Adarsh Library, Jaipur

Peepasa

Mishara Virendra · 2011/01

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पिपासा
अतीन वंद्योपाध्याय
अनुवादक
वीरेन्द्र नाथ मिश्र
उल्था प्रकाशन-कलकत्ता

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'पिपासा' उपन्यास के लेखक श्री अतीन वंद्योपाध्याय
बङ्गला के तरुण उपन्यासकारों में काफी लोकप्रिय हैं ।
आपका जन्म पूर्व वङ्गाल, वर्तमान बङ्गला देश में हुआ था।
स्वभावतः आपकी लेखनी तत्कालीन पूर्व बङ्गीय विषय वस्तु
से अनुप्राणित है । भाषा एवं भाव में बङ्गाल की
रोमांटिकता एवं मिट्टी की प्राणमयता सजीव है ।
देश-विभाजन के बाद आप पश्चिम बङ्गाल चले आये ।
जीविका के लिये कभी रसोइया बने, तो कभी जहाज की
नौकरी की । परिणामस्वरूप विभिन्न स्तरीय जीवन को
निकट से देखा।
तत्कालीन पूव बङ्गला (वर्तमान बङ्गला देश) की पृष्ठ
भूमि में प्रसारित 'नीलकण्ठ पाखिर खोंजे' साहित्य अकादमी
से पुरस्कृत होकर नेशनल बुक ट्रस्ट से कई भारतीय
भाषाओं में प्रकाशित हो रहा है।
अञ्जलि/निर्मला, सुरेश और चमन की प्यास व घुटन
भरी जिन्दगी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है 'पिपासा'।
आपके उपन्यास हिन्दी भाषा में प्रकाशित हों, हमारी
कामना है।

८८...निर्मला तथा अंजली की समाधि पर
मौलसिरी और कदंब के पेड़ दो प्रकार को शोमा
लिये बढ़ रहे हैं । अभी भी दोनों की छाया में दो
प्रौढ़ चलते-फिरते दिखाई देते हैं । वे चलते-चलते
कभी अन्यमनस्क हो जाते हैं | घास पर ओस
की बूंदें झिलमिलाती रहती हैं । ओस की बूंदों
में वे शायद प्यार को खोजते-फिरते हैं। कभी-
कभी दोनों चुपचाप पेड़ तले बैठे रहते हैं । मैदान
से ठण्डी हवा के झोंके आने पर वे विभिन्न
प्रकार के फूलों की सुगन्ध पाते हैं। कौन-सी
सुगन्ध
की है वे समझ नहीं पाते हैं।
उस समय दोनों प्रौढ़ एक-दूसरे की ओर देखकर
उदास हंसी हँसते हैं । सूर्य उन पर अपनी
किरणें बिखेरता है।"
किस फूल
८२

पिपासा

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. सुरेश इस पहाड़ी शहर में पहली बार आया है । स्टेशन पर उसने एक तांगा लिया। वह जायगा नटिंगहोम । वहाँ उसकी एफ पार्टी की आफिस है। तांगा में बैठे-बैठे ही उसने एकबार फिर सारी फाइलों को ठीक से देख लिया। किस तरह बात शुरू करेगा, किस-किस प्वाइंट पर जोर देगर, यह सव मन-ही- मन सोच लिया। दोनों तरफ छोटे-बड़े पहाड़ । स्टेशन से इस तरफ काफी खुली जगह है। इक्के-दुक्के मकान । सिर्फ एक रेल यार्ड और कीलदार तारों का अहाता । कुछ चिड़िया । वह इन चिड़ियों को नहीं पहचानता । इसके बाद कुछ आदिवासियों के घर । पहाड़ी रास्ते से होता हुआ तांगा अब आबादी में आ पहुँचा-बाजार, कालेज, मिशनरी अस्पताल । सूरज अव तक सिर पर आ गया था। गरमी का मौसम । पर गरमी नहीं है । बल्कि सुरेश को तो सरदी लग रही है। वह अपने साथ एक रैपर लाया है । पहाड़ी इलाके में पहुंचते ही इवर वालों को सरदी लगने लगती है। इसीलिये लीला ने उसके सूटकेश में दो-चार गरम कपड़े रख दिये थे। सुरेश ने हंस कर पूछा था, "गरम कपड़ों का भला क्या होगा ?" : लीला ने कोई जवाब नहीं दिया था। उसका पति साधारणत: कहीं बाहर जाता ही नहीं, और खास कर पहाड़ी इलाके के बारे में तो वह विलकुल ही अनजान है । शादी से पहले लीला अपने मामाओं के साथ बहुत घूमी-फिरी है। मामा संव देहरादून रहते थे । वह गरमी और दुर्गापूजा की छुट्टियों में मामाओं के घर पहुँच जाती थी। यूं तो सुरेश पहाड़ी शहर के बारे में अनजान था ही; पर दफ्तर के छोटे . पिपासाह . बाबू अविनाश से उसे थोड़ी-बहुत जानकारी मिली थी। कहा था; "हुन्छ गरम कपड़े ले लीजियेगा सर, जरूरत पड़ सकती है।" हालांकि इस तरह की छोटी-मोटी बात के लिए उसे आने की जरूरत नहीं थी । लेकिन चमन लाल के साथ डिसकाउंट को लेकर झमेला हो गया है। डिसकाउंट के संबंध में जव तक पार्टी से कोई वातचीत नहीं हो जाती, जब तक कोई फैसला नहीं हो जाता, तब तक कुछ करना मुश्किल है । वह एक सीमा निश्चित कर सकता था और उसके अधीनस्थ अधिकारी उस सीमा तक बात कर सकते थे; पर मुश्किल तो यह है कि चमन लाल शायद उससे कम पर ही राजी हो जाय । अधीनस्थ अधिकारी यदि ढंग से बातचीत न कर सके, तो संभव है ज्यादा डिसकाउंट देने के कारण कंपनी को ज्यादा नुकसान उठाना पड़े । पता नहीं क्यों, सुरेश इस मामले में किसी पर भरोसा न कर सका । उसने अपनी आफिस के सभी अधिकारियों को चकित करता हुआ कहा, "इसे मैं खुद सलटाऊंगा। मैं खुद जा रहा हूं।' वह और किसी पर भरोसा नही कर पा रहा है, ऐसा उसने मुंह फोड़ कर नहीं कहा । बस चला आया । आते वक्त और भी कुछ काम साथ ले आया। चमन लाल को कहने से वह स्टेशन गाड़ी भेज सकता था। लेकिन वह खुद जायगा सुनकर, चमन लाल सावधान हो जाता । अचानक पहुँचने पर ही, अधिक लाभ की संभावना है । इसलिये उसने चमन लाल को सूचना तक नहीं दी थी । आवश्यक काम समझ कर वह अचानक ही चला आया है, ऐसा ही भाव दिखायेगा। कंपनी के अंदरूनी मामलों से संबंधित होने के कारण ही शायद उसे कभी- कभार बाहर जाना पड़ता है । छुट्टियों में उसे कहीं बाहर जाने की इच्छा नहीं होती। बस, यह अपने गाँव चला जाता । लीला के साथ वह मां-बाप के पास अपनी छुट्टियाँ विता देता। पत्नी से अलग वह कभी नहीं रहा । शादी के बाद जो लीला उसके घर आयी, फिर कहीं नहीं गयी। सुरेश दक्षिण कलकत्ता में रहता और उसकी सुसराल उत्तर कलकत्ता में । ससुर का परिवार काफी बड़ा है । कितने ही आदमी हैं। रहने-सोने की बड़ी असुविधा । यहाँ आने पर लीला के हाथों काफी समय रहता है । लम्बा-चौड़ा फ्लैट है। पार्लर और बालकोनी में खड़े होने से सामने के लान में रंग-बिरंगे फूल दीखते हैं । सुरेश घरमुखी आदमी है । दपतर बंद होने पर वह सीधे घर चला आता है । लीला एक कीमती पीली साड़ी पिपासा १० - 1 पहने रहती है । बड़ा-सा जूना बांधती है । मांग में सिंदूर की बिंदी लगाती है और वह एक सरल-सुबोव वालिका बन जाती है । मायके में उसका मन नहीं लगता। किसी उत्सव में अगर जाती भी है, तो रात के दस बजते ही वापस आ जाती है । आते ही पलंग पर पड़ जाती है, मानो अभी तक वहाँ किसी ने उसे बांध रखा था, अब भाग आयी है। दोनों तरफ शहर बसा है । आवादी शुरू हो गयी है । वाह, तांगा पर आने से मजा आ गया। तांगे पर न आता, तो दोनों तरफ के लाल व नीले रंग के घर हार,रंग-बिरंगे फूलों की लताएं, इतना मनोहर पहाड़ी दृश्य मानो नहीं देख पाता । पता नहीं उसे ऐसा क्यों लग रहा है कि सहसा न आकर चमन लाल को कह कर एक अच्छे होटल की व्यवस्था करा लेता। काश, ऐसा करता तो लीला को साथ ही ले आता । कितना सुन्दर शहर है ! पहाड़ी झरना देखने पर लीला शायद चञ्चल बालिका बन उठती, हिरनी की तरह चौकड़ियाँ भरती फिरती । और इसी समय सुरेश को अपनी बच्ची की याद हो भायी। नन्हा-सा चेहरा, मासूम व प्यारा-न्यारा चेहरा उसे याद हो आया । वह मानो विदेश आ पहुंचा है। सिर्फ एक दिन का सफर कितना लम्बा मालूम पड़ रहा है। दरअसल सुरेश बहुत कम ही कहीं बाहर जाता है। छोटे कमरे में इतु अभी क्या कर रही है। उसकी अर्द्ध वार्षिक परीक्षा है। न, लीला उसके साथ नाती ही नहीं । इम्तहान और स्कूल मौज-मस्ती करने से दोनों मिट्टी में मिल जाता- वह इसे कभी भी बर्दाश्त नहीं करती। पहाड़ देखते ही वङ्गाली खुशी से नाच उठता है वाह, पहाड़ी सीढ़ियों की एक-एक सीढ़ी पर घर-द्वार, रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ, प्रशस्त लान और लान में पड़ती सूर्य की किरणें, सुन्दर युवक-युवतियों का अबाव विचरण । सुरेश का मन मुग्ध हो गया । उसने मन-ही-मन निश्चय किया, इतने दिनों वाद जव एक बार बाहर निकल पड़ा हूँ, तो कुछ दिनों तक रह कर आसपास के दर्शनीय स्थान देख कर वापस जाऊंगा। चमन लाल की फैक्टरी खोज निकालने में कोई कष्ट न हुआ। चमन लाल यहाँ एक केजी, दो केजी टीन में सरसों तेल पैक करके वेचता है । यहीं से भूटान जाने का एक रास्ता निकल गया है। इन इलाकों में पहाड़ों के ऊपर-ऊपर गाँव बसे है। चमन लाल का एक केजी, दो केजी पैकिंग का कारोवार बड़ा लाभप्रद है। सुरेश की कंपनी उसे प्रिंटेड कंटेनर देती है । चमन लाल बहुत बड़ी पार्टी है । फैक्टरी के नीचे तांगा के पहुंचते ही उसे लगा कि चमन लाल कहीं बाहर नाने की तैयारी कर रहा है । पिपासा ११ यह नीचे है । रास्ता ऊपर चला गया है । झटपट तांगे से उतर कर सुरेश ने किराया-चुकाया। वह चाहता, तो सूटकेस और चेडिंग छोड़ कर ऊपर जा सकता था; लेकिन उसे देख कर चमन लाल नीचे आ रहा था। पारा आते ही चमन लाल अवाक होकर बोल उठा, "अरे साहब भाप ! यहाँ कसे ? यह और भी बहुत कुछ बोलना चाहा, पर सुरेश बीच ही में उसकी बात काट कर बोल उठा, "पहले नहा-धो लूं, उसके बाद और कुछ।" सुरेश ने सोचा था, चमन लाल का मकान और-और मारवाड़ियों जैसा ही होगा। लेकिन चमन लाल ने बड़ा ही फैशनेबुल मकान बनाया है । पहाड़ काट कर समतल बनाया गया है। गाड़ी मकान तक नहीं जाती है। करीव तीस फीट नीचे और भी एक टीला तोड़ कर आउट हाउज बना है । यहाँ उसके नौकर-चाकर रहते हैं। गाड़ी वहीं छोड़ कर सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर जाना पड़ता है। सुरेश ने देखा, चमन लाल ने बड़ा सुन्दर मकान बनाया है। चमन लाल लम्बे अर्से से वङ्गाल में कारोबार कर रहा है । उसने सुना है कि चमन लाल की पत्नी वङ्गालिन है । सुरेश वोला, "वाह, बड़ी अच्छी जगह मकान बनाया है, भाई। सुरेश को नीचे देखने में मानो डर लगता है । करीव हजार फीट नीचे रंग-बिरंगे फूल-पौधे लहरा रहे हैं । बड़े-बड़े पत्थर संगमर्मर की छोटी-छोटी चट्टान जैसा दीख रहे हैं। - - चमन लाल बोला, "होटल में आपको तकलीफ होगी साव, आपको वहाँ अच्छा न लगेगा । जब आये हैं, तो यहीं कुछ दिनों तक रहिये । बड़ी इच्छा है, कुछ दिन आपकी सेवा करू । - चमन लाल जानता है, इस साहव को खुश करने से उसे बड़ा लाभ होगा। इन दिनों टीन कंटेनर मिल नहीं रहा है। छलांगे मार-मार कर कीमत बढ़ती ना रही है। पुराने माल का डिसकाउट अभी तक उसने लिया नहीं। कुछ माल खराब निकला है। यह चाहे तो सव माल वापस दे सकता है। लेकिन वह ऐसा नहीं करेगा। बड़े साहब को वह एक बार अपनी फैक्टरी ले जायेगा। ढेर सारे फटे कंटेनर दिखायेगा । यह चाहता तो पूरा माल वापस दे सकता था; पर दिया नहीं । झलाइ करा कर चलाने की कोशिश करेगा। वह नहीं चाहता कि उसके कारण कंपनी को इतना नुकसान हो। इस तरह वह बड़ा साहब को खुश परने की कोशिश करेगा । बड़ा साहब अगर उस पर एकवार खुश हो जायें, - पिपासा १२ तो उसे तरह-तरह की सुविधाएं मिलेंगी। जैसे पुराने माल पर ज्यादा-से-ज्यादा डिसकाउंट, इस मंहगाई में हर महीने सप्लाई ठीक रखना, नये माल के संबंध में एक मनोनुकूल एग्रीमेंट करना आदि-आदि । और अगर बड़ा साहब दो नम्बर का कारोबार करने की थोड़ी सुविधा दें तो फिर चाँदी-ही-चाँदी है। सुरेश बोला, " चमन लाल जी आप इतने रसिक है, नहीं जानता था। चमन लाल दायीं ओर वाला गेट पार कर रहा है 1 दायीं ओर का लान पार करते ही दो कमरे का खूबसूरत पलट । विलकुल अलग-अलग । कारोबार के सिलसिले में जो आता है, हाँ, पार्टी बड़ी होनी चाहिये, उसे यहाँ टिकाया जाता है। हर तरह का प्रबंध है । मोजाइक किया हुआ फ्लोर, हरे रंग से रंगी काठ की दीवार । नीले रंग का प्लास्टर किया हुआ काठ की छत । ऐसा लगता है मानो हरी-भरी घास से यह मकान बना हो । चारों तरफ हरा-भरा लान । दायीं ओर पहाड़ के करीब रेलिंग । वहाँ खड़े होने में उसे डर लग रहा था। अभी वह खिड़की के पास खड़ा है। ड्राइंग रूम, वेड रूम, एक-एक कर सब कुछ दिखा कर चमन लाल ने विदाई ली। -- खिड़की पर बैठा-बैठा सुरेश दूर-दूर तक फैले हुए पहाड़ों को देखता रहा । पता नहीं क्यों, उसे फिर लीला याद हो आयी। लीला को साथ लाता, तो मजा आ जाता । लोग ऐसी ही जगह हनीमून करने आते हैं। क्यों आते हैं, अव वह महसूस कर पा रहा है । उसकी उम्र हो गयी। शादी किये छः-सात साल बीत गये । इतनी सुन्दर जगह पृथ्वी पर कहीं है, वह जानता ही नहीं था। जानता होता तो लीला को अवश्य ही साथ लाता। मन-ही-मन वह पश्चाताप कर रहा है । जीवन भर सिर्फ काम ही करता रहा, शहर से बाहर कदम न रखा । झरना, पहाड़, नदी-नाले, पेड़-पौधे देख कर जो इतना आनन्द मिलता है, इतने दिनों बाद आज वह अनुभव कर पा रहा है। सुरेश बढ़ा सक्त आदमी है, सक्त ऑफिसर । अपनी जिम्मेवारी याद आते ही उसने सोचा कवियों जैसी भावुकता उसे शोभा नहीं देती। झटपट नहा-धो कर, खा-पीकर तैयार होना होगा। यथाशीघ्र काम खतम करना होगा। संभव हुआ, तो कल ही ट्रेन पकड़ेगा। उसे ऐसा लगा, उसके न पहुंचने पर ऑफिस एकदम ठप्प हो जायेगी। मालिक का वह विश्वासी व्यक्ति है। उसके न रहने पर फैक्टरी में मुश्किल से आवा काम होगा । वह यहाँ काम से आया है, घूमने नहीं। इस तरह की कविता-टविता उसे शोभा - -- पिपासा १३ नहीं देती। उसने जो दो-चार दिन रुकने का विचार किया था, रुक न्ह सकेगा। और ठीक इसी समय उसे लगा, चमन लाल के दक्षिणी बरामदे पर एक युवती खड़ी है । वह नीचे पहाड़ देख रही है या ऊपर आसमान, कहना मुश्किल है। बड़ी-बड़ी आँखों से सब कुछ देख रही है । लाल रंग का सिफन पहने है । जोरों को हवा बहने के कारण दो-चार उलझी लटें माथे पर फैली हैं। वड़ा उदास-उदास-सा चेहरा । मानो सुरेश का चिर परिचित चेहरा हो । सुरेश आड़ में खड़ा-खड़ा एकटक युवती को देखता रहा । उसे अव नहाने की इच्छा नहीं हो रही है। चुपचाप बैठे रहने को जी चाहता है । कहाँ थी यह ? या उसे ऐसी जगह आकर लगता है कि पृथ्वी की हर चीज सुन्दर है । हर चीज मनोहर है । सुरेश सोच न सका कि वह कल क्यों जाना चाहता है ? कौन उसे अपनी ओर खींच रहा है ? लीला, क्या लीला उसे अपनी ओर खींच रही है ? क्या कर्तव्य-बोध उसे खींच रहा है या उसका अहम् भाव ? कौन ? उसने विस्मित होकर दर्पण में अपने आप को पहचानने की कोशिश की। तीसरे पहर एकबार चमन लाल आया। सुरेश वोला, "आज ही मैं आपके साथ बैठना चाहता हूँ। कल जाने की सोच रहा हूँ। -यह कैसे हो सकता हैं साव ! आप मेरी फैक्टरी नहीं देखेंगे ? किस तरह काम चला रहा हूँ, एकवार देखेंगे नहीं ? -समय निकाल कर और कभी आकर देखूगा। --उ, हुँ, ऐसा नहीं हो सकता साव । आपके लिये मैंने दोपहर में निर्मला के साथ बैठकर प्रोग्राम बनाया है। सुरेश आराम कुर्सी पर बैठा था। पास ही टेवुल थी। वह सिगरेट पीते- पीते वीच-बीच में अन्यमनस्क हो उठता था । चमन लाल की बात सुन कर वोला, "आप और निर्मला देवी ने मिल कर प्रोग्राम बना लिया और मुझे पता तक नहीं।" --आपने यह तो पूछा ही नहीं कि निर्मला कौन है ? -निर्मला देवी के बारे में आप कई बार बता चुके हैं। -कॉलेज में पढ़ी-लिखी लड़की मेरी पत्नी है । बड़ी चुस्त-चालाक लड़की है। - . पिपासा १४ -- सुरेश को इस तरह की बात पसन्द न आयी। पत्नी के सम्बन्ध में इस तरह का मजाक सुनना यह जरा भी पसन्द नहीं करता । बोला, "और कभी होगा।" बताइये, काम पर किस समय बैठेगे ? -आप जब कहें। - फैक्टरी कितने बजे तक खुली रहती है ? आज-कल दोनों शिफ्ट काम हो रहा है। -मैं सोचता हूँ, यह सव वात ऑफिस में होनी चाहिये । -जैसी आपकी मरजी। -आप तैयार हो जाइये। --चरय वन रही है पीकर निकलयेगा । -फिर चाय ? सिर्फ चाय, और कुछ नहीं। चमन लाल हंस पड़ा । वोलर, "आपने दुनियर नहीं देखी सर, अफसोस की वात है। -क्या मतलब ! -सिर्फ काम-ही-काम। -मैं तो यह कह कर आया नहीं हूँ कि यहाँ कुछ दिन रुकूगा। कल ही घापस जाने की बात है । इसलिये कोई बहाना बनाकर रुकना ठीक न होगा। --विल्कुल ठीक कहते हैं सर । चमन लाल ने चाय पीने का अनुरोध किया, "चलिये सर, एकबार मेरे गरीवखाना में चलिये। चमन लाल लगभग चालीस साल का है । लेकिन अपनी तोंद और चर्वी के कारण वह पचास का दीखता है । काला-कलूटा । सामने के दो दाँत सोना में बंधे हैं । घर पर वह धोती पहनता है । पेंट खूब कस कर पहनना पसन्द करतो है। सिर पर मिरजापुरी टोपी । हमेशा जर्दा वाला पान खाने के कारण सारे दाँत काले पड़ गये हैं। हाँ, अभी तक वाल नहीं पका है । साही कांटे जैसे खड़े बाल । चलते-चलते सुरेश ने मानो चमन लाल को नये ढंग से देखो। दोनों तरफ दो माली हमेशा काम करते हैं । रंग-विरंगे फूलों की देख-भाल करते हैं, नये-नये फूल लगाते हैं ।, बड़े-बड़े लाल गुलाव, लाल-पीले मैरुन " पिपासा १५ - जगह है ?" . -~अच्छी, बहुत 'गुलाब, कोई-कोई पिंक गुलाब । गुलाव की सुगन्ध से उसकी नाक गरी जा रही थी। सीढ़ी के सामने ही फौवारा है । फौवारे के चारों तरफ रंग-बिरंगी बत्तियाँ लगी हैं। रात में जलाने पर प्रकाश की किरणें पानी के अन्दर रंगों की बहार लुटाती हैं । उस समय चमन लाल की सुन्दरी पत्नी शायद बहुत एकाकीपन महसूस करती है । सुन्दरी प पढ़ी-लिखी पत्नी है। रवीन्द्र संगीत बहुत अच्छा गाती है । और भी बहुत कुछ सुरेश ने चमन लाल से मुना है। जिस युवती को देख कर सुरेश का मन चंचल हो उठा था, अब समझ सका है कि यह कौन है । वह अब क्षण भर भी देर करना नहीं चाहता, पापस जाना चाहता है । इस उम्र में इतना चित्त-विकार अच्छा नहीं। बार-बार मन कहता है, इस युवती को कहीं देखा है, दूर से देखने के कारण पहचान नहीं पा रहा है। पास जाते ही मानो पहचान लेगा । सुरेश इस समय बड़ा उदास दीख रहा था । चमन लाल बोला, "क्यों साहव, कैसो अच्छी। दोनों साथ-साथ चल रहे थे। तसरा पहर है। पहाड़ की चोटियों पर सूरज उतरता जा रहा है । सुरेश को सरदी-सी लग रही है। वह बोला, मि० चमन लाल ऐसी जगह इतना खर्च कर घर वनाया क्यों ? -~~-यह जगह मुझे बहुत पसन्द है साहब । उसके बाद क्षण भर रुक कर वरामदे में जहाँ पर झाड़-फानूस झूल रहा है, पता नहीं वहाँ क्या देखा । मानो किसी की पदचाप कान लगाकर सुनी और फिर बोला, "यहाँ आते ही मेरी तकदीर बदल गयी साहव । चमन लाल के चेहरे पर हँसी देख कर सुरेश ने मन-ही-मन सोचा, वड़ा रसिक आदमी है । एक मुफस्सिल पहाड़ी इलाके में कल-कारखाने भी ज्यादा नहीं हैं । दो-चार चाय गोदाम हैं और सात-आठ तेल की मिलें है और है चमन लाल का तेल पैकिंग कारखाना । सिर्फ वही एक केजी, दो केजी के टीन में पैकिंग का काम करता है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भारी बोझ लेकर ऊपर चढ़ने में कष्ट होता है । यही कारण है कि एक-केजी-दो-केजी पैकिंग की अच्छी खपत है। लेकिन इतना बड़ा मकान, कीमती गाड़ी और भोग-विलास की इतनी सारी सामनी का कारण क्या सिर्फ यही एक मामूली-सा कारखाना है ! सुरेश को सन्देह हुआ। चमनलाल कलकत्ता पहुंचते ही कहा करता है, चलिये न साव, पिपासा १६ - एकवार मेरे गरीबखाने से हो आइये । उसकी बातचीत में ऐसी करुणा फ पड़ती है, मानो कलकत्ता में आदी जिन्दा नहीं रह सकता । कलकत्ता आते ही मानो चमन लाल का दम घुटने लगता है। वर्षों से सुरेश एक गन्दे शहर में पड़ा है। कलकत्ता से बाहर कहीं नहीं गया। वाहर जाने पर सुरेश, सुरेश न रह सकेगा; वल्कि कुछ और ही बन जायगा । चमन लाल कहा करता, साव, एकवार अगर मेहरबानी करके मेरे गरीवक्षाने पर आएँ, तो फिर वापस आने की इच्छा नहीं होगी। इस बरामदे के दक्षिण तरफ पहाड़ से एकदम सट कर रेलिंग है। काफी नीचे दो-चार मकान हैं । और हैं सूखे पेड़-पौधे । सुरेश को चक्कर-सा आ रहा है । मानो उसे कोई धक्का दे रहा है । यहाँ चमन लाल उसे क्यों ले आया है। उसने देखा, यहाँ खड़ा होते ही नीचे नदी एक रेखा-सी दीखती है। पहाड़ पर कहीं-कहीं बलखाती हुई पगडंडी चली गयी है। सुरेश वैठा नहीं। वह रेलिंग के पास खड़ा रहा । पता नहीं क्यों यहाँ से दूर-दूर तक फैले पहाड़ देखना अच्छा लग रहा है । उसे एकाकीपन का स्वाद मिल चमन लाल बोला, "खाली आँखों अच्छी तरह दिखाई नहीं पड़ता साव । -क्या, सब कुछ तो देख रहा हूँ। चमन लाल ने उंगली उठा कर दूर का एक पहाड़ दिखाया। -कुछ देख रहे है साव ? -नहीं। -~~-जरा, दायीं ओर सरक कर देखिये। -कहाँ ? -----एक छोटी-सी रेखा दीखती है न । रेलिंग पर छाती टिका कर सुरेश ने उवर जरा झुक कर देखा । --एक मिनट । --उसने आवाज दी, " निर्मला !' सुरेश समझ गया, चमन लाल अपनी पत्नी को पुकार रहा है। कोई उत्तर न मिलने पर चमन लाल. ने फिर आवाज लगायी, “निर्मला, । रहा है। " सुन रही हो?" अन्दर रंग-बिरंगे शीशे का कमरा। निर्मला वहीं से बोली, “मुझे कुछ कह रहे हो ?" -तुम किसी के हाथ वाइनाकुलर भेज दोगो ? पिपासा १७ की सुगन्ध . - गुलाब, कोई-कोई पिंक गुलाब । गुलाब से उसकी नाक भरी जा रही थी। सीढ़ी के सामने ही फौवारा है । फौवारे के चारों तरफ रंग-बिरंगी बत्तियाँ लगी है। रात में जलाने पर प्रकाश की किरणे पानी के अन्दर रंगों की बहार लुटाती हैं । उस समय चमन लाल की सुन्दरी पत्नी शायद बहुत एकाकीपन महसूस करती है । सुन्दरी व पढ़ी-लिखी पत्नी है। रवीन्द्र संगीत बहुत अच्छा गाती है । और भी बहुत कुछ सुरेश ने चमन लाल से सुना है । जिस युवती को देख कर सुरेश का मन चंचल हो उठा था, अब समझ सका है कि यह कौन है । वह अव क्षण भर भी देर करना नहीं चाहता, वापस जाना चाहता है । इस उम्र में इतना चित्त-विकार अच्छा नहीं। बार-बार मन कहता है, इस युवती को कहीं देखा है, दूर से देखने के कारण पहचान नहीं पा रहा है। पास जाते ही मानो पहचान लेगा । सुरेश इस समय वड़ा उदास दीख रहा था । चमन लाल बोला, " क्यों साहब, कैसो जगह है ?" -~-अच्छी, बहुत अच्छी। दोनों साथ-साथ चल रहे थे। त.सरा पहर है। पहाड़ की चोटियों पर सूरज उतरता जा रहा है । सुरेश को सरदी-सी लग रही है। वह बोला, मि० चमन लाल ऐसी जगह इतना खर्च कर घर वनाया क्यों ? -~-यह जगह मुझे बहुत पसन्द है साहव । उसके बाद क्षण भर रुक कर बरामदे में जहाँ पर झाड़-फानूस झूल रहा है, पता नहीं वहाँ क्या देखा । मानो किसी की पदचाप कान लगाकर सुनी और फिर बोला, "यहाँ आते ही मेरी तकदीर बदल गयी साहव । चमन लाल के चेहरे पर हँसी देख कर सुरेश ने मन-ही-मन सोचा, वड़ा रसिक आदमी है । एक मुफस्सिल पहाड़ी इलाके में कल-कारखाने भी ज्यादा नहीं हैं । दो-चार चाय गोदाम हैं और सात-आठ तेल की मिलें है और है चमन लाल का तेल पैकिंग कारखाना । सिर्फ वही एक केजी, दो केजी के टीन में पैकिंग का काम करता है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भारी बोझ लेकर ऊपर चढ़ने में कष्ट होता है । यही कारण है कि एक-केजी-दो-केजी पैकिंग की अच्छी खपत है। लेकिन इतना बड़ा मकान, कीमती गाड़ी ओर भोग-विलास की इतनी सारी सामग्नी का कारण क्या सिर्फ यही एक मामूली-सा कारखाना है ! सुरेश को सन्देह हुआ। चमनलाल कलकत्ता पहुँचते ही कहा करता है, चलिये न साव, पिपासा १६ एकवार मेरे गरीबखाने से हो आइये । उसकी बातचीत में ऐसी करुणा फूट पड़ती है, मानो कलकत्ता में आदमी जिन्दा नहीं रह सकता । कलकत्ता आते ही मानो चमन लाल का दम घुटने लगता है । वर्षों से सुरेश एक गन्दे शहर में पड़ा है। कलकत्ता से बाहर कहीं नहीं गया । वाहर जाने पर सुरेश, सुरेण न रह सकेगा; बल्कि कुछ और ही वन जायगा । चमन लाल कहा करता, साव, एकवार अगर मेहरबानी करके गरे गरीवजाने पर आएं, तो फिर वापस आने की इच्छा नहीं होगी। इस बरामदे के दक्षिण तरफ पहाड़ से एकदम सट कर रेलिंग है। काफी नीचे दो-चार मकान हैं । और हैं सूखे पेड़-पौधे । सुरेश को चक्कर-सा आ रहा है। मानो उसे कोई धक्का दे रहा है। यहाँ चमन लाल उसे क्यों ले आया है। उसने देखा, यहाँ खड़ा होते ही नीचे नदी एक रेखा-सी दीखती है। पहाड़ पर कहीं-कहीं बलखाती हुई पगडंडी चली गयी है। सुरेश बैठा नहीं। यह रेलिंग के पास खड़ा रहा। पता नहीं क्यों यहाँ से दूर-दूर तक फैले पहाड़ देखना अच्छा लग रहा है । उसे एकाकीपन का स्वाद मिल रहा है। चमन लाल बोला, "खाली आँखों अच्छी तरह दिखाई नहीं पड़ता साव । -~-क्या, सब कुछ तो देख रहा हूँ। चमन लाल ने उंगली उठा कर दूर का एक पहाड़ दिखाया। -~कुछ देख रहे हैं साव ? -नहीं। -जरा, दायीं ओर सरक कर देखिये । -कहाँ ? --एक छोटी-सी रेखा दीखती है न । रेलिंग पर छाती टिका कर सुरेश ने उपर जरा मुक्त कर देखा । --एक मिनट । ---उसने आवाज दी, "निर्मला !" सुरेश समझ गया, चमन लाल अपनी पत्नी को पुकार रहा है। कोई उत्तर न मिलने पर चमन लाल, ने फिर आवाज लगायी, " निर्मला, सुन रही हो?" अन्दर रंग-बिरंगे शीशे का कमरा । निर्मला वहीं से वोली, "मुझे कुछ कह रहे हो?" --तुम किसी के हाथ वाइनाकुलर भेज दोगी? पिपासा १७ . --भेज रहीं हूँ। उसके बाद एक अजीब-सी चुप्पी। सुरेश ने देखा, चमन लाल टेबुल और बेंत की कुर्सियाँ करीने से लगा रहा है । इस दिशा में वह सुरेश को पक्का कारोबारी लगा। और किसे बुलायेगा चमन लाल । खुद ही टेबुल की चादर ठीक कर दी। अभी-अभी वह जो एक बाइनाकुलर मंगवा भेजा है, और कलकतिया वावू वाइनाकुलर से देखने के लिये खड़ा है, लगता है चमन लाल यह सब अभी भूल गया है। सुरेश बाबू की जरा-सी दया से वह जो मालामाल हो जायेगा; लंबे अर्से से जिसकी आशा लगाये बैठा था कि अवसर मिलते ही वह उसका भरपूर फायदा उठायेगा, अभी चमन लाल में उसका आभास तक देखने को नहीं मिलता। ऐसा लग रहा है मानो चमन लाल को उसकी उपस्थिति का पता तक न हो। देरी होता देख चमन लाल ने खुद ही बाइनाकुलर लाकर सुरेश को दिया। वोला, "अव देखिये साव, सब कुछ साफ-साफ दिखायी पड़ेगा। उसके बाद चमन लाल सीढ़ी के सामने वाला दरवाजा खोल कर अन्दर चला गया। -इतनी देर क्यों निर्मला ? मुझे अच्छा नहीं लग रहा । -उनके साथ परिचय नहीं करोगी? चमन के चेहरे पर पता नहीं निर्मला ने क्या देखा । वोली, "मुझे क्यों घसीट रहे हो?" निर्मला के व्यवहार पर चमन लाल अवाक हो उठा। बोला, "तुम्हारा गाना यानी मैं कई बार उन्हें कह चुका हूँ कि तुम बहुत अच्छा गाती हो। बड़ा कड़ा आदमी है निर्मला । अपनी कम्पनी के अलावा और कुछ भी नहीं समझता। निर्मला, वोली, “आज तो मुझे माफ करना ही होगा चमन ।" निर्मला से चमन को ऐसे व्यवहार की आशा न थी। वह उसे परेशान भी नहीं कर सकता। बोला, उन्हें साथ चाय पिलाने लाया था। राजी हुए हैं, यही नसीव की बात है। -~-कहना मेरी तबीयत खराब है। -सुरेश साव कुछ नहीं कहेंगे । तुम नही जाओगी; फिर भी कुछ नहीं वोलेंगे । तुम जाती, तो मेरे लिये अच्छा होता। -सुरेश साहब को मैं पहचानती हूँ। - १८ पिपासा - -तुम उन्हें पहचानती हो ? -तुम जब उन्हें साथ ला रहे थे, फौवारे के पास मैंने देखा था। -तुम उन्हें कैसे पहचानती हो ? -वस, पहचानती हूँ। -कह कर वह रहस्यमय ढंग से हँसी। -क्यों मज़ाक कर रही हो? -किससे? -~-मुझ से। -और कुछ नहीं ! ----मुझे विश्वास नहीं हो रहा है । -फिर मैं क्या करूँ। -~-~-सुझे एकवार चूम लो। --चूम कर क्या होगा, तुम्हें तो कुछ पता ही नहीं चलता। --क्या मतलब। -विलकुल भुथरा गया है | -कह कर निर्मला ने चमन का गाल दवा दिया, “चमन, जिस बाबू को तुम पकड़ लाये हो, मैं उसे इतनी अच्छी तरह पहचानती हूँ कि मेरे जाने पर तुम्हारा सारा काम मिट्टी में मिल जायेगा। हाँ, चमन जानता है कि कभी-कभार निर्मला इतनी रहस्यमयी हो जाती है कि उसकी थाह पाना मुश्किल है । -तुम झूठ बोल रही हो।, --आज तक वोली हूँ क्या ? कलकत्ता से जब भाग्य भरोसे तुम्हारे साथ चली आयी, उसके बाद से कभी झूठ बोली हूँ ? -~~-नहीं। -तब यह सव बोल रहे हो ! -पता नहीं, मुझे क्यों ऐसा लग रहा है। --तुम्हारा साहव अभी क्या करता है ? -वाइनाकुलर पकड़ा दिया है। पहाड़ का नशा चढ़ने पर जल्दी जाना नहीं चाहेगा । दो-चार दिन रोकना चाहता हूँ। किसी और के आने पर रुपया खिला कर हाथ न कर लूँ, यही सोच कर साहब खुद ही चले आये हैं। वह मुझे जिवह करना चाहेंगे और मैं उन्हें । बाबू को अगर खुश कर पाता, चार पर्सेट डिसकाउण्ट एलाउ करा पाता, तो मुझे बड़ा लाभ होता निर्मला । चमन निर्मला की इज्जत करता है । उसका धन व ऐश्चर्य निर्मला के कारण ही है। इस बार भी उसे दो लाइसेंस मिले हैं। निर्मला को साथ लेकर वह पिपासा १६ वीच-बीच में राजधानी जाता है। उसके बाद निर्मला का आतिथ्य-सत्कार, उसका खुला व्यवहार काम आता है। निर्मला सहज ही किसी को अपना बना ले सकती है। टीन पैकिंग की आवश्यकता दिखा कर यह हर साल इम्पोर्ट लाइसेंस निकाल कर बेच देता है । अगर सुरेश बाबू को मना सके, तो अच्छा- खासा डिसकाउण्ट मिल जायेगा। लेकिन निर्मला को क्या हुआ ! वह राजी ही नहीं हो रही है । चाय पर बुलाया है। निर्मला चाय देगी, दो-चार बातें होंगी, और क्या ! निर्मला की हँसी बड़ी प्यारी है। माथे पर हमेशा बड़ी-सी विदी लगाती है । हमेशा जूड़े पर बूंघट रखती है। मांग में ऐसा लाल सुर्ख सिंदूर लगाती है कि कभी-कभार चमन लाल को ताजा घाव-सा लगता है। और निर्मला ! सांचे में ढला वदन। बड़ी-बड़ी आँखें। अङ्ग-अङ्ग में छलकता यौवन। शैंपू किये धुंघराले बाल । तरह-तरह के क्लिपों से भरा वेतरतीव जूड़ा । घड़ी में वह नक्काशीदार चेन लगाती है । रंग-बिरंगे फूल व लताओं से चित्रित नंबई प्रिंटिंग की साड़ी पहनना पसन्द करती है। इस तरह लपेट कर नाभि के नीचे साड़ी पहनती है कि लगता है कहीं फैशन शो में शामिल होने जा रही हो । निर्मला इतनी सुन्दर है, इतनी आकर्पक है कि चमन कभी-कभी अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाता। और सफेद संगमर्मर के महल में निर्मला जब अकेली चलती-फिरती है, तो ऐसा लगता है मानो कहीं झरने से टप-टप बूंदें गिर रही हों। चमन फिर बोला, "तुम क्या सचमुच में सुरेश वाबू को पहचानती हो ?" -~-मुझे क्या पड़ी है कि तुम से झूठ बोलू ? -लेकिन मैंने उन्हें कहा है न कि मेरी पत्नी वंगालिन है और रवीन्द्र संगीत बहुत अच्छा गाती है। --चमन तुम खुद भी तो बंगाली बन गये हो । इतनी अच्छी बंगला बोलते हो कि अव तुम्हें मारवाड़ी कौन समझेगा। -निर्मला तुम्हारे गाने पर सुरेश वाबू बहुत खुश होते । निर्मला इस तरह हँसी कि चमन को और कुछ कहने का साहस न हुआ। घह दरवाजा खोल कर बरामदे पर आ गया और सुरेश के पास जा खड़ा हुआ। ऐसा लगा, मानो सुरेश उसका पुराना परिचित हो। उसके यहाँ खड़ा होने में कोई नवीनता नहीं। निर्मला की ओर विना कोई विशेप लक्ष्य किये ही सुरेश वोला, "चमन लाल आप क्या रोज वाइनाकुलर लिये यहाँ बैठे रहते हैं ?" २० पिपासा - --में नहीं साव, मेरी पली बैठी रहती है। मुझे फुर्सत कहाँ, किती न किसी काम पर मैं अक्सर बाहर चला जाता हूँ। कभी-कभी तो मुझे दो-तीन महीने तक बाहर ही रहना पड़ता है। उन दिनों वेचारी निर्मला अपने आप को बहुत अकेला अनुभव करती है । वह इसी बरामदे पर बैठी-बैठी अपना समय विता देती है। चारों तरफ के पहाड़, जङ्गल, आदिवासियों का सूअर शिकार संयं कुछ यहीं बैठी-बंठी बाइनाकुलर से देखती रहती है। आपको कैसा लग रहा है साव? बहुत अच्छा। --आइये, चाय आ रही है । सुरेश ने पलट कर पीछे देखा । वैरा चाय लिये आ रहा है। अब वह एक सुन्दरी को देख रहा है । उस ओर से कोई बाहट तक नहीं मिल रही है। उसने सोचा, न देख पाता, तो अच्छा होता । लेकिन उस सुन्दरी को नं देख सकने के कारण वह मन-ही-मन वेचैन हो उठा था। वह वोला, "मि० चमन लाल, आप से मुझे कोई खास काम नहीं है, मैं तो सिर्फ आपके रिजेक्शन का माल देख कर चला जाऊँगा। माल तो होगा ही। नहीं साव । डैमेज्ड कंटेनर के भाव में बेच दिया है। -तव आप डिसकाउण्ट कैसे आशा करते हैं ? चमन ने अव दूसरी चाल चली । " साव, बम्बई से जेनिथ आया था। वे लोग सस्ते दाम पर माल सप्लाइ करना चाहते हैं । -उन लोगों का माल वड़ा. घटिया किस्म का है, उनके साथ हमारी तुलना ही नहीं हो सकती। -सर, मेरी सात-आठ तेल की मिले हैं। पूरे उत्तर बंगाल में मेरा माल जाता है। सुरेश जानता है, वह बहुत ज्यादा कमा नहीं सकेगा । जोरों की प्रतियोगिता शुरू हुई है। पहले इस कारोबार में उन लोगों का एकाधिकार था। लेकिन अव सरकारी कृपा से कितने ही लाइसेंस पाकर प्रतियोगिता में उतर पड़े हैं। वोला, "आप कितनी आशा करते हैं ?" -छः पर्सेट । -बहुत ज्यादा है, नहीं दे सकूँगा। चमन ने सोचा, ज्यादा दर-भाव करने से कहीं ये लोग अपनी नयी योजना यहाँ शुरू न कर दें। - . । All Alondiner Bom पिपासा २१ . सुरेश की ऑफिस में वह सुन चुका था कि इस इलाके में कम्पनी फल पैकिंग का एक कारखाना खोलना चाहती है। और उस प्रस्ताव का समर्थन अभी उस पर ही निर्भर करता है । वह अगर ज्यादा मोल-भाव करेगा, तो सम्भव है सुरेश इसी क्षण बोल उठे, चमन यहाँ कोई अच्छी जगह दिला सकते हो। उसके बाद जो होना होगा, वही होगा, उसके कारोबार में भी कम्पनी कूद पड़ेगी । सम्भव है, कम्पनी भी तेल खरीद कर पैकिंग करना शुरू कर दे । इतनी बड़ी कम्पनी के साथ वह प्रतियोगिता में टिक न सकेगा। उसे कारोवार बन्द करना पड़ेगा । अभी तो सुरेश बाबू ही उसका सब कुछ है । बोला, "फिर आपकी जो खुशी हो वही दीजिये साव । चमन लाल को निर्मला पर बड़ा गुस्सा आ रहा है। वह यहाँ आकर बैठती, आदर-सत्कार करती, तो शायद काम हो जाता। आखिर शर्म लाज नाम की भी तो कोई चीज है । वह चाहे तो निर्मला के विरुद्ध वहुत कुछ कर सकता है; पर वह जानता है कि निर्मला के सामने खड़ा होते ही उसकी बोलती बन्द हो जाती। चमन बोला, "साव, इतनी जल्दवाजी क्यो कर रहे हैं ? एकवार जव सेवा करने का मौका मुझे मिल गया, तो मैं इतनी जल्दी छोड़ने वाला नहीं। दो-चार दिन यहाँ देख-सुन कर जाइये । यहाँ एक जङ्गल है। उस जङ्गल में भिन्न-भिन्न प्रकार के पेड़ है और प्रायः सभी एक जैसे लम्बे हैं, उनकी डालियाँ जैसी है । मुंड-के-झुंड सुनहले हिरन वहाँ चौकड़ियाँ भरते हैं ही तिस्ता की एक छोटी-सी शाखा है । मुंड-के-झुड हिरन जब वहाँ पानी पीने आते है, देखने लायक दृश्य होता है। निर्मला और मैंने कई बार पेड़ की ओट में छिप कर देखा है। सुरेश ने प्रसङ्ग बदल दिया। "कल ट्रेन तो दस बजे है न, आप सुवह क्या व्यस्त रहेंगे ?" -नहीं । अभी तो सिर्फ आपको साथ लेकर जङ्गल, पहाड़ घूमना चाहता हूँ। -~-ठीक है, एक दिन हम दिघरिया जायेंगे। कम्पनी यहाँ एक प्लाट खरीदना चाहती है । जव आ गया हूँ, तो एकवार देख जाऊँगा। चमन का चेहरा फक पड़ गया । उसे मानो बोलने की इच्छा हो रही थी, साव, डिसकाउण्ट नहीं चाहिये । इस तरह डर-डर कर बोला, जैसे वह अभी- भी एक । पास २२ पिपासा अभी रास्ते का भिखारी बनने जा रहा हो, "प्लाट लेकर क्या होगा साहब ?" ---जैसे वह एकादम अननान हो । -कम्पनी यहाँ एक छोटा-मोटा पैकिंग प्लाण्ट बैठाना चाहती है। चमन मन-ही-मन बोला, "देखता हूं, अव तक़दीर में दर-दर की ठोकर खाना ही लिखा है।" ? रात का खाना खा कर निर्मला सोने जा रही थी कि चमन ने डर-डर कर सुरेश के प्लाट खरीदने का अभिप्राय वताया, “देखता हूँ, अव फुटपाथ पर उतरना पड़ेगा। निर्मला ने पलट कर देखा। चमन बड़ा मायूस दीख रहा है। पूछा, "क्या हुआ ?" ---तुम्हें नहीं बताया । सुन कर चिन्ता करोगी, इसलिये नहीं कहा । सुरेश बाबू सिर्फ चमन लाल के डिसकाउण्ट के लिये नहीं आये हैं। मैं भी सोचता था, इतना बड़ा आदमी दुनिया भर का काम छोड़ कर एक मामूली काम के लिये भला क्यों आयेगा। वे लोग यहाँ फ्रूट्स पैकिंग का कारखाना खोलगे। वे लोग खोलना चाहते हैं, खोलने दो। तुम क्यों झूठमूठ की चिन्ता कर रहे हो। ---फुट्स पैकिंग में लाभ मिलते ही कंपनी और सब पैकिंग में उतर पड़ेगी। वे लोग रातोंरात सारे मार्केट में छा जायेंगे। ---तुम्हारा नाम है चमन । -इतनी बड़ी कम्पनी की गुड विल के सामने मेरी गुड विल ! निर्मला ने मन-ही-मन कुछ सोचा पुरेश वाबू तब यहाँ ढेर सारे काम लेकर आये हैं। निर्मला सुनहरे रंग का गाउन पहने हैं । अन्दर कोई खास कपड़ा नहीं है। विल्कुल हल्का-फुल्का लिवास । मानो उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग की एक-एक रेखा चौंक-चौंक कर प्रतिवाद करना चाहती है, गाउन से वाहर निकल पड़ना चाहती है । चमन लाल के चेहरे पर घनीभूत कातरता है। काफी दिनों से निर्मला इस तरह नहीं सजी है। ऊँचा करके जूड़ा वाँधा है। जूड़े में वेला की माला लिपटी हुई है । जरीदार गाउन पर प्रकाश की लाल-नील किरणे फिसल रही पिपासा २३ -- है निर्मला पर बहुत - हैं, गले में एक हार है, सिर्फ एक हार । दोनों हाथ में मीना की हुई हाथी दाँत की दो-दो चूड़ियाँ, आँखों के कोने में काजल की लम्बी रेखा। चमन बोला, "समझ में नहीं आता, क्या करूं। निर्मला ने समझा, चमन एक बार और उससे अनुरोध करने आया है । क्योंकि ऐसी बातों में वह विश्वास करता है। कितना मधुर स्वभाव है निर्मला का ! वह चाहे तो चुटकी बजाते ही सुरेश की सारी योजना मिट्टी में मिला सकती है । अभी निर्मला का इतना महिमामय मुख-मण्डल, इतनी सुन्दर आँखें और अङ्ग-अङ्ग में तड़पता अवीर आवेग-चमन यह सब कुछ भी नहीं देख रहा है । सुकोमल शरीर में उठता प्यार का वार, आँखों में दहकती कामना से चमन सर्वथा अनभिज्ञ प्रतीत हो रहा है। निर्मला वोली, "बैठो।"-कह कर उसने रेकार्ड प्लेयर चला दिया। रेकार्ड प्लेयर में गाना शुरू हो गया। एक सोफा पर निर्मला झुक कर बैठ गयी । उसके कन्धे और पीठ के काफी हिस्से अव दीख रहे हैं ! चमन उसके पास आ बैठा । निर्मला को बाँहों में कस लिया। निर्मला ने फिर चमन का गाल दवा दिया । उसने खुद को ऐसा प्रकट किया, मानो अभी यह सब अच्छा न लग रहा हो । फिर इतना साज-सिङ्गार क्यों ! चमन ने सोचा था, जिस तरह निर्मला प्रतिदिन दो-चार पेग लेती है और चमन साथ देता है, शायद आज भी वह दो-चार पेग लेगी और चमन को साथ देना पड़ेगा। लेकिन चमन ने देखा, निर्मला गाना में खोयी है। यह निर्मला का प्रिय गीत है । चमन ने देखा है, निर्मला का मन जब कभी इस तरह के जीवन से कष्ट पाता है, वह रेकार्ड प्लेयर लगा कर चुपचाप यही एक गाना सुनती रहती है। नियमित रूप से दो पेग लेने की रूटिन तक भूल जाती है । निर्मला तव क्या सुरेश बाबू को देख कर कष्ट पा रही है ? क्यों, ऐसा भला होगा क्यों ? वर्तमान जीवन प्रणाली से क्या वह अनभिज्ञ है। उसने पूछा, को तुम कैसे पहचानती हो ?" अव तक गाना खत्म हो गया है । निर्मला उठ खड़ी हुई। सिर्फ संक्षेप में बोली, " मुझे नींद आ रही है । तुम डरो मत, सुरेश वाबू आज भर तो हैं ही। ---सो तो है। -कल सुवह मिलूंगी और तुम देखोगे कि वह काम के बहाने और दो-चार दिन रुक जायेंगे। -सच कह रही हो? - . "मुरेश वाबू २४ पिसमा - -तुम चिंता न करो चमन । ---कह कर निर्मला ने फिर चमन का गाल दवा दिया। आह, निर्मला के अंग-अंग में कितनी मादक सुगंध है ! कितनी कोशिश कर उसने निर्मला के लिये यह महल जैसा मकान बनाया है; फिर निर्मला जो क्या चाहती है, वह समझ नहीं पाता । उसने देखा है, जितनी बार स्वेच्छा से उसने निर्मला को बांहो में लेना चाहा है, वह अपने चेहरे पर अनोखी मुस्कान विखेर कर इतनी आकर्षक बन उठी है. कि चमन को उसे कष्ट पहुंचाने की इच्छा नहीं हुई है। किसी-किसी दिन चमन अपने पर नियंत्रण न रख पाता है। यह आगे बढ़ता है; पर रुक जाता है। उसे ऐसा लगता है मानो उसके सामने आग का एक गोला दहक रहा है। उसके बाद सब कुछ निर्मला की इच्छा पर निर्भर करता है । चमन की इच्छा की कोई कीमत नहीं। इच्छा न रहने पर निर्मला सिर्फ उसका गाल दवा देती है । उसके बाद चमन सुबोध बालक की तरह कोने वाले कमरे में जाकर सो जाता है। या जव वह यहाँ रहता है, कभी-कभार गाड़ी लेकर अकेला ही दूर गाँव चला जाता है । वहाँ उसके आदमी हैं । वहाँ उसका घर है । वहाँ शराब के नशे में वह गरीब देहाती युवतियों की जवानी में निर्मला के दु:ख ढूंढ़ता है, निर्मला को पहचानने की कोशिश करता है । इसलिये इस समय चमन ने निर्मला को परेशान नहीं किया। एक भोले-भाले बच्चे की तरह कॉरिडोर पार कर वह अपने सोने वाले कमरे में चला गया। निर्मला ने दरवाजा बंद कर लिया । हाँ, पीछे का दरवाजा खुला ही रहा । वहाँ इच्छा होने पर वह चुपचाप अकेली बैठी रह सकती है। दरवाजा और खिड़कियाँ बंद होने के कारण सर्दी नहीं लग रही है । एयर कंडीशन होने के कारण कमरे गरम है । और पता नहीं क्यों अभी सफेद चाँदनी देखने के लिये, पहाड़ की चोटियों पर जो सफेद चाँदनी खेल रही है, उसे देखने के लिये निर्मला का मन व्याकुल हो रहा है। यहाँ बैठने पर वह गेस्ट हाऊस देख सकेगी। सुरेश तो शायद उसी कमरे में टिका है। उसके सिरहाने के पास वाली खिड़की खुली हुई है क्या ! यानी अभी तक सुरेश साहब सोये नहीं है । खिड़की से निकल कर एक रहस्यमयी रोशनी वालकोनी के नीचे वाले फौवारे पर पड़ रही थी। रात के दस बजने पर सिर्फ गेट की रोशनी जलती रहती है । दायीं ओर की रेलिंग की रोशनी नीले रंग की है, वह भी जलती रहती है । और सभी रोशनियाँ बुझा दी जाती हैं । और पूरी इमारत उस समय पहाड़ पर मृत पेड़ की भाँति चुप खड़ी रहती है । आभास तक नहीं मिलता कि इतनी बड़ी इमारत में कोई रहता है। - पिपासा २५ कमी-कभार निर्मला को यह अन्धेरा वड़ा अच्छा लगता है । बचपन से ही वह एक अद्भुत रहस्य के पीछे भाग रही है । उन दिनों इसी सुरेश साहब की बुआ के पास रहती थी। सुरेश साहव की बुआ, रिश्ते में निर्मला की मौसी लगती थीं। निर्मला ननिहाल में पली है। सुरेश के साथ बिताये गये उन दिनों की बातें याद आने पर अब उसे हंसी आती है । उस हंसी के पीछे छिपी वेदना गहरे खेत-सी प्रतीत होती है। निर्मला ने सोचा, वाह, आखिरकार साहब तुम ही निकले ! तुम्हारा बड़ा नाम है । तुम बड़े सच्चे हो, साहसी हो । बड़े भले हो तुम । तुम्हारी सच्चाई और ईमानदारी पर कम्पनी का बहुत कुछ निर्भर करता है। मन-ही-मन वुदबुदा कर वह खिलखिला कर हंस पड़ी। सच्चाई और ईमानदारी जैसे शब्द सुनते ही उसे इन दिनों जोरों की हंसी आती है। सुरेश साहब, सञ्चाई और ईमानदारी कापुरुषों के लक्षण हैं । वे कुछ करने से डरते हैं; इसलिये सच्चाई और ईमानदारी की दुहाई देकर खुश रहना चाहते हैं ! निर्मला के अट्टहास से बगल वाले कमरे में चमन की नींद टूट गयी । निर्मला हंस रही है। कभी-कभार ऐसा होता है। निर्मला को जव यह कलकत्ता से ला रहा था, उस समय भी ट्रेन के रिजर्व डब्बे में इसी तरह कहकहा मार कर हंसी श्री । पूछने पर वोली थी, डरो मत चमन । तुम मुझे बड़े अच्छे लगते हो। जिस जीवन को पीछे छोड़ आयी हूँ, उसकी नैतिकता व निष्ठा की याद आने पर कभी-कभार मुझे जोरों की हंसी भाती है । तुम डरो नहीं। -~-चमन जानता है कि यह निर्मला की सिर्फ जवानी बात नहीं है। वह चमन के वैभव को बढ़ाने की जी जान से चेष्टा करती है। --तुम इतने अच्छे क्यों लगते हो, जानते हो ? ---कैसे जानूंगा? -तुम जो हो, वही हो, यानी तुम्हारा अन्दर-बाहर एक-सा है। चमन चुप था.! निर्मला को ऐसा लगा था कि वह उसकी बात समझ न सका । बोली थी, जीवन भर क्या मुझे तुम्हारी पत्नी बन कर रहना होगा ? -हाँ। -हमारी शादी नहीं होगी ? -नहीं। ----तुम क्या अपने लिये इतना सब करते हो ? -कह सकती हो। २६ पिपासा ---मनुष्य का यही स्वभाव है । वह अपने लिये ही सब कुछ करता है। -हाँ, यही स्वभाव है। --पर ऐसा दीखता तो नहीं । ---नहीं दीखता? -दीखने पर इसे मैं पाप समझती हूँ। -~मैं भी। -लेकिन मनुष्य का और भी एक स्वभाव है। -जैसे? -जैसे मनुष्य कुछ करते ही सोचता है, वह अपने लिये नहीं; बल्कि दूसरों के लिए कर रहा है। उसके कितने सारे कर्तव्य है । वह अच्छा बनने की कोशिश करता है । अन्ततः दूसरों को यही दिखाने की कोशिश करता है। ---शायद होगा । यह सब में नहीं समझता । नहीं समझते हो, इसलिये तो तुम मुझे अच्छे लगते हो । इसीलिये मैं सब कुछ कर रही हूँ चमन । तुम बड़े सीधे हो । चमन ने फिर कोई प्रश्न नहीं किया था। उसे बड़ी नींद आ रही थी। वही हंसी सुरेश भी लेटे-लेटे सुन रहा है । उसे डर लग रहा है, इस चाँदनी रात में इस तरह कौन हंस रही है । सुना है, फूट-फूट कर रोने के पहले कोई- कोई युवती ऐसी हो हंसी हंसती है । इस अट्टहास के बाद क्या वह चुपचाप अकेली-अकेली फफक-फफक कर रो रही है ? यह बिस्तर पर उठ बैठा 1 खिड़की के पलड़े खुले हुए थे। उसने शीशा भी खोल दिया । शीशा के दरवाजे पर परदा झूल रहा है । दायीं ओर वाली खिड़की पहले से ही खुली हुई थी। सर्दी महसूस हो रही है। इस सर्दी में भी उसे प्यास लग रही है। उसने तिपाई पर रखे गिलास से पानी पिया । उसके बाद चुपचाप बैठ कर कुछ सोचने लगा । सोचने पर उसे लगा कि युवती की यह आवाज उसकी जानी-पहचानी है। ठीक ऐसी ही हंसी उसने और कभी सुनी थी और चौंक पड़ा था। सुरेश दरवाजा खोल कर वाहर वरामदे पर आ गया । देखा, वहाँ कोई नहीं है। कुहासा-सी सफेद चाँदनी में पहाड़ी जंगल डूब गया है । सफेद रंग की यह खूबसूरत इमारत रहस्यमयी-सी प्रतीत हो रही है। और उसी समय सुरेश को लगा कि उवर का दरवाजा भी खोला जा रहा है। और काले रंग की चादर में खुद को छिपाये कोई लान पार कर रहा है। तुरंत उसने अपने आप को छिपा लिया । देखना चाहता है, रहस्य कहाँ तक ? पिपासा २७ जाता है। उसने देखा, लान पार कर गेट की ओर नहीं जा रहा है। वह तो इवर ही आ रहा है । आश्चर्य है, उसका खुला दरवाजा देख कर रहस्यमूर्ति क्षण भर को अचकचायी। चमन ने क्या उसके पीछे आदमी लगाया है ? काली चादर में ढका आदमी औरत है या मर्द, कुछ पता नहीं चलता । उस समय ओट से निकल कर वह मानो आत्म-रक्षा के लिये भागने का रास्ता रहा है। संभव है, अगर कमरे में कागजात न होते, तो नीचे उतर कर वह भाग पड़ता। खिड़की के नीचे जो थोड़ी-सी आड़ है, वहाँ वह आ खड़ा हुआ। वहाँ एक कामिनी का पेड़ है । पेड़ के कारण वह तो दिखाई नहीं पड़ेगा; लेकिन कमरे के अन्दर की हर चीज वह देख सकेगा। साँस बंद किये कुछ देखने की सोच कर वह खड़ा था । उसने देखा, कमरे के अन्दर जाकर काला बुरका जैसी चादर उतार कर जो खड़ी है, वह उसकी जानी-पहचानी है। चमन की पत्नी निर्मला या कोई और ! लेकिन यहाँ इस तरह अकेली-अकेली आना ! दुविधा ने मानो सुरेश के पाँव जकड़ दिये हैं । अंजली को वह यहाँ इस रूप में देखेगा, सपने में भी नहीं सोचा था। अंजली ने इस बार खिड़की से झांका । सुरेश उसकी नजर से बच न सका। छाया की तरह उसे खड़ा देख कर पुकारा, वहाँ क्यों खड़े हो ? पहचान नहीं रहे हो, क्या ? डर लगता है ? सुरेश डरपोक-सा मुंह बनाये कुछेक क्षग खड़ा रहा। उसके बाद कमरे में न आकर वह खिड़की के पास आ खड़ा हुआ। बोला, मैं सपना तो नहीं देख . रहा हूँ न ? . । अंजली की दोनों आँखें पहले जैसी ही रहस्यमयी है। स्पर्श की सीमा में पाकर उसने धीरे से सुरेश को चिकोटी काटी । बोली, क्यों मैं सपना लग रही हूँ ? नहीं। -तव अन्दर आ जाओ। सर्दी लगेगी। सुरेश अन्दर आ गया। वोला, दोपहर में एकबार दूर से तुम्हें देखा था, लेकिन ठीक-ठीक पहचान न सका था। अच्छा यह तो बताओ, चमन लाल की पत्नी निर्मला तुम्ही हो या निर्मला नाम की और कोई है ? -इतनी खोजवीन क्यों ? जरूरत ही भला क्या है ? -यू ही। २८ पिपासा ! -यू ही नहीं महाशय ! दरअसल डर लग रहा है। चमन की पत्नी रात में अभिसार को निकली है, देखते ही गोली दाग देगर । यही बात है न ? नहीं, ऐसी बात नहीं। ---फिर ? -अभी मैं तुम्हें ठीक-ठीक समझा नहीं सकता मजली। मुझे केवल प्यास लग रही है। मैं फिर पानी पिऊंगर । मेरा सब कुछ गड़बड़ हो रहा है । सचमुच में उसने पानी पिया। बड़ी देर तक कुछ न बोला। पलंग पर कुछेक क्षण चुपचाप बैठा-बैठा अंजली का मोम-सा पालिश किया चेहरा देखता रहा । अब अजली तीस पार कर गयी है। यौवन के स्पर्श से उज्ज्वल एक बालिका का परिचित चेहरा वह खोज नहीं पा रहा है। प्रथम यौवन में अंजली तन्वंगी थी। उन दिनों उसकी दोनों आँखों में ही मानो उसका सव कुछ था । बुआजी अंजली को कोई खास पसन्द नहीं करती थीं। वह एक गरीब घराने की लड़की थी । बुआजी के सम्पन्न परिवार में वह गरीव की तरह ही रखी गयी थी। इसके लिये अंजली को कोई शिकायत नहीं थी। चुपचाप घर का काम करती । फूफाजी ने स्कूल में उसका नाम लिखा दिया था। दिन में बुआजी की फरमाइशें पूरी करती और रात में पढ़ती-लिखती। सुरेश भी उसी साल पढ़ने के लिये गाँव से कलकत्ता आया। जादवपुर में दाखिला लिया। पढ़ने-लिखने में अच्छा था। बुद्धिमान और सुशील विद्यार्थी के रूप में उसकी ख्याति थी। बुआजी को सुरेश पर वड़ा गर्व था। दो मंजिले पर एक पूरा कमरा सुरेश को दे दिया गया था। घर के नौकर-नौकरानियों से सुरेश बहुत कम बात करता । अंजली नाम की कोई लड़की इस मकान के किसी कोने में रहती है, इस पर उसका कोई ध्यान नहीं था । बस, कभी-कभार वह इतना ही देख पाता कि एक किशोरी लंबी चोटी झुलाती हुई आँखें नीची किये चली जा रही है। सुबह में गणित के किसी प्रश्न का उत्तर न मिलने पर जव पह चहलकदमी करता होता, उस समय देख पाता ढेर सारी किता। दोनों हाथों से छाती में चिपकाये एक तरुणी स्कूल जा रही है। यह उसे अच्छा नहीं लगता था । वह जानता था कि वुआ उसे प्यार करती है। एक दिन उसने बुआजी से कह भी दिया, यह तुम अन्याय कर रही हो बुआ । -क्या अन्याय कर रही हूँ ? बुआजी सचमुच में उसकी बात नहीं समझ सकी थीं। इसलिये पूछा था । , Prer ----तुम अंजली को इस तरह रखती हो। बुमाजी ने पहले कोई जवाब नहीं दिया था। उसके बाद कुछ सोचकर बोली थीं, उसकी शादी का सब कुछ हमें ही करना होगा सुरेश । बेचारी एकदम अनाय है । बाप-माँ को पहले ही खा चुकी है। तुम्हारी जान-पहचान में कोई लड़का हो, तो वताओ न, झटपट शादी कर दूं। मैट्रिक ही काफी है । वस, कहीं कोई काम करता हो, कम-से-कम सौ रुपये वेतन पाता हो। सुरेश मन-ही-मन हंसा था । समझ गया था, लड़की इस परिवार पर वोझ है। उसे पिता से जेव खर्च के लिये एक मोटी रक़म मिलती थी। एक दिन मंजली स्कूल जा रही थी। उसका मुरझाया चेहरा देखकर सुरेश का तरुण हृदय व्यथित हो उठा था। सहसा यह पुकार उठा था, अंजली सुनो। अंजली धीरे-धीरे सहमती हुई उसके सामने आ खड़ी हुई थी। छः महीने हो गये; पर अंजली ने कभी सुरेश को आँख उठाकर नहीं देखा था। दोनों एक हो मकान में छः महीने से रह रहे थे; पर ऐसा प्रतीत होता था कि किसी अनजान जगह में मिलने पर वह सुरेश को पहचान नहीं सकेगी। अंजली उसके बुलाने पर डर गयी थी। मानो अनजाने में उससे कोई अपराध हो गया हो । लाख कोशिश कर भी वह आँखें न उठा सकी थी। सुरेश ने कहा था, ये लो, तुम दस रुपये रखो । अंजली को लगा था कि सुरेश उसका अपमान कर रहा है। शायद इसीलिये पहली बार उसने आँखें उठा कर सुरेश की ओर देखा था । बोली थी, रुपये लेकर मैं क्या करूंगी ? उसे कहने की इच्छा थी, तुम्हारा चेहरा देख कर मुझे वड़ा दुःख होता है। तुम्हारा मुरझाया चेहरा देख कर मुझे ऐसा लगता है कि बुआजी तुम्हें भरपेट खाना भी नहीं देतीं । तुम स्कूल में कुछ खरीद कर खाना । लेकिन मन की वात न यह कर सिर्फ इतना ही कहा था, अपने पास रख लो, आवश्यकतानुसार खर्च करना। सुरेश के स्वर में किंचित आदेश का स्वर था। अजली जानती थी, उसे लेकर बुआ और भतीजे में थोड़ा मतांतर हुआ है । लेकिन उसके कारण वुजाजी को किसी प्रकार की शंका करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। उन्होंने अंजली को इतनी मामूली लड़की समझ रखा था कि वह सपने में भी नहीं सोच सकती थीं कि उनके भतीजे की नजर उस पर पड़ सकती है। मंजली उन दिनों कोई - ३० पिपासा खास सुन्दर नहीं थी । वह हमेशा असहाय-सी दीखती थी। इसी प्रकार सुरेश नामक तरुण के प्रति अजली के हृदय में एक कैसर न स्नेह उत्पन्न हो गया था । वह सुरेश को सब परायर नहीं समझ सकती थी। जव-तब उससे मदद लिया करती। धीरे-धीरे वह सुरेश पर अपना अधिकार समझने लगी। रात में पढ़ते वक्त यदि कोई बात उसकी समझ में न आती, किसी प्रश्न का उत्तर पुस्तक में न खोज पाती, तो धीरे-धीरे दवे पाँच आकर देखती कि सुरेश क्या कर रहा है ? कभी-कभी सुरेश पढ़ते-पढ़ते सो जाता । उस समय वह उसे नहीं जगाती । मसहरी ठीक कर रोशनी वुझा देती और दरवाजा भिड़ा कर वापस चली आती । और यदि वह जगा होता, तो एक आज्ञाकारिणी छात्रा की भाँति सुरेश के सामने जर खड़ी होती । ध्यानपूर्वक सुरेश से अपना पाठ समझ कर वापस चली आती। और इसी तरह पता नहीं क्यों कर एक दिन अंजली को क्या जो हो गया ! अव वह सव याद आने पर उसे हँसी माती है। वह समझ भी न सकी कि क्यों कर उसका डर प्यार में बदल गया। अंजली बोली, इतना क्या सोचते हो ? -कुछ भी तो नहीं। -मुझे पहचानने में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं हुई ? -~~-नहीं। -इतनी आसानी से पहचान लिये ? ..--आसानी से कहाँ ? -देखते ही। -~~-भूलने जैसी कोई बात थी क्या ? -क्या पता, पुरुषों का मन ठहरा । अंजली ताने कस रही है। सुरेश बोला, खड़ी क्यों हो? बैठूगी नहीं। -फिर आयी क्यों? —तुम्हें देखने । मैं तुम्हें याद हूं या नहीं, देखने आयी । चमनलाल के साथ तुम्हारा कसे परिचय हुआ ? -~-कैसे परिचय हुआ न पूछ कर, यह पूछो कि शादी कैसे हुई ? और कुछ सुनेगा सोचकर सुरेश चुप रहा। - पिपासा ३१ अंजली काली पोशाक उतार कर बोली, लेकिन तुम मुझे पहचानोगे, यह में सोच भी नहीं सकी थी। क्यों ? -मैं क्या अब वैसी ही हूँ ? मेरा रूप क्या वैसा ही है ! तुम्हारी आँखें भी क्या अब वैसी ही हैं ? सुरेश को कहने की इच्छा थी, नहीं अब वैसा नहीं है । पहले जैसा अव कुछ भी न रहा । तुम एकदम वदल जांती; फिर भी मैं पहचान लेता । तुम चाहे जितना भी क्यों न बदल जाओ, तुम्हारी ये आँखें यानी इन दो बाँखों के साथ तुम जहाँ कहीं भी जामो, मुझे पहचानने में मदद करती। सुरेश ने सिर्फ कहा, तुम जहाँ भी रहती, जिस रूप में रहती, मैं तुम्हें देखते ही पहचान लेता। यह 'सच' शब्द अंजली को बड़ा प्रिय था। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है, अंजली की तरह 'सच' का उच्चारण कोई नहीं कर सकता। सुरेश मन-ही-मन कष्ट महसूस कर रहा है । वह उसे प्रकट नहीं कर पा रहा है । प्रकट कर पाता तो अच्छा होता । वह कल्पना भी न कर सका था कि इस तरह यहाँ अंजली से मुलाकात होगी । ऐसा आँख-मुँह या साज- सिंगार ! फिर भी यह अंजली को नहीं कह पाता है कि अंजली तुम जाओ, मुझे बड़ा कट हो रहा है । तुम इस तरह वैठी रहोगी, तो मुझे बड़ा कष्ट होगा। अजली ने पूछा, तुम कैसे हो ? । ---तुम्हारी पत्नी और लड़की ? -मजे में। ---तुम्हारे चेहरे पर अब पहले जैसा बचपना नहीं झलकता। -उम्र भी तो हो गयी। मुरेश ने मुंह उठा कर देखा । अंजली का एक-एक शब्द मानो व्यंग्य का नीला तीर है अथवा अभी भी उसके हृदय में सुरेश के प्रति एक अद्भुत प्यार पलना है । अथवा अजली उसे सिर्फ दुःख पहुँचाने आयी है। या यह कहना चाहती है, तुमलोगों ने तो मुझे डस्टबीन में फेंक दिया था, मैं अपने बुद्धिवल से वहाँ आ पहुंची है, जरा आँख उठा कर देखो । इच्छा करने पर और भी आगे बढ़ सकती हूँ। लेकिन जानते हो सुरेश, मुझे ज्यादा आगे बढ़ना अच्छा नहीं । ३२ पिपासा । लगता । मैंने कभी भी आगे बढ़ना नहीं चाहा था । तुम लोगों ने मिल कर मुझे कितनी दूर फेंक दिया ! शायद इन्हीं कारणों से सुरेश अजली से आँखें नहीं मिला पाता है । शायद इन्हीं कारणों से वह चुप बैठा है । अथवा बार-बार गिलास से पानी पी रहा है । पहाड़ की चोटियों पर या पेड़ों की फुनगियों पर सर्दी दौड़ रही है। उसे सर्दी लग रही है । हालांकि हृदय में दुःख की आग धधक रही है। वह जो भूल गया था, पहाड़ पर आने पर सब कुछ याद आ गया है। सहसा पुरानी यादें हथौड़े की तरह उस पर चोट करने लगी है। वह बोला, तुम अब जाओ अंजली, मैं सोऊंगा। मैं तुम्हें डिस्टर्व नहीं करूंगी, सो जाओ।-अंजली ने कहा । सुरेश अंजली के मुंह की ओर देख कर ठिठक गया । इतने दिनों बाद मुलाकात हुई और सुरेश ने एकबार भी नहीं पूछा, अंजली, तुम कैसी हो ? यह एक स्वार्थी की भाँति बोल कर मन-ही-मन संकुचित हो उठा है। दरअसल उसे अन्दर से कोई बल नहीं मिल रहा है। अन्दर-ही-अन्दर वह कमजोर हो गया है । वह नहीं चाहता कि उसकी कमजोरी पकड़ी जाय । लेकिन अंजली के मुंह की ओर देख कर उसे कुछ पूछने की इच्छा नहीं हुई । नहीं वह कुछ बोलना नहीं चाहता; बल्कि वह चाहता है कि अंजली थोड़ी देर और बैठे, बातें करे और उनके व्यथा क्लिट मुखमण्डल पर पुरानी स्मृतियाँ, बाल्यावस्था की मधुर स्मृतियाँ फूट पड़े। उसके हृदय एक अजीब-सी टीस पंदा होने लगी। बैठ जाओ न अंजली । कैसी हो ? --पजे में हूँ सुरेश। -तुम्हारा सुखी रहना मुझे अच्छा लगता है। --में दुःखी रहू. तुम नहीं चाहते, यही न ? -हाँ, सुखी रहने की अपेक्षा । पता नहीं आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम्हारे सुखी रहने पर मैं भी सुखी रहूंगा। --चमनलाल मुझे कोई तकलीफ नहीं देता; बल्कि मेरी ही फरमाइशें पूरी करने में वेचारा परेशान रहता है। इतना कह कर वह कहकहा मार कर हँसने लगी। मानो उसे जो सूरेग ने बैठने कहा है, उसके सुखी रहने से सुरेन को खुशी होगी, इसलिये वह इतने जोरों से हँस पा रही है। ठांजली बोली, कितनी बार सोचा है, तुम्हें एक पत्र लिवू । में निवासा ३३ -फिर लिखा क्यों नहीं ? -पता कहाँ से पाती? -बुआ जी से। । . -तुम्हारी बुआजी मुझे बहुत प्यार करती थीं न ! -~-प्यार-व्यार की बात नहीं हो रही है। पता माँगती तो जरूर मिलता। अजली दुःख की हँसी हँसी। सुरेश भली-भांति जानता है कि वैसी घटना घटने के बाद पता माँगने का मुंह अंजली का नहीं था । सुरेश भी उस समय अपना पता नहीं दे सकता था । और दो साल पहले इस स्थिति में पता माँगा भी नहीं जा सकता। उस घटना के बाद वह वुमा के घर फिर कभी नहीं गया। हाँ, उसकी शादी में फूफाजी आये थे। सुरेश तब तक प्रतिष्ठित हो चुका था, अच्छी नौकरी करता था, चाहता तो अनायास ही अंजली की खोज-खबर ले सकता था। लेकिन आश्चर्य है, अंजली की उसे याद तक न आयी । अभी अंजली एक जुगनू की तरह जल रही है। सुरेश इतना खो गया है कि वह क्या बोल रही है या उसे क्या बोलना चाहिये, एकदम भूल गया है । वह और कुछ न बोला। परिणामस्वरूप दोनों चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे । -सपने में भी नहीं सोचा था कि हम दोनों इस तरह मिलेंगे सुरेश । -तुम चाहती तो न मिलती। -~अब मैं यही सोच रही हूँ। --चमनलाल तुम्हारे बारे में कई वार बता चुका है। यदि मैं जानता होता कि निर्मला तुम्ही हो, तो नहीं आता। -क्यो नहीं आते सुरेश ? -मिलने पर दुःख बढ़ता है । अभी यह महसूस कर रहा हूँ। सुरेश को लगा कि वह कुछ ज्यादा भावुक बनता जा रहा है। पुरुपों में इतनी भावुकता अच्छी नहीं। मन-ही-मन खुद को सक्त बनाने के लिये वोला, जाओ, सो जाओ। काफी रात हो गयी, हाथ बढ़ाने पर तुम्हें पास न पाकर चमन गुस्सा जायेगा। अंजली के तन-बदन में मानो हजारों कांटे चुभने लगे हैं। उत्तर में यह बहुत कुछ कह सकती थी। लेकिन नहीं, सुरेश को आराम की जरूरत है। उठती वह वोली, दो-चार दिन तो रहोगे ही? -नहीं। काम होने पर कल ही चला जाऊंगा। ३४ पिपासा और काम न होने पर ? ---काम न होने पर क्या होगा, अभी नहीं कह सकता। अंजली फिर बोली, "तुम इस तरह यहाँ माओगे, मैं कल्पना भी न कर सकी थी। सुरेश बोला, " चलो अच्छा ही हुमा, मुलाकात हो गयी।" -~-~~यानी तुम मुझे याद करते थे ? सुरेश की समझ में न आया कि यह यया जघाव दे। शादी के बाद बादमी बहुत कुछ भूल जाता है । यह कहना गलत होगा कि शादी के बाद वह अंजली को भूल गया था। उसकी पत्नी सुन्दरी है । शादी के दिन की लीला का चेहरा आज भी उसे याद है । कितना चमक रहर था उसका चेहरा । रंग-विरंगे फूलों से कोहबर सजाया गया था । रंग-विरंगे बल्ब जल रहे थे। जरीदार बनारसी साड़ी में लीलर गजब ढा रही थी। लाल चप्पल । कपाल में सिन्दूर का टीका । माँग में सिन्दूर की लम्बी रेखा । उस रात लीला अनमोल-सी प्रतीत हो रही थी । आँखों के दोनों ओर काजल की लम्बी रेखा । लीला की माँखें झुकी हुई थीं। उसे केवल लीला का मुंह देखने की इच्छा हो रही थी। भीड़ में वह ठीक से देख नहीं पाया था। पत्नी की ओर वार-बार देखने से लोग बेशर्म कहेंगे। यह सोच कर मन-ही-मन उसे डर लग रहा था कि किसी समय उसने जो अंजली नामक लड़की से प्यार किया था, उसका मुंह देखने से बार किसी को यह पता चल जाय ! खैर, लीला तक को पता न चला । यही कारण है कि लीला अपने मैके में एक रात भी नहीं बिता सकती। लीला को ऐसा लगता है कि सुरेश उसके विना वेचैन है । लीला के विना सुरेश एक क्षण भी नहीं रह पाता । पलंग पर जाने के बाद भी जब तक लीला नहीं आती, यह सो नहीं पाता । लीला के आते ही वह उसके पास सो जाता है । इस निर्जन रात में यह और जली आमने-सामने बैठे है । मन बड़ा अन्यमनस्क हो उठा है। मजली को देखने के बाद लीला याद नहीं आती। पता नहीं अन्दर क्या हो रहा है। वह चाहता है कि अंजली चली जाय । बंजली के जाने पर वह सचमुच में सुश होगा। -अंजली तुम्हें सर्दी नहीं लगती ? -नहीं। -~-लेकिन मुझे जोरों की लग रही है। -एक कंवल ला देतो हूँ। पिपासा..३५.

--कोई जरूरत नहीं। कंवल है। -तब सर्दी की बात क्यों करते हो ? -और कोई वात मुझे अच्छी नहीं लगती। -यहाँ कुछ ज्यादा सर्दी है। -महसूस कर रहा हूँ। -तुम्हें मैं कैसी लग रही हूँ सुरेश ? -तुम काफी सुन्दर हो गयी हो। -पहले से भी ? -हाँ। -झूठ बोलते हो। -झूठ वोलने से लाभ ? -लाभ-हानि नहीं समझती । मैं पहले जैसी सुन्दर होती, तो तुम्हारे साय चल देती। -तुम अभी भी कहीं जाना चाहती हो ? -मनपसंद आदमी मिलने से सभी जाना चाहते हैं। -~~-यानी चमन लाल तुम्हें पसंद नहीं ? नहीं बताऊंगी। -क्यों? -कुछ बोलना ठीक न होगा।-कह कर अंजली ने खिड़की से झांक कर कुछ देखा । सदर दरवाजा दूर है । दो दरवान पहरे पर हैं। एक सोता है, तो दूसरा जग कर पहरा देता है। चमन के दरवाजे के पास सफेद रोशनी फैली हुई है । रोशनी जली होने पर वह समझ सकती है कि दरवाजा खुला है या वंद । कोई देख ले, तो बड़ी बदनामी होगी; अंजली ने ऐसा ही कुछ अपने चेहरे पर प्रकट करना चाहा। हालांकि वह जानती है कि चमन क्या चाहता है । सुरेश वोला, सुवह मैं नहीं जा रहा हूँ। तुम अव जाओ, मैं सोऊंगा। सुवह फिर मिलेंगे। मानो इस बार वह दरवाजा बंद करने के लिये उठ खड़ा हुआ। अंजली बिना कुछ कहे सहसा चल दी। सुरेश दरवाजा बंद करने गया; पर कर न सका । खड़े-खड़े देखने को आँखें ललचा रही थीं । जव तक अंजली फौवारा पार कर सफेद डोम जैसी रोशनी के नीचे जा खड़ी नहीं हुई, तब तक वह दरवाजा खोले खड़ा रहा । भुटपुटे । -- . - ३६ पिपासा cho họ बार कर देश हाकेजाजी . FORमाता ने कहा का हवामानहाने का रहा. या नहीं ले जैसी सुन्दर *Pr कमाया के बारे में बनाता है कि उनकी की माद एक ने भी दरका मा जिन्दा है. के बुद्धका Fe 'तामा : कई कल-कारखाने है । बनिन कि ड में अपना भविष्य बना रहा है । अनी इस म इनारस, आइटहान पकिंग निन आदि के कार वह इन इलाके में बन र समन्ना जाना है। और दान कर हड़के कारनी बड़ी नाल, काली का दाना न देने में से कितना डर नाता है : मने मन-ही-मन निद किया, एक दिन सादा वहां नहीं रहेगा। इसमन्त्र में ही अपना काम न कर ले ली जाने पर पता नहीं क्यों बकनी बना-बसा यह सब सोचन है ! वन मायद ही कनिका ही सकता है। कलकता पर ही वहता है, साहा, कवार बर आईन । आ में ना आ जाना।.... बार-बार आन करने पर भी मुरंग नहीं आया है। इस बार भी सुनेगा नहीं आता। भी कहा और किम नह अकारही कम्पनी का नुकसान हूं. सकता है. नोड कर चला आया है। मनलाल मजन के बारे में बातचीत कर और डिस्काउंट की दर निश्चित कर ब दिनी घट हो संवहां चल देगा क्योंकि वह मान रहा है. पहाड़, पहाड़ करना मंगमर्मर का विशाल महल, नाई के - राते और बादरक लहलहाते रंग- विल सौ से अधिक नाबुक बना माने हैं ! या -- - --कोई जरूरत नहीं। कंवल है। -~-तव सर्दी की बात क्यों करते हो ? -और कोई बात मुझे अच्छी नहीं लगती। यहाँ कुछ ज्यादा सर्दी है। -~-महसूस कर रहा हूँ। -तुम्हें मैं कैसी लग रही हूँ सुरेश ? --तुम काफी सुन्दर हो गयी हो। --पहले से भी? -हाँ। -झूठ बोलते हो। -झूठ बोलने से लाभ? ~लाभ-हानि नहीं समझती । मैं पहले जैसी सुन्दर होती, तो तुम्हारे साथ चल देती। -~-तुम अभी भी कहीं जाना चाहती हो ? -मनपसंद आदमी मिलने से सभी जाना चाहते हैं। ~~~यानी चमन लाल तुम्हें पसंद नहीं ? -नहीं बताऊंगी। -क्यों ? -कुछ बोलना ठीक न होगा |--कह कर अंजली ने खिड़की से झांक कर कुछ देखा । सदर दरवाजा दूर है । दो दरवान पहरे पर हैं। एक सोता है, तो दूसरा जग कर पहरा देता है। चमन के दरवाजे के पास सफेद रोशनी फैली हुई है। रोशनी जली होने पर वह समझ सकती है कि दरवाजा खुला है या वंद । कोई देख ले, तो बड़ी बदनामी होगी; अंजली ने ऐसा ही कुछ अपने चेहरे पर प्रकट करना चाहा । हालांकि वह जानती है कि चमन क्या चाहता है। सुरेश बोला, सुवह मैं नहीं जा रहा हूँ। तुम अव जाओ, मैं सोऊंगा। सुवह फिर मिलेंगे। मानो इस बार वह दरवाजा बंद करने के लिये उठ खड़ा हुआ। अंजली विना कुछ कहे सहसा चल दी। सुरेश दरवाजा बंद करने गया; पर कर न सका । खड़े-खड़े देखने को आँखें ललचा रही थीं। जब तक अजली फाँवारा पार कर सफेद डोम जैसी रोशनी के नीचे जा खड़ी नहीं हुई, तव तक पह दरवाजा खोले खड़ा रहा । भुटपुटे ३६ पिपासा मलाश में अंजली ने दो एक बार पलट कर इसे देवा, हाथ के इगारे ने दरवाजा बंद करने को रहा है, सर्दी में खड़ा रहने को मना किया है। फिर भी पता नहीं निस लालय से दरवाजा सोले वह सना रहा। कब तक वह दरवाजा खोले, खड़ा रहा, पता नहीं । मैं पहले जैसी सुन्दर होती, तो तुम्हारे साथ चल देती ।-अंजली की यह बात सुन कर यह कुछ अन्यमनस्क हो गया था । अंजली के बारे में वह इतना ही जानता है कि उसकी पहली शादी एक प्रेसमैन से हुई थी। वह मर गया या जिन्दा है, उसे कुछ पता नहीं। यहाँ अंजली चमन लाल की पत्नी है। चमन लाल का कारोबार काफी फैला हुआ है । कई कल-कारखाने है । वह भिन्न-भिन्न ढंग से अपना भविष्य बना रहा है । अपनी इस सफेद इमारत, आउट-हाउज, पैकिंग मिल आदि के कारण वह इस इलाके में धन कुबेर समझा जाता है। और खास कर पहाट के ऊपर इसनी बड़ी इमारत, पानी का फौवारा! नीचे देखने में उसे कितना डर लगता है ! उसने मन-ही-मन निश्चय किया, एक दिन से ज्यादा यहाँ नहीं रहेगा। इतने समय में ही वह अपना काम पूरा कर लेगा। अंजली के जाने पर पता नहीं क्यों यह यहाँ सड़ा-खड़ा.यह सब सोच रहा है ! चमन शायद अंजली को निर्मला ही समझता है । कलकत्ता पहुँचते ही कहता है, साहब, एकवार मेरे घर आइये न । आपके आने से मजा आ जायेगा।..... बार-बार आमह करने पर भी सुरेश नहीं आया है। इस बार भी सुरेश नहीं माता । फिर भी कहाँ और किस तरह अकारण ही कापनी का नुकसान हो सकता है, सोच कर चला आया है। चमन लाल से डैमेज टीन के बारे में बातचीत कर और डिसकाउंट की दर निश्चित कर वह जितनी जल्द ही सके यहाँ से चल देगा । क्योंकि वह समझ रहा है, ये पहाड़, पहाड़ पर बना संगमर्मर का विशाल महल, नीचे के टेढ़े-मेढ़े रास्ते और चारों तरफ लहलहाते रंग-बिरंगे फूल-पौधे उसे अत्यधिक भावुक बना सकते हैं। क्या पता, अन्त में क्या हो जाय ! दरवाजा बंद करते समय उसने देखा, सफेद रोगनी बुझ गयी है, सिर्फ पौवारा को पास एक पीली-सी रोशनी जल रही है। दरवाजा बंद कर पलंग पर लेटते वक्त उसे लगा कि खिड़की हिल रही है । बजली क्या फिर किसी दूसरे रास्ते से आ रही है ? क्या उसने जाकर देखा है कि चमन सोया हुआ है और चमन को सोया देख कर फिर वापस आ रही है ! उसने ऐसा ही लोच कर खिड़की खोल कर देखा, नहीं, कोई नहीं है। उनके मन में एक अजीव-ना डर -- ?

- सिर उठाये खड़ा है। किसी ने मानो खिड़के पर दस्तक दी है । हवा से भी ऐसा हो सकता है । हवा के कारण खिड़की हिल सकती है। अथवा इस अपरिचित जगह में यदि कोई भौतिक घटना घटी हो ? अंजली के साथ यहाँ मुलाकात होना भी क्या एक वैसी ही घटना नहीं है ? उसका डर बढ़ता जा रहा है । अंजली को वह पहचानता है। बार-बार वालकोनी में अजली का चेहरा अगर उसे दीख जाय या यह अगर कोई भूतहा काण्ड हो जाय ? पहली रात। चमन, उसकी स्त्री, और इसी रात चमन के व्यवहार में कहाँ क्या अस्वाभाविकता रह सकती है-इस पर विचार करने पर उसे लगा कि चमन ने कोई अस्वाभाविक व्यवहार नहीं किया है। बल्कि अंजली ही एक काली चादर ओढ़ कर इस कमरे में आयी थी। ठीक बुरका की तरह उसने उस चादर का इस्तेमाल किया है । झुटपुटी चाँदनी में पेड़ के नीचे खड़ा-खड़ा वह पहले डर गया था। क्योंकि एक अपरिचित युवती को इस तरह कमरे में घुसते देख वह डर गया था। खिड़की से बाहर कूद कर पेड़ के नीचे खड़े होते ही उसने यह घटना देखी थी। मजली है या नहीं पहचानने में कठिनाई हुई थी, विश्वास करने में दुःख हुआ था। अन्दर आने पर वह सब कुछ समझ सका था। अव लगता है, अजली को भगा कर मानो उसने मूर्खता की है । उसे सब कुछ जान लेना चाहिये था । यहाँ वह किस प्रकार आयी। दूसरे तरीके से भी आ सकती है। यदि आये तो उसका भय और भी बढ़ेगा । वह किसी तरह भी इस घटना को स्वाभाविक नहीं मान पाता है। यहाँ आते ही चमन के साथ डैमेज-कंटेनर का मसला तय कर पाता, तो सारा झमेला ही खत्म हो जाता। अब उसे अफसोस हो रहा है। सुरेश को अपने आप पर काफी गुस्सा आ रहा था। चमन के घर पर उसे उसकी पूर्व प्रेमिका अंजली मिल जायेगी, यह सोच कर वह यहाँ नहीं आया था । मनुष्य के रूप में सुरेश ने हमेशा सच्चरित्र रहना चाहा है। सिर्फ एक जगह अभी भी एक कांटा खच से चुभ जाता है। उसके समक्ष यदि घटना भौतिक स्वप्न हो जाय, तब अच्छा हो । हाँ, बहुत अच्छा हो । क्योंकि वह अब सोच नहीं पा रहा है । लेकिन उसी समय सुरेश को याद आया, अंजली ने उसे चिकोटी काटी थी। बोली थी, मैं भूतनी नहीं सुरेश साहव, अजली हूँ। मुझे देख कर डरने से कैसे कर चलेगा! रेकार्ड प्लेयर खुला पड़ा था। अंजली ने सारे रेकार्ड संजो कर रखे। - ३८ पिपासा सुरेश साहब के कमरे में जाने के पहले उसने अपने सारे प्रिय गीत बजाये थे। एक बार वह और सुरेश भाग कर पिक्चर देखने गये थे । गायद उनी पिक्चर के रेकार्ड उसने बजाये थे। कितने पुराने गाने हैं। फिर भी ये गाने उसे अपनी ओर आकर्षित करते है । एक दिन बह और सुरेश रेलिंग के पास खड़े थे। एक चनाचूर वाला जा रहा था। बुआजी घर पर नहीं थी। दोनों चनाचूर वाले को जाते देख रहे थे। सुरेश का उस पर विशेष ध्यान नहीं था। पड़ोस में रेडियो बज रहा था। सुरेश मानो गाना भी नहीं सुन रहा था। वह पैजामा और हाफशर्ट में था। मजली एक मामूली साड़ी पहने थी। साड़ी छोटी थीं। सुरेश उसकी ओर देख नहीं सकता था । अंजली को वह गाना अभी भी याद हे। पड़ोस के घर की बहू लेटी हुई है। पति कुर्सी पर बैठा पर्दा खींत्र देता है । पान से दोनों होंठ लाल हैं। दोनों की दो-चार बात सुनायी पड़ती हे । आश्चर्य है, अंजली उस दिन सुरेश को लेकर वैसा ही एक सपना देख रही थी। वह चाहती थी कि सुरेश कुछ बोले । कहे, जाओ तो अंजली, चनाचूर वाले को बुला लाओ। अंजली इससे ज्यादा आशा नहीं कर सकी थी। सिर्फ जव सपने देखती है वही गाना याद हो आता है-पड़ोसी घर की बहू अपने पति को पास बैठा कर नामोफोन पर जो गाना सुना करती थी। उसने कई बार देखा है, दोनों चुपचाप एक दूसरे के सामने बैठे हैं । हवा में पर्दा उड़ते ही अंजली की नजर उन घर पर जा पड़ती। वह नीचे के एक कमरे में रहती थी। उसके पास एक बुलडाग रहता था। अमिता बहन का बुलडाग । अमिता बहन बार-बार कानपुर से लिखा करती, पिताजी, टाइगर के भात में ज्यादा हल्दी नहीं दीजियेगा। सप्ताह में तीन बार बुआ मछली को दीजियेगा । फूफाजी अमिता वहन के बारे में ज्यादा जानते हैं। फिर भी वह अपनी हर चिट्ठी में हिदायत लिन भेजती थीं । कुत्ता के कमरे के बगल ही पूजा-घर था और उसके बाद या एक पृथक प्लेट । उसमें एक मद्रासी रहता था। अंजली पलंग पर जा बैठी। पता नहीं उसे यह सब क्यों याद आ रहा है। जरा-सा लचक कर उसने सारे रेकार्ड उलट-पलट कर देखे। देखते-देखते उसे याद हो आया, उस दिन सुरेश ने पूछा था, तुम्हारे स्कूल में कब से छुट्टी हो रही है ? हुँ, चनाचूर घाला को बुलाने कहता, तो कोई बात थी, पूछ रहा है, स्कूल में काव से छुट्टी होगी ? जवाब दिया, नहीं जानती। से कुत्तों पिपासा 36 -~~बुआजी के साथ तो तुम भी जा सकती थी। -कहाँ ? ---तारकेश्वर। ~मुझे अच्छा नहीं लगता। सुरेश आँखें तरेर कर बोला था, तुम्हें अच्छा लगे या बुरा, इस घर में इसकी परवाह भला करता कौन है ! अंजली ने कोई जवाब नहीं दिया था । उसे सुरेश के सामने उस तरह खड़ा रहना अच्छा नहीं लग रहा था। वह यहाँ आती ही नहीं। उसे सुरेश ने बुलाया है । कभी-कभार ऐसा होता है। जिस किसी समय सुरेश बुला भेजता है । घर पर अन्नदा है । हुँ, अन्नदा से बुला भेजा है, और अब गुमसुम खड़ा है । सोचा था, चनाचूर वाला को पास बुला कर अंजली से चनाचूर खरीद लाने कहेगा। वह बड़ा ही मालसी किस्म का आदमी है । हाँ, अंजली के चनाचूर लाने पर वह अकेले नहीं खाता। उसे सुरेश अपनी चारपाई पर बैठने कहता और दोनों मिल कर चनाचूर खाते। कभी-कभी वह बोल उठता, बुआजी तुम्हें बड़ी तकलीफ देती हैं। -~-नहीं तो। -हुँ, घर में एक कुत्ता पाल रखा है और उसकी देख-माल तुम्हें करनी पड़ती है। -~~-मैं नहीं करती, तो कोई और करता। किसी-किसी दिन सुरेश सहसा उसके कमरे में आ घुसता, आ गया अंजली, बुआजी पूजा-घर में हैं। अंजली कुछ धवरा जाती। क्योंकि बुआजी को अपने मैके पर बड़ा गर्व था। मैके की चर्चा उठते ही वह सब कुछ भूल जातीं। मैके वालों की प्रशंसा करते नहीं अघातीं। अंजली की दुर्दशा के लिये उसके पिता जिम्मेवार हैं । अंजली की माँ बुआजी की अपनी बहन नहीं थी । दूर के रिश्ते की ममेरी वहन थी । ममेरी बहन की लड़की के लिये यह और क्या कर सकती हैं। अंजली को इसके लिये कोई शिकायत नहीं थी। वह अपने आप से वोली, सुरेश साहब, तुम्ही सारी बर्बादी को जड़ थे। -~-कह कर अंजली ने वेड स्विच दबा कर एक नीला बल्ब जलाया ।- -सुरेश साहब, तुम्हीं ने मुझे सपना देखना सिखाया। बजली दुःख के दिन नीली रोशनी जलाती है । आज उसे बड़ा दुःख है। ४० पिपाना ।

- । वह लेटी है । सुन्दर एक लाल रंग की साड़ी बदल ली है। एजी तक साड़ी मीच कर सोने से क्या होगा । सब कुछ मानों उलट-पलट जाता है-उसका सब कुछ उलट-पलट रहा है । वह किसी चीज का खयाल नहीं कर रही है। अन्दर की आग फिर से जल उठी है। उसकी समझ में अभी कुछ भी नहीं आ रहा है कि वह क्या चाहती है । सब कुछ उसके हाथ में है । इच्छा हो, तो सुरेश से वह अपनी इच्छा पूरी कर सकती है। चमन यही चाहता है। तीसरे पहर से ही चमन उसे परेशान किये था । चमन का एक बहुत बड़ा नुकसान बच सकता है। सुरेश साह्न कम्पनी की ओर से आये हैं ! ईमानदार आदमी हैं। वह जो पंखला करेंगे, कम्पनी मान लेगी। वह चाहे तो सुरेश साहव से बहुत कुछ करा सकती है। लेकिन पहला प्यार ! कहीं वह बंध-सी गयी है । सुरेश उसे कभी- कभार कहता, मजली, तुम हमेशा घर में क्यों पड़ी रहती हो ? थोड़ा धूमो- फिरो। तीसरे पहर पार्क जा सकती है । स्कूल से आने के बाद पता नहीं इस अन्धेरे कामरे में पड़ी-पड़ी तुम क्या करती रहती हो ! में कुछ भी नहीं करती थी सुरेश साहव । तुम्हारे सामने बाहर जाते गुझे शर्म आती थी। और किसी तरह की शर्म मुझे उस घर में नहीं थी । बुआजी मुझे ज्यादा कपड़े नहीं देती थी । खर्च बड़ जाता । तुम तो जानते हो सुरेश, लड़कियों की लाज-शरम कपड़ों में ही सीमित है । इसलिये मैं हमेशा तुम्हारी आँखों से दूर-दूर रहना चाहती थी। तुम ने देखा होगा, जब कभी सीढ़ी के पास तुम पर नज़र पड़ती, में कितना सिमट जाती थी। मुझे और कोई शर्म नहीं थी, बस, तुम्हारे सामने कैसी पोशाक में जाने से शर्माती थी। लेकिन अब हँसी आती है । पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा क्या-क्या सोचती रहती थी। शरीर को एक दुर्लभ वरतु समझती थी। और चाँदी कि डिबिया में रखी कीमती अंगूठी की तरह मैं अपने आप को छिपा कर रखना चाहती थी। और कभी-कभी मुझ में. विचित्र इच्छा जन्म लेती थी। जैसे एक दिन जोरों की बारिश हो रही थी, रास्ते पर पानी जम गया था और मुझे इच्छा हो रही थी कि तुम्हें साथ लेकर कहीं चल दूं। ऐसी ही और भी कितनी ही इच्छाएं मुझे व्यायल किये रहती थीं । जब तुम चुपचाप बिस्तर पर पड़े रहते या सोते होते, तब मेरी इच्छा होती कि चुपचाप बैठी-ठी में तुम्हारे बालों में उँगलियाँ फे जब तुम कॉलेज से पापस आते और बुझानी तुम्हारे कमरे में आमलेट और चाय पहुँचातीं, उन समय मेरी इच्छा होती कि आमलेट और चाय में तुम्हें दे आऊँ। जब कभी जोरों की बारिश होती रहती, मेरी इच्छा होती कि खिड़की -- - -- বিভাগ पर तुम्हारी वगल में खड़ी-खड़ी मैं उस दिन वाला गाना सुनती रहूँ। लेकिन सुरेश साहब मैंने अपनी कोई भी इच्छा तुम्हारे सामने प्रकट नहीं की थी। जिस दिन तुम मेरे कारण बुआजी से झगड़ पड़े थे, वह दिन मुझे सबसे ज्यादा याद आता है । शायद मैं सब कुछ भूल जाऊँगी; लेकिन सुरेश साहब उस दिन तुमने मुझे जो कुछ दिया, तुम नहीं जानते । आँखें वन्द करते ही मुझे लगता है, कहीं कोई नहीं है, मेरे हृदय की गहराइयों में सिर्फ तुम हो, तुम । तुम्हारा वह दीप्त मुखमण्डल मैंने और कभी नहीं देखा । तुम्हारे चेहरे पर प्यार और ममता का सागर उमड़ रहा था । मैं अपने कमरे में किसी किताव पर औंवी पड़ी थी। मेरी पीठ पर लाउज फटा हुआ था और पीठ नंगी थी । वह ब्लाउज पहन कर कहीं जाया नहीं जा सकता । देखकर तुम चीख पड़े थे। तुमने अपनी बुमा को वंश का गुणगान करने मना किया था, तुमलोग कंजूस प्रकृति के आदमी नहीं हो । तुम्हारे कण्ठ की आकुलता मुझे बार-बार याद आती है । अच्छा सुरेश, आँखें वन्द करते ही आज भी मुझे वह दिन क्यों याद आता है ! और जानते हो, उस दिन से मैंने तुम्हें फिर कभी पराया नहीं समझा। शाम के समय अन्नदा ने दो साड़ियाँ लाकर दीं। हालांकि थीं तो सस्ती; पर तुम नहीं जानते मेरे लिये कितनी अनमोल थीं। आदमकद शीशे के सामने खड़ी होकर सोचती थी, हम दोनों एक साथ कैसे दिखेंगे ! या हम दोनों साथ-साथ चलें, तो कसे दिखेंगे । मुझे बड़ा बुरा लग रहा था । तुम इतने सुन्दर हो, मैं यदि थोड़ा और भी सुन्दर होती ! मेरा शरीर भगर और थोड़ा भरा होता ! दरिद्रता की लजा में मेरा उपेक्षित; पर उत्कष्ठित नारीत्व तब तक विकासोन्मुख नहीं हुआ था । तुम्हारी दृष्टि में मैं बड़ी दुबली थी। लेकिन अब ! आश्चर्य ! अंजली अचानक उठ क्यों पड़ी! सारी वत्तियाँ जला दी । खिड़की बन्द कर दिये । जेवर और कपड़े उतार कर शीशे के सामने जा खड़ी हुई। गर्वित स्वर में अव सुरेश से कहेगी, देखो मैं वही लड़की हूँ। उस समय की अंजली और आज की अंजली में कहीं कोई मेल है ? भरा पूरा शरीर, सुडौल जाँघे, मांसल भुजाएँ और गदरायी छातियाँ ! तुम यदि मुझे अभी देख पाते ! मैं जानती हूँ, तब तुम अपने जीवन के सबसे बड़े सत्य को तिलांजलि दे देते रिश्वत नहीं लेते, तुम सत्यवादी हरिश्चन्द्र हो, तुम्हारे कारण ही कम्पनी का इतना नाम है । मैं क्षण भर में सब कुछ मिटा सकती हूँ। चमनलाल यही ताहता है। वह चाहता है कि मैं तुम्हारे पास बैठू, तुम्हारा आदर-सत्कार कहं । जिस तरह वह मुझे लेकर जहाँ-तहाँ घूमता रहा है, मुझे भुना कर मोटी- । तुम - ४२ पिपासा . । - मोटी रकम का लाइन्सेस निकाला है, ठीक उसी तरह आज भी वह चाहता कि वह तुम से मेरी पूरी-पूरी कीमत बदल कर ले । क्षण भर चुप रह कर फिर अपने आप से बोली, बहुत ज्यादा भापण दे रहा हूँ। और जानते हो नुरेश साहब, सुना है, चमनलाल की पत्नी है । उसने अपनी पत्नी को सती-साध्वी बना कर रखा है। उसके पेट में इतनी चर्वी है कि तुम चिराग जला कर भी प्यार करने की कोई जगह नहीं ढूंढ पाओगे ! उसका सारा शरीर एक जैसा है। उसे देखने पर तुम्हें उबकाई आयगी । जानते हो, फिर भी चमन समाज में उसका परिचय अपनी पत्नी कह कर देता है। चमन उँगलियों पर गिन कर बता सकता है कि उसके साथ उसने कितनी रातें बितायी हैं । देखते नहीं, चमन खुद भी कैसा हो गया है। रुपया, सिर्फ रुपया। खड़े वाल, लाल-लाल आँखें, काला-कलूटा ठिंगना कद । उसे देखने से डर लगता है; पर है बड़ा भला, कापुल्प होने पर जैसा होता है । तुम्हें पता है सुरेश साहब, मेरे पास जो कुछ है, तुम्हारे सात पुरुखों में न होगा । जो कुछ देख रहे हो, सब कुछ मैं अपने नाम लिखा सकती हूँ। हाथी के दांत के पलंग पर में सो सकती हूँ। आज देहरादून, कल पूना, परसों खजुराहो, जब जहाँ जी चाहे घूम सकती हूँ। मैं अब सब कुछ कर सकती हूँ, मेरे लिये अब कुछ भी दुर्लभ नहीं है । यौवन की हर सामग्नी भरी पड़ी है । तुम्हें सब कुछ दिखाने की इच्छा होती है; पर पता नहीं मेरा मन मुझे बार-बार यह क्यों कहता है कि तुम्हें दिखाने पर मैं तुम्हारी नज़रों में छोटी हो जाऊँगी। अंजली अपने पलंग पर वापस आ गयी । कपड़े और जेवर ठीक से पहनना भूल गयी है । सर्दी लगने के कारण एक हरे रङ्ग का कम्बल ओढ़ लिया। दोनों घुटने छाती से सटाकर पड़ी रही । शायद उसे जोरों की सर्दी लग रही है। लगता है, यह बच्चों की तरह लेटो-लेटी सिसकियाँ भर रही है। नीली रोशनी में कमरे की हर चीज आकर्पक हो उठी है। कमरे के घातावरण में एक अजीव-सी रौनक है। पलङ्ग की पालिश पर नीली रोशनी फिसल रही है । अंजली के कोमल पाँवों में आलता झिलमिला रहा है। सुवह-सुबह जब वह आया था, याद नहीं उसी समय या उसके थोड़ी देर बाद बालकोनी पर खड़ी हो कर उसने जो देखा था, देख कर भी विश्वास नहीं कर पा रही थी। पहचानने में भूल भी तो हो सकती है, सुरेश ही जो सुरेश साहव है, यह भला कौन कह सकता है ! उसे किसी तरह भी विश्वास नहीं आ रहा था। तीसरे पहर वह चाय पर नहीं गयी थी, सुरेश साहब, अगर सुरेश ही - पिशाना ४३ निकल जाय ? यह क्या, सुरेश साहब तो सुरेश ही निकला। उसके इस जीवन के बारे में जान कर सुरेश को घृणा होगी। वह सुरेश को अपना चेहरा दिखाना नहीं चाहती; पर सुरेश से विना मिले रह भी नहीं सकती । एक अजीव-सी परेशानी है । एक अजीव-सा दर्द है जो रह-रह कर उसे तड़पा देता है । कांश, सुरेश न होकर वह कोई और होता ! और रात में बुरका जैसी काली चादर लपेट कर वह सीधे सुरेश के कमरे में जा उपस्थित हुई। सुरेश से उसे बहुत कुछ कहना था । सीवी-सादी बात है, वह क्या करती है, खुद ही नहीं जानती । वस, एक सनक सवार होती है और जो जी में आता है, कर गुजरती है। अभी जो कुछ सोचती है, वाद में याद नहीं रख पाती। ऐसा क्यों हुआ ? कहीं पागल तो नहीं हो जायगी ? दी। - अंजली ने उठकर बत्ती वुझा आँखें बहुत जल रही हैं । सारी रात उसने आँखों में काटी है। सिर्फ कमरे में चहलकदमी करती रही है। कभी-कभी लगता कि जोरों की गर्मी लग रही है, पसीना आ रहा है । कभी-कभी लगता कि जोरों की सर्दी पड़ रही है, सर्दी में वह जम जायेगी । वह मानो आत्म-रक्षा के लिये इस एयरकंडीशन कमरे में बंद है, कहीं बाहर नहीं जा पा रही है। वह सारी रात इसी कमरे में बंद रहेगी। एक समय उसे ऐसा लगा कि वह घुटन भरे अन्धेरे में खड़ी है। इस तरह घुटन भरे अन्धेरे में रहने से उसे बड़ा डर लगता है। मानो कोई उसे गला घोंट कर मारने आ रहा है । उसका प्रेसमैन पति गोविद गला घोंट कर उसकी हत्या करने आ रहा है ! उसने झटपट खिड़की खोल कर देखा, सुबह. हो गयी है। नीचे पाइन का जङ्गल कुहासा में डूबा हुआ है। आकाश का रंग नीला है । पहाड़ी लड़कियाँ पीठ पर टोकरी बांधे बाजार जाने को निकल पड़ी है। । हरे-भरे पेड़-पौधों और प्रभातकालीन मनोरम शान्त प्रकृति को देख अंजली पिछली रात को एकदम भुला देना चाहती है । ठंठी हवा अभी कितनी मधुर ला रही है ! दरवाजा खोल कर वह बाहर बरामदे में आ गयी। देखा, सुरेश साहब का कमरा खुला है ! काफी नीचे वह अकेले ही पहाड़ी रास्ते पर टहल रहा है । पता नहीं सुरेता के लिये अजली का मन उदास क्यों हो गया । चमन ने ऊ कर देता, रोज की तरह आज भी निर्मला तड़के ही उठी है। एक रैपर ओड़े वह चुपचाप दालकोनी पर खड़ी है। इस तरह और इस सुवह के ४४ पिसाना समय चुपचाप खड़ी रहने वाली लड़की निर्मला नहीं है । इस घर से निर्मला को बड़ा प्यार है । सुवह होते ही वह नौकरों से हर कमरे के खिड़की-दरवाजे साफ करवाती है। फौवारा के पास मालियों के साथ फुलवारी में थोड़ा-बहुत काम करती है। किस पौधे में कितनी बाद डालनी है, किस खाद से कौन फूल कितना बड़ा होगा, निर्मला भली-भाँति जानती है । परिणामस्वरूप सुबह बुलाने पर भी निर्मला पास नहीं मिलती । हालांकि निर्मला जानती है कि वह कब बाहर जायेगा । वह जानती है कि उसे क्या खाना पसंद है। आठ बजते-न-बजते चमन बाहर निकल पड़ता है । इसलिये निर्मला झटपट खाना तैयार कर देती है। यानी निर्मला यहाँ की हर चीज में इस तरह समायी हुई है कि वह परायी समझी ही नहीं जा सकती । प्रत्येक पेड़ के साथ, प्रत्येक कमरे के साथ वह जुड़ी हुई है। पहाड़ी रास्तों पर वह कितनी ही वार अकेली निकल पड़ती है। नीचे उतरने पर ज्योंही कोई सरोवर. दीखता, निर्मला पानी में पांच डूबा कर बैठ जाती है । वैठी-बैठी अन्यमनस्क हो गयी है। इस पहाड़ी उपत्यका के बाद ही पाइन का जंगल शुरू होता है । पहाड़ी लड़कियों की तरह जब यह पहाड़ और जंगलों में फुदकती फिरती है, उस समय भला कौन कह सकता है कि पहाड़ी जीवन के अलावा भी बंगाल में उसका और कोई जीधन था । आज सुबह से ही सफेद रंग की साड़ी पहने, सिर पर किंचित बूंघट काढ़े यह बालकोनी पर चुप-चाप खड़ी थी। चमन को अभी उसके पास जाते भी डर लगता था। हालांकि उसकी मुस्कान में तृप्ति की झलक था। कल से ही निर्मला ऐसी हो गयी है । वह साधारणत: ऐसा नहीं करती। बल्कि ऐसी बातों में वही ज्यादा उत्साह दिखाती है । उसने दुनिया देखी है, उसे कुछ कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं पड़ती । जब जैसे अभिनय की आवश्यकता पड़ती है, वह वैसा ही अभिनय करती है । सुरेश साहब के समक्ष उसे चमन की सती-साध्वी पत्नी का अभिनय करना है, पर सुरेश साहब को देखते ही वह बदल गयी है । अपनी बातचीत और अभिनय में एक अद्भुत प्यार प्रकट करना चाहती है। चमन जितना सोचता है, उतना ही उदासीन होता जाता है। वह बड़ा उर रहा है। यदि उसकी योजनाओं पर पानी फिर गया, अञ्चल में यह इतना बड़ा महाजन नहीं रह जायगा । सुरेश साहब ने कहा है, दिधरिया जायगे ! वहाँ सुरेश साहब की कंपनी एक नया प्लांट बैठाना चाहती हैं। सुरेश साहब का मह-मुन कर यदि उस योजना पर पानी फेरा जा सके, तो वह बन जागा । यहाँ नया प्लांट बैठने से - । तो इस पिसा ४५ निकल जाय ? यह क्या, सुरेश साहब तो सुरेश ही निकला । उसके इस जीवन के बारे में जान कर सुरेश को घृणा होगी। वह सुरेश को अपना चेहरा दिखाना नहीं चाहती; पर सुरेश से विना मिले रह भी नहीं सकती । एक अजीव-सी परेशानी है । एक अजीव-सा दर्द है जो रह-रह कर उसे तड़पा देता है । काश, सुरेश न होकर वह कोई और होता ! जैसी काली चादर लपेट कर वह सीधे सुरेश के कमरे में जा उपस्थित हुई। सुरेश से उसे बहुत कुछ कहना था । सीधी-सादी बात है, वह क्या करती है, खुद ही नहीं जानती। बस, एक सनक सवार होती है और जो जी में आता है, कर गुजरती है । अभी जो कुछ सोचती है, बाद में याद नहीं रख पाती। ऐसा क्यों हुआ? कहीं पागल तो नहीं हो जायगी? और रात में बुरका । - - अंजली ने उठकर वत्ती वुझा दी। आँखें बहुत जल रही हैं । सारी रात उसने आँखों में काटी है। सिर्फ कमरे में चहलकदमी करती रही है। कभी-कभी लगता कि जोरों की गर्मी लग रही है, पसीना आ रहा है। कभी-कभी लगता कि जोरों की सर्दी पड़ रही है, सर्दी में वह जम जायेगी । वह मानो आत्म-रक्षा के लिये इस एयरकंडीगन कमरे में बंद है, कहीं बाहर नहीं जा पा रही है। वह सारी रात इसी कमरे में बंद रहेगी । एक समय उसे ऐसा लगा कि वह घुटन भरे अन्धेरे में खड़ी है। इस तरह घुटन भरे अन्धेरे में रहने से उसे बड़ा डर लगता है। मानो कोई उसे गला घोंट कर मारने आ रहा है । उसका प्रेसमैन पति गोविंद गला घोंट कर उसकी हत्या करने आ रहा है ! उसने झटपट खिड़की खोल कर देखा, सुबह. हो गयी है। नांचे पाइन का जङ्गल कुहासा मे डूबा हुआ है। आकाश का रंग नीला है । पहाड़ी लड़कियाँ पीठ पर टोकरी बांधे वाजार जाने को निकल पड़ी है हरे-भरे पेड़-पौधों और प्रभातकालीन मनोरम शान्त प्रकृति को देख अंजली पिछली रात को एकदम मुठला देना चाहती है । ठंठी हवा अभी कितनी मधुर ला रही है ! दरवाजा खोल कर वह बाहर वरामदे में आ गयी। देखा, सुरेश साहब का कमरा खुला है। काफी नीचे वह अकेले ही पहाड़ी रास्ते पर टहल रहा है । पता नहीं मुरेश के लिये अन्जली का मन उदास क्यों हो गया। चमन ने उठ कर देखा, रोज की तरह आज भी निर्मला तड़के ही उठी है । एक रैपर ओढ़े वह चुपचाप दालकोनी पर खड़ी है। इस तरह और इस सुबह के । ४४ पिपासा -- समय चुपचाप खड़ी रहने वाली लड़की निर्मला नहीं है । इस घर से निर्मला को बड़ा प्यार है। सुबह होते ही वह नौकरों से हर कमरे के खिड़की-दरवाजे साफ करवाती है । फौवारा के पास मालियों के साथ फुलवारी में थोड़ा-बहुतं काम करती है। किस पौधे में कितनी बाद डालनी है, किस खाद से कौन फूल कितना बला होगा, निर्मला भली-भाँति जानती है । परिणामस्वरूप सुबह बुलाने पर भी निर्मला पान नहीं मिलती। हालांकि निर्मला जानती है कि वह कव बाहर जायेगा । वह जानती है कि उसे क्या खाना पसंद है । आठ बजते-न-बजते चमन बाहर निकल पड़ता है । इसलिये निर्मला झटपट खाना तैयार कर देती है । यानी निर्मला यहाँ की हर चीज में इस तरह समायी हुई है कि वह परायी समझी ही नहीं जा सकती । प्रत्येक पेड़ के साथ, प्रत्येक कमरे के साथ वह जुड़ी हुई है । पहाड़ी रास्तों पर वह कितनी ही वार अकेली निकल पड़ती है। नीचे उतरने पर ज्योंही कोई सरोवर. दीखता, निर्मला पानी में पांव डूवा कर बैठ जाती है। बैठी-बैठी अन्यमनस्क हो गयी है। इस पहाड़ी उपत्यका के बाद ही पाइन का जंगल शुरू होता है । पहाड़ी लड़कियों की तरह जब वह पहाड़ और जंगलों में फुदकती फिरती है, उस समय भला कौन कह सकता है कि पहाड़ी जीवन के अलावा भी बंगाल में उसका और कोई जीवन था । आज सुबह से ही सफेद रंग की साड़ी पहने, सिर पर किंचित बूंघट काढ़े वह वालकोनी पर चुप-चाप खड़ी थी ! चमन को अभी उसके पास जाते भी डर लगता था। हालांकि उसकी मुस्कान में तृप्ति की झलक श्री। कल से ही निर्मला ऐसी हो गयी है। वह साधारणतः ऐसा नहीं करती। वल्कि ऐसी बातों में वही ज्यादा उत्साह दिखाती है । उसने दुनिया देखी है, उसे कुछ कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं पड़ती । जव जैसे अभिनय की आवश्यकता पड़ती है, वह वैसा ही अभिनय करती है । सुरेश साहन के समक्ष उसे चमन की सती-साध्वी पत्नी का अभिनय करना है, पर सुरेश साहब को देखते ही वह बदल गयी है । अपनी बातचीत और अभिनय में एक अद्भुत प्यार प्रकट करना चाहती है । चमन जितना सोचता है, उतना ही उदासीन होता जाता है । यह बड़ा डर रहा है। यदि उसकी योजनाओं पर पानी फिर गया, तो इस अञ्चल में वह इतना बड़ा महाजन नहीं रह जायगा। सुरेश साहब ने कहा है, दिघरिया जायेंगे । वहाँ सुरेश साहब की कंपनी एक नया प्लांट वैठाना चाहती है। सुरेश साहब को कह-सुन कर यदि इस योजना पर पानी फेरा जा सके, तो वह वच जायेगा । यहाँ नया प्लांट बैठने से -- - पिपासा ४५ - - चमन मिट्टी में मिल जायेगा । उसे प्रतियोगिता में उतरना पड़ेगा और इतनी बड़ी कंपनी का प्रतियोगी होना कोई मजाक तो नहीं । भगवान जाने, क्या होगा ! चमन ने करीव जाकर देखा, काफी नीचे सुरेश साहब पहाड़ी रास्तों पर चल रहे हैं । काले रङ्ग का सूट पहने हैं और सिर पर फैल्ट कंप है। पीछे से उसने पुकारा, निर्मला । निर्मला चुप रही । आँख उठा कर देखा तक नहीं। चमन वोला, सुरेश साहब, क्या रोज सुबह टहलते है ? नहीं जानती। -तुमने तो कहा था कि तुम उन्हें पहचानती हो । उनकी हर आदत से वाकिफ हो। वह क्या-क्या पसन्द करते हैं, तुम जानती हो। निर्मला अभी क्या जवाव दे, कुछ समझ नहीं पाती। वह कुछ भी नहीं बोली । उसके चेहरे से ऐसा भाव प्रकट हो रहा है, मानो वह कुछ भी नहीं देख रही है, कुछ भी नहीं समझ रही है। --तुम सब कुछ जानती हो, इसलिये तुम्हें ज्यादा कठिनाई नहीं होगी। इसी समय कहीं शीशा फूटने की आवाज हुई। और चमन का दिल धड़क उठा । शीशा फूटने की आवाज पर भी निर्मला पूर्ववत् रही। उसकी पसन्द के कीमती शीशे के वर्तन हैं। उसके कोई वच्चा नहीं है, वह अकेली है। चमन के काम पर जाने पर या कलकत्ता जाने पर वह अकेली ही रहती है। रेकार्ड प्लेयर, आर्कडियन और घर सजाने-संवारने में उसका समय कट जाता है । और मन खराव होने पर पेड़ तले चुपचाप बैठी रहती है। इस उम्र में और है ही क्या ? उसके प्रेसनैन पति गोविन्द को सन्देह था कि उसके शरीर में बाढ़ है दुवला-पतला दमा का रोगी गोविन्द की याद आते ही अङ्ग-प्रत्यङ्ग सिहर उठता है । मुरेश के आने पर एक-एक कर सब कुछ याद आने लगा है। और यही जो चमन पास खड़ा है, संभव है, अभी-अभी गिड़गिड़ा कर कहेगा, जाओ न निर्मला, उन्हें गाना सुनना बहुत पसन्द है । उनके आने पर हम एक साथ चाय पियेंगे। उन्हें मैंने कितनी वार कहा है कि तुम रवीन्द्र सङ्गीत जानती हो । यही सब कहेगा और सुरेश साहब को हाथ में करने की कोशिश करेगा। इसलिये आज सुवह उसे कुछ भी पुरानी याद आने पर वह खुद को बड़ी अकेली महास करती है। उस समय उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता । यह अपने आप को हर चीज से अलग-थलग महसूस करने लगती है । ऐना होता है, इसलिये वह अपने आप में सीमित हो जाती है। उसे किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता। ४६ पिपासा चमन बोला, तुम बड़ी थकी-चकी-सी दीख रही हो निर्मला ! ---ठीक से सो नहीं सकी हूँ। --मशीन में गड़बड़ी तो नहीं थी? -तव? .. .. - पता नहीं क्या हुआ 1 ---आज क्या उन्हें चश्य पर बुलाऊँ । -~~-नहीं। -नहीं क्यों? -कह तो दिया, नहीं। -तुम बड़ी जिद्दी हो निर्मला । --मुझे अच्छा नहीं लग रहा है चमन । -वह तुम्हारे परिचित हैं। तुम्हें तो कोई खास कठिनाई नहीं उठानी पड़ेगी और न ज्यादा परिश्रम ही करना पड़ेगा। परिश्रम का अर्थ एक कुत्सित दृश्य के रूप में उसकी आँखों के सामने नाच उठा, कपाल पर बल पड़ गये और मुखमण्डल पर घृणा की रेखाएँ उभर आयीं। ऐसी शान्त सुबह में इस प्रकार की बातें सुनते ही मन घृणा से भर उठता है । लेकिन रुपयों का दीवाना चमन इतनी सुन्दर सुबह को मिट्टी में मिला रहा है। आज इस स्थिति में उसे उस दिन की घटना बेहद याद आ रही है। सुरेश के कमरे में वह खुद था और साथ थी अंजली। दोनों का प्यार कहीं पकड़ा न जाय, कितना डर रहा था सुरेश उस दिन ! और तो और एक सरल-सुवोध शिशु की भाँति अकारण अपराव का बोझ अपने कन्धे पर उठा लिया; पर एक शब्द भी न वोल सका । बुआ जी के सामने मानो उसकी बोलती वन्द हो गयी, कह न सका कि मैं अंजली को प्यार करता हूँ। इसलिये अंजली रात में मेरे कमरे में आती है। हमदोनों खिड़की के पास खड़े हो चुपचाप आसमान देखते है । और कुछ नहीं करते। जाने से पहले हम दोनों सिर्फ एक-दूसरे का पवित्र चुम्बन लेते हैं, और कुछ नहीं, और उस समय सचमुच में विश्वास नहीं आता कि संसार में दुःख भी कोई शब्द है । हम दोनों उस समय सुपमा मण्डित वसुन्धन के अङ्ग बन जाते हैं। हमने कोई अपराध नहीं किया। एक खिलती कली के चारों और सूर्य की किरणें थिरकती ही है, इसमें भला आश्चर्य ही क्या है ! इसलिये इस मनोरम प्रभात में परिश्रम की बात सुनते ही निर्मला को जोरों की हँसी आयी। वह इतने जोरों से कहकहा मारना चाहती थी कि उसकी पिपासा ४७ आवाज पहाड़ की चोटियों और तराई में गंज उठे। और तलहटी में जो प्रभातं- कालीन पृथ्वी की सुपमा देखता फिर रहा है उसके चारों भोर कहकहा यदि किकिंणी सदृश खनखना उठे, तो मानो एक अनन्त परिहास की सृष्टि होगी। और यह भी तो संभव है कि सुरेश यह समझ बैठे कि पहाड़ की चोटो पर खड़ा इस तरह कौन हँस रहा है । हँसी सुनते समय अन्यमनस्क होते ही किसी खड्ड में गिर सकता है । पता नहीं क्या सोच कर उसने खुद को संभाल लिया। सिर्फ बोली, जानती हूँ ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; फ़िर भी मुझ से नहीं होगा चमन । -~-ऐसी बात नहीं करते रानी। ~~~~और सुबह-सुबह मुंह से ऐसी बात निकालना तुम्हें अच्छा लगता है चमन ? - क्या करू निर्मला, गले में जो कांटा अटका है । वह आज नौ बजे मेरा कारखाना देखने जायगा । ---तो फिर मैं क्या कर सकती हैं ? -यह कहो, तुम क्या नहीं कर सकती ! तुम इतना कुछ कर सकी हो और एक छोटा-सा काम नहीं कर सकोगी ? -यह मेरा परिचित है चमन, उसके लिये मैं नयी-नवेली तो हूँ नहीं जो मुझ पर लट्ट हो जाय; वल्कि मुझे तो डर है कि वह कहीं खफा न हो जाय । निर्मला ने चमन को दूसरी दिशा में मोड़ना चाहा । --निर्मला मैं आदमी पहचानता हूँ । पुरुषों की नस-नस से मैं वाकिफ हूँ। कौन कितना खरा है, यह भी मैं जानता हूँ। तुम्हारे सामने कौन कितना बड़ा मई है, यह भी मुझे पता है । -~~-यानी सब मुझ से हार जाता है ! ----आज तक तो ऐसा कोई नहीं दीखा जो तुम से न हारा हो । -कोई-कोई नहीं भी हारता है चमन । न चाहने पर किसी को नहीं हराया जा सकता । चाहने पर सभी हराये जा सकते हैं। -~-अभी वहस करना मुझे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा है। वापसी में एकबार शहर से हो आना । मेरी कुछ चीज लानी है । -ले. आऊँगा । तुम मेरी बातों का जवाब नहीं दे रही हो। वह अभी- अभी आर आकर हाथ मुंह धोएगा । उसे चाय पर अन्दर बुलाऊँ ? - ४८ पिपासा -- m- -- -~~-नहीं। -निर्मला मेरा सर्वनाश हो जायेगा । --कह तो चुकी, मुझ से नहीं होगा। -तब क्या होगा ! वह तो आज ही चला जायगा । -वह आज नहीं जायगा । -क्या कहती हो ! -बिलकुल ठीक कह रही हूँ। -कैसे जाना कि आज नहीं जायगा । -कल रात में उसके कमरे में गयी थी। -निर्मला तुम कितनी अच्छी हो, कितनी सुन्दर !-चमन खुशी से झूम उठा। - पता नहीं सुरेश को चलना क्यों अच्छा नहीं लग रहा था । ठंडी हवा लग रही थी न ! नीचे उतर कर उसने ऊपर की ओर देखा । चक्करदार रास्ता तय कर वह नीचे उतर आया है । पहाड़ को काट-काट कर रास्ता बनाया गया है। विशालकाय अजगर सदृश चक्करदार रास्ते रंग-विरंगे फूल-पौधे संजोये लेटे हैं । उतरते वक्त फूल-पौधों की ताजी गन्ध मिल रही थी। दायीं ओर एक कुटिया है और बायीं ओर छोटा-मोटा पहाड़ी गाँच । भेड़ों का झुंड तराई में उतर रहा है । गायें घास चर रही हैं । तड़के ही सब जग गये है। यहाँ के लोग उसका चलना देखते ही भांप लेते हैं कि वह परदेशी है। यहाँ टुरिस्ट भी आते हैं ! यह दुरिस्टों के आने का समय नहीं है, वे गरमी में आते हैं। अभी चारों तरफ कुछ-न-कुछ कुटिया खाली पड़ी हैं । कुटिया वायु परिवर्तन पर आये लोगों के लिये बनी हैं। ट्रेन से आते वक्त वह इस तरफ से नहीं गुजरा है । यह रास्ता उत्तर की ओर है। चमन लाल के पैकिंग प्लांट में जाकर वह रास्ता खत्म हो गया है । पैकिंग प्लांट के आसपास चमन ने सफेद रंग के कुछ क्वार्टर बनवा दिये हैं । उस तरफ जाने पर शायद वह और भी ज्यादा आदमी देख पाता। इधर बड़ा सुनसान है । नाम तो कुटिया दिया गया है; पर अन्दर में ऐसी व्यवस्था है कि लगता है कुटियों का निर्माण साहव क्लास के वाबुओं के लिये किया गया है । हर कुटिया के सामने लान है । लान में रंग-बिरंगे फूल के पेड़-पौधे हैं। किसी-किसो पेड़ में असंख्य फूल खिले हैं। कीलदार तारों का -- पिपासा. ४६ "

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अंजली में निकटता प्राप्त करने की इच्छा तीन थी। उसके हर काम में अंजली मौजूद रहती थी। उसके मुखमण्डल पर हमेशा करुणा की छाप होती थी। इस करुण चेहरे के कारण ही सुरेश के हृदय में उसके प्रति स्नेह था । और जली के लिये सब कुछ सपना-सा था, सुरेशा उसके सपनों का राजकुमार था। उसके करीव जाना, उसे स्पर्श करना अजली को अच्छा लगता था। नुरेश के सामीप्य से उसका सारा शरीर पुलकित हो उठता था । यह सब सुरेश आँखें बन्द करते ही मानो महसूस कर पाता था । आश्चर्य है, फिर भी सुरेश आखिर तक क्यों खड़ा न रह सका ! अंजली को लेकर बदनामी होते ही वह बुआ जी के घर से भाग खड़ा हुआ। भाग कर अपने शरीर से सारी बदनामी धो पोंछने के लिये वह एकदम अच्छा लड़का बन गया । आते वक्त अंजली को एक पता दे आया था ताकि कोई कठिनाई उपस्थित होने पर अंजली उससे सम्पर्क स्थापित कर सके । सारी व्यवस्था के पीछे एक ही वात थी कि लोग यह न समझे कि वह वदनामी के डर से भाग गया है । खास कर वह अंजली के सामने यह स्वीकार करना नहीं चाहता था। समय सब कुछ भुला देता है, सब कुछ पुनः सहज हो उठता है, ऐसी भावना मन में आते ही मनुष्य निश्चिन्त हो जाता है। एक मेस में जगह पाकर वह मन-ही-मन बोल उठा था, बच गया । वह समझता था, पता जव जली को दे पाया हूँ, तो वह लुक-छिप कर उससे मिलने आया करेगी। स्कूल से वापस आते वक्त यदि मिलेगी, तो किसी पेड़ या किसी छांव के नीचे दोनों का समय मजे में कट जायेगा। आश्चर्य है, अंजली एक दिन भी न मिली । एक चिट्टी तक नहीं दी। क्या वह स्कूल के मैदान के उस पार खड़ा रहा ! या सुरेश मजली के लिये पहले जैसा आकर्षण महसूस नहीं करता था । अभी वह इन पहाड़ी रास्तों में खुद को टटोल रहा है । यह जानना चाहता है मंजली से उसे कितना पाना था और अंजली को उसे कितना देना था । अजली पर उसका कितना अधिकार था, और अजली का उस पर कितना अधिकार था । इस समय वह यह. सोच कर अवाक हो उठता है कि अंजली के न आने से उसे कोई खास दुःख नहीं हुआ था। क्योंकि मजली के प्रति उसके हृदय में करणाची, प्यार था या नहीं, कहना मुश्किल है । अगर प्यार होता, तो नवयुवक सुरेश इस तरह घर छोड़ कर नही भागता । जली ने न मिल कर अच्छा ही किया, एक ऐसा भाव मन में पालता हुआ विद्यालय का अच्छा विद्यार्थी होने के नाते वह कितावी - पिपासा ५१ कीड़ा बन गया था। खुद को बड़ा भला लड़का समझ कर बुआजी से मिलने में शर्माता रहा है। लेकिन रात में अंजली का रूप देखकर वह आश्चर्यित हो उठा था। अंजली सफेद मोम की गुड़िया नहीं, मक्खन की सजीव प्रतिमा दीखती है । सारी-की-सारी शिराय-उपशिरायें पानी की रेखाओं की तरह शरीर के अन्दर खिलवाड़ कर रही है । आँखों में उष्ण व कोमल प्यार छलक रहा हैं। चेहरे पर दुःख व विपाद का चिन्ह तक नहीं । हर बार मानो वह अरवी घोड़े की तरह उसके कमरे में आ खड़ी होती। देखो, मैं कैसी हूँ, मैं क्या तुम्हें अच्छी नहीं लग रही ? अव मैं रात का फेंका गया सुबह का वासी फूल नहीं। अब मैं सुवह का तरोताजा सूरज हूँ। जो भी मुझे छूयेगा, जल जायेगा, जल कर भस्म हो जायेगा। क्या सव सोचता हुआ, सुरेश काफी दूर निकल आया है। जलप्रपात की मावाज सुनायी पड़ रही है । सूरज धीरे-धीरे चढ़ता जा रहा है। उसने सोचा, लौटते वक्त एक तांगा पर लौट जायेगा और आज ही जो कुछ करना है, कर लेगा । क्योंकि वह समझ रहा है कि अंजली एक दुर्निवार आकर्षण फैला रही है जो सहज ही उसे सांसारिक आचार-व्यवहार से खींच कर नीचे गिरा सकता है । अभ्यासवग वह भला आदमी बन गया है। पत्नी के समक्ष वह आदर्श पति है और आफिस में एक कर्तव्यपरायण अधिकारी । यहाँ आने का उद्देश्य भी कम्पनी का हित-सावन है । कर्तव्यपरायण और ईमानदार अधिकारी के रूप में कम्पनी को किसी भी प्रकार की क्षति से बचाना उसका धर्म है । कितना डिसकाउंट देना है, कितना देना चाहिये पर विचार करना है। दिघरिया ट्रांट को प्रस्तावित योजना के हर पहलू पर भी वह भली-भाँति विचार कर लेना चाहता है । सहसा उसने देखा, एक बड़ी सुन्दर चिड़िया उड़ कर एक पेड़ की टहनी पर जा बैठी । उस चिड़िया को भली-भाँति देख लेने की इच्छा हुई। लंबे अर्से से उसने इस तरह नदी-नाले, पहाड़-जङ्गल, फूल-पौधे नहीं देखे है । उसे इच्छा हुई थोड़ा बैठ जाय । हरी घास पर बैठने की उसे इच्छा हुई। घोड़ा-थोड़ा कुहासा छाया हुआ था । मखमली घास पर ओस की बूंदे चमक रही थीं। सामने ही एक पत्थर पड़ा था । वह पत्थर पर बैठ गया । काले रङ्ग का पत्थर । तीसरे पहर अंगली फिर मिल सकती है। रात में अंजली छिप कर उसके कमरे में आयी थी। काम खत्म कर जब वह तीसरे पहर वापस आयगा, । - । पिरामा ५२ , शायद उस समय चाय किसी के हाथ भेज देगी और उस समय चमन घर पर न होगा । मौका मिलते ही आ जा सकती है। घमन ने उसे कई बार यहाँ आने को कहा है। उसकी पत्नी निर्मला का रवीन्द्र सङ्गीत पर अच्छा अधिकार है । वह नहीं जानता था; क्योंकि उसने अंजली को कभी गाते नहीं सुना। अंजली ने भला गाना कव सीखा ! यह सब सोचना उसे अच्छा लगने लगा। यह दुर्बल हो जा सकता है। उसकी दुर्वलता से चमन अनुचित लाभ उठा सकता है । नहीं, गाना सुनना ठीक न होगा । और यह तो पता ही है कि चमन कुछ ऐसा ही चाहेगा । अर्थात् चमन यदि खाने की टेबुल पर या चाय पर अंजली को भी साथ बैठा ले और कहे, सुरेश साहब को एक गाना मुनाओ। संभव है गाना सुन कर वह डगमगा जाय। उस चिड़िया की उसने फिर तलाश की। पैरों तले सुबह की धूप विसरी है। मखमली घास पर रेशमी धूप विखरी है। हरे कीड़े-मकोड़े घास पर खेल रहे हैं। यह मन-ही-मन वोला, अंजली, तव तुम मजे में ही हो । मैं भी मजे में हूँ। फिर भी मुझे लगता है कि आज में अच्छा नहीं हूँ। पता नहीं, मुझे ऐसा क्यों लगता है । ऐसा तो मेरे साथ कभी होता नहीं। जब में गंभीर वना दफ्तर में बैठा रहता हूँ, कोई मुझे परेशान करने का साहस नहीं करता, मुझ से वात नहीं कर पाता । सुना है, मेरे चेहरे पर हमेशा गर्व की छाप विराजमान रहती है--सच्चाई का गर्व, कर्तव्य का अभिमान । मेरे अन्दर भी जो एक दुःखी आदमी छिपा है, किसी को इसका आभास तक नहीं मिलता । मैं खुद भी नहीं समझ पाता । आज लगता है, मैं अपने दुःखी आदमी को लाख कोशिश कर भी छिपा कर नहीं रख सकता। चमन को अगर पता चल गया, तो वह एक-एक पाई वसूल कर लेगा। उसने मेरी बड़ी खुशामद की है । और यदि उसे यह पता चल जाय कि तुम्हारे कहने पर मैं उसके लिये वहुत कुछ कर सकता हूँ, उसके दौलतखाने की चमक-दमक मेरी उदारता पर निर्भर है, तब वह क्या करेगा उसे यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। अंजली तुम रात में क्यों आयी, मेरे कमरे में। सुरंश बड़ा अन्यमनस्क हो गया है। जितना सोचता है कि यह सब नहीं सोचेगा, उतना ही उलझता जाता है ! अपरिचित जगह आया है। यदि पता न जानता, तो वह लौट भी नहीं सकता था। पहाड़ों की सुन्दरता देखने लायक है । इन पहाड़ों पर आने से वापस जाने की किसी की इच्छा नहीं होती । हरे- भरे पेड़-पौधे, रंग-बिरंगे पक्षियों और रेशमी धूप को लिये यहाँ आने वालों को अटकाये रहते हैं, कहीं जाने नहीं देते । - -- বিষ্য ও , टप-टप पानी पड़ रहा है। झरना-कर रहा है। कभी उसकी गति तेज होती है और कभी धीमी । वर्षा की बूंदों की तरह कहीं-कहीं पत्तों पर पानी अटक जाता है । और जिस तरह वर्षा होने के बाद भी काफी देर तक वर्षा की बूंदें पेड़-पौधों से टप-टप कर गिरती हैं और एक उदास वातावरण की सृष्टि करती है, ठीक उसी प्रकार झरना का पानी भी एक अजीव-सी उदासी चारों ओर बिखेर रहा है । अंजली के साथ-उसका परिचयं दो साल का है। अव वह समझ रहा है, दो साल के अन्दर ही अंजली उसकी काफी अपनी हो गयी थी। सुरेश उठ खड़ा हुआ। पेड़ की डाल पर उसे वह चिड़िया देखने को न मिली । इसी पेड़ पर बैठी थी न ! यह कौन-सी चिड़िया है ? उसने अपने इलाके . में ऐसी चिड़िया नहीं देखी थी। सुनहली पूछ, सफेद आँखें, रूपहले पाँव । इस चिड़िया का अस्तित्व मानो दन्त कथाओं में ही शोभा पाता है। चाँदी के पेड़, सोना के पत्ते और मुक्ता के फल होने पर इस चिड़िया की शोभा बढ़ती। वह सोच न सका था कि इस तरह चिड़िया उसके आँखों के सामने गुम हो जायेगी । जिन झाड़ियों के आस-पास छोटी-मोटी धाराओं में पानी वह रहा है. वह उस ओर चल पड़ा । झाड़ियों में घुस कर वह कितनी देर तक खोजता रहा, वह नहीं जानता । न मिलने पर वापस आ गया। यह क्या, उसी पत्थर पर अंजली बैठी है! ---तुम! -अपरिचित जगह में रास्ता भूल जाओगे, यह सोच कर चली आई। -~~-उसके चेहरे पर विचित्र हँसी खेल गयी। ~ मैं सहज ही रास्ता नहीं भूलता ! ठीक वापस जा सकता हूँ। -बायद तुम जा सकते हो; पर मेरा मन नहीं माना | और फिर यह म्यान भी बड़ा भयंकर है । चारों तरफ जहरीले सांपों का राज्य है। पत्थर के नीचे छोटे-मोटे विल देख रहे हो न-कौन-सा साँप का है, कौन-सा खरगोश का, कोई नहीं जानता। कोई नहीं जानता? -कम-से-कम हमलोग नहीं जानते । यानी कोई-कोई जानता है। -~-यहाँ की पहाड़ो लड़कियाँ बता सकती है। वे बिल देखते ही पहचान जाती है कि कौन-सा दिल किस जीव का है। पिपासा ५४ साप तो अपने दिल में नहीं रहता। साँप कोई बिल नहीं बना सकता सुरेश । जानता हूँ, दूसरों के विल में रहता है । -इतना जानने पर भी तुम इस जंगल में क्यों माये ? -तुम्हें जङ्गल कहाँ दीख रहा है ? -~~-यह घास का मैदान है। और तुम जिस मखमली घास को रौंदते हुए चले आये, नहीं जानते उसके नीचे जहरीले कीड़े-मकोड़े हैं कि उनका एक डंक तुम्हारे शरीर को नीला बना देगा । सच ! हाँ सुरेश । -फिर तुम क्यों चली आयी! ----मुझे ये पहचानते हैं । मैं इन्हें कोई क्षति नहीं पहुंचाती, ये जानते हैं । उत्तर में सुरेश बहुत कुछ कह सकता था । ये जानते हैं, इसलिये उसे डंसंगे नहीं, उसे नहीं जानते हैं, इसलिये उसे उसेंगे, यह सब वकवास है । यहाँ आने पर वह सिर्फ वकवास ही कर रही है, काम की एक भी बात नहीं बोलती ! उसे तरह-तरह के संदेह हो रहे हैं । अंजली चमन की पत्नी है; हालांकि वह ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे चमन उसका कोई नहीं हो। अगर ऐसा न होता तो सुबह-सुवह उसके पीछे-पीछे यहाँ आने के पहले वह हजार बार सोचती, चमन क्या सोचेगा। उसका चेहरा देख कर तो पता ही नहीं लगता कि चमन से उसे जरा भी डर है । चमन भली-भाँति जानता है कि वह बड़ा कड़ा आदमी है। चमन उसके साथ बकवास करने का साहस नहीं कर सकता ! कुल मिला कर सुरेश को यह सब बड़ा दुरा लग रहा था । जितनी परिचित हो, पुरानी दोस्ती के नाते जितना ही निकट आये; फिर भी इस तरह नीचे उतर आना अच्छा नहीं है । बोला, मेरे पीछे-पीछे आने की क्या जरूरत थी ? वह पत्थर पर बैठी घास चवा रही है । अवोध शिशु-सा चेहरा बना लिया है । भाँखों में अजीव-सी उदासी छायी है । सुरेश का एक भी शब्द मानों उसके कानों में नहीं जा रहा है । सुरेश का हाथ थामे, पत्थर की गिट्टियों से भरे रास्ते पर चल कर अगर वह उस झरने तक पहुँच जाय तो मानो वह बच जायेगी। सुरेश बोला, मैं यह सब पसंद नहीं करता अजली। पर अंजली के सिग्य मुख-मंडल पर कोई रेखा न उभरी, केवल एकवार उसकी आँखें ऊपर की ओर उठीं । सफेद सिल्क में वह बड़ी फब रही है। रंग- , m पिपासा ५५ जा विरंगे शंख पाड़ पर अङ्कित हैं-कोई नीला, कोई सफेद तो कोई हरा । आंचल में रंग-बिरंगे फूल-पत्ते अङ्कित हैं । अंजली ने जरा-सा बूंघट काड़ा ही था कि लगा किसी दौड़ते हुए हिरन की पदचाप सुनाई पड़ रही है । यह जङ्गल का हिरन है या मन का, वह ठीक-ठीक समझ न सका । सिर्फ करीव जा कर बोला, तुम्हारा यहाँ इस तरह बैठा रहना अच्छा नहीं अजली । अंजली उठ खड़ी हुई । वोली, चलो। -कहाँ ? -घर । -फिर इवर क्यों? -इधर से एक सीधा रास्ता गया है। ...लेकिन इधर तो जङ्गल है, चलूंगा कैसे ? -~-रास्ता है। --मुझे नहीं दीख रहा है, अंजली । -पास पहुंचने पर देख पाओगे । -लेकिन इवर तो पहाड़ खड़ा है। -खड़ा है, इसलिये तो रास्ता सीवा है । ~मैं इतनी चढ़ाई नहीं चढ़ सकूँगा । ~मैं तो हूँ। ----तुम भी नहीं सकोगी जली। -एक बार देखो तो, सकती हूँ या नहीं। -मुझे साहस नहीं होता। -आओ । इस वार अंजली ने मानो जबर्दस्ती हाथ पकड़ लिया - तुम जीवन भर डरपोक ही बने रहे सुरेश । -तुम तो कहोगी ही। ---तुम्हारे बारे में मैं सब कुछ जानती हूँ सुरेश। तुम कम्पनी के बड़े विश्वासी आदमी हो। -वि.सने पहा -कलकत्ता से आने पर चमन सिर्फ तुम्हारी ही बात करता है । --तुमने कहीं कह तो नहीं दिया कि मैं तुम्हारा परिचित हूँ ? इस प्रश्न का उत्तर न देकर अंजली उंगली दिखाती हुई बोली, वह देखो, पहाड़ की चोटी कितनी सुन्दर दीख रही है। ? पिपासा ५६

सुरेश ने सिर उठा कर देखा।
-कहाँ, तुमने कोई जवाब नहीं दिया?
:- अच्छा सुरेश, तुम जो मुझे छोड़ कर भाग आये थे, तुम्हें कोई कष्ट नहीं
हुआ था
बिलकुल बच्चों जैसा प्रश्न । वह झूठ बोले सकता है, हाँ, बहुत हुआ था ।
-लेकिन ऐसा कहना झूठ होगा | वह बड़ा भला लड़का है, स्वभाव और
चरित्र से वेरी गुड न्वाय । गुड़ ब्वाय का नाम खोने को वह · राजी नहीं था।
उसे याद नहीं आता कि उसके दिल में कितना दुःख था । बोला, अब वह सब
याद नहीं।
हाँ, याद रखने जैसी बात भी तो नहीं।
---तुम मुझे कहाँ ले जा रही हो । इतने घने जङ्गलों को पार कर जाऊँगा
कैसे । पेड़-पौधे इतने घने हैं कि रास्ता नहीं दीखता ।
-डर लगता है ?
--में तो हूँ।
--मैं यहाँ काम से आया हूँ अजली । मुझे जल्दी वापस जाना चाहिए ।
तुम मुझे किस भूल-भुलैया में ले आई।
--डरो नही साहब । वह शहर गया है ।
सुरेश ने चौंक कर उसकी ओर देखा और बोल उठा, क्या मतलब ?
-~-मुझे कह गया है, खास काम से शहर जाना पड़ रहा है, सुरेश साहवं
से कहना बुरा न मार्ने । तुम्हारे नाम एक चिट्ठी छोड़ गया है ।
चमन को इतना साहस नहीं था।
-अब उसका साहस बढ़ गया है। संभल कर चलो, सामने गड्ढ़ा है।
जरा-सा पैर फिसला और हजारों फीट नीचे ।
---नहीं, मेरे पर नहीं फिसलते।
न फिसलना ही अच्छा है।
---लेकिन चमन जानता है कि मुझे कल जाना ही होगा।
----तुम घलना नहीं जानते साहब । कल तुम्हारे नहीं जाने से कुछ बिगड़ेगा
नहीं । यहाँ तुम इच्छानुसार रह सकते है ।
-मुझे बहुत काम है। मेरे नहीं रहने से ऑफिस में बड़ी असुविधा
होगी।

-होने दो न । कम-से-कम एकवार तो वैड ब्वाय वनकर देखो कितना मजा आता है। दोनों चल रहे हैं । पेड़-पौधे, लता-गुल्म जो कुछ सामने आता है, दोनों हाथों से हटा कर आगे बढ़ते जा रहे हैं । कहीं-कहीं पहाड़ इतना सीवा खड़ा है कि वह चढ़ नहीं पा रहा है और अंजली झटपट चढ़ जाती है। जली ऊपर में एक नीले रङ्ग के पेड़ तले बैठी हुई कहती है, क्यों साहब, चढ़ नहीं पा रहे हो, उतर कर साथ ले आऊँ क्या ? -नहीं, मैं खुद चढ़ जाऊँगा। -~-देखो, पाँच फिसलते ही हजारों फीट नीचे । जानता हूँ। नहीं, तुम नहीं जानते । पहाड़ की चढ़ाई तय करना तुम नहीं जानते। सुरेश को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था । उसका हाथ पकड़े वह ऊपर आ रहा है। उसे पता नहीं, अंजली उसे कहाँ ले आयी। उसने देखा, दोनों काफी ऊपर चढ़ आये हैं। वह बोला, अंजली मैं जा रहा हूँ। मेरे न जाने से तुम हिलोगी नहीं। मंजली समझ गयी, सुरेश काफी थक गया है । सुखी आदमी है, कभी शारीरिक परिश्रम नहीं करता । शारीरिक परिश्रम नहीं करने के कारण उसके चेहरे पर अभी तक नौजवान जैसी ताजगी है; हालांकि अन्दर-ही-अन्दर बहुत कमजोर है । अंजली को मजाक करने की इच्छा हुई; लेकिन कर न सकी। क्योकि पुराना संबंध आँखों के सामने तैर गया। उसने सोचा था, इस बार प्रतिशोध लूगी, चमन की बन कर उसके चरित्र को अतल गहराइयों में डुवो दुगी, उसकी गुड व्वायगिरि चूर-चूर कर डालूंगी; पर कुछ न कर सकी । मन में साहन वटोरना चाहा; पर असफल रही । चमन लाल कह गया है, मैं जा रहा हूँ। रात मे वापस आऊँगा, आशा है, अच्छी खबर दोगी। तुम्हारा बैंक दलम और भी बढ़ेगा निर्मला । यही सब सोच कर वह आगे बढ़ आयी है । लेकिन जो कुछ करने से वह मोहित हो सकता है, उसके मन में भूचाल मच सकता है, वैसा कुछ नहीं कर सकी । अव वह चुपचाप उसके आगे बढ़ने का इन्तजार कर रही है। ऊपर आकर सुरेश वोला, सोचता हूँ, कभी लीला को साथ लाऊँगा । बड़ी अच्छी जगह है, उसे काफी पसन्द आयेगी। -~ची जायेगी ! लेकिन मेरी याद आने पर तुम्हें आने की इच्छा नहीं होगी। ५८ मिाना -तुम चमन की पत्नी हो । लोला साथ आये, तो तुम्हें डर क्यों लगता है ? कारण है। एकवार साथ लाकर दिखामोन । -वह कौन-सी लता है अंजली ? -कौन-सी लता ? -~-~-वही जो पीले रंग की है। -तुम गाँव के रहने वाले हो और उस लता का नाम नहीं जानते ? गाँव में सिर्फ वचपन गुजरा है । और फिर हमारे गाँव में आसपास ऐसी लता मैंने कभी नहीं देखी । -स्वर्णलता। ---बड़ी सुन्दर है ।-कह कर आगे बढ़ा और लता का एक टुकड़ा तोड़ - लाया। अंजली बोली, जानते हो, तुम्हारा यह सव वचपना देख कर, अभी लगता ही नहीं कि तुम इतनी बड़ी कम्पनी के उच्चाधिकारी हो । सुरेश ने आँखें बंद कर कुछ सोचा । उसने मुक्ति ही एक गहरी सांस ली। वोला, सच कहती हो अजली, कितने दिनों से मैं मानो आफिस की चहारदीवारी और कलकत्ता के शोरगुल में कैद पड़ा था। इस बार सहज मुक्ति स्वयं सामने आ खड़ी हुई । तुम जब तक कहोगी, मैं रहूँगा ! अव मुझे याद आ रहा है, उस रात सपने में मैं तुम्हारे लिये बहुत-बहुत रोया था । सपने में रोने से प्यार क्या सच्चा नहीं होता, सफल नहीं होता ? । यह सब याद आने पर शांत नहीं रहा जा सकता । वापस आने पर सोच न पायी कि वह क्या करे । सुरेश की बातों में कितना दर्द छिपा है ! वापस आते ही उसने सोचा था, बाथरूम में घुस पड़ेगी। लेकिन सुरेश की आखिरी बातों ने उसे अश्चर्यित कर दिया है। नहीं; अभी कुछ सोचने का समय नहीं है, बहुत काम है । पैनट्रि में बावर्ची क्या कर रहा है ? सुरेश साहब के लिये चिकेन रोस्ट, चिकेन फाइ, ग्रीन पीज, सलाद यानी एकदम अनजी खाना बन रहा है । खाने के बाद एक कप कॉफी चलेगी । खाना तैयार होने में और कितनी देर है, अभी यह सब देखना जरूरी है। वह झटपट उठ पड़ी । यह सव बाद में भी सोचा जायगा। इस तरह सुरेश को इतने निकट पाने का उसे कभी सौभाग्य होगा, उसने सपने में भी नहीं सोचा या । वाथरूम में जाने के पहले एकबार वह पैनट्रि के दरवाजे पर गयी ।

। - । -होने दो न । कम-से-कम एकवार तो वैड ब्वाय वनकर देखो कितना मजा आता है। दोनों चल रहे हैं। पेड़-पौधे, लता-गुल्म जो कुछ सामने आता है, दोनों हाथों से हटा कर आगे बढ़ते जा रहे हैं। कहीं-कहीं पहाड़ इतना सीधा खड़ा कि वह चढ़ नहीं पा रहा है और अंजली झटपट चढ़ जाती है। अंजली ऊपर में एक नीले रङ्ग के पेड़ तले बैठी हुई कहती है, क्यों साहब, चढ़ नहीं पा रहे हो, उतर कर साथ ले आऊँ क्या ? -~~-नहीं, मैं खुद चढ़ जाऊँगा। -देखो, पाँव फिसलते ही हजारों फीट नीचे। जानता हूँ। नहीं, तुम नहीं जानते । पहाड़ की चढ़ाई तय करना तुम नहीं जानते। सुरेश को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था । उसका हाथ पकड़े वह ऊपर आ रहा है। उसे पता नहीं, अंजली उसे कहाँ ले आयी। उसने देखा, दोनों काफी पर चढ़ आये हैं। वह बोला, अंजली मैं जा रहा हूं 1 मेरे न जाने से तुम हिलोगी नहीं। अंजली समझ गयी, सुरेश काफी थक गया है । सुखी आदमी है, कभी शारीरिक परिश्रम नहीं करता । शारीरिक परिश्रम नहीं करने के कारण उसके चेहरे पर अभी तक नौजवान जैसी ताजगी है; हालांकि अन्दर-ही-अन्दर बहुत कमजोर है । अंजली को मज़ाक करने की इच्छा हुई; लेकिन कर न सकी। क्योकि पुराना संबंध आँखों के सामने तर गया। उसने सोचा था, इस बार प्रतिशोध लूगी, चमन की बन कर उसके चरित्र को अतल गहराइयों में डुयो दूगी, उसकी गुड व्वायगिरि चूर-चूर कर डालूंगी; पर कुछ न कर सकी। मन में साहस बटोरना चाहा; पर असफल रही । चमन लाल कह गया है, मैं जा रहा हूँ। रात में वापस आऊँगा, आशा है, अच्छी खवर दोगी। तुम्हारा बैंक चलेस और भी बढ़ेगा निर्मला । यही सव सोच कर वह आगे बढ़ आयी है । लेकिन जो कुछ करने से वह मोहित हो सकता है, उसके मन में भूचाल मच सकता है, वैसा कुछ नहीं कर सकी । अव वह चुपचाप उसके आगे बढ़ने का इन्तजार कर रही है। पर आकर सुरेश वोला, सोचता हूँ, कभी लीला को साथ लाऊँगा । बड़ी अच्छी जगह है, उने काफी पसन्द आयेगी। -चल: आयेगी ! लेकिन मेरी याद आने पर तुम्हें आने की इच्छा नहीं - - होगी। ५८ दिसाना ----तुम चमन की पत्नी हो । लोला साथ आये, तो तुम्हें डर क्यों लगता है ? कारण है। एकवार साथ लाकर दिखाओ न । -वह कौन-सी लता है मजली ? -कौन-सी लता? -वही जो पीले रंग की है। ----तुम गाँव के रहने वाले हो और उस लता का नाम नहीं जानते ? गाँव में सिर्फ वचपन गुजरा है । और फिर हमारे गाँव में आसपास ऐसी लता मैंने कभी नहीं देखी । -----स्वर्णलता। -~-बड़ी सुन्दर है । कह कर आगे बढ़ा और लता का एक टुकड़ा तोड़ लाया। अंजली बोली, जानते हो, तुम्हारा यह सव वचपना देख कर, अभी लगता. ही नहीं कि तुम इतनी बड़ी कम्पनी के उच्चाधिकारी हो । सुरेश ने आँखें बंद कर कुछ सोचा । उसने मुक्ति ही एक गहरी सांस ली । बोला, सच कहती हो अंजली, कितने दिनों से मैं मानो आफिस की चहारदीवारी और कलकत्ता के शोरगुल में कैद पड़ा था। इस बार सहज मुक्ति स्वयं सामने आ खड़ी हुई । तुम जव तक कहोगी, मैं रहूंगा । अव मुझे याद आ रहा है, उस रात सपने में मैं तुम्हारे लिये बहुत-बहुत रोया था। सपने में रोने से प्यार क्या सच्चा नहीं होता, सफल नहीं होता ? यह सब याद आने पर शांत नहीं रहा जा सकता । वापस आने पर सोच न पायी कि वह क्या करे । सुरेश की बातों में कितना दर्द छिपा है ! वापस आते ही उसने सोचा था, वाथरूम में घुस पड़ेगी । लेकिन सुरेश की आखिरी बातों ने उसे मश्चर्यित कर दिया है । नहीं; अभी कुछ सोचने का समय नहीं है, बहुत काम है। पैनट्रि में बावर्ची क्या कर रहा है ? सुरेश साहन के लिये चिकेन रोस्ट, चिकेन फ्राइ, ग्रीन पीज, सलाद यानी एकदम अग्नेजी खाना बन रहा है । खाने के बाद एक कप कॉफी चलेगी । खाना तैयार होने में और कितनी देर है, अभी यह सब देखना जरूरी है। वह झटपट उठ पड़ी । यह सव बाद में भी सोचा जायगा । इस तरह सुरेश को इतने निकट पाने का उसे कर्भ सौभाग्य होगा, उसने सपने में भी नहीं सोचा था। पाथरूम में जाने के पहले एकबार वह पैनट्रि के दरवाजे पर गयी। पियाना ५६ । - -मैं आ रही हूँ अब्दुल, तब तक तुम मांस में मक्खन मिलाओ। यह कह कर वह सीढ़ी वाले कमरे का दरवाज़ा पार कर वालकोनी के उस ओर चली गयी । दरवाजा ठेल कर अन्दर जाते ही शोशे में उसका चेहरा उभर बाया । धूप में घूमने से आँखों के नीचे काला पड़ गया है । वह मानो लंबे अर्से बाद अपने आप को शीशे में देख रही है। शीशे के सामने थोड़ी देर खड़े रहने की इच्छा हो रही है । भली-भाँति चेहरा देखने की इच्छा हो रही है। बाल कपाल पर विखरे हुए हैं । वचपन की भाँति अभी अपने आप से प्यार करने की बड़ी इच्छा हो रही है। शीगे के सामने से हटने की इच्छा नहीं हो रही है। आँखों का आकर्पण कितना दुनिवार होता है ! शरीर का अद्भुत गठन, छाती की गोलाइयाँ, हाथ की मुकोमल मसूण रेखाए जो पानी की रेखाओं की तरह नाचती फिरती हैं, शोशे के सामने खड़ी होकर वह यह सब देख पाती है, अपनी सुन्दरता को समझ पाती है। वह वोली, अपने आप से बोली, नहीं, अभी नहीं । फिर आऊंगी। क्यों, ठीक है न ? अभी अगर खड़ी-खड़ी तुम्हें देखती रही अंजली, तो देर हो जायगी । साहब के पेट में चूहे कूद रहे हैं, समझी । आज उसे बहुत दौड़ाया है । पहाड़ घूम कर आने के बाद अभी उसके पेट में क्या हो रहा है, मैं जानती हूँ उसे बिना खिलाये-पिलाये मैं तुम्हारे सामने निश्चिन्त हो खड़ी नहीं रह सकती बजली । अव में चली। उसने अपने आप से विदाई मांगी। वह बाथरूम से बाहर आ गयी । उसने पैर धोये । हाथ-मुँह धोकर वह अब्दुल के पास आ खड़ी हुई । -~~~-लेटून लाये हो ? ----हाँ, मेम साव। -कहाँ है ? उसने एक टव से लेटूस के पत्ते निकाल कर दिखाये | -ताजा है न? -हाँ, मेम साव। -~~-कितने दिनों से अंग्रेजी खाना नहीं बनाये हो ? ----एक अर्ता बीत गया मेम साव। -साहब बहुत बड़े आदमी हैं । खूब मन लगा कर वनाना। बेहतरीन होगा मेम साब । ६० पिपासा -~~-बहुत अच्छा । यह नया कर रहे हो? "सूर बना रहा हूँ। -हड्डियां निकाल लेना, नहीं तो सूप अच्छा नहीं होगा। -आप वा फर्माती हैं। -~-टमाटर दोगे न? -हाँ। -अच्छा होने पर इनाम मिलेगा! -कौन देगा मेम साव। -सुरेश बाबू देंगे। खुशी से अब्दुल की भौहें थिरक उठीं । बोला, सानासार इनाम पाया है मेम साव । पो धार का जमाना था । हम शिप में सारसा था। - इस बार अंजली एकदम बिगड़ गयी। अब्दुल का यह रचणाम सा गया । अनजी खाना बनाते वक्त वह भग्नेजी मिश्रित उर्दू बोलता इस तरह बोल कर वह प्रमाणित करना चाहता है कि यह तिन बरामग लिये खाना बना रहा है। --मेम साव, हमारे साव का नाम टंडन साव था। -~~-ठीक है, टंडन साहब की कहानी बाद में सुगूंगी । कितनी बार शो गगा चुके हो, सुनते-सुनते कान थक गये हैं । -नहीं मेम साव, आपने तो बस थोड़ा-थोड़ा सुना है, पूगी गुजा नहीं सका हूँ। क्या दरिया-दिल... बस, बस बन्द करो । एक काम करो, उपर का गिलास पानी में • डाल दो। -इतनी जल्दी क्या है मेम साव ? ---जो कहती हूँ, करो। इतना कह कर अंजली अपने कमरे में चली आयी ! अपार माया मोहिनी । - मोहिनी के करीब आने पर बोली, यह हाथी । गल. साहव के बाथरूम में दे पायो। कुछेक क्षण बाद ही मोहिनी घारस आ गयी ! गय बुध माय है बीबी जी। वायत्म दिखा दियामा। बोली थी, बलिय; पर वह बोले घोड़ी देर बाद ।

. क्या कर रहे है? -पलङ्ग पर लेटे हैं। अंजली मन-ही-मन हँसी । सीवे रास्ते से आने के लिये पहाड़ पर चढ़ना पड़ा है। यहाँ रहने के कारण अंजली के लिये पहाड़ पर उतरना-चढ़ना एक खेल-सा बन गया है । जब चमन नहीं रहता है, वह इसी पहाड़ से होकर जङ्गल पार कर झरने पर चली जाती है। उसके बाद करने के पानी से बने निर्मल सरोवर में दो बार रंग-बिरंगे पत्थर फेंकती है। पत्थर फैलने पर जो आवाज होती है, उसे लगता है मानो अतल महराइयों से असंख्य दु.ख एक साथ निकल कर रो पड़े हैं। वह पत्थर की आवाज पर या पत्थर फेंकने से जो पानी में वृत्त तैयार होता है, उसे देख-देख कर अन्यमनस्क-सी हो जाती है। वह तो जानती नहीं कि यह रास्ता किसी-किसी के लिये कितना भयंकर है, कितना दुलंध्य है इतनी सीधी चढ़ाई चढ़ कर सुरेश साहब के हाथ-पांव थक गये हैं। लगता है, यह एक वेजान लाश की तरह पड़ा होगा। समझ रहा होगा कि अंजली अभी भी कितना तेज भाग सकती है । सुरेश साहब की क्या मजाल, जो उसे दौड़ कर पकढ़ ले स्वभावत: मनुष्य जो खोता है, उसे फिर पाना चाहता है, जो दुर्लभ है उसे प्राप्त करना चाहता है। अजली भी यही सब सोच-सोच कर व्याकुल हो । रही है। दायीं ओर वाले बरामदे पर आकर अंजली ने झांका, वह दीखता है या नहीं ! अगर इधर की खिड़की खोली जाय, तो सुरेश को देखा जा सकता है । सभी जानते हैं कि गुन्ग साहव उसके रिश्तेदार हैं, वह चाहे तो अभी उसके कमरे में जा सकती है। उसे अन्दर जाने की बड़ी इच्छा हो रही है। पैताने में चुपचाप टैटे रहने की इच्छा हो रही है। और वीच-बीच में दो-चार बात । लेकिन अभी-अभी वह उसे साथ ले आयी है । अभी-अभी वह उसे छोड़ कर जो कुछ करना था यानी बावर्चीखाना देख आयी है । अभी किस बहाने उसके कमरे में जाय, मन-ही-मन वह कमा संकोच महसूस कर रही है। मानो इतना कुछ उस लाइमवारी आदमी के लिये किया जा रहा है। अभी चमन की बाद भाने पर उसे कोई खुगी नहीं होती। मन घृणा से भर उठता है । वस्तुत: वह जो कुछ कर रही है, भावुकतावश हीं कर रही है। चमन के परामर्ग ने उसे बड़ा छोटा बना दिया है। अगर ऐमा न होता, तो वह जीवन भर मुरेश के साथ घूमती-फिरती । नती, मजाक करती, गप लड़ाती। मुदूर - ६२ पिसासा में जो सव पहाड़ हैं, वहाँ उसे साथ ले जाती और चुपत्राप बैठी रहती। जङ्गल के अन्दर घुसने पर शायद सुरेश डर जाता और उसका भयभीत नेहरा देख कर वह कहती, सुरेश मैं यहाँ हूँ, तुम आबो । पास आने पर कहती, मैं इस पेड़ पर सहारा दिये खड़ी हूँ, तुम घूम-फिर कर अच्छी तरह देख लो। कितनी सुन्दर जगह है। तुम देखोगे, तो यहाँ के प्यार में वन्ध जाओगे। देखो, मैं पेड़ पर सहारा दिये खड़ी हूँ, तुम्हारे साथ नहीं घूम रही हूँ। आश्चर्य ! मुझे तो नींद आ रही है । इस तरह पेड़ पर सहारा दिये खड़ी रहने पर मुझे नींद आने लगती है, बता सकते हो ऐसा क्यों होता है ? लेकिन वह यह सब कुछ भी नहीं कह सकेगी। क्योंकि उसका मन उसे बार-बार कहता है, वह सब कुछ चमन के खातिर कर रही है। यह वात मन में आते ही उसके हाथ-पाँव ढीले पड़ जाते हैं । नहीं सुरेश, मैं सब कुछ भावुकतावश कर रही हूँ। मुझे लगता है, जब तक तुम मेरे पास रहोगे, मैं एक-एक क्षण का उपयोग करूंगी। इस थोड़े समय में ही में अपने जीवन की सारी इच्छाएँ, सारे सपने पूरा कर लूंगी । अपने आप से समझौता करती हुई वह जहाँ-का-तहाँ खड़ी है, हिल तक नहीं पाती। किस तरह सोया हुआ है वेचारा ? क्या पहाड़ी रास्ता तय करने सचमुच में चेहरा धंस गया है ? थकने पर थोड़ा आराम करने के बाद ही वाथरूम जाना चाहिये । वह किस तरह उसके पास जा खड़ी होगी और कहेगी, तुम नहा आओ सुरेश। गरम-ठंडा जो चाहिये, सारा इन्तजाम है । इस तरह सोये रहने से आलसी वन जाओगे | तुम तो हमेशा से आलसी रहे हो। काश, दो मुट्ठी यदि खाने को मिल जाता, तो मुझे इतनी दूर आना ना पड़ता ! वह क्या सव सोच रही है । नीचे, बहुत नीचे पहाड़ी गाँव दीख रहा है । गाँव के छोटे-मोटे मकान देखते ही उसके मन में एक अजीव-सी इच्छा जन्म लेती है। मिट्टी के दो साफ-सुथरे छोटे-छोटे कमरों का घर, पति साइकिल • चलाते हुए आयगा, वह शाम होते ही सज-धज कर दरवाजे पर जा खड़ी होगी और तब तक इन्तजार करेगी जब तक उसका अपना आदमी शहर से वापस न आ जाय । नहीं, इससे ज्यादा और कुछ उसने नहीं चाहा था। लेकिन हाय, भाग्य में तो सिर्फ रोना लिखा था। एक अन्धेरी गली, लैंपपोस्ट पर टेक दिये खड़े पति का चेहरा, और मुंह से निकलती हुई बदबू के अलावा वह और कुछ भी याद नहीं कर पाती । हाँ, कुछ अत्याचार के दृश्य उसकी आँखों के सामने से - - पिपासा ६३ नाच उठते हैं । उसका मारना-पीटना, चीखना-चिल्लाना और अंजली का चू तक नहीं करना । असह्य अत्याचार में भी वह कभी रोयी नहीं थी। पता नहीं अभी यह सब उसे क्यों याद आ रहा है ! वह अपने अतीत को इतनी गहराई में दफना चुकी है कि उसे उभरना नहीं चाहिये । वह एकदम बंगाली स्त्री हो क्यों रह गयी ! चमन के साथ उसने दुनिया देखी है। जरूरत पड़ने पर अकेली भी दिल्ली-पटना जाती रही है । वह चमन की ओर से बड़े-बड़ों के साथ उठी-वैठी है। शराब की पार्टी में शामिल हुई है। शरीर प्रदर्शन में उसने कमाल हासिल किया है। कभी-कभी शीशे के सामने ही अपने आप से पूछती है, तुम कौन हो ? अजली या निर्मला ? वताओ, तुम्हारा असली परिचय क्या है ? चिबुक पर उंगली रख कर बोली है, चुप क्यो हो, वोलती क्यों नहीं ? ओ, संकोच हो रहा है ! वाह री, सती-सावित्री ! ---कह कर निर्मला जोरों से हँस पड़ती है। इस हँसी से चमन बड़ा भयभीत हो उठता है । उसे भय होता है कि निर्मला कहीं हँसती-हँसती पागल न हो जाय । चमन की आवाज तैर आती है छिः निर्मला क्या कर रही हो ! अभी तक वह बेहोश नहीं हुआ और तुम हँस रही हो ! -~में हँस रही हूँ ! -~और क्या कर रही हो ! ज्यानी मैं हँस समाती हूँ ! -हाँ । हँस सकती हो, रो सकती हो, सब कुछ कर सकती हो; पर अभी चुप रहो । शिकार जाल में फंसता जा रहा है। काम हो जायगा। तुम अपनी गलती से बनता हुआ काम न विगाड़ो रानी। -तुम चाहते हो, काम न विगाह ? -अगर उसे पता चल गया कि तुम मेरी पत्नी नहीं हो, तो सब मिट्टी में मिल जायेगा। -और अगर उसे पता चल जाय कि मैं वेश्या हूँ, तव तुम्हारा काम नहीं होगा? -नहीं होगा निर्मला। -~-ठीक है, तब मैं तुम्हारी पनी ही बनी रहूंगी। हाँ, बताओ, अब मुझे क्या करना होगा ? - ६४ पिसासा . 1 -फिर जाओ 1 बातचीत करो । कह दो, वह घर पर नहीं हैं। वापस नहीं आयेगे । विना यह सब कहे, उसे साहस कैसे होगा? --फिर वह मुझ से क्या करेगा ? -करेगा भला क्या ! बड़ा भला आदमी है । -~-नहीं, भला नहीं है । वह मुझे चिवा-चिवा कर खायेगा । -ओफ्फो निर्मला ! -तुम मुझे धमका रहे हो ? ----निर्मला चमन पर अपनी आँखें जमा देती है। चमन आँख मिलाने का साहस नहीं कर पाता है। किसी तरह कह पाता है, नहीं, मैं धमका नहीं रहा हूँ । ठील नहीं हो सकेगा और क्या ! नहीं होने से क्या होगा ? ---इतना बड़ा लाइसेन्स हाथ से निकल जायेगा । गुरन सिंह मजा लूटेगा ! -~~-गुरन सिंह ? -और नहीं तो कौन ? -फिर मजा लूटने आया है ? -~~-यही तो सुन रहा हूँ। --हाय, कितनी मिठास है तुम्हारी बोली में चमन ! तुम्हें विना चूमे मैं नहीं जाऊँगी। -चूम लो भाई। और फिर वही लड़खड़ाते कदमों की हल्की-हल्की आवाज, पायल होने जैसी हल्की आवाज सुनायी पड़ती है । इस तरह की आवाज करती हुई कितनी आसानी से यह युवती अपने आप को हार सकती है । हरा सकती है । --चूम खाने की टेविल पर सुरेश बोला, मैं तुम्हें देख रहा था । -कहाँ ? -तुम बालकोनी पर खड़ी-खड़ी क्या सोच रही थी ? ...-कब? यही करीव ग्यारह बजे । -सोच रही थी तुम्हें बुलाने तुम्हारे कमरे में जाऊँ या नहीं। तुम नहाने नहीं जा रहे थे। मोहिनी ने आकर कहा था कि तुम सोये हुए हो। ....काफी थक गया था। - पिपासा ६५ -~-मैंने नहीं सोचा था कि इतनी-सी चढ़ाई चढ़ने पर तुम इतना थक जाओगे। -~-आदत नहीं है न । -कह कर उसने देखा, अब्दुल साना लगा रहा है। उसने पगड़ी वांगी है। कमर में तमगा है । ग्रीन पीज, सेंड विच, वेजिटेवल राइस, फिस चाप और सलाद । रंग-बिरंगे चीनी मिट्टी के वर्तन । --यह सब क्या हो रहा है ! -~-क्या हो रहा है ? -तुम तो मुझे एकदम साहब वना रही हो । -चमन अक्सर तुम्हारी पार्टियों की चर्चा किया करता है। - - -उस समय तो तुम्हें सुरेश साहब के रूप में जानती थी । तुम अपना वही सुरेश हो, कापुरुप सुरेश, भला क्यों कर जानती ? सुरेश जानता है कि अंजली यह सव मजाक में कह रही है। फिर भी इस मजाक में एक तीखा व्यंग्य छिपा है । वह समझता है और समझने के कारण ही हाथ में चम्मच लिये चुप बैठा है । अंजली पुनः किंचित सहज होकर बोली, चमन मुझ से कह गया है, चमन साहब का लंच साहबों जैसा होना चाहिये । -ऐसा कहा है ! -हाँ । बोला है, दोपहर में चावल खाने से उन्हें दफ्तर में नींद आती है। -मो तो है । लेकिन मुझे यहाँ छोड़ कर वह तो काम पर निकल गया । आज मेरी ऑफिस कहाँ है ? और फिर तुम्हें तो पता है न कि भात-दाल, मछली मुझे कितना पसन्द है ! यह सव मैं उतना पसन्द नहीं करता। अंजली वोली, तुम्हें तकलीफ होगी? तकलीफ भला क्या होगी ! चमन ने तो मेरा पूरा दिन बेकार कर दिया है। भात-दाल और मछली खाकर आराम से खर्राटे भरता । यह सब खाने पर नींद नहीं आयेगी । छुट्टी का दिन भी ऑफिस का दिन प्रतीत होगा। ~~~~यह कह कर नुरेश जोरों से हँस पड़ा। अंजली वोली, तुम अब पहले जैसे नहीं रहे मुरेश । मुरेदा चम्मच से थोड़ा-थोड़ा मूप ले रहा है । नैपकिन नीचे है। अब्दुल बाहर खड़ा है । सुरेश कोई उत्तर नहीं दे रहा है। अंजली बार-बार एक बात रह रही है। पहले जैसा कोई नहीं रहता। अब चेहरे पर कर्त्तव्य की छाप ६६ पिपासा - , -- दीखती है । अव अगर वह पहले जैसा होता, तो इतनी बड़ी कम्पनी का इतना बड़ा जिम्मेदार पदाधिकारी नहीं हो सकता । यही जो वह यहाँ बाया है और चमन उसे यहाँ छोड़ कर चल दिया है, कोई और समय होता, तो पता नहीं क्या कर बैठता । लेकिन अंजली से कितने दिनों बाद मुलाकात हुई है ! शायद फिर कभी मुलाकात नहीं होगी। क्योंकि अंजली का स्वभाव है अनात रहना । इसलिये वह कुछ नहीं बोल रहा है। हालांकि मन-ही-मन अपने आप को कोस रहा है और शायद उसका ऐसा चेहरा देख कर ही अंजली समझ रही है कि अब वह पहले जैसा नहीं है । वह तो मानो पूछना तक भूल गया था, अब पूछ रहा है, तुम मेरे साथ खाने नहीं बैठी ? कब खाओगी? बाद में खाऊँगी। '-क्यों, मेरे साथ खाओ न । -~-चमन कुछ सोच सकता है । सुरेश एकदम ठंडा पड़ गया। सच ही तो, वह किस प्रकार ऐसी बात मुंह से निकाल सका । बोलने के पहले उसने एकवार भी नहीं सोचा कि ऐसी बात कहनी चाहिये या नहीं। अंजली चमन की पत्नी है । चमन की अनुपस्थिति में उसे ऐसा अनुरोध नहीं करना चाहिये। हालांकि सुवह इस तरह की बात उसके मन में एक बार भी नहीं आयी थी। मन में नहीं आयी थी; क्योंकि अंजली ने ऐसा सोचने का अवसर ही नहीं दिया था। सुरेश चुपचाप खाये जा रहा था । दो-चार बात की, जो बोलना जरूरी है । वह पकड़ा गया है। रक्षा पाने के निमित्त वोला, तुम्हारी सेहत यहाँ अच्छी रहती है न ? हाँ, देख ही रहे हो। ---देख रहा हूँ; फिर भी हमें कुछ बोलना चाहिये अंजली । ---लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि तुम से और क्या बात करूं। ----तुम वड़े कापुरुष हो सुरेश । और कितनी वार कहोगी ? क्यों न कहूँ ? तुम तो कह सकते थे, चमन घर पर नहीं है, साथ खाने से कुछ नहीं होगा। ---तुम ने मुझे ऐसा क्यों कर सोच लिया.? अंजली समझ गयी, मजाक कुछ तीखा हो गया । मजाक तीखा हो गया या वह और कुछ सोच रहा है ? वह क्या स्वेच्छा से ऐसा कर रही है, वह क्या उसकी बन कर कुछ नहीं कर रही है, या अपने लिये कर रही है ? . - ? A ? पिपासा ६७ .. अंजली वोली, सुरेश, तुम्हें चोट पहुंचेगी, नहीं जानती थी। दरअसल वात क्या है जानते हो, हम दोनों की बात कब की खत्म हो चुकी है। यही कारण कि हमें बात करने को कुछ भी नहीं मिलता। इसलिये हम बना-बना कर बातें करते हैं। खाने के बाद काफी की चुस्कियाँ लेते हुए सुरेश बोला, शायद ऐसा ही होगा। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिये था । तुमने मुझे वचन दिया था। दिया था। -तुमने कहा था कि मुझ से शादी करोगे । कहा था। -तुम ने कहा था कि मुझ से शादी करोगे; पर तुमने मेरी दुर्बलता का नाजायज फायदा नहीं उठाया था। तुम ने मुझे पवित्र रखना चाहा था। -हाँ, चाहा था। ----फिर तुम एक सामान्य भय से भयभीत होकर क्यों चुप हो रहे सुरेश ? -धीरे-धीरे अजली, अब्दुल वरामदे पर है । -~-सुने, हर कोई सुने । मुझे अब कोई डर नहीं है। अब मैं सारी दुनिया को ढिढोरा पीट कर बता सकती हूँ, एक आदमी ने हमेशा मुझे सतीसाध्वी बनाये रखना चाहा है । अभी भी वह मुझे पवित्र बनाये रखना चाहता लेकिन सुरेश तुम विश्वास करो, अव मुझ में कुछ नहीं है। मैं एकदम क हूँ| -~-कह कर वह एक विचित्र हँसी-हँसी । जवर्दस्त नाटक हो । सुरेश । तुम्हारा खाना हो चुका, जाओ आराम करो। -और कुछ न कहोगी? -नहीं। जैसा नाटक तुमने किया है, वैसा मैंने भी किया है। सारी न सका हूँ। क्यों मारी मुलाकात हो गयी ! तुम यदि दर्शक रात मुझे एक क्लाउन के अलावा और कुछ न समझती। -~~मैं अकारण झूठ नहीं बोलता। फिर दोनों चुप । दीवारों पर महापुरुषों की तस्वीर । तस्वीर देख रहा है । पास ही एक कुर्सी पर सिर झुकाये उसके बालो की सुगंध सुरेश को मिल रही है । वह ' ६८ पिपासा इसलिये उसके कंधों की कोमल त्वचा सुरेश को आकुल बना रही है। ऐसा लगता है कि अंजली सिर झुकाये आँसू बहा रही है । ठीक-ठीक समझ में नहीं आता कि वह इस तरह सिर झुकाये क्यों बैठी है। रोने की आवाज सुनायी नहीं पड़ती। इस तरह सिर झुकाये बैठे रहने का और क्या कारण हो सकता है, नोचते ही ऐसा प्रतीत हुआ कि कहीं बारिश हो रही है। आसमान के छोटे- छोटे मेघ कहीं वारिश कर रहे हैं। कमरे की निस्तब्धता भंग करने के उद्देश्य से सुरेश इस बार बोला, मेरी बड़ी इच्छा थी कि एक दिन तुम्हारे साथ जाऊँ । बुआ जी कभी भी हम दोनों को एक साथ खाने नहीं देती थीं । तुम्हें इस बात का बड़ा दुःख था । अजली पूर्ववत् मुंह मुकाये बैठी है । लगता है, अन्यमनस्क हो गयी है । पाँव के नाखून से फर्श पर लकीर खींचने की कोशिश कर रही है। शायद अन्यमनस्कता के कारण ही समझ नहीं पाती कि यह मिट्टी नहीं, बल्कि पत्थर है। मन के अन्दर का मिट्टी जैसा नरम मंश कब का कठोर हो चुका था, आज पुनः पुरानी बातें याद आने पर आर्द्र होता जा रहा है । -क्या हुआ, कुछ वोलती क्यों नहीं ? -बताओ, क्या वोलू ! - कुछ भी। - -बाल-बच्चे होते, तो उनके विषय में बात की जा सकती। -सर्दी में यहाँ कौन-कौन-सा फूल खिलता है ? अंजली जानती है, यह महज बात करने के लिये बात है। फिर भी उसे थोड़ी राहत मिली । मुंह उठाते ही सुरेश कहीं देख न ले, यह सोच कर यह इस तरह मुंह पलट कर उठ खड़ी हुई कि सुरेश उसका चेहरा न देख सका। अंजली जब वापस आयी उसके चेहरे पर पानी की बूदें झिलमिला रही थीं। बात करती-करती बड़े मोहक अन्दाज में आंचल से उसने अपना चेहरा पोंछ लिया। अब वह एकदम सहज दीख रही है। - सर्दी में यहाँ रंग-बिरंगे गुलाब खिलते हैं। -तुम्हारे वाग में काला गुलाव है ? -यह क्यों पूछ रहे हो? यूं ही । सुना है, काला गुलाव रेवर ही देखने को मिलता है । इसलिये पूछ रहा था। चलो, बाग में चले। अपनी आँखों से सब कुछ देख लेना । काला पिपामा ६६ - गुलाव है; पर खिलना नहीं चाहता। एक बार एक कली हुई थी; पर ओला पड़ने से टूट गयी । खिल न सकी । -गुलाब तो मैंने आस्ट्रेलिया में देखा था। कम्पनी की ओर से एक कानफरेंस में में मेलबार्न गया था। सात-आठ दिन था। मुझे मुफस्सिल में टिकाया गया था। शहर ट्रेन से जाना पड़ता था । जहाँ तक मुझे याद है, उस जगह का नाम एरोवेल है । मकान लकड़ी के हैं । नीले रङ्ग की खिड़कियाँ और रेलिगं पर लाल, पीले और सफेद गुलाब । उन लोगों ने गुलाब की इतनी अच्छी खेती किस तरह सीखी ! अंजली उठ खड़ी हुई । सुरेश भी उठा । दोनों कारिडार से गुजर रहे है । सुरेश समझ रहा है कि अंजली उसके करीब रहना चाहती है। जब तक इस तरह रह सके । उसने एक प्रिटेड साड़ी पहन रखी है । साड़ी पर पूल और पत्ते अङ्कित है । पीठ पर रंग-बिरंगे फूल-पत्ते दीख रहे हैं। पाँव में आलता लगाने के कारण उसके पाँव भी लाल हैं । ओठों पर नाममात्र का लिपस्टिक । दोनों ओठ काफी सुन्दर दीख रहे हैं । वह चूंकि मुंह धो कर आयी थी; इसलिये ओठों का रङ्ग कुछ हल्का पड़ गया है । फिर भी दोनों तरफ को प्लास्टिक कलर दीवारे, दीवारों पर किये गये विभिन्न प्रकार की कारीगरी महोगनी के कीमती फर्नीचर की गंध, और पीतल के गमले में लगे कीमती मनी प्लांट ने अंजली को एक रहस्यमयी नारी बना रखा है । वह इस महल की महारानी है। उसकी एक आवाज पर नौकर-नौकरानियों की भीड़ लग जाती है। चलते-चलते सुरेश बोल उठा, तुम्हें शायद इस तरह मैं नहीं रख पाता अंजली। --तुम ने तो फूल देखोगे; फिर यह सब बात क्यों ? अधिकता देख कर पता नहीं मुझे क्यों यह कहने की इच्छा हुई। -तुम इतने बड़े आदमी हो; फिर भी सिर्फ अधिकता देख कर निर्णय देबठे। ---त्रियों के लिये क्या यही सब कुछ है । -किसने -महापुरुपों ने । -महापुरुषों ने ठीक नहीं कहा है। - हम साधारण आदमी है, हम महापुरुपों का ही अनुसरण करते हैं। - तुम लोग कर सकते हो, मैं न करती हूँ, न किया है। क्योंकि वे लोग बहुत सारी बात झूठ बोल गये हैं। जाते-जाते मुरंदा ने एक बार पलट कर अंजली की ओर देखा। अजली कहा था कि - -- कहा ! , ७० पिपासा है समझ रही है कि सुरेश उसे देख रहा है। वह जितना देख रहा है, अंजली मन-ही-मन उतना खुश हो रही है। उसका आकर्षण कोई कम नहीं है, समझ कर बोली, दो-चार दिन नहीं रह सकते ? -रहने की इच्छा तो थी; पर चमन जिस तरह सेवा-सत्कार कर रहा कि रहने को मन हामी नहीं भरता । -रह जाते तो ये सारे पहाड़ धुमा-फिरा कर दिखाती । पहाड़ों पर इतने रंग-बिरंगे पक्षी हैं जो समतल मैदान में नहीं दीखते । उन पक्षियों का कोई नाम तक नहीं बता सकता । आदिवासी उन पक्षियों के नाम जानते हैं। हमलोग भी उन्हीं नरमों से पुकारते हैं। क्षण भर रुक कर बोली, तुम्हें पक्षी दिखाने का मुझे बड़ा शौक था। -और कभी आकर देखूगा। -तुम फिर नहीं आओगे सुरेश । तुम मुझे झूठी आशा दे रहे हो । ---शायद बाऊँगा । लेकिन तुम्हारे पास नहीं । चमन कुछ सोच सकता है । मुझे जगह काफी पसन्द आयी है । कहा नहीं जा सकतर, यहाँ एक करटेज भी वनवा सकता हूँ । छुट्टियाँ यहाँ आकर विताऊँगा । -ऐसी जगह और तुम्हें कहीं न मिलेगी। मेरे सारे दुःख इन पहाड़ों की गोद में धुल गये, सारी ग्लानि गल गयी । पहाड़ मनुष्य को भिन्न-भिन्न प्रकार से सान्त्वना देते हैं। चारों तरफ हरियाली-ही-हरियाली दीखती है। ऊँचे- नीचे वलखाते पहाड़ी पथ, छोटी-छोटी पहाड़ी चोटियाँ और रंग-बिरंगे पेड़- पौधे हमेशा एक आकर्पण दृश्य की सृष्टि किये रहते हैं। चारों तरफ अतुलनीय सुपमा, प्रकृति की अपार महिमा देखने को मिलती है । -कहकर अजली ने जीभ काट ली। ---तुम्हारे सामने मैं भापण दे रही हूँ । अव तुम्हें थोड़ा विश्राम करना चाहिये । तुम्हें कष्ट देना अच्छा नहीं । सच। -~~हाँ, मैं ऐसा ही समझती हूँ। -ठीक है, तीसरे पहर फिर मुलाकात होगी। , तीसरे पहर सुरेश ने देखा, चमन लौट आया है। चमन की सफेद गाड़ी नीचे खड़ी है और आउट हाउज़ के पास दो कर्मचारी खड़े हैं। दोनों चमन की गाड़ी के निकट हैं । दरवान भाग कर गाड़ी का दरवाजा खोलता है। जिस पिपासा ७१ + कमरे में सुरेश रहता है, उसके पास एक छोटा-सा पाइन का पेड़ है। नींद टूटने पर वह पाइन के पेड़ तले आ खड़ा हुआ था। चारों तरफ धूप विखरी हुई है--सुनहली धूप । हवा ज्यादा ठंडी नहीं है। मखमली घास और पहाड़ों की सुन्दरता देखने लायक है। ऐसा लगता है, कोमलता मानो साकार हो उठी है, सुपमा सजीव हो उठी है। खड़े-खड़े वह यही सब देख रहा था और अंजली के एक सामान्य अनुरोध “दो-चार दिन नहीं रह सकते" पर विचार कर रहा था । अजीव वात है, यहाँ आने पर मानो वह अपनी जिम्मेवारियाँ भूल गया है। एक कैसा आलस्य उस पर छा गया है । लीला या इतु की याद तक नहीं आती। उन्हें छोड़ कर वह कभी भी ज्यादा दिन अकेले नहीं रहा है। शादी के बाद कान्फरेंस के सिलसिले में दो- चार बार बाहर जाना पड़ा है। फिर भी ज्यादा दिन वाहर नहीं रहा है । ज्यादा दिन होने पर लीला के सामने दुनिया भर का बहाना बनाना पड़ा है, तब कहीं छुटकारा मिला है। हालांकि यहाँ आने पर लीला और इतु की याद भी नहीं आती। वे तो उसके जीवन में एक नियम-सी बन गयी हैं। वह जानता है कि चमन इसी बीच अपना सब कुछ ठीक कर आया है। आज अनियम में पड़ कर भी उसे अच्छा लग रहा है । मानो बहुत दिनों बाद वह अनियम का खेल खेल रहा है और बढ़ जायेगा । मुबह उठते ही अखबार चाटना, साबुन, सेविंग क्रीम और स्नान । स्नैक्स खाकर वाहर निकल पड़ना । गाड़ी के अन्दर एक नीरस जीव वना रहना । आफिस में गम्भीर बना रहना । फाइलों की खोज-खवर, रेट और कास्टिंग में पूरा दिन गुजर जाना । खिड़की खोलते ही वह समझ जाता है कि नदी के उस पार कल-कारखानों की चिमनियों के अन्दर दिन का सूरज डूता जा रहा है, उसकी पत्नी लीला ने अव सजना-पंचरना शुरू कर दिया है. इतु को मजा-धजा कर आया मुख्य सड़क पर या किसी पार्क में घुमाने ले जा रही । ये सारे काम जव नियम-सा बन जाते हैं, तब अच्छा नहीं लगता। या अच्छा नहीं लगता का आभास उसे यहाँ आने पर मिल रहा है। यहाँ खड़ा होकर पहाड़ की चोटियों पर पक्षियों का कलरव मुनना उसे अच्छा लग रहा था। 'अच्छा नहीं लगता था' कहना गलत होगा, यह एक विचित्र आकर्षण में फंसता जा रहा था। वह जानता है, अंजली भी अभी बालकोनी पर खड़ी-खड़ी पुरानी बातें याद कर कष्ट पा रही है । या वह भी पक्षियों का कलरव मुन रही है। चटपट कुछ - । ७२ पिपासा - में में - और भी सोच रहा था, जङ्गल में भिन्न-भिन्न प्रकार के पक्षी हैं। यदि वह और अंजली जाये और जङ्गल में चिड़िया खोजते फिरें तो क्या बुरा है ! गुबह- ही-सुबह दोनों निकल पड़ेगे । खाना साथ रहेगा । पानी रहेगा । दिन भर पहाड़ों पर घूम करा शाम से पहले वापस आ जायेंगे । यह सब सोचते-न-सोचते याद हो आया, अंजली चमन की पत्नी है । गुबह चमन को विना बताये अंजली एक गलत काम कर बैठी है, फिर ऐसा होने पर बड़ा बुरा होगा और इसमें उसका दिल भी गवाह न देगा । फिर भी मन-ही-मन वह ऐसा क्यों सोच रहा है कि इन पहाड़ों में एक सुन्दरी युवती होगी, फूल-पत्ते अद्धित रेगमी साड़ी में वह सिमटी होगी । पांच में आलता होगा, ऊँचा जूड़ा होगा । और कोई छोटा-सा अनजान सोता पार करते वक्त उसकी चञ्चलता वह खो जायेगा ! वह ऐसी कल्पना कर ही रहा था कि देखा, चमन वापस आ रहा है ! उसकी गाड़ी मिशनरी हास्पिटल की बगल से भागती आ रही है । कालेज के टावर का घंटा बज रहा है-तीन, चार, पांच । घंटे की आवाज के साथ-साथ उसके हृदय एक अजीव-सी आग धधक उठी, करीव पानी की इ.या से वह छटपटा उठा और ठीक उसी समय आउट हाउज के पास चमन की विशाल गाड़ी धच से ककी । दरवान दरवाजा खोल रहा है । दोनों कर्मचारियों से वह कुछ कह रहा है। दोनों थैले में नीचे से कुछ उठा कर ला रहे हैं । उठाने में बड़ी सावधानी वरती जा रही है। दूर से चमन ने देखा, सुरेश पाइन के पेड़ तले खड़े हैं । सुरेश साहब को देख कर वह मुस्कराया और हाथ हिलाया । अभी उसे देख कर ऐसा लगता है कि वह सारी दुनिया विजय कर आया है । पास आते ही थैले से एक बहुत बड़ी रोहु मछली निकाल कर बोला, निर्मला की बड़ी इच्छा है, आपको मछली खिलाये । यहाँ आसपास में मछली नहीं मिलती। सुबह-सुबह अच्छी मछली की तलाश में निकल पड़ा था। मछली की तलाश में उसे कहाँ-कहाँ भटकना पड़ा है, यानी चमन और उसकी पत्नी सुरेश साहब को खुश करने के लिये क्या कुछ नहीं कर सकते, जान की वाजी तक लगा सकते हैं। यह सब जान कर सुरेश बोला, लेकिन चमन मेरे हाथ में समय बहुत कम है और काम कुछ न हुआ । तुम चले गये। --में नहीं गया साहब, निर्मला ने मुझे जबर्दस्ती भेज दिया । अन्छी मछली न होने पर तुम और किसी को भेज सकते थे । । ...

। सर, -उन लोगों की बात छोड़िये । वे बहुत करने, तो नालिपोता तक जाते । वहाँ की एक पहाड़ी नदी में कभी-कभार मछली मिल जाती है। नहीं मिलने पर वापस आ जाते। ---और फिर यह सब करने की जरूरत ही क्या है। मैं आफिस के काम से आया हूँ। तुम अगर इतना कुछ करने लगोगे, तो बड़ा बुरा दिखेगा। चमन को पता है कि सुरेश साहव बड़े कड़े आदमी हैं । मुंह पर साफ-साफ बोल देते हैं। किसी को वह नहीं छोड़ते । चिकनी-चुपड़ी बात करना तो वह जानते ही नहीं, मन-ही-मन गुस्सा जायँ, तो बचने का कोई उपाय नहीं । यह सोच कर वोला, आप बुरा मानेंगे तो निर्मला को बड़ा दुःख होगा। सुरेश को कभी-कभार क्या हो जाता है ! कुछेक क्षण पहले भी वह सोच रहा था, एकवार वह पहाड़ पर जायेगा, रंग-बिरंगी चिड़िया देखेगा, अंजली साथ होगी। मंडानुमा कीमती सफेद गाड़ी पहाड़ी रास्तों पर भागी जा रही है । दोनों किनारे असंख्य पेड़-पौधे और कीड़े-मकोड़े की गूंजती आवाज । वह गाड़ी चलायेगा या अंजली यदी गाड़ी चलाना जानती होगी, तो वहीं गाड़ी चलायेगी। कितने सारे आकर्षक दृश्य मन में तैरते रहते हैं। उस समय अपना एक और व्यक्तित्व दौड़ाता-फिरता है। चमन के वापस आते-न-आते ऐसा व्यवहार कर बैठा मानो वह चमन के व्यवहार से कितना नाराज हो गया है । और बोलते वक्त थोड़ा मुस्करा कर अपने व्यवहार पर कोमलता ढालनी चाही है । थोड़ा हल्का करने की जरूरत है। और जरूरत समझ कर ही बोला, फिर कभी छुट्टी लेकर आऊँगा, उस समय जितना जी चाहे खिलाना-पिलाना । -आप नहीं आयेगे सर । ----क्यों नहीं आऊँगा? -~-आप बड़े व्यस्त आदमी हैं। -छुट्टियों में भली कैसी व्यस्तता ! -आप लोगों के हजारों काम हैं। -~-ठोक है. काम रहने पर भी आऊँगा। ---अव मेरे लिये तुम इतनी चिन्ता न करो। जो हाथ में बैग लिये आ रहे थे, चले गगे। सुरेश बोला, तुम इतनी तकलीफ भेल कर यह मव लाये हो, और मैं तुम्हें डांट रहा हूँ। मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है । कह कर वह जोरों से हँस पड़ा । शायद सुरेश ने सोचा, चमन ने चाहे जो कुछ किया हो, वह यहाँ जिस भी ७४ पिपाता - काम से आया हो, सबसे बड़ी बात यह है कि चमन कम्पनी का कस्टमर है । उसे भी खुश रखना होगा। हालांकि उसकी कम्पनी का कोई योग्य प्रतिद्वन्द्वी नहीं है, सभी कस्टमर कम्पनी की खुशामद करते हैं। फिर भी व्यवसायिक नियम के अनुसार चमन के प्रति कड़ा व्यवहार आपत्तिजनक है। -यह सव सोच कर ही वह कहकहा मार कर हँस पड़ा । सुरेश साहब के प्रति चमन में जो सामान्य भय था, ऐसी हँसी सुन कर वह टूट गया । चमन उसकी हँसी का साथ देता हुआ हँसते-हँसते चला गया । सुरेश अपने कमरे में वापस आ गया। थोड़ी देर बाद ही मोहिनी आयी । बोली, चाय पर चमन लाल जी आपका इन्तजार कर रहे हैं । यानी चाय पर अन्दर बुलाया गया है। उसने ट्राउजर पहना ! सफेद बुशर्ट और चपल पहन कर शीशे के सामने जव खड़ा हुआ, देखा मोहिनी तब तक नहीं गयी है । दरवाजे पर खड़ी है। चेहरा पर कृत्रिम गंभीरता देखने के लिये शीशा देखना वड़ा कष्टप्रद होता है । शीशा में मोहिनी ने उसका मुंह देख लिया है । यह उसे अच्छा नहीं लग रहा है। उसकी कमजोरी पकड़ सकती है, सोच कर वोला, तुम जाओ, मैं आ रहा हूँ। साथ लिवा जाने को कहा है। -ओष्फो! उसने थोड़ा क्रीम चेहरे पर मला । सर्दी के कारण सारा शरीर वड़ा रूखा- रूखा-सा लगता है । क्रीम लगाने से चेहरा कैसा नरम और सजीव हो उठा ! दिन में सोने के कारण आँखों के नीचे थोड़ा सूज-सा गया है। अब चमन उसे देखते ही समझ जायेगा कि वह केवल रूखा-सूखा आदमी नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर भी कमनीयता है, आफिस के सुरेश साहब और इस सुरेश में जमीन- आसमान का फर्क है। मन में चञ्चलता होने के कारण बाहर निकलने से पहले सुरेशं थोड़ा गंभीर बन गया। मोहिनी आगे-आगे जा रही है । वगीचे का फौवारा अभी उतना तेज नहीं है। यहाँ चमन ने किस तरह इतना सुन्दर फौवारा वनवाया है ! दिन ढलने पर पानी उतना ऊपर नहीं उठता । तीसरे पहर की पीली पृथ्वी की तरह फौवारा का चेहरा भी विषाद से पीला हो उठता है । चलते-चलते वह ऐसा महसूस कर बालकोनी के इस तरफ पहाड़ सीधा खड़ा है । रेलिंग पर खड़े होने से नीचे देखा नहीं जाता । सिर चकराने लगता है । ऐसा लगता है कि कोई पीछे पिपासा ७५ । , - से ठेल रहा हो । वह बालकोनी तक पहुँचा ही था कि चमन उठ खड़ा हुआ । -मैंने झटपट बाथरूम का काम पूरा किया। मोहिनी आपको बुलाने गयी। मेरी प्रतीक्षा न कर निर्मला ने मोहिनी को भेज दिया था। खुद न जाकर मोहिनी को भेज कर उसने गलत काम किया है, उसके व्यवहार से ऐसा ही आभास मिलता था । काम की हुई बेत की कुर्सियाँ । बीच में बेत की तिपाई। नीले रङ्ग की तीन कुर्सियों के सामने तीन तिपाई । साफ पता चलता है कि निर्मला उनके साथ चाय लेगी। निर्मला रेलिंग के पास बैठेगी, इसलिये उसकी कुर्सी रेलिंग के विलकुल करीव है । चाय आयी; पर निर्मला नहीं आयी। चमन बुलाने गया; फिर भी नहीं आयी। सुरेश को बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि चाय पर अंजली क्यों नहीं आती ! एक साथ चाय पीने में उसे इतनी शर्म क्यों आ रही है ! दोपहर में पास बैठ कर उसे खिलाया है। हाँ, उस समय चमन नहीं था। चमन के न रहने पर उसे साहस होता है, खुल कर चल-फिर सकती है। और चमन के सामने वह एकदम परदानशीन बन जाती है सुरेश साहब को इन्तजार करने कह कर चमन अन्दर गया। ऐसा लगा कि वह अजली से यहाँ आने का अनुरोध कर रहा है। सुरेश को बड़ा आश्चर्य हुआ। दोपहर के समय उसे खिलाने में अंजली का आःह याद कर वह मन-ही- मन हँसा । उसे लगा, अंजली सब कुछ चमन से छिपा कर करती है । पता नहीं क्यों अंजली पर उसे बड़ा गुस्सा आया। चमन चाहता है, परिचय हो, घनिष्ठता हो । और फिर वह भी तो जानती है कि चमन उसे कई बार कह चुका है, निर्मला रवीन्द्र सङ्गीत में दक्ष है । फिर अजली यहाँ आने से इतना डर क्यों रही है ? उसने सोचा मौका मिलने पर अकेले में पूछेगा। चमन वापस आकर बोला, नही आयी । अचानक तबीयत खराव हो गयी है ! झट गुस्सा उठना सुरेश का स्वभाव है । वह मानो चीख पड़ना चाहता था, तुम्हारी पत्नी एक अच्छी-खासी अभिनेत्री है चमन । वह सब कुछ कर सकती है । लेकिन वह चीखा नहीं; बल्कि चाय की चुस्की लेकर शांत स्वर में बोला, आज रात जोरों की सर्दी पड़ेगी। सुरेश का इतना कहना था कि थोड़ा भुक कर चमन बोल उठा, सर कुछ और न सोचे, तो इस सर्दी में जमेगा बड़ा अच्छा। सूरेग समझ गया कि. चमन क्या कहना चाहता है। वोला, मैं तो इन चीजो से दूर हूं चमन । ७६ पिपासा चमन का चेहरा थोड़ा मुरझा गया । यही वह काला-बालटा है। टिंगना कद । चर्वी का बाहुल्य । सामने वाले दो दाँत सोने में बंधे होने के कारण उसके हसने या महम जाने का पता नहीं चलता। साही के कांटों जैसे बड़े बाल । आवश्यकता से अधिक तेल लगाने का स्वभाव होने के कारण माथे के बीच में पीतल की चकती जैसा चाँद चमकता रहता है। मोटा बेल्ट लगाने के कारण पेट का स्थूल अंश सामने आ जाता है और इससे वह और भी गिना दीखने लगता है। इतना कुछ करने पर भी अंजली उसके साथ बाहर निकलना पसन्द नहीं करती। चमन बोला, निर्मला बड़ी शौकीन लड़की है, एकदम अप-टू-डेट और मैं ठहरा गंवार । इसलिये मेरे सामने आने में शर्माती होगी। सुरेश ने कहना चाहा, यह तो कोई ठीक बात नहीं । लेकिन वह कुछ बोला नहीं, चुप रहा । यहाँ वह एक पदस्थ व्यक्ति है । अंजली जो उसकी अपनी है, बहुत अपनी, चमन नहीं जानता। निश्चय ही अंजली ने यह सब नहीं बताया होगा। अगर वह बता देती, तो वह बड़ी मुश्किल में फंस जाता । जान लेने पर चमन उससे नाजायज फायदा उठाने की कोशिश करता। बीच-बीच में उनके मन में ऐसी शङ्काएँ उठती रही हैं। इस पहल पर विचार कर मन-ही-मन अंजली की प्रशंसा कर रहा है। लेकिन अजली चिड़िया दिखाने ले जायगी बोली थी, समझ में नहीं आता अव यह कैसे होगा । और इधर अंजली अपने कमरे में फफक-फफक कर रो रही है। क्यों रो रही है, वह खुद भी नहीं समझ पाती । चमन ने नाना रूप में उसका उपयोग किया है । चमन और भी कई रूप में उसका उपयोग करेगा, या चमन अवतर जैसा कहा करता है, आकर कहेगा, साहब को रवीन्द्र सङ्गीत सुनाओ। निले वह सुनायेगी ! वह तो अपने आप में है नहीं। फिर भी उसे हमेशा अभिनय करना होगा कि वह चमन की पत्नी है और पत्नी होने के कारण वमन का उस पर पूरा अधिकार है । चमन उसके साथ सब कुछ कर सकता है, उसने सब कुछ करा सकता है । वह चाहे और जो कुछ कर सके; पर सुरेग के सामने चमन की पत्नी का अभिनय न कर सकेगी। वह ऐसा ही कुछ सोच कर गला चुप हो गया । सुन्दर, सजीव एवं सबल वृक्ष-सा एक व्यक्ति अभी बरामदे पर बैठा है । वह तो सिर्फ उसे देखने भर की इच्छा रखता है । उसे ज्यादा लोन दिलाने में लाभ ! अंजली मन-ही-मन क्षत-विक्षत हो रही थी। जैसा उनके मात्र अजगर होता है, जब वह सोच नहीं पाती कि क्या करना चाहिये, उस समय अगों की -- .. -

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उसने गा मुन्द्र पाया । यह अपने वेगमा सा कुछ को नाम माली यह अभी भी नहीं खाता मोहिनी जाना लगा गयी है । नोश को यह बड़ा बुरादा रहा T अभीव-गा गुना राना रहा है। उन साना छा नहीं लग रहा है । नव कुछ वटा सर-गुवा-गा अहित हो रहा है। चमन मन-ही-मन शुक्म हो रहा है। कल जात वा जी में कमरे में निर्मला गयी थी। दोपहर में सामने बैठा कर खिलाया है । एना कर से काम हामिल ही कर चुकी थी। पता नहीं तीसरे पहर से उसे नया हो गया है ! मुंह फुलाये है. दस बात बोलने पर एक का जवाब देती है। वह कभी भी निर्मला गो डांट नहीं सकता। उसकी आंखो पर नजर पड़ते ही एकदम सा पढ़ आता है । इसना मुनहला मौका निर्मला यूं ही हायों से निकल जाने देगी, गोच कर उसे अपने आप को काट खाने की इच्छा होती है । नमन खाते-खाते बोला, रात में इस समय वहाँ क्या करते हैं बावजी: ~~~-मोड़ा पढ़तर-लिखता है। -कितने बजे खाते हैं? साते-पीते ग्यारह बज जाता है। -आज जल्दी खा लिया, है न ? -- । तिपाई पर एक गिलास पानी और दीपावार पर एक सफेद रंग का होम । नीले रंग की रोशनी की भी व्यवस्था है । कभी-कभी रोगनी तेज होने पर पत्याई रंग-सी प्रतीत होती है । कभी बैंगनी रंग की हो जाती है। बाहन को सामरे में इतनी सारी व्यवस्था । यह सब देख कर नरेश को बड़ा आश्चर्य हो रहा है ! कमरा न ज्यादा बड़ा है और न उयादा छोटा । नीलिंग में दो बड़े-बड़े हुन लगे हैं । देखने से ही पता चलता है कि सभी-कभी कार भारी भरकम पीज हुकों से मुला दी जाती है । भाइ-फानन जंनी कोई नीज जिन पर रंग-बिरंगी रोगनियाँ जलायी जा सन। गुरेग लेटे-लेटे यह सब देख रहा है । यह चित लेटा है । अजली आज ना भयहार उसे बढ़ा अजीब लग रहा है । कल ही साना काम निपटाना होगा। हो सके तो रात को ट्रेन से रवाना हो जायेगा । यह मत्र जन्न बह सोच रहा ना, उसी समय सीलिंग के दोनों हुमो पर उसकी नजर पड़ी । यहाँकार उसे याद लाता है, कल रात दोनों हुए नहीं ये आर, अचानक ही पर उनकी नजर पी ! घर और पहादजी निन्तरता में माली के अगर वार पर -- विचार कर रहा है । उसकी आँखें खुली हुई हैं। सफेद रंग का एक कीमनी कंबल उसने छाती तक खींच रखा है। उसके हाथ कोमल हैं और रंग गोरा-चिट्टा | उसकी भुजाओं में काफी वल है। हर आदमी अपनी भुजाओं में बल की कामना रखता है । उसकी आँखों में अभी अंजली वसी है । किस तरह अंजली इतनी खूबसूरत हो गयी ! जो आदमी के साथ होता है, वही सुरेश के साथ हो रहा है । वह सिर्क एक ही बार मोच रहा है, दरवाजे पर जिस किसी समय दस्तक हो सकती है। पिछली रात की तरह अंजली आज भी छिप कर आ सकती है। आज आने पर वह क्या करेगा! वस्तुत: वह अपने मन से लड़ नहीं पा रहा है । बीच-बीच में आँखों के सामने पत्नी का चेहरा उभर आता था। अभी लीला क्या कर रही है, वह जानता है । बगल वाला पलंग खाली पड़ा है । इतु अपने कमरे में खर्राटे ले रही है । लीला हमेशा गाउन पहन कर सोती है, आज भी उसी तरह नोयी है। उसके विरह मे करवटें बदल सकती है । वह करवटें बदलती है, तो उसका सुनहला गाउन सरक कर कमर तक आ जाता है । और उस समय सुरेश की ऑखों पर होता है एक आश्चर्यजनक जो रह-रह कर जल उठता है और मुरेग वेचैन होता जाता है । वह उठ कर बैठ जाता है । पानी पीता है । लीला के पलंग पर जा बैठता है । लीला मानो गहरी नींद में हो । लेकिन वह जानता है, लीला की आँखो में नींद का नामो-निशान नहीं । वह केवल आँखें बंद किये लेटी है । गाउन खींच कर उतार देने पर भी वह एकदम चुप पड़ी रहती है । लीला का स्वभाव ही अजीब है । वह कभी खुद उठ कर नहीं आती। पता नहीं शरीर में क्या छिपा रखा है कि बिस्तर पर इधर-उधर करते देख सुरेश को ऐमा लगता है कि उसे कष्ट हो रहा है । लीला जंभाई ले रही है। नींद नहीं आ रही है । नींद का स्वांग रचती है और गाउन ठीक न रख कर आखिरकार सुरेश को अपनी ओर खींच लेती है । मुरेश एकबार जब उसे छाती में भींच लेता है, वह पागल हो उठती है । उसकी काली-काली लटों में चेहरा छिप जाता है । उस समय वह और लीला कमरे में चक्कर लगाते रहते हैं। ऐसा लगता है कि लीला एक आवर्पक मोमबत्ती बनी जल रही है और वह एक जुगनू बना कमरे में उड़ रहा है । कम्बल का रङ्ग सफेद है। उसने छाती के पास कम्वल रख लिया है । सिर के नीचे वायाँ हाथ है । दाहिना हाथ छाती पर है । देखने पर ऐसा लगेगा जुगनू। ८० पिपासा । -- . - कि नरेश युनिया भर की समस्याओं पर विचार करना । दोनों में सालिग पर बिजी है। मन में जली के प्रति एक अन्ना आवरंग जल-पुथल मना रहा है। माना पलंग पर लीला नहीं है, गोमती वा गरमीला नहीं थलि अंजली मल नही है। अंजली और लीला ! बार-बार अंजली उगे तमा रही है । और हो-न-हो, चाहे ना राल भी ऐनी यास लानी है। दूर नहीं मिली गिरने का घन्टा गया है । इस घण्टे की आवाज पहाड़ों पर गूजने से एमा प्रतीत होता है कि मनुष्य के हुक्ष्य में हमेशा एक कारण दुःख वर्तमान रहेगा। इस दुःण्ड गो मान लिये मनुष्य मर जाता है। इनमे वह आजीयन छुटकारा नहीं पा मन्ता । सुरज पानी पीने के लिये उठ बैठा। उसने एक खिड़की खोल रखी है । नयोंकिनी पहने पर भी यह सारी गिड़कियों को बन्द कर सो नहीं सकता। रात में ऐसी सर्दी पड़ रही है। हालांकि दिन में कोई खान केंद्र नहीं थी । उसने एका खिड़की को पलड़े को खोल रखा था, इसलिगे मिशनरी हास्पिटल की एक रोगनी यहाँ ने दल रही थी। और मिनरी हास्पिटल की याद आते ही, पता नहीं नो एक नगी तस्वीर आँखों के सामने नात्र जाती है । सफेद गाउन में की एक नस, जिसके सिर पर सफेद टोपी है । पैरों में सफेद जूते और नान्ये पर काले रङ्गका नुनहलान्ट्राइपदार बंज । और उसका चेहरा बार-बार अंजली जैसा हो जाता है । अभी यह अंजली को जिन रूप में देख रहा है. यह चगन की जी न होकर यदि फिमी मिनरी हास्पिटल की नर्म होती, तो माया जंचती । ठीक उसी समय उसे लगा कि अजली उनके मामने नदी है। अंजली मानो पह रही है, गुहं देशो सुरेश ! सिड़की की और क्या दंग रहे हो ? सुरेवा बटवड़ाया, अंजली, तुम जाओ । चमन को नहीं पता चला, तो बड़ी बदनामी होगी। - मुझे पता था. तुम यही कहोगे । वचपन से ही जो उन्मोक प कापुरुष है, वह इतने ज्यादा और भला पद भी क्या नसा है ? सुरेश ने सिर भुका सा है । यह क्या बोलेगा ! एक ही बात बार-बार घुमा-फिरा कर कहती है । बोला, जो हुआ है, वह हमारे भाग्य में था। तुम भाग्य पर विश्वास करते ही रे ? ---और गया ? --में हमु या रोॐ, गमभ में ग्ध नहीं आता ! सुरेश को लगता है, यह टार्नर है । उसने पर बताना चाहा; यः .

सामने कोई नहीं था । दरवाजा बन्द है । मन-ही-मन वह बड़ा उत्तेजित हो उठा है । उस दिन सुबह-ही-सुवह वह बुआ के घर से जो भाग आया था-इस समय वह वात याद आते ही वह अपने आप पर क्षुब्ध हो उठता है । इस भाग आने के कारण ही तो अंजली ऐसा तीखा मजाक करती है। अंजली वार-बार यही एक बात कह रही है। अंजली अभी आती तो वह सब कुछ खोल कर कह पाता । कहता, मैंने सचमुच बड़ी भीरता दिखायी थी। मुझे सभी इतना भला लड़का समझते थे अंजली कि मैं तुम्हारे लिये बुरा बनने का साहस न कर सका । यह सब याद आते ही मेरा मन दुःख से तड़प उठता है। अव यह सब सोचने से सिर्फ दुःख बड़ता है। फिर भी मैं कुछ न कर सकेंगा। दरवाजा खोल कर नहीं रख सकूँगा । भाग्य का लिखा भला कौन टाल सकता है ! होनी होकर रहती है । जब हमारे भाग्य में यही था. हम रोक कसे सकते थे ! फिर मानो कोई बोल उठा. सुबह-सुबह घर से भाग खड़े हुए। मेरे बारे में एक वार सोचा तक नहीं ! सारी वदनामी मेरे मत्ये मड़ कर भाग गये । घटना याद आने पर या अभी भी उसका विश्लेषण करने पर उसे अंजली की दुर्दशा समझते देर नहीं लगती। वह तो भाग गया; पर बेचारी अंजली के मुंह पर कलङ्ग-कालिमा पुत गयी । वह सभी की नज़रों से गिर गयी। बुआ जी ने तिल को ताड़ बनाना न छोड़ा। सारा दोप अंजली के सिर मढ़ दिया। मुरेश को भला दोष देती ही क्यों, वह ठहर। उनके पीहर का लड़का । उन्होंने सोचा अंजली उसे फांस रही है। वौना चाँद छना चाहता है। सुरेश मानो भाग कर बच गया। यहाँ रहता तो चुडैल उसका सर्वनाश कर डालती, उनके मापके पर कलङ्क का धन्या लग जाता। यह पूर्वजों का आशीपाद है जो सुरेश इस डायन के मोह-जाल से भाग निकला। अंजली सरल-मुबोध सुरेश को बर्वाद करने पर तुली थी ! जब कभी मुरेश का अतीत उनके सामने उभर आता है, वह सिसकियाँ मन पाता है ! आज भी मुरेश सिसकियाँ मुन रहा है । अतीत उभर आया है । दुआ जी ने दरवाजा बन्द कर दिया है। बाहर बड़ी-बड़ी एक सरल-सुवोध दालिका यानी अंजली को जली-कटी सुना रही हैं। उनका एक-एक शब्द तीक्ष्ण तीर की तरह हृदय में चुभता जा रहा है । अन्धेरे कमरे के अन्दर अजली फफाय-फफक कर रो रही है । अंजली का मुवोमल व उप्ण हृदय क्षत-विक्षत होते देख कर भी विरोध न कर सका । वह बड़ा भला लड़का था, भले लड़के की तरह ही खिड़की पर बड़ा हो किसी दूसरी खिड़की पर खड़ी किसी मुन्दरी । - ८२ पिपासा । . का मुखडा या सड़क देश-देश भार मारी गो का यात्री । अंजली ममामाल पर अतीत का दिन अब ला को नहीं मिलता। हालांकि जाँदनी अब पहा नोदी पर पिस नहीं है। मदर मिला पहार पर हरिनों का माना जा रहा है। कार में मन्द-मन्द मकान । बुरेन की जंभाई आ रही है। नींद नहीं आ रही है । आन बन्द करने पर ध गि किन के गाने की आवाज सुन पाता है । एना लगता है कि महागों पर वही मोकाभिभूत मिसकियाँ गूंज रही है। उसने जितना सोना था कि यह सब नहीं सुनेगा, उतना ही उसे लगता है कि कोई फफक-फफर पर ले रहा है । उसने खिड़की वन्द करना चाहा । वह निजता की ओर बड़ा । पल पर हाथ रखते ही देसा, पाइन के पेड़ तो कोई गाड़ी है । मायद वह पहाड़ों पर थिरकती चाँदनी देख रही हैं। नरेला ने जिनी बन्द नहीं किया । चाँदनी रात में सुगहला गाउन पहने कोई युवती बड़ी हो, तो मन न्थिर नहीं रखा जा सकता। आधी रात चीत चुकी है, चमन सो रहा है । और अंजली की आँखों में नींद नहीं ! -यह समझ रहा है, सब कुछ समझ रहा है । क्या वह सबके लोने पर गाउन पहन कर मकान के मानपास घूमती रहती है ? सुरेश ने बत्ती बुझा दी। आहिले ने दरवाजा खोल कर आगे बढ़ा। पेड़ तले एक पत्थर की चौकी । पनी हालियाँ होने के कारण चौकी पर ओस नहीं पड़ी है । यहाँ जो की है, वह यदि जली न होकर और कोई हो ! यह नव सोचता हुआ वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। उसने देशागाउन का रङ्ग सुनहला नहीं है, बल्कि कुछ पीला है। चांदनी में दुर से गुनहला दीखता है । जूला खोपा । करीब पहुंचते ही एक सुगनू नाक में भर गयीं । उसने सोचा, पुकारे या नहीं, या चुपचार बता रहे और पाया जो बादल के छोटे-छोटे टुकड़े तर रहे हैं, जिन पेड़ो पर नांदनी दरक नहीं है, यह नाव देखता हुआ इस सुन्दरी के साथ राज बिना दे : मुरंगा यह देख कर और भी भाचवित हुमाया कि गाइन पहन कर इस कड़ाके की सर्दी में रिस तरह बर्ट है । का लग रही है ? वह क्या इस पहाड़ी क्षेत्र में रह कर सकती दुग्नी उसने पीछे से पुकारा, अंजली ! अंजली ने मुंह नहीं उठाया - ? m vie -- महाया है और एक पांच पक्षाने है। जांच तक तो नहीं उठाई: MAHIdentin- । , संकोचवश और ज्यादा दूर तक देख न सका । ऐसी पोशाक में इस सी की रात में उसे वाहर देख कर सुरेश ने सोचा, शायद चमन से झगड़ कर बाहर आ गयी | अगर यह बात नहीं, तो फिर चुप क्यों है, बोलती क्यों नहीं ? लेकिन करीव पहुंचते ही वह घबरा गया, अंजली कहीं वेहोश तो नहीं ! और करीव जाकर बोला, अंजली ! तुम यहाँ क्यों बैठी हो ! तुम्हें सर्दी लगेगी। अंजली ने वोझिल आँखों से देखा। बोली, ओ, तुम ! वैठो। -बड़े निरुत्ताप व निस्तेज स्वर में अंजली बोली। इस अवस्था में सुरेश क्या करेगा, कुछ सोच नहीं पा रहा है। मुरेश ने देखा, अंजली की आँखें फिर बंद हो गयी है । पास ही जो एक आदमी बैठा है, इसका उसे खयाल तक नहीं । और वह ऐसी पोगाक पहने बैठी है कि अंग- प्रत्यंग दीखता है, हवा का झोंका आता है और गाउन उड़ा जाता है ! उसे यह भी खयाल नहीं कि उसका सब कुछ दीख रहा है। ऐसी स्थिति में यहाँ बैठे रहने की अपेक्षा चमन को बुलाना ज्यादा बेहतर है । साफ पता चलता है कि अंजली ने काफी पी रखी है। चमन शराब पीता है । एक सीमित मात्रा में पीता है । आज क्या मात्रा से ज्यादा पी गया है ? वह क्या कमरे में बेहोश पड़ा है ? अव सुरेश क्या करे, वह सोच नहीं पाता । इस समय मोहिनी होती, तो अच्छा होता । वह मोहिनी की तलाश में आउट हाउस की ओर जाने की सोच ही रहा था कि खयाल आया, इस हालत में अंजली को अगर कोई देख ले, तो बड़ा बुरा होगा। उसने सोचा, कंवल लाकर अंजली को ढक दे । उसके वाद आउट हाउस जाकर या चमन को बुला कर उसे पहुँचा दे। यह सोच कर सुरेश उठने ही जा रहा था कि अंजली का दुर्वल हाथ उसके हाय पर पड़ा । उसे लगा, अंजली सब कुछ समझ रही है। वह जो खबर देने जा रहा है, इस हालत में भी अजली यह समझ रही है। सुरेश को अब जाने की इच्छा न हुई । उसने उसे जितना बेहोश समझा था, वह उतना बेहोश नहीं है ! सब कुछ जान-बुझ कर भी वह बोला, तुम्हें सर्दी लग रही है। जाओ, सो रहो। अंजली बोली, तुम्हें नींद नहीं आ रही है ?-- -~-मैं जानती हूँ. तुम रात में सो नहीं पाते । -~-नही, मैं सो रहा था। -सो रहे थे, तो फिर पता कैसे चला कि मैं यहाँ बैठी हूँ ?--अजली की जवान लड़खड़ा रही थी। . 1 ८४ पिपासा -~-निड़की बोलते समय मुझे ऐसा लगा कि कोई पान के गेट का है। निकी बिना खोले क्या तुम्हें नींद नहीं आती ? -हो, मेसो नहीं सकता। -~-लेकिन चमन नो सकता है। तुम नही तो समते; पर नमन सो सकता है । यह खर्राटे भर रहा है । यह गहरी नींद में सोया पड़ा है ! यह पयों कर इतना सोता है ! मैं भी नहीं सकती । में काकी रात गये तथा उनी रहती हैं। -~-तुम रोज पीती हो ! कहाँ, कल तो नहीं देखा ! -रोज पीती हूँ। श्रोड़ी-सी, बस इती-सी । उसने दोनों हाथ से नरेश को मात्रा बनाने का प्रयास किया । लेकिन जिस दिन मुझे दुःख होता है, बहुत दुःख, दुःख से मेरी छाती फटने लगती है, उस दिन मादा पीती हूँ। बहुत ज्यादा । चहारदीवारी में रहना अच्छा नहीं लगता। बाहर निकल पड़ती हूँ। सारी रात घूमती फिरती हूँ। घूमती फिरती हूँ. घूमती फिरती हूँ रिकार्ड की तरह अंजली वार-बार एक ही बात कहती जाती है । --समझ में नहीं आता तुम्हें कौन-सा ऐसा दुःख है ! चमन क्या तुम्हें बीच ही में बात काट कर अंजली बोली, नहीं. कोई तुःख नहीं. कोई कष्ट नहीं देता। फिर भी मुझे क्यों कष्ट होता है सुरेन । ज्यादा पीने पर मुझे सिर्फ यही महसूस होता है कि चमन मेरे चारों तरफ मंडरा रहा है। हाँ, चमन परछाई की तरह मेरे पीछे पड़ा रहता है-एक हसी, होठों पर चरक की नफेदी । कमर में बेल्टं । तहवन की तरह धोती पहनता है । पक्षियों के पंख जैसे बाल खड़े रहते है । मुझे बड़ा डर लगता है सुरेश । क्षण भर रूक कर वोली, मैं अब अछी है न ! विस्तृत आकाश ! झिलमिलाते तारे । चाँदनी तुम्हें अच्छी नहीं लगती ? -~~~-इस जानलेवा सर्दी में तुम जम जाओगी अंजली । चलो, अदर चलो। कल मैं तुम्हारा सब कुछ सुनूंगा। - सुनोगे, मेरा सब कुछ सुनोगे !- कह कर अंजली खिलखिला कर हंस पड़ी।---सब सुनने की इच्छा प्रकट करते ही क्या सब कुछ कहा जा सकता है ? यह कह कर मानो उसे सहसा पता चला कि उसने बड़ा हल्का-फुल्का गाउन पहन रखा है । भटपट दोनों हाथों से नंगे हिम्सों को गाइन में छिपाने की कोनिम करने लगी। इधर खींचती है, तो उधर नंगा होता है, उबर खींचती है, तो इवर नंगा होता है । अन्दर कोई कपड़ा नहीं है । इच्छापूर्वक वह नहीं रखती। इस समय यह पागल जैसी हो जाती है। सब कुछ समझने पर चमन उस रात अंजली के कमरे में नहीं घुसता है तो जान पर बन आती है । बोतल, गिलान जो - -- -- पिपासा ५ कुछ सामने पाती है, उठा फकती ह । डर से चमन कमरा बंद कर सो जाता है । आज भी एक ऐसी ही रात है । सुरेश इसका अनुमान भी नहीं लगा सकता । फिर भी यह समझ रहा है कि अंजली हृदय कि अंजली हृदय में एक मार्मिक व्यथा छिपाये यहाँ रह रही है । वह बोला, तुम मेरे कमरे में चलोगी.? क्यों ! इस सर्दी में तुम मर जाओगी अंजली । ---मुझे सर्दी नहीं लग रही। लेकिन मुझे तो लग रही है । -तुम यहा क्यों सुरेश ! क्यों आये, तुम क्यों आये !---अंजली अद्भुत मन्दन में फूट पड़ी। सुरेश कुछ भी नहीं बोल पा रहा है। वह चुप है, एकदम चुप, मानो उसकी बोलती बंद हो गयी हो ! वह निश्चल-सा, होता जा रहा है । लम्बे अर्से से युवती अपना गोक-दुःख भूल कर मानो किसी अन्य जगत की वासिन्दा बन गयी थी। एक छोटे सरोवर में वह कमल बन कर उतरा रही है। वह मानो किनारे पर बैठा-बैठा देख रहा है, पानी में उतराते वक्त कमल का रंग सफेद था। सफेदी मिटती जा रही है. रंग बदलता जा रहा है-नीला और फिर काला । किनारे पर बैठ कमल को देखते-देखते वह मानो कैसी एक अतिकाय नियति का दास बन गया [-योला, मैं नहीं जानता था कि तुम यहाँ हो। -तुम कल सुबह चले गाभोगे सुरेश ? -जाऊंगा। ~~~-नही, तुम नहीं गानोगे । ----ठाक है, नहीं जाऊगा । --तुम मंरा कितना कहा मानते हो । काश, पहले मानते, पहले कयो न थे सुरेश ! -तुमने जो कुछ कहा, मैंने मुना ! अब तुम्हें मेरी बात मुननी होगी। -~-तुम्हारी बात तो मैंने हमेगा सुनी है । --अन्नद्रा ! -अगर मा न होता, तो में यहाँ क्यों रहती । मैं तो कह सकती हूँ गुरेटा कि तुम पर तुम्हारी पनी मे मेरा अधिकार कोई कम नहीं। नरेश ने टमका कोई उतर नहीं दिया ; दोला, मैं क्या कहना चाहता हूँ, नुम समन, नहीं रही हो। तुम ऐसा Ince ८३ पिपासा समका रही है। -सचमुच में समझ रही हो ? -हा । तुम जो कहना चाहते हो, मैं जानती हूँ। बताओ तो, मैं क्या कहना चाहता हूँ ? ~~~~यही कहना चाहते हो न, मैंने तुम्हारी हर बात नृती है। अब तुम गरी एक बात मानो, चलो मेरे साथ, चनन के कमरे में तुम्हें छोड़ आऊ। सुरेग ने सोचा, वह जो कुछ कहना चाहता था, मंजली ने बहुत कुछ है आला । उसने सोचा था कि कहेगा, तुम्हारी वारा जब मैंने मानी है, तुम भी मेरी एक बात मानो । अव तुम उठो । इस नदी में बैठी न हो । खुद उठ कार न जा सको, तो मैं तुम्हें पहुंचा आऊँ । अंजली बोली, हमेशा तुम मेरा वन कर इसी तरह बोलते रहे हो ;~- कार अंजली ने हाथ से देखना चाहा, जूड़ा ठीक है या नहीं। लेकिन हाथ कांप रहा है। वह शायद हाथ उठा न सकी और इस हल्की-फुल्की पोशाक में वह किस तरह जड़ बनी बैठी है । कुछेक क्षण पहले ही फफक-फफक कर रोयी थी, अभी उसका आभास तक नहीं मिलता। सुरेश वोला, मेरे मन की बात . जब तुम जानती हो, तब यहाँ और बैठा रहना ठीक नहीं । उठो, जब तक तुम नहीं जाती, मैं नहीं जो नवता । ---न जाने से तुम सी न सकोगे ? -ठीक कहती हो। ---जाने से भी तुम नहीं सो सकोगे सुरेश साहब । हा, मैं सो सकंगा। -~-नहीं, सुरेश साहब नहीं । मैं जल रहो हूँ और तुम नहीं जलते । यह अभव है, ऐसा कभी नहीं होता मि० सुरेश सुरेना ने कहना चाहा, मैं भला क्यों जलने लगा, मुझे कौन-सा दुःख है जो लता फिर । मेरी पत्नी है, इतु है । लीला तुम से किसी बात में कम नहीं। नहीं, लीला के साथ मैं तुम्हारी तुलना नहीं कर सकता । इससे लीला के सम्मान पर ठेस लगेगी, उराका असम्मान होना । लोला का सम्मान-असम्मान तो स्याल आया; पर उसने सोचा तक नहीं कि असम्मान का अर्थ अजली के समन कितना का है, किसाना बाठोर । मन-ही-मन किंचित पश्चाताप करते समय वह चुप रहा । का हुआ, कुछ बोलने नहीं ! क्या बोलं? - - am - पिपामा २७ -~-यही कि तुम मेरी ही तरह जल-जल कर मर रहे हो । सुरेश ने सोचा, इससे यदि अंजली को शान्ति मिले, तो स्वीकार कर लेने में क्या क्षति है।-बोला, तिल-तिल कर जलता हूँ। -~बढ़ा-चढ़ा कर बोले । -तिल-तिल कहा इसलिये बढ़ा-चढ़ा कर कहना हुआ ? हाँ, कहो, कभी-कभार जलता हूँ । काम करते-करते जब मैं तुम्हें याद आती हूँ, तुम थोड़ा उदास हो जाते हो । है न ? - - - -घर आकर जब पत्नी को अपनी बाहों में खींच लेते हो, उस समय सारी उदासी खत्म हो जाती है। ठीक कहती हो। --तुम क्या हो सुरेश ! -क्या हूँ! तुम बहुत बड़े साहव हो न ! लोग कहते हैं। -तुम औरत जैसा क्यों हो ? -मुझ में औरत जैसा क्या दीखा ! मुरेश उसे ज्यादा उत्तेजित करना नहीं चाह रहा है । क्योंकि शराब में घुत युवती के साथ और चाहे जो कुछ किया जाय, सहवास नहीं किया जा सकता। समझा-बुझा कर वह उसे कमरे में छोड़ आना चाहता है। कोई जग जाय, इससे पहले ही उसे कमरे तक पहुँचा आना चाहता है । क्योंकि उसके मनोनुकूल कोई बात न होने पर, पता नहीं वह क्या कर बैठे । सुरेश बोला, तुम मुझे जो दिल आये कह सकती हो। और तुम नहीं कह सकते ! -क्या कह सकता हूँ? -जो मन मे आये, तुम मुझे कह सकते हो। यह यह कर अंजली ने सहसा उसे पागल की तरह अपनी बाँहों में जकड़ लिया । बोली, सुरेग तुम पुरुष हो, पुरुप की तरह मुझे अपनी करीव रखो। कोई देख ले तो क्या होगा ! अंजली ने अपनी बाँहों में जकड़ रखा है। उसके नरम-नरम होठों पर कितनी मादरता है ! वह और जो कुछ करे, बमौके की गहनाई नहीं बना सकता । हाँ, कम-से कम अंजली अभी जो कुछ कर रही, --- ८८ पिसासा • मह समयानुकूल नहीं है । जिसे खुद का होश नहीं, उसके साथ यह गुछ नहीं कर सकता । वह डपट बार वोला, गजली, क्या हो रहा है ! बजली अलग हो गयी। उसके बाद धीरे-धीरे चल पड़ी। वह चल नहीं पा रहा है । वह लड़खड़ा रही है । सुरेश को लगा, इस तरह लड़खड़ा रही है कि तुबुक कर नीचे जा गिरेगी । वह उसे सहारा देने को आगे बढ़ा । मजली उसे नाटक कर लड़खड़ाती हुई फौवारा के करीव जा खड़ी हुई । उसे लगा कि फौधारे का पानी अंजली को भिगो रहा है। इस सर्दी में वह इस तरह भीग रही है। इस तरह का दृश्य खुली आँखों नहीं देखा जा सकता । उसने आँखें वंद कर ली। । बाकी रात सुरेश को नींद नहीं आयी । सिर्फ करवटें बदलता रहा। मानो अंजली ने उसे फिर पन्द्रह साल पहले का नवयुवक बना दिया है । यह क्या हुआ उसे ! जिस तरह अंजली की प्रतीक्षा में वह रात की घड़ियाँ गिनता, उसके देर करने पर उसका तन-बदन जलने लगता, वह स्वयं को बरग्रस्त महसूस करता, सारी रात जंभाई लेता रहता, आज भी वह वैसा ही महसूस कर रहा है। और रात के अन्तिम पहर में उसे थोड़ी तन्द्रा-सी आयी । आश्चर्य, वह देख रहा है कि उसके सिरहाने में कोई मानो चुपचाप बैठी है । वह चेहरा नहीं देख पाता । और सब कुछ देख रहा है, उसका हाथ उसके कपाल पर है। काफी सर्द हाथ । एकदम बर्फ-सा ठंडा हाथ । वह धीरे-धीरे उसके कपाल या सिर पर हाथ फेर रही है । वह रेशमी साड़ी में सिमटी बैठी है । साड़ी में लाल रंग की घरफियाँ बनी हुई हैं और रंग-बिरंगे फूल-पत्ते अङ्कित हैं । एकदम धनदेवी-सी दीखती है । हाथ-पांव की स्निग्यता पर आश्चर्य होता है । करीव बैठी है, इसलिये उसे नींद आ रही है । सुरेदा मुंह उठा कर देख रहा है । वह सपने में मुँह उठा कर देख रहा है। फिर भी कुछ देख नहीं पाता । चेहरा वह क्यों नहीं देख पा रहा है ! इतनी कोशिश करने पर भी वह चेहरा नहीं देख पा रहा है । वह मानो उठ कर चारों तरफ घूम रहा है । सब कुछ है, सिर्फ चेहरा नहीं । 'नहीं' कहना ठीक न होगा, सिर्फ पीछे का भाग देख पा रहा है। और न रहा गया, उसने पीछे से ही उसे वांहों में जकड़ लिया | और फिर पलंग पर ला पटका । पटकते ही साड़ी और साया ऊपर सरक आये । मोम जैसी गोरी-चिट्टी जांघों पर एक अद्भुत नीला रंग आँख-मिचौनी खेल रहा है । पटकने पर उसने देखा, मंजली पिपासा ८६ -- तुम। । - काफी सज-धज कर उसके पास आयी है । कपाल पर सिंदूर का बड़ा टीका ! बाँखों में काजल की लम्बी रेखा । होठों पर नीला रंग । गले में कीमती पत्यरों का सेट । और आँखों में अद्भुत कामना का वारभाटा । उसने उसे पलंग पर चित्त लिटा दिया है, इससे अंजली खुश है या नाराज, कुछ भी समझ में नहीं धाता। उदासीन-सी वह हाथ-पांव फैलाये पड़ी है। यानी सुरेश जो चाहे, कर सकता है । और ऐसा लोभ वह संभाल भी नहीं पा रहा है । वह कहता है. जाओ, अंजली, तुम चली जाओ, नहीं जाओगी तो मैं मर जाऊंगा । अंजली नहीं जा रही है । उसकी बगल में चुपचाप पड़ी है । वह कहता है, में एक अद्भुत जीव बनता जा रहा हूँ अंजली, तुम मुझे बचा सकती हो, चली जाओ बजली ने करवट बदली । अपने हाथों में सुरेश की गर्दन जकड़ ली। बायाँ पांव सुरेश पर चढ़ा दिया । और फिर उसने कुछ न किया । और जो कुछ करना है, वह मानो सुरेश के हिस्से में है । और ठीक उसी समय सुरेश को महसूस हुआ, शरीर क्रमशः ठंडा पड़ता जा रहा है, शरीर से सब कुछ निकलता जा रहा है। उसके लिये अव सोया रहना कठिन हो गया है । अंजली उसके पारुप पर मुस्करा रही है । उसकी मुस्कान मानो कह रही है, वाह रे पुरुष ! कुछ किया भी नहीं और तुम्हारा सब हो गया । छते -न-छूते सब हो गया ! ओस की तरह सब विखर गया। अंजली को जोरों की हंसी आ रही है। वह किस तरह उसकी बगल में बैठ कर यह सब वोले जा रही है । और सुरेश दूसरी ओर मुंह फेर कर देख रहा है । उसके अन्दर का घर जैसा भाव मिट गया है। मुंह का स्वाद खराव हो गया है। उसे ऐसा लगता हैं कि अंजली बार-बार बदला लेने आती है । वह डर-डर कर कहता है, मैं नहीं कर सकता, मैं औरों जैसा सब कुछ नहीं कर सकता अंजली । अंजली वोली, अच्छा उठो । तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं । हम चिड़ियों के शिकार पर जायेंगे। -कहाँ। -विहारीगंज का पहाड़ ! -वहाँ क्या है ? -पड़-पौधे । पाइन के लाखों पेड़ । रंग-बिरंगे कंटीले पौधे। -~-क्या होगा वहाँ जाकर ? --होगा और क्या ! मैं तुम्हें साथ लिये घूमूंगी। -घूमना तुम्हें इतना अच्छा क्यों लगता है ? - १० पिपासा wws और तुम मेरे साथ कर भी क्या सकते हो ! छि:, तुमने जो किया न ! घोड़ा रुकोगी ! ---कह कर बच्चों की तरह देखने लगा। गयों नहीं, पत्र तक कहोगे, तब तक । नहीं, अभी-अभी सब ठीक हो जायेगा |--कह कर उसने बजली का हाथ अपने हाथों में ले लिया । अंजली बोली, दो दिन रह जाओ, तुम्हें देखू । इस बात पर सुरेश के अङ्ग-अङ्ग में एक अजीब-सी सिहरन खेल गयी। वह एक पुरुष की तरह खड़ा हो सकता है । उसके समक्ष पुनः सब कुछ रंगीन हो गया है। मानो इस कमरे में अभी अंजली ने हजारों बत्तियाँ जला दी हैं। चेहरा तगतमा रहा है, आँखें जल रही है । एक अद्भुत आकर्षण में वह अजली के आसपास मंडरा रहा है । अङ्ग-अङ्ग में एक स्निग्ध इच्छा नाच रही है और दोनों जैसे हवा में उड़ने वाले पक्षी बन गये हैं। और खिड़की से बाहर निकल कर दोनों कहाँ-कहाँ उड़े जा रहे हैं । उड़ते-उड़ते एक वर्फ का पहाड़ नजर आया । और चारों तरफ देखने पर सिर्फ वर्फ-ही-बर्फ नजर आया। हरियाली कहीं नामो-निशान तक नहीं । और बर्फ के नीचे सारा शहर पड़ा है। शहर के दरवाजों पर मोमबत्तियाँ जल रही हैं। अभी दोनों पक्षी हैं, नहीं, ठीक-ठीक पक्षी नहीं। अंजली बर्फ की एक चट्टान पर बैठ पंख फड़फड़ाती है और पुन: वनदेवी बन जाती है। उसके पैरों के पास सुरेश एक पक्षी बना बैठा है । वह स्वयं को पहचान नहीं पा रहा है। यह कौन-सा पक्षी है ? कौआ, तोता या मैना ? वह कैसा दीख रहा है ? उसने बर्फ पर अपना प्रतिबिंव देखा । उसने देखा वह मात्र एक पक्षी है, और कुछ नहीं । पक्षी से वनदेवी को बड़ा प्यार है । पक्षी को छोड़ कर वह कहीं भी नहीं जा रही है । सुरेश को बड़ा गुस्सा लग रहा है । उसे अंजली ने पक्षी बना कर राघों रखा है। अंजली चाहे तो उसे क्षण भर में मनुष्य बना सकती है । गुस्से से मह कूक उठापूफूहू कू । अंजली तुम बड़ी स्वार्थी हो । तुम मुझे पक्षी बनाये क्यों रखती हो ? मेरी आंतरिक इच्छा है इस बर्फीले देश में तुम वनदेवी बनो और में वनदेव वन गाऊँ। कितना सुन्दर है यह देश ! ऐसे देश में तुम मुझे पक्षी बना कर रखना चाहती हो? और अब सुरेदश देख रहा है उसका हाथ थामे मंजली सीढ़ियाँ उतर रही है। चारों तरफ कदंव के पेड़ है । सुरेश को लगा कि वर्फीले देश में केवल कटव के पेड़ ही होते हैं । कदंच के असंख्य फूल मुस्करा रहे है । वर्फीले देश में सफेद - - ? । - - पिपासा ६१ - - कदंब के फूल एक अपूर्व सौंदर्य की सृष्टि कर रहे हैं । उसे साथ लिये अंजली एक अति प्राचीन भन्नावशेप के पास आ पहुंची है। रोमन साम्राड्यं के बड़े-बड़े खंभे, सिंह और मनुप्य का द्वन्द्व-उसका एरेना । अभी भी लोहे की बड़ी-बड़ी जीरे बन रही हैं। हन्नी जैसा एक आदमी, कमर में वेल्ट, सिर पर चिड़ियों के पर, मोटे होठ, ठिगना कद, सिंहद्वार पर खड़ा है । वह और कोई नहीं, चमन है । हाँ, वह चमन ही है । चमन सिंहद्वार पर खड़ा-खड़ा सिर्फ,घंटा वजा रहा है-एक, दो, तीन......। अंजली को देखते ही चमन घंटा बजाने लगा है--ढन, ढन, ढन । एक हाय से वह डमरू बजा रहा है । वह दरवाजा खोल रहा है । दैत्याकार दरवाजा । वह ठेल-ठेल कर दरवाजा खोल रहा है। हाथ में पंछी लिये अंजली वनदेवी की भाँति अपने साम्राज्य में प्रवेश कर रही है । अपने निर्दिष्ट प्रासाद की बोर वह धीरे-धीरे बढ़ रही है । सर्वत्र वैभव की छटा ! हजारों दासियाँ नतमस्तक खड़ी हैं । बड़े-बड़े पहलवान हाय में चांदी का राजदंड लिये नतमस्तक खड़े हैं । सिर पर पगड़ी बांधे, पैरों में बूट पहने और कमर में तलवार लिये एक लम्बी दाढ़ीवाला आदमी आगे-आगे चल रहा है । सांटिन का फ्राक और बर्फ- सा सफेद जूता पहने एक नन्ही-मुन्नी बच्ची धनदेवी का आंचल पकड़े चल रही है । मिट्टी में लोटने पर बच्ची की गर्दन धड़ से अलग कर दी जायेगी। सुरेश हाथ पर एक पक्षी बना बैठा है । सव कुछ देख रहा है । उसे बड़ा मजा आ रहा है । अंजली का प्रभाव देख-देख कर उसकी छाती गर्व से फूल उठती है । इसी बीच वह एकवार कूक उठा---, कुहु कू। उसके कूकते ही सब कुछ निश्चल हो गया । जो जहाँ था, मूर्तिवत चुप खड़ा रहा । ऊपर जो झाड़फानूस झूल रहा था वह भी थम गया । फानूस की बत्तियाँ जलाने के लिये एक आदमी सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, वह भी जहाँ-का-तहाँ एक गया। सब-के-सव मानो पत्थर हो गये हैं। किसी में जीवन का म्पन्दन नहीं ! वाह, क्या मजेदार दृश्य है ! वह जगा और सब जग पड़े। वह फिर कुक उठा और सव जहाँ-के-तहाँ जम गये । वह समझ गया, सिरहाने में लगा स्विच दबाने से जिस तरह बल्ब जलता-बुझता है, उसी तरह वह इन सबों से खिलवाड़ कर रहा है। इन सवों का उठना-बैठना, चलना-फिरना सब कुछ उसकी इच्छा पर निर्भर करता है । हाथ पर पक्षी बना बैठा है; पर क्षमता तो कम नहीं। उसे अपनी क्षमता पर गर्व हो रहा है। वह गर्व भरी सृष्टि से अंजली की ओर देखता है; पर अंजली पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । अंजली हार मानने वाली लड़की -- ६२ पिपासा . उसने नहा सामा अंजली की ऐनी असहाय दया के कारण यह मांग रहा था । पहाट की चोटी पर शायद अभी भी रूपहली चाँदनी छिटक रही थी। वहीं हिरनों पर गांड ठंज पानी पी रहा था ! बाथरूम में सुरेश को एक बात और भी याद हो आयी, अगली जायद उसकी छाती में मुंह छिपा कर बोली थी, फल मत जाना सुरेन! इन पहाडी पर लौट कर फिर रात आयेगी। और रात के पाते ही मैं तुम्हारे पास आऊँगी। किसी को आभास तक नहीं मिलेगा । तुमसे मुखं बहुत कुछ गहना है, सुरेग, बहुत कुछ। यह नो न सका । अङ्ग-प्रत्यङ्ग से लावन्य टपक रहा है : अंजली मानो स्निग्धता को प्रतिमूर्ति है। पहले की तरह ही वह अपना सब कुछ, उजाड़ कर देना चाहता है । यह ले नहीं पाता। सुबह का सूरज परों के पास धूप बिखेर रहा है । चिड़िया चहचहा रही है। तलहटी में आदिवासियों के घर से धुआँ निकल रहा है । भेड़ों का पहाही लियों की पीठ पर मुस्कराते बच्चे और पिछली रात की घटना में वह एक अद्भुत सत्य और स्निग्धता की झांकी पा रहा है। सुबह-मुबह लिना है। नहाने पर सारा शरीर पवित्र महसूस हो रहा है। और पिछली रात की घटनाओं पर विचार करना उसे अभी भी अच्छा लग रहा है। सारी घटनाएं यानी जो कुछ उसने सपने में देखा है, जो कुछ बुली आँखों ने देखा है - सब कुछ मिला कर वह एक काल्पनिक मायाजाल में फंसा हुआ है । उसे ऐसा लगा कि सपने में चमन की पनी अपनी आपबीती सुनानं आयी थी। पति का अत्याचार, पीठ के काले दाग, बुमाजी की निष्प्रता, गुन्ग की पुर्वलता, ऐसी ही कितनी सारी वातें ! पता नहीं. सुरेश ने कब दोनो झापों ने उसका लाउज फाड़ डाला था । जो कुछ उसने देखा उसले हृदय में व्यथा उत्पन्न होती है, प्यार उभर आता है, सहानुभूति उत्पन्न होती है। पीठ के काले-काले दाग देख कर उसे ऐसा प्रतीत हुआ था कि अंजली की पद पर असंख्य काले नाग रेंग रहे हैं । यह ज्यादा देर तक उसकी पीठ की सोर देगन सकता था। उसने आँखें बन्द कर ली थी। इस प्रकार अतीत को गहराइयों में सुबोये जाने पर वह बेचैन हो उठता है। पह यह सोच कर कांप जाता है कि इस अत्याचार के पीछे उसका भी हार है। नहीं, सिर्फ हाय ही नहीं, बल्कि अत्याचार का मूल ही यह है। उन दिन की उस घटना के बाद अंजली पर क्या गुजरी होगी, उसने कभी सोना ना - --- -- । --में अब सोऊंगा । कल रात सो नहीं सका था। --आज भी तुम नहीं सो सकोगे सुरेश । सुरेश ने मानो सहसा अंजली की झीनी पोशाक देख कर प्रश्न किया था, तुम्हें सर्दी नहीं लगती ? -नहीं। तुम्हें ?--अंजली ने शायद यही कहा था। -~~-मुझे जोरों की सर्दी लग रही है। -और एक कंबल ला हूँ? मेरे पास है। -~-सिरहाने में बैठने से तुम्हें तकलीफ होगी ? सुरेश को याद नहीं आ रहा है, जवाव दिया था या नहीं। -कितने दिनों बाद हमारी मुलाकात हुई ? -करीव तीस साल बाद । नहीं, गिनती ठीक नहीं हुई।-कह कर शायद बोली थी, अच्छा, आज के लिये विदा। कल फिर मिलेंगे। -~कल चला जाऊंगा। भेंट नहीं होगी। ---कल तुम्हारा जाना नहीं होगा, समझे । -मुझे जाना ही होगा । बहुत काम है। -तुम्हारा जाना नहीं होगा सुरेश । तुम्हारे साथ मेरी कितनी सारी बातें है । शादी के दिन एक पत्र दिया था; पर तुमने कोई उत्तर नहीं दिया। -~~-तुम्हारे उस पति का क्या हाल है अंजली ? - तुम तो कोई खोज-खवर नहीं रखते । देखोगे ? --कह कर उसने साड़ी, लाउज सव कुछ खोल दिया था । बोली थी, तुमने मेरा सब कुछ देखा है; फिर भी बहुत कुछ नहीं देखा है। -कह कर वह उसी पतला गाउन में, जिसमे एक-एक अङ्ग साफ-साफ दीखता था, सामने आ खड़ी हुई थी। पीठ घुमा कर बोली थी, ये देखो । अंजली की सारी पीठ पर काले-काले दाग थे। कुछक क्षण दोनों चुप थे। उसके बाद धीरे-धीरे सुरेश की छाती में मुंह छिपा कर अंजली बोली थी, ये सारे चिन्ह तुम्हारी बुआ जी के ठीक किये वर से उपहार में मिले हैं। इसी चमन लाल ने उसके कर हाथों से मेरा उद्धार किया है। उनका चेहरा देखकर शायद अंजली भांप गयी थी कि वह और भी कुछ जानना चाहता है, सब कुछ सुनना चाहता है। क्योंकि वह मन-ही-मन कांप - १४ पिपासा टीप : समय अमन कमरे में दाखिल हुा । गुग को मानो from 14 बदामज-यार आया है.... हो. मराठी शुक्ला, मन जाता और चश्मा । दानी वितुलना है। चमन लोपा र बको ही बोला, कोई तकलीफ तो नहीं ना ? नहीं, सालीफ को होगी। होगी नलाती है । पहाड़ी जगह होने के नाता अमलानींद नहींनी आ सकती है। कीय महते हो; पर..यल पहाडी जगह ही नहीं, किसी भी नयी जगह में मैं ठीक से सो नहीं समाता । मुबह-गुवह इतना मज-धज कर ? -हम बाहर जायेंगे। -~-यहाँ? -~-आपको साथ लेकर जागे । गाड़ी नीचे खड़ी है ! नाश्ता लेकर निकाल www.r -or- - लेकिन मेरा तो विचार है कि आज तुम्हारे साथ बैठ कर काम खत्म पर लू। -वह तो खर होगा ही। आप जब चाहेंगे, हो जायेगा ! -अभी कहाँ जाओगे ? -~~~-आप आये हैं, तो एकबार घूम-फिर कर देखेंगे नहीं । -वर पमना-फिरना तो होता रहेगा । लेकिन असली काम ही तो अभी तक नहीं हुआ। -उसमें भला कितना समय लगेगा ? बारमी में उपर से हो आयगे । उसने सोचा था, ब्रेकफास्ट आते ही यह झटपट नाना कार लेगा। रेनिन अब जल्दबाजी करने की इच्छा नहीं हो रही है। चारों तरफ पाले हरे-भरे पहाली पेड़-पौधे और उनकी फुनगियों पर चमकती गुगली इप आदि बनन नकार नागय काट देने की इच्छा हो रही है। माना अब उसे मुछ करने की नहीं है। यही जो मामने बेटा एक साथ नाताले का है और बार-बार निधी नजरों ने उसे देख रहा है-~-गुग को पृटी नजनों नहीं हो रहा है। जो जाने की का नहीं हो रही है। उनका मन कार-बार कहना है कि महाधि माल की ओर चला जाता, तो मौका मिलते ही लोग यहाँ अनन्य पल जाती । यह यहां से इसलिये बाहर जाना नहीं चाहता : को यह नता है कि यहाँ रहने पर मिनी-म-किली समय अली को ।

। . नहीं था । वह तो सिर्फ अपने वारे में ही सोचता रहा था। उसे तो सिर्फ यही चिन्ता थी कि कहीं नेक लड़के का मुखौटा उसके चेहरे से न गिर जाय । वह मासूम तरुणी की यातनाओं का अनुमान तक न लगा पाया जो एक अन्धेरे कमरे में सिसकियाँ भर कर जी रही थी। उसने सोचा सपने में जो कुछ देखा है, वह सिर्फ एक सपना था, और कुछ नहीं। जितनी दुर्दशा का अनुमान वह लगा रहा है, संभव है, अंजली को उतनी दुर्दशा भोगनी न पड़ी हो । वह सोच रहा था कि व्यर्थ की चिन्ता न कर नीचे से थोड़ा घूम आये, चाय के पहले अगर खुद को तरोताजा कर ले, तो चमन भांप भी न सकेगा कि बाबू जी कल सारी रात सो न सके हैं। वह सब सोच ही रहा था कि उसे लगा आँखों में वही दृश्य नाच उठा है। आपादमस्तक काली चादर में ढंकी अंजली खड़ी है । रात में कहीं अभिसार में जाना हो, तो शायद इसी पोशाक में निकलना पड़ता है। गाउन उसने समीज की तरह पहन रखा है। और हाँ, किसी समय नीले रङ्ग की कीमती वनारसी में सिमटी अंजली उसके कमरे में दाखिल हुई थी। पीठ के काले दाग दिखाने के बहाने सहसा उसने साड़ी उतार फेंकी थी। जितनी वार वह सोचता है, यह सच है या सपना, उतनी ही वार एक नङ्गी पीठ और काले-काले दाग ! वह मन-ही-मन चीख पड़ना चाहता था। नहीं, यह सच नहीं, अजली यह सच नहीं हो सकता। मैं तुम्हारा यह दृश्य न देख सकूगा । फिर भी अंजली पीठ घुमाये प्रतिमा-सी खड़ी है । शायद उसने कहना चाहा था, इस प्रकार मुझे टार्चर करने का क्या मतलव है अंजली ? उस समय अंजली हँस रही थी। सिर्फ हँस रही थी । हेमते-हंसते वह कांप-कांप उठती थी। और नीचे ताकने पर उसने देखा था, वारीक कपड़े के अन्दर से झांकता नितम्ब कितना ऊँचा और कछुए की पीठ-सा चिकना है। ओस टपका-टपका कर वहाँ केवल सफेद चाँदनी टपक रही है। उसने सोचा, इस तरह अगर कमरे में चुपचाप अकेले बैठा रहा, तो वह पागल हो जायेगा। उसने सोचा, झटपट कपड़े पहन कर बाहर निकल पड़ेगा कि ठीक उसी समय फिर वही दृश्य आँखों के सामने नाच उठा। अंजली सामने खड़ी है । उसकी नाभि के पास वड़ा-सा तिल है, पहले जहाँ हाथ रखने पर महसूस होता था कि मांस नहीं है, अभी वहाँ रवर जैसी चिकनाहट है। उसने चीख कर कहना चाहा था, अंजली जाओ। तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ मजली, तुम जाओ। मुझ से अब देखा नहीं जाता। - , १६ पिपासा Mar माना जाय, किनकिनी आम । ~~~~या! - यार सुदा मनाया -गर ! पहली बार जब आपलाया, बदामा आमा । RANI m जा आप कोना ने भारत का मार त्रिनि । - प्राय बाग आ गये ? -~~~-काम आने वाला आदीही नहीं। लोकगार तो जा पान वा - Hamar m- -मोलगा पा नि साहन भी बहुत पान पाते है । -और नहीं गाने का कारण गया गगन थे ? -पह तो अब आपको देख कर समग हा आजकाल आप जैसा आदमी गुराने मन-ही-मन सोचा, बालों ना ललिये एवना सब कुछ होता है । मायावानी कोई इनसे सीखे । जब ने परिणय हुआ है, लागो विशेषण नहीं गुज करने के लिये न दे दुपा हो ! गुरेमा बोला, बहाली होता तो पागना जाता ! -~ी बंगाली गर । लेकिन तब गया, बाप-दादा का दोष दिन में बोला-बहा रह गया है ! जम फर यंठ गया । पान लगा कर पद पाया और उसे भी मिला। तिलापति जी पा साहब । माह-सरह के सर्वे का नाम मुभ, न गुन पर बड़ा नुहमा । तीर निशाने पर बैठा था वायू जी । में उने ही बा रहा हा किलोनाच दोला, बैटिय बाय, मिला देता है। आपका काम हो जायगा । होगा या नहीं, तुमने उगले पता पर लिया ? -हागा, यह तो मत पता था । आपण संबंध में कोमोज गयर लीची, उनसे पता चल गया मा शिआर बई को आदमी है । उसने मन्त्र मात्र बताया पारीका भीमो दमला दिया था: बोला बा, नाहन माहिनेगा, नमा भारोबार कर रहा मर । हेय नहीं करने को लेंगे होगा ! ना बोटा आz मांगने पर मिलता। : – ༣ : सरोका : वामना आदी Mon ...

- वह ऐसा क्यों हो गया ! मानो यहाँ उसके जीवन की कोई अमूल्य निधि खो गयी थी और उसे पाने की आशा में वह फिर लौट आया है । शायद कल रात उसे उसकी निवि वापस मिल गयी है। अभी एक ऐसे आदमी के साथ उसे कहीं बाहर जाना पड़ेगा, यह सोच-सोच कर उसे बड़ा गुस्सा आ रहा है। हालांकि मुंह फोड़ कर कुछ कह नहीं पाता। उसकी कमजोरी अगर पकड़ ली जाय ! वाह, सुरेश साहव तो बगुला भगत निकले~वह अगर ऐसा समझ बैठे ! सुरेश मन-ही-मन बड़ा छोटा होता जा रहा था। उसे जो दीघरिया जाना है, वह यह भी भूल गया। दीघरिया जाना आवश्यक है । आसपास कोई कोई आवादी है या नहीं, पहाड़ों की ऊँचाई कितनी है, समतल भूमि कितनी है, सड़क बनायी जा सकेगी या नहीं, पैकिंग प्लांट के ट्रक आने-जाने लायक रास्ता है या नहीं, सब कुछ उसे भली-भांति देख लेना होगा । उसकी रिपोर्ट पर ही सब कुछ निर्भर करता है; फिर भी उसे जाने की इच्छा नहीं हो रही है । आलस्य के कारण सिर्फ जंभाई आ रही है । चमन लाल बोला, साहब जरा जल्दी कीजिये, दीघरिया यहाँ से काफी - ---दीघरिया! हम वहीं तो जा रहे हैं। -क्यों? -आप ने कहा था न कि दीघरिया देखना चाहते हैं; इसलिये आपको ले जा रहा हूँ। जगह भी देख लेंगे और थोड़ा घूमना भी हो जायेगा। चमन दीघरिया जाने को इतना उतावला क्यों है, मुरेश समझ न सका। सम्भव है, वह नाना प्रकार से उसे खुश करने की कोशिश कर रहा हो। सुरेश भली-भांति जानता है कि दीघरिया प्लांट होने से चमन को व्यवसायिक क्षति होगी। इसलिये चमन का उत्साह देख कर वह आश्चर्यित हो रहा है। सुरेदा बोला, तुम्हें मेरे कारण बड़ी परेशानी उठानी पड़ रही है चमन । नहीं साहब, परेशानी कमी, यह तो मेरा फर्ज है। आपको सुविधा- अमुविधा का खयाल न रसुंगा, तो फिर हम हैं क्यों ! सुरेश को महसूस हुआ कि आज कल जैमी सर्दी नहीं है। उसने नीले रङ्ग का ट्राउजर, नेवी नू कोट और पीले रङ्ग का टाई पहन रखा था। कभी-कभार यह हाथ में एक कीमती छड़ी लिया करता था, पर आज नहीं ली थी। बम, जाना है। इसलिये जा रहा था। १८ सिता ज्यानमारमा साउनबोला, कार नला गया कि नरेन देना, पाक और र 4 - mar -- Nehan चलो । अवर कसा? बालगने चमन नपनाप बया है। पानी का है ! उस मास में नहीं आ रहा है किय गया 2 ? या क्षण पहले भगा जल्दा मनासा यानि अनी उगता मेहरा बने पर लगता है, कई मादानी नहीं है । गरेमा गती अधीरता भांप बार चान बोला, बावरिया में हमारी गाय भी है। गरी माली है ना? गरी गहना ठीक नहीं होगा : उगले ही कलान नहीं होता । निला को यह नय पनर है न लिये पटना से पक बदिया मरी लायी। बलिया अब माँ बन ग क गाय से मानली नायालिये दो लोर सरीवली है। माना गुबह बम से आकर दुद माना जाता है । -~-नानी दूर गाय पालने की बात भी पर पास की। -लाम दूर तो है नहीं, बस पर भाटा नया मगर लाता है। और न कि पहले इमलिग निर्मला का समय नी कट जाता है। विधा अब गाय बन गली न नलिने निर्मला बोली कि वह हमारे नाद जायगी बन्ना गर सा है, निर्मला देवाना चाहती है। सुनेर केहप में हलचल मन गी ! समन मुगुरा बार बोला, जब हम जा रही है, गर, म यह भी सामना कर काले, कि उस लिया अब मान गयी है. मां बनने पर बनी । - Kas- नमन की बात न हो-न-होते किती मा नेपा, अमली माय काशी मी नाटी में जा रही है : वह मान होने के उप बोला, बहन अन्या। पर और कुछ न बोल नला। अली पर उमर आने जग-सी गली : ना. लाल लाउज, लाल जिओर, पालमा सरकारमा 7 मिन्दुर टीयर न मानो मनोमानी है !

सुरेश वोला, चलो, अब चला जाय । -~दीपरिया में हमारा एक छोटा-मोटा खलिहान है। -अच्छा! चमन को पता है कि यह सुरेश साहब का तकिया कलाम है। वात-बात पर कह उठते हैं, "अच्छा।" वह बोला, हाँ। छोटा-मोटा एक खलिहान है । निर्मला को खेती-बारी से दिलचस्पी है । एक छोटा-सा तालाब है। जामरूल और चकोतरा के पेड़ है। उसे जो-जो पसंद है, सब कर दिया है । -और कुछ नहीं किया । औरतों को मन्दिर बनवाने की बड़ी इच्छा रहती है । वह नहीं बनवाया? -~-आजकल की औरतें यह सब नहीं चाहतीं। लेकिन वह तो आजकल की औरत नहीं दीखती। -आप से अच्छी तरह परिचय न करा सका । बड़ी शर्मीली है । हो सकता है आज आप दोनों में घनिष्ठता हो जाय । -अच्छा ! चमन को हंसी आयी। सुरेश वैग खोलकर कुछ देख रहा है। उसे अपने साथ एक फाइल लेनी थी । वैरा फाइल दे गया था। कहीं बाहर जाने के पहले हर चीज भली-भाँति देख लेना उसका स्वभाव है । वह कागजात उलट-पलट कर देख रहा है । कागजात देखते-देखते बोला, तुम कहते थे कि तुम्हारी पत्नी रवीन्द्र संगीत बहुत अच्छा गाती है। -हाँ, वाबू जी। -~काम होने पर आज ही चला जाऊंगा। -~-सर, आप मन-ही-मन कुछ सोचते रहते हैं । आपके मन में कई विगेप इच्छा है। -~-तुम ज्योतिषी कब से दन गये ? -निर्मला का गाना सुनना चाहते हैं न ? -~-संगीत से मुझे प्यार है। खुद गा नहीं सकता; पर गाना सुनना पसंद करता हूँ । यहाँ आने से पहले सोचा था बोलते-बोलते सुरेश हक गया। वह क्या बकवास कर रहा है ! वह तो उनका अपना कोई है नहीं, वह तो कम्पनी की ओर से मुआयना करने आया है, यह मानो यह भुल गया था। रूक कर बोला, चलो ! और देरी करना बेकार है। , १०० पिपाता mawelamin दरया पर नो मामा मन जागेवालान हन: पहा अंदर चला गया। जिसे गुरेज नका, पाया और यह दरभा नहा है। -~~-पलो ! अचरगा। -~बन, पानी मार। नमन अपनाप का है ! नानी चुप है, । उसको माल में नहीं आ रहा किय कयों बैठे ? केक क्षणा पहले नगन गली गना हा मालकिन मत उनका हा यो पर लगता है, न जल्दबाजी नहीं है। गुरेश गी अधीरता जाप पार चमन बोला, बावरिया में हमारी गाय भी है ! वरीमोली है क्या? ---जयी कहना ठीक नहीं होगा : उनी हमें कोई काम नहीं होगा। निर्मला को पद सब पमंद है ना शालिने पटना में एक बधिया व लाया था। रहिया अब माँ वन गरी है । एक गाय से पूरा नहीं पड़ना था; इसलिये दो और समीद की है। ग्वाला मुबह बम से आगार दुव पहुंचा जाता है । -~-~-तनी दूर गाय पालने की नया जान सी, घर के पास बरते। ---कोई साना दूर तो है नहीं, वन पर गला गया समय लगता है। और चोकि, वह है लिये निर्मला का समय भी कराता है। बछिया अब गाय बन गयी है न; ललिये निर्मला बोली कि वह हमारे सार जावी । बछा मा हुआ है. निर्मला देखना चाहती है। सुरेश के हृदय में हलचल मच गई । चमन मुस्कुरा कर बोला, जब हम जा ही है सा, तब वह नी मात्र चार कर देशले कि सगी बलिया भव मां बन गयी है. मां बनने पर कंगो WriM चमन की बात पूरी होते-ज-होते निलकी में सुरेश ने देखा, अंजली बाद रंग की रेशमी साड़ी में आ रही है । यह नाहग होने को उद्देश्य से बोला, बहुत अच्छा। वह और कुछ न बोल सात मजली पर उसी आजम-मानी दान माली. लाल बलाउज, लाल गिल और सपालमा शिर का मामा-1 दं.का । सिन्दूर का टीका र गाना मग को जान नोमि है। हरी टिक नहीं पा रही क्षित नाम में नमः शिवाने को रोही उस बेला समन बनाना हैकाम न लामाका प्रती नहीं हुई। war गाड़ी पर बैठने के पहले चमन ने मानो औपचारिकता के नाते दोनों का परिचय कराया, निर्मला मेरी पत्नी । आप हैं सुरेश साहब !---कह कर वह सुरेश की ओर मुखातिब हुआ। निर्मला ने नमस्ते में दोनों हाथ जोड़ दिये । इस प्रकार नये सिरे से परिचय होता देख सुरेश विस्मित हुआ मुरेग की समझ में नहीं आ रहा है कि वह क्या बोले । अंजली ने एकदम अपरिचित-सा मुंह बना लिया है। एक ओर सुरेश, दूनरी ओर अंजली और बीच में चमन । पहाड़ी रास्ते पर गाड़ी भागी जा रही है। सुरेश को लगा कि उसके हृदय में बैठा कोई बैंड बजा रहा है। वह सहज होने की कोशिश करता है; पर हो नहीं पाता। चमन बोला, यही है रेलवेन जल-प्रपात । जब कभी अवसर मिलता है, हम पति-पत्नी यहाँ चले आते हैं। अंजली समझ रही है कि पति-पत्नी दो शब्दों पर चमन वार-बार क्यों जोर दे रहा है। -यहाँ एकवार निर्मला जङ्गल में गुम हो गयी थी।-बात पूरी कर चमन ने निर्मला के चेहरे की ओर देखने की कोशिश की। निर्मला का चेहरा नहीं दीख रहा है । वह बाहर मुंह किये बैठी है । वह पहाड़ी रास्ता, हरे-भरे पेड़, मिगनरी अस्पताल या नीला आकाश देख रही है। और मानो वह कुछ देख रही है। मुरेश वाहर नहीं देख रहा है, वह गाड़ी के अन्दर अंजली के पांव देख रहा है । अंजली ने आज चांदी की पायल पहन रखी है। पांचों की हरकत के साथ- माय पायल बज उठती है । वारिश की बूदों जैसी आवाज वह सुन रहा है । अन्दर-ही-अन्दर मानो इस पहाड़ी उपत्यका में वह आवाज गूंजती जा रही है। एक काला-कलूटा हाथ और एक भारी-भरकम शरीर बगल में बैठा है । छि: गरीर से कसी बदबू आ रही है । इतना सज-धज कर भी चमन अपने शरीर की गय छिपा न सका है । अंजली के शरीर की सुगंध भी चमन की दुगंध में ढंक गयी है । गुरेदा मन-ही-मन व्यथित हो रहा है । वह सहन नहीं कर पा रहा है । चमन अंजली की पीठ पर हाथ रखे बैठा है । वह अन्यमनस्क दीखता है । नहीं, साथ आना अच्छा नहीं हुआ। चमन दिखाना चाहता है कि वह निर्मला को निनना चाहता है ! चमन सिद्ध करना चाहता है कि दोनों एक-दूसरे को कितना प्यार करने है । उसने पावल पर से अपनी नजर उठा ली। वह भी अब बाहर देखने लगा। भी नहीं १०२ पिना -- मातीमो मे निकल । मिली मागितामा अब नही मी मामा की गया पीक एक कोसामा मा नाम दो बार लगा करने में नाम नहीं है तो रनार गाहा गया है। मायर बाली जग सामानही पसंद गाली की सतार कर गुरेज मान-पी-मन पर रहा ! रह-रह कर अकाली का शांचल विका ने बाहर रहा है। उन पर भी काला भी पार कर उड़ रहा है। लाल रंग मार नीका गजली को चार गांद लगा रहा है। गरेश पन्ट गार अंदी को नही देन पाता। यह बाहर गय को कहा पर मन ही मन पल बार अंजली को देखना चाहता है। यह नई बहाना रहा है। हाँ, नगन गे बात करने के काग वा पन्ना कर सब कुछ क्षेत्र गाना है । सही सोच कर बोला, वमन, यहाँ किन दिनो हो? चगन अवमा मुछ-न-उनर देगा। लेकिन यह गश, नमन से बात करने के बहाने बह जिन देखना चाहता है, रहती और देना बैठी है । तब गया अंजली हनी देर में ऑटन की है ! मह कुछ देश नहीं रही है ! उने क्या कुछ देखना अमला नहीं लग रहा है ! समाल राम पाली पटना पर वर्मा नही है !किन वह यह वह भी तो नही सकता। यह तो अंजली नो पहलवानता तक नहीं है। साथ ही बैठी है, वह अंजली नहीं, निर्मला है, नमन की पानी : चान बोला, हम दोनों एक साथ यहां आय है। शादी के बाद हनीमन मनाने यहाँ आये थे । जार पसन्द मा गयी । निर्मला की जमा पर मान बनवा दिया। उसके कहने पर ही काशीबार किया। निर्मला बड़ी भाग्यपान TET लक्ष्मी । जीवन में उसके आने बारह में दो गार पर माह वेग पाया मुरम की इजा हु कि यह दे. तुम जिसकी इतनी प्रगंगा पार न हो, ग्रह को र वेद पिये चुप बैठी है। यानी पाल सानी बार राठी की । गया यह सब यह पता नहीं बास अभी अंजली का नाकार सोन नदन रजा है किालमारी का यह पानी पेट नबी भी की गोगो नी सब तर, माला जला का मुकारा मिला. साल ममता, दोपहर माना और ना मान सन्मान माइन में जमा कंधा नमा मागी मन ही मनाया। जमीन मामी. ... *- 44 १ । । -- क्या यह वही अंजली है, जिसे कल रात उसने देखा था ! मुरेग अबोध-सा चुप बैठा था । वह सोच नहीं पा रहा था, क्या बोले । वमन बोला, इवर जमीन बड़ी सम्ती है। -~-अच्छा ? --सुरेश ने कहा । वमन के होठों पर हँसी नाच गयी । उसने सुरेग को जितना कड़ा आ सोच रखा था, अभी घुल-मिल जाने के कारण वैसा नहीं समझ रहा है । चमन ने निर्मला की पीठ से हाथ उठा लिया। निर्मला का स्कार्फ खुल है। उसने अच्छी तरह स्कार्फ बांध दिया। सुरेश को यह सब बड़ा बुरा लग है । उसे ऐसा लगता है कि स्वेच्छा से अंजली साथ आयी है और अब ? रही है। स्कार्फ बांधने के बाद चमन वोला, सेव या मन्तरा का बाग हो, तो अच्छा मुनाफा है। -अच्छा! वमन फिर हँसा । शायद अंजली के होठों पर भी मुस्कान खेल गयी। चमन ने सुरेश की आँख बचा कर निर्मला के नितम्ब में चिकोटी कार्ट कहीं सुरेश साहब भांप न लें कि दोनों को उनकी बात पर मजा आ रहा है निर्मला को चिकोटी काटते मुरेश ने देख लिया । उसके मन में उथल- मच गयी। चमन ने इसकी परवाह न की। वोला, आजकल वैज्ञानिक ढंग से लगाया जाता है, इसलिये फल भी काफी होता है । मुरेटा ने मन-ही-मन मोत्रा, चमन क्या मुझे दीघरिया में सेव और सर के बाग लगाने की सलाह दे रहा है ! तुम तो बड़े चालाक हो चमन । वमन बोला, यहाँ माचिस की फैक्टरी भी बनायी जा सकती है। -किया तो बहुत कुछ जा सकता है; पर मुश्किल यह है कि हा कम्पनी को सिर्फ एक ही कारोबार मालूम है और वह है पैकिंग प्लांट । -मो तो है ही। -मह उमने कीमती कम से सिगरेट निकाल कर को दी। चमन बोला, लाइनेन्स मिल जाय, तो मैं यहाँ एक कागज की बनवा कोशिश करने से लाइसेन्स मिल जायेगा। अभी तक सुरेश और अंजली में कोई बात नहीं हो पायी है। चमन --

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महानागार दिलाया, महानना l
a, TOTी पातहोती है। मामा की अभी काम
-~-दो मिनो आमा था। दोनों ने पता नहीं मान नया मतमाल
निबार विधाया।
-~~यान निल निकाला बा गाता है, आज तुमने पहली बार गुन
रहा।
----किलोमा होता. हम भला जागते ही कितनार!
जी ने अनकी पहली बार मुंह खोला, गीगा घोड़ा नहा दो, माली
गरेमा ने मना किया, लोर स्या-पया पिया जागता जगन ?
पानी सुदा यह बताना चाहता है कि वहाँ कौन-कौन-सा काम हो गकता
है, कहीं गया-नया प्रोजेरट है, यह सब मैं तुमने पाया जानता है। यही नोग
कार पर बोला, मेरी अटवी में इस इलाके का पूरा नरमा है । गुन्हें दे माउंगा।
बहुत मुछ तुम उससे इन इलाके के बारे में जान सकोगे।
नमन समझ गया कि नरेन गाहब उसमे उल्ल बनना नहीं चाहते। लने
पालाम आदमी को यह वैववाय बना भी गंगे माना है। कल रात निर्मला नहीं
सा की है, यह भी पता नहीं नममा पा रहा है । वह अब त निर्मला रमन
को अपने कमरे में बुला नहीं भेजती, पह उसय कमरे में नहीं जानता ! गुवह
प, पूजा गलती है। मन की गान्ति लिये नागी एक पाने माने
आ। जिन गान परिश्रम वादा करना पड़ता है, उसके अगले दिन सुबह
पा गानो पुमा-परमे निकालना ही नहीं चाहती । आज इतनी बार मिलने का
कारण शायद यह है कि यह दीपरिया जा रहा है, गुरेन गाहब को भी गायले
जा रहा है । सुरेश माहब माय मा रहे हैं, शायद इमलिया अन्य पूजा-पर
समित मानी है। गुरज उगरी-न-गने पूजा-
पान पर गिरे, गनाद की
सरा पमन से मामने आ पड़ी हुई है ! बोली है, में भी माम आगी।
~~~~तुम जाओगी?
waham
-विन सुरेश साहब ने गाया गया?
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वोले। क्या यह वही अंजली है, जिसे कल रात उसने देखा था ! मुरेश अवोध-सा बुप बैठा था। वह सोच नहीं पा रहा था, क्या चमन बोला, इधर जमीन बड़ी सस्ती है । -अच्छा ? --सुरेश ने कहा । चमन के होठों पर हँसी नाच गयी। उसने सुरेश को जितना कड़ा आदमी सोच रखा था, अभी घुल-मिल जाने के कारण वैसा नहीं समझ रहा है। वमन ने निर्मला की पीठ से हाथ उठा लिया। निर्मला का स्कार्फ खुल गया । उसने अच्छी तरह स्कार्फ बांध दिया । सुरेश को यह सब बड़ा बुरा लग रहा है। उसे ऐसा लगता है कि स्वेच्छा से अंजली साथ आयी है और अब शर्मा है स्कार्फ बांधने के बाद चमन वोला, सेव या सन्तरा का बाग हो, तो बड़ा अच्छा मुनाफा है। --अच्छा! चमन फिर हँसा । शायद अंजली के होठों पर भी मुस्कान खेल गयी। चमन ने सुरेग की आँख बचा कर निर्मला के नितम्ब में चिकोटी काटी । कहीं सुरेग साहब भांप न लें कि दोनों को उनकी बात पर मजा आ रहा निर्मला को चिकोटी काटते मुरेश ने देख लिया। उसके मन में उथल-पुथल मच गयी। चमन ने इसकी परवाह न की। बोला, आजकल वैज्ञानिक ढंग से बाग लगाया जाता है, इसलिये फल भी काफी होता है । मुरेश ने मन-ही-मन सोचा, चमन क्या मुझे दीरिया में सेव और सन्तरा के बाग लगाने की मलाह दे रहा है ! तुम तो बड़े चालाक हो चमन । चमन बोला, यहाँ माचिस की फैक्टरी भी बनायी जा सकती है। -~-क्रिया तो बहुत कुछ जा सकता है; पर मुश्किल यह है कि हमारी यम्पनी को सिर्फ एक ही कारोवार. मालूम है और वह है पैकिंग प्लांट । -~सो तो है ही। कह उसने कीमती केस से सिगरेट निकाल कर सुरेश को दी। चमन बोला, लाइसेन्स मिल जाय, तो मैं यहाँ एक कागज की मिल बनवा होशिया करने से लाइसेन्स मिल जायेगा । अभी तक सुरेश और अंजली में कोई बात नहीं हो पायी है। चमन की १०४ पिपामा बातों का इसर भी पा विही सती है। चपन में हाथ उठा कर दिलाया, यह देख रहे हैन साहब कोनिकल र पा पहाड, वहाँ एक किस्म की घास होती है। मागज पे लिये बड़ी अच्छी पात इस घास से कैमिकल रेवन भी बन सकता है। -किसने कहा? anna -दो कैमिस्ट ले आया था। दोनों ने पता नहीं पास से क्या सब कैमिकल निकाल कर दिखाया। -पास से कैमिकल निकाला जा सकता है, आज तुमसे पहली बार सुन --किससे क्या होता है. हम भला जानते ही कितना है सर! अजली ने अबकी पहली बार मुंह खोला, शीशा थोड़ा चढ़ा दो, मुझे सर्दी लग सुरेसा ने मजाक किया, और क्या-क्या किया जा सकता है चमन ? यानी सुरेश यह बताना चाहता है कि यहां कौन-कौन-सा काम हो सकता है, कहाँ क्या-क्या प्रोजेक्ट है, यह सब मैं तुमसे ज्यादा जानता हूँ। यही सोच कर यह बोला, मेरी अटैची में इस इलाके का पूरा नक्शा है । तुम्हें दे जाऊंगा। बहुत कुछ तुम उससे इस इलाके के बारे में जान सकोगे। चमन समझ गया कि सुरेश साव उससे उल्लू बनना नहीं चाहते। इतने चालाक आदमी को वह बेवकूफ बना भी कैसे सकता है । कल रात निर्मला कहाँ तक बढ़ी है, यह भी वह नहीं समझ पा रहा है । सुवह जव तक निर्मला चमन को अपने कमरे में बुला नहीं भेजती, वह उसके कमरे में नहीं जा सकता। सुबह यह पूजा करती है। मन की यान्ति के लिये काशी के एक साधु से मन्त्र ले आयी है। जिस रात परिधम ड्यादा करना पड़ता है, उसके अगले दिन सुबह यह मानो पूजा-घर से निकलना ही नहीं चाहती। आज इतनी जल्द निकलने का कारण शायद यह है कि वह दीपरिया जा रहा है, सुरेश साहब को भी साथ ले जा रहा है । सुरेन माहव साय जा रहे हैं, शायद इसलिये इतनी जल्द पूजा-घर में निकल पाया है। सुरज इगते-त-उगते पूजा-पाठ खत्म कर खिले गुलाव की तरह चमन के सामने का खड़ी हुई है। बोली में भी साथ जागी।

- । कह देना, दीघरिया में हमारी जमीन है। पटना से मेरे लिये एक गाय खरीद कर लायी गयी थी, उसे बचा हुआ है, वही देखने जा रही है। -तुम्हारी बुद्धि की जितनी प्रशंसा की जाय, कम है। और तुम्हारे माथे में गोवर भरा है ! ~~लोग यही कहते हैं। -~-नहीं, यह तुम्हारा अभिनय है । तुम खुद को सीवा-सादा गंवार दिखाने का अभिनय कर दुनिया को बेवकूफ बनाते हो; पर मैं तुम्हारी नस-नस पहचानता हूँ। चमन का चेहरा उतर आया था। ---यह क्या, मुंह क्यों फुला वैठे? -तुम मजाक करती हो तो मुझे बड़ा दुःख होता है निर्मला | ---ठीक है, अब तुम जाओ। बाबू से कहो, ब्रेकफास्ट कर तत्पश्चात विस्मित आँखों से देख कर चमन बोला था, तुम क्या सचमुच में हमारे साथ जाओगी निर्मला ! तुम जाओगी, मैं तो कल्पना तक न कर सका था। ----जाऊँगी। -~-कल रात गाड़ी कहाँ तक बढ़ी ? -एक इन्च भी नहीं। -क्यों! -क्यों फिर क्यों! चमन का चेहरा फिर उतर आया। निर्मला मानो उसे आश्वासन देने के उद्देश्य से बोली, समझते क्यों नहीं चमन, सुरेश माहव मेरे पुराने आशिक हैं । वर्षों बाद मुलाकात हुई है, झट से कुछ कहना अच्छा नहीं। -ठीक कहती हो। -फिर इतनी जल्दी क्यों मचा रहे हो ? चले जायगे न। -कितनी बार तो कह चुकी, जब तक मैं जाने न कहूँ, तब तक नहीं जा सकते। -क्या कहती हो निर्मला ! मेक-अप में निर्मला का चेहरा ताजे मुलाव-सा दीख रहा है। चमन चुम्बन देना चाहता है; पर निर्मला होठों पर उंगली रख कर मना करती है। चमन -- - १०६ पिपासा माया है कि अभी गुम्बन लेने से मेक-अप बदाय हो जायेगा । वह मागम पाता कि अभी गुम्बन लेने से मेक-श्रा उचट जागा, उसके होठों में गजायेगा । की-कभार जब नमन पागल-मा हो उठता है. उस समय निर्मला अपनी एका घिमिल मुसा में डोमांस कर देती । मानो यह इन नाले कलूटे नेता पर बाद फेर की है। समय-समय इन ईत्य के लिये भी उने कुछ-न-ब्ध नाना हो पाता है, अगर नहीं पारे को इस गेनो-आगाम के लिये गाये कहाँ आ। 1 - - mom आते-जाने बोला, उन्हें कुछ पता तो न चल पाया ? ~~~~या पता चलेगा? -~~यही कि तुम मेरी पत्नी नहीं हो। पमा क्यों चलेगा? -अपने पुराने आगिक से अगर गय बता दिया हो में इतनी बेचक्राफ नहीं। -~~-'यार के मामले में औरतें कुछ वेवाका होती हैं। गलत। नहीं । अगर ऐसा न होता, तो अब तक काम हो जाता। -समय लगता है। और कितना लगेगा, सकय की भी एक सीमा होनी चाहिये न । चिदिया झप से उड़ जायेगी, तब तो मानता ही पड़ेगा कि औरत प्यार के मामले में बेवाफ होनी है । मैं तो हमेगा उरता रहता हूँ कि तुम कहीं पकड में नाओ। गानी नहीं पर्दाफाश न हो जाय कि मैं तुम्हारी पत्नी नहीं है ? और नहीं तो क्या ! कौन कहता है चमन कि मैं तुम्हारी पनी नहीं हूँ ? तुम क्या सु योगध लेकर कह सकते हो? तुम तो मुझे इस तरह रखते नहीं कि मुझे यह कर दुवा हो निमें तुम्हारी न्त्री नहीं हूँ। निर्मला अब इन तह बोलती है, तो लगता है कि यह अब चमन पर यह नत्र काम नहीं गय करेगी । चमन भी सोचता है कि अब वह नि पहार एन न्ह नहीं करेगा । उसे भी बाल होता है । उफ ! माय कितना पापिया अत्याचार होता है। कौन सब हापिंड पर पच्ने होरा है ! मह सग नोचने पर पई दिनों तक चमन के ?

. बात निकल नहीं पाती । मन हमेशा उदास-उदास-सा रहता है । चमन को कुछेक क्षण चुप देख कर निर्मला समझ गयी कि दुःख चमन के हृदय को साल रहा है। वह कहकहा मार कर हंस पड़ी। हाय, वेचारा मेरे लिये बहुत सोचता है ! चमन को सहज बनाने के उद्देश्य से बोली, जाओ, अब देर न करो। थोड़ा सहज होकर चमन ने राहत की सांस ली। तत्पश्चात एक-एक कर बोला, सुरेश साहब बड़े चालाक आदमी है, उन्हें अगर भनक मिल गयी, तो सारा किया-कराया चौपट हो जायेगा। निर्मला मन-ही-मन वोली, चालाक आदमी अच्छा बनने की कोशिश नहीं करता । वह नाना प्रकार से धन कमाता है । वह जो कुछ प्राय समझता है, उसे जबर्दस्ती हथिया लेता है। मुरेश इस किस्म का आदमी नहीं है। मैं उसे भली- भांति पहचानती हूँ। ओर पहचानने के कारण ही उसकी आँखों में धूल झोंकते मुझे भय होता है । नहीं, मैं उसे अन्धेरे में नहीं रख सकती, उसे बंवकूफ नहीं बना सकती। उसे लोभ दिखा कर, शरीर दिखा कर अपना काम हासिल करना मुझे जरा भी पसंद नहीं । सुरेश के प्रति इस प्रकार का विचार भी मेरे मन को में नहीं आता है ।----निर्मला यह सब अपने आप से बोली, मुंह से कुछ न बोल सकी। उसे यह भी पता है कि गाड़ी पर उसे अपरिचित का अभिनय करना है। वह यह भी जानती है कि गाड़ी पर कैसी-कैसी बात हो सकती है और किस तरह की बात पर सुरेश परेशान हो सकता है । वह सब कुछ जानती है; इसलिये उसके होठों पर एक आश्चर्यजनक जटिल मुस्कान है। एक बाजार जैसी जगह पार होते ही चमन बोला, तुम तो जानती नहीं निर्मला, मुग साहब ने हमारा कितना उपकार किया है।---कह कर उसने एक कागज वड़ाना चाहा; ताकि सुरेदा साहब समझे कि निर्मला उनके बारे में आदा कुछ नहीं जानती है । वह अपनी बातों से निर्मला और सुरेश को सहज बनाने की कोशिश कर रहा था। सुरेटा बोला, आप से चमन बढ़ा-चढ़ा कर कह रहा है । बिना मुंह घुमाये ही निर्मला बोली, वह तो ऐसे हैं नहीं जो किसी के बारे में बड़ा-चढ़ा कर बोले; वल्कि थोड़ा कम बोलना ही उनका स्वभाव है। -~-लेकिन मैं तो समझाता हूँ कि ज्यादा बोलने की उसे बीमारी है । आप उन्हें कब से जानते है ?--कह कर इस वार निर्मला ने अपनी आँखें उनके चेहरे पर जमा दीं । बड़ी-बड़ी ऑखें, मांग में सिंदूर की चौड़ी रेखा १०८ पिपासा मोहा मनमाडलं । अभी निर्मला में कल रात की अंजली लोजे भी नहीं उनी। दरिया का कॉटेज । चमन ने देवा, निर्मला काफी महल हो उठी है ला ने अउ जना भी भय नहीं है। गुरेश साहब ने यह अनी तर वस्त नहीं हो पाया है। उसका दिल धड़क रहा है। गंभीर बादमियों से वह डरता है। इतनी कोशिशों के बावजूद भी सुरेश साहब को स्वाभाविक नहीं बना पा रहा है। हमेशा एक कमा संकोच उन्हें जकड़े हुए है। निर्मला को साथ लाकर मानो उसने सुरेश साहब को बड़ी मुश्किल में फंसा दिया है। यह खुल कर वान भी नहीं कर पाते । लेकिन बेचारा करे भी क्या, निर्मला ही तो उसकी सब कुछ है । निर्मला की बुद्धि पर उसे अगाध विश्वास है । वह जानता है कि यह युवती अपने रूप-यौवन और नाज-गणारे से स्वार्थी नेत्यों को परास्त कर डालती है। लेकिन आज चमन गुरु से एक बार बात निर्मला में देख रहा है। वह मानो भीतर से जोर नहीं पा रही है। बल्कि जो कुछ कर रही है, अनिच्छापूर्वक कर रही है । उनका चेहरा साफ बना रहा है कि वह अभिनय कर रही है। अभी अभी जो दोनों भाग कर जामुन के पेड़ तले बैठे हैं, उसमें भी कोई स्वाभा- विकता नजर नहीं आती; बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों के हृदय में एक आश्चर्यजनक प्रेम जन्म ले रहा है और यह देख कर उसे ईर्ष्या होती है। वह बर्दाश्त नहीं कर पाता; फिर भी एक बड़ी मछली फंसने के लोभ में आँखें बंद निये रहता है। और फिर गाड़ी । दीपरिया मैदान की ओर गाड़ी भागी जा रही है। गाड़ी पर नमन और सुरेश बातें कर रहे हैं । निर्मला गुमसुम बैठी है । वह फिर अन्यमनस्क हो गयी है। उसके चेहरे पर एक केसी उदासी छायी हुई है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह किसी अतल गहराई में ममगः डूबती जा रही । कोई मानो उसे खींचे जा रहा है। शायद उसका अभिनय नकल नहीं हुआ है । अपने व्यवहार के कारण वह गायद अपनी असलियत छिपा न सकी है। मुरेश शायद समझ गया है कि वह नमन की पत्नी नहीं, बल्कि खेल है । इसलिये वह हमेशा दूर-दूर रहना चाहता है, करीब आना नहीं चाहता : दो दिनों में यह देख रही है, गरीब होने पर भी नुरेशा उसले कटा-कटा-सा रहता है । उसके भारे पर हमेशा एक अजीब-सा गंकोच छाया रहता है । फल मान वह एक अदाय इन्धा के अन पागल-सीहो उठी थी कि सारी गलाओं को तो विगाना १ । कर सुरेश से कहना चाहती थी, सुरेश में वह नहीं, जो तुम समझते हो । अब मैं ऐसे जीवन से थक गयी हूँ। मुझ से अव यह सब नहीं हो पाता, सुरेश । तुम क्यों आये ? तुमने आकर मेरे मन में आग जला दी । क्यों आये तुम ? मैं अपने आप को भूल जाना चाहती थी। लेकिन वह कुछ भी न कह सकी थी। सुरेन ने उसे तरह-तरह से समझाया था। नहीं, उसने समझाया नहीं बत्कि बहलाया था। खिलौना खो जाने पर जिस तरह वच्चों को बहलाया जाता ठीक उसी तरह सुरेश ने उसे बहलाने की कोशिश की थी। उस समय घृणा और क्षोभ से उसका तन-बदन जल उठा था और इच्छा हुई थी कि सुरेश के चेहरे पर थूक दे [.. निर्मला स्वयं को पराजित महसूस कर रही है। शायद पराजित होने के कारण ही चुप बैठी है, खिड़की पर मुँह रख कर बाहर देख रही है। गाड़ी एक हिचकोले के साथ रुकी। सुरेश ने देखा दीघरिया का मैदान अपने में हरियाली संजोये दूर तक फैला है। सामने ही एक झील है। झील के उस पार एक चट्टान पहाड़ की तरह सीना ताने खड़ी है। चट्टान के चारों तरफ हरे-भरे पेड़-पौधे हरियाली विखेर रहे हैं । रंग-बिरंगी लताएं चट्टान से चिपकी हुई हैं । सामने का सूरज आश्चर्यजनक किरणें बिखेर रहा है और ऐसी किरणों में डूबी प्रकृति एक मनोहर दृश्य उपस्थित कर रही है। प्रकृति की इस मनोहरता में सुरेश को अंजली कटी-बटी-सी प्रतीत हुई । सुरेश और चमन विभिन्न विषयों पर बात कर रहे हैं। निर्मला उन दोनों से कटी-कटी रहती है। किसी पेड़ से पत्ते तोड़ कर सूंघती है या किसी झाड़ी से नीले रंग का फूल तोड़कर जूड़े में खोंस लेती है ! चारों तरफ देख कर निर्मला ने एक छोटा-सा शीशा निकाला। दोनों की नजर वचा कर उसने गीगा देखा । मखमली घास, हरे-भरे पेड़-पौधे, रंग-दिरंगे फूल, छलकते सरोवर और पहाड़ों के वीच उसे लगा कि वह अरेवियन नाइटम की नायिका बन गयी है। पता नहीं, मन क्यों कर पवित्र हो गया ! और मन में पवित्रता का अनुभव कर वह एक पत्थर पर जा बैठी । उसके हृदय में प्रकृति के प्रति प्यार उमड़ आया। रह-रह कर उसे छिपी नजरों से सुरेश को देखने की इच्छा हो रही है । नीला पेंट, इन सर्ज का कोट, सफेद मोजें; मोजों के अन्दर छिपी कोमल त्वचा, हाथ-पांव और छाती के बाल । यानी सुरेश की हर चीज उनके तन-बदन में एक अनोव-सी उणना भर रही है। मुरेश पर नजर पड़ते ही उने ऐसा लगा कि एक अजीब-सी गनगुनी धारा उनी नसो में बहने लगी है । आज तक उमका चेहरा प्रत्यागा की आग में इस तरह तमनमा न उठा था। वह पागल-सी हो उठी है । जलन इतनी तेज होती 1 ११० मिवामा में m- जा रही है कि अब वह किमान एक गगी , यहाँका किसान की भी कोई परवाह न परेन । बह गुरेश को नाप लिये किमी साल में बनेगी। जो बाद किसी या मुले दान में मनायात वर्ग में भीगती रहेंगी। निर्मला ने बला, नरेश में एक छोटा-सा मत निजाला : बह मिन- मित गोणों से फोटो खींच रहा है। ये सारे फोटो रिपोर्ट के मान कागनी को दिये जायगे । बानी फोटो लीचना भी एक आवश्यक कान है जो नरेग कम्पनी के लिये कर रहा है । निर्मला को लगा कि मुरेल छिप-किस कर उसकी सवार भी अपने कमरे में बंद करता जा रहा है। हालांकि मुझेश अंजली को पता नहीं चलने दे रहा है कि वह छिप-छिप कर उसे अपने मामले में बाँद कारता जा रहा है। लेकिन नुरेन का चेहरा देखकर ही निर्मला समना रही है कि यह सिरी मैदान और पहाड़ को कमरे में नहीं उतार रहा है। यह इस तरह निर्मला के फोटो खींच रहा है ताकि चमन को पता तक न जले। सिर्फ हिक-मिक ना आयान हो रही है। कमरा में आँच लगाये या फोटो खींचते-खींचते सुरेश अंजली के बिलकुल करीव जा पहेना । उसके बाद चमन की ओर देख कर बोला, चमन, मैं तुम्हारी गनी की एक तस्वीर ले रहा हूँ, बुरा तो नहीं मानोगे ? --अरे नहीं साहब । कल वह खाने पर न आ सकी थी, इससे वैचारी को बढ़ा दुःख हुआ था । एक क्यों बाबू जी, जितना जी चाहे, उतनी तस्वीर लीजियन। RAN -ठीक तो? -हाँ साहब हाँ । मेरी निर्गला दकियानूसी विचार की नहीं है। ~-वर, इतना तो में इनकी बातचीत से ही समझ गया है !--यह रह कर सुरेश निर्मला की ओर गुड़ा, आप जरा खड़ी हो जाये तो । बजली उठ गाड़ी हुई। -~~-जा मुंह पर उताइये न । अंजली में मुंह यादा ऊंचा उठा लिया । -इतना नहीं। संजली ने मुंह काफी नीचे भुका लिया। ..दोनों के बीन। अायको निर्मला सबली! आर तोडेर सारी तस्वीर दे चुके सुरेश साहस और लेकर घमा का ? Palpe । । मुरेवा का चेहरा कसा न एक अपराधी-सा दीख पड़ा । अंजली क्यों कर समझ गयी कि मैंने छिप-छिप कर उसकी तस्वीर खींची है ! इस वार निर्मला ने मुरेश की ओर देखा । जिस तरह हर वार देखती आयी है, जिस तरह बुआ जी द्वारा पकड़े जाते वक्त देखा था, ठीक उसी तरह देखा । ऐसी नाजुक घड़ियों में सुरेश की आँखों में आवश्यकता से अधिक भोलापन उभर आता है, उसकी आंखों से भलमनसाहत टपकने लगती है । वह सर्वथा अवोध बालक प्रतीत होने लगता है । यानी अब वह फोटो नहीं खींच सकेगा, वह जा रहा है। उसके चल देने पर निर्मला का कष्ट बढ़ जाता है, वह छटपटाने लगती है । वह सुरेश को अपने निकट पाना चाहती है, बहुत निकट । मुरेश जा रहा है, दूरी बढ़ती जा रही है । अव नहीं, वह अपने को अब नहीं रोक सकती । बोल उठी, सुरेश साहब, क्या हुआ, तस्वीर लीजिये न । सुरेश ने पलट कर देखा। -आपने इस पोज में चाहा था न ? सुरेश के मुंह से बोल न फूटा । निर्मला ने एक अद्भुत ढंग में गर्दन सीधी कर रखी है । निर्मला का सारा व्यक्तित्व फूट पड़ा है। उसने शटर दवाया; पर तस्वीर नहीं ली। ऐसी तस्वीर लेने से उसे शान्ति नहीं मिलेगी। अंजली बोली, आप मेरी एक और तस्वीर लीजिये। -किस तरह लूं, वताइये। -मैं पीछे पलट कर भागूंगी और आप कैमरा क्लिक करेंगे। सुरेदा ने यन्त्रपूर्वक भागती हुई अंजली को कैमरे में कैद कर लिया। -एक और। -किस पोज में, बताइये ? -~-इस पोज में कह कर एक पेड़ की ओट में उसने अपना आवा शरीर छिपा लिया। आधा शरीर और पूरा चेहरा बाहर है। जंगली झाड़ियों के अन्दर उसका चेहरा दीख रहा है। लाल बनारसी, आँखों में काजल; पर झाड़ियों में छिपा चेहरा । यह सब देख कर वह वोला, पर्याप्त प्रकाश नहीं मिल रहा है। -जितना मिलता है. उनने से ही हो जायेगा । जितना अम्पट होगा, उतना ही आप मुझे पहचान सकेंगे। मुरेमा को कमरा हिक करना पड़ा। अन्त में मरेग बोला, चमन तुम अपनी पत्नी के पास खड़े हो जाओ। दोनों की नबीर लंगा। । ११२ पिशामा साहब, मैं तन्वीर नहीं खिंचाता ! -आज बिना लो। -~-हमारे देश में इसकी मनाही है, गर । बलि. आप और निगला एक नाम बड़े हो जाइये, तस्वीर में ले लूंगा। चगन की ऐसी बात सुन कर सुरेश सोग न सका कि यह नया गरे । पता नहीं, उसका दिल क्यों धड़कने लगा है ! वोला, तुम नाभी-कभी बों-सी बात करने लगते हो चमन । -----जीने के लिये कभी-कभार बच्चा भी बनना पड़ता है साहब । विना मा बने जीने का मजा नहीं आता । आप निर्मला के करीब जा खड़े हो जाइये न सर । डर क्यों रहे है ! -गा भला चमों? -निर्मला बुरा नहीं मानेगी। --नहीं, मैं बुरा मानूंगी । बुरा मानने का कारण हो सकता है। -निर्मला ने नात आवाज में वाहा । सुरेश ने तत्क्षण प्रसंग बदल दिया । इसे लेकर दोनों में विवाद बढ़ सकता है, मोच कर बोला, यह किसकी जमीन है, जानते हो ? -किसकी है साह्य --एक बंगाली वावू की। दरअसल मुरेश ने अपमान पी जाने के उद्देश्य से ही प्रसंग बदल दिया था। सुरेश कुछेक क्षण कुछ सोचता रहा । धीरे-धीरे दूर चला गया। फिर कुछ गोचता हुआ चमन के करीब आ गया । वह अव अजली की ओर नहीं देख परा रहा है । चोला. उन्होंने टी-गार्डन बनाने के लिये खरोदी थी। ---फिर बनाया क्यों नहीं ? गुरेश ने देखा, अंजली काफी दूर निकल गयी है। उसने सोचा, उसे अकेले छोटना ठीक नहीं । उवर ही जाया जाय । वह चमन से बातें करता हुभा मागे कड़ पला---उन लोगों का एक्सपोर्ट-इंपोर्ट का बिजनेस था। धंया बड़ा जोरदार था। -~~~-एनसपोर्ट-इम्पोर्ट के विजनेस में लक्ष्मी बरसती है सर । -ठीक कहते हो ! उन लोगों पर भी लक्ष्मी प्रमान थी । अब हालत बिगड़ गयी है। गुरेश क्षण भर के लिये चुप हो गया । उसके बाद यह जो नहीं रहना - पिपासा ११३ । - वाहता था, सहसा उसके मुंह से निकल पड़ा, पता नहीं तुम्हारी पन्नी मन-ही-मन क्या सोच बैठी। -कुछ नहीं साहब, कुछ नहीं । वह है ही अपनी मरजी की । जो चाहेगी, वही करेगी। पता नहीं, कभी-कभार उस पर कैसी सनक सवार हो जाती है । मैं अगर जानता होता कि अभी उस पर उसकी मरजी का भूत सवार है, तो कहता ही नहीं |-चमन ने बड़े संकोच के साथ कहा । -हाँ, तो मैं कह रहा था न ! - कह कर सुरेश सहसा क्षण भर के लिये चुप हो गया। उसने देखा, निर्मला झील के पास एक पत्थर पर गुमसुम बैठी है । वोला, हाँ तो मैं यही कह रहा था कि वंगाली विजनेसमैन का मंदी में जो नतीजा होता है, वही उन लोगों के साथ भी हुआ । पता नहीं, तुम जानते हो या नहीं, स्टेनलेस स्टील के कारोबार में पैसा-ही-पैसा है । एक पड्यंत्र के फलस्वरूप उन लोगों के हाथों से कारोवार निकल गया । सुरेश मानो अभी बोल नहीं रहा है। बल्कि जो-सो बके जा रहा है। वह मानो फिर से कैमरे में कुछ ढूंड रहा है । ढूंढते-ढूंढते अन्यमनस्क-सा हो गया है । उसने निर्मला को देखा । वह उसी पत्थर पर बैठी हुई है। शायद वह कुछ गुनगुना रही है । पता नहीं क्या सोच कर वह पोल ठा, वमन, तुम्हारी पन्नी रवीन्द्र संगीत जानती है न । एक गीत सुनाने कहो न । चारो तरफ भीनी-भीनी हवा । सर्दी की हवा और गुनगुनी धूप । सूर्य की प्यारी किरणों में नहाता वन-उपवन । चारों ओर रंग-विरंगे फूलों की वहार । चमन ने आवाज दी, निर्मला। निर्मला जलतरंग-सी आवाज में वोल उठी, क्या... ! ~~~आओ न, मुरेश साहब तुम्हारा गाना मुनना चाहते है । -इधर ही आ जाओ न, कितनी अच्छी जगह है । रंग-बिरंगी चिड़ियों ने झील में उतरना गुन्ड किया है । वह देखो, एक कितनी बड़ी चिड़िया आतमान में उड़ रही है। आओ, इधर आ जाओ। अभी-अभी वह चिड़िया झील में उतर पड़ेगी। दोनों ने देखा एक बहुत बड़ी चिड़िया झील में उतर रही है। बड़ी खूबसूरत चिड़िया है । रंग एकदम सफेद है, सिर्फ पंखों पर कहीं नीला रंग दीख पड़ता है। वह और चिड़ियों के बीच रानी-सी जा बैठी। झील के चारों तरफ रंग-बिरंगे पूल खिले हैं । झील में कमल और कुमुद की बहार है । एक पहाड़ी उपत्यका में एक ऐसी मनोहर भील देख कर सुरेश मुग्ध हो गया। ११४ पिसासा निकट पहुँचने पर दोनों ने देखा, निर्मला दीनों पर पानी में दुबोने एक पत्थर पर बैठी है । लाल साड़ी और अंग-प्रत्यंग में विलवाण लावण्य ! पानी के अन्दर पांव कांप रहे है। सुरेश आज अंजली से आँखें नहीं मिला पाता ! चोरी-छिपे निर्मल सरोवर में अजली का प्रतिबिंब देखते-देखते वह अचल-मा हो गया है। क्योंकि सर्वत्र अंजली ने एक अपूर्व दृश्य की सृष्टि कर रखी है। उसका मृन एवं उदात्त स्वर वातावरण में गूंज रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो नीले आकाग के नीचे कोई वनदेवी बैठी गा रही हो । मुरंग झील के किनारे बैठा । एक हाथ घास पर फैलाये बैठा है और निर्निमेप दृष्टि से अंजली की ओर देख रहा है। उसने गाना कब सीखा ! वह इतनी गुन्दर क्यों कर बन गयी ! मुक्त पक्षियों की भाँति वह आसमान में उड़ती फिर रही है । सुरेश के हृदय में भाग धधक रही है। वह अपनी पत्नी और मन्तान को भूल बैठा है ! वह भूल गया है कि उसे जल्दी-से-जल्दी घर वापस जाना है । उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा है । केवल अंजली के साथ जल- प्रपात की शीतल छाया में किसी पेड़ तले उसे बैठे रहने की इच्छा हो रही है । - - - और फिर प्रतीक्षा। पब रात होगी । कव गिरजा का घंटा बजेगा । चमन लाल के कमरे की बी कब बुझेगी। कब दरवान गेट की रोशनी बुझा कर कम पावर का बल्ब जला देगा । जव पूरा मकान भुटपुटे अंधेरे में डूब जायेगा, उस समय एक युवती अभिसार में निकलेगी। चमन अपने कमरे में अंधेरा पलाये बैठा रहेगा । देखेगा, निर्मला जा रही है या नहीं । काली चादर में लिपटी एक मूर्ति देखते ही वह निशिन्त हो जाता है। निर्मला उसके लिये जी-जान चेष्टा कर रही है। अब चिड़िया की गर्दन निर्मला के हाथ में है । निश्चिन्त होकर वह एक चादर ओढ़ कर सो जाता है। उस समय गुरेश चहलकदमी करता रहता है । बीच-बीच में घंटा बज उठता है-~-उन-दन... । आज चौथा दिन है । सुरेश सब कुछ जान गया है। वह यह भी जान गया है कि वह एक जाल में फंस चुका है। फिर भी वह जाल तोड़ कर जा नहीं पाता । निर्मला ने उसे किसी जादुई मन्त्र में बांध रखा है। जिस तरह तिपाई पर पानी रखा रहता है, आज भी उसी तरह रखा हुआ है । जिस तरह वह कम पावर का बल्ब जला कर बैठा रहता है, आज भी उनी सरह हमा है । कल रात वह आयी घी, पास बैठी थी। सिर्फ पुरानी बातें -- पिपाना ११५ +- सुनाती रही थी । लेकिन वह निर्मला की वात मन देकर सुन न सका था; क्योंकि उसके अन्दर एक दूसरी ही आग जल रही थी। वह निर्मला को, नहीं, नहीं, अपनी मजली को बाहों में सनेट लेना चाहता था। लेकिन वह कुछ न कर सका था । उसे पता न था कि वह इतना डरपोक है। वह अपनी पत्नी को प्यार करता है । अजली उसे उफनती नदी-सी पवित्र प्रतीत होती थीं। वार- वार कोशिश करने के बावजूद भी वह अंजली को स्पर्श तक न कर सका था । उसे डर लग रहा था । मानो सुरेश उसके पास उसकी आपबीती सुनने के लिये ही बैठा रहता है । वह और कुछ नहीं चाहता। इतने दिनों का एक संस्कार हमेशा साया की तरह उसके पीछे पड़ा रहता है-~वह अपनी पत्नी को प्यार करता है। उस पर उसकी पत्नी का अधिकार है । संस्कार उसे आगे बढ़ने नहीं देता, उसकी सारी आशाओं पर पानी फेर देता है। सुबह होती है; पर यह पलङ्ग पर पड़ा रहता है । अंजली कब चली जाती है, उसे आहट तक नहीं मिलती। सुबह होते ही चमन उठ बैठता है । पूजा खत्म होते ही अंजली के कमरे में जा घुसता है। पूछता है, गाड़ी कहाँ तक बढ़ी ? -आदा दूर नहीं। -~-सुरेश साहब कुछ कहते नहीं ? -~-नहीं। ---तुम्हें छना नहीं चाहते ? ~नहीं। --आखिर तुम कर क्या रही हो निर्मला ! यह मौका फिर न आयेगा । चमन के प्रति निर्मला के मन में घृणा उत्पन्न हो जाती है। रुपया ! सिर्फ रुपया !! लेकिन एक रात सुरेश प्रतीक्षा करता रहा; पर अंजली नहीं आयी । मुरेश को नींद नहीं आ रही थी। दरवाजा खोल कर वह बाहर निकल पड़ा । कल चमन लाल किसी काम से बाहर गया था। सुरेश तीसरे पहर चाय पीने अन्दर जाता था ! कल भी गया था । अंजली उसे एक साधारण साड़ी में मिली थी। उसकी अभ्यर्थना करती हुई बोली थी, आज मेरा उपवास है । --इतनी धार्मिक क्यों बनती जा रही हो ? -यदि अगला जन्म सुखी हो । -मुना है, तुम पूजा-पाठ करती हो । ११६ पिपासा - from -- करती हूँ । देखोगे, मेरा भगवान ? काहीं. किस कमरे में? ..आओ। एक लम्बा बरामदा पार कर सुरेशं श्वेत संगमनेर के फर्ग पर जा रहा हुआ। दायीं ओर के कमरे में अंजली रहती है। कमरे को पार करते ही एक छोटा-सा दरवाजा आता है। दरवाजे के सामने ही भावान का एक बढ़ा-ना सिंहासन है। एक लम्बा-चौड़ा हाल जैसा कमरा । देवी-देवताओं के अनेक दिन । काले पत्थर का कृष्ण । सोने की आँखें । कमरे में एक टेबिल पर उसने एक तस्वीर देखी थी। किसी दूसरे की नहीं, बल्कि अपनी तस्वीर देखी थी । इतने दिनों तक तस्वीर अंजली के ट्रा में पड़ी हुई थी। लेकिन मुंया के आने के बाद वह उसे ट्रक में वन्द न रख सकी । निकाल कर टेबिल पर दो दी। सुरेशं बोला, यह तस्वीर ! -- हाँ, यह अभी तक संजोये हुई हूँ। तुम्हें मिलने को लिया जा। मेरी शादी ठीक हो गयी थी। एक प्रेसमैन के सिर में मही जा रही थी। मिलना तो दूर रहा, तुमने उत्तर तक न दिया । तुम इतने म्याथी हो । -विश्वास करो अंजली, मुझे तुम्हारी विट्टी नहीं मिली थी। -मामा जी ने सोचा, लड़की जब इतना कुछ जान गयी है, इतनी नमानी हो गयी है, तब भटपट इसे घर से भगा देना चाहिये ! बस, चट गंगनी, र याह । सिर्फ एक आदमी की जरूरत है जो इसका पति वला के। और न नर नहाल उन्हें मिल गया । काश, उस कमाल को तुम एक बार देगा पाई सुरेश ! वह तुम्हें चालीस भी दीखता और अनायास ही तुम बाट यानी नन्ह सकते थे। हड्डियों का ढांचा, कुलित प्रेसमैन मेगा पति बन बैठा। भोर शादी के बाद मेरा अङ्ग-अङ्ग भर आया, मैं बेहद सबसूरत हो गयी। और फिर एक विस्तर से दूसरे विस्तर पर भेजी जाने लगी। प्रेमन में प्रालि मालिक से एक मारवाड़ी और अब चमन । जानते हो, चमन कोक पर अगर विश्वास है । उने विश्वास है कि मंगार का हर सादमी नर जो पान हो जायेगा । उसके लिये कितनो केही वितरणमा बह वह काफी देर तक अली के कमरे में बंटा था। उसया कम पहचानता है । गाल इसी कमरे में सुरंत करना। बजली के साथ बाते करना होगा। कार यो पसन्द आया था। हालांकि इसमें 12 ; a " - । सुनाती रही थी । लेकिन वह निर्मला की बात मन देकर सुन न सका था; क्योंकि उसके अन्दर एक दूसरी ही आग जल रही थी। वह निर्मला को, नहीं, नहीं, अपनी अंजली को बाहों में समेट लेना चाहता था। लेकिन वह कुछ न कर सका था । उसे पता न था कि वह इतना डरपोक है। वह अपनी पत्नी को प्यार करता है । अंजली उसे उफनती नदी-सी पवित्र प्रतीत होती थीं। बार- बार कोशिश करने के बावजूद भी वह अंजली को स्पर्श तक न कर सका था। उसे डर लग रहा था । मानो सुरेश उसके पास उसकी आपबीती सुनने के लिये ही बैठा रहता है। वह और कुछ नहीं चाहता। इतने दिनों का एक संस्कार हमेशा साया की तरह उसके पीछे पड़ा रहता है-वह अपनी पत्नी को प्यार करता है। उस पर उसकी पत्नी का अधिकार है। संस्कार उसे आगे बढ़ने नहीं देता, उसकी सारी आशाओं पर पानी फेर देता है। सुबह होती है; पर वह पलङ्ग पर पड़ा रहता है । गजली कब चली जाती है, उसे आहट तक नहीं मिलती। सुवह होते ही चमन उठ बैठता है । पूजा खत्म होते ही अंजली के कमरे में जा घुसता है । पूछता है, गाड़ी कहाँ तक बढ़ी ? -आदा दूर नहीं। -युरेश साहव कुछ कहते नहीं ? नहीं। ----तुम्हें छुना नहीं चाहते ? नहीं। -आखिर तुम कर क्या रही हो निर्मला ! यह मौका फिर न आयेगा । चमन के प्रति निर्मला के मन में घृणा उत्पन्न हो जाती है। रुपया ! सिर्फ रुपया !! लेकिन एक रात सुरेशा प्रतीक्षा करता रहा; पर अंजली नहीं आयी। मुरेदा को नींद नहीं आ रही थी। दरवाजा खोल कर वह बाहर निकल पड़ा । कल चमन लाल किसी काम से बाहर गया था। सुरेश तीसरे पहरं चाय पीने अन्दर जाता था। कल भी गया था । अंजली उसे एक साधारण साड़ी में मिली थी। उसकी अभ्यर्थना करती हुई वोली थी, आज मेरा उपवास है । -इतनी धार्मिक क्यों बनती जा रही हो ? -~-यदि अगला जन्म सुखी हो । ----मुना है, तुम पूजा-पाट करती हो । । ११६ पिपासा -- -- Aani- । करती हूँ। देखोगे, मेरा भगवान ? -कहाँ, जिस कमरे में? -आओ। एक लम्बा बरामदा पार कर सुरेशं श्वेत संगमर्नर के फर्म पर जा खंडा हुआ । दायीं ओर के कमरे में अंजली रहती है । कमरे को पार करते ही एक छोटा-सा दरवाजा आता है । दरवाजे के सामने ही भगवान का एक बड़ा-सा सिंहासन है। एक लम्बा-चौड़ा हाल जैसा कमरा । देवी-देवताओं के अनेक चित्र । काले पत्थर का कृष्णं । सोने की मानें । कमरे में एक टेबिल पर उसने एक तस्वीर देखी थी। किसी दूसरे की नहीं, बल्कि अपनी तस्वीर देखी थी । इतने दिनों तक तस्वीर अंजली के ट्रक में पड़ी हुई थी। लेकिन नुरेश के आने के बाद वह उसे ट्रक में वन्द न रख सकी । निकाल कर टेबिल पर रख दी थी। सुरेशं बोला, यह तस्वीर ! -हाँ, यह अभी तक संजोये हुई हूँ। तुम्हें मिलने को लिखा था। मेरी गादी ठीक हो गयी थी। एक प्रेसमैन के सिर में मड़ी जा रही थी। मिलना तो दूर रहा, तुमने उत्तर तक न दिया । तुम इतने स्वार्थी हो । -विश्वास करो अंजली, मुझे तुम्हारी चिट्ठी नहीं मिली थी। -मामा जी ने सोचा, लड़की जब इतना कुछ जान गयी है, इतनी सयानी हो गयी है, तब झटपट इसे घर से भगा देना चाहिये । वस, चट मंगनी, पट ब्याह । सिर्फ एक आदमी की जरूरत है जो इसका पति कहला सके। और एक नर नहाल उन्हें मिल गया । काश, उस काल को तुम एक बार देख पाते सुरंश ! वह तुम्हें चालीस भी दीखता और अनायास ही तुम उसे साठ का भी कह सकते थे । हड्डियों का ढांचा, कुल्लित प्रेसमैन मेरा पति बन बैठा। और शादी के बाद मेरा अङ्ग-अङ्ग भर आया, मैं बेहद खूबसूरत हो गयी। और फिर मैं एक विस्तर से दूसरे विस्तर पर भेजी जाने लगी। प्रेसमैन से प्रेस मालिक, मालिक से एक मारवाड़ी और अब चमन । जानते हो, चमन को मुझ पर अगाध विश्वास है । उसे विश्वास है कि संसार का हर आदमी मेरी नज़रों से घायल हो जायेगा । उसके लिये कितनों के ही विस्तर में गर्म कर चुकी हूँ। कह वह काफी देर तक अंजली के कमरे में बैठा था । उसका कमरा नुरेशा पहचानता है । कल इसी कमरे में सुरेश और अंजली बड़ी देर तक बैठे थे। उसे अंजली के साथ बातें करना बड़ा अच्छा लगा था। अंजली का पूजा पर भी उसे पसन्द आया था। हालांकि इस उम्र में इतना पूजा-पाठ नहीं जत्रता; -- - - फिर भी उसे अच्छा लगा था। तीसरे पहर वह अंजली को गाड़ी पर ले गया या। उसी भरने के पास दो जाकर बैठे थे। बार-बार उसे अंजली को चूम की इच्छा हुई थी। लेकिन एक सङ्कोच ने उसे जकड़ रखा था। एक संस्कार उस पर सवार था । एक बड़पन उस पर हावी था । अर्यात सुरेश साहब एक नामी आदमी है, उसे तुम सहन ही अपने चंगुल में नहीं फंसा सकती। सुरेग ने बल- पूर्वक अपनी कुत्सित इच्छाओं को दमन कर रखा था। बार-बार उसे महसूस हुआ है कि वह एक जाल में फंस गया है। उसे चल देना चाहिये। जितनी बार उसने ऐसा सोचा है, उतनी ही बार उसे लगा है कि रूपहली चाँदनी में एक सुन्दरी जा रही है । वह कहाँ जा रही है, वह दूर, बहुत दूर क्यों जाना चाहती है, सुरेश की समझ में नहीं आता। अंजली मानो अकेली ही एक स्टेशन पर खड़ी रहती है । उस समय अंजली को छोड़ कर सुरेश जाना नहीं चाहता। उसकी इच्छा नहीं होती कि वह अंजली को स्टेशन पर अकेले छोड़ कर चल दे। तरह-तरह के बहाने बना कर वह चार दिन रह गया । आज रात भी अंजली को आना चाहिये था; पर आयी नहीं । आज पहाड़ की चोटी पर ऐसी खूबसूरत घाँदनी छिटक रही है, और वह अकेले बैठा है। नहीं, वह अकेले नहीं बैठा रहेगा, ऐसा नहीं हो सकता, अंजली पर उसे अधिकार है, पूरा-पूरा अधिकार । नये सिरे से उसके हृदय में अधिकार ने जन्म ग्रहण किया है । प्रौड़ सुरेश किशोर मुरेश बन गया है । वह उसके कमरे की ओर जा रहा है, चारों तरफ देख-मुन कर जा रहा है। दरवाजे पर दस्तक देते ही उसे लगा कि दरवाजा अन्दर से खुला है। उसने देखा, मंद-मंद प्रकाश में अजली औंधी पड़ी रो रही है। सुरेश सोच न सका, वह क्या करे । इस तरह फफक-फफक कर अजलो क्यों रो रही है ! मुंह छिपा रखा है। धीरे-धीरे वह सिरहाने के पास जा बैठा । सिर पर हाथ फेरते ही अंजली उठ बैठी। वह सपने में भी न सोच सकी थी कि सुरेश उसके कमरे में आयेगा। वह रंधी आवाज में वोली, तुम चले जाओ सुरेश । क्यों, क्या हुआ ! जाने क्यों कहती हो ? अंजली ने ऑखें पोंदीं । कुछ कहते-कहते रुक गयी। वह कुछ कह न un - सकी। - मुरेश बोला, रो क्यों रही थी ? -~-तुम्हे मेरी चिट्ठी न मिली, अगर मिल जाती, तो मेरा जीवन कुछ और होता।

Hd- Aam- - - -~-तुम इसलिये रो रही थी ? -~-क्यों रो रही थी, मैं खुद भी नहीं जानती सुरेश। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। तुम मुझ से कुछ छिपा रही हो अंजली । -नहीं, कुछ भी नहीं छिपा रही हूँ। -कह कर वह जोरों से हंस पड़ी ! -अच्छा सुरेश, तुम्हारी पत्नी को तुम पर बहुत विश्वास है न ? - हाँ ! --तुम ने जो एक लड़की का जीवन वर्वाद कर दिया है, यह वह जानती है। --नहीं। -तुम्हें पश्चाताप नहीं होता। सुरेश चुप रहा। -~~-क्या हुआ, बोलते क्यों नहीं ? -क्या वोलू? तुम साधु हो और मैं वेश्या हूँ। तुम सब कुछ जानते हो । मैंने अपनी असलियत बता दी। -~आज तुमने ज्यादा पी रखी है । -दिना पिये जिऊंगी कैसे । मेरा और है ही क्या, बताओ ? -कुछ नहीं ! - कुछ नहीं है, कहना गलत होगा । तुम्हारी स्मृति हृदय की गहराइयों में मैंने संजो रखा है । तुम्हारा प्यार अभी भी नंचित है । तुम्हारे साथ के दिनों की याद कर अभी भी जीने की इच्छा होती है। वैसी आकांक्षा लिये जीवन में और किसी युवक की प्रतीक्षा न कर सकी। सोच रहा हूँ कल चला जाऊंगा । यहाँ रहने से तुम्हें दुःख पहुंचता है । कुछेक क्षण तक अंजली एकटक देखती रही । वह जानती है कि अभी तक चमन का काम नहीं कर सकी है। जैसे भी हो उसे और कुछ दिनों तक अटका कर रखना होगा । शरीर के विनिमय में उसे टिका रखना होगा । लेकिन वह ऐसा कर नहीं पाती । प्यास लगने पर सुरेश सिर्फ पानी पीता है, उसे बांहों में नहीं भींचता, उसके होठों से अपनी प्यास नहीं बुझाता । सुरेशा अंजली को जितना दूर-दूर रखना चाहता है, वह जितनी कोशिश करता है कि कुछ न करेगा, उतनी ही अंजली की जिद बढ़ती जाती है । -- ---- पियाना ११६ - तुम्हें पता चल गया है सुरेश कि मैं चमन लाल की रखैल हूँ। तुम मुझे छूते भी डरते हो । मुझसे घृणा करते हो। सुरेश वोला, तुम आज रात क्यों न आयी, सोच कर मिलने आ गया । क्या नुरेश के मन में और भी तेग आग जल रही है ! क्या वह अजली के लिये तड़प रहा है ! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ। तुम्हारे शरीर का आकर्षण, तुम्हारा खोखलापन मुझे मन-ही-मन हंसाता है। तुम जितना भी बन ठन कर आओ, मेरे सामने नंगी खड़ी हो जाओ, मैं तुम्हारा भोग नहीं करूंगा। तुम्हारे पास अब मेरे लिये कुछ पाने को नहीं है। इस वार अंजली ने सीधा प्रश्न किया, मुझ से तुम घृणा करते हो न? -~-नहीं। -फिर तुमने मेरा चुम्बन क्यों न लिया! -~-चुम्बन लेने से क्या तुम खुश होगी अंजली ? -हाँ । मुझे चूम लो मुरेश । चूमने पर समझंगी तुम सचमुच में अच्छे हो । तुम मुझ से वृणा नहीं करते । तुमने मुझे माफ कर दिया है । मुरेग बगल में सो गया। चुम्बन लिया। ----अब मुझे कोई दुःख नहीं सुरेश । तुम मुझ से घृणा नहीं करते, सोच कर मुझे आज अपार सुख मिल रहा है । सुरेश तुम मूझ से घृणा नहीं करते सोच कर मुझे कितनी बुगी मिल रही है |-अजली ने पागल की तरह मुरेश को दबोच लिया ! गुरेश वोला, मैं तुम से कभी घृणा नहीं कर सकता । आज तक मैंने जो कुछ सञ्चय किया था-चरित्र, नियम-निष्ठा, कर्तव्य-बोध-तुम्हें देखने के बाद मेरा सब कुछ दिखर गया । मैं तो सपने में भी न सोच सका था कि उस दिन की घटना तुम्हे यहाँ पहुँचा देगी । मैं तो यही समझता था कि तुम मुखी हो। अच्छे भर में तुम्हारी शादी हुई है । बुभा जी ने पिता जी से कहा था, वह इतने मुन्नी घर में तुम्हारी शादी कर सकेंगी, सपने में भी न सोच सकी थीं। कह कर उसने अंजली को छाती में भींच लिया अंजली वोली, मुझे किरना अच्छा लग रहा है, बता नहीं सकती। मेरी गारी आकांक्षा तृप्त हो गयी । अब तो मुझे मितं मर जाने की इच्छा हो रही है । जितना भी चाहे मेरे शरीर से खेलो। मेरे इस शरीर में कितने दिनों बाद आज फिर बाद आयी है । मैं मानो स्वार में वही जा रही हूँ सुरेश । तुम उसमें ही भर कर इवकियाँ लगाओ ! मेरा नव कुछ पड़ा है, एक-एक कर तुम उसे । - १२० पिसासा अंजली एक गयी। अपने में समेट लो । अहा, जीवन क्या है, नहीं जानती, सुख की परिभाषा नहीं जानती, इतने सुख के वाद और भी कोई सुख है, मैं नहीं जानती । नरेग तुम प्यार में पागल नहीं बन पाते । मुझे चबा-चवा कर खा नहीं पाते । तुम कुछ भी नहीं कर पाते सुरेश । जोर से, और जोर से । 'सुरेश अब मैं नहीं सकती। तुम कितने भले हो ! सुरेश, तुम कितने अच्छे हो ! ओर लुढ़क पुरंश धीरे-धीरे उठ बैठा । एकबार उसके अवचेतन शरीर की ओर देखा। अंजली नंगी पड़ी है । विस्तर सिलवटों से भरा है। सब कुछ मिला कर एक वीभत्स दृश्य उपस्थित है। उसने एक कंबल से अंजली को ढंक दिया। कितनी शान्ति में अंजली सोयी पड़ी है। उठते समय उसने फिर इसका कपाल चूम लिया । इतने प्यार से शायद उसने कभी अपनी पत्नी को भी नहीं चूमा था। उसका कठोर हृदय आज फिर से इस असहाय युवती के प्रति सरल हृदय किशोर सुरेश जैसा रो पड़ा। वह मन-ही-मन वोला, कहो, मुझे और क्या करना है ? तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर कल चला जाऊंगा । आज से तुम्हारे सुख-दुःख का साथी मैं हूँ। तुम्हें सुखी रखने के लिये मैं सब कुछ करूंगा अंजली । । खिड़की खुले रहने के कारण सुबह की धूप सुरेश के चेहरे पर पड़ रही थी। धूप लगने के कारण ही उसकी नींद टूट गयी। इतनी देर तक वह कभी नहीं सोता । वह धड़फड़ा कर उठ बैठा । उसे याद आया, वह सारी रात एक सपना देखता रहा है । सपने में उसने एक समुद्र देखा । किनारे पर आश्रमनुमा एक विशाल इमारत खड़ी है। रंग-विरंगी लताओं में लिपटी इमारत हरे-भरे पेड़ों के बीच खड़ी है। देखने पर यह एक जंगल-सी प्रतीत होती है। वह नहाने आया है। लीला और इतु साथ हैं । इतु किनारे पर खड़ी-खड़ी अपने माता-पिता का समुद्र-स्नान देख रही है। सहंसा इतु ने देखा, पिताजी मां को छोड़ कर गहरे समुद्र में बहने लगे हैं। इतु रोने लगी । पिता को समुद्र की लहरों में उतराता देख वह रो रही है। मां उसका हाथ पकड़े खड़ी है। उसके पिताजी गहरे समुद्र में बहते जा रहे हैं। सुरेश ने मन-ही-मन पता नहीं कब यह सब सोचा है । वह समुद्र में सुबकियां लगाता है और फिर तरंगों में उतराने लगता है। उसने देखा, पह किनारे से काफी दूर निकल आया । उसे किनारे पर बालू का मैदान दीख पिपासा १२१ पड़ा । बालू के मैदान के उस पार एक घना जंगल है । वह जब किनारे पर आ खड़ा हुआ, उसे याद आया कि समुद्र में उसका वन्न वह गया है। वह नंगा हो गया है। कोई इचर आ जाय, तो क्या होगा ! फिलहाल और कोई चारा न देख कर वह अपने आप को छिपाने के लिये जंगल की और दौड़ पड़ा । बाल का मैदान खत्म ही नहीं होता, वह भागता जा रहा है; पर बालू का मैदान मानो बढ़ता जा रहा है । वह जब थके-मांदे स्वर में वोल उठा था, अब क्या होगा ! उस समय जंगल विलकुल सामने आ खड़ा हुआ था । उसने जंगल में एक छोटी- सी झील देखी । जंगल में मकान है, वगीचा है, रंग-बिरंगे फूल है । मानो अभी- अभी कोई आंगन पार कर चला गया है । वह इतने सुन्दर जंगल में घुस कर किसी को न देख सूकने के कारण वापस जाने की सोच ही रहा था कि उसे झील में कोई तैर रहा है। हाँ, अंजली तैर रही है। निर्मल जल में उसका सब कुछ दिखाई पड़ रहा है। वह रूपहली मछली की तरह झील में तैर रही है । मुरेश को किनारे पर देख कर रूपहली मछली ने डुबकी लगा दी। फिर ऊपर न आयी। लगा, ठीक उसी समय उसके चेहरे पर धूप पड़ी । वह जग गया। जग कर वह सपने पर विचार करने लगा; पर कुछ समझ न सका । उनने खुद ही सपने की एक व्याख्या की । मानो एक बंधी झील में अजली कंद है । समुद्र जाने के लिये वह छटफटा रही है । उसने नाना प्रकार से सपने की व्याख्या करनी चाही । लेकिन कोई भी व्याख्या उसे नहीं जंची । इसलिये वह खिड़की पर भा खड़ा हुआ । कल रात का दृश्य, अंजली के लिये सब कुछ करने का सङ्कल्प उसे याद हो आया । और यह सब याद आते ही वह मन-ही- मन चमन को खोजने लगा। अभी तक डिसकाउंट का झमेला नहीं सलटा है यह भी सलटाना है। . चमन अंडली के कमरे में है । वह और प्रतीक्षा न कर सका था। कल रात सुरेदा साहब अंजली के साथ रहे हैं और अब सुरेश साहब अंजली के गुलाम बन गये है, यह सब वह जान गया है। वह बोला, मेरे बारे में कहा ? -~-तुम्हारे बारे में !-कह कर अंजली उठ खड़ी हुई । वह अभी नहा कर आनी है । मुख तोलिया में बाल बाध रखा है। अभी-अभी पूजा करने जायेगी, -- १९२रिपाला बानी पान अनी गली कामो मेलो मगर नही !ी में तुम्हारी पान नगर्ग ----- रा गाव नमानी करो । आज बजगे। भने बिना मिले यह नहीं बंगा। ... उस समय यात गारना ना नहीं। मेले का नाम कीया। ....कामना -~~-उ एक गिोट देनी है। चीन के संयंत्र में अदाकार कम्पनी को नानी चिन्ता खिोटगे। उनकी रिपोर्ट में कागज सुन मयों का संचार करोगे ? - ना गुम जो तुम ने निया, घाभार बहन किया जा सके, तो पिर तुम्हारा जादही देगा। ----मन, मैं यह काम नहीं कर नरगी। --- -~~-गतलब साफ है, मुभा में यह काम न होगा। यह गोचो भी माने आप से घृणा होगी कि मैंने सिर्फ काम हासिल करने के लिंग सागर किया। में अभी भी उसे प्यार करती है चमन । कराल वह मेरे कमरे में रहा है। नाव से इसकी प्रतीक्षा में ची, जानते हो ? आज यह नव करने में मानी नजरों में गिर जाऊँगी । मुगले नहीं हो सकेगा, नमन । गोई और होती, तो चमन महाभारत माता । लेकिन निर्मला लामो में एक है। चमन उनका गुलाम बन गया है । यह अनमोल रन का मूल्यामा है। यह अपनी तीज तक प्रकट न कर नका, गि बोला, निर्मला, हम नहीं है न रहेंगे। -फिर भी में कुछ नहीं कर सकती, मैं लाचार है, नमन . गनमा का एक एग्रीमेंट दातात पारागार, में उसे गिरा नहीं मानी । पर पूजा घर में युग गयी और अन्दर में रिमा बन्द कर लिया। उसी समय वेरा भागा-भागा आ रहा काम, चमना । चमन को देखते ही बोला, बझाली साहा ने आपको सलाम ! गगन शो मेमानने का पता या अपना लियामा प्यार ! यह मन-ही-मन यही का। उगने व पानी का में गुदा में मिलेगा। Pary । क तुम्हारी कौन है ? - कमरे में घुसते ही वह हँस कर वोला, मुझे बुला भेजा है ? -~मैं जा रहा हूँ। वोलो तुम्हें कितना डिसकाउण्ट देना है ? कागज तो तैयार कर ही लिया होगा? ---हाँ साहव । सुरेश ने एक सिगरेट जलाई । बोला, चमन, एक बात कहूँ, तो बुरा न मानोगे। -क्या साहब? -निर्मला -पत्नी। ~सच वोलते हो ? -~हाँ साहब, वह मेरी पत्नी है। सुरेश ने और कोई बात न बढ़ाई । वोला, उसे पत्नी की तरह रखो ।- कह कर विना देखे ही कागजों पर दस्तखत करने लगा। चमन वोला, साहब, पढ़ कर नहीं देखा । जो देखना था, देख लिया है। ~~~यहाँ पर दस्तखत करना छूट गया है, साहव । सुरेग साहब उदास हँसी हँसे । उसके बाद दस्तखत करते-करते वोले, अब तुम खुश हो न ? -हाँ साहब, बहुत खुश। -निर्मला? -वह भी साहब। पूजा घर से निकलते ही निर्मला ने देखा, चमनलाल खड़ा है। हाथ में ढेर सारे कागज हैं । बोली, इन कागजों पर मुझे दस्तखत करना है क्या ? ~~~नहीं । सुरेश साहव ने दस्तखत कर दिये । -किस काम के लिये दस्तखत कराया। -जो सब मैं चाहता था। -~-उन्होंने कर दिया। -तत्पश्चात क्षण भर रुक कर हँसता हुआ बोला, दस्तखत करने के बाद बोले, अब तुम खुश हो चमन ? निर्मला चली जा रही थी। उसने लपक कर हाथ पकड़ लिया। बोला, मुनी जाओ, मैंने क्या कहा । १२४ विधामा निर्गलाह भरायली रही। लाहो माहय, काम गरे बाद उन्होंने का, fruicer ? नियता नहीं उठा पाना है। उस पर गानो विनती गिर गयी है ! प: किमी सा बोली, ना याब दिया? ...बोला. यह भी माहय । निर्मला ने ताण चमन के गाल पर एक भरपुर तमाचा जर विधा । बोली, में वेश्या है पर इतनी नीच नहीं चमन । बह पायद और भी कुछ बोलती । चेहरा तगतमा रहा था । यह भाग कर बाहर आ गयी। पर मुग में नहेगी, मुमने यह गया क्रिया सुदेश ? कल रात के उपभोग को तुम ने नीदा में बदल दिया । मुझे मेरे प्यार का सम्मान तुम ने न दिया लेगिन उसने बला, गुरंग नहीं है । गाली तलहटी में उतरती जा रही है। नरेश हाथ हिला रहा है। अजली भी हाथ हिला रही है और फफक कर हो रही है । तुम मुझे सतना छोटा बना गये सुरेश । एक रात के लिये भी तुम मुझे खेल के सम्मान ने बुटकारा न दिला सके ! मेरे सज्ने प्यार को तुमने सोदा समझ लिया ! - इसन बाद को घटना बिलकुल सीधी-सादी है । सप्ताह भर बाद समन ने एक पन दिया था । संक्षिप्त पत्र । निर्मला इस संसार में न रही । उनी रात नोंद की गोलियाँ खाकर आत्म-हत्या कर ली। उसे दीपरिया के मैदान में संजो कर रखा है । मौलसिरी का एक पेड़ लगाया है। निर्मला को मौलसिरी का पूल बेहद पसंद थान। मुरेश साहब भागे-भागे आये थे। दीघरिया के मैदान में रंग-बिरंगे फूल लगाये गये है। मौलसिरी का पेड़ बड़ा होता जा रहा है। देशी-विदेशी फूल लगा कार चमन ने इस जगह को नन्दन कानन बना रखा है। गगन और गुरेश बैटे रहते हैं । छुट्टियों में यहाँ आकर सुरेश कहा करता है. गावगा एक पेड़ लगा दो चमन । बचपन में मैंने उसे एक बार कदंब के फूल लाकर दिये गये । यह कहा करती थी, लक्ष्मीपूजा में हम कागजी कदद के फूलों की माला दरवाजे पर नहीं भुलायेंगे । असली कदंव की माला भुलायेंगे। वह बड़ी भली थी। बड़ी भोली-भाली थी । उसकी यह आगा कभी पूरी न हुई। निर्मला अथवा मजली की समाधि पर मौलसिरी और कोच के पेड़ दो प्रकार की शोभा लिये लिये बढ़ रहे है । अभी भी दोनों की छाया में दो प्रोड़ । पिपासा. १२५

चलते-फिरते दिखाई देते हैं। वे चलते-चलते कभी अन्यमनस्क हो जाते हैं। घास
पर ओस की बुदें झिलमिलाती रहती हैं। ओस की बुदों में वे शायद
प्यार को खोजते-फिरते हैं। कभी-कभी दोनों त्रुपचाप पेड़ तले बैठे रहते
पैदान से ठंडी हवा के झोंके आने पर वे विभिन्न प्रकार के फूलों की सुगंध पाते
कौन-ती
फूल की है, वे समझ नहीं पाते हैं। उस समय दोनों
प्रौढ़ एक-दूसरे की और देख कर उदास हंसी हंसते हैं। मूर्य उन पर अपनी
किरण विवरता है।
है,
सुगंध किस
.

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Peepasa

Author
Mishara Virendra
Title
Peepasa
File name
Peepasa
Text
OCR done
Published
2011/01
Publisher
Calcutta,printing Press Calcutta,
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
History
DLI number
546792
Barcode
4990010025289.00
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
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