Allahabad University Allahabad
Nirtyaratan Kosh -part-i St
Front matter
V
Anm
राजस्थान राज्य संस्थापित
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
( राजस्थान ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट )
द्वारा प्रकाशित
प्रधान संपादक
पुरातत्त्वाचार्य, मुनि जिनविजय
[सम्मान्य संचालक - राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर ]
,
प्रकाशनकर्ता
संचालक-राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
जयपुर (राजस्थान)
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राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्थापित राजस्थानमें प्राचीन साहित्यके संग्रह, संरक्षण, संशोधन और प्रकाशन कार्यका महत् प्रतिष्ठान - राजस्थानमा सुविशाल प्रदेश, अनेकानेक शताब्दियोसे भारतका एक हृदयस्वरूप स्थान बना हुआ होनेसे विभिन्न जनपदीय सस्कृतियोका यह एक केद्रीय एव समन्वय भूमि सा सस्थान बना हुआ है। प्राचीनतम आदिकालीन वनवासी भिल्लादि जातियोके साथ, इतिहासयुगीन आर्य जातिके भिन्न भिन्न जनसमूहोका यह प्रिय प्रदेश बना हुआ है। नैदिक, जैन, बौद्ध, शैव, भागवत एन शान्त आदि नाना प्रभारके धार्मिक तथा दार्शनिक सप्रदायोके अनुयायी जनोमा यहा स्वस्थ और सहिष्णुतापूर्ण सन्निवेश हुआ है। कालक्रमानुसार मौर्य, शक, क्षत्रप, गुप्त, हूण, प्रतिहार, गुहिलोत, परमार, चालुक्य, चाहमान, राष्ट्रकूट आदि भिन्न भिन्न राजनशोकी राज्यसत्ताए इस प्रदेशमे स्थापित होती गई और उनके शासनकालमे यहाकी जनसस्कृति और राष्ट्र सम्पत्ति यथेष्ट रूपमे विकसित और समुन्नत बनती रही। लोगोकी सुख-समृद्धि के साय विद्यावानोकी विद्योपासना मी वैसी ही प्रगतिशील बनी रही, जिसके परिणाममे, समयानुसार, सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश और देश्य भाषाओमे असख्य प्रयोकी रचनारूप साहित्यिक समृद्धि भी इस प्रदेशमे विपुल प्रमाणमे निर्मित होती गई। इस प्रदेशमे रहनेवाली जनताका सास्कृतिक और आध्यात्मिक अनुराग अदभुत रहा है, और इसके कारण राजस्थानके गाव-गावमे आज भी नाना प्रकारके पुरातन देवस्थानो और धर्मस्थानोमा गौरतोसादक अस्तित्व हमे दृष्टिगोचर हो रहा है। राजस्थानीय जनताके इस प्रकारके उत्तम सास्कृतिक - आध्यात्मिक अनुरागके कारण विद्योपासक वर्गद्वारा स्थान-स्थान पर विद्यामठो, उपाश्रयो, आश्रमों और देवमन्दिरोमे वाङ्मयात्मक साहित्यके संग्रहरूप ज्ञानभण्डार-सरस्वतीभण्डार मी यथेष्ट परिमाणमें स्थापित थे। ऐतिहासिक उल्लेमोके आचारसे ज्ञात होता है कि राजस्थानके अनेकानेक प्राचीन नगर-जैसे आघाट, मिन्नमाल, जाबालिपुर, सत्यपुर, सीरोही, बाहटमेर, नागौर, मेडता, जैसलमेर, सोजत, पाली फलोदी, जोरपुर, बीकानेर, सुजानगढ, भटिडा, रणयभोर, माडल, चितौड, अजमेर, नराना, आमेर, सागानेर, किसनगढ, चूरू, फतेहपुर, सीकर आदि सैकडो स्थानोमे, अच्छे अच्छे अन्यभण्डार विद्यमान थे। इन भण्डारोमे सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश और देश्य भाषाओमे रचे गये हजारो ग्रन्थोकी हस्तलिखित, मूल्यवान् पोयिया सगृहीन थी। इनमे से अब केवल जैसलमेर जैसे कुछ-एक स्थानोके ग्रन्यभण्डार ही किसी प्रकार सुरक्षित रह पाये है । मुसलमान और इग्रेजो जैसे विदेशीय राज्यलोलुपोके सहारात्मक आक्रमणोके कारण, हमारी यह प्राचीन साहित्य-सम्पत्ति बहुत कुछ नष्ट हो गई । जो कुछ बची-खुची थी वह भी पिछले १००-१५० वर्षों के अन्दर, राजस्थानसे बहार-काशी, कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, बगलोर, पूना, बडौदा, अहमदाबाद आदि स्थानोमे स्थापित नूतन साहित्यिक सस्थाओके सग्रहोंमे बड़ी तादादमे जाती रही है। और तदुपरान्त युरोप एव अमेरिकाके भिन्न भिन्न ग्रन्थालयोंमे भी हजारो अन्य राजस्थानसे पहुचते रहे है । इस प्रकार यद्यपि राजस्थानका प्राचीन साहित्य भण्डार एक प्रकारसे अब खाली हो गया है, तथापि, खोज करने पर, अब मी हजारो ग्रन्य यत्रतत्र उपलब्ध हो रहे हैं जो राजस्थानके लिये नितान्त अमूल्य निधि स्वरूप हो कर अत्यन्त ही सुरक्षणीय एव सग्रहणीय हैं। २] हर्ष और सन्तोषका विषय है कि राजस्थान सरकारने हमारी विनम्र प्रेरणासे प्रेरित हो कर, इस राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर (राजस्थान ओरिएन्टल रिसच इन्स्टीटयूट ) की स्थापना की है और इसके द्वारा राजस्थानके अवशिष्ट प्राचीन ज्ञानभण्डारकी सुरक्षा करनेका समुचित कार्य प्रारम किया है। इस कार्यालय द्वारा राजस्थानके गाव-गावमे ज्ञात होने वाले प्रयोकी खोज की जा रही है और जहा कहीसे एव जिस किसीके पास उपयोगी अन्य उपलब्ध होते है उनको खरीद कर सुरक्षित रखनेका प्रबन्ध किया जा रहा है। सन १९५० मे इस प्रतिष्ठानकी प्रायोगिक स्थापना की गई थी, और अब पिछले वर्ष, १९५६ के प्रारभसे, सरकारने इसको स्थायी रूप दे दिया है और इसका कार्यक्षेत्र भी कुछ विस्तृत बनाया गया है। अब तकके प्रायोगिक कार्यके परिणाममे भी इस प्रतिष्ठानमे प्राय १०००. जितने पुरातन हस्तलिखित ग्रन्योका एक अच्छा मूल्यवान् साह सचित हो चुका है। आशा है कि भविष्यमे यह कार्य और भी अधिक वेग धारण करता जायगा और दिन प्रति दिन अधिकाधिक उन्नति करता जायगा। जिम प्रकार उक्त रूपसे इस प्रतिष्ठानके प्रस्थापित करने का एक उद्देश्य राजस्थानकी प्राचीन साहि- लिक सपत्तिका सरक्षग करनेका है वैसा ही अन्य उद्देश्य इस साहित्यनिधिके बहुमूल्य रत्नखरूप ग्रन्थोको प्रकाशमे लानेका भी है। राजस्थानमे उक्त रूपमे जो प्राचीन ग्रन्य उपलब्ध होते है, उनमे से बडो अन्य तो ऐसे है जो अभी तक प्रकाशमे नही आये हे, और सेम्डो ही ऐसे है जिनके नाम तक भी अभी तक विद्वानोको ज्ञात नहीं है। यह सब कोई जानते है कि इन प्रन्योमे हमारे राष्ट्रके प्राचीन सास्कृतिक इतिहासकी विपुल मापन-सामग्री छिपी पड़ी है। हमारे पूर्वज हजारो वषो तक जो ज्ञानार्जन करते रहे उसका निष्पर्ष और नवनीत नीकाल नीकाल कर, वे अपनी भावी सन्ततिके उपयोगके लिये इन ग्रन्था त्मक कृतियोमे सचित करते गये । व्याकरण, कोष, काव्य, नाटक, अलार, छन्द, ज्योतिष, वैद्यक, कामविज्ञान,अर्थशास्त्र, शिल्पकला आदि लौकिक विद्याओके ज्ञानके साय श्रुति,स्मृति, पुराण, धर्मसूत्र, न्याय, वैशेषिक, साख्य, योग, भीमासा, जैन, बौद्ध, शाक्त, तत्र, मत्र आदि वार्मिक दार्शनिक एव आध्यात्मिक विद्याओके रहस्य भी इन अ योमे नाना स्वरूपोमे ग्रथित क्येि हुए है । इसी प्रकार, युग युगमे होने वाले अनेक शूर-वीर, दानी ज्ञानी, सन्त-महन्त, त्यागी वैरागी, भक्त विरक्त आदि गुण विशिष्ट नर-नारी जनोके जीवन और कार्योंके विविध वर्णन -चित्रण भी इन्ही ग्रन्थोमे अन्तर्निहित है । अर्थात् हमारे राष्ट्रकी सर्व प्रकारकी गौरव गरिमाविषयक कथा-गाथाकी रक्षा करने वाला हमारा यही एकमात्र प्राचीन साहित्यसग्रह है। इसीके प्रकाशसे समारमें भारतका गुरुपद ज्ञात हुआ और स्थापित हुआ है । यद्यपि आज तक इनमेसे हजारो ही प्राचीन प्रन्य, प्रकाशमे आ चुके है, फिर भी हजारों ही ऐसे अन्य और बाकी है जो अन्ध- कारके तलघरमे दटे पड़े हैं। इनका उद्धार करना और इन्हे प्रकाशमे रखना यह अब इस नूतन जीवन प्राप्त नव्य भारतके प्रत्येक व्यक्ति और सस्थाका परम कर्तव्य है। इसी कर्तव्यको लक्ष्य कर, इस सस्था द्वारा 'राजस्थान पुरातन ग्रन्यमाला' के प्रकाशनमा आयोजन भी किया गया है । इसके द्वारा सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश और देश्य भापाओमें निबद्ध विविध विषयोके प्राचीन ग्रन्थ, तज्ज्ञ एव सुयोग्य विद्वानोसे सशोषित और संपादित हो कर प्रकाशित किये जा रहे है । अब तक कोई छोटे बड़े २० अन्य प्रकाशित हो चुके है और प्राय ३० से अधिक ग्रन्थ गेमे छप रहे है। राजस्थान सरकार वर्तमानमे, इस कार्यके लिये प्रतिवर्ष २०००० रूपये खर्च कर रही है-पर हमारी कामना है कि भविष्यमे यह रकम बढाई जाय और तदनुसार अधिक संख्यामे इन प्राचीन ग्रन्थोका समुद्धार और प्राशन कार्य किया जाय । साहित्यका प्रकाश ही प्रजाके अज्ञानान्धकारको नष्ट कर, उमे दिव्यताका दर्शन कराता है। माघ शुक्ला १४, वि. स. २०१३ (जीवनके ७० वें वर्षका प्रथम दिन)। मुनि जिन विजय राजरथान पुरातन ग्रन्थमालाके कुछ अन्य ३ - प्रकाशित ग्रन्थ करणामृतपा-ठार सोमेश्वर ४ वालशिक्षाव्याकरण-ठकुर संग्रामसिह संस्कृत ५ पदार्थरत्नमजपा-प० कृष्णमित्र १.प्रमाण मञ्जरी-तार्किक चूडामणि सर्वटेवा- ६ काव्यप्रकाश, संकेत-भट्ट सोमेश्वर चार्य प्रणीत। तीन व्याख्याओसे समलकृत । वसन्तविलास- फागु काव्य २ यन्त्रराजरचना-जयपुर नरेश महाराज ८ नृत्यरत्नकोश-राजाधिराज कुभकर्ण देव सवाई जयसिह समारचित । ९ नन्दोपाख्यान-सस्कृत और राजस्थानी ३ महर्षिकुलवैभवम् - विद्यावाचस्पति स्व. १० रत्नकोश - विविवरस्तुसंग्रह विचारात्मक श्रीम पुसूदन ओझाविरचित । ४ तर्कसंग्रह फक्किका-प० क्षमाकल्याणकृत। ११ चान्द्रव्याकरणम् - आचार्य चन्द्रगोमि ५ कारकसंवन्धोद्योत-प० रभसनन्दिकृत । १२ स्वयभूछद - स्वयभू कवि ६ वृत्तिदीपिका-प० मौलिकृष्णभट्ट कृत। १२ प्राकृतानन्द -ऋवि रघुनाय ७ शब्दरत्नप्रदीप - सक्षिप्त सस्कृत शब्दकोप । १४ मुग्धावबोध आदि औक्तिक संग्रह ८ कृष्णगीति-कवि सोमना पकृत गीतिकाव्य। १५ कविकौस्तुभ-प० रघुनाथ मनोहर ९ शृगारहारावलि-हषकवि विरचित । १६ दुर्गापुष्पांजलि - प० दुर्गाप्रसादजी १० चक्रपाणिविजयमहाकाव्य-प० लक्ष्मी १७ दशकण्ठवधम्- धरभट्ट रचित। १८ कर्णकुतूहल नाटक ११ राजविनोद काव्य-कवि उदयराज रचित। १९ कृष्णलीलामृत काव्य १२ नृत्तसंग्रह-नाट्यविषयक पठनीय अन्य । राज्यस्थानी भाषाग्रन्थ १३ नृत्यरत्नकोश- महाराणा कुम्भकण प्रणीत । १४ उक्तिरत्नाकर-पण्डित सावुसुन्दरगणी कृत। १ बांकीदासरी बाता- चारणकवि बाकीदास १५ कविदर्पण-प्राकृत छ दोरचनात्मक अन्य । २ मुहता नैणसीरी ख्यात-जोधपुरके १६ वृत्तजातिसमुच्चय - विरहाङ्क कवि कृत । मुहता नेणसी लिखित १७ ईश्वरविलास महाकाव्य - प० कृष्णभट्ट ३ गोरा बादल-पदमिणी चउपई - जैन कविकृत । यति कवि हेमरतन कृत राजस्थानी भाषा ग्रन्थ ४ राठोड वशरी विगत-राठोडोके १ कान्हड दे प्रबन्ध-कवि पद्मनाभ रचित । इतिहासकी क्या। २ क्यामखां रासा-मुस्लिम कवि जानकृत । ५राजस्थानी साहित्य संग्रह - राजस्थानी ३ लावारासा- चारणकविया गोपालदानकृत । भाषा मे लिसित विविध प्रत्तान्त । प्रेसोंमें छप रहे ग्रन्थ ६ दाढाला एकल गिडरी बात-राजस्थानी भाषाकी एक सरस प्रहसनात्मक रचना। (क) संस्कृत ग्रन्थ ७ सुजान संवत - कवि उदयराम रचित १ त्रिपुराभारती- लघुपडित चन्द्रवशावलि- कवि मतिराम कृत २ शकुनप्रदीप- लावण्य शर्मा ९ राजस्थानी इन ग्रन्थोके अतिरिक्त अनेकानेक सरकृत, प्राकृत, अपभ्रश, प्राचीन राजस्थानी - हिन्दी भाषामे रचे गये ग्रन्थोका सशोधन- सपादन आदि कार्य किया जा रहा है। दूहा संग्रह इसी तरह राष्ट्र - भाषा हिन्दीमे भी उच्च कोटिके ग्रन्थोके प्रकाशनका आयोजन चल रहा है।
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान संपादक - पुरातत्त्वाचार्य, जिनविजय मुनि
[सम्मान्य सचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर]
चित्रकूटाधिपति-कुम्भकर्ण-नृपतिप्रणीत
नृत्य रत्न कोश
(प्रथम भाग)
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wwwxxxxxxxx प्रकाशक
राजस्थान राज्य सस्थापित
राजस्थान पुरातत्त्वा न्वेषण मन्दिर
जयपुर (राजस्थान)
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान राज्यद्वारा प्रकाशित
सामान्यत अखिलभारतीय तथा विशेषत राजस्थानदेशीय पुरातन कालीन
सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भाषानिबद्ध
विविधवाडायप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्थावलि
प्रधान संपादक
पुरातत्त्वाचार्य, जिनविजय मुनि
[ऑनररि मेबर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी ]
सम्मान्य सदस्य
भाण्डारकर प्राच्यविद्या सशोधन मन्दिर, पूना, गुजरात साहित्य सभा, अहमदाबाद,
विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोधप्रतिष्ठान होसियारपुर, निवृत्त सम्मान्य नियामक -
(ऑनररि डॉयरेक्टर)-भारतीय विद्याभवन, बबई
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aana ग्रन्था ङ्क २४
मदपाटदेशीय चित्रकूटाधिपति कुम्भकर्ण नृपति प्रणीत
नृत्य रत्न कोश
[प्रथम भाग]
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
प्रकाशक
संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
जयपुर (राजस्थान)
माघ
विक्रमाब्द २०१३
०१३} राज्यनियमानुसार
राज्यनियमानुसार सर्वाधिकार सुरक्षित १
फरवरी
खिस्ताब्द १९५७
राजस्थानान्तर्गत-मेदपाटदेशीय-चित्रकूटदुर्गाधिपति
नृपति कुम्भकर्णदेव प्रणीत
नृ त्य रत्न कोश
[विविधपाठभेदादि समलकृत-प्रथमवार प्रकाशित]
(प्रथम भाग- पूर्वार्ध)
संपादक
प्रा. रसिकलाल छोटालाल परीख
(अध्यक्ष-गुजरातविधासभाऽन्तर्गत-भो जे उच्चाध्ययन-'
संशोधन विद्यामन्दिर, अहमदाबाद)
तथा
डॉ. प्रियबाला शाहा, एम् ए पीएच् डी ( बबई)
डी लिट् (पारीस)
(प्रा प्राचीन भारतीय इतिहास तथा सस्कृति विभाग,
रामानन्द महाविद्यालय, अहमदाबाद)
प्रकाशन कर्ता
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
जयपुर (राजस्थान)
विक्रमाब्द २०१३]
[खिस्ताब्द १९५७
WON
मुद्रक - लक्ष्मीबाई नारायण चौधरी, निर्णयसागर प्रेस,
२६-२८ कोलभाट स्ट्रीट, बबई २
-७०
पृ.
"
२
३
७०-८२
८२-१०२
१०२-१०६
४
नृत्यरत्नकोश-अनुक्रम
१ प्रथमोल्लासे -प्रथममङ्गपरीक्षणम्
द्वितीयं प्रत्यगपरीक्षणम्
तृतीयमुपाङ्गपरीक्षणम्
चतुर्थ आहार्याभिनयपरीक्षणम्
५ द्वितीयोल्लासे प्रथम स्थानकपरीक्षणम्
६
द्वितीयं शुद्धचारीपरीक्षणम्
तृतीयं देशीचारी परीक्षणम्
कलानिधिग्रन्थोबतदेशी-
चार्यादिलक्षणम्
चतुर्थ मण्डललक्षणम्
" १०७-११८
११९-१२५
१२६-१३२
७
१३३-१३८
१३८-१४४
८
प्रधानसंपादकीय किंचित् प्रास्ताविक विशाल राजस्थानान्तर्गत मेदपाट (मेवाड) देशकी महत्ता भारतविश्रुत है । इस मेवाडके मस्तकस्थानीय चित्रकूट (चित्तौड) का- जिसको कवियोने पृथ्वीके मुकुटकी उपमा दी है-ऐतिहासिक गौरव, भारतके भूत कालमे अपना अनन्य स्थान रखता है। अतः आधुनिक भारतका प्रत्येक राष्ट्रभक्त इस पुण्यभूमि चित्तौडकी यात्रा करना अपना परम कर्तव्य समझता है । इसी चित्तौडके दुर्गरूप मुकुटमे कलगीके समान, वह जगत्प्रसिद्ध कीर्तिस्तभ विराजमान है, जिसके चित्र भारतके प्राचीन स्थापत्य विषयक प्रत्येक प्रन्थमे और इतिहास विषयक प्रत्येक पुस्तकमे दृष्टिगोचर होते रहते है । चित्तौडके यात्रीको, बहुत दूरसे, सबसे प्रथम दर्शन, इसी कीर्तनरूप कीर्तिस्तभके होते है। चित्रकूट के सबसे बडे वीर और विद्वान नृपति महाराणा कुभकर्णने ( जिनका अधिक लोकप्रिय नाम सक्षेपमे कुभा प्रसिद्ध है) यह कीर्तिस्तभ बनवाया था। स्थापत्य कलाकी दृष्टिसे महाराणा कुभाकी यह कृति अपने ढगकी अनुपम है। सारे भारतवर्षमे इस प्रकारका अन्य कोई कीर्तिस्तभ विद्यमान नही है। महाराणा कुभा, जैसे वीरशिरोमणि नृपति थे वैसे ही वे कला और विद्याके विषयमे भी अद्भुत प्रतिभासपन्न और निर्माण-कार्य-कुशल व्यक्ति थे। उनके अद्भुतकला- प्रेमके द्योतक, चित्तौडके कीर्तिस्तभके अतिरिक्त, आरावली पर्वतमालाके सबसे सुन्दरतम शिखर पर सुशोभित कुभलमेर नामक दुर्ग और उसके अनेकानेक स्थान विद्यमान है । उन्हीके कलाप्रेमसे प्रोत्साहित हो कर, आबूप्रदेश निवासी धन्ना नामक पोरगाड जातिके जैन वणिक्ने आरावलीकी उपत्यकामे राणकपुरका वह अद्भुत जैन मन्दिर बनवाया अपनी विशालता एव कलामयताकी दृष्टिसे, न केवल भारतमे ही अपितु सारे एशिया खण्डमे, एक दर्शनीय स्थान बना हुआ है। महाराणा कुमाके सरक्षणमे उस मन्दिरका निर्माण हुआ अतः उस स्थानका नाम ही राणकपुरके रूपमे सुप्रसिद्ध हुआ। इन्ही महाराणा कुम्भकर्णका बनाया हुआ साहित्यिक कीर्तिस्तभस्वरूप 'संगीतराज' नामक सस्कृत भापाका महान् ग्रन्थ उपलब्ध होता है जिसका एक भाग, प्रस्तुत रूपमे, विद्वानोके करकमलमे उपस्थित है । यह संगीतराज ग्रन्थ बहुत बड़ा है । सोलह हजार श्लोको जितना इसका परिमाण है । १६-१६ अक्षरोकी एक पक्तिके हिसाबसे ३२००० पक्तियोमे यह ग्रन्थ पूर्ण हुआ है। ग्रन्थके नामसे ही ज्ञात होता है कि भारतीय संगीत कलाके विषयमे इस ग्रन्थमे सर्वाङ्ग परिपूर्ण विवेचन किया गया है। हमारे देशकी प्राचीन परपरानुसार सगीतके अन्तर्गत, उससे सबद्ध नृत्य और वाद्य कलाका भी समावेश हो जाता है। अत: इस ग्रन्थमे गीत, वाद्य और नृत्य इन तीनो विषयका बहुत ही विस्तृत और वैविध्यपूर्ण विवेचन किया गया है।
६ नृत्यरत्नकोश राजस्थानके एक महान् नृपतिकी अनुपम साहित्यिक कृति होनेके कारण, इस अन्धराजके प्रकाशनका महत् कार्य 'राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला' द्वारा करनेका हमने आयोजन किया है । इस ग्रन्थका प्रारभिक अशात्मक कुछ भाग 'पाठ्य रत्नकोश'के नामसे बीकानेरके सुप्रसिद्ध अनूप पुस्तकालयके तत्त्वाववानमे प्रकट किया गया था- पर सावनाभावसे आगेका काम स्थगित कर दिया गया । प्रस्तुत 'नृत्यरत्नकोश'की एक प्राचीन पोथी बडोदाके 'गायकवाड प्राच्य विद्या- मन्दिर के ग्रन्थ सग्रहमे, प्राध्यापक श्री रसिकलालजी परीखके देखनेमे आई जिसके बारेमे उनने मुझसे जिक्र किया। सुश्री डॉ. प्रियबाला शाहा, जो उन दिनो प्राध्यापक परीखजीके समीप नृत्यकला विषयक साहित्यका विशेष अवलोकन एव अनुसन्धान कार्य कर रही थी, बडोदा जा कर वह पोथी ले आई और मुझे दिखाई । पोथीका दर्शनमात्र करते ही मुझे ग्रन्थकी विशिष्टता प्रतीत हो गई और तुरन्त मैने श्री परीखजी तथा सुश्री प्रियवालाको इसका सपादन कार्य करनेकी प्रेरणा दी और राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा इसको प्रकाशित करनेकी योजना की । खोज करने पर ज्ञात हुआ कि इस ग्रन्थकी दो अन्य प्राचीन प्रतिया बीकानेरके अनूप पुस्तकालयमे सुरक्षित है। पर वह पुस्तकालय, बीकानेर महाराजके निजी अधिकारमे होनेसे उनकी प्राप्तिकी समस्या हमारे सम्मुख उपस्थित हुई । प्रसगवश स्वर्गवासी भारतीय लोकसभा अध्यक्ष माननीय श्री मावलकरजीसे जिक्र किया, तो उनने बीकानेर महाराजको अपना निजी पत्र भेज कर, हमारे लिये उक्त मूल्यवान्' पोथियोकी प्राप्ति सुलभ कर दी। इन पोथियोके आधारसे, प्रेस कॉपी तैयार होने पर अहमदाबादके ही एक प्रेसमे मुद्रणकार्य प्रारभ कराया गया। कुछ समय बाद सुश्री डॉ प्रियबाला, अपने अध्ययनमे विशेप प्रगति करनेकी दृष्टिसे, फ्रान्समे पारिस-युनिवर्सिटीमे प्रविष्ट होने चली गई। प्रा० श्री परीखजी भी, गुजरात विद्या सभा अन्तर्गत उच्च अध्ययन एव सशोधन कार्यकारी भो० जे० विद्या मन्दिरकी नाना प्रकारकी प्रवृत्तियोमे अत्यधिक व्यस्त रहने के कारण, इस ग्रन्थका मुद्रणकार्य प्राय• ४ वर्ष तक स्थगित सा ही रहा । सुश्री डॉ. प्रियबालाके विदेशसे वापस आने पर मुद्रणका कार्य फिर हाथमे लिया गया। पर अहमदाबादके जिस प्रेसमे प्रथम यह कार्य प्रारभ किया गया था उसका काम सतोप जनक न होनेसे एव प्रेसकी स्थिति भी अन्यावीन हो जानेसे, बबईके सुप्रसिद्ध निर्णय सागर प्रेसमे इसके मुद्रणका प्रबन्ध किया गया । ग्रन्थका वर्ण्य विषय एक प्रकारसे सर्वथा पारिभाषात्मक हो कर गीत-नृत्यादि कलाविशेषज्ञके सु-अभ्यस्त तथा स्वानुभवप्राप्त ज्ञानसे विशिष्ट सबन्ध रखता है । अतः इसका सपादन कार्य वही विद्वान् समुचित रूपसे कर सकता है जिसका साहित्यिक अध्ययन एव प्रायोगिक अनुभव-दोनो ही यथेष्ट प्रमाणमे हो । प्रस्तुत ग्रन्थके सपादक- ।
। किञ्चित् प्रास्ताविक द्वय इस विपयके उतम विशेषज्ञ है। श्री परीखजी गुजरातके ख्यातिप्राप्त नाट्यकार- एव नाट्यकलाविदोके अग्र दिग्दर्शक है । सगीतराज महाग्रन्थका प्रस्तुत 'नृत्य रत्न- कोश' प्रकरण ४ उल्लासोमे विभक्त है । इनमे से प्रथम दो उल्लास, प्रथम भागके रूपमे, प्रकट किये जा रहे है । अवशिष्ट २ उल्लास, द्वितीय भागमे आवेगे, जो प्रेसमे छप रहा है । सपादकोकी लिखी गई विस्तृत प्रस्तावना आदि विवेचना, उसी द्वितीय भागमे दी जायगी, तथा ग्रन्थकी प्राचीन प्रतिया एव उनके बारेमे जानने योग्य अन्यान्य सब बातोका विवरण भी उसीमे दिया जायगा। इस संगीतराज ग्रन्थके भिन्न भिन्न खण्डोकी जो प्राचीन पोथिया प्राप्त हो रही है, उनमे, परस्पर, ग्रन्थकर्ताविषयक प्रशस्त्यात्मक विशिष्ट उल्लेखोमे विचित्र पाठ भेद मिलता है। एक प्रतिमे महाराणा कुभकर्णकी जगह, किसी महाराज कालसेन और उसकी कीर्तिकथासूचक वर्ण्य प्रशस्ति दी हुई मिलती है । बीकानेरसे प्रकाशित 'पाठ्य रत्नकोश की प्रस्तावनामे, उसके सपादक विद्वान् डॉ० कुन्हनराजाने इस विपयको ले कर बडे तर्क-वितर्क किये है ओर ग्रन्थकर्ता के बारेमे, वे एक प्रकारसे, बडे भ्रममे पड गये है। हमको इस भ्रमके निराकरणके लिये उन पोथियो ही से प्रत्यक्ष सामग्री प्राप्त है अतः इसका वर्णन भी उसी अगले भागमे दिया जायगा । बबई - भारतीय विद्या भवन दिनाक - २७, जनवरी १९५७ मु नि जि न विजय -- -
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मेदपाटदेशाधीश्वर-श्रीकुम्भकर्णनृपति-विरचितः नृत्य रत्न कोशः। 5 10 15 प्रथमोल्लासे प्रथमं परीक्षणम् । [ मङ्गलम् ।] उच्चैर्नाथ मुजाङ्गहाररचनां सद्धस्तकोल्लासिनी खान्येवं करणानि योजय पदे मा संभ्रमं प्रापय । कौचे चारचयाशयानुगतिकाचारीः शुभे मण्डले संप्रोक्तोऽजियेति सौरतरसे नृत्यन् शिवः पातु वः॥ एतत् किं जलमाङ्गिकं ननु मृषा किं वाचिकं तन्यते नो मिथ्या सदृशं तदेवमधुनाऽहार्य विभो युज्यते । मुग्धे सात्त्विकमेतदन विदितं किं नेति ते तत्त्वतो गङ्गां मूर्द्धनि गोपतो विजयते शम्भोगिरां विभ्रमः ॥ शिरोदेशे [चन्द्र ?] रुचिरकरपद्मेऽक्षवलयं वरे वक्षःपीठे पृथुभुजगहारोज्वलमणिम् । शिवां पार्श्वे कट्यां फणिमणिगणारब्धरशनां पदाब्जे बिभ्राणः कटकमहिजं वोऽवतु शिवः ॥ ३ [नाट्यशास्त्रस्य निष्पत्तिः।] पाव्या(नाव्या?)देरुपयोगार्थमथ नृत्यं प्रपश्यते । तदभावे यतः सर्व निर्जीवमिव भासते ॥ न नृत्येन समं किञ्चिद् दृश्यं श्रव्यं च विद्यते । चतुर्वर्गफलावाप्तित्यादेव यतः स्मृता ।। कैश्चिद' प्रमादिभिर्धर्मः कैश्चिदर्थोऽप्युपार्जितः। कैश्चित् कामफलं प्राप्तं कैश्चिन्मोक्षोऽपि नृत्यतः॥ प्रागल्भ्यमप्रगल्भानां सौभाग्यं च तदर्थिनाम् । उत्साहो हीनमनसां कीर्तिरौदार्यशालिनाम् ॥ t a begins -श्रीगणेशाय नमः, 50 ई० ॥ श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः ॥ 1 ABC द्वार। 2 ABO °री। { 50 द्रियते। 4 ABO °देशेरुचि। 5 ABO °मणि । 6pe "ता.। 7 80 °श्चि ब्रह्मा । ४20 25 ८ नु०र० को० उल्लास १, परीक्षण १ [नाट्यशास्त्रपारम्पर्यम ईश्वराणां विलासश्च स्थैर्य चञ्चलचेतसाम् । दु:खिनां धैर्यकरणमिन्द्रियाणां तु कार्मणम् ॥ यूनां शृङ्गारसर्वखं मानो मानवतामिदम् । एतद् धन्यतमं लोके खर्गेऽप्येतत् प्रशस्यते ॥ भूपानामभिषेचने पुरगृहमावेशिके कर्मणि प्रेष्ठानामपि सङ्गमे सुतजनौ पर्वखभीष्टाप्तिषु । यात्रायां विजयोत्सवे सुरगमे वैवाहिके मङ्गले मङ्गल्येषु च सर्वकर्मसु तथा यज्ञादिपूर्तेष्वपि ॥ or 5 10 wwwwwwwwwwwww 15 wwwww [नाट्यशास्त्रस्य पारम्पर्यम् ।] मङ्गल्यं जनताप्रियं नरपतिमेष्ठं विशेषादिदं शोभायं परमेतदेव जगतां नृत्यं प्रमोदास्पदम् । 'इन्द्राभ्यर्थनया पुरेदमखिलं साङ्गं विधाताऽभ्यधात् सोऽपीदं भरताय साङ्गमदिशत् तत्प्रार्थनाभ्यर्थितः॥ ११ नाव्यादित्रितयं ततः स तु सुतैः साकं शतेनाप्सरो- वृन्दैश्चापि शिवाग्रतोऽयमहिम प्रायुक्त तत् प्रीतिविद् । एवं प्रीतिपरम्परापरवशोऽप्यस्मै तदादीहशत् शम्भुस्ताण्डवमुद्धताङ्गरचनं खोपक्रमं तण्डुना ॥ १२ लास्यं चास्य पुरः पुरा खभणितैरङ्गैबिपञ्चैयुतं पार्वत्याः समदीदृशत् स भगवान् सर्वज्ञचूडामणिः । नन्वेतद् विदितं परोन्नतिभृतोऽन्योत्कर्षसर्वकषाः प्रायेणैव परोन्नतिं धृतिभृतः के वा सहन्ते बुधाः॥ १३ एवं ते भरतात्मजा गणवरात्तण्डोर्विदित्वावदन् मर्येभ्यः किल ताण्डवं गिरिसुता बाणात्मजां तामुषाम् । लास्यं साङ्गमबीभणत् पुनरुषा गोपीगणं प्रीतित- स्तेन प्राप्य ततः समग्रमुदितं सौराष्ट्रयोषाग्रतः॥ नानादेशसमुद्भवाश्च ललनास्ताभिस्ततः शिक्षिता- स्ताभ्योऽप्यन्त्र परम्परागतमिदं लोके प्रतिष्ठामगात् । पार्थायैतदुपादिशत् पुनरिदं गन्धर्वलोकाधिपः श्रीमान् चित्ररथस्तदेतदखिलं मार्गाभिधं तत्त्वतः ॥ 1 ARO इन्द्रोभ्य। 2 ARO 'त्या समु। 3 B मर्तेभ्यः। '4 ABO ना तामि। 20 Wwwmwww AM w www 25 .. WN WM शास्त्रसंग्रहः] नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ तेनेदं च विराटराजदुहिता संशिक्षिताऽत्रोत्तरा तस्योच्छित्तिरभूदिहापि कियता कालेन तद् वै पुनः। आराध्याखिललोकशोकशमनं शम्भु नृपः साकल- स्तस्मात् साङ्गमवाप्य महँनिवहायोपादिशद् विस्तरात् ॥१६ कालेनाथ पुनर्विलीनमिव तद् दृष्ट्वा गणग्रामणी शम्भुः कुम्भनृपोपधिः प्रयतते वक्तुं विदामग्रणीः । 'नाट्यादित्रिविधोपपत्तिकलनोपेतस्य तस्याधुना नानार्थाभिनयप्रपञ्चरचनारम्यः क्रमो वर्ण्यते ॥ 10 १८ १९ २०15 २१ २२ [ शास्त्रसंग्रहः।] निष्पत्तिर्नाट्यशास्त्रस्य तत्पारम्पर्यकीर्तनम् । निर्मितिर्नाट्यशालाया निवेशोऽथ सभापतेः॥ संनिवेशः सभायाश्च सर्वरङ्गार्थकीर्तनम् । कीर्तनं पूर्वरङ्गाङ्गप्रत्याहारादिलक्ष्मणः ॥ [आदौ ?] सम्यक नान्दीलक्ष्म ध्रुवा सोपोहना ततः। पात्रस्याथ प्रवेशश्च तथैवाङ्गनिरूपणम् ॥ प्रत्यङ्गलक्ष्मोपाङ्गानां लक्ष्माभिनयलक्षणम् । हस्तस्य करणं हस्तक्षेत्रस्यापि च लक्षणम् ॥ प्रचारो हस्तयोस्तबद्धस्तकर्माण्यनुक्रमात् । स्थानकानि तथा चार्यों द्विविधा मण्डलान्यपि ॥ द्विविधानि तथा नृत्तकरणानि तथैव च । तानि चोत्लुतिपूर्वाणि कलासाश्च सरेचकाः॥ करणैरभिनिवृत्ता अङ्गहारा द्विधा ततः। वृत्तयश्च तथा न्यायाश्चातुर्विध्यमुपाश्रिताः ॥ देशनृत्तविधिधा तथा परिवडिर्मता। नृत्तं पेरणिनस्तस्य लक्षणं पात्रलक्ष्म च ॥ लास्याङ्गानां तथा लक्ष्मोपाध्यायाचार्ययोस्तथा। नटनर्तकयोस्तद्वलक्ष्म वैतालिकस्य च ॥ लक्षणं रेचकस्याथ देशीनुत्तभिदां तथा । लक्षणं रासकादीनां लक्ष्म कोह्लाण्टिकस्य तु॥ 1 ARO योगादि। 2 BO नट्यादि। 3 ABO नादी। 20 २३ २५ १०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [नाट्यशालानिर्माणम् नृत्तश्रमविधिस्तद्वत् संप्रदायस्य लक्षणम् । तद्गताश्च गुणा दोषाः क्रमेणैतत् प्रकाश्यते ॥ २८ 5 २९ 10 ३२ ३३ 15 [नाट्यशालानिमाणम् ।] निष्पत्तिर्नाट्यशास्त्रस्य तत्पारम्पर्यकीर्तनम् । उभयं पूर्वमेवोक्तमथ निर्माणमुच्यते ॥ नाट्यशालागतं तत्र परीक्षेत भुवं पुरः। नाव्यवेश्मगतः कुर्याद् वास्तु लक्षणलक्षितम् ॥ दोषैरदूषिता भूमिः समा गौरी स्थिरा दृढा। अनूषरा भूमिदोषैः कीलकायैरदूषिता॥ लागलोल्लिखिता शस्ता तत्राणि समासतः। हस्तपुष्यानुराधान्त्यसौम्यचित्रोत्तरासु च ॥ द्विदैवये दिने शस्ते विष्टयाथैरपरिप्लुते । पुण्याहवाचनायेन नाट्यवेश्म समारभेत् ॥ समां कृत्वा भुवं तत्र सितं सूत्रं प्रयत्नतः। कासाद्यन्यतरजं दृढं नूनं प्रसारयेत् ॥ यदाकृष्टं बलात् पुम्भिन त्रुट्यति कदाचन । मध्य-त्रिभाग-तुर्याशे त्रुटिते क्रमतो भवेत् ॥ विभु-राष्ट्र-भयोक्तृणां फलं दोषावहं तथा हस्तात् प्रसार्यमाणेऽस्मिन् भ्रष्टेऽप्यपचयो भवेत् ॥ ततः सूत्रं दृढं कार्य नाट्यवेश्म विनिर्मिती । तत् त्रिधा गदितं वेश्म निकृष्टं चतुरस्रकम् ॥ त्र्यस्त्रं चेति पुनर्मध्यं दीर्घ सममिति द्विधा । तत्रायं देवतागारमतिदीर्घमनुत्तमम् ॥ चतुरस्रं च यद् दीर्घ भूपतीनां तदीरितम् । ब्राह्मणादेहं प्रोक्तं चतुरस्त्रं समं बुधैः ।। शुद्रादिहीनवर्णानां वेश्म त्र्यसमिहोदितम् । प्रेक्षागृहाणां निर्माणे प्रमाणं विश्वकर्मणा ।। निर्दिष्टं तत् प्रबोद्धव्यमणुश्चैव रजस्तथा। वालो लिक्षा च यूका च यवाश्चैवाङ्गुलं तथा ॥ 1 B0 दृढ। 2 AB0 तर्दिष्टं । ३५ 20 ३८ 25 ४० ४१ ४२ 5 ४५ ४६ 10 नाट्यशालानिर्माणम् ] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ एकैकोत्तरवृद्ध्या च क्रमादष्टगुणं त्विदम् । हस्ताङ्गुलानां विंशत्या चतुरन्वितया मितः ॥ चतुर्हस्तो भवेद् दण्डो नाट्यवेश्ममिती सदा । तत्र स्यान्नाकिनां वेश्म 'सप्तविंशतिदण्डकम् ॥ दैर्ये विस्तरतस्तत् स्यात् तदर्धेन मितं पुनः। नृणां षोडशभिर्दण्डैर्मितमायामतो मतम् ॥ 'त्रिरष्टभिस्तु विस्तारे तत्र सूत्रं प्रसारयेत् । नाट्यवेश्म न कर्तव्यमत ऊर्वं कदाचन ॥ प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां मध्यमं मानमिष्यते। यतस्तस्मिन् कृतं पाव्यं गेयं च श्रव्यतां ब्रजेत् ॥ संसाध्या भूमिरायामे पूर्वपश्चिमयोर्दिशोः । दक्षिणोत्तरविस्तारो प्रतीच्या विभजेच्च ताम् ॥ दण्डैश्चतुभिर्दाभ्यां च द्वाभ्यामष्टाभिरेव च । चत्वारः स्युः क्रमाद् भागास्तेषु पश्चिमतो भवेत् ॥ नेपथ्यस्य गृहीतस्य पुरतो रङ्गशीर्षभू।। तदग्रतो रङ्गपीठं तत् पुरस्तात् सभास्पदम् ॥ भुवमित्थं विभज्याथ बलिं दद्यानिशामुखे । ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा च नानारनैरलतान् ॥ मृदङ्गपटवायैश्च शङ्खदुन्दुभिगोमुखैः । सर्वातोद्यैः प्रणुदितैरुलूलध्वनिपेशलैः ।। काषायवसनादीनां पाषण्ड्याश्रमिणां तथा। उत्सारणमनिष्टानां कृत्वा दिक्षु दशखपि । पुष्पाक्षतादिभिर्मन्नस्तल्लिङ्गः शुचिमानसः ॥ यादृशं दिशि यस्यां स्याद् दैवतं निगमोदितम् । ताहशस्तत्र दातव्यो बलिर्मनपुरस्कृतः॥ सितरक्तनीलकृष्णपीतधूम्रारुणामलम् । प्रागादिदिक्पतिभ्योऽन्नं कल्पयेत् प्रयतात्मवान् ॥ ४८ 15 ४९ ५० ५१20 ५२ ५३25 1 AB0 °श्मनिती। 2 ABO °सप्तावि। 2 ABO °सप्तावि। 3 ABO तिरष्ट ।
5 10 ५९ ६० नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [नाट्यशालानिर्माणम् मुहूर्तेनानुकूलेन मूलेन अवणेन वा। रोहिण्यां 'वोपोषितः सन्नुपाध्यायः समाहितः ॥ ५५ स्तम्भानां स्थापनं कुर्याल्लग्ने सद्ग्रहवीक्षिते। सुशिल्पिघटिताः स्थाप्याः कुम्भिकाः पूर्वमेव ताः॥ ५६ अन्तर्बहिर्मानसूत्रादर्धेन स्युः स्थिरं स्थिताः । अग्निकोणं पुरस्कृत्य स्तम्भाः स्युर्ब्राह्मणादयः॥ ५७ वर्णताम्ररूप्यलोहस्तन्मूलेऽनुक्रमात् क्षिपेत् । स्तम्भान् संपूजयेत् पश्चाद् वस्त्रमाल्यानुलेपनैः ॥ पीते रकैस्तथा श्वेतैनीलैश्चैव यथाक्रमम् । पायसं गुडोदनं च कृतान्नं कृशरां तथा ॥ द्विजेभ्यो भोजनं दद्यात् स्तम्भानुक्रमतः सुधीः । तानुत्थाप्य शनैर्विद्वांश्चल-कम्पविवर्जितान् ॥ स्थापयेत् कुम्भिकाशीर्षे शान्तिपाठपुरस्सरम् । यतस्तञ्चलने राष्ट्रेऽनावृष्टिः कम्पने तथा ॥ परचक्रभयं तस्मात् तत्र यत्नो विधीयते। स्तम्भस्थापनमन्त्रोऽयं प्रणवादिनमोन्तकः ॥ यथाचलो गिरिमरुहिमवांश्च महाचलः। जयावहो नरेन्द्रस्य तथात्वमच[लो भव] ॥ अनेन स्थापितान् स्तम्भान् पश्येद् दक्षिणतो नगान् । विप्रराजन्ययोर्मध्ये भुवा खाकान्तया सह ॥ सौम्ये सप्तापरांस्तद्वन्मध्यतो वैश्यशुद्रयोः । एवमष्टादशैते स्युः स्तम्भाः साष्टकरान्तराः ।। भुवा खाक्रान्तया साकं इक्षिणेतरपार्श्वयोः। पूर्वपश्चिमयोस्तद्वद्धस्तषोडशकान्तरौ ॥ द्वौ द्वौ स्तम्भौ समारोप्यो स्वार्धाक्रान्तभुवौ पृथक् । तयोर्मध्ये तथा स्तम्भौ साष्टहस्तान्तरौ पृथक् ॥ खार्धाकान्तभुवौ स्थाप्यौ द्वौ द्वौ पश्चिम पूर्वयोः। एवं स्युर्वसवस्तम्भाश्चाथ' मध्यभुवि क्रमात् ।। ६८ 15 20 25 1 B0 वापा। 2 AB0 °ध्याय स। 3 ABO स्तभास्युः। 4 ABO °अल'। 5 ABO °च॥। 60 °मर्व। 7 ABO श्वथ।
७ ६९ 5 ७३ 10 ७४ नाव्यशालानिर्माणम्] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ स्थितस्तम्भानुसारेण सप्त सप्तापरान् सुधीः'। विन्यसेत् सूत्रमास्फाल्य चतसृष्वपि पतिषु ॥ पञ्चहस्तमितायामान विस्तारे हस्तमात्रकान् । चतुःपञ्चाशदुदितान् सह पूर्वैमनोरमान् ॥ यत्पतिद्वितयं पार्श्वे पड्लिर्या मध्यतः स्थिता। तासु कोष्ठाष्टकं कार्य समन्तादष्टहस्तकम् ॥ मध्यपङ्क्तेस्तु ये पक्षी पार्श्वतः समवस्थिते । तन्मध्ये तु स्थिते पती ये ते पूर्वेऽष्टकोष्ठकैः दैर्येऽष्टहस्तकैप्से चतुर्हस्तविभूषितैः । विस्तारायामयोर्यद्वा तां भूमि विभजेद्बुधः॥ द्वात्रिंशता तथा हस्तैश्चतुःषष्ट्या यथाविधि। द्वात्रिंशदेवं कोष्ठाः स्युश्चतुरस्रा मनोहराः॥ आयामे परिणाहे च करैः षोडशभिर्मितम् । मध्यकोष्ठचतुष्कं तु रङ्गपीठं प्रकल्पयेत् ॥ पूर्ववद्रङ्गपीठस्य वह्निकोणादिकोणगान् । ब्राह्मणाद्युपधिस्तम्भान् स्थापयेत् शिल्पिसत्तमः ॥ करैः षोडशभिः सम्यगन्तरालविभूषितान् । चतुस्त्रिंशत् पुनः स्तम्भानन्यान् वेधविवर्जितान् ॥ साष्टहस्तान्तरान् विद्वान् यथाभागमवस्थितान् । स्थापयेदेवमेतस्मिन्नष्टत्रिंशन्मनोहरान् ॥ यद्वा द्वात्रिंशता हस्तैरायामपरिणाहयोः । चतुरसां भुवं कृत्वा स चतुःषष्टिकोष्ठकम् ॥ मध्ये कोष्ठचतुष्केऽस्यां रङ्गपीठं प्रकल्पयेत् । रङ्गपीठात् पृष्ठभागे रङ्गशीर्ष प्रकल्पयेत् ॥ तत्पूर्वभागे नेपथ्यभवनं साधु कारयेत् । अग्निकोणादिषु ततः क्रमेण स्तम्भवेशनम् ॥ ७५ 15 ७० ७८20 ७९ 25 - 1 50 °सुधी। 2 80 चतुर्हस्तविभूषितैः षष्ट्या यथाविधिः while though A has the same reading it has these'l "marks of deletion ८३ 5 ८४ ८५ 10 ८७ नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [नाट्यशालानिर्माणम् ब्राह्मणाद्युपधिच्छन्नं 'पीठनेपथ्यवेश्मनो। 'खार्धाकान्तं भुवा साकं चतुर्हस्तान्तरालतः॥ ८२ प्रतिकोणं यथा कोणस्तम्भाभ्यां सह सर्वतः। तथा षोडश संस्थाप्याः स्तम्भाः सूत्रानुरोधतः ॥ आयामे तेऽष्टहस्ताः स्युर्विस्तारे स्युश्चतु:कराः। चतसृष्वपि काष्ठासु रङ्गपीठस्य कोष्ठकाः ।। ते त्रयस्त्रयोऽसंभूय स्युश्चतुःषष्टिसंख्यकाः। स्तम्भा एकोनपञ्चाशनाट्यवेश्मनि कोष्ठकाः ॥ मूर्ध्नि तेषां विचित्राणि काष्ठानि परिकल्पयेत् । भरणाख्येषु काष्ठेषु विचित्राः शालभञ्जिकाः ॥ ८६ कार्या मूर्द्धसु तेषां स्युर्धरिण्यः शिल्पिसंस्कृताः। ताखथ स्थापनीयं स्यात् तिर्यग् दारुचयं दृढम् ॥ परस्परं संहताः स्युः पट्टिकास्तत्र दारुजाः। मुश्लिष्टसंधिकं रन्ध्र निर्मुक्तं स्याद् यथा तथा॥ छादनीयं प्रयत्नेन काष्ठानामन्तरालकम् । छादनक्रममाश्रित्य परं लोहानुसारतः ॥ ८९ तथा सुधा निधेयाऽत्र यथा चन्द्रकराः परम् । तत्रानुबिम्बमासाद्य चन्द्रकोटिभ्रमावहाः ॥ स्युरेवं भित्तिकर्माथो शिल्पिवर्यः प्रयोजयेत् । स्तम्भ वा नागदन्तं वा वातायनमथापि वा ॥ ९१ कोणं वासप्रतिद्वारं द्वारं विद्धं न कारयेत् । दृढमूला समा भित्तिः पक्वेष्टकचिता हढा ॥ यथोचितद्वारदेशस्तम्भाईच्छादनोचिता। चन्द्रबिम्बप्रतीकाशा सुधालेपविभूषिता॥ विचित्रचित्र संयुक्ता वात्स्यायनविनिर्मितैः । रतप्रबन्धरुचिरा नानानाटकचित्रिता ॥ नायिकानायकोपेतनानारूपविचित्रिता । लताशालिकापिण्डीमेदवन्धविनिर्मितः॥ ९५ ८८ 15 ९० 20 ९२ 25 ४ 1 0 पीठे ने 1 2 ABO स्वस्वाक्रान्त | 3 BU स्तम्भास्यसह। 4 B0 तेषा। 5 ABO स्याति । 6 50 सुयुक्ता। 7 0 नायिको ।
Am ९७ 10 ९८ १००10 वाव्यशालानिर्माणम्] नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण श्रीकुम्भकर्णसङ्गीत-गीतगोविन्दरूपकैः । कर्तव्या चित्रिता भित्तिर्विचित्रा चित्रकर्मठेः ॥ नेपथ्यवेश्मनस्तत्र द्वारं पश्चिमतः स्मृतम् । एकमन्यद् रङ्गपीठप्रवेशाय प्रयोजयेत् ॥ पूर्वतो द्वारमेवं स्यात् तत्र द्वारद्वयं शुभम् । नेपथ्यमन्दिरे तत्र रङ्गशीर्ष प्रकल्पयेत् ॥ षड्दारुकयुतं तस्य विधिरत्र प्रपञ्च्यते । पूर्वद्वारस्य पार्श्वस्थं कर्तव्यं स्तम्भयुग्मकम् ॥ तवधश्चोर्ध्वतश्चापि दारुद्वन्द्वं मनोहरम् । विचित्ररचनं कार्यमेतत् षड्दारुकं भवेत् ॥ ब्राह्मणादिचतुःस्तम्भाभ्यन्तराले यदीरितम् । रङ्गपीठं च तत् कार्य नात्युचं नातिनिम्नकम् ॥ समन्तादष्टहस्तं तदादर्शतलसंनिभम् । लिग्धं समतलं खच्छं तत्र स्यान्मत्तवारणी॥ दक्षिणोत्तरपार्श्वस्थस्तम्भयुग्मसमाश्रया। साधारकाष्ठरुचिरा वर्णकैरुपभूषिता ॥ रत्नानि चात्र देयानि वज्रं पूर्वदिशि स्मृतम् । वैदूर्य दक्षिणे पार्चे पश्चिमे स्फटिकं तथा ॥ उत्तरे तु प्रवालं स्याद् मध्ये कनकमीरितम् । एवमेतस्य विदुषा कर्तव्योपरिभूमिका ॥ चतुस्स्तम्भसमायुक्ता सुवर्णकलशोज्वला । यथा शैलगुहाकारो जायते नाट्यमण्डपः॥ गम्भीरशब्दवान् मन्दवातायनपरिष्कृतः। निर्वातोऽतिप्रयत्नेन यस्मादेवं कृते सति ।। कुतपस्य प्रजायेत गम्भीरध्वनितोचिता। पुरतो रङ्गापीठस्य मध्यपङ्के: सुकोष्ठके । पञ्चमे वाथ षष्ठे वा स्थानं कार्य सभापतेः। निवेशनार्थमुत्सेधेनार्धहस्तं तु तत् स्मृतम् 15 १०५.20 १०६ १०७ 25 १नृ० रन.
१० नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ? [सभापतिलक्षणम् सुधाधवलितं शुभ्रं नानाभङ्गिमनोहरम् । अन्येष्वपि च कोष्ठेषु यथायोग्योन्नतानि तु॥ आसनानि प्रकल्पयानि विविधानि शुभानि च । नेपथ्यभित्तितो भित्तिं दशहस्तान्तरां दृढाम् ।। १११ पञ्चहस्तोन्नतां कुर्यात् परितोऽन्यां सनिर्गमाम् । तत्र रक्षिजनाः स्थाप्या अप्रमत्ताः समन्ततः॥ एवंविधानसंयुक्तं नाट्यवेश्म भुवो विभुः। जयायुःकीर्तिजननमन्यथा न शुभावहम् ॥ ॥ इति नेपथ्यगृहलक्षणम् ॥ 5 ११२ 10 [ सभापतिलक्षणम् ।] रामायुत्तमनायकप्रतिनिधिः स्वस्थः कुलीनो युवा पात्रापात्र विशेषवित् स्थिरतमप्रेमा कलाकोविदः। गीतज्ञः सकलागमार्थनिपुणो विद्वत्प्रियः सत्यवाक् खाधीनाखिलसेवको बहुधनोऽभीष्टार्थदानोदुरः॥ रूपखी परचित्तविद् गुणगणग्राही कृतज्ञो गुणी धर्मिष्ठो रसभावविजनमनोहारी सुवेषः सुखी । शृङ्गारी बहुदोऽनपेक्ष्यविभवः कीर्तिप्रियः कामुक प्राप्तौचित्यविशेषविच्छुचिमनाः प्रोक्तः सभाधीश्वरः ॥११५ ॥ इति सभापतिलक्षणम् ॥ ११४ 15 20 [ सभासन्निवेशः।] पीठस्यास्य पुरः सभास्तरणयुक्सद्वेदिकायां विभु- हैमं खस्थविचित्ररत्नखचितं सिंहासनं भाखरम् । अध्यासीत तदप्रदेशमहितो मन्त्री ततो दक्षिणे नानाशास्त्रकलाविशेषकुशलाः काव्यार्थनिष्ठामिताः ॥११६ विश्वार्थाभिनयप्रपञ्चचतुरास्तौर्यत्रिकज्ञा रसा- वेशाभिज्ञ नवीनबुद्धिविभवाः खस्वामिचेतोविदः । भावज्ञाः कवयो विशेषविदुषः सत्पण्डिताश्चात्र ये वैद्या ज्योतिषशास्त्रनिष्ठधिषणा ये भूपतेर्वल्लभाः॥ ११७ 25 1 ABO विद्विति। PABO °भिशनन। 3 ABO नष्ट ।
5 10 सभासनिवेशः] नृ०२० को०-उल्लासर, परीक्षण १ ते स्युर्दक्षिणतो विभोर्नवनवखखोचितान्यासना- न्यध्यास्य प्रतिभाविशेषविजितेन्द्रज्या: सभापण्डिताः। वामेनास्य पुनः सुता नरपते पुण्यभाजो जना ये चान्येऽभिनयप्रवीणमतयो नृत्येष्वभिज्ञाः पुनः ॥ ११८ पृष्ठे चास्य वराङ्गना नरपतेः स्युरिनार्यों लसत्- तारुण्याकरभूमयो वसतयो लावण्यलीलाश्रियाम् । चित्रालतिभूषिताः सिततरैर्नेबाञ्चलैः कामिनां यूनां चित्तविवेकवैभवमलं संच्छादयन्त्यो निजैः॥ चश्चद्रनमयोरुनूपुररणत्कारैर्विलासोल्लसद्- भावैर्मानससंभवं निजनिजैरुबोधयन्त्योऽन्वहम् । संसिञ्जत्करचारुचामरमरुत्संवीजयन्त्यः स्मित- ज्योत्लाशुध्रितदिङ्मुखाः परवशीकारैकसत्कर्मणा ॥ १२० अग्रे वेत्रधरा नृपेशितविदो मान्येतरज्ञानिनो दक्षा रक्षणकर्मणि प्रतिपदं संप्राप्तसंवेदकाः। प्रोदञ्चजयजीवमङ्गलशिर सेवा विदग्धाः सदा तिष्ठेयुः परितः समीरितदृशो नित्यं नृपस्याग्रतः॥ १२१ शश्वद्राजकुलोद्भवाः सुनिपुणा नित्यानुरक्ता नृपे नो भिन्ना न च संहता परिगतान्योन्यानुरागस्पृहाः । स्पर्धाबन्धमनोहरा परिगतानेकास्त्रविद्योद्धरा- स्तिष्ठेयुः परितोऽस्य रक्षणविधावुद्यत्समस्तायुधाः॥ १२२ 20 नानादेशविचारचारुमतयो नाव्यागमे पारगा वैदग्ध्यामृतवाहिनीजलधयश्वाञ्चल्यलेशोज्झिताः। द्रष्टारो विविधक्षितीश्वरसभास्थानस्य मानेप्सवो वर्तयुः परितोऽस्य बन्दिनिवहास्तत्कर्मसंशंसिनः॥ १२३ ॥ इति सभासनिवेशः॥ 15 25 [पूर्वरङ्गः।] एवं तत्र समग्रलक्षणपरीवारे सभानायके- ऽध्यासीने रुचिरोरुमौक्तिकमणिप्रायं सुसिंहासनम् । 1 B0 °न्द्रेस्या। 2 ABO मलः। 3 B0 सेवादि।
[पूर्वरज. १२४ १२५ 5 १२६ १२७ 10 १२८ १२९ नु० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ नाव्याचार्य उपेत्य तत्तदुचितप्रावीण्यविद्भिः सम वग्यः संविदधाति रूपकविधेस्तं पूर्वरङ्गं सुधीः॥ अभिनेयार्थतादात्म्यपटुः स्फुटतरो नटः। पदार्थाभिनयाञ्चित्रं व्यञ्जयन् स्यात् तदग्रतः ॥ रसाभिधायकं नाट्यशब्दे नाट्येऽपि वृत्तितः। लक्षणाया वर्तमानमुभयं दर्शयन् स्फुटम् ॥ तथा च नृत्यशब्दार्थमुभयानुग्रहं वदन् । नृत्ये चाभिनये साक्षाद् वक्ति लक्षणयान्वयम् ॥ नाट्येनाभिनयं नृत्यशब्देन च रसं पुनः। वृत्त्या लक्षणया साक्षादुभयं दर्शयन् पदम् ।। करणालाहारनिचयनुत्तमत्रोपदर्शयन् । रसा सभ्ये नटे वास्य विकलस्य जिहीर्षया ।। खात्मानं तन्मयं कुर्वन्निव रङ्गमुपाश्रयेत् । ततः कुतपविन्यासाद्यङ्गप्रचयपेशलम् ॥ सूत्रधारः पूर्वरङ्गं प्रयुङ्क्ते नाव्यतत्त्वगम् । यतो रसात्मकस्यास्य प्रयोगे प्रयुयुक्षिते ॥ रज्यते वै सहृदयः पूर्वरङ्गस्ततः स्मृतः। सपादभागः सकलः परिवत्तैः समन्वितः॥ प्रयोगोऽयं यतो रङ्गे पूर्वमेव प्रयुज्यते । तेनोक्ता भरताचार्यप्रमुखैः पूर्वरङ्गता ।। रकशब्देन तत् कर्मोच्यते तौर्यत्रिकाश्रितम् । तत्पूर्वभागो विद्वद्भिः पूर्वरङ्ग उदीरितः॥ सोपोहनास्तद्विना वा ध्रुका उत्थापनीमुखाः। सूत्रधारप्रवेशार्थी यतोऽस्मिन् पूर्वमेव हि । प्रयुज्यते ततः पूर्वरङ्गता वास्य संमता ॥ चतुरस्र-व्यत्रभेदादू द्विविधः स पुनर्द्विधा । शुद्धचित्रविभेदेन पृथगेवं चतुर्विधः॥ करणाङ्गहारराहित्यं शुद्धता चित्रता पुनः। तत्सद्भावोऽथ चित्राद्यैर्मागैमिन्नधुवायुतः ॥ - +50 प्रयुते। 15 20 25 १३५ पूर्वरङ्गाङ्गसंग्रहः] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ चतुरस्रस्तथा त्र्यस्रः षड्विधः कैश्चिदिष्यते। केषांचन मते मिश्रो द्वयं संमिश्रणान्मिथः॥ १३८ १३९ 10 १४१ [पूर्वरङ्गाङ्गसंग्रहः।] अथाभिधास्यते सम्यक पूर्वरङ्गाङ्गसंग्रहम् । प्रत्याहारोऽवतरणमाश्रवणारम्भवक्त्रपाणी च । परिघनाथ संघोटनाथ मार्गासारितं च [१]॥ आसारितोत्थापिन्यौ नान्दी शुष्का च कृष्टाहा। रङ्गद्वारं चारी सैव महत्पूर्विका त्रिगतम् ॥ प्रस्तावनेति कथितान्येतान्यङ्गानि भारते पूर्वैः। अङ्गैरेभिरिहाङ्गी निष्पन्नः पूर्वरङ्गोऽयम् । तेभ्यो नैवाभिन्नो भिन्नोऽपि प्रेक्ष्यते कचित् सद्भिः॥ [प्रत्याहारः।] उत्थापनीप्रयोगे [च ] प्राधान्येनोपकल्पिते । प्रत्याहाराद्ययं याता प्राच्योदीच्यां गतामत्र ॥ अत्राप्रावणिकाचं यदङ्गषट्कं क्रमेणोक्तम् । देवस्तवार्थमपदं पदबद्धं वा द्विधा तदुद्दिष्टम् । अपदं तत्र तु गीतं निर्गीतं कीर्तितं तच्च ॥ यत् पदबद्धं गीतं तद्देवप्रीतिदं बहिर्गीतम् । तस्मात् पदैर्निबद्धं प्रयोज्यमाश्रावणादीह ।। प्रायेण तु बहिर्गीतमन्तर्जवनिकागतैः । तन्त्रीभाण्डकृतं तज्जैःप्रयोक्तव्यमतन्द्रितैः॥ ततो जवनिकां हित्वा समस्तकुतपैः सह । नृत्य-पाव्यकृतानि स्युः पूर्वरङ्गाङ्गकानि तु॥ ततः पुनः प्रयोक्तात्र मन्द्रकादेस्तु मध्यतः । प्रयोज्यं किञ्चिदेकं तु वर्द्धमानमथापि वा ॥ पूर्वरङ्गे प्रयुञ्जीत ततोऽन्याह्नसमुच्चयम् । अथामी क्रमाद् वक्ष्ये लक्षणानि समासतः॥ ज्ञेयः कुतपविन्यासः प्रत्याहारः स चेहशः। 1 ABO अडैरिमि०। 2 ABO निष्पनः। 3 AB0 वक्षे । 15 १४३ १४४ 20 १४५ १४६ १४७ 25 १४८ 10 16 नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [अवतरणादीनि प्राङ्मुखः स्यान्माईलिको रङ्गे प्रत्यगवस्थितः। गान्धर्वाचार्यको याम्ये रङ्गभूमावुदमुखौ ॥ तस्य दक्षे मौखरिको वैणिको वामदेशगः। निवेशनं गायकानाम्- ॥ इति प्रत्याहारः॥ [ अवतरणम् ।] -तथावतरणं स्मृतम् ॥ १५० तच रङ्गोत्तरस्यां स्याद् याम्यदिग्मुखगोचरम् । पञ्चषैर्विस्तृता हस्तैस्तथा 'वसुकरायता ॥ १५१ शरचन्द्रप्रतीकाशाऽथवा बालार्कसंनिभा। नानावर्णाऽथवा रवनिकरैः खचिता नवा ॥ १५२ कोणेषु परितश्चापि मुक्ताजालपरिष्कृता। चिह्नितां दैवतैस्तत्तत्स्थानभागनिवेशितैः॥ १५३ मध्ये महेश्वरः पार्थे चतुर्मुखचतुर्भुजौ । सूर्याचन्द्रमसौ तेषां सव्यदक्षिणपार्श्वयोः॥ तारकाः स्युस्तत्परितो देव्यस्तत्कोणगाः स्मृताः। वायौ सरखती वह्नौ तारकान्वीशकोणगा। १५५ भैरवी नैऋते कामगामिनी दक्षिणे पुनः । गोरक्षः सिद्धनाथस्तु पश्चिमे पूर्व दिग्गतः॥ १५६ मीननाथ उत्तरस्यां चतुरङ्ग क्रमादिमाः । देवताः पूजयेत् पूर्व स्थानेषूक्तेषु मन्त्रवित् ॥ १५७ ॥ इति अवतरणम् ॥ [ आश्रावणा।] तत आश्रावणापाणित्रयः क्रमवशेन यत् । खल्पमादौ श्रूयमाणं मृदङ्गाद्यस्य मार्जनम् । तस्मात् तल्लक्षणं पूर्व मया सम्यगुदीरितम् ॥ १५८ ॥ इति आश्रावणा ॥ [आरम्भः।] ततः खल्पेष्ववहितेष्वङ्गमारम्भसंज्ञकम् । तद् यत्र गायकाः साक्षात् सप्तखरपरिग्रहः ॥ १५९ 150 विणिको। 2 ABO वस्तु। 3 ABO नैर्ऋतौ। 4 ABO °नवत् । 20 25 30 १६० वक्रपाण्यादीनि] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण हैं कृत्वा कुर्युस्तालयुक्तं गीतं तत्र ध्रुवाः पुनः। सप्तखरोद्भवास्ताः स्युः सुगतिश्च सुगन्धिनी ॥ रौद्री पाश्चादनी तद्वत् पाश्चालिन्यथ दैवती। अश्विनीति क्रमादाभिर्ग्रहणं स्यात् प्रसादनम् ॥ चतुरस्रभिदास्तिस्रस्तिस्रोऽप्याद्यासु तत्पराः। तिनस्यत्रभिदाखवं दैतिनीवदिहाश्विनी ।। एतगाथाभिरा तोद्यवादनं राजशिष्यया । ॥ इत्यारम्भः॥ 5 १६२ १६३ 10 [वक्रपाणिः।] तथा पाणिविभागार्थ वक्रपाणिर्विधीयते ॥ अत्र वक्राङ्गान्तमाहुः दुष्करं पाणिरुच्यते । गाथालक्षितपूर्वाला पाभिरातोद्यवादनम् ॥ ॥ इति वक्रपाणिः॥ [परिघट्टना ।] 'तव्योजःकरणाथै च भवेच परिघटना। एतद्गाथाभिरातोद्यं वादयेद् वादकोत्तमः॥ ॥ इति परिघट्टना॥ 16 १६५ [संघोटना।] वाद्यवृत्तिविभागार्थ भवेत् संघोटनाविधिः। अङ्गुष्ठाभ्यां च तर्जन्या तश्रीवादनतो भवेत् । गाथाभिरुक्तपूर्वाभिरिहातोच प्रवादयेत् ॥ ॥ इति संघोटना॥ 20 [ मार्गासारितम् ।] तत्रीभाण्डसमायोगादू' मार्गासारितमिष्यते। चित्रादि त्रिषु मार्गेषु करणैर्धातुभिः समम् ॥ ॥ इति मार्गासारितम् ॥ १६७६ 4. ABO तंत्रौजः। 1 ABO "स्ता। 2 ABO 'रात्मेद। 3 ABO पूर्वायाला । 5संखोटना।
नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ? [आसारितादीनि [आसारितम्] तालो मृदङ्गस्तत्री च कचिदेकैकशः कचित् । युग्मीभूय प्रधानं स्याद्' गुणः सर्वव्यपेक्षया । षड् ध्रुवाः क्रमतोऽत्र स्युः 'प्राधान्ये त्रितयस्य तु ॥ अथासारितमत्र स्यान्मार्गासारितपूर्वकम् । आपूर्वात् सरतेर्धातो रूपे पाताः पुरोदिताः॥ 'आसार्यन्त इति प्रोक्ता बुधैरासारिताभिधाः। एतस्योदाहृतिः पूर्वमुक्ता लक्षणपूर्विका ॥ ॥ इत्यासारितम् ॥ 5 १७० 10 15 20 [पाठवृद्धियुक्तियुक्तमासारितम् ।] यान्यवोचमहं पूर्व गीतकानि चतुर्दश । वर्धमानादिकं चैव सर्वमत्रैव योजयेत् ॥ १७१ उपक्रमे गीतकानां प्रयोगसूचनादिभिः । उपोद्यन्ते खरा यस्मात् तस्मादुक्तमुपोहनम् ॥ १७२ तदुक्तं पूर्वमस्माभिश्चतस्त्रः कण्डिका अपि । विशालासंगते तत्र कनिष्ठासारितोद्भवे ॥ मध्यमासारिताजाता विशाला संगता तथा । सुनन्देति च तिस्रोऽपि ज्येष्ठासारितसंभवाः ॥ १७४ सुमुखी च सुनन्दा च संगता च विशालिका । उक्तपाते क्रमैरेतैरासारितविधिकमात् ॥ १७५ पिण्डीबन्धाः प्रदर्यन्ते वर्धमानक्रमेण च । ते चेष्ट देवतारूपा इष्टचित्राश्रिता अथ ॥ १७६ विलम्बितलयेऽभीष्टमान आसारितस्य तु । कलाकलापसंयुक्तोपोहनस्यार्थभागिकाः ।। समाश्चतस्रश्चतुरा नर्तक्यः पुष्पपाणयः। अन्तर्धानमपाकृत्यालङ्क! रङ्गभूमिकाम् ।। तत्रावकीर्य पुष्पाणि नमस्कुयुः क्रमेण ताः। इन्द्रादिलोकपालेभ्यः परिवर्त्य चतुर्दिशम् ॥ ९७९ 1 ABOप्रधान्ये। 2 ABO आचार्यन्त । 3 AB0 यान्येवो। 4 80 °देवाता 5 80 पुष्पपुष्पपाणयः। 25 १८० १८१ १८२ १८३ १८४० १८५ पाठवृद्धियुक्तमासारितम् ] नु० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ वन्दनानि प्रकुर्वन्ति पुनश्च परिवर्तनात् । उपोहनार्थाभिनयमङ्गहारैः प्रयुज्य ताः॥ पिण्ड बन्नन्ति तत्रस्थाः कनिष्ठासारिताश्रयम् । उपोहनं पञ्चकलं सूचया भावयन्ति ताः॥ वैशाखरेचितेनासामेका भूत्वा पृथक् ततः। अभिनीयोपोहनार्थं दर्शयेच तदेतराः॥ पर्यस्तकाद्यङ्गहारैः प्रमृत्येयुस्ततस्तु ताः। पिण्डीबन्धं समास्थाय भावयन्त्यङ्कुरेण तु ॥ प्रथमोपोहनस्यार्थं परिवर्य पुनश्च ताः। वैशाखरेचितं कृत्वा करणं रङ्गपीठके ॥ विकीर्य पुष्पनिचयं 'कुर्युर्वस्तुविभावनम् । ताभ्य एका विनिश्चित्य प्रथमं वस्तु भावयेत् ॥ तदेव चारु चातुर्याद दर्शयेनृत्यतः पुनः। ततः पिण्डीगताः सर्वाः पिण्डीबन्धमुपागताः॥ सूचया षट्कलं कुर्युर्द्वितीयोपोहनं पुनः । तस्यैवं करणं ज्ञेयं तदर्थस्य विभावनम् ॥ अपसृत्य द्वितीयाथ ताभ्यो वस्तु द्वितीयकम् । 'चञ्चत्पुटेन तालेनाभिनयेत् प्रथमा तदा ॥ प्रत्येवगहारेण चतस्रो मिलिताः पुनः। विधाय शृङ्खलाबन्धं द्वितीयस्यान वस्तुनः॥ अङ्कुरेण पुनः कुर्युरुपोहनमथैकिका । ताभ्यो निःसृत्याभिनयेद् द्वितीयं वस्तु तत्परम् ॥ प्रदर्शयन्त्यङ्गहारैस्तदर्थ मिलिता अथ । पिण्डीवन्धं समास्थाय समं कुर्युरुपोहनम् ॥ एवं तृतीयाऽभिनये तृतीयं वस्तु रङ्गगा। षट् पितापुत्रकेण द्वे कुर्यातामङ्गहारतः ॥ नर्तक्यो 'मिलिताः पश्चाल्लताबन्धमुपाश्रिताः। अङ्कुरेण पुनः कुर्युरुपोहनमथ स्फुटम् ॥ १८६ 1 १८७ १८८ १८९४ १९० 21 १९२ 1- कुयुकुंयु। 2 ABO एका 5 ABO 'यस्यङ्ग। 6 ABO मिमिला। 3 ABO पद्फल। 4 ABO चचत्।
5 10 नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [पाठवृद्धियुक्तमासारितम् अन्योन्यं मिलिताः प्राग्वत् तृतीया प्रथमान्विताः। तृतीयं वस्त्वभिनयेनृत्यं कुर्याद द्वितीयिका ।। १९४ ततः सङ्गत्य पिण्डीस्थाः कुर्युस्तुर्यमुपोहनम् । सूचयाष्टकलं पश्चादपसृत्य चतुर्थिका ॥ चतुर्थ वस्त्वभिनयेदङ्गहारं ततः परा। कुर्वीरन मिलितास्तिस्रश्चतस्रोऽपि ततः परम् ॥ १९६ अङ्कुरेण चतुर्थस्य वस्तुनो भेद्यकाभिधम् । बन्धमास्थाय कुर्वीरन्नुपोहनमतः परम् ॥ विश्लिष्यान्योन्यमाद्याभ्यां द्वाभ्यां सार्क तृतीयया। अङ्गहारैरभिनयेचतुर्थी वस्तु तुर्यकम् ॥ १९८ अथ सर्वासु नर्तक्यः पिण्डीबन्धमुपाश्रिताः । चतुर्थोपोहनं कुर्युरपमृत्य तृतीयिका ॥ तृतीयं वस्त्वभिनयेत् तिस्रो नृत्यन्ति तत्पराः। लताबन्धमथास्थाय कुयुः पूर्वमुपोहनम् ॥ प्रथमं वस्त्वभिनयेत् प्रथमाऽपश्रिता ततः। तदेतराः प्रनृत्यन्ति मिलिताः पुनरेव ताः॥ २०१ कुसुमाञ्जलिमाकीर्य चतस्रोऽपि तदा समम् । अङ्गहारः अनुत्याथो भवन्त्यपश्रितास्तु ताः॥ २०२ पिण्डी शृङ्खलिका चैव लताबन्धोऽथ भेद्यकः। पिण्डीषन्धश्चतुर्थेऽपि तल्लक्षणमथोच्यते ॥ २०३ स चेष्टदेवता'रूपोऽनुकारेण स्मृतो बुधैः । तस्य देहानुकारेण विधेया च विपश्चिता ॥ पिण्डाकारेण विज्ञेयः पिण्डीबन्धस्तदा पुनः। शृङ्खलात्मा भवेद् गुल्मो लता जालखरूपिणी ॥ २०५ संदेशो भेद्यको रूपं चतुर्थमिदमीरितम् । सूचा स्यात् पिण्डिकाबन्धादकरैः शृङ्खलादिभिः॥ उभयं स्मृतमारोहेऽवरोहेडर ईरितः। यस्मिन्नासारिते पूर्वैर्यदीरितमुपोहनम् ॥ 15 20 . 25 - 1 820 तारनुकारेण। 2 ABC चा । 8 0 संदशो।
इस्थापना] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ प्रतिवस्तु तदावृत्तिरिति केचन मन्यते । स्फुट रक्तं विभक्तं च समं शुद्धप्रहारजम् ॥ २०८ नृत्यानुगं वर्धमाने वाद्यवादनमिष्यते। कनिष्ठासारितस्यायं विधिरुक्तः सविस्तरः॥ २०९ अन्येष्वासारितेष्वेष विज्ञातव्यो विधिर्बुधैः। सर्वेष्वासारितेष्वत्र नर्तकीनां प्रवेशनम् । वैशाखरेचितेन स्यादिति राजेन्द्रसंमतम् ॥ २१० नर्तक्यः षोडशैवं सुकुसुमनिचयं रङ्गभूमौ विकीर्य प्रीत्यै शम्भोः प्रनृत्यन्त्यसकृदभिनयैरर्थजातं प्रदर्य । एतद् वै पात्रवृद्धिप्रभवमविकलं वर्धमान प्रयोज्यं शम्भोरग्रेऽथ सर्वक्षितिपतिपुरतो नाल्पभूभर्तुरग्रे॥ २११ यस्मात् सर्वक्षितीशः खयमिह भगवानित्थमावेदितं प्राग- अन्यत्रैकं सुगीतं विधिवदनुभवाद् देशकालानुरोधात् । योज्यं गीतप्रवीणैरभिमतसुरतापीतये युक्तियुक्तं क्षोणीसुश्रोणिभा निगदितमखिलं बुद्धिसंस्थं विधाय॥ २१२15 ॥ इति पाठवृद्धियुक्तियुक्तमासारितम् ॥ 10 २१३ 20 २१५ [उत्थापना] अतः परं प्रवक्ष्यामि ध्रुवामुत्थापनाभिधाम् । सूत्रधारप्रवेशार्थ प्रयोगं 'नान्दिपाठकाः॥ उत्थापयन्ति रङ्गेऽस्मिन् प्रयोग पूर्वमेव यत् । तस्मादुत्थापनं प्रोक्तं राजराजेन धीमता ॥ गौ लो ग्लो लास्त्रयो गश्च लौ ग एकादशाक्षरैः। चतुर्भिश्चरणैः प्रोक्ता ध्रुवा प्रागुक्ततालयुक् ॥ गङ्गातरङ्गपरिधौतजटम् गौरीकुचद्वयनिषिक्तकरम् । देवेन्द्रमुख्यसुरपूज्यपदम् वन्दामहे शिवममेयपदम् ॥ शतौ द्विद्विकलौ सं चैककलं त्रिकलस्तु सं। प्रत्येकं चरणेष्वत्र लयत्रितयमेव च ॥ 1 ABO नादि। यथा- 25 २१६ १ २१७ 30 २० [उत्थापना २१८ २१९ २२० २२१ 10 २२२ नु०२० को०-उल्लास १, परीक्षण १ परिवर्तास्तु चत्वारस्तेषामाद्यस्थिते लये। द्वात्रिंशता कलानां स्यात् लये मध्ये द्वितीयकः ॥ सोऽपि तावत् कलस्तावान् तृतीयोऽपि कलस्ततः। तावानेव चतुर्थस्तु परं 'तस्याद्भुते लये ॥ ध्रुवेयं चतुरस्रा स्थादस्यां पाणित्रयं भवेत् । संनिपातैश्चतुर्भिः स्यात् परिवर्त इहककः ॥ प्रथमे वा द्वितीये वा तृतीये संनिपातके। पूर्वस्मिन् परिवर्तेऽत्र वाद्यभाण्डपरिग्रहः । सूत्रधारप्रवेशोऽत्र द्वितीये परिवर्तके ॥ तत्पारिपार्श्वको स्यातां सभृङ्गारकजर्जरौ । सपुष्पाञ्जलयः शुक्लवस्त्राः सुमनसस्त्रयः। कृतमङ्गलसंस्कारा वैष्णवस्थानके स्थिताः॥ प्रविशेयुस्ततः सूत्रधारः पञ्चपदी ब्रजेत् । दक्षिणं चरणं पाचक्रान्तचार्या समुत्क्षिपेत् ॥ तालत्रयं ततः सूच्या वामं चरणमुत्क्षिपेत् । सद्यः सूत्रधारोऽथ गत्वा पञ्चपदी शनैः॥ रङ्गमध्ये पुष्पमोक्षः पूजयेत् पद्मसंभवम् । नमस्कुर्यात् ततो देवं मनोवाकायकर्मभिः॥ कलाभिः स्यात् षोडशभिः पञ्चपद्यां प्रवेशनम् । पुष्पाञ्जलिविमोक्षे तु कलाष्टकमुदीरितम् ॥ तावतैव तु कालेन द्वितीये परिवर्तके। नमस्कार्य देवतानां तृतीये परिवर्तके ॥ आक्रामेन्मण्डलं पूर्ण दक्षिणं पादमुद्धरन् । सूच्या सव्येन दक्षं च विद्वदक्षेण वामकम् । सूच्यैवैवं प्रकुर्वीत मण्डलस्य प्रदक्षिणम् ॥ आचम्य प्रोक्ष्य कर्तव्यं जर्जरग्रहणं ततः। अन्योन्यं पादयोर्वेधश्चतुष्कल उदाहृतः। प्रदक्षिणं चाष्टकलमाचामे निकलेन तु ॥ २२३ २ २२४ २२५ 20 २२६ २२७ 25 २२८ २२९ म -- 1 ARO सस्थाद्भुते। 2 ABO कलं ।
२१ २३० २३१ 5 उत्थापना] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ जर्जरग्रहणं कार्य 'कलयैकिकयैव तु । तृतीये परिवर्ते च तत्र मन्त्रमिमं जपेत् ॥ नक्षत्रेऽभिजिति त्वं तु प्रसूतः शत्रुकर्शनः। जयं चाभ्युदयं चैव पार्थिवाय प्रयच्छ वै ॥ चतुर्थे परिवर्तेऽथ सूत्रभृत् कुतपोन्मुखः। विक्षेपवेधौ रचयन् पदौ पञ्चपदी व्रजेत् ॥ शशताशा सन्निपातौ पातायनववागताः। द्वादशस्तैर्द्विगुणितैः परिवर्तद्वयं भवेत् ।। परिवर्तद्वयं चात्र कला द्वादशकं भवेत् । आदावन्तेऽष्टमे तुर्ये दशमे गाः परे चलाः ॥ इयमुत्थापनी व्यस्रापातास्तालादिका इह । चतुरस्रात् पादहीना:- २३२ २३४10 16 [परिवर्तिनी।] अथ स्यात् परिवर्तिनी॥ सूत्रभृत्पमुखा अस्यां परिवर्त्य चतुर्दिशम् । कुर्वन्ति लोकपालानां वन्दनानि यतस्ततः ।। २३६ परिवर्तिनी ध्रुवाऽस्यां तु सर्वे ला अन्तिमो गुरुः । चत्वारश्चरणा छन्दो जगती चातिपूर्विका ॥ २३७ यथा-त्रिनयनमभिनवमृषभगति, अनपररदनबदनकलनम् । मदनकदनकरनयनवरं भजत भुवनभयशमनशिवम् ॥ २३८ 20 अस्थामाद्याश्चतस्रः स्युः कला गुरुतया [च या]। चतुलाः स्युः परा इत्थं कलाः षोडश कीर्तिताः॥ २३९ ताभिरष्टौ संनिपाताः संनिपातद्वयं तथा । भवेत् प्रतिदिशं कुर्यात् दिड्नाथेभ्यो नमः क्रमात् ॥ विक्षेपवेधौ रचयन् पूर्वोक्तः क्रमतः सुधीः । प्राङ्मुखः प्रणमेत् पञ्चपदीं गच्छन् सुराधिपम् ॥ २४१ उत्क्षिप्य दक्षिणं पादं वामवेधेन पूर्ववत् । कुर्वन् पश्चपदीं तत्र निवर्तेत कलाद्वयात् ॥ २४२ कलाद्वयेन गमनमियमत्र चतुष्कली । एकैकाशाधिनाथस्य नमस्करणकर्मणि ॥ २४३30 1 AB0 कलाये। 2 80 भूत्। 3 ABO पदो। 4 ABO °र्विकाम् । 26 २२ 5 10 नु० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [परिवर्तिनी एवं चतुर्दिगीशानां नमस्कारादनन्तरम् । शिव-विष्णु-विरञ्चिभ्यः प्राङ्मुखो रङ्गमध्यगः । पुंस्त्रीनपुंसकपदैनमस्कुर्यात् क्रमेण तु ॥ २४४ दूरमुत्क्षिप्तमन्त्र स्थात् पुरुषं स्त्रीपदं पुनः। किञ्चिदुत्क्षिप्तपरमं समं क्षिप्तं नपुंसकम् ॥ २४५ पुमानित्थं दक्षपादं कृत्वा त्रेधा नमस्क्रियाम् । कुर्यान्नारी तु वामांहिमेवं कृत्वा द्विधा चरेत् । वक्षं न पुंससंज्ञेयमुभयोस्तुल्यलक्षणम् ॥ स्त्री विष्णुः पुरुषः शम्भुः पदं ब्रह्मा नपुंसकम् । एवं कृते सूत्रभृता विधिना परिवर्तने ॥ चतुर्वर्णानि कुसुमान्यादायाञ्जलिना नटी। प्रविशेत् तत्प्रवेशे च ध्रुवा प्रावेशकी यथा ॥ २४८ सत्पुस्तकोल्लसितपाणितलामुद्यच्छशाङ्कसमकान्तिमुखाम् । भक्तेष्टदानकरपद्मयुगां वन्दामहे कमलसम्भवजाम् ॥ २४९ सूत्रधाराजलौ पुष्पमोक्ष कृत्वा चरेनटी । दिक्पतीनां वन्दनानि सूत्रधारोक्तवर्त्मना । आतोद्यवादनं तत्र विना गानेन वर्णितम् । नानावणैश्च कुसुमैजर्जरातोद्यपूजनम् ॥ २५१ सूत्रभृन्नर्तकी तद्वत् सूत्रधारस्य चार्चयेत् । तदाक्षिप्तिकिका ज्ञेया वा सात्र यथा भवेत् ॥ २५२ कुण्डलमण्डितगण्डयुगं भूधरकन्दरकृतवसतिम् । सुन्दरचन्द्रकलाकलित शम्भुमहं प्रणमामि विभुम् ॥ २५३ चतुर्मिश्चरणैरेवं भूषितामनुमातृभिः । आक्षिप्तिका ध्रुवा कार्या व्यपकृष्टामहं ब्रुवे ॥ २५४ चतुरस्रामष्टकलां स्थायिवर्णा स्थिते लये। खद्वयं गद्वयं गो लौ गावेवं चरणाङ्किता ॥ २५५ पङ्को षोडशमात्राभिरपकृष्टा ध्रुवा यथा। 1 ABO पदैन । 2 ABO नमस्कयाम् । 3 ABO "पुनषं । 4 80 प्रवेश । 5 B°मह। 16 २५० 20 25 २३ २ ३ २५६ नान्दी] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ हेलाविदलितकामशरीरं लीलानिर्जितदानवराजम् । देहा(कृतभूधरसूनुं वन्दे शम्भु त्रिभुवननाथम् ॥ शशताताशसं द्विः समितिपाताः कलाष्टके । ध्रुवाभिश्चतसृभिः स्यात् परिवर्तोऽग्रिमः पुनः । शेषास्त्रयस्तु तिमृभिस्तत्राद्या परिकीर्तिता ॥ इहाभिदधिरे केचिद् गणैस्तां भ्यादिभिः पृथक् । ध्रुवयोः परिवर्तिन्या कृता नृत्यं पुरा यथा ।। प्रथमे परिवर्ते तु ताभ्यो वक्रोद्भवस्तथा । बहुपादो वहिजश्चेत्याशी त्यमपञ्चनम् ॥ परिवर्तेषु शेषेषु विदध्युर्विधिनोदितम् । ॥ इति परिवर्तिनी॥ २५७० २५८ २५९ 10 15 [नान्दी।] इमां गीत्वा पठेन्नान्दी सूत्रधारः समाहितः। मध्यमं खरमाश्रित्य देवद्विजमहीभृताम् ॥ २६० आशीर्वाचनसंयुक्तं पवैरष्टभिरन्विताम् । दशभिः केचिदिच्छन्ति पदैादशभिः परे॥ देवेभ्योऽस्तु नमस्कृतिर्द्विजकुलं संवर्धतां श्रेयसा पृथ्वीशः पृथिवीं प्रशास्तु सकलां भूरस्तु सस्योत्तरा । काले वर्षतु पुण्यवारिजलदो नन्दन्तु गावश्चिरं देशः क्षेमसुभिक्षवान् भवतु नो राजास्तु सद्धर्मवान् ॥ २६२ 20 राष्ट्रं चास्तु निरामयं च लभतां रङ्गः प्रतिष्ठां परां प्रेक्षाकर्तुरिहास्तु धर्मविभवो ब्रह्मद्विषो यान्त्वधः। कीर्तिः काव्यकृतोऽस्तु भक्तिरचला भूयादुमेशे सदा तत्तद्भरिभिरन्वहं विलसतादू धर्मस्य रक्षाकरः ।। २६३ एवं द्वादशभिर्युक्ता पदैनान्दी निदर्शिता। अन्यद् भेदद्वयं चास्या ऊह्यतामनया दिशा॥ २६४ 'नान्दीपदान्तरेष्वेवमेवं भूयादितीरिणौ । उक्तार्थसप्रपञ्चज्ञौ भवेतां पारिपार्श्वकौ ॥ २६५ २ 25 1 ABO नादी।
[पूर्वराविधिः नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ तत् सप्रपञ्चवाक्यादिनान्दीभेदसमुच्चयम् । 'भरताद् ज्ञेयमत्रोक्तर्विस्तरः स्यान्महानिति ॥ ॥ इति नान्दी॥ २६६ 5 10 15 [शुष्कापकृष्टा ।] यत्र शुष्काक्षरैरेव द्यपकृष्टा तु या ध्रुवा । यस्मादभिनयात् सूत्रं प्रथमं ह्यभिसार्यते ॥ २६७ तस्मात् शुष्कापकृष्टेयं जर्जरश्लोकदर्शिका। ॥ इति शुष्कापकृष्टा ॥ [पूर्वरङ्गविधिः।] रङ्गद्वारमतो ज्ञेयं वागङ्गाभिनयात्मकम् ॥ २६८ नेयं चारीप्रचारं सहत इह मही न क्षमं वः प्लुतीनां ब्राह्मं सम क चाशापदमिह भगवंस्ते भुजोत्क्षेपणानाम् । ब्रह्माण्डाघात भीत्या परिहर विषमं ताण्डवाटोपमेवं नृत्यारम्भे भवान्या भवतु जनमुदेऽभ्यर्थितश्चन्द्रचूडः॥ २६९ वागङ्गाभिनयोपेतमिति पद्यमुदाहृतम् । शेष लक्षणमेतस्य भरतादवगम्यताम् ॥ २७० ततश्चारीसंज्ञं समं शृङ्गारचरणाद् भवेत् । रौद्रप्रचरणात्रापि [?दन] महाचारीति कीर्तिता॥ २७१ विदूषकः सूत्रधारस्तथा वै पारिपार्श्वकः। यत्र कुर्वन्ति संजल्पं तदत्र त्रिगतं मतम् ॥ २७२ प्रकृतस्यैव कार्यस्य सिद्धत्वस्यानुसूचकम् । उपायोपेयभावेन कार्यसिद्धिव्यपाश्रयम् ॥ २७३ कविनानालङ्कृतं च वाक्यं यत्र प्रयुज्यते । सा स्यात् प्ररोचना नाम वस्तुप्रस्तावनाभिधा ॥ २७४ एभिरङ्गैः प्रयुक्तैः स्यात् तत्तदैवतपूजनम् । केषाञ्चिल्लक्षणं प्रोक्तमिहोदाहरणैः सह ॥ २७५ प्रयोगस्य फलं शेष लक्ष्मोदाहरणे तथा । भरतादवगन्तव्यं नेह विस्तरशङ्कया। २७६ ॥ इति पूर्वरङ्गविधिः॥ 20 25 1 ABO भरतान् । 2 ABO सूत्र । 3 ABO शुष्का च कृष्टा । 4 B0 संकोलु । 5 B0 ब्रह्माण्डयोत। 6 ABO °भ्यार्थित।
10 अभिनयनृत्य, लास्यं च नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [अभिनयनृत्यम् ।] *निष्क्रान्ते सूत्रधारेऽथ पारिपार्श्वकसंयुते । प्रविशेन्नर्तकी तत्रायतस्थानकमाश्रिता ॥ नत्वा देवानथ क्षिप्त्वा रङ्गे पुष्पाञ्जलिं ततः। अभिनेतुं प्रक्रमतेऽभिनयान सा यथारसम् ॥ २७८5 वक्ष्येऽतोऽभिनयानादावभिनेयार्थसाधनम् । यस्मादुपेयधीन स्याद्विनोपायधिया कचित् ॥ २७. व्यञ्जयन्ती रतिमुखान् भावान् या वासनामयान् । रसावसानाऽभिनयो भवन्ती व्याप्रतिनंटे। २८० 'चातुर्विध्यात् खहेतोः स चतुर्धा गदितो बुधैः । आङ्गिको वाचिकस्तद्वदाहार्यः सात्त्विकः परः ।। २८१ तत्राङ्गिकोऽङ्गैनिवृत्तः शिरःप्रभृतिभिर्भवेत् । गाथागीतः प्रबन्धाद्यो वाचिकस्तद्भवत्वतः॥ २८२ भूषणादिरिहाहार्यमाहार्यस्तत्मकाशितः। सीदत्यस्मिन् मनः सत्त्वं सात्त्विकस्तेन भावितः॥ २८३ 15 एवं व्यवस्थिते राजा शास्त्रसागरपारगः। आङ्गिके सात्त्विकाहार्यान्तर्भावाद्वक्ति तद्विदः॥ २८४ नाट्यमार्गोपाधिभिन्नं द्विधा नृत्यमुदीरितम् । नृतेः क्तप्रत्यये रूपं देशीवृत्तमिहोदितम् ॥ २८५ नाट्यं मार्ग च देशीयमुत्तमं मध्यमं तथा । अधमं क्रमतो ज्ञेयं नृत्यत्रितयमुत्तमैः॥ [ लास्यम् ।] लास्यताण्डवभेदेन त्रयमेतद् द्विधा कृतम् । ललना ललितैरङ्गरचनोपचितैः शुभैः॥ २८७ प्रयोगैः सुकुमारैर्यत् साधितं लास्यमत्र तत् । लासाः [स्त्री पुंसयो वास्तवार्ता ये(?हाथै) तु तद्धिते ॥ २८८ साधावथै लास्यशब्दः कामोल्लसनहेतुकः। मृदङ्गहारकरणे चारी 'चरणकोमलः॥ २८९ 20 ९ 26 nant- - * Veises 277 to 28+ die Lepeated in ABU as 81 to 88 of the preceding section 1 bl चातुवेधा । चातुर्विध्या । 2 Abc तद्विताम् , ABG तद्विद । 3 AC ललिते। 4 ABU रचण। ४०र०कोशे नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [ताण्डवं, सामान्याभिनय २९० 5 २०१ २९२ 10 २०४ २९५ 15 २९६ wwwA [ताण्डवम् ।] ताण्डवं तद्भवेद्यत्तु प्राधान्येन प्रवर्तितम् । करणैरङ्गहारैश्च प्रयोगे उद्धतैरिह ॥ 'तण्डुना निर्मिते नृत्ये प्राहुर्भेदत्रयं परे । विषम विकटं लम्वित्यत्र तद्विषमं मतम् ॥ यदभ्यासवशाद्रजुभ्रमणादि प्रदर्श्यते । विरूपवेषावयवव्यापारं विषमं मतम् ॥ करणैरश्चितायैर्यत् प्रयुक्तं तद्भवेल्लघु । सङ्कीर्ण तद्भवेन्नृत्यं यदेतत्रयसंकरात् ॥ सर्वेष्वभिनयेष्वत्र व्यापारैराङ्गिकैर्यतः । उत्पद्यन्ते नृत्यभेदाः सप्रपश्चा अनेकशः॥ अतः प्रयत्नतः सर्वान् तानहं वच्मि यत्नतः। अत्राङ्गाभिनयः साक्षादङ्गविज्ञानपूर्वकः ॥ तत्राङ्गानि शिरो हस्तौ वक्षः पार्चे कटीतटम् । पादाविति षडुक्तानि भरताचार्यसंमते ॥ यथा चाह भगवान् भरताचार्य [सामान्याभिनयः।] सामान्याभिनयो नाम ज्ञेयो वागङ्गसत्त्वजः। तत्र कार्यः प्रयत्नस्तु नाट्यं सत्त्वे प्रतिष्ठितम् ॥ इह भावा रसाश्चैव दृष्ट्यामेव प्रतिष्ठिताः। दृष्ट्या हि सूचितो भावः पश्चादजैविभाव्यते ॥ न घङ्गाभिनयात् कश्चिद् ऋते रागः प्रवर्तते। सर्वस्य सहजो रागः सर्वो ह्यभिनयोऽर्थजः॥ वाङ्मयानीह शास्त्राणि वाशिष्ठानि तथैव च । तस्माद्वाचः परं नास्ति वाचः सर्वस्य कारणम् ॥ एतेऽभिनयविशेषाः कर्तव्याः सर्वभावसंपन्नाः। अन्येऽपि लौकिका ये ते सर्वे लोकतः साध्याः॥ नानाविधैर्यथा पुष्पैर्मालां बध्नाति माल्यकृत् । अङ्गोपाङ्गै रसैर्भावैस्तथा नाट्यं प्रयोजयेत् ॥ या यस्य लीला नियता गतिश्च रङ्गप्रवृत्तस्य विधानयुक्ता। २९७ 20 २९८ २९९ 25 ३०२ 30 1B0लमुना।
२७ ३०३ ३०४ 5 ३०५ ३०७10 ३०८ सामान्याभिनयः] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ तामेव कुर्यादवियुक्तसत्त्वो यावत्तु रङ्गात् प्रतिनिःसृतः स्यात् ॥ एवमेते मया प्रोक्ता भावा ह्यभिनयं प्रति । नोक्ता येऽपि तु तेऽप्यत्र लोकात् ग्राह्यास्तु पण्डितैः ॥ यानि वाच्यैस्तु न ब्रूयात् तानि गीतैरुदाहरेत् । न तैरेव हि वाक्याथैरथ प्राकेवलाश्रयः॥ श्रव्यं श्रवणयोगेन दृश्यं दृष्टिविचारणैः । आत्मस्थं वा परस्थं वा मध्यस्थं च विनिर्दिशेत् ।। एवमन्येष्वपि तथा नानाकार्यार्थदर्शनात् । विनावाचा'नुभावो वा विज्ञेयोऽर्थवशाबुधैः ॥ धैर्यलीलाङ्गहारः स्यात् पुरुषाणां तु चेष्टितम् । हस्तपादाङ्गसञ्चारः स स्त्रीणां ललितो भवेत् । नराणां प्रमदानां च भावाभिनयनं पृथक् ॥ लोको वेदस्तथाध्यात्म प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् । लोकाध्यात्मपदार्थेषु प्रायो नाट्यं व्यवस्थितम् ॥ देवतानामृषीणां च राज्ञां लोकस्य चैव हि पूर्ववृत्तानुचरितं नाव्यमित्यभिधीयते ॥ एवं लोकस्य या वार्ता नानावस्थान्तरात्मिका । सा'नाट्ये संविधातव्या नाट्यहेतोः प्रयोक्तृभिः॥ यानि शास्त्राणि ये धर्मा यानि शिल्पानि याः क्रियाः। लोकधर्मप्रवृत्तानि नाव्यमित्यभिधीयते ॥ न च शक्यं हि लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च । शास्त्रेण नियमं कर्तुं नानाचेष्टाविधि प्रति ॥ नानाशीला: प्रकृतयः शीले नाट्यं प्रतिष्ठितम् । तस्माल्लोकप्रमाणं हि नाट्यं ज्ञेयं प्रयोकृभिः ।। नाव्यप्रकाराः कथिता मयैते विज्ञाय सम्य मनुजैः प्रयोज्याः। नाव्यस्य तत्त्वानुगतः प्रयोगः संमानमय्यं लभते हि रङ्गे ॥ ॥ इति सामान्याभिनयः॥ ३०९16 20 ३१२ ३१४ ३१५ 30 * 1 AB वोचा। 2 ABC साम्राट्ये। 3 ABO समान ।
नृ०र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ [चित्र आहार्याभिनयौ वृत्तयश्च [चित्राभिनयः।] अङ्गाधभिनयस्यैव यो विशेषः कचित् कचित् । अनुक्तमुच्यते चित्रः स चित्राभिनयः स्मृतः ॥ रम्भोर्वशी'प्रभृतिभिर्दिव्यं नाट्यं प्रवर्तितम् । तथैव मानुषे लोके पार्थिवानां गृहेषु च ॥ ३१७ सङ्गीतपरिक्लेशा नित्यं प्रमदाजनस्य गुणहेतुः। यन्मधुरकर्कशत्वं भजते नाट्यं प्रयोगेण ॥ ३१८ ॥ इति चित्राभिनयः॥ 10 16 ३२१ [आहार्याभिनयः।] यतोऽलंकार्यशेषत्वमलङ्कारस्य वर्ण्यते । आहार्याभिनयस्यातो नाङ्गिकात् पृथगर्थता ॥ शेषत्वाद्गुणतापत्तेर्न प्रधानत्वमिष्यते । गुणः प्रकृत्यङ्गमतोऽन्याङ्गता संमता सताम् ॥ अन्याङ्गमप्रधानं स्यादतो न वसकः(? रसक)खतः। अङ्गेषु मुकुटादीनां शब्देषु यमकादिवत् ॥ न संस्कार-विशेषत्वात् पृथक्त्वं कस्यचिन्मतम् । सालङ्कारैर्वचोगुम्फैरङ्गैर्भूषाविभूषितः ॥ विभागादेरभिव्यक्ते रसाभिव्यञ्जकत्वतः। भूषणानां न भूष्येभ्यो गणना पृथगीप्सिता॥ यथा धुतादिके मूर्ति क्रियाभेदाद्भवेद्भिदा। एवं भूषाविभेदेन भेद इत्येव सुन्दरम् ॥ उपाङ्गता वाऽमीषां स्यात् पृथग्वृत्तेरभावतः। तथा हि त्रितये यस्मिन् चतस्रो वृत्तयः स्मृताः॥ ३२२ ३२३ 20 ३२४ ४ ३२५ 25 [भारत्यादिवृत्तयः।] भारती सात्त्वती चैव कैशिक्यारभटीति च । वर्तन्तेभिनया यस्मादाखासां वृत्तिता ततः॥ ३२६ भारत्यभ्यर्हिता यत्र वृत्तिः सा भारती मता। वृत्तिः सा कैशिकी या तु कैश्यवत् सौम्यशालिनी ॥ ३२७ 1 AB °वसी, रंभासी। 2 BC गताम् । 3 ABO वर्तते । 4 80 वृत्ति।
३२८ सात्त्विकभावपरीक्षा] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ अभिनेयपरां शोभा काञ्चित् संपादयन्त्यपि । आरं स्यात् 'शातदन्तस्य योगाद्योधा भटाः स्मृताः ।। तद्वृत्तिरिव या वृत्तिर्भवेदारभटी तु सा । ऋग्यजुःसामवेदेभ्यो वेदाचाथर्वणात्तथा ॥ क्रमाजाताश्चतस्रस्तु नानाभेदोपबृंहिताः। भारत्यां वाचिकाः सर्वे वर्तन्तेऽभिनया इह ॥ तिसृष्वन्यासु वर्तन्तेऽभिनया आङ्गिका पुनः । वृत्ति? त्य)भावादभिनयो नाहार्योऽत्रार्यसंमतः ।। 5 10 15 [सात्त्विकभावपरीक्षा ।] अतः कायमनोवाग्भिनिमित्तैस्त्रिविधैरिह । निवृत्तत्वात् त्रिधैते स्युरिति केचन मन्वते ॥ ३३२ विचारस्यासहत्वेन नैतद्युक्ततरं यतः। सात्त्विका आङ्गिकेष्वेव पर्यवस्यन्ति तत्त्वतः॥ नटस्यातत्खरूपस्य किं तादात्म्यमतो न हि । स्तम्भादीनां सात्त्विकत्वं केवलानामिहोदितम् ॥ अथ प्रयत्ननिर्वृत्त्याः सात्त्विकाश्चेद्भवन्मते । मतमेवं वचोभगिरङ्गीकारोचिता त्यिह ॥ एत एव प्रयत्नेन निवृत्त्याः सर्व एव वा। स्तम्भाद्या उत रत्यादिस्थायिनो व्यभिचारिणः॥ ३३६० तथा हि विवदन्तेऽत्र सत्त्वे प्रावादुका यथा । विकाराद्वायुसंरोधनिर्मितात् सात्त्विकाज(? अ)गुः ॥ भट्टोद्भदादयः श्वासोच्छासादेर्वासनामयात् । चिदंशो वायुसंरोधा सिद्धसंवेद्यलक्षणः ॥ ३३८ चिराचिरखरूपेण सत्त्वमित्यभिधीयते । शिक्षाभ्यासाचिरतरमङ्गायैर्नाव्यकर्मणि ॥ वासनाभिनय तहलोल्लटसंमते। यथा तदानीं नो कर्ता तादात्म्यं नैव किश्चन ॥ ३४० भावः खसुखदुःखाभ्यां के भेदा वेशकश्चन(?) । 1 B0 शादतस्य, A शास्त्रत्रदतस्य । 2 B0 नयाहार्योत्रार्यसमततः। 3 80 काम- यतो। 4 ABO स्वासोत्स्वासो। 5 ABO °धा सिधा। 25 wwwml m 5 10 15 नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण [सात्त्विकभावपरीक्षा लयतालावसानस्य विषयेष्ववधानतः । प्रणीतस्य प्रयोगत्वासंभवात् लौकिकाः स्मृताः ॥ स्तम्भादीनां तु बाह्यानां हेतवो नान्तराः कचित् । अतः सविषयत्वं नो सहमाना इमे स्फुटम् ॥ ३४३ रत्यादय इव खीयवलनेन स्वकार्यगम् । प्रयत्नायं विरुध्याथो रत्यादि समनन्तरम् ॥ ३४४ उद्भूतास्त इव ग्राह्यगुणशून्यतयात्र तु। उच्यन्ते सात्त्विका भ्रान्तचित्तवृत्तिविशेषिकाः॥ बाह्यवस्तुविशेषाभिमुख्यापेक्षाविनाकृतम् । रत्यादिरूपसापेक्षमन्तःकरणमुच्यते ॥ शुद्धं सत् तन्मते सत्त्वं केषाञ्चन मते पुनः । बीजस्थानीयमव्यक्तरूपं सत्त्वमुदीरितम् ।। ३४७ मनसा सहितं चास्य तत्त्वमेव कचिन्मते। सत्त्वशब्दाभिधेया()यत्स्थानं तत् सात्विकं मतम् ॥ ३४८ बाथार्थविषयक्रोधादिकानां परिणामतः। तदीयपरिपाकस्य परिपोषखरूपतः ॥ स्तम्भादि कारयन्ति ये रतिक्रोधादयो यतः । उद्भासन्ते सविषया अतस्तद्वयतिरेकिणः ॥ ग्लान्यालस्यश्रमाद्यासु(?स्तु) विषया भावतो यदि । यथा ये बाह्यहेतुकाः सन्तो वैवर्येनोपलक्षिताः॥ सात्त्विकान्तःपातित्वेन गणिताः पूर्वसूरिभिः । अनादयो बाधघूमशीतादिकनिमित्तकाः॥ ३५२ व्यजनग्रहणायेनाभिनयेनोपलक्षिताः। असात्त्विकेपि तन्मध्ये गणिता भवभूतिना ॥ कथं वा रतिनिर्वेदादिकमत्राभिनीयते । नटेन निरपेक्षेण मानसव्यापृतेरिह ।। इत्यादिकं तथा स्तम्भादिकं तस्मात्समं मतम् । नैवं खभोजनादौ तु जनो व्यग्रमना अपि॥ सकृन्मनः प्रयुज्यापि कुर्वन् चङ्क्रमणादिकम् । दृश्यतेज्यमना नैव स्तम्भादिजनने क्षमः ॥ 1 BO विरुध्यायो। 2 ABC चास। 3 B0 नैव । 20 25 30 5 ३६१ 10 ३६३ 15 साविकभावपरीक्षा] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ ३१ तस्मादनन्यमनसो जायन्ते ते नु सात्त्विकाः। स्तम्भादीनां न चैवं स्यात् समाधानं तु मानसम् ॥ हेतुः समानकालीनोऽष्टको दयनिमित्ततः। तद्वाष्पं जनयेयुयै नटबुद्धयवसायकाः॥ ३५८ ते स्युनटगतानां तु बाह्यवाष्पादिहेतवः। एवं ते सात्त्विकाः सत्त्वेनाहताः संसदि स्फुटम् ॥ वाक्यगाथादिभिर्गम्या नैवमवघटेत हि । एवं ते ह्यभिनीयेरनट( टा) नेत्रजलादिभिः॥ नैवं नटानामन्योन्यं प्रसिद्धा एव तेन तत् । यतोऽस्यैवं प्रसिद्धवाभिधानेऽस्य 'कचित् तत्कृतेः॥ शिष्यानौपयिका तत्र किं फलं वद तत्त्ववित् । नैवं तथाविधे बुद्धयवसायेऽष्टकस्य तु ॥ मानसैकाम्यहेतुत्वे योगपद्योदयाप्तितः। बाद्यबाष्पाष्टकस्यास्य योगपद्यादयोऽपि च । तत्र सामग्यन्तरं चेत् किमवान्तरकल्पनैः॥ सुलयमनुसरामि स्थानकं स्वीकरोमि स्फुरितमनुभवामि स्थायिरूपं सलीलम् । परमिह रचयामि प्रीतिदृष्टिं च कान्ताम् ध्रुवमुपरि नयाम्युत्फुल्लविस्फारतारम् ।। इत्यादयोऽध्यवसाया गण्या नटगता न हि । अन्तर्भावो न सर्वेषामुक्तेष्वेवावकल्पते ॥ न चातिव्यग्रमनसा तारकाया विलोलनम् । शक्यक्रियां(?) न वा योग्याभ्यासशिक्षात्र कारणम् ॥३६६ स्तम्भादावपि सा तुल्ययोगक्षेमात्र दृश्यते । एकाम्यबुद्धयवसायशून्ये नाट्ये नटेन च । ३६७25 किश्चिदप्यधुना कर्तुमशक्यं विद्यते कचित् । नटस्याध्यवसायानां लौकिकेनानुकारिणा ॥ निर्वेदादिभाववर्गगणने किं फलं वद । पायोऽपि दृश्यते स्तम्भो भयहर्षादिकैरपि । व्यजनग्रहणाचापि खेदाभिनयने कचित् । मन्दसत्त्वे नटेडकांदितापात् खेदः प्रतीयते ॥ ७० 1430 एकादयनिमित्ततः। 2 A50 जनयेयं । 3 ABO कचितत् । 20 30 10 ये ७ 15 नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [सात्त्विकभावपरीक्षा नैतद्दरिद्रगृहिणीविवाहोत्सवतुल्यताम् । अवश्यकरणीयत्वादारोहतीति भवद्वचः॥ ३७१ नैवमेवंविधस्यापि नटना नोपपद्यते। तदान्यपात्रमध्ये कि क्रियते व्यजनाग्रहः ॥ ३७२ केनचित्त्वथवा कार्यः स्वयं सामाजिकेन किम् । अन्येषु सात्त्विकेष्वेवमेव दूषणकल्पना ॥ ३७३ तेषां महानुभावानां सात्त्विकानां हृदः स्फुटम् । कलुषीकरणाजातः शङ्कुशङ्कासमागतः॥ ३७४ विशीर्णफलदानोक्तफलः फलतु किं फलः । सत्त्वाख्येन प्रयत्नेनाभिनीयन्ते तु तेऽत्र ते ॥ ३७५ भावाः स्युः सात्त्विकास्तस्मात् किं तथा तथा न हि। बाष्पगद्गदमुख्याः स्युस्तथा 'खेदोद्गमादयः॥ ३७६ प्रयत्नेनाभिनिवर्त्य हेतुश्चेत् सात्त्विके भवेत् । तत्पुंप्रयत्ननिर्वर्त्यपद्मकोशादिभिर्भवेत् ॥ वर्षधारादिकेतेऽभिनेये सात्त्विकता न किम् । अथ चेद्वयतिरेकस्ते तेभ्यस्तेषामिमे यथा ॥ ३७८ रत्यादयश्चित्तवृत्तिनिर्वेदात् पूर्वमेव तु । निवेदनं प्रकुर्वन्ति ततः प्राणमथान्तरम् ॥ ३७९ तन्मांस(१)विश्वरूपाभ्यां सत्त्वं कलुषयत्यपि । अन्तःकरणसत्त्वस्य वायुराश्रयतां गतः ।। क्रोधाद्या अपि दृश्यन्ते विकाराः प्राणसंभवाः । प्राणसूत्रपरिमोते संविदभ्यासचित्रिते ॥ विकारो जायते देहे तत्र चित्प्रत्ययेन च । रत्यादिरप्रसरणखभावः माणभूमिकाम् ॥ अनधिष्ठाय सहसाऽस्तमेति स यदा पुनः। परामर्शाल्लक्षणीयामवधानधुरं ब्रजेत् ॥ ३८३ तदा स प्रसरत्येव प्राणभूमौ तथाविधः। तामसत्वान्न नैर्मल्यसाधुतोपचितः परम् ॥ सत्त्वमित्युच्यते सांख्यप्रसिद्धं सत्त्वमित्युत । न तस्य प्राणदेहे च विकारः संभवेत् कचित् ।। 1 ABO खेदा 24 बिकु । 20 25 30 wwwwww 5 सात्त्विकभावपरीक्षा नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ धूमविधूसरवदनप्रकृतिविजिह्मखभावस्य । नैते लोके दृष्टाः कचिदपि सत्त्वे विकारास्तु ॥ ३८६ तथा च राहुल:- सत्त्वं रजस्तम इति प्रथिता गुणा ये चित्तं तदात्मकमिहोपदिशन्ति सन्तः। सत्त्वोत्कटं मनसि ये प्रभवन्ति भावा- स्ते सात्त्विका निगदिता मुनिभिः पुराणैः ॥ ३८७ इति- लाघवे च प्रकाशे च तारतम्यस्य संभवात् । दृष्टः क्रोधभयादौ च तथा सत्त्वस्य संभवः ॥ ३८८10 तत्प्राणभूम्यां प्रसृतप्राणसंवेदवृत्तयः। देहेनैव तावदमी संवित्खीकारवर्जिताः॥ 'बाद्याख्यजडरूपेण भौतिकेन तथा पुनः। इन्द्रजालादिविशदविभावेन तथैव च ।। रत्यादिकेनातिचर्व्यमाणगोचरतां गतः। अनुभावैर्गम्यमाना भजन्ते भावशब्दताम् ॥ ३९१ ते च सत्त्वे प्राणमये भवत्वात् सात्त्विका मताः। ते सत्त्वेन चित्तवृत्ते(?त्तौ) चय॑माणा विधानतः॥ ३९२ निर्वृत्ता इति विज्ञेया. सात्त्विकास्तद्यथोच्यते। मनःप्रभवतो वस्तु सत्त्वं प्राणात्मकं मतम् ॥ सीदत्यस्मिन् मनः सत्त्वोत्कर्षात् साधुत्वतोऽपि च । केचित् सत्त्वेन संजल्पखभावां शब्दभावनाम् ॥ आहुः सूक्ष्मवासनादिवरूपेण व्यवस्थिताम् । तथा चिरतराभ्यासभावनाया विकल्पतः॥ संजल्पतोद्भिन्नवृत्तेः सनानो मनसोद्भवः। यस्मिन् तत् सत्त्वमित्युक्तं ननु किं केवलो? ले)भवेत् ॥ ३९६ प्राणभूते सत्त्वरूपे तत्र को हेतुरुच्यते । तस्मात् सत्त्वाद्धेतुभूतादाहितं यत्समन्ततः॥ मनः संवेदनं तस्य संबन्धान्मनसोऽपि च । समाधानाच रत्यादि विषयस्य तु *** ॥ 15 ३९३ ५० 1. 25 ३९८30 I Bc chopथा। 2 Ab८ शूक्ष्म । 3 b मनस' ।
. 5 M 10 ४०४ 15 नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [सात्त्विकभावपरीक्षा चय॑माणादिरूपेणोत्पद्यते प्रकृतित्वतः। स्तम्भावैरान्तरैः पूर्वमभिन्नक्रमरूपधृक् ॥ एवमुक्तात् त्रिःप्रकारात् सत्त्वादुत्पाद्यतेऽत्र यः। स सात्त्विक इति ख्यात इति चेदुच्यते त्वया ॥ तथैवं रतिनिर्वेदप्रमुखा अपि सात्त्विकाः। स्थानभेदोपसंक्रान्तावस्थान्तरयुजो न 'किम् ।। ४०१ एवमेकोनपञ्चाशजाता भावास्तु सात्त्विकाः। अत्राहुः केचिदाचार्याः स्थायिषु व्यभिचारिणः॥ पर्यवस्यन्ति तेषां च रूपं प्रसरणादहिः। अन्तोष्टारेचन(?)स्तम्भादिके दुर्योजमेव तत् ॥ ४०३ तथा ह्येते प्रोततया धरायं भूतपञ्चकम् । प्रपश्चयति प्राणोऽथ स्वतन्त्रश्चेष्टतेऽपि च ॥ तत्रावलम्बते प्राणं धराद्यं भूतपञ्चकम् । प्राणो यां यां चित्तवृत्तिं कुरुते खात्मनि श्रिताम् ॥ ४०५ संपादयति तां तां स स्तम्भखेदादिभावताम् । तथा ह्यत्र क्रोधभयहर्षादिविहिता अमी ॥ देहक्रियाप्रयत्नेच्छादय एकस्वरूपिणः । चित्तवृत्तिस्तम्भमात्राकारा स्युर्व्यभिचारिणः ॥ अमीभिरेव स्तम्भाद्यैर्नाट्ये संगृह्य वर्णिताः। यथोद्वेगा वैमनस्यं बाह्यवैवर्ण्यहेतुके ॥ तस्मात् सर्वचित्तवृत्तिकलापोऽष्टक ण्व यत् । अन्तर्भूतः स चैवात्रानुभावेष्वत एव सः॥ ४०९ तदुक्ती संगृहीतः स्यादन्यत्राप्येवमूख्यताम् । जिह्मभागप्रधाने तु प्राणे संक्रान्त उच्यते ॥ चित्तवृत्तिगणो बाह्यस्तैजसस्तु तथा पुनः। क्रोध इत्युच्यते तीव्रातीव्रत्वेनोपलक्षितः॥ आकाशस्यानुग्रहे तु प्रलयः परिकीर्तितः। न तत्पूर्व ततः पश्चात् खेदवारीति केचन ॥ तामवस्थां परिप्राप्तोऽथाहित्यादिभावकः । बहिर्विकारपर्यन्तप्राप्तोऽत्र परिदृश्यते ॥ 1 B८ कि। 2 AB6° निस्निताम्। 3 ABO थबाहि । 20 • 25 30 Prem 5 15 सात्त्विकभावपरीक्षा] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ तदत्रान्तर्मनोरूपत्वाख्याभावाच बाह्यतः। भौतिकाख्यविकारान्ता चेतोवृत्तिरिह स्फुटा ॥ प्राणभूमौ तु 'विश्रान्ता दर्शिता स्थूलदर्शिना । अत्राष्टत्वं स्थूलदृशा वस्तुतोऽनन्तता मता ॥ र(अत्युच्चलतया श्वासोच्छासरूपतयान्यकः । क्रोधोऽन्तरा समुदितो बाद्योऽन्यः खेदहेतुकः॥ ४१६ आनन्दोऽप्येवमेवेष्टः शोकजे तु गलग्रहे । अन्योन्य एव तेनाष्टाविति स्थूलदृशां दृशा ॥ देहात्ममानिनां तेन नीचानां झटिति स्फुरन् । उत्तमानां तु देहादिव्यतिरिक्तात्ममानिनाम् ॥ ४१८10 विवेकशालिनां चान्तर्न बहिश्यते कचित् । योगिनां सर्वथा नेति तैर्यथैवोपदिश्यते ॥ अतो भूतानुग्रहाचाष्टधा प्राणाद्यनुग्रहात् । स मनोजवलनाद् ध्यानाद् रोमहर्षः प्रजायते ॥ ४२० अयमों मया यावदुपयोगं प्रदर्शितः। आगमस्यानुरोधेन लोकाभिप्रायवेदिना ॥ ४२१ नाट्याभिप्रायमाश्रित्य सात्त्विकत्वं निरूप्यते । अत्र प्रयत्ननिर्वाः सात्त्विका इति संमतम् ॥ ४२२ रोमाश्चादि यथा बाह्यमान्तरं स्यात्तथा नटैः। कर्तुं न शक्यते व्यग्रैः शिक्षामात्रोपजीविभिः ॥ अलमेतेन 'चेन्नैवं लोकानुकृतिरूपकम् । सात्विकं तद्भवा भावाः सात्त्विका आन्तरा मताः॥ ४२४ प्राणायनुग्रहात्ते स्युरितराङ्ग तथेप्सिताः। ननु बाष्पादि यहाह्यं नाट्यमस्तु तदन किम् ॥ ४२५ तेनान्तरालिकेन स्यात् कृत्वे(?त्ये)नेति तथा न हि । इदमत्र तु तात्पर्य ये भावा नाट्यगामिनः॥ ४२६ कुर्वन्ति सुखदुःखे ये तथा येऽभिनयन्ति ते। बाह्यादयस्तु ते कार्या यथा नो शङ्कित्तास्तथा ॥ ४२७ बाह्यधूमादिहेतूत्था दुःखजैरान्तरालिकैः। बाष्पादिभिस्तुल्यरूपा नाट्यधर्मिप्रयोजिताः ॥ 1 ABO विश्राता। 2 ABO मेवष्टः। 3 ABO 'शालिनी। 4 0 योनिना। 5 ABO नात° । 6 ABO त्तटा। 7 ABO अलमेते च तेन्नैव। 8 ABG °भावा । 9 BG नामस्तु । 10 ABG धर्मी। ४२३ 20 25 ४२८30 ३६ 5 10 ४३४ 15 नृ०२० को-उल्लास १, परीक्षण : [आङ्गिकनृत्यक्रमः निर्णीयन्ते प्रेक्षकैश्च सत्यत्वेनान्तरालिकाः। रामादिकाभिनेयानां प्रतीतिप्रत्ययस्य च ॥ ४२९ विरोधित्वसमत्वाभ्यां 'श्रुतत्वेनोपरञ्जिताः। नटज्ञान विरोधेन चैवं रूपद्यस्य च ॥ अनुसारेणानुगाम्ये रूपं भातीति सांप्रतम् । अत्र दुःखमदुःखेन सुखं चासुखितेन च ॥ नाभिनेतुं क्षमं तस्मादितयाभिस्युतेन च । द्रष्टव्यावचुरोमाञ्चाविति सात्त्विकनिर्णयः॥ ४३२ अत्र प्रयत्ननिर्वत्यै समाने भाववर्गगे। अतिप्रसक्तिमुखेषु दोषरूपस्थितेषु च ॥ सात्त्विका आङ्गिकेष्वेव युज्यन्त इति सांप्रतम् । 'तस्मान्मुख्यावभिनयौ वागङ्गप्रभवी मतौ ॥ अर्थप्रतीत्युपायत्वाद्वाचिकोऽपि हि तद्गुणः । मुख्यत्वमाङ्गिकस्यैव यदारादुपकारकः ॥ वाचिकोऽपि भवेदर्थप्रतीतिद्वारतोऽस्य च । एवं नानामुनि मतोऽभिनयोऽत्र विवेचितः॥ चतुर्धा च त्रिधा द्वेधैका सत्येवमप्ययम् । चतुर्विधो भुवो भी लक्ष्यते लक्ष्मविन्मुदे । शाखानृत्ताकुरोपाधिभेदात्तत्राङ्गिक स्त्रिधा। वर्तनाः करयोः शाखास्तत्र वैचित्र्यचित्रिताः ॥ ४३८ अङ्गोपाङ्ग चयैस्तत्र स्थानकैरुपबृंहितः। करणैरङ्गहारैश्च निवृत्तं नृत्तमुच्यते ॥ अङ्कुरोऽप्यङ्गव्यापारो दृष्टिप्राधान्यमाश्रितः। भूतवाक्यार्थविषयश्चित्तवृत्त्यर्पणक्षमः॥ स एव "सूचीसंज्ञः स्याद्भाविवाक्यार्थसूचनात् । आरभटी सात्वती च कैशिकीति तिसृष्वपि ॥ ४४१ शाखा चैवाङ्कुरो "नृत्तं वर्तन्तेऽत्र यथाक्रमात् । देशकालवयोवस्थावेषभूषणशक्तितः॥ ४४२ भाव्यते तद्गतो भेदो भावकैरजसा स्वतः। रसाभिव्यक्तिपर्यन्तो वृत्ति त्रितयवाचिकम् ॥ 1 ABO लिकः । 2 AB0 शुत्वत्वे 1 3 ABO नुगांम्ये । 4 AB0 °न्मुखावौं । 5 AB0 मते। 6 ABO द्वेधौकधा। 7 80 कत्रिधा। 8 B0 कयैस्तत्र । 9 BO निवृत्त । 10 10 पणाक्ष | 11 ABO सूचात् । 12 ABO नृत्यं । 13 B0 तृतयवाचिकम् । 20 0 ४४० 30 ३७ ४४४ ४४६ ४४७ ४४८10 ४४९ ४५० आङ्गिकनृत्यक्रम ] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ संस्मृतो नृत्यशब्देनाङ्गिकोऽप्यत्राभिधीयते । लक्षणां वृत्तिमाश्रित्य नाट्यशब्दोऽपि वर्तते ॥ नृत्याभिधेऽङ्गाभिनये प्रोक्तं पूर्वमिदं मया । नृतेः क्यप्प्रत्यये नृत्यशब्दः कर्मविवक्षया ॥ भावोपसर्जनो यत्र रसो मुख्यः प्रकाशते । तन्नाट्यपूर्वकं नृत्यं मार्गनृत्यं तदुच्यते ॥ रसोपसर्जनीभूतो यत्र भावः प्रकाशते । मार्गो भावाभिधस्तस्मान्मृग्यतेऽत्र रसो यतः॥ नाट्यमार्गोपाधिभिन्नं द्विधा नृत्यमुदीरितम् । नृतेः क्तप्रत्यये रूपं देशीवृत्तमिहोदितम् ॥ नन्वत्र प्रत्ययैकार्थे मार्गदेशीति का भिदा। उच्यतेऽत्र तदैक्येऽपि यो यत्र विनियुज्यते ॥ विवक्षावशतो ब्रूते स तमर्थमिति स्थितम् । पङ्कजत्वे समानेऽपि लोके पझे तदीरितम् ॥ विवक्षा चात्र शोभायां हस्ते हस्तैकदेशवत् । नृत्ये नृत्यैकदेशेऽपि नृत्यशब्दाद् द्वयोर्ग्रहः॥ नाट्यधर्म(?मी)लोकधर्मीत्येवं रूपविशेषणात् । इति कर्तव्यता तस्य द्विविधा परिकीर्तिता ।। नाट्यधर्मी द्विधा तत्र शुद्धां नाट्योपयोगिनीम् । आश्रित्य कैशिकीवृत्तिं करोत्यावेष्टितादिभिः॥ चतुर्भिः करणैः शोभा प्रथमा सा भवेदियम् । अंशेनैवोपजीवन्ती लोकमत्या प्रवर्तते ॥ चार्यापविद्धया हस्तेनार्धचन्द्रेण यो भवेत्। निःकाशने प्रयोगोऽत्र न शास्त्रादेव गम्यते ॥ न लोकादेककादेव तत्राज्ञानादनादरात् । किं तु द्वितयसंसर्गाद्दिदृक्षाऽस्मिन् प्रजायते ॥ लोकधर्मी द्विधा ज्ञेया चित्तवृत्त्यर्पिकैकिका। निर्वेदादेश्चित्तवृत्तेज्ञानदृष्ट्यादयो यथा ॥ अन्या स्याबाह्यवस्तूनां निरूपणपरायणा । बाह्यस्य कमलादेस्तु पद्मकोशादयो यथा ॥ नाट्यं मार्ग च देशीयमुत्तमं मध्यमं तथा। 15 ४५१ ४५२ ४५३20 ४५५ 25 ४५८30 150 संसृतो। 2 ABO शब्दापि । 3 ABO प्रोक्त । 4 AB0 लोमकन्या ।
३८ ४५९ 5 10 15 नृ० २० को०-उलास १, परीक्षण १ [आङ्गिकनृत्यक्रमे शिरोमेदा अधमं क्रमतो ज्ञेयं नृत्यत्रितयमुत्तमम् । लास्यताण्डवभेदेन त्रयमेतद् द्विधा मतम् ॥ ललनाललितैरङ्गरचनोपचितैः शुभैः। प्रयोगैः सुकुमारैर्यत् साधितं लास्यमत्र तत् ॥ ४६० लासः स्त्रीपुंसयोर्भावस्तत्राहीये तु तद्विते । साधावस्ये(? थै) लास्यशब्दः कामोल्लासनहेतुकः॥ मृगृङ्गहारकरणचारीचरणकोमलः। ताण्डवं तद्भवेद्यत्तु प्राधान्येन प्रवर्तितम् ॥ ४६२ विषमं विकटं लध्वित्यत्र तद्विषमं मतम् । यदभ्यासवशाद्रजुभ्रमणादि प्रदश्यते ॥ विरूपवेषावयवव्यापार विकटं मतम् । करणैरश्चिताधैर्यत् प्रयुक्तं तद्भवेल्लघु ॥ ४६४ सङ्कीर्ण तद्भवेन्नृत्यं यदेतत्रयसङ्करात् । सर्वेष्वभिनयेष्वत्र व्यापारैराङ्गिकैर्यतः॥ ४६५ उत्पद्यन्ते नृत्यभेदाः समपञ्चा अनेकशः। अतः प्रयत्नतः सर्वान् तानहं वच्मि तत्त्वतः ॥ अनाङ्गाभिनयः साक्षादङ्गविज्ञानपूर्वकः । अतोऽङ्गनिचयं वक्ष्ये विस्तराल्लक्ष्मपूर्वकम् ॥ यद्यप्यत्र प्रधानत्वे नृत्ये चरणकर्मणः। चरणादेः प्रकथनं युज्यतेऽङ्गनिरूपणे ॥ ४६८ तथापि शिरसोऽङ्गानां प्राधान्यादधिकारतः। शास्त्रस्यास्य मनुष्यस्य शिरःप्रभृतिवर्णनम् ॥ ४६९ यतो मौलेस्तु मनुजा वावरण]तः सुराः। इति शिष्टाचारमूलं मौलितोऽङ्गनिरूपणम् ॥ एवं शिष्टानुरोधेन यद्यप्यूत्रोपवर्णितम् । शिरप्रभृतिकाङ्गानां लक्षणं संग्रहस्तथा । तथापि नृत्ये चार्यादौ मुख्यत्वाचरणस्य च । तद्धेतुकत्वप्राधान्यादन्यस्य चरणादितः॥ तत्राङ्गानि शिरो हस्तौ वक्षः पार्चे कटीतटम् । पादाविति षडुक्तानि भरताचार्यसंमते॥ ४७३ समं धुतं च विधुतमाधूतमवधूतकम् । कम्पिताकम्पितोत्क्षिप्ताधोगतानि च लोलितम् ॥ 1 ABQ कामला। 2 AB0 चार्यादे। 3 ABO न्यस्ये। 4 A भरचा । 20 25 30 ४७४ ३ ४७५ आझिकनृत्यक्रमे शिरोमेदा.] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ निहश्चितं परावृत्तं परिवाहितमश्चितम् । एवं स्युः शिरसो भेदाः समाने च चतुर्दश ॥ सम खभावाभिनये स्वभावावस्थितं मतम् । 'इदं पूजाजपध्यानखामिसेवादिषु स्मृतम् ।। ॥ इति समम् ॥१॥ क्रमेण तिर्यग्नमितं शनैरुक्तं धुतं शिरः। प्रतिषेधेऽनीप्सिते च विषादे विस्मये तथा ।। शून्यतायामनाश्वासे पार्श्वदेशावलोकने । अत्रैवान्तर्गतं ज्ञेयं शिरः पार्श्वविलोकितम् ।। ॥ इति धुतम् ॥२॥ 5 ४७७ 10 ४८०15 ४८१ धुतमेव भवेच्छीघ्रभ्रमणाद्विधुतं शिरः। शीतात ज्वरिते भीते सद्यः पीतासवे भवेत् ॥ ॥ इति विधुतम् ॥ ३॥ तिर्यमूर्द्ध सकृन्नीतमाधूतं कीर्तितं शिरः। गर्वेण भुजवीक्षायां पार्श्वस्थस्योर्ध्ववीक्षणे ॥ शक्तोऽस्मीत्यभिमाने च तथाङ्गीकारकर्मणि । इहैवोदाहितं ज्ञेयमन्तर्भूतं विपश्चिता ।। ॥ इत्याधूतम् ॥४॥ अधस्तात् सकृदानीतमवधूतमिहोच्यते । स्थित्यर्थे देशनिर्देशे संज्ञालापनयोरपि । उपविष्टाल्पनिद्रायामाह्वाने च प्रयुज्यते ॥ ॥ इत्यवधूतम् ॥ ५॥ ऊर्ध्वाध:कम्पनाच्छीघ्रं बहुशः कम्पितं मतम् । रोषे वितर्के विज्ञाने तर्जनेऽङ्गीकृतावपि ॥ त्वरितप्रश्नवाक्ये च राज्ञा कम्पितमीरितम् । विब्बोकादिषु कान्तानामिदमाहुर्मनीषिणः। तिर्यग्नतोन्नतं ज्ञेयमत्रान्तर्भावमागतम् ॥ ॥ इति कम्पितम् ॥६॥ 20 ४८२ ४८३ 25 ४८४ 10द।
नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण [आङ्गिकनृत्यक्रमे शिरोमेदाः द्विःप्रयुक्तं कम्पितं स्यात् शनैराकम्पितं शिरः। पुरस्थवस्तुनिर्देशचित्तस्थार्थप्रकाशने । संज्ञायामुपदेशे च 'प्रश्ने चावाहने तथा ॥ ४८५ ॥ इत्याकम्पितम् ॥७॥ 5 ४८६ ऊर्ध्वाभिमुखमुत्क्षिप्तं मस्तकं विनियुज्यते । दर्शनेऽनुगवस्तूनां चन्द्रादिव्योमचारिणाम् ॥ दिव्यास्त्राणां प्रयोगे च विचारेऽर्थस्य वेष्यते । इदमेवाल्पमुत्क्षिप्तमुद्राहित मितीतरे । ॥ इत्युत्क्षिप्तम् ॥ ८॥ ४८७ 10 'अधोगतं स्यादन्वर्थ दुःखे लजाप्रणामयोः ॥ ॥ इति अधोगतम् ॥९॥ लोलितं मन्दमन्दं स्यात् सर्वदिक्षु विलोलनात् निद्रागदग्रहावेशमदमूासु तन्मतम् ॥ ॥ इति लोलितम् ॥ १०॥ ४८९ 15 20 उत्क्षिप्तांसं किञ्चिदिव तिर्यग्ग्रीवं निहश्चितम् । एतद्विलासे विब्बोके ललिते किलकिञ्चिते ॥ माने मोहायिते गर्वे स्तम्भे कुमिते स्थिते । विलासो ललिता चेष्टा विशिष्टागमनादिका ।। ४९१ विब्बोको वाञ्छितार्थस्य लाभे गर्वादनादरः। अङ्गानां सौकुमार्य यल्ललितं तदुदाहृतम् ॥ हर्षक्रोधाभिलाषादेः सांकर्ये किलकिश्चितम् । मानः प्रणयजो रोषः प्रिये तज्जैरुदाहृतः ॥ कान्तस्तुतिकथालापलीलोहेलादिदर्शने । तद्भावभावनं स्त्रीणामुक्तं मोहायितं स्फुटम् ।। अहंभावः स्मृतो गर्वः स्त्रीणामभ्यासमागमे । स्तम्भः पराङ्मुखीभावः प्रियेऽनुनयतत्परे ॥ ४९५ सौख्यानुभावेऽप्यधरस्तनकेशग्रहादिषु । बाह्यो दुःखानुभावो यः सोऽत्र कुट्टमितं मतः ॥ ४९६ I ABO पृश्न। 2 ABC वाहिता। 3 A50 अधोमत। 4 ABU प्रमाणयो। Gf प्रणामयोः स र अ.७लो ७३। 25 ४५ 5 ४९८ आङ्गिकनृत्यक्रमे शिरोभेदा ] मृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ खभावावस्थितं स्त्रीणां स्थितमुक्तं मनीषिभिः। अनेनैवोक्तपूर्व तु शिरस्तिर्यग्नतोन्नतम् ॥ ॥ इति निहञ्चितम् ॥ ११॥ परावृत्तं तु तच्छीर्ष प्रत्यकृतमुखं तु तत् । परावृत्तानुकरणे पृष्ठतः प्रेक्षणेऽपि च । लजादिजनिते कार्य 'मुखापसरणेऽपि च ॥ ॥ इति परावृत्तम् ॥ १२॥ मस्तकं मण्डलाकारभ्रामितं परिवाहितम् । स्कन्धौ किञ्चिदिवाश्लिष्यदेतदारात्रिकं मतम् ॥ हर्षेऽनुमोदने क्रोधे विचारे विस्मये स्मिते। लज्जाकृते तथा मौने प्रियानुकरणेऽपि च । कार्यमाहुरिदं तज्ज्ञाः पराभिप्रायवेदने ॥ ॥ इति परिवाहितम् ॥ १३॥ पार्श्वतो विनतग्रीवं किञ्चिदश्चितमुच्यते । व्याधौ मोहे च मूर्छायां चिन्तायां मदनिद्रयोः। स्कन्धानतमिहैव स्यादन्तभूतं शिरोऽन्तरम् ॥ ॥ इत्यश्चितम् ॥ १४॥ ॥ इति चतुर्दशविध शिर.॥ 10 16 ५०१ 20 ५०२ [अथ वेणीधम्मिल्लः ।] वेणीकृतास्तथा मुक्ता बद्धाः स्तब्धकचा मताः। मोटको जूटको वीरग्रन्थिफिलकस्तथा । नारिंगी चैव धम्मिल्ला[:]कुन्तलः संनिवृन्तकः । 'यावग्रन्थिः कुशग्रन्थिब्रह्मग्रन्धिश्च गुम्फितः। मूलग्रन्थिस्तथा मध्यप्रान्तग्रन्थिस्तथैव च ॥ इत्याद्यनेकशश्चैव ज्ञातव्याः संयताः कचाः। कुटिलो लम्बितस्तजुर्वक्रस्तथाग्रगः। शिरोमध्यगतः कर्णोपरिगः सं(? गोऽसं)यतो भवेत् ॥ ॥ इति वेणीधम्मिल: परिपूर्णः ॥ ॥ इति आङ्गिकनृत्यक्रमः ॥२॥ ५०३ । 25 ५०४ 1 BO °पि। 2 ABO बद्धा । 3 ABC °ग्रन्थ।ि 4 ABC यावग्रन्थी-कुशग्रन्थी।
or 10 15 नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण [हस्तसंख्या अनेकार्थेषु शब्देषु संयोगायैर्यथार्थता। 'आङ्गिकाभिनयेष्वेव प्रयोगादर्थता तथा । सोऽपि प्रयोगो लभते लोकात् “खशास्त्रतोऽपि च ।। ५०५ निश्चेतव्यास्ततश्चैते लोकशास्त्रानुसारतः। पताकस्निपताकश्चार्धचन्द्रः कर्तरीमुखः अरालमुष्टिशिखरकपित्थखटकामुखाः॥ शुकतुण्डश्च काङ्गलपद्मकोशोऽलपल्लवः । सूचीमुखः सर्पशिराश्चतुरो मृगशीर्षकः॥ ५०७ हंसास्यो हंसपक्षश्च भ्रमरो मुकुलस्तथा। ऊर्णनाभश्च संदंशस्ताम्रचूडः करः परः ।। ५०८ चतुर्विंशतिरित्येते हस्तकाः स्युरसंयुताः। अभिनेयपरत्वेन कचित् स्युः संयुता अपि ॥ ५०९ उपधानः सिंहमुखः कदम्बश्च निकुञ्चकः। एतैः संमिलिता भूत्वा स्युरष्टाविंशतिश्च ते ॥ अञ्जलिश्च कपोतश्च कर्कशः खस्तिकस्तथा। खेडका 'वर्धमानाख्य उत्सङ्गो निषधस्तथा ॥ दोलः पुष्पपुटश्चैव तथा मकरसंज्ञकः। गजदन्तो बहित्थश्च वर्धमानस्तथैव च । त्रयोदशैते विज्ञेया संयुता हस्तका बुधैः॥ ५१२ योगप्रदालिङ्गनाख्यौ करौ द्विशिखरस्तथा । कलापकः किरीटश्च चकषश्वाथ लेपनः॥ ५१३ सप्तैते हस्तका सन्ति बृहद्देशीविदा मते । अष्टाचत्वारिंशदेते भवन्त्यभिनये कराः॥ ५९४ चतुरस्रावथोवृत्तावन्यौ तलमुखाभिधौ। खस्तिको विप्रकीर्णाख्यावरालखटकामुखौ ॥ ५१५ आविद्ध'वक्रौ सूच्यास्यौ रेचितावर्धरेचितौ। तथा(?)चतुरस्राख्यौ 'हस्ताबुत्तानवञ्चिती। नितम्बी पल्लवाख्यौ च केशबन्धाभिधौ करौ । लताख्यौ करहस्तौ च पक्षवश्चितकाभिधौ ॥ ५१७ 1 A0 °र्थधाः, Bधा। 2 A आगिकाभि, B0 आगिभि । BABO 'धास्त । 4 ABO खंशा। 5 50 मुखा। 6 80 वद्धमानाख्या। 7 ABC वक्त्रो। 8 ABO हत्वा । 20 25 ५१८ ५२० ५२१ ५२२10 ५२४ पताकः]] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ पक्षप्रद्योतको दण्डपक्षौ गरुडपक्षको । ऊर्ध्वमण्डलिनौ हस्तौ पार्श्वमण्डलिनौ तथा ॥ उरोमण्डलिनौ ताभ्यामुरःपाधिमण्डलौ । मुष्टिकखस्तिकावन्यौ नलिनीपद्मकोशको । अलपमानुल्वणी च वलितौ ललितौ तथा । वरदाभयदी चेति द्वात्रिंशनृत्यहस्तकाः ॥ लताख्यौ यौ करौ तौ तु नृत्याभिनयगोचरौ। संप्रदायाधुक्तिबलाल्लोकाचात्र विशेषधीः॥ क्रमादशीतिरेवं स्युः सर्वे संभूय हस्तकाः। कुञ्चिताङ्गुष्ठको यत्र तर्जनीमूलमाश्रितः॥ ऋजुश्लिष्टाङ्गुलि यः पताकस्तालतः समः। राज्ञां प्रतापाभिनये प्रशंसागर्वयोरपि ॥ प्रेरणायां प्रहारे च प्रोञ्छने प्रतिषेधने । छेदे प्रधाने गोप्याथै पुष्करादेश्च वादने ॥ आदर्श याचने लक्ष्णमर्दने तालिकादिके । स्पर्शे विभजने वस्तुनिर्देशेऽयं प्रयुज्यते ॥ ज्वालार्वाभिनयने स्यादूर्ध्वप्रचलाङ्गुलिः । तथाविधोऽधोगच्छन् स्यात् धाराद्यभिनये करः ॥ ऊर्ध्वं गच्छन् नु स्मृतेषु पक्षिपक्षे कटिस्थितः। 'मृदङ्गादिप्रहारेषु स्यादधो वदतः करः॥ मुखप्रदेशमागच्छन् नाभिदेशः खपार्श्वतः। पाषाणादिस्थूलवस्तुग्रहणे तादृशः स च ॥ उत्पाटनेऽन्योन्यमुखं पताकाद्वितयं भवेत् । सरःपल्वलनिर्देशे खस्तिकीभूय विच्युतम् ॥ कार्य पताकाद्वितयं विश्लिष्य स्वस्तिकीकृतम् । क्षालनेऽन्यमधिष्ठाय शीघ्रं घर्षन् भवेत् करः॥ तथाविधः शनैर्घर्षन् मर्दने मार्जनेऽपि च । खस्मिन् पार्श्वे कंपमानः प्रतिषेधे भवेदसौ॥ वायूमिवेगेधो 'गच्छन्नुच्छ्रित प्रचलाहुलिः। अन्येष्वभिनयेष्वेतं राजराजोपदेशतः। लोके युक्तिमवेक्ष्यात्र पताकं योजयेद्बुधः ।। ॥ इति पताका ॥१॥ 15 ५२६ ५२७ 20 ५२८ ५२९ 25 ५३० 3 1 ABO मृदाङ्गादि । 2 50 गच्छन् त्रु । 3 ABO प्रि० । 4 80 पताकयो।
नृ० २० को० उल्लास १, परीक्षण १ [त्रिपनाकादयः 10 एतस्यैव यदा वक्रानामिका क्रियते तदा। त्रिपताक 'विजानीयादभिनेयमथोच्यते । एष दध्यादिमङ्गल्यद्रव्यस्पर्शादिषु स्मृतः ॥ कुञ्चितो;डलिद्वन्द्वः स्यादाह्राने पराङ्मुखः । अधस्तलो बहिः क्षिप्ताङ्गलिद्वन्द्वस्त्वनादरे ।। प्रणामे मस्तकगतः कर्तव्यः पार्श्वतस्तलः। अश्रुपमार्जने च स्यादधोगच्छदनामिकः॥ आह्वानेऽङ्गुलियुग्मस्य कुञ्चने स्यादवाङ्मुखः। उत्तानाङ्गुलियुग्मस्तु वदनोनमने भवेत् ॥ संशये क्रमतोऽङ्गुल्यौ कर्तव्येऽस्मिन्नतोन्नते। अधोमुखो भ्रमन् शीर्ष प्रान्त उष्णीषधारणे ॥ तादृशो मस्तकादूर्व कार्यों मुकुटधारणे। तिलके स्याद्भुवोर्मध्यादूर्ध्वगामी ललाटगः॥ अलकस्यापनयने त्वलिकलकसंश्रितः। विकृते गंधवाक्शब्दे नासास्यश्रोत्ररोधनम् ॥ क्रमात् कुर्वन्नङ्गुलीभ्यां विद्वद्भिर्विनियुज्यते। क्षुद्रपक्षिषु च स्रोतस्यल्पे तुच्छेऽनिलेऽपि च ॥ क्रमादूर्ध्वमधस्तिर्यकटिक्षेत्रगतः करः। अधोमुखचला गुल्यौ दधदेषः प्रयुज्यते ॥ अस्त्रे 'संमार्जने नेत्रक्षेत्रगां बजती मधः। अनामिकां दधत् कार्यों लोकाच्छेषेऽभिनीयते ।। ॥ इति त्रिपताकः ॥२॥ ५३८ 15 20 ५४२ 25 अगुल्यो वितताः श्लिष्टा एकतोऽन्यत्र चापवत् । अङ्गुष्ठः क्रियते यस्य सोऽर्धचन्द्रः स्मृतो बुधैः ।। उपर्युत्तानितोऽर्धेन्दौ कपोलफलकं दधत् । परामुखः स्यात् खेदे तु बलान्निकाशनादिषु ॥ पराङ्मुखोऽग्रतो गच्छन् लोकयुक्तिमवेक्ष्य च । कटिक्षेत्रगतौ स्यातां "रस(? श)नायामधोमुखौ।। 1 विविजा। 20 मुखोमुखोन। 3 B0 शीर्षप्रात। 4 ABO मध्यो दू। 5 80 चतस्रोत। 6 B0 चलङ्गल्यौ। 7 ABO स्त्रमार्जने। 8 B0 धमः। 9 80 कां दत् । 10 80 तार।
४५ 15 कर्तरीमुखादय ] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ मध्योपम्ये(?स्थे) तथा श्लिष्टौ तिर्यगन्योन्यसन्मुखौ। कर्णक्षेत्रगतः कार्यः कर्णाभरणधारणे ॥ ५४६ असंयुतोर्ध्वगामिभ्यामुच्छ्रिताभ्यां खपार्श्वतः। अर्धचन्द्रकराभ्यां चाभिनयो (? नेयो) बालपादपः॥ शङ्खस्याभिनयो ज्ञेयो 'मुखक्षेत्रगते द्वये । पुरतः कलसे स्यातां करावन्योन्यसन्मुखौ । कटके मण्डलावृत्त्या मणिबन्धप्रदेशगः ॥ ५४८ ॥ इत्यर्धचन्द्रः ॥३॥ अनाश्लिष्टा मध्यमायाः पृष्ठे स्यात्तर्जनी यदा। त्रिपताकस्य विज्ञेयस्तदासौ कर्तरीमुखः॥ ५४९10 अलक्तकादिना पादरञ्जने स्यादधोमुखः। तद्वदेवाग्रतः कार्यों बुधैर्मार्गप्रदर्शने ॥ नासिकाक्षेत्रतः कार्यः कर्णान्तिकमुपाश्रितः। दर्शने शीर्षगावेतौ शृङ्गाभिनयने मतौ॥ ५५१ वितर्कितेऽपराधे च पतने मरणे तथा । क्षेप्तव्योऽधोमुखो व्यस्ततर्जनिश्चलदङ्गुलिः ॥ ५५२ उत्तानाङ्गुलिरग्रस्थस्तद्वत् स्याल्लेख्यवाचने । द्वित्रिय प्रयोज्यं स्यादिति तद्वेदितां मतम् ॥ ५५३ ॥ इति कर्तरीमुख.॥४॥ अङ्गुष्ठः कुञ्चितो यत्र तर्जनीचापवनता। आकुश्चिताः पूर्वपूर्वपार्श्वगा मध्यमादिकाः ॥ ५५४ भवन्ति यत्र विज्ञेयस्तत्रारालकरो वुधैः। हृदयक्षेत्रगोऽयं स्यादाशीर्वादादिकर्मणि । खेदापनयने भालक्षेत्रात्कार्य त्वधोमुखः॥ ५५५ असंबद्धप्रलापे स्यादहिः क्षिप्ताङ्गुलिस्त्वयम् । श्राद्धकर्मादिके तज्जैः प्रयोज्योऽयं बहिर्मुखः ॥ पतदङ्गुलिराह्राने जनसंघे तथा व्रजन् । प्रदक्षिणे देवतानां भ्रमन् स स्यात् प्रदक्षिणम् ॥ अङ्गुल्यग्रः खस्तिका स्थाद्विवाहे द्वयसंगमात् । बलोत्साहधृतिस्थैर्यगर्वगाम्भीर्यसूचने ॥ 1 ABO तिर्यगन्यो। 3 BO मुष । 4 BC मरणे मरणे तथा । 5 10 'ज्यस्या। 6 ABO कार्यत्व। 7 ABO बहिमुखः । 20 25 ५५७ ५५८ 30 2 B0 करम्या।
[मुष्ट्यादयः नृ० र० को० उल्लास १, परीक्षण १ नाभिक्षेत्रादूर्ध्वगामी स्थादयं मस्तकावधिः । वीप्सया मण्डलावृत्त्या यथौचित्यादयं भवेत् ॥ कामिनीनां केशबन्धे तथा तेषां विकीर्णने । परस्परमसंबंधभाषणेऽयं प्रयुज्यते ॥ पुनः पुनर्बहिः क्षिप्ताङ्गुलियुक्तिमुपाश्रितः। त्रिपाताकोदिते कर्मण्यखिलेऽयं प्रयुज्यते ॥ त्रिपताकेऽप्यरालोक्तं स्त्रीणां पुंसां न युज्यते । इति व्यवस्थया केचिदाचार्याः संप्रचक्षते ।। ॥ इत्यराल.॥५॥ ५६२ 10 तलमध्याग्रसंलग्ना अमुल्यः श्लिष्टसंधयः। अङ्गुष्ठो मध्यमापृष्ठसंलग्नो मुष्टिहस्तकः ॥ मल्लयुद्धे खड्गकुन्तनिस्त्रिंशादिग्रहे तथा । संवाहने दोहने चाग्रगाङ्गुष्ठश्च धावने ॥ प्रकोष्ठग्रहणे चापि रसनिष्कर्षणे तथा । 'रसवद् द्रव्यतो लोके युक्तितः स्यात् करद्वये ॥ ॥ इति मुष्टिः ॥६॥ 15 ५६६ स एवोर्वीकृताहुष्टः शिखर परिकीर्तितः। शक्तितोमरयोमोले ऽलक्तकोत्पीडनेऽपि च ॥ कुशाङ्कुशधनुर्वल्लीग्रहणेऽधररञ्जने । अलकोत्क्षेपणे 'कार्ये कार्यों मुष्टिस्तु युज्यते ॥ ॥ इति शिखरः ॥७॥ 20 ५६७ ५६८ अग्रदेशेन चेल्लग्नाङ्गुष्ठानेणैव तर्जनी । एतस्यैव तदा हस्तः कपित्थः कथितो बुधैः ॥ धारणे कुन्तवज्रादेः शराकर्षादिकर्मणि। चक्रचापगदादीनां ग्रहणे च प्रयुज्यते । यथाभूतार्थकथने नियोगे शिखरस्य च ॥ ॥ इति कपित्थः ॥८॥ 25 1 ABO वधि । 2 ABO यथो। 3 A.B0 सप्रचक्ष्यते । 4 ABO निस्त्रश। BARO रसव द्रव्यतो। 6 ABO °क्षो। 7 ABC कार्य कार्ये । 8 ABC °जादिश of धारणे कुन्तवज्रयो. सं र अ ७ श्लो १३२ ।
୫s ५७० खटकामुखादयः] नृ० र० को०-उल्लास, परीक्षण १ अनामिकाकनीयस्याधुत्क्षिप्तेव कृते मनाक् । विरलेऽस्यैव चेत् स्यातां तदा स्यात् खटकामुखः ॥ उत्तानोऽयं लगादाने चामरस्यापि धारणे। प्रसूनावचये बाणाकर्षणे दर्पणग्रहे ॥ वल्गाग्रहे पत्रवृन्तच्छेदने बीटिकामहे । शरमन्थाकर्षणे च लोकयुक्तिमवेक्ष्य च । पेषणे कुडमादीनामिमौ कार्यावधस्तलौ ॥ ॥ इति खटकामुखः ॥९॥ 5 ५७२ ५७३ 10 ५७४ ५७९15 तर्जन्यनामिकेऽत्यन्तवक्रेऽरालस्य चेत् स्थिते । शुकतुण्डस्तदा हस्त ईर्ष्यायां प्रेमकोपतः॥ सापराधे प्रिये द्यूताक्षपाते लेखधारणे । वीणादिवादने चास्य प्रयोगः कैश्चिदिष्यते ॥ न त्वं नाहं न मे कृत्यमित्यसंबन्धभाषणे । बहिः क्षिप्ताङ्गुलिः स स्यात् सावज्ञे तु विसर्जने । अन्तर्मध्याङ्गुलिः स स्यात् सावज्ञावाहने तथा ॥ ॥ इति शुकतुण्डः ॥ १० ॥ तर्जन्यङ्गुष्ठमध्याः स्युरू नेताग्निवत् स्थिताः। वक्रानामा कनिष्ठो ः काङ्गुले हस्तके भवेत् ॥ चुचुकाभिनये तद्वचिबुकग्रहणे शिशोः। बिडालस्य पदे कार्यः कुसुमे चम्पकस्य च । मिते ग्रासे फलेऽस्येव रत्नाद्यभिनयेऽपि च ॥ ॥ इति काइल.॥११॥ ५७६ +4 20 ५७७ ५७८ साङ्गुष्ठाडलयः किञ्चित्कुञ्चिता विरलास्तथा । अलग्नाग्रा भवेयुश्चेत् पनकोशस्तदा करः॥ पुष्पाणां ग्रहणे नांदीपिण्डदाने च विस्तृतः। भूमिस्थितार्थग्रहणे कुश्चिताग्रस्त्वधोमुखः॥ फुल्लाब्जेन्दीवरादौ तु संश्लिष्टमणिवन्धको । 25 ५७९ 1 AB0 दर्पणाग्रहे। 2 B0 प्रेमके यत । 3 ABO °क्षेपाते। 4 ABO लेषधारणे। 5 ABO कार्य। 6 ABO नये नच। 7 ABO किचि कुचिता।
४८ [अलपल्लवादयः नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ विरलाडलीप कोशौ सिंहाचैरामिषग्रहे । लोकानुसारतः कार्यः कचिदेकः कचिद्वयम् ॥ ॥ इति पद्मकोशः ॥१२॥ 5 10 15 व्यावर्तिताख्यं करणं कृत्वा वा परिवर्तितम् । यत्राङ्गुल्या करतले पार्श्वस्थाः सोऽलपल्लवः ।। ५८१ अयमेवालपद्मः स्यात् परिवर्तितमाश्रितः। अन्तायुक्तमिथ्योक्तौ कस्य त्वमिति वादने । खापराधमोञ्छने च स्त्रीभिनास्तीतिवादने ॥ ५८२ ॥ इत्यलपल्लव. ॥१३॥ 'खटकामुखहस्तस्य यस्मिन्नूर्ध्वप्रसारिता। तर्जनी दृश्यते सोऽय हस्तः सूचीमुखो भवेत् ॥ ५८३ एकत्वे सरलोभं स्थानासास्थाश्वासवीक्षणे । भ्रमन्ती वलयाकारस्तूर्खा स्याचक्रसूचने ॥ ५८४ आयान्ती शीघ्रमूर्ध्वाधः सौदामिन्यामियं भवेत् । कुलालचक्राभिनये भ्रमन्ती स्यादधोमुखी ॥ ५८५ रथचक्राभिनयने भ्रामयेन्निजपार्श्वतः। साधुवादे ध्वजे चापि चलामा च दर्शयेत् ॥ कर्णावतंसे कर्णान्तं नयेदीषत् प्रकम्पिताम् । स्तबकाभिनये किञ्चित् कुञ्चिता स्यात् प्रसारिता ॥ कुटिलायां गतौ कार्या मण्डलाकारधारिणी। भ्रमे त्वत्यन्तमसकृत् पार्धात्पार्थान्तरं व्रजेत् ॥ ५८८ चलत्किशलये दीपशिखायामपि चेष्यते । नक्षत्राद्यवलोके च सरलोर्ध्वमुखा भवेत् ॥ भ्रमन्ती मण्डलाकारं पतने तु पतत्यधः । सिंहादिदंष्ट्राभिनये त्वोष्ठप्रान्तगतावुभौ ॥ किश्चित् पार्श्वनती कार्यों करौ सूचीमुखौ सदा। संयोगे पार्श्वसंयुक्त तर्जन्योऽधस्तले मते ॥ वियोजिते वियोगे तु कलहे खस्तिकीकृते । कर्णकण्डूयनेऽनिष्टश्रवणे श्रवणोपगा। 1 AB0 षटका । 2 AB0 कुचिता। 3 ABO सेप्यते । 4 ABO कायो। 5 ABO न्यकले of अधस्तले सं. २, अ.७. श्लो १५१ । 20 25 5 10 ५९७ सर्गशिरआदयः] नु० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ 'चिकुरापनयखेदापनये किल संश्रिता। तर्जकरिपतो; स्यात् सीवने चांशुकस्य च ॥ चलाग्रगा ज्ञात प्रश्ने किञ्चित् पार्श्वनता भवेत् । ईश्वराभिनये भालदेशगा स्यादधोमुखी ॥ देवेन्द्राभिनये सा स्यात्तिरश्चीनोन्नता भवेत् । परिवेषाभिनयने भ्रामयेन्मण्डलाकृतिम् ॥ तिरश्चीनां तर्जनी च तथान्यदपि लोकतः । नाट्याचार्योपदेशेन स्वयमूह्यं विपश्चिता ॥ ॥ इति सूचीमुख. ॥ १४॥ पताको निम्नमध्यो यः स तु सर्पशिरा भवेत् । अधोगामी सर्पगतावुत्तानो देवतर्पणे ।। मल्लानां च भुजास्फोटे नियुद्धादिषु कीर्तितः। प्रस्थ(स्थि) ते परिमाणे वास्फालने करिकुम्भयोः॥ ॥ इति सर्पशिरा.॥१५॥ मध्यमामध्यमो यत्र पताकाङ्गुष्ठको भवेत् । कनिष्ठिका चोर्ध्वगता स भवेचतुरः करः॥ अन्ये कनिष्ठिकामीषदनामापृष्ठगां जगुः । पताकाङ्गुष्टकं मध्यामूलगं चतुरे करे ॥ नये वदनदेशेऽसौ विनये मणिबन्धयोः। युतौ विचारे पार्श्वस्थ ऊहापोहे हृदि स्थितः ॥ उद्वेष्टितयुतः कार्यो लीलायां कैतवे पुनः। स मोक्षप्रेरणे च स्याच्छनैरूज़तला करः॥ मर्दनाभिनये कार्यों मध्यमाङ्गुष्ठमर्दनः । चातुर्यवचने त्वेतौ संयुतौ चतुरौ करौ ॥ उत्तानो नयनौपम्ये पद्मपत्रनिरूपणे। मृगकर्णाभिनेये च बालके स्थादधोमुखः ॥ विधेयौ खस्तिकाकारौ सुरताभिनये करौ । खल्पार्थाभिनये तद्ववर्णकस्यापि सूचने ॥ चतुरश्चतुरैः कार्यः चतुष्ष्वर्थेषु लोकतः । ॥ इति चतुर. ॥ १६ ॥ 15 ६०१ 20 25 30 1 ABO चिकुरोप 1 2 ABO प्रश्नो। 3 ABO लोकता। 4 ABO °स्थाऊ । 5 ABO वैतवे । of कैतवे सं र अ.७ श्लो १६७। 6 AB0 लोकता।
5 10 नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [मृगशीर्षादय भवेतां सर्प शिरसो यदाङ्गुष्ठकनिष्ठिके । ६०६ ऊर्धाकृती तदा हस्ती मृगशीर्ष उदाहृतः । अयेह सांप्रतार्थेषु सोऽधो सुताक्षपातने ॥ उत्तानोऽलिकदेशादिखेदापनयने भवेत् । अलिकादिक्षेत्रसंस्थ एवमायूहयेत्परम् ॥ ६०८ ॥ इति मृगशीर्षः ॥ १७ ॥ तर्जन्यगुष्ठमध्याः स्युर्यत्र त्रेताग्नियत् स्थिताः । लग्ना यत्रो विरले शेषे सो हंसवक्त्रकः॥ श्लक्ष्णे मृदुनि निःसारे महिताडलिकत्रयः। शिथिलेऽल्पे लघावग्रं दधत् क्षिप्रं विधूनितम् ॥ मुक्ताफलादिवेधे च कुसुमावचयादिषु । स्युतविच्युतभेदेन यथौचित्यं विधीयते॥ ॥ इति हसास्य. ॥१८॥ पताकस्य न तन्मूलं तर्जन्यायमुलित्रयम् । यदि किश्चिद् भवेत् स स्यात् हस्तको हंसपक्षकः॥ ६१२ आचमने स्यादुत्तानश्चन्दनाद्यनुलेपने । अधोगतस्तथोत्तानः प्रतिग्रहकृतौ मतः॥ 'त्रिपुंड्रादिविधौ कार्यों भालक्षेत्रगतः करः। प्रत्यक्षे च परोक्षे चालिङ्गने स्वस्तिको करौ ॥ स्तम्भाधभिनये कार्यों मण्डलाकृतिसुन्दरौ । स्त्रीणां विभ्रमभेदेषु स्तनयोरन्तरे भवेत् ॥ कपोलदेशे विधृतश्चिन्तायां हनुधारणे । रसभावानुभावेषु यथौचित्यं प्रयोजयेत् । अनुक्तेषु करेषु स्युरनुभाववशानुगाः॥ ६१६ ॥ इति हसपक्षः ॥ १९ ॥ स करो भ्रमरो यत्र मध्यमाङ्गुष्टको मिथः । श्लिष्टानौ तर्जनी नम्रान्ये 'तूचे विरले तथा । कर्णपूरे तालपत्रे कण्टकोद्धरणादिषु॥ ॥ इति भ्रमरः ॥२०॥ 15 20 25 . 1 ABO लषा । 2 ABO त्रिपुद्वादि। 3 ABO श्चितायां । 4 ABO तूर्ये । of सं २ अ.७ श्लो, १६८।
६१८ ऊर्णनाभादय ] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ साङ्गुष्ठाडलयो यत्र संलग्नाग्राः सुसंहताः । ऊर्ध्वाः स मुकुलो ज्ञेयो मुकुलाकारपेशलः ॥ सुरार्चने भोजने च बलिकर्मणि कुड्मले । मुहुर्विकाश्य प्रकृति नीतो दाने त्वरान्विते ॥ कमलादेः प्रार्थनायां संख्यापश्चकसूचने । सविधे कामिनीनां तु मुखस्थो विटचुम्बने । स्थादाच्छुरितकेऽप्येष रसभावविजृम्भितः। कामिनीकुचकक्षादौ सशब्दं नखलेखनम् । यद्गुलीपञ्चकेन तदाच्छुरितकं विदुः॥ ॥ इति मुकुलः ॥२१॥ ६२१ 10 R AAN 20 पश्चाप्यङ्गुलयो यत्र पद्मकोशस्य कुश्चिताः। ऊर्णनाभः स विज्ञेयः शिरस्कण्डूयनादिषु ॥ देर चौर्येण वस्तुग्रहणे कुष्टायभिनयेन च । सिंहव्याघ्राभिनये चिबुकक्षेत्रगौ च तौ। स्वस्तिकौ तु करौ कार्यों फलादेर्ग्रह एककः ॥ २३ 15 ॥ इत्यूर्णनाभः ॥ २२॥ 'अरालागुष्ठतर्जन्यौ मिलितायौ तथा पुनः। तलमध्यो(?ध्ये) सनाग्निस्तः(?मनाग न्यस्तः) स कं(?सं)दंशोऽभिधीयते ॥ ६२४ अग्रजो मुखजश्चैव पार्श्वजश्चेत्ययं विधा। तत्राग्रजःप्रामुखः स्यान्मुखजः सम्मुखो भवेत् ॥ पार्श्वतः स्यात्पार्श्वमुखो विनियोगोऽधुनोच्यते । कुसुमच्छेदने वृन्तात् कण्टकोद्धरणे तथा ॥ ६२६ सूक्ष्मप्रसूनावचये संदंशोऽग्रज उच्यते। वर्यञ्जनशलाकादिपूरणे मुखजो मतः ॥ ६२७ 25 धिगित्युक्तौ तु रोषेण संदंशः पार्श्वजः शुभः। मणिमुक्ताप्रवालादौ गुणनिक्षेपणे मतः॥ ६२८ मणीनां वेधने चापि तत्वस्यापि प्रभाषणे । ध्याने निरूपणे सूक्ष्मत्र्यणुकादेस्तु घर्षणे ॥ 1_AB0 आरालाङ्गुष्टतर्जन्यो। 2 of किंचिञ्चेत्तलमध्यस्थस्तदा सदंश उच्यते ॥ स.र.अ.७ श्लो १७६ ।
10 नृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [तानचूडादयः अलक्तकादिवस्तूनां चित्रकर्मण्यपीष्यते। पार्थाभिमुखहस्ताभ्यां दरिद्रस्य प्रकाशने ॥ ६३० भाषणे सद्वितीये स्यात् सरोषे वामहस्ततः । किञ्चिदग्रविवर्तेन तथान्येष्वपि युक्तितः ॥ ६३१ ॥ इति संदश. ॥ २३ ॥ अङ्गुष्ठो मध्यमाग्रेण संलग्नः कुटिला यदा। तर्जन्यन्ये तलस्थे चेताम्रचूडस्तदा करः ॥ शीध्ये विश्वासकार्ये च बालाहाने च भर्सने । ताले कलामुहूर्तादौ छोटिकादौ च शब्दवान् ॥ प्रसारितकनिष्ठां च मुष्टिमन्ये प्रचक्षते । ताम्रचूडं सहस्रादी गणने विनियुज्यते। क्षिप्तमुक्ताङ्गुलिः प्रोक्तो विमुषोऽभिनये बुधैः ॥ ॥ इति ताम्रचूड ॥ २४॥ ॥ इति चतुर्विंशतिरयुतहस्ताः ॥ पताको विरलाङ्गुष्ठ उपधानः करो भवेत् । स्थाचिन्ता निद्रयोरेष उपधानेऽपि युक्तितः॥ ६३५ ॥ इत्युपधान' ॥ २५॥ कनिष्ठाङ्गुष्ठको यत्राधोगती संहतं पुनः । तर्जन्यादिवयं स स्यात् सिंहास्यस्तत् खरूपतः। सिंहस्याभिनये स स्यात् मेलने द्रवचूर्णयोः ॥ ॥ इति सिहास्य. ॥२६॥ संहताङ्गुलयो यत्र मध्ये वर्तुलतात्मता'। कदम्बोऽसौ रसास्वादे हस्तको विनियुज्यते ॥ ॥ इति कदम्ब ॥ २७॥ पताकाष्ठको यन्त्र मध्यमामूलसंश्रितः। निकुञ्चकोऽसौ स्वल्पार्थे वेदस्याध्ययने मतः॥ ॥ इति निकुञ्चः ॥२८॥ 15 20 25 1 0 यक्लित.। 2 ABO °यै । 3 ABO चिता। 4 ABO मन्ते । 5 ABO "त्मतां ।
कपोतादय] नृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण १ एभिश्चतुर्भिः सहिता अष्टाविंशतिरयुतहस्ताः। भवेतां यत्र संश्लिष्ट पताकस्य तले मिथः । अञ्जलि म हस्तोऽयं विनियोगोऽस्य कथ्यते ॥ धार्यः क्रमात् शीणि वक्र चक्षुर्देशे नमस्कृती। देवताया गुरोश्चैवं ब्राह्मणानां ऋभिस्त्वयम् । नियतो नियतस्थाने स्त्रीभिरेष प्रयुज्यते ॥ इत्यञ्जलि. ॥१॥ 5 10 ६४२ ६४४ 15 - करावक्लिष्टतलको लिष्टमूलाग्रपार्श्वको । कपोताकृतितो हस्तः कपोतः कीर्तितो बुधैः॥ इममेव परे प्राहुः कूर्मकं नाट्यवेदिनः। विनये गुरुसम्भाषे प्रणामे प्रामुखो मतः॥ वक्षःस्थः कम्पितः कार्यः स्त्रीकापुरुषयोभये । स खेदवाक्याभिनये नेदानीमितिसूचने ॥ इयत्तायाः परिच्छेदेऽङ्गुलिः स्पर्शनपूर्वकम् । विमुक्तोऽयं बुधैः कार्यों युक्तितोऽभिनयान्तरे ॥ ॥ इति कपोत.॥२॥ अङ्गुल्यो यन्त्र करयोरन्योन्यस्यान्तरेषु च। अन्तर्बहिर्वा दृश्यन्ते निर्गताः स तु कर्कटः ।। परामुखतलः किश्चिदन्त ताखिलाडलिः । ऊर्व पार्थेऽग्रतो वा स्यात् कामावस्थागमोटने ॥ बहिर्गतागुलिः स्थूलजरठस्य(जठरस्य) निरूपणे। जरठ: क्षेत्रगः (जठर-क्षेत्रगः) कार्यों मनाक् चक्राङ्गुलिः पुनः॥ शंखस्य धारणे कार्यों जृम्भादौ बहिरङ्गुलिः । खेदेऽङ्गुलीनां पृष्ठे स्थाद्धनू राजाभिषेचने । मूर्ध्नि धार्याःों) द्विस्त्रिाय [लानकायें] प्रयुज्यते ॥ ॥ इति कर्कटः॥३॥ ६४६ 20 25 ६४८ - 1 B0 °षयोभ । 2 80 परिच्छेदगुलि । A तु । 4 40 पार्श्वन। 5 of जठर- क्षेत्रगःसं र अ ७ श्लो १९१। 6 The missing words are supplied from Asokamalla's work on Nitya of स्नानकर्मणि । द्विस्त्रिा मूर्भि संयोज्यो TË T RICETEISES: I folio 11 # of the mas नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [स्वस्तिकादय अरालाख्यौ पताको वा खटकामुखसंज्ञको। अन्योन्यमणि बन्धस्थावुत्तानौ वामपार्श्वगौ । हृदयक्षेत्रगौ वा स्तश्चेत्तदा स्वस्तिको मतौ ॥ एवमस्तीति नारीणां भापणे विच्युतः स तु। सागराकाशमुख्येषु विस्तीर्णेषु प्रयुज्यते ॥ ॥ इति स्वस्तिकम् ॥ ४ ॥ अन्योन्याभिमुखौ स्यातां हस्तौ चेत् खटकामुग्यो । खस्तिको मणिबन्धे वा 'खटकावर्धमानकः ।। उत्तानपादयं(उत्तानः स्यादयं) सूर्योदयादौ प्रथम मते । प्रमाण(?प्रणाम) करणे पुष्पग्रथने सत्यभाषणे । ताम्बूलग्रहणे यूनोर्द्वितीये तिर्यगाननः॥ ६५२ ॥ इति खटकावर्धमानः ॥५॥ 10 15 यद्वा वामपार्श्वगतं 20 'सर्पशीर्षों पताको वा खस्तिको 'मणिबन्धगौ। परस्परस्कन्धदेशौ गतावुत्सङ्गसंज्ञके ॥ ६५३ दक्षपार्श्वगतं नु वा। उत्सङ्गे केचिदिच्छन्ति स्वस्तिकं नृत्यकोविदाः॥ ६५४ पार्श्वस्याभिमुखे यद्वा हस्तयोः पृष्ठके यदा। कृपरी खस्तिकाकारौ उत्सले केचिदूचिरे ॥ ६५५ अतिप्रयत्नसाध्येऽर्थे लीलाया ग्रहणे तथा । "पराङ्मुखस्य शीते वा रोषामर्षकृते तथा। प्रार्थनानभ्युपगमे लज्जादावपि योषिताम् ॥ ६५६ ॥ इत्युत्सङ्गः ॥६॥ स्कन्धकूपरयोर्मध्यमन्योन्यस्य भुजौ यदा। ईषदूर्ध्वप्रदेशस्थौ गृहीतः "सर्पशीर्षकौ ॥ ६५७ तदा स्यानिषधो हस्त औत्सुक्यादी नियुज्यते । गाम्भीर्यस्थैर्यगर्वादौ आचायैर्विनियुज्यते ॥ ६५८ 1 AB0 °ख्यो। 2 ABO °मबस्थौ। 3 ABO खटिका। 4 ABO खेटका। 5 of सूर्योदयादावुत्तान• स्यादयं प्रथमे मते Vipuadasa quoted in भ को पृ १५३ । 6 of प्रणामकरणे ना शा अ६ श्लो १३८ and Vipradasa भ को पृ १५६ । 7 ABO सप्तशीर्षों। 8 ABO स्वस्तिके। 9 ABO मृत्यको । 10 A0 पुरामुखस्य। 11 ABO सप्त। 25 ५५ ६५९ दोलादया] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ कपित्थो हस्तको वापि दक्षवामेतरं करम् । मुकुलं वेष्टिते प्राहुस्तदान्यं निषधं परे॥ शास्त्रार्थस्य स्खीकरणे स्वीकृतार्थस्य धारणे । 'मान्यमेतदिदं वाक्यमित्युक्तो पीडनेऽपि च । तथा समयशास्त्रोक्तसंकेतग्रहणेऽपि च ॥ ॥ इति निषध. ॥७॥ ६६०० दोले श्लथांसो कर्तव्यो पताको विरलाली । लम्बमानौ नियोज्योऽयं मूर्छायां व्याधिखेदयोः ॥ संभ्रमे गर्वगमने कर्तव्यः पावदोलितः। मदे चैव यथायोगं स्तब्धो वा क्रियते करः॥ ॥ इति दोल. ॥८॥ ६६२ 10 उत्तानो व्यक्तसंश्लिष्टकरभौ सर्पशीर्षकौ । स्यातां पुष्पपुटो नाम पुष्पाञ्जलिविसर्जने ॥ धान्यपुष्पफलादीनां ग्रहणे च समर्पणे। 'अर्धार्थिसंप्रदाने च तोयस्यानयनेऽपि च । पाणिपात्राशने राज्ञः प्रसादग्रहणे गुरोः॥ ॥ इति पुष्पपुट. ॥९॥ 15 ६६४ परस्परोपरिगतौ सुसंश्लिष्टावधोमुखौ । अागुष्ठौ पताको तौ भये(?) तां मकरे करे ॥ क्रव्यादमत्स्यमकरद्विपीनां व्याघ्रसिंहयोः। नद्याः पूरे च बाहुल्ये प्रयोज्योऽयं विचक्षणैः॥ ॥ इति मकरः॥१०॥ 20 कटिक्षेत्रे सर्पशीर्षों कुश्चन्कूर्परको यदा। गजदन्तस्तदा हस्तो ग्रहे स्तम्भस्य स स्मृतः महाभारस्योबहने केचिदेनं प्रचक्षते । प्रथमं निषिधं तं च वरवध्वोः समेतयोः॥ 25 ६६८ 1 ABO मन्य। 2 ABO अध्यार्थिसंप्रदाने । of अर्धदाने° Vipiada.sal in भ को पृ ३७५। 3 AB0 °पात्रशने । 4 B0 गृहे ।
[अवहित्थादय. नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ विवाहस्थाननयने तथा शि(शै)लशिलादिनः। वृक्षादीनां चालने च कर्तव्यः स्याद्गतागतः॥ ॥ इति गजदन्तः ॥११॥ ६६९ शुकतुण्डावधोवत्रौ हृदयाभिमुखौ करौ । कृत्वाधो नीयमानो चेदवहित्थस्तदोदितः। दौर्बल्यौत्सुक्यनिःश्वासगात्रकाश्र्येष्वसौ भवेत् ॥ ॥ इति अवहित्थ. ॥ १२ ॥ ६७० ६७१ 10 मृगशीर्षों हंसपक्षावथवा सर्पशीर्षकौ । पराड्मुखौ खस्तिकत्वं प्राप्तौ स्याद्वर्धमानकः॥ स्वस्तिकेन विना भूतौ तावेनं केचनाभ्यधुः। द्वारवातायनादीनां कपाटोद्धाटने मतः ।। श्रीमत्कीर्तिधराचार्यों द्वितयं निषधं करं। वर्धमानाभिधं प्राह विनियोगस्तु पूर्ववत् ॥ ॥ इति वर्धमानः ॥ १३ ॥ ६७२ । 15 सुश्लिष्टाग्रौ पताको चेत् हस्तौ [मायोगदस्तदा । मेलने प्रीतियोगे च परस्परमयं मतः॥ ॥ इति प्रयोगप्रदः ॥१४॥ ६७४ किञ्चित् श्लिष्टभुजावेव पताको खस्तिकीकृतौ । आलिङ्गनो भवेद्धस्त आलिङ्गनविधौ मतः॥ ॥ इत्यालिङ्गनः ॥१५॥ ६७५ 20 श्लिष्टौ मिथश्चेच्छिखरौ करौ द्विशिखरस्तदा। शयनार्थेऽङ्गुलिस्फोटे नास्तीति कथनेऽपि च ॥ ॥ इति द्विशिखरः ॥१६॥ ६७६ 25 सभाधीशमुखं हस्तं कृत्वोयविरलाङ्गुलिः। अस्य पृष्ठे द्वितीयोऽपि तदङ्गुल्यन्तराङ्गुलिः ॥ ६७७ उभयोः करयोः प्रान्ते तथाङ्गुष्ठौ बहिर्गतौ । 1 शैलशिलादिनः of सं र अ ७ श्लो २०७ शैलशिलोत्पाटे। 2 B0 सेलने ।
६७८ 6 ६८० 10 ६८१ किरीटादय ] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ कलापं हस्तकं प्राहुः केचिच्छेषकणं(२) त्वमुं। अभिनेये फणीशेऽमुं तथा भूमीश्वरे जगुः ॥ ॥ इति 'कलापः ॥ १७ ॥ कलाप एव शीर्षत्थः(स्था) किरीट इति कथ्यते ॥ ॥ इति किरीट. ॥१८॥ कूर्परी पार्श्वलग्नौ चेत्स्यातां पुष्पपुटाभिधे ।' तदा स्याचषको हस्तः पाणिपाने नियुज्यते ॥ ॥ इति चषक. ॥ १९॥ उत्तानो वामहस्तश्चेत् पताकस्तदुपर्यपि । चलत्संदंशहस्तश्चेत् पर(पर)स्याल्लेखनस्तदा । लेखने विनियोज्योऽयं नृत्याभिनयगोऽपि च ॥ ॥ इति लेखन ॥२०॥ एते विंशतिसंख्याकाः संयुता हस्तकाः स्मृताः। अथ नृत्ताख्यहस्तानां प्रपञ्चमपि दध्महे ॥ प्रामुखौ खटकावत्रो वक्षसोऽष्टाङ्गुलान्तरे । समानकूर्परस्कन्धौ चतुरस्राबुदाहृती। आकर्षणे समाख्यातौ मुक्ताहारस्रगादिनः॥ ॥ इति चतुरस्त्री ॥१॥ हंसपक्षाख्यकरयोः समयोश्चेद्यदेककः। उत्तानोऽधो बजत्यन्यो वक्षसो यात्यधोमुखः॥ तदोवृत्तौ समाख्यातौ तालवृन्तनिरूपणे । तावेव तालवृन्ताख्यौ चतुरस्रविशेषितौ ॥ हंसपक्षीकृतौ तौ तु व्यावृत्तिपरिवर्तितौ । उद्धृतौ हस्तकौ तौ तु जयशब्दे नियोजितौ ॥ इत्युहृत्तौ ॥२॥ ६८२ 15 ६८३ ६८४ 20 ६८५ 25 तुल्यांश(?स)कूर्परी तिर्यग्भूती संमुखस्थतलौ। 1 A कपाल: B0 कपोल । 2 of कलाप एव गीर्षस्थ । Vipradasa. भ को पृ १३६ । 3 B0 °निधे। 4 AB0 इतिति च । 5 B0 °तिरव्या। 6 80 दनहो। 7 EG प्रामुखो। 8 Bo drop समयो। 9 ABO मुखतस्तलौ । of संमुखस्थतलौ ।सं र अ ७ श्लो २२१ । ८ नृ०रन० 5 10 नृ० र० को०-उलास १, परीक्षण ? [स्वस्तिकादयः उदृत्तीभूय पश्चाच त्र्यस्रीभूतौ स्वपार्श्वगौ। हंसपक्षौ तलमुग्वौ मधुरे भईलध्वनौ ।। ६८७ ॥ इति तलमुखौ ॥३॥ हंसपक्षकराश्लिष्टस्वस्तिकः खस्तिको करौ ॥ ६८८ इति स्वस्तिकौ ॥४॥ तावेव 'विप्रकीर्णाख्यौ झटिति खस्तिके च्युते । पराङ्मुखावुन्नताग्री नीचाग्री वा व्यवस्थिती। कुचाभ्यां पुरतो हंसपक्षौ तौ विप्रकीर्णको । ६८९ इति विप्रकीर्णको ॥ ५॥ पताको स्वस्तिकीभूय व्यावृत्तपरिवर्तने (१ वर्तितौ)। कृत्वा वाममथोत्तानमराल रचयेत्करम् ॥ अधोवनं दक्षिणं च खटकामुखतां गतौ । चातुरस्रेण कथितावरालखटकामुखौ ।। पद्मकोशावथोद्धास्या व्यावृत्तपरिवर्तितौ । अरालौ स्वस्तिकाकारौ जायेते खटकामुखौ ॥ ६९२ चातुरख्याविशेषे तावरालखटकामुखौ। "वणिजां सचिवादीनां वितर्केऽसौ प्रयुज्यते ॥ ६९३ अथवा हृदयाग्रस्थः प्रामुखः खटकामुखः। परोऽरालः प्रोन्नताग्रस्तियंगल्पप्रसारितः॥ परस्परान्यपार्श्वस्थौ स्वपार्वे वा व्यवस्थितौ । तालान्तरौ तदा प्रोक्तावरालखटकामुखौ ॥ ६९५ इत्यरालखटकामुखौ ॥६॥ भुजाग्रकूर्परांसेषु सविलासेषु चेत्करौ । भूत्वा पताको व्यावृत्तं विधाय भवतो द्रुतम् ॥ अधस्तलौ तदाविद्धवको नृत्यकरौ मतौ। केचित् पताकयोः स्थानेरालौ तौ संप्रचक्षते। विक्षेपवलने चैव विनियोगं प्रचक्षते ।। ६९७ इत्याविद्धवक्रौ ॥७॥ 16 ६९४ 20 । 25 1 ABO वप्र० । 2 ABO °पक्षोस्तै। 3 B0 °णिकौ। 4 of Asokamalla पताको स्वस्तिकीकृत्य व्यावृत्तपरिवर्तितौ । (folio 15 b) 5 ABO °त्वामपथो । of क्रमात् कृत्वा यत्र वाममुत्तानारालमाचरेत् । सं र अ ७ श्लो २२५ । 6 ABO °वण्य । 7 ABO मणिजा | of वणिजा। सं र अ ७ श्लो २२७ ।
५ ९ ६९८ ६९९ सूच्यास्यादय.] नृ० १० को०-उल्लास १, परीक्षण १ चतुरस्त्रौ खस्तिकौ वा सर्पशीर्षों यदा करौ । मध्यमासंगताङ्गुष्ठौ पर्यायप्रसृतौ तिरः ॥ बहिः प्रसारितां धत्तस्त्वगुली चेत्प्रदेशिनी। तदा सूचीमुखादत्र विशेष केचिदूचिरे ॥ पूर्व पताको कर्तव्यो व्यावृत्तपरिवर्तितौ । भ्रान्त्वा प्रसरणं कृत्वा पश्चादन्यस्तु पूर्ववत् ॥ केषांचन मते सर्पशीर्षाकारौकरी स्थिती। मध्यप्रसारिताङ्गुष्ठौ रेचितस्वस्तिकौ तथा। सूचीमुखौ भवेतां ताविति सूच्यास्यलक्षणम् ॥ इति सूच्यास्यौ ॥ ८॥ प्रसारितोत्तानतलौ हंसपक्षौ द्रुतभ्रमौ । रेचितौ तौ'नृसिंहस्य दैत्यवक्षोविदारणे ॥ केचिदुत्तानप्रसूतौ पताको रेचितौ जगुः । केचिदेतौ पूर्वलक्ष्मविभागेन पृथग्विदुः॥ इति रेचितौ ॥९॥ ७०१ 10 ७०२ 15 रेचिते दक्षिणे हस्ते वामे च खटकामुखे । अथवा 'चतुरस्रेणैकेनोक्तावर्धरेचितौ ।। इत्यधरेचितौ ॥ १०॥ ৩০৫ 20 एतत्करविपर्यासात् ब्रूतेर्धचतुरस्रकौ ॥ इत्यर्धचतुरस्रौ ॥११॥ 'त्रिपताको तिरश्चीनावन्योन्याभिमुखौ करौ। अंसकूर्परयोः किंचिचलतोश्चेत्कपोलयोः॥ हृदयांसललाटानां क्षेत्रे चान्यतमे स्थिती। क्षणमूर्ध( ? )तलो भूत्वा चलतश्चेचदा तदा। उत्तानवञ्चितौ हस्तौ कथितौ नृत्यकोविदैः॥ इत्युत्तानवश्चितौ ॥ १२॥ ७०६ ७०७25 1 ABO "तौतो। 2 ABO 'हास्य of प्रयोज्यौ तौ नृसिहस्य दैत्यवक्षोविदारणे । सं र अ ७ श्लो २३७ । 3 ABO चतुणस्तेणे° of एकेन चतुरस्रेण । सं र अ ७ श्लो २३७ । 4. ABU त्रिपताकोf त्रिपताको । सं र अग्लो २४५। 5 60 तिर्यश्चौ । G ABU श्चल । 7 ABU °सचिती। 8 ABO कथितो।
६१ 5 Mm ७२४ 10 15 पक्षवञ्चिताय.] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ निरूपयन्ति यत् किश्चिन्मनः किं न नपुंसकम् । गङ्गायमुनयोश्चापि नदीत्वं प्रतिषिध्य च ॥ खल्पामारोपितं यच्च तल्लीलायितचेष्टितम् । अतो द्विवचने प्राप्ते करद्वन्द्वैकहेतुजे ॥ ७२१ अस्मिन् करिस्मृतेर्हेतौ प्राधान्येन लताकरे । लीलायितेन मुनिनैकत्वमत्रोपदर्शितम् ।। ७२२ भाभिनवगुप्तैश्च तदाशयवशानुगैः। एकैकस्य करस्यात्र पृथक्त्वेन प्रयोगतः॥ ७२३ करिहस्तत्वमुचितमुदितं तन्मतं यथा । करिकर्णाकृतेस्त्वेकः परः करिकराकृतिः॥ करस्तदानयोोंगे द्वित्वोक्तिस्तत्परैरथ । इति कर्तव्यतात्वेनाविचार्यान्यत्करस्य तु॥ ७२५ गौणत्वं भणितं तत्तै जघिटीति यतोऽत्र च । समप्रधानभावो हि दृष्टः प्रकरणाग्रतः॥ ७२६ खटकत्रिपताकान्यतरः कश्चित्करः परः। करहस्ताकृतिस्तस्माद् द्वन्द्वत्वान्न द्विता कथम् ॥ ७२७ अत्राकृतिप्रधानत्वे कविनैकत्वमास्थितम् । क्रियाप्राधान्यतोऽन्येषु युक्तं द्विवचनं स्थितम् ॥ ७२८ अतो यदेकवचनं तदाचार्यस्य शंसितुम् । सर्वातिशायितां लोकमध्य इत्येव सुस्थितम् ॥ ७२९:० इति करिहस्तः ॥१७॥ निपताको कटीशीर्षे न्यस्ताग्री पक्षवञ्चितौ॥ इति पक्षवश्चितौ ॥ १८॥ एतावेव यदा पार्वाभिमुखाग्रौ घ्यवस्थितौ । पक्षप्रद्योतको ज्ञेयावुत्तानी वा तदाकरौ । केचि/गुलीको तौ पराङ्वको प्रचक्षते ॥ इति पक्षप्रद्योतकौ ॥ १९ ॥ हंसपक्षे गते पार्थादुपवक्षस्थलं शनैः । 1 Bo drop च। 2 B0 °दितन्म। 3 AB0 हस्तः। 4 ABO वरान्वौ, of 'तूभंगुली च पराङ्मुखो । स र अ ७ श्लो २५६ । 5 ABU प्रचक्ष्यते । 6 ABO वक्षस्थले।
६२ -- 10 नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [गरुडपक्षादय सविलासं तथा हस्ते तिर्यक् संप्रसृते क्रमात् । युगपद्वा तदा दण्डपक्षौ हस्तौ प्रकीर्तितो॥ ७३२ इति दण्डपक्षौ ॥२०॥ पताकौ त्रिपताको वा तिर्यगूर्व कृतौ करौ। प्रागधोग्रौ कटिक्षेत्रे स्थिती न्यकृतकूपरौ । हस्तौ गरुडपक्षौ तौ गरुडेशगणोदितौ ॥ ॥ इति गरुडपक्षौ ॥२१॥ अरालौ हंसपक्षौ वा वक्षोदेशाल्ललाटगौ। तत्रस्थावप्य(?स्थौ प्राप्य) वा भालपार्श्वयोः समुपागतौ ॥ ७३४ मण्डलावृत्तिवितता उर्ध्वमण्डलिनौ करौ । ललाटमाप्तिपर्यन्तं भ्रमणं केचिदूचिरे। चक्रवर्तनिका संज्ञावेतौ नृत्यविदा मते ॥ ७३५ ॥ इत्यू_मण्डलिनौ ॥ २२ ॥ तावेष पार्श्वविन्यस्तौ पताकाकारमागतौ । अन्योन्याभिमुखौ सन्तौ पार्श्वमण्डलिनौ मतौ ॥ आविद्धभ्रामितभुजौ केचिदाहुः स्वपार्श्वयोः। कक्षावर्तनिकेऽन्ये तो नृत्यज्ञाः संप्रचक्षते ॥ ७३७ इति पार्श्वमण्डलिनौ ॥ २३ ॥ हंसपक्षावरालो वा हृदयक्षेत्रमागतो। युगपत्करणे कृत्वोद्वेष्टितं वापवेष्टितम् ॥ ७३८ वक्षसः खस्वपार्श्वस्थौ भ्रान्त्वा मण्डलवत् क्रमात् । पक्षास्थौ वा क्रमादेती उरोमण्डलिनौ मतौ। उरोवर्तनिके त्वेतौ नृत्यकिद्भिः प्रकीर्तितौ ॥ इत्युरोमण्डलिनौ ॥ २४॥ अभ्यासात् युगपद्वेति वक्षस्युत्तानितः करः। एकोऽन्यः प्रसृतः पार्श्वे तयोर्वक्षास्थितः करः॥ व्यावर्तितेनालपद्मीभवन् पार्श्व ब्रजन करः। मण्डलाकृतिरन्यश्चोद्वेष्टिीतेन प्रसारितः॥ ७४१ 1 BO हस्तति। 2 ABU °वर्तिनका । 3 ABU एतोन। 4 Abu लिगौ। 5 ABO एताकार। 15 30 25 ७४० ७४२ ७४३ ७४४ ७४५10 ७४६ मुष्टिकस्वस्तिकादय ] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ खपार्श्वेरालतां प्राप्तो हृदयमण्डलाकृतिः प्रामुयादिति संमोक्तावुर पार्द्धमण्डलौ । इत्युर पाधिमण्डलौ ॥२५॥ विधाय क्रमतो हस्तावरालमरपल्लवौं । रेचितः स्वस्तिकाकारी क्रियेतेि] खटकामुखौ ॥ अथवा शिखरौ मुष्टी कपित्थौ वा मुहुर्मुहुः । खस्तिकाकृतितां नीती मुष्टिकखस्तिको करौ ॥ इति मुष्टिकस्वस्तिकौ ॥ २६॥ व्यावर्तनक्रियोपेतावश्लिष्टखस्तिको करौ । मिथः परामुखीभूय यौ गतौ पद्मकोशताम् ॥ नलिनीपद्मकोशौ तौ केचिल्लक्ष्मान्यथाजगुः । अन्योन्याभिमुखौ श्लिष्टमणिबन्धौ पृथग् यदा ॥ पद्मकोशौ प्रकुर्वीत व्यावृत्तपरिवर्तने । नलिनीपनकोशौ तावथवा पद्मकोशयोः॥ व्यावृत्तिपरिवृत्तिभ्यामुपजानुगतेरिमौ। यद्वा विवर्तितौ पद्मकोशौ स्यातामिमौ पुनः । स्कन्धयोः स्तनयोः पार्श्वे जानुनोरपि तत्वतः॥ इति नलिनीपद्मकोशौ ॥२७॥ उद्वेष्टितक्रियौ वक्षोदेशस्थावलपल्लवौ । ततः स्कन्धान्तिकं प्राप्य प्रस्थितावलपद्मकौ ॥ ॥ इत्यलपद्मौ ॥२८॥ ऊर्ध्वप्रसारितौ स्कन्धाभिमुखौ चलदङ्गुली । विवृत्तावलपद्मौ चावुल्वणौ भणितो प्लुतौ ॥ इत्युल्वणौ ॥२९॥ लताख्यौ बलिती ज्ञेयो स्वस्तिकीकृतकूर्परौ । अथ मूर्ध्नि विवृत्तौ तौ मुष्टिकस्वस्तिको मतौ ॥ अथवाऽन्योन्यलग्नाग्रावूर्ध्वगौ नम्रकूर्परौ । पृष्ठतः खटकावौ वलितौ गदितौ करौ॥ इति वलितौ ॥ ३०॥ ७४७ 15 ७४८ ७४९20 ७५० 25 ७५२ 1 ABO 'प्राक्तो। 2 ABO उत्तर। 3 ABO °लवां।
10 10 1 . 15 नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [ललितादयः वलितौ पल्लवौ चापि शीर्षणि ललितं विदुः । अपरे चातुरस्रेण शिरःस्थावचली विदुः॥ अपरे खटकायक्रो शिरःप्राप्य शनैः शनैः । अन्योऽन्यस्य विलग्नानौ ललितौ संचचक्षिरे । इति ललितौ ॥३१॥ वामदक्षिणभागस्थौ वरदाभयदौ करो। आरालो कटिपार्श्वस्थौ कथितौ वरदाभयो। इति वरदाभयौ ॥ ३२ ॥ द्वात्रिंशदेते संपोक्ताः समासात् नृत्यहस्तकाः। एते नृत्ये क्रमेणापि प्रयोज्या इति संमतिः॥ व्युत्क्रमेण प्रयोगेऽपि न दोषो मुनिशासनात् । अशीतिमिलिताः सर्वे त्रिविधा अपि हस्तकाः ।। इह कश्चिद्विपश्चिद्यनिश्चिनोति करानिह । चतुःषष्टिमिता(? तान् तन्नो विचारपदवीमियात् ॥ ७५८ यतो नाटीकते मानं मुनिमार्गात्परिच्युतम् । तथा हि भरताचार्यैः सप्तषष्टिरुदीरिताः॥ तन्मता सप्तषष्टिस्तान् रत्नाकरकृदभ्यधात् । तन्मतस्यापकर्षेण चतुःषष्टिमिताः परैः॥ ७६० उक्ता गवेष्यमाणेयं तद्वाचोयुक्तिजम्बुकी। विचारसिंहभूते व न तिष्ठति पदात्पदम् ॥ तथा हि योक्ता युक्त्युत्था विशेषणविशेष्यता। करयोर्विप्रकीर्णाद्या न तदा चार्यसंमतम् ॥ ७६२ यतः[कर] पृथक्त्वे न तेषामुद्देशलक्ष्मणी । मुनिनैव कृते तन्नो सुवचं यददो यथा ॥ ७६३ नीलमुत्पलमित्येष दृष्टान्तो विषमः खलु । यतोत्रायुतसंवन्धः प्रायो गुणिगुणाश्रयः॥ द्रव्ययोस्तत्र संवन्धो युतसिद्धः स्मृतो बुधैः। अन्योन्यनिरपेक्षेषु खस्तिकायेषु कथ्यताम् ॥ मल्लयोरिव को स्यातां कयोस्तत्र विशेषणम् । भिन्नगामित्वमनयोन समानमिहेष्यते ॥ 1 ABO°वेक्ष। 2 BC सिभूसे । 3 B मिति। ! B0 °दागायस। 5'1BC पृक्त्वेन। M mwww MM 20 25 30 ৩৪৩ ७६८ 5 अअनादय] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ विशेष्यं नानुयात्यन्यमनुयाति विशेषणम् । यथोत्पलं तदेवापि रक्तादिगुणयोगतः॥ विशेष्यते तथा नीलं न कचिदृश्यते बुधैः । एकादशविकारेऽपि यदि ते स्यादनन्यता न भेदः कल्प्यतां विद्वन् पताकत्रिपताकयोः। क्वचित्किंचिदभेदेऽपि हस्तकानां परस्परम् ॥ ऐक्यादामूलमैक्ये तु तव स्यादेकहस्तकः । तस्माचतुःषष्टिरिति संतोष्टव्यं विपश्चिता ॥ सप्तषष्टिरितीयं या संख्याचार्यैः प्रदर्शिता। नैव सा नियता यस्मानाष्टार्थाय हस्तकाः॥ किं तु दृष्टार्थसंपत्त्यै लोकयुक्तिमवेक्ष्य च । यथाशोभं प्रकल्प्याः स्यू रसानुगतिकाः कराः॥ प्रयोगः पूर्वमेवोक्तः परिभाषापरीक्षणे । अभिनेयवशादेते सर्वेऽभिनयहस्तकाः ॥ ७७० wwwwwww ७७१ 10 ७७२ ৩৩২ 15 त्रिविधा अपि विज्ञेया नृत्ययुक्ता युतादिकाः। आनन्त्यादभिनेयानां सन्त्यनन्ताश्च ते यथा । अञ्जनश्चन्द्रकान्तश्च जयन्तश्चेति नामभिः॥ ७७४ ও 20 ललितं वक्षसः क्षेत्रे कपोतं कर्णदेशगम्। संदंशविधिनैवं स्यादञ्जनो नाम हस्तकः॥ ॥ इत्यञ्जनः॥१॥ अर्धचन्द्रं करं कृत्वा ततो मकरमाचरेत् । शुकास्यं दण्डपक्षौ च जानुदेशललाटयोः । चतुर्भिहस्तकैः प्रोक्तश्चन्द्रकान्ताभिधः करः॥ ॥ इति चन्द्रकान्त. ॥२॥ वामे विधाय मकरं दक्षिणे वार्धचन्द्रकम् । भ्रामयित्वा समं कुर्यात् पताकं दक्षपार्श्वगम् । त्रिपताकं तथा स्कन्धे जयन्तो हस्तको भवेत् ॥ ॥ इति जयन्तः ॥३॥ ৩৩৪ 25 ७७७ -- 1 AB0 बुधः। 2 ABO 'ता! 3 ABO °दलोदपि। ९० रन.
७७८ 5 ७८० 10 wwwwwww नृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [बक्षा स्तनौ च एवमन्येऽपि विज्ञेयाः खबुद्धया नृत्यकोविदैः॥ ॥ इति हस्तप्रकरणम् ॥ [अथ वक्षः।] पञ्चधा सममाभुग्नं निर्भुग्नं च प्रकम्पितम् । उद्घाहितं च विज्ञेयं 'वक्षस्तल्लक्ष्म कथ्यते ॥ ७७२ ससौष्ठवं समं ज्ञेयं चतुरस्राङ्गसंश्रयम् । प्रकृतिस्थमिदं वक्षः स्वभावाभिनये मतम् ॥ ॥ इति समम् ॥१॥ आभुग्नं शिथिलं निम्नं वक्षः स्याद्र्वशोकयोः। व्याधौ विषादे मूर्छाभीलजादौ संभ्रमेजपि च । शीतहृच्छल्ययोश्चैव संप्रोक्तं भरतादिभिः ।। ७८१ ॥ इत्यामुग्नम् ॥२॥ निम्नपृष्ठं च निर्भुग्नं बन्धुरं स्तब्धमप्युरः। गर्वोत्सेके प्रहर्षोक्तौ स्तम्भे विस्मयवीक्षणे । सत्यवाक्ये तथा माने प्रयोज्यं नृत्यकोविदैः॥ ७८२ ॥ इति निर्भुग्नम् ॥ ३॥ अजस्रमूर्द्धमुत्क्षेपैः कम्पितं यत्प्रकम्पितम् । कामहासश्रमश्वासहिक्का दौ रोदनेऽपि च ॥ ७८३ ॥ इति प्रकम्पितम् ॥ ४॥ सरलोत्क्षिप्तमाकम्पयुक्तमुदाहितं मतम् । उत्तुङ्गालोकने जृम्भा दबोच्चासादिके तथा ॥ ॥ इत्युद्वाहितम् ॥५॥ ॥ इति पश्वधा वक्षः॥ [अथ स्तनौ।। उच्चावापाण्डुरौ श्यामौ मनापी(?सुपीनौ)लोलितौ मनाक् । सङ्कुचद्वदनौ' चेति स्तनौ[तु] षट्प्रकीर्तितौ । एतौ रसेषु भावेषु यथौचित्यं प्रयोजयेत् ॥ ७८५ 15 20 ७८४ 25 1B वक्ष्य, वक्ष्यमूल्ल । 2 B0 बन्धुरस्त । 3 50 स्तम्भविस्मयः। 4 B0 °हिष्का। 5 80 जुभा। 6 ABC श्यामामनापीलोलती। 7 ABO °दनो। 8 ABO षोन् ।
पार्श्व कटी च] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [अथ पार्श्वम् । उन्नतं च नतं चैव प्रसारितविवर्तिते । तथापमृतमित्युक्तं पाच पञ्चविधं बुधैः॥ नितम्बां सभुजैर्व्यक्तमुन्नतैरुन्नतं मतम् । नियोज्यं नाटके तज्ज्ञैरपसर्पणकर्मणि ॥ ॥ इति उन्नतम् ॥१॥ ७८६ + ७८७5 ७८८ नतबाहुनितम्बांसं नतं स्यादुपसर्पणे ॥ ॥ इति नतम् ॥ २॥ ७८९ 10 ७९० प्रसारितं तूभयतो विस्तारात् स्यान्मुदादिषु ॥ ॥ इति प्रसारितम् ॥ ३॥ विवर्तिकत्रिक पार्श्व विवर्तितं विवर्तनात् ॥ ॥ इति विवर्तितम् ॥४॥ भवेदपसृतं पार्श्व विवर्तितविवर्तनात् । निवर्तने प्रयोगोऽस्य नृत्य विद्भिश्चिकीर्षितः। प्रयोज्यमेतनाट्ये तु परावृत्तौ नटस्य तु॥ ॥ इत्यपसृतम् ॥५॥ ॥ इति पञ्चविध पार्श्वम्॥ ७९१ 15 ७९२ 20 [अथ कटी।] कटी पञ्चविधा प्रोक्ता विवृत्तो द्वाहिता तथा । छिन्ना च कम्पिता चेति रेचितेत्यर्थ लक्षणम् ॥ विदधाति कटीं यां तु नृत्यगः प्रत्यगाननः । विवर्तितामभिमुखीं विवृत्ता सा विवर्तने ।। ॥ इति विवृत्ता॥१॥ 1 B0 पार्था । 2 ABO नितवोंस । 3 ABO °स्तारास्यान्मदादिषु । of सं र अ ७ श्लो ३०५ प्रसारित तूभयतो विस्तारात् स्यान्मुदादिषु । of च Ms स्तारे स्यान्मु' ( A_S-S) Compare also ना शा (0ss) अ १०, श्लो १४ आयामनादुभयत. पार्श्वयो स्यात् प्रसारितम् । and श्लो १६ प्रसारितं प्रहर्षादौ। 4 ABO °र्तितवि। 5 ABO °त्तेद्वा। 6 ABO त्यतल। 7 ABO विवर्ता।
६८ [चरणा. नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ सोद्वाहिता कटी ज्ञेया शनैः पार्श्वद्वयेन या । चलता शोभने स्त्रीणां पीनाङ्गानां गताविव ॥ ॥ इत्युद्वाहिता ॥२॥ ७९४ 5 मध्यस्य वलनाच्छिन्ना पात्रे तिर्यमुखे कटी। व्यावृत्तप्रेक्षणे चैषा व्यायामे संभ्रमे तथा ॥ ॥ इति छिन्ना ॥३॥ ७९५ शीघ्रं गतागतैर्युक्ता पार्श्वयोः कम्पिता कटी। खञ्जवामनकुब्जानां गमने सा प्रयुज्यते ॥ ॥ इति कम्पिता ॥४॥ 10 ७९७ सर्वदिक्षु भ्रमणतो रेचिता भ्रमणे कटी ॥ ॥ इति रेचिता ॥५॥ ॥ इति कटी॥ [अथ चरणः।] समोऽञ्चितः कुञ्चितश्च सूच्यग्रतलसञ्चरः। उद्धद्वितस्त्राटितश्च घटितोत्सेधसंज्ञिकः ॥ घहितो मर्दितश्च स्यादग्रगः पाणिगस्तथा । 'पार्श्वगश्चरणो ज्ञेयस्त्रयोदशविधः स्फुटः॥ 15 ७९८ ७९९ ८०० 20 समः खभावाभिनये खभावावस्थितो भवेत् । चलोऽसौ रेचके प्रोक्तः स्वभावे च स्थिरो मतः॥ ॥ इति समः ॥ १॥ अङ्गुल्या प्रसृता यस्य पार्णिभूमौ व्यवस्थितः। उत्क्षिप्तायतलश्चैव चरणोऽञ्चितसंज्ञितः। पादाहतिविधौ स स्यान्नानाभ्रमरिकादिषु ॥ ॥ इत्यश्चितः॥२॥ ८०१ 110 मोचितः। 2 ABO पष्वग.। of सं र अ ७ श्लो ३१४ पार्श्वगः। 3 ABO क्षिसातल । of सं र अ ७ श्लो ३१६ समुत्क्षिप्ताग्रतलः। 4 ABO °णोबितसं ।
६९ कुश्चितादय']] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ आकुश्य मध्ये तूत्क्षिप्तपाणिः सङ्कुचिताङ्गुलिः। कुश्चितोऽयमतिकान्तक्रमे तुङ्गस्य च ग्रहे ।। ॥ इति कुञ्चित. ॥३॥ ८०२ वामः समः परः पृथ्व्यामगुष्ठाग्रेण संस्थितः। उत्क्षिप्तेतरभागोऽसौ सूची नूपुरवन्धने ॥ ॥ इति सूची ॥४॥ ८०३६ ८०४ अङ्गुष्टः प्रसृतो यस्याङ्गुल्यस्तु न्यश्चितास्तथा उत्क्षिप्ता तु भवेत् पाणिः पादोऽग्रतलसश्चरः॥ रेचके भ्रमणे भूमिताडने स्थानपीडने । कुट्टने प्रेरणे भूमिस्थितस्य चापसारणे ॥ ८०५10 ॥ इत्यग्रतलसञ्चर.॥५॥ स्थित्वा पादाप्रतो भूम्यां सकृद्धा बहुशोऽपि वा। पाणिनिपात्यते स स्यात् पाद उद्धहितामिधः॥ ॥ इत्युद्धट्टितः॥६॥ 16 आपीड्य पाणिना पृथ्वीं तामेवाग्रेण हन्ति यः। त्राटितः चरणः स स्यात् कर्तव्यः क्रोधगर्वयोः॥ ॥ इति त्राटित. ॥७॥ ८०७ घट्टयन्नग्रपाणिभ्यां क्रमादुर्वी मुहुर्मुहुः । ताडने विनियुक्तोऽयं घटितोत्सेधकारकः ॥ ॥ इति घटितोत्सेधः ॥ ८॥ ८०८ 20 घड्यन् पाणिना भूमि घहितः खल्पनोदने । ॥ इति घट्टित. ॥९॥ तिरश्चीनतलेनोवी मईयन् मर्दितो भवेत् ॥ ॥ इति मर्दित. ॥१०॥ - 1 B मध्ये मुक्षि 4 मध्ये मुतक्षि° 0 मध्ये युत्क्षि° The correct reading may also be मध्ययुत्क्षि। 2 ABO °स्यापयसारणे।
७० [प्रत्यानि नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण २ पङ्किलोामग्रगः स्यादग्रतः शीघ्रगत्वरः। ॥ इत्यग्रगः॥११॥ पाणिना पृष्ठतो गच्छन् चरणः पाणिगो मतः। ॥ इति पाणिंग ॥१२॥ पार्श्व गच्छन् पार्श्वगः स्यादथवा पार्श्वतः स्थितः॥ ॥ इति पार्श्वग ॥१३॥ ॥ इति त्रयोदश चरणा ॥ ८१० 10 येनानायः षडङ्ग प्रकटित इतिकर्तव्यतासंयुतोऽद्धा येनोवैः स्वामिनाप्तं निजगुणनिभृतं खीयराज्यं षडङ्गम् । यो नित्यं शम्भुजायां त्रिभुवनमहितां न्यस्यति खां षडड़े तेनायं लक्षणोक्तो व्यरचि नृपतिना' नृत्यवर्गः षडङ्गः ॥ ८११ इति 'श्रीराजाधिराज-श्रीकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते सगीतराजे षोडशसाहरूया सगीतमीमांसायां नृत्यारत्न कोशे अङ्गोल्लासे अङ्गपरीक्षणं प्रथम समाप्तम् ॥ 15 प्रथमोल्लासे द्वितीयं परीक्षणम् । [प्रत्यङ्गानि ] अथ प्रत्यङ्गसंपन्नः प्रत्यङ्गानां समुच्चयम् । प्रत्यङ्गीकृतभूपालो वक्ति लक्षणपूर्वकम् ।। प्रत्यङ्गानि स्कन्धौ ग्रीवा बाहू च पृष्ठमुदरं च । ऊरू जो चान्यौ मणिबन्धी जानुनी चैव ॥ [ स्कन्धौ। लोलितावुच्छ्रिती स्रस्तावकोचौ कर्णलग्रको। नानव व्यक्तलक्ष्माणौ स्कन्धौ पञ्चविधौ स्मृती॥ 20 ३ 1 80 °नान्तं । 2 ABO नसहितां। 3 AB0 न्यसति । 4 B0 षडङ्ग। 5 80 नृप- पसिना। 6 ABO नृत्यवर्गषडङ्गः। 7 A drops समाप्तं । 0 in a different hand इति श्रीराजाधिराजकालसेन महीमहेन्द्रेण विरचिते संगीतराजे षोडशसाहलयां संगीतमीमांसायां नृत्यरत्नकोशे अगोल्लासे अगपरीक्षणं प्रथम समाप्तम् ॥ शुभं भवतु ॥ B drops from इति to प्रथमम्, but between and अथ enough space is left for the unwritten part of the colophon 8 50 प्रत्य। 9 80 लक्षपूर्वकम् ।
प्रीवा] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण २ नियुक्तौ लोलितौ तत्र हुडुक्कावाद्यवादने । हास्ये विटकृते नृत्ये, ॥ इति लोलितौ ॥१॥ उच्छितो हर्षगर्वयोः॥ ॥ इति उच्छ्रितौ ॥ २॥ ४ 5 मदे दुःखे अमे सस्ती, ॥ इति सस्तो ॥३॥ एकोचौ मुष्टिकुन्तयोः। प्रहारे, ॥ इति एकोचौ ॥४॥ ५10 कर्णलग्नौ स्तः, शिशिराश्लेषयोरपि ॥ ॥ इति कर्णलग्नौ ॥५॥ ॥ इति पञ्चधा स्कन्धौ ॥५॥ ५ [ग्रीवा] समा निवृत्ता वलिता रेचिता कुश्चिताश्चिता। त्र्यस्रा नतोन्नता चोक्ता श्रीवा नवविधा 'बुधैः]। प्रकृतिस्था समा ध्याने जपे कार्ये खभावजे ॥ ॥ इति समा॥१॥ ज or न ७ 20 आभिमुख्यान्निवर्तेत या निवृत्तेति सोदिता। स्कन्धभारे चाभिमुख्ये तथा चकितवीक्षणे ॥ ॥ इति निवृत्ता ॥२॥ पाचोन्मुखी तु या ग्रीवा वलिता सा निगद्यते । ग्रीवाभङ्गे स्मृ(? कृतेक्षायां प्रियस्य गुरुसंनिधौ । ॥ इति वलिता ॥३॥ ग्रीवोक्ता विधुतभ्राता (?न्ता) रेचिताङ्गादिमर्दने । ॥ इति रेचिता ॥४॥ आकुश्चिता कुञ्चिता स्यात् शीर्षभारे खगोपने ॥ ॥ इति कुञ्चिता ॥५॥ 25 1 80 हुडकावाददे। 24 बुधै 80 बुधौ ।
७२ [बाहवः नृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण २ केशाकर्षेऽर्धवीक्षायां लोलातिप्रसृताश्चिता। ॥ इत्यञ्चिता ॥६॥ श्यना स्यात्पार्श्वगा खेदे पार्श्वहस्कन्धभारयोः ।। ॥ इति व्यस्रा ॥७॥ + 5 अवनम्रा नता कण्ठालम्बेऽलङ्कारबन्धने । ॥ इति नता ॥८॥ उन्नतोर्ध्वगतोर्वावलोके कण्ठस्थदर्शने ॥ ॥ इत्युन्नता ॥९॥ ॥ इति नवधा ग्रीवा ॥ ११ 10 १२ १३ 16 [बाहवः] अवास्योऽधो मुखस्तिर्यगपविद्धः प्रसारितः। अश्चितो मण्डलगतिः खस्तिकोदिष्टितावथ ।। पृष्ठानुसारी चाविद्धः कुञ्चितोत्सारितावपि । सरलान्दोलिती नने बाहुः षोडशधोदितः ॥ जर्व ब्रजन शिरोदेशाास्यस्तुङ्गवीक्षणे। ॥ इत्यूांस्य. ॥१॥ आलिङ्गलिव भूपृष्ठमधोवक इतीरितः। ॥ इत्यधोवक्रः॥२॥ तिर्यक् पाोपसी स्यात् ॥ ॥ इति तिर्यक् ॥३॥ यो मण्डल इव भ्रान्त्या अक्षाक्षेत्राहिजेत्। सोपविद्ध इति ज्ञेयो गदायुद्धादिषु स्मृतः ।। ॥ इत्यपविद्धः॥४॥ अनुव्रजन्नप्रदेशं बाहुः प्रोक्तः प्रसारितः। विनियुक्तः फलादाने फलादेाचनेऽपि च ॥ ॥ इति प्रसारितः॥ ५॥ * 20 १५ 25 १६ 3 ABO °स्याधा। 1 BG ताञ्च | 2 ABC 'त्यनता। drops from इति to 'युद्धादिषु । * BO 'दितं । 50 ७३ " अञ्चितादयः] नृ० र० को०-उल्लास१, परीक्षण २ वक्षोदेशाच्छिरो गत्वा वक्षःप्रत्यागतोऽश्चितः। खेदादौ विनियुक्तोऽयं, ॥ इत्यश्चित.॥६॥ सर्वतो भ्रमणाद्भुजः ॥१॥ उच्यते मण्डलगतिः खड्गादिभ्रामणे स तु । ॥ इति मण्डलगति ॥७॥ 5 १८ 10 १९ 15 पार्श्वव्यत्यासतो बाह्रोः स्वस्तिकः स्यादलग्नयोः। उपस्थाने 'रवेः कार्यः परीरम्भेऽभिवादने ॥ ॥ इति स्वस्तिकः ॥ ८॥ मणिबन्धाद्विनिःसृत्य पुनावृत्तिमाश्रितः । उद्वेष्टितो भवेद्वाहुः सर्वगर्वादनादरे ॥ ॥ इत्युद्धेष्टितः ॥९॥ पृष्ठतो गमनात् पृष्ठानुसारी बाहुरुच्यते । तूणाद्वाणग्रहे स स्याद् वीटिकाग्रहणेऽपि च ॥ ॥ इति पृष्ठानुसारी ॥१०॥ आविद्धोऽभ्यन्तराक्षिप्तः ॥ इत्याविद्धः॥११॥ सूचीकुर्वश्च कूर्परम् । वक्रितः कुञ्चितः पाते प्रहारे भोजने तथा ॥ खड्गादिधारणे चास्य विनियोगः प्रकीर्तितः॥ ॥ इति कुञ्चितः ॥ १२॥ अन्यपाङ्खनिजं पार्श्व व्रजन्नुत्सारितः स च । जनतोत्सारणे प्रोक्तः ॥ इत्युत्सारितः ॥१३॥ सरलः पार्श्वयोरूर्ध्वमधस्ताच प्रसारितः। सपक्षानुकृतौ माने भूस्थनिर्देशने क्रमात् ॥ ॥ इति सरल ॥१४॥ * 1 80 रवः। 2 Adiops तः। 3 B0 repeat° शने । १० नृ०र० २१ २२20 ६ . २३ 25 ७४ [वर्तना नृ० र० को-उल्लास १, परीक्षण २ आन्दोलितः स्यादन्वर्थः सविलासगतौ मतः । ॥ इति आन्दोलितः ॥१५॥ किंचिद्वक्रीकृतो नम्रः स्तुतौ माल्यस्य धारणे ॥ ॥ इति नम्र. ॥१६॥ २५ 1 5 एतेषां विनियोगस्तु परिभाषापरीक्षणे । उक्तः क्षमापालनाथेन तत एव गवेष्यताम् ।। ॥ इति बाहवः॥ २६ 10 15 1- २९ [वर्तना ।] अथ वर्तना-संगीतरत्नाकरटीकायाः कलानिधेमध्यात् सामस्त्यव्यासयोगैः करकरणमिलद्वाहुसंयोजना- जायन्तेऽसंख्यरूपाः क्रमत इह रसोल्लासिवैचित्र्यतश्च । आवावर्तनाना रसमनुरुचिरा स्वे(? स्तेन) लास्यानुरूपा- स्ताभिर्नृत्यप्रपञ्चास्त्वभिनयचतुराः पाणयोऽनेकशः स्युः॥ २७ पताकारालयोः पूर्व शुकतुण्डालपद्मयोः। वर्तना खे( ख)टकस्यापि पश्चान्म'करवर्तना ॥ २८ उद्ध(? ऊर्ध्व )वर्तनिकाविद्धवर्तना रेचिताहृया। त बान्धाख्ये फल्गुवर्तनिका ततः॥ कक्षावर्तनिकोरस्थे ( स्थ)वर्तना खड्गवर्तना। पद्मवर्तनिका दण्डवर्तना पल्लवाभिधा॥ ३० वलिता मात्रपूर्वा च वर्तना परिवर्तना। चतुर्विंशतिरित्युक्ता वर्तना भट्टतण्डुना ॥ ३१ अथ क्रमाल्लक्षणमुच्यते- सव्यापसव्यव्यत्यासाभान्तिरामणिबन्धतः। क्रियते चेत् पताकस्य सा पताकाख्यवर्तना ॥ ३२ ॥ इति पताकावर्तना ॥१॥ तर्जन्यायङ्गुलीनां यदन्तरोद्वेष्टनं क्रमात् । आवेष्टितक्रियापूर्व सा प्रोक्तारालवर्तना॥ ३३ ॥ इत्यरालवर्तना ॥२॥ 20 25 1 Bo drop क।
७५ ३५० 10 शुकवर्तनाया वर्तना ] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण २ शुकतुण्डको वक्षःस्थाविद्धोऽधोमुखः कृतः। अरुपृष्ठे वर्तितश्चेच्छुकतुण्डाख्यवर्तना ।। ॥ इति शुकतुण्डाख्यवर्तना ॥३॥ अभ्यन्तरे कनिष्ठाद्या वर्तन्तेऽङ्गुलयः क्रमात् । व्यावृत्तिक्रियया यत्र साऽलपल्लववर्तना ॥ ॥ इत्यलपल्लववर्तना ॥४॥ खटकामुखयो भिक्षेत्रे सव्यापसव्यतः। मणिबन्धावधिभ्रान्तिः खटकामुखवर्तना ॥ ॥ इति खटकामुखवर्तना ॥५॥ यदा तु मकरो हस्तः पुरस्तात्पार्श्वयोरपि । व्यावर्तते बहिश्चान्त्यस्तदा मकरवर्तना ॥ ॥ इति मकरवर्तना ॥६॥ ग(? य)दोद्धृतौ नृत्यहस्तावूर्ध्वदेशे तु वर्तितौ । तदो वर्तना नाम वर्तनाविद्भिरीरिता ।। ॥ इत्यूर्ववर्तनिका ॥७॥ अथापविद्धवत् पाणी वर्तेते चेद्भुजौ क्रमात् । आविद्धावन्तराक्षिप्तौ सा स्यादाविद्धवर्तना ॥ ॥ इत्याविद्धवर्तना ॥८॥ खस्तिकाविच्युती हस्ती हंसपक्षौ दुतनमी। रेचितौ चेद्वर्तनाभ्यां तदा रेचितवर्तना ॥ ॥ इति रेचितवर्तना ॥९॥ ३८ 15 ३९ ४०20 मणिबन्धावधिभ्रान्तौ विश्लिष्टाङ्गुलिपल्लवौ। नितम्बोक्तप्रकारेण वर्तितौ स्कन्धदेशयोः॥ पुनर्नितम्बदेशे तु पताको वर्तितौ क्रमात् । नितम्बवर्तना नाम॥ ॥ इति नितम्बवर्तना ॥१०॥ ४२.25 1 ABO वर्तते । of आविद्धवक्रयोः पाण्योर्वतते चेद्भुजौ क्रमात् Kallinātha सं. र अ.७ श्लो. ३४९ कलानिधि पृ १०७ ।
20 5 नृ० र० को० १ उल्लास १, परीक्षण २ [केशबन्धाया वर्तना केशबन्धे प्रकीर्तिता। विचित्रवर्तनायोगात् केशदेशाद्विनिर्गतौ । पुनश्च केशदेशे च पर्यायेण विवर्तितौ । पताकावेव चेत् सा तु केशबन्धाख्यवर्तना॥ ॥ इति केशबन्धवर्तना ॥ ११ ॥ व्यावृत्त्या वक्षसो भालं प्राप्य तत्पार्श्वमागतौ । ततो मण्डलवद्धान्त्या प्रचालितभुजौ करो ॥ पताको चेद्भमेदूर्ध्वमण्डलावेव कोविदः। चक्रवर्तनिकेत्युक्ता फल्गु( ? फाल )वर्तनिकापि च ॥ ४५ ॥ इति फल्गु(१ फाल)वर्तनिका ॥ १२ ॥ पार्श्वमण्डलिनोः पाण्योभ्रमणं खखपार्श्वयोः। क्रमादकैकपाधैव कक्षवर्तनिकां जगुः॥ ४६ ॥ इति कक्षावर्तना ॥ १३॥ 10 16 ४८ उरोवर्तनिकां विद्यादुरोमण्डलिनोः क्रियाम् । ॥ इत्युरोवर्तनिका ॥ १४॥ एका स्यात् कुञ्चितो मुष्टि[:]खटकास्योऽश्चितः पुरा(पर)। ४७ इति कीर्तिधरस्त्वाह मुष्टिकस्वस्तिको करौ। खड्गवर्तनिकेत्येतन्नामधेयं त्वकल्पयत् ॥ ॥ इति खड्गवर्तनिका ॥ १५॥ पद्मकोशाभिधी हस्ती व्यावृत्त्यादिक्रियाश्चिती। आश्लिष्टौ स्वस्तिकक्षेत्रे व्यावृत्तिपरिवर्तितौ ।। ४९ मिथः पराशुखी सन्तौ रलिनीपद्मकोशको । एतौ कीर्तिधराचार्याः पनवर्तनिकां जगुः ।। यद्वा- स्वस्तिको कुचिती हस्तौ ब्यावृत्तिपरिवर्तितौ । मिथः पराङ्मुखौ बद्धौ सैषा कमलवर्तना ।। ५१ ॥ इति पनवर्तना ॥१६॥ 20 ५० M 25 1 of एकस्याकुञ्चितो मुष्टिः खटकास्योऽश्चित. पर. कलानिधि on सं र. अ ७ स्लो. ३४९ पृ १०८।
५३० ५४ 10 दण्डवर्तनाया वर्तना] नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण २ वक्षाक्षेत्रं श्रयत्येको येन कालेन पार्श्वतः। व्यावृत्त्या हंसपक्षाख्यस्तेनैव परिवर्तितः॥ प्रसारितभुजोऽन्यस्तु तिर्यक् पर्यायतः पुनः। एवमङ्गान्तरेणापि क्रिया स्याहण्डपक्षयोः। दण्डवर्तनिकामेनां भद्दतण्डुरभाषत ॥ ॥ इति दण्डवर्तना॥ १७ ॥ पताको मणिबन्धस्थौ शिथिलौ स्वस्तिको पुनः। कथितौ पल्लवौ तौ हि ख्याता पल्लववर्तना ॥ ॥ इति पल्लववर्तना ॥ १८॥ व्यावर्तितेन हस्तश्चेदलपल्लवशंसिना। खपार्श्व वक्षसः प्राप्य प्रसारितभुजो भ्रमात् ।। अरालं दधदन्येन करणेन श्रयेत् परः। तदानीमेव पाव खमन्यो गच्छति पूर्ववत् ।। मण्डलेन ततोऽप्येव पुरः पार्द्धमण्डलौ। तथा तेषां क्रिया सा स्यादर्धमण्डलवर्तना॥ ॥ इत्यर्घमण्डलवर्तना ॥ १९॥ उद्वेष्टितेन निष्पन्नौ स्यातां चेदलपल्लवी । वक्षसः स्कन्धयोरूर्व प्रसारितभुजावुभौ ॥ स्कन्धाभिमुखमाविद्धौ चलिताडलिवीजनैः। अलपनाभिधौ प्राहुर्यातवर्तनिकां' परे ॥ ॥ इति घातवर्तनिका ॥२०॥ एतावेवाचलौ मूर्धक्षेत्रगौ ललिता मता। खटकास्यौ शिरोदेशे लग्नानौ तां परे जगुः॥ ॥ इति ललितवर्तना ॥२१॥ कूर्परखस्तिकाकारवर्तनाद्वलिता मता। अन्ये व्याचक्षतेऽन्योन्यलग्नाग्रौ खटकामुखौ। ऊर्ध्वगौ पृष्ठमानीतकूर्परौ वलितेति च ।। ॥ इति वलितवर्तना ॥ २२॥ ५७16 ५८ ५९ 20 ६० 25 1 ABO यंत्ये। 2 ABO प्राह vide स र अ ७श्लो. ३४९ १०९। 3 ABO का पं.inde tbrd ७८ नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण २ [गात्रवर्तिताया वर्तना व्यावर्तितोऽन्तर्गात्रं चेदलपल्लवहस्तकः । परामुखोऽपविद्धः स्यात् कथिता गात्रवर्तिता ॥ ६२ ॥ इति गात्रवर्तिता ॥२३॥ गात्रस्य प्रातिलोम्येन पाणिरुक्षिप्य वर्तते । अल्लपल्लवसंज्ञश्चेत् प्रतिवर्तनिका तदा॥ ॥ इति प्रतिवर्तनिका ॥ २४ ॥ ६४ अन्याश्च कथिताः सप्त वर्तना नृत्यवेदिभिः। वर्तना शिखरस्याद्या द्वितीया 'तिलकस्य च ॥ वर्तना नागवन्धः स्यात् सा सिंहमुखवर्तना। वैष्णव्येका तलमुखी सप्त स्युः कलशाभिधा। नाममात्रप्रसिद्धास्तास्तैरेव स्यु(१ : स्फुट) लक्षणाः ॥ ॥ इति वर्तना॥ 10 ६५ [पृष्ठम् ।] जठरं सैव बोद्धव्यं पृष्ठं तु जठरानुगम् । अतो विमुच्य तत् पृष्ठं जठरं लक्ष्यतेऽग्रतः ॥ ॥ इति पृष्ठम् ॥ 15 ६६ [जठरम् ।] पूर्ण खलं रिक्तपूर्ण क्षामं च जठरं स्मृतम् । चतुर्दा तत्र पूर्ण तु स्थूलमत्यशिते भवेत् ॥ व्याधिते तुन्दिले चैव। ॥ इति पूर्णम् ॥१॥ ६७ 20 खल्लं निलं समातुरे ॥ कर्शिते च क्षुधा स्यादातुरे जठराकृतौ ।। वैतालभृङ्गिरित्यादि। ॥ इति खल्लम् ॥२॥ 25 1 ABO तेलक। 2 सप्तमी क नि सं र अ ७ श्लो ३५० पृ ११० 1 3 of स्फुटलक्षपाः Ibad 4 ABO जठरो of पृष्ठं तु जठरोक्ताभिर्वर्तनाभिर्विवर्तते । अतोन तत्पृथग्वाच्य जठर तूच्यतेऽधुना ।सं र अ ७ श्लो ३५३ । 5 ABC निधेसमा ।
रिक्तपूर्णम् ] ७९ मृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण २ रिक्तपूर्णमयोच्यते। श्वासरोगे; ॥ इति रिक्तपूर्णम् ॥ ३॥ ६९० ७०10 तथा क्षामं नमनादुपजायते । ज़म्भायां हास्यनिःश्वासरोदनादौ तदिष्यते ॥ ॥ इति क्षामम् ॥४॥ ॥ इति चतुर्कीदरम् ॥१॥ [ ऊरुः।] चलितः कम्पितः स्तब्ध उद्घर्तितनिवर्तितौ । पञ्चधोरुस्तु वलितोऽन्तर्गते जानुनि स्मृतः॥ नियोज्यः खैरगमने स्त्रीणां, ॥ इति वलितः॥१॥ कम्पित उच्यते॥ नतोन्नते मुहुः पार्श्वे दधानोऽधमचङ्कमे ॥ ॥ इति कम्पित. ॥ २॥ निष्क्रियः स्तब्ध इत्युक्तो विषादे साध्वसेऽपि सः। ॥ इति स्तब्धः॥३॥ . ७२ 20 उद्घर्तितो मुहुः पाणि बहिरन्तश्च विक्षिपन् । क्षिपन् तथैवाग्रतलं व्यायामे तच वै भवेत् ॥ ॥ इत्युद्वर्तित ॥४॥ निवर्तितोऽन्तर्म(ग)तया पायां स्यात् संभ्रमे श्रमे ।। ॥ इति निवर्तित ॥५॥ ॥ इति पश्वधोकः॥ 25 [जङ्घा।] जङ्घा पञ्चविधा क्षिप्तोद्वाहिता परिवर्तिता। [आवर्तिता नता चैव निःस्मृता च बहिर्गता ॥ ७४ परावृत्ता तिरश्चीना कम्पितेत्यपराश्च ताः। 1ABO प्रतिचतुर्द्धादरम् । 2 Here a verse mentioning the remaining two jangha's and the additional five jangha's seems to be missing, It is reconstructed as above [क्षिता नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण २ पुनः पञ्च दशैवं स्युः, क्षिप्ता विक्षेपिता बहिः । व्यायामे ताण्डवे प्रोक्तो- ॥ इति क्षिप्ता ॥१॥ - द्वाहिता चोर्ध्वदेशयुक् । आविद्धगमनादौ स्यात्, ॥ इत्युद्वाहिता ॥२॥ जवा तु परिवर्तिता। प्रतीपगमने पुंसां ताण्डवे विनियुज्यते ॥ ॥ इति परिवर्तिता ॥३॥ ७६ 10 न विपर्यासे चरणयोामदक्षिणतः कृते । मुहुरावर्तिता प्रोक्ता विदूषकपरिक्रमे ॥ ॥ इत्यावर्तिता॥४॥ नता जवा नमज्जानुर्गतस्थानासनादिषु । ॥ इति नता॥५॥ पुरम्प्रसरणोपेता निम्मृता परिकीर्तिता ॥ ॥ इति निःसृता ॥६॥ 15 ७८ * 20 नृत्ये प्रसारिता पार्श्वे जङ्घा प्रोक्ता बहिर्गता। ॥ इति बहिर्गता ॥७॥ 'पश्चादू याता' परावृत्ता भूमिस्ते('स्थे)न च जानुना। दक्षेण सुरकार्ये स्याद्वामेन पितृकर्मणि ॥ ॥ इति परावृत्ता॥ ८॥ क्षितिस्थितबहिःपाचा तिरश्चीनासने स्थिता। ॥ इति तिरश्चीना ॥९॥ ८० कम्पिता कम्पनाभीतौ कार्ये घर्धरिकारवे ॥ ॥ इति कम्पिता ॥१०॥ ॥ इति दशधा जवा॥ 25 1 80 पाश्चाद् । 24 धान' B1 वाना of पञ्चान्ता । सं र अ ७ श्लो ३६५ ।
मणिबन्ध.] नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण २ 5 [ मणिबन्धः ।] पञ्चधा मणिबन्धः स्यात् सम आकुश्चितश्चलः। निकुश्चितश्च भ्रमित ऋजुः सम इतीरितः । प्रतिग्रहे पुस्तकस्य धारणे परिकीर्तितः॥ ॥ इति सम ॥१॥ आकुञ्चितोऽन्तर्निम्नः स्यात् प्रोक्तोऽपसरणे बुधैः । ॥ इत्याकुञ्चितः ॥२॥ निकुञ्चाकुञ्चिताभ्यासाचल आवाहने स्मृतः॥ ॥ इति चल ॥३॥ ८२ : 10 बहिनीतो निकुञ्चः स्यात् स दानाभयदानयोः। ॥ इति निकुञ्च ॥४॥ ८३ भ्रमणामितः खड्गछुरिकाभ्रमणादिषु ॥ ॥ इति भ्रमित ॥५॥ ॥ इति पश्चधा मणिबन्धः॥ 15 [अथ करभौ । करभौ मलिनो खच्छावरुणी कुञ्चितावृजू । इत्थमन्वर्थनामानौ कथितौ पञ्चधा बुधैः॥ ॥ इति करभो॥ ८४ 20 ८५ [ जानु ।] समं नतं च विवृतमुन्नतं चार्धकुश्चितम् । संहतं कुश्चितं चेति जानु सप्तविधं स्मृतम् । प्रकृतिस्थं समं जानु खभावावस्थितौ मतम् ॥ ॥ इति समम् ॥ १॥ नतं महीगतं ज्ञेयं जानु वा(?पाते नमस्कृती। ॥ इति नतम् ॥ २॥ जानुदन्वं वहिर्यातं विवृतं रा(ग)जरोहणे ॥ ॥ इति विवृतम् ॥३॥ 26 * ८२ [इत्यर्धकुञ्चितम् नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ स्तनदेशागतं जानून्नतं शैलाधिरोहणम् । ॥ इत्युन्नतम् ॥ ४॥ ८७ जान्वर्धकुचितं ज्ञेयं नितम्बनमनाबुधैः ।। ॥ इत्यर्धकुञ्चितम् ॥५॥ हीरोषासु जानूक्तं श्लिष्टान्यजानु संहतम् । ॥ इति संहतम् ॥६॥ 5 ८८ कुञ्चितं जानु लग्नोरुजङ्घमासनकर्मणि ॥ ॥ इति कुञ्चितम् ॥ ७॥ ॥ इति सप्तविध जानु ॥ 10 प्रत्यङ्गमालिङ्गति यं सदैव साम्राज्यलक्ष्मीरनुमोदिकेव । तेनामुना राजवरेण राज्ञा प्रत्यङ्गसंधः सुधियाभ्यधायि ॥ ८९ इति श्रीराजाविराजश्रीकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते सगीतराजे पोडशसाहस्न्या सङ्गीतमीमासाया नृत्यरत्नकोशे अङ्गोल्लासे प्रत्यङ्गपरीक्षण द्वितीय समाप्तम् । प्रथमोल्लासे तृतीयं परीक्षणम् उपाङ्गं(?)यस्य शोभेते चन्द्रगङ्गे सदोज्चले। सदोज्वलेन महसा भ्राजमानं नुमः शिवम् ॥ 15 * ७ 20 [उपाङ्गानि ।] दृष्ट(१ष्टि)पुटताराश्च कपोलौ नासिकानिलः। अधरो दशना जिह्वा चिबुकं वदनं तथा ॥ उपाङ्गानि द्वादशेति शिरस्यङ्गान्तरेषु च । पाणीगुल्फी तथाङ्गुल्या करयोः पादयोस्तले ॥ मुखरागश्च करयोः प्रचाराः करणानि च । कर्माणि पाणिक्षेत्राणि तेषां लक्षणमुच्यते ॥ سم ४ 25 [अथ दृष्टिप्रकरणम् ।] दृष्टयस्त्रिविधास्तत्र स्थायिजा रसजास्तथा । व्यभिचारिभवाश्चेति तासां लक्षणमुच्यते ॥ 1 Ro drop समात | 2 ABO शोभाते । ५
८३
६
७
5
८
स्निग्धा]
नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३
लिग्धा हृष्टा तथा दीना क्रुद्धा दृप्ता भयान्विता।
जुगुप्सिता विस्मितेति स्थायिजा अष्टदृष्टयः॥
कान्ता हास्या च करुणा रौद्री वीरा भयानि(१न)का।
बीभत्सा चाद्भुतेत्यष्टौ द्रष्टव्या रसदृष्टयः ।।
शून्या च मलिना श्राता (?न्ता)लजिता शङ्किता तथा ।
मुकुला चार्धमुकुला ग्लाना जिम्मा च कुञ्चिता ॥
वितर्किताभितप्ता च विषण्णा ललिताभिधा॥
आकेकरा विशोका च विभ्रान्ता विप्लुता तथा ।
जस्ता च मदिरेत्येता विंशतिर्व्यभिचारिजाः॥
व्यभिचारिषु सर्वेषु यथासां विंशतेदृशाम् ।
विनियोगस्तथा सम्यग्वक्ष्यामः पूर्वशास्त्रतः॥
षत्रिंशन्मिलिताः सर्वा भवन्ति त्रिविधा [अपि]
रसभावजयोदृष्टयोर्न विशेषोऽस्ति किं त्विह
भावजायामनुद्भूता भावा रत्यादयश्च ते ॥
लिग्धा विकाशिनी लिग्धमधुरा चतुरे ध्रुवौ ।
विभ्रती साभिलाषोद्यदेकभूस्तु कटाक्षिणी॥
॥ इति स्निग्धा ॥१॥
or
10
१०
११
५
15
१२
हृष्टा निमेषिणी किश्चिस्मिता कुञ्चितचञ्चला।
अन्तर्विशत्तारका च फुल्लगल्ला स्मृता बुधैः ।।
॥ इति हृष्टा ॥२॥
१३
20
दीनार्द्धपतितोलस्थपुटेषदुद्धतारका ।
मन्दसञ्चारिणी बाष्पव्याकुला सद्भिरिष्यते ॥
॥ इति दीना ॥३॥
क्रुद्धा स्थिरोवृत्तपुटा किश्चित्तरलतारका।
भृकुटी कुटिला रूक्षा दृष्टिविद्भिरुदाहृता॥
॥ इति क्रुद्धा॥४॥
१५ 25
हप्ता विकसिता सत्त्वमुगिरन्तीव सुस्थिरा ॥
॥ इति हप्ता ॥५॥
[जुगुप्सिता नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ निर्गच्छदिव यन्मध्यं त्रासविक्षिप्ततारका। विस्फारितोभयपुटा दृष्टिरुक्ता भयान्विता ॥ ॥ इति भयान्विता ॥ ६॥ १७ 5 जुगुप्सिताश्यदृष्टावुद्विग्ना संकुचत्पुटा । मीलत्कनीनिका स्पष्टालोकिनी परिकीर्तिता ॥ ॥ इति जुगुप्सिता॥७॥ १८ विस्मिता दूरविस्फारितारका च विकाशिनी । निश्चलोवृत्ततारा च पुटद्वन्द्वा निमेषिणी ॥ ॥ इति विस्मिता ॥८॥ 10 २० इत्यष्टौ दृष्टयः प्रोक्ताः क्रमाद्रत्यादिभावजाः। रसदृष्टय एताः स्युर्भावैरत्युल्बणैः स्फुटाः ।। सभ्रूक्षेपकटाक्षा स्यात् सविकाशातिनिर्मला। आपिबन्तीव दृश्यं या कान्ता कामविवर्धनी॥ यद्गतागतविश्रान्तिवैचित्र्येण विवर्तनम् । तारकायाः कलाभिज्ञास्तं कटाक्षं प्रचक्षते ॥ इति कान्ता ॥१॥ २१ 15 २२ आकुञ्चितपुटा मन्दमध्यतीव्रतया क्रमात् । मध्ये किञ्चित् समाविष्टविचित्रभ्रान्ततारका। त्रिविधप्रकृतेहास्या दृष्टिविस्मापने मता ॥ ॥ इति हास्या ॥२॥ २३ 20 * नासाग्रानुगता साना किश्चिन्निश्चलतारका। पतितोर्ध्वपुदा शोकात् करुणा दृष्टिरिष्यते ॥ ॥ इति करुणा ॥३॥ 25 रुक्षोया भ्रुकुटी भीमा लोहिता स्तब्धतारका । चञ्चलद्विपुटी रौद्री दृष्टिदृष्टिविदोदिता ।। ॥ इति रौद्री॥४॥ २५ 1 B0 विशाकिनी। 2 80 इत्यादि । 8 AB0 प्रचक्ष्यते । 4 ABO सान. ।
5 10 २९ भयानक.] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ ८५ वीरा संकुचितापागा दीप्ता च समतारका । अचञ्चला विकसिता गम्भीरा धीरसंमता ॥ २६ गाम्भीर्यमाधुर्यविलासशोभा- 'स्थैर्योजऔदार्यमुखानशेषान् । विवृण्वती सत्त्वविशेषभेदान् प्रसादलालित्यमुखैन मुख्यान् ॥ ॥ इति वीरा ॥५॥ अत्यन्तचञ्चलोद्भुततारोत्तपुटा जडा। दृश्यमग्निमिवास्पृष्ट्वा याति भीत्या भयानका ।। २८ ॥ इति भयानका ॥६॥ मीलल्लोलचलत्पक्ष्मा चलत्तारा मिलत्पुटौ । अपाङ्गौ संसृता दृश्योद्वेगाडीभत्सिका स्मृता ॥ ॥ इति बीभत्सा ॥७॥ अन्तर्वहिर्गामिकनीनिकेषन्मिलत्पुटापाङ्गविकाशिनी च । प्रसन्नशुक्लांशविशुद्धधिष्णाद्भुता स्मृता दृष्टिरियं पुराणैः ॥ ३० 16 ॥ इत्यद्भुता ॥८॥ शृङ्गारादिरसेष्विष्टा दृष्टयोऽष्टौ क्रमादिमाः॥ ३१ ॥ इत्यष्टौ रसदृष्टयः॥ अथ विंशतिरुच्यन्ते व्यभिचारिसमाश्रयाः। निष्कम्पा मलिनापागा धूसरा पुटतारयोः। शून्यप्रकाशिनी दृष्टिः शून्या शून्यविलोकिनी ॥ ॥ इति शून्या ॥१॥ मलिना किञ्चदाकुञ्चत्पुटा पक्ष्माग्रमन्थरा। व्यावृत्य तारकापाङ्गे दृश्याद्वैवर्ण्यशंसिनी ॥ दृष्टिः स्याद्विकृते स्त्रीणां दृष्टिविद्भिरुदाहृता। विकृतं तद्वरोरूणां प्रियेण समयेऽपि यत् । प्राप्तेऽसंलपनं माना[]रोषाद्वेति विनिश्चितम् ॥ ॥ इति मलिना ॥२॥ 20 25 I 80 अचला। 2 AB0 अथैयौं। 3 AB0 °सेधिष्टा ।
[श्रान्ता नृ०२० को-उल्लास १, परीक्षण ३ अलसा निपतत्तारा स्रस्तापाङ्गा विलोकिनी । दूराद् ग्लानोभयपुटा दृष्टिः श्रान्ता श्रमार्तिषु ॥ ॥ इति श्रान्ता ॥३॥ 5 लजितान्योऽन्यतः स्पृष्टपक्ष्माना किञ्चिदग्रतः। मीलत्तारा विनम्रो पुटा सापत्रपाभरे ॥ ॥ इति लजिता॥४॥ । व्यामूळे वाच्यता तिर्यग्मुहुश्चकिततारका । नातिस्थिरा निवृत्ता प्रागीक्षणाबाहिरुन्मुखी । शङ्कायां शङ्किता दृष्टि व्यविद्भिदाहृता । ॥ इति शङ्किता ॥५॥ 10 ३८ पतितोलपुटा दृष्टिः किञ्चिन्मीलिततारका । स्फुरदाश्लिष्टपक्षमाप्राप्यधोनीतकनीनिका ॥ विनम्रो पुटा इष्टिकुलेति प्रकीर्तिता। निद्रायामियमानन्दे हृद्ययोः स्पर्शगन्धयोः॥ ॥ इति मुकुला ॥ ६॥ - 15 मीलितार्धपुटा किञ्चिदस्फुटाकनीनिका । उक्तार्धमुकुला दृष्टिराहादे विनियुज्यते ॥ ॥ इत्यर्धमुकुला ॥७॥ 20 अन्तर्निविष्टतारा या मलिना मन्दचारिणी। विश्लथभ्रूपक्ष्मपुटा ग्लाना ग्लानौ नियोजिता। अपसारादिकेऽप्येषा संमोक्ता भरतादिभिः॥ ॥ इति ग्लाना ॥८॥ wwww किञ्चित्कुश्चत्पुटा तिर्यक् शनैर्गुढं विलोकिते। तिर्यक पतिततारा या जिह्मापाङ्गपटत्पुटा । जडतायामसूयायामालस्ये च नियुज्यते ॥ ॥ इति जिह्मा ॥९॥ 25 है 1 • RC पुरदा।
कुञ्चिता] नृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ ईषत्कुञ्चितपक्ष्मायनपुटा वक्रतारका । तिर्यग् निविष्टा हष्टिः स्यात् कुञ्चितासूयितेऽपि सा। अनिष्टेऽर्थे व्यथायां च दुरालोके महस्यपि ॥ ॥ इति कुञ्चिता ॥१०॥ 20 अधःसञ्चारिणी तारोत्फुल्लोड्रान्तपुटापि च । वितर्किता वितर्के सा विनियुक्ता मनीषिभिः ॥ ॥ इति वितर्किता ॥११॥ विलोकेतेऽलसं भ्रान्ते संतप्ते इव तारके। व्यथाचलत्पुटोपेते यस्यां सोक्ताभितप्तिका । उपतापेऽभिघाते च निर्वेदेऽपि नियुज्यते ॥ ॥ इत्यमितता ॥ १२॥ ४५10 स्तब्धतारानिमेषाद्या विस्तारितपुटद्वया । विषण्णा पतितापाङ्गा विषादे विनियुज्यते ।। ॥ इति विषण्णा ॥ १३॥ 16 'सचूक्षेपस्मितापाङ्गे कुञ्चिता मधुरोन्मुखी। ललिता ललिते प्रोक्ता दृष्टिर्मन्मथमन्थरा ॥ ॥ इति ललिता ॥१४॥ ईषद्क्रपुटापाडा तिर्यगर्धनिमेषिणी । नेत्रान्तरादन्यपथालोका व्यस्तविवर्तिनी।। दृष्टिराकेकरा दूरालोके विच्छेदकर्मणि । सापराधे प्रिये लेहविच्छेदेन यदीक्षणम् । तद्विच्छेदप्रेक्षितं स्याद् दूरालोकेऽपि सा स्मृता ।। ॥ इत्याकेकरा॥१५॥ ४८ 20 ४९ 25 विकाशिन्यनिमेषा च विकाशितपुटद्वया। इतस्ततो भ्रान्ततारा विशोका दृष्टिरिष्यते। ज्ञाने क्रोधे च विज्ञाने गर्ष उग्रावलोकने । ॥ इति विशोका ॥ १६ ॥ ५० 1 ABO ख° of सभूक्षेपस्मितान्विता स र अ ७ श्लो ४१९ ।
८८
[विभ्रान्ता
नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण ३
विभ्रान्ता कचिदश्रान्तमविश्रब्धविलोकिनी।
चश्चलोत्फुल्लतारा च विस्तीर्णा दृष्टिरुच्यते ।
नियुक्ता विभ्रमे वेगे संभ्रमे च मनीषिभिः॥
॥ इति विभ्रान्ता ॥ १७ ॥
*
5
५२
पततः क्रमतो यस्याः स्तब्धविस्फुरितौ पुटौ ।
विप्लुता चापले दुःखे तून्मादादौ च कोविदैः ॥
॥ इति विप्लुता ॥१८॥
त्रासोद्धमत्पुटा त्रस्ता सोत्कम्पोत्फुल्लतारका ।
॥ इति त्रस्ता ॥ १९॥
10
५४
५५
15
५६
t
त्रिविधा मदिरा दृष्टिर्मद्य(? द)त्रैविध्यतः स्मृता।
अधमे पुंसि संस्थस्तु मदस्तीवोऽधमो मतः ॥
अधः सञ्चारिणी तत्र किश्चिदृष्टकनीनिका ।
यनेऽप्यसिध्यदुन्मेषानिमेषाद् याधमे मदे ॥
मध्ये किञ्चिद्भमत्तारा किञ्चित्कुश्चत्पुटद्वये ।
अनवस्थितसञ्चारा मदिरा मध्यमे मदे ।।
तरुणे क्षामनयना तथापाङ्गविकाशिनी ।
आधूर्णमानतारा तु मदिरा दृष्टिरिष्यते ॥
॥ इति त्रिविधा मदिरा ॥ २० ॥
इत्युक्ता दृष्टयो लोकदृष्टिमार्गमुपाश्रिताः।
षत्रिंशत् सन्त्यनन्तास्तास्ताराभ्रपुटकर्मणाम् ॥
संदर्भाद् ब्रह्मणाप्येताः प्रत्येकं वक्तुमक्षमाः।
तत्प्रयोगमपश्चार्थ भ्वादिकानधुना ब्रुवे ॥
॥ इति दृष्टिप्रकरणम् ॥
*
20
५८
५९
25
सहजा पतितोत्क्षिप्ता रेचिता कुञ्चिता तथा ।
भृकुटी चतुरा चेति सप्तधा भ्रूः स्मृता बुधैः।
खभावात् सहजा ज्ञेया भावेषु सरलेष्वसौ ॥
॥ इति सहजा ॥१॥
पतिता] नु० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ अधोगता तु पतिता पर्यायेण सहैव वा। जुगुप्सासूययो रोषे हासे हर्षे च विस्मये। उत्क्षेपे च तथा घ्राणे पतेते त उभे ध्रुवौ ॥ ॥ इति पतिता ॥२॥ क्रमेण सह वोत्क्षेपादुत्क्षिप्ता संमता सताम् स्त्रीभिखैलालीलयोधूरेकोत्क्षेप्या दूयं नृभिः । कोपे वितर्के श्रवणे दर्शने च निजे तथा॥ ॥ इत्युत्क्षिप्ता ॥३॥ ६२ एकैव चलितोत्क्षिप्ता रेचिता कीर्तिता बुधैः ।। ॥ इति रेचिता ॥४॥ 10 सद्वितीय किका वापि मृदुभङ्गिमनोहरा । निकुञ्चिताख्या भ्रूज़ैया नियोगोऽस्याः प्रदश्यते। मोहायिते कुमिते विलासे किलकिञ्चिते ॥ ॥ इति कुञ्चिता ॥ ५॥ सा द्वितीया यदा मूलादुत्क्षिप्ता भृकुटी क्रुधि । ॥ इति भृकुटी ॥ ६॥ ६५15 20 अल्पस्पन्दा सद्वितीयायता मन्थरचारिणी। चतुरा ललिते स्पर्श शृङ्गारे रुचिरेऽपि च ॥ ॥ इति चतुरा ॥७॥ ॥ इति सप्तधा 5.॥ [पुटौ।] समौ कुञ्चितौ प्रसृतौ स्फुरितौ च विवर्तितौ । निमेषितोन्मेषितौ च पिहितौ च विताडितौ ॥ इत्येवं नवधा प्रोक्तौ पुटौ तल्लक्ष्म कथ्यते । खाभाविको समौ प्रोक्तौ स्वभावाभिनये च तौ ॥ ॥ इति समौ ॥१॥ ६८25 1 80 °दुपात्क्षि 1 2 30 समता । 3 ABC किलकुञ्चिते । १२ नृ० रन.
९० [कुञ्चितौ नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ आकुञ्चितावहृद्ये स्तो रूपादौ कुञ्चितौ पुटौ ।। ॥ इति कुञ्चितौ ॥२॥ 8 प्रसूतावायती प्रोक्तौ हर्षे वीरे च विस्मये ॥ ॥ इति प्रसृतौ ॥ ३॥ ७० 5 स्फुरिती स्पन्दितौ प्रोक्तावीर्षायां विनियोजितौ ॥ ॥ इति स्फुरिती ॥४॥ विवर्तितौ समुद्वृत्तौ क्रोधे योज्यौ विपश्चिता ॥ ॥ इति विवर्तितो॥५॥ ७२ निमेषितौ तु पुटयोः संश्लेषात् क्रोधगोचरी॥ ॥ इति निमेषितो ॥६॥ ७३ 10 उन्मेषितौ च विश्लेषानियोगं पूर्वमाश्रितौ ।। ॥ इत्युन्मेषितौ ॥७॥ पिहितावतिसंलग्न'पुटौ स्यातां शोरजे । सुप्तमूच्छितवर्षोष्णधूमवाताजनार्तिषु ॥ ॥ इति पिहितौ ॥ ८॥ 16 + पुटौं विताडिती ज्ञेयावुत्तरेणाधराहतेः। अतिविस्फारणात् स्यातामह इयौ वा विताडिती ॥ ॥ इति विताडितौ ॥९॥ ॥ इति नवधा पुटौ॥ ७६ । 20 ७७ [ताराकर्माणि ।] तारकाणां विमेदा ये ते कर्मोपाधिका मताः। कर्माण्यपि द्विधा स्वस्य विषयस्याभिमुख्यतः॥ नव तत्र खनिष्ठानि प्राकृतं च प्रवेशनम् । वलनं भ्रमणं पातश्चलनं च विवर्तनम् ॥ 1 ABO °स्फुटौ । 2 ABC इशौ। 8 °हर्षों in भ को. पृ ३७० । 4 B0 स्फुटौ। 5 ABo through out वितालितौ instead of विताडितौ। 6 ABO स्यातांमट्ट। ७८ प्राकृतम्] नृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ समुद्वृत्तं च निष्कामस्तेषां लक्षणमुच्यते । खभावावस्थितौ ज्ञेयं भावेनावेशभागिनि ॥ रसेऽद्भुते' प्राकृतं तु, ॥ इति प्राकृतम् ॥१॥ ७९ 5 प्रवेशनमथोच्यते। प्रवेशात् पुटयोरन्तर्वीभत्से च रसे स्मृतम् ॥ ॥ इति प्रवेशनम् ॥२॥ ८० वलनं त्र्यस्त्रगमनं रसयोरिरौद्रयोः। ॥ इति वलनम् ॥३॥ ८१ 10 तारयोर्मण्डलभ्रान्तिः 'पुटान्तभ्रमणं मतम् ॥ रसे वीरे च रौद्रे च, ॥ इति भ्रमणम् ॥ ४॥ पातस्तु स्यादधोगतिः। रसे च करुणे कार्य, ॥ इति पातः ॥५॥ 15 1 चलनं च प्रकम्पनं ॥ भयानके रसे प्रोक्तं, ॥ इति चलनम् ॥ ६॥ कटाक्षस्तु विवर्तने । 20 शृङ्गारे च रसे हास्ये, ॥ इति विवर्तनम् ॥७॥ समुद्वृत्तमयोगतिः॥ रसे वीरे च रौद्रे च, ॥ इति समुत्तम् ॥ ८॥ ८३ 1 AB0 °गिनी । 2 ABO द्भुतं । 3 ABO °टान्तेद॑ ।
९२ नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ [निष्कामो दर्शनानि च निर्गमस्त्वन्तरा तु यः। स निष्क्रामस्तु वीरेऽप्यद्भुते रौद्रे भयानके ॥ ८४ ॥ इति निष्काम. ॥९॥ ॥ इति नव स्वनिष्ठानि ताराकर्माणि ॥ ८५ ८६ 10 ८७ ८८ 15 [ दर्शनानि ।] ताराकर्माष्टकमथो विषयाभिमुखं ब्रुवे । रसभावे तु तत् ख्यातं साधारणतया बुधैः ॥ समं साच्यनुवृत्तावलोकितानि विलोकितम् । उल्लोकितालोकिते च प्रविलोकितमित्यपि ॥ कर्माण्येतानि कथ्यन्ते दर्शनानि मनीषिभिः। दर्शनं सममत्रोक्तं सौम्यमध्यकनीनिकम् ॥ ॥ इति समम् ॥१॥ पक्ष्मान्तल्लीनतारं च साचि तिर्यग्विलोकितम् ॥ ।। इति साचि ॥ २॥ अनुवृत्तं दर्शनं स्याद्रूपनिर्वर्णनायुतम् । अन्तःस्थिरतरा काादू विक्षया क्रिया तु या ॥ निर्वर्णना तु सा ज्ञेया, ॥ इत्यनुवृत्तम् ॥३॥ चावलोकितमुच्यते। अधस्स्थदर्शनं तत् स्यात्, ॥ इत्यवलोकितम् ॥ ४॥ विलोकितमितो मतम् ॥ पृष्ठतो दर्शनं यत्तत्, ॥ इति विलोकितम् ॥ ५॥ उल्लोकितमिहोदितम् । ऊर्ध्वस्थवस्तुनो यत् स्यादवेक्षणमथो पुनः॥ ॥ इत्युल्लोकितम् ॥ ६॥ ८ ९ 20 25 ९१ 1 ABO °क्षाद्ध।
आलोकितम्] नृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ आलोकितं यत् सहसा दर्शनं तन्मतं मुनेः । ॥ इत्यालोकितम् ॥७॥ www ९२ प्रविलोकितमन्त्रोक्तं दर्शनं पार्श्वमस्य तु ॥ ॥ इति प्रविलोकितम् ॥ ८॥ ॥ इत्यष्टौ दर्शनानि ॥ 5 [ कपोलौ।] कपोलौ षड्विधौ प्रोक्तौ समौ फुल्लौ च कुश्चिती। पूर्णौ क्षामौ कम्पितौ च, समौ स्वाभाविको मतौ ॥ अनावेशेषु भावेषु, ॥ इति समौ ॥१॥ 10 गल्लौ फुल्ली विकाशितौ। प्रहर्षे विनियोक्तव्यौ ॥ ॥ इति फुल्लौ ॥२॥ संकोचात् कुञ्चितौ मतौ॥ रोमाञ्चिते भये शीते ज्वरे चैतौ प्रकीर्तितौ। ॥ इति कुञ्चितौ ॥३॥ 16 पूर्णी गर्वोत्साहयोः स्तः कपोलावुन्नतौ च यौ ॥ ॥ इति पूर्णौ ॥४॥ ९५ दुःखे क्षामाववनती, ॥ इति क्षामौ ॥५॥ 20 स्फुरितौ कम्पितौ मतौ। रोमहर्षे स्मृतौ तौ तु कपोलाः षडिमे मताः ॥ ॥ इति कम्पितौ ॥ ६॥ ॥ इति षट् कपोललक्षणम् ॥ 25 [ नासा ।] नासापि षड्विधा खाभाविकी मन्दा विकूणिता।
९४ 5 1. 10 * नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ [स्वाभाविकी नता विकृष्टा सोच्छ्वासा खभावावस्थिता तु या । आवेशवर्जिते भावे नासा खाभाविकी मता ॥ ॥ इति स्वाभाविकी ॥१॥ निःश्वासोच्छासमन्दत्वे मन्दा नासा शुचिः स्मृता। निर्वेदौत्सुक्यचिन्तासु नासा चैव विकूणिता॥ ॥ इति मन्दा ॥२॥ अतिसंकुचिता हास्ये जुगुप्सासूययोः पुनः । ॥ इति विकूणिता ॥ ३ ॥ नता नासा मुहुः श्लेषविश्लेषितपुटा मता। मन्दविच्छन्नरुचिरे सोच्छ्रसाभिनये च सा ॥ ९९ ॥ इति नता॥ ४ ॥ अतीवोत्फुल्लपुटका विकृष्टार्तिभयादिषु । रोषोश्वासविषया भूरिसौरभलिप्सया ॥ ॥ इति विकृष्टा ॥५॥ सोच्छ्रासाकृष्टपवना निर्वेदादिषु सा स्मृता । दीर्घोच्छ्रासकरेऽर्थे च सौरभे विनियुज्यते ॥ ॥ इति सोच्छासा ॥६॥ ॥ इति पोढा नासा॥ [ अनिलः ।] प्रबद्धः स्खलितश्चैव निरस्तो विस्मितस्तथा । उल्लासितो विमुक्तश्च प्रसृताख्यश्चलौ परौ ॥ वस्थाविति नवोच्छ्छासनिःश्वासौ कोहलोदिती। समो भ्रान्तो विलीनश्चान्दोलितः कम्पितः परः॥ १०३ स्तम्भितोच्छासनिःश्वाससूत्कृतानि च सीत्कृतम् । एवं दशविधः प्रोक्तो मारुतः कैश्चिदाहतैः॥ सशब्दं वदनाद्यस्तु प्रबद्धः सन् विनिर्गतः। स प्रबद्धस्तु निःश्वासः क्षयादिषु नियुज्यते ॥ १०५ ॥ इति प्रबद्धः ॥१॥ 15 20 www 25 1 B0 विकूणिका।
स्खलित.] ९५ नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ यो निर्गच्छति दुःखेन स्खलितः सोऽभिधीयते । अन्त्यावस्थासु सव्याधौ प्रसूतिसमयेऽपि च ॥ ॥ इति स्खलित. ॥२॥ १०६ निर्गच्छति मुहुर्वक्रान्निरस्तः शब्दवान् मुहुः। श्रान्ते रोगे च दुःखार्ते विनियुक्तो बुधैरयम् ॥ ॥ इति निरस्तः॥३॥ १०७ मनस्यन्यपरेऽकस्माद्वर्तमानस्तु विस्मितः। चिन्तायामद्भुते चार्थे विस्मये च प्रवर्तते ॥ ॥ इति विस्मितः॥४॥ १०८ न 10 १०९ - घ्राणेन मन्दमापीतो मरुदुल्लासितो मतः। हृद्यगन्धे च संदिग्धेष्वर्थेषूक्तो विचक्षणैः ।। ॥ इति उल्लासित. ॥५॥ निरुद्धश्चिरमामुक्तो विमुक्तः कथ्यते मरुत् । प्राणायामे तथा ध्याने योगे चैष नियुज्यते ॥ ॥ इति विमुक्तः ॥ ६॥ दीर्घः सशब्दनिष्क्रान्तो घाणतः प्रसृतो मरुत् । ॥ इति प्रसृतः ॥७॥ 15 उष्णावुच्छासनिःश्वासौ सशब्दौ वनिर्गतौ ॥ चलावुक्तौ तु तौ चिन्तीत्सुक्यशोकेषु कीर्तितौ । ॥ इति चलौ ॥८॥ 20 ११२ खस्थौ खभावजौ प्रोक्तौ वायू खस्थक्रियासु तौ ।। ॥ इति स्वस्थ ॥९॥ ॥ इति नवधानिल.॥ समाद्या वायवोऽन्वर्थ नामानः किन्तु कथ्यते । विनियोगः समो ज्ञेयः सहजे कर्मणि स्थितः॥ ॥ इति समः॥१॥ ११३ 26 1 4 वायवोस्त्वर्थ, B0 वायवोस्त्वर्थनमोनः ।
नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ [भ्रान्त. भ्रान्तः स चान्तभ्र(? न्तभ्रं)मणात् प्रथमे प्रियसंगमे। ॥ इति भ्रान्तः ॥२॥ लीनः स्यान्मूर्छिते वायु, ॥ इति लीनः ॥३॥ पर्वतारोहणे पुनः॥ ११४ आन्दोलित ॥ इति आन्दोलितः ॥ ४॥ कम्पितस्तु सुरते, ॥ इति कम्पित.॥५॥ 6 10 स्तम्भितः पुनः। शस्त्रमोक्षे, ॥ इति स्तम्भितः॥६॥ ११५ 15 तथोच्छास आघ्राणे कुसुमादिनः।। ॥ इति उच्छ्वास. ॥७॥ निःश्वासोऽनुशयादौ स्यात्, ॥ इति नि.श्वासः॥८॥ सूत्कृतं वेदनादिषु। शब्दानुकरणे वक्रात् त्याज्ये वायौ च, ॥ इति सूत्कृतम् ॥९॥ सीत्कृतम् ॥ शीतक्लेशे ग्राह्यवायौ शब्दानुकरणेऽपि च । नखक्षते मृगाक्षीणां निर्दयाधरखण्डने ॥ ॥ इति सीत्कृतम् ॥ १०॥ नासानिलेन व्याख्यातो मारुतो वे (१व)दनोद्भवः। विनियोगान्तराण्यत्र सुविज्ञेयानि लोकतः ।। ॥ इति अष्टात्रिशद्विधो वायु.॥ 20 ११६ ११७ 25 ११८ I AB0 °श्वासानु । 2 Kumbha in भ को °नुहरणे (पृ ७३७)। 3 Kumbha in भ. को गुह्यवायौ (पृ ७२९), but on p 956 ग्राह्य ।
विवर्तितादयः] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ ११९ [अधरः।] विवर्तितः कम्पितश्च विसृष्टो विनिरहितः। संदष्टकः समुद्गश्चे (?श्वो) द्वृत्तायतविकाशिताः ॥ रेचितश्चेति दशधा बुधैरोध (?ष्ठ) उदीरितः। तिर्यक् संकुचितश्चोष्टपुटः प्रोक्तो विवर्तितः ॥ नियुक्तो वेदनासूयावज्ञाहास्यादिषु स्फुटम् । ।। इति विवर्तित ॥१॥ १२० । कम्पितः कम्पनाद्भीरुड्व्यथाशीतजपादिषु ॥ ॥ इति कम्पित. ॥२॥ १२१ 10 विनिष्क्रान्तो विसृष्टः स्यादलक्तायेन रञ्जने । विलासे चैव बिब्बोके स्त्रीणां नृणां च हेलने ॥ ॥ इति विसृष्टः ॥३॥ १२२ * प्राणो मुखान्तर्निहितः साध्येषु विनिगूहितः। रोषेययोर्वरोरूणां बलाचुम्बति वल्लभे ॥ ॥ इति विनिगूहित. ॥४॥ १२३ 15 दन्तैर्दष्टोऽधरः क्रोधे संदष्टो विनियुज्यते ।। ॥ इति संदष्ट ॥५॥ १२४ १२५ 20 * समुद्गः कथ्यते चोष्ठसंपुटो दधदुन्नतिम् । फूत्कारे चानुकम्पायां चुम्बने चाभिनन्दने । ॥ इति समुद्गः ॥६॥ मुखोत्क्षिप्ततयोवृत्तः सोऽवज्ञापरिहासयोः। ॥ इत्युत्त. ॥७॥ उत्तरोष्ठेन साकं स ततः 'स्थादायतः स्मिते ॥ ॥ इत्यायत.॥८॥ किश्चिदृत्तो(? दृष्टो)र्ध्वरदनो विकाशी कथ्यते स्मिते । ॥ इति विकाशी ॥९॥ १२६ ? 25 1 ABO °स्याद्यतः। १३ नृ० रन ९९ १३४ जिह्वा] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ निष्काशो निष्कर्षणं स्याद् मर्कटादिकरोदने ॥ ॥ इति निष्कर्षणम् ॥ ८॥ ॥ इत्यष्टौ दन्तकर्माणि ॥ [ जिह्वा ।] जिह्वाथ षड्विधा ऋज्व्यु'नता लोला च लेहिनी । वक्रा मृकानुगा चेति प्रसृतास्ये प्रसारिता। ऋज्वी श्रमे पिपासायां श्वापदानां प्रकीर्तिता ॥ ॥ इति ऋज्वी ॥१॥ व्यात्तास्यस्थोन्नता जिह्वा जृम्भास्यान्तस्थवीक्षयोः । ॥ इति उन्नता ॥२॥ 5 १३५ 10 प्रसृतास्ये चला लोला वेतालादौ प्रयुज्यते ॥ ॥ इति लोला ॥३॥ १३७ 15 जिह्वावलेहिनी ज्ञेया दन्तोष्ठे लेहिनी सती ॥ ॥ इत्यवलेहिनी ॥४॥ नृसिंहाभिनये वक्रा व्यात्तास्यस्थोन्नतानिका । ॥ इति वक्रा॥५॥ लीढसक्का स्मृता मृकानुगा कोपेष्टभक्षयोः ॥ ॥ इति सूक्तानुगा ॥ ६॥ इति षोढा जिहा॥ १३८ । 20 [चिबुकम्] अङ्गुष्ठा' (जिह्वौष्ठा) नुगतं तेषां क्रियया लक्षितं स्फुटम् । तथापि लक्ष्यते किश्चिचिवुकं सुखबुद्धये ॥ व्यादीर्ण श्वसितं वक्रं संहतं चलसंहतम् । स्फुरितं चलितं लोलमेवं चिबुकमष्टधा। जृम्भाहास्यादिषु प्रोक्तं व्यादीण दूरनिर्गतम् ॥ ॥ इति व्यादीर्णम् ॥१॥ १४०26 1 ABO ऋज्वान्नताः। 2 of जिह्रौष्ठदन्तक्रियया चिबुक लक्ष्यते ततः। सं र अ ७ श्लो ५०७।
[वदनानि नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ अधस्तादगुलं सस्तं श्वसितं वीक्षितेऽद्भुते । ॥ इति श्वसितम् ॥२॥ तिर्यग्गतं तु वकं स्याद्रहावेशे नियुज्यते ॥ ॥ इति वक्रम् ॥ ३॥ १४१ 5 ९४२ संहतं मीलितमुखं निश्चलं मौनकर्मणि ॥४॥ ॥ इति संहतम् ॥ ४॥ लग्नौष्ठं चञ्चलं नारीवल्गने चलसंहतम् ॥ ५॥ ॥ इति चलसहतम् ॥५॥ स्फुरितं कम्पितं प्रोक्तं शीते'(?भीते) शीतज्वरे बुधैः। ॥ इति स्फुरितम् ॥ ६॥ 10 चलितं श्लेषविश्लेषि क्षोभे वास्तम्भकोपयो। ॥ इति चलितम् ॥७॥ १४४ तिर्यग्गतागतं लोलं रोमन्थावर्तनादिषु ॥ ॥ इति लोलम् ॥ ८॥ ॥ इत्यष्टधा चिबुकम् ॥ 15 [वदनम् ।] व्याभुग्नं भुग्नमुदाहि विधृतं विकृतं तथा । विनिवृत्तमिति प्राहुर्वदनं षड्विधं बुधाः ॥ व्याभुग्नं किञ्चिदायामि मुखं चिन्तादिके स्मृतम् । निर्वेदौत्सुक्ययोश्चापि, ॥ इति व्याभुग्नम् ॥१॥ 20 भुग्नं वक्त्रमधोमुखम् । यतेः खभावाल्लज्जायाम्, ॥ इति भुग्नम् ॥ २॥ 4 1 सं र अ ७ श्लो ५११ has भीते शीतज्वरे तथा ।
१४७ १४८ । १४९ 10 उद्वाहि] नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण ३ गर्वानादरतो मग तौ॥ लीलासूक्षिप्तमुदाहि, ॥ इत्युद्वाहि ॥ ३॥ विधुतं तिर्यगायतम् । निषेधे नैवमित्युक्तो, ॥ इति विधुतम् ॥ ४॥ विवृतं तुप्रकीर्तितम् । विश्लिष्टौष्ठं हास्यशोकमयादिषु विचक्षणैः ।। ॥ इति विवृतम् ॥५॥ विनिवृत्तं तु तत् प्रोक्तं यत्परावृत्तमाननम् । रोषासूयितेष्वर्थध्वेतवृत्तविदो विदुः॥ ॥ इति विनिवृत्तम् ॥ ६॥ इति षोढा वदनानि ॥ ॥ इति द्वादश शिरस उपागानि॥ [पाणिगुल्फकराङ्गुलिभेदाः।] उत्क्षिप्तापतितोत्क्षिप्तपतितान्तर्गता तथा । बहिर्गता मिथोयुक्ता वियुक्ताङ्गुलिसंयुता ॥ अध्यष्ट(१अष्टधा)पाणिरित्युक्ता पादचारपदेष्वियम् । गुल्फावङ्गुष्ठसंश्लिष्टावन्तर्यातौ बहिर्गतौ ॥ मिथोयुक्तो वियुफ़ौ च पञ्चधा मुनिनोदिती। एतेषां विनियोगस्तु स्थानकादिषु दृश्यते ॥ संयुता वियुता वक्राः प्रसूताः पतितास्तथा । कुञ्चन्मूलाश्च वलिताः कराडल्यस्तु सप्तधा ॥ नाग्नैव कृतलक्ष्माणो भेदाः पाण्योंदिता इमे। १५० न 15 १५१ ९५२ 20 १५३ १५४ 25 १५५ [चरणाङ्गुलिभेदाः।] अधःक्षिप्तास्तथोत्क्षिप्ता कुञ्चिताश्च प्रसारिताः ॥ संलग्नाः पञ्चधा ज्ञेयाश्चरणेऽङ्गुलयो बुधैः । अधःक्षिप्ता मुहुः पातात् बिब्बोके किलकिञ्चिते ॥ ॥ इति अध-क्षिप्ता ॥१॥ १५६ 1 १०२ [उत्क्षिप्तादय नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ४ नवोढा लजिते तूर्ध्वक्षेपादुत्क्षिप्तिका मुहुः। ॥ इत्युत्क्षिप्ता ॥२॥ 1 5 शीतमूर्छाग्रहत्रासैः कुञ्चिता कुश्चनात् स्मृता ॥ १५७ ॥ इति कुञ्चिता ॥३॥ ऋजुः प्रसारिताः स्तब्धाः स्वापे स्तम्भेऽङ्गमोहने । ॥ इति प्रसारिता ॥४॥ अङ्गुष्ठस्याप्यमी भेदाश्चत्वारः परिकीर्तिताः। मिथोलग्नाश्च संलग्ना साङ्गुष्ठाः कर्षणे स्मृताः॥ १५८ ॥ इति संलग्ना ॥५॥ उद्धृतं पतिताग्रं चोद्धृताग्रं भूमिलग्नकम् । कुञ्चन्मध्यं तिरश्चीनं पोढा पादतलं स्मृतम् ॥ १५९ ॥ इति पाणिगुल्फाड्डुलितलानि करचरणोपाङ्गानि ॥ उपाङ्गसेवकाः सिंहासनसछत्रचामरैः। भिद्यन्ते यस्य तेनात्रोपाइसंघः प्रदर्शितः॥१॥ 15 इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते सङ्गीतराजे षोडशसाहरुया सङ्गीत- मीमासाया नृत्यरत्नकोशे अङ्गोल्लासे उपाजपरीक्षण तृतीय समाप्तम् ॥ ३ ॥ 10 १ 20 प्रथमोल्लासे चतुर्थ परीक्षणम् यस्मिन्नविद्ययाहार्य विश्व भाति सनातने । तमनाहार्यकार्येशमार्येशं शङ्करं नुमः॥ [आहार्याभिनयः।] अथ निर्धार्यते सम्यगाहीर्याभिनयो मया। यतः प्रयोगः सर्वोऽयमाहाभिनये स्थितः ॥ यतः प्रकृतयः पूर्व नानानेपथ्यसाधिताः। अन्ते (? अतो) ऽङ्गाद्यैरभिव्यक्तिमभिगच्छन्त्ययत्नतः॥ नेपथ्यजो विधिः सर्व आहार्याभिनयाभिधः। कार्यः प्रयत्नस्तत्रैव प्रयोगे शुभमिच्छता ॥ नेपथ्यशब्दवाच्यस्तु नाट्यालङ्कार इष्यते । स एवाहार्यशब्देन नाटके व्यपदिश्यते ॥ 25 नेपथ्यम् ] नृ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ४ [ नेपथ्यम् ।] चतुर्विधं तु नेपथ्यं पुस्तोऽलङ्कार एव च। तथाङ्गरचना चैव ज्ञेयः सजीवमेव च ॥ पुस्तस्तु विविधो ज्ञेयो नानारूपप्रमाणतः। सन्धिमो व्याजिमश्चैव चेष्टितच प्रकीर्तितः॥ ६ ८ [अलङ्कारः।] कायस्यालङ्कतिर्येन सोऽलङ्कारः स च द्विधा। माल्यमाभरणं चेति तत्र माल्यमनावृतम् ॥ चतुर्विधं तु विज्ञेयं देहस्याभरणं बुधैः। आवेध्यं बन्धनीयं च क्षिप्यमारोप्यकं तथा । आवेध्यं कुण्डलादीह यत् स्यात् श्रवणभूषणम् । श्रोणिसूत्राङ्गदैर्मुक्ताबन्धनीयानि निर्दिशेत् ॥ प्रक्षेप्यं नूपुरं विद्याद्वस्त्राभरणमेव च । आरोप्यं हेमसूत्रादि हाराश्च विविधाश्रयाः॥ 0.10 १० ११ 15 [ अगरचना।] सितरक्तश्यामपीता वर्णास्तैरङ्गसंस्कृतिः। वर्णानां संकरोद्भूता शस्ताङ्गरचना मता। बहुभिर्वर्णिता वर्णैः स्यादङ्गरचना नवा ॥ १२ * 20 [पुस्तः।] पुस्तः स उच्यते नाव्ये यद्विमानादि दृश्यते। ॥ वस्त्रकर्म ॥ केलिजै (2 किलिब)श्चर्मवस्त्रायैः संधानात् संधिमो मतः॥ १३ व्याजैः सूत्राकर्षणायै रचितो व्याजिमो मतः । मधूच्छिष्टान्नजत्वादियोगैर्यश्चेष्ट्यते नरैः॥ 1. ABO °देमुक्ता of श्रोणिसूत्राङ्गदैर्मुक्ता । ना शा अ २३ श्लो १३ (0 s s ) १०४ नृ० २० को०-उल्लास १, परीक्षण ४ [सजीवम् १५ 10 १६ १७ [सजीवम् ।] स चेष्टितः स्यात् सजीवो रङ्गे प्राणिप्रवेशनम् । देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः॥ प्राणिसंज्ञाः कृता ह्येते जीवबन्धास्तथापरे। शैलप्रासादयत्राणि चर्मवर्मध्वजास्तथा ॥ नानाप्रहरणाद्याश्च ते प्राणिन इति स्मृताः। अथवा कारणोपेता भवन्त्येते शरीरिणः॥ वेषभावाश्रयोपेता नाव्यधर्मीमुपाश्रिताः । वर्णानां तु विधि ज्ञात्वा वयःप्रकृतिमेव च ॥ कुर्यादङ्गस्य रचनां देशजातिवयाश्रिताम् । द्विपादः पादरहिताः चतुष्पाद इति त्रिधा ॥ प्राणिनः प्रथमे तत्र देवमानुषपक्षिणः । पादहीनास्तु भुजगाश्चतुष्पादा गवादयः॥ एवमाहार्यविधयो गवेष्या भरतादिह । अप्रस्तुतत्वात्ते नेह विस्तरेण प्रपञ्चिताः॥ भूषाप्रसङ्गतः किञ्चिन्नेपथ्यमिह दार्शतम् । १८ 10 १९ 15 २१ २२ 20 [मुखरागः।] अभिनेयार्थसंपत्तिः करणैरवधार्यते ॥ साधीना मुखरागस्य तत् स आदौ निरूप्यते। यतो वदनरागोऽयं चित्तवृतिं रसात्मिकाम् ॥ प्रकटीकुरुते तस्मादर्थसिद्धिस्तदाश्रिता। मुखरागमृतेऽङ्गानि नालमर्थप्रकाशने ॥ अतस्तेनैव शोभन्ते तानि खं शशिना यथा । रसानुशायिनी संपत् पदार्थानां प्रकाशते । तामात्मस्थां व्यनत्त्यत्र मुखरागो रसे रसे। स चतुर्धा स्मृतो राज्ञा पूर्वः खाभाविकस्तथा ॥ २४ २५ 25 २६ i Chaukhamba and Niinaya Sagal editions of N S have the leading चेष्टिम as above ( A 23 ) 8 (0s 8 )A 21 v 8 ( N s ) but the & o s has the leading वेष्टिम -( 110 ) This is a more intelligible reading Abhinavagupta explains it as जतुसिक्थादिना वेष्टस्तेन निर्वृत्तो वेष्टिमः |P 110 2 Bo dhop पादरहिता चतुः। 3 ABO पादौ । 4 ABO पूर्वस्वा ।
१०५ हस्तप्रचारा' करणानि च] नृ०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ४ प्रसन्नश्च तथा रक्तः श्यामश्चैव चतुर्थकः । खाभाविको यथार्थस्तु भावेनाविष्ट इष्यते ॥ ॥ इति स्वाभाविकः ॥१॥ शृङ्गाराद्भुतहास्येषु प्रसन्नो निर्मलो मतः। ॥ इति प्रसन्नः ॥२॥ रक्तं स्यादरुणो रौद्रे करुणेऽद्भुतवीर्ययोः। ॥ इति रक्त. ॥३॥ 5 २८ श्यामो यथार्थो विज्ञेयो बीभत्से च भयानके । ॥ इति श्यामः ॥४॥ ॥ इति चतुर्धानु (१ मुख) रागः ॥ 10 २९ [ हस्तप्रचाराः।] हस्तप्रचरणाधीनं सर्वं नृत्यं यतस्ततः। अतो नानामतैक्येन तानहं वच्मि तत्त्वतः ॥ उत्तानश्च ततः पार्श्वगोऽग्रगोऽधस्तलस्तथा । खसंमुखतलश्चोर्ध्वमुखोऽधोवदनस्तथा ॥ परामुखः पार्श्वतला संमुखश्चाग्रतस्तलः । ऊर्ध्वगोऽधोगतः पार्श्वगतोऽन्यः पार्श्वतोमुखः॥ एते पञ्चदशैवात्र प्रचाराः करसंश्रयाः। नाम्नैव व्यक्तलक्ष्माणो न ततो लक्षिताः पृथक् ॥ ॥ इति पञ्चदश हस्तप्रचारा. ॥ ३०15 ३१ ३२ 20 [करणानि ।] निरपेक्षो यथा सर्वोऽभिनयः सर्वमृच्छति । क्रियाविशेषो हस्तस्य सर्वसाधारणस्तथा। क्रियते नृत्यविद्भिर्यस्तद्धस्तकरणं मतम् । आवेष्टितोद्वेष्टिते च व्यावर्तितमतः परम् ॥ परिवर्तितमित्येतचतुर्धा परिकीर्तितम् । तर्जन्याद्यङ्गुलीनां यत्तलसंमुखतः क्रमात् ॥ आवेष्टितं स्यादागच्छेदावक्षः पार्श्वतः करः। ३४ 25 १४ नृ०रन० १०६ [करकर्माणि नृ० र० को०-उल्लास १, परोक्षण ४ करस्य करणं नाम तदावेष्टितमीरितम् ॥ ॥ इति आवेष्टितम् ॥ १॥ ३६ अमुल्योऽनुक्रमेणैव निर्गच्छन्ति तलावहिः। वक्षस्तोऽपि करस्तद्वत् तदुद्वेष्टितमीरितम् ॥ ॥ इति उद्वेष्टितम् ॥२॥ ३७ 5 ३८ आवर्तितकनिष्ठाद्यमेवमेव प्रकीर्तितम् ॥ ॥ इत्यावर्तितम् ॥ ३॥ तथैव कनिष्ठा(?ष्ठि)[काद्यमुद्वेष्टित वदीरितम् । परिवर्तितनामैतत् करणं करसंश्रितम् ॥ ॥ इति परिवर्तितम् ॥ ४॥ ॥ इति चत्वारि करणानि ॥ ३९ 10 [करकर्माणि ।] विंशतिः करकर्माणि नामलक्ष्माणि वस्यतः(१)। धूननं श्लेषविश्लेषौ क्षेपो रक्षणमोक्षणे। परिग्रहो निग्रहो खुत्कृष्टया कृष्टिविकृष्टयः ॥ ताडनं तोलनं छेदभेदी स्फोटनमोटने । विसर्जनमथाहानं तर्जन चेति विंशतिः॥ ॥ इति विशतिः करकर्माणि ॥ 15 ४१ न 20 [हस्तक्षेत्राणि।] पार्श्वद्वयं पुरस्ताच्च पश्चादूर्ध्वमधः शिरः । ललाटकर्णस्कन्धोरोनाभयः कटिशीर्षके। ऊरुद्वयं च हस्तानां क्षेत्राणीति त्रयोदश॥ ॥ इति त्रयोदश हस्तक्षेत्राणि ॥ 25 येनाहार्य जगति जगतीनाथसर्वखमुर्वी धार्या पार्या समग्रा वितरणसरणिः कार्यमार्यानुरूपम् । स्मार्य रामानुचरितमनिशं दार्यमारं समग्रं तेनाहा-'भिनयनिगमोऽकार्यशेषः क्षितीशः ॥ 1 ABO उद्वेष्टितम् । 2 ABO यदिव। 3 ABO ग्रह्योत्क। 4 50 पर्या। 5 BO 'मारस। G BO "हाया। 7 80 निगमौ। 8 ABO क्षितीशा ।
1 नु०र० को०-उल्लास १, परीक्षण ४ १८७ इति सरस्वतीररासमुद्भूतकैरवोद्याननायकेन अभिनवभरताचार्येण मालवाम्भोधि- माथमन्थमहीधरेण योगिनीप्रसादासादितयोगिनीपुरेण मण्डलदुर्गो द्वरणोद्धृतसकलमण्ड- लाधीश्वरेण अजयमेरुजयाजयविभवेन यवनकुलाकालकालरात्रिरूपेण शाकम्भरीरमणपरि- शीलनपरिप्राप्तशाकम्भरीतोषितशाकम्भरीप्रमुखशक्तित्रयेण नागपुरोढूलनधर्पितनागपुरेण अर्बुदाचलग्रहणसदर्शिताचलाद्भुतप्रतापेण गूर्जराधीशधीरत्नोन्मूलनप्रचण्डपवनेन श्रीमत्कु- 5 म्भलमेरुनवीननिर्मितपराजितसुमेरुणा श्रीचित्रकूटभौमस्वर्गतयथार्थीकरणचारुतरपथेन मेद- पाटसमुद्रसभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्तमातङ्गपञ्चाननेन प्ररूढपत्रयवनदवदहनदवा- नलेन प्रत्यर्थिपृथिवीपतितिमिरततिनिराकरणप्रौढप्रतापमार्तण्डेन वैरिवनितावैवव्यदीक्षा- दानदक्षोद्दण्डकोदण्डदण्डमण्डिताखण्डभुजादण्डेन भूमण्डलाखण्डलेन श्रीचित्रकूटविभुना अध्युष्टतमनरेश्वरेण गजनरतुरगावीशराजत्रितयतोडरमल्लेन वेदमार्गस्थापनचतुराननेन 10 याचककल्पनाकल्पद्रुमेण वसुन्धरोद्धरणादिवराहेण परमभागवतेन जगदीश्वरीचरणकिङ्करेण भवानीपतिप्रसादाप्तापसादवरप्रसादेन राजगुर्वादिविरुदावलीविराजमानेन राजाधिराज- महाराणा-श्रीमोकलेन्द्रनन्दनेन राजाधिराज-श्रीकुम्भकर्णेन विरचिते सगीतराजे षोडश- साहरूया सगीतमीमासाया नृत्यरत्नकोशे अङ्गोल्लासे आहार्याभिनयपरीक्षण चतुर्थ समाप्तम्। 10 इति सरस्वतीरससमुद्भूतकैरवोद्याननायकेन अभिनवभरताचार्येण मालवाभोषि-15 माथमथमहीधरेण योगिनीप्रसादासादितयोगिनीपुरेण मण्डलदुर्गोद्धरणोद्धृतसकलमण्डला- वीश्वरेण अजयमेरुजयाजयविभवेन यवनकुलाकालकालरात्रिरूपेण शाकभरीरमणपरिशील- नपरिप्राप्तशाकभरीतोपितशाकभरीप्रमुखशक्तित्रयेण नागपुरोलनधर्षितनागपुरेण अर्बुदा- चलग्रहणसदर्शिताचलाद्भुतप्रतापेण गूर्जराधीशवीरत्वोन्मूलनप्रचण्डपवनेन श्रीमत्कुभलमेरु- नवीननिर्मितपराजितसुमेरुणा श्रीचि[त्र] कूटभौमवर्गतयथार्थीकरणचारुतरपथेन मेदपाट- 20 समुद्रसभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्तमातगयवनेन प्ररूढपत्रयवनदवहनदवानलेन प्रत्य- र्थिपृथिवीपतितिमिरततिनिराकरणप्रौढप्र (in a different hand on another page इति श्रीजगदीशवनदेवनिजगणेन ॥१॥ जगदीश्वरीकामेश्वरीचरणकिङ्करेण ॥२॥ कामाक्षागिरिविभुना ॥ ३ ॥ अध्युष्टतमनरेश्वरेण ॥ ४ ॥ भीष्मपुरजयानीतानेकराज कन्यारत्नेन ॥ ५॥ श्रीपुरग्रहणसवर्द्धितयशोभरेणं ॥ ६॥ वाटिकाचलग्रहणजनितकीर्ति-25 पुरपराजिताचलनायकेन ॥ ७ ॥ सगमनीरदुर्गोद्वरणोद्धृतसकलमण्डलाधीश्वरेण ॥ ८॥ दमनपुरविध्वसनबदीकृतयवनीनिचयेन ॥ ९॥ महिपमेरुजयाजेयविभवेन ॥ १० शाकभरीरमणपरिशीलनपरिप्राप्तशाकभरीपरितोषितशाकभरीप्रमुखशक्तित्रयेण ॥११॥ अष्टादशगिरिशिखरपरिवारिताजनाद्रिविजयविख्यातवीर्यगर्वेण ॥१२॥ महदवमातृकापुरो ठूलनधर्षितमहोरगपुरेण॥१३॥श्रीवनदेवखामिप्र(प्रा)सादरचनापरपरमेश्वरेण ॥ १४॥ 30 श्रीध्यबकेश्वरसन्निविकीर्तिस्तभोन्नतजयस्तभेन ॥ १५ ॥ श्रीब्रह्मगिरिभौमस्वर्गतायथार्थी- करणरचितचारुपथेन ॥ १६ ॥ श्रीकामक्षागिरिनवीननिर्मितिपराजितसुमेरुणा ॥ १७ ॥ ॥
तृ०२० को०-उल्लास १, परीक्षण ४ श्रीमहिषाचलोपरिश्रीहरिशरणरचिताचलदुर्गेण ॥ १८ ॥ अभिनवभरताचार्येण ॥ १९ ॥ वीणावादनप्रवीणेन ॥ २०॥ यवनकुलाकालकालरात्रिरूपेण ॥ २१ ॥ त्रिसध्यक्षेत्र- समुद्रसभवरोहिणीरमणेन ॥ २२ ॥ परमभागवतेन ॥ २३ ॥ महाराजाविराजमहाराणा श्री[मृगाक] नामराजेन्द्रनन्दनेन ॥ २४ ॥ महाराज्ञीसौभाग्यवतीजसमाबिकाहृदयनन्दनेन 5 ॥ २५ ॥ सकलसीमतिनीशिरोमणिनिकुभराजन्यवशावतसमहाराज्ञीश्रीकर्मवती-लघुमा- देवीहृदयाधिनाथेन ॥ २६ ॥ इति महाराजाधिराजकालसेनमहीन्द्रेण विरचिते सङ्गीतराजे षोडशसाहस्या सङ्गीतमीमासाया नृत्यरत्नकोशे अङ्गोल्लासे आहार्याभिनयलक्षणम् । चतुर्थ परीक्षण समाप्तम् । उल्लासश्च प्रथमः समाप्तः ।
१ 5 ३ 10 ४ द्वितीयोल्लासे प्रथमं परीक्षणम् । [ मङ्गलम् ।]] एकं निधाय सममस्य च' जानुशीर्षे पादं परं रचितकुञ्चितमुद्धृतं च'। वन्दे शिवं सवरदाभयदानहस्तं "नेत्रामृतैः सतत साध( ? स्थान)- कमाप्तवन्तम् ।। [स्थानकानि ।। अथ स्थानानि वक्ष्यामो मार्गदेशीविभेदतः। चारी चरणमाख्यातं स्थित्वा तयवतिष्ठते ॥ यतश्चार्यादिकं सर्व स्थाने स्थाने कृतं भवेत्। अतः स्थानं प्रधानत्वात् सर्वस्यादौ प्रपश्यते ॥ वैष्णवं समपादं च वैशाख मण्डलं भवेत् । आलीढप्रत्यालीढे च स्थानषदं नृणामिति ॥ आयातं चावहित्थं च तथाश्वक्रान्तमित्यपि । गतागतं च वलितं मोटितं विनिवर्तितम् ।। इत्याचार्यमते ख्यातं स्त्रीणां स्थानकसप्तकम् । खस्तिकं वर्धमानाख्यं 'नन्द्यावर्त च संहतम् ॥ समपादं चैकपादं पृष्ठोत्तानतलं तथा। चतुरस्त्रं पाणिविद्धं पार्णिपार्श्वगतं तथा ॥ एकपार्श्वगतं तस्मादेकजानुनतं ततः। परावृत्तं समसूचि तथा विषमसूच्यपि ॥ खण्डसूचि ततो ब्राह्मं वैष्णवं शैवगारुडे । कूर्मासनं नागबन्धं वृषभासनमित्यपि ॥ इति देशीस्थानकानां विंशतिख्यधिका स्मृता। खस्थं मदालसं क्रान्तं स्या द्विष्कम्भितमुत्कटम् ॥ १० सस्तालसं जानुगतं मुक्तजानुविमुक्तकम् । उपविष्टस्थानकानां नवकं भारते मते ॥ ११25 सममाकुञ्चितं स्थानं प्रसारितविवर्तिते। उद्वाहितं नतं चेति सुप्तस्थानानि षनृणाम् ॥ 10 dhops च at both the places | 2 AB तत्रा। 3 0 ततयाधिक। 4 AB वक्ष्यामार्ग। 5 AB कृतेभवत् । 6 B सप्तमम् । 7 B नाद्य । 8 AB विष्कुंभित। 9 AB लग्न । ०°लकं । but compare its description v 82 15 ८ 20 नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ [पुरुपस्थानकानि १३ एवं समासतः पुंसां षट् स्त्रीणां तु सप्त च। देशीयस्थानकानां च त्रयोविंशतिरित्यथ ॥ नवासने च षट् सुप्तौ सर्वाणि मिलितानि तु । एकपञ्चाशदाचष्ट पञ्चाशत्कोटिभूपतिः। अथ लक्षणमेतेषां वक्ष्ये लक्ष्मविदां मुदे ॥ 5 १५ 10 १६ १८ 15 [ पुरुषस्थानकानि ।] एकः पादः समो यत्र खपक्षे त्र्यत्रितः परः। सार्द्धद्वितालान्तरितो जङ्घा किञ्चिन्नता स्थिता ॥ विष्णुदैवतमेतत् स्याद् वैष्णव सौष्ठवाश्चितम् । उत्तमर्मध्यमैः पुंभिः प्रयोज्यं मुनिसंमतात् ।। प्रकृतिस्थस्य 'संलापेऽनेककार्यान्तरान्विते । प्रयोज्यं प्रतिशीर्षेण विष्णोश्चेत्यपरेऽभ्यधुः॥ अपरे नाटयकति सूत्रधारादिना जगुः । पादः पक्षस्थितः सोऽत्र यः पार्थाभिमुखाङ्गुलिः॥ स एव त्र्यस्त्रः किश्चिचेत् पुरोदेशाभिमुख्यभाक् । अन्तरालं यदत्र स्यात् प्रसृताङ्गुष्ठमध्ययोः ।। तदेव तालसंज्ञं स्यादिति नृत्यविदो विदुः। उरः समुन्नतं यत्र कूर्परांसशिरः समम् ॥ कटीजानुसमासन्नं गात्रं तत् सौष्ठवं मतम् । अङ्गं खस्थानविश्रान्तं सन्नमित्यभिधीयते ॥ अचलस्थितिसंयुक्तं निषण्णमिति कीर्त्यते । सौष्ठवेऽङ्गमनत्युचमचञ्चलमकुब्जकम् ॥ चलपादं च तत् कार्य वृभिरुत्तममध्यमैः । वैष्णवं स्थानमेतञ्च चतुरस्रस्य जीवनम् ॥ पृथक्कटीनाभिचरौ करौ वक्षः समुन्नतम् । वैष्णवं स्थानकं यत्र चतुरस्रं तदुच्यते ॥ ॥ इति वैष्णव स्थानम् ॥१॥ १९ २० 20 २१ २२ 25 1 ABo give the line एकपञ्चाशदायष्ट etc, but A has marks of del:- tion 2 B दीगीय० 1 3 ABO सोष्ठवाच्छितम् । but भ को सौष्ठवाञ्चितम् पृ ६४६ 4 ABO संलेपनेक of सलापे नानाकार्यान्तरान्विते सं र, अ ७ श्लो १०३३ २५ समपादम्] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ एकतालान्तरौ पादौ समावङ्गे च सौष्ठवम् । समपादं च तद् ज्ञेयं चतुराननदैवतम् ।। एतचोर्ध्वनिरीक्षायां स्वीकारे णा(? चा)शिषां तथा । लिगि(? ङ्गिवतिविमानस्थस्यन्दनस्थेषु युज्यते । मध्यमानां विहङ्गानां कन्यावरकुतूहले ॥ ॥ इति समपादम् ॥२॥ २६ । नभस्यूरू निषण्णौ चेत् साधतालत्रयान्तरे। भूमेरूचे चरणयोस्तावदेवान्तरं भुवि ।। त्र्यम्रपक्षस्थयोर्यत्र वैशाखं स्थानकं तु तत् । वैशाखदैवतं स्थूलपक्षिणां वीक्षणे मतम् । अश्वानां वाहने वेगदाने प्रेरणकर्मणि ॥ ॥ इति वैशाखम् ॥ ३॥ 10 २८ २९ 15 एकतालान्तरौ व्यस्रो पादौ पक्षस्थितौ भुवि । कटीजानुसमावूरू सार्धतालद्वयान्तरे ॥ निषण्णौ गगने तत् स्यान्मण्डलं शक्रदैवतम् । चतुस्तालान्तरौ केचिन्मण्डले चरणं (?णौ) जगुः ॥ वीक्षणे गरुडादीनां नियोज्यं गरुडवाहने । धनुर्वज्रादिशस्त्राणां मोक्षणे च मुनेमतात् ॥ ॥ इति मण्डलम् ॥ ४॥ ३० 20 ३२ व्योनि वामो निषण्णोरुः पूर्वमानेन दक्षिणः । अग्रे प्रसारितः पञ्चतालं व्यस्रं च तवयम् ॥ आलीढं स्थानकं तत्तु विज्ञेयं रुद्र दैवतम् । ईर्ष्याक्रोधकृतो जल्पः कार्यस्तेनोत्तरोत्तरः ॥ वीररौद्रकृतं मल्लसंघर्षास्फोटमादिकम् । अस्मिन् संधाय शस्त्राणि प्रत्यालीढं समाश्रयेत ॥ ॥ इत्यालीढम् ॥५॥ ३३ ३४ 25 1 AB0 ° ताला ef पञ्चताल प्रसारित । सं र अ ७ श्लोक १०४९ 2 ABO कार्यों नेतो. of कार्यस्तेनोत्तरोत्तरः। सं र अ.७ श्लो १०५०, ११२ [स्त्रीस्थानकानि नृ० २० को०-उल्लास २, परीक्षण १ एतद्विपर्ययात्प्रत्यालीढं रुद्राधिदैवतम् । संधानीकृतशस्त्रस्य प्रत्यालीन मोवनम् ॥ ॥ इति प्रत्यालीढम् ॥ ६॥ 5 प्राचां चतुर्णामेतेषां प्रयोगो नाट्यवृत्तयोः । नाव्यैकगोचरस्तज्ज्ञैरन्त्ययोः परिदृश्यते। नर्तने स्थानषट्कस्य केचित् पञ्चविधेऽभ्यधुः ॥ ॥ इति षट्पुरुषस्थानकानि ॥ 10 ३८ 15 [स्त्रीस्थानकानि ।] आयतं स्थानकं तत्तु यत्र तालान्तरे स्थितः। वामखयत्रो दक्षिणश्च समो वक्षः समुन्नतम् ॥ प्रसन्न वदनं हस्तो नितम्बे दक्षिणोऽपरः। समः समुन्नता चात्र कटी पद्माधिदैवतम् ।। एतदाभाषणे कार्य सखीप्रियतमादिभिः। कर्तुं समीह(हि)तासु स्यात् कृ(? क्ष)तासु च गतिष्विदम्॥ रङ्गावतरणारम्भे पुष्पाञ्जलिविसर्प(ज)ने। आवाहने विसर्गे च तर्जने प्रतिषेधने । मानावलम्बने गर्वे गाम्भीर्येऽमर्षकर्मणि । ईयाभिलाषप्रभवे खीणामङ्गुलिमोटने ॥ एतत् स्त्रीस्थानकं कार्य प्रवेशे पुरुषैरपि । केयनोचुःखीभिरेव पूर्वरङ्गे प्रयुज्यते ॥ प्रविष्टेष्वपि पात्रेषु त्वभिनेयानभि? ति)क्रमात् । एतत् स्थानं प्रयोक्तव्यमिति केचन मन्वते ।। इदं स्थानं प्रयुज्याथ रङ्गवितरणादयः। कर्तव्या हस्तपादादिप्रचारे रुचिरैर्युताः॥ ॥ इत्यायतम् ॥ १॥ ४० ४१ 20 ४२ ४ ४४ 25 * ४५ एतत्पादविपर्यासादवहित्थं प्रकीर्तितम् । दुर्गाधिदैवतं चैतदवहित्थस्य सूचकम् ॥ खाभाविके च संलापे तुष्टौ चिन्ताविचारयोः । 1 ABO केचनोप्यू।
११३ अश्वक्रान्तम्] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ विस्मये च विलासे च वरभार्यावलोकने । लीलायां भूरिसौभाग्यगर्वजे खाङ्गवीक्षणे ॥ ॥ इत्यवहित्थम् ॥ २॥ ४८ एकः पादः समस्तस्य' पाणिदेशं गतोऽपरः। सूचीतालान्तरे चाथ समः पार्थे खके स्थितः॥ अश्वक्रान्तं तदा ज्ञेयं भारती चास्य दैवतम् । अश्वस्यारोहणारम्भे स्खलिते गोप्यगोपने प्रसूनस्तबकादाने तरुशाखावलम्बने । खाभाविके च संलापे विगलद्वस्त्रधारणे । विभ्रमे ललिते चैव प्रयोक्तव्यमिदं स्मृतम् ॥ ॥ इत्यश्वकान्तम् ॥३॥ ४९10 गतिं कर्तुं समुदिता यत्रोद्धृत्यैव नर्तकी । एकं पादमुदास्ते तदगतं न (१च)गतं तथा । गतिस्थित्योर्निरोधेन स्थानकं स्याद्गतागतम् ॥ ॥ इति गतागतम् ॥४॥ ५० 15 किञ्चिद्विवलितं गात्रं तद्दिक्षु चरणो यदा। कनिष्ठाश्लिष्टभूपृष्ठो भूलग्नाङ्गुलिकापरः। तदैतद्वलितं ज्ञेयं साभिलाषविलोकने ॥ ॥ इति वलितम् ॥ ५॥ 20 एकः पादः समस्त्वन्यः कुञ्चितोतलाडलिः। अग्रे तयोर्ध्वगो हस्तो कर्कटो मोहि टि)ताभिघे? धम्)। कामावस्थासु सर्वासु विनियोगोऽस्य कीर्तितः॥ ॥ इति मोटितम् ॥६॥ ५२ परिवर्तनतोऽङ्गानां पृष्ठतो विनिवर्तते(१र्तितम्)। ॥ इति विनिवर्तितम् ॥७॥ ॥ इति सप्त स्त्रीस्थानकानि ॥ 25 1 Bo drop स्या १५ नृ० र० तृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ [स्वस्तिकम् [ देशीस्थानकानि ।] मिथः श्लिष्टकनिष्ठौ च चरणौ कुश्चितौ यदा। खस्तिको संहतस्थाने स्वस्तिकं कीर्तितं तदा ॥ ॥ इति स्वस्तिकम् ॥ १॥ तिर्यचौ चरणी पाणिसंगतौ वर्धमानके । ॥ इति वर्धमानम् ॥२॥ चरणौ वर्धमानस्थौ वितस्त्यन्तरितौ यदा । षडडलान्तरौ यद्वा नन्द्यावर्त तदोदितम् ॥ ॥ इति नन्द्यावर्तम् ॥३॥ ५६ 10 अङ्गुष्ठौ च तथा गुल्फी पादयोश्चेन्मिथो युतौ । देहे स्वाभाविके तत् स्यात् संहतं स्थानकं वरम् । विनियोगोऽस्य कथितः पुष्पाञ्जलिविसर्जने ॥ ॥ इति संहतम् ॥ ४॥ ५७ 15 देहः स्वाभाविको यत्र वितस्त्यन्तरितौ समौ । पादौ तत् समपादाख्यं समानातं महीभृता। ॥ इति समपादम् ॥५॥ ५८ समस्यैकस्य पादस्य जानुमूनि यदीतरः। बायपाधैन लनोकिर्यायपाधं तदादिशत् । एकपादं मुनिश्रेष्ठः स्थानकं स्थानवित्तमः ।। ॥ इत्येकपादम् ॥६॥ ५९ MWWW 20 * ६० भूमिलग्नाङ्गुलीपूष्ठः पश्चात्पादस्तथैककः। परापरः समो यत्र पृष्ठोत्तानतलं हि तत् ॥ ॥ इति पृष्ठोत्तानतलम् ॥ ७॥ अष्टादशाङ्गुलं यत्र वर्धमानस्थपादयोः । अन्तरं चतुरैः प्रोक्तं चतुरस्रं मनोहरम् ।। ॥ इति चतुरस्रम् ॥ ८॥ 25 २ ६२ पाणिविद्धम्] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ पाणिविद्धे भवेत्पार्षिणरङ्गुष्ठश्लेषिणी सदा ॥ ॥ इति पाणिविद्वम् ॥९॥ पाणिः पार्थान्तरस्थान्तः पाणिपार्श्वगते भवेत् ॥ ॥ इति पाणिपार्श्वगतम् ॥ १० ॥ 6 समपादाग्रतः किञ्चिदपरश्चरणौ यदा । बाह्यपार्श्वतस्तिर्यक् स्यादेकपार्श्वगतं तथा ॥ ॥ इत्येकपार्श्वगतम् ॥ ११॥ 10 1 15 समस्य चरणस्यान्यश्चतुरङ्गुलमानतः। तिर्यकुश्चितजानुः स्यादेकजानुनते भवेत् ॥ ॥ इत्येकजानुनतम् ॥ १२॥ पाया समौ परावृत्ते कनिष्ठाङ्गुष्ठको मतौ ॥ ॥ इति परावृत्तम् ॥ १३॥ द्वावही पाणिजोकलिष्टभूमी प्रसारिती । तिर्यग् भवेतां चेत् स्थानं समसूचित दोदितम् ॥ ॥ इति समसूचि ॥१४॥ युगपत् पुरतः पश्चात् सूचीपादौ प्रसारितौ। पृथग्वा कथितं स्थानं प्राज्ञैर्विषमसूचि तत् । चरणौ भूमिसंलग्नजानुगुल्फो कचिन्मतौ ।। ॥ इति विषमसूचि ॥ १५॥ भूसंलग्नोरुपाणिः स्यादेकस्तिर्यक् प्रसारितः । अन्योऽतिः कुश्चितो यत्र खण्डसूचि मतं तदा ॥ ॥ इति खण्डसूचि ॥ १६॥ समस्याः परः पादः कुञ्चितीकृत्य पृष्ठतः। जानुसंघिसमत्वेनोत्क्षिप्तस्तद् ब्राप्रमुच्यते ॥ ॥ इति ब्राह्मम् ॥ १७ ॥ एकं कृत्वा समं पादमीषदन्यस्तु कुञ्चितः। पुरः प्रसारितस्तियंगेतत् स्याद्वैष्णवं तदा ॥ ॥ इति धैष्णवम् ॥ १८ ॥ 20 25 1 ABO °तकम्।
नृ०र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ [उपविष्टस्थानानि समस्याऽस्तु सव्यस्य जानुशीर्षसमः परः। उद्धृतो दक्षिणः पादः कुश्चितः शैवमत्र तत् ।। ॥ इति शैवम् ॥ १९ ॥ - 5 वामोऽने कुञ्चितः पश्चादन्यः पादस्तु जानुना। पृथिवीं संश्रितो यत्र गारुडं स्यात्तदासनम् ॥ ॥ इति गारुडम् ॥२०॥ । वामः समः परो जानुबाह्यगुल्फमिलत्क्षितिः। चरणो विद्यते यत्र तत् कूर्मासनमीरितम् ॥ ॥ इति कूर्मासनम् ॥ २१॥ ७४ 10 दक्षिणां तु यदा जङ्घा वामोरोः पृष्ठदेशगाम् । विदधात्युपविष्टः सन् नागबन्धं तदादिशेत् ॥ ॥ इति नागबन्धम् ॥ २२॥ ७६ जानुनी भूमिसंलग्ने संयुते वियुते तथा । सौष्ठवाधिष्ठितं चाङ्गं तदा स्यादृषभासनम् ॥ ॥ इति वृषभासनम् ॥ २३ ॥ ॥ इति त्रयोविशतिर्देशी'स्थानकानि ॥ 15 1 [ उपविष्टस्थानानि ।] हस्तावूरू कटिन्यस्तौ हृदयं किञ्चिदुन्नतम् । विस्तारिताञ्चितौ पादौ स्थानं तत् खस्थमुच्यते ॥ ॥ इति स्वस्थम् ॥ १॥ 20 आसनं संश्रितस्त्वेकः परः किञ्चित्मसारितः। शिरः पार्श्वगतं यत्र तन्मदालसमीरितम् । विपदौत्सुक्यनिर्वेदमदेषु विरहेषु तत् ॥ ॥ इति मदालसम् ॥२॥ 25 किश्चिद्वाष्पकले नेने बाहुशीर्षगतं शिरः। 1 ABO °तिदे । 2. ABO एकपर. of एक. प्रसारित किश्चिदन्योऽधिस्त्वासना- श्रितः। सं. र, अ७. श्लो १०९६ ११७ क्रान्तादीनि] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ चिबुकक्षेत्रगौ हस्तौ क्रान्तमेतदुदीरितम् । शोके ग्लाने निर्जिते च विगृहीते नियुज्यते॥ ॥ इति क्रान्तम् ॥ ३॥ ७९ नेत्रे निमीलिते पादौ यत्र विस्तारिताश्चितौ । भुजौ विस्तारितापूर्वोर्विष्कम्भि'तमिदं मतम् । भटा(द्रा)सने त्वनावृष्टे(१)नियुक्तं ध्यानयोगयोः ॥ ॥ इति विष्कम्भितम् ॥४॥ ८० समौ पादावासनं च सममस्पृष्टभूतलम् । स्थानं तदुत्कट योगध्यानसंध्याजपादिषु ॥ ॥ इत्युत्कटम् ॥ ५॥ ८१ 10 शरीरमलसं नेत्रे मन्थराकारधारिणी। हस्तौ त्रस्तौ विमुक्तौ च तदा सस्तालसं मतम् । व्याधिमूर्छामदग्लानिहानिभीतिषु तन्मतम् ॥ ॥ इति सस्तालसम् ॥ ६ ॥ ८२ 16 जानुनी भूमिसंस्थे चेत् स्थानं जानुगतं तदा। होमे देवार्चने दीनयाचने मृगदर्शने । क्रुद्धप्रसादने चैतत् कुसत्त्वत्रासने तथा ॥ ॥ इति जानुगतम् ॥ ७॥ 20 मुक्तजानूत्कटस्यैव जान्वेकं भूमिपृष्ठगम् । हवने सान्त्वने चैव सज्जने साधुकर्तृके। प्रसादने मानिनीनां विनियुक्तं महर्षिभिः॥ ॥ इति मुक्तजानु ॥ ८॥ भूमिपातो विमुक्तं स्याद्धानि(? व)क्रन्दादिषु स्मृतम् ॥ ॥ इति विमुक्तकम् ॥९॥ ॥ इति नवोपविष्टस्थानानि ॥ 25 । 1 ABO विष्कुम्भितम् । but see verse 10 and the footnote 2 ABG धान्य । of योगे ध्याने भवेदेतत् स्वभावेन यदासने । सं. र अ. ७ श्लो. ११००, नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण १ [सुप्तस्थानकानि [सुप्तस्थानकानि ।] उत्तानवदनं सुप्तं त्रस्तमुक्तकरं समम् ॥ ॥ इति समम् ॥१॥ ८६ 5 आकुश्चितं स्यादाविद्धजानु चाकुञ्चिताङ्गकम् । शीतार्ताभिनये तस्य विनियोगः स्मृतो बुधैः॥ ॥ इत्याकुञ्चितम् ॥२॥ प्रसारिते भुजामेकामुपधाय प्रसारिते। सुप्तं जानुनि तत्स्थानं सुखसुप्ते प्रकीर्तितम् ॥ ॥ इति प्रसारितम् ॥ ३॥ ८८ * 10 शस्त्रक्षतादिके सुप्तमधोवर्क विवर्तितम् ॥ ॥ इति विवर्तितम् ॥ ४॥ कूपराधिष्ठितक्षोणि स्कन्ध'न्यस्तशिरस्तथा। सुप्तमुदाहितं प्रोक्तं प्रभोलीलाद्यवस्थितौ ॥ ॥ इत्युद्वाहितम् ॥ ५॥ ९० 15 सुप्तं सस्तकरद्वंद्वमीषत्प्रसृतजङ्घकम् । तत् स्थानकं नतं खेदश्रमालस्यादिषु स्मृतम् ॥ ॥ इति नतम् ॥ ६॥ ॥ इति पटू सुप्तस्थानकानि ॥ ९१ 20 ध्यानं वैष्णवमन्वहं प्रकुरुते शैवं तदा पूजनं ब्रामं धर्ममधिष्ठिते? तीन कुरुतेऽन्यस्मै नतं खं शिरः। यत् खस्थं च मदालसं गतमतः क्रान्तं दुहृन्मण्डलं सोऽयं सांप्रतमुत्कटं वितनुते तन्नागवन्धं सुधीः॥ इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते सगीतराजे षोडशसाहस्या सङ्गीतमीमासाया नृत्यरत्नकोशे चारिकोल्लासे स्थानकपरीक्षण प्रथम समाप्तम् । 1 ABO स्कन्ध न्य° | compare स्कन्धन्यस्तशिरः। संर, अ.७श्लो ११०९, o drops the whole verse, चारी] नृ०र० को-उल्लास २, परीक्षण २ द्वितीयोल्लासे द्वितीयं परीक्षणम् । विश्लिष्टा हरिणप्लुतानि दधती तिर्यमुखा कातरा जङ्घालङ्घनिकां गतिं प्रकुरुते तन्मन्द्रिणा ताडिता। विद्युद्धान्तिवशेन वैरिवनिता यस्योरवेणीयुतेः संत्रासं भुजगोचितं विदधती नो कस्य हास्यास्पदम् ॥ १० २ ३10 m 15 [चारी।] चारीपदं तत्र चरेहिँ धातोरियं ततो ङीषि च भाव इष्टम् । कराश्चितस्तचरणप्रदिष्टस्तत्साधकत्वेऽतिशयेन धीरः॥ विचित्रजङ्घाचरणोरुकव्यञ्चिताक्रियाज्ञैर्गदितात्र चारी । भेदांस्तदीयानभिदध्महेऽतो मुनिप्रणीतं निगमं निरीक्ष्य ॥ तत्राशिणैकेन हि जायमाना चारीति चार्येव तु कथ्यतेऽत्र । सैवान पादद्वयनिर्मिता चेचारी प्रदिष्टा करणं मुनीन्द्रैः॥ वृत्तस्य चोक्तं करणात्पृथत्त्वेनैतद्यतोऽदश्वरणप्रधानम्। सैवेह धा(?चा)रीकरणत्रयेण] विनिर्मिता खण्डमिति प्रसिद्धा ।। तैर्वा चतुर्भिस्त्रिभिरेव साध्या चारी स(एम)ता मण्डल'मत्र खण्डैः व्यस्ने भव(?वे)या त्रिभिरत्र खण्डैः खण्डैश्चतुर्भिश्चतुरि]स्रके तु॥६ सेयं प्रदिष्टा द्विविधेह भौमीत्याकाशिकीत्येव च मार्गजाताः। प्रत्येकशः षोडश भूमिजाता आकाशजा देशभवा द्विधा च ॥ त्रिंशत्सपश्चाः किल भौम्य इष्टा एकोनिता विंशतिरभ्रजाताः। पञ्चाशदुक्ता अधिकाश्चतुर्भिरुभय्य एवं मिलितास्तु जाताः॥ तन्मार्गजा देशभवा मिलित्वा जाताश्च चार्यः षडशीतिसंख्याः। हस्ते तथा चाभिनये च गत्यांपादो यदा यो नटकेप्सितः स्यात् ॥ तदीयसंपत्त्युचितान चारी कार्या परा तूचितमादधाना। अन्योन्यमेवं नियमादियं तु व्यायामवाच्या भवतीह चारी॥ १० अथोदिशामः खलु ताः समस्ता विभज्य चारीमुनिसंमतेन । तल्लक्षणं चाभिदधे निरीक्ष्य मुनिप्रणीतान्निखिलान्निबन्धान् । ७ 690 25 Www * 1 RO मंत्र In A the anusvāla is scratched 2 ABC 3 TITAT देशभवा द्विधा व च।
[मार्गचार्य १२ 5 नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण २ [मार्गचार्यः।] समपादा स्थितावर्ता शकटास्या च विच्यवा। अध्यधिका चाषगतिरेलकाक्रीडिता तथा ॥ समोत्सरितमत्तल्लीमत्तल्युत्खण्डिताड्डिता। स्पन्दितापस्पन्दिताख्या बद्धा च जनिताभिधा ॥ ऊरूवृत्तेत्यथ ब्रूमः षोडशाकाशिकीरिमाः। अतिक्रान्ताप्यपक्रान्ता पार्श्वक्रान्ता मृगलुता ऊर्ध्वजानुरलाता च सूची नूपुरपादिका । दोलापादा दण्डपादा विद्युभान्ता भ्रमर्यपि ॥ भुजङ्गत्रासिता क्षिप्ता विद्धोद्वत्तेति कीर्तिता। भरताभिमताचार्यों द्वात्रिंशन्मिलितास्तु ताः॥ १३ १४ १५ 10 १६ wwwww 15 १८ 20 [भौम्यश्चार्यः।] स्थानेन समपादेन कृत्वा पादौ निरन्तरौ । नटः समनखौ तिष्ठेत् समपादा तदोदिता॥ मनु(?सा तु) चारी चरणतो? तः)प्रोक्ता कथमियं तथा। यतः स्थानसमा नैवं प्रचारस्य तु योग्यताम् । अङ्गीकृत्य प्रवृत्तेयं चारीस्थानेऽप्यसौ ततः ॥ ॥ इति समपादा ॥१॥ चरणान्तरपार्श्व चेन्नीत्वाग्रतलसश्चरः । अन्तर्जानु स्वस्तिकत्वं प्राप्यते च तथेतरः॥ खपाच नीयते पादो विकृष्यतेन चेत्तदा । स्थितावा भवेचारी, ॥ इति स्थितावः ॥ २॥ शकटास्या पुनर्यथा ॥ प्रसारितो भवेद्यत्र पादोऽग्रतलसञ्चरः। उद्वाहितमुरो देहपूर्वभागः समुन्नतः। शकटक्षेपणे चास्या विनियोगः प्रकीर्तितः॥ ॥ इति शकटास्या ॥३॥ १९ 26 २१ 1 BO मानेन, of स्थानक समपादाख्यमास्थाय धरणी क्रमात् । बेमः inभ को - , पृ.७०३ १२१ विच्यवा] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण २ विच्युतौ समपादात(? या)श्चरणौ चेत्तलाग्रतः। निकुद्द्येतां धरिणीं विच्यवा प्रोच्यते तदा ॥ ॥ इति विच्यवा ॥४॥ २२ २३ । वामः पादो दक्षिणांहे पार्श्वदेशे निपात्यते । ततोऽपसृत्य दक्षः खे पार्श्वे व्यत्रतया स्थितः ।। सार्धतालान्तरत्वेन वामे पार्श्व तथैव चेत् । दक्षिणो जायते त्र्यनस्तदा साध्यर्धिका भवेत् ॥ ॥ इत्यध्यर्धिका ॥५॥ २४ २५ 10 दक्षिणे(?णा)ट्विं तालमात्रं पुरः स्मृ? कृत्वा द्वितालिकाम् । पृष्ठे याते समं पादावीषदुत्लुतिपूर्वकम् ॥ द्रुतोरप्लुतोऽपसृत्यैव चरणावुपसर्पतः। पुनरुत्प्लुत्योऽपसृत्य कुर्यातामुपसर्पणम् । संत्रासादिव यत्रेयं बुधैश्चाषगतिः स्मृता ॥ ॥ इति चापगतिः॥६॥ २६ 15 किश्चिदुत्प्लुत्य पततो बत्राग्रतलसञ्चरौ । क्रमेण चरणौ सेयमेलकाक्रीडितोदिता ॥ ॥ इत्येलकाक्रीडिता ॥ ७॥ २८ निहितेऽन्यस्य पादस्य मध्येऽग्रतलसञ्चरे । कृते जङ्घाखस्तिकेऽन्यपादेऽग्रतलसञ्चरे ॥ घूर्णन्तौ यत्र कुर्वातेऽपमृति चोपसर्पणम् । समोत्सरितमत्तल्ली चारीयं मध्यूमे मदे ॥ ॥ इति समोत्सरितमत्तल्ली ॥ ८॥ 20 २९ अर्धव्यस्रौ यत्र पादौ जङ्घाखस्तिकमागतौ । भूमिश्लिष्टाखिलतली घूर्णन्तौ वोपसर्पतः। अथापसर्पतः सोक्ता मतल्ली तरुणे मदे ॥ ॥ इति मतल्ली ॥९॥ ३० 25 अंहिः कनिष्ठयाङ्गुल्या तथाङ्गुष्ठेन च क्रमात् । १६ नृ० रन.
१२२ [उत्खण्डिता नृ०२० को०-उल्लास २, परीक्षण २ रेचकस्यानुसारेण शनैः कुर्याद्गतागतम् । यत्र सोत्खण्डिता हस्तो रेचितोऽत्रेति केचन ॥ ॥ इत्युत्खण्डिता ॥ १०॥ ३१ 5 अग्रेण चाथ पृष्ठेन यन्नाग्रतलसश्चरम् । ताडयेच्चरण पादः समः सोक्ताड्डिताभिधा ॥ ॥ इत्यडिता ॥११॥ ३२ पञ्चतालान्तरं तियंगद्धिदक्षः प्रसारितः। निषण्णोरुसमो वामः स्पन्दिता सोच्यते बुधैः ।। ॥ इति स्पन्दिता ॥१२॥ 10 एषैवाङ्गविपर्यासाचार्यपस्पन्दिता मता ॥ ॥ इत्यपस्पन्दिता ॥ १३ ॥ ३४ ४ खस्तिकीकृत्य जो द्वे ऊर्वोर्वलनमाचरेत् । भत्तवाथ खस्तिकं पादौ क्रियेतां मण्डलभ्रमम् । ततः पार्श्व गते खं खं यत्र बद्धति सा मता ॥ ॥ इति बद्धा ॥१४॥ ३५ 15 वक्षःस्थो मुष्टिको हस्तः पादोऽग्रतलसञ्चरः । अन्यकरा' यथाशोभं चारी सा जनितोच्यते ॥ मुख्या पादक्रिया चास्यामितिकर्तव्यतेतरा । एतां देशीविदः केचिदाहुर्मुशलपादिकाम् ॥ ॥ इति जनिता ॥ १५॥ ३७ 20 ३८ पाणिरनेरग्रतलसञ्चरस्य॑ यदा भवेत् । अन्याड्रिपृष्ठाभिमुखी जङ्घा च वलिता यदा ॥ एतद्विपर्ययाद्वाथ जङ्घा च नतजानुका । स्यादन्यजङ्घाभिमुखी लज्जादौ नियोजिता ॥ जरूवृत्ताभिधा चारी चारीविद्भिस्तदोदिता। ॥ इति ऊरूद्वत्ता ॥ १६॥ 25 1 ABC अन्यक्यरा।
१२३ आकाशिक्यश्चार्य.] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण २ नियुद्धयुद्धयोरेता अङ्गहारेषु च स्मृताः ॥ ॥ इति षोडश भौम्यश्चार्यः॥ ४१ । [आकाशिक्यश्चार्यः।] अथ व्योमभवा चार्यो लक्ष्यन्तेऽनुक्रमेण हि । एकस्याङ्ग्रेगुल्फदेशे पादमुद्धृत्य कुञ्चितम् ॥ पुरः किञ्चित् प्रसार्याथोत्क्षिप्य प्रकृतिलो(मृतिर्लो)कवत् । चतुस्तालान्तरेणाथो पुनरग्रे निपातयेत् । अतिक्रान्ताभिधा चारी यन्त्र सोक्ता मनीषिभिः॥ ॥ इत्यतिक्रान्ता ॥१॥ T 10 विधाय बद्धां चारी चेत् कुश्चितं पादमुत्क्षिपेत् । तमेव निःक्षिपेत् पार्श्वे तदापक्रान्तिका भवेत् ॥ ४३ ॥ इत्यपक्रान्ता ॥२॥ 15 कुञ्चितं पादमानीयोई खपार्श्वेन तत्परम् । भूमौ चेत् पातयेत् पाया पार्श्वक्रान्ता तदोदिता॥ सा पार्श्वदण्डपादेति प्रसिद्धा तद्विदामियम् । अन्योरुक्षेत्रपर्यन्तमुत्क्षिप्य चरणं ततः। पृथ्व्यामुद्धहितं न्यस्येद्विशेषं केचनाभ्यधुः ॥ ॥ इति पार्श्वक्रान्ता ॥३॥ १५ 20 उत्क्षिप्य कुश्चितं पादमुत्प्लुत्याधो निपात्य तं । पराश्चितां च जवां च पृष्ठदेशे क्षिपेद्यदा। मृगलुता तदा चारी ज्ञेया कचकिकर्तृका ॥ ॥ इति मृगलुतः॥४॥ उत्क्षिप्तकुञ्चितस्यालेर्जानु स्तनसमं नयेत् । स्तब्धं कुर्यादन्यमद्धि मैवमध्यन्तरेऽपि चेत् । कुर्यात्तदोर्ध्वजानुः स्यादिति चारीविदां मतम् ।। ॥ इत्यूर्वजानु. ॥५॥ ४७25 1 BC °वित् । 2 ABO पाण्या पार्श्व । पातयेत् पाणिना भूमौ पार्श्वक्रान्ता प्रकीर्तिता । वेम: in भ को पृ ३६७, १२४ [अलाता नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण २ पृष्ठं प्रमृतपादस्य परोर्वभिमुखं तलम् । कृत्वा पाणिः खपार्श्व मान्यरत्व(?स्ता)लाता तदोदिता ।। ४८ ॥ इत्यलाता ॥६॥ 5 कुञ्चितं पादमुक्षिप्यास्यैव जहां प्रसार्य च । जान्वन्तां वोरुपर्यन्तां तं पादं पातयेद्भुवि । अग्रयोगेन यस्यां सा चारी सूचीति कीर्तिता। ॥ इति सूचि ॥७॥ ४ ९ 10 अश्चितं चरणं नीत्वा पृष्ठतः पाणिना स्फिजम् । स्पृशेत्तं पाद(त)येदग्रतलेन धरणीतले । यत्र सा चारिका प्रोक्ता बुधैर्नूपुरपादिका ॥ ॥ इति नूपुरपादिका ॥ ८ ॥ कुश्चितं पादमुत्क्षिप्य पार्श्वयोर्दोलयेत् शनैः। पायान्यस्येत् खपायात (?खपाङन्तं) दोलापादातदोदिता॥५१ ॥ इति दोलापादा ॥९॥ 15 अन्यस्य पाणिदेशे चेनूपुरं चरणं नयेत् । खदेहदेशाभिमुखं जान्वगत्वेन वेगतः। अग्रे प्रसार्यते दण्डपादचारी तदोदिता ॥ ॥ इति दण्डपादा ॥ १०॥ ५२ पृष्ठतो वलितं शीर्ष स्पृष्ट्वा भ्रान्त्वा च सर्पतः। पादः प्रसार्यते यस्यां विद्युद्धान्ता तदोदिता ॥ ॥ इति विद्युगान्ता ॥ ११ ॥ 20 ५३ अतिक्रान्तां विधायामुं पादं त्र्यस्त्रं विवर्तयेत् । व्यस्रपादतलभ्रान्या भ्राम्यते सकलं वपुः। यत्र तां भ्रमरी चारीमाह चारीविदग्रणीः॥ ॥ इति भ्रमरी ॥१२॥ ५४ 26 1 of 'दक्षिणक्षेत्रान्त स्वपार्श्व निनीय ततोऽपि स्वपार्श्व दोलयेदिति दोलाकारेण नयेत्, तत. स्वपार्श्वे पाया निपातयेत् । अ गु on verse ३६ अ १०. ना शा, Vol II (G OS)p 103, of also सं र, अ ७ श्लो. ९५४.
१२५ भुजगत्रासिता] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण २ कुञ्चितं पादमन्योरुमूलदेशान्तमुत्क्षिपेत् । पाणि नितम्बाभिमुखीं जानु कुर्यात् खपार्श्वगम् ॥ कटीजानुर्विवर्तेनोत्तानं पादतलं तथा । भुजङ्गनासगमका भुजङ्गत्रासिता तु सा ॥ ॥ इति भुजगत्रासिता ॥ १३ ॥ ५५ . अन्यपाच नयेत्पादं कुञ्चितीकृत्य यत्र च । तालत्रयान्तरोत्क्षिप्तं जङ्घयोः खस्तिकं ततः॥ कृत्वा तं पातयेद्भूमौ पाणिभागेन यत्र सा। आक्षिप्ता नाम चारी स्यादिति नृत्यविदो विदुः॥ ॥ इत्याक्षिता ॥१४॥ 10 खस्तिकीकृत्य विश्लिष्टे जोऽद्धिं कुञ्चितं ततः। प्रसार्य पातयेत् पाया परपाणिसमीपतः। खपार्श्व वाथ तां चारीमाविद्धामभणन् बुधाः ॥ ॥ इत्याविद्धा ॥१५॥ ५९ 15 ६० पादमाविद्धचारीकमन्योरुस्थितपाणिकम् । विधायोत्प्लवनं कृत्वा ततो भ्रमरकं चरेत् ॥ तन्निपात्य ततो भूमौ तथान्येन समाचरेत् । अंहिणा यत्र तां चारीमुद्वृत्तां मेनिरे बुधाः ॥ ॥ इत्युत्ता ॥१६॥ ६२.20 आसां शेषस्तु विज्ञेयः परिभाषापरीक्षणे ॥ ॥ इति द्वात्रिशन्मार्गचारीलक्षणम् ॥ इति भरतमतेन मार्गचारी- नृपनृपतिर्निरदीधरत् समस्ताः। रदनपरिमिता विलोक्य धीमा- नभिनवभारतिकामुखान्नितम्बा(बन्धा)न् । इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते सगीतराजे नृत्य रत्न कोशे चारीकोल्लासे शुद्वचारीपरीक्षणं द्वितीय [समाप्तम्] ॥ ६३ 25 m १२६ नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ [ देशीचार्यः द्वितीयोल्लासे तृतीय परीक्षणम् । [ मङ्गलम् ।] नानादेशेषु यं देवमेककालमुपासकाः। पश्यन्ति सदृशाकारं तस्मै सर्वात्मने नमः॥ 5 10 10 [ देशीचार्यः ।] अव(?थ)देशी(?श)स्थचारीणामुद्देशः प्रतिपाद्यते। रथचका परावृत्ततला नूपुरविद्धिका ॥ तिर्यमुखा मराला च करिहस्ता कुलीरिका। विश्लिष्टा कातरा पाणिरेचिताप्यूरताडिता ॥ ऊरूवेणी तलोदृत्ता हरिणत्रासिका परा । अर्धमण्डलिका तिर्यकुञ्चिता च मदालसा ॥ सञ्चारितोत्कुञ्चिता च स्तम्भक्रीडनिका ततः। चारी लखितजवाख्या स्फुरिताप्यपकुञ्चिता ।। अपि संघहिता खुत्ता खस्तिका तलदर्शिनी । पुराव्यर्धपुराटी च सरिका स्फुरिका ततः॥ निकुट्टका लताक्षेपाप्यडस्खलितिका परा। समस्खलितिका भौम्यः पञ्चविंशदितीरिताः ॥ विद्युभान्ता पुरक्षेपा विक्षेपा हरिणप्लुता। अपक्षेपा च डमरी दण्डपादाक्रिताडिता ॥ जङ्कालङ्घनिकालाता जङ्घावर्ता च वेष्टनम् । उद्वेष्टनमथोत्क्षेपः पृष्ठोत्क्षेपश्च सूचिका ॥ विद्धा प्रावृतमुल्लाल' इत्यत्रैकोनविंशतिः। आकाशिक्य उभय्यस्तु चतुःपञ्चाशदीरिताः। अथोद्देशानुरोधेन लक्ष्यन्ते क्रमतस्त्विमाः॥ [देश्यो भौमचार्यः।] चतुरस्रं समं कृत्वा संलग्नौ चेत् प्रदर्शयेत् । पादावग्रेऽथ पृष्ठे वा रथचक्रा तदा स्मृता॥ ॥ इति रथचक्रा ॥१॥ ८ 20 १० 26 ११ 1 AB0 उल्लासा but Verse 60 gives उल्लाल,
१२७
परावृत्ततला] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३
बहिश्चेत् प्रसृतः पाद उत्तानिततलः पुनः।
पश्चाद्देशे तदा चारी परावृत्ततला स्मृता ॥
॥ इति परावृत्ततला ॥२॥
१२
L
१३०
चरणौ स्वस्तिकीकृत्य पाण्योः पादाग्रयोस्तथा ।
रेचिती यत्र सा ज्ञेया चारी नूपुरविद्धिका ॥
॥ इति नूपुरविद्धिका ॥३॥
वर्धमानं समास्थाय पादौ चेद् द्रुतमानतः।
सव्यापसव्यं सरतस्तदा तिर्यसुखा भवेत्
॥ इति तिर्यमुखा ॥ ४॥
नन्द्यावर्तासनाजी चेत् पाणिप्रपदरेचितौ ।
पुरः प्रसारितौ चारी मराला साभिधीयते ॥
॥ इति मराला ॥५॥
१४
10
१५
संहतं स्थानमास्थाय चरणौ यत्र घर्षति ।
धरणिं पार्श्वदेशाभ्यां करिहस्ता तु सा स्मृता ॥
॥ इति करिहस्ता॥६॥
१६
15
नन्द्यावर्तस्थितावड्घी तिर्यग्यस्यां प्रसर्पतः।
कुलीरिकेति सा प्रोक्ता चारी नृत्यविशारदैः॥
॥ इति कुलीरिका ॥७॥
१७
१८20
विश्लिष्य पाणिविद्धायाश्चरणावुपसर्पतः।
यद्वापसर्पतः सोक्ता विश्लिष्टा चारिका बुधैः॥
॥ इति विश्लिष्टा ॥८॥
नन्द्यावर्तस्थपादौ चेत् सरतः पृष्ठतो यदा।
कातरा नाम सा चारी,
॥ इति कातरा ॥९॥
25
सा चोक्ता पाणिरेचिता।
यस्यां पाणिपार्श्वगते स्थाने स्थित्वाथ रेचयेत् ॥
॥ इति पाणिरेचिता ॥१०॥
१२८ [ऊरुताडिता नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ पाणिरेकपदे स्थाने स्थितो भूम्याद्धिणात्र चेत् । ऊरु ताडयति प्रोक्ता तदोरुताडिता बुधैः ।। ॥ इत्यूरुताडिता ॥ ११॥ २० पाचोभ्यां यत्र चरणावूरूस्थखस्तिकाकृती। क्षितिसंघर्षतश्चारीमूरूवेणी तदादिशेत् ॥ ॥ इत्यूरूवेणी ॥ १२ ॥ २१ पादावग्रेङ्गुली पृष्ठभागेन सरतो द्रुतम् । पुरतश्चेत्तदा चारी तलोद्भुत्तेति संमता ॥ ॥ इति तलोद्वत्ता ॥१३॥ २२ 10 तलेशयोः खस्तिकीकृत्य कुश्चिते चलितान्तके । उत्प्लुत्य निपतेतां चेरिणत्रासिका तदा ।। ॥ इति हरिणत्रासिका ॥ १४॥ २३ पादौ यदा बहिर्जीती भूमिघर्षणतः शनैः। आवर्तेते तदा प्राहुरर्धमण्डलिकां बुधाः ॥ ॥ इत्यर्धमण्डलिका ॥१५॥ २४ 15 1 तिर्यञ्चं पादमाकुश्य यत्र तं प्रक्षिपेन्मुहुः । सा तिर्थक्कुञ्चिता चारी गदिता नृत्यकोविदैः॥ ॥ इति तिर्यक्कुञ्चिता ॥ १६ ॥ २५ 20 मत्तवद्यत्र चरणावितश्चेतश्च विह्वलो। स्थाप्येते यत्र तामाहुश्वारीमेतां मदालसाम् ॥ ॥ इति मर्दालसा ॥ १७ ॥ यदान्येनांहिणाऽन्योऽहित्क्षिप्योत्क्षिप्य कुञ्चितः। युज्यते तिर्यगन्यस्तु सत् सञ्चारिता तदा ॥ ॥ इति सञ्चारिता ॥१८॥ २७ 25 एकैकमग्रतः पादौ न्यस्येदुत्क्षिप्य कुञ्चिती। 1 ABO आव]ते of बहिर्जीतावावर्तते । सं र अ ७ श्लो ९८५ १२९ स्तम्भकीडनिका] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ यस्यां सोत्कुञ्चिता नाम, ॥ इत्युत्कुश्चिता ॥ १९॥ स्तम्भक्रीडनिका तथा। तिर्यक् प्रसृतपादस्य यदा पार्श्व स्पृशेन्मुहुः॥ तलेन चान्यपादस्या, ॥ इति स्तम्भकीडनिका ॥ २० ॥ २८ - 5 । २९ 10 16 -थ स्याल्लचितजछिका। खण्डसूच्यभिधे स्थाने तिष्ठन्नहिस्तु वेगतः। आकृष्य लङ्घयतेऽन्येन चरणेन तदा तु सा ॥ इति लवितजवा ॥२१॥ भूस्पृशौ पादपाश्चौं चेत् सरतो वेगतोऽग्रतः। स्फुरिता, ॥ इति स्फुरिता ॥ २२॥ क्रमतोऽहिभ्यां कुञ्चिताभ्यां तु पृष्ठतः॥ गत्यापकुञ्चिता ज्ञेया, ॥ इत्यपकुञ्चिता ॥२३॥ स्थाने विषमसूचिके। स्थित्वोत्लुत्य पतन् पृथ्व्यामही संघहयेद्यदा ॥ सोक्ता संघहिता[ ॥ इति संघट्टिता ॥ २४॥ भूम्यां चरणाग्रेण घाततः खुत्ता निगद्यते॥ ॥ इति खुत्ता ॥ २५॥ पादोऽथ खस्तिकाकारकारितः स्वस्तिको मतः॥ ॥ इति स्वस्तिक ॥२६॥ ] 20 ३२ ३३ 25 खस्तिकौ चरणौ यत्र संहतस्थानके स्थिती। तिर्यक् पृथग्गतौ बाह्यपााभ्यां भूतलं यदा। स्पृशतस्तत्र सा प्रोक्ता चारिका तलदर्शिनी ॥ ॥ इति तलदर्शिनी ॥ २७॥ ४ १३० नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ [पुराटी पुराटिका मिथोऽह्निभ्यामुत्ताभ्यां निकुटनात् ॥ ॥ इति पुराटी ॥२८॥ उवृत्तस्यैकपादस्य चरणेन निकुट्टनम् । उवृत्तेन निकुठून सा स्यादपुराटिका ॥ ३६ ॥ इत्यर्धपुराटी ॥ २९॥ सारिका सा सरत्येकश्चरणोज्ग्रे यदा तदा॥ ॥ इति सारिका ॥ ३०॥ समाभ्यां चरणाभ्यां तु स्फुरिका सरणं पुरः ।। ३८ ॥ इति स्फुरिका ॥ ३१ ॥ अग्रेणांहेः कुञ्चितेन स्थितिः प्रोक्तो निकुट्टकः ॥ ॥ इति निकुट्टक ॥३२॥ पश्चान्यस्य पुरस्ताच चरणश्चेत् प्रसार्यते । भूमि निकुट्टयेत्तेन लताक्षेपस्तदा भवेत् ॥ ॥ इति लताक्षेपः ॥ ३३ ॥ अस्खलितिका तिर्यक् स्खलिते चरणे भवेत् ॥ ४१ ॥ इति अडस्खलितिका ॥ ३७॥ युगपञ्चरणौ यत्र पुरतः पृष्ठतोऽपि च । तिर्यक् च स्खलितः प्रोक्ता समस्खलितिका तदा ॥ ४२ ॥ इति समस्खलितिका ॥३५॥ ॥ इति पञ्चत्रिशद्भौमचार्यः ॥ 10 15 20 ४ [देश्य आकाशचायः।] पुरस्तादंहिमुत्क्षिप्य भ्रामयित्वालिके दुतम् । भूमौ चेन्यस्यते प्रोक्ता विद्युद्धान्ता तदा बुधैः ।। ॥ इति विद्युद्धान्ता ॥१॥ कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य वेगाद्विस्तार्य चेत् पुरः। विन्यस्येदवनौ सोक्ता पुरक्षेपाभिधा बुधैः ।। ॥ इति पुरःक्षेपा ॥२॥ 25 ४४ 1 एकाचरणोग्रे। B0 एकाचरोने।
४५ विक्षेपा] नृ० २० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ मुहुः प्रसार्य चरणमग्रतो गगनाङ्गणे। आकुञ्चयेत्तदा प्रोक्ता विक्षेपा नाम चारिका ॥ ॥ इति विक्षेपा॥३॥ निपतेतां समुत्क्षिप्य यत्रांही संहतौ भुवि । हरिणीव तदा चारी विज्ञेया हरिणप्लुता ॥ ॥ इति हरिणप्लुता ॥४॥ ऊरुपृष्ठं स्पृशेदंहिर्बाह्यपार्थेन यात्यथ । न्यो नितम्बं निकटमपक्षेपा तदा स्मृता ॥ ॥ इत्यपक्षेपा ॥५॥ कुञ्चितश्चरणो यत्र वामतो दक्षतो भ्रमेत् । ४६ । * 10 डमरी स्यात्तदा, ॥ इति डमरी ॥६॥ दण्डपादाचारी तदोदिता। पादौ खस्तिकमावर्त्य तिर्यगूर्व यदोत्क्षिपेत् ॥ ॥ इति दण्डपादा ॥ ७॥ ४८ 15 न यत्र विस्तारितावंही प्लुतं कृत्वा परस्परम् । गगने ताडयेतां चेत् तलेनाबालिताडिता ॥ इत्यद्भिताडिता ॥८॥ ४९ ५०20 ईषदाकुश्चितं पादमन्यपादेन लक्षयेत् । गगने चेत्तदा प्रोक्ता जङ्घा लचनिका बुधैः॥ ॥ इति जहालवनिका ॥९॥ अविणा लवयतेऽन्येन चरणः पृष्ठतो गतः । तदालाता विनिर्दिष्टा चारीनर्तनकोविदः ॥ ॥ इत्यलाता ॥१०॥ बहिर्भमणस्य चरणस्याऽरन्तभ्रमस्य च । तलं क्रमाजानुपार्श्वे जानुपृष्ठे च निःक्षिपेत् । जवावर्ता तदा प्रोक्ता चारीनर्तनचञ्चना ॥ इति जलावा ॥११॥ * 25 ५२ १३२ 5 ५५ ५६ 10 नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ [वेष्टनम् एकमन्येन पादेन वेष्टयेद्वेष्टनं तदा । तदेव चलनं प्राहुर्नृत्यवर्गणकर्मठाः ॥ ५३ ॥ इति वेष्टनम् ॥ १२॥ उद्वेष्टनं वेष्टयित्वा पृष्ठतोंडही प्रसारिते ॥ ॥ इत्युद्वेष्टनम् ॥ १३॥ पादमाकुञ्चितं पृष्ठे पुरतो वा क्षिपेद्यादि । जानुपर्यन्तमुत्क्षेपस्तदा चारी प्रकीर्तिता ॥ ॥ इत्युत्क्षेप ॥१४॥ पृष्ठतोऽस्मिन् प्रयुक्ते च पृष्ठोत्क्षेपो भवेदयम् ॥ ॥ इति पृष्ठोत्क्षेप ॥ १५॥ यस्यां विन्यस्य चरणं क्षितौ पार्श्वे नतं पुनः । प्रसारयति तीक्ष्णाग्रं सा सूची गदिता बुधैः ।। ५७ ॥ इति सूची ॥१६॥ चरणौ स्वस्तिकीकृत्यैकं किञ्चिद्दोलयेत् पुरः। कुश्चितं चरणं यत्र सा विद्धा परिकीर्तिता॥ ॥ इति विद्धा ॥१७॥ उद्वृत्तश्चरणो मूर्तिललिता बलिता भवेत् । यत्र तत् प्रावृतं ज्ञेयं कामकेलिविवर्धनम् ॥ ॥ इति प्रावृतम् ॥ १८॥ क्रमेणोल्लालयेद्यत्र चरणौ गगने नटः। उल्लालः स तु विज्ञेयश्चारिकामूर्धसु स्थितः॥ ॥ इत्युल्लालः ॥ १९॥ इत्येकोनविंशतिराकाशचार्यः । इत्युभय्यश्चतुःपञ्चाशद्देशीचार्यः ॥ इति षडशीतिर्मागदेशीचार्यः। देशे देशेषु यत्कीर्तिरमला सर्वसङ्गिनी । विचरत्यत्र तेनेयं चारीपद्धतिरीरिता ॥ ६१ इति श्रीराजाधिराजकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते सगीतराजे षोडशसाहत्या सगीतमीमासाया नृत्यरत्नकोशे चारिकोल्लासे देशीचारीलक्षणं नाम तृतीयं परीक्षण [ समाप्तम् । 15 + 20 25 १ 5 10 रेचकलक्षणम् ] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ [कलानिधेरुद्धृतं रेचकदेशीचार्यादिविषयकं प्रकरणम् ] [रेचकानथ वक्ष्यामश्चतुरो भरतोदितान् । पादयोः करयोः कव्या ग्रीवायाश्च भवन्ति ते ॥ पार्ण्यङ्गुष्ठाग्रयोरन्तर्बहिश्च सततं गतिः। नमनोनमनोपेता प्रोच्यते पादरेचकः ॥ परितो भ्रमणं तूर्ण हस्तयोर्हसपक्षयोः । यत्पर्यायेण रचितं स भवेत्कररेचकः॥ विरलप्रसृताङ्गुष्ठागुलेस्तिर्यग्भ्रमेण च । सर्वतो भ्रमणं कव्याः कटीरेचकमूचिरे ॥ ग्रीवाया विधुतभ्रान्तिः कथ्यते कण्ठरेचकः। अङ्गहाराङ्गमप्येते जनयन्ति पृथक् फलम् ॥ ॥ इति रेचकलक्षणम् ॥] 'तन्त्र पादरेचकं लक्षयति । पाण्यङ्गुष्ठयोरित्यादि । 'नमनोन्नमनोपेता अन्तर्गतिर्भवति तदा पाणैरुनमनोपेता बहि- गतिर्भवतीति द्रष्टव्यम् ॥१॥ कररेचकं लक्षयति । परितो भ्रमण-15 मित्यादि हंसपक्षयोर्हस्तयोः पर्यायेण रचितं तूर्ण पुरतो यद्भूमणं अन्तर्बहिश्चेत्यर्थे वामदक्षिणहस्तयोरेकस्मिन् हंसपले अन्तर्धमणं कुर्वति तदन्यो वा भ्रमणं करोति एवं पर्यायेण क्रियते चेत् स कर- 1 The text of this part in all the three mss is as given above There is a mention in it of कलानिधि, a commentary on सं र. On comparing the corresponding portions of e T and its commentary कलानिधि with our text, we find that it is practically an abstract from कलानिधि It may be that the cori esponding verses of नृत्यरतplay are missing in our mss oi moze probably the verses might have been similar to those of संर (श्लो ८९२-९६) Hence to give the idea of the substance of the verse-text, we quote in this bracket [ the verses on which, Kalānidhi's commentary has been quoted by our author 2 The matter from नमनोन्नमनोपेता to प्रकृतमनुसराम (2 138 ) is obviously a digression, the matter being taken as noted above from सं र and its commentaly कलानिधि of कल्लिनाथ It is therefore difficult to ascertain where the thud ottator of the second gre must have ended We have followed the mss and treated the intervening matter as a diguession Ahmad नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ [देशीचार्य रेचको भवेत् ॥२॥ कटिरेचकं लक्षयति । सर्वतो भ्रमणमिति । तच्च भ्रमरीभेदेष्वनुगतं द्रष्टव्यम् ॥ ३॥ कण्ठरेचकं लक्षयति ग्रीवाया इति॥ अथवा ॥४॥- 5 कलानिधेमध्यात् ॥ भरतानुक्रमे सति कोहलायुक्तत्वाद् द्रष्टव्यम् । लोके मुद्दप'संज्ञकाश्चारीविशेषा अपि देशीचारीष्वेवान्तर्भूता मन्तव्या। यथा--- 10 15 [देशीचार्यः ] अथ पादनिकुद्दाख्यचारीणां लक्षणं ब्रुवे । पादकुहनचारी तु लोके मुडुपसंज्ञिका ।। तस्यास्तु बहवो भेदा दिमात्रं चोच्यते मया। सव्यापसव्यवलनं पादचारीषु चोच्यते ॥ निकुहनं तु पादेन ताडनं स्यान्महीतले। उद्देशः क्रियतेऽन्वर्थश्चारीणां खो चितो मतः॥ पुर:पश्चात्सरा नाम पश्चात्पुरःसरा तथा । त्रिकोणचारी पश्चाच्च तथैकपादकुहिता ॥ पादद्वयनिकुहाख्या पादस्थिति निकुहिता। क्रमपादनिकुटा च पार्श्वद्वयचरी तथा ॥ चारी डमरुकुहाख्या डमरुद्वयकुहिता। पुरःक्षेपनिकुटा च पश्चात्क्षेपनिकुहिता ॥ पार्श्वक्षेपनिकुटा च चतुष्कोणाख्यकुहिता । मध्यस्थापनकुद्दा च तिरश्चीनाख्यकुहिता ॥ चारी च पृष्ठलुलि(?ठि)ता पुरस्ताल्लुलि(?ठि)ता तथा । अनुलोमविलोमाख्या प्रतिलोमानुलोमिका ॥ समपादनिकुद्दा च चक्रकुंदनिका ततः। मध्यचका ततो मध्यलुठिता चक्र (वक्त्र)कुहिता ॥ पञ्चविंशतिसंख्याश्च] कीर्तिता ह्यर्थयोगतः। एवमन्याश्च कर्तव्याश्चार्यश्चान्वर्थलक्षणाः ॥ १० 1 B0 भ्रमण कलानिधेमध्यात् मिति । A has the same reading but there is a mank of deletion on it like this "कलानिधेमध्यात्" । 2 ABO मधुप कलानिधि सं र पृ ३१३ । 3 ABO सोचितो of खोचितो। कनि पृ ३१३ (सर)। 4 पादस्थिति । क नि पृ ३१३ (संर)। 5 of वक्त्रकुट्टिता। कनि पृ ३१३ (संर 20 ७ ८ 25 पुर.पश्चात्सरा] नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ १३५ पादशिक्षासु कर्तव्याः कर्तव्या याश्च नर्तने । निकुट्य च तलेनादौ पुर पश्चाद्विधीयते ॥ पादश्चाङ्गुलिपृष्ठेन स्वस्थाने चापि कुहितः। पुरःपश्चात्सरा नाम सान्वर्था परिकीर्तिता॥ १२ ॥ इति पुर पश्चात्सरा ॥१॥ सैव पश्चात् पुरक्षेपात् प्रोक्ता पश्चात्पुरःसरा ॥ १३ ॥ इति पश्चात्पुर-सरा ॥२॥ निवेश्यावेशि)तो स्वत्व)धः पादः स्थापितोऽङ्गुलिपृष्ठतः। निकुट्टितः पुरस्ताच पार्श्वे पृष्ठे निवेशितः॥ १४ चरणाङ्गुलिपृष्ठेन तथा स्थाने च कुहितः। त्रिकोणचारी सोद्दिष्टा चारी चान्वर्थसंज्ञिता ॥ १५० ॥ इति त्रिकोणचारी ॥३॥ 10 * कुहितश्च खपार्श्वे च स्थापितोऽङ्गुलिपृष्ठतः। पुननिकुट्टितः स्थाने सा चैकपादकुहिता ॥ ॥ इत्येकपादकुट्टिता ॥ ४॥ 15 । एवं पादद्वयकृता सा पादद्वयकुहिता। ॥ इति पादद्वयकुट्टिता ॥५॥ कुट्टितः प्रथमं पादः स्थितश्चाङ्गुलिपृष्ठतः ॥ अन्यस्ततः कुहितश्चेत्पादस्थितिनिकुहिता। ॥ इति पादस्थितिनिकुट्टिता ॥६॥ 20 १८० पादद्वयकृता सैव क्रमपादनिकुहिता ॥ ॥ इति क्रमपादनिकुट्टिता ॥७॥ कुहितोऽङ्गुलिपृष्ठे च स्थितः पादोऽपरस्ततः। खस्तिकस्थापितः पूर्वः खपार्श्वे स्थलकुहितः। एवं पादद्वयेनापि सा पार्श्वद्वयचारिणी ॥ ॥ इति पार्श्वद्वयचारी ॥८॥ १९25 * 1 BO नर्तके। 2 4 पादध्य कृता । B0 प्रय कृत्वा ।
पृष्ठलुदिता] नृ० २० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ कुञ्चि(१ हि)तश्चरणः पृष्ठे लुठितोऽङ्गुलिपृष्ठतः। पुनश्च कुहितस्थाने सा पृष्ठलुठिताभिधा। ॥ इति पृष्ठलुठिता ॥ १७ ॥ पुरस्ताच कृता सैव पुरस्ताठिताभिधा ॥ ॥ इति पुरस्ताल्लुठिता ॥ १८ ॥ त्रिकोणचारी या चारी त्वनुलोमविलोमगा। खस्थाने स्थापितपदा ततस्तत्रापि कुट्टिता। सानुलोमविलोमाख्या चारीयं परिकीर्तिता। ॥ इत्यनुलोमविलोमा ॥ १९ ॥ २९ 5 * ३१० विपरीतप्रचारा सा प्रतिलोमविलोमिका ।। ॥ इति प्रतिलोमविलोमिका ॥ २० ॥ निकुहिती समौ पादौ स्थितौ चाहुलिपृष्ठयोः। समपादनिकुटा च कीर्तिता त्वर्थलक्षणा ॥ ॥ इति समपादनिकुट्टिता ॥२१॥ ३२ 15 कुहितं चरणं पश्चाद्धामयित्वा च विन्यसेत् । कुहयेव ततः स्थाने चक्रकुनिका मता ॥ ॥ इति चक्रकुट्टनिका ॥ २२॥ ३३ कुहयित्वा च विन्यस्य लुठितश्च निकुहितः। सा मध्यलुठिता चेति कीर्तितान्वर्थनामका ॥ ॥ इति मध्यलुठिता ॥ २३ ॥ 20 कुदयित्वा च विन्यस्य भ्रामितों लुठितस्ततः। कुहितः स पुनः स्थाने वक्त्रकुनिकाभिधा। ॥ इति वक्त्रकुट्टनिका ॥२४॥ ३५ कुयित्वा च विन्यस्य भ्रामयित्वा न्यसेत्ततः । निकुध्येत्ततः स्थाने मध्यचका प्रकीर्तिता ।। ॥इति मध्यचका ॥२५॥ ३६.४ 1 ABO चक्रकुट्टनिका. of वक्त्रकुनिका । क नि पृ ३१५ (सं.र.). १८.रल० ३ नृ० र० को०-उल्लास २, परीक्षण ४ [मण्डललक्षणम् एवं प्रकीर्तिताश्चार्यः पञ्चविंशतिः संख्यया। एवमन्याश्च विज्ञेयाश्चार्योऽप्यूह्या मनीषिभिः॥ इति प्रसङ्गान्मुडुपसंज्ञकाश्चार्यों दर्शिताः । प्रकृतमनुसरामः॥ 5 or 10 ४ 15 द्वितीयोल्लासे चतुर्थ परीक्षणम् । यन्मण्डलं भूर्भुवः खः प्रकाशाय प्रवर्तते। वरेण्यं सवितुस्तन्मे व्याधिनाशाय कल्पताम् ॥ [ मण्डललक्षणम् ।] लक्ष्मप्रकरणे पूर्व मण्डलं लक्षितं मया । तद्भेदानधुना वच्मि भ्रमरास्कन्दिते ततः॥ आवर्त शकटास्याख्यं तथा चैवाड्डितं परम् । समोत्सरितमध्यर्धमेलकाक्रीडितं ततः॥ पृष्ठकुटुं चाषगतं भौमानीति दश क्रमात् । अतिक्रान्तं दण्डपादं कान्तं ललितसञ्चरम् ॥ सूचीविद्धं वामविद्धं विचित्रं विहृतं ततः। अलातं ललितं चेति दशाकाशभवानि च ॥ भौमाकाशिकचारीणां कार्यत्वान्मण्डलान्यपि । कारणानुगुणत्वेन भौमान्याकाशिकान्यपि ॥ प्रायेणैषां नियोगस्तु विज्ञेयः शस्त्रमोक्षणे । युद्धे चाकाशिकानां तु प्राधान्यं मुनयोऽवदन ॥ [ भौममण्डलानि ।] चारीविवक्षया ज्ञेयश्चरणोऽत्र विजानतः। न न्यूनाधिकता दुष्या मण्डले चारिकागता ॥ दक्षिणे जनितां कुर्याद् वामेऽथ स्पन्दितां तथा । दक्षिणे शकटास्यां च वामेऽपस्पन्दितां तथा ॥ दक्षिणे भ्रमरी वामे स्पन्दितामितरे पुनः। शकटास्यां चाषगति वामे भ्रमरिकां तथा । दक्षिणे स्पन्दितां वामे विदध्याद्रमरे बुधः॥ ॥ इति भ्रमरम् ॥१॥ 20 ८ 25 १० . 1 See appendix I for the text of Kalanidhi 2 ABO °सकटा।
११ १२० आरकन्दितम्] नृ०२० को-उल्लास २, परीक्षण ४ दक्षिणो भ्रमरो वामोऽड्डितोऽथ भ्रमरः स चेत् । शकटास्यो भवन्दक्ष ऊरूद्धृत्तो भवेत्ततः॥ अध्यधिको भवन्वामो भ्रमरः स्यात्तथेतरः। स्पन्दितः शकटास्यस्तु वामः सोऽप्येव भूतलम् । स्फुटमास्फोटयेद्यत्र तदास्कन्दितमुच्यते ॥ ॥ इत्यास्कन्दितम् ॥ २॥ दक्षिणो जनितो वामः स्थितावर्तस्ततः परम् । शकटास्यत्वमप्यैवमेलकाक्रीडितां श्रयेत् ॥ ऊरूद्धृत्ताडिते चायौँ जनितामाश्रयेत्ततः। समोत्सरितमत्तल्लिः क्रमादशिस्तु दक्षिणः ॥ शकटास्यां भजन चारीमूरुवृत्तस्तथेतरः । अविश्वाषगतिर्द्विः स्यादक्षिणस्पन्वितस्ततः ॥ शकटास्यो भवेद्वामो दक्षिणो भ्रमरो भवेत् । वामश्चाषगतियंत्र तदावर्त स्मृतं बुधैः॥ ॥ इत्यावर्तम् ॥३॥ १३ १४ 10 १५ १६ 15 १८ 20 १ ९ दक्षिणो जनितो भूत्वा 'स्थितावतॊ भवेत्ततः। समोत्सरितमत्तल्लिः शकटास्यस्ततः परम् ॥ वामस्तु पन्दितो भूत्वा यावन्मण्डलपूरणम् । शकटास्यो भवेद्यत्र शकटास्याभिधं तु तत् ॥ ॥ इति शकटास्यम् ॥ ४॥ उद्घाटितस्ततो बद्धः समोत्सरितपूर्वकः । 'मत्तल्लिरर्धमत्तल्लिरपक्रान्ताभिधस्ततः ॥ उद्धृत्तो विद्युद्धान्तश्च भ्रमरः स्पन्दितस्तथा । दक्षिणो वामपादस्तु शकटास्यः परः पुनः॥ द्विः स्याचाषगतिामोऽड्डितोऽध्यर्धिकतां गतः। तथा चाषगतिदक्षः समोत्सरितमत्तल्लिः ॥ मत्तल्लिभ्रमरश्चैव वामोऽथो दक्षिणः पुनः । स्पन्दितां चारिकां कृत्वा भूतटास्फोटनं यदा । कुरुते प्राहुराचार्यास्तदा मण्डलमड्डितम् ॥ [॥ इत्यड्डितम् ॥५॥] २० 25 २१ २२ 30 * 1 Bo omit from स्थिताव” to भूत्वा। 2 ABC मतल्लिरथof मत्तलिरर्ध- मत्सलिर' सं.र.अ. ७. श्लो ११६०, 10 नृ०२० को०-उल्लास २, परीक्षण ४ [समोत्सरितम् समपादं समास्थाय स्थानं हस्तौ निरन्तरौ ऊवीकृतौ प्रसार्यवा'प्यावेष्टयोद्वेष्टय च क्षिपेत् ॥ कटीतटे ततः पादौ क्रमाद्दक्षिणवामको । भ्रामयेच ततो वामं पुरः पादं प्रसारयेत् ॥ क्रमादेवं नटो भ्रान्त्वा मण्डलभ्रमणं भजेत् । चतुर्दिकं तदा प्रोक्तं समोत्सरितसंज्ञकम् ॥ २५ ॥ इति समोत्सरितम् ॥ ६॥ जनितः स्पन्दितश्चैकदक्षिणश्चरणो भवेत्। वामोऽथाध्यधिको भूत्वा क्रमाचाषगतिर्भवेत् ॥ २६ मत्तल्लिर्भमरश्चैव दक्षिणः शकटास्यताम् । प्राप्य चान्ते चतुर्दिक मण्डलभ्रमणं यदा। तदा नियुद्धविषयमध्यधैं मण्डलं भवेत् ॥ २७ ॥ इत्यध्यर्धम् ॥ ७ ॥ पदै मियुतैः सुचीविद्धाख्यं करणं श्रितः। सूचीचारीयुतैर्विद्धा प्रयोगैरेलकादिकः॥ क्रीडितैः पूर्णभ्रमरैश्च सूचीविद्धाभिस्तथा। पूर्ववत् संप्रयुक्तैश्च सथाक्षिप्तः पदक्रमः॥ २९ दिकचतुष्टयसंयुक्तमण्डलभ्रान्तिसंयुतः। कटिरेचितकैश्चैवमेलकाक्रीडिताह्वयम् ॥ ॥ इत्येलकाक्रीडितम् ॥ ८॥ सूचीदक्षिणपादः स्यात् वामोऽपक्रान्तया युतः। बहुशो दक्षवामौ च भुजङ्गत्रासिताभिधौ। अन्ते च मण्डलभ्रान्तिः पृष्ठकुटुं तदा भवेत् ॥ ॥ इति पृष्ठकुट्टम् ॥९॥ बहुशश्चाषगतिभिश्चरणैः सकलैयदा। मण्डलभ्रमणं कुर्यादन्ते चाषगतं तदा । नियुद्धविषयं ह्येतत् प्रयुक्तं भरतादिभिः॥ ॥ इति चाषगतम् ॥ १०॥ ॥ इति दशभौममण्डलानि ॥ 15 20 23 I BO वायावे । 2 0 इत्येलकाक्रीक्रीडितम् ।
आकाशिकमण्डलानि] नु० २० को०-उल्लास २, परीक्षण ४ [आकाशिकमण्डलानि ।] दक्षिणो जनितां कुर्यात् शकटास्यां क्रमाद्यदा। वामोऽलातो दक्षिणस्तु पार्श्वक्रान्तस्तु वामका सूची च भ्रमरश्चैव दक्ष उद्धृत्ततां व्रजेत् । वामस्त्वालातिकोऽथाची छिन्नं करणमाश्रितौ ॥ बाह्यभ्रमरकं यत्र वामसङ्गं च रेचितम् । अतिक्रान्तायुतो वामो दण्डपादायुतः परः। अतिक्रान्तं तदा ज्ञेयं मण्डलं शङ्करप्रियम् ॥ ॥ इत्यतिक्रान्तम् ॥१॥ ३४० ३५ * 10 ३८15 दक्षिणे जनितां कृत्वा दण्डपादां भजेदथ । सूची च भ्रमरी वामे उवृत्तां दक्षिणे पुनः॥ वामेऽलातां तदा दक्षे पार्श्वक्रान्तां 'परे पुनः। भुजगन्नासितां कुर्याद्वामोऽतिक्रान्ततां भजेत् ॥ दक्षिणो दण्डपादोऽथ सूची च भ्रमरी परे। यन्त्र तद्दण्डपादाख्यं मण्डलं भणितं बुधैः॥ ॥ इति दण्डपादम् ॥२॥ सूचीवक्षस्तथा वामोऽपक्रान्तो दक्षिणः पुनः। पार्श्वक्रान्तस्ततो वामः समंतामण्डलभ्रमम् ॥ कृत्वा सूचीभवन् दक्षोऽपक्रान्तो यत्र मण्डले तदुक्तं कविभिः क्रान्तं खाभाविकगतौ स्मृतम् ।। ॥ इति कान्तम् ॥ ३॥ सोऽर्धजानुः स सूचीको दक्षिणश्चरणस्ततः। अपक्रान्तीभवेद्वामः पार्श्वक्रान्नस्तु दक्षिणः॥ पार्श्वक्रान्तस्ततो वामोऽतिक्रान्तो दक्षिणः पुनः । सूचीवामस्त्वपक्रान्तः पार्श्वक्रान्तस्तु दक्षिणः॥ अतिक्रान्तस्ततो वामश्चरणद्वितयं ततः। छिन्नं 'करणमाश्रित्य बाह्यभ्रमरकं ततः। वामश्चेल्ललितं कुर्यात्तदा ललितसञ्चरम् ॥ ॥ इति ललितसञ्चरम् ॥ ४॥ ४०20 ४१ ४२25 1 80 पुरे पुनः। 2 BO करमाश्रित्य ।
४५ 10 16 नृ०र० को०-उल्लास २, परीक्षण ४ [सूचीवितम् क्रमात् सूची च भ्रमरः पार्श्वक्रान्तस्तु दक्षिणः। अतिकान्तो भवेद्वामो दक्षः सूची समाश्रयेत् ॥ अपक्रान्तस्ततो वामः पार्श्वक्रान्तस्तु दक्षिणः । सूचीविद्धं तदाख्यातं मण्डलं मण्डलेश्वरैः॥ ॥ इति सूचीविद्धम् ॥ ५॥ सूचीदक्षस्तथा वामोऽपक्रान्तो दक्षिणः पुनः। दण्डपादोऽथ वामस्तु सूची च भ्रमरीं श्रयेत् ॥ पार्श्वक्रान्तो दक्षिणः स्यादाक्षिप्तो दक्षिणे ततः। दण्डपादस्ततश्चोरुद्धृत्तः स्यादक्षिणः क्रमात् ॥ ४७ वामः सूची च भ्रमरोऽलातश्च क्रमतो भवेत् । पार्श्वक्रान्तां 'भजेदक्षो वामोऽतिक्रान्ततां व्रजेत् । वामविद्धं तदाख्यातं मण्डलं मण्डलार्थिभिः॥ ॥ इति वामविद्धम् ॥ ६॥ चारी च जनितां कृत्वोख्दृत्तैश्चैव विच्यवः । स्थितावर्तः शकटास्य एलकाक्रीडितस्ततः॥ ४९ अरूद्धृत्तोऽडितश्चैव जनितस्तदनन्तरम् । समोत्सरितमत्तल्लिः क्रमादनिस्तु दक्षिणः ॥ वामस्तु स्पन्दितां कुर्यात् पार्श्वक्रान्तां तु दक्षिणः । भुजङ्गत्रासितां वामो दक्षोऽतिक्रान्ततां व्रजेत् ॥ उदृत्तत्वं चैष वामोऽलातः स्यादक्षिणः पुनः। पार्श्वक्रान्तः पुनः सूची वामो दक्षं च विक्षिपेत् । अपक्रान्तां भजेद्वामस्तद्विचित्रमुदाहृतम् ॥ ५२ [॥ इति विचित्रम् ॥७॥] 'विच्यवोत्खण्डिते कुर्वन् पार्श्वक्रान्तोऽन्न दक्षिणः । स्पन्दितो वामपादः स्यादुद्वृत्तो दक्षिणो भवेत् ॥ ५३ वामोऽलातो दक्षिणस्तु चारी सूचीमुपाश्रयेत् । पार्थक्रान्तस्तु वामोऽङ्गिराक्षिप्तीभ्य दक्षिणः ॥ सव्यापसव्यं भ्रमणात् दण्डपादां भजेत्ततः । [वामः क्रमेण सूची स्याद् भ्रमरश्वाथ दक्षिणः । 10 भवेक्षो। 20 मालोलातः। 8 0 भवेद्वाम। 4 Bo drop the whole ५० 720 .25, verse ५६ ५७ अलातम्] नृ० २० को०-उल्लास २, परीक्षण ४ भुजङ्गत्रासितो वामोऽतिक्रान्तो विहृताभिधे ॥ ॥ इति विहृतम् ॥८॥ सूची च भ्रमरी वामे क्रमात्पादे तु दक्षिणे।] भुजङ्गत्रासितः पश्चादलातो दक्षिणेतरः॥ आवृत्तिभिः सप्तभिर्वा षड्भिर्वा क्रमतस्त्विमाः। चारीः कृत्वा चतुर्दिक्षु भ्रान्त्वा मण्डलवद्रुतम् अपक्रान्ता दक्षिणे तु वामे तु चरणे पुनः। अतिक्रान्ता भ्रमरिके ललितैश्चरणक्रमैः । कुर्यादलातं तं प्राहुर्मण्डलं चित्रमण्डलम् ॥ ॥ इत्यलातम् ॥९॥ दक्षिणश्चरणः सुची वामोऽपक्रान्सतां भजेत् । पार्श्वक्रान्तीभवन् दक्षो भुजङ्गत्रासितो भवेत् ॥ अतिक्रान्तां चरेद्वाम आक्षिप्तो दक्षिणो भवेत् । वामक्रमादतिक्रान्तोत्सालातकीभवेत् ॥ पार्श्वक्रान्तो दक्षिणस्तु सूचीवामोऽथ दक्षिणः। अपक्रान्तो वामपादस्त्व [तिक्रान्तो] भवेद्यदा। तदुक्तं ललितं यत्र संचरेल्ललितं नटः॥ ॥ इति ललितम् ॥ १०॥ ५८ 10 ५ ९ ६० 16 ६१ ॥ इति दशाकाशिकमण्डलानि ॥ ॥ इति मण्डललक्षणम् ॥ 20 विचित्रविहृतयेनातिकान्तं वैरिमण्डलम् उल्लासितं जगद्येन पादैललितसञ्चरैः। एकलिङ्गप्रसादेन मण्डले यस्य नित्यशः नेतयस्तेन राज्ञेदं कृतं मण्डललक्षणम् ॥ ६२ इति श्रीसरस्वतीरससमुद्भूतकैरवोद्याननायकेन अभिनवभरताचार्येण मालवाम्भो- 25 विमाथमन्थमहीधरेण योगिनीप्रसादासादितयोगिनीपुरेण मण्डलदुर्गोद्धरणोद्धृतसकल- मण्डलाधीश्वरेण अजयमेरुजयाजेयविभवेन यवनकुलाकालकालरात्रिरूपेण शाकभरीरमण- परिशीलनपरिप्राप्तशाकभरीतोषितशाकभरीप्रमुखशक्तित्रयेण नागपुरोद्धृतप्रचण्डपवनेन 1 Verses between this bracket[ ] are verses no-1198-99 (a) taken from SR Ad 7 as they are missing in our mss. 2 BO वामीप्यदक्षिण।
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नृ०२० को०-उल्लास २, परीक्षण ४ श्रीमत्कुंभल मेरुनवीननिर्मितसुमेरुणा श्रीचित्रकूटभौमखर्गतातन्वीकरणरचितचारुतर- पथेन मेदपाटसमुद्रसभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्तमातङ्गपश्चाननेन प्ररूढपत्रथवनदव- दहनदवानलेन प्रत्यर्थिपृथिवीपतितिमिरततिनिराकरणप्रौढप्रतापमार्तण्डेन वैरिवनितावैध- व्यदीक्षादानदक्षोहण्डकोदण्डदण्डमण्डिताखण्डभुजादण्डेन भूमण्डलाखण्डलेन श्रीचित्र- 5 कूटविमुना अध्युष्टतमनरेश्वरेण गजनरतुरगावीशराजत्रितयतोडरमल्लेन वेदमार्गस्थापन- चतुराननेन याचककल्पनाकल्पद्रुमेण वसुधरोद्वरणादिवराहेण परमभागवतेन जगदीश्वरी- चरणकिङ्करेण भवानीपतिप्रसादाप्तापसादेन राजगुर्वा दिबिरुदावलीविराजमानेन राजाधि- राजमहाराणाश्रीमोकलेन्द्रनन्दनेन राजाधिराजश्रीकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते सगीतराजे षोडशसाहस्या सगीतमीमासाया नृत्यरत्नकोशे चारिकोल्लासे मण्डललक्षण नाम चतुर्थ 10 परीक्षणम् ।। उल्लासश्च समाप्ति समगादिति विततमतीनामभिमतसिद्विरस्तु॥ 15 ॥ इति नृत्यरत्नकोशे चारिकोल्लासे चतुर्थं परीक्षणं समाप्तम् ॥ ॥ समाप्तश्चायं द्वितीय उल्लासः ॥ 10 विचित्रैविहृते(? ते)]नातिक्रान्त वैरिमण्डल। उल्लासित जगद्येन पादेललितसश्चरैः । कामेश्वरीप्रसादेन मण्डले यस्य नित्यशः नेतयस्तेन राज्ञेद कृत मण्डललक्षणम् ॥ इति श्रीजगदीशवनदेवनिजगणेन ॥१॥ जगदीश्वरी-कामेश्वरीचरणकिङ्करेण ॥२॥ श्रीब्रह्माद्रिविमुना ॥३॥ अध्युष्टतमनरेश्वरेण ॥ ४॥ भीष्मपुरजयानीतानेकराजकन्या- रत्नेन ॥५॥श्रीपुरग्रहणसवर्द्धितयशोभरेण॥६॥वाटिकाचलग्रहणजनितकीर्तिपूरपराजिता- चलनायकेन ॥७॥ संगमनीरदुर्गोद्धरणोद्धृतसकलमण्डलाधीश्वरेण ॥८॥ मदनपुरविश्व- सनबंदीकृतयवनीनिचयेन ॥९॥ महिषमेरुजयाजेयविभवेन ॥१०॥ शाकम्भरीरमणपरि- 20 शीलनपरिप्राप्तशाकम्भरीपरितोषितशाकम्भरीप्रमुखशक्तित्रयेण ॥११॥ अष्टादशगिरि- शिखरपरिवारितांजनाद्रिविजयविख्यातवीर्यगर्वेण ॥१२॥ महदबमातृकापूरोखूलनधर्षित- महोरगपुरेण ॥१३॥ श्रीवनदेवखामिप्र[T]सादरचनापरपरमेश्वरेण ॥१४॥ त्र्यम्बकेश्वर- सनिधिकीर्तिस्तंभोन्नतजयस्तभेन ॥१५॥ श्रीब्रह्मगिरिभौमस्वर्गतायथार्थीकरणरचितचारु- पथेन ॥१६॥ श्रीकामाक्षागिरिनवीननिर्मितिपराजितसुमेरुणा ॥१७॥ श्रीमहिषाचलोपरि श्रीहरिशरणरचिताचलदुर्गेण ॥१८॥ अभिनवभरताचार्येण ॥१९॥ वीणावादनप्रवीणेन ॥२०॥ यवनकुलाकालकालरात्रिरूपेण ॥२१॥ त्रिसध्यक्षेत्रसमुद्रसंभवरोहिणीरमणेन ॥२२॥ परमभागवतेन ॥ २३ ॥ महाराजाविराजमहाराणाश्रीमृगाङ्कनामराजेन्द्रनन्दनेन ॥२४॥ महाराज्ञीश्रीसौभाग्यवतीजसमाम्बिकाहृदयनदनेन ॥ २५ ॥ सकलसीमंतिनी- शिरोमणिनिकुंभराजन्यवशावतंसमहाराज्ञीश्रीकर्मवती-लषुमादेवी-हृदयाधिनाथेन ॥२६ ।। 30 राजाधिराजकालसेनमहीमहेन्द्रेण विरचिते सङ्गीतराजे षोडशसाहस्यां सङ्गीतमीमांसायां नृत्यरमकोशे चारिकोलासे मण्डललक्षणं नाम चतुर्थ परीक्षण समाप्तम् ॥ उल्लासश्च द्वितीयः।।