Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Vigyan Gita

Khemeaj Shri Kirshna · 2011/01

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श्री।
विज्ञान गीता।
महाकवि केशवदासजी रचित.
जिसमें
शिवाशिवके सम्बादमें महामोह और विवेक
का युद्ध तथा स्पष्ट उदाहरणोंके द्वारा
ज्ञानका निर्णय वर्णितहै।
जिसको
सुमुक्षुजनोंकेलाभार्थ
खेमराज श्रीकृष्णदासने
मुम्बई
स्वकीय "श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाने में
छापकर प्रसिद्ध किया।
श्रावण सं० १९५१ वि०

इस पुस्तकका रजिष्टर सब हक्क प्रसिद्ध कर्ताने अपने स्वाधीन रक्खा है श्रीगणेशायनमः। अथ विज्ञान गीता। कविवर केशवदास कृत। छप्पय- ज्योति अनादि अनन्त अमित अद्भुत अरूप गुनि ॥ परमानंद पावन प्रसिद्ध पूरण प्रकाश पुनि ॥ नित्य नवीन निरीह निपट निर्वाण निरञ्जन ।। सम सर्व्वग स- वज्ञ चिन्त चिन्तत विद्वज्जन ॥ वरणी न जाइ देखी सुनी नेति नेति भापत निगम ॥ताको प्रणाम केशव करत अनु- दिन करि संयम नियम ॥१॥ सवैया-सँग सोहतिहैं कमला विमला अमलामति हेतु तिहूँपुरको ॥ भवभूप दुरन्तरनन्त हते दुख मोह मनोज महाजुरको। कहि केशव क्योहूँ बने न निवारत जारत जोरनिहूँ उरको ॥ अति प्रेमसों नित्य प्रणाम करै परमेश्वर को हरको गुरको ॥२॥ दोहा-केशव तुंगारण्य में, नदी वेतवै तीर । जहाँगीरपुर बहु वस, पण्डित मण्डित भीर॥३॥ सवैया-ओड़छे तीर तरंगिणि वेतवै ताहि तरै नर के- शव कोहै ॥ अर्जुनवाहु प्रवाह प्रबोधित रेवा ज्यौं राजन कीरजमोहै ॥ज्योतिजगै यमुनासी लगै जग लाल विलो- (४) विज्ञान गीता। चन पाप विपोहै ॥ सूरसुता शुभसंगम तुंग तरंग तरंगिणि गंगसी सोहै॥४॥ नराच-तहाँ प्रकाश सो निवास मिश्र कृष्णदत्त को.॥ अशेप पंडिता गुणी सुदास विप्रभक्तको।। सुकाशिनाथ त- स्यपुत्र विज्ञकाशिनाथ को॥ सनाढ्य कुंभवारअंश वंश वे- दव्यासको ॥५॥ दोहा-तिनके केशवदाससुत, भापा कवि मतिमंद।।करी ज्ञानगीता प्रगट, श्रीपरमानंदकंद ॥६॥ देव देव भापाकरें नागनाग भापाणिनिरहो नरभाषा करी,गीताज्ञान प्रमाणि॥ ॥७॥ मूढ़ लहै जो गूढमतु, अमित अनंत अगाधु ॥ भा- पाकरि ताते कहों, क्षमियो वुध अपराधु ॥८॥ दण्डक-काम क्रोध लोभ मोह दंभादिक केशोराइ पापण्ड अखण्ड झूठ जीतिवेकी रुचि जाहि ॥ पापके प्रताप ताके भोग रोग सोग जाके शोध्यो चाहै आधि व्याधि भावना अशेप दाहि ॥ जत्यिो चाहै. इंदिगण भाँतिभाँति माया मनु लोपिकै अनेक भाव देख्यो चाहै एक ताहि ॥ जीत्यौ चाहै काल इहु देहु चाहै रह्यो गेहु सोई तौ सुनावै सुनै गुनै ज्ञान गीतिकाहि ॥९॥ दोहा-परमारथ स्वारथ दुओ, साधनकी आशक्ति ॥ पढ़ी ज्ञानगीताहि तौ, जो चाहौ हरिभक्ति ॥१०॥ सुनोज्ञान- गीता विमति, छोड़ि देहु सव युक्ति ॥ रत्नाकर विज्ञानया है की सुक्ति ॥११॥ वेददेखि ज्यों सुमृतिभव, सुमृ- विज्ञानं गीता। (५) तिनि देखि पुरान ॥ देखि पुराणनि त्यौं करी, गीताज्ञानप्र- मान ।। १२ ।। सोरहसै बीते वरप, विमल सतसठा पा- इ॥ भई ज्ञानगीता प्रगट, सवहीको सुखदाइ ॥ १३ ॥ केशव ज्ञानसमुद्र की, मुनिजन लही न थाह ॥ मैं तामें पैरन लग्यो, क्षमियो कविजन नाह ॥ १४ ॥ विदित ओ- नछे नगरको, राजा मधुकर शाहि ॥ गहरवार काशीशर- वि, कुल भूपण यश जाहि ॥ १९ ॥ विजय ॥ देव कुदेवनिके चरणोदक बोरयो सबै कलिको कुलमानी ॥ दारिद दुःख बहाइ दये दिन दीरघ दान कृपा- नके पानी ॥ लोकहिमें परलोक रची धरिदेह विदेहनि की रजधानी ॥ राजा मधूकर शाहि से और न रानी न और गणेशदे रानी ॥ १६॥ वापी क्वेलको राज सुखायगो तोवरक्षुद्र पठानी नठानी ।। केशव तौर तरंगिनि पोखरि सूखि गई सिगरी बहु वानी ॥ शाहि अकबर अंकउदे मिटि मेव महीपतिकी रजधानी ॥ उजागर सागर ज्यों मधुसा- हिकी तेग बढ्यो दिनहीं दिन पानी ॥ १७॥ दोहा ॥ दोऊ दीन पुकारही, जगमें जयकी कीर्ति ॥ कृष्णदत्त मिश्रहिदई, जिन पुराणकी वृत्ति ॥ १८॥ तिनके विरसिंहदेव सुत, प्रगट भयो रणरुद्र ॥ राजश्री जिन मथिलई, समर अनेक समुद्र ॥१९॥ विजय ॥ जौन ज्यों पुंज पँवार पुवारसे तोवर तूलके तूल उड़ाए ॥ सिंह ज्यों वाघ ज्यों कच्छप बाहु हते गज

विज्ञान गीता।
ज्यों युवराज ढहाए ॥ केशवदास प्रकाश अगस्त्य ज्यों
शोक अलोक समुद्र सुखाए ॥ वीरनरेशके खड्गखुमानके
विक्रम व्याल अनेक विलाए ॥२०॥
दोहा ॥ वीरसिंह नृपकी भुजा, केशव यद्यपि तूल ॥
एक शाहिको शूलसी, एक शाहको फूल ॥२१॥
दण्डक ॥ दानिनमें वलिसे विराजमान जिनिपाहि
भागिवेकोहै गतित विक्रम तनकसे ॥ सेवत जगत प्रमुः
दितनिकी मंडलीमें देखियत केशोदास सौनकशनकसे।।
जोधनिमें भरत भगीरथ सुरथ पृथु विक्रममें विक्रम नरे-
शके वनकसे ॥राजा मधुकर शाह सुत राजा वीरसिंह
राजनिकी मण्डलीमें राजत जनकसें ॥२२॥
दोहा-द्विजन दिए सुखदानविनु, दानवेश निःकाम ॥
अभयदान देतुनखलक, निपरत्रिया रसकाम ॥२३॥ कुल-
बल विक्रम दान वश, यश गुण गनत अलेप ॥ चतुर पंच-
पट्सहस मुख, कहि न जाइ सविशेप ॥ २४ ॥ भूषण सूरज
वंशको, दूषण कलिको मानु॥ दास एक द्विजजातिको, स-
वहीको प्रभु जानु ॥२५॥
दंडक केशोराइ.राजा वीरसिंहहीके नामहिते अरिगज-
राजनिके मद मुरुझातहैं । सजल जलद ऐसे दूरित विलो-
कियत परदल दिलवल दलकेशे पातहैं ॥ भैरोंकेसे भूत
भट जग घट प्रतिभट घट घट देखे वल विक्रम विलातहैं ।।
पारी पीरी पेखत पताका पीरे होत मुख कारी कारी ढालें
देखे कोरेई है जातहैं ॥२६॥

विज्ञान गीता। (७)
सोरठा-एक समय नृपनाथ, सभामध्य वैठे सुमति ॥
बूझी उत्तम गाथ, कवि नृप केशवदाससे ॥२७॥
नृपवीरसिंह उवाच ॥ कुण्डलिया-गंगादिक तीरथ
जिते, गोदानादिकदान ॥ सुनी यथामति देवकी, महिमा
वेद पुरान ॥ महिमा वेद पुराण सवै बहु भाँति बखानत ॥
यथाशक्ति सब करत सहितश्रद्धा गुणगानत ॥ यथाशक्ति
सब करत भक्ति हरि मन वच अंगा ॥ चित्त न तजत
विकार न्हात नर यद्यपि गंगा ॥२८॥
केशव ॥ दोहा-वीर नरेश धनेश तुम, मोहिं जु बूझी
गाथ ॥ सोई श्रीशिवको शिवा, बूझीही नृपनाथ ॥२९॥
श्रीशिवउवाच॥ तारकछन्द-सुनि शैलसुता सवधर्माते
साँचे । बहु वेद पुराणनिके रसराँचे । मद क्रोध मनोज
महातमछण्डे ॥ जवहीं करियै तवहीं फलु मण्डे ॥ ३० ॥
श्रीपार्वत्युवाच-सुनियै सुरनायक नायकभत। तुमही
कर्तापरिपालकहर्ता | कहियै किहिभाँति विकार नशावै ॥
जिव जीवतही परमानंदपावै ॥३१॥
श्रीशिव दोहा-जब विवेक हति मोहको, होई प्रबोध
सँयुक्त ।। तवहीं जानो जीवको, जगमें जीवनमुक्त ॥३२॥
श्रीपार्वत्युवाच ॥ तोमर-तुम सर्वदा सर्वज्ञानर कहा
जानहिं अज्ञ ॥ कहँ होत प्रगट प्रबोध ॥ प्रभु देहु जीव
निसोधु ॥३३॥

(८) विज्ञान गीता। श्रीशिव-सुनि प्रिये प्रेमनिधान, तुम विज्ञ विविध वि- धान ॥ वाराणशी सुप्रमान ॥ वहहै प्रबोध निधान ॥३४॥ वीरसिंह-दोहा-॥ केशव हमहिं विवेकको, महामोहको युद्ध ॥ वरणि सुनावहु होइ ज्यों, जीव हमारोशुद्ध ।। ३५ ।। इति श्रीचिदानंदमनायां विज्ञानगीतायांश्रीशिव पार्वत्युप्रश्नवर्णननामप्रथम प्रभावः ॥ १॥ दोहा । विशद द्वितीयप्रकाशमें, यह वर्णिवो प्रकाश ।। कलह काम रतिको रुचिर,मंत्रविनोद विलास ॥१॥ महा- देवकी बात सब, कही सुनी कलिकाल ॥ केशवदासः प्रका- शवश, उपजे शूल विशाल ॥२॥ बात कही कलिंकाल सव, कलह चल्यो उठि धामः॥ महामोह पै वीचहीं, आवत देख्यो काम ।।३।। सवैया-भूषण फूलनिके अंग अंग शरासन फूलनिको अंग सोहै ॥ पंकज चारु विलोचन चूमत. मोहमयी मदिरा रुचि रोहै ॥ बाहुलता रति कण्ठ विराजत केशव रूपको रूपक जोहै । सुन्दरझ्याम स्वरूपसने जगमोहन ज्यों जगके मन मोहै।॥४॥ दोहा-कलह कह्यो कलिको कयो, करि प्रणाम अवदा- तः ॥ काशी उदौ प्रयोधको, सुनियतुहै मन तात ॥५॥ काम-हीरछंद ॥ देव दनुज सिद्ध मनुज संयम बत धारहीं ॥ वेदविहित धर्म सकल करि करि मनहारहीं। मो- AUGURCHAND BHAIRODAN. JAIN LIBRARY विज्ञान गीता। (९) हिं निकट तोहिं प्रगट बंधु अरु विरोधको ॥ शुद्ध सदय उदय हृदय होइ क्यों प्रवोधको ॥६॥ रतिं ॥ दोहा-प्राणनाथ सुनि प्रेमको, जग जन कहत अनेक ।। महामोह नृपनाथको, सुनियत वड़ो विवेक ॥७॥ काम ॥ भुजंगप्रयात-सजौं फूलकेहैं धनुर्वाण मेरे ॥ करों शोधिकै जीव संसार चेरे ।। गनैको वली वीर वज्री वि- कारी ॥ भए वश्य शूली हली चक्रधारी ॥ ८॥ रति ॥ दोहा-सब विधि यद्यपि सर्वदा, सुनियत पिय यह गाथ ॥ बहुसहाय संपन्न अरि, शंकनीयहै नाथ ॥ ९ ॥ काम ।। विजय-शील विलात सवै सुमिरे अवलोकत छूटत धीरज भारो॥हासहि केशवदास उदास सवै व्रत संयम नेम निहारो॥भापण ज्ञान विज्ञान छिपे क्षितिको व- पुरा सो विवेक विचारो ॥ या सिगरे जग जीतनको युवती मय अद्भुत अस्त्र हमारो ॥१०॥ रति॥ दोहा-संतत मोह विवेक को,सुनियतु एकै वंश। वंश कहा गजगामिनी, एकै पिता प्रशंश ॥११॥ काम ॥ रूपमालाछन्द-ईश माय विलोकि के उपजा- इयो मन पूत ॥ सुंदरी तिहि द्वै करी तिहि ते त्रिलोक अभू- त ॥ एक नाम निवृत्ति है जग एक प्रवृति सुजान ॥ वंश है ताते भयो यह लोक मानि प्रमान ॥ १२॥ योगवाशिष्ठयथा श्लोक-चित्तंचेतोमनोमाया प्राकृत- चेतनामपि ।। परस्मात्कारणादेव मनःप्रथममुच्यते॥१३॥ Molioiiet waronian urd. Bikanir.

(१०) विज्ञान गीता।
दोहा-महामोह दे आदि हम, जाए जगत प्रवृत्ति ॥
सुमुखि विवेकहि आदि दै,प्रगटत भई निवृत्ति ॥ १४ ॥
रति॥दोधक-जौं कुल एकरु एकपिता ज्यौं।तौ अंति
प्रतिम प्रेम निशायों ॥ आपुस माँझ सहोदर साँचे ॥ क्यों
तुम वीर विरोधनि राँचे॥१५॥
काम॥ वैर विमातनि में चलि आयो॥ आजु नयो हम-
ही न उपायो। देव अदेव बड़े अरु वारे ॥ जूझत पन्नग प:
क्षि विचारे ॥ १६॥ मातु पितै सवही हम भावै ॥ वैकलि-
मध्य प्रवेश न पावै ॥ है उनसों जग काजु न काहू ॥ ताते वै
चाहत मारयो पिताहू ॥ १७ ॥
रति ॥ दोहा-ऐसेही पिय कहत हौ, कै पायो कछुभेद ॥
करिहै कौन उपाइ करि, तुव कुलको उच्छेद ॥ १८॥
काम-एक मंत्र अति गूढहै, मोसों कहिये कन्त ॥
कहिये कैसे त्रियनिसों, दारुणकर्म दुरन्त ॥ १९॥
रति ॥ सोरठा-यद्यपि ऐसी वात, तदपि कहो पिय
करि कृपा॥ महाराज मनजात, तुम सर्वग सर्वज्ञ हौ॥२०॥
काम ॥ रूपमालाछन्द-भामिनी भव भावना तिहि भू-
लि चित्त न राँचु ॥ किं प्रवृत्तिनिको गनै वह झूठ होइ कि-
साँचु ॥रति किंदशा वह किंच दन्ति कहोहै एकहि अंश ॥
मृत्युमूरति राक्षसी इक होइगी ममवंश ॥२१॥
रति॥नगस्वरूपिणीछन्द-प्रसिद्ध पापचारिणी॥अशेप वंश
विवेक सम्मता भई॥किधों असम्मता मई॥२२॥

विज्ञान गीता। (११) काम ॥ दोहा-करै विनाश जु औरको, ताको नित्य विनाशाकेिशवदास प्रकाश जग, ज्यौं यदुवंश विनाशा॥२३॥ केशव ॥ दोहा-काम कह्यो तव कलहसों, दिल्ली नगरी जाइ ॥ दंभहि दे उपदेश तव, देखहि प्रभुको पांइ ॥२४॥ इति श्रीचिदानन्दमनायांविज्ञानगीतायां कलह रतिकाम- सम्वादवर्णननामद्वितीयः प्रभावः ॥२॥ दोहा-या तीसरे प्रकाश में, दीह दंभ आकार ॥ अहं- कार अरु दंभ को,कहिवो मिलनविचारु॥१॥ दंभ विलो- क्यो कलह जो, दिल्लीनगरी जाइ । वंचतु जगजैसे फिरतु मोपै वर्णि न जाय ॥२॥ मरहठ्ठा-काम कुतूहल में विलसै निशवार वधू मनमा- नहरे।।प्रात अन्हाइ बनाइदै टीकनि उज्ज्वल अम्बर अंगधरे।। ऐसे तपोतप ऐसे जपोजप ऐसे पढ़ो श्रुति शारुशरे ॥ ऐसो योग जयो ऐसे यज्ञ भयो बहु लोगनिको उपदेश करे ॥३॥ दोहा ।। कलह कह्यो कलिको कह्यो, सबै दंभसोंजाइ ॥ दंभ तबहिं नृपनाथ सों,जाइ कह्यो अकुलाइ॥४॥कलह गए तववेगही वासरकेआरंभाकालिन्दी सरिताहि को, उतरत दे- ख्यो दंभा॥॥जरत मनोअभिमान ते, ग्रसत मनो संसार ।। निन्दत है त्रैलोक को,हँसत विबुध परिवार ॥६॥ कामरूपमालाछन्द ॥ कबहूँ नसुन्यो कहूँ गुरुको कह्यो उपदेशु ॥ अज्ञ यज्ञ न भेद जानत धर्म कर्म न लेशु ॥ स्नान दान सयान संयम योग याग सँयोग ॥ ईशता तनु

(१२) विज्ञान गीता।
गूढ़ जानत मूढ़ माथुर लोग ॥७॥ वेद भेद कछू न
जानत घोप करत कराल॥ अर्थको न समर्थ पाठ पढ़े मनो
शुकवाल । मेखला मृग चर्म संयुत अछत माल विशाल।।
शीशपै वहुवार धारण भस्म अंगन डाल ॥ ठौर ठौर
विराजहीं मठपाल युक्त कुतर्कः ॥ घोप एक कहा रहो
जा संगते वहु नर्क ॥८॥
दोहा-शूदनिसों मुद्रित करै, उर उदार भुज दण्ड ॥
शीश कर्ण कटि पानि कुश, दंभ परयोव प्रचण्ड ॥९॥
केशव ॥ दोधक-दंभहि देखिगयो जव नीरे ॥ हूं
कृत सों वरज्यो मतिवीरे ॥
शिष्य-दूर रहो द्विज धीरज धारो ॥ पाइँ पखारि
इहाँ पगु धारो ॥१०॥
दंभउवाच ॥ दोहा-जानतहों दिल्ली पुरी, तुरुक वसत
सब ठाँइ ॥ अतिथिनि को दीजतु न यह, आसन अर्घ
सुभाइ ॥११॥
शिष्य ॥ तारकछन्द-कुल शील न कोविद जानिये
जाको । कहि क्योंकरि अर्चन आवत ताको ॥ सुधि
मूढ़ सयान सुन्यो सबुतरयो । तुम काननहूँ न सुन्यो
यश मेरयो॥ १२॥
सरस्वतीछन्द-मायापुरी इक पावनी जग गौड़ देश
प्रसिद्ध ॥ माता पिता मम धर्म संयुत लोक लोक प्रसिद्ध ॥
जाए सुपुत्र अनेक मैं तिनमहिं सुविघ्नहि युक्त ।। विश्वंभ-
रायल देव दक्षिण जानि जीवन मुक्त ॥ १३॥

विज्ञान गीता। (१३). दोहा-पायपखारि यहीं भयो, अहंकार अनुकूल ॥ वैठि दूरि द्विज जनि छुवो, गुरु को आसन मूल ॥१४॥ सोरठा-परसि तुम्हारो गात, पथिक विलोकि प्रस्वेद कण॥जगस्वामीको गात, ज्यों न छुवो त्यों वैठिये ॥१९॥ दोहा-प्रभु को करत प्रणाम जव, देव देव मुनि भाल | छै न सकत आसन क्षिती, मुकुट मणिन की माल ॥ १६ ॥ दंभउवाच॥ सवैया-एक समै हम सत्यपुरी हि गए अवलोकन पाप प्रनाशन ॥ ब्रह्मसभामहराइ उठी कहि केशव केवल पाप विनाशन ॥ देव सहाइक लोक विनाइक वैठिवेको हम ल्याइकै आसन॥पावन बावनके पग को थल मोहिं वताइ दयो कमलासन ।। १७॥ अहंकारविजय-काम न कामकी सुंदरताई पुरंदर की प्रभुता कहि को है ।। बुद्धि के गंधु गणेश मै नाहिने को कुछ रखेत की वृद्धि हि टो है ॥ पीतकके तनतेजुरती कन वात मै पातक सों वरुसोहै। केतिक शुद्धि है गंगमें केशव सिद्धि महेश की मोहित मोहै ॥ १८॥ दोहा-दंभ लोभ हँसि हँसि गहे, अहंकारके पाँइ ॥ अहंकार आशिप दई, शोभन सुखद सुभाइ ॥ १९॥ अहंकार॥ दोहा-पुत्र अनृत युत कुशल हौ, बीत्यो काल अपार॥प्रभु प्रसाद ते कुशल है, अब मेरो परिवार२०॥ अहंकार। दोधक-कारज कौन इहाँ प्रभु आए ॥ पुत्र (१४) विज्ञान गीता। सुनो हम काम पठाए । योसकु ह्याँ रहियै अब ताते ॥ आवत हैं प्रभु देवसभा ते ॥२१॥ अहंकार ॥ तारक-किहि कारण आवत हैं सुधिपाई ॥ सुविवेक कथा न सुनो दुखदाई ॥ कहि पुत्र विवेक कथा वह कैसी ॥ कहिये कि नहीं कहि मेरी सों तैसी ॥२२॥ दंभ-सरस्वतीछन्द ॥ वाराणशी सुनियै वढ्यो बहुधा विवेक विचारविज्ञान को तिनते कहैं सब होइगो अवतार॥ सोई प्रवृत्ति अनेक वंश विनाश हेत सुभाउ ॥ ताके अशे- पविलोपु कारज आइहै इहि गाउँ ॥ २३ ॥ अहंकार ॥ सवैया-भागीरथी जहँ ऐसिहै केशव साधुन के जहँ पुंज लसैं रे ।। सन्तत एक विवेक सो वेद विचारन सों जहँ जीउ कसैं रे ॥ तारक मंत्रके दाइक लाइक आपु नहाँ जगदीश वसे रे॥ साधन शुद्ध समाधि जहाँ तहँ कैसे प्रवोध उदोत नसें रे ॥२४॥ दंभ ॥ सवैया-शोक गिरावत है अति क्रोध गुमान गहें कहि आवै न हाँ जू ॥ लोभ लए दश हूँ दिश डोलत है अपमान प्रहार तहाँ जू ॥ झूठकी ईठइ नर्क के नीधि वूड़त ना अवलम्ब जहाँजू ॥काम करैं बहु भाँति फजीहति शोधनि को अवकाश कहाँ जू ॥२५॥ दोहा-को वरजै प्रभु को प्रगट, बरजे होइ अनर्थ ॥ बोध उदैके लोपको, एकै पेट समर्थ ॥२६॥ कवित्त्व-केशव क्यों हूँ भरयो न परै अरु जोर भरे

विज्ञान गीता।
(१५)
भय की अधिकाई ॥ रीतत तौरि तयो न घरी कहुँ रीति
गये अति आरतताई ॥ रीतो भलो न भरो भलो कैसहुँ
रीते भरे विनु कैसे रहाई ॥ पाइयै क्यों परमेश्वरकी गति
पेटनकी गति जानिन जाई ॥२७॥
सवैया-पेटनि पेटनि ही भटक्यो बहु पेटनि की पदवी
ननक्योंजूपिटतें पेटलियो निकस्यो फिरके पुनि पेटही सों
अटक्योजू । पेटको चेरो सबै जग काहूके पेटन पेट समात
तक्यो जू ॥ पेटके पंथन पावहु केशव पेटहि पोपत पेट
पक्योजू ॥२८॥
दोहा-तृपा बड़ी बड़वानली, क्षुधा तिमिगिल क्षुद्र ॥
ऐसो को निकसै जुपरि, उदर उदार समुद्र ॥२९॥ मन वच
कमजु कपटतजि, सेइ रहे नर कोइ ॥ केशव तीरथ
वासको, ताहीको फलु होइ ॥३०॥
अगस्त्यसंहितायां यथा श्लोक-यस्यहस्तौचपादौच मन-
श्चैवसुसंयती विद्यातपश्चकीर्तिश्च सतीर्थफलमश्नुते ३॥
इति श्रीचिदानन्दमना विज्ञानगीतायां अहंकार द-
भ सम्वाद वर्णननामतृतीय प्रभावः ॥३॥
दोहा-महामोह को वर्णिवो, चौथे मांझ प्रयानु ॥३॥सा-
गर सरिता वर्षसुर, सातो द्वीप प्रमानु ॥ महामोह विहरत
हुते, पर्वत लोकालोक ॥ कलह विलोके जाइ तह,
ब्रह्मदोपयुत शोक ॥२॥

- (१६) विज्ञान गीता। तोमरछंद-कलह की सुनि वात ॥१॥उठि चले मन के तात।बहु उठे दुंदुभिवानि ॥ तहँ विविध सेना साजि ॥३॥ चामरछंद-धर्म कर्म शर्म के सुशर्म यज्ञ दोष वन्त । तात मात भात दोष दीन दोप जे अनंत ॥ मित्र दोष मंत्रि. दोप मंत्र दोप के जुनाथ ॥ देवदोप ब्रह्मदोपलेचले अनेक साथ ॥४॥ दोहा-महामोह अति कोहकै, दोपनि के अवनीप ॥ कीनो प्रथम मिलानु महि,मोहन पुष्करद्वीप ॥५॥ चामरछन्द-चारिलाख योजन प्रमाण मान नाखिये ॥ शुद्धनीरको जहां प्रसिद्ध सिंधु भापिये ॥ ब्रह्म रूपको ज- हाँ अशेप जंतु सेवहीं ॥ मान तत्त्वको गिरीश खंड है वि- राजहीं ॥६॥ मल्लिका छन्द-योजन प्रमाण दीश ॥ दीपलक्ष है व: तीश ॥ सातखण्ड हैं सुदेश ॥ सातऊ नदी सुवेश ॥७॥ दोहा-एकसुधुम्नानी कहै, और मनोजव जानु ॥चित्ररेफहै तीसरो, चौथो गणि पवमानु ॥ ८ ॥ पंचम जानि पुरोज- वहि, छठो विमल बहु रूपः॥ विश्व धातु है सात जो, यह खं- डनि को रूप ॥ ९॥ उपसृष्टि अपराजिता, आयुर्दा अन- घासु ॥ निज धृति नदी सहस्र धृति, पंच पदी सु प्रकाश ॥१०॥ सब जन शाका द्वीप को, प्राणायामनि साधि ।। वायुरूप जगदीश को, सेवत सहित समाधि ॥११॥ केश- व शाकादीप को,समुझै सकल सुजानि ॥ सागर क्षीर स- मुद्र तहँ,श्रीपति को सुखदानि ॥ १२॥ उचक्यो शाका विज्ञान गीता। (१७) दीपते महा मोह अकुलाइ। मेल्यो क्रौंचहिं दीप जहँ, दधि सागर सुखदाइ ॥ १३ ॥ जलरूपी जगदीशको, सेवत स. कल सुजान ।। केशव योजन जानि सो, सोरह लाख प्रमान ॥ १४ ॥ मेघपृष्टि प्राविष्टय पुनि, प्राणायाम सुधाम ॥ लोहितानु तहँ शोभिये, खण्ड वनस्पति नाम ॥ १५॥ शुक्ला, अभया, अज्ञका; अरु पवित्रवति नाम ॥ तीर्थवती अरु रूपवति, अमृतौषा सुखधाम ॥ १६ ॥ तोमरछन्द-कुशदीप में लिय जाइ । घृतके समुद्रहि पाइ ।। तहँ अनिरूप अशोक ॥जगदीश पूजत लोक ॥१७॥ दोहा-सत्यव्रत शुचि भक्ति भट, रुचिव केशव दान ॥ नाभि गुप्त ममदेव तहँ, सातो होत प्रमान ॥ १८ ॥ रस कुल्या मंत्रावली, मधुकुल्या श्रुतिविंद ॥ घृतकुल्या शुचि गामिनी, नदि सहिता मृत विंद ॥ १९ ।। आठला- खयोजन सबै, कुशद्वीप सुखदाइ ॥ सो तजि शाल्मलि दी- पमें, मेल्यो जग दुखदाइ॥ २० ॥ चामर-चारिलाखयोजन प्रमाण दीप जानिये। मध्य को समुद्र देखि देखि सुःख मानिये । सात खण्ड सातहीं तरंगिनी बहजहीं। सोमरूप ईश को अशेप जंतु सेवहीं ॥२१॥ दोहा-पारिभाद्र सो मनस अरु, अविज्ञात सुरवर्प ॥ रमणक अप्याजन सहित, देउ सुरोवन हर्प ॥ २२॥ सिनी वाली रजनी कुहू, मंदाराका जानु ॥ सरस्वती अरु अनु- मती, सातो नदी वखानु ॥२३॥ २ (१८) विज्ञान गीता। नाराचछन्द-लक्षदोइ योजन पलक्ष दीप जानिये ॥ तरंगिणी समेत सात सातखण्ड मानियै ॥ दिनेश रूपदेव को अशेषजंतु सेवहीं ॥ नृदेव देव शत्रु मोहि आनि मेलि जोवहीं ॥२४॥ दोहा-सातक्षेमसमुद्र शिव, जय यश. वर्णि प्रमान ।। अमृत अभय इहि नाम युत, सातो खण्ड, प्रमान ॥२६॥ अरुना नमना संभवा, वत्सरता अवदात ॥ सावित्री अरुसु- प्रभा, सुरसा सरिता सात॥२६॥ रस सागर अवलोकियो, म- हा मोह तिहिठौर ॥ केशवदास विलास जहँ, करत देव शि- रमौर ॥२७॥ आयो जम्बूद्वीपमै, महा मोह रण रुद्र ॥ योजन लक्षप्रमाण तहँ, देख्यो क्षार समुद्र ॥२८॥ मधुछन्द है नव खण्ड विराजत जाके ॥ मानहुँ सुंदर रूपक ताके ॥ एक इलावृत खंड कहावै ॥ मंदरते अतिशो- भहिंपावै ॥२९॥ ताते चली सरिता बहु मोदा ॥ नाम क- हावति है अरुणोदा ॥ चारि तहाँशुभ बाग विराजै ॥ नित्य नए फल फूलानि साजै ॥३०॥ दोहा-चित्ररथ अतिचारु तहँ, वैभ्राजकु इहि नाम ॥ और सर्वतोभद्र पुनि, नन्दनसव सुखधाम ॥ ३१ ॥ सुन्दरीछन्द-भूत लहैं शिवके. वन को जहँ । पारवती पति केलि करें तहँ ॥ भूलि जो कोऊ तहाँ जनु आवै।। सो तवहीं तरुणीपद पावै ॥३२॥ . i विज्ञान गीता। (१९) दोहा-भदाश्वनाम धर्मसुत, सोभद्राश्वक खण्ड ॥हयग्रीव जगदीशको, सेवत जीव अखण्ड ॥३३॥ हरिगीतिकाछन्द-हरिवर्प खण्ड नृसिंहको प्रहलाद सेवत साधु ॥ शुभ केतमाल रमारमेशहिं काम कर्म करालु ।। शुभता हिरण्मय खण्ड मण्डित यत्र कूरम वेप॥ पितृनाथ सेवत अर्जमा, मन काय वाक विशेष ॥३४॥ दोहा-मत्स्यरूप भगवंतको, सेवत बुद्धि अखण्ड ॥म- नसा वाचा कर्मणा, मनु नृप रम्यक खण्ड ॥३५॥महा- मोह की पुरुप लखि,भाग्यो सेन सँयुक्त ॥केशवदासपकाश मुख, हँसे देव मुनि मुक्त ॥३६॥ रूपमालाछंद-आदिब्रह्म अनन्त नित्य अमेय श्रीरघु- वीर ॥ सावधान अशेप भावनिसंग लक्ष्मण धीर॥शुद्ध बुद्धि प्रबोध युक्त विदेहया अतिसाधु ॥ सर्वदा हनुमंत सेवत नित्य प्रेम अगाधु ॥३७॥ दोहा-भरतखंडमें आनिकै, कीनो मोह मिलान ।। ना- रायण को भजन तहँ, नारद बुद्धिनिधान ।। ३८॥ आयो तव पापण्ड पुर, देश अशेपनि जीति ॥ कोनो तहाँ मिला- न कछु, वासर बाढ़ी प्रीति ॥३९॥ सवैया-काम कुमार से नन्दकुमार की केलि थली जहँ नित्य नई है ॥ वानकी पावन तातन लागत पापिनिहूं कहँ मुक्ति मई है ॥ पुष्प शरासन हा घरही बरही रति

।
(२०) विज्ञान गीता।
कीरति जीति लई है ॥ पुष्प शरासन श्रीमथुराभव भान
भवा गुण भोर भई है॥४०॥
इति श्रीचिदानन्दमनायां विज्ञानगीतायां सप्त
द्वीपवर्णनं नामचतुर्थप्रभावः ॥४॥
दोहा-पाँचें प्रगट प्रभाव में, कहियो मिथ्या मंत्र ।। संत-
त मिथ्या दृष्टि सों, महामोह को तंत्र ॥१॥
महामोहउवाच ॥कुण्डलिया-देही न्यारो देहते, कहत
सयाने लोग ॥ दुसह दुःख ह्याँ देखि पर,लोकं करहिं गे भों-
ग॥ लोक करहिंगे भोग योग संयम व्रत साधे ॥ भूले
जहँ तहँ भ्रमत सकल शोभा सुखवाँधे ॥ भूले जहँ तहँ भ्र-
मत होत तन सों न सनेही ॥ जो झुठो है देह ततो अति
झूठो देही ॥२॥
मधु-तीरथवासी यहै सब जानै ॥ देह ते देहि को भिन्न
बखानै ॥ देहको देखत ज्यों सब कोऊ ॥ त्यों किन देही
को देखत सोऊ ॥३॥ साँचो जो जीव सदा अविकारी ।।
क्यों वह होत पुमान ते नारी ॥ जो नर नारी समान कै
जानै ॥ तौ क्यों परनारि को दोप न मान ।। ४ ।। जौं त-
म देही अवर्ण कै लेखौ ॥ देह धरे बहु वर्णनि देखौ ॥ देही
को मानत हो अविनाशी ॥ पातकी होत क्यों देह विना-
शी॥५॥जौं तुम देह अनित्य बखानो ॥ नित्य निरंजन
देही को मानो। आपनी वात जनावहु काहूकाहे को गंग-
हि हाड़ ले जाहू ॥६॥

विज्ञान-गीता। (२१) Nि : भुजंगप्रयात छन्द-वहै शास्त्र ताते सदा सत्य लेखो ॥ प्रभा सिद्धिता मध्य प्रत्यक्ष देखो ॥ धरातेज वाताम्वु है त- । त्त्व चारयो । सदा इष्टतो अर्थ काम्ये विचारयो॥७॥व- है लोक तो लोक है मुक्त विद्यै ॥ सदा चर्य चळक ते औ- रु निन्छ । विलोपोजहाँ धर्म धर्माधिकारी ॥ विलोपो स- दा वेद विद्या विचारी॥८॥ दोहा-देखि सवै पापण्ड पुर, अपनी सिगरी सृष्टि ॥रा- वर माँझ गए जहाँ, रानी मिथ्या दृष्टि ॥ ९ ॥ भुजंगप्रयात-दुराशा जहाँ तृष्णिका देह धारें॥ दुहूँ ओर दोऊ भले चौर ढारें। बड़ी आरसी चारु चिन्ता दिखावें ।। गुमानी धरे पान निन्दा खवावें ॥ १० ॥ पिपासा क्षुधा क्षुद्र वीना वजावें ॥ अलच्छी अलजी दुओ गीत गावें ॥ लिये अन्न शंका असाभानि राचें ॥ नए नृत्य नाना असंतुष्ट नाचैं ॥ ११ ॥ दोहा-अँचवाती मदिरा अरुचि, कुमतिन कथा विधा- नाहिंसासो हँसिजाति सुनि, रतिके के वचन पिछान।।१२॥ राजा ॥अनकूल--आय कछू देखति दुचिताई।लोकनि मैं यद्यपि प्रभुताई ॥ शासन मेरो सबै जग पारै ॥ एक वि- वेक सुमोमन सारै ।। १३ ॥ कौन भाँति वह जीतन पा- ऊँ। मंत्र देहि चित ताहि लगाऊँ॥ बूझि बूझि देखे हम में- त्री॥ पुत्र मित्रजन सोदर तंत्री ॥१४॥ रानी॥तोमर-सुनि राजराज विचारु॥वह शव दीहनि: -

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(२२) विज्ञान गीता।
हारु ॥ सहसा नदीजै दांउ॥यह राजनीति प्रभाउ ॥ १६॥
": भुजंगप्रयात-जु वाराणशी मै जिते जीव देखो ॥ सुका-
हू न शकै महासाधु लेखो। जुताको तजो नाम जी मोहि
लाजा॥ सुबंदे सबै लोक लोकेश राजा ॥ १६॥
दोहा-गंगा अरु वाराणशी, महादेव तिहि ठौर ।।: पांड
न धरिये पंथ तिहि, सुनो रसिक शिरमौर ॥ १७॥
राजोवाच ॥ भुजङ्गप्रयात-कहा कामिनी तें कही बात
मोसों ॥छमी प्रेम नातें कहों बात तोसों ॥ वहै ग्राम होतो
सुलेही रह्योहों। सदा सर्वदा लोक लोकेशहोहों ॥१८॥
तहाँ लोग मेरे रहैं वेषधारी ॥ जटी दण्ड मुण्डी यती -
मचारी॥ पदें शास्त्रको वेदविद्या विरोधी ॥ महाखण्ड पा-
पण्ड धर्मीपरोधी ॥ १९॥
विजय-मारत राह उछाहनीसों पुर दाहत माह अ-
न्हात उचारें ॥ वारविलासिनि.सों मिलि पीवत मद्य: अनो-
दिकके प्रतिपारें ॥ चोरी करें विभिचार करें पुनि केशव
वस्तु विचारि.विचारै॥ जो निशि. वासर काशीपुरी महँ
मेरेई लोग अनेक विहारै ॥२०॥
रानी ॥ तोटकछन्द-यह बात सुनी जवहीं तवहीं ॥ हँ-
सि बोलि उठी सु सुनी सवहीं।जिनि भूलहु भर्म मृपानि अ-
वै॥ हमपै सुनिये पुर धर्म सबै ॥२१ ॥ इक यज्ञ यजै
तपसानि करें।इकश्रीहरि श्रीहरि नामर इक वेद विचारनि
चित्त हरॆ ॥ इक न्हान विधाननि. पाप तरै ॥ २२ ॥

विज्ञान गीता। (२३) इक नौर अहारनि वायुधरें॥इक साधि समाधि न आधि । हरें॥ इक शुद्ध सदा भगवंत भये ॥ जगजीवन मुक्त | शरीर सये ॥२३॥ सुंदरीछन्द-सुंदरिकी यह बात सुनी जव ॥ रोष करयो कलिनाथ कछूतब ।। जानत नाहिं न मोवल तू शठ ॥ मैं जग वश्य करौं हठही हठ ॥२४॥ इतिश्री विज्ञानगीतायां चिदानंदमनायां मिथ्यादृष्टि महामोह मंत्रवर्णनं नाम पंचमप्रभावः॥५॥ दोहा-छठे माँझ तीरथ नदी, महा मोह दल भाउ ॥ गंगा शिव वाराणशी, मणिकर्णिका प्रभाउ ॥१॥ राजोवाच ॥ दोहा-मैं जितने तीरथ लए, तितने कहों वखानि । त्यों लैहौं वाराणशी सुनु, सुंदरि सुखदानि ॥२॥ माता पुर मायापुरी, महाकाल अपहर्ण ॥ मलिकाअर्जुन मैं लियो, मिश्रकुमहि गोकर्ण ॥३॥ महिटतरु महि के- शरी, चंडीसुर केदार ॥ कारिनूकुनख वश करयो, कुरुपेत कपर्दुअपार ॥ ४॥ काहिल कोलापुर लयो, कालिंजर पलु एक ॥ काँवरु कन्यनिकी पुरी, कार्तिकेय करि टेक ॥६॥ गया गयापुर गोमती, गोदावरॉ विशेषि । विश्वनाथ अरु विश्वजित,ब्रह्मावर्त्तहि लेखि ॥६॥ विरूपाक्ष त्र्यम्बक लयो कुशावर्त अनयाश ॥जयन नृसिंह पुरी लई, नागेश्वरी प्र- काश।जाअवधपुरी पुर योगिनी, जालंधर सुनुवाल ॥ मान (२४) विज्ञान गीता। सरोवर मानिनी, जगन्नाथ सविशालः ॥८॥ वदरीवर द्वा- रावती, अमरावती प्रमान ॥ जम्बूक्राश्रम मैं लयो तव कुसुनहिं सुजान ॥ ९ ॥ सोमनाथ निरंत है, आल नाथ एकंग ॥ हरिक्षेत्र नैमिष सदा, अंशतीशु चित्रंग ॥ १० ॥ प्रगट प्रभासु सुरेनुका, हर्म्य जाए उज्जैनि ।। शंकर पूरनि पुष्करु, अरु प्रयाग मृगनैनि ॥ ११ ॥ वृंदावन मथुरा लई, कान्तिका कहँजीति ॥ कोवपुरी वारा- णशी, जाकी मानति भीति ॥ १२॥ करतोया चम्मनिला, चर्मन्वती सुनि चारु ॥ वपद्वन्त मंदाकिनी, विदिशा कृष्णा चारु ॥१३॥चित्रोत्पला पिशाचिका, वपचा वध्याजानि॥ तपसा सेनी मंजुला, शुक्तिमती उरआनि ॥ १४॥ लूतीता- पी अंगुली, अभया हिरन दशान ॥ लिखिधावतीसुवाहिनी विमला बेना जान ॥ १५ ॥ उत्पलावती इच्छुला, भेमरथी शुभचारु ॥ वैतरणी अरु शुक्तिमा, बैलासिनी निहारुं ॥ ॥ १६॥ मंदवाहिनी मंदगा, कावेरीहि वखानि ॥ त्रिदिवा- ताप्रपन्निका, कुमुदवतीहि सुमानु ॥ १७ ॥ कृतमाला का- लांगुली, बंशकरारि विकाहि ॥ महेन्द्राले तपती सर्वशा पुन्याको चितचाहि ॥ १८॥ भुजंगप्रयातछन्द-शिवाधूतपापा शतद्रूविपासा॥वितस्ता सदा कर्मनासा।।गणो गण्डकी ऐरावती पारिजाता॥ rE JAIN WBRARY विज्ञान गीता। (२५) गोमतीसी॥ इलावाहु दापामणी देवकीसी ॥ कुमारीकृपा पाप पुंजै नसावै॥कलौ वेत्रवर्ती सुगंगा कहावै ॥२०॥ नाराचछन्द-अशेषशर्मदा विशेष जीति नर्मदा लई ॥ जग प्रभास कीशुना कृतांतसोदरी जई ॥ सरस्वती पतिव्रता चिन्हाउजोर आपने ॥ लईजुजन्हु एकहीं चुरू अँचैसु को गने ॥२१॥ दोहा-पावन सरिता सवलई, भरतखण्डकी वाम ॥ औ- रो नदी अपारको, वरणै तिनके नाम ॥२२॥ तोटकछंद-बहु दान अनाथनिदे जु डरै ।। द्विज गाइनि के दिन पांइ परै ॥ परनारि विलोकि हिये हहरै ॥ कहिमो- सों क्यों दीन विवेकु लरै ॥२३॥ दोहा-मेरेकुल के सर्वदा प्रोहित हैं पाखण्ड ॥ जाको चाहत सर्वदा, इहि सिगरे ब्रह्मण्ड ॥२४॥ मधुछन्द-नित्य तपोनि जपीनि जुभावै ॥ जापक पू- जक सों मनुलावै॥तंत्रनि मंत्रनि के उर सोहै ॥जोधनि बो- धनिके मनमोहै ॥२५॥ शान्तनि रातनि लै उर धारै ।। भागिचले हरि भक्त विचारै ॥ जाहि उरै रसभाव शमानो। को यह एकु विवेकु अयानो ॥ २६ ॥ देदुखरोग बड़ो सुतजाको ॥ वंदिपरे सिगरे जगताको ॥ आनंद रूप वि- रूपकरे हैं। चित्त अनेक विवेक टरे हैं ॥ २७ बंधु विरोधु वड़ो मम मंत्री ॥ वश्य करै सिगरेजन यंत्री । वा नर वालि वली जिहिं मारयो ।। रावणको सिगरो कुल Moholla Marotian Ward.

+ (२६) विज्ञान गीता। जारयो ॥२८॥ प्रेम डरै हियमै सुनिजाको॥ एक विवेक कहा रिपुताको ॥ वर्त्तत झूठ प्रधान हमारे॥लोक चतुर्दश जाकहँ हारे ॥२९॥ जाइ जहाँ तहँ देश नशावै ॥ नित्य नरेशनि भीख मगा३ ।। सत्य डराव हिए अति भारो॥ को वपुरा सुविवेक विचारो॥३०॥ क्रोध बड़ो दलपत्ति है मेरे ॥ जो जिय मांझ वसै सबकेरे ॥ अस्त्र धरे अपमान हमारे ॥ देवनिके पति रंक के डार ॥३१॥ दोहा-अग्रेसर कलिकहत है, अपने चित्त विचार ॥ दुरद विनोदनको जहाँ, है केहरि अनुहार ॥३२॥ मधुछंद-राखत लोभ भँडार भरेई ॥ जौ लगि काज कहा न करेई ॥ मातु पिता सुत सोदरछोड़े ॥ कौनपैश- त्रुन अंचल ओई॥३३॥शोक दरिद्र अहंकृत देखो॥आलस रोग भले भट लेखो॥ है भ्रम भेद वशीठ सयाने ॥ प्रा- कृत काम न भेद बखाने ॥ ३४॥ काम महा इक सोद- र मेरे ॥ युवती निव जीति करयो जग चेरे ॥ या जग में जन रंगन रांचे ॥ गोविंद गोपिन के सँग नाँचे॥३५॥ व्यभिचारु बड़ो सुत जाको ॥इंद्र भयो भगवंत भोताको॥ पुत्र कलंक भलो तिहि जायो॥ सोमको शीशु सिंहासन पायो ॥३६॥ नामकृतघ्न पिता त्रिय तेरो॥ ता कहँ जा- नि सदा गुरु मेरो॥ हारि रही-वसुधा सब जेती ॥ एक विवेक कथा कहि केती॥३७॥ रूपमालाछन्द-स्वामि वात विश्वास घातक मित्र दो- विज्ञान गीता। (२७) पनि देषि ॥ राजदोष कृतघ्नके सुनि मंत्र दोष विशेषि । आस पास सदा रहैं मम सुन्दरी सुनि धीर ।। को विवेक अनेकधाकरि डारिहैं तववीरं ।। ३८ ॥ ब्रह्मदोष महावली सुतते जन्योबलि वण्ड॥क्षत्रहीन वसुन्धरावाधाकरी नपख- ण्ड ॥ संहन्योयदुवंश सो जिहिं वांधियो सुरनाथ ॥ रुद्र जानत हैं प्रतापहि को विवेकु अनाथ ॥३९॥ दोहा-एक एक जग सहयो, पुनि सिगरे एकत्र ॥ मो- सों प्रभुता को करै, शंकर सहित कलत्र ॥ ४० ॥ तारकछंद-जब नृप मंत्र करयो रस भीनो ॥ सुनि त्रिय मौन गही दुखदीनो॥ राजोवाच-अवहीं नहिं मौन गहो तुम रानी ॥ सुखमें नहिं दुःखनि देहु सयानी ॥४१॥ रानी-हम जाति नारि मति मूढ़ सही॥ हरुवाई सुवात बनाइ कही ॥ पिय मंत्रनि मंत्रिनि सों कहियै ॥ सुखमै दु- ख देहनि क्यों दहियै ॥४२॥ राजोवाच-कछु मोसहुँ तोसहुँ अंतर नाही।कहि मंत्र दुयो किहि बूझन जाहीं।। हितकी हितसों दुख देन कहे जो ॥ यश सों मिलिकै सब काज नसे तो॥४३॥ रानी ॥ सरस्वतीछंद-गंगानहीं नदी कहैं निज आदि ब्रह्म अरूप ॥ संसार तारन को रच्यो अवतार हैद्रवरूप ॥ विद्या विना तपसा विना विनु विष्णु भक्ति विधान ॥ ब्र- माणडभेदत ब्रह्मघातक पातकी इक न्हान ॥ ४४ ॥ .

(२८) विज्ञान गीता। राजोवाच ॥ मधुछन्द-वामन को चरणोदक गंगा ॥ निर्गुण होत क्यों सागर संगा ॥ चित्त विचारि सुलोचनि भापो ॥ वै गजगामिनि पर्वत नाखो ॥ ४५ ॥ दोहा-जन्हु अँचै करि काढ़ियो, वाहिर जंघा फारि ॥ क्यों अपवित्र न मानियो, मुनिगणयोंपै पारि ॥ ४६ ॥ रानी ॥ मधु-वामन के पद को पिय पानी ॥ जो तुम भागीरथी भव मानी ॥ पांइ जहाँ बलिराज पखारे॥तें जल क्यों न त्रिलोक सिधारे ॥४७॥ वामन को चरणोदकै ऐ- सो ॥ माधव माधव वर्ततु कैसो ॥ ताते सबै जग झूठहि जानो। साँचिसदाशिव गंगहि मानो।। ४८॥(बृहन्नारदीय पुराणे-यथा,श्लोकातस्माच्छृणुध्वंविप्रेन्द्रा गंगाया महिमोत्त- मा॥ ब्रह्म विष्णु शिवैश्चापि पारंगन्तुं न शक्यते ॥४९॥ दोहा-इक विवेक सतसंग जहँ, अरुगंगा तटवासु ॥ सपने हूँ पिय होइ नहिं, तुम पै ताको नासु ॥५०॥ :: मधु-रुद्रसमुद्र सदा तपसा केोदेिव अदेव सबै जनजाको|इंद्र हु की प्रभुता हरि लेहीं। चौदहलोक घरीक में देहीं।।६१॥ रूपमालाछंद-बहु सिद्धि शुद्धसमेत सेवत रोम रोम प्रवोध ॥ पल एक मध्य अनन्त केशव फोरि डारहिं क्रोध ॥ छिन्न की समाधि विकल्प कल्प अनल्प होत वितीत ॥ इहि भाँति सों बहुधा पितामह विष्णुगावत गीत ॥५२॥ दोहा-तिनके शरणविवेकु है, कैसे जीतहु कन्त ॥ जब - जरि जैहो काम ज्यों, तब समझोगे अंत ॥ ५३॥ सिगरे विज्ञान गीता। तीरथ सवपुरी, जितने मुनिगण देव ।। सब सेवत वाराणशी अपने अपने भेव ॥५४॥ सरस्वतीछंद-वाराणशी अरु विन्दु माधव विश्वनाथ वखानु ॥ भागीरथी मणिकर्णिका यह दिव्यपंचकु जानु । वैकुंठ भूतल मध्य अद्भुत भाँति नित्य प्रकाश ॥ संसार नाश हि करत हैं तिनको न कबहूँ नाश ॥५५॥ राजो० ॥दोहा-कहि देवी मणिकर्णिका, नाम भयो के- हिमेव ॥ काशी मै केहि देवता, प्रगट करी केहि देव ॥५६॥ रानी॥रूपमाला छंद-वाराणशी मै विष्णु एक समै करयो तप आनि॥ जैसोकियो अत्युग्रसो हम पै नजात वखानि॥ तिनके तपोवल शंभु को शिर कंपियो भुवपाल । भूमिगि- रिप्रियकर्ण ते मणिकर्णिका तिहिकाल ॥६७ ॥ चामरछन्द-माँगिये महानुभाव चित्त वृत्ति में लही ।। शंभु जू प्रसन्न कै सुवात विष्णु सों कही ॥ ॥श्रीविष्णु- रुवाच ॥राज देहु जू सुमोहिं लोक लोक को अवै ॥ करो अजेय मोहिं सर्व भाँति शक्ति दे सवै ॥२८॥ दोहा-अंतरजामी होउ हों, लक्ष्मी को पति आशु॥ एव- मस्तु हर हँसि कह्यो, पूरण होइप्रकाशु ॥५९॥खोदि लई म- णिकर्णिका, भूमि चक्र की धोर।सोथल भरयो प्रस्वेदजल, भयो हरन अघ घोर॥६०॥ तीरथमें तीरथ भयो, तादिन ते तेहि ठौर।।नाम भयो मणिकर्णिका, देइसवै सुखगौर ॥६॥ तारक-वरणे अपने सिगरे तुमयोधा ।। उनके हम पै विज्ञान गीता। सुनिये बुधि बोधा ॥ जवहीं पिय वस्तु विचारहि देखो। सिगरो दल राज को होइ अलेखो ॥ ६२ ॥ तुम भूले जे द्विज दोष भरोसे ॥ जननी न कहूँ सुतकेवल कोसे । द्विज दोष जहाँ सुसमूल नशेजू. ॥ द्विज दोप विना. न कहूँ विनशेजू॥६३॥अपनो थल ज्यों प्रभु पावक दाहै। अनु संगति कारक हो हठि चाहै ॥ द्विज दोप भए पिय वंशतुम्हारे ॥ वल कौन विवेक चमूहि विदारे॥६४ ॥ दोहा-जोही शोक विरोध सब, कलह कलुप उर आनि॥ स्वामि दोपदै आदि सब, दोप एकही वानि ॥ ६५॥ राजोवाच ॥ हरिलीला छन्द-नारिन को यह वूझत वात जाइ ॥ सो अज्ञान फल खाइ अपाइ ॥वात सुने मरन की अतिही डेराइ ।। सव सांचे मरे मरि स्वर्ग जाइ ॥६६॥ सवैया-लोक विलोक में जाग विराग मै पाठ मै आलस बास बसाऊं ॥ एक विवेक कहा वपुरा गुण ज्ञान गुरूनि के गर्ब घटाऊं ॥ हों अपने विविचार विचार अचार विचार अपार वहाऊं ॥ धीरज धूरि मिलै कहि केशव धर्म के धामनि धूरि जमाऊं ॥६७ ॥ दोहा-करी प्रतिज्ञा राज जब, मन क्रम वचन प्रमान ॥ मंत्र बतावति तरुनि तवं, दुखसुख जानि समान॥६८॥ रानी ॥ तारकछंद-सुनिये त्रिय को पिय के दुख ते दुख ॥ सब जानत हैं पिय के सुखते सुख॥तिहितेहित वात कहों सु करोअव॥हठ छाड़हुजू मनके मनते सव॥६९ ॥ --

विज्ञान गीता। (३१)
दोहा-ज्यों तुमहीं सारत सबै, त्यों वै श्रद्धहिलीन । जो
उनको श्रद्धा तजे, तौ केशव वलहीन ॥७०॥ श्रद्धा छल
वल राज तुम, धरि पाखंडहि देहु ॥ तौ उनको साधन
विटप, फलन फलहि करि तेहु ।। ७१ ॥
राजोवाच॥गीतिकाछन्द-त्रिय साधु साधु भली कही यह
बात मोसन आजु ॥ तुव तात मोहिं दियोहुतो तिहुँ लोक
को जब राजु ॥ तब ठौर ठौर करी सबै बहु भाँति दासनि
भक्ति ॥ सुनि दैन मै तिनको कही जगदीश की सब शक्ति
॥७२॥ शुचि दंभ को लखि लोभको निधि रोग को गणि
वृद्धि ॥ गुनि गर्व को गरिमा दई कलहेंदई सब सिद्धि ॥
विभिचार को रुचि नित्यही अपलोक को दइ प्रीति ।।
महिमा दई महामोह को सब ब्रह्मदोपनि जीति ॥ ७३ ॥
दोहा-सुनु सुंदरि पापंड को, श्रद्धा देहों आजु ॥ तव
विवेक को जीति कै, काशी करिहौं राजु ॥७॥
इति श्रीविज्ञानगीतायां चिदानन्दमनायां मिथ्याष्टि
महामोह सम्बादवर्णनं नामपष्ट प्रभावः ॥६॥
दोहा-चार्वाक अरु शिष्य को, सातै मै सम्बाद ॥ विन-
ती सब कलिकाल की, उपजै सुनत विपाद ॥ १॥ कह्यो
भैरवी बोलिकै, महामोह सुखपाइ॥ श्रद्धागहि पाखण्ड
छलवल दीजै आइ ॥२॥ महामोह आए सभा, असत संग
के साथ ।। चाक बैठे जहाँ, करत शिष्य सों गाथ ॥३॥

(३२) विज्ञान गीता
चार्वाक उवाच ॥ दोधकछंद-देखतुहै कछु शिष्य संया-
ने॥भूलत हैं मुनिः वेद पयाने ॥ लाज वई जग खेत जमै
ज़ो॥ होम करैं परलोक फलै तो॥४॥
शिष्यउवाच-साँचो जो है जग खैवोरु पीवो ॥ तो यह
झूठ तपोवल पैवो ॥ सूढ़ दुराश के मोदकुखाहीं ॥
तपसा मिसु देखत नहिं जाहीं॥६॥
सवैया-हास विलास विलासनिसों मिलि लोचन लोल
विलोकन रूरे॥ भाँतिनि भाँतिनि के परिरंभन निर्भय रा-
गविरागनि पूरे॥ नाग लता दल रंग रँगे अधरामृतं पान
कहासुखसूरे ॥ केशवदासकहा व्रत संयम संपति माँझ-वि-
पत्तिनकूरे ॥६॥
दोहा-तीरथ वासी यह कहत, तजत त्रियनके साथ ॥
कलुपनि मिश्रित विषय सुख, त्यागनीय है नाथ ॥७॥
चार्वाक उवाच॥दोहा-वै सिगरे मतिमूढ़ हैं,अमल जलज
मणि डारिसीपिनके संग्रह करत, केशवराइ निहारि॥ ८॥
दण्डक-माता जिमि पोषति पिता ज्यों प्रतिपाल करै
प्रभु जिमि शासन करत हेरि हियसों ॥ भैया ज्यौं करै स-
हाइ देतहै सखा ज्यों सुख गुरुदै सिखावै सिप हेतु जोरि
जियसों॥ दासी ज्यौं टहलकरै देवीज्यौं प्रसन्नबै सुधारे पर-
लोक नातो नाहीं काहू वियसो॥ छकहै अयान मद क्षितिके
। छनकक्षुद्र औरसों सनेह करें छोड़ि ऐसी तियसों॥९॥

विज्ञान गीता। (३३)
दोहा-महामोह तब हँसिगहे, चार्वाकके पाँइ ॥ चापाक
आशिप दई, शोभन सुखद सुभाइ ॥ १० ॥
चार्वाकउवाच-कलियुग करत प्रणाम प्रभु, अवलोको वि-
पहर्ण॥धनते जन सबकाल कार, देखत प्रभु को चर्ण ॥११॥
कलियुग उवाच ॥ रूपमालाछंद-शूद्र ज्यों सब रहत
हैं द्विज धर्म कर्म कराल ॥ नारिजारनि लीन भर्तनि छाँ-
डिके इहि काल ॥ दंभ सो नर करत पूजन न्हान दान
विधान ॥ विष्णु छाँड़त शक्ति भूषण पूजनीय प्रमान।।१२॥
सवैया-ब्राह्मण घेचत वेदनिको सुमलेच्छमहीप की
सेव करें जू ॥ क्षत्रिय छाँड़त हैं परजा अपराध विना द्विज
वृत्ति हरै नू । छाँडिदयो क्रय विक्रय वैश्यनि क्षत्रि न
ज्यों हथियार धरैजू ॥ पूजत शूद्र शिला धनु चोरति चि-
त्त में राजनिको न डरैंजू ।। १३ ॥
दोहा-विष्णु भक्ति जग में करी, यद्यपि विरल प्रचार ॥
तदपि शान्ति श्रद्धा सखी, तजति न प्रेम प्रकार ॥ १४ ॥
मोह ॥ दोहा-श्रद्धा हम पापण्ड को, दई कलह के ता-
त॥शान्ती वपुरी मरैगी, श्रवण सुनतही बात ॥ १५ ॥
कलि ॥ रूपमाला छंद-वाजि वारन वाहने सुत सुंदरी
सुखदाइ ॥ क्षेत्र ग्राम पुरीनि सुख धन देश द्वीप वप्ताइ ।
भूमिलोक विलोकि पावन ब्रह्मलोकहि पाइ ॥ लोभ होतन
ऐनिरनूर शान्ति होति नराइ॥१६॥

(३४) विज्ञान गीता। मोह ॥ सवैया-कौन गनै इनि लोकन रीतिः विलोकि विलोकि जहाजनि वोरे ।। लाज विशाल लता लपटी तन धीरज सत्य तमालनि तोरे ॥ वंचकता अपमान अयान अ- लाभ भुजंग भयानक तूष्णा॥ पाटु वढो कहुँघाटन केशव क्यौं तरिजाइ तरंगिनि तृष्णा ॥ १७ ॥ लोभ-भूलतहै कुल धर्म सवै तवहीं जवहीं वह आनि ग्र- सैनू ॥ केशव वेद पुराणनि कौन सुनै समुझै न त्रसै न हँसै नू ॥ देवनि ते नरदेवनि ते सुत्रिया वर वार नज्यों विलसै- जूयिंत्रन मंत्रन मूरि गनै जगयोवन काम पिशाच वसैजू १८॥ दोहा-ताते शान्ती की कथा, कहै सुकिन्नर लोक ॥ जोर मूढ़ कह गूढ़ है, मरिहै श्रद्धा शोक ॥ १९॥ इति श्रीविज्ञानगीतायां चिदानंदमनायां चार्वाक महा मोहकलिदंभ मंत्र वर्णनं नामसप्तमप्रभावः ॥७॥ दोहा-शान्ती करुणाको कह्यौ, आठे माँझ विपाद ॥ पाषण्डिन्हको वर्णिबो, श्रद्धा रहित विवाद ॥१॥ परंपरा सिगरी पुरी, पूरि रही दुखदात ॥ शान्ती के श्रवणनि परी कैसे हूँ यह वात ॥२॥ गंगा काछनि वरतिहीं, पूजत साधु अपार॥पाई कपिला गाइसी, पटु पपण्ड चंडार॥३॥ शान्ति ॥ रूपमाला-मो विनान.अन्हाति जेंवति करति ३. नाहिं न पान ॥ नेकु के विछुरे भटू घट में न राखति प्रान॥

विज्ञान गीता। (३५) चेतिका करुणा रची सब छोड़ि और उपाइ॥क्यों जियोंज- ननी विना मरि हूँ मिलै जो आइ ॥ ४॥ नैन नीरनि भ- रि कहै करुणा सखी यह बात ॥ मोहिं जीवत क्यों मरै सु नि मंत्र अव अवदात ॥ योग राग विराग के थल सूरनंदि- नि तीर ॥ मुनिन आश्रम ठौर ठौर विलोकियै धरिधीर ॥ करुणा ॥ दोहा-सपनेहूँपापंडके, श्रद्धा परै न हाथ ॥ शान्ति विधी प्रतिकूल भे, कहा न सुनियै गाथ ॥६॥ रूपमालाछंद-रघुनाथ की तरुणी हरी दशकंध अंध लवार ॥ अरु जो दई दुर्योधनै गहि द्रौपदी करतार ॥ निजज्ञासि जो कपटी न कर त्यो श्रद्धा परि जाइ॥ सुनि- यैन कहा विलोकियै बहु काल जीवन पाइ ॥७॥ दोहा-ताते पुनिहूँ देखियै, नीके कै अब जाइ॥ जहाँ व- सत कलिकाल अव, पापण्डनि को राइ ॥ ८॥ करुणा ॥ रूपमाला यह कौन आवत है सखी मल पंक अंकित अंग ॥ शिरकेश लुंचित नग्न हाथ शिपीशिखण्ड सुरंग॥ यह नर्क को कोउ जीवहै जिनि याहि देखि डेराहि॥ निज जानियै यह श्रावका अति दूरिते तजि ताहि ॥ ९ ॥ श्रावकोवाच ॥ दोहा-देह गेह नव द्वार में, दीप समान लसंत । मुक्तिड ते अति देत सुख, सेवहुश्री अरहत॥१०॥ रूपमालाछंद-मिष्ट भोजन वीटिका मृगनाभ मै घनसा- र ।। अंग शुभ्र सुगंध संयुत सेव श्री सुकुमार।कन्यका भ- . (३४) विज्ञान गीता। मोह ॥ सवैया-कौन गनै इनि लोकन रीति विलोकि विलोकि जहाजनि वोरे ।। लाज विशाल लता लपटी तनः धीरज सत्य तमालनि तोरे॥ वंचकता अपमान अयान अ- लाभ भुजंग भयानक तूष्णा ॥ पाटु बढो कहुँघाटन केशव क्यौं तरिजाइ तरंगिनि तृष्णा ॥ १७ ॥ लोभ-भूलतहै कुल धर्म सवै तवहीं जवहीं वह आनि ग्र- सैनू ॥ केशव वेद पुराणनि कौन सुनै समुझै न त्रसै न हँसै नू ॥ देवनि ते नरदेवनि ते सुत्रिया वर वार न ज्यों विलसै- नयंत्रन मंत्रन मूरि गनै जग योवन काम पिशाच वसैजू १८॥ दोहा-ताते शान्ती की कथा, कहै सुकिन्नर लोक ॥ जोर मूढ़ कह गूढ़ है, मरिहै श्रद्धा शोक ॥ १९॥ इति श्रीविज्ञानगीतायां चिदानंदमनायां चार्वाक महा मोहकलिदंभ मंत्र वर्णनं नामसप्तमप्रभावः ॥७॥ दोहा-शान्ती करुणाको कह्यौ, आठे माँझ विपाद ॥ पापण्डिन्हको वर्णियो, श्रद्धा रहित विवाद ॥१॥ परंपरा सिगरी पुरी, पूरि रही दुखदांत ॥ शान्ती के श्रवणनि परी कैसे हूँ यह बात ॥२॥ गंगा काछनि वरतिहीं, पूजत साधु अपार॥पाई कपिला गाइसी, पटु पपण्ड चंडार॥३॥ शान्ति.॥रूपमाला-मो विनान अन्हाति जेंवति करति - नाहि न पान ॥ नेकु के विछुरे भटू घट में न राखति प्रान॥

विज्ञान गीता। (३७)
श्रावक ॥ दोहा-कपाली कहो विभत्सवपु, कैसे तेरे ध-
म ॥ पूजत हौ किहि देवको, करि करि कैसे कर्म ॥ १८॥
कपाली ॥ सोरठा केवल अंगनियोग, देखो हों जगदी-
शको। सुनो सयाने लोग, जगते भिन्न अभिन्न है॥ १९॥
चंचरी-वेद मिश्रित मांस होमत अग्नि में बहु भाँति
सों ।। शुद्ध ब्रह्म कपाल शोणित को पियो दिन रातिसों।
विप्रवालक जालले बलि देतहों न हिए लजों ॥ देवसिद्ध
प्रसिद्ध कन्यनि सों रमों भव को भजों॥२०॥
केशव ॥ दोहा-शान्ती करुणा भजि चली, कान {दिकै
हाथ ॥ संन्यासी इक देखियो, शिष्यनि लीने साथ ॥२१॥
रूपमालाछंद-कोपीन मण्डित दण्डसों नख काँख दीर-
च बार ॥ मालाक्ष शोभित हस्त पुस्तक करत वस्तु वि-
चार ॥ संसारको बहुधा विरोध कुचित्त शोधकजानि ॥ ठा-
ढी भई तहँ शान्ति सो करुणा सखी सुख मानि ॥२२॥
दोहा-इहि विधि संयम नियमसों, सोए प्रभुके पाइ॥
हमहूँ दीजै सिद्धि कछु, शोभन सुखद सुभाइ ॥ २३ ॥
संन्यासी ॥रूपमालाछंद-सीखौ सबै मिलि धातुकर्मनि
द्रव्य बाढ़तु जाइ ।। आकर्पणादि उचट मारण वशीकरण
उपाइ ॥ देहों अदृष्ट तिनैन अंजन अग्नि बंधननीर । शिक्षा
कहों परकायमध्य प्रवेशकी धरि धीर ॥२४॥
दोहा-कान {दि वह तजिगई, जी धरि दीह विपाद ।।
शूद्र जहाँ त्रिय वेप धरि, ताको सुनो विवाद ॥२५॥

विज्ञान गीता। गिनी वधू मिलि जो रमै दिन राति॥ चित्तमलिन न कीज- ईगुरु पूजियै इहि भाँति ॥ ११॥ करुणोवाच ॥ नगस्वरूपिणीछंद-तमाल तूल तुंगहै पिसंग चीर अंगहै । शचूड़ मुण्ड मुण्डिये ॥ सखी सुको विलोकियै ॥ १२॥ शान्त्युवाच ॥ दोहा-बुद्धागम यह जानिये, सजनीभिक्षु- करूप।।सुनिलीजै कछु कहत है, पुस्तक हस्त विरूप॥१३॥ भिक्षुक ।। रूपमालाछंद-हम दिव्य दृष्टि विलोकहीं सु- ख भुक्ति मुक्ति समान ।। जग मध्य है यति सिद्धि शुद्ध सु- नो सुशिष्य प्रमान ॥ कवहूं न रोकहु भिक्षुकै रमणीनि सों रम मान। निज चित्त कोमल ईरषातजि दूरि ताहि सुजान। कहि कौनको उपदेश है सर्वज्ञ सिद्धिहि जानु ॥ सर्वज्ञ बुद्ध कहा कहै बहुग्रंथ ग्रंथनि मानु ॥.. श्रावक-अब तोहिं है सर्वज्ञता कछु वातही महँ मूढ़ ॥ हमहुँ है सर्वज्ञता मद दास तो कुल गूढ़ ॥१४॥ दोहा-छोड़िशासनावौधकी, अरहंतन की मानि ॥ सुरता छाँड़ि पिशाचिता, काहे को करि वानि ॥ १५॥ तन मन जीवन जाइलों, लोक विलोक विलास ॥ज्यों बाहर के दीप पै, सदन न होत प्रकास ।। १६॥ नलिनीछंद-लिये नृकपाल नृदेह कराल ॥ करे नर मुंडनि की उरमाल | पिये नर श्रोन मिल्यो मदिरासो ॥ कपालि कु देखिये भीमप्रभासों॥१७॥ .

विज्ञान गीता। (३९) शूद्र ॥ तारकछंद-यह जानत हों अतिही यडकायो । कहि जीवतको नर नारि कहायो । वह साधन कौन मिलै जिहि राधा ।। हम हूँ उपजी जिय साध अगाधा ॥ ३४ ॥ नारीवेप-अब तोसों कहों जिनि काहु सुनावै।।सुनि जा- हि सुने उर और न आवै । तीरथ दान सबै व्रत छौड़े ॥ सो इहि साधन सो हित माँड़े॥ वेदको भेद सु व्यासहि पायो ॥ याहि ते नाहिं पुरणनि गायो॥ कोनहिं भागनिसों तुम जान्यो। जानिकै अद्भुत मंत्र वखान्यो ॥ ३५ ॥ सरस्वतीछंद-एक अद्भुत मंत्र तामें ताहि साधतु कोइ।। जा त्रिकोटि जपै सुमंत्रहि नारियो तब होइ । नारि वै तव राधिका कृत कुण्ड माँझ अन्हाइ ॥ राधिका सखि बैं मिली तव श्यामसुंदर पाइ ॥३६॥ दोहा-कान मूदि यह सुनतहीं, भागी कहि कहि त्राहि ।। श्रद्धाके आशावधी, देखति है उर दाहि ॥ ३७॥ करुणा ।। विजय-चंद्रमुखीनि में चार चकोर कि च- न्द चकोरनि मै रुचिरो है ॥ लोचन लोल कपोलनि मध्य विलोकत यो उपमा कह्यो है। सुंदरता सरसीनि में मानहु मीन मनोजनिक मनु मोहै । माणिक सों मणि मंडल कहि को यह वाल वधूनि में सोहै ॥ ३८ ॥ सती।।दोहा-नित्यविहारनि को मढ़ी,त्रिय गण देखि सिहा- ति।।एक पियति चरणोदकनि, एक उसारनि खाति ॥३९॥ पुत्री दक्षिण राजकी, आई तजि कुल तंत्र ॥ देउ कृपा करि (३८) विज्ञान गीता ऋपि ॥ हीरछन्द-कौन करम कौन धरम कौन सजत काम ॥ राधा वजूटी भपतमनितपररतिनाम ॥ ज्ञासि तिथिहि छाँड़ि करत भोजन न अचेत ॥ जासि न परसाद कननि पूजत हरिहेत ॥२६॥ नारीवेष ॥ दोहा-ज्ञासि तजे परिहरे नर, पावत कहा प्रसाद॥श्यामवंदनिहि भागु हों, लावत छोड़ि विपाद॥२७॥ चामरछंद ॥ कौन वेद मध्य देव श्याम वंदनीकही ॥ वेदको प्रमाण पूज हों न मानिहों सही ॥ राधिका कुमारि. काहि नित्य श्याम वंदही ॥ तत्र कुण्ड मृत्तिका सु श्याम वंदनी सही ॥२८॥ नारीवेप ॥ दोहा-जो तू राधाकुण्डकी, माटी मानतु इ- ट॥ तौ तू मेरो शिष्यद्वै, देखे वस्तु अदृष्ट ॥२९॥ शूद उवाच ॥ दोहा-पीछेहों शिष्य हों, पहिले सुनो विचार ।। कौन हेतुते, तू करचो नारीको शृंगार ॥३०॥ नारीवेप ॥ तोमरछंद-तप जाप मंत्र अयज्ञ ॥ मत में तजे गुणि अज्ञ ॥ बहु पाइ जे जेहि शर्मु, ॥ यह मैं धरयो भषि धर्मु॥३१॥ तारकछंद-पतिनी प्रिय तोहि किधों पति भावै ॥ इहई तु तो पति को उपजावै ।।नर देह तजे मारि होइ सुनारी॥ तव होइ भले पतिको अधिकारी ॥३२॥ नारीवेप ॥ दोहा-हो कै होइहि देहहीं, नरते सुंदरि ना- रि॥ राधा न की है सखी, मिलिहों श्याम निहारि ॥३३॥ fam

विज्ञान गीता। (४१)
. श्रद्धा ॥ सरस्वतीछन्द-असी हुती हों भैरवी लइ विष्णु
भक्ति छुड़ाइ ॥ ताको मिलो तुम जाइ जी सुख पाइ दुःख
नशाइ ॥ दौरि दुऔ सुनि मात गातनि की भली कुश-
लात ॥ सु विलोकि दुरिते पंथ में आवत उर अवदाता॥४॥
तारक-निज आजु जिये कुल केशव कोऊ ॥ अति
काँपति गात निरोवति दोऊ॥ अकुलाइ मिली अति आतुर
भारी॥ चितवै चहुँघा विन जीव विहारी ॥५॥
श्रद्धा॥दोहा-महाभयानक भैरवी, देखीसुनीन जाति।।
देखति हों दशहूँ दिशा, मेरो चित्त चवाति ॥ ६॥
शान्ति-विष्णु भक्तिको संगपल, तजतु नेह तो मात ॥
पठई हुती विवेकसों, कहन गूढ़की वात ॥ ७ ॥ शान्ति
श्रीहरिभक्ति पै,गई सुनतही वात ॥करुणाजू श्रद्धा गई, जहँ
विवेक नर तात ॥८॥
रूपमालाछंद-वाग राग रमे विराजत जगुनंदिनि कू-
ल॥ यत्र तत्र अनेक रंगनि शोभियै फल फूल ॥ बुद्धिके
सँग शोभियै तहँ राज राज विवेक ॥ रेणुका मय शुद्ध आ-
सन चित्तमें प्रभु एक ॥९॥
गीतिका-गुण गानमान विधानसो कल्यान दान सयान
सोअनुराग याग विराग भाग सँयोग भोग प्रमाण सो॥सुख
शील सत्य सँतोप शुद्धस्वरूप आनंद हाससो ॥ तप तेज
जाप प्रताप संयम नेम प्रेम हुलास सो ॥१०॥

(४०) विज्ञान गीता।
याहि प्रभु, नित्य विहारी मंत्र ॥४०॥ सेवेगी तुमको. स-
दन, छोडि जु सबै विकल्प ॥तन धन मन को प्रथमही, क-
खाये संकल्प ॥४१॥ सिखए मंदिर माँझ लै, मोहन मंत्र
विधान।उन दीनी गुरु दक्षिणा,सधर अधर मधुपान॥४२॥
शांति ॥ तारक-इनको कवहूं न विलोकन कीजै ॥
अरु यों करियै तौ निरै पग दीजै ॥ विपदा महँ. आनि
भनो दुख कीजै ॥ बूड़ि नदी मरियै विप पीजै ।। ४३॥..
दोहा- इहि विधि पाखण्डीनि के, थलनि विलोकि प्र-
काश ॥ वृंदा देवी पहँ गई, वूझन केशवदास ॥ ४४ ॥
जब लागी देहै तजन,वाणी भई अकाश ॥सुखसों श्रद्धा मि-
लन अब, है है केशवदास ॥४५॥ पूजा शालग्राम की, क:
रिपोड़श उपचार ॥ वंदन आठो अंगते, करति हुती तिहि
काल ॥४६॥
इति श्रीचिदानंदमनायां विज्ञानगीतायां पापण्ड
धर्म वर्णनोनाम अष्टमप्रभावः ॥८॥
दोहा-नवे माँझ श्रद्धा मिलन, हिय विवेक वैराग ॥राज
धर्म वर्णन सवै, उद्यम कथा सभाग॥१॥ वृंदा देवी हँसि
मिली, श्रद्धहि कंठ लगाइ ॥ कुशल प्रश्न बूझी सबै,कहि के-
शव सुखपाइ ॥२॥ मथुरा वृंदावन सवै, ढूँढयो देवि अ-
* शेषु॥ कबहुँ न श्रद्धा देखियै, चित विचार करि देखु ॥३॥

विज्ञान गीता।
राजोवाच ॥ दोहा-शासन श्रीहरिभक्तिको, सबको स-
दा प्रमान ॥ सुनि श्रद्धा इहि भाँति के, हम को कठिन
विधान ।। १९॥
रूपमालाछंद-तात मात विमात सोदर वंधु वर्ग अशे-
पाकौन भाँतिनि हों हतों सग संगहें सुविशेपा। पापके अप-
लोक के वनितानि दै बहु शोक ॥ कोप दै बहु भाँति शो-
कनि पालि लोक विलोक ॥२०॥
सतसंग-राज राज भली कही यह बात नित्य प्रमान ॥
मित्र कौन जु शत्रुको जग आपु रूप समान ॥ सर्वदा सव
भाँति बहु कार एक आनँद शक्ति ॥ और बात न मानिए
मन छोड़ि श्रीहरि भक्ति ॥२१॥
राजधर्म ॥ दोहा-राजा कै प्रभु जिनि कहो, तपसी
कीसी बात ॥ सिंह जियत क्यों मृगनि सों,नातौ मानै तात
॥ २२ ॥ दान या मति शूरता, सत्य प्रजा प्रतिपाल ॥
दण्डनीति ए धर्म हैं, राजनिक सब काल ॥२३॥
रूपमाला छंद-दान दीयत विज्ञ को अति अज्ञ को व-
शमीत ॥ दीनको द्विजवर्ण को बहु भूख भूपित भीत।।दीन
देखि दयाकरै अति अज्ञ को भुवपाल ।। गाइको त्रिय जाति
को द्विज जातिको सवकाल ॥२४॥
दोहा-धरणी को धन धर्म को, सत्य शील संतान नृप
अपने उद्धार को, सदा रहत मतिमान ॥२५॥

(४२) विज्ञान गीता।
दोहा-धीर धारिणी ज्ञान शम,दम सुभाव आचार ॥व-
ल विक्रम शुभ आदि दै, सकल धर्म परिवार ॥११॥
रूपमालाछंद-बुद्धिकी सजनी क्षमा शुचि सिद्धि कीरः
ति प्रीति ॥वृद्धि सुंदरता सदा शुचि माधुरीयुत जीति॥धी-
रता अवधारणा तपसा प्रभा अति उक्ति ॥ वर्णता अवधाः
नता सुसमाधि संततयुक्ति ॥ १२ ॥
दोहा-राजधर्म सतसंगयुत, शोभतहै सुखदाइ ॥ श्रद्धा
करुणा युतगई, दई आशिपा जाइ ।। १३॥
स्वागता-राज राज उठि पांइनि लागे ॥राज धर्म सत-
संग सभागे ॥राज पत्नि उठि कंठ लगाई। सिद्धिः बृद्धि प-
ग धोवन धाई॥१४॥
दोहा-प्रथम प्रश्न कुशलातकहि, तब वूझी नृप नाथ ॥
करुणायुत श्रद्धागई, कहन आपनी गाथ ॥ १६॥
श्रद्धा-असीहुती हों भैरवी, महामोहके हेतु ॥ विष्णु भ-
क्ति हों छीनिली, पठई राज निकेतु ॥ १६॥ शासन श्रीहरि
भक्तिजू, दई कृपा करि एहु ॥लीजेजू शिर मानिके, कीजै
नहिं संदेहु ॥१७॥
विजय-कामके काम अकाम करो अब बेगि अकामनि
आनि अरोजू ॥ मोहके मोहको. लोभके लोभको क्रोधके
क्रोधको नाश करोजू ॥ कीजै प्रवृत्ति निवृत्ति प्रवृत्ति के
पंथ निवृत्ति के पांइ धरोजू ॥ आपने बापको आपने हाथ-
कै जीवहि जीवनमुक्त करो जू॥१८॥

विज्ञान गीता। (४५) यह धर्म नवीनो ॥ एक पुरातन वात सुनावो ॥ मोहके मोह ते मोहिं छुड़ावो ॥३४॥ राजधर्म ॥ दोहा-रामचद्र जगचंद सों, कीन्हो हो संग्रा- म ॥ रामचंद्र के सुतनि जब, वाजि गह्यो गुणग्राम ॥३५॥ विवेक ॥ तोटकछंद ॥ अनजानतहीं उन रोप धरे ॥ पहिचानि पिता तब पांइ परे ॥ हम जानि पिता रण क्यों हनिये ।। यह धर्म कथा कहु क्यौं गुनिये॥३६॥ राजधर्म ॥ दोधक-यद्यपि हैं अति धर्म प्रवीने ॥ युद्ध मरुत्त पिता कहें कोने ॥ अर्जुन के सुत अर्जुनही को॥ शीश हत्यो रणमै अतिनीको ॥ ३७॥ राजनि केवल रा- ज के काजै ॥ मारत केशव काहु न लाजै ॥कै अति प्रे- म पिता समुझावो।मोह के मोह ते मोहिं छुड़ावो ॥३८॥ दोहा-ब्रह्म दोप युतमारने, कहा तातकहँ मात ॥ जौं न मारियै राज तौ, नर्क परहु सुनि तात ॥ ३९॥ सिगरे ज- म्बूद्वीप में, पूरि रह्यो परिवार ॥ राजा सिगरे तंत्रको, रा- म नाम है सार ॥४०॥ उद्यम।।दोहा-बोलि लयो उपकार कहँ,गहि उद्यमको हाथ।। राज सभा में आई कै, वैठे तव नरनाथ ॥४१॥ याचक पूजक योग युत,पण्डित मण्डित धर्म ॥ वरणे आनि विवेक सों, महामोह के कर्म ।। ४२॥ राजधर्म ॥ विजय-भूलत जीव चिदानंद ब्रह्म समुद्र के स्वादहि सूंघत नाही-॥ पीवे न वेद पुराण पुकारि " . (४४) विज्ञान गीता। रूपमाला छन्द-शूरता रण शत्रु को मन इंद्रियादिक जानि ॥ सत्य काय मनो वचादिक संपदा विपदानि ॥ चोर ते बटपार ते व्यभिचार ते सवकाल ॥ इतिते ठगलोग ते जुप्रजानि को प्रतिपाल ॥२६॥ दोहा-सखा सहोदर पुत्र सम, गुरुहू को अपराधु ॥ क्षमे न राजा विग्रहूँ, वनिता विहरत साधु ॥२७॥ दोधकछंद-संतत भोगनिनैरस जाके ॥. राजन सेवक पाप प्रजाके ॥ ताते महीपति दण्ड सँचारे ॥ दण्ड विना नर धर्म न धारे ॥२८॥ दोहा-कै तुम तजो कहाइवो, राजा आजु विवेक॥महा- मोह को दण्डकै, दीजै भाँति अनेक ॥२९॥ राजा-यद्यपि ऐसोई सदा आदि अंत है राजु । तदपि आपने वंश को, कैसे मारों आजु ॥३॥ राजधर्म ॥ दोधक-होहठ ऐसो युधिष्ठिर कीनो, ॥ लो- ग रहे कहि क्यों हनदीनो ॥ अंत खिसाइकै युद्ध सँचारे ॥ घर मांझ ते नारि समेत निकारे ॥३१॥ दोहा-बंधु नाश अर्जुन कियो, श्रीहरि के उपदेश ॥ तिनहीं अब मोचन करो, होइहि बारे देश ॥३२॥ राजधर्म ॥ स्वागता-पाप मारि प्रभु धर्म सँचारो ॥ लोक लोक यश को न पसारो ॥३३॥ विवेक ॥ वाप सों युद्ध कहो किनि कीनो॥आजु चल्यो विज्ञान गीता। (४७) गोधाबोधा युद्ध को, गहे हाथ हथियार ॥४८॥ उनके रा- जा काम है, सब योधनिको सार ॥ ताको राज प्रयोग ये एकै वस्तु विचार ॥ १९॥ वस्तु विचार ॥ सवैया-वासरहूँ निशिनो दरवार व- से मल धार रहै न घरीको ॥ सूरति शूकरिकीसी सलोम कहा वरणों थलकाम थरी को ॥ शूकरसे विषयी जन ताहि महा सुख पावत अंक धरीको ॥मारो कहा अव मार मरयो कहु ठाकुर कामनिरै नगरी को ॥५०॥ राजा ॥ दोहा-को कहिये कहि कुशल मति, क्रोध जी- तिवेजोग । ताको राज प्रयोगिये अब एकै संतोप ॥५१॥ संतोप ॥ सवैया-निर्मल नीर नदीनि के पान बनी फल मूल भखो तमपोषे ॥ सेज शिलान पलास के डास- न डासिके केशव काज सँतोपे ॥ जो मिलि बुद्धि विला- सिनि सों निशिवासर राम के नामहिं घोपे ॥राज तुम्हारे प्रताप कृशानु दशा इहि लोक समुद्रनि सोपे ।। ६२॥ दोहा-परत्रिय जननी जानिये, परधन सुख विपतूल। लोभ कहा सब मोह दल, जरि जैहैं यहि शूल ॥५३॥अपने दल बल समुझिय, रे भट आलस छोड़ि । प्रभु की तुम पापण्ड पुर, फेरो प्रतिदिन डोड़ि ॥५४॥ इतिश्रीचिदानंदमनायां विज्ञानगीतायां विवेक राज धर्म उद्यम मंत्रवर्णनं नाम नवमप्रभावः॥ ९॥ - (४६) विज्ञान गीता। पुकारि पिवावत है वहुधाहीं । झूठे विपै विप सागर तुंग तरंगिनि पीवतहीं न अपाहीं ॥ मजत है उन मज्जत केशवदास विलास विनोद वृथाहीं ॥४३॥ दण्डक-जैसे चढ़े वाल सब काठ के तुरंगपर तिनकेस- कल गुण आपुही में आनेहैं । जैसे अति वालिकावे खेलति पुतरि अति पुत्र पौत्रादि मिलि विपय वितानेहैं । आपनो जो भूलि जात लाज साज कुल कर्म जाति कर्म कादिक नहीं सो मनमाने हैं ॥ ऐसे जड़ जीव सब जानत हो केशौ- दास आपनी सचाई जग सांचोई कै जाने हैं ॥ ४४ सवैया-अंध ज्यों अंधनि साथ निरंध कुवां परिहूं न हि- ए पछितानो ॥ बंधुकै मानत वंधन हारिनि दीने विपै विप खात मिठानो । केशव आपने दासनि को फिरि दास भ- यो भवयद्यपिरानो ॥ भूलि गई प्रभुता लग्यो जीवहि वं- दिपरे भले बंदि अचानो ॥ ४५ ॥ राजधर्म ॥ मदिरा-रूप रचे यहि लोकहि केशव चेत को आपु प्रवेश करयो । चेतु भले गुन हेतु भये सुख दुःख सुतो सवही है कुरयो । तिनके कहि के चल भोगनि को सुरननिरें पद पैंड धरयो । इहि भाँति रच्यो जग झूठ महा सुकहा जगदीशके हाथ परयो॥ ४६॥ राजा ॥ दोहा-उद्यम कीजै आजुते, वह उद्यमअकुला- इ॥ जीति शत्रु जन कहँ मिलो, देखो प्रभु के पाँइ ॥४७॥ उद्यम ॥ गज वाजी सम्बर घने, गढ़े हैं दरवार ।

विज्ञान गीता। (४९) गजगामिनि ॥जलधार बहै बहु नैननि ते न रहे केहि के- शव वासर यामिनि ॥ कबहूँ कबहूँ कछु वात कहैं दमकै दुति दन्तनिकी जनु दामिनि ॥ पिय पीय रटे मिसु चात- कके वरपा हरपी कि वियोगिनि कामिनि ॥ ८॥ सवैया-कोप करयो द्विजराजसों केशव कोविद चित्त चरित्रनि लोपति ॥ साधनहू अपमारग लावति दुरि करै सतमारगकी गति ॥ चोरनिको विभिचारिनिको निशि चारनिको उपजावतिहै रति॥वातक चातकते समुझे वरपा हरपी कि वियोगिनि की मति ॥ ९ ॥ दूपतिहै परपंकज श्रीगति हंसनिकी न तऊ सुखदाई ॥ अंबर ओट किये मुख चंदहि छूटि छपै छन भान छपाई ॥ सोहतिहै जलजावली केशव पीन पयोधरमें दुखदाई ॥. मारग भूलती देखतहीं अभिसारिणि सी वरपा बनिआई ॥ ३०॥ भव कारण जी- वन देति भली विधि भूलितोन भई हित होनी ॥ द्विजरा- जकी नेकहुँ कानि करी नहिं तीनिहुँ लोकनि कीरति ली- नी॥ परिताप हरे सब भूतलके रविके कुलको पदवी बहु दीनी ॥ कहि केशव चातक मोर र वरपा हरपीकी सती रिसकीनी ॥ ११॥ इति वर्षा वर्णनम् ॥ अथ शरद ॥ दोहा-वीति गई वरपा सबै, आई शरद सु- जाति ॥ केशव वासर शोभसी, बीती कारी राति ॥ १२ ॥ दंडक-छूटि गयो प्रजनि चलीवो अपमारगको आ- पने आपने सतमारग समीतिहैं ॥ सोहति परमहंस सुर । (१८) विज्ञान गीता। दोहा-केशव दशम प्रभाव में, श्लेपक कवित विलाप्त ॥ वर्णन के मिसु प्रगटहीं, वरपा शरद प्रकाश ॥ १ ॥ तोटक-तापुर में यह वात ॥डोंडी वजी अधरात ॥आ: यसुदेत विवेक ॥ ब्रह्म धरो चित एक ॥२॥ सोरठा-महामोह यहि बात, कीनो कोप विवेक पर॥ कूच बड़ेही प्रात, करि काशी सनमुख चल्यो ॥३॥ चार्वाक ॥ दोहा-कूच न कीजै राज अब, आयो वरपा काल ॥ शरदहि आवतहीं वरद, करो विवेक विहाल ॥४॥ विजय-लोग लगे सिगरे अपमारग पोच भलो बुरो जा- नि न जाई । चंचल हस्तिन को सुखदा अचला विपदा मिनि को दुखदाई ॥ हंस कलानिधि शूरप्रभा हत खंडशि- खंडनि की अधिकाई ॥ केशव पावस काल किधों अविवेक महीपति की ठकुराई ॥५॥ज्वाल जगै कि चलै चपला नभधूम घनो की घनो धनवूरो॥खेचरलोगनिके अंशुवा जल बूंद किधों वरनोमति शूरो ॥ केकी कहै इह कीकई केशव गौ जरि जोर जवासो समूरो ॥ भागहुरे विरहीजन भागहु पावस कालकी पावक पूरो ॥६॥ घनघोर किधों भट पु- अनिपै तरवार कढ़ी तड़िता दुति भीनी ॥ गहि शक शरा- सन केशव जोति. समूहनिकी पदवी बहुलीनी ॥ कमला तजि पद्मिनि बूड़िःमरी धरनी कहँ चंदवधू गहि दीनी ॥ बरषा हरपीकि बजाइनिशान पुरंदर सूरज को रिस कीनी॥ ॥७॥मिलि मेलेहिं गात सुअंबरनील रह्योलगि बात सुनो .

--- विज्ञान गीता। (५१) सुचन्दन चढ़ायो साधु मन वच काइकी ॥ कृशकटि केहार कमलदल पदकर खंजननयन कुंद दन्त सुखदाइ की । आछेतनु गंगा जल सहित शृंगार हार केशौदास हंसगति सुंदर सुभाइ को ।। वीतेनिशि वरपाके आईहै जगावनको शरदकी शोभा वृन्द दासी रघुराइकी ॥१७॥ इति श्रीचिदानन्दमनायां विज्ञानगीतायां वर्षा शरद वर्णनोनाम दशमःप्रभावः ॥ १० ॥ दोहा-महामोह नरनाथ तब, कूच करयो अकुलाइ ॥ शोभन शरदहि पाइ बहु, दुन्दुभि दीह बनाइ ॥१॥ भुजंगप्रयात-चले मत्तमातंग भृङ्गावली सों॥ चले वा- जि कुद्दन चिंतावली सों॥चले स्यन्दनस्थाययोधाप्रवीने ॥ चले पुंज पैदा धनुर्वाण लीने ॥२॥ चामर छंद ॥ रथ राजि साजि बजाइ दुंदुभि कोहसों करि साजु ॥ विंदुमाधव को चल्यो दल भूमिको अधिरा- जु ॥ उठि धूरि भूरि चली अकाशहुँ शोभिजे जुअशेप ।।ज- नु सोधु देन चली पुरंदर को धरा सुविशेप ॥३॥ वारा- णशी अति दूरि ते अवलोकियो मन पूत ॥ ऊँचे अवास- नि उच्च सोहति हैं पताक विधूत ॥ शोभाविलास विलोकि केशवराइ यो मतिहोति ॥ वैकुंट मारग जात मुक्तनिकी नवै ज्यों जोति ॥४॥ मदिरा ।। गंग अन्हाइ के ईशहि पूजत फूलनिसों तन (५०) विज्ञान गीता। सभ कलानिधि गाइ द्विज देवतानि पूजिवेकी प्रीतिहै। पावै न प्रवेश विभिचारी निशिचारी चोर :धा- मनि धामनि रामदेवजू की गीतिहै ॥ केशोदास सवहीके. हृदय कमल फूले शोभित शरद कीधों आछी राजनी ति है ॥ १३ ॥ वन्दे नरदेव देव केशव परमहंस राजे द्वि- जराज वपु पावन प्रबलहै ॥ अवनि अकाशहूं प्रकाशमा- न केशोराइ दिशि दिशि देश देश इच्छतु सकलहै ॥ पितर प्रयाण करें दूषण सकल हरै मन वच काइ भव भूषण अमल है ॥ ठौर और वरणत कवि शिरमौर और शरद प्रकाश किधों गंगा जू को जलहै ॥ १४ ॥ जहाँ त- हाँ दुर्गापाठ पठत प्रवीण द्विज धाम धाम धूम धर म- लिन अकाशसो ॥ राज राज सिद्धासन सँयुत चँवर छत्र वाजत निशान गजगाजत हुलास सो॥ ठौर ठौर ज्वाला- मुखी दीसे दीपमालिकासी शोभित शृंगार हार कुसुम सुवाससो॥ केशोदास आसपास लसत परमहंस देवी को सदन किधों शरद प्रकाश सो॥ १५॥ केशव जगत ईश कमला समेत तहाँ जागेज्योति जल थल विमल विलास सो॥ वंदतहैं भूतनाथ भाँति भाँति विधियुत देखियतु देतु दीप अघ ओघ नाश सो॥दिशिदिशिं सुमन सफूले हैं प्रभा- व जाके वरण वरण बहु विशद हुलास सो ॥ जाहि जग लोचन विलोकि सुख पावै क्षीर सागर उजागर की शरद प्रकाशसो॥ १६॥ चवकि चिकुर चारु चन्द्रमुखी चन्द्रिका विज्ञान गीता। (५३) दोहा-उद्यम युत सतसंगयुत, देखि विवेक अखेद ।। करि प्रणाम अति दूरिहिं, बैठे भ्रम अरु भेद ॥ १२ ॥ भ्रम ॥स्वागता-महामोह महिमंडल लीनो ॥ तुमहिं राज यह आयसु दीनो॥तजो आजु शिवकी रजधानी । जाइ रहो जहँ श्रीविधि वानी ।। १३॥ भेद-हिय होई जासों कछु नेहु ॥ हमहिं आजु श्रद्धा गहिदेहु ॥ महाराज तुमको पहिरावै ॥ गहो पाइ उठि जो घर आवै ॥१४॥ सोरटा-महाराज मन तात, महामोह की बात सुनि ॥ धीरज उर अवदात, पठए उत्तर देन तव ॥ १९॥ दोहा-धीरज गये जु तिहि सभा, जहाँ पापकी गाथ ॥ महामोह वैठे तहाँ, असतसंगके साथ ॥१६॥ धैर्यउवाच-शासना दई विवेक राज राज खै कृपाल । छोड़ि देहु जीव को रिता करे महा विहाल ॥ दूरिकै सबै विचारु भाजि जाहु सिंधु पार ॥ जौ न जाह विष्णु भक्ति अनि तेज होउ छार ॥ १७॥ दोहा-कोप करयो यह बात सुनि, गहो गहो जनिजा।। वीर धीर धरि दीह दुख, गयो गयंद ढहाइ ॥ १८ ॥ शोर भयो दुहुँओर तब, उत्तरे गंगा पार|गए विन्दुमाधव निकट, श्रीविवेक तिहि वार॥१९॥शस्त्र छोरि करजोरि तब, विनती करी विवेकमनसा वाचा कर्मना,केशव भाँति अनेक२०॥ विवेक ॥ भुजंगप्रयात-महादेव है जू महादेव धारे ॥

न (१२) विज्ञान गीता। फूलि गनो ॥ आनंद भूलि कै भौंरनि के मिसु गावत वड़ भाग मनो॥ वाहु लतानि उठाइ कै नाचत केशवराँचः त हीत वनो ॥ वागनि शीतल मंद सुगंध समीर लसै हरि भक्त मनो ॥५॥ दोहा-पार देखि वाराणशी, डेरा कीनोवार ॥ महामो; ह नरपाल तव, दल रोकियो अपार ॥६॥ भुजंगप्रयात ॥ प्रबोधो दया एक वाराणशीहै ॥ सखीसी सदासंग गंगालसीहै । रुके जो महामोह ले भूमि अच्छा॥ महादेव मानो रची रामरच्छा ॥७॥ दोहा-महामोह पठए तहाँ, भ्रम अरु भेद वसीठ ॥ शो- भित हुते विवेक जहँ, परम धर्म के ईठ ॥८॥ रूपमाला छंद-देखियो शिवकी पुरी शिवरूपही सुख- दानि॥शेष पैन अशेष आननजाइ वेप वखानि ॥न्हात स- न्त अनंत वेप तरंगिणीयुत तीर ॥ एक पूजत देवता इक ध्यान धारणधीर ॥ ९॥ एक मंडित मण्डली महँ करतवेद विचार॥एक नाम र पढ़ें श्रुति शुद्ध सारणसार ॥ एक दंड धरे कमंडलु एक खंडितचीर ॥ एक संयम नियमदादिक एक साधि समीर ॥ एकहैं अनुरक्त कर्मनि एक नित्य विरक्त ॥ विन्दुमाधव केउ माधवके कहावत भक्त ॥ १० ॥ तोटक छंद-अति भूवपुरी सम मानि तवै ॥ इन भाँति- नसों अवलोकि सवै॥नृपनायकके दरवार गए ॥ गुदरे तब भीतर बोलि लए ॥११॥ - । विज्ञान गीता। (६५) विवेकउवाच-सुनो ईश यास्तोत्र को जो सुनैगो । पढ़ावै पटैगो गुनावै गुनैगो । सबै संपदा सिद्धि ताको क- रोजू ॥ सदामित्र ज्यों शत्रुताको हरो जू ॥३०॥ श्रीविंदुमाधव ॥ दोहा-होइ प्रबोध उदै हिये, तेरे केशव राइायाहि पढ़े अति प्रीतिसों, सो वैकुंठहि जाइ॥३१॥ विदा- विन्दुमाधवदई, तवहीं वार विचार गए विवेक विशेप मति विश्वनाथ दरवार ॥३२॥ चामर ॥ पापके कलाप मारि तापके प्रताप तारि ॥ शोग रोग भोगको अयोग दुःखदोपदारि ॥ जानके विमान भंजि गंजि मूढ़ गूढ गाथ ।। राखिलेहु राखि लेहु राखिलेहु विश्वनाथ ॥३३॥ धर्म ते विधर्म ते अधर्मधर्मते विचारि ॥ भेद ते विभेद ते अभेद के प्रकाशकारि ॥ कालते अकाल ते विकालते त्रिकाल नाथ ॥ राखि लेहु राखि लेहु राखि लेहु विश्वनाथ ॥३४॥शर्मा ते अशर्माते सुनो अशेपश- मंदानि ॥ भूखते पियासते संताप तोप ते वखानि ॥ वृद्धि ते समृद्धि ते प्रसिद्ध ते प्रसिद्ध नाथ ॥ राखिलेहु राखिलेहु राखिलेहु विश्वनाथ ॥ ३५ ॥ मर्णते सुजन्म ते कुजन्म ते सदा सनेह ॥ तात मात मोहते विमोहते महावि- देह ॥ लोकते अलोकते त्रिलोकते त्रिलोकनाथ ॥राखिले- हु राखिलेहु राखिलेहु विश्वनाथ ॥ ३६॥ मित्र दोप मंत्र दोप राज दोप ते कृपालु ॥ देवदोप विष्णुदोप ब्रह्मदोप

(५४) विज्ञान गीता।
महादेव है कै महादेव पारे ॥ महामोह काटे लिये नाम
आधो॥ प्रबोधो उदो देहि श्री विंदुमाधो॥२१॥ धरा धार
धारी निराधार धारी ॥ सदा ब्रह्मचारी व्रत स्त्रीविहारी ॥
भये सर्व विद्या भये नाम आधो ॥ प्रवोधो उदो देहि
श्री विंदुमाधो ॥२२॥ अरूपी चिदानंद जोतिप्रकाशी ॥
विरूपी जगद्रूप चिद्रूपवाशी ॥ कृपा के करो मुक्ति गीधो.
अगाधो ॥ प्रबोधो उदो देहि श्रीविंदुमाधो ॥२३॥ अनंगी
अनंगादि ज्योतिप्रकाशी।।अनंताभिधेयं अनंताधिवाशीम-
हादेवहू की प्रवाधा निवाधो ॥ प्रवोधो उदो देहि श्री विंदु
माधो ॥२४॥अमेयं प्रवी अनाद्यन्तरन्ता॥अशेषप्रहारी
दशग्रीव हन्ता ॥ अलच्छीनिलच्छीनिकी सिद्धि साधो ॥
प्रवोधो उदो देहि श्रीविंदुमाधो ॥२५॥ त्रिदेवः त्रिकालः
त्रयीवेद कर्ता ॥ विश्रोता कृती सूत्रयी लोकभर्त्ता ॥ कृ-
पाकै कृपापात्र कीनेनिपाधो ॥ प्रवोधो उदो देहि श्री विन्दु
माधो ॥२६॥ तपी तिव्र तापी तपस्याधिकारी॥ परब्रह्म
जूब्रह्मदोष प्रहारी॥ किए पार संसार व्याधो निपाधो॥प्रबो-
धो उदो देहि श्री विंदुमाधो ॥२७॥ अधर्मी उधारो तिहूँ
लोक गामी ॥ रची नित्य वाराणशी राजधानी॥ हरो पीर
मेरी रमाधो उमाधोप्रवोधो उदो देहि श्रीबिंदुमाधो ॥२८॥
विंदुमाधव-विवेकाय वै विज्ञ विज्ञप्ति कीनी ॥ सुनी
विंदुमाधो सबै मानि लीनी ॥ कृपाकै कह्यो मांगियै विन्दु
माधो ॥ प्रबोधो उदो देहि श्रीविन्दुमाधो॥२९॥

JAIN LIBRARY. - विज्ञान गीता। (६७) अच्छवेनान प्रत्यक्ष अंगे ॥ नमो देवि गंगे नमो देवि गंगे ॥ ४६॥ गिराधौ रमाधो उमाधो अनन्ना ॥ स्मरे देवि तो नाम ब्रह्मांडरना ॥ कहे राइ केशौ विवेक प्रसंगे ॥न । मो देवि गंगे नमो देवि गंगे ॥४७॥ श्रीगंगोवाच ॥ दोहा-सर्व भाव तु सर्वदा, पावन केशव राइ ॥ यह अष्टक नितप्रति पड़े, सो नित गंगान्हाइ ॥ गंगा जू हि प्रणाम करि, केशव उतरे पार॥ जात विवेकहि कट- क में, दुंदुभि बजे अपार ॥४८॥ इति श्रीविज्ञानगीतायां चितानंदमनायां श्रीविंदु माधव विश्वनाथ गंगास्तुति वर्णनंनाम एकादशःप्रभावः ॥११॥ दोहा-युद्ध वर्णिवो द्वादशे, महामोह की हारि ॥ केशव राइ विवेक को, जय वर्णिवो विचारि ।। १ ।। रूपमालाछंद-हयहींस गर्जि गयंद घोप रथीनिके तेहि काल ॥ बहुभेवरुंज मृदंग तुंग वजी बड़ी करनाल ॥बहुढोल दुंदुभि लोल राजत विरुद वंदि प्रकाश ॥ तहँ धूरि भूरि उ- ठी दशोंदिशि पूरियौ सुअकाश ॥२॥ दोहा-महामोह तब कोह करि, पठए दूत प्रचंड ॥ धर्म कर्मयुत युद्ध को, पटु पाखंड अखंड ॥३॥ तब विवेक प्र- ति युद्धको, आगम सुनत नसेत ॥ पठई)तहाँ सरस्वती, स- न्मुख सशर निकेत ॥४॥ Moholla Marotian Ward. Dikarir.

(५६) विज्ञान गीता। ते दयालु।विद दोप ते अनाथ दोपते अदोपनाथ॥ राखिलेहु राखिलेहु राखिलेहु विश्वनाथ ॥ ३७॥ विश्वनाथ ॥ दोहा-राखिलेउँ तोकों सदा, सवते केश- वराइ ॥ याहि पढ़े प्रति वासरहि, सो सवहीं सुखपाइ॥३८॥ पाइ प्रवोध उदो हिये, विश्वनाथ ये हर्षि ॥ गंगाजूको जाइ. पुनि, करे प्रणाम महर्षि ॥३९॥ भुजंगप्रयात-शिरश्चन्द्रकी चन्द्रिका चारु हाशे ॥ म हापातकी ध्वांतधामप्रणाशे ॥ फणी दुग्धभावे अनंगारि अंगे ॥ नमो देवि गंगे नमो देवि गंगे ॥ ४० ॥ धरा मध्य ब्रह्माण्ड को भेदि आई॥जगज्जीव उद्धार को वेद गाई॥ मही निर्गुनै स्वप्रकाशे विहंगे ॥ नमो देवि गंगे नमो देवि गंगे ॥४१॥ तजे देह देही पयो मध्य न्हाहीं ॥ ततो भेदि कै न्याइ ब्रह्माण्ड जाहीं ॥ भवच्छेदिकै तिब तुंगे त- रंगे ॥ नमो देवि गंगे नमो देवि गंगे ॥ ४२ ॥ चले निश्चले निर्मले निर्विकारे । असंसार संसार मध्येकसारे॥ अमेय प्र- भावै अनन्ते अनंगे ॥ नमो देवि गंगे नमो देवि गंगे ॥४३॥ सदा सर्व दोपादि संसोप कारे ॥ महामोह मातंग अंग प्रहारे ॥ चिदानन्द भावेधि शान्ते सुरंगे ॥ नमो देवि गंगे नमो देवि गंगे ॥४४॥धरा लोक पाताल स्वर्ग प्रकाशे ॥ मनो वाक कायाज कर्म प्रणाशे॥जगन्मातु भावे सदा शुद्ध अंगे ॥ नमो देवि गंगे नमो देवि गंगे॥ ४५ ॥ सुने स्वप्नहू में विलोके स्मरेहू ॥ क्षिए होत निष्काम नामे रहहू ॥ करे विज्ञान गीता। (५९) गए सूरति आपनि एरे। क्रोध विरोध भए भ्रम भेद सो काम कहा वपुरा गुनिएरे ॥११॥ # दोहा-पुण्य पाप सुख दुख जुरे,आलस उद्यम तत्र ॥ गर्व प्रणयनय मान मन, कलह काम एकत्र ॥ १२॥ योग वियोग सुयोग सों, बहु वियोग अरु भोग ॥ राग विराग धिरागसो, काटिनरोग अरोग ।। १३ ।। अनाचार आचार अरु, सदाचार विभिचार॥ सत्य असत्यनि आदिदै, नित्या- नित्य प्रहार ॥ १४ ॥ महामोह तब झुकि उठे, लखि सतसंग विवेक ॥ भरहराइ भट भगि चले, कहा अनेकरु एक ॥ ॥ १९ ॥ तुमुल शब्द दुहुँदिश भयो, भूतल हल्यो अका- श ॥ देव अदेवान जानियो, भयो विवेक विनाश ॥ १६॥ ब्रह्मदोप तब आपने,वंशहन्यो करिकोह ॥ जाइ पिताके पेट में, भागि चल्यो महामोह ॥ १७ ॥ रूपमाला-रण जीति खेत बजाइ दुंदुभि जीउले सुख पाइ॥ करिगंग को हरको रमापति को प्रणाम वनाइ ॥ बहु दे द्विजातिनि दान वंदिनिसों पढाइ सुगीत ॥ तव राज राज विवेक मंदिर में गए सँग मीत ॥ १८॥ दोहा-जय को कार आविवेक अरु,दै शिरतिलकप्रभार॥ कही वात सतसंग प्रभु, अरिको करो उपाठ ॥ १९ ॥ रूपमालाछंद-शत्रु को अरु अग्नि को रणको बॅचे भाशेषु ॥ होइ दीरघ दुःखदायक तुच्छकै जनिलेषु॥नी- (५८) विज्ञान गीता। रूपमाला छंद-शिर धर्मशास्त्र मुखेन्दु सुन्दर वेद लो- चन तीनि ॥ हरिभक्ति को महिमा हृदयहनि केत वादि कवीनि ।। सांख्य वाहुकनाद भाषित भाष्य न्याय सुनाद॥ रणशोभमान सरस्वती जनु अविका अविषाद ॥५॥ सो गदादिक भागिगे सबहू न मागध इंग ॥ सिंधुपार गये ति- एक अनेक बंग कलिंग ॥ पामरादि दिगम्बरादि कपाल- कादि अशेप॥मारए अरु मार वार गए तिनीचनिभेष॥६॥ दोहा-निंदक एकादशिनि के, मध्यदेशमेवार॥अरु पा- खण्ड धर्म सब,गए सिंधुके पार ॥ ७॥ जव आयो रण लो- भ तव, आयो दीरघदान ॥ देखन लागे देवगण, वल विक्रम परिमान ॥ ८॥ दानउवाच ॥ सवैया-स्योवसुदेउ सबै पशु केशव रो- मन सूतनि पाट जटे पट ॥ भोजनभाजन भूपण देहरे काटह कोटिन याचक शंकट ॥ पुत्रनि देहु कलबनि देहुरेप्राणनिदे. हुरे देहु लगीरट ॥ लोकनि को भय लोपि विलोकिये दीह दरारनि दारिद के घट ॥ ९॥ दोहा-आएकोध विरोध सव, कीने क्रोध अपार ॥ सह नशील संयुक्त तहँ, आए वस्तु विचार ॥ १० ॥ वस्तुविचार ॥ सवैया-मारिये काहेकोक्यों मरै केशव .. ऐसो उपाउ न जी जनिएरे ॥ एकते रूप अनेक भए. सब पुराणनिमें सुनिएरे ॥ थावर हूं चर हूं जलहूं थल देखि ।

विज्ञान गीता। (५९) गए सूरति आपनि एरे॥क्रोध विरोध भए भ्रम भेद सो काम कहा बपुरा गुनिएरे ॥११॥ दोहा-पुण्य पाप सुख दुख जुरे, आलस उद्यम तत्र ॥गर्व प्रणयनय मान मन, कलह काम एकत्र ॥ १२॥ योग वियोग सुयोग सों, बहु वियोग अरु भोग ॥ राग विराग धिरागसो, काटिनरोग अरोग ॥ १३॥ अनाचार आचार अरु, सदाचार विभिचार॥ सत्य असत्यनि आदिदै, नित्या- नित्य प्रहार ॥ १४॥महामोह तव झुकि उठे, लखि सतसंग विवेक ॥ भरहराइ भट भगि चले, कहा अनेकरु एक ॥ ॥ १५॥ तुमुल शब्द दुहुँदिश भयो, भूतल हल्यो अका- श। देव अदेवनि जानियो, भयो विवेक विनाश ॥ १६॥ ब्रह्मदोप तव आपने,वंशहन्यो करिकोह ॥ जाइ पिताके पेट में, भागि चल्यो महामोह ॥ १७ ॥ रूपमाला-रण जीति खेत बजाइ दुंदुभि जीउलै सुख पाइ॥ करिगंग को हरको रमापति को प्रणाम बनाइ ॥ बहु दे द्विजातिनि दान वंदिनिसों पढाइ सुगीतः।। तब राज राज विवेक मंदिर में गए सँग मीत ॥१८॥ दोहा-जयको करिअविवेक अरु,दैशि कही वात सतसंग प्रभु, अरिको करो. रूपमालाछंद-शत्रु को अरु शेषु ॥ होइ दीरघ सदा (५८) विज्ञान गीता। रूपमाला छंद-शिर धर्मशास्त्र मुखेन्दु सुन्दर वेद लो. चन तीनि ॥ हरिभक्ति को महिमा हृदयहनि केत वादि- कवीनि ॥ सांख्य वाहुकनाद भापित भाष्य न्याय सुनाद।। रणशोभमान सरस्वती जनु अंबिका अविषाद ॥५॥ सो गदादिक भागिगे सबहू न मागध इंग ॥ सिंधुपार गये ति- एक अनेक वंग कलिंग ॥ पामरादि दिगम्बरादि कपाल- कादि अशेप॥मारए अरु मार बार गएतिनीचनिभेषा॥६॥ दोहा-निंदक एकादशिनि के, मध्यदेशमेवारं ॥अरु पा. खण्ड धर्म सब,गए सिंधुके पार ॥ ७॥ जव आयो रण लो- भ तव, आयो दीरघदान ॥ देखन लागे देवगण, बल विक्रम परिमान ॥८॥ दानउवाच ॥ सवैया-स्योवसुदेउ सबै पशु केशव रो- मन सूतनि पाट जटे पट ॥ भोजनभाजन भूपण देहरे काटह कोटिन याचक शंकट ॥ पुत्रनि देहु कलबनि देहुरे प्राणनिदे. हुरे देहु लगीरट ॥ लोकनि को भय लोपि विलोकिये दीह दरारनि दारिद के घट ॥ ९॥ दोहा-आएक्रोध विरोध सब, कीने क्रोध अपार ॥ सह नशील संयुक्तं तह, आए वस्तु विचार ॥१०॥ वस्तुविचार ॥ सवैया-मारिये काहेको क्यों मरै केशव - ऐसो उपाउ न जी जनिएरे । एकते रूप अनेक भए सव: पुराणनिमें सुनिएरे ॥ थावर हूंचर हूं जलहूं थल देखि --- विज्ञान गीता। (५९) नाए सुरति आपनि एरे। क्रोध विरोध भए भ्रम भेद सोकाम को कहा बपुरा गुनिएरे ॥ ११ ॥ है दोहा-पुण्य पाप सुख दुख जुरे, आलस उद्यम तत्र ।। गर्व । प्रणयनय मान मन, कलह काम एकत्र ॥ १२॥ योग वियोग सुयोग सों, बहु वियोग अरु भोग || राग विराग धिरागसो, काटिनरोग अरोग ॥ १३ ॥ अनाचार आचार । अरु, सदाचार विभिचार॥ सत्य असत्यनि आदिदै, नित्या- नित्य प्रहार ॥ १४ ॥महामोह तवझुकि उठे, लखि सतसंग विवेक । भरहराइ भट भगि चले, कहा अनेकरु एक ॥ ॥ १५ ॥ तुमुल शब्द दुहुँदिश भयो, भूतल हल्यो अका- श॥ देव अदेवनि जानियो, भयो विवेक विनाश ॥ १६॥ ब्रह्मदोप तब आपने, वंशहन्यो करिकोह ॥ जाइ पिताके पेट में, भागि चल्यो महामोह ॥ १७ ॥ रूपमाला-रण जीति खेत बजाइ दुंदुभि जीउलै सुख पाइ॥ करिगंग को हरको रमापति को प्रणाम बनाइ ॥ बहु दे द्विजातिनि दान वंदिनिसों पलाइ सुगीत ॥ तव राज राज विवेक मंदिर में गए सँग मीत ॥ १८॥ दोहा-जयको करिअविवेक अरु,दै शिरतिलकप्रभाउ। कही वात सतसंग प्रभु, अरिको करो उपाउ ॥ १९॥ रूपमालाछंद-शत्रु को अरु आग्नि को रणको बँचे शेषु ॥ होइ दीरय दुःखदायक तुच्छकै जनिलेपु॥नी- " (६०) विज्ञान गीता। ति भाषत वेद है नृपधर्म शास्त्र पुराण ॥ हों निवेदन ताहि ते किय विज्ञ जानि सुजान ॥२०॥ राजोवाच ॥दोहा-अली कही यह वात तैं, अब मोसों स- मुझाइ॥कहो जाइ हरि भक्ति सों,करै विनाश उपाइ॥२१॥ इति श्रीविज्ञानगीतायां चिदानंदमनायां विवेक जय वर्णनोनाम द्वादशःप्रभावः ॥ १२॥ दोहा-मनहिं आनि समुझाई हैं, गिरा गूढ़ मति साधि ॥ माया दरशन करहिंगे,तेरह में ऋपिगाधि ॥ १॥ रूपमालाछन्द-भीम भाँति विलोकियै रणभूमि भू- अतिअंत ॥ श्रोणकी सरिता दुरन्त अनन्तरूपसुनन्त ॥ यत्र तत्र धुजा परे पट दीह देहनि भूप ॥ टूटि टूटि परे मनो बहुवात वृक्ष अनूप ॥२॥ पुंज कुंजर शुभ्र स्यन्दन शोभिमैं अतिशूर ॥ ठेलि ठेलि चले गिरीशनि पेलि शोणितपूर ॥ ग्राह तुंग तरंग कच्छप चारुचमर विशाल ॥ चक्रसे रथ चक्र पैरत गृद्ध वृद्ध मराल.॥३॥ हरिलीला छन्द-हा. काम हा तनय क्रोध विरोध लोभ॥ हा ब्रह्म दोष नृपदोप कृतघ्न क्षोभ ॥ मोको परी विपति को न छड़ाइ लेइ ॥ कासोंकहों वचन कौन बचाइ देइ ॥ ४ ॥ संकल्पउवाच ॥ दोहा-महाराज समुझो हिये, कछू न कीजै शोक ॥ चिरंजीव प्रभु चाहिये, काल्हि होइगो लोक। ॥५॥ पठइ दई हरि भक्ति तहँ, सरस्वती वड़भाग.॥ उप- ५. न मनमूढ़को, उपजावन वैराग ॥६॥ -

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विज्ञान गीता। (६१)
? रूपमाला छन्द-पुत्र मित्र कलत्र के तजि वत्स दुःसह
सोग।कौनके भट कौन की दुहितामृपासव लोग।।होत क-
ल्पसतायु देव तऊ सबै नशिजात ॥ संसारकी गति जानि
कै अव कौनको पछितात ॥ ७ ॥
दोहा-एक ब्रह्म साँचो सदा, झूठो यह संसार॥कौन लोभ
मद कामको, को सुत मित्र विचार ॥८॥तुम्हें गए तजि वार
बहु,तुमहुँ तजे बहुवातिनलगि सोच कहा करो, रे बावरे
गँवार ॥ ९॥
मनउवाच-शोक विदूपित उरास अव, नहिं विवेक अव-
काश ॥ केवल प्रेम प्रकाश को, समुझतु मोह विलाश॥१०॥
सरस्वती॥नाराचछंद-हिये विना परेसु को जु प्रेम वृक्ष
लाइयै ॥ मनोभिलाप लाख नीर सींचि कै बचाइयै ॥ अ-
कालकाल अग्निदोपपाइ कै सहूँ जौ। त्रिलोककै अशेष शोक
फूल फूलिकै फरै ॥ ११॥
मनउवाच॥ दोहा-यह इक वातभली भई,श्रीभगवतीक-
पाल ॥ दीनो दरशन आनि अब, तुम हमको इहिकाल॥१२॥
सरस्वती ॥ दोहा-होनहार जग वात कछु, ढही रहै नि-
दान ॥ब्रह्माहू मेटन लगै, तउन मिटै परवान ॥ १३ ॥
मन ॥ दोहा-देवी कहियै कौन विधि, मेरो मरिवोहोइ।।
जाइ मिलौं लोभादिकनि, इहाँ मरै को रोइ ॥१४॥
देव्युवाच-यह जग जैसे धूरिकण, दीहवाच सव होइ ।।
को जाने उड़िजातकहँ, मरे न मिलई कोइ ॥१५॥

(६२) विज्ञान गीता। मनउवाच-काहेते प्रभुता बढ़ति, दिन दिन होति.प्र. काश॥ देवी कहियै कार कृपा, किहिते होत विनाश।। १६॥ देव्युवाच-आयुर्वल कुलशोभ श्री, प्रभुतादिक तरु जान ।। ब्रह्मभक्ति जल शक्तिते, वाढ़त है दिनमान ॥ १७॥ नित्यात तू सत्य यह, मानो मन अवदात ॥ ब्रह्मदोप के अग्नि कण, सव समूल जरिजात ॥ १८॥ रूपमाला छंद-ब्रह्मदोष प्रवृत्तिके कुल आनि भो- अवतार ॥ पत्रपुष्प समूल कारण वंश भो सब छार ॥ ब्रह्म भक्ति निवृत्तिके कुल कल्प वेलि समान ॥ ताप ताप प्रभावके बल बढ़तु है दिन मान ॥ १९॥ दोहा-ब्रह्मदोप जिनके हिये, उपजत क्यों हूँ आनि ॥ तिनके कुलके नाशमन, मनते नियत वखानि ॥२०॥पा- तकको नहिं जानहीं, सपने हूँ सव साधु ॥ दोपन से संसर्ग के, जिहि जाको आराधु ॥२१॥ मनउथाच-देहु कृपा करि भगवती, मोकहँ सो उपदेश॥ जिहि ममता मिटि जाइ सब, उपजत जामे केश ॥ २२ ॥ रूपमालाछंद-आपुते उपजे कहोममगोत एक सुजान। एक पुत्र वखानिये अरु एक जूक प्रमान ॥ पोखियै सुत क्यों तजौं सब जूक जाति अखेद ॥ शोचनीय अशोचनीय न मूढ़मानत भेद ॥२३॥ दोहा-मन पुत्रादिक जो सवै, यद्यपि जगत अनित्त॥ न और कछू न अब,आवे मेरे चित्त ॥२४॥ ...

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विज्ञान गीता।
ri सरस्वती-मोहमनी माया वशी, औरन मनमें आइ ।।
ताके संभ्रम विभ्रमनि, भ्रमे न महि अकुलाइ ॥ २५॥जे
जगमें जन मत्त हैं, तिनके केशवअंत ॥सवही सवको सर्वदा,
माया परम दुरन्त ॥२६॥
। मन-मायाको संक्षेप सों, कहियै कछू विलास ॥ जानि
युक्त क्रम छाड़िय, उपजै चित्त उदास ॥२७॥
सरस्वती ॥ दोधक-संसृति नाम कहावति माया ॥
जानहु ताकहँ मोहकी जाया॥ संभ्रम विभ्रम संततिजाकी ॥
स्वम समान कथा सब ताकी ॥२८॥
दोहा-ताकी परम विचित्रता, जानि परै कछु तोहिं ।।
सोइ कथा अब सब कहों, जो बूझी है मोहि ॥२९॥
दोधक-भूतल मालव देश वसेजू ॥ तामह ब्राह्मण गाधि
वसेनू ॥ सोदर सुंदरि बंधु तजे जू ॥ बोधको कानन जाइ
सजे जू ॥३०॥ सुंदर स्वच्छ सरोवर देख्यो॥शीतल सा-
धु तपोमय लेख्यो । तामहँ पैठि तपोव्रत लीनो ॥ सोतह
यक्ष जलै घर कीनो॥३१॥
दोहा-ताके धीरज देखिकै, खै कृपालु भगवंत ।।
देख्यो गाधि अगाधिमति, दरशन दयो अनंत ॥३२॥
श्रीभगवानुवाच ॥सुंदरी छंद-बाहर आवहु विप्रतजो
जल।। आनि तपोजलको गहिजै फल ।।माँगहु जो जियमाँझ
रह्यो बसि ।। आनि लहो भगवंत कह्यो हँसि ॥३३॥

(६४) विज्ञान गीता। गाधिरुवाच ॥ रूपमाला छंद-विश्वके हिय पद्म के अ- लि सर्वदा सर्वज्ञासर्वदा सबके हितू तुमको न जानत अज्ञः॥ दीन देखि दया करी प्रभु नित्य दीनदयाल ॥ देहु जू वर एक मोकहँ विश्वके प्रतिपाल ॥ ३४॥ दोहा-अद्भुत माया रावरी, महामोह तम मित्र ॥ देख्यो चाहत हौं कछू, ताको जगतचरित्र ॥ ३८ ॥ सरस्वती छंद-एवमेव हरि हँसि कह्यो, पीछे भए अदृष्ट। तादिनते ताके भई, हरि माया अति इष्ट ॥३६॥ सुंदरी-एक योस जल मध्य रह्योजव ॥ कै सिगरी विधि ध्यानकरयो तव।।आपुहिं आपनही घरहीघर।।डीठि गिरचो- गतप्राण परयोधर ॥३७॥ रोवत बंधु अशेष बढयौ दुख चुंवति गोद लिए जननी मुखालेगये लोग सवै सरितातटावा रि दयो लगि रोवनकी रट ॥३८॥ जाइ चंडाल कोपुत्रभयो मुनिव्याहकरयोपितु मातु बड़ो गुनि।।क्रीड़तु है वन वीथि- नि मै किल । ज्यों संग काक विलोकिय कोकिल ॥३९॥ लेतरुणी तरुणे अनुरागनि ॥खेलत डोलत बाग तड़ागनि॥ फूलनिमें दोउ फूले फिरें तन ॥ज्यों अलिनी अलिसाथ रमै वन ॥४०॥ दोहा-एकदिना त्रिय पुत्र ले, गई पिताके गेह ॥ तब ता केशव वंश को, काल वश्य भइ देह ॥४१॥ रूपमालाछंद छाँडिगो जवहूं न मंडल तात मात.वि- योग । कीर मण्डल त्यों चल्यो मुनि पुण्य काल सँयोग। ॥

विज्ञान गीता। (६५) कालके वश राज भो तिहि देशको तिहिकाल ॥ लेगए गहि ताहि भूप भयो सुबुद्धि विशाल ॥४२॥छत्र चामर शी- श दे भये मंत्रि मित्र संयुक्त ॥ पाइघोड़े मत्त दन्ती दुःखते भये मुक्त ॥ संगले बहुसुंदरी वन वाग जाइ तड़ाग।। नृत्य गीत कवित्व नाटक रंग राग सभाग॥४३॥ सवैया अक्षकुमार सो यक्षसुतानिमें ऐननिमें कर शा- इलसोहै ॥ राशिभिवेशिनि सोसुमलाल मुनैअनि में कल कोकिलसोहै ।। केशवराइ तजे अलिनी मलिनी अलिसो भलिनीनिमें सोहै ॥ काम कुमारसो कीर महीपति राज- कुमारिनिके सँगसोहै॥४४॥ दोहा-संग चले ता नृपति भव,कीर देशको जाइ॥आठ वरस लगि राजकिय, शत्रु अनेक नशाइ॥ ४५ ॥एक दिव- सता वपचकी, तरुणी पुत्र समेत ।।जाति हुती घर आपने, उतरी वाग निकेत ॥ ४६॥ सुंदरी-भूप गयो तरुणी सँग ले सब ॥ भेंटभई तरुणी युत सो तब ॥ पुत्र त्रिया पहिचानि लगे उर॥रोइ उठी तरु- णी तव आतुर ॥४७॥ दोहा-रानिन मंविन मित्रजन, जान्यो जाति चंडारु ॥ सुंदरि सुतले संग घर, आयो नृप मतिचारु ॥४८॥रानि- न अपनी शुद्धलगि, कीनो अग्निप्रवेश ।। पीछे मंत्री मित्रजन, दुखित भयो सब देश ॥ १९॥ ताके पीछे श्वपचहूँ, कीन्हीं मनमें लाजाजरयो अग्निमें आपुही,छोड़ि सबै सुखसाज५०॥

(६६) विज्ञान गीता। तारकछंद-यहि वीध प्रबुद्धि सुगाधि भयोजू ॥भ्रम भार विचार न चित्त छयोजू॥अवजीवत हों किधों ईशमरयोहों॥ गहि लेइको मोहिं प्रवाह परचोहों॥५१॥ दोहा- जलतेनिकस्यो आश्रमहिं,गाधि गयो अकुलाइ॥ संभ्रम चित्त न छाँड़ई, बहुत रह्यो समुझाइ ॥ १२ ॥ अ. तिथि एकदिन गाधिके, आयो बुद्धि अगाधि ॥ विधिसों आ- सन अर्घ्य दै, दूरिकरी मगआधि ॥५३॥ सुंदरीछंद-मूल नए फलफूल धरे सव ॥ भोजनकै द्विज भृत्त भए जब ॥ वूझतगाधि तिन्हैं बुधि धारन ॥ दुर्वल विप्र कहो किहि कारन ॥५४॥ विप्रउवाच ॥ रूपमालाछंद-भूमि लोकनि में भलो इक कीर देश सुदेश ॥ भोग योग समृद्धि लोगनि दुःखको नहि लेश । मास एक बसे तहँ हम पूज्यमान सुबुद्धि ॥ गूढ़ भू- ढ़ चंडार भो नृप वर्ष अष्ट कुबुद्धि ॥५५॥ जाति जानि प- री खिस्याइ तज्यो सवै तिहिं राजु॥अग्निमध्यप्रविष्टभो सुख मंत्रि मित्र समाजु ॥ सुंदरी सिगरीतजी द्विज एक बुद्धिअ- गाधु ॥ देखिकै तिनको भए सब दुःख दुःखितसाधु ॥५६॥ संसर्ग दोष निवारिवे कहँ क्षिप्र जाइ प्रयाग ॥ स्नान दान अनेकधा तप साधियो बड़भाग.॥ भक्षु ह्यां हम भक्षियो मन इच्छि कै सुख पाइ ॥ दुःख दुर्बल बैगए यह वात वर्णि न जाई॥२७॥ तारक-विप्रमहामुनिकी सुनि वानी ॥ वात सबै तिन 1 विज्ञान गीता (६७) सत्य के मानी ॥ अद्भुत भाँति भई दुचिताई ॥ काहु पै क्यों हूँ कही नहिं जाई ॥५८॥ अपनी गति देखन को उ- ठि धायो॥ तवहूँ नकै मंडल विप्र बुलायो । जाइ चंडारके मंदिर देख्यो॥ वृतंत सुन्यो सब सांचु कै लेख्यो ॥२९॥ हूँन ते कीरक देश गयोजू ॥ बात सुने सब तुल्य भयोजू ॥ देखि चल्यो फिरि विप्र सशंक्यो । वीच चँडार के पुत्र वि- लोक्यो ॥६०॥देखत दौरि सुकंठ लग्यो जू ॥ विप्र वऱ्या इ छुड़ाइ भयो जू ॥ रोवत पीछे पुकारत आवै ॥ तात त- जो जनि टेरि सुनावै ॥ ६१ ॥ खेलत हो तहँ राज अहेरो॥ सोसुनिआरत शब्द घनेरोबाह्मणभागत जात विलोक्यो। दौरि कै राजकै लोगनि रोक्यो ॥६२॥ एकहि ठौर करेज- न दोऊ ॥ पूछन वात लगे सबकोऊ ॥ राजोवाच ॥ ब्राह्मण तूकहि काहिते भाग्यो । पीछे तुवालक काहे ते लाग्यो ।। ६३ ॥ वालक-दीनदयालु पिता यह मेरो॥ मो कहँ देहु कृपा- करि हेरो॥ ब्राह्मण ॥ होंद्विज मालव देश रहोंजू ॥ काननमें व्रत जाल वहों जू ॥ ६४॥ को यह राज नहों पहिचानो॥ काहेते बापु कहै सो नजानौ ॥ जाति चंडार सुविप्रन होई ॥ हूँनेक जानतहै सब कोई ॥ ६९ ॥ बांधि दुहूँन तहाँ पहुँचायो । कैदुहुँ दैशके बोलि पठायो॥६६॥ दोहा-भामिनिब्राह्मण के कहे, जातिचंडार चंडार॥राजा. ।

(६८) विज्ञान गीता। वेगि बोलाइयो, दुहुँजनको परिवार ॥६७॥राजा दोऊ रा- खियो, न्यारे न्यारे ठौर ॥ भाँति भाँति करि बूझियो, एकै कहैं न और ॥६८॥ दोधकछंद-बंधु दुहूँ जनके जब आए॥बोलि लिए तव दोउ दिखाए ॥ विप्र वशिष्ठते विप्र वखाने ॥ वेप चंडार चं- डारहि माने ॥६९॥ दोहा-मालववासी मुनि कहे, कीर देश चंडार ॥ राजा थाके न्याउ करि, होइ नहीं निरधार ॥७॥द्विजको गाधि न थापहीं, थापहि जाति चँडार ॥ झूठो द्विज साँचो इवपचं राजा करयो विचार ॥७१ ॥डारो याहि कराह में, तप्ततेल जव होइ । जौं न जरै तौ विग्रहै, जरै चडार सुहोइ॥७२॥ कारदेश्युवाच ॥ जरिहौं नाहिं कराहमैं, कीजै राज विचार ॥ याको कर्म दुरन्तहै, अति चेटकी चंडार ॥७३॥ रूपमालाछंद-कीर देश नृपाल भो इहिं भोग कीन अ- पार ॥ आइ बालक बागमें पहिचानियो तिहिंवार ॥ राज लोग जरयो सबै इहऊ जरयो मतिचार ॥ आनिधों द्विज चेटकी यह शुद्ध बुद्ध चंडार ॥७४ ॥ गाधिरुवाच-राज राजन हों जरयों नहिं मरयोहों ति: हिकाल ॥ हों चंडार न चेटकी. सुनि भूप बुद्धि विशाल ॥ अपलोक भाजन लोक में अवहों भयौं जिहिं पाप ॥ चित्तमें यहऊ न जानत देउँ कौनहि शाप ॥ ७ ॥ .

विज्ञान गीता। (६९) दोहा-पुरखा गत को विप्रहों, जानत नहीं विकार ॥ हूँन कोर के कहत ,नृप चेटकी चंडार ॥७६॥ रूपमालाछंद ॥ हाथ पानि एक काटत नाक कान- नि एक ॥ आंखि काढ़त एक डारत प्राण लेत अनेक ॥ वृद्ध बालक ज्वान जे जन जानियै नर नारि ॥ मारुमारुरटैं पढ़ें सब भाँति भाँतिनि गारि ॥ ७७॥ दोधकछंद-मूडिशिखा उपवीत उतारौ ॥ गादह जाइ चढ़ाइ सँवारौ ॥ पाइनि नील करौ मुखकारौ ॥ पर्वत ऊपर ते धर डारौ ॥ ७८ ॥ मुंडनईश शिखा जब जानी ॥ आइ अकाश भई नभवानी ॥ भूतल भूप न भूलहु कोई ॥ब्राह्मण गाधि चंडार न होई ॥७९॥ वाणी अकाश सुने भ्रम भा- ग्यो । राजहिं को ऋपि ब्राह्मण लाग्यो।आशिप दैवन गाधि गएजू ॥ सवै भ्रम चित्तके दूरि भये जू ॥ ८॥ दोहा-गाधि करयो तप जाइ कै,अवनि अनंत अगाधु॥ प्रगट भए भगवंत तह, सुन्दर श्री सुख साधु ॥८१॥ गाधिरुवाच-कौन पुण्य प्रिय दरश दिय, श्वपच कियो किहि पाप॥ मोसों वेगि कहो मिटै, जाते सब परिताप।।८२ श्रीभगवानुवाच-गाधि अगाधि पुनीत तुम, चित्त करो भ्रमनाशामाया दरशन तुम करो, ताके सबै विलास॥८३॥ पुत्र कलबनि आदि दै, झूठो सब संसारराजाको देखो स्वप्न सो,सांचो ब्रह्मविचार-॥ ८ ॥ जन्म मरण तेरो मृपा,श्वपच (७०) विज्ञान गीता। कीर नृप वेप ॥ झूठो सिगरो नाउ है, माया कर्म अलेख ॥ ॥ ८५ ॥ ताते तुम भ्रम छाँडिकै, होहु ब्रह्म सों लीन ॥ यह कहि अन्तर्ध्यान तव, भए भगवंत प्रवीन ॥८६॥ संभ्रम छाँड़ि अशेष तव, साधी शुद्ध समाधि ॥ जीवनमुक्त भयो फिरै, जग में ब्राह्मण गाधि ।। ८७॥ जैसो गाधि चरित्र सब यह मन मया विलास ॥ ताते माया को तजो, भजिये नित्य प्रकास ॥८८॥ इति श्रीमिश्रकेशवदास विरचितायां चिदानंदम मायां विज्ञानगीतायां गाधिमाया विलोकन नाम त्रयोदशप्रभावः ॥१३॥ उपजे गो पांचौ दहे, मनके अंग विराग ।। व्यास पुत्र शुकदेव को, सुनि चरित्र जग जाग ॥ १ ॥माया को समझो सवै, देवी मृषा-विलास । एको नहिं चितलाइये, मन क्रम वचन प्रकास ॥२॥ देव्युवाच ॥ दण्डक-सवको समान असमान मानियै प्रमान अति न प्रमान जग जा कहँ करत है ॥ स्वारथहूँ देई परमारथहूँ देइ देइ स्वारथहूँ औगुणनि गुणनि गहतहै सांचो झूठे ईठ कहूं डीठेतहूं डीठतु न अजरु जरनि जरयो अमर मरतहै ॥ हार सों लगाउ-होइ मानससो केशोराइ न... लाये मन मानस जरतहै ॥३॥ ।

विज्ञान गीता। ९७१) केशव ॥ दोहा॥ लागि गयो यह वचन मन, भूले कुल अनुराग॥को गिराको गूढमत, उपजि परयो वैराग॥४॥ वैराग लक्षण ॥ कुण्डलिया-देही अविनाशी सदा, देह विनाश विचार ॥ केशवदास प्रकाश वश, घटत बढ़त नहि वार ।। घटत बढ़त नहिं वार वार मति बूझि देखि सब ॥ वेद पुराण अनंत साधु भगवन्त सिद्धि अव ॥ वेद पुराण अनन्त कहत जो ब्रह्म सनेही ॥ यों छाड़त नहिं सन्त देह ज्यों छाड़त देही॥५॥ दण्डक-अनहीं ठिक को ठगु जानै न कुठौर ठौर ताही पै ठगावै ठेलि जाहि को ठगतुहै ॥ याको तौ डरनि डरु डगण डगत पलु डरके डगनि डरि डोंडी ज्यों डगतुहै ॥ ऐसे वसवास ते उदास होहिं केशोदास कसन भगतु कहि काहेको खगतुहै ॥ झूग हैरे झूठो जग राम की दोहाई काहू सांचे को बनायो ताते सांचो सो लगतुहै ॥६॥ सवैया- भूरहुँ भूरि नदीनि के पूरनि नावनि में बहुत पनि वैसे ॥ केशवराइ अकाश के मेह बड़े ववधरणि में तृण जैसे ॥ हाटनि बाटनि जात वरातनि लोग सबै विछुरे मिलि ऐसे ॥ लोभकहा अरु मोह कहा जग योग वियोग कुटुंबके तैसे ॥७॥ सुंदरीछंद-काहूँ करयो शव ते चल योवन ॥ छाड़न चाहतु है यह मोतन ॥ जानि सबै गुण शील सुभाइनि ।। सज्जन को अति दुर्जन गाइनि ॥ ८॥ -- ७२) विज्ञान गीता। दोहा-पल शोणित पंचालिका,मल संकलित विशेष॥ योवनमें तासोरमत,भ्रमर लतानि विशेष ॥ ९॥ देवी क हि वैराग यो, सांची है यह वात ॥ तदपि तुम्हें आश्रम वि- ना, रहनो नाही तात॥१०॥धरनी विन घरजोरहै, छाँडै धर्म अधर्म ॥वनितातजिजोजाइ वन,वन के निःफलकर्म ॥११॥ रूपमाला-है निवृत्ति पतिव्रता नियमादि पुत्र समेत ॥ योवराज विवेक को मिलि देहु देह निकेत ॥ वेद सिद्धि स- गर्भ हेतु पतिव्रता शुभ वाद ॥ जाइ है सुप्रबोध पुत्रहिं! विष्णु भक्ति प्रसाद ॥ १२॥ मन ॥ दोहा-उर प्रवृत्ति की वासना, सुनियै देवि सुभाउ॥ अब न लेत सखि स्वप्नहूँ, मुख निवृत्ति को नाउँ ॥१३॥अ- हंकार की होति जब, वारिद अवलि प्रवृत्ति ॥ जामें तृष्णा मंजरी, क्यों सूखति भवचित्ति ॥१४॥ सुंदछिंद-चंचलता सब को उठि धावति ॥ आदरही- न नहीं फल पावति॥जो कुल जाति अशुद्ध वखानहुँ॥ला- ज विहीन तौ तृष्णहिं जानहुँ ॥१५॥ समानिकाछंद ॥ लीन चित्तहू करै ॥ फूल सों नहीं डरै ॥शूरअंश ज्यों सजै ॥ प्रात फेरि पंकजै ॥ १६॥ देविहों कहा करौं । चित्तमें महा डरौं ॥जग्गमै नमुःख है। यत्र तत्र दुःखहै॥ १७॥ सवैया-गर्भ मिलैइरहै मलमें जग आवत कोटिक कष्ट . ॥ को कहै पीर न वोलि परै बहु रोग निकेतन ता- विज्ञान गीता। (७३) रहेनू ॥ खेलत मात पिता न डरै गुरुगेहनिमें गुरु दण्ड हेजू ।। दीरघ लोचनि देवि सुनो अब बाल दशा दिन दुः- नहेजू ॥१८॥ दोधकछंद-जौं मन में मति की मलिनाई ॥होति हिये वेत को चपलाई ।। काहू गणै न सुवर्ग भरीयों ॥ आव- ते है वरपा सरिता ज्यों॥१९॥ सवैया काम प्रताप के ताप तपे तनु केशव क्रोध वरोध सनेजू ॥ जास्तु चारु चिताई विपत्तिमें संपति गर्व- { काहू गनेजू ॥ लोभते देश विदेश भ्रम्यो भव संभ्रम वि- वम कौन भने जू ॥ मित्र अमित्र ते पुत्र कलत्र ते योवन ने दिन दुःख बनेजू ॥२०॥ दोहा-जहाँ भामिनी भोग तहँ, भामिनि विनु का भोग॥ भामिनिछूटेजग छुटे,जगछूटे सुखजोग ॥२१॥जितने थिर चिरजीव जग,अध ऊरधके लोक ॥ अजर अमरअज अमित जन, कवलित कालसशोक ॥२२॥ संवैया-शेपमई कवरी रसना नल कुण्डल सूरज सो- मसँचेजू ॥ मेपल ब्रह्मकपालनिकी पद नूपुर रुद्र कमाल रचेजू ॥ पंकजविष्णु कपालनि की वनमालन केशव काहू बचेजू ॥ हस्तक भेद दशोंदिशि दीसत उरघहूं अध मीचु नॅचे जू ॥२३॥ दोहा-देवीसो उपदेश दे,जनम मरण मिटि जाइकाल- हि को जो काल कर, ताहि रहों मिलिजाइ ॥२४॥ व्यास विज्ञान गीता। पुत्र शुकदेव सम, सुखदा मति सुगंभीर ।। व्यासपुत्रकी यह दशा, कहि माता मतिधीर ॥२५॥ सरस्वती ॥ दोधक-एक समै शुक चित्त विचारे ।। वादो विराग बढ़ो ज्योतिहारे ॥ आपुनहीं अपनी मतिजानो । त्यस्वरूप हियेमहि आनो ॥२६॥ दोहा-तब ताके विश्वासको, बूझे शुक पितुव्यास।। उप- जतहै जग कौनते, कहा विलात प्रकास ॥२७॥ . . . दोधकछंद-व्यास सबै शुक आशय पायो । भूपति सा धु विदेह वतायो॥ वै तुमको सुत उत्तरुदै ।। पूछहु जाइ महासुख पैंहैं ॥२८॥ तोटकछंद-तवही सुविदेह के गेह गए। नृप द्वार तवै थिर होत भए । तब द्वारपहीं नृप सोंगुदरे । शुकदेव अवें दरवार खरे ॥२९॥ सुंदरीछंद-उत्तर राज कछू न दयो जव ।। ठादेहि वासर सात भए तवं ।। रावर में नृप बोलि लिये गुनि ॥ ठाढ़ किये परदा तटलै मुनि ॥ ३०॥ सात वितीति भए जब वासर ॥ जाइ किये तब आँगन में थर ।। वासरसात तहीं सुविहाने ॥ साधु विदेह महीपति जाने ॥३१॥ सुंदरि आई सुगंधनि लीने ॥योवन जोर स्वरूप नवीनमज्जन कै तिन्ह न्हान कराए ॥ अंग अनेक सुगंध चढ़ाए ॥३२॥ भोज- नतौ बहु भाँति जिवाए ॥ दर्पन पान खवाय दिखाए ॥ वस्त्र नवीन सवै पहिराए ॥ सुंदर साधु स्वरूप सुहाए ॥३३॥ - विज्ञान गीता। (७५) नए रूपमालाछंद-नाचि गाइ वजाइ वीननि हाव भाव व- ताव ॥ मंदहास विलाससों परिरंभनादि प्रभाव ॥ कै थकी कासव भाँति भाँति रहस्य लीनि बनाइ ॥ शुद्धहोतु न चित्त जो बहु वल्लरी तरुपाइ ॥३४॥ दोहा-बहु तै निन्दाकै थकी, चित्त एकही रूप ॥ सुख दुख चित्त न पाइए, पाँइपरे तवभूप ॥ ३५॥ विदेह ॥ तारकछंद-कहिये जु कछू मुनि जालगिआए। अपने हम पूरव पुण्यनि पाए ॥ किहिते उपजै जगराज बखानो ॥ अरु क्यों विनशै किहि माँझ समानो ॥ ३६॥ दोहा-सोवह कैसे पाइयै, बूझन आयो तोहिं ।। भूल्यो जहँ तहँ भ्रमतहों, पार लगावहु मोहिं ॥ ३७।। विदेह ॥ दोहा-पायो हुतो जुपाइये, सुनिय श्रीशुकदेव ॥ । यह सुनि मुनि मारग लगे, सुखपायो नरदेव ॥ ३८ ॥ जाइ मेरुके शिखरपर, पूरण साधि समाधि ॥ धरी धीर सब धर्म तजि, परब्रह्म आराधि ॥ ३९॥ वरप अनेक सहस्र तह एक भाँति भव भूप ॥ क्रम क्रय दीपक ज्योति ज्यों, मिलै आपने रूप ॥४०॥ देव्युवाच-तेसैतुमहूँ समुझिमन, दुख सुख मानि समान।। तजि संकल्प विकल्प सब, पौरुप वात प्रमान ॥ ११ ॥ मन-जित लै जैहै वासना, तित तित लैहलीन ॥ पौरुप बपुरा क्योंकर, जीव वापुरा दीन ।। ४२ ॥

(७६) विज्ञान गीता। देव्यु-दुविध वासना होति है, शुभअरु अंशुभ प्रमान॥ अशुभै शुभकरि मानिय, निराधार मन जान ॥ १३॥ एक काल ब्रह्मा सभा,वैठहें मतिधीर ॥ मैं बूझी जगजी- व की, क्यों हरि हो प्रभु पीर ॥४४॥ मुक्ति पुरी दरवार के चारि चतुर प्रतिहार ॥ साधुनके शुभ सङ्ग अरु, समसंतोष विचार ॥४५॥ वसुकला-तिनमें जग एकहु जो अपनावै ॥ सुखही प्रभु द्वार प्रवेशहि पावै ॥४६॥ दोहा-जो इनको संग्रह करै मन वच छांनि छाँड़ि।मिले. आपने रूपको, सकल वासना खाँड़ि॥४७॥ मेरे घर धन पुत्र त्रिय, यह बंधन मनमान ॥ दृश्यादृश्य सुब्रह्महै, यहै. मुक्ति जियजान ॥ ४८ ॥ जाते उपज्यो ताहि मिलि, अनल ज्वाल परिमान ॥ यह कहि भई सरस्वती, केवल अंतर्ध्यान ॥४९॥ देवीके उपदेश यों, शुद्धभयों मननाथ शुद्धभए कैसीभई, नृपविवेककी गाथ ।। १०॥ इति श्रीविज्ञानगीतायां चिदानंदमनायां मनशान्ति वर्णनोनामचतुर्दशःप्रभावः ॥ १४॥ पंचदशे मनशुद्धता, जीव विवेक विचार।। परमदेव पूजा सवै, कहियो चार विचार ॥१॥ शुद्ध भयो मन जानि जव,दे- बीके उपदेश ॥ महापुरुषकी दृष्टितव, परयोसुकामसुवे- श॥२॥पाँइनि लागे परन जव, प्रभुके आपु नरेश ॥ प्रभु वरज्यो हो शिष्य तुम, गुरु कीजे उपदेश ॥३॥' --

विज्ञान गीता। (७७)
विवेक॥ वार वार जिहि होत है, जन्म मरन सो देह ॥
मनसा वाचा कर्मणा, तासों करै सनेह ॥ ४॥
जीव ॥ याही देह सुनो सुमति, ज्यों पावे विन सुःख ॥
शोक हिये उपदेश ज्यों मृत्यु न परसैं दुःख ॥५॥
विवेक ॥ दोहा-हृदय वृक्षु सों वासना,लता न लपटति
जाहि ॥ राग दोप फल ना फलै, मृत्यु न मारैताहि ॥६॥ उ-
रसि विवेक समुद्र को, डसै न वाइव कोपु॥ ताको तन को
मृत्युपै, होइ न कवहूं लोपु॥७॥ परमानंद पियूष के, कणको
पावे स्वाद ॥ ताके तनुकोमृत्यु पै, दयो न जाइ विपाद ।।८।।
क्रम क्रम साधै देहइहि, केशवप्राणायाम ॥ कुंभक पूरक
रेचकनि, तौ पूजै मन काम ॥९॥
जीव-कहो सृष्टि यह कौन है, होत कौन में लीन ॥
पुण्य पाप को फल कहो, देत सुकौन प्रवीन ॥१०॥
विवेक ।। रूपमालाछंद-तम तेज सत्त्व अनंतु अब चा-
हंतु है जु अमेय ।। सर्वशक्ति समेत अद्भुत है प्रमान अभे-
य॥ नित्यवस्तु विचार पूरण सर्व भाव अदृष्ट ॥ पुंश नारि
न जानियै सुनि सर्व भाव अदृष्ट ॥११॥
दोहा-ताके अद्भुत भाव ते, भए सरूप अपार ॥ विष्णु
ऑनि परमानु लै, उपजत लगीन वार ॥१२॥ रक्षक कीने
विष्णु विधि, करता हर हरतार॥ दण्डधरन सबकोरचे, ध-
मराज मति चारु ॥ १३ ॥ अवलोकत रवि शशि फिरत,
निशिदिन धर्माधर्म । इहि विधि. केशव समुझिवे, सवलोक-
निके कर्म ॥१४॥

(८०) विज्ञान गीता।
प्रभापूर्ण संसारके दुःख हत्ताकहो देव पूजा करों ईशंकैसे।
सिखावो सुमोसों महादेव तैसे ॥३५॥
• श्रीशिव॥दोहा-केशव छूटे जगत ते, कीजै जाकी सेव॥
सोई देव बताइयै, महादेव जगदेव ॥३६॥
दंडक-ऋपिऋषिराजवृद्ध केशव प्रसिद्ध सिद्ध लोकलोक
पाल सब कोऊ न प्रबल है ।। वरुण कुवेर यम अनिल अ-
नल जल रवि शशि सुरपति जाको दीने बलहै ॥ कौन सों
कहत देव कौनकी सिखावो सेव जार को वासना मूल म:
लिन धवल है ॥शेख धरु नागधरु नागमुख ब्रह्म विष्णु इ-
नको कलेवरु तौ कालको कवर है॥ ३७॥
वशिष्ठ ॥ भुजंगप्रयात-सुनो ईश तावत् कहों देवको
है ॥ सदासर्व संपूजिवे योग जोहै ॥ कृपाकै कहो हों कहा
देव जानो ॥ महादेव जाको महादेव मानो॥३८॥
श्रीशिव ॥ नगस्वरूपिणी-अजन्म है अमर्नुहै ॥ अशे-
पजंतु सर्न है ।। अनादि अंतहीनु. है ॥ जुनित्यही नवीनुहै।
॥३९ ॥ अरूप है अमेयहै ।अमायहै अमेयहै।निरीह नि-
विकार है ॥ सुमध्य अध्यहारहै॥४०॥ अकृत्त मै अखण्डि
त्वै ॥ अशेष जीव मण्डित्वै ॥ समस्त शक्ति युक्तहै ॥ सुदे-
व देव मुक्त है ॥४१॥
दोहा-ताकी पूजा करहु ऋषि, कृत्रिम देवगण छोड़ि ।
मनसा वाचा कर्मना, निपट कपट को खाँड़ि॥ ४२ ॥

विज्ञान गीता। (८१)
वीरसिंहोवाच ॥ दोहा-देव अरूप अमेय हैं, कहै नि-
रीह प्रकाश ॥सर्व जीव मण्डित कहौ, कैसे केशवदास॥४३॥
ज्यों अकाश घट घटनिमें, पूरण लीन न होइ ॥ यों पूरण
संदेहमें, रहै कहै मुनिलोइ ॥४४॥
वशिष्ठ-कहि प्रभु पूरण देवको, कैसे पूजन होइ ॥
हमैं सुनावो सुगम मग, ज्यों पूजै सब कोइ ॥ ४५ ॥
शिव ॥ दोधक-आनहु ज्योति हिये अविनाशी ॥अच्छ
निरंजन दीपप्रकाशी ।। निश्चलवेप समाधि विहारै ॥ वासना
अंग पतंगनि जारै ॥४६ ॥ शुद्धस्वभाव के नीर नहावै ॥
पूरण प्रेम समाधिहि लावै ॥ फल मूल चिदानंद फूलनि पूजै ।।
और न केशव पूजन दूजै ॥४७॥
दोहा-इहि पूजन जो पूजई, केशव अर्थ निमप ।। मनहु
सदक्षिण बहु करै, राजसूय सविशेप ॥४८॥ इहई साधन
शुद्धतप, इहई.योग वियोग ॥ यहै अनन्यनि को मरमु, जान-
तहैं मुनि लोग॥ १९॥ इहि विधि पूजा हम करत, अनुदिन
सुनि ऋपिराज ॥ कर्तुम कर्तुम अन्यव्या-करण भए सुर-
राज ॥५०॥ अखिल वासना जाति जरि, अखिल जन्मकी
क्षिण ।। पूजाशालग्रामकी, पूजा क्रम क्रम वित्र ॥ ५१॥
तीनिवर्ण पू0 शिला, प्रतिमा शूद्र प्रमान ॥ महादेव यह
कहि भये, ऋपिको अंतरध्यान ॥ १२ ॥

(८२) विज्ञान गीता। हरिगीतिका-तेहि दिवसते इहि भाँति पूजन पूजिकै दिन- राति॥जोई चहै सोई लहै कहि केशव सुवहुभाँति ॥५३॥ इति श्रीविज्ञानगीतायां विवेकजीव सम्वाद वर्णनोनामपंचदशःप्रभावः ॥ १५ ॥ दोहा-नृपति शिखीध्वज पोडशें, जीतेगो संसार ॥ निज तरुणी उपदेश ते, ताको गूढ़ विचार ॥ १ ॥ रानीके उपदेशते, ज्यों जीत्यौ नरनाथ ॥ त्यों अब बुद्धि विलासिनी, वल जीतहु गणनाथ ॥२॥ जीव-राजा रानीकी कथा, कहो कृपा करि आजु ॥ जाते मेरे चित्तमें,उपजै बोध समाजु ॥३॥ विवेक-शात अतीते मनु सुमति द्वापर पूर्व प्रवेश ॥ नृ- पति शिखीध्वज तव भये, केशव मालव देश ॥४॥ सुराष्ट्र देशाधिपत्तिकी, चूड़ाला इहि नाम ॥कन्या सकल कलावती रूप शील दुतिधाम ॥६॥ रूपमाला छंद-दामिनी चल चारु खंजन दाडिमी फटि- जात ॥ चंद्रमा घटिजातुहै जिय फूल फुलि कुँभिलात ॥को- किलाको कालिमा तनुमारवान अदृष्ट॥ ढगए दुख जासुकै यह जानियै जग इष्ट ॥६॥ दोहा-छातिनिछेद मुरारसम, डारतहै करि छार ॥ गए दिगंत निहंश, अरि ताके दुख तेहिवार।।७॥मुनिकन्यनि सँग

विज्ञान गीता। (८३)
सीखियो,तिहिं सवप्राणायाम।।ताते पाई सिद्धिसव,पूरण काम
अकाम ॥८॥ नृपति शिखीध्वज की भई, रानी रूप समान॥
तिनिसों मिलि तिनि भोगए, भूतल भोग विधान ॥ ९ ॥
चामर-एक काल एक आरसी विपे दुहूँ जने ॥ आपने
मुखारविंद देखियौ प्रभासने । कन्त को कछू प्रिया प्रभाव
हीन देखियो।नारि को महा प्रभा समेत देव लेखियो॥१०॥
राजा ।। दोहा-रानी सुनि या बाल ते, तेरे तन इक
रीति ॥ काहे ते तुम श्रीमती, रहो कहो करि प्रीति ॥११॥
रानी ।। रूपमालाछंद-सृष्टिको जो प्रकाश नाश विलास
जानत मित्त ॥ भोग योगअयोग के सुख दुःख मोहिं न
चित्त ॥ नित्य वस्तु विचार है न जरा जुरा न कराल ।। हों
रहों तिनि ते सुनो पति श्रीमती सब काल ॥ १२॥
राजोवाच ॥ दोहा ।। सुख है सुन्दरि धर्म फल, ताहि न
सादर लेहु ॥ उदासीन कै भाव में, मिलै माँझ दुखदेउ॥१३॥
रानी॥राजा कछू दुराहयै, जाके मन कछु और ॥ नारि-
निके एकै शरन, पति सुनियै नृप मौर ॥ १४ ॥ कुवजै कल
ही काहली, कुटिल कृतघ्न कुरूप ॥ सपने हूँ न तजै तरुणि
कोढ़ीहू पति भूप ॥ १५॥
श्रीभागवते यथा श्लोक-दुःशीलोदुर्भगोवृद्धोजडोरुग्णोऽध-
नोपि वा॥स्त्रीभिःपतिर्न हातव्योलोके नरकभीरुभिः॥१६॥
दोहा-पुनि तुमसे नृप नाथ शुभ, सुंदर भव गुण लीन।
सब सुखं दाता सर्वदा, एक विवेकविहीन ॥ १७॥

(८४) विज्ञान गीता। राजा-काहे ते तुम प्रीतमा, उदासीनमय जोग ॥ राजा है प्रभु करत हो, रंकनि केसो भोग ॥ १८॥ कालिजुकी- ने कर्म प्रभु, तेई कीजत आजु ॥ आजु राजु सोई करत,का- ल्हि करहु गे काजु ॥ १९॥ सवैया-ठादेहिं खैयतु वैठिहिं खैयतु खात परेहूँ महासुख पायो॥खातहिं खात सवै मरिजात सुखैवोई पीवो मेरे भायो॥ आवत जातनिरे दिवि केशव कौनहिं कौन कहा नहि खायो । खैवो तऊ न उवीठतु है जग श्री जगदीश बुरे ढंग लायो ॥ २० ॥ दोहा--इहिविधि बीते काल बहु,लह्यो जुनहीं अलक्ष्य ॥ भक्षत हो प्रभु करभ, ज्यों फिरि फिरि भक्ष्याभक्ष्य ॥२१॥ जोहीं जानो कर्म सर्व,सवै जगत के कंत॥आदिसरस मध्यम विरस, अति नीरसहै अंत ॥ २२ ॥ आदि अंत मध्यहुँ सरस, नित्य नएई भोग ॥ तिन्हहिं भोग जो भूप तुम, बूझि बूझि मुनि लोग ॥२३॥ सुनि सुनि सुंदरि को वचन, भो- गनि जानि अशर्म ॥ आरंभे नरनाथ तव, नित्य नएई कर्म ॥२४॥ विवेक-तीरथन्हाए विविध नि, ऊपर वल आरण्य ।। अभय दान सो दान सब,दए नृपतिमणि धन्य॥२६॥ज्यों ए. जम्बूद्वीपके, ऋपि ऋपीश सब वित्र ॥ जीते देश विदेश नृप, नृपनायक रति क्षिन ॥२६॥ यज्ञ अशेष विशेप सो तजि भजि सुर सुरनाथ ॥ निज मंदिर आए तंवै, राजा .

विज्ञान गीता। (८५) उत्तम गाथ ।। २७ ।। दीन दुखित कायर कुमत्ति, सूम अ- नाथ अपार ॥ गुंग पंगु बहु मूढ़ जन, अंध लोग अविचार।। ॥ २८॥ देश नगर अरु ग्राम के, कहा पुरुप कह वाम ॥ मनभायो पायो सबै, कीने सबै अकाम ॥२९॥ मंत्री मित्र जु पुत्रजन, मुनिगण प्रथम बनाइ ॥ पीछे कीनो तिलक शिर, रानी सब सुखदाइ ॥३०॥ राजा-मनसा वाचा कर्मना, रानी मन अवदात ॥ जोई मांगे सुन्दरी, सोई देहैं वात ॥३१॥ रानी-जीत्यो जम्बूद्वीप सब, शव मित्र परिवार ॥ बुधि बल विक्रम साहसे, त्यों जीतो संसार ॥ ३२॥दै वर राजा चित्त में, कीनो यह विचार ॥ जो छाड़ों घर घरनि अब, तो जीतौं संसार ॥३३॥ सुन्दरी छन्द-सोइ रही जव सुंदरि जानी ॥ यामिनि में बहु जो मन मानी ॥ राज तज्यो सिगरी रजधानी ।। जा- इ महावन रैनि विहानी ॥ ३४॥ मंदरके तट पर्णकुटी करि ॥ तामहिं दण्ड कमण्डलु को धरि ॥ माल हिये मृग चर्म धरयो तन ॥दोइक तो फल फूल के भोजन ॥३५ ॥ दोहा-स्नान करत पहिले पहर, कुसुम गहत युग याम ॥ तीजे पूजत देवफल, मूलनि चौथे याम ॥ ३६॥ दोधक-जागि उठो जवही निशि रानीपीविनु सेज वि- लोकि डरानी ॥ प्रीतम की पनहीं जब देखी॥कोरिक यु- क्ति हिये महि लेखी ॥ ३७॥ मोकहँ छोड़ि गए नृप कान- - (८६) विज्ञान गीता। न ॥ ज्यों नलिनी तजि भौंर गजानन ॥ हों अब जाउँ जहाँ कहुँ भूपति ॥है पत्नी कहँ पीव सदा गति ॥ ३८ ॥ दोहा-पत्नी पति विनु दीन अति, पति पत्नी वि-: नुमन्द ॥ चन्दविना ज्यों यामिनी, ज्यों यामिनि विनुचंद ।। ॥३९॥ पत्नी पतिविनु तनु तजै, पितु पुत्रादिक काइ॥ केशव ज्यों जलमीन त्यों, पतिविनु पत्नी आइ ॥ ४० ॥ मनसा वाचा कर्मणा, पत्नी के पति देव ॥ अन्नदानतप सु- रनि की, पतिविनु निःफल सेव ॥४१॥राज काज जिनि- को लगें, बोले मंत्री मित्र ॥ तिनके शिर सुख पाइकै, शोचे राज चरित्र ॥४२॥ चंचरीक-जोगके विलाश नारि जाइ कै अकाश सो॥दे- खियो प्रकाश ईश ऐनचर्म वाससो॥मण्डियोदरीनिवासु आ- सुछाँडु सुंदरी॥ऐन नाभिलेपलाल ऐन की तुचाधरी ॥४३॥ दोहा-ईश कुमण्डल छाँडिकै, लयो कमंडलु आनि ॥ जगदंडनि के दंड तजि, दारु दंड लै पानि ॥४४॥ विवेक-नरदेवी नरदेव पै, देव पुत्र के रूप ॥ गई प्रगट तिहि निकट तक, अवलोकी पटभूप ॥४५॥ हरिगीताछंद-अति गौर गूढ़ अनंग के अंग अंग रूप तरंग ॥ मुकुतानके. उरहार लोचन श्वेत चारु सुरंग ॥ उ- पवीत उज्ज्वल श्वेत अम्बर वालवेप कुमार॥नरदेव आसन 'उठे अवलोकि देवकुमार ॥४६॥ ।

JAIN LIBRARY. विज्ञान गीता। (८७) दोहा-दीने आसन अर्थ नृप, कीने दीह प्रणाम ॥ वैठे दोऊ देव दुति, पूछि कुशल गुणग्राम ॥ ४७॥ प्रगटत पर- शुभ अपर शुभ, परशुराम से व्यक्त ॥ शोभित वेदव्यास से,सकल लोक व्यासक्त ॥४८॥ नाराच-शुकप्रकाश है हिये सुज्योतिरूप लीनहौ । वि- चित्रबुद्धिअत्रिहो त्रिलोक शोक हीन हौ । वशिष्ठ हौ कि निम्मि हौ कि आदिब्रह्म देवसो ॥ पराशरै पराश बुद्धि विज्ञ देव देवसो॥४९॥ चंचरी-गर्गहो निशर्गमाव सर्व अपमान हो ॥ अंगिरा गिरा थिरा गिरीशके प्रमान हो । कश्यपू कि वश्यक अदेव देव छंडियो ॥ जन्हु हो कि जन्हु भूवि शृज्य दुष्ट दण्डियो ॥५॥ गीतिका-यमदग्नि होकि शमनि उत्तम शुद्ध सन्तकमा- नियो । सिंधु सोपि लयो सवै कि अगस्त्यऐ मन मानियो। मुनि मारकण्ड विहीन हो मुनि मारकण्ड वखानिये ।। मतिश्रोत इंद्रिनि धोत गौतम केश मानकि मानिये ॥५१॥ दोहा-कैथों विश्वामित्र हो, संतत विश्वामित्र ॥ पूज्ये पू- जक तेभए, जिनिके अमित चरित्र ।। ६२ ।। यद्यपि चतु रानन महा, चतुरानन करि हीन ॥ सोहतवेदव्यास से, नाहिं न मायहि लीन ॥५३॥ कैहो ऋपि ऋपिराज तुम, देव अदेव कि सिद्ध।। हमसों प्रकट सुनाइयै, अपनोनाम प्रसिद्ध।॥५॥ देवपुत्र ॥ तोमर-सुनिशुधमानस अंश ॥ नरदेवदेव प्र- शंश ॥सुरलोकते मतिधीर ।। हम आइयो तवतीर ॥५५॥ Moholla Marotian ! h (८८) विज्ञान गीता। दोहा-महादेवको पुत्र हौं, .. मानसीक सुनुराज कौन काज आए कहो, काननमें मुनि साज॥५६॥ राजा ॥ रूपमालाछंद-जीति देश विदेश त्यों जग जी- ति बैशह काज ॥ हों शिष्यधुजनाममालवदेश को अधि- राज ॥ जीति हो जगु क्यों कहो गुरुके विना उपदेश ॥ प- वनाहिंन चक्षु भूपतिं ज्ञान को न प्रवेश ॥१७॥ दोहा-ज्ञान गुरू पै सीखियै, जब उपजै विज्ञानु तव अधिकारी होहुगे, भूपति जिय में जानु ॥५८॥ राजा ॥ तारकछंद-तुमहीं मुनि मित्र पितायुत मेरे॥ सिखवो उपदेश सबै हित केरे ॥ जिहिते सब ज्ञान प्रयोग नि जानो॥ अति श्रीपरमानंदको सुख मानो ॥ ५९॥ देवपुत्र ॥ दोहा-राजाएक कथा सुनो, सहसा कर्मवि- धान ॥ जाते सहसाकर्म सब, छाँड़ौबुद्धि निधान ॥६॥ तारक हुतो इक भूपके वारन नीकों ॥ अतिसुंदरशूर मनोहर जीको ॥ तेहि ऊपर एक महावत सोहै ॥ जनु मेघ चढ्यो मघवा मनु मोहै ॥६३ ॥ अधरात भए वनकी सु- धिआई ॥ गजराज गिरयो जव ग्रीव कँपाई॥६२॥ रूपमाला-छोड़ि जीवत ताहि खंभहि तोरि गौवन माँह ॥स्यो जंजीरनिसो इग्यो गिरिक गुहा गुरु माँह ॥ मुर- छाहि जागे उठिगयो गजपाल राजदुवार ॥ संग लै चतुरंग सेनहिं आइगोतिहिवार ॥ ६३॥ दोधकछंद-देखितिन्हें तरुके गणतोरे ॥ मारे मनुष्य विज्ञान गीता। (८९) धने घन घोरे ॥ जोर घटाइ गए नगरी लै ॥ राखियो दीरय खात दरीले ।। ६४ ॥ आवै न जाइ तहाँ जन कौनो। लाजत लैरह्यो खातके कोनो ॥६५॥ दोहा-सुख विलास सन्मान अति, तोई गए सुजान ।। भूपण भोजनहूँ मिटे, सवैराज सुखकाम ।। ६६ ॥ तारक-गजपाल सुतो गजको मनुजानै ॥ खंभनहीं नृपमोह वखाने । शंकर होइ न वास नजानो । भूपति चित्तअदृष्ट नआनो ॥६॥ नाहिने मोह समूल उखारयो। नाहिने शत्रु वड़ो मनु मारयो ॥ कानन माँझ सुवास न आए।कैसे अदृष्ट पै जात बचाये ॥६८॥ केशव कैसहु कर्म के लीने। देशहिं जाहु जो योग विहीने ॥ लोक करै उपहास तुम्हारे ॥ रोके रहैं न बड़े अरु बारे ॥६९॥ दोहा-ज्यों न होइ गज की कथा,सो कीजो नृपनाथ ॥ ज्ञान विना वन घोर है, जो लों लज्जा साथ ॥ ७० ॥ सुखही में दुख जीतिहो, घरही में वनमानि ॥ क्रम क्रम होउ उदास नृप, तब सेवो वन आनि ॥ ७१ ॥ सहसा कर्म न कीजई,स- हसा ज्ञान विज्ञान ॥ जब केवल हिंसा घटी, छाड़ि दये भव ध्यान ॥ ७२ ॥ ताते राजा छाड़ि हठ,जैये अपने धाम ॥ ज्ञान सीखि वन आइये, तब पूजे मन काम ॥७३॥ एक क- हों अज्ञान की, औरो कथा विचारि ॥ तव कीजो विज्ञान को, संग्रह मन तम जारि॥७॥एक हुतो धरणी धनिक सब सुख पूरणगेह।।छाँड़ि गयोवन गहवरनि,चिंतामणि संदेह७५ (९०) विज्ञान गीता। दोधक-संपति सुंदरि के सुख छाड़े ॥ जाइमहागिरि के पदमांड़े । देखि मनै मन मोह्यो महाई ॥ चिंतामणि मग में तिहिपाई ॥ ७६ ॥ दोहा-चिंतामणि को पाइ कै, छूवै नहीं जु हाथ ॥ अ- नजानत ताके मते, छोडिगयो नरनाथ ॥ ७७ ॥ कौनहुँ एक अभाग ते, चिंतामणि ते भागि ॥ पाई आगे काच मणि, सो लीनी पौलागि ॥ ७८॥ दोधक-ता मणि हेतु कछू न विचारयो॥ बालक ते व ढ़ियों धनडारयो॥निर्द्धन है करि वेंचन धायो ॥ पाईफ- जीहति वित्त न पायो॥ ७९ ॥ दोहा-तैसे परमानंद लगि, राज तज्यो सुखकंद ॥ व- ड़ी फजीहति होइ ज्यों, सुक्खुन परमानंद ॥ ८० ॥ ताते तुम गृह जाहु नृप, सीखहु गुरु सों ज्ञान ॥ पुनि तुम सर्वस त्यागकै, जीतो जगत प्रमान ॥ ८१ ॥ राजा-हों नमुरयो वा बालते, कबहुँ कौनहूं कर्म ॥अवहों कैसे मुरकिहों, राजपुत्र इहि धर्म ॥८२॥ राजाजी की शा- सना दान, प्रतिज्ञाभंग ॥ तोको करै मरै नहीं, श्वान सियार प्रसंग॥८३॥राजतज्यो सव वंधुजन, धनधरणीवर नारि॥ और जो सर्वस त्याग है, मोसों कहो विचारि ॥ ८४ ॥ देवपुत्र-जाको राजा संग है, ताको तजि अनुराग ॥ प- र्णकुटी खग मृगनि क्षिति, कैसो सर्वस त्याग ॥ ८५ ॥ यह राजा ताज गयो, पर्णकुटीतर खंड ॥ जाइ शिला तल विज्ञान गीता। (९१) पौढ़ियो, मनमें वोधु अखंड ॥ ८६॥ देवपुत्र तहँई गयो जहँ राजा मतिवन्त ॥ देखि देवपुत्रहिं भयो, उर आनंद अनंत ।। ८७॥ - राजा-पर्णकुंटी दै आदिमें, कीनो सर्वस त्याग ॥ छाँडो दंडकमंडलै, मृगज तुचा अनुराग ॥ ८८॥छांडि छयो ति- नहूँ तबै, महाराज मतिधीर ॥ देवपुत्र तहँई गयो, जहँ नृप धरे शरीर ॥ ८९॥ राजा-दण्ड कमंडलु मृगतुचा, एऊ तजे सुभाग ।। दुख सुख क्षुधा पिपाश छिन, कैसे सर्वस त्याग ॥९॥ विवेक-देवपुत्र तहँई गयो, जहँ नृप द्वंद्वज हीन ॥ यथा लाभ सन्तोप हो, सर्वस त्याग प्रचीन ॥ ९१ ॥ देवपुत्र-जाते इंद्रिय व्याकुला, तासों तजि अनुराग ॥ तव कहियो नरदेव माण, साँचो सर्वस त्याग ।। ९२ ॥ विवेक-जब लाग्यो देहे तजन, महाराज मतिधारि ॥ दे- वपुत्र तव वरजियो, बोल्यो वचन विचारि ॥ ९३ ॥ देवपुत्र-देहत्याग नहिं कीजई, कीजै चित्तहि त्याग ॥ चित्तत्यागते जानियो, सांचो देही त्याग ॥ ९४॥ राजा॥ दोषक-चित्त सरूप सु मोहिं सुनावो ।। क्यों तजिये वहई समुझावो॥ देवपुत्र-वासना चित्त सरूप है सांचो॥ ताको अहंपद वीरज वाचो ।। ९५॥

1 (९२) विज्ञान गीता। दोहा-चित्त अहंपदवीजको, कीजै पाश विनाशः॥ नृपवर तवहीं होइगो, सर्वस त्याग प्रकाशः॥ ९६॥ विवेक-इहि विधि सर्वश त्यागिके, भयो परमसं. पद लीन ॥ देवपुत्र उपदेश ते, सुनि प्रभु प्रगट प्रवीन ॥ ॥ ९७॥ तृष्णा कृष्णा पटपदी, भय भ्रमरनि मति मंडि । को जाने कित उड़ि गई, हृदय कमलको छडि ॥ ९८॥ राजश्री सुनि संपिनी, क्रोधादिक अहिं लीन ॥ आवत उर गरुडध्वजै, कब बैगई विलीन ॥ ९९ ॥ अमित अविद्या राक्षसी, प्रेत सहित पाखंड ॥ राम निरंजन ररत मुख, उद- रिगई सतखंड ॥१०॥ सुंदरी छंद-नैननि मीलनकै अपमोचन ॥जाइ मि- ल्यो अपने पद सों मन ॥ संतत निश्चल बैहि रह्यो तनु ॥ काढयउकीरि शिला तनुसों जनु ॥ १०१॥ सुंदरि ऐसिद- शा जब देखी। आपने भाग दशा मनलेखी ॥राज जगावन को मति कीनी ॥ सिंहनि नादनिसों मति भीनी ॥ १०२॥ कैसहुँ ध्यान विधान न छूटै ॥ अच्युत को रस अद्भुत लूटै ॥ देवज शामज शब्द सुनायो ॥ याक्रमहीं क्रमभूत- ल आयो॥१०॥देवतनूज तहीं ढिग देख्यो। मित्र मनो वच काय कै लेख्यो ॥ तेरे प्रसाद महाप्रभु पायो॥ मो जयके यश भूतल छायो॥१०४॥ और कछू अब जो उपदेशो॥ पूरण ज्ञान महा मन लेशोजानिये हों सुसबै अव जान्यो।

विज्ञान गीता। (९३) मोहि मिटी सबकी पहिचानो ।। १०५ ॥ आइ गए तवहीं सुरनायक ॥ संग लिये त्रिय को गणमायक ॥ सुंदरि ना- चति वीन वजावति ॥ पंचमके सुर उत्तम गावति ॥ १०६॥ हाव विभाव प्रभाव करै सव ॥ मोह विधान थकी कार के अब ॥ राजहि यों जग मोहन के रस ॥ क्योंकहि जात कहो तिन सों वस॥ १०७॥ इन्द्र उ०॥ साधु अगाधु चल्यो नृप नायक ।। देवपुरी अव है तुम लायक । भाँतिनि भाँतिनि भोग करो सब ।। देवपुरी अभिलाप करौ अब ॥ १०८ ॥ राजा।। देवपुरीको देवको, को भोगी को भोग ।। हम सों प्रगट सुनाइये, साधु असाधु जे लोग।।१०९॥ करि प्रणाम य- ह बात सुनि, इंद्र गए उठि धाम ।। रानी मनसुख पाइयो,स- फल भए मन काम।।११०॥देवज कोतनु छाँडिके, चूड़ाला धरिरूप॥गई प्रगट जहँ शोभिय, भूतल भूपणभूप।।१११॥ राजा ॥ दोधक-रानि विलोकि कहो नृपसांई।सुंदरियाँ किहि कारण आई। पूजि सबै तुव चित्त की इच्छा। और कछू अब देहिन शिच्छा ॥ ११२॥ रानी-जानु न देवजको वपु मेरो॥में प्रभु संग न छाड़िहौं तेरो ॥ मैं जुदई ढिठई तजि लाजा ॥ सोक्षमिवी विनती यह राजा॥ ११३॥ राजोवाच ॥ नाराच-उधारि नर्कते सुधारि दिव्यलोक ܕܢ . (९६) विज्ञान गीता। देवी-यह अपराध अगाध सव, महामोह को जानि॥ दोष कछू न विवेक को, काल वाल अनुमानि ॥ ८॥.. शान्ती-पियदेवीहि उराहनो, ऐसे थल जिनि देहु ॥ तून कछू जानति सखी, हों जानाति कै देहु ॥९॥ गीतिका-शील है कुलनारिको यह आपदा सहिलेइ ॥ काल काटै काल पै नहिं नेक काटन देइ ॥ हाव भाव विभाव करि कै वश्यकै पतिलेइ ॥ जाइयै सुप्रोध पुत्रहि नित्य आनंद देइ ॥ १०॥ दोहा-वेद सिद्धि हँसि उठि चली, शांती जननी साथ ॥ जहाँ विवेक विशेष मति, कहत जीव सों गाथ ॥११॥ शान्ती ॥ रूपमालाछंद-वेद सिद्धि करे प्रणामहिं ईश- नेकु निहाशिमातु है यह ज्ञानदा अव चित्त माह विचारि॥ देवि सों जननीनिशों दिन दीह अंतर मानि ॥ मातु बंधति मोह वंधन देवि काटति जानि ।। १२ ॥ केशव-मनहीं माँझ विवेक को, करै प्रणाम अशेप ॥ अवनत मुख बैठी अवनि,वेदसिद्धि शुभ वेप ॥ १३ ॥ जीव-माता कहिये दिवस वहु, कोने कहाँ. व्यतीत ॥ वेद ग्रहनि मठ शनि मुख, सुनि मुनि मानसमीत ॥१४॥ तत्त्व तुम्हारो तव तहाँ, काहु शम दवो मात ॥ नहि नहि द्राविड़ दक्षिणी, अक्षर स्वच्छवचात ॥१५॥ भुजंगप्रयात-धरें एनचर्मस्सदा देह सहि ॥ जहाँ अग्नि विज्ञान गीता। (९७) तीनो द्विजातीनि मोहैं ।। चहूँ ओर यज्ञ क्रिया सिद्धि धारी॥ चलेजात में वेद विद्या निहारी ।। १६॥ दोहा-मोसों बूझीवात तिनि, कौने हो तुमलीन ॥ मैं उनको उत्तर दयो, सुनियै नित्य नवीन ।। १७ ॥ सरस्वतीछंद-नारायणादिक सृष्टि है जिनते प्रसिद्ध प्रवीन ॥ निर्लेप निर्गुण ज्योति अद्भुत ताहि में मनदीन । दोधक-ज्योति निरीह निरंजन मानी ॥ तामहिं क्यों ऋपि इच्छ वखानी ।। क्यों तिहिते भव भेदहि जानो ।। ईश अकर्त्तहि जो जिय मानो ।। १८॥ विवेक । दोहा-यज्ञहु की विद्या भई, निपट कुतर्कनि लीन । होम धूम ते मलिन तनु, यद्यपि हुती प्रवीन ॥१९॥ रूपमालाछंद-ज्योति अद्भुत भावते भए विष्णु पूरक मानि ॥ मायाहि त्यों अवलोकियो जग भयो मायकु जा- नि ॥ जो कहों वह जानिये जड़ क्यों करै जग जोइ ।। पाइ चुम्बक तेजज्यों जड़ लोह चेतन होइ ॥२०॥ दोहा-ताते यज्ञनिकी सखी, जानो जगत प्रकाश ॥ जो फल दीजै ईश को, तौ तवहीं भव नाश ॥२१॥ यह सुनि तब हों उठि चली, ता यज्ञनि की सृष्टि ॥ एक देश तिथि परिगई, मीमांसा मम दृष्टि ॥२२॥ रूपमालाछंद-कर्तृ कर्म विभाव को अधिकार भोजन पाइ ।। देखि अंगन सों मिली उपदेश देति बनाइ ॥ मोहि (९८) विज्ञान गीता। पूछि उठी कहौ तुम कर्तृ कौन विचार ॥ मैं कह्यो उनसों वहै सब उत्तरनि को.सार ॥२३॥ दोहा-अन्ते वासिनि सुनतहीं, तन मन पायो मोद ॥ देखि परस्पर तव करचो, मेरो अति अनुमोद ॥२४॥ हीर-एक जीव अंध एक जगतसाखि कहतहैं ॥ एक काम सहित एक नित्यकाम रहित हैं ॥ एक कहत परम पुरुष एंड दान लीनहै। एक कहत संग रहित किया. कर्म हीनहै ॥२५॥ दोहा-विदामाँगि तवहीं चली, हों तिनते अकुलाइ ॥ देखी विद्यातर्क की, बहुत शिष्ययुत जाइ ॥ २६ ॥ रूपमाला-एक विश्व विशेष वस्तु विकल्पना जिय जा- नि । एकनाथ परायना अरु वाद वृद्ध वखानि ॥ एक थाप तु आपने परपच्छ दोष वितानि ॥ एक मायहि ईश सों क- हैं एक चित्त प्रमानि ॥२७॥ दोहा-तिनिमो बूझी देवि कहि, कौनहिं हो तुम लीन । यह सुनि मैं उत्तरदयो, उनको वहै प्रवीन ॥२८॥उन मो- सों उपहाससों, बात विचार कहीसु ॥ विश्वहोत परमानते निर्मितकारण ईशु ॥ २९॥ क्यों अविनाश अरूप सो, क- रिकै रूप प्रकार ॥ अविनाशी सो करत अब, युक्तायुक्त विचार ॥३०॥ विवेक-एक तकै विद्या सबै, यहौ न जानत मूढ़॥ मू-

विज्ञान गीता। (९९)
दो तौलौं शश्व सो, जौलौं सत्य न गूढ़ ॥३१॥ भ्रमही ते
जो शुक्ति में, होति रजतकी युक्ति ॥ केशव संभ्रम नाश ते
प्रगट शुक्ति की शुक्ति ॥ ३२॥ रजत जानि ज्यों शुक्ति
में, भ्रमते मनु अनुरक्त ।। भ्रम नाशे ते रजत हूँ, छीवत नहीं
। विरक्त ॥ ३३॥ अविकारी जगदीश है, भ्रमही ते सविकार।
। केशव कारी रजनि में, सूझत सर्प विकार ॥३४॥
रूपमालाछंद-निकलंक है सुनिरीह निर्गुण शान्त
ज्योति प्रकाश ॥ मानिहै मन मध्य ताकहँ क्यों विकार
विलाश ॥होति विष्णुपदी नम्लान कलिकल्मपादिक पाइ।।
राह छाह छुवै न श्यामल सूर क्यों कहिजाइ ॥३५ ॥
देव्यु ॥ दोहा-गहो गहो तब सवनि मिलि, मोसों क-
झो रिसाइ ॥ गई दण्डकारण्य हों, भाँतिनिते अकुलाइ ।
॥३६॥ लई राम रक्षा तवै, हों वचाइ मुनिसाखि ॥ कंठ
लगाइ लई लपकि, गीता के गृह राखि ॥ ३७ ॥
गीतो॥ अप्रमाण मन तुम करे, माता जे जग जन्तु ॥
नरक परहिं गे जन्म बहु, जिनको नाही अन्तु ॥३८॥ इहि
विधि हों अपनी कथा, कहाँ कहाँ लगि ईश ॥ तुम अंत-
मी सदा, जानत हौ जगदीश ॥ ३९ ॥ सुनि सुनि देवी
के वचन, उर आयो कछु ज्ञान ॥ प्रश्न करी तव ज्ञान की
जिहिं उपजे विज्ञान ॥४०॥

(१००) विज्ञान गीता। जीवउवाच-ज्ञान ज्ञान की भूमिका, हमहिं सुनाउ. सु- जान ॥ सुनत नशै अज्ञान सव, जाते वाढ़ेज्ञान ॥४१॥ देवउ ॥ जीव जुजाग्रत एक अरु, दूजो जाग्रत जानु ॥ महाजुजाग्रत तीसरी, जाग्रत स्वप्न बखानु ॥ ४२ ॥ स्वप्न पाँचई है समुझि, स्वप्नो जाग्रत पष्ट ॥ प्रभा सुषुप्ता सातई सुनो सदा मतिनिष्ट ॥४३॥ सात भाँतिको मोहं. यह मिले अनेक प्रकार ।। वाँधि महाप्रभु आनिये, सोहतुभाँति अपार ॥४४॥ सहित वासना गर्भ में, प्रथम मोह अज्ञान।। वीजे जागत युक्त यह, ताको नित्य वखान ॥ ४५ ॥ गर्भ थंभ वरु आपनो, कहि जानत मन मोह ॥ महा जाग्रत ज्ञान है, पूर्व वासना छोह ॥ ४६॥ सोहों जाको यह हों प्रभु ए सव दास ॥ महाजाग्रत मोह यह, वर्णतके- शवदास ॥४७॥ तन्मय कै कै करत है, मन अभिलापविला- श॥ जानो चौथो नाम यह, जाग्रत स्वप्न प्रकाश ॥४८॥ समुझाये समुझै हिये, भूलि जाइ पुनि चित्त ॥ स्वप्न जाग्रत मोह की, छठी भूमिका मित्त ॥४९॥ आया पर नहिं जानई, कहै और की और ॥ यहै सुषुप्ता सातई, मोह कहत शिर- मौर ॥५०॥ज्ञान ज्ञानकी भूमिका, मैं वरणी सविशेष ॥कहों ज्ञानकी भूमिका, सात सुनो शुभ वेप ॥५१॥ प्रथम शुभे- जानवी, पुनि सुविचार न आन ॥ तीजी है. तनुः , केशवराइ प्रमान ॥ १२ ॥ चौथी। सवै

विज्ञान गीता। (१०१)
अशंशक्ति को जानि ॥ छठी अर्थ आभावना, सप्त तुर्यको
मानि ॥५३॥ श्रवण मूढ़ जौ हौं रहों, बूझो शास्त्र सुसाधु।।
याहीसों सब कहत हैं, शुभइच्छातम वाधु ॥९॥ इच्छायुक्त
वैराग को, करै जु चित्त विचार ॥ सदाचारको वेदमत, यह
विचारनाचार ।।५५॥ अति विचार ते होति है, इंद्रिय क-
म विरक्त ॥ सूक्षम रूप हिये धरे, तन मानसा प्रसक्त ॥५६॥
सूक्षम रूप प्रकाशते, महा शुद्ध मन होत ॥ शुद्ध सत्व हिय
आवई, सत्वापत्ति उदोत ॥१७॥ केशव सत्वापत्ति ते, छू-
टि जात सव संग ।। झूठो जानै जगतको, आसंशक्ति भुअं-
ग॥५८॥ रमै आतमा राम मन, दुख सुख भूलहि चित्त॥
परइच्छा इच्छा करै, छठी भूमिका मित्त ॥५९ ॥ तुर्या-
वस्था सातई, जाते जीवनमुक्त ॥ ताते ऊपर होति है, अ-
ति विदेहता युक्त ॥६०॥ सुनि विदेह की युक्ति जग, राज्य
करयो प्रहलाद ॥ तैसे तुमहूं शुद्ध मन, राज्य करो
अविपाद ॥६॥
राजावीरसिंहोवाच-एक भूमिका दूसरी, तीजी आवै को-
इ॥ कालवश्य् भयो वीचहीं, ताकी का गति होइ ।। ६२ ।।
केशव ॥ रूपमाला-लोक लोक रमै विमान चढ्यो
बढ्यो बहुरंग ।। मेरु मंदर भूमिमें सुर सुंदरी बहु संग ॥
कर्म उत्पन्न व शुभ पंडितनिके गेह ॥ धर्म शास्त्र पढ़े स्टै
बहु ज्ञानही सह नेह ॥ ६३॥

(१०२) विज्ञान गीता। दोहा-केशव पूरण ज्ञान ते, परिपूरण विज्ञान ।। चिदा- नंदके रूपसों, जाइ लगो मतिमान ॥ ६४ ॥ इति श्रीचिदानंदमनायां विज्ञानगीतायां अज्ञान ज्ञान चतुर्दश भूमिका वर्णनं नाम सप्तदशःप्रभावः॥१७॥ दोहा-जीवउवाच-क्यों विदेह की रीति सों, राज्य करयो प्रहलाद ॥ देवी हमैं सुनाउ ज्यों, ज्ञान बट्टै अविपाद ॥१॥ देव्युवाच-हिरण्यकश्यपु हति प्रभु, जब भए अंतर्ध्या- न ॥ उपज्यो उर प्रहलाद को, शोक विलास प्रमान ॥२॥ प्रह्लाद उवाच-नमो नारायणाय यह, मंत्र वसो मम चि- त्त ॥ केशवदास अकाश ज्यों, सदा बसत सब चित्त ॥३॥ केशव अवहों विष्णु है, करों विष्णु की सेव ॥ विष्णु भये विनु विष्णुकी, सेवा निःफल देव ॥४॥ रूपमालाछंद-विष्णुदै पुनि विष्णु मूरति को हिये महँ आनि ॥ सर्व भावनि सर्वथा करि पूजियो हरिमानि ॥ राति घोस मनो मई हरि सेव सो रतिमंडि ॥ राज काजनि छाँ- डिकै अरु और ग्रंथनि छडि ॥५॥ देशके अरु ग्राम के शव लोग एक प्रकार ॥ विष्णु भक्त भए महाचित माहँ ही- न विकार ॥ देवलोक प्रसिद्ध केशव दै गई यह वात ॥ क्षी- रसागर को गए सब देवता अवदात ॥६॥ देव-दोधकछंद-हौ प्रभु देवनि के रखवारे॥ देव वि- . विज्ञान गीता। (१०३) दूपण मारनि हारे॥ होत जुदैयत भक्त तुम्हारे । देवनिपै तेइ जात न मारे ॥ ७ ॥ श्रीविष्णु-देव विपाद तजो जिय भारे ।। भक्त सदा प्र- हलाद हमारे । दैयत भक्त अभक्त सदाई । मोकहँ जानहु देव सहाई ॥८॥ श्री भगवंत जहाँ पगुधारे ॥ आप तहाँ प्रहलाद विचारे ॥ विष्णुहिं देखतहीं सुख पायो॥ पूरणकै बहुधा गुण गायो॥९॥ प्रहाद ॥ रूपमालाछंद-नाथ नाथ विनाथ नाथ अनाथ नाथ सुसिद्ध ॥ देव देव विदेव देव अदेव देव प्रसिद्ध ।। लो- कपालकपालहो सक्काल काल मुरारि ॥ देहु जू वर वि- श्वनायक चित्त वृत्ति विचारि ॥१०॥ दोहा-सुरकुल कमल दिनेश सुनि, दितिकुल कमल हि- , मेश ॥ देहु देहु नाइकु निरखि, चित्त वृत्ति लवलेश ॥११॥ दास चित्त चातकहि प्रभु, बोलि उठे धनश्याम ॥ माँगि सु- मति प्रहाद वरु, जासों तुमसों काम ॥ १२ ॥ प्रहादउवाच-सुनि सर्वग सर्वज्ञ निज, नित्य सत्य सु- वेस ॥ सवते नीको होइ कछु, सो दीजै उपदेश ॥ १३ ॥ श्रीविष्णु॥ परम भक्त प्रहाद सुनि, सरस विष्णुपद इट। परमानंद मय देखि पुनि, परमानंद की सृष्टि ॥१४॥ देव्यु-विष्णुहि होत अदृष्ट पुनि, तवहीं श्रीप्रसाद ।। पद्मासन सों वैठिकै, कार विचार अवदात ॥ १५॥ 4

(१०१) विज्ञान गीता।
प्रह्लादउ०-जाहि विश्व में हों नहीं, अरु ब्रह्मा परयन्त ॥
सवमेंहै सब वाहिरो, होतिहि रूप अनन्त ॥ १६॥
दोधक-चंचल जौनप्रमान जुदेखो॥रूपन आफ्नोरूप-
कलेखो॥शब्द न गंध न है रस नीको ॥ हेरतु वारस लागतः
फीको ॥ १७॥ निर्ममशब्द सवै तन शोभै ॥ भूलिहुँ इंद्रिय
लोभ न लोभै ॥ बाहर भीतर व्यापक जोहै ॥ एक निरीह
निरंजन सोहै ॥१८॥ मोमहिहै जुहों जामें रहोंजू ॥ आपुहि
आपने काम लहोंजू ॥ दूसरे और न जाकहँ बूझों ॥ एक
चिदानंद रूप अरूझों॥ १९॥
दोहा-चिदानंद संभोगमय, एक रूप अति शुद्ध ॥ अ-
खिल दृष्टि ऊपर लसै, मेरी दृष्टि प्रवुद्ध ॥२०॥
दंडक-जाको नाहीं आदि अंत अमित अवाधि युत अ-
कल अरूप अज चित्तमें अतुर है।अमर अजर अज अद्भुत
अवर्ण अग अच्युत अनामय सुरसना ररतु है ॥ अमल
अनंग अति अक्षर असंग अरु अस्तुत अदृष्ट देखिवेको प-
रसतुहै ॥ विधि हरि हर वेद कहत जोसि सोसि केशोराइ ता
कहँ प्रणामहि करतुहै ॥ २१ ॥
दोहा-महामोह अहिराजसों, कोप कंचुकनि गात ॥
आवतहीं गरुडध्वज, जान्यो नहीं विलात ॥ २२ ॥ निपट
अहंकृत पक्षिणी, मम उर पिंजर छाँड़ि ॥कोजाने कित उड़ि
ई, तृष्णा राजनि खाँड़ि ॥२३॥

विज्ञान गीता। (१०५) देव्युवाच ॥ दोहा-यहि विधि श्री प्रहलाद सब, केशव चित्त विचारि ॥ चिन्तत रूप समाधि वित, रहे शरीर विसारि ॥ २४ ॥ रूपमाला-गिरिशृंगसे प्रभु चित्त कारक चित्रियो जनु चित्र ॥ तहँ वर्प पंच सहस्र वीति गए सुनो भखमित्र॥ दोहा-भयो तवै पातालमें, महाराज कुलदेव ॥ भयो विष्णुके चित्तमें, कछू सोचको लेश ॥२५॥ श्रीविष्णु ॥ तोटकछंद-प्रभुको प्रहलादहिलीन भए । दिति सून सवै इहि पंथ रए । निर्वेद भये दिवि देवनिको॥ अस्तभयो शशि सूरजको ॥२६॥ विनु सूरज क्यों भुव- लोक लसें ॥ भुवलोकनसे सब लोक नसें। हम एक इहाँ के- हि भाँति बसें । अध अरधहूं जलजाल ग्रसें ॥२७॥ दोहा-हमको देवी शासना, सुनियतहै इतिरीति ॥ रक्षहु जग आकल्पलों, दुष्ट अनेकनि जीति ॥ २८ ॥ देव्युउ० ॥ रूपमाला-चित्त मध्य विचारियो हरि सर्व देव समेत ॥ पक्षिराज चढ़े गए प्रहलाद भक्त निकेत॥चौंर ढारत सिंधुजा जय शब्द बोलत सिद्ध ॥ नारदादिक विप्र मान अशेप भाव प्रसिद्ध ॥२९॥ श्रीविष्णुउ० ॥ दोहा-परमभक्त प्रहलाद तुम, संतत जीवनमुक्त ॥ देह त्याग यह काल सुनि, तुमको नाही युक्त ॥३०॥राजदयो आशिप यो, नारायण सविशेष। सुरज (१०६) विज्ञान गीता। शशि जौं लगि रहैं, तौलौंराज अशेप ॥३१॥ राज्य करयो प्रहाद यों, अहंकार को छाँड़ि ॥ त्यों तुमहूं या लोक में, राज्य करो अरि खांडि ॥३२॥ वीरसिंह-लीन परमपदसों हुती, पूरण दृष्टि विशुद्ध ॥ फिरि तव हाँतें बूझिये, कैसे होहिं विरुद्ध ॥३३॥ केशव ॥ शुद्ध वासना रहति है, इहई वात प्रमान ॥ निज आतम सम सव लखत, नीचर ऊंच महान ॥३४॥ वाते. जीवनमुक्त सम, फिरत जगत सानंद ॥चाहे तज्यो शरीर को तवहिं तजै नृपचंद ॥३५॥ इति श्रीविज्ञानगीतायां प्रह्लाद चरित्र वर्णनं नाम अष्टदशम्प्रभावः ॥ १८ ॥ - .. . दोहा-उनईसमें वर्णिवो, वलि को अतिविज्ञान ॥ ब्रह्म भक्त हरि भक्त को, कहिवो सबै विधान ॥१॥ज्यों साध्यो वलि आपुही, त्यों साधो विज्ञान ॥ कहियै माता करि कृपा वलि विज्ञान विधान ॥२॥ देव्यु०॥ सुंदरीछन्द-पुत्र विरोचनके बलि दानव ॥ वंदत ताहि सुरासुर मानव ॥ ख्यालहिं लोक विलोक लये सब ॥ एकहि छत्र त्रिलोक छए तव ॥३॥ भक्तिके वश्य करे हरि श्री हरु ।। दैयतु भूतल स्वा अ- : तीनिहुँ लोकनि ॥दैयतवास JAIN LIBRARY. विज्ञान गीता। (१०७) दोहा-वरपै दशकोटिक करयो, भलो राज्य बलिराज ॥ धर्म चल्यो चौहूँ चरण, तिहूँ लोक सुखराज ॥५॥ रूपमालाछन्द-रत्न शृंग सुमेरु के पर बैठिकै इक काल ॥ बुद्धि वृद्धि भई हिये महँ भाँति भाँति विशाल ॥ बलि राज ॥ भोग मैं बहु भोगए, तिहुँ लोक को करिसाज ॥ तृप्ति होति न चित्त में यह कौनु है सुखसाज ॥६॥ दंडक-चलिक विमान दिशि दिशिजसु मढ़ि मढ़ि बढ़ि बढ़ियुद्ध जुरि बैरी बहु मारे हैं। केशोदास भूपण विधान परि- धान गान भामिनी सहित तिहुँ लोकनि विहारे हैं । जल दल फल फूल मूल पटरस युत व्यंजन अनेक अन्न खाइके विगारे हैं ॥ तदपि न भागी भूख चित्त न विशुद्ध होत सकल सुगंध दुरगंध कैकैडारे हैं ॥७॥ देव्यु०॥ दोहा-यह विचारि गुरु पै गये, कीने विविध प्रणाम । वात आपने चित्त की, कहन लगे गुणग्राम ॥८॥ बलिराजो०॥ तारक-सुनियै चितदै यह बात महागुरु ॥ सब दूरि करे सुरलोकनिके सुर ॥ अब मो मत लीने चले हर श्रीहरि ॥ विधि वश्यकरे बहु यज्ञनि को करि ॥ ९ ॥ भय भागि हरी निदरयो सुरनायक ॥ और है जीतिवे को कोइ लाइक ॥ कहियै सुकृपा करि ताहि करों वश ॥ अति सोधकरों जगती अपने यश ॥१०॥ शुक्र है इक देश विशाल महामति ॥ सब देशनि ऊ-

(१०८) विज्ञान गीता।
पर देश महाअति॥ सूरज सोमको अस्त उदोतु न॥ नित्य
प्रकाश निशानिशहोतु न ॥ ११॥ है न तहाँ सरिता गिरि
कूप न ॥ भूमि अकाशन सिंधु सरूपन ॥ काम न क्रोध न
लोभ न मोह न ॥ वंधन पाप अपाप प्रवोध न ।। १२॥
दोहा-राजा है ता देशको, सब समान सर्वज्ञ ॥ अजित.
अनन्त अमेय है, जानत नाहिं न अज्ञ ॥ १३॥ ताके मंत्री
एक है, कर्त्तम कर्तुं समर्थ ॥ प्रगट अन्यथा करन अरु,
जानत अर्थ अनर्थ ॥१४॥
बलिराजोवाच-नाम कहा ता देशको, मंत्री को कहि
आसु ॥ कौन धाम वा राजको, मोते अजित प्रकासु ॥१६॥
शुक्र ॥ रूपमाला-आनंदमय वह देश है तिलोक को
अतिइष्ट ॥ राजा तहाँ द्विवल पूरण सर्व भाइ निदिष्टं ॥ मंत्री
प्रभाव प्रसिद्ध है इहि नाम अद्भुत भेष ॥ कर्तार पालक
विश्ववालक युक्ति शक्ति अशेष ॥ १६॥ शासना जिनकी
भ. शशि सूर वासर राति ॥ शेपनाग सदा रहैं धरणीधरें
इक भाँति ॥ मेड़ छाँड़ि सकें न सिंधु वहै निरंतर वायु ॥
छैसकै काल न वीच प्राणनि क्षीणता विनु आयु ॥ १७॥
सवैया केशवदास अकाशमें शब्द अकाशन शब्द प्रका
शु न जानतु ॥ तेज वसे तरु खण्डनि में तरु खंडनि ते-
जनि को पहिचानतु ॥ रूप विराजत चित्रनि में परि चित्र-
न रूप चरित्र बखानतु ॥ त्यों सब जीवनि मध्य प्रभाव
२ न जीव प्रभाव न मानतु ॥१८॥

विज्ञान गीता। (१०९) दोहा-जाकी सत्ता ते लगतु, साँचो सो संसार ॥ जैवै को तादेव नृप, कीजै चित्त विचार ॥ १९ ॥ वलिराजो-जौं दई प्रभुता सबै प्रभु द्वै कृपालु सुभाउ ॥ माहिं देहु वताइ सो थल वेगिदै जिहि जाउ ॥ कौन भाँति सु- जीतिये प्रभु दीजिये समुझाय ।। मंत्र यंत्र तपादिते तेहि माहँ चित्तलगाय ॥२०॥ शुक्राादोहा-ब्रह्म भक्ति हरिभक्ति प्रभु,कैसे होहिं प्रसन्न । सोईमति उपदेशिए, मन क्रम वचन प्रसन्न ॥ २१॥ ब्रह्म भक्ति कीने नृपति, उपजि परे हरिभक्ति ॥ ताते पहिलेही तुम्हैं, हों सिखऊँ द्विजभक्ति ॥२२॥ दोधक-विप्रनि की सव सीख सुनो जू ॥ ब्राह्मण ब्रह्म समान गुनो जू॥ देहु सबै इक दुःख न दीजे ॥ आशिपसो चरणोदक लीजे ॥२३ ॥ छाँड़ि अहंकृत विप्रनि पूजो ॥ भूतलमें एइ देव न दूजो ॥ काम सबै तेहि पूजन पूजें ॥ ब्राह्मण पावहु पूजन दूजें ॥२४॥ रूपमाला-निग्रहानुग्रह जो करे अरु देइ आशिपगारि॥ सो सवै शिरमानि लीजै सर्वथा मनुहारि ॥ जानि उत्तमवि- ष्णुजू भृगु को धरयो उर तात ॥ सर्वभाव अजेयता तिन पाइयो यह वात ॥२६॥ पंगु ब्राह्मण गुंग अंध अनाथ राज कि रंक ॥अज्ञ होहि कि विज्ञ भेद न मानिये करिशंक। पू- स . (११०) विज्ञान गीता। जियै मन वचन कर्मनि प्रेम पुण्यप्रमान॥ सावधान है सेंइए सब विप्र ब्रह्मसमान ॥२६॥ दोहा-कहै भागवत मै असम, गीता कहै समान ॥ अपमान कौनहिं करौं,कौनहिं करों प्रमान ॥२७॥ शुक्र दोहा-दोऊ वचन प्रमाण हैं, अपनो विषयनि पाइ॥ इह जानोहरि भक्ति पर, समुझोसुख सुखदाइ॥२८॥ गायत्री संयुक्त हैं,सबै विप्र हरि भक्त ॥ वेद पुराणनि में कहे,चारोवि- प्र अभक्त ॥२९॥ तिन्हें छाँड़ि संपूजिये, वामन ब्रह्म सरूप। कवहूं भेद न मानिय, विप्र होत युगरूप ॥ ३०॥ श्रुति स्मृति शास्त्रनि सुनि समुझि,कर्म करै प्रतिकूल ॥ हरि पद विमुख जो विप्रहैं, नरकनि को अनुकूल ॥३१॥ पति संगा अपवित्र नृप, तिनिहूं को हित हेरि ॥ स्मृतिश्रुति शास्त्रनि करत हैं, ताकी निन्दा टेरि॥३२॥चारिकर्म युत विप्र कुल, जो कैसोई होइ॥सवही को गुरु सर्वदा,सबते पावन सोइ३३॥ वलिराजो॥चारि कर्म ते कौन है, तिन ते होत अंभक्त ॥ हम सों कहि समुझाइयै, जिय में वै अनुरक्त ॥३४॥ शुक्र-हरि को हिय जानै नहीं, द्विजकर्मनि अनुरक्त ॥ जनक जननि कहँ देतदुख, माठा पत्य अभक्त ॥३॥ इ- नको तूर न छाड़िय, कीजै द्विज आशक्ति ॥ त्रिविध पाप मिटि जाहिं उर, उपजि परे हरिभक्ति ॥ ३६॥ अकल अ विद्या रहित है, श्रद्धायुत हरिभक्त ॥ साधो नवधा अंग , तजि सवसों आशक्त ॥३७॥नव रस मिश्रित साधि नृप .

विज्ञान गीता। (१११)
नवधा भक्ति प्रमानु । दानव मानव देवगण, भक्त क-
मल हरिभानु ॥ ३८ ॥ जीतहुँ अद्भुत श्रवण सों, सुमि-
रण करुणा जानि ॥ सहित युगुप्सा दासता, पाद भजन
भय मानि ॥३९॥ वंदन वीर शृंगार सों, अर्चन सख्यसहास।।
रौद्र कीर्तन सम सहित, आत्मनिवेद प्रकाश ॥ १० ॥
रूपमालाछन्द-दीन स्मर दीन वत्सल नाम नाम निदा-
न ॥ कर्म अद्भुत भाव सों सुनि नित्य वेद पुरान ॥ छाँड़ि
मानज मानसो उपमा न कीजै दास ॥ पाद सेवहु ब्रह्म
को तजि सर्व भावनि त्रास ॥४१॥
दोहा-कीरति पठि नीरस कहै, रुद्र रूप मनु जीति ॥
मन जीते उर उपजि है, परब्रह्म सों प्रीति ॥४२॥
रूपमालाछन्द-काम क्रोधहि जीति के मद लोभ मोह
निवारि ॥ मित्र ज्यों हँसि मग्न आनंद अचि साजि
शृंगारि ॥ रूप संवर संदि सों बहु आपुयो अनयास ॥
पाइ पूरण रूपको रमि भूमि केशवदास ॥४३॥
देव्यु०॥ दोहा-शुक्राचारज के कहे, वलि साधी सव
रीति॥ शुद्ध भयो मन सर्वथा, बढ़ी ब्रह्म सों प्रीति ॥४४॥
तैसे तुमहूँ छाँड़ि भ्रम, होउ ब्रह्म सों लीन ॥ पावहु परमा-
नंद ज्यों, संतत नित्य नवीन ॥ ४५ ॥
इति श्रीचिदानंदमनायां विज्ञानगीतायां वलिचरित्र
वर्णनंनाम एकोनविंशतितम प्रभावः॥ १९॥

( ११२) विज्ञान गीता। दोहा-सृष्टि वीज के वीज को, ताके वीजहि, जानि ॥ ॥ जीवउ०॥कौन वीज तावीजको, ताकोवीज वखानि॥१॥ देव्यु-युक्त शुभाशुभ अंकुरनि, बीज सृष्टि को देहु ॥ भावाभाव सदानिमें, सुख दुखदा इह. गेहु ॥२॥ चंचरी-वीज देह को विदेह चित्त वृत्तिः जानिए । जाहि मध्य स्वप्न तुल्य सम्भ्रमादि मानिए ॥ दोइ वीज चि- तके सुचित्त है सुनो अवै ॥ एक प्राणस्पन्द है द्वितीय भावना सबै ॥३॥ रूपमालाछंद-चंद सूरहि चंद कै मग सुष्मनागतदी- श॥ प्राणरोधन को करै जेहि हेत सर्व ऋपीश ॥ चित्त शोधन प्राण रोधन चित्त शुद्ध उदोत ॥ व्याधि आदि जरे जरा युत जन्म मरण न होत ॥४॥ पादाकुल-यद्यपि तीरथ नीरनिसेवहु ॥ सकल शास्त्र मय देवनि देवहु ॥ यद्यपि चित्त प्रबोधन वोधिय ॥ तद्यपि चित्त निरोधन रोधिय ॥६॥ यद्यपि ज्ञान वियोगधरा व- ढ्यो॥ तवहूँ सोदर साथ सदा बढयो॥ यद्यपि जर्जद शेप वखानिय ॥ तवहूं चित्त सुमित्त न मानिय॥६॥. दोहा-दोइ वीज हैं चित्त के, ताके वीजनि जानि । सो संवेद बखानिये, केशवराइ प्रमानि ॥ ७ ॥ वीजु सदा संवेद को, संविद वीज विधान ॥ संविज अरु संघात को छाँड़त हैं मतिमान ॥ ८॥ संविंद को वितु बीज है, ताके म

विज्ञान गोता। (११३)
सत्ता होइ ।। केशव राइ वसानिय, सो सत्ता विधि दोइ ॥
॥९॥ एक सुनाना रूप है, एक रूप है एक ॥ एक रूप
संतत भजो, तजियै रूप अनेक ॥ १०॥ एक काल सत्ता
कहै, विमति चित्त को ताहि एक वस्तु सत्ता कहै, चित सत्ता
चित चाहि ॥ ११॥ ताको वीजु न जानिये, जाकी सत्ता
साधु ॥ हेतु जु है सब हेतु को, ताही को आराधु ॥ १२॥
सुंदरीछंद-संगुवै अर्थ अनर्थ बढ़ावत ॥ संगुवे वस्तु.
विचार पढ़ावत ।। संगुवे भुक्त लताकहँ वारण । ताते करौं
प्रभु संगु निवारण ॥ १३॥
जीवउ०॥ दोहा-संशय तृणचपदाहिकै, देवि सुनो सु-
खदाइ॥ संग कहावतु है कहा, कहि माता समुझाइ ॥१४॥
दोधकछंद-एक सुराज सुसंगु कहावै ॥ एक संग. इह.
देह कहावै ॥ और बासना संग तजो जू ॥ जीवनमुक्तः
प्रभाव भयो जू ॥१५॥
दोहा-नशे वासना गंधको, संग सबै नशि जातं ॥
निशा नशे नशि जात ज्यों, निशिचरको संघात॥ १६॥
जीव-महामोह तम चंदके, तिनकी संगति ज्योतिः ॥
ता देही को देहकी, कहो कौन गति होति ॥१७॥
देव्युवाच-संगनशैजिहि भाँति ज्यों उपजै पाप अपाप॥
तिनि सों लिप्ति न होहिं ते, ज्यों उपलनि को आपः॥१८॥

(११४) विज्ञान गीता। वीरसिंह-वेद कहै शिव सो सदा, सव.विधि जीवनमुक्त॥ कहि केशव कैसे भयो, ब्रह्म दोष संयुक्त ॥ १९॥ केशव-अकस्मात जो अशुभ शुभ, उपजि परे. कहुँ आनि ॥ तो वह लिप्त न होइ जो, शिव कीनो यह जानि२०॥ वीरसिंह-महाप्रलय करतार को, कैसे बंधन होइ ॥ हम सों कहि समुझाइये, कहिय दोष क्यों होइ ॥२१॥ केशव ॥ रूपमालाछंद-ईशकोजगदीशको यह शासना सब काल । मारि आशु अधर्म को करिधर्म कोप्रतिपाल। पाप को तिहि हेत ते तिनि करयो आशु विनाश ॥धर्म को जग मध्य में सुनि कीन पुंज प्रकाश ॥२२॥ दोहा-दुहूं भाँति की शासना, मनोभाव भयमानि ॥ जौ न मानिये सर्वथा, प्रभु को देहु वखानि ॥ २३ ॥ प्रभु को कह्यो करै न यह, अधिकारीनि अधर्म ॥ताले राखे लो- क में, लोकाधिप को धर्म ॥२४॥ देव जुरायो ईशको, रूप. सुताहि प्रकाशातहीते संसार को, लैहै.आशु विनाश २६॥ जैसे देवनि देवमणि, करत यदपि जगदीश ॥ तैसे अपने रूप को, जतन करो तुम ईश ॥२६॥ जीवउ०-जो हरि भक्ति वियोग की, कैसे साधत साधु।। कैसो तिनको रूप है, कहियै देवि अगाधु ॥२७॥ देव्यु ॥ रूपमालाछंद-एक जीव प्रवृत्त एक निवृत्त जा- सुजान ॥ सर्व सों अपवर्ग सों रत होत हेत वखान ॥ हैं -- । विज्ञान गीता। (११५) कहाँ अपवर्ग केशव नित्य संशृति लोक ॥ स्वर्ग भोगनि भोगवै जगते निवृत्ति विलोक ॥ २८ ॥ स्वर्ग नर्कनि जात आवत को फजीहति होइ॥ आइये जिहि लोक ते नहिं जीव चारै कोइ॥ आगिले मरिहैं मरत अब पाछिले परतच्छ ॥ मेटिये मरिवो वखानु निवृत्ति ये मतिअच्छ ॥२९॥ दोहा-क्यों तजिये कुल राग अरु, क्यौं तजिये संसार॥ या विचार ते होति, है, प्रथम भूमिका चार ॥३०॥ रूपमालाछंद-लोभ दंभ मदादि मान विमोह क्रोध वि- हीन ॥ वेद भेद विचार धारण ध्यान कर्महि लीन ॥ वस्तु सिद्ध प्रसिद्ध साधन साधिवे कहँयुक्त ॥ भूमिका यह दूसरी जब होइ जी अनुरक्त ॥३१॥ त्रिभंगीछन्द-निर्देवहु वारनि करि निरनि वस्तु वि- चारनि संसारनि ॥ फल फूल अहारी.विपिन विहारी तजि विविचारी मतिवारनि । तजि दुख सुख साथनि नाथ अना- थनि गुण गण साथनि श्रीनाथनि ॥ भ्रम भार अमीतीन मोह वितीतनि इंद्रिय जीतनि दिन बीतनि ॥३२॥ दोहा-पाइ तीसरी भूमिका, केशव होत प्रबुद्ध ॥असंसं- भदै भाँति के, मो पै सुनि मति शुद्ध ॥३३॥ एक होइ साधारणे, दूजो संशृति जानि ॥ तिनके रूप -प्रकार अब, तुम सों कहो वखानि ॥३४॥ रूपमालाछंद-भोगता करता न हों अब वाघ वाधक (११६) विज्ञान गीता। होन ॥ व्याधि आधि वियोग योगः अभोग भोगनि कोन-॥ संपदा विपदा सबै सुख दुःख आवत जातः॥ एक पूरव कर्म ते भ्रमिये न कौनहुँ जात ॥३५॥ दोहा-इहसाधारण जानिबो, असंसंगु इत्यादिः ॥ कहों दूसरो चित्त दै, सुनिये देव अनादि ॥३६॥ चारि चहूं भीतर जजो, अधऊरधन दिशानि ॥ नाही अर्थ अनर्थ में, ना जड़ अजड़नि मानि ॥३७॥ जाकी प्रभा प्रकाशिये, अस्ति अ- नंत असाधु ।। सवते न्यारो सर्वदा, असंसंगु सो साधु ॥३८॥ विजय-चित्त सुनाल के अग्रलसे बहु कंठव कर वि- लास विलासे ॥कारण कोमल पल्लव केशव दास संतोष सु: वासनि वासे । भूत असंग की तीसरि भूमि मिले.अलि अ- द्भुत संशृतिनासे ॥ भूप विवेक हिए.सरसी महँ मित्र विचार प्रकाश. प्रकाशे ॥३९॥ दोहा-प्रथम भूमिका अंकुरै, दूजी होत प्रकाश ।। फले तीसरीभूमिका, फल अद्भुत अविनाश॥४०॥भासतुहै अद्वि- तीय उर, दैतनुसे अकुलाइ ॥ लोक विलोके स्वप्नवत, भूमि.. चतुर्थीपाइ. ॥४१॥ तृतिया जाग्रत सम लसै, चौथी स्वप्न समान ॥ जानि सुषुप्तक पाचई, भूमि विभागः प्रमान॥४२॥ छूटि जातहै आपुते, ग्रंथि सुसब अनयासः ॥ 'जीवन मुक्त दशालसै, छठी भूमि भ्रम नास ॥४३॥ सुवद सप्तमी भूमिका, निश्चल चित्त विलास ॥ चित्रदीपकी ज्योति तय विज्ञान गीता। (११७) पूरण परम प्रकास ॥४४॥ अंतर वाहिर हीनहै, पूरण वाहिर अंत ।। जल थल घट आकाश ज्यों, पूरण पूरणवन्त ॥४५॥ पाइ सप्तमी भूमिका, भक्ति नहोत विदेह ॥ देवरूप स्वच्छंद जग, रहत विपिन अरु गेह ॥ ४६॥ जीव-हमको देवीकरि कृपा, कहो देवको नाम ॥ जि- नको करि उच्चार मुनि, पल पल करत प्रणाम ॥४७॥ देव्यु ॥ भुजंगप्रयात-कहैं एक तासों शिव शून्यएकै ॥ कहैं काल एकै महाविष्णु एकै ॥ कहैं अर्थ एकै परब्रह्म जानो प्रभा पूर्ण एकै सदा शून्य मानो॥४८॥ दोहा-एक आतमा कहतहैं, एक कहैं चित भक्त ॥ इहि विधि नाना नाम जग, लसत सबै अनुरक्त ॥४९॥ अमित अमेय अरूपके, ऐसेहैं सबनाम ॥ मुनि भक्तनिहे गहि लए महाराज गुणग्राम ।। ५०॥ भक्ति योगकी भूमिका,इहिविधि साधन साधुमहोत्त पार संसारके, यदपि अनंत अगाधु॥५१॥ सवैया-पाइ पदारथ कुंभ निरै दिवि सुंडि विधा वरुनी जनिऐजू ॥ कर्म अकर्म दियो बन जीभ पियास क्षुधा भवमें भनिएजू ॥ लोक विभेदति वासना वासु दरी मनु दीरघमें गनिऐजू । इच्छगजी मदमत्त वनी तनमें शर धीरजसों हनिएजू ॥५२॥ दोहा-जीवन इच्छहि छुरित मन, आवत कब जवदीन। इच्छा तजि जे चलतहैं,परम इच्छ परवीन ।। ५३॥ तजे न (११८) विज्ञान गीता करियो कर्म को,जब-लगिजगत प्रकाश॥ द्वै जैहै जवएकता सहजै कर्म विनाश ॥५४॥ इति श्रीचिदानंदमनायां विज्ञानगीतायां योगसप्त भूमिका वर्णनं नाम विंशतितम प्रभावः॥२०॥ -- दोहा-एकवीशमें वर्णिवो, महामोह परिहार । उत्तर मनुको सृष्टिको, राम नाम निस्तार ॥१॥ अहंकार द्वै भाँति. है, ताहि तजों केहि भाव ॥ कहो देव तुम करि कृपा, उपजै ज्ञान प्रभाव ॥२॥ देवऊ-तीनि भाँति त्रैलोक्य में, अहंकारके भेव ॥ द्वैशुभ संतत समुझिये, अशुभ तीसरो देव ॥३॥ रूपमाला-हों अरूप अमेय हों जड़ चेतनादिहु अंत ।। शोभिए जग मध्य हों जगु मोहिं मांझ लसंत ॥ भोगता करता न हों अब टोहिये सु उपाउ ॥ हों भयो जिहिते सुहों कि रहौं कि देहु कि जाउँ ॥ ४ ॥ अथ अशुभ ॥ देश ग्राम पुरीन को पति बड़ो है सुनरे- श॥ पुत्र मित्र कलत्र को प्रभु हों भलो शुभ वेश ॥ सूर हों सर्वज्ञ हों बलवान हों धनवान ॥ मोहिं पूजहु मो वि- ना जग और को भगवान ॥५॥ दोहा-आदि अहंकृत दै भले, परमानन्द निकेत ॥ हार जो तीसरो, सोई बंधन हेत॥६॥ सात्विक राजस ܐܢ

विज्ञान गीता। (११९)
तामसै, एकहोत गति धीर ॥ तजिय राजस तामसै, स-
तगुण भजिये वीर ॥७॥ सब मेरोई रूप है, सब को हों
हितवन्त ॥ अहंकार कासों करों, तजि पूरण भगवन्त ॥
॥ ८॥ जहों अहं मम जीतिहो, अखिल लोकमणिमित्र ॥
धूम धोर हरिसे तहीं, देखो अमित चरित्र ॥९॥ सकललोक
ए वसत हैं, अहंकार आधार ॥ ताहि नशतहीं नशतज्यों,
पटु प्रवोध भ्रमभार ।। १०॥
तारक-कवहूं यह सृष्टि महाशिव ते सुनि ।। कबहूँ विधि
ते कवहूँ हरिते गुनि ॥ कवहूँ विधि होत सरोरुह के मग ॥
कवहूँ जल अंबर ते कहिये जग ॥ ११ ॥ कबहूँ धरणी
पल में मय पाहन।कवहूँ जल मय मृण मै अरु कंचन॥१२॥
हरते विधि हैं कवहूँ विधिते हर ॥ हरते हरि जू कबहूँ
हरि ते हर ॥१३॥
दोहा-करियै करता मारियै, कवहूँ मारनिहार ॥ कबहूँ
पालक पालिये, विना नियम संसार ॥१४॥ पालक संहारक
रखन, भक्षक भक्ष अपार ॥ सवहींको सब जानिये, विना नि-
यम संसार ॥ १५॥ पालक संहारक रचक, भक्षक रक्ष अ-
पार ॥ सवही सबको होतहै, को जाने के वार ॥१६॥वड़ी
फजीहति जगतकी, भाँति अनेक अरूप ॥ एक रूप तवते
जुहै,अच्युत रूप अनूप ॥ १७॥

(१२०) विज्ञान गीता।
नृपवीरसिंह-ऐसोई जो जीवहै, अज़ निरीह निर्लेप ॥
कोजग वद्ध अवद्ध है, कीजै भ्रम विच्छेप ॥ १८॥
केशव-जगको कारण एक मन, मनको जीत अजीत ।।
मनको मन सुनि शत्रुहै, मनहींको मन मीत ॥१९॥ मनको
रूप अरूपहै, जैसोहै आकाश॥बढ़त बढ़ाए बुद्धि के, घटत
घटाए आस ॥२०॥मनकी दीन्हीं गांठि प्रभु, मनहीं पैछुर
आउ ॥ ज्यों मल मलहीं धोइए, विषही विष सु उपाउ॥२१॥
वीरसिंह-संतत जीव चिदंश जग, पाप पुण्यके भोग ।।
कहो कौन को होत है, ज्यों समुझैं सब लोग॥२२॥
केशव-जोई करै सुभोगवै, यह समुझो नृपनाथ ॥
स्वर्ग नर्क बंधन मुकुत, मानो मनकी गाथ ॥ २३॥
वीरसिंह-अंग भंग है देह को, पीड़ित देखिय देह ॥
मनको कैसे मानिये, मेटो यह संदेह ॥२४॥
केशव मिश्र-जिनि जिनि अंगनि सों मिलै, करत शुभा
शुभ चेतु ॥ भोग करत तिनहीं मिल्यो, सह संगति को हेतु
॥ २५॥ हरे हरे मनु ऐचि के, कीजै मन को हाथ ॥ इंद्रिय
सर्प समान हैं, गारुड़ मन के साथ ॥२६॥
सवैया-फूलत हो मुख देखि न भूलहु लाभु यहै भली
बात सिखावो ।। जौं ललकै अपमारग को मनु तौ दुखदै
सत्मारग लावो । मूढ़न साथ परे फिरि हाथ न आई है
नार्थन माथ नशावो । नो कुल को अवलोकि कै केशव
। वालन ज्यों मन क्यों न पठावो ॥२७॥

विज्ञान गोता। (१२१) दोहा-कौन तजै मन संग जो, कौन संग मन होइ। सदा जीव उन संग है, जग परिपूरण सोइ ॥२८॥ रूपमालाछन्द-जीव सों चिद्रूप सों, इतनो सुअंतर जानि ॥ विष्णु सों अरु जीव सों तितनो महामति मानि ॥ जीव सों मनसों तितो मनु सों विकल्पनि जानि ॥ संकल्पसों अरु सृष्टि सों तितनो विशेप वखानि ॥२९॥ दोहा-क्रम क्रम सब को छाँड़िय, ममता प्रभु मति युक्त ॥ अहंकार परिहार कै, हजै जीवनमुक्त ॥३०॥ जीवउ०-हम सों कहि समझाइये, जीवनमुक्त विदेह ।। जाहि सुने ते होइगो, शुद्ध भाव इहि देह ॥३१॥ देव्यु ॥ जीवनमुक्त लक्षण ॥ सवैया-लोक करै सुख दुःखनि कै जिनि राग विरागनि या महँ आने ॥ डारै उपारि समूल अहंतर कंचन कांचन जो पहिचाने॥ वा- लक ज्यों भवै भूतल में भव आपुनसे जड़ जंगम जाने ॥ केशव वेद पुराण प्रमाण तिन्हें सबजीवनमुक्त वखाने ॥३२॥ विदेह लक्षण ॥ सवैया-देखतहूँ अनदेखतहूँ लिपि रूपक सेन सरूप को धावै ॥ आपु अनिच्छ चले परइच्छ को केशवदास सदापति पावै॥कर्म अकमनि लीन नहीं निज पायज ज्योंजल अंकलगावै ॥ अतिमत्त चिदानंद मध्यनि लोग सदेह विदेह कहावै ॥३३॥ हरिगीती-जीवन मुक्त विदेह के सुनि सकल लक्षण जानि- (१२२) विज्ञान गीता। ये॥छाँड़ि जंगत मिथ्या सकल महात्यागी मानिये। लोभ मोह मद काम क्रोध की कामना उपजै डरौ'लोक अलोक विलोकत जे सव साधना समेत गुरेरो।सुनिये कछू अरु देखिये वाणी वस्तु वखानिये ॥छाड़े जु मानि मिथ्या जगत महा- त्यागी मानिये ॥ ३४॥ केशव ॥दोहा-यह सुनि सब झूठोलग्यो, दयों परमपद वित्त ॥ उपजी विद्या बोधमय, भूलि गयो सुतमित्त ॥३५॥ नाराच-नशी कुबुद्धि राति निन्द कल्पना समेतहीं। विमोह अंधकार गो पतालके निकेतहीं। विभाति ज्ञान नि- त्यके विनोद लोभहे भयो । प्रवोधको उदै विलोक ज्योति- वन्त ढगयो ॥३६॥ दंडक-जैसे भट साजि सैन हाथलै हथ्यार रण भारे भारे अरिंगण जीति जीते मनको । मारतंडमंडलको भेदत अ- खंड मति भूलि जात पुत्र मित्र सब देवगनको ॥ तैसे सत संग श्रद्धा विवेक वैराग बुद्धि छाड़िके धरेई वेद सिद्धि सो साधनको ॥ केशोदास हरिकी भगतिके प्रसाद भयो जीवन मुकुत मिलि आतमाके जनको ॥३७॥ दोहा-जैसे वंधन हेत तन, क्षेत्र छुरिनिसे मारि ॥ बंधन काटे वंदि के, छूटे भगति विसारि ॥ ३८ ॥ तौलों तम राजै तमी, जौलौं नहिं रजनीश ॥ केशव ऊगे तरणिके, तमु तमीन तमीश ॥३९॥ ऐसोझै जग में रहै, सबसों वैर

विज्ञान गीता। (१२३)
नं नेह ॥ छाँड्यो चाहै जगत को, तवहीं छाड़े देह॥४०॥
यहि विधि सों हरिभक्ति करि, साधु होत सब भक्त ॥ सवै
ब्रह्मचारी गृही, दान प्रशस्त विरक्त ।।११।।
वीरसिंह-ऐसी है है जव दशा, तब तौ आति बड़भाग।
कौन भाँति वनवास विन, घरहीं हरिसों राग ॥४२॥
केशव।सवैया-निशि वासर वस्तु विचारहि के मुख सांचु
हिये करुणा धनु है । अब निग्रह संग्रह धर्म कथानि परि-
ग्रह साधुनिको गनुहै ॥ कहि केशव भीतर योगजगै अति
वाहिर भोगनिसों तनुहै ॥ मन हाथ सदा जिनके तिनके
वनहीं घरहै घरही वनुहै॥४३॥
..वीरसिंह ॥ दोहा-कठिन रीति यहऊ कही, घरहीं माँझ
विरक्तिहमसनि पर ज्यों होइ त्यों, कहियै श्रीहरिभक्ति४४॥
केशवमिश्र । चंचरी-आदि देव पूजि पुंज रामनाम
लीजई ॥ न्हान दान धर्म कर्म छम छाँड़ि कीजई।सत्य बो-
लियै सदा विपत्ति संपदानि सो ॥ राज राज वीरसिंह चित्त
शुद्ध होइ सो ।। ४५ ॥
वीरसिंह॥दोहा-राम नाम को तत्त्वसव,हम सों कहो अ-
शेप ॥ चित्त हमारो सुनतही, शुद्ध होत सविशेप ॥ ४६॥
केशवमिश्र-ऋपि वशिष्ठ सों विनय कै, बृझेहु हे मुनि
मग ॥ राम नाम महिमा सुनहु, वीरसिंह शत्रुघ्न ॥४७॥

(१२४) विज्ञान गीता। शत्रुघ्नउवाच-कहो वशिष्टकुल इष्ट मति, राम नामको भेद ॥ जाहि सुने ते जाइगो, सबै चित्त को खेद ॥४८॥ वशिष्ठ उवाच-जब वेद पुराण नसैहैं। जप तीरथ मध्य- वसैहैं। सो उपदेश जुमारि किवारे। तब कलि केवल नाम: उधारे ॥१९॥ दोहा-मरणकाल कोऊ कहै, पापी सों भयभीत ॥ सुख- ही हरिपुर जाइगो, गावै सव जग गीत ॥५०॥ राम नाम के तत्त्व को, जानत को न प्रभाउ ॥ गंगाधरके धरनिधर वाल्मीकि मुनिराउ ॥११॥ केशवमिश्र-वीरसिंह नृपसिंहमणि,मैं वरणी हरिभक्ति.॥ जाहि सुने सहसा सुमति, है हैं पापविरक्ति ॥५२॥ जीत्यो मोह विवेक ज्यों, पाइ बोध को भेव ॥ त्यौंतुम जीतौ शत्रु सब, राजवीरसिंहदेव ॥५३॥ भुजंगप्रयात-लहै संपदा आपदा को नसावे ॥ सदापुत्र पौत्रादिकी वृद्धि पावै ॥ पट्टै वुद्धि वैराग्यकारी अभीता ॥ सुनावै सुनै नित्य विज्ञानगीता ॥५४॥ दोहा-सुनि सुनि केशव राइ सों, रीझि कह्यो नृपनाथ ॥ मॉगि मनोरथचित्त के, कीजै सबै सनाथ ॥ ५५ ॥ केशवमिश्र-वृत्ति दई पुरुखानि की, देऊवालनिआसु।। आपनो जानि कै, गंगा तट देउ वासु॥५६॥ वृत्ति दई विज्ञान गीता। (१२५) पदवी दई, दूरि करो दुख त्रास ॥ जाइ करोसकलत्र श्रीगंगा तट वस बास॥१७॥ इति श्रीमिश्रेकशवदासविरचितायां चिदानंदमनायां विज्ञानगीतायां एकविंशःप्रभावः ॥२१॥ दोहा॥अंक व्योम वसु भू वरप, पौष पक्ष उजियार ॥ तिथि त्रयोदशी पूर्ण भा, शुभ गीता बुधवार ॥१॥ विदित देशकारूपमें, छत्रधारि अवनीश ॥ लेखत भयो वसंतऋतु आयसु लय निज शीश ॥२॥ इति विज्ञान गीता समाप्ता॥ १मलद पुस्तक मिलनेका ठिकाना. खेमराज श्रीकृष्णदास * श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-मुम्बई. BAI.IN जाहिरात। याज्ञवल्क्यस्मृति पद योजना मिताक्षराभापाटीका। उक्तधर्मशास्त्र सम्बन्धी ग्रंथ महर्षि याज्ञवल्क्यजीने न्यायधर्म पूर्वक संसारकी मर्यादा स्थितीके हेतु तीनकाण्डोंमें रचनाकिया है. आचाराध्यायमें समस्त आचारविचारों की परिपाटी और जाति प्रबन्ध और उनका धर्म, व्यवहायध्यायमें समस्त व्यवहारोंकीव्यवस्था तथा दीवानी फौजदारी मुकद्दमोंका नीत्यनुसार दण्डादण्ड निर्णय और प्रायश्चित्ताध्यायमें ब्रह्महत्यादि प्रायश्चित्तोके निवारणार्थ विधि वर्णनकी है, इन्ही प्रमाणिक ग्रंथोंके आशयसे ताजीरात तथा सब प्रचलित ऐक्ट निर्मित होकर राजशासनमें परमलाभ दे रहे हैं और अब भी कचहरियोंमें उक्त ग्रंथ प्रमाणिक माना जाताहै, किन्तु यह ग्रन्थं केवल संस्कृतहीमें होनेके कारण सर्व साधारणको लाभ नहीं पहुँचासकताथा इसके गूढाशय तथा न्याय रीतिको ही लोग समझते थे कि जिन्होंने संस्कृतमें भलीभांति अभ्यास किया है. अतएव हमने उपरोक्त अभावको दूर करने निमित्त इस ग्रन्थकी टीका सरलहिन्दुस्थानी भाषामें पं०मिहिरचन्दजी (जोकि धर्मशास्त्रके अखण्डज्ञाताहैं) के द्वारा बनवाकर सुन्दर टैपके नवीन अक्षरों में छापकर प्रकाशित कियाहै टीकाकार महाशयने टीका भी ऐसी सरलकी है कि जिसको बहुतही थोड़ा पढ़ाहुआ मनुष्य भलीभांति समझकर न्यायानुसार कामकर सकताहै-और जो महाशय संस्कृताभ्यासीहैं उनको भी इस ग्रन्थकी टीका बहुतलाभ पहुंचा सकतीहै कारण कि प्रत्येक श्लोकका प्रथम पदच्छेद किया गयाहै तत्पश्चात् उनपदोंकी योजना कीगई है. उसके पीछे तात्पर्य और उसका भावार्थ लिखा गयाहै, जिससे कठिनसे कठिन श्लोक और गूढ़सेगूढ़ अभिप्रायका आशय दर्पणवत् झलक उठाहै गूढाशयोंके प्रगट करनेके निमित्त टिप्पणी भी कीगई है विशेषतः यहहै कि टीकाकारने तात्पर्य्यार्थमें अन्यान्य स्मृतियोंके उदाहरणों से श्लोकार्थ पुष्ट कियाहै जिससे अन्य ग्रंथके देखनेकी आवश्यकता नहीं रहती, उक्त न्यायधर्मोपयोगी पुस्तक समस्त राजा महाराजाओं तथा सेठ साहूकारों और सब गृहस्थाको अवश्य अपने पास रखनी चाहिये, प्रायः शासत्ताधिकारी महाराजाओंको तो अवश्यही अपने कर्मचारियोंकेपास रखना योग्य है, इससे न्यायधर्मपूर्वक राज्य अतुल कीर्तिको प्राप्त होगा, यद्यपि ऊपरके अलँकागेके मिश्रित करनेसे ग्रंथ बृहत् होगयाहै तिसपर भी मूल्य जाहिरात। केवल ६ छः रु. रक्खागयाहै, उत्तम जिल्दबंधी है, आशा है कि सज्जन पुरुष शीघ्र उक्त ग्रंथके गुण ग्रहण करके मेरे परिश्रमको सफल करेंगे। श्रीमदोस्वामितुलसीदासकृत सटीक रामायण श्रीयुतपं० ज्वालाप्रसादकृतसंजीवनीटीका ॥ लीजये महाशय! कविशिरोमणि तुलसीदासजीकी अपूर्व कविताका अक्षरार्थ भाषामृत भी लीजिये, सम्पूर्ण क्षेपकोसहित और श्रुतिस्मृतिपुराणोंके अद्भुत दृष्टांतों सहित जिसमें सम्पूर्ण शंका समाधानका विवरण है, तुलसीदासजीका समग्र जीवनचरित्र, माहात्म्य, चतुर्दश वर्ष वनवासका तिथिपत्र और अष्टम रामाश्वमेध लवकुशकाण्ड भी अक्षरार्थ सहित सम्मिलितहै, गूढार्थ, अक्षा- 'हिणीकी संख्या, प्रश्नावली, भजनमाला, प्रभाती आदिके सिवाय परम मनोहर फोटोग्राफके विचित्र चित्र भी हैं, सूर्यवंशका वृक्ष और हनुमानजीकी चित्रित प्रतिमाहै इन सबके सिवाय कठिन २ शब्दोंका बड़ा कोश भी लगाया गयाहे. ऐसी रामायण आजपर्यन्त अन्यत्र कहीं नहीं छपी देखतेही तन मन प्रसन्नहोगा मूल्य ८० है जिल्द चित्रित सुनहरी परम मनोहर है। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण. संस्कृत मूल और भापाटीका सहित खुलापत्रा ॥ कविफुलतिलक आदिकवि महर्षि वाल्मीकिकृत गमायण समग्र ग्रंथ माहात्म्य और अनुक्रमणिका टिप्पणी शंका समाधानसहित परमपुष्ट मोटे और चिकने कागजपर सुवाच्य मनोहर अक्षरोंमें छपकर विक्रयार्थ प्रस्तुत है-हिन्दोस्थानमें आजपर्यंत इसका ऐसा भाषानुवाद नहीं हुआथा इसकी टीका अत्युत्तम परम सुगम और ललित मनरंजन शब्दोंमें विद्वद्वर शिरोमणि श्रीयुत पं० ज्वालाप्रसाद मिश्रजीने अत्यन्तही सत्तम की है पद पदका अर्थ दर्पणवत् झलकायादे सकल गुणआगरी नागरीकी पूरी लालित्यता सर्वांगरूपसे दरशायी है यह बालसे वृद्धतकको परमोपयोगी है कथा पांचनेवाले विद्वानो को इससे बहुतही लाभ प्राप्त होवेगा केवल अक्षरमात्रका बोध होनेसेही सज्जनलन इस रामायणका पारायण सइनमें कर सकेंगे और कथा बाँचकर धन यश लक्ष्मीके भागी होंगे ऐसासुंदर मनोहर रमणीक ग्रंथहोनेपर भी सबके सुगमार्थ आश्विन शुदी १श्नक .

जाहिरात। मूल्य २० रु. ही रक्खा गया है डाक महसूल ३ रु० कुल २३ रु० भेन देनेपर समग्र ग्रंथ उनके मकानपर पहुँच जायगा पश्चात् मूल्य अधिक होगा ग्रन्थकी अद्भुत छवि और आन्तरिक विद्वता देखकर ग्राइकगण परम प्रसन्न होंगे ॥ ग्रंथ संख्या अ०९०००० होगी. रामरसायन। लीजिये पाउक! यह परमप्यारी रसिकबिहारीजीकी अलौकिक काव्यरचना का बहुतही सुदर ग्रंथ लीजिये. देखिये समग्र ग्रंथ परमरोचक दोहा, चौपाई, सोरठा इत्यादि छंदोंमें वर्णित है और सम्पूर्ण, ग्रंथ राम कथासे. विभूषित है रामकथामृताभिलाषियोंको तो अत्यन्तही सौख्यप्रद है रामजन्म, राम विवाह, वन गमन,सीताहरण रामरावण संग्राम, रामराज्य, रामाश्वमेध, वैकुंठ गमन इत्यादि कथायें अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णित. मूल्य डाकव्ययसहित ४ रु०. मनुस्मृति.. पंकेशवप्रसादमोफेसर आगरा कालेज कृत भाषाटीका सहित। इस उत्तम ग्रंथका सान्वयभाषा' अत्युत्तम हुआई यह पुस्तक हिंदूमात्रको परमोपयोगी है, राजा महाराजा भी इसके अनुसार धर्म पूर्वक शासन करते हैं यह ग्रंथ देखनेहीके योग्य भाषा अत्यन्त सुगम और रसीलीहै. कीमत २॥ रु. और रफ कागजकी २ रु. पुस्तक मिलनेका टिकानाः खेमराज श्रीकृष्णदास श्रीवेङ्कटेश्वर छापाखाना-मुम्बई. A

Vigyan Gita

Author
Khemeaj Shri Kirshna
Title
Vigyan Gita
File name
Vigyan Gita
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/01
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546350
Barcode
4990010024834.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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