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Saye Aur Darkhta

Tarani Sinha · 2011/03

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साये ओर दरख्त

बोधि प्रकाशन
तारिणी सिन्हा
तृतीय सस्करण 2000
(चाधि प्रकाशन से प्रथम सस्करण)
आवरण सजीव कुमार

साये और दरख़्त
तारिणी सिन्हा
बोधि प्रकाशन
जयपुर 302015

साये और दरख्त - मैं एक साधारण पाठक हूँ। टॉम मौरिश की यह पुस्तक मुझे किसी स्नेही न मेर पचासव जन्मदिन पर उपहार स्वरूप दा था। इतना कीमती कितार पाकर मैं बहुत ही पुलकिन हुआ था। इस पुस्तक को इतिहास की ओढनी म ढका एक यात्रा सस्मरण समझं या चित्रकारी का एक शानदार एलबम - कहना मुश्किल है। यो बुक स्टालो पर ऐसी किताबे देख उसे लपककर उठाना उलटना-पलटना मेरा आन्त में शुमार है परन्तु जब भा मेन पाउण्ड या डालर म लिख मूल्या को रुपये मे तौलने की कोशिश की तो गल मे कुछ लिजलिजा मा गटकने जैसा एहसास हुआ। बहुत हुआ तो एकाथ पॉकेट बुक या मैगजीन खरीद अपनी झेप मिटाने का प्रयास किया। मैं टॉम के किताब को बात कर रहा था। आज बावन पार करने के बाद मैं उसक अन्तिम पृष्ठ पर पहुचा हूँ। शायद अच्छे भोजन की तरह मैं इसे स्वाद ले-लेकर चखना चाहता था फिर यह कोई कहानी या उपन्यास तो था नहीं निसे लगातार पढ़ जाता। वैसे कितनो हो कहानियाँ इसम भरो पडो हैं एक से बढकर एक रस भरी रोमाटिक और लोमहर्षक भी। टॉम लिखता है- मन झकझोरने वाले जो भी किस्स इस पुस्तक मे मिले समझ ले वा आमेर प्रवास के दौरान मैंने अपने गाईड-दोस्त भवर सिंह से सुने थे। जाहिर है टाम इस भवर सिह से बहुत ही अधिक प्रभावित था। इस पुस्तक का लगभग हर पना इस बात का साक्षी है। होना तो यह चाहिए था कि यह पुस्तक टॉम भवर सिह को भेट करता परन्तु उसने एसा न कर अपनी इस महान कृति को चन्द रोज को मुलाकातो शेला रैनियल के नाम कर दी। आखिर क्यों ? पहले पने को भूमिका पढ कर मोचा था शायद शेला उसकी प्रेमिका होगी परन्तु ऐसा तो कुछ नही यह ख्याल मुझे अक्सर उलझन म डाल जाता। फिर अचानक मन में एक बात कौंधा जो एक छाट से बिन्दु से पसरवर विशाल प्रश्न चिह्न- सा मुझे चिटाने लगा। टाम को शेला और भवर के बीच स उगती कहानी क्यो नही दिखी ? वह तो बड़ा हो चतुर है किस्से गढने मे क्या उसने जान बूझकर इन दो को दो किनारो की तरह अलग अलग छोड दिया कि पाठक भा कुछ अपनी कल्पना की उडान भर सके। d ससार की सभी सयपशील महिलाआ को सादर समर्पित उपन्यास एक यह कहानी यो ही आरम्भ होती है- शेला डैनियल को सस्नेह समर्पित। उस शेला को जिसे सुन्दरी तो नहीं कहा जा सकता परन्तु जिसम मानो आकर्षण का पुंज विराजमान हो नीली आँखे ओर भूरे बालो के अलावा सब कुछ सीधा-सादा फिर भी जैसे खिचाव का कवच पहने हो। यू तो हमारी मुलाकात महज चन्द दिनो की ही थी जैसा अक्सर दो सैलानियो मे हो जाया करता है। परन्तु बहुत गहरे वह मेरे जेहन मे यू समाई थी कि आज इतने सालो बाद भी लगता है सामने बैठी है। वही होटल का लॉन है और इस पुस्तक मे रची-बसी सभी घटनाये किस्से कहानियाँ मैं उसे एक बार फिर सुना रहा हूँ। मैं आज भी हैरान हूँ ऐसा क्यो ? कुछ प्रश्न शायद प्रश्न ही रहेगे परन्तु वह जहाँ कहीं भी है मेरे इर्द- गिर्द ही है और रहेगी। टॉम मौरिश सोमवार-24 दिसम्बर 1956 रात्रि 1100 बजे दो ईस 1910 से 1920 के बीच भारत का कोई कोना रही है." शर्तों पर' । - जीने की चाह क्या कोई गुनाह है ? अगर एसा हाता तो मौत की जरा-सी सरसराहट जीव को चौकन्ना नहीं करती। प्राण का तो धर्म है अप्राण चेष्टा कर अपने को बचाना और यही तो किया था मानक ने। कल्पना को आँखा पर सवार मन क्या उस त्रासदी को छू भी पायगा जो उस ओरत न देखा सही और भोगी। हिकारत भरी वह नजर जो हजारो सालो से नारी जीवन को एक ही कोण से घूरती आ रही है, यह कहती आ 'हम तुम्ह जीने नहीं देगे और यदि मरन दग तो वह भी अपनी और यही शर्त ताड भाग निकली थी मानक, रह लेती विधवा बन बिटवा का मुंह देख किसी भी शर्त पर, परन्तु उसे तो रिवाजो की चिता पर स्वाहा होना था। सती हो देवी बनना था। बस वह रात ही उसकी अन्तिम रात थी। इस जीवन का इतना जल्द पटाक्षेप बाप के घर से मुश्किल से सालह पार कर जब इस दहलीज पर आई थी तो उसने इसे एक नया जावन समझा था। किन्तु हाय रो किस्मत। यह जीवन तो सम्पूर्ण छलावा निकला। दस वसन्त भी नहीं देख इस नये जीवन के और अन्तिम सफर की तैयारी। 8 "कोमल - । अपनी कोशिशा मे तो मानक ने कोई कमी नहीं रखी थी। जीवन को समझौता नहीं माना था। हाँ - समझौते की सीढियाँ चढकर ही उसने अपना नया कुनबा सभाला था। कुछ ने सशय तो कुछ ने रोष प्रकट किया था उसके ब्याह पर। दबी जवान माँ ने भी विरोध किया था कली को दुहाजू के गले बाँध रहे हो। सुना है लडका चालीस का है तो यह तो उसकी बेटी जेसी हुई।" हमेशा की तरह मर्द औरत पर हावी हो गया था। पिता ने माँ को घुडकी दी-"तुम चुप रहो लडका चौहान घराने का है। पैसेवाला है। दूर-दूर तक ऐसी धाक है कि पूछो मत - तुम औरता को क्या पता बस मीन-मेख निकाल दिया - अरे अमर सिह जैसा लडका ढूँढे नहीं मिलेगा।" मानक सब कुछ सुन-जान चुकी थी। उसके मन की उमगें तो कब की जलकर राख हो चुकी थी। अब भय और आशकाओ को गले लगाये चलते जाने के सिवा चारा भी क्या था। सुहागरात को तो यह भय हौआ ही बन गया था। किवाड के सीकड लगने की आवाज हथोडे की चोट-सी लगी थी। चमरौंधे जूते की मच-मच को आवाज मानो मानक की धडकनो को एक-एक कर बन्द करती बढ़ती आ रही थी। अगला एक चांप और उसकी साँस बन्द। दबी आकाक्षाये डर, विवशता उस पर उपवास और ब्याह के रस्मो की हरारत - सवन मिलकर उसे धर दबोचा था और वह सन्न हो लुढक गयी थी। कितने उमगों से ब्याही गई थी मानक इस चाहान घराने मे। सभी खुश थे पर शीशे पर पडी लकीर जैसे कहीं कुछ खिचा था सब के मन पर - आखिर दूल्हे की दूसरी शादी जो ठहरी। फिर उम्र म दो दूनी चार का फर्क - फिर भी चन्द महीनो मे ही मानक को शकाय आस्था म बदलने लगी थी। कितना प्यार भी ता करता था अमर सिह । छार के जनम के बाद तो जेसे अमर सिंह जारु का गुलाम ही हो गया था। एस ही किसी कमजार क्षणा म अमर सिह ने दिल खाल कर रख दिया था अपनी दूसरी पत्नी क सामने। साथ ही उसने कसम उठाई थी - यह लुट-पाट और डाकजनी 9 छाड देगा। सचमुच यह काम अब उम घिनौना लगने लगा था। कभी- कभी उसे लगता उसके बड़े भाई इस सबके लिए उस उकसात थ। क्या वह उनके हाथ की कठपुतली नहीं बन गया था? उन्र तो बस एक ही चाव था खेत पर खत खरीद जाओ। कभी टोका भी ता नहीं, आखिर अमर इतने पैसे लाता कहाँ से है ? क्या उन्ह पता नहीं था व्यापार के झूठ मुखौटे के पीछे क्या कर रहा है अमर ? पर इस छोरी को तो देखो चन्द महीना म ही सब कुछ भांप गई। शुरु-शुरु म अमर को लगा था मानक वही पुराना खेल खेल रही है, भाई से भाई को अलग करने का, चूल्हे चौक का बटवारा कर स्वयक अस्तित्व बनाने का। अमर भडका था उसे कितनी खरी-खोटी सुनाई थी, हाथ भी तो चला बैठ था। मार खाकर मानक न रोई थी न गुस्सा किया था। बस अजीब नजरा से उसे घूरा था जिसम था न भय, न ग्लानि, कुछ विद्रूप सा भाव था। शायद इन्हीं नजरा ने अमर के मन में शका का बीज बोया था और उसने अपने आँख, कान खोल लिये थे चौकना हा गया . था। । तभी उसे पता चला था उसका दाया हाथ उधो रावत भाई साहब से मिला था। उनका दलाल-जासूस- क्या कह । कब अमर ने कैसे हाथ साफ किया, कितना उसके हिस्से मे आया सब को खबर देने वाला। उसे घिन-सी आ गई अपने बड़े भाई के ढोग से जो बडा कर्मकाण्डी और दयावान का जामा पहन गाँव का मुखिया ही नहीं, बल्कि एक धर्मात्मा भी कहलाता था। सारा गाँव उसके कथन का देववाणी ही ता समझता था। छी धूर्त कहीं का। अमर ने ठान ली यह धधा वह हर कीमत पर छोड देगा परन्तु गहरे दलदल म जा पड गया क्या आसानी से उबर पाया है कभी अमर ज्यों-ज्या छुटकारे की कोशिश करता और धसता चला जाता। उसे लगता उसके चारा ओर एक जाल-सा कसता जा रहा है। शका अब भय का रूप लने लगी थी। मानक भी अनजाने ही सशकित 10 रहने लगी थी। आखिर हिम्मत कर उस दिन अमर ने लूट के माल के बटवारे के समय अपने दल वालो को साफ-साफ कह दिया - जो हुआ बहुत हुआ, आगे बस- अब उसका रास्ता बदल गया है फिर उसने अपने ऊँट को दुलत्ती लगाई और मुड चला। मुडते-मुडते उसे उधो के चेहरे पर खेलती मुस्कान को एक झलक मिली और उसका मन न जाने क्यो काप उठा। दूसरे दिन मानक को पता चला वह विधवा हो गई। भाई साहब कितना रोये थे। सारा गाँव उमड पडा था मुखिया के दुख मे शरीक होने। आह । कितना कर्तव्यनिष्ठ भाई बात तो यही फैली थी - कुछ मुसाफिरो को बवाते-बचाते रेगिस्तानी डाकुओ से मुठभेड मे अमर सिह खेत रहा था। एक से दो दो से दस फिर सौ और हजार मुँहो की गरमी पा यह झूठ का मुलम्मा सच का सोना बन गया था। गाँव के धर्मात्मा पर किसे अविश्वास होता भला आखिर यह वाणी तो उसके मुंह से ही निकली थी। तभी धर्मात्मा का फरमान एक और एलान बन गया - "गाँव मे सती देवी का भव्य मदिर बनेगा, उस स्थली पर जहाँ वीर अमर सिंह की चिता पर साध्वी मानक सती होगी ।" परन्तु क्या धर्मात्मा की धूर्तता उसको धर्मपत्नी से छुपी थी ? उसे तो सब पता था यह भी कि मानक का बिटवा भी कुछ ही दिनो का मेहमान रह जायेगा। फिर अमर सिह का बडा भाई उसकी सारी जायदाद पर साँप की तरह कुण्डली मार कर बैठ जायेगा। किन्तु वह ऐसा हरगिज नहीं होने देगी। भजन, पूजा जाप और होम के हगामे में पास के गाँव के सती चबूतरे से चरणामृत का घट लिये जेठानी मानक के कमरे गई थी। यही सती का अन्तिम पय होगा। मन मे घुमडती घृणा को कितने सहज ढग से छिपाया था मानक की जेठानी ने। कैसी निर्विकार दिखती थी। परन्तु उसे पता था इस घट के चरणामृत मे कौन-सा विष है जो पूर्णाहुति के पहले अपने शिकार को न मरने देगा न जीने का सही एहसास ही रहने देगा। नीम बेहाशी की-सी हालत में मानक किसी जादूगर के मोहपाश मे 11 वधी-सी चिता पर जा बैठेगा।दाक्त अगारा पर अगर मार भगा आ भी ता भीड की उन्माद भरी जय-जयकार चीरा,चिबाट और ढाल करताल के कलरव म सर कुछ दर जायगा। नहीं। ऐसा कुछ नहीं होन देगी जठानी। तभी मनाच्चारण व याच आरती उतारती यह बाला थी "इस आरती के बाद सभी वारर चल जायग दरवाजा लगाकर थाहर से सोकड लगा दिया जायगा, तू कान क बडे घट के जल स सान कर सुहाग का जाडा पहन इस चरणामृत का पान कर लेना फिर अगले तीन पहर तक अपन पतिदेय, कुलदेव, ईष्टदय सबका नाम ले मन हा मन जप करते रहना। तडके सयरे हम तुम्र लेने आयगे।" फिर सबका एक-एक कर बाहर कर वह मानक के काना म फुसफसाई थी - "भाग जा करमजली, मैंने सिडको की लकडियाँ काट दी हैं आरो भी वहीं धरती पर पडी है उसे या ही छाड जाना। उत्तर-पूर्व का रख लेना - अमर का पुराना ऊँट जा तुम्ह खूब पहचानता है धूई क पार दीवार के किनारे मिलेगा. धूह के दूसर किनारे पर उसका दूसरा कैंट होगा वहाँ से दक्षिण रख कर दौडा दना। बिटवा का मोह मत करना। वैसे भी उसे कल अनाथ होना है। मैं वचन देती हूँ उसे भी मरने नहीं दूगी, पर अभी तू भाग, जितनी दूर हो सके निकलते जाना, रकना नहीं सोचना नहीं मुडना नहीं जल्दी बस जल्दा निकल भाग, तुम्हें मरी कसम, बिटवा की कसम" आचल के कोर से आँखे पाछती जेठानी मुडी - फिर खट् किवाड का सीकड लग गया। मानक भौंचक बन्द किवाड को निहारती रही। उसे लगा वह सुत्र हुई जा रही है। अचानक जीव ने अपना धर्म दिखाया उसे बचना होगा। कहाँ भान हो पाया था किसी को। हाम-जाप, भजन-पूजा मृत पति के साये मे सब कुछ मन पाण से करती दिखी थी मानक। फिर कैसे सदेह होता और सच पूछा जाये तो पट बन्द होने के पहले स्वय उसे भी तो इसका गुमान नहीं था। आखिर अधविश्वासो आँसे गाफिल हो गई और रात के अधेरे मे वह भाग निकली। 12 दो महीने दो युग से लग रह थे उसे भी और उसको शरण देने वाले उस स्टेशन मास्टर को भी। कितना बड़ा खतरा मोल लिया था उसके रक्षक ने। नहीं। मानक उन्ह या हर पल सशकित - भयभीत जीते नहीं देख सकती। टोह लग जाने की आशकाये इर्द-गिर्द मडराने लगी थी। मानक ने सोचा अधेरे मे कूद ही पड़ी तो नदी क्या, खाई क्या ? और एक बार फिर वह भाग चली। चुपके से जा बैठी एक मालगाडी क एक डिब्बे मामालगाडी तो अपनी पटरी पर चल पडी किन्तु मानक के जीवन की गाडी पटरी से उतर नहीं गई थी ? अगर हाँ तो फिर ठहराव कहा और कैसा? भ तीन - कितना कम समय निकाल पायी थी शेला उस जगह के लिये। प्रीमियर इटरनेशनल बैंक के लदन ऑफिस की एक होनहार अफसर होने के नाते उसे इस स्टडी टीम के साथ बाहर भेजा गया था। शैला ने इसे दैवयोग ही समझा था। क्या न समझती। इस टीम में शामिल होने के लिये उसने काफी हाथ पैर जरूर मार थे पर अपने प्रयासों के फलीभूत होने की आशा नहीं के बराबर ही थी। लॉटरी निकल आने जैसी हो खुशी हुई थी उसे। पता नहीं कोन-सा आकर्षण था उसके हृदय म भारत के लिये। शायद इसलिए तो नहीं कि उसकी माँ भारत की थी और पिता की कर्मभूमि भी यही थी। पर कहाँ कुछ पता था उसे इस देश के बारे मे।सुना था वह भी वहीं जन्मी थी परन्तु किसी ने कभी विस्तार से बताया क्यो नहीं ? बचपन मे पिता ने कभी चर्चा छेडी भी तो माँ के आते ही बात बदल दी और मां से उसने जब भी यहाँ के बारे मे पूछा वह इधर-उधर की सतही बाते बता बडी सफाई से बात का रुख मोड देती। आते समय शेला ने अपनी जिज्ञासा को एक बार फिर दुहराया था ओर हमेशा की तरह माँ ने फिर बात टाल दी थी। फिर कुछ रोप भरे लहजे में ही उसने माँ से कहा था- "बैंक की तरफ से एक स्टडी टीम में दो हफ्ता के लिय इण्डिया जा रही है। ' उमने बात कुछ या कही थी मानो इस दो हफ्ते में भारत की पूरी जानकारी पा लेगी।

माँ ने शान्त गम्भीर शब्दो म बस इतना कहा था-"अब तुम अपने पेरो पर खडी हो गयी हो और फैसले खुद कर सकती हो।" शेला इस कथन का अर्थ जानती थी। माँ को उसका फैसला भाया नहीं था। शेला को लगा मा के चेहरे पर कुछ क्रोध-कुछ खीज के भाव खिच आये थे। क्या सचमुच मा खीझी थी या वह स्वय। जब से जार्ज वाला हादसा गुजरा है वह मा से सीधे आँख कहाँ मिला पाती है। उन्हाने तो उसे न कभी उलाहना दिया न हिकारत भरी नजरो से देखा। अपराध बोध तो उसे आ दबोचता है वरना माँ न तो निश्छल मन से सदा की भाति उस आधी में भी उसकी लपलपात लो का अपनी हथेलिया से ढक लिया था। ममता की रौ म उन्हे यह भी भान कहाँ रहा था कि उनके हाथ जल जायेगे। कुछ हद तक जले भी थे। इतना सब समझते हुए भी शेला दोनो के बीच आ गई दरार को कहाँ पाट पाती है, कब उबरेगी वह इस हीन भाव से। उसका मन घबराने लगा। वह चाह कर भी आगे बात करने की इच्छा न जुटा सकी और चुपचाप अपने कमरे म लौट गई। आज दिल्ली आये उसे चार दिन हो गये। दो-दो दिन कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में बिताने के बाद यह चौथा पडाव था। स्टडी टीम ने अपना काम करीब-करीब समेट लिया था बाकी के तीन दिन सदस्यो की सैर के लिये थे। औरा की तरह उसने भी सोचा था अगले दिन आगरा निकल जायेगी, ताज देखेगी। यह तो भला हो उस पेन्टर का जो आने के दूसरे दिन उसे हाटल मे मिला था और बार-बार किसी न किसी बहाने मिलता ही रहा था। यह ता उसी का आग्रह था कि आगरे को जगह वह जयपुर को चल दी थी। पहले दिन तो शेला टॉम से चिढकर होटल के लाज से बाहर चली आई थी। जिस माहौल म बढी पली और अब भी रह रही है उसके विपरीत अपना यह आचरण बाद में उस कुछ अजीव-मा लगा था। पता नहीं यह महज इत्तफाक था या टॉम को समझा बूझी हरकत। वह सान को मज पर शला की बगल वाली मीट पर आ बैठा था। । 16 . . आप शायद मेरा परिचय जानन को उत्सुक हैं ?" शेता ने ही पहल की थी - "मेरा नाम शेला डैनियल है।" 'धन्यवाद मेरा नाम टॉम मौरिश है। में एक टूरिस्ट हूँ अमरिकन- आप शायद अग्रेज हैं - मैं आपके स्टडी टीम के बार में जानता हूँ सास बात यह है कि आप सुन्दर तो हैं ही आपका चेहरा भी मेरा बहुत जाना पहचाना है।" टॉम एक ही साँस में बोल गया था। माना डर रहा हा, दुबारा बोलने का मौका ही न मिले। "क्या कहा?"शेला को कुछ अचम्भा हुआ इतना तो वह जानती थी उसके नाक नक्श ठीक-ठाक हैं, शरीर सुडौल है, पर ऐसा कुछ नहीं कि जिधर देखे उधर बिजली गिर जाये। उसने चुप रहना ही बेहतर समझा। टॉम ने फिर काफी कुछ इधर-उधर की बात को अपना परिचय विस्तार से दिया। दो ही दिनो मे दोना के बीच जैसे वर्षों की दोस्ती सिमट आई। तभी उसने शेला को राजस्थान के राजे-रजवाडे की रूमानी कहानिया सुनाई थी। वहाँ बनाई अपनी पेटिंग्स भी दिखाई थी साथ ही सुनाई थी - जोधपुर जयपुर आमेर और कोटपूतली के टूटे किलो मे सिसकती दफनी झकझोर देने वाला दास्तानें। पता नहीं इसम कितना सच और कितना ककड-पत्थर था। इतना तो ति सदेह साबित होता था कि टॉम एक सफल चित्रकार ही नहीं कुछ कवियो सा दिलवाला एक भावुक पर ठास कथाकार भी था। यह उसकी भाषा की चासनी और कहने का अन्दाज ही था कि वह घटा एक चित्त सुनती रही - सिर्फ सुनती रही फिर सीटिंग खत्म होने के पहले जो बात टॉम ने उस सारगी वाल क बार में कही थी वह चोंका देने वाली थी। महीना भर क अपने आमेर प्रवास मे टॉम रोज ही उस सारगी वाल से मिलता रहा था। शुरु-शुरु में तो नही पर तासर चौथे दिन से बातचीत का सिलसिला कुछ कुछ बठने लगा था। वेस तो टाम न एक तरह स किले में ही अपना खमा डाल लिया था। बस रात को पास के 16 होटल म साने चला जाता। सुबह से दिन ढले तक किले के भिन्न-भिन कोना खाइया म दुबका टॉम अपनी चित्रकारी मे डबा रहता और साझ ढले जव टूरिस्टा का ताता टूट चुका होता कुछ देर उस सारगी वाले की बीवी की दुकान पर बैठ गप्पे लडाता-हाँ उठने से पहले अच्छी टिप्स देना नहीं भूलता। धीरे-धीरे तीना बहुत घुल-मिल से गये थे-सारगी वाला भवर सिह उसकी पत्नी शोभा और टॉमा हफत भर बाद तो भवर सिह, टॉम के रगमच का सूत्रधार ही बन गया था। अब टॉम अक्सर उस दम्पति के सग उनके झोपडे तक निकल जाया करता था। एक रात गप्पो का सिलसिला कुछ या चला कि भोर का तारा भी डूबने को आ गया। शोभा तो पास को खाट पर उठगी-उठगी ही सो गई थी। ऐसा कुछ अब ज्यादा ही होने लगा था। शोभा को कुछ चिढ सी होने लगी थी परन्तु टिप का मोह भी छोडे कहाँ बनता था। उस रात भी भवर और टॉम काफी देर तक बाते करते रहे थे। किस्से कहानियों की बाते, राजे-रजवाडो के किस्से, गाँव के छोरे-छोरिया के किस्से, जादू-टोने और अधविश्वासो के किस्से। पता नहीं कहाँ से सीखा था यह सब भवर ने। उसी रात उसने सारगी वाले को बडे गौर से देखा था, तलवार कट मूछे, घने बाल, गोरा चिट्टा रग आँख कुछ भूरी और पारदर्शी-एक बचपने का एहसास दिलाता मासूम-सा। टॉम की बातो से शेला ने एक अजीब सा खाका खींचा था उस सारगी वाले का गरीब पर मुफलिस नहीं चालाक पर चालू नहीं, कुछ- कुछ भावुक परन्तु अपने नफा नुकसान को कुछ अधिक ही पहचान करने वाला कुछ मुहफट और शायद कुछ स्वार्थी भी। शेला के जेहन म टॉम के उस हीरोकट भवर सिह की कुल मिलाकर कुछ ऐसी ही तस्वीर उभरी थी उसकी बताई कहानिया से कहानिया के पात्रो पर उसकी टिप्पणी और विचारा स-अपनी दिनचर्या पर एक अव्यक्त आक्रोश से। उसकी पत्नी इन सब में गोण - बहुत गौण थी। इस पृष्ठभूमि में टॉम का वह जुमला शेला को बुरी तरह झकझोर गया था- "जानती हैं मिस डैनियल आपका चेहरा आपके अन्दाज भवर से बहुत मिलत जुलते हैं हा आपका आँस जहाँ नीली गहर झाल सी हैं, उसकी भूरी आम हिन्दुस्तानिया जैसी।" 'आप कहना क्या चाहते हैं ?"शेला के स्वर म रोय था। उसे लगा टॉम उसके व्यक्तित्व के कमजार पक्षा पर छींटा-कशी कर रहा है। 'माफ करना मेंने कतई आप पर कटाक्ष नहीं किया बस या ही रौ म कह गया मुझे सचमुच खद है।" टॉम ने शला का हाथ अपने हाथा म ले कुछ ऐसे अन्दाज से यह सब कहा कि शेला का क्रोध झट काफूर हो गया। आमेर (अम्बेर) का किला किला म बेमिसाल न सही पर अनूठा जरूर है। सेलानियो के लिए शायद बेमिसाल भी। दुलकते हाथियो पर सवार ये देश-विदेश के टूरिस्ट । मन्थर गति से चलता यह काला स्थूलकाय जीता-जागता जहाज उन्हे ले जब किले की ढलान से ऊपर उठता है तो एक विचित्र-सी समा बँध जाता है। किले की फुनगी पर चढ़े सैलानियो लिये यह दृश्य इतना लुभावना होता है कि वे क्षण भर को सब कुछ भूल कल्पना की दुनिया मे कुछ यो खो जाते हैं जैसे वे ही राज-महाराज रहे हो, उनकी सवारी उतर रही है और दरबारी कोर्निश कर रहे हैं। जब मोह भग होता है एक हल्की-सी कसक लिये वे आगे बढ चलते हैं। उनमे अधिकाश जो पाव- पेदल ही किले की चढाई चढते हैं कुछ-कुछ छूट जाने कुछ कमी रह जान का टीस लिय लौटत हैं शायद चन्द रुपये और खर्च कर ख्वाबो को थोडा और साकार कर पाने के अवसर को खो देने की मीठी चुभन से उभरी टीस। हाय रे मानव मन! परन्तु शेला ने तो बाजाप्ता हाथी की सवारी की थी।टूरिस्टो के सग हो-हल्ला किया था। फोटोग्राफ्स लिये थे। द्वार पर हुए स्वागत समारोह से वह बहुत प्रभावित हुई थी। दोपहर ढले तक उसने किले की परिक्रमा लगभग पूरी कर ली थी। प्यास लग आई थी कुछ ठडा लिया फिर पास 18 ही के गिफ्ट सेन्टर से कुछ कार्डस, कुछ छोटे-माटे सामान ले सामने घास के मैदान पर एक पेड के छाये मे सुस्ताने लगी। तभी मुख्य दरवाजे के पास बैठी मूगफली बेचने वाली पर उसकी नजर पड़ी। वैसे कई खोमचे वाले भी वहाँ थे। आँखो-आँखा म ही काफी तोल-मोल कर उसने अनुमान लगाया शायद वही शोभा हो। फिर उसके पैर उधर ही हो लिये। औरो की देखा-देखी कुछ चने खरीदे। अचानक पड पर बैठा एक बन्दर उछलकर आया और उसके हाथो से चने का ठोगा झटककर ले भागा। पल भर को वह सन्न रह गयी। इस आकस्मिक हमले से वह बुरी तरह घबरा उठी थी। उसका मुह पीला पड गया था और एक क्षण को ऐसा लगा, अब गिरी तब गिरी। इधर दर्शको के लिए यह एक मजेदार तमाशा था । चन्द मिनटो मे शेला सम्भल गई। फिर से चने खरीदे और कुछ दाने सामने इधर-उधर उडते कबूतरो की ओर फेके। देखते ही देखते बीसो कबूतर उसके इर्द-गिर्द दाना चुगने लगे। अब उसे धीरे-धीरे मजा आने लगा था। कुछ देर बाद इस खेल से ऊब वह लौटने लगी। शाम भी तो होने को आ गई थी। तभी उसने देखा चने वाली के बगल मे उसका मर्द आ बैठा था। यही होगा वह सारगी वाला भवर सिह । वह चने वाली के पास वाली सीढी पर जा बैठी और लगी इधर-उधर की बातें करने। बाते क्या थी इशारे और हाथ-पाँव के भाव ही अधिक थे। वैसे टूटी-फूटी हिन्दी शेला को आती थी। मां-बाप ने कुछ सिखाया जो था। फिर विदेशी टूरिस्टों के साथ मेल बैठाने के लिये यहाँ धधा म लगे लागो ने भी तो टूटी-फूटी अग्रेजी बोलने में महारथ हासिल कर ली थी। इसी खिचडी से शेला और शोभा दोना मजे मे काम चला रहे थे। बीच-बीच म शेला भवर सिह के तरफ भी मुखातिब हा लेती। बातो का सिलसिला बनाये रखने के लिय उसने टॉम की चर्चा शुरु को फिर क्या था अब तो बाता की पूरी बागडोर भवर सिह ने अपने हाथा म ले ली। काफी देर तक यो ही बात चलती रहीं। 19 "काफी कुछ मेल है उन दोनो म" शेला ने मन ही मन सोचा। "पग्गड और भूरे लस लगा कर भरसक वह उसका डबल बन सकती है सिफ उसका कद कुछ छोटा पडेगा।" यह सब सोच शेला के होठा पर एक हल्की सी मुस्कान खिच गई। इधर भवर सिंह अच्छे इनाम की आशा म एक रामाचकारी कहानी सुनाने लगा था। भला भवर का एसे श्रोता भी कहाँ मिलते। वाकई उसके बोलने का अन्दाज, चेहरे के उतार-चढाव का अपना एक अलग ढग था। शायद अवसर मिलन पर वह एक सफल अभिनेता बन सकता था। कहानी खत्म कर भवर सिह ने कुछ ऐसे अन्दाज से शेला की आर देखा कि उसके हाथ अपन आप पस की आर बढ गये और शेला ने पूरे सौ का नोट उसकी ओर बढा दिया। भवर सिह की बाँछे खिल गई पर उस सरकते पल मे शेला को ऐसा लगा उसकी आँखो मे एक झिझक भी है। मुसकुराते हुए उसने वह नोट चने वाली को पकडा दिया। शोभा लगी उसकी बलाइया लेने। फिर खुशामद भरे लहजे मे उसने शेला की तारीफ के पुल बाँध दिये कि वह बहुत सुन्दर है बड़ी दिल वाली है आर उसके सिर पर बँधा लाल रेशमी रूमाल तो उसकी खूबसूरती मे चार-चाँद लगा रहा है। शेला ने इस अदाज मे अपनी तारीफ कभी सुनी ही नहीं थी। अचानक ही उसके मन मे शरारत हिलोरे लेने लगी। फिर जाने किस प्रेरणावश उसन सिर स रुमाल खाल शाभा के माथे पर बाँध दिया। शाभा ओर भवर सिह दानो ही बडे जोशो-खरोश से थैक्यू-बैंक्यू करने लगे। शला का लगा यह एक महज औपचारिकता नहीं, बल्कि सचमुच प्यार का उद्गार था। पता नहीं क्या उसका मन कुछ भारी हो गया। फिर वह धीरे-धारे सुस्त कदमो से किले की ढलान उतरन लगी। हठात् उसने पीछे मुडकर दखा दम्पति भी बाहर आ गये थे। उसे मुडते देख अपना हाथ हिलाने लगे थे। वह भी उन दोना को बाय-बाय कर आगे बढ़ चली। तब तकमाड भा आ गया था। 20 चार अधेरा घिरने लगा था। शोभा ने दुकान बढाई और अपने जुगत का सामान गट्ठर मे डाल सिर पर रख लिया। भवर सिह भी अपनी सारगी और झोला कन्धे पर डाल शोभा के सग किले की ढलान उतरने लगा। साफा बाधे भवर सिंह और घाघरा चोली म शोभा टूरिस्ट विभाग के विज्ञापन की विशेष जोडी से दिख रहे थे, पर समा तो बध रहा था शोभा के पैरो मे पड़ी झाझर के खनकने से। कुछ देर दोनो खामोश चलते रहे, फिर शोभा ने ही चुप्पी तोडी- "क्या रे मन उदास हो गया क्या?" "हाँ पता नहीं क्यों उस मेम के जाने के बाद मन म टीस-सी लगी।" 'क्या मन टसक गया हाँ थी तो तीखी।"शोभा ने चुहल किया। 'ठठ्ठा करती है -साली।" "अरे गाली-गुप्ता पर क्यो उतर आया ? जा नहीं बोलती कुछ।" शोभा रूठने का भान कर कुछ क्षण खामोश रही फिर चुपर-चुपर करने लगी। 'पर जो भी कह तुम दोनो की जोडी बडी फिट बैठती - तू भी क्या साहब से कम है देखने मे। मैं तो कहती हूँ तू यह सारगी-वारगी छोड और कोट-पतलून चढा कोई नौकरी कर ले साहबो के भी कान काटेगा।" "बडी फुदक रही है, घर चल तुझे मजा चखाता हूँ।" भवर सिह की त्योरियो पर बल चढ गये थे। 21 - 'अर अकडता क्यों ह जमाने के साथ ही तो चलने को कह रही हूँ।" "में तेरा मतलब खूब समझता हूँ, तुझे मेरा सग नहीं भाता तो जा साहब न सही किसी बाबू के ही साथ जाकर बैठ जा - साली औरत जात होती ही ऐसी है।" 'अरे बाप रे बाप उतर आया न अपनी औकात पर।" अब शाभा क भी नथुन फडकने लगे थे। 'क्या में गलत कहता हूँ ? आज मेरी माँ साली नहीं भागी होती तो मुझ यह सब करना पडता अपना घर-बार छोडना पडता ? उसे तो बस अपनी जान प्यारी थी जरा सोचा भी नहीं कि इस कुसस्कार का क्या फल भुगतना पडेगा उसकी कोख जने को। सामने आ जाये तो जान निचोड लूँ उसकी । जान इतनी ही प्यारी थी तो चोहान घराने मे क्यो आई थी। अरे पद्मिनी भी तो औरत थी कैसा जौहर किया था। आज सती-देवी कहलाती हमारी मा - कितना मान हाता हमारा गाँव म। हम भी चोधरी कहलाते।" यो ही बुदबुदाता रहा भवर सिह, शोभा से अधिक जैसे खुद को दलील दे रहा हो। शोभा ने बात आगे न बढाना ही उचित समझा। चुपचाप रही, परन्तु मन मे तो उबाल आ ही रहा था। उसे भवर सिह का सब कुछ ठीक लगता था किन्तु ऐसे विचार उसके मन में काफी कोफ्त करते थे। वह पढी-लिखा नहीं थी। रीति-रिवाजा के प्रति उसकी श्रद्धा थी। फिर भी सती-प्रथा के प्रति भवर का लगाव उस बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगता। शोभा चलती रही - साचती रही- एक तरफ तो वह इतना समझदार और व्यावहारिक है दूसरी ओर इतना रूढिवादी - आखिर क्यो ? इसकी मा ता वक्त के हिसाब से बड़ी क्रान्तिकारिणी थी। उसने समाज के गलत रिवाजा के सामने घुटने नहीं टेके थे। भाग निकली थी। जरूर इस निगाड के खून म मा से अधिक बाप का मगज मिला हागा। परन्तु क्या सचमुच भवर सिह इतना रूढिवादी था जा इन ऊल- जुलूल मस्कारा से उबर नहीं पाया था। ठण्ड दिल स साचने पर उसे भी 22 . शायद यह अनुचित ही लगता, किन्तु हर व्यक्ति का सस्कार बहुत कुछ हालात के चपेट से भी बनता बिगडता है, बदलता है। बचपन से उसे सिर्फ ताने ही तो मिले थे मा के नाम। वैसे उसका बाप था तो एक तरह से लुटेरा पर चौहान घराने के मुखौटे ने उसे एक इज्जतदार चौधरी बना दिया था। मारा गया था लूट के बँटवारे में पर किस्सा शुमार हुआ, डाकुओ से मुठभेड मे खेत रहा। बात तो वही होवे जो चल निकले। भवर को तो बस इतना ही याद है, उसका बाप एक बडा चौधरी था और मा एक भगोडी जो अपने पति के साथ सती होने के भय से भाग गई। खानदान के मुँह पर कालिख पोत दी। छोड दिया अपने इकलौते बेटे को तानो की बौछार सहने को। कैसी मा थी, जिसे अपने दो साल के अबोध को छोडने मे जरा भी हिचक नहीं हुई। कौन समझाता भवर को-अरे हर हाल मे तुम्हे अभागा ही बनना था। मा तो छूटती ही- चाहे भाग कर चाहे जल कर। शायद उसे दर्द इस बात का अधिक था कि उसका बचपन ताना सुनते-सुनते ही गुजरा था। उसे बडी ललक थी कि उसकी भी घर में समाज मे, कुछ इज्जत होती वह भी पैसे वाला होता। छोटा-मोटा ही सही चौधरी तो होता। पर हाय री दुनिया । करे कोई, भरे कोई । आखिर छोरे भवर की सहन शक्ति जवाव दे गई और वह भाग निकला। तब वह मुश्किल से दस साल का था। आज भी वह कहाँ भूल पाया है बडी ताई का कोसना हर घडी ताना देना। "मुंह जले को हमारी छाती पर मूंग दलने के लिय छोड भागी राँड।" भवर को क्या पता था ताई दिन-रात ताने तो देती पर हर ताने का तौर उसके खुद के दिल पर घाव करते। बचारी का मन अन्दर ही अन्दर कसकता रहता। बस छुप-छुप कर राती सोचती-"यह करमजला इतनी लात गाली खाकर भी क्या नहीं भागता। बार-बार मनौती मानती भगवान इस मर चाडाल पति के चगुल से बचा। वचन की लाज रख। 14963 last उड़ने वाला मन और पख कटे हुये। क्या करता भवर सिह ? जब भी अपने जीवन की हीनता उसे सताती, वह अपनी मा को कोसता। शायद अपनी कमजोरिया को ढकने के लिये इससे बेहतर चादर उसके पास थी ही नही। दोना अपनी झुग्गी मे पहुँच गये थे। इधर भवर गुम तो उधर शोभा सुम, यानी दाना गुमसुम । भवर सिह कुछ देर अपनी हथेलिया पर सिर टिकाये बैठा रहा फिर कुछ निढाल-सा हो अपनी खटिया पर पसर गया। उसके दिमाग मे जाने क्या- क्या फितूर अपने करतब दिखा रहे थे। शोभा का मन भी भारी था पर उसका तो हाथ पैर हिलाय बिना काम चलना मुश्किल था। पेट को तो भोजन चाहिये ही जुट गई रसोई पकाने माचूल्हा लहक उठा था। उसके सामने चउके मउके बैठी शोभा - घुटने पर दोना हाथ और हाथी पर टिकी ठुड्डी चेहरे पर पडती लपटो की रोशनी मे उसका रूप उगते सूरज-सा दहक रहा था। उबलते भात को हाडी ने उसका ध्यान खींचा। करछुल फिराने क बाद उसके हाथ चोटी लपेटने को सरके तभी उसे अपने सिर पर बधे रूमाल का ख्याल आया। नायलॉन का खूबसूरत रुमाल जो उस मेमसाहब ने बड़े प्यार से अपने हाथो उसके सिर पर बाध दिया था ओर बोल पड़ी थी-"ब्यूटीफुल । एक्स्ट्रीमली ब्यूटीफुल" कभी कुछ इतना तेजी से घटता है कि उसके ओर-छोर का पता भी नहीं चलता ओर हादसा हो जाता है। इस ही हम अपनी तसल्ला के लिए शायद होनी कहते हैं। यह होनी ही तो थी कि शोभा के हाथों से वह स्कार्फ चूल्हे पर जा गिरा और उसे बचाने को हडबडी मे पूरी खौलती हाडी उसके बदन पर आ गिरी। चीख - एक बहुत दर्दनाक चीख हवा म गूंजी। भवर सिह चौंक कर शोभा को ओर लपका। पता नहीं किस ईश्वराय शक्ति न उसे सहायता दी। आनन-फानन उपचार में लग गया परन्तु स्थिति का भयानकता का

• Cilt hakatutkitt lik kejutawu
मोगा।
मी.पर जमा 7THIER
रामनगट-गान या TATTrrr.
अवभिगन मानि71jrn
राय
नाना-mfor
TITIATरमा Amirmir
'मालागाTITUTrizTITI :
राशनकोपाग?"
म सायद
पोज
- GST
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पांच शेला मिस शेला डेनियल आज बहुत खुश है। क्यो न हो, आखिर उसने अपने जीवन का एक अहम् मकसद हासिल कर लिया है। विश्व बैंक म एक अच्छे पद पर चुन ली गई है। क्या हुआ जो कुछ देर हो गई। यह बात दूसरी है कि उम्र का सुहाना मौसम अब दूसरे ध्रुव का रुख कर चुका है। इस मिट्टी मे तो पचास पार करक भी नई जिन्दगी शुरु होती है। उसने तो सिर्फ तेंतालिस बसन्तो को पीछे छोड़ा है। फिर उसने ता अपना रखरखाव भी कुछ ऐसे किया है कि शायद ही कोई उसे तीस से अधिक की आक सके। विधाता की भी विशेष अनुकम्पा थी कि उसे नपे तुले साचे मे ढाला था। उसके पिता भी तो छैले से ही थे और मा का तो कहना ही क्या। बहुत कुछ तो ऐसी ही थी जैसी आज वह स्वय है। हाँ - माँ डाई पसन्द नहीं करती थी ओर चाँदी के तार उसको माग मे टक गये थे। शायद वह गम्भार दिखना पसन्द करता था। लोग उसक व्यक्तित्व स कितना प्रभावित रहत थ। वह भी ता मन-प्राण से मा की पूजा करती थी। वह तो जार्ज कहाँ से एक पहाड बन आया और ज्वालामुखी-सा फट सिर्फ लावा छोड गया। फान पर खुशी का पैगाम सबस पहले उसने मा को दिया था और अगली फ्लाइट पकड मा से आ लिपटी थी। वह आनन्दातिरेक से विह्वल थी। मा भी कितनी सुश थी कभी उसको आखे चूमती कभी माथा। खुशिया क सैलाब न शेला के मन में वर्षों से पल रहे अपराध बोध को 26 1 क्षण में बहा दिया। मा से लिपट-लिपट हो उसकी आँखो मे आँसू आ गये। फिर उसे इतने वेग से रुलाई छूटी कि वह अपने को रोक न सकी और फफक-फफक कर रोने लगी। मा ने भी उसे मन हलका कर लेने दिया। सिर्फ उसका सर सहलाती रही। जब शेला कुछ संभली तो मा ने दुलार से पूछा-"क्या हुआ रे पगली। इतनी घटा कहाँ रोक रखी थी" हाँ, कहाँ छिपी थी यह व्यथा भरी घटा ? जाने कैसे और क्यो उम्र के इस पड़ाव पर अचानक इन सूख आये जख्मो मे मवाद फूट पडा।खुशी मे गम का यह कैसा सगम। छब्बीस के छलिया जार्ज को उसके निकटतम मित्र 'लेडिज- किलर' के नाम से पुकारते थे। हाँ ऐसी ही थी उसकी छवि। बडी हस्ती भी उसके सामने बिछ जाने को विवश हो जाती और शेला भी तन-मन से उसके समक्ष बिछ गई थी। शायद उम्र का तकाजा था। आखिर वह गदह पचीसी से ही तो गुजर रही थी। उसकी निगाहा मे जार्ज जैसा साहसी, माही और समझदार क्या कहीं ढूँढे भी मिलने वाला था ? बस वह तो उसका हीरो था हीरो। तब शेला उन्नीसवे वर्ष में थी। पहली बार जार्ज से लीडा ने परिचय कराया था। लीडा उससे दो साल सीनियर थी। जार्ज लीडा का कजिन था या नहीं पर यही परिचय दोना ने शेला को दिया था। धीरे-धीरे लीडा दूर होती गई और जार्ज और शेला के बीच का फासला सिमटता गया। दोनो की घनिष्टता गाढी और गाढी होती चली गई। छ महीने तक यह रामास यो ही चारी छिपे परवान चढता रहा था। फिर हठात् एक बार कैसे मा आ गई थी और वह होस्टल से गायब थी। पहले तो शला भय से काँप उठी थी फिर हिम्मत कर मा से जार्ज के प्रति अपनी रुझान का इजहार किया था। मान कहा था-"देखग, तू अभी अपनी पढाई पूरी कर।" परन्तु मा का अन्दाज उसे बड़ा रूखा लगा था। अब शेला का भरसक प्रयास रहता कि यह बात ढकी-छुपी रहे । फिर भी पता नहीं मा १५ - कैसे उसक मन का आर-पार दस लती और जितन दिन भी वह उनके पास रहती एक अव्यक्त छपपटाहट का एहसास उसे घरे रहता। वह दिन गिनती कि कब छुट्टी खत्म हो और वह वापस हास्टल भागे। पर हाय र भाग्य । इसी बीच जार्ज का फोन आया था। उसने एक ट्रिप का प्रोगाम बनाया था। शेला को होस्टल से एक सप्ताह के लिये विशेष छुट्टी लनी होगी। हास्टल लौटने से एक दिन पूर्व उसने मा से छुट्टी का अनुमोदन पत्र लिया था। बहाना था लीडा के साथ जाने का। पर पता नहीं क्या मा पूछ बैठी थी "जार्ज भी तो साथ नहीं जा रहा?" फिर वह सारी रात सा नहीं पाई थी। मा स बाले इस झूठ का पत्थर उसके सीने पर पहाड जैसा आ बैठा था। यों ऊपर से वह कुछ अधिक ही चहक रही थी। बहुत दुलरा रही थी मा को। मा भी खुश थी। स्टेशन पर उसे सदा की तरह छोडने आयी थी। जब गाडी चलने लगी तो शेला ने चुपके से रात को लिखी एक पर्ची मा को थमा दी। मा ने भी हमेशा की तरह एक लिफाफा उसे पकडा दिया। वह हर बार ऐसा ही करती थी। सब कुछ तो देती ही थी पर गाडी चलने पर कुछ पौंड के नोट रखा लिफाफा अलग से उसे जरुर देती । छोटे मे उसे कौतूहल रहता था। दश काल के चलन से बिल्कुल पर। शेला का यह बहुत अच्छा लगता था। परन्तु आज लिफाफा लेते समय उसका हाथ काँप उठा था। सदा की भाँति लिफाफा खोल कर नोट निकालने ही वाला थी कि- 'अर यह क्या " आज तो मा ने नोट नहीं रखे थे। अचम्भा एक छोटा सा पत्र था जिसमे थे ये चन्द शब्द "तृ झूठ बोलकर सारी रात सो नहीं पाई न " इससे ही यह आकने की कोशिश करना कि जो तू कर रही है क्या वह ठीक है ? हमारा कहना मान विशेष छुट्टी ले ट्रिप पर मत जा। कारण न में समझा सकती हूँ न समझाना चाहती हूँ। बस इसे मेरी आज्ञा ही समझ ले।"शला पानी से निकली मछली की तरह तडप उठी थी। हाय। यह क्या हुआ उसने तो मा को लिखा था 'ट्रिप मे जार्ज भी जायेगा। पर तुम इत्मिनान रखना मा तुम्हारी बेटी अपना खयाल रखना जानती है। मैंने सब सच कह दिया है इस विश्वास के साथ कि तुम मुझे रोकोगी नही।" 28 और यही पहला टकराव था माँ बेटी के बीच। जार्ज ने न जाने कैसे उसे अपने माहपाश म बाँध लिया था और खिची चली गई थी उस ट्रिप पर। कहीं यह अपने व्यक्तित्व की अलग पहचान अपनी परिपक्वता को दर्शाने के प्रयास मे उठाया नई उम्र का विद्रोही कदम तो नहीं था या कि यह दो विभिन सस्काराम पली-बढी दो पीढिया के बीच का सहज टकराव था। विद्रोह को इस आग को जार्ज बडी चालाकी से हवा दे रहा था। वह बिल्कुल बगुला भगत वन घात लगा रहा था। पर शेला का कोमल मन तो उस बगुल को राजहस समझ उसके सग कहीं भी उड जाने को फडफडा रहा था। लोभ चाहे जितना भी बडा हो शैतान कभी अपने बचाव का रास्ता बन्दकर जाल मे नहीं कूदता। तभी तो जार्ज ने शेला के भाग चलने की सलाह नहीं मानी थी। उसने उसे तब तक इन्तजार करने को कहा था, जब तक वह इक्कीस वर्ष की नहीं हो जाती। शेला को पहले तो यह अच्छा नहीं लगा परन्तु कानूनी रूप से बालिग होने की आवश्यकता का मतलब समझाये जाने पर उसे जार्ज की समझदारी पर फख्न हुआ था। मा और जार्ज के प्यार के कशमकश से जूझती शेला ने विश्वविद्यालय की पढाई तो किसी तरह पूरी कर ली परन्तु उसे यह भान हो चला था कि वह मा से दूर होती जा रही है। अहम् शायद दोनो पाल रहे थे। अत औपचारिकता ने दोना के रिश्ते की गहराई पर एक गर्द की परत जैसी डाल दी। अन्तत यौवन के दर्प के सामने उम्र | तटस्थ हो अपने को भुलावे मे ही उलझाये रखना उचित समझा। एक हद तक पहल शैला ने ही की। कुछ दिन इधर-उधर काम करने के बाद उसे ट्रापिकल बैंक म एक एपरटिस टेलर की जगह मिल गई। अपनी मेहनत और लगन से उसने दो वर्षों की नौकरी मे ही अपनी एक अलग पहचान बना ली। इस बीच सिर्फ पिछले साल बड़े दिन पर मा से मिलने गई थी। हमेशा की तरह मा बड़े उल्लास से मिली थी। पर शला कुछ कटी-कटी सी रही। दोनो में से किमो ने जार्ज का जिक्र नहीं किया। शेला कहती भी क्या। । 29 जार्ज गाहे-बगाहे उससे मिलता रहा था। पिछली वार लगभग एक सप्ताह ठहरा था। दोनो रोज शाम को मिलते थे। जार्ज ने शेला को बताया था वह आस्ट्रेलिया में अपने चाचा के साथ एक बडे डिपार्टमेन्टल स्टार को खडा करने म लगा है। आते ही उसने अपन एडवन्चर की कितनी कहानियाँ सुनाई थीं। शला तो बस सुनती रही-सुनती रही और उसे पता भी नहीं चला कब हफ्ता बीत गया। भला हो जेसी का जिसने शेला के प्यार भरे इन चन्द लम्हो को परवान चढने मे अपनापन और सहयोग दिया था। जेसी पेटर्सन ट्रॉपिकल बैंक मे पिछले सात वर्षों से काम कर रही थी। शेला को उसक देख-रेख मे ही ट्रेनिग मिली थी। और दोना मे कुछ ऐसा दोस्ताना हो गया कि दोनों साथ-साथ रहने लगे थी। जसी को अपनी मकान मालकिन मिसेज सैम्यूल से बडा लगाव था। चन्द ही दिना मे शेला भी उनके करीब आ गई थी। यह सम्बन्ध और भी मधुर और मजबूत हुआ था मा के आने के बाद। शायद मा आई थी यह इत्मिनान करने कि उसकी बेटी ठीक-ठाक से तो रह रही है। मा का मन ही तो ठहरा। तीन दिनो से वह रुकी हुई थी। मिसेज सैम्यूल ने एक कमरा और खाली कर दिया था और तब से वह कमरा शेला का हो गया था। इसके पहले वह जेसी का कमरा शेयर करती थी। इन तीन दिना म मा और मिसज सैम्यूल काफी घुल-मिल गये थे। कहाँ-कहाँ स दानो न कॉमन परिचित ढूढ निकाले थे। अकल पीटर का भी जिक्र छिडा था। मा को जेसी भी बहुत भायी थी। लौटते समय उसके चेहरे पर बडी निश्चिन्तता के भाव थे। इधर छलिया का छल चलता रहा और शेला उसक दिखाय हवाई किले की चहारदीवारी में अपने सपनो का महल महफूज करती रही। कितने रंगीन सपने थे ये। सब्जबाग दिखाते जार्ज के खत इस रग को ओर गहराते रहे। साथ ही यदा-कदा वह स्वय आ-आकर इन रगो पर फुहार छोड इन्ह और पुख्ता करता रहा। भोली शला खोती गई। तभी जार्ज का ताजादमखत आया था। - 30 उसका व्यवसाय अब काफी जम गया है। उसने एक घर ले लिया है। इस बार वह पूरे महीने शेला के साथ अपनी गृहस्थी का सामान जुटायेगा फिर दोनों शादी कर आस्ट्रेलिया आ बसगे। मन की दशा भी कितनी विचित्र है। खुशी का यह सदेश पा शेला जहाँ इतनी पुलकित थी वहीं मन के आसमान पर उदासो का एक टुकडा भी मडराने लगा था। सब कुछ छोडकर एक नई जगह जाना होगा- बिल्कुल अनजानी जगह। पर जार्ज के साथ तो वह स्वय इतना आगे बढ़ आई थी फिर यह हिचकिचाहट कैसी ? नहीं, अब तो आगे ही बढना होगा। जार्ज के साथ ही उसकी मजिल है और सचमुच उसका छलिया, उसका राजकुमार बडो शालीनता से आया था, पास ही एक बडे होटल म ठहरा था। इत्तफाक देखो मिसेज सैम्यूल लम्बे भ्रमण पर बाहर निकली थी पूरे घर की जिम्मेदारी जेसी और शेला पर छोड। जेसी को तो उन्हाने धर्म की बेटी ही बनाया हुआ था। जैसी ने इस बार बडे उत्साह से जार्ज का स्वागत किया था। कोई स्कैन्डल न बने इसलिये जार्ज होटल में ही टिका रहा फिर भी सप्ताहान्त मे शेला और जार्ज साथ-साथ ही रहते थे। जेसी उन्हे जान बूझकर अकेले में छोड़कर अपने मा-बाप और नन्हे बेटे से मिलने घर चली जाती। बस यही उसका ससार था। पति से तलाक हो चुका था। शादी की तारीख मुकर्रर की जानी थी। जेसी चाहती थी छ महीने रुका जाये। मिसेज सैम्यूल आ जाये पर जार्ज ने अपनी मजबूरी जताई थी। उधेडबुन म ही दो हफ्ते निकल गये। अन्तत तय हुआ छठे सप्ताह के अन्त में दोनो परिणय सूत्र मे बध जायेगे। शेला ने सोचा कि मा को कल फोन कर देगे। परन्तु मन उलझ कर रह गया। फिर एक पत्र लिखा। जेसी से एक लम्बी चौडी भूमिका वाली चिट्ठी भी लिखवाई। चिट्ठी कल पोस्ट करेगो किन्तु शेला का कहा पता था होनी कुछ और सोच रही है। काम में कुछ ऐसी उलझी कि पत्र पोस्ट करना भूल गई। यह सचमुच भूल थी या शेला के अर्न्तचेतना म छुपे अपराध का करिश्मा- कहना मुश्किल है। रात का खाना आज बाहर है। आठ बज गये और जार्ज का कोई - --- 31 -- पता नहीं। जसी और शेला दोनो सात बजे से ही तैयार बेठे था जार्ज समय का बडा पक्का था और उसने ठीक सात का समय डिनर के लिये निश्चित किया था। तभी नीचे टेलीफोन की घटी बजी।शेला लपकी । जार्ज ही था। उसकी आवाज बहुत शान्त होते हुए भी शेला को लगा उसमे एक उद्विग्नता छिपी है। जार्ज बोल रहा था- कि डिनर में वह भाग नहीं ले सकेगा। वह एक आकस्मिक उलझन मे फस गया है। कुछ जरूरी बन्दोबस्त कर वह दस बजे तक आयेगा। आज की रात स्नैक्स और काफी से काम चलाना होगा आकर सब कुछ सविस्तार बतायगा। इतना कहकर उसने फोन रख दिया। खाना क्या। बस पेट भरने का काम हो रहा था। जार्ज ने जा कहा उससे सब उलट-पुलट हो गया। उसके डिपार्टमेन्टल स्टोर्स में डकैती की कोशिश की गयी थी। एक सिक्योरिटी गार्ड मारा गया था ओर गोलाबारी मे उसके चाचा भी गम्भीर रूप से घायल हो गये थे। जार्जन भर्राये गले से कहा था- "मुझे फौरन जाना होगा। मैंने आज रात के हवाई जहाज से सीट बुक करा ली है। टाईम्स के सध्या सस्करण में यह खबर छपी है।" इतना कहते हुये उसने अखबार का स्याही से घेरा हुआ हिस्सा शेला और जेसी के आगे कर दिया। ' मैंने सोचा भी नहीं था आस्ट्रेलिया के स्ट्रोर्स के बारे मे यह छोटा-सा समाचार मेरे बहुत बडे दुर्भाग्य का समाचार है।" जार्ज की आवाज थरथरा रही थी। जेसी और शला ने उसे बहुत ढाढम बंधाया। दोनो उसे एयरपार्ट तक छोडने गर्यो । जार्ज ने पहुचते ही फोन करने का वादा कर विदा ली। दूसरे दिन सवरे दफ्तर मे जार्ज का फोन आया था- "चाचा की हालत बहुत गम्भीर है। स्टोर्स के एक हिस्से में आग लग जाने से भारी नुकसान हुआ है।" फिर उसको आवाज अपने पुराने पुस्ता अन्दाज म तुम घबराना मत शेला- सब कुछ जल्दी हा ठीक हो जायगा। हा अभी शादी कुछ दिनो के लिये टालना ही होगा। कम स बुलन्द हाती गई थी- 32 कम अकल के ठीक होने तक। उनकी हालत में थोडा सुधार हाते ही में लन्दन पहुँचूगा। जल्द ही अपना कॉन्टेक्ट फोन नम्बर और पता भेजूगा।' शैला के अवचेतन ने एक झटका दिया। ठीक है फोन नम्बर अभी गडवड हो परन्तु जार्ज कहीं भी रहता है अपना पता तो दे ही सकता है। लेकिन चेतन पर हावी प्यार के सतरगी ख्वाबो ने इस चेतावनी को ढक लिया था। दो माह तक कोई खबर नहीं। बस एक तार आया था- 'चाचा जी नहीं रहे 'फिर अन्तराल। चार माह बीत गये न फोन न खताशेला को जार्ज से अधिक अपने पर गुस्सा आ रहा था। कैसी बेवकूफ निकली। ठीक-ठाक तो कुछ भी नहीं जानती जार्ज के बारे । उसका सही ठिकाना क्या है यह भी तो पता नहीं। शक का छोटा सा बिन्दु अब पसरने लगा था। शका का फण धीरे-धीरे फुफकार मारने लगा था। जैसी भी सशकित होने लगी थी। शेला को बस इतनी तसल्ली थी कि खबर मा तक नहीं पहुंची। अगर उसने चिट्ठी डाल दी होती ? फर्क तो कुछ नहीं पड़ता। बस मा परेशान होती और उसका दु ख और बढता। शायद ईश्वर सहायक था जो उस रात वह चिट्ठी पोस्ट करना भूल गई थी। तीन हफ्ते बाद मिसेज सैम्यूल लौट रही थी। जेसी और शला दोनों को बहुत प्यार भरा पत्र भेजा था। दोनों रविवार को घर की सफाई और सजावट में लग गये थे। वॉल पेपर आदि नहीं मिल पाने के कारण कुछ काम अगले रविवार के लिये छाडना पडा था। परन्तु उस रविवार को जेसी का वेंक म अचानक जरूरी काम आ पडा था। कुछ महत्वपूर्ण स्टेटमन्ट तैयार करने थे। उस रात जेसी बड़े देर से लोटी थी। परेशान दिख रही थी। शेला ने पूछा-"क्या हुआ "लगता है हम लोग किसी बड़ी साजिश का शिकार हो गय हैं। जैसी को आवाज गम्भीर थी पर उसम घबराहट की झलक भी साफ था। 'कैमी साजिश ? 'शला की आवाज में कौतूहल से अधिक भय था। 13 जसी ने कहा-"घबराने स कुछ नहीं होगा-चला हाथ मुंह धाकर कुछ खा पी ले फिर दोना मिलकर सोचगे।" खाना क्या था बस पेट भरा जा रहा था। जेसी ने कितनी चौंका देने वाली बात कही-"आज चीफ एकाउन्टट ने मिसेज सैम्यूल का फॉरोडिग एड्स (वर्तमान पता) पूछा था। बैंक में सभी मेरे और मिसेज सैम्यूल के सबध को जानते हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि रुपये पैसे सवधी मिसेज सैम्यूल का सभी कारोबार भरसक मैं ही देखती हूँ। एकाउन्टट बता रहा था- बाहर जाने के पहले मिसेज सैम्यूल ने बीस हजार पाउंड के 'लेटर आफ अथॉर्टी टू एनकैश चेक्स' (दूसरी जगहा से रुपया निकालने की एक पुरानी बैंकिग पद्धति) लिया था। उस समय उनक खाते म पच्चीस हजार पाउंड से अधिक की जमा राशि थी।वैसे भी उनके खाते म काफी पैसा रहता है और मिसेज सैम्यूल हमारे बैंक के प्रमुख ग्राहका म एक है। एकाउन्टेट को पता इसलिये चाहिये था कि उनके एकाउन्ट म हो गये ओवरड्राफ्ट (एक तरह का ऋण) की खबर उन्हें तत्काल भेजी जा सके।" जेसी का माथा ठनका। मिसेज सैम्यूल और आवरड्राफ्ट ? नामुमकिना बहुत सरस्त जरुरत होने पर भी तार नहीं तो फोन से बैंक को स्वय या जेसी को खबर अवश्य करती। जेसी का दिमाग एक सतर्क बैंकर की भाँति तरह-तरह की सभावनाआ से सशकित होने लगा। फिर भी बाहर से उसने कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया और एकाउन्टेट को यह समझा दिया कि अगले सप्ताह तो मिसेज सैम्यूल लौट रही हैं इस बीच भजा पत्र इधर-उधर घूमता जब तक उनके पास पहुचेगा वो यहीं होगी। एकाउन्टेट को जेसी की बात जच गई थी फिर भी उसने पत्र तैयार रखने को कहा था। एक घटे बाद अपना काम निबटा जेसी मिसज सेम्यूल के खाते का जाँच करने लगी। ज्यादातार निकाले गये चेक की रकम छाटी-छोटी । यही कोई 500 से 1000 पाउड के बीच और सभी चेक लगभग 34 नम्बरवार थे जैसे 600326, 600827 600828 परन्तु यह क्या ? इनके वीच तीन चेको क नम्वर कुछ वतुके से थे। मसलन 600847, 600848 आर 600849 और फिर 600829 600830 आदि। तात्पर्य यह कि चेक बुक के अन्त के कुछ चेक पहल प्रस्तुत किये गये थे और इनकी राशि भी काफी भारी-भरकम थी। बीच वाले दोनों चेको मे दो चेक दस-दस हजार पाउँड के थे जबकि तीसरा पद्रह हजार का। उनके बाद प्रस्तुत किये गय दोना चेक पहले को भौति मात्र पाच पाच सी पाउंड के थे। जेसो अभी उधेड-बुन म ही थी कि गार्ड ने दफ्तर बन्द किये जाने की सूचना दी। वह भारी कदमो से घर आ गई। अब शेला का भी माथा ठनका। देर रात तक दोनो मगजपच्ची करते रहे पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाये। अब उनको शकाय एक भयावह रूप लेने लगी थी। जेसी ने शायद शेला से अधिक अपने को सान्त्वना देते हुए कहा- 'भगवान की कृपा से सब ठीक हो जायगा। हो सकता है विशेष परिस्थितिवश मिसेज सैम्यूल ने कुछ भारी रकमा वाले पोस्ट डेटट चेक काट हों और उसके पहले काट गये छोटे-छोटे चको का भुगतान पाने वाला ने अपने चेक देर से प्रस्तुत किये हो। फिर भी बात अटपटी सी है।" घूम फिर कर वात एक अबूझ शका के इर्द-गिर्द चक्कर काटती रही। अन्त मे दानों ने तय किया-भुगतान किये गये चेको विशेषकर भारी रकम वाली चेको की कल गहराई से छानबीन की जायेगी। परन्तु सब कुछ बडी सावधानी से करना होगा। रात भर दोनो दहशत की नोंद साये। दूसरे दिन दोनो ने मिसेज सम्यूल के खात की और भुगतान किये गये चेका की बारी-बारी से सूक्ष्म जाच को। गडबडी को शका अब पुख्ता हाती जा रही थी। मैग्निफाईंग ग्लास ने जेसी की अभ्यस्त आँखा को साफ बता दिया था कि वडी रकमा वाली चेका पर किये गय दस्तस्त जाली थे। शला किसी अनजान भय से पसीने-पसीने हा रही थी।जसी का भी वही हाल था परन्तु शला से बडे हाने के भान ने उसे अधिक सम्भाल रखा।

जालसाजा वडा चाताका स की गई थी। नगी आँया मे फर्क निकालना वह भा काम की भीड-भाड म, नामुमकिन था। जसा न पूरा तसल्ली के लिये पुर्दबीन से चेका की दुवारा जांच की। फिर ऊपर स धीर गम्भीर बनी चैका क पुलिद को वापस कर अपने सीट पर आ बैठी। उसके दिमाग में तीना चेका का याका कम्प्यूटर ग्राफिक्म की भांति अकित हो गया था। इन चेका का भुगतान दूसरे बैंक ने किसी एम जॉन के खाते में लिया था। अगल दिन जेसो ने क्लीयरिंग हाउस के स्टाफ के जरिए गुपचुप दूसर बैंक से और भी सूचनाय प्राप्त की थी। एम जॉन का पूरा नाम माईकैल जॉन था और उसके खाते का परिचय किसी लीडा ये नाम की महिला ने दिया था जो कुछ वर्षों पूर्व उस बैंक को कर्मचारी थी और बाद मे नौकरी छाड कर चली गई थी। मामला साफ था। कहानी पूरी उभर रही थी। माईकेल जॉन कोई और नहीं शेला का प्रेमी जार्ज उर्फ माईक था। जालसाज ने अपने को ज्यादा छिपान की जहमत माल नहीं ली थी। यह उसके दुस्माहसा ही नहीं दभी होने का भी प्रतीक था। उसे पता था वह एक व्याघ्र है और जाल में फसा पछी कोई और जो उसके लिए महज एक शिकार है। जेसी जितना साचती उसकी घबराहट बढती जाती। आगे के प्लाट की महज कल्पना ने उसके रोगटे खड़े कर दिये। मिसेज सैम्यूल ने टूर पर निकलने के दो दिन पूर्व जेसी के मार्फत नया चेक बुक भगवाया था। यह सिलसिला पुगना था। कभी-कभी यह काम शेला ने भी किया था। उस रोज शेला की छुट्टी थी। जेसी दफ्तर से देर से लौटी थी और मिसेज सैम्यूल घर पर नहीं थी। इधर जेसी को फौरन गाडी पकडनी थी। ट्रेन का समय हो गया था। बैंक में दो दिना की छुट्टी थी जो वह अपने परिवार के साथ बिताना चाहती थी। जेसा ने अपन साथ लाये चेक भरा सील बन्द लिफाफा शला को देकर कहा था- "यह चेक बुक मिसेज सैम्यूल का दे दना और रसीद रख लेना। बैंक खुलने पर जमा कर देगे। में लौटते समय मिसेज सैम्यूल से मीधे स्टेशन पर ही मिल लूंगी।' सोचते- सोचते जसी का सिर चकराने लगा। किसी तरह अपने को सम्भाला। - 36 दफ्तर का समय खत्म होते ही शेला को जल्दी-जल्दी घर चलने को कहा। रास्ते भर दानो खामोश रहे। घर पहुंचत ही जसी ने झट दरवाजा बन्द कर अपना शक बयान किया। अब शेला के चौंकन की बारी थी। दूसरे दिन सवेरे मिसेज सैम्यूल किसी काम से बाहर निकली थी। जाते-जाते शेला से पूछा था "जेसी चेक बुक लाई या नहीं?" इत्मिनान कर वह यह कह निकल गई थी कि चेक बुक लोटकर ले लगी। आज उनका लच बाहर है हो सकता है लौटने में देर हो जाये,शेला शाम को घर पर ही रहे और सफर को छिटपुट तैयारी में उनकी मदद करे। उस रात शेला ने सीलबन्द लिफाफा मिसेज सैम्युल को ज्यो का त्या दे दिया था। उन्होने उसके सामने ही लिफाफा खोल कर चेक बुक निकाला था और हमेशा की तरह बिना गिने अपने बैग में डाल दिया था। फिर पावती की रसीद दस्तखत कर शेला को थमा दी थी। परन्तु आज ये सारे सदर्भ कुछ बदलते नजर आ रहे थे। शका का भूत कुछ और ही इगित कर रहा था। दोपहर को जार्ज आया था। शेला उसे अपने कमरे में बैठाकर नहाने गई थी। उसे तैयार हो लौटने मे यही कोई आधा घटे लगे थे। लौटकर देखा था जार्ज मेज पर झुका कुछ पढ रहा है। फिर चाय-पान कराकर शेला ने उसे विदा किया था। हमेशा की तरह जार्ज उसके किताबो को इधर-उधर कर गया था। जब शेला उन्हे पुन सजा रही थी उसे कुछ अटपटा लगा था। क्या ? हाँ याद आया। चेक बुक वाला लिफाफा जो उसने टेवुल को दाई ओर बिल्कुल अलग-थलग रखा था एक किताब पर बाई ओर पड़ा था। कैसे? क्या ? यादो के टेप कुछ तेजी से रिवाइन्ड हो रहे थे। एक बात और याद आ रही थी। किराये की रसीद वह काँटे म फाइल करती थी। अपने किसी पिछल आगमन के दौरान जार्ज ने न जान किस सिलसिले में काँटे में लगी ताजी रसीद को दिखात हुये कहा था "पिसेज सैम्यूल का दस्तखत वडा साफ और सुन्दर है परन्तु तुम बैंक वाले शायद ऐसे दस्तखता को आसानी स नकल किया जाने वाला मानत 37 शेला ने हँसते हुए कहा था- "हाँ ये तुम्हार दस्तखत जैसे नहीं जिसम 'जी' की पूंछ देखकर लगता है कोई बत्तख दुम उठाये भाग रही है।" फिर दोनो खूब हँसे थे। शेला ने अपना शक जेसी को बताया। दोना मिलकर किराये की रसीद की जाँच करने लगे। अचम्भा। एक रसीद पर साफ दिख रहा था दस्तखत काफी मोट अक्षरा में थे। उन पर दुबारा हाथ फिराया गया था अर्थात् किसी ने नमूना उठाया था अब शक की गुजाईश ही कहाँ रह गई थी। यह जार्ज का ही काम था। शेला को अब सब कुछ साफ नजर आ रहा था। जार्ज का कोई ठीक-ठाक अता पता नहीं देना, चाचा का एक्सीडेंट, सब बकवास। वह पूरा फ्रॉड था। पर हाय री किस्मत। सब कुछ लुटाकर होश मे आये तो क्या किया। आगे की कल्पना की भयावहता ने शेला से ज्यादा जेसी को सुन कर दिया। चेक बुक उसी के द्वारा लाया गया था। लापरवाही और दायित्वहीनता का तो पूरा इल्जाम उस पर आयगा ही और उसे अपना नोकरी से भी हाथ धोना पडेगा। वह एकटक शेला को घूरती रही-घूरती रही। शेला जेसी की आँखा मे उमडते सैलाब को न झेल सकी ओर तकिये में मुँह छुपा कर सिसकने लगी। फिर किस शक्ति ने उसे झकझोरा पता नहीं और उसने अपने आँसुओ को यो पोछा माना अचानक सामने आये किसी लक्ष्मण रेखा को मिटा रही हो- "तुम बिल्कुल चिन्ता मत करो जेसी। मैं सब कुछ लिखकर कल बैंक मे दे दूँगी । यह सब मेरे कारण हुआ है सारा इल्जाम भी मैं अपने सर ले लूँगा।" शला की आवाज कुछ असाधारण सी थी। 'पागल हो गई है" जेसी चौंक कर बोला "तुम एसा नहीं करोगी-हमे जल्दबाजी में तो कतई कोई कदम नहीं उठाना है।" जेसी का दिमाग तेजी से बचाव का रास्ता दृढने लगा था। उसकी आवाज मे फुसफुसाहट थी जैसे अपने आप से ही बात कर रही हा- "अभी ता एक हफ्ते का समय है। कम से कम मिसज सैम्यूल के 38 आने तक का इन्तजार किया ही जा सकता है।" अब शेला के घूरने की बारी थी। तभी घडी ने रात के बारह बजाये। जेसी ऐसे उठी जैसे सब कुछ नार्मल हो और शेला की बाँह पकड उठाते हुए बोली- "उठो झटपट हाथ मुह धो लो। हल्का-फुल्का कुछ खा ल। फिर एक-एक नींद की गोली ले आज की रात इत्मिनान से साये। कल ठण्ड दिमाग स साचगे आगे क्या करना है।" पर नींद की एक गोली शेला के दिमाग की बौखलाहट को कहाँ रोक पा रही थी। उसके दिमाग की नसे तनने लगी थी। सोच का जाल मकडी के जाले की तरह लचक-लचक कर फैल रहा था। तभी दूर घटे न चार बजाय। एक, दो, तीन कब खिसके पता भी न चला। हार थक उसने एक साथ दो टैबलेट और लिये और चद मिनटो मे बेहोश हो गई। सबेरे जब शेला की आँख खुली- दिन के ग्यारह बज चुके थे। उसने देखा फलास्क मे चाय रखी है और उसके नीचे एक पुर्जा दबा है। जेसी ने लिखा था- "तुम आराम करो मैं दफ्तर मे बता दूगी तुम्हारी तबियत ठीक नहीं-तुम्हारी आज की छुट्टी मजूर हो जायेगी।" शेला को यह अच्छा नहीं लगा। सारा दिन वह क्या करेगी। नहाते-धोते कुछ घटे मुश्किल से निकले कि खालीपन और आने वाले खतरे को भयावहता उसे काटने लगी। अचानक उसे कुछ याद आया ओर वह पुराने अखबार उलटन लगी। जार्ज द्वारा लाया अखबार इत्तफाकन जल्दी ही मिल गया। उसने उस छोटी-सी खबर को ध्यान से कई बार पढा, जिसमे सिडनी के एक डिपार्टमेटल स्टार्स मे आगजनी और धमाके का जिक्र था। थोड़ी दर बार वह बाहर निकल पडी। जब लौटी शाम ढल चुकी थी। जसी पेन्ट्री मे कुछ पका रही थी। शेला के अदर आते ही जसी ने पूछा- "कहाँ गई थी ?" "बस यों ही थोडा टहल आई। मन घबरा रहा था। शेला न उत्तर दिया। 1 39 का स्दन त यो हो विवश हताहै सप अपन में उन झेलन की विवशता और भीकरण हागे है। परन्तु पकृति न शायद ऑनुओका इसीलिए बनाया है कि जब कोई दुव असह्य हाने लाता उम पिपलना का बहाना मिल जाय। कुछ शान्त हाने पर मुंह हाथ अच्छी तरह धा शला वाहर निकली। बाथरुमक दरवाज के पास ही जसी वन सोचकर काट रही थी। शला को निकलत दव उसन राहत की साम ली, वाली - "चला कुछ खा-पो लें।" दोनों का डिनर चुपचाप एक साथ ही खत्म हुआ। टवुल समटते हुए जसी न कहा- "वळ आदमी को इसस भी बदतर हालत में पहुंचा दता है। शान्त हो उम्मीद की किरण खाज थक हार कर सा सकता ठीक है वरना आज भी नींद की गाली ले ले।मैं ता कहूंगो तू एक हफ्ते की छुट्टी ल ल। इस बीच तुम्हारी खाज भी पूरी हो जायगी और ईश्वर ने चाहा तो सर ठीक हो जायगा।" शला उठकर विस्तर पर चली गई। भला बालती क्या किन्तु मन क किसी काने में आस की एक धीमी लौ कपकपा रही थी। शायद जेसी ठीक ही कह रही हो। शायद उसने काई रास्ता सोचा हो। बस वह तो यही मनायगी -"भगवान जसी की मदद कर।" पता नहीं क्या वह यह नहीं साच पा रही थी - "ईश्वर हमारी मदद कर।" अभी तो जेसी ही उसे भगवान स्वरूप लग रही थी। दर रात तक या ही प्रार्थना करता मनौतिया मनाती शेला कब नींद के आगोश म चनी गई उसे पता भी नहीं चला! आगे की घटना कुछ ऐसे घटी माना एक तूफान आया नाव उत्टी शला डूब गई। फिर आँख खुली और वह किनारे पर पड़ी थी। दूर सवरे का सूरज मुस्करा रहा था। मिसज डैनियल और मिसेज सैम्यूल के बीच पिछले दो रातो से देर तक बात चलती रही थी। पहली रात की बात महज औपचारिकता और एक दूसर क हाल-चाल को पूछताछ म बीती थी। उठत समय मिसज डैनियल ने बस इतना सारा किया था कि शेला आर.जेसी दाना 4.

वह परसा आ भी रही हैं। मिसेज मैम्यूल भी उसके अगल दिन आ जायगी। उनके आने से पहले मा का आ जाना बहुत ठीक रहेगा। तू घरा मत। अगर मुझ पर जरा सा भी भरोसा है थाडा सा भी मचमुच का प्यार है तो सब कुछ मुझ पर और मा पर छोड दे। बस कवल प्रभुस प्रार्थना कर वह हमारी मदद करे।" शेला को कुछ भी सूझ नहीं रहा था। वह तो महज इस कल्पना म वेचैन थी कि ग्लानि का यह बोझ लिए वह कैसे मा क सम्मुख होगी। नहीं -इससे तो बेहतर है ईश्वर उसे उठा ले। इसी सोच म वह गुमसुम बैठी रही। .. जेसी ने बात का रख पलटने के लिये पूछा-"अच्छा बता तू कहाँ गई थी ? सारा दिन क्या किया?" 'बस या ही टाइम्म के दफ्तर में गई थी।" "टाईम्स के दफ्तर में।"जेसी की आवाज में अचम्भा था। "हां परसा फिर जाऊगी एक न्यूज एडीटर ने यादा किया है यह सिडनी वाली रायर का पूरा विवरण पता लगाकर बतायेगा।"वैर सेना को यकीन था कि उस रायर से जार्ज का कुछ लेना देना नहीं। उमन ता इस इत्तफाक को बहानेबाजी का माहरा बनाया था। यह नहीं हाताला कोई और कहानी होती। हाय रो भोली! वैग जरा भी शक ना उस बरेलिये पर। कैसे कर गई नादाना। साचते-सोचा उस लगा यह पगन रोजायेगी। उठकर बापस्म की तरफ भागो उस राम उबकाई आरती थी। उसने पानी थेटे मुंह पर डाले।मामन अइन में अपना पहरा उ! रहा अजनयी सा लग र पाामानों कोई दागो चोर उपूर | आनकमा का अम्ममने उभर" जान पाया 37 भरा भाई कोष अगव नारा और चयन गयोपुरनोरना। .ram - "मैंने कहा न तू चिता मत कर । कुछ मिल जुल कर साचगे। आज सारा दिन मैंने पूरे मामल पर नये सिर से गौर किया। मुझ आशा की एक हल्की सी किरण दिखाई दे रही है। लगता है कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा।" कुछ क्षण खामाश रह जेसी पुन बोली - "हाँ बुरा मत मानना मैंने तुम्हारी मा को फोन कर फौरन आन को कहा है।" 'क्या।' शला चौंकी - फिर गुस्स भर लहज म बोली - "जसी तुमने ऐसा क्यो किया ?" 'जरा ठण्डे दिमाग से काम ले, यह सिर्फ तेरी या मेरी नौकरी का प्रश्न नहीं। हम दोनो का पूरा भविष्य दाव पर लगा है। जिस पेशे मे हम हैं वह काजल का कोठरी है जहाँ जरा सी असावधानी से लगा दाग छुडाय नहीं छूटता।" "ओह गॉड।"शेला अपना माथा पकड धम्म से बैठ गई। जेसी उसके पास आ उसका सर अपने कधे से टिका कर बोली - "शेला मैं तुमसे लगभग पन्द्रह साल बडी हूँ। इन साला ने मुझे जीने की जद्दोजहद मे काफी कुछ सीख दी है। मुझे यकीन है इस मामले को हल करने मे तुम्हारी मम्मी से काफी मदद मिलेगी।" शेला भॉचक हो जेसी को एकटक दखती रही। उसे जेसी की बाते बडी अटपटी लग रही थी। भला मा इसम क्या करेगी। "नहीं जेसी - मैं कल ही बैंक म अपना बयान देकर कहीं और चली जाऊगो और आगे के फैसले का इन्तजार करूँगी। किन्तु मा को यह काला मुँह नहीं दिखाऊगी। मुझमे इतनी हिम्मत नहीं कि मा की ओर सिर उठाकर देख भी सकूँ।" जेसी ने बडी गम्भीरता से कहा 'शला मेरा तुम पर कुछ हक बनता है यह तो मानोगी - मैं उसी का वास्ता देती हूँ मुझ अपने तरीके से इसे हल करने दो। तुम्हारे भाग निकलने से मा को कुछ पता नहीं चलगा ऐसी तो बात नहीं। देर-सबेर उन्हे तो सब मालूम होना ही है और अब तो - 40 वह परसा आ भी रही हैं। मिसेज सैम्यूल भी उसक अगले दिन आ जायेगी। उनके आने से पहले मा का आ जाना बहुत ठीक रहेगा। तू घबरा मत। अगर मुझ पर जरा सा भी भरासा हे, थाडा सा भी सचमुच का प्यार हे तो सब कुछ मुझ पर ओर मा पर छाड द। बस कवल प्रभु से प्रार्थना कर वह हमारी मदद करे।" शेला को कुछ भी सूझ नहीं रहा था। वह तो महज इस कल्पना से बेचैन थी कि ग्लानि का यह बोझ लिए वह कैसे मा के सम्मुख होगी। नहीं -इससे तो बेहतर है ईश्वर उसे उठा ले। इसी सोच मे वह गुमसुम बैठी रही। जसी ने बात का रुख पलटन के लिये पूछा- "अच्छा बता तू कहाँ गई थी ? सारा दिन क्या किया ?" "बस या ही टाईम्स के दफ्तर मे गई थी।" "टाईम्स के दफ्तर मे।" जेसी की आवाज मे अचम्भा था। "हाँ परसो फिर जाऊगी एक न्यूज एडीटर ने वादा किया है वह सिडनी वाली खबर का पूरा विवरण पता लगाकर बतायेगा।" वैसे शेला को यकीन था कि उस खबर से जार्ज का कुछ लेना देना नहीं। उसने तो इस इत्तफाक को बहानेबाजी का मोहरा बनाया था। यह नहीं होता तो कोई और कहानी होती। हाय री भोली। कैसे जरा भी शक नहीं हुआ उस बहेलिये पर। कैसे कर गई नादानी । सोचते-सोचते उस लगा वह पागल हो जायेगी। उठकर बाथरूम की तरफ भागी उसे जोरो से उबकाई आ रही थी। उसने पानी के छींटे मुँह पर डाले। सामने आइने मे अपना चेहरा उसे बडा अजनबी सा लग रहा था। मानों कोई दागी चोर उसे घूर रहा हो। फिर अचानक मा का अक्स सामने उभरता जान पड़ा। वही रोष और उद्विग्नता भरा भाव। जार्ज को एक अजीब नफरत ओर बेबसी से घूरती माँ की आँखे और मा को घूरती शेला। फिर शला का बडे वेग से रुलाई छूटी और आँसू बहते रहे। पछतावे का स्दन ता यों ही विवश हाता है उस पर अकेलेपन म उस झलन की विवशता और भी करुण होती है। परन्तु प्रकृति ने शायद आँसुआ का इसीलिए बनाया है कि जब कोई दुख असद्य होने लगे ता उस पिघलने का कोई बहाना मिल जाय। कुछ शान्त होने पर मुँह हाथ अच्छी तरह धो शेला बाहर निकली। बाथरूम के दरवाजे के पास ही जेसी घेचैन सी चक्कर काट रही थी। शेला को निकलते दख उसने राहत की सास ली बोली - "चलो कुछ खा-पी ल।" दोनो का डिनर चुपचाप एक साथ ही खत्म हुआ। टेबुल समेटते हुए जेसी ने कहा- "वक्त आदमी को इससे भी बदतर हालत में पहुंचा देता है । शान्त ही उम्मीद की किरण खाज थक हार कर सा सक तो ठीक है वरना आज भी नोंद को गोली ले ले। मैं तो कहूंगी तृ एक हफ्ते की छुट्टी ले ले। इस बीच तुम्हारी खाज भी पूरी हो जायेगी और ईश्वर ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा।" शेला उठकर बिस्तर पर चली गई। भला वोलती क्या ? किन्तु मन के किसी कोने मे आस की एक धीमी लौ कपकपा रही थी। शायद जेसी ठोक ही कह रही हो।शायद उसने कोई रास्ता साचा हो। बस वह तो यही मनायेगी - "भगवान जेसी की मदद कर।" पता नहीं क्या वह यह नहीं सोच पा रही थी - "ईश्वर हमारी मदद कर।" अभी तो जेसी ही उसे भगवान स्वरूप लग रही थी। देर रात तक यो ही प्रार्थना करती मनौतिया मनाती शेला कब नींद के आगोश में चली गई उसे पता भी नहीं चला। आगे की घटना कुछ ऐसे घटी माना एक तूफान आया नाव उल्टी शेला डूब गई। फिर आँख खुली और वह किनार पर पडी थी। दूर सवरे का सूरज मुस्करा रहा था। मिसेज डैनियल और मिसेज सैम्यूल के बीच पिछले दो राता से देर तक बाते चलती रही थी। पहली रात की बात महज औपचारिकता और एक दूसरे के हाल-चाल की पूछताछ म बीती थी। उठत समय मिसज डैनियल ने बस इतना इशारा किया था कि शेला और जेसी दोनो 42 44 बैंक के किसी जालसाजी का शिकार हो गयी लगती हैं और उन्हे सलाह- मशवरा के लिये बुलाया है। परन्तु दूसरी रात माहौल काफी सजीदा था और जेसी इसी बीच कॉफी लेकर आ गई थी। मिसेज सैम्यूल घुडकी थी - 'जब तक मैं न कहू कोई मेरे कमरे मे नहीं आयेगा।" जेसी ने डबडबाई आखा से मिसेज सेम्यूल की ओर देखा। इन आँखो मे बसी लाचारी और सिसकते फरियाद ने मिसेज सेम्यूल को एक झटका-सा दिया। वे कुछ नरम हो बोली- "तुम अभी जाओ हम दोनो को कुछ देर के लिए अकेला छोड दो"जेसी सहमी-सहमी सी बाहर निकल आई। उधर कमरे म बेचेन शला जेसी को इतनी जल्दी वापस आते देख और बौखला गई। सच तो यह था कि दोनो ही कल शाम से बदहवासी के आलम मे थीं। लगभग बारह बजे मिसेज डेनियल लौटीं उन्होने आते ही कहा था- "हमने हल्का-फुल्का खाना मिसेज सेम्यूल के साथ ले लिया है। तुम दोनो ने शायद अभी तक कुछ नहीं खाया, कुछ खा-पीकर सो जाओ सवेरे बात होगी। हाँ - चिन्ता की कोई बात नहीं, सब ठीक हो जायगा।" दूसरे दिन पता चला, यह तै हुआ था कि मिसेज सैम्यूल सभी जाली चेका के भुगतान की पुष्टि कर देगी और ओवरड्राफ्ट का पेसा भी चुकता कर देगी। बेंक को इसकी कोई खबर नहीं होगी परन्तु शेला को नाकरी से त्यागपत्र देना होगा। वह अधिक से अधिक एक माह यहाँ रह सकती है उसके बाद अपना कहीं ओर इन्तजाम करना होगा। बाद मे सब कुछ वैसा ही हुआ। मिसेज डैनियल ने शेला को घर वापस चलने को कहा था पर शेला भी तो अपने मा की बेटी थी। उसने मन ही मन मा को प्रणाम किया और कसम खाई - "मा अब मैं कुछ बन कर ही तुम्हारे पास लोटूगी।" उसने पूरी योजना बना ली थी। उसकी बचत छ सात महीने के गुजारे के लिए काफी होगा। फिर कोई पार्ट टाईम काम कर लेगी और वह पिल पडी अध्ययन मे रिसर्च मा आर्थिक दृष्टि से पिछडे देशो की दशा एव उनके सुधार' यही उसका विषय था। चन्द - 43 वर्षो म ही उसके लेस अखबारो में चर्चित होने लगे। उसक लेखा में तथ्यात्मक सच्चाई जा थी। उसे कॉलेजा और गोष्ठिया में बोलने का निमत्रण भी मिलने लगा। उसकी एक पहचान बनने लगी। पुन एक बड़े बैंक में अच्छ ओहदे पर लग गई। इस बीच मा से बस पत्रा का सिलसिला भर रहा था परन्तु जेसी बीच-बीच मे शेला की मा से मिलने जरूर जाती थी। यदा-कदा जेसी और शेला भी बाहर ही बाहर मिलते रहते थे। पता नहीं क्या शेला की हिम्मत ही नहीं होती थी वह जेसी से मिलने मिसेज सैम्यूल के यहाँ जाय। वक्त या ही गुजरता गया। इस बीच जेसी क माता-पिता दाना ही एक वप के अतराल पर चल बसे थे और जेसी अपने बेटे के साथ मिसेज सम्यूल क यहाँ ही आ बसी थी। धीरे-धीरे वक्त की मार ने जेसी और शेला के सम्बन्धा की गाठ को पत्रा तक सीमित कर दिया। कभी यादो के उद्गार उमडे तो टेलीफोन पर बातचीत कर ली। काफी दिनो बाद जब दोनो मिले थे तो जैसी ने बताया था- "मिसेज सैम्यूल के रुपये का हर्जाना मां ने कई किश्तो म पूरा किया था। शुरु के किश्तो की भरपाई मा ने अपना मकान गिरवी रख कर किया था। परन्तु उसने जेसी को कसम दे रखी थी शेला को इस बात की जानकारी न हो।" एक ओर तो बढने और आगे बढ़ने की धुन और खुशी, दूसरी ओर बीते हादसा का भयावह चेहरा। शायद यही कारण कि शेला और जेसी बहुत कम मिलते। फिर भी जब भी मिलते बाते करते पता नहीं वह मुर्दा कब और कैसे कब्र मे बाहर निकल आता । शायद डर से भयावह और कोई डर नहीं शेला कुछ हद तक इससे उबर रही थी। लेकिन जेसी उसे घुन लग रहा था। अचानक पता चला उसके दोनो गुर्दे बेकाम हो चुक हैं और जव तक कुछ किया जा सके जेसी सब जजाल से मुक्त हो चल बसी । शेला को लगा उसका आधा हिस्सा मर गया है। काफी दिन लगे उसे अपने को सम्भालने मे। बडी इच्छा हुई थी मा के पास लौट उसकी गोद म मुँह छुपाकर अपना जी हल्का करे। परन्तु उसकी अन्तरात्मा ने आवाज दी 'अभी तुम्हारा प्रायश्चित पूरा नहीं हुआ'- ऐसा नहीं कि इस बीच वह माँ से नहीं मिली थी। प्रीमियर इन्टरनेशनल बैंक मे स्टडी टीम के साथ भारत जाने के पहले भी तो वह मा से मिलने गई थी। पुरानी लकीरे तो मिटी नहीं उलटे बात बनने के बिगड गई थी। वह दरार वहीं की वहीं कायम थी। हाँ दूसरी बार जब दोनो जेसी के फ्यूनरल पर मिले थे एक खामोश दर्द लिये बिछुड़े थे। फिर काम और काम । इस देश उस देश की भाग-दौड और शेला अपने मे ही खोती चली गई। उसे अब अपने आप पर एतबार होने लगा था। कुछ-कुछ फन भी महसूस होने लगा था। उस पर आज की यह उछाल । विश्व बैंक का यह गरिमामय पद वह झूम उठी थी। शायद अब उसके व्यक्तित्व मे ठहराव आ रहा था तभी तो सब गुमान भूल सबसे पहले उसने मा को यह खुशखबरी दी थी और अगले ही फ्लाइट से उड मा से जा लिपटी थी। 4 बाँध तोडकर जब नदी आगे बढती है तो उसे कहां गुमान रहता है कि वह किसे रौंदती जा रही है - किसे छोड आगे बढ़ रही है। शेला का भी यही हाल था। परन्तु आज वह स्पष्ट समझ पा रही है - किन हाथो ने वेग दिया हे इस बहाव का। मिसज सैम्यूल ने कितना सटीक कहा था-"तुम अपने भाग्य को सराहो जो ऐसी ग्रैन्डलेडी तुम्हारी मां है।" सामने वही ग्रैन्डलेडी बैठी है और शेला की आखे उसे या निहार रही है जैसे कोई मरियम की मूर्ति को अभिभूत हो देख रहा हो। पिछले वर्षो म मा बेटी कितने दूर-दूर रही हैं फिर भी दोना के बीच यह कैसी विचित्र केमीस्ट्री है कि लगता है दोना एक दूसरे की बाँह थाम सफर कर रहे हों। "अच्छा मा सच-सच बताना तुम्ह जार्ज क्यों नापसन्द था ?" अपने ख्याला को माड देते हुए शेला ने पूछा। "क्या कहू - बस इसे इन्टियूशन समझ ले। वेसे मैंने अपने इन्टियूशन को हमेशा ठीक पाया है - बशर्ते उसका पहला सिग्नल मेरी जहन से न फिसला हो। हालाँकि जब कभी मुझ इस सिग्नल का पकडन म देर हुई कोई गहरा मुलम्मा कुछ दूसरा मतलब लगान पर मजबूर कर गया। परन्तु जार्ज क मामले म मरे मन ने बार-बार उससे सतर्क रहने की चेतावनी दी थी।" मा कुछ खोई खोई सी बोली। 46 'काश मुझे भी एसा इन्ट्यूिशन आता पर मेरी ता मति ही मारी गयी थी।" फिर कुछ रुककर शेला या बोली जैसे खुद से बात कर रही हो- "मेरे हठ और दुर्बुद्धि ने मुझ इतना हठी कर दिया कि वह सब याद कर आज भी आत्मा शर्म से मरी जाती है। सच मा - वेसे तो कोई इतनी बडी भूल नहीं जो एकदम अक्षम्य हो फिर भी कभी-कभी ऐसा क्या महसूस होता है कि मॅन सब कुछ खो दिया है।" 'क्या खोया क्या पाया? इसका आज तक कोई हिसाब कर पाया है, जो तृ करने बैठी है। इस पर जितना सोचेगी, यह उतना ही वजनी होगा। इसे दफन कर-खाक डाल। कब्र पर फिर से घास उगा। नया फूल लगा। ये नये पौधे पनप कर मरहम का काम करेगे।" "चाहती तो हू कोशिश भी की है पर वे हादसे अचानक भूत की तरह सामने आ जाते हैं और में ठिठक जाती हूँ।" 'अकेले लडने वाले के साथ यही होता है। अकेलापन खुद भूत होने जैसा है। याद रख बेटी एक हद के बाद दलील देने की आदत बुजदिली की निशानी होती है। तर्को के तराजू पर ठहराव का पलडा कभी भारी नहीं होता। जीने के लिये तो बचे खुचे अरमानो की डार पकडकर गलत सही जो मन कहे फैसला करना जरूरी होता है।" "कभी तो इन्हीं अरमाना ने - ऐसे ही लालसाआ ने मारा था" शेला के मन से हूक उठी। 'कभी ओर अभी म फर्क है। मरी हुई लालसा की ललक बहुत कुछ तपे सोने का तेज लिये होता है।" 'तो क्या सब कुछ खाया पुन मिल जायगा?" "फिर खाने-पान की बात ले आई। मैंने जीवन मे जो कुछ पाया उससे अधिक तुझे देने की कोशिश को फिर भी शायद कहीं डडी मार गई। ऐसा हम जान वृझकर नहीं करत। हमारा अह हमार सोवन का तरीका कि में यह सब कर रहा हूँ हममे एमा करवाता है। पर मजे की - 47 बात तो यह है कि न एसा देने वाला जानकर करता है न लने वाला। आदमी बना ही ऐसा है। वह सब कुछ दे ही नहीं सकता। अपने लिये मुट्ठी बाँधे रखना उसकी फितरत है। हैरत की बात तो यह है कि जब लेने की बारी हाती है तो सब कुछ लपक कर ल भी नहीं पाता। शायद तुमने भी कभी ऐसा महसूस किया हो।" शेला का लगा मा अचानक कहीं खोती जा रही है। उसकी आँख एक अजीब सी चमक लिये किन्ही यादो के दरीचो को खोल रही है "तुम्हार पापा तब बिल्कुल चिडचिड हा गय थे। अपनी अपगता से समझौता करने में एकदम असमर्थ । कुण्ठा ने उन्हे शक्की और झको बना दिया था। में भी एक घुटन-सी महसूस करने लगी थी। तुम्हारे पापा अपना में थे पर मैं यहाँ के लोगों के बीच झली जा रही थी। जी ताड महनत और समर्पित सेवा यही सबल होता है एक गुलाम का। मैंने भी यही हथियार इस्तमाल किया और बड़ी मुश्किल से अपने हक के लिये एक छोटी-सी जगह बना पाइ। सामान्य रूप से तो मान्यता का काई प्रश्र था ही नहीं। श्वेत और अश्वेत के बाव को दरार क्या कभी पटी हे जो पटती। दरअसल यह दरार ता होने और न हाने के बीच की दरार है। देश- काल बस इनके रूप-नाम बदलता रहता है।" शेला को आज पहली बार मा के मन के इस अनजान काने मे झाकने का अवसर मिला था। मिसेज डैनियल अपने ख्यालो मे ही योई बोलती जा रही थी- "इन सब के रीच तुम्हारे पापा के कजिन पीटर ही मुझ ऐसे लगे जिसमे मुझ कोई फर्क नजर नहीं आया। यह ता उन्हीं का सहारा था जिसने मुझ टूटन से बचा लिया था। पर वे हो तुम्हारे पापा के शक का कारण भी बने। जीवन म उस रात मैंने तुम्हार पापा का पहली बार इतने वाभत्स रूप मदखा था जर उनकी गन्दी गाली-जड़ा थप्पड मुझ पर पडा था। उस क्षण मैंने साचा था। काश भगवान उस उठा लता और मुझे मुक्ति मिलती। बाद में कितनी ग्लानि हुई थी। जिम मैंने कभा देवता का 48 - तरह पूजा था आज उसी से छुटकारा पाना चाहती थी। कितना अजीब है यह मानव मन, हमेशा अपनी ही करना चाहता है। अगर मन की गति पर बुद्धि का अकुश न रहे तो कितना अनर्थ हो जाये। एक पल को तो मेरा मन भी पीटर की ओर झुकने लगा था। फिर स्वय पर हसी आई थी-यह कैसा वहशीपन छुपा है मेरे अन्दर ?" "मा काश। मुझम तुम जैसे सच को स्वीकारने की हिम्मत होती।" "पगली कौन सी हिम्मत की बात कर रही है ? क्या मनुष्य कभी खालिस सच की गर्मी बर्दाश्त कर सकता है ? नहीं - वह तो सच को भी एक हथियार जैसा इस्तेमाल करता है। जब वह बेबस रहता है तो सामने वाले को कडुआ सच बोलकर अपनी हार को जीत मे बदलने की कोशिश करता है। ऐसे लोगों को कभी कभार मुहफट की सज्ञा भी मिल जाती है किन्तु यह सब महज मुलम्मा है, मुलम्मा।" शेला को लगा वह भी कहीं उलझती जा रही है। मा जैसे नींद से चौंकी-"अच्छा बहुत हुआ अब चल खा पीकर आराम कर अभी तो ढेर सारी बाते करनी हैं। कल मा बेटी मे नहीं दो सखियो म बात हागी।" फिर मा ने शेला का माथा चूमा और दोनो उठ पडे। दूसरे दिन मा ने कुरेद-कुरेद कर पूछा था टॉम का क्या हुआ? "कौन टॉम " शेला की आवाज म सचमुच आश्चर्य था। 'अरे वही तुम्हारा टूरिस्ट जिससे भारत में तुम्हारी दोस्ती हुई थी।" "अरे माँ तुम्हारा भी जवाब नहीं कहाँ की ईंट कहाँ का रोडा- भानुमति ने कुनबा जोडा।" फिर अपनी बाता पर गार कर खुद ही मुस्कुराने लगी। मा को आँखो मे एक चमक-सी उठी। शेला ने खाये-खोये से कहा-' शुरु-शुरु मे उसके दो तीन खत आये थे। मैंने भी जवाब दिया था। उसके बाद उसने अचानक चुप्पी साध ली। कुछ दिना बाद उसके प्रकाशक न राजस्थान की पृष्ठभूमि पर लिखा उसका यात्रा संस्मरण जो उसने मुझे समर्पित किया था - मेरे पास भेजा था। मैंने उसी प्रकाशक से उसका पता प्राप्त किया था। लगातार उसे कई खत लिख थे और फिर एक खत तो वापस भी लौट आया था और यह कडी वहीं खत्म हो गई।"शेला के स्वरो मे एक विचित्र सी उदामी थी। मा ने बात का रुख मोड दना ठीक समझा। वह उठ कर आलमारी से कई पुरानी एलबम ले आई ओर शेला के बगल मे बैठ उसके पन्ने पलटने लगी। कितनी बार देख चुकी है शेला इन तस्वीरो को पर समय के अन्तराल ने उनमे जैसे फिर से नई जान डाल दी हो। सभी चेहर तो उसक जाने पहचाने हैं परन्तु आज वे सभी कितने नये से लगते हैं। इन तीन किश्तो वाली एलबम के आखिरी हिस्से में तो सिर्फ उसके अट्ठारहवे जन्मदिन तक के वर्ष दर वर्ष खींची तस्वीरो को तहरीर है, जैसे किसी कृषि वैज्ञानिक द्वारा नये पौधे के पनपने की कहानी दर्ज हो। बाकी दो एलबमा मे वह उसकी मा और उसके पिता बस यही तीन ही तो हैं। शायद अपवाद स्वरूप मा और पिताजी के बीच एक तस्वीर किसी पादरी का है। उसे कई बार यह सब कुछ अटपटा-सा लगा था। परन्तु क्या और क्या यह तो अचानक आज पता चला जब मा ने उससे या यो कहें अपने आप से यह प्रश्न पूछा- "जानती हो इन तस्वीरो म बस हम तीन ही क्यो हैं ? न कोई मित्र न रिश्तेदार न पडोसी ? पीटर तो बाद मे हमारे बीच आया था। तब मैं बहुत डरी-सी रहती थी। सबसे अलग-थलग हमेशा सहमी-सहमी सी।"कुछ देर रुककर मा ने कुछ सफाई पेश करने जैस अन्दाज मे फिर कहना शुरु किया - "उखडे हुए लाग और उखड हुए दरख्त शायद एक जैसे होते हैं- नई मिट्टी नहीं पकड पात और कहीं काइ जड जी भी उठे तो एक अनजान भय उस कुम्हलाये सा रहता है।" 50 - "मा अब तुम सो जाओ" शेला ने टोका। वह मा की आँखो में ठहरा हुआ सा कपन देख पा रही थी। "सो जाउगी - तू परेशान मत हो। जानती है किसी से बहुत लगाव या बहुत प्यार - हमे दुर्बल बना देता है। मेरा भी चित्त आज दुर्बल हो रहा है। इसलिये तुम्ह सब कुछ बताकर हल्का होना चाहती हूँ। तुम्हारे लिये यह सब जानना इसलिये भी जरूरी है कि कालान्तर के तराजू पर कम से कम तुम मुझे गलत न तौलो।" शेला कुछ भी बोल नहीं पाई। सिर्फ मा का हाथ अपने हाथो मे पकडे आशकाओ से घिरी उसे एकटक निहारती रही। एलबम का पन्ना पलटते-पलटते मा फिर बोली 'इन तस्वीरो म तुम देख रही हो लगभग हर जगह ये बेजान रेल के डिब्बे हमारे पीछे माये की तरह खडे हैं। इसी ने मेरे जीवन को एक नया मोड दिया था। ऐसे ही किसी डिब्बे से उतर कर एक छोटे से स्टेशन पर में तुम्हारे पिता से मिली थी। तब भारत मे रेल को अलग-अलग कम्पनिया थी। दिल्ली से कलकत्ता तक की लाईन ईस्ट इण्डिया कपनी द्वारा बनाई गई थी। अधिकतर ड्राइवर अग्रेज या एग्लोइडियन थे।" शेला को लगा उसका अपना अस्तित्व धुधला होता जा रहा है। वह मा नहीं मोना, माना डेनियल के परछाई मे विलीन होती जा रही है। तब मोना कहाँ थी। वह तो मानक थी। अमर की विधवा अपने प्राण बचाने की लुका-छिपी की दौड से थकी हताश उस मालगाडी के डिब्बे से उतर पता नहीं किस प्रेरणावश वह उस अनजान ड्राइवर के पीछे चली जा रही थी। महीनो पनाह देने वाले उस स्टशन मास्टर से बिना कुछ बताये चुपचाप निकल भागत समय मन कितना रोया था। अपनी परवाह न करने वाले रक्षक से ऐसी एहसान फरामोशी पर जौ के साथ घुन क्यो पिस मानक न दूर से ही अनुमान कर लिया था वह गोरा चिट्टा ड्राइवर अपनी ड्यूटी पूरी कर क्वार्टर की आर जा रहा है। इस वक्त उसे अपनी - आजादी देश के इसी दुश्मन में समाहित लगती थी। हर परिस्थिति का मूल्य उसके परिप्रेक्ष्य में ही आका जा सकता है। फिर भी उसको टोकने की हिम्मत कहाँ जुटा पाई थी मानक । उसके क्वार्टर पर पहुच कर भी दस्तक नहीं दे पाई थी। बहुत हिम्मत जुटा, बरामदे के एक कोने मे दुबककर बैठ गई थी। जरा सा ठहराव पाते ही भयाक्रान्त मन और भूखा पेट लिय क्लान्त शरीर हरहरा कर टूट पड़ा था और वह तेज बुखार के ताप से नीम बहाश वहीं लुढक गई थी। जब मानक को आँखे खुली थी वह एक अनजान बिस्तर पर थी। सामने वही ड्राइवर खडा था और उसके सिरहाने सफेद लबादा पहने कोई बुजुर्ग कुर्सी पर बैठा उसका माथा सहला रहा था। बाद मे पता चला था वह वहाँ के चर्च का पादरी था। मानक हडबडा कर उठ बैठी और परिस्थितियो की आकस्मिकता से अकबकाई लपक कर पादरी के पैर पकड सिसकन लगी। पादरी ने बड़े प्यार से पूछा - "टुम कौन है यहाँ किधर से आया" मानक के मुह से बोल ता नहीं फूट पर उसका रुदन और करुण हो उठा। ड्राइवर तो बस उसे धुरता रहा घूरता रहा। परन्तु पादरी उसे सान्त्वना देत हुय बड़े प्यार से बाल- "घबराना नहीं - हम बटाआ टुम कौन हा हम टुमारा मडड करगे।" मानक ने बस इतना कहा "मैं जान बचाकर भागी हूँ - मुझे बचा लीजिये।" फिर उसका बदन थरथराने लगा। जोरो की कपकपी छूटने लगी। तेज बुखार ने उसे फिर धर दबोचा। समय तो अपनी गति से ही चलता है, यह तो मन है जो कभी पल को पहर और पहर को पल बना देता है। मानक ने भी अपने पल घटे और महाने आतक और आशा क बाच झूलते उस कैदा से बिताए थे जिसे - फासी का हुक्म हो चुका हो और उसका अबोध मन उसे बहला रहा हो घबरा मत, तू तो निर्दोष है - तेरा माफीनामा आता ही होगा। पता नहीं मानक को माफी मिली कि नहीं परन्तु भय और आशकाओ को ढकने के लिए उसे समय की चादर जरुर मिली। कितना खूब लिखा है किसी ने- 'भरा करते हैं जख्मे दिल और आँसू भी हैं थम जाते बनाई जिसने दुनिया ये उसी की मेहरबानी है।" तभी तो चर्च की छाँव मे मानक का मन रमने लगा था। पढाई सेवा और जॉन के प्यार की महक अब उसके जीवन में एक नया रंग भरने लगे थे। पहली बार वह नाम कितना अजीब कितना बेगाना लगा था। 'जॉन डैनियल' यही तो परिचय दिया था उस ड्राइवर ने। पर देखो तो उस रचयिता को फिर कौन सी नई कहानी रचने लगा ? दो साल बाद ही "डैनियल' उसका जॉन था और वह जॉन को मोना थी। हाँ जॉन ने उसे मानक से मोना बना दिया था। फिर भी मन के बधन ने मर्यादा के बाध को कभी नहीं लांघा! आज ईमानदारी से जब मोना सोचती है तो उसे लगता है इसका अधिकतर श्रेय जॉन को ही जाता है। वह बडा ही धर्मभीरू और सयमी था।तभी तो पादरी के इस सुझाव पर कि दोनो शादी कर ले - मोना ने झट हाँ कर दी थी किन्तु जॉन ने कहा था - "वह तो हिन्दू लडकी है ?" फिर मोना ने ही पहल की थी। वह ईसाई धर्म कबूल कर लगी। जिस धर्म में जिदा जलाया जाये उससे तो बेधर्मी हो जाना कहीं अच्छा है। वैसे सचमुच परखे तो उन दोनो के मन के बधन की उपज तो एक ही धर्म से हुई थी- 'इन्सानियत धर्म से।' जैसे बुर दिन नहीं रहते वैसे हा अच्छ समय का चक्का भी घूम जाता है। फिर वह हादसा हुआ था। उस दिन माना जॉन और उनके प्यार को निशानी- दो साल की शेला मधुपुर मे थे। हाय रे विधाता । मोना की झोली में सिर्फ चद साला की खुशिया डाल मुह फेर ली। उसका सुदर सपना एक बार फिर तोड दिया। कितनी कडी परीक्षा थी मोना के लिये। जॉन ने दुर्घटना में अपनी दाना टाँग सा दी थी। जॉन पूरे दो वर्ष अस्पताल म रहा था। कितनी बार ऑपरेशन हुये। ज्या-ज्यो गैंगरीन का खतरा बढ़ता जॉन के जिस्म का कटाव भी बढता जाता। आखिर शरीर का घाव तो भर गया परन्तु मन को होनता का घुन लग गया। जब छ फुट का जवान घटकर साढे तीन फुट का हो जाये तो उसके हदय का भी पगु हो जाना स्वाभाविक है। यही जॉन के साथ भी हुआ। वह अपनो पर ही नहीं अपने आप पर भी खुद को एक बोझ समझने लगा। परन्तु मोना चट्टान-सी खडी रही। विधाता ने उसे जीने की ललक ही नहीं परिस्थितियो से जूझन वाला दहकता दिल भी दिया था। नर्स फिर डायटीशीयन और क्या नहीं बनी माना जॉन के लिये। अतत जॉन के दोस्ता दूर के रिश्तेदारी और चर्च के पादरी ने पहल की और माना अपना छोटा सा घासला समट भारत से इग्लैड आ गई। ब्रिटेन के एक छोटे से कस्बे के इस छोटे से कॉटेज ने कुछ ठहराव दिया। यहीं मोना ने एक तरफ शेला को बढते तो दूसरी तरफ जॉन को घटते देखा था। चाहकर भी वह जीने का उत्साह कहाँ जगा पाई थी जॉन मे । परन्तु उसने मोना की सेवा जरूर स्वीकार की। उसे सराहा भी। जब वह साथ होती उस बडा गर्व-सा महसूस होता किन्तु एकात हात ही हान भाव हौवा बन खडा हो जाता। माना क्या कर तीन प्राणिया का पट उस पर शला की पढाई- जॉन के पेशन की रकम तो बस गरम तवे पर पड़ने वाले चद छींटे जैसे थे। मुआवजे और प्राविडेट फड के पैसे कॉटेज खरीदने मे ही कब के चुक गये थे। नये दश नये माहाल को जद्दोजहद झेलती मोना अपना कुनबा खींच रही थी। कितु इस जूझन न उस पर यह सच भी उजागर कर दिया था कि सवाभाव का हर सस्कृति म अभाव है। यदि इस भाव को सर्वोपरि 54 रख स्वार्थ भी सधे तो इससे उत्तम क्या होगा ? तभी तो उसने चुना था सुबह से शाम तक होटला और घरो की सत चाकरी, फिर देर रात तक अपगो और बूढो के अस्पताल मे नर्सिग। माना बिल्कुल थकी-हारी जब सीधे जॉन के पास लौटती - जॉन खुश-खुश दिखता पर उसकी आँखो मे छलकती पीडा क्या मोना से छिपी रह पाती। इन सब के बीच जब शेला छुट्टियो मे घर आती तो जॉन सचमुच बहुत खुश होता। अक्सर शेला को रोकने के लिये मोना से लडता झगडता परन्तु मोना नहीं मानती। फिर जॉन कई-कई दिनो तक गुमसुम रहता-एक हठी बालक की तरह । इस लुका-छिपी मे भी मोना ने सिर्फ खुशिया ढूढी ही नहीं उसे सजोया भी। परन्तु जॉन ने साथ नहीं दिया। तब शेला तेरह की थी। छुट्टियाँ मना उसे हॉस्टल लौटे एक हफ्ते हुये थे कि जीवन की कठोरता से उसका पहला मुकाबला हुआ। कितना तूफान भरा हुआ था उस छोट से तार म 'योर फादर इज नो मोर' (तुम्हारे पिता नहीं रहे)। फोन की घटी से मा वेटी दोनो चौंकी। फोन शेला का ही था। उसे फौरन मुख्य कार्यालय रिपोर्ट करना होगा। किसी बड़े डेलीगेशन के साथ उसे कई देशों के दौरे पर निकलना होगा। मा ने पहली बार उसे भारी मन से विदा किया था। उसने इतना ही कहा था- "मोका निकालकर अब जरा जल्दी-जल्दी आती रहना"। 14 सात कहते हैं भगवान के यहाँ देर है अधेर नहीं। अगर कहीं खाई खुदती है तो कहीं टीला भी बनता है। उसके लेन-देन का हिसाब ही विचित्र है। शायद अब वह शेला की जिदगी की खाई पाट रहा था। परन्तु जीवन जब भी कुछ देता है उससे अधिक मूल्य लेता है और शेला थक गई है इस लेन- देन की दौड से। उसने फैसला कर लिया है, छोड देगी विश्व बैंक को नौकरी। लदन के ही एक नामी कॉलेज ने उसे प्रोफेसर के नौकरी की पेशकश की है। अब वह मा के साथ ही रहेगी। मा को आराम चाहिये। जब से उसे दिल का दौरा पडा है काफी कमजोर हो गई है। भाग्यवश 'माईल्ड अटैक' था। खबर पाकर शेला के हाथ के तोते उड गये थे। उल्टे पाव लौटी थी मा के पास । मुश्किल से तीन हफ्ते की छुट्टी मिली थी। मा को आई सी यू से जनरल वार्ड में तब्दील कर दिया गया था। डाक्टर ने दो महीने मुकम्मल आराम की हिदायत दी थी। मा ने उसके सर को कसम खाई थी, वह अस्पताल से निकलकर घर पर पूरा आराम करेगी। मिस रूथ उसके साथ रहेगी। शेला का मन तो तभी किया था इस्तीफा दे दे, पर मा ने बहुत समझाया था। रूथ और मा के कई शुभचिन्तकों ने उसे पूरा इत्मिनान दिया था। फिर भी भारी मन से ही वह काम पर लौटी थी। मा की बीमारी मे उसे एक और अनूठा अनुभव हुआ था। सच्ची लगन से की गई सेवा कभी खाली नहीं जाती। 56 शला का सदेव यही लगता रहा था कि मा बडी एकाकी है, बिल्कुल कटी-कटी अलग-अलग। लेकिन यह महज उसका भ्रम था। कितने तो चाहने वाले हैं मा के। शुभकामनाओं का अम्बार लग गया था। दो माह बाद जब शेला मा को दुबारा देखने गई थी तो घर का माहौल देख भौंचक रह गई थी कोई ऐटेन्डेन्ट बना है तो कोई किचेन की जिम्मेदारी सम्भाले है। कोई बगीचे की देखभाल कर रहा है तो किसी की ड्यूटी टेलीफोन पर लगी है। मा के आराम में खलल न पड़े इसलिये एक अस्थाई साउन्डप्रूफ कबिन तेयार कर टेलीफोन उसक अन्दर रख दिया गया है - मिलने जुलने वाला के लिये समय नियत करने का काम मिस रूथ ने अपने जिम्मे रखा था। वह जानती है मिसेज डैनियल लोगो से मिले गुने बिना और बीमार महसूस करेंगी। बडा सुन्दर ताल-मेल बिठाया था रूथ ने - मा को अकेलापन भी न खले और थकान भी न हो। बूढो बेसहारो ओर अपगो के अस्पताल मे मा ने जो जी तोड मेहनत और निष्ठा भरी सेवा दी थी, आज वही सेवा लेने वाले या उनके शुभचिन्तक अजुरी भर-भर उसका प्रतिदान देने की चेष्टा कर रह थे। यह सब दख शेला का मन भर आया था पर साथ ही उसने यह भी महसूस किया था - कितनी खुदगर्ज है वह । आखिर उसने मा को क्या दिया हे ? गाहे-बगाहे चन्द दिनो की मुलाकात या फिर टेलीफोन पर हाल-चाल पूछने की औपचारिकता। क्या मा के प्रति उसका इतना ही फर्ज बनता है ? जिद्दी धुन और यहाँ की हवा ने तो उसे महज एक मशीन बना दिया है। खुद के इर्द-गिर्द ही घूमते रहना जीवन का मकसद नहीं हो सकता आर उसने यह काम छोड देने का फैसला कर लिया था। तीन महीने का अग्रिम नोटिस भी समय से भेज दिया था। यह मिशन कल पूरा हो जायेगा आर परसा पूरा होगा उसकी नोटिस का आखिरी दिन । परसो की ही फ्लाइट से लदन की वापसी का टिकट भी जुक है। वेस तो इस भाग-दौड की नौकरी म मा का घर हो उसका स्थाइ पता हा गया था उसने अपना पूरा सामान भी पिछले साल ही शिफ्ट कर दिया था। उस समय तक मा पूर्ण स्वस्थ हो गई थी परन्तु शलाको यह मलाल रह गया था वह मा को पूरी तीमारदारी नहीं कर पाई थी। पर सभी उसे उल्टा समझाने बुझाने लगे थे। बडी मुश्किल से तीन हफ्ते की छुट्टी मजूर हुई थी। तभी से विश्व बैंक की नौकरी छोड देने का विचार उसके मन मे मडराने लगा था। आज यह सब सोच शेला को हँसी आ रही थी। उसके त्यागपत्र के जवाव मे बैंक ने फिर एक तुर्रा छोडा था - "वर्तमान मिशन की समाप्ति पर उसे तीन महीने की छुट्टी मजूर की गई है। इस बीच वह पुन विचार कर ले और चाहे तो छुट्टी खत्म होने पर फिर काम पर वापस आ जाये।" जब उस हमशा के लिये छुट्टी चाहिये तो तीन माह की मुहलत मिल रही है। यह चाकरी का चक्कर भी अजीब है- प्यासे को पानी की जगह आईसक्रीम दिया जा रहा है। 'एक्सक्यूज मी' एयर हास्टेस ने कॉफी का ट्रे आगे बढाते हुए कहा। शेला की तन्द्रा टूटी। वह अपने सीट पर सभल कर बैठ गई। हाथ की घडी म समय देखा - सवेरे के सात बजे थे और अप्रैल की 26 तारीख थी। एक घटे बाद उसका जहाज स्विटजरलैंड के हवाई अड्डे पर उतरेगा। वहाँ से टीम के कुछ अन्य सदस्य साथ हो लगे और 27 अप्रैल को पूरा डलिगेशन जेनेवा की विशेष गोष्ठी में भाग लेगा। फिर 28 को सुबह उसकी छुट्टी। अचानक उसके मन मे एक खुशी की लहर-सी दाडी। उसने सिडको से बाहर देखा। मौसम साफ था। हवाई जहाज अपनी पूरी ऊँचाई पर यो उड रहा था मानो स्थिर हो। होटल से निकलते समय भी मौसम बडा खुशगवार था। पता नहीं क्या फिजा में क्रिसमस क खुमार की महक-सी लगी। हाँ - बडे दिन की छुट्टी पर भी शला मा से मिलने गई थी। वह पूरी चुस्त-दुरुस्त लग रही थी। रूथ ने बताया था उसके आन की खबर मिलते ही मा उसका कमरा सजाने म जुट गई थी। शता को बडा आश्चर्य हुआ था - मा का उसकी जदलती रूविया की इच्छा-अनिच्छाओ की । 58 इतनी गहरी पकड कैसे थी ? बचपन में उसे बडे-बडे फूल वाल शोख रगा के वॉल-पेपर अच्छे लगते थे पर अब उसकी पसन्द हल्के-फुल्के रगा की छींटो और बुदको मे बदल गई थी। कमरे की बाकी सजावट भी उसके तबीयत के मुताबिक थी। बडा अच्छा लगा और उसने मन ही मन फैसला कर लिया था अब सदा के लिये मा के साथ रहेगी। परिचारिकाओ को आम सेवा समाप्त हो चुकी थी। अधिकतर यात्री पेपर या मैगजीन पढने मे तल्लीन थे। कुछ झपकिया भी ले रहे थे। शेला को बस बोरियत हो रही थी। अखबार तो उसने कब का देख लिया था। समय काटने के लिए उसने सामने वाली सीट में पड़ी साप्ताहिकी निकाल ली और उसके पन्ने पलटने लगी। 'क्राइम रिपोर्टर' - मार-धाड और अपराधो के चटपटे समाचारो से भरपूर कोई स्थानीय पत्रिका थी। सम्भवत फोटो पुरानी थी ओर ब्लो अप के फैलाव से शक्ल कुछ धुधली दिखती थी। शेला को हठात् लगा युवक का चेहरा काफी जाना पहचाना है। अभी उसका दिमाग यादो की फाइल ढूँढने म लगा था कि फोटो के नीचे छपे सक्षिप्त समाचार को पढकर वह बुरी तरह चॉक उठी। उसके मुँह से एक दबी-सी चीख निकलते-निकलते रह गई "माईकेल उर्फ माइक उर्फ जार्ज या जोजेफ और क्या-क्या और उसकी गर्ल फ्रेन्ड ग्रेसी उर्फ लिन्डा ग्रे एक बैंक म डाका डालते समय मारे गये। उनके दो अन्य साथी भी बुरी तरह घायल हैं जिनके बचने की कोई आशा नहीं।" इस खबर से शेला के मन को चहकना चाहिये था। परन्तु ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। उल्टे अन्दर ही अन्दर एक गहरे दर्द की परत सी फैलने लगी। अरे । वह तो पत्थर दिल निकली पर बेचारी जेसी इसे कहाँ झेल पाई। जेसी को याद कर शेला की आँखे छलछला उठी। उसका मन दुख से कातर होन लगा। क्या इस दुख में जार्ज के बेतुक अन्त की पीडा भी मिली थी या सिर्फ अपनी भूल के बेमानी अन्त को नहीं - उसे तो परिस्थितियो को विवशता से उपजी पूरे प्रकरण की व्यर्थता कचोट रही 59 थी। प्रायश्चित के नाम पर अपनी एक छोटी सी भूल क लिय उसने अपने सम्पूर्ण जीवन के रस को खुद सोख शुष्क और वीरान बना लिया था। जीने के लिये तो उमगा की चुनरी चाहिये थी, कामयाबी का कफन नहीं। इतनी कीमत लकर तो समय ने पुराने जख्मा को कब का भर दिया था पर अब जो घाव भरना था वह तो ऑपरेशन के बाद वाला जख्म था। धीर-धीर उसका चित्त सभलन लगा। उसने एक गहरी सास ली - यह नहीं तो ऐसा हो काइ ओर अन्जाम हाता । यह तो इश्वर की कृपा है कि उस पटाक्षेप का पता चल गया वरना इस हादसे का हौआ यदा-कदा उस सताता ही रहता। प्लेन के लैंडिग की घोषणा सुन शेला का ध्यान बटा और वह सजग हो उठी। जहाज के उतरते-उतरते वह भरसक सामान्य हो चुकी थी। निराशा के बादल उम्मीदा के तूफान मे उड चले थे। अब उसका मन इस मिशन से जल्दी-जल्दी छुट्टी पा मा से मिलने के लिये उतावला हो रहा था। आने वाली कल की मीठी महक मे डूबती उतरती वह बैगेज एरिया से अपना सामान ल लॉज की ओर बढी तभी अपन नाम की घाषणा सुन उसक पाव पूछताछ काउन्टर की आर मुड चले। काउटर के पास टीम का एक पूर्व परिचित सदस्य खडा था। उसने बड़े फीके शब्दो मे 'हैलो' कहा और औपचारिकता निभाने के लिये अपना हाथ आगे बढ़ाया "ओह उसके हाथ इतने ठण्डे और बेजान से क्यो है ?" शेला का हृदय किसी अन्जान आशका से काप उठा। "मुझे आपको यह दु सवाद देते बडा कष्ट हो रहा है।" सदस्य का गला भर्राया हुआ था। उसने आहिस्ता अपने कोट की जेब से एक लिफाफा निकाल शेला की ओर बढ़ा दिया। शेला ने कॉपते हाथो से लिफाफा खोला। हवाई जहाज के एक टिकट के साथ छोटा-सा पुर्जा लगा था। "हमे बडे खेद के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि आज तडके आपकी मा का देहान्त हो गया। बैंक ने उसे मिशन से बरी कर दिया था। साथ ही लन्दन के लिय आगला उडान से उसकी सीट भी बुक कर दी थी। -4 60 आठ मृत्यु महान है, एकरूपा है। इसीलिए आदरणीय है। तुच्छ से तुच्छ प्राणी हो या महान से महानतम हस्ती सबको क्षण में अपने मे समेट लेती है। यह तो दुनियावी चोचले हैं जो हमने शोक मनाने की भी भिन्न-भिन्न मर्यादाये निर्धारित कर रखी हैं। जो सचमुच शोकाकुल है वह तो दग्ध हृदय लिये महज एक कठपुतली जैसा रिवाजो की डोर पर नाचते औपचारिकता निभाने को बाध्य है। शेला की यह मजबूरी है। उसकी मा हमारी मानक यानी मिसेज मोना डैनियल को आज अत्येष्टि है। सब कुछ समुचित सम्मान और मर्यादा से हो रहा है जैसे किसी साधारण कर्मनिष्ठ के लिये होना चाहिए। आज शेला का रहा-सहा भ्रम भी जाता रहा वह साफ देख रही थी-मिसेज मोना के चाहने वाला की सख्या कम नहीं। हाँ, बुजुर्गों की संख्या अधिक थी, कुछ के तो आसू थम ही नहीं रहे थे। ये दिखावे के आसू नहीं दर्द से पिघलते प्यार के प्रतीक थे और यही भीतर ही भीतर शेला को बल दे रहे थे। मई की 2 तारीख है मा को गुजरे एक सप्ताह बीत गया है। शेला अपने कमरे मे निपट अकेली है। हर तरफ हू-हू करता सनाटा है। पता नहीं क्यो शेला का मन अब भी मानने को तैयार नहीं कि मा नहीं रही। उसे लगता है मा यहीं कहीं है। वह लुका छिपी खेल रही है और जानते हुये भी कि शला कहाँ छुपी है सामने नहीं आ रही उसे तग कर रही है। 'नहीं मा ऐसा मत करो" - शेला का रोम-राम क्रन्दन कर उठा। 61 वह बिन पानी की मछली सी छटपटाती मा के कमरे की ओर दौड चली। वहाँ भी घोर सन्नाटा था। दीवार पर टगी मा की तस्वीर के नीचे एक मोमबत्ती जल रही थी और सामने रूथ खडी-खडी प्रार्थना कर रही थी। शला भी धीर से चलकर रूथ क बगल मे जा खडी हुई। उसने देखा रूथ की आँखो के कोर पर आँसू की पतली लकीर सी खिची थी। उसकी आँख भी भर आई। आहट पा रूथ ने आँखे खोली फिर अपने सीने पर क्रॉस करते हुए शेला के गले से लिपट गई। कुछ क्षण दोनो एक-दूसरे के कधे पर सिर टिकाय अपना जी हल्का करते रहे। पहले रूथ ही सभली फिर शेला का हाथ पकड उसे किचेन मे ले गई। उसने दो कप कॉफी तैयार की। दोनो पास की कुर्सी पर बैठ चुपचाप कॉफी पीते रहे। एक अव्यक्त खामोशी के बीच दाना ही घिरी थी। परन्तु काइ इसे ताड नहीं पा रहा था। रूथ कुछ ज्यादा ही परेशान थी पर उसे सूझ नहीं रहा था बातों का सिलसिला आखिर कैसे शुरु किया जाये। वह महसूस कर रही थी शेला को बाता मे लगाना जरूरी है। मा की अत्यष्टि के बाद से वह बिल्कुल गुमसुम है। बस हूँ-हाँ म बात खत्म। बडी मुश्किल से उसे एक सूत्र मिला। "मुझे लगता है मिसेज डेनियल कुछ प्लान कर रही थी पर तुम्हारी राय जाने बिना कुछ पक्का नहीं कर पा रही थी। शायद तुमसे जिक्र 'रूथ ने जानबूझ कर वाक्य को अधर में ही छोड़ दिया। "कैसा प्लान ? मा न मुझस ता कभी कुछ जिक्र नहीं किया" शेला का कौतूहल जाग उठा था। "मुझसे भी तुम्हारी मा ने जिक्र तो नहीं किया परन्तु पिछले कई महीना से मुझे ऐसा लग रहा था वे किसी उधेड- बुन में लगी हैं।"रुथ ने बानो को उलझाये ही रखा। कुछ देर बातो का गोल-मोल सिलसिला या ही चलता रहा। शेला को कुछ खीझ भी होने लगी थी।स्थ की बातो का कोई सिर पैर उसकी समझ में नहीं आ रहा था। पूरे प्रसग म उसे एक बात अटपटी लगी थी। मथ ने कहा था - पिछले कुछ महीनो से मा लगातार चर्च जाया करती 62 थी। कभी-कभी फादर भी घर पर आते थे। आश्चर्य। मा और चर्च। हाँ पिताजी जब थे वह हर रविवार प्रात उन्हे ह्वील चेयर में बैठा चर्च जरूर ले जाती थी। परन्तु उनके गुजरने के बाद सिवाय क्रिसमस के उसने मा को कभी गिरजाघर जाते नहीं देखा था। यह भी नहीं कि वे धार्मिक विचारो वाली नहीं थी। शेला जानती थी मा को ईश्वर के अस्तित्व म असीम आस्था थी परन्तु उन्हें धर्म के मामले में कोई दिखावा पसन्द नहीं था। उनकी प्रार्थना मौन ही हुआ करती । इस मामले मे मा-बेटी दोनो एक जैसे थे। "हो सकता है उम्र के ढलते पडाव पर उनके मन में कुछ बदलाव आया हो।" शेला के मन ने यह तर्क दिया पर वही मन इस तर्क को चुपचाप मान लेने को भी तैयार नहीं हो रहा था। वह रूथ को कुरेद-कुरेद कर बातो की तह तक जाने की कोशिश करने लगी। हार थक कर बहस इस बात पर खत्म हुई कि कल दोना फादर मेथ्यूज से मिलकर मा की अन्तिम इच्छा का पता लगायेगे। यद्यपि रूथ को पता था फादर मैथ्यूज कोई पन्द्रह दिन पहले ही न्यूजीलैंड चले गये हैं। वे मिसेज मोना की अत्येष्ट में भी उपस्थित नहीं थे। परन्तु उसने शेला से इसका कोई जिक्र नहीं किया। दूसरे दिन रूथ काम का बहाना कर कट गई और शेला को अकेले ही चर्च जाना पड़ा। वहा अब नये फादर पीटर थे। उन्हें किसी बात की जानकारी नहीं थी परन्तु उन्होने वादा किया कि वे मदर सुपीरियर से सम्पर्क कर पता करेगे। जरूरत पड़ी तो फादर मैथ्यूज से भी सीधे सम्पर्क करगे। दो दिनो बाद पता चला कि मिसेज मोना अपना मकान किसी वृद्धाश्रम को बेचने की बातचीत कर रही थीं। यह भी पता चला कि सम्बन्धित ट्रस्टी बाजार भाव का एक तिहाई देने को तैयार था और मिसेज डैनियल आधा दाम चाह रही थीं। बाद में बात लगभग तय हो चुकी थी। छूट की रकम मिसेज मोना के चन्दे के रूप में मानी जायेगी और वे इस 63 । आश्रम की आजीवन ट्रस्टी रहगो परन्तु उन्हाने कागजात पर दस्तखत इसलिये नहीं किये थे कि वे अपनी बेटी से एक बार पूछ लेना जरूरी समझती थीं। उन्होने कहा था "एक दो माह बाद शेला आने वाली है, उसने अपने दफ्तर के आस-पास ही कोई फ्लैट देख रखा है। वह जल्दी से फ्लेट ले सके तो वे वहीं चली जायेगी। वैसे भी आधे से अधिक समय तो वह भाग दौड मे ही लगी रहती है। कुछ नहीं तो फ्लैट की देख भाल के लिये ही उसको कोई चाहिये। मा अपनी बेटी की पार्टनर बन उसे शेयर करेगी।" ट्रस्ट के अध्यक्ष उनकी बात सुनकर मुस्कराये थे। कुछ शका भी व्यक्त की थी - "क्या नई पीढी को यह बात पसन्द होगी?" मिसेज मोना ने बस इतना ही कहा था 'पता नहीं परन्तु मुझे लगता है कि शला को यह प्रस्ताव बुरा नहीं लगेगा।" शेला मन ही मन अपन को कोसन लगी। काश। बड दिना की छुट्टी मे मा ने थाडी सी भी चर्चा की होती। फ्लैट लेने के पीछे शेला का भी तो एक ही मकसद था - वह मा के निकट अधिक समय बिता सके। मा की बीमारी के फौरन बाद यह इरादा उस पर भूत की तरह सवार था पर पता नहीं क्यो जैसे जैसे मा को तबियत सुधरती गई शेला का जोश भी ढीला पडता गया। कोई बात नहीं वह मा की इच्छा अब पूरी करेगी। अपने फ्लैट की बात बाद मे देखी जायेगी। उसके खुद के लिये ठिकाना तो है ही। वह पुन विश्व बैंक म अपने काम पर लोट जायेगी। कुछ नहीं तो इस मकान की देखभाल का एक बेमतलब बोझ तो कम होगा। वह आश्रम को पूरा मकान दान कर देगी। कोई पैसा नहीं लेगी। बदले मे रूथ को आजीवन ट्रस्टी बनाने और गुजारे के लिये मुनासिब भत्ता देने का प्रस्ताव रखेगी। एसा हा हुआ भी। ट्रस्टीन शेला के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। कानूनी कार्यवाही वगरह पूरी करन में पूरा महीना निकल गया। अगले हफ्त शला यह घर हमशा के लिय छोड देगी। रूथ बहुत उदास है। 61 शेला उसका दर्द समझती है। उसने उसे ढाढस बंधाया "अरे पगली। लन्दन तो में दफ्तर के ही काम से आती जाती रहूँगी, उस पर छुट्टिया भी तो है। कम से कम तुम्हारे यहाँ रहने से मरे लिये आने जाने का एक बहाना भी तो रहेगा।" आज शेला ओर रूथ दाना ही व्यस्त हैं। दोपहर बाद से ही इस घरौंदे को समेटने मे लगे हैं। पता नहीं आवश्यकताओ के नाम पर प्राणी क्या क्या इकट्ठा करता रहता है। शायद जरूरत से ज्यादा कूडा करकट जमा करना ही उसकी नियति है। क्या रखे, क्या छोडे इसी से परेशान है शेला। यह परेशानी तो बवाल ही बन गयी जब किताबो के छौंटन की बारी आई। कुछ तो छोडना ही होगा इतना बोझ नहीं ले जाया जा सकता है। किताबो की उलट पलट म हाथ आ गया 'टॉम मौरिश का यात्रा सस्मरण' लेखक के विशेष अनुरोध पर सपादक द्वारा भजा गया प्रकाशन की पहली पुस्तक, जो उसके नाम भेट की गई थी। अतीत के झरोखे खुलने लगे - दिल्ली जयपुर और आमेर का वह किला। याद आई वह घाघरे वाली लडकी, जिससे चना खरीदा था और उसका पति वह सारगीवाला, नहीं - शेला को उसका नाम याद नहीं आ रहा। वह पास वाली कुर्सी पर बैठ उस किताब के पन्ने पलटने लगी। यह क्या ? ये पने इतने कुरमुरे और गन्दे कैसे हुए ? उसने तो इसके अच्छे रखरखाव के लिए एक सुन्दर सा प्लास्टिक का स्पेशल कवर भी बनवाया था। वह कवर कहा गया शेला को ख्याला में खाया दख रूथ उसके पास आ खडी हुई। कुछ क्षण वह असमजस मे रही - इस वाकिया का जिक्र छेडे या नहीं। उसके मन ने कहा कहीं काई फक नहीं पड़गा अब इन बातो का सुन शेला परेशान नहीं होगी। उसने अपने पुराने गोल मोल से अन्दाज मे बातो का सिलसिला शुरु किया- "यही सोच रही हो न कि इस किताब की ऐसी हालत कैसे हुई।" "हा जब में मा को अपनी कामयाबी की खबर देने आई थी बात - से बात निकली थी और यह किताब उसका माध्यम बना था। फिर मा ने कहा था अच्छा हम भी तो पढ तुम्हारे मित्र ने क्या लिखा है भारत के बारे में विशेषकर राजस्थान के बार मा जानती हा रुथ - मा वहाँ पैदा हुई थी पली बढी थी" रूथ अवम्भित शला की बात सुनती रही, उसे टोका नहीं। "मुझ ता पता था कि मा भारत का है पर उसके किस खास हिस्से स हे यह मालूम नहीं था। उसी मुलाकात मे मा ने यह सब बताया था।"शेला बोलती जा रही थी परन्तु उसके हाथ किताब के पने पलट रह थे और आँख भी उसी की ओर लगी थी। उसने गौर किया जगह जगह पर कई पन्ना म गहर निशान लगे हैं जरुर यह मा ने लगाय होंगे। उनकी आदत थी किताव म निशान लगाने को। वे सदा हरी स्याही इस्तेमाल करती थी। यहाँ भी हरी लकीरें ही लगी थी। कहीं-कहीं यह निशान बुरी तरह फैल कर पूरे पते को ही गदा कर गया था। अपनी प्रिय पुस्तक की यह दशा देख शेला का मन उदास हो गया। उसने रूथ की ओर आँख उठाकर देखा। रुथ किन्हीं गम्भीर प्याला म खाई थी। 'क्या हुआ? क्या सोच रही हो?"शेला ने टोका। 'कुछ नहीं' रूथ का छोटा सा उत्तर था। कुछ क्षण रुककर वह पुन बोली -"पिछले कई महीनो से मैंने मिसेज मोना को सोने से पहले अक्सर इस किताब को पढत देखा था। तुम्हे तो पता है उन्हें टेवुल कुर्सी पर बैठकर ही पढने की आदत थी। बीमारी के बाद के चन्द महीना को छोडकर शायद ही मैंने उन्ह कभी बिस्तर मे लेटे लेटे पढते देखा हो।" शेला ने हामी भरी। 'उस समय मुझे कुछ कुछ ऐसा आभास हुआ था पर अब तो यकीन सा होने लगा है कि इस किताब को पढ़ते पढते ही मिसेज डैनियल को दिल का दौरा पड़ा था।" "तुम कहना क्या चाहती हो?'शेला की आवाज म भयमिश्रित आश्चर्य था। 66 . सयागवश उस रात तुम्हारी मा के सिवा इस घर में कोई नहीं था। मुझे कुछ जरूरी काम से बाहर जाना पड़ा था। जाने से पहले मैंने रोजी को रात को ठहरा देने की बात कही थी। परन्तु मेडम ने हँस कर टाल दिया था। कहा था तुम निश्चिन्त होकर जाओ। पडोसी से कह दिया है उनका रसोइया रात का खाना बना देगा और सबेरे आठ बजे तक तुम आ ही जाओगी।" मैं सचमुच निश्चिन्त होकर चली गई थी। काश। मुझे जरा भी गुमान होता। बोलते-बोलते रूथ का गला भर आया और वह अपनी रुलाई न रोक सकी। शेला ने उसे ढाढस बंधाया। आगे की घटनाओ का शेला को पता था परन्तु आज के प्रसग मे सब कुछ बडा रहस्यमय लग रहा था। रोज की भाँति बडे तडके वह लडका अखबार डालकर मुडा ही था कि घर की पूरी बत्तिया जलते देख उसे ताज्जुब हुआ। साइकिल गेट पर लगाकर वह अन्दर आया। मुख्य दरवाजा भी खुला था। वह कुछ सशकित होने लगा। बाहर से ही कई बार आवाज लगाई। घटी भी बजायो पर कोई उत्तर न पा सहमते कदमो से भीतर घुसा। उसे पता था दाई और मिसेज डैनियल के सोने का कमरा है। उसने पर्दा उठाकर देखा पढने के टेबुल पर रखा लैम्प भी जल रहा था। उसके पास वाली कुर्सी फर्श पर उलटी हुई थी। पास ही मिसेज मोना जमीन पर आडी तिरछी पड़ी थी। फिर वही थोथी भाग-दौड जो हर अचानक मौत के पीछे होती है। डॉक्टरों की राय मे मिसेज मोना को पढ़ते-पढते ही जर्बदस्त दिल का दौरा पड़ा था और वे कुर्सी पर ही ढेर हो गई थी। यहा तक तो सब कुछ साफ ही था पर रूथ की बाकी बातो ने एक अजीब-सा जाल बुन दिया था। वह ठीक आठ बजते-बजते आ गई थी। बेवक्त की चहल-पहल देख उसका माथा ठनका था। मिसेज मोना के शव को ठीक से लिटाया जा चुका था। परिचितो को खबर दी जा रही थी। उसी उथल-पुथल मे रूथ ने टेबुल पर इस किताब को बेतरतीब-सा पडा देखा था। पूरी किताब गीली लग रही थी। प्लास्टिक वाला कवर अलग पड़ा था और ठीक उसी के बगल मे एक फोटोग्राफ भी उलटा पड़ा था। 67 बाकी का अनुमान सहज था। हमेशा की तरह मैडम पढने बैठी हागी। गरम दृध का गिलास टेबुल की बाई ओर रखा होगा। भूल से हाथ लग जाने या चौंकने से गिलास गिरा होगा और उसका दूध छलक कर सोधे किताव पर फैला होगा। उन्होने जल्दी-जल्दी टेबुल और गिलास को पोछा होगा। हाँ गीला डस्टर भी नीचे रद्दी की टोकरी म पडा था। फिर देखा होगा दूध कवर के अन्दर भी घुस गया है। कवर उतारा होगा तभी उसके फ्लैप मे रखी वह तस्वीर बाहर आ गई होगी। एक बार फिर सब साफ-सूफ कर उत्सुकतावश उन्हाने फोटो को ध्यान से देखने के लिये हाथ में लिया होगा कि हार्ट अटैक चाण्डाल बन कर उन पर टूट पडा होगा। रूथ जैसे गहरी नींद से चौंकी बोली- "वह तस्वीर भी गीली थी। उसमे तुम्हारा चेहरा तो मेरा जाना पहचाना था पर बाकी के एक लडके और लडकी विचित्र वेश भूषा में थे। फाटो पर दाग न बैठ जाये इसलिये मैंने उसे अच्छी तरह पाछ कर किचेन म सुखाया था फिर उसे सीधा रखने के लिये रेसीपी बुक क अन्दर डाल वही छोड दिया था। पता नहीं क्या मुझे लगा था वह तस्वीर कुछ खास माने रखती है। इसलिये 'इतने नाजुक मौके के बीच मैंने यह बेतुकी हरकत की थी। साचा था जब तुम कुछ शान्त हो जाओगी तो चर्चा करूँगी। पर देखो तो पूरी को पूरी बात ही दिमाग से उतर गई। मैं अभी वह फोटोग्नाफ लाती हूँ।"कुछ ही मिनट बाद वह किचेन से तस्वीर लिये लौटी और उसे शेला को थमा दिया। शला बडे गौर स उस तस्वीर का कई मिनटो तक घूरती रही। हा वही तो है। और याद हा आई टॉम के साथ होटल के लॉज मे बिताई गई वह शाम । कहा खो गया टॉम कहा खो गये सब? आखिर सबक सब इस तरह क्या खो गये । खाना ता उसे चाहिये था और वह है कि सब थपेडे झलती आज भी खाने पाने का हिसाब लिये बैठी है। हे ईश्वर । तुमने मर ऊचा करन को सब कुछ दिया पर अपना कधा तो छाडा होता जिस पर मैं सिर टिका सकता साचते-मोचते शेला का हृदय बोझिल हो गया। 68 उसे घबराहट और बेचैनी सी होने लगी। हठात सब कुछ छोड-छाड वह बाहर निकल पडी। बाहर टहल कर थाडा फ्रेश महसूस किया। जब रात गहराने लगी तो अन्दर लौटी। रूथ के साथ खाना खाया फिर गुडनाईट कह अपने कमरे मे सोने चली गई। परन्तु नींद कहाँ ? बार बार यही ख्याल आता रहा "अन्तिम समय मे मा के पास काई नहीं था।"रूथ की बातो से स्पष्ट था मा बिल्कुल भली चगी थी। शायद अपनी मौत का उन्हे खुद भी गुमान नहीं था फिर फिर ? प्रश्र फैलता गया। घबराहट और बेचैनी ने उसे फिर घेर लिया। पता नहीं क्या सोचकर वह टॉम की किताब और तस्वीर लिये मा के कमरे मचली गयी। ठिठुरती रात आशकाओ से थर्राया मन, झुरझुरी देता साय साय सनाटा - शेला को लगा कोई उससे कुछ कहना चाह रहा है - कौन ? क्या? उसने एक झटके से अपने का सम्भाला ओर मा का टेबुल पर बैठ उस किताब को ध्यान से पढना शुरु किया। पहले भी उसने इसे ध्यान से ही पढा था और थोडा पढते ही पूरा प्रसग उभर कर सामने आ जाता था। परन्तु कहा ~ उसे तो मा की मौत और इन सब के बीच कहीं कोई सूत्र नजर नहीं आ रहा। थककर उसने किताब पलट दी और कुर्सी के पीछे हथेलिया पर सिर टिकाये आँखे बन्द कर दिमाग को ढीला छोड दिया। कुछ देर बाद उसने फिर किताब पढना शुरु किया। वह काफी देर तक पढती रही। पर इस बार उसका ध्यान उन्हीं प्रसगों पर केन्द्रित था जहाँ मा ने स्याही से निशान लगाये थे। स्याही के फैलाव और दूध के धब्बा ने मिलजुलकर कहीं कहीं की छपाई बहुत धुधली कर दी थी। बडी कोशिशो के बाद शेला उन हिस्सो को पढ़ पा रही थी। अब उसे कुछ कुछ रोशनी दिखाई दे रही थी। उनमे एक साम्य था। ऐसे सभी चर्चित प्रसग घूम फिर कर कुछ गिन चुने स्थाना के थे और सब की पृष्ठभूमि मे कहीं न कहीं भवर सिह जरूर था। भवर सिह जिसे टॉम ने अपनी पुस्तक मे एक न भूलने वाला पात्र 1 बना दिया है । गोरा चिट्टा तलवार कट मूछे भूरी आँखा वाला भवर सिह आज एक बार फिर शेला के सामने साकार हो गया। शैला ने किताब बद कर दी और अपन आटोमैटिक कैमरे से खींचे उस तस्वीर को पुन गौर से देखने लगी। शोभा भी कितनी खूबसूरत दिख रही थी इस तस्वीर मासही अर्थों में वह स्वय ही कुछ फीकी-सी पड़ रही है उन दोनो के सामने। अचानक शेला ने भवर सिह के पग्गड को अपनी उगलिया स ढक दिया। फिर बडे ध्यान से उसके नाक नक्श का मुआइना करने लगी। शायद ऐसे ही किसी तुलनात्मक अदाज ने टॉम के अन्दर के कलाकार को झकझोरा होगा ओर हठात् शेला को याद आई टॉम की कही वह बात - 'ह्वाट ए रिजेम्बलस' कितनी समानता है। तो क्या माँ भवर सिह से मिलने के बाद चुहल-चुहल मे शेला ने भी तो पल भर के लिये सोचा था “मूछे लगा, साफा बाँध वह भवर सिह का डुप्लिकेट बन सकती है।" तो क्या मा भवर सिंह वह विह क्या सोच रही है। क्या एक ही पेड की शाख या भी फैल सकती हैं या कि ये सिर्फ साय हैं। साये जो सच भी हैं ओर नहीं भी। . हमारे प्रस्तावक की कल्पना यहीं चुक गई है। मगर आप अटकले लगाना चाहते हैं तो जरूर लगाये कि शेला भारत जायेगा भवर सिंह को खोजने की चेष्टा भी करेगी। परन्तु क्या मिलेगा उसे सिवाय सूखी टहनियो के समेटने के और एक अर्थहीन सतोष के। 10 और अत मे अनत के आकार को अपने मे समेटने वाला रचयिता तो शेला के लिय कुछ ओर ही रच रहा है। शला आज नौकरी पर वापस जा रही है। सामान पहले ही जा चुका है । घटे भर बाद उसकी टैक्सी आ जायगी। वह सभी कमरा म बारी-बारी से घूम आई है। वह बार-बार घडी देख रही है। चाहती है जल्दी से जल्दी टैक्सी आये और वह यहाँ का मोह तोड भाग। तभी दरवाजे की घटी बजी। पोस्ट मैन था। मिसेज डेनियल के नाम एक रजिस्टर्ड चिट्ठी थी। शेला ने दस्तखत कर ले लिया। सावधानी से लिफाफा खोल पत्र निकाल पढने लगी। 4 जून 1970 डियर मैडम में नहीं जानता किन शब्दो मे आपका शुक्रिया अदा करु । वर्षों बाद कल मैंने आजादी की सास ली है और आज यहाँ पहुचा हूँ। यहीं आकर पता चला कि आपने इग्लेण्ड के चर्च और वहा की अमेरिकी एम्बेसी की नाक मे दमकर उन्हे पता लगाने पर मजबूर किया था। दिना मैं भारतीय महाद्वीप के पहाडो की यात्रा पर था। भूटान- नेपाल होता हुआ भारत की सीमा से मानसरोवर और केलाश की ओर निकल पडा। फिर भटक कर चीन के जिनिजियाग इलाके में निकल गया। यह सन् 1962 की बात है। दुर्भाग्य से तभी भारत और चीन के बीच लडाई छिड गई। कुछ हिन्दुस्तानी सिपाहियो क साथ मुझे भी पकड लिया गया। मुझ भारत का जासूस समझा जाने लगा। मरा सामान पासपोर्ट आदि पहले ही खा चुका था। मेरी जिरह होती रही पर बात कुछ हो तो निकले। मैं तो समय का मारा था। मुझे एक जेल से दूसरे जेल घुमाया जाता रहा। चूंकि न मेरी खोज खबर लेने वाला कोई था न मेर जान- पहचान वाला के पास कोई सुराग, पिछले आठ वर्षो से एक अनजान देश मे गुमनामी की जिदगी जीने पर मजबूर रहा। कोई साल भर हुये कुछ उम्मीद बधी जब ब्रिटेन सरकार ने खोज खबर लेनी शुरु की। आज पता चला माध्यम ता आप थीं। कहने को बहुत कुछ है पर पत्र बहुत लम्बा हो रहा है, मिलकर बाते होगी। कुछ औपचारिकताये पूरी करके मैं 7 जून की शाम को आपसे मिलने आ रहा हूँ। मिलने की विशेष आस लिये, आपका चिरअनुगृहीत टॉम मौरिश पत्र पढकर शेला के दिल की धडकन तेज हो गई। यह कौन आ रहा है ? टॉम या मा का आशीर्वाद

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तारिणी सिन्हा एक सवेदनशील रचनाकार और
सहदय इन्सान है। पेशे से बेकर, स्टेट बैंक ऑफ
इण्डिया के उपमहाप्रबन्धक रहे, सिन्हा जीवन
के गुणा-भाग मे उलझते-सुलझते साहित्य के
अध्ययन में निरन्तर मग्न रहे हैं। लिखना बाद मे
शुरु किया। लिखने के लिए विषय की कोई
सीमा नहीं, बाध्यता नहीं। एक दिन के घटनाक्रम
से लेकर जिजीविषा और मृत्यु-भय जेसे
मनोवैज्ञानिक सत्य इनके विषय विस्तार मे आते
हैं। इनकी अब तक प्रकाशित कृतिया है-
बैकरनामा, हलफनामा ओर उखडे दरख्त ।
बैकरनामा मे सिन्हा के बैंकर रूप मे बिताए
कार्यकाल के अनुभवो का लेखा-जोखा हे और
हलफनामा उपन्यास साहित्यिक गरिमा लिए हुए
एक रहस्य कथा है।
यह उपन्यास 'उखडे दरख्त' की किचित
परिवर्तनो के साथ पुनर्प्रस्तुति है।
सपर्क
जया निवास, बी-245, वैशाली नगर, जयपुर (राजस्थान)
दूरभाष 0141-355081
आवरण सजीव कुमार

Saye Aur Darkhta

Author
Tarani Sinha
Title
Saye Aur Darkhta
File name
Saye Aur Darkhta
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2011/03
Publisher
Bodhi Prakashan Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
78
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551535
Barcode
4990010032265.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
rQi5vF1RHKL
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