Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Saptatikabhidhah Sastha Karamagranthah Granth - 2
Front matter
ॐ श्री गोश्वरपार्थनाथाय नम है ।। सफलागमरहम्यवेदिपरमज्योतिर्विधीमद्विजयटानसूरीश्वरसदगुरुभ्यो नम ।। श्रीमदरामदेवगणिप्रणीतप्राकृतभापागाथार टिप्पनेन भूपितः सप्ततिकाभिधःष ठः कर्मग्रन्थः जातिया टिपनकादिना समलडकृत्य सम्पादकः संशोधकश्च प्रवचनकौशल्याधार--मिद्वान्तमहोदधि-सुविशालगच्छाधिपति-परमशासनप्रभावक- कर्ममाहित्यनिष्णात--परमपूज्य-स्वर्गताचार्यदेवेश-श्रीमद्विजयप्रेमसूरीश्वर- विनीताऽन्तेवासि-निःस्पृहतासलिलनिधि-परमगीतार्थ-परम- पूज्या-ऽऽचार्यदेव-श्रीमवि होरसूरीश्वर- विनेयरत्नमुनि-श्रीललितशेरवर विजय- शिष्यरत्न-मुनि-श्रीराजशेखरविजय. शिष्यः- मुनि-श्रीवीरशेखरविजयः यकाशिका-भारतीय-पाच्य-तत्त्व-प्रकाशन-समितिः, पिन्डवाड़ा (राज.)
प्रथम आवृत्तिः-
प्रति-२५०+२५
राजसस्करण-१५) रु.
राजाधिराज
-२८) रु०
वीर सात २५००
विक्रम सवन २०३०
* प्राप्तिस्थान *
भारतीय प्राच्यतच प्रकाशन समिति
C/० रमणलाल लालच
१३५/१३७ झवेरी बाजा , बम्बई .
भारतीय-प्राच्यतत्व-प्रकाश-पमिति
C/o शा समरथमल रायचद
पिडवाडा, (राज०)
स्टे० सिरोही रोड (W R )
भारतीय प्राच्यतच-प्रकाशन समिति
शा. रमणलाल वजेचन्द,
C/0 दिलीपकुमार रमण
ती मार्केट,
अहमदाबाद २.
सानोदय प्रिंटिंग प्रेस, पिंटव
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Editted by
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Published by
haratiya Prachya-Tattva rakas an a iti,
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(Rajasthan) (India)
*** ** First Edition Copies 250+25 DELUXE EDITION RS 15 SUPER DELUXE RS 20 { A 1) 1974 AVAILABLE FROM I BHARATIYA PRACHYA I ATTVA PRAKASHAN SAMITI Co Shah Raminlal Lalchand, 135/37 Zuveri Binar BOMBAY-2 (INDIA) 2 BHARATIYA PRACHYA TATTVA PRAKASHAN SAMITI C/o Shah Samaratomal Raychandji, PINDWARA, (Rajastban) St. Sirohi Road (W.R) (INDIA) * 3 BHARATIYA PRACHYA TATTVA PRAKASHAN SAMITI Shah Ramanlal Vajecband, C/o Dılıpkumar Ramanlal, Maskatı Market, AHMEDABAD-2 (INDIA) Printed by Gyanodaya Printing Pross PINDWABA (Raj) St Sirohi Road, (WB) (INDIA)
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सकलागमरहस्यवेदि-मरिपुरन्दर बहुश्रुतगीतार्थ-परमज्योतिर्विद-परमगुम्देव
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परमपूज्य आचार्यदेवेश श्रीमद् विजयदानसूरीश्वरजी महाराज
GRADDREDESISKREKDA
। - * प्रकाशकीय निवेदन * यह सूचित करते हुए हमे अन्यन्न आनद हो रहा है कि अल्प समय मे परमपूज्य मिद्वान महोदधि कर्मसाहित्य निष्णात स्वताचार्यदेवेश श्रीमहि जयप्रेमसूरीश्वरजी महाराना की परम पावनी निश्रा में उनकी ही परमकृपा दृष्टि से सकलित किया हुआ और श्लोकबद्ध प्राकृत भाषा मे रचे हुए मूलग्रन्थ तथा सस्कृत भाषा मे रचे हुओ टीका ग्रन्य रूप लाग्वोठलोक प्रमाण कर्म साहित्य का सर्जन हो चुका है, और मी सर्जन चालु है जिनके वोल्युम (महाग्रन्थ) । ग्रन्यरत्न हमारी मन्या द्वारा आपके कर कमलों मे पहुच चुके है और प्रन्थों का मुद्रण कार्य चालु है । जिसे यथा समय आप प्राप्त कर सकेंगे। इसके अलावा इस कर्मसाहित्य विषयक मुनिचन्द्रसूरि विरचित टिप्पनक से युक्त पूर्वाचार्य कृत चूर्णि और उदयप्रभरि विहित टिप्पनक इन दोनों से विभूपिन किया हुआ ऐसा पूर्व वर वाचक श्रीशिवशर्मसूरिप्रणीत 'बन्धशतकम्" नाम का प्राचीन ग्रन्थ त्न मी इस ममिति द्वारा प्रकाशित किया गया है। उसी तरह पूर्वाचार्य कृत मूल टीका सहिन "चत्वार प्राचीना कर्मग्रन्था" नाम का प्राचीन ग्रन्थान हमारी सस्था द्वारा प्रकाशित हो चूका है । ठीक उसी तरह प्रस्तुत ग्रन्यरत्न मी प्रकाशित हो रहा है। रामदेवगणिकृत टिप्पणक युक्त सप्ततिकाख्य पष्ठ कर्मग्रन्थ तथा रामदेवगणिरचित टिपरणक और वृत्ति महित सूक्ष्मार्थविचारसारप्रकरण मुद्रित नहीं होने से तथा उनकी हस्तलिग्वित प्रत एव प्रेस कॉपिया भी मिलने से इन का मुद्रण आवश्यक बन गया था। संपादन-संशोधन :- परमपूज्य सिद्धान्तमहोदधि कर्मसाहित्य निष्णात सुविशालगच्छाधिपति स्वर्गत आचार्यदेवेश श्रीमद् विजयप्रेमसूरीश्वरजी महाराज साहेब के शिष्यरत्न परमपूज्य गीतार्थ निस्पृहतानीरधि आचार्य- देवेश श्रीमद् विजयहोरसूरीश्वर म सा. के शिष्यरत्न प.पू मुनिराज श्री ललितशेखरविजयजी म सा के शिष्यरत्न प पू मुनिराज श्री राजशेखरविजयजी म. सा के शिष्यरत्न प. पू. मुनिराज श्री वीरशेखरविजयजी म. सा. ने कर्मसाहित्य के नव निर्माण के विराट कार्य को करते हुवे भी अपने अमूल्य समय का भोग देकर इस 'ग्रन्यरत्न' का संशोधन कर, हस्तलिखित प्रत्यादि के साथ मिलानादि करके संपादन किया है । संपादन-पद्धति :- मूलग्रन्थ-टीकाग्रन्थ-साक्षिग्रन्थ-प्रतीक-टिप्पणी आदि के लिये विभिन्न छोटे बडे-खुले व गहरे एव विविध प्रकार के टाइप पसद कर अभ्यास कर्ताओं की अनुकूलता बनाए रखने का ठीक प्रयत्न किया है, जैसे मूल प्रन्थ २० पोईन्ट ब्लेक टाईपों मे, टीकाग्रन्थ १६ पोईन्ट सामान्य टाईप मे, प्रतीक १६ पोईन्ट ब्लेक टाईप मे, साक्षिग्रन्थ टिप्पणी विषयानुक्रम और शुद्धिपत्रक १२ पोईन्ट सामान्य टाईप शुद्विपत्रक में सहायक :- ग्रन्थमुद्रित हो जाने के बाद मे भी अनामोग मुद्रणदोषादि के कारण रही हुमी अशुद्धियों के समार्जन के लिये शुद्धिपत्रक मे प पू स्व. आचार्यदेव के शिष्यरत्न प. पू आगमप्रज्ञ आचार्यदेव श्रीमद् विनयजम्वुसूरिश्वरजी म सा तथा प पू. वीरशेखरविजयजी म सा और जैन श्रेयस्कर मडल पाठशाला मेहसाणा के अध्यापक सुश्रावक श्रीयुत पुखराजभाई ने श्रीयुत वसतभाई आदि द्वारा सहयोग दिया है यह शुद्धिपत्रक ग्रन्थ के अत मे दिया गया है। तदनुसार ग्रन्थ सुधार कर पढ़ने का ध्यान रखने की ज्ञान-पिपासु वाचकों से हार्दिक अपील है । . मे रखे है।
प्रकाशकीय निवेदन कृतज्ञता प्रदर्शन :- अत मे सबसे पहले स्व परम गुरुदेव सिद्धान्तमहोदधि कर्ममाहित्य निष्णात आचार्यदेवेश श्रीमद् विजयप्रेमसूरीश्वरजी म. सा. का जितना उपकार और भाभार माने उतना कम है। क्योंकि उनकी ही परमकृपा और प्रभाव से इस समिति का उत्थान और कर्मसाहित्य का विशाल हो सका है। साहित्य की इस इमारत की नींव की इंट तो आप ही हैं। साथ मे हस्तलिखित प्रतिया आदि के साथ मे मिलाकर, टिप्पणिया बनाकर, षडशीति प्रकरण के सव पदार्थों के ग्यारह (११) यत्रों बनाकर उनका प्रथम परिशिष्ट और टिप्पणियुक्त पाचों प्राचीन कर्मग्रन्थ तथा सप्ततिकानाम के षष्ठ कर्मग्रन्थ की मूलगाथा, द्वितीय-चतुर्थ पञ्चम षष्ठ कर्म ग्रन्थ की माष्यगाथा तथा सप्ततिकासार की गाथा और सूक्ष्मार्थविचारसारप्रकरण की मूलगाथा तथा भाष्य गाथा का दूसरा परिशिष्ट बनवाकर जी-तोड परिश्रम से जिन्होंने इस ग्रन्थरत्न का सपादन किया है वह पूज्य मुनिराजश्री वीरशेखरविजयजी म सा के अवर्णनीय उपकार के हम चिर ऋणी है। इस ग्रन्थ के शुद्धिपत्रक के सहायक प. पू आगमप्रज्ञ आचार्यदेव श्रीमद् विजयजम्बूसूरी जी म सा तथा प. पू मु वीरशेखरविजयजी म. सा. और महेसाणा के प्राध्यापक पुखराजभाई तथा वस तभाई आदि का हार्दिक आभार मानते हैं । श्रीरामदेवगणि की बनवायी हुभी सप्ततिकाटिप्पणी और सूक्ष्मार्थविचारसार टिप्पणी की प्रेस कापीया डभोई के "श्री जम्बूस्वामि जैन मुक्ताबाई भागममदिर" नाम ज्ञान भण्डार के लिए तैयार की हुश्री जिन्हों ने इस कार्य के लिये भीजवायी उन पूज्य आगमप्रज्ञआचार्यदेव श्रीमद् विजयजम्बूसूरि म सा. का हृदय पूर्वक उपकार और भाभार मानते है। श्रीरामदेवगणि की ही रची हुश्री विभिन्नप्रकार की टिप्पणि की हस्तलिखित प्रत और सूक्ष्मार्थविचारसार प्रकरणनि की फोटोकोपी के लिए सुविधा करवानेवाले मोजक अमृतलालभाई का एव इन सब प्रत्यादिकी प्राप्ति करवाने में सहाय करने वाले पू मुनिराजश्री जयघोषविजयजी म सा. तथा पू मुनिराजश्री धर्मानन्दविजयजी म सा. का भी हार्दिक उपकार मानते है । 'प्रफ रीडींग' सहायक महेसाणा वाले मास्टर च लि का तथा मुद्रण काय को आत्मीयतातथा तेजी से करने वाले ज्ञानोदय प्रिन्टींग प्रेस - पिंडवाडा के व्यवस्थापक व्यावर निवासी श्रीमान फतहचन्दजी जैन (हालावाले) एव उनके सहयोगी कर्मचारीगण की निष्ठा एव तत्परता के कारण उनकी स्मृति सदा सराहनीय बनी रहेगी। द्रव्य सहायक :- श्री हुकमीच दजी कोल्हापुर वालो ने अपने स्व० पिताजी श्री डु गाजी की पुण्य स्मृति में इस ग्रन्थ के मुद्रण-व्यय मे रु ५०००) की द्रव्य सहाय करके अपूर्व श्रत मक्ति की है। श्री डु गाजी का जन्म विक्रम संवत १९१९ मे राजस्थान-सिरोही जिले के फुगणी गांव मे हुआ था। व्यवसाय का प्रारम्भ महाराष्ट्र मे कोल्हापुर जिले के वडगाव में कपड़े की दुकान से हुआ। आर्थिक स्थिति सामान्य होने पर भी नीतिमत्ता असामान्य थी। क्षमा-परोपकार-सहनशीलतादि सात्त्विक गुणों से जीवन एक सुश्रावक के उचित था। सामायिक प्रति पूजा पच्चक्खानादि नित्य कृत्यों मे तथा श्री सघ के कार्यो मे सदैव अप्रमत्त और उत्साही रहते थे। फलत विक्रम स० १९८० में मुनि भगवतों की निश्रा मे अनशन बी भावना के साथ सर्व-सग का त्यागकर दिवगत हुए। ।
प्रकाशकीय निवेदन [७ हुकमीचंद जी के परिवार मे धर्म सपन्नता आचारशीलता ओर नीतिमत्ता का जो उत्कर्ष है इसका श्रेयः स्व० डु गाजी को ही है। इनका यह दानादि धर्म उत्तरोत्तर वृद्धि को पाता रहे और भाव-धर्म का स्वरूप लेकर मोक्षदायक बने यही शुभेच्छा। निकट भविष्य में और अधिक ग्रन्थों के प्रकाशन की आशा मे । भव शिन समिति य- (1) पिंडवाडा स्टे सिरोहीरोड (राजस्तान) शा. समरथमल रायचन्दजी (मंत्री) (u) १३५/१३७ जौहरी बाजार शा. लालचन्द छगनलालजी (मंत्री) बम्बई-२ भारतीय प्राच्य-तत्त्व ॐ समिति का ट्रस्टी मंडल ® (१) शेठ रमणलाल दलसुखभाई (प्रमुख) खंभात (६) शा. लालचंद छगनलालजी मंत्री पिंडवाड़ा (२) शेठ माणेकलाल चुनीलाल बम्बई (७) शेठ रमणलाल वजेचन्द अहमदाबाद । (३) शेठ जीवतलाल पशी बम्बई (८) शा. हिम्मतमल रुगनाथजी वेडा (४) शा. खूबचन्द अचलदासजी पिडवाडा (९) शेठ जेठालाल चुनीलाल धीवाले बम्बई (५) शा. समरथमल रायचंदजी मंत्री पिंडवाड़ा (१०) शा. इन्द्रमल हीराचन्दजी पिडवाडा अयाज्जलि जिन्होने भवरूपी सागर से मुझे बाहर निकाल कर चारित्ररूप नौका पर चढाया और दीक्षा दिन से लेकर बारह वर्ष तक आपने सानिध्य में रख कर ग्रहणशिक्षा और आसेवनशिक्षा के साथ साथ ही संस्कृत-प्राकृतव्याकरण न्याय दर्शन काव्य कोश छन्द अलङ्कार प्रकरण छेढ. आगमादि विविध विषयक ग्रन्थो के अभ्याम द्वारा अमृतपान करवाया । जिन्होकी सतत मत्प्रेरणा और परम कृपा से ही महागंभीर और अतिभगीरथ ऐसे कर्मसाहित्य के नवनिर्माण में आज तेरह तेरह वर्ष तक लगातार प्रयत्नशील रहा हूं और भी ऐसे नवसर्जनादि अनेक कार्यों में व्यस्त रहने पर भी जिस पुण्यपुरुष की अमीदृष्टि से ही इस ग्रन्थरत्न की सम्पादनता मे भी सफलता पा रहा हूं । उन कर्ममाहित्य के सूत्रधार सिद्धान्तमहोदधि सञ्चारित्रचूडामणि परमशासनप्रभावक सुविशालगच्छाधिपति परमाराध्यपाद स्वर्गीय आचार्यदेवेश- श्रीमद् विजय प्रेमसूरीश्वरजी महाराजा की परमपावनी स्मृति में भवदीय कृपैकाभिलाषी मुनि वीरशेखर विजय पाकृतभाषागाथावटिप्पनक-यन्त्रकादिना-ऽलङ्कृतः प्ततिकाभिधः कर्मग्रन्थः
આ ગ્રન્થમાં દ્રવ્યસહાયક
---
છે
શાહ હુકમચંદજી ગાજી રાઠેડ (કુરાણી)
(કલાપુર)
१ , " 01 " AN " ३ * विषयानुक्रमः * सप्ततिकाभिधानः षष्ठः कर्मग्रन्थः सूत्रकृत्तथा टिपना कृन्मगलादिक्म् मामान्यतो नामोत्तरप्रकृतीना सामान्यतो मूलप्रकृतीना वन्योदयमत्तान्यानसवेध ३२-३७ बन्धोदयसत्तास्थानानि तत्सवेवश्च १-२ चतुर्दशजीवस्थानेषु ज्ञानावरणा-ऽन्तराययो- जीवस्थानेषु रूत्तरप्रकृतीना ३७-३८ गुणस्थानेषु दर्शनावरणोत्तरप्रकृतीना बन्धोदयसत्ता- सामान्यत उत्तरप्रकृतीना स्थानानि तद्भङ्गाश्च ३८ " ज्ञानावरणाऽन्तरायोत्तरप्र० ३-४ ॥ दर्शनावरणो-त्तरप्रकृतीना वेदनीया.ऽऽयु-र्गोत्रकर्मोत्तरप्रकृतीना ३८-३६ ४-५ , गोत्र वेदनीयाऽऽयुरुत्तरप्रकृतीना मोहनीयोत्तरप्रकृतीना ३९-४४ नामोत्तरप्रकृतीना , मोहनीयोत्तरप्रकृतीना गुणस्थानकेषु ज्ञानावरणा-ऽन्तराययोदर्शना- बन्धथानमा बन्धस्थानेषूदयस्थानानि वरणस्य चोत्तरप्रकृतीना उदयस्थानमगा १.१३ वेदनीय गोत्रा-ऽऽयुरुत्तरप्रकृतीना ५६-५७ वन्धस्थानेषु सत्तास्थानानि १४ मोहनीयस्योत्तरप्रकृतीना गुणस्थानानि प्रतीत्य बन्धो- योगानाप्रित्योदयस्थानमगा ६३-६४ दयसत्तास्थानसवेप उपयोगाना १.-१६ }" ॥६५-६६ , नामोत्तर वन्यस्थानानि, तद्भङ्गाश्च १७-२१ लेश्या आभित्योदय , ६६ २२-२३ नामोत्तरप्रकृतिबन्धोदयसत्तास्थानानि ६६-७५ ३' ३२ गतिमार्गणाचतुषके , तद्भङ्गा सवेधश्च ७५-८० १-७१ षष्ठकर्मप्रन्थमूलगाया ११-२७ १-६६ २८-३४ " "६-७-८ 5-8 " ५५-५६ " " ॥ ५७-६२ " " " " - सत्ता १-१० भाज्य n " सार || मा नागरागा || ॐ ह्री श्री अई श्रीगखेश्वरपार्श्वनाथाय नम' ।। न्यायाम्भोनिधिश्रीमद्विजयानन्दसूरीश्वरपाइपद्धेभ्यो नमः ।। सद्धर्मसंरक्षकश्रीमदाचार्यविजयकनलसूरीश्वरपादपद्मभ्यो नमः ।। सकलागमरहस्यवेदिश्रीमदाचार्यविजयदानसूरीश्वरेभ्यो नमः ।। कर्मसाहित्यनिष्णातश्रीमदाचार्यविजयप्रेमसूरीश्वरेभ्यो नमः ।। परमगीतार्थश्रीमदाचार्यविजयहीरसूरीश्वरेभ्यो नमः ।। 'श्रीमचिरन्तनाचार्यप्रणीता VED स ततिका (सित्तरी) "श्रीमद्रामदेवगणिना कृतेन टिप्पनकेन समलङ कृता" सिद्धपएहि महत्थं बन्धोदयसंतपगडिठाणाणं । वोच्छं सुण सखेव निस्सदं दिहिवायरस ॥सू०-१॥ (१) कइ बधतो वेयइ कइ कइ वा पगउिठाणकम्मसा । मूलुत्तरपयडीसु भगविगप्पा बोद्धव्वा ॥सू०-२॥ (२) सुगइगमसरलसरणि, वीरं नमिऊण मोहतमतरणि । सत्तरिएटिप्पेमी, किंची चुन्नीउ अणुसरिउ' ॥१॥ (३) [१] संखेवा भंगाण, सुमरणहेउ तह पगडिठाणाणं । पत्तेयं पगडीणं, नामग्गाह च काहामि ॥२॥ आउसमं अट्ट भवे, आउविहूणा य सत्त बंधम्मि । मोहणियाऽऽउविणा छ उ, एगो वेयणियवंधो उ ॥३॥ (५) [३] अठुइओ बहुयाणं, मोहं मोत्तूण केसि सत्तुदओ । घाइविहूणा चउरो, तह सत्ताए वि तियठाणा ॥४॥ (६) [४] ४. (४) [२] १ अज्ञातनामाचार्यचिता इत्यर्थ , न पुनश्चिरन्तनाभिधाचार्यविहिता इति । २ ( ) एतस्वितान्त- गतगाथाक्रम ससूत्रक L D (लालभाइ दलपतभाइ विद्यामदिर) प्रत्यनुसारी । सूत्ररहितगाथाक्रम पुन J (जेसलमेर) प्रतिप्रेसकोप्यपेक्ष । ३। ] एतचिह्नान्तर्गनगाथाक्रम ससूत्रक J प्रतिप्रेसकोप्य- धिन । ४ "सखेवेण त्यपि।
२] २ सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे [५] सामन्ना १ जीव २ गुणा ३, पत्तेयं मूलपयडिविसओ उ । नियनियभंगेहि समं, सुत्तऽणुसाराउ तं च इमं ॥५॥ (७) मूलप्रकृतौ सत्तास्थानानि- अट्ठचिह-सत्त-छब्बंधएसु अटेव उदय' सताई । एगविहे तिविगप्पो, एगविगप्पो अबंधम्मि ॥सू०-३।। (८) पढमद्ध कंठ। सत्तऽ १ सत्त सत्त य २, चउरो चउरो य ३ उदयसंतंसा । एगविहबंधगे इह, तह य अवंधम्मि चउ चउरो ॥६॥ (९) [६] [७] सामन्न ठवणा- वन्धो ८ ६ उदओ ८८ ४ सत्ता ४ जीवस्थानेषु मूलप्रकृतीनां बन्धोदयसत्तास्थानानि- सत्तऽबंध अठ्ठदयसत तेरस जीवठाणे एगम्मि पच भगा दो भंगा होंति केवलिणो ॥सू०-४॥ (१०) [८] पढम कटं । 'एगम्मि' सन्निट्ठाणे । अडसत्तछेगवंधा, उदए संते य पढमतिसु अह एगम्मि सत्त अह य, तह सत्त य सत्त उदयंसा ॥७॥ (११) सम्णिस्स ठवणा- [९] बन्धो ८ ६ १ १ उदओ ८ ७ सत्ता 5 G ७ तेरसु जीवठाणेसु ठवणा- ७-८७-८ ए 1 उ० ८ ८ ८ r r स० ८ 5 ८ जीव-सू सू वे प. अस अस अप प बा त्रिनि० च प अप प अप प० अ १ "सतंसा" इति वा पाठ । २ "हुति" इत्यपि । स अप ढाणा' अप प अप जीवस्थान-गुणस्थानेषु मूलकर्मणां तथौघतो ज्ञानावरणोत्तरप्रकृतीना बन्धोदयसत्तास्थानानि [३ केवलिठवणा- बन्धो उदओ सत्ता ४ ४ गुणस्थानकेपु मूलप्रकृतीनां बन्धोदयसत्तास्थानानि- अ एगविगप्पो, छस्सु 'उ गुणसन्निएस दुविगप्पो। पत्तेय पत्तेय, घघोदय-सतकम्माणं ॥सू०-५।। (१२) [१०] मिस्सअपुब्बा वायर, सगवंधा छच्च वंधए सुहमो । उपसंताई ३ एगं, अवधगोऽजोगि एगेगं ॥८॥ (१३) [११] मिच्छासामणअविरय-देसपमत्तअपमत्तया चेव सत्तऽढबंधगा इह, उदया संता य पुण एए ॥६॥ (१४) [१२] जा सुहुमो ता अट्ठ उ, उदए संते य होति पयडीओ । सत्तऽड उवसंते खीणि सत्त चत्तारि सेसेसु ॥१०॥ (१५) [१३] ठवणा- गुणठाणाणि मिच्छ| सा० | मि० अवि० देप० | पम० अपम अपू० | अणि सु० उव० खीण सजो अजो बधो ८७/८७८७ ६ १ १ उदओ ८ ८८1८1८८८८८ ८ ७ ४ सत्ता ८८८८८ ८ ४ २ २ २ १ १ १ OM १ मूलपयडीसु भणिया बन्धोदयसंतठाणसविगप्पा उत्तरपयडीसु तहा ते च्चिय पयडेमि पत्तेयं ॥ (१६) उत्तरप्रकृतिपु बन्योदयसत्तास्थानानि- बंधोदयसंतंसा, नाणावरणंतराइए बधोवरमे वि तहा, 'उदयसा होति पंचेव ।।मू०-६॥ (१७) [१४] पंच । १ "वि"इत्यपि । २ "वादर" अनिवृत्ति । ३ उपशान्त कषायक्षीणकषायसयोगिकेवलिन । ४ सत्त- ऽळुयसते” इति L_D. प्रतौ । ५ 'उदसता हुति" इति ।
४] सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थे नाणावरणं महसुयरओहि३मणोनाण४केवलावरणा ५ । विग्धं दाणे १लामे २, भोगु३वभोगे४ य विरिए य ५ ।।११।। (१८) [१५] सामन्नेण गुणट्ठाणगेसु य वधाइवोच्छेदमाह- नाणंतरायवंधो, सुहुमे संतुदय 'खीणचरिमम्मि वोच्छिन्ना य कमेणं, दो दो भंगा उ दोहं पि ।।१२॥ (१६) [१६] , ठवणा- नाणावरण अतगय० बधो ५ ० उदओ ५ ५ सत्ता ५ ५ ५ ५ दर्शनावरणस्योत्तरप्रकृतीना बन्धोदयसत्तास्थानानि- घंधस्स य संतस्स य, पगइहाणाणि तिन्नि तुल्लाई । उदयहाणा: दुचे, चउ पणगं दसणावरणे ||सू०-७।। (२०) [१७] नयणेयरोहि-केवल-दसणआवरणयं भवे चउहा निद्दा-पयलाहि छहा, निदाइ दुरुत्त थीणद्धी ॥१३॥ (२१) [१८] दसणावरण सामण्णे ठवणा- - बधो है ६ उदओ ४ सत्ता ६ ६ १ एतत्प्रतिपादन सप्ततिकाचूर्णि-टीकाभ्या सम (न) विरुध्यते, तद्यथा- 'दो होति दोसु ठाणेसु'त्ति उदासताणि दोणि, एयाणि उवसतखीणकसायेसु दोसु भवति, सुहुमरागचरिमसमए बधो वोच्छिण्णो, छ उमत्थत्ताओ उदयसता अस्थि । ते य खीणकसायचरिमसमए दोवि खिज्जति ।” (मप्ततिकाचूर्णिपत्र ३५ पृष्ठि २) । तथा द्वयो पुनर्गुणस्थानकयो उपशान्तमोह-क्षीणमोहरूपयो 'वे उदयसत्तेस्त न बन्ध , वन्धस्य सूक्ष्मसम्पराये व्यवच्छिन्नत्वात् । एतदुक्त मवति बन्धाभ वे उपशासमोहे क्षीणमोहे च ज्ञानावर गीयाऽन्तराययो प्रत्येक पञ्चविध उदय पञ्चविधा च सत्ता भवतीति परत उदय सत्तयोरप्यभाव । (कर्म ग्रन्थद्वितीयविभाग. पृ० २०७) २ आदिशब्दात् प्रचला ज्ञातव्या ।
दर्शनावरण गोत्र वेदनीयाऽऽयुष्ककर्मणामुत्तर प्रकृतीना बन्धोदयसत्तास्थानानि [५ नव छच्चउहा चथे, तह 'संता पंच चउर उढयम्मि । सामण्णमिणं बीए, भंगा पुण होति एस्कारा ॥१४॥ (२०) [१६] बीयावरणे नत्र बंधएसुपर पंच उदय नव संता । छ च्चउबंधे चेव, चउ बधुदए छलसा य सू०-८।। (-३) [२०] उवरयबंधे चउ पण, नवंस चउरुदय च चउ सता। वेणिया-ऽऽउय-गोए,विभन्न मोह परं वोच्छं । ०-६ । (४) [२१] नव छ च्चउ बेहबंधे, उदए चउ पंच संत नव छसु वि । चउबंधुदए "संता, 'छच्चेव य होंति खवगरस ॥१५॥ (२५) [२२] धंधोवरमे चउ पंच उदय नव संत होति उवमंते । खीणे उदयवउक्कम्मि छ च्च चत्तारि संताओ १६॥ (२६) [२३] ठवणा- बधो ह c ६ ६ 20 ० . C उदओ ५ ५ ४ ४ १४ ४ सत्ता ६ है ६ ६ है ६ & ६ ६ ४ 'वेदणीयाउयगोए विभज्ज मोह पर वोन्छ । वेदनीया ऽऽयुगोत्र,णामुत्तरप्रकृतीना वधोदयसत्तास्थानसवेधभङ्गा- 'गोयम्मि सत्त भगा, अद्वय भगा भवति वेयणिए। पण नव नव पण भगा, आउचउक्के विकमसोज।मु०-०। (२७) [२४] नीयं बंधं नीयस्स उदय नीयस्त चेव संताओ । अनिलाऽनलजीवाणं इयरेसु अणंतरुव्वदृ ॥१७॥ [२५] अनला-ऽनिलजीवाणं एगो इय एसु केसिं चि ॥ (२८) उद्वालियउच्चागोए तेउवाऊण णीयमिह संत इयरेसु च उबट्टे पज्जती जा न पूरेइ ॥ (२६) १-५-७ "सत्ता" इति L D प्रतौ। २ 'सामन्न" इति L D प्रतौ । ३ "हुति" इति L D प्रतौ। ४ अत्र प्राचीनकर्मस्तवकारादिभित्रयोदशमङ्गा प्रतिपाद्यन्ते । यतस्ते क्षपकाणामपि निद्राद्विकोदय स्त्रीक्रियते । दृश्यता प्राचीनकर्मस्तवे यस्त्रिंशत्तमगाथापूर्वार्धं तट्टीमा च ६क्षपकाणा स्त्यानद्धित्रिक- श्रयानन्तर षड्विधा सत्ता बोद्धव्या । ८ अय गट J० प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । L D प्रती चास्ति । ६ "केनाऽपि विदुषा सप्ततिकामूलप्रकरणेऽनुसन्धानार्थ प्रक्षिप्तमिद गाथासूत्रम् , न तु मूलप्रकरणन्येद- मिति । एवमप्रेऽपि ज्ञेयम् । - ४] ४ सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थे नाणावरणं महसुयरओहि३मणोनाण४केवलावरणा ५ । विग्धं दाणे १लामे २, भोगु३वभोगेष्ट य विरिए य ५ ।।११॥ (१८) [१५] सामन्नेण गुणट्ठाणगेसु य बधाइयोच्छेदमाह- नाणंतरायवंधो, सुहुमे संतुदय 'खीणचरिमम्मि चोच्छिन्ना य कमेणं, दो दो भंगा उ दोण्हं पि ।।१२।। (१६) [१६] णावर बधो - उवणा- নাবান্না अतराय० ५ ० उदओ ५ ५ ५ सत्ता ५ ५ ५ दर्शनावरणत्योत्तरप्रकृतीना वन्धोदयसत्तास्थानानि- बंधस्स य संतस्स य, पगइहाणाणि तिन्नि तुल्लाई । उदयहाणा: दुचे, चउ पणगं दसणावरणे ।।सू०-७॥ (२०) [१७] नयणेयरोहि-केवल-दसणआवरणयं भवे चउहा । निद्दा-पयलाहि छहा, निदाइ दुरुत्त थीणद्धी ॥१३॥ (२१) [१८] दसणावरण सामण्णे ठवणा- बधो ६ ४ उदओ ४ सत्ता ६ ६ ४ १ एतत्प्रतिपादन सप्ततिकाचूर्णि-टीकाभ्या सम (न) विरुध्यते, तद्यथा- 'दो होंति दोसु ठाणेसु' त्ति उदयसताणि दोण्णि, एयाणि उवसतखीणकसायेसु दोसु मवति, सुहुमरागचरिमममए वधो वोच्छिण्णो, छ उमत्थत्ताओ उदयसता अत्थि । ते य खीणकसायचरिमसमए दोवि खिज्जति ।” (मप्ततिकाचूर्णिपत्र ३५ पृष्ठि २) । तथा द्वयो पुनर्गुणस्थानकयो उपशान्तमोह-क्षीणमोहरूपयो 'वे' उदयसत्तेस्त न वन्ध , वन्यस्य सूक्ष्मसम्पराये व्यवच्छिन्नत्वात् । एतदुक्त मवति बन्धाम वे उपशान्समोहे क्षीणमोहे च ज्ञान वर- णीयाऽन्तराययो प्रत्येक पञ्चविध उदय पञ्चविधा च सत्ता मवतीति परत उदय सत्तयोरप्यभाव । (कर्म ग्रन्थद्वितीयविभागः पृ० २०७) २ आदिशब्दात् प्रचला ज्ञातव्या ।
[५ दर्शनावरण गोत्र वेदनीयाऽऽयुष्ककर्मणामुत्तर प्रकृतीना वन्धोदयसत्तास्थानानि नव छच्चउहा वधे, तह 'संता पंच चउर उदयम्मि । 'सामण्णमिणं वीए, भंगा पुण होति 'एक्कारा ।।१४।। (२२) (२२) [१] बीयावरणे नव बंधएसु चउ पंच उदय नव संता । छ च्चउबंधे चेव, चउबंधुदए छलसा य सू०-८॥ (-३) (-३) [२०] उवरयबंधे चउ पण, नवंस चारुदय उच्च चउ सता । वेयणिया-ऽऽउय-गोए,विभन्ज मोह परं वोच्छं ।।०-६। (४) [२१] नव छ च्चउ बेहबंधे, उदए चउ पंच संत नव छसु वि । चउचंधुदए "संता, 'छच्चेव य होति खवगरस ॥१५।। (२५) [२२] बंधोवरमे चउ पंच उदय नव संत होति उपसंते । खीणे उदयचउक्कम्मि छ च्च चत्तारि संताओ ।१६।। (२६) [२३] बधो | • • उदओ ४ । सत्ता ६ ठवणा- ६ ६ ६ ६ ४ ४ ४ ५ ४ ५ | ४ ४ & है है 8 cal ६ ६ ४ "वेदणीयाउयगोए विभज्ज मोह पर वोच्छ । वेदनीया.ऽऽयुर्गोत्राणामुत्तरप्रकृतीना वधोदयसत्तास्थानसवेधभगा- 'गोयम्मि सत्त भगा, अ य भगा भवति वेयणिए । पण नव नव पण भगा, आउचउक्के विकमसोडासू०-०) (२७) [२४] नीयं बंधं नीयस्स उदय नीयस्त चेव संताओ अनिलाऽनलजीवाणं इयरेसु अणंतरुव्वट्ट ॥१७॥ [२५]] अनला-ऽनिलजीवाणं एगो इय एसु केसि चि ॥ (२८) उद्वालियउच्चागोए तेउवाऊण णीयमिह संतं इयरेसु च उबट्टे पज्जत्ती जा न पूरेइ ॥ () १-५-७ "सत्ता” इति L D प्रतौ । २ 'सामन्न" इति I D प्रतौ ।३ “हुति" इति L D प्रतौ। ४ अन्न प्राचीनकर्मस्तवकारादिभित्रयोदशभङ्गा प्रतिपाद्यन्ते । यतस्ते क्षपकाणामपि निद्राद्विकोदय स्वीक्रियते । दृश्यता प्राचीनकर्मस्तवे त्रयस्त्रिंशत्तमगाथापूर्वाधं तट्टीका च ६ क्षयकाणा स्त्यानद्धित्रिक वयानन्तर षड्विधा सत्ता बोद्धव्या । ८ अयं णठ J० प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । L D प्रतौ चास्ति । E "केनाऽपि विदुषा सप्ततिकामूलप्रकरणेऽर्थानुसन्धानार्थं प्रक्षिप्तमिद गाथासूत्रम् , न तु मूलप्रकरणम्येद- मिति । एवमग्रेऽपि ज्ञेयम् । ।
सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे नीउच्चं बंधुदए, विगप्प बंधोवरमे उच्चस्स उदय चत्तारि दोहि संतेहिं । दो-एक्कसंताओ ॥१८॥ (३०) [२६] ठवणा- घधो नीय नीय नीय उच्च उच्च सन्ता २ उदओ नीय नीय उच्च नीयं उच्च उच्च उच्च नीय २२ २ २ उच्च सायाऽसाये दोसु', 'चउभंगा बंध-उदइ दु दु संता । बंधोवरमे चउरो, संता दुसु दोन्नि दुसु एगं ॥१६॥ (३१) [२७] ठवणा- बधो असा-असा- साय साय . उदओ असा असा- असा. असा- साय साय साय साय य सन्ता २ २ २ २ २ १ एगो अ बंधपुव्वे, बंधे बंधुत्तरे य चउ चउरो । नरतिरियाणं आउयचउक्कबंधुदय-संतेहिं ॥२०॥ (३०) [२८] सुर-नरयाणं पण पण, बंधे बंधुत्तरे य दो दुन्नि । जम्हा न तेसिँ बंधो, सुर-निरयाऊण संभवड ।।२१।। (३३) [२९] ठवणा- देवाण भगा मणुयाण भगा तिरियाण भगा नेरइयाण भगा ति नि ८ . . . ० दे. म ति.नि. . बध. ० म ति ति ० . ० देन . ०मति. ० उद दे दे ममम मममम मम ति ति ति तिति ति तिति ति निनिनि नि नि सत्ता १२२२ २५.२२२२/२/२१२/२१ २२२२/२/२/२२/१२२२२ lale मोहनीयस्योत्तरप्रकृतीना वन्वस्थानानि दश- बावीस एक्कवोसा, सत्तरसा तेरसेव नव पच । चउत्तिगद्ग च एक्क, बध हाणाणि मोहस्स।सू०-१०॥ (३४) [३०] १"चउभगो" इति J० प्रतिप्रेसकोप्य म् । २ हाणाइ" इति L D प्रतौ।
[७ ओघतो गोत्र वेदनीया-ऽऽयुर्मोहनीयोत्तरप्रकृतीनां वन्धोदयसत्तास्थानानि - मिच्छं कसायसोलम, भय कुच्छा तिण्ह वेयमन्नयरं । हास-रइ इयरजुयलं च बंधपयडी य बावीसं ॥२२॥ (३५) [३१] इगवीसा 'मिच्छविणा, नपुवंधविणा उ सासणे बंधे । अणरहिया सत्तरस न वंधि थिई "तुरिअठाणम्मि ।।२३।। (३६) [३२] बियसंपरायऊणा, तेरस तह तइयऊण नव बंधे । भय-कुच्छ-जुगलचाए, पण चंधे बायरे ठाणे ॥२४॥ (३७) [३३] तह पुरिस-कोह-ऽहंकार- माय-लोभस्स बंधवोच्छेए चउ-ति-दुग-एगवंधे, कमेण मोहस्स दम ठाणा ॥२॥ (३८) [३४] ठवणा-२२, २१, १७, १३, ९, ५, ४, ३, २, १॥एवं बधे १०॥ मोहनीयस्योत्तरप्रकृतीनामुदयस्थानानि नव- एगं च दो य चउरो, एत्तो एगाहिया दसुक्कोसा । ओहेण मोहणिज्जे, उदयट्ठाणाणि नव'होति ॥०-११।। (२८) [३५] एगयरसंपरायं, वेयजुयं "दोणि जुयलजुयचउरो । पच्चरखाणेगयरे, छूढ़े पंचेव पयडीओ ॥२६॥ (४०) [३६] छ विडय ४ एगयरेणं, छूढ़े सत्त य दुगुछि भय अह । अणि नव मिच्छे दसगं, सामन्नेणं तु नव उदया ॥२७॥ (४१) [३७]- ठवणा-१, २, ४, ५ ६ ७, ८, १०। मोहनीयस्योत्तरप्रकृतीना सत्तास्थानानि पञ्चदश- अट्टग-सत्तग-छ-उचउ-तिग दुगएगाहिया भवे वोसा। तेरस''पारेक्कारस. एत्तो पंचाइएकूणा ।।सू०-१२॥ (४२) [३८] - १ "मिच्छृणा" इति L D प्रती । “मिच्छोणा" इति वा पाठ ।२ अत्र पु-स्त्रीवेदयोरन्यतरस्य बन्ध प्रक्षिप्यते । ३ "सत्तरस न बधि थिइ" इति L D प्रतौ । अत्र केवल पु वेदो बध्यते । ४ उप- लक्षणात्तृतीयगुणस्थानके ऽपि । ५ "माया०" इति वा । ६ “हुति" इत्यपि । ७ वेदत्रिकादन्यतरवेदयुतम् ।। ८ "दस” इति तु J० प्रतिप्रेसकोप्याम् । तेनोदयपदेन नवापेक्षयोदयस्थानानि, दशापेक्षया तूदयप्रकृ. तय इति सम्माव्यते । अत्राचार्यश्रीमलयगिरिपादा सप्ततिकाटीकायामित्थं क्रमभेदेन व्याख्यानयन्ति "तत्र तत्र चतुर्णा सज्वलनानामन्यतमस्योदये एकमुदयस्थानम् । तदेव वेदत्रयान्यतमवेदोदयप्रक्षेपे द्विकम् , तत्रापि हास्यरतिरूपयुगलप्रक्षेपे चतुष्कम् , तत्रैव मयप्रक्षेपात् पञ्चकम् , जुगुप्साप्रक्षेपात् षट्कम् , तत्रैव चतुर्णा प्रत्याख्यानावरणकषायाणामन्यतमत्त्य प्रक्षेपे सप्तकम् , तत्रैव चाऽप्रत्याख्यानावरणकषाया- पामन्यतमस्य प्रक्षेपेऽष्टकम् , तत्रैव चतुर्णाभनन्तानुवन्धिकषायाणामन्यतमस्य प्रक्षेपे नवकम् , तत्रैव मिध्यात्वप्रक्षेपे दशकम् ॥” ( कर्मग्रन्थ द्वितीयविमागपत्र १६२) १० 'अट्टयसत्तय" इति । ११ “वारि- कारम" इति L. D प्रती।
सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे (४६) [४२] पविठाणाणि ताणि मोहस्स 'होति पन्नरस । षधोदयसते पुण, भगविगप्पे बहू जाण ॥०-१३॥ (४३) [३९] नव नोकसाय सोलस, कमाय दंसणतिगं ति अडवीसा । मम्मत्तुब्बलणेणं, मिच्छे मीसे य सगवीसा ॥२८॥ (४४) [४०] छब्बीसा पुण दुविहा, मीसुव्वलणे अणाइमिच्छत्ते । सम्म दिवऽडवीसा, अण ४ क्खए होड चउचीमा । २६॥ (४५) [४१] मिच्छे मीये सम्मे ३, खीणे ति-दुवीस एकवीसा य । अट्ठकसाए तेरस, नपुक्खर होइ बारसगं ॥३०॥ थीवेयि खीणिगारस, हासाई ६ पंच चउ पुरिसखीणे । कोहे माणे माया, लोभे खीणे य कमसो उ ॥३१॥ (४७) [४३] "तिग दुग एग अमंतं, मोहे पन्नरस संतठाणाणि । बंधोत्यसंवेहे भंगविगप्पे बहू ॥३२॥ ठवणा-२८, २७ २६, २४ २३, २२ २१ १३, १२, ११, ५,४३२,११ 'वधंसुदए पडुच्चा, जवि पुणो मोहविवरणं वुत्तं । तह वि य सुहगुणणत्थं सुहसुमरणहे एगत्थ ।।३३।। (४६) [४५] मोहनीयस्य बन्धथानाना मङ्गः - छवावीसे चउ इगवीसे सत्तरसतेरसे दो दो । नवबधए 'उदोन्नि उ, एक्के "मओ परं भगा।सू.-१४॥ (५०) [४६] वेयजुयलेहि चरिया, भंगा छच्चेव चउर नपुऊणा । जुयलेहि चउसु दो दो, सेसा एक्केवक संभविया ॥३४|| (५१) [४७] जाण {४८) [४] १ २ ३ ४ ६ ८ ६ अनिवृत्ति गुण- ठाणाणि ठवणा- मि सा मिल अवि (देश प्र. अप अपू० अपू०१२ अपू०१२३४५ बधट्ठाणाणि २. २१ है है भगा ६ २ २ २ २ or १ १ ११११ . १ ' हुन्ति' इति । २ ०"द्दिविडवी 'इति प्रतौ ३ "थीवेयखीणिगान्स" इत्यपि। ४ "तिगद्गएग- असत" इति वा, 'तिग दुग य सत" इति L D प्रतौ ! ५ "बंधसगुण पडु" इति प्रतौ । "वधुदयगुण" इति D प्रती। 'वि दुणि s" इति । ७ "मकारस्थलाक्षणिक” इति सप्तनिकाटीकायाम् ।
मोहनीयस्य सत्तास्थानानि, बन्धस्था भगा , बन्घस्थानेषूदयस्य नानि, उदयम्थानभङ्गाश्च । ॥ -- मिच्छाइ पमत्तंता जुयलगया वेयभंग उट्ठति । बुच्छिन्न अरडसोगा पमत्ति उवरिं तु एगेगा (५२) 'एर गुणापगेसु बधभगा ॥२५ । इयाणि उदयठाणाग उदयपगविवरणमाह- मोहनीयस्य बन्यस्थानेदयस्थानानि- दस घावीसे नव इगीसे सत्ताइ उदयठाणाणि । छाई नव सत्तरसे तेरे पचाइ अट्टेव सूत्र३-१५॥ (५३) [४८] चत्तारि आइ नवषधएसु उक्कोस सत्त उदयसा । पचविहषधए पुण, उदओ दोण्हं मुणेयव्यो।सूत्रम्-१६॥ (५४) [४६] एत्तो चउबंधाई, एककुदया हवंति सम्वे वि । पधोवरमे वि तहा,उदयाभावे विवाहोज्जा सू०-१७|| (५५) [५०] ठवणा- चध २२ २१ १७ १३ ६ ५४/३/२ उदय ७९८६ १०७८६६/७८६५६७८९४५६७३/११/१ (१,१ मिच्छ-तिकसाय वेयं, जुयलन्नयरेण २ सत्तगं तत्थ । वेयतिग-चउकसाए, जुयलन्नयरेण चउवीसा ।।३५।। (५६) [१] वेएसु चउकसाया, कोहाइकमेण उदयओ होति । एकेक्कम्मि चउचउरो, तिग-चउगुणिया उ चारसगं ॥३६॥ (५७) [५२] ते हास-रईउदए, अरई-सोगपरियत्तउदए वा दो मिलिया चउवीसं, उदयगया मोहणीयस्स ||३७} (५८) [५३] एव सव्वत्थ चउवीसिया चारणा । सत्तोदयम्मि एगा, अण-भय-कुच्छाण एगयरखेवे । अठ्ठदओ तिन्नि तहिं, दुगसंजोगम्मि तह नवए १३८॥ (५६) [५४] तिगपक्खेव दसेगा, चउसु वि उदएसु अट्ट चउचीमा (मिच्छे)। सासणमीसे तिगतिण भयकुच्छदुगेहि चउचउरो ॥३९॥ तिगपक्खेव दसेगा चउसु वि उदएसु अट्टचउचीसा । मिच्छम्मि गुणहाणे सेसगुणाणं च एम कमो ॥ (६०) तिगतिग उदयहाणा सासणमिस्से य सत्तअडनवगं । १ अय पाठ J प्रतिप्रेसनो या नास्ति, L D प्रतौ चास्ति । २ "उदयकम्मसा" इति ।। ३ "उद- यविगया य मोहस्स ॥५॥” इति L D प्रतौ ।
१० ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे छलउदयम्मी एगद्गएगकमसो चउरो चउरो पत्ते ॥ (६१) एगा भय-कुच्छा-सम्मखेवएगयरे । सत्तोदयम्मि तिनि उ, दुग-तिगपक्खेव मिच्छसमा ॥४०॥ (६२) [५६] पत्तेय अट्ट अट्ट उ अविरय-देसे पमत्त-अपमत्ते अप्पुव्वे पुण चउरो, सव्वे बावन्नमिच्छाई ॥४१॥ (६३) [५७] चोयगो आह- . - अणउदयरहियमिच्छो कम्मि जिए कित्तियं च से कालं । ह-तदुवलगसम्मदिद्विस्स मिच्छुदयआवलियकालं ॥४२॥ (६४) [५८] चउवीससंतकम्मी, मिर गओ अणंतिणो बंधे मुत्तु अबाहाकालं तदु उवरि निक्खिवे दलियं ॥४३॥ (६५) [५६] कहणंतबंधिउदओ आवलियाउपरि वुच्चए एवं । सव्वं पडिग्गहंते अन्नकसायाण मणे ॥४४॥ (६६) [६०] जं पढमसमयदलियं, संकेतं तं च आवलियउवरि । उदयंसे आगच्छइ, तम्मी से अट्ठ उदओ उ ||४|| (६७) [६१] अन्नं च तम्मि समए, उदीरणोवट्टणागयं दलियं उदयम्मि खिवइ जीवो, अणंतिणो तेण आवलिआ ॥४६॥ (६८) [६२] तं चेव सत्तगं भय-दुगुच्छ-अणसहिय अढनवदसगं । इत्थं चउवीसा होति तिन्नि तन्नेग जहसंखं ॥४७॥ चउवीसा पुव्वकमा कमेण उदएण जहसंखं (६१) पुन्चुत्तसत्तगा मिच्छफेडणे खेवणे यऽणंताणं सत्त य सासाणे तह-ऽड नव य भयकुच्छपक्खेवे ॥४८॥ (७०) [६४] वेयतिकसायमीसं, जुयलन्नयरेण सत्त मीसम्मि । भयकुच्छाणन्नयरे, एगदुगेणं च अट्ट नव ॥४९॥ (७१) [६५] तिगसंपराय ३ वेयं १ जुयलनयरेण छच पयडीओ । भयकुच्छसम्मखेचे अविरयसत्तऽट्ट नव 'होति ॥५०॥ (७२) [६६] 'अजउदयठाणचउरो (व) देसविरए य सब्यविरए य । नवरं कसायहाणी एक्केक्कं जाण जहरखं ॥५१॥ (७३) [६७] %D १"हुति" इति L. D प्रतौ २ "अजउदयट्ठाणा तह चउरो देसे य" इति L D प्रतौ ।
[ ११ मोहनीयस्योदयस्थानमगा इगसंपरायवेयं जुयलन्नयरेण चउरउदओ उ । अप्पुब्वे भयकुच्छा एगदुगेणं च पण छकं ॥५२॥ (७४) [६८] इगवेयइगकसाए उदओ 'दोण्हं तु बायरकसाए । एक्कुदयवेयखीणे वायरसुहुमाण 'दोण्हं पि ॥५३॥ (७५) [६९] "उदया इचाइ पए भणिया उवसंति तिन्नि संताओ । अडचउवीसउवसमे इगवीसं खंडसेढीए ||५४|| (७६) [७०] बावन्नं ५२ चउवीसा गुणठाण पडुच्च इत्थ उडविया । बंधुदए पुण चत्ता ४० सामन्न पडुच्च उठेंते ॥ (७) मोहनीयस्योदयस्थानाना भगा एकगछक्केकारस दस चउक चेव एए चउवीसगया धारदुगिकम्मि एक्कारा ॥सू०-१८॥ (८१) [७१] एईए विवरण जतगाहाओ- एगो "दसोदओ नवुदयचउर तह अड पंच सग छक्कं । छत्तिग पण दुग चउ एग हुन्ति उदएसु ठाणाई ।।५५॥ (८२) [७२] दसगम्मि एग तिग पढमनवगि सेसेसु नवसु ३ एगेगं । पढमे अट्ठगि तिन्नि उ दुग दुग तिग एग वउवीसा ॥५६॥ (८३) [७३] तिसु सत्तगेसु एगेग तिन्नी तिन्नि उ छहए एगा । *सव्वुदए चउवीसा, तह एग तिगं तिगं छदुगे ||५७।। (८४) [७४] पणउदइ एग १ वीयम्मि, तिन्नि चउरोदयम्मि एगाउ । चार दुगोदयभंगा एक्कोदय ॥५८|| (८५) [७५] गुणठाणा मि मि सा मी अवि मि.सा मी.अवि दे. मि.सा मी अचि दे होति एक्कारा चणाः उदयठाणा २०१६ 8 ८७७ ७ चउवीसिया १ ३ १ १ ३ ३ ३ or १-२ "दुन्ह" इति L D प्रतौ । अय पाठ J. प्रतिप्रेसकोप्यामस्ति, ३ "उदयाभावे वि वाहि- जिते-'इइ सुत्ताओ मणिया उवसते तिन्नि चेव सताओ" इति L D प्रतौ। ४ "दसोदउ नवोदय" इति वा । ५ "सव्वुदए छतिगे ॥ इति । प्रतिप्रेसकोप्याम् । “सत्तुदए" इत्यपि वा L D. प्रतौ माति । तथा J प्रतावपि स्यात् ।
१२] सप्ततिका मधे पष्ठे कर्मग्रन्थे अवि दे स दे स स. दुगोदए भगा १२ |६/६ ५५४एक्कोदर भगा ११ ૨ ૨ ૨ ૨ ૨ w ३३ १३.२ एव चवीसा ४०+भगा २३ । इय मोहरायसेन्ने चालीसकुडंब ४०वग्ग किल भिचा । वग्गे वग्गे य तहा चउचीसकुड्डविया अत्थि ॥५९॥ (७८) [७६]] तेहि य जगडिज्जतं सव्वजगं कलकलेड अणवत्यं 'मोत्तुमपमत्तसिद्धा इय एवं मोहिया जीवा ॥६०॥ (७६) [७७] उदयपया य कुडुवी माणुससंखा य इत्थ किल विदा । सूरा य पयइभेया इयरि अमखा मुणेयव्या ॥६१॥ (८०) [७८] गुणठाणा मिच्छ सासण. | मिस्स० अविरय० देस० वधठाणा २२ २१ १७ १७ १३ १ उदयठाणा १० EEN 8 ६७८ है ५ ६७ चवीसिया प ३ १ १ १ १३३ १ १ ३ चउवीसियनरखा ४ ४ प्रमत्त अपमत्त० अपुव्व० अनिवृत्तिः सू उप० ६ 8 ६ ५४/३/२/१ . . ४ om or ० १/३/३/१ १/२ २ १२/४/३/२१ १ ४ उदयपए पयबिंदसखामाह- १ "मुत्तु अ०'' इति L D. प्रतौ । २ "उदयपयपयकुडु वी" इति L D प्रतौ । ३L D प्रतावय पाठ , J. प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । " मोहनीयस्योदयस्थानमगा [ १३ नवतेसीयसएहि उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा । उणहत्तरिसीयाला पयविंदसएहिं विन्नेया।।सू०-१६॥ (८६) [७६] चत्ता चउवीसाणं चउवीसगुणा य 'होति नवसठ्ठा । तेवीसभंग मिलिया तेसीया नवसया होति ॥६२॥ (८७) [८०] वेयतियचउकसाए अन्नयरुदएण भंगवारसगं पणबंधे दुगउदओ चउबंधाई उ एककुदया ॥६३॥ (८८) [८१] चउबंधे चउभंगा तिगभंगाईण भंगया छक्कं । उवरयवंधे एगो एक्कुदएक्कारभंगाओ 11६४॥ [२] जे बधड ते वेयइ वंधे य पडुच्च इय दसगं ॥ ८६) पयाणं सखा वुत्ता । इयाणिं पयविंदाण सखा कहिज्जइ- उचरयवंधे एगो तुरियकसायस्स सुहुमकिटुदए । संखा विवक्खिया उह एक्कुदएकारभंगाओ ॥ (९०) जत्थुदए चउवीसा जत्तियसंखा स एव गुणकारो । चउराइदसंतुदया गुणिनियचउवीससंखाए [८३] दस१०चउपन्न५४ट्टासीमसत्तरि७०वायाल४२वीस २०चउ४संखा । दुगउदयम्मी एगा एक्कुदइकारभंगाओ ॥६६॥ (९२) [८४] चउवीनगुणा काउं पत्तेयं तेसि होइ इय संखा । चालीसा दोन्नि सया२४०बारस छन्नउय १२६६ तह अन्ने ॥६७।।६३) [८५] वारहिया इगवीसं२११२सोलस आसी य१६८० सहस अट्टहिया १००८ चउअसिया ४८०छन्नवई९६चउवी सि२४क्कार११भंगा ॥६॥ (६४) [६] एव सव्वविसुद्धेण ६६४७ । "उणहत्तरि छत्तीसा, एकारसभंग मिलिय सीयाला । अन्ने उ चउरवंधे दुगोदयं विति किल किचि ॥६६॥ (६५) (६५) [८७] नवपंचाणुसएहि उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा । अउणत्तरि एगुत्तरि पयविंदसएहि विन्नेया।।सूत्रम्-२०॥ (६६) [८] पुवेयवंधवोच्छेय आवली एक्क दोण्ह उदओ उ । ॥६५॥ (६१) - १-२ 'हुति" इति L D प्रतौ । ३ "दुन्नि" इति L D प्रतौ । ४"दस य अढहिया १००८ । इति J प्रतिप्रेसकोप्याम् । ५ 'उणहत्तरि सीयाला पयविंदाण तु हुन्ति मोहस्स" इति L D प्रतौ । ६ "नवपचाणउयसपहुदय "इत्यपि ।
१४ ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे तेसि मए पयबारसविंदा चउवीस 'तइ अहिया । ७१॥ (९७) [८९] मोहनीयस्य बन्धस्थानेषु सत्तास्थानानि- तिन्नेव उ बावीसे इगवीसे अठ्ठवीससत्तरसे । छच्चेव तेरनव एसु पेचेव ठाणाणि ॥सूत्रम्-२१॥ (६८) [१०] संतट्ठाणा संखा बंधे वधे पडुच्च इह भणिया । तह वि य सुहगुणणत्थं गुणउदय पडुच्च संवेहो ॥७२।। (९९) [११] बंधगुणठाणगेसु उदयट्ठाणाउ सुत्तभणियमवि पुणरवि सुमरणहेउं, तह "उदए संतसंखाओ ॥७३॥ (१००) [१२] चउठाणा मिच्छत्ते सासणमिस्से य तिगतिगं जाण । अजयाइ अप्पमत्तं चउचउठाणा उ उदयाण ॥७४।। (१०१) [१३] सत्तोदय अडयीसा सेसेसुदएसु तिगतिगं जाण अडसत्तछक्कमहिया वीसा बावीसबंधम्मि ॥७।। (१०२) [१४] इगवीसे अडवीसा एक्का सत्ताइतिसु वि पत्तेयं । मीसम्मि संतठाणा अडसगचउअहियवीसाउ ॥७६॥ [५] मीसम्मि संतठाणा तिगतिग अडवीसा सगवीसा सम्मुव्वलणे य मीसउदयम्मि । चउवीससंतठाणं सेटिं उवरिं पडंतस्स ॥ (१०४) अजओदयम्मि पढमे अडचउइगअहियवीस २८, २४ २१, बीए तइए ते च्चिय तिवीसबावीसंजुत्ता २८,२४,२३,२२ २१ ।।७७॥ (१०५) [१६] इगवीस तुरिए २८,२४,२३,२२जेणं सोयगस्स उदओ उ । एवं देस-पमत्ता-ऽपमत्तयाणं च दट्ठव्वं ७८॥ [१७] हेगवीसवज्जतुरिए२८,२४,२३,२२ चउरो ठाणा उ तत्थ मंतम्मि । सो वेयगदिट्ठीणं इगवीसा खवगदिट्ठीणं ।। (१०६) तिगपणपणचउसंता सव्वे सत्तरसठाणसंखाए एवं देसपभत्तापमत्तयाण दटुवं ।। (१०७) देसविरओ दुविहो तिरिमणुसामन्नपंचठाणाई । अडवीसा चउवीसा तिरियाणं देसविरयाणं ।।७।। (१०८) [९८] इगवीसा बावीसा तिरियाण भोगभूमि संभवइ १ "इत्यहिया" इति L D प्रतौ । २ 'सतसठाणसखा" इति L D प्रतौ । ३ "सुत्तमणियमविण इति,J प्रतिप्रेसकोप्याम् । ४ "उदया" इति J प्रतिप्रेसकोप्याम् । उदएसु पत्तेयं ॥ (१०३) [ १५ ३ मोहनीयस्य बन्धस्थानेषु सत्तास्थानानि गुणस्थानानि प्रतीत्य बन्धोदयसत्तासवेधश्च 'जत्थ न विरईभावो ते वि य मणुखवगआयाआ ||८०॥ (१०९) [९९] अडचउइगेण अहिया वीसा अप्पुन्धि तिसु य पत्तेयं । उदएK सत्ताओ, वायररागे अओ वोच्छं ॥८१॥ (११०) [१०० पंचविहचउविहेसु छछक्कसेसे जाण पंचव । पत्तेयं पत्तेय चत्तारि य पंधवोच्छेए ॥सूत्रम्-२२।। (१११) [१०१, पणगाइ५,४,३,२.१एगु संते तह य अवंधम्मि तिन्नि पत्तेयं । चउरदुइक्कवीसा २४,२८, २१.उवसमसेढिं पडुच्चेए ।,८२। (११२) [१०२] इगवीसा खवगम्मि वि पणगे बंधम्मि किंचि कालमिह । मज्झिल्लट्ठकसाएक्खय तेरस १३नपुमि बारसगं १२ ॥८३।। (११३) [१०३] थीवे यखीणिगारस पणगे किंची चउक्कवंधेवि । हासाइखीणि पणगं चउरो पुरिसम्मि चउवंधे ॥८४॥ (११४) [१०४] तियवन्धे वि य संता संजलणचउक्क आवलिदुगुणा । कोहे खयम्मि तिन्नि उ ते चेव दुगम्मि खणमित्तं ।।८५।। (११५) [१०५] माणे खयम्मि तिन्नि उ तत्थेव दुगम्मि जाव अंतमुहू । ते चेव एक्कवंधे जाव न खीणा तिजयमाया ॥८६॥ (११६) [१०६] मायाए खीणाए लोभो बंधम्मि लोभसंता य । अब्बंधम्मि वि लोभो सव्वे तियजुत्तठाणाइं ॥८७॥ (१९७) (१०७] ३ १ ३ ५ गुणहाण. | मिच्छहिट्ठि| सासण० मिस्स० अविरय० | देसविरय० बन्धट्ठाण २२ १३ | उदयट्ठाण०७/८/९/२०१७८७८/६६/७/८/६५६७८ सत्ताठाण २८ " " " " " २७ " " " 88 सत्ताठाणाणि २४ " " २३ " " २२ सव्याणि AN ६ १७ १ "नन्य" इति L D प्रती । २ "चउमट्ठएक्क” इतिL D प्रतौ । ३ "लोभे” इति L D प्रतौ ।
सुत्तभणियमवि । १४ ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे तेसि मए पयवारसविंदा चउचीस 'तइ अहिया । ७१॥ (१७) [८९] मोहनीयस्य बन्धस्थानेषु सत्तास्थानानि- तिन्नेव उ बावीसे इंगवीसे अट्ठवीससत्तरसे । छच्चेव तेरनवबंधएसु पंचेव ठाणाणि ।।सूत्रम्-२१॥ (६८) [१०] संतवाणा संखा बंधे वधे पडुच्च इह भणिया । तह वि य सुहगुणणत्थं गुणउदय पडुच्च संवेहो ॥७२॥ (१९) [११] बंधगुणठाणगेसु उदयट्टाणाउ पुणरवि सुमरणहेउं, तह 'उदए संतसंखाओ ॥७३॥ (१००) [१२] चउठाणा मिच्छत्ते सासणमिस्से य तिगतिगं जाण । अजयाइ अप्पमत्तं चउचउठाणा उ उदयाण ॥७४।। (१०१) [१३] सत्तोदय अडयीसा सेसेसुदएसु तिगतिगं जाण अडसत्तछक्कमहिया वीसा वावीसबंधम्मि ॥७॥ (१०२) [१४] इगवीसे अडवीसा एक्का सत्ताइतिसु वि पत्तेयं । मीसम्मि संतठाणा अडसगचउअहियवीसाउ ॥७६॥ [१५] मीमम्मि संतठाणा तिगतिग ।। (१०३) अडचीसा सगवीसा सम्मुव्वलणे य मीसउदयम्मि । चउवीससंतठाणं सेटिं उवरिं पडंतस्स ॥ (१८४) अजओदयम्मि पढमे अडचउइगअहियवीस २८, २४ २१, ठाणाई। चीए तइए ते च्चिय तिवीसवावीसंजुत्ता २८,२४,२३,२२ २१।।७७॥ (१०५) [१६] इगवीस वज तुरिए २८,२४,२३,२२जेणं सोवेयगस्स उदओ उ । एवं देस-पमत्ता-ऽपमत्तयाणं च दट्ठव्वं ॥७८॥ [१७] हगवीसवज्जतुरिए२८,२४,२३,२२ चउरो ठाणा उ तत्थ मंतम्मि । सो वेयगदिट्ठीणं इगवीसा खवगदिट्ठीणं || (१०६) तिगपणपणचउसंता सव्वे सत्तरसठाणसंखाए एवं देसपभत्तापमत्तयाण दट्ठवं देसविरओ य दुविहो तिरिमणुसामन्नपंचठाणाई । अडवीसा चउवीसा तिरियाण देस विरयाणं ॥७६।। (१०८) [१८] इगवीसा बावीसा तिरियाणं भोगभूमि संभवइ १ "इत्यहिया" इति L D प्रतौ । २ "सतसठाणसंखा" इति L D प्रतौ । ३ "सुत्तमणियमवि" इति, J प्रतिप्रेसकोप्याम् । ४ "उदया" इति J प्रतिप्रेसकोप्याम् । उदएसु पत्तेयं . च ॥ (१०७) [ १५ मोहनीयस्य बन्धस्थानेषु सत्तास्थानानि गुणस्थानानि प्रतीत्य बन्धोदयसत्तासवेधश्च 'जत्थ न विरईभावो ते वि य मणुसवगआयाआ ||८०|| (१०९) [९९] अडचउइगेण अहिया वीसा अप्पुचि तिसु य पत्तेयं । उदएसु सत्ताओ, वायररागे अओ वोच्छं ॥८१|| (११०) [१०० पंचविहचउविहेस' छछक्कसेसे जाण पचव । पत्तेयं पत्तेय चत्तारि य पंधवोच्छेए ॥सूत्रम्-२२।। (१११) [१०१, पणगाइ५,४,३,२.१एगु संते तह य अवंधम्मि तिन्नि पत्तेयं । चउरदुइक्कवीसा २४,२८, २१,उवसमसेटिं पडुच्चेए ।.८२। (११२) [१०२] इगवीसा खवगम्मि वि पणगे बंधम्मि किंचि कालमिह । मज्झिल्लट्ठकसाएक्खय तेरस १३नपुमि वारसगं १२ ॥३॥ (११३) [१०३] थीवे यखीणिगारस पणगे किंची चउक्कवंधेचि । हासाइखीणि पणगं चउरो पुरिसम्मि चउवंधे ॥८४॥ (११४) [१०४] तियबन्धे वि य संता संजलणचउक्क आवलिदुगुणा । कोहे खयम्मि तिन्नि उ ते चेव दुगम्मि खणमित्तं ।।८५।। (११५) [१०५] माणे खयम्मि तिनि उ तत्थेव दुगम्मि जाव अंतमुहू । ते चेव एक्कवंधे जाव न खीणा तिजयमाया ॥८६॥ (११६) [१०६] मायाए खीणाए लोभो बंधम्मि लोभसंता य अब्बंधम्मि वि लोभो सव्वे तियजुत्तठाणाइं ॥८७॥ (११७) {१०७] ३ १ ३ ५ गुणट्ठाण मिच्छद्दिट्ठि | सासण. मिस्स० अविरय० देसविरय० बन्धट्ठाण २२ २१ १७ १३ उदयट्ठाण ८६ सत्ताठाण ७८ ९ १०७८ ७ २८ " " २७ २४ " " " सत्ताठाणाणि २४ " Y २३ " १० ३ सव्वाणि १ "तत्थ" इति L D प्रतौ । २ "चउअट्ठएक्क" इतिL D प्रतौ । ३ "लोभे” इति L D प्रती।
१६] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे सत्ताठाण ५ ५ ३ ६६|५|५|५|४|३ गुणढाण पमत्त अपमत्त अपुव्व अनियट्टि सु ३० वघाण ९ ह . ५४३२१ 0 उदयट्ठाण०|४|५|६/७/४ ५ ६ ७/४/५/२/१/११/१ | १|| , - " . न . , २४ Lh २१ " " सत्ताट्ठाणाणि २३ m : . १३ ११ 10] ~ , २२ " १७ है ala - 10 सव्वाणि |४|३| १३२ गुणठाणगउदएसु संतट्टाणाण संख इय वुत्ता गुणठाणगपत्तेयं, 'सव्वसंखा य इय भणिमो ॥८८।। (११८) [१०८] दसतिगनवमिच्छाइसु, अजयाई पचगम्मि सगसयरी । छच्छक्क पणचउक्कम्मि पणपण सेसेसु चउतिग अबंधे ।।८९।। (१५६) [१०] 'मोहे सवेहभणणा तेत्तीससय तु संतठाणाण गुणठाणगे पडुच्चा बंधे पुग अहनउई य ॥९०॥ (१२०) [११०] दसतिगवीसा सत्तरस दुसु य पत्तेय दुसु य पत्तेय संतठाणाई । मगवीस पचगाई चउर अबंधम्मि य ठाणाई ।।९१।। (१२१) [१११] सगवीस मीसगम्मी सेसा सामन्न चउसु उदएसु । इय अजयमीसगाणं वीसं सतरमवंधम्मि ॥९२।। (१.२) [११२ दसनवपन्नरसाई घधोदयसतपयरिठाणाणि भणियाणि मोहणिज्जे एत्तोनाम पर वोच्छ ।सू० २३।। (१२३) [११३] १ 'सबसख" इति L D प्रतो। २ "मोहसवे." इति । प्रतिप्रेसको याम् । ३ "नवई ॥२०॥" इति LD प्रतो।
मोहनीयस्य गुणस्थानकान्याश्रित्य बन्योदयमत्तास्थानानि नाम्नो बन्धस्थानानि [ १७ १ दसनवपण्णरसाई इच्चाई विवरियं समासेण 'इत्तो य नामवंधा तेवीसाईणि विवरेमि ॥९२॥ (१२४) [११४ नाम्न उत्तरप्रकृतीना बन्धस्थानानि तेवीसपण्णवीसा छन्वी अट्ठवीसगुणतीसा । तोसे तालमेग बंध हाणा. नामस्स ॥सू०-1॥२४॥ (१२५) [११५] ठवणा-२३, २५ २६, २८ २६, ३०,३१, १, वन्न १रसगंध फासा१ तेयगकम्मडग१अगुरु१उवधायं । निम्मेण १-नाम-धुवया सेसा अडवनअधुवाओ ।।१३।। (१२.) [११६] गड ४ अणुपुव्वीचउ २ छ उ संधयणागीतसावीस२०च । जाइ५सरीरं३ गतिगं३ परघाचउ४ तित्थ विहगदुग (१२७) अडवन्न अधुवाओ- तग्गयणुपुव्विजाई थावरमाई उ दूसरविहूणा धुववध९हुंडउरलं तेवीसअपज्जथावरए ॥९४॥ (१२८) [११७] सासपरघायखेवे पणवीसा सुहुमवायराणं तु छब्बीस आयवेण उज्जोअपरित्ति बंधतिगं ॥९॥ [११८] अपजतं अवणित्ता पज्जत्तगखेव पज्जपाओगा सासपरघायखेवे सो बंधो पज्जपाओगो १९६॥ {११९] अपजत्त अवणित्ता पञ्जत्तगखेव सा उ तेवीसा । सासपरधायखेवे पणवीसा होइ पगईणं (१२९) पजाणं सुहमवायराणं तु छब्बीस आयवेणं अहवा उज्जोयपरियत्तो ।। (१३०) *बायरएगिदिपाउग्गा एसा || बधतिग थावराणेय ॥ "सेसा बधा य इय नेया॥ गडजाइछेयपुच्ची हुडउरलदुगधलं दूसररहिया तसअपज्जत्तपत्तेयं ॥९७॥ (१३१) [१२०] बीया पणवीसेसा तसपाउग्गा तहा य सरसासे विहगपरपायखेवे उणतीसा तीस उज्जोए ॥९८॥ (१३२) [१२१] पुढवाइवायराणं धुवर धा अथिराड ५ १ "एत्तो य" इति L D प्रतौ। २ “ठाणाणि" इति वा । ३-४ "अय पाठ L D प्रतापस्ति J प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति 1५ "भय पाठ L.D प्रतौ नास्ति, J प्रविप्रेसकोप्या वास्ति।
१८] सप्ततिकाभिध षष्ठे कर्मग्रन्थे पणवीस अपज्जाण उणतीसा तीस पज्जपाओगा । बितिचउरिदियपंचिदियाण तिरियाण बंधे उ ॥९॥ (१३३) [१२२] पणवीसा गुणतीसा तिरियसमा तीस तित्थसंजुत्ता । बंधतिगं मणुजोगं नेरडयअसुद्धअडवीसा ॥१००। (१३४) [१२३] सा चेय- नरयदुर्ग २ परघायं १ सासं१दुहखग १सयल १हुंडं च१ । धुवबधि हतमचउक्कं २ वेउन्विदुर्ग २ च अथिराई ६॥१०१।। (१३५) [१२४] देवदुग २परघायं १ सासं १ सुभखगइ१सयल१चतुरंसं १ । धुवबंधीहतसदसगं१०वेउविदुगंरच अडवीसा । १०२।। (१३६) [१२५] मा तित्थे उणतीसा ऽऽहारदुगे तीस तिसु य इगतीसा । चउठाणा देवाण सेढिदुगे एग जसकित्ती ॥१०३।। (१३७) [१२६] चउ पण सोलस नव घाणउईसया 'उ अत्याला। ईयालांत्तरछायालसया एक्केक्क पधविही ॥सू०-२५।।(१३८) [१२७] टवणा- | बधठाणा २३ २६ २८ २६ ३० ३१ १ भगा ४ २५ १६ | ६ ६२१८४६४१ १ १ बायरपत्तेगियरे भगा चत्तारि बंधतेवीसे पणवीसे पणवीसा छच्चीसे भंगसोलसग ॥१०४॥ [१२८] ठवणा- बा बा (ad सु प० सा प मा २ ३ एस गमो सव्वेसिं भगाणं चारणे होइ ।। (१३६) वायर-थिर-पत्तेया सुभ-जस-पडिवक्खभंगवत्तीसा साहार-सुहमि जसवज्ज वीस वारस असभविया ॥१०५।। (१४०) [१२६] य” इति वा । २“इयलीसोत्तर" इति L D प्रती । ३ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति ।
नाम्नो बन्धस्थानमगा [१४ । वादर बादर बादर नादर वादर बादर बादर वादर बादर वादर बादर बावर बादर बादर बादर बाद र उत्तेज पत्तेअ पत्तेअ पत्तेभ उत्तम पत्तेज पत्तेभ पत्तेभ साधा साधा साधा साधा साधा-साधा सा थिर थिर थिर | थिर अथिर अथिर अथिर अथिर थिर थिर थिर थिर मथिर अथिर अथिर मथिर। सुम सुम असुभ असुभ | सुभ | सुभ असुभ असुभ | सुभ सुभ असुभ असुभ सुभ | सुभ असुभ असुभ जस अजस जस अजस जस अजस जस अजस जस अजस जस अजस जस अजसः २३ . . . • . १२ ४ १० 8 ५ सुहम सुहम सुहम सुहम सुहम सुहम सुहम सुहम सुहुम सुहम सुहम सुहम सुहम सुहम सुहम सुहम पत्ते पत्ते पत्ते पत्ते पत्ते पत्ते | पत्ते पत्ते सा. सा- सा- सा-सा- सा- सा- सा- धा० धा. धा० घाधा०मा० था.धा. थिर थिर थिर थिर अथिर अथिर अथिर अथिर थिर थिर थिर थिर अधिर थिर अथिर अथिर सुभ सुभ असुभ असुभ सुभ सुभ असुभ असुभ सुभ सुम असुभ असुभ सुम सुभ असुभ असुभ जस अजस जस अजस जस अजस जस अजस नस अजस जस अजस जस अजस जस १३ | १४ | १६ | १८ . . १ १६ २० 'साहारणस्स वा सुहमस्स वा होण्हं वा जसेण सह बधो न भवइ । असमत्तमणुय [तह] बितिचउपणिदितिरियाण बंधि पणवीसे । असुहपयडीण जेणं न तेसि जेणं न तेसि परियत्ति एक्केको । (१४१) असमत्तमणुयवितिचउपणिदितिरि पण्णवीसि तह पंच । असुभपयडीण जेणं न तेसि परियत्ति संभवइ ॥१०६॥ [१३०] उज्जोय-आयवेणं थि भजससेयरेहि सोल उ आयवपरियत्ति अठेव ॥१०७।। (१४२) [१३१] उज्जोवेणं अट्ट १ अय पाठ LD प्रतावस्ति ।
२० ] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे ठवणा- थिर थिर थिर थिर अथिर अथिर अथिर अथिर सुम सुम असुम असुभ सुभः सुभ असुभ असुभ जस अजस जस अजस जस अजस जस अजसा .१ २ ३ ५ ६ एसा वि ठावणा इह वायरएगिदिविगलदेवाणं तह तीसे मणुजोगे पत्तेयं जस्स संभविया ॥१०८।। (१४३) [१३२] थिरसुभजसइयरेहिं वितिचउरिंदीण अट्ठ पत्तेयं उणतीसतीसवंधे अडवीसे ॥१०९॥ (१४४) [१३३]] अट्ट देवाणं 'ठवणा- बभठा. २५ २८ २६ ३० वेइ० १ तेइ० १ 5 चउ० १ देव० ८ तीसा य मणुयजोगा उणतीसा तीस एगतीसा य देवाण अह अह य एक्केक्को भंगमेएसु ॥११०॥ (१४५) [१३४] ठवणा- जोग्ग मणु देव० २९ ३० १ भगा 5 - १ बधो | ३० ३१ | १ थिरछक्कं सुभखगई सप्पडिवक्खेहि चारिया संता । गुणिया संघयणा-ऽऽगीहि भंगया सयलतिरियाणं ।।9।। (१४६) [१३५] १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति । २ "सघयण तहागिईहि । तिLD प्रती। 4. ॥१४६।।"
नाम्नो वन्धस्थानमगा [१ चत्तारि सहस्सा छस्सयाउ अछुत्तराउ गुणतीसे । एवं उज्जोयतीसे मणुए 'उणतीसि ते चेव ॥११२।। (१४७) [१३६] थिर सुमसुभग सुसर आइज जस सुभख० संघ०सठा | बधठा० सघ०सठा २६ ३० तिरि० ऽथिर सुभ दुभग दूसर भगाउन जस |ऽसुभख० १४६०८४६०८ ३२ १२८ । ७६८४६०६ भणु १ १४६०८ १२८७६८ ४६ XE . २ ४ ६४ नारय अडवीसेगो एगो कित्तीए सेणिमासज्ज । तेरससहस्सनवसयपणयाला 'सच्चपयडीणं ॥११३।। (१४८) [१३७) तेवीसाई ठाणा सवियप्पा बंधे । एत्तो य सबजियवंधठाण पत्तेय भंगजंतइयं ॥ (१४९) अट्ट विवरिया ठवणा- नामवंधठाणा| २३ २५ २६ २६ | ३० ३१ सव्वसखा वघठाणभंगा २५ । १६ ६६२४८४६४१ १ १ १३६४५ एगिदिया ४ | २० | १६ . विगलिंदिय ३ 0 . २४ । २४ पतिरिय ४६०८४६०८ . . ६२१७ मणुयपाउ. १ ० . ४६०८८ १६१७ नरयपाउ० or ० ० देवपाउग्ग० . १ १८ चपाउग्ग० | . . १ एत्तो य उदयठाणा सव्वजियाणं च इंति सामन्नं । वीसाई जान य अठेव पज्जंता ॥ (१५०). नाम्न उदयस्थानानि- ते पारस १ "उणतीसे" इति L D, प्रतौ । २ “सव्वपिंडेण ॥१४॥” इति L. D. प्रतौ।३ इद यन्त्र LD. प्रतावस्ति।
२० ] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे . ठवणा- २ ३ ४ ५ ६ थिर थिर थिर थिर अथिर अथिर अथिर अथिर सुम सुभ असुम असुभ सुभः सुभ असुभ असुभ जस अजस जस अजस जस अजस जस अजस .१ ६ | एसा वि ठावणा इह बायरएगिदिविगलदेवाणं तह तीसे मणुजोगे पत्तेयं जस्स संभविया ॥१०८।। (१४३) [१३२] थिरसुभजसइयरेहिं वितिचउरिंदीण अट्ठ पत्तेयं उणतीसतीसवंधे अडवीसे ॥१०९॥ (१४४) [१३३] अट्ठ देवाणं 'ठवणा- बधठाक २५ / २८ । २६ ३० बेइ० १ ८ तेइ० १ चउ० १ ៨ देव० ८ ठवणा- जोग्ग मणु | ३० तीसा य मणुयजोगा उणतीसा तीस एगतीसा य देवाण अह अह य एक्केको भंगमेएसु ॥११०॥ (१४५) [१३४] देव० बधो २९ ३० / ३१ E थिरछक्कं सुभखगई सप्पडिवक्खेहि चारिया संता । गुणिया संघयणा-ऽऽगीहि भंगया सयलतिरियाणं ॥१११॥ (१४६) [१३५] १ इद यन्त्र ! D प्रतावस्ति ।२"सघयणतहागिईहि भगया] (भगा य) सयलतिरियाण ॥१४॥" तिL D प्रती। भगा ८ १ १ नाम्नो वन्धस्थानमगा [१ चत्तारि सहस्सा छस्सयाउ अटुत्तराउ गुणतीसे । एवं उज्जोयतीसे मणुए 'उणतीसि ते चेव ॥११२।। (१४७) [१३६] २६ ३० थिर सुमसुभग सुसर आइज | जस | सुभख० सघ० सठा |वधठा० | २५ ऽथिरसुभ दुभग दूसर भगाउनऽजस ऽसुभख० १२८ ७६८ तिरि० १ ४६०८४६०८ १६ १२८ ७६८४६०८ मणु० ४६ X६ २ ४ ६४ १ ४६०८ नारय अडवीसेगो एगो कित्तीए सेणिमासज्ज । तेरससहस्सनवसयपणयाला २सव्वपयडीणं ।।११३।। (१४८) [१३७] तेवीसाई ठाणा सवियप्पा अट्ट विवरिया बंधे । एत्तो य सव्वजियबंधठाण पत्तेय भंगजंतडयं ॥ (१४९) उवणा- सवसखा नामबंधठाणा | २३ | २५ २६ २८ २९ ३० ३ १२४८४६४१ १ बधठाणभगा ४ २५ १६ ६२४ १ १३६४५ एगिदिया ४ २० १६ विगलिंदिय ० ३ | . २४ । २४ ० . प०तिरिय १ . ४६०८४६०८ .. . ६२१७ मणुयपाउ० १ ० . . . ८ ८ १ ४६०८/८ ४६१७ नरयपाउ० | . १ देवपाउग्ग० १८ मपाउग्ग० • | १J एत्तो य उदयठाणा सव्वजियाणं च हुंति सामन्नं । वीसाई जाव य अठेव पज्जंता ॥ (१५०) नाम्न उदयस्थानानि- . ON ते चारस १ "उणतीसे" इति L D, प्रतौ । २ “सव्वपिंडेण ॥१४॥” इति L. D. प्रतौ । ३ इद यन्त्र L D. प्रतावस्ति।
२२] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे वीसिगवीसाच उदीसगाई इगतीसगत्ति एगहिया । उदयट्ठाणाणि भवे नव अट्टय'हुति नामस्स।सू.-२६॥ (१५१) [१३८] तेवीसाई ठाणा सविगप्पा अट्ट विवरिया वंधे । तह बारस उदयगया वीसाई अझ पज्जंता ॥११४॥ [१३]] ठवणा- २० । २१। २४ । २५ ।२६। २७ । २८ । २९ । ३०। ३१ ।।८।। उढएसु जे सामी कित्तय उदया उ कस्म पत्तेयं । भंगा वि य पत्तेयं तेसि संखाइयं भणिमो ॥११५।। (१५२) [१४०] निम्मेणथिराऽथिरश्तेयकम्म१वन्नाइ४अगुरु?सुह?मसुहं । नामधुवोदय बारस १२ सेसा अधुवा उ पणपन्नं ॥११६॥ (१५३) [१४१] तस४थावराइ४चउ चउ, तह सुभगा दुभगआगिसंघयणाद । गड४अणुपुब्बी४ य तहा, परघाचउ४ तित्थ१ उवधायं१ (१५४) जाइश्सरीरो३वगा३ विहदुगर सव्वा वि पंचवन्नाओ ५५ । पत्तेयं पयडि विवरेमि ।। (१५५) तसतिग-सुभगा-ऽऽइज्जा मणुगइ-सगल-जसकित्ति तह धुवया । वीसा उ समुग्धाए "सेसा उ कमेण पक्खेवा ॥११७।। (१५६) [१४२] ओरालियदुगरेमुसभं १ पत्ते१ घाय१इयरसंठाणं ६ । छन्चीस सजोगिकेवलि ओरालियमीसि समुघाए ।।११८।। |१४३] ओरालियदुगरमुमभं १ पत्तेयुश्वघाय१इयरसंठाणा ६ । वि य छक्क सत्त ए छूढे छव्वीस समुघाए ॥ (१५७) परघाय-सास-विहदुग-सरदुग-एगयरखेवि तीसुदओ सामन्नकेवलि तिगं त्थियरे तित्थसंजुत्ता ॥११६।। (१५८) [१४४] सामन्नकेवलिउदया-२०, २६, २८, २९, ३०, ८ ॥ तित्थयरउदया-२१, २७, २९, ३०, ३१, ६ ॥ सदनिरोहे तीसा उणतीसा सासरोहि तित्थयरे । बारुदयठाणनामे १ - । १ "उ एमाहिया य इगतीसा" इति वा पाठ । २ 'होति" इति L D प्रतौ । ३ "सखा य इय" इति L D प्रतौ । ४ “धुवउदया'' इति L D प्रतौ। ५ "तइए चउपचमे समए।।१५६।।" इति L D प्रतौ । "दुग" इति J प्रतिप्रेसकोप्यामस्ति । किन्तु स सम्यग् न प्रतिभाति ।
नाम्न उदयस्थानानि [ २३ ।। (१५९) अन्ने उ उणतीसट्ठावीसा केवलि तह मयंतरेण इमं ॥१२०॥ [१४५] तह सव्वरोहि नवगं छहाणा हुन्ति उदएसु उणतीसठ्ठावीसा केवलि तह सव्वरोहिं अडपयडी । अट्ठ उदया मयंतरेणं तु उदएसु ॥ (१६०) 'सर-सास-परधा रोधा विहगड-पत्तेय-कमनिरोहेणं तीसुदया गुणतीसाइ जाव पणवीसउदएणं ॥१२१।। (१६१) [१४६] उपवाए चउवीसा ओरालदुगेण होइ बावीसा । उमभा-ऽऽगीण निरोहे वीसा धुवरोहि अठेव ॥१२२।। (१६२) [१४७] सेलेसी आरंभे उदयहाणाउ अट्ठ केवलिणो । सेलेसी पडिवन्ने अट्ठण्हं पयडिउदए उ ॥१२३।। (१६३) [१४८] एए सामण्णे केवलम्मि तित्थयरि तित्थजुयठाणा । लिहियाउ पंचसंगह-विवरण-अप्पयरठाणाउ ॥१२४॥ (१६४) [१४६] गडजाइआणपुची थावरसुहुमं अपजधुवउदया दुभगाणाइजाजस विग्गहगह पगडइगवीसा ॥१२५।। (१६५) [१५०] आणुपुविरहिया अ एगिदिसुहमइयराणं । हुंडु-वधा-पत्तेएहि उरलदेहेहि चउवीसा ॥१२६॥ (१६६) [१५१] पणवीसा छव्वीसा सत्तावीसा य होड सा चेव । परघाय-सास-आयव कमेण एगिदुदयठाणा ॥१२७॥ (१६७) [१५२] पडजाइआणुपुची तसतिगणाइजअजसदुभगं धुवउदया सव्वे वि हु अंतरगड पगडइगवीसा ॥१२८।। (१६८) [१५३] सा आणुपुच्चिरहिया संघयण-तहा-ऽऽगि-एगयरखेव । तह पत्ते-उवधाए ओरालदुगेण छव्वीसा ॥१२६।। (१६६) [१५४] "एसा पुण छच्चीसा मणु-तिरि-विगलाण उदयपाओगा । लद्धिअपजापजाण करणे नियमा अपजाण ॥१३०॥ (१७०) [१५५] परघाय जत्थ खेवे उदए जीवाण ते उ च । पजाण १ "सर १सास १ परघाय विहगइ ' इति L D प्रतौ। २ 'वज्रर्षभसधयणसमचतुरस्रसस्थानयोनि- रोघे' इत्यर्थ । ३ "उरलपरहि" इति 1 D प्रतौ । ४ ' हुन्ति ता" इति L D प्रतौ । ५ "एए उ दुवे उदया" इति L D प्रतौ ।
२४ ] सप्ततिकामिवे षष्ठे कर्मग्रन्थे । तणुपज्जत्ती नियमा इयरा 'उ कमेण पज्जत्ती ।।१३।। (१७२) [१५६] विहगड-परघायजुया अट्ठावीसा ससासउणतीसा उज्जोएणं तीसा सरेण सा एगतीसा उ ॥१३२॥ (१७१) [१५७] संघयण्णा सव्वे तएव तिरिओदया य देवेसु । पढय चिय संठाण वेउचिदुगं च इट्ठखगइसरा ॥१३३।। (१७३) [१५८] एगिदियाण पंच उ छछक्क सुरविगलमगलतिरियाणं । मणुए उज्जोऊणा उदयट्ठाणाउ 'सव्वेवि ॥१३४॥ (१७४) [१५६] एगिदियाण-२१,२४,२५,२६, २७ । देवाण-२१, २५, २७,२८,२६,३० । विगलसगलाण-२१, २६, २८, २६, २७, ३१ । मणुयाण उदय ठाणा-२१.२६,२८,०६,३० ॥ हगवीणा तिरिजडवेउविहारगाण च । अविश्यमणुवे उब्धिय उज्जोऊणा य चत्तारि ॥१३॥ (१७२) [१६०] नेरइयाणं तिरिसम संघयणुज्जोयवज्ज पंचेव २५,२७,२८,०९,३० असुहपयडीण उदया अविवक्खा भगया पंच ॥१३६।। (१७६) [१६१] जे उदएसु सामी उदयापयडीण विवरणं विहियं । इत्तो पत्तेय इहं भंगाणं चारणं भणिमो ॥१३७॥ (१७७) [१६२] अप्पज्जसुहुमअजसा सेयरमिलिएहि अट्ट उ विगप्पा । सुहुमअपज्जे य जसं वज्जित्वा पंच समविया ॥१३८॥ (१७८) [१६३] पच ठवणा- अप अप. अप अप प सु सु बा बा सु बा बा अज अज अज अज ज ५ . ० ३ . २ अप्पज्जसुहुमसाहार अजसडयरेहि भंगसोलसगं । सुहुमअपज्जे जसउदयवज छक्कं असंभवियं ॥१३६।। (१७६) [१६४] १ जे जत्थ समविया ॥१७२।।" इति L. D प्रतौ । २ “पञ्चेव ॥१७४॥" इति L D प्रतौ ।३ "सुरसमउजोऊणा य उदयपब्वेव।" इति L D प्रतौ । ४ "कुणिमो" इति L. D प्रतो ।
नाम्म उदयस्थानानि तद्भगाश्च [ २५ एगिदियठवणा- S ST. ST ऽप डप. डप Sप. ऽप.पज्ज पज्जपज्ज | पज्जपज्ज.पज्ज.) पज्जा पज्ज. सु. सु सु सु. बा. चा वा बा सु सु सु. | सु वा. बा. बा वा. | वा. सा.सा प सा. सा. प सा प प सा प प ऽज जि. ऽज ज ऽज. ज. Sज. ज है . ८ . . ६ ५ ० ३ सा सा ऽज. ऽज ऽज १० • | ४ वायरपत्तेयजसा सप्पडिवक्खेहि अट्ठ उ विगप्पा । सुहुमे वज्जेज्ज जसं उदए छच्चेव संभविया ॥१४०।। (१८०) [१६५] एगिदियपणुकीसाठवणा- बायर बायर सुहम सुहुरहु सहु. पत्ते पत्ते. साहारण साहा पत्ते पत्ते साहा. साहा. ऽजस जस | ऽजस बायर बायर जस जस जस १ w २ ४ ० ५ छब्बीसा वि य तिविहा सासुज्जोए य आयवेगयरे । सासे छा पुन्वुत्ता पत्तेयजसेयरेहि चउजोए ॥१४१॥ (१८१) [१६६] ठवणा- उज्जोय उज्जो उज्जो | उज्जोय पत्तेय पोय साहा साहा जस ISजस जस जिस L १ २ ३ आयवछव्वीसाए पत्तेयजसाजसेहिँ दो चेव । वाए विउविकरणा चउवीसाइसु य एक्केक्कं ॥१४२।। (१८२) [१६७] सास छवीसे छूढे आयवसगवीस अहव उज्जोए । पुन्वुत्ता छन्भंगा पिंडे एगिदिवायाला ॥१४३॥ (१८३) [१६८] २६ ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे एगिदिय उदयठवणा- उदय०→ २१ २४ •५ २६ 1 सामन्न ५ ५ १० ६ AM उज्जोय० ० ४ Int आयत्र० . २ विउव्वि० ० १ १ ० एव कुलभङ्गा- १३ ४२ । ६ वेडंदियइगवीसे पज्जत्तजसेयरेहि चत्तारि अपजत्ते जसवज्जा तिमि उ छब्बीसि एमेव ॥१४४॥ (१८४) [१६६] पज्जत्तजसजसेहि अट्ठावीसम्मि भंगया दोन्नि एव गुणतीसतीसे एक्कत्तीसे य ते चेव ॥१४॥ (१८५) [१७०] नवरं दो अणुतीसा सासे छूढे य अहव उज्जोए । तह तीसाओ तिन्नि उ सरदुगउज्जोयएगयरे ॥१४६।। (१८६) [१७१] सरदुगएगयरेणं दो दो डगतीसाउ भंगवावीसं बेडंदिय-तेइंदिय-चउरिदिय मिलिय छावट्ठी ॥१४७।। (१८७) [१७२] २९ ३० ३१ एव। १८ १२ विगलठवणा- उदय २१ ०६ भगा है ६ १२ सुभगाइज्जजसेहिं सप्पडिवखेहि अट्ठ उ विगप्पा । अप्पजदुभगणाइज्जअजस एगो य इय नवगं ।।१४८॥ (१८८) [१७३] पज्जत्तसुभगआइज्जकित्ति तह सेयराहिँ सोलसगं । असमत्त य सुभतिगं वज्जिय नव होति सभविया ।।१४६।। [१७४] इयाणि पचिंदियचारणाठवणा- 5955 पज्जत्त→ सुभग सुभग सुभग सुभग दुभग | दुभग दुभग दुभग दुभग आइज्ज आइज्ज ऽणाइज्ज ऽणाइज आइज्ज | आइज्ज णाई अणाइज्ज अणा जस जस जस ऽजस जस ऽजस जस जस 5जस। २ MY ६ १ । -भगा नाम्न उदयस्थानेषु मगा [ २७ इगवीसुदयविंगप्पा संघयण तहागि गुणिय छच्चीसे । एग असमत्तभंगो अट्ठासीया मया 'दोन्नि ॥१५०॥ (१८८) [१७५] विहगुगपस्यित्तेणं अट्ठावीमम्मि सुद्धया दुगुणा । 'सासुज्जोउणतीसे चावन्नेक्कारस मया उ ॥१५१॥ (१६०) [१७६] सुरदुगउज्जोएणं "एगयरेण परिवत्ति तीसुदए पंचसया छावत्तर तिगुणा सत्तरस अडवीसा ॥१५२॥ (१६१) [१७७] सरदुगएगयरेण छूटे इगतीसि भंगया एक्कारसबावण्णा पणिदितिरिउदयठाणेसु ॥१५३।। (१६२) [१७] नव उणनउया दोसय छावत्तरपंच दुगुण तह तिगुणा । दुगुणा इगतीसाए उणवन्न छलुत्तरा पिंडे ॥१५४॥ (१:३) [१७६] | २८ | २६ | ३० ३१ एए । पणिदितिरियठवणा- उदय | २१ एवं भगा है २६६ २८८५७६ ५७६ ५०६ ५७६ ৩৫ २८८ ५७६ ४९०६ एवं मणुयगईए मणुयगई इत्थ होइ वत्तव्वा । नवरं उज्जोयरहिया उदया पंचेव सवियप्पा ॥१५५॥ (१६४) [१८०] नव उणनउग दोसय छावत्तरपंच दुसु य पत्तेयं । बावणेषकारसया छब्बीसदुरुत्तरा पिंडो ॥१५६।। (१६५) [१८१] मनुयठवणा- उदय २१ | २६ एवं २८ २६ ३० (- भगा ९ २८ २८८ |५७६ ५७६ २८८ २६०२ वीमोदयम्मि एगो छच्च छबीसे य तीसचउवीसा । 'विहगा सरसंठाणेहिं एगों अट्ठोदए भंगो ॥१५७।। (१९६) [१८२] पढमंतिमदाभंगा गहिया सेसाउ मणुयगहणेण तित्थोदय एक्कोक्को सब्वे तित्थयरि छन्भंगा ॥१५८।। (१९७) [१८३] १ "दुन्नि" इति L D प्रतौ। २ "छावत्तरपच उदयभडवीसा।” इति L D प्रतौ । ३ "सासु- बजोयुणतीसे" इति I. D प्रतौ । ४ "एगेगयरपरि०' इति L D प्रतौ । ५ "बावन्ने" इति L D प्रतौ । ६ "विह १-सर१ सठाणेहि एगो" इति L D प्रतौ ।
२८ ] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे भगा | २१ । + १ . केवलितित्थयरठवणा-१ उदय→ २१ | २६ २७ | २८ | २६ | ३१ ९ केव० (६) | (१२) (१२) (६) | (१२) (१२) ० (२४) १२(५६) तित्थ १६ भगणाइज्जाजससेयरमिलिएहिँ अट्ठ उ विगप्पो पत्तेयं पत्तेयं उदएसु छसु छसु वि देवाणं ॥१५९॥ (१६८) [१८४] १ ठवणा- दूभग । दुभग | दुभग | दुभग सुभग सुभग | सुभग | सुभग अणाइज्ज अणाइज्ज आइज्ज आइज्ज अणाइज्जमणाइज्ज भाइज्ज आइज्ज अजस जस अजस जस अजस जस अजस जस १ २ ३ ५ ६ - ठवणा- 1 २. ३० + - ८ ८ सासुज्जोएगयरे तह सरउज्जोयएगयरसहिया अट्ठावीसुणतीसे दुगुणा चउसट्ठि सव्वे वि ॥१६०॥ (१९६) [१८५]] एवं विउव्वितिरिए इगवीसूणेसु भंगछप्पन्ना । तह मणुए वेउवि य उज्जोयविणा उ बत्तीसं ॥१६१॥ (२००) [१८६] उज्जोयरहियतीसा मोत्तण चउसु उदएसु । सम्वे उदय०-२१ २५ २९ देवभगा | ६४ वेउम्वियति १६ १६ ५६ ८ ३२ आहारगउदएसु भंगा सत्तेव तिरियसारिच्छा आहारदुर्ग खिविउं वेउव्विदुगं तु अवणेहिं ॥१६२।। (२०१) [१८७] १ J प्रतिप्रेसकोप्या २७-०८ उदयग्थानद्वये केवलिसका मगा न दर्शिता । L D प्रतौ पुन ६-६ षड् षड् भगा दर्शिता । तथा ऽप्यत्रा-ऽन्यतरविहायोगतेरुदयत्वाद् द्वादशाना मगाना सम्भव इति हेतोदश भङ्गा निरूपिता , तथैवा-ऽन्यत्र दर्शितत्वात् । ० ८ ८ . ८ " म ८ ० ८ - नाम्न उदयस्थानेषु भगा [२ तिरियसरिच्छा जेणं दुभगऽणाइज्ज अजसपयडीओ । अविरयवोच्छिन्ना ते न तेसि उदओ जईणं तु (२०२) एवं जइवेउव्वे नवरं नवरं उज्जोयभंगया तिणि । सेसा उ मणुयगहणे नेरइयअसुद्धपंचेव ॥१६३।। (२०३) [१८८] २१ २५ २७ २८ २९ | ३० सव्वे ठवणा- -- उदय २ १ . १ ७ आहारग० २ जति० १ १ २ २ १ ७ नारकिय० M १ | १ १ ५ ठवणा- २७ ९ 크 भगा १ नाम्न उदयस्थानाना भङ्गा- एमबियालिफारसी छ प तेत्तीसा । पारस सयाणऽहिगाणि' बि सीईहि ।।सू.२७।। (२.४) [१८] 'उणतीसे रिसयाणऽहिगा होहिं । एक्केक्कगं च वीसादडुदयते उदयविही ।।सू.-२८॥ (२०५) [१९०] उदय २० २८ २९ ३० ३१ ४२ ११ ३३ (६०० ३३ १२०२/१७८५२६१७११६५ १ एएसि विवरण- पण नव नव नब अढग एगं एग इह उदयइगवीसे । इगिविगलतिरियमणुए सुरनारयतिथि वायाला ||१६४॥ (२०६) [१६१] छञ्चत्तारि य एगं बायरसुहुमे य पवणवेउव्वे एगिदियाण भंगा एक्कारस होति चउवीसे ॥१६५।। (२०७) [१९२] सत्तऽह अहः अह य एगो एग तह उदयपणवीसे । एगिदिसुरविउव्वियतिरिमणुआहारनेरइए ॥१६६।। (२०८) [१९३] तेरस नव इगि विगले दोसय नउय मणुय तह तिरिए । सया छच्चीसे उदए भंगाण एगस्थ ॥१६७॥ (२०१) [१६४] १ "दुपच०" इत्यपि । २"उणतीसिकारस" इत्यपि । ३ "हुति" इति L D. प्रतौ।
३० ] सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थे छच्चट्ठ अट्ट अट्ट य एगो एग तह एग सगवीसे । एगिदिविक्कितिरिनरसुरनारयतित्थआहारे ॥१६८॥ (२१०) [१६५ छक्क पणसयछावत्तराईं दुसु तह य दुसु य सोलसगं । नव दुग एग भंगा अठ्ठावीमम्मि उदयम्मि ॥१६६।। (२११) [१९६] विगलतिरिमणुयदेवा तिरिनरवेउव्विहारनेरइए इह बारमय दुरुत्तर मिलिया एगत्थ पिंडेणं ॥१७०॥ (२१२) [१९७] एक्कारस वावन्ना छावत्तरपंच 'दुसु य सोलमगं नवबारमदुगभंगा डक्केवककमेण उणतीसे ॥१७१।। (२१३) [१९८] तिरिनरदेवा तिरिनर 'वेउन्वियविगलहारगजईण तित्थे नाग्यकमसो मिलिया सत्तारपणसीया ॥१७२।। (२१४) [१९६] सतरस सय अडवीसा अट्ठारस तह डगार बावन्ना । अट्ट एग एग तह एगं तीसउदम्मि ॥१७३।। (२१५) [२००] तिरिविगलमणुयदेवा तिरिनरखेउव्विहारतित्थयरे मिलिया भगाणं उणतीससयाउ सत्तरस ।।१७४।। (२१६) [२०१] एक्कारस बावन्ना बारस एक्को य भंग इगतीसे । तिरिविगलतित्थमिलिया सव्वे पणसह इक्कारा ॥१७॥ (२१७) [२०२] वीस नव अट्ठ उदएसु भंग" मेक्कक्क ते य केवलिणो । मंखा उदएसु बारससु कमेण पत्तेयं ।।१७६।। (२१८) [२०३] वायाला छावट्ठी उणवण्णसया छलुत्तरविगप्पा । इगिविगलतिरिपणिदिसु छब्बीस दुरुत्तरा मणुए ॥१७७।। (२१६) [२०४] च उसठ्ठी पण सुरनारयाण छप्पण्ण तिरियवेउव्वे । पणतीस मणुविउव्विसु सत्तट्ठ य हारकेवलिणो ॥१७८।। (२२०) [२०५] इय सव्वुदयविगप्पा एक्काणउया सया उ सगसयरी ७७६१ । एत्तो सतहाणा ते बारस होति नामस्स ॥१७९।। (२२१) [२०६] इय इय १ "दुदुसु' इति J प्रतिप्रेसकोप्या किन्तु स सम्यर न भाति । २ "विउवि तह विगल' इति जे प्रतिप्रसकोप्याम। ३ "सत्तारा" इति L D प्रतौ । ४ "एक्कारा' इति L D प्रतौ ५ "एक्के- क्कु" इति L D प्रतो नाम्न उदयस्थानेषु भगा [१ - ००४२ ५११/७१३ . मन्वुदयविगपठवणा- भग- नाम उदयठाणा २००१२०/२५ २६ २ २८ २६ । ३० ३१ ३८ सरवा उदए सव्वभगा|१४२११३३ ६०० ३३ १२०२१७८५२९१७११६५१,१७७६१ १४२|११|३| ६०० १३३ १२०२१७८५/२९१७/११६७ एगिदियभगा • • • विगलिंदिय ६ | १२ | १८ पर्षिदियतिरिय",000 • २८९ ० | ५७६ ११५२१७२८/११५२ ० २८८ ० ५७६ ५७६ ११५२] • ० २६०२ विउव्वियतिरिय .. ५६ ०।६।० ९ २ न ०६६ ० .४९०६ मनुज" ९०० ०२६६ 0 . . ८ . . . . १६ १६ ८ ८ . . ०/ ३२ ० . . " मणुज , - देवाण, ८१६ १६ . . तित्ययर ० ना १ १. १ . ६ केवलीण १ (म) (म) (म) ६ ६ . ० ० म ६) . २ ६ १ वेउब्धियजा . . १ . . . . . M m ० . २ . . १ . २ ~ . नारक 0 ५ आहग" १ | १ • 000 नाम्न मनाम्थानानि- तिदुणउई 'उगुणउई अच्छलसी असीह उगुसीई । अच्छप्पन्नत्तरि नव अट्ट य नामसताणि।। सूत्रम्-२६।। (२२२) [२०७] ठवणा-६३, १२, ८६,८८,८६,८०, ७६, ७८,७६, ७५, ६,८) गइ-अणुपुव्वी चउ चउ बधण-संघाय-जाइ-वन-रसा ५ । तणु ५ पत्तेयं पण पण अंगतिगं अट्ठ फासा य ||१८१।। (२२३) [२०८] छागी छस्संधयणा विहदुग-दुगगंध सेयरा वीसं पत्तेया अट्ट भवे तेणउई नामसंताओ ॥१८२।। (२२४) [२०९] १ "इगुनउइ” इति वा, "गुणनडई । अडसी छलसी असीड गुणसीई । भट्ठय०" इति वा ।
३२] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे । - मणुदुगउव्वलणेणं च तित्थूणा बाणउई तेणउई चेवहारचउऊणा सत्ताए गुणनउई अट्ठासी होइ तित्थूणा ॥१८२।। (२२५) [२१०] नेरइयसुरदुगाणं एगयरूव्वलणि होड छासीई । 'तत्तो विउव्विचउसुरदुगाण आसीइ उचलणो ॥१८३।। (२२६) [२११] अत्तरि तेउवाउसंतमिणं पढमचउ । तेरस-खएण चत्तारि खवगस्स ॥१८४।। (२२७) [२१२] साहारसुहुमचउजाइ थावरं आयवं च निरयदुगं । तिरियदुगं उज्जोयं तेरस अनियट्टिवोच्छेए ॥१८५।। (२२८) [२१३] मगुयगइजाडत यरं पज्जत्तसुभगआएज्जं । जसकित्ती तित्थयरं अजोगि जिणसंति नव होति ॥१८६।। (२२९) [२१४] ता तित्थूणा अट्ठ उ केवलिसामन्नसंतए होति । 'इत्तो चंधुदयाणं ट्ठाणाण संवेहो ॥१८७|| (२३०) [२१५] बंधुदयसंतठाणा एगत्थ परूविया वि सव्वत्थ विसेमो पगईसु कायव्वो ठाणमासज्ज ॥१८८|| (२३१) [२१६] नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानानि- नव पच उदयसता तेवीसे छन्वीले । भटु चउर से नवसत्तुगुनीसतीसम्मि ।।सूत्रम्-३१।। (२३२) [२१७] રરકારકારક ૨૦ । ठवणा- बन्ध. उदय० ६/६९ ८ ९ सत्ता ७ तेवीम पन्नवीसा छब्बीसुणतीसतीस बंध नव नव उदयट्ठाणा वीसा नव अट्ठ 'मोत्तूणं ॥१८९।। (२३३) [२१८] ठवणा-२१, २४ २५, २६, २७, २८, २९, ३०.३१, इगिविगला सविगप्पा तिरिमणु न तह सवेउवा । नियनियउदयविगप्पेहि सव्वे पति संभविया ॥१९०॥ (०३४) [२१६] १ "णिरसुरदुगचउविक्कियभट्ठासी असीइ उज्वलणे !! (२२६)" इति L D प्रतौ। २ "हुति" इति L D प्रतौ । ३ "एत्तौ" इति L D प्रतौ। ४ 'मगि गुण ती०' इत्यपि । ५ "बघेसु"इति L D प्रती। ६ "मुत्तूण" इति L D प्रतौ। ।
[३३ नाम्न सत्तास्थानानि वन्धोदयसत्तास्थामानां संवेधश्च नवरं इह पडिसेहो तिरिमणुयाणं च भोगभूमीणं । तणुयकसायत्तणओ अट्ठावीस च बंधति ॥१९१॥ (२३५) [२२०] ते पज्जत्ता एत्थ य अपज्जि गुणतीसमवि य चंधति । जम्हा ते देवेसु न अन्नगड जंति पाए ॥१६२॥ (२३६) [२२१] ईसाणंतसुरा पज्जत्तेगिदियाण पाओगा बंधति मिच्छदिट्ठी पणवीसा तह य छच्चीसा ॥१६३॥ (२३७) [२२२] गुणतीसतीसधा सव्वे देवा य तह य नेरइया नियनियउदयविगप्पेहिं 'सम्ममिच्छाइ जहजोग्गं ॥१९४॥ (२३८) [२२३] बधट्ठाणा २३ | २५ २६ २८ तह ठवणा- ३० २८ २९ ६ ६ है ९ ८ उदयट्ठाणा ५ ५ ५ ४ सत्ताटाणा ७ नव नव उदयट्ठाणा बंधे बंधे य हुति पत्तेयं सवियप्पाई वुत्ता अट्ठावीसम्मि पुण एए ॥१६॥ (२३६) [२२४] अट्ठावीसे बंधे उदयट्ठाणा उ अट्ट नायव्वा केवलितिगचउवीसं चउरो "मोत्तूण सवियप्पा ॥१९६॥ (२४०) [२२५] इगवीसे छव्वीसे उदए जे चट्टमाणया जीवा । खाइगवयगदिट्ठी नियमा बंधंति न उ अन्ने ॥१९७।। (२४१) [२२६] सेसेसु उदएसु सम्मदिद्वि तह मिच्छदिट्ठी य अज्झत्थवसा बंधहि सुरनारयजोग्गनरतिरिया ॥१९८॥ (२४२) [२२७] २८ बधे ८ उदयट्ठाणा-२१।२५।२६।२७१२८।२६।३०॥३१॥ उदएसु जे जीवा चट्टता चंधगा उ ते भणिया । तेसिं तु संतठाणा कित्तिय के कस्स तं भणिमो ॥१९९।। (२४३) [२२८] (१)इगि(२)विगल ३ सगल पंचंसिगा उ चत्तारि आइए उदया। (१)उणवीस(२)ऽद्वारस(३)दुसयअनउआ उ न उ अन्ने (चुन्नीगाहा) ॥२००। (२४४) [२२९] (१)उणवीस(२)ऽद्वारस (३)दुसय अठ्ठनउया य हुन्ति भंगाणं । १ "सम्ममिच्छा य” इति L D प्रतौ । २ "सविगप्पा इय" L D प्रतौ । ३ "मुत्तूण" इति LD प्रती।
३४ ] सप्ततिकामिवे पाठे वर्मग्रन्थे (१)इगि (२)विगल(३)सगलतिरिए पणतीसा तिन्नि सव्वे वि ३३५॥२०१।। (२४५) [२३० ठवणा- उदय २१ २५ २६ सव्वे भगा सू० अप० १ २ ३ सू०प० १ ५ १६ १ एगिदिय बाro १ ३ बा प० २ ४ १ १ वि०अप० ३ ३ ६ | १८ वि०प० w ६ १२ विगल० | पणिदिति० पति अप० १ १ २ प०ति०प० २५८४६/२६८ सत्ताठा० ५ ५ ५ ५ २०३३५ नेया । २सेसा उ सबभंगा अत्तरिसंतवज्जिया चउगइ जियसंभविया ७४५६ पणसंतहाण पुण एए ॥२०२॥ (२४६) [२३१] वाणउई अट्ठासी, अट्ठत्तरि असि य होइ 'छासीइ । चउपढमेसुदएसु अत्तरिवज्ज सेसेसु ॥२०३।। (२४७) [२३२] य एवं संवेहो बंधट्ठाणेसु पंचसु वि भणिओ । नव पंच उदयसंता वुत्ता सेम च "वोच्छामि ॥२०४॥ (२४८) [२३३] नव पचे उदय सनगाण २ ठवणा- बधट्ठाणा २३ २५ २६ ३० उदयट्ठाणा ६ ६ ६ सतठ्ठाणा ४० •४ ४० ४० ४० ४० १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति । J प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । २ "सेसा अद्वत्तरि सतवजिया भगा ७४५६ ।। श्य एव सव्वभगा अत्तरिसनवजिया नेया" । इति J प्रतिप्रेमकोप्याम् । ३ "छासीया" इति LD प्रतौ। ४ "वुच्छामि" इति L D प्रतौ ।
नाम्नो वन्धोदयसत्तास्थानसवेध' [ ३५ उ उणतीसतीसवंधे संतवाणा पत्तेयं । पण पण इह पुन्चुत्ता तित्थजुया दुन्नि पुण एए ।। (२४६) चउवीसं इगतीसं उदए 'मोत्तु उणतीसवंधम्मि दो दो य संतठाणा तेणउई अउणनउई य ॥२०५॥ (२५०) [२३४] एवं तीसे बंधे नवरं छब्बीस मुत्तु छटाणा । इय संवेहो वुत्तो नव सत्तुगतीसतीसम्मि ॥२०६॥ (२५१) [२३५] बधट्टाणा | २९ ३० उदयट्ठाणा ७ दो दो संतढाणा-१३-८८ सत्ताठाणा| १४ | १२ w अट्ठावीसे वंधे संवेहो अट्ठ उदय चउसंता वाणउई अट्ठासी छासी तह अउणनउई य ॥२०७}} (२५२) [२३६] छसु आइएसु दो दो बाणउई अट्टसी य ठाणाई । तीसे चउरो ठाणा उणनउई मुत्तु इगतीसे ॥२०८।। (२५३) [२३७] अखबीसवट्ठाणे २५ | २६ । २७ २७ । २७ । २८ २९ ३० ३१ ६२ ६२ ९२ | १२ १२ १२ ९२ elec १६ ठवणा- उदयठाणाणि २१ एव ९२ १२ ६८ ८८ ८८ ८६ ८८ सत्ताठाणाणि पर ८६ ८६ तीसोदय उणनउई अट्ठावीसे कहं भवे वंधे । भाचार्य प्राह मणुतित्थसंतगम्मी मिच्छगए निरयमिमुहम्मि ॥२०९।। (२५४) [२३८] तित्थयरसंतकम्मी सम्मदिट्ठी उ वंधए णियमा । उणतीसं तित्थजुयं वेयगधा उ नो अन्ने ॥ (२५५) १ "मुत्तु” इति L D प्रतौ । A पेज न० ५२ A एतच्चिह्नगत टिप्पनक द्रष्टव्यम् ।
३४ ] सप्ततिकामिवे षष्ठे कर्मग्रन्थे (१)इगि (२)विगल गल(३)सगलतिरिए पणतीसा तिन्नि सव्वे वि ३३॥२०१॥ (२४५) [२३० 'ठवणा- - उदय २१ । २४ २५ २६ सव्वे भगा सू० अप० १ २ ३ सू०प० १ २ १ १ १ १६ एगिदिय बा अ० १ २ ३ बा १० २ १ १ वि०अप० ३ ३ ६ १८ वि०प० ६ ६ १२ विगल. पणिदिति पति अप० १ १ २ प०ति०प० २८८४६२६८ सत्ताठा०५ ५ ५ २०३३५ सेसा उ सबभंगा अत्तरिसंतबज्जिया अत्तरिसंतवज्जिया नेया । चउगइ जियसंभविया ७४५६ पणसंतहाण पुण एए ॥२०२॥ (२४६) [२३१] वाणउई अट्ठासी, अट्टत्तरि असि य होइ "छासीइ । चउपढमेसुदएसु अत्तरिवज्ज सेसेसु ॥२०३।। (२४७) [२३२] इय एवं संवेहो बंधहाणेसु पंचसु वि भणिओ । नव पंच उदयसंता वुत्ता सेमं च 'वोच्छामि ।।२०४।। (२४८) [२३३] नव पवं उदय सनगापा २ ठवणा- बघट्ठाणा २३ २५ २६ २६ ३० उदयट्ठाणा है ६ ६ ९ ६ सतढाणा ४० ४० १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति । J प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । २ "सेसा अट्टत्तरि सतवज्जिया भगा ७४५६ ॥ श्य एव सव्वभगा अठ्ठत्तरिसतवजिया नेया" । इति J प्रतिप्रेसकोप्याम् । ३ “छासीया" इति LD प्रतौ । ४ "वुच्छामि" इति LD. प्रतौ ।
नाम्नो वन्धोदयसत्तास्थानसवेधः [ ३५ उ सत्त पत्तेयं । उणतीसतीसबंधे संतवाणा पण पण इह पुबुत्ता तित्थजुया दुन्नि पुण एए ।। (२४६) चउवीसं इगतीसं उदए 'मोत्तु उणतीसवंधम्मि दो दो य संतठाणा तेणउई अउणनउई य ॥२०५॥ (२५०) [२३४] एव तीसे बंधे नवरं छत्रीस मुत्तु छट्ठाणा इय संवेहो वुत्तो बुत्तो नव सत्तुगतीसतीसम्मि ॥२०६॥ (२५१) [२३५] वघट्टाणा २९ । ३० उदयट्ठाणा) ७ ६ दो दो संतढाणा-६३-८४ सत्ताठाणा) १४ । १२ अट्ठावीसे बंधे संवेहो अट्ठ उदय चउसंता वाणउई अट्ठासी छासी तह अउणनउई य ॥२०७। (२५२) [२३६] छसु आइएसु दो दो बाणउई अट्ठसी य ठाणाई । तीसे चउरो ठाणा उणनउई मुत्तु इगतीसे ॥२०८॥ (२५३) [२३७] अडबीसबढाणे ठवणा- उदयठाणाणि २१ २५ २६ २७ २८ २६ ३१ / एवं ९२ | १२ ९२ ६२ | १२ ९२ ६२ ६२ ८८ ८८ ८८ ८८ ८६ ८८ सत्ताठापणाणि पप ८६ ८६) तीसोदय उणनउई अट्ठावीसे कह भवे बंधे । आचार्य प्राहमणुतित्थसंतगम्मी मिच्छगए निरयभिमुहम्मि ॥२०९।। (२५४) [२३८] तित्थयरसंतकम्मी सम्मदिट्ठी उ बंधए णियमा । उणतीसं तित्थजुयं वेयगवंधा उ नो अन्ने । । (२५५) १ "मुत्तु " इति L D प्रतौ । पेज न० ५२ 4 एतच्चिह्नगत टिप्पनकं द्रष्टव्यम् ।
सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थे ठवणा- २६ ३ है ६ ६ ६ सत्ताठाणा ४० ४० ४० १६ ५२ वेगसम्मद्दिड्डी णिरयाभिमुहो वमेइ सम्मत्तं । तेण मुहुत्तं भिन्न उणनउई मिच्छमंता उ ॥ (२५६) सतढाणाण सखामाह- आइतिए वीमसयं उणवीसा तह य होड चउपण्णा वावन्ना वि य कमसो सत्ताठाणाई छण्हं पि ॥२१०।। (२५७) [२३९] बधट्टाणा | २३ | २५ २६ / २८ उदयट्ठाणा ५४ | एगेगमेगतोसे एगे एगुदय अट्ट संतम्मि उवरयबधे दस दस वेयगसतमि ठाणाइ । सूत्रम् ३२।। (२५८) [२४०] इगतीसे बंधम्मी उदओ तीसन्ह तेणवइसत्ता तह एगवंधि उदयं ३० संतवाणाइँ तहि अट्ठ ॥२११॥ [२४१] जसकित्ति बंधु तीमन्ह उदय तह संतठाण अढे व ।। (२५६) पढमा चउरो ठाणा ते चिय पत्तेय तेरसविहूणा । इय अट्ठ संतठाणा जसकित्तीबंधसंवेहो ॥२१२।। (२६०) [२४२] उवरयवंधे दस उदयठाण तह दस य संतठाणाई । चउवीसा पणवीमा छलसी अत्तरी मुत्तु ॥२१३।। (२६१) [२४३] 'ठवणा- बधठा० ३१ १ उदय० १ १ १० सत्ताक १ १० । वीसछ्वीसा तीमा केवलिणो पुव्ववुत्त उदयाउ सरसाससव्वरोहे नवअट्ठयअहियवीस अट्ठव ॥२१४॥ (२६२) [२४४] दो दो य संतठाणा उणसी पन्नत्तरी य सव्वेसु । अट्ठोदयम्मि संतं ते चिय अट्ठव संतम्मि ॥२१५(२६३) [२४५] १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, J प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति ।
नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानसवेधश्चतुर्दशजीवस्थानेपु जानावरणान्तराययो' संवेधश्च [३७ एए केवलिउदया तित्थजुया ते य छच्च तित्थयरे । दो दो संतवाणा आसी 'छाहत्तरी तह य ॥२१६।। (२६४) [२४६] छठ्ठदए नवपयडी ते चिय संतम्मि चरिमसमयम्मि । तित्थयरकेलिस्सा तइयं ठाणं तु संतम्मि ॥२१७|| (२६५) [२४७] उवसंते चउ पढमा तीसे उदयम्मि तह य तित्थयरे । रसणं केवलिनियरे उवरयवंधम्मि संवेहो ॥२१८।। [२४८] तेरस तेरस भेया केवलितित्थ्यर तह य उवसंते । चउ पढमा तीसुदए उवरयवंधम्मि संवेहो ॥ (२६६) २उवरयवधे ठवणा- उदयठाण० २० २१ | २६ २७ २८ २९ ३० ३० ३१ ८ सम्वे ६ - सत्ताठाण २ २ २ २ २ 5 ३ ३० सामान्येन नाम समाप्तम् ।। मूलुत्तरपगईसु बंधोदयसंतठाण इय भणिया जीवगुणठाणगेसु तह उत्तरपगइसु भणिमो ॥२१६।। (२६७) [२४९] तिविगप्प पगइठाणेहि जीवगुणसण्णिए ठाणे भगा पउंजियवा जत्थ जहासंभवो भव ।।सू-३३।। (२६८) [२५०] तिविगप्पा बोधव्वा बंधं उदयं च संतठाणतिगं भंगा पउंजियव्वा जियगुणठाणाण संभविया ॥२२०॥ (२६९) [२५१] चतुर्दशजीवस्थानेषु ज्ञानावरणान्तराययोबन्धोदयसत्तास्थानभङ्गा तेरसमु जीवसंखेवएसु नाणंतरायतिविगप्पो एक्कम्मि तिदुविगप्पो करणं पइ एत्थ अविगप्पो॥सू.-३४।।(२७०) [२५२] नाणावरणतरायठवणा- सण्णी जीवट्ठाणा ३ ध ० ५ ५ उदय ५ ५ ५ सत्ता ५ ५ १ 'तहाहारचउरहिया" इति J प्रतिप्रसकोप्याम् । २-४ इद यन्त्र L D प्रताबस्ति, J प्रतिप्रेस- कोप्या नास्ति । ३ "इत्य" इति L. D प्रतौ । , ३८] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे करणं पइत्ति जोगी मणमाईणि उ हवंति करणाई । सञ्चसओ दुण्हं पि हु करणं पड़ तेण अविगप्पो ||२२१।। (२७१) [२५३] जीवस्थानेषु दर्शनावरणीयस्य वन्धोदयसत्तास्थानमगा तेरे नव चउ पणगं नधसएगस्मि भग 'मेक्कारा । 'वेयणियाउं गोए विभज्ज मोहं पर वोच्छ ॥सू.-३५॥ (२७२) [२५४] नवबंधं नवसंतं चउपण उदयम्मि दंसणावरणे 'तेरससु आइमेसु सण्णी पुव्वुत्त एक्कारा ।।२२२।। (२७३) [२५५] • ४ । ५ 'ठवणा- वधठाणा ९ ६ . . ४ ६ ० ४ उदयठाणा ४ ५ oc ४ ४ सत्ताठाणा 8 है ६ है ९ है ६ है 8 ६ जीवस्थानेषु वेदनीयगौत्रयोर्बन्धादिस्थानाना मना - पज्जत्तगसनियरे अट्ठ चउक्क च वेयणियभगा । सत्तग तिग च गोए पत्तेय जीवठाणेसु ।। सूत्रम्-०।। (२७४) [२५६] ॥ ठवणा- बधो . अ अ.,सा सा. मा० सा० य अ सा अ० सा- सा. य सा० य० उदओ अ. सा- सा०। य० सा- य० सा० सत्ता २ २ २ २ २ १ पढमा दुग तह तुरिओ गोए वेयणियभंगचत्तारि । तेरससु आइमेसु सन्नीपज्जत्ति पुच्चुत्ता ॥२२३।। (२७५) [२५७] "तेरससु जीवठाणेसु ठवणा- बध० नी नी उदय० नी नी नी सत्तानी २ २ १ "मिक्कारा" इति L D प्रतौ। २ 'वेयणियाउय गोए" इति L. D प्रतौ । ३ "तेरससु पि इमासु" इति L D प्रतौ। ४ इक्कारा" इति L D प्रतौ । ५-६-७ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, J प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति ।
जीवस्थानेषु ज्ञानावरणादिकर्मवन्धोदयसत्तास्थानभङ्गा [E 'सन्निपजन्तगस्स ठवणा- . बंधो उच्च . नीय० नीय० नोय० | उच्च उदो नीय० नीय० । उच्च० नीय उच्च उच्च उच्च सत्ता नीय० २ २ २ २ २ सणिम्मि सत्त भंगा पढमो कह जेण तेउवाऊणं । भण्णइ पढमुश्चवण्णे तेहितो तिरियसण्णिम्मि ॥२२४।। (२७६) [२५८] जीवस्थानेष्वायुषो बन्धादिस्थानमगा पज्जत्ता-ऽपज्जत्तगस गे पज्जत्तअमण-सेसेसु । अट्ठावीसं दसग नवगं पणगं च आउस्स ॥सू.- ०॥ (२७७) [२५६] सण्णिअपज्जमणुतिरिय मणुतिरिजोगं च आउ बंधंति । 'एक्कक्कु वंधपुव्वे बंधु४त्तर४ चउर इय दसओ ॥२२५।। (२७८) [२६०] सन्नी पज्जे भंगा अडवीसं पुचवुत्त आउम्मि पज्जाऽमण तिरियसमा पण "इक्कारे य ५ देवसमा ॥२२६।। (२७६) [२६१] - 'ठवणा- ११ जीवठा० ५ प० अस० है अप० सं० १० प० स० २८ जीवस्थानेषु मोहनीयबन्धादिस्थानभङ्गा- अट्ठसु पंचसु एगे एगदुर्ग दस य मोहषधगए । तियचउनवउदयगए तिग तिग पण्णरससंतम्मि ।।सू.-३६।। (२८०) [२६२] १.६ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, 1 प्रति प्रेसकोप्या नास्ति, २ 'भन्नई" इति D प्रतौ १३ "०ववन्ने" इति L D प्रतौ । ४ "एगो अवधपुव्वे" इति उ. प्रतिप्रेसकोप्याम् । ५ “एकारे” इति LD प्रती।
४०] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे 'ठवणा- जीवठा० ८ or वधठा० or २ १० उदयठा० ३ ४ ६ सत्ताठा० KW ३ १५ अट्ठ उ जीवट्ठाणा सत्त अपज्जत्तसुहमपज्जो य । बावीसबध एगं दुवंधरपढमा भवे पणगे ॥२२७॥ (२८१) [२६३] २ठवणा- जीवठा २२ बधठा० २२ उदया पत्तेयं - वायरविगलअसन्नी पज्जत्ता पंच हुति जियठाणे । चावीमा इगवीसा दुगवंधा मिच्छसाणाणं ॥२२८॥ (२८२) [२६४] छब्बावीसे 'चउएगवीस [भंगं दु]चंधम्मि जे उ पुव्वुत्ता । इगविगलेसु तेच्चिय जेण तिवेएसु ते जंति जेण तिवेएसु ते जंति ॥२२९।। (२८३) [२६५] अडनवदसगं जीवठाणतेरससु बावीसबंधगेसु इयरेसु नवंतसत्ताई ॥२३०॥ (२८४) [२६६] चउवीमा चउचउरो तिगतिग उदएसु वनिया पुव्यं । नवरं नपुसवेइसु चउरट्ठ पणिदिए * *मोत्तुं ॥२३१।। (२८५) [२६७] छप्पन्नं इह अट्ठा सोलस चउवीस गुणिअनामेहि अट्ठसया बत्तीसा ८३२ उदयविगप्पा य मोहस्स ॥२३२।। (२८६) [२६८] पयविंदविहिमाह- छत्तीसाणं दसगं चउरो बत्तीस तिन्नि छत्तीसा । अट्टऽट्ट गुणायारो तह चउवीसाइ पयविदा ॥२३३।। [२६९] १.२ इद यन्त्र L D प्रताबस्ति, I प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । ३ "चउइगवीसे [भगदु]" इति LD प्रती * पेज न० ४२ एनच्चिह्नगत टिप्पनक द्रष्टव्यम् । ४ "मुत्त" इति L D. प्रतौ । ५ "गुणसनामेहिं' इति L D प्रतौ। । ६"उ' इति L D प्रतौ ।
जीवस्थानेषु मोहनीयस्य बन्धोदयसत्तास्थानानि तद्भङ्गाश्च [ ४१ अड अन्ना बत्तीसा वि य चवीसाए गुणित्तु सिवएसु । चाहत्तरिसयचउसद्विअहियपयविंदपिंडेणं ॥२३४॥ [२७०] उदए नपुंसवेए वंधे बावीस उदयठाणतिगं नव दसगं कमसो इगदुगएक्का चउवीसा ।। (२८७) उदयगुणा छत्तीसा ते दस ठाणा नपुसउदयम्मि । ते अट्ठा छत्तीसा दसहिँ गुणा तिन्नि सय सट्टा ३६० ।। (१८८) पज्जत्तवायरविगला ४ वंधे इगवीस साणमासज्ज सत्ताइ नवंतुदया नपुस चउरह पत्तेय ।। (२८६) उदयगुणा बत्तीसा चउग्गुणा १२८ ते य हुति इह अट्ठा । पुव्वुत्त ३६० एइ अट्ठा अट्टगुणा हुन्ति पयविंदा ३९०४ ।। (२९०) छत्तीसं चउवीसा तीसु वि पत्तेय मिच्छगुणठाणे १०८ । सासण अमणे पज्जे बत्तीसा विदचउवीसा १४० ॥ (२६१) चउरुत्तरगुणयाला ३६०४ अट्ठगुणा इत्थ होति पयविंदा । तेत्तीससया इह सद्विसहिय ३३६० चउवीसगुणकारे ।। (२६२) वाहत्तरि चउसट्ठा ७२६४ पयविंदाणं तु मोहनीयम्स । तेरससु आइमेसु सन्नीपज्जत्ति पुच्चुत्ता ॥ (२९३) जीवट्ठाणा मुहुम न बायर ऽप वेइ.ऽप ते ऽप चउ ऽप. ऽसप सप. सुहमपज्ज वट्ठाणा २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ बधभगा ६ ६ ६ ६ w w ६ ६ १०० १ . उदयट्ठाणा ६.१०८६१ 8 ८९१०८११०८६ ८६१० चवीसियाण १२१/१२/११/२/११२११२११२११२/१२/२१ अट्ठाण च सखा चवीसिया २ १२४ ६२४ अगावा १११६ ८ ६ पेज न०४२ द्रष्टव्यम् ।
४२ ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे बादरपज्ज वे पज्ज ते पज्ज च पज्ज ऽस-पज्जा बा पज्ज | वे.पज्ज ते.पज्ज च पज्ज ऽस-पज्जा २२ २२ २२ २२ २२ २१ २१ २१ २१ २१ w ६ ur ६ ३ wr ४ ४ ४ ८१०८१०८8 ० ८६ ८६ ०७/८/९/७/८/६/७/८/९ ८६७८९ १२१ १२ ११/२१/१/२|११|२|११|२|१|१ ११ २१ २१/१/२१ २४ २४ ८ | = ५६ अट्ठगा + १६ चउवोसा-८३२ उदयविगप्पा । ३२/३-३२/३२/३२/९६८ २/३२/३२/३२९६३२/३२/३२/३२ ર ३६३६३६/३६।२६३६३६३६|३६/३६३६३६३६३२ ૨૬૨૬૨૬૨૬૨૬રિકરિરર રરરર રરરર ३२६६ उदए-ऽgगा पए-ऽट्रगा- चउवीसिया वा पयविंदा USIS IS IS | ८६४ २५६ 3c २५६ ७६८ SIS इगि विगल अपज्जत्ता सुहुमो पज्जो य छच्च जियठाणा । तह विगल चारपज्जा उदइ नपुसेण ए दस उ ॥२३॥ (२९४) [२७१] * अस्सन्निसनिपज्जा तह य अपज्जा य चउर जियठाणा । तिगवेयपरावत्तो उदए आसज्ज चउसुपि आसज्ज चउसुपि ॥२३६।। (२६५) [२७२] तेरससु जीवठाणेसु सतट्ठाणसंखमाह इगवीसबंधगाणं सासणभावम्मि पंचजियठाणा उदएसु पत्तेय एगा अडवीस संतम्मि ॥२३७॥ (२९६) [२७३]] वावीसबंधतरस वंधे वंधे य तिगतिगं उदया उदएसु पत्तेयं तिगतिगसंता उ पुव्वुत्ता ।।२३८।। (२६७) [२७४] * इह ग्रन्थे लव्ध्यपर्याप्ताना सझ्यसज्ञिपञ्चेन्द्रियाणामपि वेदत्रयमङ्गीकृत्य यत्प्ररूपण कृत तत्तु सर्व- स्या-ऽपिलव्ध्यपर्याप्तस्य नपु सकवेदित्वाच्चिन्त्यम् , यतश्चूर्णिकाररपिलब्धिपर्याप्तसज्ञिनीव लब्धिपर्याप्ता- सज्ञिन्येव वेदत्रयमड्गीकृतम् , न पुनर्लध्यपर्याप्तसझ्यसज्ञिनोरपि, यदुक्तम्-“एक्केक्कम्मि उदयम्मि नपु सगवेदेण चेव अट्ट अट्ट भगा । सेसा न सभवति । असन्निपज्जत्तगस्स तिहिं वि वेदेहि उट्ठावेयध्या ।" इति । किञ्च सिद्धान्ताभिप्रायेण पर्याप्तोऽपर्याप्तो वा सर्वोऽप्यसज्ञी नपु सक एव, यदुक्त जीवस्थानेषु बन्धोदयसत्तास्थानानि तद्भगाश्च [ ४३ -- श्रीप्रज्ञप्तौ-ते णं भते ? असन्निपचिंदितिरिक्खजोणिया कि इत्थिवेयगा पुरिसवेरगा नपुसगवेयगा ? नो इस्थिवेयगा नो पुरिसवेयगा नपु सगवेयगा" इति । एतत्सिद्वान्ताभिप्रायेण च श्रीमन्मल्यगिरिपादें सप्ततिकाया पड्विंशत्तमगाथावृत्तौ पर्याप्ता सज्ञिनि नपुसकवेद एव दर्शित , तत्राऽपि चूर्णिकारामि- प्रायेण वेदत्रयम् , एव सप्ततिकामाष्यपञ्चपञ्चाशत्तमगाथावृत्तौ श्रीमेरुतुझाचावैरपि । तेनाकारमात्रमड्गी कृत्य कार्मग्रन्थिकमताभिप्रायेण लब्धिपर्याप्तासज्ञिनि वेदत्रय समवति, तथैव बहुभिर्वत्तिकारें समर्थित- त्वात् । चूर्णिकारास्तु विपाकोदयापेक्षया वेदत्रयमसज्ञिनि लब्धि पर्याप्ते स्वीकुर्वन्ति, न पुन केवलमाका- रमात्रेणेति विशेष । न पुनर्लव्ध्यपर्याप्तसक्यसजिनोरपि । चउक्क - न च "चउ चउ पुमिथिवेए" इति पञ्चमसग्रहवचनम् , "पुमस्थिवेए चरम चउरो॥” इति प्राचीनपडशी- तिवचनम् , “थीणरपणिदि चरमाचउ'' इति नव्यषडशीति वचनम् , इत्यादिवचनैस्तथा श्रीरामदेवगणि- नैव प्राचीनषडशीतिदशमगाथाविवरणे जीवस्थानेषु मार्गणास्थानानि दर्शयता-"असणि भाज्जत्तगस्स उत्तरभेया। त जहा वेयतिग । सन्निपचिंदियस्स अपजगस्स उत्तरभेया । त जहा-गाव वैयतिगा" इत्यादिना पर्याप्ता- ऽपर्याप्तसज्ञिद्वया-ऽसज्ञियलक्षणेपु चतुर्ध्वपि जीवस्थानेषु वेदत्रय प्रतिपादितम् , अत कथ लब्ध्यपर्याप्तसक्यसज्ञिनोस्त निषिध्यते भवतेति वाच्यम् , अभिप्राया- ऽपरिज्ञानात् , यतस्तत्र सर्वत्रा-ऽप्यपर्याप्त करणेना-ऽपर्याप्त विवक्षित इति न कश्चिदपि दोप, भवत्वत्रा ऽपि करणा-ऽपर्याप्त इति चेत् , सत्यम् , तदेहा ऽप्यदोप एव, किन्तु सो-ऽत्र विवक्षितो नास्ति, यतो लव्ध्यपर्याप्तस्यैवा-ऽत्र विवक्षितत्वेन सप्तस्वप्यपर्याप्तेपु प्रथमगुणस्थानादिकमेव दर्शितम् , अन्यथा द्विती- यगुणस्थानादिकमपि दर्शित स्यात् । ननु यथा भाववेदमाश्रित्य सप्ततिकाभाष्य-५६-५७ तमगाथावृत्तौ मेरुतुगाचायैर्विप कोदयतो देव- नारकाणा वेदत्रयस्य समवो दर्शित तथा च तद्ग्रन्थ -"यद्यप्याकृत्या देवाना क्लीबवेदो नारकाणां च पुंस्त्रीवेदौ न स्तस्तथा-ऽपि विपाकोदयतो वेदत्रयमपि समवति" इति । तथा लब्ध्या-ऽपर्याप्नयो सत्य- सज्ञिनोरपि स्यादिति चेत् , न, तत्रैव सप्ततिकाभाष्य ५५ तमगाथावृत्तौ तैरेव मेरुतुङ्गाचार्यलब्धिपर्याप्त- ज्यतिरिक्ताना त्रयोदशानामपि जीवभेदाना वलस्य नपु सफवेदस्यैवोदयस्य प्रतिपादनात् , एवमन्य त्रा-ऽपि । अन्यथा यथा “उदयविगप्पा जे जे उदीरणाए वि होंति ते ते उ । अतमुहुत्तिय उदया समया- दारम भगाय॥३॥” इति पञ्चसग्रहसत्कसप्ततिकागाथाम्बोपज्ञवृत्तौ-"युग्मेन वेदेन वा-ऽवश्यमन्तमुहूर्ता- दरत परावर्तितव्यम्" (पञ्चसग्रहप्रथममागपत्र-२४३-१) इति स्ववचनमादृत्य पञ्चसहकारीवस्थानेषु वन्धहेतून दर्शयद्भिश्चतुर्दशस्वपि जीवस्थानेषु वेदत्रयं प्रतिपादितम् , (पञ्चसग्रहप्रथमभागपत्र-१७६-१८२) तथा चूर्णिकार-भाष्यवृत्तिकारादिभिरपि चतुर्दशस्त्रपि जीवमेदेषु वेदत्रयस्य विधान कृत भवेत तुल्यन्यायत्वात् , न च तैस्तथा विहितम् , एव प्रस्तुतग्रन्थे-ऽपि, तथा श्रीमन्मलयगिरिपादैरपि 'उदय विगप्पा " (पञ्चसग्रहसप्ततिका ३३ गाथा प्रथमभागपत्र-२४२-२) इति गाथावृत्तौ युग्मेन वेदेन वाऽवश्य मुहुत्तादारत परावर्तितव्यम्” इति पञ्चसग्रहकारवचन पुरस्कृत्य भावनाया विहितत्वे-ऽपि जीवभेदेपु बन्धनिरुपणावसरे तदनाहतम्” उक्त च तैम्तत्र-"इह सज्ञिपञ्चेन्द्रियव्यतिरिक्ता शेषा. सर्व-ऽपि ससारिणो जीवा परमार्थतो नपु सका , केवलमसज्ञिपञ्चेन्द्रिया स्त्रीपु लिङ्गाकारमात्रमधिकृत्य पु स्त्रीवेदे प्राप्यन्ते” (पञ्चसग्रह प्रथममागपत्र १८३-) इति । ततो वेदत्रयपरावृत्तिमतमप्रधान प्रतिभाति । किञ्च लन्ध्यपर्याप्त सर्वो-ऽपि नपु मक एवेति हेतोरत्र लध्यपर्याप्तसझ्यसज्ञिनोर्वेदत्रयस्य यत्प्रतिपादन तदु विचारणीयम् । . .
४४] सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थे इगवीसे ते पणरस सत्तरसयं तु चंधि तु धि बावीसे । बत्तीसं संतसयं सन्नी सामन्नगहणेण ।।२३९॥ (२६८) [२७५] ठवणा- बध० २२ २२ २२ २२ ૨૨ २२ २२ २२ २ ૨૨ उदय |८||१०८ ९ १० ८ ९ १०८/६/१०/८/६/१०/८/९/१०८६१०८६१०८ ९/१० सत्ता ३३३ | ९/१० ८ ६ [१० ८६१ TERIER ६ ६ ६ ६ ६ २२ २२२ २२ २२ २ २१ २१ २१ २१ ८ ०८/६/२०८६ ६ १० है ७ ९ है ३ ३ ३ ३ ३ इति जीवस्थानेपु मोह समाप्त ॥ जीवस्थानेषु नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानानि- पणदुगपणगं पणचउ पणगं पणगा हवंति तिन्नेव । पणछप्पणग छच्छप्पणगं अट्ठदसगं 'च ॥सू.-२७।। (२६८) [२७६] एतद्गाथाद्वयस्य विवरणे L D प्रतौ गाथाप्रतीकानुसारेण पूर्व सप्तत्त्वप्यपर्याप्तजीवभेदेषु नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानानि प्रतिपाद्य तत पर्याप्तसूक्ष्मजीवभेदे, पर्याप्तबादरजीवभेदे, पर्याप्तविकले- न्द्रियभेदत्रये पर्याप्ताऽसजिजीवभेदे च क्रमेण भणितानि । J प्रतिप्रेसकोप्या पुन प्राक् त्रयोदशस्वपि जीवभेदेपु बन्धस्थानानि, तत उदयस्थानानि त्रयोदशजीवभेदेपु, तत सत्तास्थानान्यपि त्रयोदशसु जीवभेदेषु प्रतिपादितानि इति गाथाभेट गाथाक्रमभेदश्च J प्रतिप्रेसकोप्यपेक्षया विवरणगाथा- २४१ त २८३ सन्ति । L D प्रतौ विवरणगाथा-३०१ त ३५० भवन्ति । तथा L D प्रतौ त्रयोविंशतिबन्धकत्व वैक्रियोदयवता पञ्चविंशति-सप्तविंशत्युदयस्थानद्वयगताना प्रतिषिद्धम् , J प्रतिप्रेसकोप्या न निषिद्धम् , नाम्न एकोनत्रिंशद्बन्धस्थाने एकविशतिषड्विंशत्युदय- स्थानयोस्त्रिनवतिसत्स्थान J प्रतिप्रेसकोप्या निषिद्धमपि L D प्रतौ न प्रतिसिद्धम् । तेन J प्रतिप्रेस- कोप्यपेक्षया L D प्रतौ त्रयोविंशतिबन्धस्थाने पञ्चविंशतिषड्विशत्युदयस्थानयो प्रत्येक द्वे द्वे सत्तास्थाने इति चत्वारि सत्तास्थानानि न्यूनानि, एकोनत्रिंशद्वन्धस्थान एकविशति-षड्विंशत्युदयस्थानयो प्रत्येक त्रिनवतिसत्स्थानमिति द्वे सत्कर्मस्थाने अधिके । तत पर्याप्तसज्ञिजीवभेदे बन्धाऽबन्धस्थानवयु- दयस्थानगतानि समुदितानि सर्वाणि सत्तास्थानानि L D. प्रतौ अष्टोत्तरशतद्वयम् २०८, J प्रतिप्रेस कोप्या दशाधिकद्विशते २१० सन्तीति विशेष । १"ति" इत्यपि पाठ ।
जीवस्थानेषु मोहनीयनाम्नोबन्योदयसत्तास्थानानि तद्भगाश्च [४५ सत्तेव अपज्जत्ता सामी 'सहुमो व बायरो चेव । विगलिदियाउ तिन्नि य तह य असन्नी य सन्नी य ।।सू.-२८ । (३०८)[२७७] २पणदुगपणगति एएसिं विवरण | पणबधट्ठाणा ते य इमे- तिग२३पणवीस २५छ्वीसा२६गुणतीसा२९तीस३०बंधठाणा उ । पढमम्मि जीवठाणे इय नेयं नाव तेरससु ॥२२०॥ [२७] पढमम्मि जीवठाणे इय णेयं जाच सत्तसु य । (३०१) भगा इह मिच्छसमा चारणाहिट्ठा उ कया ॥ चउ ४ पणवीसा २५ सोलस १६ वाणवइसया वि हुंति चालीसा ९२४० छायालं बत्तीसा ४६३२ सत्तअपज्जेसु पत्तेयं ।। (३०२) अमणम्मी पज्जत्ते छद्धा अडवीमवधिमागच्छे सन्नी पज्जत्ते पुण अट्ठव य होति पुव्वुत्ता ॥२४॥ [२७६] भंगा इह पुव्वुत्ता सव्वत्थ वि जीवठाणवधेसु पत्तेयं जोइज्जा जे जत्थ व होति संभविया ॥२४२॥ [२८०]] इगचउवीसेगिदिसु २१।२४ छ्वीसइगवीस ६६।२१ पंचसु तसेसु । दो दो उदयअपज्जे[स] भंगा सव्वे वि पंचंसा ॥२४३।। (३०३) [२८१] इगवीसे दो भंगा वायरसुहुमेहि "एक्कइक्केण । 'बायरपत्तेगियरे चउरो चउवीसि अजसेण ॥२४४॥ (३०४) [२८२] अप्पज्जपणतसाणं सव्वासुभपगइमिलिय मेक्केक्क इगवीसे छब्बीसे पण पण पत्तेय दुण्हं पि ॥२४५।। (३०५) [२८३] मणुयअपज्जे भगा चउ चउरसंतकम्मंसा अट्टत्तरी न तेसि सेसा चत्तारि संभविया ॥२४६।। (३०६) [२८४] एत्थ अपज्जत्ताणं असन्निसन्नीण भंगया दो दो । इगवीसे छव्वीसे मणुजोगे चउरए हुंति ॥२४७।। [२८५] पणचउपणगं सुहमे बंधे भंगा अपजसमसव्वे उदएसु पुण भंगा चउसु वि उदएसु पत्तेयं ।। (३१०) नवर वा पाठ १ "तह सुहमवायरा चेच" इत्यपि, 'सुहमा य वायरा चेव' इत्यपि, "सुहुमो य बायरो चेव" इत्यपि, । २ अय पाठ L D. प्रतावस्ति, J प्रतिप्रेसकोग्या नास्ति । ३ "छट्ठा" इति वा । ४ "पणसना ।। (३०३)” इति L D प्रतौ । ५ "एक्कमेक्केण" इति L D प्रतौ । ६"तह पत्तेगियरेहिं दो दो" इति L D प्रतौ । ७ “एक्कोको" इति L D प्रतौ । ८ "भगा उ” इति D प्रतौ ।
४४] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे इगवीसे ते पणरस सत्तरसयं बावीसे । बत्तीसं संतसयं सन्नी सामन्नगहणेण ॥२३९॥ (२६८) [२७५] तु चंधि ठवणा- बध० २२ २२ २२ २२ ૨૨ २२ २२ २२ २२ उदय]८/६१०/८/९/१०/८/६/१०८/६/१०/८/१०/८/९/१०८/६/१०८६१०८/९/१० ९ १० ER CTER० ८/९/१० २८ सत्ता २७३३ ६ है है है ह २२ २२ २२ २२ २१ १ २१ २१ २१ ८६ ६ १०८ ८६ १०८ ९ १० ७८९/७/८ ७८/९/७/८/९ है 8 ३ ३ ३ ३ ३ इति जीवस्थानेषु मोह समाप्त । जीवस्थानेपु नाम्नो वन्धोदयसत्तास्थानानि- पणदुगपणगं पणचउ पणगं पणगा हवंति तिन्नेव । पणछप्पणग छच्छप्पणगं अट्टहदसगं च ।।सू.-२७।। (२६६) [२७६] एतद्गाथाद्वयस्य विवरणे L D प्रतौ गाथाप्रतीकानुसारेण पूर्व सप्तत्वप्यपर्याप्तजीवभेदेषु नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानानि प्रतिपाद्य तत पर्याप्तसूक्ष्मजीवभेदे, पर्याप्तवादरजीवभेदे, पर्याप्तविकले- न्द्रियभेदत्रये पर्याप्ताऽसज्ञिजीवभेदे च क्रमेण मणितानि । प्रतिप्रेसकोप्या पुन प्राक् त्रयोदशस्वपि जीवभेदेपु बन्धस्थानानि, तत उदयस्थानानि त्रयोदशजीवभेदेपु, तत सत्तास्थानान्यपि त्रयोदशसु जीवभेदेपु प्रतिपादितानि इति गाथाभेद गाथाक्रमभेदश्च J प्रतिप्रेसकोप्यपेक्षया विवरणगाथा- २४१ त २८३ सन्ति । L D प्रतौ विवरणगाथा-३०१ त ३५० भवन्ति । तथा L D प्रतौ त्रयोविंशतिबन्धकत्व वैक्रियोदयवता पञ्चविंशति-सप्तविंशत्युदयस्थानद्वयगताना प्रतिषिद्धम् , J प्रतिप्रेसकोप्या न निषिद्धम् , नाम्न एकोनत्रिंशद्वन्धस्थाने एकविशतिषड्विंशत्युदय- स्थानयोस्त्रिनवतिसत्स्थान J प्रतिप्रेसकोप्या निषिद्धमपि L D प्रतौ न प्रतिसिद्धम् । तेन J प्रतिप्रेस- कोप्यपेक्षया L D प्रतौ त्रयोविंशतिबन्धस्थाने पञ्चविंशतिषड्विशत्युदयस्थानयो प्रत्येक द्वे द्वे सत्ताम्थाने इति चत्वारि सत्तास्थानानि न्यूनानि, एकोनत्रिंशद्वन्धस्थान एकविशति-षड्विंशत्युदयस्थानयो प्रत्येक त्रिनवतिसत्स्थानमिति द्वे सत्कर्मस्थाने अधिके । तत पर्याप्तसज्ञिजीवभेदे बन्धाऽबन्धस्थानवयु- दयस्थानगतानि समुदितानि सर्वाणि सत्तास्थानानि L D प्रतौ अष्टोत्तरशतद्वयम् २०८, J प्रतिप्रेस कोप्या दशाधिकद्विशते २१० सन्तीति विशेष । १"ति" इत्यपि पाठ ।
[४५ जीवस्थानेषु मोहनीयनाम्नोर्बन्धोदयसत्तास्थानानि तद्भगाश्च सत्तेव अपज्जत्ता सामी 'सहुमो व बायरो चेव । विगलिदियाउ तिन्नि य तह य असन्नी य सन्नी यासू.-२८ । (३००)[२७७] २पणदुगपणगति एएसि विवरण ।। पणबंधढाणा ते य इमे- तिग२३पणवीस२५छवीसा२६गुणतीसा२९तीस३०बंधठाणा उ । पढमम्मि जीवठाणे इय नेयं नाव तेरससु ॥२२०॥ [२७८] पढमम्मि जीवठाणे इय णेयं जाव सत्तसु य । (३०१) भगा इह मिच्छसमा चारणाहिट्ठा उ कया । चउ ४ पणवीसा २५ सोलस १६ वाणवइसया वि हुँति चालीसा ९२४० छायालं बत्तीसा ४६३२ सत्तअपज्जेसु पत्तेयं ॥ (३०२) अमणम्मी पज्जत्ते छदा अडवीमवधिमागच्छे सन्नी पज्जत्ते पुण अट्ठव य होति पुव्वुत्ता ॥२४॥ [२७६] भंगा इह पुव्वुत्ता सव्वत्थ वि जीवठाणवधेसु पत्तेयं जोइज्जा जे जत्थ व होति संभचिया ॥२४२॥ [२८०] इगचउचीसेगिदिसु २१।२४ छवीसइगवीस २६।२१ पंचसु तसेसु । दो दो उदयअपज्जे[सु] भंगा सव्वे वि पंचंसा ।।२४३।। (३०३) [२८१] इगलीसे दो मंगा वायरसुहुमेहि "एक्कइक्केण । बायरपत्तेगियरे चउरो चउवीसि अजसेण ॥२४४॥ (३०४) [२८२] अप्पज्जपणतसाणं सव्यासुभपगइमिलिय मेक्कक्क इगवीसे छब्बीसे पण पण पत्तेय दुण्हं पि ॥२४५।। (३०५) [२८३] नवर मणुयअपज्जे भगा चउ चउरसंतकम्मंसा अद्वत्तरी न तेसि सेसा चत्तारि संभविया ॥२४६॥ (३०६) [२८४] एत्थ अपज्जत्ताणं असन्निसन्नीण भंगया दो दो । इगवीसे छब्बीसे मणुजोगे चउरए हुति ॥२४७।। [२८५] पणचउपणगं सुहमे सुहमे बंधे भंगा अपजसमसव्वे उदएसु पुण भंगा चउसु वि उदएसु पत्तेयं ।। (३१०) ६ १ "तह सुहमवायरा चेव” इत्यपि, 'सुहमा य वायरा चेव" इत्यपि, "सुहुमो य बाथरो चेव" इत्यपि, वा पाठ । २ अय पाठ L D. प्रतावस्ति, J प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । ३ "छट्ठा" इति वा । ४ "पणसना ।। (३०३)" इति L D प्रतौ। ५ “एक्कमेक्केण" इति L D प्रतौ । ६"तह पत्तेगियरेहिं दो दो" इति L D प्रतौ। ७ "एक्कोको” इति L D प्रतौ । ८ "भगाउ' इति L D प्रतौ ।
४६ ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे ।। (३१०) पज्जत्त सुहुम एगो इगवीसे दुगदुर्ग च इयरेसु । साहारणडयरेहि भंगा पण पंचसंतंसा ॥२४८|| (३११) [२८६] इगवीसे चउवीसे डग दुग पणसंतभंगया तिन्नि । तह पणवीसछवीसे इक्केक्को अजसउदएणं ॥२४६।। [२८७] पणवीसे छन्वीसे इक्केको पंच सतंसो दो इह भगा अन्ने साहारणि पण्णवीस छव्वीसे । अत्तरी न तेसिं तेउवाउण संभवइ ॥२५०।। (३१३) [२८८] सुहमे पज्जे उदया चउरो पत्तेय पंच संतंसा चउ पंचा बधे बंधे य पत्तेयं ।। (३१४) "सुहमगिदियपज्जत्तठवणाजतइय- सुहुमे पज्जे पणचउपणग ति बधठाणा उदय- पणधा चउउदया पणसता उदयठा० २१ २३ इह वीसं बधभगा सत्ता- भगाठाणा | २४ | २५ | २६ ४ पणसता २ प्र१ प्र१ २५ २५ २० चउसता ० . सासा १ २६ २० सत्तठाणा- ९२ ९२ ९२ १२ २६ ६२४० ७ २० पणसता ८८ ८८ ८८ ३० ४६३२ ७ २० चउभगा, ८६ ८६ | ८६ | ८६ सवे- | १३६१७ ३५ १०० च उसता ८० ८. ८० ८० सुहुमपज्जत्तबधभगसखा १३६१७ दुन्निभगा। ७८ ७८ ७८ पणगा तिन्नेव त्ति। तिविगप्प वायराणं बंधोदयसंत पणग पत्तेयं बंधा उ अपजसमा उदया पंचेव पुण एए ।। (३१५) वायरडगवीसाए दो भंग जसेयरेहि पणसंता । जसपत्तेडयरेहिं चउरो चउवीसि तह चेव ॥२५१॥ (३१६) [२८६] सुहुमि'' इति L D प्रतौ । २ "रणेय०" इति L D प्रतौ। ३ "दो भगा इह" इति । ४'पन्नवीसि" इति च L D. प्रतौ । ५ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, J प्रतिप्रेसकोग्या नास्ति । १
जीवस्थानेषु नाम्न बन्धोदयसत्तास्थानमगा
[ ४७
ते पणवीसछवीसे चउरो चउरो य एसि 'दुगभंगा ।
पत्तेयअजसचरिया पण संता हुंति नायव्वा ॥२५२।। (३१७) [२९०]
एगिदिअपज्जाणं छन्भंगा सुहमि पज्जि पंचेव ।
अड बायरपज्जत्ते सव्वे उणवीस पंचंसा ॥२५३।। (३१६) [२६१]
सेसा उज्जोयचरिया चउरो दो आयवेण भंगा उ ।
छब्बीसे सगवीसे तिगवाउविउचि पुच्चुत्ता ॥२५४॥ (३१८) [२९२]
पंचेव उदयठाणा चउरो पणसंत एगु पणसंतो
चउचीससंतभेया बंधे बंधे पत्तेयं
य
॥ (३२०)
उणवीसं पणसत्ता
सेसा तेवीस चउरसंता उ ।
बायालीसविगप्पा एगिदियसयलउदएसु ॥२५॥ [२९३]
पज्जत्तजसजसेहिं 'दो दो इगवीसि तह य छव्वीसे ।
बेइंदियतियचउरिदियाण पण पण संतंस पत्तेयं ॥२५६।। [२६४]
विगलअपज्जत्ताणं तिगतिग इगवीसि तह य छब्बीसे ।
पुव्वुत्ता भंगा वारस पुण एए (ति) अट्ठारा ॥२५७।। [२६५]
सूभगआएज्जजसेयरेहि
अट्ठव पज्जइगवीसे
संघयणागिइ भणिया उदए छव्वीसए भंगा ॥२५८|| [२९६]
इय सन्निप्रसन्नीणं तिरियाणं पंच अंसिया नेया ५७६ ।
सेसा उ सव्वभंगा अट्टत्तरिवज्ज संभपिया ॥२५९।। [२६७]
नामे
इह संवेहे जीवठाणेसु बंधसंखाओ ।
चंधेसु उदयसंखा उदएसु य संतसंखा उ ॥२६०॥ (३०९) [२९८)
१ "एक्केक्के" इति L D प्रतौ । २ "सेसचउसता" इति L D प्रतौ। ३"पणसता" इति L D
प्रतौ । ४ "अन्ने” इति L D प्रतौ । ५ "दुस्सु वि उदएसु दुन्नि पत्तेय" इति L D प्रतौ ।
"
४८ सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे 'सत्तअपज्जेसु ठवणा- सत्तअपज्जेसु पण दुग पणग ति, पण वधठाणा, दो उदयठाणा, पण सत्तठाणा। जीवठाणा सुहु० अ० बाद० अ० वेइ० अ० तेइ० अ० चउ० अ० अस० अ० स० अ० उदयठाणा २१ २४ । २१ २४ । २१ २६ । २१ । २६, २१ २६ । २१ । २६ २१ २६ ति । ति१ति.१] ति१ म १ स.१, म १ म १ उदयभगा २ १ २ or १ १ १ १ or सत्ताठणा ६२ १२ १६२ ६.२ ९२ ९२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ ९२ ९२ पचसत्ता ८८ ८८ ८८ ८६ ९६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६६ ८६ 8 ८० ८० ७८ 1 ७८ ति ति } तिति बधठाणा बधभगा उदय- उदय- ठाणा भगा सत्ता- आपणा २३ २ २५ २५ २ ७० २६ १६ २ १ ७० २६ ६२४० २ १६ ७० ३० ४६३२ २ १६ ७० सव्वे→ १३९७ ८० ३५० सत्तअपज्जेसु पत्तेयवधभगा १३९१७ [२६]] तिगपणवीसछ्वीसे उणतीसे तीसबंधठाणेसु नव नव उदयहाणा केवलिए उदय मुत्तूणं ॥२६१॥ इगिचितिचउरपणिदियतिरिमणुसविउच्चि पाय धंति । नियनियउदयविगप्पे सव्वे जे जस्स संभविया ॥२६२॥ १३द यन्त्र L D प्रतावस्ति, J प्रनिप्रेसकोप्या नास्ति ।
जीवस्थानेषु नाम्नो वन्धोदयसत्तास्थानमगा' [ ४६ एगिदितिरितसेसु तेउवासणणंतरूप्पन्ना पज्जत्तीअसमत्ता अट्ठत्तरिसंत केसि वि ॥२६३।। (३२१) [३०] 'पज्जत्तबायरेगिदियठवणा जतइय--- बायरपज्जे पणगा हवति तिन्नेव उदय- सत्ता- वधठाणा वधभगा पण बधा, पण उदया. पण सता। मंगा ठाणा उदयठाणा २१ २४ २५ २६ २७ २३ २६ २४ पणसतभगा २ ४ १ १ २५ २५ ०६ २४ चउसतभगा • १/४ | १०६ १ २६ २४ २४ सत्ताठाणा ५ ५ ५ ५ ४ २९ ६२४० २६ अट्ठभगा पणसता अट्ठारस चउसता, ४६३२ २६ २४ देउठिवभगा ३ तिसता (सव्वे - १३६१७ १४५ १२०) बायरएगिदियपज्जत्तवधभगा ||१३९१७॥ पण छप्पण विगलाणं तिविगप्पा एसि हुंति पत्तेयं । पण बंध अपजसमा उदया छच्चेव पुवुत्ता ॥ (३२२) पजत्तजसजसेहिं दुस्सु चि उदएसु दुन्नि उदएसु दुन्नि पत्तेयं पत्तेयं । नवरं दो उगतीसा सासुज्जोयाण एगयरे ॥ (३२३) तह तीसाओ तिन्नि उ सरदुगउज्जोयएगयरखेवे । सुरदुगएगयरेणं इगतीसा दुन्नि उदएसु छद्गुणा वारसग दो गुणतीसे य चउर तीसुदए । दो इगतीसे अहिया सव्वे विगलाण सहि ति ॥ (३२५) वितिचउरिदियपज्जे दो दो पत्तय भंग छच्छ इगवीसे छन्वीसे पणसंता सेसचउसंता ॥ (३२६) एए चितिचउरिदिय उदया सव्वे वि डंति पत्तेयं दो पढमा पणसंता चउरुदया चउरसंता उ ॥ (३२७) बंधेसु जे भंगा उदया भंगा उ जे उ बंधम्मि । उदएसु सत्ता पत्तेयं मग्गणा होइ ॥ (३२८) १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति,J प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । ।। (३२४) जे ५० ] सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थे २८ | २९ . 'ठवणा- पण छप्पण विगलाण ति | पण बधा छ उदया उदय सत्ता- पणसतठाणा विगलेसु बधठाणा बंधभगा भगा ठाणा उदयठा० २१ १ | २६ ३० | ३१ २३ २० २६ पणसता २ २ २५ २५ २६ चउसंता ६ १६ । २० २६ विगलभगा ६ ६ ६ १२ १८ २६ ९२४० २० / २६ सत्ताठाणा ५ ४ ३० ४६३२ २० | २६ एव बेइदिय-तेइंदिय-चउदियाण पज्जाण पत्तेय (सव्वे→ १३९१७ १०० १३०) २ २६ १२ ५ 20 ४ बधे पत्तेयविगलभंगा ॥१३९१०॥ छ छप्पणग ति ॥ पजामण विगलसमा उदयविगप्पा उ सन्निसारिच्छा । बंधेसु संतसंखा विगलाण व तस्स तीससयं (३२६) तह अडवीसा अन्ना सवियप्पा वंध अमणाणं देवनिरयगइजुग्गा अंतिल्लेहिं दोहि उदएहि ॥ (३३०) अट्ठासी वाणउई सत्ताठाणा उ दोन्नि पुवुत्ता । छासीई होइ तहि दोसु वि उदएसु छस्संता (३३१) २ठवणा-छछप्पणग ति छ बधा, (छ) उदया (पण)सत्ताठाणा उ अमणपज्जे विधठाणा वधभगा उदयभगा सतठाणा उदयठाणा- २१ | २६ | २८ २९ ३० ३१ २३ ४६०४ पणसतभगाने २८८ २५ २५ ४६०४ २६ ४ २६ ए च उसतभगा→ ० ० ५७६/११५२/१७२८११५२ २६ ४६०४ २६ सत्ताठाणा-→ ४ ४ ४ २८ है २८८. ६ २९ ९२४० ४६०४ २६ ४६३२ ४६०४ २६ (सव्वे- १३६२६ २७४०० १३६) १-२ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति ।
जीवस्थानेषु नाम्मो बन्योदयसत्तास्थानमङ्गा [५१ जा अमणा अप्पज्जे पणवंधा दुगद्ग उदयाउ पंच'सत्तंसा । पंचुदया दसठाणा बंधे बंधे य पत्तेय १२६४।। (३०७) [३०२] पंचगुणा पंचासा सत्त अपज्जत 'तेहि गुणकारो । तिन्नि सया पन्नासा संतढाणाण उदएसु ॥२६शा (३०८) [३०३] सुहुमेयर पज्जाणं ठाणा चउ १००पंच१२०उदयसखाए । चउ पणसंतंसा एगे चउसंतकम्मंसो एगे चउसंतकम्मंसो ३२६६।। [३०४] वेइंदियाइपज्जत्तयाण छच्चुदयठाण आइमदुग पणसंता अद्वत्तरि बज्जिया सेसा ॥२६७।। दुसु दस चउ सोलसगं बंधे बंधे य मिलिय तीससयं । बेइंदियाइ अमणे मिलिया सयपंच वीसहिया ॥२६॥ [३०६] तह अट्ठवीसबंधे अमणाणं दुन्नि उदयअंतिल्ला । वाणउई अट्ठासी छलसी पत्तेय दोसु छटाणा ॥२६९।। [३०७] तिणि सया पंचासा सयमेगं तह सयं च वीसहियं । अप्पज्जसुहुमवारे विगलामण पंचछच्चीसा ॥२७॥ [३०८] छन्नउय सहस्सेगं जीवठाणेसु । तेरससु आइमेसु अठ्ठदसगाण ई भणिमो ॥२७१।। [३०] अट्टदसग ति पुव्वुत्तबंधठाणा अट्ठ उ उदया उ चउर मुत्तूण । केवलितिगचउचीसं दस सता अट्ट नव मुत्तु ॥२७२।। (३३२) [३१०] एगिदियवायाला विगले छावट्टि केवलीण? चउरो य अपज्जाणं मोत्तु सेसा उ ७६७१ सण्णिस्स ॥२७३॥ (३३३) [३११] सतठ्ठाणा भन्नइ- विगलसमा सन्नीसु छस्सु वि उदएसु संतठाणाई । पणवीसे सगवीसे दुग दुग । ९२ १८८ । एए विउव्वीणं ॥२७४॥ (३३४) [३१२] २१ । २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ उदयभगा- २५ २६ ५७६ २६ (११६६१७७२२८९ ८/१९५२ सतहाणाणि "ठवणा- उदय- ठाणा सखा । - (सत्ताठाणा-→ ५ १ "सतसा" इति . D. प्रतौ। २"तेहिं" इति L. D. प्रतौ। ३ “पचासा" इति 1 D प्रतौ । ४'सता दस" इति L D प्रतौ । ५३द यन्त्र L D प्रतावस्ति, प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । - चउसु पत्तेयं वधठाणा बधभगा ४ ३० । ५२] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे तेवीसवंधगाणं छन्चीसा हुंति संतठाणाणि पणसगवीसे वञ्जिय सेसा उदया जओ तेसिं ॥ (३३५) तेवीसे छव्वीसं तीसं बंधेसु 'ठवणा- एव सत्ता ॥१४॥ २३ | २५ / २६ २६ २५ १६ ९२४८/४६४१ (१३९३४) सत्ताठाणा २६ | ३० | ३० ३० (१४६) उणवीसा गुव्वुत्ता सत्ताठाणा उ अडवीसे ॥ (३३६) तीसं तु संतठाणा पंचसु बंधेसु होति पत्तेयं । १५० उणवीसा पुवुत्ता १९ सत्ताठाणा उ अडवीसे ||७|| तह उणतीसे बंधे सत्त उ उदया उ मणुयमासज्ज । तेणवई उणनवई पत्तेयं संतठाणाई ॥२७६॥ (३३७) [३१४] मणुतित्थसंतियाणं सत्तसु उदएसु वट्टमाणाणं । उणतीस बंधठाणं पंचसु दो । ६३ ८६ । दोसु उणनवई ॥२७७'। [३१५] १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति। A नाम्न एकोनत्रिंशद्वन्धस्थाने मनुष्याणामेव २५-२७-२८-२६-३० प्रकृत्यात्मकेषु पञ्चस्वेवोदय- स्थानेषु वर्तमानाना त्रिनवतिसत्तास्थानस्थान प्राप्यते, नेतरोदयस्थानेषु वर्तमानानाम् , यतो नार- केपु जिननामा-ऽऽहारकसप्तकोमययुगपत्सकर्मकाभावात्तिर्यचु जिननामसत्ताया एवा ऽऽमावाद्दे वेषु नाम्नस्त्रिनवतिसत्कर्मणामेकोनत्रिंशद्बन्धस्थानस्या--ऽभावान्मनुष्या-ऽतिरिक्तगतित्रयगताना जीवाना नाम्न एकोनत्रिंगद्वन्धस्थाने नाम्नस्त्रिनवतिसत्कर्मस्थान ना-ऽवाप्यते, चतुर्विशत्युदयस्थानस्य केवला- नामेकेन्द्रियाणामेव प्रायोग्यत्वेन मनुष्यप्रायोग्याण्युदयस्थानान्येकादश, तत्राऽष्टनव विंशत्ये कत्रिंशत्प्रकृ- त्यात्मकोदयस्थानचतुष्कस्य केवलिनामेव सम्भवान्नाम्न एकोनत्रिंशद्वन्धस्थाने वा त्रिनवतिसत्कर्मणि वा तदुदयस्थानचतुष्क नैव प्राप्यते, ततो नाम्न एकोनत्रिंशद्बन्धस्थाने २१, २५, २६, २७, २८, २६.३० प्रकृत्यात्मकानि सप्तैवोदयस्थानानि, सन्ति, तत्रा-ऽपि २१-२६, एकविंशति पड्विंशतिप्रकृत्यात्मकवजेशेपेपु पञ्चस्वेवोदयस्थानेषु नाम्नस्त्रिनवतिसत्ता प्राप्यते, २१-२६ एकविंशति पड्विंशतिप्रकृत्यात्यमकोदय- स्थानद्वये त्रिनवतिसत्कर्मता कथ न प्राप्यते इति चेत् उच्यते-जिननामा-ऽऽहारकसप्तकोभयसत्कर्मणा मनुष्याणा नियमतो वैमानिकदेवेष्वेवोत्पादोऽस्ति । तेषाञ्च सम्यग्दृष्टित्वेन जघन्यतोऽपि साधिक पल्योपमस्थितिकेष्वेवोत्पादस्य सम्भवेन वैमानिकभवस्थितेरपि जघन्यत पल्योपमपमाणत्वेन च पल्यो- पमतो न्यूनस्थितेरनुत्पादादा-"ऽऽहारकसप्तकोद्वलन कृत्वैव” पुनर्मनुष्येषत्पादो भवति, तेन तदानीम- पर्याप्ताऽवस्थायामेकविंशति--घड्विंशतिप्रकृत्यात्मकोदयस्थानयोर्वर्तमानाना मनुष्याणामेकोनत्रिंशद्बन्ध- स्थाने त्रिनवतिसत्ता नामकर्मणो नैव भवति, आहारकसप्तक जिननामोभयसत्कर्मताया अभावात् , आहा- रकसप्तकस्य जिननाम्नो वा नूतनबन्धस्य तत्राऽसद्भावाच्च । " जीवस्थानेषु नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानमगा' [ ५३ उणतीस वंधमाणाणं ।। (३३८) देवगईपाउग्गं 'सत्ता सव्वेसु दो दो ९३,८६ ।। २८ २९ ३० ठवणा- २१ | २५ २६ / २७ २ २ २ एवं तीसे वंधे नवर सुग मणुयजोग वंधंति । छसु निएसु उदएसु वारसठाणा संतस्स १२ ॥२७८।। (३३६) [३१६] | २१ , २५ | २७ २८ २६ २ठवणाः उदयठाणा ३० सत्ताठाणा २ २ २ २ चंधम्मि एगतीसे उदओ 'तीसाइ तिणवई संता । तह एगवंधि उदओ सत्ताठाणार्ड अट्ठव ॥२७९॥ (३४०) [३१७] छायालं सयमेगं छन्वीसुणवीस तह य नव ठाणा । अब्बंधि अट्ट सनिसु दो सय अडुत्तरा सव्वे २०८॥ (३४१) “ठवणा- वधठाणा २३ , २५ | २६ । २८ २९ ३० ३१ उदयठाणा ८ ८ ८ ८ ८ १ १ सत्ताठाणा २६ । ३० ३० । ३० (२०० ३० " ८ (२०८) छव्वीस केवलीणं तिगतिग सत्ता नवऽट उदएसु । तित्था-ऽतित्थगराणं दो दो दो सेसेसु सम्बेसु ॥ (३४२) मतान्तरेण सिद्धान्ता-ऽभिप्रायेण पुन सम्यग्दृष्टीना पल्योपमाऽसङ्ख्येयभागादिन्यूनस्थितेष्वपि भवनपत्यादिदेवेपूत्पादोऽस्ति, ततस्तत्रा-ऽऽहारकसप्तकजिननामोभयसत्कर्मा मनुष्यउत्पद्या-ऽऽहारकसप्तके - नुद्वलिते सत्येव पुनर्मनुष्यो भवति, तदा तस्य नाम्न एकोनत्रिंशद्वन्धे एकविंशति-पड्विंशत्युदयस्थानद्वये निनवतिसत्कर्मता लभ्यते, एतदभिप्रायेणैव सप्ततिकामूल-चूणि वृत्तिपु तथा-ऽत्रैव ग्रन्थे प्राग् ॥२०६|| दयस्थानद्वये (२५०) तमगाथायामनन्तर ॥२७॥ तमगाथायाञ्च नाम्न एकोनत्रिंशद्वन्धस्थाने सप्तोदय- स्थानेषु त्रिनवति सत्कर्मता प्रतिपादितेति सम्भाव्यते । L D प्रतौ पुनरत्राऽपि-विनवतिसत्कर्मता एकविंशति षड्विंशत्युदयस्थानद्वये निपिद्धा । १२-५ इद यन्त्र L D प्रतौ। ३ "तीसन्ह" इति L D प्रतौ । ४ "सत" इति L D प्रतावस्ति, उ प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति ।
५४] सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थे १ ठरणा- अट्ठदसग ति, अट्ठ बधठाणा अट्ठ उदयट्ठाणा सत्ताठाणा दम सन्निम्मि (उदय। सत्ता- बधठाणा वधभगा भगाठाणा उर्दयठाणा २१ १ २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ २३ ७५६२ २६ सन्नितिरिभगा ८ ५७६ ११५२) ७२८/११५२ २५ २५७६५६, ३० मायभगा C ० . २८८ ५७६/५७६११५० २६ १६ ७६५६ ३० विउवितिरिय, . 8 ४१२३ १ आहारकमगा १ १ ० २६ ६२४८७६७१ ४४ देवाण भगा १६१ १६ ३० ४६४१ ७६६७ ४२ नारकाण भगा १ १ ० १ ० ० ३१ १ (१४४) १ विउव्यिमणु, ० ६ १ . १ १ ७२ or ८ सत्ताठाणा ५ २ २ ४ ४ ४ (सव्वे→ १३७४५ २००) सतित्थयरसत्ता ६३ / ९३ ६३ ९३ ९३ । ६३ ६३ ६३ सासन्न तिरियमणुयचउसु उदएसु भगा चुन्नीए न भणियत्ति न लिहिया दह ६ सह ८६ उ अट्ठावीसं बंधं बंधहि तिरिमणुय निययउदएहि । सुरनिरगइपाउग्गं विसुद्ध तह किस्समाणा । (३४३) करणि अपजत्ता उण आइमचउउदय वट्टमाणा उ सुद्विगया अडवीसं इयरा उणतीस चंधति 11 (३४४) इह आइम चउउदया इगवीसछवीस तह य अडवीसा । उणतीसा त्रिय कमसो वियप्प जे जस्स संभाविया ।। (३४५) १ इद यन्त्र L D प्रताबस्ति, प्रतिप्रसकोप्या नास्ति । अत्र L D प्रतौ "उदयहू" इति पाठो दृश्यते किन्तु सम्यग् न ज्ञायते इति कृत्वा-ऽस्माभिरेकत्रिंशद्वन्धसत्कमेक त्रिंशत्प्रकृत्यात्मकमुदय- स्थानमाश्रित्य मझा १४४ दशिता इति ज्ञेयम् । यदि केषाञ्चिदाचार्याणामभिप्रायेण पुनरुत्तरबैंक्रियमनु- प्या आहारकमनुष्याश्चापि प्रकृतबन्धकतया विवभ्यन्ते तदेहैकोनत्रिंशदुदयस्थानमप्यधिकतया लभ्येत, तथे कोनत्रिंशदुदयस्थानसत्कभगद्वय त्रिंशदुदयस्थानसम्बन्धिमङ्गद्विकमिति चतुणां भङ्गानामधिकतया लामात्सर्व उदयभङ्गा १४८ स्यु ।
जौवस्थानेषु नाम्नस्तथा गुणस्थानकेषु ज्ञानावरणान्तरायदर्शनावरणीयाना बन्धोदयसत्तास्थानभगा. [५५ एए । (३४७) ठवणा- उदय- ठाणा भग- सवा . . ० ८ ६ 8 न य विवरियं पुढो इह भंगा अडवीमि उदयगंभविया । चुन्निदुगे वि हु लहुए अहवा न हु अवगया सम्मं ।। (३४६) तेण न भंगपमाण अडवीसम्मि चउउदयसंभवियं । तिरिमणुसामन्नाणं इयरुदएसु च पुण पणतीसमणुविउन्चिसु छप्पन्नं तह तिरिक्खभगा तीसिगतीसे उदए तिरिमणुसामन्न जे भंगा ।। (३४८) पणतीसं छप्पना चालीससया उ अहिय चत्तीसा । ४०३२ भंगाणं तु पमाणं विउव्विदुगउदयअंतेसु ॥ (३४६) अट्ठावीसबधजतझ्य- २१ | २५ २६ २७ २७ २८ २९ ३० ३१ माणुम० ० .. ० ११५२ ० (११५२) तिग्यि० ० | ० (१७२८/११५२ (२८८०) मणुवे. | • - उन्विय १ / ० (३५) तिरिवे- | 0 | (५६) उध्विय सामन्नमणुयतिरियभगा सम्यग् न ज्ञा(यन्)ते चउसु उदएसु ।। जीवस्थानेषु नाम समाप्तम् ।। चउपढमट्ठाणाई ४ तेरसहीणाइँ ४ नाव पत्तेयं । [३१८] एवं उवरयबंचे सन्नीपज्जत्तसंवेहो ॥२८॥ पंचासं सयमेगं चउवीसणुवीस तहय सत्तरस दुन्नि सया य दहोत्तर सन्नीपज्जत्तठाणाणि । ॥२८॥ [३१६] भणियाउ जीवठाणे बंधोदयसंतविवरणं किचि गुणठाणगेसु तं चिय भणामि किचि समासेणं ॥२८२।। (३५०) [३२०] गुणस्थानकेपु ज्ञानावरणा-ऽन्तराययोर्दर्शनावरणस्य बन्धोदयसत्तास्थानाना भगा - नाणंतरायतिविहमवि दससु दो होति दोसु ठाणेसु । 'मिच्छासाणे वोए नव चउ पण नव य संतंसा ॥.-३६।। (३५१) [३२१] १ इद यन्त्र L D. प्रतावस्ति, J. प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । २ "जीवठाणेसु” इति J प्रतिप्रेस- कोप्याम् । ३ "तेच्चिय" इति J प्रतिप्रसकोप्याम् । ४ 'हुति" इति L. D प्रतौ । ५ "मिच्छासाणा', इति LD. प्रतो। १६ ८ [ ५६ सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे जा 'मीसाहनियहीओ छचउ पण नव य सन्तकम्मंसा । चउबंधतिगे चउपणनवस दुसु जुयल छस्संतास.-४०।। (३५२) [३२२J उवसते चउपणनव खीणे चउरुदय छच्च चउसता । वेणियाउयगोए विभज ह पर वोच्छ ।।सू.-४१।। (३५३) [३२३] नाणतरायगाहातिगस्स विवरण पुवुत्त ॥ दुसु जुयले छस्संता एएण पएण सूइया खवगा तेसि विसेसं विवरे किची गाहानुसारेण ॥२८३।। (३५४) [३२४] अच्चंतविसुद्वत्ता निदाउदओ न खवगसेढीए अप्पुवाई चउबंधगेसु चउरोदओ तेण ॥२८४॥ (३५५) [३२५] अप्पुव्वपढमभागे छक्कं उवरि तु चउरवंधुदए । सुहुमो सत्ताए बायरसंखंस नवसंता ॥२८५।। (३५६) [३२६] थीणतिगखविय उवरि छस्संता जाव सुहुमरागंतो । बंधोवरमे चउरुदय खीणि संता उ छचउरो ॥२८६॥ (३५७) [३२७] गुणस्थानकेपु वेदनीयगोत्रयोर्बन्धस्थानादिमझा चउ छस्सु दोन्नि सत्तसु एगे चउ गुणिसु वेयणियभंगा। गोए पणचज दो तिसु एगट्ठसु दोन्नि एगम्मि ||सू.-०॥ (३५८) [३२८] छसु आइमेसु पढमा चउरो बंधे य अंतिमा दो दो । वेयणिए इय सत्तसु गंधोवरमे चउर एगे ॥२८७१) (३५९) [३२६] वंधोवरमि अजोगे सायासायाग उदउ को कस्स जाव दुचरिमो दो दो चरिमे एक्कक्क संताओ ॥२८८।। (३६०) [३३०] सायं बंधं तह उदय साय तह सायबंधि दुक्खुदओ । दो दो संता दोसु वि इय भंगा सत्तसु गुणेसु ॥२८९।। (३६१) [३३१] पदमम्मि पढम पंच उ बीए पढमं विवज्जिया चउरो । उच्चं बंधं नीचुच्च उदय दो संत भंगदुगं ||२६०।। (३६२ [३३२] एगेसि मयं नीय वयगहणे नेव होइ उदयम्मि । नीया वि हु जइजाई तह वि य ते उच्च वेयति ॥२९१।। (३६३) [३३३] -- "मिस्साइ०" इति L. D प्रतौ । २ "अतरिउ” इति : D प्रतौ । ३' चरमे'' इति L. D प्रवौ। - १ गुणस्थानकेषु दर्शनावरणीय-वेदनीय गोत्रा ऽऽयुपा वन्योदयमत्तास्थान भङ्गा [ ५७ संजयपमत्तठाणाउ जा चरिमो सुहुमरागगमओ उ 'यधोदयम्मि उच्चं सता दुम उच्चनीयाणं ।।२९२।। (३६३) [३३४] उवरयवये उच्च उदए "मंताड दो वि जाजोगी अज्जोगि 'चरमसमए ‘उदए मता य उच्चम्म ।।२६३।। (३६४) [३३५] गुण थानकवायुपो घन्वादिस्थानमड़ा- अच्छा हिंगवीसा सोलस वीस च वार छद्दोसु । दो चउसु तीसु एक्क मिच्छाइसाउगे भगा।सू -०।। (३६६) [३३६] अट्ठावीसं २८ पढमे २६ वीए नरयाउ नरतिरि न बंधे । तइए वंधविवजा १६ चउत्थए वीस इय होति ।।२९४ । (३६७) [३३७] अविरयसम्मा जीया तिरिमणु देवाउ[एकमेव वति । नारयसुर मणुयाउं अट्ठ उ भगा असंभविया ।।२६५।। (३६८ [३३८] 'नरतिरियदेसविरया देवाउ एकमेव चवंति । पुव्युत्ता दस जुत्ता भगविगप्पा उ बारस उ ।।२६६।। (३६९) [३३९] १"मणसरिस पमपत्तियरे ६ उवरि मणुउदयमणुयमंताओ । खबगे पडुच्च एगं वि य सेढी चउसु सुरसंता ||२६७।। (३७०) [३४०] गुणठाणा मि० [सा० मी० दे० प० प. 8 ११ठवण- ५ ५ ५ ५ उदय ५ ५ अतरायण दसणारण नानावरण सत्ता ५ ५ ६ ५ ६ ५ ६ बव है 8 ६ ६ उदय| ४/५ ४/५ ४/५ ४/५ ४/५ ४/५ ४/५ मत्ता 8 ६ ६ 8 & है वेदनीय भगा ४ ४ ४ २ गोत्र भगा ४ २२ २ १ or आउय० भगा २८ २८ | २६ १६ १२ ६ ६ / १ "वधे उदए" इति L D. प्रतौ । २ 'दो'' इति L D प्रतौ । ३ 'सत्ताए” इति D प्रतौ । ४ "चरिम०" इति L D प्रतौ । ५ "उदओ" इति L D प्रतौ । ६ “वन्धामावा” इति L D प्रतौ। ७ "हुति" इति L D प्रतो । 'अविग्यसम्मा [जीवा] तिरिमणु देवार एगमेव” इति L D प्रतौ । ६ “पुव्युत्तदस जुत्त" इति L D प्रतौ । १० मणुभग" इति L D प्रतौ । ११ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, प्रनिसकोप्या नास्ति।
५८ ] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे नि०नि० सु० ० अजो. उ० खी० स० . . ० . ५ . ५ ५ ५ ० ० ५ ० ५ ५ ५ ० . ४ ० ० ४/५/४/५४/५ ४/५ ४ ० ० ० . ० ६९/६/९/६ ९/६/९/६ १६/४ २ २ २ २ २ ४ १ १ १ १ १ २ १ १ २ ० २ २ २ २ १ १ गुणस्थानकेषु मोहनीयस्य बन्धस्थानानि- गु गगेसु अ. सु एक्केक्क मोहबंधठाणं तु । पचानियहि णे अधोवरमो परं तत्तो ॥सूत्रम्-४२॥ (३७१) [३४१] गुणस्थानकेषु मोहनीयोदयस्थानानि- सनाइ दस उ मिच्छे सासायणमीसए नवुक्कोसा। छाई नच उ अविरए देसे पचाइ अठेव ॥सूत्रम्-४३।। (३७२) [३४२] विरए खओवसमिए चउराई सत्त ऽपुव्वम्मि । अनिअहिवायरे पुण एक्को व दुवे व उदयंसा ।।सू.-४४॥ (३७३) [३४३] एग सुहुमसरागो वेएइ अवेयगा भवे सेसा । भगाणं च पश्याणं पुवुद्दिढेण नायव्व सूत्रम् ४५॥ (३७४) [३४४] "गुणठाणगेसु अतुसु" इचाहगाहाचउक्कस्स विवरण पुव्वं व दट्टव्व ।। जड वि इह मोहविवरण गुणठाण पडुच्च हिदुओ भणियं । संपर तस्सऽणुसारेण जंतइयं ॥ पुण करपत्तं गुणस्थानेषु मोहनीयस्य वन्धोदयस्थानभङ्गा [ ५५ ठवणा- मीस गुणठाणा मिच्छदिट्टि सासादन अविरयसम्म देसवि. पमत्त. २२ है १७ २१ १३ बढाणा वधभगा २ ६ ४ २ २ २ उदयट्ठाणा ७८ ७/८/१०/७/८१७८१६७८५६७८४|५/६७ चउवीसिया १/३/३/१/१२/११/२|१|१३|३|११|३|३|१|१|३|३ | १ उदयपद १९२ ६६ ९६ १६२ १९२ १६२ ठवणा- अपमत्त अपुव्व० अनियट्टिबायर० सु. ० . 8 ९ ५.४३|२|१ . १ १ १११११ ० ४५६/७४ ५ ६|२|११|११ . ११३/३/१/१२/१/१२/११ १।११ १६२ ६६ १२ मोहिया जीवा मिच्छाइ गुणट्ठाणगेसु उदयसखामाह- उदय चउ- मि० सा० मी० वि० दे० ठाणा वीसि 105 प०प०नि०नि० सु० 'ठवणा- . . १० १ . ० १ . . ६ ० १ १ ६ ० ० ० . २ 0 ० ३ . २ ३ | १ ७ ११ १ १ १ ३ ३ १ १ . ० . wr ० ० ११ १ . ३ ३ ૨ 10 ० . ० ० ३ ३ २ . ० . . . १ १ . . ४ ३ २ १२भ एव वावन्न चउबीसिया।। उदयपया चवीस- १ गुणा १२४८ ॥ दुगोयएगोदद्यपया ११॥ १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । दुगोदयभ० १२ एगोदयभ०५ ५८ ] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे नि०नि० सु० उ० खी० अजो. स० . ५ ० ५ ० . ५ ५ ५ ५ . ५ ५ ५ ५ ० ० . ६/४ ४ ४ . . . ४/५/४/५ ४/५ | ४/५ ४ . ० ० है ९/६ ९/६ ६ ६/४ ० ० २ २ २ । २ ० १ १ or २ 0 २ २ . २ २ १ १ गुणस्थानकेषु मोहनीयस्य बन्धस्थानानि- गुणठाणगेसु अ सु एक्केक्क मोहबंधठाणं तु । पचानियहि णे अधोवरमो परं तत्तो |सूत्रम्-४२॥ (३७१) [३४१] गुणस्थानकेषु मोहनीयोदयस्थानानि- सनाइ दस उ मिच्छे सासायणमीसए नवुक्कोसा। छाई नव उ अविरए देसे पचाइ अठेव ॥सूत्रम्-४३॥ (३७२) [३४२] विरए खओवसमिए चउराई सत्त Sपुत्वम्मि । अनिअदिवायरे पुण एको पदुवे व उदयंसा ॥सू.-४४॥ (३७३) [३४३] एग सुहुमसरागो वेएइ अवेयगा भवे सेसा । भगाणं च पचाणं पुन्बुद्दिठेण नायव ॥सूत्रम् ४५॥ (३७४) [३४४] "गणापागेसु अद्वसु" इच्चाइगाहाचउक्कस्स विवरणं पुव्वं व दळुव्व ।। जड वि इह सोहविवरण गुणठाण पडुच्च हिट्टओ भणियं । तस्सऽणुसारेण जंतइयं ॥ (३७५) सपड पुण कमपत्तं गुणस्थानेषु मोहनीयस्य वन्धोदयस्थानमगा [ ५५ ठवणा- . गुणठाणा मिच्छदिट्टि सासादन| मीस अविरयसम्म देसवि. पमत्त. बधढाणा २२ २१ १७ १३ बधभगा ६ ४ २ २ २ २ उदयट्ठाणा ७८६१०७ चउवीसिया १३.३.१/१२/११२/११३/३/११/३/३/११/३/३.१ उदयपद १९२ ६६ ९६ १६२ १९२ १६२ ठवणा- अपमत्त अपुव्व० अनियट्टिबायर० सु ९ ५|४|३|२|१ ० १ ११/१/१] १ ० ४/५/६/७४|५|६|२|१|१|१|११ 0 ३/३/११/२/१ ११११ १६२ ६६ मिच्छाइ गुणठ्ठाणगेसु उदयसखामाह- 'ठवणा- १२ मोहिया जीवा उदय चउ- प०प०नि०नि० सु० s ठाणा वीसि | मि० सा० मी० ऽवि० दे० १ | १ . . . ० ० . १ ० ० ० . . ११ ३ २ २ ३ १ ० . ० ० १२ १ १ १ ३ । ३ . ० wr o ० ११ ov w ३ . ० . . १ २ ० . १ . है ३ ३ ४ ३ १ १ २ १२भ एवं वावन्न चउवीसिया॥ उदयपया चउवीस- १ ५ गुणा १२४८ ॥ दुगोदयएगोदयपया १०॥ १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । दुगोदयभ०१२ एयोदयभ०५ ६० ) सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे गुणठाणा मिच्छ| सा मा० १ १ १ १ १ पत्तेय गुणठाणे पडुच मोहुदयपयविंदसखामाह- 'ठवणा- मीस०] ऽवि देिम- पमत्त उपम० निय ऽनियट्टि सु० रतवि० मोहोदय १६२ ६६ ९६ १६२ १६२ १९२६ १६२/६६ १२ १ पयविंद ६८ ३२ । ३२ ५२ ४४ ४४ । २० चउवी सिया १ भ भ १भ १भ १ १ पयविंदा १६३२७६८ ७६८ १४४०१२४८१०५६/१०५६४८ २८ १ एव मोहोदय१२६५।। एव पयविदचउवीसिया ३५२।। पयविंदा २६।। एव सव्वे पयविंदा ८४७७ ।। ४८० ठवणा- गुणठाणा मिच्छ० सा०मी० ऽविरय० । देमवि० | पमत्त० उपम० ४ ४ । ४४ पदच उवीसिया पदविंदचउ- ६८ ६० ३२ । ३२ वीसिया ५२ ४४ पदविंदा १६३२ ७६८ ७६८ १४४० १२४८ १०५६ । १०५६ २८,२७,२६, २८ २८,२७ २८ २४ २९,२४ २८२४ २४ २३,२२ २१२३,२२,२१ ३,२२,२१२३,२२,२१२३,२२,२५ सत्ताठाणा २८,२४ २ठवणा- - निक अनियट्टि सु १२ १ १ १ K ० M २० भ २४ | १ १ १ १ १ ० उदयपया १२६५ ॥ पयविंदच उबीसिया ३५०, भगा २४॥ पयविंदा ८४७७ ॥ ४८० | २४ १ / १ १ १ । १ १ . २८,२४ २८,२४, २१, १३, १२,११, ५ २८ २४ २१ १ २४ २१ २१ ४, ३. २,१ १ इद यन्त्र L. D प्रतावस्ति, J प्रतिप्रेसकोप्या नारित । २ इद यन्त्र I प्रतिप्रेसकोध्यामस्ति, LD. प्रतौ नास्ति।
गुणस्थानेषु मोहनीयस्योदयस्थानभङ्गा [६१ इक्कारसेव मोहनीयस्योदयस्थानमगा एक'छडेकारका सेव नवतिनि एए चउवीलगाया धारदुगे पच एगम्लि सूत्रम्-४६॥ (३७६) [३४५] बोरसपण ससिया उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा। 'चुलसीयसत्तसत्तरिपयविदसएहि विन्नेया ॥सू-०॥ (२७७) [३४६] गुणस्थान पु मोहनीयोदयम्थानभङ्गा अडगचउच उचउरगा य चउरो य 'होनि चउवीसा । मिच्छाइ अपुच्चंता धारसपणग च अनियही ॥सू.-०॥ (३७८) [३४७] दसगस्मि एग मिच्छे तिग तिग नवअट्ठगम्मि सत्तेगा एगदुग एग साणे नवअट्ठगसत्तगे कमसो ॥२६८॥ (३७६) [३४८] तह मीसगस्मि एवं अविरयसम्से छडेग चउवीसा । तिगतिग सत्तग अग एगा नवगम्मि बोधव्वा ॥२९९।। (३८०) [३४९] पचोदयस्मि एगा तिगतिग छस्सत्तगे य अढेगा । देसविरयस्मि एक अढग चउवीस उदएसु ॥३००। (३८१) [३५०] चउरोदयस्मि एगा तिग तिग पणछक्गम्मि सत्तेगा । संजयपमत्तउदए अपमत्ते तह य एवं तु ॥३०१।। (३८२) [३५१] अप्पुव्वे चउरेगा पणगे दो छक्कगम्मि एका उ मिच्छाइ अपुचंते वावन्ना सन्वचउवीसा ॥३०२।। (३-३) [३५२] चउवीसगुणा एए बारस अडयाल हुंति मोहुदया । दुग एग उदयभंगा नवमे ते जाण सोलसगं ॥३०३।। (३८४) [३५३] चंधोवरमे सुहुमे एगुदओ लोभसुहुमकिट्टीणं सव्वुदयविगप्पा वारसपणसह मोहरस ॥३०४॥ (३८५) [३५४] आह कह एक उदए 'हेट्ठा एकारभंग नणु वुत्ता । इह पुण पंचेव कहं पुव्विं बंधो इहं उदओ ॥३०५।। (३८६) [३५५] जे बंधड ते वेयड बंधविवक्खाइ भगएक्कारा उदयविवक्खाइ पुणो एक्कुदए पंच भंगा उ ठवणा-पेज न०५६ ॥ । उय ॥ (३८७) १ "०छडिका०” इति L D प्रतौ । २ "एक्कम्मि” इति L D प्रतौ । ३ "सट्ट०" इति L D प्रतौ । ४ "चुल्सीइ सत्तुत्तरिपयः” इति । ५ 'हुति" इति वा । ६ "उवरिं" इति L D प्रतौ ।
६२] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे अट्ठी बत्तीसा बत्तीसा सहिमेव धावन्ना चोयाल दोसु वीसा मिच्छामाई सामन्ने ॥सू.-०।। (३८) [३५६] मिच्छे जो चउवीसा उदयगुणा ते उ मिलिय अट्ठी । वत्तीसाइ कमेणं एस गमो जा अपुचते ॥३०६॥ (३८६) [३५७] 'एए सव्वेगट्ठा चउवीसाए गुणित्तु कयरासी । उणतीसभंगसहिया चुलसी सतहत्तरा एवं ॥३०७॥ (३६०) [३५८] ठवणा-पेज न०६०॥ जोगोवओगलेसाइएहि गुणिया हवति कायव्वा । जे जत्थ गुणहाणे हवंति ते तत्थ गुणकारा ।।सू.-४७।। (३६१) [३५६] 'मोहुदयजोगपयविंदाण च विवरणमाह- मोहुदयपयविगप्पा गुणि(आ) गुणठाणजोगसंखाए । सामन्नं नव जोगा सव्वेसि अहिय केसिचि ॥३०८|| (३६२) [३६०] नव गुणिया उदयपया इक्कारसहस्स तिन्नि पणसीया ११३८५ । अन्ने वि चउर जोगा मिच्छे साणे य सम्मम्मि ॥३०९॥ (३६३) [३६१] तह मीसपमत्तेसु एगो दो जोगअहियया कमसो । इत्थ वि लद्धविगप्पा खेप्पिज्जा पुवरासिम्मि ॥३१॥ (३६४) [३६२] वे उव्यिय तह वेउब्धिमीसओरालमीसकम्मइया मिच्छम्मि सासणम्मि य अविरयसम्मम्मि ए अहिया ।।३११।। (३६५) [३६३] अडचउवीसा वेउब्धियम्मि चउचउरसेसतिगमिच्छे । अणउदयरहियउदया न "होति सत्ताइनवगेसु ॥३१२।। (३६६) [३६४] ||जओ वुत्तः। अणउदयरहियमिच्छे जोगा दस कुणइ जं न सो कालं अणणुदओ पुण तदुवलग सम्मदिद्विस्स मिच्छुदए ॥३१३।। (३६७) [३६५] सासणमीसे चउरो देउब्धियजोगि दुसु य पत्तेयं । तह उरलमीमकम्मणि सासणभावम्मि चउचउरो ॥३१४।। (३६८) [३६६] वेउविमीसनरए अहोमुहो नेव सामणो गच्छे देवा न संढवेया विउव्यिमीसम्मि नपुऊणा ॥३१॥ (३६६) [३६७] १ "वत्तीस बत्तीस' इति। २ "वोसा वि अमिच्छमा०" इति । ३ “एमव्वे एगत्या" इति L. D प्रतौ J प्रतिप्रेसकोप्यामपि । ४ "अय पाठ J प्रतिप्रेसकोप्पा नास्ति, किन्तु L D प्रतावस्ति । ५ 'हुन्ति' इति L D प्रतौ। ६ 'वोत्त' इति L D. प्रती । ।
गुणस्थानेषु मोहनीयस्योदयस्थानभङ्गा [ ६३ य सोलहया तेण चत्तारि । अविरयसम्मे अट्ठ उ उब्धियकायजोगि चउवीसा तह मीसकम्मणेसु नवरं थीवेयपडिसेहो ॥३१६॥ (४२८) [३६८] इह सम्मदिट्ठिजीवो न थीसु उववज्जइत्ति ववहारे अच्छेरउत्ति होज्जा अहवा सुत्तस्स बाहुल्ला ॥३१७|| (१०१) [३६६] नपुवेय कहं भन्नइ वेयगरहियाउ जेण तिन्नुदया । तह वेयगेण तिन्नि उ नरएसुववज्जमाणाणं ॥३१८॥ (४०२) [३७०] इत्थ य नपुंसवेओ इयरगईउ पुमवेय संभाविया । संभावयामि इत्थं नपुसथीवेयपडिसेहो ||३१६।। (४०३) [३७१] ओरालमीसि सम्मे पुरिसवेएण चेव उववाओ । अह तित्थं थीवेए इत्थ'वि अच्छेरसंभवओ ॥३२०।। (४.४) [३७२] अहह सोलहया वेउन्वियमीसकम्मइगजोगे । ओरालमीसि चउरो उच्चिय अह चउचीसा ॥३२१॥ (४०५) [३७३] आहारयदुगजोगे सोलहया अट्टअट्टउदएसु । जम्हा पुन्वधरी वा विक्कियलद्धी य नो इत्थी ॥३२२१ (४०६) [३७४] इय वीसं २० तह बारस १२ चउरो अट्ठव 'मिलिय चवीसा। मिच्छाइ अविरयंते तह सासणि चउर सोलहिया ॥३२३।। (४०७) [३७५] अविरयसम्मे वीसं पमत्तविरियम्मि सोलसोल हया । चउवीसमोलहेहिं गुणिया खिव पुवरासिम्मि ॥३२४।। (४०८) [३७६] तेरससहस्स तह इक्कसी य जोग पयसबपिडेण । (१३०८१) इय अणुमारा विंदा गुणिज्ज इह सव्वजत्तेणं। ।३२५।। (४०६) [३७७] पुव्वं च जोगगुणिया पयविंदा ते हवंति इह दंडा । तेणउया दोन्निसयासहस्सछावत्तरी नवहि (७६२६३) १३२६।। (४१०) [३७८] वेउवियअट्ठी वत्तीसा इयरजोग पत्तेयं छावत्तरसयमेगं चउवीसियमिच्छदिविम्मि १३२७॥ (४११) [३७६] सासायण वेउब्वियओरालियमीसकम्मइगजोगे बत्तीस पत्तेयं वेउन्वियमीस सोलहया ।। (४१२) १ "व" इति L D प्रतो ।२ "मेलि" इति L. D. प्रतौ । ३ "मय०" इति L D. प्रतौ । ४ "दुन्नि" इति L D प्रतौ। ।
६४] सप्तनिकाभिधे पष्ठे कर्मग्रन्थ ॥ (४१४॥ मीसे विउविजोगे बत्तीस होति विदचउवीसा । अविरयसम्मे सट्ठी वेउब्बियकायजोगम्मि ।। (४.३) तह मीसकम्मणेसु सोलहया सद्धि होति पत्तेयं । ओरालियमीसम्मी तसट्ठी अट्ठया जाण आहारग तह आहारमीस सजयपमत्तउदयसि चोयालं पत्तेयं सोलहया दोसु जोगेसु एए गुणित्तु सव्वे नियनियठाणेहि पुवरासिम्मि । पक्खिवसु सम्वउत्तो सपुन्ना जेण सा रासी ।। (४१६) मोहोदयपयविंदा गुणजोगवियारणाअ उवउत्तो संखा पुण उणनवई महस्स तह तिन्नि उणपन्ना ।। (८६३५६) (४ ७) 'ठवणा- ।। (४१५) -- गुणठाणा→ मि० | सा मी अवि देस मत्त ऽपम |ऽपुव्व | नय | सु जोगठाणा→ १३ । १३ १३ (सव्वे) or ९ ११ ९ ९ ९/१०/६/१ (- ६ १५ ६५०४/४३००२५२ १२ ६ १२ जोगपया→ २२०८/१२१६ ६६० २२४०१७ ८/१९८४१७२८ ८६४ ६४४ १३०८१ जोगपयविंदा ६७२८/७६८० १६-१११२-११०६- જ ન કર ८९३४६ मोहोदयपयविदा गुणिजोगवियारणा तडय मखा जाया सहस्स उणनवइ तिणि सया अउणपण्णा य ८६३४६।।३२८॥ मणिया जोगपयदडम राणा, झ्याणि उवओगपयदडमग्गणा भण्णइ- पढमे चीए पंच उ तइए चउ पंचमे च छच्च भवे । सेसे सत्तुवओगा मोहुदएहि गुणिज्जाहि ॥३२६।। (४१८) [३८१] मिच्छे जा चउवीसा उवओगगुणा हवति तेसि पया । नवमयसट्टा ९६० सव्वे सेनेसु य एस होड कमो ३३० । (४६६) [३८२] जडवि चउवीममंखा गुणिया उबओग इत्थ पियवुत्ता । तहवि य चचीसगुणा मोहपया "एत्थ दडव्या ३३१ । (४२०) [३८३] - १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, J प्रतिप्रेमकोप्या नास्ति । २ ' भन्नई” इति L D प्रतौ । ३ ' सेस- गुणाण च एस कमो । ४ "पुच्चुत्ता” इति L D प्रतौ । ५ 'इत्थ' इति L D प्रतो गुणस्थानेषुमोहनीयस्योदयस्थानभङ्गास्तथैव योगोपयोगलेश्या आश्रित्याऽपि [६५ साणे चउसयसीया ४८० मीसे छावत्तरा य पंच भवे ५७६ । अविरयमम्मे ११५२ देसे ११५२ ककारसवावण्ण इक्केरके।।३३२।।(४२१) [३८४] उबओगपय पमत्ते तेरस चोयाल १३४४ तहय इयरे य १३४४ । छब्बावत्तरपुब्वे ६७२ अनियट्टिसय तु बारहियं ११२॥३३३।। (४२२) [३८५] सुहमे बंधोवरमे एक्कुदए सत्त हुति उवओगा । सव्वे सत्त सहस्सा नवनउया होति सत्तसया (७७९९) ।। ( २३) अठ्ठी बत्तीसा इय अणुसारेण सेसचउवीसा नियउवओगगुणा ते पयदंडा हुति सव्ये वि सव्वे वि ॥ (४२४) चउवीस पंचभगा सत्तगुणा ते वि खिवसु रासिम्मि । एक्कावन्नसहस्सा तेसीया हुति सव्वे वि ।। (५१०८३) (४२५) उपयोगपयदडा- वणा-1 मि.सा प भ० ७७६.६. उपओगपय- ७ गुणठाणा → मी अवि० देस अप अपु अनि सु उवओगा→ चो ५/४६/४ ६/६/८/७/८/७/८७/४७/१६म ७/१६ (सव्वे) उपओगपया- ६६० ४८० ५७६ ११५२|११५२/१३४४४३४४८६७२ ३४४,६७२) ११२ =૨૬ રૂકાદ૬૮૬૪૦૭૪==રૂરરરરર૨૦૬ विंदा ५१०८३ इयाणि लेसपया लेसदंडा य भन्नति- पढमचउक्के छक्क उवरि तिगे तिन्नि होति लेसाओ । सेसेसु सुक्कलेसा मोहुदएहि गुणिज्जाहि मिच्छम्मि लेसउदया इक्कारसया हवंति बावन्ना ११५२ । अविरयसम्म तेच्चिय लेसगुणा होति ते उदया ११५२ ।।३३४।। (४२७) [३८६] सामण ५७६ मीसे ५७६ देसे इयरे य होति लेसुदया । छावत्तरपचसया' ५७६ पत्तेय पुब्धि छन्नउई ६६ ॥३३५॥ (४२८) [३८७] सोलस १६ अनियट्टिम्मी सुहुमे एकको य संखसम्धे वि । नउया बावन्नसया सत्त उ भगा उ पिंडेण ५२६७ ॥३३६।। (४२६) [३८८] अट्टी इच्चाई गुणिया सव्वे वि लेसढंडाओ अहतीससहस्सा दोन्नि सया सत्ततीसाउ ३८२३७ ॥३३७॥ (४३०) [३८६] || (४२६) . 4 १ इद यन्त्र L D प्रतावस्ति, J. प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । २ "तिच्चिय" L D इति प्रती।
६६ ] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे 'ठवणा- गुणठाणा + मि सा. मी अवि देस दे लेसा ६ ६ w ६ ३ लेसापया - ११५२ ५७६ ५७६ ११५२ ५७६ लेसापयदडा- ९७९२४६०८ ४६०८ ४६०८ ८६४० ३७४४ स ठा.सख्या। - ३ ३ - सत्ताठाणा - २८,२७,०६, २८ ५ ५ ८२४,२३२८२४२३ २४ २१,२१ २२,२१, पमत्त अप० अपुर अनि० सु ३ ३ १ १ १ १ ५७६ ९६ १ ४८० or - ५ ३ , ३ - मयमख० 11-(२९७ ३१९८ ३१६८ →३८२३७ । ११ २८,२४,२३/२८,२४०३ २८,२४ २८-४,२१ २८,२४/२८,४,२१ २२,२१, २२,२१ १ १३,५२,५११ २१,१ ५४,३,२, गुणस्थानवेपु मोहनीयसत्तास्थानानि गुणठाणगेसु सत्तासम्वामाह- तिन्नेगे एगेग तिगमिस्से पच चउसु तिगपुव्वे । एक्कारबायरम्मो सुहुमे चउ निन्नि उवसते ॥सू.-४८॥ (४३१) [३९०] तिन्नेगे एगेग गाहा पुव्वभणिया सत्तट्टाणा उ मोहे गुणट्ठाणमासज्ज- इयाणि नामस्स भन्नइ- गुणस्थानकेषु नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानानि- वछक्क, तिगसत्तदुग गनिगद्ग, तिगहचऊ दुगछच्चउ दुगपणचउ चउद्गचउ पणगागचऊ ॥१४३७ [३९१]... एगेगमह एगेगमह छउमथकेवलिजिणाणं । एग चउ एगं चउ अट्ट चउ छक्कमुदयसा ।सू.-५०।। (३३) (३६२]. एएसि विवरण 'भण्पाइ- : Dar - १ इदं यन्त्र ED प्रतानस्ति, J प्रतिप्रेषवा नास्ति । अग पाठ प्रतिप्रेसकोप्या नास्ति । ३ "मोहमासज" इति L. D प्रतौ। ४ " जय ' दुनि L OF गुणस्थानेषु मोहनीयस्य लेश्या आश्रित्योदयस्थानमगास्तथा मोदनीयसत्तास्थानानि तथा नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानमगा [६७ - ठवणा- १ ३ गुणठाणा- ५ w ८ ६ १० | ११ १ | १२ १२ । १३ | १४ १४ बंधट्ठाणा- ३ wr ३ २ 이 २ . ४ ५ १ उदयठाणा है ७ ८ २ १ १ १ २ ६ ४ सतठाणा- ६ २ २ ४ ८ ६ 3 ४ तीसंत छच्च बंधा उदया नव केवलीण मोत्तूण । पणसंता पुव्वुत्ता उणनवई मिच्छदिहिस्स ॥३३८॥ (४३४) [३९३] बंधभगा- घउ पणवीसा सोलस नव वाणउई मगा य चत्ताला । बत्तीसुत्तरछायालसया मिच्छस्स बंधविही ॥सू.-०।। (४३५) [३६४] बधभगा १३९२६॥ सत्तहारकेवलि भंगतिगं जइ विउव्वि संभविया मोत्तूण सेस सव्वे मिच्छद्दिहिस्स संभविया ॥३३६॥ (४३६) [३६५] संवेहो उदएसु वंधे वधे य संतचालीसा । नवर उणतीसवधे "नेरडय पडुच्च उणनउइ ॥३४०॥ (४३७) [३९६] इगवीसे पणवीसे सगवीसे अट्ठवीसउणतीसे उणतीसबंधगा ए पंचसु उदएसु नेरइया तित्थयरमंतकम्मी नरए बंधाउ अंतरमुहुत्तं मिच्छत्तवेयगो सो पंचसु नेरइयउदएसु ।।३४१॥ (४३९) [३९७] अट्ठावीसे बंधे अंतिल्ला दोन्नि उदय मिच्छस्स । चउतिगसत्ताठाणा पुव्वुत्ता सत्त सव्वेवि ॥३४२।। (४४०) [३९८] अडवीसे सत्त पंच उणतीसे । दोधि आणाइँ मिच्छम्मि ॥३४३।। (४४१) [३६९] ॥ (४३८) बंध० २१ ४० 8 सत्ता० उदय ४० २६ ५०/५ ३० ४० ०१२ । ९ ९ & (छन्नवछक्क ति गय ॥१।। इति प्रथमगुणस्थानके) अट्ठ नव मुन्न ।” इति L D प्रतौ । २ ' भगा तिग' इति L D प्रनौ । ३ "मुत्तण" ते L D प्रतौ । ४ "अहिया उणनवइ पणभेया ॥४३णा" इति L D प्रत'। १ "वीस - ६८ सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मगन्थे अडवीसुगुतीसतीसा बंधा साणम्मि बंधभंगा उ अड चउसट्ठिसयाई बत्तीससया कममो उ ॥३४४।। (४४२) [४०० २८ २६ ३० भगा ८ - पुव्यभवायायाणं बधट्टाणा | ६४००३२०० छेवट्टहुंड मुत्तं पणपणगेणं गुणिज्ज थिरगाई ।१२८ जम्हा न सासणम्मी हुंड छेवट्ट वझति ॥३४५।। (४४३) [४०१] तेण उणतीसवधे चउसट्ठिसया उ मणुयतिरिएसु । 'उज्जोयतीसि भगा बत्तीससया उ तिरियाणं ॥३४६।। (४४४) [४०२] चउपढम तिनि चरिमा मिच्छगनवगाउ सासणे सत्त । अट्ठासी वाणउई सत्ताहाणा उ साणम्मि ॥३४७।। (४४५) [४०३] पढमा उ चउरउदया इगिविगलपणिदिलद्धिपजाणं । करणि अपजाण संविया ॥३४८॥ (४४६) [४०४] चउ पढमा एगिदिसु चउवीमं मुत्तु ते च्चिय तसेसु । णवरि पणवीसउदओ सुरेसु ।। (४४७) तिण्णुदया जे चरिमा उवसमसम्मम्मि अणउदय भणिया । पञ्जत्तचउगईसु जे जरस य केइ संभविया ॥३४६।। (४४८) [४०५] भन्नई- बत्तीस दोन्नि अट्ट य बास्त्री य सया य पच नव उदया। बारहिगा तेवीस बावन्नेकारस 'सया य ।सूत्रम्-०॥(४४६) [४०६] दो २ छक्क ६ अट्ठ ८ अट्ठग ८ तह अट्ठग ८ सासणम्मि इगवीसे। इगि १ विगल २ सगल ३ मणु ४ सुर ५ पजत्ताणं च संभविया ॥३५०॥ (४५०) [४०७] वायरपत्तेयवणे पजत्तजसाजसेहि दो भंगा इगवीसे चउवीसे २४ अट्ठय ८ पणवीसि देवाणं ॥३५१॥ (४५१) [४०८] पुव्वुत्त एगिंदी भगा उदएसु के कस्स तं १ "उज्जोयतीसवधे” इति L. D प्रतौ । २ "दुनिअट्ट य बासीइ" इत्यपि । ३ "सयाइ। LD प्रती।
गुणस्थानेषु नाम्नो वन्धोदयसत्तास्थामभङ्गा [६९ दोसय अट्ठासीया मणु तह तिरियाण छच विगलाणं । पंचमया वासीया ५८२ उदए छव्वीसि सव्वे वि ॥३५२॥ (४५२) [४०६] एगो य अट्ठभगा नारयदेवाण उदइ उणतीसे तीसुदइ तिरियमणुसुर तेवीससया उ बारहिया ॥३५३।। (४५३) [४१०] उज्जोयतीसि अट्ट उ कारसवावन्न ते य सरतीसे देव तह तिरिय भंगा ते च्चिय मणुयाण तिरियसमा ।।३५४ः। (४५४) [४११] उज्जोयतीसउदओ मिच्छद्दिहिस्स न उण साणस्स । उज्जोयएगतीसा सासणभावम्मि कह एवं ॥३५।। (४५५) [४१२] जं मिच्छदिद्विभणियं 'सामणतीसम्मि तस्स पक्खेवा । अपजत्ति संभवो तहि साणं भासाइपजत्ते ॥३५६।। (४५६) [४१३] इगतीसा तिरिउदए सासणभावम्मिकार वावण्णा चउसहससत्तनवई ४०९७ सासणगुणसव्व पिडेण ||३५७।। (४५७) [४१४] संवेहो य इयाणि सासणभावम्मि पंधि अडवीसे दो उदया अतिल्ला तिगसंत न तिरिय बाणउई ॥३५८।। मणुतीसुदए सत्ता बाणवई जेण कोइ सेढोओ चुयहारगकम्मंसी सासणभावम्मि गच्छेज्जा ॥३५९।। (४५९) [४१६] अडसी तिरिमणुयाणं नियनियउदएसु बट्टमाणाणं अडवीसवंधगाणं तिगठाणा संत संवेहो ॥३६०॥ (४६०) [४१७] उबलियसेमहारगउवसमसम्म लहित्तु जेसि मयं तत्तो सासणभावं बाणवई तिरिय न विरोहो ॥३६१॥ (४६१) [४१८] जो गंठि ता पढमो गंठि समईअओ भवे बीयं । अनियट्टीकरणं पुण सम्मनपुरक्खडे जीवे "तस्स य अते उबसमसम्मं तिगपुंज कुणइ मिच्छस्स । (४६३) वेयगसम्मट्टिी अणंतरं सव्वविरइ लहिऊण तत्तो विसुज्झमाणो आहारचऊ समज्जेइ ॥ (४६४) अडवीससंतकम्मी मोहे वाणवड १ 'सासुणती०" इति L D प्रतौ । २ "०वावन्ना" इति L. D प्रतौ । ३ "एषा गाथा-पूर्णा लेखकदोपात् L D प्रतावस्तीति सम्भाव्यते । एतद्गायोत्तरार्धम्-'तव्वडिओ पुण गच्छइ सम्मे मीसाइ मिच्छे वा ।। (४६३)" इत्येवविध स्यादन्यथा वेत्यपि सभावना क्रियते। (४५८) [४१५] कह भन्नइ- ॥ (४६२) नाम संतंसी । -- ६८] सप्ततिकाभिवे षष्ठे कर्मगन्थे । अडवीसुगुतीसतीसा बंधा साणम्मि बंधभंगा उ अड चउसद्विसयाई बत्तीससया कममो उ ॥३४४।। (४४२) [४००] २६ भगा 1 पुव्वभवायायाणं बधट्टाणा २८ - ६४००३२०० छेवदृहुंड मुत्तं पणपणगेणं गुणिज्ज थिरगाई ।१२८। जम्हा न सासणम्मी हुंडं छेवट्ट वझति ॥३४५।। (४४३) [४०१] तेण उणतीसवधे चउसट्ठिसया उ मणुयतिरिएसु । 'उज्जोयतीसि भगा बत्तीससया उ तिरियाणं ॥३४६।। (४४४) [४०२] चउपढम तिन्नि चरिमा मिच्छगनवगाउ सासणे सत्त अट्ठासी वाणउई सत्ताहाणा उ साणम्मि ॥३४७।। (४४५) [४०३] पढमा उ चउरउदया इगिविगलपणिदिलद्विपजाणं । करणि अपजाण संभविया ॥३४८॥ (४४६) [४०४] चउ पढमा एगिदिसु चउवीसं मुत्तु ते च्चिय तसेसु । णवरि पणवीसउदओ सुरेसु पुव्वुत्त एगिदी ॥ (४४७) तिणुदया जे चरिमा उवसमसम्मम्मि अणउदय भणिया । पञ्जत्तचउगईसु जे जस्स य केड संभविया ॥३४६।। (४४८) [४०५] भगा उद एसु के कस्स तं भन्नइ- बत्तीस दोन्नि अ य बासी य सया य पच नव उदया। बारहिगा तेवीस बावन्नेकारस 'सया य ।सूत्रम्-०||(४४६) [४०६] दो २ छक्क ६ अट्ठ ८ अट्ठग ८ तह अढग ८ सासणम्मि डगवीसे । इगि १ विगल २ सगल ३ मणु ४ सुर ५ पज्जत्ताणं च संभविया ॥३५०॥ (४५०) [४०७] वायरपत्तेयवणे पञ्जत्तजसाजसेहि दो इगवीसे चउवीसे २४ अट्ठय ८ पणवीसि देवाणं ॥३५१॥ (४५१) [४०८] भगा । १ "उज्जोयतीसवधे” इति L. D प्रती । २ "दुन्निअट्ठ य वासीइ" इत्यपि । ३ "सयाइ"। LD प्रती।
गुणस्थानेषु नाम्नो वन्धोदयसत्तास्थामभङ्गा' [ ६९ दोसय अट्ठासीया मणु तह तिरियाण छच्च विगलाणं । पंचसया वासीया ५८२ उदए छब्बीसि सव्वे वि ॥३५२।। (४५२) [४०] एगो य अभंगा नारयदेवाण उदइ उणतीसे तीसुदइ तिरियमणुसुर तेवीससया उ वारहिया ॥३५३।। (४५३) [४१०] उञ्जोयतीसि अट्ठ उ कारसवावन्न ते य सरतीसे देव तह तिरिय भंगा ते च्चिय मणुयाण तिरियसमा ।।३५४॥ (४५४) [४११] उज्जोयतीसउदओ मिच्छद्दिहिस्स न उण साणस्स उञ्जोयएगतीसा सासणभावम्मि कह एवं ॥३५।। (४५५) [४१२] जं मिच्छदिद्विभणियं 'सासणतीमम्मि तस्स पक्खेवा । अपजत्ति संभवो तहि साणं भासाइपञ्जत्ते ॥३५६।। (४५६) [४१३] इगतीसा तिरिउदए सासणभावम्मिकार बावण्णा । चउसहससत्तनवई ४०९७ सासणगुणसव्व पिंडेण ||३५७।। (४५७) [४१४] संवेहो य इयाणिं सासणभावम्मि बंधि अडवीसे दो उदया अतिल्ला तिगसंत न तिरिय बाणउई ॥३५८।। (४५८) [४१५] मणुतीसुदए सत्ता बाणवई जेण कोड सेढोओ चुयहारगकम्मंसी सासणभावम्मि गच्छेज्जा ॥३५९।। (४५९) [४१६] अडसी तिरिमणुयाणं नियनियउढएसु वट्टमाणाणं । अडवीसबंधगाणं तिगठाणा संत संवेहो ॥३६०॥ (४६०) [४१७] उव्वलियसेमहारगउवसमसम्म लहित्तु जेसि मयं तत्तो सासणभावं वाणवई तिरिय न विरोहो ॥३६१॥ (४६१) [४१८] जो गंठिं ता पढमो गंठि समईअो भवे वीयं । अनियट्टीकरणं पुण सम्मत्तपुरक्खडे जीवे "तस्स य अते उवसमसम्मं तिगपुंज कुणइ मिच्छस्स । (४६३) वेयगसम्मदिट्टी अणंतरं सव्वविरद्द लहिऊण तत्तो विसुज्झमाणो आहारचऊ समज्जेइ ॥ (४६४) अडवीससंतकम्मी मोहे बाणवड नाम १ 'सासुणती०” इति L D प्रतौ । २ "बावन्ना" इति L D प्रतौ । ३ “एषा गाथा-पूर्णा लेग्वकदोपात् L D प्रतावस्तीति सम्भाव्यते । एतद्गाथोत्तरार्धम्-'तव्वडिओ पुण गच्छद सम्मे मीसाइ मिच्छे वा ।। (४६३)" इत्येवविध स्यादन्यथा वेत्यपि समावना क्रियते । कह भन्नइ ॥ (४६२) संतंसी । ।
७० ] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे च ।। (४६६) परिवडिउं मिच्छत्तं तह गच्छड चउसु वि गईसु ॥ (४६५) मिच्छत्तगओ तिन्नि वि सम्मं मीसं च हारचउपयडी। उज्वलिडं आढवई उबलइ संखपल्लंसे ॥ (४६६) छव्वीससंतकम्मी पुण स च करणेहि उवसमं पावे । तस्संते अणउदए सासायणभाव गच्छेज्जा । (४६७) आहारचउव्वलिए अट्ठासी संतकम्म णामस्स अहवा वि पढमसम्मे अते साणो व अट्ठासी ॥ (४६८) अन्नेसि मयं तिन्निवि उव्वलियं आढवेइ समकालं । उव्वलइ कमेण तहा पल्लासंखसभागेण उन्नलिए दिट्ठिदुगे हारगसंतम्मि उव्वलियपाए । इत्थंतरम्मि उवसमकरणेहि उवसमइ पावं ।। (४७०) तस्संते अणउदए पढमं साणो व बुच्चए सो च बाणवडसंतकम्मं साणे तिरियाण न विरोहो ॥ (४७१) जे उणतीसं बंधहि सासायणमणुयतिरियपाउग्गं अडसीइमंतठाण सत्तसु उदएसु तह 'तीसे ॥३६२।। (४७२) [४१६] नव तिरिपाउग्गं उज्जोयसहियं तु वधमाणाणं । तिगअट्टअट्टठाणा सव्वे उणवीस पिंडेण ॥३६३॥ (४७३) [४२०] 'उणतीसतीसबंधे नियनियउदएसु संत बाणउई । पुव्वं व भणियविहिणा तिरिमणुय मयंतरेणेह ॥३६४।। (४७४) [४२१] तिगसत्तदुग ति गय ।। २॥ (इति द्वितीयगुणस्थानके) उणतीसअच्छीसा बंधे उदएसु तीसउणतीसा तर 'एगतीस उदए दो ठाणा स्त मीसस्स ॥३६५।। (४७५) [४२२] पसु भंगसो, उदएँ पाउतीमा ।३४६॥ भंगा नदियां उगाया ॥३६६॥ (४७६) [४२३] एगं अट्ट य नारयदेवाज तेवीसं चउरुत्तर २३०४ नरतिरियाण च तीसुदए ॥३६७।। ४७७) [४२४] इगतीसा तिरियाणं तिरिय विगप्पा इकार बावन्ना ।११५२। एवं चउतीससया पणसट्टा मिस्सभंगाणं ॥३६८॥ (४७८)[४२५] १"तीसि" इति L D प्रतौ । २ "हुति" इति L. D. प्रतौ १३ “य कार" इति प्रतिप्रेसकोप्य - गुणस्थानेषु नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानाना मगा सवेधश्च [ ७१ ९२९९ । संवेहो बंधेसु उदयं उदयं पडुच्च दो ठाणा अडवीसि दुअंतिल्ला इयरे 'उणतीसउदओ उ ॥३६६।। (४७९) [४२६] एच सतहाणार ६॥ दुगतिगदुग ति गय ॥३|| (इति तृतीयगुणस्थानके) तिगबंधठाण अजए अडवीसु गुतीसु तह य तीसा य । थिरसुभजसइयरेहि भंगा अहह पत्तेयं ॥३७०। (४८०) ४२७]] अट्ठ उ उदयट्ठाणा जे पुवुत्ता उ वंधि अडवीसे । उदयविंगप्पा सव्वे जे जेसि हुंति संभविया ।।३७१।। (४८१) [४२८] चउगई उ पडुच्च संतठाणसामित्तसमवमाह- संतढाणा चउरो पढमा तेणवइ मणुयदेवाणं अपमत्तसंजओ चंधिऊण अजसो मणुस्सदेवो वा ॥३७२।। (४८२) [४२६] ते च कहं अपमत्तो अपुचकरणो य वंधि इगतीसं । परिवडिऊण अमंजय मणुओ देवो व मरिउ उववन्नो ॥३७३।। (४८३) [४३०] बाणउइ संतकम्मी आहारग बंधिऊण चउगइया । ते उबलिति अजया अणउबलिए य चाणउई ॥३७४॥ (४८४) [४३१] उणनवड देवमणुए नेरइयाण सम्मदिट्ठीणं । तिरिए न तिन्थमंता निरिमणुमिच्छाण अंतमुहू ॥३७५।। (४८५) [४३२] अडमीड संतठाणं चउसु वि गईसु सम्ममिच्छाणं । मणुतिरियाणं सेसा जा जम्स य होइ संभविया ॥३७६॥ तेग्सहीणा चउरो पढमाडकमेण खवगाणं ॥ (४८६) नव तित्थि अट्ठ केवलि सत्ता पयडी अजोगिगुणठाणे । छासी तह सीई तिरिमणु अत्तरि गइतसाणं च (४८७) अट्ठावीसे बंधे अट्ठ उ. उदया संत दो-ठाणा अट्ठासी बाणउई दुग दुग पत्तेर्य उदएसु १६ ॥३७७॥ (८८) [४३४] उणनीमबंधगाणं सामन्तण तु सत्त उदया उ । इगतीनं बज्जेत्ता तिरियाण न मणुयपाउग्गा ॥३७८॥ (४८९) [४३५] दुविहोणनीमबंधो मणुगडपाउग्ग तह सुराणं च देवगईपाउग्गं मणुया चंति तित्थजुयं ॥३७६।। (४९०) [४३६] १ "तिन्नेव” उ या उ" इति J प्रतिप्रेमको म् । २ "" इति ।. प्रतिप्रेसकोप्याम् । च -- सवेहो भन्नइ - ७२] सप्ततिकामिवे पष्ठे कर्मग्रन्थे मणयगईपाउग्गं इह पंचसु उदएसु तेणउई ६३ तहय होइ उणनवई । इगवीसे १ छव्वीसे १ उणनवई संतएगाउ ॥३८०|| (४६१) [४३७] कह भन्नह ।। इह आहारचउक्कं अविरड[ए]पत्तो य उव्यलेमाणो । उव्वलइ कमेण तहा पलियासंखंसभागेण ॥३८१।। (४६२) [४३८] तित्थयरसं म्मी देवा मणुएसु चविउ उववण्णा नाहारसंतकम्म बंधाभावाउ इह तेसिं ॥३८२।। (४६३) [४३९] इगवीसा छब्बीसा दुन्नि उ उदया सरीरअसमत्ते । उणतीसवंधगाणं सम्मद्दिठ्ठीण मणु याणं ॥३८३।। (४९४) [४४०] सुरनेरइया य सम्मदिडी य अट्ठासी बाणउई नियनियउदएसु दो ठाणा १२ ।।३८४॥1 (४६४) [४४१] एवं सुरनेरडया तित्थजुया तीसठाण बधंति तित्थाहारगसंता जेणं चंधि त्ति उववन्ना ॥३८५।। (४६५) [४४२] मणुगइजोग्गं तीमं. सुरनेरइया उ तित्थजुयबंधे तित्थाहारगसंता जेणं बंधे त्ति उववन्ना तेणवई उणनवई उदयं उदयं पडुच्च देवाण ।१३।। निरये नोभयसंता तेणं उणनवइ उदएसु ||३८६।। (४६६) [४४३] सोलस तह चउरीसा वारसठाणा उ तीसु वि कमेण । बावन्न संतठाणा अविरयसम्मस्स बंधेसु ॥३८७।। (४६७) [४४४] तिअटुचउ त्ति गय ॥४।। (इति चतुर्थगुणस्थानके) अडवीसा उणतीसा बंधा उदया उ चउर वेउव्वे । इगतीसतीसउदया सामन्न देसविरयाणं ॥३८८॥ (४६८) [४४५] पुन्चुत्तबंधभंगा। उदयविगप्पा उ.- सरखगइ चरिया । संधयणतहागिहया - चोयालसयं तु पत्तेयं ॥३८६ ।-(४६६) [४४६] तीसोदयम्मि तिरिमणु 'पणुउदयतिरिविउब्बिय ५, |] (४६५) १ 'पण' इति L. D प्रतो।
गुणस्थानेषु नाम्नो यन्धोदयमत्तास्थानाना भगा सवेधश्च [ ७३ - ठवणा- २५ २७ उदयठाणा→ २८ २६ ३० ३१ . उडिवतिरि १ | १ | १ १ वउविमणु- १ १ १ ० . सा. तिरि ८ 5 ० | १४४ १४४ • • . x» • ४४१ सा मणु • • • इय सवेहो भन्नइ अट्ठावीसा य तिविह बंधंति । मणुतिरियकम्मभूमग पलिभागिय देसविरया य ॥३६१॥ (५०१) [४४८] छच्चेव उदय इत्थं दो दो ठाणाडसी य बाणउई । इगतीम न मणुएसु बारस ठाणा उ उदएसु । ३६२।। (५०२) [४४६] तह देसविरयमणुया अडवीसा तित्थसहिय उणतीसा । तेणवई उणनवई पंचसु उदएसु पत्तेयं ।। (५०३) वारस तह दस सत्ता सव्वे बावीस देसविरयाणं दुग छच्चउ त्ति गय ॥५॥ (इति पञ्चमगुणस्थानके) अन्नो उदयविसेसो सत्तय वेउवि तह य आहारे । चोयालसय तेरस अट्ठावन्नं सयं १५८ संखा दुगपणचउ त्ति गय ।।६।। (इति पाठगुणस्थानके) चउवधा अपमत्ते अट्ठावीसाइ जाव इगतीसा 'इक्केक्कभंगमेसिं दो उदया तीसउणतीसा ॥३६३॥ (५०६) [४५०] इक्केक्कं च विउविसु तह इक्केक्कं च हारगजईणं । चोयालसयं तीसे अडयालसयं तु पिडेणं ॥३६४।। (५०७) [४५१] संवेहमंतसंखा दो दो उदया उ बंधि पत्तेयं .. इक्कक्क संतठाण सव्वे अद्वैव उदएसु ॥३९शा (५०८) [४५२] तित्थाहारगसंता रहेउसभावा तमेव बंधंति सम्मअपमत्तसंजय इक्केक्कं तेण उदएसु ॥३६६।। (५०९) [४५३] ।। (५०५) १२३४-६ "एक्के” इति L. D. प्रतौ । ५ "हे उसमावे' इति L D प्रतौ ।
७४ ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे ठवणा- वधठाणा ૨૮ २६ ३० ३१ उदयठाणा २६ । ३० २६ । ३० २६ २ ३० २९ ३० सत्ताठाणा ८८ ८८ ८९ ८६ १२ ९२ ६३ ।। (५११) ।। (५१३) चउदुगचउत्ति गय ||७|| (इति सप्तमगुणस्थानके) बंधा जहाऽपमत्ते अपुव्वकरणि जसकित्तिपंचमिया । तीसुदओ तह भंगा ७२ पढमतिसंधयणसंभविया ॥३६७।। (५१०) [४५४] एगयरे सठाणे सरदुगसगईहिँ होइ चउवीमा । पढमतिसंघयणहया वाहत्तर भंग सव्वे चउपढम संतठाणा अपुव्यकरणस्स एक्कउदयम्मि एत्तो य नवरि वोच्छं जसकीत्ती बंधउदएसु ॥३९८।। । ५१२) [४५५] जसकित्तीए धंधे उदओ तीसन्ह चउर सत्ताओ । एवं सत्ताठाणा अद्वैव अपुवकरणम्मि पणएगचउ त्ति गय ।।८।। (इत्यष्टमगुणम्थानके) एगेगमट्ट एयं वायरसुहुमाण दुण्ह पत्तेयं जसकित्तिमधु तीसह उदउ तह संतठाणाई ॥३९६।। (५१४) [४५६] चउपढमा उवसामग खवगा य पडुच्च बायरकसाए । तह तेरस खविएहि चउरो खगाण अट्ठ । ४००। (५१५) [४५७] गेगमति गय ।।६-१०।। (इति नवम दशमगुणस्थानकयो) बंधोवरमे उवयत खीण तीसण्ह उदय पत्तेयं । चउचउरमंतठाणा उबममखीणम्मि पुव्वुत्ता ।।४०१॥ (१६) [४५८] सरखगडविववखेहिं चउरो चउनीस आगिई गुणिया । ते संघयणातगेण वाहत्तरि होति उवमंते ।।४०२।। (५१७) [४५६] सरखगडविप खेनि चउरो चउवीम आगिई गुणिया । खीणम्पि या नेया पढमम्मि संघयणे ।। (५१८) (nr च नि ॥११-१२।। इत्य कादश-द्वादशगुणस्थानकयो) केवलमजोसु अट्ट र ढो उदयठाण जहसंखं । दो ढो णा तिन्थातित्थाण जोगिरम ॥४०३।। (५१९) [४६०] जे च ना आमी छावत्तरी य दो तिन्नि । १ “हुति' उनि L १ । २"तित्ययरे' नि L D प्रतौ । 7 गुणस्थान केषु गतिमार्गणाचतुष्के च नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानानां भगा संवेधश्च [७५ सामन्त्रकेवलिदुर्ग उणसी 'पण्णत्तरी दुन्नि ॥४०४।। (५२०) [४६१] पण पण उदएसु इहं संतढाणाइ वीस जोगिस्स । अज्जोगिकेवलिम्मी पगई नव अट्ठ उदओ उ ॥४०॥ (५२१) [४६२] नवउदए दो संता तित्थजुया नव य संत इइ तिन्नि । अट्ठोदयम्मि एए तित्थविहूणा य इय (६) छच्च ॥४०६॥ (५२२) [४६३] (अट्ठ चउ त्ति दुछक्क ति य गय ॥१३-१५।। (इति त्रयोदश चतुर्दशगुणस्थानकयो) चउतीससंतठाणा उवरयवंधम्मि सव्व उदएसु भणियाउ विवरणा इह गुणठाणगगाहदुगनामे ॥४०७॥ (५२३) [४६४] दोछक्कट्ठचउक्कं इच्चाई मग्गणा उ चोद्दस वि । सूइ[य] इह सत्थयारेण तेसिँ पि करेज्ज अणुसारा ।।४०८॥ (५२४) [४६५] दोछक्काढचउक पणनवए रछक्क बधुदया नेरइयाइ संता ति पच एक्कारस चउक्कं ।। सूत्रम्-५१॥ (५२५) जीवभेदा निरि तिरि मणु देव ठवणा- वघठाणा २ ६ ८ ४ उदयठाणा → ६ ६ सत्ताठाणा ३ ५ ११ निरयगइ दुन्नि बंधा उणतीसा तीस तिरियमणुजोग्गा । भंगा इह पुव्वुत्ता संघयणतहागिगुणियाउ ।। (५२६) अद्भुत्तर छायाला उणतीसे दुन्ह तीसि जोयजुये । तह तीसे तित्थजुये मणुजोगे मणुजोगे अट्ठ भंगा उ ।। (५२७) ठवणा- बधठाणा (मन्वे) २६ ३० J तिरिजोग्गा भ ४६०८ | ४६०६ (६२१६) मणु जोग्गा भ० ४६०८ ८ (४६१६) (१३८३२) १ "पन्नत्तरी” इति D प्रतौ ।
७६ ] सप्ततिकाभिधे षष्ठे वर्मग्रन्थे मणुगड ठवणा- २६ ३० ३१ । 8 0 तिरियगई छब्बन्धा तेवीसाई य तीसपज्जंता भंगा इह मिच्छसमा अर्टव ओघुत्ता ।। (५२८) वघाणा→ | २३ 10 १ । (सवे) तिरियवधठाणम ४ / २५ १६ | २४०/४६३२ ० (१३६२६) मणुयबधठाणम १०४८४६३३ १ ६०४८/४६३३ १ (१३६३७) पणवीसा छव्वीसा उणतीसा तीस चउर सुरगंधा । आइदुगिगिदिवायरडयरे मणतिरियपाउग्गा पणवीसे अड भंगा छन्वीसे दुगुण आयवुज्जोए । वायरएगिदिगया दोसु य नरयव्व उठंति || (५२६) ।। (५३०) ठवणा- -- बबट्टाणा २५ २६ २ २६ ३२ सम्वे] तिरियजोग्गभ १६ ४६०८ | ४६०८ (६२४०) मणुयज्ञोग्गभ ४६०८ (४६१६) (१३८५६) दोछक्कट्ठचउक्क ति गय ॥ (इति नरकादिगतिचतुष्के नाम्नो बन्धस्थानानि) इगवीसा पणवीसा सगवीमा अट्टचीस उणतीसा । नेरहय पंच उदया एक्केको भंगमेएसु ।। (५३१) ठवणा- उदयठाणा- २१ २५ २९ भगा १ or पण उदया एगिदिसु विगले सगले य छच्च पत्तेयं । सामन्नतिरि विउव्विय देवुदया पंच न य पढमो ॥ (५३२) वायाला छावट्ठी इगविगले निययनिययउदएसु । सगलेसु छच्चुदया उणपन्न छलुत्तरा छप्पन्न तिरिविउव्विसु पिडे पणसहससयरिजुयउदया । तिरियगइ सच्चभंगा ठावणसित्तं तु जंतइयं पिडे ॥ (५३३) । (५३४) गतिमार्गणाचतुष्के नाम्नो बन्धोदयस्थानानां मङ्गा [७७ ठवणा- उदयठाणा→ → २१ २५ २६ २७ २८ २६ ३० (सम्वे) ३१ 1 एगिदिभ → ५ ११ | १३ ६ . . ४२ विगलभ → ६ । ६ ६ १६ १० ६६ ५७६ सगल तिरिम ६ ० २८ह ० ५७६ ५७६ ५७६ ५७६ ५७६ ४९०६ वेउव्यितिरि • ८ • ८ | १६ . - । (५३५) अड भंगा पुव्वुत्त ॥ (५३६) सामन्नमणुयउदया इगवीस छवीस तह य अडवीमा । उणतीसा तीसा तह छन्वीस दुउत्तरा पिडे सेसा उ छच्च ठाणा केवलिआहार तह विउव्वाणं त्ता पणतीसा मणुउदए ठवणा- उदयठाणा - २०२१ २५ ३० ३१ ६ मणुभग० → ५७६ | ५७६ ११५२ आहारभग०→ सामन्नके०→ | ०२ २४ तित्थयर० → २६ २० | २८ / २६ ३ सत्व भगा U + 0 ६ ० २९ ० . २६०२ १ ० २ २ oM १ ० ० 10 ६ शेष०२ १ १ ८ १ १ १ 0 ६ घेउवि० ९ १ 이 이 ० इगवीसा पणवीसा छच्चुदया देवेसु सत्तावीसाइ जाव तीसुदओ भंगा चउसट्टि सव्वेवि ।। (५३७) ठवणा- - उदयठाणा → २१ २८ ३० | २७ ८८] उदयभंगा १६ । १६ ८ सव्वभगा ६४|| ७८ J सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे तह पंचमिया ८। उ ।। (५४१) नह तीने पण नव एक्कार छक्क त्ति गय ॥(इति नरकादिगतिचतुष्के नाम्न उदयस्थानानि) बाणउई अट्ठासी उणनवई निरय तिन्नि संताओ । तिरियगइ पंच संता सामन्नेणं तु इय एवं ॥ (५३८) बाणउई अट्ठासी छलसी अत्तरी य चत्तारि । आसी अत्तरिवज्ज मणुएस ॥ (५३) मणुयसत्ताठाणा- ६३, ६२, ८६, ८८ ८६, ८०, ७६, ७६, ७५, ६, देवगइ चउर संता तिणवड बाणवइ तह य अट्ठासी ।। उणनवई संत भवे 'इओ(नो) संवेहु एएस ।। (५४०) (तिपचएक्कारसचउक्क ति गय ।। इति गनिचतुष्के नाम्न सत्तास्थानानि) (अथ गतिमार्गणाचतुष्के नाम्नो बन्धोदयसत्तास्थानसवेध ) उणतीसे बंधम्मी पंचसु उदएसु निरय दुगसंतं । बाणबई अट्ठासी तिरिजुग्गे संतया दस उज्जोए उणतीसे तह य मणुयजुग्गम्मि । दस दस संतवाणा उणनवई दोसु पणपणगं 11 (५४२) तिन्थयरसंतकम्मी मिच्छद्दिट्ठी उ अंतमुहुकालं उणतीसबंध संतं उणनवइ नेरइयउदएसु तह तीसचंधि एवं सम्मद्दिट्ठी उ निरयचंधेसु आयमचउअंतमुहू चरिमे निरयाइयं संतं इय संवेहो वुत्तो नारयवंधुदयसंत चालीसं । तिरियगई संवेहो इय अणुसारेण वोच्छामि बधठाणे २६, उदएसु सतठाणा तु एव सव्वा २५|| बधठाणे ३०, उदएसुसतठाणा उदयठाणा २१ २७ २१ | २५ | २० | २८ | २६ ६२ ६२ सगलतिरिजुग्गे मणुयगइजुग्गे ८९ तित्थयरसतकम्मी एच सव्वेवि १५॥ तिरियगइसवेहो भन्नइ- पणवधा हिवसमा वंधे बंधे य नव उदयठाणा । आइमचउ पणसंता चरिमा नियमा उ चउसंता ॥ (५४६) ।। (५४३) ।। (५४४) ॥ (५४५) ठवणा- २५ २६ ६२ ९२ ९२ ८८ ६२ १२. ९२ ८८ ८८ २ २ २ २ २ ८६ ६६ १ १ १ १ १ [७९ ।। (५४८) || (५५२) गतिमार्गणाचतुष्के नाम्न सत्तास्थानमङ्गा बन्धोदयसत्तास्थानसंवेवश्च चालीमसंतठाणा बंधे बंधे य होति पत्तेयं । दुनिसय संतभेया अट्ठावीसम्मि पुण एए ॥ (५४७) अट्ठावीसे बंधे उदयट्ठाणा उ अट्ठ पुव्वुत्ता कम्मभोगभूमियवेउव्यियतिरियमासज्ज दो दो संतट्ठाणा अट्ठसु उदएसु होति पत्तेयं । नवरं दोअंतिल्लिसु छलसी अट्ठार सब्वेवि ।। (५४१) मणुयगइसवेहमाह- मणुउदया पुण सत्त उ उदए उदए य चउर संताउ । बाणवई अट्टानी छलसी तहऽसीइ तुरिया उ ॥ (५५०) नवरं दो वेउब्धिय दो दो पढमाउ संतभेया उ । चाणउई अट्ठासी पणवीसे तह य सगवीसे ॥ (५५१) संवेहो बंधेसु बंधे बंधे य सत्त सव्वुदया । चउवीस संतठाणा पंचसु बंधेसु पत्तेयं पढमतिगवंधु मिच्छे उणतीसा तीस सम्म तह मिच्छे । सव्वेसु संतठाणा चउवीसे पंच गुणिया उ ॥ (५५३) तित्थयरसंतियाणं तिणवइ उणनवइ दुन्नि उदएसु उणतीस बंधठाणे सत्तम उदएसु पत्तेयं अठावीसे वंधे सत्तसु उदएसु संतसोलसगं तीसे तह इगतीसे वाणउई तह य तेणउई ।। (५५५) जसकित्तिबंध अट्ठ उ उवरयवंधम्मि तीस पुव्वुत्ता । नउयसयमंतसखा मणुयगई नामसंवेहो (देवगइसवेहमाह-) देवगई मवेहो वंधे वंधे य सव्वुदयठाणा वाणउई अट्ठासी दो दो संता उ उदएसु तित्थयरसंतिया जे मणुयगईजोग्गतीस बंधंता । तेणउई उणनवई छसुवि उदएसु तेणवइमंतकम्म पलियासंखंसआउवोलीणे न घडइ देवगईए आहारचउक्क उबलह केसिंचि मए एवं आहारुव्वलिय सचरमखंडस्स विहु तेणवई तेण बहुकालं || (५५४) ।। (५५६) ।। (५५७) पत्तेयं ॥ (५५८) || (५५६) संता अहिया 11 (५६०)
८०]
सप्ततिकाभिधे षष्ठेकर्मग्रन्थे
।। (५६०
।। (५६२)
देछक्कट्ठचउक्कं
इच्चाउट्ठाण गइचउकस्स
बंधोदयसवियप्पा संतढाणा य इय
वुत्ता
इय अणुसारेण तहा नेया इह मग्गणाण तेरससु
बंधोदयसंतगया भेयवियप्पाउ सव्वत्थ
इय एउ सुमरणत्थ टिप्पणमित्तं पि किंचि उद्धरियं
लक्खणछंदवियारो न य कायव्यो य को वि इहं ।। (५६३) [४६६]
इत्थ य सुत्तविवन्नं मइमोहा किंचि उद्धरिय होज्जा ।
सोहिंतु जाणमाणा मज्झ य मिच्छुकडं होउ । (५६४) [४६७]
सिरिजिणवल्लहसूरी आसी सूरुव्व भुवणविक्खाओ ।
तस्सेव विणेएणं उद्धरियं रामदेवेणं
॥ (५६५)
॥ इति श्रीरामदेवगणिकृत सप्ततिकाटिप्पनक समाप्तम्
॥
शिवमस्त शीतः
जैन जयति शासनम
१ सप्ततिकाभिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे-ऽवशिष्टमूलगाथासूत्राणि [८१ इगिविगलिदिय सगले पण पच य अढ बंधठाणाणि। पण छवकेकारुदया पण पण बारसगसंताणि ॥सूत्रम्-५२।। इय कम्मपगडिठाणाणि सुट्टु वधुदयसतकम्मसा । गइआइएहिं अट्ठसु चउप्पगारेण नेयाणि ॥सूत्रम्-५३॥ गइ १इदिए २य काए ३जोए ४ वेए ५ कसाय ६ नाणे य। संजम ८ दसण : लेसा १० भव ११ सम्मे १२ सन्नि १३ आहारे १४॥सूत्रम्-०॥ सतपयपरूवणया १ दव्वपमाणंच २ खेत्त ३ फुसणा य । काल ५ तर च ६ भावो ७ अप्पाबहुयं च ८ दाराइ ॥सूत्रम्-०॥ Xउदयस्सुदोरणस्स य सामित्ताओ न विज्जइ विसेसो। मुत्तूणं ईयाल सेसाणं सव्वपयडीणं ॥सूत्रम्-५४॥ Xनाणंतरायदसगं१० दंलण नवह वेयणिज्जमिच्छत्तं। सम्मत्त १ भ १ वेया ३ उयाणि ४नवनाम ९ उच्चं १ च ॥सूत्रम्-०॥ मणुयगइजाइतसवायरं च पजत्त भगमाइज्ज । जसकित्ती तित्थगर नामस्स हवंति नव एया सून्नम्-०॥ तित्थयराहारगविरहिया उ अज्जेइ सव्वपयडीओ । मिच्छत्तवेयगो सासणो वि उगवीससेसाओ ॥सूत्रम्-५६।। छोयालसेस मीसो अविरयसम्मो तियालपरिसेसं । तवन्न देसविरओ विरओ सगवन्नसेसाओ ॥सूत्रम्-५७|| उगुसहिमप्पमत्तो देवाउगस्स इयरो धि अट्ठावन्नम पुग्दो छप्पन्न वावि छन्वीस ।सूत्रम्-२८॥ बावीसा एगणं बंधइ अट्ठारसत्ति सत्तर सुहुमसरागो, सायममोहो सजोगि त्ति ।।सूत्रम्-५९|| १ ब पह अनियट्टी । ४ उदयस्सु गाहा ।। नाणतरायगाहा ॥ निद्दापणगाण सरीरपज्जत्तीए पज्जयाण बीयसमयाउ आढ- वित्तु उदओ हवइ उदीरणाए विणा ताव जाव इदियपज्जत्तीए पज्जत्तगुत्ति तओ बीयसमयपभिइ दोवि हुति त्ति ॥ मिच्छत्तस्स पढमसम्मत्तमुप्पइतेण अतरकरण कय तत्थ पढमठिईअ आवलियसेसाए उदीरणा नत्थि उदओ चेव ।। सम्मत्तस्स बावीससतकम्मे आवलियसेसे उदभो चेव ॥ अहवा उवसमसेटिं पडिवज्जतस्स अतरकरणे कए पढमठिईए आवलियसेसाए उदओ चेव ॥ तिण्ह वेयाण जेण वेएण सेटिं पडिव जस्स अतरकरणे कए पढमठिईए आवलियासेसाए उदो चेव ।।
२] सप्ततिकामिधे षष्ठे कर्मग्रन्थे ऽवशिष्टमूलगाथासूत्राणि पढम । -- एसो उ' बंधसामित्तोघो गइयाइए वि तहेव । ओहाओ साहिज्जा जत्थ जहा पयउिसम्भावो ||सूत्रम्-६०।। तित्थयरदेवनिरयाउयं च तिमु तिसु गईमु बोधव्य । अवसेसा पयडीओ हवंति सव्वासु वि गईसु ॥सूत्रम्-६१।। पढमकसायचउक्कं दसणतिगसत्तया वि उवसता । अविरयसम्मत्ताओ जावऽनियहित्ति नायव्वा ।।सूत्रम्-६२॥ सत्तट्ट नव य पन्नरस सोलस अट्ठारसेव इगुवीसा । पगाहिदुचउवीसा पणवीसा पायरे जाण ॥सूत्रम्-०॥ सत्तावीसं सुहमे अट्ठावोस वि मोहपयडोओ । उवसंतवीयरागे उवसता हुति नायव्वा ॥सूत्रम्-०॥ ायचउक एत्तो मिच्छत्तमोससम्मत्तं अविरयसम्मे देसे 'पमत्तअपमत्त खोयति ॥सूत्रम्-६३।। अनियटिबायरे थीणगिडितिगनिरयतिरियनामाउ सखिजइमे सेसे तप्पाओगा उ खोयति ॥सूत्रम्-०|| एत्तो हणइ कसायहगं पि पच्छा णपु सग इत्थी । तो णोकसायछक्क पि छुहइ सजलणकोहम्मि ॥सूत्रम्-०॥ पुरिसं कोहे कोह माणे माणं च छुहइ मायाए । मायं च छुहइ लोभे लोभ मुहम पि तो हणइ ।।सूत्रम्-६४॥ खीणकसायदुचरिमे निद्द पथल च हणइ छउमत्थो । आवरणमंतराए छउमत्थो चरिमसमयम्मि सूत्रम्-०॥ संभिन्नं पासंतो लोगमलोगं य सव्वओ सव्वं तं नथि ज न पासह भूयं भव्वं भविस्सं य ।।सूत्रम्-०॥ देवगइसहगयाओ दुचरिमस भघियम्मि खीयति । सविवागेयरनामा नीयागोयपि तत्थेव ॥सूत्रम्-६५॥ अन्नयरवेयणिज्जं मणुयाऊ उच्चगोय नामे य वेएइ अजोगिजिणो उक्कोस जहन्न एक्कार ॥सूत्रम्-६६॥ मणुयगडजाइतसबायरं च त्तसुभगमाएज्ज । जस तित्थयर नामस्स हवति नव एया ॥सूत्रम्-६७|| १. "पमत्तअपमञ्चगे य खीयंति" इति पाठ ।
[ ८३
सप्ततिकाभिधे पष्ठे कर्मभन्थे ऽवशिष्टमूलगाथासूत्राणि
तचाणुपुच्चिसहिया तेरस भवसिद्धियस्स चरिमम्मि ।
सन्तंसगमुक्कोसं जहन्नयं घारस हवन्ति ॥सूत्रम्-६८||
मणुयगइसहगयाओ भवखित्त विवागजीववागत्ति ।
वेयणिअन्नयरुच्च च चरिमसमयम्मि खोयति ॥सूत्रम्-६९॥
अह सुचिरसयलजयसिहरमरुयनिरुवमसहावसिद्धिसुह।
अणिहणमव्वाबाह तिरयणसारं अणुवति ॥सूत्रम्-७०॥
दुरहिगमणिउण परमत्थरुइलबहुभगदिद्विवायाओ ।
अत्था अणुसरियव्वा बधोदयसतकम्माणं ॥सूत्रम्-७१।।
जो जत्थ अपडिपुन्नो अत्थो अप्पागमेण बडोत्ति ।
तं खमिऊण बहुसुया पूरेऊणं परिकहितु ॥सूत्रम्-७२।।
गाहरगं सयरीए चदमहत्तरयथाणुसारीए
टीकाएं नियमियाणे एगूणा होइ नउईओ सूत्रम्-०॥
॥ सप्ततिका समाप्ता ॥
शिवमस्त सजगता
जैन जयति शासनम
अठ्ठदय-संत सप्ततिकाभिधः षष्ठः कर्मग्रन्थः सिद्धपएहि महत्थं, बंधोदयमंत 'पयडिठाणाणं । चुच्छं सुण संखेवं, नीसंदं दिहिवायस्म ॥१॥ का बंधतो वेयइ, का कइ वा संतपयडिठाणाणि । मूलुत्तर पगईसु, भंगविगप्पा 'उ बोद्धव्वा ॥२॥ अट्टविहसत्तछब्बंध 'एसु, अव उदय संतंमा । एगविहे तिविगप्पो, एगविगप्पो अधंमि ॥३॥ सत्तट्टबंध तेरससु जीवठाणेसु । एगंमि पंच भंगा, दो भंगा हुंति केवलिणो ॥४॥ अहसु एगविगप्पो, छरसु वि गुणसन्निएसु दुविगप्पो । पत्ते पत्ते बंधोदयमंतकस्माण ।।५।। पंच नव' 'दुन्नि अट्ठा-वीसा चउरो तहेव चायाला । १'दुन्नि अ पंच य भणिया, पयडीओ आणुपुव्वीए ।। ६ ॥ (प्रक्षेपगाथा) बधोदयसंतसा, नाणावरणंतराइए पंच । वंधोवरमेषि उदय, संतंसा हुंति पंचेव ॥६॥७॥ * सप्ततिकाख्यस्य पष्ठस्य कर्मग्रन्थस्य मूलगाथा सप्ततिकाचूर्णावेकसप्ततिसङ्खयाका गृहीता. सन्ति । ताश्चात्रा-ऽङ्कतो दर्शिता तथा ऽन्या अपि प्रक्षिप्तगाथा मुद्रितपुस्तके[पलभ्यन्ते ता अप्यत्र सगृहीता , ताभि. प्रक्षिप्तगाथामि सह मूलगाथाना क्रमाङ्क एकनवतिसहयान्त प्रदर्शित स च मुद्रित. पुस्तकेपु दृश्यते । हस्तलिखितप्रतौ पुनरेकनवतिगाथाक्तक्रमानुमारेण ६६-६७ तमगाथयोर्मध्ये दगाथे अधिकतथा स्त , ६२ तमगाथा नास्ति, ६८-६६ तमगाथयोर्मध्येऽधिकतयैकगाथा-ऽस्ति, तेन हस्तलिखित प्रतौ सर्वा गाथास्त्रिनवतिर्भवति । मुद्रितपुम्नकापेक्षया हस्तलिखितप्रतौ २१.६२ तमगाथयो , २७-२८ तमगाथयो , ५५-५६ तमगाथयोश्च क्रमव्यत्ययोऽस्ति । ८६ तमगाथा च भिन्नवास्ति । तथा श्रीमन्म- लयगिरिपादकृतवृत्तावपि चूर्णिवन्मूलगाथा' सन्ति, केवल तत्र २४-२५ तमगाथयोर्मध्ये भाष्यसत्का- ऽशीतितमा गाथा २५ तमगाथातयाऽधिका प्रक्षिप्ता विद्यते, तेन तत्र सर्वा गाथा द्वासप्ततिर्भवति । १ "पगई" इति वा "पगडि" इति वा । २ "वोच्छ' इपि । ३ “निन्सद'' इत्यपि । ४ "सति पगडिठाणाणि" इति चा. "पयडिसतठाणाणि' इति वा “पयइठाणकम्मसा' इति वा “पयडिठाणसतसा' इति वा पाठ'। ५. “पयडीसु" इति वा, 'पयडीण" इति वा पाठ-। ६ “उ बोधव्या" इति वा “मुणेयव्या" इति चा पाठ । ७ "गेसु" इति वा। = "सताई' इत्यपि । ६ “होति" इत्यपि । १०-११ "दोन्नि" इत्यपि । १२ "य" इत्यपि। १३ तहा उद-सता होंति पचेव ॥६॥' इति वा, "तहा उदसता हुति पञ्चेव ॥६॥” इति वा, "पुणो पञ्चेव य उदयसतसा ।। इति वा । १3 , .
२] सप्ततिकाभिध पष्ठ कर्मग्रन्थ बंधस्स य संतस्स य, 'पगडाणा तिणि तुल्लाई । 'उदयट्ठाणा दुवे, चउ पणगं दसणावरणे ॥ ७ ॥ ८॥ बीआवरणे नवबंध एसु, चउपंचउदय नवसंता । छच्चउबंधे चेवं, चउबंधुदए छलंया य ॥८॥ ९ ॥ उवरयवंधे चउ "पण, नवंस चउरुदय 'छच्च चउ संता । वेअणिआउयगोए, विभज्ज मोहं परं कुच्छं ॥ ६ ॥१० ।। गोअंमि सत्त भंगा, अह य भंगा हवंति वेअणिए । पण नव नव पण मंगा, आउचउक्के वि कमसो उ ॥११॥(प्र०) बावीस इक्कवीसा, 'सत्तरसं तेरसेव नव पंच । चउ तिग दुगं च'इक्कं, वधट्टाणाणि मोहस्स ॥१०॥१२।। १'एगं व दो व चउरो, एत्तो १२एगाहिआ दसुक्कोमा । ओहेण मोहणिज्जे, उदय हाणाणि नव हुँति ।।११।१३।। "अट्ठय-सत्तय-छ-च्च उ-तिग-दुग-"एगाहिआ भवे वीसा। तेरस 'वारिक्कारस, 'इत्तो पंचाड ' एगूणा ।।१२।।१४।। संतस्स पयडिठाणाणि, ताणि मोहस्स हुँति पन्नरस । वंधोदयसंते पुण, भंगविगप्पा २३बहू जाण ॥१३॥१५॥ छब्बाबीसे चउ इगवीसे, सत्तरस तेरसे दो दो । २४नवबंधगे वि"दुण्णि उ, "इकिकमओ पर भंगा ।।१४।।१६।। दस बावीसे नव २ इगवीसे, सत्ताइ उदय कम्मंसा । छाई नव सत्तरसे, तेरे पंचाड अट्टेव ॥१५||१७|| १ “पगईठाणाणि तिन्नि तुल्लाणि" इति वा, "पगडिट्ठाणाणि तिन्नि सरिसाणि ।" इति वा । २ "उदयट्ठाणाणि" इति वा । ३ "गेसु" :ति वा । ४ गेसु" :ति वा । ४ ‘पच उदय नवसत छञ्च चउजुयल ।” इत्यपि पाठ । ५ "छ चउसताइ" इत्यपि । ६ “वोच्छ” इति वा। ७ “य" इत्यपि । ८. "एकवीसा" इत्यपि। ६ “सत्तरसा" इत्यपि। १० “एक्क" इति वा 'एग" इति वा ११ "एक्क" इति वा, ‘एको" इति वा. "एको' इति वा, "एग च दो य चउरो' इति वा । १२ “एक्काहिया" इत्यपि । १३ "णिज्जा” इति वा । १४ “ढाणा नव हवति' इत्यपि । १५ "अगसत्तग" इति । १६ “एका०" इत्यपि। १७ "बारेकारस' इति वा “वारेकारा” इति वा। १८ "एन्तो" इति वा । १६. ' एक्कूणा' इत्यपि, “एकूणा' इत्यपि वा। २० "पगडि०" इति वा, “पगह." इनि वा, "पगइठाणाइँ" इति वा । २१ 'होनि" इति वा । २२ "०विगप्पे” इति वा । २३ "बहु" इत्यपि। २४ ‘णव०" त्यपि । २५ "दोन्नि' इत्यपि । २६ “एक्के- क०" इत्यपि। २० "इक्कयोस' इति वा “एगवीस" इति वा । २८ "ठाणाणि" इति वा "०ठाणाइ"इति वा ।
सप्ततिमाभिध षष्ठ कर्मग्रन्थ [ ३ १६ चत्तारि 'आइ 'नवबंध एसु उक्कोम सत्तमुदयसा । पंचविहवंधगे पुण, उदओ "दुण्डं मुणेअन्बो ॥१६॥१८|| इत्तो चउ वधाई, इविकक्कुदया हवंति सन्चेवि । वंधोवरमे वि तहा, उदयाभावे 'वा' हुज्जा ॥१७॥१९॥ 'इक्कग छक्किक्कारस, दस सत्त चउक्क'इकगं चेव । एए चउवीसगया, १३चउवीस दुगेकमेक्कारा ॥१८॥२०॥ १'नवतेसीडसएहिं, उठय' विगप्पेहि मोहिआ जीवा । "अउणुत्तरिमीआला,पय" "विंदसएहि बिन्ने आ॥२०॥२१॥ नवपंचा' उअसए, उदयविगप्पेहि मोहिआ जीचा। २°अउणुत्तरि एगुत्तरि, पयविंदसएहि विन्नेआ ||१६||२२|| २१तिन्नेव य बावीसे इगवीसे अट्टवीस २२सत्तरसे । छच्च व तेरनव-बंध२४ एसु पंचेच २५ठाणाणि ॥२१॥२३॥ पंचविहचउविहेसु, छछक्क सेसेसु जाण पंचेव । पत्तेअ, पत्ते चत्तारि २ अ बंध वुच्छेए ॥२२॥२४॥ दसनवपन्नरसाई. बंधोदयसंत पयडिठाणाणि । भणि आणि मोहणिज्जे,'इत्तो नामं परं वुच्छं॥२३॥२५॥ १ "माइ' इति वा। २ "णव0” इति वा । ३ "०गेसु" इति वा । ४ 'सत्तक्कमेण उदयसा" इति वा "उकोससत्त उदयसा" इति वा । ५ "दोह" इति वा । ६ 'एत्तो' इति वा । ७ "बधादी" इत्यपि । ८ "एक्कुरकु" इत्यपि, "इक्केदकु०” इत्यपि वा । ९. "ता होज्जा ॥१६॥" इति वा । १० 'होज्जा" इत्यपि। ११ एका छक्कारस" इत्यपि । १२ “एकगा' इति वा, "एक्कग" इति वा । १३ 'चउवीसटुगेक्कमिक्कारा ॥१८॥” इत्यपि, “चउवीस दुगिकमिकारा ॥२०॥" इत्यपि वा, "बार दुगिक्कमि इक्कारा ॥२०॥" इत्यपि वा । १४ इयं गाथा हस्तलिखितप्रती द्वाविंशतितमी द्वाविंशतितमी चैकविंशतितमीति व्यत्यय । १५ “विगप्पेहि मोहिया' इत्यपि । १६ "अउणत्तरिसीयाला'' इत्यपि । १७ "०वद०" इत्यपि। १८ णउयसए" इति वा, '०णउइसएहुदा" इति वा, "०णुयसए हिं" इति वा । १६ "मोहिया" इत्यपि । २० "अउणत्तरि" इति वा, "अउणत्तरि एगुत्तरि' इति वा । २१ ‘तिण्णेव उ” इति वा, "तिन्नेव उ" इति वा । २२ "कस्मसा सत्तरसे छस्सते तेरस नववधए पच ॥२३॥” इति हस्तलिखितपतौ। २३ “णव०" इति वा । २४ "०गेसु" इति वा । २५ "ठाणाइ ॥२१॥ इति वा २६ “पत्तेय पत्तय" इत्यपि । २७ "य"इति वा, “उ” इति वा । २८ "वोच्छेए' इत्यपि। २६ "०पगइ०" इति वा •पयइ०” इत्यपि वा । ३० "भणिया" २६ ३१ "एत्तो' इति वा । ३२ ‘णाम' इति वा । ३३ "वोच्छ' इत्यपि ।
२] सप्ततिकाभिध पष्ठ कर्मग्रन्थ बंधस्स य संतस्स य, 'पगडाणा तिणि तुल्लाई । उदयट्ठाणा दुवे, चउ पणगं दसणावरणे ।। ७ ।। ८ ।। वीआवरणे नवबंध एसु, चउपंचउदय ननसंता । छच्चउर्ववे चेवं, चउवंधुदए छलंसा य ॥८॥ ९ ।। उवरयवंधे चउ पण, नवंस चउरुदय 'छच्च चउ संता । वेअणिआउयगोए, विभज्ज मोहं परं बुच्छं ।।६ ॥१ ० ॥ गोअंमि सत्त भंगा, अट्ठ य भंगा हवंति वेअणिए । पण नव नव पण भंगा, आउचउक्के वि कमसो °उ ॥११॥(प्र०) बावीस इक्कवीसा, 'सत्तर तेरसेव नव पंच । चउ तिग दुगं च इक्कं, बंधट्टाणाणि मोहस्स ।।१०।।१२।। १'एगं व दो व चउरो, एत्तो १२एगाहिआ दसुक्कोमा । ओहेण मोहणिज्जे, उदय हाणाणि नव हुँति ।।११।१३।। १ अट्ठय-सत्तय-छ-च्चउ-तिग-दुग-"एगाहिआ भवे वीसा । तेरस 'वारिक्कारस, 'इत्तो पंचाड "एगूणा ।।१२।।१४।। संतस्स पयडिठाणाणि, ताणि मोहस्म हुँति पन्नरस । बंधोदयसंते पुण, भंगविगप्पा २बहू जाण ||१३||१५|| छब्बाबीसे चउ इगवीसे, सत्तरस तेरसे दो दो। नवबंधगे विदुण्णि उ, इकिक्कमओ परं भंगा ।।१४।।१६।। दस बावीसे नव २ इंगवीसे, सत्ताड उदयकम्मंसा । छाई नव सत्तरसे, तेरे पंचाइ अट्टेव ॥१२॥१७॥ - २४ . - १ "पगईठाणाणि तिन्नि तुल्लाणि" इति वा, "पगडिठ्ठाणाणि तिन्नि सरिसाणि ।" इति वा । २ "उदयट्ठाणाणि” इति वा । ३ गेसु" :ति वा । ४ ‘पच उदय नवसत छच्च चउजुयल। " इत्यपि पाठ । ५ "छ चउसताइ" इत्यपि । ६ “वोच्छ” इति वा । ७ "य" इत्यपि । ८. "एकत्रीसा" इत्यपि । ६ "सत्तरसा" इत्यपि । १० "एक्क" इति वा · एग" इति वा ११ "एक्क" इति वा, 'एक्को" इति बा, "एको' इति वा, “एग च दो य चउरो' इति वा । १२ “एक्काहिया" इत्यपि । १३ "०णिज्जा" इति वा । १४ "०ढाणा नव हति' इत्यपि । १५ "अगसत्तग" इति । १६ “एक्का०" इत्यपि । १७ “बारेक्कारस' इति वा “वारेकारा” इति वा । १८ "एत्तो" इति वा । १६. 'एक्कूणा'' इत्यपि, “एकूणा' इत्यपि वा । २० "पगडि०" इति वा, “पगइ०" इति वा, "पगइठाणा" इति वा । २१ 'होंनि" इति वा । २२ "विगप्पे” इति वा । -३ "बहु” इत्यगि । २४ ‘णव०" : त्यति । २५ "दोन्नि' इत्यपि 1 २६ "एक्के- Fo" इत्यपि । २७ "इकोस" इति वा “एगवीस" इति वा । २- "ठाणाणि" इति वा "०ठाणाइ"इति वा ।
सप्ततिमाभिध षष्ठ कर्मग्रन्थ [३ चत्तारि 'आइ 'नवबंध एसु 'उकोम सत्तमुदयंसा । पंचविहवंधगे पुण, उदओ 'दुहं मुणेअब्बो ॥१६॥१८॥ इत्तो चउबंधाई, इविकक्कुदया हवंति सन्चेवि । बंधोवरमे वि तहा, उदयाभावे वि 'वा'"हुज्जा ॥१७॥१९॥ १'इक्कग छक्किक्कारस, दस सत्त चउक्क'इकगं चेव । एए चउवीसगया, 'चउवीम दुगेकमेकारा ॥१८॥२०॥ १'नवतेमीइसएहिं, उदय विगप्पेहि मोहिआ जीवा। "अउणुत्तरिमीआला,पय विढसएहि विन्ने आ ॥२०॥२१॥ नवपंचा' उअसए, उदयविगप्पेहि १ मोहिआ जीवा । २ अउणुत्तरि एगुत्तरि, पयविंदसएहि विन्नेआ ॥१६॥२२।। २"तिन्नेव य वावीसे डगवीसे अट्ठवीस २२सत्तरसे । छच्च व तेर नव-बंध एसु पंचेव "ठाणाणि ||२१।।२३।। पंचविहचउबिहेसु, छछक्क सेसेसु जाण पंचेव । पत्तेअ, पत्ते चत्तारि २७अ बंध वुच्छेए ॥२२||२४|| दसनवपन्नरसाई. बंधोदयसंत पयडिठाणाणि भणिआणि मोहणिज्जे, 'इत्तो नामं परं वुच्छं।॥२३॥२५॥ २ १ "माइ" इति वा। २ “णव0" इति वा । ३ "गेसु” इति वा । ४ 'सत्तुक पेण उदयसा" इति वा "उक्कोससत्त उदयसा' इति वा । ५ "दोह" इति वा । ६ 'एत्तो' इति वा । ७ "वधादी" इत्यपि । = "एक्कुबकु" इत्यपि, "इक्केक्कु.” इत्यपि वा । ९. "ता होज्जा ॥१॥" इति वा । १० "होज्जा' इत्यपि। ७१ एका छक्के कारस' इत्यपि । १२ "एकगा' इति वा, "एक्कग" इति वा । १३ 'चउवीसदुगेक्कमिक्कारा ॥१८॥" इत्यपि, “चउवीस दुगिकमिकारा ॥२०॥'' इत्यपि वा, "बार गिक्कमि इक्कारा ॥२०॥" इत्यपि वा । १४ इयं गाथा हस्तलिखितप्रतौ द्वाविंशतितमी द्वाविंशतितमी चैकविंशतितमीति व्यत्यय । १५ “विगप्पेहि मोहिया' इत्यपि । १६ "अउणत्तरिसीयाला'' इत्यपि । १७ '०वद०" इत्यपि । १८ व्णउयसए" इति वा, ' ०णउइसएहुदा" इति वा, "०णुयसए हिं" इति वा । १६ “भोहिया" इत्यपि । २०. "अउणत्तरि” इति वा, "अउणत्तरि एगुत्तरि' इति वा। २१ 'तिण्णेव उ” इति वा, 'तिन्नेव उ" इति वा । २२ “कस्मसा सत्तरसे छत्सते तेरस नववधए पच ।।२३।।" इति हस्तलिखितप्रतौ। २३ "णव०" इति वा । २४ "गेसु" इति वा । २५ "ठाणाइ ॥२१॥” इति वा २६ “पत्तेय पत्तय" इत्यपि । २७ "य"इति वा, "उ" इति वा । २८ "वोच्छेए" इत्यपि। २६ "०पगइ०" इनि वा ०पयइ०" इत्यपि वा । ३०. "भणिया" २९ ३१ "एत्तो" इति वा । ३२ ‘णाम" इति वा । ३३ "वोच्छ'' इत्यपि ।
४ सप्ततिकाभिव' पष्ठ कर्मग्रन्थ तेवीस १पण्णवीसा, छब्बीसा अट्ठवीस २गुणतीसा। ३तासेगतीस होग. ध श्ढाणाणि नामस्स ॥२४॥२६॥ ६चउ पण्वीया सोलग नव वाणउईमया व अडयाला । एयालुत्तरछाया -लसया इक्किक्क वयविही ॥२७॥(प्र०) दीसिगवीमा चउवीसमा उ एगाहिआ य इगतीसा। उदयट्ठाणाणि भवे नव अह य हुँति नामस्स ॥२५॥२८॥ १-इक्क विजालिमकारस, ११तित्तीसा छस्मयाणि १२तित्तीसा। बारसमत्तरससयाण -हिंगाणि विपंचसीईहि ॥२६॥२६।। अउणत्ती सिक्कारमसयाणिहिअसतरपंचसट्ठीहिं १४४चिकक्कगं च वीसा-दटठुदयतेसु उदयविही ॥२७॥३०॥ तिदुनउई १५गुणनउई, १६अडसी छलसी असीड १७गुणसीई। १८अट्ठयछापन्नत्तरि, नव अढ य १९नामसंताणि ॥२८॥३१।। अह य वारस बारस, वंधोदय संतपयडि २१ठाणाणि । ओहेणाएसेण य, जत्थ जहामभवं २२विभजे ॥२६॥३२॥ नव ३पणगोदयसंता तेवीसे २४पन्नवीस छब्बीसे । अ चउरहवीसे, नव २५सगि गुणतीस तीमंमि ॥३०॥३३।। २६एगेगमेगतीसे, एगे एगुदय अह संतमि । उवरयर्वधे दस दय, वेअगमंतसि ठाणाणि ॥३१॥३४॥ १ ‘पन्नवीसा" इत्यपि । २ 'गुणतीसा" इनि, 'उगुतीसा" इत्यपि वा। ३ 'तीसिक्क०" इत्यपि, "तीमेकः' इत्यपि । ४ "मेक्क" इत्यपि । ५ "ढाणा" इत्यपि । ६ इय गाथा मूलगायातया चूर्णी नास्ति. श्रीमन्मलयगिरिविहितवृत्त्युपेनसप्ततिकाया चा ऽस्ति । २७.२८ तमगाथयोर्हस्तलि खितप्रती व्यत्ययोऽस्ति । २७ तमगाथास्थानेऽष्टाविंशतितमी गाथा, अष्टाविशतितम्या स्थाने सप्त- विंशतिनमीति । ७ "एक्केक०"इत्यपि । ८ 'गाइ इगतीसगत एगहिया" इत्यपि । "०गादि.गतीसग ति एगहिया ।" इयपि “गाति एगाहिया उ इगतीसा।" इत्यपि, “गाइ एगाहिया उ इगतीसा" इत्यपि वा। E "होंति" इत्यपि । १० "एमबियालेकारस' इत्यपि, एगविया रेकारस" इत्यपि वा । ११-१२ "तेतीसा' इत्यपि । १३ "०सेक्कारससयऽहिगसत्तरस पंच." इत्यपि, “० सेकसारससयाहिगा सतरस- पच०" इत्यपि, “सेक्कारससयाणहिगसतरपच०" इत्यगि वा १४ "इक्वेक्का" इत्यपि, "एक्के कग" इत्यपि ग। १५ "इगु०" इत्यपि, 'उगुः" इत्यपि वा । १६. "अच्छलसी" इत्यपि "अट्टयर लसी" इत्यपि वा । १७ "गुरु" इत्यति । १ अट्ठयछप्पणत्तरि” इत्यपि, 'अच्छप्पणत्तरि” इत्यपि । १६ "णाम" इत्यपि। २० "सतपगडिठाणा" इत्यपि। २१ ठाणाइ" इत्यपि । २२ "विभए" इत्यपि । २३ "पचोदय०" इत्यपि “पच उदय०" इत्यपि । २४ “पण्णवीस ' इत्यपि । २५ ‘सत्तुगतीस०" इत्यपि,"सत्त- गुतीम" इत्यपि, “सत्तिगुनीस." इत्यपि वा । २६ 'एगेग इगतीसे” इत्यपि । २७ "ठाणाइ" इत्यपि । " " (५. सप्ततिकाभिध पष्ठ कर्मवन्य तिविगप्पपगठाणेहि, जीवगुणसनिएसु ठाणेसु । भगा पजियव्या, जत्थ जहा संभवो १भवड ॥३२॥३५॥ तेरससु जीवसखेवएसु, नाणंतरायतिविगप्पो । रेडक्कमि तिदुविगप्पो, करणं पड ३इत्थ अविगप्पो॥३३॥३६॥ तेरे नव चउ पणगं, नब संतेगंगि भंगमिक्कारा | वेअणिआउगगोए, विभज्ज मोह पर चुच्छं ॥३४॥३७॥ पज्जत्तगसन्निपारे, अट्ट चउक्कं च ६वेअणियभंगा। ७सत्त य तिगं च गोए, पत्तेअ जीवटाणेसु ॥३८॥(प्र०) पज्जत्ताऽपज्जत्ता, समणे पज्जत्तयमण संसेसु । अट्ठावीसं दसगं, नवगं पणगं च आउरस ॥३९॥(प्र०) अट्ठसु पंचसु एगे, एग दुगं दम य मोहबंधगए । तिग चउ नव उदयगए, तिग लिग पन्नरस पतंमि ॥३५॥४०॥ पण दुग पणगं पण चउ, पणगं पणगा हवंति तिन्ने च । पण छप्पणगं छच्छ,-प्पणग अङ्क दसग ति ॥३६॥४२॥ सत्तेव अपज्जत्ता, सामी सुहुमा य वायरा चेव । विगलिदिआ १०उ तिनि उ, तह य असन्नी ११अ सन्नी १९अ ॥३७॥४२॥ नाणंतराय तिविहमचि, ढससु दो १३हुति दोसु ठाणेसु । मिच्छा१४साणे १५वीए, नव चउ पण नव य १६संतंसा॥३८॥४३॥ १७मिस्साड १८नियट्टीओ, छ च्चउ पण नव य संतकम्मसा । चउबंध तिगे चउपण, नवंस दुसु जुअल१६छस्संता॥३६॥४४॥ उबसंते चउ पण नव, खीणे चउरुदय छच्च चउ२०संता। वेअणिआउअगोए, विभज्ज मोहं परं २१वुच्छं ॥४०॥४५॥ चउ छस्सु दुन्नि सत्तसु, एगे चउगुणिसु वेअणिअभंगा। गोए पण चउ दो तिसु, एगट्टसु २२दुन्नि डक्कमि ॥४६॥(प्र०) १ "होइ" इत्यपि । २ "एक्झम्मि” इत्यपि । ३'एत्थ" इत्यपि । ४ “वोच्छ” इत्यति । ५ "०यरे” इत्यपि। ६ "वेय०” इत्यपि । ७ "सत्तग" इत्यपि । ८ "पत्तेय" इत्यपि। ६ तह मुहमवायरा०" इत्यपि। १० "य" इत्यपि । ११ १२ "य" इत्यपि । १३ "होति" इत्यपि । ५४ "सामण" इत्यपि । १५ "विइए" इत्यपि । १६ ‘सत्तसा" इत्यपि । १७ "मीसाइ" इत्यपि । १८ "नियट्टीए" इत्यपि । १९ “छस्सत" त्यपि । २० "सत" इत्यपि । २१ "वोच्छ" इत्यपि ! २२ "दोन्नि" इत्यपि।
६ ] सप्ततिकभिध पष्ठ कर्मग्रन्थः अढच्छाहिगवीसा, सोलस वीसं च वारस छ दोसु । दो चउसु तीसु इक्कं, ३मिच्छाइसु आउए भंगा ॥४७॥(प्र०) गुणठाणएसु अट्ठसु, इविकक्क मोह ४बंधगाणं तु । ५पच अनिअट्टिठाणे, बंधावरमो पर तत्तो ॥४१॥४८ । सत्ताड ढस उ मिच्छे. सासायणमीर ए ६नकुरकोसा। छाई नव उ अविरए देसे पंचाइ अद्वैव ॥४॥४९॥ विरए खओवसमिए, चउगई सत्त छच्चऽपुव्वं मि । अनिअट्टिवायरे पुण, इक्को व दुबे व उदयंसा ॥४३॥५०॥ एगं सुहुमसरागो, वेएड अवेअगा भवे सेसा । भंगाणं च पमाणं, पुव्वुट्टेिण नायव्य ॥४४॥५१॥ १०इक्क छडियकारिवका रसेव उस्कारसेव ११नव तिन्नि । एए चउवीसगया, बार दुगे पंच १२इक्रमि ।।४।।५२।। बारसपणमट्टिसया, उदयविगधेहि १३मोहिआ जीवा । चुलसीई सत्तुत्तरि, पय विदसएहिं १७ विन्नेआ ॥५३॥(प्र०) अट्टग चउ चउ चउरगा य, चउरो १६अ हुंति चउचीसा । मिच्छाइअपुव्वंता, वारस पणगं च १ अनिअट्टी ।।५४॥(प्र०) १८जोगोवओगलेसा, उएहि गुणिआ हवंति १ कायव्वा । जे जत्थ २०गुणहाणे, हवंति ते तत्थ गुणकारा ।।४६।।५।। अट्ठी बत्तीस सट्टिमेव २१बावन्ना । २२चोआल दोसु वीसा,२३ विअमिच्छमाईसु २४मामन्नं ॥५६॥(प्र०) बत्तीसं. १ "पछाहिय.'' इत्यपि । "वार छ दोसु' इत्यपि । ३ “मिच्छाइसु आउगे" इत्यपि । ४. "वधठाण" इत्यपि । ५. 'पचानि०" इत्यपि । ६ “णवु०" इत्यपि । ७ "णव" इत्यपि । ८ "अणिक इत्यपि। ९ ‘एको' इत्यपि । १० एक्को" इत्यपि । १० छिडेक्कार सेव एक्कारसेव” इत्यपि । ११ “णव' इत्यपि। १२ एक्कम्गि" इत्यपि । १३ 'मोहिया" इत्यपि । १४. “वधसएहि" इत्यपि । १५ "विन्नेया" इत्यपि १६ 'य" इत्यपि, “य होंति" इत्यपि वा । १७ "अनिय?' इत्यपि, "अणियट्टे” इत्यपि वा । १: ५५-५६ तमगाथयोर्हस्तलिखितप्रती व्यत्ययोऽस्ति । १९ "नायबा" इत्यपि । २० "गुणट्ठाणसु हुति" इत्यादि ! 'गुणट्ठाणेसु हाँति" इत्यपि । २१ "बावण्णा' इत्यपि । २२ “चोयालु" इत्यपि। 'चोयाल चल जीता विय मिच्छमाईसु ।।" इत्यपि । २३ "मिच्छामाईसु" इत्यपि । २४ "सामण्ण' इत्यपि ।
सम्नतिकाभिध पष्ठ कर्मग्रन्थ [. एगे- गम? तिन्नेगे एगेगं, तिग सीसे पंच 'चउसु तिगपुचे । ३इक्कार वायरमि उ, सुहुमे चउ तिन्नि उपसंते॥४७॥५७।। ४छन्नव छचकं तिग सत्त, दुगं दुग तिग दुग ति अह चउ । दुग'छचउदुगपणचउ, चउदुगचपणगएगचऊ॥४८॥५८॥ एगेगमह छउमस्थांवलिजिणाणं । एग चऊ एग चऊ, अट्ट चऊ दु छकमुटयंमा ॥४६॥५६।। चउ ६पणवीसा सोलस, नव चत्ताला सया य चाणउई। बत्तीसुत्तरछायाल-सया मिन्छस्स बंधविही १६०(प्र.) अट्ठ सया चउसट्टी, बत्तीमसयाई सासणे मेआ । अट्ठावीसाईसु, सव्वाणऽहहिग 'छन्नउई ॥६१।।(प्र.) इगचत्तिगार बत्तीस, छसय इगतीसिगारनवनउई । सतरिगसि गुतीसचउद इगारचउसट्टि मिच्छुदया ॥६२।(प्र.) बत्तीस १ दुन्नि अट्टय बासीइसया य पंच नव उदया । ११वारहिआ तेवीसा, चावन्निक्कारस सया य ॥६३।।(प्र.) दो छक्कट्ठ चउक्कं, पण १३नव इक्कार छक्कगं उदया । ४नेरइआइसु १५सत्ता, ति पंच इक्कारस चउक्कं ।।५०॥६४॥ १६इग विगलिदिअ सगले, पण पंच य अट्ठ बंधठाणाणि । पण १ छक्किवकारुदया, पण पण बारस य संताणि ।।५१॥६५।। १८इअ कम्मपगडठाणाणि, सुट्ठ वंधुदय संतकम्माणं । १६गइआइएिह अट्ठसु, २०चउप्पयारेण नेयाणि ॥५२॥६६।।२१ १ तिगगे” इत्यपि । २. "अयमेव पाठ समीचीनोऽस्ति । तथाऽ'यत्र चूर्णिकारै टीकाकृद्भिश्व "चउसु नियट्टि र तिन्नि" इति पाठो विवृतः । हस्तलिखितप्रतौ पुन 'पच” इतिशब्दो नास्ति तथा "चउनु पुण नियट्टितिग" इति पाठ उपलभ्यते । ३. "एक्कार बायरम्मी” इत्यपि । ४ छण्णव" इत्यपि । ५ पणेगचऊ ॥५८॥" इत्यपि । ६ “पगु०” इत्यपि । * “य सय चोवढेि बत्तीससया य" इत्यपि ! = "छण्णई" इत्यपि । ९. इय गाथा हस्तलिखितप्रतौ नास्ति सुद्रितपर केषूपलभ्यते । १०. "दोन्नि" इत्यपि । ११ "वारहिगा' इत्यपि । १२ "चावन्ने०" इत्यपि । १३ 'नवगेक्कार" इत्यपि । "नवपक्कार” इत्यपि वा । १४ "०र८" इत्यपि। १५ "सता" इत्यपि । १६ "इगि” इत्यपि। १७ "छक्के इत्यपि । १८ "इय कम्मपगडि०" इत्यपि, 'इय कम्मपगइठाणा" इत्यपि । १६ "गइयाइएसु" इत्यपि, “गदयाइएहि" इत्यपि । २० "चप्पगारेण" इत्यपि । २१ "गाइदिए य काए जोए वेए कसायनाणे य । संजमदसणलेसा मयसम्मे सन्निआहारे ॥ सतपयपस्वणा दयपमाणं च वित्तफुसणा य। कालत च भावो अप्पावहुय च दायव्य । इति गाथाय ६६-६७ वमगायायोमध्येऽधिकत्या हस्तलिखितप्रतौ प्रक्षिप्त दृश्यते । १ छक्कचऊ । ॥
= । सप्ततिकाभिध पष्ठ कर्मग्रन्थ' उदयस्सुदीरणाए, १सामित्ताओ न विज्जड विसेसो । २मुत्तूण य ३गयालं, सेसाणं सच पयडीणं ॥५३।।६७॥ नाणंतरायदसग, दंमणनव वेअणिज्जमिच्छत्तं सम्मत्त लोभ वेआ-उआणि नवनाम उच्च च ॥५४॥६८।५ ६तित्थयराहारग विरहिआओं, अज्जेड सब-पयडीओ। मिच्छत्तध्वेअगो सा–सणो१०वि गुणवीससेसाओ।।५५॥६६।। छायालसेसमीमो, अविरयसम्मो १५तिआल१ परिसेसा । १३तेवन देसविरओ, विरओ १४सगवन्नमेसाओ ॥५६॥ ७०।। १५इगुणहिमप्पमत्तो, बंधs देवा१६उअस्म इअरो घि १७अट्ठावन्नमपुव्यो, १८छप्पन्न वावि छन्वीसं ॥५७||७१।। वावीमा एगणं बंधड १६अट्ठारसंतमनिअट्टी । २०सतरस सुहुमसरागो, सायममोहो सजोगुत्ति ॥५८॥७२॥ एमो उ बंध२२सामित्त,-ओहो गइआइ ३एसु वि तहेव । ओहाओ २४साहिज्जड, जत्थ जहा २५पगइसब्भावो ॥५९॥७३॥ तित्थयरदेवरिया-२६उअंच तिसु तिसु गईसु २७वोधव्वं । अवसेसा २८पयडीओ, हवति सव्वासु वि गईसु ॥६०॥७४॥ पढमकसायचउवक, दंसण२९तिग सत्तगा वि उवसंता, ३०अविरयसम्मत्ताओ, जाव ३१निअट्टित्ति नायव्वा ।।६१।७५।। . . . पग- - १ "सामित्ताए” इत्यपि । २ "मोत्तण” इत्यपि । ३, “ईयाल' इन्यपि, "उगुयाल" इत्यपि वा। ४ "०पगडीण" इत्यपि, "पगईण" इत्यपि । ५ "मणुयगइजाइत सबाथर च पज्जत्तसुमगमाएज्ज । जसकिनी तित्थयर नामस्स हवति नवए य ॥ ॥” इतिगाथा । ६८-६६ तमगाययोमव्येऽधिकतया हस्तलिखितप्रती प्रक्षिप्ता दृश्यते । ६ 'तित्थगरा." इत्यपि । ७ 'विरहिआउ" इत्यपि "०वजियाउ" इत्यपि । ८ ईओ” इत्यपि, पगडीओ' इत्यपि वा । ६. 'वेयगो” इत्यपि । १० "वि उगुवीसंसाओ" इत्यपि “वि इगु- वीससेसाओ" इत्यपि, 'उ उणवीससेसाओ" इत्यपि वा । ११ "तियाल" इत्यपि। १० "०वरिसेस" इत्यपि । १३ 'तेवण्ण ” इत्यपि, । "तेपन्न" इत्यपि वा । १४ "सगवण्ण" इत्यपि, 'सगपन्न" इत्यपि । १५ "इगुसट्ठि०" इत्यपि, "उगुसढि०' इत्यपि वा। १६ "०उयस्स प्यरो वि" इत्यपि, “उग च इयरो वि' इत्यपि वा । १७ "अट्ठावण्ण" इत्यपि ! १८ "छप्पण्ण" इत्यपि । 'अट्ठारस त्ति अनियट्टी" इत्यपि, अट्ठारस ति अनियट्टी" इत्यपि वा। २० "सत्तर” इत्यपि । २१ "सजोगित्ति' इत्यपि। २२ 'सामित्तोहो" इत्यपि, “सामित्तओवो" इत्यपि। २३ "०ए वि तह चेव' इत्यपि । २४ "साहेज्जा" इत्यपि । २५ "पगडि" इत्यपि । २६ "०उग च" इत्यपि, "० उय च" इत्यपि वा । २७ "बोद्धव" इत्यपि । २८ "पगडीओ" इत्यपि । २६ "तिय सत्तया वि" त्यपि । ३० "अविरत०" इत्यपि । ३१ 'नियट्टी" इत्यपि ।
सप्ततिकाभिष पष्ठ कर्मग्रन्थः [ १ सत्तट्ट नव य पनत्स, सोलम् अट्ठारसेव १गुणवीसा । एगाहि दु चउवीसा, पणवीसा वायरे जाण ॥७६॥(प्र.) सत्तावीस सुहुमे, अट्ठावीसं ३च मोह ४पयडीओ। उवसंत ५वीअराए, उवसता हुँति नायव्या ॥७७॥(प्र.) पढमकसायचउक्के, त्तो मिच्छत्तमीससम्मत्तं । अविरयसम्मे देसे, पमति अपमत्ति खीअंति ।।६२।।७८ अनिअट्टिवायरे थीण-गिद्धितिगनिरय निरिअनामाओ । ११संखिज्जइमे सेसे, तप्पाउग्गाओं १२खीअंति 11७६(प्र.) २३इत्तो हणइ कसाय-ड्रगपि पच्छा १४नपुंसर्ग इत्थी । तो १५नोकसायछक, १६छुहेइ संजलणकोहंमि ।।८०(प्र.) पुरिसं कोहे कोहे, माणे माणं च छुहइ मायाए । मायं च छुहड १७लोहे, लोहं सुहमंपि तो हणड ॥६३।१८१॥ खीणकसायदुचरिमे, १८नि पयलं च हणइ छउमत्थो । आवरणमंतराए, छउमत्थो चरम ममयमि ॥८२(प्र.) देवगडसहगयाओ, दुचरमसमयभचिअंमि १६खीअति । सविधागेअरनामा, २१नीआगोअ पि तत्थेव ॥६४॥८३॥ अन्नयर२२वेयणीअं, मगुआ२३उअमुच्चगोअ२४नवनामे । एइ अजोगिजिणो, उक्कोसजह२५न्नमिक्कारा ॥६५॥८४॥ २६मणुअगइजाइतसवायरं च, पज्जत्तसुभग माइज्जं । जसकित्ती तित्थयरं, २८नामस्स हवंति नव एआ॥६६॥८५ १ "इगुवीसा" इत्यपि, “उगुवीसा" इत्यपि, “उगवीसा" इत्यपि । २ "पणुवीसा'' इत्यपि । ३ "पि" इत्यपि । ४ "पगडीओ" इत्यपि । ५ "वीयरागे" इत्यपि । ६ "होति" इत्यपि । ७ "एत्तो” इत्यपि । ८ "अविरयदेसे विरए" इत्यपि। "अविरयदेसे विरयपमत्तऽप्पमत्ते य" इत्यपिवारा “पमत्तअपमत्त खीयति" इत्यपि । १० 'तिरिया" इत्यपि, “तिरियणामाउ' इत्यपि । ११ "सखे०" इत्यपि । १२ "खीयति" इत्यपि। १३ 'एत्तो" इत्यपि । १४ "णपु ०" इत्यपि । १५ 'णो०" इत्यपि । १६ "छु भइ” इत्यपि । १७ “लोभे लोभ" इत्यपि । १८ 'निदा पयला य" इत्यपि। १६ "ख'यति" इत्यपि । २० "०गेयर०" इत्यपि । २१ "नीया गोय०" इत्यपि । २२ "वेयणीय" इत्यपि,"वेयणिज्ज" इत्यपि । २३ "०उय उच्चगोय०" इत्यपि । २४ "णाम च" इत्यपि, “नाम नव" इत्यपि । २५ "न्नएक्कारं ॥” इत्यपि, "न्नमिक्कारे।।" इत्यपि । २६ मणय" इत्यपि ! २७ "०माएज्ज" इत्यपि । २८"णामस्स हवति पत्र एया" इत्यपि। ।
८ सप्ततिकामिध पष्ठ कर्मग्रन्थः १ उदयस्सुदीरणाए, सामित्ताओ न विज्जड विसेसो । २मुत्तूण य २डगयालं, सेसाणं सय४पयडीणं ॥५३।।६७।। नाणंतरायदसग, दंगणनव वेअणिज्जमिच्छत्तं सम्मत्त लोभ वेआ-उआणि नवनाम उच्च च ।।५४॥६८॥५ ६तित्थयराहारग विरहिआओ, अज्जेइ सव्व-पयडीओ। मिच्छत्तध्वेअगो सा—सणो१०वि गुणवीससेसा॥५५॥६६॥ छायालसेसमीमो, अविरयसम्मो १५तिआल? परिसेसा । १३तेवन देसविरओ, विरओ १४सगवन्नसाओ ||५६। ७०।। १५ गुणहिमप्पमत्तो, बंधड देवा१६उअस्म इअरो वि । १७अट्ठावन्नमपुव्यो, १८छप्पन्नं वावि छवीमं ॥५७||७१।। बावीमा एगूणं बंधड १६अट्ठारसंतमनिअट्टी । २०सतरस सुहुमसरागो, सायममोहो १सजोगुत्ति ॥५८||७२।। एसो उ बंध२२सामित्त,-ओहो गडआइ°३एसु वि तहेव । ओहाओ २४साहिज्जड, जत्थ जहा २५पगइसब्भावो ॥५९॥७३॥ तित्थयरदेवनिरया-२६उअं च तिसु तिसु गईसु २७वोधव्वं । अवसेसा २८पयडीओ, हवंति सव्वासु वि गईसु ॥६०||७४।। पढमकसायचउपकं, दंसण ९तिग सत्तगा वि उवसंता, ३०अविरयसम्मत्ताओ, जाव ३१निअट्टित्ति नायव्वा ।।६११७५।। १ "सामित्ताए" इत्यपि । २ "मोत्तण' इत्यपि । ३ "ईयाल' इन्यपि, "इगुयाल" इत्यपि वा । ४ "पगडीण" इत्यपि, "पगईण” इत्यपि । ५ "मणुयगइजाइतसबायर च पज्जत्तसुमगमाएज्ज । जसकिनी तित्थयर नामस्स हवति नवए य ।। ॥” इतिगाथा । ६८-६६ तमग ययोमध्येऽधिकतया हस्त लिखितप्रतौ प्रक्षिप्ता दृश्यते । ६ 'तित्थगरा." इत्यपि । ७ 'विरहिआउ" इत्यपि, "०वज्जियाउ" इत्यपि । ८ ईओ" इत्यपि, 'पगडीओ" इत्यपि वा । ६ 'वेयगो” इत्यपि । १० "वि उगुवीसेसाओ" इत्यपि “वि इगु- वीससेसाओ" इत्यपि, 'उ उणवीससेसाओ" इत्यपि वा । ११ “तियाल" इत्यपि । १२ "०परिसेस" इत्यपि । १३ 'तेवण्ण " इत्यपि, । "तेपन्न" इत्यपि वा। १४ "सगवण्णः" इत्यपि, 'सगपन्न.” इत्यपि । १५ "इगुसट्टि०" इत्यपि, उगुसट्ठि०' इत्यपि वा। १६ “उयस्स प्यरो वि” इत्यपि, "०उग च इयरो वि' इत्यपि वा । १७ "अट्ठावण्ण" इत्यपि । १८ "छप्पण्ण' इत्यपि । . ६ 'अट्ठारस त्ति अनियट्टी" इत्यपि, अट्ठारस ति अनियट्टी” इत्यपि वा। २० "सत्तर” इत्यपि । २१ "सजोगित्ति" इत्यपि। २२ 'सामित्तोहो" इत्यपि, "सामित्तओवों" इत्यपि। २३ "०ए वि तह चेव" इत्यपि । २४ "साहेज्जा" इत्यपि । २५ "पगडि०" इत्यपि । २६ “उग च" इत्यपि, "० उय च” इत्यपि वा । २७ "बोद्धव्य" इत्यपि । २८ "पगडीओ" इत्यपि । २६ “तिय सत्तया वि” त्यपि । ३० "अविरत०" इत्यपि । ३१ - नियट्टी" इत्यपि । . पग- " .
सप्ततिकाभिध पष्ठ क्मग्रन्थः [ सत्तट्ट नव य पनरस, सोलस अट्ठारसेव गुणवीसा । एगाहि दु चउवीसा, २पणवीसा वायरे जाण ७६॥(प्र.) सत्तावीस सुहुमे, अट्ठावीसं ३च मोह ४पयडीओ 1 उवसंत ५वीअराए, उवसता हुँति नायव्वा ॥७७॥(प्र.) पढमकसायचउक्के, पत्तो मिच्छत्तमीससम्मृत्तं । अविरयसम्मे देसे, पमत्ति अपत्ति सीति ।१६२११७८।। अनिअट्टिवायरे थीण-गिद्धितिगनिरय१ निरिअनामाओ । ११संखिज्जइमे सेसे, तप्पाउग्गाओं १२खीअंति ॥७६(प्र.) २३इत्तो हणइ कसाय-ट्टगेपि पच्छा १४नपुंसगं इत्थी । लो १५नोकसायछक, १६छुहेइ संजलणकोहंमि ॥८०॥(प्र.) पुरिसे कोहे कोहं, माणे माणं च छुहइ मायाए । मायं च छुहड १७लोहे, लोह सुहमंपि तो हणइ १६३।३८१॥ खीणकसायदुचरिमे, १-निद्दे पयलं च हणइ छउमत्थो आवरणमंतराए, छउमत्थो चरय ममयमि ॥८२॥(प्र.) देवगइसहगयाओ, दुचरमसमयभविअंमि १६खीअति । सविवागेअरनामा, २१नीआगोअ पि तत्थेव ॥६४॥८३ अन्नयर२२वेयणीअं, मणुआ उअमुच्चगोअ४नवनामे । वेएइ अजोगिजिणो, उक्कोसजह२५न्नमित्कारा ॥६५॥८४॥ २६मणुअगइजाइतसवायरं च, पज्जत्तसुभग२७माइज्जं । जसकित्ती तित्थयरं, २८नामस्स हवंति नव एआ॥६६॥८५ - १ "इगुवीसा" इत्यपि, “उगुवीसा" इत्यपि, “उगवीसा" इत्यपि । २ "पणुवीसा'' इत्यपि । ३ "पि" इत्यपि । ४ "पगडीओ" इत्यपि । ५ "वीयरागे" इत्यपि । ६ "होति" इत्यपि । ७ "एत्तो" इत्यपि । ८ "अविरय देसे विरए' इत्यपि। "अविरयदेसे विरयपसत्तऽप्पमत्ते य” इत्यपिवाद "पमत्तअपमत्त खीयति" इत्यपि । १० 'तिरिया" इत्यपि, "०तिरियणामाउ' इत्यपि ३११ "सखे.” इत्यपि । १२ "खीयति" इत्यपि । १३ 'एत्तो" इत्यपि । १४ "णपु ०इत्यपि । १५ ‘णो०” इत्यपि । १६ "छुव्भई" इत्यपि । १७ "लोभे लोम" इत्यपि । १८ 'निदा पयला य” इत्यपि। १६ "खीयति" इत्यपि । २० "०गेयर०” इत्यपि । २१ "नीया गोय०" इत्यपि । २२ "वेयणीय" इत्यपि,"वेयणिज्ज" इत्यपि । २३ "० उय उच्चगोय." इत्यपि। २४ "णाम च" इत्यपि, "नाम नव" इत्यपि । २५ "न्नएक्कारं ॥” इत्यपि, "न्नमिक्कारे ।।" इत्यपि । २६ मणय." इत्यपि 1 २७ "०माएज्ज" इत्यपि । २८ "णामस्स ह्वति पत्र एया" इत्यति।
१०] सप्ततिकाभिध' पष्ठ कर्मग्रन्थ - -- १तचाणुपुब्बिसहिआ, तेरस भवसिद्विरअस्स चरमंमि । संतंसग को, ३जहन्नयं वारस हवंति ॥६७।६।। ४मणुअगइसहगयाओ, भवखित्तविवाश्गजिअविवागाओ । वेअणिअन्नयरुच्चं, ७चरमसमयमि खीअति ॥६८॥८७।। अह सुइअसयल जगसिहर-१०मरुअ११निरुवम१२सहा- वसिद्धिसुहं । १३अनिहणमव्वाबाहं, तिरयणसारं अणुहवंति ॥६९।८८।। दुरहिगम--निउण--परमत्थ--४रुडरवहुभंगदिट्टिवायाओ। अत्था अणुमरिअव्वा, बंधोदयसंतकम्माणं ॥७०॥८६।। जो जत्थ अपडिपुन्नो, अत्थो अप्पागमेण बद्धोत्ति । तं खमिऊण बहु१५सुआ, पूरेऊणं परि१६कहंतु ॥७१॥१०॥ गाहग्गं १७सयरीए, चंदमहत्तरमयाणुसारीए। १८टीगाइनिअमिआणं, एगूणा होइ १९नउईओ ||६१(प्र.) १ अस्या गाथाया स्थाने हस्तलिखितप्रतौ निम्ना गाथा दृश्यते । ' ता एव हुति नेया बारस भव- सिद्धिगस्स चरमते । सतस्स उ उक्कोस जहन्न एक्कारस हबति । ८८" इति । २ "०यम्स' इत्याग, गस्स" इत्यपि वा। ३ "जहन्नग” इत्यपि । ४ "मणुय०" इत्यपि । ५ 'गजियविवाओं 1" इत्यपि, "गजीववागुत्ति ।" इत्यपि, 'गजीववागत्ति" इत्यपि, "हवति भवजोवपावकम्मसा" इत्यपि । ६ "वेयणिय०" इत्यपि । ७ "चरिमे समयम्मि खीयति ॥६॥” इत्यपि, “च चरिमभवियस्स खीयति ॥६६ । ६८॥" इत्यपि, “अचरिमममयम्मि खीयति ॥६८" इत्यपि । ८ “सुदयः" इत्यपि "सुइरसइजलमसिहर । ९ "जय" इत्यपि । १० "मरुय०” इत्यपि। ११ ‘णिरुवम" इत्यपि १२ "०समाव०" इत्यपि। १३ "अणि०” इत्यपि । १४ "रुइल." इत्यपि । १५"०सुया" इत्यपि । १६ 'कहितु" इत्यपि । १७ सत्तारिए" इत्यपि, “सतरीए" इत्यपि वा। १६ “टीकाएं नियमियाण” इत्यपि, “टिक्काएँ णियमियाण” इत्यपि । १६ "णउईउ' इत्यपि।
* सप्ततिकाभाष्यम् * मिऊण महावीरं कम्मट्टपरुवणं करिस्सामि । बंधोदयसतेहि सत्तरियाचुनिअणुसारा ॥१॥ परातरायदंसणवरणे वेयणियआउगोयाणं सुगमित्ति किपि दसिय सेमपि समासओ वोच्छ ।।२।। णाणंतरायदसगं बंधहि मिच्छाउ जाय सुहुमोत्ति । उदसंत जा खीणो आवरणं दसणस्सित्तो ॥३॥ जा सायणु नव बंधी मिच्छा उवरि छ्वंधि जाऽपुव्यो । अप्पुया जा सुहुमो निदादुगविरहिचउबंधी ॥४॥ मिच्छा जा उपसंतं नवसतं उदयचारिपणगं वा । खवगाण वि नवमन्तं जा वायर भागसंखेज्जो ॥५॥ उवरिं खीणदुवरिमं जा छ उ चउ संति चरिमि खीणस्स । उदए पुण खवगाणं चत्तारि उ सणावणे ॥६॥ चउपणगं वा उदए खीणदुचरिमं तु जाच अन्ने उ । भणियं दसणावरणं संपइ पभणामि वेयणियं ।।७।। जाव पमत्तु असायं सायं जोगंत जयहि मिच्छादी । अस्सायं सायं वा उदए दो संति भंगचऊ ||८|| बंधविणा उ अजोगी जाव दुचरिमं दुसंति ते बुदया । चरिमे वि ते वि उदया उदयगयं 'संति भंगचऊ 118 || आउस्सेगं बंधे एगं उदयम्मि संति दो हुति । जा बंधो उदएर्ग दो संतं बंधविरमम्मि ॥१०॥ एवं नरतिरियाणं दुसंत अभंग चउगइसु । आउचए जोग्गाणं नेहयसुराण पुण एवं ॥११॥ भंगच पत्तेयं पत्तेयं जं ते बंधति आउद्गमेव । सव्वेसिमुदयसत एगेगं बंधपुव्विं तु ॥१२॥ १"वधहिं" इत्यपि । २ "उधा" इत्यपि। ३ भागुसखिज्जो इत्यपि मुद्रितप्रतौ। ४ "जयहि" इत्यपि। ५"सत" इत्यपि । ६"जुगाण" इत्यपि ।
अनोगतं ॥१७॥ सप्ततिकामाप्यम् (गतिः समाप्ता) अच्छा हिंगवीसा सोलस वीसं १ बार छा दोसु । दो चउसु, तीसु 'एक्कं मिच्छाइसु आउगे भंगा ॥१३॥ गुणठाणेसु आउस्स भमा इति ।। आऊ अडवीसचिह भणिय पभणामि २ संपर्य गोयं । बंधोदयसतेहि णीयं तिरियाण मिच्छाण ॥१४॥ ते वि हु तेऊ वाऊ तत्तो वा आगया पुढविमाई । जाव न उच्चागोयं बंधहि तावेस भंगो उ ॥१५॥ दो संत नीयबंध नीउच्च उदड सासणो जाव । उच्चं वर्ध नीयं च वेयए जाव देसोति ॥१६॥ दो संतमुच्चबंध उच्च उदयम्मि जाव सुहुमोत्ति । दो संतमुच्चमुढयं उवसंताओ उदमंत उच्च चिय अजोगिचरिमम्मि सत्तमो भंगो। मणियं गोयं संपड भजामि मोहं समासेणं ॥१८॥ बावीस "एगवीसा सत्तरसं तेरसच नव पंच । चउतिगदुर्ग च एणं बंधट्ठाणाणि दस मोहे ॥१६॥ मिच्छ कसायसोलस भयं दुर्गछा तिवेयअन्नयरं । हासरई इयरे वा छ भंग मिच्छरस वावीसा ॥२०॥ मिच्छन सगरहिया इगलीसा सासणस्स चउभंगा । अणइत्थिरहिय सतरस दो भंगा मीसअजयाण ॥२१॥ दुतियकसायविहूणा तेरस देसम्मि नव य विस्यम्मि । दो મંા नवरं अपमत्ताईण एगेगो ॥२२॥ ज ते हासरडदुर्ग वंधहि नन्नं तु "जाव अप्पुब्यो । हासरइभयदुगुछारहिया पंचेव ते टुति ॥२३॥ तो पुकोहाईणं कमेण वोच्छे सेसठाणाई । अनियट्टि पंच बंधइ न सेस उदयं च एत्तो य |॥२४॥ एको व दो व चउरो'एत्तो एक्काहिया दसुकोसा । ओहेण मोहणिज्जे उदयट्ठाणाणि नव हुति ॥२५॥ १ "इक्क" इत्यपि । २ "सपइ" इत्यपि । ३ “सत उ" इत्यपि । ४ "इक्कवीसा सत्तरसा' इत्यपि । ५ "मन्नयर " इत्यपि । ६ "वधहि" इत्यपि । ७ 'जाइ” इत्यपि । ८-११ "इत्तो" इत्यपि । ९-१० "य" इत्यपि। ११ "इत्तो इक्काहिया" इत्यपि । दो सप्ततिकाभाष्यम् [ १३ चउ कोहाइ अणाई टुजुयल हासरइअरइसोगाणं । वेयतियं एएहि भंगा चउवीसतिजनामा ॥२६॥ सज्ञाकरण अणविणु तिन्नि कसाया जुयलन्नयर तिवेयअन्नयरं । मिच्छ च सत्त उ चउ मिच्छे भंगा तिजा हुति ॥२७॥ चउवीस संतु सम्मी मिच्छ गंतु अणतचयमाणो वधावलिया पढमा तत्थुदओ नत्थि गंताणं ॥२८॥ भयगुच्छअणंताणं एगयरे अट्ट नव य पुण हुंति । दुगजोगतिण्हमेगयरखिवणि-तिगुणा ३ तिजा दुसुचि ॥२९॥ दस तिहुँ पि हु खिवणे तिजभंगा २४ अट्ट सन्चि हुँति तिजा । ||२४||८|| सत्तट्टनवा एवं सासणमिस्से य नवरं तु ॥३०॥ मिच्छाठाणेणंताणुबंधे मिस्सं च खिवसु जहसंखं । चउ चउ तिजाय' दोसु वि मिच्छविणासम्मि छक्कुदओ ॥३१॥ भयगुच्छवेयगाणेगयरे सग ७ अट्ठ ८ एगद्गखिवणे । तिण्हं दुगजोगाणं' ति३ तिज २४ नव तिहिं वि एगतिजो ॥३२॥ सव्वट्ठ तिजा २४ । एवं विइयकसाएहि विरहिया देसे । पंचाई अट्टता उदया' सव्वेऽह तिज हुंति ॥३३॥ तइयकसायविहूणा विरए चउराइ सत्तगता उ । उदया सव्वट्ट तिजा ४।२८ तत्थ उ सम्मे विसेसो यं ॥३४॥ जा वेयगसम्मघरा उदया ताणं तु हुंति न ' पढमा । खइयगउवसमियाणं चउत्थउदया नवि य हुंति ॥३५॥ पणवंधि बार भंगा कसायवेएहि दुन्ह उदयस्मि । पंचाओ य चउक्क संकममाणस्स ते चन्ने ॥३६॥ जावइया वभंती तस्समभंगा य तत्थ य हवंति । एगो अबंधगस्स उ एगारस सब्धि एगुदए ॥३७॥ चउरो जईउ देमाउ पंच अजयाउ छाउ जाऽपुव्या । सत्तापमत्त देमट्ट नव उ अजयंत मिच्छाउ ॥३८॥ १ "दो वि हु मिस्स विणा' इत्यपि । २ “ति ति तिज नव तिहिँ वि" इत्यपि । ३ "सव्य-भट्ठ" विपि । ४ "सब्वेऽ?" इत्यपि । ५“हु" इत्यपि । ६ “ने वऽन्ने" इत्यपि ! ७ "वधती इत्यपि ।
सप्ततिकामाध्यम् दस मिच्छे अनियट्टी वेयह दो एगु वा सहुमु एर्ग । उदया गुणसु एवं भंगविगप्पा इमे तेसु ॥३९।। अट्ट य चउचउ चउरट्ठगा य चउरो य हुंति तिज२४ नामा चउतीस भंग ८ एगो ९ सुहुमंता हुँति जहरखं ॥४०॥ उदओ सम्मत्तो।। अठग सत्तग छच्चउ' तियदुगएक्काहिया भवे वीसा । तेरम बारेकारम एत्तो पंचाइ एगूणा ॥४१॥ मोहो सयो अडवीस मम्मि उव्यलिड होइ सगवीसा । मिस्सुव्वलिए छब्बीस अणाडमिच्छस्स वा होड ॥४२॥ जहसंखं अणचउ ४ मिच्छा'मिस्स २ सम्म च अट्ट य कसाया। नपु१२ "मिथिहासछप्पु खविए मोहाउ २८ जा चउरो ।।१३।। "एक कम्मि य खीणे संजलणे सेस संत जावेगो । गुणग्थानेषु सत्तास्थानान्याह- मिच्छे जा घव्वीमा अट्ठावीसा य सासाणे ॥४४॥ चउवीसंता छब्बीसवज्जिया मिस्मि हुंति मंताउ । अडचउतिदुएगहिया वीसा अजयाइचउसु पि ॥४५॥ तो अडचउएगहिया वीसा उवसंत जाव सव्वेसि । तेराड खगि वायरि एगंता “एगु सुहुमम्मि ॥४६॥ अडवीसमंतकम्मो सम्म उव्यलिय जाइ मीसम्मि । "मिच्छादिट्ठी एवं सत्तावीसा हवड मीसे ॥४७॥ साप्रत गुणास्थानविपयवन्धोदयेपु सत्ताम्थानान्याह-~ जे गुणठाणगसंता ते ते ताणं पि बंधउदएसु । 'मोत्तु वायरखवगो अणसम्मविसेसिउदए वि ॥४८॥ इयवीमाई चउरो पणचइ चउचड डगार पण चारि । तिब्बंधासु संतं वंधसमं एगअहियं च ॥४९॥ १ "तिगदुगएगाहिया" इत्यपि । २ ' उव्यलिए" इत्यपि। ३०मी०" इत्यपि। ४ "इस्थि" इत्यपि । ५ "इक्किक्कम्मि उ” इत्यपि । ६ “उवसतु" इत्यपि । ७ "एग" इत्यपि । ८ 'मिच्छदि०" इत्यपि । है 'अणमम्मविसेसुदए वायरखवग च मुत्तणा ॥४८॥” इति मुद्रितप्रतौ पाठान्तरम् । १० इय पायाद्वयी हस्तलिग्वितप्रतौ, मुद्रितप्रतौ पुनरित्थ दृश्यते । 'मिच्छुदए अगरहिए अट्ठाब से च हुति सतम्मि । सम्मजुइ उदइ इगवीस नत्थि तिदुवीससम्मिविणा १४९।। इगवीमाई चउरो पणचई चउचह्न इगार पण चारि । तियववाइसु सत बधसम एगअहिय च ।।५०॥ इति । १० - सप्ततिकाभाष्यम् सम्मजुय उदड डगवीस नत्थि तिवीम नत्थि विणा । मिच्छुदए अणरहिए अठ्ठावीसेव यतम्भि ॥५०॥ युचयनपित्थियते जुगवे थक अवेइ एक्कुदओ । चउवध संतिगारस जुगवं सत्तक्खए चउरो । ५१|| पंडगपट्ठवगेयं एवं थीए चि नवरि नपि खीणे । 'ता इत्थिउदयसंतं पुबंधं जुगवुच्छेएइ ११५२॥ 'पुरिसो पट्टचगो पुण सबिगवीमाइफासए कमसो । हासछगखवणकाले पुवंधुढया परं परं थक्का ११५३॥ सम्म विणा उदएसु संतविभागो उ अजयमाईणं । चउरटुवीस उचसतसम्मि खीणम्मि उगवीसा |॥५४॥ जीवस्थानेषु बन्धादीनाह - अदुसु पंचसु एगे जियठाणे एग दुन्नि दस बंधा । तिग चउ नव उदयम्मि उ तिग तिग पन्नरस संतम्मि ॥५॥ गतिपु वधादीनाह-- चट्ठाणा तिन्नि उ पढमा सुरनारएसु चउ तिरिसु । सुरनारयाण छाई तिरि पंचाई दसंतुदया ॥५६॥ डगवीसंता तेवीसवज्जिया छावि संति तिसु गइसु । मणुयगईए सव्वे चंधोदयसंतठाणाणि ॥५७|| मोहो सम्मत्तो॥ तेवीसपन्नवीसा छव्वीसा अट्टवीस गुणतीसा । तीसेगतीसमेग बंधट्ठाणाणि नामस्स ।।५८॥ वनचउतेयकम्मा निम्माणुवघायमगुरुलहुयं च नव धुवधा एए सव्वत्थ मिलेति जा बंधो ॥५६॥ थिरसुभ२ सुस्सर३ सुखगइ४ सुभग जसाई देय७ सियरसत्तदुगा संघयणा ६ मंठाणा छद्धा-पिंडा हवंतेए ॥६॥ नवगाविरुद्धगहणे तज्जा भंगा हवति सम्वत्थ । छायालसयाणि अदुत्तराणि अविसेसिए धुवओ ६१॥ १ "तो इत्यिउदय सन्त पुबध जुगव छेएइ” इति पाठो मुद्रितप्रतो दृश्यते। किन्तु स छन्दमङ्गा- दिहेतुना ऽशुद्ध प्रतिभाति। २ "तिसिक्कतिसमेग" इति मुद्रितप्रतौ पाठोऽस्ति, किन्तु सोऽशुद्ध. । ३ 'नए वि० इत्यपि ।
J १६ ] सप्ततिकाभाष्यम् जत्थ य अ य भंगा तत्थ य थिरसुभ२ जसेहिँ३ सियरेहि ३। उदिति संकरहिया आयवउज्जोय 'दुगि दुगुणा ||६२।। वधस्थानानि विवरयन्नाहगाथादशकेन- नियगइदुगनियजाई उरलं हुंडं च थावरं अथिरं । अणएज्ज असुभदूभग अपज्जनवधुवय अजसं च ॥६३।। पत्तेयदुगेगयर सुहुमदुगेगयरिगंदितेवीसा । 'एगिदियाइतिरिनर बंधहि मिच्छेण चउभंगा ॥६४॥ सोसासपराधाए खिने पणुवीसिगिदिपज्जस्स । पत्तयसुहुमसुभथिर जसजुयलिहिं वीस भंगाओ ||६५।। विरुद्धपरित्यागेन ज्ञया । नेरइयवज्ज मिच्छो बंधड एसा वि होइ छब्बीसा । उज्जोयआयवाणं एगयरे भंगसोलसगं ॥६६॥ साहारणसुहमेहिं उज्जोयजसायवा न 'वझति । अपजत्तेणं च तहा पमत्थपरियत्तमाणीओ ॥६७|| एगिदिवज्जतिरिमणुअपज्ज पणवीस एत्थ पणभंगा । तसवायरउरलदुगं सेवट्ट तहय पत्तेयं ॥६८॥ * तेवीससेससहियं नरतिरिएगिदियाइ नारयअडवीसेवं बंधहि तिरिमणुयपंचिदी ।'६९॥ चंधति । मा एक- नियगडदुगनियजाईवायरपरघाय पञ्जपत्तेयं नवधुव सासु तसं चिय वेउव्विदुगं च हुडं च ॥७०॥ अपसत्थपिंडसहिया सघयणं 'मोत्तु मिच्छ बंघेड । भंग विणा मिच्छाईपुव्वंता सा वि सुरजोग्गा ॥७१।। नवरं भगा अढ उ समचउरंसं पसत्थपिंडं च । सा तित्थि इगुणतीसा बंधहिँ अजयाइणो अहवा ||७२।। १"दुवि" इत्यपि ह० प्रनौ । २ एगिदिया य तिरि०" इत्यपि । ह० प्रतौ ३ "वायरपत्तेयथिरासुम- जसि सियरेहिं वीसाला ॥६५॥” इत्यपि मुद्रित प्रतौ पाठान्तरम् । ४ 'बधति" इति मु० प्रतौ । ५ "अपि- जत्तविगलतिरिमणुयजुग्गपणवीसइत्य पण भगा” इति मुद्रितप्रती पाठान्तरम् । ६ "सेसतेवीस०” इति मुद्रितप्रतौ पाठोऽस्ति पर तु म छन्दभङ्गकारणेणा-ऽशुद्धो भाति । ७ "पज्जत्त०” इति तु मुद्रितप्रती पाठोऽति, किन्तु स न सम्यक् , छन्दोमनत्वात् । ८ "मुत्तु मिच्छु” इत्यपि । ६ 'बधइ" इति मु० प्रतौ - सप्ततिकाभाष्यम [ १० नियगडदुगनियजाई उरलदुगं वायरं पराघायं । पत्तेय पज्ज नव धुव नवपिंडा उ तमं सामं ११७३११ नरतिरिय 'जोग्गमिच्छाड 'दोन्नि चंति पिंडजा भंगा । विगलट्ठमंग हुंडं सेचट्ठ हीणपिंडिल्ला |७४॥ संघयणा मंठाणा छावि हु मिच्छाण हुंति बंधम्मि । "सेवठ्ठहुंडविरहे पण सामणि तयणुभंगा उ ||७|| "पढमं सुरनेरइया मिस्साडजया नराण पाउग्गं । अडभंग मत्थपिडा एस बिसेसो इगुणतीसे ।।७६ ।। नरगुणतीस तीसा तित्थेणं होड अजउ वंधेड । अहवु जोयण तीसा तिरि गुण तीसाड तह सव्वं ।।७७।। अहवा सुरअडवीयाऽऽ' हारगदुजुया अभग वरतीसा । तित्थेणं इगतीसा बंधहि अपमत्तअप्पुना ॥७८।। जसकित्तिमपुबाई बंधहि उवमतमाड न उ नाम । नामबंध ठाणाई भंगसंखा इमा तेसु ॥७९॥ चउ ४ पणबीमा २५सोलस१६नवा बाणउई सया य अडयाला । "इगयाउत्तरछायालसया४६४१ एक कबंधविही 11८०॥ गुणस्थानेपु वन्वस्थानान्याह- मिच्छो छ उ तीसता सासणु' अजया य तिनि तीसंता । देमपमत्ता मीसा बंधहि वीसा नवहिया ॥८॥ अडवीमाई चउगे बंध: अप्पुब्यो । एगमनियट्टिसुहुमा सेसा नाम न बंधति ८२॥ जीवस्यानेपु वन्वस्थानान्याह- एगेगतीम सन्नी पज्जो अडवीस पज्जु अमणो वि । सेमा उ पंचठाणा वंधड सबवे वि जियठाणा ॥३॥ इय अपमत्तु पंच १ "जुग्ग०' इत्यपि 'टुन्नि" इत्यपि । ३ "छेब?" इत्यपि । ४ "छेवढ०" इत्यपि। ५ वर्धा पुरनेरइया मिम्सा अजया य मणुयाउग।" इति मुद्रितप्रती पाठान्तरम् । ६ “पसस्थ." इति मु प्रनौ। ७ "अजय" इति मु प्रती | "जोडण" इत्यपि मु प्रतौ । ९ "०तीसाएँ' इत्यपि मु० प्रती १० "०हारदगजुया' इत्यपि मु. प्रतौ । ११.१२ "वहि" इत्यपि मु० । १३ "०ठाणा" इत्यपि मु. १४ “पणुः" इत्यपि मु. ११५ "इगुयातुत्तर 'त्यपि मु। १६ "इकिक ' इत्यपि मु०१७ "अजा त्यपि मु० । १८ वयहि इत्यपि मु.
१८] सप्ततिकाभाष्यम् गतिपु तान्याह- मणुएसु सब्धि बंधा पणछन्नववीस तीस देवेसु । तिरिएसु छ ६ तीसंता नरए. गुणतीसतीसा य ॥४॥ घणयाल सन्नि नरि सत्ततीस तेरस सहस्स नव य सया। तिरि पब्जि अमणि मिच्छे ते छच्चीसा असम्मजया ।।८ ते सतरसहिय 'जियवारसेसु अट्ठसय तेरस सहस्सा | छप्पन्नहिय सुरेसु बत्तीसहिया य ते नरए ॥८६॥ छन्नवडसयट्ठहिया सोलस बत्तीस सोल सोलस य । चउ पंच एगमेगं साणाइसु भंग जा सुहुमो ॥८७}} ॥ इति जीवस्थानादिपु भगा। - 11 बंधो समत्तो। वीसिगवीसा चउवीसि गाउ इगतीसमंत एगहिया । उदयट्ठाणाणि भवे नव अट्ठ य हुंति नामस्स ८८ 'तेयाकम्मागुरुलहु थिरसुभजुयलाणि निम्म वनचउ । एया वारस पयडी धुवोदया हुंति नामस्स ॥८६॥ सघयणासंठाणासुभगं१आदेय१जस१ति३जुयलाणि । "रामीगुणेण भगा अडसीया दो सया हुंति ॥६०|| करण । पज्जत्तजसादेयं सूभगजुयलेहि नव य भंगाओ । अपसत्थेगु अपज्जे पज्जट्ठ उ करणजवडिल्लं ॥११॥ साहारणे ण आयवु-जोयजसायव अपज्जसुहमेहिं । साहारुज्जोयजसायवे य नोदिति सुहुमतसे ॥२१॥ उदयस्थानानि विवरयन्नाह त्रिंशद्भिर्गाथामि.- नियगइदुगनियजाई थावरनादेय दुहयधुवपयडी सुहुमापज्जजसाणं दुगदुगएगयरि पणभंगा 11६३॥ थावरइगवीसेसा अवणिय अणुपुव्वि पत्तियं एयं । पत्तेयदुगेगयरं हुंडं उरलं १°उवग्यायं, ६४|| १ १. "०बारसजिएसु' इत्यपि मु० । २ "गाइ०” इत्यपि । ३ "इय गाथा हस्तलिखितपतो नास्ति । ४ सघयणं सठाण सूभगआ०" इति मु प्रतौ । ५ “रासिगुणणे' इति मु प्रतौ । ६ “साहारणे न" इति मु० प्रती । ७ "दुभग०" इत्यपि मु । ८ “एगयरे य” इति ह प्रतौ । ९ "घित्तिउ'' इत्यपि मु प्रती। १. "च उवघाय" इत्यपि मु प्रतौ।
, सप्ततिकामाष्यम् TE दस भेगा 'उरलम्मी विउविपज्जेगु जाण चउवीसे । वायरविउविदेहे पत्तेयं वित्थ य विसेसो ॥९५।। पज्जचउचीस पणुवीस होइ परधाय सच तहिं भंगा । पत्तेयर सुहुमरजसजुयलि 'छाओं एक्को य वेळच्चे ॥६६॥ उसासे छब्धीसा तत्थ वि ते सत्त अहव 'उज्जोय ॥४॥ अहवा चि आयवेणं २ चउरो४ दोर गिदि छन्चीसा 1180 सा वौसमझे आयवउज्जोयएगयरि छुढे सत्तावीस छ ६ भंगा एगिदियभंगवायालं ॥८॥ जा इगवीसा एगिदियस्स विगलाण होइ सा चेव । किंतु तसवायरं चिय पाठो भंगा य तिन्ने ॥६॥ अपसस्थपञ्जमैंगो एगो नरएसु अटु वि सुरेसु । नव तिरिनरेसु जवडि भंग सेसो उ विगलकमो ११००॥ विगलइग वीसि अणुपुग्विविरहिए खिवसु हुँडसेबट्टे । उरलदुगं उवघायं पचेयं चैव छब्बीसा ॥१०११ ते भंगतिय सा वि हु दुखगइ "परपायखिवणि अडवीसा । भंगा य दोषि इत्थं अपजभंगा जओ नत्थि ॥१२॥ ऊसासुजोयाणेगयरे गुणतीस भंग चत्तारि । सासगुणतीसतीसा सुरदुगउजोय एगयरे ॥१०३॥ १२छभंगा सर तीसा इगतीसोजोयएण भंगचऊ । बेइंदियवावीसा छावट्ठी सबबिंगलाणं ॥१०४॥ सगलाणं छब्बीसा एवं नवरं तु रासिजा भंगा २८८ । अप्पञ्जभंग अप्पसत्थजुत्त १ अडवीस पुण एवं ॥१०॥ खगईदुगएगयरे परधाए खित्ति रासिजा २८८ दुगुणा । रासिजरेभंग चउगुणा४ गुणतीसे सासि जोए वा ॥१०६ ।। ऊसासे गुणतीसे सरदुगउज्जोयएगयरखेचे - - १ उरलम्भि उ'' इत्पपि मु १२ “जाणि" इति ह प्रतौ ! ३ "बायह" इवि मु । ४ "इत्थ'' इत्यपि मु०१५"छा इको उ" इति मु०१६"उज्जोए" इत्यपि मु.१७ "छब्बीसे" इत्यपि।८"तिन्लेव" इत्यपि मु । ९"बीस" इति मु. । १० "परिधा०" इति मु. १११ "दुन्नि" इलि मु । १२ “छ य' इत्यपि मु । ।
२० । सप्ततिकाभाष्यम् य 'छग्गुणरासिजभंगा२८८ तीसाड पुणो वि सरतीसा ॥१०७॥ उजोएणिगतीसा चउग्गुणा ४ रासिजा उ उदयंसा । छलहियगुणवन्नसया भंगा पंचिंदितिरियाणं ॥१०॥ उजोयरहियतिरिविहि सामन्ननराण अत्थि सव्यो वि । दुगहियछव्वीससया . भंगाणं ताण तो हुंति ॥१०६।। बेउब्धियपणुवीमा उम्बिदुगं समंतचउरंसं पत्तेय उवधायं सिगवीसणुपुब्बिरहिया ॥११०॥ अडभंग सत्तवीस वि सुखगइ परघायसंजुय तहेव । - सासुजोएगयरे अडवीस दु अट्ठ २।८ जवडिल्ला ॥११ उज्जोयसूसरेगयरि सास अडवीस होड गुणतीसा । जबडिल्ला दो य अठा उज्जोए तीस जबडट्ठा ॥११२॥ तिरि छप्पन्न भंगा. नरेसु एमेव भंगपणतीमा । जं उज्जोओं जईणं तहि पसत्था य जवडिल्ला ॥११,३।। आहारमंजयाण वि एवं आहारगं तहिं वच्चं । 'एक्कको वि य भगा सव्वत्थ वि सत्तमिलिया वि ||११४।। नरगडपणिदिजाई तसवायरपजसुभगधुवपयडी आदेयजसा वीमं तित्थेणिगवीस केवलिणो ॥११५॥ उरलदुगं सहाणं पत्तेगुवधायवज्जरिसहं च । मह वीसाए छवीसा सत्तावीसा य तित्थेणं ॥११६।। स च्चेव य छन्वीसा परघाउस्सासगडसरेगयरं । पक्खिविय भवे तीसा एगत्तीसा य तित्थेण ॥११७॥ केवलिणो तीसुदए सरंमि रुद्धे भवे इगुणतीमा । अडवीम सामरोहे अहवा तित्थयर इगतीसा ॥११८॥ सरगेहि तीस सासम्मि गूणिया एवमट्ठ मणुयगई । तमसुहयपजवायरपणिंदिया-ऽऽ'एजयजसेहिं ॥११९॥ नव तिथिण केवलिणो सब्वे भंगट्ठ पुन्वगहणेण । मणुयाण सच्चि भंगा छन्वीससया उ' बावन्ना ॥१२०॥ १ "छगुणा" इत्यपि मु । २ "०परिघायः" इति ह प्रतौ । ३ “च सत्था” इति ह । ४ "इकिको ञ्चिय" इत्यपि मु । ५ "पत्तेयुः' इत्यपि मु । ६ “इज्ज" इत्यपि मु.।
सप्ततिकाभाष्यम् [ २१ नियएगवीसजुत्ता विउव्यितिरिसरिस हुंति देवुदया । चउमहि देवभंगा अपसत्था पंच नरएसु ॥१२१॥ उदपु भङ्गसख्या॥ इग वेयालिकारस तेत्तीसा छस्सयाणि तेत्तीसा । वारस सत्तरससयाणहिगाणि विपंचसीई हिं ॥१२२॥ अउणत्तीसेगारमसयहियसत्तरसपंचसट्टीहिं एक्के कगं च वीमादळुदयंतेतु उदयविही ॥१२३।। 1 दयस्यान २०२१२४-५ २६.७ २८ २६ ३० ३१ ८ भग १४२११३३/६०० ३३/१२०२१७८५/२६१७११६५११ । बन्धम्थानेषु उदयानाह- इगतीमता डगवीसमाइणो सब्धि उदय विज्जंति । तीमंतचंधगेसु चउवीसा 'मोत्तु अडवीसे ||१२४|| गुणतीमतीस उदया इगतीसे एगवंधि तीसेव चउवीमा 'पणवीसा 'मोत्तुमवंधम्मि दस सेसा ।।१२५।। साप्रत सर्वोदयभङ्गसख्यापूर्वक सर्वस्थानेषु सभवितोदयभग सख्यामाह- सत्तत्तरी सया एकाणउया सव्वभंगाणं ७७९१। जड१८सुर६ नरय५विहूणा तेवीसे वंधि सेसुदया७७०४॥१२६॥ "नारय५जई? ८विहूणा पुण छब्बीसे य पन्नवीसे य ७७६८) केवलिरहियाउदया गुणतीसे तीसवंधे य ७७८३।।१२७॥ पनमया बासीया ५०८२ अडवीसे बधि जमिह तिरिउरला । देहेणापडिपुन्ना पढमे संघयणसंठाणे ||१२८॥ अडयालं भंगसयं१४८डगतीसे एगवंधि दुगसयरी १७२ अट्ठाणबई मध्ये अवधए हुंनि उदयसा ॥१२॥ ॥ उनि बन्धस्थानेषु उदयभगसख्या ॥ सात गुणस्थानेषु उदयस्थानान्याह- १ "मुत्त' इत्यपि मु । २ "०उदओ” इत्यपि ह । ३ "पणु०" इत्यपि मु ।४ "मुत्त' इत्यपि उ । ५ "नस्यजदविहणा पुण छपीमे पनवीमरवे य" । इत्यपि मुद्रित प्रतौ। ६ वासीती' इत्यपि मु।
२० । सप्ततिकाभाष्यम् य 'छग्गुणरासिजभंगा२८८ तीसाड पुणो वि सरतीसा ॥१०७॥ उजोएणिगतीसा चउग्गुणा ४ रासिजा उ उदयंसा । छलहियगुणवन्नसया भंगा पंचिदितिरियाणं ॥१०८।। उज्जोयरहियतिरिविहि सामननराण अत्थि सब्यो वि । दुगहियछब्बीससया भंगाणं ताण तो हुंति ॥१०६।। वेउव्यियपणुवीसा वेउव्विदुगं समंतचउरांसं पत्तेयं उवघायं सिगवीसणुपुब्बिरहिया ॥११०॥ अडभंग सत्तवीस वि सुखगइ परघायसंजुय तहेव । - सासुञ्जोएगयरे अडवीस दु अट्ठ २।८ जवडिल्ला ॥१११।। उज्जोयसूमरेगयरि सास अडवीस होइ गुणतीसा । जवडिल्ला दो य अठा उजोए तीस जवडट्ठा ॥११२॥ तिरि छप्पन्न भंगा. नरेसु एमेव भंगपणतीमा । जं उज्जोओं जईणं तहि पसत्था य जवडिल्ला ॥११३॥ आहारसंजयाण वि एवं आहारगं तर्हि बच्चं । 'एक्केको वि य भंगा सव्वत्थ वि सत्तमिलिया वि ॥११४॥ नरगडपणिदिजाई तसवायरपजसुभगधुवपयडी आदेयजसा वीमं तित्थेणिगवीस केवलिणो ॥११५॥ उरलदुर्ग सहाणं पत्तेगुवघायवज्जरिसहं च ।। मह वीसाए छ्बीसा सत्तावीसा य तित्थेणं ॥११६।। स च्वेव य छचीमा परघाउस्सासगइसरेगयरं । पक्खिविय भवे तीसा एगत्तीसा य तित्थेण ॥११७|| केवलिणो तीसुदए सरंमि रुद्धे भवे इगुणतीया । अडवीम सामरोहे अहवा तित्थयर इगतीसा ॥११८।। सरगेहि तीस सासम्मि गूणिया एवमट्ठ मणुयगई । तमसुहयपजवायरपणिंदिया-ऽऽ'एजयजसेहि ॥११९॥ नव तित्थिण केवलिणो सव्वे भंगट्ठ पुवगहणेण | मणुयाण सन्धि भंगा छव्वीससया उ' वावन्ना ॥१२०॥ १ "छगुणा" इत्यपि मु । २ "०परिघायः" इति ह प्रतौ । ३ “च सत्था" इति ह । ४ "इक्किको चिय" इत्यपि मु । ५ "पत्तेयु०' इत्यपि मु । ६ “इज्ज" इत्यपि मु । - सप्ततिकाभाष्यम् [२१ नियएगवीसनुत्ता विउन्चितिरिसरिस हुति देवुदया । चउमटि देवभंगा अपमत्था पंच नरएसु ॥१२१॥ उदपु भङ्गसख्या॥ इग बेयालिकारस तेत्तीसा छस्सयाणि तेत्तीसा । सत्तरससयाणहिगाणि पिंचसीई हिं ॥१२२॥ अउणत्तीसेगारमसयहियसत्तरसपचसट्ठीहिं एक्केकगं च वीमादलृदयंतेतु उदयविही ॥१२३॥ २६ उदयस्यान २०२१२४१-५/२६-७ २८ શર ३० मन १४२११३३ ६०० ३३/१२०२१७८५०६१७११६५१ । बन्धम्यानेषु उदयानाह- इगतीमता डगवीसमाइणो सब्धि उदय विज्जंति । तीमंतवंधगेसु चउवीसा 'मोत्तु अडवीसे 11१२४॥ गुणतीमतीस उदया इगतीसे एगवंधि तीसेव चळवीमा पणवीसा "मोत्तुमबंधम्मि दस सेसा ॥१२५॥ साप्रत सर्वोदयमगसख्यापूर्वक सर्वस्थानेषु समवितोदयभङ्ग- सख्यामाह- सत्तत्तरी सयाई एकाणउया सव्वभंगाणं ७७९११ जड१८सुर६ नरय५विहूणा तेवीसे बंधि सेसुदया७७०४॥१२६॥ 'नाग्य५जई१८ विहणा पुण छब्बीसे य पन्नवीसे य ७७६८) केवलिरहिया उदया गुणतीसे तीसवंधे य ७७८३||१२७|| पनमया बासीया ५०८२ अडवीसे बधि जमिह तिरिउरला । देहेणापडि पुन्ना पढमे संघयणसठाणे ||१२८|| अडयालं भंगसयं१४८डगतीसे एगचंधि दुगसयरी ।७२ अट्ठाणवई मवे अबंधए हुंनि उदयसा ॥१२६॥ ॥ इति बन्धथानेषु उदयभङ्गसख्या ।। साप्रत गुणस्थानेषु उदयस्थानान्याह- १ "मुत्त" इत्यपि मु । २ "०उदओ" इत्यपि ह० } ३ "पणु०" इत्यपि मु ।४ "मुत्त" इत्यपि भु । ५ “नरयजइविहूणा पुण छवीमे पन्नवीमवधे य" । इत्यपि मुद्रित प्रतौ। ६ वासीती" इत्यपि सु -- २२ ] सप्ततिकामाध्यम् इगतीसंता इगवीसमाइणो मिच्छि सन्धि उदयाओ ! सत्तट्ठवीसरहिया ते चेव उ सच सासाणे ॥१३०॥ गुणतीसाई तिन्नि उ इगतीसंता उ मिस्सगुणठाणे । चउबीसरहिय अजए देसे चउछेग-२४-२६-२१-वीसणा।।१३१॥ विरए वेवं नवरं इगतीसाए य रहिय अपमत्तो । गुणतीसतीस पुव्वा जा खीणो तीस जोगेवं ॥१३२।। चउपणअहिया वीसा नव अट्ठ य 'मोत्तु अट्ठ उदयाओ। नव अट्ठ अजोगंमी भंगोवाओ इमो तेसु ॥१३३।। सुहुमतिगं सुहु सा मिच्छे इगविगल जाव सासाणे । उदया 'वि न संतेए सासाणे नरगइगवीसा ॥१३४॥ एगिदिसु छव्वीसा नरतिरि गुणतीसतीस चुजोई । सुरवजा पणवीसा इगतीसा तिरिसगलसेसा ॥१३५।। मिश्रे विशेषमाह- नरतिरिए गुणतीसा तीस वि जोएण नत्थिणमीसाण । अण एजदुहयमजसं देसाईणं न य उदेइ ॥१३६।। गुणतीसंतुद एहि संजयदेसा न हुंतुरलदेहा आहारनरूज्जोया जइस्सऽपुवऽढ केवलिणो ॥१३॥ संघयणे पढमे चिय सेढी तिन्नाइ अनि उवसमगे । तित्थयरे सम रं सरखगई सुप्पसस्थित्ति ॥१३॥ नि दयभंगसंखा अजोग्गरहिया भवे निययसंखा । गुणठाणे गुणठाणे भंग चिय 'संपय वुच्छं ।।१३।। सत्तत्तरितेवत्तरि ७७७३ भंगसया मिच्छसासणे एवं । चारि सहस्सा सगनउय ४०९ मीसि चउतीस यणसट्टा३४६५ ॥१४॥ अजए इगवन्नसया इगचत्ता ५१४१देसि चउसय अट्ठवन्नसयंछठे १५८ अडयालसयं १४८ तु अपमते ॥१४॥ f ४४३1 तिरिसेसर- १ "मुत्त" इत्यपि मु । २ "य" इत्यपि मु । ३ इयगाथा मुद्रितप्रतावित्यम्-' गतीस असुरपणुवीसिगिदि छन्वीसा । तिरिजोई विगलतीसा तिरिमणुयाणं च गुणतीसा" इति । ४"भणुइन" इत्यपि मु०१५"एसु" इत्यपि मु० । ६ "सपइं" इत्यपि मु० ।
सप्ततिकाभाष्यम् [२३ उवरि जा उवसंतो विसत्तरी ७२ खीणमोहि चउवीसा २४ । अडचत्त ४८ सजोगम्भी दो भंगा चरिमगुणठाणे ॥१४२॥ जीवस्थानेपूदयानाह- छव्वीसंता सुहुमे सगवीसता य बायरे उदया इगतीसंता चउवीसहीण समणेगवीसाई ॥१४॥ विगलामणेसु ते वि हु पणुवीसा सत्तवीस विणु छाओ । पजि 'अपजाण निज दो दो उरलोदया पढमा ॥१४४॥ जीवस्थानेषु उदयस्थानकमङ्गसख्यामाह- सुहमेयरेसु तिय तिय ३ अपजि पज्जेसु सत्त गुणतीसं । सन्नि अपज्जे चउरो दो दो सेसेसु ऽपज्जेसु ॥१४५।। छावत्तरि इगसत्तरि समणे विगलेसु वीस पत्तेयं अमणे गुणवन्नसया चउसहिया जीवउदयंसा ॥१४६॥ गतिषूदयम्थानान्याह- इगपणसगढ़नवहियवीसा नरगे सुरेसु तीसा वि । नरुदय-चउवीसूणा नवट्ठवीसूण-तिरिएसु ॥१४७॥ उदयंस पंच नरए तिरिए पण सहस सयरि भंगाणं । देवेसु चउसट्ठी नरेसु नरेसु छव्वीसवावन्ना ॥१४८॥ गुणस्थानजीवस्थानगतीनां बन्धेषूदयानतिदिशन्नाह- गुणतीसंता उदया अडवीसे नत्थि जाव मीसोत्ति । निगतीस तित्थबंधे इगतीसचयाइ ३१ गुणसरिसा ॥१४९॥ पणसगअहिया वीमा तेवीसचए न होइ सगलाणं । गुणजियगईण सरिसावसेसबंधेसु उदयाओ ॥१५०॥ मिश्रस्यैकोनत्रिंशद्वन्धे एकोनत्रिंशदुदय ।। ॥ उदओ सम्मत्तो।। तिदुनवई गुणनवई 'अच्छडसी असी य गुणसी य अट्ठयछप्पन्नत्तरि नव अट्ठ य नामसंताणि ॥१५१|| पडिपुन्नु नामु तिणवइ तित्थविणा दुणवई य सा होइ । चउआहारगरहिया ता६३-९२ गुणनवई य अडसीया॥१५२॥ १ "अपज्जत्ताण निय दो" इत्यपि । २'अडसी छडसी असीइ गुणसीइ ।" इत्यपि मु० । ३ “परि पुन" इत्यपि मु.। - २१] सप्ततिकाभाष्यम् 'सुरदुगनरयदुगे वा एगयरे नासिए हवड छासी । असइ विउविचउक्के दुगअन्नयरे य उबलिए ॥१५३।। मणुयदुगे उबलिए अडसत्तरि सत्तखवणरहियाण । खवगाणं पुण सव्वे छासी अडसत्तरी मोत्तु ॥१५४॥ तेणवडमाइयाओ चउरो नामस्स तेरसे खविए । जायति अमी गुणसी छसयरि पणसयरि जहसंखं ॥१५५।। नरयदुगं तिरियदुगं विगलिगजाई य थावरं सुहुमं । आयावं उजोयं साहारण तेरस इमाओ ॥१५६।। दुणवडअडमीयाओ उवसंतो जाव संति मिच्छाओ । तिणवड गुणणवईओ दो वि हु अजयाउ अट्टण्हं । १५७|| गुणनवड असी छासी "अडसत्तरि मिच्छि थूलखवगाओ । पणछन्नवहियसत्तरि असी अजोगंतऽणुवसते ॥१५८|| नव अट्ठ अजोगिम्मी सत्ता गुणठाणगेसु इय भणिया । गुणवंधुदएसेव नवरं तत्थ य विसेसोयं ॥१५९।। अडवीसचयं "मोत्तु दुणवइ छडसी८६ असी-प्य सव्वत्थ । छन्वीसंतुदएसु अडसयरी पंचमी मिच्छो ॥१६०॥ गुणतीसचए गोदएसु२१ २५,२७, २८, २९नवसी विधि अडवीसे। दुणवड नवठ्ठछासी नवसी विणु एकनीसुदए ॥१६१।। सासणि तीसे तुदए दुणवइ अडमी य सेमि पुण अडसी। अजए गुणतीसचए तिनवइ नवसी छवीसुदए ॥१६२।। 'देमपमत्ति गुण' तीसे २६ चइ अजए तीसि तिणवई नवसी । अडवीसचए दुणवड़ अडसी अजयाडतिण्डंपि ॥१६३।। अडमी नवमी दुणवड तिणवह संता कमेण वधेसु । अपमत्तअपुयाण इगतीमंतेसु चउसु पि ॥१६४।। १ "अन्या गायाया स्थाने मुद्रितप्रताविय गाथाऽस्ति । “छासीइ असइ सुरदुगि नरगाचियछक्कगे अमइ असिई । सुरदुगि नरयदुगेण व छक्कचए सद पुणो छासी।" इति ! २ "अट्टत्तरि" इत्यपि मु० । ३ ‘अडहत्तरि मुत्त ।।" इत्यपि मु०। ४ "साहारण" इत्यपि मु० । ५ अडहत्तरि इत्यपि मु०। ६ "०म्मि उ" इत्यपि मु०। ७ “मुत्त दुनवई छडसी असीइ” इत्यपि मु० । ८ "अडसीइ" इत्यपि मु० . "देसि" इत्यपि मु. 1 १० "निसे" इत्यपि मु०।
सप्ततिकामाष्यम् [ २५ तित्थविणा उदएसु अतित्थसंताई हुंति केवलिणो । तित्थेण सतित्थाई सेसा संता गुणकमेण ॥१६॥ जीवस्थानेषु सत्तामाह- दुणवड अडसी छासी असीइ अडहत्तरी य तेरससु । पन्नत्तरिपज्जंता दस संता सन्निपजत्ते ॥१६६॥ जीवस्थानविपयवन्धोदयेपु सत्तामाह- 'बंधोदइ तेरेवं नवरं उरलोदए छ्चीसंते । अडसयरि संति वंधे अडवीसि अतिथि मिच्छविही ॥१६॥ छव्वीसंतचएसु सनिम्मि वि होइ विगलविहि नवरं । पणसगवीसुदएसु दुणवइ अडसी अ तेवीसा ॥१६॥ अडवीसाई तीसंतबंधि संता निययउदएसु । अजयजुयमिच्छविहिणा छलसीमाई उरलि चेव ॥१६६॥ इगतीसएगबंधे अवंधि उदएसु जइविही होइ । करणं पइ सन्निम्मि वि विहि केवलिणो निरवसेसो ||१७०॥ गतिपु सत्तामाह- एगचउ पंच छहिए वीसे उदयम्मि जे तिरियउरला । तेसिं चेवडसथरी तिरिजोग्गचईण नवरं तु ॥१७॥ छप्पणवीसुदएसु अडसयरी नस्थिगिदिपजस्स । जससाहारणआयवउज्जोएहिं तु मिस्सेसु ॥१७२॥ दुणवइ अडसी चउगइ असी य छासी य मणुयतिरिएसु । सुरणर तिणवइ नरगे वि गुणवई पंच नरि सेसा ॥१७३।। गतिविपयवन्धोदयेषु सत्तामाह- बंधोदएसु गइविहि णारयतिरिएसु णवरि अडसयरी । जीवे व्व तिरिगईए अडवीसि अतिथि सन्निविही ।।१७४॥ तिरिसयलि२६८विगलि १८सव्वे पर्णसिगा एगवीसछब्बीसे। उरलेगिदियभंगा एवं इगवीसचउवीसे ॥१७॥ पत्तेयअजसभंगा दो दो छब्बीसपन्नवीसेसु । एवं च पंच सत्तिगतिन्निसया 'होति पणतीसा ॥१७६।। १ "बन्धोदय" इति मु० प्रतौ। २ 'असीइ छासीइ" इत्यपि मु०३ “जीवव्व" इत्यपि मु०।४"पणं- सगा" इति वा । ५ "सतिग" इत्यपि मु०१६ "हुति" इत्यपि मु०। - 3 सप्ततिकाभाष्यम् । मणुएसु वि मन्निविही णवरं अडमयरि नत्थि तह तीसे । पंधे तिनवइ नवसी इगतीसुदओ नसड बंधो ॥१७७|| देवाण तीसबंधे संता चउरो वि नियमउदएसु । दुनवइ अडमी मता सेसेसु बंधउदएसु ।१७८|| संवत्थ वि अडमयरी अन्ने तिरियाण उरलउदएसु। पणसगर्व सुदएसु 'तेवीसचयं नरे चिंति ॥१७६।। सामान्येन सर्वबन्धेषु सत्ताम्थानान्याह- तीनंतऽडवीसविणा बंधेसुदएसु एगतीमंते इगवीसाइसु दुणवइ अडसी छासी अमी ठवसु ॥१८०॥ छब्बीमतुदएसु अडसयरी २ पंचमी तहा ठवसु गुणनवई तह तिणवइ ठवेसु एएसु उदएसु ॥१८१।। गुणतीमवंधगस्स उ चउचीसिगतीमवज्जि सेसेसु । छच्चउअहिया वीसिगतीसा वज्जित्तु तीसचए ॥१८२।। इगतीसबंधि उदया गुणतीसा तीस सति तेणवई । इगपंधिअबंधीणं तीसुदए अट्ठ संताणि ॥१८३॥ तिदुनवई गुणनवई ' अडमी य असी य तह य गुणसीया । छप्पणहत्तरि ' एत्तो अवंधि सेसेसु उदएसु ॥१८४॥ वीसछ्वीसऽडवीसे गुणसी पन्नत्तरी य संताई । गुणतीसे इगुणासी छप्पणसयरी असी चेव ॥१८५।। णवउदए संताई असीड छावत्तरी य नव चेव अठ्ठदए ते चेव उ एगूणा तित्थनामेण ||१८६।। असीड छसयरि दुन्नि उ इगवीसिगतीससत्तवीसाए । अडवीसे पुण बंधे नवइ 'अडसी य सव्वत्थ ॥१८७।। इगतीसुदए छासी छासी गुणनवई तीसुदयअहिया । गुगनवइ कस्स भन्नड मिच्छद्दिहिस्स ननस्म ॥१८॥ 3 १ "तेवीसचओ वि मणुएसु ॥” इत्यपि मुद्रितप्रतौ पाठ । २ "पचम ” इति मु० प्रतौ। ३ 'छक्क- च उअहियवी०” इत्यपि मुः । ४ 'अडमी[६]इ असीइ तह य गुणसीड ॥" इत्यपि मु० ! ५ "इत्तो" इत्यपि मु०१६"अडसीइ सव्वत्थ" इत्यपि मु०। ७ 'तिसुदए अहिया।" इत्यपि मु०।
[ २७ सप्ततिकामाष्यम् गुणनवड कहं भन्नड चियतिन्थो 'वेयगे गओ मिच्छं । बंधेइ नरगजो ग्गा अडवीसा तीसउदयंमि ॥१८९|| पत्तरस तस्स नगरे उदइगवीसाइ पंधि गुणतीसा । अन्तमुहुत्तं तत्तो सतित्थ तीसा चिणइ सम्मे ॥१९॥ इय मयकम्मबंधाइरूवणा लेसओ मए भणिया । संतंताताणतं अत्तपुरं इच्छमाणेण ॥१६१।। १ 'वेयगो" इत्यपि मु०। • 'वर्ग अडवीस" इत्यपि मु० । ३ “तीस" इत्यपि। "अभयपुर" इत्यपि । इति सप्ततिकाभाष्यं समाप्तम् सप्ततिकाभाष्यम् - मणुएसु वि मन्निविही णवरं अडमयरि नत्थि तह तीसे । वधे तिनवइ नवसी इगतीसुदओ नसइ बंधो ।।१७७।। देवाण तीसबंधे संता चउरो वि नियमउदएसु । दुनवइ अडमी मता सेसेसु वंधउदएसु ।१७८॥ सव्वत्थ वि अडमयरी अन्ने तिरियाण उरलउदएसु । पणसगर्व सुदएसु तेवीसचयं नरे विति ॥१७६।। सामान्येन सर्वबन्धेषु सत्तास्थानान्याह- तीनंतऽडवीसविणा बंधेसुदएसु एगतीमंते इगवीसाडसु दुणवड अडसी छासी अमी ठवसु ।।१८०॥ छब्बीमतुदएसु अडसयरी २ पंचमी तहा ठवसु गुणनवई तह तिणवइ ठवेसु एएसु उदएसु ॥१८१।। गुणतीमबंधगस्स उ चउचीसिगतीमवज्जि सेसेसु 'छचउअहिया वीसिगतीसा वज्जित्तु तीसचए ॥१८२।। इगतीसचंधि उदया गुणतीसा तीस सति तेणवई । इगवंधि अबंधीणं तीसुदए अट्ठ संताणि ॥१८३॥ तिदुनवई गुणनवई १ अडसी य असी य तह य गुणसीया । छप्पणहत्तरि ५ एत्तो अचंधि सेसेसु उदएसु ॥१८४।। वीसछ्वीसऽडवीसे गुणसी पन्नत्तरी य संताई गुणतीसे इगुणासी छप्पणसयरी असी चेव ॥१८॥ णवउदए संताई असीइ छावत्तरी य नव चेव अठ्ठदए ते चेव उ एगूणा तित्थनामेणं ॥१८६।। अमीड छसयरि दुन्नि उ इगवीसिगतीससत्तवीसाए । अडवीसे पुण बंधे नवइ 'अडसी य सव्वत्थ ॥१८७।। इगतीसुदए छासी छासी गुणनवई तीसुदयअहिया । गुणनवड कस्स भन्नड मिच्छदिहिस्स नन्नस्म ॥१८८॥ । १ "तेवीसचओ वि मणुएसु ॥” इत्यपि मुद्रितप्रतौ पाठ । २ “पचम" इति मु० प्रतौ। ३ 'छक्क- चउअहियवी०" इत्यपि मुः । ४ 'अडमी[ई]इ असीइ तह य गुणसीइ ॥” इत्यपि मु० । ५ "इत्तो' इत्यपि मु०१६"अइसीइ सव्यत्य" इत्यपि मु०। ७ 'तिसुदए अहिया।" इत्यपि मु०। - सातति कासारम् | २१ संतवाणा पनरस अडवीसा ताव इत्थ सुपसिद्धा । सम्मत्ते उचलिए सगवीसा होइ संतम्मि ॥१५|| मीसम्मि उ छब्बीसा अणाइमिच्छस्स अहविमो नेया । अणुवधीणुव्वलणे चउचीसा मिच्छपुजम्मि ॥१६॥ खवियंमी तेवीसा बावीसा मिस्सजसवणम्मि । सम्मत्तजखवणे इगुवीसा खवगसम्मस्स ॥१७॥ अट्ठकसाए खविए तेरस चारस नपुसवेयखए । थीवेयखएक्कारस खीणे छक्कम्मि पंचेच ॥१८॥ पुमवेयखए चउरो तिन्नि उ कोवम्मि दुन्नि माणम्मि । मायाखयम्मि एको इय भणियं सयलमोहणियं ॥१६॥ तेवीस पन्नवीसा छव्वीसा अहवीस इगुतीसा । तीसेगतीसमेगं बंधट्ठाणाणि नामस्स |॥२०॥ तेवीसा पणवीसा छन्नवहिय वीस तीस एयाणि मिच्छद्दिट्ठी बंधइ तिरियगईए निमित्ताई ॥२१॥ एगिदियपाउग्गाणि बंधठाणाणि तिन्नि पढमाणि । तत्थ च तेयगकम्मगवन्नाइचउक्कयं चेच ॥२२॥ अगुरुलहू उवघायं निम्माणं नव इमाउ धुवबंधा । तिरियगई एगिदियजाई ओरालियं हुंड ॥२३॥ तिरियाणुपुब्बिथावरवायरसुहमाण दुन्हमेगयरं अप्पजत्तगपत्तेयइयरमेगियरथिरगं च ॥२४॥ असुभं दूभगअणइजअजसधुववंधिणीहि सुह एसा । अप्पज्जत्तगएगिदियाण पाउग्गतेवीसा ॥२५॥ परघाउस्साससमा पञ्जत्तेगिदिजोग्गपणवीसा
॥ स तिकासारम् ॥
बंधे उदए
सिरिवीरजिणं नमिऊण भणियनीसेससत्थसारथं ।
वुच्छामि सत्तरीए सारमिणं संगहेऊण ॥१॥
चंधे उदए संते पण पण पढमंतिमेसु कम्मेसु ।
वेयणियाउयगोए
य एकिक्कं ॥२॥
संतम्मि दोन्नि एक्कं व हुज्ज अह दंसणस्स आवरणे ।
नव छच्चउरो बंधे संतम्मि य उदय चउ पण वा ॥३॥
वावीस इक्वीसा सतरस तेरस हवंति नव पंच ।
चउ तिग दुग एक्कं वि य बंधट्ठाणाणि दस मोहे १४||
मिच्छं कसायसोलस वेओ एक्को भयं दुगंछा य ।
जुयलेगेण दुवीसा इगवीसा मिच्छविगमम्मि ॥५॥
अणवंधविगमि सतरस तेरस विगमे अपच्चखाणाणं ।
पञ्चक्खाणाभावे नव हासाईचउकस्स ॥६॥
वोच्छेए पणबंधे पुमवेयाविंगमओ य चत्तारि ।
कोहाई य कसाए केवलए बंधए तत्तो ॥७।।
कोहे विगए वंधइ संजलणतिगं दुगं तु माणम्मि
मायाविगमे बंध अनियट्टी लोभमेगं
तु ॥८॥
दस नव अह य सत्त य छ पंच चउ दुन्नि एक मोहुदया ।
मच्छ कसायचउक वेओ जुयलं भयदुगुछा ||६||
एए दस अणविगमे भयदुगुंछाण वेगविगमम्मि ।
नवउदए दुगविगमे अट्ठ य सत्त उ तिगाविगमे ॥१०॥
अणरहियकसायतिगं वेओ जुयलं छलोदए एवं ।
आइल्लवीयरहिया दुन्नि कसाया य पुमवेओ ॥११॥
जुयलेण य पणगुदए चउरुदओ पुणिकयम्भि संजलणे ।
वेएण य जुयलम्मि य दुगोदओ जुयलविगमम्मि ॥१२॥
वेयस्स पुणो विगमे संजलणकसायमेगमुदयम्मि ।
इय दिसिमित्तं भणिया एगेगपगारओ उदया ॥१३॥
अट्ठग-सत्तय-छ-च्चउ-तिग-दुग इक्काहिया भने वीमा ।
तेरस पारिकारस पण चउ ति दु इक्क मोहस्स ॥१४॥
साततिकासारम् [२५ संतढाणा पनरस अडवीसा ताव इत्थ सुपसिट्टा । सम्मत्ते उच्चलिए सगवीसा होइ संतम्मि ॥१५॥ मीसम्मि उ छव्वीसा अणाइमिच्छस्स अहविमो नेया । अणुवंधीणुव्वलणे चवीसा मिच्छपुजम्मि ॥१६॥ स्ववियंमी तेवीसा वावीसर मिस्सपुजखवणम्मि । सम्मत्तजखवणे इगुवीसा खवगसम्मस्स ॥१७॥ अट्ठकसाए खविए तेरस पारस नपुंसवेयखए । थीवेयखएक्कारस खीणे छक्कम्मि पंचेव ॥१८॥ पुमवेयखए चउरो तिन्नि उ कोवम्मि दुन्नि माणम्मि । मायाखयम्मि एक्को इय भणियं सयलमोहणिय ।।१६।। तेवीस पन्नवीसा छब्बीसा अट्टचीस इगुतीसा । तीसेगतीसमेगं बंधट्टाणाणि नामस्स ॥२०॥ तेवीसा पणवीसा छन्नवाहिय वीस तीस एयाणि मिच्छद्दिट्टी बंधइ तिरियगईए निमित्ताई ॥२१॥ एगिदियपाउग्गाणि बंधठाणाणि तिनि पढमाणि । तेयगकम्मगवन्नाइचउक्कयं चेव ॥२२।। अगुरुलहू उवधायं निम्माणं नव इमाउ धुवबंधा । तिरियगई एगिदियजाई ओरालियं हुंड ॥२३॥ तिरियाणुपुचिथावरवायरसुहमाण दुन्हमेगयरं अप्पजत्तगपत्तेयइयरमेगियरथिरगं च ॥२४॥ असुभं दूभगअणइजअजसधुवबंधिणीहि सुह एसा । अप्पञ्जत्तगएगिदियाण पाउग्गतेवीसा ॥२५॥ घरघाउस्साससमा पज्जत्तेगिदिजोग्गपणवीसा आयाचुञ्जोए वा तजोगा चेव छच्चीसा ॥२६॥ पणवीसा गुणतीसा तीसा वेइंदियाण पाउग्गा तेवीसाए पुबोइयाएँ खित्तम्मि सेवळें ॥२७॥ अंगोवंगे य तहा अप्पजत्तस्स जोग्गपणवीसा नवरि तसं वेडंदियजाई च्चिय इत्थ भणियच्या ॥२८॥ परघाउस्सासअणिटुगमणदूसरसमेयगुत्तीसा तत्थ च Hin ३.] सप्ततिकासारम् नवरं एमा देवाण पज्जत्तगरस जोग्या मुणेयया ॥२९॥ एवं चिय तीमा विहु नवरं उज्जोयबंधगस्सेसा । एवं जा चउरिंदी बंधतिगं होइ एयं पि ||३०॥ पंचिदियतिरियाणं मणुयाणं तह य होइ पाउग्गं । एयं चिय बंधतिगं संघयणाईहि नाणत्तं ॥३१॥ अन्नं चुज्जोएणं तीसा न हु होइ मणुयपाउग्गा । किं तु सुरा निरया वि य तित्थयरसमं कुणंति तथं ॥३२॥ अडबीसे गुणतीसा तीसा इगतीसमेव एयाणि । पाउग्गाणि वंधठाणाणि चत्तारि ॥३३॥ देवगई पचिदियजाई वेउध्वियं च चउरंमं । अंगोवंग च तहा देवणुपुबी य नायव्वा ॥३४॥ परघाऊमासपसत्थगमणतसवायरं पज्जत्तं । पत्तेयं च थिराथिरसुभासुभाणं च एगयरं ||३५|| सुभगं सुस्सरमेव य आइज्जजसाण दुन्हमेगयरं । धुवबंधिणीण नवगम्मि मीलिए होइ अडवीसा ।।३६॥ 'तित्थयरेणुगतीसा आहारदुगेण होइ पुण तीसा । तित्थयराहारदुगे य मीलिए हवड इगतीसा ॥३७॥ नेडडयाणं जोग्गा 'एक्कच्चिय बज्झए उ अडवीसा साहे सुराण भणिया नाणत्तं निरयमद्दाई ॥३८॥ वीसा एक्कग चउ पण छ सत्त अट्ट नवसमहिया वीसा । तीसेगतीस नव अट्ट अट्ठ उदयठाणाणि वारस उ ॥३९।। तेणउई बाणउई नवदृछहिँ समहिया असी असिई । नवअट्ठछपन्नत्तरि नवट्ट बारस वि संताणि ॥४०॥ ओहेणं भणियार्ड जप्पाउग्गाणि वंधठाणाणि । तह उदसत्ताणिहि वोच्छं चउगइविसेसेण ॥४१॥ एगुत्तीसा तीसा वि य बंधठाणाणि दुन्नि निरयाणं । इगवीस पन्नवीसा सत्तहनवाहिया वीसा ॥४२॥ १ "तित्ययरे गुणतीसा" इत्यपि वा । २ "एक्कविहा" इत्यपि वा ।
सप्ततिकासारम [ ३१ । य उदयट्ठाणाणि इमाणि पंच संताणि हुंति पुण तिन्नि । वाणउई य नवासी अहामी तत्थ चधदुगं ॥४३॥ जह पुछि निदिट्ट पंचिंदियतिरियमणुयपाउग्गं । तह इहई विन्नेयं उदयद्वाणाणि पुण बुच्छं ॥४४॥ तेयङ्ग कम्मडगं वन्नाइचउक्कअगुरुलहुयं च थिरमथिर सुभमसुभं निम्मेण धुवोदया एए ॥४५॥ निरयगई पचिंदियजाई निरयाणुपुचि तसनामं । वायर तह पज्जत्तग दूभग अणइज्जमजसं च ॥४६॥ बारस धुवोदयाओ इय एगवीसा भवंतरालम्मि । हुंडं वेउबिदुगं उबघायं तह य पत्तेय ॥४७॥ एयाहि पणवीसा सरीरपत्तस्स आणुपुवि विणा । तत्तो सरीरपज्जत्तगस्स परघायगमणा ॥४८॥ पक्खित्ते सगवीमा उमामे अहवीस 'इगुतीसा । सरसहिया अह सते वाणउया ताणि वोच्छामि ॥४९॥ गडचउगजाउपणगं पच सरीराणि पंच संघाया । पचेव चंधणाई छस्संठाणाणि तह चेच ५०|| अंगोवंगाण तिम छस्संघयगाणि वन्नगंधरसा । फासा सव्वे वीस विहायुदु चउरो य अणुपुची ॥५१॥ अगुरुलहू उवघायं परघाऊसासआयवुज्जोयं तसवायरपज्जतं पत्रोयथिरं सुभं सुभगं ॥५२॥ सूमरआइज्जजम थापरदसगं तसाइपडिवक्खो । निम्माणेण सहिया बाणउई नाममंतम्मि ॥५३॥ आहारगं सरीर बंधणमंघायअंगुवंगं च । एएहि चउहि रहिया तिथयरसमा नवासी य १५४।। तित्थयरनामरहिया अट्ठासी अवसिया य निरयगई । इत्तो तिरियगईए वोच्छ बुधुदयसताणि ॥५५।। तेवीस पन्नवीसा छब्बीसा इगुणतीस तीसा य । एया पंचिण एगिदियाण वधस्स ठाणाणि ॥५६।। १ "गुणतीसा" इत्यपि वा।
३.] सप्ततिकासारम् नवरं एमा पज्जतं । पज्जत्तगस्स जोग्या मुणेयचा ।।२९।। एव चिय तीमा वि हु नवरं उज्जोयचंधगस्सेसा । एवं जा चउरिंदी बंधतिगं होड एयं पि ॥३०॥ पंचिंदियतिरियाणं मणुयाणं तह य होइ पाउग्गं । चिय बंधतिगं संघयणाईहि नाणत्तं ॥३१॥ अन्नं चुज्जोएणं तीसा न हु होइ मणुयपाउग्गा । किं तु सुरा निरया वि य तित्थयरसमं कुणंति तथं ॥३२॥ अडवीसे गुणतीसा तीसा इगतीसमेव एयाणि । देवाणं पाउग्गाणि बंधठाणाणि चत्तारि ॥३३॥ देवगई पचिदियजाई वेउध्वियं च चउरमं । अंगोवंग च तहा देवणुपुबी य नायव्वा ॥३४॥ परघाऊमासपसत्थगमणतसबायरं च पत्तेयं च थिराथिरसुभासुभाणं च एगयरं ॥३५॥ सुभगं सुस्सरमेव य आइज्जजसाण दुन्हमेगयरं । धुवबंधिणीण नवगम्मि मीलिए होइ अडवीसा ॥३६॥ 'तित्थयरेणुगतीसा आहारदुगेण होइ पुण तीसा । तित्थयराहारदुगे य मीलिए हवइ इगतीसा ॥३७॥ नेडब्याण जोग्गा 'एक्कच्चिय बज्झए उ अडवीसा साहे सुराण भणिया नाणत्तं निरयसद्दाई ॥३८॥ वीसा एकग चउ पण छ सत्त अट्ट नवसमहिया वीसा । तीसेगतीस नव अट्ठ उदयठाणाणि बारस उ ॥३९।। तेणउई बाणउई नवट्ठछहिं समहिया असी असिई । नवअढछपन्नत्तरि नवट्ट बारस वि संताणि ॥४०॥ ओहेणं भणियाई जप्पाउग्गाणि वंधठाणाणि । तह उदसत्ताणिहि वोच्छं चउगइविसेसेण ॥४१॥ एगुत्तीसा तीसा वि य बंधठाणाणि दुन्नि निरयाणं । इगवीस पन्नवीसा सत्तहनवाहिया वीसा ॥४२॥ १ "तित्ययरे गुणतीसा" इत्यपि वा । २ "एक्कविहा" इत्यपि वा।
प्रनिगमाय उदयटाणाणि इमाणि पत्र सताणि इनि पुण तिनि । याणर्ज य नवामी अहामी तन्य व्यङग ॥४३॥ जह पुचि निट्टि पचिंदियतिग्यिमणयपाउगं । तह इह विनयं उपयट्ठाणाणि पुण बुन्छ । तेयडग कम्मडगं बन्नाइचउक.मगुरुलहुयं व थिरमथिर सुभमसुभं निम्मेण धुवोदया m |१५|| निरयगई पचिंद्रियजाई निग्याणुपुब्धि तमनाम । बायर तह पज्जत्तग दूभग अणडजमजन च ॥४६॥ बाग्म धुयोदयाओ इय एगवीसा भवंतगलम्मि । हुंडं वेउब्धिदुर्ग उवधाय तह य पत्तेय ॥४७॥ एयाहि पणवीसा मरीरपत्तस्स आणुपुब्धि रिया । तत्तो सरीरपज्जत्तगस्म परघायगमणा य ॥४८॥ पक्खित्ते सगीमा उमामे अट्टवीय 'डगुतीसा । सरसहिया अह सते वाणउया ताणि वोच्छामि ॥४९|| गडचउगजाइपणगं पंच सरीराणि पंच संघाया । पंचेर चंधणाई छस्संठाणाणि तह चेव ॥५०॥ अंगोरगाण तिनं छस्मंघयणाणि नगरसा । फासा सव्वे वीस विहायुदु चउरो य अणुपुची ११५१।। अगुरुलहू उबघायं परघाऊसासआयवुज्जोयं तसवायरपज्जत पत्तोयथिरं सुभं सुभगं ॥५२॥ सूमरआइज्जज थावरदसगं तसाइपडिवक्खो । निम्माण सहिया वाणउई नामगंतम्मि ॥५३॥ आहारगं सरीर चंधशामघायअंगुवंग च एएहि चउहि रहिया तिथयरसमा नवासी य 1॥५४॥ तित्थयरनामरहिया अट्टासी अवसिया य निरयगई । इत्तो तिरियगईए वोच्छ बुधुदयसंताणि ॥५५॥ तेवीस पन्नवीसा छब्बीसा इगुणतीस तीसा य । एया पंचिण एगिदियाण बंधस्स ठाणाणि ॥५६।। १ "गुणतीसा" इत्यपि वा।
३
सप्ततिकासारम्
।
॥६॥
य
इगवीसा चउवीसा पंचगछगसत्तसमहिया वीसा ।
उदयट्ठाणाणि इमाणि पंच बाणउय अट्ठासी ॥७॥
छलसी असी य अट्ठत्तरी य एयाणि पंच संताणि ।
तिरिमणुपाउग्गाई वंधट्ठाणा' जहपुस्विं ॥५८॥
उदयवाणिगवीसा जहपुच्वं नारयाण निद्दिट्ठा ।
नवरिंगिदियजाईपमुह नाणत्तमिह
नेयं ॥५॥
तत्तो सरीरपत्ते ओरालसरीरइंडउपाय
साहारणपत्तेयाणमेगा अणुपुग्विविगमम्मि
चउवीसुदओ तत्तो सरीरपज्जतगस्स परधाए ।
खित्तम्मि पन्नवीसा ऊसासुदयम्मि छब्बीसा ॥६॥
आयात्रुज्जोए वा खित्ते सगवीस संतठाणेसु ।
बाणउई अट्ठासी जह निरयाणं तहेहं पि ।६२।।
देवदुगे उव्यलिए तत्तो अट्टत्तरी य संतम्मि ।
तेवीमपनवीसा छन्नवहियवीसतीसा ॥६३॥
विगलिदियाण तिण्हं पि बंधठाणाणि पंच एयाणि ।
इगछकगअडनवहियवीसा तीसा
य इगतीसा ॥६॥
उदयद्वाणाणि इमाणि छच्च एगिदियाण जह भणिया।
नवरं इगवीसाओ अणुपुन्वि विणा सरीरत्थे ॥६५।।
ओरालदुगे हुंडे उवघाए तह य चेव सेव? ।
पत्तेयम्मि य खित्ते छन्वीसा होड उदयम्मि ॥६६॥
परघाए गमणमि य अट्ठावीसा तओ य उस्मासे ।
इगुतीसा तीसा उण सरंमि उज्जोइ इगतीसा ॥६॥
वाणउई अट्ठासी छलसी य असी य अट्ठसयरी य ।
संताण पंच एगिदियाण जह पुधभणियाणि ॥८॥
तिगपंचगछगअट्ठगनवाहिया वीस तह य तीसा य ।
छ इमाणि बंधठाणाणि हुँत्ति पंचिदितिरियाणं ॥६॥
एयाणि जहा विगलिंदियाण पाएण नवरि इत्थहिया ।
अट्ठावीसा नेया सुरनेरइयाण
एकगछकगअट्ठगनवाहिया चीस तीस इगतीसा ।
पाउग्गा
॥७०॥
सप्ततिकासारम उदयट्ठाणा छचिय पागयपंचिंदितिरियाणं [७१॥ एयाणि जह विगलिंदियाण नाणत्तु जाइमाईहिं । पंचगसत्तगअदुगनवाहिया वीस तीसा य ॥७२॥ वेउब्धियतिरियाणं उदयद्वाणाणि पंच एयाणि अस्संघयणी चेउब्बियत्ति नो एगहीणत्ति इगपंच सत्तहगनवाहिया वीस तीस इगतीसा । अठ्ठदया सामन्नेण हुति पंचिदितिरियाणं ॥७४। एएसि संताण वि पंच जहेगिंदियाण भणियाणि । सम्मत्ता तिरियगई इत्तो बुच्छामि मणुयगई ॥७५|| तत्थ मणुयाण अट्ठ वि बंधहाणाणि पुव्वभणियाणि । चउवीसविरहियाई एक्कारस उदयट्ठाणाणि १७६॥ अत्तरिवलाई एकारस हुति संतठाणाणि सामन्नमिणं बुच्छ विसेसओ उदयसताणि ॥७७|| इगवीसा छन्वीसा अडवीसा एगूणतीस तीसा य । पागयमणुयाण इमाणि उदयठाणाणि पंचेव ॥७८|| पंचगसत्तगअट्ठगनवाहिया वीस तीस जहपुचि । पंचिंदियतिरियजुग्गा तहित्थ वेउविमणुयाणं ॥७९॥ वीसेगवीस छस्सत्तअट्टनवअहिय वीस तीसा य । इगतीस नवट्ठ भवे दस उदया केवलिजिणाणं 11001 मणुयगई चिदियजाई तसवायर च पञ्जतं । सूभगआइजजसं धुचोदएहि समा वीसा ॥८॥ सामन्नकेवलिस्त य इमा समुग्धायवट्टमाणस्स । तित्थयास्सिगवीसा छब्बीसा देहपत्तस्स 1८11 केवलियो पक्खित्ते ओरालदुगोवधायपत्तेए संघयणे संठाणे सत्तावीसा य तित्थयरे 11८३॥ छच्चीसाए खिते परपाऊसासगइसरेगयरे ओरालकायजोगे तीसा सामनकेवलिणो सरसासनिरोहे तीसा उण केवलिस्स अडवीसा । ऊसामे अनिरुद्धे सरे निरुद्धम्मि गुतीसा ॥८५॥ ।
३४ ] Load सप्ततिकासारम् तीसा उ महावत्थस्स होइ तह इक्वतीय तित्थयरे । गइजाहतमं वायरपज्जतं सुभगमाइज्ज ॥८६॥ जसतित्थयरेहिमसो नवोदो पुण इमो अजोगिस्स । तित्थयरनामरहिओ अटुदओ होड तस्सेव ॥८७॥ तेणउई बाणउई नवढछहि समहिया असी असिई । आखवगाणं छ इमा हवंति नामस्स संताणि ॥८॥ तेरसनामे खविए चउन्ह आडल्लमंतठाणाणं तत्तो कमेण जाणसु सवगाणं केवलीणं च ||८९॥ असिई अउणासीई छाबत्तरि पन्नसत्तरी चेव हुँति अजोगिजिणाणं पुव्वुत्तनवट्ठसंताणि ॥९॥ देवाणं पणवीसा छवीसिगुत्तीस तीस चउबंधा । एगिदियपंचिंदियतिरियाण नराण पाउग्गा ॥९१॥ उदयट्ठाणाणि पुणो पंच जहा नारयाण भणियाणि । छद्रं तु इहं तीसा उजोएणं समा नेया ॥१२॥ तेणउई बाणउई नवअट्ठहि समहिया असीई य । संतवाणाणि पुणो देवाण इमाणि चत्तारि ॥९३।। एयाहिँ जहा पुट्विं भणियाइँ तहा इहं पि नेयाणि । इय बंधोदयसंताणि वन्नियाई समासेणं ||९४॥ इय सत्तरीए सुत्तस्स तह य चुन्नीए सारमुद्धरियं । सीसाण हियहाए भणियं सिरिहेमसूरीणं ॥१५॥ जो पढइ इमं जीवो तस्स फुडं सत्तरीयचुन्नीए सारत्थो हिययत्थो विस्फुरइ सया सनामं व ॥९६॥ - ॥ इय सत्तरीसार सम्मत्त ।। इति सप्ततिकासारं समाप्तम् शुद्धिपत्रकम पृष्ठः पक्तिः अशुद्धि. ३ १५ अणि । ८ २४ २ शुद्धिः अणि । सुहम। पृष्ठ' पक्ति अशुद्धिः शुद्धि ५२ ९९ दा-"sऽहारक- दा-ऽऽहारकसप्तकोद- सप्तकोदलनं लनं कृत्वव पुनः २२ कृत्वैव" पुन २ २२॥ ७०/७८ (गाथाका.) ७६-८६ ( ,) १३३ २४ २२८ ७१-७६ । १५ २-१८ ८०-८७ १६ १२ १३२ १६ १४-२२८२-६२ २६ १६ एव ५ गिदिय ३१ २ को कस्सा ५४.६१ (गाथाका) एव एगिदिष ६ १२ १८० १८१ विगल (३) ३१ ०२ १८१ ३१ २४ १८२ २२ २८ "एत्तो ३३ २४ विगल ३) ६ वा अप. ५ दो दो ३७ २३ घ. ३८ १५ ठवणा ४२ २३ चूर्णिकार ४३ १ पश्चम ४३ २३ ०क्ष्य ४३ ३१ मुहुत्ता ४४ १४ २७ ३ २८ ६ २२० बा. अप. २.दो दो बध. 'ठवणा चूर्णिकार ५३ २० स्थितेष्वपि स्थितिष्वपि ५३ २४ ॥२०६|| दय- ॥२०६।। (२५०) स्थान (२५०) ५४ १७२८ ५४ १३ १३७४५ १३६४५ ५५ ११ भग मंग २६ २० को कस्स। ५६ २७ ॥२९१॥ (३६३) ॥२६१(३६५) २६४ ५ ३६४ ३६५ ५७ १० पंधविवज्जा वधविवज्जा ५७ २२ दसणारण दसणावरण ५ ठवण ठवणा ६२ २ विन्ना बावन्ना ६४ १५ १७८ १७२८ १ नेषुमोह० नेषु मोह ६५ ७ २३ ४२३ ८ केवलीण केवलोण ६७ ३१ प्रतो प्रती ६९ २३ जो ७२ १० ॥३८४॥ (४९४) ॥३८४॥ [४४१] [४४१] ७२ १२ ॥३८५||(४६५) ॥३४॥ [४४२] [४४२] वेउन्वि० ७५ १४ नके) भनो नके) जइणो वीसं भेया उ नो तिरिमओ (५०४) भनी ७३ १६ तेरस तीसे ५ ४६०३ ॥४०९॥ (५६३) L (५६४) ॥४१॥ (५६४) मुहूर्ता ३८ २४० ३ उदिवा स नत्र ठापणा १३६१७ पारिदियान ४८ १८ १३१७ ४८ है पादियाण ४५ ११ घउसता ५२ १०.५ ५२ २८ पमाण चरसता २७५ प्रमाण
.
इति
सप्ततिका