन्य के उपकार
में ही वे अपनी समस्त ऋद्धि की सार्थकता मानती हैं।
तब..."तव मनुष्य का क्या कर्तव्य है ?
नगरसेठ सुदर्शन ने विचार किया-मेरा क्या कर्तव्य है ?
समाधान उसे मिल चुका था। उसने निश्चय कर लिया
कि वह अपनी सारी सम्पदा तथा अधिकार एवं शक्ति प्रजा
के हित में व्यय कर देगा। तभी उसकी सम्पत्ति तथा शक्ति
सार्थक होगी।
नगरसेठ सुदर्शन सम्पत्तिवान तथा शक्तिवान पुरुप था।
उसने अपनी प्रतिभा से अपनी सम्पत्ति तथा शक्ति को और
३० सूली और सिंहासन
भी बढ़ाया तथा ज्यों ज्यों वह वढ़ती गई, उनका उपयो
वह प्रजा के हित में करता चला गया | राजसत्ता के सहा
उसने प्रजा के व्यापार-व्यवसाय की इस प्रकार से उन्नति
तथा व्यवस्था की कि सारे राज्य में एक भी निरुधर्म
निष्क्रिय व्यक्ति न रहा। एक भी व्यक्ति राज्य में ऐस
न रहा जिसके पास कार्य न हो, जिसके पास जीविका के
साधन न हो।
राज्य की समस्त प्रजा में नगरसेठ सुदर्शन का जयजय
कार गूंज उठा।
इस प्रकार सुदर्शन सेठ सांसारिक और व्यावहारिक
कार्य पूर्ण कुशलता से करते हुए धर्म लाभ भी नियमितरूप
से करते रहे। किसी भी क्षण वे आत्मकल्याण की साधन
को भूले नहीं।
सुदर्शन के वृद्ध माता-पिता भी समय आने पर इस नाश
वान देह का त्याग कर गए।
फला-फला वृक्ष अपनी शरण में आने वाले प्रत्येक जीन
को शान्ति देता है। सुदर्शन भी अपनी शक्तिभर समस्त
प्रजा को सुख देने वाले सिद्ध हुए। व्यक्ति-व्यक्ति के मुख से
यही शब्द सुनाई पड़ते थे—सुदर्शन की जय हो ? नगरसेट
जिनदास के
सुपुत्र की जय हो !!
नागिन ने फन उठाया चम्पानगरी में ही एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम था कपिल । वह वेद-वेदांग, न्याय, दर्शन, व्याकरण, काव्य आदि का प्रकाण्ड विद्वान् था। इसके अतिरिक्त वह राज- पुरोहित भी था, अतः नगर में उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी तथा सम्पत्ति की भी उसके पास कोई कमी नहीं थी। वह एक सज्जन पुरुष था। उसका आचार-विचार शुद्ध था । किसी व्यक्ति की उसने कभी कोई हानि नहीं की थी। कपिल ब्राह्मण की पत्नी थी-कपिला । वह परम सुन्दरी थी। उसे अपने रूप का गर्व भी था और थी उसके हृदय में छिपी हुई वासना की एक अनवूझ अग्नि । कपिल और कपिला के स्वभाव में यहीं पर अन्तर था। सदाचारी ब्राह्मण की युवती पत्नी कपिला अपने यौवन और रूप में अंधी बनी हुई थी। भोग-विलास की आकांक्षा का एक लह- राता हुआ समुद्र उसके हृदय में उफान भरता रहता था। समान स्वभाव के होने के कारण कपिल और सुदर्शन में मैत्री थी। दोनों युवक थे, सदाचारी थे, विद्वान् थे, विचारशील थे। अतः उनका मैत्रीभाव स्वाभाविक ही था। ३१
३२ सूली और सिंहासन
-
उस मैत्री में कहीं किसी स्वार्थ की भावना नहीं थी । वे
शरीर और एक आत्मा थे। एक दूसरे का हितचिन्तन
उनका कर्त्तव्य था । दैनिक कार्यों से अवकाश पा कर वे
दिन एक दूसरे से मिलते और नाना प्रकार के विचार के
चर्चा में अपने समय का सदुपयोग किया करते थे। वस्तु
एक दूसरे से मिले बिना उन्हें चैन भी नहीं मिलता था
लेकिन कपिला के अन्तःकरण में एक विषधर अपना फ
'धीरे-धीरे उठा रहा था। सुदर्शन के रूप और यौवन में
देख-देख कर उसकी छाती जल रही थी। वह सोचती थी-
आह ! ऐसा सुन्दर पुरुष ! ऐसा बलिष्ठ यौवन ! वह स्त्र
धन्य है, जिसे इस कामदेव के समान सुन्दर पुरुष का सहवा
प्राप्त है । काश !........किसी दिन मुझे भी इस पुरुष
सहवास का सुख प्राप्त होता !!
वासना का सर्प जव एक वार अपना फन उठा लेता है
तो बिना डसे रहता नहीं। कपिला भी एक विवश सपिनी
के समान भीतर ही भीतर ऐंठ रही थी और सुदशन
अपनी वासना की दाढ़ों में जकड़ लेने के लिए आतुर हो
रही थी। अवसर की प्रतीक्षा में वह ठहरी हुई थी और
ज्यों-ज्यों विलम्ब होता जाता था त्यों-त्यों उसका विपी
भी भयंकर होता चला जा रहा था।
और अन्त में एक दिन उस भयंकर नागिन को अपने
शिकार पर आक्रमण करने का अवसर मिल ही गया ।
दिन राजा ने कपिल को किसी राजकार्य से किसी अन्य मा
को
नागिन ने फन उठाया ३३ . जाने का आदेश दिया। राजा की आज्ञा शिरोधार्य करके कपिल अपनी यात्रा की तैयारी करने घर पर आया उसने कपिला से कहा- ।" "कपिले ! राजा की आज्ञा से मैं बाहर जा रहा हूँ। जितनी जल्दी सम्भव होगा मै लौट आऊंगा । तुम सावधानी और शान्ति से रहना सुनकर कपिला के मन में भीतर ही भीतर एक आनन्द की लहर दौड़ गई। उसे.अव अवसर मिला था, जिसकी उसे कितने समय से प्रतीक्षा थी। किन्तु छल तो नारी का स्वभाव ही है, उसने दिखाने के आँसू आँखों में भरकर भोले ब्राह्मण से कहा- ! "नाथ ! तुम कितने समय बाद आओगे ? मैं तुम्हारे वियोग में कैसे जीऊँगी ? मैं अकेली कैसे रहूँगी ?" भोला ब्राह्मण जहरीली नागिन के भेद को क्या जाने ? वह गद्गद होकर वोला- "तू तो विल्कुल पगली है। मैं बहुत जल्दी ही लौट आऊंगा। और देख, सुदर्शन तो यहाँ है ही, वह तेरी देख- भाल करेगा । तुझं किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होने देगा। कोई आवश्यकता आ पड़े तो उसे बुला भेजना। वह मेरा परम मित्र है, कोई संकोच नहीं करना।" कपिला को और चाहिए भी क्या था? वह तो मन.ही मन सोच रही थी कि यह ब्राह्मण व्यर्थ ही विलम्ब क्यों कर
३४ सूली और सिंहासन
X
X.
रहा है, शीघ्र चला क्यों नहीं जाता? अपने झूठे आंसू
पोंछकर उसने कहा-
"शीघ्र ही आना, प्रियतम ! मैं पलक-पांवडे बिछाकर
प्रतीक्षा करती रहूँगी।"
और फिर उसने ब्राह्मण की तैयारी बड़े उल्लसित मन
से जल्दी-जल्दी कर दी।
भोले ब्राह्मण-देवता यात्रा पर चले गए।
X .
ब्राह्मण के चले जाने के पश्चात् कपिला ने तुरन्त अपना
शृगार आरम्भ कर दिया। खूब सज-संवर कर, आभूषणों
और मूल्यवान वस्त्रों से अपनी सुन्दर देह को और भी
सुन्दर बनाकर उसने अपने शयनागार को भी सुसज्जित
किया। उसने निश्चय कर लिया था कि आज वह अवश्य
ही सुदर्शन के साथ सहवास का सुख प्राप्त करेगी।
पापी व्यक्ति अपने मन में यह विचार करता है कि अन्य
भी व्यक्ति भी उसी के समान हो पापी होंगे।
सब प्रकार से प्रस्तुत होकर कपिला सुदर्शन सेठ के
आवास की ओर चल पड़ो। सुदर्शन के सेवक ने जब अपने
स्वामी को कपिला के आगमन की सूचना दी तो सुदर्शन को
वड़ा आश्चर्य हुआ । वह शीघ्र ही अपनी मित्र-पत्नी का
स्वागत करने द्वार पर आया।
द्वार पर आकर उसने देखा कि कपिला की आँखों में
आँसू भरे हुए हैं, उसका मुख उदास और चिन्तित है ।
उसने घवरा कर पूछा-
नागिन न फन उठाया ३५
--
"क्या बात है भाभी ! आप यहाँ ? और इतनी घवराई
क्यों हैं ?"
रोते
हुए
कपिला ने उत्तर दिया-
'मैं आपको बुलाने आई हूँ। शीघ्र ही मेरे साथ घर
चलिए..........
सुदर्शन और भी धवराया। उसने
पूछा-
"क्यों कुशल तो है भाभी ! आखिर हुआ क्या है ?"
अनिष्ट की आशंका से सुदर्शन का हृदय कांप उठा था।
पिला ने कहा-
...........
ता"
"आप जल्दी चलिए । आपके मित्र के शरीर में भयंकर
दना हो रही है। अनेक उपचार किए, किन्तु फल नहीं
कला
"ओह ! तो ऐसे समय में आप उनके पास से यहाँ
गों.चली आई ? किसी सेवक को भेज देतीं, मैं तुरन्त चला
.......अरे सेवक !' सुदर्शन ने जोर से पुकारा,
शीघ्र रथ तैयार करो।"
सुदर्शन को क्या मालूम था कि उसका मित्र तो उस
गर में ही नहीं है ! उसका हृदय निश्छल था, वह मित्र
। अस्वस्थता से चिन्तित होकर अविलम्ब कपिला के साथ
ल पड़ा । मार्ग में उसने अपने मित्र की अस्वस्थता के
षय में कपिला से अनेक प्रश्न किए; किन्तु वह उन प्रश्नों
| इधर-उधर का उत्तर देकर टालती रही। उसके हृदय
,
३६ सूली और सिंहासन
में तो एक ही बात बस रही थी-आज इस सुन्दर पुरुष
साथ सहवास का सुख अवश्य प्राप्त करूंगी।
घर पहुँचते ही सुदर्शन ने पूछा-
"कपिल कहाँ है ?"
"वे भीतर शयनागार में हैं। आइये।" कहा
कपिला शयनागार की ओर बढ़ी। सुदर्शन चुपचाप उमा
पीछे-पीछे चला।
ज्यों ही वे दोनों शयनागार में पहुँचे, कपिला ने कक्ष क.
द्वार वन्द कर दिया। सुदर्शन को कुछ समझ में नह
आया। वह चकित होकर सुसज्जित कक्ष को देख रहा थ
और अपने मित्र की खोज रहा था कि कपिला ।
कहा-
"आइये देवता ! इस शय्या पर विराजिए।"
"लेकिन कपिल कहाँ है ?" सुदर्शन ने विस्मित होने
हुए पूछा।
कुछ देर पूर्व जो नारी घबराई हुई और दुःखी दी
रही थी, वह अब बिल्कुल बदल गई थी। उसके वस्त्र म
अपनी-देह पर से इधर-उधर सरकने लगे थे। उसके ओट
पर एक रहस्यमय मुस्कान खेल रही थी। उसकी बड़ी
बड़ी आँखों में एक विचित्र प्रकार का आनन्द लहरा रह
था। उसके सारे शरीर से एक तोव कामोत्तेजक छवि प्रा
हो रही थी।
!
• --
नागिन ने फन उठाया ३७
उस मुसकान में कितना विष या ! उस दृष्टि में
कितनी ज्वाला थी !!
--
नागिन अपना फन उठा चुकी थी।
सुदर्शन को भी अव कपिला के व्यवहार में किसी छल
की गन्ध आ चुकी थी। उसने कुछ कठोर होते हुए
कहा-
"मैं कुछ समझा नहीं । कपिल कहाँ है ?"
"अब कपिला ने सुदर्शन के निकट आते हुए कहा--
"आप जितने सुन्दर और वलिष्ठ हैं, उतने ही भोले भी
प्रतीत होते है । आपके मित्र यहां नहीं हैं, वे यात्रा पर गए
हैं । घर विलकुल सूना है, कोई भी नहीं है । मैं बहुत समय
से इस अवसर की प्रतीक्षा में थी। सुदर्शन ! प्रिय ! मैं
तुम्हारे विना अव जी नहीं सकती। मेरे हृदय में तुम्हारे
प्रेम की अग्नि भभक रही है । उसे शान्त करो। सुदर्शन !
मैं तुम्हारे समक्ष सम्पूर्ण रूप से समर्पित हूँ। मुझे तुमसे
प्रेम हो गया है, मेरे साथ इस यौवन के सुख को भोगो
तथा मेरे और अपने जीवन को धन्य करो।"
तो यह रहस्य था, यह छल किया है इस विलासी
नारी ने मेरे साथ । अपने पति को धोखा देकर, और मुझे
भो
छल से अपने चंगुल में लेकर यह
अपनी वासना की
तृप्ति करना चाहती है !-सुदर्शन ने समझा। विचारों का
एक ववण्डर उसके मस्तिष्क में उमड़ आया। कपिला
३८ सूली और सिंहासन
सुन्दरी थी, अद्भुत सुन्दरी थी, इसमें सन्देह नहीं। वह
युवती थी, और उसके साथ रमण करना किसी भी विलास
युवक के लिए एक सौभाग्य की बात ही हो सकती थी।
किन्तु सुदर्शन तो विलासी और कामुक नहीं था। गुवर
वह था, सुन्दर भी था। किन्तु वह केवल देह से ही सुन्दर
नहीं, मन और आत्मा से भी उतना ही सुन्दर था। चरित्र
ही उसका वास्तविक सौन्दर्य था, वही उसके जीवन की
निधि थी।
किन्तु अब वह करे क्या ? किस प्रकार वह इस नारी
के जाल से मुक्त हो ? क्या वह उसे क्रोध से अपमानित
करके और दुत्कार कर चला जाय? वह विचारने लगा।
किन्तु उसे विचार आया-क्रोधित और अपमानित नारी
घायल और अपमानित नागिन और शेरनी से भी अधिक
भयंकर होती है । उस क्रोध की स्थिति में वह क्या नहीं
कर सकती है।
सुदर्शन ने सोचा कि यदि सीधे-सीधे वह कपिला का
तिरस्कार करके चला गया तो यह कपटी नारी न जाने
किस तरह का व्यवहार करे। जाने वह किस तरह का
तूफान खड़ा कर दे ? जाने वह लोगों में किस तरह की
वात फैलाए ? वह यह भी कह सकती है कि सुदर्शन चरित्र
होन है । उसने अपने मित्र की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर
अपने मित्र के घर जाकर उसकी पत्नी का अपमान किया।
उससे विलास करने की इच्छा .की, प्रयत्न किया। उसने
ऐसा किया, वैसा किया
?
नागिन ने फन उठोया ३६
यदि ऐसा हुआ तो सुदर्शन निष्कारण ही लोक में
बदनाम हो जायगा। पापी अपनां पाप निरपराध : व्यक्ति
के सिर पर मढ़कर अपने आपको पवित्र प्रमाणित कर देगा
और निरपराध व्यक्ति उसके क्रोध का शिकार हो जायेगा।
वास्तविक वात
किसे मालूम होगी ? कौन उसकी बात का
विश्वास करेगा?
नहीं, सुदर्शन ने निश्चय किया, इस तरह तो मुक्ति
नहीं है । कोई अन्य उपाय ही काम में लिया जाना चाहिए।
साँप भी न मरे और लाठी भी न टूटे ।
अन्त में सुदर्शन को एक उपाय सूझा ।
कपिला की ओर प्रेमभरी दृष्टि से देखता हुआ वह
बोला-
"कपिला! सचमुच आज मुझे बड़ा सुयोग प्राप्त हुआ
है। तुम जैसी सुन्दरी और युवती नारी जिसे प्रेम करे,
उससे बड़ा सौभाग्यशाली व्यक्ति और कौन
सकता है ?
तुम जैसी नारी को पाने के लिए तो लोग तरसते हैं और
प्रयत्न करते हैं । किन्तु हाय ? मैं क्या करूँ ! मैं कुछ कह
भी तो नहीं सकता
.....?"
सुनकर कपिला को कुछ विस्मय हुआ । वह वोली--
"क्या वात है ? क्या तुम घबरा रहे हो ? डर किस
बात का है ? ऐसे अवसर बारबार नहीं आते। शीघ्रता
करो।"
?
४२ सूली और सिंहासन
?
"कपिला! कैसे कहूँ ? बात भी ऐसी ही है । यद्यान
नैं भी सुन्दर हूँ और युवक हूँ, किन्तु मेरा यौवन तो उस
पलाश के सुन्दर पुष्प के समान है, जिसमें गन्ध नहीं होती।
वह केवल सुन्दर ही होता है, देखने मात्र के लिए हो।
उसका उपयोग कुछ नहीं है । मेरा यौवन भी ऐसा
हो है।"
अब कपिला को कुछ निराशा हुई। किन्तु उसने
कहा-
"ऐसी क्या बात है ? आपका यौवन निरर्थक क्यों है ?
आप ऐसे सुयोग का लाभ क्यों नहीं ले सकते ?"
सुदर्शन ने निराशा का नाटक करते हुए अपने चेहरे
उदास बनाते हुए कहा-
"कपिला ! वह कारण गुप्त है। किन्तु तुम्हें तो मैं
वह बताऊंगा ही। क्या तुम प्रतिज्ञा करती हो कि यह
रहस्य किसी पर प्रगट नहीं करोगी? यदि तुम यह प्रतिमा
करो तो मैं यह बात तुम्हें बता सकता हूँ। साथ ही में
भी तुम्हें वचन देता हूँ कि आज की यह बात किसी के
नामने प्रगट नहीं करूंगा। बोलो, तुम क्या कहती
हो ?"
कपिला तो मातुर हो रही थी। वह सुदर्शन के साथ
भोग करने में एक क्षरण का भी विलम्ब नहीं चाहती थी।
इसके साथ ही वह स्वयं भी यह चाहती थी कि यह
नागिन ने फन उठाया ४१
सारी बात किसी पर प्रकट न हो। अत: उसने शीघ्रता से
कहा-
"मै प्रतिज्ञा करती हूँ, आप. मुझे शीघ्र ही सारी
बात बताइये । सम्भव है, मैं कोई उपाय खोज सकू ?"
"यदि तुम कोई उपाय खोज सको तो कहना ही क्या
है ? मेरो प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रहेगी। किन्तु मुझे.
आशा नहीं है। जिस प्रकार एक रोगी और असमर्थ व्यक्ति
अपने सामने षटस भोज़न होते हुए भी उसका उपभोग
नहीं कर सकता, वैसी ही स्थिति मेरी है....... कपिला !
देखो तुमने प्रतिज्ञा की हैं, किसी से कहना नहीं, मैं....
मैं पुरुषत्वहीन हूँ।"
सुनते ही कपिला पर जैसे विजली गिर पड़ी। उसकी
सारी आशाओं पर तुपारपात
गया। कैसी लालसा से
वह सुदर्शन को लेकर आई थी ! कितने समय से वह उस
पर मोहित थी और उसके साथ सम्भोग-सुख प्राप्त करने
की इच्छुक थी ! किन्तु अव जब उसे मालूम हुमा कि वह
नपुसक है, तव उसकी निराशा और क्रोध की कोई सीमा
न रही । सुदर्शन के प्रति उसे जितना प्रेम था, उतनी ही
घृणा अव उसे उसके प्रति हो आई।
युवती स्त्री, जो भोग-विलास की इच्छुक हो, वह
जितनी घृणा एक पुरुषत्वहीन व्यक्ति से करती है, उतनो
संसार में किसी वस्तु से नहीं करती।
-
.
४२ सूली और सिंहासन
-
........
अपनी घोर निराशा, क्रोध और घृणा में कपिला ने
सुदर्शन की बात समाप्त होते ही कहा-
"अभागे, नपुंसक ! जा निकल जा, यहां से
अन्धे को क्या चाहिए?
केवल दो आँखें।
और सुदर्शन को क्या चाहिए था ?
सुदर्शन को जो चाहिए था, वह यही तो था। आगमः
का भी विलम्ब किए वगैर वह मुह लटकाए हुए कपिला के
'घर से निकल गया और परमात्मा को स्मरण करता हुभः
अपने घर की ओर भाग छूटा।
एक जहरीली नागिन के फन्दे से आज सुदर्शन या
गया था। वह आज तो उससे बच गया, किन्तु क्या नागिः
शान्त वैठ सकी?
दो सहेलियाँ चम्पानगरी में आज इन्द्रोत्सव मनाया जा रहा था। प्रातःकाल से ही सारे नगर में धूमधाम आरम्भ हो गई थी। नगर के सारे नागरिक उत्साहपूर्वक इस उत्सव में सम्मिलित होकर जीवन का आनन्द लेने की तैयारियां कर रहे थे। स्त्रियाँ आज अपने शृंगार की चरम सीमा पर पहुंच जाना चाहती थीं। बालकों के उल्लास का कोई अन्त नहीं था और युवक अपनी. मस्ती : डूब रहे थे। यह इन्द्रोत्सव नगर से बाहर विशाल और सुन्दर उद्यान में मनाया जाता था। राजा तथा प्रजा.दोनों मिल कर इस दिन अत्यन्त उत्साह से राग-रंग करते थे। राजा दधिवाहन ने एक दिन पूर्व ही घोषणा करके नागरिकों को उत्सव में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दे दिया में . था। उत्सव-स्थल पर भीड़ समाती ही न थी। एक ओर राजा का शामियाना लगा था, जहाँ पर अनेकों सेवक- सेविकाएं, सैनिक, और दरबारी अपने-अपने योग्य ४३ -- ४८ मूली और सिंहासन वस्त्रों में सुशोभित इधर-उधर आते जाते दिखाई पड़ी थे। दूसरी ओर, राजा के शामियाने के समीप ही महारानी अभया का विशाल शामियाना था। उस शामियाने के भीतर की शोभा वही व्यक्ति देख सकता था, जिसने पूर्व- जन्म में अनेक सत्कर्म किए हो । अनेकों सुन्दरी सेविकालो तथा नागरिकों से घिरी हुई महारानी माज इस प्रकार शोभित होती थी, जैसे देवियों और अप्सराओं से घिरी हुई इन्द्राणी। नगर-पुरुपों तथा स्त्रियों के बैठने के लिए भी समुचित और अलग-अलग व्यवस्था की गई थी। धीरे-धीरे सारा नगर उत्सव-स्थल पर पहुँच गया। आनन्द का एक सागर ही जैसे इन पुरुष-स्त्रियों के रूप मृत होकर लहरा उठा। महारानी अभया की सभी सहेलियाँ जव एकगित हो नई तब उसने प्रस्ताव रखा- "कपिला ! चलो हम कुछ देर कहीं घूम आएं।" रानी का प्रस्ताव तो आदेश का ही रूप होता है तुरन्त रथ तैयार किए गए और उनमें रानी की सहेलियो बठकर घूमने के लिए चल दी। कपिला रानी के रस में उसके साथ वंठी थीं। रानी अभया के सुसज्जित रथ के पीछे-पीछे हो जो स्थ आ रहा था, उसमें कौन था ? its -
दो सहेलियां ४५
उस रथ में अपने पांच पुत्रों के साथ बैठी थी हमारे
चरित्रनायक सुदर्शन की पत्नी-मनोरमा । -
कपिला ने पीछे मुड़कर मनोरमा को देखा। '
ऐसा लगा जैसे किसी नागिन ने अपने शत्रु को अपनी
विपभरी दृष्टि से घूरा हो!
पाठक भूले न होंगे, कपिला की वासना अतृप्त ही रह
गई थी। सुदर्शन उसे सन्तुष्ट न कर सका था। वह
'शूल उसके हृदय में आज तक चुभा हुआ था और अपना
विष उसके सारे शरीर में फैला रहा था ।
आज नागिन ने अपने शत्रु पर प्रहार करने का एक
अच्छा अवसर पाया।
कपिला ने रानी अभया से पूछा-
"महारानी ! यह हमारे रथ के पीछे किसका रथ है ?
यह अत्यन्त सुन्दर स्त्री कौन है ?"
"बड़ो भोली बनती है। इसे भो तू नहीं जानती ?
‘रानी ने कही।
.
.
.
--
"नहीं"
है
"हूँ, बड़ी कमजोर तेरी स्मरणशक्ति, क्यों ? अनेक
वार तू इससे मिल चुकी है, फिर भी भूल गई ?" कहकर
अपने ओठों पर एक हल्का-सा व्यंग ला कर अभया ने
कहा-"कोई सुन्दर पुरुष होता तो तेरी आँखों में ऐसा
बस जाता कि जनम जनम तक उसे नहीं भूलती।"
४६ सूली और सिंहासन
-
एक पापी व्यक्ति दूसरे पापी को पहिचानने में देर
नहीं करता । अभया भो कपिला को खूब पहिचानती थी।
और अभया क्या थी, यह हम अपने पाठकों को बताने जा
ही रहे हैं।
कपिला ने अभया के व्यंग को समझा, किन्तु टालने
हुए कहा-
"सचमुच अभया ! मैं इसे नहीं जानती। कौन है
वह
?"
"यह नगरसेठ सुदर्शन की पत्नी मनोरमा है।"
"अच्छा! ईश्वर ने जोड़ी तो अच्छी मिलाई है।
सौन्दर्य और यौवन में कोई किसी से कम नहीं है। और ये
चार वालक किसके हैं ?"
"बड़ी अजीब औरत है तू ! ये बालक इन्हीं के हैं।"
"ओ हो ! ये नगरसेठ के बालक हैं ! खब! संसार में
आश्चर्यों की कमी नहीं है ।"--कहकर कपिला एक भयं.
कर और कुटिल हसी हंस पड़ी।
रानी को कपिला को इस वात पर और इस तरह हंसने
के ढंग से आश्चर्य हुआ। उसने कुछ न समझ कर
पछा--
"आखिर वात क्या है कपिला ! तेरी हंसी का
?"
"कुछ नहीं, हंसी के लिए क्या कारण ? यू ही हंग
पड़ी थी।"
कारण
दो सहेलियां ४७.
"झूठी कहीं की। सच सच बता। मुझसे कपट नहीं
चलेगा।"
"नहीं महारानीजी ! आपसे कपट कैसे करूंगी।
किन्तु प्रत्येक बात के लिए एक अवसर होता है । इस अवसर
को मैने उपयुक्त नहीं समझा ।"
रानी का कौतूहल बढ़ता जा रहा था। कपिला यही
तो कर रही थी। वह अपने विषबुझं तीर को ठीक समय
पर, ठीक स्थान पर छोड़ना चाहती थी। रानी ने आतुर
होकर पूछा-
-
"जो कुछ भी हो, तू मुझे इसी समय सारी बात बता,.
आखिर मामला क्या है ?"
"तव कपिला ने कहा-
"आप नहीं मानतीं तो वताती हूँ, किन्तु किसी से
कहिएगा नहीं। सुदर्शन तो नपुंसक है नपुंसक के पुत्र
कसे ? और यह देवी जी चार पुत्रों को लेकर सती-साध्वी
वनी वैठी हैं। मुझे इसी बात पर हंसी आई थी।"
कपिला की वात सुनकर अभया रानी क्षण भर के लिए
तो आश्चर्य में डूब कर अवाक रह गई। उन्हें ठीक से समझ.
ही नहीं पड़ा कि कपिला क्या कह रही है और जो कुछ
कह रही है, उसका अर्थ क्या है। धीरे-धीरे उस कथन का
अर्थ उन्हें समझ में आया और वे
कुछ
क्रोधित-सी हो कर
वोलों
-
४८ सूली और सिंहासन "तू झूठ बोलती है कपिला! तुझे शर्म आनी चाहिए। किसी भी भली स्त्री के लिए ऐसी कठोर और अपमान- जनक बात कहना शोभा नहीं देता। हंसी-मजाक में भी ऐसी बात नहीं कहना चाहिए। सुदर्शन को सारी राजधानी जानती है, उनका आदर करती है। इसी प्रकार सुदर्शन के 'पत्नी मनोरमा के चरित्र को भी कौन नहीं जानता आखिर तुझे इस तरह की वात कहने का विचार आय कैसे ?" रानी ने वात कठोरता से कही थी, और यदि कोई अन्य स्त्री होती तो महारानी के ऐसे कथन से कांप उठती। किन्तु कपिला तो मंजी हुई स्त्री थी, और उसके साथ ही वह रानी के चरित्र को भी उसकी सहेली होने के नाते - अच्छी तरह जानती थी थी । अतः वह जरा भी विचलित नहीं हुई और उसने उसी प्रकार हँसते हुए उत्तर दिया-- "महारानीजो ! आपके साथ यही तो कठिनाई है। आपको कोई बात न बंताई जाए तो मुश्किल और बताई जाय तो भी मुश्किल । चित भी आपकी और पट भी आपकी । अब कोई करे तो क्या करे ?" "अच्छा ! ऐसा ही है तो वता, तुझे कैसे मालूम हुआ कि सुदर्शन नपुंसक है ?" "सुदर्शन की नपुंसकता की बात स्वयं सुदर्शन से अधिक और कौन जान सकता है, महारानी ! और यह
दो सहेलियां ४६
बात मुझे स्वयं सुदर्शन ने ही कही है। किसी अन्य व्यक्ति
ने यदि यह वात मुझे कही हाती तो मैं भी आपकी तरह
उस बात पर विश्वास नहीं करती।"
महारानी अभया फिर से विचार में पड़ गई। कुछ
देर चुपचाप विचार करने के बाद वे इस निर्णय पर पहुँची
कि अवश्य ही इस पुरुषकामी स्त्री ने सुदर्शन को कभी
अपने जाल में फंसाने की कोशिश की है और सुदर्शन
चतुराई से इसके जाल से निकल गया है। यही कारण है
कि आज यह अपने अपमान का बदला लेने के लिए सुदर्शन
के लिए ऐसी बात कह रही है।
प्रगट में रानी ने कपिला से कहा-
"कपिला ! मैं बात समझ गई हूँ। तूने धोखा खाया
है। इन बच्चों को देखकर एक मूर्ख व्यक्ति भी यह कह
सकता है कि ये बालक सुदर्शन के अतिरिक्त अन्य किसी
के नहीं हो सकते। इनकी आकृति का सम्पूर्ण अंश सुदर्शन
से मिलता है। इसके अतिरिक्त इस मनोरमा को देखकर
भी कोई भी व्यक्ति सहज ही कह सकता है कि यह स्त्री
दुराचारिणी नहीं है । परपुरुषगामिनी स्त्री की आँखें छिपी
नहीं रहती, कपिला ! तू देखती नहीं, जव से सेठानी अपने
साथ है, एक क्षण के लिए भी उसकी आँखें ऊपर नहीं
उठीं । तेरी तरह वह आँखें नचा-नचा कर इधर-उधर सुन्दर
पुरुषों की खोज नहीं करती फिरती, समझी ?"
५० सूली और सिंहासन
दोनों एक दूसरे को समझती थीं। लेकिन महारानं
की बात कपिला को सगत लगी और वह विचार करने
लगी कि क्या वास्तव में सुदर्शन अपने चरित्र की रक्षा के
लिए मुझे धोखा देकर वच गया ?
वह विचार कर ही रही थी कि रानी ने फिर उससे
पूछा-
"अच्छा ! तुझे सुदर्शन ने स्वयं यदि अपनी नपुंसकता
की बात कही है, तो उसकी आवश्यकता क्या आ पड़ी?
क्यों तूने पूछा और क्यों उसने तुझे बताया, जरा
सुनू ?"
-
कपिला अब पकड़ी गई। रानी के शब्दों में स्पष्ट
' व्यंग था । उसने हिचकिचाते हुए उत्तर दिया-
"असल में........मुझे उसने नहीं कहा। वह अपनी
नपुंसकता की बात मेरे पति को बता रहा था, तब मैंने
यह बात सुन ली थी।"
"हूँ ! दाई से पेट छिपा रही हो? अभी वाहती थो
कि मुझसे कहा था और अब कहती हो कि मेरे पति से
कहा था । कपिला तू झूठ बोल रही है। सच-सच बोल,
क्या बात है ?"
अब कपिला के लिए कोई मार्ग नहीं बचा था। अवश्य
ही उसने सुदर्शन से प्रतिज्ञा की थी कि वह यह वात किसी से
कहेगी नहीं, किन्तु उस प्रतिज्ञा को तो वह तोड़ ही चुकी
थी। इसके अतिरिक्त रानी और वह एक दूसरे को
दो सहेलियाँ ५१ । अच्छी तरह पहचानती थीं। दोनों की गुप्त बातें दोनों जानती थीं। अतः कपिला ने अन्त में सारी घटना रानी को ज्यों की त्यों सुना दी। रानी ने जब उस घटना को सुना, तव उसका रहा सहा सन्देह भी दूर हो गया। उसे निश्चय हो गया कि सुदर्शन ने कपट-जाल से मुक्त होने के लिए ही अपनी नपुंसकता की झूठी वात उसे कह दी थी। इसके अतिरिक्त उस चरित्रवान पुरुष के पास और मार्ग ही नहीं थो । कपिला से उसने कहा- "देवीजी ! अव आप समझी होंगी कि सुदर्शन पुरुषत्व- हीन नहीं है। वह आपके चगुल से बचना चाहता था और वच गया।" "हूँ ! लगता तो मुझे भी ऐसा ही है। किन्तु तब तो सुदर्शन धन्य है। यदि वह मेरे जाल से भी साफ और वेदाग निकल गया है तो मैं विश्वासपूर्वक कहती हूँ कि ससार की कोई स्त्री उसे पथभ्रष्ट नहीं कर सकती।" रानी अभया के लिए कपिला का कथन एक चुनौती था। भीतर ही भीतर वह भी सुदशन के प्रति आसक्त थी, और अब उसे कपिला ने चुनौती भी दे दी थी। उसने तुरन्त कहा- "रहने दे कपिला ! अधिक अहकार अच्छा नहीं। संसार में एक तू ही सुन्दर स्त्री नहीं है । और यह भी मत -
५२ सूली और सिंहासन
समझ कि त्रियाचारित्र को तेरे अलावा और कोई नई
जानता। अभी तू थोड़ो शिक्षा ले। इस त्रियाचरित्र
आगे सुदर्शन तो क्या, बड़े बड़े ऋषि-मुनि भी डोर
गए हैं।"
"अर्थात् अब महारानीजी स्वयं अपना जाल फेला
एगी। ठीक है, हम भी देख लेंगे कि आप कितनी निपुरू
हैं । कपिला के जाल से छूटा हुआ शिकार रानी अभया
जाल में फंस गया तो कपिला सदा के लिए अभया के
दासी हो जायगी।"
"देख लेना। प्रतिज्ञा करती हूं कि एक वर्ष के भीत
सुदर्शन को अपनी ओर आसक्त कर लूंगी और उस
चरित्र को खण्डित करके बता दूंगी। यदि मैं ऐसा नहीं में
सकी तो अपने प्राण त्याग दूंगी।"
वह उत्सव रानी की इस भीषण प्रतिज्ञा केला
समाप्त हुआ।
षडयन्त
?
महल में पहुँचकर महारानी चिन्ता में निमग्न हो गई।
प्रतिज्ञा तो वह कर चुकी थी,
किन्तु वह प्रतिज्ञा पूर्ण कैसे
हो ? सुदर्शन कोई साधारण पुरुष नहीं था । उसे अपनी ओर
आकृष्ट कर लेना महारानी के लिए एक विषम समस्या
ही थी।
किन्तु महारानी को कुछ अपने सौन्दर्य का गर्व था, कुछ,
अपनी चतुराई का विश्वास था, कुछ राज्य की स्वामिनी
होने का अहंकार था, और इन सबसे बढ़कर उसे जिसका
भरोसा था, वह थी उसकी धाय पंडिता ।
पंडिता वास्तव में छल-प्रपंच करने में यथा नाम तथा
गुण ही थी। वह इस विषय की पंडिता ही थी। रानी उसे
अपने पिता के घर से ही साथ लाई थी। वाल्यकाल से ही
पंडिता ने रानी को पाल-पोसकर बड़ा किया था । अतः रानी
उसका पूर्ण विश्वास करती थी। सब तरह की गुप्त बातें
वह अपनी उस धाय को बताया करती थी। और पंडिता
ही थी, जो रानी को इस कार्य में पूरी मदद करती थी।
।
•५३
५४ सूली और मिहासन
।
अस्तु, रानी ने पंडिता को बुलाकर उस दिन की सारी
घटना सुनाई और अपनी प्रतिज्ञा को वात वताकर कहा-
"पंडिता ! यह मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है । जैसे भी
हो, सुदर्शन को तू मेरे पास ला । तेरे अतिरिक्त अन्य कोई
व्यक्ति यह दुष्कर कार्य नहीं कर सकता।"
पंडिता ने ध्यान से रानी की बात सुनी और उत्तर दिया-
"तुम निश्चिन्त रहो, रानी ! बड़ी आसानी से मैं सुदर्शन
को तुम्हारे पास ला दूंगी। मेरा इतना ही काम रहेगा।
उसके बाद तो तुम उसे अपनी ओर आकृष्ट कर लोगी न?"
"अवश्य ! तुम एक बार किसी प्रकार उसे मेरे पास ला
दो, फिर तो मै सौन्दयं, अधिकार और छल-बल से उसे अपने
वश में कर ही लूगी । लेकिन, पंडिता ! सुदर्शन सामान्य
पुरुष नहीं है । उसे यहाँ लाने में तुझे अपनो सारी बुद्धि
और शक्ति लगा देनी पड़ेगी। मैं सोच नहीं पातो कि आखिर
तु उसे मेरे महल में लाएगी कसे ?"
उत्तर में पंडिता रानी के बिल्कुल समीप खिसक आई
और फसफसा कर रानी के कान में उसने कोई बात कही।
रानी का चेहरा उसकी बात सुनकर कुछ खिल गया ।
यह पंडिता के षड़यन्त्र का आरम्भ था।
।
X
X
X
महारानी के महल में हलचल मचो हुई थी । दासियां
चिन्ता में डूबी हुई इधर से उधर भाग थी दौड़ रही थी
किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे ! महा.
पड्यन्त्र ५५ रानी अभया की तबियत एकाएक विगड़ गई थी। किसी भी उपचार से वे स्वस्थ नहीं हो रही थी। राजवैद्य हरान थे। उन्हें महारानी का रोग समझ में ही नहीं आ रहा था, उपचार करते तो क्या करते ? रानी चिल्ला रही थी, उन्होंने अपने आभूषण तथा वस्त्र उतार कर फेंक दिए थे। कभी वे थर-थर काँपने लगती थी। चिन्ता सवको ही रही थी, किन्तु उपचार किसी को कोई सूझ नहीं रहा था। कुछ दासियाँ दौड़ी-दौड़ी महाराजा दधिवाहन की सेवा में उपस्थित हुई और निवेदन किया- "महाराज ! शीघ्र पधारिये। महारानी अभया की स्थिति गम्भीर है। न जाने उन्हें क्या हो गया है ? राज- वैद्य हैरान हैं। क्षणभर का भो विलम्ब न करें महाराज!" महाराजा तुरन्त महारानी के महल में पहुंचे । आ कर उन्होंने रानी की स्थिति को देखा और जानने का प्रयत्न किया कि उन्हें क्या पीड़ा है। किन्तु उत्तर में रानी और भी अधिक जोर से चीखने-चिल्लाने और कांपने लगी। महाराजा भी चिन्तित हो गए। राजवैद्य की तरफ उन्होंने प्रश्नभरी निगाहों से देखा, किन्तु राजवैद्य उत्तर में केवल नीची दृष्टि करके मौन रह गए। उपयुक्त अवसर देख कर पण्डिता ने महाराज से कहा- -
५६ सूली और सिंहासन
"महाराज ! आज्ञा हो तो सेविका कुछ निवेदन करना
चाहती है।"
"हाँ हाँ, पण्डिता ! कहो, तुम तो महारानी के सार
हमेशा रहती हो। क्या तुम महारानी की अस्वस्थता ।
बारे में कुछ बता सकती हो ?"
महाराजा की आज्ञा पाकर पण्डिता ने कहा-
"महाराज ! मेरी समझ से महारानी की अस्वस्थता
का एक ही कारण हो सकता है। वह यह, कि जव बाप
युद्ध के लिए गए थे, तब पतिव्रतो महारानी ने आपकी
कुशलक्षेम के लिए अनेक प्रकार से पूजा-पाठ किया था तया
कामदेव की ऐसी मनौती भी की थी कि हे कामदेव ! जय
नहाराजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके कुशलपूर्वक लौट
आएंगे, तब मैं आपकी विधिपूर्वक पूजा करूंगी तथा उससे
पूर्व एक पतिव्रता स्त्री की भाँति अपने महल से बाहर
कदम नहीं रखूगी। किन्तु जब आप पधारे, तब आपसे
मिलने की प्रसन्नता में वह अपनी प्रतिज्ञा को भूल गई।
मेरी तुच्छ बुद्धि में यह आता है कि महारानी पर इस
कारण से देव का प्रकोप हुआ है।"
"हूँ, यही कारण हो सकता है। महारानी ने भूल की।
किन्तु अब इसका उपाय क्या है ?"-महाराजा ने
पूछा।
"महाराज ! मेरे विचार से आप देव की पूजा का भार
पड्यन्त्र ५७
अपने ऊपर लेकर पूजा कीजिए । देव तुप्टमन होंगे और
महारानो स्वस्थ हो जाएंगी।"
"ठीक है । किन्तु पूजा किस प्रकार करनी होगी ?"
"महाराज ! आप शुद्ध जल से स्नान करके देव से
प्रार्थना कीजिए कि वे महारानी को स्वस्थ कर दें । देव को
आप वचन दीजिए कि आप विधिपूर्वक उनका पूजन
करेंगे। तथा स्वस्थ हो जाने पर स्वयं महारानी भी
उत्साहपूर्वक आपका पूजन करेंगी तथा पूजन पूर्ण हो जाने
पर ही अब अपने महल से बाहर निकलेंगी।'
पण्डिता की
सलाह
के
अनुसार राजा दधिवाहन ने
देव से प्रार्थना की । प्रार्थना पूर्ण हो जाने पर पण्डिता ने
पूर्व-निश्चित संकेत के अनुसार रानी अभया के
शरीर का स्पर्श किया और देव को सम्बोधित करके
कहा--
"हे देव ! आप महाराजा की प्रार्थना स्वीकार करके
महारानी पर से अपना प्रकोप हटा लीजिए। महारानी से
भूल हो गई, किन्तु आप उन्हें क्षमा करें। स्वस्थ हो
जाने पर वे विधिपूर्वक आपकी पूजा करेंगी और
पूजा समाप्त न होने तक वे महल से बाहर नहीं
निकलेंगी।"
षड्यन्त्र का चक्र अब घूमने लगा था। पण्डिता की
वात समाप्त होते ही महारानी उठकर बैठ गई। पण्डिता
कहा
ने
५८ सूली और सिंहासन
!
"देखिए महाराज ! मैंने ठीक कहा था न ! महारानी
पर देव का ही प्रकोप हुआ था । अब आप कोषाध्यक्ष तथा
अन्य राजकर्मचारियों को आवश्यक आदेश दे दोजिएम
महारानी कामदेव की पूजा करेंगी। उसके लिए बावस्या
'धन तथा अन्य सुविधाएं महारानी को इनको इच्छा के
अनुसार प्राप्त होती रहें । द्वारपालों को भी आदेश कर
कि उत्सव के कारण वार-बार होने वाले आवागमन
किसी प्रकार की वाधा न डालें।"
रानी के स्वस्थ हो जाने से राजा बड़े प्रसन्न
उन्होंने पण्डिता की समझदारी की प्रशंसा करते हुए उस
कहने के अनुसार आवश्यक आज्ञाएं कर्मचारियों को दे दो
धीरे-धीरे महारानी के कक्ष में एकान्त हो गया। उन
अतिरिक्त अब वहाँ केवल एक ही व्यक्ति बचा था-प्रपा
पण्डिता 'पण्डिता'।
रानी या राक्षसी ?
दिन नगर
से
कार्तिक मास की पूर्णिमा । चम्पापुरी में इस दिन
बड़ी धूमधाम से कौमुदी-महोत्सव मनाया जाता था । उत्सव
मुख्य रूप से स्त्रियों का था। राजधानी के सारे पुरुष उस
वाहर
चले जाते थे और स्त्रियाँ स्वतन्त्रता
पूर्वक आनन्द-क्रीड़ा करती थीं।
कौमुदी-महोत्सव से कुछ दिन पूर्व से ही पंडिता ने
कामदेव की पूजा आरम्भ कर दी थी। उसके लिए उसने
लिए उसने कामदेव की एक सुन्दर मूर्ति बनवाई थी।
मूर्ति की आकृति बहुत कुछ सुदर्शन की आकृति से मिलती
जुलती थी। उस मूर्ति को वह प्रतिदिन दासियों के सिर
पर रखवाकर धूम-धाम और गाजे-बाजे के साथ महल से
वाहर प्रातःकाल ही ले जाती थी और दिन भर नगर में
चुमा फिराकर सायंकाल होने पर अन्धेरा होते-हं'ते महल
में लौटा लाया करती थी।
कौमुदी महोत्सव के लिए महाराजा दधिवाहन ने
समस्त प्रजा को आदेश दे दिया था। आदेश के अनुसार
सभी पुरुषों को महोत्सव के दिन नगर से बाहर जाना था।
५६
६० मूली और सिंहासन
में
राज-घोषणा सुदर्शन ने भी सुनी। उसने विचार किया
कि जो लोग राग-रंग और
धूम-धाम आनन्द लेते है.
उनके लिए तो यह उपयुक्त अवसर है। वे पूर्णिमा के दिन
नगर से बाहर जाकर आनन्द करेंगे। किन्तु स्वयं सुदर्शन
को तो उस दिन कार्तिक की पूर्णिमा-चातुर्मास की
अन्तिम तिथि होने के कारण धर्म-ध्यान करना था। उसके
लिए उसका नगर में ही रहना आवश्यक था। विचार
करके सुदर्शन ने राजा से अपने लिए विशेष आज्ञा लेने
का निश्चय किया।
सुदर्शन राजा दधिवाहन के पास गया और उनसे
निवेदन किया-
"आपकी आज्ञा के अनुसार महोत्सव के दिन सभी
पुरुषों को नगर से बाहर जाना है। किन्तु मेरे सामने एक
धर्मसंकट उपस्थित हुआ है। चातुर्मास की अन्तिम पक्ष
तिथि है। मैं दिन भर धर्मध्यान करना चाहता हूँ। आपकी
कृपा हो तो मैं इस आशा से मुक्त रहकर नगर में ही रहना
चाहता हूं।"
नुदर्शन के चरित्र और उसकी धर्मनिष्ठा को राजा
अच्छी तरह जानते थे। वे स्वयं एक चरित्रवान पुरुष थे।
अतः सुदशन की प्रार्थना को सुनकर उन्हें प्रसन्नता ही हुई
कि चलो, मेरे राज्य में एक ऐसा श्रेष्ठ व्यक्ति तो है, जिसकी
दृष्टि में सांसारिक आनन्द उल्लास से अधिक धर्म के प्रति
प्रेम है। अतः उन्होंने बड़ी प्रसन्नता-पूर्वक कहा-
-
रानी या राक्षसी ? ६१
जिसने इस
"सुदर्शन ! मुझे तुम पर गर्व है । ऐसे पुरुप जिस राजा
के राज्य में हों, वह सचमुच ही भाग्यशाली हैं । मैं तुम्हें
अपनी इस आशा से मुक्त करता हूँ। तुम प्रसन्नतापूर्वक
नगर में ही रह कर धर्मध्यान करो।'
आज्ञा पा कर और महाराज को प्रणाम करके सुदर्शन
प्रसन्न मन से अपने घर लौट आया।
लेकिन राजा की इस आशा से केवल सुदर्शन ही
प्रसन्न नहीं था । एक और भी व्यक्ति था,
आज्ञा को सुना और मन ही मन वह अत्यन्त हर्षित हुआ।
वह व्यक्ति कौन था?
पंडिता।
पंडिता ने जब सुना कि महोत्सव के समय नगर
के सब लोग नगर से बाहर रहेंगे और केवल सुदर्शन हो
नगर में रहकर धर्मध्यान करेगा तो उसने सोचा कि अब
उसका काम और भी आसान हो गया है। उसने यह
प्रसन्नता का समाचार जा कर रानी अभया को सुनाया।
‘रानी ने
कहा-
"यह तो ठीक है कि सुदर्शन अकेला रहेगा। लेकिन
इससे क्या ? तू उसे यहाँ ले कर आएगी कैसे ?"
एक कुटिल हँसी हंसते हुए पंडिता ने उत्तर दिया-
सुदर्शन पौषधवत ले कर ध्यान में बैठा होगा।
।
?
६२ मूली और सिंहासन
-
मैं दासियों को ले जा कर उसे उठा लाऊँगी।
महारानीजो ! आप चुपचाप देखिए कि मैं किस कुशलता
से उसे यहाँ ले आती हूं। यहाँ लाने के बाद तो आप उसे
अपना बना लेंगीन ?"
रानी को यदि सन्देह था तो यही कि पंडिता सुदर्शन
को उसके महल में कैसे लाएगी। उसे इस बात का तो
निश्चय था कि एक बार सुदर्शन यहाँ आ जाए, फिर तो
उसके रूप के प्रबल आकर्षण से वह स्वयं ही खिंच जाएगा
और उसका दास बन जाएगा। अतः उसने पंडिता से इतना
ही कहा-
"तू सुदर्शन को एक बार यहाँ लेकर आ तो सही।"
पौषधशाला का वातावरण एकदम शान्त और स्वच्छ
मा। किसी प्रकार का शोरगुल नहीं, किसी प्रकार का
आडम्बर नहीं। वहाँ पर योग्य स्थान पर एक तेजस्वी
व्यक्ति मौन हो कर ध्यानमुद्रा में बैठा हुआ था। उसके
कान्तिमान चेहरे को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो
स्वयं कामदेव किसी विशेष साधना में तत्पर हो कर
च्यानस्थ बैठे हों।
यह व्यक्ति हमारा चरित्रनायक सुदर्शन था।
सुदर्शन राजा की आज्ञा पा कर याज प्रातःकाल से
पोपवत लकर यहां ध्यानस्थ था। अब धीरे-धीरे सन्ध्या
हो चली थी। उसी समय कुछ विश्वस्त दासियों के सिर
रानी या राक्षसी? ६३, र कामदेव की मूर्ति को रख कर पंडिता वहाँ आई। जाज उसने कामदेव की मूर्ति को वैसे ही सादे वस्त्र पहनाए , जैसे पौषध के समय पहने जाते हैं । इसके अतिरिक्त हम पने पाठकों को यह चुके हैं कि पंडिता ने रामदेव की मूर्ति बहुत कुछ सुदर्शन की आकृति से मिलती- तुलती बनाई थी। तो वता ही पंडिता ने पौषधशाला में जा कर कामदेव की उरा ति को तोड़-फोड़ कर एक एकान्त स्थल पर फेंक दिया। सके बाद वह सुदर्शन के समीप आई और उससे कहा- "सेठ सुदर्शन ! आपने पौषधव्रत लिया है और आप यान में लीन हैं। मैं आपको किसी विशेष प्रयोजन से कसी विशेष स्थान पर ले जाने के लिए आई हूं। आप [पचाप इसी तरह से बैठे रहिएगा। आप कुछ भी बोलें हीं। वस्तुतः मेरे ऐसा कहने की भी आवश्यकता नहीं , क्योंकि आप एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति हैं और अपने व्रत को प कदापि नहीं तोड़ सकते। यदि आप जरा भी बोलेंगे । हिलेगे-डुलेंगे तो आपका ध्यान टूट जायगा और व्रत- ग होगा और इससे आपकी बदनामी होगी।" सुदर्शन ने आँखें वन्द किए हुए ध्यानमुद्रा में ही डिता की बातें सुनी। उन्होंने समझ लिया कि दाल में छ काला अवश्य है । किन्तु इस समय तो वे एक समय- शेष के लिए अपने शरीर का उत्सर्ग कर चुके थे। अपने -
६४ सूली और सिंहासन
शरीर से उन्हें इस समय कोई प्रयोजन नहीं था, .
'ममत्व नहीं था। इसके अतिरिक्त कायोत्सर्ग करना स्वयं
उपसर्गों को आमंत्रित करना है। उन उपसर्गों पर विक,
'पाना, उन बाधाओं और कष्टों को झेल कर अपनी कायार
विजय पाना ही इस तपस्या का लक्ष्य है ।
सुदर्शन ने विचार किया कि यह प्रतिकूल परिषह भार
है। किन्तु अब उस पर विजय तो पाना ही होगा। इस प्रति
कूल परिषह से घबरा कर अपने व्रत को तोड़ देना तोकापर
ता और पाप होगा। उन्होंने यह भी विचार किया कि अधिर
मे अधिक यह जो भी व्यक्ति यहाँ आया है, उसके शरीर
कहीं ले जा कर नष्ट ही तो कर देगा ? भले ही वह ऐ.
कर दे, भले ही वह उसे कितनी भी पीड़ा पहुँचाए, कि
बत अखंड ही रहना चाहिए...
यह विचार करके सुदर्शन एक श्रेष्ठ तपस्वी को भाग
पंडिता की सारी बात सुनकर भी विचलित नहीं हुआ और
शान्त रह कर अपने ध्यान में मग्न रहा ।
और दुष्टा पंडिता ने दासियों से सुदर्शन को उठवा गा
कामदेवमूर्ति के समान उनके सिर पर रखवाया और
तरह गाजे-बाजे के साथ उसे महल की ओर ले चलो।
प्रतिदिन कामदेव की मूर्ति इसी प्रकार नगर
कर महल में वापस लाई जाती थी। आज भी वाला
रही थी। अतः किसी भी व्यक्ति को कोई सन्देह नहीं है,
रानी या राक्षसी?
.
.
द्वारपालों की दृष्टि को भी चतुर पंडिता ने इसी तरकोव से
धोखा दे दिया और कामदेव की मूत्ति के रूप में सुदर्शन को
'उठा कर वह रानो के महल में ले आई।
महल के एकान्त कक्ष में सुदर्शन को विठा कर पंडिता
ने रानी अभया को सूचित किया। रानी तो सुदर्शन के आने
की राह में पलकें विछाए बैठी ही थी । वह अपना श्रेष्ठतम
आज-शृगार करके तुरन्त उस कक्ष में आई।
उत कक्ष में सुदर्शन और रानी के अतिरिक्त अन्य कोई
भी व्यक्ति उस समय नहीं था।
अथवा यह भी कहा जा सकता है कि एक नागिन थी
और उसके सामने था उसका एक सुन्दर शिकार ।
रानो वोली, अथवा नागिन ने फूत्कार
किया-
'अरे ! मेरे कक्ष में यह कौन छिपकर बैठा है? आकृति
से तो यह सुदर्शन सेठ जैसा लगता है। तव क्या तुम सुदर्शन
सेठ ही हो ? राजा ने तो तुम्हें धर्मध्यान करने के लिए आज
के दिन नगर में रहने की आज्ञा दी थी, और तुम हो कि
एक पापो चोर की भांति मेरे कक्ष में छिपे बैठे हो ? तुम्हें
तो लोग बड़ा धर्मात्मा आदमी समझते थे और तुम वास्तव
में इतने गिरे हुए पुरुष
निकले !"
वस्तुत: सुदर्शन को शान्त, ध्यानमुद्रा में बैठे देख
हो उसके यौवन और रूप को देखते ही पानी-पानी हो गई
थी। वह आतुर हो चली थी कि कव सुदशन उस पर
?
६६ सूली और सिंहासन
आसक्त होकर उसके प्रेम की भिक्षा उससे मांगे। किन्तु वः
चतुराई से सुदर्शन को अपने वश में करना चाहती थी।
साम-दाम-दंड-भेद, किसी भी मार्ग का आश्रय वह से
सकती थी।
कक्ष में आते ही रानी ने जो कुछ कहा था, वह सुदर्शन
के मन में भय का संचार करने के लिए। उसने सोचा था
कि इस प्रकार सुदर्शन जब देखेगा कि उस पर रानी में
महल में चोरी से घस आने का आरोप लगाया गया है. तब
वह अपने सम्मान और प्राणों के भय से स्वय को रानो को
इच्छा पर छोड़ देगा और जैसा रानी चाहेगी,वैसा ही करेगा।
किन्तु सुदर्शन ने रानी के कथन को शान्ति से सुना और
वह मौन ही रहा।
सत्य की दृढ़ आधार-शिला पर खड़े हुए संकल्पवान
वीर पुरुष किसी भी भय से डिगते नहीं।
सुदर्शन भी ऐसा ही एक वीर पुरुष था।
उसे मौन देखकर रानी ने कहा-
"देखो सुदर्शन ! इस तरह काम नहीं चलेगा। वस्तुतः
मैं तुम पर मोहित हूँ। तुम्हारा प्रेम चाहती हूँ। यौवन
और सौन्दर्य का सागर मेरी देह में लहरा रहा है । और
तुम जानते हो कि मैं यहाँ की महारानी हूँ, जो चाहूँ, वर
कर सकती हूँ। मेरे एक इशारे पर तुम्हारे प्राण ले लिए
जा सकते हैं। एक ओर तुम्हारे लिए मृत्यु है और दूसर
रानी या राक्षसी ? ६७
ओर चम्पानगरी की अनन्त सौन्दर्यवती महारानी का प्रेम।
बोलो तुम इन दोनों में से क्या चनते हो ? तुम नगर सेठ
हो, नगर में तुम्हारी प्रतिष्ठा है। यदि तुम मेरी बात को
स्वीकार नहीं करोगे तो जानते हो क्या परिणाम होगा?
मैं तुम पर लांछन लगाऊंगी। सारी प्रजा मेरी ही बात को
पत्य मानेगी और तुम्हें ढोंगी, पापी, नीच कह कर तुम पर
यकेगी। महाराजा तुम्हें प्राणदड देंगे । इस प्रकार अपनी
प्रतिष्ठा को नष्ट कर देने से क्या लाभ ? स्पष्ट है कि तुम्हारे
लिए एक ही मार्ग है- मुझसे प्रेम करो । मेरे प्यासे हृदय
को शान्त करो। मुझे अपने हृदय से लगा लो। तुम्हें वचन
तो हूँ कि यह बात बिलकुल गुप्त रहेगी और हम एक दूसरे
से आजोवन प्रेम करते रहेंगे।
सुदर्शन मौन, निश्चल !
"सुदर्शन! मूर्खता मत करों । देखो, मैंने अब तक तुम्हारे
पाथ कोई कठोरतो का व्यवहार नहीं किया है, किन्तु तुम
जानते हो मेरी शक्ति को । अत: मेरी बात मानो, उठो और
मेरे साथ दाम्पत्यसुख को भोगकर अपनी तपस्या का
फल पाओ।"
सुदर्शन अविचलित!
तब रानी स्वयं विगलित होकर अनुनय कर उठी-
"प्रिय सुदर्शन ! देखो, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। तुमसे
प्रार्थना करती हूँ, तुम्हें अपना सर्वस्व समर्पित करती हूँ।
पदि सदा सदा के लिए, नहीं तो, एक बार-केवल एक वार
-
६८ मूली और सिंहासन
-
मुझे अपने गले लगा लो । में इसो की याद में अपना ग
जोवन काट दूंगी । सुदर्शन ! मुझ पर दया करो.'
और सचमुच ही रानी सुदर्शन के पैरों पर अपना नि:
रख कर फूट-फूटकर रो पड़ी।
रानी रोती रही और सुदर्शन विचार करता रहा-
'रानी मोह में फंस गई है । क्षणिक सुख की लालसा में
यह अपने पवित्र पातिव्रतधर्म को नष्ट कर देना चाहती है,
और साथ ही मेरे शील को भी भंग करना चाहती है, । में
अपने प्राण तो दे सकता हूँ', किन्तु अपने धर्म को, नरिय को
नष्ट नहीं कर सकता। रानी मेर सौन्दय और यौवन पर
मोहित होकर करणीय अथवा अकरणीय सभी कार्य
कर सकती है । यहाँ तक कि राजा की हत्या करके अपना
आकांक्षापूर्ति के लिए मुझं राजा भी बना सकती है। किन्तु
अपने धर्म को खंडित करके राज्य और विलास के मस को
लेकर क्या में कभी सुखी हो सकता हूँ ? इसके अतिरित.
जो स्त्री अपने विवाहित पति की हत्या करके अन्य पुष
अपना सम्बन्ध कर सकती है, उस स्त्री के प्रेम का क्या
विश्वास ? यह कुकृत्य करने पर उतारू हो गई है । इमे में
कैसे समझाऊं? अव मेरा क्या कर्तव्य है........'
सुदर्शन के मन में यही विचार चल रहे थे । सनी ने
जब देखा कि उसकी प्रार्थना पर सुदर्शन जरा भी विमल
नहीं हुआ है, तब उसने निश्चय किया कि अब भय दिया
के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है । यह विचार
?
से
-
---
रानी या राक्षसी ? .६६ वह क्रोध से जल उठी। उसकी भ्र कुटियाँ तन गईं, आँखें अंगारों की भांति जलने लगीं । क्रुद्ध सपिणी की भांति वह भयंकर फूत्कार उठी- "सुदर्शन ! आखिर तू रहा एक बनिया ही। और वनिया हो कर तेरा ऐसा साहस ! तू चाहे नगरसेठ हो, किन्तु है तो मेरी प्रजा ही। तेरा जीवन मेरी कृपा पर निर्भर है। जब तुझसे प्रार्थना कर रही हूँ, अनुनय-विनय कर रही हूँ, तब तू सुनता नहीं और अपने अहंकार में डूवा जा रहा है। लेकिन तू यह वात अच्छी तरह समझ ले कि प्रसन्न होने पर मैं कल्पलता के समान हूँ, किन्तु क्रोधित हो जाने पर प्राण ले लेने वाली तलवार की धार हूँ। मैं अन्तिम वार तुझसे कहती हूँ, ध्यान से सुन ले । यदि मेरी वात तू स्वीकार कर लेगा तो मैं तेरी दासी बनकर रहूँगी, तुझे अपना सर्वस्व सौंप दूंगी। किन्तु यदि तू अब भी मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं तेरे प्राण ले लूगी । बोल, तू क्या चाहता है ? जीवन और आनन्द अथवा मृत्यु ?" रानी अब राक्षसी वन चुकी थी। कोई भी सामान्य व्यक्ति उसके इस विकराल रूप और उसके इस भयंकर क्रोध के सामने भयभीत हो जाता। किन्तु हमारा चरित्रनायक सुदर्शन असाधारण वीर पुरुष था। सत्य और धर्म की तुलना में संसार की कोई भी अन्य वस्तु उसके लिए हीन थी । वह धर्मनिष्ठ जीवन व्यतीत करता था, किन्तु उसे जीवन से
७० सूली और सिंहासन
कोई मोह नहीं था। और नश्वर जोवन से जिसे मोहनी
उसे मृत्यु का भय कैसे हो सकता है ?
सुदर्शन ने अब विचार किया कि रानी को मति मा.
गई है, केवल मौन रहने से वह समझगी नहीं । अतः से
अपने ध्यान को पूर्ण करके रानी को सपझा कर उसे मार
से मुक्त करना चाहिए। यह उसका कर्तव्य भी है।
सुदर्शन ने ध्यान भंग किया। मुख पर एक गधुर मुस्त
राहट ला कर उसने रानी अभया से कहा-
माता ! क्रोध तथा मोह को त्याग दीजिए। विचार
कीजिए कि आप महारानी हैं और सारी प्रजा की माता हैं।
मैं भी आपकी प्रजा हूं, और इस नाते आपका पुटा हूँ।
गुरुपत्नी, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता तथा स्वयं अपनी
माता के अतिरिक्त राजा की पत्नी भी माता होती है।
और वह माता सबसे बड़ी होती है। आपको वही गौरव
पद प्राप्त है। आवेश को त्याग कर अपनी स्थिति पर
विचार कीजिए। आप मुझे जो कार्य करने को कह रही है.
वह किसी भी प्रकार से योग्य नहीं, न मेरे लिए, न आगो
लिए।
"आपने अपना निश्चय मुझे सुना दिया है। मैं भी
अपना निश्चय आपको बता रहा हूँ-मेरुपर्वत डिग नात
है, पृथ्वी अपना आधार त्याग सकती है, सूर्य प्रकाश
स्थान पर अन्धेरा दे सकता है, संसार का प्रत्येक अगंभ।
संभव हो सकता है, किन्तु यह अच्छी तरह जान लीहि:
रानी या राक्षसी ? ७१ - .. कि मैं अपने धर्म को कभी भी नहीं छोड़ सकता, परस्त्री मेरे लिए माता के समान रही है और रहेगी। मैं आपकी प्रत्येक आज्ञा मानने के लिए प्रस्तुत हूँ, किन्तु वे अनतिक नहीं होनी चाहिए, धर्म के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। "आपने मुझे पौषध के समय यहाँ मंगवाया है। आपके इस अपराध को मैं क्षमा करता हूँ। किन्तु यह निश्चित मानिए कि जिस उद्देश्य से आपने मुझे बुलाया है, वह कभी पूर्ण नहीं होगा। आपके प्रलोभन व्यर्थ हैं, प्रार्थना अर्थहीन है और आप जो मृत्यु का भय मुझ दिखा रही हैं, वह भी निरर्थक है । मृत्यु का मुझे कोई भय नहीं है। यदि अब भी आप सन्मार्ग पर चलना चाहें तो उसमें आपका और मेरा दोनों का कल्याण है, किन्त यदि आपका निर्णय नहीं वद- लता है तो मेग भी निर्णय अटल है-आप चाहें तो मेरे प्राण ले सकती हैं, अपना धर्म आपको नहीं दूंगा।" कोई विवेकवती नारी होती तो सुदर्शन का यह सदुप- देश उसके ज्ञान-नेत्र खोल देता । किन्तु रानी अभया मोह से ग्रसित थी। उसे सुदर्शन की वे बातें और भी कटु लगीं। ज्ञानी पुरुषों ने ठीक ही कहा है- 'कामान्ध व्यक्तियों को कोई उपदेश फल नहीं देता।' अस्तु, सुदर्शन के मौन होते ही अभया गर्ज उठी- "मुझे माता कहने का साहस न कर और अपने ये उपदेश अपने पास ही रख । मैं कपिला नहीं हूँ कि तेरे वाग्जाल में फंस जाऊँ। तूने कपिला को तो अपने आपको -
७२ सूली और सिंहासन
नपुंसक कहकर धोखा दे दिया, किन्त मुझसे बच कर तुन
जा सकता। अब भी समय है, विचार कर ले। मेरे यहां
था तो तू मेरी इच्छा की पूर्ति करके ही जा सकता है।
सीधा मृत्यु के द्वार पर ही। यदि एक बार मैने सैनिकों
बुला कर तुझे उनके हवाले कर दिया, तब फिर तेरी मुरि
नहीं है। फिर तेरी प्रार्थना पर भी कोई ध्यान नहीं दूंगी
ऐसा करने का अर्थ होगा मेरी अपनी बदनामी । अत: अपन
अन्तिम उत्तर मुझे दे, बोल क्या चाहता है ?"
अन्य कोई व्यक्ति होता तो भय से अथवा आकर्षण
अभया जैसी सुन्दरी स्त्री को पा कर धर्म से पतित ।
जाता। किन्तु सुदर्शन एक अडिग चट्टान की भांति दिन
ही रहा ।
रानी ने जव सुदर्शन को मौन ही देखा तो उसने य
मान लिया कि सुदर्शन डिगेगा नहीं। कोई भी आगर
-मृत्यु का भय भी इसे विचलित नहीं कर सकेगा।
उसने अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया।
रानी ने अपने ही हाथों से अपने वस्त्र कुछ फाड़ हाले
जालों तया स्तनों पर अपने नखों के चिह्न बना लिए और
घंटा बजाकर सैनिकों को आवाज दो।
भय के घंटे की आवाज तथा रानी की पुकार सुनकर
महल के रक्षक तुरन्त उस कक्ष में दौड़े आए। जो मार
करके रानी ने क्रोध से भर कर कहा-
रानी या राक्षसी ? ७३:
"रक्षको ! क्या तुम लोग सोते रहते हो? तुम्हारा
पहरा होते हुए भी
यह
पापी यहाँ कैसे चला आया? इस
दुष्ट को पकड़ लो। इसने मेरा अपमान किया है, मेरे
सतीत्व को नष्ट करने का प्रयत्न किया है । देखते नहीं हो,
इसने मेरे वस्त्रों को फाड़ दिया है, मेरे अंगों को नोंच डाला
है। यह तो मैं थी, इसलिए इसके चंगुल से बच गई, कोई
अन्य स्त्री होती तो यह पापी उसके शोल को नष्ट ही कर
देता । शीघ्रता करो, इस दुष्ट को वन्दी बना कर ले जाओ
और सूली पर लटका दो । मेरी प्रतिज्ञा है कि जब तक इसे
सूली पर न चढ़ा दिया जायगा, में अन्न-जल ग्रहण नहीं
करहेंगी।"
आदेश दे कर रानी भीतर के कक्ष में चली गई। सैनिक
सुदर्शन को बन्दी बनाने के लिए आगे बढ़े। सैनिकों के
नायक ने सुदर्शन को जव गौर से देखा तो उन्हें पहचान
लिया। उसे घोर आश्चर्य हुआ। वह विचार करने लगा
कि सुदर्शन जैसा धार्मिक तथा चरित्रवान व्यक्ति कैसे ऐसा
नीच कार्य कर सकता है ? बात तो यह असंभव है, लेकिन
फिर ये यहाँ आए कैसे ? क्यों आए ?
?
नायक इसी उधेड़बुन में पड़ा था। उसे यह विश्वास
ही नहीं होता था कि सुदर्शन सेठ जैसा सदाचारी व्यक्ति
कभी ऐसा कार्य कर सकता है। अन्त में उसने इस रहस्य
को स्वयं सुदर्शन से ही पूछने का निश्चय किया। उसने
पूछा-
७४ सूली और सिंहासन
सेठजो! सारा नगर आपको सदाचारी मानता है।
मुझे भी विश्वास नहीं होता उन बातों पर, जो महाराने
ने कही हैं। किन्तु महारानी ने आप पर अभियोग लगा
है, वह आपने सुना ही है । इसलिए हम आपसे पूछते हैं ।
आखिर यह रहस्य क्या है ? वास्तविक बात आप ही बता
सकते हैं। कृपा कीजिए और हमें बताइये कि आप यह
क्यों और कैसे आए, ताकि हम आपको सुलो पर चलाने में
'पापकर्म से बच सकें।"
सुदर्शन ने शान्तिपूर्वक नायक की बात सुनी । किन
उसने विचार किया कि रानी उसकी माता हैं, वह उन्हें
माता कह चुका है। अब यदि वह वास्तविक बात नायर
को बता देता है तो माता अपमानित होंगी, राजा के द्वारा
उन्हें दंड भी दिया जायगा। तब क्या मैं अपनी माता को
अपमानित होने दूं? क्या उन्हें दंडित होने दूं? नहीं, पुस
का यह कर्त्तव्य नहीं है । पुत्र का कर्तव्य है कि वह स्वय
सव प्रकार का कष्ट सहकर भी अपनी माता की रक्षा करे.
उसके सम्मान की रक्षा करे।
यह विचार करके सुदर्शन ने अपने प्राणों का मा.
त्याग दिया और रानी अभया के सम्मान की रक्षा की
के लिए उसने मौन ही रहने का निश्चय किया ! नायन
प्रश्न के उत्तर में वे मौन ही रहे, केवल एक निर्दोष, मथर
मुसकान उनके चेहरे पर झलक उठी।
नायक ने बहुत प्रयत्न किया, किन्तु सुदर्शन ने
बार जो निश्चय कर लिया, वह पत्थर की लकीर हो गया
2
.
रानी या राक्षसी ? ७५
के
उसके किसी प्रश्न के उत्तर में उन्होंने एक शब्द भी अपनी
रक्षा के लिए नहीं कहा।
हार कर नायक ने निश्चय किया कि सुदर्शन सेठ को
महाराजा सम्मुख उपस्थित कर दिया जाय । महाराजा
स्वयं सारी घटना को जान कर उचित निर्णय कर देंगे।
उसने सैनिकों को आदेश दिया--
"सेठ सुदर्शन का हम सम्मान करते हैं। किन्तु रानी
इन पर अभियोग लगाया है, और ये उत्तर में केवल
मौन हैं । अत: इन्हें महाराजा की सेवा में उपस्थित करो।"
सैनिकों के पहरे में बन्दी सुदर्शन राजा दधिवाहन के
सामने उपस्थित किए जाने के लिए ले जाए गए।
ने
अभियोग और दण्ड
रक्षकों के पहरे में वन्दी सुदर्शन रात में ही महाराज
दधिवाहन के सामने ले जाए गए। महाराजा उस समय
नगर से बाहर अपने डेरे में थे । रक्षकों के नायक ने महा-
राजा से निवेदन किया-
"परम भट्टारक महाराज दधिवाहन की विजय हो !
सेठ सुदर्शन इस समय महारानी के कक्ष में पाए गये है
महारानी ने नगरसेठ पर अभियोग लगाया है कि वे महा
रानी का अपमान करना चाहते थे, उनके सतीत्व पर वे
आक्रमण करने को प्रस्तुत थे
। महारानी ने नगरसेट को
तुरन्त सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया है। किन्तु मै नगर
सेठ को आपके सामने लाया हूँ, आपका आदेश प्राप्त करने
के लिये । महाराजा निर्णय दें।"
सुदर्शन को इस अवस्था में देख कर और नायक हारा
घटना का वर्णन सुनकर राजा दधिवाहन आश्चर्य में
कर कुछ समय के लिए विजड़ित हो कर रह गये । यह क्या
असंभव वात वे सुन रहे हैं ? परम सदाचारी सुदर्शन थोर
यह जघन्य कृत्य ! क्या यह संभव है ? क्या सूर्य भी कभी
अन्धकार दे सकता है ? नहीं, यह सभव नहीं'
अभियोग और दण्ड ७७ - ! कुछ देर बाद महाराजा दधिवाहन बोले- "नायक ! तुम जा सकते हो । सुदर्शन सेठ को सम्मान- 'पूर्वक विश्राम करने दो । मैं प्रातःकाल उनसे बात करूंगा।' महाराजा को प्रणाम करके नायक सुदर्शन सहित चला गया। उसके चेहरे पर सन्तोष को झलक थी, मानो उसे विश्वास हो गया हो कि सदाचारी' सुदर्शन ऐसा कुकृत्य नहीं कर सकते और महाराजा दधिवाहन अवश्य ही उनसे वास्तविक वात को जान लेंगे। महाराजा ने अच्छा ही किया कि किसी आवेश में आ कर उन्होंने कोई निर्णय नहीं दिया। . और महाराजा दधिवाहन को सारी रात नींद नहीं आई। चे विचार करते रहे-अवश्य ही कोई रहस्य है इस घटना के पीछे । सुदर्शन जैसा व्यक्ति किसी बुरे प्रयोजन में इस रात्रि के समय मेरे महल में नहीं जा सकता। वह महा- रानी का अपमान करने जैसा कुकृत्य भी नहीं कर सकता। देखुंगा, प्रातःकाल उससे पूछूगा, रहस्य का पता तो लगाना ही होगा। : प्रातःकाल होने पर महाराजा दधिवाहन स्वयं ही सुद- शंन के पास गये और उनसे पूछा- "नगरसेठ ! आप पर जो अभियोग लगाया गया है, उस पर मुझे विश्वास नहीं होता। आपके आचरण को मैं भी जानता हूँ और सारी प्रजा भी। अतः आपसे पूछता हूँ कि ७८ सूली और सिंहासन माप बताएं कि आप रात्रि को महारानी के महल में कैसे और क्यों गए ?" किन्तु सुदर्शन ने तो इस विषय में मौन धारण कर लिया था। उन्हें मृत्यु का आलिंगन कर लेना स्वीकार था. किन्तु वे महारानी की प्रतिष्ठा को कलंकित नहीं करना चाहते थे । वे यह भी नहीं चाहते थे कि महारानो के आय. रण को जान कर परमकृपालु महाराजा दधिवाहन बाट पाएं । यदि महाराजा को यह पता चल जाता कि रानी का वास्तविक चरित्र क्या है, तो उस उदार राजा को कितनी मानसिक पीड़ा होती? अस्तु, महाराजा के उत्तर में सुदर्शन ने कुछ भी ह. कहा । महाराजा ने बहुत प्रयत्न किया, कहा कि निस्स. च हो कर वे सारी बात बता दें, यदि कोई सामान्य अप- राध अनजाने ही सुदशन से हो भी गया होगा तो वे उसे क्षमा कर देंगे। किन्तु सुदर्शन ने अपना मौनभग नहीं के प्रश्न किया। - महाराजा बड़ी उलझन में पड़े । सुदर्शन का मौन कुछ सन्देह अवश्य उत्पन्न कर सकता था, किन्तु महाराजा को फिर भी कुछ विश्वास नहीं हुमा । उन्होंने उस, घटना की छानबीन महल में आ कर ही करने का निर्णय किया। महाराजा महल में लौट आए। धीरे-धीरे सारी प्रजा को इस घटना का पता चल गया। किन्तु प्रजा में एक भी व्यक्ति ऐसा न था, जिसे विश्वास हो सके कि सेठ सुदर्शन
अभियोग और दण्ड ७९
ऐसा कर सकते हैं । प्रत्येक नागरिक यही कहता था-ऐसा
हो नहीं सकता। अवश्य ही कोई रहस्य है। रहस्य का
पता लगाया जाना चाहिए। सुदर्शन पर लगाया गया यह
अभियोग झूठा है।
राजा दधिवाहन महारानी के महल में आए। उन्होंने
देखा--महारानी अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़ी हैं और क्रोध
से भरी हुई हैं। उन्होंने पूछा--
"क्या वात है रानी?
यह हालत क्यों बना रखी है ?
कुशल तो है न ?"
"जी, यह कुशल ही है कि मेरा सतीत्व बच गया । महा-
राज ! आज मैं लज्जा से गड़ी जा रही हूँ। आपके होते हुए
कोई
दुष्ट इस प्रकार अपमान करे और मेरा सतीत्व नष्ट
करने का साहस करे, इससे बड़ी लज्जा की बात मेरे और
'आपके लिए क्या हो सकती है ? और आपने उस दुराचारी
को अब तक जीवित रख छोड़ा है, यह और भी अधिक
लज्जा की बात है। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जब तक उस
पापी को सूली पर नहीं चढ़ा दिया जाएगा.. अन्न-जल ग्रहण
नहीं करूंगी। अव या तो वही जीवित रह सकता है या मैं
ही । आप किस विचार में पड़े हैं ? उसे प्राणदण्ड क्यों नहीं
देते ?
महाराज असमंजस में पड़े रह गये। कैसे निर्णय हो ?
वास्तविकता क्या है ? सुदर्शन कुछ बोलता नहीं, और उसके
सदाचरण पर सारी प्रजा को विश्वास है । इधर रानी
?
ने
८० सूली और सिंहासन
'पर यह भीषण आरोप लगा रही है। कैसे निर्णय लिा
जाय, क्या निर्णय किया जाय ?
उन्होंने रानी से पूछा-
"रानी! कुछ शांत होकर उत्तर दो। यह विमान
रखो कि दधिवाहन के राज्य में अपराधी बच कर नही
जायगा। उसे अपने पाप का दण्ड अवश्य मिलेगा। मिल
यह वात आखिर किस समय की है ? सुदर्शन तुम्हारेगा
में आया ही कसे ? रक्षक कहां थे ? दासियाँ स्या
रही थीं ?"
महाराज जव कहा
कि-'विश्वास रखो, दधिवाहन
के राज्य में अपराधी वचकर नहीं जाएगा, तब रानी का
कलेजा भीतर ही भोतर काँप उठा था। किंतु उत्तर में :
और भी अधिक चीख कर बोली-
"धिक्कार है मुझं कि मैं आपके जैसे राजा को पानी
हूँ। आपकी रानी का सतीत्व नष्ट करने का एक दुष्ट प्रयत्न
करे और आप केवल प्रश्न पर प्रश्न ही करते चले जांच।
कोई अन्य सामान्य व्यक्ति होता तो वह अपनी पत्नी के
सम्मान के लिये लड़ मरता। किंतु आप हैं कि विचार करने
का ढोंग कर रहे हैं। दासियाँ थकी हुई थीं। दालों को
आंखों में धूल झोंक कर वह पापी आ गया होगा, मैं का
जानूं ?"
राजा ने रानी का रूप देखा, वात सुनी और हिम
निर्णय पर नहीं पहुंच सके । वे विचार करते रहे-
--
-
अभियोग और दण्ड ८१ ऐसा कर तो नहीं सकता। यदि वह निरपराध हो और में उसे दण्ड दे दूं तो बड़ा अनर्थ होगा। प्रजा सुदर्शन को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करती है। विद्रोह कर देगी और दूसरी तरफ यदि रानो का अभियोग सत्य ही हो और अप- राधी को दण्ड न मिले, तव भो अनुचित होगा। इसी उलझन में पड़े राजा दधिवाहन फिर सुदर्शन के पास आए । उन्हें विश्वास था कि सुदर्शन बोलेगा तो सत्य ही बोलेगा। लेकिन यदि वह मौन ही रहा तो समस्या जाटिल हो जायगी। उन्होंने सुदर्शन से फिर कहा- "देखो सुदर्शन ! जो तथ्य है, वह मुझे बताओ । मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ। एक बार में रानी के कथन पर तो अविश्वास कर भी सकता हूँ, किन्तु तुम्हारे कथन पर नहीं । बोलो, कहो, यह क्या रहस्य है ?" मौन ! "तुम्हारे इस मौन का क्या अर्थ समझा जाय ? मौन का अर्थ क्या तुम्हारी स्वीकारोक्ति मानी जाय ? लेकिन उस पर मुझे विश्वास नहीं होता। आखिर तुम कुछ कहते श्यों नहीं हो ?" 1 मौन और मुस्कुराहट वह मुस्कराहट मानो कहती हो कि-राजन् ! म विवश है। झूठ में बोल नहीं सकता, और सत्य का उद्घाटन में कर नहीं सकता।
८२ सूली लौर सिंहासन
राजा ने बहुत समझाया, बहुत आश्वासन दिए, यह
कहा कि यदि तुम सत्य बात कह दोगे तो में तम्हें क्षामा क
दूंगा। किन्तु सुदर्शन को नहीं बोलना था, सो नहीं हो बोला
विवश होकर राजा लोट आया। उसने अपने प्रमा
मंत्रीश्वर को भी सुदर्शन से पास भेजा, यह विचार कार
कि शायद सुदर्शन उन्हें सत्य घटना बता दे । किन्तु परिणा
वही रहा । अन्त में राजा ने अपने मंत्रियों से सलाह लो-
"मंत्रिगण ! बड़ी समस्या है। सुदर्शन पर रानी र
अभियोग है । सुदर्शन कुछ कहता नहीं । और सुदर्शन ऐस
कृत्य भी कर सकता है, यह विश्वास नहीं होता। का
किया जाय?"
मंत्रियों ने विचार करके कहा-
"राजन् ! एक ही उपाय है। प्रयत्न करके देखा ज
सकता है। प्रजा में से कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को चन का
मुदर्शन के पास भेजा जाय । सम्भव है कि ये सुदर्शन में
समझाने में सफल हों और उससे घटना को वास्तविकता
को जान सकें।"
गजा ने विचार करके कहा-
"यह ठीक हो है । सम्भव है, प्रजा के प्रतिनिधियों के
सफलता मिल जाय । कदाचित् सुदशन ने उन्हें भी यू
नहीं बताया, तब फिर क्या किया जाय और क्या नहीं रिय
लाय? इस विषय में भी प्रजा के उन प्रतिनिधियों ने मला
-
अभियोग और दण्ड ८३ . - ली जायगी । यदि उन्होंने भी सुदर्शन को अपराधी स्वी- र कर लिया, तव हमें निर्णय करने में सुविधा होगी।" इस निर्णय के अनुसार प्रजा के प्रतिनिधियों को सुदर्शन पास भेजा गया। जा कर उन्होंने कहा- "सेठजी ! हम जानते हैं, और हमें विशवस है कि आप दाचारी हैं । आप तो किसी भी अन्य व्यक्ति के घर पर ते हो नहीं । दूसरे के घर जाने का आपने त्याग किया आ है। हम यह भी जानते हैं कि आप पर-स्त्री को माता समान मानते हैं । फिर महारानी के साथ अनुचित व्यव- र करने आप जाँय, यह एकदम असम्भव वात है। "किन्तु महारानी आप पर अभियोग लगा रही हैं । पका कर्तव्य है कि उस अभियोग का प्रतिवाद करें और ची बात को प्रकट करें। आपके ऐसा करने पर उचित रगय किया जा सकता है।" प्रतिनिधि समझाते रहे और सुदर्शन मौन वने रहे। प्रतिनिधियों ने फिर प्रश्न किया- "नगरसेठ ! आप कोई उत्तर क्यों नहीं देते ? मौन का ये क्या यह नहीं माना जाय कि आप अपराधी है ? हम पको विश्वास दिलाते हैं कि कदाचित आपका अपराध ना भी तो सारी प्रजा आपके साथ है। हम से धना करके आपको क्षमा करा देंगे। मान ल । मूल मनुष्य से हो ही जाती है । अ ही गई हो तो वह क्षम्य मान ली - .
८४ मूलो और सिंहासन
....
?
"किन्तु हमें तो यह विश्वास है कि आप निरपराध
ऐसी स्थिति में मौन रह कर आप अपने आपको अगदी
क्यों बनाते हैं ? आप प्रजा के लिए प्राण-स्वरूप है ; प्रजा
आपको अत्यन्त प्यार करती है। निरपराध होने पर भी आ
पर कलंक लगे, यह हमारे लिए घोर दुःख का विषयमा
हम यह जानते है कि आप महान् त्यागी हैं। आपको अपने
जीवन का मोह नहीं है। किन्तु यह प्रश्न केवल it
जीवन का तो नहीं है। इसके साथ प्रतिष्ठा का भी प्रश्न
है। यदि आपकी प्रतिष्ठा को कलंक लगा तो आप
और बच्चों का जीवन भी दुःखी हो जायगा। उन्हें
घटना के कारण जीवनभर कलंक का भार ढोना पड़ा।
क्या यह उचित होगा ? श्रीमान् ! जरा विचार नति
और हमें सच्ची बात बता दीजिए।"
प्रजा के प्रतिनिधि प्रत्येक प्रकार से समभा-सममा
थक गए । किन्तु सुदर्शन अपने निश्चय पर दृढ़ रहा । उस
ना निश्चय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो, जोकर
ममाप्त हो जाय, प्रतिष्ठा कलकित हो जाय, स्त्रीचा
को दुःख भोगना पड़े, किन्तु माता पर सकट नहीं है
दूंगा।
मुदर्शन अपनं इसी संकल्प पर अचल रहा ।
अन्त में प्रतिनिधियों ने निराश होकर कहा
"हम हृदय से चाहते थे कि आप पर लगाया गया :
व लकः दूर हो जाय । आपकी किसी प्रकार से कोई हानि
अभियोग और दण्ड ८५
--
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हो । आपके शरीर को, आपकी प्रतिष्ठा को, आपके परिवार
को कोई आंच नहीं आए। साथ ही हमें भी आपके समान
सदाचारी और योग्य नगर-नायक का आधार बना रहे ।
महाराजा भी यही चाहते हैं । किन्तु दुर्भाग्य है, हम सब
लोगों का कि आप मौनभंग ही नहीं करते । हम निराश
हो कर जा रहे हैं।"
सुदर्शन के हठ से निराश और क्रोधित हो कर प्रजा के
प्रतिनिधि लौट आए।
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राजा ने प्रतिनिधियों से पूछा-
'कहिए. सुदर्शन से बातचीत करके आप लोग किस
निर्णय पर पहुँचे ?"
"धर्मावतार ! सुदशन ने तो जो मौन धारण किया है,
वह भग ही नहीं होता। हमने उसे बहुत समझाया, किन्तु
वह कुछ भी कहने के लिए अपना मुंह खोलते नहीं।"-
प्रतिनिधियों ने उत्तर दिया ।
तब राजा ने गभीर होकर पुनः प्रश्न किया-
"ऐसी स्थिति में आपका क्या निर्णय है ? मैं स्वयं तो
कुछ निर्णय कर नहीं पा रहा हूँ, करना भी नहीं चाहता
हूँ। मेरा निर्णय आप लोगों की सम्मति पर निर्भर
करता है।"
"महाराज ! जब अपने अभियोग के विरुद्ध में वह कुछ
: भी नहीं कहता, तब हम यह भी नहीं कह सकते ।
।
८६ मूनी और सिंहासन
।
निरपराध है । अपराधी वह हो, और सच पन्हे, तब तो
प्रजा की ओर से उन्हें क्षमा करने की आपसे प्रार्थना की
करते. किन्तु जब वह मौन है, तब हमारे पास कोई मा
ही नहीं है।"
"अर्थात् ऐसी स्थिति में उसे अपराधी मान लिया जाना
चाहिए?"
"और कोई मार्ग नहीं है, महाराज ! उसके मौन को
हम उस पर लगाये हुए अभियोग को स्वीकृति हो मान
सकते हैं।'
"ठीक है; तब मैं यही निर्णय दे सकता हूँ कि सुदर्शन
ने पांच अपराध किए हैं। उसका पहला अपराध यह है
उसने अपने पद, अपनी प्रतिष्ठा, अपने पर किये जाने वाले
वश्वास के विरुद्ध कार्य किया है। उसने दूसरा भाग
यह किया है कि धर्म की आड़ ले कर, मुझे धोखा दिया ।
तीसरे वह अनुचित रीति से महल में माया । उसका नौया
भयंकर अपराध यह है कि उसने अपनी माता के समान
महारानी का अपमान किया और उसका गतीत्व न
करने का प्रयत्न किया। और उसका अन्तिम अपराध या
है कि उसने मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया । यह रानामा
की अवहेलना है।
"अस्तु, आप सबकी सहमति से मैं मुदर्शन को आप
राधी ठहराता हूँ और आज्ञा देना है कि गुदर्शन को अपने
अभियोग और दण्ड ८७ पराधों के दण्ड-स्वरूप मृत्यु-दंड दिया जाय। उसे मृत्यु- इ सूली पर चढ़ा कर दिया जाय । "राज्य-नियम के अनुसार उसकी सारी सम्पत्ति राज्य- प में आनी चाहिये, किन्तु उसकी पूर्व सेवाओं को लक्ष्य रखकर मैं विशेष आज्ञा देता हूँ कि उसकी सम्पत्ति सके पुत्रों के लिए ही छोड़ दी जाय । "यह मेरा अन्तिम निर्णय है, किन्तु मैं विशेष अनुग्रह रता हुआ यह आज्ञा देता हूं कि यदि सूली पर चढ़ा दिये ने के पूर्व तक भी वह वास्तविक बात बता दे, अथवा ह ज्ञात हो कि उस पर लगाया गया अभियोग मिथ्या है, इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जा सकेगा।" "अब आप लोग अपने आवास को लौट सकते हैं महाराज को प्रणाम करके प्रतिनिधिगण उदास चेहरे ए लौट आये। उनकी विवशता उनके मुख पर स्पष्ट कट थी । क्योंकि वे सब सुदर्शन को बहुत प्यार करते थे। सुदर्शन की पत्नी मनोरमा असाधारण स्त्री थी। वह वयं सदाचारिणी और धर्मनिष्ठ थी, तथा उसे अपने सदा- री पति में अटूट विश्वास था। उसने जब सुदर्शन पर लगाए गए अभियोग की बात नी तो सुन कर एक क्षण के लिये भी उसने इस अभियोग ो सत्यता पर विश्वास नहीं किया। उसके मन यह खिण्ड विश्वास बना रहा कि उसके पति ऐसा में
८८ मूली और सिंहासन
स्वप्न में भी नहीं कर सकते। उसे यह विश्वास भी को
रहा कि सत्य कुछ देर के लिए छिपाया जा सकता है,
नत्य को हमेशा के लिये कदापि छिपाया नहीं जा साना
वादल कुछ देर के लिये सूर्य को ढक सकते हैं, जिन
नदा के लिये नहीं।
उसके पति पर अभियोग लगाया गया है, ठीर है,
राहु कुछ समय के लिये सूर्य और चन्द्र को ग्रसित करो
हैं । महारानी के असत्य के राह ने कुछ समय के लिये
उसके पति के सदाचरण के तथा सत्य के सूर्य को गति
कर लिया है, किन्तु अन्त में सूर्य प्रकाशित होगा हो । अना
में सत्य उद्भासित होगा ही-~-यह अटल नियम है।
यह भी अटल है, सूर्य की भांति प्रकाशित है कि उस
पति पर लगाया गया अभियोग अवश्य ही सत्य की शकि.
ने छिन्न-भिन्न होगा।
कोई साधारण स्त्री होती तो इस अभियोग की बार
सुन कर हाहाकार करने लगती। किंतु हाहाकार से का
अभी भी कुछ लाभ हुआ है ? ऐसा करना समय और शाम
को नष्ट करना है। यही विचार करके मनोरमा दृढ रही।
उसने अपना समय व्ययं के विलाप में न लगा कर धमकी
आराधना में लगाना आरम्भ कर दिया।
अपने पुत्रों सहित गुदर्शन की पत्नी परमात्मा का रस
ना करने बैठ गई। अपने मन में उसने निश्चय feat
अभियोग और दण्ड ८६ कि वह अपने पति का मुख तभी देखेगी, जव उन पर लगाया गया यह कलंक मिट जायेगा। मनोरमा ध्यान में बैठी थी। उसके परिवार के कुछ ईष्टजन तथा प्रजा के कुछ व्यक्ति उसके घर पर आए । उनका विचार था कि वे मनोरमा को समझायेंगे कि जा कर सुदर्शन को समझाये और उससे सत्य वात जान ले। घर पहुँच कर उन्होंने द्वारपाल से पूछा- "सेठानी घर पर हैं ?" "जी।" "उन्हें सूचित करो कि हम लोग उनसे मिलना चाहते हैं। "क्षमा करें ! स्वामिनी इस समय ध्यान में हैं।" उन प्रतिनिधियों ने सोचा कि शायद सेठानी को अव उनके पति पर लगाये गये अभियोग की जानकारी नहीं हुई है, तभी वे ध्यान में बैठी हैं । अतः उन्होंने द्वारपाल से फिर कहा- - "अपनी स्वामिनी को सूचित करो कि हम लोग आए हैं. और उन्हें यह भी बतादो कि नगरसेठ पर अभियोग लगाया गया है।" द्वारपाल ने शांति से उत्तर दिया- "स्वामिनी को अभियोग की बात ज्ञात है।" यह सुनकर उन सब लोगों को घोर आश्चर्य हुआ- अभियोग की बात सेठानी जानती हैं, और इ. निश्चिन्त बैठी हैं ! अद्भुत शक्तिशाली है ! ---
१० सुलो भोर सिंहासन
-
उन्होंने एक बार फिर प्रयत्न किया, कहा-
"जा कर सेठानीजी से कहो कि यह समय धर्मशान
वैठने का नहीं है। इस समय उन्हें जा कर सदर्शन को सभ.
झाना चाहिए । वे किसी की बात सुनते नहीं हैं, राजा
मंत्रियों की, प्रजा के प्रतिनिधियों की किसी की बात
उत्तर में वे अपने अभियोग के विरुद्ध कुछ बोलते नहीं हैं :
अतः सेठानीजी को स्वयं उन्हें जा कर समझाना चाहिए
सेठानी को स्वयं भी यह विचार करना चाहिए कि यदि
सुदर्शन ने सत्य बात नहीं बताई तो उन्हें मृत्युदण्ड दे दिशा
जायेगा, सेठानी विधवा हो जायेंगी, बच्चे लगाव है।
जाएंगे......."
द्वारपाल की आँखों में मुनते-सुनते आँसू आ गए। देवता
के समान अपने स्वामी को वह प्राणों से भी अधिक प्यार
रता था। वह तुरन्त अपनी स्वामिनी के पास चला गया।
और कुछ देर बाद वह उदास चेहरा लिए लौट भी
आया।
लौटकर उसने रोते रोते ही कहा-
"श्रीमान् ! आपने जो कुछ कहा, वह मैने स्वामिनी ।
कह दिया । किन्तु वे तो ध्यान में ऐसी लीन हैं कि
उत्तर ही नहीं देतो.
निराश और दुःखो ये सब ईटजन मदमंग पर
.."
लौट आए।
सुली से सिंहासन आत्मा की शक्ति अनन्त है । उस शक्ति को जान लेना और दृढ़ संकल्प के साथ प्रकट करना हो पुरुषार्थ है । केवल भारतवर्ष ही नहीं, संसार में आज तक जितने महापुरुष हुए हैं, उनकी महानता का यही रहस्य है कि उन्होंने अपनी ही आत्मा में स्थित उस अनन्त और अपराजेय शक्ति को पहचाना और अपने संकल्प के वल से उसे प्रकट किया। शक्ति को पहचानना विवेक हुआ। विवेक के साथ पुरुषार्थ आया और व्यक्ति महान् बन गया। हमारे चरित्रनायक सुदर्शन ने अपनी इस शक्ति को पह- चान लिया था। वह अच्छी तरह यह समझता था कि संसार व्यर्थ है । सार्थक और अव्यर्थ जो है, वह आत्मा का लोक है। रही कारण था कि उसने दृढ़ संकल्प कर लिया था कि प्राण हे या जाय, सत्य को नहीं छोड़गा, धर्म को नहीं त्यागूंगा। ससार का क्षेत्र भौतिकता का क्षेत्र है। वह क्षणस्थायी । आज है और कल नहीं रहता । जो सनातन है, इसलिए जो सत्य है, वह आध्यात्मिकता का, आत्मा का क्षेत्र है । दर्शन की दृष्टि उसी ओर केन्द्रित हो चुकी थी। -
६२ मूली और सिंहासन
सुदर्शन को सूली पर चढ़ाने का समय और स्थान निर्मा-
रित कर दिया गया था । राजा की आज्ञा से इसकी योजना
नगर में कर दी गई थी । सुदर्शन के अपराध गौर स
राध के लिए निर्धारित भीषण दंड-मृत्युदंड की शो
को सुन कर सारे नगर में हाहाकार मच गया। प्रत्येकनार
निवासी को यह अनुभव होने लगा कि आज वह बना।
जायगा । आज चम्पानगरी अनाथ हो जायगी।
अव कौन होगा, जो दोन-दखियों के कष्ट भी मिल
करेगा? कौन होगा जो राज्य के अनाथ और असणं
व्यक्तियों के लिए अपने आँसू और पसीना बहाएगा मश:
नहीं रहेगा तो अब कौन रहेगा, जो नगर के लिए एक आमा.
दीप के समान होगा?
-
अन्धकार
सघन अन्धकार ही क्या अवशेष
रह जायगा?
ऐसे ही विचार अब प्रत्येक व्यक्ति के मन में हाराहार
मचा रहे थे।
किन्तु उपाय नहीं था । एक घोर विवशता थी, जिसने
नागरिकों के जीवन को जड़ कर दिया था । नगर निगम
दुःखी थे, मन्त्रि-परिपद् उदास थी, राजा विवश और
चिन्तित था। किन्तु नहीं था-कोई उपाय नहीं था, कि
के पास कोई उपाय नहीं......"
क्योंकि सुदर्शन का मौन अखंड था।
मूली ते सिंहासन ६३ सुदर्शन को सूली के योग्य वस्त्र पहना कर बाजार में से होकर सूली के लिए नियत स्थान पर ले जाया जाने लगा। मुदर्शन के आगे-आगे वह शोकसूचक वाद्य अपनी करुणध्वनि में बज रहा था, जो प्रत्येक ऐसे अवसर पर वजाया जाता था । उस वाद्य की वह ध्वनि सुन कर ही नगरभूमि और आकाश क्षणभर के लिए अवसन्न हो गये और फिर जैसे वे 'घोर पीड़ा से चोख उठे । सुदर्शन को सूली के वस्त्रों में चला जाता देखकर देखने वालों के कलेजे फट गए. धीरे-धीरे सुदर्शन के पीछे एक झुंड इकट्टा हो कर चलने लगा। यदि लोगों के चेहरे उदास और दुःखी न होते तो शायद ऐसा प्रतीत होता जैसे किसी महावीर की विजययात्रा हो रही हो। सुदर्शन के चेहरे पर तो ठीक वही भाव था । शान्त और सकल्पवान उसके चेहरे से एक आलौकिक आ- 'नन्द का प्रकाश झर रहा था। लोग तरह-तरह की वातें विचार रहे थे और कह रहे थे कोई कहता था कि यह अन्याय है, सुदर्शन जैसे महापुरुष को यह दण्ड देना स्वयं राजा का ही अपमान है। कोई कहता था कि सुदर्शन भूल कर रहा है। उसे सत्य का उद्घाटन कर देना चाहिए । कोई कहता था कि अव सुदर्शन के स्त्री-बच्चों का क्या होगा? केवल उनका ही नहीं, राज्य के अन्य अनेक परिवारों का क्या होगा, जिन्हें सुदर्शन पिता की भाँति ही पाला करता था।
१४ सूली भोर सिंहासन
Vuith
इन्हीं विचारों के बीच सुदर्शन धीरेधीरे निश्चित मान
को ओर बढ़ता जा रहा था। स्वयं उसके मस्तिर
केवल एक ही विचार था-मां का अपमान नहीं होने दूंगा
'विजययात्रा' के शीर्ष पर सबसे आगे-आगे न
हुआ सुदर्शन जव अपने महल के सामने से गुजरने लगा, स.
सैनिक वहाँ रुक गए। उन्होंने नगरसेठ से प्राथना की
"नगरसेठ ! यह आपका महल है । थोड़ा रुक कर जाने
स्त्री-बच्चों से अन्तिम भेंट तो कर लीजिए।"
सुदर्शन मौन बने वहीं रुक गए।
कुछ क्षण बिलकुल शान्ति तथा प्रतीक्षा में गुजर गए।
किन्तु महल से बाहर सुदर्शन से मिलने के लिए कोई
भी नहीं निकला । न उसके बच्चे और न ही उसकी पनी
मनोरमा ।
मनोरमा का दृढ़ संकल्प था-अपने पति का मुख तभी
, जव उन पर लगा हुआ कलंक मिट जायगा । और
उस कलंक को मिटना ही चाहिए। यदि सत्य का अस्तित्व
है, धर्म का अस्तित्व है, तो ऐसा हो नहीं सकता कि
उसके चरित्रवान पति पर लगाया हुआ असत्य का कला
दूर न हो।
मनोरमा नहीं आई। यह देखकर लोगों के हृदय न
सिरे से विदीर्ण हो गए। क्या अन्तिम समय, अन्तिममा
भी पत्नी अपने पति से और पुत्र अपने पिता की
रिलेंगे ? हे विधाता ! तेरी गति कितनी विचित्र है !
मूली से सिंहासन ६५ सुदर्शन के चेहरे पर एक भी रेखा परिवर्तित नहीं हुई। वैसे ही अखण्ड शान्ति धारण किए हुए वे आगे बढ़ गए। सूली के स्थान पर पहुँचकर राज्य कर्मचारियों ने सुद- शन से कहा- "नगरसेठ ! अब यह अन्तिम अवसर है। महाराजा का तथा सारी प्रजा का यह आग्रह है कि आप अव भी सच्ची घटना को प्रगट कर दे। हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप अपना मौन भंग करें।" एक, दो और तीन बार यही प्रार्थना दोहराई गई, केन्तु सुदर्शन का मौन भंग नहीं हुमा । भीषण और तीखी धार वाली सूली सूर्य की किरणों में चमक रही थी। ऐसा प्रतीत होता था कि जीवन के मर्म को भेद डाल कर उसे विनष्ट कर देने के लिए मृत्यु ने अपना नवसे तीक्ष्ण शस्त्र तैयार कर रखा हो। चारों ओर जन- समुदाय फैला हुआ हाहाकार कर रहा था और सिसक रहा IT | देखने वालों की दृष्टि एक बार अपने प्रिय नेता नगर- ठ सुदर्शन पर जाती थी और एक बार उस चमचमाती ई तीक्ष्ण सूली की नोंक पर और फिर वह दृष्टि आंसुओं की धारा में पिघल कर वह जाती थी। अन्त में दंडाधिकारी ने सुदर्शन से कहा- "मान्य नगरसेठ ! हम विवश हैं। अव महाराज की मृत्युदण्ड देना ही पड़ेगा। ज्ञा के अनुसार हमें आपको
२६ सूली और सिंहासन
अस्तु, आप अपने अन्तिम समय में अपने इष्टदेव काम
कर लें।"
दण्डाधिकारी का यह कथन सुनकर सुदर्शन ने मानाने
संथारा ले लिया। परमपिता से उन्होंने अपने मन ही मन
'कहा-
'परमात्मन् ! संसार के सभी जीव मेरे मित्र हैं। म
किसी से राग नहीं, किसी से द्वेप नहीं । मेरे मन में किया
के प्रति कोई कटुभावना नहीं, कोई वैर नहीं। अगर
पापों का, तीन करण तथा तीन योग से मैं त्याग करना
हूँ। महारानी अभया माता के प्रति भी मुझे किंचित् मा
भी वैर नहीं । बल्कि मैं तो उन्हें अपना उपकार करने वाली
ही मानता हूँ। उन्हों के कारण आज मुझ अठारह पाये
का तीन करण, तीन योग से त्याग करने का सुयोग मिला
है। विश्व के सभी जोव सुखी हों।'
इस प्रार्थना के पश्चात् सुदर्शन ने एकाग्र हो कर नया
महामंत्र का ध्यान किया। उनकी आत्मा उस ध्यान में नीट
हो गई, इस देह के अस्तित्व को सम्पूर्णरूप से भुला नः ...
सुदर्शन ने जव परम एकाग्रता से नवकारमंत्र का भान
किया, तब उसकी अनन्त शक्ति से उसी क्षण देवताओं
आसन काँप उठे। देवताओं ने अपने अवधिज्ञान द्वारा सा
कारण देखा-भूलोक में परम तपस्वी,परम चरित्रवान
र्शन को अकारण ही मूली पर चढ़ाया जा रहा है।
सूली से सिंहासन ६७ तत्क्षण देवताओं ने निश्चय किया-जिसके हृदय में सार के किसी जीव के प्रति वैरभाव नहीं, जिसके हृदय में वकार मंत्र का ऐसा अखण्ड, ऐसा एकाग्र ध्यान है, जिसने आज तक कोई भी पापकर्म नहीं किया, उस सुदर्शन की झा हमें करनी होगी. सुदर्शन का ध्यान अखण्ड था । इष्ट-स्मरण के लिये दया गया समय समाप्त होने पर अधिकारियों ने सुदर्शन को सूली पर चढ़ाने के लिए उठाया । यह लिए उठाया । यह देखकर आकाश और भूमि जनता की चीत्कार से गूंज उठे... ....... किंतु सहसा ही वह हाहाकार और चीत्कार एक ही क्षण समाप्त हो गया। लोग विस्मित हो कर फटे हुए नेत्रों से खते रह गए- ..... ... कि जव-अधिकारियों ने सुदर्शन को सूली पर बैठाया, व उसी क्षण किसी अलौकिक अदृश्य शक्ति से वह सूली वर्ण का एक झिलमिलाता हुआ सिंहासन वन गई। आ- काश से फूल वरसने लगे सुदर्शन उस सिंहासन पर उसी शांतमुद्रा में बैठे थे। देवता उनके दोनों ओर चंवर डुला रहे थे-अद्भुत दृश्य या ! अद्भुत घटना थी! लोग अव तक विस्मित और विज- इत बने हुए फटी आंखों से यह देख रहे थे। उन्हें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि जो कुछ वे देख रहे हैं, वह स्वप्न है या सत्य ? वे सो रहे हैं या जाग रहे हैं ? वे कहाँ यह क्या हुआ? । हैं ?
२८ सूली और सिंहासन विस्मय के साथ सबके चेहरे पर एक अवर्णनीय हपं था, किंतु अब तक वह भी जड़ित बना हुआ था। इस स्तव्धता को वेधता हुआ देवताओं का स्वर उठा-- "सुदर्शन की जय हो ! शील, धर्म और चरित्र का पालन करने वाले सच्चे सत्पुरुष सुदर्शन की जय हो ! "सुदर्शन ! आपके समान धर्म और चरित्र का दृढ़ता में पालन करने वाले महापुरुषों के प्रताप से ही हम देवताओं के आसन अकम्पित हैं। आपने एक महान् आदर्श हम देव. ताओं के समक्ष भी प्रस्तुत किया है, आपको सहन राहा सावुवाद ! आपकी सदा जय हो !" अव जनता की संज्ञा लौटी, और उस संज्ञा के लोटके ही सारा आकाश सुदर्शन की जय ध्वनि से गूंज उठा। हां का एक समुद्र ही जैसे उफन पड़ा। सुदर्शन की जय का महाघोप उस स्थान से उठ कर, या. काश को गुजाता हुआ महाराजा दधिवाहन के विशाल राज- प्रासादों से जा टकराया....." महाराजा दधिवाहन तत्क्षण अपने रथ पर बैठकर उस स्थान पर वायु-वेग से उड़ते हुए आए। आ कर जो दृश्य उन्होंने देखा, उसे देखकर वे धन्य हो पए । जन्म-जन्म के पुण्यों का फल जैसे उन्हें उस क्षण प्राप्त हो गया। उनकी आँखों में सुदशन के प्रति आदर और स्नेह सूली से सिंहासन ६६ - । के कारण आँसू आ गए । गद्गद स्वर से, हाथ जोड़ कर उन्होंने सुदर्शन से कहा- "हे महापुरुष ! हे देवतुल्य ! हे सुदर्शन ! हम अज्ञानियों को क्षमा करो । मैं ही अन्धा हूँ, मेरा ही अपराध है कि मैं सत्य को पहचान नहीं सका।" "किन्तु सत्य को तो प्रकट होना ही था, वह हुआ । आज मेरे हर्ष की कोई सीमा नहीं है । आज मेरे समान गौरववान कोई अन्य राजा इस भूमि पर नहीं है। क्योंकि केवल मेरे ही राज्य में आपके समान एक देवता-पुरुप निवास' करता है । सुदर्शन ! नगरसेठ ! नगर के प्राण ! मुझ क्षमा करो।" राजा दधिवाहन अपने हृदय के सच्चे उद्गार इस प्रकार प्रकट कर रहे थे कि उन्हें देखकर सुदर्शन उनका सम्मान करने के लिए सिंहासन से नीचे उतरने लगे। किन्तु राजा ने उन्हें सिंहासन से नीचे उतरने नहीं दिया। वे बोले- "सुदर्शन ! सिंहासन से नीचे मत उतरो। तुम्हारा वही स्थान है। आज ही तो यह अवसर आया है कि जब हम तुम्हें अपने सच्चे स्वरूप में देख पा रहे हैं। हमें अपनी आँखों को तृप्त कर लेने दो। राजा देखता रहा, जन-समुदाय अतृप्त नेत्रों से निहारता रहा उस शोभा को-सूली कहीं नहीं थी। एक भिल- मिलाता हुआ स्वर्ण सिंहासन था, जिस पर सुदर्शन अपने -
१०० सूली और सिंहासन
अद्भुत तेज-सहित वैठे हुए थे। आकाश से फूल बरस रहे
थे। और देवता सुदर्शन को चंवर डुला रहे थे.......
कुछ देर बाद सुदर्शन की पत्नी मनोरमा भी अपने
पुत्रों सहित वहाँ आई। उन्हें देखकर जनसमुद्र ने फट कर
राह दे दी और उस धर्मपरायणा, पतिपरायणा महिला
की जय-ध्वनि से दिशाओं को गुंजा दिया।
मनोरमा अपने पति के सामने आई। हाथ जोड़ कर
उसने अपने पति को प्रणाम किया और अनिमेप नेत्रों में
प्रसन्नता का सागर लिए वह उन्हें एकटक देखती रह गई।
सुदर्शन ने भी अपनी पत्नी को देखा। उनके चेहरे पर एक
मुस्कान थी, नेत्रों में स्नेह की घटाए ।
जनता के आग्रह पर राजा ने मनोरमा से प्रार्थना की-
"आप धन्य हैं । आपकी सत्य और धर्म में अटूट निष्ठा
को धन्य है । मुझे क्षमा कीजिए, मैं अज्ञानी हूँ। और आपका
जो उचित स्थान है उसे ग्रहण कीजिए, सारी प्रजा की बोर
से मैं प्रार्थना करता हूँ।
मनोरमा को राजा ने सुदर्शन के समीप सिंहासन पर
बैठा दिया। तब उन दोनों की जय से एक बार आकार
फिर गूंज उठा।
मुक्ति की राह पर
महाराजा दधिवाहन अपनी मंत्रिपरिषद् तथा अन्य
गण्यमान्य नगरजनों के साथ सुदर्शन के घर तक आए ।
मनोरमा ने सबका यथोचित सत्कार किया।
विदा से पूर्व महाराजा ने सुदर्शन से कहा-
"नगरसेठ ! ईश्वर की कृपा से आपको किसी वस्तु
का अभाव नहीं है। किन्तु मेरी इच्छा है कि आपको इस
प्रन्नसता के दिन की स्मृति में कुछ न कुछ भेंट अवश्य हूँ।
कहिए, मैं आपको क्या अर्पित करू ?"
सुदर्शन ने महाराजा की बात सुन कर उत्तर दिया-
"राजन् ! परमात्मा तथा आपकी कृपा से सचमुच
मुझे किसी वस्तु का अभाव नहीं हैं। अभाव असन्तोष में
से आता है । मुझे असन्तोप है नहीं। इसलिए मैं क्या कह
सकता हूँ? आपकी कृपा ही मेरे लिए सब कुछ है।"
"यह तो ठीक है, सुदर्शन ! फिर भी आज मैं कुछ न
कुछ तो आपको देना ही चाहता हूँ, अपने ही सन्तोष के
लिए । वचन देता हूँ कि आप जो कुछ भी मांगेंगे, अवश्य
१०१
१०२ सूली और सिंहासन
किया।
दूंगा। चाहे आप मेरा राज्य अथवा मेरा जीवन हो।
न माँग लें।" राजा ने
आग्रह
तब सुदर्शन ने राजा के आग्रह को देख कर मणमा
विचार करके कहा-
"महाराज! यदि आपको यही इच्छा है कि मैं कुछ न का
अवश्य माँगू, तो माँगता हूँ। मैं एक ही बात मापसे चाहता
हूँ कि इस प्रसँग को लेकर आप अभया माता से कुछ न
कहें, उन्हें क्षमा कर दें तथा उनसे रुष्ट भी न रहें। लार
देना ही चाहते हैं तो मुझे यही दीजिए। अज्ञानवश उनसे
जो भूल हुई है, वह भुला दी जानी चाहिए।"
सुदर्शन की यह मांग अप्रत्याशित थी। किसी को विचार
भी नहीं आ सकता था कि इतने बड़े अपराधी के लिए भी
सुदर्शन के हृदय में इतनी करुणा तथा क्षमा होगी। सब
राजा ने क्षणभर विचार किया और
विस्मित हुए ।
फिर कहा-
"सुदर्शन ! तुम धन्य हो, सच्चे महापुरुष हो। उचित
तो यही था कि अपराधी को कठोर से कठोर दंड दिय
जाता। किन्तु तुम्हारी उदारता महान् है, और मैं वर
बद्ध हो गया हूँ। अस्तु, जैसा तुम चाहते हो, वहीं होगा
में महारानी को क्षमा कर दूंगा, बल्कि उनसे इस प्रग
को ले कर कोई चर्चा की नहीं करूंगा।"
सुदर्शन को यह वचन देने के बाद महाराजा अपने म
को लौट गए।
मुक्ति की राह पर १०३ ...- उधर महारानी अभया स्वयं अपनी ही आत्मा द्वारा धिक्कारित हो कर वेचैन थीं। जब से उन्होंने आज की . घटना स्नी थी, सुना था कि सुदर्शन को मृत्यु के मुख में ले जाने वाली सूली देवताओं के प्रभाव से सिंहासन वन गई, तब से उन्हें अपनी आँखों के सामने मृत्यु नाचती हुई दिखाई पड़ने लगी थी। उन्होंने जान लिया था कि अव कहीं शरण नहीं है। उनके पाप पर से पर्दा उठ गया है और वह संसार के सामने प्रगट हो गया है। निश्चित है कि अव उन्हें इस घोर अपराध के दंडस्वरूप मृत्यु का आलिंगन करना होगा। वे महाराजा दधिवाहन के न्याय को खुव अच्छी तरह जानती थीं। कदाचित् किसी कारण से यदि महाराजा उन्हें क्षमा भी कर दें, तब भी अब यह उनके सम्मान का प्रश्न था । किस मुंह को लेकर अव वे लोगों के सामने आ सकती थी ? कौन नहीं जानता कि महारानी ने कितना बड़ा पाप किया है ? नहीं, अव जीवन सम्भव नहीं है। सारे संसार द्वारा मन ही मन अपमानित होकर वे जीवित नहीं रह सकती। यह विचार करके महारानी ने स्वयं ही मृत्यु का आलिंगन कर लेने का निश्चय कर लिया। उन्होंने आत्म- हत्या कर ली। रानी की धाय पंडिता ने भी जव देखा कि पाप का घड़ा फूट गया है और महारानी ने आत्महत्या कर ली है, .
१०४ सूली और सिंहासन
तब वह भी चुपचाप महल और राज्य को छोड़ कर भार
खड़ी हुई।
महाराजा ने राजमहल में आ कर दासियों को आजादी-
"महारानी अभया को हमारे पास भेज दो। उनमें
कहो कि सुदर्शन के प्रसंग को ले कर वे कोई संकोच मन में
न करें। उस घटना को उन्हें भुला देना चाहिए।"
दासियाँ महारानी के महल में गई और उन्होंने वहां
जा कर जो दृश्य देखा होगा, उससे पाठक परिचित हो चुरे
हैं । महल में महारानी नहीं, उनका शव ही था।
दासियों ने डरते-डरते महाराज को सूचना दी। महाराज
इस सूचना
को
डूब गए। उन्होंने सोना
-पाप का अन्त और हो भी क्या सकता है ?
सुन कर विचार में
X
X
x
सब लोगों के चले जाने के बाद जब सुदर्शन को एकान्त
प्ति हुआ, तब उसने विचार किया--
सांसारिक दृष्टि से विचार करू तो मेरे पास सब कार
है। घर-परिवार है। धन-सम्पत्ति है । लोक में प्रतिष्ठा है।
यौवन और स्वास्थ्य है। किन्तु क्या यही सब कुछ है ?
क्या यह सदा रहने वाला है ? नहीं, यह तो इस संसार
के साथ यहीं रह जाने के लिए है। जीवन को तो मागे बड
जाना है। आत्मा का लोक इस संसार से अलग है, आगे
है, महानतर है, सनातन है, मेरा वही तो स्थान है। मु.
वहीं तो जाना है........
मुक्ति की राह पर १०५. --- - था, तव जहाँ मुझे हमेशा के लिए रहना नहीं, वहाँ से जितनी जल्दी संभव हो, चल देना ही उचित है । इस संसार में रह कर आत्मा अनेक प्रकार के माया-जाल में फंसती चली जाती है। विवेकशील व्यक्ति को इससे यथाशीघ्र मुक्त : होना चाहिए" यही विचार सुदर्शन के मस्तिष्क में वादलों की तरह । उमड़-घुमड़ कर आते चले गए और अन्त में उन्होंने निश्चय कर लिया कि जिस संयम का स्वीकार उन्होंने कुछ समय के लिए किया अव उसे हमेशा के लिए अंगीकार कर लेना चाहिए। निश्चय पर पहुँच कर उन्होंने अपनी पत्नी को बुला कर कहा- "प्रिये ! संसार आसार है। सार जहाँ है, वहाँ हमें जाना चाहिए। हमने इस जीवन के सुख को, यदि उसे सुख ही कहा जाय, तो काफी भोग लिया है। अब हमें अपनी आत्मा 'के कल्याण का विचार भी करना चाहिए । अस्तु, मैंने निर्णय किया है कि अब संयम को स्वीकार कर लू और मुक्ति की राह पर आगे बढ़ जाऊं। इसमें तुम्हारी सम्मति की आवश्यकता है।" मनोरमा विवेकशील महिला थी। पति के कथन पर उसने गंभीरता से विचार किया और उत्तर "प्रियतम ! आपका कथन सत्य है। कहीं है । इस मोह में पड़े रह कर ... -- हक
१०६ सुली और सिंहासन
आँचल में शेष रह सकता है। अतः मैं आपके मार्ग में या
नहीं बनूंगी । आपका निश्चय शुभ है।"
पत्नी की ओर से यह सम्मति पा कर सुदर्शन को हाँ
सन्तोष और प्रसन्नता हुई। उन्होंने दीक्षा लेने के पूर्व
'घर की यथावश्यक व्यवस्था कर देने की तैयारी आर
।
x
X
X
शीघ्र ही सारे नगर में यह समाचार फैल गया
नगरसेठ सुदर्शन गृह-त्याग करके दीक्षा ग्रहण कर रहे
लोगों को फिर से सुदर्शन के वियोग का दुःख होने लग
मृत्युदंड से बच कर सुदर्शन अव संसार त्याग कर रहे
लोगों के लिए तो सुदर्शन चले ही जा रहे थे । किन्तु उन
विचार किया कि कल्याण के पथ पर जाते हुए व्यक्ति
रोकना नहीं चाहिए, और यह विचार करके लोगों ने
प्रकार धर्म धारण किया।
राजा दधिवाहन ने भी जब देखा कि अब सुदर्शन
‘मन संसार में लग नहीं सकता, तब उन्होंने भी अनः
आज्ञा दे दी और बड़ी धूमधाम से सुदर्शन का दीक्षा
त्सव किया । दीक्षित हो कर, संयम धारण करके, लोगों
धर्म का माहात्म्य समझा कर सुदर्शन चम्पानगरी से वि
कर गए।
नगरसेठ सुदर्शन अब सुदर्शन मुनि हो गए थे।
मुक्ति की राह पर १०७ विचरते-विचरते सुदर्शन मुनि एक स्थान से दूसरे स्थान र होते हुए एक वार पाटलिपुत्र पहुँचे । वे मार्ग पर चल हे थे कि उनके सामने एक स्त्री किसी स्थान पर जाती हुई आई और मुनि को देख कर वह ठिठक कर खड़ी हो गई। हुनि ने उस स्त्री को देखा और आंखे नीची करके वे आगे ढ़ गए। किन्तु मुनिवेश में भी उस स्त्री ने सुदर्शन को हचान लिया। इस पहचान के साथ ही उस स्त्री के हृदय में वैर और शोध की ज्वाला सुलग उठी । सच है, नीच व्यक्तियों का वभाव बड़ी कठिनाई से ही वदल सकता है । उस स्त्री ने दर्शन मुनि को पहचानते ही स्मरण किया कि इन्हीं के गरण उसे नाना प्रकार के कष्ट सहने पड़े है । उस स्त्री को सुदर्शन मुनि के कारण चम्पानगरी से भाग र पाटलिपुत्र आना पड़ा था और यहाँ आकर उसे एक 'श्या की सेविका बन कर रहना पड़ रहा था । सुदर्शन मुनि । कारण ही उस स्त्रो की पुत्रीतुल्य रानी को आत्महत्या रनी पड़ी थी ? पाठकों को यदि पूर्वकथा का विस्मरण नहीं हुआ है तो समझ गए होंगे कि यह कुटिला स्त्री कौन थी ? स्त्री के स्वरूप में यह नागिन पंडिता थी। सुदर्शन जिस सूली पर चढ़ाए जाने वाले थे, जब वह संहासन बन गई, जब सत्य सूर्य की तरह प्रगट हुआ और भया तथा पंडिता के पाप का घड़ा भर कर फट गया- -
१०८ सूली और सिंहासन
तव अभया ने आत्महत्या कर ली थी और पंडिता दहा
भाग कर पाटलिपुत्र आ गई थी। यहाँ मा कर वह अपने ही
कुटिल स्वभाव के अनुकूल एक वेश्या के यहाँ अब दासी यो।
अचानक जव उसने सुदर्शन को मुनि के वेश में विचरले हार
वहाँ देखा, तब उसके हृदय में बदला लेने की भावना
जागृत हुई।
पंडिता शीघ्रता से अपनी स्वामिनी वेश्या के पास आई
और चूकि वह स्वयं तो कुछ कर नहीं सकती थी, इसलिr
अपनी रूपवती और यौवनवती स्वामिनी को उभारने लगी..
"स्वामिनी ! विस्मय की बात है। वैसे तो समार में
ऐसे महापुरुषों का होना असम्भव ही प्रतीत होता है जो
सुन्दर तथा युवतीं नारी के आकर्षण से खिंच न जाए, रितु
कोई कोई पुरुष तो ऐसे होते ही हैं, जिन्हें कोई भी स्पी
अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकती।
पंडिता की स्वामिनी वेश्या का नाम हरिणी था। यह
सचमुच ही एक हरिणी के सदृश रूपवती भी थी। अपन
का उसे गर्व भी था। इसके अतिरिक्त वह एक वेश्य
थी। छल-कपट तथा त्रिया-चरित्र उसने अपनी जमघट
में प्राप्त किया था। पंडिता की बात सुन कर उसने उत्त
दिया--
"पंडिता ! तू नासमझ है । संसार में ऐसा कोई पुर
है ही नहीं, जो सुन्दर, यौवनवती तथा त्रिया-चरित्र में कुल
कामिनी के आगे न झुक जाय।"
मुक्ति की राह पर १०६
"मेरा अनुभव तो यह नहीं कहता । मेरा ता यही कहना
है कि ऐसे पुरुप भी संसार में हैं, जिन्हें कोई स्त्री अपनी ओर
आकपित नहीं कर सकती।"
"तू भ्रम में है पंडिता !"
"तब क्या आपका यह कयन है कि ऐसे पुरुष का संसार
में होना असंभव है, जो स्त्री के आकर्षण को विजित करके
अपने चरित्र पर दृढ़ रह सके ?"
"विलकुल ! और मैं यह वात चुनौती के साथ कह
सकती हूं।"
कुटिला पंडिता धीरे-धीरे अपना जाल फैला रही
थी । अब उसने सीधी चुनौती दी-
"स्वामिनी ! निरर्थक विवाद से क्या लाभ ? आपके
कथन को तभी सत्य मान सकती हूँ, जव आप मेरे द्वारा
वताए गए पुरुष को अपनी ओर आकर्षित कर लें।"
"अच्छा, तो यह बात है ? मुझे स्वीकार है। ला, बता
कौन-सा है वह तेरा पुरुप, जिसके लिए तू कहती है कि वह
स्त्री के आकर्षण से परे है ? किंतु ऐसा पुरुप न बताना, जो
वृद्ध हो अथवा वालक ही हो।"
"नहीं स्वामिनी ! वह पुरुष न तो वृद्ध है, न वालक है।
उसके समान रूपवान और स्वस्थ युवक आपको ढूढे न
मिलेगा। वह पुरुष पुरुपत्वहीन भी नहीं है, आपके विश्वास
भी
वताए
देती हूँ, लेकिन मैं
हूँ, उस पुरुष को वश में करना जरा
!
के लिए यह
"
११० सूली और सिंहासन
"देखा जायगा । तू उस पुरुष को मुझे बता तो सही
देखते-देखते उसे अपने वश में करके अपना सेवक न बनाया
तो मेरा नाम भी हरिणी नहीं।"
लोगों को अपने कुटिल जाल में फंसाने में निष्णात
पंडिता ने पाटलिपुत्र की सवसे रूपवती वेश्या हरिणी को
सुदर्शन मुनि के संयम को भंग करने के लिए तैयार कर
लिया । वह विचार कर रही थी कि किसी प्रकार यदि सुद
शन का संयमभंग हो तो उसके जलते हुए कलेने में
ठंडक पड़े।
अवसर पा कर पंडिता ने हरिणी को बताया-
"वह देखो ! मुनिवेश में वहाँ जो अत्यन्त रूपवान पुर
जा रहा है, उसे पहचान लो । मैं उस पुरुष को पहचानतो
हूं। यदि आप उसे अपने वश में कर लेंगी, तभी मैं आपसी
चुनौती को सफल मानूंगी। मेरा अनुभव है कि इस पुराण
को वश में करना संसार की किसी भी स्त्री के लिए अस
म्भव है।'
हरिणी ने ध्यान से देखा-हाँ, यह पुरुष है तो अत्यन
सुन्दर,जैसे साक्षात् कामदेव । वह मन ही मन सुदर्शन मुनि
पर, जो कि उस समय गोचरी लेकर अपने स्थान पर लौट
रहे थे, मुग्ध भी हो गई। कुछ पल उन्हें एकटक देशका
।
उसने कहा-
"ठीक है पंडिता! अब मेरे रूप, यौवन तथा कौशन की
परीक्षा ही होगी। मैं इस पुरुप के अभिमान को अवश्य ही
मुक्ति की राह पर १११ तोडूंगी; लेकिन तू यह तो बता कि तू इस पुरुष को कैसे जानती है ? यह है कौन ? और तू यह क्यों कहती है इसके विषय में कि इसे वश में करना असम्भव है ?" पंडिता ने हरिणी के कुछ और समीप खिसक कर कहा-- "स्वामिनी ! आप पूछती हैं तो वताती हूँ। लेकिन यह : एक गुप्त बात है । यदि प्रकट हो गई तो "चिंता न कर, शीघ्र बता। मुझ पर भी अविश्वास करती है ?" : "नहीं, आप पर अविश्वास कैसा ? किंतु किसी से कहि- एगा नहीं, अन्यथा मैं विपत्ति में पड़ जाऊंगी "अच्छा बता, कह दिया, नहीं कहूँगी किसी से । तू कुछ. बोल तो सही।" "स्वामिनी ! यह पुरुष विख्यात चम्पानगरी का प्रसिद्ध । नगरसेठ सुदर्शन है । अव तो इसने साधुधर्म अंगीकार कर लिया है । यह उस समय की कथा है, जब यह साधु नहीं बना था । तव में चम्पानगरी में वहाँ को महारानी अभया को धाय थी। महारानी अत्यन्त रूपवती व युवती थी । सुद- शंन नगरसेठ था और उस पर चम्पानगरी की प्रत्येक युवती स्त्री मोहित थी। इस पुरुष में आकर्षण ही ऐसा -- है
११२ सूली और सिंहासन
पंडिता स्त्रियों के स्वभाव को पहनानने में कुशल यो।
इतना कहते-कहते वह गौर से हरिणी के चेहरे पर जन
होते हुए मनोभावों को ताड़ रही थी
और हरिगो के मन में सुदर्शन मुनि को देखने ने वा;
जो भाव उठ रहे थे, उन्हें पाठक जान चुके हैं।
अपने पिलाए विष का असर देखते हुए पंडिता ने आगे
कहा-
"एक वार महारानो अभया ने अपनी किसी सनी से
इस पुरुप के विषय में चर्चा की और बात ही बात में महा.
रानी ने यह प्रतिज्ञा कर ली कि वे सुदर्शन को अपने कप
और यौवन से आकपित कर लेंगी और उसके साथ दाम्पस
सुख का भोग अवश्य करेंगी।
"क्या बताऊँ स्वामिनो ! महारानी ने अपने मन में
ह
अभिलाषा मुझे बताई । वड़ो कठिनाई से मैं इसे गहा-
रानी के महल में ले गई। महारानी ने अपनी सारी गति
लगा ली। वे इसके सामने सम्पूर्णरूप से समर्पित हो गई।
साम-दाम-दंड-भेद उन्होंने किस उपाय को काम में नहीं
लिया ? किन्तु भगवान् जाने यह पुरुष किस धातु का बना
कि टस के मस नहीं हुआ।"
विप का प्रभाव अच्छी तरह से देखने के लिए गति
चुप ही गई। उसे चुप हुई देख कर आतुर हरिण
नत्सकता से पूछा---
?
!
मुक्ति की राह पर ११३
"फिर क्या हुआ?
"एक लम्बी सांस पंडिता ने ली और आगे बताया-
"फिर क्या होना था ? यह सुदर्शन तो हिला ही नहीं
और दुःख की मारी महारानी ने आत्महत्या करलो
"आत्महत्या ?"
"हाँ स्वामिनी ! महारानी को मैंने अपनी बेटी की तरह
पाला था। वह तो चली गई और मैं भाग कर यहाँ चली
आई । आज इसे-इस सुदर्शन मुनि को देखकर मेरे मन में
विचार आया कि क्या संसार में कोई ऐसी स्त्री नहीं, जो
इसे वश में कर सके ?"
यह एक दूसरी चुनौती थी। स्त्री को अपने रूप का
वड़ा अभिमान होता है । हरिणी को यह चुनौती भी तीखी
लगी। उसने मन ही मन दृढ़ निश्चय कर लिया कि कुछ
भी हो, इस पुरुष को वश में करना ही होगा.......
-
x
X
X
पंडिता ने जानबूझ कर हरिणी को यह नहीं बताया था
कि किस प्रकार युदर्शन को सूली का दंड दिया गया था
और वह सूली सिंहासन बन गई थी। उसने ऐसा इसलिए
किया था कि कहीं सुदर्शन की इस दृढ़ता और प्रभाव को
जान कर हरिणी उसे वश में करने के प्रयत्ल को त्याग न हे.'
अव हरिणी ने विचार करना
सोचा कि महारानी अभया इन्हें
.
११४ सूली और सिंहासन
रही होगी तो रही होंगी, वे क्या जाने कि पुरष लोके
वश में किया जाता है ? मैं तो इस कार्य में कुशल ए।
वेश्या हूँ। मैं देखते ही देखते इन्हें अपने वश में कर तक
इस प्रकार स्वयं को आश्वस्त कर के हरिणी ने अबस
सोचा कि सुदर्शन को अपने घर लाया किस प्रकार जाय!
ये मुनिलोग किसी वेश्या के घर तो किसी भी प्रयोजन
जाते ही नहीं। इसी प्रकार एकान्त में किसी स्त्री से दिन
के समय में भी नहीं मिलते. रात में तो मिलने का प्रश्न
नहीं आता । तव कसे उन्हें अपने घर बुलाया जाय ?
अन्त में हरिणी ने निश्चय किया-मैं एक श्राविका को
वेष धारण करके, श्राविका के अनुकूल ही आचरण करके
मुनि से प्रार्थना करूंगी कि वे मेरे घर आ कर आहार न
करें। इस रीति से वे अवश्य ही मेरे घर आ जाएंगे । बस.
एक वार वे मेरे घर आ जायँ, फिर तो मैं उन्हें अपनी
मोर आकृष्ट किए बिना छोडूंगी ही नहीं
यह निश्चय करके हरिणी ने श्राविकाओं के व्यवहा:
हन-सहन, वोलचाल आदि की जानकारी प्राप्त की। अनी
रह से इसका अभ्यास कर लेने के बाद, एक दिन यः
नि के मार्ग में हाथ जोड़ कर विनयपूर्वक सड़ी हो गई और
नि के समीप आने पर उसने प्रार्थना की
"महाराज ! मुझ धाविका पर भी कृपा कीजिए. मा.
ती तारिए । मेरा घर समीप ही है, कृपया युद्ध गोवर्ग
हण कीजिए। मेरा नियम है कि मैं किसी साधु-महात्मा
-
मुक्ति की राह पर ११५
को दान दिए बिना भोजन ग्रहण नहीं करती हूँ। आज
सौभाग्य से आपके दर्शन प्राप्त हुए हैं, कृपा कीजिए।"
"महाराज ! किसी समय में पतित जीवन व्यतीत करती
थी, किन्तु आप के समान ही साधु-महात्माओं की कृपा से
अव में एक श्राविका का शुद्ध जीवन व्यतीत करती हूँ', अतः
आपको मेरे यहाँ पधार कर भिक्षा ग्रहण करने में भापत्ति
नहीं होनी चाहिए। यदि आप नहीं पधारेंगे तो मेरा दुर्भाग्य!
मुझे अपने नियम के अनुसार भूखी ही रहना पड़ेगा।"
सुदर्शन मुनि ने अपने सामने एक विनयशीला श्रीविका
; को आहार ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करते हुए देखा । वे
तो सरलहृदय थे, शुद्ध भावना थी। उन्हें किसी छल या
कपट का क्या अनुमान ? स्थान-स्थान से गोचरी ग्रहण
करना उनका नियम था, अतः उन्होंने हरिणी की प्रार्थना
को स्वीकार कर लिया। वे भिक्षा ग्रहण करने हरिणी के
घर चले गए।
ज्यों ही मुनि ने हरिणी के घर में प्रवेश किया, दासियों
ने हरिणी की आज्ञा से घर के द्वार वन्द कर दिए । द्वार
वन्द किए जाते देख कर सुदर्शन मुनि समझ गए कि वे किसी
छल-कपट में पड़ गए हैं। किन्तु शुद्ध हृदय वाले घीर पुरुष
आई हुई आपत्ति से घबराते नहीं। उन्होंने विचार
कि जैसे भी उचित होगा. इस आपत्ति से पार
ही होगा।
...
.
-
११६ सूली और सिंहासन
द्वार वन्द हो जाने पर हरिणी वेश्या अपने वा
स्वरूप में प्रगट हुई । अपने सौन्दर्य और यौवन का प्रदर्शन
करतो हुई वह मुस्कराकर कटाक्ष करती हुई बोली-~-
"पधारिये मुनिवर ! अब संकोच किस बात :
आज मैं आपको अद्भुत दान दूंगी। देखिए, जरा गौर से
देखिए, कंचन के समान मेरी इस सुन्दर काया को देना
और छलकते हुए मेरे इस योवन को देखिए । में यह मार
आज आपको दान कर दूंगी। दान क्या करूंगी मुनिवर !
मैं अपना सर्वस्व ही आज आपको समर्पित कर दूंगी।
आप एक बार दृष्टि उठा कर मेरी ओर देखिए तो सही
सुदर्शन मुनि की दृष्टि भूमि पर थी और वे विचार
कर रहे थे। उन्होंने समझ लिया कि यह नारी अज्ञान में
है और मोहित है । धैर्य के अतिरिक्त अव अन्य मार्ग इसने
वचने का नहीं है।
अस्तु, उन्होंने जहाँ वे खड़े थे, उस स्थान को माने
रजोहरण से स्वच्छ किया और ध्यान लगा कर वे उसमान
पर बैठ गए।
हरिणी ने अनेक बातें ध्यानस्थ मुनि से कहीं। अनेक
प्रकार से उसने यह प्रयत्न किया कि मुनि का त्याग कर
हो, वे उसे देखें और उसकी और याकर्षित हों, निक
नहीं जानती थी कि वह व्यक्ति जो उसके सामने मा
होकर ध्यानस्थ वैठा था, वह अपने संयम को पालने में का
की भांति कठोर और हिमालय की भांति अटल का !
मुक्ति की राह पर ११७ हार कर हरिणी ने सोचा कि यह मुनि ऐसे तो कुछ सुनते नहीं, इन्हें राग-रंग से अपनी ओर याकर्षित करना चाहिए। नृत्य और संगीत में बड़ा आकर्षण होता है। देवता, पशु-पक्षी-सभी संगीत से प्रभावित हो जाते हैं, तव एक मनुष्य को तो उससे प्रभावित होना ही चाहिए । मधुर संगीत की लहरें वातावरण में सिहरन उत्पन्न करने लगी। हरिणी ने अनेक प्रकार की कामोद्दीपक राग- रागिनियाँ गाई, किन्तु सुदर्शन मुनि के उग्र संयम के सामने उन्हें व्यर्थ ही जाना था और वे व्यर्थ ही गई। यह प्रयत्न भी निष्फल जाता देखकर हरिणी को बड़ा क्रोध आया। उसने सोचा कि यह मुनि जव किसी भी प्रकार से विचलित नहीं होते, तव उन्हें भूखा ही मरने देना चाहिए। देखती हूँ कि ये कब तक भूखे इस प्रकार से बैठे रहते हैं । भूख के आगे अच्छे-अच्छे शक्तिशाली व्यक्ति हार मान जाते हैं। इन्हें भी जब भूख सताएगी, तब ये अपना ध्यान भंग करेंगे और मेरी बात स्वीकार करने के लिए उन्हें विवश होना ही पड़ेगा। यह विचार करके सुदर्शन मुनि को ध्यानस्थ छोड़ कर हरिणी वहाँ से चली गई। किन्तु भूख से पराजित तो वह व्यक्ति होता है, जिसे जीवन से मोह हो। सुदर्शन मुनि को जीवन का कोई नहीं था। संयम और चरित्र उन्हें एक ही न जोवनों से बढ़कर प्रतीत होता था।
११८ सूली और सिंहासन
एक, दो और तीन दिन इसी प्रकार से व्यतीत हो
सुदर्शन मुनि निश्चल और एकाग्र होकर ध्यान में हो यो
रहे। बीच-बीच में हरिणी ने मुनि को विनलित का
और भी अनेक प्रयत्न किए, किन्तु वे सब व्यर्थ गए।
चौथे दिन जब सूर्योदय हुआ तब उस पतिता पर
का हृदय भी परिवर्तित हो गया। सुदर्शन मुनि के
के प्रभाव से उसके हृदय में ज्ञान की एक किरण जारी
उसने विचार किया-
हाय ! मैं कैसी पापिष्ठा हूँ कि ऐसे शुद्ध और मंग
पुरुष को अपनी क्षुद्र वासना की क्षणमात्र की तृति
लिए पतित करना चाहती हूँ और उन्हें इतना कष्ट देर
हूँ? जिस सुख को प्राप्ति में करना चाहती हैं. अयाय
उस सुख से भी बढ़कर कोई सुख है, जिसकी प्रालि
विश्वास में ये मुनिराज इस सुख की ओर आंग उठा
भी नहीं देखते।
मैंने भयंकर भूल की है। जिन पूज्य गुरुः
मुझे पूजा करनी चाहिए थी, उन्हें मैंने इस प्रकार में
यातना दी है । अब मुझे अपनी इस भूल का गुधार र
चाहिए। जितना पाप में इस जोवन में कर ली है.
यदि संभव हो तो इस महापुरुष की कृपा से धाने
प्रयत्न करना चाहिए।
यह शुभ निश्चय करके हरिणी मन ही मन पणा
मुक्ति की राह पर ११६ -- करती हुई सुदर्शन मुनि के चरणों के समीप आकर गिर गई और करुण स्वर में बोली "पूज्य मुनिवर ! मुझ पापिनी को क्षमा कर दीजिए | मैंने घोर पाप किया है । मैं अज्ञान में थी। किन्तु अव आपके निष्कलंक चरित्र के प्रभाव से मेरे हृदय में सत्य ज्ञान प्रगट हुआ है। मैं अपने अपराधों के लिए आपसे क्षमा माँगती हूँ।" "मुनिवर ! आप महान् हैं। आपको मुझे क्षमा करना ही होगा। आप मुझे अपनी शिष्या स्वीकार करें अथवा नहीं, किन्तु मैं आपको अपना गुरु मानती हूँ और प्रण करती हूँ कि भविष्य में एक सच्ची श्राविका का जीवन धर्म- पूर्वक व्यतीत करूंगी। "पूज्य गुरुदेव ! क्षमा आपका विशेष गुण है । मुझे क्षमा कीजिए और अपने स्थान को सुखपूर्वक पधारिये। द्वार मुक्त है।" ती न अपनी स्वामिनी को इस प्रकार प्रायशि देख कर पंडिता के हृदय में भी परिवर्तन का कलुप भी मिट गया । उसे भी अपने तव वह भी सुदर्शन मुनि के समक्ष "पूज्य मुनिराज ! इस सारे रानी अभया को मैंने ही आपके सहायता दी थी और इस वो ! में हूं हूं मने
१२० सूली और सिंहासन
साया था । मैं घोर पापिनी हूँ। किन्तु अब मुझे अपने पाले
का ज्ञान हुआ है । मैं सच्चे हृदय से अपने अपराधों कि
आपसे क्षमा मांगती हूँ। साथ ही प्रतिज्ञा करती है।
अपना शेष जीवन में भी हरिणी बहिन की तरह धर्मावर
में व्यतीत करूगी। कृपया अपना ध्यान तोलियामा
सुखपूर्वक अपने स्थान को पधारिये।"
"माता ! मन में दुख न लाओ। जो कुछ हुआ उसे भून
जाओ और तुम्हारे हृदय में ज्ञान प्रकट हुआ है तो उसके
सहारे जीवन को उन्नत बनाओ। मुझे तुममें से किसी एक
कोई क्रोध नहीं है। प्रसन्नता ही है कि मुझे अपने गया
और धर्म में दृढ़ बनने का अवसर मिला । अपनी प्रतिमाओं
का पालन करो और अपनी आत्मा का कल्याण करो।"
वर्म का उपदेश हरिणी और पंडिता को दे कर सुरजन
मुनि उनके आवास से निकल कर चल पड़े। मागं में उन्होंने
विचार किया- 'इस शरीर के कारण अनेक लोगों को कर
होता है। कपिला को, तथा अभया की माता को कष्ट हुआ।
उसके बाद इस हरिणी माता को कप्ट हुआ । संभव है. आन
जा कर भी किसी अन्य को व्यर्थ ही नष्ट में पहना ।
किसी को कष्ट न हो, यह विचार करके मैने संयम पा
किया, किन्तु संयम लेने पर भी किसी को कष्ट हो, in;
अवसर मा ही जाता है । भिक्षा लेने के लिये ही मुझं हिम
के घर जाना पड़ता है। अतः अब यही उचित है कि
किसी एकांत वन में जा कर तपश्चरण कर । पारीर को
-
मुक्ति की राह पर १२१
।
तक रहना है, रहे। जव तक इसकी रक्षा वन में होगी,
होगी; किन्तु भिक्षा के निमित्त अव मुझे नगर में भी नहीं
आना है।'
यह महान् निश्चय करके सुदर्शन मुनि हरिणी के यहाँ
से चल कर सीधे वन की ओर हो चले गए।
उस समय उन्हें कोई देखता तो उसे यही प्रतीत होता
कि जैसे सब कुछ छोड़ कर साक्षात् त्याग चला जा रहा हो,
निलिप्त हो कर, मोह से रहित होकर ।
.
अन्तिम चरण-युक्ति !
आत्मा शुद्ध हो, उसका उपादान कारण अच्छा हो
निमित्त कारण भी अच्छे बन जाते हैं और उन्नति में स:
यक होते हैं।
सुदर्शन मुनि को अनेक अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति
में से गुजरना पड़ा। किन्तु उन सब परिस्थितियों का प्रभार
उनकी आत्मा को शुद्ध से शुद्धतर तथा उच्च से उतार
ही बनाता गया। उसका कारण यही था कि उनका
दान कारण अच्छा था। उन्होंने कष्ट सहे, प्रतिकुल परित
सहे. और उनसे अपनी आत्मा को और भी दृढ़, और में
बनाया।
सामान्य अथवा कमजोर आत्मा वाले व्यक्ति के लिये
यह स्वाभाविक था कि वह इन अनुकूल तथा प्रतिशत पनि
पहों में पड़ कर राग-द्वेप में लिप्त हो जाता, उसके पार
का वन्य होता । किन्तु सुदर्शन मुनि का उपादान कारः
अच्छा था, उनकी आत्मा सशक्त थी, अतः ये निमित
उनकी उन्नति में ही सहायक हुए।
कल्याण की कामना करने वाले व्यक्ति को निमित
कारणों की अच्छाई-बुराई देखने के स्थान पर आ
१२२
अन्तिम चरण-मुक्ति ! १२३ । में लगा आत्मा की ही अच्छाई-बुराई को ओर दृष्टि रखनी चाहिये। सुदर्शन मुनि ने यही किया। जैसा भी निमित्त कारण उप- स्थित हुआ, उन्होंने अपनी दृष्टि आत्मा की शुद्धता और पवित्रता पर ही रखी । परिणाम यह हुआ कि वे धीरे-धीरे कर्म-बन्धनों से मुक्ति की ओर बढ़ते गये। और अव सुदर्शन मुनि एक एकांत, निर्जन वन में 'पहुँच गए। वहां जा कर उन्होंने योग्य स्थान खोज कर ध्यान लगाया । वे अब पूर्णतया अपना समय शुभ ध्यान देना चाहते थे। किन्तु संयोग की बात है, सुदर्शन मुनि को अभी एक और कठिन परीक्षा में से गुजरना था । जिस जंगल में सुदर्शन मुनि ध्यान लगा कर बैठे थे, उसमें महारानी अभया आत्मघात करने के बाद एक व्यन्तरी (निम्न कोटि की देवी) के भव में उत्पन्न हुई थी। इस व्य- न्तरी ने ध्यानस्थ सुदर्शन को देखा। उन्हें देखते हो विभंग ज्ञान की सहायता से अपने पूर्वभव की घटना स्मरण हो आई। उस घटना का स्मरण होते ही व्यन्तरी के हृदय में वैर यो भावना बड़ो तोव्रता से उत्पन्न हुई। उसने विचार किया --पूर्वभव में मैंने इस पुरुष को अपना प्रेमी बनाना चाहा था, किन्तु इस निर्दय ने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की थी। 'परिणामस्वरूप मुझे आत्महत्या करके मरना पड़ा और
१२४ सूली और सिंहासन
नीच व्यन्तरी के भव में उत्पन्न होना पड़ा। अयक्तिको
अवसर मिला है, मुझे इससे अपना बदला लेना चाहिए।
इसके अतिरिक्त पूर्वभव की मेरी इच्छा भी अभूत्र
गई थी। यदि मैं अब भी इसे अपने पर आसक्त करमा
तो अपनी उस अतृप्त इच्छा को पूर्ण कर सकती हूँ।
यह विचार करके उपने गुदर्शन मुनि को अपनी ओर
आसक्त करने का निश्चय कर लिया। एक बार जो
में
यह
भी विचार आया कि जब इम पुरुष ने गृहस्वनी
में ही अपने संयम को नहीं त्यागा, तब जब तो इसने सार
धर्म स्वीकार कर लिया है, अव यह क्या मानेगा ? किन
फिर भी उसने सोचा कि अब मैं एक व्यन्तरी हूँ, गंगा
अव बढ़ गई है, मैं अनेक रूप धारण कर सकती हैं, इसलिए
व है कि मैं इसे विचलित कर सकू। यह विचार करते
सुदर्शन के समीप आई।
सत्य है, अनान में पड़ी हुई आत्मा सत्य को नहीं -
चान पाती। तभी तो उस व्यंतरी के मन में गुर्शन मांग
को विचलित कर सकने की आशा जागृत हुई।
वह आशा केवल एक दुराशामान थी ।
वह आशा केवल एक असंभव बस्तु की प्राणा की।
सुदर्शन का अपने संयम ने भ्रष्ट होना संभव ही नी या
व्यन्तरी सुदर्शन मुनि को पास मा कर यह प्रगल कर
लगी कि वे अपना ध्यान भंग कर दें और उसकी ओर
अन्तिम चरण-मुक्ति ! १२५
पित हों। मुनि ध्यान में लीन थे और लीन हो बने रहे।
व्यंतरी ने एक परम सुन्दरी स्त्री का रूप धारण किया।
वह मुनि से बोली-
"हे मुनिवर ! उठिए, अनने ध्यान को समाप्त कीजिए।
आपके तप के फलस्वरूप मैं आपको प्राप्त हुई हूँ । आपकी
सेवा के लिए उपस्थित हुई हूँ। अपने तप के फल स्वरूप
प्राप्त हुई मुझ जैसी परमसुन्दरी नारी का भोग कीजिए
और अपने जीवन को सफल कीजिए।"
इसी प्रकार की अनेक वातें व्यन्तरी ने मुनि से कहीं।
किन्तु उनका क्या असर होना था? व्यन्तरी के सारे प्रयास
निष्फल गए। मुनि उस व्यन्तरी की बातें सुन कर यही
विचार करते रहे-परीक्षा का एक और अवसर इस माता
ने मुझे दिया है। ठीक है, अग्नि में से तप-तप कर ही सुवर्ण
कुन्दन वनता है। इस माता का भी मुझ पर उपकार ही
होगा । मुझे इस परीक्षा में से उत्तीर्ण हो कर निकलना है।
व्यंतरी सुदर्शन मुनि को विचलित करने का प्रयास
करती जाती थी, उसी परिमाण में मुनि अपना ध्यान बढ़ाते
जाते थे । वे धीरे-धीरे आत्मा की उच्च से उच्चतर भूमिका
पर चढ़ते जा रहे थे।
उधर व्यन्तरी अपने प्रयत्नों को अकारथ जाता देख कर
अत्यन्त क्रुद्ध हो गई। अपनी वैक्रियशक्ति को सहायता
से उसने अत्यन्त विकराल पिचाशिनी का रूप धारण कर
लिया और हाथ में नंगी तलवार ले कर झपटती
१२६ सूती बोर सिंहासन
र्शन को भयभीत करने का प्रयत्न करने लगी।
लगी-
को धर्मढ़ोंगी ! तुरन्त उठ कर मेरे चरण पारि
मुझसे क्षमायाचना कर । मैं जो कुछ तुमसे पहूँ या को
कार कर । अन्यथा में तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े गारगी
शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाने की निन्तारितो?
शरीर का मोह, जीवन का मोह तो सुदर्शन नाय काय
चुके थे ?
प्रलोभन भी व्यर्थ।
भय भी व्यर्थ ।
सुदर्शन मुनि अचल, निर्भय, शांत, निविकार।
उनके मन में एक ही विचार था-परीक्षा हो रही
इस परीक्षा में मुझे उत्तीर्ण होना है। पहले इस गाना
. :नुकूल परिषह दिए, अब प्रतिकूल परिपह दे रही है। मेरे
लए दोनों समान हैं। न मुझमें राग है, न द्वेष मो.
प्रसन्न ही होना चाहिए कि मेरी दृढ़ता की परीक्षा होगी
है और उस परीक्षा के परिणाम-स्वरूप मेरी बाणा की
रही-सही मलिनता भी दूर हो रही है।
यही विचार करके सुदर्शन मुनि ज्यों-ज्यों मार्ग
कष्ट देती जाती थी, अपने निर्मल ध्यान को ।
उनका निर्मल ध्यान इतना बढ़ा कि वे माकरण द्वारा
शुक्लध्यान में प्रवेश करके अन्तर्मुहतं में नौ, दम
यन्तिम चरण-मुक्ति ! १२७ और ग्यारहवें गुणस्थान को पार करके बारहवें गुणस्थान में पहुंच गए। फिर तेरहवें गुणस्थान पर पहुंचते ही उन्हें सम्पूर्ण अनन्त और निरावाघ केवलज्ञान तथा केवलदर्शन प्राप्त हो गया। केवलनान तथा केवलदर्शन प्राप्त होते ही मुनि सुदर्शन भगवान् सुदर्शन भगवान् हो गए । देवताओं को तत्क्षण इस उपलब्धि का ज्ञान हुआ। त्रिलोक में आनन्द का वातावरण छा गया। केवलज्ञान- महोत्सव मनाने के लिए देवता उसी क्षण अपने विमानों पर चढ़ कर आए। परम आनन्द के साथ केवलज्ञान-महोत्सव मनाया गया। तब भगवान् सुदर्शन ने उपस्थित परिषद् को धर्म का उपदेश दिया- "हे देवो! यह उत्सव किसी शरीर का नहीं, गुणों का है । जिन गुणों के प्रकट होने पर आपने यह महोत्सव मनाया है, वे गुण आपकी आत्मा में भी हैं। आप भी उन गुणों को प्रकट कर सकते हैं। आत्मा समान है, मेरी भी, आपकी भी। प्रश्न केवल उपाधि का है। यदि आप लोग भी अपने में रही हुई उपाधि को समाप्त कर दें, तो वे ही गुण आपकी आत्मा में भी प्रगट होंगे, क्योंकि वे पहले से ही वहाँ उपस्थित हैं।" भगवान् सुदर्शन का उपदेश सुनने वालों के अमृत की तरह झर रहा था। उसे सुन कर उस .
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१२८ सूली और सिंहासन
से ग्रसित व्यन्तरी का हृदय भी परिवर्तित होकर विशुद्ध
हो गया। उसने विचार किया कि जिन भगवान् के गुलों
की प्रशंसा इन्द्रादि देव भी कर रहे हैं, उन्हें कष्ट दे कर मैं
घोर पाप किया है। अब मुझे एक क्षण का भी वितन्त्र
न करके अपने सिर पर से इस पाप की गठरी को कार
फेंकना चाहिए
व्यन्तरी भगवान से हाथ जोड़ कर कहने लगी-
"प्रभो । मैंने अज्ञानवश बहुत पाप किया है। मुझे क्षमा
करिए। मैने आपको बहुत उपसर्ग दिए हैं। उस पाप का
बोझ मेरे लिए अव असह्य हो रहा है, मुझे क्षमा करके
उस वोझ को कम कीजिए।"
भगवान् सुदर्शन के मुंह पर एक अलौकिक क्षमाभाव
था । उन्होंने देवों को सम्बोधित करके कहा-
"इस भव की इस व्यन्तरी से मुझे अपने संयम में बड़ी
सहायता मिली है। जिन गुणों के प्रगट होने से मैं इस
अवस्था को पहुँचा हूँ, उनके प्रगट होने तथा इस अवस्था
को पहुंचा हूँ, उनके प्रगट होने तथा इस अवस्था तक पहुँ,
चने में इसकी वजह से बड़ी शीघ्रता हुई है।"
व्यन्तरी को सम्बोधित करते हुए भगवान् ने कहा-
"मैं स्वयं पर तुम्हारा उपकार निष्कारण ही नहीं मान
रहा हूँ। चम्पानगरी की घटना ने मुझे संसार त्याग के
लिए प्रेरित किया । उसके बाद यहाँ भी तुम्हारी
ही सहायता से मेरे ध्यान में उच्चता भाई और
अन्तिम चरण-मुक्ति ! १२६
शीघ्र प्रकट
मेरी आत्मा के निर्मल
गुण हुए। यह तुम्हारी
सहायता का ही परिणाम है। मेरे हृदय में तुम्हारे
लिए वही स्थान है जो किसी भी उपकारी के लिए हो
सकता है।"
भगवान् के मुख से ऐसे मधुर वचन सुन कर वह व्यन्तरी
धन्य हो गई। भगवान की प्रार्थना और उनका ध्यान करती
हुई वह सम्यक्त्वधारिणी बन गई।
देवगण भगवान् का जय-जयकार करते हुए अपने-अपने
स्थान को लौट गए।
भगवान् सुदर्शन ने कुछ काल तक जनपद में विचरण
; करके अपनी अमोघ वाणी से जीवों का कल्याण किया।
अन्त में अपना निर्वाणकाल समीप जान कर सहयोगी
अवस्था से शैलेशी अवस्था में पहुँच कर और मन-वचन-काया
के योग को शुद्ध करके वे सिद्ध, बुद्ध तथा मुक्त हो गए।
एक महान् जीवन इस प्रकार तपता-तपता, शुद्ध होता-
होता उन्नति के अन्तिम, उच्चतम चरण पर पहुँच गया!
.
लेखक की कुछ महत्वपूर्ण रचनाएँ ४०) ५ ) ४ ) १. भगवान् महावीर : एक अनुशीलन २. भगवान् पार्श्व : एक समीक्षात्मक अध्ययन ३. भगवान् अरिष्टनेमि और कर्मयोगी श्रीकृष्ण १०) ४. भगवान् ऋषभदेव : एक परिशीलन (द्वि० सं०) १५) ५. जैनदर्शन : स्वरूप और विश्लेषण ३०) ६. भगवान महावीर की दार्शनिक चर्चाएं २५) ७. जैन आगम साहित्य : मनन और मीमांसा ३०) ८. महावीर युग की प्रतिनिधि कथाएँ १२) ६. कल्पसूत्र : एक विवेचन २०) १०. साहित्य और संस्कृति १२) १. धर्म और दर्शन ५) २. चिन्तन की चांदनी १३. विचार रश्मियां ७) १४. अनुभूति के आलोक में ४) १५. विचार और अनुभूतियां १६. खिलती कलियां : मुस्कराते फूल ३)५० ३)५० १८. फूल और पराग १)५० १९. वोलते चित्र १)५२ २०. अतीत के उज्ज्वल चरित्र २) २१. महकते फूल श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय शास्त्री सर्कल, उदयपुर (राजस्थान) २ ) १७. प्रतिध्वनि २ ) ---