Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Ful Aur Pashan [ Punai Charitar ]
Front matter
+
फूल और पाषा
[पुण्यपाल चरित्र]
मूल
लेखक
स्वामी हिम्मतमलजी मह
मशोधक-मयोजक
मरुधर केसरी श्री मिश्रीमलजी महाराज
स्पान्तरकार
श्री सुकन मुनि
श्री मरुधरकेसरी साहित्य प्रकाशन समिति
यावर-जोधपुर
श्री मगधर केसरी साहित्य माता का पुष्प : ४६
फूल और पाषाण
[पुण्यपाल चरित]
प्रतिया ११००
मुद्रण
वि० सं २०४७ श्रावण,
मन् १९९० ई , अगस्त
वीर निर्वाण संवत् २५१७
अर्थ मोजन्य।
श्रीमान
ताराचन्दजी यम्य,
कुरयायां (मारयाड, राज)
प्रगान प्राप्ति यान:
सो मरघरकैगरी साहित्य प्रकाशन समिति
पीपनिगा बाजार, ज्यावर [13]
मनोगत वन
बंधित मन्त्रालय, अजमेर
10 सपा
।। श्री मरुधर मरी गुम्भ्योनम ॥ उदार सहयोगी "फुन घोर पापाण" के एम मस्पारण के प्रकाशन मे स्व श्री ताराचन्दजी बम्ब के सुपुत्र, उदार हृदयी, एव धमणन्यं, पूज्य प्रवर्तकः मरुधर फेमरी १००८ श्री मिश्रीमलजी म मा के अनन्य भक्त मर्वश्री जबरनन्दजी, धर्मीचन्दजी, गौतम पदजी, महावीरचंदजी उगमनन्दजी बम्ब ने प्रत्यन्त उदारना, पक्षा, भक्ति एवं या भावना से निलिप्त रह पर प्रर्य महयोग किया है। पाप मारवाड में फुरडाया निवासी है। कुरजाया स्व दादा गुरदेय श्री मुटमलजी म सा. मी स्वर्ग स्पली है।
४
आपकी प्रबल भावना थी कि गुरुदेव श्री जी के सत् साहित्य
के प्रकाशन का शुभावसर प्राप्त हो जिससे अपने हृदयगत भावो को
जानते हुए कुछ अशो में गुरुभक्ति का परिचय देकर साहित्य सेवा
का लाभ ले सके।
श्रमणसंघीय सलाहकार उप-प्रवर्तक श्री सुकनमलजी म सा.
ने इस साहित्य सुश्रुपा का शुभ अवसर प्रदान किया तदर्थ आप पूज्य
महाराजश्री के आभारी हैं ।
गुरुभक्त बम्ब परिवार दक्षिण भारत के रायनूर जिले के
सिंधनूर व गगावती नगर मे व्यवमाय रत है । महयोग के लिये
शनश धन्यवाद ।
-मंत्री
श्री मरुधर केसरी,
साहित्य प्रकाशन समिति
जोधपुर-व्यावर
फर्म का पता
0 गौतम ट्रेडर्स
मेन रोड, सिन्धनूर, जिला रायचूर (कर्नाटक)
11 संजय ट्रेडिंग कम्पनी
सी० एम० पी० रोड,
पो० गंगारती, जि० रायचूर (कर्नाटक)
.... de- PM स्व० श्री ताराचन्दजी बम्ब सिन्धनूर
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प्रकाशकीय - . श्रमणमूर्य प्रवतंका गुग्देवश्री ग्ब मिश्रीमलजी महाराज प्राज के रथानावामी जैन समाज मे भीप्म पितामह माने जा सकते हैं । पापा तेजरवी प्रोजरची वचंग्व सम्पन्न व्यक्तित्व न केवल स्थानकावामी समाज पर किन्तु ग्राम-पाग के सम्पूर्ण जन-प्रजन क्षेत्र में गिर चढकर बोलने वाला प्राध्यात्मिक जादू था। आप जितने करणाशील, दयालु व परोपकार-परायण थे, उतने ही समाज गुधारक, मघ मगठन और बुराख्यो के प्रति कठोर नातिकारी भी थे। ९० वर्ष की प्रायु मे भी गुरुदेवश्री की सिंह गर्जना ममाज मे नव घेतना फूंका रही थी। शिक्षा, मेवा, म्यमि-महायता, चिकित्सा, माजीव-अनुयाम्पा प्रादि दिशा मे प्रापकी प्रेरणा गे प्राज भी प्रतिवर्ष यो रुपये की धनराशि का सव्यय होता है । अन्य क्षेत्रो की भांति नाहित्य-धी ना क्षेत्र भी प्रापश्री के इतित्य च प्रेरणा से समृद्ध हुअा। प्रापधी म्वय सस्कृत-प्रायात- कारगी-राजस्थानी को उद्भट विद्वान्, कवि, प्रोजन्वी वक्ता थे। नापत्री के माहित्य में भी मदाचार, मगठन, पर्तव्य-पालन, पुरुषायं पार परोपकार की धारा प्रवाहित हई। प्रस्तुत रचना प्रापधी की काव्य-पुणलता व साहित्यिक प्रतिभा [ जीवंत प्रमाण है । गुरुदेव के मेवाभावी मुशिप्य श्री गुजान मुनि इसे हिन्दी मे रपान्तरित किया है । सम्पादनधम श्रीयुत श्रीनन्द ती गुराना ने किया है। प्राधिक महगोग स्व० श्रीमान् ताराचन्दजी म्य गो पुण स्मृति में उनके सुपर श्रीमान् जयरचन्दजी, मोचन्दजी गौतमचन्दजी महावीरचन्दजी एवं उगमचन्दजी बम्ब । पदान किया है। सभी के प्रति मादर गता है हम ---मंत्री ।
सम्पादकीय
-
संपराए
भगवान महावीर ने फरमाया है-
जं जारिमं पुवमफासि फम्म
तमेव आग
प्राणी पूर्व जन्म मे मा (शुभ या अशुभ) गर्म करके प्रात
है, इस जन्म में बैगा ही (मपुर माद) फल प्राप्त मारता है ।
विष्य के गाम्न माग्नि दर्शनोका, मदानार और नीति
नियमी ला मूत धन यही मिसान्त है। प्रत्गे धर्म व दर्शन
मिमीन किसी भीगता, समं पटन नियम म्बीका
लिया है, पोरया के आधार पर ही नीति, धर्म ए
गातार पेनिम बिरहए। रेप का बुग फल और अ
Timrai मनुष्य को चुरा, पाप व अन्या
शो में बनाना, गे और भाभी दिमाता है, वहाँ दार
पोर, मेगा वा प्राहि मी प्रेरणा व प्रोत्माह
(७) o प्रकाशित हुया है वह तो शायद उनका अल्पाग मात्र है, विशाल साहित्य तो अभी तक भण्डारो मे ताटपत्रो व भोजपनो मे लिपटा हमा ही है। प्रस्तुत यथानक-पुण्यपाल चरिन भी एक अप्रकाशित सुन्दर राजस्थानी कृति का जीर्णोद्धार व नव रूपान्तर ही है, जो हिन्दी भाषा में पहली बार पाठको के समक्ष प्रस्तुत है। ऐमे 'पुण्यपाल' चरित्र पर मम्कृत भाषा मे २-३ रचनायो का उल्लेख मिलता है पर वृतियां अब तक प्रकाशित नहीं हुई है । जराती में भी जिनकुशत सूरि की 'गुणमुन्दरी' चतुष्पदी के पुण्यपाल "राजा की कथा है, अन्य गुजराती रचनायो के विषय मे भी पटा है, र प्राय अब तक हस्तलिखित ही है। प्रस्तुत पुण्यपाल चरित्र के रचयिता है जैनाचार्य पूज्य श्री रघुनाथजी महाराज के सम्प्रदायानुयायी रवामी श्री हिम्मतमलजी Tit० सा० । स्वामी श्री हिम्मतमलजी म० का विशेष परिचय तो एराप्त नही होता है पर गुरदेव श्री मिश्रीमलजी म० साल के प्रथक न्धयत्नो से उनकी कुछ उत्तम कृतियां अभी प्रकाश में प्रायी है। सरदेवश्री ने प्राचीन भण्डारी में से पोजकर हालिखित प्रतियां निकाली, फिर उनका मगोधन किया, सुन्दर नग्पादन मिया और ही हिम्मतमलजी म० सा० मी ३-४ एतियो पा प्रगान भी हमा- हिम्मत विलास' नाम से । ग्वामीजी श्री हिम्मतमलजी म० मा० या जन्मरमान का नश्चित पता नहीं चलता, पर यापदे पिताश्री पानोरामजीनीयान का लवर में ही स्वर्गवास हो जाने ने माताश्री पीवार अपने पीहर पार्वणना (मारवाड-मोजत परगना) मे तो रहती थी। श्री रपीबाई हान्वय भी दात धाभिमानकारी पी दरामवती दी। छापने अपनी नागालो मा वेन्द्र-हिम्मत को लघुपम मे हो विधायन पराया म 1
(८)
और पूज्य स्वामीजी श्री धर्मवन्दजी म० साल की प्राज्ञानुवर्ती सा
व धाविनायो की देखरेख में रहकर स्वय ने दीक्षा गहण कर
बालक हिम्मतमलजी ने भी वि० सं० १९२६ नंग शाला १३
पूज्य स्वामीजी म० के चरणो मे जनेन्द्री दीक्षा ग्रहण करनी । प्रा
प्रवर प्रतिभा के बल पर यापश्री ने जैनशास्त्र व काव्य प्रन्यों
अच्छा अध्ययन किया और अनेक काव्य कृतियों रनी। प्रापनी:
रचनाग अब तक पूज्यश्री रघुनाथ जैन पुस्तकालय, सोजत गिर्ट
प्रकाशित हो चुकी है।
'पुप्यपाल' चरिन मनुष्य के शुभाशुभ कार्यों का एक नमत्त
निदर्शन है । पूर्वकृत अशुभ कमों के कारण प्राणी विपत्तियो में प
है परत शुभ कर्म का उदय होने से विपत्ति भी सम्पतिवा
बन जाती है। मप्टो में भी काति और वैभव प्राप्त होने लगता
गीत पुपाल तथा उनकी चार पत्नियां गुणगुन्दरी, मोभार
पादिमा विचौरव मिलन चाही पाश्चर्यकारी व रोगाचा
रविनी मन प्रतिमा ने बीच-बीच मे गुन गेनगः अवान्तर कार
नेबारा पटना प्रगट दिये जिगरी काना की गति तो
माथ हीबिभिप्रेरणा व शिक्षा भी व्यन हो रही।
मेरे पदेन गुर श्री परधर देगरीजी मल मा० ने म:
जीवन प्राधिकारी श्रम में मुमता, F
HTET नागनाने की टि गेसी काम्पिा
*प्र: । माग पाट मने जीवन विमाम
F
मा
---गुरुग
पल और पाषाण 1 - पत्म देश की जनता, वहाँ के नर-नारी तो इसका गर्व करते ही गि हग ग देश के वामी है, यहाँ के पशु-पक्षी भी बहुत नुखी । इस देश के वनो को भी प्रकृति ने सव सुविधाम्रो ने भर दिया ।। दूगरे, एस पूरे देश मे जैनधर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार या । ई भी प्रारोट 7 चा मन-मौजी यहां के वन्य-पशुत्रो को पीडा देने ला नहीं पा । प्रत. यहां के वन्य-पगु तपोवन के पायो की तरह च्छिन्द--निर्भय विचरण पारने थे । उर्वरा भूमि, लहलहाते सेतो, गारू गायो और धन-धान्य से समृद्ध इस वत्स देश की राजधानी विराटनगर। विराटनगर अपने नाम के अनुरूप विगाल नगर था। ऊंचे- से भवन, साफ-सुपरे धौर चौडे राजमार्ग तपा मजावट में भरे जारो के इस नगर मे अधिकतर सेठ-यापारी हो रहते थे। यहां राजा पा जितम, जो प्रजावत्सत, धीर-वीर और पराजमी था। जा जितरानु ना शासन सुमासन पा और मके सुभानन में हाथ ने पाना दाहिना हाथ था, मत्री बुद्धि । महामात्र सुयुति दात ही दूरदी, बुद्धिमान, फुगल बाय- मौर देशभरापा। राज्य काही नारी राज-परिवार भी पाम राजा जितगम् मनी मुक्ति की मलाह के बिना नहीं . 1. ---- २ / फूल और पापाण करता था । ममी मुबुद्धि राजा का ही नहीं, विराटनगर के जन- का चहेता और उनका स्वजन जैसा था । गुबुद्धि मत्री की पत्नी थी, कमलावती । मृदुभाषिणी कम पतीनी गोद अभी ता मनी थी। लेगिन इसका उसे विशेष मर नहीं था, क्योकि जिनो धर्म का महाग होता है, उनको जीवन कोई प्रभाव नही चटकते। पुन मे गम्बन्ध में एक दिन पति-पत्नी में बात चल पा पर चिड़िया अपने बच्चे को दाना गिला रही थी। उसे कमलावती बोली- "सामो ' मनान वा मोह पशु-पक्षियो को भी होता हम तो पिर भी मानव हैं।" "गुनारा अभिप्राय मैं समझ गया प्रिये !" ममी सुबु कहा-"मलान होने बाद तो पशु-पक्षी अपनी संतान को गा, पर गंगान होने में पहले उनमें गतान के प्रति किसी प्र गौ ता नही होगी। मनुम तो मतान के लिए अनेको उ भी ना. परन-सी मोग-गा देवागधन या पुष्टि , "पा T-नशाना" मनाली गुरु मुकारा ५ भापती पदीया नही पा प्रापका मन मेगा माग दोनो को जोरदोई दाना हमारे प्र ? माहिर सी गगा। ग्वामी । बैंगे में r::THE FIR दि द नही मिलता । पर मा है kि RHIT यी दादोबाने चाहिए।"
फूल और पाषाण /३ प्रदृश्य को मानना । दृश्य क्या है ? दृश्य है यह ममार जो दिखाई देता है और अदृश्य है धर्म जो दिखाई नहीं देता। "प्रिये । दिनाई देने वाली चीज जानी जाती है और न दिवाई देने वाली चीज मानी जाती है। जब हम समार को जान लेंगे तो उसका मूल्य कम हो जाएगा और धर्म के प्रति प्रादर बढ़ जाएगा। "प्रिये । धर्म को मानने के बाद दिमाग में धर्म का सहारा और दिल मे धर्म का प्यार रहेगा। फिर ममार का प्यार हट जाएगा । सतान समार है । मैं तो यह मानता हूँ कि मतान हो तो उसके प्रति अपना पर्तव्य करे और न हो तो परेशान न हो।" कमलावती चुप हो गई। उसे कुछ तमनी हो गई थी, क्योकि पह धर्मनिष्ठ नारी थी। कभी-कभी उनके मन में नतान पी लालमा गागती अवश्य घी, जो पति के साथ बातचीत करने से शमित हो जाती थी। सतान की प्रामा से विरत रहकर पति-पत्नी जीवन बिताते थे । मत्री सुबुद्धि और मत्री-पत्नी कमलावती इम प्रभाव की पूर्ति अपने से घोटो पर वात्सल्य लुटाकर गरते थे। लेकिन एक दिन पह भी प्राया, जब इन दोनो के पुण्यो ने करवट बदली। एक रात मामलापती कमलो से भरे सरोवर मा स्वप्न देराफर उठी और पति गो बताया कि स्वामी | प्राज तो मैंने वसा अच्छा सपना देखा है । लाल-पाल मामलो से भरा एक सरोवर रात मैने देखा है। "कमल पुष्पो के प्रतीक है।" मत्रो ने महा--"जने जमल भी जड कीचड मे होती है, वैसे ही पुण्यो नी पर भी वधन मे होती है, पयोगि प्राविर पुष भी तो कर्म ही है । पुष्प गुमयम है और ये सुखो फेमसारी मुखो के दधन में बांधते हैं।" "पाप तो पाप-पुण्य की प्यारा परने लगे ।" बुध त । ।
४ ४ / फूल और पापान - । उतावलापन दिखाते हुए कमलावतीने पाहा "मैं तो यह जा नाहती हूं किम न्वप्न का फर क्या है।" 'पारी तो में बता रहा था।" मत्री बोला--"पुण्यो ने एर पुन को माना तुम बनोगी। जैसे सरोवर कमलो से भरा ऐसे ही हमारा पुन भी पुण्यो से भरा होकर अवतीर्ण होगा।" "पुण्यपाल }" कमलावती के मुंह से निकला-."मैं पुन का नाम पुष्पपाल रतूंगी।" मशीने प्रमग बदला- 'माज मातो मे कुछ देर हो गई। राजसमा प्राज ज पहुँचना है। पान तक राजा इनीलिए शुश है कि मैं समर गया। बरना तो उसे उल्टा पडते देर नहीं लगती।" जो पापको अपने पुतो मा गरोगा नहीं, जो राजा से ३ मनायती गोगी-' राजा माप पर गोई अहमान ना। नर प्राको मुर्ति और मूझ-गम का फल हो तो प्रा' देता। गोटी प्रिये ।" मी नेता--- 'मोने को यदि नोटो कोमाता पाना और मानने-सोने से पी । पति मन नगार गजमेवा नकार f.7 मीननामा बामगेगा? बामा मममी का गनर मनी बने। fir Tी यार।" ' fनी बोगा पनि-पली...लोनी नि " | TR में निसन मनी गनममा । . । -- GET : सभा में नी । मभीम - - - ...- फूल और पापाण /५ भाजपुरोहित, नगरसेठ प्रादि पहले ही आ गये थे । मभी अपने-अपने आसनो पर विराजमान थे । महामन्त्री सुबुद्धि का प्रामन राजा के पहिनी पोर राजसिंहासन से कुछ नीचा था। कुछ ही देर बीती गि रोमहाराज जिनशत्रु सभा मे पधारे। मभी उनके स्वागत मे खडे हो माये । राजपुरोहित ने रवस्ति मत्र पढे, तब राजा ने प्रागन ग्रहण किया । चांवरधारिणी चंवर ढोरने लगी। चारण ने विरद बखाना- "वत्स देश के प्राण । विराटनगरमुकुट महाराज जितशत्रु के (पंजो के यश से धरती का कोना-कोना महक रहा है। महाराज जतशा अपने पूर्वजो की परम्परा का पालन करते हुए हम नवले जाग्य-विधाता बने है। वे जिम पर प्रसन्न हो जाते हैं, उसे सुखो गुना देते है और जिन पर आपकी दृष्टि टेटी होती है, वह घल Pाटने लगता है।" इतना यह चारण ने जोर-जोर में 'महाराज जिनमत की, पिगटगरेण जितशत्रु गो' प्रावास ऊँची की और पूरी ममा ने 'जय- नाव ना उद्घोष किया। नारण में अपना विरद सुनकर राजा के भीतर प्रहमार जगा का में मनुष्यो का भाग्य-विधाता है । लेग्नि वाणी मे विनम्रता शाई । अहकार को छिपाने के लिए वाणो का महारा लिया ही जाता पी । राजा जितग ने भी सगुनित होकार पाहा- "हमारे देश में प्राज जो सुख-समृद्धि, उमा धेय मेरे द्धिमान गपियो, रणांपुरे मैनिगे और नुदेर से धनी धेरिटयो है। प्राप नवये नहयोग के बिना में बचा पर माता ?' जिस दिन गोई विप याद नहीं होगा पा उस दिन गजा जवान सभा गे बंटा र विभिन्न प्रमों पर बातें किया करते थे। राम गर्ग, पाप-पुष्प, पाप, पहेलियाँ पारि विषयो पर गर्चा हा ली पी। आज रासा जिप ने नभा ये. मध्य पर प्रम मा गने गहा- p है
६/ फूल और पापाग
"हमारे धर्मशास्त्रो मे ऐसा लिखा है कि शुभाशुभ नम
फल भोगना अनिवार्य है। बुरे कर्मों का फल हमे दुख फेमा
भोगना पड़ता है। क्या यह भी सभव है कि हमे दु ख न भोग
पडे?"
क्षणभर नभा मे मनाटा रहा । फिर राजपुरोहित ने कहा-
"धर्मशास्त्रो की बात प्रत्यक्ष देखने में भी प्राती है । यो
अधा है तो कोई लूना-लंगडा । कोई राजा है तो कोई लकडहार
में मब अपने नामों का फल भोगते दीराते है । अत कर्मों के फल ।
भोगना अनिवार्य।"
सभी ने राजपुरोहित के इस कथन का समर्थन किया । लेनि
मनी गुबुद्धि को यह बात पूरी तरह नही जनी । उसने कहा-
"पृतीनाय ! नामों का फल भोगना तो अनिवार्य है, लेमि
गोमा भोगना अनिवार्य नहीं । एक स्थिति ऐसी भी पाती।
जा भोला को गुग-युग प्रभाषित नहीं करते । यह स्थिति धर्म
गहारे पानी है। धर्म को पकाने वाला व्यक्ति ममना-रम गापा
पर है। कोई भी परिस्थिति उगे दुग मे दुगी
मुत्र में गुणी नारीपर गाली।"
-
फूल और पाषाण /७ - *-- प्राज पूरा संसार इस प्रयत्न मे तो लगा है कि दुख मिटे । लेकिन दुराशा मोर दुराशा से उत्पन्न दोप को नहीं मिटाता। "पृथ्वीनाथ । बाहर की परिस्थितियो से दु.ख-सुख का गम्बन्ध जोडना दुराशा है । छोटा बच्चा खिलौना पाफर मुखी होता है और पिलौना टूट जाने पर रोता है। स्पष्ट ही वालक अपने मुख- 'दु ख का सम्बन्ध बाहर, यानी खिलौने से जोडता है । वही बच्चा जव वढा, यानी समझदार हो जाता है तो खिलौने के प्रति आकृष्ट नहीं होता और खिलौना टूट जाने पर दुखी नही होता । "पृथ्वीनाथ | इमी तरह अज्ञानी जन ही सुख का सम्बन्ध धन से जोडते है । इसका व्यावहारिक पहलू यह है कि पूर्व अशुभ 'कर्मों के प्रभाव से कोई मनुष्य निर्धन अथवा कगाल तो हो सकता है, पर यदि वह धर्म का सहारा पफडेगा तो उमको समझ में यह प्रा जाएगा कि सुत का मम्बन्ध धन से नहीं है । तव वह ममता-रस 'मे डूबा रहकर टूटी पाट पर भी प्रानन्द मे मोयेगा। रगा-मूदा गाकर भी तृप्ति का अनुभव करेगा। अतः बुरे कानों का फल । गरीवी प्रादि तो अनिवार्य है, पर दुखी रहना अनिवार्य नहीं है।" "तो इसगा अर्थ यह हुआ कि दुख होते दुख होते तो है, पर धर्म- निष्ट को व्यापते नही है ?" राजा ने कहा-"लेकिन ये बातें सबकी समझ मे पायें नी ?" "धर्म-श्रवण से ।" मत्री ने पहा-"मेरा निवेदन है कि जिन तरह हमारे विराटनगर में स्थान-स्थान पर उपाश्रय है, उसी तन्ह पूरे वत्स देश मे अन्यान्य उपाधय प्रयवा ग्थानकः बनवाये जाएं। इसके साथ ही घूम-घूमकर जन मुनियो ने प्रार्थना की जाए कि वे अपने पिहार-गम मे वत्स देग मे घधिय-से-अधिक प्रायें और हमारी प्रणा पो धर्म का मर्म समभा, ताकि यहां के लोग गमता-रम में जिगन र मफे।" राजा जित' को मन्त्री । म्ह प्रस्ताव बहत पनन्द ८/ फूल और पाषाण ... - याया। इनी गमय वत्स देश के अनेक नगरो, पुरो और ग्राम उपाधनों के निर्माण की योजना बनी। काफी समय योजना में योता । यथानमय सभा विजित हुई और मन्त्री सुबुद्धि मनि-भवन पर पहुंचा। कमलावती ने मुत्न राफर पति का स्पार दिया और जब मत्री निश्चिन्त होकर बैठा तो कमलावती बोली- "माज आप जल्दी मे थे। सवेरे की चर्चा अधूरी रह गई आपने मामलो को पुण्यो का प्रतीक बताया था । तो क्या "मागे की बात मैं पहूंगा ।" मत्री बोला--"कोई भी जी निनाल पुमात्मा नहीं होता और न पूरा पापी ही होता है । मर घर में गवगे पर उठे हुए कमल होते है तो काई भी होती। तुमने जो स्वप्न देशा है, उसका प्रतीमा यही है कि हमारे यहाँ : जोर TT प्रागंगा कर पृयोको पोट र पायेगा, पर यो घालावध भी गरे साथ होगा। "प्रिये । मानव-जन्म पाप-पुण्य-दोनो तरह के कर्मों को क्षः नी कोने में नियोगा। शुभगं प्रयया पुण्य भी गा। भगवान महावीर ने मीकिए तो ज-भव को ठोकर मार दी और अपना मार मानाया। प्राज ये तीचंगस्थापा Mirrनोरमारे याद" frमाना नामनामनी मधहो गरी । यु माग गदि न गी | गर्म प्रिधिामी ने भरपूर मान दिया - Titi, 7 मार कर भी प्रमर Parmi पनी शुभ दोरी Rai ममता की .. ::::::: .7ीमा पार भी पिाता। म . .. , -- 2 प्राशा के फल का दिन प्राया। मंत्री के घर बेटा जन्मा- की हो मलावती पुत्रवती बनी। राजा जितशन ने मन्त्री सुबुद्धि के घर पारे धाई भेजी। मन्त्रि-पुत्र का जन्मोत्सव ऐमा मनाया गया, मानो , परत्वराज का जन्मोत्सव हो । विराटनगर मे हर्ष का सागर हिलोरें रिने लगा। मों को मन्धि-पुत्र का रुप मोहित करने वाला था। वालरवि की भी ण्य भीह-गान्ति । मानो रवर्ण और सिन्दूर का मिश्रण देह से पुता हो । को नियारे और गामन से नेत्र । बाल काले और पुंघराले । प्रोठ संस्थारले-पतले और पदमराग से बने लगते थे। माथा अष्टमी के चन्द्र मा था। ग्यारह दिन बाद बारहवां दिन नामकरण का दिन था । जातफा इन गभी नाग पुण्यपाल रखा गया । यह नाम रमलावती के मन मा पूर्व- दियारश्चित नाम था और मन्त्री द्वारा बताये गये स्वप्न-फल का इगित | प्रा । पुण्यपाल का लालन-पालन पांच धायो को नोपा गया । एक हदो नान कराने के लिए मज्जनधानी पी। दूसरो दूध पिलाने वाली मलाद तीरधात्री। तीसरी गोरी गारर मुलाने वाली शयनयानी थी। सोधी जमा मे लेकर पिलाने वाली पी-अवधानी और पांचवी रेलौनो से वरताने पाली हीराधात्री पी । लेकिन पांचो धायो सभी गुण एगः पोती पमलापती में । अमलावती माता दी।
१० / फूल और पापाण
घायें कितनी ही हो, पर गिशु के लिए माता से बड़ा सहारा
होता है?
पुज्यपाल हायो-हाय नेलता
हुमा
बढने लगा। बदने
वह तीन माल का हो गया । अब वह तोतली वाणी मे नवकार
का पाठ भी करता था। माता कमलावती ने बचपन से हो
मस्कार देना शुरु कर दिया। पुण्यपाल जब घर के प्रांगन
चलता तो इनका बडा ख्याल रखता था कि कोई नीटी न
जाए। एक दिन भूल से एक चीटो उसके पैरो से दबकर मर गई
तीनवर्षीय बालक पुण्यपाल ने पूरे दिन व्रत रगा। तब म
ममनावती ने पति से कहा था-
"मैं तो उसका नाम धर्मपान रखती तो ज्यादा अच्छा होगा
मनी बोले थे--
"प्रिये !
पुण्म गे ही धर्म सम्फार बनते हैं। जो
पुगारमा बना है, यही बार में धर्मात्मा बनता है।
"प्रिय ! मे अब राजमभा ने जाया करंगा । महार
निको पार करने थे। जानती हो, उन्होंने इस बारे
"T?" "मलानी ने पूछा- "तो यह बिना देगे
RAMA
' कि ' म ने 47-मामी । गर्ग नही
rathi। हम गुम्बारे पुष्पपान को प्रा
":"।बा गिरनार गगितामा
7:41. मोरो मरने जनप्रिया
फूल और पाषाण / ११
।
"प्रिये । मैंने राजा मे कहा कि पुण्यपाल के ऐसे भाग्य कहां
तो वह राजा बने तो मेरे इम कयन पर राजा का अहकार फुत्कार
र उठा । राजा ने कहा- इसमे पुण्यपाल का भाग्य क्या करेगा ?
ह तो हमारी इच्छा की बात है। हम जिसे चाहे उसे राजा वना
। खैर, यह तो प्रागे की बात है। तुम अपने पुत्र को राजसभा मे
या करो।"
"तो तुम कुछ नहीं बोले " कामलावती ने कहा-"कह देते
के पुण्यपाल प्राखिर पुण्यपान है । यदि वह राजा बनेगा तो अपने
पुण्यो से बनेना, किसी के बनाये नही बनेगा ।"
"व्यर्थ ही राजा गो रप्ट कर देता ? " मत्री ने महा-
'राजा कुछ भी कहे तो कहने मे यया होता है । राजा-रग तो पुण्य
रा पाप से ही बना जाता है, इसे जानता फोन नहीं ? पर मैं कुछ
पाहता तो राजा तनिक देर मे उल्टा पड़ जाता । खैर, अब तुम
पुण्यपाल को तैयार कर दो।"
पुण्यपाल ने सिर पर पीली गोल टोपी पहनी, जो रत्नो मे
जबी पी । टोपी के किनारे से पोडे-थोडे बाल निकाले हुए थे। माघे
पर टीका पा और प्रोटो पर मुस्कान थी। हाथो में पहुंचियां, वक्ष
पर हार और पाठा पहने था पुण्यपाल । उनका अंगरखा गुलाबी
-
।
-
रंगका था।
पुण्यपाल को लेकर मत्रो सुवद्धि राजसभा पहुंचा तो मारी
सभा उसके मोहना रप को देखती रही। राजा जितग ने पोटी
देर उसे गोद में बैठाया पोर कहा-
"मत्रो ! तुम्हारे पुत्र गो प्राज हमने मिहागन पर बैठे हुए
पहली बार गोद में लिया है। इन पुगी मे मे जो हम देना चाहते
सो सुनो।
१२ फूल और पापान "जरा मवाना हो जाएगा तो हमारी पोर एक भननदाग-दाग ला, पोई मे अलग मिगे। माता- मरन और हाट-बाट गरा युरराज मेरोगे।" मंगी ने रामानी मारता मोगराता । सभामदों ने भी राग प्रहार को न frefrजिस पर महाराज जिला प्रगार हो माना बना दो। नीर-धीरे पापमानामापान गिरगा, "पा धमधाम में उगला निचारमा लागे पाग करताय नामोनमा । शिन में पतागण, ना, गा, म. पान प्रादिमागमा गरमधान, अभिमानल, म प्रयोग मानना गरी पार- गणिती नाकाम, , , fri, ff :: ffmanानाका मनोराः। 7 THAT forer मापार माना गा। w -- फूल जार पापाण। १२ "यह लिवायट ब्राह्मी कहताती है। प्राजकाल उनका प्रचलन है, इसलिए इसका भीगना जररी नहीं समझा जाता। लेकिन मिति को जानने के लिए उन ब्राह्मी लिपि का जानना ही नहीं, अनिवार्य है। तुम्हारी लगन देनकर मैं आज तुम्हे ग्रहालय में ले पाया हूं।" "पुण्यपाल । ब्राह्मी लिपि मा प्राविष्कार कर्मयुग के प्रारम्भ गा था। इगमा प्राधिकार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की पुत्री । ने गिया धा। ये ब्राह्मी प्रथम चक्रवर्ती भरत की बहन भी पुण्यपान ने ब्राह्मी लिपि सीसी। कुछ ही दिनो में उसने । तिपि मे लिगे नारे ताम्रपण पढ साले । धीरे-धीरे पुण्यपान अध्ययनकाल समाप्त हुधा और वह गात्र-शास्त्रो में प्रवीण र, बहत्तर कला-निष्णात होकर घर लौटा । पुण्यपाल के रप-गुण, सदाचार, विनय, शिप्टता, मादव, गिरनार, माहनिरुता, प्रौदार्य, वीरता प्रादि गुगो से जन- प्रभावित हुमा । कामलावती तो फूली नही नमाई। वर्षों बाद अपने पुत्र से मिनी थी। राजा जिनगम ने उसे जो नुविधाएं की थी, उनका उल्लेख करते हुए कमलावती ने कहा- "पुन । तेरा भवन अलग है। तेरे वक, मनिक सब कुछ है । हमारे राजा बडे दयालु है। उन्होने बिना किसी रवा म पर यह पानी । एक दिन जागर तुम उनण भागार - "हां पुर। नहीं तो गा पा गमभंगा कि पुष्पपाल यह । नागे।" ममी सुबुद्धि प्रानो पत्नी नमनावती का नमन एरा-- "बेटा । नब मुग्ग-साधनो की पोषणा महाराज मन ने सब की पी, पर लू तीन सालामा और उन्होंने
१४ / फूल और पायाण
पहली बार तुझे गोद में लिया था। राजा को प्रसन्न करना हम
पतंव्य है।"
-
पुष्यपाल ने दृढ स्वर मे पहा-
"अपने कमों से प्रसन्न करना हमारा कर्तबा हो सकता है
पर राजा को नती प्रशंसा करके उने प्रसन्न करना तो सर्वया प्र
चित है।"
"पिताजी ! मैंने राजा ने कोई नुविधा नहीं मांगी। फिर
आभार दिन यात हा प्रकट करु ? रही बात अहकार की।
अहंकार तो भीतर दिल में होता है, न कि वाणी में । ऐसा भी है।
गया है कि वाणी में बहुत विनम्रता हो और भोतर अहकार
अहकार भरा हो । अत में राजा के प्रति आभार प्रकट करने गाया
नहीं जाऊंगा।"
कमलावती ने पति की ओर देखा और बोली-
"इमरी ओर से प्राप ही राजा की प्रशसा कर देना ।
पर दबाव मत डालो।"
मनी ने पत्नी पी वान मानना ही ठीक ममगा वह पुण्यप
को लेकर गनमा गया। राजा ने पुष्पपात्र के लिए एक प्र
प्रागन इलयारा था। पुमपाल राजा को भिवादन पर बैठ
मध्या को यकामगय मन्त्री पुष्पपात के माथ घर लौटा तो कामना
--
ने इमा-
फूल और पाषाण | १५ न । "पाप तो व्यर्थ ही राजा ने डरा करते है ।" कमलावती ली-"जब पुण्य अनुकूल होते हैं तो राजा सुग होता है और वि बुरे कर्मों का उदय होता है तो सगे माँ-बाप, मित्र, भाई प्रादि वजन भी प्रतिकूल हो जाते हैं।" "प्रव इन बातो को छोटो।" मयी वोना-"पुण्यपाल को यद्यालय में पाये देर नहीं हुई कि उनके लिए वेदियों भी आ गई। गन्तपुर के मत्री अपनी कन्या का विवाह पुण्यपाल के माथ करना पाहते हैं।" "यह तो मेरे मन की बात हो गई स्वामी !" कमलावती गोली-"पुत्रवधू के विना मेरा घर-प्रांगन मूना है। भला, नाम स्या है बहू का?" "कनकमजगे।" मत्री ने कहा-"लामो मे एक है। चौमठ पंद्याएँ पढ़ी हुई है। पुण्यपाल और कानकमजरी की जोटी बड़ी मच्छी रहेगी।" व्याह पक्का हो गया। पुण्यपाल मा विवाह कनकमंजरी के राध मोल्लास सम्पन्न हो गया। युवराज के से रहन-सहन प्रोर ठाट- गट पे माथ पुण्यपाल अपने नये भवन में सुखमय दाम्पत्य भोगने निगा । जब कभी यह वनभ्रमण को जाता तो चार अगरक्षक उसके पाथ पलते । उसके ऐश्वर्य को देखकर मुछो को ईर्षा भी होती और रिह देते--यह है विना मुकुट का राजा । पिता राजा का नौकर एक नत्री ही है और पुष बिना पद के कितना कुछ है ।
3
"स्वामी । क्या आप मेरे लिए सौत लायेंगे ? मै अपने भ
पर गर्व करती हूँ कि मैं अपने प्राणेश्वर की अकेली हूँ, पर आज
मपने ने तो मुझे डरा दिया है।'
"अपने से ही डर गई तुम?" पुणपाल ने कनफामंजरी
कपन पर टिप्पणी मी-"क्या सपने में मैंने दूसरा व्याह किया है
"प्रिये ! मपने की बात नो तुम
जानी। पर मेरे हृदय
बात तो यह है कि तुम्हे पाने के बाद मुझे प्रव
भी पाने
इच्छा नहीं।"
"नगर मे पहले या जाग्रत नहीं होती स्वामी !" पाना
मजगे बोनी--"प्राग प्रापशी इच्छा नहीं है, पर जब दूसरे विका
त मगर प्रापमा तर इच्चा मानत होने में देर का लगती है ?"
"तो मैं तुम्हारे लिए पानी च्या को मार भी तो मा
है।" पुमान ने मामी को वक्ष से लगाकर कहा
तो व पोर ही बात मालमती है।"
"माया" नाम गरी ने पति का बानुपाश छाने
नाहोगे ?"
"faiभीही माना कि तुम ममय मोन मग
ले। पास यदिग हो तो उसमे पर
M
फूल और पापाण | १७ । - रत्नियां ममा सकती हैं । वे पत्नियाँ देखने मे अगल-अलग लगती है, पर होती एक का ही रप है । लेकिन तुमने मपने मे क्या देखा ? अपने की बात तो रह ही गई।" "सौत का भय मुझे भी नही है ग्वामी ।" कनकमजरी बोली-"यह तो युग की प्रथा है कि धनी और श्रीमन्त पुरुष अनेक को सहारा देता है। एक मूर्य क्या अनेक कमलिनियो को नहीं पलाता ? मोती में भागडा तब होता है, जब पुम्प मे कुछ देने का बहकार हो । मूर्य मे कुछ देने का अहकार नही होता । पुरुष कुछ मानेने की न मोचे तो हम जितना चाहे उमने भरपूर पा लेंगी। फिर पर गिटा क्यो होगा ?" "लेकिन सपना तो छूटा जा रहा है।" पुण्यपाल बोला- कम मेरी उत्सुकता तुम्हारा मपना सुनने की है। विवाद "सपना भी सुनाऊँगी ।" मानकमजरी बोली--"पहले यह हृदय तानो मपना मच्चा होता है या भूठा ।" "दोनो ही बाते पुण्यपाल कहने लगा-"यह मनार भी सपना ही है । यह मच्या भामता है, पर झूठा होता है । प्राज म जो बातें कर रहे है, ये मच्ची है। छह महीने बाद ये ही बातें पना हो जाएंगी। बोती हुई पटना और देरी हुए नपने में कोई तर नहीं होता।" पानकमजरी जरा गम्भीर होकर माहने लगी- "स्वामी । मैं प्रापने नाप वन मे भटक रही है। प्राप मुझे कार चले गये है। मैने प्रापणे बाल गोजा पर पाप नहीं ग्लेि । पु निराश हो गई तोकिली ने बताया यि मेरे पनि ने नो दूसरा पाह पार लिया है । बन, फिर मेरी प्रांच दल गई। मुझे लगता त देनियर सपना भविष्य पटना पा न हो। प्राप दूसरा ।" दूसरे ती है।" तो हा- उसमे १८/ फूल और पापाण व्याह करलें, इसको चिन्ता नहीं । पर मुझे छोडकर दूसरी के रहे तो मैं जी नहीं सदूंगी।" "ऐमा मत सोचो प्रिये" पुण्यपाल बोला-"सपने में दोनो वन मे भटक रहे है। यदि में तुम्हे छोड देता तो वन में माय क्यों भटकते? "प्रिये । म्वप्नफा हो या ज्योतिप का फलादेश, भरिए बारे में जानने की कोशिश करनी ही नहीं चाहिए । जैसा । जाए, भोगता नले । जो घटनाएं हमारे जीवन में पूर्व निश्चित ही नम-रूम में पायेगी । उन्हें एक सफल अभिनेता की तरह जाना ही जीवन जी सायंकना है।" कागामारी संतुष्ट हुई। उसने मामायिक-प्रतिक्रमण । और प्राज बहुविधि दान दिया। पुण्यपान भी समस्त धर्मकिन में निवृत्त होर राजमभा जाने की तैयारी करने लगा। art १ X नमा जिन का दरबार लगा था। किसी देश का पार गुटा-पिटा-सा राजममा में पाया और बोला- "जनमाका । मैं गालिनि नगरी का व्यापारी अपना गार पाया । । राग्ने में मेरा मव मार्थ हायुमो ने लूट लि तपाई मात्र मेरे पाम रहे हैं। गानो के गुण्डल भी दुध नही छोटे । दि पार नगरमेठ मुझे थोडी-गी पूंजी गग को यही हार पुन, साना व्यापार गुरु म। लुट करत जाने नोटमा गहरी नारना ।" ' गना मे तुम वैगे ही लौटोगे, जो ":: बोस के गाय -"तुम्हारी ही गोगा। सहा में विगतोदो बना दि मी परतायोग मारे को दे दो।"
फूल और पापाण | १९ राजा के इस प्रौदार्य मे अहकार का पुट भरपूर था । चाटु- कार सभासदो ने व्यापारी से कहा- "हे मेठ । हमारे राजा मानवो के भाग्य-विधाता है । ये जिसे चाहे, उसे बना दें और जिसे चाहे उसे मिट्टी में मिला दें।" ये वाते सुनकर पुण्यपाल मुस्करा दिया । वह भी सभा मे था । उसकी मुस्कराहट देख राजा को अपनी उपेक्षा नगी । राजा ने पूछा-- "हे गुणागार पुण्यपाल ! तुम क्यो मुम्कराये ?" "सभासदो की नासमझी पर !" पुण्यपाल ने बटी निर्मीयता से गहा-"अपने भाग्य का बनाने-बिगाउने वाला मनुष्य स्वय होता । समय है अापने पूर्व भव मे इस श्रेष्ठी में कुछ गण लिया हो। अपनी उदारता के रूप में प्राप इस सेठ का कण ही इने लौटा रहे है । इसका गार्थ लुटा तो इसके पापोदय के कारण । इमे प्राप धन दे रहे है तो इसके पुण्योदय के कारण । रात-दिन की तरह मनुष्य के जीवन मे पाप-पुण्यो का उदय होता रहता है।" बात तो सच्ची घी, पर मीठी नहीं थी। गाउवा सत्य राजा को बुरा लगा । उसने पुण्यपान मे कहा- "अभी तुम नादान छोकरे हो। इसलिए अपनी धारणा बदलो धोर पुन मगनने की कोशिश करो कि मेरी नामध्यं मे बनाना विगारना है या नहीं। "पुण्यपात । तामलिप्ति के एस सेठ की बात तो जाने दो। अपनी बात कहो । धाज तुम जो कुछ हो मेरी गापादृष्टि के कारण हो। तुम्हारे ठाट-बाट मैने बनाये हैं। मैं यदि चाहे तो तुरे दर-दर भटगा हूं।" "माप गुग हे पृप्वीनार पुष्पपाल ने की दृदना ने - है २० / फूल और पापाण म गहा-"म आज जो कुछ हूँ अपने पुण्यों के कारण हूँ और जो नहीं हूँ, अपने बोटे कर्मों के कारण हूँ । विराटनगर में और भी सड हैं। वे सुन्दर भी है और विद्यावान भी है। आपने उनके ठाट-4 क्यो नही किये, मेरे ही क्यो किये ? इसलिए कि मैंने ऐसे पुण्यो बन्ध रिया है कि मैं ऐसा ऐश्वर्य का जीवन जी सकू।" "तो हम कुछ भी नहीं। तुम हमारी सामर्थ्य को चुनी दे रहे हो ?' राजा क्रोध मे चीखने लगा-"मनी सुबुद्धि । सुन हो, अपने पुण्यपाल की बाते । इसे समझा दो कि सचाई को स्वोर कर ले, वरना परिणाम अच्छा नहीं होगा। मंत्री ने प्रार्थना के स्वर मे कहा- "अन्नदाता | छोटों की शोभा अपराध करने मे ही है। बरे हैं। आपकी शोभा छोटो के योटो को भुलाने मे है । यह न जाने पर में तो प्रापसी मामध्यं जानता हूँ । पूरा नगर जानता है प्रापकी गृपादृष्टि का गे क्या कर देती है । मैं इसे समझा दूंगा पनी गने देगा ही 7 है।" मनीती शामर मे राजा का क्रोध शान्त हुग्रा । घर मा मगी अपने पा पर विमठा- "पमा यर जारी है कि गिद्धान्त के पीछे अपना जीवन - 7 "पुरार मान लोगोई व्यक्ति ढेला फेल रहा है । गुर लोगो मोग में कर देना तुम्हारे गिर मे लग माना निबर में कोई धन वरमा रहा हो तो जग धूल के ने गट होगी हर गयोग में मेरे मिर पर नि मोठी? "ना पुषो में गय बुध मिलता है। पर रा तुम्हाग विगाया ? यदि , गुम गजा फूल और पाषाण | २१ 4- पुण्य F में समर्थन करके उसकी मामर्थ्य को रवीकार कर लोगे तो क्या तुम्हारे अस्त हो जाएंगे ? तुम तो प्रा बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हो।" "राजा की बात न मानने में मेरा क्या विगटेगा?" पुण्यपाल बोला--"पुण्यो के फल मे यदि विश्वान अटूट हो और फार्मनिद्धान्त धारणा दृढ हो तो राजा की बात न मानने मे मेरा क्या विगडेगा ? छ भी नहीं। "पिताजी श्राप जो राजा के समर्थन की बात कहते है, सिका अर्थ सीधा-सा यही है कि कर्मनितान्त में प्रापशी धारणा द नहीं है और कर्मफल मे अटूट विश्वास नहीं है।" है। पास बैठी कमलावती ने कहा- "बेटा । तेरी बात का समर्थन में पूरी तरह से करती हूँ। किन एक बात पूडूंगी । राजा की बात न मानने से भी तेरा कुछ भाही बिगडेगा और उनकी बात मानने से भी कुछ नहीं बनेगा तो फर राजा की बात मान लेने में ही पया बुराई है ?" "बुराई है माँ ।" पुण्यपाल बोला- बोला---'"फिर लोगो का विश्वास मनिद्धात मे हटने लगेगा । लोगो को अपने पुष्पों और धर्म का होकर राजा ना महारा रहेगा । धार्म की बात मह ने मानने की ही होती, दिल और दिमाग में मानने पी होती है। दिन में है प्रश्वास होता है और दिमाग में धारणा होनी है । जब यह बात प निश्चित है कि मेरा बनना-विगरना मेरे गुभाशुभ गमों पर तधारित है तो मैं राजा न भूले घहमारमा समर्थन पयो कार ?" माफरले से तो जनधर्म मा अनादर तो करेगा।" पुण्यपाल की दृढता देव मत्री मुनि ने फिर सुध नहीं पाए । पर जिसभा नीनय बाते नामकरी में भी मुनी तो गत पो मने नता समा अपने पति से पूजा--- *Pantar vave २२ / फूल और पापाण - "स्वामी ! मैं तो अल्पज्ञ हूँ। फिर भी एक शका है कि ६ राजा आपसे नव सुविधाएं छीन ले तो क्या होगा ?' "मेरे लिए इन मुविधायो का मूल्य ही क्या है, जो कुछ हो? पुणपाल बोला- -"मूल्य होने पर व्यक्ति चिपकता है और मूल्य पर उनका उपयोग तो करता है, पर चिपकता नहीं है। "प्रिये । मेरी बात यो ममझो कि केला खाते समय गेले पिनो का उपयोग तो होता है, पर उमका मूल्य नहीं होता । इसनि केा साकार हम बड़े महज भाव से उसके छिलके को फेंगा देते हैं मूल्य भोजन का है, उन पान का नहीं है, जिसमे भोजन किया जा है। थाली सोने की हो गा तांबे की अयवा पत्तो की पत्तल हो. उगो उपयोग में कोई गलर नही है। सभी मे रोटी रपकरण गएगी। "प्रिये ! यदि अशुभ पर्म उदय मे आयेंगे तो मय सुविध हिननी ही चाहिए और फिर जब पुण्य प्रकट होगे तो इगमे हा गने मोग मिलेंगे। एमी दृढ धारणा और अटूट विश्वास गे गा में गाली बात मानने को तैयार नहीं है।" पृतपानी मा की चर्चा नगर भर में फैल गई थी मनिलाबी बात ही मनी थी, पर ममी मुबुद्धि का : Facा। अपने-अपने मम्मारी की बात होती है । गोताहो गया तो या बुरा होगा । पत्र Trt मा प्रा उगने गही ठीक नममा कि पुप्पा को वाया-गई हो जाएगी। प्रा. 57 frite " माह में मनाने के अलावा पुछ - f. IT । .
"मानूंगा पिनाजी | प्रापको प्राज्ञा मानना मेरा परम तिंव्य है।" "तो बेटा | तू तब तक राजसभा मत जा, जब तक राजा का अलावा न पाये।" । Ram- - पुण्यपाल ने यह बात मान ली । उसने राजसभा जाना छोड देया । राजा जितशतु ने भी पुण्यपाल के प्रति कोई उत्सुकता नहीं 'दगाई । मानो वह इस प्रसग को भूल ही गया । उनी तरह तीन महीने बीत गये । एक दिन अचानक ही राजा जितगा की भेंट पुण्यपाल से वन हो गई । होनहार को बन्दी कौन बना पाया है । दोनो वनभ्रमण को निकले थे और प्रामना-सामना हो गया। चार अगरक्षक पुण्यपाल के साथ थे । बडे-छोटे की मर्यादा के अनुसार पुण्यपाल ने घोडे ने तीचे उतरकर राजा का अभिवादन किया। उसे देव राजा मुम्पराठा 'प्रौर बोला- "नय तो मान गये मेरी मामर्थ्य को ? चार अगन्धको दो पाच तुम घूम रहे हो, यह सब मेरी प्रसन्नता के कारण है । दनाने- विगाउने गी सामथ्र्य राजा जिताए मे. दमलो तुम चनौती नही मनाते।" "मेरा विचार प्राज भी वही है, जो पर ले पा।" पृष्रपान ने पाहा.---"प्राप मेरी भोग सामग्री को निमित्त भर है। पुण्य ही निमित जगाते है। निमित्त का कोई मूल्य मेरी दृष्टि नही है।" राणा पुषित हो गया ! दोना पह- "साज राजसभा में धाना । वही में नये सामने तुम्हारे भाग्य का पंचनामा । देगा, तुम्हारे पुष या गरले है।" पुष्पपात पचासमय राजमना पाचा । राजा भी नही माग - ।
२४ / फूल और पापाण
.
था । जय राजा पाया तो ममा के नियमानुसार राजपुरोहित ने
ग्यस्ति पाठरिया पौर चारण ने विरद वगाना । राजा बीन मेरी
योन पठा-
"नारण ! बैठ जाम्रो । अाज हमे पुष्पपाल की चुनौती मा
उत्तर देना है।"
फिर राजा ने दुपयपान मे पहा.
"पुपाल में तीसरी बार तुम्हे बचने का अवसर दे रहा हूँ।
मुझे तुम पर दया भी पाती है। मुझे भी नो दिग्राम्रो कि तुम्हारे पुष्प
कहाँ है । सट तो वही दोग रहा है कि तुम मेरे दिये भागो को भोग
रहे हो।"
"राजन् । ग्रामा अश्य नक्ति होती है और देह दृश्य शक्ति
। जग प्रात्मा गातार देश में प्रविष्ट होर मायं परासी
ती दशा पुसी पाप-पुण अश्य होते है और उनका
नितिमा। मेरे गुपको गरण आप निमित्त बना
मोको मामयी देशमा प्रापी मायको यह मामगं नही
२ मेगावाला दिगार मसे।"
r
फूल और पाषाण | २५ पुण्यपाल ने सभी को टिप्पणियाँ सुनी। उसने यह भी मुना- "राजा को भी बाल की खाल नहीं निकालनी चाहिए।" "पुण्यपाल ने कटवा तो बोला, पर वोला मत्य।" लेगिन ऐमी टिप्पणियां करने वाले काम ही थे। मनी मुबुद्धि का मुख मुरझा गया था । उममे कुछ राहते नही बन रहा था। उने अपने पुन पर ही फ्रोध था गि, उसने मेरी वात न मानफर इतना मनट मोल ने लिया । पुण्यपाल के देश-निफागन की चर्चा नगर भर में फैन गयी । फमनावती तो सुनते ही मून्छिन हो गई । उनकमजरी रोते- रोते बेहाल थी । लेकिन पुण्यपाल न दु खी घा, न मुनी। ऐमी प्रवरथा को ही समतारम की स्थिति कहते है, जो पुण्यपान जने धर्म- निष्ठो गोही प्राप्त होती है या फिर ऋषि-मुनि एम रम का पान कर पाते है । क्रिया-प्रधान धर्म करने वाले ममतारन का पान नहीं गर पाते।
- कनकमंजरी ने हठ किया- "स्वामी ! मैं आपके साथ चलूंगी। पाप तो यही कहेगे कि यही रहकर सास-श्वसुर की मेवा करो। पर वनगमन वाले पतियो का इतिहास देखो। सीता राम के साथ गई थी। दमयन्ती ने भी नल का साथ नहीं छोड़ा था। द्रौपदी पाण्डवों के साथ वन-वन भटकी थी।' "इतिहास से हमें शिक्षा लेनी चाहिए।" पुण्यपाल बोला- "इतिहास पी गलतियां दुहराना बुद्धिमानी नही है । "प्रिये ! सीता ने राम की बात नहीं मानी तो दुख भोगा। वह सब तुमने सुना है। प्रत. दुख उठाने की गलती तुम क्यो कर रही हो?" "दु.स की बात अापने पूब रही।" कनव मजरी बोली- "पति के माय रहकर जो कष्ट मिलते है, वे भी सुग्रकर होते है और पति के बिना सब भोग, सब गुण और मुविधाएँ कप्टप्रद हुमा करती हैं। "स्वामी । पति ने पत्नी का गम्बन्ध तो काया-छाया का होता है । जर मियान में छाया पाया मे अन्नग नहीं रही तो मैं ही प्रापये बिना में रह माती है।" अनतः पुष्पपात लोकनकमजरी की बात माननी पड़ी। पन्नीगतंगार होने का आदेश देकर पुण्यपाल माता पमलावतीने पिमा लेने गया तो माता की मांग परम पड़ी। बोली वह- -- -- फूल और पापाण / २७ । "बेटा । म ऐमा हृदय कहां से लाऊं कि तुझे जाने को कहूं ? कसे कहूँ कि जाप्रो बेटा। "मेरे नाल । तेरे लौटने की तो कोई अवधि भी निश्चित नही है । तू तो सदा के लिए जा रहा है। यह राजा कैसा कठोर है जो हमे भी तेरे साथ नहीं जाने देता।" "माँ ! कर्मो मे विश्वास करो।" पुण्यपाल ने कहा-"मेरा विश्वास अटल है। एक दिन मैं यहाँ अवश्य पाऊँगा । राजा ने मुझे जो देश निकाला दिया है, इसमे भी मेरा हित किया है । देव की योजना गोई नही जानता । बुराई में भलाई छिपाना देव की लीला होती है। "माँ | तुमने बचपन में ही मुझे धर्म का मर्म समभाया है। धर्म गा महारा लेने वालो को शोक-वियोग प्रोर भय तो नता ही नहीं माना । तुम मोहवण विचलित हो रही हो । धर्म और धर्य का गहारा लेकर मुझे पानीर्वाद दो ति जहां भी जाऊं तुम्हारे दूध पो नाज र।" मामलावती मौन हो गई । उसने कुछ गहने न बना । पुप्यपाल ने उगम परण हए और पिता से मिलने चल दिया। पिता भी शोकागुल थे। पुत्र को पक्ष मे लगाकर मत्रो नुवृद्धि रोने लगे। पुण्यपाल ने उनी धीरज बंधाया। हार पर रप तयार रहा था। पुण्यपात और जननायजरी रम मे बैठे। दोनों को विराटनगर में वीन मो दूर एका वन मे पोटगार रप वापस मा गया । पुणपाल के चले जाने में नगर-भर मे गोगा गया था। हर घर में मातम-मा या पा । कामनावती घोर युतिको नामान्य होने में माफी दिन नग गरे। पटे-से-बटा पोल-दियोग ममानी पारी में गटा जाता है। मरी छोर पपान पगना ने पल-पंदन ही मल । मुबुद्धि २८ / फूल और पाषाण । - - -- रहे थे। कभी संध्या को तो कभी दोपहर को ही चलना बन्द कर देते । वन मे किसी वृक्षमूल में रात बिताते और सबेरे चल देते । वाते करते रात कटती । मार्ग भी कथा-प्रसगो के सहारे कटता जाता। "क्या हमारा जीवन अब यो ही वन-वन भटकते बीतेगा?' कनकमजरी ने कहा-"स्वामी । अब कोई नगर आये तो वही आप ठहरने की व्यवस्था कर लें । मैं स्वय किसी की मजूरी कर लूंगी।' "तुम मजूरी करोगी?" पुण्यपाल वोला "प्रिये नट-नर्तन ही स्त्रियो की कमाई खाते है । मैं क्या मर गया हूँ, जो तुम मजूर करोगी ? "प्रिये । जो पुरुष अपनी स्त्री का उदर-पोपण नहीं कर सकते वे भी कोई पुरुष है ? लगता है तुम थक गई हो?" "साहम और उत्साह का माकार रूप आप मेरे साथ है। फिर मैं क्यो थकूँगी ?" कनकमंजरी पति के पैर दवा रही थी। दार पर हाथ मे लेते हुए बोली-~~"ये चरण मेरा बल है । जिम दि मेरा यह बल थकेगा, उसी दिन मैं भी थकूगी।" "यदि मैं तुम्हारा बल हूँ तो तुम मेरी शक्ति हो ।" पुण्यपाल बोला-"स्त्री पुरुष की शक्ति होती है । मुना तो होगा कि बिना शक्ति के शिव, शव हो जाता है। शव मे जब 'ई' नाम की शक्ति मिलती है, तभी वह शव, शिव अर्थात् कल्याणकर्ता हो जाता है।" "यह तो काव्याना का चमत्कार रहा स्वामी।" कनामजरी ने प्रसंग बदलार कहा-"प्राप बुरा न मानें तो एक बात पुडूं।' पुण्यपाल ने अनुमति दी -"तुमसे बातें करने की जो फुरगत कहां वन में मिली है, वमी विराटनगर में यहाँ थी?" मनगमजी बोली- "पूनी।" -- "स्वामी। यदि पाप राजा जितशय के अहार को पुष्ट कर फूल और पाषाण | २९ -- देते । यह कह देते कि उसी के कारण श्राप सुखी हैं तो वह प्रापको देशनिकाला क्यो देता ?' "देशनिकाला तो मेरा होना ही था।" पुण्यपाल बोला- "पर उसके लिए कोई बहाना भी तो चाहिए । राजा बहाना बना। इसीलिए उसने ऐमी बात पाही, जो मैं मान नहीं सकता था।" "प्रिये । यह देशनिकाला राजा जितणनु का दिया हुअा नही है, मेरे कर्मों के कारण है । राम ने किमी की कौन-मी बात नही मानी थी ? उन्होने पयो अपना देश छोडा ? ये मव कार्य पूर्व नियो- जित होते है । अत. यह वात तो तुम मन से निकाल ही दो कि राजा ने किया है।" मूर्यारत होने में देर धी । पुण्यपाल ने बाते करना बन्द पर पत्नी से कहा- "प्रिये । मै कुछ फन नोड लाऊँ । साध्य-पार्मो का समय हो रहा है।" पुण्यपात पल ले प्राया । नाध्य सामायिक और प्रतिक्रमण करने पे बाद दोनो ने फलाहार का भोजन किया और सो गये। गित गात उठे पीर नित्य-पार्मो से निवृत्त होकर पुन चल दिये । पगी फ्रम से चलने-ठहरते दोनो किमी नगर के निकट पहुँच तिथे । नगर में डेट-दो पोम दूर सरोवर पर डेरा जमाया । पुण्यपाल सुभाष दिया..- "प्रिये । रात नी मरोवर पर वितायें। सवेरे इन नगर में 'लंगे । मम्मय या तो वहां के राजा के यहाँ यो कार्य पा दूंगा। ह भी नहीं दया तो जगरा ने पाली गाटुंगा।" "जैसे भी होगा रह लेंगे।" माना मजरी योनी-"बहुत दिनो । पालमा भीषण नहीं मिला । भोजन ये दिना शक्ति भी तो नही भगती।" f -- . .
३० / फूल और पाषाण
"भोजन से शक्ति मिलती है, यही तो एक दुराशा है । प्रिये
यह आशा झूठी है कि भोजन से शक्ति मिलती है। क्योंकि जो
वनाती है, वह चलाती नहीं है । भोजन का कार्य शरीर का बना
है, न कि उसे चलाना।"
"तो फिर शरीर किस शक्ति से चलता है ?" कनकमजरी
पूछा -"जब भोजन में शक्ति नहीं है तो आप क्यो भो
करते है ?'
पुण्यपाल
ने बताया-
"शरीर के भीतर जो प्राणशक्ति है, यही उसे चलाती है।
लोग भोजन का सम्बन्ध शक्ति से मानते है, वे भोजन करने के व
कार्य करते है और जो उनका सम्बन्ध शरीर-पोषण से मानते हैं,
कार्य करने के बाद भोजन करते है।
"प्रिये । आयुर्वेद मे ऐसा कहा गया है कि भोजन करने
बाद राजा की तरह विश्राम करे, न तो दौड़े और न तेरे । यदि र
ऐसा करेगा तो मृत्यु उगके पीछे-पीछे दौड़ेंगी-
मुक्त्वा राजवदातीत यावदन्नं कर्मों गता।
न धावनं न प्लावनं मृत्यु धावति धावतः ॥
"यह तो आपने नई बात बताई।" कनकमनरी बोली
"लेकिन मनार तो उनी भ्रान्ति मे चल रहा है कि भोजन से श
मिलती है।"
"इनानिए रोग फैले है।" पुण्यपात बोला--"दु यो
पारण हर स्तर की घानियां है। मन के स्तर पर लोग धन
मानते है और गग्रह की प्रवृनि अपनाते है । उमा उल्टा
पान या हो कि मां-ज्यो धन बना है, त्यो त्यो चिन्ता
पानी है।
"धन के उपयोग में मैं मार नही करता। लेकिन :
।
फूल और पाषाण | ३१ कमाये हुए धन के दसवें भाग को प्रन्यो मे बांटकर उसका भोग किया जायगा तो चिन्ता पाम नहीं पायेगी।" इन तरह की बातो में काफी रात बीत गई। सवेरे उठकर दोनो नित्यकर्म मे निवृत्त हुए तो पुण्यपाल वोला- "प्रिये | मैं उस नगर में हो पाता हूँ। तब तक तुम यही बैठो। ज्यादा दूर नहीं है । ठहरने की व्यवस्था करके प्राऊँगा और तुम्हारे लिए भोजन भी लेता पाऊँगा।" यह फह पुण्यपाल नगर की ओर चला । उमे जाते हुए कनक- मजरी देनती रही । जब यह प्रायो से अोझल हो गया तो मूसे पतो पर करवट बदलकर लेट गई और विचारो की दुनिया मे खो - गयी। पुण्यपाल नगर के हाट-बाजारो को देग्रता हुआ किसी धर्म- भागानी तलाश पर रहा था। तभी उमने दिढोरा पिटते मुना उद्घोषक मह रहा था- "जो भी श्रेष्ठी पुष्पदत्त के माघ समुद्र यात्रा के लिए जाएगा, उसे वेतन के अलावा रहने-गहने ती मय सुविधाएं दी जाएंगी।" घोषणा तो अच्छी तरह न समझ पुण्यपाल भागे चन्न दिया। जपपने पर गो चबूतरे पर उगने एक वृद्ध को धकेला बैठा देखा तो चबूतरे पर प गया धार प्रणाम गारो मानन ग्रहण पिया । तद- नन्तर उसने पूछा- "पूज्य । म परदेगी हैं। इन नगर के बारे में गुछ दवाए।" "इस नगर का नाम रजपुर है ।" वृद्ध ने कहा- "रत्नमेन यहां के राजा । पापारिक दृष्टि में इन नगर पा मान्य है, पयोगि गमुद्रा मिलारे बना है। विदेशी प्यापारी यहां पाने ही एते है। तुम भी क्या कोई प्यापारी हो' ।
३२ / फूल और पाषाण "व्यापार को आपने खूब याद दिलाई।" पुण्यपाल बोला- "यह पुप्पदत्त कौन है ? अभी मैंने घोषणा सुनी थी कि जो पुष्पदर के साथ समुद्री यात्रा करेगा, उसे वेतन और सब सुविधा मिलेगी।" "बड़े लोगो की बाते बडी निराली होती है ।" वृद्ध ने कहा- "इसी रत्नपुर मे श्रीदत्त नामक एक सेठ रहते है। धन की को कमी नही है । करोड़पति है । पुष्पदत्त उन्ही का इकलौता बेटा है "पुष्पदत्त ने समुद्र पार जाकर व्यापार करने का निश्चय किर है । सात जहाज भरे तैयार है । हरेक जहाज पर एक-एक व्यति की उसे खोज है। छह मिल गये। सातवे की तलाश है । उस का ढिंढोरा कई दिन से पिट रहा है।" "तो क्या लोग सहज मे ही समुद्र यात्रा के तिए तैयार नह होते ?" पुण्यपाल ने पूछा- "बेरोजगारो को तो झट तैयार । जाना चाहिए।" "रोजगार से प्राणो का मूल्य अधिक है।" वृद्ध ने कहा- "समुद्री यात्रा प्राणो पर सेलना होता है । इसीलिए कोई-कोई । यह साहस कर पाता है।" "मृत्यु तो मर जगह है।" पुण्यपाल ने वृद्ध से कहा--"पूज्य पाप ही बताये, मृत्यु कहाँ नही है । उठते-बैठते, गाते-पीते हर सम मृत्यु साथ रहती है । जब कोई नहीं होता, तव नितान्त अकेले में : चिर-मंगिनी मृत्यु रहती है। "तुम्हारी वात से मैं सहमत हूँ वत्म।" वृद्ध ने कहा-"मर वाले घर में भी मरते है और जिन्हें बचना होता है, वे समुद्र पर भी बचते ही है। लेकिन मृत्यु का भय तो मनुष्य को उसमन हाने रहना है कि यह कागे, यह न करो। पुष्पदत्त भी इमी भय । कारण मान सेवमो पोका-एर पहाज का ग्वामित्व गीपकर सा - मे फूस बार पापाण । ले जाना चाहता है। उसने मोचा है कि सब के भाग्य में मेरा साभा हो जायगा । मब के पुण्य जहाजो को दबने से बचायेगे तो मैं भी बच जाऊंगा।" "अपनी-अपनी समझ है ।" पुण्यपाल बोला--"सातो पापी हुए तो पुप्पदत्त को भी ले डूबेगे और यदि एक पुप्पदत्त पुण्यात्मा हुआ तोमवको बचा लेगा। अच्छा पूज्य | मै चलूं। अापने नगर यी जानकारी दी, उसके लिए धन्यवाद । में किसी धर्मशाना को पोचूंगा।" यह पह पुण्यपाल वृद्ध के पास से उठ गया और धर्मशाला की ग्राज मे चलते-चलते एक जगह रख कर विचार करने लगा- 'पुष्पदत्त के साथ में ही चला जाऊँ तो बना रहे ? लगता है देव ने गाता रथान मेरे लिए ही खाली छोटा है । पर्मपरीक्षा का यह एक अवसर है । अकेले मे ही भाग्य-परीक्षा हो पाती है।' 'लेकिन कनकमजरी?' पुण्यपाल ने कनकमजरी के बारे में गोचा-'उसका क्या होगा ? उसे छोटकर जाऊ कंगे ? उने नाथ भी ले जा नहीं सकता । उसे यही धार । उने घोटकर जाना उगी मे हित मे है । मेरे माथ कहाँ-वहां भटकेगी ? नमार मे भन्ने जनो को पामी नहीं है । मेरी पोज मे गनकमजरी रत्नपुर प्रायेगी । :स्निी भले जन का प्राश्रय उसे अवश्य मिल जाएगा। फिर माधन तो धर्म का होता है । कनकमजरी शीलवती नारी है। मामनदेव उनकी रक्षा गारेगे । नत ऐने ही दमयन्ती को छोड गया या तो दम्चन्ती ने अपने पुदिन अपने शीलधर्म के सहारे काट लिए थे। पानामजरी भी रनपुर में रहेगी । फिर तो में पुष्परत के नाच लोट ही मारूंगा।' हुदर पो पा करके पुण्यपाल नागर तट की घोर वोगा। रह-रहकर उसे माणमा हो रही थी कि गुमने पहले पोई पोरन पहुँच जाए सो बसा तेज चल रहा था। -- - Premium.sarmmarrimartm T ३४ / फूल और पाषाण - - "मोह तुम को उसी जहाज उसी तरह पुप्पदत्त एक तम्बू मे बैठा था। उसके माता-पिता, मित्रा उसे घेरे बैठे थे। तभी पुण्यपाल पहुंच गया और बोला "आपका सातवां सेवक मैं रहा ।" पुप्पदत्त ने चोककर कहा-"तुम तो देवदूर में आये हो भैया । प्रस्थान का मुहूर्त तो टला ही जा रहा था। ठीन वक्त पर आये । अब जहाज निश्चित मुहूर्त में प्रस्थान करेंगे।" पुण्यपात वश हो गया। पुष्पदत्त ने पुण्यपान मे बैठाया, जिसमे वह स्वय बैठा था। उसका जहाज बीच मे था यथासमय शयनाद के साथ जहाजो के लगर उठे । सेठानी श्रीदत्त और सेठ श्रीदत्त अपने पुत्र के जहाजो को जाते हुए राडे-डे देर रहे थे । सागर की तरगो को चीरते हुए जहाज वडतेज रहे थे, जैसे ममता ज्ञानी ससार के उतार-चढावो को देखता चलता है । पुण्यपाल के जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ था । इधर कनकमजरी वडी व्याकुल हो रही थी। अभी तक स्वाम क्यो नही गोटे ? मध्या भी हो गई। उसके मन मे तरह-तरह के विनार पाने लगे । कभी मोनतीनही कुछ हो न गया हो। किमी नकार मे तो नहीं फंस गये । फिर एकाएक ही अपने सपने को याद आ गई। वन-वन भटरने का मपना तो मच्चा हो ही गया । हा गम | मही दूसरी बात भी मच न हो । देव तू बडा क्रूर होता है कनामजरी रोने लगी। पर बन मे उमका रुदन मुनने वाल गौन था ? रात के चरण बटते पा रहे थे। पति की प्रतीक्षा जाने के बाद अब वह पति की गोज में रत्नपुर की ओर बर चली तभी एका जगली हाथी ने उमा पीछा किया । नानकमजरी बेतहार दौडी। पर हां तक दौड पानी ? हारे को धर्म का महारा । हा पना नवकार मन्म पा जाप गरने बैठ गई और प्राणों का मो his फूल और पापाण / ३५ धर्म ने चमत्कार दिखाया। हाथी कनकमजरी के पास प्राकर डा हो गया और चिंग्याउ मार वन मे चला गया । कानक का जाप व भी चालू था । आँखें खोली तो अपने को सुरक्षित पाया । यदि वन मे सकट न पाये तो धर्म के प्रति प्रान्था कैसे बढे? जरीकी धर्म के प्रति ग्राम्या वटी और उमने निश्चय ग्यिा कि मं-रज्जु के सहारे मैं रत्नपुर में रहतार ही अपने पति को पा गी। मानक रत्नपुर पहुंची। एक उपाश्रय में शरण ली। पति के न लिने तक मौन धारण किया और वेला, तेला, अष्टम प्रादि तप रके पति की प्रतीक्षा करने लगी कनकामजरी के मौन-तप की बात पूरे नगर में फैल गई । मव से देखने पाते और नमन करके चले जाते । राजा रत्नमेन भी ये । उन्हें इस बात का दुख हुआ कि मेरे नगर में इन सती को ई गाप्ट है । वे कनक से नहीं बुलवा सके । तब उन्होंने घोषणा रा दी कि जो भी इस सती का मौन तोडेगा, मै उसे अपना सर्वस्व क दे डालूंगा।
5 । - श्रीपुर नगर समृद्धि का प्रागार या । ममुद्रतटवर्ती इम नका मे दूर-दूर के व्यापारी पाते थे । धन-धान्य मे सम्पन्न उम नगर न राजा था शूरमेन । शूरसेन प्रजावत्सल राजा था । एक बार इस दे। मे मूगा अकान पड़ा । पोखर-तालाब मब मून गये । कुमो का पान भी बहुत नीना हो गया । पशुओ को घास-तृण भी नमीब नहीं होता था । राजा ने अपने अन्न भण्डार प्रजा के लिए खोल दिये । विदेश महायता भी ली गई । अकाल कट गया और फिर गूब वर्षा हुई तो खेती लहलहाने नगी । ऐमे ही गान मे राजा शूरमेन ने अपनी सभा मे कहा- "ग्रन्न मे ज्यादा जररी पानी है। इसीलिए पानी को जीव भी कहते है । प्रकृति का कोई भरोमा नही । जाने कब मूया जाये । प्रत मैं पशु-पक्षियो और नागरिको-मभी के हित में। विगाल तालाब बनवाना चाहता हूँ । इममे बारहो माम पानी म रहेगा। जल की समस्या हल होगी।" पर घर में मभी ने राजा के प्रस्ताव पा ममर्थन किया नगरमेट ने एक लाग म्वर्णमुद्राएं देने की घोषणा दग्वार मे म दी। फिर तो नगर के सभी श्रेष्ठियों ने अपना हाथ बंटाने में निश्चय किया । यद्यपि उनी जात नहीं थी, क्योकि राजा गुग्ने अपने गमे ही सह मगेवर बनवाना चाहते थे । गेडो की योग भी। जर व्यय राजा कोहीरना था ।
फूल और पाषाण / ३७ । हजारो मजदूरी को काम मिल गया। स्त्रियां भी हाय बंटाने लगी । तालाब खुदने लगा। राजा शूरसेन म्वय भी मजदूरो का उत्माह वढाने जाते थे । पहले दिन उन्होंने ही पांच कुदाल चलाकर गुदाई का श्रीगणेश किया था । तालाब खुदते महीना भर हो गया था। एक दिन एक कुदाल के नीचे एक बडा-सा ताम्रपत्र निकला। मजदूर ने प्रावाज देकर गवको अपने पास बुलाया । मव उम ताम्रपत्र का तमाशा देखने लगे। एक वृद्ध ने राय दी- "भाइयो । खुदाई का काम यही रोक दो। मैंने ऐगा मुना है कि यदि गुदाई मे ताम्रपत्र निकले तो वह किमी देव का आदेश होता है। जरूर इसमे कुछ चेतावनी होगी। इसे राजा के पास ले चलो।" "यहां किसी राजा का महल होगा।" एवः दूसरे ने कहा- "पुराने राजा अपने बारे मे लिगकर ताम्रपत्र गटवा देते थे कि शायद 'भी युगो बाद खुदाई हो तो हमारे बारे मे लोग जान ले ।" "जो भी होगा, इसको पढने में पता चल जायगा ।" महा-"प्रागे का कार्य राजाज्ञा मे ही फरना है।" ताम्रपत्र राजा शूरनेन ने पास पहुंच गया । राजा ने मिट्टी मे लिपटे इस ताम्रपत्र को धुलवाया। मांजने ये वाद हममे लिये प्रधार उभर पाये । राजा उन्हें पनने लगा और अपने ममी में बोला-- "तुम पलो मग्री । मेरी तो कुछ समझ मे नही पाता।" मत्री ने पदने की कोशिशी ग्रोर पहा- "महागज । यह किमी प्रपरिचित लिपि में लिया। एमा जादने बाना तो दंगना पडेगा । पुरानी लिपियां प्राज ग्रन्त हो गई। उनके नाम पर मुने जाते है।" राजा ने अपने नगर के विद्वान् पडित, लिपि विगारद बुनवाये । कोई भी उस तारपण को नही पट सका । पर तो रागो चिन्ता ने -- 1 1 ५ - Manparm
३८ / फूल और पापाण
बढ़ गई। उसने मोचा, 'यदि ताम्रपत्र न निकलता तब तो कोई
नही थी। अब यदि इसके लेख की उपेक्षा करके खुदाई करवा
तो अनर्थ हो सकता है।
अपनी चिन्ता के निवारणार्थ राजा शूरसेन ने अपने उद्घो
मे पहा-
"हमारे नगर मे दूर-दूर के लोग आते ही रहते हैं। पता न
कौन ऐना निगल पाये जो इस ताम्रपत्र को पढ सके । प्रत तुम
दिन एक बार यह घोषणा नगर मे कर दिया करो कि जो भी राम
को प्राप्त ताम्रपत्र को पड़ेगा, राजा शूरमेन अपनी पुत्री मौभा
मंजरी का विवाह उसके माथ करेगा ।"
नालाब की खुदाई का काम कालान्तर के लिए बन्द हो गया
राजा की घोषणा नित्य गरे एक बार नगर मे दुहरा दी जाती
अभी तक कोई ऐना भाग्यशाली नर नहीं पाया था, जो राजा प
जामाता बन सके । तीन महीने यो ही बीत गये । इन महीनो के मा
राजा की चिन्ता दिन-पर-दिन बढनी जाती थी। उसे अव ताम्र
पढाने से अधिक चिन्ता अपनी पुत्री के लिए हो गई । यदि ताम्रप
न पटा गया तो मेरी बेटी कुंवारी ही रह जाएगी ।
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आंधी-मेह और तूफान, अंधियारी रातें तथा जलदम्युनो
मंगटो को पार ले हुए पुष्णदत्त ये मातो जहाज सकुशल श्री
नगरी बदरगाह पर पहुँन गये
। पुष्पदत्त
ने
पुण्यपाल
मो धन्यव
देते ? गहा-
"पुष्पान | मरमुन तुग पुणपुस्ज हो । यदि तुम न होने
जग-न्युहमारे नहाजो गोद लेने । तुम्हारे तीये की मार ने उन
गरे मिट्टी में मिला दिये। अपने लाभाश का अधिकाश मैं तुम
फूल और पापाण / ३९ - "पाप अपने पुण्यो मे मफल हुए हैं।" पुण्यपाल ने कहा- "जल-दस्युग्रो से जहाजो की रक्षा करना तो मेरा कर्तव्य था, क्योकि में प्रापका वेतनभोगी मेवक है।" "मेवक कहकर मुझे लज्जित मत करो।" पुप्पदत्त बोला- "तुम्हें छोडकर शेष छह सेवक है और तुम मेरे मित्र हो । खैर, अब पाम मे लगें । यहाँ माल अच्छा विक जाएगा।" मजदूरो ने मातो जहाजो का मान किराये के गोदामो मे भरवा दिया । पुण्य पाल को साथ लेकर पुष्पदत्त राजा शूरसेन की सभा में गया । राजा को भेंटादि देकर माल बेचने की अनुमति प्राप्त कर नी। यथासमय दोनो अपने देरो पर पाकर मोये। मवेरे पुण्यपाल अकेला नगर-भ्रमण को निकला । श्रीपुर के बाजार बढे सुन्दर थे । पक्तिवद्ध दुकानो को देखते हुए पुण्यपाल एका चौराह पर पहुंचा तो राजा की घोषणा मुनी। पृण्यपाल ने मोचा, 'जरर यह ताम्रपथ ब्राह्मी लिपि में अकित होगा। मै तो इसे पट लूंगा। माही लिपि मे प्राचीन दूसरी कोई लिपि नहीं है।' यह सोचकर पुण्यपाल उद्घोपक के पास पहुँचा और बोला--- "मुझे राजा के पास ले चलो। मैं ताम्रपत्र पढ़गा।" "राजकुमारी गा नाम सुनकर मुंह में पानी भर पाया होगा ।" उद्घोपम ने नीचे से ऊपर तका पुण्यपाल को देगकार पहा--"देवा पी लिपि को कोई मानव कैसे पट माना है। बहुत प्राये. अपनी हसी कराकर चले गये । तुम भी कोशिश कर लो।" "जो चीज समझ मे नही घाती, नांग उने देवमाया महर दान देते है।" पुण्यपाल ने हंसपर महा-"तुम्हाग प्यान fr गिनी देवता ने तानपत्र अचित करके. गाडा होगा ? यदि ऐमीनी बात है तो भी यह मानव लिए गाडा गया है। प्रन उसे कोई मागय ही परेगा।"
४० / फूल और पापाग मुनाल र बोला- "तुम्हारी बातें मेरी ममझ मे बाहर हैं।" उद्घोषक ने कहा- "लेकिन एक बात मेरी समझ में अवश्य पाती है कि यदि राज प्रतिजाबद्ध न होता तो वह राजकुमारी का विवाह तुम्हारे सार अवश्य कर देता । लगता है तुम भी किसी देश के राजकुमार हो।' पुण्यपाल ने कोई उत्तर न दे राजसभा की ओर जाने । उतावनी दिखाई। उद्घोषक उसे अपने माथ ले गया । दरबार उसके म्प पर मोहित हो उठे। राजा शूरसेन प्रभी सभा मे नई पाया था । मत्री ने उसे अतिथि पक्ति में बैठाया । यथासमय राजा मिहामन पर विराजा। ताम्रपर की या चली। राजा ने तानपत्र पुष्पपाल के मामने रख दिया । पुण्यपाल पहले तो उसे मन-ही-मन कृछ पटक-पटक कर पड़ा । फिर राज पो "इसे लेकर वही चले, जहाँ यह निकला है। तभी इमर पना गार्थक होगा।" "यह क्या बात ?" राजा बोला-"अधयुदे तालाब के पा गागर क्या इसमे पुछ और लिग जाएगा ? उसमे जो लिगा है, उ पही क्यो नही पन देते ?" "यहां पटने में एक ही प्रापत्ति है।" पुण्यपाल बोला-"य यह यहां मैं प्रमाण नही दे पाऊंगा। यहां पढ़ने में पाप को मा लंगलिको पटा है, इनमे वही निगाहै। फिर भी में यही देना हूँ।" "Tাদা रिया--- "मा धनी रत्नगर्भा गर्म रत्न भरे पड़े हैं। लेकिन य मी पुजामा यो हो निती है। यदि कोई पापी इग वसुन्धरा गत गाटे और वही पिर मोदे तो उसका धन कोयला बन जाता है प में पटना गुरु - फूल और पाषाण / ४१ । किन यदि पुण्यात्मा खोदे तो उमे दूसरे का गडा धन भी महज मे मल जाता है। "मेग यह धन युगो वाद या कमी भी किसी पुण्यात्मा को मलेगा। जिसे यह धन मिलना होगा उमे पहले यह ताम्रपत्र मलेगा। इसमे लिये निर्देशो के अनुसार खुदाई करने पर चार बडे लिश रत्नो मे भरे मिलेंगे। "मैं कचनपुर का अरवपति सेठ था। वहुत-सा धन मैंने दान । बाँटा । ये चार फलण मां वसुन्धरा को भेंट कर दिये कि अपने मामी मपूत को देना। "अब खुदाई का निर्देश पढो- "जहां यह ताम्रपत्र मिला है, उमी म्थान पर बीम हाय हरा और गोदो । फिर उसी सतह तक बीम हाथ पूर्व दिशा में चोदने चलो । बीमवे हाथ की मीमा पर चार-चार हाथ चारो ओर कोदो। फिर उग वर्गाकार स्थान को चार हाध पोर खोद डालो । पारो पन्नश मिल जाएंगे।" ताम्रपत्र सुनते ही सब अवाक रह गये। मत्री के मुंह से निकाला "तो कभी यहां कचनपुर नाम का नगर होगा ? उगी स्थान र प्राज श्रीपुर नगर बस गया है।" "पुर भी हो, यह तो बडा अद्भुत रहस्य रहा ।" राजा पूरगेन ने गाहा-"प्रब तो प्रमाण भी मिल जाएगा।" राजा ने पुण्यपाल को देगा और निहासन मे उठगर उसया पप पर अपने पाम लागर बोना- "जामाता । तुम्हारा स्थान प्रब यही है। अब तो तुम्हे ही या राजा बनना है। मेरे गोई पुत्र नहीं । प्रब तुम्ही मेरे पुत्र सो और तुम्ही मेरे जामाता हो।" - -
४२ / फूल और पाषाण
पुण्यपाल
को कनकमजरी की याद मा गई। उमने विवाह
पिण्ड छुड़ाने के लिए कहा-
'राजन् ! मेरे स्वामी ही प्रापके जामाता बनने के योग है
रत्नपुर के युवा श्रेष्ठी पुष्पदत्त मेरे स्वामी हैं। मैं तो उनका तुम
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सेवक हूँ।"
।
"सेवक स्वामी भी बन जाता है।" राजा बोला-"अब तु
सौभाग्यमजरी के स्वामी हो। उमका विवाह तो तभी हो गया |
जब तुम ताम्रपन पट रहे थे। मुझे कुछ मन बतायो। न मैं तुम्हा
वंश जानना चाहता है प्रोर न कुन्न । बम अपना नाम बता दो।"
"इम नगध को पुण्यपाल कहते है।"
पुष्पपाल की जय-जयकार होने लगी। उसे लेकर राजा पर
गुदै तालाब पर गया। ययानिर्देश गुदाई की गयी तो रत्नों में भी
चार लग निकले । राजा ने मबो मामने कहा-
"भायो । ताम्रपत्र मे लिगा है कि मेरा धन युगों बाद कि
पुण्यात्मा को मिलेगा । सो पुण्यात्मा तो पुण्यपाल ही है । यह ।
मुझे नहीं, उन्ही को मिला है । इनके ग्राने में पहले तो तामपन में
लिए मान एक धातु का टुकड़ा था। प्रत यह धन में कंगे
माता हैं ? उनकी चीज इन्ही को मिलनी चाहिए।"
'बिना अधिकार के में भी मे लूंगा पुण्यपाल
ने गहा-
"पापी धरती मे निकला है, इसलिए यह धन प्रापना ही हम
धरती का नामी गजा होना है।"
नानाग पर परी भीर में पुष्पदत्त भी था । उसने पुत
गाय दवामा प्रोर धीरे-रहा-
"पताल । तुम मूगों में भी गर्व हो। प्राय धन को
दरगाहो? बीमार र गो। प्राधा-प्राधा बांट लेंगे।"
फूल और पापाण / ४३ पुण्यपाल ने मन-ही-मन पुष्पदत्त की वणिक वृत्ति को धिक्कारा पोर उसमे कुछ न कह राजा मे ही पुन कहा- 'राजन् । इस धन का एक और विकल्प है। यह तालाव प्रजा के निमित्त था । अत यह धन प्रजा का हो गया। तालाव बनने के बाद जो बचे, मो प्रजा मे बँटवा दो ।' मभी ने एक स्वर मे पुण्यपाल की बात को स्वीकार किया । बजा की धरोहर के रूप मे फिलहाल चारो कलश राजकोप मे रखवा दिये गये । मरोवर की खुदाई का काम पुन चालू हो गया और उस परोवर का नाम 'पुण्य-सर' रख दिया गया । अव मौभाग्यमजरी के विवाह की तैयारियां शुरू हो गई । गुभ मुहतं निकाला गया । विधि-विधान से रति-सी रूपसी सौभाग्य- जरी के साथ पुण्यपाल का विवाह सम्पन्न हो गया। पुण्यपाल अव राज-जामाता था। पत्नी के माथ वह श्रानन्द में रहने लगा। उगने पुष्पदत्त के सभी व्यापारिक कर माफ करा दिये थे। पुप्पदत्त अपना मव माल बेच दिया और श्रीपुर का माल खरीदकर नातो महाज भर लिये तो पुण्यपाल मे कहा- "पुण्यपान ! तुम राज-जामाता बन गये तो क्या अपने तिंव्य को भी भूल गये ? तुम मेरे नाथ नयो ग्राये धे, यह तो याद ही होगा ?" "मय कुछ याद है ।" पुण्यपाल बोला-"राज-जामाता पया, राजा होकार भी मैं तुम्हारा मेवक हैं। आज मैं जो बना है तुम्हारे रण बना हूँ।" "नेनिन मै तो कुछ नहीं बना।" पुप्पदत्त ने पुरे हुए रयर में ला- 'रत्नपुर लौटने तक तुम्हें मेरा नाप देना है। नीलिए मैं हुने साप लाया था।" -
४४ / फूल और पाषाण
.
"जहां-जहां तुम जापोगे में तुम्हारे साथ रहूँगा। तुर
मकुशल रलपुर पहुंचाकर ही मैं अपना कोई काम करूंगा।
पुष्पदत्त को प्राश्वासन दे, पुणपाल ने राजा शूरमेन
प्रस्थान की अनुमति मांग ली। पत्नी मौभाग्यमजरी को भी मम
दिया। उसे पिता के पाम घोड पुग्णपाल ने
पुष्पदत्त
के साथ प्रा
प्रस्थान किया। सातो
जहाज किमी द्वीप की मोर बढ रहे थे। श्री
मे पुष्पदत्त ने काफी लाभ कमाया था । गलपुर लौटने तक पहर
देशो से लाभ कमाना चाहता था ।
पुरपदत्त के जहाज एग पनजाने देश के नगर सोपारपुर पर
गये । जहाज के लगर दानते हए पुष्परत ने पुष्पपान से कहा-
"जाना तो मिहनद्वीप था, जो कि रलो को ग्राने है
लेकिन भाग्य जाने विमनगर मेले माया।"
"भाग मार देगा तो यहाँ भो गय उपार्जन होगा।
पुण्यपाल ने कहा-"यहां के बाद गिदलीप ही लेंगे।"
मगरह बानीन करते हुए ममुद्र तट पर ही पुष्पदरा
तम्बु लगवा दिये। गाल अनी जहानी में ही भरा था । यो
मण्टो-नाजार के हाल-चाल देगार हो माग उतरवाने का निशा
L
था।
समुद्रतट पर बसा सोपारपुर ठगो का नगर था । इम नगर में कोई व्यापारी पाता नही था, क्योकि यहां के ठगो की चर्चा दूर- र नगा फैल चुगी थी। फिर भी भाग्य का मारा भूला-बिसरा कोई व्यापारी प्रा भी जाता तो यहां के लोग बडे चातुर्य प्रोर बुद्धिनौशल में व्यापारी का धन हडप लेते थे। पुप्पदत्त भी भाग्य का मारा ठगो कनगर सोपारपुर मे प्रा लगा था। सोपारपुर की प्रजा ही ठग नही थी, राजा पोर अधिकारी भी धृतं तपा ठग धे । वप्रगति यहाँ का राजा पा । पाणा यहाँ या पुरोहित था और माया मे प्रवीण कुबुद्धि नाग का कोषाध्यक्ष था। नर यहाँ का अधिकारी था । ऐसे लोगो के नगर में ममुद्रतट पर युप्पदत्त के सातो जहाज लगे थे । सवेरा हुप्रा । पुप्पदत्त पुण्यपाल के माय बैठा बाते मार रहा कि तभी पूर नामक रक्षक कुरा मैनिको के माप माया पोर पाने ही बोला-- "न जहाजो का स्वामी कौन है ?" "पाहिए, नया प्राज्ञा है ?" पुष्पदत्त ने विनम्रता से कहा- "ये सातो जहान मेरे है।" "हमारे नगर गा नियम सुन लो।" नगररक्षण करने पहा- 'जो भी व्यापारी यहां प्राता है, वह पहले राजा पा पट्ट हन्दी ४६ / फूल और पापाण m4 तोनता है, तब नगर में नर-विक्रार पाता है। प्रत तुमको पहले हायी तोलना पडेगा। यदि नहीं तोलोगे तो तुम्हारे मातो जतार बीन लिये जायेगे । हावी तोलना जरूरी ही नहीं अनिवार्य । क्योकि ऐमा न करने पर नगर की देवी हम पर रुप्ट हो जाती है।' इतना कह नगर-रक्षक पागे वह गया । अव तो पुष्पदन में हवाश्यां उठने लगी : उसने पुण्यपान ने कहा-- "अब का होगा? यह दुष्ट हायी लार पुन सायेगा ।हार्य नो में पया तो पाऊँगा, लगता है सानो जहाज देने पडेगे।" "तुम निन्ता मत करो।" पुण्यपाल ने कहा-"हम राजा ने पास जागर नहेगे कि यह कमा अधेर , frr तो प्रगम्भव पा कराये गर न करने पर अपना मात दे।" पुप्पदत्त तुच गाहना कि सभी काणा पुरोहित पा गया। उसने अपने जागूनो मे पुपपत्त का नाम-धाम पहले ही मालूम कर लिया या, गो यानेही हा "पदन । तुम यूब पाये । तुम न पाते तो मुझे तुम्हारे नगर रनपुर जाना पटना । अयानी दग रगार स्वर्णमुद्राएं मुझसे ले गो।" "मेरी मुद्राएं।" पुरन ने माराय ने कहा-"पहर पाश्चयं गो पर ग्राा मुझे जानते है । दूसरा यह कि दस हजार गणं मुद्रा मा मुझे हिम यानी देना चाहते है। र देना पड़ता है भंगा !" काणा पुरोहित योगा- "शिलीमा मार मगे तो नर मिलता है और फिर दूर -मदेना भी "}}क गार में तुम्हारे नगर रत्नपुर गा। मु पी, गो तुम्हारे पिता मे दग हमार मुद्रा में शान, भगंदर नाप र तुम्हाग र गुर" । Ama फूल और पाषाण / ४७ -- ना । - "पुष्पदत्त । तुम्हारे पिता ने मेरी मजबूरी का खूब फायदा उठाया । मेरी अांख गिरवी रखकर मुझे ऋण दिया । अब मेरी माप वापस कर दो और अपना ऋण ले लो। वरना मैं तुम्हारी मांग लिये विना नही रहूँगा । मैं अभी आता हूँ । अषि रख लेना।" यह कह काणा पुरोहित चलता बना । अब तो पुरपदत्त का हिग फर पड गया । करे तो क्या करे ? हाथी न तुले तो भी धन गया । प्राण कहाँ से दूंगा । यह दुष्ट भी जाने क्या लेगा। यो पदत्त को चिंतित देख पुण्यपाल ने कहा- "सेटजी । चलो राजा के पास चलते है। इन ठगो से राजा मुक्त करा सकता है।" पुण्यपान और पुप्पदत्त राज दरवार की प्रोर चले ही थे कि तने मे ही एका ठग प्रौर पा गया । वह सोपारपुर का ही कोई पापारी था । पाते ही उसने कहा- "अरे भाइयो | मैं तुम्हारे ही हित की बात कहने प्राया । यह नगर ठगो का नगर है । जब तक तुम्हारे पास माल रहेगा, ग प्राते ही रहेगे । यहाँ का राजा भी उन्ही का समर्थन करेगा।" "तुम भले प्रादमी लगते हो।" पुष्पदत्त बोला-"दो ठग तो मारे पास प्रा चुके है । इनसे बचने का कुछ उपाय बतायो।" "गुड होगा तो मक्खियाँ पायेगी ही।" कपट नामक व्यापारी पहा--"तुम अपने माल का मोदा फर लो । मातो जहाजो का ाल मुझे विनियम मे दे दो। यानी मैं माल के बदले माल दे । म । "मात मग दोगे।" यह प्रश्न पुण्यपाल ने किया--"काय दोगे ाल और बगा दोगे ?" पारी बोला-- ४६ / फूस और पापान - "जब जाने लगो तब ले लेना । माल तुम जो चाहो लेना। लेकिन माल हम वही देगे, जो हमारे पास होगा।" "ठीक है।" पुष्पदत्त बोला--"हमे गोदा मजूर है।' "तो फिर माल मेरा हुमा ।" कपट व्यापारी ने कहा- मेवक भेजता है, वे माल ले जाएंगे।" पनी बीन काणा पुरोहित पोर कूर नामक नगर-रक्षा एक माय प्राये । कर हाथी तोलने की बात कहने लगा और अपनी मांग के लिए ऊधम मचाने लगा । पुण्यपाल ने बी. कहा- "माप सब लोग राजा के पास चले । राजा हो हमारा करेगा।" काणा पुरोहित और दूर नगर-रक्षकदोनो हो गह कि राजा पाम चलं । क्योकि ये जानते थे कि सदानी: राजा हमारे पक्ष में ही निर्णय गरेगा। प्रत काणा पुरोहित नगर-राक, कपट मापारी, पुष्पान और पुष्पदरा पाँचो । प्रतिवादी मोपारपुर के रागा वगति है राज दरबार में प मयने मानी-पानी बात कही । राजा ने गवकी बात ध्यान से पोर पुष्परत गे परा-- ": श्रेठी मी तुमपाना हमारी शिवणता है। यदि हाथी नही होत गरे तो नगर की देवी मेरे नगर को भरम परदे मामाने नगर को बचाने के लिए मैं हाथी न तोलने वा मग मा ले लेना। पर वो पुसमन- हम प्राप"हादी नोलगे। प्राप दावी 4 । - "redit:
फूल और पापाण | ४९ - राजा चकराया। बोला- - १० । "पर पहले इस पुरोहित को आँख तो दे दो। इस हाथ अपना ऋण लो और उस हाथ इसकी आँख दो।" "यह काना झूठ बोलता है।" पुष्पदत्त ने क्रोध में कहा- "मेरे पिताजी इतने क्रूर नहीं हैं कि आँख गिरवी रखकर ऋण दें।" "प्राय वाली बात सही है।" पुण्यपाल बोला-"हमारे सेठ पुष्पदत्त को पूरी जानकारी नही है । मैं इनके पिता का पुराना । इनके पिता से गिरवी रखकर ऋण देते है।" "यह तुम क्या कहते हो पुष्पदत्त को कडी नजरो से घूरा-"तुम मेरे सेवक हो या दुश्मन तुम भी झूठ बोलते हो।" पुण्यपाल ने पुप्पदत्त का हाय मसक दिया, यानी चुप रहो, कुछ मत बोलो । इधर काना तो पुण्यपाल के पैरो मे गिर पड़ा और सिवका ?" ने पुण्यपाल ? 'बोला- न - *វត្ថុតិ "तुम देवता हो । मेरी आंख मुझे वापस करा दो । गिरवी की वस्तु न लूं तो मेरे कुल को वट्टा लग जाएगा कि एक प्राय भी 'न छुड़ा सका।" "प्रापफी आँप मिलेगी।" पुण्यपाल ने काणे से कहा- राजा से पूरी बात कह लेने दो।" "हो तो राजन् पुण्यपात ने वनगति राजा से कहा "राजन् ! पुष्पदत्त के पिताजी श्रीदत्त रत्नपुर में इस बात के लिए बहुत प्रसिद्ध है कि वे बाहर से आये व्यापारियो को कुच-न पुध गिरवी रखकर मरण देते है। किसी की पगडी रखकर अप देते है तो किसी की भूध का बाल रखकर प्रण देते है । ग्रांचे भी उन्होंने बहलो को गिरवी रखी है। मुझे तो पता पा कि प्राय वाले अपनी-अपनी " ५०, फूल और पाषाण । ! " प्रांग नांगगे । गिरवी रवी चीज तो प्राबरू होती है। लोग स बेचफर भी मूंछ का बाल छुड़ाते है। 'तो राजन् ! हमारा भी तो यह तंग है कि किनी वस्तु गडबड न हो. अर्थात् किमी की चीज किती प्रोर पर न न नाए । मेरे पास जो गांधो की मंजूषा है उसमे इन पुरोहितनी भी प्राय है तथा मोरो की भी प्रायें है। प्रत' मैं पहले इनकी र प्राव निकालंगा और उसके वरावर तोलार तथा मिनान कर इनकी प्राव घाटकर दूंगा। इतना ह पुण्यपात ने चमचमाती हुई कटार गिनी काना ऐमा भागा कि फिर मुड़कर नहीं देया । राजा भी ना गया किमान तो कोई गुरुमो का भी गुरु भाया है। माना नामक लापारी बोला- "राजन् ! इनका मान मुझे दिलाइये। बदले मे में यह मा. दूंगा, जो मेरे घर में है। मेरा इनसे मौदा तय हो चुका है।" "तुम्हारे पर मे क्या-क्या माल है ?” राजा ने आपा महा----"माल के नाम गिना दो, जो ये चाहेंगे बदले में ले अपना नाम तो इन्हें देना ही होगा।" राजा ने मोरा वा कि जाने की पार पडी नहीं । प्रा में मानी जहाजो का मान ले लूंगा नयोति कपट नामक मापारी गमा गति लामो प्रादमी था। राना के कहने पर र पिने घर माना नाम बनाये ।- मेरे घर में रेत, मिट्टी के ढेर लगे । गोपर मोर माग । उनी पाम के प्रम्बार भी पोरगा माले मागे जहान भरने और मा .." : नुमान तो सही है।" Irati i 11 ftif- - फूल और पाषाण | ५१ सातो जहाज । - "अपना माल इन्हे सांप दो सेठ ! न्यायदृष्टि से हमारे व्यापारी की बात सही है।" "न्यायदृष्टि से हम खाली करने को तैयार है। माल के बदले हम मच्छरो की हड्डियाँ लेंगे। अापके व्यापारी के यहाँ मच्छर भी तो है । मच्छरो का नाम इन्होने छिपाया था। माल अपनी इच्छा का लेगे, यह पहले तय हो चुका है।" अव तो कपट नामक व्यापारी वगलें झांकने लगा। इस बार भी पुण्यपाल की जीत हुई । अव हाथी तौलने की वारी थी। क्रूर नामक नगर-रक्षक सबके साथ हाथी लेकर समुद्र तट पर गया। हाथी नाव पर चढाया गया । जहाँ तक नाव पानी मे डूबी, वहाँ एक निशान लगा दिया गया। फिर हाथी नाव से उतारा तो नाव ऊपर उठ गई । अव पुण्यपाल ने नाव मे ककड-पत्थर भरवाये । जब 'निशान तक नाव पानी में डूब गई तो पत्थर भरना बन्द कर दिया। फिर नाव के सव ककड-पत्थर निकालकर पुण्यपाल ने तुला पर तौल दिये और हाथी का वजन बता दिया । पुण्यपाल के बुद्धि-चातुर्य से सभी दग थे । पुष्पदत्त तो जय- जयकार ही करने लगा। अन्त मे राजा वक्रगति ने पुण्यपाल से पहा- "हे भद्र । ठगी तो बुद्धि का खेल होता है । इसमे न चोरी है, न लूट । हो, बुद्धि का दुरुपयोग अवश्य होता है । बुद्धि के इस खेल मे तुम हमसे ऊपर रहे । प्रत. हन तुम्हारा अभिनन्दन करते हैं।" "मेरा अभिनन्दन तो तभी होगा, जब आप और आपके अधिकारी लोग ठगी वद करें।" पुण्यपाल बोला-"इस बुद्धि को परोपकार में लगाकर भी तो ग्राप लाभान्वित हो साते हैं।" "भव ऐसा ही होगा।" राजा वमति ने प्रतिज्ञा की-~- -- . 7
५२ / फूल और पापाग
है
।
-
माज से उगी नहीं होगी। तुम भी प्रागे जानो तो, जो-जो माता
मिले, नवसे कहते जाना कि अब सब सोपारपुर में प्रायें। प्रगत
माय ठगी का व्यवहार नहीं होगा।"
यह कह राजा बम्गति ने एक सहल स्वर्णमुद्राएं पुया
को दी। पुष्पदत्त ने अपना माल यहीं नहीं बेचा, क्योकि भार
तुए
थे । प्रत माल से भरे सातो जहाज लेकर पुष्पदत ने सोपार
से निहलद्वीप के लिए प्रस्थान किया। पुण्यपाल के पुण्यों से हो
पुप्परत मराल बच निाना था, परना ठगो ने तो उसे अपने
में पस हो लिया था।
7 । सिहलद्वीप के राजनगर का नाम मिहलपुर था। यहां के राजा धे मिहलसिंह । इस देश मे रत्नो का बाहुल्य था । यहाँ के हाथी भी बहुत प्रसिद्ध थे। रत्नो के लिए ही यहां व्यापारी आते थे, क्योकि उनके माल का विक्रय मी रत्नो मे होता था। लेकिन यहाँ तक पाना भी मौत से लडकर याना था। इसलिए भाग्यवान पोर मामी व्यापारी यहां तक या पाते थे । राजा सिंहलसिंह के राजकोप मे यो तो अपार रत्न ये । पर पाठ रत्ल उनके पास ऐसे दिव्य प्रभाव वाले थे, जो अत्यन्त दुर्लभ ५। ये रत्न राजा के पूर्वजो के थे । कमाल की बात यह थी, अभी नक इन रत्नो के गुण-प्रभाव की परख नहीं की गई पी । क्योकि राजा ने इसकी जरूरत ही नही समझी थी। एक दिन राजा मिहल- सिंह के मन मे विचार पाया कि अपने पूर्वजो के रत्नो की परय नाराकर यह तो जानूं कि किस रत्न मे क्या प्रभाव है । एक दिन राजा सिंहलसिंह ने अपने नगर के प्रसिद्ध रत्न- पारधी बुलाये । रत्नो की मजूपा उनके सामने रखकर कहा- "थे दुर्लभ रत्न मेरे प्रपितामह, यानी पितामह के भी पिता के युग की है। माज में यह जानना चाहता हूं कि किन रत्न में क्या पारपी परण करने में लग गये। पूरा दिन बीत गया, पर
५४ / फूल और पापाग
।
।
।
कोई निगा नहीं लिया जा सका । दुसरे दिन फिर परब दुई। र
पारविरो ने प्रापस ने विचार-विमर्श करके एक स्वर से रहा.
'राजन् । इनमें ये चार नकली है और ये नार प्रमो
रमने प्रधित हम नहीं जान पाये। मोति ऐसे दिन रत्न
पहली बार देने है।"
राजा उदास हो गया। उसने चार-चार रत्न दो मजपाम
लावाये और अपने मनो से कहा-
"मन तो मैं इन रत्नो के गुण जानकर ही रहंगा ।
नगर में घोषणा करा दो कि जो भी इन रत्नो
प्रमाा प्रमाण माहित बनायेगा, में अपनी बहिन तिन कमरो
निगाह उनके नाम कर दंगा।"
मश्री मिलार ने राजाज्ञा का पालन Pिा पोरा.
प्रामा रामशरणा मिटानपुर नगर में सा दी । भाग
मेला पुलामी मा नुमाया । उसो माथी श्रेष्ठी पुष्पा
मानहान गोषणा नोन दिन पहले ही मिहनपुर के पा
पर प्रार। उगारमा किराये गोदामो में भरा
माका ! पुरा से अनुमान ने पुष्पान नगर भ्रमण कर।
की और माने ना को उक्त घोषणा सुनी तो पटना
-
पटना TEETIT कर रा-बार प.!
गनीमार 1 पोरो या माग
kiism मागन ! II-गार रलीमनाएं Triure
HEETTE लोगो कार PAT
। चार रन मोर पर
11
--
फूल और पाषाण / ५५ सुनते ही राजा झल्ला पडा और बोला- "कभी पहले भी रत्न देखे है ? वस, रहने दो कर चुके परण! न "अरे भाई । जिन्हें तुम असली कह रहे हो, मेरे रत्न-पार- जियो ने इन्ही को नकली बतलाया है। जो वात अनेक रत्न-पारखियो एक स्वर मे कही, तुम उसी का उल्टा कह रहे हो?" "रत्नो का निर्णय बहुगत से नही होता राजन् पुण्यपाल बोला-"प्रमाण से होता है । बहुमत से ये जो चार रत्न असली बताये गये है, इसका प्रमाण क्या दिया आपके परखकर्तायो ने ? मैं कहता हूँ कि ये नकली है और मै तो प्रमाण भी दूंगा।" "अरे, तो तुम प्रमाण भी दोगे ।" अब तो राजा भौचक्का हो गया । शमिन्दा-सा होकर बोला- "मुझे क्षमा करना भद्र | तुम्ही - मेरी निराशा दूर कर सकते हो।" यम अव पुण्यपाल ने प्रमाण देना शुरू किया । उसने कहा- "राजन् ! चोट मारने पर असली रत्न उचटकर अलग जा गिरेगा और नकली चर-चूर हो जाएगा।" पुण्यपान ने करके दिखाया तो नफाली रत्न चूर्ण बन गया। भगती उचट कर दूर गिरा। दूसरे की परख हुई। नकली डूबकर पानी में बैठ गया और असली तरता रहा । अमली नकली का सही वर्गीकरण देख राजा ही नही, सारी सभा दग रह गई । अब उसने नकली रत्न फेंक दिये मोर असली रले । राजा ने कहा- "रत्न-पारपियो का भरोसा कर यदि में नकली मानगर भननी रलो को फे देता तो मेरे हाथ क्या रहता भद्र । भव इन चारो रत्नो के गुणादि भी बना दो।" 7
५६ / फूल और पापाग
।
"नाप गे नारो रत्न बहुत दिन है।" पुष्पपान ने 1-
"में एक-एक के गुण बताता हूं।
पुमपाल ने मन के कुछ दाने मंगवाये । ये दाने एक
पर विचर दिये तो कबूतर और प्रल पक्षी दाना गर्ने ।
पुगपाल ने एक रत्न दानो के बोन में रख दिया तो सरो:
दी गये और उरे-दरे से दानो को दुर से देखने लगे। दाना
का नाहत मिनी का नहीं हया। जन पुन. रल हटा दिया तो
पुनः दाना चुगने लगे । रत्न फिर रचा तो पक्षी फिर हद ग:
पह नमत्कार सभी बड़ी हैरत में देख रहे थे।
पुणपाल ने रत्न राजा को देकर महा-
"राजन् । इम रत्न को वर्चक रन्न कहते है। इसके र
मन का भण्मार मोर राजकोष कभी नहीं घटेगा, वलि पाता।
जाएगा। नी नरह अन्य तीनो का प्रभाव सुनिये ।
"राजन
इन दुगरे रत्न को पाम रखने से युद्ध मे तिमी
गत पार नही होगा । तीगरे रत्न का प्रभाव यह है
पास रहने में उसने बने में बना जा सपना है । गौशाल
निधारा रन है। गपं. च्च् प्रादि का कंगा ही frr हो, '
पानीमोर प्रारशियाशी पिता देतो वह त।
नारोमा । नती पर तो समय पर ही हो सकेगी।"
नगर गुण पोर प्राव राजा सिंहामिह में ।
iiiitri पुरानाग-नकार होने गगी । उगे मा
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3. TT.71मारे पर !
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-
फूल और पाषाण | ५७
न तिलकमनरी का विवाह वडी धूमधाम के साथ पुण्यपाल से कर
।
-
पुण्यपाल अपनी नवप्रिया तिलकमजरी के साथ सानन्द रहने
। एक भव्य भवन मे उमे आवास मिला । इधर पुष्पदत्त के
सी कर माफ हो गये । उसका माल भी खूब विका। राजा
हलसिंह उमका भी प्रादर-सम्मान करता था। सेठ पुष्पदत्त सध्या
'प्रायः राजा के साथ बैठा करता था।
पुण्यपाल के पलटते दिनो को देखकर पुष्पदत्त को जलन होने
गी। उसने सोचा, 'समय का मारा, फटेहाल और भोजन के लिए
* मुंहताज पुण्यपाल रत्नपुर मे मेरे पास आया था। भोजन की
वस्था मैंने की। वेतन पर रखा । मेरा वेतनभोगी सेवक क्या से
गया ? श्रीपुर के राजा शूरमेन की पुत्री सौभाग्यमजरी इसे
भी। यहाँ के राज्य का उत्तराधिकारी भी यह वन गया । यहाँ
कर सिंहलसिंह की वहिन तिलकम जरी भी इसे मिल गई । यहाँ
दहेज का धन और तिलकमजरी लेकर यह मेरे साथ जायेगा तो
इ मेरा मालिफ लगेगा और मुझे लोग इसका नौकर समझेगे तब ?
र मैं यही इसका पतन करूगा।'
ईर्ष्या क्या नही कराती ? ईर्ष्यालु अपने लाभ के लिए नही
ला, बल्कि दूसरे की हानि के लिए वलिदान हो जाता है ।
मदत्त ने भी पुण्यपाल को गिराने का निश्चय कर लिया ।
एका दिन की बात । राजा सिंहलसिंह के साथ पुष्पदत्त अकेला
आ था । होनहार की बात कि राजा ने ही पुण्यपाल की वात छेड़
। उसने
पूछा-
"हमारे बहनोई पुण्यपाल तो बहुत गुणी निकले । ये तुम्हारे
५व से नोकरी करते है। घर में कौन-कौन है, तुम्हे तो सब
'लूम होगा ?"
५८/ फूल और पापान
?"
पुणवत्त को
"
।
।
पर वानों का करा होगा राजन्
"पारको तो में काम है। पानी पीकर जातिल
ठीक होता है ? प्रा कुछ न पूछे, यही टी
तानापी
उत्तुरता बड़ी। उसने
कहा-
"नहीं-नहीं, मुझे सब कुछ बतानो।"
पुष्पदन की इच्चापति का वातावरण वा गा।
मनीरतापूर्वक ला-
मन्दर बहुत-मी गलाएं मौन रोता
रहीन हो जाता है ? नट बहुल-मी अनोपी मानी जा
तो माह पहन ऊना हो जाता है ?
"जब मापने गुचा तो रहना ही पडेगा । पुEE
में मेरे हो रहा है। बुद्धि का तेग , मो रनो को पररा .
गा। मेरे बहरतो ती कमी है। पर है नो जाति - ii
मोनाना-ना कापन में ही मर गये थे। मनाय नर
पिता ने मे नौकर रख लिया। गित या फिर भी का
"महाराज।
।
"हा-हार। म तो लुट गया।" गना ने माना।
पोटा-मानी नगी पहल नितमगे भने पना
फूल और पापाण / ५९
1 मच्ची भी है तो भी पुष्पदत्त यदि पुण्यपाल का हितैपी होता
गादापि नही बताता। अब में पूरी छान-बीन करूंगा।'
मत्री मनिमार अव पुण्यपान के पास उठने-बैठने लगा । वातो
बातो मे उसने पूछा-
"जागाता । अापके पिताजी को दिवगत हुए कितने दिन हो
/?"
"क्या कहते हो तुम ?" पुण्यपान कुछ कुद्ध होकर बोला-
रे माता-पिता-दोनो जीवित है । समय की बात है कि मैं
से दूर हूँ।
"ममिवर ! वत्सदेश में विराटनगर नामक एक नगर है।
के रागा है जितशत्रु । उन्ही के महामत्री सुवुद्धि मेरे पिताश्री
। माता है, कमलावती। लेकिन पापको यह मदेह कैसे हुआ
मेरे पिता
"अापके सेठ पुष्पदत्त ने ही विप-बीज बोया था।" मत्री
ला--"अच्छा हुअा वीज नही उग पाया । उसने अापको जाति
नाई बताया था और कहा था कि आपके माता-पिता बचपन
.
?"
.
ही. "
"अब मै उमी से सच उगलवाऊंगा।" पुण्यपाल मनी मतिनार
| लेकर पुष्पदत्त के पास गया और बोला-
"पुप्पदत्तजी | मेरे साथ चलो। राजा के सामने में आपके
से काटुगा । प्रापिर नाई हूँ तो नाई का काम भी फल ।"
पुष्पदत्त को ऐमी पाशा कदापि नहीं थी । वह घर-पर कांपने
गा। पुण्यपात के पैरो मे गिरकर क्षमा मांगने लगा । पुण्यपाल
"तुम मेरे नहीं, मेरे साले राजा सिंहलसिंह के अपराधी हो ।
त. चलकर उन्ही से क्षमा मांगो।"
६० / फूल और पाषाण डरता-सकुचाता पुष्पदत्त राजा के पास पहुँचा । सब हकीरः) मत्री मतिसार ने राजा को बता दी । पुष्पदत्त ने मौन होकर अपना अपराध स्वीकार किया। राजा को उल्टा पडते क्या देर थी। उसन आदेश दिया- "इस कृतघ्न का सब धन छीन लो और इसे प्राणदण्ड दिन जाय । ऐमे कृतघ्न व्यर्थ ही धरती का बोझ होते हैं।" "धरती अपना वोझ स्वय हल्का कर लेती है । कर्ता स्वय अपने कर्म का फल पाता है।" पुण्यपाल ने कहा-"राजन् । क्षमा कर दो। क्षमा ही वीरो का भूषण है।" राजा ने पुष्पदत्त को अभय कर दिया । पुण्यपाल की उदारत देखो, इतने पर भी वह पुप्पदत्त के माथ रत्नपुर तक जाने को तैया था । सब कुछ पाकर भी पुण्यपाल अपने को पुष्पदत्त का सेवक र समझता था । सेवक धर्म के नाते उसे पूरी समुद्री यात्रा तक पुप्पदन के साथ रहना था। सातो जहाजो को सामान से भरकर पुष्पदत्त ने सिंहलपुर चलने का विचार किया तो पुण्यपाल ने राजा सिंहलसिंह से सा. गाने की अनुमति मागी । तव राजा सिंहलसिंह ने समझाया- "भगिनीपति ! यह पुष्पदत्त तुम्हारा शत्रु है। इसने तुम्न अनाय और जाति का नाई बताया था। यद्यपि तुमने उसका अपरान क्षमा कर दिया है। फिर भी यह कृतघ्न और अनुदार है। र इसके साथ जाने का विचार सर्वाश मे त्याग दो। मार्ग में यह तुम धोना देगा।" "पाप कहते तो ठोग है।" पुण्यपात ने कहा-" वचन के कारण तो सब हितो का त्याग किया जाता है। मैं रत्ना में पुप्पदत्त के माथ मेवक बनकर चला था। प्रत रलपुर न उमना माय देना मेरा कर्तव्य है। - ६ फूल और पापाण / ६१ . "राजन् ! उपकार तो शत्रु का भी मानना चाहिये। मैं यहाँ तक पाया, इसका श्रेय पुष्पदत्त को ही है । अत' मुझे साथ जाने की अनुमति दीजिये।" राजा सिंहलसिंह ने विदा की तैयारियों की। सात जहाज हेग मे दिये । सातो में रत्न, मणि-मुक्ता, हाथी-घोड़े, सैनिक यादि परे थे । तिलकमजरी की सेवा के लिये दासियां भी दी। यथादिन दह जहाजो ने सिंहलपुर के बन्दरगाह से प्रस्थान किया। इनमे रात जहाज पुष्पदत्त के पोर सात ही पुण्यपाल के थे। चौदहो हाजो का रुख श्रीपुर नगर की ओर था। वहां पुण्यपाल की पत्नी भाग्यमजरी थी। पुण्यपाल उसे भी साथ लेकर रत्नपुर जाना राहता था।
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चौदहो जहाज श्रीपुर नगर के सागर-तट पर लगे । र
शूरसेन ने जाना कि मेरे जामाता पुण्यपाल आये है तो स्वागत
तैयारियां शुरू कर दी। सौभाग्यमजरी कदम्ब पुष्प की ।
रोमाचित हो उठी। बड़ी धूमधाम
से
तिलकमजरी और सौभाग्यमजरी सगी बहनो की तरह बड़े प्रे
पुण्यपाल का नगर-प्रवेश
मिली।
सौभाग्य मजरी ने कहा-
।"
--
।
"बहन तिलकमजरी । तो ये तुम्हें लेने गये थे ? वत
जाते तो क्या मैं रोक लेती ? पर ये पुरुष बहुत छिपाते
"छिपाया तो मुझ से भी था।" तिलकमजरी बोली-
ये मुझे लेने सिंहलपुर नहीं गये थे। मै तो रत्नो की परप के
इन्हे पा गई । पारखी बडे ऊँच है।"
सौभाग्यमजरी हँसने लगी। हंसते-हंसते बोली--"
ही नहीं, पढ़ने वाले भी एक ही हैं। मुझे तो ताम्रपत्र पड़ कर
गये।"
इसी तरह दोनो अपनी-अपनी कहनी लगी। इन दोनो
पत्नियो को पाकर भी पुण्यपाल का ध्यान कनकमजरी मे लगा
था। इसीनिये वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता या। इधर
गुरमेन ने एक दिन पुण्यपाल से कहा-
-
फूल और पापाण / ६३ "जामाता! अव में तुम्हारी एक नही मुनूंगा। मेरा क्या भरोसा, जाने कब दीक्षा ले लू । तुम यह राज्य सम्भालो।" मव ने राजा के प्रस्ताव को सराहा । पुरोहित ने तुरन्त राज- रोलका का मुहूर्त निकाल दिया । यथादिन पुण्यपाल का राज्याभिषेक गया। अब वह श्रीपुर का राजा बन गया। उसे राजा बना देय प्पदत्त के हृदय पर तो सांप ही लोट गया। वह हाय-हाय करके राथा पीटने लगा कि 'हाय । मेरा सेवक राजा बन गया और मैं उतना का उतना ही रहा। अब तो ऐसा पक्का उपाय करूंगा कि मका मब कुछ मेरा होगा।' पुण्यपाल राना तो बन गया, पर रत्नपुर जाने की जल्दी उसे it कारणो से थी। पहला कारण तो पुष्पदत्त के साथ वचनवद्धता का था और दूसरा कनकमजरी की सुधि लेना। दोनो पर विचार पर पुण्यपात ने एक दिन पूर्व राजा शूरसेन से अनुमति मांगी- "पूज्य कुछ दिन पाप राज्य और सम्भालें। मुझे पुप्पदत्त । साथ रलपुर अवश्य जाना है । फिर मैं लौटूंगा।" राजा शूरसेन राजी हो गया। उसने भी धन से भरे मात हाज दहेज में दिये । अव चौदह जहाज पुण्यपाल के ही थे। पुष्पदत्त निजी जहाज पुण्यपाल के निजी पहाज से लगा-सटा चल रहा । पुण्यपाल के निजी जहाज मे उसकी दोनो पत्नियां और दासियां दिन जहाज मे कूदकर पाया और । पुष्पदत्त एक पुण्यपाल के ma "मिर! रत्नपुर जापार तो तुम मुझसे अलग हो ही जायोगे । हो तो कुछ दिन साय चले। तुम मेरे जहाज मे नही आये तो मैं वप हो चला प्राया।" "यह तुमने बहुत मचा किया।" पुण्यपान ने सच्चा प्रेम हुए कहा-"आज मेरे साप ही भोजन करो। रत्नपुर में भी ६४ / फूल और पाषाण - मैं तुमसे अलग कैसे रह सकता हूँ? तुम्हारे सिवा वहां मेरा है ? वह नगर भी मेरे लिये परदेश है।" "मेरे घर को अपना ही समझना।" पुष्पदत्त बोला- छह हवेलिया है । एक हवेली मैं तुमको दे दूंगा।" इसी तरह दोनो मे प्रेम की बातें होती रही। लेकिन एक । का प्रेम सरल-सात्विक था तथा पुष्पदत्त का प्रेम नाटकीय और से भरा हुअा था। वातो ही बातो मे पुष्पदत्त की दृष्टि सौभाग्यम और तिलकमजरी के सौन्दर्य पर पड़ी तो वह मन्मथ की प्राः जलने लगा। भोजन तो किया, पर मन मे जहर घुलता रहा। पीकर जव पुष्पदत्त उठा तो कहने लगा- "पुण्यपाल ! कल दोपहर को तुम मेरे जहाज म भोजन कर मित्र का धर्म है कि मित्र के यहाँ खाये तो उसे खिलाए भी।" पुण्यपाल ने निमन्त्रण स्वीकार लिया। पुष्पदत्त मे चला गया। सौभाग्यमजरी ने रात को पुण्यपाल से कहा- "स्वामी । मुझे पुष्पदत्त की दृष्टि मे खोट दिखाई देता उसके जहाज मे हरगिज मत जाना।" "यह दुष्ट तो इनसे जला बैठा है।" तिलकमजरी ने सम किया--"हमारे यहाँ पुप्पदत्त ने इन्हे नाई बताया था। तब रु दाल नही गली तो अब कुछ दुष्टता अवश्य करेगा।" "स्त्री-स्वभाव बड़ा डरपोक होता है।" पुण्यपाल ने द पत्नियों से कहा-"तुम दोनो व्यर्थ डर रही हो । यदि तुम्हारे । प्रवरा है तो तुम्हारे सुहाग का बाल भी वांका नहीं होगा।" पत्नियो को समझाकर पुण्यपाल सोया। दोनो उसके चर नापते हुए बाद में मारें। सवेरा हुना और जय दोपहर के भो. का समन हुआ तो पुण्यपाल पुष्पदत्त के पास जाने लगा। दुतरी र अपने जह अतः तुम फूल और पापाण/६५ । पत्नियों ने उसे फिर रोका । पर पुण्यपाल नही माना । होनहार प्रबल होती है। दुष्टहृदय पुष्पदत्त ने पुण्यपाल को भोजन में नशीला पदार्थ कर खिलाया। खाते ही उसे शौच की प्रवल शका हुई । वह प्ये पर शौच के लिये बैठना ही चाहता था कि पुष्पदत्त ने धक्का दया । पुण्यपाल छपाक् मे सागर में गिरा और गुडुप्-गुडुप् डूबने ।। पुप्पदत्त छाती पीटकर रोने लगा और मित्र के शोक में [ भी कूदने को उद्यत हुआ कि उसके सेवको ने रोक लिया । इधर तिलकमजरी और सौभाग्यमजरी ने सुना तो उनके तो ही निकल गये । उनसे रोया भी नहीं गया। शोक की प्रति से मूच्छित हो गई। दासियो ने उन्हे शीतलोपचार से चैतन्य किया दोनो पछा. खाकर रोने लगी। वाल विखर गये । कपड़ो का होश नहीं रहा । वडा ही कारुणिक रुदन था। काफी रो लेने के व हो उनका शोक इतना कम हुग्रा कि कुछ सोच सके। दोनो के कुछ सामान्य होने पर पुष्पदत्त उसके पास पहुंचा र बोला- "जो होना था, सो हो चुका। अब तो आपको अपना जीवन ना है । मैं आपको सब तरह का सहारा दूंगा । पुण्यपाल का पान में फरूंगा।" "तुझे तो मैं चुटकियो मे उड़ा दूंगी।" तिलकमजरी सिंहनी- । गरज उठी-" दुष्ट | सिंहलपुर मे भी तूने अपनी नीचता पाई थी कि मेरे स्वामी को नाई वताया था। तूने ही मेरे सुहाग लूटा है।" "तना क्यो दहाडती है ?" पुष्पदत्त ने वेशर्मी की हँसी हंत- र यहा--- "मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ। लेकिन यह मेरी
६६ / फूल और पाषाण
भलमनसाहत है कि मैं
तुम
दोनो को सोचने विचारने का समय
रहा हूँ।"
इतना कह पुप्पदत्त अपने जहाज मे चला गया । उसके ६
मौभाग्यमजरी ने तिलकमजरी को समझाया
"वहन इस समय युक्ति से काम लेना चाहिये । पुष्प
नीच है । रत्नपुर तक हम इसके अनुक्ल रहे । वहां जाकर तो
ठीक हो जायगा। क्योकि नगर के लोगो के मामने हम र
नीचता प्रकट कर देगी।"
"मै ता इससे अव वात भी नही करना चाहती।" तिल
मंजरी ने कहा-"तुम जैसा ठीक समझो, स्थिति को संभाल लो
अगले दिन पुप्पदत्त पुन पुण्यपाल की पत्नियो के पास ग्राः
माभाग्यमजरी ने उनका स्वागत करते हुए मोठे बोल कहे-
“सेठजी ! आप वहन तिलकमजरी की वात का तुरा
मानना । पति के मरण का शोक जल्दी समाप्त नहीं हो जात
अन्ततः तो हमे ग्रापका ही सहारा लेना है। लेकिन पति का
भुलाने में समय तो लगेगा ही। प्रत आप हमे छह महीने
का समय दीजिये। इतनी अवधि तक हम धर्माराधन कर शा
प्राप्त करेंगी।"
पुष्पदत्त प्रसन्न हो गया । उसे लगा कि सौभाग्यमजरी सम
दार है । बात भी ठीक हे । पुण्यपाल को भुलाने का समय मुझे
ही चाहिये । अव पुष्पदन इन दोनो के पास नही जाता या । म
दामियो का ही भेज देता था।
जहाज चलते रहे। यथाममय इक्कीमो जहाज रत्नपुर
दरगाह पर पांच गो। पुष्पदत्त के सेवा सेठ श्रीदत्त को म्।
दे माय मि मापत पुष मात जहाज ले गया या प्रांर अब इस
फूल और पापाण / ६७ जहाज लेकर लोटा है । अब तो श्रीदत्त सेठ की खुशी का ठिकाना नही रहा । उसने अपने पुत्र के स्वागत की जोरदार तैयारियां की 'पोर इप्ट मित्रो सहित पुत्र को लेने सागरतट पर पहुँचा। पुष्पदत्त की माता भी गई थी। पुप्पदत्त माता-पिता के चरणो मे गिर पड़ा । दोनों ने ग्राशीर्वाद दिया। सभी लोग पुप्पदत्त की प्रशसा करने लगे कि यह तो बडा भाग्यशाली है। पहली वार में सात के बदले तीन गुने-~-इक्कीस' जहाज लेकर लौटा है। पुप्पदत्त भी अपनी प्रशसा पर फूला नहीं समा रहा था। पुष्पदत अपनी कां को एकान्त मे ले गया और बोला- "माँ ! तेरे लिये तो मैं कुछ विशेष लाया हूँ। तू सुनते ही उछल पडेगी और जब देखेगी तो तेरी खुशी का ठिकाना नही रहेगा।" 1.- फूलमाला सी . "तुझे देखकर ही मै बहुत खुश हूँ।" सेठानी ने कहा- "तुमसे अधिक मुझे और प्रियतर क्या होगा ?" "ऐसी वात नही हे मा ।" पुप्पदत्त वोला-"तू ही तो कहा करती थी कि पुष्प, मैं तेरे लिये वहू लाऊँगी। "माँ ! मैं तेरे लिए एक की जगह दो पुत्र-वधुएँ लाया हूँ। दोनो ही राजकन्याएँ है। एक श्रीपुर के राजा शूरसेन की बेटी सौभाग्गगजरी है और दूसरी का नाम तिलकमजरी हे, जो सिंहल- द्वीप के राजा सिंहलसिंह की वहन है।" "अरे सच ।" सेठानी सचमुच ही पुशी से उछल पडी- "तेने पहले क्यो नही बताया ? चल, मुझे बहुप्रो के पास ले चन । में पूरे नगर को भोज दूंगी।" पुष्पदत्त माता को लेकर जहाज मे गया तो देखा सोनाग्य- नपरी पोर तिलकमजरी-दोनो नायव धी। अब तो . --- - पुप्पदत्त फे ६८ / फूल और पापाण हाथो के तोते उड़ गये । उसका मुंह सूख गया। मां ने उनको घर- हट को देखा तो वह भी घबरा गई और पूछा-- "अरे, तू अपनी पत्नियो की भी रक्षा नही कर सका का - 7 गई वे?" कि मेरे नगर रत्नपुर "धोखा दे गई माँ" पुष्पदत्त बोला-"असल में वे प्राय देश छोड़ने के कारण बहुत दुःखी थी। तुम चिन्ता मत करो। उन्हे जल्दी हो खोज लाऊँगा।" पुप्पदत्त असली वात छिपा गया। सेठानी यह जानने के रिद विचारो की उधेड़-बुन मे उलझ गई कि आखिर वहुएं धोवा यो र गई। इधर सेठ श्रीदत्त के सेवक इक्कीसो जहाजो का माल घार करने में जुटे थे। पुप्पदत्त गाजे-बाजे के साथ अपने घर पहुंचा दूसरे दिन भेटादि लेकर वह राजा रत्नसेन की सभा में पहुंचा प्रीत अपने व्यापार की सफलता भी बताई । राजा रत्नसेन यह जानकर बहुत प्रसन्न हुआ मे पुप्पदत्त जैसे भाग्यशाने और पुरुषार्थी वणिकपुत्र भी ह । सौभाग्यमजरी पोर तिलकमजरी कहां गई ? जिस समर पुष्पदत्त अपने परिवारीजनो तथा इप्ट मित्रों से मिलने में लगाया उस समय भीड का लाभ उठाकर ये दोनो खिसक गई। भाग्य मयो से दोनो उमी उपाश्रय मे पहुँची, जहाँ कनकमगरी मौन-तप कर रही थी। इन दोनो ने भी अभिग्रह किया कि जब तक हमे हमार पति नहीं मिलेगा, तब तक मौन नही तोडेगी। उपायय-नेविका ने अगले दिन राजा रत्नसेन को सूचना दी- "अन्नदाता | दो सती रानियां और आ गई है। वे भी मान नेपर बैठ गई है।" "हाय ! मेरे राज्य का कल्याण कैसे होगा ?" राजा ने मन- ही-मन मोना, "जहां नीन-तीन मतियों कष्ट पा रही है।' M " फूल और पाषाण / ६९ गजा रत्नसेन रथारूढ होकर उपाश्रय गया। उसने तीनो से m- । "अाप अपना कप्ट मुझे बताये । मैं सर्वस्व दांव पर लगाकर भी प्रापका कप्ट दूर करूंगा।" कोई नही वोला । निराश होकर राजा रत्नसेन लौट पाया। पनिकमजरी, सौभाग्यमजरी और तिलकमजरी-तीनो एक ही वृक्ष पी लतायें थी। पर न तो कनकमजरी यह जानती थी कि ये दोनो मेरे सौभाग्य की साझीदार है और न ये दोनो ही जानती थी कि यह हमसे बडी हमारी ही वहन है। - --
के साथ हुआ
प्रवल पुण्य क्या नहीं कर देते ? पुण्य का प्रताप ऐसा होता है।
कि काला विषधर फूलो की माला बन जाता है। अग्निपुज को शीशल
होते भी देर नही तगती। अथाह सागर मे से बच निकलना असभवः
सा लगता है, पर धर्म के प्रभाव से असभव भी सभव होता है।
ऐमा ही पुण्यपाल
और वह सुरक्षित बच गया।
जिस समय पुण्यपाल
को
पुप्पदत्त ने समुद्र
मे धकेला था, वह इन
गया । पहली बार उछला तो उसने नवकार मन का स्मरण किया
इस स्मरण मे कैसा तीव समर्पण रहा होगा, इसकी कल्पना ही की
जा सकती है। परिणाम यह हुमा कि एक बार का उछला हुमा पुष्प
पाल पुन: नहीं इवा, उसे एक मगर ने अपनी पीठ पर से लिया
या। वह मगर लहरो से टकराता हुआ किनारे की ओर दौडा पौर
पुण्यपाल को किनारे छोड पुन समुद्र में पैठ गया ।
यकावट के कारण पुण्यपाल की देह चूर-चूर हो गई थी
उसके पपरे मुने तो मभी कपड़ो मे नमक भरा था । समुद्र का पार
पानी मय गया और नमक रह गया । पुण्यपात ने नमक झाड़ा और
गरोपरी तताश करने लगा।
ममुद्रतटवर्ती बन मे पुषपाल को एक वरमाती मरोर नि'
गया । पानी बहन निमंन था । उममे हिरन पानी पी रहे थे। पुष
पान एर पेट की नई में बैठ गया, ताकि उसे देखकर हिरन नागर
.
फूल और पापाण / ७१ जाये। जब हिरन पानी पीकर कुलांच भरकर भाग गए तो पुण्य- पाल ने कपडे धोकर सूखने डाल दिये और खुद ने म्नान किया। योडी ही देर में कपड़े मूख गये । अब वह भविष्य के बारे में विचार करने नगा. ma- । । 'रत्नपुर के मार्ग का कुछ ठिकाना नहीं है । जहाँ में लगा है. इस ओर कही से कोई जहाज पाने की मभावना भी नहीं है । पुप्प- दत्त ने बहुत बड़ा धोखा दिया । अव किधर जाऊ?' पुण्यपाल वन मे ही घूमने लगा। उसे एक वन-पथ मिल गया। उमी पर पड गया पुण्यपाल । महीने भर की लम्बी यात्रा के बाद पुण्यपाल एक नगर मे पहुँचा। नगर के प्रवेश द्वार पर ही मगल- पुर का नामपट्ट लगा था। इसमे पुण्यपान इतना तो ममझ गया कि इम नगर का नाम मगलपुर है। मगलपुर बहुत सुन्दर नगर था। उसकी बमावट वडे करीने की थी। सभी मकान पक्तिबद्ध बने थे । गलियां चीटी और म्फटिक की बनी थी । राजमार्ग चौडे और छायादार वृक्षो वाले थे। बाग-बगीचे, मरोवर, हाट, चौराहे-मगलपुर का मभी कुछ सुन्दर था। लेकिन बडे -प्राश्चर्य की बात यह थी कि यह नगर सूना-सुनसान था । किसी व्यक्ति की पान तो अलग रही, कोई कुत्ता-बिल्ली भी नगर में दिखाई नहीं दिया। पुण्यपाल विचार करने लगा-'यहते है कि हजार मान में गार उजड जाता है। हजारो सालो मे नगर भी उजड जाता है । पिन उजडे हुए नगर के भवन तो वण्डहर होते है । यहाँ तो बात ही कुछ और है।' पुण्यपारा ने पुन सोचा---'यह नगर तो ऐसा लग रहा है कि दो-चार दिन के बीच ही सब यही एक साध भाग गये।'
७२ / फूल और पाषाण बात भी ऐसी ही थी। वस्त्र, घी, रत्न, ताम्बूल, मिठार आभूषण, किराना प्रादि की दुकानें खुली पड़ी थी। पर न कोई दुकानदार था और न कोई खरीदने वाला था। परी चूल्हो पर अधजली लकडियां पड़ी थी। बच्चो के पालने लटके में खाटो पर विस्तर विछे थे, मानो रात को कोई सोने मायेगा! लोगो के रहने के सभी लक्षण विद्यमान थे, पर रहने वाला को 4 नही था। - पुण्यपाल पूरा नगर घूम-घूमकर देखने लगा । ज्योज्यो । आगे बढता, उसका आश्चर्य भी बढ़ता जाता। अन्त मे पुण्यपा' राजमहल के मामने पहुंचा और निर्भय होकर सीढ़ियां चढ़ता गर तथा पाँचवी मजिल के भवन में पहुँच एक और आश्चर्य देखा। राजभवन के पांचवे खण्ड पर एक परम रूपवती कन्या के थी। कन्या ने पुण्यपाल को देखा और पुण्यपाल ने कन्या को देवा दोनो एक दूसरे को देखने मे खो गये। फिर जैसे कुछ होश प्राप हो, वह कन्या घबराकर बोली- "जल्दी भागो। चले जाओ यहाँ से । तुम्हारे प्राणो पर सर है।" "प्राणो पर सकट कहां नहीं है ? और मृत्यु के मुंह में से में लोग बन जाते है ।" पुण्यपाल बोला--"सुन्दरी ! जो व्यक्ति समु मे मे भी जीवित बच जाता है, उसका यह विश्वास और भी दृढ ? जायेगा कि पुष्प यदि रक्षक हो तो मारने वाला कोई नहीं । "सुन्दरी । मैं इस नगर की जनशून्यता का रहस्य जाने पिन नहीं जाऊँगा । यह भी जानना चाहूँगा कि इतने बड़े नगर में न योनी सो रहती हो।" गुन्दरी कुछ प्रारमस्त हो गई। पुण्यपाल को एक प्रामन पोती. ।
फूल और पाषाण | ७३ "इम पर बैठो। आपके आने से मानो मेरे प्राण ही आ गए। बह दुष्ट राक्षस एक प्रहर वाद या जायेगा तब तक मैं आपको प्रपनी रामकहानी सुना दूं। मैं भी मरूंगी तो अापके साथ ही महंगी। अव पाप आदि से अन्त सुनें ।" यह कह उक्त सुन्दरी पुण्यपाल को एक कहानी सुनाने लगी। x x x मगनपुर नगर मे शुभमति नामक राजा राज्य करता था। शोभना उमकी रानी का नाम था। रानी शोभना ने एक कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कुसुमथी रखा गया। राजा शुभपति प्रजावत्सल राजा तो था ही, धर्मनिष्ठ भी था। माधु-मन्तो की वह विशेष सेवा करता था । नगर के वाहर तपस्वियो का एक प्राश्रम था । वहां के प्राचार्य थे विश्वभूति, जो बहुत ही तपोनिष्ठ सन्त थे । अमरभूति नामक उनका एक शिष्य था । वह भी 'तपश्चर्यापूर्वक जीवन बिताता था । तापस अमरभूति महीने भर का कठिन उपवास करता था 'पोर महीने भर बाद किसी एक घर से भिक्षा लेकर पारणा करता पा। यदि प्रथम घर से भिक्षा नही मिलती थी तो फिर वह दूसरे पर से भिक्षा नही लेता था और पुन एक महीने का व्रत करने का 'निश्चय करता था। लेकिन कभी उसके जीवन मे ऐसा नहीं हुमा, जब उसे लगातार दो महीने का व्रत करना पडा हो । एक बार राजा शुभमति ने तापस अमरभूति से प्रार्थना की नि इस मास के अन्त मे आप मेरे घर से ही भिक्षा लें । तापस * ने स्वीकार किया । होनहार की बात कि जब अमरभूति पारणा के लिए भिक्षा लेने राजार गया तो राजा को उसके आने का ध्यान - ही नहीं रहा । तापस भिक्षा लिए 'नोटा और पुन एक महीना निश्चय ७४ / फूल और पाषाण राजा को अपनी भुल मालूम हो चुकी थी। वह दौड़ा-दौर आश्रम गया और अमरभूति के पैरो मे पडकर अपने अपराध क्षमा मांगी तथा प्रार्थना की कि इस बार भी मेरे यहां हो पधारें। दूसरी बार भी राजा से अनजाने में चूक हो गई । अब ने तापत के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा । वह अभिग्रह करके बैठा राजा से बदला लूंगा। उसने जान-बूझकर मुझे भूवा मारा है । उने यो क्रोध मे देख उसके गुरु विश्वभूति ने समझाया- "वत्स अमरभूति । कोध वड़ा घातक शत्रु है । सतो का शम्म क्षमा और उपशम है, क्रोध नहीं। राजा शुभमति के प्राचरन से तो तुम्हारे कर्मों की निर्जरा ही हो रही है। धर्म-परीक्षा के इस शुभ अवसर को मत छोड़ो। सन्त तो वही है, जो अपने प्राणमा के प्रति भी दयातु रहता है।" अमरभूति पर गुरु के वाक्यो का कोई प्रभाव नहीं हुमा उमने निदान शिया कि 'मेरे अब तक के तप का यही प्रभाव हो कि गै राजा शुगमति से अपना बदला ले मई।' ऐना निदान-निश्चय कर अमरभूति तापस ने प्राण त्यागे मोर मरकर असुर हना । इतना मुनाने के बाद सुन्दरी वाला ने पुण्य . से हा- । मगनपुर के राजा शुभपति की कन्या अनुगधी । है। पूर्वभय प्रमरभूति तापम ने इस भव में प्रमुर पना' मेरे ता-पिता को मार दिया । इम नगर के लोगो को बार गुमाया नो मब-ने-सब दरवर भाग गये। तभी से 43 अनमूत। "हे भद्र । मुझे उमने जीवित छोटा है, क्योकि मेरे मार विवाद नना चाहता है । लेकिन बल का प्रयोग नहीं करता।'' 4 - ।
फल और पापाग / ७५ सोचा है कि यहाँ अकेले रहते-रहते कमी तो मैं ऊब जाऊंगी और उसके ममक्ष ममर्पण कर दूंगी । "लेकिन मैंने भी कुछ मोचा है। मैंने सोचा है कि जब तक वह बल का प्रयोग नहीं करता, तव तक में जीवित रहूँगी ग्रोर जिम -दिन यह असुर बल का प्रयोग करेगा, जीभ गीचकर अपना प्राणन्त कर दूंगी।" "प्रव तुम चिन्ता मत करो ।" पुण्यपाल ने कुसुमची ने महा--"पापी कितना ही बलवान हो, वह अपने पाप से ही मरता है । पुण्यवनी को यमराज भी नहीं मार सकता। "कुसुमधी । असुर से में युद्ध करूंगा। यह युद्ध पाप-पुष्प का युद्ध होगा । यदि उसके पुण्य प्रवल हुए तो वह मुझे मार देगा पोर यदि मेरे हाय उमकी मौत होगी तो में उमे टिकाने लगा - दंगा।" m कुसुमश्री आश्वस्त हुई। उसने पुण्यपान को छिपा दिया। कुछ ही देर बाद असुर प्राया। पाते ही उसने कुमुमश्री से पता- "आज कोई मनुष्य यहाँ अवश्य दिपा है । मुझे मानुप-ध पा रही है।" "पाप नर-भक्षण करके प्राते है, इसलिए आपके रोम-रोम में मानुष-गध वसी रहती है । यहाँ तो एक में ही मानवी हूँ।" असुर ने फिर ज्यादा छान-बीन नहीं की। चुपचाप सो गया । । सबेरे उठा तो पुण्यपाल ने उसका सामना करके पहा- "तेरे सन्मुप में तेरा काल बनकर पाया है। अब मरने से - । तयार हो जा।" एतना सुनते ही असुर का मनोवल गिर गया । भीतर-री- भीतर यह कांप गया। उसने सोचा, यह कोई नुक से सवाया है।
७६ / फूल और पाषाण । असुर ने स्वर मे कहा- तभी तो चुनौती दे रहा है । पुण्यवान् के आगे सभी को हार । पडती है इतने मे ही पुण्यपाल ने एक धक्के मे असुर को गिरा और उसकी छाती पर चढकर चोटी पकड ली । असुर गिड़गिड़ा लगा। कुसुमश्री को ऐसी ग्राशा कदापि नही थी कि असुर इन जल्दी मात खा जाएगा। खुशामद के "मुझे गऊ जानकर छोड दो। मै वचन देता हूँ fr कहोगे, वही करूंगा।" पुण्यपाल ने असुर को छोड़ दिया और उसे समझाया- "पूर्व भव मे तुमने जो तप किया था उसी के कारण अमुर योनि को प्राप्त हुए, क्योति असुर भी एक प्रकार के देश हैं-निकृष्ट देव । यदि तुम उपशम का सहारा लेते तो बैंमा देव ही बनते। "हे असुर देव । धर्म-कर्म के अमिट प्रभाव की उपेक्षा करो। कुछ ऐमा कर्म करो कि पुन. मनुष्य बन जानो। त्यो मनुष्य ही शुभकर्म तथा धर्मपालन कर सकता है। अपनी भाषन मे तुम अब भी धर्म की शरण ले सकते हो। अब तक तुमने जो भी किया है, उससे अपना अगला जन्म ही विगाडा है।" "मापने मुझ मदान्ध की पांखें खोल दी है।" पर। रहा-"अब मेरे लिए क्या प्राना है ? मैं तो अब मदा प्रार अनुगामी बनकर रहूंगा।" पुण्याल ने प्राशा दो- "जो तुमने, विगाटा है, उसे अब तुम्ही बनायो प्रर्यान् : सनन्द नगर मंगलपुर को पुन प्राबाद कर दो।"
फूल और पापाण / ७७
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असुर ने नागरिको की ढूंढ-खोज शुरू कर दी । गुफा
फन्दरानो में जो छिपकर रहते थे, उन सब को असुर ने नगर मे
बमा दिया । पन्द्रह दिन मे पूरा नगर प्रावाद हो गया । पुराने
सभामद, मत्री प्रादि भी भा गये । सबने मिलकर पुण्यपाल को
मंगलपुर के राजसिंहामन पर बैठाया। अब पुण्यपाल मगलपुर का
राजा था।
कुसुमश्री ने एक दिन पुण्यपाल से कहा-
"पाप मुझे लेकर प्राचार्य विश्वभूति के पास चलिये । वे ही
मेरा दान प्रापको देंगे। पिता तो नहीं है, पर वे प्राचार्य मेरे पिता
से भी बडे, पितामह के समान है।"
पुण्यपाल को यह सुझाव अच्छा लगा । वह आचार्य विश्वभूति
के पास पहुँचा । प्राचार्य ने कहा-
"भद्र । जो काम में नहीं कर पाया, तुमने कर दिखाया ।
मसुर मुझे सब कुछ बता गया है। वैसे तो कुसुमधी तुम्हारी ही है,
पर तुम मर्यादा रख रहे हो, इसलिए इस बेटी का कन्यादान में ही
करूगा।"
पुण्यपाल के साथ कुसुमश्री का विवाह विधि-विधान से हो
गया। प्राचार्य विश्वभूति ने तीन दिव्य चीजे पुण्यपाल को देते हुए
--
"राजन् इन तीनो चीजो को लेकर मेरा भार हल्का करो।
में इन्हे पिसी सुपात्र
को ही देना चाहता था। जिसका सुनाम ही
पुग्यपाल हो, उससे बडा सुपात्र मुझे कोन मिलेगा ?
"राजन् पुण्यपाल | पहली चीज यह उडनखटोला है। यह
देवाधिष्ठित और दिव्य है । इस पर जितने जन बैठना चाहेगे, उतना
हो बड़ा इसका विस्तार हो जायगा। यह मन की गति से आकाश में
कता है। जहां आने की इच्छा करोगे, यह तुम्हे वही पहुँचा देगा।"
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७८ / फूल
और पापाण
"दूसरी चीज यह कंथा है। इसे प्रतिदिन झाड़ना । का
नित्य स्वर्णमुद्राएँ निकलेगी।
"तीसरी चीज यह माला है। इसे धारण करके जैसे हा
इच्छा करोगे, वैसा ही रूप तुम्हारा हो जायगा । जब इसे
लोगे तो
पुनः
निज रूप को प्राप्त कर लोगे।"
पुण्यपाल ने तीनो चीजे सम्मान के रूप स्वीकार को प्रा
चौथी पत्नी कुसुमश्री के साथ वह रथ में बैठकर नगर पाच
उसका जीवन कुसुमथी के साथ बडे आनन्द से बीतने लगा।
शासन मे मगलपुर की प्रजा वहुत सुखी थी।
तीन महीने यो ही बीत गये । एक दिन पुण्यपाल को कम
मजरी की याद सताने लगी। उसने सोचा, "मैने कनकमजरी
साथ बहुत अन्याय किया है। वह मेरी प्रथम जीवन-सगिनी है।'
रत्नपुर के साथ सरोवर पर अकेला छोडकर मैं पुष्पदत्त के सार
लिया था। वह जाने कहां भटकती होगी ?"
पुण्यपाल ने रत्नपुर जाने का निश्चय कर लिया और गुः
से कहा-
-
"प्रिये ! यह मगलपुर तुम्हारा पीहर भी है । प्रत यही
अकेले कुछ दिन रह सत्ती हो । मुझे कुछ दिन को अनुमति दो
एका जनरी काम करके लोट पाऊँगा।"
"ऐमा क्या जरूरी काम है, जिसे आप मेरे साथ नहीं
गारो ?" पुसुमधी ने म्हा---''स्वामी ! जब यह नगर निगम
यहाँ पक्षी भी पर नहीं मारता था, तब तो यहाँ मैं अकेली रही ।
प्रा प्राप बिना एक पल भी नहीं रह सर्वांगी। आप नहीं जा
में भी पाप नाव चलेगी।"
TAIT ने मुमत्रो को माय ले लिया। दोनो मा
फूल और पापाण / ७९ । 1 नसार बैठे पोर मन-ही-मन आदेश दिया कि हमे रत्नपुर के पास मरोवर पर पहुंचा दो। मन की गति से उडनखटोला उडा और उनी वो मरोवर पर उनरा जहाँ पुण्यपाल कनकमजरी को छोड गया था। सुमश्री के साथ पुण्यपाल कुछ देर सरोवर पर बैठा और उन क्षण की याद पी, जब वह यही कनकमजरी के साथ भी बैठा था। उसने एक रात सरोवर पर ही विताई । सवेरे उठकर कया झाडा तो शीशा टेर सारी स्वर्णमुद्राएँ बरस पडी । सवको समेटकर पुण्यपाल रक रत्नपुर नगर मे पहुँचा । धर्मशाला मे ठहरा और कुसुमश्री को वही से छोड पुण्यपाल एक मकान की खोज मे घूमने लगा । ढूंढ-खोज करके उसने एक मकान किराये पर ले लिया। अपना सभी सामान व्यावर विशेषकर पटोला और कथा उसमे रख दिया और फिर कुसुमश्री का को लेने चला । धर्मशाला पहुँचकर पुण्यपाल ने कुसुमश्री से कहा- "प्रिये । किराये पर एक बहुत अच्छा भवन ठीक कर पाया हूँ। कुछ दिन हम उसी भवन मे रहेगे।" "लेकिन आप इस नगर में रहना ही क्यो चाहते दुगुणधी ने पूछा-"मगलपुर से ऐसा मन क्यो उचट गया कि पही किराये के भवन मे रहेगे ?" पुण्यपाल ने अभी तक कनकमजरी का रहस्य नही बताया था, पत. उसने गोल-मोल वात कही- "प्रिये । इस रत्नपुर नगर से ही मेरे जीवन का नया अध्याय म शुरू हुआ था। ये सब बाते मैं तुम्हे फिर कभी बताऊँगा। फिलहाल तो पही नमझ लो कि इस नगर में कुछ दिन रहना चाहता हूं।" कुसुमधी उठकर चल दी। दोनो पैदत ही चले । कुछ ही दूर पहुंध ये कि भयभीत नागरिको की भीड हो-हल्ता करते ग्रा पहुंची। एसा मच रहा था-'वचना, भाइयो वचना । राजा का हाथी विगड पत्ता ?" कार ती
८० / फूल और पाषाण
गया है।' एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते लोग इधर-उधर भाग रहे थे
भीड़ के इस घेरे मे कुसुमश्री पुण्यपाल से बिछुड़ गई। दोन
दूसरे को खोजने लगे पर कोई किसी को नहीं पा सका। रला
बड़ा नगर था। यहां आकर पुण्यपाल ने अपनी चौथी पत्नी कुनुमा
को भी खो दिया । वह अकेला ही अपने किराये के भवन पर
गया और सिर पकड़कर बैठ गया ।
10 पति की खोज में कुसुमश्री गलियो मे भटकने लगी। उसके पति ने जो मकान किराये पर लिया था, यदि उसका पता होता तो वही पहुँच जाती । पर अव कहां जाए ? घूमती-फिरती, वह वहीं, उसी उपाश्रय में पहुंची, जहां कनकमजरी, सौभाग्यमजरी और तिलकमजरी मोन-तप कर रही थी। उनके साथ कुसुमधी भी मौन-तप करने बैठ गयी। 11 उपाश्रय की सेविका ने राजा रत्नसेन को पुन सवाद दिया- "अन्नदाता । कोई चौथी धर्माश्रिता नारी भी मौन तप करने पा बैठी है । यदि इन चारो सतियो का मौन नही टूटा तो अनर्थ हो जाएगा।" सुनते ही राजा चिन्ता मे पड़ गया। बड़ी देर के सोच-विचार के बाद राजा को एक युक्ति सूझी । उसने तत्काल घोषणा कर- - "मेरे नगर के उपाश्रय मे चार सतियां मौन-तप कर रही है। जो भी व्यक्ति इन चारो का मौन भग करेगा, मैं उसके साथ अपनी बेटी पुष्पवती का ब्याह कर दूंगा।" यह घोषणा रोज होने का आदेश था। पहले दिन की घोषणा पुपाल ने सुनी तो विचार पिया कि सभव है ये चारो मेरी ही पलियाँ हो । यह सोच पुण्यपाल ने रूप बदलने वाली माला को २/ फूल और पापाण । - धारण किया और योगी के वेश की कल्पना को तो तत्काल योगोक हो गया। पुण्यपाल के गोरे मुखमण्डल पर काली दाढ़ी बड़ी भान रही थी । गैरिक वस्त्र पग्निपुज से लगते थे। रुद्राक्ष की माग कमण्डल, दण्ड तया प्रशूल उसके हाथो मे शोभित थे। योगी पुणगान उपाश्रय की ओर चत दिया और वहां जाकर अपनी चारो पलिम को देखा तो हर्ष से फूला नही समाया। उसने सोचा, पर मैं कल दर चारो का मौन तोउँ गा पोर चमत्कारी उग से मिलूंगा। यह सो। पुण्यपान अपने भवन में पहुंच गया। दूसरे दिन राजा का पटह पुन. बजा। योगी वेश में पुणपात ने पटह का स्पर्श कर लिया। फिर तो नगर भर में शोर मन कि एक योगी ने पटह छुपा है । पटहवादक योगी को सम्मान माय राजा के पाम ले गये । राजा ने पूछा- "योगिराज। तुम मौन कैसे तोडोगे?" "पाप मेरे साय उपाश्रय चलिए।" योगी ने कहा- प्रापको मालूम हो जाएगा।" प्रम नो राजा रत्नसेन योगी को लेकर उपाश्रय पहुंगा । मा में मत्री प्रादि भी ये तथा नागरिको की भीड भी साय ग गईयो नारो नारियां मौन बैठी थी । योगीरूप पुण्यपात ने रामान रहा- । मेरी गरिक चादर पर इन चारो मौन । रहर मकिन है । जर में इमे पढूंगा तो चारो ही बोगी।" "लेकिन इन पर तो कुछ नहीं लिया ।" राजा रत्नसेन ।। प्रारवयं मे रहा-"एकदम कोरी-माफ नादर मे तुम क्या पड़ोगे ! "पो नो योग का चमत्कार है।" पुण्यपाल ने राना भा ETHIRI--"अपय निवावट को योगी ही पर मकते हैं।' "राजन फूल और पापाण / ८३ . - . सभी लोग योगीरूप पुण्यपाल के प्रभाव मे मा गये । पुण्य- पाल ने चादर फैलाई और झूठ-मूठ पढने का अभिनय करते हुए पाप-बीती सुनाना शुरू किया। राजा प्रादि यही समझ रहे थे कि - योगी जो कुछ कह रहा है, वह पढकर ही कह रहा है । पुण्यपाल ने कहना शुरू किया- "वत्स नामक एक देश है। वहाँ की राजधानी है- विराट- नगर । वहां का राजा है, जितशत्रु । जितशत्रु के मत्री का नाम 'मुबुद्धि है और मत्री सुबुद्धि की पत्नी का नाम कमलावती है। कमलावती ने एक पुत्र को जन्म दिया, उसका नाम पुण्यपाल रखा गया । जब पुण्यपाल वहत्तर कलामो मे दक्ष हो गया तो उसके पिता मुबुद्धि ने उसका विवाह कनकमजरी से कर दिया । "एक वार राजा जितशत्रु ने अपनी सभा मे यह अहकार प्रद- गित किया कि मेरे ही कारण लोग सुखी या दुखी है । पुण्यपाल ने इसका विरोध किया और कहा कि पापका दभ मिथ्या है। सभी - अपने पुण्यो से सुखी होते है । राजा पुण्यपाल की इस बात से चिढ गया और उसने पुण्यपाल को देश-निकाला दे दिया । पुण्यपाल अपनी - पत्नी कनकमजरी को लेकर विराटनगर से चल दिया । कालान्तर मे वह रत्नपुर के निकट एक जलाशय पर रुका । उसने अपनी पत्नी कनामजरी को जलाशय पर ही छोडा और उससे कहा कि मैं इन नगर में कुछ व्यवस्था करके पाता हूं। उसके बाद ।" "उसके बाद क्या हुआ ?" कनकमजरी बोल पडी- "मुझे अकेला छोडफर मेरे प्राणनाथ कहां चले गये।" कनकमजरी से कुछ न कह पुण्यपाल ने राजा रत्नसेन से । . न "देवा राजन् टूट गया। सबसे पहले इसी ने गौनयत लिया था । अब आगे की कहानी में कल पढूंगा।" एक का मौन ८४ / फूल और पाषाण try "शेष तीनो का संकट भी अभी मिटा दो।" राजा ने frre अनुरोध किया -"पाप तो करुणावतार हे। इन पर भी दया करो "में तो अधर मे ही रह गई।" कनकमंजरी ने भी योगों प्रार्थना की--"मेरा मौन तो टूट गया पर मेरे प्राणेखर तो नही मिले । मेरा अभिग्रह तो पति-मिलन तक मौन रहने तथा "तुम्हारी इच्छा शीघ्र पूर्ण होगी।" योगीरूप पुण्यपात पहा-"पागे की कथा भी सुनलो।" योगीरूप पुण्यपात ने पुन नादर पढना शुरू किया- "पुण्यपान रत्नपुर पाया । उमी समय श्रीदत्त के पुरा पुणः का पटह बज रहा था। उसे एक सहयात्री की जरूरत थी। मा. परीक्षा के उद्देश्य मे पुण्यपाल पुष्पदत्त के साथ हो लिया। पुणः मान जहाज लार ममुद्र-यात्रा कर रहा था । सातो जहाज कर 4 श्रीपुर नामक नगर में पहुंचा। वहाँ का राजा शुरसन एक मरो चुदवा रहा था । गुदाई मे उसे एक ऐसा ताम्रपर मिला, लिने नही पढ़ सका था। राजा शुरसेन ने घोषणा की कि जो को पद देगा, मैं उसके माय अपनी पुत्री मौभाग्यमगरी हामि र गा! पुण्यपान ने वह ताम्रपत्र पर दिया । उioriti राजकुमारी मौभाग्यनगरी के माय हो गया। मोभापम नारी पिता के पास छो3 पुणपाल पुप्पदत्त के साथ ग्रागे चन दिया।" प्रामौभाग्यमजरी बोली- कि या हुमा महाराज ? म हो मांभाग्यमारी। सनमार्ग ने मौभाग्यमारी को और देवा और मोमा माग ने नामकरी हो देवा। दोनों यह जानकारी पात! Finी नि को मिला है। योगी पुन मागे पदन - "पुमान नहलापुर पहुंचा। वहां उसने सिंह - 1 फूल और पापाण | ८५ महमिह के रत्नो को परीक्षा करके राजा की चिन्ना को मिटाया । गजा ने अपनी बहन तिलकमजरी का विवाह पुण्यपाल के माय कर दिया। "प्रागे की कथा में सक्षेप करके पढता हूँ। दोनो पत्नियो के पीहर मे पुण्यपाल को चौदह जहाज मिले थे। अपने चौदह जहाज और दोनो पत्नियो को लेकर पुण्यपाल पुप्पदत्त के साथ चला । पुप्पदत्त ने पुण्यपाल को मागर में धकेल दिया ।" "यह मव कहानी मेरे पति की ही है।" निलकमजरी बोली- "मेरा मा कहता है कि मेरे पति मागर मे से बच गये होगे । प्रव वे गहाँ है ? हे योगी। आप तो त्रिकालज्ञ है । आप सब जानते होगे।" - योगीरूप पुण्यपाल ग्रागे कहने लगा- "पुण्यवल मे पुण्यपाल बच गया। उगे ए मगर ने किनारे 'नगा दिया। वहां से चलकर पुण्यपाल मगलपुर नामक जनमुन्य नगर में पहुंचा। उस नगर में मात्र एक कन्या रहती थी। वह भी • राजकन्या कुसुमश्री । वह नगर एक अमुर ने उजाड दिया था। पुण्यपाल ने असुर को वश मे करके मगनपुर को पुन प्राचार किया पोर वहाँ का राजा बन गया । उसने कुसुमधी में विवाह को भर लिया । रानी कुमुमश्री के मार रहकर पुण्यपाल मगलपुर की प्रजा का पालन करने लगा।" "एक दिन पुण्यपाल को अपनी प्रथम पत्नी निकम जरी । । बहन याद आई । वह कुसुमधी को लेकर यहाँ रत्नपुर ने पापा । महाँ हामी से बचने के चार में कुसुमी और गुमपाल पापम में विड गये।" "भै हो कुसुमधी हूँ।" कुसुमधी बोली-":वि - -
२६ / फूल और पाषाण
अब तो आप हमारे पति को बता दो। हम चारो का सौभाग
"तुम्हारा पति इसी नगर में किराये का मकान लेकर
रहता है । कालान्तर मे वह स्वय ही तुम चारो से मिलेगा।"
"पुगियो । अव तुम मेरे साथ चलो।" राजा रत्नरोग
चारो नारियो से कहा-"अब तक मेरे एक पुमो पुष्पक्ती यो
आज से मैं पांच पुत्रियों का पिता हुमा ।"
इतना कह राजा ने योगी से कहा-
"योगीराज | मेरी पुत्री का क्या होगा? मेरी घोषणा तो
थी कि जो पुरुष इन चारो का मौन तोडेगा, उसी के साथ मे प्रा.
पुषी का विवाह करूंगा । लेकिन पाप तो गृहत्यागी योगी है, ।"
"तुम्हारी निन्ता भी दूर होगी।" योगी ने कहा--"इन TT
का पनि पुण्यपाल ही तुम्हारा जामता होगा।"
राजा प्राशा से भर गया। कनक, सौभाग्य, तिलक प्रो
हुसुम-चारो को उसने रय मे बैठाया और अपने भवन को
गया । चारो राजा के घर में बडे से
करने लगी। चारो पापम में बातें करती और अपनी-अपनी करी
मागे छोटी कुसुमधी बोली-
"हाग, पुष्प की धनिया होते है ! मुझे भी कभी नहीं बना
कि मेरी तीन बड़ी बहनें और भी है।"
"सबसे बड़ा मजाक तो यह रहा कि हम चारो पर
रसी पोरगरी को नहीं जान पाई।" तितकमनी बोगी-
"अर प्राय को उन पूब लडूंगी।"
"तुम गरको मोर ग में लाएंगी।" अनन्याही पनी
गारी पावती ने सहा-"हंगी कि मापने मेरी बहना की।
रहकर पति को प्रो
N
फूल और पाषाण | ८७
।
"दुप तो
दुष्ट पुष्पदत्त ने दिया है।" तिलक म्जरी बोली-
'एक दिन उसको भी दण्ड दिलाना है।'
"कोई किसी को दु ख या सुख नहीं देता।" कनकमजरी
गोली-"सब अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही सुख-दुख पाते है।"
इसी तरह पांची घुल-मिलकर रहती थी। राजा रत्नसेन
पपने गुप्तचरो और अन्वेषको से पुण्यपाल की खोज कराने मे लगा
पा। पर उसे सफलता नहीं मिली थी, क्योकि पुण्यपाल तरह-तरह
के वेश बदलकर नगर में रहता था। उसके पास रूप बदलने वाली
माला थी। पत्नियो की ओर से उसे किसी तरह की चिन्ता नही
पी। क्योकि सब सुख-सुविधा
के साथ राजमहल मे रहती थी।
पुण्यपाल अब किसी नाटकीय ढग से पुष्पदत्त की धूर्तता का पाठ उसे
पढाना चाहता था और इसी की योजना वह मन-ही-मन बनाया
।
फरता था।
रत्नपुर मे धनदत्त नाम का एक श्रेष्ठी रहता था। पर
उनकी पत्नी थी। श्रेष्ठी धनदत्त और सेठानी धनधी-दोनों।
धर्मनिष्ठ, माधुमेवक प्रौर उत्तम कोटि के श्रावक थे । नगर के येडि
जन धनदत्त के माधु-स्वभाव और धार्मिकता को मगहते थे।
दानगुरो में अग्रणी था और नगर के धनी सेठो में भी प्रग्रणी था।
धनदत्त पा व्यापार कई प्रकार का था। उसके पास पां।
सेती थी। मैकडो-हजारो सेतिहर मजदूर उमके मेतो मे नाम से
थे। हजारो मन अन्न, गन्ना, पौर कपाम उसके खेतो मे होती गो।
धनदत्त की प्राय का दूसरा साधन उसके पशु थे। उसके पास मं
केंट गेट-वकारिता थी। वह उनको ऊन का व्यापार भी करता था।
नीमरा काम वह लेन-देन का करता था। वह मापारियो ।
उनि व्याज पर ण भी देना था।
पनदत श्रेष्ठी के चार पुत्र थे। बड़ा राम या । दारा मा
या। गोगरे प्रौर नोये में नाम कमरा देवदत नौर मणिदत्त
मानो में यात प्रेम था। नारी का विवाह भी हो चाया
माकन मागे माता-पिता के माय मम्मिनित परिवार के सा
गा।
सागर मेठानी धनश्री का निधन हो गरा। धमा
Freोना। गनी के पिता उसे यह ममार मूना-गुना
7
।
फूल और पाषाण / ८९ मा व्यापार का मव काम उमने तीनो बडे पुत्रो पर छोड दिया । बोधा मणिदत्त अभी व्यापार-कुशल नहीं या । मवने फुरमत पा मेठ ग्रनदत्त का अधिकाश समय धर्म-ग्राराधना मे बीतता था। सेठ धनदत्त ने अपने पुत्रों के भविष्य पर विचार किया और नारी के लिये उमने चार भवन बनवाये। चारो एक ही नक्शे के बने थे। किमी मे एक खिडकी का भी अन्तर नहीं था। चारो मकान पूरे होने के डेढ़ महीने बाद ही धनदत्त ने पाट पकउ ली, यानी बीमार हो गया। एक दिन उसकी तबियत ज्यादा घवराई तो उसने अपने चारो पुत्रो को बुलाकर कहा- "पुत्रो । तुम्हारी माता तो छह माल पहले ही चली गई। मुझे भी उसके पास जाना है। तुम लोग चिन्ता मत करना, क्योकि मां-बाप मदा किसी के जीवित नहीं रहते । "पुत्रो ! जैसा प्रेम तुम नारा भाइयो में है, उन पर मै गवं करता है। लेकिन यह प्रेम प्राय स्त्रियों के द्वारा खण्डित हो जाता है। जैमा प्रेम तुम भाइयो मे है, वैमा ही तुम्हारी पत्नियो में भी रहे, यह जरूरी नही । प्रत तुम मेरी बात ध्यान से सुनो। "मेरे मरने के बाद जब तक प्रेम से निभे, चारो शामिल रहना । जब देवरानी-जिठानिने मे गनमुटाव होने लगे तो चारो पालग हो जाना । तुम चागे के लिये मैने एक-एक भवन बना दिया । तुम्हारा रहन-गहन बंटेगा, पर दिन तो नहीं पटेंगे। "पुयो । मैने अपने ममस्त धन को नी चार वरापर भागा में { काट दिया है । जव तुम अलग होना चाहो तो मेरी चाट पि में : स्पान को पोरना। इसमे चार सालस निलगे। हर बना पर मनन-अलग नाम युदा होगा। अपने-अपने नाम वाला। लेना।" इतना मह धनदत मौन हो गया । पोडी देर सारा पानी • -
९० / फूल और पापाण
उठो। रक्त की वमन हुई पोर वमन के माथ ही धनदत्त के
पनेरू उड़ गये । चारो भाई रोने लगे। चारो को पत्नियां भी हम
हाय करने लगी। पडोमी भी आ गये। सबने मिलकर धनात
अन्तिम संस्कार किया। चारो ने अपने पिता का मृत्यु-भोज ।
किया।
।
दो-तीन महीने तो चारो शामिल रहे। फिर चारो को मा
रहने की इच्छा हुई । बड़े राम ने सबसे कहा-
"भाइयो । मकान तो नाहे जब ले लेंगे। सबसे पहले पाने
अपने नाम के कलश ले लें।"
मय राजी हो गये । निर्देशित जगह चोदी गई। रोक
अपना-माना नाम पढकर हरेक ने लिये। सबसे पहले गम में
अपना कलश धोया। कलश मे भूसा और मिट्टी भरी पी। राम ।
तो अपना माया पीट लिया-
"हाय, यह फैसा मजाक किया पिताजी ने मुझे मुमा-मि,
दिया है। याम । तु अपना कलश पोलपर देव, तेरे कान
भु
श्याम ने अपना कलश पोला तो यह भी चोचना गया
उमो फलग में तो और भी बुरी चीज थी। पशुमो के दे :
मोर पंच के बाल भरे थे। अब तो कटपट देवदत ने भी
फलग घोला तो उसमें भी बेकार की चीजें थी। कुछ
दको ये प्रोर कुछ रेशम के टुकडे भरे थे। तीनो एक समान निर
और गो थे। पर मामी दृष्टि मनसे छोटे मणिदत्त के
पी। गिदन ने अपना जलश गोता तो मयकी प्राध को'
गई। उसने समुद्राएं और रत्न भरे थे। राम बोहा-
"ता ने जो पापान किया है उसे हम ठीक की। तो
माना दिमाको।"
..
फूल और पाषाण | ९१
।
"मैं तो एक कोड़ी भी नहीं दूंगा।" मणिदत्त वोला-"यह
तो अपना-अपना भाग्य है। मैंने अपने नाम का कलश लिया है,
तुममे से तो किसी का नहीं लिया ?"
"इसमे नाम की क्या बात है ?" श्याम बोला-"हम चारो
एक पिता की सन्तान हैं। पिता की सम्पत्ति पर चारो का समान
अधिकार है । अत: इस धन का बंटवारा तुम्हे करना ही होगा।"
"मैं प्राण दे दूंगा, पर अपने पालश की एक भी मुहर नही
दंगा।" मणिदत्त बोला-"अगर मेरे कलश मे कूडा-कचरा निकलता
और तुम्हारे मे मुहरें निकलती तो क्या तुम मुझे दे देते ?"
देवदत्त अव तक चुप था। वह
वोला-
"भाइयो | हम आपस मे क्यो लडें ? पिता ने मरते-मरते जो
झगड़ा पडा किया है, उसका निपटारा राजा रत्नसेन के न्यायाधि-
करण मे ही होगा।
सभी को देवदत्त का यह प्रस्ताव पसन्द पाया। चारो भाई
राजा रत्नसेन की राजसभा में पहुंचे और अपनी समस्या राजा के
सामने रखी। राजा ने मनी की पोर देखा और कहा-
"न्याय के दृष्टिकोण से तो मणिदत्त के धन का समान
बंटवारा करके चारो मे बांट देना चाहिये ।"
"यह तो अन्याय होगा।" मन्त्री ने कहा-"स्वर्गीय सेठ
धनपत्त का बंटवारा पहले सभी ने स्वीकार कर लिया था । सव के
कलशो पर अलग-अलग नाम भी सेठ द्वारा अफित मिला है। पिता
जिन को जो चाहे दे, चाहे न दे। इस व्यवस्था मे कोई पुत्र ऐतराज
नही कर सलता।"
"पैतृक सम्पत्ति का बटवारा तो न्यायदृष्टि से बरावर होता
। इसमे पिता को पक्षपात करने का अधिकार नहीं है।"
-
९२ / फूल और पाषाण
।
-
मन्त्री बोला-
"राजन् आपका दृष्टिकोण सर्वथा उचित है।
स्वर्गीय मेठ ने तो अपने निजी पुरुषार्थ से इतना बड़ा भार
किया था। अतः उसे यह अधिकार था कि किसी बेटे को म:
और किमी को अधिक दे। किसी को कुछ न दे, यह परिकार
उसे था । प्रत. राम, श्याम और देवदत्त को मणिदत्त के धन मे
नहीं करनी चाहिए।"
राजा ने तीनो बडे पुमोदी पोर देगा नो राम गोला-
"न्यायरक्षक । हमारे पिता यदि यह कहते कि मैं अपने हो।
बडे पुत्रो को कुछ नहीं दे रहा है और छोटे मणिदत हो ना
दे रहा हूँ तो हमे कोई ऐतराज नहीं था। हमारे पिता ने मरो गमः
पहा था. मैने अपने ममस्त धन का बरावर नंदवारा चार भा.
मे कर दिया है। चागे नारो मतान बिल्कुन एकामे है । म
भी चारो को बराबर रख दी है। लेकिन जब हमने अपने ।
पोते तो भूमा, पशुप्रो के मीग मोर भुजपा के टुकडे मिले।
तो घोटे को मिला है।"
"यह तो बड़े प्राश्चयं ही बात है।" मनी बोला- मेटा
दन प्रानी धामिाता के लिए प्रसिद्ध थे। वे विषकी भी थे।
मह मगाय और प्रधार्मिकना देवार नो मापनगं होता।"
मर कुछ सुनने बाद राना रनमेन ने निर्णय दिला..
"ष्टि-पुषो। तुम्हारे पिता ने हम मुकारण बेटा
माया नहीं करले । पान भी नहीं करनाले दे:
में ही TT हा है कि उन्होंने गुतापूर्ण Trifl
'यो-यो ! मग भारका पाद का
4. it if गार TTMM हैदमाम तुम तीन Hit ,
।
।
फूल और पाषाण / ९३ वादी हो। तुम्हारे स्वर्गीय पिता और छोटा भाई मणिदत्त प्रति- वादी है। "श्रेप्ठि-पुत्रो ! स्वर्गीय सेठ धनदत्त के प्रतिवाद को हम लोग अपनी बुद्धि से समझने का प्रयत्न करेगे। अत तुम्हारा वाद हम अपने न्यायाधिकरण में विचाराधीन रखते हैं। पाठ दिन बाद तुम अपना न्याय-निर्णय जानने प्रा जाना ।" इसके बाद सभा विसर्जित हो गई। X X x पुण्यपान की राजा रत्नसेन ने बहुत खोज कराई पर वह कही नहीं मिला । उससे योगी ने यह कहा था कि पुण्यपाल रत्नपुर में ही है, इसलिए राजा के गुप्तचर उसे नगर मे ढूंढा करते थे। लेकिन पुण्यपाल वेश-परिवर्तन करने के कारण राजा के गुप्तचरी को नहीं मिला। आपको योगी के कुछ दिनों से पुण्यपाल ने योगी का वेश भी त्याग दिया था। राजा ने अपनी मभा मे कहा- "मेरी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने वाला योगी भी जाने पहा चला गग ? वह भी कई दिन से दिखाई नहीं देता है ।" "बहते पानी और रमते जोगी का कोई ठिकाना नहीं होता।" यह बात एक युवा श्रेष्ठी ने कही-"महाराज । धरना पर विश्वास करना चाहिए।" "तुम कौन हो?" राजा ने युवा श्रेष्ठी में पहा -"पही तुम्ही तो पुण्यपाल नही हो।" "मेरा नाम धनराज है।" युवा श्रेप्टी ने महा-मैं एक गावाह हूँ। अपने मार्च से बिछुड जाने के कारण प्रापफे नगर में टहरा हूँ । सम्भव है मुझे ढूंढते मेरा सार्थ दमी नगर में या जाए।" धनराज नाम का युवा घेष्ठी पुण्यपाल हो पा । उसने एक ९४ / फूल और पापाण " व्यापारी का वेश बना लिया था और अब वह इसी रूप में रत्नसेन की सभा में पाया करता था। प्रतिथि-मापारि प्रासन-पक्ति में वह बैठा करता था। उसे माते-जाते चार-पांची हो गये थे। एक दिन राम, श्याम, देवदत्त और मणिदत्त का : पाया। राजा ने बड़े निराश-स्वर मे कहा- "मेरी सभा में आज तक कोई निराश नहीं लोटा । श्रेप्ठिपुत्रो का न्याय में नही कर सकता। प्रत. मुझे तो वही: लगता है कि जितना धन घोटे श्रेष्ठिपुर मणिदत्त को मिला। उतना ही में शेष तीनो पुयो को अपने यजाने से दे दूं।" "आविर समस्या क्या है ? युवा श्रेष्ठी धनरागणी पु..., पाल ने कहा-"निपटारा हर समस्या का हो सकता है।" राजा ने सम्पूर्ण वाद धनराज को समझा दिया । धन, के कारोबार का व्योरा देते हुए राजा ने धनराज से यह भी कहा। सेठ धनदत बहुत ही बुद्धिमान पोर धर्मात्मा था। मरते-मरा एक विचित्र विवाद पैदा कर गया है। धनराज ने सब बातो पर विचार कर राजा से "यह तो कोई समस्या नहीं है । साप पाता करें तो दिन का न्याय में कर मारता है।" "तुम न्याय कर सकते हो?" "किर हमारे न्यायाधिकरण की लान बन जाएगी। मन में नोनही पापा ।" 'मामा के कारण ही नो तिल का ना! पर TH TRIIT नारो योष्टि-पुता int II IIS (Til 7111111 + wwwary . महामात्य ने मामले . ५ फूल और पाषाण / ९५ धनराज ने सबसे बडे श्रेष्ठिपुत्र राम को चुनाया । पूटा- "नाम ?" "राम ॥ - "अपने पिता के सामने तुम उन्हें व्यापार में क्या महयोग देते पि?" धनराज ने कहा-" "जो कुछ वताना, मच-सच बताना।" गम बोला- "पिता का कृपि-व्यापार मे ही सम्भालता था। जिननी उपज होती थी, मव का क्रय-विक्रय में ही करता था। मुझ से छोटा भाई श्याम पशु-व्यापार को देखता था । व्यापार का मारा काम तो हम तीनो बड़े भाई ही सम्भालते थे। छोटा मणिदत्त तो कुछ भी नहीं करता था। फिर भी पिताजी उसे करोड़ो का नकद धन दे गये।" "फिर तो तुम यह भी जानते होगे कि सेती की उपज से कितनी प्रामदनी होती थी ?" धनराज ने राम से पूछा --"कृषि- व्यापार की पूरी जानकारी तो तुम्हे होगी हो।" "सेती से करोड की आमदनी होती थी।" राम बोला- "किमी वर्ष वर्षा न हो, तब कुछ घाटा पड़ता था।" 'फिर तो तुम मूखों के भी मूर्य हो।" धनराज ने कहा- "तुम्हारे पिता तो बहुत बुद्धिमान थे । तुम मूर्ख नही समझे तो इसमें पिता का क्या दोष ? मूर्य ही होरा को काच समझता है । "हे मूर्यराज । तुम्हारे क्लश मे भूसा-मिट्टी निकला, सफा म यह है कि तुम्हारे पिता कृषि-व्यापार तुम्हे सौप गये है । "तुम्हारा दूसरा भाई भी मूर्य है। उनके कला में पशुप्रो के टूटे नीग भोर पूंछ के बाल निकले है। इसका अर्थ है कि पशुधन नारे मोटे भाई श्याम को सोपा गया है । दूध को वित्री योर 31 निर्यात से भी करोड़ो की प्रामदनी होगी।" --
२६ / फूल और पापाण
राम-श्याम की तो वां विल गई। प्रव धनराजो देश
तीसरे धेप्ठिपुत्र को बुलाकर पूछा-
"तुम्हारे कलश मे क्या निकला?"
"भूर्जपत्र और रेशम के टुकडे ।" देवदत्त ने स्मत. नी र
"पिताजी के समय मे में ऋण-वसूली का कार्य सम्मानमा पा
मुनीम मेरे प्रधान कार्य करते थे।"
"अब तो
तुम भी नमझ गये होगे।" धनराजने १:
"यही-वाते रेशम पर लिये जाते है। चा हिसार भूक
लिया जाता है । अत तुम्हारे पिता ने तुम्हारी योगना रे
तुम्हे ऋण-वसूली का कारोबार दिया है।
"प्ठिपुयो । मणिदत्त तुम सबसे छोटा है । यह अभी :
में नासमझ है । इसलिए तुम्हारे पिता ने उसे नकद धन मणि-
रल पोर स्वर्गमुद्राएं दी है।
"तुम्हारे पिता ने गुन्दर बंटवारा तो किया हो, तुम्हारी
की परीक्षा भी नी नी।"
"शुद्धि परीक्षा तो हमारी भी हो गई।" राना
महा---'तुमने तो कमान ही कर दिया। इतनी दूरी
नहीं समझ पाया । मनमुन, तुमने हमारे न्यायाधिकरण की 1}}
" और हम तुम्ह पन्छित वर देना चाहते हैं।
मान लो । पछि नहीं मांगोगे तो हमे !"
शादियान देने की मांग लंगा।
- "मानी ही मागा।"
अमित न प्रान मी देखे।" महार:
.
फूल और पाषाण / ९७
-
"महा-"तुम मांग कर तो देखो । जो तुम मांगोगे, हम वही देंगे।"
धनराज ने मांगा-
"तो फिर मुझे अपना कराधिकारी बना दीजिए। मैं आपके
यहाँ के तया बाहर से पाये व्यापारियो से कर वसूल किया करूंगा।
कर मैं अपनी इच्छा से वसूल करू', यह अधिकार मुझे दीजिए।"
राजा ने अधिकार दे दिया और अपने नगर में पटह वजवा
दिया कि आज से श्रेष्ठी धनराज व्यापारियो से कर वसूल किया
करेंगे। इनकी प्राज्ञा का उल्लघन कोई नही कर सकता।
f धनराज को एक कार्यालय मिल गया और सहयोग के लिए
एछ कर्मचारी भी मिल गये ।
ज
.
,
12
निराज ने व्यापारियो की नामावली ली और उनसे
करना शुरू किया। यह सबसे प्राधा कर लेता था। इससे सभी ...
पारी गुश थे पोर धनराज की जय-जयकार की कोई
राधिकारी तो बहुत हो उदार प्रौर धर्मात्मा है।
धनराज गवसे रहता था शिव्यापारियो से उधार
निगा नो वे कर की गोरी नहीं करेंगे । फिर तो !'
र गे । गमका कोप मापारियों में ही भरना है। प्रा.
का तिंदकिपारियो को महगोग दे।
दिन धनराज श्रेष्ठी श्रीदत के गहा गया मोर'
हुनाका र नगा दिया। इस पर श्रीदत्त पापु lifi
or प्रोर बोना-.
4. पापात तुम क्यो हरने हो? गबगे प्राधा कर fra:
पोर मोना बाना चाहते हो।
फूल और पाषाण | ९९ । "भाइयो । जिसे तुम उदार कराधिकारी कहते. हो, वह मूर्ख है । ऐमें मूर्य का क्या भरोसा, जिसका कोई सिद्धान्त न हो । आज गने मुझे चोर-तस्कर कहा है, कल को तुमसे भी कह सकता है । दिह जहाजो का माल कर के रूप मे लेना चाहता है। वोलो, तुम या कहते हो?" एक व्यापारी बोला- "भाइयो । श्रेष्ठी श्रीदत्त हमारे नगर के प्रतिष्ठित श्रेष्ठियो हैं। नये कराधिकारी धनराज ने इनको चोर कहा है, यह सहन ही होगा । अतः हम राजा से दो शिकायतें करने इकट्ठे होकर लें। पहली शिकायत यह कि श्रीदत्त पर कर इतना अधिक क्यो गाया गया ? दूसरी यह कि इन्हे चोर क्यो कहा ? श्रीदत्त और पदत्त को चोर कहना समस्त व्यापारियो के गाल पर एक माचा है।" मभी व्यापारी इक्ट्ठे होकर राजसभा पहुंचे । धनराज वहाँ हले से ही था। सभी ने धनराज की ओर इगित करते हुए कहा- "अन्नदाता | जैसा अन्याय और सम-विषम व्यवहार आपके ये काराधिकारी धनराज ने किया है, उससे क्षुब्ध होकर हम सब आपारी प्रापका राज्य ही छोड देंगे। अतः आप इसे दण्डित जिए।" राजा ने धनराज से कहा- "यह तुमने क्या किया? मैंने तो तुम्हे बहुत चतुर समझा था। चन में बांधकर तुम मेरे राज्य को क्यो चौपट करना चाहते हो?" धनराज बोला- "यही दिन देखने-दिवाने के लिए मैंने आपमे यह अधिकार - ma "वीनाथ ! श्रेष्ठो श्रीदत जैसे है, वैसे है । पर इनका पुत्र १००/ फूल और पाषाभ पुप्पदत्त तो चोरो का चोर है । इसने पुण्यपाल को समुद्र में धोतार उसकं चौदह जहाज हथिया लिये है। इसके पास तो सात ही जहार . tha -- । -- 1 अव तो "यह झूठ बोलता है।" पुष्पदत्त ने कहा--"जोन पुण्यपान में किसी पुण्यपाल को नहीं जानता।" धनराज ने अपने कठ की रूप-परिवतिनी माता उतारी पोर. तुरन्त अपने असली रूप-पुण्यपाल के रूप में पा गया। पुण्यात को देव पुप्पदत थर-थर कापने लगा। अब पुण्यपात बोला-- "में ही पुण्यपाल हूं। पुष्पदत्त । क्या तुम मुझे नहीं पहचानते ? अव सब बातें अपने मुंह से कह दो । सच बोलने पर तुम जग मारे हो । मैंने तुम्हे सिंहलपुर में भी प्राणदण्ड से बचाया था। वरना में सिंहलपुर के राजा को यही ले आऊंगा।" पुष्पदत्त ने सब कुछ स्वीकार कर लिया। व्यापारी उमे धिक्कार देने लगे। श्रेष्ठी श्रीवत ने भी धिक्कारा- "रे नीच । तु मेरा पुन होने लायक कदापि नहीं है। मित धात तूने किया, कृतघ्नता का पाप तुने किया प्रौर परनारियो । हरण करने का तुने जाल रचा। माज से तेरा-मेरा कोई सा नहीं है।" राजा रत्नसेन भी कुपित हुआ। उमने तुरन्त नियमिता "इम नीचको प्राणदण्ड दिया जाय।" पाधिको ने उसे बन्दी बना लिया। पर परोपकारी पुष न उभे मुक्त करा दिया । अब रागा ने पुपात को अपने पर मिहामन पर बैठाकर पदा--- "जामाता । योगी ने तो कहा था तुम इमी नगर में हा छिप य ? मैंने तो तुम्हारी बहन योज कराई थी।" - -- 7 r फूल और पाषाण / १०१ - "मैं हो योगी था।" पुण्यपाल ने कहा-"मैं ही धनराज प्टी बना था। अपना परिचय देने के लिए कुछ नाटक तो करना था। अब पुण्यपाल के रूप मे श्रापके सामने हूँ।' राजा ने तुरन्त विवाह का मुहूर्त निकलवाया। यथादिन और याममय राजा रत्नसेन ने अपनी पुत्री पुष्पवती का विवाह पुण्यपाल के गाथ कर दिया । पुण्यपाल अब पाँच पत्नियो का पति था । कनक- पजागे, मोभाग्यमजरी, तिलसमजरी, कुसुमधी और पुष्पवनी । पांचो में बना प्रेम और अपनत्व था। पुण्यपाल पाँचो के साथ सुखमय जीवन बिताता था। एक दिन रत्नपुर मे कोई मुनि आये । राजा-प्रजा सभी मुनि पी देशना सुनने गये । राजा रत्नमेन प्रतिबोधित हो गया। उसने दीक्षा लेने का निश्चय कर डाला और सबसे पहला काम यह किया कि पुण्यपान का राज्याभिषेक किया, फिर दीक्षा लेकर चारित्र ग्रहण कर लिया। अब पुष्पपात रत्नपुर का राजा था। उसने नये सिर से राज्य भी व्यवस्था की । कई दानशालाएं खुलवा दी। पूरे राज्य मे ग्राखेट- निषेध की घोषणा करवा दी। पुण्यपाल के पास उडनखटोला था । यह मन की गति से गन्तव्य स्थान पर पहुंचा देता था। उसमे बैठकर पुग्यपान पहले नागर पार श्रीपुर गया। वहाँ श्वसुर राजा शूरसेन को पारित ग्रहण करने का मुअवसर दिया और राज्य संभाला । सिंहलपुर के राजा मिहनसिंह का भी कोई उत्तराधिकारी नहीं था। अत उन्होंने की चारित्र ग्रहण पर अपने बहनोई पुण्यपाल को राजा बनाया। पुण्यपाल उपनपटोले के जरिये मगलपुर, जो कुतुमथी का पोहर भी था, श्रीपुर, जो सौभाग्यमजरी का पीहर था तथा सिंहलपुर रो जिलगामजरी का पीहर था--इन तीनो राज्यो मे जाता था और रोक राज्य की राजसभा में कम-क्रम से बैठता था। अन्त में वह - ।
१०२ / फूल और पाषाण पुण्यपाल को कुछ काल योग 4 को रत्नपुर लौट प्राता था। यह नगर पुष्पवती का पीहर था। इस तरह पुण्यपाल रत्नपुर, श्रीपुर, मगलपुर और सिंहलपुर चार राज्य का महिमावान राजा था और चारो देशों की प्रजा का पालन न्या. नीति से करता था । रत्नपुर मे उसका विशाल सैन्य संगठन या। पांचो पत्नियो के साथ दाम्पत्य-सुख और चारो राज्यो ।। शासन-सुख भोगते हुए महाराजाधिराज तो उसे अपने माता-पिता की याद आने लगी। उसने एक दिन सोना कि कोई पुत्र कितना ही महिमावान हो, यदि वह अपने माता-पिता की सेवा नहीं करता तो उसका जीवन व्यर्थ ही है। अपने मन की बात उमने पटरानी कनकमजरी से कही तो कनकमजरी बोली- "स्वामी । विराटनगर का अन्यायी राजा मेरे सास-श्यमुर भी दु.ख देता होगा । अत. आपको एक दूसरे कारण से भी निराट- नगर जाना चाहिए।" "प्रिये | मैं उडनखटोले पर बैठकर विराटनगर जाऊँ और अपने माता-पिता को यहां रत्नपुर मे ले पाऊँ।" पुण्यपाल ने कहा- "विराटनगर जाने का यही एक कारण मेरी समझ में प्राता है। वहा जाने का दूसरा कारण क्या है, सो तुम बताओ।" "स्वामी । आप बहुत भोले है।" कनकमंगरी ने मा- "विराटनगर के राजा जितशत्रु ने ऐसी निर्दयता से आपको 2- निकाला दिया, इने मैं कभी नहीं भूलूंगी।" "बुराई तो बुरे स्वप्न की तरह भूल जाना चाहिए।' पुष्पपाल ने कहा-"फिर राजा जितशत्रु को बुराई भी मेपि नाई हो गनी, टलने में उसका उपकार मानता है । तुम्ही नांगा " यदि वह मुझे देश-निकाला न देता तो मैं जीवन र मनि-पुर बना रहता । चार रामो का राजा नहीं बन पाता । राजा का निकालानी मेरे रिमीप 1 - ..
फूल और पाषाण | १०३ - विल्कुल पुण्यपाल वोला- "वात तो पापकी ठीक है।" कनकमजरी बोली- 'लेगिन भूले को राह दिखाना भी तो हमारा कर्तव्य है। राजा जितशत्रु अहंकारवश यह मानता था कि मैं जिसे चाहूँ, उसे हाथी पर बिठा दूं और मैं चाहूँ तो उसे ही गधे पर विठा दूं। वह अपने को दूसरो का भाग्य-विधाता समझता था। अत. उसकी ग्रोखें खोल देना ठीक रहेगा । इसमे उमका भ्रम तो मिटेगा ही और उसके चापलूस सभासद भी देख लेंगे कि मनुष्य अपने पाप-पुण्यो से विगडता-बनता है। "स्वामी | पाप अपने उदाहरण को विराटनगर मे पेश करके लोगो की ग्राम्या कर्म सिद्धान्त मे जमा दें तो यह बहुत वडा कार्य होगा । मैं यह नहीं चाहती कि द्वेषवश प्राप राजा जितशत्रु से बदला ले। लेकिन यह अवश्य चाहती हूं कि अपनी ऋद्धि दिखाकर विराट- नरेश और विराट-प्रजा की आंखें खोल दें।" "तुम्हारी बात में ममझ गया प्रिये ।। "अब मैं तुम पांचो को अपने माथ ले जाऊँगा। अपनी चतुरगिणी विशाल सेना लेकर विराटनगर जाऊँगा । राजा जितशत्रु का अहकार मिटाना भी धर्म का ही एक अग है।" यस अव पुण्यपाल ने अपनी जन्मभूमि जाने का निश्चय कर लिया । राज्य व्यवस्था मत्रियो को सौंप दी । चतुरगिणी सेना सजाई घोर पांची पत्नियो के साथ विराटनगर को कच कर दिया। उसके नाटक को देखकर ऐसा लगता था कि कोई चक्रवर्ती राजा दिग्विजय पारने जा रहा हो। मार्ग में वसन्तपुर नामक नगर पडा। वहां के राजा ने तुरन्त ही पाल की अधीनता स्वीकार कर ली पोर अपनी सेना पुण्यपाल पी नेना में मिला दी। पुण्यप्रभाव से मार्ग के राजा पुण्यपाल को पाना नम्राट मानते जाते थे और उसकी सेना टिड्डी दल की तरह ती जाती थी। मार्गो में रखते-ठहरते पुण्यपाल का क्टक विराट- गारी भोर बटता जाता था। - "
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.
"कमल-पुष्पो से पूर्ण सरोवर का स्वप्न देखकर तुमने गर्भ
धारण किया था।" मन्त्री सुबुद्धि ने अपनी पत्नी कमलावती से
कहा-
"प्रिये। मेरे
अनुभव
से
हमारा पुत्र पुण्यपाल पुण्यो का धनी ही
हुा । पर इस दुष्ट राजा ने कुछ न सोचा । अपने नयनतारे के बिना
भी मैं जीवित हूँ, यह मोचकर मेरा हृदय फटा जाता है।
"यो रो-रोकर तो तुम अपनी आंखें भी खो बैठोगे।” कमला-
वती बोली-"मुझे तो समझाते हो और खुद रो-रोकर घुल रहे ।
हो।
"स्वामी । मुझे भी तो देखो, मैं मां होकर भी पुत्र के वियोग
मे जीवित हूँ।
"तू जीवित है ?" मन्त्री बोले "मुझे क्यो पागल बना रही
है । कमला ! तुने कब से अन्न नही लिया? मुझे खाने को कहती है
और स्वयं कुछ खाती-पीती नहीं । ऐसे तू कैसे जीवित रह पायेगी।"
कमलावती रो पड़ी। पति-पत्नी दोनो ही पुण्यपाल की याद
रहते थे। कभी पति पत्नी को समझाते कभी पत्नी पति को
कुछ
खिलाती और कहती-
"खानोगे नहीं तो जीवित कैसे रहोगे ? पुत्र को देखने को ;
।
मे घुलते
प्राग्रह करके
.
फूल और पापाण /१०५ - प्रागा मे हम दोनो को जीवित रहना है। मेरा मन-बार-बार माहता है कि हमारा पुण्यपाल एक दिन पायेगा अवश्य ।" इमी प्राशा मे दोनो अपने दिन काट रहे थे । राजा जितशत्रु ने अब उन्हे मत्रिपद से भी हटा दिया था। एक दिन पुण्यपाल का क्रोध गजा ने मत्री सुबुद्धि पर ही उतार दिया और कहा- "मत्री ! तुम्हारे पुत्र पुण्यपाल ने मेरे प्रति जो उपेक्षा दिखाई, उसका कारण तुम हो । तुम पिता-पुत्र एक ही हो। तुम्हारे कारण हो पुण्यपाल ने यह स्वीकार नहीं किया कि वह मेरे कारण ही मुग्री है। "मग्री ! तुम कृतघ्न हो। मैंने तुम्हे महामात्य का पद दिया । तुम्हे सव सुविधाएं दी और तुम्ही अपने पुत्र को समझा नही नाये ?" "आप एक बच्चे के अब भी पीछे पडे है।" मंत्री ने अपना भोभ प्रकट किया-"अपने राज्य से निकालकर भी आपको सतोप नही हुमा ? मुझे भी आपने उसके साथ क्यो नहीं जाने दिया ? मैं यदि भापका मत्री हूँ तो एक पुत्र का पिता भी हूँ।" " तुम अपने पुत्र का खोट अब भी नहीं मानते ?" राजा बोला-~-"ठीक है । विषफल का वृक्ष भी विषवृक्ष ही होता है । अव में अच्छी तरह जान गया कि मेरी सत्ता तुम्हे भी स्वीकार नहीं है । मत प्राज से तुम मत्री नही हो । घर रहकर पुत्र का शोक मनायो।" राजा ने महामत्री सुबुद्धि को मत्रिपद से हटा दिया । सव मुविधाएँ भी छीन ली। अपने सचित धन से ही पति-पत्नी गुजारा कारने लगे। राज्य गा काम चलाने के लिए राजा जितशत्रु ने एक की रमह घार मन्त्री नये नियुक्त किये । मत्रियो की नियुक्ति से पहले राजा ने विचार किया- ।
१०६ / फूल और पाषाण । 'एक की जगह मैं चार मंत्री ऐसे नियुक्त करूंगा, जो मेरी हाँ-मे-हां मिलाये । मेरा ही जय-जयकार करे। ऐसे व्यक्ति छोटो जातियो मे मिल सकते है । एक दरजी, एक कुम्हार, एक घांची और एक माली-ये चार मंत्री मै नियुक्त करूंगा।' राजा ने पुन सोचा-'दरजी काटने-छांटने मे प्रवीण होता है। अत वह मेरे राज्य की समस्याओ को भी काट दिया करेगा। कुम्हार निर्माता होता है, अत कुम्हार योजना-निर्माण में मेरी मदद करेगा।' ऐसा मूर्खतापूर्ण विचार करके जितशत्रु राजा ने कुम्हार, घाँची, दरजी और माली-चार मत्री नियुक्त कर लिये । नियुक्त होते ही इन चारो ने राज्य को खोखला करना शुरू कर दिया। अपने रिश्तेदारो को अच्छे-अच्छे पद दे डाले और राज्य के धन से अपने-अपने घर भर लिए । राजा इनकी ओर से आँखें बन्द किये था, क्योकि ये राजा की झूठी प्रशसा करके उसका अहकार तृप्त किया करते थे। कोई कहता- "पुण्यपाल मूर्ख था। आपने हम जैसे तुच्छ लोगो को इतना ऊंचा उठा दिया तो आपको ही हम भाग्य-विधाता क्यो न कहे ?" कोई कहता- "राजा को रक और रंक को राजा बनाने की क्षमता केवल आप मे ही है। जिस पुण्यपाल ने अापको अप्रसन्न किया, वह मूर्य ही नही, मूर्यो का मूर्ख था।" ऐसे ही एक दिन राजा जितशत्रु का दरबार लगा था और चारो मत्री उसकी प्रशंसा कर रहे थे कि एक साय चार राजसेवको ने भयभीत होकर कहा- फूल और पापाग/ १०७ पृथ्वीनाथ ! मावधान हो जाएं। गिनी गना ने हमारे नगर को घेर लिया है। उसकी गेना का अन्त दिवाई नहीं देना । मानो विराटनगर के चारो और सेना का समुद्र उमड पडा हो।" "हमने शत्रुनो को जीतकर ही अपना जिनगनु नाम नायक किया है ।" जितशत्रु ने अपने चारो मग्रियों की प्रोर देगने हुए कहा--"एक ण हमारा क्या बिगाड मकता है " राजसेवको ने मन-ही-मन मोच लिया, 'जब बुरे दिन प्राते है तो दगी इरह बुद्धि कुठित हो जाती है।' इधर दरजी मत्री ने राजा पा हौसला बढ़ाया-- "राजन् ग्राप चिन्ता मत करना । हग -निकों को कैची से कच-मच काट देंगे।' पांची मनी बोला- "काटने की जरूरत हो क्या है ? जमे कोल्हू मे मरनो पेली जाती है, उसी तरह हम नव को पेल देंगे।" कुम्हार मत्री ने कहा- "जमे चार को एक जाता है, पैन ही न शत्रुराजा को चक्कर कटा देगे।" माली क्यो पीछे रहता ? उमने भी कहा- "वेचारे शयनो की औकात हो गया है । जैसे बाग मरिचन पौधे, पास-कड़ा और घर-पतवार उपाउफर फे दी जाती है, पन हो सबको मैं अकेला ही उपाडकर फेक दूंगा।" अपने मन्त्रियो को सूझ और उनके गौर्य पी प्रमाना नगर रामा फूलपार कुप्पा हो गया और सभा पिजित कार दी। दूसरे दिन पुन. राजसभा जुडी । राजा-मन्त्री प्रधान्यान बंटे। पामर राग सात सना मे भाया और उसने जिता सोनियापन कर हा--- - . डडे से घुमाया - १०८ / फूल और पाषाण "राजन् ! मैं मंगलपुर, श्रीपुर, सिंहलपुर और रत्नपुर-चा राज्यो के राजा का दूत सुनाम अपने राजा का सन्देश प्रापर देता हूँ। । "राजन् । तीन दिन के अन्दर या तो आप हमारे राजा की अधीनता स्वीकार कर लीजिए या फिर युद्ध के लिए तैयार रहिये।" अब तो राजा जितशत्रु के होश उड गये। अब तक तो वह निश्चिन्त था, और किसी भी राजा के आक्रमण की बात एक मजाक ही समझता था । पर अब तो सचमुच ही युद्ध का निमन्त्रण आ गया। राजा ने दूत को तो विदा कर दिया और राजसभा विसर्जित कर तुरन्त एक मन्त्रणा-सभा जोड़ी। उसमे कुछ चुने हुए मन्त्री तथा प्रजा परिषद् के प्रतिनिधि आये । राजा ने गम्भीर होकर कहा- "सव परिस्थिति आपके मामने है। सेना बहुत विशाल है मैंने तो यही समझा था कि हमारी किसी से शत्रुता नहीं है, तो हा पर कोई क्यो आक्रमण करेगा, पर अब तो युद्ध का निमन्त्रण आ है गया है । युद्ध न करना कायरता होगी और युद्ध करने का अर्थ है निश्चित पराजय । आप लोग मुझे सलाह दीजिए।" "अापके नये मंत्री किस दिन काम आयेंगे?" एक मंत्री ने कह ही दिया-पहले इनसे परामर्श करना ठीक होगा।" "आप लोग मुझे शर्मिन्दा न करें। राजा ने कहा-"ये मन्त्री अच्छे दिनो के मत्री । बुरे दिनों मे तो ये कुबुद्धि ही दे सकते है।" "कुबुद्धि को त्याग सुबुद्धि ही अपनाइए।" उसी मन्त्री ने पुन कहा-"राजन् । भूतपूर्व महामन्त्री सुबुद्धि से अच्छा कुगल तन्त्री, दूरदर्शी और नेक व्यक्ति आपको दूसरा नही मिलेगा।" "लेकिन मैंने उनका अपमान किया है।" राजा बोला- । । .
फूल और पापाण | १०९ - ने - "उनके पुत्र पुण्यपाल को देश-निकाला दिया, इसका क्षोभ तो उन्हें है ही। दूसरे, मैंने अपमानित करके उन्हे मन्त्रिपद से भी हटाया। मत में किस मुंह से बुलाऊँ ?" राजपुरोहित ने कहा- "महाराज ! मन्त्री सुबुद्धि भले ही अव शानन-तन्त्र ने मम्बन्धित नहीं है, पर वे देशभक्त अव भी है और रहेंगे। देश में लिए ये मान-अपमान सब कुछ भूलकर अापका माथ देंगे।" "तो फिर मुझे ही उनके पास जाना चाहिये।" राजा गितगत्रु कहा-"उनके घर जाकर मुझे उन्हे मान देना चाहिए।" मन्यणा-सभा को विसर्जित कर राजा तत्काल पूर्व मन्त्री गुवुद्धि के पर गया । मत्री को बडा आश्चर्य हुमा । उन्होंने स्वागतपूर्वक राजा को धासन देकर कहा- "स्वामी ग्राज सेवक के घर पधारे हैं। प्राज में पडभागी सुमा ।" राजा बोला-- "पर आज तो मैं कुछ मांगने पाया हूँ। यह देश जितना मेरा उतना पापका भी है। याज देश पर मकट है। प्रापती गुबुदि इसे उवार सकती है।" राजा ने विस्तार से मव वाते मन्त्री सुवुद्धि नो बनाई। मन्त्री ने समस्या पर विचार किया प्रोर कहा- "राजन् । प्रपनी से वडी शक्ति से टकराना फनी चुलिमानी नही है। लेकिन अपने राज्य को किसी और राजा को दे देनानी पनुचित है । मत बीच का मार्ग हो ठीक रहेगा। प्रति हमारा राज्य भी पराधीन न हो और युद्ध भी न करना पडे । यह नाम किर से हो सकता है । सब पाते माप मेरे ऊपर दोड़िये । मैं पापको नाम ११० / फूल और पाषाण । - . 1. लेकर उस आक्रामक राजा के शिविर मे जाऊँगा और पूडूंगा कि चार राज्य पाकर भी आपकी राज्य लिप्सा क्यों नही मिट रही ?" "बस-बस यही ठीक है।" राजा ने कहा-"हमे तीन दिन का समय मिला है। अत. कल ही हम लोग चले।" सब वाते तय करके राजा जितशत्रु प्रसन्न होकर राजभवन लौटा । दूसरे दिन जितशत्रु और मन्त्री सुबुद्धि रत्नादि की भेंट लेकर पुण्यपाल के पास गए । राजा जितशत्रु तो शिविर के बाहर ही रहा। पुण्यपाल के सेवक सुबुद्धि को भीतर शिविर में ले गये। पुण्यपाल एक भव्य सिंहासन पर बैठा था। उसकी पांचो पत्नियाँ भी भिन्न-भिन्न आसनो पर बैठी थी। दो-चार सेविकाएं भी खडी थी। अपने पिता सुबुद्धि को देख पुण्यपाल आसन से खडा हो गया। सुबुद्धि अपने पुत्र को एकाएक ही नही पहचान सका । जब पुण्यपाल उसके चरणो मे गिरा तो मन्त्री हक्का-बक्का रह गया । चरणो से उठकर पुण्यपाल ने अपनी पत्नियो से कहा- "अपने श्वसुर के पैर छुप्रो।" सुबुद्धि का सिर चकराया। पुण्यपाल' को नजरें गढाकर देखा तो वोला- "अरे पुन्ना तू ? मेरे बेटे तू यहां ऐसे कैसे पाया ? कही में स्वप्न तो नही देख रहा ?" पुण्यपाल ने पिता का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने सिंहासन पर बिठाकर स्वय नीचे उनके चरणो मे बैठकर बोला- "पिताजी । आपके आशीर्वाद से ही मै आपके लिए चार पुत्र- वधुएँ और लाया हूँ । पहली कनकमंजरी को तो आप जानते ही हैं । आपकी चरण-रज की ऐसी महिमा रही कि मैं चार राज्यो का राजा भी हूँ। यह सब कैसे हुआ यह सब तो फिर बताऊंगा । पर - - ?
. फूल और पाषाण / १११ यह वहुन चिन्तित तो मैं पापको और माताजी को लेने तथा राजा जितशयुका भ्रम मिटाने पाया हूँ।" "म्रग मिटाने से पहले उनकी चिन्ता मिटायो।" मन्त्री ने महा-"युद्ध-भय से । प्रापिर तो वे हमारे - राजा और हम उनकी प्रजा है।" बग, पुण्यपाल ने अपने सेवक द्वारा राजा जिनगा को भीतर बुलवाया। राजा से कुछ देउ-छाड़ करते हुए पुग्यपाल ने रहा- "राजन् । पाप जिसे चाहे, उसे राजा बना दें और जिने गाहे रका बना दे । फिर अाज अाप युद्ध से क्यो घबरा रहे है "युद्ध बराबर वाले से किया जाता है।" जिनश ने कहा- "महाँ प्राप चार राज्यो के राजा और कहाँ में एक वत्म देश राजा । युद्ध के लिए आपने मुझे चुना, श्मका मुझ पाश्चय है।" "मैं तो प्रापसे भी छोटा हूँ।" पुण्यपाल पिता प्रापका सेवक हो, वह भला आपने बड़ा फैसे हो माला में प्रापकी बदौलत यही विराटनगर मे सुप नोगता पा और पापा नाराज किया तो मापने देश में निकाल दिया। पापका निता या, ग्राप की ही प्रजा का एक अग यह पुण्यपाल हो प्रापर्क नामने ने पहा-"गिमया 7 तुम " राजा ने अटककर कहा--"अरे सच, तुम तो पुण्यपात ही हो।" रामा जिासत्रु ने पुण्यपाल को पहनान गिया । प्रा पुसाल गोला-- 'राजन् । अपने देश से युद्ध मला में कने गर नापा? में तो पापमो एक सच्ची बात यह बनाने मारा कि मनुष्य अपने ११२/ फूल और पाषाण - पुण्यों से ही सब कुछ पाता है। यदि आप इस सत्य को स्वीकार कर लें तो मेरा यहाँ आना सार्थक हो गया।" राजा जितशत्रु इतने भावुक हो गए कि रो पड़े और पुण्यपाल को हृदय से लगा लिया । आंसू पोछकर राजा ने कहा- "बेटा ! मेरा विश्वास करना । मैं हृदय चीरकर नहीं दिखा सकता । जीवन मे जो कुछ मैंने आज पाया है, वह पहले कभी नहीं पाया। अहकारवश मैं सचाई को भूल रहा था। तुमने मेरी ही नही, जगत की आंखे खोल दी है।" "बस, तो अब एक वस्तु मै आपसे मांगूंगा।" पुण्यपाल वोला-"मेरे माता-पिता को मेरे साथ जाने की अनुमति दीजिए। मैं इन्हे रत्नपुर ले जाऊँगा। मेरा जन्म इनकी सेवा के लिए हुआ to राजा जितशत्रु ने पुण्यपाल का हाथ झटका और कहा--- "तू तो मुझे जीवन भर रुलाना चाहता है। लगता है तूने मुझे क्षमा नहीं किया ? "अरे पगले ! मेरे और कौन है, जो इस राज्य को सम्भातेगा? मैंने तो जव तू छोटा था, तभी तुझे अपना उत्तराधिकारी मान लिया था। तभी तो तुझे एक युवराज की सब सुविधाएं दी थी। अव सब भूल जा और अपने नाटक को सत्य कर दे। तूने नाटकीय रूप में ही मुझसे राज्य मांगा था। अव में सचमुच तुझे राज्य देता हूँ। "वेटा ! मेरे धर्म में अन्तराय मत बनना । अव तो मैं किन्ही मुनि के माने तक ही विराटनगर मे रहूँगा।" "तब तो मैं भी आपके साथ ही रहूंगा।" मन्त्री सुबुद्धि नै राजा से कहा-"जीवन भर आपके साथ रहा तो चारित्र पालन में भी आपके साथ क्यो न रहूँ ?"
फूल और पापाण / ११३ गए?" . "तो श्राप सब मुझे अफेला छोडकर जाने की जल्दी करने लग पुण्यपाल बोला-"मेरे ऊपर अापके वात्मल्य की छाया क्या मेरे पाते ही हटेगी? ऐमा मत करो, ताता" "जीव तो अकेला ही है वेटा ।" सुवुद्धि मत्री ने अपने पुत्र पुण्यपाल से कहा-"मैं अकेला हूँ, इस सत्य को भूलकर जीव जब अपनी इच्छायो का परिवार बढाने लगता है, तभी वह काम-पक में फैमने लगता है।" "ये बाते अब फिर करना ।" राजा ने मयो से पाहा--"प्रय उठो और पुण्यपाल के नगर-प्रवेश की तैयारियां करो।" राजा जितशतु और मनी सुबुद्धि शिविर से बाहर निकाले और रपो में बैठकर नगर को गये। विद्युत्गति से पूरे विराटनगर में यह रामाचार फैल गया कि हमारे मत्री सुबुद्धि का पुत्र पुण्यपान ही पाया है। कमलावती ने तो प्रश्नो की बौछार कर दी। उसने अपने पति से अनेक प्रश्न पूछ डाले- 'तुम मुझे साथ क्यो नहीं ले गए "मेरा पुन्ना अब तो बहुत लम्बा भी हो गया होगा ?" "क्या वह मुकुट भी पहने था?" "बहुएं कैसी है "बहुमो को तो साथ ले पाते ?" मामलावती के सभी प्रश्नों का उत्तर देते "गिसके पियोग में इतने वर्ष काट दिने, उसे देखने के लिए घोडा धैर्य रयो । अब तो वह पा ही गया है।" दो मे ही नगर-प्रवेश पीसव तयारिलो मानन-पान पूरी । - ?" ?" मत्री ने कहा ११४ / फूल और पाषाण . - हो गई। पुण्यपाल हाथी पर सवार हुआ । आगे-पीछे अपार भीड थी। पांचो बहुएं रथो मे चल रही थी। पूरे नगर में पुण्यपाल की सवारी घूमी। फिर उसका हाथी, उसके घर ही गया। माता. कमलावती ने भीगे नेत्रों से पुत्र की प्रारती उतारी । द्वार-पूजन करके बहुमो का प्रवेश कराया। खुशी से कमलावती का ऐसा हाल हो गया कि वह मूक होकर इधर-उधर घूम रही थी। कभी इस बहू को देखती, कभी उसको। पांचो बहुएँ वार-वार सास के पांव पलोटती। आज दास-दासी मुंहमांगा पा रहे थे। नगर भर मे पुण्यपाल की ही चर्चा हो रही थी। कई दिन बीत गये पर पुण्यपाल के जीवन की घटनाएँ समाप्त ने नही हुई। उसके माता-पिता दुहरा-दुहराकर उसके जीवन की बातें । पूछते । बहुएँ भी बताती । राजसभा मे अव पुण्यपाल का भी एक ग्रासन था । अव तो राजा ने सबके सामने स्पष्ट करके कह दिया- "भाइयो । मेरा अहंकार मिथ्या था। सचाई तो यही है कि मनुप्य कर्म का पुतला है । कर्म जैसा नाच उसे नचाते हैं, उसे वैसा । ही नाचना पड़ता है । मेरे इस कथन का प्रमाण पुण्यपाल से अधिक नि स्पष्ट दूसरा क्या होगा ?" पुण्यपाल ने अपनी सब सेना रत्नपुर वापस भेज दी थी। यहां रहकर भी वह उड़नखटोले से अपने शासित राज्यो को देख- भाल करने जाता। राजा जितशत्रु ने पुण्यपाल से बहुत प्राग्रह किया कि विराटनगर के राजसिंहासन पर बैठो। पर पुण्यपाल ने कह कि जब तक कोई मुनि यहां न आये, तब तक तो साप ही राज्य- भार सम्हाले रहे । राजा ने पुण्यपाल की यह वात मान ली थी। दिया 14 एक बार यशोधर मुनि विराटनगर मे पाये । उद्यानरक्षक ने उनके प्रागमन की सूचना राजा जितशत्रु को दी तो राजा ने अपने पहूमूल्य प्राभूपण उद्यानरक्षक को दे डाले। इस दिन पी प्रतीक्षा राजा को बहुत दिनो से थी। सिंहासन से नीचे उतर राजा ने उद्यान की अोर मुंह किया और घुटनो के बल बैठ मुनि की नाय- वन्दना की । तदनन्तर उद्घोपफ ने मुनि के पधारने का मवाद नमस्त नगरी में प्रचारित कर दिया । धार्मिक जनो का मन मयूर नृत्य कर उठा । सभी जन मुनि-दर्शन करने उद्यान जाने की तैयारियां मारने लगे। राजा जितशतु अपनी रानी अनुरागवती और समस्त मनामदो के साथ उद्यान गया। महामत्री सुबुद्धि अपनी पत्नी कमलावती को लेकर पहुंचे। पुण्यपाल अपनी पांचो जीवन-नगिनियों को लेकर मुनिधी की देशना सुनने गया। नगर के ऊंच-नीच, धनी-निधन, अपहारे, ग्पाले, व्यापारी प्रादि हजारो की नव्या में पहुंचे । बडे- डे लाठी टेफ-टेककर जीवन का सार तत्त्व पाने मुनि के मनपसरण में विराजे। भगोर वृक्ष के नीचे एक शिला पर मुनि पशोपर टे। नके पास-पात भ्रमण समुदाय था और दूर-दूर त पा से विधे - ११६ / फूल और पाषाण - एक बड़े मैदान मे श्रोताजन बैठे थे। सभी जन मुनि को भावभीनी अमृत भरी देशना दत्तचित्त होकर सुन रहे थे । मुनि ने देशना के वीच कहा- "बार-बार राजा बनोगे, रंक बनोगे। जिसके एक बार पति वनोगे, उसी के फिर भाई भी वनोगे । नाटक के इस मंच पर यो ही तुम अपनी भूमिका कब तक निभाते रहोगे ? यह कर्म तुम्हे इसी तरह नचायेगा । कर्मों के बधन को काटकर मुक्ति-वधू का हाय पकड़ो तो जीवन अखण्ड सुख और आनन्द से भर जाएगा।" मुनि की देशना सुनकर राजा जितशत्रु, मत्री सुबुद्धि आदि कई प्रतिवुद्ध हो गए । इन सभी ने चारित्र ग्रहण कर कर्मक्षय करने का निश्चय कर लिया। मुनि के समवसरण से लौटकर नरपाल जिता ने बड़े आडम्वर के साथ पुण्यपाल का राज्याभिषेक किया। पुण्यपाल विराटनगर का राजा बना । अव दीक्षार्थियो की तैयारियां होने लगी। विराटनरेश पुण्यपाल ने अपने माता-पिता तथा पूर्व राजा जितशत्रु और रानी अनुरागवती का दीक्षा महोत्सव मनाया । नगर भर में धर्म का उत्साह छा गया । चारो मोक्षार्थी शिविकानो में बैठकर उद्यान की ओर चले। आँखो मे आँसू भरे प्रजाजनो की भीड उन पर पुष्प-वर्षा कर रही थी । यथासमय चारो उद्यान पहुंचे। राजसी वेश उतार कर चारो ने पच-मुष्टि केश-लोचन किया। फिर मुनिवेश धारण किया। मुनि यशोभद्र ने चारो को चारित्र सम्बन्धी देशना दी । कुछ दिन बाद राजर्षि जितशत्रु और मुनि सुबुद्धि ने गुरु के साथ अन्यत्र विहार किया। माध्वी द्वय-कमलावती और अनुरागवती साध्वी सघ में मम्मिलित हो गई। पुण्यपाल अब विराटनगर में रहकर ही पांचो राज्यो का शामन चलाने लगा। मुख्य राजधानी उमने विराटनगर को ही बनाया। मुनि : .
फूल और पाषाण / ११७ यशोभद्र ने उगने श्रावकवत ग्रहण कर निये ये। अत श्रावकाचार का पालन करते हुए वह अपना जीवन विताने लगा। उनकी पांचो पलियां भी उत्तम कोटि की श्राविका थी। कालान्तर में पांचो गर्म- पनी हुई और पुण्यपाल पाँच पुत्रो का पिता बन गया। पांचो गजकुमार देवकुमार से सुन्दर कनकमजरी के अगजात का नाम कनसेन था। नौभाग्य- मजरी से उत्पात पुत्र का नाम पुण्यपाल ने सुभागसेन रवा । निलकमजरी के जाए को तिलकमेन कहा जाता था। कुमुमश्री से उत्पन्न पुत्र का नाम कुसुमगेन और पुष्पवती के जगजान गा पुष्पकुमार था । पुण्यपाल ने पांचो पुयो के नाम उनकी जन्मदारियो के नाम के अनुमार ही रपे थे। पांचो का लालन-पालन पांच-पान धायें करती थी। द्वितीया के चन्द्र के समान पांचो राजकुमार दिन प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे। अाठ वर्ष की उम्र में पांचो कलाचार्य के पास रहकर विद्या धौर कलाएं पढने-सीखने लगे। कालान्तर में पांचो वस्त्तर कलामो में निपुण हो गए। समय यो ही सर-सर वीतता जाता था। वर्षा पो ही बीत चले। पुण्यपाल ने अपने पांचो पुत्रों का विवाह सुन्दर राजकुमारि के साथ कर दिया । पुत्रवधुप्रो को रुन-सुन से पुण्यपाल का अन्न पुर गूंजने लगा। एक वार मुनि धर्मघोष पिराटनगर में पाये । वे मुनि पल- शानी मुनि धे। लोकालो का ज्ञान के प्राप्त कर चुके थे, इनाना जन्म-जन्मान्तरो का भेद जानते थे। उनकी देशना सुनने तबाट पुष्प- पाल पांचो रानियो, पुत्रो योर पुत्रवधुमो के साथ गए। मुनि ने ममतभरी देशना देते हुए कहा- + ११८ / फूल और पाषाण 3. " । -- -- "इस जगत मे कोई राजा है तो कोई दर-दर का भिखारी है। किसी ने उच्च कुल मे जन्म पाया है तो कोई चाण्डाल के घर जन्मा है। किसी ने स्वस्थ और सुन्दर शरीर पाया है तो कोई अधा, बहरा लँगडा और कोढी है। "भव्य जीवो ! आखिर इस विपमता का कारण क्या है ? विचार करो, मनुष्य-जन्म पाकर भी जीव दु.खी क्यो है ? इस भेद का और वैपम्य का कारण मात्र कर्मों का फ़ेर है। शुभकर्म भौतिक सुखो का अम्बार लगा देते है और अशुभकर्म वाला दीन-मलीन और दुखी रहता है । अतः सामारिक सुखो के लिए पुण्यो का सचय करो। "भव्य जीवो । पुण्य सचय से भी तुम ससार मे ही उतरोगे। सोने की जजीर का वधन भी तो बधन ही है। अत. दोनो तरह के कर्मों का क्षय करने से ही अनन्त और अखण्ड मोक्ष-सुब मिलेगा। इसे पाने के बाद जीव फिर जन्म-मरण और जरा-व्यापि से सदा-सदा के लिए छुटकारा पा जाता है। चाहे कोई कितने ही जन्म ले, पर अन्तत जीव को शिवपुर मे ही जाना है।" मुनि की देशना समाप्त हुई तो पुण्यपाल ने पूछा- "हे मुने ! पूर्वभव मे मैंने ऐसे क्या शुभकर्म किये थे कि पांच राज्यो का राजा बना । देवागना-सी सुन्दर पांच पलियां मिली। इसके विपरीत मैंने जीवन में कप्ट भी बहुत भोगे। मैं सागर मे भी धकेला गया। अतः मैंने अशुभ कर्म भी किये ही होगे। आप तो जन्म. जन्मान्तरो का रहस्य जानते है। अत में आपके श्रीमुख से अपना पूर्वभव सुनना चाहता हूँ।" केवली मुनि धर्मघोप वोले- "हे राजन् । हर जीव पाप-पुण्य-दोनो तरह के वध लेकर जन्मता है। कोई पुण्य अधिक लेकर पाता है तो कोई पाप का वध . -
फूल
और पापाण / ११९
7
अधिक करता है । क्रम-क्रम मे दोनो का उदय-अस्त होता है, इसीलिए
जीवन में उतार-चढाव पाते हैं। तुम तो
वस्तुत: पुण्यार्थी जीव
हो। तुम्हारा पुण्यपाल नाम मवंथा सार्थक ही है। पूर्व मव मे तुमने
पुण्यो का सचय अधिक किया था, इसीलिए यह ममृद्धि प्राप्त की
पोर गुछ पाप भी किये, इमलिए दुख भी भोगे । अव अपना पूर्व नव
विस्तार से सुनो, सब कुछ स्पष्ट हो जायगा।"
इतना कह मुनिवर पुण्यपाल का पूर्वभव उसे सुनाने लगे ।
समस्त श्रोता पुण्यपाल का पूर्वभव दत्तचित्त होकर मुनने लगे।
--
"
-
15 मगध देश अपनी व्यापारिक समृद्धि और सम्पन्नता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। इस देश का केन्द्रीय नगर था राजगृह । इसी नगर मे रहकर ध्वजारथ नाम का राजा मगध देश का शासन करता था। राजगृह नैसर्गिक शोभा से सम्पन्न वडा ही आकर्षक नगर था। वैभारगिरि ग्रादि पाँच पर्वतो से घिरे इस नगर मे वाग-बगीचो का सौन्दर्य भी अपूर्व था। इस नगर के भव्य भवन बहुत ऊंचे और आकर्षक थे, क्योकि यहां सेठ-साहूकारो की ही अधिकता थी। धनी- निधन सभी जन राजा ध्वजारथ के सुशासन और न्यायरक्षा के कारण सुखी थे। श्रेष्ठि-व्यापारियों के इस नगर मे गगदत्त नाम का एक कोटीश्वर श्रेष्ठी रहता था। गगादेवी उसकी सेठानी का नाम था। पति-पत्नी-दोनों ही सरल स्वभाव के धर्मनिष्ठ प्राणी थे। संतो की भक्ति और धर्म मे रुचि दोनो मे कूट-कूटकर भरी थी। सेठानी गगा- देवी के दुर्गावती नाम की एक छोटी बहन और थी, जो इसी राजगह मे धनदत्त नामक श्रेष्ठी को व्याही थी। दोनो बहनें एक दूसरे के घर अाती-जाती थी। विशेष बात यह थी कि दोनो की ही गोद सूनी थी। फिर भी दोनो को आशा थी कि यदि कुछ पुण्य शेप हुए तो कभी फूल और पाषाण | १२१ । -- मतान भी होगी ही। लेकिन भाग्य ने दुर्गावती के साथ एक क्रूर पेल पेला कि वह विधवा हो गई । सेठ धनदत्त निस्सतान मरे । दुर्गावती के जेठ-देवरों और कुटुम्बियो ने अपनी जालसाजी से उनके पति का धन हथिया लिया । अब वह रोटी के लिए भी जेठ- देवरो की मुंहताज हो गई। गगादेवी से अपनी बहन की यह दशा नही देषी गई। उसने अपनी विधवा वहन दुर्गावती को अपने पास बुलवा लिया और कहा- "वहन ! तेरे कोई संतान होती तो धन के लिए झगड़ा किया नाता । तेरे लिए रोटी-कपडो की यहां कोई कमी नही है। तू मेरे हास रहकर सुख से अपना जीवन विता सकती है।" "अव तो तुम्ही मेरे सब कुछ हो।" दुर्गावती ने कहा-"जब पति ही चले गए तो धन क्या चीज है ? अच्छा हुआ धन गया वरना चिन्ता भी बढ जाती । तुम्हारे सहारे धर्मध्यान करते हुए मै अपना जीवन विता दूंगी।" दोनो बहनें वडे प्रेम से रहने लगी। सेठ गगदत्त भी अपनी गाली दुर्गावती का बडा सम्मान करते । दोनो बहनें साथ-साथ उपाथप जाती । साथ ही खाती-पीती और उठती-बैठती। तीनो प्राणियो का जीवन बड़े सुख से बीत रहा था । एक दिन गंगदत्त ने सेठानी गगादेवी से रात के एकान्त मे पहा- "प्रिये ! हमने तो सोचा था कि तुम्हारी बहन की संतान को हो गोद रख लेगे । पर वह वेचारी तो विधवा हो गई। आखिर हमारे इस अपार धन का क्या होगा ? घर मे धन की कमी नहीं है, पर हमारे बाद इसे कौन भोगेगा?" "मापने मेरा दुप ताजा कर दिया।" सेठानी बोली- - १२२ / फूल और पाषाण "पाप तो धन-भोग के कारण ही दुखी है, पर मै तो अपने सूने मातृत्व के कारण रात-दिन दुःखी रहती हूँ। आपने मेरी आज तक नहीं सुनी । यदि मेरी माने तो एक बात कहूँ?" "हाँ-हाँ कहो।" उत्सुक उत्सुक होकर सेठ ने कहा-"आज मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूं।" सेठानी बोली- "स्वामी! आप कुलदेवी को प्रसन्न कीजिए । यदि उसे हमारे कुल की कुलदेवी बने रहना है तो एक पुत्र का वरदान अवश्य देगी।" "पुत्र देना देवी के हाथ की बात नहीं होती।" सेठ ने मुस्कराकर कहा-"फिर भी मैं तुम्हारी वात मानूंगा । क्या पता देवी के बहाने ही हमारे पुण्यो का उदय होना भाग्य मे लिखा हो।' वस, अब दूसरे ही दिन श्रेष्ठी गगदत्त ने कुलदेवी की पारा- धना शुरू कर दी। सातवे दिन देवी प्रकट हुई। उसने पूछा- "सेठ ! तुम्हारा कौन-सा प्रिय करू ? मैं तुमसे प्रसन्न है।" "आपसे क्या छिपा है ?" सेठ बोला-"मातेश्वरी । मुझे एक पुत्र ।" अपने अवधिज्ञान से देवी ने गगदत्त का भाग्य देखकर कहा- “सेठ ! तुम्हे पुत्र की प्राप्ति तो अवम्य होगी। लेकिन तुम्हारे धन का नाश हो जाएगा। यही तुम्हारा भविप्य है।" इतना बताकर देवी अन्तर्धान हो गई। गंगदत्त धन-नारा की बात तो मानो भूल ही गया । पुत्र-प्राप्ति के वरदान से वह नाच उठा। सेठानी भी इस खुशखवरी को सुनकर फूल उठी । छोटो वहन दुर्गावती ने भी प्रसन्न होकर कहा- की चाह है। - फूल और पापाण / १२३ ? . "अब मैं मोमी बन जाऊँगी। कोई मुझे मोमी कहकर बोलेगा।" "मोगी और मां में भेद हो क्या है ?" मठानी गगादेवी ने अपनी बहन दुर्गावती ने कहा--"वह हम दो माताग्री का पुत्र होगा।" कोटीश्वर सेठ गगदत्त ने वरदान-प्राप्ति के उपलक्ष्य में पूर्व दान-पुण्य किया। फिर ममयान्तर से सेठानी गगादेवी गर्भवती हो गई। उसके गर्भवती होते ही गगदत्त के कपडे के नान गोदाम जल गाए । वाईग लाय का धन राग का देर हो गया । फिर तो गो- ज्यो गर्न वदना जाता था, त्या-त्यो गगदत्त का धन कपूर की गध की तरह उडता जाता था । अन्त ऐमा हुया कि मेट गगदत्त पूरी तरह निधन हो गया । वम, एक हवेनी हो रह गई थी। घर में एक भी नौकर नहीं था। जैसे-तैसे गुजर हो रही थी। लेकिन राजगृह के लोग अब भी उसे सेठ गगदत्त ही मानते थे और रहते थे कि हाथी कितना ही पट जाए, एक विटोरे वरावर नो रहना ही है। हवेली के भीतर सेठ कैसे जी रहे है, इस अमलियत को नो पेरी जानते थे । अव एक दिन सेठानी गगादेवी ने पुत्र प्रमप किया। बोटी बहन दुर्गावती ने पी-गुरु-मोठ का मिश्रण बनाकर जमा को पिलाया । पर मे कुछ भी नहीं पा । नेठानी गनादेवी ने धोनी मे प्रानू भरकर अपने पति से पहा "नगर वालो से भपनी दुर्दशा अपने दिपायोगे । पर में भीतर तो हम भूसे भी रह सकते है। पर इन अभाने का अम्बो तो मनाना ही पड़ेगा । कैसे मनामोंगे।" "समा प्रा मेले पर ही कर लिया १२४ / फूल और पाषाण । - वोले-"दस महीने पहले मैंने कुछ मुहरें गाढकर सुरक्षित कर ली थी। वे ही इस आड़े वक्त मे काम आयेगी।" सेठानी की चिन्ता मिट गई । सेठ ने गढे धन का स्थान बोदा तो बिलख पड़ा बेचारा । सव मोहरें कोयला बन गई थी। हाय-हाय करके अव सेठ ने कहा- "भाग्य के विरुद्ध सचित धन भी काम नहीं पाता । हाय मैं क्या ररू ?" "भाग्य पर भरोसा रखो।" सेठानी ने कहा-"धन नहीं रहा तो क्या हुआ, आपकी साख तो बनी है। अपने पड़ोसी सेठ सागरचन्द्र से दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ उधार ले लो । कभी तो दिन बदलेगे ही, तब दे देना।" इसके अलावा दूसरा चारा भी नहीं था। सेठ गगदत्त सागरचन्द्र के घर गये। उनकी रोनी सूरत देखकर सागरचन्द्र पहले ही समझ गया कि कुछ लेने आये होगे । अत पहले से ही कह बैठा- "सानो भाई गंगदत्त ! कैसे आये ? अरे भाई, अाजकल तो बाजार बहुत मन्दा चल रहा है। छ महीने से जुडी पूंजी बा रहा हूँ। जो ले जाते है, देने का नाम ही नहीं लेते । खैर छोडो, बतायो, तुम कैसे पाये ?" गगदत्त का दिल बैठ गया । ऋण मांगने का साहस नहीं हुआ। पर लेना तो था ही, अत: कड़ा जी करके कह दिया--- "सेठजी ! मैं भी आप से दस हजार मुद्राएँ ऋण तेने पाया हूँ। जो कहोगे, वह व्याज दूंगा। इस समय मेरी वात का सवाल है।" "देखो भाई गगदत्त ! वैसे तो मेरा धन तुम्हारा अपना ही है। लेकिन लेन-देन के कुछ नियम होते है। मूल तुम चाहे जब दो, पर व्याज तो मैं हर महीने लूंगा । तुम व्याज कहाँ से दोगे ?" - -
फूल मोर पापाण / १२५
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गंगदत्त मोचने लगा--'यह धन में जन्मोत्सव के लिए ले
रहा हूँ। प्रत. पचं करना है। अतः हर महीने व्याज यहाँ ने दे
पाऊँगा ? यदि व्यापार के लिए ऋण लिया होता तो लाभ में से
व्याज निकलती जानी।'
गगदत्त को मौन देश गागरचन्द्र ताद गया कि अच्छी चिडिया
फंसी है। प्रत. पूछा-
"यह तो वतामो, तुम्हे धन की जरूरत क्या है।"
"पुत्र का नामकरण संस्कार कराना है।" गगदन बोला-
"व्यापार का हाल तो तुम जानते ही हो । मुझे निराश मत
करो, मैं तुम्हारी पाई-पाई का दूंगा।"
"तो फिर स्पष्ट मुनलो। बुरा मत मानना।" सागरचन्द्र ने
बड़ी बह्याई से कहा--"जब तक व्याज न हो, तब तक तुम्हारा
पुष मेरे यहाँ रहेगा । गव मून-व्याग-दोनो दे दो, तव अपने पुत्र
फोते जाना।"
मरता क्या न करता ? गगदत्त ने मणी शत स्वीकार कर
ली। तिया-पढ़ी हो गई। पचि साक्षियो पंहस्सादर नी हो गये।
प्राण लेकर भगदत्त अपने घर पाया । जन्म के बारहवें दिन गगदत्त
ने अपने पुत्र का नामकरण संस्कार घडी धूमधाम से गया मोर
पुम का नाम देवदत्त रवा ।
नामकरण वाले ही दिन सागरगन्द्र धादा दवरत को
लेने भा पहुंचे। गगदत्त ने उसे रहा-
"भाइयो । मेरी ओर से नेउ सागर पन्द्र से रिना किस
को महीने भर तक तो मा का स्तन-पान कर लेने हैं। महीने भर
चादरे अवश्य नजाने।"
सेवक चले गये। नागरचन्द्र नान तो गया, पर उसने अपने
।
१२६ / फूल और पाषाण
पहरेदार गंगदत्त के घर रख दिये कि गगदत्त कही पुत्र को लेकर
राजगृह न छोड़ जाए। महीना भर बीता। सागरचन्द्र के आदमी
देवदत्त को ले गए । सेठानी गंगादेवी तो रोते-रोते मूच्छित हो गई।
मौसी दुर्गावती भी खूब रोई। दैव के आगे किसी का वश नहीं
चलता।
इधर सागरचन्द्र के घर खुशियां छा गई। उसने अपनी पत्नी
श्रीमती से कहा-
"प्रिये ! भाग्य जब देता है तो छप्पर फाडकर देता है । देवो
हमारे कोई सन्तान नही थी । अव यह देवदत्त हमारा वश-भास्कर
हो गया।"
"अोस चाटने से कभी प्यास नही बुझती। प्यास तो घर के
घड़े के जल से ही बुझती है।" सेठानी श्रीमती ने कहा-"किसी
दिन मूल-व्याजदोनो देकर गगदत्त इसे ले जायगा, तब आप क्या
कर लेंगे?"
"अव तो यह इसी घर में रहेगा।" सागरचन्द्र बोला-
"गगदत्त कंगाल है और रहेगा । वह क्या खाकर मूल-व्याज-दोनो
चुकायेगा? वडा होकर देवदत्त हमे ही अपना माता-पिता समझेगा।
तुम भी इसे अपना ही पुत्र मानो।"
सेठानी श्रीमती पति के विचारो से सहमत हो गई। पांच
धायें देवदत्त का पालन-पोपण करने लगी। अब वह रत्नजटित
चन्दन के पालने मे झूलता था।
इधर सेठानी गगादेव और उसकी छोटी बहन
दुर्गावती-
दोनो देवदत्त की याद मे रोती थी। एक दिन दुर्गावती ने अपनी
बहन गंगादेवी से
कहा-
"वहन ! पुत्र के हित में मेरी एक बात मान लो तो कहूँ ? में
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फल और पापाण | १२७
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प्रत बिना
थेष्ठी सागरचन्द्र के पर दामी बनकर रहूँगी तो उसका सब तरह से
प्याल रखूगी। वैसे भी घर मे तगी तो है ही।"
गगादेवी कुछ देर तो मौन रही । फिर बोली-
"माँ का प्यार न मिना तो मोमी का प्यार तो उसे मिलता
ही रहेगा । मैं बडी स्वाबिन हूँ । अपने स्वार्थ के लिये में महमत हूँ
कि तू सागरचन्द्र के घर नौकरी कर ले।"
"यह तो मेरा ही स्वार्य है।" दुर्गावती बोली-"एक दिन
। तुम्ही ने पाहा था कि मां और मौसी में प्रतर या है। मैं उसे
. अपना ही पुष समझती हूँ। हम दोनों के बीच यही एक महारा है।"
दुर्गावती को गागरचन्द्र जानता भी नहीं था।
गिसी मन्देह के उमने दुर्गावती को अपने पर की मेविका के रूप में
रख लिया । दुर्गावती गृह-गेविका पी, मो नेट के पर ही रहती थी।
देवदत्त का वह बहुत बाल रखती थी और इस बात गे यह सन
गतुष्ट भी मि देवदत्त सुगो के मूले में फूल रहा था।
इधर सेठानी गगादेवी और सेठ गगदत्त एक दिन रात में ही
उठ गए। राजगृह मे रहना उनके लिए मुश्किल हो गया । यो
पुप्र का वियोग, दूसरे, दुर्गावती का भी पर न रहना और नीनरी
बात यह तिनिधंगना पैर जमाए बैठी थी। राजा ने र उनी
मेहनत-मजूरी भी नही होती । प्रत अपन दुन्नि मारने काय
कही धन्ध र चले गए।
जब सेठ सागरचन्द्र ने सुना कि नगदन मा पली
पाली भन्या चला गया है तो उनका यह विमान पाना
देशात को मुभने प्रब कोई नही चीन ना |
16 । समयान्तर से देवदत्त ने आठ वसन्त देख लिये । वह ग्राउ साल का हो गया । सेठ सागरचन्द्र ने धूमधाम से उसका विद्यारम्भ किया । देवदत्त अव कलाचार्य के पास रहकर कलाएं सीखने लगा। व्यापार-वाणिज्य-कला मे उसकी प्रारम्भ से ही रुचि रही । मब मिलाकर वह बहत्तर कलामो को रुचिपूर्वक सीख-समझ रहा था। देवदत्त के पीछे सेठानी श्रीमती गर्भवती हुई । नौ महीने बाद उसने एक पुत्र को जन्म दिया। बारहवें दिन उसका नामकरण संस्कार हुआ। राजगृह के गणमान्य श्रेष्ठी उसके प्रीतिभोज में आये। सागरचन्द्र ने इसका नाम भानुदत्त रखा । भानुदत्त का लाल-पालन भी पांच धायो की देखरेख में हो रहा था। एक दिन सेठानी श्रीमती ने अपने पति से कहा- "देवदत्त से अव हमे क्या लेना-देना ? अपना प्रापिर अपना हो होता है। अब तो हमारा अगजात भानुदत्त ही सब कुछ है। नफली देवदत्त को मै अपनी सम्पत्ति मे से फूटी कौड़ी नहीं देने दूंगी।" "वात तो तुम्हारी ठीक है।" सागरचन्द्र ने कुछ कार कहा-"लेफिन, देवदत्त से मैं कहूंगा कैने कि तू हमारा पुय नहीं है ? ' फूल और पापाग / १२९ यदि मैं उसे अपना पुत्र नहीं मानूंगा नो राजगृह में मेरी बडी निन्दा होगी।" "तो फिर कुछ ऐमा उपाय करो कि माप भी मर जाय और लाठी भी नहीं टूटे।" मठानी बोली- "भानुदत्त रा अधिकार भी नदिने और देवदत्त अपने को पराया महमूस भी न करे।" "समय तो पाने दे।" मागरचन्द्र बोला--"ममय प्राने पर मैं सब ठीक कर लूंगा।" ये मव बातें देवदत्त की मौसी दुर्गावती ने भी गुननी । अब यह विशेष मतकं रहने लगी। गमय बीतता गया। देवदत्त युवा- तरुण होकर पर मा गया। भानुदत्त नी अब ममनादार हो गया पा। श्रेष्ठी सागरचन्द्र ने देवदत्त का विवाह इन्दुमती नामक एक प्रेष्टि-कन्या के साथ कर दिया। प्रब वह नग भवन में अपनी पत्नी के साथ रहने लगा। यह सब मंठानी श्रीमनी को अधरना पा। m दिन उमने देवदत्त से नल्लाफर कहा- "देवदरा। तू म तरह से योग्य हो गया है। तंग भाई भानुदत्त अभी छोटा है। तुझे चाहिए कि अपने पिता का प्यापार तू सम्भाल ले। बेटा जब बडा हो जाना तो मा-बाप का हाथ बंटाता है।" "मां । मैं सब कुछ पारने को तैयार है।" देवस बोला- "पर पिताजी तो मुझे तुषकारने ही नही दने। तुम उनको भी - समभाभी।" सेठानी श्रीमती ने अपने पति से एमास मे २हा-- "स्वामी । इस देवदत्त को मापार के बहाने धाप नमुः पार करिसी देश में भेज दो। भाप ने चाहा तो मोटा अपन भारी : निगल जाएगा। फिर हमारी सम्पत्तिमा एरमात्र उत्तराधिकारी (मारा भानुदत्त ही रहेगा।" भव तो । me- ।
१३० / फूल और पाषाण - "तूने मेरे मन की वात छीन ली।" सागरचन्द्र ने कहा- "यही मैं भी सोच रहा था। दुनिया की नजरो मे मेरा पितृत्व भी बना रहेगा।" वस, अव तो देवदत्त सागर पार जाने की तैयारियां करने लगा । सागरचन्द्र ने निर्यात किया जाने वाले माल से उसका जहाज भरवा दिया। दुर्गावती अवसर की खोज मे थी। उसने मौका देव देवदत्त को उसके जन्म का रहस्य बताकर कहा- "बेटा | मैं अभागिन तेरी मौसी तेरे ही कारण इस सेठ को दासी बनी हुई हूँ। यह सब बताने का मौका अाज हो पाया है। सव बाते तू जान ही गया है। अत अब तू लिखा-पढी करके हो व्यापार करने जाना ।" "मैं सब कुछ समझ गया मौसी।" देवदत्त बोला-'मेरे पीछे तुम अपनी बहु इन्दुमती का ख्याल रखना । विदेश से लौटकर मैं अपने पिता का ऋण सागरचन्द्र को चुकाऊंगा। फिर अपने माता- पिता की खोज करके उन्हे राजगृह ले ग्राऊंगा। भानुदत्त और मुझसे जो भेदभाव ये लोग रखते है, वह मुझसे छिपा नही ।" इम तरह मौसी दुर्गावती से सब कुछ जानने और समझने के वाद देवदत्त श्रेष्ठी सागरचन्द्र के पास आया और बोला- "पिताजी । विदेश से लौटकर मै आपकी पंजी आपको लौटा दंगा और जो लाभ होगा, उस पर मेरा अधिकार रहेगा।" "सो तो रहेगा ही।" सागरचन्द्र बोला--"तेफिन तू और में क्या अलग है ? मेरा लाभ तेरा है और तेरा मेरा ।" "प्रापली वात ठीक है पिनानी । देवदत्त बोला--"लेटिन जय पुत्र ममय हो जाए तब उसे पिता की लक्ष्मी का भोग नहीं करना चाहिए। पिता की लक्ष्मी माता के समान होती है। अत. मन में स्व-प्रजित धन का ही भोग मन्दगा।"
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फूल जोर पापाण | १३१
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"मुझे तेरी वात मो वार स्वीकार है।" नागरचन्द्र बोला-
"तुझ जैसे साहमी, विवेकी और उद्यमशील पुत्र को पाकर में धन्य
"तो फिर पाप एक स्वीकृति-पत्र लिग दीजिए । तनी मै
व्यापार करने सागर पार जाऊंगा।"
"क्या पिता-पुत्र में विश्वाम नाम की कोई चीज नहीं होती।'
गागरचन्द्र बोला-"तेरो शर्त तो मे मो वार स्वीकार कर ही रहा
हूँ। फिर लिया-पढ़ी की क्या जरूरत है ?"
"व्यापारिक लेन-देन पोर गिद्धान्त की दृटना तो पिता-पुष
में भी होती है ।" देवदत्त बोला-"पहावत भी है, हिनाच जो-जो
परगीस सो-सो' । इस समय हम पिता-पुन न होकर व्यापारी है।"
सागरचन्द्र नियत्तर हो गया। उसने एक शर्त-पत्र लिया
"भै सागरचन्द्र, नुपुर रत्नचन्द्र, अपने पुत्र देवदत्त, जो भानुदान
से दस वर्ष वदा है, को व्यापार हेतु विदेश मेज रहा हूँ। म भो
बारह रोड का माल निर्यात के लिए दिया है। विदा न नोट पर
यह बारह करोड़ की कद पूंजी मा पापन करेगा पार का नाम है
कमायेगा, उस पर एक मात्र नीरा अधिकार गा । नानु दत्त और
मै सागरचन्द्र उस ना नाम में ने भी तो अधिकारो नी ।"
यह भर्त-पत्र पर देवदत्त भने परवान
अनुकूल पवन पार यह पसनमा पाटणपुर नगर का।
जब भाग्य धनुराल होता है तो मोद मनु
ने पाटणपुर में हो अपना मावा और पर्या-TTER:
ने उने और भी
गुप
पाटमपुर में पारा देवा यात्रा
लिए पसार किया कि मी.मी. की
.
दिया।
१३२ / फूल और पाषाण -- नामक चार श्रेष्ठि-कन्यानो का विवाह देवदत्त के साथ हो गया। इन चारो के पिताओ ने रत्न, स्वर्ण, मणि-मुक्ता, वस्म आदि पर्याप्त धन देवदत्त को दहेज मे दिया। चारो पत्नियों को पाकर देवदत्त कुछ दिन के लिए पाटणपुर में ही रह गया । इधर सागरचन्द्र सोचता था कि देवदत्त अभी नहीं लौटा तो अब क्या खाक लौटेगा ? लगता है वह तूफान को चपेट में आकर जहाज सहित समुद्र मे डूब गया। मेरा बारह करोड का धन गया सो गया, भानुदत्त का साझीदार मारा गया। कुछ दिन का दाम्पत्य सुख भोगने के बाद देवदत्त को अपने कर्तव्य की याद आई। माता-पिता का ऋण चुकाकर स्वयं को मागरचन्द्र के बन्धन से मुक्त करना उसका कर्तव्य था। अत पर अपने श्वसुरो से विदा ली और चारो पलियो को साथ लेकर राजगृह की ओर चल दिया। राजगृह मे विकने लायक माल उसने पाटणपुर से अपने जहाजो मे भर लिया था। अब उसके पांच जहाज थे। एक- एक जहाज उसके श्वसुरों ने दहेज में दिया था। इधर मे भी उसे अनुकूल पवन मिला। मार्ग में उसने अपनी चारो पत्नियो को अपने जीवन का रहस्य बताकर कहा था कि राज- गृह मे दासीरूप मे तुम्हे दुर्गावती मिलेगी, वह तुम्हारी मुसिया सास है। तुम चारो उसी के पैर छूना । श्रीमती सेठानी के मत ना। इसके अलावा इन्दुमती नामक तुम्हारी एक बड़ी बहन भी है । देवदत्त के पांचो जहाज यथासमय राजगृह पहुंचे। मागरचन्द्र उसकी अगवानी करने पाया। पूरे राजगृहवासियो ने देवदन में पुरुषाय पोर भाग्य को सराहा । नारो पलियो को लेकर देवदत्त घर पहुंचा। चारो ने दुर्गावती के पैर छुए तो सेठानी श्रीमती बोल पट्टी- फस और पाषाण / १३३ "वहुप्रो, यह पया करती हो? तुम्हारी साम तो मैं हूं। इन दामी कपर क्यो छूती हो ?" "हमारे पति इनकी बड़ी बहन के अगजात है। प्रत हमारी मुमिया मास है ये । प्रापगे तो हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है।" पलियो के स्पर-में-स्वर मिलाकर देरइन बोला- "प्राग से ये न घर को दामी नही है। प्रव में भरने पर रहूंगा । प्रापसी कोप से तो भानुदत्त जन्मा है। तो ।" "मैं कब तुझे अपना कहती है।" मेटानी श्रीमती शंध में निमियाकर योगी-"पहले तो हमारा यह कर्ज दे, जो तेरे पाप ने लिया था। फिर वह भी दे, जो तेरी पढाई और विवाह में प्रचं + हुमा है।" "पापकी पाई-पाई मिलेगी।" यह महर देवदत्त भीधा रागा पजारप की राजसभा मे गया। राजाको रत्नादि की भेंट देकर देवदत्त ने अपनी बात कहलानी। न्यायप्रिय राजा ने तुरन श्रेष्ठी मागरन्द्र को पाया और देवदत्त ने प्रण का उचित धन दिलवार उरी बन्धनमुक्त करा दिया। अब देवदत्त अपने पिता की होली में पहुंचा। पिना भवन को देवदत्त ने धामी तरह में साफ कराया। उसके पिता द्वारा गाडा गया जो धन कोयला वन गया पा, परम देवदात को जमाती हुई स्वर्णमुद्राची नो रूप में मिला। यही भाष का फेर होता है। मौनी दुर्गा पौरमती, बी, नीलवनी, मेदवती पोर गुणरजरी-धो पतियो मार देत परन रिता भवन मे रहो मगा । जाजो समान मान मोशनीभरवाला। " मा ज्यापार भयो तर पलने का। पुरान गांरार-चार नोट पाये । बुध गरे भी रखे। राजा की अनुमति नकारत ने राम- पोषणामी निरपिता मननपर बिनदिन १३४ / फूल और पाषाण का ऋण हो, वह मुझसे ले जाए और जिस पर मेरे पिता का ऋण हो, वह मुझे दे जाय। अव तो देवदत्त के पास काफी धन पाने लगा। भाग्य की लीला बड़ी विचित्र होती है। देवदत्त को गिना प्रयास और भाग-दौड़ के अपने माता-पिता का भी पता चल गया। दानपुर नामक किसी नगर के व्यापारी राजगृह आये और व्यापारेक कार्य से वे देवदत्त से मिले तो वातो ही बातो मे पता चल गया कि देवदत्त के माता-पिता दानपुर में किसी सेठ की नौकरी करते हैं। देवदत्त उन्हे ले आया। अब इस परिवार में किसी तरह का प्रभार नही रहा था। गंगदत्त देवदत्त जैसे पुत्र को पाकर बहुत सुग्री या और सेठानी गंगादेवी तथा छोटी बहन दुर्गावती-दोनो पांचो पुत्र- वधुओ को पाकर फूली नही समाती थी। बहुत समय यो ही बीता। काल किसी को नहीं छोड़ता। देवदत्त के माता-पिता और मौसी-तीनो सरक्षक परतोकवासी हो गए । अब वह था और उसकी पाँचो पत्नियां थी।
17
एक पार
गुमतिनागर मुनि राजगह
में मारे। गोवर्ग
लिए देवदतो गृहद्वार पर पहुँचे । देवदन उन्हें पाहार नही
बारामा और परियो महिन दास ने मुनि ने धृषानी पोर
-
"यह मुण्डित मुनि निना मनिन । ने पनीने को गं.
प्राती है।"
मुनिन भिक्षा लिए बिना नौट गए। कुरी मिनो वादन
। अपनी पलियो माहित मृत्यु को प्राप्त मा पोर । एका जन्म
पाण्डास के पर सुपा, देव त चाहाल पुष पना और उसकी
पी पापो पलियां मही नगी बले-पालान-पुरिमा पनी । सपा-
तर मे हो भाई-वन पटेए ।
मुनि गुमनागर को घर के 3.1 प्राय या मा।
मयोग से ये पादान-पुन और पुगिसो उनका जप
। जानर उपनाम --
"प जीबी । न मे तुम पर।
तुमने तो मने बार-anा, न मानो
'भार तुम शान पर हो । म मामा..
१३६ / फूल और पाषाण पूर्वभव मे तुम पति-पत्नियां थे और इस भव मे भाई-बहन हो।" अपना पूर्वभव सुनकर चाण्डाल-सन्तानो के रोगटे खड़े हो गए। उन्होंने मुनि से धर्म ग्रहण किया और श्रावक बने । अब वे पायदान करने में कभी पीछे नही रहते थे और निष्ठापूर्वक श्रावकवतो का पालन करते थे। कालान्तर मे मृत्यु को प्राप्त कर ये रहो प्रागी देवलोक को प्राप्त हुए। विराटनगर मे जुड़े समवसरण मे मुनि धर्मघोष पुण्यपात को उसका पूर्वभव सुना रहे थे। कनकमंजरी, सौभाग्यमजरो, तिलकमंजरी, कुसुमश्री और पुष्पवती---पुण्यपाल की पानी पत्नियां भी समवसरण मे बैठी थी । कनकसेन, सुभगसेन, तिलकसेन, कुसुमसेन और पुष्पकुमार-ये पांचो पुत्र भी अपनी-अपनी पत्नियो के साथ बैठे थे। विराटनगर के नर-नारी तो हजारों की संख्या मे थे ही। पुण्यपाल का पूर्वभव सुनाने के बाद मुनि धर्मपोष x x x ने उससे कहा- - - 1 "राजन् । पूर्वभव मे तुम्ही देवदत्त थे। इन्दुमती, चन्द्रवती, शीलवती, वेदवती और गुणमजरी तुम्हारी पांचो पत्नियां आज भी . तुम्हारी पांचो पत्नियां है और बीच के एक भव मे बहनें बनी । म का चमत्कार अब तो तुमने देख ही लिया। पायदान के कारण तुम पांचो राज्यो के राजा बने हो। देवागना जैसी पांच पत्नियों के पति प्रोर देवकुमार से पांच पुत्रो के पिता बने हो । "हे राजन् । धर्म की उपेक्षा का प्रभाव इस जन्म में भी शेप रहा है, मो तुम्हे कुछ कप्ट भी उठाने पडे है । पर तुम्हारे पुग्यो ने तुम्हें हर कदम पर मम्हाना है। अपना पूर्वभव सुनकर राजा पुण्यपाल और उसकी रानियों में एक गहरा नि श्वान घोड़ा तथा पुष्पपान ने कहा- फूल और पापाण / १३७ " मुन अब तो हमें अपने चरणों की शरण दीजिए । अब की काय करने की प्रवन सा है।" "जमा करने में तुम्हारी प्रात्मा गुग्न माने ना करो।" मुनि पाहा-"लेकिन धर्म-कार्य में विनम्ब मन करो।" पुण्यपाल को दीक्षा की अनुमति मिल गई। उनली पांचो पत्नियो ने नी दीक्षा लेने का निश्चय कर लिया। पुण्यपाल ने अपने पाँची राज्य पुनो को दे दिये। कनामेन को विराटनगर राज- सिंहासन पर बैठाया, गुमगनेन । श्रीपुर का राज्य दिया, जो पूर्व में उनके नाना शूरमेन का राज्य पा। निहलपुर | राग नित- मन को मिला। रत्तपुर का गम पुष्पपती के पुत्र पुरपकुमार को दिया । मगनपुर मा राज्य मुमुनधी के पुत्र पुगुमगेन को पुत्रो की रार कर पुण्यपाल ने पारित ग्रहण किया और उगकी पत्नी भी साप चनकार माध्वी नप मनम्मिलित होगा। कुछ दिन विराटनगर में रारदा मोक्षापियो गुरु धपोष के साथ अपन बिहार किया। पिपर पुण्यपान के पानी पुर पारधर्म या पनि सरो हा न्यान-नी से अपने-अपने राज्यों की प्रजा 47 पालन पर र । राजा देते मगर उनके पिता जी freinीपी, जनता पर ध्यान रखते थे। गुरु ने धन पर एबिहार निता और मनपरी गापा घर पर है। होने एक दिन का प्रा लिया। देवाने या महोत्सव मनाया । पिर IT (पाम र ५ मुनि मोटार पापा। . राजषि पुष्पपात न १३८ / फूल और पाषाण पाँचो साध्वियो ने तपश्चर्या करते हुए पण्डितमरण प्राप्त किया और देवलोक मे गई। अगले भव मे ये जीव पुन मनुष्य भव प्रादा करके चारित्र पालन कर शिवपुर के अधिकारी बनेंगे। भव्य जोर इसी तरह जन्म-जन्मान्तरो मे भटकने के बाद अन्त मे मुक्ति-धू वरण करता है । यही पुण्यपाल ने किया था।
हमारे महत्वपूर्ण प्रकाशन १-६ कर्मग्रन्य [भाग १-६] मम्पूर्ण सेट : जन दर्शन की मूल कु जी है- कम मिद्धान्त | कर्म निद्धान्न को सम्यकरूप में समभने पर ही जैन दर्शन का हार्द समझा जा माता है। कम मिद्धान्त का सुन्दर अत्यन्त प्रामाणिक विवेचन पदिए- कर्मप्रत्य- मूल रचयिता : श्रीमद् देवेन्द्रमूरि व्याख्याकार : श्री मरधर केसरी मिश्रीमनजी महाराज सम्पादक श्रीचन्द मुराना : देवकुमार जैन ७ जनधर्म मे तप स्वरूप और विश्लेषण : तप मर्यागीण स्वरूप पर शास्त्रीय विवेचन । तप सम्बन्धी ग्रने चिन। ८ पच सग्रह भा १ मे १० ९-१६ प्रवचन साहित्य-(अप्राप्य) १ प्रवचन प्रभा २ धवलशान धारा ३ जीपन योनि ४. प्रपचन सुधा ५ गाधना पध पर ६ मिश्री कीनिया ७ मियता की मणियाँ ८. मिधी विचार वाटिका ७-२४ उपदेश साहित्य- मज वसा पर पाठ महत्वपूर्ण लघु पुस्तिकाए जापन सुधार (ममुक्त जिल्द) १५-३४ मुशमं प्रवचन माना (धर्म पर १० पुग्न) १५-३५ बाय साहित्य जग रामकतारमादा - - - वीज और वृक्ष भविष्य का भानु जैन पाडव यशोरसायन (नवीन परिवद्धित तुलनात्मक भूमिका व परिशिष्ट गुप्त तकदीर की तस्वीर ३८-४७ उपन्यास व कहानी-साहित्य- साझ सवेरा किस्मत का खिलाड़ी भाग्य कोड़ा धनुप और वाण फूल मोर पापाण एक म्यान : दो तलवार शील सौरभ तकदीर की तस्वीर अन्य साहित्य : ४८. विश्व वधु महावीर (अप्राप्य) ४९. तीर्थंकर महावीर ५० संकल्प और साधना के धनी: धीमरुधर केसरी मिश्रीमलजी महाराज ५१. दशवकालिक सूत्र (पद्यानुवाद) ५२. श्रमणकुलतिलक प्राचार्य श्री रघुनाथजी महाराज ५३ मिश्री विचार वाटिका (प्रवचन)-प्रेम में ५४. मिश्री काव्य कल्लोल (कविता-भजन सग्रह) ५५. (दो भाग में-अमृत सागर) ५६. अमृत नवशति ५७. जीवन निर्माता के तीन सूत्र ५८. जीवन निर्माता के तीन सुत्र (Eng ) ५९. तेपोज्योतितालीस - मम्पर्क करें- श्री मरुधर केसरी साहित्य प्रकाशन समिति पीपलिया बाजार पो० व्यावर (राजस्थान) OC
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