Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Jain Prasanotar Kusumavali

Kadawat, Shriyut Rikhab Chand Ji · 2011/01

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॥ श्रीधीनगगायनमः । कविवर मुनिश्री नानचन्द्रजी महाराज रचित गुजराती जैन प्रश्नोत्तर कुसुमावली हिन्दी अनुवाद अनुवादक श्रीयुन मास्टर रिग्वनचन्दजी कडावत स्टेट मिल इन्दौर. पैगग्यशतक, मार्गानुसारी के ३० गुण, उपदेशरत कोप मदनचरित्र कर्तग कौमुदी आदि के अनुवाद कर्ता प्रकाशक- श्रीयुत् गिरधारीलालजी अनराजजी माग्वला गलोर श्रीयुत कानमलजी माटावन के प्रयापसे श्री जैन सुपारक प्रेम, अजमेर में मुद्रित अर्थ सहित प्रतिग्रमण और शालोपयोगी प्रश्नोत्तर के दोनों भाग पढ़ लेने वालों की अमूर मेट প্রথমাবলি म० सजिल्द म० १९२२ श्रावण म० सजि १०००

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UPEHAR श्री चीतरागायनमः 18 कविवर मुनिश्री नानचन्द्रजी महाराज रचित गुजगती 14 जैन प्रश्नोत्तर कुसुमावली हिन्दी अनुवाद अनुवादक श्रीयुत्त मास्टर रिखथचन्दजी कहावत स्टेट मिल इन्दौर। 14- ग्यशतक, मार्गानुसारी के ३५ गुण, उपरेशर कोष मदनचरित्र कर्तव्य कौमुदी मारिके अनुवाद पर्चा प्रकाशक- श्रीयुत् गिरधारीलालजी अनराजजी सांखला बेंगलोर श्रीयुत कानमेभारावत के प्रबन्ध से श्री जैन सुधारक प्रेस, अजमेर में मुद्रिता। मर्थ सहित प्रतिक्रमण और शालोपयोगी प्रमोत्तर के दोनों भाग,पढ लेने वालों की अमूल्य भेट प्रथमावृत्ति श्रावण १००० सं० १९२२.. ५ (मु०सजिल्द .4 'मुनिश्री नानचन्दजी रचितः गुजराती पुस्तकें। (१) मुबोध सगीतमाला भाग १, २, ३ दूसरी आपूर्ति मर्वोपयोगी पद संग्रह पृष्ठ ४०० की० १२ आना; (-२), सुबोध संगीतमाला, भाग ३रा पृष्ठ १०० तीसरी) 'श्रावृत्ति स्त्रीउपयोगी संगीत पुष्प की० ३ आना ( ३ ) जैन प्रश्नोत्तर कुसुमावली तीसरी आवृत्ति पृष्ठ 2 जैनतन्वज्ञान का प्रकरण प्रश्नों का संग्रह की. ३ आ. (४) सुगंध कुसुमावली नित्य पाठ करने योग्य की०२ माना. " । 1 . ( ५३,सामायक स्वरूप दूसरी आवृत्ति विवेचन सहित कीमत ३ आना. - '( ६ ), सस्कृत. काव्यानन्द-बोध-बचन श्लोकों का मंग्रह की २ आना.. ::: (७ । छन्द मंग्रह-छन्दों अध्ययनो और स्तुतियों का मग्रह की. २ यांना (८.'सायिक प्रतिक्रमण-छः काय का बोल, पैतीस चोल और पदों के संग्रह सहित की. २ आना. (६) रसिटेशनो .. भाषणों,, मवादों - और- गायन ) कीमत, पहला भाग) तीसरा ) मिलने का पता:- .' श्री अर्जरामरजन विद्याशालाना कार्यवाहक, मु०-लींवड़ो (काठियावाड़): (ऊपर की जैन पुस्तकों का मुनाफा विद्यार्थियों की- महायता में दिया जाता है। " 1

निवेदन।
श्री अजरामर जैन विद्या, भवन की ओर से कविवर
विद्वान मुनि श्री नानचन्द्रजी स्वामी रचित जितनी पुस्तके
प्रकाशित हुई हे वे सब उपयोगी और सस्ती होने रो
इतनी लोक प्रिय हुई कि कई पुस्तकों की अधिक प्रति
गुजगती में छपाई जाने पर भी उनकी माग अधिक ही
रही और नई ग्रावृति प्रकाशित किये निना काम न चला
यह पुस्तक उन्हीं में से एक का अनुवाद है, जिसका नाम
श्री जैनें प्रश्नोत्तर सुमावली है जिसकी उपयोगिता इसी
मे सिद्ध है कि थोडे 'असे में ही इसकी गुजराती में तीन
आवृतिया प्रकाशित होगई । इस पुस्तक के अधिक लोक
प्रिय होने का कारण इसकी उपयोगिता देखत सहज ही
ध्यान में आता है। इसमें विचारशील विद्वान मुनि ने
सम्पूर्ण विचार कर ससार की गति समझ विषय पाये हैं
जिनका मनन और 'निर्वचन के साथ का अभ्यास सचे
तत्वज्ञान के अकुर स्फुरित करता है । प्रथम और दूसरे
पाठ में व्यवहारोपयोगी और तल प्रवेश के प्रश्नोत्तर है।
तीसरे पाठ में महानीर स्वामी से समान्ध रखने वाले
नानने योग्य हाल सरलता से समझ सकें इस तरह लिये
है। चौथे पाठ में देव, गुरू, धर्म, में सम्बन्धित न्याय
पूर्वक श्रद्धा रढ करे ऐसे प्रश्न रा है । पाचवे, छठे पाठ
में सम्यग्ज्ञान सम्बन्धी प्रश्न कर उपयोगी हाल दिसाया
है। सातवें पाठ में सम्मकदर्शन और पाठ में चारित्र्य
तप भार वीर्य की स्पष्ट 'समझ दी है । पाठ नो. दस.
ग्यारह और बारह ये नव तत्त के अपूर्व बानानन्द में

२
लीन करते हैं। तेरहवें पाठ में गुण स्थानक और चौदहवें
में कर्म प्रकृति सम्बन्धी प्रश्न है । पंद्रह में त्रेसठ सलाके
पुरुषों सम्मन्धी विविध हकीकत थोड़े में समझाई है और
मोलहवें पाठ में ज्योतिष सम्बन्धी पवहारोपयोगी ज्ञान
समझाया है। इस तरह इस छोटीसी पुस्तक में महाराज
श्री ने सम्पूर्ण प्राथमिक ज्ञान भर दिया है।
जिस शाला की ओर से ये पुस्तकें गुजराती में प्रका-
शित हुई है उनमें से यह-" जैन प्रश्नोत्तर कुसुमावली "
पाठशाला की पाठ्य पुस्तकों में नियत है और अनुभव से
यह सिद्ध है कि प्राचीन रीति से नव तन्य, गुण स्थान,
कर्म, प्रकृति, प्रभृति न रटाते आनन्द के साथ विशेष स्थिर
ज्ञान इस पुस्तक से प्राप्त होजाता है ।
1
1,
व्यावर नगर में “जैन पाठशाला" लगभग एक साल
से जारी है इसके धार्मिक कार्स में अर्थ महित प्रतिक्रमण
त्र शालोपयोगी जैन प्रश्नोत्तर दोनों भाग को स्थान दिया
है । तत्पश्चात इस पुस्तक को नियत किया गया है। स
माज में रिशेप ज्ञान वृद्धि के हेतु हम पाठकों के सम
इसे हिन्दी में छपाकर उपस्थित कर रहे है। इसके साः
ब्रह्मचर्य का प्रकरण भी दासिल कर दिया गया है जि
से विद्यार्थीगण ब्रह्मचय के लाभ से परिचित होकर योग्य
समय तक ब्रह्मचारी रहने का प्रयत्न कर सके. हम इस
पुस्तक के मूल लेखक व 'अनुवादक के श्रामारी है।
जिनकी कृपा से हम इसे हिन्दी जैन ससार के समक्ष रख
-

३ म ममर्थ हुए हैं । यह पुस्तक उन सज्जनों को सादर अ- मुल्य भेट की जावेगी के जो "प्रतिक्रमण" शालोपयोगी जैन प्रश्नोत्तर दोनों भाग कण्ठस्थ कर चुके होंगे। - । विनीत- 7 गिरधारीलाल अनराज सांखला बैंगलोर पुस्तक मिलने को पता- श्रीयुत पुनमचन्दजी खीवसरा, बीचडली मोहल्ला व्यावर (राजपूताना) - .

जैन पुस्तक माला से निकली हुई पुस्तकें ।
प्रत्येक जैनी भाई का यह परमोच धर्म है कि वह पेट के
लिये जैन पुस्तक विक्रेताओं के 'बजाय पुस्तकें हम से में
गाया करें ताकि हम निस्वार्थ सेना करने का विशेष रूप
से सौभाग्य प्राप्त हो ।
(१) जम्बुस्वामी चरित्र पृष्ठ ६० ॥ १२ का
४) (२) सुदर्शन सेठ चरित्र पृष्ठ ४८ मूल्य २) २५ का
२॥) (३) नारीधर्म निरुपण पृष्ठ.५२ मूल्य )॥ १२ का
११४) जैन शिक्षण पाठमाला पृष्ठ ६४ मूल्य)११ का
११) (५) वैराग्यशतक पृष्ठ २४ एक का) १०० का ५)
(६) मार्गानुसार के ३५ गुण पृष्ठ १६ मूल्य ?) १०० ५)
(७ जैन दर्शन जैन धर्म पृष्ठ १६ मूल्य ।। २१) सैकड़ा ।
सुखसाधन ग्रन्थमाला के निकले हुए ग्रन्थ ।
(२) उपदेशरत्नकोप पृष्ठ ५० मूल्य )॥ ७ का १)
(0) कर्त्तव्य कौमुदी मूल, भावार्थ, विवेचन सहित पृष्ठ ५००
मूल्य २) कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक २॥) रुपया.
स्वीकृति मिलगई शीघ्र छपाई जावेगी।
श्री श्री १००८ श्री उपाध्याय जैन मुनि श्री आत्मा-
रामजी रचित जैन धर्म शिक्षापली पहला, दूसरा, तीसरा
ओर चौथा भाग जैन पाठशालाओं के कार्यकर्ताओं को थोक
सरीदने पर लगभग लागत मात्र पर दी जावेगी ।
पुस्तकें मिलने का पता:-
मोतीलाल रांका,
प्रानरेरी मैनेजर.
जैन पुस्तक प्रकाशक कार्यालय, शवा (राजपताना)
,

4 [२] महामुनि श्री गुलाबचंदजी स्वामी और मुनिवर्य वीरजी मामी रचित अनेक पाठशालाओं में पढ़ाने तथा ' इनाम के लिये स्वीकृत । जैन शिक्षण पाठमाला पहला भाग। पृष्ठ ६४ मूल्य २) पाठशालाओं से ८) सकड़ा. इस पुस्तक पर जैन व अजेन पत्रों की सम्मतियां। (१) हिन्दी केसरी: इममें नीति, सदाचार, व्य- पहार और वम क्रिया विषय पर उपदेश किये गये है। पुस्तक जनों के काम की है। (२) जैन शासना-आ.पुस्तक धार्मिक शिक्षण लगानी इच्छा राखनारा अभ्यासी ने रणी उपयोगी छे तेनी अन्दर पाठीनी योजना करवामा पानी के एकदर पुस्तक सार छ। (३) विश्व विद्या प्रचारका-पुस्तक में जैन मता- नुकूल नीति चोध सदाचार, व्यसन का त्याग विषयो का उपदेश पाठक्रम से दिया है। जन विद्यार्थियों के लिये रहे पुस्तक (४) बैंकटेश्वर समाचारः-इस पुस्तक में पुरुषा और स्त्रियों दोनों को सदुपदेश दिये है। (५) कान्फरेन्स प्रकाश'-यह पुस्तक यथा नाम तथा गुण वाली है प्रत्येक जैन पाठशाला के कार्यकर्ता को अपने २ कोर्स में रखकर विद्यार्थी को पढाने योग्य है। 1 काम की RNA - -- , [३] (६) दिगम्बर जैनः इसमें २५,पाठों में विद्यार्थी को पढ़ाने योग्य धर्म, नीति और व्यवहारिक विषय का उपदेश दिया गया है जैन पाठशाला में प्रवेश करने योग्य है। (७) आदर्श जीवन:-जन शाला ने भाषण उपयोगी है। (८) महावीरः-इसमें साधारण लोकों के लिये नीति योध, सदाचार, व्यसन त्याग आदि विपयों के मारे में उपदेशात्मक वाक्य लिसे हैं। (8) जैन पथ प्रदर्शक:-पाठशाला में पढाने यो- ग्य इस पुस्तक में बालकों के काम की बातें है। (१०) पचराज:-इस पुस्तक में नीति, सदाचार, व्यवहार और धर्म क्रिया हम चार विषयों पर छोटे २ वाक्यों में वर्णन किया है । पुस्तक उपदेश प्रद है इसमें २५ पाठ है । जैनी भाईयों के तो बड़े काम के है । (११) जैनमित्रः-पुस्तक बहुत अच्छी और स्कूल के लड़कों को शिक्षादायक है। (१२) जैन हितैषीः-इसमें अनेक उपयोगी शि चाएं हैं। (१३) अग्रवाल बन्धुः-इसमें धर्म और सदाचा मम्बन्धी निपयों पर २५ पाठ दिये गये है। प्रत्येक पा में अनेक वाक्य है। . 1 -- । - - - ।

श्री वीतरागायनमः।
जैन प्रश्नोत्तर कुसुमावली ॥
सामान्य प्रश्नोत्तर।
पाठ पहला.
१ प्रश्न:-धर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो दुर्गति में जाते हुए जीव को बचाता है।
२ प्र०-धर्म का मूल क्या है ? उ०-विनय ।
३ प्र०-विनय का अर्थ कहो ? उ०-विशिष्ट नीति (न्याय)
४ प्र०-पाप का मूल क्या है ? उ०-लोम ।
५ प्र.-रोग का मूल क्या है ?
उ०-स्वादिष्ट वस्तु साने का कुन्यसन ।
६ प्र०-दुःस का मूल क्या है ? उ०-राग ( स्नेह )।
७:०-दुःस किसे कहते हैं ? उ०-परतन्त्रता ।
८प्रक-मुस किसे कहते है ? उ०-सज्ञान स्वतन्त्रता ।
है प्र०-सुस का निदान क्या है ? उ०-संतोप ।
१० प्र०-संतोप का अर्थ कहो ? उ०-इच्छाओं की रोक ।
११ प्र० - संसार में जामृत कौन है ? उ०-विवेकी, सम दृष्टि ।
१२ प्र०-संसार में मुप्त कौन है ? उ०-अविरेकी, मिथ्या दृष्टि
१३ प्र०-ससार में मदिरा कौनसी है ? उ०-मोह ।
१४ प्र०-मसार में अमृत कौनसा है ?
उ०-अनुभगियों का हितोपदेश ।
१५ प्र० संसार में अग्नि कौनसी है ? उ०-पो ।

-
-
१६ प्र०-गुरु कौन हो सकता है ?
उ०-जो आत्मा के हितार्थ उपदेश देता है।
१७ प्र०-हित का अर्थ क्या? उ०-कर्म दुःख से मुक्त होना।
१८ प्र०-शिप्य किसे कहते हैं ?
उ० जो गुरु की आज्ञा धारक और भक्तिकारक हो।
१६ प्र०-दरिद्री कौन है ? उ०-अधिक तृष्णावान् मनुष्य ।
२० प्र०-श्रीमंत कौन है ? 30-सर्वथा संतोषी।
२१ प्र०-मूर्ख कौन है ?
13०-जो अमूल्य भव व्यर्थ गुमाता है ।
२२ प्र०-चतुर कौन है ? उ०-जो जन्म सफल करता है।
२३-१०-शत्रु कौन है ? उ०-मनो विकार ।
२४ प्र०-मित्र कौन है ? उ-आत्म बोध
२५ प्र०-नेत्र कौनसे ? उ० सद्विद्या ।
२६ प्र०-अनित्य क्या है ? उ०-पौद्गलिक सर्व वस्तुएँ ।
२५०-अचल क्या है ? उ०-परमात्म सरूप ।
२८ प्र०-जगत का दास कौन है ?
उ०--जो आशा का दास है।
२६ प्र०-सब संसार किसका दास है ?
।, उ०-श्राशा जिसकी दासी है।
३० प्र०-जगत में गिरने का रास्ता कौनसा है ?
उ०: सात व्यसन की सेवकाई ।
३१ प्र०-सात व्यसन कौनसे ?
उ०-जुआ, मासाहार, मद्यपान, वैश्यागमन, शिकार,
चोरी, परस्त्रीसेवन।
३२ प्रश्न-क्या जानना मुश्किल है ?
उचर-स्वंदोष तथा स्वस्वरूप ।
A

-- , ३३ प्र०-हिरा कौन है ? उ० -जो हित बोध नहीं सुनता है। ३४ प्र०-गूगा कौन है ? उ. जिसे समय पर उचित बोलना न आवे । ३५ प्र०-अंधा कौन है ? उ०-विषय में आसक (कामी) ३६ प्र०-पशु कौन है ? उ०-अविवेकी । ३७ प्र०-शूरवीर कौन है ? उ०-मन को जीतने वाला। ३८ प्र०-जड़ का.धर्म क्या है ? उ०-सड़ना, गिरना, रूपान्तर होना। ३६ प्र०-चैतन्य को धर्म क्या है ? उ०-अविनाशीपना। ४० प्र०-जीव किसे कहते हैं ? उ०-जो प्राण से जीवित है। ४१ प्र०-अजीच किसे कहते हैं उ० चैतन्य रहित जड़। ४२ प्र०-पुण्य किसे कहते हैं, उ०-जिन कर्मों का परिणाम इष्ट हो। ४३०-पाप-किसे कहते है ? उ०-जिन कमी का परिणाम अनिष्ट हो। ४४ प्र०-मोक्ष किसे कहते है ? उ०-मर्व कर्मों से मुक्त होना। १५.प्र०-समार किसे कहते हैं? उ०-जहाँ जन्म, मरन के चक्र चला करते हैं। 3 ४६ प्र०- सम्पत्ति कितने प्रकार की है? उ०-दो, आसुरी, देवी। ४७६०-संसार का बीज क्या है ? उ०-राग शौर द्वेष । ४८०-क्या करना चाहिये? उ०-समझ कर अपना कर्तव्य ।* ४६ प्र०-क्या न करना चाहिये.१,३०-अकर्तव्य • "कर्त्तव्य मकस्य" का मान नाम करना हो तो कम्प कौमुदी" मूल भायार्थ विरेचन सहित २) भेजकर जैन पुस्तक प्रकाशक कायालय मोर राजपूताना) से मंगा।' - , -

५० प्र०-किस राह पर चलना चाहिये?
उ०-जिस राह से महा पुरुष गये हैं।
५१०-किस राह न जाना चाहिये?
उ०-परमात्मा की आज्ञा न हो।
५२ १०-जीव मात्र के कितने शरीर है ?
3०-दो सूक्ष्म और एक स्थूल, यो तीन ।
५३ प्र०-ज्ञान का अर्थ क्या है ? उ०-यथार्थ जानना ।
५४ प्र०-अज्ञान किसे कहते है ? उ०-विपरीत समझ।
५५ प्र०-चांडाल कौन है ?
उ०-विश्वासघाती, कृतघ्नी, मिथ्या साक्षी देने वाला,
प्रचण्ड क्रोधी, ये चार कर्म चांडाल और पाँचवा
जाति चाडाल ।
५७ प्र०-साधु कौन है ? उ०-जो आत्म कार्य साधता है ।
५८ प्रक-चतुर कौन है ? उ०-जो अवसर पहिचानता है।
५६ प्रक-विद्वान् कौन है ?
उ०-जो विद्या पढ़कर तदनुसार बर्ताव रखता है।
६० प्र०-पंडित कौन है?30-जो स्वाश्रय द्वारा श्रेय साधता
६१ प्र०-पढ़ा हुआ कौन है ? उ-जो संसार में न भुलाता है।
६२ प्र०-अकल का शत्रु कौन है ?
उ०-जो अपना रहस्य दुश्मन को बताता है ।
६३ प्र०-अकल का चारदान कौन है ?
उ०-जो मूर्ख होकर पंडित बनता है ।
६४ प्र०-व्यापारी कौन है ? ।
उ०-जो न्यायानुसार व्यवहार में कुशल हो।
६५ प्र०-नृपति कौन है?
उ० जो मनुष्यों का न्याय पूर्वक पालन करता है

.
?
.
६६ प्र०-क्षत्री कौन है ?
उ०-जो नाश होते मनुष्य को रोक, रक्षा करता है।
६७ प्र०-प्राह्मण कौन है?
उ०-जो आम तत्त्व (ब्रह्म) पहिचानता है।
६८०-मनुष्य कौन है ? उ०-जिम में मनुष्यत्व हो ।
६६ प्र०-मनुप्प होते पशु कौन है?
उ०-जिसे सारासार और हिताहित का विचार या
ज्ञान न हो।
७० प्र०-देव कौन है ? उ०-जिस में दिव्य गुण भरे हों।
७१०-शास्त्र का अर्थ क्या
उ० जिससे शिक्षा मिलती है ।
७२ प्र०--सिद्धान्त का अर्थ क्या ?
उ.-जिसका अर्थ मिद्व, ( पूर्ण ) हो ।
'७३ प्र-सूत्र किसे कहते हैं ?
उ०-जिम में मूल कम, और मानार्थ अधिक हो, या
जिस में अक्षर कम, और अर्थ अधिक निकलता
हो।
७४ प्र० -महत्ता का मूल क्या है ?
उ०-किसी से कुछ न मांगना ।
७५ प्र०-अस्थिर वस्तु कौनसी' उ०-धन, यौवन, प्राध्य
७६ प्र०-शल्य की तरह दुःखदाई कौन है?
उ०-गुम कृत पाप कर्म ।
७७ प्र०-उत्तम. दान कौनसा ?
उ०-अभयदान और ज्ञानदान ।
७८०-आदरने योग्य क्या है ? उ०-सद्गुरु के वचन ।
७६ प्र-पवितकान है। उ० -निष्कपटी अतःकरण वाला।

,
८० प्र०-अपना श्रेय करने वाला कौन है उ०-अपन ही हैं।
८१ प्र०-अपना अनिष्ट करने वाला कौन है ? उ०-अपन ही है।
८२ प्र०-अपन अपना अनिष्ट कैसे करते है।
उ.-अज्ञानता के कारण ।
८३ प्र-क्या त्यागना मुश्किल है ? उ०--दुष्ट श्राशा ।
८४ प्र०-समस्त संसार का गुलाम कौन है ?
उ०-जो आशा का गुलाम हो ।
८५ प्र-परम आपद का स्थान कौन सा है?
उ०-अविवेक।
८६ प्र-निर्भयता कब प्रकट होता है ?
उ.-अविद्या जब नाश होती है।
८७ प्र०-सचा खजाना कौन सा है ? उ०-सद् विद्या ।
८८ प्र०-सद् विद्या क्या फल देती है ?
उ०-पर थाधीनता का निवारण करती है।
28 प्र-सचा लाभ कौनसा' उ०-यात्म स्वरूपकी पहिचान
९० प्र०--विश्व को किस ने जीता है ?
उ.--जिम ने मन जीत लिया है।
६१ प्र०-अभय का स्थान कौन सा उ०-यथार्थ वैराग्य ।
१२ प्र--समस्त संसार में उन्नत कौन है ?
उ.-निस्पृही मानन (निराशी)
१३ प्र०-दुःस कितने प्रकार के है ?
उ.-मानसिक और शारीरिक ऐसे दो।
६४ प्र.मन कैसे जीता जा सका है ?
उ०-वराग्य मय अभ्यास से ।
१५०-धर्म का स्वरूप क्या है ? उ.-परम सत्य ।
।
-

६६ प्र.--धर्म वृक्ष का फल क्या है ? उ०-मोक्ष (निर्वाण)
६७ प्र०--मोक्ष का प्रथम चरण कौन सा है ?
उ०-सच्चे शास्त्र का श्रवण ।
६ प्र०-मोक्ष का वीज क्या है ?
उ०-सम्यक् ज्ञान (सचा ज्ञान)
88 प्रा-मोक्ष फल का रस क्या है ? उ०--परमानद ।
१०० प्र०--परमानन्द स्वरूप किस का है ?
उ.--अपनी आत्मा का ।
सामान्य प्रश्नोत्तर।
पाठ दूसरा.
१ प्रश्न-जीर के बंधन कितने है ? उत्तर-दो राग और द्वेष ।
क्ष्म जीव कितनी तरह से दंडित होता है ?
उ० -तीन तरह से, मन, वचन और काया से ।
३ प्र.- कपाय कितने है?
उ.-चार कोष, मान, माया, लोभ ।
४ प्र०-शल्य कितने है ?
उ-तीन, माया, नियाण, मिथ्यात्त्र, ।
५ प्र.--गुप्ति कितनी है ? उ--तीन, मन, वचन, कायागुप्ति
६ प्रकिया कितनी है?
उ०-चार, स्त्री, भात, राज, और देश कया।
७ प्र-ध्यान कितने है?
उ.-चार,आध्यान,रौद्रध्यान, धर्म ध्यान, शुक्ल ध्यान।
re-ध्यान के और गी भेद है ? अगर है तो कौन से ?
उ०-चार भेद हैं-पदस्थ, पिंडस्थ, रूपस्थ, रूपातीत ।

( ८ ) । प्र-लेण्या कितनी है ? उ०-छः कृष्ण, नील, कापुत, तेजू , पद्म, और शुक्ल लेण्या। १०प्र०-भय कितने है ? उ०-सात, इहलोक, परलोक, मृत्यु, अपयश, अक. स्मात्, आदान, आजिविका । ११ प्र०--नय कितने हैं? उ.--सात, नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समाभिरुढ, एवभूत। १२ प्र०-निलंपा कितने है ? उ-चार, नाम, स्थापन, द्रव्य, भाव, ३ प्र१०--ज्ञान कितने हैं। उस-पाच, मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यव, केवल ज्ञान। १४ मा अज्ञान कितने है ? उ०-तीन, मति, श्रुत, विभंग ज्ञान । १५ प्र०-दृष्टि कितनी हैं, और कौनसी ? उ०-लीन, समदृष्टि, मिथ्यादृष्टि, सममिच्या दृष्टि, (मिश्र दृष्टि) १६ प्र.- शास्त्र देसने में कितनी दृष्टि हो और कौनसी । उ०--पचीस, चार प्रमाण, चार निक्षेपा, सात नय द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, निश्चय, व्यवहार, वि शेय, अविशेष कार्य, कारण । १७ प्र०-चार प्रगण कौन से ? 30 17 मान, आगम, उपमा, । १८ र ? उ-तीन नया पाठ! , , - ( ६ ) . और १६ प्र०-तीन कौन से? उ.--हिरात्मा अन्तगत्मा, परमात्मा। २० प्र.-आठ कौन मे? उ.-द्रन्गात्मा. कपायात्मा, योगात्मा उपयोगान्मा, ज्ञानात्मा, दर्शनात्माचरित्रात्मा, और वीयात्मा। । २१ प्र०-योग कितने १ उ-तीन, छ: और पंद्रह । २२ प्र०-तीन कौनर से23०--मनयोग,चनयोग,कायायोग २३ प्र०-पद्रह कौन से? उ०-सत्यमन, असत्यमन, मिश्रमन,व्यवहारमन,सत्य- भाषा, असत्यभापा, मिश्रभाषा, व्यवहारभाषा, औदारिक, वैक्रिय, आहारिक, ये तीन और इन तीनों के मिश्र तथा कार्माण योगः २४ प्र०-छ' कौन से? उ०-कर्म योग, ज्ञान योग, मंत्र योग, भाक्ति योग, हठ योग, और राज योग। २५ प्र०-प्राचार कितने हैं ? उ.-चार, ज्ञानाचार, दर्शनाचार, तपाचार, और वीयांचार । २६ प्र० राशि कितनी हैं ? उ०-दो, जीन और अजीव, या व्यवहार और अव्य वहार। २७ प्र--रस कितने है ? उनीह, श्रृंगार, वीर, करूणा, हास्य, रौद्र, भयानक श्रम्दुत, विभत्स और शात रस । २८ प्र०-भावना कितनी? उ. चारह और चार । २६ म०-चारह कौन सी?

(१०)
"
उ.--अनित्य भावना, अशरण भावना, संसार भावना
एकत्व भावना, अन्यत्व भावना, अशुचि भावना,
श्राश्रव भावना, मंचर भावना, निर्जरा भावना,
लोक भावना, बोधि भावना, और धर्म भावना।
३० प्रचार कौनसी' उ०--मैत्री, करूणा, प्रमोद, माध्यस
३१ ५०--समवाय कितनी?
उ.-पांच, काल, स्व [ब, नियत, पूर्वकर्म, उद्यम
३२ प्र० -पाप कितने ? उ.-प्राणतिपात आदि अठारह ।
३३ प्रक- कर्म के कितने भेद है ?
उ० -याठ, ज्ञानावरणीय, 'दर्शनावरणीय, वदनाय,
मोहनीय, आयुष्य, नाम, गोत्र और अंतराय कर्म।
३४ प्र०. प्राण कितने है ?
उ० दस० पाच इंद्रिय, मन, वचन, काया, श्वासो
श्वास, और आयुष्य ।
३५ प्र०- सूत्र कितने प्रकार हैं?
उ० सात, विधि, उपदशे, आदेश, वर्णन, भय
1
-
उत्सर्ग, अपवाद ।
,
३६ १०- प्रमाद कितने हैं।
उ. पाचमद, विषय, कपाय, निंदा, विकथा ।
३७ प्र० तत्व कितने हैं?
उ.- नौ है. जीव, अजीव, पुण्य, पाप, श्राश्रव, संवर,
निर्जरा, बंध, मोच।
३८ प्र-द्रव्य कितने हैं ?
उ. छः धर्मास्ति काय, अधर्मास्ति काय, आकास्ति

-
काय, जीवास्ति काय,
काय, कालोस्ति काय, और
पौद्गलास्ति काय ।
३६ प्र.-भाव कितने हैं १ ३०. प्रथम तीन, दूसरे तीन
४०प्र०-तीन कौन २ से?
उ- उत्तम, मध्यम, कनिष्ट, तथा क्षायक भाव,
क्षयोप शम भाव, और उपशम भाव ।
४१३० -दोष कितने?
उ०-तीन, अति ज्याप्ति, अव्याप्ति, असभर ।
४२ प्र० प्रर्याप्त कितनी है?
उ... आहार, शरीर, इंद्रिय, धासोश्वास, भाषा
और मन ।
महावीर प्रभु सम्बन्धी प्रश्नोत्तर ।
पाठं तीसरा.
१ प्रश्न चौतीसवे तीर्थकर कौन हुए ?
उत्तर- महावीर सामी।
२ प्र० चे कौन से देवलोक से चल कर आये थे ?
उ० दसने प्राणत देवलोक से।
३ प्र. कौन से गाव और किस के यहा
उ० महान कुण्ड गाव में ऋषभदत्त ब्राह्मण की स्त्री
देवानन्दा के उदर में।
४५. कौनसी तिथि को ? उ. आपाढ़ शुक्रा ६ ।
५ प्र. वहा कितने समय तक रहे ?
उ. साडे चयासी अहो रात्री।

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१ २२ प्र०-उनकी आर्या कितनी हुई ? उ०-बत्तीस हजार। २३ प्र.-उनके श्रावक कितने हुए ? उ:-एक लास और उन्सठ हजार । २४ प्र०-उनके श्राविका कितनी हुई ? उ०-तीन लारा अठारह हजार । २५ प०-नौदह पूर्व के ज्ञान वाले कितने साधु थे ? उ०-तीन सा २६ प्र-अवधि ज्ञान वाले कितने हुए ? उ०-तेरह सौ । २७ प्र०-मनपर्यच ज्ञानी कितने हुए उ०-पाच सा। २८०-चायलम्विधारी कितने हुए ? उ०-सात सौ २६ प्र०-केवल्यज्ञानी साधु कितने हुए उ०-सातसौ । ३० प्र०--उनकी कितनी आर्या मोक्ष पधारी' उ०- -चौदहमा ३१ प्र०-अनुत्तरनिमान में कितने साधु गये ? उ० आठ सौ ३२ प्र०-प्रभु को कवेल्यज्ञान का हुभा ३०-वैसास सुद दसम को। ३३ प्र०-केल्यज्ञान प्रगट हुए बाद उन्होंने पहिला काम कौनसा किया ? उ०-चार तीर्थ की स्थापना करी । ३४ प्र०-चार तीर्थ कौनसे १. उ०-साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका । ३५ प्र०-ये प्रभु मोन कर गये ? उ०-कार्तिक बद ३०॥ ३६ प्र०-उनके गणधर के नाम कहो ? उ०-इद्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति, विगतभूति, सुधर्मास्वामि, मडिपुत्रजी, मोरीपुत्रजी, अक- म्पितजी, अचलजी, मेतारजजी, प्रभासजी । ?

awar ३७ प्र०-उनके (प्रत्येक के) कितने २ शिष्य थे। उ०-प्रथम पांचके, पांचसी, २ दोके साढ़े तीन सौ, और अंत के चारों को तीन २ सौ शिप्य थे ऐसे ४४०० शिष्य थे। ३८ प्र०-महावीर स्वामी के मोक्ष पधारने पर केवल्यज्ञान फिसे प्रकट हुआ, और गादी पर कौन मंठा' उ०-गाँतम स्वामी को केवल्यज्ञान प्रकट हुआ, और मुधर्मास्वामी उनके पाट विराजे । ३६ प्र०-महावीर स्वामी के पश्चात गौतम स्वामी और सुधर्मास्वामी कर मोक्ष गये ? उ०-गौतमस्वामी बारह वर्ष बाद, और सुधर्मास्लामी बीस वर्ष चाद मोक्ष गये । ४० प्र०-सुधर्मास्वामी के पश्चात कोन पाट विराजे, और वेकितने ज्ञानी थे? उ०-उनके पाट जम्मु स्वामी बैठे, और वे केवल जानी थे। ४१ प्र०-महानीर स्वामी के कितने वर्ष बाद जम्बूस्वामी मोक्ष पधारे। उ०-चोसठ वर्ष ४२ प्र- उनके बाद कोन केवलज्ञानी हुवे । उप-किसी को भी केवलज्ञान नहीं हुम्ला । चरम केवली श्री जम्बूस्वामी थे ( उनके पश्चात भरत- क्षेत्र से केवलज्ञान बिच्छेद गया) ४३३०-जम्बूस्वामी के पश्चात कौन नाचार्य और वे कितने वर्ष बाद स्वर्ग पधारे पश्चात् ।

उ०-जम्बूस्वामी के पश्चात उनकी गादी प्रभवसामी
को मिली, चे महानीर स्वामी के ७५ वर्ष बाद स्वर्ग
गये, उनके पाट श्री समरस्वामी हुए चे महागीरस्वामी
से १८ वर्ष बाद स्वर्ग गये। उनके पीछे यशोभद्र पाट
पर विराजे, वे महागीरस्वामी के १४८ वर्ष बाद स्वर्ग
गए। उनके दोशिष्य थे मभूतिविजय और, भद्रनाहु,
सभूतिविजय, महाबीरस्वामी से १५६ वर्ष बाद और
भद्रबाहु १७० वर्ष बाद सर्ग गए।
४४ प्र०-उन भद्रबाहु स्वामी को कितना ज्ञान था ?
उ०-चौदह पूर्व का ज्ञान था, उनके पश्चात कोई चौदह
पूर्व के ज्ञान चाले साधु न हुए।
४५ प्र०-भद्रबाहु के शिष्य कौन हुए, और कितने
ज्ञानी थे?
उ०-स्थूली भद्रजी थे, और वे दस पूर्व के ज्ञानी थे. उन ,
के पश्चात् र्पू का ज्ञान धीरे २ कम होता गया।
६४ प्र०-जैन सूत्र सिद्धान्त किसने लिखे ?
उ०-देवीर्धगणि चमाधम ने।
४७ प्र०-चे महावीर स्वामी के कितने पाट बाद हुए ?
उ०-सत्तावीमवें पाट पर बैठे।
४८ प्र०- पुस्तकें किस ग्राम में लिखी ?
उ० वल्लू भीपुर में (वला में)
४६ प्र०-महापौर स्वामी से कितने वर्ष नाद पुस्तकें लिखी
गई । उ०-६८० वर्ष पश्चात् ।
५० प्र०-सूत्र किसने संगठित किये ?
उ.-सुधर्मा स्वामी गणधर ने ।
.

५१ प्र०-महावीर स्वामी ने बेले कितने किये ?
उ०-दो सो उन्तीस ।
५२ प्र०-तेले कितने किये ? उ०-बारह ।
५३ प्र०-उपवास कितने किये?
उ०-पंद्रह २ दिन के अर्धमास क्षमण १२, डेढ
मासी दो, दो मासी ६, हाई मासी दो, तीन मासी
दो, चार मासी नो, छ: मासी दो ।
५४ प्र०-साडे चारह वर्ष और पंद्रह दिन में कितनी
नींद ली ? उ०- दो घडी ।
५५ प्र०-मोक्ष गये तय कौनसा नक्षत्र था ?
उ०-स्वाति ।
५६ प्र०-महावीर स्वामी के च्यवन, हरण, जन्म, और
केवलज्ञान प्रकट होते समय कौन २ से नक्षत्र थे।
उ०-इन पांचों अवसर पर उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र था।
५७ प्र०-उन्होंने दिक्षा कितने जनों के साथ ली थी?
उ.-अकेले ने ही।
५८ प्र०-साड़े घारह वर्ष और पंद्रह दिन में उन्होंने भो
जन कितने दिन किया? उ०-तीनसो उंच्चास दिन।
५६ प्र०-उन्होंने एक २ उपवास कितने किये ?
उ०-उन्होंने एक २ उपवास किया ही नहीं कम से
कम एक साथ दो उपवास किये हैं।
-

(१७) . . देव गुरु धर्म सम्बन्धी प्रश्नोत्तर। पाठ चौथा। १ प्र०-देव किसे कहते है ? उ०-अठारह दोप रहित हो । २५०-अठारह दोष कौन से ? उ०-दानांतराय, लाभावराय, भोगांतराय, उप- भोगांताराय, वीर्यातराय, हास्य, रति, अति, भय, शोक, निंदा, काम, मिथ्यात्व, अज्ञान, निंद्रा, अविरात्ति, राग, द्वेप। ३ १०-देव के शरीर होते या नहीं? उ०-शरीर रहित और सहित भी देव होते है । ४ प्र०-शरीर सहित देव कोन हैं? उ०-जिन्होने चार घनधाती कर्म नष्ट किये है। ५ प्रश्न-धनधाता कर्म कौन से ? उ.-जानावर्णीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, अंतरायकर्म । ६ प्र०-जन घनघाती कर्मों का नाश होता है तन को- नसा ज्ञान प्रकट होता है ? उ.- केन्यज्ञान । ७०-ऐसे केवल्यज्ञानी कितने प्रकार के होते है ? उ०-दो, सामान्य केवली, तीर्थकर केवली । ८०-सामान्य केनती का अर्थ क्या -चाहे जो हलु कर्मी मनुष्य सदनोद्वसुनकर प्रारम- स्वरूप को पहिचान परम पुरुषार्थ द्वारा केवल्य ज्ञान प्राप्त करते है, उन्हें मामान्य केली कहते है। है (१६) ६ प्र०-अन्य मनुष्य की अपेक्षा केवलज्ञान प्राप्त होने वाले मुमुक्षु में किसी बात की सच्ची श्रापश्यक्ता होती है। उ०-हां, उनका शरीर, वज ऋपम नाराच संघयण वाला, तथा पूर्ण मायुप्य को पाने वाला अवश्य होता है। १० प्र०-तीर्थकर केवली की पाहचान कहिये ? उ-जगत के उद्वारक इन महापुरुषों का जन्म अ- मुक समय में ही होता है, और दमरे मनुष्यों की अपेक्षा इनका अपूर्ण सामर्थ्य अपूर्व तेज. अपूर्व नान, अपूर्व शक्ति और अपूर्व प्रभाव होता है। ये परम पुरुप अमुक काल तक गृहस्थाश्रम में रह कर उचित समय मे,गृस्थाश्रम प्याग संयम 1 ग्रहण करते है। ११ प्र.- उन्हें सयम की दिक्षा कौन देता है ? ७०-उन्हें गुरु की अपेक्षा नहीं रहती इसलिये चे स्नय दिसा ग्रहण करते हैं। १२ प्र०-दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात वे किस प्रवृती में लगते है। उ०-पूर्व कृत मंचित कमी को दग्ध करने के लिये तपश्चर्या करते है, हमेशा निजन प्रदेश में रहते है, और आत्म ध्यान ध्याते है, जनतक कंपल ज्ञान प्रकट न हो यहा तक किसी को उपदेश की तरह उपदेश नहीं देते।

(१६) प्र०-उनके कितने लक्षण होते है ? 10-एक हजार पाठ। प्र०-केरलज्ञान प्रकट होपर पहिलेचे क्या करते है ? उ०-साधु, माी श्रावक, श्राविका इन चार तीथों की स्थापना करते है और इमीलये वे तीर्थकर कहलाते हैं। प्र-ये तीर्थकर मुख्य कितने धर्म कर्तव्य) का प्रति पादन करते है ? उ.-(गृहस्थ आपगार धर्म, और (त्यागी) अणगार वर्म इन दो का । प्र०-उनके मुरप और प्रभाकि शियों का नाम- क्या होता है ? उत्तर-गण वर । 9 प्र०-उन तीर्थंकर महाराज के दूसरे नाम कहो ? उ०-अरिहतदेव, जिनेश्वर, परमात्म, प्रभु ऐसे अनेक गुण सम्पन्न नाम है। ८ प्र. अरिहत के गुण कितने ? उ०-गुण तो अनत है परतु पुदगल मयोगी बारह गुण गिनते हैं। प्र०-ये प्रभु अशरीरी कर होते है ? उ०-अायुष्य, नाम, गोत्र, वेदनीय इन चारों कर्मों का (जो प्रारब्ध से है ) नाश होता है, तब तीनों गरीर से मुक हो परमधाम प्राप्त करते हैं और अशरीरी बनते है। २० प्र०-वे अशरीरी केली प्रभु किस नाम से पहिचाने जाते हैं ? उ०-सिद्ध परमात्मा के नाम से।

( २० )
२१ प्र०-उनका आकार होता है या नहीं?
उ०-नही वे निराकार, निरजन, अरुपी और परमज्ञान
मय होते है।
२२ प्र० चे सिद्ध प्रभु जगत से क्या व्यवहार रसते हैं ?
उ०-उन्हें कुछ कार्य करना शेप नहीं रहा, इसलिये ये
कुछ भी व्यवहार नहीं रखते।
२३ प्र० -चे सिद्ध प्रभु किसी भी समय इस संसार में
आवें या नहीं?
उ०-उनका जनम मृत्यु नाश होगया है इसलिये वे
इस संसार में भी नहीं सकते।
२४ प्र०- इस समार का कर्ता कौन है ?
उ०-दुनिया आदि रहित है, इसलिये इसका कर्ता
कोई नहीं।
२५ प्र०-धनाने वाले के बिना यह दुनिया किस तरह
बनगई ?
उ.-जो वस्तु अनादि होती है, यह किस तरह बनी
यह प्रश्न ही नहीं होसका।
२६ प्र.-किसी ने नहीं बनाई यह आप किस आधार से
कहते है ?
उ०-किसी समय की बनी हुई वस्तु हो तो उसका
फिसी समय नाश भी होता है, परन्तु इस दुनिया
का नाश नहीं होता, इसलिये यह प्राकृतिक निना
बनाई अनादि काल मे है ऐमा सिद्ध होता है ।
२७ प्र०-दुनियां की दिन प्रति दिन हानि, वृद्धि दृष्टिगत
होती है, असंख्य प्राणी जन्म लेते है और
"

(२१) मरते हैं। असंख्य भव्य पदार्थ नष्ट हो जाते हैं तो भी नाश नहीं होता किस तरह कहते हो? उ०-दुनिया की प्रत्येक वस्तु का रुपान्तर होता है, मिर्फ स्थूल दृष्टि से हानि वृद्धि दिसती है परन्तु सचमुच में एक परमाणु का रासानियक प्रयोग से भी नाश नहीं होता, और न नया उत्पन्न होता है, इसलिये दुनिया परमाणु रूप से नित्य और कार्य रूप से अनित्य है । २८ प्र० कर्ता जो ईश्वर नहीं तो जीवों को सुख दुरा देने चाला कौन है ? उ०प्राणी मात्र अपने कर्मानुसार सुख दुख भोगता है, इसमें परमात्मा को बीच में आने की आवश्य- कता नहीं रहती ? २६५०-कर्म जड या चेतन्य है ? उ०-कर्म जड़ है। । ३० प्र०-जो जड है वे प्राणी को सुख दुख कैसे दे सकते हैं, इस प्राणी ने इतना पाप पुण्य किया इसलिये इसे इतना सुख दुख मिलना चाहिये, ऐसा ज्ञान उस जड को कैसे हो जाता है ? उ०-जिम प्रकार विप साने से शरीर में पीडा दुःख हो ऐसा गुण पिप में है, और पौष्टिक सुराक खाने से शरीर में शाति सुस हा यह पौष्टिक खुराक का गुण है इसी तरह प्रत्येक पदार्य में शुभअशुभ असर करने का गुण है, विष यो अमृत को सुख दुख प्राप्त करने का ज्ञान नहीं तो भी उनका जैमा

है
।
म्वभाव है वैसा असर वे उस वस्तु को काम में
लाने वाले प्राणी के साथ करते हैं।
३१ प्र०-जिस तरह चिप या अमृत के खाने या उपयोग
में लाने से चे असर करते है, उसी तरह क्य
कर्म असर करते है ? कमै क्या वैसी वस्तु है ।
उ -जिस प्रकार रिप या अमृत से सुख दुस होता है
उसी तरह कर्म से सुख दुख होता है विष और
अमृत जिस प्रकार शुभाशुभ परमाणु पुद्गल
का समूह है उसी तरह कर्म भी शुभाशुभ परमा-
णु का समूह है सिर्फ निप और अमृत स्थूल
और कर्म पुद्गल सूक्ष्म है।
३२ प्र०-चिप या अमृतादि पदार्य जिस तरह शरीर के
अमुक २ भाग में से प्रवेश करते है, उमी तरह
कर्म कैसे प्रवेश करते है ?
उ०-प्राणी मात्र जैसे विचार, इच्छा, अध्यवसाय,
मन के संकल्प अथवा आवश्यकताएं रसते है, वैसे
परमाणु पुद्गलों के समूह मन द्वारा ग्रहण करते
है और वे पुद्गलों के समूह राग द्वेप वाली
आत्मा के साथ तीरनीर के समान मिल जाते हैं
तब कर्मदल कहलाते है।
३३ प्र०-रे कर्म दल प्राणियों को सुख दुख कर देते हैं
- उ०-जब तक वे कर्मदल सत्ताधीन हो ( संचित रुप
में हो) तब तक कुछ भी नहीं करते, परन्तु जब
वे कर्मोदय होते है ( पराब्ध में आते हैं । तत्र
प्राणी सुस दुस का अनुभव करता है ।
-

. - १४ प्रक-जीव को ऊच नीच गति प्राप्त करान वाला कौन है? उ.-कर्माधीन प्राणी स्वतः के कर्मवंश जिस गति में जाने योग्य होता है उम गति में जाता है। ३५ प्र०-जीप दो कमों से सुख दुःस होता है तन कोई मनुष्य कर्म की स्तुति करे भजन करे, अगर उस के नाम की माला फेरे, तो उस मनुष्य को कर्म सुख दे मक्के या नहीं ? उ०-नहीं। ३६ प्र.क्यों न करे' उदाहरण देकर समझामो' उ०-जिस तरह जहर साने वाला मनुष्य विप उता- रने वास्ते विप की स्तुति करे, भजन करे, अ- थवा उस के नाम की माला फेरे तो उस से जहर नहीं उतर सका उसी तरह कर्म की स्तुति करने से कुछ नहीं हो सक्ता। ३७ प्रक-परमात्मा की स्तुति करने से या भजन करने से वे परमात्मा अपना भला कर सक्के हैं या नहीं? उ०-नहींपरमपद प्राप्त परमात्मा किसी का भला का बुरा करने की इज नहीं करते। ३८ प्र०-जन ने किमी का भला या चुरा कुछ नहीं कर सके तो उनका भजन करने से क्या लाभ है ? और उन से प्रतिकूल रहने में क्या हानि है ? उ०-जीर जैसी भावना या किया करता है, उसका उसे मदृश्य फल मिलता है परमात्मा का (२४) स्मरण, कीर्तन, ध्यान, भजन, ये उत्तम भाव- नाएं और उच क्रियाएं है । उन पर पवित्र का ध्यान धरने वाला स्वयं पवित्र हो जाय ऐसा उन प्रभु में अलोकिक गुण है । और उन प्रभु से प्रतिकूल रहने वाला अपनी अनिष्ट भावनाओं, और क्रियाओं से अपने स्वतः का अज्ञानता, के कारण अनिष्ट कर लेता है। ३६ प्र०-परमात्मा हमारा भला करेगा, इस श्राशा मे मनुष्य उनका स्मरण या स्तुति करते हैं तो उन्हें फल मिलता है या नहीं ? उ०-परगात्मा का नाम ही मंगल रूप है, इसलिये जितने प्रेम और शुद्ध मन से उनका स्मरण करें उतना लाभ अवश्य प्राप्त होता है। ४० प्र०-कोई मनुष्य अपना व्यवहार न सुधारे, और सिर्फ परमात्मा का स्मरण ही करता रहे तो उसका भला हो सका है या नहीं ? उ०-प्रभु का स्मरण करने वाला जो अपना व्यवहार खराव रक्खेगा, तो उसे स्मरण करना ही न रुचेगा, श्रेय की इच्छा रखने वालों को स्मरण के साथ अपना व्यवहार भी सुधारना चाहिये। + ४१ प्र०-गुरु किसे कहते है ? उ०-आत्मस्वरूप को पहिचान उसक कल्याणार्थ यथार्थ मार्ग पहिचान कर उस राह पर चलत है और दूसरों को चलाते है उन्हें गुरु कहते है।

( २५ ) है ४२ न-जिस लग से वे चलते है वह आत्मकल्याण का सन्चा मार्ग है या झूठा, यह कैसे समझ सक्त है? उ०-जो महात्मा श्रात्मा के कल्याणार्थ सच्चे मार्ग से चलते हैं यह उनके स्वभाव प्रकृति, आ चार, विचार पर से समझा जाता है । ४३ प्र०-आत्म कल्याण का मच्चा मार्ग कैसा होगा? उ०-भवसागर से पार पाने के लिये वीतराग प्रभु ने जिस मार्ग का प्रतिपादन किया है वही मार्ग सच्चा ४४ प्र०-उन मोक्ष मार्ग में जाने वाले महात्मायों के वृत नियम कैसे है? उ०-अहिसा आदि पाच महाव्रत, पाच सुमति और तीन गुप्ति का पालन करना ब्राह्य और अभ्य- न्तर दोनो प्रकार के परिग्रह, मोह, माया से दूर रहना यति के क्षमा आदि दस गुणों का धारण करना,- विषय कपाय से विरक्त रहना और हमेशा अपने तथा दूसरों के हित होनेका का प्रयत्न करना। ४५ प्र०-गुरु अपने शिष्य को तार कर मोक्ष बदर तक ले जासक्ने है? उ०-सद्गुरु तो तिरने की कला सिखाते हैं और कठनाईया समझा देते हैं रस्ता बताते भौरशका निवारण कर देते है विरना यह प्रत्येक शिम्प को स्वतः का कार्य है। किसी भी समय गुरु

(२६ )
शिष्य को मोक्ष पहुंचा देते है यह नहीं हो
सती।
४६ प्र० हितोपदेश कर्ता गुरु की सेवा करने में क्या
फल प्राप्त होता है?
30-सदगुरु अपूर्व समझ कराके अपनी अनादि की
अज्ञान दशां टालने के निमित्त ननते है। इनके
परिचय से अपनी प्रांति टलती है, मान गलता
है, मिथ्यात्व का नाश होता है और अंत में
श्रात्मकल्याण के सुख प्राप्त कर सकते है ।
धर्म
४७ प्र०-धर्म किसे कहते हैं।
उ०-दुर्गति में जाते हुए जीव को बचाले उसे धर्म
कहते हैं।
४८ प्र०-ऐसे धर्म का लक्षण क्या है ? उ०- अहिंसा ।
४६ प्रक-धर्म की नबि क्या और स्वरूप क्या है ?
उ०-न्याय धर्म की नींव और सत्य यह धर्म
स्वरूप है।
५० प्र०-धर्म का व्यवहारिक अर्थ क्या है ?
उ०-कर्तव्य (फरज)।
५१ प्र०-धर्म का अर्थ कर्तव्य कैसे हुआ ?
उ० कर्तव्य अर्थात करने योग्य काम और करने
योग्य कार्य यही मनुष्य मात्र का धर्म है।
'५२ ० करने योग्य कार्य सरका एकसा या भिन्न २
होता है?
।
का
.
-

( २७)
उ०-अधिकार पर से प्रत्येक के कर्तव्य थोड़े बहुत
अंश में भिन्न २ होते है।
५३ प्र०-भिन्न २ कर्तव्यों के थोड़े बहुत दाखले देकर
'समझायो?
उ०-गुरु के साथ शिष्य का, शिष्य के साथ गुरु का,
राजा के साथ प्रजाका और प्रजा के साथ राजा
का इसी तरह पिता पुत्र का परस्सर, पति पत्नी
का परस्पर ऐसे ही मित्र भाई,उपकारी, शरणा.
गत, अनुयायी अपने से हलकी जाति के प्राणी,
अपने से उच्च जाति के प्राणी, इसी तरह एक
दूसरे के भिन्न २ कर्तव्य होते है।
५४ प्र०-गुरु के साथ शिष्य का क्या कर्तव्य है ?
। उ०-गुरु की भक्ति करना और उनके कथनानुसार
व्यहार करना।
५५ प्र०-शिष्य के साथ गुरु का क्या कर्तव्य है ?
उ०-शिष्य की योग्यतानुसार उसे ज्ञान सिखाना और
हित राह दिखाना।
५६ म०-प्रजा के साथ राजा का क्या कर्तव्य है ?
उ०-प्रजा शांति में रहे ऐसे प्रयत्न करना, सदा,
सुलह शांति व्याप्त रहे इसलिये कायदे घना
कर न्याय पूर्वक प्रजा का पालन करना और
जिस तरह प्रजा की आगादी नढ़े वैसा करना।
५७०-राजा के साथ मजा का क्या कर्तव्य है ?
उ०-ऐसे न्यायी निपुण नृपकी याज्ञा सिरोधार्य कर उन
की उन्नति चाहना और उनके हमेशा कृतज्ञ रहना।
.

(२८)
-
.
५८ प्र०-पुत्र के साथ माता पिता का क्या कर्तव्य है?
उ०-पुत्र को बालवय से ही शुभ संस्कार में लगाना,
कुटेवों से वंचित रखना विद्याभ्यास कराना और
दुनिया में श्रेष्ठ पुरुषों की तरह जीवन व्यतीत
कर सके ऐसे कुशल बनाने का प्रयत्न करना ।
५६ प्र०-माता पिता के साथ पुत्र का क्या कर्तव्य है ?
उ.-उनकी सेवा करना, उनके अत्यन्त उपकार को
कभी न भूलना, अपनी योग्यता प्रकटित होने
पर उनका भार उतार कर धर्म ध्यान और
शांति में जीवन व्यतीत करें ऐसी सहूलियत
कर देना।
६.प्र.--पति पत्नी का परस्पर क्या कर्तव्य है ?
उ०--परस्पर प्रेम रखना, एक दूसरे की भूल सुधा-
रना, अन्योन्य हित चाहना, मान करना,
मदद देना, आपत्ति में सहायक होना, दुख में
भाग लेना, स्वार्थ न माधना और भविष्य की
प्रजा के हृदय में उत्तम संस्कार के वीजारोपण
करना ।
६१०-मित्र के साथ क्या कर्तव्य है ?
उ०-उन से माया-कपट न करना, हितचिंतक बनना
सरान राह पर जाता हो तो सत्तराह पर लगा-
ना. दुख में दुखी होना और किसी प्रकार उन
से भेद भाव न रखना।
६२ :०-उपकारी के साथ क्या कर्तव्य है?
उ०-उपकारी को योग्य सत्कार करना और जहा
.
-

(२६) तक बन सके उनके उपकार का बदला चुकाने की भरसक कोशिश करना। ६३ प्र०-शरणागत के साथ अपना क्या कर्त्तव्य । उ०-सानुकूलतानुसार सहायता करना, उनकी या- चना पर लक्ष देना परन्तु लापरवाह न होना । ६४ प्र०-अनुयायियों के साथ क्या कर्तव्य है ? उ०-उन्हें सुधारना, मुसी करना, सत्तराह लगाना, और उनका जीवन सुख से व्यतित हो ऐसा न यत्न करना। ६५ प्र०-अपने से उच्च पुरुषों के साथ अपना क्या कर्च व्य है ? उ०-उन पर पूज्य भाव रसना, उनकी उच्चता, यो- ग्यता का अनुकरण करना और उनके उत्तम गुण देसकर प्रमुदित होना परन्तु इर्पा न करना । ६६ प्र०-अपने से हलके प्राणियों के साथ अपना क्या कर्तव्य है ? उ०-उनपर दया करना, उनके दोप और अपूर्णता देस आकुल न होने या घृणा न करते उन्हें दोष मुक्त करने का प्रयत्न करना और अपने से बने उतना उनका भला चाहना और करना । ६७प्र०-गृहस्थाश्रम के कार्य करना धर्म कैसे कहा जाता है। धर्म के दो विभाग हैं। एक गृहस्थाश्रम का धर्म और दूसरा त्यागाश्रम का धर्म | गृहस्थ को गृस्थाश्रम के नियमों का पालन करना ही उ- नका धर्म है। -- .

(३०) . . ६८ प्रा-धर्म का दूसरा अर्थ किया ? उ०-स्वभाव। ६४ प्र०-धर्म का अर्थ स्वभाव कैसे किया ? - उ०-चेतन और अचेतन प्रत्येक पुद्गल के भिन्न २ स्वभाव है वे उनके धर्म हैं। ७० प्र०-सब पुद्गलों का सामान्य धर्म क्या है ? उ०-मिलना, भिन्न होना, रूपान्तर होना, नये जूने होना, सूक्ष्म रथूल पना धारण कर वर्ण, गंध, रस, स्पर्श का पलटाना यही धर्म ( स्वभाव) पुद्गल का है। ७१ प्र०-चेतन का धर्म क्या है ? उ०-सदा स्वउपयोगी, सच्चिदानन्द स्वरूप में लीन, परम ज्ञान में रमन यही शुद्व चेतन का धर्म ( स्वभाव ) है। ७२ प्र०-चेतन में शुद्ध और अशुद्ध यह क्या ? उ-चेतन जब तक जड ('शरीर और कर्मों के) साथ है तबतक अशुद्ध है और जन कर्मों से बिलकुल मुक्त होजाता है तब शुद्ध समझा जाता है। ७३०-जड के साथी चेतन अपने ही धर्म का पालन करते है या अन्य धर्म का ? 7 उ०-जड़ के साथ अति सम्बन्ध होने से जड़ का धर्म ही अपने में स्थित कर लेता है जिससे जड़ के विकारों, से, अपने में विकार और जड के गलनं पलन में अपना गलन पलन समझता है 1- ཀ - - (३१) और अनेक कार्य करता है ये सब उसके स्वत के धर्म विरुद्ध है । परन्तु जन जड़ और चेतन के धर्म जान समझ कर पर भार कोन्याग स्वभाव में रहने का प्रयत्न करता है, तन कमाँ की नि- जरा होती है, और उस समय वह अपने धर्म का सेवन कर रहा है ऐसा समझा जाता है। ७४ प्र०-गृहस्थाश्रम धर्म का पालक कव समझा जाता है ? उ.-विवेक पूर्वक अहिसादि पाच अणुनतों का पालन करता हुआ सेना धर्म की चाह रखता है, दुसी को विश्राम भूत होता है, सत्य प्रिय चनता है, परोपकार से प्रेम रस निर्दोष जीवन व्यतीत करता है, वह गृहस्थ धर्म का पालक समझा जाता है। ७५ प्र०-सक्षिप्त में देन गुरु और धर्म का अर्थ कहो ? उ०-सन कर्मों से विमुक्त, आत्म स्वरूप प्रकट कर अनन्त सुस के भोता हुए वे देव वीतराग के प्रतिपादन किये हुए मार्ग पर चलने वाले, आत्म कल्याण के साधने और अन्य को सधा- ने वाले गुरु और आत्म कल्याण साधने की जो सर्गोत्तम किया है कि जिस क्रिया से दोपों समूल नाश होता है और आत्मा की स्व- तन्त्रता प्रकट होती है उस किया का नाम धर्म की क्रिया है। . 2- ( ३२ ) - समयक ज्ञान। परोक्ष ज्ञान (पाठ पाँचवां) १ प्रश्न-मोक्ष प्राप्त करने के मुख्य साधन कितने हैं । उचर चार, सम्यकज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यरुचा- रित्र और विशुद्ध तप। २ प्र० -बान का अर्थ क्या ? उ०-किसी भी वस्तु को उसके नाम, गुण, जाति किया और स्वरूप से विशेष समझना वह । ३ प्र०-ज्ञान के कितने भेद है ? उ०-पांच, मतिजान, थुत ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनःपर्यव ज्ञान, केवल ज्ञान ४ प्र०-इन पाचों के संक्षिप्त भेद कितने ? उ०-दो प्रत्यक्ष ओर परोक्ष। ५ प्र०-परोक्ष ज्ञान कितने ? उ०-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान । ६५०-मतिज्ञान का अर्थ क्या ? उ०-इन्द्रियों मन के द्वारा मति से जानना वह मति ज्ञान है। ७ प्र०-मति ज्ञान का दूसरा नाम क्या है ? उ०-आ- भिनिवोधिक। प्र०-मतिज्ञान के कितने भेद है ? उ०-दो, श्रुत नि- श्चित, प्रभुत निश्चित् । हप्र०-श्रुत निश्चित के कितने भेद है ? उ०-चार, अ वग्रह, ईहा, अपाय, धारणा। १० प्र०-अवग्रह अर्थात् क्या ? उ०-किसी भी वस्तु के सामान्यता (अनिमितता) समझना ।

११ प्र.-अवग्रह के कितने भद हैं ? उ०-दो व्यंजनावग्रह, अर्थावग्रह । १२ प्र०-व्यंजनावग्रह का अर्थ क्या ? उ०-किमी पदार्थ का इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होना । १३ प्र०-अर्थावग्रह का क्या अर्थ है ? उ०-यस्तु के भार को सामान्य रीति से समझना। १४ प्र०-अर्धावग्रह के कितने भंद है? उ०-छः, पाच इन्द्री और छट्टा मन, इन छः पदार्थो के अर्थ का अवग्रह अर्थात गोध होता है । १५ प्र०-व्यजनावग्रह के कितने भेद हैं ? उ०-चार, श्रुत घाण, रस, स्पर्श, ये ४ इन्द्रिया (चक्षु और मन इन दो का व्यजनानग्रह नहीं होता )। १६ प्र० ईहा का अर्थ क्या है ? उ०-सामान्य रीति से जानी हुई वस्तु पर विशेष विचार करना । १७ प्र०-अवाय का अर्थ क्या है ? उ०-विचार किये पश्चात् उसका निश्चय करना । १८ प्र०-धारणा का अर्थ क्या है ? उ०-उम निश्चित की हुई को धारण करना यह । १६ प्र०-ईहा, असाय, और धारणा के कितने भेद है । उ०-प्रत्येक के छः २ भेद, पाच इन्द्री और छहा मन, तीनों के मिलकर अठारह भेद होते है । ०२ प्र०-श्रुत निमित के कुल कितने भेद हुए' उ-प्र विग्रह के छः, व्यजनावग्रह के चार, वाय, धारणा, के छ छ: सर २८ भेद हुए। ईहा, अ-

२१ प्र०-श्रुत निश्चित का अर्थ क्या है ? उ०-श्रुत अर्थात्
सुनकर उसके अर्थ का विचार करना ।
२२ प्र०-अश्रुत निश्चित अर्थात् क्या ? उ०-स्वतः की
चुद्धि फैलना।
२३ प्र०-अश्रुत निश्चित के कितने भेद है ? उ०-उत्पा-
तिया, विनिया, कम्मिया, परणामिया ये चार
प्रकार की बुद्धि हैं।
२४ प्र. औतपातकी का अर्थ क्या ? उ०-अपने स्वतः
की सहज ही में बुद्धि उत्पन्न होजाय (बीरबल
बादशाह की तरह )।
२५ प्र०-पैनयिकी का अर्थ क्या ? उ०-गुरु प्रभृति का
विनय करते वुद्धि प्राप्त हो ।
२६ प्र०-कार्मिकी अर्थात् क्या ? उ०-अभ्यास करते बुद्धि,
उत्पन्न हो ।
२७ प्र०-परिणामिकी अर्थात क्या? उ.-ज्यों २ वय की
वृद्धि हो चुद्धि बढ़ती जाय ।
२८ प्र०-पूर्व भन का जिससे स्मरण होजाय वह कौनसा
ज्ञान है ? उ० जाति स्मरण ज्ञान ।
२६०-यह जान पाच ज्ञान में किस ज्ञान का भेद है ?
उ०-मति ज्ञान का।
३० प्र०-श्रुत ज्ञान का अर्थ क्या ? उ०-शब्द ज्ञान अ
थवा शास्त्र ज्ञान ।
३१ प्र०-यह जान मतिज्ञान सिराय किसी को होता है?
उ०-नहीं, मतिज्ञान होता है उसे श्रुत ज्ञान होता है
और भुत ज्ञान हो उसे मतिज्ञान, श्रुत निनामति

(३५) ज्ञान नहीं हो सका और मतिज्ञान निना युतज्ञान नहीं हो सकता। ३२ प्र०-श्रुतज्ञान कितने तरह का होता है ? उ०-दो दो भाग करें ऐसे सात जाति का श्रुत ज्ञान होता है ( सर मिलकर १४ जाति का ) ३३ म०-इन चौदह जाति के नाम कहो? उ०-अक्षरधुत अनक्षरधुत, सनीभुत, असंजीथुत, सम्यकथुत, मिथ्याभुत, सादिश्रुत, अनादिश्रुत, सपर्यवसित- भुत, अपर्यवसितश्रुत, ममिकश्रुत, अगामिकत, अंग, प्ररिष्ठ और अग बाहिर ये १४ भेद । ३४ प्र०-यक्षरश्रुत के कितने भेट है ? उ०-तीन, सज्ञा- क्षर, व्यंजनाक्षर, लब्ध्यक्षर । ३५ प्र०-मज्ञाक्षर अर्थात् ? उ०-लिपि से या सकेत से समझाना । ३६ प्र०-व्यंजनाक्षर अर्थात् ? उ०-उच्चारण करके सम- माना। ३७ अ-लब्ध्यक्षर अर्थात् ? उ०-लब्धि रुप अक्षर (घोडे अक्षरों के अवण से अधिक शास्त्रों का ज्ञान होजाय)। ३८ प्र०-अनक्षर श्रुत अर्थात् क्या' उ०-छींक, वगासी, घटा, झालर, ढोल प्रभृति के शब्द । ३६ प्र०-संश्रुित का अर्थ क्या ? उ०-मन नाले, प्राणी को शब्द मुनकर ज्ञान हो। ४. ३०-प्रसन्नीभुरा अर्थात् क्या ? १०-विना मन के समुर्छिम प्राणी को इन्द्रियों के आधार सेशात्रहो। -

( ३६ )
४१ प्र०-सम्यक्श्रुत अर्थात् क्या ? उ०-समदृष्टि
को शास्त्र का सम्यक् ज्ञान हो ।
४२ प्र०-मिथ्याश्रुत अर्थात् क्या ? उ०-मिथ्या ।
जीव को शास्त्र की उलटी रीति से ( मिथ्या
ज्ञान हो।
४३ प्र०-सादि और सपर्यवसित श्रुत अर्थात् क्या ?
उ०-द्रव्य से एक पुरुप, क्षेत्र से भरत ओर ईमत
कालसे उत्सर्पिणी अवसर्पिणी तक जो
जान है वह सादि सपर्यवसित थुत ज्ञान है।
४४ प्र०-सादि सपर्यवसित श्रुत का शब्दार्थ क्या ?
उ०-आदि (प्रारम्भ ) सहित अन्त तक ।
४५ प्र. अनादि अपर्यवसित श्रुत का अर्थ क्या?
उ०-जिम का आदि और अन्त नहीं ऐसा श्रुत,
द्रव्य से, कई पुरुष, क्षेत्र से महाविदेह क्षेत्र
काल से महाविदेह क्षेत्र में प्रचलित काल तक
४६ प्र०-गमिक श्रुत अर्थात् क्या ?
उ.-शास्त्रो में समान, और अनुक्रम वाले अधि
कार हो।
४७ प्र०-अगमिक श्रुत का अर्थ क्या ?
उ० - जिसके अधिकार मिन्न २ और श्रममान हों।
४८ प्र०-अंग प्रविष्ठ श्रुत अर्थात् क्या ?
उ०-जो शास्त्र अग भूत हो ।
४६ प्र०-वे अग भूत शास्त्र कितने और कौन से ?
उ०-बारह, आचारग, सुयडांग, ठाणांग, समनायांग,
विविहा पन्नति (भगवति) ज्ञाता, उपासक,
जे

दशांग, अंतगढ़ दशांग अनुत्तरो व वाई, प्रश्न
व्याकरण, विपाक और दृष्टिवाद ।
प्रा-अग नाहिर अर्थात क्या ?
उ०-अंग से सम्माधित उपांग ।
प्र०-वे अग बाहिर के भेद कितने और कौनसे ?
उ०-दो, आरश्यक और आवश्यक से व्यतिरिक्त ।
१०-पारश्यक के कितने अध्ययन हैं और कौनसे ?
उ०- छ'सामायिक चऊनीसंथो, वंदना, प्रतिक्रमण,
कायोत्सर्ग, प्रत्यारयान।
३ प्र०-आवश्यक से व्यतिरिक्त के कितने भेद हैं और
कौन से?
उ०- कालिक सूत्र और उत्कालिक सूत्र ।
४ प्र०-कालिक सत्र का अर्थ क्या ? और कितने है ?
उ०-अमुक समय ही पढना चाहिये वे कालिक सूत्र
तीस है।
१५ प्र०-उत्कालिक सूत्र अर्थात क्या? और वे कितने है ?
3०-अमज्भाय और अकाल सिनाय चाहे जिसबात
पढ सके ने उन्तीम हैं।
प्रत्यक्ष ज्ञान।
पाठ (६)
१ प्र०-प्रत्यक्ष ज्ञान के भेद कितने और कौनमे ?
उ०-दो इन्द्रिय प्रत्यक्ष और नो इद्रिय प्रत्यक्ष ।
२५०- इंद्रिय प्रत्यक्ष के कितने भेद है ?
30-पाच, इद्रियों के पाच ।

( ३८ )
३ प्र-नो इंद्रिय प्रत्यक्ष के कितने भेद हैं ?
उ०-तीन, अवधिज्ञान, मन पर्यवज्ञान और केवलब
४०-श्रवधिज्ञान अर्थात् क्या?
उ०-इन्द्रियों की सहायता न लेकर परमारे अर
सीमातक आत्माको मनेक अवधान से इ
उत्पन्न हो वह अवधि ज्ञान है।
५ प्र०-अवधिज्ञान के कितने भेद हैं ?
उ०-दो, भव प्रत्ययिक, और क्षयोपशम प्रत्यायर
६ प्र०-भव प्रत्ययिक अर्थात् क्या ?
उ०-देवता और नारकी के मव में अवधिव
होता है वह।
७ प्र०-क्षयोपशम प्रत्ययिक अर्थात् क्या ?
उ०-अवधिज्ञान को आवरण करनेवाले कर्मों
विशुद्ध अध्यवसाय से क्षयोपशम हो जाय फिर
मनुष्य और तिर्यचको जो ज्ञान प्रकटे वा
क्षयोपशम प्रत्यायक अवधिज्ञान है।
८०-क्षयोपशम प्रत्ययिक के कितने भेद हैं और
कौन से?
उ०-अनुगामी, अनानुगामी, वर्धमान, हायमान,
प्रतिपाती और अप्रतिपाती ।
३०-अनुगामी का अर्थ क्या ?
उ०-नैत्र की तरह साथ ही रहे ।
१० प्र०-अनानुगामी अर्थात् क्या ?
१०-जहां उत्पन्न हुआ हो उसी स्थान पर देख
अन्य स्थान पर जाने से न देख सके।
.
.

(३६)
--
२१ प्र०-वर्धमान का अर्थ क्या ?
०-उत्पन्न होने पश्चात् विशुद्ध अध्यवसाय का सं..
योग होने से उसकी वृद्धि हो।
१२ प्र०-हायमान का अर्थ क्या? उ०-उत्पन्न होने पश्चात्
अशुभ विचार आने से घटने लगे।
१३ प्र०-प्रतिपाती अर्थात् क्या ? उ०-उत्पन्न होने पश्चात्
जल्द ही वह ज्ञान लुप्त हो जाय ।
१४ प्र०-अप्रतिपाती का अर्थ क्या ?
उ०-उत्पन्न होने पश्चात् वह ज्ञान स्थिर रहे।
१५ प्र०-अवधिज्ञानी द्रव्य से कितना देखता है ?
उ०-जघन्य अनंत द्रव्य देख सकता है और उत्कृष्ट
सब रूपी द्रव्य देख सका है।
। १६ म०-अवधिज्ञानी क्षेत्र से किवना देख सक्ता है?
उ०-जघन्य, अगुल का असंख्यातवां भाग उत्कृष्ट
सन लोक और अलोक में लोक के जितने अ.
संख्य खन्ड देख सक्ता है।
१७प्र०-काल से अवधिज्ञानी कितना जान, सक्ता है!
उ०-जघन्य प्राविलिका के असख्यानवें भाग जितने
काल को जान सका है और उत्कृष्ट प्रतीत
अनागत, असंख्याति असर्पिणी, उत्सर्पिणी
के कालचक्र को जान सका है।
१८ प्र०-भाव से अरधि प्रानी कितना-जान सक्ता है।
उ.-जवन्य उत्कट अंनत भाव जान सका है

(४०) २२ १६ प्र.-यथार्थ ज्ञान का नाम क्या है ? उ०-सम्यकज्ञान २०.५०-विपरीतज्ञान का नाम क्या है ?, उ०-मिथ्याज्ञान ( अज्ञान) २१ प्र० -सम्यकज्ञान वाले को दृष्टि कितनी होती है ? उ०-एक सम्यक दृष्टि । प्र-मिथ्याज्ञान वाले को डाट कौनसी होती है। उ०-मिथ्याष्टि। २३ प्र०-मिथ्यादृष्टि को मतिज्ञान प्राप्त हो तो उसे क्या कहते हैं ? उ०-मति अज्ञान । २४ प्र० -मिथ्यादृष्टि को श्रत ज्ञान हो तो वह कैसा ज्ञान समझा जाता है ? उ०-श्रुतप्रज्ञान | २५ प्रमिथ्याटि को अवधिज्ञान हो वह कैसा स- मझा जाता है ? उ.-विभंगज्ञान । २६ प्र०-मनः पर्यवज्ञान अर्थात् क्या १3०-संज्ञी पंचे- .द्रिय जीवों के मनको सब तरह से जान लेना। २७ प्र०-मनको जान लेना अर्थत् क्या ? उ०-दूसरे मनुष्य के दिल में रही हुई सब बात स- मझ लेना। २८ प्र०-मनः पर्यवज्ञान के कितने भेद है ? और कौन से ? उ०-दो, ऋजुमति विपुलमति । २६,०-ऋजुमति अर्थात् क्या ? उ०-सामान्य रीति से ग्रहण करने की मति । ६० प्र०-विपुलमति का अर्थ क्या ? उ०-विशेष रीति से ग्रहण करने की मति ।

(४१ ३१ प्र० ऋजुमति कितना देसता है?उ०-अनॅत प्रदेशी, अनंत मनके भान जनता है, देसता है। ३२ प्र०-विपुल मति कितना देसता है ? उ०-चे भी उपरोक्त भान देसते हैं परन्तु अधिक विशुद्वत्ता से। ३३ प्र०-मनपर्यवज्ञान किमको उत्पन्न होता है ? उ०-समदृष्टि आत्मार्थी साधु मुनिराज को । ३४ प्र०-अपिज्ञान और मनः पर्यज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान किस तरह हैं ? उ० - इन्द्रियों की पिना सहायताके मनसे शात्मा को प्रत्यक्ष दिसाते हैं इसलिये प्रत्यक्ष है। ३५ प्र०-मति और श्रुत जान परोक्ष किस तरह है ? उ.-इन्द्रियों की सहायता सिवाय मन नही जान सक्का इसलिये आत्मा को परोक्ष है। ३६ प्र-छदमस्थ को उत्कृष्ट कितने ज्ञान प्राप्त होते है ? ज०-चार, मति, श्रुत, अरधि, और मन पर्यवज्ञान । ३७ प्र.-सर्व श्रेष्ठ परमज्ञान कौनसा है ? उ.-केवल्य ज्ञान । ३८ प्र० केबल्य अर्थात क्या ? उ०-एक, शुद्ध, सम्पूर्ण, प्रत्यक्ष, अमाधारण, अ- नत, अस्सलित, वह केरल्यज्ञान है। ३६ प्र०-यह ज्ञान उत्पन्न होता है तन क्या दिखाता है ? उ० रूपी अस्पी, मफल्य द्रव्य, क्षेत्र से लोक लोक काल से भूत, भति, वर्तमान भावसे सर्व गुण पर्याय दस्तामल करत् देखे जाते हैं। . - (४२) - ४० प्र०-इस ज्ञान के भेद कितने उ०-यह ज्ञान अखण्ड आत्म प्रकाश के समान हो से इसके भेद नहीं हैं। ४१ प्र० केवल्य के सिवाय चार ज्ञान किस भाव आते हैं ? उ०-क्षयोपशम भाव से । ४२ प्र०-केवल्यज्ञान किस भार से प्रगट होता है ? उ०-क्षायकभाव से। सम्यक दर्शन। (पाठ सातवां) १प्र.-मोक्ष प्राप्त करने का दूसरा साधन कौन सा ? उ०-सम्यक दर्शन । २.५०-दर्शन के कितने भेद है और कौनसे ? उ०-आठ चक्षुदर्शन, अचक्षु दर्शन, अवधि दर्शन, के- वल्य दर्शन, सम्यक दर्शन, मिथ्या दर्शन, सम- मिथ्या दर्शन, स्वप्न दर्शन । ३ प्र०-पाठ दर्शन कितने अर्थ में शामिल है। उ०-तीन अर्थ में, (१) दृश्य में, (२) सम्यक्त्व में, (श्रद्धा) (३ ) सामान्यज्ञान में । ४ प्र०-मतिश्रुत ज्ञानवाले को कौन मा दर्शन होता है १ उ०-चक्षु दर्शन, अचक्षु दर्शन । ५ प्र०-अनधिज्ञानी को कौनसा दर्शन होता है ? उन्यवाधिदर्शन। ६ प्र०-मनः पर्यवगनी को कान मा दर्शन होता है। उ०-चक्षु दर्शन, अचनु दर्शन । -

७ प्र. केवन्यजानी को कौनमा दर्शन होता है।
उ.-केरल्यदर्शन।
८०-चक्षु दर्शन का अर्थ क्या ? उ०-चच से देखना।
६.प्र०-अचक्षुदर्शन का अर्थ क्या ?
उ०-चतु सिवाय अन्य इन्द्रियों तथा मन से नो
सामान्यज्ञान होता है वह अचक्षु दर्शन ।
१० प्र०-अवधिदर्शन का अर्थ क्या ?
उ-इन्द्रियों को बिना ही सहायता के मन में अमुक
सीमा तक देखने का जो सामान्यज्ञान प्रकट
हो वह अवधि दर्शन है।
११ प्र० केवल्य दर्शन का अर्थ क्या ?
उ०-सम्पूर्ण सामान्यज्ञान ।
१२ प्र०-मनः पर्यवज्ञान है और मनः पर्यव दर्शन क्यों
नहीं?
:-मनः पर्यवज्ञानी को सामान्य रीति में देखना
नहीं पड़ता अतएव दर्शन नहीं है।
१३ प्र०-सम्यकदर्शन अर्थात् क्या ?
3०-यथार्थ देसना।
१४ म०मिथ्या दर्शन अर्थात् क्या?
उ०-हो उसमे प्रतिकूल देखना।
१५ प्र०-समामिच्या दर्शनका अर्थ क्या'
१०-कुछ सत्य और कुछ असत्य देसना।
१६३०-स्वप्न दर्शन अर्थात् क्या ?
उ०-स्वप्न में जो २ देखा जाता है उसे अचचु
दर्शन भी कहते हैं।

१७ प्र० -देखना इस अर्थ में कितने दर्शन होते हैं ?
उ०-एक, चतु दर्शन।
१८ प्र०-श्रद्वा इस अर्थ में कितने दर्शन होते है ?
30-तीन, सम्यक दर्शन, मिथ्या दर्शन, सममिथ्या
दर्शन।
१६ प्र० सामान्यज्ञान के अर्थ वाले कितने दर्शन हैं ?
उ -तीन अचतु दर्शन, अवधि दर्शन और के
ल्य दर्शन।
२० प्र०-सम्यकदर्शन हो उसे कौनसा ज्ञान होता है।
उ०-सम्यज्ञान।
२१ प्र०-मिच्यादर्शन हो उमे कौनमा ज्ञान होता है ?
उ.-मिय्याज्ञान ।
२२ प्र०-समामिथ्या दर्शन हो उसे कौनमा ज्ञान होता है?
उ.-ममामय्याज्ञान ।
२३ प्र० सम्यरुज्ञानी हो वह कॉनमे देव गुरु, धर्म
को मानता है ?
उ०-राग, द्वेप, रहित, सर्व कर्म से मुक्त, केवल्य
ज्ञानी, ऐसे पवित्र स्वरूपी को देव (प्रभु)
मानता है और उन्ही वितरागी देव के फरमाये ।
हुए मार्ग पर ममत्व रहित विचरण करने वालों
को गुरु' पौर जिसराह से परम शांति मिले वह
वितराग के बताये हुए परम दयामय मार्ग को
धर्म मानता है।
२४ प्र. -धर्म की नीव क्या ? उ०-सम्यक्त्व ।
२५ प्र०-सम्यक्त्व न हो तो जीय मोच पासला है या नहीं?
.
.

। १५॥
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-
-
उ -नहीं विना सम्यक्त्व के जीव मोक्ष नहीं पा सका।
२६ प्र०-सम्यक्त का संक्षिप्त अर्थ क्या ?
उ०-ज्ञान और मच्ची श्रद्धा ।।
२७ प्र०-सम्यक्त्व की पहिचान के कितने सफेत है ?
और कौन कौन से?
उ०-६७, तीन शुद्धि तीन लिंग. पांच लक्षण, पाच
दूपण (अतिचार ) से रहित, पाच भूपण नार
मर्दहना छ स्थान, पाठ प्राचार, आठ प्रभा
वा, दस रुचि, दस विनय ।
२८ प्र०-तीन शुद्धि कौनसी ?
उ०-मन, वचन और काय शुद्धि ।
२६ प्र०-तीन लिंग कौनसे ?
उ.-(१) आगम श्राण की रुचि (०) धर्म कार्य
करने में प्रेम (३) गुरु भक्ति ।
३० प्र०-पाच लक्षण कौनसे ?
उ.-सम (समस्थिति । समवेग ( में शामिलापी ।
निर्वेद । विपयपर अरुचि ) अनुकम्पा, दुखी पर
करुणा, आस्था (विश्वास)।
११ प्र०-पांच पण कौन से?
•उ-शका. काता,वितिगच्छा ( फलका सदेह ) पा
संड-प्रशसा, पापड का परिचय ।
३२ प्र०-भूपण पाच कानमे ?
उ०-स्वधर्म में अटल आगम शैली में कुशल सत्या.
नुप्रेती, तीर्थकी सेवा करनेवाला, धर्म का
उद्धारक।
,

(४६ )
.
३३ ५०-छः स्थान कौन से !
उ.-जीव का अस्तित्व है, जीव शाश्वत
जीव शाश्वत है, पुन्न
पापका कर्ता है, भोक्ता है. मुक्ति है, उसका
उपाय है, इन छः का स्वीकार करने वाला।
३४ प्र.-चार सर्दहना कौनसी ?
उ.-परमार्थ का परिचय, तत्वज्ञानी की सेवा, श्रद्धा
भृष्ट स्वदर्शनी का त्याग, मिथ्यात्वी संगर्वजन ।
३५ प्र०-पाठ आचर कौन से ?
उ०-निःशंका, निः कांक्षा, निवितिगच्छा, (फल
में निस्सदेह ) अमूढ दृष्टि, उपयोध, समीप
आने वाले को उपदेशकर्ता, स्थिरीकरण
(धम से च्युत होने वाले को स्थिरका ) धर्म
वत्सल, प्रभाविक ।
३६ १०-आठ प्रभावक कौनसे ?
७०-(१) प्रावचनी ( प्रवचन की कुशलता से मार्ग
प्रदीप्त करे ) ( २ ) कथा निपुण ( धर्म कथाएं
कह कर दुर्योधी को धर्म में लगावे ) (३)
वादी (शास्त्रार्थ कर शासन दिपावे ) (४)नि-
मिच भाषी ( भूत भविष्य के ज्ञानसे मार्ग
दीपावे )(५) तपस्वी निस्पृहता से तपस्या
कर मार्ग दिपावे)(६) विद्या सम्पन्न । रसा-
यन यंत्र, खगोल, भूगोल, भूतल, भूस्तर, इ.
तिहास, न्याय, इत्यादि सीख जैन सिद्धांत में
करें) (७) सिद्धि सम्पन्न ( विविध प्रकार
की सिद्धियों द्वारा जैन मार्ग को दिपावे ) (८)
।

(४७)
कवि ( काव्य शक्ति द्वारा सिद्धात को पुष्ट करने
वाले ग्रंथ रच धर्मका दिपावे)।
३७ प्र०-दस रुचि कौनसी ?
उ०-निसर्ग रुचि, ( स्वाभाविक) उपदेश रुचि, था-
ज्ञा रुचि, स्वरुचि, बीजरुचि, अभिगम रुचि,
विस्तार सचि, क्रिया रुचि, संवेप रुचि, धर्म
रुचि,।
३० प्र०-दस विनय कौन से?
उ०-माचार्य उपाध्याय, स्यैवर तपस्वी, ग्लानी,
शिष्य, कुल, गण, सघ, स्वधर्मी इन दस का
विनय करता।
३६ प्र०-साधु या श्रावक में सम्यक्तत्व न हो तो वे किस
गिनती में है?
उ०-द्रव्य (नाममात्र ) श्रावक या साधु गिने जाते
४.प्र.-सम्यक दृष्टि की खाम विशेषता क्या है ?
उ०-सम्यक दृष्टि सात स्थान का आयुष्य का नया
चध नहीं बांधता है।
४१ प्र०-सात स्थान कौनसे ?
उ०-नारकी, तिर्य च, स्त्री, नपुंसक, भग्नपति, वाण
च्यातर, जोतिषी इन सात स्थान का थायुष्य
नही बांधता है।
१२ प्र०-सम्यक्त्व प्राप्त होने पर मृत्यु तक कायम रहे
तो वह जीव कितने भव कर मोक्ष प्राप्त कर
लेता है ?

(४८)
M
उ०-जघन्य, तीन भव और उत्कृष्ट पंद्रह भर कर
मोद जाता है।
४३ प्र०-सम्यक्त्व आये पश्चात् वापिस चलीगई और
मृत्यु तक न रही तो वह जीव का मोच
पाता है?
उ०-जघन्य दूसरे तीसरे भव और उत्कृष्ट अर्ध
पुद्गल परवर्तन में मोक्ष पाता है।
चारित्र तप और वीर्य ।
(पाठ आठवां)
१ प्र०-सम्यक्त्व के बाद कौनसा कर्तव्य है ?
उ०. चारित्र।
२ प्रचारित्र अर्थात् क्या?
उ.--आत्म कल्याण करनेकी शुद्ध क्रिया व्यवहार)
अर्थात् दुस मुक्त होने का व्यवहार ।
३ प्र०- उगके कितने भेद है ?
उ० -दो देधिरति और सर्व विरति (व्रत)।
4--देशनिरति के कितने घ्रत है ?
उ०-चारह, पाच अणुव्रत तीन गुणव्रत चार
शिक्षा व्रत।
५ प्र. अणुव्रत अर्थात् क्या ? उ-साधु के व्रत की
अपेक्षा छोटे (मर्याद वाले )।
६ प्र०-गुणव्रत अर्थात् ज्या ? उ०--अणुव्रत को गुण
(मदद ) करने वाले।
७ प्र-शिक्षाबत अर्थात् क्या ? .

- (-४६--- . . उ.-धर्म-शिक्षा के भवन समान या शिक्षा पर्याद भणुक्त रूप मंदिर के शिखर समान । प्रदेश विरति का प्रचालित नाम क्या है ? 15 उ० श्रावक,या अमणोपासक । प्र.-सर्वविरति कौन ? उ०-साथ् । १०.म.-उनके कितने व्रत हैं है. उ०-पांच महावत और छठे रात्रि मोजन के त्याग। ११५०-पाच महावत कौन से ? ? - सर्वथा जीव हिंसा का त्याग, सर्वथा असत्य के त्याग, सर्वया मदत्तू के ( चोरी त्याग, सर्वथा मैपुन के त्याग, सर्वथा परिग्रह के त्याग । १२ प्र.-इस सिवाय उन्हें और क्या पालना आवश्यक है। उ०-पांच-सुमति और तीन गुप्ति , rite १३ प्र०-पांच सुमति कौनसी. और उनका अर्थ क्या ? उ०-र्या सुमति अर्थात् यत्न - पूर्वक चलना, मापा सुमिति मर्यात,यत्ना से, बोलना, एपणा सुम- ति, अर्यात-यत्ना से पहिरना, अब पानी ले- ना):प्रायाण मर मत,निमेवणीया समति भ. यात अपने उपकरण प्रभृति -पत्ना से सेना, , रखना, उच्चार भादि- परिठावणिया सुमति अर्थात् डाल देने फेंक देने की वस्तुए यत्न पूर्वक डालदेना, फैक देना। २४.१०-तीनगुप्ति कौनसी, और उनका; अर्थ क्या ! उ.-मन, पचन और काया से पाप न करना और धर्म में स्थिर करना. - .. 7 N ।

( ५० ) - -- १५ प्र०-श्रावक के गुण कितने और कौनसे ? । उ०-इकवीस, १ अनुद्र २ रूपवंत ३ सौम्य प्रकृति बाला, ४ लोक प्रियं ५ मकर ६ पापभीरू ७ शाट्य रहित ८ चतुर लसावत १० दयाल ११ मध्यस्थ परिणामी १२ सुदृष्टि चाला १३ गुणानुरागी १४ शुभ पक्ष धारण करने वाला १५ दीर्घ दृष्टिवन्त १६ विशेपज्ञ १७ अपराभी १८ विवित १६ कृतज्ञ २० पराहराकारी २१ लन्ध लची. १६ प्र०-साधु किसे कहते हैं ? उ०-स्वयं आत्म कल्याण साधता है, और दूसरों को सधाता है. १७ प्र०-उनके गुण किंतने और कौनसे ? १०-सत्तावीस १ दया २ असत्य त्याग ३ भस्तेय '४ ब्रह्मचर्य ५ अपरिग्रह ६ अक्रोध ७ निर्मान ८ निष्कपट हनिलाम १० सहन शीलता ११ निष्पकपात १२ परोपकार १३ तपश्चर्या १४ प्रशांतता १५ जितेन्द्रियता १६ परममुमुक्षुप्रति १७ प्रसभ दृष्टि १८ 'सोम्य १९ नम्रता २० ... "गुरु मनि २१ विवेक २२ वैराग्य स्तता २३ : सत्यानु प्रेघ २४ ज्ञानामिलाप २५ योग निष्ट- ता (मन, वचन और काया को नियम में रख- ना) २६. संयम में रति ७ विशुद्ध श्राचार. १८ प्र० अध्ययन कराते हैं उन्हें क्या कहते हैं और उन 1 . । H , . ग के कितने गुण हैं ?

+
ए
,
उ०-उपाध्याय कहते हैं और उनके-२५ गुण।
१६.४०-सम्प्रदायका मुख्य क्या कहलाता है ?
उ.-आचार्य, और उनके गुण ३६ हैं।-:-
२० प्र०-साधुजी का धर्म कितने प्रकार का है ?.
उ०-दम, चमा, निर्लोम, निष्कपट, निर्मान, वपर्या
सत्य, संयम निर्मलपना, निकंचन और प्रमचर्य
२१ प्र.-चारित्र्य का फल क्या है ?
उ.-आते हुए कर्मों को रोकना ।
२२ प्र०-जीवको सुस दुख होने का क्या कारण है।
उ०-जीव के वधे हुए शुभाशुभ कर्म ।
२३,१०-अशुभ कमी के नाश करने का उत्तम साधन
कौनसा ?
उ०-तपश्चर्या |
२४ प्र.-तपश्चर्या अथात क्या ?
उ.- जिस क्रिया से आत्मा पवित्र, निर्मल, शुद्ध,
निर्दोष बनती है।
२५ प्र०-उसके भेद कितने और कौनसे ?
उ०-छः बाह्य और छः अभ्यतर ।
२६ म०-उनके नाम कहो।
१०-१ अनसन (आहार का त्याग) २ उपोदरी
( बुधा से कम भोजन करना )३ भिताचरी
( भिक्षा जाते समय,अभिग्रह धारण करना) ४
रसपरित्याग । मिष्ट रस का त्याग करना )२
काया केश (शीत, उष्ण, लाचादि कष्टका सहन
करना) ६ प्रतिसहेलणा-(प्रग उपाग को नि-
सम में रखना) ये छः बाध तप हैं (१) मा.

।
-
17
यमित (गुरु मागे किये हुए अपराध का
कौशंकर शुद्ध होना । (२)विनयध्या
वचे(४) स्वाध्याय (५) यान ।"६ का
योत्सर्ग (ये अभ्यवर तप)
२७ प्र०-बाय और अभ्यंतरं इन दोनों में मधिक वीक्ष्ण
Tऔर फलदायक कौनसा तप है।
उ.-अम्यवर फल तप.
२८ प्र०-तपश्चर्या करने में मुख्य किसकी भावश्यकता है?
उ.-वीर्य ( पराक्रम ) की।
२६ प्र-वीर्य के कितने भेद हैं।'
उ.-तीन ! बालवीय, पंडित वीर्य, बाल पंडित वीर्य.
३० प्र पाल वीर्यपात क्या और वह किसे होता है।
उ०-प्रत प्रत्याख्यान करने का पल जोन प्रकट कर
सके,एस चौथे गणस्थान तक के जीवोंकों होता है.
२१ प्र०-चाल 'पंडित वीये प्रथा क्या ?
उ०-प्रत प्रत्याख्यान देश से कर सके
ऐसे ५
गुणस्थाने वाले जीव
३२ प्र०-पंडित वीर्य प्रयोत क्या
उ.-सर्व विरती साधु, जो छो गुणस्थान से १४ वें
गुणनितकके जीव है, पतिवीर्य के धनी हैं।
जीव तत्व।
पाठ नवा)
१.३०-दुनिया में मुख्य तत्व कितने हैं
उ०पदों जीव देवा,मजीव तत्व
A

(५३) . । '- प्र०-जीव और अजीव के परस्पर सम्बन्ध से कितने तत्व गिन है? उ०-ना जीर, अजीव. पुन्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, वध, मोक्ष। ३ प्र-नीच किसे कहते है। उ.--जो दस प्राणों द्वाराजीवित हैं उसे जीव कहते हैं। ४ प्र-दस प्राण कौन से ? उ०-पांच इन्द्री, मिनरल, वचनवल, कायपल, श्रा- सोच्छास और आयुष्य । ५ -जी का लक्षण क्या है ? उ०-ज्ञानोपयोग लक्षण ( सदास्व उपयोगी) चैतन्य लनण सुस दुख का समझने वाला, करने वाला, भुगतने वाला। ६०-जीव के मुख्य भेद कितने ? उ०-त्रस और स्थावर ७ प्र०-त्रम अर्थात् क्या! उ.-जिन्हें जाम हो स्वयं चल फिर सकते हैं। ८०-स्थावर अर्थात् क्या? उ०-स्थिर रहते हैं ( जो स्वयं चल फिर न सके। ६०-स्थावर के मुख्य भेट कितने भौर कौनसे ? उ०-दो, सूक्ष्म चार बादर । १० प्र०-सूक्ष्म कैसे और कितने -- उ०-जो चर्म चक्षु से नहीं देखे जा सक्ने वे समस्त लोक में भरे हैं और अनंत हैं। ११ प्र०-चादर जीप कोलसे 15 उ.-धर्मच से जिनके शरीर का समूह देखा जाता है। । - ( ५४ ), १२ म०-यूक्ष्म और बादर उन दोनों के कितने भेट है! 50-बाईस-पृा, पानी, अनि वायु, ये चार सूक्ष्म और चार बादर यों दोनों मिलाकर हुए मार वनस्पति के तीन भेद. सूक्ष्ग, प्रत्येक साधारण ये तीन मिल कर ११ जिनके अपर्याप्ता और पर्याप्ता मिलकर. २२ भंद हुए। १३-प्रत्येक और माधारण किसे कहते हैं? उ-शरीर शरीर में एक जीव होते है ये प्रत्येक और एक शरीर में अनत जीव हवे साधारण कर लाते हैं (कंद मूलादि) १४ प्र०-पर्याप्ता और अपर्याप्ता अर्थात क्या ? ., उ०-प्रत्येक जीव जब आकर जन्म लेता है, तब उसे जितनी प्रर्याप्ती वाघना होती है न वाधता. वहा तक अपर्याप्ती गिना जाता है और सब बांध लेने पर पर्याप्ता गिना जाता है। १५ प्र० - पर्याप्ती कितनी और कौनसी ! उ०-६ आहार, शरीर, इन्द्री, श्वासोच्छास मापा और १६ प्र० स्थावर जीव के कितनी इन्द्रियां होती है ? उ.-काया एक ही। १७५०-प्रस के कितने भेद हैं? उ०-चार वेइंद्री तेइंद्री चौरेंद्री ये तीन विकलेंद्री और चौथा पचेंद्री।" १८०-विकलेंद्री के कितने भेद हैं ? है - . । . 3 । " "

,
"
उ०-६ वेइंद्री, तेहद्री, चौरेन्द्री ये तीन जिनके पास
और अपर्याप्ते मिल कर ६ भेद हुये।
प्र०-वे इंद्री जीव कौन से?
१०-काया और मुह इन दो डायां वालों को बे इद्री
कहते हैं जैसे शख कीडा अलसा इत्यादि ।
२.प्र.तेइन्द्री जीव कौनमे ? उ०-काया, मुंह, नासिका
इन तीन इन्द्रीयों वाले तेइद्री कहाते हैं जैसे जू.
लीक, माकड । सटमल) इत्यादि
२१०-चीरेन्द्री जीव कौनसे ?
उ०-काया मुंह, नासिका, नत्र ये चार इंन्द्रिय वाले
चौरद्री जीव कहलाते हैं जैसे मक्खी, मच्छर,
डास प्रभृति ।
२२५०-पंचेंद्री प्राणी कौन है ? उ-काया, मुह, नासिका
नेत्र. कर्ण, जिनके ये पाचों इद्री हो ।
२३ प्र०-पंचेंद्री के कितने भेद और कोनसे ?
उ०-चार, नारकी, तिर्यंच, मनुष्य, देवता, ।
२४ प्र०-नारकी अर्थात् क्या ? उ०- नरक ( एकांत दुख
में रहने वालों का स्थान ) में रहने वाले जीव ।
२५ प्रा-नरक कितनी और कौनसी ? उनके नाम गोत्र
और भेद कहो । उ०-नरक सात १ घमा २
वशा ३'शिला ४ जना ५ रिंग ६ मघा ७ मा.
पवई ये सात नाम तथा १ रतन २ शर्करा ३चालु
“४ पक ५ धुन ६ तम ७ तमतमा प्रमा ये साव
-

गोत्र के नाम है इनके पर्याप्ता और अपयाप्त
मिलकर चादह भेद हुए।
२६ प्रतियंच के भेद कितने और कौनसे मुख्य दो
संझी और असज्ञी।
२७ प्र०-संशी असंज्ञी किसे कहते हैं उ०-गर्भज ( मन
वाले सनी और सगुर्छम · विनामन के )असंझी
८२ प्र०-सी और संज्ञी तियंच के कितने भेद है।
उ०-वीस १ जलचर ( जलमें रहने वाले ) (२)
स्थलचर ( जमीन पर रहने वाले अवादि)३
उरपर ( सादिक छाती से चलने वाले )
भुजपर ( भुजासें चलने वाले ) ५ खेचर
(आकाश में चलने वाले ) ये पाच मंत्री और
पाच असंज्ञी इन दसों के पर्याप्ता और अपर्या-
सा मिलकर २० भेद हुए।
२६ प्र.-मनुष्य के कितने भेद हैं ? उ०-३०३,१५ कर्म
भृमि ३० अकर्म भूमि ५६ अंतर दीपा इन
एकमो एक के प्रर्यासे और अपर्याप्ते मिलकर
२०२ गर्भेज १० समुच्छिम अपर्याप्ता मिलकर
३०३ भेद हुए।
३० प्र०-समुश्लिम के पर्याप्ते क्यों नहीं है. उ०-ये जीव
पर्याप्त में न आकर अपर्याप्ते, में ही मृत्यु हो
जाते है इसीलिये इनके पर्याप्त नहीं गिने ।
गर्भज और समुच्छिम इनमें क्या भेद हैं।
-स्त्री पुरुष के संयोग से जो उनि होते हैं वे
गर्मज है और इस संयोग से न पत्तम हो कर
T

7 जो मनुष्यों के उच्चारादि मल मूत्र-मै उत्पा होते हैं वे मनुष्य समुच्छिम गिने, जाते हैं। ३२ प्र०-मनुष्य समुच्छिम अपनको नजर पाते हैं या नहीं? उ०-नहीं, वे इतने सूक्ष्म है. कि चर्म चतुओं से: नहीं देखे जाते। ३३ प्र० समच्छिम मनुष्य के उत्पन्न होने के स्थान , कितने और कौनसे ? उ०-चौदह, मिष्टा, पेशाब, खुंखार, नाकका मैल, वमन, पीच, परु, रुधिर वीर्य, सुखाई हुई अशुचि फिर गीली होजाय, मनुष्य के कलेवर, स्त्री पुरुष का संयोग, नगर के खाल में मनुष्य के सर्व असुचि के स्थान में। ३४ प्रतियंच, के मल में कौनसे जीव उत्पन होते हैं। उ०-उसमें पचेंद्री जीव नहीं उपजते परन्तु चे इंद्रिया दिक जीव उत्पन होते हैं। ३५ प्र०-मिट्टी, तथा पानी के योग से कौन से जीन उ० वनस्पति के तथा वे इन्द्री से. पचेंद्री तक के जीव उत्पन्न होते परन्तु वे समुच्छिम गिने जाते हैं। ३६ प्र०-कर्म भूमि अर्थात् क्या ? उ:-काम धधे से - निर्वाह करने वाले प्रदेश । ३७ प्र०-अकर्म भूमि अर्थात् क्या ? उ०-काम धधे विना सिर्फ इच्छा बल से निर्वाह करने वाले प्रदेश । ३८ प्र०-अतर द्वीप का अर्थ क्या ? बाहर लवस्य समुद्र में ५६ भतर दीप है उनमें बन्मना । - उत्पन्न होते हैं? ? उ०-जम्बुद्वीप 4 r । +

( ५६ )
गोत्र के नाम हैं इनके पर्याप्ता और अपयामा
मिलकर चादह भेद हुए।
२६ प्र.-तिगच के भेद कितने और कौनसे ' मुख्य
संझी और असशी।
२७ प्र०-संशी असंज्ञी किसे कहते है उ०-गर्भज (मन
वाले सनी ओर सगर्छम । विनामन के ) असंही
८२ प्र०-असंज्ञी और संज्ञी तिथंच के कितने भेद हैं ?
उ०-धीस १ जलचर ( जलमें रहने वाले) (२)
स्थलचर (जमीन पर रहने वाले अश्वादि)३
उरपर ( सादिक छाती से चलने वाले )४
भुजपर ( भुजासे चलने वाले ) ५ खेचर
(आकाश में चलने वाले ये पाच मज्ञी और
पाच असज्ञी इन दसों के पर्याप्ता और अपर्या-
सा मिलकर २० भेद हुए।
२६ प्र.-मनुष्य के कितने भेद हैं? उ.-३०३,१५ कर्म
भूमि ३० अकर्म भूमि ५६ अंतर दीपा इन
एकसौ एक के प्रयासे और अपर्यासे मिलकर
२०२ गर्भेज-१०१ समुच्छिमे अपर्याप्ता मिलकर
३०३ भेद हुए।
३० प्र०-समुछिम के पर्याप्ते क्यों नहीं, उ०-ये जीव
पर्याप्ते में न आकर अपर्याप्ते में ही मृत्यु हो
जाते हैं इसीलिये इनके पर्याप्त नहीं गिने।
३१ प्र०-गर्भज और समुर्छिम इनमें क्या भेद हैं।
-त्री पुरुष के संयोग से जो उत्पन्न होते हैं वे
गर्मज है और इस संयोग से न उत्पन होकर
--
+ -

- -- जो मनुष्यों के उच्चारादि -मल मूत्र में उत्पन्न होते हैं वे मनुष्य समुच्छिम गिने जाते हैं। ३२ प्र०-मनुष्य समुच्छिम अपनको नजर पाते हैं या नहीं? उ०-नहीं, वे इतने सूक्ष्म हैं, कि चर्म चक्षुओं से : नहीं देखें जाते। ३३ प्र० समच्छिम मनुष्य के उत्पन्न होने के स्थान , कितने और कौनसे? उ०-चौदह. मिष्टा, पेशाब, खुंखार, नाकका मैल, वमन, पीत्त, परु, रुपिर, वीर्य, सुखाई हुई अशुचि. फिर गीली होजाय, मनुष्य के कलेपर, स्त्री पुरुष का सयोग, नगर के खाल में मनुष्य के सर्व असुचि.के स्थान में। ३४ प्र०-वियंच के मल में कौनसे जीव उत्पन्न होते हैं । उ०-उसमें पंचेंद्री जीव नहीं उपजते परन्तु चे-इंद्रिया दिक जीव उत्पन्न होते हैं। ३५ प्र०-मिट्टी तथा पानी के योग से कौन से जीव उ० वनस्पति के तथा वे इन्द्री मे पचेंद्री तक के जीयू उत्पन्न होते परन्तु वे समुच्छिम गिने जाते हैं । ३६ प्र०-कर्म भूमि अर्थात् क्या ? उ.- काम धधे से निर्वाह करने वाले प्रदेश । ३७ प्र०-अकर्म भूमि अर्थात् क्या ? उ०-काम् धधे चिना सिर्फ इच्छा बल से निर्वाह करने वाले प्रदेश । ३८ प्र०-मंतर द्वीप,का अर्थ क्या ? उ०-जम्बु द्वीप पाहर लगय समुद्र में ५६ मतर द्वीप है उनमें जन्मना उत्पन्न होते हैं ? '- ?

( ५८ ).
-
३६ प्र० 'भकर्म भूमि और अतर द्वीपी मनुष्य कौनसे ।
२०-युगलिया, भद्रिक, भले स्वभाव वाले मर कर
देवलोक जाने वाले।
४० प्र०-कर्म भूमि के पंद्रह चेत्र कौन ! - पांच भतर
पाच इभरत, पांच महाविदेह ।
४१ प्र०-तीस अकर्म भूमि के क्षेत्र कौनसे ? उ०-पाच
हेमवय, पाच एरणवय, पाच हरिवास, पांच
रमकपास पांच देवकुरु, पाच उत्तर कुरु ।
४२ प्र --देवता के भेद सक्षेप में कितने और विशेष में
कितने ? उ०-संक्षेप में १० और उत्कृष्ट १९८ ।
४३ प्र०-जघन्य और उत्कृष्ट कौन २ से वे कहीं?
30-(१) भवन पति २) परमाधामी १५ (३
पाणज्यंतर १६ (४)जम्भिका १०१ ५)ज्यो.
तिपी दस । ६ )किल्चीसो तीन (७) लोकातिक
है। ८ । देवलोक १२ (8) प्रवेकी । ।१०)
अनुत्तर वमानिक पाच । यो सब मिलकर 88
जाति के देव के पर्याप्ता और अपर्याप्ते मिलकर
१६७।
४४ प्र० - सब जीव मूल स्वरूप में समान है या छोटे भई
उ०-मूल सरूप में समान है परन्तु कर्म रूपी उपा-
धि मे पड़े छोटे गिने जाते हैं ।
४५ प्र०-जीव का कोई घात करना चाहे तो हो सकी है
या नहीं
१०-नहीं. जीर यमर है । किसी दिन नहीं मरता,
-

४६०-तर मरजाना यह क्या ?
१०-जीवका शरीर से प्रथक होना.
४७ नाव नहीं मरता तो पाप कैसे लगता है ?
उ०-जीव की सीकृति कीहुइ प्यारी से प्यारी काया
वस्तु को भिन्न कर दुख उत्पन्न करने से पाप
लगता है.
४८-सब जीव समान है फिर एकन्द्री को मारने से
कम और मनुष्य को मारने से आधेक पाप क्यों
लगता है ?
१०-जो जीन अधिक उत्क्रांति पाया हो, जगत में
विशेष उपयोग हो जिसके पास अधिक प्रात्मि-
क द्धि हो उसे मारने से (उसकी ऋद्धि का
वियोग कराने मे ) अधिक पाप लगता है और
जो जीव कम ऋद्धिमान, कम उपयोगी, और कम
उत्तात होता है उस तरफ से कम पाप लगता
है कम अधिक के प्रमाण से कग अधिक पाप
लगता है।
४६ म-जीव का उत्पन्न कर्ता कौन है।
उ.-कर्ता कोई नहीं, अनादि है।
५. प्र.-उत्पन्न किये बिना उनकी प्राप्ति कैसे होती है ?
उ०-किसी भी समय कोई वस्तु उत्पन्न हुई तो उसका
विनाश भी किमी दिन होता है, परन्तु इस जीर
का नाश नहीं होता यह अविनाशी है, इसलिये
इसका उत्पन्न करने वाला कोई नहीं ऐसा सिद्ध
होता है।

(६० ६२ .) । . ५१ प्र०-जिस.तरह जर पदार्थ तूटता है फूठता विखरता है और फिर एकत्र होजाता है तरह इस जीव की स्थिति होती है या नहीं १०-स्थिति पलटती है.वह जड़ रूपी मूर्तिमान इस लिये ऐसा नहीं हो सका ।। ५२ प्रा-जीव को कैसे पहचान सक्ने हैं ? २०-जो जीव अधिक बढ़ती न पाये हैं वे जींव पूर्ण पानी, अग्नी और वायु के शास्त्र वेत्ताओं के कार से मानना. पाकी वनस्पति से सर.जीव चन फिरने सुख दुख की इच्छाएं और संज्ञाओं सहजही में पहचाने जाते हैं। ५३.प्र. जीवों की पहिचानकर उनके साथ कैसा व्यवहार रखना चाहिये । उ०-अपने से हलकी जाति के सब जीनों पर दया रखना, तथा अपने सामान के प्राणियों के सार! समान भाव रखना, और अधिक शक्ति वाले ना उपकारा पुरुषों क साथ, पूज्य मात्र रखना ! ५४ प्र०-अनंत जीवों का स्वरूप किस रीति से जानते हैं। उ.-अपना जीव है वैसे ही नाकी के सब जीव है इस लिये अपने जीव का स्वरूप नरावर समझ लेने से याकी के सन जीवों का स्वरूप समझ में भाजाता ५,५ प्र-सब जीवों के उत्पन्न होने की जीव योनी कितनी! उ०-चोरासी लाख ७ लाख,पृथ्वी काय ७ लार % 1 है - *-- (६१) - अपकाय ७ लाख. तेऊ काय, ७ लात, वायु काय,१० लाख प्रत्येक वनस्पति काय, १४ लाख साधारण बनस्पति काय, २ लाख बेंद्री, २ लाख वेंद्री, २ लाख चौरेंद्री, १ लाख नारकी, चार लास देवता, ४ लाख तिर्यच, १४ लाख मनुष्य ५६ प्र.-जीवयानि भर्याद क्या ? उ०-जीवों के उत्पन होने के भिन्न २ स्थान । ५७ १०- जीरके समूह को क्या कहते हैं ? उ०-बीवास्ति काय । । ५८ प्र.-जीव का दूसरा नाम क्या है ? उ०-प्राण, भूत, सत्व, विश्नु, आत्मा, प्रभृति अनेक नामों से पहिचाना जाता है। ५४ प्र०-जीव कौनसे भवसे मोद में जा सका है। उ.-मनुष्य मन से। .६० प्र--कोई जीरित मनुष्य को दाग दे तो जले या नहीं? उ.--जीव दग्ध नहीं हो सका, सिर्फ शरीर दग्ध होता है। ६. प्र०-नव शरीर जलने लगता है तब ऐसा क्यों कहता है। उ-अनादि की थज्ञानता से निज स्वरूप को भूल कर और शरीरादि पर वस्तु में, वह मेरी । ऐमा मान, जड़ के विनाश से अपना विनाश दुमा समझ कर दुःखी होता है। ६२ प्र०-जो जीव नहीं मरता को शरीर में से निकल कर कहा जाता होगा। 4 में जलता हू 1- . य ( ६२ ) उ० जिंदगी में जैसे शुभाशुभ श्राचरण में पिस प्रकार शुभाशुभकर्म का सचय करता है वैम हो स्थान में जाकर उत्पन्न हो जाता है । ६३ प्र०-एक जीव के प्रदेश कितने हैं ? उ०-असंख्य । ६४ प्र०चे प्रदेश अलग २ हो जाते है या नहीं? उ०-नहीं, वह एक प्रदेश दूसरे प्रदेश से कभी भिन्न नहीं होता। ६५ प्र०-जीव अपना बड़े से बड़ा रूप धारण करे तो कितना हो सका है। उ०-चौदह राज लोक ( समस्त दुनियां में समावेश होसके इतना बड़ा हो सका है। ६६ प्र०-इतना बड़ा होकर कीटादि के शरीरों में किस तरह रह सक्ता है ? क्या उमे तकलीफ नहीं होती होगी? उ०-एक बडे होल में बिजली का दिया प्रकाश देता है, परन्तु उस पर जितना भाजन ढका है उसी में प्रकाश समा जाता है, इसी तरह जीव शरीर के प्रमाण से रह सकता है ऐसा ही उस का स्व- रूप है और इस तरह रहने में उसे कुछ तक- लीफ नहीं हो सक्ती, कारण वह अरूपी है । .६७ प्र०-जीव प्रत्येक कार्य स्वतः ही करता है या किसी के द्वारा कराता है -संजीजीव मन द्वारा और असीजीव मन जैसी शक्ति द्वारा इन्द्रियों से काम काज लेते है। 1 ( ६३ ) अजीव तत्व। (पाठ दसवां) १ प्र०-अजीव अर्थात् क्या ? उ० चैतन्य रहित जड लवम २ प्र०-इस के मुरय भेद कितने हैं। उ०-दो, रूपी और अरूपी । ३ प्र०-रूपी अरूपी किसे कहते हैं।' उ०-जिम द्रच्य में वर्ण, गंध, रस स्पर्श हो वह रूपी । और न हो वह अरूपी है। ४ प्र०-रूपी के मुख्य मेद कितने हैं ? ० चार पुद्गलास्तिकाय का स्कंध, देश, प्रदेश और परमाणु। प्र०-पुद्गलास्ति काय का अर्थ क्या? उ०-(पूडन,गलन) मिलना, भिन्न होना जैमा जिस- का स्वमाव है वह पुदगल और उसका समूल है पुद्गलास्तिकाय । ६ प्र-स्कंध, देश, प्रदेश, और परमाणु अर्थात् क्या: ज०-जो द्रव्य पूर्ण-समग्र हो वह स्कध कहलाता है उसमें के किसी भाग की कल्पना करना देश, उसका परम सूक्ष्म से सूक्ष्म माग प्रदेश, वह सूक्ष्म प्रदेश मुख्य द्रव्य से भिन्न हो जाय बह परमाणु कहलाता है। ७ प्र. वह परमाणु कितना सूक्ष्म होता है ? इसका । विशेष स्पष्टीकरण करो। उ.-अनत सूक्ष्म परमाणु के मिलने से एक चादर परमाणु, 'अनत बादर परमाणु के मिलने से एक ..

(६४
उष्ण परमाणु, आठ उष्ण परगणु से एक शीत
परमाणु, आठ शीत परमाणु से एक उर्धरेणु
आठ उधरेणु से एक त्रसरेणु, आठ प्रसरेणु मे
एक रथरेणु, पाठ रथरेणु इतना उत्तरकुरु देवकुरु
के मनुष्य का एक बाल होता है। वैसे आठ
बाल-एक महाविदेह क्षेत्र के मनुष्य के सिर का
वाल । वैसे आठ गाल-भरतक्षेत्र के मनुष्य के
सिर का एक बाल । माठ पाल-एक नीक
आठ नीक-एक जू। आठ जूं-एक नव का मध्य
माग | पाठ जव के मध्य भाग-एक अगुंल ।
चारह अंगुल-एक चेंत,( पालिश्त )। दो बा.
लिस्त-१ हाथ ! दो हाथ-एक कुची-1 दो कुची
एक धनुष । दो हजार धनुष-एक गाऊ । चार
गाऊ-एक योजन।
८प्र०-अरूपी के मुख्य भेद किवने ?
-उ०-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकास्तिकाय इन
तीनों के स्कंधदेश प्रदेश यो नो और दसवा
काल यों दस भेद हुए।
प्र०-धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय अर्थात क्या?
: उ०-जीव और पुद्गल के चलने , में सहायक हो।
जिस प्रकार मछली में तैरने की शक्ति है, परन्तु
पानी बिना नहीं तर सक्ती। जिस तरह उसे पानी
मददगार है वैसे ही धर्मारितकाय के बिना कोई भी
व्यक्ति गति नहीं कर सका और स्थिर रहने में
जो मददगार हैं वह अधर्मास्तिकाय का गुण है
J
-

(६५) १० प्र०- काल के नन्हे से नन्हे भाग को क्या कहते हैं ? 73०-समय। ११ प्र०-३६ समय कितना सूक्ष्म होता है उसका विस्तार से वणन करो। -उ-खमींचकर बोलने में असंख्याते समय व्य- तीत हो जाते हैं उस असख्य समय को एक आपलिका कहते है। ऐसी २५६ भावलिका में निगांद वाले जीव का एक भव हो जाता है एमे सत्तर भव से एक श्वासोथास होता है। ऐसे सात श्वासोश्वास से एक स्तोक होता है और सात स्तोक के बराबर एक लव ऐसे मि- तोतर लव का एक मुहूर्त होता है १२ प्र०-एक मुहूर्त में कितनी आवलिका होती है ? उ.-१,६७,७७,२१६ श्रावलिका. १३ प्र-एक मुहूर्त में निगोद वाले जीव के कितने भव होते हैं ? उ०-६५,५३६ भव । १४ प्र.-एक अहोरात्रि में कितने मुहूर्व होते हैं ? उ०-३० गुहूर्त । १५०-एक पुद्गल परावर्तन का समय का होता है ? २०-पद्रह अहोरात्रि-एक पक्ष । दो पत्त-एक माह । चारह माह-एक वर्ष ! पाच वर्षक युग । ८४ लासवर्ष एक पूर्वाग।८४ लाख पूर्वाग-एक पूर्व । असख्य पूर्व-एक पन्योपम । दस क्रोडा कोही पन्योपम-एक सागरोपम । दस क्रोडा क्रोडी सागरोपम-एक अवसर्पिणी। ये दो मिलकर चीस

कोड़ा कोड़ी सागरोपम का एक काल चक्र होता
है। ऐसे अनन्त काल चक होतो एक पुद्गल
परवर्तन होता है।
१६ १०-अजीव वत्व के चार और दरा मिल कर चादर
भेद कौन से उनके विस्तार से कितने भेद हैं।
उ०-मरूपी के तीस भेद और रूपी के पाचसो तीत
भेद मिल कर कुल ५६० भेद हुए।
१७ प्र०-३० भेद अरूपी अजीव के किस प्रकार होने
हैं ' समझायो।
उ.-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अकास्तिकाय,
(१) द्रव्य से एक क्षेत्र से लोक के अनुसार
काल से अनादि अनंत, भाव से. वर्ण, गंध,
रस, स्पर्श मूर्ति रहित, । ५) गुणसे धर्मास्ति-
काय चलने में सहायता करने वाली अधर्मास्ति-
काय, स्थिर रहने में मदद देने वाली, और
भकास्तिकाय अवगाहन अर्थात् मार्ग देने वाली
ये पद्रह भेद हुए । सोलवा काल द्रव्य से अ.
नेक (१७) क्षेत्र से ढाई द्वीप के अनुसार
(१८) काल से आदि अनंत (१६) भावस
वर्ण गंध रस स्पर्श रहित (२०) गुणसे वर्तन
लक्षण नये को पुराना करना और पुराने को
निकाम का कर देना ये वीम और जो दस
अरूपी के पाहिले कहे है मिल कर तीस भेद
अजीर अब्पी के हुए
।

-
-
१०प्र०-रूपी भजीव के पांचसा तीस भेद कान से !
समझाभो।
उ०-प्रत्येक रूपी द्रव्य में मुख्य गुण पच्चीस हैं।
पांच वर्ण (काला, लाल, हरा, पीला, सफेद। दो
गंध (सुगंध, दुर्गध) पाच रस (तीक्ष्ण, कटु,
कसाएला, सट्टा, मीठा ) पांच सठाण ( परि
मडल, वट वम, चोरस, आयत आठ स्पर्श
खरदरा, कोमल, भाग, हलका, शीतल. उष्णा,
स्नग्ध रुव, ये पच्चीस मुस्य भेद हैं उनमें के
एक एक वर्ष के बीस भेद होते है दो गध पाच
रस पाठ स्पर्श पाच सठाण। ऐसे शच २ वर्णके
सौ भेद हुए एक एक गंध के तेवीस भेद होते
हैं (पाच वर्ण, पांच रस, पाठ स्पर्श, पाच सठाण।
ऐसे दोनों गंध के ४६ भेद हुए एक एक रस
द्रव्य के बीस भेद होते हैं ( पांच वर्ण दो गध
पांच सठाण, पाठ स्पर्श) ऐसे पाच रस के सौ
भेद हुए हर एक द्रव्य के सठाण के वीस भेद
हैं पाच वर्ण, दोगध पांच रस, आठ स्पर्श) यों
पाच ठाण के सौ भेद हुए हर एक द्रव्य के
स्पर्श के तेईस भेद हैं (पाच वर्ण, पाच रस, दो
गघ, छ सर्श, पांच सठाण ) पहिले खरखरा
और कोमल वर्ज देना फिर दो २ स्पर्श छोड़ने
जाना आठ स्पर्श के १८४ भेद हुए वे सर मिल
फर ५३० भेद अजीव रूपी के हुए।

(६८) - । . पुन्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष। ( पाठ ग्यारवां ) १ प्र०-पुन्य वत्व अर्थात् क्या ? उ० -जिसके फल, भोगते हुए मिट हों और जिसने इच्छित वस्तु प्राप्त हो। २ प्र-पुन्य कितने प्रकार से संचित होता है ? उ०-नो, अन्न, पानी, जगह, वस्त्र और इनके सिवाय कौन से भी योग्य साधन वे पांच और मन, वचन, काया को शुभ प्रवृत्ति भोर ही नम्रता। '३ प्र०-इन ना प्रकार के सचित पुण्य का फल कितनी 'तरह से भोगते है? उ.-बयालीस प्रकार से। ४ प्र०-यालीस प्रकार का सार समझाओ? उ०-गति, जाति. शरीर, इंद्री, उपांग, संघण, (दृढता) संठाण, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, बल, तेज, यश सौभाग्य, सौन्दर्य, वैभव, कंठ, लालित्य, इज्जत शान्ति, शक्ति, प्रताप, इत्यादि २ उच्च और सुखदायक प्राप्त हों। ५ प्र०-पाप अर्थात् क्या ? उ०-जिसके फल भोग ते हुए अनिष्ट और कटु हो । ६ -वह पाप कितनी प्रकार से संचित होता है ? उ०-अठारह प्राणातिपात, मृपावाद, भदत्तादान, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया,लोभ, राग, द्वेष, क्लेशा अभ्याख्यान, पैशुन्य, परपरिवाद, अरति, रवि. मापा, मोसा, मिथ्यात्ल, दर्शन, शल्य । - T 1 .

.
७ प्रा-पाप के फल कितने प्रकार में भोगे जाते हैं ?
उ० ८२ प्रकार से
प्र.-८२ प्रकार का सार कहो?
उ०-गति, जाति, इद्रियां उपाग सपण, माण,
वण, गंध, रस. स्पर्श, अत्यंत, हलके, खराब और
अमनोग्य होते हैं इनके मियाय निर्बल, निस्तेज
अपयश दुभाग्य अस्थिर, दुःस्वर, ज्ञानावरण
दर्शना वरण, पाच अतराय । दान, लाम, भोग,
उपभोग वीर्य की भतराय ) पाच प्रकार की
निद्रा (निद्रा, निद्रा, प्रचला, प्रचला, प्रचलन
थिणी, ) से लीप्त हो और चारित्र मोहनी की
पचीस प्रकृतियों ढकी रहें।
६ प्र०-माश्रव अर्थात् ?
उ०-मात्मरूप तालाब में इंद्रियादिक नालों में कर्म
पापला पानी का प्रवाह हो।
१. प्र.-आश्रव के कितने मेद हैं ?
उ०-मामान्य २० मेद है मिथ्यात, अत प्रमाद,
• कषाय, अशुभयोग, प्राणाविपात, मृपावाद
प्रदत्तादान, मैथुन, परिग्रह, पाच इद्रिया तण
मन वचन काया को यश न रखना हर एक कार्य
में अविवेक चपलता करना ।
११:०-संवर अरथात् क्या ?
उ० भात्मरुपी वालात में पाप रुप जल के प्रवाहको
माता हुभा वृत प्रत्यारयादि छिपा रूप द्वार
से रोकले उमे सवर कहते हैं।
-

(७०) . . १२ प्र उसके भेद कितने हैं। उ० सामान्यत पीस, समाकित, वन, प्रत्याख्यान अन माद, अकपाय, शुभयोग, दया, मत्य, असत्येष, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह पांच इंद्रिया तथा मन, वच- न. काया इन माठों को वश करना हर एक कार्य में विक अचपलता के वीम भेद हुए। १३ प्र-निर्जरा अर्थात क्या ? उ.-आत्मा के प्रदेश से तपश्चर्या द्वारा कर्म ग्रंश मे कर्म की निजरा होना अर्थात् जलकर दूर होना उमे निर्जरा कहते हैं। १४ प्र-निर्जरा के कितने भेद हैं ? उ.-सकाम, मकाम । १५ प्र०-सकाम अर्थात् क्या ? उ.-इच्छा पूर्वक समझ कर कर्म से दर होना- १६ प्र०-धकाम अर्थात क्या? उ०-इच्छा बिना, तिर्यच की तरह कष्ट सहन करते कर्म की निर्जरा होना। १७५ -बातत्व अर्यात् क्या? उ.-श्रात्मा प्रदेश और कर्म पुद्गल के दल चीर नीर की तरह तथा लोह अनी की तरह एकत्र होना। १० प्र०-उसके भेद कितने हैं? उ०-चार, प्रकृति बंध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध, प्रदेश बंध। १६ प्र०-प्रकृति बंध क्या? उ -लो कर्म बाधे जाते हैं उनका फल सुख या दुःख प्राप्त होने का स्वभाव का परिणाम ।

( ७१)
१
'
५० प्र०-स्थिति अर्थात् क्या ?
३० जो कर्म जिवने समय में मचित हुआ है उतने ही
समय तक मोगना उसे स्थिति पंध कहते हैं।
२१ प्र-अनुभाग अर्थात् क्या ? उ. वह कर्म नौन या
मंद जैसी इच्छा से संचित हुअा हो
२२ प्र० प्रदेश अर्थात् क्या ?
उ०-उस कर्म पुद्गल के जितने दल सचिन हुए हों
उसे प्रदेश चन्ध कहते हैं।
२३ प्र.-मोक्ष अर्थात् क्या?
उ.-सर्व पात्माके प्रदेश से सकल यधन का छूटना
सकल दोपादि से मुक्त होना, सकल कार्य की
सिद्धि होना उसे मोक्ष कहते हैं ।
२४ म.-मोन जाने के कितने साधन है।
१०-चार, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप ।
२५ प्र -मोक्ष जाने वाले के कितने दोनों की अत्यन्त
श्रावश्यकता है?
उ.-मनुष्यत्व, वज्र रुप, भनाराच, सवयण, परम शुक्र
ध्यान दायक सम्यक्त्व यथाव्यात,
परम शुक्र लेण्या, पडित, वीर्य, केवलबान
फेलदर्शन।
ग
.
चारित
न
नव तत्व सम्बन्धी विशेष प्रभोचर
पोठ पारहवा.
१५०-बीव शरीर के कौन से माग में रहता है ?

।। ७२ । । । उ०-शरीर के समस्त भाग में बसे तिल में तेल और दूध में घृत है। २३०-प्रत्येक जीव समान प्रदेश गण शक्ति बान और स्वभाव वाले होते हैं या भिन्न २ ? उ०-प्रत्येा जीव मूल स्वभाव से वो सब तरह स समान होते हैं परंतु उपाधि (कर्म) के कारण शनिवान गुण और स्वभाव में एक दूसरे से कम अधिक देखे जाते हैं। ३०-जीव को कर्म कब से लगे है ? उ० -अनादि काल से जीव और कर्म साथ ही है। ४०-स्थूल देह-से जब जीव भिन्न होता है तब उसके माथ क्या क्या रहता है, उ०-जस और कारमान ये दो शरीर और शुभाशु' कर्म सामग्री: ५ न-मुक हुए जीव को कर्म लगे या नहीं? उक-मुक जीवों को कर्म नहीं लगते । ६ प्र०- कर्म किसको लगते हैं जीव को या कर्म-को १०-कर्म सहित जीव है और उसे ही कर्म लगते हैं। 50 प्र.-अनादि काल से रहने वाली कितनी-वस्तुएं है। उ.-अनंत जीव परमेश्वर और जगत (पुद्गल समूह ८प्र०-इन तीनों में से किसी का किसी समय नाश होता है या नहीं? उ.-नहीं इन तीनों में से किसी का नाश नहीं होता। प्र०-जीव मात्र सुख चाहते हैं वह सुब कहा है ? उ.-सुख जीव के पाम ही है। । # J ( ७३) - ०प्र० अपने ही पाम हो नो फिर अन्य जगह क्यों ढूंढन। फिरता ह। 30-अपनी अजानता के कारण । ११ १०-जीर सतन्त्र है या परतन्त्र उ०-जन तक कम से विमुक्त न हो वहां तक परतन्त्र प्रार निमुक्त होने पर जीव म्वतन्त्र है। १२ प्र०--सुस कितने प्रकार का है ? उ०-दो, आत्मिक सुस और पोद्गलिक सुख । १३ प्र०-पाद्गलिक मुख के कितने भेद हैं ? उ०-दो, शारिरिक, मानसिक । १४ प्र०-दुःख के कितने भेद है ? उ०-दो, शारिरिक मानसिक । १५ प्र०-एक जीव के पाम कम रूपी कितने परमाणु पुदगल होते हैं ? उ०-अनन्त । १६ प्र.-जिस ममय कर्म बन्धे या छूटे वर एक समय में फितन परमाणु पुद्गल हाते हैं ? उ०-अनन्त । १७ प्र.-जीव जर स्यूल शरीर से निकल कर दूसरी गति में जाता है तर उमझा गाते टेढी तीर्थी रहती है या सीधी उ०-सीधी तनिक भी टेढी नहीं। १८ प्र०-फिमी जीर को मजनूत काच या लोहे की कोठी म चन्द कर दें तो भी जीन निकल सकेगा? उ०-हा. म्यूल शरीर को छोड कर उसका निक- लना सरल हे। १९५०-दो सूक्ष्म शरीर और कर्मका बडा भारी समूह जीव के साथ रहते भी वजसी बन्द कोठी में से जीव कैसे निकल सका है ? 4

(७४)
उ० गज जैनी मजबूत कोठी में रहे हुए छिद्र अपने
चर्म चक्षु से नहीं देखे जाते परन्तु जीर के
निकल जाने को उसमें असंख्य छिद्र रहते हैं।
२० प्र०-दूसरी गति में जाते हुए जीव को कोई रोकने
वाला या ठहराने वाला कोई स्थान मध्य में
आवा है या नहीं?
उ.-नही, जीव और उसके साथ रही हुई उपाधि
सब इतनी अधिक सूक्ष्म रहती है कि उसे दृढ से
दृढ़ बज्र की भीत से भी निकल जाने में कोई
कठिनाई नहीं होती।
२१ प्र०-एक परमाणु में वर्ण गन्ध, रस, स्पर्श कितने
होते हैं?
उ-चाहे जिस जाति का एक वर्ण, एक गन्ध, एक
रस और दो स्पर्श रहते हैं।
२२ प्र०-शुभाशुभ कर्मों में वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श कितने
होते हैं।
-कर्मों के समूह में पाच वर्ण, दो गन्ध पाच रस
और चार स्पर्श रहते हैं।
२३ प्र.-आठ स्पर्श में से चार स्पर्श कौन से नहीं होते।
उ०-भारी, हलका, दृढ और कोमल ये चार नहीं
होते थौर चाकी के चार होते हैं।
२४ प्र०-ऐसे चार स्पर्श वाले पुद्गल दूसरे कौनसे हैं ?
उ०-शुभाशुभ कर्म, मन, नचन, और कार्मण शरीर
के पुद्गल चो स्पर्शी (चार स्पर्श वाले) होते है।
२५ प्र०-रूपी और अरूपी किसे कहते हैं।
उ०-
,
-

( ७५ )
से
-
उ०-वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श सहित जो द्रव्य हो उसे
रूपी और न हो उसे अरूपी द्रब्य कहते हैं।
२६ प्र०-जीव नत्र कर्म नधन करता है तर वे पुद्गल
कहा ग्रहण करता है।
उ-यपने मन्यन्त समीप रहे हुए पुदगलों को ग्रहण
करता है।
२७ प्र०-किसी भी रंग का एक परमाणु हो उस में कुछ
मिले सिवाय फेरफार हो मके या नहीं?
उ०-हा, उस की वृद्धि, हानि, होती है वैसे ही वर्ण
गध रस, बदलते भी हैं।
२८ प्र.-परमाणु जैसे सूक्ष्म द्रव्य में कुछ मिला या नि-
कल गया, हानि हुई या धृद्धि, स्वरूप बदलना
कैसे बन सका है।
उ०परमाणु का ऐमा ही स्वभाव है।
२६ प्र०पानी के परमाणु पृथ्वी के रूप में और पृथ्वी
के परमाणु पानी के रूप में होते है या नहीं ?
उ०-हां, पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति इन
सब के परमाणू एक दूसरे रूप में बदलते हैं
परन्तु जल के या पृथ्वी के परमाणु जल या पृथ्वी
रूप में ही रहें ऐसा नहीं हो सक्ता ।
३० प्र०-पृश्व्यादि परमाणु जल रूप और जल के पृथ्व्या-
दि रूप में हो जाते हैं इसे दृष्टांत देकर समझायो।
उ०-ऑक्साजन और हंड्रोजन नामक दो वायु एकत्र
करने से उन का पानी हा जाता है पानी वृक्ष
के मूल में सींचने से मूल द्वारा वृक्ष में प्रवेश

-- - . हो वृक्ष रूप हो जाता है, वृक्ष मुखा कर जीर्ण हो जाता है तन पृथ्वी में मिल जाता है उसी पृथ्वी के परमाणु अन्य प्रयोग होने पर अन्य रूप में हो जाते है। ३१ प्र०-एक जाति के वर्ण, गंध, रस के परमाणु पुद्गल अन्य वर्ण गंध रस के रूप में हो जाते है, दृष्टांत से समझाओं? उ.-कालेरंग की मिट्टी के प्रदेश पर नीम, गुलार जुई, प्रभृति, वृक्ष के बीज लगाने से नीम का वीज अपने स्वरूप को प्रकट करने वास्ते अपने से ही वर्ण, गंध, रस के परमाणु की सींचेगा और गुलार, व जुई अपने अनुकूल परमाणुओं को ही सीघंगे और उस काली मिट्टी के पर- माणुगो को अपने २ रूप में परिणित करेंगे, काली दिखती हुई मिट्टी को गुलाब का बीज, गुलाव के रूप में फिरा सकता है। ३२ प्र०-वड का जीर्ण चीज जमीन में रोपने से उसे भारी पड वृक्ष के रूप में कौन बनाता है । उ०-उस वडके पीज में ऐसी शक्ति होती कि उस मिट्टी, पानी, प्रकाश, गर्मी ऐमी वस्तुओं की सुयोग प्राप्त होने पर वह विकास पाता है और समीप के पुदगलों को खींच अपने रूप में परि- णित कर वड वृक्ष के रूप में बनाता है । इसी तरह प्रत्येक वृक्ष अनुकुल सयोग प्राप्त होने पर 4 १

( ७७
उत्पन्न होकर चढते है और प्रतिकुल सयोग पा
नाश पाते है
३३ १०-धर्म, पुण्य, पाप इनमे क्या फर्क है ?
उ.-जीन के साथ बंधने वाले शुभ कर्म पुन्य और .
अशुभ कर्म पाप तथा जीव से कर्म की निर्जरा
होना ( छूट जाना ) धर्म गिना जाता है ।
३४ प्र-किमी जीव के पास सिर्फ पाप कर्म या सिर्फ
पुन्य कम ही हो सक्के हे या नहीं ?
उ०-नहीं अधिक या कम परन्तु पाप कर्म और
पुन्य कर्म, दोनों रहते है।
गुण स्थानका
( पाठ तेरहवां)
१५०-जीव के गुण की एक २ से उन्नत मीढियों के
म्थान को क्या कहते हैं ? उ. गुण स्थानक ।
२ प्र०-गुण स्थान का विशेषार्थ दृष्टांत देकर समझायो।
उ० जसे किमी वास स्थान पर जाने में रास्ते में
स्थान या स्टेशन पर से होकर जाना होता है
तथा किसी मंजिल पर जाना हो तो सोपान की
पत्तियों पर मे उसी मजिल पर जाना पड़ता है
उसी तरह जीव को मुक्ति रूप अचल स्थान पर
पहुचने में जो २ गुण स्थानक पसार करने
पत्ते है वे गुणम्थान कहलाते है ।
३ न०-गुण स्थानक कितने और कौन से हैं ?
1

( ७८. marvws - उ०-चौदह, १ मिथ्यात्व २ साचादान ३ मिश्र ४ अविरति सम्यक दृष्टि ५ देशविरति ६ प्रमत संजति ७ अप्रमत सजति ८ निवृति बादर । अनिवृति चादर १० सूक्ष्म संपराय ११ उपशात मोह १२ क्षीण मोह १३ संयोगा केवली १४ अयोगी केवली। ४ प्र०-मिथ्यात्व अर्थात् क्या? उ.-दृष्टि का विपर्यास ( सोटापन)। ५ प्र०-मिथ्यात्व को पात से अधिक पुष्ट करके स- मझायो। उ०-जैसे धतुरे के चीज खाने वाला सफेद वस्त को पीली देखता है वैसे ही मिथ्याल मोहनी कम के उदय से प्राणी जगत का वास्तविक स्वरूप यात्मा का हित, सुख का मार्ग, शाति का श्रागार नहीं देस सत्ता सद्धर्म सद्गुरु सत्य देव, मिथ्यात्व के दवाब से नहीं पहचान सक्ता और देह को ही आत्मा समझता है। ६ प्र०-जीव को मिथ्यात्व कब से लगा होगा? उ०-अनादि काल से जीव मिथ्यात्व गुणस्थानक रहा हुआ है। ७ प्र०-मिथ्यात्व में ऐसा कौन सा गुण है जिसमे मि- थ्यात्व गुण स्थानक कहलाता है। उ.-मिथ्यात्व में रहने से गुप्त सर्व ज्ञान में से अक्षर के अनत वे भाग जितना ज्ञान प्रकट रहता है इस- लिये उसे गुण स्थानक कहते हैं। - में

,
+
१५ म०-इन पाचो मिथ्यात्व में से अधिक खराब मिथ्या-
उ-अभिनिवसिक अधिक सराप दे क्योंकि जान
( ७६ )
सन -जीव को इतना भी प्रकट झान न रहे तो?
उ.-ज्ञान का गुण तनिक भी प्रकट न हो तो जीव
का नाश हो अजीर हो जाय परन्तु ऐसा कमी
नहीं हो सका।
१.प्र०-मिथ्यात्व मुख्य कितने प्रकार का है ?
उ०-पाच,अभिग्राहिक, अनभिग्रहिक, अभिनिवमिक,
संशयिक अण्णाभोगक।
१० प्र०-अनियहिक यथात् क्या ?
-प्रत्येक असत्य (मिथ्या बात को) को बिना
विचारे ग्रहण कर रखने की मृढ़ता ।
११ प्र. अनभिग्राहक अर्थात् क्या ?
उ०-किसी बात का निर्णय किये बिना सांच, झूठ,
की स्वीकृति करे।
१२ प्र.-अभिनिसिक अर्थात् क्या ?
उ०-यमझ बूझ कर अपना दुराग्रह रक्से छोडे
नहीं।
१३ प्र०-सायिक अर्थात् क्या
उ.--प्रत्येक सच नात में भी शका रक्से
१४ प्र०-प्रणामागिक अर्थात् क्या ?
उ०-चे भानावस्था, जिस में किसी बात की कुछ
त कौनसा और कुछ ठीक कौन सा ?
--
सपर न रहे
बूझ कर खाली दुराग्रह करता है इसलिये यह

(८०)
1
दुःसाध्य बीमारी के सदृश है और अनाभिग्राहक
ठीक है कारण कि उस में नम्रता के गुण हे
और सोटे के साथ अच्छे को भी स्वीकारता है
इमसे उम में मार्गानुमारा पना प्राप्त होता है ।
१६ प्र०-मार्गानुसारी अर्थात् क्या ? *
उ.-अनादि काल से ससार में परिश्रमण करते हुए
जीन का मोक्ष के मार्ग तरफ लगना ।
१७ प्र - इन पाचों के मिनाय मिथ्यात्व का समावेश कान
से मिथ्यात्व में होता हे ? उ०-अभिग्रहिक में।
१८ प्र०-दूसरे गुण स्थानक का नाम क्या ?
उ०-साश्चादान सम्यक्त्व ।
१६ प्र०-माश्वादान का अर्थ क्या ?
उ०-आश्वादान सहित वह साचादान
२० प्र० आधादान फिसका ?
उ० उपरोक्त गुण स्थानक को त्यागते ही इम गुण
म्यान में जीव छावलिका जितना समय रहता
है अर्थात् उपरके स्थान से नीचे के स्थान में
आते हुए मध्य के समय में पूर्व के गुण का
स्वाद रहता है वह ।
२१ प्र०-साश्चादान एक भवमें कितने समय आता है ?
उ०-पाच वक्त ।
विशेष जानना हो तो "मार्गानुसोरी" के ३. गुण की
पुस्तक का टिकिट भेज़र मगायो। पता
जैन पुग्नक : काशक कार्यालय, न्याधर रा पू)
प्रकाशक
-

२२ प्र०-एक समय जिन्हें साश्चादान आता हे उसका
फल क्या
उ०-कृष्ण पक्षी था वह शुक्ल पक्षी हुआ, अमख्य
ऋण मिट कर स्वल्पऋण रहता है वैसा फल
होता हे।
२३ प्र--माश्चादान सम्यक्त्वी उत्कृष्ट कितने समय में
मोक्ष जाता है ?
उ० अर्द्ध पुद्गल परावर्तन में असिर मोत जाता है।
२४ प्र०-पुद्गल परावर्तन का समय कितना? उ० -अनती
उत्मर्पिणी और अवसर्पिणी जिमम समाजाय ।
२५ प्र०-तीसरे गुणस्थानक का नाम क्या है ?
उ०--मित्र गुणस्थानका
२६ प्र०--मिश का अर्थ क्या ?
उ०-मम्यक्त्व र मिथ्यार की मिश्रता।
२७ प्र०-मिश्रपने को दृष्टात से समझाओ? उ०-जिम
तहर श्री पड में मिठास और सटाम दोनों
साथ २ रहते हैं. सध्या समय रात, दिन का
मिश्र पना रहता है उमी तरह मध्यम भार
उत्पन्न होता है उसे मिश्र गुण स्थानक कहते है।
२८ प्र०-उसकी मान्यता कमी होती है ?
उ०-मत्य
और असत्य दोनों मार्ग की ओर रुचि रखता
हो, एक में भी निश्चित न हो परन्तु गमागील हो ।
-मित्र गुणग्यानक की स्थिति कितनी है ?
उ०-अतर मुहुर्त रह कर या तो ऊपर चढ़ता है या
नीचे गिरता है।
'.
२६ प्र
-

(८०) ? दुःसाध्य बीमारी के सदृश है और अनाभिग्राहिम ठीक है कारण कि उस में नम्रता के गुण हे और सोटे के साथ अच्छे को भी स्वीकारता है इससे उम में मार्गानुमारा पना पास होता है । १६ प्र०-मार्गानुसारी अर्थात् क्या ? * उ.-अनादि काल से ममार में परिश्रमण करते हुए जीत का मोक्ष के मार्ग तरफ लगना । १७ प्र.-इन पाचों के सिवाय मिथ्यात्व का समावेश कान से मिथ्यात्व में होता है ? 3०-अभिग्रहिक में। १८ प्र०-दूसरे गुण स्थानक का नाम क्या ?, उ०-साधादान सम्यक्त्व । १६ प्र० माश्चादान का अर्थ क्या ? उ०-पाश्चादान सहित वह साचादान । २० प्र० प्राश्चादान किसका ? उ० उपरोक्त गुण स्थानक को त्यागते ही इस गुण स्थान में जीव छै आवलिका जितना समय रहता है अर्थात् ऊपरके स्थान से नीचे के स्थान में आते हुए मध्य के समय में पूर्व के गुण का माद रहता है वह । २१ प्र०-साश्चादान एक भवमें कितने समय प्राता है ? उ.-पाच वक्त । , विशेष जानना हो तो "मार्गानुसारी" के ३५ गुण की पुस्तक का टिकिट भेजकर गानो। पता जैन पुस्तक काशक कायालय, व्याघर पू) . N . प्रकाशक

?
२२ प्र०-एक समय जिन्हें साधादान आता है उसका
फल क्या
उ०-कृष्ण पनी था वह शुक्ल पक्षी हुआ, अमरख्य
ऋण मिट कर स्वल्पऋण रहता है वसा फल
होता है।
२३ प्र--माश्चादान सम्यक्ती उत्कृष्ट कितने समय में
मोन जाता है ?
ब० अर्द्ध पुद्गल परावर्तन में असिर मोक्ष जाता है।
२४ प्र०-पुद्गल परावर्तन का समय कितना? उ० -अनती
उत्मार्पणी और असर्पिणी जिमम समाजाय ।
२५ १०-तीसरे गुणस्थानक का नाम क्या है ?
उ०-मित्र गुणस्थानका
२६ प्र०-मिय का अर्थ क्या?
। उ० सम्यम्व और मिथ्यात्व की मिश्रता।
२७ प्र०-मिअपने को दृष्टात से समझाओ? उ०-जिस
तहर श्री संड में मिठास और खटास दोनों
साथ २ रहते हैं सध्या समय रात, दिन का
मिश्र पना रहता है उसी तरह मध्यम भार
उत्पन्न होता है उमे मिश्र गुण स्थानक कहते है ।
२० प्र०-उसकी मान्यता कैसी होती है ?
उ०-सत्य
और असत्य दोनों मार्ग की ओर रुचि
हो, एक में भी निश्चित न हो परन्तु शकाल
२६ प्र०-मित्र गुणग्थानक की स्थिति कितनी है ?
उ०-अतर मुहुर्त रह कर या तो ऊपर बहता
नीचे गिरता है।

(८२ ।
३० प्र०-चौथा गुण स्थानक का नाम क्या है ?
उ०-अविरति सम्यक्त्व ।
३१ प्र०-अविरति सम्यक्त्व का अर्थ क्या १
उ.-असत्य मान्यता को त्याग सत्य मानने की
श्रद्धा हो परंतु ब्रतको न आदर सके।
३२ प्र०-सम्यक्त्व के कितने भेद है?
उ०-पाच क्षायिक क्षयोपशमिक, भौपशमिक, सा
श्वादान, और वेदक।
२३ प्र. क्षायिक, क्षयोपशामिक और औपशमिक का
अर्थ क्या?
उ०-मोहनीय कर्म की मूल दो प्रकृतिया हैं ? चारित्र
मोहनीय २ दर्शन मोहनीय । इनमें से चारित्र
मोहनीय की २८ प्रकृतिया हैं और दर्शन मोह
नीय की तीन, १ समकित मोहनीय २ मिश्र
मोहनीय ३ मिथ्यात्व सोहनीयं । ये तीन और
दर्शन मोहनीय की २८ प्रकृति । चार अनतानु
वधी क्रोध, मान, माया, लोम इन सात प्रकृति
का क्षय करने से क्षायिक समकित गिनी जाती
है । इनका उपशम करने से उपशम समकित
और कुछ क्षय और कुछ उपशम करने से क्षयो
पशमिक समाकित गिनी जाती है।
३४ प्र०-अनतानु वधी कषाय अर्थात् क्या ? उ.- अनन
है अनुबंध जिससे अर्थात् जो तीव्र कषाय के
सेपन से भनत कर्म के पुद्गलों का बंध अनुक्रम
से पडता है।
1
.
1

(८३)
१५ प्र०-ममकिन मोहनीय का थोड़े में शब्दार्थ कहो।
उ० -समाकत होते भी मोहनीय की अमुक प्रकृति
द्वारा सीजना पडे
३६ प्र०-मिथ्यात्व मोहनीय अर्थात् क्या ? उ०-मिथ्यात्व
में गिरना पडे वह।
३७ प्र०मिश्र मोहनीय अर्थात् क्या ? उ०-कुछ समकित
और कुछ मिथ्यात्व इन दोनों के मिश्र में रहना
परे वह
३८ प्र०-पाचवें गुण स्थानक का नाम क्या है ? और उसका
भर्य क्या?
उ०-समकित सहित शक्ति अनुसार व्रती को अंगी-
कार करना अर्णव पाप को देश से तजना यह
देश विरति नामक पाचवां गुण स्थान गिना
जाता है।
३६ १०-इस गुण स्थान में कितनी प्रकृतियों का भयो-
पशम होता है?
.-सात, प्रकृति पहिले कही हुई वे और अप्रत्या
ख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ इन ग्यारहो
का क्षयोपशम होता है।
४. प्र.-इस गुण स्थान वाला जीर कितने मव में मोष
जाता है?
उ.-जघन्य तीसरे भव और उत्कृष्ट पंद्रहवें भव मोर
जाता है।
५१ प्रदेश चिरति में सास किवने और कौन से गुव
पकद होते है।

---
उ-ये दोनों सर्व विरति होते हुए भी सयम में थाना
बहुत प्रमाद सेवने वाले होते है वे प्रमत संयनि-
(४)
उ०-कवीस-अल्प इच्छा, अल्पारम्भ, अल्परिग्रह
मुशील धर्म वृत्ति, पाप भीर नीति निपुरा
एकांत आर्य, विवेक दृष्टि, न्यायालम्पो जा
श्राराधक, अनुरु, निष्कपट, कोमल लाकपिट
सौम्य, परगजु विनित, कृतज्ञ, सरल स्वभा
पार गत्यानुप्रेती।
४२ प्र.-एसे डकवीस गुण वाले श्रावक के कितने व्रत है।
उ०-बारह, याच अणुव्रत, नीन गुण व्रत,
शिक्षा व्रत।
४३ प्र.-श्रानरूपना एक भव में मन से कितने म
उ०-प्रत्येक (नव ) हजार समय आता है।
४४ प्र-छटवें, सातवे, गुणस्थानक के नाम क्या ?
उ०-प्रमत मंयति और अप्रमत संयति ।
४५ प्र०-प्रमत और अप्रमत संयति का अर्थ क्या ?
और संयम में प्रमाद, सेवने हारे न हों उन्
अप्रमत संयति कहते है।
४६ प्र०-छट्टे और सातवें गुण स्थानक में कितनी प्रकृतिय
का क्षयोपशम होता है.
* विशेष जानने के लिये "धावक वर्म दर्पण"
माग ) के टिकिट भेजकर भगाओ । पता
जैन पुस्तक प्रकाशक कार्यालय,
अाता है ?
-
द्विनी
व्यावर (रा पू)
प्रकाशक

- (८५) : उ-छट्टै गुणस्थान में ग्यारह प्रकृति पहिले कही व और प्रत्याख्यान के क्रोध मान, माया, लोभ यों पद्रह प्रकृति का क्षयोपशम होता है और सात गुणस्थान में संजल के क्रोध सहित सोलह प्रकृतियों का क्षयोपशम होता है। ४७ ४०-छछे, सात गुणस्थान में कौन होता है ? उ.-पांच महानत धारी साधु पुरुष । ४८ प्र०-साधुपना एक भव में मन से कितने समय प्राता है ? उ०--उत्कृष्ट नव मौ वार । ४६ प्र--पाठ गुणस्थानक का नाम क्या ? यौर उसमें कितनी प्रकृतियो का क्षयोपशम होता है ? उ० -पहिले की हुई सोलह प्रकृति और मजल का मान मिल कर १७ प्रकृति का क्षयोपशम होता है उसको निवृति चादर गुणस्थान कहते हैं । ५. प्र. -उस गुणस्थानक की कमी स्थिति होती है ? उ०-शुक्र ध्यान प्रकट होता है, सहज समाधि रहती है, कल्यवान रूप सूर्य के उदय के पूर्व ही अनुमर रूपज्ञान अरुणोदय प्रकट होता है । ५१ म०-इस गुणस्थानक में हरएक जीव जाने वाला श्रत में केवल्यज्ञान की सीमा तक पहुच सक्ता है ? उ०-इस जगह उपशम और क्षपक ऐसी दो विचार की ग्रेणिया हैं। इनमें मे जो उपशम श्रेणी पर चढता है वह ग्यारहवं गुणस्थान में जाकर प- तित होनाता है, और क्षपक श्रेणी में चढ़ता है वह कर्म के दल को तोड़ते २ समय-२ पर अ.

--
1
नत-गुनी विशुद्धि करते तेरहवें- गुणस्थान
जा केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है।
५२.७०-इम गुणस्थानक का दूसरा नाम क्या है ?
30-अपूर्व करण । पहिले प्राप्त नहीं हुआ ) गुण
स्थानक।
५३ प्र०-इम गुणस्थान वाला कितने भव करके मोक्ष जाता
उ०-जघन्य इसी भव में, और उत्कृष्ट तीसरे भन.
५४ प्र०-निवृति वाटर का अर्थ क्या ?
उ.-चादर कपाय से निचर्तित ।
५५ प्र०- नवमे गुणस्थानक का नाम क्या ? और इसमें
कितनी प्रकृतियो का क्षयोपशम होता है।
उ०-सतरह पहिले कही वे, और संजल की माया,
स्त्री वेद पुरुप वेद, नपुंसक वेद यों इकबीस
प्रकृति का क्षयोपशम करता है उसको अनिवृति
चादर गुणस्थानक कहते हैं।
५६ प्र०-अनिवृति चादर का अर्थ क्या?
उ०-सर्वथा क्रिया द्वारा निवृति नहीं परन्तु बादर
संपराय क्रिया रही।
५७ प्र०-दसवें गुणस्थानक का नाम क्या ? और उसमें
कितनी प्रकृतियों का क्षयोपशम होता है।'
उ०-एकवीस पहिले कही वे और हास्य, रति,
भय, शोक जुगुप्सा इन सत्ताईस प्रकृतियों का
क्षयोपशम करता है उसे सूक्ष्म संपराय नामक
दसवा गुण स्थानक,कहते हैं।
५८ प्र-सूक्ष्म सपराय अर्थात् क्या ?
अरति
4

(८७ ) । उ०-सूक्ष्म अर्थात् थोड़ी सम्पराय क्रिया अर्याद छदमस्त की क्रिया रही है उसे सूक्ष्म संपराय । कहते हैं। - ५६ प्र-ग्यारहवें गुणस्थानक का नाम क्या ? और उसमें कितनी प्रकृतियों का क्षयोपशम होता है ? उ.-सत्तावीस पहिले कहीं वे और संजल का लोम ऐसी अहाइस प्रकृति का उपशम करता है उसे उपशांत मोह नामक ग्यारहवां गुणस्थान कहते हैं ६०५-उपशांत मोह का अर्थ क्या ? उ०-उपशात अर्थात् जिसने मोह सर्वथा दया दिया है अर्थात् पानी के नीचे मैल स्थित रहता है, परन्तु पानी निर्मल दृष्टिगत होता है, उसी तरह यहां पर मोहनी कर्म के उपशम होने से श्रद्यवसाय निर्मल होते है। ६१ प्र.-इस गुणस्थानक का परिणाम क्या ? उ०-इस गुणस्थानक में जो मर जाय तो अनुत्तर विमान में जाकर देवता हो, और चौथे गुण स्थानक में रहे और नहीं तो अवश्य पतित हो तब दस से प्रथम गुणस्थानक में पाजाय परन्तु वहा से आगे न चढ़े। ५२ प्र-पारहवें गुणस्थानक का नाम क्या ! और इस- में कितनी प्रकृतियें दवती है ? उल-पहिले कही हुई अहाईस प्रकृतियों को सर्वथा दबाता है उसे चीण मोहनीय नाम का बाहर- वां गुणस्थान कहते हैं।

( ८८ ) . - ६३ प्र०-उस गुणस्थानक : की स्थिति (परिणाम ) कमी होती है ? उ०-क्षपक श्रेणी, क्षायक भाव, क्षायक समीकत, और यथा ख्यान चारित्र्य में रहते कारण सत्य जोग सत्य, भाव सत्य, अमाथी, अकपाई वि तरागी, अविकारी, महाज्ञानी, महाध्यानी, वर्ष । मान परिणामी, अप्रतिपाति होता है, वहां अतर :: मुहुर्त रहता है और इसी जगह ज्ञानावरणीय, द- र्शना वरणीय, अंतराय का-भी, क्षय कर तेरहवें गुणस्थानक के पहिले समय में ही केवल ज्योति , प्रकट करता है उसे क्षीण मोहनीय गुणस्था- नक कहते हैं। ६४ प्र०-तेरहवें गुणस्थान का नाम क्या ? और उसका लक्षण क्या ? उ०-चह दश घोल सहित हो, सजोगी, सशरीरी, स- लेशी, वीतरागी, यथा ख्यात चारित्री क्षायिक सम्यक्त्वी, पडित वीर्यवान, शुक्लध्यानी, केवल :- “ज्ञानी, केवल दर्शनी होता है उसे सजोगी केवली गुणस्थानक कहते हैं । ६५ प्र०-उस गुणस्थान में कितने समय रहता है । उ०-जघन्य अंतर मुहुर्त और उत्कृष्ट थोडा कम क्रोड पूर्व। ६६ प्र.-तेरहवें गुणस्थानक में रहे हुए कैसे गिने जाते हैं। उप-केवली भगवान, जग दुद्धारक अनंतज्ञान ढ- शेन के आधार भूत, भविष्य, वर्तमान, काल 1 . . -

के सर्व भावों को एक समय में यथार्थ रीति से
जानने वाले।
६७ प्र०-चौदहवें गुणस्थानक का नाम क्या?
उ.-अयोगी केवली गुणस्थानक ।
६८ प्र० अयोगी केनली अर्थात् क्या ?
उ-इस गुण स्थान में मन, वचन, काया के जोग
और प्राण का निरोध कर रूपातित परम शुक्ल
ध्यान में अडोल स्थिति में पचाचरनाले जितने
समय तक रह चार (वेदनी, आयुष्य, नाम, गोत्र,)
कर्म का क्षय कर शरीर से मुक्त होता है ।
६६ प्र०-तेरहवें गुणस्थानक में कितने कम्मों का क्षय
होता है ?
उ०-मोहनीय ज्ञानापरणीय, दर्शना बरणीय, अतराय
इन चार धनधातिय कर्म का क्षय होता है, और
याकीके चार जली हुई रस्सी के समान रहते हैं।
७० प्र०-चौदहवं गुणम्थानक से मुक्त हो कहा जाते हैं ?
उ०-सिद्ध क्षत्र में, अनत सिद्ध स्वरूप में विराजित
होते हैं।
७१ १०-वे सिद्ध भगवान इस लोक में कभी आते है?
उ०-नहीं उनको यहा पाने का कारण नहीं अर्थात्
कभी भी नहीं पाते।
७२ प्र०-उनकी शक्ति किम प्रकार की होती है ?
उ.-धनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, श्रनन चल, वीर्यः
अनत तेज, प्रखड ग्रानन्द, और अनंत भान्या
वाघ, आत्मसुस, के धर्ता है।

(६०)
७३ प्र०-उनका स्वरूप कैसा होता है ?
उ०-उनका स्वरूप अगम्य, अगोचर, अवाच्य अलक्ष
अचल. और अनंत स्वरूपी होता है।
७४ प्र०-सद्ध हुई आत्मा एं कितनी होगी ?
उ०-भिन्न २ आत्माएं सिद्ध पर पाई है इस पक्ष से
अनंत सिद्ध है, और सनका स्वरूप समान है इ
ससे एक है । जहा अंनत है वहां अनंत है जहा
एक है इस पक्ष से एक गिनी जाती है।
कर्म प्रकृति के प्रश्नोत्तर ।
पाठ चौदवा
१ प्र०-जीवको दुस सुख देने का निमित्त कौन है ?
उ०-जीव के वाधे हुए शुभा शुभ कर्म ।
२०-ये कर्म कितने प्रकार के है ? उ. - आठ ।
३ प्र०-उनके नाम कहो ?
उ०-ज्ञानापर्णीय, दर्शनावरणीय, वंदनीय, मोहनीय,
आयु नाम, गोत्र, अतराय ।
४ प्र०-प्रत्येक कर्म जीर की कोन २'सी शानियों के
अवरोव करने वाले हैं।
• ज्ञानकी अनंत शक्ति को दबाने वाला है, दर्शना
चरणीय दर्शन को, वेदनीय आत्मीय अनत सुख
को, मोहनीय क्षायिक सम्यक्त्व का, आयुष्य अक्षम
स्थिति गुण कों, नाम कर्म अमूर्ति' गुण को,
गोत्र अगुरु लघु गुण को, अंतराय आत्मिक
अनन्त शाले को रोको नाला
,
उ०-जाना वरणी ये
१
।

"
५ प्रक-ज्ञाना वरणीय कर्म कैसे बन्धता है।
उ०-झानी के कार्य में विघ्न डालने से, उनका उपकार
भूलजाने से, उनका अपमान करने से, उनके
साथ नितडानाद करने से झगडालेश, द्वेष तथा
किसीके ज्ञान की अंतराय देने से ज्ञाना वरणीय
कर्म का बन्ध होता है।
६ प्र०-इस बम का क्या फल है।
उ.-मति ज्ञानादि कोई ज्ञान पैदा नहीं होता है तथा
पाच इन्द्रिया का ज्ञान या विज्ञान भी नहीं होता
है वह जड मूह पशु सा रहता है ।
७ प्र०-उस कर्म की स्थिति कितनी है ? उ०-जघन्य
अनमुहर्त की, उत्कृष्ट तीस कोडाकोड सागर की।
प्रा-दशनापरणीय कर्म कैसे बन्धता है ।
उ.-दर्शन सम्यक्त्व-अथवा शासन या दर्शन शक्ति)
में विन करने से, टेढ़े बोलने से, त्रुटि देखने
से, असातना करने से, उनके विपच भूव बनने
से, तथा हर किमीको इनकी पतराय देने से
दर्शना चरणीय कर्म का वध होता है।
९ प्र०-इस कर्म का क्या फल है ? उ०-देखने में
प्रत्येक शक्ति से ये नमीन रहता है, चनु दर्शन
मे पारम्भ कर कोई सत्य दर्शन नहीं होता।
१० प्र०-दर्शनावरणीय कर्म की स्थिति कितनी है?
उ -ज्ञानापरणीय के अनुसार ।
११ प्रावेदनीय कर्म के कितने मंद है?
उ- ढो० साता, अमाता वंदनीय ।

(६२)' . १२ प्र० -साता वेदनीय कर्म कैसे बनते है ? उ. प्राणियों को शांतता देने से, दया, अनुकम्मा करने से, कोई प्रकार की पीडा, दुःस, अमाता नहीं देने से, साता वेदनीय कर्म का बंध होता है। १३ प्र०-साता वेदनीय कर्म का बंध कैसे होता है ? उ. प्राणियों को प्रशान्ति देने से निर्दयता करनम, शारिरिक या मानसिक दुःख देने से असाता चंदनीय कर्म का बंध होता है । १४ प्र०-यह साता या असाता वेदनीय कर्म क्या फल देता है? स-सातावेदनीय से शारिरिक तथा मानसिक दोनों प्रकार के मनोज्ञ सुख, शान्ति, और इनके अनुकुल हर एक सयोग प्राप्त होते हैं। अमाता वेदनीय से अमनोज्ञ सामग्री मिळती है दुःख अशाति, व्याधि, व्याकुलता, पराधीनता पीडा, और हर एक प्रकार के प्रति कुल संयोग प्राप्त होते है। १५ प्र०-साता चेदनीय की स्थिति कितनी है ? उ०-जघन्य दो समय की उत्कृष्ट पन्द्रह कोडा कोड सागरोपम की। १६ प्र०-असाता वेदनीयं की स्थिति कितनी है ? उ.-जघन्य एक सागर के भाग में से ३ भाग में एक पल्य के असख्यातवें भाग कम की और उत्कृष्ट तीस कोडां क्रोड सांगरोपम की। १७ प्र० मोहनीय कर्म कैसे बंधते हैं? - , , . . ।

उ०-तीन क्रोध, मान गाया, लोम करने से, जीयो को वश करने से, प्रग्य रीतिसे मारने मे अथवा उपदेश से किसी को प्रतिकूल समझा कर मारने में १८६०-मोहनीय कर्म का फल क्या? उ.- इस मोहनीय कर्म की २८ प्रकृतियों में में जितने प्रकार की प्रकृतियों की तीनता मंदता हो उनमें यह घिरा रहे. सत्य वस्तु को न पहचान सके और असत्य में ही लित रहे। १६ प्र. उसकी स्थिति किस प्रकार की होती है दृष्टान्त द्वारा समझायो -जैमे मद्य पान के नशे से भान रहित मनुष्य हिताहित के मार्ग को नहीं समझ सक्ता, अनमंदी खो वैटता है, उसी तरह मोहनीय कर्म के उदय से मनुष्य आत्मज्ञान, मत्यमार्ग, हित के साधन और अपने कर्तव्य नहीं समझ सक्ता । २० प्र० मोहनीय कर्म की स्थिति कितनी है ? उ०-जयन्य अतर मुहूर्त की उत्कृष्ट मित्तर क्रोडा कोड सागर की। २१ प्र० आयुष्य कर्म के कितने भेद हैं । उ -चार, नार की, मनुष्य, त्रियच, देव । २२ प्र०-इन चारों में से नारकी का आयुष्य कैमेवधता है? उ-महा आरंभ समारम करने से महापरिग्रह सेवन क- रन से, सदा, मद्य माम का श्राहार करने से पंचेंद्री प्राणियों को बिना अपराध घात करने से इत्यादि ऐसे महा अनर्थ, अकार्य, जुल्म करने से नारकी का आयुष्य अधवा है।

२३ प्र०-तियेच का आयुष्य कैसे बांधा जाता है ? उ० माया कपट. करने से, प्रपंच जाल फैलाने स, कम ज्यादा तोल नाप की वस्तुएं रख अन्य का ठगने से, विश्वासघात, असत्य, छल, दगा कर दूसरो को ठग लेने से २४ प्रक-मनुष्य का आयुष्य कैसे बंधता है ? उ -दया से, भद्र प्रकृति से, विनीत प्रकृति से, और अभिमान रहित सरलता से । २५ प्र०-देव का आयुष्य कैसे बंधता है। उ०-न्याय पूर्वक गृहस्थ धर्म ( श्रावक व्रत ) का पालन करने से, मुनि धर्म ( साधु व्रत । फा पालन करने से बाल तपश्चर्या करने से, और यकाम निर्जरा से। २६ प्र. देवता नारकी का आयुष्य कितना है ? उ०-जघन्य दश हजार वर्ष का तेतसि सागदोपम का। २७ प्र०-मनुष्य तिर्यंच का श्रायुष्य कितना है ? उ०-जघन्य अंर्त मुहुर्त का उत्क्रय तीन पल का । २८ प्र०-नाम कर्म के कितने भेद है। उ०-दो शुभनाम कर्म, अशुभनाम कर्म । २६ -शुभ और अशुभ नाम कर्म कैसे बंधता है । उ०-मन, बचन,काया को मरलता से, योग्य रीति से, न्याय मार्ग पर प्रवृत करने से तथा दूसरों की श्राकाक्षाओं को दुःख पहुच ऐमा कोई वित- डापाद न करने से शुमनाम कर्म बंधता है और इनके विपरीत चलने से अशुभ नाम कर्म का संचय होता है। ३० प्र-यह शुमा शुभनाम कर्म क्या फल देता है ? - ।

उ० शुभ नाम कर्म के फल से इष्ट, शब्द, रूप, गंध,
, रस, स्पर्श गति, स्थिति, लावण्य, यश कीर्ति
बल वीर्य, पुरुषार्थ पराक्रमे स्वरादि मनोज्ञ प्रास
होते हैं, और अशुभ नाम कर्म स इनके प्रतिकूल
यमनाज्ञ सुख प्राप्त होते हैं।
३१ प्र०-नामकर्म की कितनी स्थिति है ? उ०-जघन्य
आठ मुहुर्त की उत्कृष्ट बीस कोडा कोड मागर
की।
३२ प्र०-गोत्र कर्म के कितने मेद है?
१०-दो उच्च गोन, नीच गोत्र ।
३३ प्र०-उंच, नीच, गोत्र कैसे वन्धता है ?
उ -जाति,कुल चल रूप,तप, शास्त्र, लाम एश्वर्यताहन
आठ प्रकार के मदसे नीच गोत्र का वध होता
है और ये वस्तुए प्राप्त होने पर भी यह न को
तो उन्च गोत्र का वध होता है ।
३४ प्र -3च, नीच गोत्र कर्म का फल क्या है।
उ. उन्च गोन से जाति, लाभ, कुल, चल, रूप,
तप, शास्त्र ऐश्वर्य उच्च मिलते हैं, और नीच
गोत्र से ये पाठों वस्तुए हलकी एव, तुच्छ
मिलती है।
३५ प्र०- इस गोत्र कर्म की कितनी स्थिति है ?
उ.-जयन्य पाठ मुहुर्त की उत्कृष्ट बीम फोड़ा फोड
सागरोपम की।
३६ १ -पतराय कर्म कितनी रीति से बघता है ?
-
,

.
"
।
+
उ०-दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य उनका
किसी जीव के उपभोग में , ( अतराय ) रोहे
अटकाने से ।
३७ प्र.अतराय कर्म का क्या फल है ?..
उ.- जो मनुष्य किसी को जैसी अंतराय ,दे वैसाही
अन्तराय उसे मिलती है उस वस्तु का प्रयत्न करने
पर भी वह प्राप्त नहीं हो सक्ती।
३८ प्र० इस कर्म की कितनी स्थिति है ?
उ०-जघन्य अंतर मुहुर्त की उत्कृष्ट बीस क्रोडा कोड
सागरोपम की।
त्रैसठ श्लाध्य पुरुपों सम्बन्धी प्रश्नोत्तर ।
, पाठ पंद्रहवा
१ प्र०-इस अवमर्पिणी काल में अपने आर्यावर्त में
कितने तीर्थकरे हुए ? उ०-चौईस ।
२ प्र०-चाकी रहे हुए। चार भरत और पांच इर व्रत
कितने तीर्थकर हुए
उ०-उन प्रत्येक भरत और इर व्रत में चौवीस २
तीर्थकर इस अवमर्पिणी काल में हुए ।
३ प्र०-एक कालचक्र में एक २ क्षेत्र में कितनी चौवीसी
होती है ?
उ-दो, (एक उत्सर्पिणीमें, एक अवसर्पिणी ।)
४ प्र०-एक पुद्गल परीवर्तन में कितनी चौवीसी होती है।
उ०-अनन्ती।
में
,

(६७) १ हुए 8 प्र-पहिले कितनी चौबीसी हुई होंगी ? उ० अनती. प्र०-आते (भविष्य ) कालमें कितनी चौबीसी होगी ? उ०-अनंती ७ प्र-तीर्थकर कौन २ से आरे में हुए? उ-तीसरे और चौथे मैं ८ प्र०-उन चौनीम तीर्थकरों के नाम कहो ? उ.-पभदेव से महावीर स्वामी ९ प्र०-इन चौबीस तीर्थकरों में से तीसरे बारे में फितने और चौथे बारे में कितने हुए उ०-एक प्रथम तीर्थकर तीसरे ओरे में और बाकी के सब तीर्थकर चौथे बारे में हुए । १० प्र०-ऋषभदेव भगवान का दूसरा नाम क्या है ? उ.-प्रदिनाथ, आदि जिनेश्वर, अर्थनी, आदिश्वर, ''प्रयह नाम क्या दिया गया ? उ०-उन्होंने जुगल्या धर्म दर कर धर्म की मादि की जिसस यादिनाथ नाम पड़ा १२ प्र०पमदेव भगवान ने दूसरा क्या कार्य किया ? उ०-पुरुषों की ७२ कला और' स्त्रियों की ६४ कला लोकों को सिखाई। १३ प्र०-प्रथम कलाए सिखाई या धर्म स्थापित किया ? उ०-पहिले कलाए सिखाई और फिर राजपाट त्याग दिक्षा ली, दिक्षा लेने के १०० वर्ष पश्चात् केवल्य प्रान प्रकट हुआ और फिर धर्म की स्थापना की अर्थात् , मन्तक्षेत्रमें चार सर्धिका विच्छेद होगया या उनकी फिर स्थापना की? - .. " T . .

.६८) . J ? १४ प्र०- अपभदेव भगवान के कितने पुत्र थे ? उ०-मो। १५०-उनके सबसे बड़े पुत्र का नाम क्या उ.-भरत। १६ प्र०-भरत राजा कौनसी बही पदवी पाये थे ? उ०-चक्रवर्ती राजा की। १७ प्र०-चक्रवर्ती राजा किसे कहते हैं? उ०-जो चक्र द्वारा भरतक्षेत्र के छहाँ खडॉ का साधन करते हैं उसी तरह जो चौदहों रन तथा नौ निधान प्रभृति मोटी रिद्धि दे, स्वामी होते हैं वै चक्रवर्ती कहलाते हैं। १८ प्र०-एक २ चौबीसी में ऐसे कितने चक्रवर्त होते हैं? उ०-चारह । १६ प्र.-अपने भरत क्षेत्र में उत्पन्न बारहों चक्रवर्ती के " १ 7 नाम कहो। हरिषे- उ०-भरत २ सगर ३ मधक ४ सनत्कुमार ५ शांति ६ कुंथु ७ भरह ८ सुंभूभ महापद्म १० ण १.१ जय १२ ब्रह्मदत्त। २० प्र०-तीर्थंकरों की और चक्रवर्तियों की किन • ने पदवी पाई.१ उ०--शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरिनाथ, । २१ प्र०- चक्रवर्ती होकर तीर्थकर कैसे हुए ? उ० चे पहिले चक्रवर्ती राजा थे फिर संयम लेकर तीर्थकर पद को प्राप्त हुए। २२ प्र०-चक्रवर्ती मरकर कौनसी गति में जाते हैं। - (६) . उ०-जो चक्रवर्ती की रिद्धि त्यागकर संयम लेते हैं चे अवश्य मोक्ष या देवलोक में जाते हैं और जो चक्रवर्ती पद में ही मरते हैं वे अवश्य नरक गति में जाते हैं। २३ प्र०-चक्रवर्ती से प्राधा राज्य पाया और अर्द्ध शाई के स्वामी हुए वे कौनसे राजा कहलाते हैं ? उ० वासुदेव या अर्द्ध चक्री। २४ प्र०- वासुदेव कितने खंड जीतते हैं। उ-तीन, दक्षिण भरत के। २५,०-एक चौबीसी में ऐसे कितने वासुदेव हुए हैं ? उ०-नो. २६ प्र०-भरतक्षेत्र में हुए नव वासुदेवों के नाम कहो। उ०-१ त्रिपृष्ट महावीर स्वामी की जीव २ द्विप्रष्ट । स्वगंभू ४ पुरुषोत्तम ५' पुरुपसिंह ६ पुरुष पुंड- रीक ७ दत्त नारायण ६ कृष्ण । २७ १०-वासुदेव अपनी समस्त जिंदगी में किसीसे पराजित ही या नहीं। उ०-नहीं, ये किमी से नहीं हारते । २८1०-वासुदेव के भाई को क्या कहते हैं। उपलदेव। २६ प्र. वासुदेव के सब भाई बलदेव कहलाते हैं ? उ-नहीं, उनके बड़े भाई जो महा समर्थ हों वे पल. देव कहलाते हैं। ३० प्र०-वासुदेव की हाजरी में कितने देव रहते हैं। उ.-माठ हजार। .

(११० )
३१ -चक्रवर्ती की सेवा में कितने देव रहते हैं ?
- उ मोलह हजार ।
३.२ प्र०-एक चौबीसी में कितने बलदेव होते हैं ?
उ.-नौ।
३३ प्र०-इस चौबीसी में प्रकट हुए नौ बलदेवों के नाम
कहो १ . उ०-१ अचल २.विजय.३ भद्र ।
सुप्रभ ५ सुदर्शन ६ आनन्द ७ नंदन : राम
६ बलमद्र।
३४ प्र०- बलदेव मरके कहां जाते हैं १.३०-वासुदेव के
। मृत्यु से वैराग्य.पा वलदेव अवश्य दिक्षा लेने
हैं और मृत्यु पाकर मोक्ष या देवलोक पधारते हैं।
३५-३०-वासुदेव की तरह और कोई तीन खंड जीतते हैं।
उ०-प्रति वासुदेव तीन खण्ड जीतते हैं।
३६ म०-प्रति वासुदेव किसे कहते हैं ? उ०- वासुदेव के
प्रति पक्षी, प्रति वासुदेव । ....
३७ प्र०-प्रति वासुदेव किससे मारे जाते है ?
उ०-प्रति वासुदेव और वासुदेव के मध्य अवश्य युद्ध
होता है और प्रति वासुदेव को बासुदेव मारते
हैं और प्रति वासुदेव के जीते हुए तीन खण्ड
वासुदेव प्राप्त करते है।
३८ प्र०-नों प्रति वासुदेवों के नाम कहो ?
उ०-अग्रीव, तारक,, मेरक, मधु, निशुभ, जालेंद्र
प्रहलाद, रावण, जरासिंधु, ।
३६ प्र-वार्यकर चक्रवर्ती, वासुदेव, बलदेव, प्रनि वासुदेव
ये सब कैसे पुरुष कहलाते हैं ?
.

(१०१)
( उ०-लाध्य वाले पुरुष कहे जाते हैं।
१० प्र०-प्रत्येक चौबीसी में ऐसे प्रख्यात पुरुष कुल कितने
होते है।
-उ०-मठ।
-
ज्योतिष्य के प्रश्नोत्तर।
'पाठ सोलहवां।
१ प्र०-भूत, भविष्यत, वर्तमान काल के फलाफल देखने
को कौनसा शास्त्र है? उम्ज्योतिष्य।
२. ज्योतिष्य के नायक कौन हैं? उ6-ग्रह, नक्षत्र ।
३ प्र-गृह कितने है ?
उ०-नव।
४०-कौनसे ? 36-सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र,
। शनि, गहुँ, केतु ।
५०-नक्षत्र अर्थात् क्या?
30-एक सी रीति से गमन करनेवाले 'प्रभावोत्पादक
-
तारे।।
.
६ प्र०-नक्षत्र किनन है ? उ.-सत्ताईस, अष्ठाईस
७ प्र०-उनके नाम क्या है और प्रत्येक नक्षत्र के कितने
तारे हैं।
उ०-(१) अश्विनी,जिसके तीन तारे (२) भरणी,
के तीन, । ३ कृतिका के छ: (४) रोहिणी
के पांच (५) मृगशीर के तीन (६ )भाद्राका
एक (७) पुनर्वसु के पांच ( 2 )पुएप के तीन
7 (8 अश्लेषा के छा. (१) मा सात
(११) पुर्वा फाल्गुनी के दो (३२) उत्तरा

(१०२) तीन (२४), - । फाल्गुनी के दो ( १३०) हस्ति के पांच (१४) '; चित्रा का एक (१५) स्वांति का एक (१६) विशाखा के पांच (१७) अनुराधा के चार (१८) जेष्ठा के तीन (१६) मूल के ग्यारह (२०) पूर्वाषाढ़ के चार (२१) उत्तरापादा के पार (२२) अभिच के तीन (२३) श्रवण के निष्टा के पाच ( २५)शतभी- सा के सौ( २६ ) पूर्वा भाद्रपद के दो (२७) उत्तरा भाद्रपद के दो ( २८) रेवती के बत्तीस। ०प्र०-नक्षत्रों का गणित किस संज्ञा से होता है। उराशी पर से। ६ प्रगाश कितनी और कौन २ सी. ? उ०-चारह (१) मेष (२) वृष (३) मिथुन (४) कर्क (५) सिंह (६) कन्या (७) तुल () कृषिक (६) धन (१२),मकर (११) कुंभ (१२) मीन १० प्र०-कितने नक्षत्र पर एक राशि रहती है । , 'उ०-सा दो नक्षत्रों पर प-मेष रापि में कितने नक्षत्र है ? 3०-अश्विनीपूर्ण भरणी पूर्ण, कृतिका का एक चरम १२ प्रवृप राशिमें कितने नक्षत्र हैं। उ०-क्रतिका के तीन चरण रोहमी पूर्ण और मृग शीर के दो चरण। २३ -मिथुन राशि में कितने नक्षत्र है। उ6-मृग शीर के दो चरण, मार्दा पूर्ण, पुनर्वसु के ~ " . ५तीन चरण । -

(१०३)
४ प्र-कर्क राशि में कितने नक्षत्र है।
उ०-पुनर्वसु का एक चरण, पुष्य पूर्ण अश्वपा पूर्ण
१५३०-सिंह राशि में कौनसे नक्षत्र है?
उ०-मघा पूर्ण पूर्वा फान्गुनी पूर्ण उत्तरा फान्गुनी
का एक चरण ।
१६५०-कन्या राशि में कौनसे नचत्र है।
उ०-उत्तरा फाल्गुनी के तीन चरण, हस्त पूर्ण के
दो चरण ।
१७५०-तुल राशि में कौनसे नक्षत्र है ?
उ०-चित्रा के दो चरण स्वाती पूर्ण, विशाखा के
तीन चरण ।
१८.प्र. वृश्चिक राशि में कितने नक्षत्र हैं ?
उ०-विशाखा का एक चरण,अनुराधा पूर्ण,ज्येष्ठा पूर्व
१६०-धन राशि में कौनसे नवत्र है ?
२०-मूल पूर्ण, पुापाढा पूर्ण, और उत्तरापाटा का
एक चरण।
२०१०-मकर राशि में कौनसे नवत्र हैं'
उ०-उत्तरापाढा के तीन चरण श्वर्ण पूर्ण, धनिष्ठा
के दो चरण ।
२१ प्र-भ राशि में कौनसे नषत्र है।
उ.- धनिष्ठा के दो चरण शवभीसा पूर्ण, पूर्व
भाद्रपद के तीन चरण।
२२३०मीन पारी में कौनसे नपत्र है।
उ०-पूर्वा माद्पद का एक पाया, उत्तरापूर्ण, रेवती पूर्व
-

(१०४) 9 १3०० घ० ० ० . ३२ प्र-मकर, " " २३ प्र०-मेप राशि के कौनसे अक्षर हैं ? उ.-अलाई २४ प्र०- वृष-" ":"? उ०-ख व ऊ. २५ प्र०-मिथुन, ... .. १.उ-क०छ०५० २६ प्र-कर्क १ उ०-उ०० २७ प्र०-सिंह राशि के कौनसे अक्षर हैं ? उ०, म० ८० २८ प्र०-कन्या" " ? उ०-५० १०० २६ प्र०-तुल ३०प्र०-वृश्चिक,, ,, ":" "" ! उ.-२० त० १, उ०-न०२०प० ३१ प्र०-धन """" ?'उ०-५० ज० " ३३ प्र०-कुभ १ उं०-ग० श० ३५ प्र०-मीन १ 3०-द०१० ज०० ३५ प्र०-युग के कितने वर्ष होते हैं ? ६३५-पाच वर्ष को क्या कहते हैं। उ०-पांच मवत्सर। ३ प्र-संवन्मर कितने प्रकार के हैं . उपाच ३८ प्र०-उनके नाम कहो ? उ०-चद्र संवत्सर, सूर्य संवत्सर, नक्षत्र मवत्सरंतु 1- संवत्मर अभिवर्धन संवत्सर। ३६ प्र०-चद्र मंवत्सर के कितने दिन होते हैं। उ०-तीन से चौपन में कुछ कम कुछ ज्यादा परिपूर्ण २. प्र-सूर्य संवत्सर के कितने दिन होते हैं ? उ.-तीन से आसठ २.११ प्र०-नक्षत्र संवत्सर के कितने दिन होते है। उ०-३२७.१ "" पार 1 + " .

१ . ४६ प्र०-युद्ध" ", . - """ M " You ४२ म ऋतु संवत्सर के कितने दिन होते हैं १ 39-३६० ४३ प्र०-अभिवर्धन ... 3e-३८०० ४४ प्रक-सब नक्षत्रों का मंडल गुरु कितने दिन में फिरता है? । उ०-वारह वर्ष में। ४५ प्र०-मंगल कितनी वक्त में-फिरता है। उ०-१२ वर्ष ,, उ०-चारह माह । ४७३०-शुक्र कितने समय में परिभ्रमण करता है? ,' उ०-१२ माद। ४८ प्र०-रवि उ०-१२ माह। ४६०-शनि , ""h ? उ०-तीम वर्ष । ५० प्र०-चद्ग।" ,? -उ०-सत्ताईस दिन मे कुछ ज्यादा।। ५१ प्र०-राहु" {",'उ०-उद वर्ष । ५२ १०-परदेश गमन करने वालों को कौन , कौन से अवयोग जानना चाहिये? उ०-दिशा शूल, नान काल, काल राहु, योगिनी, चद्र इत्यादि। ५३ प्र०- पूर्व दिशा में किस वार को दिक शूल रहता है? उ०-शनि और चंद्र को। ५४ प्र०- पश्चिम दिशा में किस वार को शूल रहता है? . उ-रवि, शुक्र को। ५५ प्र०-उत्तर दिशा में किस वार को शूल रहता है? उ०-युध और मंगलवार को। ५६५०-दक्षिण दिशा में किस वार को शूल रहता है? “39-गुरुवार । " "

उ०-शुक्र और रवि
५७ प्र०-वायव्य कोन में किसmur
3०-मंगळ
५८४०-ईशान , . . . . . ., उ०-सुध और शान
५६ प्र०-नैऋत्य,
६०प्र०-अमि
.... उ०-गुरु और चंद्र
६१ प्र०-जिस दिशा में शूल हो मोर उसी और प्रयास
करे तो क्या होता है।
उ०-हानि होती है।
६२ प्र०-कौनसा नक्षत्र किम दिशा में होतो गमन नहीं
करना चाहिय !, ..
। उ०-जिस दिन को हस्त नवत्र हो तो उत्तर में, चित्रा
हो उस दिन दक्षिण में, रोहिणी होतो पूर्व में
श्रवण हो तो पश्चिम में गमन न करे अगर
1, “करता है तो मृत्यु प्राप्त होती है ।
६३ प्र० नमकान किस दिन क्सि दिशा को रहता है !
उ-रवि को उत्तर में, चंद्र को वायव्य में, मंगल को
पश्चिम में, बुध को नैऋत्य में, गुरु को दचिष
में शुक्र को आग्रेय में, शनि को पूर्व दिशा में,
काल का बास रहता है इसलिये नम कालं की
और गमन नहीं करना चाहिये।
६४ प्र०-ईशाण कोन में नम काल कब होता है?
उ.-ईशाण कोन में नग्न काल होता ही नहीं।
६५ प्र०-योगिनी कौनसी तिथी को कौनसी दिशा में
-
।
उ०-प्रतिपदा और नवमी को पूर्व में, द्वितीया और
इसमी को उत्तर में वृतिया और एकादशी को

-
भमि कोन में, चतुर्थी और दादशी को नऋत्य
में, पंचमी और प्रयोदशी को दक्षिण में, पी
भौर चतुर्दशी को पश्चिम में, सप्तमी और पूर्णिमा
को वायव्य में अष्टमी और अगारश्या को
ईशान कोन में योगिनी का वास रहता है ।
६६ प्र० गमन करते समय कौनमी दिशा में योगिनी
हो तो लाभ होता है और कोनमी दिशा में
हो तो हानि होती हैं?
उ०-वाई और सुख प्रद पीछले भाग पर हो तो
वांछित फल देने वाली दाहिनी और धन की
नाशक तथा सन्मुख होतो मरण पद गिनी
जाती है।
६७-चंद्रमा पूर्व में होतो कौन कौन सी राशि होती है ।
उ०-मेप, मिंह, धन।
६८०-चंद्रमा दक्षिण में हो तो कौन २ सी राशी होती है।
उ०-यूपम, कन्या, मकर ।
६६०-चद्रमा पश्चिम में होतो कौन २ सी राशि होती है?
उ.-मिथुन, तुल. कुभ।
७० प्र.- चंद्रमा उत्तर में होतो कौन २ सी राशि होती है?
उ०-कर्क, वृश्चिक, मीन ।
७१ प्र०-गमन करने वालों को कौन सी दिशा में चंद्र
लाभकारी है?
उ०- चद् मन्मुए हो तो लाम प्राप्त हो, दाहिना होतो
सुख मिले, पीठ की ओर हो तोप्राण का नाश
हो बांड भोर हो तो धन का नाश होता ।
॥

( १८
।
-
.
७२ प्र०-ग्रहों के घुमन के भवन कितने है, उ०पारह ।
७३ प्र०-भारह भुन किस २' नाम से पहिचाने जाते ही
उ०-पहिला भुवन तन (शरीर दूसरा धन तीसरा
माई चाया मित्र-पांचवां पुत्र: छठा शत्रु सातवा
स्त्री पाठवां मृत्यु नवा धर्म दसवां कर्म ग्यारहवां
लाम चारहवां व्ययं ।
७४३०-जन्म कुंडली के प्रथम भुगन में ग्रह हों तो वे क्या
। फल देते हैं ?
उ०- लम भुवन में सूर्य, मंगल, शनि हो तो शरीर
11 में भिन्न २ प्रकार की पीडा उत्पन्न करते
रहते हैं योर गुरु, चंद्र, शुक्र, बुध, हो तो शरीर
में मुख शांति रहती है ।
७५ प्र०-दूसरे धन भुवन में ग्रह हो तो ये क्या ३ फल
देते हैं १ .
उ०-सूर्य, शनि, मंगल हो तो धन का नाश करते हैं
... और चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र होतो धन की वृद्धि
होती है।
७६०-तीसरे भ्रात भुवन मे ग्रह हो तो चै क्या फल
देते हैं।
उल-सूर्य निगंग करे, चंद्र कांतिवान कर, मंगल
क्रोधी करे, बुध कार्य की सिद्धि करे, गुरु शुक्र
शनि बुद्धिमान चतुर रूपवान, स्त्रियों को प्रिय
कारी बनाये।
७७ प्र०- चौथे मित्र भुवन के ग्रह क्या'३ फल देते है ?
३

(१०६) -- - उ.मूर्य, मगल शनि, मुख से रहित करते हैं चद्र 17. बुध, गुरु, शुक हो तो सुखी करते हैं और राज्य से मान दिलाने वाले होते हैं । ७प्र.-पाचा पुत्र भुवन में ग्रह होतो वे क्या २ फल देते है। • उ०-सूर्य होतो अत्यन्त क्रोधी बुध हो तो कम संतति वाला, शनि-और मगल होतो संताते रहित, शुक्र, चंद्र और गुरु हो तो विषेश मतति वाला मुखी तया.स्वरूपवान होता है। ६ प्र०-छठे शत्र भुगन के ग्रह क्या रं फल देते है ? उ०-सूर्य और मंगल शत्रु पद का नाश करते हैं, शनि राज्य से मान दिलाते है, शुक और बुध कुमति देते हैं.-गुरु रांग बढ़ाते हैं, चद्र.विकलता को नष्ट करते है । ८० प्र--सातवें स्त्री भुवन में ग्रह हों तो वे क्या फल देते हैं। उ.--सूर्य मगल शनि हो तो स्त्री कुकर्म वाली दुःस v . और उपाय . " - तो वे दायक हो गुरु शुकचद्र और बुध हो तो स्त्री बहु सतान-वाली, सुशील तथा सुखदायक प्राप्त हो। २१ प्र० - पाठवें मृत्यु भुवन में ग्रह हों तो वे क्या २ फल देते हैं? उ०-आठ भुवन में कोई भी गृह हो तो भ्रष्ट करते हैं, शस्त्र से अग को पीड़ित कराते हैं तथा रोगी करते हैं। ८२ प्र०-नवमें धर्म मुवन के ग्रह क्या फल देते है ? उ०-सूर्य, शनि, मगल धर्म रहित, मति हीन और कुशील करते है, चंद्र-युद्ध-गुरु-शुक्र हों तो धर्म प्रेमी मति मान फरते हैं । . - . -

(१०६
७२ प्र०-ग्रहों के घूमन के भवन कितने हैं.?'उ०-बारह ।
७३ प्र-बारह भुवन किस २' नाम से पहिचाने जाते हैं?
उ० -पहिला भुवन तन (शरीर दूसरा,धन तीसरा
भाई चौथा मित्र पांचवा पुत्र छठा शत्रु सातवा
स्त्री आठवां मृत्यु नवां धर्म इसवां कर्म ग्यारहवा
लामं चारहवा व्ययं ।
७४ प्र०-जन्म कुंडली के प्रथम भुनन में ग्रह हों तो वे क्या
.
फल देते हैं ? -
: उ०-लम भुवन में सूर्य, मंगल, शनि हो तो शरीर
में भिन्न २ प्रकार की पीडा उत्पन्न करते
रहते है और गुरु, चंद्र, शुक्र, बुध, हो तो शरीर
में सुख शाति रहती है।
७५ प्र.-मरे धन भुवन में ग्रह हाँ तो वे क्या ई फल
.
उ०-सूर्य, शनि, मंगल हो तो धन का नाश करते हैं
और चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र होतो धन की वृद्धि
होती है।
७६ 'प्र०-तीसरे भ्रातृ भुवन में ग्रहे हों तो वे क्या फल
उल-सूर्य निगेगें करे: चंद्र कांतिमान 'करे, मगल
क्रोधी करे, बुध कार्य की सिद्धि करे, गुरु शुक्र
शनि बुद्धिमान चतुर रूपवान, स्त्रियों को प्रिय
कारी बनाये
७७ प्र०- चौथे मित्र भुवन के ग्रह क्या २ फल देते हैं।
-
-

उ०-पाठभुवन में कोई भी गृह हो तो वे युद्ध ८२ प्र०-नवमाधम मुवन के ग्रह क्या फल देते हैं। ०-सूर्य. शनि, मगल धर्म रहित, मति हीन और कुशील करते हैं, चंद्र-युद्ध-गुरु शुक्र हो तो धर्म (१०६) - -- . उसूर्ग, मंगल शनि, सुख से रहित करते हैं चद्र चुध, गुरु, शुक्र हो तो सुखी करते हैं और राज्य से मान दिलाने वाले होते हैं ७८५०-पाच पुत्रभुवन में ग्रह होतो वे क्या २ फल देते हैं। - उ०-मूर्य होतो अत्यन्त क्रोधी बुध हो तो कम सतति वाला, शनि और मगल होतो सताते रहित, शुक्र, चढ़ और गुरु हो तो विपेश सतति वाला सुखी तथा स्वरूपवान होता है। ७६ प्र० छठें शत्रु भुवन के ग्रह क्या २ फल देते हैं ? ३०-सूर्य और मंगल शत्रु पक्ष का नाश - करते हैं, शनि गज्य से मान दिलाते है, शुक्र और बुध कुमति देते है -गुरु रांग नढाते हैं, चद्र विफलता और उपाय को नष्ट करते है। ८० प्र-सांतवें स्त्री भुपन में ग्रह हो तो वे क्या फल देते हैं? उ०-सर्य मगल शनि हो तो स्त्री कुकर्म वाली दुःख दायक हो गुरु शुकचंद्र और उध हो तो स्त्री पहु । सतान पाली,सुशील तथा सुसदायक प्राप्त हो । १५०-पाठवें मृत्यु भुवन में ग्रह हों तो वे क्या २ फल देते है ? भ्रष्ट करते है, शस्त्र से भग को पीड़िन कराते हैं। 7 " . तथा रोगी करते है। . प्रेमी मति मान करते हैं। - " (११०) . ८३ प्र०- दसवे कर्म भुवन के गृह क्या २ फल देते हैं । उ०-सूर्य, मंगल, शनि कुकर्मी तथा कुपुत्र बनाते हैं चंद्र कीर्तिवान शुक्र धनवान, और बुध, गुरु, शनि कार्य में प्रीतिवान करते हैं। ८५ प्र०-ग्यारहवें लाभ भुवन के ग्रह क्या २ फल देते हैं ? उ०-सूर्य राजा से लाभ कराता है चन्द्र शुक्र धनवान चनाता है, मंगल स्त्री सुख देता है, युद्ध जानी विवेकी, गुरु ऐश्वर्य शाली बनाता है, और श- नि कीर्ति मान करता है। ८५ प्र.-मारहवें व्यय भुवन में जो ग्रह होते हैं वे क्या फल देते है ? * उ०-सूर्य दुष्ट स्वभावी पनाता है, चंद्र एक आख रहित करता है, मंगल पाप कर्म कराता है, बुध fy : निधन बनाता है, गुरु दुर्बल अंग करता है शुक्र बहुत खर्च कराता है, शनि, तीक्ष्ण प्रक- ति चाला करता है। ६०-जन्म कुंडली में कौनसे ग्रह कहा २ हों तो बालक ., पराक्रमी होता है? उ.-जिसके लग (प्रथम स्थान में ) स्थान में शुक्र और युध हो, केन्द्र स्थान में वृस्पति हो, तथा दसवें स्थान में मगल हो तो चालक पराक्रमी और कुल दीपक, तेजस्वी होता है। ६७ प्र०-ये, ग्रह उन स्थानों में न हो तो क्या होता है ? उo-माल रहित और-अशक्त होता है। ८८ प्र०-जन्म कुंडली में कैसे ग्रह हो तोशीघ्र मृत्यु होती है ? . 3 . M ।

(१११) 7 । उ० -जिसके चौथे स्थान में राहू, छठे शोर पाठवे स्थान में चंद्र या छठे और आठवें स्थान में मगेल सूर्य और शनि हो तो चालक शीघ्र मृ- त्यु पाता है। ८९७० जन्म कुडली में कैसे ग्रह हो तो राज योग गि- ना जाता है ? उ०-जिसके केंद्र स्थान में शुक्र गुरु और चंद्र हो अथवा शनि और चंद्र, लम स्थान हो. सूर्य और गुरु त्रिकोण स्थान में हों अथवा मंगल 'दसरे स्थान हो तो राज योग गिना जाता है । ६० - जन्म कुंडली में कैसे प्रह हो तो उसके मान पिता जीवित न रहें. उ.-जिसके छठवें स्थान में चंद्र लग्न स्थान में श- नि, सातवें स्थान में मगल. हो उस बालक का पिता जीवित नहीं रहता है-मीर लग्न स्थान में गुरु दूसरे स्थान में शनि तीसरे स्थान में राष्ट्र होतो उस बालक की माता जीवित नहीं रहती है-और छठे स्थान में मंगल, सातये स्थान में राहू, पाठवें स्थान में शनि तो उसकी स्त्री जीवित नहीं रहती है। ६१ प्र -पाप ग्रह कॉनमे और शुभ ग्रह कौन से हैं ? उ-रवि-मंगल शनि-राहु-केतु ये पाप ग्रह और प द-बुध गुरु और शुक्र येशुम ग्रह गिने जाते हैं। १२ प्रा-कंग ग्रा. हानी पालक मल्पायुप्प पाला हो. ~ A - rkopme (११०) 7 many tr ८३०-दसवे कर्म भुवन के गृह क्या २ फल देते हैं। उ०-सूर्य, मगल, शनि कुकर्मी तथा कुपुत्र बनाते हैं चद्र कीर्तिवान शुक्र धनवान, और बुध, गुरु, शनि कार्य में प्रीतिवान करते हैं। ८५ प्र०-ग्यारहवें लाभ भुवन के ग्रह क्या २ फल देते हैं ? '30-सूर्य राजा से लाभ कराता है चंद्र शुक्र धनवान बनाता है, मंगल स्त्री सुख देता है. बुद्ध ज्ञानी निवेकी, गुरु ऐश्वर्य शाली बनाता है, और श- नि कीर्तिमान करता है। ८५ प्राचारहवें व्यय भुवन में जो ग्रह होते हैं वे क्या फल देते है? उ०-सूर्य दुष्ट स्वभावी बनाता है, चंद्र एक प्रास रहित करता है, मंगल पाप कर्म कराता है, बुध 'निर्धन बनाता है, गुरु दुर्बल अंग करता है शुक्र बहुत खर्च कराता है, शनि, तीक्ष्ण प्रक- ति वाला करता है। ८६०-जन्म कुंडली में कौनसे ग्रह कहा २ हों तो बालक । पराक्रमी होता है?' उ.-जिसके लम (प्रथम स्थान में ) स्थान में शुक्र और बुध हो, केन्द्र स्थान में वृस्पति हो, तथा दसवें स्थान में मंगल हो तो वालक पराक्रमी और कुल दीपक, तेजस्वी होता है। ८७ प्रक-ये, ग्रह उन स्थानों में न हो तो क्या होता है । उ०-माल रहित और अशक्त होता है । ८८ प्र०-जन्म कुंडली में कैसे ग्रह हो तोशीघ्र मृत्यु होती है ! . - 17 -- " -- है - उ०-जिसके चौथे स्थान में राहू, छठे भार भाठवें 'स्थान में चद्र या छठे और आठने स्थान में मंगल सूर्य और शनि हो तो बालक शीघ्र मृ- त्यु पाता है। 4. जन्म कुडली में कैसे ग्रह हों तो राज योग गि- ना जाता है ? उ०-जिसके केंद्र स्थान में शुक्र गुरु और चंद्र हो अथवा शनि और चंद्र लम स्थान हो सूर्य और गुरु त्रिकोण स्थान में हों अथवा मंगल 'दसरे स्थान हो तो राज योग गिना जाता २० प्रक-जन्म कुंडली में कैसे प्रह हों तो उसके मात पिता जीवित न रहें -जिसके छठवें स्थान में चद्र लग्न स्थान में श- नि, सातवें स्थान में मंगल हो उस बालक का पिता जीवित नहीं रहता है और लग्न स्थान में गुरु दूसरे स्थान में शनि तीसरे स्थान में राह होतो उस बालक की माता जीवित नहीं रहती है-और छठमें स्थान में मगल, सात स्थान में राहू, आठवें स्थान में शनि हो तो उसकी स्त्री जीवित नहीं रहती है। ६१ प्र -पाप ग्रह कौनसे और शुभ,ग्रह कौन से है ? उ-रवि मगल शनि-राहु-केतु ये पाप ग्रह और द्र-बुध गुरु और शुफ येशुम ग्रह गिने जाते हैं। ६२ प्र-कसे ग्रह हो तो चालक शल्पायुप्य वाला हो। . ।

(११२)
"उ०-जिसके आठवें स्थान में चद्र और केंद्र में पाप
1 - ग्रह चौथे स्थान में राहु हो तो बालक एक व
पजीवित रहता है परन्तु छठवें आठने तथा
लम में बुध हो तो वह चौथे वर्ष मृत्यु पाता है
और शनि स्थान में सूर्य, हो और सूर्य स्थान में
शनि होतो बारहवें वर्ष मृत्यु पाता है।
६३ प्र०-किस वार को कौनसी तिथि हो तो मृत्यु योग
गिनते हैं ?
उ०-रवि और मंगल को नंदा तिथि (1-६-११)
गुरु और और चंद्र को भगा तिथि. .२-७-१२)
शुक्र को जया तिथि (३-८-१३ ) बुध को
ihiरिता तिथि (४-१-१४) शनि को पूर्णा ति-
थि (५-१०-१५) हो तो. मृत्यु योग गिना-
जाता है।
१४प्र-किस चार को कौनसी तिथि हो तो सिद्ध योग
-
गिना जाता है?
-
उ०-'शुक्र को नंद्रो वुध को 'भद्रा, मंगल को जया,
शनि को रिक्ता गुरु को पूर्णा तिथि हो तो सि-
द्व योग गिना जाता है।
प्र-राशियों के स्वामी कीन हैं?
उ०-मेप और वृश्चिक' का स्वामी मंगल-वृषभ और
'तुल का स्वामी शुक्र कन्या और मिथुन का
स्वामी बुध कर्क का स्वामी चंद्र-मीन और धन
का स्वामी गुरु-मकर और कुंभ का स्वामी शनि,
! सिंह का स्वामी सूर्य ।

(११३ ) - ६६ प्र०--मनुष्य के भाग्य में गृह फेर-फार करते है ? ६ उ०-नहीं। ६७ प्र०-अच्छे ग्रह मनुष्य का मला करते हैं और खराब ग्रह अश्रेय करते ऐमा कहते हैं इसका क्या -- 1 . प्रत्युत्तर है? , म T - - उ. ऐमी कहावत है परन्तु ये बात मच्ची होने पर भी सच्ची नहीं मानी जाती। ६८ प्र०-ती मची पातं क्या है। उ.--मनुष्य का श्रेय अश्रेय होना उनके भाग्य (पूर्व - के पुरुषार्थ से बंधे हुने शुभाशुभ कर्म) पर निर्भर है. ज्योतिप्य तो सिर्फ भाग्य को पहिले से देखने का घड़ियाल जैमा यत्र है। ६ प्रज्योतिष्य पर से पहिले से, क्या मालूम होजाता है? उ०-हा जिप मनुष्य का जैपा प्रारब्ध हो, जैसे सुरा दुस प्राप्त होने के हों, पैसे ही शुभाशुभ ग्रह जन्म कुंडली में वैसे ही स्थान में पडे हुए रहते है। १०० प्र०-गमन करने में ज्योतिष्य क्या मदद करता है? उ-ज्योतिष्य का नरावर शान, हो तो पहले से ही लाभ हानि का ज्ञान हो मक्ता है। १०१०-ज्योतिष्य और अपने कार्य में क्या सम्बन्ध है ? उ-ज्योतिप्य चक्र यह अपनी पृथ्वी के प्रत्येक व्यक्ति के साथ सम्पन्व रखता है और इमी से उमके किरण अपने ऊपर शुभ अशुभ अमर भी करते है।

१२ प्र०-अपने भाग्य निर्बल हों और अपने शुभ मुहूर्त दंसकर गमन करें तो श्रेयकारी होगा क्या? उ०-निर्वल भाग्य होगा और अश्रेय कारी होना होगा तो शुभ मुहूर्त मिलेगा ही नहीं अथवा सराच मुहुर्त होगा भी तो वह भूल से श्रेयकारी समझा जायगा परन्तु श्रेष्ट मुहूर्त में अनिष्ट होना असंभववित है। १०३ प्र०-जो भाग्य में कुछ भी फेर फार नहीं कर मक्ता तो ज्योतिप्य देखने का क्या फल है ? उ०-भविष्य की पहिले से ही खबर होजाय और । जिमसे कुछ भी उत्तम पुरुषार्थ कर कर्मोदय होने के पहिले उसका उपाय कर लिया जाय, यही -उसका फल है। ए- --- T + - • T । ब्रह्मचर्य। लड़कों को वाल्य अवस्था में २५ वर्ष पर्यन्त अवश्यं ब्रह्मचर्य पालना चाहिये। १ प्र०-मन बचन काया के शुद बोगों से ब्रह्मचर्य पा- लने से क्यार लाम होते हैं। उसके विपरीत कु- शील में प्रवतने से क्या २ हानियां होती हैं। उ०-ब्रह्मचर्य से शरीर सुडौल, बलिष्ट, सुन्दर और स्वतेज होता है। और मानसिक चल इतने बढते है जिसमे आश्चर्यजनक सिद्धि प्राप्त होती है, जिससे कुलकी, जाति की, धर्म,की, वा देशकी सेवा कर इम लोक में यश का,मागी बनता हुआ, धर्म में दृढ रहकर शात्म कल्याण करता हुआ परमव में देवेन्द्र आदि की पदवियों का मोगता पन, मोष सुख प्राप्त करता है। कुशील में प्रवेश करने बाला दुखी होता है। २५-प्रवचर्य से शरीर सुन्दर सुडौल पलिष्ट कैसे - - I - -- . 7 बनता है? २०-माता पिता की योग्य अवस्था से जन्म पाय बालक, जैसे दिन दूनी रात चौगुनी अवस्था में वृद्धि को प्राप्त होता है, आदि व्याधि से बचने 7 • से समर्थ होता है, डील डौल में मजबूत और चम " पाट करता हुआ तेज प्राकृति वाला होता है । "जंघ तक की वह मन वचन काया की शुद्धि से - - m . ब्रह्मचर्य को पालता है, यदि वह बालक पाल्य अवस्था ही में कच्चा वीर्य नष्ट करने लग जाय . तो, चे अपनी उपरोक्त वीडियो को नष्ट कर दुखी । होता हुआ; विकराल काल. के गाल में पतित हाता है।. -३ म-योग्य अवस्था किसे कहते है। उ.-पुरुष को २५ वर्ष पर्यन्त और..तियों को १६ वर्ष पर्यन्त, शुद्व योगों से ब्रह्मचर्य पालना और H. कुशील में नहीं प्रवर्तनों य ही योग्य अवस्था है। Ti-रावर्ष पहिले विवाह करने में मारिरिक सम्पति सेनए होती है और क्यों अयोग्य समझा जाता है। "वैदिक शास्त्रों का सिद्वान्त हैं कि मनुष्य का rry - वीर्य : वर्ष पहिल परिपकग्नहीं होता है • - - और अपरिपके अवस्था में कच्चो वीर्य नष्ट होने मरीर की प्रांगेग्यता भ्रष्ट होती है। और अ- तक बिमारीयों को भोक्ता बन असमय में काल के गाल में पड़ जाता हFERETE " प्रकचा चीर्य नष्ट होने मे या आरोग्यता में त्रा धा पड़ती है ? उ. जसे, आम्रवृक्ष को बोने वाला वर्ष बाद ही, फल TET की आकाक्षा करे-तोरया.२०:फूल लग के या ४-कचे या अधपक्के फल-हाथ लगेंगे। उसी प्रकार-दूसरे इर्ष,मसी० या २५ फल हाथ लगेंगे इसी तरहा था-वर्ष का प्रावध सो९ या १५% सौ फल हुने में सामर्थ होता -- . 1 १२१७) V- - है मो भी उतनों स्वादिष्ट नहीं मार वृद भी अन्दाज १२ फीट से जियादा नहींवढ सक्ता । यदि उपरोक्तों को पालने वाला आदमी चतुर होतो उसाम्रवृक्ष के फल की या ६ वर्ष तके श्राशानहीं करता हुआ, फूल काटवे ही जाता है जिसमें उस वृक्ष की मार उमी में रहने से, वह वृक्ष प्रति विशाल और गहर गंभीर होता । है-और तुर्त का फल देने वाले पक्ष से कई गु- मा. उचा और विस्तार में फैल जाता है, और फल, भी उसके स्वादिष्ट गाडियों से हजारों उतरते हैं। उसी तरह योग्य अवस्था यानी २५ वर्ष तक शुद्ध ब्रह्मचर्य पालने वाला पुरुष, कद का उंचा. शरीर पलिटे, निरोगी और दीर्घ आयुष्म- न्त होता है, उसकी सन्तान भी बलिष्ट, लंबी, मायुष्य वाली सतर्ज होती है और जी वीर्य को कंचा नष्ट करते है, वे अनेक रोगों में फसते हुये बहुतसी देवाईयां पाते २ अधुरे आयुष्य में । परलोक को मुसाफिरी को तैयार होते हैं। श्रख- मारों की दवाईया देख देख ललचाते हैं । धन मिार धर्म को तिलाजली देते हुये, नाल अवस्था के कुकमा से नष्ट किये हुये वीर्य के लिये पश्चा नाप करते है, सन्तान होती ही नहीं यदि हो भी जाय तो पलहीन, - रोगिए, अल्पायु होती है वह मर गानी म बुट्टे बाया बन बैठते हैं, गाल बैठ जाते है, दिति गिर जाते हैं। योग चलने से . ।

(१९८) . - कहें - F " थकावट होती है, चित्त भ्रमित होता है, और • स्मर्ण शक्ति भास्थिफा ले जाती हैं, थोडीसी सु राक जियादा लें तो अजीर्ण होता है, पौष्टिक सुराक से घुखार भाजाता है, खांसी सताने ल- गती है, ऐसे २ हजारों, दुःखों से दुखी होता है जिसका पूरा बयान नहीं लिखा जा सक्ता, तो कह सक्त है, कच्चा वीर्य नष्ट करने वाला अथाह दुःखःसागर में गोते मारता है। १५ प्र०-यदि २५ वर्ष पर्यत ब्रह्मचर्य पालने में इतना लाम है तो उसके दृष्टान्त बहुत से होने चाहिये। मात्र एक आम्र दृष्टान्त ही से कैसे इस हो! उ०-दृष्टान्त तो अनेक हैं किंतु.विषय बढ़ जाने . भय से मात्र दो या चार वर्तमान के अच्छे २ दृष्टान्त देकर समाधान करुंगा; मानलो जैसे एक हीरा, जब वह अपनी विल्कुल कच्ची अवस्था होता है जब उसे कोई खान में से निकाले तो चमक तो उस में होती है किंतु वह चमक कोमल और दृढ़ता रहित होने से थोडीसी चोट से टूट जायगा, और.मात्र मुंह पी. भाप से चमक-भद्दी हो जा- यगी, और उसकी कीमत बिलकुल थोडी यानी हजार की जगह सिर्फ एक रुपया, जिसको जौहरी लोग फटक (पटिकम) कहते हैं, यदि पर और जियादा-दिन खान में रह कर पक जाय ता पुखराज होता है। वह पटिकम,से हम मजबूत के 1 में 7 - ." A १ ... -- .

६. . -- - १ चमक और दृढ़ता में ज्यादा होता है, यदि हीरे की कीमत हजार की हो तो इसकी पचाम रुपये होगी, और यदि वह पुरी मुदत्त तक खान में पका तो इसमें दृढ़ता इतनी बढ़ती है कि 7 लोहे के धन से भी नहीं टूटता, बल्कि उलेट { ४ घण ही में खड्डा पड़ जाता है, और इसमें चमक १ इतनी होती है कि घोरमघोर अंधकार को नष्ट कर प्रकाश कर देता है जिससे वह हीरा कहलाता है, वैसे ही बहोत से कोमल चालक देखने में तो तेज और कामल नजर आते हैं किंतु दुर्भा- ग्य से फुसंगत में पड़ कुकर्म सीख वीर्य नए करं ने लगते हैं, जिससे चचलता और तेज नष्ट होने । 'से चहरे पर झुरियां पड़ जाती हैं। जैसे वह हीरा घन की चोट से रक्षा करने में समर्थ होता है वैसे ही यह परिपक्क वीर्य वाला प्लेग आदि चीमारियों से बचने में समर्थ होता है। वैसे ही कच्चे गर्भ का पानी पडने-से कई पीमारिय उत्पन्न होती हैं, ऋतु विपरीत फल देने लगती है, लोग दुखी होते हैं, जैसे कोई आदमी सेतका कच्चा नाज काट डाले तो अनाज आधा मी नहीं मिलेगा, चारा भी कम होगा कीमत पुरी नहीं मिलने से अपने किये पर पश्चाताप करेगा और दुःसी होगा, वैसे ही अपने कोमल कलेवर द्वादस वर्षीय बालक का विवाह कर सुख मानने बाले माता पिता, अपने प्राणगिय पुत्र को - । । J - (१२०) --- T । 1 रे- ; , शील रुप कीचड़ में ढकेला देते है। यह माता पिता अपने तुच्छ लोभ के लिये विचारे मालक गा के मानसिक और शारीरिक बलं को नष्ट कर खान पान और, सासारिक सुस से आखिर धर्म ध्यान से भी वचित कर कूप के मेंडक की तरह - दुःख से आयु व्यतीत करा, अल्प (अधुरे) आयु r:: - ही में परलोक की मुसाफिरी करा देते हैं। ७प्र०--यह दृष्टान्त तो ठीक है किन्तु इसका प्रत्यक्ष प्र- माण भी अवश्य होना चाहिये, क्योंकि यह बाल विवाह.की.रीति तो बहुत दिनों में प्रचलित ह । यदि हम बाल विवाह ही से दुःसी होते हैं, तो योग्य अवस्था, तक ब्रह्मचर्य पाल सुस भुगत रहे हैं सो बतलाइये। "-उप्रिय बाल मित्रों अंदाज दो माँ वर्ष पहले अंग्रेज लोगों में भी यही प्रथा थी। याने पाल्य अवस्था ही में बालकों को कुकर्म में पड़ते दुसी होते देख उसको रोकने के लिये अग्रेजों ने हिन्दुस्थान को प्राचीन रीति अनुसार, बालकों को ५ ही वर्ष की अवस्था में पाठशाला में भेजना शुरु किया, जो २५ या ३० वर्ष की प्रस्था तक पूर्ण ब्रह्म- चर्य पालता या विद्याभ्यास करता है, जिससे आज अंग्रेजों में विद्वान और कला कौशल में हुशियार होते हुये, हिन्दन विशाल देश । पर राज्य करते हैं। कॉन ज्यादा - २कला -- . क 17 - एरोप्लेन (हवाई जहाजा वे तार का तार, मोटर, रिल, प्रमुख अनेक चमत्कारी श्रनार्य कला प्रच- '"लित कर लोगों को चकित करते हैं किन्तु इनके भी दिादा गुरु अमेरिकन जो पचास वर्ष पर्यन्न - ब्रह्मचर्य पालते हैं यहाइनमें भी ज्यादा चमत्कार TT दिया करे एशिया, युरोप, भफ्रिका आदि वि- शिाल देशों में अपना रुजगार फैला, करोड़ों परसों की संख्या में धन इकटा कर, सो या २ उमसे भी ज्यादा यायुष्य सुख और स्वतन्त्रता पूर्वक भोगते है, इनमें ऐसे • धनाढ्य ह जो मिलता हो तो हिन्दुस्तान को भी सरीद " “सकते ह और कितने की मासिक आमदनी 'गेड साडेढ करोड़ तक है। कहें तो कह - मकते है कि यह सब द्रव्य ब्रह्मचर्य की तुच्छ .... “मिद्विया हैं क्योंकि यह लोग ब्रह्मचर्य सिर्फ Mm'अपने शारीरिक सुखके लिये ही पालते हैं, इससे " उनका धार्मिक सम्बन्ध उतनानहीं है, जितना कि माम मदिरा का त्याग कर, दया धर्म के पालने हाले एक पार्य पुत्र का है, क्योंकि वह तो शुद्ध ममकित्त और ब्रह्मचर्य ही को मोन का साधन मानता है। सच्च है कि जब यह हमारा प्रार्य दश ब्रह्मचर्य में दृढ़ था, उस समय के माता पिता अपने पुत्र को योग्य अवस्था तक ब्रह्मचर्य पालन कराते थे, और न ही श्रग जागृत हुवे बिना विवाह नहीं करते थे, ऐसा शास्त्रों से or - ५ (१२२ । - - - प्रमाण मिलता है, और यहां तक लिखा है कि :- एक रात्रि शुद्ध ब्रह्मचर्य पालने वाले को तावे - 'उपर रोज क्रोड सौनिया दान देने वाल से भी 721, ज्यादा फल मिलता है. वो, विचारिये २५ वर्ष पर्यन्त ,ब्रह्मचर्य पालने में कितनी पुन्यवानी चढ़ती है, और कितना शारीरिक और मान- “सिक बल बढता है, इस विचार से कितनेक “ब्रह्मचारी रहने ही, में सुख ! मानते थे । उस समय यह हमारा आर्य देश धन धान्य से । परिपूर्ण था; कला कौशल में बढा चढा था, - 1 और इन देश के आर्य पुत्र विदेशों से धन " ... की रासियां बहनों में भर भर कर लाते, और देश को गौरववंत पनाते थे, अहा ! तब यह हमारा आर्य देश मुकटमणी समान सुशोभित 1, था अहो। आश्चर्य | आज उसही आर्य भूमि में, ब्रह्मचर्य के अमाव से करोड़ों "भारतवासियों को भर पेट भोजन नहीं मिलता जो देश चीना- : : दिक विशाल देशों को वन देता था। आज 7. उसही देश की संतान,वस्त्र के अभाव से दुःखी 'होकर.प्राण तक दे देने की खबरें अखबारों में । “पढने में आती हैं। सच्च है जो २ देश, जाति र धर्म उपर चढ़े हैं, चढ़ते हैं, व चहेंगे उनका एक मात्र आधार ब्रह्मचर्य हो है और जो २ देश ;; मा जाति नीचे गिरी है..गिरती है व गिरेगी, - -1 7 (१२३) . १ ३ 4- उन सबका मुग्ध्य-कारण भननचर्य (कुशील ) - ही है, वास्ते-योग्य अवस्था केक अवश्य प्रमचर्य पलिनी चाहिये। प्र-विद्यार्थियों को क्यों ब्रह्मचर्य पालना चाहिये और उससे क्या लाम! - उ०-विद्यार्थी जब विद्याध्ययन करते हैं, या स्टन करते हैं, तब मगज में थकावट होती है, उसकी पूर्ति खून का तत्व (सार) वीर्य ही से होता है इस लिये विद्यार्थी भवस्था तक पूर्ण ब्रह्मचर्य पालना चाहिये। ६०-दुर्भाग्य से कुसगत में पड़ या माता पिता की डाली. हुई फरज मे जो बालफ आल अवस्था ही में,वीर्य नष्ट करते हैं, उससे विद्याध्ययन में क्या २ हानिया होती है? - उ-कठिन अभ्यास में जब भगजपच्ची करनी पड़ती है, तब मगज में प्रशण (घसारा) उत्पन्न होता है जैसे २ अभ्यात पढ़ता जाता है तैसे २ मगज का प्रशण भी बढ़ता ही जाता है, जितने प्रमाण में मगज का पसारा होता है, उससे भी ज्याप्रमाण, में उसे पोष्णता मिलनी ही चाहिये, मगज की याने थकावट की पूर्ति करने की कोई चीज समार में है तो एक मात्र वीर्य ही है जो मात्र ब्रह्मचर्य ही से पास होता है। इसही कारण से बिना ब्रह्मचर्य के विद्याध्ययन में विन होता है, मानसिक पल प्राय -- . S . mr. A नष्ट होता है। और अभ्यास थकावट और भू लावट से प्राय कक जाता है। विद्यार्थियों ! ब्रह्मचर्य की प्रसंशा मैं कहाँ-नर्क गाऊं तात्रे उमर FE में एक ही दफे वीर्य नष्ट करने वाला सिंघ, अपने से चौगुना श्राकार और वजन वाल हस्ती को मात्र एक जोरदार-गर्जन मे कपापमान कर देता है, में ही ताने-उमर में एक ही बार भोगेन्न वाली सिंघनी का दूध, इतना तेज है कि तांबा बांदी, लोहा आदि के पात्रों को छेदता हुआ निकल जाता है उस दर को रखने को कोई समर्थ है तो एक मात्र सोने ही का पात्र है वर्तमान में 'लोहे की संकल को तोडने वाला, हाथी को बाती पर चढ़ाने वालो.५ मैन के पत्थर को छाती पर FFor उठाने वाली राममूर्ति अपने भाषण में इन सर का कारण एक मात्र ब्रह्मचर्य होलीया है। इस Marवास्ते हे लडकों ! हमेसा ब्रांच में दनकर विद्यास्यास करो इसेही मां तुम्हागे तुम्हारे कुल की देश की, जाति की धर्म की भलाई है। याद रहे हस्त मैथुन आदि महा भयकर 'कुकृत्यों मे हमेशा अपने अमुल्य शंगर की रक्षा करना, यदि ब्रह्मचर्य की रक्षा में गफनत करोगे ता उ बाबा वन श्रीपध और लाठी की शरण लनी पड़गी; फिर हजार पश्चाताप करने पर भी नहीं बनेगा। मा शान्तिः शान्तिः श्रौं शान्तिः । भरभदाई.लि. 1 1

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Jain Prasanotar Kusumavali

Author
Kadawat, Shriyut Rikhab Chand Ji
Title
Jain Prasanotar Kusumavali
File name
Jain Prasanotar Kusumavali
Text
OCR done
Citation
1922
Published
2011/01
Publisher
Shri Jain Shudarak Press Ajmer
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546422
Barcode
4990010024898.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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