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Mahatma Gandhi Ke Niji Patra

Vajpaye Laxmidhar · 2011/03

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"सस्ती-हिन्दी-पुस्तक-माला" का पांचवां पुप्प
महात्मा
गांधी के निजी पत्र
"परिचरितव्याः सन्तो यद्यपि कथयन्ति नो सदुपदेशम् ।
यास्तेषां स्त्रैरकथास्ता एव भवन्ति शास्त्राणि"।
-
सम्पादक
पं० लक्ष्मीधर वाजपेयी।
प्रकाशक
'सस्ता-हिन्दी-पुस्तक-माला कार्यालय,
कानपुर।
प्रथम संस्करण
सम्वत् १९७६
सूल्य ।

संस्थापक:-
यावू बेणीमाधव खन्ना
और
सेठ चन्द्रभानु गर्ग
आनन्दमठ, कानपुर ।
प्रकाशक
,
पं० गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही
'सस्ती-हिन्दी-पुस्तक-माला' कार्यालय,
कानपुर।
मुद्रक
लाला भगवानदास गुप्त,
कमर्शल प्रेस, जुही-कलां,
कानपुर।

सस्ती-हिन्दी-पुस्तक-माला का
कार्यक्षेत्र
S
,
(१) इस पुस्तक-माला का उद्देश्य उपयोगी और सामयिक
ग्रन्थों को प्रकाशित कर, स्वल्प मूल्य-लागत मात्र
में सुलभ करने का है।
(२) इसमें राजनीति, साहित्य, समाज-नीति, शिक्षा,
धर्म-तत्व, विज्ञान, श्रमजीवी और कृषकोपयोगी
विषयों पर पुस्तके प्रकाशित की जायंगी।
(३) यह पुस्तक-माला प्रयल करेगी कि राष्ट्रभाषा हिन्दी
का प्रचार, गांवों में विशेष रूप से हो और ग्रामीण
साइयों का साहित्य सर्वाङ्ग पूर्ण हो ।
(४) यह पुस्तक-माला मौलिक अन्धों को प्रकाशित करने
का पूर्ण प्रयत्न करेगी, जिससे हिन्दी संसार में
मौलिक लेखकों का जन्म हो और उन्हें प्रोत्साहन
मिले।
--
(५) यह पुस्तक-माला किसी धर्म से सम्बन्ध रखनेवाले
विवाद-अस्त ग्रन्थों को प्रकाशित न करेगी।
म

२ इन पत्रों में महात्मा जी के ऐसे अनेक उपदेशप्रद उद्गार पाठकों को मिलेंगे, जिनके मनन से सहृदय पाठकों के चरित्र में बहुत कुछ परिवर्तन हो सकेगा। श्राशा है. चरित्र- गठन का उच्च प्रादर्श रखनेवाले सभी लोग इस छोटी सी पुस्तिका से पूरा पूरा लाभ उठावेंगे। प्रयाग, लक्ष्मीधर वाजपेयी। आषाढ़ शुक्ला ८, सं०११७8 वि०।

m
महात्मा गांधी के
निजी पत्र
( १ )
१४-५
ती० मे "घ खु
की सेवा में,
गो० बेचारा चला गया । अपना होने के कारण
स्वाभाविक ही यह लिखते समय मुझे भी रुलाई भा रही
है। परन्तु बहुत दिनों के मनन से भव मेरे विचार बहुत
द हो गये हैं। मैं समझता कि हम सब माया के जाल
में सब ही फंसे हुए हैं। जो दशा समाज की है, वही देश
की भी है। मेरे हृदय में जो भनेक विचार चक्कर काटते
रहते हैं, उनमें से सर्वप्रधान विचार को ही में इस समय
मापके सामने रख रहा है । सच पूछिये तो झूठी लोक-लज्जा
अथवा मोह के फन्दे में पड़ कर हम अपने लड़कों के विवाह
कर देते हैं, उनमें सैकड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, और फिर
चुपचाप विधवानों के मुख देखते रहते हैं। हां, यह में
कैसे कई कि विवाह बिलकुल करना ही न चाहिए ? परन्तु
कोई न कोई मर्यादा तो रखोगे ? हम बच्चों के विवाह कर

में
के उनको केवल दुःख में डाल देते हैं । आगे चल कर वे
लड़के सन्तान उत्पन्न कर के और भी अधिक फठिनाइयों में
फंसते हैं। हम लोगों के धर्म-नियमानुसार स्त्री-प्रसंग केवल
संतानोत्पादन के लिए ही है, शेष सघ विषय-वासना है।
परन्तु हमारे पाचरण में यह बात कहीं दिखाई नहीं देती।
यदि वास्तव यह सच है, तो क्या सचमुच ही हम अपने
लड़कों के विवाह कर के उनको भी अपने ही समान विषयी
नहीं बना रहे हैं ? इस प्रकार यह विषय-वृक्ष बढ़ता ही जा
रहा है। मैं कदापि इसको धर्म नहीं समझता । यद्यपि में आप
का छोटा भाई हूं, तथापि में अपने मन के ये विचार, श्राप के
द्वारा, सारे कुटुम्ब के सामने उपस्थित कर रहा हूं। यही मेरी
कुटुम्ब-प्लेषा है। अपराध होता हो, तो क्षमा करना । चौदह
वर्ष अध्ययन और सात वर्ष आचरण करने के बाद, अवसर
पाकर, ये विचार प्रकट किये हैं। -
मो
की दण्डवत् ।
(. २ )
.
जोहान्सबर्ग .
२१-५-१६०
चि० म
। तुम्हारा. पत्र मिला। मेरे विषय में चिन्ता करने की
कोई आवश्यकता नहीं। मुझे विश्वास है कि मुझे अपना.
बलिदान देना ही पड़ेगा । मैं नहीं समझता कि (जनरल)
स्मट्स् अन्त तक धोखा दे सकेगा । लोग बिलकुल अधीर

३
.
हो रहे हैं, अपना बलिदान देने के लिए वे दिलकुल प्रातुर
हैं। उनको मौका भी मिल रहा है, यह सन्तोषःकी बात है।
जिसमें प्रात्म-कल्याण समझता हूं, उसका आचरण करते
समय यदि यात्म-बलिदान किया जा सका, तो इस से श्रेष्ठ
मृत्यु और क्या हो सकती है।
गो का मरना योग्य ही था, परन्तु मृत्यु की कल्पना
से जी उदास क्यों होना चाहिए ? यह संसार क्षणभङ्गुर
है। फिर यदि मेरा प्राण इस संसार से चला जाय, तो उस
के कार्य-कारण का विचार में क्यों करता रहूं ? मृत्यु तक मेरे
हाथ से अनुचित कुछ भी न हो-इतनी इच्छा काफी है, और
बस इतनी ही चिन्ता होनी चाहिए । मुझे इसी जन्म में मोक्ष
मिल सकेगा-ऐसी दशा कम से कम अभी तो प्राप्त नहीं
हुई, परन्तु इस समय मेरे विचार जिस ओर जा रहे हैं, उस
से कहा जा सकता है कि यदि मैं अपने इन्ही विचारों में
शरीर छोड़ सकूगा, तो अगले जन्म के अन्त में मुझे मोक्ष
अवश्य ही प्राप्त होगा।
मोहनदास का आशीर्वाद ।
१
की सेवा में,
( ३ )
२६. १६०६
ती खु..
यह पत्र आधी रात को लिख रहा है। विस्तृत पत्र
लिखने के लिए समय नहीं है। आप मुझे मौका देते हैं
कि मैं अपनी फ़िक रख। परन्तु आपकी ही शिक्षा है कि
।

"अपनी " (मात्मा) मरती नाही, मारती नहीं और न मरवाती है। यदि भापकी मामा या दो किशरीर को ही "स्व" समझ कर इसकी चिन्ता रमाँ, तो भगवान् ने उसको “माया " कहा है। फिर फ़िक किसकी रखू? मैं तो " अपने " की ही चिन्ता रखूगा, मर्यात जिस प्रकार हो सकेगा, उस स्व" का पान-सम्पादन करूंगा। यह करते हुए शरीर का बलिदान करने की शक्ति अवश्य ही प्राप्त होनी चाहिए। यह जो मैं लिख रहा, इसका कारण यह है कि, बहुत सोचने के बाद मुझे यही देख पड़ा कि हम लोगों की भनेक कहावतें और शिक्षाएं बिलकुल धर्म-विषय हैं; और जिसे हम लोग सर्वश्रेष्ठ प्रत्य करते हैं. उसको म्यव- बम बिलकुल ही दूर पटा रहे हैं। मैंने ऐसे ग्यब- हार के विषय अपनी सारी शकियों को माज़माने का विचार किया है। मोहनदास की दण्डवत् । हार में ( ४ ) दि.म तुम्हारा पत्र मिता । गो..."के चले जाने से सभी को सका प्रभाष बरफ रहा है। इससे एक बात सबके भान रखने योग्य है पाप कि मृत्यु का रोकना हमारे साथ में नहीं है। इसी लिए परीर का मोह छोड़ ५ कर परमार्थ में मस्त राना और मास्मसिद्धिका लम्पादन करना चाहिए। ऐसा करने के लिए प्रसवर्ष एक अरहर और मावश्यक साधन है। ऐसे विचार मेरे मन में बराबर बढ़ते जा रहे हैं। मोहनदास का माशीर्वाद । ( ५ ) शुक्रवार, (रात में) चि.म सत्व-पालन करते समय बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। ऐसा एक भी उदाहरण मिलना अत्यन्त कठिन है, जब कि सत्य-पालन करनेवाले प्राणी को शारीरिक कर भोग- नाम पड़ाहो। शारीरिक दुःख ही एक मात्र मुबह-यदि यह समझ में भाजाय तो मनुष्य अपना प्रारम-कल्याण कर सकता है। जो हो, वह प्रश्न विचार करने योग्य है। सत्य की जर इस वाक्य का बहुत ही समर्थ मा है, परन्तु इससे हम को विचलित होने का कोई कारण नहीं। मो. का माशीर्वाद । . माम शुक्ला १० प्लेग, हैजा, इत्यादि के विषय में तुमने मुझसे अनेक प्रश्न किये हैं। राजकोट में जब बहे मरे, तब मैंने घर में अथवा वस्ती छोड़ देने की सब को सलाह दी। मेरे ये विचार संयत् - १९५८ (लन् १६४) के थे। अय में सम- झता हूं कि मेरे वे विचार भ्रमात्मक थे, यहां तक कि मेरे विचार अव यदल गये हैं । परन्तु दोनों दशाओं में, उद्देश्य एक ही था, और वह था सत्य की खोज। अव मेरे ध्यान यह वात आ गयी है कि इस प्रकार घर छोड़ने से आत्मा के गुणों से अपनी अनभिज्ञता प्रकट होती है । इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी अवसर पर घर न छोड़ना चाहिए। घर जलने लगे तो छोड़ना ही चाहिए। किसी घर में लांच अथवा बिच्छू रतने हो कि मृत्यु की आशंका हो, तो उसे छोड़ना ही चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि वैसा करने में बिलकुल ही दोष नहीं है जिसने आत्मा को पहचान लिया है-उसका अनुभव किया है उसके लिए आकाश छप्पर है। वह जंगल के सांपों और विच्छुओं को मित्र के समान समझेगा। इसके विपरीत, हम सरदी- गरमी के भय से घर में रहते हैं, और वहां जब प्लेगादि का भय उत्पन्न होता है, तब फिर घर छोड़ देते हैं। परन्तु, फिर भी मन के लड्डू खाया करते हैं, कि हमको शीव ही आत्मदर्शन हो जाय तो अच्छा । कम से कम मैं तो ऐसा हो समझता हूं। प्लेग के समय मो घर छोड़ कर निकल गये और उन्होंने घर की रक्षा के लिए नौकर को रख दिया। यह मनुष्य के लिए अनुचित है। यदि घर जलता होता तो नौकर भी अवश्य ही चला गया होता। इस उदाहरण से तुम सारा रहस्य समझ सकते हो। प्लेग इत्यादि का भय तो मैं एक साधारण बात समझता हूं। मुसलमान अपना घर' नहीं छोड़ता,

७
और ईश्वर पर भरोसा रखकाः चुपचाप बैठा रहता है श्रद्धा
के साथही साथ यदि दूसरे उपाय हो सके, तो और अच्छा है।
हम भागते रहेतो, तब तक प्लेग के, नष्ट
होने की कोई सम्भावना नहीं। जिन जिन गावों में प्लेग
होता है , उन उन गावों में हम उसका कारण तो ढूँढ़ते
नहीं, वरन उलटे भाग जाते हैं । यह दुर्वलता है
परन्तु मेरे इस उत्तर से अभी तक स्वयं मेरा ही
समाधान नहीं हुश्रा, फिर तुम्हारा कैसे होगा ? हम
लोग जब प्रत्यक्ष मिलेंगे, और अनायास प्रश्नोत्तर होंगे,
तभी मेरे हृदय की बात मालूम होगी । मैं इस समय
पूर्णतया समाधान नहीं कर सकता, इसके दो कारण
हैं । एक तो मैं इस समय ऐसे काम में फंसा हुश्रा
हूँ कि विस्तारपूर्वक लिनने को समय नहीं है, और
दूसरा यह कि मेरी वाणी और कर्म में अन्तर है। मेरे
मतानुसार जर दोनों में ऐश्य · हो जायगा, तब तुम
को तत्काल समझा देने के लिए मुझे यथोचित शब्द
मिल जायँगे । प्लेग के भय से बुजर्ग लोग यदि तुम से
घर अथवा गांव छोड़ देने को कहें, तो उस समय तुम्हें
वैसा ही करना उचित है , पयोकि जब तक हमारे
नैतिक जीवन . को धका न लगता हो, तब तक बड़ों
की आमा मानना हमारा धर्म है, उसी में कल्याण है
मृत्यु के भय से नहीं, किन्तु बड़ों की प्रसन्नता के लिए
यदि तुम प्लेगवाला घर छोड़ दो, तो यह तुम्हारा
पूर्ण निर्दोष आचरण होगा ।
आजकल ऐसा विचित्र समय आगया है कि,
बहुत अवसरों पर लोगों का बड़ों की मात्रा पालन करने

F +- के विषय में विचार करना पड़ता है। मैं समझता कि माता पिता का प्रेम एक ऐसा रहस्यमय विषय है कि किसी अत्यन्त सबल कारण के बिना उनका पित न दुनाना चाहिए। परन्तु माता-पिता के अतिरिक्त भन्य बड़ों के विषय में भी इतना कठोर नियम पालन करने को मेरा अन्तःकरण नहीं कहता । जहां हम को नैतिक दृष्टि से कुछ सन्देद उत्पन्न होगा, वहां निम्न श्रेणी वाले बड़ों की भाशा का उल्लंघन करना पड़ेगा। उल्लंघन करना कसंध्य है। यदि कल मेरा पिता मुझ से चोरी करने को कहे, तो यही उचित है कि मैं चोरी न कर। यदि ब्रह्मचर्य पालन करने की मेरी इच्छा हो, और माता पिता इसके विरुद्ध माझा दे. तो मुझ नम्रता- पूर्वक उस आशा का उल्लंघन करना चाहिए । मैं समझता हूं कि म की सगाई तब तक की जाय, जब तक के स्वावलम्बी न बन जायँ, यही उचित है। यदि मेरे माता पिता भाज जीवित होते और वे मेरे इस मत के विरुद्ध कहते तो मैं ममतापूर्वक इस विषय में उनका विरोध करता, और मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये मेरे इस कार्य को उचित ही मानते। मस इतना ही लिखना पर्याप्त होगा। यदि कुछ विशेष शंका उत्पन्न हो तो प्रसन्नतापूर्वक पूछो। ऊपर जो कुछ लिखा है, वह इसी विश्वास से लिखा है कि तुम अर्थ का अनर्थ न करोगे। कदाचित कोई पाखंडी मेरे उपर्युक्त कथन को उद्दण्डतापूर्ण बतायेगा, अथवा मेरे शब्दों पर अन्धविश्वास करके कोई दूसरा ही अर्थ निकालेगा; और मनमाने कारणों से बड़ों की भाषा और रा +

का अपमान करेगा, यही नहीं, बरिक ऊपर जो वाक्य
मेग के विषय में लिखे गये हैं, उनसे यह भी अर्थ
निकलेगा कि उचित उपाय समझ कर मद्य मांसादि
सेवन करने में भी कोई हानि नहीं, तो यह उसका पाखएक
होगा।
का माशीर्वाद ।
( ७
है नघबर १६०८
।
माज तुम्हारी तबीमत के विषय में मि० पेस्ट का
भेजा हुआ तार मिला। मेरा दद्य घिदीर्ण होगया, मैं
रो रहा है, परन्तु तुम्हारी सेवा करने के लिए वहां
माने योग्य मेरी स्थिति नहीं। मैंने सत्याग्रह के इस
युद्ध में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है। मेरा यहां
माना सम्भव नहीं। सजा दी जायगी, तभी पा सकंगा
और यह असम्भव है। तुम जरा साहस रखो, पथ्य से
रहो, फिर अच्छी हो जामोगी। परन्तु मेरे दुर्भाग्य से
यदि तुम नहीं बच सकोगी, तो मैं तुम' को इतना ही
लिखता हूं कि, इस वियोगावस्था में, मेरे जीवित राते
दुप, यदि तुम चली जामोगी, तो कोई हानि नहीं।
तुम पर जो मेरा उत्कट प्रेम है, उसके कारण लोगों
कोटि में, चाहे तुम चली जाओ, परन्तु फिर भी-तुम
मेरे लिए जीवित रहोगी। तुम्हारी प्रात्मा अमर है। मैं
तुमको विश्वास दिलाता कि यदि तुम्हारा भम्त हो
मायगा, तो, जैसा मैंने तुम से भनेकों बार कहा है, मैं फिर

दूसरी स्त्री से विवाह नहीं करूंगा। परमात्मा पर विश्वास
रख कर तुम सुख से प्राण छोड़ो । तुम्हारी मृत्यु मी
सत्याग्रह का एक अंग ही है। मेरा युद्ध केवल राजनैतिक
ही नहीं, वरन वह धार्मिक भी है और इस लिए अत्यन्त
शुद्ध है। उस में मर जाय, तो भी भला और जीते रहे, तो
भी भला । यह समझ कर तुम मन में कुछ भी खेद नहीं
करोगी, यही मुझे आशा है - यही मेरी तुमसे याचना है।
शनिवार, रात, बजे।
चि० म०
प
-
इतना हो चुकने पर, फिर ऐसी पुस्तकें पढ़ते पढ़ते
अन्त में तुम अन्तर्विचार कर सकोगे।
प्रत्येक प्रन्य
में कोई न कोई त्रुटि रहती ही
और, अवश्य
रहेगी। लेखक के निजी आचरण की छाप उसके लेखन
पर पड़े विना नहीं रहती। इसलिए मनुष्य मात्र के लेखों
में कोई न कोई त्रुटि अवश्य ही रहती है । उसको मूंग
के कचरे की भांति निकाल कर सुन्दर दाना भर ले लेना
चाहिए । अन्तर्विचार की प्रादत रखनेवाले के लिए
यह सहज है ।
का आशीर्वाद
म
म:

प्र
( 8 )
रविवार।
चि०स
म .. ....
आत्मा के अतिरिक लव क्षणभंगुर है, यह विचार
सदैव मन में रहना चाहिए । यही नहीं, वरन उसकी लिद्धि
के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए । मैं ज्यों
ज्यो विचार करता हूं, त्यो त्यो मुझे सत्य और ब्रह्मचर्य
की महिमा अधिकाधिक विचित्र मालूम हो रही है ।
मैं समझता हूं कि सत्य में ही ब्रह्मचर्य और अन्यान्य
नीतिधर्म का समावेश होता है; परन्तु फिर भी ब्रह्मचर्य
एक सत्य की ही टक्कर का महान् तत्त्व है; और मेरा
दृढ़ विश्वास है कि दोनों के पालन ले प्रत्येक कठिनाई
दूर होनी चाहिए। सच्ची कठिनाई तो अपने मनोविकार
की ही है । यदि बाह्य विषयों को सुख का श्राधार
न समझे, तो " लोग क्या कहेगे " इस प्रश्न के बदले “हमें
क्या करना चाहिए" यही हम सोचने लगेंगे
का आशीर्वाद
है
म
( १०, )
विपत्ति में धैर्य के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं ।
जो साधन ट्रांसवाल में, वही अपने देश में हैं, यह
सोचते हुए मेरे मन में तो कोई शंका ही नहीं, परन्तु
का पत्र यही सिद्ध कर रहा है कि, हमारी तैयारी
'फिनिक्स जैसे प्रदेश में ही हो सकती है। यद्यपि स्मशान
६

म भी निर्भय नींद लेमा हमारा कम्य है; परन्तु वहां
नींद का प्रारम्भ होते ही भय से मृत्यु होजाने की अधिक
सम्भावना है। इस समय हमारा भारतवर्ष स्मशामवत्
है। वहां रहकर मीराबाई का बोल मा,
बोल
मा, बोल
मा, सीताराम पिना बिजु बोल मा" अथवा ऐसे ही अन्या-
स्य पच का कर निर्भयतापूर्वक भजन किया जा सकेगा।
परन्तु यहां युव की तैयारी होसकेगी, जिसका, करना
भावश्यक है x x x x मुझे ऐसा आभास होरहा
है, मानों मुझ में इतना बल आ रहा है कि प्रत्येक रीति
और प्रत्येक स्थान पर होने वाली मृत्यु का भानन्दपूर्वक
स्वागत किया जा सकेगा। ऐसा ही बल सबको प्राप्त
हो, यही मेरी इच्छा है।
.
( ११ )
साधारण विचार करने पर भी तुम्हारे ध्यान में
माजावगा कि, इस समय कौन किसको निकाले, या प्रश्न
ही उत्पन्न नहीं होता। बदि फिनिक्स की दशा अत्यन्त
निर्बल हो जायगी, तो निकालना अथवा रखना कुछ करना
नहीं पड़ेगा। जिसमें शक्ति होगी, वही टिकेगा। उस समय
यह प्रश्न उस्प होगा कि, कौम रहेगा १ भाज तमश्वाह
नहीं देते, पर जाने को देते हैं। इसमें भी कमी करके, कष्ट
सह कर, सूजी रोटी नाकर कौन टिकता है, बस, यही
प्रश्न है। x x x फिनिक्स ही कहां फिनिक्स में टिक
सकता है? जहां फिनिक्स का उद्देश्य है, वहां फिनिक्स
है। x x x यदि तुम यह मानते हो कि, मेरी मारमा

१३
--
समर्थ है, तो फिर वैसी ही तुम्हारी भी है। हमारी
तुम्हारी आत्मा में कुछ भी भेद नहीं। पर तुम में जो यह
इतनी अनारमता-भीरता-संशय-अनिश्चितता, इत्यादि
जो कुछ हो, उसको निकाल डालो, बस, हम दोनों बरा-
पर ही है। अन्तर इतना ही है कि मैंने अत्यन्त प्रयास से
बहुत से आश्रम स्थापित किये हैं, उतने अथवा इससे
भी अधिक, दृढ़तापूर्वक, साइस के साथ, तुमको. भी स्था-
पित करने है
( १२ )
इस समय यही दशा है। मैंने जो कुछ कहा है उसके
विरुव चाहे सारा संसार खड़ा हो जाय, मुझमें निराशा
उत्पन्न नहीं होगी। यह में गर्व से नहीं कह रहा हूं, परन
यह सत्य है। भारतवर्ष को शुद्ध करने की हमें महत्वा-
कांदा नहीं है, किन्तु हम स्वयं शुद्ध हो, यही हमारा मनो-
रथ है। यही मनोरथ-यही महत्त्वाकांक्षा होनी चाहिए,
अन्य सब व्यर्थ है। जिसने प्रात्मा को नहीं पहचाना उसने
कुछ भी नहीं जाना। रामण के उत्साह से हमें प्रारमा की
भोर जाना चाहिए।
( १३ )
सुम्हारे विषय में जो असन्तोष है, अथवा तुम्हारे
ऊपर जो कटाक्ष हो रहे हैं, उनके कारण यदि तुम अलग

१४
ने कायरता
होना चाहते हो, तो यही कहना पड़ेगा कि तुम
दिखलाई; और उस दशा में फिर उनके और तुम्हारे विषय
में मेरा जो कर्तव्य है, उसको करना मेरे लिए, कदिन
होगा। x x तुम्हारे अलग होजाने से. उनका अकल्याण.
अवश्य ही होगा। हम लोग एक महान् प्रयत्न में लगे हैं।
तत्वज्ञान की खोज में है।
(१४ )
ईश्वर परमात्मा है और जो प्रात्मा है उसको मोक्ष
है,-पाप पुण्य है। मनुष्य को इसी जन्म में मोक्ष मिलना
सम्भव है। मन में यह बात अवित हो जाने के बाद भी
हमारा संशोधन जारी रहना चाहिए। यह कहने का तिल.
मात्र भो कारण नहीं कि जो कुछ हो रहा है, सब ठीक ही है।
अथवा बुजुर्गों ने जो कुछ किया, वह सब ठीक ही था । वास्तव
में सामान लेना आत्माके विरुद्ध है। इसमें सन्देह नहीं कि
जो पुराना है उसमें अधिकांश ठीक है, परन्तु जिस प्रकार
अग्नि में धुश्नां अवश्य ही रहता है, उसी प्रकार प्राचीन
उत्तमता में निकृष्टता भी है। मस्तुः इन सब का पृथक्करण,
करके तत्त्व ग्रहण करने में ही सच्चा ज्ञान
श्रीकृष्ण का प्रसाद प्राप्त होने के लिए एक ही सरल
नार्ग है, वह यह कि शनैः शनैः बुद्धि द्वारा सत्यादि गुणों
का सेवन करके सब विषयों से राग हटा कर एक ही राग
रखना चाहिए। x x शरीर चला जायगा, किन्तु इसकी
चिन्ता नहीं।
शानरूपी कौवा यदि वासनारूपी पिंड सा डालेगा,
--

१५. तो पिता अवश्य मिलेगा। जो लड़का माता पिता को भूल जाता है, वह इस संसार में क्या कर दिखायेगा ? तुम्हारी और ....... की कृत्ति में कुछ दोष नहीं है, इस लिए मैं निश्चिन्त हूं। प्रदर्शिनी के विषय में लिखा, सो वही परिणाम सब जगह हुमा है। स्वर्ण-मृग की भांति है, फिर जब श्री सीतादेवी को लोभ उत्पन्न हुधा तब हमारी तुम्हारी कौनसी. बात ? सत्य तो यह है कि यह सारी पश्चिमी सभ्यता की चमक-दमक है। यदि इस चमक-दमक से हमारी श्राख्ने चौधिया नः जावें, तो समझ लो कि हम जीत गये।। इस संसार में स्त्री से निर्लिप्त रहने-विषय को मारने- के लमान कठिन कार्य कदाचित ही और कोई हो। इस श्रोर तुम प्रयत्नशील हो, अतएव तुम को इस में अवश्य ही सफलता होगी। प्रयत्न करते रहना चाहिए, और फल- सिद्धि की साधना करते रहना चाहिए, इससे पूर्ण सिद्धि होगी। ये मेरे विचार परिपक्व होजाने पर भी- और उनको व्यवहार में लाने का प्रयत्न करते हुए ही - रा० और दे०की प्राप्ति हुई है। मेरी इस.प्रारम्भिक निष्फलता- द्वारा ही तुमको अधिक उत्साह प्राप्त होना चाहिए। पुरुष को सिंह, की उपमा दी है, हम सब को इन्द्रिय-वन का राजा बनने की शक्ति प्रात्म-चिन्तन द्वारा प्राप्त होगी। . कवि ने - ( १५ ) सुदामा जी का चरित्र मैंने पढ़ डाला था । सुदामा और नरसी मेहता की दरिद्रता से स्पर्धा करने का मुझे उत्साहमा । इसी से मैंने लिखा कि... .."का जोमान है वह शुष्क है, और सुदामा का शान सच्चा तथा अनुकरणीय है.. भीकृष्ण को मैं परमात्मा मामता। वह परमात्मा कौन है ? वह अर्जुन का 'सारथी' सुदामा का 'मित्र' और मरसी मेहता का 'ऋण-मुक्त-क रसके ऊपर टीका-टिप्पणी करने का मुझे स्वम में भी विचार नहीं माया। यदि मेरे पा से तुम को ऐसा मामास हुआ, तो इसके लिए मैं पापी, इस विचार से मैं थरथर कांप रहाई कि मेरे हाथ से इस विषय में एक अक्षर भी किस प्रकार निकला । जब से तुम्हारा पत्र मिला, मैं घबड़ा गया है । सुदामा जी की पनी ने जो ताना मारा, रसे मैं भलंकारिक-व्यङ्ग समझता । फिर भी यदि वह शम्दशः (जैसा कि चरित्र में लिखा है, वैसा ही बोली हो, तो भी उसमें कोई विरोध अपवा प्राश्चर्य मही! स्त्री और क्या कहेगी। सुदामा जी का शव यही था कि, सब सान कर चुप रहा जाय । ऐसी दशा में स्त्री यह कहेगी ही कि, "भयो, जब श्रीकृष्ण के समान मित्र मौजूद हैं, तब फिर उनसे सहायता क्यों नहीं लेते?" सुदामाजी बहुत गरीब थे और उसी दशा में सन्तुष्ट थे। वे महान् मक थे। उसी प्रकार नरसी मेहता ने मी, यद्यपि श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष दर्शन किया, तथापि अपनी दरिद्रावस्था से मुक्त होने की उन्होंने कभी इच्छा नहीं की! 3 . ( १६ ) मुझे फिर विकालत करने का अवसर न मिले, यही मेरी प्रबल इच्छा है। मैं अपने जीवन भर, फिनिक्स में, पूर्ण दरिद्रावस्था में रहं-यही मेरी इच्छा है, यही में ईश्वर से मांगता हूं। परन्तु सव लक्षण विपरीत दिखाई पड़ते हैं ... । जान पड़ता है कि कल के लिए एक पाई भी नहीं, कैसा होगा ?" ऐसी चिन्ता करने का अलभ्य अवसर न मिलेगा। मैं इस को अलभ्य लाभ समझता हूं क्योंकि इस संसार का बहुत बड़ा भाग इसी दशा में है। बुद्ध आदि की यही दशा थी, आगे भी यही रहेगी। इसके विना आत्मा का अनुभव न होगा यह मेरा विश्वास हो रहा है। x ४ ने हम को पढाया; पर ऐसा मालूम होता है कि वह शान शुष्क था सच्चा शान तो सुदामा जी अथवा नरसी मेहता ने ही दिया। इन्द्रियों के भोग भोगते हुए यह कहना कि, "मैं कुछ नहीं करता, इन्द्रियां अपना अपना काम करती हैं, मैं तो कृष्ण स्वरूप हं"-कोरे मिथ्यावाद का लक्षण है । जिसने पूर्ण- तया इन्द्रिय-दमन किया है और शरीरयात्रा भर के लिए ही जिसकी इन्द्रियां व्यापार करती है, ऐसा मनुष्य यदि उपर्युक वाक्य कहे, तो उसे शोभा देगा। हम में से किसी को भी उपर्युक्त वाक्य कहने का अधिकार नहीं; और जब तक सभी दरिद्रता न मा जावे तब तक वैसा अधिकार मिल भी नहीं सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि जो राजा होता है, वह अपने पुण्य प्रताप से ही होता है। सच तो यह है कि निस कर्मानुसार सब कुछ होता है। परन्तु यह कहना, कि वह कर्म पुण्य-कर्म ही था, आत्मा के गुणों को देखते हुए मिथ्या २

ठहरता है। यदि चे विचार तुम सब की समझ में ना जायगे,
और जो उत्कृष्ट चिन मैंने ऊपर अंकित किया है यह स्थिति
प्राप्त करने की यदि इच्छा करते रहोगे, तो परमात्मा वैसा
लमय हम लोगों को अवश्य ही एक न एक दिन ला देगा।
A
4
(१७)
प्रीमोरिया-जेल ।
२५ -३ १९०६
चि. नगिलाल,
x x x मैंने व जेल में बहुत कुल पढ़ लिया है।
इससन, रस्किन, मेज़नी की कृतियां पढ़ रहा है। उपनिषद
भी पढ़ता रहता हूं। शिक्षा का अर्थ अक्षर ज्ञान नहीं, किन्तु
चरिविकास और धर्म का सच्चा शान है। यह मेरा नत
सब प्रकार के पुस्तकावलोकन से अधिकाधिक दृढ़ हो रहा
है। यदि शिक्षा का यही उद्देश्य होगा - और मेरे मता-
नुसार यही लच्चा उद्देश्य है. - तो इस समय तुस को
उत्तम प्रकार की शिक्षा मिल रही है।
माता की सेवा करते समय उसके तीचे स्वभाव को
लहन करना, चि० हीरालाल की अनुपस्थिति में चि० चंची
की मनभाती चीज़ की पहले से ही अटकल लगाकर उस
की फिक रखना, जिलले उसजो चि० हीरालाल की याद
नावे, रामदाल और देवीदास को 'सन्हाजते रहना-
इसले अधिक उत्वष्ट शिक्षा और कौन सी हो सस्तो है ?
तुम यदि इस काम में पास हो गये, तो यह मानने में कोई

हानि नहीं कि तुम को श्राधी से अधिक शिक्षा मिल चुकी । उपनिषदों पर नाथूराम जी की जो प्रस्तावना है, उसके एक वाक्य ले मेरे मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। वे लिखते हैं कि ब्रह्मचर्य अवस्था, जो कि पहली है, वह अन्त की अवस्था, अर्थात सन्यालावस्था के समान है । यह विलकुल ठीक है निदोपावस्था में, अर्थात जीवन के बारहये वर्ष तक ही प्रानन्द सोगा जा सकता है। लड़शा जब अपनी उम पर ना जावे, तब उसे अपने उत्तरदायित्व का शान अवश्य ही करना चाहिए। बारह वर्ष के बाद प्रत्येक मनुष्य को अपने प्राचार-विचार में सत्य और अहिला- विषयक संया ना. पालन करना ही चाहिए । यह कार्य ऐसी छाभ्यास-पद्धति से नहीं होना चाहिए जिससे जी ऊत्र उटे, किन्तु स्वाभाविक विनोद-पद्धति ले ही होना चाहिए ! राजकोट बहुत से बच्चे मेरा स्मरण करते हैं। जब मैं तुम ले छोटा था, तब सुरते पड़ों की सेवा में लञ्चा मा- नन्द मिलता था । बारह वर्ष के बाद फिर मुझे बैला भालन्द नहीं मिला । यदि तुम सद्गुणों का अनुकरण करोगे तो तुम्हारा जीवन सद्गुणमय बनेगा, और यह समझा जायगा कि तुमने अवश्य ही मे शिक्षादर्श प्राप्त किया। ऐले ऐले गुगा जब तुम में श्रा जायंगे, तब तुम पृथ्वी क्षेचाहे जिस कोने में अपना जीवन व्यतीत कर सकोगे, और प्रात्मशान -ईश्वर-शान-प्राप्त करने के मार्ग में लगोगे। हां, इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि तुम अक्षर- ज्ञान प्रात ही न रो; वास्तव में बात तो यह है कि उस - ।

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काम है कि, माता पिता की सेवा करो, 'जो कुछ हो
सके। उतना पढ़ो : और खेती करो । आने की चिन्ता
करना तुम्हारा कर्तव्य नहीं है ,बह तुम्हारे माता पिता
का कार्य है। उनके बाद तुमको उस चिन्ता का अनुभव
माप्त होगा। हां, एक यह निश्चय अवश्य करना चाहिए
कि, बैरिस्टरी अथवा डारी झा व्यवसाय हम नहीं करेंगे।
हम दरिद्री हैं ; और दरिद्री ही रखने के लिए परमात्मा
से याचना करते हैं। द्रव्य को आवश्यकता सिर्फ पेट
भरने के लिए ही है। फिनिक्स की उन्नति करना हमारा
कर्तव्य है ; च्योंकि इसी मागे से हमको प्रात्मा का पता
लगेगा; और हमारे हाथ से देश-लेवा भी होगी । इस वात
का सदेव ध्यान रखो कि तुम्हारी चिन्ता मुझे बनी रहती है।
अपना चरित्र गठन करना ही मनुप्यमान का सच्चा कर्तव्य
केवल कमाई के लिए ही शिक्षा की आवश्यकता नहीं है।
जो मनुष्य कभी सतुग्यता का त्याग नहीं करता, वह कभी
सूखो नहीं मरता; और यदि इस प्रकार मरने का मौका ही
आ जाता है, तो वह कभी नहीं डरता। तुम निश्चिन्त रह कर,
वहां जो अध्ययन कर सको, करते रहा। यह लिखते हुए
तुमसे मिलने की, और अपना मन दाव रखने की इच्छा
हाती है; किन्तु यह वात असम्भव हाने के कारण प्रॉखों
में आँसू पात है। 'बापू' तुमपर कभी निर्दय नहीं होगा,
इसका विश्वास रखो। मैं जो कुछ करता हूं तुम्हारे कल्याण
के लिए हो करता हूं। तुम दूसरे की सेवा करते हो, वह
व्यर्थ नहीं जायगी।

२३ ( २० ). ८-१९०६ चिना , - - तुम्हारा पत्र पढ़ कर मुझे अत्यन्त आनन्द हुशार में जानता हूं कि भारतवर्ष के अधिकांश लोगों को इस लड़ाई का रहस्य मालूम नहीं। इससे यही नष्ट होता है कि हमारे पूर्वजों के यात्म-बल का ज्ञान इस समय दब गया है ! समय अवश्य लगेगा; परन्तु ज्यों ज्या ज्ञान होता जायगा, त्या त्यों आत्म-बल पालौटी पर उतरता जायगा । में जिल श्रात्म-बल के विषय में लिख रहा हूँ, उसका अन्तर्भाव मन्दिर इत्यादि में जाने के बाह्य उपचारों में बिलकुल नहीं होता। कभी कभी ये उपचार श्रात्म-बल के विरोधी भी होते हैं। यदि 'इंडियन ओपीनियन' को ध्यान- पूर्वक पढ़ा होगा, तो यह बात समझ में आ जायगी। विशेष समझा सकेंगे। वहां बैठे बेठे भी तुम इस बल का प्रयोग कर सकोगे। लत्य और अभय को दृढ़ करना ही इसका पहला पाठ है। मो का श्राशीर्वाद 2 . " ( २१ ) जोहान्सबर्ग, -१६०६ चि० मणिलाल, सुलह होने की अव वहुत ही कम सम्भावना है। इस

x xx
--
लिए यह पत्र मंगलवार को लिखे डालता हूं, क्योंकि अब
भागे चल कर अधिक कार्य बढ़ने की आशा है।
ज्यों ज्यों मैं यहां का अनुभव प्राप्त करता जाता हूं, त्यो त्यो
यही मालूम होता है कि यहां सब से अधिक और उत्तम
शिक्षा मिल सकेगी। ऐसा समझने का कोई विशेष कारण
नहीं; इसके अतिरिक्त मुझे यह भी मालूम हुआ है कि
यहां की शिक्षा का कुछ भाग दोष-युक्त है। फिर भी यह
मन में आता है कि तुम सब थोड़े दिनों के लिए यहां रह
जानो। हम जब कि अपना कर्तव्य सुन्दर रूप से बजा
रहे हैं, तो फिर जो कुछ होना होगा, यह होगा। तुम्हारा
दृढ़ता-पूर्वक वहां का पढ़ना एक प्रकार से यहां माने की
तैयारी ही है।
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x
x
x
हम जितने पेड़ों की रक्षा कर सकते हैं, उससे अधिक
पेड़ बाग में हैं - अतएव वे यही प्रकट करते हैं कि
हमारा ज्ञान कशा है। जितना परिश्रम हो सके, उतना
करके रखवाली करो।
का के यहां पुत्रोत्पत्ति हुई, अच्छा हुआ। तथापि
मेरे विचार तुमको मालूम ही हैं । तदनुसार मुझे खेद
भी होता है। देशकाल का विचार करते हुए ऐसा मालूम
पड़ता है कि, इस समय बहुत ही थोड़े भारतवासियों को
विवाह करने की आवश्यकता है। विवाह का अर्थ भी बड़ा
गम्भीर है। विषयोपभोग के लिए जो मनुष्य विवाह करता
है, वह पशु से भी अधिक नीच है। विवाहित को संतानो-
त्पादन के लिए ही मैथुन करना चाहिए, यही धर्मशास्त्र भी

२५
कहता है। इस दृष्टि से देखने पर यही कहना पड़ता है
कि आजकल उत्पन्न होनेवाली सन्तान केवल विषय
वासना का फल है, इसी कारण वह नास्तिक और चरित्र
हीन होनी आती है।
x
x.
x
बापू का आशीर्वाद
पर
( २२ )
लंडन, ३०
१९०६
महाशय स्वामी जी,
कृपापत्र मिला । कुछ दिन पहले आपने डिपो-रोड
कर्जन वायली " विषयक जो व्याख्यान दिया, में
ने उसको पढ़ा था। शिक्षाविषयक पत्र भी पढ़ा। उपर्युक्त
तीनों लेख पढ़ कर मुझो खेद हुआ। मापने मेरे पास जो
पत्र भेजा. वह आपके इसलाम-धर्म-विषयक विचारों का
निदर्शक है। इसके अतिरिक्त वह पत्र यह भी सूचित करता
है कि इस्लाम धर्म जानने वाले के प्रति आपका कैसा
व्यवहार है ? मैं आपके इस्लाम धर्म विषयक मत के
सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखता, परन्तु मैं समझता हूं कि
इस्लाम-धर्म पर आपका जो कटाक्ष है, वह हिन्दू-धर्म के
रहस्य का विरोधी है। केवल कटाक्ष ही होता, तब भी
कोई बात न थी, किन्तु उसको प्रकट करते हुए मापने
उस मौके पर जो नीति-विरुद्ध व्यवहार किया है, वह
विशेष दुःखदायक है।
:

२६
श्रापका यह कथन अत्यन्त दीनतादर्श है कि हिन्दू.
धर्म के रक्षा अंगरेज़ हैं । यदि स्वयं ही अपने धर्म की
रक्षा करने के लिए समर्थ नहीं है तो दूसरे श्या करेंगे ?
सिर ! मैं समझता हूं कि शिक्षा-विषयक आपके विचार
हिन्दू-मुसलमानों में केवल बिरोध उत्पन्न करने वाले हैं, यदि
हिन्दू मुसलमानों में इतना बड़ा अन्तर रखने की आवश्यकता
है, तो फिर भारतवर्ष का पराधीन रहना ही उचित
होगा । फिर उसमें विदेशियों को क्या दोप दिया जाय ?
सच तो यह है कि ऐसा अन्तर रखने से हिन्दू धर्म का लोप
ही हो जायगा ! सौभाग्य से हिन्दू-धर्म अचल है। हजारों
वर्ष से उसकी रक्षा हो रही है, और मेरे धर्म-गुरुओं के
हाथ से भी उसका लोप नहीं हो सकता, यह मेरा अटल
विश्वास है। प्रापको विशेप क्या लिखा जाय ? आप के
ज्ञान के प्रति मुझे श्रादर है, किन्तु आपके व्यहार ले
मुझे खेद हो रहा है।
का आशीर्वाद ।
म
( २३ )
जोहान्सबर्ग
१७-8-१६08
x
x
x
-
चि० मणिलाल,
परोपकार करना, दूसरे की सेवा करना, और यह
करते हुए अभिमान में विलकुल न श्राना- बल,
बल, यही

२७ सच्ची शिक्षा है। ज्या ज्यों तुम वयस्क होते जानोगे, त्यो त्यो यह बात विशेषरूप से तुम्हारे अनुभव में आती जायगी। दीन-दुखियों की सेवा करने से अधिक श्रेष्ट और कौन सा मार्ग है ? इली में धर्म का बहुत सा समावेश हो जाता है। मि० 'वेस्ट ने 'बा' को अंडे का रस (शोरुवा ) दिलाया, परन्तु इल. विषय में निर्विकार भाव ही रखना चाहिये। यदि अंडे के रस के बिना तुम्हारी मां का प्राए भी चला गया होता, तो भी मुझे कोई आपत्ति न थी। क्योंकि उसकी प्राक्षा के विना मैं उसे वह रस कदापि न देने देता। प्रात्मा की अपेक्षा शरीर अधिक प्रिय कदापि न मालूम होना चाहिए। श्रात्मा को पहचानने- बाला यह जानता रहता हैं कि हम शरीर से भिन्न है। वह शरीर का हिंसक है, रक्षक नहीं। यह लव समझ- ने में कठिन है, परन्तु पवित्र और संस्कारयुक्त प्राणी की समझ में यह बात सहज ही आ जाती है , और वह उसके अनुसार चलता भी है। ऐसा समझना अत्यन्त भ्रमपूर्ण है कि प्रात्मा जब शरीर में रहेगी तभी कुछ भला अथवा बुरा कर सकती है । इस भ्रमात्मक विचार के कारण ही इस संसार में बड़े बड़े भयङ्कर पाप हुए हैं; और हो रहे हैं x x यह शरीर दमन करने के लिए ही हमें प्राप्त हुआ है। x x

३०
नहीं पाता। कमाऊ बनने की इच्छा क्यों हो रही है ?
यह कुछ ठीक नहीं, क्योंकि एरमात्मा सब को पेट के
लिए देता है। मजूरी कर के भी तुम्हारा पेट भरेगा !
इसके अतिरिक्त हमको तो फिनिस के उद्धार में,-
प्राथवा ऐले. ही कार्य में मरना है. फिर कमाने की कौन
सी बात ? अच्छा, यदि देश के लिए तुमसो पढ़ना है; तो
तुम इस लमय भी पढ़ ही रहे हो। और यदि कहो कि
आत्मसंशोधन के लिए पढ़ना है , तो इसके लिए तो शुद्ध,
होने की शिक्षा चाहिए, और तुम पवित्र हो ऐसा
लोग: कहते हैं ! फिर रह क्या गया यही कि तुम को
अधिक काम करने के लिए पढ़ना है। परन्तु इसके लिए
इतनी उतावली दिखलाने की प्रावश्यकता नहीं। जो फि.
निकल में हो सके, वह कर लो, शेप के लिए भागे देखा
जायगा। यदि ऐसा तुम समझते हो कि तुम्हारी. चिन्ता
मुझे है तो तुम स्वयं चिन्ता करना छोड़ दो।
वापू का आशीर्वाद
।
.
(२७)
कीलडोनन केलल.
२४ - ११
१२ -१६०६
चि० मणिलाल,
रात के लाढ़े नौ बजे हैं। केप टाउन अब यहां ले पांच
दिन का मार्ग है। दाहते हाथ से लिखते लिखते थक गया
हूं, इसलिए अब तुम्हारा यह पत्र बायें हाथ से लिख रहा हूं।
--

मैं होगा सम्भव है शिलुझे बाहर ही बाहर जेल जाना पड़े, अतएव यह पन तुम्हें लिख रहा हूं। समझता हूं कि मेरे जेल जाने से तुमको भानन्द ही कमोकि तुम लमझदार हो। इस लड़ाई का सेद ही यह है कि, जेल जाने में श्रानन्द माना जायं; और प्रलन्नता से रहा जाय। फिनिक्स के विषय में पूछा, सो भी अच्छा हुआ। हम घान्ना की खोज कैले कर सकेंगे और देश-लेवा हमारे हायसे केले होनी इलसा जप पहले विचार कर लिया जायगा, तब फिर यह लमझाया जा सकेगा कि फिनिक्स ले हमारा क्या सम्बन्ध है। श्रात्मशोध करने के लिए पहले नीति पछी होनी चाहिए। अभय, लत्य और ब्रह्मचर्य इन शुरणों सा लस्रावन करना ही नीति है। इसके करने से स्वयं ही देवावा होती है। इसके लिए फिनिकल से बहुत लहायता मिलेगी। शहर की वस्ती बहुत धनी होती है , और वहां अनेक मनोमोहक वस्तुएँ भी होती हैं, अत- एव ती राय में वहां नीति की रक्षा करना बहुत कठिन होता है ! इसलिप. ज्ञानी पुरुषों ने फिनिक्स के समान एकान्त. स्थल बतलाया है। अनुभव ही एक सच्ची पाठशाला है, जो अनुभव नुम्हें फिनियस में प्राप्त हुधा है, वह अन्यत्र मिल नहीं लाता । श्रात्मशोधन के विचार भी वहीं किये जा सके हैं। x x x X

( २८ )
किलोनन केसला
बुधवार।
चिकरामदास,
४ ४ ४ देखो, तुम को कुछ नही लाये, इस लिए
तुम बापू पर नाराज़ न होना! मुझे कोई चीज़ पसन्द हो
नहीं भाई, यूरोप की चीज़ मुझे पसन्द हो नहीं पाती, मैं
करण्या? मुझे तो भारतवर्ष का ही सब कुछ पसन्द
दूरोप के खोग तो अच्छे हैं; पर उनका रहन सहन अच्छा
नहीं।
( २६ )
चैत्र शुक्ला १२ मंगलवार.
सं० १६६७ ।
चिमणिलाल,
कामएप क्रोधएप रजोगुण समुन्द्रवः ।
महारानो महापाप्मा विध्येनभि वैरिणम् ॥
जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा कि, मनुष्य अनिच्छा
से,-अपनी मर्जी के विरुख भी पाप में प्रवृत्त क्यों होता है,
तब भगवान ने उनको उपर्युक्त उत्तर दिया। इसका अर्थ
यह है कि पाप का मूल काम है, क्रोध है, ये रजोगुण से
उत्पन्न होते हैं, ये बहुभक्षी है, और भारी पापी है, इनको
बहुत बड़ा शत्रु जानो। यह एक सिद्धान्त है, प्रतएव जब
मि० के० क्रुर हुए थे, तब तुमको शान्त रहना चाहिये था।

मैं
हमारे बुजुर्ग लोग जब हम ले क्रुद्ध हो, तब हमको नमू
हो जाना चाहिए, चुप हो जाना चाहिए, और यदि
उत्तर देना पड़े, तो यही कहना चाहिए कि,
अपनी भूल को सुधार लँगा, मुझे क्षमा कीजिए।" इसमें
सचमुच हो जानबूझ कर अपराध करने की कोई स्वीका-
रोक्ति नहीं । जच वह वयोवृद्ध मनुष्य शान्त हो जाय,
तब अपने को जो कुछ शंका हो; उसका विनयपूर्वक
समाधान कर लेना चाहिए।
मि० के० जब शान्त हो जाते, तब तुम को उनले पूछना
चाहिए था कि अमरूद लड़े जा रहे थे, इसलिए उनको
दे डाला तो इस में क्या हानि हुई ?
( ३० )
चैत्र बदी ७ शुक्रवार।
चि० मणिलाल,
यह नहीं जानता कि दशमी का व्रत न रख कर
एकादशी ही क्यों रखते हैं , पर हां, पखवाड़े में कम से कम
एक दिन के लिए भोजन छोड़ देने से शरीर और मन
शुद्ध रहता है।
( ३१ )
वैशाख वदी है।
चि० मणिलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैने कल ही तुम्हें एक पत्र लिखा

C है। तुमने अपनी प्रीटोरिया की यात्रा के विरुद्ध विशेष कारण दिया है। यहां जव से नियस किया गया, कोई भी देर से नहीं उठा, और वहां तो एक सप्ताह भी नियम का पालन नहीं किया गया! अव भी विचार करो । फिर एक बार सूचित करता हूं कि जिस बात का प्रारम्भ करो, विचार पूर्वक करो और जिसको प्रारम्भ कर दो उसको अन्त तक पहुंचाये विना मत छोड़ो। इस बार का मेरा उपवास मेरे हाथ से तुम्हारी अन्तिम सेवा है, इससे अधिक शक्ति सुझमें नहीं। जो कुछ समझना हो, उसे समझ कर अपना चरित्र दृढ़ करना तुम्हारा कर्तव्य है। उपवास इत्यादि के झगड़े में पड़ना तुम्हारा कास नहीं। x X x X X , x X ३२ ) जेठ वदी। दि० मणिलाल, * तुम को जो कुछ करना हो, विचारपूर्वक निर्भयता के साथ, स्वतंत्रता से करो। बापू को क्या पसन्द होगा, इसका विचार पीछे करो। पहले तुम स्वयं, आत्म- कल्याणार्ध जो कुछ करना हो, उसे निश्चित करो, और उसी के अनुसार चलो। यह विश्वास रखो कि, जान बूझ कर अनुचित ढङ्ग ले किया हुश्रा उद्योग निष्फल ही होगा।

३५
+
( ३३ )
भाद्रपद शु081
चि० मणिलाल,
डेविड की प्रार्थना (बाइबल की ) समझ लेने योग्य
है । उसमें उसने दुष्टों का नाश करने की इच्छा की
है, उसका रहस्य यह है कि उसको दुष्टता सहन नहीं हुई।
यही विचार रामायण में हैं। देवता और मनुष्य, दोनों ने
राक्षसों का संहार चाहा था।
जय राम रमा०” इत्यादि
स्तुति में भी यही भावार्थ है। उसका आध्यात्मिक अर्थ यह
है कि, डेविड (अर्जन देवी सम्पत्ति ) अपने शत्रु (दुर्यो
धनादि श्रासुरी सम्पत्ति ) का नाश चाहता है। यह
सात्विक दृत्ति है और भक्ति-भावना में इसका समावेश
होता है। परन्तु जब ज्ञान-दशा प्राप्त होती है, तब दोनों
वृत्तियां दब जाती हैं; और केवल शुद्ध भाव
शेष रह जाता है। इस दशा का वर्णन प्रायः बाइबिल
में न मिलेगा । डेविड दोपयुक्त होते हुए भी भक्त था।
प्रार्थना में उलके जो वचन है, उनकी भाषा सरल है। वह
स्वयं महान् था ; फिर भी ईश्वर के निकट दीनवत् व्यवहार
रख कर वह अपने को तृणवत् मानता है।
केवल
चि० मणिलाल,
मैं उतावलेपन से एक भी कदम नहीं रखूगा | विचार
श्राने ही चाहिए। मेरे कार्यों में परिवर्तन होना ही चाहिए।

३६
an
परन्तु
मैं ऐसी कोई बात न करूंगा, जिससे तुम घबड़ा
जाओ। निराशा को फटकने न देना तुम्हारा कर्तव्य है।
दीर्घ प्रयत्न के बिना उन्नति नहीं होलकती, परन्तु जहां
एक बार उच्च पदवी को पहुंच गये फिर उसकी उज्वलता
की सीमा नहीं। साहस बड़ा है; उसको करने के लिए तुम
समर्थ हो; क्योंकि प्रत्येक आत्मा के गुण समान ही है।
जो श्रावरण हैं , उनको निकाल डालो, बस फिर तुमको
अपनी निज की शक्ति मालूम हो जायगी। इसकी कुंजी
" यम-नियम, इस विषय में फिर कभी लिखूगा
* जो कुछ पढ़ो, उसका खुब मनन करो।
विना विचार किये कुछ भी उच्चारण न करो, एक भी अक्षर
न लिखो, और न कोई कार्य करो।
-
x
( ३५ )
फाल्गुन १०४, १६६६ ।
चिकन
",
तुम्हारा पत्र मुझे मिला है। वहां रह कर भी यहां
की उद्देश्य-सिद्धि में तुम्हारी सहायता होगी। मुझे
मालूम होता है कि, वहां भी बहुत झगड़ना पड़ेगा; पर
यह करने के लिए तुम्हारा चरित्र बनना चाहिए। क्या
तुमने अपने धर्म के मूल तत्त्व समझ लिये हैं ?
तुम कहोगे कि, मुझे सम्पूर्ण गीता कण्ठान है, अर्थ
भी आता है; फिर यह क्यों पूंछते हो कि, मूल तत्त्व मालूम
हैं या नहीं ? परन्तु मैं मूल तत्त्वों के जानने का यह अर्थ

समझता हूं कि, तदनुसार आचरण सरना । देवी-सम्पत्ति का पहला गुण अभय है। यह श्लोक याद आता ही होगा। किन्तु क्या तुमने कुछ भी अभय-पद प्राप्त किया है ? जो उचित है उसे क्या, मृत्यु-पर्यन्त, निर्भयतापूर्वक करते रहोगे ? जब तक यह स्थिति न प्राप्त हो जाय, बरा- रर प्रयत्न करते रहो। फिर तुम बहुत कुछ कर सकोगे। इस अवसर पर प्रल्हाद जी, सुधन्वा, इत्यादि के दृष्टान्तों को आंखों के सामने रहना चाहिए। यह न समझना कि वे सिर्फ दन्तकथाएँ हैं। सच तो यह है कि ऐसे ऐसे काम करने वाले भारत माता पुत्र हो गये हैं , इसी लिए हम उन प्राख्यानों का पाठ करते हैं। यह नहीं कहा जा लकता कि अाज भी प्रसाद और सुधन्वा, हरिश्चन्द्र और श्रवण भारत- वर्ष में नहीं हैं। हम योग्य वन जायंगे, तब उनकी भेंट होगी। अवश्य ही वे वम्बई के भवनों में नहीं मिलेंगे। चट्टान में रोहूं उपजने की आशा नहीं। बम्बई में यदि रहना हो, तो यह भली भांति समझ लो कि मुम्बापुरी नरकपुरी की खान है, उसमें कुछ तत्व नहीं । का आशीर्वाद। स ( ३६ ) फाल्गुन कृ०७, १६६६ । तुम्हारा पत्र मिला । उसको इसके साथ लौटाता हूं, जिससे उत्तर ठीक तौर से ध्यान में आ जाय ।

तुम ने जो शंकाएं निकाली हैं, उनके निवारण करने
का प्रयत्न करता है; पर कदाचित् तुम्हारा समाधान न
होगा। स्वराज्य-विषयक लेख यदि तुम फिर एकदा चार
पढ़ कर देखो तो जो खुलाला तुम को चाहिए, वह कदाचित्
उसमें ही तुम को मिल जायगा ।
हम ने जितना 'सुधार फरना चाहा है, उतना ही
पीछे हम को लौटना पड़ेगा, इसमें सन्देह नदी और यहाँ
कठिन है। पर उसको किये बिना और कोई गति नहीं।
जब कि हम दूसरे ही मार्ग में लग गये हैं, तब पोछे लोटे
विना छुटकारा नही हो सकता। जो कुछ हम भोगते आये
है, उसके विषय में बीतरागी बनना ही टीक है; पर ऐला
होने के लिए उस भोग के विषय में तिरस्कार उत्पन्न होना
चाहिए। जो लाधन लाभदायक जान पड़ते हैं, वे लूट
नहीं सकते; पर उनमें जितना लाभ दिखाई देता है, उससे
हानि ही अधिक है इस बात का जिस को विश्वास हो
जायगा, वह उस को तुरन्त ही त्याग देगा। हम लोगों के
पत्र शीघ्र मिलने का सुभीता हो गया, मैं नहीं समझता
कि इसमें हम लोगों का लाभ हुा । जब हम रेलवे
इत्यादि साधनों को ही नमस्कार करने के लिए तैयार हो
जायेंगे, तब केवल इस लिए, कि पत्र शोधू पहुंचते हैं, इस
प्रलोभन में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं ! जिन वस्तुओं
में वास्तव में कोई दोष नहीं है, उनका यथोचित उपयोग
करने में कोई हानि नहीं । जब तक हम इस सभ्यता के चक्कर
में पड़े हैं, तब तक डाक इत्यादि का काम अपने भर के
लिए उपयोग कर लेने में कोई हानि नहीं। हां उनका
उपयोग समझ बूझ कर करना चाहिए, इससे उनका मोह

३४ उत्पन्न नहीं होगा, और व्यवसाय सम्बन्धी व्याधियां न बढ़ेगी, वरन वे कम ही होती जायगी। यह बात जिसकी समझ में आजायगी, वह उन देहातों में रेलवे अथवा डाक ले जाने का प्रयत्न न करेगा, जहां वे न होगी। यह लच है कि जहाज़ इत्यादि वातं एकदम नहीं जायगी, और न कोई उनका त्याग करेगा; परन्तु इस भय से तुम को और चुप बैठ कर उनका उपयोग बढ़ाने की कोई प्राव- श्यकता नहीं । यदि एक मनुष्य उपर्युक्त साधनों का उपयोग कम करेगा, अथवा बन्द कर देगा, तो दूसरा उसका अनु. करण करने लगेगा । दूसरा करें, चाहे न करे, परन्तु जो समझता है कि ऐसा होना चाहिए, वह अपना कर्तव्य करता ही रहेगा । सत्य के प्रचार की यही शैली है, इसके अतिरिक्त संसार में और कोई युक्ति ही दिखाई नहीं देती। मुझको . पालामेंट का मोह दूर होना कठिन काम है। प्राचीन काल में शरीर की खाल छीलते, जलाते, नाक-कान काटते थे। यह जंगलीपन था, परन्तु चंगेज़ खां और तैमूरलंग इत्यादि के अत्याचार की अपेक्षा पालामेंट का अत्याचार बड़ा है और हम उसी में चक्कर खा रहे हैं। श्राधुनिक अत्याचार एक प्रकार का मोहजाल है; और यही अधिक नाश करता है। एक व्यक्ति के अत्याचार का सामना किया जा सकता है, परन्तु जब एक प्रजा के नाम से दूसरी प्रजा पर अत्याचार होता रहता है, तब उसका सामना करना बहुत कठिन होता है। प्राचीन काल की अँधेर नग- रियों के अनबूझ राजाओं में भी कोई २ चतुर राजा निकल जाते थे, वैसे ही आज कल , की भी दशा है। यदि हम

४०
पर अकेला राजा एडवर्ड राज्य करता होता, तो कोई हानि
न थी; परन्तु आज कल तो प्रत्येक अंगरेज़ हमारा और
तुम्हारा राजा है। आज कल की इस दशा का पूर्ण विचार
करके देखो। इसमें माया मोह का प्रश्न नहीं। भारत की
साधारण बुद्धि को पालामेंट एक ढकोसला जान पड़ता
है, पर जो असाधारण बुद्धि सभ्यता के चक्कर में पड़ी
हुई है उसको तो पालामेंट से भारी प्रेम है।
तुम कहते हो कि पिंडारी लोगों के आगे दया का क्या
काम ? परन्तु इससे तो तुमने मानों प्रात्मा के अस्तित्व
पर ही आक्षेप किया, अथवा उसके गुणों को अस्वीकार
किया ! भगवान पतंजलि ने दया इत्यादि का इतना
महत्त्वपूर्ण वर्णन किया है कि उसके विचार से ही हृदय
भर जाता है। वास्तव में बात तो यह है कि हमारे हृदय
में भय ने घर कर लिया है, अतएव वहां सत्य, दया,
इत्यादि गुणों का विकास नहीं होता, और इसी कारण
हम यह निश्चय कर लेते हैं कि दया आदि गुणों का
कर प्राणियों पर कुछ भी प्रभाव न पड़ेगा । दया
करने वाले पर ही दया करना वास्तव दयावृत्ति नहीं
है, किन्तु यह तो दया का व्यापार है।
हमारी रक्षा चाहे कोई मुफ्त में करे और चाहे दाम
लेकर करे, हम दुर्बल ही कहलायेंगे। यदि पिंडारी इत्यादि
लोगों के कष्ट से छूटने के लिए हमको विदेशियों की
सहायता लेनी पड़ती है, तो हम सचमुच ही स्वराज्य के
लिए योग्य नहीं। यदि शरीर-बल से उनको जीतना है,

.
४१
तो वह वल हमको स्वयं ही बढ़ाना चाहिए। ऐसी दशा
ने 'कर' इत्यादि देने की प्रात्रश्यकता नहीं। स्त्री पति
के द्वारा, अधिकार से अपनी रक्षा चाहती है, परन्तु तभी
तो वह 'अवता' कहलाती है।
स्वराज्य उली के लिए है जो समझता है कि 'स्वरा.
ज्य ' क्या चीज़ है । हम और तुम अाज ही उसका उपभोग
कर सकते हैं, परन्तु दूसरों को यह लीखना पड़ेगा कि वह
कैसा है ? किसी का दिया हुअा राज्य भी परराज्य ही है,
चाहे फिर उसका दिलाने वाला भारतीय हो या अंगरेज़ ।
गोरक्षा-प्रचारिणी-सभा को गो-वध-प्रचारिणी-लमा
कहा जाय तो विशेष उपयुक्त होगा क्योंकि उनका उद्देश्य
यह होता है कि नौत्री को जबरदस्ती छुड़ाकर अथवा
सुसलमानों को दवा कर उनकी रक्षा की जाय ।
द्रव्य देकर गौत्री को छुड़ाना कोई सच्ची रक्षा नहीं
है। यह तो कसाई को कपट लिखाने का खुला मार्ग है।
इसी प्रकार यदि मुसलमानों पर दबाव डाला जायगा।
तो वे और अधिक वध करेंगे, परन्तु यदि उनको प्रेम
से वशीभूत किया जायगा अथवा उनसे सत्याग्रह किया
जायगा, तो वे गौओं की रक्षा करेंगे। यह सब करने के
लिए गोरक्षा-प्रचारियो-सभा की आवश्यकता नहीं। ऐसी
सभा हिन्दुओं को हिन्दूपन सिखलाने वाली होनी
चाहिये।
बैल को पूग पूरा चारा न देकर, परई कोच कर,

४२ बहुत सा काम कर और तरह तरह के कष्ट देकर मारने की अपेक्षा तलवार की एक बार से हो टुबई का देना अधिक अच्छा है। रामचन्द्र और रावण इत्यादि के तहत स्वरूपों का वर्णन करने से बड़ी गड़बड़ी मचेगी। दस मस्तकों और बील भुजाओं वाला गवण, मेरे विचार से मानवी शरीर में ता हो नहीं सकता, परन्तु हो. यह बात बुद्धि में पाती है कि रावण पक महान विषयो और जड़-पदार्थ घा: पबम् श्री रामचन्द्र पी चैतन्य ने उसका नाश किया। "सद-माह-महा-समता-रजनो तम- पुज" नाशक दिवाकर की सेना-पेला वर्णन तुलसीदास जी ने श्री रामचन्द्र का किया है। सद, लोह और ममता का जब हम में गन्ध भी न रहेगा. तब पया हम को किसी शरीर का नाश करने के लिए शारीरिक बल की पावश्यकता पड़ेगी ? यदि नहीं, तो फिर मद, मोह, मनता रहित पूर्णया- निधि श्री रामचन्द्र ने रावण का नाश किस प्रकार किया होगा? हम जब रामक्री विभूति तक पहुंचेगे, लक्ष्मण समान चौदह वष निद्रा का त्याग करेंगे, ब्रह्मचर्य पालेंगे तभी हम को यह मालम होगा कि शारीरिक बल का उपयोग करना पड़ता है या नहीं। पद् वन्दन ले सब कुछ सिद्ध होता है, यह मुझे दिखलाना है। ट्रांसवाल का उदाहरण अच्छा दिया। यह कहने से काम नहीं चलता कि प्रेम है : बरन् उसको कसौटी पर उतारना पड़ता है। इस बात को सोचो कि हरिश्चन्द्र का सत्य, जब तक सत्य नहीं ठहर गया. तब तक उनको कितने संकट भोगने पड़े। सुधन्वा की भक्ति जब तक सच्ची नहीं सिद्ध हो गई, तव तक उसको क्या क्या सहन करना पड़ा ? हमें यह न समझना चाहिए कि ये सब दन्त-कथाएं हैं । हां, नाम, रूप अन्य हो सकते हैं। कथा लिखनेवाले ने अनुभव लिख रखा है । ट्रांलवाल में भी मेरे समान बड़बड़ करने वालों की परीक्षा आज हो रही है। उन में अनेक सत्याग्रही कहलाने वाले लोग आज ढोंगी सिद्ध होगये हैं। फिर लम्चा सत्याग्रही किलको माना जाय? यह तो कहीं लिखा नहीं कि जिन में दया इत्यादि गुण होंगे, उनको दुःख नहीं भोगना पड़ेगा । दुःख है क्या चीज़ ? मन ही वन्ध- मोक्ष का कारण है-ऐसा गीता में लिखा है। सुधन्या को खौलनेवाले तेल की कड़ाही में डाल दिया था; परन्तु दुःख देनेवाले की दृष्टि से ही उसके लिए वह दुःख था; स्वयं सुधन्वा को तो प्रानो भक्ति की महिमा दिखलाने के लिए वह एक बहुत सुन्दर अवसर मिल गया था। यह सम्भव नहीं कि सब लोग एक ही समय में गरीव अथवा अमीर हो जायें, परन्तु सारासार विचार करने के पश्चात यह ध्यान में आजायगा कि किसानों पर अधिकांश संसार का गुजारा है। किसान लोग गरीव ही हैं । यदि कोई वकील. परमार्थ को बढ़ २ कर बाते मारता है, तो उसे मेहनत-मजदूरी करके उदर-पोषण करना चाहिए, और विकालत मुफ्त में करनी चाहिए। कदाचित यह बात तुम्हारे ध्यान में शीघू न आयेगी कि वकील एक अत्यन्त प्रालसी प्राणी होता है। मान लो, कोई मनुष्य

मात्रा में ही मिनारों में मना रहता है किसय मानन्द
गा, अगर मानमान AIR FTrऔर 4 पन
नमा गाभिन्तु. गर जिन पर
गायों में गिरकर मरता है, उसी ITat.
दत मी घरी रममा तीन जाना
र frat parisीर ने मोग-गिमार
बनाना है। यह बात पर निगोलि होने
है, या में हार गन्नु गन,
Pramari
।
दशा में वर्ग की मं.पा पा र सकता
: पांच साल मुनीर र दिमावर, योगी
पाट गरीनमाला Ary: शा.
वियोग करने की गति से देश को मारा,
नल शमोहोर अधिपदनामी
दिन यचना चाहिए, रोग देने कान में आयो
शीशेजना करनी चाहिए बदमाद हमको बिना
शास्त्र के अध्ययन के भी गालम हो सकती । मका यह
तात्पर्य न कि बिलात हीन हो-ये हमारे धीरे
लगे ही करने का मतलब यही है कि इस दवसाय
को अधिक महत्त्व देकर अनेक नपयुयया धन और समय
का अपव्यय करते हैं. यह अन्ना नदी मिलायती चाक से
तो हम को लेशमात्र भी लाभ नहीं था; और न हो सकता
है , या निशित समझिये।
तुम्हारी शंकाओं के उत्तर हो चुके । सम्पूर्ण भारत के

२५ उद्धार का भार विना कारण सिर पर मत लो। श्रपना निज का ही उद्धार करो। इतना भार काफ़ी है। सब कुछ अपने व्यक्तित्व पर ही लागू करना चाहिए । हम स्वयं ही भारत- वर्ष हैं - बल, यही मानने में आत्मा का बड़प्पन तुम्हारा उद्धार ही भारतवर्ष का उद्धार है। शेष सब व्यर्थ है, ढोंग है। तुम में सच्चे प्रात्म-प्रेम का रस उत्पन्न हो, उसी में तुम डूचे रहो। शेष की चिन्ता तुमको और मुझको करने की कोई अावश्यकता नहीं । दूसरे की चिन्ता करते करते कुछ हाथ न पायेगा। किसी ने ठीक कहा है:- दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम । अस्तु, इसका विचार परमार्थ-दृष्टि से करो, स्वार्थ-दृष्टि से न करो और कुछ पूछने की इच्छा हो तो ज़रूर पूछो। का यथायोग्य। म f . ( ३७ ) कार्तिक शुक्ला २, सं १६६८ ! चिम लिय-राम-प्रेम-पियूष-पूरण, होत जन्म न भरत को। मुनिमन अगम यम नियम शमदम विषम व्रत आचरत को ॥ दुख दाह दारिद दम्भ दूपण सुयम मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठहिं हठि राम सन्मुख करत को ॥ यह छन्द अयोध्याकांड के अन्त का है। इस पर विचार

मेरे कानों मसको यनिमल गारोटिन
रथ में मति को प्रधान पद मिला, अनारने
लिए भी गम-नियमादि चाहिए माविषय में माyिari.
प्रणाली निगपशेगी। शमदमादि की शिक्षा दिना मात्र
चतुरता है, मैं इस बात का अनुमान बाणा पर कर
रहा है. तुमको या उपवेशद।
कामाबाद
.
बदो स०१६
सर्पदंश पर तुमने कुछ प्रश्न किये हैं। और दुसरे
अनुभव भी बतलाये हैं। मैं इस विषय में जो कुछ लिम्गा,
लो अनुमानिक है, अनुभविक नहीं । नुम को जो उदाहरण
मिले हैं, उन पर बहुत कुछ ध्यान देने की आवश्यकता
नहीं 1 ( शरीर में संचार होने से ) जो हिलने-जुलते हैं, उसमें
शायद कुछ अर्थ हो, पर अधिकांश में विशेषतया ढोग ही
रहता है। सर्प और विच्छ उतरने के विषय में भी ऐसा
ही है। निःसन्देहः इसमें थोड़ा सा तथ्य अवश्य है, परन्तु
ऐसा नहीं कि हम उसकी खोज की धुन में लग जाये ।
हमारी प्रकृति आत्मिक होनी चाहिए। सब कुल यहाँ तक कि
आरोग्यता भी-उसी के अधीन है। प्रात्म-शोध में निमग्न
रहनेवाले को सब कुछ आप हो आप मिल जाता है।
।

बहुत लोग उन कपड़ों का बारहो माल व्यवहार करते हैं, परन्तु, चाहे वे "दान कंडक्टर" भले ही हों, फिर भी गरमी में उनका व्यवहार करना ठीक नहीं. क्योंकि इससे शरीर नाजुक हो जाता है। शरीर को सम-शीतोष्ण रखने के लिए इस प्रकार तैयार करना चाहिए कि वह शीत और उष्ण दोनों का सामना करके विजय प्राप्त करें। ईश्वर है भी और नहीं भी है। सूल अर्थ से ईश्वर नहीं है। मोक्ष के प्रति पहुंची 'हुई श्रात्मा ही ईश्वर है, इसलिए उसको सम्पूर्ण ज्ञान है। भक्ति का सच्चा अर्थ श्रान्मा सा शोध ही । प्रात्मा को जब अपनी पहचान हो जाती है, तब भक्ति लही रहती, फिर वहाँ ज्ञान प्रकट होता है। नरसी मेहता इत्यादि ले ऐली ही आत्मा की भक्ति की । कृष्ण, राम, इत्यादि अवतार थे, परन्तु हम भी अधिक पुण्य से वैसे हो सकते हैं। जो श्रात्मा मोक्ष के प्रति पहुँचने के लगभग श्रा जाती है, वही अवतार है। उनले विषय में उसी जन्म में सम्पूर्णता सानने की आव- श्यकता नहीं। कृष्ण, राम, बुद्ध, ईसामसीह, इन सव में कौन बड़ा हुया, यह बतलाना अत्यन्त कठिन है । सब के कार्य भिन्न भिन्न, प्रसंग भिन्न भिन्न और समय भिन्न भिन्न हैं। यदि चरित्र का विचार किया जाय, तो कदाचित युद्ध का दर्जा ऊपर रहेगा। परन्तु यह भी कैसे कहूं! अपने अपने मन के अनुकूल सत्तों ने उनके वर्णन किये हैं। वैष्णव - कृष्ण को पूर्णावतार मानते हैं, उनको वैसा मानना ही चाहिए, क्योंकि इसके बिना अनन्यभक्ति नहीं होगी ! निश्चियन लोग ईसामसीह के विषय में ऐसा ही कहते हैं। भारतवर्ष में कृष्ण अन्त में हुए है, श्रतएव उनकी विशेष महिमा है। ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास न करने वाले को इधर- उधर भटकना पड़ता है, अन्यथा; उले यह कहना पड़ेगा कि आत्मा भी नहीं है ! अवतार की आवश्यकता है और वह सदैव रहेगी। जब लोगों में अत्यन्त निराशा और अनीति फैलती है, तब अवतार हुआ करता है। जिस समय किसी देश में दुष्टों के कारण कुछ साधारण नीति पालन करने वाले लोग अपने हितों की रक्षा चाहते हैं, उस समय जो मनुष्य यलिष्ट और नीतिश होता है. और जो दुष्टों से दबता नहीं वरन जिसके मय से दुष्ट हो दव जाते हैं, वही मनुष्य ( अपने पराक्रम के कारण ) जीवितावस्था में अथवा मरने पर अवतार माना जाता है । ऐसे मनुष्य का यह मानना सम्भव नहीं कि हम जन्मतः ही अवतारी है। धर्मों की तुलना करने में कोई लाभ नहीं। यह बात मन में रख कर, कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है, दूसरे धर्म की ओर देखना चाहिए। साधारणतया धर्म की तुलना करते हुए दया-धर्म ही की माया रहती है। जिस धर्म में दया को विशेष अवकाश दिया गया है, उसी धर्म को श्रेष्ट समझना चाहिए। दया धर्म का मूल है," इत्यादि वचन सहज सब -- के

४६
ही समझ में आने योग्य सूत्र है। "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या-
यह दूसरा सूत्र है। ऐसा एक भी सूत्र नहीं हो सकता जो
सब को समान ही स्वीकार हो । परन्तु मैं समझता हूं
कि श्रात्मार्थी मनुष्य को उचित समय में उचित वचन
उपरति के लिए कारण होता है।
जाति-भेद की आवश्यकता है भी, और नहीं भी है।
ज़बरदस्ती कायम रखे जाने वाले जाति-भेद की बिलकुल
ही आवश्यकता नहीं । पेरिया-अस्पृश्य-जाति को उत्तेजन
देने में गा ... ने जो कार्य किया, वह स्तुत्य है।
सारांश यह कि जितने मनुष्य हैं, उतने ही धर्म हैं।
जव तक मनुष्य भिन्न भिन्न प्रकृति के हैं, तब तक धर्म भी
भिन्न भिन्न रहेंगे। जो मनुष्य अपनी आत्मा और दूसरे की
आत्मा को एक रूप समझेगा, उसको धर्म में भी एकता
दिखाई देगी।
कहते हैं कि जब आत्मा शरीर-बन्धन से मुक्त होता
है, तब वह मोक्ष पाता है। मोक्ष-स्थिति इन्द्रियगम्य नहीं;
किन्तु अनुभवगम्य है। भूतादि योनियां दुष्ट योनियां हैं।
दुष्कृत्य करने वाले इन योनियों को प्राप्त होते हैं।
दुग्धोपचार-विषयक पुस्तक मैंने देख ली, परन्तु मुझे
वह पसन्द नहीं आई। मेरी दशा ही ऐसी है। चाहे कोई
यह भले ही सिद्ध करदे कि मांस-भक्षण में शरीर को उत्तम
करने की शक्ति है, परन्तु फिर भी वह मेरे लिए त्याज्य
है। बल, दुध के विषय में भी ऐसा ही समझिये। मेरा

५०
मत है कि वह भी मांस का ही एक स्वरूप है, इस लिए
मनुष्य
को उसके खाने का अधिकार नहीं। ऐसा कहना तो
अज्ञान की परमावधि है कि छोटा बच्चा मां का दूध
पीता है, इसलिए मनुष्य को गौ का दूध पीना चाहिए ।
...का याशीर्वाद ।
( ३६ )
श्रापाद शुल्ला ६, सं० १६६६ ।
चिज
मैं अच्छी पाठशाला के विरुद्ध नहीं है, परन्तु मेरा
मत है कि बहुत से विद्यार्थियों की पाठशाला अच्छी नहीं
होती। सच्ची पाठशाला वही है जहां चौबीसों घंटे विद्यार्थी
रहते हैं, क्योंकि ऐसी पाठशाला में दुहरी शिक्षा मिलती
'. - हमारे सभी शास्त्र विचारपूर्वक और शानपूर्वक लिखे
गये हैं , यह मानने की कोई आवश्यकता नहीं। यह भी
एक शास्त्र ही है। हां, यदि ऐसी व्याख्या की जाय कि
जिसमें शुद्ध ज्ञान है , वही शास्त्र है , तो अवश्य ही यह
कहा जा सकेगा कि शास्त्र ज्ञान-पूर्वक लिने गये हैं। किन्तु
जिनमें नर-यज्ञ इत्यादि वाते हैं , उनको अज्ञानमूलक मानना
पड़ेगा । कदाचित् ये बातें शुद्ध शास्त्रों में पीछे से धुलेड़ दी
गई होगी; परन्तु श्रात्मार्थी मनुष्य को उनके संशोधन की
कोई आवश्यकता नहीं । यह काम इतिहास संशोधकों का है।
-

५१ हमको तो प्रत्येक लेख और वचन से सिर्फ सार ले लेना है। सभी शास्त्रों को शास्त्र ही समझ कर और उनके अनर्थ को अर्थ (सत्य ) मान कर, उनकी संगति लगाने के झगड़े में हमको क्यों पड़ना चाहिए ? चाहे भारतवर्ष हो. चाहे और कोई जगह हो, ज्ञान और अज्ञान दोनों साथ ही लाथ चल रहे हैं। इसी लिए धर्म के नाम पर देवी को वलि इत्यादि देने के अन्याय-पूर्ण कार्य हो रहे हैं। वर्तमान समय में हम उनको दूर करने के प्रयत्न में भी नहीं पड़ सकते। इस समय तो आत्मा को पहचानना ही हमारा मुख्य कर्तव्य हो रहा है। जब हम इस पाठ को सीख कर तैयार हो जायेंगे, तव शेष सब बातों का खुलासा श्राप ही श्राप हो जायगा। यह नितान्त सम्भव है कि विभीषण जो रामचन्द्र महाराज से विलकुल निःस्वार्थमात्र से मिले होंगे। निस्स- न्देह, लगे भाई के अपराध भी परमेश्वर से कौन और कैसे छिपा सकता है ? इसके अतिरिक्त साई के अनर्थ टालने लिए भी प्रभु की सहायता माँगी जा सस्ती है ! तुमने भागवत का श्लोक उद्धत किया है; उसका शब्दशः अर्थ करने से काम नहीं चलेगा। कृष्ण की लीला कृष्ण ही जाने। उन्होंने चाहे सकाम होकर ही कर्म किया हो, तथापि हमारे समान जड़-बुद्धि प्राणी बैला नहीं कर सकते; उनकी प्रभुता उनको वैसा करने की सुविधा देती होगी; परन्तु इसले हम, तो वही सुविधा नहीं ले सकते। सच पूछिये तो भागवत के लेखक ने भी अपने ज्ञान के अनु-

પર
क
सार कृष्ण के विषय में लिखा है, लचा कृष्ण किसी को भी
मालूम नहीं हुश्रा।
का प्राशीर्वाद ।
म
( ४० )
प्राषाढ वदी १ सं० १९६६ !
चि० ज
इस विषय में तुमने जो कारण दिये हैं कि हमारे
समान लोगों पर अयोग्य भक्षण का प्रभाव तुरन्त ही क्यों
पड़ता है, वे कारण ठीक हैं । वुद्धदेव ने भिक्षा में मिले हुए
मांस का ज्योंही भक्षण किया, त्योही उनका देहपात
होगया।
पेज़क न्यूटन के आविष्कार के विषय में तुमने
जो विचार प्रकट किये हैं, वे ठीक हैं। अभी हाल में
प्रख्यात विज्ञान-वेत्ता वो ने भी यही विचार प्रकट किये
हैं । वे कहते हैं कि इन सब आविष्कारों से लोगों की
नीतिमत्ता किसी अंश में भी नहीं बढ़ी । मेरा ख़याल
है कि बिना दूध के रहने वाले अनेक लोग होंगे, परन्तु
मैं पहले ही कह चुका हूं कि, किसी समय में एक महा-
पुरुष ने भारत में मांसाहार बन्द करने के लिए जो
उपक्रम किया, वह इतना महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था कि
उसके आगे दूध के विषय में विचार करने वालों अथवा
लिखने वालों की धीमी आवाज़ किसी के कान में नहीं

५३ पड़ सकी। इसका कारण हमारा प्रज्ञान है। हमने संसार का समस्त साहित्य कहां पढ़ा अथवा देखा है ? सच तो कि भूतकाल में इसका विचार हुअा हो अथवा त हुधा हो, हम को यह देखना चाहिए कि, यह बात हमारी बुद्धि में आती है या नहीं। इसके सिवाय, दुध- सेवन करना पाप है, यह कोई कहता नहीं। यह है कि X x x X का श्राशीर्वाद । (४१ ) फाल्गुन शुक्ला ६, १६६६ । चि० ज. ब्राह्मणों का सन्मान करते समय हम को अपनी भावना पवित्र रखनी चाहिए, उन पर श्राक्षेप न होना चाहिए किसी खानदानी कुहम्ब के मनुष्य को दरिद्वावस्था में देख कर अवश्य ही उसके विषय में हम को खिन्नता होती है और मन में श्राद-मात्र भी पैदा होता है, परन्तु किली वेश्या-पुत्र के विषय में बैला नहीं जान पड़ता। मेरे लिखने का यह तात्पर्य नहीं है कि, ब्राह्मणों के दुराचरण का भी अनुमोदन करना चाहिए । वे जिस समय निष्कारण भिक्षा मांगने पाते हैं, उस समय यदि तुम अपना अध्ययन छोड़ कर उनको चटनी भर घाटा डालने जानोगे, तो मानों तुम अपने अध्ययन की व्यर्थ हानि करोगे। इस में ब्राह्मणों को मान देने की कोई बात

1
५.४
नहीं, उलटे तुम्हारी भीरता और अविचार का ही परिचय
मिलता है।
मैं पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करने के विरुद्ध नहीं
हूं , परन्तु वर्तमान पाठशाला का हमारे ऊपर व्यर्थ और
अनुचित प्रभाव पड़ता है। मैं उसके विरुद्ध हैं। वर्तमान
पाठशालाओं में अध्यापक नीति नहीं होते, यह पहला
दोष है । विद्यार्थी शिक्षकों से दूर रहते हैं, यह दूसरा
दोष है। अनेक विषयों में व्यर्थ समय जाता है, यह
तीसरा दोप है , और ये पाठशालाएं प्रायः हमारी गुलामी
का चिन्ह होती हैं , यह चौथा दोष है।
यदि तुम दूध, दही नहीं छोड़ोगे तो कोई हानि
नहीं: किन्तु उनको प्रधानता अवश्य ही न देना।
का आशीर्वाद ।
..
म
( ४२ )
चि० ज
.
पवित्र तीर्थ स्थानों में तेल त्याज्य समझ कर घृत
पवित्र माना गया है ; इसका जो कारण मैंने अनुमानित
किया है, वही ठीक है। भारतवर्ष पहले मांसाहारी था;
परन्तु किसी मनुष्य जब पहले पहल अनेक लोगों
को निमांसाहारी बनाया, तब उसने घी को अति पवित्र
वस्तु निश्चित किया, बस, तभी से हम लोग अपने खान-पान
में धी का बहुत अधिक उपयोग करते हैं। जितना धी
ने

अधिक हो, उतनी ही रलोई उत्तम होती है, इससे
बढ़कर पागलपन का विचार और क्या हो सकता है ?
परन्तु यही विचार सब को पलन्द है, इसलिए पवित्र स्थानों
में भी घी को उच्च पद प्राप्त हुआ है । जिसने पहले
पहल यह सुधार किया, उसने देखा कि जब लोग अधिक
घी खाने लगेंगे, तव मांसाहार को बहुत आवश्यकता
न रहेगी । इंगलैंड के शाकाहारी लोग अंडों का
व्यवहार इसी उद्देश्य ले करते हैं। उनकी रसोई में अंडे
के बिना कदाचित ही कोई पदार्थ रहता हो । उन्होंने
अंडों को करीब करीव पवित्र स्थान दिया है ।
.
"स्वाद जय" करने के विषय में तुम ने जो श्लोक
दिया, उसको मैंने देखा, तथापि मेरी की हुई
आलोचना अव भी ठीक ही है । एक श्लोक से कुछ
अन्तर नहीं पड़ सकता । उस विषय पर विशेष जोर
देना चाहिए था। यदि ऐसा किया होता, तो बड़े बड़े
वैष्णव-मन्दिरों में प्रत्येक अवसर पर जो मिष्ठान्न भोजन
हुश्रा करता है, वह कदापि जारी न रहता । प्रत्येक तिथि-
पर्व के दिन घी गुड़ इत्यादि दान करने की चाल ही
न पड़ी होती; और ब्राह्मण-भोजनों का रिवाज भी
पड़ा होता। वर्तमान समय के ऋषियों और साधुओं ने
स्वादेन्द्रिय को नहीं जीता; किन्तु उलटे स्वादेन्द्रिय ने
ही मानों उन पर विजय प्राप्त कर लिया है; इस सम्बन्ध
में जितना लिखा जाय, उतना थोड़ा है। यदि हम किसी
का अपमान करने के अभिप्राय से ऐसा कहें तो पापी
ठहरे, परन्तु जहां हमारा और दूसरे का कल्याण ही

५६ मुख्य प्रश्न है, वहां चाहे जितना मान्य पुरुष हो, यदि उसने अपूर्णता दिखाई दे, तो उसका विचार करना हमारा कर्तव्य है। का आशीर्वाद। म" + ( ४३ ) फाल्गुन वदी ११, चुइटेन सिंगल। चि० मणिलाल, x फेरफार बहुत जल्दी कर रहे हो, ऐसा करो जिससे उसमें कुछ स्थायी हो जावे । यदि तुम्हारा जीवन वहाँ नियमित हो गया तो समझ लो कि बहुत कुछ हो गया । मैं लमझता हूं कि मेरे साथ तुम्हारा चलना ठीक x होगा। x x देश में तुम उच्च-श्रेणी केबलचारी बनो, और तुम्हारा प्राचरण स्वाभाविक ही इतना संयमी हो जिसने दूसरों पर तत्काल उसका प्रभाव पड़े-बल, यही मेरी अभिलाया है। इसके लिए तुम्हारे भीतर उद्योग- वृत्ति, अभ्यास-वृत्ति और शुद्धवृत्ति बानी चाहिए । जान बूझ कर प्रभाव डालने का प्रयत्न करने से प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम को स्वयं जो पसन्द आये, अर्थात् कर्त्तव्य के तौर पर, 'स्वयं अपनी पसन्दगी से, पूर्ण विचार के बाद, जो कार्य- क्रम तुम निश्चित करो, उसका श्राजन्म पालन करना चाहिए। , x X- X (४४) , x x X राये ? गुरुवार । चि० मणिलाल, जिस पत्र में तुमने पश्चात्ताप दिखलाया है, उली पत्र में लिखते हो कि, उसी दिन शाम के समान वस्तु तक परोसना भूल गये । यह तो लिखते हो कि परो- लना भूल गये, परन्तु यह नहीं लिखते कि कैसे दोष किसका है ? क्या तुमने यह काम किसी दूसरे को सौंपा था ? प्रेम से बनाया हुश्रा शाह तुमको स्वयं ही परो- सना चाहिए था, अस्तु, इलले भी कुछ शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ! जो होगया, उस पर शोक करने की कोई श्रावश्य- पता नहीं, परन्तु हां, उसले शिक्षा ग्रहण करने की प्राक- श्यकता जरूर है। इस विषय में कर्तव्य-परायण बनो । आत्म-संयम का साधन करो। परन्तु विना विचार के यह कैले हो सकेगा? लव विपक्ष में श्रादर-माद रखो। दूसरों के दोष देखने की अपेक्षा, उनके गुणभर ले लेने चाहिए; और अपने दोप देखने चाहिए । ग मारने में कदापि लमय न व्यतीत करना चाहिए, किन्तु सतत विचार करते रहना चाहिए । एशक्षण भी व्यर्थ जाने देना मानों उतना जीवन व्यर्थ ही खोना है और यह ईश्वर की चोरी करना है। यह जान कर प्रत्येक क्षण का अच्छा जपयोग करो। शरीर कालो। को खूब

x
X
(४५)
चैत्र कृष्णा २, रविवार ।
चि० मणिलाल,
मि० कोलनचेक चाहे जब सोते हो,
लेकिन तुमको अपना नियम न छोड़ना चाहिए। भोजन का
भी वैसा ही नियम रखना चाहिए । जो बाक्य तुम्हारी
समझ में नहीं पाये, उसका अर्थ इस प्रकार है "जो लोग
अपने कार्य केवल कानून के कारण हो (अर्थात् केवल कानून
के भय से मन से नहीं ) करते हैं, उनको तो शाप है ही:
बल्कि ऐसा भी लिखा है कि जो कानून में कहे अनुसार
काम नहीं करते (अर्थात् उसके अनुसार नहीं चलते)
तो पूर्णतया शापित है " (बायबल) । भावार्थ यह है कि
केवल पढ़ लिख लेन से ही कहीं मोक्ष मिलने का उदाहरण
नहीं मिलता। गीता में भी ऐसा हो चाश्य है, श्री कृष्ण ने
अर्जुन से कहा है कि, "त्रैगुण्य विषया वेदा निस्त्रगुण्यो
भवार्जुन ।" इसका यह अर्थ नहीं कि शास्त्रविहित कर्म
करना ही न चाहिए । उन कमी को तो करना ही चाहिए,
परन्तु वही न ठहरते हुए उनका गूढ़ अर्थ समझ कर उनका
मूल हेतु पहचान फर-अधिक उन्नत होना चाहिए, यही
उसका अर्थ है। जो मनुष्य विहित कर्मों का त्याग कर के
शुष्क ब्रह्मवादी बनेगा, वह तो "इतो भूष्टस्ततो भूष्टः" हो
जायगा। वह ऐसी हो स्थिति में पड़ जायगा कि इधर
उसका शास्त्र का प्राश्रय भी चला जायगा, और उधर ज्ञान
की नींव भी न पड़ेगी। इसी लिए सेंटपाल ने गेलेशियन्ल से
कहा था :-"चाहे तुम लोग शास्त्रानुसार कर्म भले ही करो,

५६ -- परन्तु यदि तुम ईसामसीह पर श्रद्धा रख कर, उनके उपदेश के अनुसार, न करोगे, तो शापित रहोगे।" यही अर्थ" वाँड मेड” और “फ्री वूमन” में है। वाँड का अर्थ है वन्धन । उसमें शास्त्र को स्थल माता की उपमा देकर दिखलाया है कि “ चाँड-मेड" यह परतंत्र-गुलाम की श्रेणी की है, अत- एव उसकी प्रजा भी गुलाम ही होगी! श्रद्धा का अर्थ है भक्ति, इसके लिए दिव्य माता की उपमा दी गई है। दिव्य माता की प्रजा देवरूप होती है। ऐसा भावार्थ लगा कर, आगे पीछे की संगति देख कर, तब देखो कि तुम्हारी समझ में आता है या नहीं। इस के बाद फिर मुझको लिखो। पहले कोरिन्थियन के पन्द्रहवें प्रकरण के छप्पनवे श्लोक का अर्थ यह है कि, पाप हो मृत्यु का दंश है, अर्थात् पापी मनुष्य को मृत्यु-दंश का कष्ट होता है। अगले वाक्य का अर्थ यह है कि पुण्यशील के लिए वहीं मोक्ष-साधन होता है, और शास्त्र के पोले ज्ञान में शाप भरा रहता है। पद पद पर यही हमारे अनुभव में आता है। शास्त्र के नाम पर सैकड़ों पाप होते हैं। पांचवे रोमन्स के वोस श्लोक का अर्थ तो सरल है। "ज्यों ज्यों शास्त्रीपन बढ़ा, त्यो त्यो अपराध भी बढ़े, परन्तु जव जव पाप का पहाड़ बढ़ा, तब तब ईश्वरीय-कृपा भी बढ़ी। सारांश यह है कि, इस कलिकाल में भी शुएक-शान के चक्कर से बच कर पेसे मनुष्य निकले, जिन्होंने भक्ति-मार्ग दर्शन कर के शास्त्र का गढ़ार्थ सिखलाया। यह ईश्वर की दया है । जान के पन्द्रहवें प्रकरण के तीसरे श्लोक का अर्थ इस प्रकार है:-"जो कुछ मैंने तुम से बतलाया है, यदि तुम उसके अनुसार चलोगे,

तो विशुद्ध हो जानोगे। Are यह भविष्यवाचक समझना
चाहिए, और Through का अर्थ “ अनुसार चलने से"
करना चाहिए।
जीवन में सुधार सम्बन्धी फेरफार करने के पहले
भली-भांति विचार करो, परन्तु जब एक बार फेरफार
कर लो, तब फिर उसमें जोक की तरह चिपटे रहो।
मि० के० के गुणों पर लुब्ध होना ठीक है, पर जहां कहीं
उनकी कमज़ोरी दिखाई दे, वहां उसको समझ कर
उसले दूर रहो। तुमने जो नवीन फेरफार किया है,
यह विचारपूर्वक नहीं हुा । यह नहीं कि मि० के०
जो कुछ करें, वह तुमको भी करना ही चाहिए। तुमको
स्वतंत्रतापूर्वक विचारना और उसके अनुसार आचरण करना
चाहिए । ऐसा करने, में कितने ही बार भूत भी होगी,
- परन्तु इसके लिए कोई उपाय नहीं। निर्मल-जित्तले पूर्ण
विचार कर लेने के बाद, मेरे विचारों के भी विरोध करने
का तुमको अधिकार है, और नीति.की दृष्टि से जहां जो
बात उचित दिखाई दे, वहां पर वैसा ही करना तुम्हारा
कर्तव्य है। मेरी यही,प्रबल इच्छा है कि तुम मोक्ष का
कर मोक्षार्थी बनो, पर जब तक तुममें
स्वतंत्र विचार-शक्ति और हृदय की दृढ़ता न श्रा जावे,
मेरी श्राशा, लफल नहीं हो लकती । इस समय तुम्हारी
दशा बेल के समान है.। बेल जिस वृक्ष, पर चढ़ती है, उसी
के समान उसका स्वरूपा बनता है। परन्तु प्रात्मा की ऐसी
गति नहीं है, प्रात्मा स्वतंत्र और सर्वशक्तिमान है।
...-
4
तत्व समक
।

६१ ४६ केप-टाउन, भाई श्री." माघ वदी १२ । श्राप का पत्र मिला। चि० म० को वहां भेजने का विचार नहीं। उसको यहां के वैभव से छुड़ाया है ऐसे ही कारणों से चि० ज को वहां भेजा है जिसको ब्रह्मचर्य पालन करना है, उसको पुष्टिमार्गी वैष्णयों की संगति में न रहना चाहिए । यही मेरा मत है। जान पड़ता है कि, 'बा' की तवीत अब अच्छी है। वहां लड़के उद्योगशील बने, और शीघ्र उठने में कुछ भी कलर न करें, इस विषय में कड़ी दृषि रखिये । म की तवीश्रत कैसी है ? सब बातो का खुलासा उत्तर दीजिए । पेसा प्रयत्न कीजिए कि साहव की पत्नी को किसी तरह का संकोच न होने पावे । उनको यदि विशेष प्रकार के खान-पान की आवश्यकता हो, तो आप उसकी व्यवस्था करें, अथवा स्वयं उन्हीं को कर लेने दें, यही अच्छा होगा। मि० ऐन्ड्रय ज़ ने सचमुच ही बड़ा काम किया। ।.. ८ M ( ४७ ) माघ वदी अमावस्या, केप-टाउन। भाई श्री आपका जे के विषय का पत्र डा के पाल

६२
भेज दिया है, और म ... का पत्र पढ़कर फाड़ डाला है।
मैंने समझा कि यदि आप का पत्र उसे मिलेगा, तो उस
पर उलटा प्रभाव पड़ेगा। अब ऐसा मालूम पड़ता है कि
वही विचार आप फिर उसको वतलावें । मेरा मन तो
उसके विषय में बहुत ही खराब हो गया है। श्रापने उसका
जो चित्र अंकित किया था, मुझे वह उससे भी अधिक
बुरा दिखाई देता है। यदि उसने आपका पत्र देखा होता,
तो वह चिढ़ जाता; और अधिक पाप करता । वह पत्र
उसके पास भेजें या नहीं, इसका विचार करते हुए अन्त
में ऐसा ही करना निश्चित किया।
यह भली भांति जान लेना चाहिए कि, जिन पर
हमारी श्रद्धा है, यदि हम उनसे कुछ भी छिपावे, अथवा
जो बात हममें नहीं है, वह है-ऐसा उनसे दर्शा, तो
हमारा कल्याण कभी न होगा। इसी कारण और .
का पाप भयंकर हुअा। अपनी इस महान दाम्भिकता के
कारण ही वे ऐसा घोर कर्म कर सके। यदि वास्तव
ही धोखा देने का भाव उनमें न होता, तो भावेश में पशु-
तुल्य बन जाने के बाद तुरन्त ही मनुष्यता का ज्ञान उनमें
श्रा गया होता, और विषय त्याग कर देते । इस समय
(पहिला) रास्ते पर आ गया है, और जान पड़ता है
कि (दूसरा ) मोह-जाल और दम्भ में ही पड़ा हुआ है।

६३ 1 । (४% ) क्षेप-टाउन, फाल्गुन, शुक्ला ! भाई श्री आप का पत्र मिला । नेपाल अाखिर चला ही गया । उसकी स्त्री को अब अपना हृदय मज़बूत कर लेना चाहिए। मृत्यु के कारण हम को अपने कत्तव्य का विचार करना चाहिए, और देह के विषय में प्रायः तिरस्कार करना चाहिए। मृत्यु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं । यह देखा गया है कि जब मनुष्य जल कर मरता है, तब भी उसे बहुत अधिक दुःख लहना नहीं पड़ता । दुःख का अतिरेक हो जाने पर मूर्खा पा जाती है। जो लोग देह पर 'अधिक मोह करते हैं, उन्हीं को मरते समय दुःख भी अधिक होता है। श्रात्म तत्व जानने वाला सरने से कभी नहीं डरता । नेपाल की भांति इस समय क्षण-क्षण पर हज़ारों मनुष्य, हजारों जीव-जलकर मर रहे हैं । अखिल- ब्रह्माण्ड से नेपाल एक चींटी ले भी छोटा प्राणी था । हम, जान-अनजान में, आग जलाते समय, रात को दीपक जलाने म. नेपाल से भी बड़े न जाने कितने जीव-जन्तु जला डालते हैं ! मान लो कि बह्मा एक बड़ा सारी जीवं अब उसकी दृष्टि में हर चींटी से भी छोटे जीव ठहरे। उसके नेत्र की परिधि ही इतनी बड़ी होगी कि हम एक तुन्द्र मशक के तुल्य उम्मको दिखाई देंगे ! उस महाजीव ने नेपाल को जला दिया, तो इसमें कौन सी बड़ी बात होगई ? कदाचित् उसने यह भी समझा होगा कि अपने मुख के लिए नेपाल के समान चुद जीव को जीवित ।

६४
जलाना ही चाहिए । नेपाल हमको अपनेही समान एक
जीव मालूम होता है, इस कारण उसके कष्ट देख कर
इल भय से हमको उसके विषय में दया मालूम होती
कि, हमारी भी ऐसी ही दुर्दशा होगो; परन्तु चींटी,
खटमल, मच्छड़ और ऐसे ही अनेक जन्तु जो हमारी
आँखों को दिखाई भी नहीं पड़ते, उनके विषय में जो
बुद्धिवाद हम लड़ाते हैं, वही बुद्धिवाद हमसे महान श्रेष्ठ
ब्रह्मदेव भी हमारे विषय में करता होगा । इतना जब
हमारे ध्यान में भलीभांति आ जायगा, तब नेपाल पर
भाये हुए प्रसंग से हम यह शिक्षा ग्रहण करेंगे-
१-अपने ऊपर दया कर के, सब जीवों को समान
समझ कर, उन पर भी दया करनी चाहिए, और अपने
किसी सुख के लिए भी जीव-हिंसा कदापि न करनी
चाहिए।
२-शरीर पर अवास्तविक प्रेम न करना चाहिए, और
मृत्यु का सनिक भी भय न करना चाहिये।
३-शरीर अत्यन्त दगाबाज़ है, यह सोच कर इसी
क्षण मोक्ष-लामग्री तैयार कर रखनी चाहिए।
ये तीनों सूत्र कहने में बहुत सरल हैं; परन्तु इनका
मन में थाना कठिन है; और मन में आने पर भी उनके अनु-
सार प्राचरण करना तो मानों तलवार की धार पर ही
नाचना है।
श्रय प्रातःकाल का समय है; और मेरे विचारों का

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प्रवाह उपर्युक्त रीति से ही बह रहा है, क्योंकि 'बा' को
आजकल फिर कष्ट हो रहा है। उसको मृत्यु-भय से विमुक्त
करने का मेरा प्रयत्न जारी है।
।
( ४६ )
केप टाउन, फाल्गुन वदी २
भाई श्री
श्रापका पत्र वारम्वार पढ़ा। शंकराचार्य का एक
श्लोक है, उसमें यह है कि समुद्रतीर बैठकर, एक तिनके
से पानी की एक एक बूंद निकालते हुए, सारा समुद्र
खाली करडालनेवाले मनुष्य को जितने धैर्य और जितने
काल की आवश्यकता है, उससे भी अधिक धैर्य और अधिक
समय की आवश्यकता मन मारने अर्थात् मोक्ष साधने
में होती है। आप तो बहुत उतावले दिखाई पड़ते हैं। मैंने
इतना विचार किया है । परन्तु मेरा भी मृत्यु-भय अभी
तक नष्ट नहीं हुश्रा है। फिर भी मैं अधीर नहीं हुआ हूं।
मेरा प्रयत्न जारी है, इसलिए कभी न कभी मुक्त अवश्य
होऊंगा। तुम भी प्रयत्न करने का कोई अवसर न जाने दो।
यह हमारा कर्तव्य है। फल देना अथवा उसकी इच्छा
करना ईश्वराधीन है, फिर हमको क्या चिन्ता? मां बच्चे
को दूध पिलाते हुए परिणाम का विचार नहीं करती। उसका
यथोचित परिणाम होता ही है। बस, मृत्यु-भय को टालने-
मनोविकारों को दूर भगाने के लिए ऐसा ही प्रयत्न करो
और प्रफुल्लित रहो। इससे सब काम हो जायगा ! अन्यथा
बन्दर का विचार न करने के विषय में विचार करते करते
५

है - . जैसे मनही बन्दरमय हो जाता है, वैसा ही हाल होगा। हमने पाप-योनि से जन्म पाया, पाप-कर्म के कारण देहाधीन हुए; भस्तु; यह सव मल आप एक क्षण में कैसे धो सकते हैं? सुतर भाषे तेम तूं रहे, जेमतेम करीने हरिने लहे।" * यह उपदेश अखा भगत ने किया है। तुलसीदास जी कहते हैं, " संकट हो या न हो परन्तु राम नाम जपो, इससे सब कुछ सिद्ध होता है ।" हमको भी यही अर्थ सिद्ध करना है। इसलिए यही जप निरन्तर जारी रखो। राम' कौन सा है, यह मन से निश्चित कर लो। राम, निरंजन है, निराकार है। वह राक्षली. वृत्ति-समूह रूपी रावण का, देवी-वृत्ति रूपी भनेक प्रकार के शस्त्रों के द्वारा, संक्षार करने वाला है, यह सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए यारह वर्ष तपस्या करने वाला है। सारांश यह है कि शरीर और मन को एक क्षण भी निरु- द्योगी न रहने दो। दोनों को उत्साहपूर्वक काम में लगाये रहो। इससे तुम्हारी उपाधियां निश्चय ही नाश हो जायेंगी। शेष, श्रानन्दपूर्वक परमेश्वर पर भरोसा रखो । “ मुझ पर ईश्वर की कृपा है ".--इस विश्वास का उपयोग, उप- युक्त प्रकार से प्रत्यक्ष प्राचरण करने पर ही होगा। *" चरखे के अनुसार जैसे सूत निकलता है, वैसे ही तू भी कर्मरूपी चरखे के अधीन है । जिस प्रकार हो सके, परमात्मा को प्राप्त कर 1 गुजरात में 'अखा' नामक एक साधु हो गये हैं, जो जात के सुनार थे। उन्हों ने कविता में अन्य प्राचीन साधुकवियों की तरह, वेदान्त का सरल उपदेश किया है । -सं०

६७
यह ध्यान रखना चाहिए कि हम जैसा माँगेंगे, वैसा
ही परमात्मा मिलेगा। तुलसीदास ने रामचन्द्र को मांगा,
इसलिए श्रीकृष्ण राम होगये और लक्ष्मी को सीता बनना
पड़ा। म
की खांसी अच्छी करो . कारण ढूंढो ।
( ५० )
फाल्गुन शुभला ८, १६७० ।
चि० दे०
तुम अक्षर सुधारो
की तबीयत इस समय दुत
खराब हो गई है। उसको और मुझे दोनों को
विश्वास है कि डाकृरी ओषधियों का ही उस पर बहुत
चुरा प्रभाव पड़ा है । उसी की इच्छा थी कि डाकर
की ओषधि ली जाय, परन्तु दो ही तीन प्याले लेने के
याद बीमारी खूब बढ़ गई है। पर कुछ भी खाया नहीं
जाता। कल कुछ अंगूर लिये, एर जान पड़ता है, वे
भी लाभकारी न हुए ।
अन्त में उसने निश्चय कर
लिया है कि चाहे मृत्यु भी हो जाय, तो भी वह उसले
न डरेगी। इसलिए चिन्ता करने का कोई कारण ही नहीं।
शरीर एक ऐसी वस्तु है , जो जाने ही वाला है और
जिस दिन जाना होगा, उसी दिन वह जायगा। इसी
हिसाब से हम को उपाय भी सूझते हैं ! परन्तु श्रात्मा
अमर है। हम चाहे शरीर का सम्बन्ध ही दृढ़ मानते रहे,
पर वास्तविक सम्बन्ध तो श्रात्मा के साथ रहता है।
जय शरीर से जीव निकल जाता है, तब हम उसको
ज़रा देर भी नहीं रखते, यह निश्चय है। यह जान कर

.

प्रकार के. शरीरों की प्राप्ति से और उनके कारण होने वाले क्लेशों से मुक्त होना । तथापि यह कहने की आवश्य- कता नहीं कि ईश्वर नहीं है। ईश्वर का सच्चा अर्थ हम अपने मर्यादित ज्ञान से करते हैं । फल देने वाला और कर्ता वास्तव में ईश्वर नहीं ! किन्तु देहधारी आत्माओं के मुक्त हो जाने के बाद यदि अन्य किसी भिन्न प्रात्मा की कल्पना की जा सके, तो वही ईश्वर है। वह जड़ वस्तु नहीं, शुद्ध चैतन्य है। अद्वैतवादियों का यही कथन है। राजा के समान ईश्वर की किसी काल में और किसी प्रसंग में भी आवश्यकता नहीं। ऐसी आवश्यकता का स्वीकार करना मानो आत्मा की शक्ति को मर्यादित करना है। ' - प्रश्न २-मैं गौ को नहीं मारता, कभी नहीं मारा, कष्ट नहीं देता, मार्ग में रोकता नहीं, फिर भी यदि वह मुझे मारने श्रावे, तो क्या करना चाहिए ; और क्यों ? उत्तर-गाय जो मारने को दौड़ती है, इसमें हमारा दोष यह है कि हम गाय और अन्य जीवों से डरते हैं । भय एक दोप है; और जब तक हम में भय है तब तक ऐसी उपाधियां आती ही रहेंगी। जब तक हमको गो का भय मालूम होता रहे, तब तक उसके सामने न जाना चाहिए, और यदि जावे, तो मार खाना चाहिए। गौ को ( बदले में ) मारने से हमारा अथवा उसका कुछ भी लाभ नहीं! प्रश्न ३- यदि कोई मनुष्य निर्भयता से व्याघ्र की गुफा में चला जाय तो व्याघ्र उसको मारेगा या नहीं ?

H
H
दिन न खाना मानो 'वा' की मृत्यु ही है। इसी भय से
इस समय इस विचार को दूर कर दिया, परन्तु फिर सोचा
कि जे ... कोफी जाना ही चाहिए। यहां जाकर रहना
ही उसका मुख्य धर्म है। यहां रहने में उसका कल्याण नहीं ।
x x x मुझ में क्या है-यही मालूम नहीं होता! मुझ में
इतनी निर्दयता है, जैसा कि कई लोग कहते हैं, दूसरा
मनुष्य मेरी प्रसन्नता सम्पादन करने के लिए जी-जान
तोड़ कर काम करता है और असम्भव कार्य भी करने
का प्रयत्न करता है; और जब यह देखता है कि उसका होना
शक्ति के बाहर है, तब अन्त में त्रिमता धारण कर के
भी मुझे भुलाता है। श्री० गोखले ने भी मुझ से अनेक बार
ऐसा ही कहा कि, " तू ऐसा कठोर है कि दूसरे को बड़ा
डालता है; और यह मनुष्य वेचारा भय से अथवा नेरी
प्रसन्नता सम्पादन करने के लिए जी-जान तोड़ कर मेहनत
करता है, और अन्त में निर्यल मनुष्य कृत्रिमता धारण करता
है। तू लोगों पर असह्य बोझ लादता है । मैं स्वयं भी तेरा
काम, जी तोड़ कर कर रहा हूं। यद्यपि वह मेरी शक्ति से
बाहर है।
-
mheroen
( ५३ ।
वैशाख वदी १४, १६७०।
[महात्मा जी ने पन्द्रह दिन उपवास करने के बाद,
सातवे दिन प्रार्थना कर चुकने पर सब को सम्बोधन करके
कहा]

- में में x तुमने गीता के श्लोक कण्ठान करके मुनाये; परन्तु मैं इससे खुश नहीं हूंगा। तुम इतिहास पढ़ो चाहे न पढ़ो, गणित हल करो चाहे न करो, संस्कृत सीखो चाहे न सीखो, इसकी मुझे बिलकुल चिन्ता नहीं, परन्तु हां, संयम-वृत्ति धारण करना तुम्हारे लिए, अत्यन्त आवश्यक है। बस यही मुझे चाहिए। यदि समय बाजायगा तो में मनुष्य का गुलाम बन जाऊंगा, परन्तु मन का गुलाम कभी नहीं बनूंगा। मन का गुलाम बनने के बरावर घोर पाप दूसरा कोई नहीं है, इसलिए तुमः होशियार वनो, और सनं को काबू रखना सीखो। चल, इसी दशा तुम मेरे पास रह सकते हो, अन्यथा मुझे किसी की आवश्यकता नहीं। मैं तुम को सिखाने का भी अभिमान नहीं रखता। मेरे पास एक ऐसा शिष्य है जिसे सिखाना कठिन से कठिन कार्य है । उसको शिक्षा देकर ही मैं तुम्हारा, भारत माता, अथवा अखिल मानव- जाति का कल्याण कर सकूगा । वह शिष्य में स्वयं ही हूं; उसको मैं मन" कह कर पुकारता हूं। इस रीति से जो अपने आप को स्वयं शिष्य बनावेंगे, वही यहां रहने योग्य हैं। जिनको यह कठिन मालूम होता हो, उनका यहां न रहना ही अच्छा! वे यदि यहां से चले जायँगे, तो मैं यही कहूंगा कि अच्छा किया। स्वयं न समझते हुए (केवल यंत्र की भांति ) काम करना पाय है। मैं यह नहीं चाहता। -

1
( ५४ )
भाई श्री रा०
तुम्हारा पत्र मिला। पहिला पत्र भी पहुंचा था; पर
कोई बात नहीं थी, इसलिए उत्तर नहीं लिखा।
के रंग पलटे सो ठीक है। जहां एकीकरण
का प्रयत्न हो रहा है, वहां एकता होने के पहले भिन्न
भिन्न रंग दिखाई देने ही चाहिए । साधारणतः शकर स्वच्छ
दिखाई देती है। परन्तु जय स्वच्छ करने को बैठते हैं,
तब उसमें इतना मैल निकलता है जो देखा नहीं जाता।
इससे यह मालूम होता है कि शक्कर को जितना शुद्ध
हम समझते हैं, उतनी वह नहीं होती; और स्वच्छ होने
के पहले वह बहुत ही मलयुक्त रहती है। ज... के प्रयतों
के विषय में भी ऐसा ही समझना चाहिए ।
चि० आ
इस समय जो दुःख भोग रहा है:
और भा० प...... जिस कठिनाई में व्याकुल है,
दोनों ही को सुख और सुविधा प्राप्त होगी।
( ५५ )
रविवार।
भाई श्री. रा०
जान पड़ता है, आप पिछले जन्म के मेरे ऋणी
अन्यथा मेरा ऐसा कौन सा अधिकार है जो आप
मुझ पर इतना प्रेम करते? कल जब मैं ऐसे ही संकट

में पड़ गया, तब आपने जो प्रेम-भाव मुझ पर दिखलाया
वह अकथनीय था। इससे में यह इच्छा करता हूं कि
आप दोनों ही की आत्मा अधिक तेजस्वी हो; और ऐसे
प्रेम के अनुभव से भाप यह इच्छा करते रहे कि प्रात्मा
की शक्ति के विषय में मेरा विश्वास अधिक दृढ़ हो!
एक बुद्र प्रतिक्षा अथवा एक साधारण सी तपस्या के
विषय में उत्पन्न होनेवाला भादर जब इतना कर सकता
है, तब सम्पूर्ण तपश्चर्या से कितना विलक्षण कार्य हो
सकेगा, उसका अनुमान ही नहीं किया जा सकता यह
साधारण त्रैराशिक का उत्तर प्राता है ; और सच पूछिये
तो हैं भी ऐसा ही। यह प्रतिक्षा यदि न की होती, तो
शुद्ध प्रेम का अनुभव मुझे न प्राप्त हुआ होता; और यह
भी न होता कि सबी वात तत्काल थाहर निकल पाती,
और बेचारे बच्चे निर्दोष ठहरते मैंने चि० x x x
को जिस ऊंचे दर्जे पर समझ रखा था, उससे उसको
नीचे आना पड़ा, तथापि वह पुण्यात्मा है, यह अभी
मेरा विश्वास बना है। उसमें सद्गुण बहुत हैं , उनको
बढ़ाना इमारा कर्तव्य है। निःसन्देह उसका पाप और
काम तो भयंकर था, परन्तु हमें ऐसा व्यवहार करना
चाहिए जिससे उसे स्मरण न हो। उस को गृहस्थी के
कामों में प्रवीण होने के लिए उत्तेजना दीजिए। ऐसा
प्रवस कीजिए जिससे बच्चे उसका अपमान न करें।
रात को पोथी-पुराण का बांचना जारी रखिये।
वकों को सुबह पांच बजे उठाने का दायित्व रा०
है।
की तबीअत के विषय में नियमितरूप
से खबर मिलती रहनी चाहिए।
1
r

( ५६ )
पोप बदी १०, सं० १९७०, बुधवार,
प्रीटोरिया।
भाई श्रीरा
आज ही मि० ऐड्यूज़ के साथ जो० व० को आने
का विचार किया था, वह नहीं हो सका । जनरल
स्मट्स् ने मेरे पत्र का जो उत्तर भेजा है, वह सन्तोष
जनक नहीं है। यदि हो सका, तो उसमें सुधार कर
लेने की आशा है और इसलिए कल रहने वाला हूं।
यदि सन्तोषजनक उत्तर मिल जायगा, तो भी यह न.
समझना चाहिए कि झगड़ा मिट जायगा। हां, यह होगा
कि उससे बहुत कुछ उन्नति की सम्भावना होगी। सब
बातें विस्तारपूर्वक लिखने के लिए समय नहीं है,
क्योंकि अभी सर बेंजमिन से मिलने जारहा हूँ।
का रोग नहीं हटता, इसका मुझे आश्चर्य
मालूम होता है। कम से कम उसके रोग की चेष्टाएँ देखने
के लिए ही फिनिक्स में शान्ति के साथ रहने की इच्छा
होती है। जो कुछ हो सके, करो। यदि जनरल स्मट्स
का सन्तोषजनक उत्तर मिला, तो कुछ न कुछ विश्राम मिलने
की सम्भावना है। बच्चे फिर नियमित रूप से हो जायें, इसका
पूर्ण ध्यान रखिये।
म.

है , १ wome- (. ५७ ) ७, न्युइटेन सिंगल मंगलवार १०३ मुझ पर सब से बड़ा प्रसंग आ पड़ा है। मैं समझता हूं, मेरे भाई मेरे विषय में अन्तिम क्षण तक विचार करते करते अन्त में कल स्वर्गवासी हुप ! उनको मुझसे मिलने की बड़ी उत्कट इच्छा थी, और में भी इस बात के लिए आतुर हो रहा था कि कब एक बार भारतवर्ष पहुंच , उनके पैरों पर मस्तक रख ; और उनकी सेवा करूं । इसके लिए मैं अपना काम भी जल्दी २ समाप्त कर रहा था, परन्तु होनहार कुछ दूसरा ही था ! अब मुझे विधवाओं के कुटुम्ब में जाने की नौबत आयेगी, और विधवा भी कैसी ? जो मुझ पर ही अवलम्बित रहनेवाली ! भारतवर्ष की कौटु- स्थिक व्यवस्थाप्रणाली आपको मालूम नहीं है, अतएव श्रापको इस प्रसंग की कल्पना नहीं होगी। किसी न किसी प्रकार भारतभूमि को एक वार वापस जाने की इच्छा दिन प्रति दिन प्रवल हो रही है। पर क्या कहूं? मेरी यह इच्छा सफल होगी, अथवा नहीं, इस विषय में मुझे भी शंका ही है। तथापि, इस यात्रा की मुझे तैयारी करनी चाहिए और जो कुछ परिणाम हो, उसे शान्त-चित्त से उस सर्वशक्तिमान प्रभु को सौंपना चाहिए ! ऐसे आघातों से मनुष्य में मृत्यु के विषय में अधिक निर्भयता आती रहती है। यदि मेरे हृदय में इस अवसर पर किसी प्रकार की हलचल मचे तो यह समझना चाहिए, - .

कि ऐसे शोक में स्वार्थ की छाया है। क्योंकि जब मैं भरने को सदैव तत्पर और मृत्यु आना एक बहुत बड़ा सौभाग्य मानता हूं, तो फिर मेरे भाई का मरना मेरे लिए कुछ आपत्तिजनक नहीं है । हमको मृत्यु से भय मालूम होता है; इसीलिप. हम दूसरे की मृत्यु पर रोते हैं। शरीर नाशमान है और आत्मा अमर है। अब इसका नाम हो गया तव शरीर और आत्मा के विभक्त हो जाने पर मुझे शोक कयों करना चाहिये ? परन्तु इस सुन्दर और आश्वासन. युक्त सिद्धान्त में जव सच्ची श्रद्धा होगी, तभी यह साम्य- स्थिति प्राप्त होगी। इसमें जिसकी श्रद्धा है, उसको शरीर का मोह न करना चाहिए, बल्कि शरीर का नियन्ता बनना चाहिए। उसको अपनी आवश्यकताएं. इतनी ही रखनी चाहिए जिससे देह देही पर अधिकार न चलाते हुए उसके वश में रहे। दूसरे की मृत्यु के लिए शोक करना मानो एक प्रकार से शाश्वत शोक की दशा में फंसने के समान है, क्योंकि शरीर और आत्मा का सम्बन्ध एक शोकप्रद वात है। इस समय मुझ पर इन्हीं विचारों का सामाज्य छाया दुश्रा है । इस समय इस विषय में सुझसे दूसरा पत्र लिखा नहीं जाता। यही किसी न किसी तरह लिख दिया। इस लिए मि० पोलक को भी यही पत्र पहुंचा दीजिए; को भी इसे पढ़ने को दे दीजिए। इसके याद मि० वेस्ट इत्यादि लोगों के पढ़ने के लिए छ भी भेज दीजिए। और म के पास - ( ५८ ) केप टाउन । बुधवार, जेठ बदी। माई श्री० जय श्रीरामचन्द्र वन को जाने लगे, तब राजा दशरथ ने उनसे कहा कि कैकेयी को जो वचन दिया गया है, उस की चिन्ता नहीं । बचन भंग हो जाय. तो भी कोई हानि नहीं, परन्तु तुम वन को न जानो। इस लौकिक और स्थूल पुत्र- प्रेम से उत्पन्न होनेवाली पिता की इच्छा का अनादर करके भी दाम दन्द्रली बल को चले गये। इस प्रकार सच्ची पितृ- अक्ति प्रकट करके उन्होंने दशरथ का और अपना भी नाम असर कर लिया। हरिश्चन्द्र ने अपनी धर्मपत्नी को बेच कर, पुत्र रोहिताश्व के गले पर तलवार रखने तक की भी तैयारी कर के, स्त्री-भक्ति और पुत्र-वात्सल्य दिखलाया। प्रत्नादले पिता ही श्राला का उल्लंघन कर के पितृ-भक्ति प्रकट ही; और उसका उद्धार किया। मीराबाई ने राना कुम्भा का त्याग करले स्वयं उलको ही अपना भक्त बनाया। दयानन्द ने अपने माता-पिता को छोड़ कर, विवाह करने से विरत पोकर, पीछे रंगे हुए लोगों से घच कर मातृ-भक्ति और पितृ-भक्ति कायम रखी । अपनी युवती स्त्री को निद्रा- वस्था में छोड़ कर बुद्ध देव चलते चने । ऐले अनेक उदाहरण हमको मिलेंगे। उनका चिन्तन करके यदि उनके समान प्रसंग था जाय, तो स्वयं अपने आप अन्तर्विचार करके सत्य नीति की दृष्टि से उस समय जो उचित दिखाई दे, वैसा करना चाहिए। श्रवणजी की

और सूक्ष्म
स्थूल
दोनों भक्तियां एक ही प्रवाह में मिली
हुई थीं। इस कारण यदि हम उस उदाहरण को लें, तो
प्रायः उसका सत्य पूर्ण सत्य हमारे ध्यान में नहीं पाता।
सत्यमार्ग से चलनेवाले मनुष्य को, संकट के समय में
भी, जो सत्य होता है, वही सूझता है । हम वैराग्यविषयक
पद्य सदैव पढ़ा करते हैं, परन्तु यदि वे धर्मसंकट के समय
हमारे उपभोग में न आवे', तो फिर उनको केवल 'तोता-
रटन' ही कहना चाहिए । सदैव गीता-पाठ करते रहे:
पर यदि अन्तकाल में उस की सहायता न हो, तो फिर
पाठ करना और न करना दोनों बराबर ही हैं। इसीलिए
मैं सदैव कहा करता हूं कि थोड़ा ही पढ़ो, पर जो कुछ
पढ़ो, उसका मनन अवश्य करो और उसका रहस्य समझ
कर उसके अनुसार चलने को तैयार हो ।
जब हम इष्ट मित्रों के विषय में वीतरागी बनेंगे,
तभी हमारा हृदय सच्चा दयालु बनेगा और उनकी
सेवा भी कर सकेंगे । 'वा' के विषय में मैं जितना अधिक
वीतरागी बन रहा हूं, मुझसे उतनी ही अधिक उसकी
लेवा हो रही है। बुद्ध ने अपने माता पिता का त्याग कर
के ही उनका उद्धार किया, गोपीचन्द ने वैरागी बन कर
ही अपनी माता के विषय में अत्यन्त शुद्ध प्रेम प्रकट किया।
इसी प्रकार तुम भी अपना चरित्र ठीक कर, नीतिश बन
कर, अत्यन्त निर्मल और दृढ़ होकर, अपने माता-पिता की
सेवा करो । जब तुम्हारी श्रात्मा अत्यन्त शुद्ध अवस्था
को पहुंच जायगी, तब तुम्हारे इष्ट मित्रों पर उसका प्रभाव
पड़े बिना कदापि न रहेगा।

( ६ ) केप टाउन, मंगलवार जेठ वदी १॥ मि० सिंह के विषय में यहां बैठे २ केवल समाचारपत्र पढ़ कर ही सम्मति नहीं दे सकता। मि० नार्टन भी एक वार ऐसे ही एक मुकदमें में सरकारी वकील थे। किसको नेता मान और किसको न माने, यह प्रत्येक के अपने २ मत का प्रश्न है। साधारणतः जो सत्याग्रही होता है , वह ऐसे मामलों में तटस्थ रहता है । तुम लिखते हो कि ऐले मामलों में यदि लत्याग्रह करना पड़े, और जेल जाना पड़े, तोलाम- झना चाहिए कि सत्याग्रह का उद्दश्य सफल हो गया। ऐसे मुकदमे में हमें सदैव बोलना हो चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं। सत्याग्रह कव करना चाहिए ? इस प्रश्न का उत्तर एक दम नहीं दिया जा सकता। सत्याग्रही जब सत्याग्रह प्रारम्भ करता है, तब वह इस बात को कुछ पहले से निश्चित नहीं कर रखता। ज्योंही वह अपनी आत्मा को स्फूर्ति के विरुद्ध कोई भी कार्य होता हुआ देखता है, त्यो ही, तत्काल, वह अपने प्रात्म-बल का उपयोग करता है। मैंने जिल लमय सत्याग्रह प्रारभ किया, उस समय मैं समझता था कि यह धर्म का एक अंग है। किन्तु अब अनुभव से मुझे यह प्रतीत होगया कि यह स्वयं ही धर्म है; यह एक चिन्तामणि है, और इसी कारण मुझ में वह विचार धर्म- रूप से पूर्णतया परिणत हो गया है । सत्य के विना दूसरा कार्य नहीं । यह जिल्लने निश्चित किया, वही सत्याग्रही, और ऐसे मनुप्य को सदेव मौके पर उपाय सूझता ही है । सारा ६ २ जीवन ही सत्यमय होना चाहिए; धीरे २ यम-नियमादि के पालन से वह प्राप्त होता है। स्थूल विषय सीखने के लिए जैसे वर्षी प्रयत्न करना पड़ता है, वैसा ही प्रयत्न सत्याग्रह का स्वरूप समझने के लिए भी करना चाहिए । ज्यो २ तुम्हारी और हमारी आत्मा के श्रावरण दूर होते जायँमे, त्यो २आत्मा विकसित होती जायगी, और बलवान् सत्या- ग्रही की भांति लड़ेगी। ( ६० ) लंडन, श्रावण शुक्ला ७, १६७० । भाई रा० तुम्हारा प्रेम भूलने से भुलाया नहीं जा सकता । 'वा' के विषय में तुमने विजय प्राप्त कर लिया, यह एक बड़ा ही भारी काम किया। वा' ने अपना स्वभाव बहुत कुछ बदल लिया है, ऐसा मुझे यहां अनुभव हो रहा है। तुमने जो २ व्रत ग्रहण किये हैं, उन सब का दृढ़ता- पूर्वक पालन करो। उनमें बैताल की भांति चिपट जाओ, इस से तुम म को जीत लोगे, संसार को जीत लोगे, और तुम स्वयं अपने ऊपर स्वराज्य स्थापित कर के हिन्द- स्वराज्य भी स्थापित करोगे। सारांश यह है कि सारे विजय की मुख्य कुंजी हमारा धर्म है । इस प्रौढ़ धर्म की लरलता, और उसी प्रकार विषमता भी अपरम्पार है। हम जैसी सादगी से रहते थे, उसी को अधिक

८३
।
चढ़ानो । जब तक मैं वहां था, तब तक तुम स्वतंत्र थे।
अव कैद में हो, यह समझो। स्वादेन्द्रिय को बढ़ने न देना।
खाने में हानि नहीं, और उसके लिए तो कोई रोक ही
नहीं, इत्यादि विचारों के बदले इस विचार द्वारा विजय
प्राप्त करो कि यह एक व्याधि कम हुई, अब उसे भी कम
करूंगा।
अपनी रहन-सहन की सव बात मुझे सूचित करते
रहो । तुम और श्री० प्रो सगे भाई की तरह रहो। खेती
मन लगायो । सारे फिनिक्स में सुगन्ध फैलाकर उसको
धर्मक्षेत्र बनायो । जहां तक हो सके, मौन धारण करो।
तामिल को मत छोड़ना और मुत्तु इत्यादि. वरावर
चोलने की आदत डालते रहना।
मो का आशीर्वाद ।
।
में
।
( ६१ )
लंडन
।
१६१३।
भाई रा
शङ्कराचार्य ने कहा है कि जैसे कोई मनुष्य समुद्र-तट
. पर बैठ कर किसी तिनके से एक २ जलबिन्दु लेकर सारे समुद्र
को उलीचने लगे, तो उसको जितने समय और जितने धैर्य
की आवश्यकता होगी, मन को वश में करने के लिए उत्त
से भी अधिक समय और धैर्य की आवश्यकता है। इस
लिए तुमको निराश न होना चाहिए । क्या उस लम्पूर्ण

८६
होगा ! वरन् जब तुम विचार करोगे कि तुम्हारा काय
क्या है, तभी मुझ सुख होगा।
-
डंडी का जेल,
सन् १९९४ ई० मंगलवार
(आज मुझे ) नौ मास की सजा हुई है और दो
जगह जव छै छ महीने की सज़ा मिल जायगी, तब कुल
२१ महीने हो जायेंगे, और मैं सब से अधिक भाग्यशाली
बनूँगा । वेष बदले विना कारावास मिलता है, यह एक
उपाधि कम है । जब से हड़ताल हुई , आज पहली ही बार
मुझे फुरसत मिल रही है।
जेल अब हमारे लिए बहुत ही साधारण हो रही है,
मैंने उसको टालना अच्छा नहीं समझा । आज के मुकदमे
में कानूनी दाँव-पेंच बहुत से, ; परन्तु उनसे हम क्यों
लाभ उठावें ? मोह इसी को कहते हैं। उसमें एक प्रकार
का यह गर्व श्राजाता है कि यदि मैं बाहर रहूंगा, तो अधिक
कार्य करूंगा; और इसीलिए मैं बिलकुल चुप बैठ गया।
थे
-
-
( ६५ )
मार्गशीर्ष शुक्ला ।
भाई श्री रा०"
.",
तुम्हारा पत्र मिला, जिससे मालूम होता है कि तुम्हारी

...में काम करने की है। विचार उत्तम है। मैं
तुम को उसमें उत्साह दिलाऊंगा, पर इस विषय में मुझे
शंका मालुम होती है कि ऐसा जीवन तुम्हें सहन होगा या
नहीं । वहां रह कर (१)ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए,
(२) सून्म सत्यव्रत पालन करना पड़ेगा, (३) शारीरिक
परिश्रम के कार्य को, अर्थात् कुदाल-फावड़े को, सच्चा काम
समझना चाहिए, (४) पुस्तकीय विद्या ज्ञान ही बढ़ाती हो, तो
इस उद्देश्य को बिलकुल भूल जानो। अनायास और
प्रसंगानुसार जो कुछ ज्ञान बढ़जाय, बही ठीक होगा, (५
मन में यह दृढ़ निश्चय होना चाहिये कि पुस्तकीय ज्ञान की
अपेक्षा चरित्र दृढ़ करना ही हमारा कर्त्तव्य है, (६) जाति
अथवा कुटुम्ब के अन्याय का निर्भयतापूर्वक विरोध करने
की तैयारी होनी चाहिए, (७) पूर्ण दरिद्रता धारण करनी
चाहिए ।
यह सब तुम्हारे हाथ से हो सके, अथवा करने की
इच्छा हो, तो ज में आने की बात मन में लाओ। वहां
जीवन दिन प्रति दिन अधिक कष्टपूर्ण होता जायगा; और
वैसा कष्टपूर्ण होना ही सुख मानना पड़ेगा।
यदि तुम्हारा विचार मार्च महीने में पाने का हो, तो
उपर्युक्त विचारों का अधिक मनन करो। पत्र लिखते रहो।
( ६६ )
माव बदी।
भाई श्री रा..",
तुम्हारा पत्र मिला। सूली पर चढ़ा हुश्रा मनुष्य भी

80
( ६८ )
.
केप टाउन,
मैं
फाल्गुन वदी १०, रविवार ।
भाई श्री
यदि चित्त पवित्र हो, तो विकारेन्द्रिय के विकृत होने
का कोई कारण ही नहीं । पर चित्त है क्या चीज़ ? यह
कैसे जाना जाय कि वह पवित्र है? चित्त ही आत्मा
अथवा आत्मा का स्थान है। उसमें पवित्रता का अनुभव
करना ही प्रात्म-शान होना है; और ज्ञान का अस्तित्व होने
पर इन्द्रिय विकार हो ही नहीं सकता। पर साधारणतया,
चित्त शुद्ध करने के प्रयत्न को ही हम चित्त की पवित्रा-
वस्था समझते हैं। तुम्हारे विषय में मुझ में प्रेमवृत्ति है।
इसका अर्थ इतना ही है कि, वैली वृत्ति धारण करने का
प्रयत्न करता हूं, फिर जब प्रेमवृत्ति अखंड हो जायगी,
तब तो हम ज्ञानी ही बन जायँगे। वैसा तो मैं हूं नहीं।
जिसके विषय में मुझ सच्चा प्रेम होगा, वह मेरे हेतु का
अथवा मेरे कथन का विपर्याल न करेगा; मेरा तिरस्कार
तो कदापि न करेगा। इससे यह सिद्ध होता है कि जिस
समय हमको कोई अपना शत्रु मानता है, उस समय पहले
पहल हमारा ही दोष होता है। गोरों से जो हमारे मामले
पड़ते हैं, उनमें भी ऐसा ही समझना चाहिए । इसलिए
हृदय की पूर्ण पवित्रता अन्तिम स्थिति है। तब तक बस
इतना होगा कि जितनी पवित्रता अधिक होगी, उतने ही
विचार अधिक शान्त होंगे । विकार कोई इन्द्रियर्गत विषय
"मन एव मनुष्याणां कारणं वन्धमोक्षयोः ।

६१ इन्द्रियां तो केवल मनोविकार व्यक्त होने के साधन मात्र हैं। उनसे हम मनोविकार पहचानते हैं। : सारांश यह है कि, इन्द्रियों का नाश करने से कुछ मनोविकार नष्ट नहीं हो सकते । हिजड़े भी विकारमय पाये जाते हैं। जन्मतः नपुंसक मनुष्यों में भी इतने विकार होते हैं कि, उनमें से बहुतेरे अकर्तव्य करते हुए दिखाई पड़ते हैं । मेरी गन्ध-शक्ति मन्द है, फिर भी सुवास लेने की इच्छा होती ही है। जब कोई गुलाव इत्यादि की सुगन्ध का वर्णन करता है, तव मेरा मन भी भ्रमर की भांति उधर दौड़ता है और ज़बरदस्ती उसे फिर स्थिर करना पड़ता है। जव मन पर काबू नहीं होता; पर विचार-शक्ति तीव्र होती है, तव कई लोग इन्द्रिय छेद डालते हैं। ऐसे मनुष्यों की अनेक आख्यायिकाएं सुनी गई है। करने की आवश्यकता भी हो सकती है मान लो, मेरा मन चंचल हो उठा; और किसी भगिनी पर कुदृष्टि पड़ी , मुझे काम सता रहा है। पर विलकुल अंधा नहीं बन गया हूं- अव ऐसे समय में यदि कोई दूसरा उपाय सुभाई न पड़े, तो मेरी राय में इन्द्रिय-छेदन करना ही एक पवित्र कार्य है । क्रमशः शुद्ध होने वाले को ऐसा मौका नहीं आता । जिसको तीन वैराग्य प्राप्त हो गया है। परन्तु पिछला आचरण पवित्र नहीं, उसके लिए अवश्य ऐसा मौका पाने की सम्भावना रहती है। यदि कोई कहे कि, भाई ! हमको ऐसा तात्कालिक उपाय वतलाश्रो कि विकारो. त्पत्ति ही न हो और इन्द्रिय चलायमान न हो, तो उसका यह कथन वन्ध्या के पुत्र चाहने के समान होगा। यह कार्य वैसी दशा में वसा ar an ऐसी दशा में अधिक समय चाहता है। जिस प्रकार जादू का आम सिर्फ देखने भर को होता है, उसी प्रकार क्षणिक मनशुद्धि से कोई लाभ नहीं होता। पर हां, वैसा हो सकता है। मन जब यहां तक तैयार हो जाता है कि वह पवित्र हो सके; और उस दशा में सन्तसमागमरूपी पारस को जब वह ढूंढ़ता रहता है, एकाएक सन्तसमागम हो कर अपने पवित्र स्वरूप का दर्शन हो जाता है; और अपवित्रता स्वप्नवत् मालूम होती है। परन्तु इसके लिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह सब तत्काल दुपा; पर देखने में यह इलाज अवश्य ही ऐसा जान पड़ता है कि यह बहुत साधारण है , कम से कम है; और तात्कालिक है। एकान्त-सेवन, सत्संग, शोधन, सत्कीर्तन, सद्बाचन, निरन्तर शरीर-दमन, अल्पाहार, फलाहार, अल्प-निद्रा,भोग- विलास का त्याग, श्रादि वाते जो करेगा, उससे मन का राज्य हस्तामलक हो जायगा। मनुष्य को इतना तो अवश्य करना चाहिए, और अन्य बातों पर भी ध्यान देना चाहिए । जब जब मनोविकार उत्पन्न हो, तव तव उपवासादि व्रतों का पालन करो। . x X X मी का कार्य रावण के पन्ध का था। उसने तपस्या कर के राक्षसी-वृत्ति प्राप्त की। रामचन्द्र ने तपस्या कर के दैवीवृत्ति का सम्पादन किया । इस प्रकार हेतु के अनुसार एकही कार्य के भिन्न भिन्न फल प्राप्त होते हैं। यदि खेती का कार्य ठीक ठीक न चलता हो; और उसमें अपना कोई दोष तुम्हें दिखाई देता हो, तो उत्साह- पूर्वक उसे निकाल डालो ! तुम जैसे बड़े के बर्ताव पर ही बच्चों का चालचलन अवलम्बित है। , केप टाउन, में फाल्गुन वदी १०। भाई श्री तुम्हारा पन मिला । तुम्हारे उपवास का समाचार मुझे मिला था। सकारण किया हो, तो मुझे कुछ कहना नहीं । तुमको वहां एकान्त मिलना असम्भव है। बाह्य-प्रवृत्ति विशेष होनी चाहिए । वहां सेवा-धर्म प्रधान है। की तबीयत खराब हो जाने से मैं घबड़ा गया हूं। वह शीघू पूर्ववत् हो जाती तो अच्छा होता। के लिए जी घबड़ा रहा है। उलझी तवीश्रत ठीक क्यों नहीं होती, कुछ समझ में नहीं पाता । वह मेरे साथ चले, यही मुझे भी ठीक मालूम होता है । तुम को इस प्रवन्ध में रहना चाहिए। देश जाने पर देखा जायगा। मन में सदैव यही शाता है कि मानसिक रोग के कारण ही ऐसा होता होगा। जेल में तवीश्रत न्यों अच्छी रही, इसका कारण बराबर ढूंढ़ रहा हूं। परन्तु; उपर्युक्त कारण ही दृष्टि के सामने आता है। वहां मन श्राप ही आप स्थिर हो गया था, उसी का प्रभाव शरीर पर भी पड़ा, यहां तक कि चाहे म

+
जो खाने को मिलता, तबीअत ठीक ही रहती थी। फिर
अब जेल के बाहर वैसा ही सनोराज्य क्यों नहीं प्राप्त किया
जा सकता ? चाहे जो हो, हिन्दुस्तान में जाना ही म
को
उचित है, तथापि उसकी सलाह ले लेनी चाहिए।
+
मैं अपनी एक बात यहां लिखे देता है। एक बार
'बा' को अदरक खाने की इच्छा हुई। मुझको भी अदरक
का निषेध न था, अतएव उसके साथ मैं भी, यह देखने
के लिए कि अदरक में क्या गुण हैं, खाने लगा । 'बा' को
ऐसी ऐसी चीज़े खाने का बड़ा शौक है । वह अद्रक की
जड़ें निकाल लाई । मेरा भी मन चला, यहां तक कि छोटी-
छोटी चार पांच कोमल जड़ें में चबाने लगा। एक दिन 'वा'
ने मिस गुलबाई की टोकरी से बहुत सी जड़ें लेकर एक
कोठरी में रख दी। यह देख कर मुझे बड़ा अचम्भा मालूम
हुश्रा । इसके बाद एक रात व्यतीत हुई । सुबह अचा-
नक मेरे मन में आया-अदरक कैसे खायें अदरक की एक
गांठ की एक पोर में अनेक जड़े पैदा होती हैं, इसलिए
उसमें बहुत से जीव-जन्तु होने चाहिए । इसके सिवाय
कोमल जड़ खाना मानों कोमल बालक की हत्या करने के
समान है। मुझे अपने विषय में अत्यन्त तिरस्कार उत्पन्न
हुश्रा । बस ! इस जन्म में अदरक न खाने का निश्चय किया।
इतना ही नहीं-अभी मजे की बात तो अागे ही है। 'वा' ने
देखा कि मैं अदरक नहीं खाता । उसने कारण पूछा
समझा कर बतला दिया । उसकी भी समझ में आ गया।
उसने अधिक कोमल जड़ें लौटा ली; और शेष में से खाने
को
मुझ
से श्राग्रह दिया। मैंने इन्कार कर दिया । व्रत

६५ , जारी ही है। परन्तु जीम और आंखों का हाल विलकुल कुत्तों का सा है। जहां नज़र पड़ी कि अदरक खाने की इच्छा होती है। मुंह में पानी भर पाता है, परन्तु जूंठन पर नज़र पड़ने पर भी जिस प्रकार चटोरे कुत्ते, मालिक के देखते हुए, ऊँठन खाने का साहस नहीं करते, उसी पूकार "आत्माराम जी" के देखते हुए जिह्वा उस अदरक को नहीं छूती। अदरक दिन भर मेरी नज़र के सामने ही रहती है, क्योंकि जहां मेरे काग़ज़-पत्र पड़े हैं, वहीं वह भी रक्खी है। इस समय मेरी ऐसी दशा हो रही है कि कुछ पूछिये ही नहीं। शक्कर और नमक छोड़ने में मुझे जितना कष्ट नहीं हुश्रा, उतना कष्ट मुझे इस अदरक से मन हटाने में पड़ रहा है। फिर अब तुम अपना दोष क्या निकालते हो? मन को (शराब) पिये हुए वन्दर की जो उपमा दी गई हैं, सो कुछ झूट नहीं । मुझसे ज्ञान सीखने की अभिलापा तुम कैसे रख सकते हो ? हम सब एक ही टूटी नौका पर सवार हैं। हां, उसमें मुझे अनुभव का ज्ञान कुछ अधिक है, इसलिए में जहां बतलाऊं वहां पैर रखना हो, तो भले ही रखो; पर हैं हम सभी अँधेरे में और एक ही खोज में । मेरा कदम शायद विशेप ज़ोर से और विश्वासपूर्वक पड़ता होगा; पर इल विषय में तुम्हारे मन में मेरे सम्बन्ध में विशप आदर- भाव होना मानो तुम्हारी प्रगति जहां की तहां ठहरा देने के समान ही है। जब मैं सब कामनाओं पर विजय प्राप्त कर लूगा, तब तुमको अथवा दूसरों को बेधड़क उपदेश दूंगा । इस समय तो श्रानो, हम सब एक साथ मिल कर' मोक्षदाता नारायण की खोज करें, और कदाचित् इस खोज में भूल जाँय, फिसल जायँ अधचा धोखा खा जायँ, तो भी, an

श्राश्रो हम सब, बड़े साहस के साथ, और धैर्यपूर्वक आने
ही वढ़ते चले।
( ७० )
केप टाउन, शनिवार।
भाई श्री
मैं चाहता है कि तुम सभी मेरे साथ दौड़ो। पर
मुझे वैसी श्राशा नहीं है। मैंने यह कभी नहीं कहा कि
जो कुछ मैं करता हूं, वह सब तुम भी करो। हां, जो
कार्य तुम अपने सिर पर लो, उसे करना ही चाहिए।
""धरपकड़ कर कार्य करने का प्रश्नही नहीं। पर यदि तुम
''का व्यसन आप ही श्राप समझ फर न छोड़ दोगे: और
मुझे धोखा दोगे, तो इसमें तुम्हारा ही दोष है। वञ्चे
भी वैसी ही कुछ मर्यादा तकश्रा गये, यह हमको समझना
चाहिए। फिनिक्ल में उन्होंने किसी बात का त्याग किया,
वहां वह बात त्याज्य मानी गई; फिर वही बात अब दूसरी
जगह कैसे की जा सकती है ? अलोना ही खाना चाहिए, इस
वात की किली पर जबरदस्ती नहीं। परन्तु: गरम मसाला,
मिष्टान्न, अति स्वादिष्ट भोजन, चाय, काफी, इत्यादि वस्तुएं
लसी के लिए त्याज्य हैं। विपय, चोरी, असत्य और देर से
उठना भी सव के लिए त्याज्य है। यह प्रवन्ध जिन को कठोर
जान पड़ता हो, उनको वहां रहना ही क्यों चाहिए ? प्रत्येक
संस्था के कुछ विशिष्ट नियम होले हैं। वे नियम भीतर अथवा
वाहर लव जगाइ पालन करने ही चाहिए, पालन न करने
वाले का संस्था में रहना व्यर्थ है !

X
x
तुम्हारा कहना है कि बच्चे और दूसरे मनुष्य अनेक
बातें “ शरमी-शरमा" करते हैं; परन्तु मन से नहीं करते,
और घोखा देते हैं । यह कदाचित् मेरा दोष होगा; परन्तु
इससे मुक्त होने का मुझे एक ही मार्ग दिखाई देता है, और
वह यही है कि मैं स्वयं किसी के साथ न रहूं। पर इस
समय में ऐसा करना उचित नहीं समझता। रा...."शरम
से, मेरे न कहते हुए ही, अलोना खाने का ढोंग दिखला
कर मुझे धोखा देता है , इसमें मेरा दोष क्या?
४ तुम अलोना व्रत नहीं करते, इसलिए
तुम कुछ मेरे लिए कम नहीं , और ज..." शुद्ध फलाहारी
है, इसलिए वह कुछ अधिक नहीं । अलोना अथवा
सलोना खाने में क्या कोई पाप-पुण्य थोड़ा ही है ?
उसमें जो रहस्य है , उसी में पाप-पुण्य है । इमाम साहब
ने कुछ समय अलोना का पालन नहीं किया, तथापि इससे
वे मेरे लिए कुछ अप्रिय नहीं हो सकते । मिस् स्लेचिन
यद्यपि प्रत्येक विषय में मुझ से विरोध करती रही, तथापि
मैं कितनी ही बातों में उसका शील तुम सब से अधिक
उच्च श्रेणी का समझता हूं। सब प्रकार के फेरफार में
यथाशक्ति संयम करने का और उसे बढ़ाने का हमारा
उद्देश्य है। यह जिसको स्वीकार न हो, वह मेरा त्याग कर
दे-ऐसा मैंने उस रात को कह दिया था, और मैं समझता
कि मेरा वह कथन उचित ही था।
x नान के काम पर मैं खुश नहीं हुआ
और न मैं बंगाली वकीलों का तिरस्कार ही करता हूं।
सत्याग्रही इन दोनों प्रसंगों से निर्लिप्त है। उसका कर्तव्य
x
--

ही अलग है। सत्याग्रही ठीक है या भ्रमपूर्ण है ? यह प्रश्न तुम्हारे पत्र में है । परन्तु यदि यह तुमको श्रव तक मालूम नहीं हुआ, तो फिर यही कहना पड़ेगा कि यह अनुभव- गस्य है, समझाने से समझ में नहीं आ सकता ! यही समझने के लिए तो हम स्वादेन्द्रियादि जीतने के प्रयास में पड़ते हैं। ४ यह मत समझो कि संयम का अर्थ अलोना व्रत ही है। तुम दो दिन की बाली सूखी पनेथी नमक के साथ खा कर यदि गुज़ारा करो, तो भी यह कार्य अनेक प्रकार की मेवा का स्वाद चखने से भी अत्यन्त उच्च श्रेणी का है। सच तो यह है कि कार्य की शुद्धता-अशुद्धता का निर्णय इस बात से किया जायगा कि तुम 'किस उद्देश्य से सूखी पनेथी खाते हो, और मैं किस उद्देश्य से मेवा खाता हूं। P " पवित्रता दूसरे की निन्दा से लजित नहीं होती, किन्तु और अधिक प्रबल होती है।" तुम से कुछ भी अनुचित वात हुई हो, वह सब मुझसे स्वीकार करो। ऐला विना किये तुम्हारे उपवास और सैकड़ो प्रायश्चित्त निष्फल हैं ! " मैं यहां आने के लिए आतुर हो रहा हूं , पर अपना कार्य छोड़ना मेरे लिए असम्भव है। चाहे सूर्य पश्चिम में उदय हो, तथापि एक बार की हुई प्रतिज्ञा वापस लेना कदापि सम्भव नहीं । जिनको में अत्यन्त निष्पाप समझता हूं, वे यदि इस प्रकार के पापी होंगे, तो यह देह एक क्षण भर भी अधिक रखने की मेरी र इच्छा नहीं। .

88 मनुष्य के लिए अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना कोई सहज काम नहीं । तुम दोनों को ही इस पत्र ले क्रोध आयेगा; परन्तु जो बात मेरे मन में आती है , यदि में वह न लिखू, तो मुझ में जो सत्यांश है, उसमें कालिमा लगेगी, और मैं तुम्हारा अनिष्टचिन्तक कहलाऊंगा। जिससे तुम को दुःख हो, वही बात करना इस समय मेरा धर्म है। - ६ ७१ ) केप टाउन, शनिवार। भाई श्री ... तुम्हारा पत्र श्राज इतनी देर को मिला है कि आज ही की डाक से उलका उत्तर भेजा नहीं जा सकता और तार देने से भी वह नहीं पहुंचेगा । तार अब सोमवार को ही दूंगा। जहां माता के प्रेम का प्रश्न है. जहां पुत्र-वात्सल्य का सवाल है, वहां दूसरे का सलाह देना एक बड़ा भारी धर्म- संकट है। फिर भी मुझे सलाह देनी ही पड़ेगी। अपने पिता के पत्र से जब तुमने अपना निर्णय किया, उस समय हमने तुम्हारी माता जी के उद्गारों का अनुमान करही लिया था। उनका पत्र श्रा जाने ने कोई नयी बात नहीं हुई। हां; इतना अवश्य हुअा कि, एक नवीन भाव प्रकट हो गया है. और प्रेम ने स्वाभाविक ही तुम्हारे सन पर प्रभाव

१००
जमा लिया है। अब यदि निर्माह बन कर, विचारपूर्वक
निर्णय करोगे, तो तुम्हारे प्रेम को निर्मल और दिव्य स्वरूप
प्राप्त होगा ? तुम अपना प्रेम सारे संसार को दे सकोगे-
वैसा करने का प्रयत कर सकोगे यही मातृभूमि
का उद्देश्य है, अन्य प्रकार की भक्ति एक स्थूल, लो.
किक और देहसम्बन्धी है । तुम बहुधा इससे मुक्त
होने के गीत गाया करते हो। प्रा संसार प्रसार वि-
चारी" इस गीत को गाकर इसका रहस्य ढूंढो । “जीवने
श्वासतणी सगाई" का अर्थ क्या है ? फिनिक्स और अन्य
स्थानों की रहन-सहन में यही अन्तर है कि यहां जो कुछ
हम लोग पढ़ते हैं, उसको अपने भीतर दृढ़ करने का प्रयत्न
करते हैं। भारतवर्ष जाने की तुम्हारी इच्छा क्षणिक है।
क्योंकि पांच अथवा पन्द्रह दिन बाद रोना है और उसके
बाद तो वियोग है ही।
इसके अतिरिक्त अपनी जीवन-यात्रा इस रीति से
चलाने की हमारी इच्छा है कि एक कौड़ी भी पास न रहे।
किसी गरीव मनुष्य ने ऐसे मौके पर क्या किया होता,
इसका विचार तो करो।
तुमको माता-पिता के दर्शनों की जो सदैव लालसा
रहती है, सो उत्तम है। पर इस भावना को दबाकर अपना
जीवन विशेष वीतरागी बनाना इस समय तुम्हारा कर्तव्य
है। अपना चरित्र बनाने के लिए तुमने स्वदेश त्याग किया
। यह तुम्हारा वनवास है । इसी में तुम अपने मा.
बाप को प्रसन्न कर सकोगे। तुम स्वच्छन्द नहीं हो, किन्तु
दिन पर दिन आत्मोन्नति करते जाते हो-संयमशील हो

, रहे हो-इसलिए देश जाने के कर्त्तव्य से तुम मुक्त हो । मैंने छापेखाने की दशा की ओर देख कर यह विचार विलकुल ही नहीं किया; किन्तु यह सलाह मैंने सिर्फ इसी बात को सोच कर दी है कि तुम्हारी प्रात्मोन्नति किस में है। तथापि, यदि अपनी लौकिक मातृभक्ति के कारण तुम्हा- रा मन घर जाने ही की ओर लगा हो, और यहां शान्त- चित्त से रहना सम्भव न हो, तो तुम प्रसन्नतापूर्वक देश चले जाओ। मेरा लिखना सलाह के ढङ्ग पर है, इस बान का ध्यान रख कर स्वतंत्रतापूर्वक तुम निर्णय करो और तदनुसार ही कार्य करो। ( ७२ ) भाद्रपद कृष्णा १३, १६७०, विलायत। चिम x x x शायद तुम यह जानना चाहते होगे कि मैं, वा- यल लोगों की सेवा का ही कार्य करने को तैयार कयों होगया । मेरा कहना यह था कि, दक्षिण आफ्रिका में सत्याग्रही की हसियत से हम घायलों की सेवा भी नहीं कर सकते। क्योंकि वैसा करना मानों लड़ाई को उत्तेजना देना है। जिसकी इच्छा कसाईखाने को उत्तेजना देने की नहीं है, वह कसाई का घर साफ करने के लिए नहीं जायगा । परन्तु मैंने देखा कि विलायत में रह कर मानों में एक प्रकार से १०२ लड़ाई में भाग ले रहा हूं। लड़ाई के दिनों में लंडन में जो कुछ खाने को मिलता है वह जलसेना की संरक्षा से ही मिलता है-अर्थात् ऐशी संरक्षित खूराक खाना दोषास्पद है । इलका सच्चा उपाय एकदी है कि यहीं के पहाड़ों अथवा गुफाओं में चला जाय; और मनुष्य-प्राणी की सहायता के बिना जो भोजन-वस्त्र सृष्टि देवे, उसी पर निर्वाह करे । परन्तु इतना आत्मबल अभी मुझ में नहीं पाया कि मैं यह कर सकूँ । फिर भी हाथ पैर हिलाये विना मिलने वाला, लड़ाई के कारण अपवित्र, अन्न ग्रहण करना अनुचित मालम होने लगा। कर्त्तव्य समझ कर देह अर्पण करने के लिए हज़ारों लोग तैयार हो कर निकल पड़े-ऐसी दशा में मैं ही चुप कैसे बैठता ? बन्दूक ! बन्दूक तो यह हाथ कभी चलायेगा 'नहीं-फिर रह गया एक घायल लोगों की सेवा का कार्य- इसी को मैंने उठा लिया। इस प्रकार मन से मेरा संवाद हुश्रा । हां, यह बात मैं दृढ़तापूर्वक नहीं लिख सकता कि मैंने जो कदम रखा है, ठीक ही है, तथापि बहुत विचार कर के भी अब तक मुझे दूसरा और कोई मार्ग नहीं सूझा । x ज्यों ज्यों मुझे अनुभव हो रहा है, त्यो त्यो मेरा यही विचार हो रहा है कि यहां श्रा कर डिग्री प्राप्त करना बिलकुल बेकार है । विद्याथियों की दशा करुणाजनक है। वे शिक्षा प्राप्त करते होंगे-समझते होंगे-पर विचार नहीं करते । शील (चरित्र) तो धूल में लोट रहा है । बहुत ही थोड़े मनुष्य, (सो भी वयस्क हो जाने पर) यदि श्राव- श्यकता ही हो तो, इधर श्राव। x. x x तुम सब की दशा अवश्य ही बहुत बुरी x x

१०३
होगी ? ईश्वर तुम को सहायता देवे; और कर्तव्य करने में
दृढ़ता देवे --यही मेरो इच्छा है। x x x
बहन की गोद में सोने का मौका कब श्रावेगा-कौन
उन पाल हो श्रापा या नहीं, यह जानने
की इच्छा है।
जान? म
(७६
कार्तिक शुक्ल ७, सं० १६७१,
लंडन।
चि० म
तुम को इधर कुछ दिदी ले पत्र लिख नहीं सका।
आज बोनत अच्छी है, इसलिए लिखने बैठा हूं । अब तक
बिस्तर पर ही हूं, और जान पड़ता है कि और दस दिन तक
ऐसाही पड़ा रहना होगा। इस बार वेदनाएँ बहुत भयंकर
थी, और मेरी राय में इसका कारण यही है कि मैंने डाकर
मित्र की बात मान ली, सब का श्राग्रह हुना, इस कारण मैंने
उन वस्तुओं का ग्रहण करना स्वीकार कर लिया जिनके
विषय में अन्तिम व्रत ग्रहण नहीं किया था । दाल, भात,
शाक चार दिन खाया। चारो दिन बेदनाएं बढ़ती ही गई;
और जिसके लिए यह सब किया, लो तो वन्द ही नहीं हुआ।
पांचवें दिन नमक खाया, उस दिन असह्य वेदना हुई । स्वयं
अन्त में छठवें दिन डाकृर को छोड़ दिया और अपनी ओषधि
करने लगा। वेदनाएं बिलकुल बन्द हो गई, और बवासीर
+

१०४ - श्रीस भी दध गई. तथापि मेरी मूर्खता के कारण फिर रोग उभड़ा। नमक खाया, उस दिन, जीवन में पहले ही पहल. रक्त गिरा। वह अवतक जारी ही है। इससे मेरे एक परिचित शाका- हारी गोरे डाकुर को कोल नवेग से ले आये। उन्होंने कहा कि, नमक की आवश्यकता नहीं, परन्तु कन्द मूल की अावश्य- कता है। इसके सिवाय उन्होंने यह भी सम्मति दी कि, चूंकि उपवास से शरीर बिलकुल क्षीण होगया है, इसलिए इस समय तेल, फली. इत्यादि न खाना चाहिए । अतएव आजकल मैं वाली के पानी. पाठ औन्स मुनका, आठ टरनिप, गाजर, बालू और कोबी इत्यादि के काढ़े पर गुज़र कर रहा हूं । शरोर विलकुल निर्बल हो गया है। इन उपचारों पर भी मेरा पूरा पूरा विश्वास नहीं, परन्तु अभी मुझे अपनी कुंजी अपने हाथ नहीं लगी । इसलिए यह प्रयोग कर के देख रहा हूं। तकलीफ़ वन्द है। रक्त अभी जारी है। मुह में रुचि बिलकुल नहीं । इस कारण स्वादेन्द्रिय वश करने के लिए यह एक उत्तम अवसर मिल गया है। निब्बू भी बन्द कर दिया है, इस कारण तेल से रहित टरनिप, गाजर का काढ़ा पीने में रुचि बिलकुल ही नहीं रहती, फिर भी मैं उसको श्रानन्द से पी लेता हूं। पहले पहल बाली का पानी जरा बुरा लगा था । पर अब उसको भी मजे में पी लेता हूं। तुमको यह सब विस्तारपूर्वक लिख रहा हूं, इसलिए कहीं घबड़ा मत जाना। आशा है मैं फिर पूर्ववत् हो जाऊंगा; और सो भी फलाहार से ही होगा, इस बात का मुझे पक्का विश्वास है। अनुभव से जो हो वह देखना चाहिए, दूध लेने का आग्रह मित्र-मंडली करतो हो रहती है। मैंने साफ इनकार कर दिया है । इसके विषय में तो मैंने कहा

१०५
है।
दिया है कि, यह मेरा नियम है। अतएव चाहे प्राण भलेही
चले जायँ, पर दृध ग्रहण नहीं करूंगा।
'चा' की शक्ति विचित्र है। मेरे उपचार पर उसका
विशेष विश्वास जम रहा
यहां मुझे इडिया श्राफ़िस से सत्याग्रह करना पड़ा है,
इसका वृत्तान्त अगले पत्र में लिखूगा ।
x x x असह्य संकट सहन कर के भी सम्पूर्ण उद्देश्यों
का पालन करो। x x सब की तबीयत कैसी है ? वहां जाने
के बाद बच्चों की आत्मा पर वहां के वायु-मण्डल का क्या
प्रभाव पड़ा है, इत्यादि वात विस्तार के साथ लिखो।
'बापू' का आशीर्वाद ।
4
( ७४ )
लंडन,
कार्तिक वदी ३ सं० १६७१ ।
चिम
लम्बे लम्चे पत्र लिखने का यह अवसर नहीं है। मेरी
तवीश्रत सुधर रही है। यदि आगामी सप्ताह में कुछ विशेष
सुधर गई , तो और भी समाचार लिखेंगा। तीन दिन हुए,
विस्तरा नहीं छोड़ा। श्राशा है कि तबीयत ठीक हो
जायगी। किन्तु, मेरी चिन्ता मत करना ।
माई. म
का पत्र प्राया था। उसका उत्तर

१०६
xx
भेज दिया है । उसको पढ़ कर अमल में लायो ।
भाई सो दवाखाने में जहां हमारे घायल सिपाही
पड़े हैं, वहां गये हैं। कमज़ोरी के कारण मैं नहीं गया
इसके साथ कई काग़ज़ भेजनेका विचार है। यहां प्रारम्भ किया
हुमा सत्याग्रह सफल हुश्रा है । विचित्र संयोग है। 'वा',
की तबीयत अच्छी रहती है। मि० कोलनवक मेरे साथ ही
रहते हैं।
तुम सब को यहां बुलाने का विचार है। परन्तु यहां मुझे
अधिक दिन रहना पड़ा तो x x ५ मैंने जो पत्र मि० रो०
को लिखा है , उसकी एक नकल भेजने का विचार है। उस
पत्र के कारण किसी को अव्यवस्थित न होना चाहिए और
न कुछ आशा करनी चाहिए । यह पत्र पहुँचने के पहिले यदि
मेरा तार तुम्हें न मिले, तो ऐसा समझो कि मेरी मांग का
उपयोग नहीं हुआ।
मोहनदास का श्राशीर्वाद ।
.
x
xx
( ७५ )
लंडन
कार्तिक बदी १०, १६७१ ॥
चि० म...
x x
- तुम सब को अच्छा अनुभव प्राप्त हो रहा
है। शान्तिनिकेतन में इस रीति से रहो जिस से हम सब
के द्वारा उनको सहायता पहुंचे और उन्हें कुछ भी संकोच
B

१०७
न हो। प्रायः इसी में सुभीता होगा कि, स्वाने के जिन
पदार्थों के बिना तुमको दिक्कत पड़ती हो, वे पदार्थ स्वयं
तुम्हीं मंगा लो। यहां बैठे हुए मैं तुमको क्या बतला सकता
हूं । जो उचित हो वही 'विचारपूर्वक करना चाहिए !
तामील लड़कों को हिन्दी तेजी के साथ सिखाओ ।
नहीं तो बेचारी को कठिनाई पड़ेगी। जब वहां तुम रहते
हो, तब थोड़ी सी बँगला भी सीखो, इसमें विशेष समय नहीं
लगेगा। यदि कोई तामिल मनुष्य मिल जाय, तो तलाश
कर लो। डाकृर मेहता भाई रा को यदि दे देंगे,
तो अच्छा होगा। तुम्हारे ऊपर एकाएक बड़ी भारी ज़िम्मे-
दारी पापड़ी है । आशा है, इसको तुम भलीभांति निभाओगे।
.
--
भाई सो इत्यादि रोगियों की सेवा करने के
लिए स्थान पर जा पहुंचे हैं। मैं अपनी तबीअत के कारण
नहीं जा सका। अव जाने की गप्पे मार रहा हूं; पर कठि-
नाइयां आ ही रही हैं।
-
कविवर, मि० पैड्यूज़ तथा मि० पियसंत की सेवा
करते रहो। इस प्रकार का उपाय करते रहो कि सब लोग
बड़ों की मर्यादा रखना सीखें। वहां रहनेवाले सब लोगों
से पहले उठा करो।

-- 4 । ( ६ ) फवोवीर रोड ३ डब्ल्यु, लंडन; मार्गशीर्ष बदी ८, १९७१। चिम , तुम सब के पत्र मिले। मैं अपनी वर्तमान दशा में सबको अलग अलग पत्र नहीं लिख सकता। इसलिए यह पत्र सबके लिए समझा जाय; और सब लोग मुझे पत्र लिखने रहो। मेरे वहां श्राने पर तुम मट्ठा खाने की प्राज्ञा मुझ से मांगने वाले हो, वह में यही से दिये देता हूं। वहां की परिस्थिति के अनुकूल जिस किसी चीज़ की आवश्यकता समझते हो, उसे पूरा कर लो। मुझ से पूछने के लिए अटक कर न बैठो। सब बातों में संयम का पालन कर के चलने का तत्त्व ध्यान में रखो, तब कोई कार्य करो। बस । तुम्हारा यह कथन ठीक है कि, खेतो. ही सच्ची प्रभु- सक्ति और परोपकार है। खेती करते हुए, खाते, खेलते, फिरते. स्नान करते, प्रत्येक कार्य के समय, हरिनाम लेना उचित ही नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य भी है। जिसको राममय होने की इच्छा है, जो प्रयत्न करता है-उसको किसी विशिष्ट समय की आवश्यकता नहीं। परन्तु नव- युवक को नियम की आवश्यकता है। इसलिए जिस समय खेती का काम न हो, वही समय प्रार्थना के लिए नियत करना चाहिए। यह समय उषाकाल-जिस समय अंधेरा

१०६
रहता है वही-समझना चाहिए । शास्त्र कहते हैं कि अरु-
णोदय के पहले ही संध्या श्रादि कर्म करने चाहिए। इस
लिए हम लोगों ने रात का जो समय नियत कर दिया
है, वही ठीक है।
खेती के काम में जो उत्साह दिखला रहे हो, उसको
बढ़ानो। फलों के वृक्ष लगाओ। ४४४ यदि अपने से बड़े
प्रत्येक शिक्षक की थोड़ी बहुत सेवा करने का निश्चय करोगे,
तो बहुत अच्छा होगा।
जितना हो सके, उतना सामान हाथ से बनालो । जो
अपने हाथ से न हो, उसके विना ही काम चला लेने की
आदत डालो। यदि हम खेती पर और शारीरिक परिश्रम
एर अपना निर्वाह कर लेने लगे, तो मानो हमने सब कुछ
प्राप्त कर लिया, और सब कुछ सीख लिया। मुझे भी यही
सीखना है; पर कदाचित् इस शिक्षण के बिना ही मुझे देह
त्याग करना पड़ेगा। तुम्हारे विषय में अवश्य ही ऐसा न
होना चाहिए!
यदि वहां गुरुदेव को कठिनाई पड़ती हो और काफी
स्थान न हो, तो तम्बू अथवा अन्य कोई रहने के सुभीते का
प्रबन्ध करवा लेना चाहिये।
मेरा मन मुझ से कह रहा है कि उद्देश्य और रहन-सहन
की दृष्टि से संसार में फिनिक्स से अच्छी संस्था नहीं है,
और यदि कोई हो भी, तो लभ्य श्रेणी के लिए अज्ञात है।
तुम सभी पर यही प्रभाव पड़ा है, यह भी एक तरह से
अच्छा है । मेरी तवीत अभी पहले की सी नहीं हुई कि इतने

११०
में कल से 'बा' को खूब रक्तस्त्राव प्रारम्भ हुआ है। प्रभु
की इच्छा कौन जान सकता है ? तुम सब निश्चिन्त रहो।
-~
मेरे भोजन में वनस्पति के क्षार काफ़ी नहीं; इसलिए
डाकृर एलिसन ने कन्द-मूल और शाक-भाजी खाने की
सलाह दी है। इस कारण, इस भयंकर दशा में भी, वह
प्रयोग कर रहा हूं। मेरा भोजन इस प्रकार है-सुबह दो
से लेकर तीन चमचा केला और मूंगफली का रसा बनाता
हूं। उसमें टोमेटो और एक चम्मच तेल डालता हूं। दोपहर
को एक छोटीसी गाजर और प्राधा छोटा कचा टरमिट,
तथा गेहूं और केले के भाटे के बने हुए पाठ बिस्कुट पका
खाता हूं। कभी कभी गाजर टरनिप की जगह कञ्ची कोबी
के दो पत्ते बांट कर खाता हूं। रात को दो चमचा भात
पका कर साथही उपर्युक्त रीति से कच्ची भाजी तथा भिगोये
हुए अंजीर और उसके साथही केले और गेहूं के आटे की
रोटी का थोड़ा टुकड़ा खाता हूं। इस प्रकार आजकल गुज़र
हो रहा है। मतलब यह है कि पके हुए भोजन से कच्चे
भोजन पर पाना चाहते हैं; और गेहूं को छोड़ कर उसकी
जगह फल-फलहरी श्रारम्भ करना चाहते हैं । सुबह दो
एपल ' खाता हूं। कच्ची भाजी खाते हुए अब लगभग
एक मास हो गया होगा। इसले कुछ हानि नहीं जान
पड़ती। तुम कहते थे कि कच्ची भाजी खाई जा सकती है;
परन्तु वह मेरे गले से नहीं उतरती थी। यहां कच्ची भाजी
खानेवाले बहुतेरे दिखाई देते हैं। बहुत से विचारों के
लोग यहां हैं। परतु उनका हाल इस समय नहीं लिखूगा !
वह फिर कभी लिखूगा । मैंने दूध, घी न खाने का अन्तिम
.
--

व्रत यहां ग्रहण किया है। डाक्टर लोग बिलकुल पीछे हो
पड़े थे, इसलिए सोचा कि यदि प्रतिज्ञा न करूंगा, तो
शायद फिसल जाऊं, इसलिए प्रतिज्ञा कर ली। अब इस
जन्म में इन वस्तुओं को न खाऊंगा। अन्यान्य चूत वहां
लेंगे। यदि बीच में प्रसंगवश यही लेने पड़े, तो कह नहीं
सकते।
..
--
(७)
(रंगून से श्राते हुए जहाज़ में )
चैत्र
३ शुक्ला १२, सं० १९७१ ।
चि.ज
तुम्हारा पत्र मिला।
x x x स्तरम एकाएक गिर
गया, इसका मुझे भी श्राश्चर्य हुआ। यदि यह वही खम्भा
है जिस पर अमूल्य लेख खुदे हुए थे, तो बहुत ही बुरा
हुआ! तुमने जो कुछ किया सो उचित किया । तुमने
अपनी श्रीर ले शंका-निवारण करके (स्तस्म) तोड़े, लो
ठीक ही किया । मुझे वह स्थान दिखलाओ, इससे
अधिक मालूम होगा। मैं लमझता हूं, इमली शिथिलता
नहीं लाती। खाने में श्रदरक, विशेप होनी चाहिए।
फिक्शन का अर्थ है:-कल्पित कहानी। इसमें सन्देह
नहीं कि, रामायण और महाभारत में इतिहाल कम और
कल्पना अधिकांश में है, परन्तु ये दोनों ही धर्म-ग्रन्थ हैं;

1 ११२ । । और करोड़ों लोग इतिहास से भी अधिक उनका आदर करते हैं, यह उचित ही है। रामायण में भरत का जैसा वर्णन आया है, कदाचित वैसा भरत रामचन्द्र का भाई न दुना होगा; परन्तु वैसा भरत भारतवर्ष में उत्पन्न अवश्य ही दुआ होगा, इसीलिए तो तुलसीदास उसकी कल्पना कर सके। रामायण में जो गुण अंकित किये गये हैं, वे गुण जिनमें मौजूद होंगे, भारतवर्ष उन्हीं का वन्दन करेगा। सत्याग्रह के लिए किया हुआ प्रयत्न चाहे व्यर्थ चला जाय और फिनिक्ल बिलकुल उजाड़ हो जाय; परन्तु फिर कोई वात मन में लाने की आवश्यकता नहीं। शान्ति के साथ खेती करेंगे । अशान्ति में भीख मांगेगे, मजूरी करेंगे श्रथवा भूखों मरेंगे। किया हुश्रा कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता । यह निरपवाद कानून है, इसका दृढ़ विश्वास रखो। फिर खेती करने का मौक़ा आया तो करेंगे और न आया, तो देखा जायगा! ( निश्चिन्त रहना चाहिए ) खेती कोई साध्य नहीं है, साधन है । स्थूल दृष्टि से लोक- सेवा एक लाध्य है। सूक्ष्म दृष्टि से मोक्ष एक साध्य है, दोनों साध्यों को साधने के लिए खेती एक साधन है । यदि साध्य के साधने में उसके कारण से रुकावट पड़े तो उलको छोड़ देना चाहिए । क ... जिस चीज़ के खाने की स्वतंत्रता चाहता है, वह अनर्थ है। तथापि ऐसे लोगों के विषय में, इस विचार ले, कि कभी न कभी उनसे रसादिकों का त्याग होगा, तितिक्षा करना उचित है। हम लोगों की संगति उनके लिए सत्संगति ही है। । . ।

उसके लिए सरलतापूर्वक जो कुछ करना पड़े, वह
सब हमको करना चाहिए। क के विषय का नियम सब
के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी बातों में एक ही नियम नहीं
पाला जा सकता। क भी यदि मर्यादा छोड़ देगा
तो काम नहीं चलेगा।
'फिनिक्स संस्था के इस स्वरूप में आने का कारण
पूज्य श्री गोखले हैं। उन्होंने हमारी संस्था का नाम
फिनिक्स रखा, जिससे तुरन्त ही यह नाम अन्य लोगों
तथा उनके ध्यान में आ जाये । 'फिनिक्स' के बहुतेरे
उद्देश्य यहां की अन्य संस्थाओं के भी हैं, पर फिनिक्स के
उहश्य वे स्वयं जानते थे, अतएव 'फिनिक्स' नाम ही
जारी रखा गया है। यह नहीं कि, इसी नाम को हम बनाये
रखेंगे। जब कहीं स्थायी हो जायँगे, तब फिर नाम दूँढ़ेगे।
x x x रंगन में अनेक अनुभव प्राप्त हुए ।
बापू का आशीर्वाद ।
( ७८ )
मदरास, वैशाप सुदी ११ ॥
भाई श्री ५ म ",
अहिंसा के विषय में आप का विचार ठीक है। अहिंसा
के अंग दया, अक्रोध, अ-मान, इत्यादि हैं। सत्याग्रह की
नोव अहिंसा-धर्म है। यह अत्यन्त स्पष्टता के साथ कलकत्त
में दिखाई दिया और वहीं विचार किया, इसको अपने वत

११४ तौर पर रख लेना चाहिए। अधिक विचार करने पर यह भी जान पड़ा कि, इसमें सव' यम-नियमों का पालन करना चाहिए, और व्रत के तौर पर जब हम उनका पालन करते हैं, तभी उनकी सूक्ष्म स्थिति भी हमारी दृष्टि में आती है। मैं यहां सैकड़ों लोगों के साथ बातचीत करते समय भी सब यम-नियमों को स्त्रो के सामने रखता हूं। सिय-राम-प्रेम-पियूष-पूरन होत जन्म न भरत को। मुनिमन-अगम यमनियम शमदम विषम व्रत पाचरत को । यह छन्द मुझे उस अवसर पर कलकत्त में याद आया और उसका खुब मनन किया। इन बूतों के पालने में ही भारतवर्ष का और हमारा मोक्ष है, यह मुझे साक्षात् दिखाई पड़ रहा है। अपरिग्रह-वत के पालन करने में यह मुख्य बात ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी वस्तु का अनावश्यक संग्रह न किया जाय । यदि खेती के लिए बैलों की आवश्यकता होगी, तो बैल और उनके लिए आवश्यक सामान भर रखेंगे। जहां अकाल की सम्भावना सदैव रहेगी, वहां अनाज का संग्रह कर रखेंगे, परन्तु इस बात की जांच सदैव करते रहेंगे कि, क्या बैलों की और अनाज की वास्तव में आवश्यकता ही है। हम को सारे यम-नियमो का विचारपूर्वक पालन करना चाहिए. इस से दिन दिन दृढ़ता बढ़ती जायगी और त्याग- योग्य नवीन वस्तुएं सूझती जायँगी । 'त्याग के लिए कोई सीमा ही नहीं । त्याग जितना हो अधिक होगा, आत्म-दर्शन भी उतनी ही शीघ्रता से होगा। मन का झुकाव परिग्रह- त्याग की ओर है; और यदि शरीर-शक्ति के अनुसार त्याग , ११५ करते रहें, तो यह अपरिग्रह व्रत के पालने के समान ही होगा। इसी प्रकार अस्तेय है । अपरिग्रह में अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह का समावेश होता है, अस्तेय में वैसी वस्तुओं के उपयोग का समावेश होता है। मैं एक कुरते से अपना बदन ढांक सकता हूं, फिर भी यदि मैं दो कपड़े पहनें, तो इसका यह अभिप्राय होगा कि मैंने दूसरे की चोरी की । क्योंकि जिस वस्त्र का उपयोग दूसरे जीव को हुधा होता, उस वस्त्र को मैं अपना कैसे कह सकता हूं? यदि पाँच केलों से मेरा निर्वाह हो सकता है, तो छठवां खाना चोरी है। मान लो कि हम सब की कम से कम आव- श्यकता के अनुसार हमने ५० निम्बुओं का परिग्रह किया। उसमें से मेरे लिए सिर्फ दो की आवश्यकता है, परन्तु यह देन कर कि निम्बू तो अधिक है, मैं यदि तीसरा ले लूं , तो यह दूसरे की चोरी होगी। में इस प्रकार से विशेष (अावश्यकता से अधिक) उपयोग करने से अहिंसा-बूत का भी भंग होता है। यदि अस्तेय- वृत्ति से उपयोग कम करेंगे, तो हम उदारता बढ़ेगी। प्राणि- मात्र को सदैव अभयदान देने से दया और प्रेम का चिन्तन होता है। ऐसा चिन्तन जो कोई करेगा, उसके विरुद्ध स्वप्न में भी कोई प्राणी उठ नहीं सकता । यह शास्त्र का स्पष्ट सिद्धान्त है। मेरा अनुभव इन सब बूतों का मूल सत्य है। मन को धोका देकर जो चोरी होगी, वह चोरी नहीं ठहरेगी। मन को चक्कर से है।

११६
-
।
डाल करें जो परिग्रह किया जायगा, वह अपरिग्रह ठहरेगा ।
सारांश यह है कि पद पद पर अति सूक्ष्म विचार से हम
सत्य प्रवर्तन कर सकेंगे। जिस समय यह संशय उत्पन्न हो
कि अमुक वस्तु का संग्रह किया जाय अथवा नहीं, उस
समय उसका निषेध करना ही उत्तम नियम है। त्याग के
कारण सत्य का भंग नहीं होता। जहां यह विकल्प उत्पन्न हो
कि बोले या नहीं, वहाँ मौन धारण करना ही सत्य-व्रत का
कर्तव्य है।
मेरी ऐसी इच्छा है कि, तुम सभी लोग स्वतंत्र रूप
से विचार कर के, फिर जो व्रत ग्रहण करना हो, उसको
ग्रहण करो। व्रत ग्रहण करने की सदैव आवश्यकता है। जिस
समय जिसको आवश्यकता जान पड़े, उस समय उसको
व्रत श्रवश्य ग्रहण करना चाहिए और जितने व्रत लेने
हो, उतने लेने चाहिए।
यह सच है कि श्री रामचन्द्र जी एक बहुत बड़े प्रतापी
होगये; और उन्होंने बहुत बड़ा पराक्रम कर के लाखों ही
राक्षसों का संहार किया। फिर भी यदि उनके पीछे लक्मण
और मरत के समान भक्त न होते, तो श्राज राम को कोई
पहचानता भी नहीं। यदि रामचन्द्र में केवल असाधारण
क्षात्र-तेज ही होता, तो कुछ समय के लिए चमक कर उनका
माहात्म्य विलीन होगया होता। उन्हीं की भांति असुर संहा-
रक अनेक पराक्रमी पुरुष हो गये हैं, परन्तु उनमें से किसी
की भी कीर्ति
माहात्म्य घर घर गाया नहीं जाता।
रामचन्द्र में और ही कोई बात थी। उन्होंने वह लक्ष्मण
और भरत के भीतर डाल दी थी और इसी कारण लक्ष्मण

और भरत महान् तपस्वी निकले ! उनकी तपस्या का महत्व
गाते हुए तुलसीदास जी ने ऐसा वर्णन किया है कि, ऐसा
तप, जो महामुनियों के लिए भी अगम्य है, यदि उस तप
को करनेवाले भरत जी पैदा न हुए होते, तो मेरे समान
मूढ़ को राम दर्शन कैसे हुआ होता ? सारांश यह है कि,
लक्ष्मण और भरत राम यश के, अर्थात् उन की शिक्षा के,
मानों द्वारपाल ही हैं। परन्तु यह भी नहीं कि केवल तप ही
से सब कुछ सिद्ध हो जाता हो। जिस प्रकार लक्ष्मण ने
चौदह वर्ष तक प्राहार-निद्रा का त्याग किया था, उसी प्रकार
इन्द्रजित ने भी किया था । परन्तु तप का रहस्य लक्ष्मण को
जो शरामचन्द्र से प्राप्त हुआ था, वह इन्द्रजित के पास नहीं
था,-यही नहीं, बल्कि तप-प्रभाव का दुरुपयोग करने की
उसकी प्रवृत्ति थी, इसी से वह राक्षस ठहरा,
और
लक्ष्मण
जो भक्त और मुमुक्षु तपस्वी थे, उनके हाथ से उसका परा-
भर हुश्रा ! बस इसी भांति गुरुदेव का आदर्श चाहे जितना
उच्च हो, तथापि यदि उल श्रादर्श ने कार्यरूप में परिणत
करनेवाला कोई नहीं निकला, तो काल के प्रगाढ़ अन्धकार
में वह आदर्श विलीन हो जायगा । और इसके विरुद्ध, यदि
उस श्रादर्शको, ध्येय को धाचरण में लाने का प्रयत्न
करनेवाले कोई निकलेंगे, तो उसका प्रकाश कई गुना
अधिक फैलेगा।
,
श्रादर्शवत् आचरण बनाने की सीढ़ी तपस्या है,
लिए यह तप-यह डिसिप्लिन-बालकों के जीवन में उतारना
कितना श्रावश्यक है, इसका विचार करो।

( ७६ )
.
बम्बई,
पौष वदी ११, सं० १६७१ ॥
चि०म०
तुम्हारा पत्र मुझे मिला है। वम्बई के तट पर आते हो
आनन्दाश्रु बहने लगे । अब तक आनन्द की लहरों में ही है।
फिर भी बम्बई में चैन नहीं पड़ता। वम्बई मानों लंडन सी
मालूम होती है। लंडन के सारे ढंग यहां भी दिखलाई पड़
रहे हैं। परन्तु हां, वहां का सा सुभीता अवश्य ही यहां नहीं
मिला। यह भी भारतवर्ष में वसने का पक लाभ ही कहना
चाहिए ! सुभीते के लिए हम हैरान न हो - इसीलिए
मानों हिन्ददेवी ने लंडन की प्रतिमा ही यहां खड़ी कर
दी है। आदर-सत्कार से बिलकुल उकता गया है। एक
क्षण भर भी विश्राम नहीं मिला। लोग वरावर आते ही रहते
है, परन्तु इसमें उनको अथवा मुझको कोई लाभ नहीं।
तुम दृढ़तापूर्वक वहीं बने रहे, यह अच्छा किया।
किसान के लिए इधर-उधर घूमना सम्भव नहीं । यदि
किसान का वच्चा खेतों को वैसा ही छोड़ कर वाप से
मिलने दौड़े, तो अधर्म होगा।
।
मैं समझता हूं कि हिन्दी, उर्दू, तामिल, और बँगला
लिपियां हम सब को सीखनी चाहिए ।

मैं फलाहारी हो बना हूं। खास कर केला, मुंगफली और निम्बू पर ही निर्वाह करता हूँ। -- ( ८० T + फाल्गुन वदी ३, गुरुवार १६७१। चि० म. यह पत्र बम्बई से लिख रहा हूं। प्रायः एक दिन यहां भी अधिक रहना पड़ेगा। तुम्हारे तीन पत्र पूने में मुझे एकदम ही मिले। हम अपनी संस्था अखिल भारत- वर्ष के लिए चलावेंगे, इसलिए सारे भारत से भीख मांगेंगे परन्तु अहमदाबाद से आवश्यकता भर के लिए जमीन और घर मांगने ही चाहिए। यह एक नींव की तरह प्रा। यांत्रिक सहायता के विना जहां तक हमारा वश होगा, काम चला लेंगे। इस से पुतलीधर बन्द होगे या नहीं इसकी चिन्ता करने की हमको 'श्रावश्यकता नहीं। यदि पुतलीघर वाले और अधिक पुतलीधर खोलना बन्द कर दें गे, तो इतना ही बहुत होगा। यदि वे यह नहीं करेंगे, तो जिसको हम सुन समझते हैं उसमें हम मग्न रहेंगे। वस । ब्रह्मचर्य के विषय में अब तक तुम ठीक ठीक नहीं समझ सके। के को यदि प्राज मोक्ष मिल जाय, तो बधा तुमको बुरा मालूम होगा ? यदि मालूम हो, तो यह - .

१२०
m
।
कितनी मोहदशा है? यदि मनुष्य सन्तानोत्पत्ति करता है,
तो उसकी सन्तान संसार के लिए सुखदायक होती है
यह मानने में बहुत अहं-भाव और प्रशान है, अच्छा मनुष्य
(सत्पुरुष ) संसार की प्रवृत्ति की इच्छा नहीं रखता ।
ऐसे मनुष्य संसार-निवृत्ति अर्थात् मोक्ष की इच्छा करते
रहते हैं। अच्छे मनुष्य के सच्चे साथी उसके पुत्र प्रादि है
इतना भी समझ में न आता हो, तो बड़ा भारी अज्ञान ही
कहना चाहिए । मेरे इस कथन का यह अर्थ नहीं कि
के... को विवाह ही न करना चाहिए । उसके संस्कार
के अनुसार उसको बुद्धि उपजेगी। तुम्हारा कर्तव्य यही
है कि तुम उसके सामने उच्च आदर्श रखो। उससे यदि
वह नीचे पाजावे, तो कोई हानि नहीं । ऐसे मनुभ्य
की सन्तान परमार्थी हो सकती है, परन्तु उत्तम
लन्तान उत्पन्न करने के उद्देश्य से ही जो ब्रह्मचर्य का
अंडन करेगा, उसी की सन्तान उत्तम हो सकती है
इन दोनों अवस्थाओं के बीच का रहस्य भली भांति
समझ लो। पहली स्थिति में शानपूर्वक पाप है, दूसरी
में शान के होते हुए भी थोड़ी दुर्वलता के कारण वह पतित
हो रहा है। इससे ऊपर पानेको मार्ग है। पहली में तो ऊपर
न आने का निश्चय है, ऊपर आना पतन समझा जाता है।
हमारे साफ़ साफ़ कहते हुए भी के ... यदि विवाह कर
लेगा, तो कोई हानि नहीं । यदि विवाह न करेगा, तो उसमें
इतनी शक्ति पाजायगी कि उसके तेज से सारा संसार कम्पित
रहेगा । मा-बाप को अपने लड़को की उस दशा की इच्छा
करनी चाहिए जो उत्तम से उत्तम हो । योग्यतानुसार
जैसा लड़का उत्पन्न होगा, वही ठीक है। मेरे विचारों में
44

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Mahatma Gandhi Ke Niji Patra

Author
Vajpaye Laxmidhar
Title
Mahatma Gandhi Ke Niji Patra
File name
Mahatma Gandhi Ke Niji Patra
Text
OCR done
Citation
1922
Published
2011/03
Publisher
Kanpur, Sasta Hindi Pustakmala Karyalaya
Language
Sanskrit
Pages
116
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550728
Barcode
4990010031540.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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