Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Jaat Katav Prarambh

2011/08

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ग " " " मुहिम मागमे नामयोग पाप्रकारका गंभ ७ गारमे नाममोग सनम नया प्रमा माय गन्मयोग परकारका निरज्ञान कारक मानगि. मागमापान जाम पालापस्मारामां १८ मग गंभ: मासा मतिका गादिमासान परविचार गनिरागापार महापती पाकिम भागमे नाम शुभफलाना पलंगा मिरच्या भार पा प्रायनारिभाम्याग्विार का किनार दीप्त साम्य दास्पयुनादि उपमतिकाज्ञान होफि.संज्ञा १९ महमादितयोग इतिज्ञातल प्रपमम् । निर्मनप्रसयपोग अयसूतिकातत्व २ मुम्र तथा मटसे प्रसयपोग जन्ममे पूर्वपितृमरणयोग पिनाफे परोक्ष जन्मयोग २.माताके सायमेही मारकर सर्प पेष्टित जन्मयोग मरणयोग नाल पेरित भंगपिचार यमल जन्मयोग सयमृत्यु होनेयोग मन्म समये पिता बंधनयोग दश ग्यारा सोला दिनमे नौकामध्ये जन्म योग मलसमीपे जन्म योग २२ भकमासमे शिशुमरणयोग कारागारे नन्म योग वीनपससे एकापर्यंत पालक गतमन्मयोग की मृत्युका योग देयालय कोड़ालय भार रेतीकी एकवर्षसे २४ पपर्वतके जमीनमे जन्मयोग २२/भायु योग यहाभग्निशाला, सर्वरिष्टभंगयोग २१/महाकश्योग - मृत्यु योग " " पाग- .00 संस्कृत पृ० " " ६३ देहपुष्ट योग ६४ ६४ ५०वाला " " विषय विषय पृ० सत्वादिगुगप्रकृतिविचार ४४ कामीयोग अथप्रकीर्णतत्व । भतिकामीयोग भल्सकाम वा भरपवीर्ययोग ६१ मंगलाचरण ४५ नपुंसस्योग भाव विचार ४५ वीर्यच्युतियोग भंगविचार (देहसुनामुखयोग) ४६ | उन्मादयोग देहकार्य योग ४० शीघ्रवार्धक्यचिन्होदययोग १८ प्रकृतिवृद्धयोग दांध इत्व भंगविचार ४९ नातिवृद्धनयुवायोग दार्थ दहयोग ." वृद्धभीतरुण समानदिनने. धामन (ठेगना) योग विकलांग योग ५० रसापन उपसनीयोग रक्तपिनयोग .५२ वहभोजनकर्ता योग देवदुर्गध योग ५२ सुखसभोजन करनेवाला योग लकड़ी के सदारसे चलने श्राद्धनमोनन कर्तायोग कायोग ५२ भल्पभोजन करनेवाला वेलज्नयोग ५२j शीघ्रभोजन कायोग उलजयोग ५३ चिरभुज (देरसेभोजनकतो) कपटीयोग ५३ योग कपटोयोग ५३ | कदनभोजन कायोग कपटी योग ५४ भोजन भरयोग रयोग ५५ धीरयोग कातरयोग | पिशुनयोग । कोधीयोग ५६ चांडाळयोग कलहपिययोग ५६ शिस्तीयोग क्षमावान योग ५७ क्षारादिपदार्थ प्रियपोग हाभ्यासक्तयोग ५७ मधुरादिपदार्थ प्रिययोग दोहीयोग मधुरेभरुचिभम्लपदाच गुरुद्रोहीयोग ५८ रुचियोग चोरयोग तीचकर्मा नीचपयगम्लेच्छ- व्यसनोयोग धोग निर्यसनीयोग ५९ नातिपाहायोग भोपालयोग .६० नाविच्युतियोग भविश्वासीयोग r| जातिपोप्ययोग " " ६८ ६८ ६८ " " ७० ७१ (४) ८७ " " " " " " " " विषय कौतुकियोग भालसीयोग कृषिकर्तायोग खल्वाट्योग शोभननेपयोग बदगुद लोचनयोग मिलिताक्षयोग विकलनयनयोग मंदलोचनयोग वनेश्योग নী। अंधयोग निशाश्योग নানাহাখায় घामनेयेधातयोग दक्षनेत्रीघातयोग नृपकोपसेनेत्रोत्पाटनयोग नेत्रमादयोग कागयोग दंपतिकागयोग यधिरयोग मागच्दयोग नाशादयोग मुखदपयोग मकयोग (गुंगा) गंगस्वर योग मितमुध्योग दुम्न योग दधिमपोग बिहादीपयोग भमायोनियोग गद्गदवारयोग रोहियोग परसवारदोग विषय दंतविकार योग ५] इस्तनाश हस्तपीडायोग ७२ बुब्जयोग [कबड़ा] ८८ ७२ कठिनचित्तयोग ८८ " |विरुद्धचित्तयोग "अंडवृद्धियोग ७३ जंवाक्षतियोग पंगुयोग इनसे विशेष स्यादेखना | शरीरलक्षणपरसे लग्नचंद्र भौर ग्रहोकीपरिक्षा मेषराशी वर्णन उपभगशी मिथुनराशी ७८ कर्फराशी ७८ सिंहराशी ७८ कन्या राशी, ७८ तुला राशी , ७५/ वृश्चिक राशी धनराशी ८. मकरराशी ८१/कुंभराशी ८२ मीनराशी ८२ प्रहपरीक्षा पृष्ट ९७ से १०६ ८३ अवधनपिवेक. ८४ १०५ स्वलापनीयोग १०८ ८५ पट्टधन या महाधनीयोग ८६ गदग्रनिकता योग ८६ दिसम्र निकायोग भननिका योग ८० भयुवाधिक निकायोग " " " "पनीयोग पृ० विषय २१२ दारद्रीयोग विषय लक्षाधीशयोग ११२ पितृकृत धननाशयोग दिलक्षेश योग ११२ धननाशयोग शिलक्षाधीशयोग २१२ निर्धनयोग फोटोगयोग पारयेयधनलाभयोग ११३ महादरिद्रीयोग निध्याप्नियोग सर्वसंपत्तिमान्योग स्वोपनितधनाप्तियोग १२४ भ्रातृधनाप्तियोग यहकुंट्या योग मातृधनाप्तियोग विशतिजनपालकयोग E १४ पंधुतःकृपर्वा धनाप्तियोग ११५ पंचाशजनपालकयोग पुात धनाप्तिपोग त्रिशतजनपालकयोग २८ ११५ मुपजाजितधनाप्तियोग भनेकजनपालकयोग १६ शतोधनाप्तियोग भनादयोग भार्यातोधनाप्तीयोग | संदौनयोग २२ २१५ परिवारक्षययोग १२ पितासेधनाप्तियोग ११५ विशेषप्रकारके धनयोग धनाप्तियोग १२ धनलाभप्राप्तिदिशा दारीयोग १२० ११६ पनलाभयोग परांगना फी भासक्ति मेधन- नाशयोग नातिदिनादसे धनहानीयोग १८ पहुभ्रातृभगिनी योग मेश्याकोशाकृतयोग २८ भ्रातृभागनी संख्याविचार १३३ गिडादनक्षपायोग पौराग्निभानधननाशयोग ११.! भनमोलतियोग लोकापवादसे धनक्षयपोग भनुनहीन योग निर्धनयोग भागारोगीयाग पापका धननाशयोग भ्रान्तःस्नेहीयाग धर्मकार्यमे धननाशयोग भातात पननाशपो १.१ सावियोग मातहतधननाशयोग १२१ पदामामिपोग पुत्रात पननाशगंग १२३ विस्मीयोग साहात पननासयोग १२१ प्रसिदकांनी पियोग मापात पननाशपांग २६८ १२१ काठपापागादिविलायोग १२८ अथसहज विका ११८ धानहीनयोग १२० राजयोग १२. भूतकयोग १०. " " " " " २०२ मत्रकृयोगयोग " " 0 " " " (८) विषय पिण ° अथपाधियेकः । पानसरोगयोग पिसानीहायग নিহাথী २९८ गायिकारयोग तःवयोग देकल्ययोग तृयायोग ताशययोग 'तनुशोग, गुल्म, संग्रहगी और भनिमारयोग २१० बुरीडायोग १९९ भग्निविपादित तथा शीत शवयोग रयोग रिहना तथा शयनाशयो प्रमेहरोगयोग गपीठकादिपीडायो २०० यातरोगयोग पिगंडयोग बजगंदयो कुष्टरोगयोग सरोगीयोग मरोगी " शूलरोगयोग २०३ / पामान (खाजरोग) योग परोगी " रांत्वनननितरोगयोग भरोगयोग २०४ दोगीयोग कफरोगयोग २२५ गाधियुत नित्यरोगी तया- श्रीहरोगयोग नारोगवान् योग ददरोगयोग २१६ रोग धिरोग सर्पभययोग दररोगीयोग २०५ चौर तथा भग्निभययोग रोगीयोग फोडा,भाग्न तथा खलभय ररोगीयोग योग. २१७ भिरोगोंयोग श्वानभययोग ૨૧૮ दोगीयोग शिमालादिभययोग दरोगी या गुह्यरोगीयोग २०६ चतुष्पद्भययोग प्रादिपीडायोग मृगभययोग पस्मारीयोग गजमययोग २१९ २०७ भश्वभययोग पोग गेदशयिल्यभययोग रागयोग २०८ क्षेत्रचिंतायोग | सौख्यचिंतायोग २१९ वाहनाभरणवधचिंतायोग " " मलभययोग " " " " " " " " " " " " " " " Umasha " " २३ २३ २३ २३ " " विषय पृ० विषय छाचामचिंतायोग वहदारापो. पुचिंतायोग হনামাযী धीचिंतायोग २२.) मुंदरनीयो तातधुचितायोग २२० पयोधिकनीयो. याजाधितायोग विकलांगीश्रीपो. মানুল্লামাযহীন कलावतीबीयो० मातुलसुसयोग रोगाछीयोग इतिषष्ठषिक: २२० पुनर्भुभार्यायोग अथसप्तमविवेक। पतिनताखीयोग सुदारायोग युद्धारंभात्पूर्वधृथ्योग २२१ विधवास्त्रीलाभयोग युद्धमाइपोग जारिणीस्त्रीपोग पुदपायजयपोग कुदारायोग युद्धोत्साही युदशलयो० २९२ दामीसमास्नीयोग सेनापतियो वन्ध्यास्त्रीयोग व्यभिचारीयो. घण्टास्त्रीयोग दंपतिजारयो २२४ स्वदाररतयोग मानास्त्रीगामीयो. २२५/ कलमांतरभागीयोग मातृगमनकर्तायो. चाक्ष्यविसहयोग भगिनीगमनयोग "विवाहवर्षप्रमाणयोग चंध्या तथा रजस्वलासे दरदेशविवाहयोग २३५ संगकायो. २२६ स्थूलस्तनीभार्यायो. पश्यासंगयो. दीर्घ तथा हस्वभगवतियोग घाागीसंगयो. गुयात्रीयोग गर्भिगीसंगयो जायानाशयोग कृष्णवर्ण खनासंगयो जायाहीनयोग २४॥ गस्तस्पगयो २२७ लोकापदाद्भार्यास्यागयो. २४२ वयोधिनीगमनयो० २२७ भार्यायाभग्निदाहो ૨૨ पशुगामीयो. श्रीशरीरेपिशाचपीडायो. भगचुम्बनशीलया. २२८ दारईतायोग विवाद संख्यायो "करात्रसंपन (सीसुख) योग एक विवाहयोग २२९ कामिनीतोपकृतयोग २४२ द्विभार्ययो " वाणिज्यवानयोग त्रिभार्यायो. २३० इनिसप्तमविवेकः। " " " " " " " " .

(१२) प. " " " " " " चंद्र युध चंद्र गुरु ३१५ चंद्र शुक्र " " " " " " " " " | बुध शनि " " " " " " . " " ३१४ शनि मंगल" शनि शुक्र " " ." " " शुभ मंगल " मंगळ विषय पृ० विषय वाहनव्यूहनाय योग ३१३ / रवि शानि वाहन सुख योग चंद्र मंगल अथदादशमविवेकः। हानियोग त्यागीयोग दभाद्धर्मपरिग्रहयोग चंद्र शनि । दानशील योग दानप्राप्तीयोग शुक गुरु धर्मे दृढगुद्धि योग बुध गुक बुध गुरु भन्नदाता योग सदऽसब्धय योग धनसंचय का योग -नागपस्तयोग गुरुयोग फक ऋणदातायोग ३१९ परगृहवासी योग बंधन योग ३१९ मातृ पितृ घातीयोग अथमिश्राविकः। जन्मावसरे पितु मातु या मरणयोग पन्दिनीषियोग पाम्पियाशिनयोग मातृधनक्षेत्रादि काम योग शित योग फपटेन विपक्षगयोग मानेन दादशनावेशयोः धियोंन्धित युदपयोग मधफल ३२१ | सत्यवादी योग ३२३ पदमियादि योग आमान ममाधिपान योग ३२४ । ददु कहु पीडायोग धर्मनिनयोग मनी कृपा प्रजाती योग मंदाति भ्रातृदिनपोग उलान तथा पानी रतयोग "मला शिटादियोग हिपहपयोग भधियोग चंद्र योग पल भम्पा लक्षण "योग ३२७ ३२८ योगानां फलपरिपाकसमय ३२° निधनी लोभी योग " . ३२१ " " " ३२९ " "मनमा " "" मोगा योग पल ". ३२६ / फममम माग " " " " " " " " 1 " (१३) विषय पृ० विषय पू० मुनफा योग फल ३३३ विषकन्याभंगयोग भनुफायोग फल काकवाध्यायोग दुधरायोग फल बन्ध्यायोग केमद्रुम योग फल इतिसीमातकतवं। फेम म भंगयोग प्रचरधन तथा सिद्धयोग अथदशातत्वम् । देवताऽतिषि पृमक योग दशाविचार इतिप्रकीर्णत्वम् । पूर्णादशाफल अथनीजावकतत्वं रिकादशाफल भनिष्टादशाफल २४६ नातकोनं फलमीणांविलोक्यं३३५ मीणाभसंभवं पति ते५ ३३५ भारोहिणीदाफल, भवरोहिगोदशाफल शील भपण गणपतीघीयो० पुरुषाकृति श्री योग " पूर्यादिशभाउतरार्दमिश्रा प्रत्येक राशीके त्रिंशांशकाफक शुभदशा नीता यामशमनफनायोग३३७ कधादशा ३४० लग्नदशाफल मुभर्तृका योग ३४८ ३३८१ यतिस्पपहदशाफल पलीयमन्वितायोग प्रवासीपति योग "भभीष्टसिद्धिदादशा भवापश्यते योग "रानभयदा नया रिपदादशा भरिपाइपोग "भतिपादादादशा पुन योग "मदाप्रतिपादादशा भम्पसमा योग " लग्नाविदादश भावेश ३४९ पतिसक्षम सुसपता योग पदमांनशाप्रवेश समप भत्सनायोग यशशुभाशुभदमाफ ३५२ भनपत्यापोग पहचारन भरपर्गन मृत्पापण्यायोग "शुभाशुफरपिचार पुग्धपोग इतिमानत्यम् पंचम सांततिपा मुरादपनी योग समानिसमय एर्गन पंपराकानिवासस्थाना माल विधायोग विधायोग टीकाकारकाशपर्गन पिसम्पापोग ग्रंपसमामी " " दशाफल सरोगभगा पा सद्भगापोग ३३९ भतरदशाफलम् ४. " ottic

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भीभुवनेवरी प्रिंटिंगप्रेम, में छपीई पुस्तक
विषयार्थ तयार है.
६ लघुपूजाऽनुष्टान पद्धति धी
पूमा तया भनुशन संबंधी भैप्तीपुस्तक भानतकही भी छपीनी
इस पुस्तक के पढ़नेसे हरेक पालक पना भौर फर्मकांड में नियुग
होमाताहै भौर पूना मनशान संबंधी काम के लिये दुसरी कोई पुस्तक
पटनेकी गरूरत नही रहती है पुस्तक परमोपयोगी पास रखने योग्य
है मुत्य. )
8 ग्रह आणि ग्रहाचा परिणाम मराठी
इसमे ग्रहफ्पापदाद भौर ग्रहोफा भसर मनुप्पा दिकार यो और
पपोफरहोता है वगेरा ५ विषय के पनौके उत्तर भति उत्तम प्रकार से
लिरखेगये है जिसके पढनेसे सर्व साधारण भी पलित के नमानने
याले नास्तिको को उत्तर देके परास्वकरसते हे पुस्तक भरश्य देखने
योग्य है. जदीकरो पुस्तके यहुत कमरहगई है मूल्य ।।)
परिक्षा विचार ।
मै इस साल परिक्षामे पास होउंगा के नही इसप्रश्न का उत्तर सोप
पत्तिक शास्त्रानुसार जाननाहो तो इसपुस्तकको भवश्य देस्निपे विचार
हेन्दी भाषा मे किया गया कीमत) मात्र
नाडीमानविवाहपटल.
इसमें विवाहमहूते विषय विवेचन के ६. श्लोकद येप्रत्येक लोक
नक २ पलके बरावरके है इसलिये इनसाठही लोकोका १ पाठ पूरा
याके १ घड़ी याने २४मिनिटहोनाते हैं भनाइसंग्रथके द्वारा विवाह
उहत का निर्णय भौर खरीखोटी घडीकी पहचान ये दोन काम एकस"
यडेकामकी देखनेयोग्य है मूल्य -1) माय
अध्यक्ष श्रीभवनेश्वरी प्रिंटिंग प्रेस
ज्योतिपर्कायालय-रतलाम.
सिने पुस्तक
"

भापाटिकासहित. जातकतत्व प्रारम्भः। साम्बंसदाशिव विष्णु गणेशंच गुरुतथा । नत्वाजातक तत्वस्य भापा टीका करोम्यहं ॥ १ ॥ टीकाकार ग्रन्यादिमें विप्रविघातार्थ स्वष्टदेवकों प्रणामरूप चरण करताहै, साम्पसदाशिव एवं विष्णुभगवान और गणेशजी निजगुरु पूज्यपादमहादेवजी महाराज को नमस्कार करक में श्रीति शमा जातकतत्व की भाषाटीका करताहू ॥२॥ श्रीगुरुगणेशाम्या चरणानत्वाप्राचीनार्वाचीन होरात न्त्रसारमुद्धृत्य महादेवोजानक तत्वं कुरुते ।। ३ ।। टीका-श्रीगुरु गणेश और जगदम्बाके चरणोंको नमस्कार प्राचीन भौर नवीन फलितगात्र के ग्रन्यांका सारलेके महादेव जातकतल ग्रंथकरते है ।। १। इस प्रकार निर्विमसे ग्रंथ परिसा ग्रंथ कार पेष्टदेव भौर निजगुरु गणेशकों नमस्कार करके पर करते है। मस्तकमुखोरो हृदुदरकटियरितलिङ्गोरुजानुजयां मेपादितः कालाङ्गम् ॥ २॥ टीका-राशियो केभंग विभागमस्तक १ मुख २ स्तनमध्य ४ ददर ५कटि ६ पस्ति [ नाभीके नोचका भाग " पेदू"]७ | जंघार घुटना १० पिंडली ११पाच पैर ] १२ इनस्थानों में कम राशीको भादिलं वागविगी कालपुरुष के भंग में मानना ।

(२) [जातक्तत्व] के विभाग में जिस राशीका जिस स्थान पर अमल कहाहै जैसे मेषका :मस्तकपर सिंहका पेटपर इत्यादि उनसर्य १२ बाराहिस्थाना में से निस विभाग की राशीदीर्घहो वह अंग लंबाइस्वराशी हो तो हस्व अथवा जिस रागी को पापग्रह पीडित करते हों वह राशी जिसस्थान र अमल रखती होगा उस अंगमे कष्ट जानना जैसे कर्क या सिंह पर पापन है इनको पापग्रह देखते है इनका स्वामि पापग्रह से युक्नदृष्टहै. त पेटमे वा हृदय में पीडा कहना एवं सर्व अंगोका विचार काल पुरुष अंगविनागसे जानना ॥२॥ म,शुन, च, र, बु, शु, म, गु, श, शगयो मेपादीशाः॥३॥ टीका-मंगल १ शुक्ररथचंद्र ४ राय ५युध ६ शुरु ७ मंगल . गुरुः९ शनि १० शनि ११ गुरु १२ मेषादिराशियों के क्रमसे स्वाम कहे है ॥३॥ इस मूमे ग्रंथकाने नाकदेशनामनिर्देशन्याय से १ राशियों के स्वामियों के नाम एक २ अक्षरमे कहहै ॥३॥ रसोम्यो नृस्त्रियो चरस्थिरद्विस्वभावाश्चमपादेः॥४॥ सिंहादिचतुष्कयुग्मकुंभाः शीदियाः मीन उभयोदयः शे. पाटोदयाः ॥ ५॥ टीका-रागियोंकि फरीदर्सज़ा-करभार सौम्प, पुरुष म्री, नरस्थिा और द्विस्वभार, इम ममम मेपादिराशियो कि संज्ञानाननाः ॥ ४॥ सिंह५ कन्या ६ तर ७.धक ८ मिगन और कुभ ११ श्रीपादय राशी मीन १२ उभरोदय और मप १ पम २ फर ४ धन ९ मसर १० पटोदय रानी नानना ॥५॥ रिमिथुनशीपादया दिने शेपारातो पटिनः ॥६॥ सामिपुनरिनाशीदिया.रानिदिन में पला in पटादप उभपांदय 1121।४।९।१० । १२. रा घटवार जारग! || (३) [भाष.टिका सहित] कर स्त्री पुष्य राशीयोकी संज्ञाका चक्र. मेष पभ मिथुन वर्क सिंह का तुल वृद्धिक धन एकर कुंभ मीन मूर सैम्य कर सौम्य होम्य कर सौम्य कर सौम्य पुरुष वं। पुरुष स्त्री पुरुष स्त्री पुरुष स्त्री पुरुष स्त्री चर स्थिर द्विम्म चर स्थिर द्विस्व. चर स्थिर द्विरव. स. स्थिर द्विस्व. पृश, पृटो शपो. पृष्टा शायों, ता. शा. श.पो. पृष्टी. पृष्टी. शापों उभये. रात्रीगणी राशी रात्रा दिन दिन दिन दिन रात्री रात्री दिन मंत्री देह धन सोत्थमात्रात्मजारि स्त्रीमृति धर्म कर्म लाभव्य यालमापदायाः ॥ ७॥ टिका-देह १ धन २ सोत्य (भ्रातृ)३माष (माता)४ भा. 'स्मज (पुत्र)५ भरि (शट) ६ श्री ७ मृति ८ धर्म कर्म १० लाभ ११ व्यय १२ लग्नकों आदिले क्रमसे वाराहि भायोके नाम जनना ।। ७॥ यह होरा द्रेष्काण नवांश द्वादशांश त्रिशांशाः षड्वर्गाः॥८॥ टिका-पवर्ग--ग्रह १ हारा २ ट्रेप्काण ३ नयांश ४ द्वादशांश ५और चिंशांश ६ इनको पद्यर्ग कहते है ।। ८॥ समेचंद्रार्कयो विपमेन्यत्ययेनहोरा ॥ ९ ॥ न्येपुनवःशा द्रेष्काणपाः ॥ १० ॥ चरभेस्वम्मातिन्थरे नवमभाविबभावे पञ्चमभानवांशाः११ -स्वभावादशांशाः ॥ १२ ॥ समेगुकज्ञज्यार्फि कुजानां पंचायष्ट शरेपवस्त्रिंशांशा वि- पमेन्यथा ॥ १३ ॥ टी-ग्रह- राशियों के स्वामि ऊपर है उस प्रमाणे लिम्बनार नोट-* PRERA आनही समस्त देशवादि पतन और सांप्रसन महलापीय - अतर प्रत्यक्षप्रतीतहार एकदा ज्योत दिने र कुन्ध गहभदा साधन प्रपमरना तदुपरांत उन मार दास भार फ्लदिरामा मानमतता २होरा-समराशी में अंगना न भोर १५ में भंशतक रवीकीहोरा मानना शिपम गशीम इममें उन्ट भयांत १५ भगतक रवीकी १५ से ३० अंशतक चंद्रकी होग जानता ॥९॥ ३ देष्काग-रागीक. प्रथम काग (म भगतक) में उसी 'राशीका स्वामि दमा काग (3" में अंगतक) में भानी रा- शीसे पांचमी राशीका म्यामिनीमापाग (२० मे अंगकत) में भपनी राशी सं नयमी गशीका स्वामि काग काम्वामिहोनाई १० ४ नवांश-चग्गशी में अपनी राशीमहि म्यिग्गनी में अपनी राशीसे जो नवमीराशी हो उसकों आदिले हिम्पमात्र गशीम अपनी राशीसे जो पांचवी राशी हो उसको भादिले नशंग के स्वामा जानना राशीके नवमें भागको नयांग कहने है. एक नयमांश।२० (तीनभंश : पीसकला) का होता है ॥ ११ ॥ ५द्वादशांश-द्वादशांश के स्वामी अपनी राशीस ही जानना. एक द्वादशांश टाई भंशका होता है ॥ १२ ॥ ६ मिंशांश-समराशी में शुक्र बुध गुरु शनि मंगल ५। ७1८1- ५१५इन भंशोकै क्रमसे मिंशांश के स्वामी कहे है विषम राशी में व्युत्क्रम [ उलटे] अर्थात् ५।५।८।१५ इन अंशो के क्रम से मंगल शनि गुरु बुध शुक्र त्रिंशांश के स्वामी मानना ॥ १३ ॥ - पड्वर्गा एव सतमांशसहिताः सप्तवर्गाः १४ विपमे स्वस्मात्समे सप्तमात्सप्तमांशः १५ सप्तवर्ग चक्र । उपरोक्त षड्वों मे सप्तमांश मिलाने से सप्त वर्ग होते है ।।१४।। ७ सप्लमांश-विषम राशीमे अपनी राशी से ही और सम राशीमे अपनि राशीसे जो सातमी राशी होव उससे गिननेस जो राशी भावे उसका स्वामी सप्तमांशका स्वामी होता है। एक सप्तमांश ४ अंश १७ कलाका होता है॥१५॥ सप्तव दशांश पोडशांशपष्टचंशयुता दशवर्गाः १६ दावर्ग- सप्तवर्ग मे दशांश पोडशाश भौर पष्टचंश ये तीनवर्ग

[ भाषाटीका सहित]
र भी मिलादेने से दशवर्ग होते है ॥ १६ ॥
ओजेवस्मात्समे नवमाद्दशमांशः ॥ १७ ॥
चरेजायाः स्थिरेसिंहाचा द्विस्वभावे चापायाः पोडशांशाः१८
स्वभात्पष्टवंशः ॥ १९ ॥
टीका-दशांशपोडशांश और षष्टयंश लाने कि विधि-विषम राशी
: अपनि राशी से ही समराशी में अपनी राशीसे जो९ नवमी राशीहो
सिसे दशमांश के स्वामी समझना ( एक दशमांश तीन अंश का
ता है) ॥ १८॥
टीका-बर गशी में मेष राशीको आदिले स्थिर राशीमें सिंह राशीकों
मादिले द्विस्वभाव राशी में धन राशी को आदिले ग्रह पोडशांश के
तिनी संख्या के विभाग मे होवे उतनी संख्या पर्यंत गिनने से जो
शी आये उसका स्वामी षोडशांश का स्वामी जानना । एक षोड
शांश १ अंश ५२ कला १६ विकला का होता है ।। १८ ॥
टीक-पटवंदा के स्वामी अपनी राशी से ही जानना। अर्थात
मितनी संख्या के षष्टयंश विभागमें ग्रह होवे उतनी ही
संख्या पर्यंत उस गशी से गिनने से नो राशी आवे बह राशी और
उमका स्वामी षष्टयंश का स्वामी जानना । एक पष्टयंश भंग ३०
कला का होता है। दूसरी गति यह है कि अंशोको द्विगुण करना
मिचकी कला ३ तीससेकमहोती उनमें १गुक करना और ३० तीम
से अधिक होतो २ दोपुनः करने से जो आवे उतनीही संख्या का
पचंश विभाग जानना यह विभाग वारासे अधिक होती १२
बाग काभागदना । उदाहरण ।। जैसे लग्न ५॥ १५॥ ५५ ॥ ७ है इसके
अंश१५ को द्विगुण किये हुवे, अंशोके नीचे कला तीससे अधिक है
इसलिये २ मिलाये ३२ हुवे अतः यत्तीस में विभाग मे लग्न है यह
१२ से अधिक है यारहका भागदिया शेष ८ रहे लग्न कन्या हे अतः
कन्या राशी से ८ भाठ पर्थत गिनने से १ मेप रागी आई यह पटवंश
लग्न आपा इसका स्वामी भाम ये पयशपतिहुभा इसी प्रकार
सर्वत्र जानना ॥ १९॥

[ जातक्तत्व यादित्यो चाउधिमित्रवर्गः पारिजातोत्तम गोपुर सिंहासन पा रायतदेवलोक देवलोकैरावतवैशेषिकसंजःक्रमात्. ॥२०॥ टीका-पारिजातादि वर्ग संज्ञा लोनकीविधि-उपरोत्तरीतीसे दशवर्ग साधन करना और उसमे जितने स्व.उच्च भधिमित्र. ग्रहके वर्ग होवे उन चाँकि संख्या का योग करना वहयोग यदिर होयतो वहग्रहपारिजात २ वर्ग मेहै एवं ३ उतम. ४ गोपुर ५ सिंहासन. ६ पारावत.७देवलोक ८ देवलाफ. ९एरावत १०वैशेषिकांश वर्गसंज्ञानानना.उदाहरण ॥ जैसे सूर्यके दशवर्गमे स्व. २ उच्च १ भधिमित्र ग्रहका वर्ग है इनका योग ६हुवाती सूर्य छ8पारावतांशंसन्न कयनमे है ऐसे दिसर्वत्रनामना।।२०॥ टयंरोशास्त्वयुग्मघोरे १ रास २ देव ३ कुरै ४ रक्षोगणे ५ किन्नरै ६ भेंट ७ कुलभ ८ विपा ९ मि १• मायाँ ११ प्रेतपुरीप १२ बरुणे १३,१४ कला १५ हि १६ १७चंद्र १८ मृदुं १९. मृहुँ २० पर्ने २१ विष्णु २२ यागौश२३दिगम्बर २४ देवी २५द २६ कलिनाश२७क्षितारा२८कमलाकर २९ मंदालेज मृत्यु ३३ कॉल ३२ दावाग्नि ३३ पौर ३४ पनकटक ३५सुंधा ३६ मत ३७ पूर्ण९३८ विप- विय ३९, कुलनीग १० मुस्प ४१ वंशापो ४२ मात १३ काठेरेप ११ माम्य १५ मृ? ४६ गीतले ४७ दंष्ट्राकराले ४८न्दुस ४. प्रवीण ५० के लौग्निदायुध निर्मल शुभा ५४७ गुनो ५५ तिौनल ५६ सुधा ५.७ पयोधि.५८ भ. ३०

[नातकाल
मणे ५९ दुरेखा ६० युग्मेतु व्यत्ययः ॥ २१ ॥
टी विषमराशीमपष्टयं शप क्रमसे धोर राक्षसरइत्यादिक्रमसेनानना
और समराशी मे उरटे जानना । अर्थात् विषम राशीका गृह जितनी
ज्याफे पष्टयंश विभागमे होवे उतनीही संख्या पर्यंत क्रमसे धोर
क्षिसादि गिननेस पष्टय होगा. भौर समराशीमे उतनही पष्टयश वि-
भाग पयत उलटा इंदुरेखा र भ्रमणादि २ कर्मस गिननेसे पट शेप
होताहै ॥२१॥
पट्यशेश चनम् ।
घोर १.६० राक्षस २-५९देवर५८पैर ४-५७रक्षागण५-५६ मिनर६-५५
भ्रष्ट-५४ कुरा ८-५३ विष ९-५२ भग्नि १०-५१माया ११-५०
"प्रेतपुरीष १२-४९ वरुण १३-४८ इंद्र १४-४७ कला १५-४६ महि
१६-४५ चंद्र १७-४४ चंद्र १८-४३ मृदु १९-४२ मृदु २०-४१
पन्न.२५-४० विष्णु २२-३९ वागीश २३-३८ दिगम्बर २४-३७
देव २५-३६ अर्द्ध २६-३५ कलिनाश २७-३४ क्षितीश २८-३३
कमलाकर २९-३२ मंदात्मज ३०-३१ मृत्यु ३१-३० काल ३२-२९
दावाग्नि ३३-२८ घोर ३४-२७ यमकंटक ३५-२६ सुधा ३६-२५
भमृत ३५-२४ पूर्णेदु ३८-२३ विषदिग्ध ३९-२२ कुलनाश ४०-२१
मुख्य ४१-२० वंशक्षण ४२-१९ उत्सात ४३-१८ कालरूप ४४-१७
सौम्य ४५-१६ मृदु ४६-१५ शीतल ४५-१४ दृष्टाकराल ४८-१३,
इंदुमुख ४९-१२ प्रवीण ५०-११ कालाग्नि ५१-१० देहायुध ५२-९
निर्मल ५३-८ शुभ ५४-७ भशुभ ५५-६ भतिशीतल ५६-५ सुधा
५७-५ पयोधि ५८-३" भ्रमण ५९-२ इंदुरेखा ६.१.१.
इन ६० में २६कूरांश १ मध्यम ३३ देव भाग के श्रेष्ट (शुभ ) फलदे
ने वालहै ।।
लग्नाम्बस्तदेशमानिकेंद्राणि ॥ २२ ॥
टीका लग्न १ चतुर्थ सप्तम भार दशम १० (१-४-४-१०)
इन चार स्थानोकी केंद्र सनाई ।। २३ ॥
स्वायाटमात्मजाः फणफराः ॥ २३ ॥

८
[मागाटीका महित]
टीका-दूसग म्याग्यांसाठ्यांपांना५(१-५-८-११)
इनचारस्थानोकि फगर संना ॥२४॥
यरि धर्मान्त्या आपगल्लिमाः ॥ २४ ।।
टीका-तिसगउटा नरमायाग्या १२(:.-.---१२)
इनचार म्यानेकि आप फिलम मजा ॥ २४॥
व्याय खारया: उपचयाः ॥ २५ ॥
टीका-तीसराश्ठादमयाण्यारवां??म्यानकीउपचय मजाह२५
धर्मात्मजो त्रिकोगो ॥ २६ ॥
टीका- नवम ९ और पंचम ५ म्यानको त्रिकोण संजाई ॥ २६ ॥
तुर्याप्टमो चतुरस्रो ॥ २७ ॥
टीका-चाय और आठमे स्थान को चतुरस्र कहत है ।। २७ ।।
स्वास्तौ मारकौ ॥ २८॥
टीका-दुसरा २और सातमा येदोनो स्थान मारक संजकहै ॥२८॥
स्वांत्यौ नेत्र संज्ञौ ॥ २९ ॥
टीका-दूसरा २ वारवां १२ स्थान नेच संजकहै ।। २९ ॥
पष्टाष्टमांत्यात्रिकादुष्टाश्च ॥ ३० ॥
टीका-छठा ६ आठमा ८ वारवा १२ इन तीन स्थानोकोषिक-
स्थानकहा है और दुष्टस्थानभी कहतेहै. ॥२०॥
कालिझपान्त्य भागा ऋक्षसंधयः ॥ ३१ ॥
टीका-कर्क ४ वृश्चिक ८ मीन १२ राशीयोंका अत्य भाग (२१ अंश.)
ऋक्ष संधी कदाता है ॥३१॥
सिंहादि चतुष्कं दीर्घ कुंभादि चतुष्कंन्हस्वंशेपाःममाः३२
टीका-सिंह ५ कन्या तुल ७ व्रश्चिक ८ राशी दीर्घ संज्ञक और
.२ मीन १२ मेप ? वृषभ २ राशी हस्य (छोटी) शेष मिथुन ३
४ धन ९ मकर १० राशी सम संज्ञकह (नहिदी और नहि
भर्थात दोनोके मध्यकी ) ॥ ३२॥

(९) [भाषाटीका ] अर्को १ जीवः २ कुज ३ श्चंदौ ४ गुरु ५ मंदारो ६ शुक्र ७ शनिः ८ सूर्पज्यो ९ ज्ञार्केज्य- मन्दा १० जीवः ११ शनि १२ रितिक्रमातन्वादि कारकाः ॥ ३३ ॥ टीका-लाग्नादि वाराहिभावो के स्पिर कारकः ॥ लग्नका १ रवि. धन भावकार गुरु ।सहनका मंगल चितुर्थका ४चंद्र बुध पंचम५का गुरु। रिपु ६ का शनि मंगल । सप्तम ७ का शुक्र । भष्टम का ८ शनि । नवम ९का रवि गुरुादसम १० का युध सूर्य गुरु शनि। लाभका ११ गुरु । व्यय १२ भावका शनि । भाव कारक जानना ॥३३॥ कर्क घटेणझपालितुलाः सजलाः शेपाशुप्काः ॥३४॥ टीका-कर्क ४ का ११मकर १० मीन १९ वृधिक ८ तुल ७ राशि सनल (जलराशी) है शेष मेष र वृपभ२ मिथुन ३ सिंह ५ कन्या ६ धन ९ शुष्क राशी है ॥ ३४॥ क्षीणे न्दर्क यमारराहुशिखिनः पापा स्तन्मात्र युतो- बुधश्च ॥ ३५ ॥ टीकाक्षीगचंद मूर्य शनि मंगल राहु केतु ये पापग्रह है भोर युध पापग्रह से युक्त हो तो वह भी पाप होता है। पाचात्य विद्धानगण हर्शल नेपच्चन को भी पापमानते है इनके अतिरिक्त शेष ग्रह [ पूर्ण चंद्रमा शुभयुत बुध गुरु शुक्र ] शुभ ग्रह जानना ॥३५॥ मंदतों स्लीयो चंद्राच्छो स्त्रियो शेपानराः॥ ३६ ॥ टीका-शनि बुध नपुंसक चंद्रशुक्रसी सूर्य मंगल गुरु पुरुष सज्ञक * PIRN को ममी से गुहपक्ष की ममी तक क्षाणचं उसके गार पूर्ण होता.

(१०) [जतकतल] FY चंद्राकज्याः सात्विका ज्ञाच्छो राजसो शेपास्तामसाः३७ टीका-चंद्र मूर्य गुरु सात्विक (सतोगुणी) बुध शुक्र रातस (रजोगुर्ग- मंगल शनि राहु केतु तामस (तमोगुणी) ग्रहनानना ॥३॥ मेपगो मृग कन्या कर्कान्त्य तुलाः सूर्यायुच्च भानि तत्सतमानि नीचभानि दशमतृतीयाष्टाविंश पंचदश पंचम सप्तविंशविंशांशा अर्का दीनांपरमोच्चनीचभागाः ॥ ३८ ॥ टीका-मेष १ (म) वृषभ २ (च) मकर १० [ में ] कन्या ६[.. ककं ४ [ गु.] मीन १२ (शु.) तुल (श.) राशी फ्रमसे सस दि ग्रहोंकि उच्च राशी कहीहै इनसे सातमी २.राशी [ तुल ] ( वृधिक (चं) कर्क (म) मीन (बु) मकर (गु) कन्या [3 मेप [शनि ] मर्यादिग्रहो किनीच राशि जानना और इनही राशी क्रमसेः १०।३।२८ ॥ १५।५।२७।२०। ये अंश परमोच परम नीच के भश जानना ॥ ३८ ॥ सिंहगोजांगनाचापतुलघटाः सूर्यादिनां मूलत्रिकोण- भाति ॥ 30 ११ ) ८ ७ [भाषाटीका] स्व. उच्च, नीच. मूलत्रिकोण राशि चक्र. वी चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु स्वराशी. ६ १२ पपम मकरकरा कक मीन तुला वृषभ वृधि उच्चराशी ३1२८१५.५ २७ २० परमास दृश्चिक मीन मकर कन्या में श्चि, वृषभ नीचराशिप- ३१२८ १५ ५ २७२० रम नचिांश विषम मेघ कन्या धन तुल कुंभ कुभ सिंह गिल शिको- २ जराशी उ.३१२ म१० १५२ मा मि उच्चमूल श्री स्वर-स्वरस्वर भिमष, मतल २७स्वर कोण स्वरा स्वर के अंश ० ९ उ.१५ पेंगलनेत्रो रक्तश्याम वर्णः पित्तप्रकविः समगावः प्रतापीः रल्परोमयागर्कः ॥ ४१॥ का-ग्रहोके स्वरूप । जोग्रह बलवान हो उसके अनुरूप रादि स्वरूप जन्मतथा प्रश्न में कहेगातहे ।। पिंगल नेत्र, (नाकांति पिली ) रनश्यामरंग, पित्तप्रकृति, सम प्रतापी, अल्पकेश कमवोलनेवाला मूर्य है ।। ४१॥ कुकशो वर्तुलाङ्गने मेधावी मृदुवाक शुभदाग्वियेकी त' कमात्मा चंद्रः ॥ ४२ ॥ :-चंद्र-तरंग, दुर्बल, गोलाकारशरीर, घुद्धिवाद, मधुरभाषी, है, विचारवान्, वातकफ, प्रतियुक्त चंद्र है ।। ४२ ॥ हक्तरुणः रुशमध्पो रक्तसिताङ्गः पेतिकचंचलधी र प्रताप्यारः ॥ ४३ ।। -भौम-दुष्पदृष्टि (सरावननर) याला, तरुग (जवान ) भ-

मेपगो मृग कन्या कोन्त्य तुलाः सूर्यायुच्च भाति
दि ग्रहोंकि उच्च राशी कही है इनस सातमी २.रामी [ तुल] (
वृश्चिक (चं) फर्क () मीन (बु) मकर (ग) कन्या
(१०)
[नामा
चंद्राकच्या मालिका जाली राजमोंगेपास्तानमा
टीका-मंद मग गुरु सानिक (सतोगुणी) पर शुक्र गतस (ar
मंगल शनि राष्ट्र मंत्र नामम ( नमागणी ) प्रहमानना ॥ ३१
तत्सनमानि नीचभानि दशमतृतीयाष्टाशि पंचा
पंचम सन विंश विंशांशा अर्का दीनापरमोच्चनीचभागाः
॥ ३८ ॥
टीका-मेष १ (म) वृषभ २ (7) मकर १० [में ] कन्या ६[1;
कर्क [.] मान २ (अ) (.) राशी प्रमो
मेष [शान ] मर्यादिग्रहो किनीच राशि जानना भार इनही
क्रमसे: १०।३। २८ । १५।५।२७।२०। ये अंश परनोद
परस नीच के भश जानना ।। ३८॥
सिंहगोजांगनाचापतुलपटाः सूर्यादिनां मूलत्रिकोण
भानि ॥ ३९ ॥

T माशि २ ९ ) यी ३२०/३. ३१२ उ.१५ म) कन्या शतर, प्रतापी, भरूपकैश कमबोलनपालामूर्य है।। ४ ।। मी भर पात कफात्मा चंद्रः ॥ ४२ ॥ रमारभाट, विचारपान, पातकफ, महतियुनः चंद्र ६ ।। ४२।। [भाषाटीका ] स्व. उच्च. नीच. मूलत्रिकोण राशि चक्र. रवीचंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु | ५ स्वराशी. ८ ६ १२ मेष उपभमकर कन (कके मीन तुला उपभ वृधि उच्चराशी १० २८/१५ २७ २० परमोच्च रश्चि.वृषभ नीचराशिप १०३1२८ | १५ ५।२७। २० रिम नचिांश सिंह षभ मेष कन्या धन तुल कुंभ कुम सिदामल शिको- णराशी म. १५/२० मिन मित्र स्वरा उञ्चमूली स्वर-२७ स्या स्वरस्वरणस्वर भिमेष, मतलशि के अंश पिंगलनेत्रो रक्तश्याम वर्णः पित्तपतिः समगात्रःप्रतापीः अल्परोमयागर्कः ॥ ४१ ॥ मी टीका ग्रहोंके स्वरूप ॥ जोग्रह बलयान हो उसके भनुरूप, गुंग मूर्यनपिंगल नेय, (नेकांति पिली) रनश्यामरंग, पित्तप्रकृति, सम शुरुशो पर्तुलाङ्गो मेधावी मृदुवाक् शुभद्दग्वियेकी दुष्पहातरुणः कशमध्यो रनसिवाङ्गः पेविकचंचलधी रुदार मताप्यारः ॥ १३ ॥ टीका-भीम-दुष्टदृष्टि (सरारनगर) याला, उरग (नरान) भ- सी । भोर .- ra (१२) [जातकतत्व] वस्या, पतलीकमर लाल और श्वेतरंग का शरीर (गौर) पित्तमकृति चंचलबुद्धी, उदार स्वभाव प्रतापि, भौम है ॥४३॥ गद्गदवाग्यास्यशीलः सुधीर्वाश्यामाङ्गस्त्रिधातुः पुंश्च लोज्ञः ॥ ४४ ॥ टीका-बुध-गद्गदवचन बोलनेवाला हास्यशील (हसनेवाला) श्रेष्ट बुदि, दूर्वा के रंगसमान :श्यामरंग का भंग. वातपित्तकफ प्रकृति, व्यभिचारी पुय है ॥४४॥ स्थूलोगोराङ्गः कफात्मापिङ्गाक्ष मूर्धन्यकचाभियुक्तो विद्वान गुरुः ॥ ४५॥ टीका-गुरु पुष्टशरीर गौररंग कफ प्रकृति पीलीनेमकांति और पालेहि मस्तक के फेशोस गुन विद्वान् गुरु है ॥ ४५ ॥ मुखीवली दर्शनीवपुः सुलोचनः कृष्णकुटिल केशः कामीवातकफात्मा श्यामः शुक्रः ॥ ४६ ॥ टीका-गुफ-सुसी पलवार दिखनोटे शरीरयाला मुहावने नेप का भौर टे? (पुरुषाले) मेश भधिकामी, गात कफ प्रकृति श्याम फारवाला शुक्र है ॥१६॥ किपास्यसनुः कातराक्षः कृष्णःकरादीर्घाद्ने वृहद्दन्तो- सतनूम्हो वातात्ना कठिनयाग निन्योमन्दः॥४७॥ काति-मकामा किक्रिया में भमा रापने नापार कासारंग, संत, दीपदहब? दांवाला मारी भोर का यान परिस्टोरसाद पोरवालातया नियकम करनेवाला शनि अस्थिरनमग्नावग्वमागकस्नायूनिमर्यादीनांधातयः शा-मारि लिया। मम्मि (सी) या मंहगारप गरमामा (मीनाली पाहीचमड़ी) का प चमड़ी का [भापाटीका ] चर्चाका. शुक चीयंका. शानि नशीका. अधिपति है. इनको ग्रहोंबिधातु हते है । जो ग्रह अष्टम मे हैं वा मृत्यु कारक है उसके धातुके कोप ( अंगमे रोगादिपीड़ा तया मरण भी होता है ।। ४८ ॥ सूर्यस्यमन्दाच्छोरिपू ज्ञःसमः शेपाः सुहृद ॥४९॥ चंद्रस्यज्ञाकों सुहृदो शेपाः समाः ॥५०॥ भोमस्य शुक्रार्कि समो झोरिः शेपाः सुहृदः ॥५१॥ जस्येन्दुः शत्रुः शुक्राक्रे मित्र शेपाः समाः ॥५२॥ जीवस्य ज्ञाच्छापरी समोर्कजः शेपा मित्राणि ॥५३॥ शुरूस्य ज्ञार्कजो मित्रे कुजेज्यौ समौ शेषावरी ॥५४॥ मन्दस्प बाच्छो सुहृदो जीवः समाशेपा शत्रवः ५५५५ टीका-नसर्ग मैत्रिचक । मूर्य के-शनि शुक्र शत्रु बुधसम चंदभीम गुरु मित्र है ।। ४९ ॥ चंद्रक-धमूर्यमित्र शेष, ( मंगल गुरु शुक्र शनि ) सम है ।। ५०॥ मंगलके-शुक्र शनि सम बुध शत्रु शेष (रवि चंद्र-गुरु) मित्र है ।। ५१ ॥ बुधके चंद्रशत्रु शुक्र सूर्य मित्र शेष (मंगल गुरु शनि ) समहै ।। ५२ ।। गुरुके-बुध शुक्र शत्रु शनि सम शेष ( रवि चंद मंगल ) मित्र है ।। ५३ ॥ शुक्रके सुधशनि मित्र मंगल गुरु सम शेष [ रविचंद्र भान शन है ॥ ५४ ।। शनि के बुध शुक मित्र गुरुसम शेष रविचंद्र मगल शन्न है ।। ५५ ।। अन्योन्यस्य पार्वत्रयगास्तत्काले मित्राणिशेषाः शत्रवः५६ । टीका-तात्कालिकम शिसाधन ! जिस ग्रहसे जो ग्रह अपने समीप के तीन तीन स्थानमे अर्थात २१३१४ और १२॥ ११ ॥ १० होय बह उस ग्रहका तात्कालिक मित्र जाननाऔर शेष स्थान ५।६।७ ८१९ मे हो वह उस ग्रहका शत्रु जानना ॥५॥ उभयथामित्राण्य धिमित्राणि शत्रवस्त्वभिशत्रयो मित्रश यः समा मित्रसमा मित्राणि शत्रुसमा शत्रवः ।।५।।

(१४) [जातस्तल] नैसर्गिकमेत्रि चक्रम्. मं शु चं मं बुरचं शु । रचं बुश युशु मिन. बु में मंगु शुश श मंगुगु । सम. बु चं शुरचं शनु. - टीका-पंचधामैत्रिचक्र साधन । उपरोक्न नसक और तात्कालिन मै त्रिसाधन ककें देखना उनदोनो मैत्रिमें जो ग्रह मिनका होवे व अधिमित्र (मिा मित्र भधिमिा) दोनो मैनिमें जो ग्रह शत्रु होवे व भधिशत्रु (शत्रु शत्रु अधिशत्रु) एक मैत्रिमित्र भौर दुसरीमे शत्रुहो तो समहोता है (मित्रशत्रु-सम) ऐसेहि मित्र और समहौवे तो (सममित्र-मित्र) सम और शत्रु होवे तो ( समशत्रु-शत्रु )३ होता है ॥ ५७॥ तृतीयदशमी नवमपंचमी चतुर्थाष्टमी सप्तमपादर्दितो ग्रहाः पश्यन्ति ।। ५८॥ टीका-तीसरे ३ दशमे १० एकपाद । नवमे पांचवें ५द्विपार चौपे ४ भाठवे ८ त्रिपाद और सातमें ७ स्थानमे ग्रह पूर्ण दृष्टी देखते है ॥ ५८ ॥ तृतीय दशमी शनि त्रिकोणं गुरु श्चतुरस्र भौमय विशेषतः पूर्ण पश्यति ॥ ५९ ॥ टीका-ग्रहो कि विशेष दृष्टि । तीसरे ३ दशमे १० शनि । नत्रमे पांचवे ५गुरु। चोये नाठवे स्थानमे मंगळ विशेष पूर्ण दा [भापाटीका] से देखते है भर्थात् सर्वग्रहो कि पूर्ण दृष्टि ७ सप्तमस्थान की कही है मो सातमे तो ये शनि गुरु भौम पूर्ग दृष्टी से देखतेहि है विशेष कर [३।१०][९.५][४।८] इन स्यानो में भी पूर्ण दृष्टी से देखते है यह इन ३ ग्रहो कि विशेष दृष्टी कही है ॥६॥ दिनेवारारंभादस्वकालो निश्यस्ततोवारमयेश कालांतः स्वारखंडेनहतोष्ट भक्तो लब्धं गुलिकेष्टकालः॥६०॥ टीका-गुलिक साधनो पयोगि गुलिकेष्टकाल साधन की रीति । दिन के समयका जन्म होतो वार प्रवेश कालके आरंभ समय से सूर्यास्त कालपर्यत की घयादिकको भौर रात्रिका जन्महोवे तो पूर्यास्त समय से वार प्रवेशकाल पर्वत जितनी घस्यादिक होवे उनको पपने वर्तमान यार के खंडेसे अर्थात आगेके सूघ ६२ मे वारो के दिन पति के संडे कहे है उनमें से जो बार भपना हो उसका दिनका जन्म हो तो दिनके संडे से और रात्रिका हो तो जो रात्रिका खंडा होवे उससे गुगन करना आठका भागदेना लब्ध आये वही गुलिकका इष्ट काल होताहै ॥ ६ ॥ वार प्रवेश काल मुहूर्त चिंतामणी में कहाहै उ सकी रीती यहहै कि ।। श्लोक-पादोनरेखा परपूर्वयोजन पलप्तीनास्ति पयोदिनादतः । उनाधिकास्तद्विवरोद्भवल ऊर्द्ध तथा धो दिनपप्रवे- शनं ।। जिस ग्राम का वार प्रवेश काल देखना हो उस ग्राम मे जिस ग्राम की मध्यरेखा लगती हो उस मध्यरेखा और अपने ग्राम के बीचके जितने पश्चिम अथवा पूर्वयोजन का अंतरहोवे उतनीही संख्या मे से चतुर्यास घटाना शेष रहे उतने ही पलोंको पंदरा घटीमें रेखा से पश्चिम मे ग्राम होतो मिलाना और पूर्व मे भपना ग्राम होतो घटाना शेष रहे वह उस ग्रामका पार प्रवेश कालका ध्रुव होता है । इससे जिस दिनका वार प्रवेशकाल देखना हो उसी दिन के दिनाई के साप अंतर करना शेष नितनी पले बचे उतनहीं पल दिनाई से ध्रुव भरप हो तो दिन चढ़े भौर दिनाई से ध्रुव जादा होरे तो उत- नी ही पल रात्रि शेष रहते वार प्रवेश होता है । इस प्रकार बार प्रदेश काल लाना यदि दिनच? चार प्रवेश हुवा होये तो नितने पल दिनचढ़े हुग उतनी ही पळ दिनमान मे से (१४) [मातस्तर] नैसर्गिकमैत्रि चकम्. यु श श चं में यु र शु रग - : मयुशशु मिन. मं शा मंगु গুহা श । मंगु गु । D शु बु | चं शुरचं श. टीका-पंचधामैत्रिचा साधन । उपरोक्तनसगीक भोर तालाकि मै त्रिसाधन ककें देखना उनदोनो मरिमें जो ग्रह मित्रका हो। अधिमित्रा (मित्र मित्र भधिमिा) दोनो मेनिमें जो ग्रह शत्र होने भधिशत्रु (शत्रु शत्रु अधिशशु) एक मैजिमिन भौर दुसरीमे श तो समहोता है (मित्रशत्रु-तम ) ऐसेहि मित्र और समहोवे तो (सममित्र-भित्र) सम भौर शत्रु होवे तो ( समशत्रु-शत्रु ) होता है ।। ५७॥ तृतीयदशमौ नवमपंचमौ चतुर्थाष्टमी सप्तमंपादर्चितो ग्रहाः पश्यन्ति ॥ ५८॥ टीका तीसरे ३ दशमे १० एकपाद । नवमे पांचवें द्विपाः चोथे ४ भाठवे शिपाद और सातमें स्थान ग्रह पूर्ण दृष्टी देखते है ।। ५८॥ तृतीय दशमी शनि त्रिकोणं गुरु श्चतुरस्र भौमभ विशेषतः पूर्ण पश्यति ॥ ५९ ॥ टीका-ग्रहो कि विशेष दृष्टि । तीसरे ३ दशमे १० शनि । नत्रमे पांचये ५ शुरु । चोभाठवे स्थानमे मंगल विशेष के पूर्ण [भापाटीका] से देखते है भात सर्वग्रहो कि पूर्ण दृष्टि ७ सप्तमस्थान की कहीं है सो सातमे तो ये शनि गुरु भौम पूर्ण दृष्टी से देखतेहि है विशेष कर [३११०][९१५][४।८]इन स्थानो में भी पूर्ण सृष्टी से देखते है यह इन ३ ग्रहो कि विशेष दृष्टी कही है ॥ ६॥ दिनेवारारंभादस्तकालो निश्यस्ततो धारप्रदेश कालांतः स्ववारखंडेनहतोष्ट भत्तो लब्धंगुलिकेष्टकालः ॥६॥ टीका-गुलिक साधनो पयोगि गुलिकेष्टकाल साधन की रीति । दिन के समयका जन्म होतो वार प्रवेश कालके भारंभ समय से सूर्यास्त कालपर्यत की पट्यादिकको भौर रात्रिका जन्महोये तो सूर्यास्त समय से वार प्रवेशकाल पर्यंत नितनी घध्यादिक होवे उनको अपने वर्तमान वार के खंडेसे भात भागेके सूत्र ६२ मे वारो के दिन राशि के खंडे कहे है उनमे से जो वार भपना हो उसका दिनका जन्म | तो दिनके संडे से और राधिका हो तो जो रात्रिका खंडा होवे 'ससे गुगन करना आठका भागदेना लव्य आये यही गुलिकका इष्ट ल होताहै ॥ ६ ॥ बार प्रवेश काल महूर्त चिंतामगी में कहादै उ की रीती यहहै कि ।। श्लोक-पादोनरेखा परपूर्व योनन पलयुतोना स्ति योदिनार्द्रतः । ऊनाधिकास्तद्विवरोद्भवैपल कई तथा धौ दिनपभवे- निं । जिस ग्राम का वार प्रवेश काल देखना हो उस ग्राम मे जिस गम की मध्यरेखा लगती हो उस मध्यरखा भौर अपने ग्राम के चिके नितने पश्चिम भयया पूर्वयोजन का अंतरहो उतनीही संख्या मे से चतुर्थास घटाना शेष रहे उतने ही पलीको पैदरा घटीमें रेखा से पश्चिम मे ग्राम होतो मिलाना और पूर्व मे अपना ग्राम होतो घटाना सप रहे वह उप्त ग्रामका धार भोश कालका ध्रुव होता है । इससे जिस दिनका चार प्रवेशकाल देखना हो उसी दिन के दिनाई के साथ अंतर करना शेष नितनी पले बचे उतनहीं पल दिनाई से ध्रुव अस्प होवे तो दिन चढे भोटिस ,

(१६)
[आतकतत्व]
घटादना एवं रात्रिशेषरहते वारप्रवेश हुआ होता नितने पल शंप
रात्रि रहते प्रवेशद्वया उतनेहि पल दिनमानमे अधिक मिलादेना सो
चार प्रवेशकाल से मूर्यास्तकाल पर्वतका काल होता है। ऐसे हि सूर्या-
स्तकाल से वार प्रवेश पर्यंत के कालकों जानना । उदाहरण. । जैसे
किसी का जन्म सम्बत् १९५३ कार्तिककृष्ण ६ भौमवार को
इष्ट. ३९। मू. ६ | १२ पर रात्रिका जन्म है इसलिये मूर्यास्त से
बुधवार के प्रवेश का कालपर्यत समय निश्चय करने के लिये बुधवार
का प्रवेशज्ञान प्रथम किया रतलाम-और मध्यरेषा उज्जयनी के बीच
के भतरकी योजन संख्या ६ है इसमे से इसी संख्या का चतुर्याश.
१६ पटाया ४।० शेष रहे यह पल रेसा से पश्चिम मे रतलाम
होने में १५ पटी मे युनः की १५। ४।३० यह रतलाम का पार प्र-
वंश ध्रुवक हुवा इसके और बुधवार के दिन के दिनाई. १४ । २।०
के अंतरकिया ।।२।३० शेप वस्यादि अंतर रहा इसदिन दिनाई से
ध्रुव भधिक है इसलिंग ? घडी २ पल ३० विपल राभिरहते बुधवार
प्रेमामा. अतएव मंगलगार के मूर्यास्त समय २८1५ से मोदय
पर्यत गतिमान ३१५९ है इस में से चारप्रसंशकाल १।२१३०
'पटापार.३.१५२।३० यह मूर्यास्त से यार प्रवेश कालान्त-
ममप भी इसको मंगलवार के राज का जन्म ६ सयर मंग
प्यार फरामी के मंहजो भागे मूग ६२ मे कदाह उस से गुगन
वि.१५२३० हु इसके ८ फा भागदिया लम्ब३।५१।३३
पागनिक का इकान भा. इस इटा हानस्पट फीरीनि से
मार सान साप. ७.२ पद मलिक लग्न म्पष्ट हमा॥६॥
तत्काल छाननुल्यो गुलिकः ॥ ६ ॥
दिनकोडात्रा मानगाहपंचाधिषिनेदुमिता गुलि-
काः॥ ६२ ॥
गा-बागर पोटालान की निगे मोहान मायनका
पारिशमाता॥२॥

T [मांपाटीका दिनमे सूर्यसें राभिमें अधसे ७१६१५१४॥३.२१ प्रमसे गुलिक के संडे जानना ।। ६२॥ एवं मंगु शुश ७६ ५४३ २१ दिनमें गुलिक संडा ७६५ ४ रात्रिी गुःख. अन्योन्यष्टों एकतरदृष्टी अन्योन्यस्थानस्थितावेक अस्थिती या संबंधोवगंतव्यः ।। ६३ ॥ टीका-संवैध ग्रह आपसमे परस्पर देखते होवे उस्को प्रथम दृष्टि संबंध जानना एक ग्रहदेखताहोवे दूसरा उसको नहीं देखता होय परंतु जो देखता है उसकी राशी मे गयाहो तो उस्को एकतर दृष्टि संवधं २रा जानना। दोनो परस्पर स्थान में स्थित होवे भर्थात् एककी राशीमें दूसरा और दूसरे की राशी में पहला होवे उस्को भन्योन्य स्थान सम्बंध ३ राजानना । दोनो ग्रह एकत्थानमे स्थितहोवे उस्को एका स्थित सम्बंध ४था जानना । ऐसे चारप्रकार के सम्बंध होते है ।। ६३॥ मंदाकाराः शुष्का चंद्राच्छौ सजली जलर्भगोज्योच ६४ टीका-शनी सूर्य मंगल शुष्क और चंद्र शुक्र सजल ग्रह जानना बुध गुरु जलराशीमे जायतो सजल शुप्फराशीमे स्थितहोने तो शुष्कलानना ।। ६४॥ सर्व ग्रहेन्योधिकांशादिनात्मकारक स्तत कमेण न्यूनांशा अमात्य भातृ मातृ पितृ पुत्र ज्ञाति दारा कारकाः६५ टीका-सूर्यादि राहु पर्यंत सर्व ग्रहोमे से गोगह भधिक अंशादिक का हो वही भोत्यकारक होता है फेर उससे न्यूनन्यून भंशार्दिकफे ग्रह क्रमसे भनात्य भ्रातृ मात पित पुर ज्ञातिदारा कारक जानना ॥६॥ अंशशब्देनात्मकारकनवांशः ॥ ६६ ।। टीका इसग्रंथमे जहां भंश शब्दाचे वहां भामकारक ग्रह के नयांश लाकी कुंडली जानना इसीको कारवांस बुद बहते ५६६१ [नातकल] ओजः ममाहाल कुमार युवा वृद्धामृतास्या अवस्थाः समः व्यत्ययः ॥ ६७ ॥ टीका-विषम राशीमेमसे उछर्भशोके विभागसे पाल कुमार २ युवा ३ वृद्धा ४ मृता भवस्या जानना भौर समराशीमे विसरीत जानना भर्यात छ भंशका ग्रहहौवेतो मृता १ से १२ तुक वृद्धा २ पोरीसे १८तक युवा भेठारासे २४ भशतक कुमार२५चावीससे ३० भंशपर्यंत चाल ५ भवस्या जानना ।। ६७ ॥ द्वादशांगादशपट्केवस्थितःपूर्णकाउदः ॥ ६८ ॥ टीका-वह जिस राशीमे हो उस शाशीके पारा भंशको भादित ६ उभंशके भीतर स्थित हो (भर्याद १२ । १३॥ १४ ॥ १५॥ १६॥ १७ १८ भंशका हो) तो यह पूर्ण फलदेता है ।। ६८॥ बलंपदत्युक्तम् ॥ ६९ ॥ टीका-इस ग्रंयमे जहा पल शब्द आवे वहा केशीका षड्बल समझना ॥ ६९॥ वक्रग उच्चगोवा महाबली ॥ ७० ॥ टीका-जोग्रह वक्रगती होवे वा भपनी उच्चराशीमे स्थितहोवे वह महाबलवान समझना ॥ ७० ॥ सतुङ्ग मूलत्रिकोणगा नानिष्ट फलदाः ॥ ७२ ॥ टीका-स्वराशी उच्चराशी मूलत्रिकोणराशीमे जो ग्रहस्थितहोते है घे नेष्टफलनहीं देते है (श्रेष्टहीफलदेतेहै ) ॥ ७२ ।। गुरुपूर्ण दृष्टोयहो नानिष्टफलदः ॥७२॥ टीका-जिसग्रहको गुरु पूंगदृष्टीसेदेखताहोवेवह नेष्टफलनहीं देता है।।७२ यहर्शसंख्यां ग्रहसंख्या हता पुनः ग्रहांशसंख्याहता इष्टजन्म नक्षत्रलम संख्याभिर्युतार्कनष्टा शेषावस्थाः ॥ ७३ ॥ शयनो.१ पवेशन २नेत्रपाणी ३ प्रकाश ४ गमना ५ ऽगमन ६ सभा ७ गम ८ भोजन '९ नृत्यलिप्सा १०; ।

,
[भाषाटीका]
कौतुक १३ निद्रा १२ अवस्थाः ।। ७४ ॥
टीका-जिसमक्षाका ग्रहहोवे उसनक्षा की संख्या को ग्रहकी संख्यासे
(सूर्य होतो १ से चंद्रहोतो २ से इसक्रम से संख्यारह की होती है ) गुणन
करना फेर उसको ग्रह नितने भंशका होये उतनीही भशसंख्यासे गुणन
करना और उसमे इष्टघटी जन्मनका की संख्या भोर जन्म के लग्न
की संख्या मिलना १२ बारहका भागदेना शेष १ वचनो शयन २ उपये
शनापाणी४ प्रकाश ५ गमन ६ भागमन ७ सभा ८ गम ९
भोजन १० नृत्यलिप्सा ११ कौतुक १२ निद्रा भवस्था जानना ७३-७४
उदाहरण। सूर्य ६ । १२ । २२ यह स्वातिनक्षा के द्वितीयवरण है
मभिन्यादि कृमसे स्वातिनक्षा १५ पंदरहवाहे इसलिये ग्रहसंच्या
१९ इसको सहसंख्या १ से गुगनकिये १५ हुए फेर सूर्य १२ मा
फाई इसकरण ग्रहोश संख्या १२ यारासे गुणनकिये १८० भाये इसमे
जन्म समय की इष्टपटी ३९ भौर मिथुन लग्न के ३ जन्म नक्षत्र
पुनसके ७ मिलानेसे भायाहुभा यांग ४९ मिलाया २२९ हुए इसमे
१२ याराका भागदिया शेप १ मचाभतएव मूर्य शयना भयस्थाने है
ऐसेहि सर्वग्रहोकि भयस्या जानना ॥७४।।
सोच गोदीप्त स्वभगः सत्यो हितभगो हास्पयुक्तः शुभ
वर्गनः शांतः स्फुरदभिः शक्को मूढोलुप्तोनीचगोदीनः पाप
शत्रुभगः पीडितः ।। ७५॥
टीका-भपनी रशरामी जोमदस्थितहोवे यह दीप्तरजानना।भौरनो
स्लराशीका हो यह स्वस्थ२ मित्रराशी मैस्थितहो गह हास्पयुनाइएवं
शुभरही के वर्ग मे (भर्यात दशवर्ग मे मिस ग्रहमे भधिक शुभ ग्रहकावर्ग)
हो शांत४ भोर जोरलयान हो वहशन५भस्तका दो पहलुप्त ६ नीचरा-
धीमे स्थितही यहदीन भौरपाप ग्रहकी भवया भपने शत्रुग्रह कीराशी
में स्थितहो चहग्रह पीडितसजक ८ जानना ॥५॥
इति महादेषात जातक्तले संतातत्वं प्रथमम् ॥ १॥
इतिमी मगकर्ष भीमन्महादेवात मातकसत्तास्पमाता पेिवामनु
श्रीनिवास रचित नामशिनि मापारीसपा संजाल प्रयमम् ॥१॥

(२०) ॥ अथ सूतिका तत्यम् ॥ भर मतिका [प्रमति समपना] बिनार गर्गन करते है। (पिनाक परांश जन्मपोग) चदेणादृष्टेन्श-पितुः परोक्षं जन्म ॥ १ ॥ स्थिरप्टमांकायांत्ये चंद्रण चाष्टमै स्वदेशस्थापनुः परोक्षं जन्म ॥२॥ चरेतु प्राग्यज्जातस्पपिता विदेशं गतेजन्म ॥३॥ मन्देहे वास्तेभोमे पितुः पगेझं जन्म ॥ ४ ॥ ज्ञाच्छांतरे चंद्र पितुः परोक्षं जन्म ॥ ५ ॥ टीका-पिताके परोक्षमें यालकका जन्मयोग-चरमालग्नको नहि देखाना होतो पिताके परोक्ष में जन्म जानना 11 ॥ स्थिराशी । २१ ५।८। ११ । का सूर्य । भाउमै ८ नवमे ९ग्रय ११ पारवे ।१२। स्थानमें स्थित होगे. भौर चन्द्रमा लग्नको नहि देखना होतो पित स्वदेश में रहते हुवे भि पिता परोक्ष में जन्म होवे [ जन्म समयमें पिता परके बाहर कही होवे] |२|| चरराशि [ मेष तल मकर कर्क] का सूर्य ८।९।११ । १२ । स्थान में स्थित होवे भौर चन्द्रमा लग्न को नहिं देखता होतो पिता विदेश में गाया और पीछे से जन्म हुआ॥ ॥ शनि लग्न में होवे अपका सातमे स्थान में मंगल होने तो पिताके परोक्षमे जन्म जानना. इससूत्र मे योग कहै शनी. लग्न में होतो.२ रा मंगल सात मे होतो.॥४ बुध भौर शुक्रके बीच में चन्द्रमा:स्थित होतो पिताक परोक्ष में जन्म मानना ॥ सर्प वेष्टित योग. भौमत्र्यंशेचन्द्रे पापलग्ने भुभाम्स्यायगासवेष्ठितो जातः॥ ६॥ ... राशी-१८ के देकाणमें पन्द्रहोवे और पापग्रहः राशी-१-५-८-१०-११-] का लग्न होवे सर्व शुभ ग्रह दुसरेर' ।

।
(भाषा टोकासहित)
२१
नयारमे ११ स्थानमें जायतो सर्प वेष्टित जन्म होता. सर्प वेष्टित
का तात्पर्य-सपकार नशोंसे वी तदाकार नालसे भी ॥६॥ भौरभी
सर्वार्थ में सर्पवेष्टिवके योगकहे है वे प्रसंगसे पताते है । यदि भष्ट
मेश लग्नमें राहु सहित होतो बालक सर्प वेष्टित्त हो १ भयका
केंदमे राहु भोर गलिकसे लग्नेश्चर युतहोघे २ भषया लग्नेश
भष्टमेशद्रमें गुतहो ३तथा लग्न में पापग्रहका द्रेष्काणहोतो बालक
सर्प मेष्टित होवे४ और लग्नमें सर्प घाभंडज ट्रेप्काण होवे ५ तथा ट्रे-
प्काण तत्स्वाभियुक्तहो भौर शुभदृष्टिरहितहोतोसर्पष्टित जन्मदोधे ।।।
वृपाजसिंहगे मन्दे वा भोमे भांशतुल्येवयये नालवेष्टितः॥७॥
टीका-मेष वृषासह राशीके लग्नमें शनिभथवा मंगल स्थित होता उस
राशि भौर नवांशके राशि विभागके समान भंगमें बालकनालवेष्टित
होताहै भर्यात् यह राशि वाउस्का नवांश कालपुरुषके भंगमें निसस्थान
में होवे उस स्थानमें नाला लिपटा हुवा होता है ॥ ७॥
यमल जन्म योगः
चतुष्पदेके शेपेपुसवलेषु इयङ्गग्गेषु यमलजन्मः ॥८॥
टीका-चतुप्पदराशि (मेष वृप सिंह मकर पूर्वाद धनका उत्तरार्द्ध)
का मूर्य होवे भार शेषग्रह बलवान होकर द्विस्वभान राशिके लग्न मे
स्थित होवतो यमल भन्म-(जोडलेजन्म) होवे ८ ग्रंथांतरोमें लिखा
है कि भाधानलग्नका स्वामी भौर तृतीय स्थानका स्वामी लग्नमें
होतो यमल (दो बालक) मत्पन्न होवेगे।भयवा भाधान लग्नेश तृतीय
येशसे युक्नहोकर तीसरे स्थानमें होतोभी वही फल जानना [ दो
बालक होवेंगे ॥८॥
जन्म समये पिता पंधनयोग-
सूर्योत्रिकोणास्तगौ मन्दारोपापभगौजन्मनि पिताबदः।।
टीका-सूर्यसे ९१५1 नवमे पांचवें भयवा सातवे स्थानमें शनि
मंगल दोनोही पापग्रहकी राशि में एकत्र स्थित होवेतो जन्म समयमें
पिता बंधाइभा कहना ॥९॥
नौकामध्ये जन्मयोग-
पूर्णेन्दौ ककें झेलग्ने जीवेत नौका जन्म ॥ १० ॥

२२ (जातक तल) टीका-पूर्णचन्द्रमा कर्कराशीका होवे भौर बुध लग्नमें गुरु चतुर्यस्या नमें स्थित होतो नावमें जन्म दाता है ।। १०.।। जलासत्र जन्मयोगाः जलभेंगेऽस्पर्गेन्दौ जलासने जन्म ॥ ११॥ जलभगावंगचन्द्रौजलासन्ने जन्मः ॥ १२ ॥ जलभगे चन्द्रे साम्बस्थे जलासन्ने जन्म ॥ १३ ॥. टीका-जलराशी [४।११।१० । १२।८1७1] का लग्न हा भौर सातमें स्थानमे पूर्ण चन्दमा स्थित होतो जलके निकट स्थ नमें जन्म होता है ॥ ११॥ जल राशीके लग्न और चन्द्रमा दोनो होवेतो जल के समीप जन्म होवे ॥ १२॥ जलराशीका चन्द्रमा दशम १० भवा चतुर्थ स्थानमें स्थित होवे तो जलके समीपमें जन्म जानना ।।१३।। कारागारे जन्मयोगः चन्द्रझे मंदेन्त्ये पारदृष्टे कारागारेजन्मः ॥१४॥ का-लग्नमें चन्द्रमा भौर बारहवें स्थानमें शनि पापपइसे दृष्टहोवेतो जळखानेमे जन्म कहना ॥ १४॥ [गर्त में जन्मयोगः] कल्पिंगेजे चन्द्राटे गर्तेजन्मः ॥ १५ ॥ का-कर्क भयवा वृश्चिक राशिके लग्नमे शनि स्थित होवे भौर उस को चन्द्रमा देखता होती गई [स] में जन्म होता है॥१५॥ [फोटालय देवालय भौर रेतोकी जमीन में जन्मयोग] जलभे मेरे सदृष्टे कीडालये कदृष्ठेदेवालये चन्द्रदृष्टेसरार्क रावन्यां जन्म ॥१६॥ टी- अलरानी [१११११ १२८11] का शनि लग्न होरे भोर उसको पुरसता होतो कोदालय (भानंदनी नगा) में जन्नत मयं देसता रोरतो देवालपमें भौर चन्द्रदेखताहाना रेती रिलो रंगमीन में जन्म करना ।। १६॥

(भाषा टीकासहित . स्मशान, रमणीयग्रह, भग्निशाला, रानमंदिर, शिल्पालयम, जन्म योग । नृलग्नेमन्देकुजदृष्टे श्मशाने सितेन्दुदृष्ठेरमणीयगृहे गुरुद्दष्टे ग्निशालायां रविष्टे नरेन्द्रामरालयगोकलान्यतमे ज्ञहदे शिपालये जन्मः ॥ १७॥ टीका-नर राशी ( १।३।५।७।९।१२ः) के लग्नमें शनी स्थित होर और उस्कों मंगल देखताहोतो श्मशानमे जन्म जानना । शुक्र चन्द्र देखते होवेतो रमणीय स्थानमे जन्म होव । गुरु देखता हावंता भग्निशाला भथवा रसोई घामें जन्म कहना । सूर्य देखता होतो राजमहतमें तथा देवालयमें तया गौशालामें जन्म होचे । भौर बुध जो देखता हविता शिल्पालय (कलाभवन सिलावटी सुथारी लहारी मुनारी चिपकारी काम जिसमकानमें होतेहोवे उसमकान)मे जन्मजानना ॥१॥ माताछोदे भौर दीर्घायु होवे। मन्दाराश्यांपञ्चमस्ते? चन्द्र मात्रात्पज्यते गुरुदृष्टेतु चन्द्रे दीर्घायुः ॥ १८॥ का-शनि मंगलसे।५११९. पांचवे सातवे तथा नवमें स्थानमै चन्द्रमा होवेतो माताउस बालकको छोडदेवे यदि उस चन्द्रको गुरु देखाता होती माता छोडदेचे तभी दीघायु होताहै ॥ १८ ॥ माता त्याग करे भोर मरजाने के योग. पापदृष्टेचन्हेंगे ले भौमे मातत्यको विनश्यति ॥१९॥ पारदृष्टेने चन्द्रे मंदारोलामे मातृत्यकोरिनश्यति ॥१०॥ टीका-पग्रहते देख हुमा चन्दना लानरे हो और सातने मंगल दोनो माताके छोर देने से मरनाता है। १९ ।। पापण्हने देखा हुमा चन्दमा लग्न में होने शनि मंगल दोनो म्याचे स्थानमे स्थित दोवतो माता त्यागकर देनेसे मरजाता है ॥ २० ॥ किम मात्र संबंधी गहमें जन्म योग मातापितमइयोर्गेवटी तत्संबंधीगृहे जन्नः || - (जातकतर) किा-माता पिता ग्रहमस नांग्रह पलपान होगे उसके संबंधी घरमे जन्म नानना भयांद माताग्रह बलवान होवेतो माता संबंधी जाना मामा मासी के परम जन्म होय भार पितृग्रहबलवान होतो पितृ संबंधी पिता काका भादिके घरमे जन्म होता है ॥ पहनातकम "दियार्क शुक्रो पितृ मातृ संजितौ शनैश्नरेन्द्र निशितदिपर्यात् । पितृव्य मातृप्पम संजितौनता ययौन युग्मतं गतो तयोः शुभी " ! भर्यात् दिनमें जन्म होये रसनीय सर्वपिता भौर शुक्रमाता संजन ग्रह होता है एव रात्र में जन्म होये उसके शनैश्चर पितृ संजक और चन्द्रमा मातृ संज्ञक होताई येही उलटे भयांत दिनमे जन्म होवे उसके शनैश्चर पितृव्य (काका) भार चन्द्रमा मातृप्पस ( मासी) संज्ञक और रातमेजन्म हो तो सूर्य काका भार शुक्र मातृप्यम् (मासी) संज्ञक जानना । इसप्रकार पितृ मातृ संज्ञक ग्रह कह है इनहीके बल भनुसार जन्म स्थान कहना ॥२२॥ वृक्षनदी प्राकारादिमें जन्म यागः । सोम्योः सर्वे नीचगा वृक्षनदी प्रकारादिपु जन्म ॥२२॥ टीका-सर्व शुभग्रह नीचराशीमे गये होवेतो वृक्षके नीचे तथा नदीम राकिलेके भीतर भयवा कोइ . प्राकार (:परकोटे ) के भीतर जन्म होताहै। २२॥ मार्गमे जन्म योग. नीचगेपुशुभेपुचंद्रेने ग्रहमात्रादृष्ट टव्यांजन्म ॥ २३ ॥ टीका-शुभग्रह नीचराशिमें स्थित होवे और लग्नमे गयेहुवे चंद्रकों कोई भी ग्रह देखता नहीं होवे तो मार्गम जानना ॥ २३॥ अंधकारे नन्म योग. चंद्रे तुर्येवा मंदयुतदृष्टे वा जलभांशेन्धकारे जन्म ॥२४॥ टीका-इस.मूत्रमे तीनयोगहै। चंद्रमा चोथेस्थानमै स्थित हो तो भंधकारमै जन्म होवे २ अथवा चंद्रमा शनीसे युक्त दृष्टदोवेतो भंधका रमे नामहो अर्थया चंद्रमा जलराशी [४।१०।११।१२।८।। में तथा जलराशी नवमशिने होतो अंधकार (अंधेरे में ) जन्म in ॥ २४॥ 5 १० , : 4 (भाषा टीकासहित) (२५) बहुदीप गृहे जन्म योग, सबले भौमदृष्टे बहुदीपगृहे जन्मः ॥ २५ ॥ टीका-बलवान सूर्यको मंगल देखता होवेतो बहुत दीपकवाले घरमें जन्म कहना ॥२५॥ तैल, वर्ति, दीपज्ञान योग चन्द्रात्तैल ज्ञानम् ॥ २६ ॥ लग्नाद्दीपवर्ति ज्ञानं ॥ २७ ॥ चरेचर स्थिर स्थिरो द्विस्वभावे खंडवदीपः ॥२८॥ टीका-मूतिका घरमें-दीपकमें तेल चन्द्र के भनुरूप [ क्षीण , पूर्ण, सपाप, जैसा चंद्रहो वैसा भरूप अधिक मध्यम ] जानना ॥ २६ ॥ भौर ऐसेहि लग्नके अनुरूपबत्ती कहना ॥ २७ ॥ जन्मसमयमें चर राशीका सूर्य होवेतो चंचलदीप(हातमें चलता फिरता होगा) स्थिर राशीका सूर्य होतो स्थिरदीप (एकस्थानमें रखा हुवा) और द्विस्वभाव राशीका सूर्य होतो खंडवदीप(देहली में रखाहुया दीपक)जानना ॥२८॥ मस्तकसे का पांयसें जन्म ज्ञान । शीपादयांशेंगे ईतः प्रसव उभयोदयांशहस्ततो न्यथापादतः ॥ २९ ॥ टीका-जन्म लग्न में शीपारय राशी (३।५।६।७।८।११) नवांशहो तो मस्तककी तरफसे जन्म कहना । उभयोदय र (१२) का नवांशहोतो हातसे जन्म अर्थात् प्रथम हस्त निकला। भौर पृष्ठोदय राशी का नवांश होवेतो पांवकी भौरसे जन्म जानन कष्ट योग- लग्नचंद्रान्यतरतो बंध्वस्तगेपुरेपुमातुः कष्टम् ॥६ टीका-लग्न तया मासे चोये सातमे स्थानमे दूरग्रहहोयेतो मार विशेष कष्टहमा जनाना (फरग्रह-म. मं. श. रा.)॥३०॥ मृतिका गृह द्वारताने । केंद्रगस्य वा यलिनो ग्रहस्य दिशिगृहद्वारम् ॥ ३ ३

(जातक तल)
टीका केंद्र ।।४।७।१०। स्थानमें जोग्रह स्थितहोवे तथा जोय
सर्वग्रहोसे अधिकवलीहोवे उसकी दिशामें सूतिकायहका द्वा
जानना ॥३१॥ ग्रहोकिदिशा वृहज्जातक मे इसप्रकार कही है "प्रार
द्यारविशुक्र लोहित तमः शौरेन्दु वित् सूरयः" अर्थात पूर्वका स्वाम
राये १ भाग्निका शुक्र २ दक्षिणका मंगल ३ नमतकाराहु ४ पश्चिमत्र
शनि ५ वायव्यका चंद्र ६ उनरका बुध ७ ईशानका गुरु ८ स्वान
जानना ॥३२॥
गृहज्ञान.।
काष्टाढ्यं नवं दग्धं चित्रं दृढं रम्यंजीर्णक्रमादर्कादिषुये
बली तदनुसारी गृहम् ।। ३२ ॥
टीका-जन्म समयमें सूर्यादि ग्रहोमेंसे जोग्रह भधिक वलीहोवे लदन
सार बालकका जन्म गृह (मकान ) जानना. यदि मूर्य पलवान
होवतो काटगृह ऐसे हि चंदवलवान होतो नयामकान मंगल. जल।
हुया एध चित्र विचित्र गुरु मजबूत. शुक्र मुंदर शनि पुराना
[जीग] मकान जन्म का कहना ॥३२॥
गृहके किसभागमे जन्म हुभा.
वृपाजयो रुदये गृहस्य पूर्वभागे युग्मस्याग्नयां कर्क सिंह
योम्ये कन्यायां नैऋते तुलावृश्चिकयोः पश्चिमेधनुपो
पायो मंदभयो रुत्तरे झपस्येशान्यां जन्म ॥ ३३ ॥
एवं शय्या जानम् ॥ ३४ ॥
रीवा-जन्म समयमे मेप या मृषभ लग्न होती घरके पूर्णभागमे भार
मिन होतो परफेभग्निकोगमे फर्क सिंह राशिका लम होतो परफे
दक्षिग भागमें कन्या सम होतो घरकै नैरल कोगमे तुल निक
मग्न होनो पाक पनि मागमे धनगशीका लग होतो धरके गा
वांग मरमग्न होता परपं. दमा भागमे मीनराशीका हम
होतोपरगान भागमे जन्म कहना मीपार शया
(मुनिका का पहंग) मा विचार मानना ॥३४॥
शाप्या मिट वा पाद विमारः।
एनागि गप्याशिर विकारत्येपुपादाः ॥ ३५॥

(भाषा टीकासहित (२७) यत्र पाप स्तत्रो त्यारः ॥ ३६॥ टीका-उपरोक लग्नकी दिशांके तरफ पलंग का शिर (शिराभ्या) कहना अर्थात् मेष वृष लग्न में पूर्वकी तरफ मिथुन में आग्नि कोणमें १४।५। कर्क सिंह में दक्षिणमें इसी प्रकार वाराहि लग्न में जानना और लग्न से ३।६।९। १२ । तीसरा छठा नया गारवां स्थान पलंग के पाये जानना ॥ ३५ ॥ इन स्थानो मैसे जिस स्थानमें पाप ग्रह युक्त होने वहि पलंग का पाया फटाहुवा समझना ।। ३६ ॥ उपसूति का ज्ञान । लग्न चन्द्रान्वरगयह संख्या उपसूविका उदगत्यन्तर मा दक्षिणाः बाह्याः ॥ ३७ ॥ टीका लग्न और चन्द्रके वीवमें जितने ग्रह स्थितहो उतनीही 'संख्या उपसूतिका जानना ग्रह उत्तराई [ लग्नसे सप्तमभावपर्यंत ] मे होवेतो भीतर (मूर्तिका के समीप में ) भौर दक्षिणाई ( सप्तम से लग्न पर्यंत) मे होवेतो बाहर कहना ॥ ३७॥ वकोचसंस्थे त्रिगुणाः स्वः पशनवांशेस्थिते दिगुणा नीचास्तगैरर्दमिता उपसूतिकाः ॥ ३८ ॥ मीनाजांन्डे गोघटाङ्गे चतन कर्कहयांगपंच शेपे तिस्रउपमूविका ॥ ३९ ॥ टीका-लग्न चंद्रके वावमे जितने ग्रह स्थितहो उतनी उपमूर्तिका कहीहै उस्मेभि यदि बक्र राशिका अथवा उच्च राशिका ग्रह स्थित होवेतो उनकी संख्या की तीन गुनी तपसुतिका कहना भारस्वराशी स्वदेष्काण स्वनवांशके ग्रह होतो उनकी संख्यासे द्विगुण संख्या उप भूतिका जानना ॥ ऐसेहि जितनेग्रह नीचराशी के भस्तके होवे उत नी संख्या कि भाधि उपसूति का समझना ॥ ३८ ॥ तथा मीन मेष लग्न में जन्म होतो दो २ वृष कुभ लग्न होतो ४ वार कर्क सिंह होती पांच ५ शेष३६१७१८१९ | १० लग्न होतो ३ उप मृतिका जानना ॥ ९॥ इनमें भी सायमें लिखा कि चन्द्र बध . " (२८) (जातक त) गुरु शुक्रादि शुभ यह होतो मुन्दर सौभाम्पनी भार शनि र योग होतो विधवा कृष्ण वर्णा कृष्ण वस्त्रा उपमतिका जाना यहरुदिनयोगः ॥ गोजाश्चि युग्म सिंहांगे बहुरुदितो जातोन्यथान टीका-वृषभ मेप धन मिथुन सिंह राशिका लग्न होतो जन्म मे पालक पहुत रोया और शेष लग्न मे होतो रुदन नहीं जानना ॥४०॥ निर्जने प्रसव योगः॥ अंगे चंद्रे ग्रहमात्रादृष्टे निर्जने प्रसवः ॥ ४ ॥ टीका-लग्नमें चंद्रमा स्थितहोवे और उसको कोईभी ग्रहनदी होवेतो निर्जन (शून्य) स्थान में जन्म कहना ।। ४ ।। सुख तथा कष्टसे प्रसव योग ।। खांयुगे, शुभेषु सुखेन प्रसव त्रिकोणास्तगेषु । करतः॥४२॥ टोका-दशमें १ और ४ चोथे स्थानमें शुभग्रह स्थित हो हुवा भौर विकोण ९.५। सप्तम ७ मस्यानमें पापग्रह कष्टसमसबहुवाकहना ॥ ४२ ॥ जन्मसे पूर्व पितृ मरण योगः।। तुर्येखेवा मन्दारा योगे जन्मतःप्रापिता टीका- चतुर्थ ४ भयवा १० दशम स्थानमे शनि मंगल जो ग्रहोका योग होवेतो जन्म के पहले पिता मरण कह माताफे साप बालंक का मृत्यु योग । लग्नं पटारताष्टमगाःपापामानासह बालस्य : यन्ते चंद्रसमंदेलग्नादमभामे मात्रासह बालम ग्रस्त के मंदना न्यतमयुते रंघाड़े कुजे. मा

(जातातल)
का- लग्न में छटे सातम भाटमे स्थान में सर्व पापग्रह स्थितहोत्र
माता के गाय मे बालक की मृत्यु होरे ॥४४॥
ण दिनका चंद्रमा शनिसे युक्त होवे भौर लग्नमे भयया भांठमे
महोवोतो माता साय चालक की मृत्यु हो ॥ ४५ ॥
ग समय का रवि, शनि अथवा उध से युक्त होवे और लममे
भाठमे मंगलहोंने तो माता के साथ बालक की मृत्यु हो।।४।।
महाकष्ट योग.
भोमभेकरिमंदेन्दुदृष्टेटमेचेन्ने बालस्प महाकष्टम् ॥४७॥
-मंगल की ११८ राशी के सूर्य मंगल शनि होवे भार चंद्र दे.
, होये ८ भाठमै स्थानमें गुरु स्थित हो तो यालक को महाकाट
सामृत्यु होने के योग.
पपारि पापयुतौ बालमृतिः ॥ ४० ॥
जग्नेशेसानीचोरन्धे नालस्य सयोमृतिः ॥ ४१ ॥
हो केंद्रपापमात्रयुतदृष्टे बाल • ॥ ५० ॥
गेगेपन्दे एमभौमे पाल० ॥ ५१ ॥
दारभेखेके पापेटेष्टे पाल० ॥ ५२ ।।
आमेचरे पापेष्टेवाल• ॥ ५३ ।।
(मायेचंद्र शुरदृष्टकोणेरामा पा० ॥५॥
दादारापयां फागष्टमगास्सरलागुटामाउ०५५॥
गांयास्तांगेपुरापयुतभदोलिशुभायुतदृष्टोमा।०५६।
पापापा० ॥ ५७ ॥
दन् लिन पापाचाल. ५८ ॥
न्दिा केन्द्राष्टमगा पापात्राल० ॥ ५९ ॥

(३०) (भाषा टिकासहित) काल्पंगे सलाःपूर्वाई सोम्याःपराई या उमास्ताष्टांत्य- सपादोशुभादृष्टे शुभायुवे केंद्रेषुवाल॥६०॥ त्रिकेसौम्याःद्रकोणेपापा लग्नगाल• ॥६१ ।। चन्द्रशापयुतेषु सर्व केंद्रेपुया० ॥ ६२ ।। लग्नास्तगोपापी चंद्रो मिश्रदृष्टोपाल ० ॥ ६३ ॥ क्षीणेदायत्ये पापपुलग्नाष्टमगेपु केंद्रवरगेप शुभषुपाल०६४ पापांतरचंद्रे रंधाम्बुसप्तमगे बाल० ॥६५॥ संध्यायांभापगाः पापाइन्दुहोरायां घाल ॥ १६ ॥ रंधास्तगौ तापापापमात्र दृष्टौशाल० ।। ६७ ॥ लग्नान्त्यासाङ्केकमाच्चंद्रारार्कमन्दा बाल० ॥ ६८॥. पठयां जातस्य भीमाकविगेमृतिः ॥ ६९ ॥ पटाष्टममगचंद्रे पापवर्गस्ये तुपैराहोशिशुमरणं ॥ ७० ॥ टीका-पारमे भौर ६छठे स्थानमे पापग्रह यक्तहोये तो बालक की सद्य मृत्यु कहना ॥४८॥ लग्न का स्वामी सूर्ययुक्त होवे भौर नीच राशी में स्थित होकर भाठने स्थान मे नाय ते! पालक की सद्य मृत्यु पहना ॥ ४९ ॥ राहु केंद्र १।४।७।१०। में स्थितहोये भोर पाप ग्रह मात्र से युक्त तया दृष्टहोवे तो यालक की सद्य मृत्यु होति है ॥५॥ सातमें सूर्य लग्नमें शनि भाठ में मंगल होवे तो बालक की शीघ्र मृत्यु होतिः ॥ ५१ ॥ शनि तथा मंगल की १०।११।१।८ राशिका सूर्य १० दशम स्थान में स्थितहोये भौर पापग्रहो से दृष्टहो तो पालक की शीघ्र मृत्यु होति है ।। ५२॥ चंद्रमा छठे भाठ में स्थान में पापग्रहों से दृष्टहोये तो बालक की शीप्रमृन जानना ।। ५३ ।। के भय भंश (२९ अंश) में स्थित चंद्रमा शुभ ग्रहों से दृष्ट होये और ९।५ नममे पांचमे स्थान में दो से भधिक पाप ग्रह शीय गृत्य कहना ॥५४॥ मानि सूर्य चंद्र मंगल हो तो

(गातक तत्व)
ये ग्रह बलवान होकर क्रमसें १२।९।८बारमे नवमे लग्न मे भाठमे
स्थान मे जाय और गुरु इनको नहीं देखप्ता होये तो चालक की शीघ्र
मृत्यु कहना ॥५५॥ नवमे पांच बारमे सातमे ९१५१२१७ तथा
लग्न मे पापग्रह युक्त चंद्रमा स्थितहोवे भार बलबान शुभग्रह से युक
तथा दृष्ट नहीं होवे तो बालक की शीघ्र मृत्यु कहना ॥५६॥ लग्नमें
चंद्रमा और सातमे २।३ पापग्रह होवे तो पालक की शीघ्र मृत्यु
जानना ॥ ५७ ।। शनी से ८ आठ मे स्थान मे बलवान पाप
ग्रहगये होवे ता बालक की शीघ्र मृत्यु जानना ॥५८ ॥ क्षीण चंद्रमा
लग्न मे स्थित होवे केंद्र १।४।७११० भार अष्टम स्थान मे पापग्रह
युक हो तो बालक की शीघ्र मृत्यु होति ।। ५९ ॥ कर्फ भौर वृश्चिक
राशि के लग्नमे जन्म होवे प्रवाई (लग्नप्ते सनम भावपर्यंत) में
पापग्रह स्थितहोवे भौर उत्तरार्द्ध (सप्तमसे सम्न पर्यंत ) में शुभग्रह
स्थित होये तो पालक की शीव मृत्यु होवे, भयवा लग्न सप्तम भष्टम
भार पारमें स्थानमें पापग्रह युक्त चंद्रमा स्थितहोके शुभग्रहो से दृष्ट-
नही हो और केंद्रस्थान में शुभग्रह युतनही होरे तो वालक की शीय
मृत्यु होतिहै ।।६०॥ त्रिक स्थान ६।८।१२ मे शुभग्रह, केंद्र १६४७१०
कोण (९५) स्थानमे पापग्रह भोर लग्न म मर्य स्थित हो तो बालक
की जल्दी मृत्यु जानना ॥६॥ चारोहि केंद्र ॥४१० स्थानमे पाप
मह भौर चंद्रमा स्थित होये तो बालक की शीघ्र मृत्यु होवे ।। ६२॥
लग्न भार सप्तम स्थानमे दी पापग्रह स्थितहोरे और चंद्रमा
निग्रह (शुभ पाप दोनु ) से दृष्टहोये तो बालक की शीम मुर
होचे ॥६३ ॥ यारमे स्थानमे क्षीगचंद्रमा, लग्न र भौर भटम ८
स्थान में पारम्ह, और केंद्रस्थान के शिवाय भन्य पगफर तया
भापो दिलम स्थान में शुभग्रह स्थित होवे तो बालक की शाम मृत्यु
जानना ॥ ६१ ॥ पापग्रहो के बीचमें चंद्रमा ८ ।४।७
भाव में गयाहोरे तो बालककी शीघ्र मृत्यु होये ॥६५॥ सध्या समय
मे सन्म होये भोर राशी के भय भंशमे भर्धार २९ में भशमे पाप
यह गोवे भद्रकी होरा में स्थित हो तो पालक की शीप्र मृत्यु
हानि ॥६६॥ भाठो भार सात स्थानमे पापग्रह स्पिन होवे भार
पापमहमाल देखते होवे वो यलटर भी मृत्यु जानना ॥ १७॥

. (३२) (भाषा टिकासहित) चंद्र.१ मंगल १२ सूर्य ८ शनि १ स्थानमे क्रमसे गयेहो तो बालक फी शीघ्र मृत्यु कहना ।। ६८॥ उठके दिन जन्म हो। मंगल भौर सूर्य लग्नमे स्थितहोये तो बालक फी शीय मृत्यु होति ।। ६९ ॥ उठे भाठ मे स्थान मे चंद्रमा पापवर्ग मे गया या स्थितहोरे भोर चौथे स्थान में राहुहो तो पालक का शीम मरण होये ॥ ७० ॥ दश ग्यारा सोला दिन में मृत्यु योग. चंदा दस्ते भौमाकी दशाहे शिशु मरणं ॥ ७१ ॥ मंदभगे जीवेष्टने पापे टे एकादशाहे शिशुमरणं ॥ ७ ॥ मन्दे के पारमात्र दृष्टे पोडशाहे शिशु मरणं ॥ ७३ ॥. टीका-चंद्रमा सें सातमे स्थानमे मंगल भौर न्र्य दोनो स्थित होव तो दशमे दिन बालक की मृत्यु होवे ॥७२॥ शनी कीराशि ०१५ का गुरु ८ अष्टम स्थान मे स्थितहोये और पापग्रहों से होरे ते।' ११ ग्यार में दिन बालक की मृत्यु जानना ॥७२॥ शनि लग्न में होये सर्व पापग्रह देखते होवेतो १६ सोलमे दिन वालक की मृत्युनानना ।।३।। लग्नांशे शे पठे पष्ठभतुल्य दिनेशिशु मरणं ॥७४॥' टीका-जन्मलान .जिस राशीके नवमांश मे हो उसका स्वामी छठे स्थान में गयाहोवे तो,उठे स्थान मे जो राशि होवे उतने दिन में पालक मरता है॥ ७४.॥ भक मास में शिश मरण योगं. पष्ठाटमगाः सोम्या वक्रग पापदृष्टा मांसे शिशुमरणं ॥७५॥ सपापे ङ्गे शे धूने मासे शिशुमरणं ॥ ७६ ॥ '. जापत्ये शुभेषष्ठे मासे शिशुमरणं ॥ ७७ ॥ सपाप,जन्मेशे रंधे मासेशिशुगरणं ॥ ७८ ॥ लानोले सठविजिते माझे शिशुमरणं ॥ ७९ ॥ मंदारि रंधे पा पृष्ठे मासे शिशुमरणं ।। ८०॥" . .

(भाषा टिकासहित) टीका-छठे आठ स्थान में शुभ ग्रहगये होवे पक्रगती मे गो हु। पापग्रह देखते हो तो १ मासमे बालक की मृत्यु कहना ।। ७ ।। पापग्रह से युक्त लग्न का स्वामी ७ सातमे स्थानमे स्थितहोये तो र एकमास मे बालक को मृत्युहोये ।। ७६ ॥ लग्न मे भीष चारमे स्थान मे गुरु,भार शुभ ग्रह छठे स्थान बैठे होवे तो १ भेकमास में बालक की मृत्यु जानना ।। ७७ ॥ जन्म राशी का स्वामी पाप ग्रह से युक होकर ८ आठ मे स्थान मे गपादोवे तो मास मे बालक का मृत्यु जानना ।। ७८॥ लग्न का स्वामी सातम स्थान में पापग्रह से पराजित (हारा) हुवा हो तो मासकी आयु जानना ।। ७९ शनी मूर्य मंगल ८आठ मे भयया छठे स्थान मे जाय तो पालक की १ एकमास की भायु कहना ।। ८० ।। तीन पक्ष से अकवर्ष पर्यत की भायु के योग. ग्रहणेनेशे ऽचले सपापे पक्षवयं वा यासत्रयजीवति ॥८॥ रंङ्गेशे पापयुत दृष्टे सुर्यमासायुः ॥ ८२ ॥ सर्व आपोक्लिममा विषलाः पण्मासायुः ॥ ८३ ॥ पापः सुते इन्दौराः पण्मासायुः ॥ ८४ ॥ टीका-लग्न का स्वामी ग्रहण समय का हो भौर निर्दली होकर पापग्रह से युक्त होवे तो पक्षत्रय (देढ महिना) भयका तीन महिना बालक जीवित रहेगा ।। ८१ ।। लग्नका स्वामी ८ भाउ मे स्थान में पापग्रह से युक्त दृष्टहोंने तो ४ चार मास की भायुवालक की जानना ॥ ८२॥ शुभ तथा पाप सर्व ग्रह भापोलम (२६।९।१६) स्थान मे भाय भौर निवली होये तो पालक की ६ छेमास की भायु कहना ॥ ८३॥ पारग्रह की राशी ( १८०९।१०।११) मेगये हुवे चंद सूर्य मंगल पंचमस्थान में स्थितहो तो ६ छ महिने की भायु जानना || ८४ ॥ लापण नागपारिणा पारंपरिणापामांकन पत्र

(जातक तल)
पृष्ठेऽष्टमे वा मासि मृतिः ।। ८५॥
लग्नद्रप्काणेशे पठे भतुल्ये माति मृतिः ॥ ८६ ॥
टीका-दुसरे भौर धारमे स्थान में १ भथवा १२ वारमे और उठे
स्थान मे २ या आठमें और उठे स्थानमें ३ अयया ८ आठमे और नवमे
स्थानमे ४ सर्व पापग्रह स्थितहोवे तो छठे तथा ८ भाठ मे महिने में
मृत्यु कहना ।। इस सूयमे चारयोगफ है इनमे से कोई भी योग हो तो
६ तथा ८ महिने मे बालक की मृत्यु जानना ।। ८५ ।।
लग्न देकाण का स्वामी ६ छठे स्थान मे स्थितहोये तो छठे स्थान
मे जो राशी होये उत्तनहि संख्या के मासमे बालक की मृत्यु जानना
॥८६॥
भेक वर्ष से २४ वर्ष पर्यंतके आयु योग,
पाष्टमगयोः पाप दृष्टयोः पापयो तिरे मृतिः ।।८७॥
चंदजी केंद्रे मूढमंदारदृष्टी यातरमृतिः ॥ ८८॥
लग्नपाचशेटभे पापमाप्रदृष्टे वर्षयायुः ॥ ८९ ॥
केंद्राष्टपष्ठेयकगेहेकुजभे सबलारदृष्टे वर्षत्रयायुः ॥१०॥
का-पाह से देखो ये पापग्रह छटे भाठमे स्थान मे गहेवि ती
एक वर्षके याद पालक की मृत्यु जानना ॥ ८७ ॥
संयुध दोनो फेंदमे स्थितहोये भौर भस्तके शनि मंगल उनको
देगले होगे तो पालक की एक यप के पश्चात् मृत्यु भानना ॥ ८८ ॥
सन के मामी से चंद्रमा की राशीमा स्यामी८ भादयेस्थान
मेस्पिन भोर पापग्रह माप देगने होय मो२दो वर्ष की माणु
जानमा।।८९॥
पदभार गरे आदमें १४01१०1३८ म्यान में यकगानिमय
र भया युधि रामीका नाप भौर उम्को पलशन मंगल
सा होमोसीन या मीमा मानना ॥ ९ ॥
मोन्ये पागनो पारो पुष्पदंतौ वर्ष प्रयायुः ॥१०॥
तोपरमे वादे मन्देन्द्र र भूपष्ट वर्षप्रयायुः ॥११॥

(भाषा टिकासहित) पष्वाष्टमे कर्कगेझे चन्द्रद्रष्टे तुर्येन्दे मृतिः॥९३ ॥ टीका-पापग्रह के नवमांशमे गये हुवेसूर्य चंद्रमा तीसरे स्थानमे स्थितहोये और पापग्रह उनको देखते होवे तो ३ वर्षकी भायुनानना ॥११॥ मेष वृश्चिक शराशी का गुरु भाठमे स्थान मे जाय और उस्कोशनि चंद्र सूर्य देखते होये शुक्र की दृष्टि नहि होवती वर्षकि भायु जामना ॥ ९२॥ छठे भाठमै स्थान मे कर्कराशी का बुधहोरे और चंद्रमा उस्को देखताहोये तो ४ वर्ष की भायु जानना ॥ ९३ ॥ सेंज्यौ वा सेंदीयारा या समन्देन्दच्छाराः पञ्चमाग्दे मृतिः ॥ २४ ॥ लग्नेराहो पापमानदृष्ट युते पश्चमाग्देमृतिः ॥ ९५ ॥ सुर्यन्दूभेषिकेशुके पापदष्टे पष्टेब्दे मृतिः ॥ ९६ ॥ लग्नेमन्दाराः क्षीणेन्दारस्ते पष्ठे सप्तमेवाग्देमृतिः ९७ ।। क्षीणदावास्ते लग्नेमंदाराच्छा गुर्षदृष्टाः सप्तमेब्देमृ० ८॥ पश्चाष्टमगाः सौम्याः कोणेपापा अष्टमेन्दे मृतिः ।। ९९ ॥ क्षीणदावस्तेशुभेछानेमदाराकोगुदृष्टासप्तमेव्देमृदि।.. त्रिचंद्रोकियोगे नवमादे मृतिः ।। १०१ ॥ टीका-चंद्रमा मूर्य गुरु स युत होये १ भयवा चंद्रमा से मपं शानि मंगल युभ होये एभषया शनि से चंद्र मंगल युनः होने ३ तो ५ पास पर्ष की भायु जानना । इस गमे । योग है इनमेसे कोईभी होने तो ५वर्ष की भाणु काना ॥ ९४॥ लग्न में राह स पाप ग्रहों से दृष्ट होवे तो पांच की भाष (मानत) म भगिनी का PREPान (it) में रिक होरे भार पर होगी मोगा मेरा मानना ॥ लग्न में शनि मगर मिादाने भोरक्षीग पदमा ७ साली स्थान में होगा भागार में मी९॥ सातमें स्थानमे सीग गंडमान में शनि मंगल शुरु स्थिती भार इनकी गुरु नाहि दमासी गारमेम में मुगु भावना ॥९॥ माट में गानमें सौप ग्रह (*. सु.गु.गु.) भोर । स्थानमें पारा नारे सोभाठमे मां में मृत्यु मानना ॥१९॥ तुल नया गगम राशी का मेरमा ममम म्यानमे होने और हरन मे शनि मंगल मूर्य होगा इनको गुरु नही देयता होतो मात पर्प की भायमानना ।। १०.॥ प्रिफ ६८।१२ स्यान में नंद सूपं शनिका योग होये तो ९ना में यम् मृत्य जानना || १०१॥ ; ज्ञमगा इन्दोरा गुर्षदृष्टा नवमादेमृतिः ।।१०२॥ युनेचरे टमेशेने मंददृष्टे नवमाब्देमृतिः ॥१०॥ चंद्रा शापस्ते या त्रिके भतुल्याब्दमृतिः ॥१०॥ जन्मेशाधगोशुकाओं वा लग्नेशेषष्ठे भतुल्यादेमृतिः .' चंद्राङ्गती मंदार्कयुतौ द्वादशाब्देमृतिः ।।१०६॥ जीवभौमभे भौमेजीवभे वा सूर्यमंद मंदेसूर्यभे द्वादशाब्दे 'मृतिः ।।१०७॥ क्रमान्मेपादिगो विधुरष्टम नवम त्रयोविंश द्वा विश पञ्चम प्रथमचतुर्थत्रयोविंशाष्टादश विं शैकशिदशमलवस्थो लयांकमितान्देमृतिदः॥१०॥ टीका-अधकीराशी ३२६ के चंद्र सूर्य मंगल होवे भौर गुरु की दृष्टी पर नही होवे तो नववर्ष की उमरमे मृत्यु होये ॥ १२ ॥ ... सातमे होवे भार ८ भाठमे स्थान का स्वामी मन में (भाषाटिका सहित) स्थत होकरशनी से दष्ट हो तो नव वर्ष की उमर जानना ॥ १३ ॥ चंद्रमा भौर लग्न का स्वामी सातमे स्थानमे स्थितहोवे अथवा क स्थान ६१ ८1१२ मेंमायतो उस स्थान में जोराशी हो उतने ही ख्या वर्षमै मृत्यु जानना ॥ १०४॥ जन्मराशी के स्वामीसे भाठमे स्थानमे शुक्र और सूर्य दोनु जाय । व्यवा लग्न का स्वामी टेस्यान में गयाहो तो उस स्थानमे जो राशि उतने हि वर्ष की आयु जानना ॥१०५॥ चंद भोर लग्न की राशी केस्वामि शनि मर्यसे युक्त होघेतो बार१२ । वर्ष मे मृत्यु जानना ॥ १०६ ।। गुरु, मंगल की (११८)राशिका होवे, भौर मंगल, गुरु की (९।१२) शिका होये भयवा सूर्य, शनि की १०११ राशि का भौर शनि, सूर्य की ५ राशि का होवे तो १२ पार में वर्ष में मृत्युजानना ॥ १०७॥ जन्म समय मे चंद्रमा मेषके ८वृषभके ९मिथुनकर३ कर्कके २२ सिंहके ५ कन्याके १ तुलके ४ वृश्चिक के २३ धनके १८ मकरके २० कुंभके २१ कीनके १० अंश का होचतो भंश के संरूपा के चराचर वर्ष में मृत्यु नानना ॥ जैसा के किसी के जन्म समय मे चंद्रमा धनके १८ अंशकाहे तो १८ भठार मे वर्ष में मृत्यु कहना इसी प्रकार सर्व राशि यो मे समझना ।। १०८॥ सर्व रिष्ट योगोंके भंगयोग। रात्रौपशाष्टमगवद्रः शुक्ले सर्वारिष्टहरः ॥१०९॥ सौम्य भांशगाः सौम्याः सर्वरिष्टहरः ॥११॥ भेशेकेंद्रे वा सौम्येकेंद्रे सर्वारिष्टहरः ॥११॥ शीर्पोदयगास्सर्वे सर्वा० ॥११२॥ पठाष्टमगे कृष्णचंद्रे दिवा पापदृष्टे सी० ॥११३॥ स्वोच्चमुहडेचंद्रे सर्वारिष्टहरः ॥१४॥ चंद्राखेजीवो व्यये ज्ञाच्छी लाभे खलास. ११५।। कम्जेइन्दो केंद्रे सदृष्टे. सर्वारिष्टहरः॥११६॥ :

(जातक तत्व) कर्काजवृषेश राही सर्वा० ॥११७॥ केंद्रे तदयेच सर्व खेटाः स० ॥११८॥ शुभमे पूर्णेन्दौ सर्या ॥११९॥ पष्टाष्टमे चंद्रे शुभवर्गगे स० ॥१२०॥ इन्दङ्गौ सर्व ग्रह दृष्टी सर्वा० ॥१२१॥ शुभांरो केंद्र कोणे शुक्र दृष्टे चंद्रे सर्वा० ॥१२॥ बलिशुभः केंद्रगो लाभेसूर्यः सर्वा० ॥१२३॥ सवलेङ्गापे शुभमात्र दृष्टे सर्वा० ।।१२४॥ जीवस्वभोच्चगे केंद्रे सर्वाः॥१२५॥ पापाः शुभ वर्गगाः शुभ मात्र दृष्टास• ॥१२६।। : ध्यापारिगो राः शुभमात्रदृष्टयुतः स• ॥१२७॥ • सर्वे मलिनो वा नराशिगा वामित्रभगा याशुभंभगा शुभवर्गगाः सर्वारिष्टहरः ॥ १२८ ॥ टीफा-11 शुक्लपक्ष मेरानिसमय में जन्म होये भौर छटे भा स्पान मे चंद्रमा स्थितहोने तो सर्व रिष्टयोग का नाशकरता है। शुभग्रह कि राशि भौर नवमांश ( २०४९।१२।३०६४) मे शु गये हो तो सर्वारिष्टनाश करते है ११० मन्म राशी का स्वामी केंद MIR मे स्पितहोष भषया ग्रा दम हो तो सारिष्टनाश करते है १११ संग्रह शीर्वोदय राशी ३५६८११ मे गप हो तो सो माश करते है ११२. कृष्णाक्ष में दिन का जन्म होरे भोर ६८ भाटेम स्थान सदमा हपाप ग्रह दर होवे तो सारिष्ट नाश करता है ११३ पदमा भनि स्वराशि (५) उच्च राशी (२) तथामिन न है 4 (भाषा टीकासहित) राशी मे स्थितहोवे तो सर्वारिष्ट नाशकरता है ११४ चंद्रमासे दशम स्थान में गुरु, पारमे स्थान में बुध शुक्र भौर ग्यार में स्थान मे पापग्रह स्थितहोये तो सर्वारिष्टकानाश करते है ११५ कर्कतथा मेष राशि का चंद्रमा केंद्रमे स्थितहोये भौर शुभ ग्रहसे दृष्टहोवे तो सर्वारिष्ट नाश करता है ११६ कर्कमेष तथा वृषभ राशी के लग्नमे राहु स्थितहो तोसवा ११७ केंद २४१० भौर पणफर २।५।८।११ स्थान मे सर्व ग्रह स्थितहोये तो सर्वारिष्ट नाशकरते है ११८ पूर्ण चंद्रमा शुभग्रह की राशी का होवे तो सर्वा० ११९ शुभग्रह के वर्ग में गया हुवा चंद्रमा छठे भाठमे स्थान में स्थित हो तो सा रिष्टकानाश करता है १२० चंद्रमौर जन्म लग्न को सर्व ग्रह देखेंत होवे तो सर्वा ०१२१ शुभग्रह की राशि के नवांशमे गयाहुवा चंद्रमा केंद्र कोण १२४७ १०९३५ स्थान में स्थितहोवे भौर शुकृ उसको देखता हो । सर्वारिष्टनाश करता है १२२ बलपान शुभग्रह फेंद्र ४१० मे स्थितहोये भौर ११ ग्यारमे स्थान,मे मूर्य होवे तो सर्वा० १२३ लग्नका स्वामी बलवान होवे संघ शुभग्रह से दृष्ट होवे तो सर्वा रिट०॥ १२४॥ केंद्र ४१० स्थानमें स्वराशी ९६१२ तथा भपनि उशाशी मे गयावा गुरुस्थित होये तो सर्वारिष्टनाश होये ।। १२५ ॥ पापग्रह शुभग्रहों के वर्ग में गयेहोवे भौर शुभग्रह मात्र से हर हो तो.सर्वा रिटनाश होवे ॥ १२६ ।। तीसरे ग्यारमें उठे ३ । १९१६ स्थानमे गयाहुवा राहु शुभ ग्रहों से युक्त तया दृष्टहोवे तो सर्वा ॥१२७ ॥ सर्व [शुभ पाप ] गह मलवान होवे १ भषया सर्व मह नरराशी [१२३५९।११] में गयेहोवे २भयषा सर्व ग्रहभपन मिजगह कि राशी में स्थित हा भपया शुभगह की राशी में स्थितहोवे ४ भयषा सर्वग्रह शुभण्ह के पगमे गपेहोवे ५ तो सर्वारिष्ट नासहोवे । इस मृग में ५ पांच योग कई है इनमे से कोई भी योग हो तो सरिटहर योग मानना ।। १२८ ॥ इति संबोरिष्टहर योगाः ।।

(४०)
(जाक तल)
भर नारज माग पहने.
पठाष्टमेशी चमारयुतो तुर्यगो जारजः ॥ १२ ॥
पष्ठांशो पापयुती जारजः ॥ १३०॥
पष्ठांदेशपोर्मन्दयोगे शृदजो ज्ञयोगेश्वजोड योगशवजे
जीवशुमान्यतरयोगे ब्राह्मणजः ॥ ११ ॥
अशेपापमात्र संबंधे जारजः ॥ १३०. ।
केंद्रसोत्येश योगे जारजः ॥ १३३ ।।
द्वित्रिपंचारीशा लग्नगा जारजः ॥ १३४ ॥
पापेङ्गे शुभेयूने खेमन्देजारजः ॥ १३५ ॥
चंद्रेङ्गे सुतेशुके सोत्येभोमे जारजः ॥ १३६ ।।
लग्ने मुखेराही पितृव्यजः ॥ १३७ ॥
ठग्ने राव्हारी पुष्पवतोयूने नीचजः ॥ १३८ ॥
शून्येपुकेन्द्रेषु जारजः ॥ १३९ ॥
सर्वेद्विषष्ठाष्टांत्येषु जारजः ॥ १४०॥
जीवर्गहीनेंगे जारजः ।। १४१ ।।
खेगातुर्यसपापचंद्रे चन्द्रलग्नौ गुर्वदृष्टौ जारजः ॥१४
पुष्पर्यंता वेकभगो गुवदृष्टौ जारजः ॥ १४३ ।।
लग्नाम्बुपेष्टधर्मप योगे जारजः ॥ १४४ ॥
तो नपेऽवले जारजः ॥ १४५॥
परे लग्नपेऽवले पापदृष्टे जारजः ।।१४६॥
भौम दृष्टे जारजः ॥ १४७॥

(भाषा टिकासहित) (४१) चंद्रमंदयोगे जारजः ॥ १४८।। टीका-छठ आठमे स्थानके स्वामी चंद्र मंगल से युक्त होकर चतुर्थ स्थानमें स्थित हो तो जारज (व्यभिचारसे उत्पन्न) कहना ।। १२९।। छठे आर नवम स्थान के स्वामी पापग्रहों से युक्न होये तो जारज कहना ।। १३०॥ छठे और नवम स्थान के स्वामि शनि से युक्त होवे तो शूट से उत्पन्न कहना एवं बुध से युक्त होये तो वैश्य से, सूर्य से गुरु होये तो क्षत्री सें, गुरु से अथवा शुक्रसे युक्त होवे तो ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन्न जानना ।। २३१॥ कारकांश लग्नमे पापग्रहमानका संबंध होवेतो जारज • ॥१२॥ फेंद्र १४७१ १० स्थान के स्वामी से तृतीय स्थान के स्वामिका योग होवे तो जारज कहना ।। १३३ ।। दूसरा २ तीसरा ३ पांचवा ५ भौर छटा ६ स्थानके स्वामी लग्न में स्थित होवे तो जारज करना । स्मरणरहै ये चारोंग्रह सम्न में होवे तो योग जानना नहींतो योग नहि होता है ।। १३४ ॥ लग्न में पाप ग्रह ७ सप्तम स्थानमें शुभग्रह भार १० दशम स्थान मे शनि स्थित हो तो जारज होताहै. ॥ १३५ ।। लाम में चंद्रमा पञ्चम स्पान शुक्र और तीसरे स्थानमे भौम स्थितहोय तो नारज जानना ।। १३६ ॥ लग्न मे सूर्य, चतुर्थ स्थान में राहु स्थितहो तो पितृव्य [ काके ] से उत्पन्न हुया कहना ।। २३७॥ लग्नमें राहुमंगल भौर सप्तम स्थान मे मूर्य चंद्रमा स्थितहोवे तो नीच से उत्पन्न करना ॥ १३८ ।। केंद्र १४७१० स्थान में कोईभी ग्रह नहीं होये तो जारज यदना ।। १३९॥ सर्व ग्रह २१६८।१२ दूसरे छठे भाठमे बाहरवें स्थान मे स्थित होवे तो जारज कहना ।। १४०॥ लंग्नमें गुरु का बर्ग नहि हो तोनारज कहना ॥ १४१॥ दशमें लग्न में तथा चौथे स्थानमें पापग्रह से युन. चंदमा स्थित हो भौर लग्न, चंद्र, फों गुरु नहि देखता होवे तो जार ॥१४२।।

.
(४२)
(जातक तत्व)
सूर्य चंद्र दोनों एक राशी मे स्थितहोवे और उनको गुरु नहीं
देखता होवे तो जारज कहना ॥ १४३॥
लग्न १ चतुर्य ४ षष्ठ ६ और ९ नवम के स्वामीयों का योग होवे
तो जारज कहना ये चारो एक राशि मे जितने नजीक भंशमे होत्र
उतनाहि योग बलवान जानना ॥ १४४ ॥
नवम ९ भार ४ चतुर्थ स्थानमें पापग्रह स्थितहोये और लग्नेश्वर
निर्वली होवे तो जारज कहना ॥ १४५ ।।
चतुर्थ स्थान पाप ग्रहों के वीचमे होवे लग्नपति निर्वली होवे पापग्रह
से दृष्ट होतो जारज०॥ १४६ ।।
सप्तमभावकास्वामी धन २ स्थानमे पापग्रह से मुक्त हो और
भौम से दृष्ट होये तो जारज ॥ १४७ ॥
चंद्र शनिका योग होय तो जारज होताहै १४८॥
जारज योग के भंग योग.
लमपेङ्गे वा लमदृष्टरि जारजयोग भङ्गः ॥ १४९ ॥
लग्नेजीव युतदृष्टे जारजयोग भङ्गः ।। १५० ॥
लमचंद्रान्यतरो जीवभवर्गान्यतरगो जारजयोग भङ्गः१५.
टीका- लग्नेश लग्नमें युक्तहो भयवा लग्न को देखताहो तो
जारज योग का भंग जानना ।।१४९॥
लग्नमें गुरु गुक्तहोतया लग्न को गुरु देखताहोवे तोजारज योगका
भंग जानना ।। १५० ॥
लग्न तथा चंदमा गुरु की राशि का भयया गुरु के दशवर्ग में होने
तोनारन योगका भंग जानना भयात् इनयोगों में से कोई १ योगभी
होरेको उपरोनः नारन योग नहीं जानना ।। १५१ ।।
चिन का विचार
यदयपवे कुजाको तयारनचिन्हम् ।।१५२।।
राम्हर्कजोयत्र तत्र शामचिन्हम् ॥१५३॥
टग्नगाभद्राराच्छाः शिरमिचिन्हम् ॥१५॥
शुङ्गे रंधेराही मस्तके वा वाम कर्ण चिन्हम् १५५
ओरेनें कोणेमंदे लिंगेगुदसमीपे या चिन्हम् ॥१५६॥

ज्योरंधे कोणेशुक्रे सुखेनेगदे जठरे चि० ॥१५७॥
राव्हच्छौतुर्ये मंदेकुजेबा वामपादे चि. ॥१५८॥
यत्य राजयांगो भंग रहितस्तस्य करचरणान्यतरत्र राज
चिन्हम् ॥१५९॥
चंद्राकी यरजगो तदङ्गे चिन्हम् ।। १६०॥
टीका-काल पुरुष के शरीर विभाग के विचार से शरीर के जिस
वयवस्थान में मूर्य भौम युक्तहोवे उस स्थानमे लालरंगका चिन्ह जान-
॥ जैसे किसीके लग्न से ४ चतुर्थ म्यानमें कर्क राशी मे सूर्य मंगल
यतहै तो यहस्थान कालपुरुषके हृदयकाहे इसलिये इस कुंडलीकाले
हृदयके समीप सालरंग का मश वगेराका चिन्ह कहना एवं सर्व
नो का विचार जानना ।। २५२ ।।
राहु शनि जिस स्थानमें होवे उस अंगपर श्याम चिन्द जानना १५३
लग्नमे चंद्र भौम शुक्र युक्त होयेतो मस्तकपर चिन्द जानना १५४
लग्नमे शुक भौर ८ अष्टम स्थानमे राहु युक्त होवे तो मस्तकपर
नया वाम कर्गपर चिन्ह जानना ॥ १५५ ।।
लग्नमें मंगल और नवम पंचम ९५ स्थानमे शनि युक्त होवे तो
गपर भयया गुदा के समीप मे चिन्द जानना ।। १५६ ।।
भष्टम स्थानमे बुध गुरु त्रिकोण स्थान (९।५) मे शुक भौर चौथे
लग्नमे शनी युक्त होय तो पेटपर चिन्ह मानना ।। १५७॥
चतुर्थ स्थान मे राष्ट्र शुक्र भौर शनि भयवा मंगल लग्नमे स्थित
तो पाये पांव मे चिन्ह जानना ।। १५८ ।।
निसके भंग रहित राजयोग पूर्ण होवे उसके हात भया पांचों में
चिन्द जानना ।। १५९ ।।
वंद्र, रवि, मिस भंगमें युन होवे उस भंगमे चिन्ह फहना ॥१६॥
शुभ जन्म के योग.
वर्गोतमेझे या चंद्रेशुभं जन्म ॥ १६१ ॥
सूर्यादने सद्महे शुभंजन्म ॥ १६२ ॥

(४४)
(नातक तत)
एकस्मिन्नपि कद्र ग्रह युते शुभं० ॥ १३ ॥
आत्मकारके सब ठे शुभंजन्म ॥ १६ ॥
टीका- लग्न वर्गोतम नांग में ही भयानमा यगतमा
होये तो जन्म शुभ जानना ॥ १६ ॥
मूर्य से दमरे स्थान में शुभग्रह स्थित होये ना शुग गन्म मानना।
भेकभी केंद्र म्यानमें ग्रह यन दर तो शुभ जन्म पदना ॥१६
भारम फारक ग्रह पलवान होये तो शुभ जन्म गहना ।। १६४ ।।
पारीर की भाति लक्षण वर्ग विचार.
लग्न नन्दारापतुल्याकारो या वीर्याधिक ग्रह तुल्यतनु:१६
चंद्राकांवनवांशप वर्णः ॥ १६६ ॥
टीका-लग्न मे जिस ग्रह की राशी का नवमांश होवे उसग्रह के स्वरूप
(संज्ञा तं० सूत्र ४२ से ४८ मे कहे है) के समान शरीर का भाकार
भयवा जोग्रह अधिक बलवान होये उसग्रह के स्वरूप के समान शरीर
का आकार लक्षण करना ।। १६५॥
चंद्रमा निस राशीके नवमांशमे होये उसके स्वामी के वर्ग के
समान शरीर का गौर श्यामादि वर्ण जानना ।। १६६ ।।
सवादिगुगप्रकृती का विचार.
सूर्योयस्यत्रिशाशे, तद्गुणभाक् ॥ १६७ ॥
टीका-सूर्य निस ग्रह के प्रिंशांशमे होवे उसग्रह का जो सत्वरन
समादि गुणहोवे वैसाही शरीर का गुग जानना ॥ १६७ ॥
इति श्रीमहादेवकत जातकतत्वे प्रसूतिका
तत्वंद्वितीयम् ॥ २॥
इतिश्री गणकवर्गाश्रमन्महादेव कृत जातक तत्याख्य जातकग्रंथे
तत्सून श्रीनिवास रचित तत्वप्रदर्शिनि भापाटीकायां
ममृतिका तत्वं द्वितीयम् ॥ २॥

.
(भाषा टिकासहित)
भय प्रकीर्ण तत्वारम्भः ।
आलिङ्गनाय संवृत्तौ भवौदेवो मिथोभिया ।
विश्लेपस्पेकतायावी भूयास्तामझन्लायनः ॥ ३ ॥
टीका-भव प्रकीर्णतत्वका भारम्भ करते समय ग्रंथकर्ता मंगला
चरण करते है । भालिंगन के लिये प्रवृत्तहुऐ शिवपार्वती परस्पर
विश्लेष (जुदे) होने के भय से भेकरूप निन्होंने (भर्द्धनारीश्वर)
धारण किया है वे साम्बसदाशिव हमारे मंगल के लिये होवो ॥ २॥
तसादौ भवानां विचारः।
योभावःस्वस्यामि शुभैर्युक्तोदृष्टो चा तस्पवृद्धिः पापहनिर्मि
मिश्रम् ॥ १॥
नीचारिस्थोपहो भावनाशकः ॥ २ ॥
स्वमुहलुङ्गस्योभायवृद्धिकरः ॥ ३ ॥
यद्भावात्रिके पापास्तादावनाशः ॥ ४ ॥
यहादेशस्त्रि के विकेशो वा यदावेतद्भावनाशः ॥ ५॥
यद्भावीयकेंद्रार्थकोणस्थानानि शुभपतियुतानि तद्भावपुष्टिः
पापयुवानिचेद्धानिर्मिभयुतानि मिश्रम् ॥ ६ ॥
यद्भावेशोरिनीचास्तगः शुभैरयतेक्षितश्वेतद्भावनाशः ॥७॥
यपदावीयरंधेश सूर्यशनि गुलिकेश गुलिकांरीशानांमध्ये
योधिकवली तत्माके मूर्तिविनादिनाशः॥८॥
टीका-मयम दादशभावों का शुभाशुभ फल विचार के साधारण
नियम कहते है। जोभाव भपने स्वामी भौर शुभप्रहो से पुनः भषा
होवे उस भाषी वृदि भौर पापग्रहो से युक्त पा रहोवे बस-
भाव की हानी तथा शुभ पाप मिले रे (मिम) ग्रहों से युक्त दृष्ट
होवे उस्का मिश्रफल जानना ॥१॥

( (जातक तख) नीचराशी का तथा शत्रु राशी का ग्रह जिसभाव में स्थितहोवे वह ग्रह उस भवका नाश करता है ॥२॥ स्वराशि का तथा मित्र और उच्चराशी का ग्रह जिसभाव में स्थित होवे यहग्रह उसभाव की वृद्धि करता है ॥३॥ जिस भावसे ६।८।१२ छठे भाठने वारवे स्थान मे पापग्रह गयेहोरे उसभाव की हानी जानना ॥४॥ जिस भावका स्वामी ६०८११२ मे स्थित होवे अथवा जिसभावं मे त्रिक स्थान (६।८1१२) का स्वामि युक्तहोये उस भावका नाश कहना ॥५॥ निस भावसे १४११०१२।९।५ स्थान शुभ ग्रह से भऔर भाने स्वामी से युक्त होवे उसभाव की वृद्धि (उत्तम फल ) कहना और पापग्रह से युक्त होवे तो उसभातकी हानी तथा मिश्र (शुभपाप) ग्रहसे युक्त होवे तो मिश्र (मध्यम) फल कहना ॥ ६॥ जिस भावका स्वामीशत्रु ग्रहकी राशीका अयवा नीच राशीका तया. भस्त का होवे और यह शुभग्रहों से युक्त तथा दृष्टनरिहोवे तो उस भायका नाश होता है ॥७॥ मिस निस भावसे ८ भष्टम स्थानका स्वामी, भोर मूर्य, शनि, गुलिक की राशीका स्वामी, भौर गुलिक के नयांश का स्वामी, इनपांची मेसेजोभधिक यलयान होये उसकी दशामे उस उस देह धनादि भाव फा नाश मानना । भर्थात ला में ८ स्थान के स्वामी से दिनार किया होता देदका नाश फहना. धनमायसे ८ के स्वामी स होतो धनका ऐसहि प्रत्येक भाव के फल का नाश कहना ।। ८ ।। .भयांग विचारः स्वशिरोशुमयुने पाशुभदृष्टे देहमोस्यं ॥१॥ अङ्ग्रेगोंगे देह सौम्पं । १० ॥ मापनेगेषिक देहसोइयंन ॥ ११ ॥ टमेपापा टनगेव दीनीय देहसोम्पन्न ॥ १२॥'

(भाषा टिकासहित)
दहकाश्ययोगाः ।
शनि चंद्रोमेपे देहकार्य ॥ १३ ॥
अन्त्येहेलोव केंद्रगेवर देहकार्य ।। १४ ॥
लग्नेशाधिष्ठित भेशनिके देहकार्यम् ॥ १५॥
शुष्कांगे शुष्कयहे देहकार्य ॥ १६ ।।
शुष्कयुतेंगेशे देहकार्यम् ॥ १७ ॥
शुष्कयहोङ्गो देहकार्यम् ।। १८ ॥
लग्नेशांशेरो शुन्केदेहकार्यम् ॥ १९ ॥
शुकाङ्गणैःपाप देहकार्यम् ॥ २० ॥
टिका-भव शरीरका विचार कहते है । लग्नका स्वामी स्वनवांशम
व शुभग्रह से युक्त होये भधवा शुभग्रहों से दृष्टहोवे तो देहका सुख
होवे.॥९॥
लमका स्वामी लग्नमे होवे तो देह सुख जानना ।। १० ।।
पापग्रह से युक्त लग्नेश्वर ६-८-१२ मे स्थान में जायतो देह
सुख नही होरे ॥ ११॥
लग्नमें २-३ पापग्रह होवे भौर लमका स्वामी हीनपली होये तो
दह सुख नही होये ॥ १२॥
देहकार्ययोग कहते है।
मेप राशी में शनि चंद्र युक्त होवे तो देह दुर्बल कहना : १३ ॥
पारमे स्थानमे सूर्य, और केंद ११४१७११० स्थानमें भौम होने
तो देह कार्य (कृश) जानना ।। १४ ।।
लग्नेश्वर निसरा मे स्थितहोवे उस राशी का स्वामी त्रिक
(६-८-१२) स्यानमे स्थितहोवेतो देह कृदा (पतली) होवे ।। १५॥
शुष्क राशी १।२।३।५।६।९ के लममे शुकग्रह [ रवि मंगल शनि-
युध गुरु.] स्थितहोवे तो देह कार्य (पतलीदेह ) होये ॥ १६ ॥
लग्नेश्वर शुष्कराह [रविमंगल शनि भौरशकराशी मे गयेहुवे बुध
गुरु.] से युक्त होवे तो देह कार्य पतली देह ] जानना ॥१०॥

(४८)
(जातक तत्व)
लग्नेश्वर शुष्क ग्रह की राशीका होतो देह कार्य [दुर्बलदेह]
जानना ॥ १८॥
लमपति के नवांशका स्वामी शुष्कग्रह (र. म. श. बु.) होवे तो दुर्वक
देह होताहै ॥ १९॥
शुष्कराशी [१-२-३-५-६-९] के लग्नमे २-३ पापग्रह युक्त होने
ता (दुर्वला ) देह मनप्य होता है ॥२०॥
देह पुष्टियोग
राशीशे सांङ्गनाथे देह पुष्टिः ॥ २३ ।।
तोयझेशोशुभान्विते वा जलखगदृष्टे देह पुष्टिः ॥ २२
शुभाङ्गे जलःशांशेरो देह पुष्टिः ॥ २३ ॥
लग्नेशुभः पापग्यर्जिते देह ॥ २४ ॥
लग्नेगुरुयुते या गुरुदृष्टे देह ॥ २५॥
जलो शुभैयुवे या दृष्टे देह ॥ २६ ॥
मिथुनांशे देह० ॥ २७ ॥
लमगे सपले सत्सचरे देह० ॥ २८ ॥
टीका-मन्मराशी का म्वामी लग्नेभर से युक हो तो पु
शरीरमाटा होगा ॥२१॥
घनका म्यामि गलराशी १०८ मे स्थितहोफेश
प्रह[.यु.गु..] से युनाहोवे भयगा मलाह (मे.शु.यु. ग.
मे हारे नो पुरदेवाला होता ॥२२॥
मुनकीरामी [४।६।९।१२।२७] का संगम हो
भार बार नामांस का मामी जनगगि का हो तो पटा
पासादातराई।॥२॥
गुनाह पारी में भटहोय तो पुष्टदेव मानना ॥२४॥
जन्मान में गहाको भयमान गुरु देवता की।
.
मानना॥१५॥

(भाषा टीकासहित) (४९)
जलराशी ४ । ७1८1१० । ११ । १२ का लग्न शुभग्रहों से युक्त
वा दृष्टहोये तो पुष्ट देह होता है ॥२६॥
कारकांश कुंडलीमे मिथुन लग्न होवे तो पुष्टदेह होताई ॥२७॥
मन्मलग्न में बलवान शुभग्रहस्थितहोये तो पुष्टदेह होताहै ॥ २८ ॥
लानादिराशयः शिरः प्रभृतिकाला पुकल्प्याः ॥२९॥
यत्राझंन्दीधराशि दीर्यभपश्च तद्दीर्घम् व्यस्तेन्हत्वमित्रमिदं
ग्रहानाकांतराशिश्चेद्राशिवत् ॥ ३० ॥
दीर्घदेह योग।
बुधात्सप्तमेभौमे दीर्घदेहः ॥ ३३ ॥
लग्नपेदीर्घभे दीर्घदेहः ॥ ३२ ॥
देह भौर देहके कोन रभवण्य हस्व दीधहै उनका विचार ।
टीका-जैसे मेपादि द्वादश राशि मस्तकादिपादपर्यंत कालपरमे
लिना को तेहि जन्न लानकी राशि को आदिले १२ पाराहि
शि मस्तक से पादपर्यंत कालपुरुष के भंगने कल्पना करना ।
दाहरण के लिये कल्पना कीजिये जैसे किसीका जन्मलग्न ५सिंह राशि
तो ५ सिंहमस्तक ६ फन्या मुस्ख ७ तुल उर ८धिक हृदय ९ धन
दिर १० मकर कटि ११ फुभवस्ति १२ मीनलिंग १ मेप उरु २
पजानु ३ मियन जंघा ४ कर्क भंधि (पांच) स्थान हुभा इसीमकार
पत्यक लग्नसे भंगकी कलना करना ।। २९॥
इन दररोन मम्मकादि पादपर्यंत भंगस्यान में से निसभंगमे वर्ष
पशि ५६८ भोर दो राशीकास्वामी (म.यु.शु.मं.) स्थित
होरे यह भगदीपं जानना भीर भौरमिसभंगस्थानमे हमरामि ११।-
१२।११२ मार राशिकास्वामी स्थितहोरे वह भंग हम्म मानना
एपंमिश्र गाशि।४।९।१° भौर मिश्र राशि केस्वामि निमस्थान में
स्पिनहोरे उसगको सत्र अर्थान नहीं दीर्घ भौर नही इस्य मानना।
पप निसराशि में जाप उसीराशी के समान महको हम्य दर्य मिश्र
समाना॥३०॥
पुरस मातम म्यान भीम स्थितहोरे गोदीधदर होताई ॥३१॥

(५०)
(जातक नाल)
लग्नकी राशिका म्यामि धनराशि५।६।१८ का होता दी
देर होनाहे ॥३२॥
नामनगांग.॥
मंदातुर्य चंद्रेराश्यायभागे बाल्पतरगश्यंन्यभागेवामनः ३३
लग्नेशेल्पतरों शुभम्याने यामनः ॥ ३४ ॥
पृष्टोदयगेचंद्रनुयशनिदृष्टेचाजारोवामनः ॥ ३५॥
सिंहाच्छोसमृगचंद्रेवामनः ॥ ३६ ॥
आयत्येशेचंदेमंददृष्टेसोम्याऽदृष्टेवामनः ॥ ३७ ॥
लग्नेशेल्पलमदर्शिनि मनः ॥ ३८ ॥
वामन योग कहनेहै।
टोका-शनिसें चाय स्थानमे चंद्रमा राशिके प्रथम भागमे सि
होवे अथवा हस्य राशि के भत्यभाग में [२९] भगमे होनो वार
(ठिंगना) होता है ॥ ३३॥
लग्नेश न्हस्व राशिमे स्थित होये और उस्को शुभग्रह नहि देख
हो तो वामन हाताहै ॥ ३४॥
पृष्टोदयराशी (१।२।४।९।१०का चंद्रमा चोये स्थानमे श
से दृष्टहोवे और लगेश मेष राशी का होतो वामन होताहै ॥३५॥
सूर्य शुक्र सिंहराशीमे स्थितहो और दूसमे स्थान में मकरराशी
चंद्रमा होतो वामन होताहै ॥३६॥
'लग्नतथा व्यय १२ स्थान का स्वामीचंद्रमा, शनीसे दृष्टहोवै में
शुभग्रहोसे भदृष्टहोवे तो यामन होताहै ॥३७ ।।
लग्न का स्वामि हस्वराशी मे स्थित होये अथवा लग्न को देख
होवे तो यामन होताहै ।। ३८॥
विकलांग योग।
केंद्रस्थाः क्रूरा विकलाङ्गः ॥ ३९ ॥
केंद्रगौ पुष्पवंतौ विकलाङ्गः ॥ ४० ॥
लग्नेशुकेमंददृष्टे श्रोणिभागे येकल्यम् ॥ ११ ॥

(भाषा टिकसिाहत) तुयशुक्रे मंदाराज्ञान्यतरयुतेजोवेकर चरणकट्यन्य तमः-- कल्पम् ॥ ४२ ॥ चंदेखभौमेस्ते मेदेशिगे विकलाङ्गः ॥ ४३ ।। सुतांभोंभे क्रूरैदृष्टे हीनाङ्गः ॥ ४४ ॥ मंदेर्थे खचंद्रे ज्ञेस्ते विकलाङ्गः ॥ ४५ ॥ नीचगाः शुक्रेन्दुमदाः कुम्भे विकलाङ्गः ॥ ४६ ॥ टीका-केंद्रस्थान (१४७१०) मे दूरग्रहस्थितहस्तिो विकलांग (विकलशरीरयाला ) होताहै ।। ३९ ।। केंद्रस्थान १ । ४६७।१० मे सूर्य चंद्रमा हो तो विकलशरीर होताह ।। ४० ॥ लग्नमे गयाहुया शुक्र शनि से दृष्टहोवे तो कटि भागमे विकलता होतीहै ।। ४१ ॥ चौथे स्थानमें शुक्र, होवे और शनि, भौम, अथवा बुध इनतीनो मे से किसीसेभी गुरु गुत होये तो हाथ, पांव, कटि, स्थानमे से किसि अकस्थानमे विकलता होतीहै ॥ ४२ ॥ चमा १० दशमे भौम ७ सातवें शनिवेशिस्थान [ सूर्य से दूसरे] में होयेतो विकलांग होताहै ।। ४३ ॥ पांचमे तथा नवमे मंगल होवे और क्रूरग्रहोसे दृष्टहोवे तो हीनांग होताहै।। ४४॥ शनि २ दूसरे चंद्रमा १० दशमे बुध ७ सातवे स्थानमें स्थितहोवे तो विकलांग होता है ॥ ४५ ॥ शुक्र चंद्र और शनि नीच राशी मे स्थित होवे और मुभराशी का मूर्य होतो विकलांग होता है ।। ४६ ।। रनपित्तरोग योगः नीचेभौमे रक्तपित्तकोपः ॥ ४७ ॥ टीका-जन्म समयमें भौम नीचराशीका होतो रक्तपित्त रोगका कोप होता है। अर्यात नाक, मुख, तथा मलदार की तरफसे रुधिर पड़ाकरता है।। ४७ ॥

(५२) (जातक तल) देवदुर्गधयोग. मंदझेशुक्रेदेहदौर्गध्यम् ॥ ४८॥ पष्टेशेवः वा नके देहदौर्गध्यम् ॥ ४९ ॥ ज्ञाशुके ज्ञयुते केंद्रे देहदोर्गध्यम् ॥ ५० ॥ मेपगेचंद्रेझे देहदोंर्गध्यम् ॥ ५१ ॥ टीका-शनि की राशी १० । ११ का शुक्र होवे तो देहमें दुर्गध होतीहै ।। ४८ ॥ छठे स्थान का स्वामी बुध की राशि. ३६ का हो भपया मकर राशी का होवे तो देहमे दुर्गध होतीहै ।। ४९ ॥ बुधकी राशी ३।६ मे गयाहुयाशुक्र बुधसैयुक्तहोवे और केंद्र .११४१७११० स्थानमें स्थितहोये तो देहमें दुर्गध होती है ।। ५०॥ मेपराशी का चंद्रमा जन्म लग्नमे स्थितहोये तो देहमे दुर्गध होतीहै ॥५१॥ लकड़ी के साहारचलने का योग. लग्नेशेंत्ये पापयुतदृष्टे यष्टचाचलति ॥ ५२ ॥ टीका-सग्नका स्वामी १२ वारंवं स्थानमें पापग्रह से पुन तथा इटहोवे तो लकड़ी के साहारे से चलनेवालाहोता ॥ ५२ ।। विलनयोग. चंद्रनाभीमदृष्टी विलज्जः ॥ ५३ ॥ भाणेदोसारेनिके पिलग्जः ॥ ५४ ॥ ज्ञान्छायङ्गे भीमस्ते बिलग्जः ॥ ५५ ॥ जीद् भामटे विटग्जः ॥ ५६ ॥ १ . टीका-पंद्रभार व्य दोनुग्रह नाम हटहोयता विलन होलाद ५३ सीमनंदना मंगल म गुन होकर विफ६.८॥१२ स्थानमै गाय घिटन होता ॥४॥ बुर शुगमन भार मातम स्यानने भामहरिती पिटमहोदाई ५५ . -:

free (जातकताव) राहुमंदारयोगे हत्कपटी ।। ६७ ॥ शनि मंगल भार राह इन तीनोमे से १ भेकभी ग्रह मनु मे होतो हकपटी होता ।। || राहु शनि और मंगल इन निनाग्रहीका योग(युनि) होतोह पटी होना ।। ६७ ।। निष्कपटीयोग. सुखे स्वक्षाच्चगे शुभे निष्कपटी ॥ ६८ ॥ मुखेशे बलाढये निष्कपटी ॥ ६ ॥ तुंर्यशुभः मित्रान्वित दृष्टे निष्कपटी ॥७० ॥ हृदयशे गोपुरायशे निष्कपटी ॥ १ ॥ पाताले मृदंशादियुते निष्कपटी ।। ७२ ॥ लग्नशेबुगे'शुभयुतक्षिते निष्कपटी ॥ ७३ ॥ लग्नेशे बलाढये निष्कपटी ॥ ७४ ॥ लग्नपे पारावताशे निष्कपटी ।। ७५ ॥ .. लग्नेगुरौ शुक्रदृष्टे निष्कपटी ।। ७६ ।। -इन्हकोतुर्ये क्षणमात्रंकपटी उ निष्कपटी ।। ७७ ॥ तर्पतमसी-पापयुतदृष्टे बहिः शुद्धोतः कपटी ।। ७८ ॥ तुर्य बहुपापर्यंतदृष्टेपूर्ववत् ॥ ७९ ॥ टॉक-स्वराशि तथा उच्चराशि मे गया हुया शुभग्रह चोपस्थान में स्थितहोवनों निकंपटी होताहै ॥ ६८॥ चोयस्यान कास्वामी बलवान हो तो निष्कपटी हताहै ।। ६९ ॥ चौविस्थान मे शुभग्रहको राशि राजा४।९।१२ भपने स्वामी के भिग्रह से युक नया दट होतो निष्कपटी होताहै ॥ ७॥ चोयम्यान का स्वामि गोपुरादि भगमे हो तो निष्कपटी होता है । चयभार मृदंशादिक मेहाते तो निष्कपटी होता है ।। ७२ ॥ .. m ( भाषा दीकासहित) रग्नेश्वर चतुर्थ स्थानमे भ: शुभ ग्रहहे.युन नथा दृष्टहोवतो निष्कपटी होताहै ॥ ७ ॥ लग्नेश्वर बलवान होतो निष्कपटी होना ।। ७४ ।। लग्न का स्वामि पारावतादि अंशमे होवेता निष्कपटी होनाहै ७५ शुक्र से दृष्ट गुरु लग्नमे स्थित होवती निष्कपटा होता है ।। ७६ ।। बंदमूर्य का योग चौथे भाव में हो तो क्षणमात्र कपटिरहै पश्चात् निष्कपटी होता है । ७७ ॥ पापग्रह से युक्त तया दृष्ट राहु चौथे स्थानमे, स्थितहोवे तो बाहर तो निष्कपटी (शुद्ध) भौर अंतःकरणमें कपटी होताहै ।। ७८ ॥ चौथस्थानमे बहुत पापग्रह युक्त हो तथा ४ स्थानको देखते होघेतो वाहार से निष्कपटी भार अंतःकरणमें कपटी होताहै ॥७९॥ शूरयोगः रात्री बल्यारेंगे खे वा शूरः । ८० ।। भौमस्ते बलवान् शूरश्च ।। ८१ ॥ टीका-चलवान मंगल, लग्नमे अथवा १० दशमे भावमे नारे भौर राशिसमय का जन्महो तो शूरवीर होता है ।। ८० ।। सातवे स्थानमे मंगल स्थितहोवेतोबलवान भौरभर होताहै ॥८॥ दूसरे ग्रंथोमे लिक्खादे तथा भनुभय से देखने मेभामाद कि जिसके जन्म लग्नसे तीसरे३ २ ६ ग्यारवें ११ स्थानमे भौम शनि रवि राहु स्थित होते है यह शूरवीर उद्योगी साहसी हिंमतवान पराक्रमी होता है। कातरयोग. निर्बलारणांगे दृष्टे कातरः ॥ ८२॥ रात्रौशनौ दशमे कातरः ॥ ८३ ॥ स्वतंगभोमटेंगे कातरः ॥ ८४ ।। अंशाधिकमेपापेशूरःशुभेकातरः ।। ८५॥ टीका-मन्मलग्नको निपली मंगल देखनाहो तोफातर (टरपोक) होताई ॥ ८२॥..

.
(.५६)
(जातक तल)
राशि समय मे जन्मही शनि दशमेस्थानमे स्थितहोतो कार
(डरपोक) होताहै ।। ८३॥
स्वराशि ८ का मंगल लग्नकों देखता होतो कातर होताहै ।
कारकांसश लग्नसे ३ तीसरे स्थानमे पापग्रह स्थितहोतो शूरहोत
भौर शुभग्रह स्थितहो तो कातर होता है ।। ८५॥
कोधियोगः
दिवावल्यारे खंगे क्रोधी ॥ ८६॥
लग्ने अस्ते वा निर्बलारे शनिदृष्टे कोधी॥ ८७ ॥
लग्नेभौमे क्रोधी ॥ ८८॥
यूनेषलवति भौमे क्रोधी ।। ८९ ।।
त्रिकोणेल्यवीर्ये राशिपे क्रोधी ।। ९० ॥
अन्त्याप्टमेनेरों कोधी ॥९१ ॥
धनेशे गुलिकान्चिते क्रोधी ॥९२ ।।
टीका-दिनकानन्म होवे भौर पल बान मंगल १० दश में भापत्र
१लग्न मे स्पिनदो तो फ्रोधी होताद ।। ८६ ।।
लग्नमे भयग सात पे स्थानमे निचली मंगल दोये शनि देखत
होतो माहाता ।। ८७॥
सरनमे मंगल होतो मांधी० ॥८८॥
मातम स्थानेम पलसान मंगल होना प्राधी होताहे ।। ८९॥
जन्म गशिका स्मामानिवली होके नियोगम्पान (९५) स्थित
होतोयी-॥९॥
सान पारामि पारवै नयाभादमेम्मानमे जायतीमधी॥११॥
धन रम्यान पायामि गुटिकम एमादो तो कापी होला ।।९१ ॥
मतापिपयोग
नु पुन मोन्य करह मियः ॥ १३ ॥
-बीसम्यान मंत्र या दोनों पर निय होगाद ॥९॥

(भाषा रीकासहित) क्षमावास्योग कालिझपर्क भौमदृष्टे क्षमायान् ॥ १४ ॥ तुर्येशेड़े वा लग्नेशे तुर्य क्षमावान ॥ १५ ॥ सवलेतुर्य क्षमावान् ॥:९६ ॥ शुभेतर्य क्षमावान् ॥ ९७ ॥ टीक-कर्क वृश्चिक मीनराशि मे गयाहुवा सूर्य भीमसे दृष्टहवितो क्षमायान होताई ॥ ९४॥ चौथस्थान का स्वामि लग्नमे भयावा लग्न का स्यानि चौवस्थान मे जायतो क्षमावान होताहै १९५॥ चौथास्थान बलवान हो (स्वामि से तथा गुरुबुध से युक्त दृष्ट होवे ) तोक्षमावान होता ॥ ९६ ॥ शुभप्रद चौधस्थान में स्थित होवती अमावान होता ॥ ९॥ हास्यासक्त योग शनिग्रह ज्ञारौ हास्यासक्तः ॥ ९८ ॥ ज्ञेनेचास्तेजीव हास्यासक्तः ॥ ५९ ॥ ज्ञांशेंगे हास्यासक्तः॥ १०.॥ टीका-पधमंगल कार्योगमकर भया कंभराशी मेदोवती हास्या सन(हसीसी में रहनेवाला) होता ।। ९८ ॥ लग्नमें अधभार सात मे गुरु स्थित होवनो हाम्या ॥९९ ॥ बुधकी राशि का नयांश लग्न होतो हास्यासक्त होता १०० द्रोहीयोग. सोत्यभामे नचंद्र द्रष्टे द्रोही ।। १०१।। लग्नेशेने पठेद्रोही ॥१०२ ॥ लग्नेशे निर्यले द्रोही ॥ १०३ ॥ टीका-तीसरेस्थानमें मंगल होरे भोरे उसको गुपचंद देखते होतो दोही होताई १०१ (जातक तत्व) गोपालयोग अंशात्ले जीवार्कमात्रदृष्टे गोपालः ॥ १२३ ॥ टीका- कारकांश लग्न से १० दशमस्थान को गुरु सूर्य के शिवाय भौर कोई ग्रह नहिदेखते होवे (भर्थात् गुरु सूर्य ही देखतेहो तो गोपाल न करनेवाला होताहै ॥ १२३ ।। अविश्वासीयोग अशांदर्म जीवावविश्वासी ॥ १२४ ॥ टीका-कार कांश लग्न से नवमे स्थानमें गुरुसूर्य स्थितहोवे। भविश्वासि (किसीपर भरोसा नही रसनेवाला) होता है ।। २४ ।। कामीयोग. उच्चगे वा नीचगे या सिंहपूर्वादशुकोत्रकामी ॥१२५॥ स्वाशे शुक्रे कामी ॥ १२६ ॥ पापदृष्टे शुके कामी ॥ १२७ ॥ युग्म स्वक्ष या शुके कामी ॥ १२८ ॥ सांगमुतेपुपनेरो कामी ॥ १२९ ॥ टीका-भराशी (१२)फागुफ६।८1१२ नागरभवानीच राई (6) पामुक में नारे २ या मिदंराशि के पूर्वाद (१५ भने भीतर) में गायागुकलिम्पान (1८1१२) मंस्थितहोगा तो काम म गाम योग ।। २२५ ॥ बनता गोरे तो कामी होता॥ १२६॥ परोपा देगा होये नो कामी होता ॥ १२ ॥ किशनगम भगना मानिमाम्पिन हो तो कार्म हमा॥१८॥ धन (२) मा मामी दमम १० सामे पापांग ५ या जीवामी ना ॥१९॥ भाकामीयांग । (भाषा टीकासहीत) भौमाच्छयुतो जीवेचारीशे कामाधिक्यं ॥ ३१ ॥ टीका-सात में स्थानमे शुक्र होवेतो अति कामी होताहै ।। १३० ॥ । मंगलशुफकायोग कोईभस्थिानमै होवे और उटेस्थान कास्वामी महोत तो भतिकामी होताहै इसयोगका संभव कर्क तथा तुललग्न जन्म पाने वाले को ही होताहै ।। १३१ ॥ भल्पकाम या भल्पवार्य योग शनिधनुपिपेलग्ने ऽल्पकामः ॥ १३२ ॥ विपमोदयगेशुक्रेल्पवीर्यः ॥ १३३ ॥ तुर्य चंद्रशनि अल्पीयः ॥ १३४ ॥ शुकस्तेंगेशदृष्टेऽल्पवीर्यः ॥ १३५ ॥ शुरुक्षचंदेल्पवीर्यः ॥ १३६ ॥ टीका-धन अथवा वृपभ राशिके लग्नमे शनि स्थित होवेतो भल्प फामी होता है ॥ १३२ ।। विषम राशो (२०३५०९।११) के लग्नमे शुक्रहो तो भल्प वीर्य होता ॥ १३॥ मंद मोर शनि चौथे स्थानमे युनदोवे तोभस वीर्य होताद १३४ सातमे स्थानमे गये हुवे शुक्र की लग्न का स्वामी देखताहो तो भल्प पार्य होता है ॥ १३५ ।। शुक्र कीराशी२।७ काचंद्रमा होयतोभस वीर्य होता है ।। १३६।। नसक योग मंदाच्छोखेरंधे याशुभद्रटिशहित्येपण्दः ॥ १३७ ॥ पष्टांपेजलादेशुभद्रग्धानेपण्ढः ।। १३८ । चंद्रावामदनीवाभीमार्को युग्मोजळगा पन्योन्यं पश्यतः पण्डः ॥ १३९॥ ओजोगे समर्मगोमेक्षिवे पंण्टः।। १४० ।।

(जातक तत्व) चंद्रज्ञो युग्मोजक्षगौ भौमेक्षितो पंदः ।। १४१ ॥ पुभागसितेन्गानि पंढः ॥ १४२॥ मंदाच्छौखे पंढः ॥ १४३ ॥ शुक्रात्पष्टेष्टमेमन्दे पंढोवातादृशः ॥ १४४ ॥ अशकेतो मंदनदृष्टेपंढोवातादृशः ॥ ११५॥ मंदाच्छौ शुभट्टाग्घी नौरन्ध्रगो पण्डो वा तादृशः॥१४६" पष्टांत्येनीचगेमदेपंढो वा तादृशः ॥३४७ ।। टीका-शनि और शुक्र ये दोनो दशमे अथवा भाठवे स्थान मेरि त होये और शुभग्रहोसे भदृष्टहोवे तो नपुसकहोता है ।। १३७ ॥ जलराशि मे गयाहुवा शनि छठे अथवा पारवे स्थान मे होये भी उसपर शुभग्रह की दृष्टिनहि होयेतो नपुंसकहोताहै ॥ १३८ । चंद्र रवि अथवा शनि बुध अथवा मंगल रवि येग्रह क्रमसे सम भोर चिपमराशि में स्थितहोके परस्पर देखते होवेतो नपुंसकहोताहै भर्थात् चंद्रसमराशिका रवि विषमराशिकाहोये अथवा शनिसमराशि का और बुधविषमराशिका होवे अथवा मंगल समराशिका और रवि विषमराशिका होवे और ये प्रत्येक परस्पर पूर्गदृष्टि से देखतेहोवतो इन तीनों योग मे से भकभी योगमे जन्महोनेसे नपुंसक होताहै ॥१९॥ विषमराशि का लग्न समराशि श६।८।१०।१२ में गयहुये भीम से दृष्हाये तो नपुंसक होताहै ।। १४० ॥ समराशि का चंद्रऔर विषमराशि का बुधहोवे इनदोनोकों मंगल देखनाहीये तो नपुंसक होताहै ।। १४१ ।। शुक्रनंद और लग्न येतीनों पुरुपराशि ॥३॥९९।११ के नवांश पे होतो नपुंसक होना ।। १४२।। शनि और शुक्र यदोनो दशमे होतो नपुंसक होता।। १४३।। शुभ मे उठ भाउ स्थान मे शनी हो तो नपुंसक भयवा न सर के ममान होताह ॥ १४४।। कारकांश लग्नमें केतुदोष भीर यह सानि पुसदृष्ट हो तो -सक या नमुमर के समान होता है ।। १४५॥ -- ( भाषा टीकासहित) शनिशुम भाठमै स्थानमे स्थित होवे और इनदोनोको शुभग्रह न. ही देखते होये तो नपुंसक वा नपुंसक के समान होताहै ।। १४६ ।। नीचराशिमे स्थित शनि छठे तथा वारवे स्थान में हो तो पंट अथवा पंढ के समान होताहै ॥ १४७ ।। वीर्यच्युति योग राहौशुर्कजेवोच्चगेककमेपेचद्रेवीर्यच्युतिः।। १४८॥ लग्नेचंद्रे गर्वकजीसुते वीर्यच्युतिः।। १४९ ।। कन्योदये मंदज्ञद्रष्टे मन्दत॑शुक्रे वीर्यच्युतिः।। १५० ।। टीका-रा शुक्र अथया शनि अपनी उच्चशिमे होये और कर्क राशि कामूर्य मेपकाचंद्रमाहौवतो वीर्यश्राव हेातार हताहै ।। १४८ ॥ लग्नमे चद्रमा और गुरुशनि पांचवे स्थानमे स्थित होये तो वार्थच्युति (पिर्यश्राव ) होतारहता है ।। १४९ ॥ कन्याराशि के लग्नकों शनिवध देखते होवे और शानिकि राशि १०।११ काशकहोय ता वीर्यच्युति होती है ।। १५० ।। यह योगनिसको होताहै उसके पैशानमें वास्यममें ना नीकर्दशन स्पर्श मागसहिवायथावहोंनायाकरताहै उन्मादयोग ईज्य कुजेस्ते उन्मादी ॥ १५१ ॥ लग्नेशना मदत्रिकोणे कुजे उन्मादी ।। १५२ ॥ मन्देड्ने व्यय कोणचंद्रे या भौमे उन्मादी ।। १५३ । मुढेनीचेपटे सोत्थेशे पापद्रष्टे गरलज उन्मादः॥ १५४ । भौमस्ते जीवङ्गे उन्मादी ॥ १५५ ।। क्षीणदेकजावंत्ये उन्मादी ।। १५६ ॥ मंदार्थशौ सपापो वावज उन्नाद ।।९५७ ।। धनेशार्कजोमर्ययुवा राजकोषजउन्मादः॥ १५८ ॥ यार्थशौ भौमयुतौ पिनज उन्मादः ॥ १५ ॥ चंद्राकोकोणाङ्गगोद्रेजोवेयमारक्षणवारेटन्मादः॥१६०।

(जातक तत्व) इदर्कजोलग्ने ज्ञद्रष्टौ विव्हलः ॥ १६ ॥ टीका-लग्नमे गरु और सातमे मंगलहोतो टन्मादि ( विक्षिप्त) होताहै ॥ १५१ ।। लग्नमे शनि सातवें भयया नवमे पांचवे मंगलहोवे तो उन्मादि होताहै ॥ १५२ ।। लग्नमे शनि, बारवे सूर्य, नवमे पांचवे चंद्र, अथवा मंगल स्थितहोवे तो उन्मादी हाताहै ॥ १५३ ।। तीसरे स्थानका स्वामी अस्तका, भयवा नीचराशीका छठे स्थान मे होये और पापग्रह से दृष्टदोषे तो जहरखानेसे उन्माद होताहै || १५४ ॥ सातमे मंगल आर लग्नमे गुरु होवेतो उन्मादी होताहै ।। १५५ ।। क्षीणचंद्र और शनि येदोनबारवस्थानमहोवे तो उन्माद होताहै।।१५६। शान भौर धनस्थानका स्वामि ये दोनो पापग्रहसे. यक्त होवे तो वायस उन्माद होताहै ॥ १५७ ।। धनेश और शनि ये दोनो मर्य से युक्तहवेतो राजकोपसे उन्माद होता है ।। १५८ ॥ शनि और धनस्थान का स्वामि ये दोनो मंगल से युक्तहोये तोः पित्तजन्य उन्माद होताहै ॥ १५९ ।। चंद्र और सूर्य दोनो नरमे पांचव भयका लग्न में होये भार केंद्र ॥४॥१० मेगुरु होये जन्मसमय मे शनि भयवा मंगल की काल होरा हो या शनि मंगलवार केदिन जन्म होवे तो उन्माद होता ।। १६ ॥ चंद्र शनि लग्नमे होवे और बुध इनको देखताहोवे तो चिन्हल (भ्रमिष्ट) होला ।। १६१ ॥ शीध्यार्थ क्य चिन्होदय योग धनेतो शधियाधस्यचिन्होदयः ॥ १६२ ।। टीका-धनस्थानमे फेन होयता शीध्वृद्धावस्था के चिन्द उदय होनान ।। १६२।। महानि वृद्ध योग हि कन्या लग्नगा प्रकृति वृदः ॥ १६३ ।।

(भापाटीका सहीत)
टीका-राहु शनि सूर्य गुरू ये चारो लग्न मे हो तो प्रकृति द्ध
स्वाभाविकवृद्ध) होताई ॥ १६३ ।।
नातिवृद्धनयुवा योग
चंद्राच्छोलग्ने नातिवृद्धो नयुवा ॥ १६४ ॥
टीका-चंद्र शक लग्नमे हावता नतोभाषिक वृद्ध भौर अनि
वानही (मध्या यस्थाका ) होताहै ॥ १६४॥
वृद्धभी तरुग के समान रहनेका योग.
सबभौमेलामे वृद्धोपितरुगायते ॥ १६५ ॥
टीका-बलवान मंगल लाभ ११ भावमें होवेतो वृद्धावस्थाहावतोभी
रुणके समान रहताहै ॥ १६५ ।।
रसायन पसनी योग.
खे सुखशे रसायनव्यसनी ॥ १६६ ।।
सुखेशे विपले रसायनन्यसनी ॥ १६७ ।।
टीका-चौथे स्थानका स्वामि १० दशमे स्थानमे होवेतो धातु उपधातु
की रसायन पनाना तथा उसका सेवन करन में विशष प्रीतिरखनयादा
होताहै ॥ १६६ ॥
चौथे स्थानका स्वामि निर्वली होतोधात उपधातु की रसायन
पनाना तथा उसकासवन करने मेशेिष प्रीतिरखनेवाला होता है, १६७
बहुभुस्योग.
सपापे अर्थशे बहुभुक् ॥ १६८ ॥
सपापेर्थे क्रूरपष्ठवंशे बहभुक् ॥ १६९ ।।
टीका-धन २ स्थानका स्वामि पापग्रहसे युत्तदोवे तो बहुत भोजन
करनेवाला होताहै ।। १६८ ॥
धन २ स्थान पापग्रहले युतहोवे और करपष्टयशमे होतो अधिक
भोजन करने वाला होताहै ।। १६९ ।।
सुखमुक योग,
सशुभे धनेशे सुसभुक् ॥ १७० ॥
धनेशुभे पापडग्धीने सुखभुक् ॥ १७१ ॥

(नानक तता) धनेशुभदृष्टयाधिक्ये सुसभुक् ॥ १७२ ॥ धनेशे बलयति सुसभुस् ॥ १७३ ।। शपिकांशेर्थशे वा गुरुदृष्टे सुसभुक् ।। १७४ ।। टीका-धनेशशुभयदसे पुतदोवतीमुमसे भानन करनेवाला होनाई धन २ स्थानमे शुभग्रह हो भौर धनस्यान को पापग्रह नहि है हो ये तो मुखसे भोजन करने वाला होना ।। १७॥ धन २ स्थानपर शुभग्रह की अधिक दृष्टि होतो मुससे भोजन म वाला होताहै ।। १७२॥ धन २ स्थान का स्वामि बलवान होवेतो मुखसे भोजन करने वा होताहै ।। १७३॥ धनेश वैशेषिकांदा (संज्ञाध्यायमा २१ मे कहा ) मे होवे भर धनेश को गुरु देखताहोवेतो सुख भोजन करने वाला होता है ।।१७५ श्राद्धात्र भोजनकतोयोग. धनेशे मंदे नीचो गुलिक युते सततं श्राद्धभुक् ॥ १७५ । टीका-धन २ स्थान का स्वामि शनि नीचराशि मे होये और गलिकरं युक्त होवे तो निरंतर श्राद्धान्न भोजन करनेशला होताहै ।। १७९॥ अल्पमुकयोग. धनेशे शुभे वो स्वोच्चे शुभदृष्टेड ल्पाशी ।। १७६ ॥ का-धुन २स्थान का स्वामि शुभग्रह होये अथवा अपनी उच्चराशि का होये और शुभ ग्रह से दृष्ट होये २ तोभल्पभाजनकानवाला होताहै ।। १७६ ॥ शीघ्र भन योग. सबलथशे सशुभे शोधभुक् धनेशे चरभे शीघ्रभुक् ॥ १७८ ॥ धनेशुभ शुभदृष्टे शीघ्रभुक् ॥ १७९ ॥ टीका-धन २ स्थानका स्वाभि घलवान हो औरशुभग्रह से युत हो तो शीघ्र भोजन करनेवाला होताहै ॥ १७७ ।। धन र स्थान का स्वामि चर राशि ४१० काहविता जल्दि भान गा। टासाहत) (६७) न करने वाला होता है ।। १७८ ॥ धन र स्थान का स्वामि शुभग्रह की राशि का होवे और शुभग्रह उस्को देखतेहोये तो जल्दी भोजन करनेवाला होताहै ॥ १७९ ।। चिरभुर योग कोशेपापलं पापयुतदृष्ठे चिरभुक् ।। १८० ॥ धनेशे स्थिरा चिरभुक् ॥ १८ ॥ टिका-धनभायमै पापयह की राशिहोवे भोर पापग्रह युक्त तथा देखते होती ऐरतक भोजन करनेवाला होताहै ॥ १८॥ धनस्था नकास्वामी स्थिर २५।८।११ राशिका होवेतो देरतक भाजन करने वाला होता है ।। १८१ ।। कदनभुक योग गुठिकारयोगे कदन्नभुक् ॥ १८२॥ टीका-गलिक और मंगल का योग होपेतो दुष्टान्न (स्वरावभन्न) भोजन करने वाला होताहै ॥ १८२ ॥ भोजनशूर लग्नजीवे भोजनशूरः ॥ १८३ ॥ टीका-लग्नमेगुरुहोवे तो भानन मेशूर (भोजन करने में बहादुर) होताहै ॥ १८३॥ धारयोग भ्रातृपेबलिनिकेंद्रकोणगे सौम्पदृष्टवैशेपिकांशे धीरः १८४ विक्रमेशे शुभाशे शुभदृष्टयुवे धीरः ॥ १८५॥ विक्रमार्केश योगे धीरः ॥ १८६॥ सोत्येन्दुयोगेधीरः ।। १८७ ॥ टीका-तीसरे स्थान का स्वामि बलवान होकर केंद्र कोण राण १९९५ स्थान होव शुभग्रह से दृष्टहोये वैशेषिकांशमे होये तो धीर (पत्रान् ) होताद ।। १८४॥ तीसरे स्थानका स्वामि शुभग्रह की राशि और शुभग्रहके नवमां (६८) (जातक तख) शमें होवे शुभमहसे युतदृष्ट होये तो धीर होता है ।। १८५" तीसरे ३ और १२ वारमे स्थान के स्वामि कायोग होघेतो धीर होताई ॥ १८६ ।। तीसरे ३ स्थान के स्वामि से चंद्र का योग हो तो धार होता है ॥ १८७ ॥ पिशुनयोग. सुतेंगेशेपिशुनः ।। १८८॥ पापे रोपिशुनः ॥ १८९ ॥ पापद्दष्ट्याधिकङ्गे पिशुनः ।। १९० ।। टीका-लग्नका स्वामि ५ पांच होयेतो चुगलखोर होताई ॥१८in लग्नका स्वामि पापाह होयतो चुगलखोर होताहै ॥१८९।। लग्नपर पापग्रहो कि दृष्टि भधिक होयेतो अगलखोर होताह १९० चाण्डालपोग. पापदृष्टेजी मतमसी चाण्डालता ॥ १९१ ॥ नीचभांशेजीये चाण्डालता ॥१९२॥. रीका-गुरु, राहुसंगत हरि गौर उस्को पपगह देयता होतो चाण्डाल प्रकृति होताई ॥१९॥ नीचराशि भार नीच नवांशमें गुरोरतो चाण्डाल मति होना १९९ पिशाचमन्मयोग. परतेनदेश पाराकोणे पिशाचजनिः ॥ ११.३ ।। टीग-प्राममयमाचंद्रमालग्नम होय भार ९५मगमगांन स्थान में गाद मायनोविज्ञान महतियाला जन्मताद।।१९।। शिक्सियोग. हम सयुते शिल्पी । ११४ ।। मरने केंद्र गिल्लि ॥ १५॥ योग शिलि ॥ १२.६ ॥ ।

(भाषा टीकासहित). (६९) टीका-केंद्र११११७६१० मै शनि, बुधसैयुक्त होवेतो शिल्पकार्य रनेवाला होताहै ॥ १९४ ॥ बलवान बुध ११४७१० मै स्थानमे होवतो शिल्पज्ञ होताहै १९५ गुरु भौर बुधका योग होवेता शिल्प जाननेवाला होताहै ॥१९॥ मुथारमिसावट तथाकसागरा हुनर के कामको शिल्प विद्यारहेत है क्षारादिपदार्य प्रिययोग शेज्योंपटे उपदंशप्रियः ॥१९॥ टीका-घटेस्थानमे उथ वृहस्पति होयेतो भच्छे क्षार पदार्थोकोमिय माननेवाला होताहै ।। १९७ ।। सर्वार्थवितामणीमदूसरेयोगभीकददै उठेधशुभग्रहसदृष्टही भौर पष्टेशशुभ युक्त होवे परंतु पापगहोके मध्यमे स्थितहोयेतो भच्छे क्षार पाहायोंको पियमाननेवालाहोताहै । छठे शुरु भयंवा बुधकी. राशीमृद्धशादिकमे होतो क्षारयस्तुप्रियमाननेवालाहोताहै २ मधुरादिपदार्थमिपयोग. पष्टेशेजीवे शुकवा मधुरादिप्रियः ।। १९८ ॥ सशुभेजे मथुरप्रियः ॥ १९९ ॥ टीका-टेस्थानका स्वामि गरु भयवा शुक्र होवेतो मधुरादि (मीठे- भादि) प्रार्थ प्रियमाननेवाला होताहै।। १९८ ॥ बुध शुभग्रहसेगुक होतो मीठा पदार्थ प्रियमानने वाला होताहै १९९ पातरमकहाकि पष्टेशगुरु वा शुक्र गोपुरादिभंशकमेहावेतो मीठा भादिपदार्थ नियमाने भयवा शुभाहसंयनःशुक्र छठेस्थानमें स्थित होवे २ वा शुभके नवांशमे शुकहोवे भौर शुभग्रहासदृष्टहावेतो ३ का शुक बलगावहोवे बुधसे युत होवे भौर पारावतादि शुभनवांशमे स्थित हावेतो नित्य मीठापदार्थरा भोजन करनेवाला होता है । मधुरे भरुचि, भम्लपदाच रुचियोग. सपापेक्षे मधुरेऽरुचि ॥ २० ॥ टीका-पापगद से युक्तधोवतोमीठपदार्थपरभरुचिवालाहोताहे२०० ग्रयांतर में कहा कि युध पापग्रहसे दृष्ट होती मीटपदार्थपर भरुचि (७.) (गातक तल) रखनेवाला होताहै १ युध साहिन शुक्र मंठे भाषम होतो यह मनु' सट्टा पदार्थ सानेगला होताहै, २ छंटेस्थानमे शुभ मंगल से गुन होत १ भयवा छठेस्थानमे शुक्रहोये भार उस्को मंगल देवताहोनी भयवा छंठेगये हुये शुक्रकोसूर्य देवताहोयतो ३ वदमनुष्य स्खट्टापद (दहि इमलि निंधु कटी आदि संपदार्थ ) सानेवाला होना है. नीचकर्मा, नीचपथग, म्लेच्छ योग. लग्नेकजव्यंशे केंद्रगचंद्रदृष्टे नीचकर्मा ॥२०१॥ द्यनेलग्नेमन्दे पुण्यसोत्थे भौमे श्रेष्टयापिनीचपथगः२० मंदायिकगोव्यंशे नवांशे त्रिंशांशे वा नीचयोपानुपंस म्लेच्छोभवति । २०३ ॥ टीका लग्नमे शनिका रोकाणहोये भौर ११४१७११० मे स्थान गया हुका चद्र देखताहोतो नीचकर्म करनेवाला होताहै १२०१ . सातमे सूर्य लग्नमेशनि और ९१३ नवमे तथा तीसरे स्थानमे मंगः स्थितहावेतीउत्तमवर्गकाहो तथापि नीचमार्गमे चलनेवाला होताहै २० शनि और सूर्य दोनो एकरराशिके होवे? अथवा एकरागिक द्रेष्काणमे वा एकरराशिके नवांशमे ३ वा भेकराशिके किं.शांशमे ४ हवितो नी जातिकी स्त्रीके संगसे म्लेच्छ होजाताहै ॥ २० ॥ टीप-इसमूत्रा चारयोग कदहै इन चारयोगमंस जिसके दो योगसे जितने भधिव होवे उतनाहि ये योग बलवान जानना केवल शनि सूर्य दोनो अब राशि के होजाने से ये योग नहि मिलेगा ज्ञातिपीडायोग. पष्टाङ्गेशौ लग्नगौ ज्ञातिपीडा ॥ २०४ ॥ लग्नेशेपष्ठे पष्ठेशदृष्टे ज्ञातिपीडा ॥ २०५॥ शुक्रेज्योलग्नेपरेशयुतो शन्यारतमोदृष्टौ ज्ञातिपीडा २०६ टीका-लग्नेशभौररठेस्थानकास्वामि ये दोनो लग्नम होतो ज्ञातिसे पीडाहानिदै ।। २०४॥ लग्नेश छठे स्थानमेहोये और उसको छठे स्थानका स्वामि देखता नानातिसे पीटाहोतीहै ॥ २०५।।

(भाषार्टीका सहीत) (७) पष्टशसे युक्त शुक गुरु लग्नम स्थितहोवे और इनको शनि मंगल राहु देखतेहोवे तो ज्ञातिसे पीडादौतीहै ॥ २०६ ।। जातिच्यतियोग. लग्नेशादा लग्नाविकोपार्जातिच्युतिः ॥२०७॥ जेन्दजा नीचारिभागमा जातिच्युतिः ॥२०८॥ टीका-लग्नसे गयया लग्नेशसे ६८१२ स्थानमे पापग्रह स्थित होओनो जातिवादर होताहै ॥२०७ ।। बुध, चंद्र, शनि, ये तानी नाच तथा मात्र राशिक नरमाशमै होवेतो जातिवादर होताहै ।। २०८॥ जातिपोप्ययोग. इन्दजी मित्रः जातिगोप्यः ॥ २०९ ॥ टोका-चंदशानिमित्रराशिकहवितोजातिकोपोषणकरनवाला होता है ॥२०९॥ कौतुकियोग. लाभेशेड्ने कौतुकि ॥ २१ ॥ लाभेरोशुभे वा सबले कौतुकी ॥ २११ ॥ लाभेशुभे कौतुकि ॥ २१२॥ टीका-लाभ ११ स्थानकांस्वामि लानमहोवेतो कौतकिहोताहै २१० लाभस्थानकास्वामिशुभग्रहहोवे बावलनानहोवताकौतुक (खिलाडी) होताहै ॥२१॥ ग्यारमें स्थानमे शुभग्रह स्थितहरितो कौतुक होत है ।।२१२॥ भालसियोग. ईज्यमन्दयोगे अलसः ॥ २१३ ॥ लग्नेशे मंदान्विते अलसः ॥ २१४ ॥ लग्नेशे निर्मल अलसः ॥ २१५ ॥ लग्नेमापदृष्ट्याधिश्ये अलसः ॥ २१६ ॥ , (नातक तत्व) टीका-गुरु.शनिका योग होतो आलसी होताहै ॥२१॥ लग्नेश्वर शनीसे युत होवेतो भालसी होताहै ।। २१४॥ लग्नेश्वर निवली होवेतो भालसी होता है ।। २१५ ।। नग्नपर पापग्रहोकि दृष्टि भधिकहावेतो भालसी होताहै ॥२१॥ कृषिकर्तायोग अंशाद्धर्मे जिवे कपिकर्ता ॥ २१७ ॥ अंशादरिंगौ पापो कृषिकर्ता ॥ २१८ ॥ टीका कारकांशलग्नेसे नरमेस्थानमे गुरु रोवतो खेतिकरनेवाला होताहै ॥ २१७ ॥ कारकांश लग्नसे छठे स्थानमे २ दो पापग्रह स्थितहोवेतो खेति करने वाला होताहै ।। २१८ ॥ सल्वाटयोग धनुपि वृपेङ्गे रैर्दष्टेखल्वाटः ॥ २१९ ॥ सपापे पाझे सल्वादः ॥ २२० । कचंद्रे भीमदृष्टे सिंहचापाल्यंगनालग्ने खल्वाटः २२१ टीका-करग्रहोसे दृष्ट धन तथा वृषभ लग्नहोरेतो सलाट(गमा) होता ।। २१९॥ पापगडकि राशिका लग्नपापग्रदो युक्त होवती पवाट होताह २२० फरामिंगपादुगा नंदमा मंगलसे दृष्टदोये भौर ५।९।८।६ राति का सानदायतो मसाट होताहै ।। २२१ ।। सोमनायांग नेगुभे नेगेंचगभान्यितेनेगयुतेशोभनंनत्रः २२२ रीमा-नाम्यान ११२मे शुभाददार, नाम्यानकास्यामि गुभग्रहसे भार सरनाम युनानी भरनेवाला होता २२२ ।। पाइपलोचन योग. ने मिश्रायुदलाचनः ॥ २२३ ॥ भीर मुहानमपिही मित्र (शुभ) से हनन (पीरलागी २२॥

(भाषा टीकासहित)
मिलिताक्षयोग
धने वा व्ययेपापे मिलिताक्षः ॥ २२४ ॥
टीका-दूसरे अथवा गरवें स्थानमे पापग्रह होयेतो मिलिताक्ष
होताहै ।। २२४ ॥
विकलनयनयोग.
सकरार्कोन्त्ये वात्रिकोणे विकलनयनः ॥ २२५ ॥
टीका-हरमहले यत पूर्व वारवेस्थानम भयया ९१५ वेगनमे दावे
तो विकलनेत होतादै ॥ २२५ ।।
मंदलोचनयोग.
धनेवाव्येशुक्रे पापयते काणो वा मंदलोचनः ॥२६॥
टीका-दूसरे भववा पारवें स्थ नमे शक पापग्रहसे युक्त होवेतो काणा
[अकवा ] भयवा मंददृष्टिवाला होताहै ।। २२६ ।।
वक्रनेत्रयोग.
पुष्पवंतावमदृष्टौ वकगो व त्रिके वक्रनेत्रः।।२२७॥
चंद्रारावेकभागेऽझगोचिन्हम् ॥ २२८ ।।
टीका-सूर्य और चंद्रमा ये दोना वकीग्रहकी राशिमे स्थित होते
भोर पापग्रह से दृष्टहावे १ भया ६८1१२ स्थानमेस्थिनहोवे तो
घम. नेम (टेटेनेप) होतेहै ॥ २२७ ॥
चंद्र, भौर मंगल दोना भेक नवांशमें (बहुतसमीप २ भंशके,
भेकराशिमे) होयतो नोमे चिन्दहोता ॥२२८ ।।
नारोगीयोग.
पष्ठेशेषकगऽक्षिरोगी ॥ २२९ ॥
ज्ञारसंलग्नपे ज्ञारदृष्टेऽक्षिरोगी ॥ २३० ॥
रंध्रांगेशोपष्ठे सम्पनेप्रेरोगः ॥ २३१ ॥
पठेटमेशुझे दक्षिणनेत्ररोगः ॥ २३२ ॥
धनेशशुभेक्षिते टग्नेशे पारयते सगेगनेयः ॥ २३३ ॥

(७४) (जाना ) मंदारगुटिकयुते नेत्रेश नेत्ररोगः ॥ २३४ ॥ नेपापा यमदृष्ट्या नेत्रे रोगहतंभवेत् ॥ २३५ ॥ नेत्रेशांशशेपाप रोगहतनेत्रः ॥ २३६ ॥ लग्नाष्टमेणुके करदृष्टेथुरातान्नेत्रपीडा ॥ २३७ ॥ लग्नेभोमेशयने नयनेगदः ॥ २३८ ॥ स्पेशशुक्रयोगे नेत्ररोगी ॥ २३९ ॥ शुकात्रिनेत्रेशे नेत्ररोगी ॥ २४ ॥ त्रिकोणेसूर्येपापदृष्टे निस्तेजोनेत्रः ॥ २४१ ॥ टीका-चक्रगतिग्रह की राशिम उठेस्थानका स्वामि होवतो नेत्रर होताहै ।। २२९ ॥ लग्नका स्यामि बुध (३१६) अथवा मंगलकी (१1८) राशि होवे भौर बुध मंगल उस्को देखते होयेतो नारोगी होताहै ॥२६ लग्न भौर अष्टमस्थानके स्वामि ये दोनो छठेस्थानमे होवतोस (बाये ) नामे रोगहोता है ॥ २३ ॥ छठे आठमे स्थानमे शुकहोवेतो दक्षिणनेत्रमे रोगहोताहै ॥२६॥ धनेश शुभग्रहसे दृष्टहोवे और लग्नश पापग्रहसेयुतदोवतो सरो नेत्रहोताहै ।। २३३ ॥ दूसरे भौर वारवेस्थानके स्वामि शनि मंगल भौर गुलिकसे युक्त हो। तो नेत्रा मेरोग होताहै ॥ २३४ ।। दूसर पारवे स्थानमे पापग्रहहोवे और उनको शनि देखताहोते रोगसे ने पीडित होतेहै ॥ २३५ ॥ नेत्रास्थान (२०१२) के स्वामिका ननांशका स्वामि पापग्रहकि राशि का दोस्तो रोगसे नेत्रपीडित होते है ।। २३६ ।। लग्नमे तथा भाठमे शुक्रहोवे क्रूरग्रहसे दृष्टहोवेतो अश्रुपातसे नेत्रमे पीडाहोतीहै ॥ २७॥ शवनावस्यामे गयाहुया मंगल लानमे होवेतो नेत्रमे पीडाहोतीहै २३८ "

(भाषा टीकासहित)
(७५)
धनेश भौर शुक्र का योग होयेतो नेत्ररोगी होता है ।। २३९ ॥
शुक्रते ६।८।१२ नेत्रस्यान का स्वामि होयेतो नेवरोगी होता है ।।२४०॥
पापत्रह से इष्ट मयं ९।५ नयमे पानम स्थानमे होतो निस्तेन
नमहोते है ।। २४१ ॥
भंध योग
लग्नेशे सार्कशुके त्रिके जन्मांध ॥ २४२॥
सूर्ये राहुबस्तेंगे मन्दारी त्रिकोणे जन्मांध ॥ २४३ ॥
नेत्रांगेशो भान्वच्छयुती त्रिके जन्मायः ॥ २४४ ॥
त्रिकेचंदारयोगे पातादन्यः ॥ २४५॥
सेज्यदी पिके सेकादंन्धः ॥ २४६ ॥
चंद्राच्छीत्रिक कामांन्धः ॥ २४७ ॥
शेन्दधिके गानान्धः ॥ २४८॥
इन्दको मोत्थे या कन्धः ॥ २४९ ॥
पाई भामे केंदधः ।। २५० ॥
यमले सूर्येन्धः । २५१ ॥
मोम्याग्रिक कष्टा अन्धः ॥ २५२ ॥
फुजेंग कुंभेन्यः ॥ २५२ ॥
गुफांगतो स्वोस्पेगो विकरयान्धः ।। २५४ ।।
गुफपापायांयुक्त मन्द्रोधनन्धः ॥ २५५ ॥
सुतायुगौ पापी भन्यः ॥ २५६ ।।
पत्रिक पारयः ॥ २५७ ।।
पारिशुभाम्यांनी अन्यः ॥२८॥
मिह जी या गुन्धः ॥ २९॥

(७६) (जातक तत्व) यमेन्दोः क्रमादत्यार्थाष्टमगा नेत्रहीनः ॥ २६० ॥ यथा तथा पष्ठाष्टांत्ययनस्था श्चंद्राकारयमा बलीग्रह दोपजानेत्रहीनता ।। २६१ ॥ लग्नाच्छुकावासुतेराहु स्सूर्यदृष्टच्छेन्नेत्रनाशः २६२ मंदेतुर्य पांपैदृष्टे नष्टदृष्टिः ॥ २६३ ॥ टीका-लग्नेश्वरसूर्य शुक्रसे युक्तहोकर ६३८५१२ स्थानमे होतो जन्मांध होताहै ।। २४२॥ लग्नमे अहण समय का सूर्य हो भौर शनि मंगल ९१५ मेंस्थान होयेतो जन्मांधहोताहै ।। २४३ ॥ नेा १२ स्थानका स्वामी और लग्नश ये दोनो मर्य शुक्र सेयु हो के ६।८।१२ स्थानमे जावेतो जन्मांध होताहै ॥ २४४ ॥ चंद्र मंगल का योग ६८०१२ में स्थानमे होयेतो पतन (गिरजाने, से भधाहोता है ।। २४५ ।। गुरुसे युक्त चंद्रमा ६।८।१२ मे स्थानमे होयेतो सेककरने से भंधा होताहै ।। २४६ ॥ चद्र भौर शुक्र दोनो ६८१स्थानमै होयेतो कामांध होताहै २४७ पुष चंद्रमा ६८०१२ में स्थानमें दोयेतो शाम्रांध होताद ।। २४८ ॥ मंद्र भौर सूर्य दोनो तीसरे स्थानमै भयया ।।४10॥१० में म्यानम होतो भंधामोतादै ॥ २४९।। पापग्रह कि रानी में गया। मंगल ११४११० मेस्थानमे होयतों भंधादाता ॥ २५॥ पानि किराशी ११११ का मूर्य ७ मातमे स्थानमे होती भधा होताई ।। २५१ ॥ गुमराह ।।१२ मे क्यानमे गयहोरे भार उनको मानद देनने होग नोगशेताह ॥२५॥ नाशिका मंगल सम्म ती भवाहालाई ।। २५३ ।। - भार टाका म्वामि यदानी २०१२ मा भार माम,म्यान, 'मलको ८२ म्यान नावनी भधाहीनाद ।। २४ ।।

७५ (भाषा टीकासहित) शुक्र और पापग्रहोसे युक्त चंद्रमा धनस्थानमे स्थितहोवेतो अंधा होताहै ॥ २५५ ।। पांचवे और चौथे ४ इनदोनोंस्थानोमे पापग्रह स्थितहोवेतो अंधाहो- ताहै ।। २५६॥ पापग्रह से दृष्ट चंदमा ६१८११२ मे स्थानमे स्थित होक्तो भंधा होताह ॥ २५७ ।। चंद और सूर्य येदोनो पारमे स्थानमे स्थितहोवे भौर इनको शुभग्रह नहींदेखतेहोवेतो अंधाहोताहै ॥ २५८ ॥ सिंहकाशीन अथवा शुक्र लग्नमे होवेतो अंधाहोताहै ॥२५९ ।। शनि चंद्र सूर्य, ये तीनो क्रमसे १२।२२८ स्थानमे स्थितहोवे भ. र्थात् शानि १२ वा.मे चंद्रमा २ दूसरे सूर्य ८ आठमे स्थानमे होतो नाहीनहोताहै ॥ २६ ॥ छठे स्थानमे चंद भष्टम स्थानमे रवि वारवे स्थान में मंगल भौर धन स्थान मेशनि इस प्रकार यथाक्रमतथा विनाक्रम कोईभी स्थानमै इनग्रहोमेसकोईभी ग्रह स्थित होतो इनमेस जाग्रह भधिक बलवान होवे उसी ग्रहके वातपित्त कफादि दोषसे नेत्रानाश होते है ।। २६१॥ लग्नसेअपत्राशुक्रसे पांचवेस्थानमेराहु सूर्यसे दृष्टहोतो नेगनाश होते हैं ।। २६२ ।। चौथे स्थानमे शनि पापग्रहोसे दृष्टहोतो नष्ठदृष्टी होताहै।। २६३ ।। निशांधयोग सेंदुः शुक्रस्त्रिकस्थो निशाधः ॥ २६४ ॥ शुकेंदुयतेनेवेशेङ्गे निशांयोनतुस्वोच्चभैयुते॥ २६५ ॥ टीका-चंद्रसयुक्त शुक ६१ ८ १ १२ मे स्थानमदोरे तो निशांध (समिअंधा) होताहै ।। २६४ ॥ नेास्थान २१२स्थानी शुक्रवंद से युक्त होके लग्नमस्थितहोतो निशांव (रातके समय भंधा) होताहै परंतु ये ग्रह स्वराशी चराशि के तथा शुभग्रह से युक्त नहिहोतो येयोग जानना. ॥ २६५ ॥ नेमनाशयोगे लग्नार्थेशोत्रिकेविनाशः ॥ २६६ ।।

(जातक तख)
चंद्राकों सिंह शन्यारदृष्टे नेत्रनाशः ॥ २६७ ॥
टीका-लग्नेश भौर धनेश ये दोनो ६३८८१२ स्थानमे हारतो नेत्र
नाश होताहै ।। २६६ ।।
चंद्रसूर्य, सिंहराशि के लग्नमे स्थितहोये और शनि मंगल इनको
देखते होवतो ने नाशहोतेहै ।। २६७ ॥
घामनेोधातयोग
भौमेन्त्ये वामनेो घातः ॥ २६८ ॥
टीका-बारमे स्थानमे मगल होयेतो थामनेत्रामे घातहोतीहै ।। २६८ ।।
दक्षनेत्रोघातयोग
मन्देर्थे दक्षनेत्रे घातः ।। २६९ ।।
टीका-दूसरेस्थानमे शनि होवेतो दक्षिणनेमे घातहोतीहै ।। २६९ ॥
नृपकापसे नेत्रोत्पाटनयोग.
लग्ने धनारी कर्मेशाःशुक्रयुता नृपकोपान्नेत्रोत्पाटनं २७०
अच्छाक्षिपो नीचांशगौ पापयुतौ नृपकोपान्ने० ॥ २७१ ॥
राजारिनाथारोशौत्रि के लग्नेशयुतौ नृपको० ॥ २७२ ।।
टीका-धनेश पटेश और दशमेश येतीनो ग्रह शुक्रसयुक्ताहाके लग्नमे
स्थितहोयेतो राजाके कोपसेनेा उखाडे जात ॥२७० ॥
शुक्र और नेत्र स्थान २।१२ केस्वामियेदोनो नीचराणिक नवांशमें
स्थित होवे और पापग्रह से रात होवतो राजाकोपसे नाउखाडे
जातेहे ।। २७१ ॥
दशम भार छठे भावके स्वामि मिनाहोकेनवांशमेहोवे ग्रह।८।१२
मे स्यानमै लग्नेश से युतहोये तो रानाक कापसेनेाउखाडेनाये २५२
नयमादयोग
शुकातिरों पष्ठगो शुभैनदृष्टी नेत्रप्रमादः ।। २७३ ।।
टीका-शुक भौर २१२ मे म्यानके स्वामी छठे स्थानमें स्थितहो
नामपद टनकोनाहिदमोहोवे तो नाप्रमाद (नास्थिर नहिरह
पर उबर चटव रहनेका) रोगहोता है ॥ २३ ॥

(भाषा टोकासहित) काणयोग लग्ने भौमे वाचंद्रे शुक्रेज्यदृष्टे काणः ॥ २७४ ॥ सिंहचंद्रेस्ते भौमदृष्टे काणः ॥ २७५॥ कर्केसप्तमे भौमदृष्टे काणः ॥ २७६ ।। चंद्राच्छापत्ये या यूने वामाक्ष्णाकाणः ॥ २७७ ॥ टीका-मंगल अथवा चन्द्रमा लग्नम होवे भौर शक गुरु इसको बते होवतो काणा होताहै ।। २७४ ।। सिंहराशिकाचंद्रमा सातमे स्थानमं स्थितहोवे और मंगल से टहोबतो कागा होताहै ॥ २७५ ॥ कर्क राशिका रवि सातम स्थानमे स्थितहोये भौर मंगल उस्को खता हवितो काणा होताहै ।। २७६ ॥ चंद्र और शुक्र दोनों पारमे स्थान मेमयया सातमेस्थानस्थित वितो चामना काणा होताहै ।। २७७ ।। दंपती कागयोग व्ययारीगौ चंद्रार्को दंपतीकाणौ ॥ २७८ ॥ टीका-चारमै स्थानम चंद्रमा और उठे स्थान में रवि स्थित होरतो पति (दोनी स्त्री पुरुष काणं होतेहै ॥२७८॥ स्पष्टीकरग. फबल १२ । ६ स्थान में चंद्र रवि के स्थित होनस ही दोनी नि का काणा होना संभवतही। वास्तविक विचारपरन से जैसे नाश भंध, काण. भादि जोनो योग पिछाडी सहभायेहै उनमे २० ६८ स्थान भौर मर्ग चंद्रपर मंगल शनि आदि पापग्रह कीटष्ठी भौर योग का विशेष संवैध वर्णित है. वसहि लग्न और मातम स्था १२६६ या स्थान है उसमें पूर्ण चंद्र का योग होनेसे दंपति के मेगावहता सभव है. परंतु यदिएवान योगानसार इन १२१६ निमें गंधवे नंद भूर्य पर मंगल शनिमादि पारग्रह की दृष्टी या पद का योग नही होतो पे याग नहीं मिलेगा. पारन नायी यांगो भयरहितही ययोगदिया इसलिये भिशयांग म पाया लखनहि किया तथापि समारोप (20) (मानफना) हामाहे मनपा महायोग पागात होतो गांग यलपान होन है. इसीप्रकार विना ?" भाइ ३ माता ४ा ५श्री भाका १२ स्त्री ९ फाम्री ११ कामिमी ६ मामा ६ मामाकीश्री १२ भुग!! फुफा ६ मासी ६मासा १२ साला ९ सालेका सालासी दाई १दादा पुगका ९इत्यादिम्मान पामिया मेस निम स्थान कास्वामी रवि शुमस गुन होक ६८१२स्थानमे जागे भौर मंगल शनि राहुहर्शल नेपगुन भादि पापगहोंसे सनष्टहीये तो उस२ को भवन माप्त होगा ऐसायुदिमानपंडितांने यिनारकर कहना. ॥ उदाह जैसे १० दशम स्थान पिताका स्थानहै इसदसमभावसे रा१२। भाष भौर इन स्थानके स्वामि पारगद से युनः दृष्टहीये भौरद भाषकास्वामी रवि शुक्र से युक्त होकं पापग्रहोंसे द्रष्ट होयतो । भंवाहोता इसीप्रकार प्रत्येक उपरोन भारके स्वामी से प्रत्येक भावका वित करके कहनी. बधिरयोग. मंदात्तुर्येसोम्ये पटेशेत्रिक बधिरः ॥ २७९ ॥ सरिपु पूर्णेदुशुक्रो बधिरः ॥ २८० ॥ रात्रौशे पष्टे खेशुक्रे बधिरः ।। २८१ ॥ सितेत्ये ज्ञयुते वामकर्णे श्रुतिन्यूनता ।। २८२ ।। ज्ञपटेशौ क्रूरदृष्टौ बधिरः ॥ २८३ ॥ पापास्यायत्रिकोणे सौम्धेनेशितायाधियकराः ॥ २८४ । पटेशत्रिके मददृष्टे बधिरः ।। २८५ ।। टीका-शनिसे चौथे स्थानमेवुधहोवे और छठे भावका स्वामी ६८t भावन होयेतो बहराहोताहै ।। २७९ ।। पूर्णचंद्रमा और शुक्र येदोनो अपने शयग्रहसे यतहोवे तीवहराहोता इसींगमभीपापग्रहका उल्लखन हिहै तथापियास्तविकषिचार से इनप ता (भाषा टीकासहित) पाहाकीदृष्टि तथा पापग्रहोका योगहोवेवोभवश्य बहराहोताहै २८० रागिसमयका जन्महोवे लग्नसे छठेस्थानमेवध भौर दशवें भावमे कहोवेतो बहराहोताहै ॥२८॥ बारमेभावमेशुक्र बुधसेयतदोषेतो वामकर्णसे कम सुननेवाला होताहै ॥२८॥ बुध भौर उठेभावका स्यामी इन दोनोको करयह देखते होवे तो पहरा होताहै ॥ २८३ ।। तीसरे ग्यारवे नवमे पांधवे भावमें पापग्रहजारे भौर उनको शुभग्रह नहिदेखतेंहोवेतो बहरा होता है ।।२८४॥ छठे भावका स्वामि६।८।१२ मे स्थानमे होवे भौर उसको शनि. देखता होये तो बहरा होता है ।।२८५॥ फर्णच्छेदयोग हंसार्षिचंद्रास्त्रिसुतास्वधर्भगाःसोन्याऽदृष्टयुताकर्णच्छेदः- ॥२८६॥ चंद्रादस्तेमदे शुक्राीलग्ने कर्णछेदः २८७ नीचे गोणियुते कर्णच्छेदः ॥ २८८ ॥ टीका-सूर्य शनि चंद्रमा ३१९ में स्थान मे स्थितहो भौर शुभ महोसे दृष्टया युत नदिहोवे तो कर्णच्छेद होताहै (कान कटताहै) २८६ चंद्रमाससातमे स्यानमे शनिहोघे भौर शुक्रसूर्य लग्नमे होवेतो फर्णच्छददाताहै (फानकटताहै ) ॥ २० ॥ नीचराशि [६]काशुक राहुसे युतहोवे तोकणच्छेद होताहै ॥२८८॥ सर्वार्थमे इनके भतिरिनारदोयोग यह कहहै कि शनैश्वर मंगल सहित होवे भोर धनेदा लग्नमें होवे १ तथा पष्टश भौर धनेश पे दोनो लग्न मेंहोवे भौर शनि मंगल १२ पारमे भारये स्थितहोवे २ तो कानकटे घा.फुटनावे-एसेही विचार फिनादीभावो फाभीकरना, पित्रादिभार भौर भाषेश एवं उनउन भायोके फारफग्रहोंके साथ उपर्युक्त बधिर तपा मगच्छेदादि योग होघे भयया भागे नाशाहेदादि भौर भीनो जोयोग पहनावगे ये योग होतो फिसादिको को षधिर, तथा कर्ग विच्छेदादि समस्त योगोका फलरहना।

(मातक तत्व) । नाशादयोग शुझेपठे कुजङ्गे नासाच्छेदः ॥ २८९ ॥ टीका-छठेस्थानमेशक भौर लग्नमेमंगल हो तो नासांछेद होताहे ॥ २८९॥ मुखदुर्गधयोग इंदुच्छौ मेगौ लग्नपप्ठेशे मुसदोगध्यं ।। २९० ॥ कर्काजगेशके मुखदौर्गध्यम् ॥ २९१ ।। लग्नदो पष्टशेज्ञे मुखदौगंध्यम् ॥ २९२ ।। टीका चंद्र और शुक्र मेपराशिमें होये भौर लग्नमै ताय छठेयुधहोवे । तो मुखमेद्गंध (पदय) भातीहै ।। २९० ।। कर्कवा मेपराशिका शुक्रहोवतो मुत्रमे दुर्गध भातीहै ।। २९१ ।। लग्नमेचद्रमादो भार उटे स्यनका स्वामि युधहावे तोमखमे दुर्ग भातीहे ।। २९२॥ मकयोग कालिझपेने सूर्याधस्थचंद्रष्टे मूकः ॥ २९३ ॥ ज्ञारिशी लग्नगो मकः ॥ २९४ ॥ जीपारीशायंगे मूकः।। २९५॥ धनरोपोषिके मुकः ।। २९.६ ॥ टीका-क वृधिक तया मान इननिःशद राशिमे गयेथे युव को मूर्य नीचे गयाहुया (भमायाश्याका) चंद्रमा देखता होतीसक(गंगा) घऔर रेस्थानका स्यामि यंदोनी लानमे स्थित्रदोयतो सक गा होता है ।। २९४ ॥ सौर पशि सग्नमे एतदीयेतो मग (मुंगा) होला ॥२९॥ देश और गुरुपदोनों ८१२ में स्थान में होती मूक (मुंगा) १२९६ 11- इमी नाहग तिा माता भाई भोगाई श्री मामा । अंगरा काविनार मिसभावम किया माताह उन २भार (भाषा टीकासहित) (८३) स्वामी गुरुसे युक्त होके।८।१२ जावेतो जिसरभावका स्यामि होवे २ को गंगापन होनेका कहना. शंभहाराप्रकाशमे लिखाहै कर्क धक और मीनराशी मेपापी ग्रहस्थितदोवे राशीकेअंतमे वा वृषराशी वंद्रमा स्थितहोवे और पापग्रहोसे दृष्टदोवेतो मक होता है और शुभ से दृष्टहोयेतो चिरकाले के पश्चात् बोलनेवाला होताहै. भयात् पांच के उपरांत बोलताहै. १. कूरमह संधिमे गयेहोवे कोई शुभग्रह नही तेहोवे भयवा चद्रमापापग्रहोसे युक्त होतोजहके समान गुंगाहोताहै. मुंगश्वर योग कालिझपझे चंद्रदृष्टे मुखेसूर्ये पष्ठभेपापदृष्टे गुंगस्वरः ॥ २९७ ॥ शुक्केन्दारावङ्गे गुंगस्वरः ॥ २९८ ॥ टीका-कर्कवृश्चिकतथामीनराशिमेगयाहुवावुध चंद्रसेदृष्टहोवे, चौथे- पानमे सूर्य हो भौर छठम्यानकोपापग्रह देखतेहोवे तो मुंगस्वर समजनेमे नहीआवे वैसानाकमे गइयड गहवड बोलनेवाला होता है २९७॥ शुक्रपक्षमै जन्महोवे और चंद्रमंगल का योग लग्नमे होवेनो गंगस्वर गुमा स्वरवाला) होता ॥ २९८ ॥ इनउपरोनायागोस मूकदोताहै ये नथ कारों का मत सत्य है परंतुमकमन- पोकि कुदलिये देखने से मकस्यकिंग पाणी दोष उत्पन्न हानेकविशेष कारण नोनो अनुभव से दृष्टिगत होते है ये इसमुजिव है (१) द्विताय स्थान में पापग्रह युक्त होवे भार उसस्यान का स्वामि चराशिका किवां भस्तंगत होकं पापत्रहोसे दूषित (गुनदृष्ट) होये और रवि छुप का सिंहराशिनेपोग कोईभीस्थानमे होये तो निधपकरके मक (गगा) होता (२)सिंहराशिमें रविधुध का निसकहोते है उसकी वाणी मे नि- ध्य पूर्वक दोपहाताद बहुयानोलोक बोलतेसमय भटकतेहै, उनकी कुंडली में ये योग होता। भनि घोलनेवाले बोलते समय भटकनेवाले मुख टेटा बांका करके वो लनेवाले बोर भांसमिचकानेवाले यंगरा पोरने भसंख्यभदई (गातफ सस) . उनकी इंदली में भी विशेषकर दितीय स्थान में ग्रह काही प्रभार दृष्टि पटताहै महसित मन चंद्राकों मीनस्थामहसितमुखः ॥ २९९ ॥ धनेशे स्वोच्चमे केंद्र प्रहसिवमुखः ॥ ३०॥ कोशेशे सौम्ययुते करे सुमुखः॥ ३० ॥ टीका-मीनराशिमे चंद्रसर्प यतहोयेतो महसीत मुख होताहै २ धनेश अपनी स्वराशि तथा थराशि का होक फेद २४|१०. स्थित होवेतो प्रहसित मुख होताहै ।। ३.० ॥ धन(२)स्थान का स्वामि शुभग्रह से युक्त होकर ॥४॥स्था मे स्थित होवतो समस्न होताहै ।। ३०१ ।। दुर्मुख योग धने पापे धनेरोपापयुते नीचारिंगे दुर्मुखः ॥ ३०२॥ टीका-धन स्थान में पापग्रहहोवे भौर धनेशपापग्रहसे युक्तहोके नीच भयमा शवराशि का होवेतो दुर्मख होताहै ।। ३०२॥ दीर्घमुख योग धनेपापे दीपमुखः ॥ ३०३ ॥ टीका-धन स्थान मे पापग्रह होतो दीर्धमुख (लचेमुखवाला) हताहै ।।३.३ ॥ बाग्मीयोग यामित्रमंदे चंद्रखे वाग्मी ॥ ३०४ ॥ भंदाच्छोविने मंदों वाग्मी ॥ ३०५ ॥ . दिवातिहजे वाग्मी ॥ ३०६ ॥ नौकशे धाग्मी ॥ ३०७ ॥ कोणयास्वोयेशुभेक्षित'महयोगेवाग्मी३०८ (भाषा टीकासहित) धनेशेपारावतांशे केंद्रे वाग्मी ॥ ३.९॥ सौम्यशेजीवे वाग्मी ॥ ३१०॥ एगी शांशपे उच्चे गोपुरे वा वाग्मी १३११॥ शुभेजीवे वर्गोत्तमे वाम्मी ॥ ३१२॥ नशेपारावतांशे जीवयुते वाग्मी ।। ३१३ ॥ हा-सातमेशनि दशमेचंदमा होतो अतिवक्ता (भच्छाशेलने- व्याख्यानदाता, परागना, शास्त्रानुसार भत्यंत बोलनेवाला) ॥३४॥ स्थानमे शनि शुक्र जावे और शनि की राशि १० ॥ ११ का सूर्य भतियक्ता होताद ।।३०५।। के समय जन्महोवे और सिंह राशीका बुधहोवे तो अच्छावक्ता ॥३०६॥ समय मे जन्महोवेभोर कर्ककाबुधहोवेती भच्छावक्ता होताहे३० पानका स्वामि पधसे युक्त होने और १।४।११०१९।५ स्थानमें थवा धनस्थानकास्वामि भपनिस्वराशी उच्चराशीकादो शुभयद व पुरुषाहसे युक्त होवे तो अच्छावताहोताहे ॥३०८॥ कास्वामि पारावतांशमेहोवे १।४।७) १० स्थानमे जावेती का होताहै ॥ ३०९॥ राशीके नशमे गुरुहोवती भच्यायक्ता होताहै ।। ३१०॥ 'सराशीके नवमांशमहोवे उसकास्वामी उच्चराशीकाहोवे भयया र दोवतो भच्छावता होताहै ॥ ३११ ।। गुरु मह वोत्तमांशमें हरितो भन्छावक्ता होताहै ३१२ का स्वामि पारायतांशमेहोवे गुरुसे युक्त होवतो भच्छावता ३१३॥ जिहादोपयोग जिन्हादोपः ॥ ३३४ ॥ ०७ (८६) (जातक तल) टीका-छठे स्थानकास्वामीबुध होवेतो जवानमे कोई भीतरहका या होताहै ॥३१४॥ ये दोषहोना संभव प्रतीतनहींहोता क्योकीजिव्हाकासंबंधधनस्थानने है भतएव धनस्थानमे पापग्रह स्थितहोवे धनकोपाप ह देखतेहीये और पष्टेश बुधहोवे पापग्रहो से युक्त दृष्टहोवे शत्रनीचराशी गंतहार तो भवश्य निन्दामे दोषहोना संभव है। भस्फुटोक्तियोग. मदेशाधने केतावस्फुटोक्तिः ॥ ३१५॥ टीका-सातमे स्थानके स्वामी से धनस्यानमे केतु होरे तोर बोलनेवाला नदि होताहै ।। ३१५ ।। गद्गदवाकयोग. मंदर्वेशे मंददृष्टे गद्गदयाक् ॥ ३१६ ॥ टीफा-बुध १०१११ राशिका हो भौर शनि उस्को देखता हो। गद्गद पार (प्रेमसे जैसे गद्गद स्वरहोंक चोलता है वैसेही गदा मंठसे बोलने वाला) होताहै।। ३१६ ।। लल्लोरोक्तियोग. धर्मेशे शुक्रे लल्लरोनिः ॥ ३१७ ।। धनेरो विषले फराशे लहरोनिः ।।३१८॥ पापेश्ने या पादृष्टे फरांगे पापयुते लहरोक्तिः ॥३१९।। टीका-नमस्पानगरपामि शुक होतो सदरोमि (निसमारपर रानभकनारे सभापर महतदेग्नक जगाननको भार पा घोलमके एमा) भएक के बारनेगला होता ॥१७॥ और नामेभर गराइनमे ये योग मिटना भमभाई। धनदानिटी हो और परमानांश रोग नि (भाई केबाबासाला॥१८॥ पाव भयता घरम्यान को पानी भार पायद यही तो मन (नारे (भागा टीकासहित) (८७) - भटक के बोलने वाला).हाताहै ॥ ३९॥ परुष वाक्योग. मंदेन्दुयोगे परुपवाक् ३२० ॥ टीका-शनि, चंद्रका योग कोईभिस्थानमे होतो परपवार (वठोर पचन बोलने वाला) होताहै ।। ३२०॥ दंतविकारयोग गोजपनेंगे रैदृष्टे वा युते दंतविकारः ।। ३२१ ॥ सतपापाः सौम्यैरदृष्टया दंतविकृतिः ३२२ ॥ चंद्रार्यर्का वा पापा अस्ते दशनाभिघातः ॥ ३२३ ॥ सप्तमेशाधनेराही स्थूटदतः ॥ ३२४ ॥ धनारीशौयुती सपातौ दंतरोगी ॥ ३२५ ॥ सुतेगेर!ही दंतुरो दंतरोगीपा ॥ ३२६ ॥ टीका-पापग्रहोसे दृष्ट भयवा युक्त वृषभ,मेप, वा धनराशि कालग्न होये तो देतविकार ( दांतमे वीमारी) होती है ॥ ३२१ ।। सातमे स्थान मे गये हुये पपागहोको शुभग्रह नाहिदेखतेहोघे तो दंतविकृति ( दांतमे विकार) होता है ॥ ३२२ ।। चंद्र शनि भौर मयं सातमेस्थान मे जाये भयवापपाग्रह सातमे बैठे होर तो दातगिरजाने भयया टूटनातेहै ।। ३२३ ॥ सप्तमेश से दूसरे स्थान में राहुहोय तोमोटेदांतवाला होताई ३२४ धनेशभार पटेश ये दोनो, पपामहो से यत होपतो दंतरोगी होताई ३२५ पानमे भपरा लग्नमे राहुहोवे तो पढे दातवाला दंतुर, भपया दंत रोगी होता ।। ३२६ ॥ हस्तनाश हस्तपीटा योग शकुचुजीयुतो दिवातुर्यगे शुक्रेच हस्वनाराः ॥३२७॥ शन्यारोराहुमुखे चारीगो हस्तनाशः ।। ३२८ ।। देया मंदेशुक्रयते हस्तनागः ।। ३२९ ॥

(जातक तत्व)
मैदेन्दाः पष्ठाष्टमगा हस्तपीडा ॥ ३३० ।।
टीका-शनि मंगल २बुध ३गुरु४येचारोभेकस्थानमेयुतहोवे दिन
समयका जन्महोवे भऔर चौथेस्थानमे शुक्र स्थितहोवे तोहातका
होता है ।। ३२७॥
शनिभौर मंगलराहुके भोग्यांशमें स्थितहोये और छठेस्थान में
तो इस्तनाश होताह ॥ ३२८ ॥
छठे स्थानमे शराशीका शनि शुक्रसेयुतहोये तो हस्तनाश होत
॥३२९॥
शनि चंद्र भौर सूर्य ये तीनोदि छठे या भाठमे स्थानमे स्थितहों
वो हातमे पीटाहोती है ॥ ३३ ॥
कुन्जयोग
तुझेन्शे वक्रभेल्यांशे कुजः ।। ३३१॥
टीका-मेपतया यधिक राशिका लग्नेभर चतर्यस्थानमे मा भार
यह वृधिनराशि के नशमें स्थित हो तो सूपड़ा होता है ३३१
कार्टन चित्त योग
रंधेस्थिरे क्षेज्यगुकाः कठिनचिनः ॥ ३३२ ।।
टीमा-ध गुरु भौर शुफ पनी नाही भाठमे स्थानमे स्थिर राशि
८११ र ती बटारमिनार होता है॥२॥
भिमांगनांग.
सुसेकरे मरामि सुवेगे विरुद्धचिनः ॥ ३३३ ।।
शामायानन मास्थित भौर मुयश मान पुन
विमानना
भादियांग
भनी माग समादिः ॥ ३३४ ॥
भौम मांगकाग दातादवाधिक ॥ ३३: ।।
सभी मश्या कदलना दि. ३१६
मालिका ग्याः ॥ ३३॥

(भाषा टीकासहित) टीका-शुक्र और मंगल भाठमेस्थानमे युक्त होवे तो पायुके को भंडवृद्धिहोतीहै ॥ ३३४ ॥ शुक्र और मंगल मेष अथवा वृधिक राशिकेहोघेताकायुसे भंड होति ॥ ३३५॥ चंद्र और शुक मेष अथवा वृधिक राशिमे होवे भौर उनको शं गुरु देखतेहावेतो कललन (रक्तभऔर नलवीर्य के कोपसे) भंया होतिहै ।। ३३६॥ फारकांश लग्नमे गुलिक युक्त होरे भोर केवल बुधहाउसको देख होतो स्थल (बडे) भेटका होताहै ॥ ३३७ ॥ जंधाक्षतियोग. पूर्णेन्दारोपटे जधाक्षतिः ॥ ३३८ ॥ शनीन्दाराव्यये जंघाशतिः ॥ ३३९ ॥ टीका- पूर्णचदमा भौर मंगलका योग छठेस्थानमहोवती जंघाक्ष (पीढलीमे पीडा) होती ।। ३३८॥ शनि चंद भौर मंगल पारमे स्थानमे स्थितहोतो जंघाक्षति (हि डलीमेपीडा) होती ।। ३३९॥ पंगुयोग. झपाल्यजकर्कमृगान्यतमगौइन्दको सपापोनवमपंच या पंगुः ॥ ३४०॥ पष्ठेसूर्यारमंदाः पंगुः ॥ ३४१ ।। मंदारीशौव्यये पापदृष्टौ पंगुः॥ ३४२ ।। रंघांकेशो सपापो तुर्ये पंगुः ॥ ३४३॥ कर्कचंद्रार्को शुभादृष्टो पंगुः ॥ ३४॥ मंदाच्छ्युतो शुभादृष्टी पंगुः ।। ३४५॥ दारेरोसोरेमपापे पंगुः ॥ ३४६ ।। इति प्रयमरिवेक.

(नातक तख़) टीका-मीन १२ वृश्चिकटमेष, कर्कटमकर १ इन राशिमे से कोई राशिमे चंद्र शनि पापग्रहों से युक्त होवे भयया पापयहोसे युक्तचंदी ९५ मे स्थानमे स्थितहोवे २ तो पंग (पांगला) होताहे ॥ ३४ ॥ सूर्य भंगलं भऔर शनि छठेस्थानमे एकत्रित होतो पंग (पांगला होताहै ।। ३४१ ॥ शनिभौर पष्टेशये दोनो चारमेस्थानमेहोवे भौर पापग्रह इनको देख होतो पंग होताहै ।। ३४२ ।। भष्टमेश भौर नवम स्थानका स्वामियेदोनो चौथस्थानमै पापणा से युक्त होये तो पंग होताई ॥३४३ ।। चंद्र शनि कर्क राशिमे स्थितहोवे भौर शुभग्रह उनको नहि देखते होयेतो पंग होताहै ॥ ३४४ ॥ कोईभि स्थानमे शनि शुक्र का योग हो भौर उनको शुभग्रह नदि मते दोवेतो पंग होताहै ।। ३४५ ॥ सप्तम स्थानकास्वाभिशनि, पापग्रहसे युक्त होतो पंगहोताहै ३४६ पांचपर १२ या स्थान मीनराशीभौर शनि का भमल है इसकारण येतीनो पापग्रहोस यत दृष्टीवे नीचतया शकिराशी हो भौर ऊपर महायपोगपनते होपेतो भयश्यपंग या पायमकोईभी तरहकी पीटा- होना संभव है. इसके शिवाय और स्यादेखना ! उपरोस पोगोके शियापम भाई कॉलाभ, भाईकपत्रकाली, माताका पिता (नाना) माताकाराग्य, मौत्रकाराप, पुनकाशाला, पुत्रकलौटे भाईकीत्री, पत्रकाभाग्य, सालेकाएत्र, मालिककीमाता, पापीमाना, (दादी) मुसरेकापिना, मामेकामृत्य, काफेकामारपेक्षा, गुरुकापुत्र, मसरकाराग्यव्यापार, सामुकीमाता, भादि फा पियारभी उपरको पर पागौर भनसारही मयम भाषमे देमना. शरीर के क्षणोंपरसे। टग्नना और ग्रहोंकी परिक्षा करना अतिमहत्यका कामहे भौरमामपनमा से मवरनाभतः महाउसका दिग्दर्शनारा देना (भाषा टीकासहित) शरीर भौर शरीरके भवयव, वर्ण, चेहरा, नेत्र, स्वर, दंतपंक्ति, पाणी केश, हाव भाव शरीर के उपरफेचिन्ह भादि के सहायतासे लग्न व चंद्र भौर ग्रहोफि परिक्षा होती है इसमे कुछभी शंकानहीहै कितु भव- लोकनशक्ति जिसमान की होती है उसीमानसे इसकाममे यशमिलताहे. भतएव शरीररक्षणपरसे यहपरिक्षा कैसे करना ऐसे उपयोगीविषयका परिज्ञान सर्व साधारणोको प्राप्त होने के लिये वईवार भनेक मनुष्यों पर भनुभव कियेहुये योग सर्वसाधारणो केभनुभवार्थ प्रकाश करते जिससे लग्न सराई किवा मोटा इसका निर्णयभी भलीप्रकार कुंटली सथा शरीर लक्षणपर से करसकेगे. । नीचे लिखे हुवे लक्षण मिस मिस समय जिन २ के शरीरपर देखनेमे भावे उसी उसी समय भमक लम व भमक राशी है ऐसा निःशंसय कहनेमे हरकत नही इन लक्षणोमे सर्व मनुष्यमात्र भासकेगे ऐसा फह नहींसक्त क्योकि ईश्वरीकृतीका वर्गीकरण करणां भत्यंत कठिणही नही किंतु भशक्य है। भतः भान पर्यंत जितने समझमे भौर भनुभवमें मायेहै उतनेही योग लिनेहै मभ्यासि मनुप्योने इनका योग्य उपयोग करके भपना भपना ज्ञान चढाना चाहिये। मेप-मश्विनी, भरणी, कृतिका का भेकचरण मिलके मेपराशी होतीहै, ऐसेही प्रत्येक राशी । नक्षत्रो की होती है इन प्रत्येक नक्षत्रोका स्वरूप भिन्न २ है इसकारण इसराशी तथा प्रत्येक राशीयोके लक्षण नो नो लिखेहै उनमे परस्पर विरोध देखने मे भावेगा । भमुक नक्षत्र का भमक लक्षण कहनेमेभानाकठीण तथापिप्रत्येक राशीयोफे मनुप्पो ने जो जो लक्षण देसने मे भाय? वे सर्व लिमहै इसकारण विरोध तरफ नक्षत्रोफे भिन्नखते देखफे विचार करना। चालचलन पावले के समान एकांत भधिकप्रिय, इसना बहुत म भौर वहभी सिर्फ चेहरेपर दिखनेवाला, बोलना भटकते वे,नादे सिनही, शब्दफिका घोगरा (रोत्या मनुप्यके समान) होठके बाहर किलेहुवेदांत किंवा दांतो केसाथ दुसरी छोटीलाईन वा दांतोके पी कोतीन एफके पीछेएक ऐसदात होवे, दांतो की नीरेकी पनीरकरी (९२) (नातक तत्व) केदांत के समान छोटी य गोलहोने, शरीर की मुद्रा गुस्सेवाले मनु फेसमान, पहातनचलनेवाला भौर दोदनेवाला, दूरदूर की मसाल करनेवाला, यारंवारस्थलांतर करनेवाला, फिरणेका उद्योग धंधारा वाला, शरीरपतला, वर्णताम्रके समान, दांतोमेसमृनपहनेगी- किंवा भन्यकोईभी प्रकारका दंतरोगवाला, नितना कहे उत्तनाति करने वाला (मुदकीयदि नदि) स्वतःविचारनकरतेहुवे दूसरा माफिक सुनकै भलमकरनेवाला क्रोधविशेष परंत फ्रोध का भां भत्यतकम, नेत्रलालरंगके, तया कछपीले (पिंगट) मस्तकतया भयवाकोनसेहिशिरोभागपरासीभातरहकी निशानीहोवे प्रकृति बहुधा ज्यरका तथा रक्तका विकारवाला, तामसी, निाही, हट्टभंतपर्यंत चलानेवाला, मनमेभाये उसका कुछ विचार कामकरनेवाला, शरीरके अवयव मजबूत, ऐसा इसराशीका स्व सर्वराशियोमे यह राशी जल्दी पहचानमे आसनी है और इसरा मनुष्पभी बहुत देखनेमे आते है। इसराशीमे यदि रवि होवेतो सफेत, हरा, और कालामिले हुई. जैसे किसी किसी भग्रजो के नेत्र होते है वैसे नेत्रहोवे, राव और एकत्रहोतो विशेष उपरोक्तरंग केनेत्र होवे, केवल मंगलहविता केदश तविकेसमानव पिंगट होये, इसराशीमे जो अकेलारवी लग्नमे तो वह मनुष्य ऊंचाशरीरका भौर संतप्तहोये, व मस्तकालकीपीडा इसराशीके लग्नमे केवलमंगल होवतोशरीरके कोईभी भागसेरक्तस्त्रात विकारहोये, मुख व छाती का भाग विशेषलालहोवे, मस्तकमे गूमड़े टाट वगेरा विकारहोके उस की निशानीरहै, किंवा पडनेसे जसमा उसकी निशानीरहे, भयया माताके यहोवे, । रवि किंवा मंगल इसराशीमे दूसरे स्थानमहावतो विशेषकाला हरा सफेदमिले हुवेरंगकेनेत्र (कोईरभंग्रेजोके जैस होतेह वैसे )हावे, या मनुप्यके सरीखेहोये, भौर नेत्रपीटा (भाखभानेकी) विशेष भादतरी चाये भयया छठे स्थानमे ये ग्रह होतोभपघातहोवे, भाग्निभयो पेट पर दाग (टामके) निशानहोये, भयंकर तापभाने, छोटी माता पटीमातसे विशेषगीहाहो भम्लपितरोगहो वा भनिस जलने दुपहोवे।

(भाषा टीकासहित)
इसराशीम लामे शनिहोवेतो बोलतेसमय जवानविशेषेभटके भयय
दूसरी कोईभी स्वोरहोये दांतचंदकरके बोले किंवा टेढामंद करके बोले
त्रिमले बारीक व होवे भोर कुछ पिंगट होथे ।
शनिसाय रवि भयया मंगलकापोग होये किंवा रवि मंगल दोनुक
बोग होवनो नेत्र मांजरे (बिल्लीकनैनके समान) होवे, इसराशीम रा
"यवा शनीकोईभी स्थानमे होयेतो शब्द फीका खोखरा होताहै।
वृपभ-कृत्तिका के तीन चरण रोदणी व मृगके दोचरण मिलने
पभ राशी होती है इसराशी के मनुष्य क्वचित मिलते है।
शरीरकावांधा बुबमूरत य मध्यमउंचा, दांतसर्फत, वर्णसफेत
र य तेमस्त्री, चेहरामोहक, व सुंदर, नेत्रसफेतहोंके लेजस्वी प्रकृति
रागी गालभोर हातकामणीबंध ( फलई) गोल भौर भरीहुई, शिव
तिः शरीरमे पर्नुलल तेनरभतिस्वच्छता येणुण विशेष ननरभाते
बहरेपर सायाका चिन्दभीहोमाव इसराशी किस्त्रिया भति तेजस्व
भौर गौर होती है.
इसराशिमे गुरु चंद्र किंवा शुक्रहोवतो शरीर का भोर दांतका य
पटिक के समान शुभ्र व तेजस्वी होता.
उपरोन वर्णन जैसा रोहिणी भागमे मच्छामिलेगा पैसाइतरभागं
नहीं मिलगा.
मिथुन- मृगके दो चरण, भादो घ पुनर्वमके तीनचरण मिल
मिनराशी होती है इसराशी के मनुष्य बहुत ननरभाते है
बेदरा गदर भोरदाटीकभागकीतरफ उरोटापन मस्तकपीउकैभाग य
तरफ नारेलसरीखालंगा शरीर दुरलातलाय ऊना, बगहामिला
फाला,नेत्रसाल, महापारीक,स्वरमनुल मागीस्पटारिशेप घोलनेवार
पना (ज्यास्थानदाता) पिदान, गिद्यगसंगो, भाषाशाघ्र उसममानं
शासा, शास्त्री, पानी,लोक हे पहारन वर्गका सपोग बोलने
शिप करने वाला, भौर फमरपाहर निकाले केनमारा बटने पार
होर, गोदम रानी लक्षण है-
। कर्क-नाम पाएकवानपभपा मिटके पर बीरे
सी.रामीटनम पानी मरिरासापागाचेपागोरीन,माश

(जातकतत्व) फेनाक जन्म पानेवाला भथवा रहनेवाला, फिरनेका धंधारा- वाला, गायन जानने वाला, आगेके दांत चोडे व मोठे, भोर सुने वाहरदिखनेसरीखे, चेहरा गोलभौरमोहक, हातपंजे गरि भौर पांव ये भवययवडेहोवे, वहातनदोडनेवाला जल्दी पर बांके पांवरखके चलनेवाला, शूर, भभद्र बोलने वाला, चैनकरने वाला, म्रीयोंका शोकीन देखियोवाला, वर्णकालासांवला, बांधासाधारण मजबूत, उचायिमध्यम, व्यसनी और भनेक त्रीयोको भोगनेरा इस प्रकार के लक्षण.इस राशी के है. इस राशी के लग्न में गुरू होवेतो पर्णगोरा य यांधाशरीर भच्छा होता है भार नियं शनी होताहै, इस राशी में शुक्र व चंदा लग्न मतो भतींचनी होताहै, भौर गाने का पनाने का तथा नाटक ' विशेष शोकीन होताहै, मंगल शनी व राहु होयेतो व्यशनी हल पिचार का य रोगी प्रकृति का होता है, चतुर्थ तथा पष्ट स्थान है। राशी में ये ग्रह होयतो दुःख दारिद्र और विपत्ति भोगने पालापार पटमे दुमने का तया उदर रोग पाला होता है, सिंह ह-मया पुर्ण य उत्तरा का रचरण मिलक सिंह राशी होती हैं, दांतभाशय मनपूत, राति चोटीय भरदार, काल विस्तीर्ण भार कुडेक भागे निकला हुया, महराभोंपके पाससेमुक्ष्म दृष्टी मे देखने मे मिह सरीमा दरीघ, नारगरा, शरीरमनपत, कराहा मार, यगंकाला, शादमीठा, नियतकालिका, बेडर, प्रमखपणेते भगय हॉके. पाटाग्मे नियमितचलेने, पाला भधिकारि (आ मर ) सात, शतिभाग निकालके मरने पालाभौर महान पाना, परामनयन परमान, मिष्टा पनि और भरप्प इनमें कोई भी बाग वा नियम काने वारा, व इनमे प्रीतिरपने याटा, इस प्रकार इम गतीमगा। दम गमगा नद्रइकबा पहला वर्गगोग होता वामन में गेय ( पदपा) र माता पार भन्न मनमा मनमी बटाटा पिहोवाया ग कामही पण मन तर सोमारामासिवान (भाषा टीकासहित) वान मजबूत होता है, वर्ण तांवके समान होता है, नत्र पीले, शरीर का दिखाव लढ़ाउमनुष्य के समान, और अति गंभीरदिनताहै, दूसरे मनुष्य को अपने तावेमें रखनेवाला कपाल अधिक आगे निकला हुवा और कपाल पर संचापणा, तेजस्वी, करस्वभावका, अमलदार, (घडा भाफिसर) सनापति होने योग्य, भपघात, दुःखाप्ति, और रक्त वाव इनका भय विशेष, ऐसा होता है. शनि किंवा राहु होवतो शरीर परिश्रम सहन करने की शक्तिवाला होता है परंतु रोगिष्ट रहता प्रमुखत्व प्राप्त नहीं होवेशत्रुभय विशेष होवे. कन्या-उत्तरा के तानचरण हस्त और चित्राके दोचरण मिल के कन्या राशी होती है. ललावाला खडा रहे भौर चले उस वक्त गर्दन टेढीरक्खे, भालसी, धीमा, चलते समय हातजादे दिलावे, हंसताहुवा घोले, चहराचौटाव गोल, चालहातीसरीखीघूमती, नीयों के लक्षण. विशेष, स्वरवारीक, विद्वान, कलाकुशल, पहनने के कपडे बंगरा का विगह ने करने की विशेष चिंता नहीं करने वाला, इस प्रकार का इस राशी का स्वरूप है. तुला-चित्रा के दो चरण स्वाती भऔर विशाखा के तीन चरण मिलके तुल राशी होतीहै. चेहरा, हात, पायकी नलिये औरएकंदर शरीर भधिक लंबा होता है, पांवकी नलिय वाकदार, शरीरउंचा और दुबला पतला वर्ग बहुधा काला,स्वर पतला,मुंह बंद करके हंसने वाला, अनुकरण करने योग्य, गिनतीके और तुलेहुवेवचन ठहरके बोलने घाला, वृत्तिसात्विक बोलते समय उभीगर्दननादे हिलाताई वढा रहे और चले उस समय कमर नमाके भागे झका हुया दिखता है, विद्धान, और शास्त्रज्ञ, एसा इस राशी का स्वरूप है। लग्न मे रवि इसराशी का होवेतो शरीर विशेष ऊंचा च काला होताहै, चद्र होयतो शरीर के अश्या नादे लंबे और गारे होते है, गुरु शुक व बुध होयेनो दिखनोटा मुदर शरीर होता है. वृश्चिक-विशाखा का एक चरण भनुराधा ज्येष्टा मिलके वृश्चिक राशी होती है. कमर के उपर के भागकी अपेक्षा नीचे का भाग छोटा होता है, भारउसी प्रमाणे कितनक भवयवभी छोटे होतेहै, उचाई । (जातकतत्व) कम होती नाक मोटा भौर फूजा हुवा स्वभावगहरा भौर सुन्नस रखने वाला, सर्वदांतपडे, वर्णगोरा, मुखकाजवाडा मोठा, इस तरह फा इस राशी का स्वरुप है. धनु-मूल पूर्वापाटा भौर उत्तराषाढाका एक चरणमिलके धनराशी होतीहै. छाति भागे करके घूमते चलनेवाला कसाहुवा शरीर, शरीकी 'भाकृति विशेषमजबूत भौर सुडोल, नाक चंपेकीकलीके समानतीसा शरीरनदुपला न जादेपुष्ट, बहुतहीमजबूत, गला ५ दाढी ये भाग मानो किसीने हातसे दुरुस्त किये होये वैसे कोरदारसुन्दर गरदन जाडी भरी हुई, भुजदंडभैरहवे, पहलवान के समान, भौर हायकी ईजादी घोडेपर बैठनेवाला, लडाई दंगे में पीछे न हटने माला, बोलने मे पलका गवं विशेष रखनेवाला, वर्णसाधारणगौरा, लडाई मे बहादुर, नेत्रपीले, ऐसा इस राशी का स्वरूप है. इस राशी में मंगल होवतो प्रकृति भत्यंत उष्ण होति है भौर भर्ग (ययाशीर ) भपया इसरा रन विकार का कोईरोग, भपवात किया फोइभी दुम की प्राप्ति होतीरहे, शुकहोयेतो शरीर तेजस्वी होये देवी मनुपरेसमान दिमनेवाला होता है, बुधबा गुरु इस राशी में होचतो साफसुधरा तेजस्वी मन्दर म्वरूप याला होता है, शनि पा राहु होनी मुदौलराशन हो परंतु रोगिष्ट रहे. मकर- उमराणादा फेतीनगाण, भयग, पमिष्टाके दोयरण मिलकर मार राशी होती है, कितनेक यघन शरीर पतला, छोटा गंदन और ममी लंपी, भसंबद्धभौर भपिनार से पालनपाला एकही पात में मन गुधा निवाला, भंगविक्षाहाम्याम्पद, एकदमय भागाम से भीर मध्य में पानधारप में भाषण करने याला, कितने समय मगर भनि सहा ( मनान) र के कितनेक भापर पानीको भक्षा भविषनाहे वार में नादाहुपाशारीर, म्नान गंपादि धर्म मनिपुरमा करने वाला पामेभाकी मगुग भान याने वाला, ममा मनं २ ताफ सिम देने वाला, पट्टी पड़ी, गुरदार मरे गमशाला, भोक फा बाई, दादग्दशनी मुमारी पानं पारा नवाहामगार सीमा किंवा यानमार्गक कि मान मानक पान वरा, मप्रकार का दम रामी का पाई.

(भाषा टीकासहित) (९७) इस राशी में जब मंगल अंतके भागमें होवतो शरीर बड़ा भारी व भति सट्ट होता है वर्ण, तांबेके समान होवे और शरीर पर अतिशय फेशहोते है. कुंभ--धनिष्ठा के दोचरण शततारका, पूर्वाभाद्रपदाके तीन चरण मिलके कुंभ राशी होती है, शरीर सूक्ष्म , बहुधा मस्तकपर तालके भागमे केशनही होवे, कपालके दोनुनाजुके भागजादे छोटे दिखतेहे, चेहरा दिखाउ सुंदर,विद्याव्यासंगी,बडाकल्पना करने वाला, गंभीर य तात्विक विचार करने वाला, कायदेकापंडित इस प्रकार इस राशीका स्वरूप है. इसराशीका शनि लग्नमे हौवेतो शरीरपुष्ट, ऊंचा, और मजबूत होता है. भीन-पूर्वा भाद्रपदा का भेक चरण उत्तरा भादपदा व रेवती मिल के मीन राशी होती है. शरीर विशेषटेगणा, मस्तक प कितनेक शरीर के भवयव बहुत छोटे, जननद्रियपारीक, वर्णसाधारणगोरा, इसप्रकार के इस राशी के लक्षण है. इस प्रमाणे राशी के सामान्य लक्षण है एक राशी के सर्वही लक्षण एक ही मनुष्य में मिल जायेगे ऐसा नहीं समझना चाहिये किंतु जिस समय एक दो रक्षण स्पष्ट देखने मे आवे उस समय उस राशी का निश्चयात्मक ज्ञान होयेगा। लग्न अमुक राशिका वचन्द्र अमुक राशीका है ऐसा निश्चयात्मक कहते भाना मुश्किलहै तथापि दोनो मेसे एक कायम होने बाद दूसरे का ज्ञान उत्तम होसकेगा इस काममे अवलोकन व विचार शक्ति बढ़ाने का ज्यों ज्यों विशेष अभ्यास होता जायेगा त्यो त्यो लग्न व चन्द्रकी परिक्षा दोन मे परिज्ञान अधिक बढ़ता जायेगा। ग्रह परिक्षा. कडली में ग्रह कहीभी क्योंन बैठेही राशीपरत्व और स्थानपरत्व शरीरपर परिणाम अवश्य करते हैं इस परिणाम का वरोवर ज्ञान होने से किसी समय लग्न का ज्ञान नहीभी होयेतो यह इस परस होसका है इस कारण योटेसे अनुभव किये हुवे योग नीचे दिये है. १ कपाल भधिक आगे दिस्नेतो सिंह राशीका मंगल लग्न में हे ऐसा जानना- (९८) [जातकताव] २ नेत्र पीले भोर लाल दिखतो भग्नि राशी ( मेष-सिंह-अथवा धन )मे रवि भयवा मंगल ग्रह है ऐसा जानना नेत्र बहुत बड़े भोर भागे भाये हुये । निकले हुये ) दिखने के लक्षण मंगल के ही है यह निश्चय जानना- ३ नेत्र गोल होये और भागे हुये दिसत होयेतो सप्तम मे मंगल हे एसा समझना. ४ कपाल मे दर्द, भर्श ( वाशिर) नेत्रो मेभारक्तपणा, चेहरेपर अधिक लाली, एसा लक्षण होयेतो मंगल लग्न मे है ऐसा जानना. ५ गर्दन के भागपर लाल रंगका दाग, किसीभी कारण से उत्पन्न हुवे जखम का निशान होये अथवा जल जानेका तथा रक्त विकार के गाठ वगेरा का चिन्ह होये माताके व्रणका चिन्द होवे इस प्रकार के लक्षण देखने मे भावतो लग्न मे अथवा चन्द्र के पास मलग होगा भार ये योग मेप राशी पर हुवा होगातो अवश्य कुछ निशान होवे होगा. ६ नेत्रमे पीडा होती रहती होवे विशेषतः भाखोकी पलको मे दाने पडनाने का विकार होवेतो मंगल धनस्थान में है असा जानना. ७. शरीर का कोनसाहि भाग टुटा हूवा काटा हूया अथवा जलाया हवा होतो धन राशी मे मंगल है ऐसा जानना. ८ काला हरा और सफेद मिले हुवे रंग के नेत्र जैसे किसी २ अंग्रेन के होते है वैसे होयेतो रविमंगल किंवा हर्शलमंगल ये नेत्र स्थान में अयया कुंडली मे कहीभी एकत्र होवेगे. ९. नेत्र अति तेजस्वी स्वच्छ काले व पाणीदार होवेतो शुक्र दूसरे स्थान मे भयवा नेत्रस्थानम होगा एसा समझना. १. नेत्र मलिन अतिकाले गहल रंगके ( गगले ) छोटे ? इस प्रकार के होवेतो लग्नमें भयया दूसरे स्थान मे चंद्रसे युतशुक्रमानना. ११ शुक्र के समानही चंद्रफेही नेत्र होते है यह भवलोकन प्रयास शक्ती से इनदोनो ग्रहोका फरक समझ नेमे भाताहै लिखते नहीं बनता। १२ नेत्र में हरेपणा अधिक होयेतो रयि शनि, मंगल शनिवार्शल शानि, का योग लग्नमे. भयया दूसरे स्थान मे कर्क, सिंह, धन, मेष, राशी मे है ऐसा जानना. २३ दात शभ स्वच्छ व तेजस्वी होतो चंद्र गा भौर शुक्र लग्न तया दूसरे स्थान मे समझना. -- (भाषा टीकासहित) (९९) १४ आर्द्रमुख व होठपर चर्वी व लालपणा विशेष होतोलगमेतया दूसरे स्थानमे चंद्रगसमझना. १५ बोलते यत्रत अटकताहोवे तथा जीभ में विकार होवेतो लग्नमे 'भयया दूसरेस्थानमे राहूपापयुत समझना. १६ दातवंदकरके अथवा मुखनादे नहीखोलके मुहमेही बोलताहोवे तो लग्नमे शनिहै ऐसाजानना. १७ लिखने के समय मुहयांकाटेढ़ा करके लिखताहीवे तो दूसरस्था- नमे राहु का संभव जानना. १८ जिवान भागे करके बोलता होवे रकारका उबार उत्तम नहीकर सक्ता होये किंया भन्यकोई बोलने की खोड होतो चंद्रासयुक्तजान ना भयवा लग्नमे राहूजानना. १९ दंतपंक्ति धनुप्या कार व भतिशय वांकदार होवेतो लग्नमे राहू होताहै. २० दमा सर्दीका रिकार व वातवद्ध शरीर होवेतो शनिचंद जल- राशीमे भेकत्र समझना. २१ बोलतेवखत खंकारताहोवेव वारंवार खांदेसे गरदन घसताहोये तो चंद्र शनि कुंभराशीमे एकत्र जानना. २२ हमेशा सरदी सेनाकबहता होने वा बहुधा बोलते समय नाकमे कुछ भटकगयाहोये वैसा करतो शनिचंद मकर राशिमे भयवा जल. राशि (कर्क वृश्चिक मीन ) मे जानना. २३ पेट बहुतवडादिखे किंवा पेटपर बहुतसेकेश होवेतो चौयस्थान मे चंद्र भथवा गुरु इनदोनोमेसे एक का संभव जानना. २४ अम्लपित्तका रोगहोये तो रविमंगल ये दोनो मेषराशी के होके लग्न चतुर्य वा पट स्थानमे जानना. २५ अपस्मार (मृगी) होवतो चंद्रमा शनिसे युक्त हे भौर सामने मंगल किंवा चंद्रमा मंगलसे युक्तहे भौर सामने शनिवेठाह वा छठे स्थानमे चंद्र भौर चारमे स्थानमे मंगल गया है एसा जानना. २६ वस्त्रा भरणसे शरीरको सजानेगला, न्यारे न्यारे रंगके भनेक प्रकार के पोपास पहननेवाला, और शोकीन, ऐठवान,भत्तरकाशोकीन, ऐश करनेवाला होवेतो लग्नमे शुक्रहोंनका संभय जानना.

(१००) (जातक तत्व) २७ दूंद (तोद ) वाला शरीर, गोरा, सत्वगुणी, श्रेष्टबुद्धिका, कफ प्रकृति, बिनचूक कामकरनेवाला, स्मरणशलिभपूर्व, अांतगमकरने वाला, भव्य, बिलकुलनिय॑शनी, गंभीर, सभ्य कीतीमान्, विद्वा सफेदकरडेपहननेवाला, दांत व नेत्र स्वच्छ, विद्याव्यासंगी, मी विचारका होवेनो लग्नमे गुरु जानना. २८ भंडवृद्धो का विकार होयेतो वृश्चिक राशिके शनि भंगल देखता है किंवा वृधिक राशिमे गयेहुवे चंद्रको शनि भार मंग देखते होंगे एसा जानना. २९ जालील पने कतरना बलगदार [ मरोडदार मुन्दर ] भक्षर लिखना नामनसे अक्षर लिखना ड्राइंग वगेरा कोईभी तरहकी हरू फौशल्यका काम करताहोये तो कन्याराशीम शुक्र भयया चंद्रमाका संभव जानना. ३० यकील येरीस्टर सोलीसीटर वा जन होतो मिथुन कन्या, किंवा मकर कुंभ, किंवा धन मीन, इनलममे जन्म जानना. भगवा इन साननं जन्मनही होरली गुध गुरु व शनि तो भरपर A. गनः राशीमे समझना-तया शनि और गुरु ये दोनों ग्रह उसकी मंडलीम मगनसे मान स्थितीम अपश्य होयेंगे. १ शनि गुरु एकराशीम यह नगीकननीक भंगमहोये. २शनि गुरु परस्पर एकसे मरा मानने म्यानमे होय. यही मह परम्पर नाम पंचमहोये और मेप तुल मिथुन धन भरा मिह गमिक होकं ॥२८॥५॥११॥३९ म्यान मेगा एमानानना. ननियर नया एल. मी. परिक्षा पाम फि.पाहुया भोर गिया तो नमक मिगुन मुल गाभ राशीका मगल भोर शुरु | मे म्यान विभौर शुम एक गती नाम नी1 भाभी सान अपराचंद मागनिर है पंमा मानना. । सिक या धंधा बनवादा होनालन्न भपया चंद्रसेन मानामा. ग. मी काने पाल. गाई गई गाकिर (सर) यान पापा पमा ममदार ३४मन संग ना मारा कोराकानि भारतमा . ( भाषा टीकासहित) राशीमे गुरु भथवा चंद्रहै एसाजानो ३५राजकीय संकट भायहोवे तो रवि भथवा चंद्र इनका किंवा हर्शल का केंद्रयोगहे भथवा रवि वा चंद्र शनि भपका युतद्दे ऐसाजानो ३६ सजन डाक्टर होतो वृश्चिक राशीमे चंद्र मंगल भवन भथवा वृश्चिक राशी लग्नमें वा दशमेहे ऐसाजानो। ३७ निपुत्रिक होवेतो शनि व गुरु एकराशीपर है एसानाना २८ संतती मूलमै होतिही नहीहेग्वे अथवा बहुत कम होति पंचम भावके आरंभमे सिंह कुंभ अथवा मेष राशीहे एसाजान ३९ संतती जल्दी जल्दी होताहोतो पंचममै कर्क मकर वृi मीनराशिहे एसा समझो ४० कन्या प्रना अधिक होतीहावेतो लग्न चंद्र पंचम स्थान ये कर्क मकर वृश्चिक वा मीन राशीमद एसाजानो ४१ लडके भधिक मरते होवे तो गुरू व मंगल ये एक रा बहुत नजीक नजीक अंशके भयवा मंगल की पूर्ण दृष्टि योग है ऐसा जानना। ४२ गर्भपात होते होवे बालक जन्म के बाद अल्प काल होवे स्त्री के प्रसूती समय में बालक भडताहोवे किंषा ग काट के निकाल नेका प्रसंग आताहीवेतो पंवनस्थानमे वा। स्थानमे राहु मंगल व हर्शल ये ग्रहहै ऐसानानना. परंतु कर्क मेष, राशी का राहु होवेतो संतान जल्दी देताह भौर दानीभी न ४३ सर्व लडकेहि होतेहोवेतो पंचममे पुरुष राशि हे भौर भी पुरुष राशी में है अथवा पांचमे घ एकादशस्थानमे पुर एसाजानन. ४४ संतती एकवस्त होने याद फेर यहुत वर्ष पछि बालब पंचममें तया एकादशमे शनिहै एसामानना. ४५ पीटपर बहुत भाई बहन होचतो तीसरे स्थानमे कर्क, वृश्चिक, मान, ये राशी है ऐसाजानो. ४६ पीठपरके भाई यहन जीयते नदीहोतो तीसरे स्थान मेष सिंह धन या पृश्चिक राशिका, होनेका संभवद.

(नातकताल) . ५७ र पाठपरका (कोटा) भाई या बहन मृतहोये भयबाटन के गर्भगत हुयहोरतो तीसरे स्थानमे रवि या मंगल हे एसा नानना. ४८ माइपोमे एसपता नहीं होंगे किंगा भाइयोका कोईभी तरह का गुस नहीहरितो तीसरे भवमा ९ नवम स्पानमे मंगल हे एसानानना ४५मानसे कम मुनताहोये तो मिथुन तुल या सुभ राशीका शनि "सासरे ग्यारमे भयया नवमे स्थानमे जानना. ५० कान फुटाहीयेतो शनि मंगल व रविसे ग्रह तीसरे ग्यारवे किंवा नवमे स्थानमे एकत्र भयया, उलट पलट ये एक एक ग्रह एक.एक स्थानमे होने का संभय जानना । ५१ जन्म होने के पश्चात ७ सात पर्प के भीतर किंचित पहले कोईभी. समयजो कटुवमे एक भयया भधिक भकस्मात मृत्यु हवे होयतो दूसरे स्थानमें हर्शल है ऐसा मानना। १५२ हर्शल का स्वाभाविक धर्म ऐसा कि वह जन्म कालमे जिस स्थानमे होवे उस स्थानपर जिस व्यक्तिका विचार किया जाता उसी व्यक्तिका भकस्मात् मृत्य होताहै। ५३ मा बाप को मृत्य एकसाथ एकही समयमे होवेतो चतुर्य स्थान में शनि चंद्र योग होवे भौर चोथे भयया दशमे स्थानमे दर्शल होना चाहिये-इससंबंधके भौरभी योगहै इस ग्रंथमे कमसे भगेभावगेही ५४ जिनके भगंदर सर्वागमे जखम किंवानग, गर्मी व दूसरे भयंकर जननेंद्रियके विकार होवेतो उनके छठेस्थानमे वृधिक राशीमे शनि किंवा मंगल होगा। ५५ लग्नकार्यमे जो भानगडपढीहोवे किंवा भकस्मात् लग्न निधय हुये हवे वितरजावे किंवा अन्य विन भायहोये तो सप्तममे हर्शल हानेका संभव है ५६ जिनको दिगंत कीर्ति प्राप्तहोती है उनके नवम स्थानमे गुरु चंद्र योग होताहै। ५७ जो मनुष्य अपने पीछे अपना नाम कायम रखने वालहोते है उनके नयनस्थानमे भयया चंद्रसे नवमस्थानमे शनि, गुरु रविय हर्शल इन वटेग्रदोमेसे एकादा भी ग्रह, बलवान गये पिनारद नहीं ५८ साधारण श्रीमंत मनुप्योके ग्रह उदील (उमसेलग्नपर्यत) (भापा टीकासहित) (१०३) भागमे किंवा धनभाग (नवमैसे तीसरे स्थानके भारंभ पर्यंत ) मे बहुत ग्रह स्थित होते है। ५९ द्रव्य कितनादी मिले तथापी हातमे टिकतानही विनाकारण खर्चहोजावे कर्नहोजाये वगेरा बाते संपत्ति संबंधमे बनतीदोवे तो लग्न के तथा चंद्रके दूसरे स्थानमे मंगल होनेका संभवहै वानवी रीतीसे सर्च करतेहुवेभि पैसा की तंगीरहे भौर कर्जा करनापडता होतो लग्न भयवा चंद्रसे वारवे स्थानमे मंगल होनेका संभव है। ६० कंटव बढाहोये किंवा बहुत मनुष्यो का उपजीवन स्वतःके भाधारपरदोये तो दूसरेस्थानमे गुरु होने का संभव होताहै ६१ कुटुव मे कलह होडारहताहोये तो दूसरेस्थानमेरवि होनेकासंभवदे ६२ वडीलार्जित संपत्ति के संबंधका झगडा पेदाहोवतो दूसरेस्या- नमे मकर राशिका रनिहोनेका संभव है. ६३ पादन ( सवारी) तथा चतुपदका व वर्गीचेगरा कृषी का शोख होवेतो चतुर्थस्थानमे गरु शुक्र भयवा एध होने का संभवनानका ६४ नाक मुख दांत पेटीये यंगरा मेसे कभी भवयवसै रुधिर जोनका विकार होवतो मेषराशीके २६ भंशके भागे का लग्न होता है । १६५ वी भति मुंदर प गोरी होवेतो सप्तममे भपवा लग्नमे शुक- होय भयया गुरुहोवे क्वनित चदीहोता है। ६६ श्री साययणको दरले पतलयांधकी भौर पढी संतप्तफरस्वभाव की हारतो सप्तममे भयवा दुसरे स्थानमे मंगल होता है। ६७ पालपमे सुस्वरूप होयेतो पांचमे भयया एकादश स्थानमे शुक हानेका सभा। ६८ प रोगी रहते हो तो पांचमे स्थानमे शनि भपरा मंगल होने का संभागानना। ६९ कथा वाचनगलातया व्याख्यान दाना शाम्री विविध्यारणी हॉगनी मिधन राशीका मग्न भयवा मंद्र होता। ४. श्रीरटके पली गई होर दिया पिसीभीकारणसे मासे मेरनार होपतो सप्तम स्थानमे हल जानना। गदिकोई मनप्प पिसी गाद (दनस) गयाहोरेनो उसपी इंटी मेनीन लिमये योगोमेसे एकभार योग निषषहरेगा।

(१०४) (जातकतत्व) (१) कर्क किंवा सिंहराशीमे पापग्रह. (२) चंद्र किंवा रवि ये पापग्रहोसे युक भयवा दृष्ट. (३) चतुर्थ भयवा दशम मे पापग्रह. (४) मेष सिंह धन किंवा मकर इन राशीयोमेसे कोईभी राशी चर्थ अथवा दशम स्थानमे. (५) चंद्र के चतुर्य स्थानमे पापग्रह. (६) रविके दशमे भयवा नवमे पापग्रह. (७) चंद्र अथवा रविये शत्रुक्षेत्री शत्रुग्रहसे युक्त. ७२ जोडले ( दोपचे सायहोवे ) वझे बहुधा एकलग्न और एर राशीमे जन्मपाते है उनके लग्नमे राहु होताद भौर यह राहु का मीन मियुन भयवा धन राशी मे होताहै मीन और मिथन येरा राशि चक्रमे मुग्म (जोडली) राशीहै इसकारण जोडले बालको कुंडली में इनराशीमे लग्न, चंद्र, राहु, किंवा शुक्र, भयवा ल स्वामी, होते हैं ऐसा देखनेमे आताहै कन्या और धन ये राशी भ प्रमसे । मीन भऔर मिथुन राशी की सातमी राशी हे इसकारण व रोन लग्न चंद्र राहु भादि इन राशियोमे भी देखनेमे भातेहै! ७३ ललाई लिये हुये गौर कांती, मुखपर व छातीपर लाली, ने पागीदार, चित्र विचित्र पौपाल धारण करने का होस निर्मला तेजस्विता, घंट, स्टाकिंग घड्याल, छत्री, लकही ये वापरने काही होये तो शुक्र भौर मंगल का योग होने का संभव होता है। ७४ चहरा ऊंचाकम, चोडामादा, हास्यमुख, टापटीपर भर गाला यातृत्वविशेष स्वच्छ यस्र पहिनने का शरीर स ग्सने का भौर विद्यापासंगका हौस होये तो लग्न में युध है। जानना। ७५ शरीर दुबला पतला कफ प्रकृती, गोराय पाणीदार भनिन मलने पस्त गिसक सहममै थुक रहता होगे या लाळ पहली বাসব বাগান মান নয়, ামী, মায়া। पारण पानेवाला ये लक्षण हरिनी सानमे मंद्र छानेका संभा। निर्यानी दोनो हातमे पुरा गा गम भाग नंद इनमें भीक ग्रह ममझना। " (भाषा टीकासहित) (१०५ ७७ जगतमे लोग भगवे गिनेमातेहो जोराजा, संस्थानिक, जाहानि रदार, इनामदार, किंवा बडी तनख्वाह के सरकारी मोठे नोकर, (ब आफिसर) बहुतलोकोपर अधिकार रखनेवाला, तथा बहुतलोगनिसब मानदेवे और अपने उपर मुख्यामाने तथा जोलोग खासगीधंध चलानेवाले होवे उनको भी जगतमे राना भयवा प्रनाकेपाससे मा मान मिले, प्रनाकलोको के तरफ से यही अपना स्वराअग्रगण्य है ऐर समझ राना सरीखा मान जिसको मिलताहो, उत्तम व्याख्यान दात उत्तमपुराणिक, बडाशास्त्री, उत्तम हरीदास, वगेरा मानपानेवाले लो तथा जिनके हायनांचे विशेष लोक काम करतेहो. जो प्रधान हो कोईभी मुख्य पदपररहनेवाले होते है, उनकी कुंडली मे सिंह अथः कर्क ये राजाराशि अवश्य बलवान् हुये विना रहती नहीं । भौर जैर जिसका भविकार भौर मान बडा होवे उसो माफिक इन राशिमेरा चंद्र गुरु बुध किंवा शुक्र ये सर्व ग्रह किंवा इनमेंसे एकभी कोई र युक्त हुये बिना रहतानही. (१) लग्न सिंह होवे इस राशि में रवि, चंद्र, गुरु, बुध किया शु मेसे कोई एक यह वा सर्वग्रह युक्त हावे और दशमे इनमे कोई ग्रह होवेतो मुख्यत्व प्राप्त करणेका कारण होताहै. (२) मंगल सिंह राशि का होरे वा दशमे सिंह राशिका जावतो मनुष्य को मुख्यत्व शीघ्र मिले और उसका मान भधिक भौर तनख्वाह जल्दी२ वढनीमाती है (३) सिंहराशि मे राहु शनि ये दो ग्रह मात्र भच्छनहींहै ये ग्रह । घे तो मनुष्य जिस खाते मे होवे उस खाते मे मुख्य की जग उस्को जल्दी मिलने वालि नही भौर तरक्की (प्राशन, पग बदना) भी जल्दी होता नही (४) सिंहरादि १॥३।४।५।९।१० स्थान मे स्वाभायिक बलवान है। स्थानो मेसे कोई भी स्थानमे येराशि होरे भोर इसमे गुरु, मंग रवि, चंद्र युध, या शुक होये तो भनुक्रम उत्तांतर पहिले : भपेक्षा दूसरा निल योगदोनाद (५) सिंहराशि.मे कोई भी ग्रहनही होये तोभी केवल सिंहराशि उपरोक्त स्थानमे होतो मुख्यपद देतीह उपरोनः बहेमन

(गतिकल)
मिडली में सिंह राशि कोई भी उपरोनः स्थिती में नोनही होतो
फिर फल ज्योतिष का महलाही पाहे ।
(३) मिस प्रमाणे सिंहराशि का गंन कियाह रसीप्रमाणे कर्क राशि
काभि महत्व हे फक्त इसराशीमे कोइभी पागह का योगनी
होना चाहिय शुक, बुध, चंद्र, गुरू, ये ग्रह इसराशिमे उतरी तर
चलयान होते है।
(७) कुंडाल में ये दोन [१५] राशि उनम स्थिती होती भात
उत्तम योग होता है
एक राशि पलयान इसरी निग्रह होयतो उत्तम याँग
एकराशि पलवान दूसरी पलहीन होवती मध्यम योग
परंतु कर्क राशि यलवान और सिंह निर्बल होती निर्मल योग
(८) लग्न बलवान होवे और इन दोनराशी का पूर्वोक्त योग मंडलीमे
कहींभी होवे तो इनके फलका अनुभव स्थान बलक योग्यतानु
सार मिलेगा।
लग्नपलचान नहीं हो और ये राशी कुंडली मे कहाभी बलवान
होयेतो जो हल के पगार की मुख्यपणे की जगह होर वह जगह .
मिलती परंतु जिनके लग्न बलवान नहीं होवे भौर ये राशी
भी बलबान नहीं हो तो उसका जीवन तो निरर्थक है। होताहै.
इनके शिवाय जितने अनेक योग इस पुस्तकमे लिख है उन
सब योगोका इसी प्रमाणे मनुष्य केशरीर लक्षग सुख दुःखादि
जीवन कृमके योग मिलाके भनुभव करने का सतन अभ्यास
करते रहने से कुंडली देखनेकी जिसमानकी अबलोकन व विचार
शक्ति ज्यो ज्यो अधिक बढेगा त्यो त्यो मुद्भतफल कहनेका
और सहनमे मनुष्य की कुंडली के ग्रहोकि परिक्षा करनेकी
योग्यता उतनदी मानसे बढ़ती जायेगी। इतिशम्
इति प्रथम विवेक टीका समाप्तः

(भाषा टीका सहित) (१०७) अथ धनविवेक. धनेंगेशे खेलाभपे धनेशांशेशे शुभे नामतोधनी ॥ १ ॥ चंद्राच्छभै रुपचयगैः सद्योधनी ॥ २ ॥ खार्थपो युती केंद्र कोणगौ सयोधनी ॥ ३ ॥ खेशांशशायेशी युतो सद्योयनी ।। ४ ।। सिंहासने धनेश धनी ।। ५ ।, धनेशात् धनांगपेशी केंद्रगौधनी ॥६॥ चतुर्पु स्वःगेपुधनी ।। ७ ॥ चल्यर्थशः सायांकगो धनी ।। ८॥ चंद्रार योगे धनी ॥९॥ भरधन भावका विचारकहतेदे टीका-लग्नेश धन २ स्थानम, लाभ ११ पति दशमस्थानमे धनस्थान केस्वामि का नवमांशका स्वामि शुभ ग्रहोवे तो नाम मात्र से धनवान होताहै भावपास कुछ्नहि होते हुवेभी धनवान समझामावेगा.॥१॥ चंद्रमासे ३।६।१०।११ स्थानमे शुभगद स्थितहोतो शीघ्रधनवान होताहै ।।२॥ दशम स्थानका भीर धनस्थान का स्वामि एक राशिमे पुतहोके १५४ ११५५९ में स्थानमे स्थित होयतो शीघ्र धनसान होता ॥३॥ दशमस्थान के स्वामि का नवांश का स्वामि भौर साम ११ स्थान का स्वामिएकत्र यतहोये तो शीघ्र धनवान होता है ॥ ४ ॥ धन २ म्यानका स्वामि सिंहासनांश मे होवनोधनवान होता ॥५॥ धनम्धान का स्वामि माहाबैठाहो उससे दूसरे स्थानकास्वामिभौर लग्नका स्वामि यदोनो १४.१ मेस्थानमेनाचे तोधनवान होताई ६ चारपद स्वराशि में गये होवती धनवान होताई ॥७॥ -

(मानाना)
पलमान धन २ स्थानका ममामि १०१९ म्यानमे माता
धनवान होना है।1८॥
नद भौर मंगलका गोग होयना धनगन होना है।॥ ॥
म्पस धन योग
केंद्र कोणशे ऋग्पष्टचरो स्वल्पधनं ।। १ ।।
लाभेशांशेशेकरपटयरोगुकजीवान्यतरयुनदृष्टे
स्वल्पयनी ।। ११ ॥
टीफा-दसरम्यानकाम्यामि पर पटचंश मेहोष भौर ॥४११०१९१९
मे स्थानमें स्थितहोय तो म्यल्पधनी होताहै ॥ १० ॥
लाभेश भिसग्रह के नवांशमे होये वहमह र षष्टयंगम हो। और
शुक्रअयया गुरु से युत दृटहोये तो म्यल्पधनी होताहै ॥ ११ ॥
बहुधन योग वा महाधनी योग
सौम्य रुपचयगे हवनः ॥ १२॥
लग्नेशांशे शशिशे बलाढये धेशेपिकशिशुभदृष्टेबहुधनः
खेशांरोशे वैशेपिकांशे सार्थशलाभेश दृष्टयुते बहुधनी ११
केंद्र चतुष्टये शुभान्विते महाधनि ।। १५॥
लग्नार्थायेशा वैशेपिकांशे महाधनी ।। १६ ।।
कशे मंदेलाभे महाधनी ।। १७ ।
स्वःसुते लाभेमंदे महाधनी ॥ १८ ॥
लाभेजीवे व पंचमे महाधनी ।। १९ ॥
स्वगुरौ पुत्रेचंद्रे महाधनी ॥ २० ॥
सिंहकों गुर्वारयुते माहाधनी ॥ २१ ॥
कर्केने चंद्रे गुर्वारयुते महाधनी ॥ २२ ॥
भौमेंगे स्वः मन्दाच्छज्ञयुते महाधनी ॥ २३ ॥

(भाषाटीकासहित) जीवेंगे स्वः चंद्रारयते महाधनी ॥ २४ ॥ स्वञिङ्गे मंदाच्छयुत दृष्टे महाधनी ॥ २५ ॥ स्वाशुगे चंद्रार्कयुत दृष्टे महाधनी ॥ २६ ।। कन्यायायमारराव्हच्छा महाधनी ॥ २७ ॥ का-लग्नसे ३।६।१०।११ मे स्थानमे सर्व भ ग्रहगये होवेतो बहुत कामालक होताहै ।। १२ ।। ग्नेश जिसग्रहके नवांश भेहोये उस ग्रह के नवांशका स्वामि बलवान भौर वैशेषिकांशभे स्थितहोकर शुभग्रहसे दृष्टहावेतो बहु धनवान है ।। १३ ॥ समिया के नवांश का स्वानि वैशेषि कांश स्थितहोके दसरे भोर ५५ स्थान स्वामि योसे दृष्टहोवे वायत होवेतो पहुधनकामालिक ॥१४॥ वारोही केंद्र ॥४॥१० स्थानमे शुभग्रह यतहोये तो महाधनी होता लग्न १ धन २ भोरलाभ ११ इनतीनो स्थानोंके स्वामि वैशेषिका होवे तो महाधनी होताहै ॥ १६ ॥ कर्क राशीका वधहोये भौर शनिग्यारमे स्यान में होतो महाधनी नाहै । इस मामे कर्कका बुधका स्थाननाहिकहा है इससे कोई स्थानमे कर्कका बुधबैठनेसये योगहोसकताहै परतमेरे विचारमे याद कायुध पाच स्थान होतो भाधक बलवान योगहोना संभवदै १७ पराशि २०११ मे स्थितशनि ५ मे भयदा ११ मेस्थानमे होतो हाधनी होताहै ।। १८॥ नयार मे स्थानमेगर भौर सराशि का ५ सूर्य पांचमे होवेतो माहा भी होताहै ।। १९ ॥ यह योग मेप लग्नमे होना संभव है स्वराशि (९।१२) का गुरु हो वे भार (५) पांचमे स्थानमे चंद्रमा तो महाधनी ॥२०॥ इस योगमेभी गरुका स्थान नही कदाहे परंतु यदि गुरु लग्नमे होवे तो सन्झमे ये योग भधिक बलवान होना संभव है कारण लग्नने (११०) (जातक्तत्व) १२ का गरु होनसे ५ मे कर्क का चंद्र हो सकता है इससे दोनो स्वक्षे का नवम पंचम योग होताहै भऔर इन दोनो केंद्र को धिपोका दृष्टी संबंध होताहै सो मीन लग्न मे यह योग अधिक बलवा जानना चाहिये। सिंह राशि का सूर्य लग्नम गुरुमंगलसे युत होवे तोमदाधनिहोताहै २१ कर्कराशि का चंद्रमा लग्नमे गुरु मंगळ से गतहोयतो महाधनी होताहै ॥ २२॥ स्वराशि ११८ का मंगल लग्नमे होवे भोरै शनि, शुक्र, सुप, इनतीनो से यतहोये तो महा धनी होताहै ॥ २३ ॥ स्वराशि ९।१२ का गुरु लग्नमे होवे भौर चंद्र मंगल से संयत होने तो महा धनी होताहै ॥ २४ ॥ स्थराशि(३६) कावध लग्नमे शनि शमसे युद्धहोव वा दृष्टहोये तो महाधनी होतहै ।। २५ ।। स्वराशि(राकाशुकलग्नमे होये भौरचंद्रसूर्य से युतदृष्टहोतो म हाधनी होताहै ।। २६ ।। कन्या राशिम शनि,मंगल राहु भौर, शुक्र, ये चारोयह स्थितहोयतो महाधनवानहोताहे ॥२७॥ सदनिकेशयोग। लग्नपविरोधनपशिशेच सोन्येगुरुदृष्टे सहयानिकेशः२८ रग्नपथ लाभेशक में गुरुदृष्टे सहसनिकेशः ॥२९॥ अंगेशांशशे गोपुरे कर्मेश दृष्टेसहस्रीनप्केशः ॥३०॥ दोस- लग्नसनयांगास्वामी औरधनेशकेनवांशकाम्यामी गम पदीय भार टनको गदेगतादविता एक हमार निफया म्यामा हालाई ॥२८॥ निष्फ भफि (मोहर) को पहले भमरमे लिपाई " दीनारेऽपिन निशानी"कोई लोगनिष्कमाभयंकायाभीकरतई परंतु शाम्रया और भनुभव नियाभयं भसाहादाना पनि यन है इसका मांग नहानिक सदभार बदा मामा मानना।

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(भाषाटीकासहीत)
लग्रेश धनरस्थानमेहोवे लाभेश ११दशमस्थितहोवे भौर गुरुसेदृष्ट
होवेतो एकहजार असर्फी का मालिक होताहै ॥ २९॥
लग्न के स्वामी का नवांश का स्वाभि गोपुरांशमे हो भौर उस्को
दशमेस्थानका स्वामी देखता होचतो एक हमार असफीयोका स्वामि
होताहै ।। ३०॥
द्विसहस्र निकेशयोग
कर्मेशत्य नवांश सनांशेशी बलाढ्यौ जीवाच्छदृष्टी
विसहस्र निकेशः ३१
धनायेशौ सौम्यपष्टयंशे बलान्वितो द्विसहस्रनिष्कशः ३२
टीका-दशमस्थान के स्वामि का नवांशकास्वामी और सप्तमांशका
स्वामी थेदोनोबलवानहोये , गुरुशुक्र इनको देखते होवतो दोदनार
भसायोका स्वामिहोताहै ।। ३१ ॥
धनेशऔर लाभेशयेदानोशुभषष्ठवंशमेहोवे भार बलवानहोतोदो ह
गार भसफियोकामालिकदोलाहै ॥३२॥
धनभावेश मिसग्रहकेद्रेष्काणमहोये क्ग्रह धनेशनिसग्रहकेनयांशमे
होवे उससेयतहोवे और वहसर्वोत्तमबलवानहोवेतो भाठहजार मुद्रा
(मोहर) कास्वामी होताहै।।
अयुत निकेश योग।
लग्नेशत्यव्यंशेश युक्तसप्तमांशशो बैशेपिकांशे अयुतनि
केशः ।। ३३ ॥
टीका-लगेश जिसग्रहकेद्रेष्कागमेहोवेवह लग्नेशके सप्तमांगके
म्वामि से यत हो भौरवैशेषिकांशमे होवेतो दसहजार भसीयो का
मालिकहोता है ॥३३॥
भयुताधिकनिकेशयोग।
शुस्वांत्ये जीवेर्थेवेशपिकांशङ्गेरोअयुताधि कनिकेश:३४
गुगेगीधने वैशेषिकांगे केंद्र कोणेवायुताधिकनि० ॥३५॥

(११२)
(नातकनार)
का-बारहये भया इसरे स्थानमे शुफ, भार इसरे स्थान में
वृहस्पतिहरे मोर लग्नेश शपिकांदामे होतो सहकार भविष्ट
पकामयामी हानाहे ॥५॥
गुरु मोर सायास्यामिये ६ नं पोषिकांशमे स्पित होकर परमात्र
मनाये भयया १४१०९५ मे म्याने स्थितदोवती दसह नारसे
भधिक द्रव्यका स्वामी होताहे ॥३५॥
लक्षाधीशोग।
कर्भशस्य शशस्य सतारोश ऐरावांरो लक्षाधीशः ३६
टीका-दशमेश भिसग्रहदकाणमें ही उसके सप्तमांश का स्वामि
ऐरावतांशमे होता लक्षाधीश होताहै।। ६६ ।।
द्विलक्षशयोग
साभेदचतुष्टयेधनपारादसिंहा नेवाउनदयेशः ३०
टीका-चारो केंद्र १४:१० स्थानमे शुभह स्थित होये भार धनेश
पारावतांशमे भयया सिंहासनांशम होपतो दो लक्षरुपयाका स्वामि
होता ॥ ३७॥
विलक्षाधिपयोग
लग्नापेशा वैशेषिकांशगौ सोम्यपटवंशगौच विलक्षा
शिपः ॥ ३८ ॥
धनायधर्मशाबलिनः केंद्रगाखिलक्षाधिपः॥३९॥
टीका-लग्नेश और लाभेश ये दोनो वैशेषिकांशमे होवे और सौम्यप
प्रचंश मे स्थितहोये तो तीन लक्ष का स्वामि होताहै ॥३८॥
धन २ लाभ ११ और नवम ९ स्थान के स्वामि बलवान होवे और
ये तीनो १।४।७।१० स्थानमे स्थितहोये तो तीन लक्ष का मालिक
होताहै।॥३९॥
कोटीशयोग।
लग्नशिश भाग्येशी परमोच्चांशगों लाभेशेवरोपिशगः
कोटीशः ॥ ४० ॥

(भाषाटाकासहीत)
टीका- लग्नके नवांशसास्वामि भोर भाग्यश येदोनो परम वजांश
मेजावे और लाभेश वैशेषिकांशमस्थित होवतो कोटीश ( एक करोड
का स्वामी ) होताहै ।। ४० ॥
वाल्ये बहु धन लाभयोग।
सांकाशी केंद्रगो लग्नेशस्यांशेशस्येश्वरेणदृष्टो बाल्ये
बहुधनलामः ॥ ४ ॥
लग्नार्थायगैः शुभैयेलाढ्यैर्धनेशस्यांशेशेनदृष्टैल्येवहुधन
लाभः॥४२॥
टीका- नवमेश भोर धनेशकायोग १५४०५१ मे स्थानमेसे कोई भी
स्थानमे होवे भऔर उनको लगेशके नवांशका स्वामि जिसराशीमे होवे
उसराशीका स्वामी देखता होवेता वालणकी भवस्थामे बहुतधन
कालाभ होताहै ॥४१॥
लग १ धन २ भौर ग्यारमे भायमे सनशुभग्रह बलवान होके स्थित
ये भौर उनको धनेश के, नवांशका स्यमी देखताहोतो बालपर्णकी
स्वस्थामे बहुतधनका लाभहोताहै ॥ ४२ ॥
निध्याप्तियोग
लाभेशेङ्गे लमशेर्थे धनेशलाभे निध्यातिः ॥४३॥
लग्नेशेशुभेथे निध्यामिः ॥४४॥
कोशेशे रंधेनिध्यातिः ॥४५॥
टीका- लाभेश लग्नमे, लगेश धनस्यानमे, धनेश लाभस्थानमे,
वेतो गहुये धनकालाभ होता है ।। ४३॥
समका स्वामी शुभग्रह धन २ स्थानमे स्थित होवे तो गहुए
जाने की प्राप्ती होति ।। ४४ ।।
धन स्थानका स्रामि भाठमे स्थानमे स्थितहोतो गढे घना
भाताई ॥४५॥

(जातकतत्व) स्त्रोपार्जित धनाप्तियोग, सर्वग्रहाधिकाले लग्नपेकेंडे जीवयुते वैशेषिकशिथेशे सो- पार्जितधनः ॥ ४६॥ अमेशाशेशोचली धनपमित्रं सत्केंद्रकोणगः खो०१७ लग्नायपयुक्तोर्थशः केंद्रकोणेशुभदृष्टः कालबलान्वितः स्वोपार्जितधनः॥ ४८ ॥ टीका-लग्नका स्वामि सर्वग्रहोंसे अधिक बलवान होके ॥४॥७१० में स्थानमे गुरुसे युक्त होवे भौर धनेश वैशेषिकांशमे स्थितहोवेतो अपने बलपराक्रमसे कमायाहुया धन प्राप्तहोताहै ।। ४६ ॥ लग्नेश के नवांश का स्वामि बलवान होवे तयाधनभाव के स्वामिका मित्र शुभग्रहहोवे भौर केंद्रकोण (११४११०९५) स्थानमेस्थित होने तो अपने पलपराकमसे कमायाहुया धन प्राप्तहोताहै ॥४७॥ , धनभाव का स्वामि लग्नेश और लाभेश से युक्त होक केंद्रकोण ( १२४ १९९५) स्थानम स्थिनहोवे और शुभग्रह से हटहोघे, कालपळसे गुनहोरे तो अपने बलपराकम से कमायामा धनप्राप्त होताई ४८ भ्रातृधनाप्तियोग. पलान्विवीसोत्यगो धनाङ्गपो घुमहदृश्युक्तो वैशेषिका- शग सोत्येरावयुतदृष्टो भ्रातृधनाप्तिः ॥ ४९ ॥ टीका-पना भौर लग्नेश ये दोनो पलवान होके तीसरे स्थानमे स्थितहोये पुरुषमहसे युक, भया दृष्टहोये भार वैशेषिकांदामे स्थित, नूनीश से युत या दृष्टहारे तो भाईका धनमाप्तहोता ॥४९॥ मातृधनलाभयोग. नुर्यगयुतदष्टे धनेगे जननी धनलाभः ॥५०॥ साधना पर्यम्यानके स्वामी मे युत था इरादावे तो मानाका .

। (भाषाटीकासहित)
बंधुतः कृपेयाधनलाभयोग.
धनेशेसुखेशयुतदृष्टे वैशेषिकांशबन्धुतःकृपेर्वाधनलाभः५१
टीका-धनेश चोयेस्थानके स्वामिसे युक्त वा दृष्टहोवे और बैशेषि-
कांशमे होवेतो पंधु से घा कृषिकर्म से धनलाभ होताद ५१
पुत्रत धनाप्तियोग.
सुतेशतत्कारकात्यायुतदृष्टेवार्थेशेवलिनिसुनतोधनाप्तिः५२
टीका-धनस्थान का स्वामि पंचम स्थानके स्वामि से भौर पंचम
कारकसे युत वा दृष्टदोरे या धनेश वलयानहोवे तो पुत्रसे धनप्राप्ति
होतीहै ॥ ५२॥
सुपुत्रार्जित धनाप्तियोग,
वेरोपिकांशेङ्गेशे बलाढये सुपुत्रार्जितधनाप्तिः ॥५३॥
टीका-लग्नेश वेदोषिकांशमे होवे भीर बलवानहोवे तो सुपुन्नामित
धनकीमाप्ति होतीहै ॥ ५३॥
शमुतोधनाप्तियोग.
पटेशतत्कारकपुतदृष्टेशे पलिनिशत्रुतो धनातिः ५४
टीका-पटेश से तथा उसके कारकसे धनेश युत वा. दृष्टहोये भौर
लिवानहोवे तो शसे धन प्राप्तिहोती है । ५४ १५
भार्यातीधनाप्नियोग,
जायेश तत्कारकयुतद्दष्टेथेशे बलिनिभार्यातो धनाप्तिः५५
टीका-बलवान धनेश सप्तम भावके स्वामि भौर सप्तम भावके
कारकसे युतवा दृष्टोवेतो त्री से (श्री संबंध से) धनाप्तिहोति है ५५
पितास धनाप्तिपोग.
सेशतत्कारकयुतदृष्टेथशे बलिनिपितृवोधनानिः ॥५६॥
टीका-पलान् धनभावका स्वामि दशमेश भौर दशमभावके कार
के पद से युत वा दृष्टहोवेतो पितासे धनकी प्राप्तिहोती ॥१६॥
तुर्येक पितृधनाप्तिः ॥५॥
टीका-चतुर्थ स्थानमे सपं स्थितहोतो पिताके धनकी प्राप्ति
होतीहै ॥५॥

[११६]
(मातकतर)
धनाप्तियोग,
कोशशेयलयतियस्यकारकेण यद्भावेशेनवा युतेदृष्ट तद्वारा
धनाप्तिः ।। ५८ ॥
टीका-धनस्यानका स्वामि पलयान होकर निस भावके कारक से
अथया जिस भायक स्वमी से युत या दृष्टोव उसमावसे गिस २ पिन
मातृ भ्रात्रा दिव्यनिका विचार कियानाता है उसर व्यक्तिद्धाराधन
की प्राप्ति होवेगा ऐसाजानना ॥ ५८ ॥
धनलाभ प्राप्तिदिशा.
लाभेश दिशायाधनातिः ॥ ५९ ॥
लाभ गत राशि दिशातो धनाप्तिः ॥ ६० ॥
टीका-लाम ११ स्थानका स्यामि जिस दिशाका मालिक होये उसी
दिशासे धन प्राप्ति होतिहै दिशाके स्वामी वृहन्नातकमे "भागाद्यारवि
शुक्र लोहित तमः शौरिंदु वित्सूरयः "इस प्रकार केहह भयाद लाभ
श रवि होवेतो पूर्व दिशासे शुक्रहाये तो भाग्नकोणसे मंगलदोवती
दक्षिणदिशासे राहु होवेतो नैऋतकोणसे शनिहोतोपश्चिम से चंद्र
हावेतो वायुकोणसे बुध होतो उत्तरसे गुरुहोतो ईशान कोणसे धनलाभ
होताहे ॥ ५९ ।।
एवं लाभस्थान मे जो राशी स्थितहोये उसराशी की जो दिशा
होवेउसी दिशासे धनकी प्राप्ति कहना अर्थात १।२राशिहोतो
पूर्वसे ३ भग्नि कोणसे४५ होतो दक्षिणसे ६ होतो नैऋतसे ७८ होता
पश्चिमसे ९ होतो वायुकोणसे १०१११ होतो उत्तर दिशासे १२ मीन
राशि होये लाभ स्थानमेतो ईशान कोणसे धनलाभहोवेगा कितनोका
यहभिमतहेकि २५।९ राशिहोतो वसे श६१० दक्षिणसे, ३१७११
पश्चिमसे, ४।८।२२ उत्तर से प्राप्ति होतीहै ।। ६० ।
धनलाभयोग
लाभेशे केंद्र कोणे लाभेपापे धनलाभः ॥ ६१ ॥.
लाभपेपने धनपेलाभे धनलाभः ॥ ६२ ॥
धनायपो केंद्रगौ धनलाभः ॥ ६३ ॥

(भाषाटीकासहीत) (११७) लाभपेपारावताशे धनलाभः ॥ ६४ ॥ लाभेशशे केंद्रकोणे शुभसंबंधे धनलाभः ॥ ६५ ॥ शुभांतरे लाभेशेशे धनलाभः ॥ ६६ । लाभास्यशिशे शुभसंबंधे धनलाभः ॥ ६७ ॥ ज्ञाच्छा वर्थे धनलाभः ॥ ६८ ॥ रंधेसौम्या धनलाभ ः ॥ ६९ ॥ मेपे चंद्रे घटेगंदे नवे शुक्रे चापेर्के पैतृकं धनं नलभते ७० टीका-लाभेश ४११०९५ मे स्थान मे स्थितहोवे भौर ग्यारहवें स्थानमें पापग्रह पेठेहांचे तो धनलाभ होताहै॥६१ ॥ लाभेश धनभायमे भौर धनेश लाभ भावमे स्थितहोतो धनलाभ होताहै ।। ६२ ।। दूसरे २ और म्पारहये ११स्थानके स्वामी ११४१४१८ मे स्थानमे स्थित होये तो धनलाभ होताहै ।। ६३॥ लाभ (११) भाव का स्वामी पारा वतादि भंशमे होवेतो धनलाभ होताहै।। ६४॥ लाभ ११ भावका स्वामी कारकांश कुंडली में १-४-७-१०-९-५ मे स्थानमे स्थित होवे शुभग्रह से संबंध कर ताहोतो धनलाभ होताहे६५ लाभ ११ भावेश कार कांश लग्नमें शुभ ग्रहो के मध्यमे होवती धनलाभ होता ॥६६॥ लाभेशका नयांशका स्वामि शुभग्रह सेसंबंध करताहोतो धनलाम होताह ।। ६७ ॥ युध और शुक्र धन भाव मेगये होवेतो धनलाभ होता ।। ६८॥ आठमे भावमे शुभ ग्रह गयेहोपेतो धनलाभ होताहै ।। ६९ ॥ मेष राशि चंद्रमा, कुंभ राशिमे शनि मकर राशीमे शुक्र, धनराशि मे सूर्य कपसे पितहोतो पिताका धन[संपनि नहिमिलेगा ॥७॥ परांगना भासनिमे द्रव्यनाश योग अंशांदकराहोपरांगनासक्तेर्दव्यनाशः ॥ ७१ ॥ ।

{ २१८) (जानकलत) टीका-कार कांश लग्नसे ९ नवमे स्थानमें गहु होरनी परस्त्री की भासदी के कारण से धनका नाश होना ।। ७१ ॥ जाति विवाद से धनहानी यांग व्ययेझे ज्ञातिवियादाधनहानीः॥ ७२।। टीका-बारह १२ ये स्थानमें बुध स्थित होषितो जानि संबंधी विवा द से धनहानि होति ७२ मिथ्याकोशांतकृतयोग सरत्यशे मिथ्याकोशांतकृत् ॥ ७३ ।। टीका-व्यय १२ स्थान का स्वामि पापग्रह से युत होतो फल काममे धन कोखरच करके संपत्तिकानाशकरनेवाला होताई ।। ७३ ॥ राजदंडादनक्षपयोग लग्नेशेल्पवटेनर्ययतेथेशस्पेनीचेया पापदृष्टे राजदंडा इन क्षयः ॥ ७४ ॥ लाभेशेंत्येन्त्येशेर्थे त्रिशे वा नीचगे राज । ७५ ॥ पष्ठेशे सागपे नीचगेराजकारकयुते वा राज०॥७६ ॥ धनशेत्ये व्ययेशेर्थे सपाऐंगेशेरिंगराजदं० ॥ ७७ ॥ लाभेखेशेगेशयुते दुःपञ्चशे राजदं० ॥ ७८ ॥ टीका-लग्नेश भल्प पलीहोवे धनस्थानका स्वामी बारवें १२स्थानमे सूर्य से युतहोये और नीचराशि का होवे भयया पापग्रहसे दृष्टदोवतो राजदंड (जरवाना देनेसे ) धनका नाशहोता है. ।। ७४ ॥ लाभेश बारवें १२ स्थानमे और पारवेंस्थानका स्वामि २धनभावमे होये १ अथवा धनेश ६८०१२ मे स्थानमे नीचराशी का होतो राज दंड से धननाश होताहै ७५ ( इसमत्रमे २ योगकहेहै ) धनभायंका स्वामि नीचराशी मे स्थितहों के छठे स्थानमे पापगह के साय गुक्त हो अथवा राजकारक ग्रह से यतहोये तो राजदंड से पाहोनाई ।। ७६ ॥

(भाण्टीकासहित)
जनस्थान कास्वामी १२ वारहवे स्थानमे, बारमे स्थानका स्वामीधन
स्थान मे होवे और पापग्र सेयुत लग्नका स्वामीरठे स्थानमेहोरतो
राजदंडसे धनक्षयहोताहै ७७
दशम भावका स्वामि ग्यारवे ११ स्थानमे लग्नेश से युत होये और
वह दुष्ट[ अशुभ ]पष्टयश मे होवती राजदंड से धनक्षय होताहै ७८
चौराग्नि भूप कृत धन नाशयोग,
धनायपो कुजष्ठो पापांशगी होनाली सपापो चौरामि
भूपकतो धननाशः ॥ ७९ ॥
धनेशांशे शाशेशसपापत्रिकेलग्नेशदृष्टे चौराग्नी भए कतो
धननाश: ।। ८० ॥
टाका-धन २ और लाभ ११ भावके स्वामि ये दोनाही भौमसे दृष्ठ
होवे पापग्रह के नवांश मे होवे,निवली होबे, और पापग्रह से युत होवे
तो चौरसे अग्निसे रा राजा से धन का नाश होता है ७९
धनभावकास्वामी जिस ग्रह के नवाशमे होवे उसके नवाशका स्या
मि पारपद से युत होकर ६१८११२ स्थानमे स्थितहोवे भार उस्को
लग्न कास्यामि देखता होवनीचौरचिोरिहानेसे भाग्नसेलायलगनेसे)
राजा से (रामाकि नारानीस ) धनका नाश होताहै ८०
लोकाप वाद मूल से धनक्षययोग.
सपापे पेशेरिंगकरपाचंगे धनायफ्युते लोकापवाद मूल
कधनपः ॥ ८१||
रीका- दशम भाव का स्वामी छटे स्थान मे पापग्रह संयुत्तदोचे घर
पप्शमे होरे धन २ भार लाभ ११ भारके स्वामी पोस युतहोयेतो
लोकापवाद के कारण धननामसीताई.८१
निधनयोग
धनेशारीरोशे रिक सपापे ऋरपटचशे निर्धनः ॥८२॥
सपापा धनधनेशायेशा निर्धनः ॥ ८३ ॥
प्यशशिश धनेश युतदृष्टे निधनः ॥ ८४ ॥

. . (१२०) (जातक्तल.) नीचे केंद्रे सपापे निर्धनः ।। ८५ ॥ कोशेशांशे शांशेशे कालदंडांशे निर्धनः ।।८६ ॥ लाभे लाभपे वा पाप संबंधे निर्धनः ॥ ८७ ।। टीका-धनेश का नवांशमा स्वामि जिसराशिम स्थित होवे उस स्वामी ६८४१२ मे स्थानमे पापग्रह से गुतहीवे भोर करपष्ठचशमे हो तो निर्धन होताहै ८२ धन २भार धनभाव का स्वामि और लाभ११ भावपति यतीनो पा ग्रह से यत हो तो निर्धन होताहै ८३ पारवे स्थानके स्वामीका नवांशका स्वामि धनेश से युत होने दृष्ट होतो निधन होताहै ८४ नीनराशि का मय केंद्र ( ॥४॥११० ) में पापग्रह से युत होतं निधन होना है ८५ धनंश के नवांशका स्वामि का नयांशका स्वामि कालंददाशमे होर तोनिधन होता ८६ लामा लाभ !! भाग्ने पापग्रह संसर्वध करताहोगतो निन डोनार ८७ पार मलक धननाश योग व्यये व्ययेगे या पापसंपन्ये पापमूलक धनक्षयः ॥८॥ का-व्या १२ भानका नामि पारमै स्थानमें ही भयापापग्रह से गय करताहाती पारकर्मम धननाश होता है. ८८ धर्म मलय धनक्षय योग अपत्येोगा शुभगवे धर्ममूलक धनायः ॥ ८९ ।। भुज्यी वाचंद्रता व्यये धनमुन्टक धननाशः॥ ९. ।। माया म्यानमामि पारम्यान में स्थित सभा मनमा गर करना होता धर्म का धनक्षम होना ९ करमा नट स्थल १२ स्थान में स्थित हनी धर्म व धन कामना - (भापारीकासहित) (१२१) भ्रातृकृत धननाशयोग अंत्येशेल्परले भोमसंबंधे भ्रातृरुतो धननाशः॥९१ ॥ टीका-व्ययस्थानकास्वामि निलीहो भौर मंगल से संबंध परता वेतो भाई धनकानाश करताहै ।।११।। मातृकृतधननाशयोग सुखेश संबंधेत्येशे मातृरुतो धननाशः ॥ २२ ॥ टीका-पारमे स्थानका स्वामि निर्वलीहोवे भौर सुनेस ४ से वंध करताहोवेतो मासा धननाशकरती है ।। ९२॥ पुत्रकृतधननाशयोग व्ययपेल्पयले पुत्रेश संबंधे पुनरुतो धननाशः ॥१३॥ टीका-व्ययेश निर्वलीहोवेभार पुत्रैश (पंचमेश) से संबंध करताहोवेतो त्र धनको नाशकरताहे ।। ९३ ॥ शवकृत धन नाश योग. व्यपेशे पलहीने गुठिकादियुते वा पष्ठेशसंपंधे शत्रु तो धननाशः ॥१४॥ धशेरिगे शत्रुकवो धननाशः ॥ ९५ ॥ टीका-व्यय २ स्थानका स्वामि निवली होये भर गलिक शनि मंगल राहुभादिपापयदसे युतहोये भयया पष्टेश से सम्बप करता होये शव के समय से धनका नशा होताहै ॥१४॥ टीका-धनस्थानका स्थानि छठेस्थानमें जावतो शट धनका नाश करताहे ॥१५॥ जाया कृत धननाशयोग कुरोरोन्स्पेरोल्पबठेजायेशसम्बंधेजायारुवोधननाशः.९६ टीका-बारवे स्थानका स्वामि कर ग्रह[ मू में श.] नवांश मे स्थितहोकर निचली होरे भोर सप्तमेग से सम्बंध करता हो तो श्री घनकानाश करती है ।।९६ ।।

(१२२) (जावकतल) पितृतधननाशयोग ध्ययेशे खेश संबंधे पितृस्तो धननाशः ॥ ९७ ।।. टीका-अपेश भल्पपलीहोर और दशमेशसे संमंधकरतारेजेठउँ पिता धनकानाशकरताहै ।। ९७ ॥ धननाशपोग धनेजे चंद्रदृष्टे धनहानीः ॥ ९८॥ क्षीणेदावर्थ ज्ञदृष्टे संचित धननाशः ॥ ९ ॥ राव्हर्कजावणे शुदुयुतराशीतयुते कुमार्गध्ययः १०. कोरोकुजेर्थनाशोग्निचौरादितः ॥ १०१ ॥ त्रिकोणजीवे भोजने धननाशः ॥ १०२ ॥ कोणेश संबंधी योगेहेग्रह निकेशयुवो धननाशकः१.३ टीका-धनभावमेयुध, चंद्रमासे दृष्टहोयेतोधनहानि होति है ॥ १८ ॥ सीणचंदमा धनभावमे होयें भौरं उस्कोबुधदेखता होयतो संचित कियेहुषे धनका नाश होता है.९९ धनभाषमे राष्ट्र शनि शुक्र भौर चंद्रमा, जिसराशिक होवे उस के स्वामि से युत होतो कुमाग में धनका सर्च भधिक होताहै धनभाय मे मंगल होवतो भग्नि भयवा चौर वगेरा.से धनगनादा होवाद १०१ नवमें पांचमे भायमे गुरुहोयेतो भोजन के. (भीमने जिमाने फे) काममे धनमानाश होताहै, १०२ जोग्रह धनभावम, नवमे पांचमे स्थानके स्वामी से सम्बंध करताहो भौर ६।८। १२ स्थानके स्वामी से युत होये यहधननाश . कारक निधनयोग लाभार्थीत्येगहुः शयने निर्धनो धमतेमहीम्॥ १०४ ॥ लग्नेशरंधेरैधेरोंगे मारकेशयुने निर्धनः ॥ १०५ ॥ :- . जानना १०३ (भापाटिकासहित) (१२३) पटेशेंगे लग्नशेपाटे मारकेशयुते निर्धनः १०६ चंद्राविंगेमारकेश युतदृष्ठे निर्धनः १०७ टीका-शयना वस्यान मे गपाहवारा ग्यारवें दूसरे भपका पारमै मे जापती धनकेलिये भूमिपर भटकताफिरता रहनेपरभी निधन ताह १०४ स्टनेश भाठमे भोर मष्ठमेश लग्नमे इसरे नया सातमेस्पारफे स्वा सि युत होतो निधन होता है १०५ छठे स्थान का सामि सग्नमे भौर लमका स्वामी छठेस्थान मे दुसरे या सातमे स्थानके स्यामी से पुत होतो निधन होताहै १०६ लग्नमे चंद्र भौर सूर्य ये दोमो दूसरे तया सातमे स्थान के स्वामि युत तया दृष्टहोये सो निर्धन होताई ॥ १०७ ॥ दरिद्रीयोग. धनकारकात् धनवेदेशपापे दरिद्री १०८ स्वकारकात त्रिपष्टे शुभे दरिद्री १०९ खेशुभा धनेपापा दरिद्री ११० फ-धनकारक (गुरु) से दूसरे, चापे, तपा पांच, स्थानमे रापमह होपेतो दरिद्री होता है ।। १०८॥ पनवारफ गुरु ] से सासरे, छठे स्थानमे शुभप्रद शेवतो परिमी होताहे ॥१९॥ दूसरे भाषमे पापपर भौर दशम दाभयह होरतो दरिधी होताई ११० महादरिद्रीयोग. धर्मरीत्यत्रोर्थे तृतीयगेपुपापेषु महादरिद्री १११ केंद्रगाभवेश्यमंदाठिकारोमात्पाष्टमगोमहादरिमी १२ एकभरयों पुष्पाता पन्योन्याशगी सदादरियो १३ पुष्पयंताटे शेपानीचर्तगा राजपुषोपि दरिदी १११ शेद्वारयमा नीचगा मृगेशुक्रराजपुरोपि दरिमी ११५

(जानना)
नीचेंककोणे रंभामे राजपुरोपि दरिद्री ११६
टीका-नवमे स्थानका म्यामि पारमे, पारम भाषास्वामी धनभातम,
भौर तीसरे भागमे दोनीन पापग्रहगाये तो महादरिद्रीहोताई १११
चंद्र गुरु और शनि १४ मे स्यानमे जावं भौर गुलिक व
मंगल ये दोनो पांचो पारवे तया भाटम स्थानमै हानी महादरिद्री
होताहै ११२
सूर्य भौर चंद्रमा ये दोनो एक राशीम हो भौर मयं, चंद्रके नवांश
मेष चंद्रमा मूर्यके नवांशमे (कर्फ राशीके रांश मे सूर्य भौर सिंह
राशीफे नगंशमे चंद्रमा) होवेतो सदादरिद्री होता है ११३,
सूर्य और चंद्रमा ये दोनो कुमराशीने होवे भोर शेष सर्व ग्रह नींव
राशीमे गये होवे तो रानाका पुत्र दावता भी दरिद्री दोताहे. ११४
बुध, चंद, मंगल, शनि ये चारो नीचराशीक होने भौर मकर राशी
का शुक्र हो तो राजापुत्रहोवे तो भी दरिद्री होता ११५
नीचराशीका सूर्य नवमे तथा पांचभे होवे और भाठमे भावमे मंगल
होवती रानाकापुत्रभी दरिद्रीही होताहै ११६
सर्व संपत्तमान् योग.
अंगेशोगुरु ज्ञकवियुतः केन्द्रगः सर्वसम्पदन्वितः ११७
स्वोच्चेस्वमित्रेवा शुभभे शुभैदृष्टङ्गेशे संपत्तिमान् ११८
धनेशेज्यौ धनेने संपत्तिमान ११९
देवलोकारो सबलेनेशे सम्पत्तिमान १२०
लग्नेशेषलयति शुभवर्ग केंद्रपयुते सम्पत्तिमानं १२५
लग्ने शुष्ट सशे सम्पत्तिमान् १२२
केन्द्रार्थकोणे लग्नेशज्ययोगे सम्पत्तिमान् ११३ :
लाभधीस्थेपुसौम्पेषु सम्पत्तिमान १२४...
धर्मशेङ्गे तुयाँको स्वभावावलोपिनी सम्पनिमान १२५
.

(भाषाटीकासहित)
टीका-लग्नका स्वामि गुरु, बुध शुक्र से युक्त होके ॥४॥१० मे
स्थानमे स्थित होवेतो सर्वसम्पदन्वित होताहै ११७
लग्नेश्वर स्व, उच्च, तथा अपनि मित्र, राशीका भयवा शुभ ग्रहकी
राशीका होये भौर उम्को शुभग्रह देखते होवेतो सम्पत्तिमान होताहै ११८
धनभावका स्वामी भौर गुरु ये दोनो २२२४०१० स्थानमे जावे तो
सम्पत्तिमान होताहै ११९
देवलोकांश मे सूर्यहोवे भौर लग्नेश्वर बलवान होवे तो सम्पत्तिमान
होताहै १२०
लग्नेशवलवान्होवे शुभग्रहोके वर्गमे जावे केन्द्रकेस्वामि से यतहोवे
तो सम्पत्तिमान होताहै १२१
लग्नमे सूर्य शुभग्रहोसे दृष्टहोवे भौर लग्नका स्वामी दशम भावमे
होवेतो सम्पत्तीमान होताहै १२२
लग्नेश्वर और गुरु इन दोनुका एकराशिमे योग १४१०२०१२।९।५
स्थानमे होतो सम्पत्तिमान होताहे १२३
ग्यारमे और पांचवे स्थानमे सर्व शुभग्रह गयेहोवतो सर्व सम्पत्तिमान
होताहै १२४
नवमस्थानका स्वामि लग्नमे होवे चतुर्थका स्वामि चतर्थ को भौर
नवमका स्वामि नवमभावको देखता होवेतो सम्पत्तिमान होता १२५
बहुकुटुंबीयोग.
ससौम्येशेर्थे केन्द्रेया कुटुम्बी १२६
धनेधनेशे वा शुभसम्बन्धे कुटुम्बी १२७
टीका-धनभावका स्वामि शुभग्रह से युक्नहोके दूसरे भाव मे होने
भयया केंद्र शा१० स्थानमे जावेतो कुटुम्बवाला होतादै १२६
धनभायका स्वामिधनभावमे होवे भयवा धनेश शुभग्रहसे सम्बंध
करताहावेतो बडे कुटुंबवाला होताहै १२०
विंशतिजन पालक योग.
धनेशे शुभैर्युते परावतांशे विंशतिजनपालकः १२८
टीका-धनभावका स्वामी शुभग्रहोसे युतहोवे भौर पारावतांशमे
'स्थित हो तो वीस मनुष्यो को पालनेवाला होताद १२८

बृपक मानेच मनन्दे कमाये मापदीनः १३३
(१२६)
(जातकतत्व)
पंचाशननपालकयोग.
धनेशेगोपुरांशे धनेशांशपेशुभे सिंहासनांशे पञ्चाराज्जन
पालकः १२९
टीका-धनेश गोपुरांशमे होवे भौर धनभावके स्वामीका नवांशका
स्वामि शुभग्रहहोवे भौर यह सिंहाशनांशमे गयाहोवतो पचास मनु
को पालने वाला होताहै १२९
त्रिशतजनपालकयोग.
धनेशसिंहासने या पारावतांशे जीवयुतदृष्टे त्रिशत जन
पालकः १३०
टीका-धनभावपति सिंहाशनांशमे होये भयया पारावतांशमेहीये भार
गुरुसे युत किंवादृष्टहोवे तो तीनसो मनुष्यो को पालन करनेवाला
होताद १३° .
भनेकजनपालकयोग.
सिंहासनांशेजी गोपुरांशेशुके धनेशे ऐरायतांशे उनेकजन
पालक: १३१
टीका-मिहाशनांगमे गुरु, गोपुरांशमे शुक्र, भौर ऐरावतांशमे धनेश
होतो भनेक मनुष्यीको पालन करनेवाला होताद १३१
भनादरयोग.
सपापेष्टमेशे पादृष्टे पापांतरे पाप:या रन्धे यातथाभूते
पारभवान्विनोन्यथा तीनः १३२
टीका-भटमेटा भयमा भटमम्मान पापग्रह गुनोगे, पापग्री
ट, पाक बीचमही या पागाकी गलीमे गया तो
भनादर पनवाला होता. महाभ भादानही हो) भोर महास
पुट भादो के बीच भी गएका भष्टमेश भयो भष्टम
भावही मांत्र भादरपानपाटा होगा।

(भाषाटीकासहित)
(१२७)
भाग्येशे व्यये केन्द्रपापे धनादिहीनः १३४
टीका-वृपभराशी का मूर्य, मीन का चंद्र, मेप का शनि, भौर कर्क
का मंगल, होवेतो संपदारहित होताहै १३३
नवमे भावका स्वामी बारमे हो भौर ॥४११० स्थानमे पापग्रह
गये होयेतो धनादि सम्पत्तीहीन होताहै १३४
परिवारक्षय योग.
लग्नान्त्यास्ते सर्वे परिवारक्षयः १३५
इतिद्वतीय धनविवेकः
टीका- लग्नमे पारमे भौर सातमे स्थानमे सर्व ग्रह गयेहोवे तो
परिवारकाक्षय होताहै (परियारके सर्यलोकोका नाश होनाताहै) १३५
विशेषमकारके धनयोग
(१) भाग्येश लाभेशयोग. (१२) लाभेश धनेशयोग.
(२) भाग्यश दशमेशयोग. (१३) लामेश चतुयेशयोग.
(३) भाग्येश चतुर्येशयोग. १४) लाभेश लग्नेशयांग.
(४ भाग्येश पंचमेशयोग (१५) लाभेश पंचमेशयोग.
(५) भाग्येश लग्नेशयांग. (१६) लग्नेश बनेशयोग.
(६) भाग्येश धनेशयोग. (२७) लग्नेश चतुर्येशयोग.
(७) दशमेश लाभेशयोग. (१८) लग्नेश पंचमेशयोग.
(८) दशमेश चनुपेशयोग, (१९) धनेश चतुर्येशयोग.
(९) दशमेश लग्नशपोग. (२०) धनेश पंचमेशपोग.
(१०१ दशमेश पंचमेशपांग. १२१) चतुर्येश पंचमेशपांग.
(११) दशमेश धनेशयोग.
ये कीस प्रकार के भौर भी विशेष धनयोग येसयोग व्यपस्पान
फसिवाय धनभागमेहोरे भयवा चतुर्षपंचम स्थानमहोये तोर्गउनम.
फल देनेगलेनानना।
७ सातमै स्थानमे धनयोगहौरतो गंपलभाटमेगरम होवती
भाषाफल ६ उटेहरेतो मनुशिफल रातासमझना. नरदो
प्रदरतननीय २ (बहुतनी ५भशकपररसे) होतभिपांगजानना.

(१२८) (जातकतत्त) दारीययोग. [१]पटेश धनेशयोग. [१२] व्ययेश सप्तमेशयोग. [२] पटेश लग्नेशयोग. [१३] पटेंश भाग्येशयोग. [३] परेश चतुर्थेशयोग. [१४]पटेश तृतीयेशयोग. १] व्ययेश धनेशयोग. २५] व्ययेश भाग्येशयोग. [५] व्ययेश चतुर्थेशयोग. [१६] व्ययेश तृतीयेशयोग. [६] व्ययेश लग्नेशयोग. [१७] पष्टेश लाभेशयोग. 1] षटेश दशमेशयोग. [१८] पटेश अष्टेमशयोग, [८] व्ययेश दशमेशयोग. [१९] व्ययेश लाभेशयोग. [९] पष्ठेश पंचमेशयोग. [२०] व्ययेश अष्टमेशयोग. [१०] षष्टेश सप्तमेशयोग. [२१] षष्टेश व्ययेशयोग, ११] व्ययेश पंचमेशयोग. ये इकास प्रकार के विशेष दारिद्ययोगहै. येयोग धनस्थानमे वा दारिद्यभागमेहेवितो पूर्णवलवादजानना व्यपस्थानमहोत्रेतो पादोन (पोन ४५) भौर दुसरेस्थानमे होरतो अर्धवलजानना. उपरोक्त समस्त धन मार दारिख योगों का विचार करने से मितने जोजोयोग भावे ये कमसे (धनयोग) धनयोग के तरफ भोर दारिययोग दारिदायोग के तरफ जुदे २ भक २ वाजु कमसे लिखना और उनके पला बलका विचार करके देखना यदि धनपोगकी अपेक्षा दारिद्र योग अधिक बलवान होगये होवेनो धनयोग होतेहुवेभी दारिद पोगको प्रय रता ही रहेगी। मेवं यदि दाग्दि योगकी अपेक्षा धनयोग भधिक से- ज्या का भौर बलवान होवेतो धन योगकी प्रबलता होने के कारण हा रेद्र योग होतेहुंभी धनयोग की ही प्रयलता होयेगा. इसप्रकार उभय योगोमेसे जोयांग बलवत्तर होवे वही फल लापल के तारतम्यानुसार जानना. इनमेभी विशेष सूक्ष्म विचार पूर्वक देवने से धन भौर दारिद्य गफे बलोरल के तारतम्य भेदसे ही श्रीमतका दरिदी भारदरिद्री श्रीमंत तथा श्रीमंत महा श्रीमंत भार दरिद्री फे मद्दा दरिद्री रहै उनका विनार इसप्रकार जानना. किया श्रीमंत स्थिति मेसे गोईभी स्थितिमै जन्म पयानहो , H भाषाटिकासहित. (२२९) परंतु इसना निश्चित है कि गरीब स्थिती मे जन्म होके जोमनुष्य श्री मंत होनाते है उनके धनयोग श्रीमंती की स्थिति में जन्म पानेवाले मनुपके धन योगसेभी बलवत्तर होते है। ऐसे दोमनुष्यो कि कुंडली देखनेस जान पड़ेगा फि पहिला श्रीमंत व दूसरा चाहे कितनाही श्री मरहे तथा सामान्य दिवेगा।इसी प्रमाणे जन्मभर सामान्य स्थिति भोगने वाले कि भपक्षा किंवा जन्म दरिद्री मनुप्यकीभपेक्षा जो मनु प्य श्रीमंत के यहां जन्म लेके भागे बिलकुल दरिद्री होनेवाले है उन के यह दारिध योग करने वाली स्थिति में भधिक बल बत्तर होगे। देशकाल व जातिपरत्व से धनयोग के फल मिलते है हिंदुस्थान में जन्म पाये हुवे मनुष्य के नो उत्तम नियोग होवे वही योग जो भाज के समय में अमेरीका जर्मन भयवा इंग्लंड देशोमे किसी मनुष्य के होयेतो वह कोट्याधीशहोये विनारहेगानही भौर हिन्दुस्थान में रसी उत्तम धनयोग वाला बहुत हुवा तो लक्षाधिश होजाताह ऐसदि ग्रह हिंदुस्थान मभी यदि किसी भिल्ल वगेरा नीच जातीवाले के भाजादे तो वह बहुत हुवातो बेफिकी से पेटभर खाने कमाने वाला होसफ्ता है इससे अधिक उसकी श्रीमंतीकी दोट जानेवाली नही सारांश, धन योग का फल परिस्थिती के प्रमाणसे प्राप्तहोवेगा। ज्योशिष शास्त्र से दिइस बात का निर्णय होना चाहिये यह बात बरावरहै परंतु इतनी सूक्ष्मता समझने कि मनुष्य मे सामर्थ्य नही इस लिये अपने को देश, काल,जाति, परिस्थीती, के तरफ लक्ष देके विचार करन के शिवाय दुसरा साधन नही. कुंडली में भारीभवन को भादिले धनभावपर्यंत स्थान "धनभाग" और सहनभावसे भष्टमभावपर्यंत ६ स्थान "दारिद्यभाग" जानना १ धनग और दारिद्ययोग ये दोनोयोग यदिधनभागमेहो भौर धनयोग रत्तम प्राल पहोवेतो मनुष्य गरीब के घरमे जन्मपाकर भी गरीबी की स्थिती से निकलके श्रीमंत (उन्नती) पायेविनारदेगानही परंतु यदि दारिद्योग की शक्ति भधिकहोवेतो वहकितनाहि उलट मुलट प्रयलकरेगा तथापि मूलकीस्थितीमे विशेष बदलाता होनेवाला नही, भौर दारिययोग यदिबिलकुलही नहींहोतो वहमनुष्य भामर गांत श्रीमतीभोगगा भौर रंफकाराव हुयेविना रहेगानही, धनयोगद्दी मूलमेनहींहोवेतो किसी तरेसे पटसे पेट भरता रहेगा.

(२३) जातकताय. २ धनयोग भार दारिद्ययोग यदि ये दोनुयोग दारिद्यभागमेहुये हो। ऐसे समय यदि धनयोग की शक्ति भधिक बलवान होतो मनुष्य गराध स्थितामे होते हुवे भित्रतिपानेमे भग्रसर होगा परंतु इसका स्वरूप (मर्यादा) सामान्यरहेगा भौर समयभी भधिक लगेगा ऐसा मनुष्य न १ के योग के मनुष्यों की भपेक्षा कम योग्यताका होगा. भार यदि दारिद्ययोगमूलमही नहीं होवेतो मनुष्य मूलभे गर्गव होतो प्रयत्न से धनवान होगा भौर धनवान स्थितिका होता किंचित् धन बढ़ायेगा भयवा जो स्थिति वही कायम रहेगा।धन योगबिलकुल नहीं होवतो भामरण दारिद्यभोगकरेगा अथवा थीमान के कुलमे जाम लिया होवेगा तो दिनोदिन कंगाल होता जावेगा। धनयोगकी अपेक्षा दारिद्ययोगी शाकि भधिक होतो पिसी समय ठीकस्थिति किसीसमय दुःखी स्थिति भीगना पड़ेगा. ३ धनभागमे धनयोग व दारिद्यभागमे दारिद्य योग सम समान शक्ति के हावतो मनुष्य कितनेक दिन गरीब स्थितीको व कितनेक दिन श्रीमती स्थिति को भोगेगा। यदि धनयोग की शक्ति भधिक होवेतो गरीवासे निकलके उन्नती पावेगा और धनवानस्थितीका हो तो किंचित धनबढानेवाला होवेगा । दारिद्ययोग की शक्ति अधिक होने तो उसके नसीचमे या जन्म दारिद्यभागना पडेगा. यदि ये योग धनवान के होवेतो "भरमभारी और टिपारा खाली" ऐसी स्थिति उसके भायुष्यमे जावेगा; भर्थात् पईसा नहीरहेगा और फेयल भरम बनारहेगा। ४ दारिद्यभागमे धनयोग व धनभागमे दारिदायोग होतो मनुः प्प सधनयरमे जन्म पावे तो आगेदरिद्रीहोवेगा य जन्ममे दरिद्री होवेतो बहुत समय बाद किंचित दारिद्रसे पिंटछुटेगा. ये योग निसप्रकार जन्म लग्नपर से देख रोही चंद्र पुंडली पर भी देखना भोर तारतम्यते सांपत्तिक स्थितिका विचार परना। इसमकार धनयोगका विचार करके निर्णय करने से जो अनुमान ठेरायानागा यह महसा चकनेवालानही या विचार गतिपकी भोमा मिसाजो स्वयं करंगा तो विनचूक अनुमान धसकेगा।

भाषाटीसा.
(२३१)
धनयोगों के शिवायमे धनभावमे भाईकी श्री का मामा, भाईकी
काकीसाद, भाईको पुराफरी वा धनहानि सर्च, मामाकि भाईकीनी,
माताकोलाभ, मित्रक पाकीस्त्री, मित्रबॉलाभ, पुत्रीसासु, पुाके
मित्रकी म्री, पुत्रकाराज्यसुन. शत्रुके माइकीम्री, स्त्री की मृत्यु, दादा
को मृत्यु, दादीको धन मुख, सुसराकोलाभ, भादिधातोका भि विचार
फरना.
इतिद्वितीय धनविकीका समाप्तः
अथ सहजविवेकः।
बहुभ्रातृभगिनीयोग.
लग्नलग्नेशान्यवरत रुपायगे झेंन्हारेज्ये बहुभावरः केती-
तुबहु भगिन्यः॥१॥
सोत्यशे स्वसौ यदृष्टे भातृमान् ॥ २ ॥
सोत्थप सशुभेकेन्द्र मातृमुखम् ॥ ३ ॥
सोत्येशुमैयुते या दृष्टे सोत्योपटिनिभातृलाभः ॥४॥
भातृपे कारके या वलिनी शुभसम्पन्धे भ्रातृलाभः।।५।।
गोपुरे सौत्येशे कारके सिंहासने शुभ भातृटाभः ॥६॥
पराजो भातृो केन्द्र शुभयुहष्टे भ्रातृलामः ॥ ७ ॥
मोत्यो सोम्पाशे भातृलाभः ॥ ८॥
सोत्यसोस्थो पलादो भ्रातृटामः ॥९॥
मृदंशादियुरे मोत्यो गुभनष्ट भ.तृलामः ॥ १॥

(२२) मातात. पशेपिकांश सोत्यपे शुभयुतहट भ्रातृलाभः ॥ 110 घुमाः मोत्यकारकेशी ग्रह दृष्टी भातृल भे- परित्येक गिनीलामो मिग्रे उभपलाभः ॥ १२ ॥ टीका लग्न तथा लग्नेश से तीसरे भोर माये स्थानम युर बन्द मंगल गुरु जाये त: यहुत भाइ मा मुम होताह भार फतु गम ने तो बहुत भगिनी का मुस होता है.' तीसरे भायका स्वामि स्वराशीका होवे शुभ ग्रह देखते होये तो भाई फा मुखयाला होताई २ तीसरे भायका स्यामि शुभग्रह से युत होवे भौर केंद्र ( 1 ) स्थानमे गवाहो तो भाई का मुखहोता है ३ तीसरा भाव शुभग्रहों से युतहोये भयया शुभग्रहों से दृष्टदो तीसरे भायका स्वामि पलयान होयेतो भाई का लाभहोता है । तीसरे भायका स्वामि भयवा भ्रतृकारक बलवान होवे शुभग्रह से सम्बंध करताहोंचे तो भाईकी प्राप्ति होती है ५ तीसरे भायका स्वामि गोपुरांशमे होवे भ्रातृकारक सिंहासनांगमे होवे भौर शुभगह को राशी मे गयाहोवे तो भाई की प्राप्ती होतीहै । भ्रातृस्थान का स्वामि पारायतांशमे होवेभोर केंद (१०)स्थान में स्थितहोकर शुभह से युत दृष्टहोवतो भाई का लाभ होताहै .. तीसरे भावका स्वामि शुभराशी भौर शुभराशी के नवांशम होतो भाई,का लाभ होताहै.८ तीसरे मे तीसरेभावका स्वामी गयाहोवे वलवाद होतो भाई का लाभहोता ६९ तीसरे भावका स्वामि मृद्धशादिक से युतहोये भौर शुभग्रह से युत दृष्ट होयेतो भाई लाभ होता. १० तीसरे भावका स्वामि वैशेषिकांशी होवे शुभग्रहसे युत दृष्ट होते भाई का लाभ होता ११ तीसरे भावका स्वामि भार भ्रातृकारक ग्रह ये दोनों पुरुषराशी (१३५९।११) भार पुरुषराशी के नवांशमेगये होवे इनको पुरुषाई (र. म. गु.) देखते होवेतो भाईका लाभहावेगा भार इनसे विपरीत जातकतख. (२३३) होवे अर्थात् दोनोग्रह स्त्री राशी भौर श्री राशी के नवाशमे गये होवे और इनको स्त्री ग्रह (चं.शु. श.) देखते होवेतो भगिनी का लाभ दोरगा । और मिश्राह देखते होवे मिश्रराशि नवांशमे दोनो महगये हो तो दोनो का (भाई बहनका) लाभ होवेगा १२ भ्रातृ भगिनी संख्या विचार. सोत्थराश्यंश दशाभावादि संख्या ॥ १३ ॥ सोत्थगयह स्यांशका भात्रादि संख्या ॥ १४ ॥ सोत्थेशकारयुत भांशवशाहातत्संख्या ॥ १५॥ सोत्थेशयुतमांशवशा तत्संख्या ॥ १६ ॥ स्त्री खेटेधर्मगै भगिन्यो नृखेटै तरः ॥ १७ ॥ ज्योधने कन्यायांगहौ भ्रातृत्रयम् ॥ १८ ॥ टीका तीसरे स्थानमे जितनी राशीहोर वा जितने नवांश गये होवे उत्तनेहि भाई बहन की संख्या जानना १३ तीसरे भावमे गयेहुवे प्रहके नवांश की संख्या के अनुसार भयात् नेतने नवांशगपे होचे उतमेहि भाई बहन की संख्या जानना १४ तीसरे भारका स्वामि और कारक ये दोनो नितनी संख्या राशी अथवा नवांशमे होवे उतनीही संख्या भाई बहनकी..मानना १५ तीसरे भायका स्वामि जितनी राशी भौर नयांशमे गया होवे उसके शातभाईवान की संख्या जानना १६ नवमे भावमे मितने स्त्री ग्रह गयेहोवे उतनीही संख्या बहिन जानना और जितने पुरुषग्रह गयेहोवे उतनीही संख्या के भाई जानना यदिग्रह पकभयका उच्चरशी के होतो तीनगुनी संख्या मानना एवं स्वक्षेत्री होवेतो द्विगुण संख्या जानना ऐसेहि नीच शत्रुक्षेत्री होवतो आधी संख्या जानना १७ बुध गुरु धनभावमे गपेहोवे भौर कन्यारशीका राहु होवेतो तीन, भाई जानना १८ भाषाटाकासाहत. भ्रातृहीनयोग. विक्रमेशागे त्रिकस्थौ भ्रातृहीनः ॥ १९ ॥ पष्टेसोत्थपारो पापभगी पापयुतीया भ्रातरउत्पद्यनश्यति२० भ्रातृकारके नीचांशे पापदृष्टे दुःपष्टयशे भ्रातृहानिः २१ सोत्येपापयुत दृष्टे भातृहानिः ॥ २२ ॥ भ्रात्रीशेषापांतरे भातृहानिः ॥ २३ ॥ पपांतरेसोत्ये नीचखेटान्विते वा शुभादृष्टे भ्रातृहानिः २४ सोत्थपांशेशे पठे नीचास्तारिगे भ्रातृहानिः ॥ २५ ॥ भ्रातृकारके पापान्तरे भ्रातृहानिः ॥ २६ ॥ भातृपे सोत्थे क्रूरपष्टचशे पापदृष्टे भ्रातृहानिः ॥ २७ ॥ सहजेशांशशेश्वरांशशेपटे भ्रातृहानिः ।। २८ ।। सोत्थेशांशश्वरांशेगे नीचास्ताग्भिभ्रातृहानिः ॥२९॥ सोत्यो वा कारकेत्रिके पापेक्षितयुतेस्वोया भ्रातृहानिः३० सोत्थगे:पापैर्याल्ये भ्रातृहानिः ॥ ३ ॥ सोत्यपेतत्कारके वा पापैर्युते वा भ्रातृहानिः ।। ३२ ॥ सिंहेको भातृहानिः ॥ ३३ ॥ धनमायापाःसंहजेराही भातृहानिः ।। ३४ ।। भोमात्सोत्थपापे घातृमुखन ॥ ३५॥ टीका-नीसरे मायका म्यामि भौर मंगल ये दोन ६१८११२ स्थानमे गपहोतो भ्रातृहीन होये १९ तीसरे स्थानका म्यामि और मंगल ये दोनोगह छठेस्थानमे पार पदकी राशीकही भया पापणसे युनदायनी भाई टलनहाकै नाश दो २.

जातक्तत्व भ्रातृकारकग्रह नीचराशी तमा नीच राशी के नवांशमे होवे, पापण्ह से दृष्टहोवे दुष्ट पष्टयंश मे होवे तो भ्रातृहानि होवे २१ तीसरा भाव पापग्रह से युत दृष्टहोवे तो भ्रातृहानि होवे २२ तीसरे भावका स्वामि पापग्रहोके मध्यमे (बीचमे ) होघेतो भ्रातृ हामिदीये २३ तीसरा भाव पापग्रहो के वाचमेहोवे नीचराशीमे गयेहुये ग्रहसे युत- हावे अथवा शुभग्रहोसे अदृष्टहोवेतो भ्रातृहानी होवे २४ तीसरे भावर स्वामिका नवांशका स्वामी छठेस्थानमै नाच मस्त तथा शत्रुराशी मे गया हो तो भ्रातृहानि होये २५ भ्रातृकारक ग्रह पापग्रहो के बीचमे होतो भ्रातृहानिहोये २६ तृतीयश तृतीयभावमै पापग्रहोंसे दृष्यहोवे बा करपश्चशमेहोवे तो भाईयोका नाशहोवे २७ तृतीयेश के नवांदशके स्वामीका नवांशका स्वामी ठेस्थान में गपाहोचे तो भ्रातृहानिहोवे २८ तृतीयेश के नवांशका स्वामी जिसराशी के नवांशमे होवे उस्का स्वामी नीच मस्त तथा शत्रु ग्रह की राशिमे गयाहोवेतो भ्रातृ हानी होवे २९ तीसरे भावका स्वामि अथवा कारकग्रह त्रिकस्थान (६.८१२) में पापग्रह सेयुक्त दृष्टदोवे भयवा अपनी उधराशीमे स्थितहोकमि ६.८५१२ स्थानमे पापग्रसे युक्तद्रष्टहोवतो भ्रातृहानी होवे ३० तासरे भाषमे पापग्रहोका योग भधिक होवेतो बाल्यावस्थामे भ्रात हानि होवे ३१ तीसरे भाव का स्वामी भयवा भ्रतृकारफगह पापग्रहों से युत होतो भ्रातृ हानिहोवे ३२ सिंहराशी का भूर्य नवमे होतो भ्रातृहानिहोवे ३३ धनभायमे दो तीन पापग्रह गयेहोवे भौर तीसरे भावे राहु होतो भातृ हानिहोवे ३४ मंगल से तीसरे स्थानमे पापग्रह गपे होवे तो भाईका सुख नही होवे३५ भनजोत्पतियोग. लग्नात्यगोपापी अनुजोत्पत्तिः ॥ ३६ ॥ है टीका लग्न और पारमे भावमे पापमहगये होवे तो छोटे भाईका जन्म होवे ३६ -- ।

(२३६) भागादीकासहित. भनुनहीनयोग. सोत्थेमंदे भीमदृष्टे ऽनुजहीनः ॥ ३७ ॥ टीका-तीसरे भावमे शनि जावे उस्को मंगल देवता होतो छोटा भाई नहीहोवे कदाचित होयभीती नीवित नदीरः ३७ भ्रातारोगायोग सहजेज वर्ग भोमदृष्टे भ्रातारोगी ॥ ३८ ॥ टीका-तीसरे भाव में चंद्रमाका वर्ग भधिक होवे और उसको मंगल देखता होये तो भाई रोगी रहे ३८ भ्रातृतःस्नेहयोग सोत्यांगेशौमित्रे भ्रातृस्नेहः शत्रूचेदरेम् ॥ ३९ ॥ टीका तीसरे भवका स्वामी भौर लग्न का स्वामी येदोनो ग्रह परस्पर मित्र होवेतो भाई के साथ मित्रता रहेगा और येदोनो परस्सर शत्रुग्रहहोवे तो भाई के साथ शत्रुता रहेगा ३९ राजनप्ययोग. अंशे रविशुक्रदृष्टे गजप्रेप्यः ॥ ४ ॥ अंशारखे ज्ञदृष्टेयुते राजप्रेष्यः ॥४१ ॥ टीका-करकांश लग्नको रविशुक्र देखतहोवतो राजाकी नोकरी करने वालाहोताहै ४० कारकांश लग्नसे दशम भाव बुधसैयुत दृष्ट होवेतो रामाकी नोकरी करने वाला होताहै.४१ विवरण-हलकारा,चपराशी,सिपाही, हवालदारकों, भादिले नीचे दके मुत्सद्दीगिरी की नौकरी करनेवालोमेसे कोइभी काम कर में वालको प्रेप्यकहते है। भृतकयोग। सुरभेदैः शुभदृष्टिहीनः कमगर्भूतकः ॥ १२ ॥ मन्दांशे नीचभेशुक्रे व्ययेचंद्राकौं भृतकः ॥ ४३ ॥ दशमगैः पापैःसौम्या दृष्टे तक: ॥ ४४ ॥ .

जीवनमा . टीका-सूर्य, मंगल, शनि, येतीनो दशम भाव में जाये और इनको शुभ महनही देखतेदोये तो कोई भीतम्हकी मजूरी करनेवाला होताद ४२ नीचराशी का शुक्र शनिफि राशी के नशमे होवे और बद्र सूर्य चारवेस्थनमे गयेहोवेतो कोईभीतरहकी मजूरी करनेवाला होताहै ४३ दशमे भावमेदोतीन पापग्रहजावे भौरउनको कोई शुभग्रहनदी देवताहोवे तो कोईभी तरहकी मजूरी करने वालाहोताहै ४४ दासान्वितयोग पटेशेमाने शेमन्दयुत केन्द्रे दासान्वितः ॥ ४५ ॥ राज्ये शुभदृष्टयाविक्ये दासान्वितः ॥४६ ॥ दीका-छटेम्यानका स्वामीदशम भावमेहोवे कामभावकास्वामि शनीसे युतहोवे केन्द्र(१४|११० स्थानमें गयाहोवेतो नोकर चाकरोसे युतहोये ४५ दशमे भावपर शुभग्रहो कीदृष्टि भधिकहोवतो नोकर चाकरो से युतहोये ४६ बहुदासान्वितय.ग. कर्मेशांशेशे मंदे पष्टपसंबंधे बहुदामान्वित : ॥ ४७ ॥ नृपे शुभकर्मपदृष्टे बहुदासान्वित : ॥ ४८ ॥ टीका-दशमे भावक म्यामिके नवांशकास्वामिशनि छठे भाव स्वामिसे संबंध करताहौवेतो बहुत नोकरोसेयुतहोये ४७ दशम स्थानमे सूर्य होवे औरउस्को दशमस्थान का स्वामि शुभर देखताहरितो बहुत दासो नौकरो) वालाहोता ४८ विक्रमोयोगे. सहजे शुभ दृष्टयाधिश्ये वा पापयुते वा सहजपे बल ढचे विक्रमी ॥४९॥ सहजपे केन्द्र कोणे विक्रमी ॥ ५० ॥ सोत्यागेशयोगे विक्रमी ॥ ५१ ॥ ..

मापाटीकासहित.
टीका-तीसरे भावपर शुभग्रहोकि भधिक दृष्टि हो भयवा तिसरे
भावमें पापग्रह गुतहोवे २ भपया तिसरे भावका स्वामी बवान
होयतो पराक्रमी होताहै ॥ ४९ ।।
तिसरे भायका स्वामी केंद्रकोग (१९६५) स्थानमें जाने
तो पराक्रमी होताहै । ५० ॥
तीसरे भावका स्वामि भोर लग्नका स्वामि इन दोनो का योगही
(दोनो भेक राशीमे ५*श के अंतर से भधिक भतर के नहींहोरे)
तो पराक्रमी होताहे ॥ ५१ ।।
प्रसिद्ध कर्मा जीवी योग.
अंशे मंदे प्रसिद्ध कर्मा जीवी ॥ ५२ ॥
टीका-कार कांश लग्नमें शनि गपाहोवे तो प्रसिद्ध कर्म करके
जीवन व्यतीत करने वालाहोवे ॥ ५२ ।।
काष्ट पाषाणादि विक्रेता योग.
पष्टेशे सोत्थे काष्ट पापाणादि विक्रेता ॥ ५३ ॥
टीका-छठे स्थानका स्वामि तीसरे भावमे जावेतो लकडीवा लकड़ी
कावनाहुवा सामान भौर पाषाण (फत्थर) वगेरा का सामान बेचनेवाला
होताहै ( स्टेशनरी सामान वचनेवाला भी इसी योगमे होताहै ) ५३
भिक्षुकयोग.
मेपचंद्रे भीमदृष्टे भिक्षुकः ॥ ५४ ॥
चंद्रे शुभग्धीने दासोथवा भिक्षुकः ॥ ५५ ॥
सर्व ग्रह नीच मूढांशगैः कर्मान्यगे भिक्षुकः ॥ ५६ ॥
अंत्ये गुरौ केंद्रेशनौ लग्नब्जे भिक्षुकः
टीका-मेषराशी में चंद्रमाहोये उस्को मंगल देखता होतो शिक्षक
भीनमांग के पेटभरने वाला) होता है ५४ ।।
चंदमाको शुभग्रह नहीं देखते हावतोदास अपवा भिक्षुक होताहै ५५
ग्रह नीचराशि भयवा नाचराशिके नवांशतया मस्तक होवे
र दशमे स्थानके बिना दूसरे कोई भी स्थानमे नावनो भिक्षु
॥५६॥

बारमे भारमै गुरु, केंद्रमै शनि, लग्नमे चंद्रमा गयाहोवेतो (भिक्षुक) भीखमांगकेपेट भरने वालाहोता॥ ५ ॥ नियकर्मा जीवी तथानीय कमांजीवीयोग. चन्द्रा नपुत्रेजीचे घमेशुभे या पापेनिन्ध कमीजीवी५८ एकस्मिन्ग्रहे मित्रभगेपराजीवी ॥ ५९ ॥ राज्येने त्रिकोणार्थे मन्देपामत्युगै नीर्चवत्पाजीवी ६० टीका-चंद्रमासे दूसरे भयका पांचमेस्थानमे गुरुहोव, भौर भाठमे स्थानमे शुभ भयया पापग्रह गयाहौवेतो निन्यकर्मकरनेसे भानीविका होये ॥५८॥ एकभीग्रह भपने मित्र ग्रह की राशिमे गयादवितो पराजीवी अर्थात दूसरेके भाधारपर नीहिचलाने वाला होताह ।। ५९ ॥ लग्न का स्वामि दशम स्थानमे भौर १५१९ स्थानमे शनि भोर भाठमे त्यानमै पापग्रहगये होवेतो नीववृत्तीफे कर्मसे जीयननीवाह करने यालादोये ॥६॥ पित्रादित अर्याप्तियोग. लग्नादाचंद्रा दोघेर्दशमगैः पितृ जननो शत्रुमित्रत्वात स्त्री भृत्ये योप्तिः ॥ ६१ ॥ टीका- लग्नसे भयवा चंद्रमासे दशमे स्थानमूर्य गवाहोतो विकासे, चंदमाहोयेतो मातासे, मंगलदोवतो शत्रुसे, बुधहावेतोमित्रस, गुरुहोपतानातामे, शुक्रहोवतास्नीस,शानेहवितानाकरचाकरस, धनकी प्राप्ति होती है । सारावली में विशेषफल इसीप्रकार लिसादे चंट्स दशमे सूर्य होतो-सिद्धारंभ, धनसमृद्ध, उत्तमसत्व, नृपति जानश्यवान पुष्ठदेहिहोये. भामहोपेतो-साहसनिरत, प्रत्पतनियाप्ती, विपपलु मूर निपादचरितहोते. धुपहोतो-विद्वान, धनान, पहुभुन, नृपति म्यान, शिल्पत, मान, हो. 1 " " " " . भापाटीकासहित. चंद्रसे दशम गुरुहोवेतो-सिद्धार्थ, धार्मिक, धनसमृद्ध, उत्तमचरित. नरेंद्रसचिव, प्रख्यातहोवे. शुक्रहोवेतो-सुभग, ललितस्वर, वित्तवंत, सिद्धारंभ, नृपपूजितहोवे. शनिहावेतो-रोगा, निःस्व, दुःखान्वित, प्रजाहीन, रममे, नित्योद्विग्नमनहोवे. वृत्तिविचार. लग्नेन्दयः खेशस्यांशेश वशातिवदेत् ॥ ६२ ॥ टीका- लग्न चंद्र भोर मूर्य इनतीनो मेस जो भधिक बलवान होने उससे दशम स्थान के स्वामी का नवांश का स्वामि जाग्रहों उसीकधमांनुसारवृति (धंधा कहना भयांत् वह जिन२ वर्णवस्तधातु दिशा समय भादिका कारकहोवे उन्हीटन्दी बस्तु भोके व्यवसाय (धंधाकरने ) यालाहोवेगा । कितनेफ कामत है कि धंधेकाविचार" में दका स्पदपतिगांशनाथवृत्या" "कौशस्थनवांशराशिपयशादतियदेन" इत्यादिवचनसे रवि चंद्र यजिस ग्रहके नवांशमे होये उसके धमांनुसार धंधाकहना, तीसरामतयहहौकि कुंडलीम लग्नचंद्रमेसे भोपलवानहोये उससेजादशमस्थानहै उसकामाधिपति जिसमूहक नयांगमे होये उसकेधर्म प्रमागधंधाकहना। इनतीनाम से प्रथम ति संग्न चंद्र भार सूर्य से जोअधिस्पलसम्पन्नदोये उससेदशमस्थनका भधिपति मिस राशि नवांशमे हो उसकस्यामी के धर्मप्रमाणे धंधा पहना पहिल्यॉनकलना भभिकभामट भारयुमि युक्त है भतए शसिममागे धंध की फसनाकरना ग्रहोकाधम. सूपोगे भैषज्य मुगन्धिसवर्णाि मुक्तामणिपण्येन मंत्रोपदेश रमवाद विनोद मार्ग वृतिः ६३ चंदशेगा, मुक्ता पवालादि याणिज्येन कृषि मृदयाम्यिनाद माग राज्यागना श्रेयेन वृत्तिः ६४ भामांगे मनःगिला हरितादिंगन्दुकाननादिनि सह-चा कुन्त चापतोमरायः साहसे रिग्निक्रिपयास्ववल क्रियारम्भ नाप्तिः॥६५॥ शिक्षाविन्यासेनगणितेन य-योगेनकाव्येनचित्रपुस्तक प्रच्छेद घाणमाल्यरचना गन्धयुक्तिप्रभृतिभिवृतिः ६६ गावांश देवमाह्मण पंडितेभ्यःसुवर्ण लवणांजन गजायाकरे- प्रक्रियावादेनयज्ञदानतीपवासगुरुसेवनादिभ्योवृति:६७ कोशे वज्रमरकत पद्मरागेन्द्र नीलप्रभृतिः रौप्पेणलोहै भिःश्रेष्ठमहिपिभिः सुवर्ण गजाश्वव्यापारेण वृत्तिः ६८ यंशे अध्वगमना दिकेन वध्यपातिकया स्वशरीर ताड- येन भारवाहेण स्वकुलानुचित कर्मभिःवृतिः ॥६९॥ -~-लग्नचंद्र तथा भूर्यसे दशम स्थान के स्वामि का नवांश का सूर्य होवती-वैद्यकी ( वैद्य भयवा ढाक्टरी कामसे, ) भत्तर सुगंधी पदायोंसे, मुर्वणके लेनदेनसे, ऊनी कपडोके व्यापार मणि वगैराकी दुकान से भच्छी सलाह या राषदेनेसे, धी कर वगेरा पहरस के व्यागरसे, मुकद्दमेवानीसे, इसी खुशी उमाशोके रस्तेसे भवरा कितनोकका मत है कि इनके शिवाय ही भौर धान्यके व्यापारसे वृति होये ६३ पद भयवा सूर्य से दशम स्थानके स्वामीफा नवांशका स्वामी -शेख माती प्रवाल भादि यस्तु के व्यापार से खेतीके काम- गीचेमिट्टी के यरतन खिलोने भादि मिट्टीके व्यापारसे भच्छि हसि बुशि के रस्ते तथा राजाङ्गनाके भाश्रयसे भयवा मित है कि पाणी सरीखे पतले पदार्थ वा पाणीसे उत्पन्न पहायक सरस तया वसो पारसे वृवि [धधा] द भासा सूर्य दशम स्थानके स्वामीका नश का ह, हासो-नसिहरनार, हिंग- मुरमा बगेरा के (१४२) भाषाटीकासहिन. व्यापारसे तलवार चक भाला धनुष्य तोमर बन्दुक तोप भाटि भन्न शस्त्रोके व्यापारसाहस कमांक करनेमे, भग्नि के महा। यतासे होनेवाले मुनार, लुहार, भाक्षिके काम से लढाई से याद विवाद भादि स्वरल क्रियारंभसे या कितनेक के मतसे नौरी, सिपाहि. घिनली, सम्बन्धी कामकरने से, रसोई करनेसे, नया सटीक फा काम करने से वृत्ति होये ।। ६५ ॥ लग्न चन्द्र अथवा सूर्य से दशम स्थान के म्यामी का नयांग स्वामि युधहोतो-मुन्दर भक्षर लिखनेस गगित के काममे (हिसायके वामते) यंत्रकला कौशल्य के काम से कविता करने स टाईग (चित्र लेखन के कामसे पुस्तककी बंधाई पुस्तकवनाई भादि कामस पत्रके पुछ पत्ती भादि काटके बनानेके कामसे वाणरचना तथा पुप्पके हार गजरे गेंद पंखे शय्या भादि रचना के कामसे धूप भगस्यत्ती उबटना आदि सुगंधी पदायोंके व्यापार से तथाकितनेक के मतसे वक्तृत्व (व्याख्यान तया बोलनेके कामसे ) शाम्राध्ययन और ज्योतिष के धंधासे तथा बुद्धि तामध्यके धंसे शिक्षक के काम से बुकसेल्टर के कामसे कागद के व्यापारसे वर्षासन अयया नेमणुक लेकर रहनेवाला ऐसा धंधा करने से वृत्ति होवे ॥ ६६ ।। लग्नचंद्र अथवा सूर्य से दशमे स्थानके स्वामिके नवांशका म्यामि गुरुहोवेतो-देव बाह्मग तथा पंडित के सबंधी देवपूजन यज्ञ याग भनुष्टान तथा शास्त्रीय पुराण कथा वार्ता व्याख्यानादि धर्मोपदेशक कामसे सुवर्ण लवण सुरमा आदिके तया हाथी के व्यापारमे भूगर्भय खदानोके व्यवसायसे कमकांडादि क्रियावाद से दान तीर्य उपयास गुरु सेयनादि कार्यत तथा शिक्षक भन्यासी वेदांती योगी हरदास वरील पेरिस्टर सोलीसीटरके कामसे मसलतदार भक्त सायु भ'हरेदार मनिस्ट्रेटतथा न्यायाधीश के काम व लोको मुरुया आदि के काम से वृत्ति (धंधा) होवे ।। ६७ ॥ लग्न चंद्र तथा सूर्य से दशमेस्यान केनवांश का स्वामिशुकहोरनी हीरा मरकामणि पनराग इंदनीलमणि भादिक व्यापारस चांदी लोहा, सोना, भुंदर गौ, भंस, गन, भय, भादि के व्यापार में नयादा दहो गुड व खारे पदार्थ के व्यागारसे या कितने र मतसे दारो' + नातफ्तख. (१४३) काममे रहने वाला, कपडे भुगंधीपदार्थ व फूल बेचने वाला नाटक में पार्टलानेवाला अलंकारदागदागीनेवेचना तयातय्यार करनेका धंधाकरनेवाला होवे ।। ६८।। लग्न चंद्र तथा सुर्य से दशमे स्थान के स्वामिक नवांश का स्वामी शानिहोतो- चपरासी हलकारा तथानित को रम्तेमे जादा चलना फिरनापडे चैसे कामकरनेवाला, आंहदेदारकेलामसे सून हिंसा व चोरी करने से अपने शरीर को ताहनादि दुःखदेनसे हमाली मजुरी आदि म्यकुलानुचित कर्म करने में तथा छापाखाने का मालिक भयन उत्तम नोकरी करनेसे स्नती व वागवीचका काम करनेसे देवालय नोकरी करने से कभी कभी ईश्वरभक्ति मंदिर पूजा करनेका भार सम्बाद पहुचानका धंधा करनेवाला हाये ॥ ६९ ।। पाश्चात्यलोक धंधा के विचार करने में जन्म कुंडली मे दशमस्थान गई हुई राशी तथा बलवान राशि भौर राशियामे गयेहुवे ग्रहोके धर्म नुसार वृतिका निर्गध करते है। उनलोगोका कथन है कि मेष, वृषभ सिंह, व मकर ये रागी धातु इमारतवांधना सोनारमा काम भौर त्रिकविद्या इनका बोधकरती है. मिथुन तुल व कुंभ ये तीनो शास्त्रीय राशिये है इसकारण जिसकाम की, शास्त्र, व चुद्धिचातुर्य का उपयोग विशेषहौवे घेरे काम के कर ले लोक उत्पन्न करती है. कर्क वृश्चिक व मीन ये गशी होटल (वीसी, उपहारगृह) का धंध रने वाले तरेहकार सर्वप्रकार की दारूप मादक पदार्थ बेचनेवाले (या तय्यार करनेवाले दारू के व्यापारी खलाशी तया मच्छीमारने लि वा वैचनेवाले लोक उत्पन्न करती है. वृश्चिक राशि ये विशेष करके रसायन शास्त्र येत्ता व प्रसिद्ध वैद्य बहे मोटे विज्ञडाक्टर ) और भांजगह करने का धंधा करनेवाले टोक उत्पन्न करतीहै. कन्या और धन ये राशि संबाद पहुचानेकाकाम किरकोल सामान का व्यापारी पुस्तके पेचनेवाला और अपनेवाला खोद काम करने पाला फलामिज लोक तप्यार करती है. वृषभ कन्या यमका मशि कृषि संबंधी व चाग वर्गाचे संबंधी यौप विज्ञानानने वाले लोक तप्यार करती है.

मापाटीकासहित. मेष सिंहधनयेभग्निराशि भग्निसे भपया साफसे भयका पिनलीसे पसनेपाले कारखानेका धंधे करनेवाला, हथियारोका कारखाना चलाने याला लटार पभयंकर रितफे कामकरनेपाललोक तप्पार करती है। नप पहोतसे ग्रह इन राशियो में पलयान हो तो ऐसा धंधा करने पाला होता है. नप बहुतसे ग्रह कर्फवृधिक भौर मीन इन जलराशियोंमें गयेहाती पाणीसरीखी पतलीदया सोडावाटर लिमोनेट, भक, गुलाचनल, लडर भौर तेरहवार भनेक प्रकाकरी दारूपचनेवाला पलालीका धंधा करनेवाला तथा मच्छीका वपारी होताहै. नो बहुत यह शाम्रीय राशीमे गयेहोवती उत्तम विद्धवान गुरसही लेखक संपादक भयवा फपढेका पारी होवेगा. जो बहुतग्रह पृथ्वी (वृष कन्या मकर राशी महोवतीइमारत बांधनका फाम खेतीका काम भमि संबंधका व्यवसाय करने मे प्रवीण होताहै. नव बहुत ग्रह मेष सिंह धन इन भाग्नराशीमेगये होवेतो लुहारसुतार सोनार कारीगर का कामकरनेसें घोडा वगेरा चतुष्पदका व्यापारी चायुकसवार ईजनीयर व लोह का काम करनेवाला दलाल और सेनामे हरके प्रकार की नौकरी करने वाला होताहै। बुध मंगल वशनि वलवान्होकर एकब होवेतो मनुष्य चोर लुटारु बद- माश वे कायदेशिर काम करने वाला बहुत बुरे लोको का भगुभा होताई. शुक्र बुध मंगल एकत्र होवतो सोदाइका पारीफ नकाशीका काम करनेवाला चित्र कारीका काम करने वाला कारीगर मनुष्य होता. चंद्र शनीस दुषित हुवा होवेतो उस मनुष्यने स्वतंत्र धंधाकरना नही पांतीदार होवतो उसमे भागेदोनानही ऐसा मनुष्यने नोकरी कर नाहि मच्छाहे इसीमे भाग्योदयहोरेगा. पश्चात्य ज्योतिषी इसताल के भाधारपर धंधेकी कल्पना करते है। राशिवग्रह इनका उपरोक्ततत्वानुसार विचार करके लग्न चंद्र व सर्व से दशमस्यानगराशि, उकास्वामी, उसके नवांशकीराशी, भोर उसराशा कास्वामि, दशम स्थानस्यग्रह, भोर भधिक ग्रह जिन राशी योमे जावे उनका विचार करक, धंये का विचार देशकाल जानि कुल रिवान भौर परिस्थितीको ध्यान मेरसके करने से बहुत काके की कल्पनाठीक होगा।

मातकवत्व. (१५) लानाइराश थारपाद्यस्मिन्नवांशे वर्तते तदीशोक्तावृतिः प्रत्यहं ॥ ७० ॥ द्रव्यदा मित्रारिस्वभान्यतरत्रपत्रगतास्तादृशामित्राऽरियो- योगद्वाराधनाप्तिः ॥ ७ ॥ धनदोर्क स्तुङ्गे बलिनि स्वविक्रमा द्धनम् ।।-५२ ।। लग्नार्थायगै सौम्यै बलिभि बहुप्रकारे धनाप्तिः ॥ ७३ ।। ; इति तृतीय-विवेकः टीका- जन्म लग्नसे दशम स्थान का स्वामी गे.चरमे राशि धम- शात् जिस समय निसराशी के नवांशमे होवे उसके स्वामिक धा सार प्रत्यह वृत्ति कहना ॥ ७० ॥ दादेनेवाला ग्रह भाने मित्र ग्रहकी राशिमे गयाहीयेतो मित्र द्वारा पत्र फाराशिमे गयाहावेतो शत्रुद्धारा स्वराशीमे गया होवतो अपने उयोग द्वाराधनप्राप्तिहातहि ॥ धनदेने वाला मूर्य भपनी शशिम गयाहोवे घलयानहोषे ताभपने रा कमसे धन की प्रानि होगा ।। ७२ ।। लग्न धन भौर लाभ स्थानमे बलवान् शुभ ग्रह गये होतो पत्त तरहसे धनाप्ति होगा ॥७३॥ इसके सिवाय पराक्रम, भाइके सालेकापुत्र, माईबेपुत्रकीमग्रीका भाई, मामाकाप्तिा, माताकाव्यय, माताकाकाफा, माताकोमुसाफी माताकी गमी, मित्रकीमामी, मित्रकाकाका, मित्रकाम्यय, पुत्रकेपुर- कीसी, पुमकालाभ, शत्रुकाप्तिा, शालेफित्री श्रीकामाग्य, नोकर चाकर, उरुस्थल, पिताकारोगा, दादीकाभाई, दादाकाभाग्प, भादिकारिचारभी तीसरे भावसेहिकरना। इति तृतीय विवेक टीका समाप्ता।

मापारीकासहित मयचतुर्थवियेकः माधोपयोग. अधिकांश मातुर्दुग्धशोषः ॥ १॥ सोत्यपेनिक सरदेपरम्री स्तन्यानं ॥२॥ रोका-कारकांश लग्न युधिराशीका होवती माता का दामना भान माताकेदध फमतीततरे ।। १ ।। तीसरे भार स्वामी ६१८४१२स्थान में होर भौर चंदना सेन झरतो परधीका स्तनमानकरके पायरीश हवा ॥२॥ मात मुरु नाशयोग खेकुजेटमेजावे बलाढये मातृ सुजन ॥ ३ ॥ परेटचंदे स्तेभोमे मगाणे मातृ मुरंजन ॥ ४ ॥. शुक्र वाचसापान्तरे पापयुदष्टे मातमुचन ॥ ५॥ सुखे मुग्वेशे वापापतिरे पापपतदृष्टया मातृसदन ॥ ६ ॥ चंद्रादम्ते सरापे शुकै मातृसदन ॥ ७ ॥ मंदे पापयुते पापळे मातृसुखेन ॥ ८ ॥ पुत्रेचंद्रे मातृतुखन ॥ ९ ॥ चन्द्रारीसे धर्मवा मातृमुखन ॥१०॥ सपाप चंदेस्ते मातृसुखेन ॥ ११ ॥ गुरावो धनेमन्दे राहायूने पातृसावन ॥ १२॥ जीवेङ्गेरदे सोत्थे राही माता नजीवति ॥ १३ ॥ सोत्येस्तकें लग्नेमामे माता नजीवति ॥ ३४॥ पापांतरेचंदेशचातुर्यनगस्थाः पापामाता नजीवति ५५ मुखे मंदे पाप दृष्टे शीधं मातृ नाशः ॥ १६ ॥ .

मातकतत्य. (१४७) टीका- दशम भावमें मंगल भाठमें स्थानमे पलवान गरदोतो माताका सुखनही होये ॥३॥ स्टे अथवा आठमै स्थानमे चंद्रमा होवे भार पापग्रह सपुत मंगल ' सातमे गया होवती मात.का सुखनहीं होये ॥४॥ शुक्र भण्या चंद्रमा पाप ग्रहों केबीनमे हा भयवा पाप ग्रहो मयुत दृष्ट होवती माताकामुखनही होवे ।। ५॥ सवश मुख भावमे गया होये अथवा मुखश पाप ग्रहों के बीचमे हावे पापापग्रहोस गुतदृष्ट होवती माताका सुख नहींहोये ॥६॥ चद्रमासे सातमै स्थानम पापग्रहसयताक्र गया होवेतो माता कामुख नहींहोये ॥७॥ शनि पापग्रहोसे युतहोये भार पाप ग्रहकी राशी मंगयाहीवेत माताका मुख नहींहाच ॥ ८॥ चंद्रमा पांममे स्थानमे ग्याइवितो माताका मुख नहींहाय ।।९। चंद्र और मंगल यदोनो नवमे भयया दशम भाव मे गयेहोवतो मात कामुम्ब नहींहोवे ॥1॥ पाप मह सेयुत चंद्रमा सातने स्थानमे गयादोवेतो माताका मुरू नहीहोये ॥११॥ लग्नमें गुरू धनमें शनि सातमेरा हीरतो माताका सुखनही होये १: लग्नमेगुरु धनभेशनि तीसरे स्थानमेराहु गया होवोतो मात नहीजी ॥२३॥ तोसरे भयवा सात मे स्थानमें सूर्य और लग्नमें मंगल गयापित मानानही मी ॥१४॥ पापग्रहों के बीच में चंद्रमा होरे भयका चदमारो चौथे भारसाना स्थान में पापग्रह गयेहांवतो माता नहींनीव ॥ १५ ॥ मुम्ब (४) स्थानमे शनि पापग्रहस दृष्यहोरतो शीप माताका नाम होरे ॥ १६॥ मातुदींघीयुयोग. सुखेमदे शुभदृष्टे चिरेण मातृनाशः ॥ १७ ॥ सम्वेशुभकारकेशुभयुनेवलापेवामुख पालुदीर्घायुः १८ चंद्रे पलाढये वाशुक शुभयुतद्दष्ठे मातुर्दीर्घायः ॥१९॥ " (१४८) भाषाटीकासहित. शुक्रे वाचन्द्रे शुभांशे केन्द्र मातुर्घाियुः ॥ २० ॥ सुखपांशेशांशपे केन्द्रे बलाढये मातुर्दीर्घायुः ॥ २ ॥ टीका-चोयेस्यान में शनि शुभ ग्रह से दृष्टहायतो माताका नाश बहुत वशे पीछे होवे ।। १७॥ चतुर्य भावमे शुभग्रह होवे बलवानमातृकारक ग्रह शुभग्रहसंयुत होत्रे भयया यहमातृ फारकगह मुनस्यानमै गयाहोतो माता दीर्घायु हावे ॥१८॥ चंद्र बलवान् होवे भया शुक शुभग्रहसे युत दृष्ट होवेवो माता दीर्घायुहोत्रे ॥ १९॥ शुक भयका चंद्रमा शुभग्रहकि गशीके नयांशमे होये भोर करें (१४।१०) भ्यानमे गयेहोरेतामाता दीर्घायुहोवे ॥ २० ॥ चतुर्थ स्थानके स्वामि कनवांशका स्वामी जिसग्रहके नया में होने यहग्रह पलवान होकर केंद्र ( ११.) स्थानमे जावेतोमाता- दर्यायहोवे ॥२१॥ पिता मात्रा सहेय मृत्यु योग. उग्नाम्खुशास्त्रिकोणकेन्द्रगाःपितामात्रासहयाम्रियते २२ रीका-लग्न चतुर्य भौर नवम स्थानके स्वामि -२२४१/९/१० इनस्यानोमेगये हरितो पिताकिमृत्यु माता सापहीहोरे ।। २२ ।। रानो चंदात्रिकोणे मन्दे मातरधः ॥ २३ ॥ का रात्रि के समय मन्महारे भौर पदमासे १५ स्थानमे शानि गपाहारती मातामा यपहाचे ॥२३॥ माता पतिव्रता पोग. सोशेढ़े पलाये माता पतिव्रता ॥ २४ ॥ सरले वरोपिकांरो शुभदष्टे माता पतियता ॥२५॥ तुपेश शुमार्कदृष्टे माता पतिव्रता ॥ २६ ॥ रीर-राममे महार मुगा होतो मादा पतिमता ॥ २४॥ मातृ स्थगो.

(११ खेमा शपिकांशम दोरे शुभहा से दृष्ट होवतो माता प्रतिप्रर ॥२५॥ नश शुभग्राहोरे रसको शुभमद भार रवि देयता होस्तो मा ना होवे ॥२६॥ माता जारिगयोग. नरेश कुजेनयुते चंद्रसुखे पापदृष्टे माता जारिणी ॥२७॥ तुम्को गहुयुत्ते समापे माता जारिणी ॥२८॥ का-श भोर मगल इनदोनो से युत चंद्रमा रस पानमे नारे इनको पाप यह देव दहावतो माताजारिणी (पति व्रत धर्महीना). ॥२७॥ व स्थानका लागि राहु भार पापण्डोसे. युत होतो माता जी होने ।। २८॥ मातृ स्नेहयोग. आन सुखेशा पन्योन्यमित्रे शुमेक्षित युते मातृस्नेहः२९ नशे केन्द्रलेशदृष्ट पाशुभ हायुते मातृस्नेहः ३० 'का-लग्न भर मुख स्यान कास्यामि पदोनो परस्पर मित्रदोष शुभापहों से युतनपा दृष्टहापती मातासप्रीति भनिरहंगा २९ पुश-(११४.७११.१ स्थानमें गया होरे भोर समो. देखाहीरे भवशा पंद्रने गया हुवा मुमेश शुभमहसे युत दृष्ट रोमाता हरहेगा। इनपोगो नि हरिकी मातास मेर गा ऐसा मानना ॥३॥ दिषि मनायोग. सो वित्रापावर: मौम्पे एका ॥ ३१ ॥ F- स्थानमे पापमहगा रोपेतो तीन मातार भार- घरगया हेपतो एकमाता हो ॥१॥ पतु पदमुमपेगा पारो चतुपसः मुसदाः ॥ १२ ॥ . सर शुभ ररपाधि से पतामहरा : ३३ नांशका स्यामि धाराशिका होवे २भपया लाभेश या लाभ म्यान, माटीसहित टी-main मार गुपन गमिका होती मामा (गार भर पोरा गोरा) कापागा. ॥ ३२॥ मुसम्यानर शुभमाफि दरि भधिको पदका मुम रंगा ॥३३॥ पायंग्रीयोग. जीफेरो पारायणे पाल्येमुखी ॥ ३४ ॥ धर्मशुभेजगापे यंगुभवलोके पाल्पमुमी ॥ ३५ ॥ टीका-16 केल्यानमे होग भार लग्नका सामि पागातारा गपाहायला पारगारस्यामे मुम्बी रहंगा ॥ ३४ ॥ नपने भाषने शुभग्रहालग्नम पापग्रह धनभायमै शुभग्रह देवलोकांश मे हरितो पास्यास्यामे मुम्रीरहंगा ॥ ३५ ॥ नृन्दावरंमुखी रोग. शुभ-रो शुभाशो या गोपुरेनाशालरंतुषा ३६ टीका-लग्नका स्वामि शभग्रहको राशिमेनारे शुभयहीं से दृष्टहो। भयया गोपुरांशमै गयाहौधतो १६ सोलाको टमर निराद मुखी होगा।॥ ३६॥ निशतिरोधगलीयोग. लग्नेशेचापे वा लग्नेशांशो वा तथास्थितलाभेशे विंश- तिवर्षेभ्यः परंमुखी ॥ ३७ ॥ का-लग्न कास्तानि धनराशिका होत्र स्थामिकानांगका मामि धनगशिने गया। इनमीनापगो- मेसे कोई भीभेक योगदोनो) बीस वर्षको उमर होने के बादमुनी हावंगा ॥३७॥ त्रिंशदर्परः परमुखीयोग। लानेशाय शेकेन्द्र तथालाभे शायरो या शिर्पतः परं- सुखी ॥ ३८॥.. भया लग्नेश्वर

नतिक्तत्व
(१५)
-नके स्वामिका नवांशका स्वामी पंद्र (१४.५१०)
मेगया होये १ तथा लाभ (१११ स्थान के स्वामीका नवांशका स्वामि
मेंद्र () मंगयाइशेयतो २ तीस वर्षकी समर होनाने रुपया-
सखी होगा ॥३८
भापत्रपतिमुसपोग.
लग्ना दातुरीयगाःशुभाआये वसे मुखम् ॥ ३९ ॥
रग्नेशुके पूर्वादसुखी ।। ४० ॥
केंद्रस्था गुरुजन्मतनुपा यौवन सुखी ॥४१॥
टीका- जन्मल चतुर्थभावपरत (१२३४) शुभमद गर्यहोरतो
उमरखे भादिभागमें सुखा होगा ॥३९॥
लरक गपाहाती भायुके पुवाईमे सुखीरहगा ।। ४॥
कद(१।४।७५१०) स्यानम गुरु और जन्मलग्नका स्वामिगयाइवितो
यौवनावस्थामे मुखीरहेगा ।। ४ ।।
पाल्य दुःखीततःमुखीयोग.
पापाधने केन्द्रेशुभे लग्नेशेउत्तमांशे पायेदुःखितत :
मुखी ॥ ४२ ॥
सैका-धनभावमै पारग्रह, केंद्र (१०) मशुभग्रह गर्यहोवे
भौर लग्नेश बत्तमांशमै होवती बालपणेमे दुःखीरहे भार पीछेसुखी-
रहेगा. ॥ ४२ ॥
मध्यवयसीमुखीयोग
पञ्चपादाष्टममाःशुभामध्यवयसिम्सी ॥ १३ ॥
टीका, पंचनस्यानसे भाठमेस्थान पर्यंत ( ५६८) सशुभग्रह
गयेह वो मध्यायस्मा में मुखीरहेगा ॥ ४३ ॥
भायमध्यवपप्तोसमीयोग.
शुभसगैग्नान्त्यलाभगैः केन्द्रसिंहासनेजीवे आय मध्य-
घयसोः सुखी ॥४४॥

मारीसहित छानार्थसात्ये शुभरष्टियुते शुभेद् जोपाराबवे आपमध्य पपतोमुखी ॥ ४५ ॥ टीका-सानप (१२) भार धाम ()स्थानमेममंजुम प्रहगोहोरे भोर रिहासनांशमे गामा गुह मेन्द्र (ज!" स्पानमेगपाहापको भाव भार मध्यदोना भसम्पागे मुखीगा। एनधन भार तृतीयस्यान गुमडोसे गुतवहां मानमामग्री राशिगुरुपारायतांश गपाहायेतो भागभीरमायदानाभात्याम मुसीरहेगा ।। ४५॥ भस्पतपामध्यांतपपसोः मुखीयोग. धर्मादारितफगाः शुभा अन्त्येवयासमुखी ॥ ४६ ॥ देवलोकांशशुके गोपुरेलग्ने शुभदष्टे मध्यान्त्य वयसोः सुखी ॥ ४७ ॥ टीका-नयमस्थानसे यारमेम्यान पर्पत (९।११।१२) साम ग्रहगयेहोघेतो भन्यायस्यामंमुखीहोये ॥ ४६ ।। देवलोकांशमे शुक्रहीये गोपुरांशम लग्नहोये भारशुभेमहसे दृष्यहोवेवो मध्ये भौर भएदोनो भवस्थाममुखीरहेगा. ॥७॥ भानीय गुस्खीयोग. वर्गोत्तमनेन्शे वा स्वोच्चाशके या स्वमित्रयंरोपा शुभयु. उदृष्टे आजीवमुखी ॥ ४८॥ टीका-लग्नकास्वामी वगानमांशमै ( निसराशीकामन्मकुंडली मेडोवे उसीराशीका नरांश कुंडलीमेभी ) पितो १ भपवालग्नकास्वामि भपनिस्वराशि व शराशि कनवांशमेहोरेर भषवा लग्नकाग्यामी भपने-मिनगह काणमे हो भयका शुभाहो से युतदृष्ट हावतो भाजन्म (जीये जहांतक) मुखी रहेगा ॥४८॥ सुखीयोग.; शुभेङ्गेशुभदृष्टे पापयोरगहिवे.सुखी..।।..॥ पञ्चसुस्पर्शगेषु महासुखी ॥ ५० ॥... --

जातकत्व.
तालेशेजीवदृष्टे मुखी ॥ ५ ॥
भेमुखसुखी ॥ ५ ॥
खरोशुभान्तरेसुखी ॥ ५३॥
नीवेमलिनी तुर्यपयुतेसुखी ॥ ५४ ॥
केन्द्रकोणेसशुभेसुखेशे सुखी ।। ५५ ॥
रातालेशे मृदंशेसुखी ॥ ५६ ॥
उग्नेशाज्जीवे पलिनिसुखी ॥ ५७ ॥
गोपुरायशेम्बुपे जीवेचमुखी ॥ ५८ ॥
शुभशितुशे धनोपचयगेसुखी ॥ ५९ ॥
शुभान्तरेचन्द्रसुखी ॥ ६० ॥
का-लग्नमे शुभग्रह होवे भौर उनको शुभग्रह देखतेहोवे कोईभी
ग्रहका योग नहाहावेतो सुखीहोवे ॥४९॥
न्म कुंडलीमे पांचग्रह स्वराशिके (स्वक्षेत्री) होवेतो माहासुखी
॥५०॥
वस्थानके स्वामीको गुरुदेखता हवितो गुखी होवे ।। ५१ ॥
खस्थानमें शुभग्रह स्थितहोये तो मुखोदावे ।। ५२॥
स्वस्थानका स्वामी शुभग्रहोंके मध्यमे होयेतो मुस्खीहोवे ॥ ५३ ॥
लियादगुरु मुखेशसे गुतहोवेतो सुखीहोवे ॥ ५४ ।।
सुखशशुभगह से युत होकर फैन्दकोण ( १॥४॥॥१०१९।५) स्थानमे
पोतो मुखी होवे ॥ ५५॥
खेश मृदंशमे गयाहोंवतो मुखीहोवे ॥ ५॥
बग्नके स्वामीसे गर भयिक बलवान होवेता मुखीहोवे । ५७॥
उखश भार गुरु ये दोनो गोपुरादि शुभांशम होतो मसीहावे ५८
मुमेशशुभमहकी राशिके नवांश मे होवे भारवह २।३।६।१०।११ में
निमॅगयाहोवेतो सुखी होवे ॥ ५९ ।।
चंद्रमा शुभग्रहोंके मध्यमे हावतोमुखीहोवे ॥६॥

भाषाटीकासहित. दुःखी योग. .. ज्ञराव्हर्काः सुतम्था स्वभौमे रन्धेमन्दे दुःखी ॥६१॥ लग्नगाः पापा दुःखी ॥ ६२ ॥ पापे तुर्यजीवे ल्पबलिनिसघनोपिदुःखी ॥ ६३ ॥ सपापे सुखपे ऽबले सधनोपिदुःखी ॥ ६४ ॥ पापशिम्बुपेनीचगे सधनपुत्रोपिदुःखी ॥ ६५ ।। सभौमार्काम्बुपे कूरांरो शुभहम्धीनेनित्यं दुःखी ॥६॥ भोमार्कोनीचारिभागगो सुखपापदृष्टो क्रूरशिप्रमादा हाथ नाशोदुःखीच ॥ ६७ ॥ रंग्रेशेलाभे याल्येदुःखी ॥ ६८॥ लग्नेर्कजे ष्टमेराही पटे भौमे दुःखी ॥ ६९ ॥ पापान्तरे चन्द्रे दुःखी ॥ ७० ।। लग्नेशेन्त्ये खेपापे चंदार योगे दुःखी ॥ ७१ ॥ टीका-पंचमस्थानमे सुधरादुभौर मूर्य, चौथस्थानमभौम, भाउ स्थानमे शनि गयाहीयेतो दुःखीहोये ॥ ६१ ॥ लग्नमें पापग्रहगंय होयतो दुःसीहोय. ।। ६२ ।। मुसस्थानमे एकपापहनाये भौर गुरू भरुपयलीहाये तोसधन होनहवेभीदुःसीहोयेगा ।।६।। गुसस्थानका म्यामि पापग्रहसे युतहोये भौरवहनियलीहो तो सधन होने ये भी दुखीहोरे ।। ६४ ॥ ससस्थान का स्वामि नीचरामी मे गपाहार भोर पापग्रहकी ी से नवांशमै होमो मधनं भौर पुन यालाहोतेहुवे भी दुःसीडीयगा! मुसम्यान का सामि पापग्रह नवांशमार गमगरसेगा भौर अमग्रहोम वरनहीं दोनोनित्य दुबईगा. ॥६६॥ भूपं भौर मंगल यंदानो नीचा भार पापग्रहको राशिफ्नशमे मातकवत. स्पतहोकर मुखस्थानमेजाव भौरपापग्रहोसे दृष्टहावेतो अपनेप्रमादसे ह धन भादि का नाशहोरे भोर दुःखीहोरे ।। ६७ ॥ भष्टमस्थान का स्वामि ग्यारखे स्थानमे गयादवितो वाल्या वस्थामे दुःखीहोवे ।। ६८॥ लग्नमशनि, भाठमराहु, छठेस्थानमभौम, स्थितहोये तो दुःखीहोर पापग्रहोके मध्यमे चन्द्रमागयाहोवे तो दुःस्त्री होये ॥ ७० ॥ लग्नेशवारमे स्थानमे, भौर पापग्रह दशमेस्थानमे, गयाहोवे भौर चंद्र नगलका योग कोई भी स्थानमें हुवा होवेतो दुःस्वी होवे ॥ १ ॥ भूपिका माार श्वादिदुःखदयोग. मेषांरो मूपिका मार्जारं दुःखदम् ॥ ७२ ॥ सिंहांशे श्वावदयो दुःखदा...७३ ॥ कन्यारो ग्निकणा दुःखम् ॥ ७४ ।। टीका-कारकांश मुंडलीम मेष राशिका लग्नहोतो मूपिका (चूहे) भौर पिल्लो दुःखदेवेगे ।। ७२ ।। कारकांश कुंडलीमें सिंहराशिकालग्न होवेतो श्वान वगैरा दुःख देवेगे ॥ ५३॥ कारकांशलग्न कन्याराशीका दवितो भग्निकण (तणब्या) वगेरासे दुःखहोवेगा ॥७॥ प्रसादवानयोग. नुफैशाचन्द्राच्छौ प्रासादवान् ॥ ७५ ॥ तुर्यशादुच्चग्रहे प्रासादवान् ।। ७६ ॥ अंशानुर्यराव्हर्कजी प्रासादवान् ॥ ७७ ।। टीका-कारकांश कुंडलीम चतुर्थम्यानमें चन्द्रशुक्रकायोग होतो मासाद ( रामाभोंक महल के समानमहल) वालाहोवे ॥ ७५.।।. कारकांशलग्नसे चतुर्यस्थानमे उराशीका ग्रहगया होवती मासाद पालाहोवे ।। ७६ ॥ फारकांश लग्नसे चतुर्यस्थानमे गहु शनिकायोग होवती प्रासाद पाला होवे ।। ७७॥ .

भापाटीकासहिन. इष्टिकाग्रहयोग. केत्वारोतुपैशा दिष्टकागृहं ।। ७८ ॥ टीका-कारकांशलग्नस मतुर्थस्थानमे केनु मंगल का योग होवो ईटसपनाया मकानहोये ।। ७८ ॥ काष्ट ग्रहयोग. सुसंशाजीचे काटगृहम् ॥ ७९ ॥ टीका-कारकांश लग्नस मुखस्यानमै गुरुगयाहोवेतो लरहोग मकान ( जिस्मे लकड़ीनादे लगीहोवे यैसामकान ) होये ॥ ५॥ तृगगृहयोग. सुखेशा दर्के तृणगृहम् ८० टीका-कारकांश लग्नसे सुखस्थानमें मूर्यगयाहौवतो तृणगृह (एस फाधर ) होवे ॥ ८॥ विचित्रगृहयोग धर्मपेकेन्द्रे गेहेरोस्वोच्चमित्रगे तुर्यतुंगगेग्रहेविचित्रगृहमू८१ खतुर्येशो चन्द्रमन्दयुतौ विचित्रम्वेश्म ८२ टीका-नामेभावकास्वामी केन्द्र ( १॥४॥॥१०)स्थानम, चतुर्य फास्यामी स्वउच्च भयवामित्रराशिका होवे भार चतुर्थभाव, वर राशिमें गयाहुया कोईभी ग्रहस्थितहोचे तो विचित्रग्रहदोवे ॥ ८॥ दशम भोर चतुर्थका स्वामि यदोनो चन्द्रशनिस युतहोवे तो कि गृहोवे ।। ८२ ॥ हयंप्राकारादियतगृहयोग. मोत्थेसौम्ये तुर्येशबालिनि गृहशेशे वलपुर्गे हयंप्राकारा युतगृहम ८३ तुपसिंहासने गोपुरे मृदंशे वा हर्नामाकारादियुतगृहम्८ का-तीसरेभावमें शुभप्रहहोवै चनुर्येश बलगन्होये और मनु स्थानके स्वामिका स्वामि (चर्यभारकास्वामिनिसराशिमगयाही उसकास्वामी पूर्णवलवावदोके तो देवता,राजा, भौर टेवनयानों रहनेयोग्य चोगिकिद संवेष्टिन उत्तममहलहोवे ।। ८३ ।। r -- .

नातकतात. चतुर्षभावकाहानि सिंहासनांश गोपुरांश भयया मृदंशमें गयाहोवे तो राजाभाऊरहनेयोग्य उत्तम महल होवे ।। ८४ ॥ देविवेश्मयोग. गृहेशे पारावते गोपुरे वा चन्द्रगुरुद्दष्टे देषिकवेश्म ८५ लग्नांबर्थेशा यावन्तः केंद्रकोणेतावन्तो गृहाःशोभनाः ८६ टीका-चतुर्थभावकास्वामि पारावतांशमै भयवा गोपुरांशमें होवे भौर वह चन्द्रगुरुसे दृष्टदोर तो देवताभासमान यद्वादेवतायुक्त उत्तम महल होरे । ८५॥ लग्नेशचतुयश भार धनेश इन तीनोग्रहोमसे जितनेग्रह केन्द्रकोण (१।४।५।०९१० स्थानमें गयेहोवे उतनहीगृह भच्छे सुंदरहोवे ८६ गृहलाभयोग. लग्नेशेम्बुगे सुखशेङ्गे गृहलाभः ८७ गेहेशेषलाढये केन्द्रे शुभदृष्टे गृहलाभः ८८ मुन्वेशे वेरोपिकांसे परमोच्चगे गृहलाभः ८९ तुर्येशांशशाशेशे केन्द्रे गृहलामः ९० लाभार्थों तुर्येतुर्यपे वैशेषिकारो शुभहग्योगेरव्हर्थगृहं लभ्यते ९१ टीका- लग्ने सवभाव, भौर चतुशलग्नमें गयाहविता गृह लामहोवे ।। ८७ ॥ चतुयश चलवान होक केन्द्र (1) स्थानमें गयाहो शुभ- ग्रहसे दृष्टहोतो गृहलामहोवे ।। ८८ ॥ परमोच्चराशिमे गयाहुवा मुखेश वैशेषिकांशमें गयाहोवेतो गृह- लाभहोवे ।। ८९॥ चतुर्थेश के नवांशका स्वामी निसराशिम गयाोवे उसराशी के 2. स्वामी का नशंश का स्वामी केन्द्र (४१) स्थानमें गयाहोरे तो गृहलाभ (घरकालाम । होरे ।। ९ ।। . -- दुवेभीभपने कबजेमे भाजाव २दसरा भपने जन्मदाता मातापिताको (१५८) मापाटीकासहित.. पन २ भोर माम ११ भाव स्वामी गनुर्पमात्रमहोवे भौर चतुः भाषकास्वामी बैशेरिकांशी गपाहार शुभग्रासे गुतहरदोई तो बहुद धनसहित परकालाभहो ॥११॥ भरूस्माराछामपोग. तुर्याङ्गपो तुर्ये करमामुदानिः ॥ ९२ ॥ टीका-लग्न भौर चनुभावका मामी ये दोनों चतुर्थ भावले गये होवेतो भस्मात् गृहका लाभहोते १ यदिपदोनो नग्नम गयहोरे भोर भपनी उच्च, मित्र, तथा स्वराशीमहोते शुभग्रहों से दृष्टहविता भाव श्यं विनाप्रयनकियेही घरका लाभहोवे ॥ ९३ ।। दत्तकयोग गृहलाभ योगभी. २ भेद । १ धर्मार्थ किंवा बक्षीस कोई मकान मिलनाये भयवा भपर्नदर नमीफ रिस्तवालका मकान दत्तमननाने छोर दूसरे मातापिताके यहांदत्तक (गोंदमे ) जानेसे घरभारसंपनि- कालाभहोव। उपरोक्त गृहलाभयोगासे इसदसकमानेके योगम नन्मदाता माना पिताके मुमकी हानी भौर दूसरे माता पिताके पर भौर संपत्ति । लाभ होनेकी विशेषता होनेसे दत्तक गयेहुवे कितनेही मनुष्योकि कुंद्र लियोपर ताविकाविचारद्वारा विचारकरनेसे जो ७ नियम इतर मोगके भनुभवमै भाये वेइसग्रंथके पाठकोंके भनभवार्थ प्रकाशित करनेमे भातेहै। (१) कर्क भथवा शिंहराशिमें पापग्रहगयेहोवे । (२) चंद्र भपका रवि पापग्रहोंसे युक्तकिंवा दृष्टहोवे । (३) चतर्य भयवा दशमस्थान पापग्रहगयेहोवे । (१) मे, सिंह, धनु किंवा मकर इनराशियशमसे कोईभीएकराई चतुर्थ भयरा दशमभावमे गईहोवे । (५) चंद्रके चतुर्यस्थानमें पापग्रह गयहोवे । ६) रवीके दशमस्थान भयवा नवमस्यानमें पापग्रहगयेहाये ! (७) चंद्र भपका रवीये शत्रुक्षेत्री शबण्हसे युक्तहों तोदनकमाने मातंकतात. गृहलाभहेगा । जोलोग दत्तकगयेई भयवानोमानेवालेई ननकी- मन्मकुढलीमें इन ७ योगामेसे भेक दो तीनयोग भवश्यदेखने में भावेगा, यदि भेकमी योगदखने में भावे तो नोतिषको झुठामान- नेवालोका कपन सत्यसमझना । गृहनाशयोग, पावन्तः पापाः साम्बुस्वान्त्यनाथैः सहिता निकस्था स्तावन्तोगृहा वन्हिनादान्ते ॥ ९३ ॥ राव्हर्कोअंशे कुजमानदृष्टे गृहदाहः ॥ १४ ॥ तुर्येशेषष्ठे पापदृष्टेगेहनाशः ॥ ५५॥ गेहेशांशशेषष्ठे गेहनाशः ॥ ९६ ॥ तुर्याङ्गगर्थेशा यावत्पापर्युता स्वावन्तां गेहानांनाशो- नतुशुभदृष्टे ।। ९७ ॥ केन्द्र केणे गेहे शैथिल्यप्रयुक्त पात भयम् ९८ तुर्येशेरन्ये स्वयमेन गेहं पातयति ९९ टीका-नितमे पापनाशम, चतुर्भ,धन, भौर पारमे, भाषफेस्वामि पास युक्त होके ६८१२ स्थानमेगपे होवे उतने हीघर भग्निसे मलना रंग ७३ कारकांश लग्नम राहु मंगपहो भौर इनको केवल मंगलही दमता होवे तो भग्निसे घर जलेगा ९४ सतुर्थेश रठेभावमै पापग्रह से हारतो घरका नाराहावे १५ चधेश के नवांश का स्वामी स्थानमै गपाडीचे तो परकानाश- मौवे. १६ मनु लग्न भी धन इनतीभार के स्वामि मितने पापमो से तिहोवे उतनेही पो का नाशहाचे भौरपदि ये शुभकास होतो कानाशनहीं होगा ९५ केन्द्र कोग (Mit.) स्थानमें रगिस्पिनीरता पुराना होनसपर पड़नेका भपाई ९८ मापारीबाराहीन. मनु भाउने भारमें गो गाही परफोगनाई १ बहराइनासोग तुर्यतत्पीचरसे कारके या तया यह गृहयामः १... टीका-पर्यभार भौर उमा मामि ये दोनों पर राशी के तो भयया चनुपंमारका कारक ( मंद गुप) भरराशी का हो तो बान परमे रहन गला (भकयाम कभी भिरमाम नही करने वाला होने १०० स्पिायासमोग. गृहतलो स्थिरे तथा काग्के या स्थिग्यामः १०१ शुभपष्ठघरो तुर्य स्थित्वामः १०२ टीका-चतुर्थभाव भार उसकास्वानी यदोनो स्थिराशी होते भया चतुर्यभायका फारक [चयुध ] स्थिरराशी होती भेरही पाने स्थिरयास करनेवालाहाये. १०१ चतुर्यभार शुभपष्ठघंशमे होवे तो भेदी घरमे स्थिरवास करने- पालादोवे १०२ पक्षेत्रमा योग. खे सुखेशे कौरोम्बुगे बलिनिभीमे बहुक्षेत्रवान १०३ . . बलाढ्यौ खाम्बुपौ परस्परसुहृदो बहुक्षेत्रवान् १.४ . , तुर्यतत्पो शुभयुती बहुक्षेत्रवान् १०५ तुयशेसुते गोपुरायरो वहुक्षेत्रवान् १०६ टीका चतुर्थेशदशमभाव भौर दशमेशचतुर्थस्थानमे गयाहोघमंगल- बलवान्दोवतो बहुतनमीनवाला ( वडा नागीरदार ) होवे. १०३ दशम भौर चतुर्थ भावके स्वामी बलवानहोवे भौर भापसमैदोनो मित्रमहोये तो बहुतजमीन वालाहोवे १०४ चतुर्थभाव भौर चतुर्थ भावकास्वामि येदोनो शुभग्रहसयुत होतो सहुत जमीनवालाहोरे १.५ चतुयश पंचमभावमें गोपुरादिभशमे गवाहोवे तो बहुत जमीनवाला - . + क्षेत्राप्तियोग. पलिन्यङ्गेरोम्बुगे बलिन्यम्बुपेङ्गे शुभहग्योगे स्वपराक- माक्षेत्राप्तिः १०७ भ्रातृपेण तत्कारकेण या युते तुपेशे भातृतःक्षेत्रातिः१०८ स्त्रीकारकेम्बुगे क्षेत्रपेप्ने तयोर्मेन्या फलवतःक्षेत्रानिः१.९ पष्टेशेतुपे तत्पेपछे पष्ठेशतःक्षेत्रपेधिकवलेशत्रुतःक्षेत्रातिः११. /गेहेशेवराशी घलिन्युपचयगेशुभदृष्टे बहुक्षेत्रानिः १५" टीका-बलवानलग्नेशमुखभावमे,भौरबलवानचतुर्येश लग्नमेंगयाहोवे शुभग्रहसे युत दृष्टहोवे तो भपनेपराक्रमसे जमीनकी प्राप्ती होये १०७ तृतीयभावकस्वामीसेभयवावृतीभाषकैकारक(मंगल सेंचतुर्थ भाव फास्वामि युतहविताभाईसे जमीनकी प्राप्तिहोवे १०८ सीकारकग्रह [ शुक्र ] मुखभावमें भौरमुखभावकास्वामी सातमें भावमें गयाहोवे येदोनो परस्परमित्रग्रहहोतो त्री से भयषा घीके संबंधसे जमीनकीप्राप्ती होवे. १०९ उठेभावका स्वामि चतुर्थभावमें भौरचतुर्थभावकास्वामि उठेभावमें गयाहो छठेभावके स्वामीसें चतुर्थेश भधिक बलवान होवता शत्रूसें जमीनकी प्राप्तिहो ११० चतुश स्वराशिका होवे भौर बलवानहोकर १६१०११म भावमे- शुभग्रहमे दृष्टों के गयाहोवे तो बहुतनीनकी प्राप्तिहोये १११ क्षेत्रादिनाशयोग गेहेशेनीचारातिमढगेपापान्तरेपापदृष्टक्षेत्रादि नाराः ११२ पापान्तरे कुजे पापदृष्टे फरशिक्षेत्रादिनाराः ११३ तुर्येशे करपष्टयंशे तुर्येपापे क्षेत्रादिनाशः १४ तुपेशेत्रिके क्षेत्रादिनाशः ११५

मारीकारादित
गहरो सरापे नीचारिभे क्षेत्रादिनाश: ११६
फर्मेरो घुगे सारे क्षेत्रनाशः ११७
फरमृत्युपमापंशे सपेरो क्षेत्रनाराः ११८
सेसपो राजकोपात क्षेषनाशः ११९
विशारोशिश्वरेणसहिवेऽपाम्बुपे राजकोपाद
क्षेत्रनाराः १२०
टीक-चतुशमीच शगीका भाया भस्तंगतोय पाराहाके
पीच भोर पापमहांस दृष्ट होये तो गनीननापदामा ना १२
पापग्रहके मध्य मंगलगवाहोरे पापाग्रहास रच भर करमको
राशिकमयांशी इयती नमीनगाय दादफा नाराहावे ११३
चतुर्थेश फरपष्टयंश (पास्पष्ठवंश) मेरो और चतुर्यस्यानम
पापग्रहगयाहीवनी ममीनतापदादका नामहोत्र १४
चनश६८१२में भावमेगयाहवतीनमीनवगैरामा नाराहारे ११५
चनुज्ञ धनभायमे पापग्रह यतहोने नीम या शाई
गयाहार तो जमीन जायदादादि सम्पत्तिकानाशांचे १९६
दशमभायका स्वामि पापग्रहसे युतहोके चतुर्थभावमै नायेतो नम
नका नाशहारे ११७
क्रूर,मन्यु,यम, भादि दुष्टपष्ठ,शमे गयाहुवा दशमभावकावार
वर्षभावयें गयाहौरतो जमीनका नाशाहोये १२८
सूर्य भौर चतुर्थभावकावामी येदोनो दशम भावमेगये होवती राम
के कोपमे जमीनगनाशहोत्र ( राजाजमीनजप्तकरलो) ११९
धनेश के नयांशमा स्वामी जिसराशिक नवांश होये उसकस्बा
संभौर पापग्रहमें चतुर्थभाव स्वामी शुतहार तो रानाक कोपर
ममीनका नाराहावै १२०
भूमिविनायोग.
गेहेरोतुझे थेशपापेनीचारिभे भूमिविक्रेता १२१
-तुर्थेश उच्चराशिमें भार नीच तया शत्रु राशिमे गपाडवा

जातरवल.
.
धनभावका स्यानि पारग्रहहोये तो जमीन वने पालाही १२१
पत्रममित्रवायोग.
सुता शामित्रत्वे पुत्रोमित्रम् १२२
टीका-रमेश भौर साशक मित्रानो पुत्रले मित्रतारहे १२२
घांतःप्रीतियोग.
रानाङ्गेशमित्रत्वे स्त्रो मैत्री १२३
टाका-मेश और लाश के मित्रताहोतो खीसे निघतार १२३
बहननमैत्रीयोग,
सुग्वाङ्गेशमित्रत्वे बहुजनमैत्री १२४
सुसेशुभदृष्ट्याधिक्येबहुजनभित्रता १२५
टीका-मुखेश मोर लाश के मियताहयिती पहा मनुष्यों से मित्र.
ताहोरे १२४
चतुर्थ भार शुभग्नहोंकि दृष्टि भविकदोये तो बहुतननो मित्रता.
होये १२५
सहपापपोग.
द्वयोभित्रक्षेत्रगयोः मुहतोयः १२६
टोका-केनी दोरहभियतशिने गयेहीवनी मिय का पोषगकरने
पासाहोरे १२६
যায়ী,
सुबमोम्ये माग्यदृष्टे सुम्य कारकैवलिनि बन्यायः १२७
गेहे जीये गेहपे शुभते जोरदृष्टे बन्धुपज्यः १२८
नुर्यघाचे स्वमित्रभे या खेरे गुरु रन्धुपुज्यः १२९
निभरस्वगै पधाग्यः १३०
टीका चनुभाग में गया। शुभा शुभाइ से होवे भौर शुभ
मारक पर होतो पापक (माननीप)
से १२७
चतुर्थ भाव गमागहरे भाका हानि भाइ से एत मौर
गुह होती पवर्गकाम्प (माननीय) होर. १२८

माटीकामहित.
कोर भी पार्ष भाम भानी समस, मिस रात्रि में
गमा होरे भोर गुरु से रोष मो मान मर्ग का प्रत्याशी १२९
कोहभी वनगा भरनी सरालिम गोरे तो 4ysगंगाल
कापुर कार फना माग.
केन्द्र कोणे सुसेरो योपिकांगे पापटग्योगहीने पन्या
काररुत् ११
तुपे सोम्याःपन्धुपकार कृत् १३२
धनशे थामेत्रिकोणे गेहेशुभदृष्टे बन्धुपकाररुत् १३३
गेहेरो केन्द्र शुभारो पन्धुपकार कृत् १३४
चतुर्प महेषु सहदेहयेषु पंधुपोप्पः १३५
टीका-मेपिकांश म गयारा चतुयेंश फेन्द्र कोण[RIMer
स्थानमें गवाहोवे भौर पापगहों से युत दृष्ट नही होरे तो पन्धु
का उपकार करने वाला होवे १३१
घतुयंभावमें भधिकशुभग्रह (युध गुरु शुक) गये होवे तो बन्धु व
का उपकार फरने माला होवे १३२
धनभावका स्वामो नपपांचमे भयवा लाभभावमे गयाहोवे भी
चतुर्यभावशुभग्रहसें दृएहोये तो वन्धुजनपर उपकार करनेवार
चतुर्थभारका स्वामी शुभग्रह के नवांशमहोवे भौर केन्द्र (१॥४
स्थानमेगयाहोवे तो बंधुननपर उपकारकरने पालाहोवे १३४
कोइभी चारह भाने मित्रमद की राशिमेगहोवेनो बंधुनन के
पोपणकरने वालाहोवे १३५
पंधुभिस्त्यज्यतयोग.
तुर्यपे क्रूरपष्ठरोल्पवीर्य बन्धुभिस्त्यज्यते १३६
-चतुर्थेश पापग्रहसे युतहोवे फरषष्ठवंशमहोवे भीरभरपवर
भपया नीच शत्रु राशिम गयाइवितो बन्धुननासे त्याग
होवे १३३

पन्धुमध्येकुत्सितयोग
धुनाथे बहुपापयुते तथैव कारके बन्धुमध्ये कुत्सितः१३७
का-चतुयश बहुत पापग्रहोस यतहोये भौर चतुर्थभावका कारक
सुध ) भाबहुतपापग्रहांसे युतहोघे तथाचतुर्थ भावभीपापयुत होग
न्धुननो मे निन्यहोये १३७
पंधुद्वैपायोग
आपातुर्ये नीचास्त खगयुते शुभग्योगहीनेयन्धुरेपी:३८
का चतुर्यगावमें पापग्रह की राशाहीवे भौरउसमें नीय मस्त
मेगयावा ग्रहयुतहोवे किसीशुभग्रहसंयुत दप्टनहीं होचतो. पन्धु
का देपीहोरे १३८
पप्पशायीयोग.
अन्त्येशेशुभ सम्पन्चे शुभवर्गे स्त्रोच्थेना पर्यशापी१३९
व्ययेशपपिपिशुभव शपनसुखम १४.
-का-बारवे भाषकास्वामी शुभग्रहसेसंबध (संज्ञातंत्रस्न ६४मेकाहे
मे ) करताहोरे शुभग्रहों के दशवर्ग होयै भयया भपनी राशि
चाहो तो पलंगपर शपन करनेवाला ( उत्तनमान नुनधान् ]
विमायकास्वामि पान्ग्रहहोये भीर यदिहशुभग्दो फे पगमे
होय तो शयनकामुख भच्छाहोरे १४०
शयनसुबाभावयोग
व्ययेशेषापसम्बन्धे शयसुखाभावः १४१
लग्नेशेषिके शयनमुखाभायः १४२
नीचेङ्गेशे शयन मुसाभारः १४३
देहोरन्दमान्यगुयुने शयनमुखाभावः १४४. .
इतिचतुर्थविवेकः
टोका-अपेश प्रापमहसे सम्बन्धकरताहोपतो शपनकासुननहीं

माटीमा
नेशनिक (६८) स्थानमे गपारोपेतो शपनका एमन
होघ १४२
बग्नेश मीनराशीका हो तो शयमका मुमनहरण
लग्नेश शानि गलिक क्या संयुतहरितो शयन का 'मुबनी
रोपे १४४
इसफेसिवाय गाईधनकारिचार' पुत्रकाम्यप, पत्रका मुसारी
पुनकाशयनसुख. श्री का पिता, मालिकफीमी' हरये, दादाकाराग्य
मानग्यपार, दादीफी माताका मुख, दसकलानेकापियार भाहिरिएप
भीरतुर्थभाषसेदेखना।
इतिपर्वपिरेकस्पटीकासमाताः
भथपञ्चमयिक।
पुदिमानयोग.
सतशुभे शुभदृष्ट युते पुद्विमान् ।
सुतेशेतुङ्गे वा शुभान्तरे बुद्धिमान २
गरी केन्द्र कोणे बुद्धिमान ३
शुभभे सुतेरो सतेजीवे मुदिमान ४
ज्ञे सते वा सुतेशे बलिनि केटेवा पुद्धिमान ५.
का-पंचम भाषमै शुभमई की राशी शुभमासे या-रोमो
दिमार हो ।
पंचम भावका स्वामिभपनी राशि गपाहोरभया शुभप्रद
के मध्य रोपे वो चुदिमारहोगे
गुरु फेन्द्र कोण[ ९ स्थानमें गपाहीये तो पुस्टिमार
पैरमेश शुभप्राकाराशि [V इनराशि पौमसे कोई
भारामी मगयाहोरे भोर पंचम भावमे गुरुहोये तो विमाहोरे
है.

मावस्वास. FOpt1 " सुध पाचमे भाषम गयाहोवे गवा पंचमेशवलवानहाये २भयरा पंचमेश बलशान होके केन्द्रमे गयाहोरे । तापदिनाद हो - विशेष बुद्धिमान् योग. पुत्रेशे केन्द्रे शुभान्विते धारणादिष्ट सुतेरो कारके मृवंशादियुते शुभहायुते, धारणादिपटुः . सुतो गोपुरानो धारणादिष्टः ८ सतकारके गोपुरादौ पेरङ्गितको मेघावी ९ टीका:चिमेश केन्द्र :) स्थानम् शुभग्रहसे गत होतो धारणादिपटु [ कोईभीवात मकरसन सुनुलेनसे याद रखने समझने भादिमे विशेषचतुर मुद्धिवाला होने ६ पंचमेश भार पंचमका फारक['गरु मृदुभादिशुभपश मे होपे भार शुभग्रहसे दष्टहावे तो धारणादिषटु हो : int पंचमेश गोपुरादि भामें होवेतो धारणादिपटु दोष ८ पंचमका फारफ [गुरु गोपरादि भंशम होघेतो दूसरेके भभिप्राप को उसकीयष्टा परसेहीसमझलेने पाला भार मेधाषी (पारणापति. इदिशाला),होरेर muो. शिमोत्तरदानशीलयोग. शेन्डाराणा मुपरि बलिमह दृष्टो शिमोत्तरदानशीलः।। का-मध चंद भार मंगल इनतीनाप्रपर मलबान शुभग्रहको रवि गरता हामरभराव (तुरंतउचित जगबनेगळा ) होणे : पंव धी योग. एग्न कोणे चन्द्राको चउधीः ११ केन्द्र जीरे चंचलपी १२ सोम्येये ऽपले पाष्टे चलचितः १३ टीका-हानमे तथा ९५ भाषमे रविवंद गोतो यक पुषि पालादेखि ११ केन्द्र स्थानमें गुरुगपाहो तो पंचक बुद्धिमाशाहोरे ११

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(१९८)
भाषाटिकासहित.
धनभायमै बुध निर्मलीहो गयाहो भौर यह पापणास दृष्टीदेखो
पलचित्त [ भस्थिरावन याला ] होये १३
सावियोग.
ससोत्थरे जे सांलिंकः१४
की-तृतीय भाष लामासे युध मुगदोपे वो साविक मा
पाला होये १४
मुरारपोग
ध्यपेरोने: सुपाक् १५
का-पपेश लग्नमें गयाहोये तो भाछा मदर पोलने पासा गरे ।
विस्मयशीलयोग.
त्रिके चन्द्रे शुक्र दृष्ट विस्मयलशीट: १६
सपापे सत विस्मयशीट: १७
भी कारके सपा पा परपष्ठपंरो विस्मयशीरः १८
रीका-विकरयान [ १८१२ ] में गपापा चंदमा, शुभ र
तोरिस्मरण पुदिशाला १६
पंचमेस पापपा युरोप तो विस्मरण पुदिनाला १०
युटिक(ध)
पासपनो मा पुदिपाय
माया गपारितोरिस्मरण पादयसा होगे १८
निधीयोग.
हग्ने चन्द्र मन्दारदष्टे हीनधीः ।
पुगतेरो पटपंदो हीनधा..२०
मंदाराको मन्दं पश्यन्ति मस्र्पगः २१
the-गयाराम Ratnagirint
नाम की महिमान बनी चोर ॥
भाग
इंगमा पन्देन्ट गुटिका-:२२

नातकतत्व.
धनेगुलिकाकों पापदृष्टो वा सार्कजेसोत्थपेजड़ः २३
सपाप धनेशे से समाजड़ः २४
सतमसि सोत्थपे जड़ः २५
सुतेभन्दे लग्नेशे भन्ददृष्टे सुतेशेसपापेजड़ः २६
गुलिकार्कजोसुते शुभयोगहीने जड़ः २७
सुतेजी मेधानाश: २८
सका-शनिचंद्र मार गुलिक येतीनो केन्द्र (११४१७१०) मेंगयेहो-
पतो नबुध्दि [ महामूर्ख ] होवे २२
धनभायमें गुलिफ भार सूर्य गहोये इनदोनों को पापग्रहदेखतेहोवे
१ भयका तृतीयभावका स्वामि शनिसंयुतहोवती नइदिही २३
पापग्रइसेयुतधनेश दशम भावमे गयाहोयतो सभामेजदहोवे भयात्
सभामेकुटपालनासके २४
तीसरभावका स्वामि राहुसे युत होवतो जहहोवे २५
पंचमभायमेगपाहुया शनि, लग्नेश को देखताहोवे भौर पंचमेश
पापग्रहसे युतहोवे तो नरहोये २६
पंचममात्रमें गलिक शनिकायोग फिसीशुभग्रहसेयुतनदोहोवे तो
महा २७
पंचममारमें गुरूगपाहीयेतो मेघानाश ( धारणारदिदिकाना)
रोपे २८
याक्षिस्योग.
अरोकेतीशुक्रमात्रदृष्टेयाज्ञिकः २९
टीकाकारांश लग्नमे केन केरलशुको दशहारे तो यज्ञादिक
काह करानेगाराहोवे २९
मांकियोग.
अंशाकोणे पापये मान्त्रिकः ३०
अंशात्कोगे पापये पापोभूतादिनिग्रहका ३१
अदाकोणेपापे शुभदृष्टेनुपाहकः ३२

(१७०)
भाषाटीकासहित.
टीका-कारकाशलग्नसे पांचमे भौर नवम स्थानमे कमसे भैर
पापग्रह दानोस्थानमे गातोमांत्रिक (मंत्रवेत्ता ) हारे ३०:
कारकांशलग्नसे नवमेपांच में दोनोस्थानमेएकर पापग्रहगर्यहोवे भौर
सनको पापग्रह देखते होवतो भूतादिकों का नियह ( प्राविध)
फरनेवालामांत्रिक हो। ३१
कारकांशलग्नसें नयमे पानमेस्थानमें गपहुवेदोनो पापग्रह शुभग्रहस
दृष्टहवितो लोकोपरमंत्रादिद्वारा भनुग्रह करनेवालाहोवे ३२
भिपयोग.
अंरों झेन्दुशुकदृष्टे या धनेभिषक् ३३
शुक्रेन्दुदृष्टेशे रसवादी ३४
सशुभराव्दकविंशपापयुतीविषयः ३५
टीका-कारकांश लग्नकों बुध, चंद्र, शुक ये तीनो ग्रहदेखते हो।
भयषा धनभायकों ये तीनोग्रद देखते हो तो भिषक (मेय हो ।
फारकांश ठग्न शुरुवन्दसे, दृष्टहवितोरसायनका सपपोग काने
पाला रसपैय होये ३४
कारकांशलग्न में राह रवि, शुभ भार पाप दोनो प्रोसे था
तो विषय[षिका विशेष पयोग करनेवाला य]
लग्न, रवि, चंद, मंगल, भौर दशम भाव इन पांचों में से भार
तीन किंवा पांगहि यधिक राशिम भषवा गृधिक शशि मांश
गि धिराशि गगक भंशमगपाप तथा भग्निराशिम त
इसमाला कालराशि [६]म तथा ३ा६ राशि भंश होतोय
शेगा.
येप्पाकारगपांग.
अर्थमुवपो शान्जीये याकरणः ३३
बलिनिगुरोतगे रविगुकटेशाब्दिकः ३०
वाशिम ..३५ प ७.७२.न.
41. ६.२८ १५.७.'
४४.११.२, 10 11 12.01.-१३

नातकतत्व (१७१) टीका-कारकाशलग्नसे धनभावम तथा पांचमे गुरुगया होवेतो वैयाकरण होवे ३६ धनभावका स्वामी गुरु पूर्णवळवारहोवे भौर उसको रवि, शुक्र देखते होवतो वैयाकरण होवे ३७ मीमांशकयोग. धनेसोत्थे शुवेशाज्ञज्यो मीमांसकः ३८ टीका-कारकांशलग्नसे दूसरे तीसरे तथा पांच में स्थानमे पुध गुरु गयेहोवे तो मीमांशा शाम्रज्ञदोवे ३८ तर्कज्ञयोग, अंशात्सतार्थसोत्थे जीवारौ वार्किकः ३९ जीवाच्छौधनेशोरव्यार दृष्टौतार्किकः ४० जीवाच्छौतुङ्गस्वर्भ त्रिकोणगौ तार्किकः ४१ टोका-कारकांशलग्नसे दूसरे तीसरे सपा पांचम भापमे गुरु मंगल गहवितो तर्कशास्त्री होवे ३९ द्वितीय भावका स्वमि गुरु भयत्रा शुक्र होवे और उसको रवि मंगल देखते हारतो न्याय शास्त्री होवे ४० गुरु भौर शुक ये दोनोभपनी उच, स्व, भपवा मलत्रिकोण राशिमे गये दोयतो न्यायशाम्रज्ञ होवे ४१ सांस्यतयोग. अंगाधने पुत्र सोत्थे जीवेन्द्र सांस्यज्ञः ४२ टीका-कारकांशलानसे दूसरे तीसरे तथा पांचमें भारमे गुरु मंद गौरतो साम्यशाम्रा हारे १२ गागततयोग. अंशात्सोत्ये सुते केतुजीवी गणिवतः १३ पनेमामे गुभदृष्टे गणितज्ञः ४४ चंदारोधने तरटो केन्द्रग्थे वा कुजे गणितज्ञः १५ । --- - - - (१७२) भाषाटीकामाहित. धनेशजेवाचे गुरोलग्नेनमे मैदे गणितज्ञः ४६ जोपकेन्द्रकोणे स्वाञ्चशुक्रज्ञयरो या घने गणितज्ञः १७ टीका-फारकांश लग्नसे दूसरे, तीसरे भषया पांचम भाव के भौर गुरु गये होये तो गणितशास्त्र का जाननेवाला होये ४३ धनभायमें मंगलगया होये भौर यह शुभ ग्रह दृष्टकोवे तो गणित शाका जानने यालाहोये ४४ धनभायमे चंद्र मंगल का योग होवे भौर उनको बुध देखवाहोवे । भयषा केंद्रस्थानमे बुध किंवा मंगल गयाहो तो गगित शामका माननेवाला होये ४५ धनभावका स्वामि बुध भपनी टचराशि ( कन्या राशिम १५ अंश तफ) में, गुरुलग्नमें, भौर शनि भाठमें मायम गयाहौवतो गणित शाम्र जानने वालाहोवे ४६ गुरुकेंद्र त्रिकोणस्थानमें शुम भग्नी उमराशि ( मीन ) में और बुध धनभावकास्वामीहोर वा धनभाव मे गया हो तो गणितशास माननेवाला होवे ४७ जिसके गणितज्ञ योग होताहे वह गणितका जाननवासा ज्योतिषी भपया गणितशास्त्री किंवा हिसावतपासनेवाला [भकाउन्टेन्टनम या इंजनियर, भोवरसीयर, सेटलमेन्टभाफीसर, रेव्हेन्युभाफि साइन्सजाननेवाला, पैमायशजाननेवाला, रोकड्या, समानची, हि घरखनेवाला, जमाखर्चनविश, भादि गणितसे संघरखनेवालेका से ग्रहयोग के बलाबल तारतम्यभेदेके अनुसार कोईभी गणितकान करनेवाला होगा। ज्योतिर्विद योग. ज्ञाच्छो सोत्यार्थगौ ज्योतिर्विदष्टिः ४८ धनेरोपलिनि केन्द्रायकोणेने ज्योतिर्षियामेष्टः ४९ स्वोधनजीवे ज्योतिर्विदग्रेिट५० टीका-बुध शुक्र का योग दूसरे तथा तीसरे भावमे हो भपका दोनोमे से एक दूसरे भौर दुसरा तीसरे भावमे गयाहो तो ज्योति दोम श्रेष्टहोवे ४८

गायकवाय.
धनमायका स्वामि पलपान होये भार सदाशिकोण स्पानमे पुष
पा होता उपोतिर्विदमि भ्रष्टहोवे ४९
उपाशी (फ) का गुरु धनमायमें मपातो स्पोतिषियोमें
उमम ज्योतिषी होवे ५०
सर्वार्थमें एफ यह मी योगलिसा कि धनमायका स्यामि सर्पा
मंगल हो भार या गुरु शुक से दृष्टहोरे युध पारापतांशमे गया होणे
तो ज्योविए की पुती माननेमे वापरहोवे ५१
भविष्यवनायोग.
धीकारके केंद्र कोणे शुभदृष्टे भविष्पहता ५१
टीका-पुदिकारकमह । गुरु) फेन्द्रग्रिकोणस्थान में गवाहोरे भोर
शुभपसे हटायेतो भविष्यफल काहनेवाला पोतिषीहोरे ५१
निकारक्षयोग.
जीवस्यारोमृदंरो पिकालज्ञः ५२
- जीवेगोपुरे शुभद्दष्टे त्रिकालम: ५३
टीका-गुरु मपनि स्वराशी ९४१२ नशमे होरे भोर महिरभनी
गपाहोवती निकालज( भूत भविष्य वर्तमान हानीकार के पास मानने
पाला) ज्योतिरिडोर ५२
गुरु गोपुराशमे गपाहोरे भार वामपास इष्टदो दो भून भविष्य
प्रवेमान फाटका फळ माननेराठा निकाष्टा हो"
घेदांवसंगीतज्ञोग.
अंशानेपुसोत्ये जीयाकौवेदांत संगीवतः ५४
का-कारक नसे दूसरे तीसरे तथा पाप माप गरमूब
गपे हारे हो बात साम भोर संगीतशाम (गापन शाम मारने
पारा ५४
पैराग.
पनेरो तुंगे गोपुरेजे सिंहासनेजीर वेदान्तशः ५५
पाराजवेपन्दे शेन गुरोले वेदान्ततः ५६
रकोगेनीवे पेदाम्तनः ५७

-
मापाटिकासहित.
2 उत्तमोशे भृगौलग्ने वेदान्तज्ञः ५८
देवलोकेचंद्रे उत्तमांशभृगौकेन्द्र वेदान्तज्ञः ५९
कोशेंगेशे कोशशे पारावते वेदान्ती ६०
स्त्रोचेंगेशे कोशेशे परावते व्ययेशुक्रवेदांती ६१
टीका-धनेशपुर भपनी उच्चराशि ( कन्याफे १५) में, शनि गो:
रांशमै, और गुरु सिंहासनाशमें, गयाहोये तो वेदांत शास्र जानने
पाला होय ५५
परायतांशमें शनि हो भौर गुरुकों चुप देखता होतो घेदान
शाहजहावे ५६
गुरु वेन्द्र त्रिकोण स्थानमें गवाहोगे तो येदान्त शाम्रज्ञ होरे (इस
योग यदिएरु स्त्र, उच्च या मित्र राशिहोचतो येयोग मिलेगा।
उननांश, गपाश शुक लानमें गयाहारे तो घेदान शास मानने
पालाहोरे ५८
देवलोकांशमे चंद्रमा, भौर उनमांग गपाहुगा शुक ये दोनों में
स्थानमें गये हो तो यदान शान माननेवाण होरे ५९
लग्नेशपन में और धनेशागतांशी होगी पेदाती हो.
भानिस्शाशि मे गमाया एप हममें, भोर पारावतांमें, गया
राधा शक मारमें भापमें गाद तावदान्तीदारे ( ये योग
पान में जन्मदोरे उसके दोरेगा। ६१
प्रमनिटपोयोग.
रोरोखठोके शुभदृष्टे अनिष्टः ६२
भासे पागले शुभष्ट प्रमानेरः ६३
सैरा-भान नाग मरिसलगमे गहने भीरबान
नेता प्रतिष्ठा १२
ETERTREETiभार ६ मा

जातकतत्य.
(१७५)
फवियोग.
खेंशगेकषिः ६४
लामेशे लाभेकविः ६५
टीका-दशमेभावका स्वामि लग्नमे गया। वो कवि ( कविता
करने वाला) होये ६४
लाभेश लाभ भावमे होता कविहीवे.६५
विदुषारंजक
सारेशे शुभ: विदुपां रअकः ६६
ज्ञारोमदभे कदृष्टो राजविदुषो रअकः ६७
टीका-शुभग्रही गशीने बुध मंगल का योग होतो विद्धानोकों
प्रसन्न करने वाला होये ६६
शानिकी रायो (१० वा ११) में गहुये बुध मंगल को सूर्य देखता
हावतो राना और विद्वानोको प्रसन्न करने वाला होये ६७
इन दोनो योगो म मंगल बुध का योग का स्थान नही बताया है
पांतु यदि ये योग धन अथवा पंचम भावमे होयेतो भधिक बलकार
हावेगा।
विद्वान.तथा पहित योग..
पठीसुतेश केन्द्रकोणे विद्वान् ६८
धनेलाभेडशे पण्डितोधर्मवित् ६९
खेलाभेस्तेशे पंडितः ७०
टीग-स्व, उच्च, मित्र राशिम गयावा घलवान् पंचमेश केन्द्र वा
नियोग (१९१५) स्थानमें गया होवेतो विद्धानहाँ १८
लग्नेश धन में भयवा लाभ भावों गया हो तो धर्मका जानने
वाला पण्डित होवे ६९
पंचमेश दरमें भयवा लाभ भावमें गपाहोवे तो पण्डितहोये
-

.
(१५)
भाषाटिकारित
पशास्त्रामयोग.
फेन्ग्रेजीये सिंहासनेशुके धनस्यामारो ज्ञेगोपुरे षट्शा-
प्रवाष्टमः ७१
कोशेशस्थानेश्वशिरोमंदे या मोमेसपापे केंद्रकोणो
पशासवडमः ७२
सूर्याशेशो परोपिकवि पलिम्पर्षे पटूशास्त्रवल्लभः ७३
गुरोबलिन्पर्धेधने शशिरोकेंद्र शुमदृष्टे पदृशानबष्ठभः७१
टीका-गुरुकेन्द्रस्पानमें, शुभसिंहासनांशमें, भौर धनमावर्मे भो राशि
होवे उसराशिक नयांशमें गयाहुया बुध गोपुरांशमें होवेवो पट्शासा
माननपाळा विद्धान होये ७१
धनेश जिसराशिमें स्थितहोमे उसके स्यामिका नशिका स्वामि
पानि भपया मंगल होवे भौर यह पापग्रहसे युतहोकर फेन्द्र त्रिमाण
(२१४१०९९) स्थानमें गया होवे तो यहाँ शास्तोकि नाननेगळा
पिदान होवे ७२
मूर्य मिसराशिके नवांशमे हो उसका स्वामि वैशेषिक्रांशमे गा
होये भौर धनभाव वळयाम् (भानेस्वामि या शुभमासे युत । होरेडो
पट्शास्रज्ञहोये ५३
स्य, उच्च, मित्र राशिमें गपाहुया पलवान् गुरु धनभावमें भौर
धनेशके नवांशका स्वामि केंद्रमें शुभग्रहसे दृष्टहो तो षट्शास्त्र वेत
पिदान होस
अंधकायोग.
भंगात्सुते सपापी चंद्रेज्यौ ग्रंथात् ७५
टीफा-कारकांश लग्नरों पांचमे भाषमें पापगइसे पुत चंद्र गुरु गरे
होवो पपवाहोर ७५
दोषि विदार योग.
पजाहिद महिवेपे शुकेशिवे शूछोपिविद्वान् ।

मातकवत. टीका-राहु भयवा केतु भौरशनिसें युतगुरु शुक्र दृष्टदो वों शूदनातिमै उत्पनहुवा हो तोभी विद्वान होरे ७६ सर्वविद्यायोग. चंद्राकोणेजीवे ज्ञाकोणमोमे सर्वविधाः ७७ टीका-चन्द्रमासे ९-५ भावमें गुरु भौर सुधसे ९-५ भावमें मंगल गयाहोतो संविया माननेवाला हो। ७८ इंग्रेमी पारसी भरपी विद्यायोग. । पंचमेरविणायभामे कनिमंदतमाभपि पापग्रहेग संदृष्टाविया ताप्रमुखी भवेत् । लग्नस्थितोनिशानायः मुतेशेपापसपुते पंचमेभरने पाप: पारसी मारपी पठेत २ ज्योतिषश्याम संग्रा पत्र १०२ ज्योतिषश्यामसंगहमें लिखाद कि-रविसे पांच में भावम मंगल शुक्र, शनि, भौर रा इनचारी में से कोईभी भेक, दो पातीन' प्रह गयेही भोर पापग्रह से रहो तो इग्रजी पिया जान पासाहोवे। लग्नमें चंद्रमामाये पंचममा भौर पंचमेशपापणसे पतहवेतीपारसी भयवा भरपी दिया जाननेवाला हो ।२ मन, पेरिस्टर, पहीरर, सिंथापकील योगः पुस्लीविज्ञान लिया कि-मिनके जन्मरानो १.१२-८१.१॥३. स्थानमें से कोई भी स्थानमें गुरु भौर शनि एपराधि भतिसमीप भंगोमे गयेहोवे १ भयया पास्पर शनि से गुह) सासमे स्पानमें गयेर भण्या परस्पर नसमें पांवरे स्थानमें उपरोक भायोमे गहोवे ३ भार मेप, हम, मिथुन, पन, भ, किंवा सिंहराशिको भोजन, रेरिस्टर, सोनिमीटर, कोबर किंवा पकील पीए एस. एली. भारिपीपरिक्षामेपासादियारा मनप्प होंगे। भैसा गुरु मानि के योग कापलर सारी शनि मुपयोगका भी पर उपरामा स्पान भोर राशी में गह शनि रिपति समानतो होहोनाह पति शनि भौर पुष इनकापाग पावावतारे लिपे उगम नहीं होता कारण यह है कि पाणीकारको उसका शनिस पोग होतो मनुष्य भर का नेटानही इसलिये निससम्म परिक्षामा माहोrmirat ReOgerच। --

(१०८)
मावाटिकाएलि.
मंडलीमे गे गोग दाताईपद कील भापमापी हो।
उपरोक्त (गुरु शनि या वृध शनि ) महाका योगपंचमस्थान में स
पॉनम होताई र मेस्थान में हो तो मध्यम भौर लग्नम या धनमाने
दोषो कानर होता है।
सभामूकपोग.
तुपैरोंगेस्ते पंडितोपिसभामूकः ७८
टीका-चतुश लग्न.भपरा सप्तम भायमें गया होतो पंडित होते
हुरे भी सभामे मूकसनान होगा भधांत सभामें बोलनही सके
(सभाक्षोभ होगाये) ७८
भनपत्पयोग.
विषिर्याः सर्वेनपत्यवा ७९
टीका - सर्वग्रानिळी (नीच, शत्रु, राशीम, पाभस्तंगत तथा !
८११२ स्थानमें गये हो वा फेशवामे को हुये षड्बल मे हीन बली) हो
मो पत्र किंपा पुषी कोई भी संतान नदिहोये संतानरहीत होरे) ७९
गांनुत्पादयोग.
छग्ने स्तेमन्दे या यूनेशनी खेजीवदृष्टे गर्भानुसादः८०
मन्दारौ पठे वा तुर्ये गर्भानुसादः ८१
सारीशो कंजः पष्ठे चन्द्रे चास्ते गर्भानुत्पादः ८२ .
टीका- लग्नमें सूर्य, भौर सातमें शानि गया हो । भयवा सातमे
भावमें रवि शनी गये हो भार दशम भाव को गुरुदेखता हो तो गर्भ
ही उत्पन्न नहि होवे (गोत्पती भी नहि होये । ८.
उठे भपया चतुर्प भाषम शनि मंगल का योग हो तो गोस्पती
भी नहोये ८५
उठे भाव का स्वामी भौर शनी येदोनो छठे भावमे जावे भीर साव
मे भाषमे चंद्रमा गया हो तो गोत्पत्ति भी नहींहोवे ८२
गर्भन्यतिपोग..
'सुतपापयुतदृष्टे गर्भच्युतिः ८३
पुत्रस्यनाश पावत्पापदृष्टः शुभाइट स्तावङ्गर्भपातः ८.

मातस्तव
टीका-पंचमभाष पापग्रह ( म. मैः श. रा. के.इ. ने. भौर इनसे
युत बुध ) से युत भौर दृष्टहो तो गर्भपातहोजायेगा ८५
पंचमभावमें जिसराशी का नवांशहोवे उसराशीकों यदि कोई शुभग्रह
देखता नहीं हो तो नितने पापाइ देखते होवे उतनेही गर्भका नाश
[पात ] होवे ४
सर्पशापादिपुत्रयोग.
सुतेगही भीमदृष्टे भीमभे या सर्पशापादिपुत्रः ८५
यमेसुते चन्द्रदृष्टे सुतेशेराहुयुते सर्पशापाद्विपुत्रः ८६
सराहोपुत्रकारकेपुटेशेऽवलेमोमांगेशोयुतौसर्पशापाद्विपुत्र:००
सुतकारकेसारे राव्हंगे पुत्रेशेत्रिके सर्पशापाहिपुत्रः ८८
पुत्रशेने सारेकुजशि राहुमांदियुतें गेचर्सपशापाविपुत्रः८९
सुतेशेभोपे सुतेराहो सौम्पदृष्टे सर्पशापाविपुषः १.
सुतांगेशोपिषलौ सञज्यासुतेपापाः सर्पशापाद्विपुत्रः १,
लग्नेशेराहुयुवे पुरोभौमयुते कारकेराहरटे सर्पशापा-
द्विपुनः ९२
टीका-पंचम भावमें गयाइधाराहू मंगल से इष्टदो किया पंचममाश्में
मंगलकी (मेष, वृधिक) राशीमें राहूगपाहो तो सर्पले शापसे पुरानाही
होने ८५
पंचम भाव में गयाहुया शानि चन्द्रो इदो भौर पंचमेश राह
युतहो तो सर्प के शापसे पुाहीनोये ८६
पुकारपग्रह [ गुरु ] राहसे युतहो, पंचमेश निर्मली हो, भार
लग्नेश मंगलसे युनहो तो सर्प के शापसे पुपरहितहोवे .
पुगकारक । गुरु) मंगल पुराहो लग्न राहू, भार पंचमेश
६८०१२ भाषने गहरे दोसर फेशाप्रसे पुत्रहीनहोये ८८
पंचमभाषा स्वामि पुन, मंगल से युतहो कर मगरके ही नरामये
पाहो मौलिक छान गपेहोवो सांके शापसे तीन
.
-

(140" मामाटिकानाहित. ममभाषा समिमंगलही भार पनन भात गपामा राह पुषसे गुण मिा रहो तो सपके गारसे विशाहले १५ पंचमेश भार लग्नेश ये दोनो नियमममा सर्वगा। सुप गुरु से मृत होकर गो (पाँचौ .म.रा.पु. ग. गयेही) वो सर्पशापसे पुत्रहीनहोये ९१ लग्नेश राइस पपसमेश मंगळसे दो भीर पुत्रकारमादक) रासें हो तो सर्प के शापसे पुत्रहीनहाने ९२ पितृसापादिपुप्रयोग. पुत्र रांवरे त्रिकोणगपयुतदृष्टे पितृशापाहिपुत्रः ९३ सुते पापान्तरे मन्दानीचगे पितृशापादिपुत्रः ९४ सिंहेज्ये पुत्ररोयुते पुत्राङ्गगौपापो पितृशापाद्विपुषः ९५ सूपरन् हवेमन्दे पुवेरोराहुयुते पितृसापाद्विपुत्रः १.६ व्यपपेहेरन्ध्रपुरे सपेरन् पितृशापादिपुत्रः ९७ टीका-पंचममारकास्वामि सूर्य ९ में तया में भावमें पारग्रहीके पीचमे गपाही भोर पापगहोंसे तष्टो तो पितृशापसे पुषीन पंचममायमे नीचराशीका सूर्य, दानिक नाशने । तुल राशीके ४-५ में नवांशमे ) गयाहो भौर पापग्रहोके मध्यमे स्थितहो तो । पितृ ) फैशापसे पुत्रहीन होवे ९४ .सिंहराशीमें गुरुगयाहो, पंचमेश सूर्यसे युतहोवे भौर पंचमभाव प लग्नमे पापग्रहगये होतो पितृ केशापसे पुरानहींहोवे १५ भाठमेंभावमें रवि, व पंचमभाग्मे शनि, गपा भौर पंचमेश रा से पुतहो तो पितृकेशापसे पुनही होये ॥ वारभावस्वामि लग्नने, भष्टमभावास्यामी पंचम भाव में भी दशममारकास्वामी भाठमेभाश्मे गयाहो तो पितृ शापसे पुत्र हीनहोवे ९७ माशापादिपुषपोग.. पुगपेचन्द्रनाचंगेयापापान्तरेसुवाम्बुगोपापोमातृशापादिपुगः . होये ९३ लाभेमेन्दे तुर्येपापाः पुनीचगेचन्द्रे मातृशापाहि पुत्रः ९९. सुतेशेषिकेलग्नरोनीचेपापयुतेचन्द्रमातृशापाविपुत्रः१०० मुतेशचन्द्रे मन्दराव्हारयुते मातृशापादिपुत्रः १.१ सुखेशेमोमेराव्हर्कजयुतेलग्नेपुष्पबन्तीमातृशापाविपुत्रः१०२ सुखेशेटमपुत्राङ्गेशपष्ठेखारीशालग्नेमातृशापादिपुत्रः१०३ पुत्राकाष्टारिगाराव्हारपदालग्नेशेत्रिकेमातृशापाहिपुत्रः१०४ राव्हारेज्यानिकस्था मन्दचन्दोपुत्रे मातृशापाविपुषः३०५ टीका-पंचमभावका स्वामि चंद्रमा नीवराशिका हो अथवा.पाप- म्होंक मध्यमे (पापाकर्तरीमे ) हो भौर चतर्थ र पंचमभायमे पाप ग्रह गयेहो तो माताके शापसे पुत्रहीनहोवे ९८ लाभभावम शनी, व चतुर्थभावमें २१३ पापग्रह.गयेहो भौर पंचम भावमे नाचराशी ( ८1 का चन्द्रमा गयाहो तो माताके शापसे पुत्र हसनहोर ९९ पंचमेश ६८1१२ भावमें गयाही लग्नेश नीचराशी काही मार चंद्रमा पापग्रह से गतहो तो माताके शापसे पुत्रहीनहोवे १०० पंचमेश चंदमाहोवे भौर वह शनि राहु व मगल से युतहो तो माताकशापसे पुत्रहीनहोवे १०१ सुखेश मंगल हो भौर यह राष्ट्र व शनि से युतहो भौर लग्नमे सूर्य, चंद्रमा, ये दोनो गयेहोतो माताकेशापसे पुत्रहीनहोवे १०२ मुखेशभाठमे भाषमें, पंचमेश च लग्नेश ये दोनो छठेभावमें तपा दशमेश भोर षष्ठेश ये दोनो लग्नमे गयेहोतो माता शापसे हीन होये १०३ राहु मूर्य मंगल भौर शानि ॥११८१६ इनभायोंमें पपामम कोषा व्युत्कम गयेहो भौर लग्नेश ६८1१२ भावमें गयादो तो माता मापसे पुत्रहीन होने १०५ राहु मंगल भौर गुरु ये तीनो ६८१२ भावगयेहो भार पंचम भाषमें शनि चन्द्रमाको योग हो तो मातामेशापसे पत्रहीनहोये १०५

भाषाटिकासाहित.
कुलदेवदोपा दिपुत्रयोग.
मन्दोरिगेहे ज्ञेन्दुसूर्यदृष्टेलग्नेपापदृष्ट कुलदेवोपाहिपुत्रः
मन्दर्तसूर्येपापदृष्टे वा पापवर्गझे कुलदेवदोपाद्विपुत्रः १.५
टाक-उटेभावमेंगयाहुवाशनि, बुध चंद्र और सूर्य से दृष्टदो लानी
पापमह देखतेहोतो कुलदेवदोषसे पुत्रहीनहोर १०६
शनि की राशी (१०।११ ) में गयाहुवा सूर्य पापग्रहसे दृष्टहोर
भयया लग्नमे पापग्रहका वर्ग भषिक होतो कुलदेवके दोषो पुन
हीनहोवे १०७
मुतहीनयोग.
मझे सुतेभामे सुतहीनः १०८
जीवात्सुतेरोभिकपुत्रवाने शालग्नानिकस्था सुतहीनः१०९
जीवेपश्चमे जीवात्सुतेकरे सुतहीनः ११०
दारा पुत्रपेयलिनि पष्ठेशयुतदृष्टोऽपुत्रः १११
धीधर्मी सदारेशो दुस्थानगो हीनपली सुमादृष्टेमुढे
बहुदारोप्यपुत्रः ११२
मन्दारौखेपर्मयापुत्रता ११३
मन्दारशुक्रादारगा अपुत्रः ११४
शत्रुभेलग्न ज्ञेन्दुद्दष्ठे पठा) सूपें विपुषः ११५
सुतशेस्ताव पापयुते विपुत्रः ११६
गुरोमुतेशे सपापेऽवलेविप्रः ११७
सपापेरो त्रिसुतेशे विपुत्रः ११८
कोणेगुरो पापयुतेविपुषः ११९
एग्नेरोकुजापाठेपुरेशे विषुत्रः १२.
प्पपेशेसापेविरुषः १२१

मातरूवत्व (१८३) कन्या सूयें भोमेसुतेविपुत्रः १२२ सुतेशुकभीमान्यतराऽदृष्ठे द्वित्रिविवाहेष्वप्य संतानः १२३ लाभेसेन्दौमन्देऽपजत्वमः १२४ टीका-लामें सूर्य भौर पांचमे मंगल गयाहोतो मुतहीनहोवे १०८ जिसराशीभ गुरु स्थितहो उसराशीसें पंचम भायका स्वामि मो ग्रहहो वह ६८१२ भावमे गयाहो भौर जन्मलासे भी पंचम नवम लग्न के स्वामी ६०२ भावमें गयेही ता पुत्रहीनहोचे १०९ पंचम भावमें गुरुगयाहो भौर गुरूसे पांचमे भाव में पापग्रह गयाहो तो पुत्रहीनहोत्र ११० पंचमेश सप्तमभावमें भथया लममे गयाहो भौर यह पलयान परेश से युनदृष्टदो तो पुत्रहीनहोय २११ नवम, पंचम और सप्तम भापके स्वामी निर्वली होफर ६१२ भावमें गयेहो भौर पापमो से युतदृष्टहो तोरहतस्त्रियहोवे तोमी पुप. नहीहोवे ११२ शनि और मंगल ये दोनो नवमे या दशमें भावमें गयेही तो पुन हीनहोत्र ११३ शनि मंगल भौर शुफ येरीनो सातम भावमें गपेहो तो पुषहीन होवे ११४ रग्नेश छठे स्थानमें शत्रुग्रहको राशीम हो, भौर वह चुपचंट में दृष्टही छठे भवर दुसरे भारमे मांगयाहो तो भएनहारे ११५ पंचमा के नयांग वास्वामी भस्तकादो भार वह पापण्हसें पुतही सो पुत्र होनहोरे ११६ पंचम भावमा स्वामिगुरु पापग्रहयुत हो भौर निली होता पुत्रीनहोये (पंचम भावमे धन मीन राशीहोतो ये योग होता है। ११७ नेश पापग्रह से युतहो भार पंचमेश ६८०१२ में गया तो पुत्रदानहोये ११८ पापपहसे गुरदोकर गुरुर में तथा ५में भायमै गपादौती पुत्र हीमही १ सग्नेश मंगलमी रामा (१८) में गवाहो मोर पंचमेश पटे भार. भेतो पुत्रीनहोरे १२. --

.
1१८४)
गााटिकासहित
पा भायफारामीरशी किंवा लग्नमें गया तो पुत्रहीनको १२
फापाराशीक लग्नमें पड़ी भोर पांच, भावमें मंगल गयाही वो
पुत्रहीन होये १२२
शुम किंवा मंगल इनदोनोममे यहि एक भी पंचममारको नहीं देश
साहो तो दो तीन विवाह करनेपरभी संतान नहीं हो। १२३
सापर्ययह है कि पंचम भावकों शुक्र किंवा मगळ किया दोनो देखो
होतो संततीहोयेगा । कारण-विकास्वामि शुरद भौर रितुका स्वामि
मंगल हे अव रितु रेत के स्वामिकी दृष्टि गर्भस्थान (पंचम) पर
होगा तभी गर्भ रहेगा भौर इन की दृष्टि नहीं हो सो ५ किया
त्रिपोसे विवाद करने परभी संततीहोना भसंभवहै ।
छाभभावमें चन्द्र शनी फा योग ( यती) हो तो संतती नहींहोये १२५
पुरनाशयोग.
पापांतरेसुतभेवावदीशे वाकारके पापसंयुके पुत्रनाशः १२५
सीधर्मपुत्रेयांशपाः पापांशगाः पापयुवाः पुत्रनाशः ११६
पुत्रेशेफरोशे नीचास्तभे पापदृष्टे पुचनाशः १२७
व्ययेशांशेशस्य व्यंशेशेनयुवे या दृष्टेसुतेशे पुत्रनाशः १२८
पुत्रप्रकाशे जातंजातंम्रियते १२९
पापा:पञ्चमे जातजातंम्रियते १३०
सुतेसूर्य मृतापत्यः १३१
कोणगा:पापा क्षीणेन्द मन्दर्भेजीमूढ़े पुत्रसुखभृका
नश्पति १३२
ज्ञेपश्चमलग्नसुखपापे पुत्रमुख भूत्वानश्यवि १३३
टीका-पंचमभाष, भपया पंचमेश, किंवा पंचमभावका कारक
गुरु ] पापगहोके मध्पमें (पापकर्तरीमें) हो भोर पापाग्रहसे
दो तो पुत्रनाशदोरे (पत्रमाप्ती तो होगा किंतु नीवेगानहीं)।

मातफतव.
( १८५)
पंचमेश, सप्तमेश, भौर नवमेश, ये तीनोग्रह -जिस जिस ग्रहके
नवांशहोो वेपद पारग्रहके नवांशमें गयेहो भऔर पापग्रहसे युतदो
तो पुत्रनाशहोवे [ पुत्रदोकर मरजावे ] ०६
पंचमेश दूरग्रह के नवांशमे गयाहो भौर यह नीचराशी का वा
भस्तंगतहोकर पापग्रह से दृष्ट हो तो पुत्रनाशदोवे १२७
व्ययेशके नवांशका स्वामि जिसराशीके ट्रेष्काण में हो उसराशीके
स्वामी से पंचमेश युत किंवा दृष्टदो तो पुरानाशहोवे १२८
प्रकाशावस्थामें गयाहुभा मूर्यपंचमभावमे गयाहो तो जितने संतान
जन्मतेजाय उतनेही मरतेजाय (संतान जीवित रहेनही ) १२९
तीन चार पापग्रह पंचमभावमे गयेहो तो जितने संतान नन्मतेमावे
उतनेही मरतेनाय १३०
पंचमशावमे सूर्य मयाहो तो मृतापत्य होवे १३१
नयमे पाचमें भानमे पापग्रह, लामे क्षीणचंद्रमा, भौर शनि की
राशी ( १०-११) में गयाहुवा गुरु भस्तका हो तो पुत्रकासुख होकर
नाशहोजावे १३२
पंचमभावमें बुध गयाहोवे और लग्न तथा सुन इनदोनो भावमे पाप
ग्रह गयेहोतो पुत्रका मुखहोके नाशहोनावे १३३ येसर्वयोग भल्पायु.
प्रजाहोंनेकहै।
पुत्राति वा पुत्रमुख रहित योग।
क्रूर पष्ठ्यंशे पुत्रपे पाप दृष्टयुते पुत्रार्तिः १३४
सोत्येश चंदो केन्द्रकोणगौ पुत्रसुखन. १३५
सिंहजारौ सुतगौ सुतेशेपठे सुतसोपन १३६
भोगक्षेमतेराही भौमदृष्टे सुतसोस्यन. १३७
नीचेगुरौ भृगौवा समेझे विपमे सुतसौख्यंन १३८
धीस्थेमंदे पुत्र सुखन १३९
ध्यन्त्यालार्य सुतेसहजपे सुवमुखन १४०
पञ्चमे जीवझे सुतसुर्खन १४१

भाषाटिकासहित.
मन्दवावङ्गे लौशुकेज्यौ सुतसुखन १४२
जीवात्सुतपापे सन्तान सुखाभाचे नान्यथा १४३
टीका-पंचमेश क्रूरपष्टयशमे होये और पापग्रहसे युतकिंवा दृष्ट होतो
पुत्र कामुख नहींहोवे (पुत्रहोते हुवेभीउसका सुखनही होवे) १४
तृतीयेश और चंद्रमा ये दोनो ११९१५ भावमेंगधे होतो
पुत्रसुखनही होवे १३५
सिंहराशिम गयेहुवे शनि मंगल पंचमभावमे स्थितोवे और
पंचमेश छठे भावमे हो तो पुत्र मुखनही होवे १३६
पंचम भावमें मंगल की राशि (१-८) में गया वारा,
भंगलसे दृष्टदोवे तो पुत्र का सुख नही होघे १३७
गुरु और शुक्र भपनी नीचराशी (१०-६) मे गयेहो भयान
समराशी (२-४-६-८-१०-१२) में भार सूर्य विषम राशी (18
१-७-१-११) में गयाोये तो पुत्रका सुखनही होवे १३८
पंचम भावमें शनिगया हो तो पुत्रका सुखनही होवे १३९
नृतीयमापका स्वामी (३-१२-१-२-५) भायमैगया होतो
का मुखनदीहोये १४०
V पंचम भावमे गुरुकी राशी (९।१२) होतो पुत्रकामुत्रनहीं होरे १४१
युध शनि लग्नमे गयेहो भौर वृश्चिक राशीमें गुरु शुकका योग
होतो पुत्रका मुतनही होवे १४२
गुरु में पाचमें भावमें पापयह गयाहो तो संतान मुम्न नसीहोर भार
शुभग्रह गयोय तो संतानका मसदोगा १४३
पुत्रमुग्रहीनयोग में पत्रहोरेनही, १ किया पुत्रारमरजाय२ अपार
पाहोनेहो भी नका मुखनादौने ३ प्रहमा भीर नहीभा
सीमाहा होरे । ये तीनप्रकारफे पुरामुख नदीहोने भदो इनभने
जिनकपुदीन किया पुजनाश, किंवा पशविच्छेदयोग, प्रबल
रे टनकै तो पुत्रशोगाशनही किया रो मरनापेगा भार कर
गुनमगहीन योग ही हार भौर पर उन योग नही होता
होनहानीया मननहीगा।
-

नातक्तत्व
( १८७)
वंशविच्छेदयोग.
ज्ञाइपी लग्नेतर केन्दगोवंशविच्छेदः १४४
पापपहा व्ययसुताटमगा वंशविच्छेदः १४५
चन्द्रेज्योलग्ने यनेमन्दे वा मोमे वंशविच्छेदः ११६
मुखेपापा वंशविच्छेदः १४७
लग्नान्त्य सुताष्टमगैः पापेवेशच्छेदः १४८
सुतेचन्द्रे पापारन्धाङ्गान्त्यगा वंशविच्छेदः ११९
ज्ञाच्छोमदे सुखपापे सुतेजीवे वंशविच्छेदः १५०
चन्द्राष्टमेपापा वंशविच्छेदः १५१
पाप सुखेचन्द्रमुतनेन्शे सुतपेऽल्पपले वंशविच्छेदः १५२
पञ्चमेपापा वंशविच्छेदः १५३
शुभेस्मरे खचन्देलखेपापा वंशविच्छेदः १५४
भीमो मन्देरन्धे मुतेक पंशविच्छेदः १५५
टीका-धुप भौर लग्नेश ये दोनो उनके बिना दूसरे केन्द्रम्मान
(at) में गहो तो यशविच्छेद होये १m
पारमे, पांचमे, भौर भाठमे, भावमें पापग्रह गयेहो तो बानि.
च्छेदहोये १४५
लग्न में चंद्र गुरु का योगदोरे भोर सातमें भावमें शनि किंवा मंगल
गयाहो तो मशपिच्छेद होरे १४६
संपूर्ण पापप्रद चई भाव गोष तो पंशविच्छेद होरे १४७
मम्मलग्नमें, बारमे, पांच, भौर भाटमैं भावमे संपग पारपद गपे
सोशपिरोदराने १४८
पंचम भाषमे चंद्रमा गमाधि भौर भाठम, हग्नमे, कारमे, मारमें
संग पापमह गयेदो नोक्षाविद होरे १४९
सातमें भादमें पुरापुरम में पापपर, भौर पचम भाग्में गुरु
गपाशेरे तो शरिन्जेदोरे १५०

- भावमें चंद्रमाहोतो तीसवर्षकि उमरहीनेक पश्चासन्तान होगा ११८ भूयनिपलीहोवे भोर मंगल समराशी [२४६८१-१२] में स्थित, कम्राशी में गयाहुवा चंदमा पापग्रहसे युत य दृष्टहोवे भौर मर्य, (१८८) भाषाटिकासाहित. चंद्रमासे भाठमे स्थानमें गपग्रह गपहोतो वंशविच्छेदहीवे १५१ लग्नमें पापग्रह, मुखमैचन्द्रमा पंचममें लग्नेश, गपाहाये भौर पंच- मेशभावली होतोशपिच्छेद यशानाश करनेवाला योगदोवे) ११२ संपूर्ण पापग्रह पंचम भावमेगयेहोवेतो पंद्याकानाशदोये १५३ सप्तम भावमेशुक्र, दशमभावमें चंद्रमा, भौर मुख भावमै पापग्रह ३.४ गयेहोवे तो वंशकानाहोव २५४ लग्नमें मंगल, भाठमे शनी, पाचमें भावमे मयं, गयाहो तो वे कानाशहोवे १५५ वंशविच्छेदयोग पुत्र किंवा पुत्री कोई भी संततीनहीरहे (वंशकानाम- होजावेगा) विलंवतःप्रजायोग। सशुभा अङ्गाङ्क सुतेशा स्त्रिकस्थाविलम्वतःमजा १५६ खभेसौग्या मुतेपापाः सुतसुखं बिलम्बात १५७ पापोजीवो वा तुसुतेष्टमे चन्द्र त्रिंशदोर्ष संततिः३५ पापःपापयुतेलग्नेसूर्येऽवलेयग्मझेकुजेत्रिंशद्वर्षो सन्ततिः। कर्केचन्द्रे पापयुतदृष्टेच मन्ददृष्टेसूर्ये पष्टितमेन्देपुत्राप्तिः१६ राहीलाभे वाईके पुत्रसुखम् १६१ टीका-लग्न, नवम, भौर पंचम भायके स्वामी शुभग्रहसे युतहोर ६८१२ भावमैगयेहो तो विलम्बसे संतानहोवेगा १५६ दशम भावभे सर्वशुभग्रहगयहोवे गार पंचमभावमें संपूर्ण पापाइ गयहो तो पुका मुख विलम्ब स( देरीसे) होगा १५७ पापग्रह किया गुरु चतुर्थ भयवा पंचम भावमेगपाहोवे भौर भान पापग्रहकी राशी [ १८५१११ लग्नमें पापग्रह युती तो तीसवपकी उमरहोने के पश्चात्सन्तान होगा १५९ पानी देखना हो तो ६० में वर्षमे पुत्रकी प्राप्तिहोगा १६

नातकताव.
लाभभावमें राहगयाहो तो वृद्धावस्या में पुत्रकामुखहोगा १६१
इन कासिवाय भार भी विशपयोग वृहत्पारावारीमें इस प्रकार
लखे है कि।
पंचम में गुरुनारे भौर पंचमेश शुक्रतयुतहोतो ३२ तथा ३३ मे
पिने पुत्रप्राप्तिहोगा।
पंचमेश भोर पंचमकारक (गरु ) ये दोनो केन्द्र (१३१४१)
यानने युनहो तो तथा ३६ में अपने पुत्रप्रापिहोवेगा।
जन्मलग्नते नाने ग6 गपाहाये भौर गुरुने नबने स्थानमें गया
तुक, लानेश से युनहो तो ४० में वर्षगे पुत्रप्राप्तिदोवगा।
कटारजातियोग।
राहकांगः सुगाः शान्तितः सुतसौख्यदाः १६२
सुतेशेनीचे धर्मरोने ज्ञकेतु पुत्रे कष्टात्पुत्राप्तिः १६३
टीका-राहु, रवि, भोर मंगल ये तीनो पंचम भायमै गयेहोतो
शांति करने से पुत्र सुम्बर्फ प्राप्तिहोगा १६२
पंचमेश अपनी नीराशीने गपादो, नवनेश लग्नमें और बुध केतु
पंचमें भावमें गयेहोतो कष्टसे । शाति भादि भनेक प्रयत्न करनेसे)
पुरकी प्राप्ती होरेगा २६३
शीप्रसंतानोदपयोग.
सुनेगोजक राहु केतू सन्तानोत्पनौनोविलम्यः १३४
टीका-चन भावमे मेष वृषभ किंग कर्क राशी भे राह भया
केतु गयाहो तो संतानकी प्राप्त होनेमे विलम्पनहींहोगा २६४
पुत्रप्राप्तियोग.।
सप्तमेशाशिलनार्थ धमेरो पुनातिः १६५
सुतेशुभयुतहदे पा सुरुभेजीवे या पुवामिः १६६
लग्नेशपने पुत्ररोज्यो पटिनो पुत्राप्तिः १६७
पुत्ररोज्ये लिनि बग्नेशष्टे पुत्राहिः १६८
• संतान RTERय निर्णय विशय क्षार जानना चशमय
विवार " म पुस्तकमा पाय से देरीयम -

भाषाटीपासहित.
वैशेषिकांशेजीये तथा पुत्रेोच शुभदृष्टेपुत्राप्तिः १६९
विशेसुते बलाढ्ये गुरुदृष्टे 'पुत्राप्ति: १७०
पुत्राङ्गपोपरस्परं पश्यतः पुत्राप्तिः १७१
पुत्राङ्गपावन्योन्यभगो या युती पुत्राधिः ३७२
सुताङ्गेशो केन्द्रगौशुभान्वितों धनपेवलिनिपुत्राप्तिः१५३
पुरोशे शुभयुतहष्टे पुत्रानिः १७४
धर्मानेन्शौसप्तमें धनरोगः पुत्राप्तिः १७५
सुतेशेमृदंशादिगे पुत्राप्तिः १७६
गोपुरादोसुवेशे पुत्रानिः १७७
पुरांशेशन लग्नेशारोशेमुते पुजातिः १७८
जीवांशशेकेन्द्र पुत्राप्तिः १७९
धर्मायसुवेशाः पारावतादिगाः शुभदृष्टाः पुनाति:१८
लग्नाद्वाचन्द्रापंचमे शुभाशुभसम्बन्धे पुत्रसम्भवोनान्यथा
टीका-सप्तमेश के नवाशका स्वामी लग्नेश, धनेश, भौर नय
इन तीनों ग्रहोंसे दृष्टहो तो पुत्रप्राप्ती होगा १६५
पंचमेश किंवा पंचमभाय भथवा पंचमका कारकमह (गुरु)
ग्रहसे युत भौर दृष्टहा तो पुत्रमाप्तिहोगा १६६
लग्नेश पंचम भावमेंगयादो, पंचमेश भौर गुरु ये दोनोपरिग
लयान होये नो पनप्राप्तिहोगा १६७
पोशगुरु पूर्णवलयान होये भौर उसको लग्नेश देसताहो त
परोयेगा १६८
पला पंचमभापका स्वामि वैशेपिकांशमे गयादो भौर शुभ
गाउपाय तो पाप्तिहोगा १६९
नाम नाम पटगान होकर पंचमभायगय हो भौर गुरु
.
सनो योनिदोरेगा १७०

भातकतत्व.
पंचमेश भोर लग्नेश ये दोनोपरस्पर भैक दूसरे को देखते होतो
पुत्राप्तिहोयेगा १७१
पंचमेश भोर लग्नेश ये दोनो भन्योन्यराशीमे (पंचमेशकी राशीमे
लग्नेश भोर लग्नेश की राशीम पंचमेश ) गयाहो भयका पंचमेश भोर
लमेश ये दोनो भेकराशीमे युतहोतो पुनानिहोवेगा १५२
लग्ना भौर पंचनेश ये दोनो शुभहसे युतहो कर केन्द्र [राश
१०] स्थानमे गहा, और धनेशवलवानहो तो पुत्राप्तिहोवेगा १५३
पंचमेश के नवाशका स्वामी शुभाइसेयुत भौर हटहो वोपुमा-
लिहोगा १७४
नवमेश भौर लमेश ये दोनो सप्तम भावमें गयेहो भौर धनेशलग्न
में गयाहो तो पुत्राप्तिहोगा १७५
पंचमेश मृदंशादि शुभांशमे गयाहोतो पनालिहोवेगा १७६
पंचमेश गोपुरादि भंशमेगयाहो तो प्राप्तिदोवगा १७७
पंचमभायका नवांशका स्वामी लग्नमे भोर लग्नेश के नवांशका
स्थामी पंचमभायम गयाही तो पुत्राप्ति वगा १७८
गरुके नवाश का स्वामी केन्द्र ( १४१°) मे गयाहो तो पुत्रा.
प्तिहोगा २७९
नबम, लग्न, भौर पचमेश, ये तीनोग्रह पारावतादि शर्मगहोप
भौर शुभर इसे हटहो तो पत्राप्तिहोवेगा १८०
लग्नसे भषमा चन्द्रमासे पाचमै भावमेशुभप्रद की राशि शुभग्रद से
युक्त दृष्ट हातो पुत्र होगा और इससे विपरीत होतो नही होगा १८१
कन्या प्राप्तीयोग।
सुतभे समवर्ग शमन्दान्पवरयुचे शुक्रचंद्रान्यवर दृष्टे
कन्या प्रजावान् १८२
पुत्र नेत्रपाणी पुनहानिः कन्यानिश्च १८३
पुत्रेयूनो सभावस्वागे कन्पाधिक्यं १८४
शुक्राम्जामुतभे समझे शुभाजदृष्टे पहुकन्यावान् १८५
सवेष्टमे बहुकन्या १८६

.
भाषाटीकासहित.
लाभेने शुक्रेचन्द्रेया कन्याप्रजाः १८७
क्षेन्दच्छानामन्यतमे सुते कन्योत्पादः १८८
टिका-पंचम भाव मे समराशी (२६८१०१२) भौर सन
राशिका नराश बुर किंवा शनी से तहोने भौर शुक्र भयवा चन्दवे
किंवा इनदोनोसे हरदो तो फम्या मना पाला होये १८२
नेत्र पाणि अवस्था में गधाहुचा युष पंचमभावमे गपाहो हो
पुत्री हानी भौर पन्याको प्राप्ती होगा १८३
सभास्ता मे गया दुध पांच मया सातमे भायमे गया।
वो बहुत कन्या दोषणा १८४
पंचम भाव समराशी (२२१६११०।१२) का होये मारवाशुक
चंद के दशवर्ग में होकर शुभ चन्द्र से ही हो तो यहुत कम्पास
सादये १८५
पंचमेश पनमें भया भाठमे भाव पाहतो पर कन्या
होगा १८६
लाभभाषमे युध, गुरु, किंवा चंद्रमा नतीनो मेसे कभी प्रह
गपा होता फन्यामानावाला होषे १८७ (नितने भारत महा
रे तनादी योग बयान राता)
गुप, मंत्र, भौर शुभ इन गानोम के एकभी पारी भायम गराई
तो फन्पामनाका मम्मोगा १८८
भत्तस्य योगा
को चन्द्रगुते कन्यादान्मापात्यः १८९
नीचे पुत्रो पटादित्रयो पारयुते कामपन्ध्या १९०
पुणेगी नन्दलाच्या"
टी-मोकामन्दमा या मासी गमता
सािभरातान पाशाहोरे
वाचाim२ मे भाप गा भार का
पाठे पासोमा देव (भारतानस ति
कि. रोपाई भी कान १

मावतस्व
पामा योग.
सुतेशुक्मांशी वा शुक्रदृष्टेबहुमजः १९२
टीका-पंचम भापमें शुक्र की राशी (२-७) भौर नशंश हाय
कोश पलपान शुरु पंचम भाव को देखता हो तो बहुपन ( बहुत
संतान पाना) होतारे १९२
पत्र पुत्री संख्या योग.
पुत्रे यावत्पुमहदृष्ठि स्तावत्पुत्राः १९३
कोणशुक्ररंगेन्दावेकपुत्रः १९४
सुतेराहु केतु कुपुत्रः १९५
धीस्थे शुभदृष्टे त्रिपुत्रः १९६
मृगेकजेसवे त्रिपुत्रः १९.
सुते मृगगे भौमे त्रिपुत्रः १९८
कुंभेमन्दे सुते पञ्चपुत्रः १९९
। सुतेसूर्यभोगगुबन्यतोकमा देक विपञ्चपुत्रोत्पत्तिः २००
सितेन्दुवर्गेपुत्रः ओजभे सिवेन्चुयुते बहुपुत्रः २.१
पुतीग्रह हक्तुल्या कन्या २०२
सुते चन्द्रज्ञ सितशनयो द्विधि पञ्चसप्तकन्योत्पत्तिः२.३
टीका-पंचम भाषपर मितने पुरुष महकी दृष्टिदोषे उतनेही पुत्र
होगे १९३ जिस ग्रहकी धी हो वह स्व राशिका होतो दिगुण
समूल निकोण राशी का होतो.त्रिगुण संख्या कहना ) भयवा
पंचम भावमे जितने नवांश गपेहोवे उनने संतान कहना शुभ महसेहष्ठ
होतो उससे द्विगुग संख्या मानना । भया तिनैक विद्वान पुत्र
स्थान में गई ईई राशी के भककि संरूपाक समान फिंचा पुत्र धानेश
की फिरण की संझपा के समान भी संतानकी संख्या करते है।
शुक्रतीराशी (७-२) मे गपाहवा चंद्रमा नवन किंवा पंचम
भारमें गयाझोतो एकपुष होगा १९४

तीन पुत्र, गुरु गया होतो ५पांचपुत्र, होगा। मूर्य मंगल दोनोरे तो मय गुरु हो तो ६ मंगल गुरु होतो ८ मर्य मंगल गुरये विषम राशी २३५१५१का पंचमभाव अक्र भौर चंदकर गया होवेभार वह शुक्र चंद्रसे युत होवेतो बहुत पुत्रवालाहोरेगा। पंचमभायमें चंद्रगयाहोतो ३ शुक गया होतो ५शनीगयाहोतो भाटीकासहित पंचम भावमे राहु भपका केतु गयाहे थे तो एक कात्र होर १११ पंचम भावमे गयाहुना मर्य शुभ ण्हसे दृष्ट होतो तीनपुत्रो १९ मकर राशी मे गयाहुया मंगल पंचमभावमे होतो तीनपुत्रहोरे ।' मकर राशी का शनी पंचमभाषमे गयाहोतो तीनपुत्रहोंने १९८ कुंभ राशी का शनी पंचमभावमे गयाहोतो पांचात्र होवेगे परंतु मूत्र २०९ के भनुसार इसी योगमे दत्तपत्र योगभी होमाताई इस कारण यदि कर राशीका पंचम भाव भंश कलासे भधिक भंग का होये भौर उसमे शनीगया होतो तीन पुत्र होयेगे एवं कुंभराशीम पंचम भाव १० भालासे RESशकला पर्यंत के अंशः कराके भति रिक्त शेप भंशका हो भौर उसमे शनिगयाहोतो पांच पुष होगे भन्यथा नहीं होगे । तात्पर्य यह कि मकरके भंश ! कला पर्यंत के पंचम भावमे मर का शनि, तथा कुंभ में ही भंग से १६ भंश ४० कला पर्यंत के पंचम भाषम कुंभकाशानि, नागा तो दत्त पत्र ही लाना पडेगा तीन तपा पांच पुत्र नहीं होरगे १९९ पंचम भापमें सूर्य गया तो । एक पुत्र, मंगल गयाहोतो । तीनो गये होतो.९ पुत्र का नन्म होयेगा.२०० पंचम भावपर नितने भी यही दृष्टी होवे उतनीहरीकन्याहोवेगार ५पन्याका मन्महोवेगा (भोर ये ग्रह दो तीन संयुक्त होये तो उनकी संख्या के ऐल्पके भनुसार कन्याका नन्म समझना २०३ वृहत्पाराशरीमे संतान संख्या भौरभीविशेष योग इसप्रकार लिनेहकि लग्नमेराह पांचमेगुरु, नवमेशनि, गयाहोतो । पत्र होवेगा। धनेश पंचमेशका योग पंचम भाव में हवा होतो ६ पुत्र होगा उनमेमरजायेगा। : नवम भाव शनि गया हो भीर नबमेश पंचम मे होतो "पुर होरेगा जिनमे दो गर्भ यमल (जोरके 'पालक होगे।

नतिकता.
गुरु ९ मे किंवा ५ में मायमे व धनेश १० मे भाप गयाहो भौर
पंचमेश पलवान होतो ८ पुत्र होयेगा।
परमोच्च राशी का गुल्हो च धनेश राहुसे युत होघे भौर नवमेश मे
गपादोतो पुत्र होरेगा।
परमोशराभी मे गया हुवा पंचमेश लग्नेगसे युतहोघे भौर गुरु
शुभग्रहसे युत होतो १० पुत्र होरेगा।
पंचम भावमे पापग्रह गपारो भौर गुरुसे पांचमे शनीगया हो
तो दूसरा विवाह करने से (दूसरी श्री के ) पुत्र होरेगा भार३मो
का सुप रोगा.
प्रथम पुत्र किंवा पुत्री जन्म योग ।
व्यर्थाले लग्नपे प्रथमः सुतः २०४
द्विस्व भावगा भन्नाशकाः प्रथमः सतः २.५
लाभेपापे पंचमे चन्द्रान्छौ प्रथमः कन्याः २०६
पुरो पुंभारागे घुग्रहे प्रथमं पुत्रोन्यथा कन्या २.७
टीका-लग्नेश बग्नमे किंवा दूसरे तीसरे भागमें गयाहोतो प्रथम
पुषहोगा२.४
चंद, मंगळ, भौर शक यतीनो-दिस्वमार राशी में गहोतो
प्रथम पुत्र होरेगा. २.५
लाभ (११) भाष पापना गया भोर पांचम भागमे चंद्र
का योग होती प्रपम कन्या होगा २०६
पंचमेश पुरुश मोरे भोर वह पुकाराशी १३५॥१९॥११)
मे, पुप श्रीराशी के निवांश में गया होरे तो प्रथम पुत्र होगा।
भौर पंचमेश परियोग हो वे भौरवो राशी (२।१६८११२)
मे सी राशी के ही नवशिम गया होतो प्रथम कन्या होगा २०७
भारस पुष योग।
पंचएकनमे गुरुामें शुभराशावारसः पुत्रः २.८
सरीका-पंचमभारमे कंपल गुरुका दशार्ग होचे किंवा परमेशुभ
गरी राशी शुभपा वर्ग में शुभ यह सेट सेतो भोर स पत्र
(सोम) का सुख मेगा २०८

মাথায়,
सापुत्र योग।
मन्दांशोमुते चन्दमन्दान्पतरयुतदचपुत्रः २०१
तुर्ये मन्दारौ दत्तपुत्रः २१.
पंशविच्छेश्योगे दत्नपुत्रः २७
टीका-पंचमभावमे शनीकी राशी ( १०-भौर शनीकी राशी
काही नांशगयाहो भौर उसमे चंद भयवा शनी युत होतो मात्र
लेना पडेगा।२०९
चतुर्य भागमें शनि मंगल का योग होतो दत्तपुत्र लेनापडेगा २५"
पेश पिच्छे से मिलने योग कोहैं उनमें से कोईभी योग होतो
पसपुन लेना पडेगा २११
दासीपुष योगा
सकेता पेशेज्ञशुक दृष्टे दासीपुत्रः २१२
शुक्रन्त्ये सौरीशे दासीपुत्रः २१३
टीका-कारकांश लममे गयाहुया केतु, पुध, शुकवर होतो
दासी से उत्पनहुवा पुष होगा २१२
पारमे भायमे गयाषा शुफ शनी के नवांशमे होती दासी 3.
स्पा हुमा पुम होगा २१३
मीत पुत्र योग।
धीरयेमन्दे ज्ञेन्दुयुते क्रीतपुत्रः २१४
का-पंचम भावमे गया हुवा शनि, बुधवन्द्रसे युतहोतो फ्रीत पुत्र
कीमत देके खरीदाबा(पुत्र) होगा २१४
पुत्रेणसह मित्रौ दासिन्य योग.।
सुताइन्शामिनत्वे पुत्रोमित्रम्. २१५
सुतांशो समौ पुत्रेण सहोदासम्पम् २१६
टोका-पंचमेश भोर लानेश के पास्पर मित्रताहोर तोपुत्रने साप
मित्रता (मीति) रहेगा २१५

मतिकता.
टग्नेश पंचमेश परस्सर समग्रह होतो पुत्रो साप उदासीनता
(समभाष ) रहेगा २१६
भातानुक्ता मतयोग।
टानपुरेशयो रन्योन्यदृष्टा सुतआज्ञानुवर्ती २१७
पुत्रांगेशा बन्योन्य भांशगो सुतआनानुवर्वी २१८.
टोका-लग्नेश पंचमेशको भार पंचमग लग्नेशको देखना होतो
पिताको भाजापालन करने वाला पुत्र होगा १५
पंचमेश लोश की शि मेकिंपा सोनश नवांश भोर छोनश
पंचमेश की राशि में भयरा पंचमेश के नशंषमे गपाडो पिताको
भाज्ञापालन करने वाला होगा २१८
पुन पापय पश्य योग।
पुत्रपेलेरोषत्रपुरारपपश्यः २१९
सतेशदृष्टेन सुतेले शदष्टे पुत्रचारपश्पः २२.
इविपंचमविवेकः
टीका-पनमेश हममे भोर टोनश पंचममै गपाहो तो पुरेकर
ने माफिक परने पाहा रे २१९
पंचमेशात्रको भौर नेश चनंको देश होवो जपने
मेरो २२०
इन पिधारो के सिवाय भाइंका छोटाभाई, माकपाटेकीमी,
मित्रका धन कुटुम्मा मानापन दम्र, पुत्र पसा, भीकों
साभ, नोहरका भाई, पेटकाBER, पिसाकामा रापाकों साभ,
परिवार भी इसी पंचम भार से करना।
इति पंचम किस्पटी समाप्तः।

: माटीकासहित अप पष्टविरकः। जातिगत्रु योगा पष्ठेरो पष्ठे जातिः शत्रुः टीका-उठे भाव का स्वामी छठे भामही जावेतो नातिके टोग शहो। मुतः शमुयोग.। अन्त्यारिंगे सुतेरोसतःशत्रु: २ पुत्रोदयेश शात्रवे वा पुत्रपष्ठे लग्नेशदृष्टे पुत्रःशत्रुः ३ टीका-पंचमेश छठं भयवा गरमे भाषमे नोवती पुष शत्रु होवे २ लग्नेश पंचमेश के परस्पर शत्रुता हो भयका पंचमेश उठेमात्र गपाहो भौर उसको लग्नेश देखता हो ता पुष शत्रुहोवे । मातृवरयोग। लग्नेशस्य सुखापेशी शम चेन्मातृवरम् । सुखपे पापदृग्युते मातृवेरम् ५ तुर्यपे लग्नपतः पष्ठे वा तुर्येशे षष्ठे मातरम । टीका-मुख भौर शाम भारके स्वामी लग्नेशके शत्रु होवो मावा से वैरहोवे । मुनेश पापग्रहसे युन दृष्टहोतो मातासे वरहोवे ५ मुखेश लग्नेश छठे भावमें गवाही भथवा मुझेश छठभावमेग- पाहो वो मातासे वैर होये ६ पिता शत्रु योग। लग्नखेशयोः शात्र वाखेरी लग्नतो लग्नपतो वा षष्ठे पिताशत्रुः ७ सुत्शेषिके लानेशदृष्टे पितृदूपकः ८ प्रवेशे निकराव्हार दृष्टे पितृदूषकः ९

(१९९)
टीका-लग्नेश दशमेश के परस्पर शत्रुताहो भषमा दशभावका
स्वामी लग्नसें वा लोश सेंछठेभावमे गया होतो पिता शत्रुहोरे ७
पंचमेश ६८१२ म्यानमें गयाहो भौर उस्को लग्नेश देखता हो
तो पिताको दूषग लगाने वाला ये ८
पंचमेश ६।८४१२ स्थानमें गयाो भार वह राहु मंगल. इन दोनो पहो
से दृष्टहो तो पिताको दूषण लगाने वालाहोरे ९
शयपीढायोग.
पष्ठेरोकेंद्रे पापदृष्टे शत्रुपीड़ा 1.
पष्ठपापा वा लग्नेशः पष्ठे षष्ठेरोले- शत्रुपीड़ा ११
पष्ठपेऽवले पापदृष्टे पापांतरे वा शत्रुपीड़ा १२
टीका-एष्ठेश केंद्रमे गयाहो और पापगह से दृष्टहो तो शत्रुकी
पीड़ा होवेगा १०
छठे भावमे पापग्रह युतहो भया लानेश छठेभावमे भार षष्ठेशलग्न
में गयाहोतो शत्रकी पीड़ा होगा ११
पप्ठेश निर्वली होकर पापग्रह से दृष्टहोवे भयवा पापग्रहों के मध्यगत
हो तो शत्रुको पीडाहोगा १२
खी गधु पोग।
लग्नदारपयोः शात्रये वीशत्रुः १३
का-लानेश सप्तमेश के परस्सर शत्रुता होती श्री शादीचे १३
परिहन्ता तथा शमनाश योग ।
पठेरोगे घेरिहन्ता १४
पटेशे बलाढये वरिहन्ता १५
पटेशुभ दृष्टया धिक्ये वैरिहन्ता १६
परोधिके नीचमूढारियुते लग्नेरोपलिाने रापुनाराः १७
लग्नेशादरीशेल्पबले शत्रुनाशः १८
पछे कौतुके शत्रुनाशः १९

(२०)
मापा टीकासंहित
टीका-पष्ठेश लग्नमे गयाहोतो वरिकानाश करनेवाला हो ।
पष्ठेश बलवान होवेतो पैरिहन्ता होये १५
षष्ठस्थानपर शुभ ग्रहों कि दृष्टि भषिक होतोवरिहन्ता हो। १६
पष्ठेश ( ६८११२ ) त्रिकस्यानमे हा नीच, भरत तया श|राशी
के ग्रहसे युतहोवे भोर लग्नेश वलपान होतो शत्रुका नाश होवे १५
सग्नेश से पष्ठेश भल्ल बली होतो शत्रु का नाश होवे १८
उठे भावमे सूर्य कौतुकावस्थामे गया होतो शत्रुका नाशहरि ११
व्रणपिठिकादि पाहायोग.।
भौमेली गुहसितहम्धीने व्रगपिठिकापीड़ा २०
केवर्कजा दस्त व्रणपीठिका पादा ३१
लग्नपारी त्रिके ग्रन्थिशस्त्रज व्रणपीड़ा २२
सपापरीशे लग्नेत्रिके शरीरेनगः २३
मंदारा परिगौ वा व्ययगो व्रणः २४
सारीशेड वाष्टमे शिरोवणः २५
लग्नेशकुजेपुत्रेपापान्वितेपापदष्टेशिलाशन मंगमस्तके २६
भौमेंगे पनेजीये वा शुक बांकितशिर: २७
मचंदेरीशंगे वाष्टमे मुखवगः २८
भोमारीयायगे वाटमे कंठवगः २९
जीवारीशा वंगे वाष्टमे नाभिमुटेवगः ३०
शारीगोधेगेवा हृदय नगः ३३
दाकारीशी लग्ने नमूळे अगः ३२
मंदसियों रं देहे पादयणः ३३
गहु केतु पुनारीयोमे देहे अपरायणः ३४
पापारिगेमौर पपेशक पासपार्भवणः ३५

मातकवाव. (२०११) -- पयेगुरोविधी से ज्यायारिंगेगुदा बगः ३६ पठेत्येवासकियोगे सौम्पादृष्टे गंडपालादयः ३७ सपापे कर्मगेरिशे पाष्टे वा यदंगरायो तदंगे व्रणः ३८ टीक-वृश्चिक राशीमे गयेहये मंगल को गुरु शुक्र नहीं देखने होतो मखम फेडा फनसी की पाहाहोये २० कतु भौर मानि ये दोनो हातमे भावमें गयेहोतो जखम फोडा मगेरा घी पोट्टाहोगा २१ लग्नेशगर मंगल ये दोनो ६८१२ भावने गयेहोंयेतो गठान की भोर शास्त्र के नबमका पोड़ा होगा २२ पापमहसें गत पाठ लग्न तथा निरस्थानमें गयाहोतो शरीरमे पाय ( जखना होगा २३ दानि भौर मंगल ये दोनो उठे भयत्रा बारमे भावों गपेहोतो घारकी पादा होगा २४ पश सूर्यसे युतहोकर लग्नमें या भाट. भाव जायेतो मस्तक में जखमहोगा २९ बग्नेश गल होष भार वह पचम भामें पापग्रह से मृत दृष्टहै। तो पापा तथा शम्र से मस्तक जस्सम हारेगा ५६ सागरहो भौर सातमें भावमें गह भयना शुभ गयाहोतो अगापित शिहोरे भर्यान मस्तको बहा जखमो के चिन्ह हारे २० पठेश चंद्रसे यहोर लाने भयकामाठ भावमे गया तो मसपर प्रग। पाव) होये २८ भंगल से गुत होकर पटेश लमने वा माठ भायमे गपाहोवती ठमे सन २९ गहरों पतमोफर पठेश लममें या भाठमें भायम नोवती नाभी नीचे गोयगा. दुधरी पतकर यष्टेश समवाभाठमें भाय में गपाहातोहर समें प्रमोरम तुमसे युत होकर पढेश नमे या भाद- भाषी गया वती नेपलमें जनमदोरे ३२ होवे ३७ (२.) मापा टीकासहित शनीसे गुतहोकर पोश लाया भाठम भावमें गयाइवितो पार मे व्रण होये ३३ राहु या केतुसे युतहोकर षष्ठेश हा भपया भाठमभावमें गया होतो भाट पर व्रग होवेगा ३४ मंगल ३-११-६ भायम गयाही भौर वारमें भावमै शुकहोतो घाम पाश्व में व्रण होये ३५ बारमे भावमे गुरु भौर चंद्र दोनों गये दो भौर युध :-६-11 भारमे होतो गुहा के समीप व्रग होवे ३६ मंगल भौर शनि का योग उठे अथवा पारमें भाव होवे और उनको शुभग्रह नहीं देखते दोतो गंडमाला रोग (ठम होताद का) पापग्रहसे युत भयया दृष्ट पटेश दशम भावमे मिसराशीमें जावे पद राशिकालपुरुष के भंगमे जिस भंगकी हो उसी भंगमे जखम (घाव ) होगा भर्यात मेषराशी होतोमस्तक मे वृषम होतोमुखार इत्यादि कमसे राशीभग भनुसार व्रणका स्थान मानना ३८ तापगण्ड योग। लग्नेशार्को त्रिके वापगण्डः ३९ टीका-लग्नेश भौर रवि इन दोनो का योग ६८।१२ भावमै हाँ 'तो तापगडं (दाहयुत गलगंड ) रोगहोवे ३९ जलज गंड योग। चंद्राङ्गेशौ त्रिके जलज गण्डः ४. लग्नपष्टेशचंद्रात्रि के जलगैजेण्डः ४१ मकरांरो दुष्टग्रन्यि गण्डादि ४२ टीका-चंद भैर लग्नेश इनदोनोका योग ६८।१२ भाष मे होतो जलसे उत्पन्न हुवा गलगण्ड रोगहारे ४० लग्नेश, पट्ठेश, भौर चंद्रमा ये तीनो ६२ भायम गयेहोतो मलनगंड (फफ्ननिगलगंड ) रोग होवे ४१ कारकाशन मकर राशीका होतो दुष्टययि रोग या गड रोगापिहोवे ४२

मादकवार..
(२.३).
पितरोगीयोग.
टानेराती विक पिनरोगी १३
टीका-लोश भार युध का योग ।।१२ गारमें होतो पिनका रोग
होवे ५३
भामरोगीयोग.
जीवांगेशोंत्रिक आमरोगी ४४
-गुरु भौर लमेश का योग ६२ भारमें हो तो भाम
रोगी रो॥
क्षय रोगी योग।
शुमादेशौ त्रिक क्षयरोगी १५
अंशातुपोत्यगौ कमात्कुजराह क्षयरोगी ४६
भोमार्य दृष्टे रग्ने शासक्षयादिः ४७
चंदाको धन्योन्य भांशगो क्षयी ४८
सिंहया कर्कचंद्राको क्षयी ४१
रुपपे च भोमस्टे महणिजः क्षपी ५०
कक्षपी ५०
शा-गुरु भार लानेका योग ६८२ भागमें वोरोनी
फारम सनसे पलुभाष मंगल भौर पारमें भाग गरे
तो क्षयरोगीहोरे ।
मंगलौर निम्न मोतीलाम स्पादिरोग गरे ७
पभोर रपि परम्पर भय HAIR मे गहरे पान
पंटीमेसीनसालिमारीदि)
रामसिंगरामागतोपरगारो
मी में रिसोग होवो रोगी

(२०४)
भाषटीकासहित
शनिसे युक्त चंद्रमा को भौम देखता हो तो संगहणी रेग जनिर
क्षय रोग होरे ५०
फराशी में सुध गया हो तो क्षयोगी होये
चौरांत्यज जानित रोगयोग ।
लग्नेरोनमह शनि गहु केतन्यतमत्रिके चौरांत्यज जनि
तो रोगः ५२
टीका-लग्नेश से शनि, राहू. किया फेन इतीनो ग्रहों में से
कोईभाभेक ग्रह गुनहोकर । ६८.१२ } विकस्थानमें गयाही
चौर तथा भग्यन नानिक मनुष्य के मन से रोगोंगा। ५२
होगायोग।
तुर्यगा उज्यागजाहयोगी ५३
टोका-गुपि भार गनि ये तीनो ग्रह चतुर्थ भायमै गयो
हयोगी दी १३
गधियुन नित्परोगी नया नाना रोगमन् योग.
मंदे पारयुतदृष्टेन्त्ये या त्रिकोणे व्याधियुतः ५४
निकेष्टमेरो नित्यरोगी ५९
टाभरोषष्ठ नानागेगवान ५६
सा-हत युत शहर शनि पार मापन होता
९५५ भाव में पारोतो आपियुन (गेगी। ५४
भाट भाI FIो र स्थानमें गहतो मियी
साना उरे मामें गया तो अनेक रोगामाता
नौरोगयाग।
शुभांगे मनमे यो रोगः ५.
- भार मायामांग सम मा में है तो
आरोग.
गगी चोग
ग्यारोपटे गहरा लानेगेडा रोपनी ५८

का-छठेभावमैं गयेहुवे शनि मंगल रविव राष्ट्र से दृष्टहो भौर
लग्नेश बलहीन होतो बहुत दिनतक भाराम नहीं होनेवाला ( दघि)
रोग होये ५८
उदर रोगी पोग।
मदेराहु केतू उदररोगः ५९
रंधेमंदे ठग्ने चंद्रे उदररोगः ६०
टीका-पातमें भावमें राहु किंवाकेतु गवाहोती उदर (पेटमे)
रोगहोवे ५९
भाठमें भाव में शनि भोर लग्न में चंद्रगया होतो उदर रोग (पेटका
रोग भर्यात मैदानी पेटमे दुखना जलोदर कठोदर भादिरोग होघे६
दंतरोगी योग.
लग्ने गुरु राह दन्तरोगी ६१
पष्ठे राहु केतू दन्ते धरे पारोगी ६२
टोका-लग्नमें गुरु राष्ट्र का योगदा तो दंतरोगी (दातक रोगवाला)
टेभावमे राह किया फेनुगया होते। दांतमे वा भोष्टमेरोगहोवे ६२
स्मररोगी योग.
मन्दारान्दुपु रंधारिवित्तान्स्पस्थेषु स्मारोगी ६३
टीका-शनि, मंगर, रधि, भौर चंद्रमा ये चारोग्रह ८६२९१२
इनचारो भावो में क्रमसे या कोईभी स्थान में चारों फगता में या
पारे न्यारे गये होतो काम संबंधी । यी विकार का ) रोगहार
मागंगाग।
मोत्येग नाभिगगी ६४
टीका-उदभाव का म्यामी तीतो भाय में गपाहोतो नाभिरो
गी(नामी मे रोगही वा नामसरकरने की पीटा) होवे ६४
पाद रोगीयोग
मंदेरिगे पादरोगी ६५
टीका-उठेभाय में शनिगपाहातो पांव में रोगवाटा होता ६५
होये ६१

मापारीकासहित
गुरोगी वा महारोगी योग।
झारखेोरो शधुदृष्ठे गुदसमीपे (नेवारोगः ६६
ज्ञारांगेशाः सिंहगाः सुखवा ध्यये गुदरोगः ६७
काल्पेशे चंद्रे पापयुते गुप्तरोगः ६८
रंध्रपापा गुह्यरोगः ६९
जीवेत्ये गुह्यरोगः ७०
सारोपप्ठेराज्ञौ लिंगरोगः ७१
टीका-लग्रेश बुक्की राशी मे) किंवा मंगलकी राशी (८० .
मे गयाहो भौर भपने शत्रुपदसे दृष्टहो तो गुदा के समीप वा भवान
मे रोगहोवे ६६
बुध, मंगल भौर लग्नेश ये तीनो ग्रहसिंहराशी मे गये भीर
सुखा४में किया वारवें भाव मे स्थितहो तो गुशमे रोग होवे ६७.
फर्क भया वृश्चिक राशि नवांशमे गयावा.चंद्रमा पापग्रहोस
युतहायतो गुप्तांग मे रोगहोये ६८
भाठ में स्थानने ३४ पापग्रह गयेहोवेतो गुप्तांगमे रोगहोंने १९
पारमें भाव में मुझ गया होवेतो गुप्तांग मे रोगहरे ७०
पठेश भौर बुधये दोनों मंगल से युतहोतो जननेंदियन रोगहारे।
शम्रादिपीडायोगा
लग्नेकुजे शन्पर्क हटे शमादिपीड़ा ७२
टीका-लग्नमें गया हुवा मंगल शनि और रविसे दृष्ट होतो शमा
दिक से पाहाहो ७२
भरस्मगि योग।
सार्कजेचंद्र भौमदृष्टे स्मारी ७३
रंघेचंद्रराहु अपस्मार्ग ७४
रंधे पापाभंदाच्छो संयती केन्द्र परमारी ७५
पष्ठाष्टमें मदे कुजपुते परमारी ७६

M
हो ७६
मातकर्वत.
चंद्रागको लग्नमृतिगाः क्रूरदृष्टा अपस्मारी ७७
ग्रहणकालेयमारौ रंधेपष्ठे वा गुरुहानेलानेत्रिकोगेपस्मारी७८
इन्दौठे-राही अपस्मारी ७९
तरीका-शनी से यत चंद्रमा भौम से दृष्ट होतोभपस्मार (मृगी)
रोगाला होवे ७३
भाठमें भाव में चंद्र राहु का योगहोतो मृगी गैगवाला होवे ७४
भ ठमे भाव में ३।४ पापग्रह गये हो भौर चंद्र शुक्र का योग
केंद्रस्पानमें बाहोतो भपस्वार । मृगी) रोगवाला होवे ७५
उठे किंवा माठ में भावमें शनि मंगल का योग होतो भासमारी
चंद्र मंगल भार सूर्य से तीनोगह लग्नमै भिटम भाषमे गये
हो भोर पापमह से रघहोतोभपस्मार रोगी होवे ७०
ग्रहण ममयका जन्मही शनि मंगल का योग भयवा भाठमे
। भावमे हो और लग्न किं ९४५ मे भारमे गुरु का योग नहींहोतो
भपस्मार रोगगला हो ७८
उठेमारमें चंद्रमा मौर लग्न में राहु गपाहोतोभपस्मार रोगाला
होने
तालुरोग योग।
ज्ञार्थेशी सराहुकेत्योः पठे तमस्थाशयुनौ तालुरोगः ८०
टीका धनेश भौर बुधरा किंवा फेनु से युग होकर छठे भाव में
गहो भौर निप्सराशी में राष्ट्र स्थितो उसराशी साभी से गतहो
ataलरोगी (ताल स्थानमे गंगाला) हो ८०
गळरोगयोग।
सजेसोत्यो गलरोगः ८.
पापेसोत्ये गलरोगः ८२
सोत्येगुलिके विरोपादठरोगः ८३
सपापेचं सुते कंठ रोगः ८५

. । (२०८) भापाटीकासहित. टीका-कीसरे भाव का स्यामि युधसे युत होती गलमे रोगो८१ तीसरे भाव में पापग्रह गयेहोतो गळेमे रोगहोवे ८२ तीसरे भाव में गुलिक गगहोतो भवश्य गलरोग होवे ८३ पापग्रह से युतचंद्रमा मुखभाव में गयाहोतो ठमे रोगहोवे । मस्तक रोग योग। सोत्येशेशेश्वरारोशे केंद्रपाग्युत दृष्टे मस्तकरोगः ८५.. यमारराहव एकळेगा मस्तकरोगः ८६ टीका-तीसरे भाके स्वामी के नवांश का स्वामी निसराशि के नवांश में हो उसका स्वामि ॥१० भाव में गयाहो भोर पापग्रह से युत दृष्ट होतो मस्तक रोग होये ८५ शनि, मंगळ, भौर राहु ये तीनोयह एकराशीमें गयेहोतो मस्तक मे रोगहोय ८६ मुखरोगयोग. कुजगिरो ज्ञयुवे मुखरोगः ८७ कोशेारी मुखरोगः ८८ टीका-मंगळकी राशी ( १८) में गया हुवा लमेश बुध से पुत्र होतो मुख मे रोग हो। ८७ धनभावमे रवि मंगलका योग होना मुन में रोग होने ८ फर्णरोग योग संत्ये प्रेत पुर्णपांशे भोंमे कर्णरोगः ८९ सोत्थे गुठिकार्कजो शुभहम्पीनो कर्णरोगः ९० सोत्थपे झूरपष्उयंरो कर्णरोगः ९१ अंशे केतो पापदृष्टे कर्णच्छेदः कर्णरोंगो वा ९२ शका-प्रेत पुरीप संज्ञा पष्ठशमें गयाहुवा मंगल तीसरे भार गया हाती कानमें रोग होने ८९ तीसरे भारमें गलिक भार शनि गये हो भोर इनको कोई शुभ नहीं देखता होतो कानमें रोगहोवे ९० .

मातकतरव. तीसरे भाकालामिफरषष्ठवंशमैगयाहो लोकानौरोगहोवे ११ कारकांश लग्नमें गयेहु केतुकों पाप या देखते होतो कानकटनाये अथवा कानमें रोग इवे ९२ पीनसरोग योग. पष्ठेचंद्र रंधेमंदे न्त्यपालमपेपारशे पानसरोगः९३ टीका-छठे चंद्रमा, भाठमे शनि, व बारमें पापग्रह, गये हो भारत- शिपापादके नवांशम होतो पानस रोग होवे ९३ पिशाच पोडायोग. रंधचंद्र रुमदेबले पिशचपीड़ा ९४ तमोजो लग्ने पिशाचपीड़ा १५ शका-आठमें भावमें चंद्रमा शनीसे युत हो भौर निवली होती पेशानपाडा दोरे ९४ पहभऔर शनि का योग लग्नमे होतो पिशाचपीडाहोवे १५ बातर्षिक ज्वरयोग. धेशसराहुकेतौचातुर्थिकज्वरः ९६ रीका-भश्मेश राहु किंवा तुसे युत होतो वार्षिक सरका रोग वि५७ दइनकस्य योग। ध्ययेरो पले करभारी नीचांरो वा देहवैकल्यम् ९७ व्ययेपास पापयेशः पापयुतो देह पैकल्पम् ९८ सूर्या द्वितीयेपेदे खचंद्रे सममेमोमे देहवेकल्यम् १९ का-पारमें भावका स्वामिनिरलो हो भौर पापण्हकी राशीम नषाशमे भवानीराशी क नमांश होतो देह में विकलताहौर ९७ धारम भावमें पापग्रह गये हो भगवा पेश पापण्डोसे युतदातो में शिकरता होवे ९८ मूर्पसे दूसरे भाषमे शनि, दशमचंद्रमा, भौर सातमें भावमे मगल गपा होतो हमें विकलता दोरे ९९.

(२१.). भाटाकीसहित
तनुशौंप, गुरम, संग्रहणी, भतिसार रोग योगाः
चंद्रार्का पन्योन्यसंगो तनुशोषः १..
कर्कालिघटांशे चंद्रे समंदे गुल्मरोगः १०१
अंशात्सुते केवौ संग्रहणी १०२
कोशेमदे वा राहौ संग्रहणी १०३
लग्नतमोजो यूनेयमारौ अतिसाररोगः १०१
का-चंदकी राशी () में रवि भार रविको राशी (५) में
चंदमागयाहो तो तनुशोषरोग ( शरीरमूखतानावे यह रोग)
होने १००
कर्क वृधिक किंवा कुभराशीके नवांशमें गयाहुवा चंद्रमा शनिसे
युत होतो गुल्म रोग (गोलाक्टनेकी विमारी) होवे १०१
कारकाश लग्नसे पाचमें भावमें केतु गयाहोतो संग्रहगारोग
होये १०२
धनभावमें शनि किंवा राहु गपाहोतो संग्रहणी रोग होवे १०३
लग्नमें राहुबध भौर सातम भावम शनि मंगल गये होतो भवि-
सार-रोग होवे १०५
भग्नि विपादित तया शीत उक् योग.
धर्मे कुजेग्निविषार्दितः १०५
सपापे पापदृष्टे दो टग्ने शीवरुक् १०६
टीका-नवमे भाषमे मंगळगयाहोतो भाग्नि तया विपके सपर
दुखी होवे.१०५
पापमहसे यत भार दृष्ट चंद्रमा लग्नमें गयाहोतो सरदीका
होषे १०६
प्रमेहरोग योग.
मंदार्कशुकाः पंचमस्याः प्रमेहः १.७
कान मदेभौषे प्रमेहः १.८
सेभोमे शनि युत दृष्टे प्रमेहः १०९
से
त

नातकतत्व.
टीका-शनि, रवि, भौर शुक ये तीनो ग्रह पंचमस्यानमे गये होतो
प्रमेहरोग । सुजाक या परमिया) होवे १०७
लग्नमे रवि भौर सातमे मंगल गवाहोतो प्रमेह रोग होवे१०८
दशम भावमे मंगल शनिसे युक्त किंवा दृष्ट होतो प्रमेहका रोग
होये १०९
यातरोग योग
समंदेरीशे नीचे ऽनिलरोगः ११.
इज्येने मदे मेदे वाताधिक्यं १११
त्रिकोणास्ते भौमे मंदेड्ने वाताधिक्य १५२
क्षीणेन्दु मन्दी व्ययगौ यावाविश्यं ११३
टीका-नीचराशीमे गयाहुया षष्ठेश शनीसे युा होतो बात रोग
रो भयांत ८४ प्रकारके शयेक रोग है उनमेसे कोईभी रोग
होवे 1.
लामें गुरु भौर सातमें भावमें शनिगयाहोतोवायु भधिक होये ११५
नव पाचमे तथा. सातमे भावमे मंगल भौर लग्नमें शनिगमा
होतोनात रोग भधिक होवे ११२
क्षीणचंद्र भार शनीका योग पारमें भावमे होतो वात रोग अधिक
होये ११३
मूत्र कृच्छरोग योग।
जलभेचंद्रे उत्पेषष्ठे जलसंग ज्ञदृष्ठे मूत्रकृच्छूरोगः १११
पापाः षष्ठे वां सतमे भूत्र रुच्छ्ररोगः ११५
का-जनराशीका चंद्रहो उसकंदकी राशीका स्वामी छठे भाष में
गया भौर उसको जलाशी में गपाहु जुधदेवताहोतो मत्रकृच्छू
रोग (पेशाव महाकठ से उतरे वह रोगहरे. ११४
उठे भयवा सात म भावमे ३४ पापग्रह गयेहोवो मूत्र पुच्छरोग
इंटीयोग
मेषेने खेजे शनि भौम योगे कुटी ११६

.
.
(२१२)
भाषा टीकासहित
युग्मकर्क भीनाशे च यमार युवे कुष्टी ११७
कालि वृप मृगगैः पापे खिकोणे दृष्टे वायते कुष्टी ११८
जेन्दु लग्नपा राहु केतु युताः कुटी ११९
कुजेने रन्धे तुर्कजे कुटी १२०
मंदारेन्दच्छेपु ऋरादितेषु जलभगेपुसजलकुष्टी १२१
मंदारि युतो रक्तकृष्णारूप कुटी १२२
पप्ठेरो सारेंगे पिचकुष्टी १२३
समन्देरीरोने कफकुष्टी १२४
सर्य पष्ठेशावंगे रक्तकुष्टी १२५
अंशात्तुर्येचंद्र केतुदृष्टे नीलकुष्टी १२६
अंशातच कुजद्दष्टे पहाटी १२७
चंद्राच्छो सपापी जलभगौ वित्रि १२८
अंशात्सुखे चंद्रे शुक्र दृष्टेवित्रि १२९
लग्नेश इन्दारोवा राहुकत्वन्पतर युती एकत्रावित्रि ३.
मंदारचंद्रा मेपेवा वृपे चित्रि १३:
सौरायोरिः वनस्थयोः क्रमालग्नेचं सूर्यस्ते वित्रि १२
टीका-मेपराशी का बुध, दशमे चंद्रमा, भौर शनि भीमका एकरा
शिम योगहोतो कुष्टरोग वाला होवे इसयोग में शनि भौमके योग का
स्थाननही कहाहै परंतु यदि ये योग दशम भावमे चंद्रमा से युतहोतो
विशेष बलवान होवेगा ११६
मिथुन, कर्क, तथा मीन राशी के नवांश में गयाडवा' चंद्रमा शनि
मंगल से युरिया इटहोतो कुष्ठ रोगाला होरे ११५
कर्क, यक्षिक, भौर मकर, राशी में पापमह गये दो भौर उनसे
""भावयुत भपया हो तो मुष्टरोगी होरे ११८.

मातफतत्व (२१३) बुध, चंद्र, भौर लग्नका स्वामी ये तीनो राहु किंवा केतु से युत हो तो कुष्ट रोगी होवे ११९ लग्नमें मंगल,भाठमे भावमें रवि भौर चतुर्थभावमें शनि गया होतो कुष्ट रोगी होवे १२० शनि, मंगल, चंद्र, भौर शुक ये चारो ग्रह पापयहसे युत वा दृष्ट हो और बलराशी में गये हो तो जिस कुष्टरोगमे पानी चुपाकरे पैसा सजल कुष्ट रोगवाला होरे १२१ शनि रवि भौर मंगल का योग हो तो रक्तकृष्ण नामका कुष्ट होवे । इस योग में स्थान नहीं कहा है परंतु ये योग १६४८ भाव में होतो बलवान् जानना १२२ पप्ठेश लग्न में मंगल से युत होतो पित्तकुष्टी होये १२३ षष्ठेश बग्नमें शनि से युत होतो कफ कुप्टी होवे १२४ षष्ठेश लग्नमें सूर्य से युत हो तो रक्तकुप्टी होवे १२५ कारकांशलग्नसें चतुर्थ भाव में चंद्रमा केतुसे दृष्टहोतो नील दृष्टी होवे १२६ कारकांशलग्नसे चतुर्थभाव में गयादुव चंद्रमा मंगल से दृष्ट होतो 'महा कुष्टी होवे १२७ नलराशी मे गये हुवे चंद्र शुक्र पापग्रहों से युतहोतो सफेद कोढ़ का रोग होवे १२८ कारकांश लग्नसे चतुर्थभाव में चंद्रमा शुक्रसेदृष्ट होतो सफेद कुष्ट रोग होवे १२९ लग्नेश किंवा चंद्र मंगल, राहु भपवा केनुसे भुत होती कोईभी श- रीरके एक भागमे सफेद फुट होगा १६० शनि मंगल भौर चंद्रमा ये तीनो मेष भयरा वृषभ राशी मे गये होतो सफेद कुष्ठ रोग होये १३१ बारमे शनि, धनमें मंगल, लग्न में चंद्रमा, भौर सातमें सूर्य क्रमसे गपे होतो सफेद कुष्ट रोग होये १३२ कुष्टरोग १८ प्रकारका होता है उनमेसे ग्रहयोगोंके बनानुसार को. ईभी जातका कुष्ट रोग होता है।

भाषारीकासहित.
शूलरोगी योग ।
पठान्त्यगौ मन्दारो शूलरोगी १३३
सिंह चंद्रे पापार्दिते शूलरोगी १३५
लाभेशे सोत्थे शूठरोगी १३९
केद्र कोणे सिंहगेशने सोत्यजीवे शुलगेगी १३६
ठीका-छठे किंवा बारमें भावमें शनि मंगल गपैहो तो शूलरोग पाना
होता है १३
सिंहराशीमें गयाहुवा चंद्रमा पापग्रहोंते युत दृष्ट होतो शूलरोगी
होवे १३४
लाभेश तीसरे भावमे गया होतो शूलरोगी होव १३५
सिंहराशीमें गयाहया शुक्र केंद्र कोणस्थान (१९५ ) में
भौर गुरु तीसरे भावमें गया होतो शूल रोगो होरे १३६
पामान योगा
सपाप चंदे नरमे पामानः १३७
टीका-पापण्हसे युत चंद्रमा नव भावमें गयाहोतो पाम (साग)
रोग पाला हरि १२७
भरोग योग ।
मन्देन्त्ये पाप दृष्टेऽर्शतः १३०
मन्दे टग्ने कुजेस्तेऽर्शसः १३९
पुनरंधेरो कर शुभारप्टेडीसः १४०
मदेतेलो भामहे ऽरीम: १४१
मन्देन्त्से गुनगी लानारी अर्शमः १०२
प्ययेने भामांशष्टमः ११३
टीमा-गारमें भाव में शनि पापपासे दृष्ट होती मा (airs
रोगरोरे ११८
पानि न भोर मंगवातमें मामें दातो मसगी हो॥

जातक्तार.
अष्टमेश ऋग्न होकर सातमें भावमें गयाहो भार शुभग्रहसें दृष्ट
नह। तो भरोगी होये १४०
शनि सप्तमभावमें भार वृश्चिकराशीका मंगलनवमै भावमें गया
हो तो भश रोगी होवे १४१
शनिवार, भावमें भौर लग्नेश व मंगल ये दोनो सप्तम भाव में
गये होतो भर्श रोगी होवे १४२
बारवे भाव में गयाहुवा शनि, मंगल भौर लग्नेश दोनोसे दृष्ट होतो
भरोगी भर्थात् ववाशीर के रोगवाला होवे १५३
कफरोग योग।
मंदार्क योगे कफरोगः १४४
टीका-शनि सूर्यका योगहोतो कफका रोगहोष १४४
प्पीहरोग योग।
पटेशेचंद्रे पापयुते पहिरोगः १४५
लग्नेशेस्ते क्रूरदृष्टे शुभहम्धीने पहिरोगः १४६
चंद्रेग पठेशी कामावष्टौ पहिरोगः १४७
.' कामांशे चंदेरमात्र दृष्टे प्लीहरोगः १४८
सौरारमध्यगे चंदे मृगे पोहवासादिः १४९
सुतगौमंदचंद्रो प्लीहरोगी १५.
टीका-पष्ठेश चंद्रमा पापात होतो प्लीदरोगी (तिल्लीवटनेका रोग)
होवे १४५
लग्नेश सप्तम भावमे दूर ग्रहसे दृष्टही भौर किप्ती शुभग्रहसे दृष्ट
महिहोतो प्लीहरोगहोवे १४६
चंद्रमा निसराशिम गयाहो उसराशी का स्वामि भौर पठेश ये
दोनो क्रूर ग्रहमात्र से दृष्ट होतो प्लीहरोग होचे १४७
सप्तम भावका किया लग्नका स्वामी चंद्रमा हो भौर यह फरग्रह
मात्र में दृष्टहातोशोह रोगहोवे १४८
शनि भौर मंगल के मध्यमे चंद्रमा गयाहो भौर फरराशीभरवि.
होतोकीमा तिशी घटनेका) कासास कास का रोगहीने १९

.
(२१६)
भाषाटिकासहित.
पंचम भाव में शनि चंद्रमा गयेहोतो प्लीहरोगसला होवे १५१
ददगेग योगा
कोशेजलः चन्द्रे मन्ददृष्टे ददुः १५१
लग्ने ददुः १५२
टीका-जलराशीम गयारा चंद्रमा धनभावमे गया और उसके
शनि देवता हो तो दद् ( दादका ] रोगहोवे १५१
लग्नमें रवि गयाहोतो दुदरोग होवे १५२
जलभययोग।
कारो जलभयम् १५३
अष्टमे चन्द्रे जलभयम् १५४
लग्नेम्जे पापदृष्टे जलभीः १५५
टीका-कारकांश लम कराशी का होतो नलका भय (जलपान)
होरे १५३
भाठमे भाप में चंद्रमा गयाहोतो जलका भय होवे १५४
लग्नमे गायहुवा चंद्रमा पापग्रह से दृष्टहातो मलका भयहोरे १५१
सर्प भययोग।
चंद्रारीपाठेऽ ष्टमेवा सर्पभयम् १५६
तमस्पर्थे गुलिकयुतदृष्टे सर्पभयम् १५७
सोत्ये राहुयुतेने सर्पभयम् १५८
टीमा-चंद भौर मंगर ले भयया भाट में भाष में गये होता सा
काभपहोवेगा ३५६
धनमारमे गया वाराष्ट्र गलिक से युतदातोसमाभय होगा।
तीसरे भाव का स्वामि भार राहायोगान में होली सांस
भापही १९८
चौरसपा भग्नि भय योग
पापेने त्रिकोणे गुलिके चोर भयम् १५१

केवावने पापयुत दृष्टे पिशाचचौरभयं १६० सराहुकेतो पष्ठेशे सर्पपीडाचौराग्निभीर्वा १६१ धर्मेशे षष्ठे पष्ठेश दृष्टे चौराग्निभीः १६२ पष्ठेशे मंदारगुत्ते चौराग्निभीः १६३ टीका-लग्नमें पापग्रह, भार ९-५ भाश्मे गुलिक गया होतो चौर- का भय होरे १५९ लग्नमे गयाहुवा केतु पापग्रहसे युत भौर दृष्ट होतो पिशाचका तथा चौरकाभय होव १६० षष्ठेशराहु से किंवा केतुसे युव होतो सर्व पीडा भयवा चोरभय पा भग्निका भय हो। १६१ नबमें भावका स्वामि छठे भाव में षष्ठेशसे दृष्ट होतो चार किंवा भग्निका भय होवे १६२ पष्ठेश शनि मंगळसे युत होतो चौर किंवा भग्निका भय होवे १६३ स्फोट भग्नि तथा स्खल मय योग, लग्नाष्टास्ते भौमदृष्ठे स्फोटाग्निखलभीः १६४ सन्माष्टाद्यार्थे भौमे सूर्यदृष्टे स्फोटाग्निसलीः १६५ लग्नान्त्यारिमदे गुलिकारौ सूर्यदृष्टौस्फोटाग्निखलभीः१६६ सारेपप्ठेरोऽग्निभी: ५६७ फरेंगे पापयुतदृष्टेऽग्निभीः १६० 'टीका-लग्नमे भाठमे भयया सातमै मात्रमें गयावारविमंगल से दृष्ट होतो फोडाफुन्सिका तया भग्निका वा दुष्ट मनुष्यका भय होवे २६४ सातमेभाठमे लग्नमे अथवा धनभावमें गयाहुवामंगलमूयंसे दृष्ट हो तो पासा पुन्सिका तथा भग्नीका भयवा दुष्ट मनुष्यकामय होये १६५ लग्नमें पारमें छठे भपया सातमे भावमें गुलिक मंगलका योग हो और उनको रवि देखता होतो फाटाफुन्ति तपा भानीका भयवा इष्टमनुप्पका भय होये १६६

(३१८)
मा Tera
पप्ठेश मंगल से पुदीतो भग्निका भय रोपे १६५
मग्नमें गये हुये कर पा पारग्रहसे मृत भौर पृष्टहों तो भानीमा
भय दोष १६८
शान मप योग.
धनेमन्देवापदृष्टयुते शुनोभयम् १६९
मन्देधनेशयुक्तदृष्टे शुनोभयम् १७०
टीका-धनभावमें शनि पापाइसे युत भौर दृष्ट होतो वानका
(कुनेफा) भय हरि १६९
शनि धनेशसे युत भार दृष्टहोतो श्वानका भय होय १५०
शृगालादि भय योग.
गुलिकारी धनेष्टमे या धनेश दृष्टौ गालादिभिः:01
यमे पष्ठेशे सूर्ययुते शृगालादिभीः १७२
टीका-गुलिक भौर मंगल धनमे भयया भाठमें भावमें गये हो.
भौर धनेशसे दृष्ट होती शियाल होमी भादि नंगली जानवरोंका
भय दोषे १५
धनभावमें पष्ठेश मूपंसे पुतहोतो शियाल वगेरा भंगली मानकरी
का भयहोवे १७२
चतुष्पदभययोग.
लग्नेजीवसोत्यपो चतुष्पदभीः १७३
चंद्राभेराही चंद्रार्कयतेपशुभी १७४
टीका-गुरु भौर तीसरे भावका स्वामी ये दोनो लग्नमें गयहोतो
चतुपद ( गाय भैस गधा भादि) का भयहोरे १५३,
मक किंशासिह राशीमें गयावा राह राषचंदसे मुतहोतो पशूका
भयहोरे १७४
मृगभययोग.
पष्ठेरो पन्दे राहुकेतुयुते. मृगभीः १७५
टीका-पष्ठेशशनि, राशि केतुसे युतहोतो हरिणका भयहोये १७५

गजमययोग.
पष्ठांगपोजीषयुतोगजभीः १७६
टीका-पटश भौर लग्नेशये दोनो गुरुसे युतहोतोगजाभयहोवे १७३
भश्वभययोग.
लग्नारीशौ चंद्रयुतो अश्वभी १७७
शका-लग्नेश भोर षष्ठेश ये दोनो चंद्रमासे युतहोतो भनाभय.
गेहशैपिस्यभपयोग.
धेिकोणेगेहशेथिल्यभयम् १७८
टीका-विभाठमें नवमें किया पांवमें भावमें गयाहो तो पुरानेघरका
पड़ने का भयहोवे १८
क्षेत्रर्चितायोग.
खे भौमक्षेत्रचिंता १७९
टीका-शमे भारमे मंगल गया तो सैमसंधकी विता१७१
सोध्यचिंता योग.
विक भौमे सौरपचिंता १८.
री-गल ६८०१२ मार गया हो तो मुमकी चिंता रहे १८०
वाहनाभरणवस्मचिंतायोग.
जीवत्रिक बाहनामरणस्वनिता १८,
का-गुरु ६१८०१२ म.९ में गपा होतो पाइन भाभूषण भौर परमा.
रिकी विदेश १८१
उन चामर, चिंतापोग.
पिक चंद्रे पा सिने चामर छत्र चिता १८२
रीका- भपया गुरु. ६८५१२ में भाषमे गया तो मामा
(उपकी चितारो १८२
पुर रिता योग.
पूने कोणे जीरे पुत्र चिंता १८३
।

(२२०)
মাধ্যাক্ষাদান,
टीका-गुरु सातमे किया ९५ भाषमें गयाहो तो पुप्रसंधी वित
रहे १८३
धी चितायोग,
सुते पी चिन्ता १८५
टीका-पुथपंचमभावमें गपाहो तो मुदिसंबंधी चिंता रहे 14
तात बंधु चिन्तायोग।
सूर्य कोणे तात बन्धुचिन्ता १८५
टीफा-नक्मे पांचमें भाव में भूपंगयाहोतो पिवा तपा बंधु सम्बी
चिंता रहे १८५
याचा चिंतायोग।
सुतेने शुक्रे यात्रा चिंता १८६
टीका-पांचमे भयवा सातमें भाव मे शुझ गयाहोतो यात्रा मुसारी
संबंधी चिन्तारहे १८६
भातुल सुखाभाष योग।
खधर्म पापदृष्टेभौमे मातुलाभावः १८७
ज्ञात्पष्ठे पापे मातुल सुखन १८८
टीका-नवमे किंवा दशमें भावमे मंगळ पापमहसे द्रष्टदो तो मामा
का मुस्खनहींहोवे १८७
बुधसे छठे भावमे पापग्रह गयेहोतो मामाका सुन नहींहोथे १८८
मातुल सुनयोग।
पप्ठेशुभदृष्टयाधिक्ये मातुल सुखम् १८९
पठेशुभे मातुल सुखम् १९०
शुभयुते मातुल सुखम् १९१
इतिष्ठविवेकः
टीका-छठे भावपर शुभगहोकि भधिक दृष्टीहो तो मामाका
भरछा रोयेगा १८९
छठेभाव मे शुभण्ह गयेहोतो मामाका सुख हो ।

नातकतरव. • भष्टमेश लग्नेश मार दशमेश ये तीनो र केन्द्रकोण मा बाम स्था न (१९९१) में गये हो तो दीर्घायु हो। । शनि भपनि स्वराशि किंवा उच्चराशी में स्थित होकर उपचय स्थान (११) में गया हो.भा भरमेश शनि.पंचम भाव में गया हो तो दीघायु होने भठमेश भार ठग्नेश भटम भाव में गये दो १ भथवा भष्टमेश सग्नेश रोनो लाभ भावमें गपे हो २ तो दीप दोबे ६ पटश भार व्यपेश ये दोनो लग्नमें गयेहो । भषवा दशमेश द में गयाही २ किंवा लग्नेश केंदमै गयादा तो दाघायु होरे ७इसमूत्रमें तीन योग कहे है। । दशमेश भग्नी उराशी में स्थित होकर पंचमभाव में गया हो ? भयना भष्टमेश केंद्र में गया हो किवा केंद्रस्थानमें शुभ ग्रह गये हो तो दीपाय होवे ८ इस सूत्र में भी तीन योग है। दशमेश करने, भौर भटमेश ये तीनो ग्रह शनि से युक्त होकर में. दस्थान में गये दो तो दीपाय होवे ९ सर्वपापग्रह तीसरे ग्यारपे तथा रठे भाव भोर सर्व शुभग्रह द्र- कोण स्थानमें गये हो तो दीर्घायु होवे १० ; सशुभग्रह उठे सातमें भौर भाठमै भावमे भार सर्व पापण तीसरे के पार भाषौ गो तो दीया हो । संगनमें गपाहुया भटमेश गुरुशुक्र से दृष्ट हो तो दीर्घायु होवे १२ सर्वशुभ पद कोण (1) स्पानमें गपे हो और पर पारावतांश में गये हो तो वीपीय दोपे १३ मध्याय योग। पापाः पणफरतर्प विस्थामध्यायः ११ अतेशेऽरले जीवेकेद्रकोणे त्रिपापे मध्यायः १५ शुभे केंद्रकोणे मन्पटिनि पप्ठेष्टमे वा पापे मध्पायः१६ त्रिकोणे कटे वा मिया मध्यायः १७ सकारासपण्ह पगर (२०११) स्थानमें भपता वीसरे मोर एवं भाव में गये होवो मम्मा गरे १४ . - - (२४) माताटीलासहिल. लग्नेशानिर्वली होणे, गुह मेंद किया पिकोण स्पानमें दो मोर पा- पर ६२ में भावमे गये हो तो मध्याय होने १५ सर्वशुभग्रहकेंद्र या त्रिकोणस्थान में गये तो भार शनि पटवार होकर क्विाभाठ में भार में गया हो। भयंका पापमा पठ- यान होकर छठे या भाठ में भाव मे गये दो तो मध्याय होवे ।। केन्द्र पिकोणस्थान ( ९५) में शुम भार पाप ( दोनों मिश्र यद गये से तो मध्याय होये १७ भस्यायु-योग। सपापे रन्धेशेन्त्ये पठे या अल्पायुः १८. पापाआपोक्लिमस्या अल्पायुः १९ लग्नाप्टमेशौव्यये रिगे याऽल्पायुः २० धनेरोद्धे स्वर्कजे लामे इज्याच्छौ' अल्पायुः २१ लग्नजारौ चन्द्रो रन्भगः पष्टे जीवेऽल्पायुः २२. लग्नेशेष्टमे ल्पायुः २३ त्रिपापेरेशे ऽपलेल्पायुः २४ क्रुरपष्ठवंशे मन्दरन्धेशौ सपापी पापदृष्टीवाल्पायुः २५ पापेकेन्द्र शुभग्घीनदेशेऽवलेल्पायुः २६ व्ययार्थगौपापो शुभदृग्धीनो अल्पायु::२७ टीका-भष्टमेश पापग्रहसे युतहोकर वारवे भाव में किया छठे स्थान में गयाहो तो भसाथ होये १८ सर्व पापग्रह भाषोक्लिम (९१२) स्पानम गयेहो तोमरसाए होये १९ लग्नेश भौर भष्टमेश ये दोनो प्रह घारखे भाष मे भयमा छठेभाषेमें गये होतो भत्सायुहोवे २० धनेश नपमें भाव में शनि सातमे भावमें भौर गुरु शुक्र लाभ (ग्यार में) भाष में गयेहो तो मत्सापदोरे २१ - , , नातकतत्व. टानमै शनि मंगल, भाठमें भाषमें चंद्रमा भौर उठेस्थान मे गुप गयाहोतो भस्पायुहोवे २२ लग्नेश भष्टम भावमे गयाहोतो भल्सायहोवे २३ पापग्रह ६८०१२ में भाव में गयेही भार लग्नेश निर्वली रोवों भत्तायुहोव २४ शनि भौर भष्टमेश ये दोनो षष्ठवंशमे गयेहो भौर पापगहों से युत्त किंचा दृष्टहावेतो भल्ला होये २५ केंद्रस्थान ( १ ) में गहुये सर्व पापग्रहोको शुभग्रह देखते नहींो भार लग्नेश बलहीन होतो भस्पायु सेवे २६ चारखे भौर दूसरे भार में पापमह गपे हो भार उनको शुभग्रह नही देखते होतो भत्सायु होवे २७ सद्या मृत्यु योग। लग्नेराहुः पठाष्टमे चन्द्रे सयोमृत्युः २८ टीका-लग्नमे रामौर छठे किंवा भाठ में मार में चंद्रमा गपाहों तो तुरंत भूम्यहोरेगा २८ पांतरे मृत्युयोग. मन्दाकाराः पठेटमे यन्तिरे मृतिः २९ टीका-शनि, रवि, भौर मंगल उठे भाठमे भाष में गये होतो एक संपकी उमर होनेके पचात् मृत्यु होने २९ भको मृत्यु योग. सूर्यक्षेमन्देमन्दान्दे मृतिः ३. टीका-मयकी राशी (५) मे शनि भार शनिकी राशी (२०११) में रविगया हो तो भार में वर्ष में मरण होगा ३० एवं सर्वार्थ चिंतामणी योगायुके भन्य विशेष योग टिमे उन- काभी भायुदायमें विगरकरना भारश्यक है भवएप इन योगोंको बत करने में भाते हैं। चंदमापी राशीका स्वामि मपं पापग्रहसे पुक होकर १८ मे मार में माने शुभण्डोंकी रधी से रखिोभार ग्नेश भापोपिळमस्पा- नमें शा॥१२ गया हो वो १६ पर्ष मे मुख होरे ।

(२४८) भाषाटिकासहित स्टग्नेशकी राशी में भष्ठमेश भार भष्टमेशकी रामीम लग्नेश हो शुभ ग्रासे युक्त न हो भयया लग्नेश भष्ठमेश ६१२ भावमे पंचम- से युकहोतो १८ मे गं मरनहोगा २ केंद्रस्थान मे पापग्रह शुभयहोकि दृष्टि से रहितही भौर चंद्रमा ! मेभाषमे गयाहोतो २. मे मरणहोणे ३ पृहस्पति से युत सूर्य ४ कर्क रामी फेल गया दो भार भठमे केंद्र हो तो २२ में वर्ष रण हो । राहुसे युत चंद्रमा ५ मे तथा ८ में भाव में गया हो भार बग्न में गुरुहो तो २२ में वर्ष मरण होवे' दो पापग्रहोंके वीचमें गया हुवा लग्नेश शुभ ग्रहसे युत न हो भौर जिस लग्न में पिता का जन्म होवे उसी राशी लग्न में जन्म दुरा हो तो २५ मे वर्ष मरण होवे ६ भपनि शत्रु राशि में गया हा शनि लग्नमें गया हो भार सर शुभ ग्रह ३६६।९।१२ भाव में हो तो ५६ वा २७ में वर्ष मरण हवे रवि भौर चंद्रमा शनि से संबंधी का भम भाव भेगा होतो२९ में वर्ष मरण होव८ पापा ११८७ में भावमें गये हो भौर शुभग्रह पणफर या भाषा- लिमस्थानमें सेतो २८ मे वर्ष मरण होवे १ लग्नेश भोर भष्टमेश के वीचमें चंद्रमा गया हो भौर गुरु बारहो भाषमे हो तो २७ वा ३० वर्षे मरण हो . भष्टमेश पापग्रह गठसे भौर पापों से इष्टदोष भवालग्नेशभरम में गयाहोतो २८ मे वर्ष मरण होवे ११ भष्मेश बलवान होकर केंद्र मे भयवा समझ गयाहोतो३० भना ३२ मे वर्ष मरण होवे १२ चंद्रमा सर्प से युतहो भष्ठमेश मेंदोदो, पापमद भष्टमभावमेह, मोर पापग्रह से युक्त कोई भी निर्षकी महा गयाहोतो १२ मे २ मृत्यु होवे १३ बध सहित चंद्रमा चारवें भाव में हो भौर निचली भष्टमेश शुभप्र- इसे यत वारट होकरद्रस्थानमें गया हो तो ३. में वर्ष मृत्य नातकताव. (२४९) भष्टमेश ९१ भावों मे से किसी भाव में हो भार ग्नेश भष्टम स्थानमें पापयुत दृष्ट हो तो २४ में वर्ष मेही मृत्यु होवे १५ भष्टभेश लग्नमें भार बग्नश क्लरहित होवे तो ३० वर्षकी ही भायु होवे १६ चंद्रमा भौर लग्नेश पापग्रहोंसे दृष्ट तथा बलहीन होकर भापोक्लि. मस्थान मे गये हो तो ३० घर्ष से भधिक नही जीये १७ गुरुशुक्र केंद्र मे हो पापयुत लग्नेश पोक्सिम में दो भौर संध्या फालमें जन्म होवे तो ३६ वर्षकी परमायु होये १८ पापग्रहों के बीच में गयाहया शत्रुराशी में स्थित निवली रवि लग्नमें गया हो भार शुभग्रह उसको नहीं देखवे हो तो ३६ वर्षकी परमाणु होवे १९ लग्न में चंद्रमंगलगयेहो केंद्र तथा भष्टम भावमें शुभयह नहीं और लग्न मे गलिक हो तो ३६ वर्षकी परमायु होये २० मंगलकी राशी (१८) मे गयाहुवा चंद्रमा लग्न में पापग्रहोंसे दृष्ट हो भौर शुभग्रह केंद्र में नहीं गये हो तो ३३ वर्षकी भाय होवे२१ भष्टमेश पापग्रह चंद्रमासे युत होकर केंद्र किंवा त्रिकोणस्थानमें गया हो और यह दशमस्थान स्थितपापग्रहोंसे दृष्ट हो तो ३३ वर्षकी भायुहोवे २२ चंद्रमा सेयुक्त शनि लग्न में गया हो भौर शुभराशी में मंगल हो तो ३३ वर्षकी भाय होवे २३ पापग्रहोके पीचमे लग्न गया हो भौर लग्नेश मिथुनराशीका होवे भौर गुरु चतुर्थभाव में हो तो ३७ वर्षकी भायु होवे २४ मंगलसे युक्त भष्टमेश लग्न में गया हो यद्वास्थिरराशा में गयादुरा मंगल भाठवें वा बारह में भावमे स्थितहो तो ४२ मे वर्ष मरण होवे२५ केंद्र मे गुरु, दश मे शनि, भौर लग्नचरराशीका हो तो ४४ वर्षकी भायु होवे २६ उच्चराशिका शनि लग्न मे, गुरुसप्तमभावमें, मौर शनि दशमे, भावम गया होतो ४४ वर्ष की भायहोवे २५ लग्नेश पापग्रहसे युतझोकर भष्टम भावमें गयाहो भौर शुभग्रह केंद्र मे नही होतो ४० वर्ष की भायहोवे २८ (२५.) भाषाटीपासहिय. पापा से युतलग्नेश भष्ठमभावमे भोर पापग्रहसे युज भटमेस छठे भाव मे बलवान होवे वा शुभदृष्टि रहित होतो ४५ मे वर्ष मेमर• महोये २९ मेषराशी का पूर्ण चंद्रमा लग्नमे शुभग्रहोसे दृष्टहोतो ४८ मे वर्ष मृत्यु होवे ३० किसीभी ग्रहसे युक्तहोकर शनिम्न में गया भौर चंद्रमा ८f १२ मे भावमे होतो ५२ मे वर्ष मरण होवे ३१ धनराशीकागुरु लग्नमें गयाहो भौर राहुसे युक्त मंगळ भाठमै भा. यो होतो ५ मे वर्ष मृत्यु होवे ३२ भष्टमेश सप्तम भाव भौर पापयुत चंद्रमा ६८ मे भायमे गाने तो ५८ में वर्ष मृत्यु होवे ३. भटमेश से युक्त गुठलग्नमे गयाही भयया कुंभराशीका गुरुपामा सहित केंद्रमे होतो. मे वर्ष मृत्युहोये ३४ लग्नमे शनि, चतुर्थ मे चंद्रमा, सप्तममे मंगल, दशममें सूर्य गया भार पुध गुरु शुक मेसे किसीएफ से भी युकहो तो राजाहो पर पर्यंत मीवितरहे ३५ लग्नमे गपाहुवा शुक्र, चंद सुध भौर गुरुसे इष्टदोष तथा पंचम भा. पमे गुरु गमाहातो. यर्प की भायुद्धोये ३६ सग्नमे शुभ दमें बुध शनि भौरा में भावपरमोधराशीगा मह गया, होतो.वर्ष की भायहोरे ३७ RITTEकार होरा टोपे दांनी भाठम भार में मटा दमे गमागे या फी भापुहोरे ३८ पदमा सक्ति रवि रसमे भायमें, शनिला भौर यह पर्ष मार में गपाहोदो १८ वर्ष की मायुरो ३९ हातमें गुहय मीन राशी में प म शानिमायोग किसी भी माप में भार मारणे भाव में चंद्रमा गया गावकी भायु हो रात में यंदमा, पर राशी नीयका पनि दशमें, भारत मा मपं गवारोटोकी भागु होरे । सानिमावि रामार शुभम भापति मदने मारोतो. या भीin मातफ्तत्व (२५१) पलवान् शुभग्रह केंदम गये हो भौर मष्टम मे कोइ शुभग्रह नही होये तथा लग्नेश पापग्रहों से दृष्ट नही हो तो ७० वर्ष तकनीक्षित रहे४३ पंचम भावमें मंगल नीचराशी में शनि भौर सप्तमभावमें सूर्य गया हो तो ७० वर्षकी भाय होवे ४४ सर्व शुभाशुभ ग्रह लग्न से छठे भावपर्यंत हो अथवा सप्तम सेव्यय पर्यंत क्रम से गये हो तो ७० वष से ऊपर दीर्घायु होने ४५ लग्नसे छठे भाव पर्यंत बलवान् सर्वशुभग्रह भोर सप्तम भाव से १२ भावमें पर्यंत बलवान् सर्व पापग्रह गये हो तो ८० वर्ष मे मृत्यु होने४६ चंद्रमा से युत होकर गुरुकेंद्र में शुभ ग्रहसे दृष्ट होवे भौर भन्य सर्व ग्रह दशम भाव से ऊपर के भाव ( १९१२) में गयेहोतो ८६ में वर्ष मृत्युहवि ४७ केन्द्र में शुभग्रह तथैव भष्टमभाव के विना भन्यभावमे पापणहो भोर लग्नसे छठे भावमें चंद्रमा गयाहोतो ८६ में वर्ष मृत्यहोवे ४८ लग्नेशसे केंन्द्रस्थानमें गुरुगयाहो और (३।१२।१२) में भावमें पापमह स्थित होतो १०० सो वर्ष जीवितरह ४१ केवल गुरु लग्नेशसे फेंदमे गयाहोतो ७० वर्ष की भायुहोवे ५० तीनगद अपनी उच्चराशीमेंहो वृषभ किंवा कर्क राशीके लग्नमें गुरदो मकरका मंगल हो भौर भन्यसर्व ग्रहकेंद्र में गयेहोतो परमा १२. वर्षकी होवे ५१ इत्यादि भोर भी भनेक योगद व पांतरोसे मानना। सिंहान्मृत्युपोग। चंद्राकपिछेवाटमे सिंहान्मृतिः ३१ तुमोमे खेजे सिंहान्मृतिः ३२ टीका-सूर्य चंद्रमाकायोग छठे किंवा भाठमे भादमें होवो सिंहस मुराहोरेगा ३१ चतुर्थ भावमें मंगल भौर दशम भावमें शनिगयाहो तो सिंहसे मार सान्मृतियोग. राम्होखे समान्मृतिः ३३

होये ३३
(२५२)
मापाटिकासहित
राव्हपिरोपापेक्षिती सर्पान्मृतिः ३४
सर्कसुसेभोमे मन्देष्टमे सन्मृितिः ३५
युनेशन्यर्कराह पुसर्पपीडाको मृत्युः ३६
टीका-राहु भौर शुक्रका योग दशम भाव में होता सर्प दंश से मृत्यु
कारकांशलग्नमें गयाहुवासूर्य पापग्रहसदृष्टहोतो सर्पदेशसेंमृत्यूही
दशम रवि चतुर्थभावमे मंगल भोर भाठमें शनिगयाहोतो सर्पदंश
मृत्युहोवे ३५
शनि रवि भौर राहुसातम भावमें गयेहोतो सर्पदंशसें मृत्युहो। ३६
शस्त्रान्मृतियोग।
कुजार्कजावंगे चाप्टमेचंद्रेशस्त्रान्मृतिः ३७
केतुसुखेशोषष्ठे शस्त्रेणमृत्युः ३८
पापयोर्मध्ये कुजर्सगेचंद्रे शस्त्रेणाग्निना वा मृत्युः ३९
रंध्रस्यौ यमारौ राहुयुतौ शस्त्रवोमृत्युः ४०
शुका चन्द्रमन्दी शखतोमृत्युः ४१
टीका लग्नमें शनि मंगल भौर भष्टम भाव में चंद्रमा गया हो तो
शघ से मृत्यु होने ३७
सुखेश भोर केतु छठे भाव में गये हो तो शम्र में ( तलवार पैदा
छुरी कटारी भादिके लगने से मृत्यु होवे ३८
मंगलकी राशी ( १८ ) में गया हुवा चंद्रमा पापग्रहों के पीवमें
स्थितहोवोशन से भयवा भमिमे जळजानेसे मृत्यु होवे ३९
भाठमेभावमे शनिमंगल राहुसे युक हो तो शम्रसे मृत्यु हो ..
चन्द्रशनि, शुक्रकीराशी (1) मे गये होतोशस्त्र से मृत्यू होर
स्वदंशान्मृति योग।
जीवारोखे यूनेश्वदंशान्मृत्युः ४२
टोका-दशमें गुरुमंगल भौर सातमें भावमें रवि गया हो तो कुते
फाटने से मृत्यु होवे ४२
.

नातकतस्व.
कृमृत्यु योग।
राजगई मृत्यु योग ।
द्वादशांश से सुखे सूर्ये राजगेहे मृत्युः ४३
टीका-द्वादशांश कुंडली में दशमे या चतुर्थ भाव में सूर्य गया है
वोरामाके मकानमें मृत्यु होरे ४३
कुजेन्त्ये मंदेष्टमे मृत्युः ४४
भोमेरिगेदुर्मुत्युः ४५
रोका-बारमें भाव में मंगल भौर भाठ में शनि गया हो तो खरा
रीतसे मरण दोघ ४४
मंगळठे गया हो तो दुर्मरण होवे ४५
ती का पर्वते मरण योग।
राहुसूर्ययोगे तीर्थे वा पर्वते मृत्युः ४६.
जीवेङ्के तीर्थे मृत्युः ४७
ज्ञाच्छौ धर्मे द्वारावत्यांमृत्युः ४८
ज्ञाकोधर्मे मार्गे या शिवालये मृत्युः४९
'लग्नेधर्मेशे तीर्थे मृत्युः ५०
चंद्रधर्मेशावष्टमे सन्मृत्युः ५१
सौम्पेरंध्रे शुभहदे पा धर्मपे सौम्ये वीर्थेमृत्युः ५२
टीका-गड्ड भौर मूषका एक राशी में योग हो तो तीर्थ में पापर्वतप
मरण रोये ४६
नवम भावमें गुरु गपाहोतो तीर्यमें मरण होवे ४७
चुप शुक नवमें भावमें गये होतो दारापतीपुरी ( दारीफा) ।
मरण होवे ४८
बुध मयं नवमें भाय में गयेहोतो मार्ग में किंवा शिवालयममे मर
होवे ४९
धर्मेश लाममे गयादातो तार्थमे मरण होवे ५०

(२५४)
मापारीमाथि
मंट भार नवमेश ये दोनो भाठमेमार मे गये होतो सनरगहो
(चिनारटपाये भच्छी तरह मरणहोयेगा) ५१
भटम भाव मे गयाहया बुध शुभग्रह से दृष्टदो भयना नरमेश
मुधहोतो तीर्थमे मरण होगा ५२
कफादतिसारादामृत्यु योग।
भौमेरिगेकदृष्टे कफादतिसारावामृत्युः ५३
टीका-छठे भाव में गपाहुना मंगळ रविसे दृष्ट हो तो कफसे किंवा
भतिसाररोग से मरण होये ५३
शकटान्मरण योग।
मन्देष्टमे शकटान्मृत्यः ५५
टीका-शनि भाठमे भायमें गया हो तो गाड़ी से मरण होवे ५४
यदि यह शनि पापमहसे यत दृष्ट हो तो यह योग बलवान् समझना
केवल शनिके ८भाठमे होने से फल मिलना भसंभव है।
कारागारे या शूलेनमृत्यु योग.
ज्ञार्कजावष्टमे कारागारे शूलेवा मृत्यु ५५
टीका-युध शनि का भष्टम भावमे योग हो तो नहलसानेमे किंवा
शूल (शुलीपर चढनेसे ) मृत्यु होवे ५५
वर्तमान समयमे शुलीपर चढानेकी शिक्षाके बदले कासीकी सगाई
भा करतीहे।
शम्पायां वा भंतराले मरण योग
शुक्रज्ञावष्टमे शय्यायां वान्तराले मृत्युः ५६
टीका-शुक्र भौर बुध भाठ मे भाव में गये होतो पलंगपर पिडोने
भयवा भंतराल में (मंजिल पर) मरणहोचे ५६
विभतिरोगान्मरण योग।
मन्दार्क योगे विभूति रोगान्मृत्यः ५७
टीका-शनि रवि का योगभाठमें भाव में होतो विभूति रोगसेमरण हो
उर्ध्वपंधनान्मरणयोग।
मन्दारौ मृविगौ उयधनान्मृत्यः ५८

नातकतत्व.
(२५५)
धनाझपोत्रिके सराहु केतू उबंधनान्मृत्युः ५९
टीका-शनि मंगल भाठमेभायमें गये होतोऊचा बंधनेसे मरण होवे५८
धनेश भौर लग्नेश ये दोनो राह किंवा केतुसे युत होकर ६८०१२
भाव में गये हो तो उद्धंधन (फासीसे ) मरण होवे ५९
विद्युत्पाततो मृत्य योग।
मन्दाक्नेशयुते विद्युत्पातान्म युः ६.
टीका-शनिकी राशी ( १०१११ ) में गयाहुभा रवि लग्नेशसे युक्त
होतो विजली के गिरनेसे मरण होवे ६०
वाहनान्मरण योग।
सखेशेषष्ठे मन्दयुते यानान्मृत्युः६,
भौमेंबुगे से वाहनपाततो मृत्युः ६२
रंध्रांगपो तुर्यपयुतौ वाहनतो मृत्युः ६३
टीका-मुनेश उठे भाव शनि से युक्त होवो पाइनपरसे पड़ने से
मरण होवे ६१
मंगल चतुर्थ भावमे भौर रवि दशम भायमे गयाहो तो बाहनपर से
पड़ने से मरण होवे ६२
भष्टमेश भौर लग्नेश ये दोनो चतुर्थेश से युक्त होतो धादन से मरण
होये ६३
वाइन-हाथी, घोड़ा, गाड़ी, रेल, मोटर, साइकल, उंट, वगेरा वाइन
स्वदेशे विदेशे वा मार्गे मरण योग ।
चराने स्वदेशे विस्वभावतें विदेशेऽन्यथा मार्गे मृत्युः६४
टीका-जन्म,लग्न चरराशीकाहोतो स्वदेशमे द्विस्वभाव राशी
३१६९४१२ का होतो विदेश में और स्थिर राशी २२५५८५११ काहोतो
मार्गमे मरण होवेगा ६४
चौरान्मरण योग।
राहत्तपेशीपष्ठे चोरन्मृत्यः ६५
गिनेमाते है।
.

( २५६) मापाटीकासदिव.
रन्ध्रांगपोषष्ठे सराहुकेतू चौरशस्त्रघाततोमृत्युः ६६
टीका-चतुयेंश राहुसे युतहोकर छठे भावमे गयाहोतो चौरसे मार
होवेगा ६५
भएमेश भौर लग्नेश ये दोनो राहु किंवा केतुसे युक्तहोकर उठे भर
घमे गये होतोचौरके शम्रघातसे मरणहोवे ६६
शिलामतान्मरण योग.
अर्कारीखेवा सुखे शिलाप्रपातान्मृत्युः ६७
टीका-रवि मंगल दशमे किंवा चतुर्थ भाव में गये होतो शिगने
पढ़नेसें मरणहोये ६७
कूपपातान्मरण योग।
सोरेन्दारैः कमाइन्ध्वस्वकर्मगैः कूपपावान्मृत्युः ६८
चंद्रार्का बुभयोदये जलनिमज्जनान्मृत्युः ६९
टीका-चतुर्थ भाव मे शनि, सातमें चन्द्रमा, दशम मंगल कमगर
होतो कुर में गिरने से मरण होवेगा ६८
चन्द्रभारण्यायोगमीनराशिमहोतोजल में यजानेसमरणावेगा।
स्वजनेन हनन योग।
कन्यास्य चंद्राको पापदृष्टौ स्वजनेन हन्यते ७०
टीका-कपाराशि में गये हुये चंद्र रवि पापपदोसे दृष्ट होती मा
फटुम्पक (सगोत्रक) मनुष्य के हात से मारनेके कारण मरणगा'
मलारण मरण योग।
मगचंद्रेकमन्दे जलोदरेण मृत्युः ७१
‘राका-मकर राशीमें चंद्रमा भार कमी में शनि गया।
महोदर रोग से मरण रोपे ७१
रमोत्यशोपोगान्मरगयोग.
कन्यागचंदे पायोमध्पेनोत्ययोपान्मृत्युः ७२
टीका-कन्या राशी में गा चंद्रमा पाग्रहों के बीच में tal
रपिरगन्य सोपोग से मनोरे ५२

मातकतत्व.
(२५७)
रज्जु भग्नि पावासमरणम पौंग.
सौरखें चंद्रपापयोमध्येरज्वग्निपातै भृत्युः ७३
टीका-शनि की राशी (१०११)मे गया हुवा चंद्रमा पापग्रहों के वीचमे
तो रस्सी से वा भानी से किंवा गिरजाने से मरण होवेगा ५३
स्त्री हेतुक मरण होगा।
सपापे इन्दावस्ते मेपेशुके सूर्पङ्गे स्त्री हेतुक मृत्युः ७४
रीका-~-सप्तम भावमे पापग्रह से युक्त चंद्रमा, मेघराशी में शुक्र और
निमें सूर्य गयाहोतो श्रीके कारण मृत्यु होवेगा ७४
शूलरोगण मृत्यु योग।
सूर्यास्तुर्ये खेयमे शूलेन मृत्युः ७५
त्रिकोणावगैरसक्षीणेन्दु पापैः शूलेन मृत्युः ७६
तुर्ये खेकुजे क्षीणेन्दुद्दष्टे शूलेन मृत्युः ७७
टीका-चतुर्थं भाव में रवि मंगल भौर दशम भाव में शनि गपाहोतो
इल रोगसे मृत्युहविगा ७५
क्षीण चंद्रमा से युक्त होकर पापग्रह नवमें पांचमें किंवा लग्नमें गये
तो शूलरोग से मृत्यु हो ७६
चतुर्थ भाव में रवि भौर दशम मंगल गया हो इनको सीण चंद्रमा
रखता होतो मूलरोग से मृत्यु होवे ७७
काष्टादि घाततो मृत्युयोग।
खभौमे तुर्ये। मन्ददृष्ठे काठाभिधाततो मृत्युः ७८
रंधखाम्बुतनुगैः क्रमाक्षीणेन्दाराजा गुटपावतो
मृत्युः ७९
जेन्दाराजा: साहायेगे घूमाग्निबन्धनकाष्ठादिन
हारान्मृत्युः ८०
सास्वाम्बुगै मन्दाकारैरायुधाग्नि नृप कोपतो मृत्युः ८१
टीका-दशम मंगल, व चतुर्ष भारमै रवि गयाहो भौर इनको शनिदें

(२५८) भाषाटिकासहित. सताहोतो लकड़ी की चोटलगने से मृत्यहोवे ७८ भाठमें भावमें क्षीणनंद्रमा, दशमे मंगल, चतुर्थ भावमे शनि, और लग्नमे रवि क्रम से गयेहोतो लट्टकी लगने से मृत्युहोवेगा ७९ दशमे क्षीण चंद्रमा नमें मंगल ग्यार मे भान में शनि भौर पंचन भाषमे रवि गयेहोतो धुएंसे घपराजाने के कारण या भग्नी मै मला ने से घा वधन में पड़ने से किया काष्टादिक के प्रहारसे (पावसे ) मरण होवेगा ८० दश शनि सात मे रवि भौर मुसमे मंगल गपाहोतो शनसे भग्नि से किंवारानाक कोपसे मरणहोयेगा ८१ ममिपाततो मरण योग। मन्देन्दारै ब्धि दशमग च्छिद्रे क्रमिपावतो मृत्युः ८२ टीका-धनमें शनि मुनम क्षीगचंदमा दशमें मंगल गयाहोतो मखम के छिद्रोमे कीड़े पड़जानेसे मरणहोवे ८२ यंत्रपीड़नान्मरण योग। यनेमोमे चंद्रार्कजावङ्गे यंत्रपीड़नान्मृत्युः ८३ टीका-सातमें मंगल भौर लग्न मे चंद्र शनि गये होतो किसी बरे दयनानेसे किंवा कटजानेसे मरण होवे ८३ विण्मध्ये पतितस्य मरणयोग । भीमार्किचन्दैस्तुलाजयमगिविण्मध्यपतितस्पमृत्युः ८४ सप्तांबुव्योमगैः सूर्यारक्षीणेन्दुभिर्विमध्येपवितस्यमृत्युः८५ टीका-तुलराशि मे मंगल मेषराशीमेशनि,शनिकीराशि (२०११) में चंद्रमा गये होतो विष्टामें पड़ेहुवे का मरण होये ( मरते समय वि. यामे पढारहे भौर मरण होये) ८४ सातमे रवि चतुर्य में मंगल भौर दशमे क्षीण चंद्रमा गयेहोवा विष्टा मे पड़े हुये का मरण होयेगा ८५ प्रेतः पक्षिभिर्भक्ष्यवि योगी सूर्यारावस्ते मन्देष्टमे क्षीणेन्दौतुर्ये पक्षिभिर्भक्ष्यवेवः ८६ टीका-रवि मंगळ सात में, शनि भाठ में, भौर क्षीग'चंद्रमा पर्य 1 .

मानपदव. (२५९) भावमे गये होतो उस के देहको पक्षि भाग करेंगे अर्यात उसके शयका भाग्न संस्कार नहीं होगा और जंगल मे पहुचे को पक्षीखावेगे ८६ शैल शिवरा यानि कुड्यपाततो मरण योग । चन्द्रनारयमेर्नयाघात्मजाप्टमगैःशैलशिखराशनिकुड़यपात- तो मृत्युः ८७ रन्मलग्नाधिपा वाली भीमपप्टेशयुतौ शैल शिखराश- निकुड़यपातको मृत्युः ८८ टीका-नवमेक्षीण चंद्रमा, लग्न में रवि, पांच में मंगल, भार भाठ में शनि गपे हो तो पर्वतके शिस्तर गिरनेसे, विमली वा विजली के संबंधी भशनि उल्का आदेके पड़ने से किंवा भीतके गिरनेसेनी दबके मरण होगा ८७ भटमेश भौर करनेदा ये दोनो निर्वली होकर मंगल भार पऐश से युक्त हो तो पर्वतके शिखर गिरनेसे वा पिजलीके पडनेसे किंवा दीवाल के गिरनेसे दयके मरण होवेगा ८८ रणे तथा शत्रुकोपतः मृत्यु योग । रन्धेशुभः पापारिविक्षिवोरणे मृत्युः ८९ निदितः शयानो वा पारपुतोटमे शत्रुकोठो मृत्यु १० टीका-भटमभावमे गयाहुवा शुभमह पापग्रह से किंवा अपने शत्रु ग्रहसे दृष्ट हो तो संग्राम में मंरंग होये ८९ साध में लिखा है कि पष्ठेश भष्टमेश किंवा मंगल पराक्रमेश से युक्त हो भौर शनि शुलिक से युत होकर फरांशक में स्थित हो तो युदसे मरण होवे ? शनि जिसके देकाण में गया है वहयद मंगल से युक्त या दृष्ट हो भौर मंगलकी राशीमें वा भांशमही गपाहो तो युद्धसे मरण होवे २ निद्रा तथा शयनावस्था मे गयाहुवा पापग्रह भष्टम भावमें गया हो तो शटके कोपसे मृत्यु होवे ९० वृपभेण मृत्यु योग। भौमाहट लग्नं शुक्रेज्यावष्टं चेद्युपमेण मृत्युः ९१

(२६)
भापामासहित.
टीका-मंगळ भौर रमि से दृष्ट जन्म हम्न यदि गुरु शुक्र धन
हो तो यूपभ से मरण होवेगा ९१
वृक्षपाततो मृत्युयोग
मन्दाकॊलग्ने राहु दृष्टौ वृक्षपाततो मृत्युः ९२
टीका-लग्नमें गये हुवे शनि रवि राहसे दृष्ट हो तो इसके गिरनेस
मरण होवेगा ९२
व्याघ्रतो मरण योग।
जीवसंज्ञे मंदः कुजे व्यावतो मृत्युः ९३
टीका-गुरुकी राशी ९।१२ में बुध भौर शनिको राशी १०१११ में
मंगल गयाहो तो सिंहकी नातिके छोटें वाघ से मरण होये ९३
शरेण मरण योग ।
धर्मपापाः शुभादृष्टाः शरेण मृत्युः ९४
टीका-नवम भाव मे गयेहुवे पापग्रह शुभग्रहसे भदृष्टहो तो शरसै
(घाणसे) मरण होगा ९४
विषेण मरण पोग।
चंद्रज्ञौ पठेटमे वा विषेण मृत्युः ९५
टीका-छठे किंश भाठ मे भाव में चंद्र बुधगये होतो विष (जहरखाने
या खिलाने से मरण होरे ९५
गजतः मरण योग
पुष्पवंती पष्ठाष्टमे वा गजतो मृत्युः ९६
टीका-छठे भयवा भाठमे भाव मे रविचंद्रकायोग होतो मनसे मरण
होगा ९६
रंध्रगत ग्रहदोष मशान्मरणयोग।
रंपरयौवन्हे अंद्रेजलयोगा डोमेशस्त्रतो बुधेज्यरतो गुरौ
त्रिदोषतः शुक्रे क्षुधया रानौ तृपया मृत्युः ९७
योपलवानिधनपश्यते चातुकोपतोमृत्युः ९८

नातकतरव. (२६१) उक्तयोगाभावेष्टम भावा धिष्ठितव्यशश स्योक्ताग्न्यम्पादि स्वगुण हेतुतोवृत्युः ९९ निधनग द्रेष्काणतोमृत्युः १०० टीका-भाठमें भावमै यदि रवि गवाहोतो भनिमें जलने से, चंद्रगया होतो जलमे डूबने से, वाजलके संवधसे, मंगल गयाहोतो शनसे, बुध गयाहोतो ज्वर, की पीडासे, गुरु गयाहोतो सन्निात दोषसे,शुकगयाहो तो क्षुधाके दुखः रो, शनिंगयाहोतो तृषार्त होनेसे मरण होवेगा ९७ यदिकोई भी ग्रह भाठ में भावमे नही गयादोतो नो बलवान ग्रह भष्टम भावको देखताहो उसीकी उपरोक्त धातु के कोपसे मरण होवेगा भाव यदि वलयान रवि भटम भावको देखता हो तो भग्नि से, चंद्र देसवादो तो जल से, मंगल देखता हो तो शत्रसे, बुध देखता से तो ज्वर से गुरुदेवताहोतोसनिपातरोगसे, शुक्र देखता हो तोक्षधासे, शनि देखता हो तो तृषासे मृत्यु होवेगा ९८ पदि भष्टम भाव में कोई भीग्रह गया नहो पाकोई यह भटम भावको देवताभिनहोतोमष्टम भावमे निसराशीकाद्रप्काण हो उसके स्वामि में भग्नि जल शस्त्रादिदोपके भनुसार मरण हावेगा भांत यदि भष्टम भावके ट्रेष्काण का स्वामी रवि होतो भग्निसे, चंद्र होतो जलसे, भंगल होतो शस्त्रसे, अपहातो घरसे गुरुहोतो त्रिदोपसे, शुक्र होतो क्षुधासें शनि होता तपासे मरण होगा ९९ जयरा भटमभायमे जोद्रपकागहो उसकेभनुसार मरण होयेगा १०० भएमभावमे गाईप्रत्येक राशिके ३ तीन काणो काफळ भित्रर नीचे सिमाई तदनुसार मानना। देकाण फल। मेपायच्यरो प्लीहजो वा विपजोमा पितजो मध्ये जल- जो न्त्येकपादिपातको मृत्युः १५ नृपादिपरो सरासादितो मध्ये पिचाग्निचारतो न्य स्पतावादियो मृत्यः ३.३

(२६२)
मानाटिकासनि.
गुम्माये वातशासतो मध्येत्रिदोषा दन्त्येयानार्वत पाततो
पारण्ये मृत्युः १०३
कायेऽपेयपानात्कण्टकावामध्ये पिातिसारतोन्त्ये महा-
भ्रमप्लीह गुल्मादितो मृत्युः १०४
सिंहाये विषांबुगेगेण मध्ये, श्वसनाम्बुरोगेणान्त्येयानपी-
डाविपरास्त्रेण मृत्युः १०५
कन्याये वातमस्तकरोगेण मध्येदुर्गाद्रिपानातकोतोन्ये
खरोष्ट्र शस्त्राम्बुपाततो मृत्युः १०६
तुलाये पतनास्त्रीतः पयतो मध्येजठररोगणान्पच्याच
जलान्मृत्युः १०७
अल्पाये विपशवतो मध्ये भारश्रमाहा कटिवस्तिरोगवोन्त्ये
लोष्टकाष्ट पापणतो मृत्युः १०८
चापाये वातगुदामया मध्ये विषयाणाभ्यामन्त्ये जलजल
चार्युदरामयान्मृत्युः १०९
मृगाये सिंहवराह वृश्चिकतो मध्ये भुजंगतोन्त्ये चौराग्नि
शत्रज्वरतः मृत्युः ११०
कुम्भाये रुपनजोदर व्यापितो मध्येगुखरोगादग्पेविषा-
न्मृत्युः १११
मीनाद्येगहिणी प्रमेहगुल्मजो मध्येजलोदरंगजमाहतो
न.प्रभेदा दन्त्ये कुरोगा न्मृत्युः १२
'टीका-मेषराशीके प्रथम द्रेष्काणमे भष्टमभावहो तो सीइसे ( किस
के रोगसे ) पापिसे भयका पिके रोगस मम्पद्रेष्काणहो तो मलमें

नातकतस्व. (२६३) चनेसे वा जलेके संबंक्स भैत्यद्रेष्काणहो तो कुभा पापड़ी तालाय दी वगैरामे गिरगानेसे मृत्यु होगा ११ भष्टमभाव वृषभ राशीके प्रथम द्रेष्काण हो तो गधा घोड़ा भादि चतुष्पद परसे पड़ने से घा इनके मारनेसे मध्यद्रेष्काणमेहा तो पित्तके कोपसे भग्निमें जलनेसे चौरकी चपेटसे तीसरे द्रेष्काणमेंहो तो ऊंची नमहसे ( पाहाद ऊचे मकान भादि परसे गिरपड़ने से ) वा कुत्ते वल्ली वन्दर सियाल बरगड़े भादि के काटनेसे मरण होगा १०२ भटम भार मिथुनरशिके प्रथम द्रष्काण हो तो ८४ प्रकारके पात संबंधी वायुरोगसे वा श्वास से [ दमेके रोगसे ] मध्यद्रकाणमेहो तो त्रिदोषके कोपसे [सन्निपातसे तीसरे द्रेप्काणमेहो तो गाडि घोड़ा हाथी मोटर साईकल रैल भादि वाहनपरसे गिरगानेसे का इनकी लगनेसे वा पर्वतपरसें गिरपड़नेसे भयवा पर्वतका कोई भाग भपने ऊपर गिरपड़ ने सेवा मंगलमे मरण होगा १३ भष्टम भाव कर्क राशों के प्रथम देष्काण मे हो तो नहीं पीने योग्य पीनको वस्तुको पानकरने से भया कांटो से विधनाने से मध्यदे- काण में हो तो विषसे वा भतिसाररोगसे भंत्यद्रकाण में हो तो चक्र मानेके महारोगसे प्लीहरोगसे बा गोलके रोगसे वा विशचिका (हेना) भादिरोगसे मरण होवेगा १.४ भष्टमभान सिंहराशी के प्रथम द्रेष्काणमें हो तो विषसे वा नहरीति इलाके महामारी (प्लैग) हेजाभादिरोगसे तथा जलोदर भयमा जल सेवेधी विकारके रोगसे मध्यद्रेष्काण हो तो श्वासरोगसे वा नलसंबंधी रोगसे तीसरा देकाण हो तो वाइनकी पीडासै या विषसे वा शस्त्रा. घात से मरण होगा १.५ भष्टमभाव कन्याराशिके प्रथम द्रेष्काण में हो तो ८४ प्रकारकी वायु के रोग से वा मस्तक के रोग से भर्यात् मस्तकमें दर्द पीडा होने से या मस्तिष्कमे सन्मादादि कोई दुष्ट रोग उत्पन्न होने से मध्यद्रेष्काण दो तो पिलेपरसे या पर्वतपरसे गिरपड़ने से वा राजाक कोपसे, ती. सरा देकाण हो तो गधे परसे वा केट परसे पड़ने से शस्त्राघातसेवा नलमें पड़ने से मरण होवेगा १०६ 'भष्टम भावमे तलराशीका मयम द्रेष्काण हो तो गिरपड़ने से स्त्री के सपब से (स्त्री स्वयं मारदा वास्त्री मरवादाले ) भपा गाय भष्टम भाव मीन राशी के प्रयन टेष्काण मे होतो संग्रहणी रोगसे (२६४) मााटीकासहित. भेस भादि पशु के मारयैठने से दसरा ट्रेक.ग हो तो जलोदर कटोर मंदाग्नि भनी विभूनिका भादिपेटके ८ प्रकारके रोग होते है उनमें किसी भी पेटके रोगस, तीसरा ट्रेपाग हो तो सांके काटने से व मलमे गिरनेसे मरण होगा १०७ भष्टम भाव मे वृश्चिकराशिका प्रथम काग हो तो विष (जार से शस्त्र से दूसरा ट्रेष्काण हो तो वोझा उठानेसे भपया मिहनता कामसे या कमर पेटु भादि स्थानों के रोगसे तीसरा ट्रेकाग हो तो मिट्टी के टेलेकी या कारकी पापापागकी चोट लगनसे मरण होगा। भष्टम भाव धनराशिके प्रथम द्रेष्काण में हो तो पादीके भांति गुदाके रोगसे, मध्य द्रेष्काण हो तो विपसे वा पागके (वीर) छगनेसे तीसरा द्रेष्काण हो तो जलसे वा नळचारी मगरमच्छ फछुभे भादिजीवों से वा पेटकी पीड़ा भाठ प्रकारकी होती है उसने से कोईभी पेटके रोगसे मरण होवेगा १०९ भष्टमभाव मकरराशीके. प्रथम द्रकाण में हो तो सिंहसे वा समर से षा विच्छुके काटने से मध्य द्रेष्काणमें हो तो सांप काटने से तीसरे द्रेष्काणमै हो तो चौर भग्नि शम्र किंवा ज्वरके रोगसे मरम होगा ११० भष्टम भाव कैमराशी के प्रथम देष्काण मे होतो त्री के वा पुत्र के चंधसे किंवा पेट के रोगसे मध्येद्रमाण में होतो गुप्त स्थान । जन नेदिय ) में गरमी सजाक प्रभादि गुप्त रोगोसे तीसरा ट्रेका होतो विष (जहर ) से मरण होवगा १११ वा मभेह ग़ल्म रोगस मेध्यद्रेष्काण होतो जलार रोगसे वा गासे वा मगरसे वा नाव स्टीमर नहान भादिमे से जल में गिरजाने से तीसरे द्रेष्काण में हो तो प्लेग देना वगेरा जितने भनेक प्रकार दृष्ट रोग है उनमें से किसीभी दुष्टरोगसे मरण होगा ११२ पलिसहगामिनी योग। धर्मपाराको धर्मगा लग्नास्तेशौमित्र पत्नी सहगामिनी रीका-श्वमेश, मंगल भौर रवि ये तीनों नवमें भाव में गये हो भौर सग्नेश सप्तमेश मित्र हो तो श्री सनी होगा १९३ .

मातकतत्व
शुभलोकाप्ति योग ।
अंशावालानादन्येशुभे शुभलोकातिः ११४
टीका-कारकांश लग्नसे भया जन्म लग्नसे भाठ में भावमें शुभग्रह
गया हो तो मरणानंतर शुभलोककी प्राप्ति होवेगा ११४
ब्रा सायुज्ययोग।
सिंहासनेचन्द्रपारिजातेगुरौऐरावतेशुक्रेब्रह्मसायुज्यं ११५
अन्त्यशास्केतौ ब्रह्मसायुज्यं ११६
अंगादन्त्ये मेपचापगशुभे ब्रह्मसायुज्यं ११७
एकस्थानगानां चतुर्णामधिष्ठितराशीशेकेन्द्रकोणे ब्रह्म
सायुज्यं ११८
माने मीनेनौम्ये वा भौमे ब्रह्मसायुज्यं ११९
रन्यरोयाने निद्रिते वा शुभयुतदृष्टे ब्रह्मसायुज्यं १२०
लग्नेशोगन्धर्मशोधर्मरन्धेशोरन्ध्रपश्यविचेद्ब्रह्मसायुज्यं:२१
नवमे केवलशुभदये ब्रह्मसायुज्यं १२२
का-सिंहासनांश में चंद्रमा, पारिजातांश में गुरु भौर ऐशवतांश
शुक्र गया हो तो मनसायुज्य ( मुक्ति प्राप्ति होगा ११५
कारकाश लग्न से चारवे भावमें केतु गया हो तो मनसायुज्यपाधि
वगा ११६
कारकांश लग्न से वारमे भाव मेष किंवा धनराशि में शुभमद
गया हो तो प्रासायुज्य प्राप्ति होवेगा ११७
'भैरस्थानमें गये हुवे चारग्रह जिस राशीम गये हो इस राशीका
वामि द किंवा त्रिकोणस्थान में गया हो तो ब्रह्मसायुज्यप्राप्ति
होगा ११८
मीन राशीका बुध दश में किंवा मीनराशीका मंगल दशमें गए
हो तो भासायुज्य प्राप्ति होगा ११९
निद्रावस्या में गया या भानश मुअभाव में गया हो नपमा नि-

(२६)
भाषाटीकासहित.
द्रावस्था में गया हुवा भष्टमेश शुभ ग्रहों से युत दृष्ट हो तो नमसा-
युज्यप्राप्त होगा १२०
लग्नेश लग्नको धमेश धर्मको भष्ठमेश भष्टमको देखताहो तो ग्राम
सायुज्यप्राप्ति होवेगा १२१
नवमें भाव में केवल दो शुभग्रह गये हो तो ब्रह्मसायुज्य ( मुक्ति )
माप्त होगा १२२
विष, पाषाण, भग्नि जलयात योगा।
षष्ठेष्टमे या चंद्रज्ञो विषघातः १२३
ज्ञायिष्टमे विषाग्निपातः १२४
लामेभामाकी विषाग्निशस्त्रयातः १२५
खर्के सुखेकुजे पापाणघातः १२६
भौमार्को सुखे पापाणघातः १२७
सुखेरा युतं दृष्टे सेशे पापाणघातः १२८
सुखपेतमोर्कि युते कुजेक्षिते पापाणघातः १२९
राहो मदे पा लाभे काठपापाणघावः १३०
कजेष्टमेग्निपातः १३,
क्षीणावप्टमे जलपातः १३२.
तुशे जलः नीचारि मूढहीन पळे तुरिगे जलपावः१३३
लग्नेशे वले सुमे पापे जलपावः १३४
सुखेगेऽवले सुआपापे जलपातः १३५
मुखपे सपापे केन्द्र जलपातः १३६
सन मुसेगो सखे फरादृष्टौ जलपातः १३५
सुसेगस्पेसरण सुसपे युत दृष्टे जलपातः १३८

मातकतरष. (२६) टीका-छठे किंवा भाठ में भाव में चंद्र बुध गये हो तो विषको धात चात् जहर से मरणांत कष्ट दावेगो १२३ अष्टम भाव मे उप सूर्प गये हो तो नहर किवा भग्निकी पात हो- (जदरसे वा भग्निसे मरते मरते बचेगा) १२४ रवि मंगल लाभ भावमें गये हो तो विष, भग्नि, वा शमकी घात बेगा १२५ दशमरवि भौर सुखम मंगल गया हो तो पाषाण (पत्यर) से घात होवे मरते मरते बचेगा) १२६ विभौर मंगल दानी सुस्वभावमें गये हो तो पाषाणकी घात होवे ११७ सोश से युक्त किंवा दृष्ट दशमेशहो तो पापाणकी घात होवे १२८ मुनेश, शनि व राहुसे युत होवे भौर मंगळसे दृष्टहो तो पाषाणकी न हविगा ५२९ सातमें किया ग्यारम भावमें राह गया हो तो फाष्ट तथा पाषाणकी ति हविगा १३. मंगल भाठमे भावमें गयाहोतो भनि की पात भाव भग्निसे जल निका भयहाँ धेगा १३१ सीण चंद्रमा भटम भावमे गयाहोतो जलयात होरे (जलसे मरता रता बचे) १३२ चतुर्थेश नलराशीमे भपनी नीच शत्रु किंवा भस्तराशी काहीन बली किर चतुर्थ मे भयवा छठे भावमे गया होतो नलकी घातहोवे १३३ लग्नेश निवलीहो भौर सुखमे पापग्रह गयाहोतो मलकीयातह१३४ मुखेश निर्वली हो भौर सत्रमे पापग्रह गयाहोतो नलपातहोवे १३५ सुखेश पापमह से यत होकर पेंद्रस्थान मे नावेतो जलयात होवे १३६ लग्नेश भार सुखेश ये दोनो सुस्वभावमे गयेहो भौर दशमेश इनको बता होतो मलयात होवे १३७ मलेश जिसराशी में गयाहों उसके स्वामी से सुनेश युत किंवा दृष्ट तो मलयात होवे १३८ मोद-पात उसको कहते है जिसको ध्यपहाइमेसोग " पात" भान मरते रदे बचा मागोत का हुया कहते है।

(२६८) भाषाटिकासहित.
शंगि, मसि, देवी, पात या पाहनात तया उच्चप्रदेश तोपतनधात पोगाः।
राव्हारावष्टमे शृंगि नखि दंष्ट्री घातः १३९
चापाशे याहना दुच्चप्रदेशवो वा पतनम् १४०
टीका-राहु भौर मंगल भाठमे भायमे गपहोतो गाय स मॅदा हरिम
भादि सींगपाले पशुभासें या सिंह पाप कुत्ता विल्ली यन्दर री भादि
नरवाले जानवरोसे या साप विच्छ भ्रमर मूबर भादि काटने वाले
जानपरोंसे घातहोवें १३९
कारकांश लग्न धनराशी का होतो वाहनपर से गिरपढ़नेसे भयत्रा
उंचमकानादिस्थान पर से गिरने की बात होपे १४०
याहन भययोग।
चंद्रारौकेन्द्रे पाष्टमे वाहन भयम् १४१
सुखे क्षीणेन्दौ वाहन भयम् १४२
टीफा-चंद्र मंगल केन्द्रस्थानमें या भाठ मे भाव में गये होंतो वाहन
से भयहोवेगा १४१
सुनस्थान में क्षीणचंद्रमा गयाहोतो वाहन से भयहोवेगा १४२
भुज, कर, पाद, मस्तक, फर्ण, च्छेद योगाः।
सपापे भौमार्क मंदे भुजच्छेदः १४३
शत्रभे मन्दे शुक्रयुत दृष्टे करच्छेदः १४४
चंद्रातमोभीमा अष्टमे करपादच्छेदः १४५
मन्दः रादौ सिंहचंदेष्टमे मस्तकच्छेदः १४६
भौमार्को रंधे मस्तकच्छेदः ११७
मन्दारधनेशालग्ने कर्णच्छेदः १४८
पष्ठासौलग्ने मन्दारीपष्ठे कर्णच्छेदः ११९
टीका-मंगळकी (१८) किंवा मर्यकी राशी (१) में शनि पाप
सहित गया हो तो भनच्छेद होरमा १४३
क

जातकतत्व.
(२६९)
भाने शवकी राशी मैगया हुभा शनि शुक से युत किंवा दृर हो तो
हाय फटनामा १४४
चंद्र मूर्य राह भोर मंगल ये चारो ग्रह भाठ में भाव में गये है तो
हाय तथा पांव कट जायेगा १४५
शनि की राशी । १०११३ ) मे राहु गया हो भौर सिंहराशीका चंद्र
मा भाठमे भाव में हो तो मस्तक कटेगा १४६
मंगल भौर मूर्य का गोगभाठमे भावमे हो तो मस्तक फटेगा १४०
फेल भेकारे योग से फसमिलना असंभव भतएव यदि पे मंगल
रविपापप्त दृष्ट हो तो ये योग मिलेगा।
शनि मंगल भौरधनेश यतीनालग्नमे गयेहोतो कानकटजावेगा १४८
पप्ठेश भौर धनेश लग्न में गये हो भौर शनि मंगल उठे भाव में हो
वो कान टनावेगा १४९
मा इत्यादि योग।
पाः चंद्रे भौमार्कदृष्टे ब्रह्महत्या १५.
यमारियोगे ब्रह्महत्या १५१
जीपाकारयोगे ब्रह्महत्या १५२
पापक्ष चंद्र मन्दारि दृष्ठे गोहत्या १५३
लग्नपारावेकांशगो ऋरहत्या १५४
पापयुते गुरौ नीचे वा रखो पाठहत्या १५५
पापे २२ रन्गो पापदृष्टे गो मृगहत्या १५६
चन्द्रज्ञोरो पापदृष्टो पा नीचांरागों शुभदृाधीनो नित्यं
पक्षिहत्या १५७
इत्यष्टम विवकः।
टीग-पारपाकी राशी में गया रामंदमा मंगल भौर मर्प मे
एरोतो मनहत्या करने पासा मेरे १५.
पानि ररि भैर मंगा इन कानोका पोग एकाशी में वो मा
ग्या करने वाला रोपे १५१

(२७." भाषाटिकासहित. गुरु रवि भौर मंगल इन तीनोका योग एक राशी में हो तो अमर स्याकरने वाला होता. १५२ पापराशि में गया हुवाचंद्रमा शनि रवि भौर मंगल इन तीनों ग्रहों से दृष्ट हो तो गो हत्या करने वाला होता है १५३ लग्नेश भौर मंगल ये दोनों भाराशी में भक्दी भंश मे गये हो भयात् लग्नेश की भौर मंगलकी पूर्ण यति निसदिन हो उस दिनका नाम होतो दुष्ट हत्या करने वाला होता है १५४ पापग्रहसे युत गुरु नीच राशी मे गयाहो किंवा पापग्रहसे युत रवि नीच राशी मे गया हो तो वाल हत्या करने वाला होता है १५५ केंद्रस्थानमे पापग्रह भौर भाठ मे भाव में गयाहवा शुक्र पापग्रहसे दृष्ट हो तो गा तथा मृगकी हत्या करने वाला होता है १५६ दशम भाव मे गये हुवे चंद्र बुध पापग्रहोसे दृष्ट हो भयवा नाच- राशा के नवाशमे गये हो भोर शुभग्रहों से दृष्ट नहीं तो नित्य पक्षियो की हत्या करने वाला.दोता है १५७ इन के सिवाय भाईकी स्त्रीकेमामाकीस्त्रीका, भाईककाकीसुसरेका, भाइके रोग वा शत्रका, मामिकेभाईका, मित्रपत्रका, पुत्रके सुसरेका पुत्रके मित्रका, शत्रकेभाईका, स्त्रीधन वामृत्युका, गुप्तेंद्रीका, दादाके धनका, दादिको मृत्युका, विचारभी इसीभप्टमभावमे करना। इति भष्टम विवेकस्य टीका समाप्ताः । अथ नवम विवेकः। पुण्यवान् योग। सुखे ज्ञाच्छौ पुण्यवान् । सौम्यान्तरे सुखे पुण्यवान २ गोपरायरो सिते पुण्यवान् ३ मृदंशे जीवे पुण्यवान् ४ • नोर-एकराची में गयहुवे प्रदो मंगोत्र मंतर ५पांच मंशसे म्यूनहोतो योग समझा जाता।

जातकतत्व.
(२७१)
भोजने पुण्ये पुण्यवान ५
धर्मेनगे निद्रिते राही पुण्यक्षेत्रवासी पुण्यवांश्च ६
धर्मेशुभदृष्टयाधिक्ये पुण्यवान् ७
टीका-बुध शुक्र सुख भाव मैं गये होतो पुण्यवान होवे ।
सुख भाव शुभमहों के बीचमे होतो पुण्यवान् होवे २
शुक्रगोपुरादि शुभ भंशोमे गया होतो पुण्यवान होवे ३
गुरु मृदु संज्ञक शुभषष्ठवंशमे गपाहोतो पुण्यवान होवे ।
भोजनावस्था में गया हुचा रवि नवमें भाव में गया होतो पुण्यवाद
होने ५
निदावस्था मे गया हुवा राहू नबमे भयवा सातम भाव में गयादों
तो उत्तम तीयोमे रहनेवाला किंवा पुण्यवान् होवे ६
नवम भावार शुभग्रहोकि भधिक दृष्टी होतो पुण्यवान होने ७
पातकी योग।
चंद्राराबङ्गः शनीयूनेपातकी ८
लग्नेशे सभौमे सपापेन्दो पष्ठे पातकी ९
एकांशगौ पुष्पवन्तौ सपापी महापातकी ३०
अष्टमेरोके पातकी "
मामाको घेकत्र पातकी १२
पापान्तरे पापदृष्ट युते तुर्येवा वदीशे पातकी १३
सुखगैः पापैः सुखेशे पले गुलिक युते पातकी ५४
धर्मे पापे पावकी १५..
धर्म पापमुते वा क्रूरपष्ठशे वा पापांवरे पावकी १६
मन्दतमसी धर्मे गुलिक दृष्टेऽनिपापी १७
सराहुचंद्रे सपापगुरुदृष्टेति पातको १८

(२२)
माटीकासहित
गने चंद्राको मन्ददृष्टो पातकी 120
कशद्वार योगेपातकी २०
सपापो गुलिक धनेशौ पातकी २१
जीवेङ्गे मदेमन्दे पातकी २२
पष्ठेचंद्रे सपापे भामे पावकी २३
व्यये मंदे गुप्तदोपी व्यसनीच २१
टीका-लग्नमें चंद्र मंगल भौर सातमे भावमे शनि गयाोतो पार
की ( हत्या का पाप करने वाला ) होता ८
लग्नेश मंगलसे युतहो भौर पापग्रह से युतही फर चंद्रमा छठे भाव
मे गया होतो पात की होताहै ९
सूर्य चंद्रमा एक राशी मे एकही भंशमें (समान भंशमे) गये हो
भौर पाप ग्रह से युक्त होतो महा पापी होता १०
भष्टमेश नवमें भावमे गायहो तो पापी होताहै ११
मंगल भौर सूर्य दोनो एक राशी मे युक्त होतो पापी होताहै १२
चतुर्थ भाव किंवा चतुर्येश पापग्रहों के बीचमे होवे भौर पापग्रह से
युतदृष्ट होतो पातकी होताहै १३
सुत्रस्थानमे पापग्रह गयहो भौर मुनेश निर्वली होकर गुलिकसे युत
होतो पातकी होताहै १४
नवमे भावमे पापग्रह गये होतो पातकी होताहै १५
नपमेश पापग्रहसे युतहो १ भयवा फ़रषष्ठयंशगयाहोर भया
नवमेश पापग्रहोंक बीचमे गपाहो तो पातकी होताई (इसमूत्रमे ३
योग फर) १६
गुलिक से देखेहवे शनिराह नवमे भावमेग
रासयत चंद्रमा पापग्रहसे भौर गरसे दृष्ट होतो महापापीहोताहै १८
सवभाव में गये हुवे चंद्रसूर्यको शनि देखता हो तो पापी होता है।
सीगचंद भौर मंगर इन दोनोंका योग किसीभी स्थानमें हो तो
होतादे२.
तो महापापीहोताहर

नातकतख. (२५३) गुलिक भार धनेश ये दोनों एक राशी मे पापग्रह से मुक्त हो तो रातकी होता है २१ लग्नमें गुरु भौर सातमे भाष मे शनि गया हो तो पातकी होताई२१ उठेभाव में चन्द्रमा गया हो भौर पापग्रहसे युत मंगल हो तो पा- उकी होता है २३ चारवें भाव में शनि गया हो तो गुप्तपाप करनेवालाभौर कामजनित क्या कोपजनित दोष वाला होता है २४ शंकर भक्तियोग। केत्वकोवंशे शिवभक्तः २५ अंशकत्वीज्यो शिपभः १६ । सुते सूर्य युवदृष्ठे सरे शरमकः २७ टीका कारकांश लग्न में केतु भौर सूर्य गये हो तो शिवी भक्ति करने वाला होवे २५ कारकांश लग्नमें केतु भौर गुरुगये हो तो शिवकी भक्ति करने पाला होये २६ पंचम भाव सूर्य से युत या दृष्ट हो तो सूर्य तथा शंकरकी भक्ति करने पाला होवे २७ गोरी तथा लक्ष्मी भादि देवीभक्ति योग । अंशेकेतु चन्द्रौ गौरीभक्तः २८ अशे शिखिशुको लक्ष्मी भक्तः २९ सुते गुरु सम्बन्धे शारदाभक्तः ३० सते शुफ संबंधे चामुंडाभक्तः पंचमे भृगुचंद्रसंबंधे स्त्री देवभक्तः ३२ रीका-कारकांश लग्न में केतु भौर चंद्रमा गये हो तो गौरी (पार्ट- वि) या पार्वतीके देसे उत्पत्र हुई महाकालि महासरस्वति भादि शक्तियोंकी भर्तिकरने वाला देवीभक्त होवे २८ कारकांश लग्न में केतु भौर मुक गये हो तो महालक्ष्मी तपा मारा

(२७४)
माटीकासहित.
लक्ष्मी संबंधी दशमहाविद्याभोंकी भक्तिकरने वाला होवे २९
पंचमभाष गुरुसे युत दृष्ट हो तो शारदा ( सरस्वती ) की भकि
करने वाला होवे ३०
पंचमभाव शुझसे युन दृष्ट क्षे तो चामुंडा देवीकी भक्ति करने पाटा
होवे ३१
पंचमभार में शुक चंद्रका संबंध (शुम तथा चंद्रसे युत दृष्ट पंच
भाव) होतो स्त्री देवता (शक्तियों) कि भक्ति करने याला होये ३१
विष्णु तया सास्तिकदेव तया स्कंद भैरवादि पुरुषदेव भक्ति योग।
अंशेज्ञार्कजौ विष्णु भक्तः ३३
तुरो सुते विष्णु भकः ३४
व्ययेशे धनाप्टमे सवेश संबंधे साविक देवमनः ३५
अंशे केत्वारौ स्कंद भक्तः ३६
पुत्रे भौम संबंधे स्कंद भैरवभक्तः ३७
सुवेज्ञ संबंधे सर्वदेवभक्तः ३८
पुने यह सम्पन्धे पुन्देष भकः ३९
टीका-कारकांश लग्नमें पुध शनि गये हो तो विष्णु किमान
रने वाला हो ।
अनु। पंचम भाव में गया हो तो विष्य तया विष्णु के पर
करसताफी भकिकरने पाळा होरे ३४
व्यपेश पनपा भष्टमभाव में गया रोमा पंचमेश में सब
करना हो तो साखिर देयताकि भनि करने वाला हो।"
मारकांश नमे तु भौर मंगळ गप हो तो शामिल
मक होने ३६
पसमभाव में मंगका संबंध ( मंगळ पुती
र स्वामिनया भरवा मम.होये ३.
पचममा (पो परममावर) at al
देशमा विभाबिर दारा ८

भातफतत्व.
(२७५)
पंचम भावमे पुरुष ग्रह का संबंधहो तो परुष देवतांभों कि भक्ति
करने वाला होवे ३९
गुरु भक्ति योग,
जीवेशश्यांशशे गुरुशुक्रदृष्टे गुरुभक्तः ४०
नन्देशुभे गुरुयुतदृष्टे गुरु भक्तः ४१
धर्मपे मृदंशादौ गुरुभक्तः ४२
टीका-जिसराशिमे गुरु गयाहो उसके स्वामिक नवांशका स्वामि
गुरुभौर शुक्र से दृष्ट होतो गुरुरी भक्ती करनेवाला होवे ४.
नवमें शुभग्रह गयाहो मौर यह गुरुसे युतया दृष्टहोतो गुरुको भक्ती
करनेवाला होवे ४१
नवमेश मृदु संज्ञक शुभषष्ठवंशम गयाहोतो गुरु कि भक्ति करनेवाला
होवे ४२
पक्षिणी तथा प्रेताशन्यादि भक्ति योग.
नन्दने चंद्र संबंधे यक्षिणी भक्तः ४३
सुते मन्द सम्बंधे प्रेताशन्यादिभक्तः ४४
टीका-पंचम भावमे चंद्रका संवधेहो (चंद्रसे युतदृष्ट पंचम भावदो)
तो यक्षिणी की भान करनेवाला होताहे ५३
पंचम भावमे शनिका संबंधहोतो प्रेत शाकिनी भादिक्षुद्रदेवियो
किभात करने वालाहावे ४४
परपीदक देवभक्तियोग।
तमासंबंधेपुत्रे परपीड़क देववाभक्तः १५
रीफा-पंचमभाव मे राहण संबंध (राहुसे युतदृष्ट पंचम भाव)
होते दूसरेको पीदा देनेवाले देवताभी कि भक्ति करने वाला होताहर
धर्माध्यक्ष योग।
गुरौ वा भृगों स्वोच्चशुभवर्गे धर्मेशे समले धर्माध्यक्षः१६
ईपाच्छौ ज्ञारो धर्माध्यक्षः ४७
धर्मपेशुभयुतदृष्टे धर्माध्यक्षः ४८

(२७६)
भापाटिकासहित.
टीका-गुरु भयया शुम भपनि उच्चराशी मे भौर शुभयहोंके वर्गमे
गया हो भौर नवमेश वलयान हो तो धर्माध्यक्ष (धर्माचार्य वा भधिक
धर्म करनेकराने वाला) होता है ४६
गुरु शुक्र ये दोनो बुधके नवांशमें गये हो तो धर्माचार्य या अधिक
धर्म करने कराने वाला होता है ४७
नवमेश शुभग्रहसे युत भौर दृष्ट हो तो धर्माचार्य या धर्म करने
कराने वाला होता है ४८
कूप तडाग तथा जीगोद्धार तथा मुस्यानादि को योग ।
खेशे गोपुरे कूपादिका १९
भाग्यपे मृदंशे शुभदृष्टे कूपादिकर्ता ५०
कुंभारो तड़ागादिका ५१
खे सुखेरो जीर्णोद्धारादि कर्ता ५२
सजीबजे गोपरे वा सभौमे सुस्धानकर्ता ५३
टीका-दशमेश गोपुरांश मे गया होतो कुया, गांवढीभादि नलाशय करने
वाला होवे ४९
नवमेश मृदु संज्ञक शुभ षष्ठवंश मे गयाहोभार शुभ ग्रहसे दृष्ट होतो
फुवां वावड़ी भादि जलाशय करने वाला होव ५०
फारफांश लग्नमे कुंभराशी होतो तलाव पापड़ी कुवा भादि करने
घाला होताहै ५१
मुखेश दशमे भायमे गया होतो देवालय तथा जलाशयो कामीणों
दार करने वाला होताहै ५२
गुरुसे युक्त बुध गोपुरांश मे गयाही भयया मंगलसे युक्त मध गो
रांश मे होतोउत्तम(सार्वजनिक लाभा) स्पान करनेवाला होताई ५१
यज्ञ कर्ता योग।
ज्यकर्मपाः सबला यज्ञकर्ता ५४
खेने सपेङ्के शुभाशे शुभ दृष्टे यज्ञकर्ता ९५,
धर्म ज्ञे स्वोये पापापीने यज्ञकर्ता ५६

नातकतत्व. (२७) ज्यखेशाः सरलाः शुभदृष्टा विशेषेण यज्ञकर्ता ५७ रीका-गुध गुरु भौर दशमेश येतीनो ग्रह बलवाव होतो यज्ञ करने रला होवे ५५ दशम भाव में बुध गयाहो भौरशुभग्रह के नवांश मे गयाहुवा शुभमा दृिष्ट दशमेश नवमे भावमें स्थित होतो यज्ञकरने वाला दोरे ५५ भपनी उच्च राशी मे ( कन्या राशीफे १९भशमे ) गयाइवा उप चिमे भावमे गयाहो भऔर पाप ग्रह से दृष्ट नहो तो यज्ञ करने वाला वे १६ सुध गुरु भौर दशमेश ये तीनो मह बलवान होकर शुभग्रहसे दृष्ट तो भरश्य यज्ञादि शुभधर्म कार्य करने वाला होवे ५७ यज्ञे विघ्नयोग- खपे खोच्चे सपापे नीचांशगे दुस्थे यज्ञारंभोत्तर विन:५८ टीका-भपनी बच्चराशी मे गयाहुवा दशमेश पापण्हसे युत होकर नीचराशीके नवांश मौर ६८०१९ भावमे गयाहो तो यज्ञका भारंभ होने के पश्चात् यज्ञमें विघ्न उपस्थित होरेगा ५८ भयश योग। चन्द्रादा शुझादने मन्देऽयराः ५९ चन्द्राच्छौ लग्ने मन्ददृष्ठेऽयशः ६. का-चंद्रस भपा शुकसे धनभाव में शनि गयाहो तो यशहीन (भपयश पाहा)ोता ५९ चंद भार शुक्र लग्नमे गये हो भौर उनको शनि देखता हो तो यश हीन (भपपशवाला) होता है ६० भाग्यहीन योग। तुपैरोएमे भाग्यहीनः ६१ लानार्थदारपादुस्थाविवाहात्परतोऽभाग्यम् ६२ धर्मपपष्ठे शत्रुनीचदृष्टेभाग्यम् ६२ भाग्पेशे भरारी नीचभारोऽभाग्यम् ६१

(२७८)
भाषाटिकासहित.
.
होये ६५
भाग्यपेऽपले धर्म पापा अभाग्यं ६५. . . . . .
लग्नपेऽपलेऽभाग्यम् ६६
केन्द्रेशनो जीवचन्द्रान्यतरादृष्टेऽभाग्यं ६७
टीफा-मुखेश भाठमें भायमें गया हो तो माग्यहीन होवे ६१
लग्न पन भौर सप्तमभावका स्वामि ये तीनो ग्रह छठे. माउ में
किंवा चारमें भावमें गये हो तो विवाह होने के पश्चात् भाग्यहीन हो। ६२
नवमेश छठे भाव में गया हो भौर भपने शत्रुग्रहसे किंवा नीचराशी में
गये हुये ग्रह से दृष्ट हो तो भाग्यहीन होवे ६३
नवमेश क्रूरग्रहकेनवांश वा नीचराशीभशमे गया हो तो भाग्यहीन
नवमेश घलराहितहों मोर धर्ममावमें पापग्रहगयेहोवो भाग्यहीनहोवे।
लग्नेश निर्वली हो तो भाग्यहीन होवे ६६
केंद्र में गयाहुवाशनि, गुरुकिंवा चंद्रमासे दृश्नहोतो भाग्यहीनहोवे६०
भाग्यवान योग।
धनेशे लाभे कर्मपयुतदृष्टे भाग्यवानू ६८
लामरोड़े कर्मपयुतदृष्टेभाम्पवान् ६५
धर्मपेर्थेकर्भपयुतदृष्टे भाग्यवान् ७०
लामपके धनपेलाभे धर्मशेर्थे सपयुतदृष्टे महाभाग्यवान्।'
-भाग्येइज्याच्छयुतदृष्टे भाग्यवान् ७२
धशुक्रेज्ययुतदृष्टे भाग्यवान ७३
लग्नार्थेशी पुत्रे भाग्यवान् ७४. ,
लग्नेशेकेशेङ्गे भाग्यवान ७५
भाग्येरो लाभे भाग्यवान ७६
भाग्यायपयोगे भाग्यवान् .७७
-

मातकतत्व. (२७१) . भाग्यशेर्थे भाग्यवान् ७८ सोत्यपुत्राझ सबलग्रहे भाग्यवान् ७९ टीका-धनेश लाभ भावमे गया हो और दशमेश से गुत पा र हौं तो भाग्यवान होने ६८ लाभेश नवम भावमें गया हो और दशमेश से यत वा दृष्ट हो तो भाग्यवान होवे ६९ नवमेश धनभाव में गयाहो भौर दशमेश से युत या दृष्ट हो तो माग्यवान होवे . लाभेश नयमे भाव मे, धनेश लाभभावमें, नवमेश धनभावमें गया हो भौर दयाश से युत या दृष्ट हो तो महाभाग्यवान होवे ७१ नवम भाव गुरुशुक से युत वा दृष्ट हो तो भाग्यवान होवे ७२ भाग्येश गुरुशुक्र से युत वा दृष्ट हो तो भाग्यवान होवे ७३ जग्नेश और धनेश ये दोनो पंचम भाव में गयेहोतोभाग्यवान होवे ७४ लग्नेश नवमें भावम भार नवमेश लग्नमें गयाहोतोभाग्यवान होवे ७५ भाग्येश लाभ भाव में गया हो तो भाग्यवान होवे ७६ भाग्येश भौर लाभेश इन दोनोंका एकराशी में योग हो तो भाग्य. बान होव ७७ भाग्येश धन भाव में गयाहो तो भाग्यवान् होवे ७८ तीसरे पांचमें भोर कम्नमें चलवान् शुभग्रह गपेहोतोभाग्यपार होवण भाग्योदय योग। चरङ्गे तदीशे चतथा चरखेट दृष्टे विदेशे भाग्योदयः ८० स्थिरे लग्नाङ्गेशोस्थिरखेटदृष्टौ स्वदेशे भाग्योदयः ८१ अन्यथा सर्वत्र भाग्योदयः ८२ धर्भ शुभदृष्टयाधिक्ये सर्वदेशे भाग्योदयः ८३ शुक्रे उपचये सप्तमवाविवाहोत्तरंमाग्योदयः ८४ जायेशे सप्तमोपचये विवाहोत्तरं भाग्योदयः ८५ सोत्या शोशुभयतदृष्टौवाशुभांशगौभ्रातृधनतो भाग्योदय:४६ ।

(२८०) मापारीमारिय. पुत्राङ्केशयोगे शुभयुतदृष्टे सुततो भाग्योदयः ८७ त्रिकोणे भाग्यपयुतदृष्टे सुततो भग्योदयः ८८ टीका-नरराशिका लग्न भौर लग्नेश हो भौर चरणद (चंद्र) से दृष्टो तो विदेशमे भाग्योदयहोरेगा ८० स्थिर राशि का लग्न भौर लग्नेश हो भार स्थिरग्रह (सूर्य) से दृष्टदो तो स्वदशमे ही भाग्योदय होवेगा ८१ द्विस्वभाव राशिका लग्न भौर लग्नेशहो भौर शुभग्रहसे युत दृष्टयो तो सर्वदशमे भाग्यो दयहोवेगा ८२ नवमभावपर शुभग्रहोकि भधिक हटिहोतो सर्वदेश मे भाग्योदप होवेगा ८३ शुक्र उपचपस्थान [६११११] मे भयावा सप्तम भावमें गया होतो विवाह होनेके पश्चात् भाग्योदय होवेगा ८४ सप्तमेश सात मेभावमे भयवा उपचय स्थान (३६१११) मे गयाहोतो विवाह होनेके पश्चात् भाग्यो दय होनेगा ८५ तृतीयेश भौर नवमेश का योगहो भौर शुभम्हसे युत वा रष्टो भपवा तृतीयेश नवमेश शुभग्रहों के नवांश में गये हो भार दोनो युव हो तो भाई के धनसे भाग्योदय होवेगा ८६ पंचमेश नवमेश का योगहोभौर यह शुभग्रह से युत व दृष्ट होतोपुष से भाग्योदय होवेगा ८७ नयम पंचम भाव भाग्येश से युत भौर दृष्टोतो पत्रसे भाग्योदय होवेगा ८८ भाग्योदयके वर्षका विचार वृहत्पाराशरीमे लिया है किभाग्यस्थान में गुरुगयाहो भौर भाग्यश केंद्र मे हो तो२० वर्ष बाद भाग्योदय होवेगा? बुधपरमोच्चाशम गाहो भार भाग्येश भाग्यमही हो तो ३६ परके बाद भाग्योदय होगा २ भाग्येश धनभाव मे गयाहो भार धनेश भाग्य में गय हो तो यके पक्षात् भाग्योदय होगा३ यदिभषिक परवान भार पड़वर्ग :शुद्ध होकर भपनी सराशी रिंग

मातमतत्व.
4
(२८१)
उच्च राशि में गवाहमा भाग्येश रपि होतो २२ मेवपं पदसतो
२४ मापं मंगल हो तो २८ मे, बुध हो तो ३२ में, गुरु होतो 1 में,
अमही तो २५ में शनि हो तो ३६ मे रा दोनो ४२ में वर्ष में भाइयो
दय होगा। इसी प्रकार मन्य भावों के स्वामीभी मो भधिक पलमान
रोकर भपनी समा उच्चरात्री में गयेही उनका भाग्योदय
मोर उसभावके फलकी दिहोगा।
गंगास्नान योग।
खेराहो पा सुपे गंगास्नानम् ८९
से पूर्णेन्दीज्यो गंगास्नानम् ९.
से जीवे गंगास्नानम् ९१
शुक्रज्यो केंद्रे युनौ गंगास्नानं ९२
धनेश गुज्यास्तुंगे गंगास्नानम् ५५
में पा वदोशेन्त्ये गंगास्नानम् ९४
पंदे सोत्ये शुभदृष्टे जल गंगास्नानम् ९५
धरो जल केन्द्र गुभदृष्टे गंगास्नानम् १६
धर्मे जीवाटे गंगास्नानम् १५
मगले शुभदृष्टेऽनेकवीर्य दर्शनम् ९८
शाम भार में भरा गर्य
मेगा ८९(गंगाला नान करना
इसमें भार में पूर्णमा और
S
.

(२८२) माटीकासहित. जलराशी का चंद्रमा तीसरे मारमे गयाही भोर गुभयद से दशा तो गंगास्नान होगा. ९५ मराशी मे गयावा नवमेश केंद्रस्यान मे गया भोर शुभया दृष्टहोतो गंगास्नानहायेंगा ९६ नवम भाव को गुरुदेवता होतो गंगास्नान होगा भाठमें भाय में गया हुवा बुध शुभग्रह से पृष्टहोतो भनेक तीर्पर नों के दर्शन होवेगा ९८ महायात्रा योग। धर्म कर्मप योगे महापात्रा ९९ धर्मे शुभदृष्टयाधिक्येपेद्रायकोणे महायात्रा ... चंद्राद्धर्मेशे केन्द्र महायात्रा १०१ चंद्रा शुभदृष्टयाधिक्ये वा शुभयुते महायात्रा १०२ टीका-नवमेश दशमेश का एक राशीमयोगदोतो महायात्रा होवेगार नवम भावपर शुभमहो कि भधिक दृष्टि हो भौर नवमेश १॥४॥ १०१११९०५ भावमे गयाहो तो महायात्रा होगा १०० चंद्रमासे नवमेभावका स्वामि केन्द्रमे गया होतो महायात्रा हो धेगा। चंद्रमा से नंवमें भायपर शुभग्रहों कि भषिधि हो,भयरा भधिक शुभग्रदो से नवम भावयुत होतो महायात्रा होगा १०२ प्रव्रज्या योग। पहचतुष्टयादि एकगंपवज्या करम् १०३: यावन्तो बलिनस्तावन्तःस्त व प्रवग्या करा: १०४ तापमः कापालिकोरक्तपट आजीवी विदंडी परी नग्नः सूर्योदितः १.५ अस्वगास्तु तद्भक्तिमात्रम् १०६ मन्द मेरो वा मंदाराशे चंद्रमन्दमात्र इष्टे संन्यासी 10 पनी मलीनो संन्यासी १०८. , नातकतरव. (२८३) चंद्रेज्याङ्ग्रेप्पकिदृष्टेषुधर्मजीवराजयोगजोबलगुप्त काणादा दिसमः १०९ टीका--एक राशी मे चार पांच छ सात ग्रहो का योग होने से मह धर्म को त्याग करके सन्यासी होताहै १०३ एक राशी में गौ हुने चार से अधिक प्रव्रज्या योग करने वाले ग्रहो जितने भषिक बलवान यह होवे उतने हि ग्रह भपने भपने भाधि त्य की प्रव्रज्या करते है १०४ यदि प्रवज्या करने याले ग्रहो मे रवि भधिक वळवान हो तो वपस्त्री भग्निहोत्र, या गायत्री का उपासक किंवा सूर्य की भक्ति करने । पा नैष्टिक ब्रह्मचारी) होताहै। द्र पळवानहो तो कापालिक (फपालरोधारण करनेवालापानान ति के धारणेवाला या शिवकी दीक्षावाले बापवासादि करनेपाला पी) होता। मंगळ चळवान होतो लालवत्र धारणकरनेवासाकादिक भाभयमों बोपासना करनेवाला जितेदिशिखामूत्ररहित कापायांबरधारीताहै। बुध बलवान होतो भाजीधी भर्यात् कपट करके नीविका करने वा आश गारुड मेमोरी दीक्षित होता है। गुरुषलवान् हो तो त्रिदंड धारण करनेवाला कापायांवरधारी उन्यासी होताहै। शुक्र बलवान हो तो चक्रको धारण करनेवासा भयवा बहुत सा. सन्यासियो कि जमातकामालिक ठाटपारसे साधुमाकी मंडली भनेवाला भोर पशुपतिदीनामे स्थित होता है। शनि बलवान हो तो नग्नरहनेवाला पदिकठिनवपल्पाले बतको पारकरनेवाला दिगंवर तपस्सी होता १.५ परिप्रवश्या योग करने वाले ग्रामस्तंगत हो तो केवल संन्यासि योको भतिः करने वाला होगा। प्रबन्या नहीं इचिगा). चंद्रमा शनिक ट्रेकाणने गया रोकिंना शनि मंगलकै नरांशमें गयारा नंद्रमा मनासेही सेतो संन्पासो होबार १७ सग्नेश भौर शनि बलहीन होरेजो संन्याधी होता १०८ (२८५) भाषाटिकासहित. चंद्र, गुरु, भौर लग्न इन तीनोंको शनि देखता होरे भोर नाम भाव में गुरुगयाहो तो राजयोगका 'भागानुभषे करनेवाला ब्रह्मगुप्त काणादादि मुनियोके समान प्रतिष्ठावाला भयवा भाचार्य पदधारी तपस्वी होवेगा १०९ भबज्याघ्रष्ट योग। प्रव्रज्याकरे पराजिते प्रव्रज्याघ्रष्टः ११० जन्मेशे मन्दमात्र दृष्ट प्रवज्या भ्रष्टः १११ चंद्रराहुयोगे क्रूरांशे सगुलिके संन्यासभूष्टः ११२ अंशेकेतोमन्दमात्रदृष्टे सन्यसाभासः ११३ जीवैरिगेम्युगे तपोहीनसंन्यासी ११४ इति नवम विवेकः। टीका-सन्यासयोग करने वालाग्रह पराजित (गहयुद्धमे हारा भा) होतो प्रव्रज्या भ्रष्टहोपेगा ११० जन्मराशी के स्वामी को केवलशनीही देखताहो भौर भन्य को भीमहदेवतेनहो तो प्रवज्या भ्रष्टहोवेगा १११ रगहोफेनवांशमे गयेहुवे चंद्र भोर राहका एकराशीमयोगही भौर पद गालकसे युतहो तो संन्यास सेभ्रष्ट सन्यासहण करके त्यागदेगा वा संन्या सके नियम पालननही करनेवाला नाममात्रा संन्यासी ] होयेगा । ११२ कारकांशलग्नमे गयाहुवा केतू केवलशनीसेदृष्ट हो तो रान्या सिका फेवळ वेषधारण करनेवाला होये भान सरासंन्यासी नहीहोर। उठे भावमे गुरु भौर मुखभावमे रविगयाहो तो सपरहित ( यम नियम रहित वा तपस्याहीन) संन्यासी होवेगा ११४ इत्यादिविचारो सियाय गुरू, भाईकीम्रो, भाईकपुत्र के शालेकाधी, मामा कीमाता, माताकामामा, मित्रका मामा, मिनकीकाफी, पुत्रा पुत्र, पुत्रकीविद्या, शत्रुकिमाता, शालक, नौवरकीम्री, स्थान, दादाका भाई, भादिषातोकाविवारभी इसनवम भावसही करना। इति नामापरेकस्य सकारातः । । .

नातक्तव. (२८५) . अथदशमयियेकः । व्यापारीयोग। राज्ये शुभदृष्ट्याधिक्ये व्यापारी १ खेनेव्यापारी २ खानेशयोगे व्यापारी ३ सङ्गो व्यापारी ४ खेराकेन्द्रायकोणे शुभदृष्टे व्यापारी ५ सेशे स्वः शुभयुते व्यापारी मानशीलः ६ रीका-दशमभारपर शुभग्रहो कि भधिक दृष्टि हो तो व्यापारी म- नुष्य होये १ : दशम भाव मे बुधगया हो तो व्यापारी व २ दशमेश और लग्नेशका एकराशी में योग हो तो व्यापारी होवेगा३ लग्नेश दशमभावमें गयाहो तो व्यापारी होवेगा। दशमेश १०।११।९।५ भाव में गपाहो भौर शुभगइसे दृष्ट हो तो व्यापारी होवेगा५ दशमेश भपनी स्वराशी मे गयाहो भौर शुभमहसे युत हो वो ज्या- पारी भोर भभिमानी होवेगा ६ मानीयोग। सेशे शुभसम्बधे मानी ७ खेशेशुभवर्ग वा स्वोचे दृढ़मानी ८ शुभांवरे माने मानी सेशे वैशेषिकारो मानी .. धर्मरोङ्गे गुरुदृष्ठे राजमान्यः " जीवज्ञयोगे राजमान्यः १२ ।

(२८)
भाटिकामरित.
धर्मरोलाभे राजयन्पः १३
धर्मपारायतादो राजान्पः १४
लग्नेशे शुभव” या गोपुरादी राजवन्यः १५
टीका-दशमेश शुभहसे सम्बंध करता तो मानवाला रोगा
दशमेश शुभग्रह यग गया भपराभग्नी उराशी में गया
हो तो इदरत भार मानघाला होता है।
दशमभाय शुभमहाक मध्यमें गया हो तो मानवाला होता है।
दशमेश पेशेषिकाश में गयाहोतोमान ( प्रतिय) माला होता !
लग्नमें गपारवा नयमेश गुरुसेदृष्टहोतो रानमेंमानवाला होताहै !!
बुध गुरुका योग एकराशीमे हों तो रानमें मानप्रतिष्टा वाल हो१२
नवमेश लाभ भावमें गयाहो तो रानय रामालोगानिसको मुक)
पेसामान बाला होरे १३
नववमें भाषका स्वामि पारावतादिभंशमें गयाहो तो रामबन्यो!"
लग्नेश शुभग्रहों के वर्गमे चिा गोपुरादिशुमाशों में गया हो तो
रामपंच होगा १५
मानहीन योग।
सपे पापसंषधे मानहीनः १६
खपे 'पापवर्ग क्रूरपष्ठवंशे षा मानहीनः १७
टीका-दशमेश पापगहोसे संबंध (संज्ञातत्वमें संबंध ४ प्रकारका
कहा है तदनुसार ) करता हो तो मानहीन होवेगा १६
दशमेश पापग्रहके दशवर्गमें गया हो भव पापपष्ठ,शमें गया
होतोमानप्रतिष्टा हीन होवेगा.१७
फर्मादि वैकल्य योग।
सेरोऽधलेसपापे कांदिवकल्पम् १८
क्षेज्पशुकादुस्थाः पापदृष्टाःकर्मादिकल्पं १९
सेपापदृष्टयापिक्ये कर्मादिवैकल्य २०,
कर्मपदुस्थे कदिवैकल्यं २१

नातकतरव.
टीका-पापग्रहसे युत दशमेश बलहीन होतोजोकोई व्यापार धंधा या
काम करेगा उसमे सफलता नहोगी भार विकळनाया व्ययता होवेगा१८
बुध गुरु भार शुक ये तीनों ६।८।१२ में भाव में गये हो भौर पापग्रहसे
दृष्टहोतो प्रत्येक काम मे सफलतानहोगी भौर उसमे विकळता विन
व्यग्रतादि होवेगा १९
दशमभावपर पापग्रहों कि भधिक दृष्टि हो तो प्रत्येक काम करने में
विकलता होगा २०
दशमेश ६८६२ में भावमे गपा होतो जो काम करेगा उसी मे वि
फलता व्यग्रता वा हानि होगा भार सफलता प्राप्तन होवेगा २१
सरकीतियोग।
कर्क चंद्रे पारावतांशे शुक्रेज्येशिवे सत्कीतिः २२
खरोबाराबतादौ सत्कातिः २३.
शुभयुते खेशे सत्कीविः २४
शुभांवरखे शुभहष्टे सत्कीनिः२५
सपेशुभांरो सत्कीति: २६
लग्नपे बलाध्ये सपेदेवलोके धर्मपे सिंहासने सत्कीति:२७
टीका-कराशीम गयारा चंद्रमा पारापतांशमे हो भार पा गुरु
शुझसे दृष्ट हो तो सत्कीति । उत्तमकीर्ति वाला वेगा २२
शमेश पारावतादि शुभवर्ग मे गपाहातो सत्कीति पाला होरे २३
दशमेश शुभग्रह से यत होतो सत्कीति वाला होवे २४
दशमेश शुभमहोके मध्यमे गया. भौर शुभग्रहोसे दृष्टोतो सत्तीति
पाळा होवे २५
दशमेश शुभग्रहोंकी राशी के नवांश में गयाहोवो सत्कीर्तिवालाहो२६
लग्नेश रलवान से दशमेश देवलोकांश में गयाहो भौर नरमेश सिं
हासनोश में गपाहतो सकीर्ति पाला होने २७
भसरकीर्ति योग।
सपापसंबंधे ऽसत्कातिः २०
.

(२८८)
भावारीकामदिव.
सपे पापवर्ग ऽसत्कीर्तिः २९
खेमंदाका असत्कीतिः३.
पातांतरे कर्मणी असत्कीर्तिः३०
टीका-दशमेश पापग्रह से संबंध करताहो तो भसत्कीर्ति यालाहौर
दशमेश पापग्रहों के दशवर्गमें गपाहो वो भसत्कीति वाला होने २१
शनि भौर रविका योग दशौभायमे हो तो मलकीति वाला हो३३०
दशम भावपापग्रहोफे बोनमे गयाहो तो भसाकति पालाही ३१
भाज्ञाका तया मूर सौम्याज्ञा फोपोगाः।
खेशे शुभे शुभदृष्टयुते आज्ञाकर्वा ३२
खेशे मृदंशे वा शुभाशे मा केन्द्रे बलाढये आज्ञाका३३
खर्क वा भौमे आज्ञाकी ३४
सेशे केन्द्रे शुभयुत्दृष्टे क्रूरपष्ठयंरो सौम्याज्ञाकर्ता ३५
समन्देकर्मपे रन्धयुते ऊरांश केन्द्रराज्ञाका ३६
..राहु-गुलिकौमाने क्रूराज्ञाका ३७
धने राहु केतु राज्ञाकर्ता ३८
धर्मपनीचे कूराज्ञाकर्ता ३९
टीका-दशमेश शुभयह हो भौर शुभग्रहसे गुत भौरदृध होतोभाज्ञा
(हुकुम ) करने याला होये ३१
दशमेश मृद संज्ञक्शुभषष्ठयंशमे गयाहो १ भथवा दशमेश शुभग्रह
की राशीक नवांशमे गयाहो या दशमेश वळपान होकर केंद्र
(१४) स्थान मे गया हो तो भाज्ञाकरने वालाहोरे ३३ (६स
सूत्र मे ३ योग है)
दशम भानमें रवि भयवा मंगल गयादीतो भाज्ञाकरने वालादोष ३४
दशमेश शुभग्रह से युतदृष्ट होकर फेंदमें गयाहो भार फर षष्ठयंश
मे गंपादोतो सौम्य [शांतीसाय भाज्ञा करने वाला होये ३५
FM

मातस्तस्व.
(२८९)
शनि और अष्टमेश से युनहोकर दशमेश पापग्रहकी राशी फेंमांश
मे हो भौर पेद्रस्थान ( २५१.) में गया तो राज्ञा करनेका
लाहोर ३६
दशमे भावमे राहुभौर गुलिक गयेहोतो कुरभाज्ञा करनेवालाहोवे ३७
धनभावमें राह किंवा केतुगयाहोतो दूर भाज्ञा करनेवाला होये ३८
नवमेश नीचराशी में गया होतो क्रूर(कठोर भाज्ञा फरनेशलाहो३९
राज कार्य कायोगा
साशे राजकार्य कर्ता ४०
केन्द्रेक राजकार्यकर्ता ११
केन्द्र कोणे चंद्रे राजकार्य का ११
राज्येशे लाभे केन्द्रे या राजकार्य कर्ता १३
लग्नागे जी राजकार्य का ४५
टीका-कारकांश लग्नमें रवि गयाहोतो रामायं परनेवालाहोर४०
केंद्रस्थान (१।४।१०) में रवि गपाहोवो राज्यकार्य करने वाला
चंद्रमा केंद्र या त्रिकोण स्थानमे (२४१०९।५) गपाहोतो रा
म में काम करने वाला हरि ४२
राज्पेशलाभ भाम गयाही भया दशमेश फेंद्र में गपाहतो रामका
ये करने वाला हो ।
लग्न किंश चतुर्थ भायमें गुरुगपाहोतो राजकार्य करनेवाला
फुल मुख्य कुल तुल्यादि योग।
अंशे ग्रहये कुल मुल्पः ४५
'एकाको कुलतुल्यः ४६
होसः सकुश धिकः ४७
सोत्गुरौ छामेचं कुलदीप: ४८
भोमटेहि सुचंद्रे पपेराही कुठदीपकः १९

(९०) भाषाटिकासहित. टीका-कारकांश लग्न में शुभ पिया पाप कोईभी दाग्रह गयेहोतो अपने कुलम मुख्य मनुष्यहोरेगा ४५ कोईभी एकमह भरनी हाराशी मे गपाहातो भपने कुल के बराबर प्रतिष्टा घालावेगा ४६ दौग्रह भानी स्वराशी में गयेोतो भपने कुलसे भधिकातिटावा- लाये ४७ तीसरेभावमे गुरु भार लाभ भावमें चंद्रमा गाहोतो कुल दीपक होये ४८ लग्नमसिंहराशी का मंगल, पांचमे चंद्रमा भार वारवें भाषमे राहु , गयाहोतो कुलदीपक होवे ४१ प्रतापीयोग। रन्धारीश बन्योन्यस्थानगो वा केन्द्रगौ.प्रतापी ५: पष्ठेगरी लाभेचन्द्र प्रतापी ५१ लाभपे शुभभांशे प्रतापी ५२ टाका-भष्टमेश छठे भाव में भौर षष्ठेश भाठमें भाव में गयाहो भ. थवा भष्टमेश भार पप्ठेश ये दोनों केंद्रस्थान (४०) में गये हो तो प्रतापी होरे ५० छठे भावमें गुरु भार लाभ भाषमें चंद्रमा गयाहो तो प्रतारी हो लामेश शुभग्रहकी राशी भौर शुभग्रह ही नवांशमें हो तो प्रतारी होने ५२ श्रीमान योग। लाभेवलाढयेशुभग्रहे शुभदृष्टे वा श्रीमान् ५३ धनगाश्चन्द्रेग्याच्छाः भीमान् ५४ टीका-पलवान् शुभना लाभभाव में गयाहो भयवा शुभप्रद लाभ भाषको देखता हो तो श्रीमान् होवे ५३ धनभाव में चंद्र गुरु भार शुक गये हो तो श्रीमान होवे ५४ पितमुख योग। सेरो शुभे शुभयतदृष्टे पितृसुखम् ५५ L नातकतत्व. (२९) खेश पारावतादौ पितृसुखम् ५६ सेशे शुभांतो गुरु शुक्र युते वा पितृसुखम् ५७ गोपुरादौ पितृकारके पितृसुखम् ५८ टीका-दशमेश शुभग्रहहो भौर वह शुभग्रहसे युत भार दृष्ट हो तो पेताका सुत्र उत्तम रहेगा ( पिताकी दीर्घायु होगा) ५५ शमेश पारायतादिशुभवर्गमें गया हो तो पिताका सुन उत्तमरहेगा५६ ‘दशमेश शुभग्रहोंके मध्य में ( बीचमें) गया हो भपवा दशमेश गुरु कसे युक्त हो तो पिताका सुख उत्तम रहेगा ५७ पितृकारक ग्रह ( रांब) गोपुरादि शुभांशमे गपादो तो पिताका मुख भच्छा रहेगा ५८ वृहत्पाराशरी में लिखा है कि भाग्येश परमोश। शमें गया हो भाग्यस्थानगतराशीके नवांशमे गुरुगादो भार जन्मलग्न केंद्रस्थानमे शुक्रगया होतो पिताकी दीर्घायु होरे । पिता परस्त्रीगामी योग। खारिप खगों पितापरवी गामी ५९ लानेशे सपापे धने वा धनारियूनेशाः सपापाः कोशगाः पिवासज्जन स्त्री गामी ६० टीका-दशमेश भौर पप्ठेश ये दोनों दशम भाव में गपेहोवो पिता परस्त्री गामी होरे ५९ पापग्रहसे या होफर लग्नेश धन भाव में गया १ भपका धनेश परेश भौर सप्तमेश ये तीनो पापमहसे युक होकर धनभाष में गये होतो पिता सज्जन परस्त्रीगमन करनेवाला हरि ६० पिता, धूर्त योगा सखाशाप जनको विटः ६१ भाग्याम्पो सुखे जनको विटः १२ सैला-मुनेश भौर पष्ठेश ये दोनो नपमें भाव में गपेहो तो पिता धर्व किंवा ठगाईका काम करने वाला होये ६१ 'नाश भौर मुखेशये दोनो मुखभार में गये हो वो पिता पूर्व पा उगाई करने वाला होरे १२ 2.

(२९२)
भाषाटीपारित.
पितृ दुःख पोग।
पेशे पापसंबंधे पापान्तरे पितृ दुःखम् ६३
अर्कादशमेशे पाण्युतदृष्टे पितादुःसी ६४
टीका-दशमेश पाप ग्रह से संबंध करता हो पापग्रहोंक बीवमें गया
होता पिताका दुःस होगा या पिता दुःखी रहेगा ६३
रवि से दशम भावका स्यामि पापग्रहसे युत भौर दृष्टहोतो विता
दुःखी रहेगा ६४
पितृमुखादि भत्स योग।
सुसरो विके पितृसुखमल्पम् ६५ .
सूर्यारोखे धर्मे या शीघ्रं पितृमृतिः ६६
सपापसूर्ये यूने शीघ्रं पितृमृतिः ६७
सारिखेशे शीघं पितृमृविः ६८
पुन: खेभौमेन्त्येराही पितानजीववि ६९
खे शत्रुभे भौमे पितानजीवति ७०
लग्नेजीरे धने ज्ञारयमा विवाहे पितृमतिः ७१
चन्द्रावि पितर्जले मृविः ७२
चन्द्राकाझपे पापदृष्टौ पितुर्जटेमृतिः ७३
शुमार्ण चरे भीमदृष्टयुतो पितान्यदेशे मृतिः ७४
टीका-मुखेश ६८२२ में भाव में गया हो तो पिताका मुन्न भर
रहेगा ६५
सूर्य भौर मंगल दशमभाव में भयश नवमे भाषमे गयहोती ही
(भपनी छोटी उमरमेही) पिताकि मृत्यु होरेगा ६६,
पापग्रहसे युक्त सूर्य सातमे भाव में गया हो तो पिताकी शीघ्र
प्रयु होगा ६७
शमेश रवि भोर मंगल से युक्त होतो पिताको मृत्यु होगी।
.

- मातकतत्व. (२९५) सात में मूर्य दशमे मंगल भौर वारवे भावमें राहुगया होतो पिता जीवे नहीं ६९ (शीघ्र पिता कि मृत्यु होवेगा) । दशम भावमे शत्रुराशी मे गयाषा मंगळ होवे तो पिता जीवेनही । (शीघ्रपिता का मृत्युदोवेगा) ७० लग्नमेगुरु धनभावमें बुध, मंगल भौर शनि ये तीनो ग्रह गयेहो तो विवाह के समय पिताकि मृत्यु होवेगा ७१ चंद्र भौर रवि येदोनो नवमे भावमे गयेहोतो पिताकी जलमे डूबने से मृत्युहोगा ७२ चंद भार रवि मीनराशी मे गये हो भऔर पापग्रह से दृष्ट होतो पिता लि जलमें डूबने से मृत्यु होरेगा ७३ परराशी में गहुवे शुरु भोर रवि, मंगळसे युक्त किंषा दर होतो पिताकि भन्य देशमे मृत्य होवेगा ७४ पितुर्दहनयोग। चरे केन्द्रे वा चन्द्रे पितरौ नदहेत् ७५ टीका- चरराशी का रवि केंद्रमे गयाहोतो पिताका भौर परराशी का चंद्रमा केंद्रमे गयाहोतो माता का भग्नि संस्कार भपनेहातसे न ही करने पावेगा ७५ मन्मतः प्रापित मरणयोग. भोमाविजे खे जन्मतः प्राक् पितृमरणम् ७६ मन्दारौ खे जन्मतः प्राकू पितृमरणम् ७७ टीका-मेष राशी में गयेहवे मंगल भौर रवि दशम भावमे गये होतो नन्महोनेके पहिले हि पिता का मरण कहना ७६ शनि मंगल दशम भावमे गयेहोतो जन्महोने के पूर्व ही पिता का मरण कहना ७७ वृहत्पाराशरी मे लिखा कि उठे भाठमे किंवा पारवे भाव में रवि नएमभावमे भष्टमेश लानमेव्यपेश भोर छठेस्थानमे निसराशी का नराशहो यहाशी पंचमभावमै गई होतो जन्महोने के पहिले ही पिया कि मृत्यु ऐसागानना । भाठमे रवि और भष्टमेश नपम भापमें गवाहोतो पहिले वर्ष में पिवा किमुष होवेगा।

. . भाषाटिपासरित. पोगनयनेमानमें भोर नरमेश नीवाश्यंश में गयाहोतो तीस रे किंवा १६ मे वर्ष में पिता कि मृत्यु होवेगा३ लग्नेश भाठमेभावमें भौर अरमेश रविसे युक्त होतो २ इसोभना पारवे वर्ष में पिताकि मृत्यु होगा। जन्म लग्नसे चतुर्थ भायमै राह भी पंचम भावमे रवि गवाहोतो सोलहमे भयवा भठारह मे (१८) वर्ष मे पिता कि मृत्यु कहना १ रासे युत सूर्य हो भौर चंद्रमासे वो भावमै शनि गया हो तो सातमे भयवा उन्नईस (१९) मे वर्षमे पिताका मरण होरेगा ६ भाग्येश व्ययभायमे भौर व्ययेश भाग्यभाव मे गया हो तो ४४ यु- मालीस मे वर्ष मे पिताका मरण होगा ७ सूर्यके नवांशमे चंद्रमा गया हो भोर लग्नेश भष्टम भावमेहो तो मे तथा ४१ मे वर्ष में पिताका मरण होगा ८ दशमस्थानका स्वामि सूर्य, चंद्र भौर मंगलसे युक्त हो तो ५० मे वर्ष पिताकी मृत्य होवेगा ९ तीसरे भाव रवि भौर तीसरे तथा सातमे भाव में राहु गयाहोतो ६ उठे वर्ष में मथवा पचीस में वर्ष में पिताका मरण जानना १० धनभाव में शनि भौर भाठमे भाव में रवि गयाहोतो३० मे तया २१ में किंवा २६ मे वर्ष पिताका मरण होगा. ११ भाग्येश नीचराशी में गयाहो भौर उसनीचराशिका स्वामी नामे भाव में गयाहोतो २६ मे तथा ३३ मे वर्ष पिताका मरण होगा १२ सिंहासनाप्तियोग। सुखार्थाङ्गेशाः स्वः धर्मरोने सिंहासनादितः ७८ धर्माङ्गसुखेशाः कर्मगाः बलिखेशयुताः सिंहा० ७१ धर्मेम्बुपे शुक्रेज्यों तुर्थे धर्मेशे केंद्रकोणे सिंहासनामिक विचपे केन्द्रे स्त्रोचे शुभदृष्टे सिंहासनामिः ८१ शुभाकेन्द्र व्यरीशगाः पाः सिंहासनाप्तिः ८२ टीका-सुमेश धनेश भौर लग्नेश भपनि स्वराशीमे गयो भौरना मेश लग्नमे स्थितहोतो सिंहासनकी प्राप्ती होयेगा भर्यात किसीवरे • रानाकी गद्दीपर बैठनेका सौभाग्य प्राप्त होवेगा७८ " नातकतख. नवमेश लग्नेशा भौर मुखेश ये तीनो दशमभानमै गयेहो भौर बल पान दशमेश से युक्त होतो सिंहासन की प्राप्तिहोवेगा ७१ मुखेश नवमे, गुरु शुक चतुर्थ भावमे भौर नवमेशद्रकोवारिकोण स्थानमे गयाहोतो सिंहासन की प्राप्ति होवेगा ८० भपनि उचराशि मे गयाहुया धनेश फेंदमे गयाहो भौर शुभग्रह से पहोतो सिंहासन की प्राप्तिहोवेगा ८१ संपूर्ग शुभमहद्रमे गयेहो और संपूर्ण पापग्रह तीसरे छठे ग्यारमे भाव में स्थित होने सिंहासन की प्राप्ति होवेगा ८२ इन योगों में जन्माहुवा किसी राजाके यहां दत्तक जायगा बाभ- पनी धीरतासे राज्य संपादन करेगा। नृपतुल्य योग। पट्स्ससंगाः वा शुभषष्ठयशेर्के नृपतुल्यः ८३ चंद्रज्योसुते वोत्तमांशे नृपतुल्यः ८४ चन्द्रेनें गुरौसुखे सेशुक्र मन्देस्वोच्चे नृपतुल्यः८५ दशमादासोत्थगाः सौम्यानृपतुल्यः ८६ सौम्या केंद्रकोणपापास्यायरिंगालोनशेसबलेनृपतुल्यः८७ नीचगभेशोच्चेशः केन्द्रनृपतुल्यः ८८ बलिनिचंदे लग्नेतर केन्द्रकोणे शुक्रजीवान्यतरदृष्टे नृप तुल्यः ८९ नीचगाः स्वोच्चांशगाः नृपतुल्यः ९० देहेजीवे ज्ञकेन्द्रे भाग्यपदृष्टे नृपतुल्यः ९१ सेशेस्वोच्चमित्रांशे पारावतादौ नृपतुल्यः ९२ नीचे जीवे धर्मपरन्धे शुभारी नृपतुल्यः ९२ जीवेन्त्ये लाभेमंदे सोत्थ नृपतुल्यः ९४ टीका-उग्रह भपनी स्वराशी मे गये हो भयवा रवि शुभषष्ठपंश (२९६) भाषाटीकासहित. में गयाहो तो राजाके समान हो। ८३ चंद्र भौर गुरु ये दोनो पंचम भावमें गये हो भयया सत्तमांश में गये होतो राजाके समान होगा ८४ लग्नमें चंद्रमा सुखमेगुरु दशमेशुफ गयाहो भौर शनि भपनि य तया उराशीमें स्थितहो तो राजाके समान होगा ८५ दशम भावसे तीसरे भावपर्यंत ( १०१११३) के छ भागों में संपूर्ण शुभग्रह गयेहोतो राजाके समान होवे ८६ संपूर्ण शुभयह केंद्र या त्रिकोणस्थान में भौर संपूर्ण पापणtt भावमें गपे हो लग्नेश बलवान होतो रानाक समान होवेगा नीचराशीमें नो ग्रहगयादो उसराशी के स्वामीकी जो समराशी को उसका स्वामी यदि केंद्र (१४१०) मे गया हो तो रामाके स- मान होवेगा ८८ रलयान चंद्रमा लग्नविना भन्य फेदकोणस्थानमें (VIRAL गपादो भौर शुक्र किंशा गुरूंसे दृष्ट हो तो रामाके समान होये ८९ नीचरोशीमे गेप हुये यह भानि उराशी नवांशमें गये होतो रामाक समान होगा ९० लग्नमे गुरु भौर केंदमे गंयाहुया पुध भाग्येश से हटहो तो रामा संमान हरिमाण दशमेश भानी स्य, उन्म तथा मित्रराशीके नवांशमे भौर पारा तादि शुभांशी गपा होतो रामा समान होगा ११ नोपराशीका गुस्लग्नम भार भाग्येश भरमभाय में शुभण्डारी दीरामे गया तो राना समान होगा १५ पारये मायमे गुरु व ग्यारमेभावमेशनि गहो भौर तीसरे भाग स्वामि मुको तोराना समान होगा ९४ राजाधिराम योग। पटनाः स्वोरचगाराजाधिराजः ९५ सोमुतेमुखेगेसे कोणाटे राजाधिराजः ९५ धरित्यायनोन केन्द्र सानफ्युतो राजाधिराजः ९७ शमोत्ये मंदाका दमाच्छो टामजीद राजाधिरामा ८

.
.
.
गुरावझे युनाम्बुगेसूर्ये चक्रगेशुक्रसुते राजाधिराजः९५
जीवाकीवजे खेकजे धर्मगाझेन्दच्छाराजाधिराज..
कन्याङ्गेशे झपजीवे लाभेमंदे हयेशुषकाविलो राजा
धिराजः १.१
धर्मेमन्दे उच्चे कुजे शेज्याच्छाः सुते राजाधिराजः १०२
सकलाबरेषु राजाधिराजः १.३
सोत्थेशनौ पठेभौमे खेशुके धर्मस्वोच्चे राजाधिराजः०४
सुतेशे सबले खायोगे केन्द्र राजाधिराजः १०५
खरोदेवलो के स्वादेशीपारावे लाभपेगोपुरेराजाधिराज ०६
गो मीनालिकन्यासु सर्वे राजाधिराजः १०७
घट सिंह युग्म धनुःषु सर्वे राजाधिराजः १०८
तुलाजन्ना हय मृग हरिषु सर्वे राजाधिराजः १०९
ज्ञाराज्यापु सघटेषु सर्वे राजाधिराजः ११०
.जेन्दु जीवभेषु सर्वे राजाधिराजः १११
टीका-छग्रह भपनी उच्चराशी में गयेहो तो राजाधिराज होता ९५
दशमेश पंचममे मुखेश दशम भावमें गया हो भौर नवम पंचन
भावके स्वामियों से दृष्ट होतो समाधिरान होरे ९६
नवम भौर पंचमभार स्वामी लग्नेशते युत होकर सप्तम स्थानके
विनाभन्यकेंद्रस्थान (१।४।१०) में गये होतो राजाविरान होगा९५
बंदमासे तीसरे भाव शनि रवि, चतुर्थभावमें उपगुरु और लाभ
भार मे गुरु गया हो तो राजाधिराम (वहाराना होगा ९८
लग्नमेगुरु सप्तम् ाि चतुर्थभावमे रवि भौर चक्रगती का शुक
पंचममार मे गयाहो तो रामाविराम होने ९९
भेपराशी मेगुरुभौर रवि, दशमेमंगल भौर नवम भावमे युध चंद्र
पशुक्र ये तीनोमगहो तो रामापिरान होष १००

मामला पापा ममे मीनाजी में PAH भागने शनी, धन Ang, गोपडी मार मंगलम विनामिक राशि में होतारामा गिरानमा.1 नामे मार पनि हो मानिसमरागिन से भारगुरा गुक मेलामा मम भामे गोमो रामाविरामको योग परि गममा गाभा सानो भाषा परवान होगा १२ शुनमा पार संग पद परराशि में गर होतो गाधिराज रोपे BIR मारमे शनि छठे मगज दमे गुरु मारनामे भारोमानि उatो मे गा मारपि गपाती राना धिराम गोगा। येयो गसिंदग्निमे जन्म होने परिसरली में होना समाई १५४ पदस्थान में नामे मार दशमेश का योग हो भौर पंचना पलवान होता रांगाधिरान हो १०५ दशमेश देवलोकांशमे घाम नरमे ये दोनो पारावतांगमे और लाभेश गोपुरांश मे गपाहोतो रामाधिराम होवे २९६ धूपम मौन वृधिक भौर कन्या इनचार राशियोंमें यदि शुभपापसर्व यह गहोतोरानाधिरान होगा १०७ भ, सिंह, मिथुन भार धन इनचारराशीयों मे पदिसंपूर्ण शुभपापयः गयेहोतो .माधिराम होगा १०८ तुल, कन्या, धन मकर भौर सिंह इनवराशियोने सफल शुभ पापमहं यदि गये होतो रामाधिरान होगा १०९ धमंगल सूर्य भौर गुरु इनचारों ग्रहों की मशिने तथा कुंभ राशीमे (३६।१८।९।९।१२।१५) सशुभ पाप ग्रह यदि गरे हो तो रामा धिरान होगा ११ बुध चंद्र भौर गुरु की राशि (१२) में सर्व शुभशाप ग्रहयदि गोहोतो राजाधिराम होगा । १११ भूपति योग। लग्नादाचंद्राद्धर्मकर्मपाबन्योन्यगी भूपतिः ११२ स्वतंगाः सप्त भूपतिः १५३.. . +

मातमतत्य.
(२९९)
सप्तसुहृद्भगा भूपतिः ११४
'ध्यादिग्रहासोचमा भूपवंशजो भूपतिः ११५
रेषु स्वोच्चेषु ऋरो भूपतिः ११६
खोचे षु शुभेष शुभमनिर्मिभेषभिभमतिः भूपतिः ११७
पश्चादयो ग्रहाउच्चागा अन्यकुलजो भूपतिः ११८
चरेङ्गे मन्दाकरिज्याः खोच्चगाभूपतिः १३९
मृगोनचरेड्ने मन्दाज्याः स्वोच्चगा भूरतिः १२०
तुलानचेरे भौपेज्याः सोच्चगाभूपतिः १२१.
कर्कोनचरेडे मन्दाराकोः सोषणा भूपतिः १२२
मेपोनचरे) पन्दारेज्याः स्वोच्चगा भूतिः १२३
रीका-लग्न से भयवा चंदमासे नवम भार दशम भावके स्वामि
परस्सर भन्योन्यस्थान [ नवमेश दशम भाव मे भौर देशनेश नबने
भाव ] गये होतो राजा होवे ११९
सातमहभपनि स्वराशिम यदि गये हो तो राजाहोवे ११३
यदि सातग्रह अपने मित्रग्रहकी राशिमे गयेहोतो रानाहो११४
तीन से भधिक ग्रहमपनी चराशी मे गयेहो तो राजाके वंशमे
उत्पन्न हव होगातो रानाहोगा ११५भर्यात् भन्य वंशमे उत्पनहो
तोरानाके समान वा प्रधान भादि होगा ।
भर ग्रह भनि उच्चराशिमे गये होतोरस्वभावका राजा होवेगा११६
शुभम्ह भपनि उच्चराशिमें गयेहो तो शुभ (शांत स्वभावका
तपा शुभ भौर पाप दोनोगह (मिश्र ग्रह । भपनि उचराशि मे गये
हो तो मित्र स्वभावका राना होगा ११७
पांचसे भधिक ग्रह ( पाच छ सात) यदि मपनि उच्चराशि में हो
वो भन्यके कलमे उत्पन्न हुवा मनप्यमी रामा होगा १५८
चरी १४१० का लग्नहो भौर शनि रवि मंगल गुरुये चारो
महभपनि उस्चराशिमे गये हो तो राजा होवे ११९

.
.
भावारीबारहिन.
मरशिकपिना भयभर
शिकाग्न भार
शनि रपि गुरुगतानो भानी उसपरशी में गये. हो तो राना
दोगेगा १२०
सशक रिना भाप चराशि [ Ant-1 का लग्नही भोर
मंग गह रविताना प्रामानि रन्मराशी में गर्म हो तो राना
ये १२१
राशिकविना भन्प चरराशी [१] ग नहीं मार
शनि मंगल रषिये तीनो प्राभानि उच्चराशी मे गये हो तो राना
दोर १२२
भेपराशी के बिना भन्पचाराशी ( मालग्नदो भौर शनि
मंगल गुरु ये तीनो महभपनि उस्वराशि में गहोतारामाहीये १२३
कचंद्रे स्वोचग जीवार्कयोरन्यतरेड्ने भूतिः २१
स्वःचंद्रवोच्चग यमायोरन्यनेर भूपतिः १२५
चंद्र स्वोच्चग सूर्यास्योरन्यतरङ्गे भूपतिः १२६
कर्क चंद्रे स्वोचगयो यमेज्ययोरन्यता भूपतिः१२५
कचंद्र खोच्चग जापारमोरन्यवरेङ्गे भूपविः १२८
कर्कचंद्रे वोच्चग यमारयोरन्यवरे भूपतिः १२५
भेपेड़े कचन्द्र भूतिः १३०
चन्द्रेज्पो ककड़े भूपतिः १३१
तुटे जे कर्कचन्दे भूपतिः १३२
मौनमृगे कचन्द्र भूतिः १३३
टीका-कर्क राशिका पंद्रही भोर भपनि उच्चशि मे गयावा गुरु
तथा सूर्य लग्न गया मर्यात् मेकिंया राशी का लग्नहो भार
रवि गुरु ये दोनो सवराशी के होचंद्र कर्क राशी का होवो रामा
होगा १२४

मातफताब
पराशी का चंद्रमा हो भौर भी उच्चराशी मे गयाहुका शनि
तथा रवि लग्न मे गयाहोनो गना होवे भर्यात तुल किंवा मेषलग्न
हो शनि रवि उच्च भौर चन्द्रमा करका होते. राजा होवे १२५
फर्क राशि का चंदमाशे भौर भनि उच्चराशि में गयावा रवि
मंगल लग्नमे गातो भयात् मेप किंग मार राशी का लमहो रवि
मंगल उच्च के हो भौर एकका चंद्रमादो तराना होगा १२६
कर्क राशीका चंद्रमा से भार भानि उत्तराशि मे गया हुभा शनि
सया गुरु लग्नमें गयाहो भर्यात् तल किंवा कमी का लग्न होशनि
गाशीभौर चंद्रमा कराशी का रोतों रानाहोरेगा १२७
बराशीका बदमासे मोर भपनि उशाशीमे गया हुवा गुरु तथा
मंगळ लग्नमे गयाहो भर्यातू फकम्बिा मकरराशी के कग्नहो गुरु मंगल
उचके भोरदमा कर्डका होतो राना होगा १२८
फराशिका चंद्रमा को भौर भपनि सचराशीमे गया हुवा शनि
तथा गल मे गयाहो भात तुलकिंगा मकर लग्नहो शनि मंगल
नभीर चन्द्रमा सेतोराजा होगा १९
मेरामा केलामे विगाहो भैर कर राशी मे चंद्रमा तोरा-
ना होगा १३.
कशीला चंद्र गरु गोहातो राजा हरे २३१
तुललान में शनि गया और काका चन्द्र होतो रामा होने १३२,
मकर राशी लग्नमे मंगल हो तो राजा रे १३३
लग्नवर्गोत्तमे चन्द्राग्रह चतुष्टयादिदृष्टे भूपतिः १३४
धोनमेचन्द्र ग्रहचतुष्टयादिदृष्टे भूपतिः १३५
कुंभेजे मेप सूपचंद्र न्यतमेश युग्मतिहालिगेषु शेज्या
रेषु भूपतिः १३६
ज्ञापिष्ठे यमेन्दम्पवरे उच्चगे लानेऽ जेकुजे तुलेशुकेक
केंजीचे भूतिः १३७
लग्नजे भौमेमृगे चापे चन्द्राको भूपतिः १३८

.
भाषाटिकासहित.
चन्द्रारौ मृगङ्गे चार्के भूपतिः १३९
चन्द्रार्की यूने सूर्येने चापेजोवे भूपतिः १४०
तुझेचंद्रे सिंह खयमे यूनेजीवे भूपतिः १४१
मृगङ्गेमन्देसोत्थेचन्द्रे युग्मेभौमधेर्मज्ञव्ययेजी पृथुयशो गुणी
भूपतिः १४२
चापेचन्द्रेपो मृगमुखेभीमे तुङ्गगज्ञाच्छान्पतरेले भूपतिः११३
ज्ञेतुझेङ्गे यमारोसुते चन्द्रेज्य सितास्तुर्ये गुपी भूपतिः ३४४ ..
कुंभेमेरे तुङ्गेभीमे स्वक्षेक मीनेने न्वटे भपति ४५"
रीका--वगोतमांशमे (जिसराशी का लग्नहीं उसीराशी के नवांश
मे ) गया हुवा लग्न, चंद्र के पिना मन्य चारं पांचग्रहों से दृष्ट हो तो
भूपति होने १३४
योत्तमांशमे गयाहुया चंद्रमा चार पांच ग्रहो से दृष्ट हो तो रामा,
मुभराशीका शनि मेषकारवि वृषभका चंद्रमा इन तीनों में से को-
इभीएकलग्न मे गया हो भौर मिथुनमे वध, सिंहमेगुरु भार वृश्चिक
राशि मे मंगल हो तो राजा होवे १३६
भाव बुध सूर्य भौर भानि चराशीमे गयाहया शनि किंचा,
चंद्रमा लग्नमे हो मेपराशी में मंगल तुल मे शुक्रप कराशी में एक
गयाहो तोराना हो १३७
लग्नमे शनि मकरराशीमे मंगल भौर धन राशी मे चंद्र व रेवि गयको
तो रामा होवे १८
मपाराशी के ठग्न मे चंद्रमंगळ गये हो भौर धन राशीका रवि हो
तोरामा होवे १३.
सातमे भायमे चंद्र शनि लग्नमें सूर्य भार धनराशीभ गुरु गयाही को
माहोरे ४०
उसराशी (२) मे गयावा चंद्रमा लानमे गया और सिंघाशी
मर्प, दशमे दानि, सातमें भावमे गुर, गया होताराना र १४१;
."
.

राजाहोवे १४३ मातहतव. मकरराशीके लग्नमे शनि, तीसरे भावमे चंद्रमा मिथुनराशी मे मंगल नवमे बुध भौर बारम भावमे गुरु गपाहो तो वहाकोतिषाला गुगवान् राना होवे १४२ धन राशीमे चंद गुरुष मकरशी के पूर्वाद में मंगळ गया हो भार भपनी उच्च राशी में गया हुवा बुध किंवा शुक्र लग्नमे गया हो तो उचराशी (६) मे गयाहुवायुध लग्नमेगयाहो शनिमंगल पंचम भागमे ( मकर राशी मे । भौर चंद्र गुरुज शुक्रये तीनो चतुर्थ भावमे गयेहोतो गुणवान् राजाहो १४४ कुंराशी का शनि मकरराशी १० फा मंगल सिंहराशी ५कारवि हो भौर मीनराशी के लग्नमे चंद्रमा गयाहोतो राजा होवे १४५ तुझे जीवे मपेभौमे तदन्यवरेडे भूपतिः ११६ मपे चन्द्राच्छशेष लाभगेषु तु जीवे भूपतिः १४७ मृगजे चंद्रास्पिा भोमेजे ज्ञेयुग्मे तुळेशके पृथुप- शो भूपतिः १४० शेतुडेले खशुके च रोज्यौयूने मन्दारों सुते भूपतिः १९४ आमकारकाईने तुर्ये सुते शुभे भूपतिः १५० आत्मकारकादिपु सोत्यगौ पापो भूपतिः १५१ कङ्गे तुर्कजारौ ख ज्ञेज्यार्कशुका भूपतिः १५२ कुंभेशु के चतुर्प स्त्रोच्चमेष भूपतिः १५३ बलाढ्याः स्वोच्चगाः पूर्वप पूर्वदलेनृपोन्यथापरदले१५४ पूर्णेन्दु युक्तौ मन्दारो भाग्ये भूपतिः १५५ टीका--उमराशीमे गुरुभौर मेपराशिमे मंगल गयाहो भौर इनदोनो मे से भेक लानमे गयाहोतो राजावेगा १४६ मेष राशी का रवि दशम चंद शुक्र वध थे तीनो लाभ भावमें भार भपनी उच्चराशी मे गया हुआ गुरु लग्नमेगपाहोतोरामा होवेगा

भाषाटीभरादित.
मकर राशी लग्नमे मनि, चंद्र भौर रविये दोनो मानी मानी
सराशी में(४मचंद्र ५भेररिरामेराशिममंगल मियुनराशीम पर
भौर तलराशी मे शुरु गया होतोय? या मार कातिवासा रामा हो
देगा १४८
लग्नमे भपनी उच्चाराशी (६) में गपासादान माग्ने शुभ
सप्तमभाष चंद्रय गुरु भोर पंचमभावभे शनि मंगळ गये होतो तर
होगा १४९
भारनकारक ग्रासे दूसरे चोये भौर पांच में भारमें शुभनागपे ।
सोरामा होगा १५०
भारमकारक ग्रहते छठे भौर तीसरे भाषमे पापमा गये होतो राजा
होये १११
फराशीका लग्नहो चतर्थमाय मे शनि मंगसो भार दशम भारमै
बुध गुरु सबक ये चारो ग्रहगये होतोरामारे १५२
कंभराशिकेल नभे शुक गया हो और कोई भी चार ग्रह भनि ह
राशिने गये होतो रानाहोरे १५३
लग्न से छठे भाव पर्यंत पूर्वपदा मे भानि उच्चराशि में गबहुवे
बलरान् ग्रहगये होतो भायु के दरमेराना होगा भौर सप्तम
भारसे ला पर्यंत के परपटक मे यदि चराशी में गोवज्ञवानमा
गये होतो भायु के उत्तरार्दने राजावेगा १५४
शनि भौर मंगल ये दानो पूर्णचंदते युक्त होकर भाग्यभाव (नएम)
भेगमे हो तोराना होगा १५५
लग्नपसौम्या उपचये राजा १५६
राव्हारचंद्राः पञ्चमे राजा १५०
उदयेचरे भाग्यपेसिंहासने केंद्रे राजा ५८
खेस्थिराङ्गेशेकेंद्रेजीरे राजा १५९
भाग्येश रोशे सुखे पुरे राजा १६.
टीका-टग्नेश भौर शुभप्रद उपचप
३१ स्थानमे गये होती
रामा होरे १५

मातकष.
राहु मंगल भौर चंद्रमा ये तीनो पंचम भावमे गये होतो रामाहोपे१५५
चाशि ११४७१० का लाहो भौर सिंहासनांश मे गया हुवा
भाग्य केंद्रस्यानमें गयाहोतो रामा होये १५८
स्पिरराशी २।५।८।११ के लग्नका स्वामि दशम भाषमे गयाहो भौर
गुरु केंद्रमे होतो राजा होवे १५९
भाग्येश के नाश का स्वामि सुख मेवा पंचम भावमे गयाहोतोरा
ना होवे १६.
भूपति तथा मंत्रीयोग।
जीवः तुले कजे भूपजोभूपान्यजो मंत्री १६:
सेना राव्हारीपष्ठे भूपजोभूपान्यजो मंत्री १६२
'सोरजीवेरन्धेशुके भपजोभू. १६३
सिंहेकुजे युग्मे राहौ भूपजोभू० १६१
चंदारावले वा दशमे भूपजोभू० १६५
शुभपष्ठरोके केंद्रायकोणे भूपजो भूपान्यजो मंत्री १६६
सुतेशेङ्के धर्मपेसुते भूपजोभू० १६७
कोणाम्बु राम्याडेशा युक्ता भूपजोभू. १६८
चंद्राद्दशमेरो सबळे केन्द्रनवमार्थे भूपजोभू० १६९
'एकोप्युच्चगो मित्रदृष्टो भूपजोभू० १७०
धर्मेशे जीव खशुके पुरेशदृष्टे भूपजोभू० १७१
शुक्रज्योतुयें भूपजोभू. १७२
टीका-तुलराशी का जन्म लग्न हो भौर गुरुकी राशी ९।१२ मे शनि
गपाहतो राजा के यहां जन्मपायाहोतो राजा भौर भन्यके यहाजन्म
पायाहोतो मन्त्री होता १६१
दशम भावमे बुध विभौर छठे भावमे राहु मंगल गये होतोराजाके
पहा जन्म पायाहोतो राजा भौर भन्यक परजन्म पाया हुषा प्रधान
पामंत्री होताद १६२

(०६) भापारीकासहित. " तीसरे भाव मे गुरु गौर भाठमे भाव में शुक्र ग्याहो तोरानाके यहां जन्म पाया होतो राना भौर भन्य के यहांजन्म पायाहो यही होताई १६३ सिंहराशीम मंगल भौर मिथुन राशी में राहगयाहोते। राजाके या मन्म पायाहो तोरानाभौर भन्यके यहां जन्म पाया हो तो ममी होताहै १६४ पहयोग कर्क वा सिंह राशी के लग्नमेजन्म होनेयाळे के बलवानहोता चंदौर मंगल ये दोनो लग्न मे भयश दशम भावमे गयेहोतोराना. के यहा नन्मपापाहोवहराजाभौर भन्यके यहाजन्म पायाहो वो ममी होता है १६५ शुभाठचशमें गयाहुवा रवि ११४११२९५ भार में से किसी भावमें नपाहोतोराजाके यहा मन्मपापाहो तोराजा भोर भपके यहा जन्म पाया तो मंत्री होता है १६६ पंचमेश नवमभाष भार नवमेश पंचमभाषमे गवाहोतो राजाले यर जन्मपायापारामाभौर भन्यपहानन्मपापा शेतो मंत्री होता है । नमय पंचम चतुर्थ दशम भौर लग्न इनपांचो भावोंके स्वामि एकरा शिमे युन होतोराना फेयहा जन्म हुपादोतो रामा भौर भन्य केपहा नन्मपापा तो मंत्री होगा १६८ बदमासे दाम भापमै मोराशी दो उस पा स्रामि मलयान होकर २.१९२भावमें गवाहोतो रागा यहामन्मपायाहोतोगनामा अन्य के यहाजन्मपायाहो तो मंत्री होताई १६९ उचशी गपाहुया एकभीपहभपने मित्रसे दृष्टीतो राना मानन्मपागाहोतीरानारमन्पर्क यहांनन्मपायाहो तो मंत्रीोता. नरमेशगुरु कीराशी १२ मे गपाहो भौर दशमभापमे गपारा कपंचमेश मेहोतो रांना यामम्मा.यादातोरामा य भन्यो हमन्मापादो दो मंत्रीहोताहै १॥ गुरु भार गट पदोनो चतुर्थ भावमंगयेदाता राना से यह मान पि.रोलो रामा भौर भन्पोयाममपापा ता मनी होगद १२ चोन्पों का मानोपान्यजो मंत्री१७३ कन्पायर्या चंद्रजी मजो पापजो १७४ मातवरब. (३७) तुड़े सबटमन्दयुते भूपजोभूपान्यजो मंत्री १७५ शुक्रज्यो तुङगो केन्द्र कोणे भूपजो भूपान्यजो मंत्री १७६ नगार्थाअन्त्येषु सर्वेषु भूपजोभूपान्यजो मंत्री १७७ यूनोन केंद्रकोणे सुखेरो भूपजोभूपान्यजो मंत्री १७८ गुराबुलगे केन्द्र से शुके भपजो भपान्यजो मंत्री १७९ केन्द्रकोणार्थे खशे शुभदृष्टे भूपजोभूपान्यजो मंत्री १८० सशुभे खेशे सुते पुत्रपेचापे भूपजोभूपान्यजो मंत्री १८१ धनेरो पारावते शुभहष्टे चन्द्रात्पुण्यपे देवलोके भूप.१८२ लग्ने के खेशेढे भूपजो भूएन्यजोमंत्री १८३ पुष्पदन्तायझे खभौमे योआये धर्मेचापगे जीवे भू. १८४ स्वाशके तुर्ये धचंद्र भूपजोभुपान्यजो मंत्री १८५ रमेझे तुफै जीवे पुष्पान्तो दशमे लामेज्ञाराच्छाभूप०१८६ दायोदयमाचंद्राफिजीका ज्ञारीधने शुक्राों तुर्थे भूप- जोभूपान्यजो मंत्री १८७ गुरौगापुरादौवालिनि सुतेरा युते भूपजोभूपान्यजोमंत्री1८८ 2.फा-कराशी में चंद्र भौर गुरुगये होतोरानाके यहा जन्मपापाहो राजा भौर भन्यके यहा जन्मपायाहो वह मंत्री होता है १५३ कन्याराशी में चंद्र बुधगये होतो राजाके यहा जन्मपायाहो यह राजा भन्य के यहा जन्मपायाहो पद मंत्री होता है १७४ स्वराशी में गयाहुया रवि बलवान् शनिसे युतहो तो रानाके यहां न्मपायाहोपहरागावभन्यफे यहा नन्मपायाहो वह मंत्री होता है१७५ भपनी रमाशी मे गये हुवे शुक गुरु [ मीनमेनुक्र फर्कमे गुरु गया भोर पे पोनो केन्द्र वा त्रिकोण स्थान मे गये हो तो राजा के यहा न्मपापाहोपहरामावभन्यो यहाजन्मपायाहो वह मंत्री होता १७६ (१०८) भाषारिकासहित. सप्तम धन लग्न भौर व्यय ॥२१॥१३ इन चारो भागो मे सम्भ पाप ग्रह गये हो तो राजाके यहां जन्मपायाहो यह राना म भन्य के यहा जन्मपायाहो पद मंत्री होताहै १७७ सप्तमस्थान के बिना भन्य केंद्रत्रिकोगस्यान (१०९) में, सुमेश गया होतो राजा के यहां जन्मपायादो वह राना भौर भन्यक यहा जन्मपायाहो वह मंत्री होता है १७८ उचराशी में गयावा गुरु केंद्र में भौर शुक दशमभावमें गयाहै। तो राजा के यहां जन्मपायाहो वह राजा भौर भन्यके यहा जन्मपापा वह मंत्री होता है १७९ शुभमहसे देखाभा दशमेश केंद्रत्रिकोण में तया धनभाव में गया हो तो रानाके पहा जेन्मपायाहो या राना भौर भन्यके यह जन्मपायाहो वह मंत्री हाता है १८. शुभग्रह से युत दशमेश पंचमभाव में गयाहो भौर पंचमेश धनराशी में होतो राजाके यहां जन्मपायाहो वह राजा भौर भन्यो यहा जन्मपायाहो वह मंत्री होती है १८९ पाराश्ताशमें गयाहुवा धनेश शुभयहसे दृष्ट हो भौर चंद्रमा से नवमे स्थानका स्वामि देव कांश में गयाहो तो राजाके यहां जन्मपाया: पह राजा भौर भन्यके यहा जन्मपायाहो यह मंत्री होतो है १८२ लग्नेश नवमें भाव में हो भौर दशमेश लग्नमें गया होतो राजाके यहा. जन्मायाहो वह राजा भौर भन्यके यहा . जन्मपायाहो वह मंत्री होतो है १८३ रवि चंद्र लग्नमे हो, दशमें मंगल, ग्यारमें भावमे शनि, नामे भा. धर्मे धनराशीमें गयावा गुरु गयाहो तो राजाके यहा जन्मपायाहो कर रामा भोर भन्यके यहा जन्मपायाहो यह मंत्री होताहै १८४ ये योग मेष राशीके लग्न मे होवेगा। भपनी स्वराशी २ मे गयाहवा शुक्र चतुर्षभावने और चंद्रमा नामे भावमे गयाहीतोरानाके यहाजन्मपायाहो पहरामा भौर भन्य यहा नन्मपापाहो यह मंत्री होताई ५ यह योग फर्फ पा कुंभ छग्नमे होगा। लग्नमे शनि, चतुर्थभावमे गुह, दशम भावों सूर्य व चंद्रमा और (भारमें युध मंगल शुभ ये तीनोग्रह गये हो तोराना यार : . र

नातकतरख.
मन्मयाहो वह राजा भोर भपके यहा जन्मपायाहो यह मंत्री
होताई १८६
दशमे चंद्रमा ग्यारमेशनि लग्नमेगुरु धनबुधमंगल और चतु-
प्रभावी रवि शुक गय हो तो रामाके यहां जमायाहो वह राजा
भौर भन्यके यहा नन्मपायाहो वह मंत्री होताद १८०
गोपुरादि शुभांश में गुरु गयाहो भौर बलवार होकर पंचमेशसे युत
हो तो राजा यहां जन्मपाया हो तो राजाहोताह भौर भन्यके यहां
जन्महुवाहो वह मंत्री होता है १८८
राजयोगभंग योगा।
नापखशानीचगा व्यर्थाराजयोगाः १८९
मद्रायांव्यतीपाद कांतिपाते जन्मनिव्या राजयोगाः१९.
परमनीचांशे चंद्रे व्यर्थाराजयोगाः १९१
उच्चगाः खटानीचांशगाव्याराजयोगाः १९२
उच्च नीचांशे गजपुत्रोपि नीचतांगच्छति १९३
परमनीचगे व्यर्थाराजयोगाः १९४
नीचगेशुके सिंहांश वा स्वारो पराजयोगाः १९५
राज्यदानीचारात्यस्तगाव्याराजयोगाः १९६
उत्पातदिने जन्मनि व्यराजयोगाः १९७
दशमेनीचखगे व्यर्थाराजयोगाः १९८
चतुर्ष खगेपु शत्रुभगेषु वा नीचांगभगेषु व्यर्थाराजयोगाः९९
महमात्रादृष्टश्चंद्रो वा बानो व्यर्थाराजयोगाः २००
सिंहारो पापयुते क्षीणेन्दौ सौम्यादृष्टे व्यर्थाराजयोगाः२.५
पुरमनीचांरो जीवे वा शुक्र व्याराजयोगाः २.२.
पापानीचगारसर्वे कण्टकगाः सौम्यासिकगाव्यराजयोगाः२०३
सौम्पाअस्तगा केन्द्रहीना उग्नेराहोचन्द्रदृष्टे - पापा:पर
4

(३१) भापाटीपासहित. ध्यायगाव्यर्थागजयोगाः २०४ इति दशम विवेकः । टीका नरमेश दशमेश भौर लाभेश ये तीनो भपनी नीवराशी में गये होतो उपरोक गमयोग व्यर्थ होगा भर्यात यधपि रानयोग उत्तम पनाहोगा तयापि रामयोगका भंगयोग वलपार'भानायगा वो यह उपरोक सर्व राजयोग निष्फल होनागा भतएव उभययोगों के पलायनका विचार करके राजयोगका फलाफल कहना १८९ भद्रामें व्यतीगतयोगमें क्रांतियात (महापात ) दोष में जन्म हो नेसे राज योग व्यप दोषणा १९० परमनीचा में (अधिक राशीके ३ भंशका)चंद्रमा होतो रामयोग व्यर्थ होगा १५१ चराशीमें गये हुझे मह यदि नीचराशीक नवांशमैं गौहोती रान योग व्यर्थ होवेगा १९२ उच्चराशीमे गयावासूर्य नीचराशीके नवांशमें गयाहोतो रागा काभीपुत्रहोतो नीचताको प्राप्त होगा भर्थात् यह राज्यच्युत होजावेगा १९३ परमनीच राशी में ( तुलराशीके १ भंशमें ) रवि गाहो नो राजयो- गव्यर्थ होवेगा १९४ नीवराशा (६ राशी में) गया या शुक्र सिंहराशीके भपका - राशी ॥२ के नवांशमे गया होतो राजयोग व्यर्थ होवेगा १९५. राजयोग फरनेवाले ग्रह यदि नीच, शत्रु राशी में गयेहो किंवा भ- स्तंगतहो तो राजयोग व्यर्थ होगा १९६ उत्पातके दिन भर्धात् जिसदिन भूकंप विद्युत्पात गंधर्वनगरदर्शन दिग्दाह परिवपादिदिव्यभौमभांतरिक्षके सातहो उसदिन यदि जन्म होतो राजयोग व्यर्थ होगा १९७ दशमभावमे नीचराशीका ग्रहगया होतीरामयोग व्यर्य होगा ११८ फोईभी चारग्रह भपने शत्रु ग्रहकी राशीमे गये हो भषया चारमा.. नीचराशी के नवाशमें गये हों तो राजयोग व्यर्थ होगांधेगां' १९९ चंद्रमा भयवा लग्न किसीभी ग्रहसे दए न हो तो रामयोग व्यर्थ । होगा.२०० .

मातफतश्य. - सिंहराशीके नवांशमें गपाहुवारवि पापग्रहसे युत हो भौर क्षीण चंदमा किसी शुभयहसे दृष्ट नहो तो राजयोग व्यर्थ होयगा २०१ मक भपका शुक्र भपने परमनीचराशीके भंश ( गुरु मफरक ५ शमें किंवा शुभ कन्याक २७ भंश मे) गयादोतो राजयोग व्यर्थ हो- गा२०२ नीचराशीमें गये हुये सर्व पापण्ह केंद्र में गये हो भौर सर्व शुभप्रद किस्थान १८१२ में गये होतो राजयोग व्यर्थ होगा २०३ शुभण्ह भस्तंगत होवे भौर फेंद्रमें नहीं गयेहो चंद्रसेदृष्टानु ल- निम हो सर्वपापग्रह ६३१ मे भावमें स्थितहोतो सर्व राजयोग इत्यादि विचारों में सिंपाय भीरको मृत्यु, नौकीमाता (सासु ) मा- हिक, मानस्थान युटने पुत्रकारोग शठ, दादाके मित्र, ग्रह, चतु. मदादि विषयोका विचारभी इसी दशमभायमें करना- इति दशम विषकस्य टीका समाप्ता ध्यहोरेगा २०४ अकादशदिवेकः बहु लाभयोग। डामेशुभारंपायनोलाभोन्यथा न्यापतो मिश्राउभयथा : लाभेशुभहष्ट्याधिश्ये बहुलाभः २ लाभपेद्रकोणे बहुलाभः ३ लाभपे शुभ संबंधे बहुाभः ४ टीका-लाम (ग्यारमें ) भावमे शुभग्रहगये हो तो न्यायमार्ग से ध. नका लाभ होवेगा । भौर पापग्रह लाभ भाव गपे होतो भन्यायमा- से धनका समावेगा। तथा शुभ व पापद मिप्रग्रह) लाभ भावमें गपे होतो न्याय भौर भन्याय दोनो से भाव मित्रमार्ग से धनका लाभ होगा। काभभावपरशुभमहोमिभधिक रष्टि होतोधनकालाभबहुत होवेगार . (१२) भावारीकासहित. लाभेश केंद्रकिया त्रिकोणस्थान (१०९।५) में गया हो तो धनका पदुन लाम हविगा। लाभेश शमग्रहसे संबंध (संबंधचारप्रकारका संज्ञातायकसुत्रा ६४ में कहा है) करता होतोधनका लाभ बहुत होगा। याहनयानयोग चंद्रादयने शुक्रयानवान् ५ चंद्रात्सिवे सोत्थायेयानवान् ६ सुखेशेलाभे गुरुदृष्टे बहुयानवान् ७ गुरुदृष्टसुखेशेन सुखेदृष्टे यानवान् ८ जीवाच्छौ सुखेश युतो केद्रकोणायगी यानन्यूनाथः । इज्याच्छो धर्मपयतो भाग्ये वा तुर्ये यानव्यूहनायः ३० धनपयुतेन्त्येशे तुझे भाग्यदृष्ठे यानव्यूहनाथः " टीका-चंद्रमासे सप्तमस्थान में शुक्र गयाहो तो गाड़ी घोड़ा मोटर साइकल भादि वाहनवाला होवे ५ चंद्रमासे शुक्र तीसरे किंवा ग्यार में भावमें गयाहो तो पानिका मालिक होवे भर्यात पाहन भपने घरू रखने वाला होष ६ गुरुसे देखाहुभा मन्त्र भविश लाभभवामें गयाहो तो बहुत बाहनो पाला होष ७ गुरुसे देखे हुवे मुस्खेशसे सुनमाय संदृष्ट होतो शाहनवाला होरे ८ गुरु व शुक्र से युक्त होकर सोश केंद्रमिकोण भयका लाभ भाव में गपाहो तो वाहनोके समूह [ झुंड ] का मालिक होघे भर्यात घात पाहनों वाला होवे. गुरु प शुक्र नरमेशसे युक्त होफर भाग्य ( नयम) भाष मे किंवा मुख भावमे गयेहो तो भनेक प इनोस मालिक होवे १०. भपनी स्वराशी में गयाभा व्ययेश धनेशसे युतहोकर मार भावको देनता होतो बहुत यादनारका मालिक होरे ।। निनके पाइनन्मानाय योग होता है उनके घरमे बहुत याहन हापि . . . .

जानकनत
हागाडी मोटर भादि होवेगे किंवा इन वाहनोका धंधा करने वाला
रगा ट्रामवे भयया रेलवे कंपनी के भागीदार वा निजके वाहन के
का व्यापार करनेवाले लोगोकभीपही योगबलवान हुवे नजरभायेगे।
वाहन सुखयोग।
धर्मायखेशास्तुर्ये वाहनमुखम् १२
सेउमगरसेटे धांगशष्टे वाहन सुखम् १३
सिंहासनग्युगो लग्नेशदृष्टो वाहनसुखम् १४
सुसेरो सबले शुभदृष्टयुते वाहनसुग्नम् १५
सुसेरोझे सशुक्रे पाहनसुखम् १६
सुसेरो जीवयुवे वाहनसुखम् १७
चंदेज्यशुकास्तुपयुता अढ़े पाहनसुखम् १८
धर्मपयुतेम्बुपे सबले जीयदृष्ट्युवे वाहनसुम्पम् १९
भाग्यशाल्लाभेडेशे सुसेरोधर्मे वाहनसुखम् २०
सुखपे केंद्र वदीरोडे पाहनसुखम् २१
से चग्नेशे खेशेने पाहनसुखम् २२
पने कौशेष सुगगे कस्मिभिग्रहे वादनमुसं २३
उखेशे ऐरावते गजवाहनसुख २४
रखेशे केन्द्रेवेरोपिकेवा लाभपेगोपुरे गजवाहनसुसं २५
इत्येकादशमविवेकः "
-जयमेश लामेश भोर दशमे ये तीनोद चतुर्थ भारमे गये.
। पानका पुन दोषगा १२
राशिम गया दामभावने गमादो भौर र भाग्पेसर
इन दोनों हहोतो वाहनका मुनरोरेगा १३
भोर समेत पेरोनो सिंहासनांशमेगो भार सनेश से
नोमानमा मुसरोरे १४

(३१४) भाषाटीकासहित. सुखेशवजवानहोकर शुभाइसेयुत भार दृष्टहोतो याहनकासुखदौवे१५ शुक्रसे युतहोकर सुखेश लग्नमे गयाहो तो वाहनका मुखहोगा १६ गुरुसे यत होकर मुलेश लग्नमे गयाहोतो वाइनका गुसहोवेगा १७ चंद्र गुरु शुक्र भौर चतुर्थभावका स्वामी ये चारोग्रह लग्नमे गयेही तो वाहनका सुनहोगा १८ चलवान सुखश भाग्येश से याहोकर गुरुसे युत दृष्ट होतो वाहन का सुखहोवेगा १९ भाग्येशसे लाभभावमे लग्नेश गयाहो भौर मुनेश भाग्यभावमे गया हो तो वादनका सुखहोवेगा २० सस्नेश केंद्रस्थानमें जिस राशिमे गयाहो उसराशी का स्वामी लग्नमें , गपाहोतो वाहनका सुखहोगा २१ लग्नेशदशमे नौ दशमेश लामे गयाहोवो वाइनका सुखहोगा। लममें धनेश व धनमे दशमेश गपाहो भौर कोईभी एक मह उच्च राशीमे होतो वाहनका सुनहोवेगा २३ . सुखेश एरावतांश मे गयाहोतो गजवाहन का सुखहोयेगा २१ मुनेश केंदमेहो वैशेषिकांशमें गयाहो भौर लाभश गोपुरांशमे गया। तो गन (हाथी) की सवारी का सुख मिलेगा २५ जिनके निजके घर की सवारी नहोतेभी गादी घोड़ा मोटर बग्घी हाथी भादि सवारियो बैठके फिरनेका वा उनपर अधिकार रखनेका भवसर मिलतारहता है उनकी जन्मकुडलीमे वाहनसुख का योग बलवान देखनेमे भावेगा। इत्यादि विचारोफे सिवाय भाईफेभाईकीत्री, भाई शाला शाली भाईका भाग्य, माताकी मृत्यु, मित्रको मृत्य, फाकीस्रो, पुत्रके पुत्राची शालेकी श्री, घी कि विद्या, पांडिये ( घटनेके नीचेकी पांडलियो फा स्थान ) भौर दादाकी विद्या बुद्धि भादि यातोका विचार भी लाभभायसे करना। इत्येकादशम विवेफस्पटीमा समाप्ताः ।

मातपतव.
अथ द्वादशमविवेकः।
हानि योग।
पटेष्टमेचंद्रानेमन्दे सर्पहानिः १
व्ययेपापहष्टयाधिक्ये धनहानिः पदेपदे २
टीका-उठे किंवा भाठमे भावमे चंदमागया हो भौर सप्तम भापमें
शनिहो तो सर्वस्वकी हानि होवेगा।
बारमे भावपरपापग्रहों कि भधिक दृष्टिदो तो पदपद पर धनकी
हानी रोती रहेगा भर्यात कोई भी काम लाभके लिये करेगा उसमे
वारंवार हानि होती जावेगा २
स्यागी योग।
मीनाशे त्यागी ३
. टीका-कारकांश लग्नमे मीनराशी हो तो त्यागी पुरुष होवेगा३
दभाद्धर्म परिगह योग।
शुभेड़े धर्मपापाशे वा पापपष्ठयंशे दम्भाधर्मपरिमहा ४
टीका-नवमभावमे शुभग्रह गया हो भौर धर्मेशपापयह नवांश मे
हो अथवा नवमे शुभग्रह गयाहो भौर नवमेश पाषष्ठवंशमे होतो कपट
से धर्माचरण करने वाला होवेगा ५४
दानशीळयोग।
धर्मपे सोचे शभदृष्टे दानशीलः ५
": धर्मे शुभदृष्टयुते दानशीलः ६
धर्मपे पाराववादोगुरुदृष्टे लंग्नपेभृगुदृष्टे दानशीलः ।
लग्नेधर्मपदृष्टे लग्नपे केंद्रे महादानशीलः ८
दानेशे सिंहासने साङ्गप दृष्टे माहादानशीलः ९
दानपेग्युगे खपेकेन्द्र व्यपेशे गुरुदृष्टे महादानशीलः १०
खोच्चगेज्ञे धर्मपदृष्टे लाभे केंद्र महादान शीलः ११
टीका-नरमेश भपनी उच्चराशी मे गया हो भौर का शुभग्रह सेटर

(३६) भाषाटीकासक्षित. . हो तो दानकरने वाला ( दानशील ) होये ५ नवम भाव शुभग्रहसे युत भार पदोतो दानशीलहोवे ६ पारावतदिशुमांशमे ग्याहुगा नवमेश गुरुसे दृष्टदो भौर लग्नेश शुक्र से दृष्ट होतो दानशील होवे ७ धनेशसे लग्नदृष्टही भार लग्नेश केंद्र स्थान में गयाहोतो महादान शील (बडादान देनेवाला) होते ८ नवमेश सिंहासनांश में गयाहो भौर नह लग्नेश व दशमेश से दृष्ट हो तो वहादान शील होये ९ नवमेश सुखमे व दशमेश केंद्र मे गया हो भौर व्ययेशकों गुरुं देन- ताहो तो महादानशील होवे १० भपनी उच्चगशी में गयाहुवा बुध नवमेश से दृष्ट होकर लाभमे या मेंद्रमे गयाहोतो महादान शीलहोये ११ दनमाप्ति योग। सबलेट्वपलामे धर्म कर्मपदृष्टे दानप्रातिः १२ सुतपेड़े धर्मकर्मपयुते लग्नपदृष्टे दानपातिः १३.. धर्मपेखपदृष्टे केंद्रकोणे परमोच्चशिवा दानप्राप्तिः १४. टीका परवान् लग्मेश लाभभावमेगयाहो भौर नवमेश व दशमः इनदोनो से दृष्टहोतो दानकी प्राप्ति होगा १९ नवमेश व दशमेशसे युतहो कर पंचमेश नवमे भावमे गयाहो भी सग्नश से दृष्ट होतो दानकीप्राप्ति होदेगा १३ दशमेश से दृष्टहोकर नवमेश केंद्र किंवा त्रिकोण मे गयाही भया नवमेश अपने परमोचाश में न्याहोतो दानकी प्राप्ति होवेमा १४ धर्मेटसद्धि योग । धर्मेशे सशुभे शुभांश धर्म दृढ़धुद्धिः१५ धर्मपे बैशेषिके धर्मे दृट्युद्धिः १६ धर्मपे शुभषष्ठयो धर्मे दृढ़युधिः १७ टीका-नवमेश शुभ ग्रहसेयुत होकर शुभग्रह के नवांशमें गयाहो तो धर्म मे स्टबुदि वालादोये १५ .

जातफतव.
धर्मेश वैशेषिकांशमे गयाहोतो धर्ममे दृट्युद्धि वाला होवे १६
नमेश शुभषष्ठवंश में मयाहोतो धर्म मे दृढ विश्वास पाला होवे १७
भन्नदाता योग।
शुक्रेज्योधने धनशे वैशेपिके न्नदाता १८
सबलेधन केंद्रोपचये बलिशुभैर्दृष्टेऽन्नदाता १९
टीका-शुक्रव गुरु धनभावमे गयेहो भौर धनेश वैशेषिकांशमे होतो
भत्रदान करनेवाला होताद १८
चलवान धनेश केंद्रभयया उपचय ।।६।१०।११ स्थानमे गयाहो और
बलापान शुभग्रहो से दृष्टहोतो अन्नदाता होताहै १९
सदऽसन्द्यययोग।
व्ययेशुभेसव्ययोऽशुभेऽ सब्धयो मिश्रमिश्रः २०
व्यये रवि राहुशुक्र योगे राजमूलोव्ययः २१
जीवन्त्ये करव्याजेन व्ययः २२
क्षीणन्दु सूर्यो व्यये राजद्राव्यं हरेत् २३
अन्त्ये मंदारो भ्रातृद्वारा व्ययः २४
टोका-पारमे भावमेशुभयद गयेहोतो सन्मार्गमे धनका खर्चहोवेगा पाप
ग्रह गये होतो भसन्मार्ग मे भौर शुभपाप दोनो [ मिश्र] अह गयेहोतो
मिश्र मार्ग[भच्छे और बुरे दोनो मार्ग] मे धनका चर्स होवेगा २०
रवि राहु भौर शुक्र इन तीनोका योग वारमे भावमे होवो राज्यके
कार्य संबंधमेधनका खर्च होवेगा २१
वारमै भावमे गुरुगयाहोतो कर[महसूल ] के वाहने से धनका खर्च
क्षिगचंद्रमौर रविपदोनोचारमेभावमे गयेहोतो रानाधनछीनलेगा२३
घारमे भाव में शान भौर मंगल ये दोनो गये होतो भाइके द्वाराधनका
धन संचय कर्तायोगा
व्यये शुभे धनसंचय संस्था २५
.
होगा २२
खर्चदोषेगा २४

. (३१८) भाषाटिकासहित. रीका-पारमे भाषमे शुभए गयेहोतो धनका संचय होता रदेगा २५ मग ग्रस्त पाग। धनेपापे व्ययेने शे सेशलाभपयुत दृष्टे ऋणग्रस्तः २६ खपापे धनेशे मूढे धनरंधे ऋणपातः २० नीचेर्थशे कूरपष्टयंरो तथा लाभेशे ऋणप्रस्तः २८ सपाप लग्नपत्रिकेश युतदृष्ट ऋणग्रस्तः २९ पुत्रपेङ्गे शुभादृष्टे ऋणग्रस्तः ३० लाभांशेरो शुभयुते क्रूग्पष्टयंशे ऋणग्रस्तः ३' लग्नपे मूढारिनीचत्रिके मारकेशयुते भाग्यपे शुभैरदृष्टे नरेशोपि मणग्रस्तः ३२ टीका-पापादधन भाव में व लग्नेश बारमेभावमें गपाहो भौर दशमेश लाभेशसे युतदृष्टहो तो ऋगग्रस्त होवेगा २६ पापग्रहसे युत धनेश भस्तंगत होकर धनभावमे किंवा भाठमें भावमे गयाहो तो ऋणगस्त [फर्ज से पीडित ] होवेगा २७ नीचराशीमें गयाहुया धनेश फरषप्ठयंशमे गयाहो भौर लाभेशभी नीचराशीमे स्थितहोकर क्रूरपष्ठवंशमे स्थितहो तो ऋणगस्त होगा२८ पापग्रहसे युतलग्नेश छठे भाठमे किंवा वारमें भावस्वामि से युत भधा हप्ट होतोगग्रस्त शेवगा २९ पंचमेश लग्नमे गयाहो भऔर यह शुभग्रहों से दृष्टनहो तो ऋणग्रस्त होवेगा३. लाभेशके नवांशका स्वामि शुभग्रहसे युतहो भौर फरषष्ठशने गयाहो तो ऋणपस्त होवे ३१ लग्नेश भस्तका वा भपनी शत्रु किंवा नीचराशीमे स्थितहोकर६८०१२ मे भावमे गयाहो भौर भाग्येश [ नवमेश] मारकेश (धनेश मा सप्त मेशसे ) युतहो भौर वह शुभग्रहोसे दृष्ट नहो तो यदि राजा बाराना, के समान मनुष्य हो तथापि ऋणग्रस्त होगा भयात् ये योग राजा होतो पहभी भाषणग्रस्त हुये विनारहता नहीं तो साधारण मनुष्य की क्या क्या है।

जातकतत्व. ऋणदाता योग। पनायेरायोस्यशेशस्यांशशोदेशेपिकांश केंद्रकोणे ऋणदाता३३ लग्नेशांशेशो पृदंशादो जीवदृष्ट ऋणदाता ३४ टीका-धन भौर लाभ इन दोनों भावोंके स्वामियोंके नेप्काणके स्था मिके नवांशके स्वामि यदि वैशेषिकांश में स्थितहोकर केंद्र किंवा वियोगस्थानमें गये हो तो लोगोंको उधाररुपये व्यामपर देने वाला रिजा देने वाला) होता है ३३ जग्नेशके नवांशका स्वामि मृदुसंजयादि शुभ षष्ठवंशमें गयाहो भौर गुरु उसको देखता होतो ऋणदेनेवाला (करजा देनेवाला) होताहै ३४ बंधन योग। व्ययत्रिकोणार्थगेषु पापेषु बन्धनम् ३५ स्वान्त्ययोः सुवाकयोः पठान्त्ययोः सोत्याययोश्चतुर्थदश मयोर्वाग्रहसाम्ये पंधनम् ३६ वृपाजहयो दये पापायल्याइसुवगारज्जबंधनं ३७ वृश्चिकोदये यन्त्याड सुतगाः पापाः भूगहे पंधनं ३८ युग्मतलाजकन्योदये हपत्याइपुत्रगाः पापानिगढ़पंधनं ३९ झपकर्कमृगोदये इयन्त्याङ्क सुवगा पापा दुर्गप्रवेशो नि- गड़रहितः ४० लग्नारीशी समन्दी केन्द्रकोणे बंधनं ४१ टीका-भारमें दूसरे नंबमें भौर पांचमे इनचारो भायोमे पापग्रह गये होना बंधन होगा३: धन में भार बारमें, पानवम व पांच में, किंवा छठे व पारमे, भपया तीसरेप ग्यारमे, पा चोपेष दशमे, भाषमे समान गाद भयो मेक पनमें गपाहो तो एक ध्यय मेभी या दो महयन मेगपे रो तो दोहीम्पय मेगप हो ऐसे नितने एक भाष में उसनेही दूसरे भारमे रहगये होतो अपनहोरेगा।

(३२०) भापाटीकासहित. इससूबमें बंधनकेपाच योग कहे है इनमें से एकभी योगवनने से बंधन योग होता है किंतु जितने भधिकयोग होंगेउतनाहियोग अधिक बलवान समझा जावेगा ३६ वृषभ मेप या धनराशीका लग्नहो भौर उसमे दूसरे वारमें भौरनपने पाच में इनचारोही भाव पापगद गये होतो रस्सी से बंधन होगा ३७ वृश्चिकराशिका लग्नहो और २-१२-९-५ इन चारों स्थान में पाप- ग्रहगये होतो गुफा वा जमीन के नीचे के तलघरमे बंधन में रहेगा ३८ मिथुन तुल मेप किंवा कन्याराशी का जन्म लग्नहो भौर २-१२- ९-५ इनवारोभावोमे पाप ग्रहगयेहोतो मंजीर से बंधनहोगा (पावने वेड़ीपड़ेगा) ३९ मीन कर्क किंवा मकर राशी का लग्नहो भौर दूसरे पारमे नवमे पांचमे इनचारो भागोमे पापग्रह गयेहो तो किलमे सादि (साधारण) केदहोगा ४० लग्नेश भौर षष्ठेश ये दोनो शनि से मुक्त होकर केंद्र किंया त्रिकोण स्पानमे गयहोतो बंधन (कैद ) होवेगा ४१ योगानांफलपरिपाकसमयः । योगकर्तपु योधिकबलस्तदीयदशांतर्दशायां परिपाक:४१ इतिद्वादशमविवेकः। टीका-नितने योग कहेगये है उनयोगोके योगकर्तामोमेप्से मो भधिकवळयान् ग्रहहोताई उसमहकी दशा भंदेशा उस योग के पलकी प्राप्ति होवेगा ४२ इसप्रकार योगाकेफल परिपाक का समयजानना। पप भावने सपरोन फलविचारोफे सिवाप भाईकीसान भाईको राज्यमन्त्र मामी माताकाभाग्य मित्रभाईकीम्री पाका ( तिाका भाई मियाभाग्य पुत्रकामृत्य नौकामामाम्री भी माफी माटिकका भाई, दुरीमुमारी, पाय व नेत्रस्यान मुसराफा भाग्य, दादासारोग दाभाटिसर्व पातीका विशेपपिचारभी इसी भापमं करता। इविवादसमाविस्टीका रामाना। १२

,
पुरुषोताई २
नातकतत्व.
(३२१)
अथमिभविवेकः
वन्दिजीवियोग।
अंशेभौमे धातुवादिकौन्तिको वन्हिजीवीच ?
टोका-कारकांश लग्नमे मंगलगयाहो तो धातुउपधातुका कामकरने
वालावा रसायनशास्रज्ञ भालारखनेवाला भयवा शस्रवनानेवाला किंवा
भग्निके संबंध कामकरनेवाले लुहार मुनार भादिके कामकरके टप.
मीविकाकरनेवाला होता है ।
वाग्विद्यादीन योग।
सुतपत्रिके वाग्धीनो विद्याहीनश्च २
सुतेशो ज्ययुतनिक वाग्विद्या प्रपंधहीनः ३
रीका-पंचमेशत्रिकस्यान ६८.१२ मे गयाहोतो वाफ भौर विद्याहीन
पंचमेश, युध भौर गुरुसेयतहोकर प्रिकस्थान ६.०१२ में गयाहोतो
पामविद्या भौर प्रबंधहीन मनुष्यहोता है ३
विरन.योग।
यूनेने भार्यानजीवति याविरक्तः १
एग्नेपापे शुभादृष्टयुते संन्यासीनीनाशोवा ५
टीका-सप्तमेशरग्नमे गयादोतोभाया (स्त्री) मीरेनहीं किंषापिरन
(संन्यासी) रोता है।
घग्नमें गपाषा पापमहशुभप्रद से पुन किंवाहर नहोतो संन्यासी
ये भषया स्मीकानाशदोवे भयान स्त्री जीवित नहीं रहेगा ५
बग्नेशभावेशयोः संबंधफलं ।
टग्नरोझे भाग्यवान् वैप्णा पटुश्च ६
भनेझेन्टेरोभने धनीमानीगणीदानीच ७
सोत्यरोनेन्द्रशे मोत्येपपार्यः कुटमुसदः ८
मुरोगेनोगे सुखक्षमावान् सदसद्धिपनसीपितृभाफिमांभर

(३२४)
भाषाटीकासहित.
भोगनेवासा और विद्याके संबंध से (पटने पढ़ाने से ) जीविका करने
पाला होताहै २४
कारकांश लग्नमे गुरुगयाहोतो मीमांसा शासनाननेवाला मर्मज्ञानी
घेदविद्या जाननेवाला भौर दातापुरुष होताहै २५
नवमेश शुभग्रहसेयुत भार दृष्टहोकर केंद्र किंवा निकोग ९१५ स्थान
मे गयाहोतो धन विद्या भौर भाग्य से युतहोताहै २६
नौचराशीमे गयाहवारविकर ग्रहसे दृष्टहोकर उठे नया माउने भार
मे गपाहोतो राजाके कोपसे पिताका मरण भौर धनकानाश होता. २७
बलवान नरमेश पारातादिशुभांशी गपादोतो मानी गुगीधर्मक
भौर.धनवान पुरुपहोताई,२८
जपध्यान समाधिमान तथा धर्मनिरत योग ।
सेशेडे शेखपले शुकेज्ययुक्स्टे जपध्यान समाधिमान्य
खेशस्पशिशिशेसंबले सेोड़े जपपान समाधिमान।।
अंशादमें शुभदृष्ट्युते धर्मनिरतः सत्यरादी गुरुभक्तमान्य
थातुपापदृष्टयुवे ३०
व्ययेरो यात्रावान्धार्मिकोपनी ३२
टीका-दशमेश नयमे हो भौर नरमेश यसपानहोकर गुरु भारपुर
से.यत किंवा दृष्टदोनो जपल्यान पा समाधि साधन बनेका
वाहे २९
दशमेश के नवांशका स्वामिनिसराशी नाश गाम
शामिलवानदो भार दशमेश नामे भावमगादीवोमासान
धिवालाहोता.
कारकांशलानसे नवम स्थान गुभहसेर भार धर्म
पवादो भौर गुरुभत होना पारस ari ran
गा मयांत यदि कारयांशलग्न नसभा 2
होतो पापभमायादी भौर गाडेको ।
स्पेश मामेभारमे गाली यात्रा (ला)
ARTI पाकि) भोर मnist

नातकतत्व.
(३२३)
इनमेशलग्नमे भौर लग्नेश दशम में गयाहोतो राजा, प्रख्यात गुण
वाला, सुंदररूप भौर सत्कीर्तिवाला होताद १५
स्पेशलाभमेभार लाभेश सामे गयाहोतो सत्कर्म करनेवाला दीर्घायु
राजा भौर विदान होताहै १६
सग्नेश पारमे भौर व्ययेश लग्नमे गयाहोतो सर्वका शत्रु बुद्धिहीन
भौर कृपग मनुष्य होताहै १७
लग्नेशे सोत्येपष्ठे विक्रमी मानीदयावांश्च १८
साम्बुगड़े कामीससीच १९
अन्न्पेशे मानीधनहीनश्च २.
सजीवसोत्यपधीरः शास्त्रविशारदश्च २१
सारेसोत्यपे जडःप्रचण्डःकोपीच २२
सगुठि सोत्थपेहदो जड़ोधीरश्च २३
अंशेपूर्णन्दुशुक्रो भोगीविद्याजीबीच २१
अंरोजी फर्मज्ञानी घेदषिदावाच २५
भाग्यकेंद्रकोणे शुभयुवदृष्टे घनवियाभाग्ययुतः २६
नौपष्टेष्टमे करदृष्टे नृपकोपासितृमरणपिचनाराध२७
सप भाग्यपे पाराववादी मानीगुणी धर्मशीलो धनीच २८
रीमा रम्नेश तीसरे किंचा उठे भाषमे गयाहो तो पराकमी मानी
भार पाशन होताद १८
सागरशमे फिला चतुभारमे गपादोतो फामीभौर मुपी होगा
पनेन पारम भावमे गयासतो मानी भार धनहीन रोतारे २.
तृतीपा गुरसे गुतहोतो धीर[पंपरा भार शामविशारदोबार
नीपत मंगटोपतरोनोमर पार मौरकोपी मनुप्पोताई २२
तीपेश गरिब मुहातोट, मरियमनस भोर पोर पुराण
गारदा हानी पूर्ण पन्द्रमा मौर शुक गयेहोवोर; भोग
पवाद २३

(३२४)
भाषाटीकासहित.
भोगनेवाला और विद्याके संबंध से ( पढ़ने पढ़ाने से ) जीविका करने
घाला होताहै २४
कारकांश लग्नमे गुरुगयाहोतो मीमांसा शान नाननेवाला फर्मज्ञानी
वेदविद्या जाननेवाला भौर दातापुरुष होताहै २५
नवमेश शुभग्रहसेयुत भौर दृष्टहोकर केंद्र किंवा त्रिकोण ९१५ स्यान
मे गयाहोतो धन विद्या भौर भाग्य से युतहोताहै २६
नीचराशीभे गयाहुवारवि कर ग्रहसे दृष्टहोकर उठे तथा भाठमे भाव
मे गाहोतो राजा कोपसे पिताका मरण भौर धनकानाश होता है २५
चलवान नवमेश पारास्तादिशुभांशमै गयादोतो मानी गुणीधर्मशील
भौर धनवान पुरुषहोताहै २८
जपध्यान समाधिमान् तथा धर्मनिरत योग ।
खेशेडशेसबले शुकेज्ययुतदृष्टे जपध्यान समाधिमान्२९
खेशस्यांशेशांशेशेसबले खेशेड जपथ्पान समाधिमान् ३.
अंशादर्मे शुभदृष्टयुते धर्मनिरतः सत्यवादी गुरुभक्तश्चान्य
थातुपापदृष्टयुते ३१
व्ययेशेडे यात्रावान्धार्मिकोधनी ३२
'टीका-दशमेश नयमे हो भौर नवमेश पनपानदोकर शुक्र भौर गुरु
पुत किंवा दृष्टदोतो जपध्यान पा समाधि साधन पररावाठा
होताई २९
दशमेश के नवांशका स्वामिनिसगशीके नांशी गपाहो उसका
स्वामि बलवानहो भार दशमेश नवमे भावमगपाहो तो गध्यान म.
माधियालादोता.
कारफासलग्नसे नयम स्थान शुभप्रद सेयुत भौर इटहोतो धर्मनिरत
.भार गुरुमन होताद पापणासयत हरदातो रसमा पर
चिंगा भर्यात यदि कारकांशलग्नसे नयमभार पाहसे युत
- पापा भत्तत्पबादी भौर गुरुदेषी होगा
च्यपेश नवमे भारमै गयारोली यात्रा (तीर्थयात्रा वादेश तागमन)
बासा धर्म करनपाला (धार्मिक) भार धनवान मन

जातकतरख
9
धनी कृपण तथा प्रतापी योग ।
स्वःन्त्येशे धनी रुपणो बहुपशुमांध ३५
कर्माबेशावन्योन्यभगौ ख्यातःप्रतापीच ३४
टीका-पारमेभावका स्वामी भपनी स्वराशिमें गयाहोतो धनवान
कृपण (कंजूस) भोर नहुत गाय भैस भादि पशुभोवाला होताद ३३
दशमेश भौर लग्नेश परस्पर भन्योन्यराशी मे भर्यात् दशमेशकी
राशी मे लग्नेश भार लग्नेशकी राशीमे दशमेश गयाहोतो प्रख्याति-
वाला भार प्रतापी मनुप्य होताद ३४
कुलन बहुस्त्रीरव योग।
दारे कुजे पहुस्त्रीरतः कुलघ्नश्च २५
अंशादस्ते पतिव्रता विकलाझी स्त्री ३६
पापालग्नान्त्यास्तगा सुत स्त्री नाशकाः ३७
मदे कुटुम्बी बहुवीरवः ३८
धर्मशेन्त्येन्त्येरोथै सोत्ये पापेकुभोजीदुष्कर्मान्यगामी ३१
नीचभांश जीवेजीवारोऽतिदःखी मतदारहीनः १.
टीका-सप्तमभावमें मंगळगयाहो तो बहुतत्रियो से सहसास करने
पाला भोर कला मनुप्य होताहै ३५
पारकांशलग्न से सप्तमभावमें सर्प गयाहो तो पतिव्रतामाहोवेगा
किंतु यह विकलदेह पाळी होवे ३६
लग्न में पारवे भौर सातमे भावमें पापग्रहगये तो पुपका भौर
स्त्रीका नाश करते है ३७
सप्तमभावमें सूर्य गयाोतो यडे फटुम्ब याला भौर पहुनस्रीयोसे
सहवास करनेराला होता है ३८
नरमेश पामें व्ययेशधनभावमें भौर पापग्रह तीसरे भावमें गये
होतो दुशाम भोगनकरनेवाला दुष्टकर्म करनेवासा परस्पीगामी नर
होता है ३९
नीचराशी तपा नीचराशीये नत्रांशमें गुरुगपाहो भौर गुरुको राशी

भागरिकासहित.
के नयांशमे रवि होते। महादावी पुत्र तथा सी हीनमनुष्य होता है.
द्विग्रह योग ।
चन्द्रार्कयोगे यन्त्राश्मका ४१
ज्ञायोगे क्रियापटुकीर्तिमौल्पान्वितः ४२
जीपार्क योगे कुरोन्यकार्य निरवः ४३
शुकार्कयोगेङ्गायुधैर्लम्पस्वः ४४
मंदायोगे धातुनैपुण्यं ४५
चंद्रारयोगे लुब्धकश्चलचितः ४६
चंद्रायोगे प्रियवागर्थस्टुः सौभाग्यकीय॑न्मितः १७
चंद्रपयोगे शत्रुजेता कुलमुख्पश्चपलो पनी ४८
चंद्राच्छयोगे वस्त्रादिक्रियापटुः ४९
चंद्रमंदयोगे परुपास्कपटी ५.
समन्देशे परवञ्चनदलो गुरुवचनातिकामीच ५,
शुक्रज्पयोगे सद्विद्या धनदारगुणयुक्तः ५२.. '
ज्ञाच्छयोगे वाग्मी विद्वान्भूपगणप: ५३
झेंज्ययोग गतिप्रियो नृत्यविन्मल्लः ५४
मन्दारयोगे दुःपनतभापी निन्दितश्च ५५'
यमाच्छयोगेल्पदृष्टिर्लिपिपुस्तचित्रवेत्ता: ५६ ।
शुकारयोगे गोपालकमलदक्षाराङ्गाना गामी ५०
आरेज्ययोग पुराध्यक्षो नृपमामवियोद्विजः ५८
टीका-रपिवंद्रका एकराशी में योगहोतो पन्त्र (फलीके
काकाम भौर परयरको कामकरने वालाहोता है।

। नातकतल . ध रविकायोंगहोतो काम करने में कुशल बुद्धिमान सत्कीर्ति भौर सुनसे युतहोता है ४२ गुरुरविका योगदो तो रस्वभावका भौर दूसरेका कामफरने वाला होता है ४३ शुकरविका योगक्षोतो भपने शरीरफे वलसे भौर शस्त्रादिकसेधन प्राप्त होता ४४ भनिरषिका योग होतो रसायनशानके काममें निपुणता भयवाधात उपधातुभोसे धननेवाले कार्योको करनेमे निपुण होता है ४५ चंद मंगलका योगहोतो कोभी भौर परचित्तवाला होता है (स्थिर विनरहतानही) ४६ चंद्रयुधका योगहोतो प्रियवचन बोलनेयाला द्रव्योपार्जनके काममें पतुर भाग्यवान भोर सत्कीर्तिवालाहोता है ४७ चंद्रगुरुका योगहोतो शत्रुकों नीतनेवाला भपने कुळमें मुख्यपुरुष घपलवुद्धिवाला भोर पहाधनवान होताहै ४८ चंद्रशुका पागहोंतो वनसीपनाचुनना नपाचनाना इत्पादि वसनि- माणके काममें फुशलहोता है ५५ चंद्रशनिका योग होतो कठोरवचन बोलने पाला भौर कपटी स्वभा. घका पुरष होता है ५० शनिबुध का एक राशीमे योग होतो दूसरे को ठगनेमे 'चतुरंभौर गुरुके वचन को उलंघन करनेवाला होताद ५१ शुक्रगुरु का एकराशीमे योगहोतो सद्विद्यान्वित धन,मी, भौर गुण युक्तमनुष्य होताहै ५२'. बुधशुक्र का योगहोतो भन्छा दोसनेवाला (पका) विदार भोर राजाभोके समूहका भधिपति रोताहै ५३. मुधगाका योगहोतो गायनमे प्रीतिरमनेयाला नृत्यकलाको नानने. माला भोर मल [फुस्वीकरनेवाला होताहै ५४ शानिमंगरका योगहोतो दुःखी झूठबोलनेवाला भौर निन्दित मनुष्य होता शनिशुफका योगहोतो भत्सरेटि भात भरष्टि मा भनी , जिस्को कोर्ट साईट मातहे ऐसीदृष्टीवाला होता तिने कामको ।

. (३२८) भाषाटीकासहित. या लीपनेपोतने रंगाईकरने कामको भार चित्र कलाको जाननेवाला होताहै ५६ गुममंगल का योगहोतो गोभोपालनेवाला, मल्ल, चतुर भौर परांग- नागामी मनुष्य होताहै ५६ गुरुमंगल का योगहोतो किसी गाम पाशहरका मालिक वा बडेस्वतंत्र भधिकारवाला राजा और विद्वान् साह्मणहोताहै ५८ परग्रहवासी, मातृपितृपाती, निर्धनी, लोभीयोग । राहकान्यतर युतेपप्ठेरोन्त्ये परग्रहवासी नीचवृत्तिश्च ५९ लग्नेन्त्ये चन्द्रपष्ठेभौमस्ते मातापितृघावी ६० ,' मेपेचन्द्रमन्ददृष्टे निर्धनोलोभी ६१ टीका-पष्ठेशराष्ट्र तथा रपिसे युतहोकर वारमेभावमे गयाहोवो पर येघरमेरहनेराला भौर नायवृत्तिका मनुस्यहोताहै ५९ लग्नमें तया घारमे भावमे रविगयाहो भौर चंद्रमा छठे ध मंग सातमे भावमे गयाहोतो मातापिताका पात [नाश करनेवालाहोवे। मेषराशीमे गयाहुवाचंद्रमाशनिसे होतीनिर्धन भौरलोभीहोताहै। नन्मायसरे पितुर्मातुर्वा मरणयोग । कर्माम्बुपौत्रिकेऽपलौसबलेटपेजन्मावसरेपितुर्मातु मिरणम् टीका-दशमेशभौर मुखेश दोनो निर्वलाहोकर त्रिकस्थान ६८०१२ में गयेहो भौर लग्नेशवलवान होतो नन्मके समय पिताका था माताका मरणहोदेगा ६२ यहयोगहोवे रसके जन्मकालमे मातृपितृ के सद्योमरणयोग भी हुवे होतोभवश्य इस योगका फल मिलेगा। भ्रातृधनक्षेत्रादिलाभ तथा भाग्यशान् तथा मानीयोग । सुखेशांशपेकेन्द्रमित्रदृष्टेवाभीमदृष्टयुतेभ्रातुपनंक्षेत्रंचनामोवि६३ धर्माम्बुपो कर्मगो सर्वार्थवाइनयुतो भाग्यरान् ६४ सेजी इडितज्ञोमानीच ६५ टीका- मुझेश के नवांशका स्वामि केंद्रमे गयाहो में

नातकतत्व.
।
मित्रमहसे दृष्टहो भयवा मंगलसे युत तथा दृष्टहोतो भाईकाधन भौर
जमीन भादि संपत्तिका लाभहोताहै ६३.
नवमेश गौर सुलेश ये दोनो दशमभावमे गयेहोतो सर्व संपत्ति भौर
पाहन सेयुत भाग्यवान मनुष्यहोताई ६४
दशमभावमे गुरु गयाहोतो इसारेपरसे मनकी बात जाननेवाला भोर
मानी । भकारी) मनुष्यहोताहै ६५
कपटेन विषभक्षण कर्तायोग।
धनेशे पापदृष्टे कपटादिनाविप भोजनम् ६६
टीका -धनेश पापग्रहसे दृष्टहोतो कपटादिक से विषखावगा (कोई
जहरखिलादेवेगा) ६६
धैर्यान्वित युदपटु सत्यवादी फटुप्रियादियोग ।
शुभर्तघातृकारके शौर्यधैर्यान्वितः ६७
सोत्थेशांरोश्वरांशेशेस्वादिवर्गे मानीयुद्ध पटुःकलहप्रियः ६८
लग्नेर्थेजीवे मधुरप्रिय मधुरवाक् सत्यवादी ६९
लग्नेश कुमार्कदृष्टे कोधीपसनी कटुप्रियः ७.
कोशगोज्ञाको सेवारतो स्थिरधनी ७१
सोत्थेराहुमन्दो कुनखीदक्षकरेघाती वायुरोगी ७२
सोत्येक या भौमेस्थिभंगो विषभयं वन्हिजं चिन्दम् ७३
सलामृतिगा सबगचिन्हंगुत्यं भगंदरादिरोगीच ७४
सेचंद्र तांगेजी दानीतपस्वी जितेंदिया ७५
ज्ञेन्दजाः केन्द्रव्ययधर्मगा ऐश्वर्यज्ञानहीनः ७६
सर्वेनहानीचारीभागगा उच्चस्थापि सत्कर्महीनोमिक्षाशी७७
टीका-भातृकारकमा [ मंगल ] शुभमहकी राशी गपाहोती शूरता
मुव भौर भयोन्वित होताहै ६७
तृतीयेशक नवांशका स्वामि मिसराशी के नवांशमे गया उसका
.

( भापाटीकासहित. स्वामि स्वउश मित्र राशीके शुभवर्गमे गयाहोतोमानी युद्धकलापबीग भौर कलहप्रिय मनुष्यहोताहै ६८ लग्नमे तयाधनभावमै गुरुगयाहोतो मीठीवस्तुखानेपर प्रेमासनेवाला मधुरवागीसे भाषणकरनेवाला भार सत्यवादी मनुष्यहोताहै ६९ लग्नेश लग्नमे गयाही भौर रवि तया मंगलसे दृष्ठहोतो क्रोधी विपत्ती भोगनेवाला भौर कटुरस [ चरपरावारांपदार्थ ] परप्रेमरखने. यालाहोता ७० युध भौर रवि धनभावमें गयेहो तो सेवाकरनेमे तत्पर रहनेवाला भौर स्पिरधनवाला होता है ७१ तीसरेभाव में राहु भार शनिगयेहोतो नराय नलवाला दक्षिणायमें घात ( चोट पाशमसे घावहोने का भय ). बाळा भौर पायुकेरोगेसे युत होता तीसरे भाव में रविभवरा मंगळगया होतो किसी भी मोट- टेगी तया विषकाभय याभग्निसे मनमानेकाशरीरपर चिन गा५३ पापग्रह भएमभाव में गयहोतो गुप्तस्पानमें किसी मबमका निन होये भौर भगंदरववाशीर भादिरोग घाला. दाम भागमें बदमा भौरे पंचमभायम भयया मग्नमें गुहगयाहोतो दांनी तपस्सी भोर मितेन्द्री होता ७५ मटमें, चंद्रमागारमें मायमे भौर शनि नवौभागमें, गयोको ऐश्वर्ष भोर शानहीन मनुष्य होता ७६ उच्चराशिम गपे हुवेमीसर्वग्रह पदिनीय किंवा शाराशीके नाम शमें गयेहोतो साफमहीन भौर भिक्षामांग पेटभानेपानाहाना टु कंडुपीदा, मंदाग्नि भानहीन पलाशीमादि योग। लग्नेगेर ग्रे शरयुतदृष्टेग्निमापदण्डपीडावित्री०८ भोमेश नेत्रपाणी भुजङ्गादत्तक्षतपापकांग्यु भयम् ७१ चंद्राच्छौंपटेष्टमे वा मन्दाग्ग्युदारोगी ८. फेलिमोत्ये भ्रातृहीनो पनीच ८१ कासादिषपगामामागुमन्दा मापीनं नाति भातफतव. 'राव्हिदसपापारिके उन्मादीकलहशील ८३ अंशेराहो धानुष्कथोरोवा ८४ अशेशुके राजसेवीकामीच ८५ भ्रातृपेसशके कामीकलही ८६ सलयुवदृष्टे कुजेस्ते मूत्रकृच्छ्री क्लीपः ८७ शुभांराहीनौज्ञचंद्रौकेन्द्रे विस्मयालुभ्रमयुक्तः ८८ लाभांकथेशे उद्यमी धनी गुणी ८९ लग्नरोन्त्ये खपापे भौयुतचंद्रे परदेशी भिक्षाशीदुःखी९० जीवाशी पृष्ठान्त्यगो क्लेशभारद्रव्यहीनः १३ टीका लग्नेश भटमभावमें गयाहो भौर करयहोसे युत व दृष्टदो तो मदाग्निरोग, दद्दादकी ] पीडा धुनलकी पीडा भौर सफेद दाग के कुष्टरोगका भय होता है ७८ नेत्रपाणि भरस्पामे गयामा मंगल लग्नमे गयाहोतो सर्पकदारका जखम (सांपकेफाटकादुःख) भार भग्निका तथा जळकाभयहोरेगा चंद्रमौर शुक्र येदोनो छठे भयना भाठमे भाषमे गयेहोतोमंदाग्नी रोगवासा वथा उदरके रोगवालाहोताहै . बेतु भौर चंद्रमा का योग तीसरे भायमे होतो भ्रातृहीन भार धन- थान होता है ८१ उठेमंगल सातमभावमेराष्ट्र भाठमेशनि फ्रमसेगयेहोतो मी जीवित नदीरहे भौर भ्रातृहीनहोवेगा ८२ राहु भौर चंद्रमापापपहसे युतहोकर बारमे भारमें गयहोतोउन्माद (पागलपन) रोगवाला भौर फलदशील [ झगड़ालू होताहै ८३ फारफांशलग्नमेरागपाहतो धनुष्यरमनपालाभयमा चौरहोता है। कारकांशलग्नमेगुरुगयाहौतोरानसैवी ( राममेनोकरी करनेवाला) भौर कामीहोगा ८९. वृतीपेश शुफसे युतदोवो कामी भार फरहकरनेवाला रोताt es भाषाटिकासि.. सप्तमभावो गयाहुवा मंगल पापमहसे युतदृष्टहोतो माहोय. बाला तथा नपुंसकहोताहै ८७ पापग्रहों के नशमे गयेहुये गुपचंद्र पंद्रमें गयेहोतो विस्मयशील, दयालु, भोर भ्रमगुन होता है ८८ धनेश लाभमे भयया नवमभागमै गाहोतो योगी धनशान भोर गुगी होता ८९ लग्नेश पारमेभावमे पापग्रह दशमेभायमे भौर चंद्रमा मंगलसे पुतोफर कोईभीमात्रमे गपाहोतो परदेशमे रहनेवाला भीसमint. साने याला दुखी मनम्यहोता. गुरु भौर धनेश ये दोनो छठे तया पारमे भाषमे गहोती कोश भोगनेपाला मोर दगहीन मनुष्पहोताहे ९१ भधियोग। पंचात्सोम्याः पठादित्रपगाभमूर सचिवपोपलवातम्यात९२ रीका-बदमासे छे मात्रमे भाठमे भाषमे भागको महो मातारतम्यमरसे मेनापनि, मंत्री भौर गमाभांत मामे जम्मानमे शुभग्रह गयनो मेनापति भी मतमतानो गर्भ शुभ मागवानी मंत्री तव भमभाषमे सशुभ होतो जाइनरभधिक होने से बना मौरीनरी निपत योगममाना में मंदमे या भविग पारि जम्ममा सामे wel मारनेम शुभ मानने भाषियोगईलाई RAN पभी सोन पर भगा। HABAधाना हम यता चन्द्रापायी व्यसनुका पने मनुका उभयत्र दुषण- ग्यपा एमः १३ ":/मे भागना में न बारममा म नोकामा that wriमहामना । नातकतत्व. (३३३) सनुफा योग फल। नुफायांराजावत्समो वा धीधनख्यातिमांश्च ९४ -सनुफा योगमेंनन्यहोतो राजा वा राजाके समान भाग्यशाली न धनवान भौर सस्कीर्तिवाला प्रसिद्धपुरुष होता है ९४ भनफा योग फलं। नुफायां प्रभुः शीलवान् ख्यातो निरोगी ९५ -मनुफायोगमे जन्म होतो राजा वा राजाके समान भाग्यवान् Pणसम्पन्न प्रसिद्ध भौर निरोगी पुरुष होता है ९५ दुरुधरायोग फळं। रुधरायां धन वाहनाट्योत्पन्नभोगसुखभुक् ९६ हा-दुधरापोगमें जन्महोतो धन और वाइनके सुझसे युक्त भौर बैंककी प्राप्तिले भनेक सुखभोग भोगनेवाला होता है ९६ केमद्रुमयोग फलं। मदमे मलिन दुःखितनीचनिस्वो नृपजोपि ९७ को-केमद्रुमयोगमे जन्महोतो राजाके यहामन्मपायाहुवा मनुष्य लेनस्वभावका वा मैलारहने वाला दुखी नीचप्रकृतिवाला नीचे भौर निर्धन मनुष्य होता है भर्थात् साधारण मनुष्य के भग यह योग होतो यह दरिदीहुये विना रातानही ४७ मदुमभंग योग-जातकपारिमावलिमा है। नेशाकरेकेंदगते भगोवा जीवेक्षिते भैषदरिद्रयोगः शुभान्वितेवाशुभ ध्यमेंदी नीवेक्षित नैरदरिद्रयहरः३॥ दितिमित्र निजतंगगृहांशकस्थे जीवेलिते यदि दरिद्रतयारितीनः णेतनौशुमपुते विक्तिगनाते जोपैक्षिते हिमकरेंनभवदरिद्रः ३७ साराशरेप्रालेयानुसूतिकालयदावासमा टेवीक्ष्यमाण:परीति पीयध्य राजयोगं मनुष्य सत्कोशाढच ईतिम मंच ५७ भर्यात् निसके मन्म समय मे १) चंद्रमा भपवा शुक्र केंद्रस्थानमे स्थितहो भौर गुरुसेष्ट होतो केममयोगकाभंग ( दरिद्रयोगनही ) करवाई। २) पदमा शुभप्रहसतहो भपका शुभमहोते मध्यमे गापहो

(३२)
भाषाटिकासरित.'
सप्तमभावो गयाहुवा मंगल पापग्रहसे युतदृष्ट
बाला तथा नपुंसकहोताहै ८७
पापग्रहोके नशेयमे गयेहुये युधचंद्र चंद्रमें गये।
दयालु, और भ्रमयुक्त होताद ८८
धनेश काभमे भयवा नवमभाषमे गवाहोतो
गुणी होताहै ८९
लग्नेश पारमेभावमे पापग्रह दशमेभावमे
युतहोकर कोईभीभावमे गयाहोनो परदेशी
स्वानेवाला दुस्खी मनप्यहोताहै ९०
गुरु भौर धनेश ये दोनो छठे तया वार
भोगनेवाला भौर द्रव्यहीन मनुष्यहोताहे १
भधियोग।
चंद्रात्सोम्याः पठादित्रयगान्धमूप समि
टीका-चंद्रमासे छठे सातमे भाठमे
पलकेतारतम्यभेदसे सेनापति, मंत्री
उठेस्थानमे सर्वशुभग्रह गयेहोतो मे
शुभ ग्रहगयेहोतो मंत्री तथैव भष्टर:
होताहै। इनग्रहोके भधिक बलवान
निर्बल योगसमझना १२
जैसे चंद्रसे यह भधियोग कर,
भाठमे भावमेसर्व
फलभी उपरोक्त
भनफा

जातकतत्व.
(३४५)
टीका-इसीप्रकार फलका विचार विवाहसमयमें और प्रश्नसमयम
भीजानना।
इनके सिवाय पंचांगफल महोकाभावफल राजयोगादिकफलका वि-
शेषविचारजानना हो तो स्त्री जातकमे देखना।
इतिश्री गगकर श्रीमन्महादेवकृत जातकतत्वाख्य नातकये
तत्सून श्रीनिवास रचिततलप्रदर्शिनी भाषाटीकायां स्त्रोनाततवं
चतुर्यम ४
अथ दशातत्वारम्भः।
दशाधिचार।
ग्रहोभावराशिग्योगजीविकादिफलं स्वदशांतर्दशयांददाति १
टीका-भावजनित राशिजनित दृष्टिननित योग तथा सम्बंधननित
तथा जीविकादि जितने शुभाशुभ फल ग्रहो के कहेगये है वे सफल
ग्रह भपनि दशा अंतदेशामे देते है।
संपूर्णा दशाफलं
अतिबलस्यपरमोच्चगस्य का दशासंपूर्णाभिधाधनारोग्य
विवर्धिनी २
टीका-मी ग्रह भतिवल्यानहो अथवा परम उन्मराशीमे गयाहोउसकी
दशा संपूर्णानामकीहोतीदेयहदशा धन भारोग्यकोषढ़ानेवाली जानना२
पूर्णादशाफल ।
किंचिद्दलोपेतस्पोच्चगस्प पूर्णाधनका ३
टीका-जोग्रह किंचितलवान दो भार भपनी उच्चराशीमे गयाहो.
उसको दशा पूर्णानाम की होती है वह धनलाभ करने वाली जानना
रिक्ता दशाफल ।
पिपलस्य वा नीचगस्य रिक्ता धनहानिदा ४
टीका-गोमद निलो होक्षिा भपनी नीचराशीमे गयाहो उसकी
दशा रिक्तानाम भी होती यह धनहानी देनेवालागानना
३

ता है।
--
भाषाटीकासहित.
भौर गुरुसे दृष्टहोतो केमद्रुम योग नहीं होता है।
(३) चंद्रमा भधिमित्रराशी का र्फिया भपनी स्वराशीका हों
भयवा भधिमित्र तया भपनी रचराशीके नवांशमे गया
हो और गुठसे दृष्टहोतो केमद्रुम योग नहीं होताहै ।
(४) पूर्णचंद्रमा शुभग्रहसे युवहोकर बुधकी चराशीमे गयाहों
और गुरुसे दृष्टहोतो फेमद्रुम योग नही होताहै।
(५) चंद्रमा सर्वग्रहोसे दृष्टहोतो केमद्रुम योग का भंग कर
इन पांच योगोमे से भेक भी योग जिसके जन्मसमय मे नहीं हो
उसके केमद्रुम योग का फल भवश्यहोवेगा।
एकस्मिन्नप्युचगे समित्रे प्रचुरधनः सिद्धः ९८
सपलेखेशेकेन्द्रकोणयज्ञकूपायवनकीदेवतातिथिपूजकः९९
शुभावकगाराज्यार्थदाः पापाव्यसनधनहानिदाः १०.
सर्वेसौम्यायापारिगा बाल्येसुखी तत्रैवपापावयसोन्त्ये:०१
इति महादेवकत जातकतत्वे प्रकीर्णतत्वं तृतीयम् ३ ।
टीका-यदि कभी ग्रह भपनि उच्चराशीमे गपाझे भौर भपने मि
ग्रहसे युत होतो बहुतधनवाला तया सिद्धपुरुष होता है ९८
बलवान् दशमेश केंद्रषिकोणस्थाने [ राजार ९५ ] मे गया।
........
--..-.....याय

नातकतत्व (३४७) दशा पूर्वादभे [भाधी] शुभ भौर उवराईमे मध्यम फल देनेवाली होवेगा८ शुभदशा। मित्रोचात्मस्वत्रिकोण वर्गोचम स्ववर्गस्यशुभा ९ टीका-जोग्रह अपने मित्रग्रह की राशी मे तथा उञ्चराशीमे,स्वराशी' मे या मूलत्रिकोण राशीमे अथवा वोत्तमांसमें ( जन्मकालमे जिस- राशीका ग्रहही उसीराशीका नवांश मे भादो) भयवा भपनी स्वरा. शीके दशवर्गमे गयाहो उसग्रह की दशाशुभफल देनेवाली जानना ९ कथा दशा अस्तारि नीच भांरागस्य कटा . टीका-गोग्रह मस्तकाहो अपने शानु ग्रह की राशी भौर नवांश में गयाहो भयका नीचराशी भौर नीचराशीके नवांश में गयाहो उसकी दशा कष्ट देनेवाली भशुभमानना १० अवरोहिण्यधमाचेत्कदा " आरोहिणी मध्याचेत्संपूर्णा १२ सादृष्ट्युतस्यापिकरश्मे केंद्रकोणगस्पशुभान्यथा कष्टा १३ टीका-जिसग्रहकि भयम संज्ञक भवरोहिणी दशा अर्थात् । जोग्रह भपनी उच्चराशिको उल्लंघन करके नीच राशी के सन्मुन जानेवाली 'छराशी में स्थितहोकर (मीचाभी लाषी होकर ) भपनी नीच पा शत्रु राशी के नवाशमे गयाहो उसकी दशा नेष्ट [कष्टदेने वाली समझना । जिसग्रहकी भारोहिंगो दशा मध्यासंज्ञक भर्थात् जोग्रह भपनी नीच राशीको उलंघन करके उच्चराशीके संमुभ मानेवाली उराशीमे स्पि तहोकर (उच्चाभीलापी होकर ) भपने भिम ग्रहकी राशी के वा उच्च राशी वा भपनी स्वराशी नशमे गयाहो उसकी दशा संपूर्ण उतम अफल देनेवाली समझना १२ जोयह शुभहसे दृष्ट और थुतहो भधिक वळपान हो जिसकी उच्च रश्मि भधिक भाईको नोक्द्र या त्रिकोणस्थान (२१.९५) मे गयाहो उसकी दशा शुभफल देनेवाली जानना भौर इससे विपरी 1. - (३४८) भाषाटीकासहित. त स्थिति मे गयाहुवा होतो उसकी दशा कष्टदेनेवाली नेष्टजानना। भर्यात जो ग्रह पापग्रहसे युत और दृष्टदो निर्वली, भस्तंगत, नीच, घा शत्रुगशी गत किंवा राशिसंधिमे भथवा भावमधीमे गयाही कर. पाठयंगम गा पापांशमें गयाहो श३६८।११।१२ इनभावोमंस किसी भी भाषमे गयाहो उसग्रहकी दशा करनेवाली होगा १३. लग्नदशाफल. लग्नदशा चरभंगे देकाणक्रमाच्छूटामध्याधमा हिस्व- भावेव्यत्ययेन स्थिरेनेष्टेटसमा १४ टीका-लग्नकी महादशा यदि चरराशी का लग्नहोतो काणके क्रमसे भर्थात् चरराशीका लग्न प्रयम ट्रेष्काणमे होतो उसकी दशा अष्ट दूसरे द्रेष्कागमे होतो मध्यम और तीसरे द्रेष्काणमे होतो भए. म फल देनेवाली, एवं द्विस्वभावराशी का लग्न यदिप्रथम द्रेकागः होतो भधम दूसरेमे मध्यम तीसरे टेष्काणमे होतो श्रेष्ट फल देनेवाली भौर स्थिरराशीका लग्नहोतो यदि वह प्रयम देकाणमहोतो नेष्ट. दूसरे द्रेष्काणमे होतो श्रेष्ट तीसरे द्रेष्काणमे होतो मध्मफल देनेवाली दशा जानना १४ वक्रगतिस्थग्रहदशाफलं। वक्रगस्यपाके स्थानमान सौख्यायपचयः १५ टीका-जोग्रह वक्रगतीका हो उसकी दशामे स्थानमान सुनादिक का हास होवेगा एसाजानना १५ त्रिकेवरगस्यपाके भाटसिद्धिः १६ भाङ्गेशरिपुपाके बुद्धिभ्रंश राजभयंच १७ राहुयुतस्य दशारिष्टदा १८. ... रन्ध्रगानेशस्पपाके तिपीडा १९ इष्टाधिकस्यभेष्टा कदाधिकस्यनेष्टा समस्यसमा २० दिविलोपेवस्य पाके महाप्रतिष्टास्वदिग्मागे...'

नातकतत्व.
टीका-त्रिकस्थान ६८४१२ के विना भन्यस्थान मे १३२॥३॥४॥५॥७.
५:१०।११ गयेहुवे ग्रहको दशामे भभीष्टकार्य की सिद्धिहोतीहै १६
जन्मराशी भौर लग्नके स्वामीका जोग्रह शत्रुहो उसकी दशामें
मुद्धिभ्रंश और रानभय होताहै १७
जोगह राहुसे युतहो उसकी दशा कष्टदेनेवाली होतीहै १८
भष्टम स्थानमे गयेहुवे लग्नेश की दशा शरीरमे भतिपीड़ादायक
होती १९
जिसग्रहका इप्ट (केशवीपद्धतीके भनुसार ग्रहो का जो इष्ट कपा
फल लायाजाता है वह इष्ट ) यदि अधिकहोतो उसकी दशा श्रेष्ट
भौर कष्ट फल अधिक होतो उसकी दशा नेष्ट भौर यदि मध्यम
दोनोइटकष्टवलसमान होतोसामान्य मध्यमफळदेनेवालीहोतोहे २०
नोगह दिग्पल से युक्तहोता है उसकी दशाम महा प्रतिष्ठा भौर
भाग्पकीवृद्धि जिसदिशाका बहह स्वामिहो उसदिशामे होतिहे २१
दिशाके स्मामि वृहज्जातकमेलिखेहे 'प्रागाद्या रविशुक लोहित तमः
शोरिद बिरसूरयः भर्यात् पूर्ण कास्वामी रवि, भग्नि कोणका शुक्र,
दक्षिणकामंगल,नैऋतकाराष्ट्र, पश्चिमका शनि, वायुकोणका चंद, उत्तर
काबुध, भौर ईशान कोणका गुरु, स्वामिह तदनुसार जानना ।
भावेश दशा फल.
लग्नेश दशापल धनदा २२
धनेशदशा कष्टार्थदा २३
सोत्थापाके प्रायेण नेष्टफलम् २४
सुखश पाके गृहादिसुखं २५
सुवेशदशा विद्यार्थदा २६
पठेशदशा-रिप भयदा २७
जायेशदशाशोकदा २८
मृत्युपदशायां मृत्यु २९
धर्मेश दशायां धर्मक्रिया ३.

(३५०)
भाषार्टीकासदित.
खेरादशा नृपाश्रयार्थदा ३१
समेशदशा लाभदा.३२
व्ययेश दशार्थ हानि कष्टदा ३३
टीका-लग्नेश की दशा वल भौर धनके देनेवाली अष्टहोतीहै ।
दशामे घी कोपीड़ा भी होति २२
धनेशकी दशा कर (शरीर में पीटा तथामरण) भोर धनला
देनेवाली तथा श्री को पीदा करने वाली होति २३
ततीयेश की दशा बहुधानेटफल देनेवालो ही निकलती तथा भ.
इकी भीकोभी पीड़ादताह २४
सुन्नेशकी दशामे पर वाहन चतुष्पद माता मिग्रा विफ का तपादेर
का सहोताहे भौर प्रायः पिता शीरमे कटभी हाताई २५
पंचमेशकी दशामे पियामाप्ती भौर पनकालाभ तया सन्मान गरि
मुदिाद मातामा मृत्यु या माताको पीडाहोतीदे २६ ।।
परेशकी दशामेशभाभप भाररोगदितपापुत्रकोपीदा होती२७
सप्तमेशमीशा शक्दिन पाली सपा शरीरम पीहारनेही
भष्टभेश की दशामे मत्पभपहोता है तथा श्री कीमत्यु पा विशाभी
होता २९
सभा की दशाम तोप यानास शेन यज्ञ क्या कन्यादानादि
धर्मकार्यभार भाग्योदय होना३.
समाकी दशामराम्या आपको प्राप्ती भोरपनाळाम तपामा
नमदिरादय होवाद तथा माता *समे पीड़ा भीती
मिदिमानवामदेनेवाची भौरविवाकीम का
व्या [ पारमे मा स्वामि पीसाधनहानी भारतमा
REगायां पान्तरे शताबहानि मामयम् ३४ .
अन्योन्याशनायो तरे महामपन, ३५

जातकतत्य. (३५१) पाकेशात्रिकमस्य भुक्ती स्थानच्युविनिथ ३६ पापपाकेशुभांतरे आदौकष्टवतः सुखम् ३७ शुभपाके शुभांतरे सुखम् ३८ शुभपाके पापांतरे आदौसखंततोभयम् २९ रिपुयपापस्य पापदशांतरे विपत् ४० टीका-पापग्रहकी महादशामे पापग्रहकी भतर्दशा नवाती तपशबु के सबसे धनकी हानि और महाभय होताहै ३४ पूर्णवन्द्रमा शुभयत बुध भौर गुरु शुक्र थे शुभग्रह भौरक्षीणनन्द्रमा पापातयुवव शनि भगत राहु केतु ये पापमह पद्यपी माने गयेह तथापि ग्रहाका शुभाशुभ निर्णय उददायप्रदीपानुसार उक्तपापग्रहभी केंद्रका स्वामिहोतोशुभ भौर शुम पाप सर्वग्रह त्रिकोणके (९।५ के स्वामिहो तो शुभप्रहमाननाते भार तीसरे, छठे, ग्यारमें, तथा भाठ मे स्थानके स्वामि पापग्रह तथा दूसरे पारवें स्थानके स्वामि शुभहोकर पापसंबंधी होतो पाप भार पाप होकर भी शुभका संबंधी होतो शुभफल दाता स्थान तया संबंध से होता है तदनुसार विचार करनेसे जो शुभ पाप ग्रह हो यद शुभ भोर पाप जानना । जो ग्रह परस्पर भेकदूसरेसे छठे भाठमे स्थानमे गयेहो उसकी भर्थात् निसयहकी महादशाहो उससे छडे किंवाभाठमे स्थानमे गयेहुवे ग्रहकी भंतर्दशा मे महाभय कष्टरोग स्थानच्युति भादिनेष्टफल होताहै ३५ जिसमहकी महादशाहो उससे त्रिकस्यान ६८१२ मे गयेहुवे ग्रह की अंतर्दशा मे स्थानच्युति (स्थान छुटनाना) भौर धनकी हानि होतिहे ३६ पापग्रहकी महादशामे शुभग्रहकी अंतर्दशा होतो वह भंतर्दशा पहिले भाधा कष्टदेनेवाली भौर उतरती हुई भाधी सुखदायक होतिह ३७ शुभग्रहकी महादशामे शुभगदकी अंतर्दशा होतो उसमे मुख पृद्धि भनागम होताहै ३८ शुभग्रहकी महादशाम पापाद की अंतर्दशाहोतो यह अंतर्दशा प- दिले (पूर्वार्द्ध मे पेठती हुई भावी मुखादि शुभफल भौर उतरती [ उत्तराईमे ] भाधीमय देनेवाली होती. ३९ (.३५२) भापारीकासहित. पापग्रह की महादशा में भपने शत्रुपद से युक्त पापग्रहकी भतर्दशा होतो उसमे विपत्ती माप्त होती ४० दशांतर्दशा प्रोश समय वसागुभाशुभ फल विचार । दशांत ईशाप्रवेरोसलग्नाः खेटारफुटाःकार्याः ४३ वनपाकेशे वा शुभेलग्नोपचयगे दशाभेटा ४२ अंगेपाकपमित्रवर्गे वा शुभवर्गदशाशुभा ४३ प्रवेशेस्वर्भगेचंद्रे मानार्थसुख सिंहेन्नसुखं भोमभेकलहणे ज्ञभेविद्यार्थानि जीवभेकपिमानार्थसुखं शुक्रभेदार मान यशार्थीति मन्दर्भसेवा ४४ त्रिकेवरस्थे सबलेचंद्रेदशाश्रेष्टा ४५ मुख्यदशेशोच्च मित्रस्वभस्थः सन्दशेशाधिष्ठित राशि त उपचय त्रिकोणास्वगश्वेश्चन्द्रःशुभफलदोन्पथानेष्टः४६ चंद्राधिष्ठितो राशिर्जन्मनियहाव गस्तदायोत्थंशभमशुभ- वाज्ञेयम् ४७ विपत्कर्तृदशारम्भे सर्वाधिकवलः कोपिसद्वर्गगःशुभमित्रदृष्ट थेन् विपत् ४८ टीका-महादशा तया अंतर्दशाके प्रवेश समयमे भर्यात दशाभंतर्दशा जिससमय प्रेवश हो उस समय के स्पग्रह लग्न और भाव, चलितादि करना भौर उसपरसे दशान्तर्दशा का शुभाशुभ फल ज्ञान करना । दशाप्रवेश समयकिलग्न कंडलीमे दोश (जिस अहमी दशातर्दशा प्रवेशहो वह ) भयया शुभग्रह लग्नमे तथा उपचय शहा ११ स्थान मे गयादो तो वहदशा श्रेष्टफल देनेवाली होती १२ दशामवेश समयके लग्नमे यदि निसाहकी दशाप्रवेशहुई हो उस ग्रहका भौर उसके मिनाह का पर्गही भयवा शुभागहोकावर्ग होतो पह प्रवेशईदशा शुभफल नेपाली समझना जातकतत्व. निसदिन निससमय दशाप्रवेश को उस समयका चंद्रमा यदि स्व. राशी (४) का होतो मान धन भौर सुखका लाभ होगा, यदि सिंह राशीका होतो भत्रका मुख होगा, मंगल की राशी ११८ का होतो कलह [ लड़ाई ] भौर ऋण [ की ] बढ़ेगा, बुधकी राशीका शप का होतो विद्या की भौर धनको प्राप्ती होगा, गुरुकी राशी ९।१२ का होतो कृषि [ खतों ]मान, धन, भौर सुन, की वृद्धि होगा। शुक्रकी राशाशका होतो कुदारा [खरावनी] से संग भोर मान यश धना किकी प्राप्त होगा। शनि की राशी ११११ का होतो सेवाका मुस्त्र होगा [ सेवाकरने करानेका सुख मिलेगा ] ४४ दशाप्रवेश समयका चंद्रमा बलवानहोकर यदि प्रवेशसमय की लग्न इंदलीमे त्रिकस्थान ६८०१२ के बिना भन्यस्यान १३२॥३४॥५. १९५१११ मे गयाहोतो वह दशा श्रेष्ठफळ देनेवाली जानना ४५ जिसबहकी दश प्रवेशावद मुख्यदशाका स्वामी यदि दशाप्रवेश समयमे अपनी उच्चराशी मित्र या स्वराशी में स्थित होकर दशा- प्रदेश लग्न कुंडलीमे निसमावमे गया उसभावस्थित राशीसे उप चय ६१०११ तथा त्रिकोण ९५ स्थानमे तथा सप्तम भावमे चं. द्रमा गयाहो तो वह चंद्रमा दशाका फल [ जिस हीदशातर्दशा प्रवेशहो उसका फल ] शभदेवेगा और इससे विपरीत [१४५ ८।९।१२ स्थानमे गया ) हो तो नेष्टफल होगा ४६ ' दशामवेश समयका चंद्रमागिमराशीमे गयाहो वहराशी जन्म कुंड- लीमे मिसभावमे गईहो उसभावजनित मो शुभ भयवा भशुमफल चंद्रकाहे उसीकसमानशुभाशुभफल जानना । उदाहरणार्थ कल्पनाकरो वह चंद्रमा धनमायो गहि भोर धनभावमे चंद्रमा शुभफलदावाद तो दशाप्रवेशसमय मे भी यह चंद्रमा शुभफलदाता होगा । एवं वर चंद्रमा भशुभफलदाताहै तो दशाप्रपेशमेभी भशुभफलदेगा । विपत्ति करनेवाली [भशुभफलदेनेवाली ] दशाप्रवेशहो उससमय पदि कोई ग्रह सर्वग्रहोस भधिक बलवान होकर शुभाहोर वर्गमे गयाहो भौर शुभ या अपने मित्राहसे दृष्ट हो तो विपत्ति नहीं होगा (भशुभफलनही होगा) एवं उपरोकरक्षणवाला सर्वाधिकवलीयह भशुभफलदायक दशाक स्वामिको देखताहोतोभवश्य भशुभफल- नहींहोगा ४८ ९८ - (३५४) भाषाटीकासहित. ग्रहचारवशेन भवर्गज शुभाशुभफलविचार। जन्माङ्गचन्द्रान्यवरतचारवशेनोपचयगोग्रहचे मित्रोच मूलत्रिकोणाभिवोटवर्गजशुभंपूर्णमशुभंस्वल्पदिशतिअन्य थानेष्टं पूर्णशुभंस्वल्पं तत्रापितारतम्यात्कथनीयम् १९ टीका-जन्मलग्नसे भयया जन्मके चंद्रमासे जोगाराशीफे भ्रमग वशात् पचपस्यान २६।१०१११ मेगयाहो भौर भपने मित्राही राशीमे तया उच्च भया मूलत्रिकोण राशीमेगयाहो यह महयदि भष्ट वर्गमभी शुभफल देनेवाला (अधिकरेक्ययुत होतो शुभफलपूर्णदेवेगा भौरभशुभफल स्वलदेवेगा भौर विपरीतहोतोभर्यात जन्मलग्नसे भय. या नंद्रमासे भनुपरस्थान ।।४।५।७।८।९।१२ मेगयाहो भौरशातया नीच राशीमे गंयाहो भषया भस्तकाहो पापयुतहटहो भौर भष्टक मि भशुभफल देनेगाला ( स्वल्परक्ययुत ) होतो नेटफलपूर्ण भौर शुभंफलस्वसदेवेगा इनमे शुभाशुभफल के तारतम्यभेदसें विचार करके शुभाशुभफलयोका गोनर पिचारसे कहना ४५ इसपदतीसेही ग्रहोकाराशीभ्रमणद्वारागोचर से शुभाशुभफल विमा• र जन्मलग्न भौर जन्मस्थनंदसे पाचात्य विद्वान गण भी वर्ष मास दिन पटीपर्यत का करते भोर मास्तर मे इसप्रकार विचार करना दशाफलविचाकी भपेक्षा भविषगुगमभौर सरल र युमिपुर प्रतीत. होताद मेने भनुमकरसाद फि उपरोन गमावणार का पज पिनारकरनेसे बरारशुभाशुभफळ मिलनेमाते। अनुभूतिपदनाम ज्योतिशासमुत्तमम् । निगमानिनं लोक विजयवेवराम् । जैमिन्यायुक्तिः सारंनवनीत मिमोदृतं ॥ महादेवनविदुपा स्वादपन्तुमयुद्धयः । टोकाचे निमावा (दांग वा वेदरामाराम भी टोसे वैदित (मादित) प्रत्यक्ष अनमयको माया . .

नातकतत्व ज्योतिपनामका जो उत्तम शानद वद विनय (विशेषजय ) को प्राप्त होतारहो। ग्रंथकर्ता महादेवजी विद्वद्वयं लिखतेदे कि जैमिनी भादि मुनियों नेजोफलविचारकेलिये भनेकपलिने उनकासार ग्रहण करके जैसेदहोमसे मक्खन निकालते है वैसेही भनेकपोमेसे नवनीत रूपयह ग्रंथनिकालाहै इसकास्वादसुबुद्धिवाले विद्वानगग लेतेरहे ॥२ इतिमहादेवकतजातकतत्वे दशातत्वं पञ्चमम् ५ इतिश्री गणवर्य श्रीमन्महादेवकृत नातकतत्याख्य जातकयेथे तामनु श्रीनिवासरचित तत्वप्रदर्शिनि भाषाटीकायां दशातस्य पञ्चमं ५ समाप्तः। ग्रंथकर्ताकानिवास स्थान और ग्रंथसमाप्ति का समय वर्णन । गयम् । श्रीमदवन्तिकापरनामधेयाया उज्जयिन्याः पथिमतः पड़- योजनमिवे भूप्रदेशे रत्नललाम नाम पुटभेदन प्रचण्डकोद- पडपण्डितद्वेषणकठिनकण्ठनिकर्वनकुठारकठोर राठोडबंगा- वतंस भीमदछपसिंहपुत्रभरैवसिंहतनुजेन सुकुमारेणापिकुमा- रविक्रमेणां धीरेणाप्यान्तररिपुविजयधीरेण रणजीवसिंहेन गुप्त नृपकार्यधुरीणस्य धीरातिगम्भीरस्यापि चालचक्षुषः शहा- मतअलेः सहायकमुपेयुषा नानादेशानीतवीचित्रचित्रिविरु- उताराजिविराजिवसुधासौधनीजुष्टोपवनराजिविराजमान वि- विविधागौरव गर्षशालिनापि जनसौजन्यजनननैपुण्यशा- लिना विधयुधवृन्देन विलसितयानपाठराालया स्तभूपणं 'नक्तंच प्रचुरघण्टापयस्यापिवसरलविस्तृतोज्ज्वटिवदीपाय- (३५६) भापारीकासहित. ल्या जनितदीपोत्सवसुसं चन्द्रचुम्बिना प्रसादिना प्रसादेन जनितजननयनानन्द प्रतिकूलबद्धपूलेन निरस्तावृषिज वृजिनी वयत्र बसता पराशरवश्पपाठक रेवाशरसनुनो दुम्परेण महादेवेन विष्णुसहायेनाष्टाविशदधिककोनविंशविश- ततमेविकमवत्सरे (१९२८) फाल्गुनशकृपञ्चम्यां जातकतत्वं नाम ग्रन्थोनीतः पूर्णवाम् । तात्पर्य-भवंतिकापुरी जिसको उनन कहते है उससे पश्चिममे छयोजन [२४ कोश ] पर राठोहकुलभूपग श्रीमदलवंतसिंहनी महारानाके पुत्र भैरवसिंहनी के पुत्र श्रीमद्रणनीतसिंहनी माहारामासाहवकी राजधानी का रतलाम शहरहै जिसका साशन सन्त माहाराजाकीसुकुमारावस्या होने के कारण उनकी भौरस सहायकरूपसे भतीधीर गंभीरस्वभावके सुदूरदर्शविचारवान । मी सहामतमलीजी [मुप्रिन्टेन्डेन्ट ] साइप बड़ीचतुरतासे सुंदरवगीचा तथा उत्तमपाठशाला ( संट्रलकालेग भतिविशाल राजभवन (महल) भौर बड़ी बड़ी भनक सड़के पुळे या उत्तम रोशनीका प्रबंधादि भनेक दर्शनीय शहरको शोभादेनेवाले मनो रंजक कार्यकी योजनाकरन्यायानुसारकार्यचलारहेहै ऐसे सन्दरनगर मेनिवासकरनेवाले उदुंबर ज्ञातिय पाराशर गोममे उत्पन्न पाठकोपनाम पाले रेयाशंकरजी के पुन महादेव शर्मा, विष्णुशास्त्रीनी की सहा यतासे विक्रम सम्वत १९२८ के फाल्गुन शुक्ल पंचमी के दिन यह जातक तत्व नाम ग्रंथ संपूर्ण किया । -लोक-भासीद्रनपुरे पराशर फलोत्पनो दिनोदुम्बरापात:पाठक नामतो गुणनिधिः श्रीनन्दरामाभिधः ॥ तत्सूनर्गणितागमज्ञतिक श्रीमोतीरामाङ्गयो । रेवाशङ्कर भागमेषुनिपुणस्तस्माददामिकः । तदात्मजउदारधी गणकमौलि चुडामणि । रभूदरणिमंडळे गुणनिधि महादेवयित् ॥ तदङ्गजनुषा मघौ नगगुणाटचंद्रमिते शकेषिनिरमादिर्द विवरणं सतांप्रीतये मशुदगुद्धपत्रम् । -पृष्ट पंक्ति भशुद्धं शुदं पृष्ट पक्ति अशुद्ध - १७कीट कटि १० १चंद्रार्कज्या चंद्राज्या २ १०राष ७ सूर्य है मूर्यहै २१४चरस्थ चरस्थि १२ १२ दर्शनीषा दर्शनीयवपु २ १९तल १२ २३ ४८ ३ दावा भावाः १३ १७ भौमशन भौम] शत्रु २हारा होरा ३ मैत्रिसाधन मैत्रिसाधन ४ १४ गह भदाई १५ १६ योजनप । योजने दिस्त सर्यतो पलैयुतो ५ १४टीक टीका १७ ११२रा जान २रामान १८ १८७२ ६ १७टचशे पपचशे १९ १२इसकारण इसकारण ६ १९प्तात स्पात १९ १५ भवस्यान भवस्यामे २ पष्टचशेष षष्ठय- १९ १७स्वोच स्वोधगो क्रमसेधार शेशघार गोदिप्त दिप्तः पीड़ित ५ पटहोने पठशेश सज्ञक संज्ञक २० २३षेष्ठितो पष्टितो ३ प्रसंगले प्रसंगानुसार ६ पट शेष पठशेश ८ हो होने ७. १९५ष्टा २१ १८ करती करते १.होता होतो ८.२०२९ भैश २९माभग २१ १६ मकर: मकरका ८ २३ तल पूर्वाद पूर्वाद ..२९प्रधिक दृभिक २१ होवाद २६यपापग्रह पेशपया |२२ ४ पूर्ण स्वपूर्ण २९.गुरुः सुधारगुड-२२ ४मन्न जन्मः २.सतसंतक २२ मामस्पेनलासत्रेनन्मः ७ . ७ ५गिननेस गिननेसे | १९ २५ पिडित सा २४ाताई + २२ १९श्य ८हावता . " २. भगुदगुदपत्रम् । पृष्ट पंक्ति भदं शुद्धं पृष्ट पंक्ति भशुदं शुदं २२ २१रेताकी रेतीकी २७ भर्या २९ भधार ૨૨ २३ जन्म जन्मः ३१ ३० पलक चाल २६ देखता । ३२ ४शीष शीघ्र हायता होतो ३२ १३से होवे सदृष्टः ४ गोकला गोकुला ३२ २३ ५शि पालये शिल्पालये | ३२ २१ सोम्या सौम्या होतो ५भार भौर २३ २२ हे होरे ८ लग्न-लग्नके देकादेका २४ १ग्रहमस ग्रहमेसे ७ सर्मपिता मूर्यपिता २७ ९१ २४ १४ यागः योगः ५शराशि राशी स १० रुस गुरुसे २४ २०दृट ८ सयले सबके ૨૨ मार्गमे जान मन्ममान २५ १६ मीषा शीपी २८ारे २५ ३० सयौरिघ सारिश १.माग्रह मोग ११ स्वमि स्वामि २१ १६मार मोर २७ असावा प्रख्या ४४ युक्त -८ १. मतम-1 सप्तम मस्या १७मो प्रती १ए २३श्रमम्म १३पनः १.नाराम ४८ ८९वता होतो II.1) सादुर पारो पापग्रह २५ सवें ३८ २३ हपाप पार हसदृष्ट सेट १४शुक्र २४ मासे चन्द्रमासे ३१ २७ पिर नन्दागर नन्दांवर मांगने । वामनाय शमण भशुद्धसुद्धपभम्। १८ सूथ १तुर . २२ होनौर पृष्ट पंक्ति भशुद्ध शुदं पृष्ट पंक्ति भमुद शुद्ध ९पाध्य पापदृष्टय २२ हो छठे तुयें ७० १०:म्लेच्छो म्लेच्छो २६वेंशि वेशि ८लानेसे लग्नसे २४ होताहे होता है ७ धारक- पारने १६ इन्दको इन्द्रका स्पानम स्थानमे ४ फारकांसश कारमाश ७४ १६लग्नश हमेश ११ स्यीय रूपी १९ होता होतो ७५ २७ कुनेंग कुजगे १८ रोते होतो ७६ १४ सेक नेसे सेकनेसे ५९ २२ सःसंबंध संबंध ९शीन शनि होताहै १या में धारमें १९लग्नदीना नेशनो १४स्पानम स्थानमें ३ २७चंद्राको चंदामा .८मगढ़ मंगल સૂર્ય २२ माडे समाहे ६४ २३ विमल विन्दल नाचे जायेगे ६४ २६ शी शनिं ७दखते ६. २७ शीघ्र कीय ३४ यनेत्र येनेत्र २८ गंधकार जयकारने दिखनेया नमंत्र नेत्र ६ होताहै लाहोताहै ८० पहातार होता १५विष विशेष १मतरबएस) भतएपऐसे ६५ २२ कानि स्वामि ५पत्र २८चर ६पुगुन्न पुपकात्र रेसते १८पूर्ण हो . प्रणेन्दु .२५ दोष ८१ २० बार पपिर शुभग्रह ८२ रताय १५ो होसह पीरहेता २० दिवाय दिसोप ६ शुनपोगरिनपोग ८४ १२ मुन उमेत १५ सर्य " चाराशि " ८ दखते " " तपा || भगददायम्। १७ पानेवाला मेभी २४ विषक } विवेकस्य पृष्ट पंक्ति भशुद्ध शुदं पृट पनि भगद १२४ ९दरिद्री दरिद्री १४२ २२ कमकांटा कर्मकांटा ११हावतो होतो १४४ ८ पचनेवाला बेचनेवाला १३हारे हो १७रके हरेक १६ संपत्तमान संपत्तिमान २८राशाका राशीका १२५ १ यतहोने युतहोये २९ फरक फरके १७चार्य चतुर्थ १४५ १४ राशिम राशिम १२६ २३ पनेवाला विषेरस्य १२९१४मभी १४७ १९ होवोतो होतो १२९ २८ पदलाता बदलावो १४८ १९ गधगो यधयोग २२९ ३१ तरसे तरहसे १५९ ३ होतो होतो पृष्टांक २२९-२३० १२१-१३०" १४ शुमेक्षित शुभेक्षित २३१-२३२ १३१-१३२ २२ मतायोग मातायोग १३१ ७विवेक २६ चतु पद रीका टीका- १५. २५ ाशदर्प दृष्टे त्रिंशद्वर्ष २३२ १दृष्ट १५१ ९जन्मळसे जन्मलग्नसे २ळाभे लाभो १२ कद्र भोर मेंद्र २९भार ४ केन्द्र केंद्र पृष्टांक २३३ २३४४ पचशे ९बयसोः षष्ठयो घयसी पृष्ठांक- १५भार भौर १३६ २२ दलेके एजेंकेतया | १५३ १९ मुखश मुखेश २२गरु २३७ ४ स्थनमें स्थानमें गुरु १३८ १९ मेषचंद्र १५४ २स्तये मेषचंद्रे स्तुयें गुरु २५ हारतो होतो १५५ ५स्थानम स्थानमे १४० ११ पृप्ति । धृति । १५५ ११ श्वावदयो वादयो १५दनि दनि १३ पुंडलीम कुंडली में १४१ तिः ।। M. २७ लग्नस लग्नेस ६ वृतिः । यत्तिः शनिसे . " 3 " १५६ १९ शनिस " " " चतुश शनि " } ६ भशुधनशुध्दपत्रम् । पृष्ट पंक्ति भशुद्ध शुद्ध पृष्ठ पंक्ति भशुद्धं १५८ २० भानभवार्य भनुभवार्य ११ पुत्रसे पुत्रेशे २५९२८लग्नम लग्नमे १२ सूर्य सूयें २३ इनतीभाव इनतीनोभाव १७ मर्य मूर्यः १६० २१ हारतो होतो २८ नोचंगे नीचगे ८ चतूर्येश १८१ ९ चतर्थ चतुर्थ १६२ १६ नोवता जायेतो ११ भाषम भायमे १६४ ३ स्वराशिम स्वराशिम २३ शानि १२काशम कामे १६५ ४चतय चतुर्ष ४ छटे ८टीका १८२ १८ यें सूयें थे सूयें। चतुर्थ टीका-चतुर्य १८२ २३ कगः कुमः २८३ २९राशा राशी १६६ ६पएका पुरको २८६ १२भार भौर ८.५पार व्यापार २१ मुख होय : मुग्रहविगा २६६ २३ गुरू गुरु २८फा पुत्र ७ परति परागत १८९ १४ सनर्क मुसकी १८ हटा દ पंचम १६८ ५३ सदृष्ट से दृष्ट होय. नोटमे-५०१ मे मप्ति प्राप्ति १९० २४ गध गया १६८ २४ पचमेश. बुद्धि बुद्धि १९१ १२ पत्राप्ति पुमाप्ति २.शुभम शुभग्रह २६९ यदि गुद्धि १९२ पहुवा નો ८सभापस्ता समस्या २०० २.गपदाव गहोने नोट- रमे६.१८-३६.१८.३० कारकाश :१७होव १जगपा बन २धनम्या डाक भनस्प २२ भार १२विवाग प्रिोग १९. २८ मौरस २८.१. मन्दा मन्दा १६पंच में पंचमेश " २दानो " २१ नाका नीयम कारमा १९३ १८ग्ना + १९७ १९ माईडेपा माई भशुद्धशुदपत्रम् । " ' १०७ पृष्ट पंक्ति भशुद्ध सुद्ध पृष्ट पंक्ति भशुदं शुद्धं २०० ९पिठिका पीठिका २३५ २३ सन्धो सन्यो २०१ ५फेडा फोडा २३६ ११ व्ययेकने व्ययेकजे केतु १३७ ६ बाद विवाह २६ जख मखम २३७ १ सय सूर्य १७ गल मंगल २३८ १३ स्थल स्यूह २७ वष्ठेश षष्ठेश २४१ २६मद मरे २.२ २४ बग्नेश लग्नेश २४३ १४०पापर व्यापार २०५ १६ उंटे उठे २४४ केन्द्रेवा केन्देवा १३ नाभिगेगी नाभिरोगी. २४५ १३ दीर्घाय दीर्याय ७भठमे भाठमे २४५ २५ जीवेकेद्र जी केंद्र .८६ पाग्युत पापयुत | २४८ २१ गरुसे गुरुसे भौर २४९ १३ गलिक যক্তিক सोत्ये २५१ १ केंद्रम अंद्रमे १०९ ५वपापे न्स्येपरे ४भाय भायु २२ राशिम राशिमतया २५१ ६ थप पर्ष २३ राशीक राशीके ८१२भावमें १२मैभाषमें २४ १२ कॅन्द २५१ २६ मृत्य मृत्यु २५१ २९ राव्ही राहो २१ २० पाठशे षष्ठवंशमे १२५४ २४ विभुति विभूति २२ २१ हावे (२५४ २६ ग योग चारी ५मृत्य मृस्प २४ व्यमि. ६न्मयुः व्यभिचारी २५५ २७ चौर २८ :२ गुनामे शुकसे चौरान्मृत्युः ३१ २दाराशा दारेशा २१ २७ स्वामी स्वामी २६० ११शनिका पानिकी ३१.२१ सामोमे. स्वामीसे २६४ २२प २० सेरये - केंद्र २४ व्यरि. व्यभिचारी २५५ न्मूष्यः चार } . मयम, ८ } M मनभ्य भगुदगुदायमा पृट पनि भाद पृट पनि भाद गुदं मेप मध्यदे. ३२. पान पान जळादर जलोदर ३२३ ८ माम्गेशे साम्गेद्रे २६५ भद्रमश भटमेश २६६ १५मदेवा मरेमा ३२६ २० भारज्य:। भोज्य २७४ २६ यादृष्ट गुनदृष्ट गोग योगे २७५ १परुप पुर ३२८ १७ सालको सबली । २५९ ३धना धनेश २६ इस्ति इद्वित. २८० २७ गयहरतो गाहोतो ३३४ भार भोर पर २८४२८ सप्तः युत समाप्तः मनध्य २८८ १० शुभांशेवा शुभांशे या ३३४ ५घी मी घी मी २८९ २४ दोस्ः दोस्तों Erd दृष्टे २९९ ९चरेटे चो २७ सावीक .साधीको ३०० १३ तेरने सरेङ्गे ३३७१ यके धके ४ मृगते २३८ २२ कुमारी धुंवारी ३.३ १२ तरे तरने सप्तमशे सप्तमेश ३०३ २१ पूर्वप पूर्षक ३३९ २१ सद २०४१८ पटक पटक २८ चन्दक्षी चन्दी ३०५ १६ राज्या ३४० १९ नवश नवांश राज्यादेशा डेशा ३१२ १६ भाववे भावमे ३०७ २ शुक्रज्यो शुक्रेज्यो ३४५ ६ माततवं जातकतत ३०७ ३ नगार्थाङा नगार्याङ्गा |३४८ २ गली निली ३१३ १४ तदशैडे सदीशङ्गे जहाजहां दृष्ठ ३१३ १६ धनेशेडे धनेशेङ्गे भट जहाजहां भष्ठ . ७पारमः बारमे | जहागहां षष्ट पष्ठ ३१७ १३व्याजन व्यान जहाजहां परश षष्ठयंश 'योग निष्ठ २९ यन्त्याङ दयन्ता इतिशुद्धिपत्रम् । मृगेट्ने " दृष्ट ste याग जहांनाही निष्ट ।

छपने योग्य नवीन तय्यार होगये
और उपना शुरुहोगया.
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चौघडिया विचार
चौघटिया निसको मारनाही लोग दुदिया कहते है वास्तव में यह
चौघडियदि या दुघडिये है वा पोनचाहिये भयया कोई भौरहा
चीजो इनका शास्त्रीय पद्धतीसे से विचार करना भौर किस काम
मे येदेखना इसका विवेचन इस पुस्तकमे भलिभांति हिन्दी भाषामें
वर्णन किया गया है कीमत - माय
शनिविचार.
इसपुस्तक मे बिसराशी मे शनी किसको कैसा कप शुभा शुभ फल
भपनी साटेसाती (पनौती ) कादेता है पगेरा २ विषयोका शास्त्रीय
पद्धती भनुसार सोपपत्तिक विचन हिन्दी भाषामे कियागया है
कीमत मात्र।
संतति समयविचार.
संतान किस समयने होगा इस प्रश्नका उत्तर शाघानुसार जान
गर्भ रहने का समय निश्चय साना चाहते हो तो इस पुस्तकको लिये
विचार सरल हिन्दीभ पामे शिवसागया है कीमत मा) मात्र
द्वात्रिंशयोगावली जातिक.
पह सान साना नाय की बनाई हुई वर्ष ल देखने की उनम
पुस्ता है इम्ने उन नम्बावसाचने भरने भनुभव कियहरे नमारीफ
३२ योग वर्षल विचारके किसोयही भाषा टीकासहित प्रकाशित
किय? मूल्य सिर्फ भाने मात्र
उड्डीस प्रशान.
एहत रहीस उपचुके है परऐसा नहीउ भनीतर परीभि नही
इसमे जितने ननमंत्र रिई ने सचमकार पताना पुस्तक
रेखने योग हैमूत्सा) मार
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* पिनया कप पाटीका की गा मोकिनगा भगीन मामा पढीदीमा नमी है इसमे भी अनि गुण सामान कि बद्री नमन मन भीगामुन्य 2 ॐकार महीमापकारा यह बदी 4 स्तर निानी भारत फनम्नममाचार पत्रों में भगाना महमा धर्माचार्शनि मुक में प्रामा कोई इस्ने टुडे को उलट पलट नोरन हिंद मोनी गुजराती भी वर्ग माला याला सहन में सीयसन देखने योग्य पिमित्र पुस्त है मूल्य मात्रा दशाफलदर्पण टिप्पणिसमेत । जातकमे दशाफल विचार का कोईभीप म्रतंत्र ऐसा नहीं कि जिसके द्वारा म्यतंबर से दमाका फलविचार उत्तम कसे करसके। इसटी के कारणही मोतिपालोग जम्मात्री तो बद्धी.२ बनाते हैं पर दशाका फलविवार जैसा चाहियोसालिसही नही सके अतएर इसक्षतीको मिटाने के लियेही यह ग्रंय समस्त परित प्रयोमेस संद करके दशाफल देखनेका परमोपयोगी बनायागयादै । इम्मे समसकार दशहजार लोक की संख्या दश विभागांम विभा कीगई है. मिस्मे प्रथम विभाग में दशा प्रयोजन धैयाली प्रकार की दशाका 'भेद भोर उनके साधन करनेकी उसादरग सदित रीति और उन दशाभोके चक्र तथा उनमेसेकोनसीदशामुरूप है उसका निर्गय कद- पर भागे संपूर्गादि भनेक प्रकार की दशाफटका भेद विस्तार पूर्वक वागत है । तपादशावधिक प्रहारशुभा शुभ मानिटादशा का निश्चय तपाउ नीच मूल धिकोगस्वक्षेत्रभतिमित्र मित्रादि पांचोभेद महित दशाकाविचार तथा भस्त उदित वक्रमार्ग गाँस्यकाफर एवं 7ल स्पनयांगवलोपेत राहयादि अंहोस विशेष २ दशाका “विचार भौर देशमुख, धन भ्रातृ, मात, गृह, ग्राम, मित्र, ह. । यदिपत्र, रोग शर्ड, भायो, मरण, निधिलाभ, भाश्या धर्म, लाम व्यय, मुसाफरो, भादि बारोहीभावमनित फलसि २

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Jaat Katav Prarambh

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Not Available
Title
Jaat Katav Prarambh
File name
Jaat Katav Prarambh
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
344
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310970
Barcode
99999990314406.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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r9KwfsyV6ka
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