Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Shri Pakshik Sutra, Shrman Sutradi Sangrah
Front matter
Regd No 117505:
5
Liege No 127505
4
است ۔
f
why
w
ww
am
3001
-
> RE
were
1
1
1: Ao Note Book
R
श्री पाक्षिकसूत्र-श्रमणसूत्रादि संग्रह
(संस्कृतानुवाद सहित गुजराती भाषान्तर
--
गुरुणीजी श्रीगुलाबश्रीजीनी शिष्या साध्वीजी श्रीलाभश्रीजीना उपदेशशी असे
श्री भावनगर श्राविका समुदायनी आर्थिक सहायथी
छपावी प्रसिद्ध करनार,
विरमागणारसिमासमान
श्रीजैनधर्मप्रसारक सभा-भावनगर. तारा
श्री आनंद प्रिन्टींग प्रेसमा शा. गुलाबचंद लल्लुभाइए छाप्यु.
वीर सवत २४४६
विक्रम संवत १९७६
प्रस्तावना. सर्व कोइ विद्वान साधुवर्गना जाणवामांज छे के प्रथम अने चरम तीर्थकरना तीर्थना साधुओनो जे दश प्रकारनो आचेलक्यादिक कल्प गणधरादिके कहेलो छे ते नियमित रीते ज आचरवानो छ, परंतु बावीश तीर्थकरना साधुओनी जेम अनियमित नथी. तेथी करीने ज वर्तमान तीर्थना मुनिओ स्थितकल्पिक कहेवाय छे. जो के आ आचलक्यादिक सर्वे कल्यो सामान्य रीते कहीए तो त्रीजा औषधनी जेवाज छ, तो पण प्रतिक्रमणनो कल्प विशेपे करीने त्रीजा औषध जेवो छ, अने तेथी करीने छल्ला तीर्थकरना शासनमां गणधर महाराजाओए अनगारधर्मर्नु वर्णन करती वखते सप्रतिक्रमणो धर्मः " "प्रतिक्रमण सहित ज धर्म छ" एम स्पष्ट रीते कहेलुं छे. तेमज जेत्रो प्रतिक्रमण करता नथी अथवा जेओने प्रतिक्रमण करवानी रुचि नथी तेवा श्रमणाभासो श्रीमान् वीरस्वामीना शासननी बहारज छे एम पण स्पष्ट कहेलुं छे. केटलाएक तत्व जाण्याविना न कहे के के-" अतिक्रमण तो प्रमत्त साधुओने माटे जले, अप्रमत्तने माटे नथी." तेमणे एटलुं तो समजबुज जोइए के अप्रमत्त भाव तो मात्र सूक्ष्म अंतर्मुहूर्त सुधीज रहे छे, ते काइ निरंतर रहेतो नथी. बाकीनो सर्व काळ प्रमत्तभाव ज होय छे, तेथी सर्व कोइने प्रतिक्रमण कर उचित छे. कारण के सर्व आव- श्यको आत्मानी शुद्धि करनारां कयां छे. आ प्रतिक्रमण पांच प्रकारनां कयां छे.
दैवसिक १, रात्रिक २, पाक्षिक ३, चातुर्मासिक ४, अने सांवत्सरिक ५, तेमां जिनशासनने अनुसरनारा सर्व साधु- ओ सर्व सावद्ययोगथी निवृत्त थयेला होय छे, तेथी करीने तेमनी मन, वचन अने कायानी वृत्तिो अत्यंत विशुद्ध तो पण अनाभोग अने प्रमाद विगेरेने लीधे निषिद्ध कार्य करवाथी तथा कर्तव्य कार्य नहीं करवाथी मूल- गुण अने उत्तरगुणमा जे काइ बादर के सूक्ष्म अतिचार उत्पन्न थाय तेनी शुद्धिने माटे हमेशां दिवसने छेडे अने रात्रिने छेडे ( सांज सवार ) साधु श्रावकादि प्रतिक्रमण करे छे. तेमां दिवसने छेडे जे अतिक्रमण करवामां आवे छे तेने दैवसिक अने रात्रिने छेडे जे करवामां आवे छे तेने रात्रिक प्रतिक्रमण कहेवामां आवे छे. ते उपरांत पक्षने अंते, चातुर्मासने अंते अने संवत्सर (वर्ष) ने अंते जे विशेष विस्तारथी प्रतिक्रमण करवामां आवे छे ते अनुक्रमे पाक्षिक, चातुर्मासिक अने सांवत्सरिक प्रतिक्रमण कहेवाय छे. अहीं कोइने शंका थाय के-हमेशां देवसिक अने रात्रिक प्रतिक्रमण करवाथी ज दिवस तथा रात्रिमा थयेला अतिचारोनी शुद्धि थया न करे छे तो पछी पाक्षिक विगेरे प्रतिक्रमणो करवानी शी जरुर छ ? तेनो जवाब ए के जे-जेम कोइ माणस तेल, आंवळा अने जळ विगेरे वडे शरीरने दररोज शुद्ध करे छे तो पण पर्व दिवसे तेने विशेष शोभाववा माटे धूप, सुगंधि विलेपन, श्रेष्ट वस्त्र अने किंमती अलंकार विगेरे धारण करे छ, ते ज प्रमाणे मुनिओ विगेरे पण हमेशां प्रतिक्रमण करवा वडे चारित्र रूपी शरीरने शुद्ध करे छे तो पण विशेष शुद्धिने माटे पाक्षिकादिकने विषे विशेष प्रतिक्रमण करवा वडे उत्तरीकरण करे छे. कयुं छे के- "जह गेहं पइदिवसं-पि सोहियं तहवि पक्खसंधीसु ॥ सोहिजइ सविसेसं, एवं इहयं पि नायव्वं ॥१॥ " "जेम घरने हमेशां संमार्जन विगेरे वडे शुद्ध करवामां आवे छे तो पण पखवाडीए तेने विशेषे करीने साफ कराय छे, तेम अहीं पाक्षिकादिक प्रतिक्रमण माटे पण जाणवू. वळी हमेशना प्रतिक्रमणमां कदाच अनाभोगादिके करीने सूक्ष्म अथवा बादर अतिचार विसरी जवायो होय, अथवा स्मरणमां आव्या छतां पण भय, लजादिकने लीधे गुरुनी समक्ष तेनुं अतिक्रमण कर्यु न होय, अथवा कर्या छतां पण मंद परिणामने लीधे तेनुं सम्यक् प्रकारे प्रतिक्रमण थयुं न होय, आवा कारणथी साधुओ पाक्षिकादिकमां ते ते आतिचारोनुं स्मरण करी अधिक संवेगने पामी तेनुं सम्यक् प्रतिक्रमण करे छे अथवा तो कदाच अतिचार न लाग्यो होय तो पण पाक्षिकादिकमां त्रीजा वैद्यना औषधनी जेम विशेष प्रतिक्रमण करईं योग्य छे. त्रण प्रकारना औषध आ प्रमाणे-" क्षितिप्रतिष्ठित नगरमा जितशत्रु राजा हतो. तेने सेंकडो मनोरथोवडे अने घणा प्रकारनी मानताओवडे धारिणी नामनी पट्टराणीथी एक पुत्र थयो, ते कुमार राजाने प्राण करतां पण वधारे प्रिय हतो. तेथी "पा मारा पुत्रने भविष्यमां कदाच काइक रोग थशे, माटे ते नहीं थवा देवा सारु' आगळथी ज तेनो उपाय करा, के जेथी रोगनो संभव ज न थाय." एम धारी राजाए वैद्याने बोलावी कह्यु के-"मारा पुत्रने एवी दवा करो के जेथी कदापि रोगनो संभव ज न थाय." तेओए कह्यु बहु सारु. ए प्रमाणे करशुं." राजाए पूछयुं-" त्यारे तमे कहो के तमारी पासे केवी केवी औपधनी क्रिया छ ?" त्यारे एक वैद्य बोल्यो के-" मारी पासे एवं औषध छे के जो कांड पण रोग होय तो तेनो तत्काळ नाश करे छे; परंतु रोग विना जो खावामां आवे तो ते नवो रोग उत्पन्न करे छे. " वीजा RS M वैये कहूं के "मारं औषध आपवाथी रोग होय तो तेनो नाश करे छे, अने रोग न होय तो कांइ पण दोष के गुण करतुं नथी." पछी त्रीजाए कह्यु के-"मारु औपध वापरवाथी जो तने रोग होय तो ते नष्ट करे छे अने रोग न होय तो तेना शरी- रना बळ, वीर्य, रूप अने यौवन विगेरेने वृद्धि पमाडे छे तथा आवता रोगने अटकावे छे." ते सांभळी राजाए त्रीजा वैद्यनुं औपध कर्यु." एज रीते श्रा प्रतिक्रमण पण जो अतिचारादिक दोष होय तो तेनी शुद्धि करे छे, अने जो दोप न होय तो चारित्र रूपी शरीरने अत्यंत शुद्ध-उज्वळ करे छे. आ उपरथी ए सिद्ध थयुं के अतिचार हो अथवा न हो तो पण पाक्षिकादिक प्रतिक्रमण अवश्य करवा योग्य छे. पाक्षिक विगेरे सर्व प्रतिक्रमणनां सूत्रो प्राये जिनेश्वरभाषित होवाथी गणधरोए ज रचेला छे, एम ते सूत्रोनी भाषा उपरथी स्पष्ट जणाइ आवे छे. कारण के गणधररचित आगमोने विषे जेवी भाषा अने वेनी शैली के तेवीज आ सूत्रोनी पण छे. आ पाक्षिक सूत्रमा प्रथम त्रण गाथाओ मंगळने माटे करेली छे. तेमां पण वीजी गाथामां "इमं गुणरयण- सायर० विगेरे शब्दो वडे आ पांच महाव्रतादिक गुणो रूपी रत्नोना समुद्रने आराधी जेओ संसारने तरी गया छे तेओने मंगळ रूप करी हुं पण आराधना करवा सन्मुख थयो छु" एम कही पांच महाव्रतादिकनी आराधना रूप अभि- धेय पण बताव्युं छे, अने त्रीजी गाथामां नव पदनुं मंगळ कयु छे. छेवट चोथी गाथामां पांच महाव्रतनी उच्चारणा करवा माटे सावधान थवानुं कर्तुं छे. पछी सूत्रनो आरंभ करतां प्रथम महाव्रतनी उच्चारणा ते शुं? एम शिष्यनो प्रश्न लइ तेना जवाबमां " महाव्रतनी उच्चारणा पांच प्रकारनी छे अने रात्रिभोजनविरमण व्रतने साथे गणतां छ प्रकारनी " ३ ॥ छे. एम कही ते छए व्रतोनां नाम मात्र आप्यां छे. त्यारपछी प्राणातिपातविरमण नामना पहेला महाव्रतनुं स्वरूप कहेवू शरु कय छे. प्राणातिपात (जीवहिंसा) ना द्रव्यादिक चार भेदो व्याख्या सहित बतान्या छे. पछी केवळीए कहेला चारित्रधर्मने बावीश विशेषणो आपी आवो धर्म पाम्या पहेला अज्ञानादिक चार कारणो वडे अने धर्म पाम्या पछी अग्यार कारणो बडे जे प्राणातिपात त्रिविध निविधे थयो होय तेनी निंदा गर्दा करी अतीत, वर्तमान अने अना- गत ए त्रण काळ आश्री अनुक्रमे निंदा, संवर अने प्रत्याख्यान कहुं छे, एटले के अतीत काळे जे काइ पाप कर्यु होय तेनी निंदा ज थइ शके छे, वर्तमान काळे पाप करवानो संयोग आवे ते वखत ते करतां अटकी जर्बु ए रीते तेनो संवर थइ शके छे, अने अनागत काळे एटले हवे पछी हुँ पाप नहीं करूं एबुं प्रत्याख्यान थइ शके छे. त्यारपछी अनागत प्रत्याख्यानने अरिहंतादिक पांचनी साक्षीए स्वीकार करवानुं कयुं छे. आ रीते पञ्चख्खाण करवाथी साधु सर्वकाळे, सर्व स्थाने अने सर्व अवस्थाए निरंतर संयमीज होय छे एम बताची छेवट प्राणातिपातविरमण व्रतनी स्तुति करी छे तेमां आ व्रत लेवाथी पोताने तथा पर जीवोने केटलो गुण थाय छे ? ते बताची छेवट पोताने ए व्रत मोक्ष आपनार थाय छे एम कडं छे. श्रा व्रत आराधबाथी आत्माने थता गुणो अने विराधयाथी थता दोषो जे जे बतावेला छे ते सामान्य विचार करतां पण सर्व मध्यस्थ जनोनुं चित्त अवश्य स्वीकार करे ए वात स्पष्ट जणाइ आवे छे. अंते गुरुनी आज्ञाथी व्रतनो स्वीकार करवानुं कहेल छे. एटले के सर्व कार्यमां गुरुनी आज्ञा ज मुख्य छे अने तेनी आज्ञा विना करेली क्रिया निष्फळ छ एवो जैन सिद्धांतनो चोकस निर्णय सूचव्यो के.
प्रथम महाव्रत पछी अनुक्रमे चीजें, त्रीर्जु, चोथु, पांचमुं अने छडे रात्रिभोजनविरमण व्रतो अनुक्रमे आपेला छे. तेनां सूत्रोना आलावा घणे भागे प्रथम महायतने मळता ज छे. एक सरखी शैलीथी न आ छए व्रतो आपेला छे. दरेक महाव्रतने छेडे अर्थमां व्रतनी आराधनानुं अने विराधनानुं शुभाशुभ फळ तथा ते ते व्रतना भांगा विगेरे आप्या छे. छए व्रतोनो पृथक् पृथक् स्वीकार कर्या पछी छए व्रतो एकी साथे अंगीकार करवानुं कर्तुं छे. कोइ पण व्रत के नियम लीधो होय तेमां अनाभोग के प्रमाद विगेरे कारणथी अतिचार लागवानो संभव छे तेथी छए व्रतोनो स्वीकार कर्या पछी एक एक गाथाए करीने छए व्रतोना अतिचारो कह्या छे. पछी छए व्रतोने अतिचार रहित पाळवार्नु अनुक्रमे छ गाथावडे कहां छे. त्यारपछी वीजी छ गाथामां पण बीजी रीते तेज वात कही छे अने सातमी गाथामां पांचे व्रतो भेळा कह्यां छे. त्यारपछी त्रेवीश गाथाओ पापी छे तमा एक, वे, त्रण, चार एवी रीते अनुक्रमे एक एकनी वृद्धि करतां दश सुधी अशुभ स्थानो वर्जवार्नु अने शुभ स्थानो अंगीकार करवानुं कहुं छे. त्यारपछी महावतोना विशेपणो द्वारा तेने पाळवानुं फळ बतावी- ने महाव्रतोनी उच्चारणा समाप्त करी छे, अने मंगळने माटे आसन्न उपकारी होवाथी श्रीमहावीर स्वामीने नमस्कार कर्या. त्यारपछी जेम महाव्रतोनो उच्चार कर्मनो क्षय करनार के तेज रीते सूत्रनुं कीर्तन पण कर्मनो क्षय करनार छे तेथी श्रुतकीर्तनमा प्रथम छ आवश्यकनां नाम, तेनी सद्दहणा विगेरे अने पछी तेना अतिचारोनी आलोचना प्रतिक्रमण विगेरे कयुं छे. त्यारपछी आवश्यक शिवायना २८ उत्कालिक अने ३६ कालिक श्रुतनां पण नाम, तेनी सद्दहणा अने तेना अाराधन अनाराधनथी लागता दोपोनी आलोचना विगेरे कां छे. त्यारपछी अंगप्रविष्ट द्वादशांगी पण तेज रीते कही छे. त्यारपछी श्रुतज्ञान आपनार आचार्यने नमस्कार करवा पूर्वक पोताना प्रमाद- मिथ्यादुष्कृत दइने छेवट श्रुत- देवतानी स्तुति करवा पूर्वक पाक्षिक सूत्रनी समाप्ति करी छे त्यारपछी खामणानो अधिकार आपी पाक्षिक चार खामणां आप्यां छे. त्यारपछी आहारना सुडताळीश दोपो बताव्या छे. त्यारपछी श्रमण सूत्र के जे पगामसज्याना नामथी पण ओळखाय छे ते अति उपयोगी होवाथी पाक्षिक सूत्रनी साथे आपवामां आव्युं छे. तेमां प्रथम नवकार मंत्र भणी करेमि भंते कही अरिहंतादिक चार मंगळ, चार लोकोत्तम अने चार शरण अंगीकार करी दिवस संबंधी अतिचारनुं प्रतिक्रमण, इर्यापथिकनुं प्रतिक्रमण अने पछी प्रकामशय्या, निकामशय्या विगेरेनुं प्रतिक्रमण देखाडयुं छे. पछी गोचरीना अने स्वाध्यायना अतिचारोनुं अतिक्रमण कर्यु छे. त्यार- पछी संक्षेपथी अने विस्तारथी अतिचारो गणावी एटले के एक प्रकारे असंयम, वे अकारना बंधन, त्रण प्रकारना दंड, गुप्ति, शल्य, गौरव विगेरे, चार प्रकारना कषाय, संज्ञा, विकथा विगेरे, ए रीते अनुक्रमे एक एकनी वृद्धि करी तेत्रीश आशातनाओ सुधीना अतिचारोनुं प्रतिक्रमण कर्यु छे. आ बधा भेदो बहुज समजवा जेवा छे. पछी चोवीश तीर्थकरोने नमस्कार करी जिन प्रवचनने अनेक विशेषणो पापी तेनी स्तुति करी छे. पछी संयम, ब्रह्मचर्य विगेरे उपादेयनो स्वीकार अने असंयम, अब्रह्मचर्य विगैरे हेयनो त्याग करवा कर्तुं छे. छेवट अढी द्वीपमा वर्तता सर्व साधुओने वंदना करी तथा सर्व जीवोन भित्रभावी खमावी श्रमण सूत्रनी समाप्ति करी छे. आ पाक्षिक तथा श्रमण सूत्र टीका, अवचूरी अने भाषांतरो सहित जूदी जूदी संस्थाओ तरफथी अनेक शैलीमां छपावी बहार पाडवामां आवेलां छ. परंतु तेना प्राथमिक अभ्यासी साधु साध्वीओ अल्प प्रयासे अने अल्प सहायथी आ सूत्रो शब्दार्थ सहित कंठे करी शके एवो शुद्ध गुजराती भाषामा लखायेलो टबो के बाळावबोध छपायेल के लखेल प्रतरूपे जोवामां आव्यो नथी, अने आवा समयमां तेवा साधननी खास जरुर छे एम जाणी गुरुणी श्री गुलावश्रीजीनी शिष्या साध्वीजी श्री लाभश्रीए श्री जैन धर्म प्रसारक सभाना शास्त्री जेठालाल हरिभाइ पासे पोतानी रुबरु बेसाडी अत्यंत खंतथी ा काम कराव्युं छे. तेमां मूळ सूत्रपाठ प्रायः श्रेष्ठी श्री देवचंद्र लालभाइ जैन पुस्तकोद्धारनी संस्था तरफथी छपा- येल सरि श्री यशोदेव प्रणीत विवरण (मोटी टीका) वाळा श्री पाक्षिक सूत्रने आधारे लखवामां आव्यो छे. छतां क्वचित् लखेली जूनी प्रतमां तथा परंपराथी चालता आवता साधु साध्वीओना मुखपाठमां कांइक तफावत जणायो छे तो ते पण ते ते स्थळे टिप्पणी रूपे अथवा मूळ स्थळे काउंसमां बतान्यो छे, अथवा छापेल प्रतनो पाठ काउंसमां के टिप्पणीमा वताव्यो छे. सामान्य संस्कृतना अभ्यासीओने सूत्रभाषाना ज्ञान साथे सहेलाइथी अर्थ याद रहे तेटला माटे टीका तथा अवचूरिने अनुसारे मूळ सूत्रनीज नीचे संस्कृत छाया मूकवामां आवी छे, अने तेनी नीचे शुद्ध गुजराती भाषामां मूळसूत्रनुं एक एक पद लइ तेनो शब्दार्थ लख्यो छे. तेमां अन्वय प्रमाणे वाक्यार्थ करवामां अभ्यासीओने सरळता थवा सारु प्रायः अन्वय प्रमाणे मूळनां पदो लीधां छे, अने कोइ ठेकाणे लांबा वाक्यमां अभ्यासीओनी गुंचवण करवा माटे खंडान्वय पण राख्यो छे. आ पाक्षिक सूत्रनी मोटी टीकामां मूळनो अर्थ घणो विस्तारथी विद्वत्ता भरेलो आप्यो छे, ते सर्व अत्यंत उपयोगी छे, परंतु या कार्य प्राथमिक अभ्यासीओ माटे करेलुं होवाथी संक्षेपमा अने जैनकोममा चालती आवती सहेली तथा सांकेतिक भाषामां तेनो शब्दार्थ बहुधा करवामां आव्यो छे, अने तेमां खास जाणवा जेवी हकीकत टीकाने आधारे बनता प्रयासे संक्षिप्त करीने लखी छे. ते पण मूळना शब्दार्थमां गुंजवण नहीं आववानी खातर प्रायः मूळनो शब्दार्थ लखाइ गया पछी आपवामां आवी के. कोइ ठेकाणे टीकामांचे रीते व्याख्या करी होय तो तेमांथी संक्षे- पना हेतुथी एक व्याख्या पण करवामां आवी छे. जेमके आठमा पानाना पहेला पृष्ठमा मूळनो पाठ जे “ सव्वेसि पाणाणं सव्वेसिं भूयाणं " विगेरे चार पदोनो एकज अर्थ लख्यो छे, अने बीजो अर्थ पण टीकामां प्राण एटले विकलेंद्रिय, भूत एटले वनस्पतिकाय, जीव एटले पंचेंद्रिय अने सत्त्व एटले बाकांना चार स्थावरो कया छे" ते अमे लख्या नथी. विगेरे. प्रथम आ कार्य मात्र एक पाक्षिक सूत्र माटेज करवानो विचार हतो, परंतु ते समये अत्र विराजमान प्रवर्तक महाराज श्री कांतिविजयजी महाराजनी प्रेरणाथी साध्वीजी श्री लाभश्रीजीए श्रमण सूत्रनुं काम पण अवचूरिने आधारे तेवाज क्रमथी तैयार कराव्युं. आ बन्ने कार्यमा प्रवर्तकजी महाराजना मुख्य शिष्य मुनिवर चतुरविजयजी तथा प्रशिष्य मुनिवर पुण्यविजयजीए सारी मदद थापी छे. तोपण अमारी पूछवा विगेरेनी खामीने लीधे अथवा पॅफ तपासवामां थयेला प्रमा- दादिकने लीधे जे काइ अशुद्धि रही गइ होय ते सुधारी लेवी ने अमोने तेनी सूचना आपवी के जेथी बीजी आवृत्ति वखते तेनापर लक्ष रहे. गुफ सुधारती वखते प्रमादना कारणथी एक वे मोटी भूलो थइ छे ते मोटी भूलो बधी प्रतोमा अमे हाथे ज सुधारी लीधी छे, अने बीजी चाकीनी नानी भूलोनुं शुद्धिपत्र प्राप्यु छे. ते पर अभ्यासीओए पूरतुं लक्ष आप. श्री जैनधर्म प्रसारक सभा-भावनगर.
या ग्रंथ छपाववामां नाणानी मदद श्रापनारनां नाम. ५००) भावनगर श्राविका समुदायना अक्षयनिधि विगेरे तप वखते आवेल ज्ञानखाताना. ५१) बाइ सूरज १२) बाइ मोती ५) वाइ अजवाळी २५) बाइ पुरी १०) बाइ धनी ५) बाइ उजी २५) वाइ दीवाळी १०) बाइ अनोप ५) बाइ दीवाळी २५) बाइ फूली १०) बाइ झवेर ५) बाइ प्रेमी १६। बाइ मणि १०) बाइ जडाव ५) बाइ कस्तुर १५) पाइ समरथ ७) वाइ नाथी ५) बाइ रुकमणी १५) बाइ मणि ७) बाइ पोती ५) बाइ धोळी अनुक्रमणिका. पत्रांक. ३ पाक्षिक खामणा ४. १ श्रीपारिक सूत्र. ४ आहारना ४७ दोष. २ खामणा. ४८ ५ श्रीश्रमण सूत्र. ५) वाइ नवीवाह श बाइ कमर शबाइ अनोप ५) वाइ झमक ५) बाइ नवल ५) बाइ मोती ५) बाइ मणी १ ४६ ५३ ५७ पत्रं. पृष्ठ. पंक्ति. १ mm १ १ (मि) दोष लोमः तस्य ५ ur ६ १ १ ur लेवावडे क शुद्धिपत्रं. शुद्ध पत्रं. पृष्ठ. पंक्ति. अशुद्ध. (सिद्ध अ) (सिद्धे) ५२ प्रणाणे प्रमाणे ४ संसारपारि० संसारपार० ५४ २ १२ लोमः ऐवा एवो ५६ (अणयाए) (प्रमाणयाए) ६१ ९ लेवावड के (तिविहेण) तिविहेणं) ६३ कपायवडे आनुगामिकं । आनुगामिकं पारगामिकं ६५ द्रव्यने द्रव्यने ६६ २ सुधी अणुं वा २ विपयवालं अदिनाणे अदिशादाणे | ७६ २ १३ (अंबंभ) खड्गबाह्यम् अङ्गवासम् wr or por or ar p r or on or in او و س م شد m » ع سم د م कषायवडे ११ १३ १४ ४३ १२ १ १३ अणं वा ७१ सुधी विषयवाल ( अभं) ॐ नमः सिद्धम् । पादिक सूत्र. संस्कृतानुवाद सहित गुजराती भाषान्तर. तित्थंकरे अतित्थे, अतित्थसिद्ध अतित्थसिद्धे अ।सिद्धे जिणे रिसी मह-रिसीय नाणं च वंदामि॥१॥ (तीर्थकरान् च तीर्थ अतीर्थसिद्धान् च तीर्थसिद्धान् च। सिद्धान जिनान् ऋषीन महर्षीन च ज्ञानं च वन्दे॥) (तीत्थंकरे अ)-अतीत, अनागत अने वर्तमान चोवीशीना जिनेश्वरोने, (तित्थे) तीर्थने एटले जिनप्रवचनने, (अ- तिथ्थसिद्धे अ) तीर्थ प्रवा पहेला जेओ सिद्ध थया तेमने, (तित्थसिद्ध अ) तीर्थनी स्थापना थया पछी जेओ सिद्ध थया तेमने, (सिद्धे अ) बाकीना तेर भेदे सिद्ध थया तेमने, (जिणे) भवस्थ केवळीओने, (रिसी) सर्व सामान्य सा- धुओने, (महरिसी य) लब्धिवंत मुनिओने, (नाणं च)-मतिज्ञानादिक पांच ज्ञानने (वंदामि)-हुं वांदु छु. १.
त जे य इमं गुणरयण-सायरमविराहिऊण तिएणसंसारा।तेमंगलं करित्ता, अहमवि आराहणाभिमुहो॥२॥N: (ये च इमं गुणरत्नसागरमविराध्य तीर्णसंसाराः । तान् मङ्गलं कृत्वा अहमपि आराधनाभिमुखः।।) (जे य) वळी जे महामुनिओ (इमं) आ (गुणरयणसायरं) पंच महाव्रतादिक गुणोरूपी रत्नोना समुद्रने (अवि- राहिऊण ) नहि विराधीने एटले अखंड रीते पाळीने (तिमसंसारा)--संसाररूपी सागरने तरी गया ले (ते) ते महामुनि- ओने (मंगलं) मंगळरूप ( करित्ता) करीने (अहमवि) हुं पण (आराहणाभिमुहो) मोक्षमागनी आराधना करवामां प्रान सन्मुख थयो छु. २. मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साहू सुयं च धम्मो अ। खंती गुत्ती मुत्ती, अज्जवया मद्दवं चेव ॥३॥ (मम मङ्गलम् अर्हन्तः सिद्धाः साधवः श्रुतं च धर्मः च । क्षान्तिः गुप्तिः मुक्तिः आर्जवता मार्दवं चैव॥) (अरिहंता)--चोत्रीश अतिशयो सहित तथा आठ कर्म रहित एवा श्री अरिहंत प्रभु, तथा (सिद्धा) सिद्धो, तथा (साहू)- साधुओ, तथा उपलक्षणथी सर्व आचार्यों अने उपाध्यायो, तथा (सुयं च) श्रुतज्ञान, तथा (धम्मो अ) अहिंसादिक धर्म, तथा (खंती) क्षमा एटले क्रोधनो त्याग, तथा (गुत्ती) गुप्ति एटले संलीनता, तथा (मुत्ती) मुक्ति एटले निर्लोभता, तथा (अजवया ) श्रार्जवता एटले सरलता-मायानो त्याग, तथा ( मद्दवं ) मार्दव एटले माननो त्याग-निर- भिमानीपणुं, (चेव) निश्चे, आ नव पदो (मम) मारा प्रत्ये (मंगलं) मंगळ करनार थाओ. ३.
लोगम्मि संजया जं, करिति परमरिसिदसिअमुभारं। अहमवि उवनिलो तं, महव्वयउच्चारणं काउंnan, (लोके संयताःयां कुर्वन्ति परमर्षिदेशिताम् उदाराम् । अहमपि उपस्थितः तां महावतोचारणां कर्तुम्।।) (लोगम्मि ) तिर्खा लोकने विपे ( संजया) संयमधारी मुनिओ (परमरिसिदेसियं) परम ऋषि जे तीर्थंकरों अने गणधरो तेओए कहेला तथा ( उआरं) उदार एटले प्रधान एवा (ज)जे पंचमहाव्रतना उच्चारतेने (करिति ) करे थे, (त) ते ( महन्वयउच्चारणं ) महाबतोना उच्चारने ( काउं) करवा माटे (अहमवि) हुं पण (उपठिो) उद्यमवंत थयो छु. ४. सूत्रं-से किं तं महव्वयउच्चारणा ? महन्वयउच्चारणा पंचविहा पन्नत्ता राइभोअणवेरमण छट्ठा ।। (अथ किं' तत् महाव्रतोचारणा ? महाव्रतोचारणा पञ्चविधा प्रज्ञप्ता रात्रिभोजनविरमणषष्ठा ॥) अहीं शिष्य प्रश्न करे छे के हे गुरुमहाराज ! (से) हवे (तं) ते (महन्वयउच्चारणा) महाव्रतोनो उच्चार (किं) शुं वस्तु छ ? अर्थात् तेना केटला प्रकार छ ? गुरुमहाराज उत्तर आपे के के हे शिष्य ! (महव्वयउच्चारणा ) महाव्रतोनो उच्चार (पंचविहा) पांच प्रकारे (पन्नत्ता) कह्यो छे, तथा (राइभोअणवेरमणकठा) रात्रिभोजनथी जे विरमवू ए छठो प्रकार छे. हवे पंच महाबत अने छटुं रात्रिभोजनविरमणव्रत कहे छे. १ 'का २ सा' इति वा संस्कारः सू०-तं जहा-सव्वाश्रो पाणाइवायाओ वेरमणं १। सव्वाओ मुसावायाओ वेरमणं २ । सव्वाओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं ३ । सव्वाश्रो मेहुणाओ वेरमणं ४ । सव्वात्रो परिग्गहाओ वेरमणं ५। सव्वाश्रो राइभोयणाश्रो वेरमणं ॥६॥ (तद्यथा-सर्वस्मात् प्राणातिपातात् विरमणं १। सर्वस्मात् मृषावादात् विरमणं २। सर्वस्मात् अ- दत्तादानात् विरमणं ३। सर्वस्मात् मैथुनात् विरमणं ४ । सर्वस्मात् परिग्रहात् विरमणं ५। सर्वस्मात् रात्रिभोजनात् विरमणं ॥ ६॥) (तं जहा) ते आ प्रणाणे-(सव्वाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (पाणाइवायाओ) प्राणातिपात थकी एटले जीवहिंसा थकी (वेरमणं) विरमवू-निवर्तवू-पाछु फरवू १. (सव्वाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (मुसा- वायाओ) मृषावाद थकी एटले जूडं बोलवा थकी (वेरमणं) विरमवू २. (सव्वाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (अदिनादाणाओ) अदत्तादान थकी एटले चोरी करवा थकी (वेरमणं) विरमवू. ३. (सव्वाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना ( मेहुणाओ) मैथुन थकी (वेरमणं ) विरमवू. ४. (सब्बाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (परिग्ग- हाओ) धनधान्यादिक बाझ अने रागद्वेष रूपी अभ्यंतर परिग्रह थकी (वेरमणं) विरम. ५. (सव्वाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (राइभोयणाओ) रात्रिभोजन थकी (वेरमणं) विरमवू. ६.
सू०-तत्थ खलु पढमे भंते महव्वए पाणाइवायाओ वेरमणं, सव्वं भंते पाणाइवायं पञ्च- कामि, से सुहमं वा बायरं वा तसं वा थावरं वा नेव सयं पाणे अइवाएज्जा, नेवन्नेहिं पाणे अइ- वायाविज्जा, पाणे अइवायंते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि, न कारवेमि, करंतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ (तत्र खलु प्रथमे भदन्त महाव्रते प्राणातिपातात् विरमणं, सर्व भदन्त प्राणातिपातं प्रत्याख्यामि, अथ (तद्यथा) सूक्ष्म वा बादरं वा त्रसं वा स्थावरं वा नैव खयं प्राणान् अतिपातयामि, नैवान्यैः प्राणान् अतिपातयामि, प्राणान् अतिपातयतोऽपि अन्यान्न समनुजानामि, यावजीवं त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गहमि अात्मानं व्युत्सृजामि ॥) (तत्थ) तिहां (खलु ) निचे (भंते ) हे भगवंत (पढमे) पहेला (महव्वए) महावतने विपे (पाणाइवायाओ) प्राणातिपात थकी (वेरमणं) विरमवू, एम भगवंते कयुं छे. तेथी (भंते ) हे भगवन् (सव्वं पाणाइवाय) सर्व प्राणाति- पातने एटले जीवोना विनाशने (पञ्चरकामि ) हुँ वर्जु छु. (से) ते जीवो आ प्रमाणे जाणवा-(सुहमं वा) सूक्ष्म एटले म जे जीवो चर्मचची देखाय नहीं ते (वायरं वा ) अथवा बादर एटले जे जीवो चर्मचतुथी देखाय ते (तसं वा) त्रस एटले जेओ टाढ तडकाथी त्रास पामे अने हाली चाली शके ते (थावरं वा) स्थावर एटले जे हाली चाली न शके एवा पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजस्काय, वायुकाय अने वनस्पतिकाय. (पाणे ) आ उपर कहेला चार प्रकारना जीवोने ( सयं) हुँ पोते ( नेव अइवाएजा) नहींज विनाश करूं, तथा (पाणे ) ते जीवोने (अन्नेहिं ) वीजा पासे (नेव अइवायाविजा) नहींज विनाश करावं, तथा (पाणे) ते जीवोने (अइवायंते वि) विनाश करता एवा पण (अन्ने) वीजाओने (न समणु- जाणामि ) अनुमोदना न करूं-सारा न जाणुं. क्या सुधी ? तो के (जावजीवाए) जावजीव सुधी एटले हुँ जीवू त्यांसुधी. (तिविहं ) त्रिविधने (तिविहेणं) त्रिविधे करीने एटले (मणेणं) मनवडे ( वायाए ) वाणीवडे ( कारणं) कायावडे (न करोमि ) हिंसा नहीं करूं (न कारवेमि ) नहीं कराळ (करंतं पि अन) हिंसा करता एवा पण बीजाने (न समणुजाणामि) नहीं अनुमोदना करूं. (तस्स ) ते हिंसा संबंधि पापने (भंते ) हे भगवन् (पडिकमामि) हुं पडिकमु छ एटले तेनाथी पाछो फरूं छु, (निंदामि ) आत्मानी साक्षीए ते पापने निंदु छु, ( गरिहामि ) गुरुनी समक्ष गर्दा करुं छु, (अप्पाणं वोसि- रामि ) तेवा पापकारी मारा आत्माने वोसरावु छु एटले विविध प्रकारे तजुं छु. से पाणाइवाए चउविहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्वरो खित्तो कालो भावनओ। दव्वत्रो णं पाणाइवाए छसु जीवनिकाएसु, खेत्तो णं पाणाइवाए सव्वलोए, कालो णं पाणाइवाए दिया वा रायो वा, भावो णं पाणाइवाए रागेण वा दोसेण वा ॥ ( स प्राणातिपातः चतुर्विधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतः भावतः। द्रव्यतः णं प्राणा- तिपातः षट्सु जीवनिकायेषु, क्षेत्रतःणं प्राणातिपातः सर्वलोके कालतःणं प्राणातिपात: दिवा वा रात्रौवा, भावतः णं प्राणातिपातः रागेण वा द्वेषेण वा।।) (से) ते (पाणाइवाए ) प्राणातिपात एटले जीवनो विनाश ( चउबिहे ) चार प्रकारवाळो (पमत्ते) श्री वीतरागे कह्यो छे. ( तंजहा ) ते चार प्रकार आ प्रमाणे-(दव्वओ) द्रव्यथी एटले द्रव्यने आश्रीने (खित्तो) क्षेत्रथी एटले क्षेत्रना प्रधानपणाने आश्रीने (कालो) काळथी एटले काळने आश्रीने तथा (भावो) भावथी एटले भावने आश्रीने. तेमां (दव्यत्रो णं) द्रव्यने आश्रीने (पाणाइवाए) प्राणातिपात ते के जे (सु) पृथ्वीकाय १, अप्काय २, तेजस्काय ३ वायुकाय ४, वनस्पतिकाय ५ अने त्रसकाय ६ ए छए (जीवनिकाएसु) जीवोनी निकायने विषे थाय छे, तथा (खित्तओणं) क्षेत्रने आधी (पाणाइवाए) जीवहिंसा ते के जे ( सव्वलोए ) चौद राज प्रमाण सर्व लोकने विषे थाय छे. तथा (कालोणं) काळने आश्रीने (पाणाइवाए) प्राणातिपात ते के जे ( दिया वा राओ वा) दिवसने विषे अने रात्रिने विषे थाय छे. तथा (भावओ णं) भावने आश्रीने (पाणाइवाए) प्राणातिपात ते के जे (रागेण वा दोसेण वा) रागे करीने तथा द्वेषे करीने थाय छे. आ प्रमाणे प्राणातिपातना भेदो कह्या. हवे तेज प्राणातिपात अतीतकाळे एटले धर्म पाम्या पहेला करायेल होय तेनी विशेष निंदा करवा माटे कहे छे- सू०-जंछ मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस अहिंसालक्खणस्स सञ्चाहिष्ठियस्सै विणयमूलर्स खंतिप्पहाणस्सै अहिरन्नसोवन्नियस्स उवसमपभवस्सं नवबंभचेरगुत्तसं अपयमाणसे भिक्खा- वित्तिअस्सं कुक्खीसंबलस्से निरग्गिसरणस्से संपक्खालियस्सै चत्तदोसस्से गुणगाहियस्से निव्वियारस्स निवित्तीलक्खणस पंचमहव्वयजुत्तस्र्स असंनिहिसंचयरसे अविसंवाइयस्सै संसारपार- गामिअस्स निव्वाणगमणपजवसाणफलस्स, पुविं अरणयाए असवणयाएं अबोहिएँ अणभिगमेणं, अभिगमेण वा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयांए बालयाएं मोहयाएँ मंदयाएँ किड्डयाएं तिगारवगड्याए चउक्साओवगएणं पंचिंदिओवंसट्टेणं पडुपन्नभारियांए सायासोक्खमणुपालयंतेणं इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु पाणाइवानो को वा कारावित्रो वा कीरंतो वा परेहि समणुन्नाओ तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं ॥ (यो मया अस्य धर्मस्य केवलिप्रज्ञप्तस्य अहिंसालक्षणस्य सत्याधिष्ठितस्य विनयमूलस्ये क्षान्तिप्रधानस्य * पि य मए इति वा.
अहिरण्यसाँवर्णिकस्य उपशममभवस्य नवब्रह्मचर्यगुप्तस्यं अपचमानस्र्य भिक्षावृत्तिकस्यै कुक्षिशम्बलस्यै निरग्निशरणस्य संप्रक्षालिकस्य त्यक्तदोषस्य॑ गुणग्राहिकस्य निर्विकारस्य निर्वृत्तिलक्षणस्य पञ्चमहाव्रत- युक्तस्यै असन्निधिसंचयस्ये अविसंवादिनः संसारपारिगामिकस्य निर्वाणगमनपर्यवसानफलस्य, पूर्वम् अ- ज्ञानतयो अश्रवणतयो अबोध्यौ अनभिगमर्ने, अभिगमेन वा प्रमादेने रागद्वेषप्रतिवद्धतया यालतया मोहतर्यो मन्दतयों क्रीडतयाँ त्रिगौरवगुरुकतयाँ चतु:कषायोपगते पञ्चेन्द्रियोपवशार्तेने प्रत्युत्पन्नभारि- तयां सातसुखमनुपालयती, इह वा भवे अन्येषु वा भवग्रहणेषु प्राणानिपातः कृतो वा कारितो वा क्रि- यमाणो वा परैः समनुज्ञातः, तं निन्दामि गामि त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन) (जं) जे-प्राणातिपात (मए) में (इमस्स धम्मस्स) आ चावीश विशेपणवाळो धर्म पाम्यानी (पुचि) पहेला एटले धर्म अंगिकार कर्या पहेला अज्ञानादिक चार कारणोए करीने तथा धर्म अंगीकार कर्या पछी प्रमादादिक अग्यार कार- णोए करीने को होय तेने हुँ निंदु छ. ए प्रमाणे आ सूत्रनो संबंध छे.. हवे प्रथम धर्मना बावीश विषेपणोनो अर्थ आ प्रमाणे- धर्म केवो ? (केवलिपन्नत्तैस्स ) केवळी भगवंते प्ररुपेलो एटले उपदेश करेलो १, तथा (अहिंसालरकणस्स) अहिंसा एटले प्राणीनुं रक्षण तेज के लक्षण जेनुं एवो २, तथा (सच्चाहिहियस्स) सत्य वचन वडे आश्रित करायेलो एटले व्याप्त * त्यक्तद्वेषस्य इति वा.
तथा (विणयमूलस्स) विनय छे मूळ कारण जेनुं एटले विनयथी उत्पन्न थयेलो , तथा (खंतिप्पहाणस्स ) क्षमा प्रधान जेमां एवो ५, तथा (अहिरनसोवनियस) नथी हिरण्य एटले रुघु अने सुवर्ण एटले सुवर्णना अलंकार विगेरे जेमां अर्थात् उपलक्षणथी सर्व परिग्रह रहित एवो ६, तथा ( उपसमपभवस्स) उपशम एटले इंद्रिय अने नोइंद्रिय (मन) नो जय, तेनाथी उत्पत्ति के जेनी एवो ७, तथा (नवबंभचेरगुत्तस्र्स ) नव प्रकारनी ब्रह्मचर्यनी गुप्तिथी गुप्त ( सहित ) एवो ८, तथा (अपयमाणस्स) नथी पचन क्रिया जेमां एवो एटले के पचनादिक आरंभ रहित , तेथी करीनेज (भिरकावित्तिरस) भिक्षा वडे आजीविका छे जेमां एवो १०, तथा (कुरिकसंबलस्स) कुक्षि एटले उदरने विषेज शंवल एटले भातुं छे जेमां अर्थात जेमां कुक्षिनी बहार कांइ पण खावानुं राखी शकातुं नथी एवो ११, तथा (निरग्गिसरणस्स) शीतादिकने दूर करवा माटे नथी अग्निर्नु शरण लेवातुं जेमां एवो १२, तथा (संपकालियस्सै ) कर्म रुपी मळने सम्यक् प्रकारे पखाळनार एटले शुद्ध करनार एवो १३, तथा (चत्तदोसस्से) त्याग कर्या छे मिथ्यात्व अज्ञान विगेरे दोषो जेणे एवो अथवा त्याग कर्यो के द्वेष जेमां एवो १४, एज कारण माटे (गुणगाहियेस्स ) गुणोने ग्रहण करवाना खभाववाळो १५, तथा (निधियारस) गयो छे-नाश पाम्यो छे विकार एटले कामनो उन्माद जेमांथी एवो १६, तथा (निवित्तीलरकणैस्स ) निर्वृत्ति एटले सर्व सावधयोगनी विरति के लक्षण (स्वरुप) जेनुं एवो १७, तथा (पंचमहन्वयजुत्तस्स) पांच महाव्रतोए करीने युक्त एवो १८, तथा (असंनिहिसंचयस्से) साधुए पोतानी पासे कांइ पण (मोदक, उदक, खजुर, हरडे विगेरे) पदार्थोनो संचय राखी शकातो नथी जेमां एवो १६, तथा (अविसंवाइयस्स) विसंवाद रहित एटले जेमां कोइ पण प्रकारनो हठ कदाग्रह विगेरे विसंवाद नथी ऐवा, अथवा साची युक्तिथी जनों बाध थतो नथी एवो २०, तथा (संसारपारगामिस्स) जे संसार रुपी समुद्रनो पार पमाडनार छे एवो २१, तथा (निव्वाणगमणपजवसाणफलस्स ) मोक्षनी प्राप्ति रुपी छेल्लुं छे फळ जेनुं एवो अर्थात् आ धर्म खर्गादिक सुख आपी छेवट मोक्षरुप फळने आपनार छे. २२. धर्म अंगीकार कर्या पहेला जे अज्ञानतादिक चार कारणोए करीने प्राणातिपातनो संभव छे ते चार कारणो बतावे छे.- (अश्मयांए) अज्ञानपणाए करीने १, तथा (असवणेयाए ) सद्गुरुना मुखथी नहीं सांभळवावडे करीने २, अथवा सांभळ्या छतां पण (अबोहिए ) अबोधवडे करीने एटले यथार्थपणे धर्मर्नु स्वरूप न जाणवा वडे करीने ३, अथवा व्यव- हारथी श्रवण अने बोध छतां पण (अणभिगमेणं ) सम्यपणे धर्मने नहीं अंगीकार करवा वडे करीने ४, जे प्राणातिपात मारा वडे करायो होय तेनो त्याग करुं छु. एम संबंध जाणवो. (अभिगमेण वा) अथवा धर्म अंगीकार कर्या छतां पण अग्यार कारणो बड़े प्राणातिपातनो संभव छ, ते अग्यार कारणो कहे छे—(पमाएणं) मद्य विषयादिक प्रमादे करीने १, तथा (रागदोसपडिबद्धयाए ) राग अने द्वेषना प्रतिबंध वडे एटले व्याकुळता वडे करीने २, तथा (बालयाए ) बाळकपणा वडे एटले अज्ञानपणाए करीने ३, तथा ( मोहयाए) मोह एटले चित्तनी व्याकुळता अथवा मोहनीय कर्मनुं आधीनपणुं तेणे करीने ४, तथा (मंदयाएं) मंदपणाए करीने एटले कायानी जडताए करीने अर्थात् आळसुपणाए करीने ५, तथा (किड्डयाए) द्यूतादिक क्रीडा करवा वडे करीने ६, तथा (तिगा- स्वगरुयाए) ऋद्धि गारव, रस गारव अने साता गारव ए ऋण गारवे करीने थयेली जे गुरुता एटले भारेपणुं ते वडे करीने वानुः हित ॥ ७, तथा (चउकसाओवगएणं) क्रोध, मान, माया अने लोभ एचार कषायना उदयने वश थवा वडे करीने ८, तथा (पंचिं- दिओवसदेणं) स्पर्शनादिक पांच इंद्रियोना वशवर्तिपणाथी प्राप्त थयेटु जे आर्तध्यान ते वडे करीने ६, तथा ( पडुपनभा- रियांए ) उत्पन्न थयेलो जे कर्मनो भार तेणे करीने अर्थात् कर्मना गुरुपणाए करीने १०, तथा (सायासोखमणुपौलयंतेणं) सातवेदनीय कर्मना उदयथी उत्पन्न थयेटु जे सुख तेने भोगववामां आसक्त थवा वडे करीने ११. आ उपर कहेला चार अने अग्यार कारणोने लीधे (इहं वा भवे) आ भवने विपे अथवा (अन्नेसु वा भवग्गणसु) बीजा एटले आ भवथी पहेलाना भवोने विषे (पाणाइवाओ) जे प्राणातिपात (कओ वा) में कर्यो होय, अथवा (कारा- विओ वा) बीजा पासे कराव्यो होय, अथवा (कीरंतो वा परेहिं ) बीजाए करातो थको (समणुनाओ) में अनुमोद्यो होय एटले सारो कह्यो होय (तं ) तेवा प्राणातिपातने (निंदामि) हुं मारा आत्मानी साक्षीए निदु छु, (गरिहामि) गुरुनी समक्ष गर्दा करुं कुं. (तिविहं) करवू, करावयु, अनुमोदq एम त्रण अकारना प्राणातिपातने (तिविहेण) त्रण प्रकारे एटले(मण) मनवडे (वायाए ) वाचावडे तथा (काएणं ) कायावडे हुँ निंदु गहुँ छं. हवे त्रण काळ संबंधी प्राणातिपातनी विरतिने प्रतिपादन करता सता कहे छे.. सू०-अईयं निंदामि, पडुपन्नं संवरेमि, अणागयं पच्चरकामि सव्वं पाणाइवायं ॥ (अतीतं निन्दामि, प्रत्युत्पन्नं संवृणोमि, अनागतं प्रत्याख्यामि सर्व प्राणातिपातम्) (अईयं) अतीतकाळे-भूतकाळे करेला ( सव्वं) सूक्ष्म तथा स्थूळ सर्वे (पाणाइवायं ) प्राणातिपातने (निंदामि) हुँ निहुँ छु, ( पडुप्पन) वर्तमानकाळे संभवता-थता सर्व प्राणातिपातने (संवरेमि) हुं संवरु छु-निवारुं छु, (भणागयं) अनागत एटले भविष्य काळ संबंधी सर्व प्राणातिपातने (पच्चरकामि) पञ्चख्खं झु-निषेधुं छु. आ उपर कहेला अनागत प्रत्याख्यानने विशेष प्रकारे कहे छे- सू०-जावजीवाए अणिस्सिो हं नेव सयं पाणे अइवाएजा, नेवन्नेहिं पाणे अइवायावेजा, पाणे अइवायंते वि अन्ने न समणुजाणामि ॥ (यावज्जीवम अनिश्रितोऽहं नैव स्वयं प्राणान् प्रतिपातयामि, नैवान्यैः पाणान् अतिपातयामि, प्रा- पान अतिपातयतः अपि अन्यान न समनुजानामि) (अणिस्सिओ) अनिश्रित एटले आलोक तथा परलोकनी आशंसा रहित एवो ( है ) हुँ (जावजीवाए) जावजीव सुधी ( सयं) पोते (पाणे) प्राणोनो (नेव) नहींज (भइवाएजा) विनाश करूं. (अग्नेहि ) बीजा पासे (पाणे) प्राणोनो (नेव) नहींज (अइवायावेजा) विनाश करावं. (पाणे ) प्राणोनो (अइवायते वि) विनाश करता एवा पण (अन्ने) बीजाओने (न समणुजाणामि) हुं सारा नहीं मानु. कोनी साक्षीए हु आ पञ्चरखाण करु छ ? ए शंका उपर अरिहंतादिक पांचनी साक्षी बतावे छे. सू०-तं जहा-अरिहंतसस्किअं १ सिद्धसकिसाहुसरिक ३ देवसकिअं ४ अप्पसस्कियं ५॥
त्र - (तद्यथा-अर्हत्साक्षिकं १ सिद्धसाक्षिकं २ साधुसाक्षिकं ३ देवसाक्षिकं ४ आत्मसाक्षिकम् ५) (तं जहा) ते आ प्रमाणे-(अरिहंतसरिक) अरिहंतनी साक्षीए १, तथा (सिद्धसकिअं) पंदर भेदना जे सिद्धो तेमनी साक्षीए २, तथा ( साहूसरिकअं) साधु एटले महामुनिओ तथा उपलक्षणथी आचार्य अने उपाध्याय तेमनी साक्षीए ३, तथा ( देवसरिक) समकितदृष्टि जे भुवनपति आदिक देवो तेमनी साक्षीए ४, तथा (अप्पसरिक) विर- तिना परिणामवाळो जे मारो पोतानो आत्मा तेनी साक्षीए ५ हुँ आ पञ्चख्खाण करुं छु. अहीं कोई शंका करे के-पोते अने साक्षी ए बन्ने प्रत्यक्ष होय तो ज आ लोकमां साक्षीनो व्यवहार कही शकाय छे. अहीं तो सिद्ध भगवान अतींद्रिय होवाथी तेमनी साक्षी शी रीते कहेवाय ? तेनो जवाव ए के जे-पचरूखाण करनारनी मति श्रुतज्ञानथी चासित थयेली होवाथी ते तेना स्वरूपने जाणे के तेथी तेने भावनी कल्पनाए करीने ते सिद्धो प्रत्यक्ष जेवा ज छे. तेथी तेओनी साक्षी कही शकाय छे. तथा आ क्षेत्र अने अन्य क्षेत्रमा वर्तता तीर्थकरो अने मुक्तिमा रहेला सिद्धो केवळज्ञान रूपी चक्षुबडे पचख्खाण करनारना पञ्चख्खाणने जोइ ज रह्या छे. तेमज भुवनपति आदिक देवो जिनचैत्य विगेरेना अधि- ठायक होवाथी अथवा ति लोकमां विचरता देवो चैत्यवंदनादिक करवा आवेला होताथी समीपे होय छे अथवा पोताने स्थाने रह्या छतां पण कथंचित् द्वीप समुद्रो प्रत्ये अवधिज्ञाननो प्रयोग करता होय छे तेथी तेश्रो पण साक्षी थइ शके छे. आ प्रमाणे पञ्चख्खाण करवाथी शुं थाय छे ते कहे छे.- सू०एवं भवइ भिकू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चकायपावकम्मे दिवा वा राओ वा एगो वा परिसागो वा सुत्ते वा जागरमाणे वा ॥ (एवं भवति भिक्षुः वा भिक्षुकी वा संयतविरतप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा दिवा वा रात्री वा पर्ष- गतो वा सुप्तो वा जाग्रत् वा ॥) (एवं) ए प्रमाणे एटले पूर्व कह्या प्रमाणे प्रत्याख्यान करवाथी (भिरकू वा) साधु अथवा (भिरकूणी वा) साध्वी (दिशा वा) दिवसे अथवा ( राम्रो वा ) रात्रे, ( एगओवी.) एकला होय अथवा ( परिसागो वा) पर्पदामां-साधु के साध्वीना समुदायमा रहेल होय, (सुत्ते वा) सुता होय अथवा (जागरमाणे वा) जागता होय तो पण ते ( संजय ) सतर प्रकारना संयम सहित होय छे, तथा (विरय ) विविध प्रकारे बार प्रकारना तपने विपे रक्त-तत्पर होय छे, तथा (पडिहय) स्थितिनी हानि करवाथी ग्रंथिनो भेद करीने विनाश पमाडथु छ अने (पच्चरकाय) हेतुना अभावथी फरी नहीं वधवा वडे दूर कयु छ (पावकम्मे ) ज्ञानावरणीयांदिक पापकर्म जेणे एवो थाय छे. अर्थात् प्राणातिपातनुं प्रत्याख्यान करनार साधु तथा साध्वी निरंतर संयमवाळा, विरतिवाळा अने पापकर्म रहित थाय छे. प्राणातिपातनी विरतिनी ज स्तुति करे छे.- सू०--एस खलु पाणाइवायस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्तेसिए आणुगामिए, सव्वेसिं पा- णाणं सव्वेसिं भूयाणं सव्वेसिं जीवाणं सव्वेसिं सत्ताणं अदुरकणयाए असोयणयाए अजूरणयाए 10 India अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरियावणयाए अणोदवणयाए, महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरि- साणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे, तं दुककयाए कम्मरकयाए मोकयाए बोहिलाभाए संसारु- तारणाए त्ति कटु उवसंपजित्ताणं विहरामि ॥ (इदं ग्वलु प्राणातिपातात् विरमणं हितं सुखं क्षमं निःश्रेयसिकम् श्रानुगामिकं सर्वेषां प्राणानां सर्वेषां भूतानां सर्वेषां जीवानां सर्वेषां सत्त्वानाम् अदुःखनतया प्रशोचनतया अजूरणतया अतेपनतया अपीडन- तया अपरितापनतया अनद्रावणतया, महार्थ महागुणं महानुभावम् महापुरुषानुचीर्णम् परमर्षिदेशितं प्रशस्तं, तत् दुःखक्षयाय कर्मक्षयाय मोक्षाय बोधिलाभाय संसारोत्तारणाय इति कृत्वा उपसंपद्य विहरामि) (एस) आ ( खलु) निश्चे (पाणाइवायस्स) प्राणातिपातथकी ( वेरमणं) जे विरमद् ते (हिए ) पथ्य भोजननी हित एटले कल्याणने करनारुं छे, तथा (सुहे) तरस्याने शीतळ जळपाननी जेम सुख करनारुं छे, तथा (खमे) क्त-उचित स्वरूपवाडं छ, तथा (निस्सेसिए ) मोचनुं कारण होवाथी निःश्रेयस रूप के, तथा (आणुगामिए ) आनु- गामिक एटले उत्तरोत्तर भवोमां सुखनो अनुबंध करनारुं छे..मा व्रत एवा प्रकारचें केम छ ? तेना उत्तरमा कहे छे.-के (सम्बसि पाणाणं) सर्व पंचेंद्रिय प्राणीभोने (सव्वेसिं भूयाणं) सर्व भूत-एकेंद्रियोने (सन्वेसि जीवाणं) सर्व जीवोने एटले देव, नारकी उत्तम नर अने असंख्य वर्षना आयुष्यवाळा नरवियंचोने तथा (सव्वसि सत्ताणं) सर्व सचोने FARI एटले सोपक्रम मायुष्यवाला नरतियचो भने विकलौद्रियोने (भदुरकण्याए) दुःख नहीं उत्पम करवावडे करीने, तथा (असोयणयाए) शोक नहीं उत्पम करवा वडे करीने, तथा (भजूरणयाए) शरीरनु जीर्णपणुं नहीं करवावडे करीने, तथा (अतिप्पणयाए) परसेवो, लाळ अने अश्रु उत्पम थाय तेQ कारण नहीं करवावडे करीने, तथा (अपी- डणयाए) पादादिकना संकोचविकोचथी पीडा नहीं उत्पन्न करवावडे करीने, तथा (अपरियावणयाए) चो- तरफथी शरीरनो संताप नहीं करवा वडे करीने, तथा (प्रणोदवणयाए) त्रास अथवा मार नहीं करवा वडे करीने मा व्रत हित मादिकने करनारुं छे. वळी आ प्राणातिपातविरमणव्रत ( महत्थे) मोटा भर्थवालं छे एटले तेनुं स्वरूप भने फळ वि- गेरे मोटुंछ, तथा ( महागुणे) सर्व महाप्रतोना समग्र गुणोनो आधाररूप होवाथी मोटा गुणवालं छे, तथा (महाणुभावे) खर्ग अने मोक्षादिक आपनार होवाथी मोटा अनुभाव-माहात्म्यवालं छे, तथा ( महापुरिसाणुचिन्ने ) तीर्थकर गणधर विगेरे महापुरुषोए आचरेलुं एटले सेवेलुंके, तथा (परमरिसिदेसिए) तीर्थकरादिक महर्षिोए देशित एटले भव्य प्राणीना उप- कारने माटे कहेलुं छे, तथा ( पसत्थे ) अत्यंत प्रशस्त खे--शुभ छे. आवा प्रकारचें ते प्राणातिपात विरमणवत छे तेथी क- रीने ते व्रत (दुरकरकयाए) शरीर अने मन संबंधी दुःखोनो क्षय करवा माटे, तथा (कम्मरकयाए) ज्ञानावरणीयादिक कर्मोनो क्षय करवा माटे, तथा ( मोरकयाए) मोक्ष मेळववा माटे, तथा (बोहिलाभाए) जन्मांतरमा पण समकितनी प्राप्ति थाय तेटला माटे, तथा (संसारुत्तारणाए) संसारसमुद्रनो पार पामवा माटे-मारे थशे (ति कटु) एम करीने एटले एवा हेतुथी व्रतने (उपसंपजित्ताणं) अंगीकार करीने (विहरामि ) ९ मासकन्पादिकना विहारवडे वर्तु छ--विचरुं हुं.
हवे आ प्रथम प्रतनी समाप्ति करे छे.--- सू०-पढमे भंते महव्वए उवट्ठिोमि सव्वाओ पाणाइवायायो वेरमणं ॥ (प्रथमे भदन्त महाव्रते उपस्थितोऽस्मि (ततः) सर्वस्मात् प्राणातिपातात् विरमणम्) (भंते ) हे भगवान् (पढमे ) पहेला (महव्वए ) महाव्रतने विषे ( उवडिओमि ) हुं उपस्थित थयो छु-प्राप्त थयो छं. तेथी ( सव्वाओ) सर्व (पाणाइवायाओ) प्राणातिपात थकी (वेरमणं ) मारे आजथी विरमण-निवृत्ति के. अहीं भंते एटले हे भगवंत एवं गुरुनु आमंत्रण आ व्रतना आरंभमां, मध्यमां अने अंतमा आपलुं छे तेनो हेतु ए के गुरुने पूछ्या विना एटले तेमनी आज्ञा लीधा विना काइ पण कार्य करवू नहीं अने कर्या पछी " आपनी आज्ञा प्रमाणे कयें छे" एम गुरुने निवेदन करवू. पा रीते करवाथीज ते व्रत आराध्यु कहेवाय छे. आ व्रतनी आराधना नहीं करनारने नरकगति, अल्प आयु, घणा रोगो तथा कुरूपपणुं विगेरे प्राप्त थाय छे. पहेला महाव्रतना भांगा ३६ आ प्रमाणे थाय छे--सूक्ष्म, बादर, त्रस अने स्थावर ए चारने मन, वचन अने काया ए त्रण जोगे गुणीए त्यारे बार थाय. तेने करवं, करावईं अने अनुमोदबुं ए त्रण गुणा करीए त्यारे कुल छत्रीश थाय छे. ॥ इति प्रथमं महाव्रतम् ॥
॥ अथ द्वितीयं महाव्रतम् ॥ सू०-अहावरे दोच्चे भंते महव्वए मुसावायायो वेरमणं, सव्वं भंते मुसावायं पच्चरकामि, से कोहा वा लोहा वा भया वा हासा वा नेव सयं मुसं वएज्जा, नेवन्नेहि मुसं वायावेज्जा, मुसं वयंते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कार- वेमि करतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि।। (अथापरस्मिन् द्वितीये भदन्त महाव्रते मृषावादात् विरमणं, सर्व भदन्त मृषावादं प्रत्याख्यामि) अथ (तद्यथा) क्रोधाद्वा लोभावा भयाद्वा हास्याद्वा नैव स्वयं मृषा वदामि, नैवान्यैः मृषा वादयामि, मृषा वदतोऽपि अन्यान् न समनुजानामि, यावज्जीवं त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गर्हामि आत्मानं व्युत्सृजामि) (अह) हवे-पहेला महाव्रतनी पछी (भते) हे भगवन् (अवरे) अन्य (दोचे) बीजा (महन्वए) महाव्रतने विषे (मुसावायाओ) मृपावाद थकी (वेरमणं) सर्वथा विरमवू-निवर्तवं एम भगवंते कझुं छे. तेथी (भंते) हे भगवन् (सव्वं) रे - समग्र (मुसावायं) मृषावादने (पचकामि) हुँ पचख्खं छु-निषेधुं बु. (से) ते आ प्रमाणे--(कोहा वा) क्रोधथी (लोहा वा) लोभथी, पहेलो भने छेलो कषाय कहेल होवाथी बचेनावे पण जाणी लेवा तेथी करीने, मानथी, मायाथी, (भया वा) भयथी ( हासा वा) हास्यथी तथा रागथी, देपथी, कलहथी, भम्याख्यानादिकथी (सयं)९ पोते (मुसं) मृषा (नेव) नहीं ज (वएजा) बोलुं. (अन्नेहि.) बीजा पासे (मुसं) मृषा (नेव) नहीं ज (वायावेजा) बोलावं. (वयंते वि) मृपा बोलता एवा पण (अन्ने) वीजाओने (न समणुजाणामि) सारा नहीं जा'-अनुमोदना नहीं करु. केवी रीते ? (जाव- जीवाए) जावजीव सुधी (तिविहं) त्रिविधने (तिविहेणं) त्रिविधे करीने एटले (मणेणं) मनवडे (वायाए) वचनवडे (कारणं) कायावडे (न करेमि) मृषावादने नहीं करूं. (न कारवमि) नहीं करावं. (करंतं पि भ) मृषावाद करता- बोलता एवा पण बीजाने (न समणुजाणामि) नहीं अनुमोदना करु. (तस्स) ते मृपावाद संबंधी पापने ( भंते ) हे भगवन् (पडिकमामि) हुं पडिकमु छु. (निंदामि) भात्मानी साचीए निंदु कुं. (गरिहामि) गुरुनी समक्ष गहीं करूं छु. (अप्पाणं) वोसिरामि) तेवा पापकारी मारा आत्माने वोसिरावं छु-विविध प्रकारे तजुं छु. सू०-से मुसावाए चउविहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्वो खित्तो कालो भावो । दव्वत्रोणं मुसावाए सव्वदव्वेसु, खेत्तो णं मुसावाए लोए वा अलोए वा, कालो णं मुसावाए दिश्रा वा राश्रो वा, भावनो णं मुसावाए रागेण वा दोसेण वा ॥
(स मृषावादः चतुर्विधः प्रज्ञप्तः, तयथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतः भावतः। द्रव्यतः णं मृषावादः सर्वद्रव्येषु, क्षेत्रतःणं मृषावादः लोके वा अलोके वा, कालतः णं मृषावादः दिवा वा रात्री वा, भावतः एं मृषावादः रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते पूर्व जणावेल (मुसावाए ) मृषावाद (चउन्बिहे ) चार प्रकारे (पश्नत्ते) को छे. (तं जहा) ते आ प्रमाणे- (दव्वओ) द्रव्यथी-द्रव्यने आश्रीने (खित्तओ) क्षेत्रथी-क्षेत्रने आश्रीने (कालो) काळथी-काळने आश्रीने अने (भावमो) भावथी-भावने आश्रीने. तेमा ( दवमो णं) द्रव्यने आश्रीने (मुसावाए) मृपावाद (सन्वदन्वेसु) धर्मा- स्तिकाय अधर्मास्तिकायादिक सर्व द्रव्यने विषे-ते संबंधी अन्यथा प्ररूपणा करवाथी थाय छे. (खेत्तओ ) क्षेत्रने पाश्रीने (मुसावाए ) मृषावाद (लोए वा ) लोकने विषे अथवा (अलोए वा) अलोकने विपे बोलाय छे. ( कालोणं) काळने आश्रीने (मुसावाए ) मृपावाद( दिया वा) दिवसने विपे अथवा (राओ वा) रात्रिने विषे बोलाय छे. अने (भावओ णं) भावने आश्रीने (मुसावाए) मृषावाद (रागेण वा) माया अने लोभरूप रागवडे बोलाय छे. एटले के पोते ग्लान नहीं छता हुं ग्लान छु, खप नहीं छतां मारे अमुक वस्तुनो खप छ, अथवा भिक्षाटन करवामां आळस आववाथी मारा पग दुःखे के विगेरे माया वडे मृषावाद बोलाय छे तथा लोमथी एटले सारा अन्ननो लाभ थवाथी बीजा एषणीय अंत प्रांत आहारने आ अनेषणीय छ एम कहेवाय छे. अथवा ( दोसेण वा) क्रोध अने मान खरूपवाळा उपवडे मृषावाद बोलाय छे. एटले के क्रोधथी अन्यने 'तुं दास छे' एम कहे अने मानथी पोते बहुश्रुत नहीं बता हुं बहुश्रुत छु' एम बोले. अहीं उपलक्ष- सूत्र नु हित - थी भयवडे तथा हास्य विगेरेवडे पण मृषावाद बोलाय के एम जाणी लेवू. ते आ प्रमाणे-कांइक अकार्य करीने पछी प्रायश्चित्तना भयने लीधे ' में कयु नथी' एम बोले. एज रीते कोइनी हांसी करवा विगेरेमां पण असत्य बोले. अहीं द्रव्य अने भावथी चार भांगा थइ शके छे. ते आ प्रमाणे-कोइ द्रव्यथी मृषावाद बोले पण भावथी न बोले १, कोइ भावथी बोले पण द्रव्यथी न बोले २, कोइ भावथी अने द्रव्यथी बनेथी मृषावाद बोले ३, अने कोइ द्रव्यथी अने भावथी बन्नेथी मृपावाद न बोले. ४. उदाहरण-कोइ हिंसक व्याधे कोइ पुरुपने वनमां पूछयु के-"अहींथी मृगोने जतां तें जोया छ ? ते सांभळी दयाना परिणामथी ते जोया छतां 'नथी जोया' एम कहे. आ द्रव्यथी मृपावाद कहेवाय छे ? कोइ पुरुष अ- सत्य बोलवाना परिणामवाळो छतां बोलती वखते सहसात्कारथी सत्य बोली गयो, पण तेने भावथी ते मृषावाद लाग्युं २. कोइ पुरुष हुं असत्य बोलीश एवो विचार करी बोलती वखते पण असत्य बोले, तेने द्रव्य अने भाव ए बनेथी मृषावाद लागे छे. ३ चोथो भांगो शून्य ज छे. केमके तेमां द्रव्यथी ने भावथी मृषावाद न बोलवानी वात छे. सू०-जं मए इमस्सधम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालरकणस्स सच्चाहिट्ठिअस्स विणयमूलस्स खतिप्पहाणस्स अहिरणसोवनिअस्स उवसमपभवस्स नवबंभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्स भिरकावि- तिअस्स कुरकीसंबलस्त निरग्गिसरणस्त संपरकालिअस्स चचदोसस्त गुणग्गाहिअस्स निव्विारस्त निवित्तीलकणस्स पंचमहव्वयजुत्तस्त असंनिहिसंचयस्स अविसंवाइस्स संसारपारगामिअस्स निव्वा- णगमणपज्जवसाणफलस्स पुट्विं अन्नाण्याए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेण वा पमा एणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगराए चउक्कसाओवगएणं पंचिंदिनोवसट्टेणं पडुप्पन्नभारिपाए सायासोरकमणुपालयंतेणं इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु मुसावाओ भासियो वा भासावित्रो वा भासिजंतो वा परेहि समणुन्नाओ तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं । अईनं निंदामि पडुप्पन्नं संवरेमि अणागयं पच्चरकामि सव्वं मुसावायं । जावजीवाए अणिस्सिो हं नेव सयं मुसं वएज्जा, नेवन्नेहि मुसं वायावेज्जा, मुसं वयंते वि अन्ने न समणुजाणामि । तं जहा-अरिहंतसरिक सिद्धसकियं साहुसरिक देवसरिक अप्पसरिक । एवं भवइ भिरकू वा भिरकुणी वा संजयविरयपडिहयपच्चरकायपावकम्मे दिया वा राश्रो वा एगो वा परिसागो वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु मुसावायस्त वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए प्राणुगामिए सव्वेसिं पाणाणं सव्वेसिं भूआणं सव्वेसि जीवाणं सव्वेसिं स- त्ताणं अदुरकणयाए असोअणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरिश्रावणयाए अणो- .
इवणायाए महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दुरकरकयाए | कम्मरकयाए मोरकाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणयाए त्ति कटु उवसंपजित्ताणं विहरामि । दोचे भंते महव्वए उवठिोमि सव्वाओ मुसावायाओ वेरमणं ॥ (एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत् ) आ सर्व सूत्रनो अर्थ पूर्वनी जेम जाणवो. विशेष ए के जे प्राणातिपातने ठेकाणे मृषावाद शब्द कहेवो. आ व्रतनी आ- राधना जे न करे ते परभवे जिह्वाना छेदने पामे तथा अविश्वास्य अने मूंगो थाय. बीजा व्रतना भांगा ३६ा प्रमाणे छे- क्रोध, लोभ, भय अने हास्यने त्रण योगे गुणवाथी पार थाय. तेने त्रण करणे गुणीए त्यारे छत्रीश थाय. ॥ इति द्वितीयं व्रतम् ॥ ॥अथ तृतीयं व्रतम् ॥ सू०-अहावरे तच्चे भंते महत्वए अदिन्नादाणाओ वेरमणं, सव्वं भंते अदिन्नादाणं पच्च- रकामि । से गामे वा नगरे वा अरन्ने वा अप्पं वा बहुं वा अणुं वा थूलं वा चित्तमंतं वा अचित्त- हित ॥ द्रव्यथी अदत्तादान लागे छे पण भावथी लागतुं नथी १. कोइ भावथी अदत्त ग्रहण करे पण द्रव्यथी न करे. जेम हुं पारकी वस्तु हरण करुं एवो अध्यवसाय छतां पण कोइ माणस ते वस्तु लइ शके नहीं, तेने भावथी अदत्तादान लागे छे पण द्रव्यथी लागतुं नथी. २. कोइ द्रव्यथी अने भावथी बन्ने प्रकारे ग्रहण करे . जेम हुँ परवस्तु ग्रहण करुं एवा अध्यवसायथी ते पर- वस्तु ग्रहण करे तेवा मनुष्यने द्रव्य अने भाव बनेथी अदत्तादान लागे छे. ३. कोइ द्रष्यथी तेमज भावथी पण ग्रहण न करे. आ चोथो भांगो शून्य छे. ४. सू०-जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालकणस्स सच्चाहिअिस्स विणयमूलस्स खंतिप्पहाणस्स अहिरन्नसोवनिअस्स उवसमपभवस्स नवयंभचेरगुत्तस्सअपयमाणस्स भिखावित्तिअस्स कुरकीसंबलस्स निरगिसरणस्स संपरकालिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिअस्स निविपारस्स निवित्ति- लरकणस्स पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्स अविसंवाइयस्स संसारपारगामिअस्स निव्वाणगमण- पज्जवसाणफलस्स पुदिव अन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेण वा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगरुत्राए चउकसाओवगएणं पंचिर्दिोवसट्टेणं पडुपन्नभारियाए सायासोरकमणुपालयंतेण इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु क्ष हु होय, अथवा (अचित्तमंत वा ) अचित्त होय, तेवी (अदिन) अदत्त वस्तुने ( सयं) हुँ पोते (नेव) नहींज (गिएिहजा) ग्रहण करुं. (अनहिं ) बीजा पासे (अदिन्नं) अदत्त वस्तुने (नेव) नहींज (गिएहावेजा) ग्रहण करावं. (अदिनं) अदत्त वस्तुने (गिएहते वि) ग्रहण करता एवा पण (अने) वीजाओने (न समणुजाणामि ) सारा नहीं जा'-अनु- मोदना नहीं करूं. केवी रीते ? (जावजीवाए) जावजीव सुधी (तिविहं.) त्रिविधने (तिविहेणं) निविधे करीने एटले (मणेणं) मनवडे ( वायाए) वचनवडे (काएणं) कायावडे (न करेमि ) अदत्तनुं ग्रहण नहीं करूं, (न कारवेमि) नहीं करावं (करंतं पि) करता एवा पण ( अन्नं) वीजाने (न समगुजाणामि ) अनुमोदना नहीं करूं. (तस्स ) ते अद- त्तादान संबंधी पापने (भंते) हे भगवन् (पडिकमामि ) हुं निषेध करुं छु. (निंदामि ) आत्मानी साक्षीए निंदु छु. ( गरिहामि ) गुरुनी समक्ष गहीं करुं छु. (अप्पाणं) तेवा पापकारी मारा आत्माने ( बोसिरामि) वोसिराई छु-विविध प्रकारे तजु छु. सू०--से अदिन्नादाणे चउबिहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्यत्रो खेत्तो कालो भावओ। दव्वओ णं अदिन्नादाणे गहणधारणिज्जेसु दव्वेसु, खित्तओ णं दिन्नादाणे गामे वा नगरे वा अरन्ने वा, कालोणं अदिन्नादाणे दि वा राओवा, भावो णं अदिन्नादाणे रागेण वा दोसेण वा ॥ (तत् अदत्तादानं चतुर्विध प्रज्ञप्तं, तन्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतः भावतः। द्रव्यतः णं अदत्तादानं ग्रहणधारणीयेषु द्रव्येषु, क्षेत्रतः णं अदत्तादानं ग्रामे वा नगरे वा अरण्ये वा, कालतः णं अदत्तादानं दिवा वा रात्री वा, भावतः णं अदत्तादानं रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते (अदिनाणे) अदत्तादान (चउन्विहे) चार प्रकारे (पन्न) कमु छे. (तं जहा) ते आ प्रमाणे-(दव्वो) द्रव्यथी ( खेत्तो) क्षेत्रथी ( कालो) काळथी अने (भावओ) भावथी. तेमां (दव्वओ णं) द्रव्यने आश्रीने (अदिना- दाणे) अदत्तादान ( गहणधारणिजेसु) ग्रहण करी शकाय अने धारण करी शकाय एवा (दव्वेसु ) द्रव्योपदार्थोने विषे थइ शके छे. अर्थात् धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय विगैरे द्रव्यो ग्रहण के धारण करी शकाता नथी तेथी सर्व द्रव्यने विपे एम कहां नथी. (खित्तो णं) क्षेत्रने आश्रीने (अदिनादाणे ) अदत्तादान (गामे वा) गामने विपे, अथवा (नगरे बा) नगरने विषे, अथवा (अरने वा) अरण्यने विषे थइ शके छे. (कालो णं) काळने आश्रीने (अदिन्नादाणे) अद- त्तादान (दिआ वा ) दिवसे अथवा (रात्रो वा) रात्रीए संभवे छे. ( भावओ णं ) भावने आश्रीने (अदिनादाणे) अदत्ता- दान ( रागेण वा) माया अने लोभरूप रागथी अथवा ( दोसेण वा ) क्रोध अने मानरूप द्वेपथी थइ शके छे. तेमां जनो मायावडे अदत्तने ग्रहण करे ले, लोभवडे वणिक अने चोर विगेरे ग्रहण करे छे, क्रोधवडे राजादिक ग्रहण करे छे, मानवडे अभिमानी पुरुषो अदत्तनुं ग्रहण करी शके छे. तेमज लोभ विना अदत्तादान संभवतुं नथी तेथी माया विगेरेमां पण लोभ तो रहेलोज छ एम जाणवू. अहीं द्रव्य तथा भावने आश्रीने चतुर्भगी प्रमाणे थाय छे-कोइ द्रव्यथी अदत्त ग्रहण करे पण भावथी न करे. जेम रागद्वेष रहित कोइ साधु कोइपण प्रकारे अनुज्ञा लीधा विना तृण प्रमुखने ग्रहण करे, तेने %3D द्रव्यथी अदत्तादान लागे छे पण भावथी लागतुं नथी १. कोइ भावथी अदत्त ग्रहण करे पण द्रव्यथी न करे. जेम हुं पारकी । वस्तु हरण करुं एवो अध्यवसाय छतां पण कोइ माणस ते वस्तु लइ शके नहीं, तेने भावथी अदत्तादान लागे छे पण द्रव्यथी लागतुं नथी. २. कोइ द्रव्यथी अने भावथी बन्ने प्रकारे ग्रहण करे छे. जेम हुँ परवस्तु ग्रहण करुं एवा अध्यवसायथी ते पर- वस्तु ग्रहण करे तेवा मनुष्यने द्रव्य अने भाव वनेथी अदत्तादान लागे छे. ३. कोइ द्रव्यथी तेमज भावथी पण ग्रहण न आ चोथो भांगो शून्य छे. ४. सू०-जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालखणस्स सच्चाहिठिअस्स विणयमूलस्स खंतिप्पहाणस्स अहिरन्नसोवनिअस्स उवसमपभवस्स नवबंभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्स भिखावित्तिअस्स कुरकीसंबलस्स निरगिसरणरस संपरकालिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिअस्स निव्विारस्स निवित्ति- लरकणस्स पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्स अविसंवाइयस्स संसारपारगामिअस्स निव्वाणगमण- पज्जवसाणफलस्स पुट्वि अन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेण वा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगरुपाए चउकसाओवगएणं पंचिदिश्रोवसट्टेणं पडुपन्नभारियाए सायासोरकमणुपालयंतेण इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु .
अदिन्नादाणं गहिरं वा, गाहाविमं वा, घेप्पंतं वा परेहि समणुन्नायं, तं निंदामि, गरिहामि, तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं, अईअं निंदामि, पडुप्पन्नं संवरेमि, अणागयं पञ्चरकामि सव्वं अदि- नादाणं जावज्जीवाए अणिस्सिो हं, नेव सयं अदिन्नं गिण्हेज्जा, नेवन्नेहिं अदिन्नं गिराहाविजा, अ- दिन्नं गिण्हते वि अन्ने न समणुजाणामि, तं जहा-अरिहंतसरिक सिद्धसरिक साहुसरिकअं देव- सरिकअं अप्पसरिकों। एवं भवइ भिकु वा भिस्कुणि वा संजयविरयपडिहयपच्चरकायपावकम्मे दिया वा राओ वा एगो वा परिसागओवा सुत्ते वा जागरमाणे वा। एस खलु अदिन्नादाणस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सव्वेसिं भूत्राणं सव्वेसिं जीवाणं सव्वेसिं सत्ताणं अदुरकणयाए असोअणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरिावण- याए अणुइवणयाए महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिले परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दु- रकरकयाए कम्मरकयाए मोरकाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणाए त्ति कटु उवसंपजित्ताणं विहरामि। तच्चे भंते महव्वए उवट्ठिभोमि सव्वामो अदिन्नादाणामो वेरमणं ॥
(पतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत् ) या सर्व सूत्रनो अर्थ पूर्वनी जेम जाणवो. विशेष ए जे प्राणातिपातने बदले अदत्तादान कहे. जे माणस प्रा व्रतनी आराधना न करे तेने वध, बंधन दारिय, थापणनो नाश विगेरे दोषो ( हानीओ) थाय छे. वीजा व्रतना भांगा ८१ आ प्रमाणे-गाम, नगर, अरण्य, अल्प, बहु, अणु, स्थूल, सचित्त, अचित्त ए नवपदने त्रण जोगे गुणवाथी २७ थाय तेने त्रण करणे गुणवाथी ८१ थाय छे. ॥ इति तृतीयं व्रतम् ॥ । अथ चतुर्थ व्रतम्। सू०-ग्रहावरे चउत्थे भंते महव्वए मेहुणाओ वेरमणं । सव्वं भंते मेहुणं पञ्चरकामि, से दिव्वं वा माणुसं वा तिरिकजोणियं वा नेव सयं मेहुणं सेविजा, नेवन्नेहिं मेहुणं सेवाविजा, मे- हुणं सेवंते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए सिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न क- रेमि, न कारवेमि, करंतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अ- प्पाणं वोसिरामि ॥
(अथापरमिन् चतुर्थे भदन्त महाव्रते मैथुनात् विरमणं, सर्व भदन्त मैथुनं प्रत्याख्यामि । अथ (त- यथा) दिव्यं वा मानुषं वा तैर्यग्योनं वा नैव स्वयं मैथुन सेवे, नैवान्यैः भैथुनं सेवयामि, मैथुन सेवमा- नानपि अन्यान् न समनुजानामि, यावजीवं त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वचसा कायेन न करोमि, न कार- यामि, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिकमामि निन्दामि गहामि आत्मानं व्युत्सृजामि) (अह) हवे (भंते ) हे भगवन् (अवरे ) अन्य ( चउत्थे ) चोथा ( महव्वए) महाव्रतने विषे (मेहुणाओ) मैथुन थकी ( वेरमणं ) सर्वथा विरमबुं एम भगवंते का छे. तेथी (भंते ) हे भगवन् (सळ ) समग्र ( मेहुणं ) मैथुनने (पञ्च- कामि) हुं निषेधुं छु. (से) ते आ प्रमाणे-(दिव्वं वा) देव संबंधी, अथवा ( माणुसं वा) मनुष्य संबंधी, अथवा (तिरिकजोणिरं वा) तिर्यचयोनि संबंधी ( मेहुणं) मैथुनने ( सयं) हुं पोते (नेव) नहींज (सेविजा) सेवु. (अन्नेहिं) बीजा पासे ( मेहुणं ) मैथुनने (नेव ) नहींज (सेवाविजा) सेवरावू. ( मेहुणं ) मैथुनने ( सेवंते वि) सेवता एवा पण (अने) बीजाओने (न समणुजाणामि) अनुमोदना नहीं आपु. केवी रीते ? (जावजीवाए ) जावजीव सुधी (तिविहं) त्रिविधने (तिविहेणं) त्रिविधे करीने एटले (मणेणं) मनवडे (वायाए ) वचनवडे (काएणं) कायावडे (न करेमि) मैथुनने नहीं करूं. (न कारवमि ) नहीं करावं. ( करतं पि अन्न) करता एवा पण बीजाने (न समणुजाणामि) अनुमोदना नहीं आपुं. (तस्स) ते मैथुन संबंधी पापने (भंते) हे भगवन् (पडिकमामि) हुं निषेधुं छु. (निंदामि ) आत्मानी साक्षीए निंदु छु. (गरिहामि) गुरुनी समक्ष गर्दी करुं छु. अने (अप्पाणं वोसिरामि) तेवा पापकारी मारा आत्माने वोसिराचं छु-तनुं छु.
सू० से मेहुणे चउब्विहे पन्नते, तं जहा-दव्वओ खित्तो कालो भावो । दव्वश्रो णं मेहुणे रूवेसु वा रूवसहगएसु वा । खित्तो णं मेहुणे उद्दलोए वा अहोलोए वा तिरिअलोए वा। कालो णं मेहुणे दिश्रा वा राओ वा। भावो णं मेहुणे रागेण वा दोसेण वा ॥ (तत् मैथुनं चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतः भावतः। द्रव्यतः णं मैथुनं रूपेषु वा रूपसहगतेषु वा । क्षेत्रतःणं मैथुनम् ऊर्ध्वलोके वा अधोलोके वा तिर्यरलोके वा।कालतः णं मैथुनं दिवा वा रात्रौ वा । भावतः णं मैथुनं रागेण वा द्वेषेण वा) ( से ) ते ( मेहुणे ) मैथुन (चउन्विहे ) चार प्रकारे (पन्नते ) कयु छे. (तं जहा) ते आ प्रमाणे-(दव्वओ) द्र. व्यथी (खित्तओ) क्षेत्रथी (कालो) काळथी अने (भावओ) भावथी. तेमां (दव्वओ णं) द्रव्यने आश्रीने ( मेहुणे ) मैथुन ( रूवेसु वा ) चित्रामण आदिक निर्जीव रूपोने विषे अथवा (रूवसहगएसुवा) रूपनी साथे रहेला मनुष्यादिक सी- वने विषे संभवे छे. (खित्तत्रोणं) क्षेत्रने आश्रीने ( मेहुणे ) मैथुन ( उड्डलोए वा ) ऊर्ध्वलोकमां एटले मेरुना वनखंडमां तथा सौधर्म विगेरे देवलोकमां अथवा (अहोलोए वा) अधोलोकमां एटले अधोग्राम-कुबडीविजय तथा भवनपतिना भवन विगेरेमा, अथवा (तिरिअलोए वा) द्वीप, समुद्र, पर्वत विगेरे तिर्छालोकमां संभवे छे. (कालोणं) काळने आश्रीने (मेहुणे) मैथुन (दिवा वा राओ वा) दिवसे अथवा रात्रे संभवे . ( भावमओ णं ) भावने आश्रीने (मेहुणे) मैथुन (रागेण वा) - माया अने लोभ रूप रागवडे अथवा (दोसेण वा) क्रोध अने मानरूप द्वेषपडे संभवे छे. अहीं पण द्रव्यथी भने भावी मैथुननी चतुर्भगी थइ शके छे. तेमां कोइ द्रव्यपी मैथुन सेवे अने भावथी न सेवे, जेमके राग द्वेष रहित कोइ स्त्रीने बळात्कारे कोइ पुरुष सेवे तो ते स्त्रीए द्रव्यथी मैथुन सेव्यु अने भावथी न सेव्यु. १. कोइ भावथी मैथुन सेवे पण द्रव्यथी न सेवे. जेमके कोइने मैथुन सेक्वाना परिणाम थया पण तेनी प्राप्ति थइ नहीं तेने भावथी सेवन थयु अने द्रव्यथी न थयु. २. कोइ भाव अने द्रव्य बन्नेथी मैथुन सेवे छे. ३. तथा कोइ द्रव्य अने भाव बन्नेथी मैथुन सेवता नथी. आ चोथो भंग शून्य छे. सू०-जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालकणस्स सच्चाहिठिअस्स विणयमूल- स्स खंतिप्पहाणस्स अहिरणसोवन्निस्स, भिकावित्तिस्स कुकीसंबलस्स निरग्गीसरणस्स संपरका- लिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिअस्स निग्विारस्स निश्वित्तीलकणस्स पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनि- हिसंचयस्स अविसंवाइस्स संसारपारगामिअस्स निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स पुवि अप्लाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं, अभिगमेण वा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिमारवगरुआए चउक्कसाओवगएणं पंचिदिनोवसट्टेणं पडुप्पन्नभारिआए साया- AJIRARभमस नरभरगुत्तस्य अषमता परम n सोकमणुपालयंतेणं इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु मेहुणं सेविअं वा सेवावित्रं वा सेविजंतं वा परेहि समणुन्नायं तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं। अईअं निंदामि पडुप्पमं संवरेमि अणागयं पञ्चकामि सव्वं मेहुणं । जावज्जीवाए अणिस्सियो हं नेव सयं मेहुणं । सेविजा, नेवन्नेहि मेहुणं सेवाविजा, मेहुणं सेवंते वि अन्ने न समणुजाणामि । तं जहा-अरिहंत-. सखियं सिद्धसरिस्कअं साहुसकिअं देवसस्किअं अप्पसखि अं । एवं भवइ भिरकू वा भिरकुणी वा संजयविरयपडिहयपच्चकायपावकम्मे दिया वाराओ वा एगो वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु मेहुणस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए प्राणुगामिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सव्वेसिं भूत्राणं सव्वेसि जीवाणं सव्वेसिं सत्ताणं अदुकणयाए असोअणयाए अजूरणयाए अतिप्प- णयाए अपीडणयाए अपरिश्रावणयाए अणोदवणयाए महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दुकरकयाए कम्मरकयाए मोकाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणयाए त्ति कट्ठ उवसंपज्जित्ताणं विहरामि। चउत्थे भंते महव्वए उवट्ठिोमि सव्वाओ मेहुणाश्रो वेरमणं ॥ B (एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत् ) या सर्व सूत्रनो अर्थ पूर्वनी जेम जाणवो. विशेष ए छे जे प्राणातिपातने ठेकाणे मैथुन कहेवू. मैथुन सेवनारने आ भवमा तेमज परभवमां वध, बंधन, अपयश, नपुंसकत्व, वांमीयापणुं अने विधवापणुं विगेरे दोषो प्राप्त थाय छे.पा व्रतना २७ भांगा आप्रमाणे-देव, मनुष्य अने तिर्यच एत्रण पदने त्रण जोगे गुणतां ६ थाय तेने त्रण करणे गुणवाथी २७ थाय छे. ॥ इति चतुर्थ महाव्रतम् ॥ ॥ अथ पञ्चमं महाव्रतम् ॥ सू०-अहावरे पंचमे भंते महव्वए परिग्गहाओ वेरमणं, सव्वं भंते परिग्गहं पच्चरकामि, से अप्पं वा बहुं वा अणुं वा थूलं वा चित्तमंतं वा अचित्तमंतं वा, नेव सयं परिग्गहं परिगिरहेजा, नेवन्नेहिं परिग्गहं परिगिण्हाविजा, परिग्गहं परिगिण्हते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि, न कारवेमि, करंतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥
(अथापरस्मन् पञ्चमे भदन्त महाव्रते परिग्रहाद्विरमणं, सर्व भदन्त परिग्रहं प्रत्याख्यामि, अथ तयथा) अल्पं वा बहु वा अणु वा स्थूलं वा चित्तवद्वा अचित्तवद्वा नैव स्वयं परिग्रहं परिगृणामि, नैवान्यैः परिग्रहं परिग्राहयामि, परिग्रहं परिग्रहणतोऽपि अन्यान समनुजानामि यावजीवं त्रिविधं त्रिवि- धेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गामि आत्मानं व्युत्सृजामि) ( अह) हवे (भंते) हे भगवन् (अवरे ) अन्य (पंचमे) पांचमा ( महन्वए) महाव्रतने विषे (परिग्गहाओ) परिग्रह थकी (वेरमणं) सर्वथा विरमवू एम भगवंते कयु के तेथी (भंते) हे भगवन् ( सव्वं) समग्र (परिग्गहं) परि- ग्रहने ( पचरकामि ) हुँ निषेधुं छु. (से) ते आ प्रमाणे-(अप्पं वा ) मूल्यथी अल्प, अथवा (बहुं वा) मूल्यथी बहु- बहु मूल्यवाळा, अथवा (अणुं वा) प्रमाणथी नाना, अथवा ( थूलं वा) प्रमाणथी मोटा, ते वळी (चित्तमंतं वा) सचित्त होय, अथवा (अचित्तमंतं वा ) अचित्त होय, तेवा (परिग्गह) धन धान्यादिक परिग्रहने ( सयं) हुं पोते (नेव) नहीं ज ( परिगिरहेजा) ग्रहण करु. (अन्नेहिं ) वीजा पासे (परिग्गहं ) परिग्रहने (नेव) नहीं ज (परिगिबहाविजा ) ग्रहण करावं. ( परिग्गहं ) परिग्रहने (परिगिएहते वि) ग्रहण करता एवा पण (अने) बीजाओने (न समणुजाणामि) अनु- मोदना नहीं करूं. केवी रीते ? (जावजीवाए) जावजीव सुधी (तिविहं) त्रिविधने (तिविहेणं) त्रिविधे करीने, एटले (मणेणं) मनवडे (वायाए ) वचनवडे (कारण) कायावडे (न करेमि) परिग्रहने ग्रहण नहीं करूं (न कारवेमि) नहीं करावं स ति ( करतं पि) करता एवा पण (अन्न) बीजाने (न समणुजाणामि ) अनुमोदना नहीं करु. (तस्स) ते परिग्रह संबंधी पापने (भंते) हे भगवन् ( पडिकमामि) हुँ निषेधुं छु (निंदामि) आत्मसाक्षीए निहुँ छु (गरिहामि ) गुरु समक्ष गाँ करुं छु अने (अप्पाणं ) तेवा पापकारी मारा श्रात्माने (वोसिरामि) वोसरावु छु-विविध प्रकारे तजुं छु। सू०-से परिग्गहे चउविहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्वश्रो खेत्तयो कालो भावओ। दव्वश्रो णं परिग्गहे सचित्ताचित्तमीसेसु दव्वेसु, खेत्तो णं परिग्गहे लोए वा अलोए वा, कालो णं परि- ग्गहे दिवा वा रात्रओ वा, भावो णं परिग्गहे अप्पग्धे वा महन्धे वा रागेण वा दोसेण वा ॥ (स परिग्रहः चतुर्विधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतः भावतः । द्रव्यतः णं परिग्रहः स- चित्ताचित्तमिश्रेषु द्रव्यषु, क्षेत्रतः णं परिग्रहः लोके वा अलोके वा, कालतःणं परिग्रहः दिवा वा रात्री वा, भावतः णं परिग्रहः अल्पार्धे वा महार्थे वा रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते (परिम्गहे) परिग्रह ( चउबिहे ) चार प्रकारनो (पन्नते) कह्यो छे. (तं जहा) ते आ प्रमाणे-दिव्यत्रो) द्रव्यथी (खेत्तओ) क्षेत्रथी (कालओ) कालथी अने (भावओ) भावथी. तेमां (दवओ णं) द्रव्यथी (परिग्गहे) परिग्रह ( सचित्ताचित्तमीसेसु) सचित्त, अचिच अने मिश्र एवा (दब्वेसु) आकाशादिक धर्माधर्मादिक सर्व द्रव्योने विषे थइ शके छे. एटले के गाम, घर, प्रांगणुं विगैरे प्रदेशमा ममता करवाथी आकाशनो परिग्रह थाय छ, गति करवाना प्रदेशमा गुरु भा ममता करवाथी धर्मास्तिकायनो परिग्रह थाय के, कोइ पण स्थानमा बेस, सुवु विगेरे उपर ममता करवाथी अधर्मास्तिकाय द्रव्यनो परिग्रह थाय के माता, पिता, स्त्री, विगेरे उपर ममता करवाथी जीव परिग्रह थाय छ, हिरण्य सुवर्णादिक उपर ममता करवाथी अजीव एटले पुद्गल द्रव्यनो परिग्रह थाय छे, तथा शीतकाळ, उष्णकाळ अने वर्षाकाळ अथवा छए ऋतुमाथी कोइ पण उपर मूळ करवाथी काळद्रव्यनो परिग्रह थाय छे. (खेत्तमओ णं) क्षेत्रथी (परिग्गहे) परिग्रह (लोए वा) लोकने विषे अथवा (अलाए पा) अलोकने विपे थइ शके छे. ( कालओ यं) काळथी (परिगहे) परिग्रह ( दिवा वा ) दिवसे अथवा ( रामओ वा ) रात्रे थइ शके छे. ( भावनो णं) भावथी ( परिग्गहे ) परिग्रह (अप्प- पेवा ) अल्प मूल्यवाळी वस्तु उपर अथवा ( महग्घे वा ) घणा मूल्यवाळी वस्तु उपर थइ शके छ, अथवा ( रागेण वा ) रागवडे अथवा (दोसेण वा ) वीजा उपरना द्वेष वडे थइ शके छे. अहीं पण द्रव्य तथा भावने आश्री चतुर्भगी थाय छे. ते आ प्रमाणे कोइ द्रव्यथी परिग्रह धारण करे छे पण भावथी नयी करतो, जेमके रागद्वेष रहित कोइ साधु द्रव्यथी उप- गरण धारण करे पण तेना पर मूळ नहीं होवाथी भावी परिग्रहधारी नथी. १. कोइ भावथी परिग्रह धारण करे पण द्रव्यथी न करे. जेमके कोइने अमुक वस्तुपर मूळ छे पण तेने तेनी प्राप्ति न थाय, तो तेने भावथी परिग्रह छ पण द्रव्यथी नथी. २. कोइने द्रव्यथी अने भावयी पण पारग्रह होय छे जेमके कोइने कोइ वस्तुपर मूळ होय अने ते वस्तु तेने प्राप्त थाय तो तेने द्रव्यथी अने भावथी परिग्रह होय छे. ३ द्रव्यथी पण परिग्रह न होय अने भावथी पण परिग्रह न होय ए चोथो भंग शून्य छे. सू०-जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्त अहिंसालरकणस्त सच्चाहिट्ठिअस्स विणयमूलस्स खंतिप्पहाणस्त अहिरमसोवन्निअस्त उवसमपभवस्त नवबंभचेरगुत्तस्त अपयमाणस्त भिरकावित्तिा- स्त कुकीसंबलस्त निरग्गिसरणस्त संपकालिग्रस्त चत्तदोलस्त गुणग्गाहिअस्स निव्विारस्त नि- वित्तीलकणस्त पंचमहव्ययजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्त अविसंवाइस्स संसारपारगामिअस्स निव्वाणग- मणपज्जवसाणफलस्स पुट्विं अण्णाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं, अभिगमेण वा पमा- एणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए कियाए तिगारवगरुबाए चउकसाओवगएणं पंचिदिओवसट्टेणं पडुप्पन्नभारिआए सायासोरकमणुपालयंतेणं इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु परिग्गहो गहिरो वा गाहावित्रो वा धिप्पंतो वा परेहि समणुनाओ तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं । अईअंनिंदामि पडुप्पण्णं संवरेमि अणागयं पच्चरकामि सव्वं प- रिग्गहं । जावज्जीवाए अणिस्सिओ हं नेव सयं परिग्गहं परिगिण्हेजा, नेवन्नेहिं परिग्गहं परिगिण्हा- वेजा, परिग्गहं परिगिण्हते वि अन्ने न समणुजाणिज्जा। जहा-अरिहंतसकिअं सिद्धसरिक सा- हुसकिअं देवसकिअं अप्पसरिकअं । एवं भवइ भिकू वा भिरकूणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चरका- २ यपावकम्मे दिया वा रामओ वा एगमो का परिसागमो वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु परि- ग्गहस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए प्राणुगामिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सव्वेसिं भूत्राणं सब्वेसिं जीवाणं सव्वेसिसत्ताणं अदुकणयाए असोश्रणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरिश्रावणयाए अणुदवणयाए महत्थे महागुणे महागुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दुककयाए कम्मरकयाए मोस्काए बोहिलाभाए संसारुत्तारणयाए त्ति कटु उवसंपजित्ता णं विहरामि । पंचमे भंते महठवए उवट्ठिओमि सव्वाभो परिग्गहाओ वेरमणं ॥ (एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत्) श्रा सर्व सूत्रनो अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो. मात्र प्राणातियातने ठेकाणे परिग्रह शब्द कहेवो. परिग्रह धारण करनारने वध, बंधन, मारण, दुःखीपणुं अने नरकगति विगेरे दोषो प्राप्त थाय छे. पांचमा व्रतना ५४ भांगा ा प्रमाणे थाय छ- अल्प, बहु, अणु, स्थूळ, सचित्त अने अचित्त ए छ पदने त्रण जोगे गुणतां१८थाय. तेने त्रण करणे गुणवाथी ५४ थाय छे. ॥ इति पञ्चमं महाव्रतम् ॥
। अथ षष्ठं व्रतम् । सू०-अहावरे छठे भंते वए राईभोश्रणाश्रो वेरमणं, सव्वं भंते राईभोअणं पचकामि, से असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा, नेव सयं राइं भुंजेज्जा, नेवन्नेहिं राइं भुंजावेज्जा, राई भुंजते वि अण्णे न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न करेमि न कार- वेमि करतं पिअन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ (अथापरस्मिन् षष्ठे भदन्त व्रते रात्रिभोजनात् विरमणं, सर्व भदन्त रात्रिभोजनं प्रत्याख्यामि, अथ (तद्यथा)-अशनं वा पानं वा खायं वा स्वाद्य वा, नैव स्वयं रात्री भुजे, नैवान्यै रात्रौ भोजयामि, रात्रौ भुञ्जानानपि अन्यान्न समनुजानामि, यावजीवं त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गामि आत्मानं व्युत्सृजामि) (अह) हवे ( भंते ) हे भगवन् (अवरे ) अन्य (छ8) छठा (वए) व्रतने विषे ( राइभोप्रणाओ) रात्रिभोजन- थकी (वेरमणं ) वीरसुं छु. ते रात्रिभोजन चार रीते थाय छे-रात्रिए ग्रहण करी रात्रे ज खाय १, रात्रे ग्रहण करी दिवसे भ खाय २, दिवसे ग्रहण करी रात्रे खाय ३ अने दिवसे ग्रहण करी दिवसे खाय ४. आमांनो छेल्लो चोथो प्रकार शुद्ध पहेलाना त्रण प्रकार रात्रिभोजनमां गणाय छ, आवी रीतना रात्रिभोजनथकी (वेरमणं ) सर्वथा विरमq एम भगवंते कह्यु के तेथी (भंते ) हे भगवन् ( सव्वं ) सर्वथा (राईभोअणं ) रात्रिभोजनने (पञ्चरकामि) हुँ निषेधुं छु. (से) ते आ प्रमाणे--(असणं वा ) भात दाळ विगेरे अशन अथवा ( पाणं वा) पाणी विगेरे सर्व जातना पान, अथवा (खाइमं वा) खर्जूर विगेरे खाद्य अथवा ( साइमं वा) तांबूलादिक खाद्य पदार्थोनुं ( सयं ) हुं पोते ( राई रात्रे (नेव) नहींज (मुंजे- जा) भोजन करूं, (अन्नेहिं ) बीजाने (राई) रात्रे (नेव) नहींज (भुंजावेजा) भोजन करावं, (राई) रात्रे (मुंजते वि) जमता एवा पण (अण्णे ) बीजाओने (न समणुजाणामि) अनुमोदना नहीं करूं. केवी रीते ? (जावजीवाए ) जाव- जीव सुधी (तिविहं ) त्रिविधने (तिविहेणं ) त्रिविधे करीने एटले (मणेणं) मनवडे (वायाए ) वचनवडे (काएणं) कायावडे (न करेमि ) भोजन नहीं करूं, (न कारवेमि) वीजाने भोजन नहीं करावं, ( करतं पि) भोजन करता एवा पण (अन्न) बीजाने (न समणुजाणामि ) अनुमोदना नहीं करूं. (तस्स) ते रात्रिभाजन संबंधी पापने (भंते ) हे भगवन् (पडिकमामि ) हुं निषेधुं छु, (निंदामि ) आत्मसाक्षीए निंदु ( गरिहामि) गुरु समक्ष गर्दा करूं छु, अने (अप्पाणं) तेवा पापकारी मारा आत्माने (वोसिरामि) विविध प्रकारे तनुं छं. सू०-से राईभोषणे चउविहे पन्नत्ते, तं जहा दव्यत्रो खेत्तो कालो भावो। दव्य- 8 औसामध्यमां रात्रि व्यत्तिकमावीने धीजे दिवसे खाय तो आ भागो संभवे छे. परंतु ते दरेक पदार्थ साटे संभवतो नश्री.
ओ णं राईभोषणे असणे वा पाणे वा खाइमे वा साइमे वा, खित्तो णं राईभोषणे समयखित्ते, कालोणं राईभोषणे दिवा वा राओ वा, भावो णं राईभोश्रणे तित्ते वा कडुए वा कसाए वा अंबिले वा महुरे वा लवणे वा रागेण वा दोसेण वा ॥ (तत् रात्रिभोजनं चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतः भावतः । द्रव्यतः णं रात्रिभो- जनम् अशने वा पाने वा खाये वा खाये वा, क्षेत्रतः णं रात्रिभोजनं समयक्षेत्रे, कालतः पं रात्रिभोजनं दिवा वा रात्रौ वा, भावतः णं रात्रिभोजनं तिक्ते वा कटुके वा कपाये. वा अम्ले वा मधुरे वा लवणे वा रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते (राईभोअणे ) रात्रिभोजन ( चउबिहे) चार प्रकारे (पनते) कहेलु छे. (तं जहा)ते मा प्रमाणे- (दव्वओ) द्रव्यथी (खेत्तओ) क्षेत्रथी (कालमो) कालथी (भावो) भावथी, तेमां (दव्यओ णं) द्रव्यथी (राई- भोप्रणे) रात्रिभोजन (असणे वा ) अशनने विपे अथवा (पाणे वा) पानने विपे अथवा (खाइमे वा) खाधने विषे अथवा ( साइमे वा ) स्वाधने विषे संभवे छे. (खित्तमओ णं) क्षेत्रथी (राईभोअणे) रात्रिभोजन (समयखिते) समय १ क्षेत्र जे अढी द्वीप अने वे समुद्र तेने विषे संभवे छे. ( कालमो णं) काळथी ( राईभोरणे) रात्रिभोजन (दिया वा) दिवसे अथवा (राओ वा) रात्रे थइ शके छे. (भावओ णं) भावथी (राईभोअणे) रात्रिभोजन (तिचे वा) लींबडो विगेरे कडवा पदार्थने विषे, अथवा (कडए वा) भादु विगेरे तीखा पदार्थने विषे, अथवा (कसाए वा) वाल विगेरे कपायला-तुरा पदार्थने विषे, अथवा ( अंबिले वा) छाश विगैरे खाटा पदार्थने विषे, अथवा ( महुरे वा) दूध विगेरे म- धुर पदार्थने विषे, अथवा ( लवणे वा ) लवण विगेरे खारा पदार्थने विष संभवे छे. ते पण ( रागेण वा) रागवडे करीने अथवा ( दोसेण वा ) द्वेषवडे करीने संभवे छे. वहीं पण द्रव्य श्रने भाव आश्री चार भंग थइ शके छे. ते आ प्रमाणे- कोइ द्रव्यथी रात्रिभोजन करे पण भावी न करे, जेमके राग द्वेष विना कोइ माणस सूर्य नहीं उग्या छतां उग्यो मानीने अथवा सूर्य अस्त थया छतां अस्त थयो नथी एम मानीने रात्रिभोजन करे अथवा तो सबळ कारणने लइने रात्रिभोजन करे तेने द्रव्यथी रात्रिभोजननो दोष लागे छे पण तेवा अध्यवसाय नहीं होवाथी भाव आश्री दोष लागतो नथी. १. कोइ भावथी रात्रिभोजन करे पण द्रव्यथी न करे, जेमके हुँ रात्रिए जमीश ए प्रमाणे अध्यवसाय करे पण रात्रिए तेने भोजन मळे नहीं, तेने भावी रात्रिभोजन थयुं पण द्रव्यथी न थयु. २. कोइ द्रव्यथी अने भावथी पण रात्रिभोजन करे, जेमके कोइ रात्रे जमवानो विचार करी रात्रे ज जमे तेने द्रव्यथी अने भावथी रात्रिभोजननो दोष लागे छे. ३. कोइ द्रव्यथी अने भावथी पण रात्रिभोजन न करे, ए चोथो भंग शून्य छे. सू०-जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालकणस्स सच्चाहिट्ठिअस्स विणयमू- लस्स खंतिप्पहाणस्स अहिरासोवनिअस्स उवसमपभवस्स नवबंभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्स भिका- वित्तिस्स कुकीसंबलस्स निरग्गिसरणस्स संपकालिअस्स चत्तदोसस्स गुणगाहिस्स निविश्रा- रस्स निवित्तीलकणस्सपंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचयरस अविसंवाईअस्स संसारपारगामिअस्स निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स पुवि श्रमाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेण वा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगरुबाए चउकसा- मोवगएणं पंचिंदिनोवसट्टेणं पडुप्पन्नभारिश्राए सायासोकमणुपालयंतेणं इह वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु राईभोगणं भुत्तं वा भुंजाविध वा मुंजतं वा परेहि समणुन्नायं तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं। ईशं निंदामि पडुप्पाही संवरेमि अणागयं पञ्चकामि सव्वं राईभोअणं ।जावज्जीवाए अणिरिसओ हं नेवसयंराईभोअणं भुजेज्जा, नेवन्नेहिं गईभोअणं भुंजावेजा, राईभोअणं भुंजते वि अन्ने न समणुजाणिज्जा। तं जहा-अरिहंतसरिक सिद्धसकिअं साहुसकिअं देवसरिकअं अप्पसलि। एवं भवइ भिकू वा भिकुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चकायपावकम्मे दिया वा रात्रो वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु राईभोअणस्स वेरमणे हि सुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सब्वेसिं भूआणं सव्वेसिं हित ॥ जीवाणं सव्वेसि सत्ताणं अदुकणयाए असोयणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अप- रियावण याए अणुदवणयाए महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थेतं दुकरकयाए कम्मरकयाए मोकाए बोहिलाभाए संसारुतारणयाए ति कडु उवसंपजित्ताणं विहरामि । छठे भंते वए उवट्ठिओमि सव्वाओ राईभोगणाओ वेरमणं ॥ (एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत्) आ सर्व सूत्रनो अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो. विशेष ए के प्राणातिपातने ठेकाणे रात्रिभोजन कहेवू. आ व्रत पांच महा- व्रतोनी साथे कह्यं तेनुं कारण ए छे जे पहेला तीर्थकरना तीर्थना साधुओ ऋजुजड होय छे अने चरम तीर्थकरना तीर्थना साधु वक्रजड होय छे तेमने आ व्रत मूळ गुणमां जाणवा छे. तथा मध्यम चावीश तीर्थकरना तीर्थना साधुओ ऋजुप्राज्ञ होवाथी तेमनी अपेक्षाए उत्तर गुणमां जाणवानुं छे. रात्रिभोजन करनारने कीडी, पतंग विगैरेनी हिंसानो दोष लागे छे. आ छठा व्रतना भांगा ३६ आ रीते थाय छे-अशन, पान, ख़ाध अने खाद्यने त्रण जोगे गुणतां बार थाय, तेने त्रण करणे गुणतां छत्रीश थाय. छए व्रतोना मळीने २७० भांगा थाय छे. ॥ इति षष्ठं व्रतम् ॥
WAN हवे सर्व व्रतोनो स्वीकार एक साथे कहे छे.- सू०-इच्चेइयाइं पंच महव्वयाई राईभोगणवेरमणछट्ठाई अत्तहिअट्ठाए उवसंपजित्ताणं विहरामि॥ (इत्येतानि पञ्च महावतानि रात्रिभोजनविरमणषष्ठानि आत्महितार्थाय उपसंपद्य विहरामि) ( इन्चेइयाई ) आ पूर्वे कहेला ( राईभोअणवेरमणछट्ठाई ) रात्रिभोजन विरमण छे छई जेमां एवां (पंच महव्वयाई) पांच महाव्रतोने (अत्ताहिअट्ठाए ) आत्माने हितकारक जे मोक्ष तेने अर्थे (उपसंपजिताणं ) अंगीकार करीने (विहरामि) हुं विचरुं छु एटले सुसाधुना विहारवडे वर्तु छु. कारणके विहारने भभावे अंगीकार करेला व्रतोनो पण अभावनो प्रसंग आवे छे-संभवे छे. हवे अनुक्रमे महाव्रतोना अतिचारो बतावे छे.- अप्पसत्था य जे जोगा, परिणामा य दारुणा । पाणाइवायस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥१॥ (अप्रशस्ताश्च ये योगा परिणामाश्च दारुणाः। प्राणातिपातस्य विरमणे एष उक्तः अतिक्रमः॥१॥ (अप्पसत्था य) हिंसाना हेतुरुप होवायी अप्रशस्त एवा (जे)जे (जोगा) यतना विना चालवू बोलवू विगेरे योगो व्यापारो छे, तथा ( दारुणा) भयंकर एवा (परिणामा य) जे प्राणीनो घात करवाना अध्यवसायो छे, (एस) ते - धातु हित मा (पाणाइवायस्स) प्राणातिपातना (वेरमणे) विरमणने विषे (अंइंकमे) अतिक्रम-अतिचार (युत्ते) भगवते कहा मा प्रमाणे जाणीने तेवा योग भने अध्यवसायनो त्याग करवो. १ हवे बीजा व्रतने आश्री कहे छे.- तिव्वरागा य जा भासा, तिव्वदोसा तहेव य । मुसावायरस वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥२॥ (तीवरागा च या भाषा तीब्रद्वेषा तथैव च । मृषावादस्य विरमणे एष उक्तः अतिक्रमः॥२॥) (तिव्वरागा य) ताव रागवाळी (तहेव य ) तेमज (तिव्वदोसा) तीव्र द्वेषवाळी (जा) जे (भासा) भाषा बोलवामां भावे, (एस) ते आ (मुसावायस्स) मृषावादनी (वेरमणे विरतिने विषे (अइकमे) अतिक्रम-देशथी भंग अथवा सर्वथी भंग (वुत्ते ) जिनेश्वरोए कह्यो के. एम धारी तेनो त्याग करवो. २ हवे त्रीजा व्रतने आश्री कहे छे.- उग्गहं च अजाइत्ता, अविदिण्णे य उग्गहे । अदिण्णदाणरस वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥ ३ ॥ (भवग्रहं च अयाचित्वा अविदत्ते च अवग्रहे । अदत्तादानस्य विरमणे एष उक्तः अतिक्रमः॥३॥) ( उग्गहं च ) भवग्रहने-उपाश्रयने (अजाइत्ता) याचना कर्या विना-खामीनी आज्ञा लीधा विना तेमां जे रहे, तथा (आवदिखे य) अवग्रहना खामीए नहीं आयेला ( उग्गहे ) अवग्रहने विषे एटले अवग्रहनी मर्यादामा जे काइ चेष्टा करवी. (एस) ते आ (अदिणादाणस्स) भदत्तादाननी (वेरमणे) विरतिने विषे (अइफमे) भतिक्रम-मतिचार ( वुत्ते) कहो . ३ हवे नोथा व्रतने आश्री कहे छे.---- सदारूवारसागंधा-फासाणं पवियारणे । मेहुणस्स वेरमणे, एस वुत्ते श्रइकमे ॥ ४ ॥ (शब्दरूपरसगन्धस्पर्शानां प्रविचारणा। मैथुनस्य विरमणे एष उक्तः अतिक्रमः॥४॥) (सहा) वेणु, वीणा, सीना गीत विगेरे शब्दो, (रूवा) स्त्री श्रादिकनां मनोहर रूपो, ( रसा) मधुरादिक रसो, (गंधा) पुष्पनी माळा, चंदन विगेरेना गंधो तथा ( फासाणं) कोमळ तळाइ अने स्त्री आदिकना कोमळ स्पर्शो ए पांचे विषयोनी जे (पवियारणे ) रागथी सेवा (एस) ते आ (मेहुणस्स) मैथुननी (वेरमणे) विरतिने विषे (अइकमे) अतिक्रम-अतिचार (वुत्ते) कयो छे. ४ हवे पांचमा परिग्रह व्रतने आश्री कहे छे. इच्छा मुच्छा य गेही य, कंखा लोभे य दारुणे। परिग्गहस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥५॥ (इच्छा मूर्छा च गृद्धिश्च कांक्षा लाभश्च दारुणः। परिग्रहस्य विरमणे, एष उक्तः अतिक्रमः॥५॥) (इच्छा ) नहीं प्राप्त थयेला कोइ पण पदार्थनी प्रार्थना तथा ( मुच्छा य ) नाश पामेला पदार्थनी मूर्खा-शोक करवो तानु- हित ते तथा (गेही य ) विद्यमान पदार्थ उपर आसक्ति तथा (खा) नहीं प्राप्त थयेला विविध पदार्थनी आकांक्षा रूप जे (दारुणे) तीन (लोभे य) लोभ (एस) ते आ (परिग्गहस्स) परिग्रहनी ( वेरमणे) विरतिने विषे ( अइकमे) अतिक्रम (वुत्ते) तीर्थकरोए कहेलो छे. तेथी तेनो त्याग करको. ५ हवे छठा व्रतने आश्री कहे छे.- अइमत्ते य आहारे, सूरखित्तम्मि सकिए। राईभोयणस्त वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥ ६ ॥ (अतिमात्रश्च श्राहारः सूरक्षेत्रे शङ्किते । रात्रिभोजनस्य विरमणे एष उक्तः अतिक्रमः ॥ ६॥) (अइमते य ) प्रमाणयी अधिक एटले जे आहारनो राने ओडकार आवे एवो जे (आहारे ) आहार कर्यो होय तथा (वरखित्तम्मि) सूर्यतुं क्षेत्र-उदय अने अस्तवालं आकाश क्षेत्र जे ते (संकिए ) सूर्य उग्यो छे के नहीं ? अथवा सूर्य अस्त थयो छे के नहीं ? ए प्रमाणे शंकित एटले शंकाचालं सते जे आहार करवो (एस) ते आ (राईभोयणस्स) रात्रिभोजननी (वेरमणे ) विरतिने विषे ( अइक्कमे ) अतिचार (वुत्ते ) कह्यो छे. माटे तेवो आहार वर्जवो. ६. आ प्रमाणे महाव्रतोना अतिचार कह्या. हवे ते ज व्रतो जे प्रकारे अतिचार रहित पाळेलां थाय ते कहे छे-- दसणनाणचरित्ते, अविराहित्ता ठिो समणधम्मे। पढमं वयमणुरके, विरयामो पाणाइवायाओ॥१॥ (दर्शनज्ञानचरित्राणि अविराध्य स्थितः श्रमणधर्मे। प्रथमं व्रतमनुरक्षामि विरतोऽस्मि प्राणातिपातात्) (दसणनाणचरित्ते) समकित दर्शन, मतिज्ञानादिक ज्ञान अने सामायिकादिक चारित्रने (अविराहित्ता) नहीं विरा- धीने एटले परिपालन करीने (समणधम्मे ) साधुना धर्मने विषे (ठिओ) रह्यो एवो हुँ ते (पढम) पहेला (वयं ) व्रतर्नु (अणुरके ) रक्षण करुं छु एटले अतिचार रहित पालन करुं छु. (पाणाइवायाओ) प्राणातिपात-जीवहिंसा थकी (विर- यामो) हुं विरम्यो छु. १. दसणनाणचरित्ते, अविराहित्ता ठिो समणधम्मे । बीयं वयमणुरके, विरयामो मुसावायाभो ॥२॥ दसणनाणचरित्ते, अविराहित्ता ठिो समणधम्मे। तइयं वयमणुरके, विरयामो अदिन्नादाणाश्रो ॥३॥ दसणनाणचरित्ते, अविरहित्ता ठिो समणधम्मे । चउत्थं वयमणुरके, बिरयामो मेहुणाओ ॥४॥ दसणनाणचरित्ते, अविराहिता ठिो समणधम्मे । पंचमं वयमणुरके, विरयामो परिग्गहारो॥५॥ दसणनाणचरित्ते, अविराहित्ता ठिो समणधम्मे। छठं वयमणुरके, विरयामो राईभोयणाश्रो ॥६॥ (अस्य गाथापञ्चकस्य संस्कारः पूर्ववत् ) आ पांचे गाथानो अर्थ पहेली गाथा प्रमाणे जाणवो. विशेष ए के पहेला व्रतने ठेकाणे अनुक्रमे वीर्जु, त्रीजु, चोथु, पांचसु अने छहुं व्रत कहेवं, तथा प्राणातिपातने ठेकाणे अनुक्रमे मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह अने रात्रिभोजन कहवु. २-३-४-५-६.
नु
हित
॥
हवे बीनी रीते पण महाव्रतोनुं रक्षण कहे छे-
बालयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिो समणधम्मे। पढमं वयमणुरके, विरयामो पाणाइवायाभो॥१॥
(श्रालयविहारसमितो युक्तो गुप्तः स्थितः श्रमणधर्मे। प्रथमं व्रतमनुरक्षामि विरतोऽस्मि प्राणातिपातात)
(आलय ) समग्र दोष रहित उपाश्रयने सेवनारो, (विहार) शास्त्रमा कह्या प्रमाणे विहार करतो, ( समिओ) इर्या
आदिक पांच समितिए सहित, ( जुत्तो) युक्त एटले अचेलपj, अस्नान, पृथ्वीपर शयन करवू, दातण न कर, मस्तक
दाढी मूल मुंडाववा नहीं, भिक्षा मागवी, तथा क्षुधा, पिपासा, शीत, आतप विगेरे परिसहो सहन करवां अने गुरुकुळमां
वसईं ए विगेरे साधुना गुणोथी युक्त-सहित, (गुत्तो) त्रण गुसिए गुस-सहित तथा (समणधम्मे) क्षांति आदिक साधुना
धर्ममां (ठिो ) रह्यो एवो हुँ (पढम) पहेला (वयं ) व्रतनुं (अणुरक्खे ) रक्षण करूं छु (पाणाइवायाओ) प्राणाति-
पात थकी (विरयामो) हुं विरम्यो छु. १.
आलयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिो समणधम्मे।बीयं वयमणुरके, विरयामो मुसावायाओ ॥२॥
आलयविहारसमिझो,जुत्तोगुत्तो ठिोसमणधम्मे।तइयं वयमणुरके, विरयामोअदिन्नादाणाओ॥३॥
आलयविहारसमिश्रो, जुत्तो गुत्तो ठिश्रो समणधम्मे। चउत्थं वयमणुरस्के, विरयामो मेहुणाश्रो ॥४॥
पालयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिमो समणधम्मे। पंचमं वयमणुरके, विरयामो परिग्गहाभोग॥५॥
श्रालयविहारसमित्रो, जुत्तो गुत्तो ठिमो समणधम्मे। छठं वयमणुरके, विरयामोराईभोयणाभो॥६॥ (गाथापञ्चकस्य संस्कारः पूर्ववत् ) मा पांचे गाथानो अर्थ पहेली गाथानी जेम जाणवो. विशेष ए के पहेला व्रतने ठेकाणे अनुक्रमे बीजुं, त्रीर्जु, चोथु, पांचमुं अने छई व्रत कहे, तथा प्राणातिपातने ठेकाणे मृपावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह अने रात्रिभोजन कहेवू. ३-४-५-६. हवे पांचे महाव्रतो माटे भेलु कहे छे-- बालयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिमो समणधम्मे।तिविहेण अपमत्तो,रस्कामि महव्वए पंच ॥७॥ (श्रालयविहारसमितो युक्तो गुप्तः स्थितः श्रमणधर्मे। त्रिविधेन अप्रमत्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ७) (आलय ) समग्र दोष रहित उपाश्रयने सेवनार, (विहार ) शास्त्रमा कह्या प्रमाणे विहार करनार, ( समिओ) पांचे समिति सहित, (जुत्तो) अचेलपणुं श्रादिक गुणोवडे युक्त, (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त तथा (समणधम्मे) साधुना धर्मने विषे (ठिो) रह्यो एवो हुँ (तिविहेण ) मन, वचन अने काया रूप त्रण प्रकारना करणे करीने (अप्पमत्तो) प्रमाद रहित-सावधानपणे रह्यो थको (पंच) पांचे ( महन्वए) महाव्रतोने (रकामि ) पालन करुं छु. ७. हवे एकथी आरंभीने अनुक्रमे एक एकनी वृद्धि करता दश अशुभ स्थानकोनुं वर्न अने दश शुभ स्थानो अंगीकार करवा ए द्वारवडे करीने महाव्रतोना रक्षणने न कहे छे- किसूत्र १ कतानु- सहित १७॥ सावजजोगमेगं, मिच्छत्तं एगमेव अन्नाणं । परिवज्जतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ १॥ (सावद्ययोगमेकं मिथ्यात्वमेकमेवं अज्ञानम् । परिवर्जयन् गुप्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥१॥) ( सावजजोगमेगं) एक एवा सावध योगने-पापव्यापारने तथा (मिच्छत्तं एगं) एक एवा मिथ्यात्वने-देव, गुरु, धर्म संबंधी मनना विपरीत अध्यवसायने तथा (एव अनाणं) एज प्रमाणे एटले एक एवा अज्ञानने एटले विपरीत ज्ञानने ( परिवजंतो) वर्जतो एवो अने ( गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (पंच ) पांच ( महव्वए) महाव्रतोनुं (रकामि) रक्षण करुं छु. १. अणवज्जजोगमेगं, सम्मत्तं एगमेव नाणं तु । उवसंपन्नो जुत्तो, ररकामि महव्वए पंच ॥२॥ (अनवद्ययोगमेकं सम्यक्त्वमेकमेवं ज्ञानं तु । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥२॥) (अणवजजोगमेगं) एक एवा अनवद्य योगने एटले पाप रहित व्यापारने तथा ( सम्मत्तं एगं) एक एवा समकितने तथा ( एव नाणं तु) एज प्रमाणे एटले एक एवा ज्ञानने पण (उपसंपन्नो) प्राप्त थयेलो अने ( जुत्तो) साधुना गुणोवडे युक्त एवो हुँ ( रकामि महव्वए पंच ) पांच महाव्रतोनुं रक्षण करुं छु. २. दो चेव रागदोसे, दुन्नि अ झाणाइ अदृरुदाई। परिवज्जतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ ३॥ (द्वावेव रागद्वेषौ द्वे च ध्याने आतरौद्रे । परिवर्जयन् गुप्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ ३॥)
(दो चेव) वे एवा ज ( रागदोसे) राग अने द्वेषने तथा (दुभि अ) बे एवा (अवरुद्दाई) आर्त अने रौद्र नामना (झाणाइ) ध्यानोने (परिवजंतो) वर्जतो एवो अने (गुचो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (रकामि महव्वए पंच) पांच महाव्रतोनुं रक्षण करुं छु. ३. दुविहं चरित्तधम्म, दुन्नि अ झाणाई धम्मसुकाई। उवसंपन्नो जुत्तो, रस्कामि महव्वए पंच ॥४॥ (द्विविधं चरित्रधर्म द्वे च ध्याने धर्म्यशुक्ले । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ ४॥) ( दुविहं ) वे प्रकारना एटले देश अने सर्व एवा बे भेदना (चरित्तधम्म) चारित्र धर्मने (दुन्नि अ) तथा वे प्रकारना (धम्मसुकाई ) धर्म अने शुक्ल नामना ( झाणाई ) ध्यानोने (उपसंपन्नो ) पामेलो अने ( जुत्तो ) साधुगुणे युक्त एवो हुँ (रकामि महव्वए पंच) पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं दु. ४. किण्हा नीला काऊ, तिलि अलेसाउ अप्पसत्यायो। परिवजंतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥५॥ (कृष्णां नीलां कापोती तिखश्च लेश्या अप्रशस्ताः। परिवर्जयन् गुसो रक्षामि महाव्रतानि पञ्चे ॥५॥) (किण्हा) कृष्णलेश्या (नीला) नीललेश्या (काऊ) कापोत लेश्या (तिमि अ) एत्रण (अप्पसस्थाओ) अप्रशस्त एटले क्लिष्ट कर्मना बंधनी हेतुरूप होवाथी असुंदर एवी (लेसाउ) लेश्याओने (परिवजंतो) वर्जतो अने (गुचो) त्रण गुप्तिवडे गुप्त एवो हुँ (रकामि महब्बए पंच) पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. ५.
सूत्र तानु- हित ॥ तेऊ पम्हा सुक्का, तिमि श्रलेसाउ सुप्पसत्थाओ। उवसंपन्नो जुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥६॥ (तैजसी पमा शुक्लां तिस्रश्च लेश्याः सुप्रशस्ताः। उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥६॥) (तेज) तेजोलेश्या (पम्हा ) पालेश्या अने (सुका) शुक्रलेश्या ( तिणि अ) एत्रण (सुप्पसत्थाओ) सुप्रशस्त एटले शुभ कर्मना बंधनी हेतुरूप होवाथी सुंदर एवी (लेसाउ) लेश्याओने ( उवसंपनो) पामेलो अने (जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हुँ (रकामि महव्वए पंच ) पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. ६. मणसा मणसच्चविऊ, वायासच्चेण करणसच्चेण । तिविहेण वि सच्चविऊ, रस्कामि महव्वए पंच ॥७॥ (मनसा मनःसत्यचिद्वान वाकसत्येन करणसत्येन । त्रिविधेनापि सत्यविद्वान् रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ।।७।) (मणसञ्चविऊ ) मननुं सत्य एटले अकुशल मननो निरोध अने कुशळ मननी प्रवृत्ति, ते रूप मनसंयमने जाणनार एवो हुं (मणसा ) शुभ स्वभावरूप चित्तवडे करीने १, तथा ( वायासचेण ) वाणी सत्य एटले कुशळ (सत्य ) वचन बोलवू अने अकुशळ ( असत्य ) वचन न बोलवू ते रूप वाणीना संयमवडे करीने २, तथा (करणसच्चेण) क्रिया सत्य एटले कार्य सते उपयोगथी गमन आगमन करवू अने कार्य न होय त्यारे हाथ पग विगेरे मवयवोने हलाववा नहीं एवा कायसंयम वडे करीने ३ (रकामि महन्वए पंच) हुं पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु आ त्रण भांगा होवाथी द्विक (बे) संयो- गीया बीजा त्रण भांगा पण सूचवन कर्या के एम जाणवू, ते आ प्रमाणे-मनोवाक् सत्ये करीने एटले मन अने वाणीना संयमवडे करीने १, तथा मन:काय सत्ये करीने एटले मन अने कायाना संयमवडे करीने २, तथा वाक्काय सत्ये करीने एटले वाणी अने कायाना संयमवडे करीने ३ हुं पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. तथा ( तिविहेण वि) मन, वचन अने काया रूप त्रण प्रकारना करणे करीने पण (सच्चविऊ ) सत्यने-संयमने जाणनार एटले शुद्ध संयमने पालन करनार एवो हुं पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छं. आ त्रिक संयोगीयो एक भांगो थयो. तेथी ते सर्व मळी सात प्रकारना संयमे करीने हुँ पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. एम जाणवू. चत्तारि दुहसिज्जा, चउरो सन्ना तहा कसाया य । परिवजतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ ८॥ (चतस्रो दुःखशय्याः चतस्रः संज्ञाः तथा कषायाश्च । परिवर्जयन् गुप्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥८॥) (चत्तारि) चार (दुहसिञ्जा) दुःख आपनारी शय्याने तथा (चउरो) चार संज्ञाने (तहा) तथा ( कसाया य) चार कषायने ( परिवजंतो) वर्जतो एवो अने (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (रकामि महव्वए पंच) पांच महाव- तोतुं रक्षण करुं छु. अहीं चार दुःखशय्या कही ते श्रा जिनेश्वरना मतनी सदहणा न करवी ते १, का कामभोगनी वांछा करवी ते २, परना लाभनी वांछा करवी एटले बीजा कोइने जे काइ लाभ थयो होय तेवो लाम पोताने वांछे ते ३, अने स्नाननी वांछा एटले हाथ, पग, के मुख धोवु अथवा आखे शरीरे स्नान करवू तेनी इच्छा करवी ते. ४. चार संज्ञा आ प्रमाणे-आहारसंज्ञा १, भयसंज्ञा २, मैथुनसंज्ञा ३ अने परिग्रहसंज्ञा ४. चार कषाय-चार चार प्रकारना क्रोध, मान, माया अने लोभ. ८. प्रमाणे ale कसूत्र तानु- सहित ॥ चत्तारि य सुहसिज्जा, चउव्विहं संवरं समाहिं च । उपसंपन्नो जुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥६॥ ( चतस्रो दुःखशयाः चतुर्विधं संवरं समाधि च । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥६॥) ( चत्तारि य ) चार ( सुहसिजा ) सुख आपनारी शय्याने, तथा ( चउन्विहं ) चार प्रकारना (संवरं ) संवरने तथा (समाहिं च ) चार प्रकारनी समाधिने (उवसंपन्नो) पामेलो अने (जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हुँ (रकामि महव्वए पंच) पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. अहीं चार सुखशय्या या प्रमाणे छे.-जिनेश्वरना मतनी सद्दहणा करवी ते १, कामभो- गनी वांछा न करवी ते २, स्खलाभ संतोष एटले पोताने जे काइ मळे तेनाथी संतोष राखवो ते ३ अने अस्नाननी वांछा एटले हाथ, पग के मुख धोवानी अथवा शरीरे स्नान करवानी इच्छा न करवी ते. ४. चार संवर आ प्रमाणे- प्रमाणे-मनसंवर एटले अकुशळमां ( पापकार्यमां) प्रवर्तता मननो निरोध करवो अने कुशळमां (पुण्यकार्यमां) प्रवर्तावq ए मनसंवर १, रीते वचनसंवर २ अने कायसंवर ३ जाणवा, तथा उपकरण संवर एटले महामूल्यवाळा वस्त्रनो अने सुवर्णादिकनो त्याग करवो अथवा वस्त्रपंचक, पुस्तकपंचक, तृणपंचक अने चर्मपंचकनो त्याग करवो ते. ४. तथा चार समाधि आ प्रमाणे- ज्ञानसमाधि १, दर्शनसमाधि २, चारित्रसमाधि ३ अने तपसमाधि ४. ६. पंचेव य कामगुणे, पंचेव य अण्हवे महादोसे । परिवजंतो गुत्तो, रखामि महव्वए पंच ॥ १० ॥ (पश्चैव च कामगुणान् पश्चैव च पाश्रवान् महादाषान् । परिवर्जयन् गुप्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥१०॥)
. ( पंचेव य ) शब्द, रूप, रस, गंध अने स्पर्श ए पांच (कामगुणे) कामभोगोने तथा (पंचव य) प्राणातिपात, मृपावाद, अदत्तादान, मैथुन अने परिग्रह ए पांच ( महादोसे ) महा दोषने करनारा (अण्हवे ) आश्रवोने ( परिवजंतो) वर्जतो एवो अने (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (रकामि महव्वए पंच) पांच महाव्रतोनुं रक्षण करुं छु. १० पंचिंदियसंवरणं, तहेव पंचविहमेव सज्झायं । उवसंपन्नो जुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ ११ ॥ ( पञ्चेन्द्रियसंवरणं तथैव पञ्चविधमेव खाध्यायम् । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥११॥) (पंचिंदियसंवरणं) श्रोत्रादिक पांच इंद्रियोना संवरने एटले इष्टवस्तु पर रागथी अने अनिष्टं वस्तु पर द्वेषथी प्रवर्तता इन्द्रियोने रुंधवा तेने (तहेव) तेम ज (पंचविहमेव ) वाचना, पृच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षा अने धर्मकथा ए पांच प्रकारना ( सज्झायं ) स्वाध्यायने (उपसंपनो) पामेलो अने (जुत्तो) साधु गुणे युक्त एवो हुँ (रक्खामि महन्वए पंच) पंच महा- व्रतोतुं रक्षण करुं छु. अहीं वाचना एटले भणq ते १, भण्या पछी शंका उत्पन्न थाय त्यारे गुरुने पूछळू ते पृच्छना पूछीने शंका रहित थया छतां पछीथी भूली न जवाय तेने माटे फरी फरी सूत्र गणवू ते परिवर्तना ३, सूत्रनी जेम अर्थ पण भूली न जवाय तेने माटे अर्थनुं वारंवार चितवन करवू ते अनुप्रेक्षा ४ तथा आ प्रमाणे श्रुत भण्या पछी श्रुतधर्मनी कथा । एटले व्याख्या करवी ते धर्मकथा ५ कहेवाय छे. ११. छज्जीवनिकायवह, छप्पि य भासाउ अप्पसत्थाउ। परिवजंतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥१२॥ y (षड्जीवनिकायवधं षडपि च भाषा अप्रशस्ताः । परिवर्जयन् गुप्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥१२॥) (छजीवनिकायवहं ) पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजस्काय, वायुकाय, वनस्पतिकाय अने त्रसकाय ए छ प्रकारना जीवनि- कायना वधने तथा (अप्पि य) छ प्रकारनी (अप्पसत्याउ) अप्रशस्त एटले भारे कर्मना बंधनी हेतु भूत होवाथी असुंदर एवी ( भासाउ) भाषाओने (परिवनंतो) वर्जतो एवो अने (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ ( रक्खामि महव्यए पंच ) पंच महाव्रतो, रक्षण करुं छु. अहीं छ प्रकारनी अप्रशस्त भाषा आप्रमाणे छे–अलीक वचन १, हीलित वचन २, खिसित वचन ३, परुष वचन ४, गार्हस्थ्य वचन ५ अने व्यवशमिताधिकरणोदीरण (कलह उदीरण) वचन ६. तेमां कोइने दिवसे प्रचला निद्रा आवती होय तेने कोइ पूछे के-" तने दिवसे केम प्रचला निन्द्रा आवे छे ?" तेना उत्तरमां ते कहे के-" ना, मने प्रचला निद्रा आवती नथी." आ अलीक वचन कहेवाय छे. १. सामान्य साधुने हे गणि ! हे वाचक! एम इर्ष्याथी जे कहेवू ते हीलित वचन कहेवाय छे. २. कोइना हलकी जातिना जन्म अने कर्म विगैरे उघाडां करवां ते खिसित वचन कहेवाय छे. ३. हे दुष्ट शिष्य ! एवं जे कठोर वचन कहे ते परुष वचन कहेवाय छे. ४. हे पुत्र ! हे भाणेज ! ए रीते गृहस्थीना संबंधी बोलावq ते गार्हस्थ्य वचन कहेवाय छे. ५. तथा शांत थयेला अधिकरण-कलहनी उदीरणार्नु वचन बोलवू ते व्यवशमिताधिकरणोदीरण वचन एटले कलह उदीरण वचन कद्देवाय छे. ६. १२. छविहमभितरयं, बझं पि य छव्विहं तवोकम्मं । उवसंपन्नो जुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥१३॥ (षड्विधमभ्यन्तरकं बाथमपि च षड्विधं तपाकर्म । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥१३॥)
(छविहं ) छ प्रकारना (अम्भितरयं) भाग्यंतर (बझं पि य) तथा बास पण (छविहं) छ प्रकारना (तवोकम्म) तपकर्मने (उपसंपनो) पामेलो तथा (जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हुँ ( खखामि महत्वए पंच) पंच महव्रतोतुं रक्षण करु छु. अहीं भाम्यंतर तपना छ प्रकार आ प्रमाणे हे प्रायश्चित्त १, विनय २, वैयावृत्य ३, स्वाध्याय ४, ध्यान ५भने उत्सर्ग ६. ० प्रकारनो बाह्य तपाप्रमाणे-अनशन १. उनादरी२, वृत्तिसंक्षेप ३, रसत्याग ४, कायक्लेश ५अनेसलीनता ६.१३. सत्त य भयठाणाई, सत्तविहं चेव नाण विभंगं । परिवज्जतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ १४ ॥ (सप्त च भयस्थानानि सप्तविधं चैव ज्ञानविभंगं । परिवर्जयन् गुप्तो रक्षाम महाव्रतानि पञ्च ॥१४॥) (सत्त य) सात (भयठाणाई) भयनां स्थानकाने तथा ( सत्तविहं चेव ) सात प्रकारना ज (नाणविन्भंग) विभंग ज्ञानने (परिवजंतो) वर्जतो तथा (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (खखामि महम्चए पंच) पंच महाव्रतोनुं रक्षण करुं छु. अहीं सात भय आ प्रमाणे ले-आलोक भय १, परलोक भय २, आदान भय ३, अकस्सात् भय ४, वेदना भय ५, मरण भय ६, अने अपकीर्ति भय ७. विभंग ज्ञान एटले मिथ्यात्व सहित अवधिज्ञान. तेना सात प्रकार आ प्रमाणे--एक दिशि लोकज्ञान एटले पूर्वादि चार दिशाओ अने ऊर्ध्व तथा अधौ ए छ दिशामांथी एक दिशाए लोकनुं ज्ञान एटले जाणवू ते. चीजी पांच दिशाए लोकनो ज स्वीकार नहीं करवाथी आ विभंग ज्ञान कहेवाय छे. १. पांच दिशि लोकज्ञान एटले कोई एक दिशा विना बीजी पांच दिशाए लोकर्नु जाणवू ते. महीं पण एक दिशाए लोक नहीं मानवाथी विभंग कहेवाय छे.२. क्रियावरण जीव एटले जीव मात्र प्राणातिपातादिक क्रिया ज करे छे ते जोवामां आवे छे अने ते क्रियानुं कारण जे कर्म सूत्र तु- सहित ॥ (ज्ञानावरणादिक) ते जोवामां आवतुं नथी तेथी जीवने मात्र क्रियानुंज आवरण छे, कर्मर्नु आवरण नथी एम जे मानवु ते. अहीं किया ज देखाय छे माटे ते मानवी अने कर्म देखातुं नथी माटे न मानवू ए निभंग ज्ञान छे. ३. मुदग्ग जीव ( तनुमय जीव) एटले भवनपत्यादिक देवो पोताना शरीरनी अवगाहनाना क्षेत्रनी अंदर रहेला तथा वहार रहेला पुद्गळोने ग्रहण करी उत्तरवैक्रिय शरीर रचे छे ते जोइ सर्व कोइ जीवनुं शरीर पोताना अवगाहक्षेत्रना बास तथा आभ्यंतर पुद्गळोथीज रचायेलुं छे एमजे मानवं ते विभंग ज्ञान छे. केमके तेवु शरीर तो मात्र मनुष्य अने तिर्यच (औदारिक)ज के, देवादिकनुनथी. ४. अमुदग्ग जीव (अतनुमय जीव) एटले देवोनुं वैक्रिय शरीर बाह्य अने आभ्यंतर पुद्गळोने ग्रहण कर्या विना ज रचायेनुं जोवामां आवे के तेथी सर्व कोइ जीवनुं शरीर बाह्य आभ्यंतर पुद्गळोयी रचायेलुं नथी एम जे मानवू ते विभंग छे. ५. रूपी जीव एटले वैक्रिय शरीरवाळा देवोने जोइ सर्व कोइ जीव रूपी ज के एम जे मानवू ते विभंग छे. ६. सर्व जीव एटले वायुथी पुद्गळोने पण हालता चालता जोइ सर्व कोइ पण वस्तु जीव ज छे कोइ पण अजीव छ ज नहीं एम जे मानवु ते विभंग छे. ७. पिंडेसण पाणेसण-उग्गहसत्तिकया महज्झयणा । उवसंपन्नो जुत्तो, ररकामि महव्यए पंच ॥१५॥ (पिण्डैषणापानैषणाऽवग्रहसप्तैकका महाध्ययनानि । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥१५॥) ( पिंडेसण ) सात पिंडैषणा तथा (पाणेसण ) सात पानपणा तथा (उग्गह) सात प्रकारना अपग्रह तथा (सत्तिकया) सात सप्तकका तथा ( महज्झयणा ) सात महाध्ययनो, आ सर्वने ( उवसंपन्नो ) पामेलो अने (जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो अर्थात् उतरवैक्रिय. २ अर्थात् भववैक्रिय.
हुँ (रक्खामि महव्वए पंच) पंच महावतोर्नु रक्षण करुं छु. अहीं सात पिंडैपणा आ प्रमाणे छे-असंसट्ठ-असंसृष्ट एटले हाथ तथा पात्र खरडाय नहीं तेवू अन १, संसह-संसृष्ट एटले हाथ तथा पात्र खरडाय तेवु अन २, उद्धड-उध्धृत एटले तपेली विगेरेमांथी काढीने आपे ते, तेमां हाथ खरडाय अने पात्र न खरडाय अथवा पात्र खरडाय अने हाथ न खरडाय एवी रीते अन्न आपे ते उधृत एषणा कहेवाय छे. ३.अप्पलेविया अल्पलेप एटले लेप रहित चणा विगेरे लेता चोथी एपणा थाय छे. ४. उग्गहिया-अवगृहीत एटले भोजन समये गृहस्थीए वाटका विगेरेमा नांखेलुं अन्न ग्रहण करतां पांचमी एपणा कहेवाय छे. पग्गहिया-प्रगृहीत एटले भोजन समये पीरसवा माटे अथवा पोताने खावा माटे हाथमां जे अन्न लीधु होय ते ग्रहण करवाथी छठी प्रगृहीत एषणा कहेवाय छे. ६. उज्झियधम्मा-उज्झितधर्म एटले नांखी देवा योग्य जे अन्नने कोइ मनुष्यादिक लेवाने इच्छतो न होय तेवु अथवा नांखी देतां अधु बाकी रहुं होय तेवु अन्न ग्रहण करतां सातमी एपणा थाय छे ७. पाननी एषणा पण एज प्रमाणे सात प्रकारनी जाणवी. सात प्रकारनोअवग्रह-उपाश्रय या प्रमाणे छे–जहा- चिंतिय-यथाचिंतित एटले मारे अमुक प्रकारनो उपाश्रय ग्रहण करवो, ते सिवाय बीजो लेवो नहीं एम विचारी तेवोज - हण करे ते. १. सपरिग्गह-स्वपरावग्रह एटले हुं बीजा साधुओ माटे उपाश्रय मागीश अने बीजाए ग्रहण करेला उपाश्रयमां हुं रहीश एम विचारी तेवो ज ग्रहण करे ते. २. सउग्गह-खावग्रह एटले हुं बीजाने माटे उपाश्रय मागीश, परंतु वीजाए ग्र- हण कर्यो हशे तो तेमां नहीं रहुं एम विचारी तेज प्रमाणे करे ते. ३. परुग्गह-परावग्रह एटले हुं बीजा माटे उपाश्रय नहीं मागु, पण बीजाए ग्रहण कर्यो हशे तेमा ज रहीश. एम विचारी ते प्रमाणे करे ते. ४. सइगुवग्गह-स्वकीयावग्रह , क तानु- सहित २॥ एटले हुं मारे माटे ज उपाश्रय मागीश, पण वीजा माटे नहीं मागु एम विचारी ते प्रमाणे करे ते. ५. सागारिसंथारुग्गह- सागारिकसंस्तारकावग्रह एटले हुं जेनो उपाश्रय ग्रहण करीश तेनी ज सादडी विगेरे संथारा माटे लइश, ते नहीं मळे तो उत्कटुक आसने अथवा बेठो बेठो ज रात्रि निर्गमन करीश. एम विचारी ते प्रमाणे करे ते. ६. अहसंघडिउग्गह-यथासंघ- टितावग्रह एटले उपर कह्या प्रमाणे ज जेनो उपाश्रय तेनोज संथारो लेवो परंतु ते अमुक प्रमाणवाळो होय तो ज, एम विचारी ते प्रमाणे करे ते. ७. तथा सात सप्तकका श्राप्रमाणे-स्थान सप्तैकक १, नैपेधिकी सप्तैकक (नैधिकीएटले स्वाध्यायभूमि) २, उच्चार प्रश्रवणविधि सप्लैकक ३, शब्द सप्लैकक ४, रूप ससैकक ५, परिक्रिया सप्कक ६. अने अन्योन्यक्रिया सबैकक ७. आ नामना सात अध्ययनो आचारांगना बीजा श्रुतस्कंधमां बीजी चूलिकारूप छे. ते अध्ययनो सर्व मळीने सात ज छ, तोपण तेमनां तेवांज नामो होवाथी ते दरेक अध्ययन सप्तकक कहेवाय छे. तथा सात महाध्ययनो सुगडांग-सूत्रकृतांगना बीजा श्रुतस्कंघमा छे, तेओ पहेला श्रुतस्कंधनां अध्ययनो करतां मोटां के तेथी ते महाध्ययनो कहेवाय छे. तेमनां नाम आ प्रमाणे छे-पुंडरीक १, क्रियास्थान २, आहार परिज्ञा ३, प्रत्याख्यान क्रिया ४, अनाचारश्रुत ५, आर्द्रककुमारीय ६ अने नालंदीय ७. १५. अट्ट य मयठाणाइं, अट्ठ य कम्माई तेसि बंधं च । परिवज्जतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥१६॥ (अष्टौ च मदस्थानानि अष्टौ च कर्माणि तेषां यन्धं च । परिवर्जयन गुप्तो रक्षाम महाव्रतानि पञ्च ॥१६॥ (अट्ठ य ) आठ (मयठाणाई) मदनां स्थानोने (य) अने (अट्ठ) आठ (कम्माई) कर्मोने (च) अने (वेसि) ते आठ कर्मोना (बंध ) बंधने एटले नवा कर्मना ग्रहणने (परिवशंतो) वर्जतो एवो तथा (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ ( रक्खामि महब्बए पंच ) पंच महाव्रतानुं रक्षण करु छ. अहीं आठ मदनां स्थानो आ प्रमाणे छ- जाति १, कुळ २, बळ ३, रूप ४, तप ५, अश्वर्य ६, श्रुत ७, अने लाभ ८. आठ कर्म भा प्रमाणे-ज्ञानावरणीय १, दर्शनावरणीय २, वेदनीय ३, मोहनीय ४, प्रायुष्य ५, नाम ६, गोत्र ७ भने अंतराय ८. १६. अह य पवयणमाया, दिट्ठा अविहनिट्टिय:हिं । उवसंपन्नो जुत्तो, रस्कामि महव्वए पंच ॥१७॥ (अष्टौ च प्रवचनमातरः दृष्टा अष्टविधनिष्ठिताथैः । उपसंपन्नो युक्तो रक्षाम महाव्रतानि पञ्च ॥१७॥) (य) तथा वळी ( अट्ठ) आठ ( पवयणमाया) प्रवचननी माताओ (अहविहनिट्टिय?हिं ) आठ प्रकारना ज्ञानावर- णादिक अर्थो—पदार्थो-कर्मो जेनां क्षय पाम्यां छे एवा तीर्थकरोए (दिठ्ठा) जोयेली छे, ते प्रवचननी माताभोने (उव- ( संपमो) पामेलो तथा (जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हुँ (रकामि महवए पंच ) पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. अहीं आठ प्रवचनमाताओ आ प्रमाणे छे-इयर्यासमिति १, भाषासमिति २, एपणासमिति ३, आदानमांडमात्रनिक्षेपणासमिति ४, उच्चारप्रश्रवणेखलसिंघानजल्लपारिष्ठापनिका समिति ५, मनोगुप्ति ६, वाग्गुप्ति ७ अने कायगुप्ति ८. १७. नव पावनियाणाई, संसारस्था य नवविहा जीवा । परिवज्जतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ १८ ॥ ( नव पापनिदानानि संसारस्थाश्च नवविधा जीवाः। परिवर्जयन् गुप्तो रक्षाम महाव्रतानि पञ्च ॥ १८॥)
हित ॥ (नव ) नव प्रकारनां (पावनियाणाई) पापनां नियाणांओ (य) अने ( संसारत्था ) संसारमा रहेला (नवविहा) नव प्रकारना ( जीवा ) जीवो, तेमने (परिवजंतो) वर्जतो एवो तथा (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (रक्खामि महन्वए पंच ) पंच महाव्रतोनी रक्षा करुं छु. अहीं नव नियाणांमओ आ प्रमाणे छे-कोइ साधु के साध्वी निया| करे के साक्षात् देव के देवलोक कोणे दीठा छ ? आ राजाओज देव छे. तेथी जो मारा तप अनुष्ठानचें फळ होय तो आवता भवमा हुँ राजा थाउं. आई निया' करी ते देवलोकमां जाय अने त्यांथी चवीने राजा थाय छे, पण तेने ते भवमां समकितनी प्राप्ति थती नथी. १. एज प्रमाणे श्रेष्ठी एटले हुं श्रेष्ठीना कुळमां उत्पन्न थाउं एवं नियाj करी देवलोकमां जइ त्यांथी चवी श्रेष्ठीना कुळमां उत्पन्न थाय, तेने पण बोधि दुर्लभ छे. २. स्त्री एटले पुरुपने घणो व्यवसाय होय छे, वळी संग्राम विगेरे तेने करवा पडे छे, तेथी स्त्री थाउं ते सारं एवं निया' करी देवलोकमा जइ त्यांथी चवी स्त्रीनो भव पामे, तेने पण बोधि दुर्लभ छे. ३. पुरुष एटले स्त्री तो सर्वथा पराधीन होय छे अने पुरुष सर्व कार्य करवामां समर्थ छे, तेथी हुं पुरुष थाउं एवं निया' करी ते प्रमाणे थाय, तेने पण बोधि दुर्लभ छे. ४. परप्रवीचार एटले आ मूत्र विष्ठाथी भरेला मनुष्योना भोगो बीभत्स छे, रंतु देवताओ बीजा देव के देवीने भोगवे के अथवा पोताने ज देव देवी रूपे विकुर्वीने भोगवे छे ते सुंदर छ माटे ते मळे तो ठीक एम नियाj करी ते प्रमाणे पामे, तेने पण बोधि दुर्लभ छे. ५. खप्रवीचार एटले मनुष्यना भोगो तो अशुभ छ, तथा जे देवो बीजा देव के देवीने भोगवता नथी पण पोते ज पोताने देव देवीरूपे विकुर्वीने भोगवे छे ते सुंदर छे, तेथी ते मेळवू एम निया' करी ते प्रमाणे उत्तम देव थाय, ते त्यांथी चवी मनुष्य भवमां धर्म सांभळे, पण तेमां तेने श्रद्धा थाय नहीं, तेथी ते तापस विगैरे थइ स्त्रीना कामभोगनी मू वाळो रही मरीने किल्बिपि देव थाय, त्यांची चवी वारंवार मुंगो, वहेरो थाय, परंतु तेने बोधि दुर्लभ छे. ६. अप्रवीचार एटले कोइ साधु अथवा साध्वी मनुष्य अने देवना भोगथी निर्वेद पामी नियाj करे के ज्या मैथुनना भोग नथी त्यां हुँ उत्पन्न थाउं, एवं नियाj करी ते प्रमाणे ते उत्तम देवलोकमां जाय, त्यांची चवी मनुष्य थाय, ते सुलभवोधी थाय, पण विरति न पामे. ७. आ उग्रादि कुळना पुत्रो श्रावकना व्रतो अंगीकार करी साधुओनी भक्ति करे छ, हुं पण तेवो थाउं. एवं निया' करी ते प्रमाणे थाय, ते चार प्रकारना श्रावकधर्मने अंगीकार करे, पण यतिधर्म पामे नहीं. ८. जो हुँ दरिद्र कुळमां उत्पन्न थाउं तो मारो आत्मा सुखे करीने चारित्र पामे, एवं नियाj करी ते प्रमाणे थाय, ते यतिधर्मने अंगीकार करे, पण ते भवमां सिद्धि पामे नहीं. ६. तेथी कांइपण निया' न करवू एज श्रेष्ठ छे. नव प्रकारना संसारी जीवो आ प्रमाणे छे-पृथ्वीकाय १, अप्काय २, तेजस्काय ३, वायुकाय ४, वनस्पतिकाय ५, द्वींद्रिय ६, त्रीन्द्रिय ७, चतुरिंद्रिय ८ अने पंचेंद्रिय ६. १८. नवबंभचेरगुत्तो, दुनवविहं बंभचेरपरिसुद्धं । उवसंपन्नो जुत्तो, रकामि महव्यए पंच ॥ १६ ॥ (नव ब्रह्मचर्यगुप्तो द्विनवविधं ब्रह्मचर्यपरिशुद्धम् । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महावतानि पञ्च ॥ १६ ॥ (नववंभचेरगुत्तो) नव ब्रह्मचर्यनी गुप्तिवडे गुप्त एवो अने (दुनवविहं ) बे वार नव एटले अढार प्रकारना ( बंभचेरपरिसुद्धं ) शुद्ध ब्रह्मचर्यने ( उवसंपन्नो) पामेलो एवो अने ( जुत्तो) साधु गुणे सहित एवो हुँ ( रक्खामि महन्वए पंच ) पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. अहीं नव ब्रह्मचर्यनी गुप्ति आ प्रमाणे-चसहि- - वसति एटले स्त्री, पशु, पंडक रहित स्थानमा रहे, ते १. कह-कथा एटले स्त्रीनी कथा न करवी अथवा एकली स्त्रीओनी पासे धर्मकथा न करवी ते.२. निसिजा-निषद्या एटले स्त्रीनी साथे एक आसनपर न बेसवं, तथा स्त्री बेठी होय ते आसन उपर तेना उठया पछी पण बे घडी सुधी न बेस ते. ३. इंद्रिय-इंद्रिय एटले स्त्रीना नेत्रादिक अवयवो जोवा नहीं ते. ४. कुड़ितर-कुड्यंतर एटले भीतने श्रांतरे रहीने स्त्रीना कामभोगादिकना शब्द सांभळवा नहीं ते. ५. पुव्वकीलिय- पूर्वक्रीडित एटले स्त्री साथे पूर्वे जे क्रीडा करी होय तेने संभारवी नहीं ते. ६. पणीय-प्रणीत भोजन एटले घृतादिकथी नीतरतो अति स्निग्ध आहार न करवो ते. ७. अइमायाहार-अतिमात्राहार एटले मात्रा (प्रमाण ) थी अधिक आहार न करवो ते. ए. तथा विभूसणा-विभूषणा एटले शरीरनी विभूषा (शोभा) न करवी ते. ६. अढार प्रकारनुं ब्रह्मचर्य आ प्रमाणे-औदारिक अने वैक्रिय मैथुनने मन, वचन, कायाए करी करवू, करावq अने अनुमोदq नहीं ते. १६० उवघायं च दसविहं, असंवरं तह य संकिलेसं च । परिवज्जतो गुत्तो, रखामि महव्वए पंच ॥ २०॥ ( उपघातं च दशविधमसंवरं तथा च संलशं च । परिवर्जयन गुप्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ २०॥) (च) अने ( दसविहं ) दश प्रकारना ( उवधायं) उपधातने (तह य) तेम ज (असंवरं ) दश प्रकारना असंवरने (संकिलेसं च) तथा दश प्रकारना संक्रशने ( परिवजंतो) वर्जतो एवो अने (गुत्तो)त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ ( रक्खामि महव्वए पंच) पंच महाव्रतोनुं रक्षण करुं छु. अहीं दश प्रकारना उपघात ा प्रमाणे-पहेलो उद्गम उपघात, ते आधा- कर्मादिक दोषथी उत्पन्न थाय छे. १. बीजो उत्पादन उपघात, ते धात्री आदिक दोषथी उत्पन्न थाय छे. २. त्रीजो एषणा उपधात, ते शंकितादिक भेदथी उत्पन्न थाय छे. ३. चोथो परिकर्म उपधात, ते वस्त्र पात्रादिकने समारवाथी उत्पन्न थाय के. ४. पांचमो परिहरण उपघात, ते प्रमाण रहित अथवा अकल्प्य एवा उपकरणनो उपभोग करवाथी उत्पन थाय छे. ५. छटो ज्ञान उपघात, ते श्रुतज्ञाननी अपेक्षाए अकाळे स्वाध्यायादिक करवाथी थाय छे. ६. सातमो दर्शन उपघात, ते जिनवचनमा शंकादि करवाथी थाय छे. ७. आठमो चारित्र उपधात, ते पांच समितिनो मंग विगेरे करवाथी थाय छे. ८. नवमो अनीतिक उपधात ते अप्रीतिवडे विनयादिकनो उपधात थाय छे. ६. तथा दशमो संरक्षण उपघात, ते शरीरादिक उपर मूर्खा करवाथी परिग्रहनी विरतिनो उपधात थाय छे. १०. दश प्रकारनो असंवर आप्रमाणे इष्ट विष- यमां रागथी अने अनिष्ट विषयमां द्वेषथी प्रवर्तती श्रोत्र इंद्रियनो संवर न करवो ते श्रोत्रंद्रिय असंवर कहेवाय छे. १. तेज प्रमाणे चक्षु इंद्रिय असंवर २, प्राण इंद्रिय असंवर ३. रसनेंद्रिय असंवर ४ अने स्पर्शनेंद्रिय असंवर पण जाणवा. ५. अ- कुशल एवा मन, वचन अने कायानो संवर न करखो ते मन असंवर ६, वचन असंवर ७ अने काय असंवर ८ जाणवो. उपकरण असंवर एटले प्रमाण रहित अथवा अकल्प्य वस्त्रादिक उपकरण ग्रहण करवां ते. ६ तथा सूची असंवर-शरी- रने उपधात करनारा सूची-सोय अने कुशना अग्रभाग विगैरेनो असंवर एटले तेमने न गोपववा ते सूचीकुशाग्र असंवर कहेवाय छे. १०. तथा दश प्रकारनो सक्लेश एटले असमाधि ा प्रमाणे छे-वस्त्रादिक उपधि संबंधी जे संक्रश ते उपधि संक्लेश कहेवाय छे. १. उपाश्रय संबंधी जे सक्लेश ते उपाश्रय संजेश कहेवाय छे. २. कपायोवडे अथवा कषायोरूपी जे संक्लेश ते कषाय संक्रेश. ३. भक्तपान संबंधी जे संक्लेश ते भक्तपान संश. ४. मनने विषे अथवा मननोजे संक्लेश ते मनसंक्लेश. ५ तेज प्रमाणे वचन संक्लेश ६, कायसंजेश ७, ज्ञान संक्लेश S, दर्शन संक्लेश ह अने चारित्र संक्लेश जाणवा. १०-२० सञ्चसमाहिट्ठाणे, दस चेव दसायो समणधम्मं च । उपसंपन्नो जुत्तो, ररकामि महव्वए पंच ॥ २१ ॥ ( सत्यसमाधिस्थानानि दश चैव दशाः श्रमणधर्म च । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पश्च॥ २१ ॥ (दस) दश प्रकारनां ( सच ) सत्यने तथा ( समाहिट्ठाणे) दश प्रकारना समाधिनां स्थानोने (चेव) निश्चे तथा (दसाओ) दश भकारना दशाश्रुतस्कंधोने तथा ( समणधम्मं च ) दश प्रकारना साधुधर्मने ( उवसंपन्नो) पामेलो एवो अने ( जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हुँ (रकामि महव्वए पंच ) पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. अहीं दश प्रकारनां सत्य आ प्रमाणे छे.--जनपदसत्य-कोइ देशमां पाणीने पय कहे छे, कोइ देशमां नीर कहे छे, कोई देशमाउदक कहे छे इत्यादि सर्व सत्य मान ते जनपदसत्य. १. संमतसत्य-कुसुद, कुवलय, कमळ, अरविंद एविगेरे सर्व जातिनां कमळो पंकमां उत्पन थाय छे तो पण सर्व बाळगोपाळने अरविंद जातिनुं कमळ ज पंकज (पंकथी उत्पन्न थयेटु) नामथी संमत छे ते संमतसत्य. २. स्थापनासत्य-मूर्तिमां अरिहंत विगैरेनी स्थापना कराय के ते स्थापनासत्य. ३. नामसत्य-कुळनी वृद्धि करतो न होय तो पण कोइनुं नाम कुळवर्धन होय ते नामसत्य. ४. रूपसत्य-जेम कोइ पाखंडी माणस साधुनुं लिंग धारण करे तो ते पण साधु कहेवाय छे ते रूपसत्य. ५. प्रतीत्यसत्य एटले कोइनी अपेक्षाए सत्य होय ते, जेमके टचली आंगळीनी अपेक्षाए अनामिका मोटी छे, ते मध्यमानी अपेक्षाए नानी बतां मोटी कहेवाय ते प्रतीत्यसत्य. ६. व्यवहारसत्य एटले पर्वत बळतो नथी, तेमा रहेलुं घास वळे छे, तो पण पर्वत बळे छ एम कहेवाय छे ते व्यवहारसत्य. ७. भावसत्य एटले जेमां श्वेत आदि कोइ वर्ण अधिक होय तेने आश्रीने एकवर्णवाल्लं कहेवू ते. जेमके बगलीना शरीरपर पांचे वर्णनो संभव छ तो पण श्वेतवर्ण अधिक होवाथी धोळी वगली कहेवाय छे ते भावसत्य. ८. योगसत्य एटले संबंधने लइने सत्य, जेमके दंडना योगथी माणस पण दंडी कहेवाय छे, छत्रना संबंधथी माणस पण छत्री (छत्रवाळो) कहेवाय ले ते योग- सत्य. ६. तथा उपमासत्य एटले उपमाए करीने सत्य, मोटा विशाळ तळावने आ तळाव समुद्र जेवू विशाळ छे एम कहेवाय छे ते उपमासत्य. १०. समाधिनां दश स्थानो आ प्रमाणे.-स्त्री, पशु अने पंडक (नपुंसक) ना संबंधवाळा शयन, आसन, उपाश्रय विगेरे स्थानोने साधु सेवे नहीं. १. मुनि केवळ स्त्रीओनी पासेज धर्मकथादिक न करे, अथवा स्त्रीना रूप विगरेनी कथा न करे. २. मुनि प्रणीत-घृतादिकना टीपा पडता भोजननो आहार न करे. ३. भोजन के पाणीनो अधिक आहार न करे. स्त्रीनी साथे पूर्व जे काइ क्रीडा विगैरे करेल होय तेने संभारे नहीं. ५. स्वीनी साथे एक आसनपर न वैसे, तेना उठ्या पछी पण बे घडी सुधी ते स्थाने न बेसे. ६. स्त्रीना मनोहर अवयवोने जुए नहीं. ७. शब्दानुपाती एटले पोताना के परना मनोहर शब्द उपर प्रीतिवाळो न थाय, रूपानुपाती एटले पोताना के परना सुंदर रुप उपर प्रीतिवाळो न थाय, तथा गंधा- नुपाती एटले पोताना के परना सुगंध उपर प्रीतिवाळो न थाय. ८. श्लोकानुपाती एटले यशकीर्तिमां प्रीतिवाळो न थाय.. ६. तथा मुनि साता-सुखमां प्रीतिवाळो-आसक्त न थाय. १०. दश दशाश्रुतस्कंध आ प्रमाणे.-कर्मविपाक दशा १, उपासक दशा २, अंतकृत दशा ३, अनुत्तरोपपातिक दशा ४, ४.
आचार दशा ५, प्रश्नव्याकरण दशा ६, बंध दशा ७, द्विगृद्धि दशा ८, दीर्घ दशा है तथा संक्षेपिक दशा. १०. श्रा प्रमाणे दशाश्रुतस्कंध छेदसत्रमा दश अधिकार के. दश प्रकारनो यतिधर्म या प्रमाणे.-चांति १, मार्दव २, आर्जव ३, मुक्ति-निर्लोभता ४, तप ५, संयम ६, सत्य ७, शौच ८, अकिंचनता-परिग्रहरहितपणुं अने ब्रह्मचर्य. १०. २१. श्रासायणं च सव्वं, तिगुणं एक्कारसं विवजंतो। ®उवसंपन्नो जुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ २२ ॥ (पाशातनां च सर्वां त्रिगुणमेकादशं विवर्जयन् । उपसंपन्नो युक्तो रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ २२॥) (च) अने वळी ( सव्वं ) सर्व-सामान्ये करीने समय एवी अथवा (तिगुणं ) त्रणे गुणीए एवा (एकारसं) श्र- ग्यार एटले अग्यारने त्रणे गुणतां तेत्रीश थाय तेटली (आसायणं) आशातनाओने (विवशंतो) वर्जतो एवो तथा (उव- संपनो) अनाशातनाने पामेलो एवो तथा (जुत्तो) साधु गुणे सहित एवो हुँ (रकामिमहव्वए पंच) पंचमहावतोनुंरक्षण करुंछु भहीं तेत्रीश आशातना आ प्रमाणे छे.-अरिहंतनी आशातना एटले तीर्थकरो छेज नहीं. होय तोते जाणतां छतां शामाटे भोग भोगवे छ ? अथवा विरति लीधा छतां देवादिके करेला समवसरणने शामाटे भोगवे छे? इत्यादि. १. सिद्धनी आशातना-सिद्धो छ ज नहीं. होय तोपण तेओ चेष्टा रहित होवाथी शुं कामना छे ? इत्यादि. २. आचार्यनी आशातना- मा आचार्य नानी वयनो छ, अकुलीन छ, दुद्धि छे, गरीब छे इत्यादि. ३. एज प्रमाणे उपाध्यायनी आशावना. ४. साधुनी * परिवजतो गुत्तो, इति पाठः बहुपु प्रतिपु साधुसाध्वीमुखेपु च दृश्यते.
आशातना-आ साधु सिद्धांतने जाणता नथी, क्रोधी छे, उतावळा चाले छे, गाळो भांडे छे इत्यादि. ५. साध्वीनी श्राशावना -आ साध्वी कजीयाळी छ, घणी उपधि राखे छे विगेरे. ६. श्रावकनी आशातना-मनुष्य जन्म पामीने तथा जिनधर्म जा- णीने पण आवको दीक्षा लेता नथी, तोपण ते लोकमां केम धन्य कहेवाय छे ? इत्यादि. ७. एज प्रमाणे श्राविकानी आ- शातना.८. देवोनी आशातना-देवो निरंतर कामभोगमांज आसक्त छ, विरति रहित छ, चेष्टा रहित छे, तेओ समर्थ छतां पण तीर्थनी उन्नति करता नथी इत्यादि. ६. देवीनी आशातना पण एज प्रमाणे. १०. इहलोक आशातना-मनुष्यने आ मनुष्यलोक इहलोक कहेवाय छ, तेनी असत्प्ररूपणा करवी ते आशातना छे. ११. परलोकनी आशातना-मनुष्यने नारक, तिथंच अने देव ए परलोक छे तेनी असत्प्ररूपणा करवी ते आशातना छे. १२. केवळी प्रणीत धर्मनी आशातना-केवळीए श्रुत अने चारित्र एम वे प्रकारे धर्म रच्यो छे, तेनी आशातना एटले आ श्रुत प्राकृत भाषामा छ, ते कोणे रच्यु छ ? ते कोण जाणे छ ? तथा जेमां दान देवातुं नथी एवा चारित्र धर्मथी शुं फळ छे ? इत्यादि. १३. स्वर्ग, मृत्यु अने पाताळरूप आखा लोकनी पाशातना असत्प्ररूपणा करवाथी थाय छे. जेमके सात द्वीप अने सात समुद्र एटलो ज लोक छे इत्यादि. १४. सर्व सत्त्वनी आशातना तेनी विपरीत प्ररुपणा करवाथी थाय छे. १५. काळनी आशातना-काळ छेज नहीं, अथवा श्रा विश्व ज काळनी परिणति के इत्यादि. १६. श्रुतनी आशातना तेमां कह्याथी विपरीत प्ररूपणा करवाथी थाय छे. १७. श्रुत देवतानी आशातना-श्रुत देवता छेज नहीं. होय तो पण ते काइ तीर्थनी उन्नति करता नथी इत्यादि. १८. वाचनाचा- येनी आशातना-या वाचनाचार्य बीजाना सुखदुःखने जाणता ज नथी, कारणके ते वारंवार वांदणां अपावे छे इत्यादि.
१६. हवे वाकीनी चौद आशातनाओ सूचना विषयवाळी कहे छ-व्याविद्धाक्षर एटले विपरीत अक्षरो बोलवा ते. २०. व्यत्याम्रोडित-परस्पर संबंध विना छूटा छूटा अथवा सेळमेळ अक्षरो बोलवा ते. २१. हीनाक्षर-ओका अक्षर बोलवा ते. २२. प्रत्यक्षर-अधिक अक्षर बोलवा ते. २३. पदहीन-पद ओछु बोलबुं ते. २४. विनयहीन-उचित विनय कर्या विना बोलवू ते. २५. घोपहीन-उदात्त, अनुदात्त विगेरे स्वर रहित वोलवू ते. २६. योगहीन-जोग वह्या विना भणबुं ते. २७. सुष्टुदत्त-शिष्यनी शक्ति उपरांत तेने वधारे भणाचवं ते. २८. दुष्टुप्रतीच्छित-शिष्य कलुष मनथी भणे ते. २६. अकाळस्वाध्याय-अकाळे भणवू ते. ३०. काळ अस्वाध्याय-भणवाने काळे न भणबुं ते. ३१. अस्वाध्यायिक स्वाध्याय -असज्झायने वखते अथवा असज्झायने दिवसे भणबुं ते. ३२. स्वाध्यायिक अस्वाध्याय-सझायने रखते अथवा सझायने दिवसे न भणबुं ते. ३३. अथवा तो गुरुना विषयवाळी तेत्रीश आशातनाओ थाय छे ते आ प्रमाणे.-कारण विना गुरुनी आगळ चालवू. १. गुरुनी पडखे चालवू. २. गुरुनी अति समीपे चालवू. ३. एज रीते सन्मुख उभा रहे. ४. पडखे उभा रहे. ५. अति समीपे उभा रहेवू. ६. एज रीते सन्मुख बेस. ७. पडखे बेसवु. ८. अति समीपे बेसबु. ६. आ नव प्रकारे करे ते आशा- तना समजवी. बहार विचारभूमिथी आवीने गुरुनी पहेलां चल करे-हाथ पग धोवे. १०. बहार विचारभूमिथी आवीने गुरुनी पहेलां गमनागमननी आलोचना करे. आ बने प्रकारे करे तो आशातना लागे. ११. राने अथवा सवारे गुरु बोलावे त्यारे शिष्य जागता छतां बोले नहीं तो आशातना लागे. १२. गुरु कोइनी साथे कांइ आलाप संलाप करवाना होय तेना N पहेलांज पोते (शिष्य) तेनी साथे आलाप संलाप करे तो पाशातना लागे. १३. अशनादिक लावीने प्रथम वीजा साधु पासे आलोचना करी पछी गुरु पासे आलोचना करे तो आशातना लागे. १४. अशनादिक लावीने प्रथम बीजा साधुने देखाडी पछी गुरुने देखाडे तो आशातना लागे. १५. अशनादिक लावी प्रथम बीजा साधुओने निमंत्रण करी पछी गुरुने निमंत्रण करे तो आशातना लागे. १६. गुरुने पूछ्या विना वीजा साधुअोने तेमनी इच्छा प्रमाणे अशनादिक आपे तो आशातना लागे. १७. गुरुनी साथे अशनादिक खातो सतो पोते सारो सारो आहार ग्रहण करे तो आशातना लागे. १८. दिवसे गुरुए बोलान्या छतां जवाब न आपे तो आशातना लागे. १६. गुरु प्रत्ये मोटा शब्दथी कठोर वचन बोले तो आशातना लागे. २०. गुरु बोलावे त्यारे पोते जे ठेकाणे बेठो होय त्यां बेठो वेठो ज जवाब आपे तो आशातना लागे. २१. गुरु बोलावे त्यारे शुं छे ? एम जवाव आपे तो आशातना लागे. २२. गुरुने तुंकारे बोलावे तो आशातना लागे. २३. गुरु कहे के आ ग्लान साधुनी वैयावच्च केम करतो नथी ? त्यारे पोते सामो कहे के 'तमे केम करता नथी?' एम बोलवाथी आशातना लागे. २४. गुरु धर्मकथा कहेतां होय ते वखते पोतार्नु मन सारं न रहे (अनुमोदना न करे) तो आशातना लागे. २५. गुरु सूत्रादिकनुं व्याख्यान करे र त्यारे 'तमने सांभरतुं नथी, आनो अर्थ तो आवो छे. एम बोलवाथी आशातना लागे. २६. गुरु कथा कहेता होय, तेने छेदी पोते बोलवा मांडे तो आशातना लागे. २७. गुरु देशना देता होय ते वखते 'भिक्षादिकनो अवसर थयो छे' एम कही गुरुनी पर्पदानो भंग करे तो आशातना लागे. २८. गुरुनी पर्पदा वेठी होय तेज वखते वेत्रणवार तेनी तेज कथा पोते कह्या करे तो आशातना लागे. २६. गुरुनी शय्या संस्तारकने पगवडे संघट्टो करी मिथ्यादुष्कृत आपे नहीं तो आशातना लागे. ३०. गुरुनी शय्यामां के संथारामां बेसवादिकथी आशातना लागे. ३१. गुरु करतां पोतार्नु आसन उबुं राखवाथी आशातना लागे. ३२. गुरुनी समान आसन राखवाथी पण आशातना लागे. ३३. आ आशातनाओ दशाश्रुतस्कंधमां कही छे. २२. एवं तिदंडविरओ, तिगरणसुद्धो तिसल्लनीसल्लो। तिविहेण पडिकंतो, रकामि महव्वए पंच ॥ २३ ॥ (एवं त्रिदण्डविरतः त्रिकरणशुद्धः त्रिशल्यनिःशल्यः।त्रिविधेन प्रतिक्रान्तःरक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥२३॥) ( एवं) एज प्रमाणे (तिदंडविरओ) मन, वचन अने काया एत्रण दंडथी विराम पामेलो, तथा (तिगरणसुद्धो) मन विगेरे त्रण करणे करीने शुद्ध थयेलो, तथा (तिसल्लनीसलो) माया शल्य, निदानशल्य अने मिथ्यात्वशल्य एत्रण शल्यवडे शल्य रहित थयेलो, तथा (तिविहेण) त्रण प्रकारना करणे करीने एटले मन, वचन, कायाए करीने (पडिकतो) पडिकमेलो एटले सर्व अतिचारोथी निवृत्ति पामेलो एवो हुँ (रकामि महन्वए पंच) पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. २३. हवे महावतोना उच्चारने समाप्त करता छता कहे छे.- इच्चेयं महव्वयउच्चारणं थिरत्तं सल्लुद्धरणं धिइबलयं ववसाओ साहणट्ठो पावनिवारणं निका- यणा भावविसोही पड़ागाहरणं निज्जुहणाऽऽराहणा गुणाणं संवरजोगो पसत्थज्झाणोवउत्तया जुत्तया य नाणे परमट्ठो उत्तमट्ठो, एस खलु तित्थंकरहिं रइरागदोसमहणेहिं देसिलो पवयणस्स an १ सारो, छज्जीवनिकायसंजमं उवएसियं तेल्लोक्कसकयं ठाणं अब्भुवगया ॥ (इत्येतत् महाव्रतोच्चारणं स्थिरत्वं शल्योद्धरणं धृतियलकं (दं) व्यवसायः साधनार्थः पापनिवारणं निकाचना भावविशोधिः पताकाहरणं नि!हणा आराधना गुणानां संवरयोगः प्रशस्तध्यानोपयुक्तता यु- क्तता च ज्ञानेन परमार्थः उत्तमाः, एतत् खलु तीर्थङ्करैः रतिरागद्वेषमथनैः देशितः प्रवचनस्य सारः (ते च ) षड्जीवनिकायसंयमं उपदिश्य त्रैलोक्यसत्कृतं स्थानम् अभ्युपगताः॥) (इच्चेयं ) ए रीते आ ( महन्वयउच्चारणं) पंच महाव्रतानुं उच्चारण करेलुं छे. तेनाथी शो गुण थाय ? अथवा उच्चारण के छ ? ते उपर कहे छ के-(थिरतं) महाव्रतोने विषेज अथवा धर्मने विषे स्थिरपणुं थाय छे. तथा (सल्लु- द्धरणं) शल्यनो उद्धार-नाश करनार छे, तथा (धिइबलयं ) धृति एटले चित्तनी समाधि, तेनुं बळ आपनार छ, तथा ( ववसाओ) दुष्कर कार्य करवानो अध्यवसाय करनार छ, तथा ( साहणट्ठो) साधकतम पदार्थ एटले मोक्ष अर्थने सा- धवानो उपाय छे, तथा ( पावनिवारणं) पापर्नु निवारण करनार छ, तथा (निकायणा) निकाचना जेवी निकाचना एटले व्रतोनो स्वीकार करवामां अत्यंत दृढ निबंधन छ, तथा (भावविसोही) भाव एटले आत्माना परिणामने अत्यंत शुद्ध करनार छ, तथा ( पडागाहरणं) चारित्रनी आराधनारूप पताकाने ग्रहण करनार छ, तथा (निज्जुहणा) आत्मारूपी नगरमांथी कर्मरूपी शत्रुने काढी मूकनार छ, तथा (आराहणा गुणाणं) मुक्तिना साधनरूप गुणोनी आराधना करनार छे, तथा (संवरजोगो) नवा कर्मना आगमननो निरोध करनारजे संवर तेनो योग एटले व्यापार करनार छ, तथा (पसत्थ- सूत्र जानु हित .॥ ज्झाणोवउत्तया) प्रशस्त एवा धर्मध्यान अने शुक्लध्याननो उपयोग करनार-जोडनार छ, तथा (जुत्तया य नाणे) ज्ञानवडे करीने युक्तता एटले सहित करनार छ अर्थात् ज्ञानेवडे सद्बोधने उत्पन्न करनार छ, तथा ( परमट्ठो ) परमार्थरूप छे एटले अकृत्रिम पदार्थरूप छ, तथा (उत्तमट्ठो) उत्तम पदार्थरूप छे, कारणके मोक्ष साधवामां आ महाव्रतो सर्वोत्तम छे. वळी (एस) आ महाव्रतोनो उच्चार (खलु) निश्थे (रइरागदोसमहणेहिं) रति एटले चारित्र मोहनीय कर्मना उदयथी उत्पन्न थतो आनंद, राग एटले ममता अने द्वेष एटले अहंकार तेमने मथन करनारा एवा (तित्थंकरहिं ) तीर्थकरोए (पवयणस्स सारो) प्रव- चनना सार रूप कह्यो छे. तथा ते तीर्थकरो (राजीवनिकायसंजमं) पृथिव्यादिक छ जीव निकायना रक्षणरूप संयमनो तथा उपलक्षणथी मृषावादादिकना परिहार रूप संयमनो भव्य प्राणीओने ( उपएसियं) उपदेश आपीने तथा उपलक्षणथी पोते पण ते प्रकारे संयम पाळीने ( तेल्लोकसकयं ) त्रण लोकना जीवोए सत्कार करेला एटले पूजेला (ठाणं) स्थानने अर्थात् मोक्ष स्थानने (अब्भुवगया) पामेला छे. आम कहेवाथी पण महाव्रतो अत्यंत ग्रहण करवा लायक छ एम सूचवे छे. हवे आ महाव्रतोना कीर्तननी समाप्तिमां मंगळने माटे आसन्न उपकारी होवाथी विशेषे करीने श्री महावीरस्वामीनी स्तुति करे छे.- नमो त्थु ते सिद्ध बुद्ध मुत्त नीरय निस्संग माणमूरण गुणरयणसागर मणंत मप्पमेय, नमो त्थु ते महइ महावीर वद्धमाण सामिस्स, नमो त्थु ते अरहो, नमो त्थु ते भगवत्रो ति कटु ॥ (नमोऽस्तु ते सिद्ध बुद्ध मुक्त नीरज निःसङ्ग मानमूरण गुणरत्नसागर अनन्त अप्रमेय, नमोऽस्तु ते महति (कृतमते ) महावीर वर्धमान स्वामी (इति कृत्वा), नमोऽस्तु ते ऽर्हन् (इति कृत्वा ) नमोऽस्तु ते भगवान् इति कृत्वा ॥) (नमो स्थु ते) तमने नमस्कार हो. तमे केवा छो? ते उपर भगवानना संबोधनवाळा विशेपणो आपे छे-(सिद्ध) हे सिद्ध ! (बुद्ध) हे बुद्ध ! एटले केवळज्ञानवडे समग्र वस्तुतत्त्वने जाणनार ! (मुत्त ) हे पूर्वे बांधेला सर्व कर्मोथी मुक्त (नीरय) हे नवा बंधाता कर्म रहित अथवा हे उत्सुकता रहित ! (निस्संग) हे पुत्र, स्त्री, धन विगेरे सर्व संग रहित ! ( माणमूरण ) हे सर्व माननो-गर्वनो नाश करनार ! (गुणरयणसागर ) हे गुण रूपी रत्नना सागर ! (अणंत) हे अनंत ज्ञान स्वरूप ! ( अप्पमेय ) हे अप्रमेय एटले छद्मस्थना ज्ञानथी न जाणी शकाय तेवा ! कारण के शरीर रहित एकला जीवनुं स्वरूप छद्मस्थो जाणी शकता नथी. तथा ( नमो त्थु ते ) तमने नमस्कार हो. तमे केवा छो? तेना संबो- धन आपे छे-(महइ) महानने विपे एटले मोक्षने विपे करी छे मति जेणे एवा (महावीर) हे महावीर ! एटले रागादिक शत्रु उपर पराक्रम करनार, एटले तेनो विजय करनार अथवा विशेष करीने मोक्ष प्रत्ये जनार अथवा भव्य प्राणीओने मोक्षमां मोकलनार, अथवा कर्मनो नाश करनार ! आ सर्व अर्थ महावीर शब्दना थाय के कह्यु के के-कर्मनुं विदारण करे छ, तपवडे विराजे छे-शोभे छे अने तपना वीर्यवडे युक्त छे, तेथी ते वीर कहेवाय छे." तथा (वद्धमाण) हे वर्धमान ! एटले माता पिताए पोताना कुळ अने समृद्धिनी वृद्धिना हेतु रूप होवाथी जेनुं वर्धमान नाम कर्यु के एवा ! शा माटे तमने नमस्कार हो ? ते माटे कहे छे के (सामिस्स ) तमे स्वामी-प्रभु छो ए हेतु माटे. तथा (नमो त्थु ते अरहो) अशोकादिक आठ महा प्रातिहार्य ने त्र त रूप पूजाने लायक होवाथी तमे अर्हन् छो ए हेतु माटे तमने नमस्कार हो. तथा ( नमो त्थु ते भगवओ ति कट्ट भगवान को ति कडु एटले एम करीने-ए हेतु माटे अथवा ति कट्ठ एटले त्रणवार तमने नमस्कार हो. अहीं समग्र ऐश्वर्य, रूप, यश, लक्ष्मी, धर्म अने प्रयत्न ए छ भग शब्दना अर्थ थाय छे, ते भग जेने के ते भगवान कहेवाय छे. जेम महाव्रतोनो उच्चार कर्मनो क्षय करनार छ, तेम श्रुतनुं कीर्त्तन पण कर्मनो क्षय करनार छे, माटे महाव्रतोतुं कीर्तन समाप्त करवापूर्वक श्रुतनुं कीर्तन करवा माटे कहे छ- एसा खलु महव्वयउच्चारणा कया, इच्छामो सुत्तकित्तणं काउं॥ (एषा खलु महाव्रतोचारणा कृता, इच्छामः श्रुतकीर्तनां कर्तुम् ॥) ( एसा) आ (खलु ) निश्चे (महव्वयउच्चारणा) महाव्रतोतुं उच्चारण ( कया ) कयु. हवे ( सुत्तकित्तणं) श्रुतनुं कीर्तन ( काउं) करवा माटे ( इच्छामो ) अमे इच्छीए बीए. अही श्रुत संक्षेपे करीने वे प्रकारनुं कर्तुं छे-अंगप्रविष्ट अने अंगबाह्य. तेमां वे पग, ये जंघा, बे ऊरु, एक पृष्ठ, एक उदर, बे बाहु, एक ग्रीवा अने एक मस्तक, आ प्रमाणे श्रुत रूपी पुरुषना बार अंगमा रहेढं जे श्रुत ते अंगप्रविष्ट कहेवाय छे. ते आ प्रमाणे-आचारांग अने सूत्रकृतांग ( सुगडांग) ए प्रवचन रूपी पुरुषना के पगरूप छे, स्थानांग अने समवायांग ए वे जंघा रूप छे. विगैरे. अथवा गणधरोए जे श्रुत रच्यु ते अंगप्रविष्ट अने जे श्रुत स्थविरोए रच्युं ते अंग- बाह्य कहेवाय छे. तेमां अंगप्रविष्ट जे श्रुत ते नियत छे एटले अवश्य छ, अने जे अंगवाह्य श्रुत छे ते अनियत छे. हवे ते अंगबाह्य श्रुत पण वे प्रकारनुं छे-आवश्यक अने आवश्यकथी बीजं. तेमां आवश्यक श्रुतमां अल्प कहेवा जे छ तेथी प्रथम तेने कहेवा माटे तेना उपदेशकने नमस्कार करवा पूर्वक सूत्र कहे - नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइयं छविहमावस्सयं भगवंतं ॥ ( नमः तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः, यैः इंद वाचितं षडिधमावश्यकं भगवत् ) (तसि ) ते (खमासमणाणं ) क्षमादिक गुणवाळा महातपखी गुरु महाराज अथवा तीर्थकर गणधरादिकने (नमो) नमस्कार थानो. के (जेहिं ) जे क्षमाश्रमणोए ( भगवंतं ) अतिशयादिक गुणवाळं ( इम) आ (छन्विहं) छ प्रकारनुं (आवस्सयं) आवश्यक (वाइयं ) अमारी पासे यांच्यु अमने संभळाव्यु-अमने आप्यु अथवा सूत्रार्थपणे रब्यु छ. ते आवश्यकना छ प्रकार बतावे छे. तं जहा-सामाइयं चउवीसत्थओ वंदणयं पडिकमणं काउस्सग्गो पञ्चरकाणं, सव्वेहिं पि एयम्मि छविहे आवस्सए भगवते समुत्ते सपत्थे सगंथे सनिज्जुत्तिए ससंगहणिए जे गुणा वा भावा वा अरहंतेहिं भगवतेहिं पन्नत्ता वा परूविया वा, ते भावे सबहामो पत्तियामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो॥ ( तद्यथा-सामायिकं चतुर्विंशतिस्तवः वन्दनकं प्रतिक्रमणं कायोत्सर्गः प्रत्याख्यानं, सर्वस्मिन्नपि एतस्मिन् षड्विधे अावश्यके भगवति ससूत्रे साथै सग्रन्थे सनियुक्तिके ससंग्रहणिके ये गुणा वा भावा वा अर्हद्भिः भगवद्भिः प्रज्ञप्ता वा प्ररूपिता वा, तान् भावान् श्रद्दध्महे प्रतिपद्यामहे रोचयामः स्पृशाम: पालयामः अनुपालयामः॥) (तं जहा ) ते छ प्रकार प्राप्रमाणे छे-(सामाइयं ) सामायिक १, (चउवीसत्थओ) चतुर्विंशतिस्तव २, (वंदणयं) वंदनक ३, (पडिक्कमणं) प्रतिक्रमण ४, ( काउस्सग्गो) कायोत्सर्ग ५, तथा ( पच्चरकाणं ) प्रत्याख्यान ६. ( सव्वेहि पि) सर्व एवा पण (एयम्मि) आ (छविहे ) छ प्रकारना (आवस्सए आवश्यकने विपे, केवा आवश्यकने विपे? (भगवंते ) समग्र ऐश्वर्यवाळा, ( ससुत्ते ) सूत्र सहित (सअत्थे ) अर्थ सहित (सगंथे ) सूत्र अने अर्थ ए बने सहित ( सनिज्जुत्तिए ) नियुक्ति सहित ( ससंगहणिए ) संग्रहणी सहित एवा मा छ प्रकारना आवश्यकने विषे (जे) जे कोइ (गुणा वा) गुणो एटले विरति तथा जिनेश्वरना गुणोतुं कीर्तन ए आदि धर्मों, अथवा (भावा वा) क्षायोपशमादिक भावो अथवा जीवादिक भावो-पदार्थो (अरहंतेहिं ) देवादिकनी करेली पूजाने योग्य एवा तथा ( भगवंतेहिं ) समग्र ऐश्व- यांदिवाळा जिनेश्वरोए ( पन्नत्ता वा ) सामान्य रीते कह्या छे अथवा (परूविया वा) विशेषे करीने कह्या छे, (ते भावे) ते भावोने (सदहामो) 'आ एम ज छे' ए रीते सामान्यपणे अमे श्रद्धा करीए छीए, (पत्तियामो) प्रीतिथी अंगीकार करीए छीए, (रोएमो) अत्यंत अभिलापाथी रुचिवाळा करीए छीए-रुचावीए बीए, (फासेमो) सेववावडे स्पर्श करीए छीए, (पालेमो) वारंवार पाळीए छीए, तथा (अणुपालेमो) जावजीव पाळीए छीए. -- ते भावे सदहंतेहिं पत्तियंतेहिं रोयंतेहिं फासंतेहिं पालंतेहिं अणुपालंतेहिं अंतोपकस्स जं वाइयं पढियं परियट्टियं पुच्छियं अणुपेहियं अणुपालियं तं दुककयाए कम्मरकयाए मोकाए बोहिला- भाए संसारुत्तारणाए ति कडु उवसंपजित्ताणं विहरामि ॥ (तान् भावान् श्रद्दधानः प्रतिपद्यमानैः रोचयद्भिः स्पृशद्भिः पालयद्भिः अनुपालयद्भिः अन्तःपक्षस्य यत् वाचितं पठितं परिवर्तितं पृष्टम् अनुप्रेक्षितम् अनुपालितं तत् दुःखक्षयाय कर्मक्षयाय मोक्षाय बोधि- लाभाय संसारोत्तारणाय इति कृत्वा उपसंपद्य विहरामः) (ते भावे ) ते भावोने (सदहंतेहिं ) आ आमज छे एवी रीते सामान्यपणे श्रद्धा करता, ( पत्तियंतेहिं ) प्रीतिथी अंगीकार करता, (रोयंतेहिं ) अत्यंत अभिलापाए करीने सेवन करवामां सन्मुख थइने रुचावता, (फासंतेहिं ) सेववावडे स्पर्श करता, (पालंतेहिं ) वारंवार पालन करता तथा (अणुपालंतेहिं) जावजीव पालन करता एवा अमोए (अंतोपरकस्स) पखवाडीया मध्ये (ज) जे काइ (वाइयं ) वांच्यु होय एटले वीजाने आप्यु होय, भणाव्यु होय, (पढियं ) पोते भएयु होय, (परियट्टियं) परावर्तन कर्यु होय एटले सूत्रथी गण्यु होय, (पुच्छियं) पूछ्युं होय एटले प्रथम भणेला सूत्रादिकमा शंका थये छूते प्रश्न कर्यो होय, (अणुपहियं ) अर्थ भूली जवाना भयथी विचार्य होय-मनन कर्यु होय तथा (अणुपालियं) आ सर्व प्रकारवडे पाळ्युं होय एटले शुद्ध अनुष्ठान कर्यु होय (तं) ते सर्व (दुककयाए) शरीर अने मन संबंधी दुःखना क्षयने माटे ( कम्मरूयाए) ज्ञानावरणीयादिक कर्मना विनाशने माटे ( मोक्खाए ) मोक्षने माटे (बोहिलाभाए ) बोधिना लाभने माटे एटले परभवमा सद्धर्मनी प्राप्ति माटे ( संसारुत्तारणाए ) संसारनो पार पामवा माटे अमारे थशे (ति कटु एम करीने एटले ए हेतुथी ( उवसंपजित्ताणं) ते सर्व अंगीकार करीने (विहरामि) अमे विचरीए छीए एटले मासकल्पा- दिक साधुना विहारवडे वर्तीए बीए. तथा- अंतोपकस्स जं न वाइयं न पढियं न परियट्टियं न पुच्छियं नाणुपेहियं नाणुपालियं संते बले संते वीरिए संते पुरिसकारपरकमे, तस्स आलोएमो पडिकमामो निंदामो गरिहामो विउद्धेमो वि- सोहेमो अकरणयाए अब्भुटेमो अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवजामो, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ ( अन्तःपक्षस्य यत् न वाचितं न पठितं न परिवर्तितं न पृष्टं नानुप्रोक्षितं नानुपालितं सति बले सति वीर्ये सति पुरुषकारपराक्रमे, तत् अालोचयामः प्रतिक्रमामः निन्दामः गामः व्यतिवर्तयामः (वित्रोट- यामः विकुद्दयामः वा) विशोधयामः अकरणतयाऽभ्युत्तिष्ठामः यथाई तपःकर्म प्रायश्चित्तं प्रतिपद्यामहे, तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥) (अंतोपक्खस्स) पखवाडीयानी मध्ये अमे (जं)जे (न वाइयं ) न वांच्युं होय एटले बीजाने आप्युं न होय, (न पढियं ( पोते भण्युं न होय, (न परियट्टियं) परावर्तन कयुं न होय एटले गण्युं न होय, (न पुच्छियं) शंका थये छते पूलघु न होय (नाणुपहियं ) विचायुं न होय एटले भूली जवाना भयथी चितवन कयुं न होय तथा (नाणुपालियं) पाळ्यु न होय-अनुष्ठान कयु न होय, शु छतां पा सर्व न कर्यु होय ? (संत बले) शरीर संबंधी चळ छतां (संते वीरिए) आत्मानुं वीर्य छतां तथा ( संत पुरिसकारपरकमे) पुरुषपणाना अभिमानरूप पराक्रम उतां पण अमे जे वांच्युं विगेरे न होय ( तरस) ते सर्वने अमे (आलोएमो) आलोचिए छीए एटले गुरुने निवेदन करीए बीए, (पडिकमामो) प्रतिक्रमण करीए बीए-पाला फरीए छीए, (निंदामो) आत्म साक्षीए निंदीए बीए, (गरिहामो) गुरुनी समक्ष गर्दी करीए छीए, (विउद्देमो) अवाचनादिकना अनुबंधनो विच्छेद-नाश करीए छीए, (विसोहेमो) शोधीए छीए एटले दोपरूपी पंकथी मलिन थयेला आत्माने निर्मळ करीए बीए, (अकरणयाए) फरीथी तेम नहीं करवावडे करीने (अन्मुढेमो) उद्यमवंत थइए डीए, तथा (अहारिहं ) अपराधने उचित एवा (तवोकम्म) नीवि आदिक तप कर्मरूप (पायच्छित्तं) प्रायश्चित्तने ( पीडवजामो) अमे अंगीकार करीए छीए. तथा (तस्स ) ते अवाचन, अपठन विगेरे दोपना ( दुक्कडं ) दुष्कृतने-पापने (मिच्छामि) अमे मिथ्या करीए छीए-मिथ्यादुष्कृत आपीए छीए. आ प्रमाणे आवश्यक शुत कयु. हवे आवश्यक शिवाय बीजा श्रुत संबंधी कहेवानो अवसर छे. ते श्रुत पण वे प्रकारच्छे- कालिक अने उत्कालिक. तेमा जे श्रुत असझ्झाय न होय तो दिवस अनेरात्रिनी पहेली अने छेल्ली ए वे पोरसीमांज भणाय के ते श्रुत काळे-काळवेळाए नीपजेलं होवाथी कालिक कहेवाय छ, तथा जे श्रुत काळवेळा अने पांच प्रकारना असमझाय सिवाय सर्व वखते भणाय छे ते उत्कालिक कहेवाय छे. तेमां प्रथम उत्कालिक श्रुत कहे छे.- a नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइयं अंगवाहिरं उकालियं भगवंतोतं जहा-दसवेवालियं कप्पियाकप्पिमं चुल्लकप्पसुझं महाकप्पसुग्रोवाइअं रायप्पसेणिअंजीवाभिगमो पालवणा महापास- वणा नंदी अणुओगदाराई देविंदत्थयो तंदुलवेत्रालिअं चंदाविज्झयं पमायप्पमायं पोरिसिमंडलं मंड- लपवेसो गणिविजा विजाचरणविणिच्छो झाणविभत्ती मरणविभत्ती आयविसोही (चरणविसोही मरणविसोही) संलेहणासुग्रं वीरायसुझं विहारकप्पो चरणविही आउरपच्चरकाणं महापच्चरकाणं ॥ (नमस्तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः, यैः इदं वाचितम् खङ्गबाह्यम् उत्कालिकं भगवत् । तद्यथा-दशवका- लिकं कल्प्याकल्प्यं क्षुल्लकल्पश्रुतं महाकल्पश्रुतम् औपपातिकं राजप्रश्नीयं जीवाभिगमः प्रज्ञापना महा- प्रज्ञापना नन्दी अनुयोगद्वाराणि देवेन्द्रस्तवः तंडु(दु)लवैचारिकं चन्द्रावेध्यकं प्रमादाप्रमादं पौरुषीमण्डलं मण्डलप्रवेशः गणिविद्या विद्याचरणविनिश्चयः ध्यानविभक्तिः मरणविभक्तिः आत्मविशुद्धिः (चरणवि- शोधिः मरणविशोधिः ( संलेखनाश्रुतं वीतरागश्रुतं विहारकल्पः चरणविधिः पातुरप्रत्याख्यानं महाप्रत्याख्यानम् ॥) १ एतदध्ययनद्वयपाठः क्वचित् दृश्यते ।
(नमो तेसिं खमासमणाणं ) ते क्षमाश्रमणोने एटले सूत्रार्थने आपनारा गुरुओने नमस्कार थाओ. के (जेहिं) ओए (इमं ) आ (अंगबाहिरं ) अंगबाह्य ( उकालिअं) उत्कालिक एवं अने (भगवंतं ) मोटा अर्य रूप समृद्धिवालं श्रुत (वाइयं ) अमोने आप्युं छे. (तं जहा) ते उत्कालिक श्रुत आ प्रमाणे छे.-(दसवेयालिअं) दशकालिक १ (कप्पि- आकप्पियं) कल्प्याकल्प्य २ (चुल्लकप्पसुअं) क्षुल्ल (नानुं) कल्पश्रुत ३ ( महाकप्पसुअं) महाकल्पश्रुत ४ (ोवाइअं) औपपातिक ५ (रायप्पसेणि) रायपसेणी-राजप्रश्नीय ६ (जीवाभिगमो) जीवाभिगम ७ ( पसरणा) प्रज्ञापना ८ (महापासवणा) महाप्रज्ञापना ६ (नंदी) नंदी १० (अणुओगदाराई) अनुयोगद्वार ११ (देविदत्यो) देवेंद्रस्तव १२ (तंदुलवेआलिअं) तंदुलबैचारिक १३ (चंदाविज़्मयं) चंद्रावेध्यक १४ (पमायप्पमायं ) प्रमादाप्रमाद १५ (पोरिसि- मंडलं) पौरुपीमंडळ १६ (मंडलप्पवेसो) मंडळप्रवेश १७ (गणिविजा) गणिविद्या १८ (विजाचरणविणिच्छमो) विद्या- चरणविनिश्चय १६ (झाणविभत्ती) ध्यानविभक्ति २० (मरणविभत्ती) मरणविभक्ति २१ (आयविसोही) आत्मवि- शुद्धि २२ (संलेहणासुझं) संलेखना श्रुत २३ ( वीरायसुअं) वीतराग श्रुत २४ (विहारकप्पो) विहार कल्प २५ ( चरणविही) चरणविधि २६ ( आउरपञ्चक्खाणं) आतुर प्रत्याख्यान २७ तथा (महापचक्खाणं) महाप्रत्याख्यान २८. आ प्रमाणे या २८ अध्ययनो कहां. ते उपलक्षण होवाथी आटलांज के एम नथी. बीजां पण छे एम जाणवू. सव्वेहिं पि एयम्मि अंगबाहिरे उकालिए भगवंते ससुत्ते सत्थे सगंथे सनिज्जुत्तिए ससंगह- ।
... 3D णिए जे गुणा वा भावा वा अरहंतेहिं भगवंतेहिं पामत्ता वा परूविश्रा वा ते भावे सदहामो पत्ति- श्रामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो। ते भावे सदहंतेहिं पत्तितेहिं रोअंतेहिं फासंतेहिं पालंतेहिं अणुपालंतेहिं अंतोपरकरस जं वाइअं पढिअं परियट्टिकं पुच्छिअं अणुपेहि अणुपालिअं तं दुककयाए कम्मरकयाए मोकाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणाए त्ति कटु उवसंपजित्ता णं विह- रामि । अंतोपरकस्स जं न वाइ न पढिरं न परियहि न पुच्छिनं नाणुपेहि नाणुपालिअं संते बले संते वीरिए संते पुरिसकारपरकमे, तस्स आलोएमो पडिकमामो निंदामो गरिहामो विउद्देमो विसोहेमो अकरणयाए अब्भुटेमो अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवज्जामो तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ (एतत्सूत्रस्य संस्कारः पूर्ववत् ज्ञेयः) आ सूत्रनो अर्थ प्रथम आवी गयो छे ते प्रमाणे जाणवो. आ प्रमाणे उत्कालिक श्रुत कमु. हवे कालिक श्रुत कहे छे..- णमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइभं अंगबाहिरं कालिअं भगवंतं । तं जहा-उत्तरज्झ- यणाई दसाओ कप्पो ववहारो इसिभासिाई निसीहं महानिसीहं जंबुद्दीवपन्नत्ती सूरपन्नत्ती चंद- पन्नत्ती दीवसागरपन्नत्ती खुड्डियाविमाणपविभत्ती महल्लियाविमाणपविभत्ती अंगचूलिआए वग्गचूलि- आए विवाहचूलिबाए अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए धरणोववाए वेसमणोववाए वेलंधरोववाए देविंदोववाए उट्टाणसुए समुट्ठाणसुए नागपरिआवंणियाणं निरयावलिआणं कप्पिाणं कप्पवडिंस- याणं पुप्फिबाणं पुप्फचूलिआणं (वेगिहाण) वणिहदसाणं आसीविसभावणाणं दिट्ठीविसभावणाणं चारण(सुमिण)भावणाणं महासुमिणभावणाणं तेअग(ग्गि)निसग्गाणं ॥ (नमस्तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः, यैः इदं वाचितम् अङ्गवायंकालिकं भगवत्। तद्यथा-उत्तराध्ययनानि दशा: कल्पः व्यवहारः ऋषिभाषितानि निशीथं महानिशीथं जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिः सूरप्रज्ञप्तिः चन्द्रप्रज्ञप्तिः द्वीपसागर- प्रज्ञप्तिः क्षुल्लका विमानप्रविभक्तिः महती विमानमविभक्तिः अङ्गचूलिका वर्गचूलिका विवाहचूलिका अरुणोप- पात:वरुणोपपातःगरुडोपपातः धरणोपपातः वैश्रमणोपपातःवेलन्धरोपपातः देवेन्द्रोपपात उत्थानश्रुतंस- मुत्थानश्रुतं नागपरिज्ञावलिका निरयावलिकाः कल्पिकाः कल्पावतंसिकाः पुष्पिताः पुष्पचूलिका (वृषिएकाः) वृष्णिदशा आशीविषभावना दृष्टिविषभावनाः चारण(स्वप्न)भावनाःमहास्वमभावनाः तैजसनिसर्गाः॥) (तर्सि) ते (खमासमणाणं) क्षमाश्रमणोने (णमो) नमस्कार थाओ. के (जेहिं ) जेओए ( इमं) आ (अंगबाहिरं) १ आ पद मोटी टीकामा तथा अवचूरिमा नथी. भाषांतरमां तो मूळमां तेमज अर्थमां पण नथी. तेमज छत्रीशनी गणत्रीमां पण नथी.
अंगबाह्य (भगवंतं) अतिशयादिक गुणवाळू (कालिअं) कालिक श्रुत (वाइअं) अमने आप्युं छे. (तं जहा) ते आ प्रमा- ( उत्तरज्झयणाई ) उतराध्ययन १, (दसाओ) दशाश्रुतस्कंध २, (कप्पो) वृहत्कल्प ३ ( ववहारो) व्यवहार ४ ( इसिभासिआई) ऋषिभापित ५ (निसीहं) निशीथ ६ (महानिसीहं) महानिशीथ ७ (जंबुद्दीवपन्नती) जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति : (सूरपन्नत्ती) सूरप्रज्ञप्ति : (चंदपन्नत्ती) चंद्रप्रज्ञप्ति १० (दीवसागरपन्नत्ती) द्वीपसागरप्रज्ञप्ति ११ (खुड्डिा विमाणपवि- भत्ती ) क्षुद्रका विमानप्रविभक्ति १२ (महल्लिा विमाणपविभत्ती) महती विमानप्रविभक्ति १३ (अंगचूलिआए) अंगचूलि- का १४ (वग्गचूलिआए) वर्गचूलिका १५ (विवाहचूलिआए) विवाहचूलिका १६ (अरुणोववाए) अरुणोपपात १७ (वरुणो- ववाए) वरुणोपपात १८ (गस्लोववाए) गरुडोपपात १६ धरणोववाए) धरणोपपात २० (वेसमणोववाए) वैश्रमणोपपात २१ (वेलंधरोववाए) वेलंधरोपपात २२ (देविंदोववाए) देवेंद्रोपपात २३ (उट्ठाणसुए) उत्थानश्रुत २४ (समुट्ठाणसुए) समुत्थान श्रुत २५ (नागपरित्रावणिआणं) नागपरिज्ञावलिका २६ (निरयावलिपाणं) निरयावलिको (कप्पिाणं) कल्पिका २७ (कप्पवडिंसयाणं ) कल्पावतंसक २८ (पुष्फिआणं) पुष्पिता २६ (पुप्फचूलित्राणं) पुष्पचूलिका ३० ( परिहदसाणं) वृष्णिदशा ३१ (आसीविमभावणाणं) आशीविष भावना ३२ (दिट्ठीविसभावणाणं) दृष्टिविष भावना ३३ ( चारण- भावणाणं) चारणभावना ३४ ( महासुमिणभावणाणं) महास्वप्न भावना ३५ तथा (तेयगनिसग्गाणं) तैजसनिसर्ग ३६. आ छत्रीश अध्ययनो पण उपलक्षण जाणवा, कारण के श्री ऋषभदेव स्वामीना वखतमा चोराशी हजार प्रकीर्णको हता, १ हवे पछीना पाच नाम आ निरयावलिकाना विभागरूप ज छे. iA मध्यम बावीश तीर्थकरोना वखतमा संख्याता हजार प्रकीर्णको हता, एटले के जेना जेटला शिन्यो तेटला प्रकीर्णको होय छ, तथा श्रीवर्धमान स्वामीना वखतमां चौद हजार प्रकीर्णको (प्रकीर्णसूत्रो) हता. सव्वेहिं पि एयम्मि अंगबाहिरे कालिए भगवंते ससुत्ते सअत्थे सगंथे सनिज्जुत्तिए ससंगह- णिए जे गुणा वा भावा वा अरहंतेहिं भगवंतेहिं पन्नत्ता वा परूवित्रा वा ते भावे सदहामो पत्ति- श्रामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो। ते भावे सदहंतेहिं पत्तिअंतेहिं रोयंतेहिं फासंतेहि पालतेहिं अणुपालंतेहिं अंतोपखस्स जं वाइयं पढिअं परियट्टिनं पुच्छियं अणुपेहि अणुपालिअं, तं दुककयाए कम्मरकयाए मोरकाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणाए ति कहु उवसंपजित्ता णं विह- रामि । अंतोपरकस्स जं न वाइअं न पढिन परिअहिअं न पुच्छिमं नाणुपेहिअं नाणुपालिअं संते बले संते वीरिए संते पुरिसकारपरकमे तस्स बालोएमो पडिकमामो निंदामो गरिहामो विउद्देमो विसोहेमो अकरणयाए अब्भुट्टेमो अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवजामो तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ (एतस्यापि सूत्रस्य संस्कारः पूर्ववत् ॥) आ सर्व सूत्रनो अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो.
भा आ प्रमाणे कालिक श्रुत कमु. हवे अगप्रविष्ट श्रुतने कहे छे- नमो तेसिं खमासमणाणं जेहिं इमं वाइअं दुवालसंगं गणिपिडगं भगवंत । तं जहा-आयारो सूयगडो ठाणं समवाओ विवाहपन्नत्ती नायाधम्मकहाओ उवासगदसाओ अंतगडदसाओ अणुत्तरो- ववाइअदसानो पण्हावागरणं विवागसुयं दिद्विवाओ ॥ • (नमस्तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः यैः इदं वाचितं द्वादशाङ्गं गणिपिटकं भगवत् । तद्यथा-आचारः सूत्र- कृतं स्थानं समवायः विवाहप्रज्ञप्तिः ज्ञाताधर्मकथाः उपासकदशाः अन्तकृतदशाः अनुत्तरोपपातिकदशाः प्रश्नव्याकरणं विपाकश्रुतं दृष्टिवादः ॥) ( तेर्सि) ते (खमासमणाणं) क्षमाश्रमणने (नमो) नमस्कार थाओ, के (जेहिं ) जेोए ( इमं ) आ (गणि- पिडगं) गणिपिटक-गणि एटले गणधरो, तेओना कहेला अर्थना साररूप-उत्तम भाजनरूप ( भगवंतं) अतिशयादिक गुणयुक्त (दुवालसंगं) द्वादशांग-बार अंग (वाइवे) अमने आपेल छे. (तं जहा) ते आ प्रमाणे-(आयारो) आचा- रांग १, (सूयगडो) सूत्रकृतांग २ (ठाणं) स्थानांग ३ (समवाओ) समवायांग ४ (विवाहपन्नत्ती) विवाहप्रज्ञप्ति -भगवती ५ ( नायाधम्मकहाओ) ज्ञाताधर्मकथा ६ ( उवासगदसाओ) उपासकदशा ७ (अंतगडदसाओ) अंतकृत- दशा ८ (अणुत्तरोववाइयदसाओ) अनुत्तरोपपातिक दशाह (पएहावागरण) प्रश्नव्याकरण १० (विवागसुयं) विपाक- श्रुत ११ (दिट्ठिवाओ) दृष्टिवाद १२. सव्वेहि पि एयम्मि दुवालसंगे गणिपिडगे भगवंते ससुत्ते सअत्थे सगंथे सनिजुत्तिए ससंग- हणिए जे गुणा वा भावा वा अरहंतेहिं भगवंतेहिं पन्नत्ता वा परूविया वा, ते भावे सबहामोपत्तियामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो, ते भावे सदहंतेहिं पत्तितेहिं रोयंतेहिं फासंतेहिं पालंतेहिं अणु- पालतेहिं अंतोपकरस जं वाइयं पढिरं परियट्टिअं पुच्छिअं अणुपेहि अणुपालिअं, तं दुकखयाए कम्मखयाए मोखाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणाए ति कट्ठ उवसंपजित्ता णं विहरामि। अंतोपखस्स जं न वाइअं न पढिअंन परियट्टिन पुच्छिनाणुपेहिअं नाणुपालिअं संते बले संते वीरिए संते पुरि- सकारपरकमे तस्स बालोएमो पडिक्कमामो निंदामो गरिहामो विउट्टेमो विसोहेमो अकरणयाए अब्भु- ढेमो अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवज्जामो, तस्स मिच्छामि दुक्कडं । (अस्यापि सूत्रस्य संस्कारः पूर्ववत् ) आ सूत्रनो पण अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो. हवे श्रुतज्ञान आपनार आचार्यने नमस्कार करवा माटे तथा पोताना प्रमादन मिथ्यादुष्टत देवा माटे कहे छे- नमो तेसिंखमासमणाणं, जेहिं इमं वाइयं दुवालसंगं गणिपिडगं भगवंत। (तं जहा) सम्मं कारणं फासंति पालंति पूरंति तीरंति किति सम्म प्राणाए बाराहति। अहं च नाराहेमि,तस्त मिच्छामि दुकडं॥ (नमः तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः यैः इदं वाचितं द्वादशाङ्गं गणिपिटकं भगवत् । (ये चेदं ) सम्यक् कायेन स्पृशन्ति पालयन्ति पूरयन्ति तीरयन्ति कीर्तयन्ति सम्यगाज्ञया आराधयन्ति । अहं च नाराध- यामि, तस्मिन् मिथ्या मे दुष्कृतम् ) (तेर्सि) ते (खमासमणाणं) क्षमाश्रमणोने एटले क्षमादि गुणोवडे शोभित एवा गुरुप्रोने (नमो) नमस्कार हो, के (जेहिं )जे क्षमाश्रमणोए ( इमं ) आ (गणिपिडगं) गणि एटले आचार्य तेनो पिटक एटले रत्नादिकनी पेटी जेवी पेटी अर्थात सर्व अर्थना सारभूत एवं अने ( भगवंतं) समग्र अश्वर्यादिक अतिशयोबालं (दुवालसंगं) द्वादशांग श्रुत (वाइयं ) अमने आप्यु के एटले सूत्र अने अर्थवडे रच्युं छे, तेमने नमस्कार हो. तथा जे क्षमाश्रमणो श्रा द्वादशांग श्रुतने ( सम्म) सम्यक् प्रकारे (कारण) कायावडे एटले केवळ मनवडे ज नहीं कायाए करीने पण (फासंति) फरसे के एटले ग्रहण करवाने वखते विधिपूर्वक ग्रहण करे थे, (पालंति ) वारंवार अभ्यास करवावडे रक्षण करे छे, (पूरति ) परिपूर्ण करे छे, (तीरंति ) भूल्या विना. जन्मना पारने पमाडे छे, (किति ) सारी रोते कीर्तन करे छे तया ( सम्म) सम्यक् १ आ पद छापेली प्रतोमा नथी. अर्थ संगत पण नथी. साधु साध्वीओना मुख पाठे छे.
प्रकारे (आणाए) तेमां कहेली आज्ञा वडे (पाराहति) आराधना करे छे. (अहं च ) अने हुँ (नाराहमि ) तेनी जे काइ अाराधना करतो नथी एटले प्रमादथी पाळतो नथी-ते प्रमाणे वर्ततो नथी (तस्स) ते नहीं आराधवाथी थयेलु (मे) मारुं ( दुकडं ) दुष्कृत ( मिच्छा) मिथ्या हो. अर्थात् अनाराधना संबंधी थयेला अपराधनी हुं माफी मागु छु. हवे आ पाक्षिक सूत्रनी समाप्तिने विषे श्रुतदेवतानी स्तुति करे छे.- सुयदेवया भगवई, नाणावरणीयकम्मसंघायं । तेसिं खवेउ सययं, जेसिं सुयसायरे भती ॥१॥ (श्रुतदेवता भगवती ज्ञानावरणीयकर्मसातम् । तेषां चपयतु सततं येषां श्रुतसागरे भक्तिः ॥१॥) (भगवई ) पूज्य एवी (सुयदेवया) श्रुतदेवता-श्रुतनी अधिष्ठाता देवी (तेसि) तेओना (नाणावरणीयकम्मसंघायं) ज्ञानावरणीय कर्मना समूहने ( सययं) निरंतर (खवेउ) खपावो एटले नाश करो. के (जेर्सि) जेओने (सुयसायरे) श्रुत- रूपी सागरने विषे (भत्ती) भक्ति एटले बहुमान अने विनय छे. अहीं कोइ शंका करे के-श्रुत रूपी देवतानी पा स्तुति करवी योग्य छे. परंतु श्रुतनी अधिष्ठायक देवता तो व्यंत- रादिक होय छे, ते काइ कर्मनो क्षय करवामां समर्थ नथी, माटे तेनी स्तुति शामोटे करवी ? आ शंकानुं समाधान ए छ जे--श्रुतनी अधिष्ठायक देवतामा रहेलुं शुभ प्रणिधान पण तेना स्मरण करनारना कर्मनो चय करवामां कारणरूप थाय के. एम शासमां कहेतुं छे. ॥ इति श्रीपाचिकसूत्रम् ॥
गु भा हवे खामणा कहे छे. इच्छामि खमासमणो अन्भुट्टिओमि अभितरपखियं खामेउं । पन्नरसग्रहं दिवसाणं पन्नर- सराहं राईणं जं किंचि अपत्तियं परपत्तियं भत्ते पाणे विणए वेयावच्चे आलावे संलावे उच्चासणे समासणे अंतरभासाए उवरिभासाए जं किंचि मज्झ विणयपरिहीणं सुहुमं वा बायरं वा तुन्भे जाणह, अहं न याणामि, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं । (इच्छामि क्षमाश्रमण अभ्युत्थितोऽस्मि अभ्यन्तरपाक्षिकं क्षमयितुम् । पञ्चदशानां दिवसानां पश्च- दशानां रात्रीणां यत् किश्चित् अप्रीतिकं प्रकृष्टमप्रीतिकं (परप्रत्ययं वा) भक्ते पाने विनये चैयामृत्ये आलापे संलापे उच्चासने समासने अन्तरभाषायाम् उपरिभाषायां यत् किश्चित् मम विनयपरिहीनं सूक्ष्म वा बादरं वा यूयं जानीथ, अहं न जानामि, तस्मिन् मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥) (खमासमणो) हे क्षमाश्रमण--हे गुरु ( अमितरपरिकयं) पखवाडीयाने विपे उत्पन्न थयेला अपराधने (खामेउं) क्षमाववाने (इच्छामि) हुँ इच्छुछु. केवळ इच्छुछु एटलुंज नहीं पण (अब्भुट्टिओमि ) हुं उभो थयो छु, एटले खमाववानो प्रारंभ करंछं. ते आ प्रमाणे-(पन्नरसरह ) पंदर (दिवसाणं ) दिवसो मध्ये तथा ( पनरसएह ) पंदर ( राईणं) रात्रिओ मध्ये (जं किंचि ) जे काइ सामान्यथी के विशेषथी तमारे विपे (अपत्तियं) अप्रीति करनारुं तथा (परपत्तियं ) अत्यंत अप्रीति करनारं अथवा परप्रत्ययं एटले परना हेतुवालं के पाताना हेतुवालं अप्रीति करनारुं माराथी थयु होय ते मारु दुष्कृत मिथ्या थाओ. तेमां तमारा ( भत्ते) भोजनने विपे (पाणे) पाणीने विपे (विणए ) विनयने विषे (वेयावच्चे) औषध विगैरेनी वैयावचने विप (आलावे) आलापने विपे एटले तमारी साथे एक बार बोलवाने विप (संलावे) वारंवार परस्पर वात करवाने विपे (उच्चासणे) तमाराथी उंचा आसनपर वेसवाने विये (समासणे) तमारी समान आसने चेसवाने विपे (अंतरभासाए) तमारा भाषणनी वचमां बोलवाने विपे ( उवरिभासाए) तमारा बोली रया पछी तमारा करतां वधारे बोलवाने विषे ( किंचि ) जे कांइ सामान्यपणे के विशेषपणे ( मझ) मारं (सुहुमं वा) सूक्ष्म (वायरं वा) अथवा वादर (विणयपरिहीणं ) विनय रहित अनुचितपणुं थयु होय, ते (तुम्भे) तमे (जाणह) जाणो छो. (अहं न याणामि) हुं जाणतो नथी. (तस्स ) ते अपराधने विपे (मि दुक्कडं ) मारुं दुष्कृत (मिच्छा) मिथ्या थाओ-हुं आपने ते मारा पापर्नु मिथ्या दुष्कृत आपुं छु-खमा छु. ॥ अहमवि खामेमि तुब्भे॥ (अहमपि क्षमयामि त्वाम् ) उपर प्रमाणे खमाववाना प्रारंभमां आचार्य कहे-(अहमवि ) हुं पण ( तुम्भे) तने (खामेमि ) खमा छु.
EF H हवे पाक्षिक खामणा ४ कहे छे. १ इच्छामि खमासमणो पियं च मे जं भे हट्ठाणं तुट्ठाणं अप्पायंकाणं अभग्गजोगाणं सु- सीलाणं सुव्बयाणं सायरियउवज्झायाणं नाणेणं दसणेणं चरित्तेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणाणं बहुसुभेण भे दिवसो पोसहो परको वइकतो, अन्नो य भे कल्लाणेणं पज्जुवट्टिओ, सिरसा मणसा मत्थएणवंदामि ( इच्छामि क्षमाश्रमण ! प्रियं च मे यत् भवतां हृष्टानां तुष्टानाम् अल्पातकानाम् अभग्नयोगानां सुशीलानां सुव्रतानां साचार्योपाध्यायानां ज्ञानेन दर्शनेन चारित्रेण तपसाऽऽत्मानं भावयतां बहुशुभेन भगवन्तः ! दिवस: पौषधः पक्षो व्यतिक्रान्तः, अन्यश्च भवतां कल्याणेन (युक्तः) पर्युपस्थितः, शिरसा मनसा मस्तकेनवन्दे) शिष्य कहे छे-(खमासमणो) हे क्षमाश्रमण गुरुजी! (इच्छामि ) हुँ इच्छु छु एटले आगळ हुं जे कहुं छु ते इच्छा पूर्वक कहुं छु. (च) वळी (मे ) मने (पियं) प्रिय पण छे. कोइ वस्तु प्रिय नहीं छतां पण कारणने लीधे इच्छवामां आवे छे तेथी अहीं इच्छा अने प्रीति बन्ने कहेवा माटे प्रिय पण छे एम कां. शुं इच्छुछु अने शुं प्रिय छ ? ते कहे छे के (जं) जे (भे ) तमारो, तमे केवा छो? (हवाणं) हर्ष पामेला एटले रोग रहित होवाथी हर्पित ॥
थयेला सथा (तुट्ठाणं) संतुष्ट थयेला तथा (अप्पायंकाणं) अल्प शब्द अभाव चाचक होवाथी तत्काळ नाश करनारा असाध्य रोग रहित, अथवा सामान्य रीते नीरोगी, अथवा सर्वथा प्रकारे रोग रहितपणानो संभव होतो नथी तेथी अल्प रोग- वाळा तथा (अभग्गजोगाणं) नथी भग्न थया संयमना योग-मन, वचन, कायाना योग जेना एवा तथा (सुसीलाणं) सारा शीलवाळा तथा (सुन्बयाणं) सारा-अतिचार रहित व्रतवाळा (सायरियउवज्झायाणं ) आचार्य अने उपाध्याय सहित एवा तथा (नाणेणं ) ज्ञानवडे, (दसणेणं ) दर्शनवडे-समकितवडे, (चरित्तेणं) चारित्रवडे अने ( तवसा ) तपवडे (अप्पाणं) पोताना यात्माने ( भावेगाणाणं) भावना करता एवा तमारो (पोसहो) पौषधरूप एटले पर्वरूप (दिवसो) दिवस अने (परको) अर्ध मासरूप पक्ष (बहुसुभेण ) घणा सुखे करीने (मे) हे भगवंत (वइकतो) व्यतीत थयो छे-चीती गयो छे. (य) अने (भे) तमारो (अनो) बीजो पक्ष ( कल्लाणेणं) कल्याणे करीने सहित (पज्जुवटिओ) प्राप्त थयो छे. आ प्रमाणे मंगळ वचन कहीने शिष्य गुरुने वंदना करे छे-तेथी करीने (सिरसा ) मस्तकवडे तथा ( मणसा) मनवडे उपलक्षणथी वचनवडे पण ( मत्थएणवंदामि) आपने वंदना करुं छु, अहीं मत्थएणवंदामि ए समग्र पदनो वंदना करूं छु एवो अर्थ सूत्रोमां घणे ठेकाणे रूढ छे, तेथी पुनरुक्त दोप नथी. तुब्भेहिं समं ति (युष्माभिः सममिति) गुरु कहे के-(तुम्भेहि समं ति) तमारी साथे ए सवें सिद्ध थयु के.
. - २ इच्छामि खमासमणो पुवि चेइयाई वंदित्ता नमंसित्ता तुब्भण्हं पायमूले विहरमाणेणं जे केइ बहुदेवसिया साहुणो दिहा समाणा वा वसमाणा वा गामाणुगामं दूइज्जमाणा वा राइणिया संपुच्छंति, ओमरायणिया वंदंति, अज्जया वंदंति, अजियाओ वंदंति, सावया वंदंति, सावियानो वंदंति, अहं पि निस्सल्लो निकसायो त्ति कटु सिरसा मणसा मत्थएणवंदामि ॥ अहमवि वंदावेमि चेइयाइं॥ (इच्छामि क्षमाश्रमण ! पूर्व चैत्यानि वन्दित्वा नत्वा युष्माकं पादमूले विहरता (मया ) ये केचन बहुदैवसिकाः साधवो दृष्टाः समाना वा वसमाना वा ग्रामानुग्रामं द्रवन्तो वा रात्निकाःसंपृच्छन्ति, अवम- रात्निका वन्दन्ते, आर्या वन्दन्ते, आर्यिका वन्दन्ते, श्रावका वन्दन्ते, श्राविका वन्दन्ते, अहमपि निःश- ल्यो निकषाय इति कृत्वा शिरसा मनसा मस्तकेनवन्दे ॥अहमपि वन्दापयामि (वन्दयामि) चैत्यानि) (खमासमणो) हे क्षमाश्रमण ! ( इच्छामि ) चैत्यवंदापन अने साधुवंदापन आपने निवेदन करवा माटे हुं इच्छु छु के (पुचि ) पूर्वे-विहार करवाना काळ पहेलां (चेइयाई ) जिनेश्वरोनी प्रतिमाओने (वंदित्ता) गुणनी स्तुति करवावडे वांदीने, (नमंसित्ता ) कायावडे नमस्कार करीने, क्या ? (तुब्भएहं ) तमारा ( पायमूले ) चरणनी समीपे वांदीने पछी (विहरमाणेणं) एक गामथी बीजे गाम विहार करता एवा में (जे केइ ) जे कोइ (बहुदेवसिया) घणा दिवसना दीक्षा- पर्यायवाला ( साहुणो) साधुओ (दिट्ठा) जोया होय, ते साधु केवा ? (समाणा वा ) जंघावळ क्षीण थवाथी वृद्धवास- पणाए करीने आश्रय करेला क्षेत्रनी बहार नहीं विचरनारा अथवा ( वसमाणा वा) ऋतुबद्ध काळे मासकल्पी विहार करनारा अने वर्षाकाळे एक स्थळे चातुर्मास करनारा एज कारण माटे (गामाणुगामं) एक गामथी बीजे गाम (दूइजमाणा वा) विहार करता अथवा गामने विषे एक रात्रि रहेता अने नगरने विषे पांच रात्रि वसता, आ सर्वनी मध्ये (राइणिया) रात्निक एटले ज्ञानादिक भावरत्नना व्यापारी दीक्षापर्याये मोटा एवा आचार्यों में वांद्या थका (संपुच्छंति) आपना शरीर कुशलादिकनी वार्ता पूछे छे, (ओमरायणिया) आपथी दीक्षापर्याये नाना एवा आचार्यो (चंदंति ) आपने वांदे के अने कुशलादिक तो पूछे जछे, (अजया वंदंति) सामान्य साधुओ वांदे छे, (अजिआओ वंदंति ) साध्वीओ वादे के, (सा- वया वंदंति ) श्रावको वादे छे, (सावियानो वंदति) श्राविकाओ वांद छ, ( अहं पि) हुं पण ( निस्सल्लो) मायादिक शल्य रहित थयो छु तथा (निकसाओ) कषाय रहित थयो छु (त्ति कटु) एम करीने-ए कारण माटे (सिरसा ) मस्तकवडे (मणसा) मनवडे ( मत्थएणवंदामि ) वंदना करुं छु. तथा (अहमवि) हुं पण (वंदामि चेइयाई ) तमोने चैत्यो वंदावू छु एटले अमुक अमुक नगरादिकमां में जे जे चैत्योने तमारे माटे वांद्या छ तेने तमो पण वांदो. आ प्रमाणे शिष्य कहे त्यारे गुरु आ प्रमाणे बोले.- मत्थएणवंदामि अहं पि तेसि ति ॥ (मस्तकेनवन्दे अहमपि तानिति) धन ग (अहं पि ) हुं पण (तेसि ) तेमने-ते चैत्यादिकने (मत्यएणवंदामि ) वांदु छं. ३ इच्छामि खमासमणो अब्भुट्ठिोमि (उवडिओमि) तुब्भण्हं संतियं ग्रहाकप्पं वा वत्थं वा पडिग्गहं वा कंबलं वा पायपुंछणं वा रयहरणं वा अस्करं वा पयं वा गाहं वा सिलोगं वा सिलोगद्धं वा टुं वा हेडं वा पसिणं वा वागरणं वा तुब्भेहिं चियत्तणं दिन्नं मए अविणरण पडिच्छियं तस्त मिच्छा मि दुकडं ति॥ (इच्छामि क्षमाश्रनण ! उपस्थितोऽस्मि युष्माकं सत्कं यथाकल्पं वा वस्त्र वा प्रतिग्रहं वा कम्बलं वा पादप्रोञ्छनं वा रजोहरणं वा अक्षरं वा पदं वा गायां वा श्लोकं वा श्लोकार्य वार्थ वा हेतुं वा प्रश्नं वा व्याकरणं वा युष्माभिः प्रीत्या दत्तं मयाऽविनयेन प्रतीक्षितं, तस्य (तत्र) मिथ्या मे दुष्कृतमिति) (खमासमणो) हे क्षमाश्रमण ! ( इच्छामि ) हुं इच्छु छु. (उवडिओमि) हुं मारा आत्माने निवेदन करवा माटे प्राप्त थयो छु-तत्पर थयो छु. ते ए के (तुभएहं संतिय ) तमारा संबंधी एटले जे मारा परिभोगमा श्रावतुं ते या सर्व तमारं (अहाकप्पं वा) कल्पे तेवु-स्थविर कल्पने उचित एवं (वत्थं वा) वस्त्र, अथवा (पडिग्गहं वा) पात्र, अथवा ( कंबलं वा) कांबल, अथवा (पायपुंधणं वा) पादरोंछन, अथवा ( रयहरणं वा) रजोहरण, अथवा (अस्करं वा) अक्षर, अथवा ( पयं वा ) पद, अथवा (गाहं वा) गाथा, अथवा (सिलोग वा) श्लोक, अथवा (सिलोगळू वा) अर्धे श्लोक, अथवा (अट्ठ वा) अर्थ, अथवा (हेउं वा) हेतु, अथवा (पसिणं वा) प्रश्न, अथवा (वागरणं वा) उत्तर, या सर्व वस्तु (तुन्भेहिं ) तमोए (चियत्तेणं । प्रीतिवडे (दिन्नं ) मने आपी छे, परंतु (मए) में (मविणएण) अविनयवडे (पडि- च्छियं) जे ग्रहण करी छे, (तस्स ) तेमा मि मारु ( दुकडं) दुष्कृत (मिच्छा) मिथ्या थाओ. अर्थात् आ वस्तुओ अवि- नयथी लेतां मने जे पाप लाग्युं होय ते मारुं पाप मिथ्या थाओ• ते पापर्नु हु मिथ्यादुष्कृत मापुं छु. आ प्रमाणे शिष्य कहे त्यारे आचार्य वोले.- आयरियसंतियं ति॥ (प्राचार्यसत्कमिति) (आयरियसंतियं ति ) आ सर्व पूर्वाचार्य संबंधी छे अर्थात् मारुं कांइ नथी. या प्रमाणेनुं वचन अहंकारनो त्याग करवा माटे तथा गुरुने विषे भक्ति जणाववा माटे छे. हवे शिक्षा अपायेला शिष्यो ते अनुग्रहने बहु मानता सता आ प्रमाणे कहे, छे...- ४ इच्छामि खमासमणो अहमपुवाइं कयाई मे किइकम्माइं आयारमंतरे विणयमंतरे सेहियो सेहावित्रो संगहिरो उवग्गहिरो सारिओ वारियो चोइसो पडिचोइनो चियत्ता मे पडिचोयणा अब्भुट्टियोहं (उबढिओऽहं ) तुब्भण्हं तवतेयसिरीए इमायो चाउरंतसंसारकंताराअो साहदु नित्थ- क %3D रिस्सामि त्ति कटु सिरसा मणसा मत्थएणवंदामि ॥ (इच्छामि क्षमाश्रमण ! अहमपूर्वाणि कृतानि च मया कृतिकर्माणि आचारान्तरे विनयान्तरे शि- क्षितः (सेधितो वा) शिक्षापितः (सेधापितो वा) सङ्ग्रहीतः उपगृहीतः सारितो वारितः चोदितः प्रतिचोदितः प्रीता मे प्रतिचोदना उपस्थितोऽहं युष्माकं तपस्तेजाश्रिया इत: चातुरन्तसंसारकान्तारात् संहृत्य निस्तरिष्यामि इति कृत्वा शिरसा मनसा मस्तकेनवन्दे) (खमासमणो) हे क्षमाश्रमण ! ( अहं) हुं (अपुव्वाई) अपूर्व एटले अनागत काळ संबंधी वैयावृत्त्यादि कृतिकर्मो करवा माटे (इच्छामि ) इच्छु छं. (च) अने वळी (मे) में (कयाई) पूर्व काळे करेला जे आपना (किइकम्माई) वैयावृत्त्यादि कृतिकर्मों ते प्रत्ये (आयारमंतरे) कोइक ज्ञानादिक आचारने विषे तेनो आंतरो-व्यवधान पाडे छते अथ- वा ज्ञानादिक क्रिया नहीं करे छते तथा (विणयमंतरे ) आसन आपq ए विगेरे कोइक विनयने विषे तेनो आंतरो पाडे छते अथवा विनयनी क्रिया नहीं करे छते (सेहिनो) गुरुए पोतेज मने शिक्षा आपी होय अथवा आचार अने विनयने । विषे मने कुशळ को होय, तथा (सेहावित्रओ) उपाध्यायादिक पासे मने शिक्षा अपावी होय अथवा आचार अने विनयने विषे मने कुशळ कराव्यो होय, तथा (संगहिरो ) मने शिष्यपणे ग्रहण कर्यो होय एटले आश्रय आप्यो होय, तथा ( उव- ग्गहिओ) ज्ञानादिक अने वस्त्रादिक वडे मने आश्रय आप्यो होय, तथा (सारिओ) मने हितमा प्रवर्तान्यो होय अथवा कार्य संभारी आप्युं होय, तथा (वारिओ) अहितथी निवार्यों होय, तथा ( चोइओ) संयम योगमां स्खलना पामे छते त्थरिस्सामि ) हुं निस्तार पामीश - ओळंगी जइश , ( त्ति क १ ) एम करीने - ए हेतु माटे ( सिरसा ) मस्तक वडे ( मत्थएण- आ प्रमाणे तमारे कर उचित नथी एवा वचनवडे मने प्रेरणा करी होय, तथा (पडिचोइओ) तेवीज रीते वारंवार प्रेरणा करी होय ( मे पडिचोयणा) आ प्रमाणे मने जे वारंवार प्रेरणा करी होय तथा उपलक्षणथी शिक्षादिक करेल होय ते मने (चियत्ता) प्रीतिकारी छे, परंतु अहंकारथी मने अप्रीतिकारक नथी, तेथी ( उवडिओऽहं) प्रेरणा करेला अर्थोनुं संपादन करवा हुँ उद्यमवंत थयो छु. तथा (तुभएहं ) तमारी ( तवतेयसिरीए) तपना तेजनी एटले तपप्रभावनी लक्ष्मीए करीने ( इमाओ ) आ प्रत्यक्ष एवा (चाउरतसंसारकंताराओ) नरकादि गतिना भेदे करीने चार अंत-सीमा (विभाग) चाळा संसाररूप अरण्यथी (साह१) कपाय, इंद्रियो अने योगादिकवडे विस्तार पामेला आत्माने संक्षेपीने-संकोचीने (नि- वंदामि ) हुं आपने वांदु छ अर्थात् मन वचन कायावडे वांदु छु. ते सांभळी आचार्य कहे छे. नित्थारगपारगा होह॥ (निस्तारकपारगा भवत) (नित्थारग) संसारसमुद्री प्राणीओने निस्तारनार अथवा प्रतिज्ञाना निस्तारनार अने (पारगा) संसारसमुद्रने तीरे जनारा ( होह) तमे थाओ. आ प्रमाणे गुरुनु आशीर्वचन छे. ॥ इति क्षामणाविधिः ॥
ग
अथ आहारना ४७ दोष.
सोलस १६ उग्गमदोसा, सोलस १६ उप्पायणा य दोसा य ।
दस १० एसणा य दोसा, गासेसण (५) मिलिय सगयाला ॥१॥
(षोडश उद्गमदोषाः षोडश उत्पादनाश्च (या) दोषाश्च ।
दश एषणाश्च दोषाः ग्रासैषणामिलिताः सप्तचत्वारिंशत् ॥१॥)
साधु साध्वीने आहार पाणी वहोरतां ( सोलस) सोळ ( उग्गमदोसा) उद्गमना दोपो एटले आहार उत्पन्न थती
वखतना श्रावकथी उत्पन्न थता दोपो लागे छे, तथा ( सोलस ) सोळ ( उप्पायणा य) उत्पादनाना एटले वहोरती वखते
साधुथी उत्पन्न थता ( दोसा य ) दोपो लागे छे, तथा ( दस ) दश (एसणा य ) एपणाना साधु अने श्रावक ए बन्नेथी
उत्पन्न थता ( दोसा) दोपो लागे छे, तथा ( गासेसणमिलिय) आहार करती वखते ग्रासेपणाना-मांडलीना पांच दोषों
लागे छे ते मळीने ( सगयाला ) कुल सुडतालीश दोपो थाय छे.
प्रथम उद्गमना सोळ दोषो कहे छे.-
आहाकम्मुद्देसिय, पूईकैम्मे य मीसजाए य । ठवणा पाहुडियाए, पाओयर-कीय-पांमिचे ॥२॥
परिट्टिए अभिहडु-भिन्ने मालोहडे य अच्छिज्जे । अणिसिह झोयरए, सोलस पिंडुग्गमे दोसा ॥३॥ (आधाकौद्दशिकतिकाणि च मिर्धजातं च । स्थापना माभृतिका प्रादुष्करकीतप्रामित्यानि ॥२॥ परिवर्तितमभ्याहृतोद्भिन्नेमालापहृतं चाच्छिद्यम् । अनिसृष्टमध्येवपूरकं षोडश पिण्डोद्गमा दोषाः ॥३॥ (आहाकम्म) आधाकर्म दोप-साधुने निमित्ते एटले साधुने मनमां धारण करी सचित्त वस्तुने अचित्त करे अथवा अचित्त वस्तु रांधे ते १. ( उद्दसिय ) औदेशिक दोप-पूर्व तैयार करेला भात लाडु आदिक मुनिने उद्देशीने एटले मनमां धारीने दहीं गोळ आदिकथी मिश्र करी स्वादिष्ट करे ते. २. (पूइकम्मे य) पूतिकर्म दोष-शुद्ध आहार आधाकर्मी आहा- रमां नांखी मिश्र करवा अथवा प्राधाकर्मी आहारथी खरडायेली कडछी विगेरेवडे शुद्ध आहार वहोराववो ते. ३. (मीस- जाए य) मिजोति दोप-जे आहार पोताने माटे तथा साधुने माटे प्रथमथीज संकल्प करीने बनाववो ते. ४. (ठवणा) स्थापना दोप-साधुने माटे क्षीर प्रमुख जूदा करी पोताना वासणमा राखी मूकवां ते. ५. (पाहुडियाए) प्राभृतिका दोष- विवाहादिक आववानो विलंब होय छतां साधुने गाममा रहेला जाणी ते लाभ लेवा माटे वहेला करवा अथवा विवाहन समय नजीक छतां साधुनी राह जोवा माटे विलंबे करवा ते. ६. (पाओयर ) प्रादुष्करण दोष-अंधकारमा रहेली वस्तु दीवा आदिकवडे अथवा भींत दूर करवा वडे प्रकाशित करीने आपवी ते. ७. (कीय) क्रीत दोष-साधुने माटे वेचाती लावीने कोइ वस्तु तेमने आपवी ते. ८. (पामिचे) प्रामित्य दोष-साधुने माटे उधारे लइ आवी ते वस्तु तेमने आपवी ते. ६. (परिट्टिए) परावर्तित दोप-साधुने माटे पोतानी वस्तु बीजानी वस्तु साथे बदलावी तेनी वस्तु साधुने आपली 1 ते. १०. (आमहड) अभ्याहृत दोष-आहारादिक सन्मुख लावी साधुने आपेते. ११. (उन्मिने) उद्भिन्न दोष-कुडला विगैरेमाथी घी विगेरे काढवा माटे तेना मुख उपरथी माटी विगेरे दूर करी अथवा कपाट, तालं विगैरे उघाडी तेमाथी ते काढी साधुने वहोरावयु ते. १२. (मालोहडे य ) मालापहृत दोष-मेडी, भोयरा के शीका उपरथी उतारी साधुने वहोरा- वq ते. १३. ( अच्छिजे ) आच्छिद्य दोप-पोते बळवान होवाथी बीजानी वस्तु झुटीने-आंचकीने साधुने आपली ते. १४. (अणिसिडें) अनिसृष्ट दोष-जेना एकथी वधारे स्वामी होय एवा आहारने ते सर्वमाथी कोइ एक जण बीजानी रजा विना साधुने वहोरावे ते. १५. ( अझोयरए ) अध्यवपूरक दोप–साधुनु आगमन सांभळी पोताने माटे रंधाता अ- नमां बीजुं वधारे नांखी ते रसोइमां वधारो करे ते. १६. ( सोलस ) आ सोळ (पिंडुग्गमे ) पिंडोद्गमना ( दोसा) दोषो आ सोळ दोपो दातारथी उत्पन्न थाय छे. हवे साधुथी उत्पन्न थता उत्पादनाना सोळ दोपो कहे छे.- धाईदूइनिमित्ते, आजीववणीवगे तिगिच्छा य। कोहे माणे माया, 'लोभे अहवंति दस एए ॥४॥ पुस्विपच्छासंथव, विजामंते अचूाजोगे य । उप्पायणाइ दोसा, सोलसमे मूलकम्मे य ॥ ५॥ (धात्रीदूतीनिमित्तानि आजीववनीपैकी चिकित्सा च । क्रोधः मानः माया लोमैः च भवन्ति दश एते ॥४॥ पूर्वपश्चात्संस्तवः विद्यामन्त्री च चूर्णयोगों" च । उत्पादनाया दोषाः षोडश मुलकर्म च ॥५॥)
(धाई ) वाळकने धवरावनार, स्नान करावनार, अलंकार पहेरावनार, रमाडनार अने खोलामा बेसाडनार-आ पांच जातनी धात्री माता कहेवाय छे, तेमाथी कोई पण कर्म साधु भिक्षाने माटे करे ते धात्रीपिंड दीप १. (दूइ) दूतीनी जेम भिक्षाने माटे संदेशो लावे अथवा लइ जाय ते दूतीपिंड दोष २. (निमित्ते ) भिक्षाने माटे भूत, भविष्य अने वर्तमान काळ संबंधी लाभालाभ रूप निमित्त कहीने भिक्षा ग्रहण करवाथी निमित्तपिंड दोप ३. (श्राजीव ) भिक्षाने माटे पोतानी जाति, कुळ, गच्छ, कर्म, शिल्प विगैरेंना खाण करवाथी मुनिने लागे ते आजीवपिंड दोष ४. (वणीवगे) ब्राह्मण, श्रमण विगेरेना भक्तो पासथी आहार लेवानी इच्छाथी हुं पण तेनो भक्त छु एम कही आहार ग्रहण करे ते वनीपकपिंड दोप ५. (तिगिच्छा य ) वैद्यनी जेम औषध आपी अथवा बतावी आहार ग्रहण करवाथी लागे ते चिकित्सापिंड दोप ६. (कोहे) विद्या अने तप विगरेनो प्रभाव वतावी, राजानुं मान्यपणुं देखाडी अथवा क्रोधनुं फळ देखाडी भिक्षा ग्रहण करवाथी क्रोधपिंड दोष ७. (माणे) पोतानी लम्धिनी प्रशंसाथी अथवा बीजाए उत्साह आपवाथी अथवा कोइए अपमान करवाथी हुँ सारो आहार लावी आपुं एम अहंकार करी श्रावकने विडंबना करी आहार लावे ते मानपिंड दोष ८. (माया) विविध प्रकारना वेष अने भाषा विगेरे बदली आहार लावे ते मायापिंड दोष 8. (लोभे अ) अति लोभथी आहार माटे अटन करे ते लोभपिंड दोष १०. ( हवंति दस एए) शा रीते दश दोष लागे छे. वथा (पुचिपच्छासंथव ) पुदि एटले दाता- रना मावापनो अथवा पच्छा एटले दातारना सासुससरानो संथव एटले परिचय जणावी-ओळखाण काढी भीक्षा ग्रहण करे ते पूर्वपश्चात्संस्तवपिंड दोप ११. (विक्षा) विद्यानो उपयोग करी भिक्षा लेवाथी विद्यापिंड दोप १२. (मंते अ) मंत्रनो प्रयोग करी भिवा ले ते मंत्रपिंड दोप १३. (चुण ) नेत्रांजन आदि चूर्णनो उपयोग करी भिक्षा लेवाथी चूर्णपिंड दोप १४. (जोगे य) पादलेप आदि योगनो उपयोग करी भिता ग्रहण करवायी योगपिंड दोप १५. (य) तथा (सोलसमे) सोळमो ( मूलकम्मे ) गर्भनुं स्तंभन, गर्भ धारण, गर्भपात, रक्षाबंधन विगेरे कर्म करी भिक्षा लेवाथी मूलकर्मपिंड दोप १६. ( उप्पायणाइ दोसा) आ सर्वे उत्पादनाना दोषो छ, आ दोपो साधुथी उत्पन्न थाय छे. हवे गृहस्थी अने साधु ए बोथी उत्पन्न शता पाणाना दश दोगो बतावे छे. संकियमस्कियनिखित-पिहियसाहरियदायगुम्मिस्से।परिणयलित्तछजिय, एसणदोसा दस हवंति ॥६॥ (शक्तिप्रैक्षितनिक्षिप्तैपिहितसंतदायकोन्मिश्राः । श्रपरिणतलिप्तछंदिता एपणादोषा दश भवन्ति ॥ ६॥) (संकिय) दातार अथवा साधुने आहार देतां अथवा लेता प्राधाकर्मादिक कोइ पण दोपनी शंका थाय तो तेने शंकित दोप लागे छे१. (मस्किय) पृथ्वी आदिक सचित्त मथवा मव आदिक निंघ के पोते निषेध करेला अचित्त पदार्थथी मिश्रित थयेलो पिंड देतां अथवा ग्रहण करतां प्रक्षित दोप लागे छे. २. (निरिकत) पृथ्वीकाय आदि छ काय उपर स्थापन करेलो अचित्त पिंड पण देतां अथवा लेतां निक्षिप्त दोप लागे छे. ३. (पिहिय ) फळ आदि सचित्त वस्तुथी ढांकेली वस्तु देतां अथवा लेतां पिहित दोष लागे छे. ४. (साहरिय) देवाना पात्रमा रहेली काइक वोजी वस्तुने सचित्त एवा पृथ्वी आदिक उपर मूकी ते पात्र वडे देतां अथवा लेतां संहृत दोप लागे. ५. ( दायग) वाल, वृद्ध, नपुंसक, ध्रुजतो, अंध, मदोन्मत, हाथ & पग विनानो, बेडीमां नांखेलो, पादुका उपर चडेलो, खांसीवाळो, खांडनार, पीसनार, भुंजनार, कापनार, पीजनार, दळनार, फाडनार, तोडनार विगेरे छ काय विराधक तेमज गर्भिणी, तेडेला छोकरावाळी तथा धावता बाळकवाळी स्त्री भावा पासे- थी आहार लेतां दायक दोष लागे छे ६. ( उम्मिस्से) सचित्त धान्यना कणथी मिश्रित साकर विगेरे वस्तु देतां अथ- वा लेतां उन्मिश्र दोष लागे छे. ७. (अपरिणय ) अचित्त पणाने पाम्या विनानी वस्तु देतां अथवा लेतां अपरिणत दोष लागे छे. ८. (लित ) अकल्प्य वस्तुथी लेपायेला पात्र के हस्त वडे देतां अथवा लेतां लिप्त दोष लागे छे... (अडिय) पृथ्वीपर घी आदिना टीपां पडनां होय एवी रीते देतां अथवा लेता छर्दित दोप लागे. कारण के तेवी रीते करतां त्यां रहेला अने वीजा आगंतुक जीयोनी पण मधुर्विदुना उदाहरणनी जेम पिराधना थाय छे. १०. (एसणदोसा दस हवंति) आ दश एपणाना दोषो के. हवे मासेषणाना एटले आहार वापरती वखतना पांच दोषो कहे छे.. संजोयणापमाणे, इंगाले धूम कारणे पढमा । वसहिबहिरंतरे वा, रसहेऊ दव्वसंजोगा ॥७॥ संयोजनाऽप्रमाणौ इंगालो धूर्मोऽकारणी प्रथमा। वसतियहिरन्तरे वा रसहेतोव्यसंगोगात् ॥७॥) (संजोयणा) संयोजना नामनो( पढमा ) पहेलो दोष ते ( रसहेऊ ) सारो साद करवाना हेतुथी ( वसाहिबाहिरतरे वा) वसति (उपाश्रय ) नी बहार अथवा अंदर प्राचीने ( दग्नसंजोगा) मांडा निगेरेनी साथे घी खोड विगेरे द्रष्य-पदार्थनो ॥
गु भा संयोग करवाथी थाय छे. १. (पमाणे) जेटलो आहार करवाथी धीरज, बळ, संयम तथा मन, वचन अने कायाना यो- गने बाधा न आवे तेटलो आहार करवो जोइए, तेथी वधारे आहार करे तो प्रमाणातिरक्तता दोप लागे छे. २. ( इंगाले) स्वादिष्ट अन्नना अथवा तेना दातारना वखाण करतो आहार करे तो ते साधु रागरूप अग्निथी चारित्ररूप काष्ठोने अंगारारूप करे के तेथी वे अंगार दोप कहेवाय छे. ३. (धूम) अभनी के तेना देनारनी निंदा करतो भोजन करे तो ते चारित्ररूप काष्ठने बाळी धूमाडा रूप करे के तेथी ते धूमदोष कहेवाय छे. ४. (कारणे) कारण विना भोजन करे तो कारणाभाव नामनो दोप लागे छे. अहीं भोजन करवानां छ कारणो कयां छे, ते या प्रमाणे- क्षुधा वेदना सहन न थइ शके तो आहार करवो १, प्राचार्य, बाळ, वृद्ध ग्रने ग्लान आदिकनी वैयावच करवाना कारणे आहार करवो २, इयर्यासमितिनी शुद्धि माटे आहार करवो ३, संयमर्नु पालन करवा माटे आहार करवो ४, जीवि- तव्यनी रक्षा करवा माटे आहार करचो ५, तथा धर्म ध्यानने स्थिर करवा माटे आहार करवो ६. आ छ कारणोने माटे आहार करवानी जरुर छे. ते शिवाय आहार करे तो अकारणदोष लागे के. मा पांच आहार करती वखतना दोपो के. कुल मळीने ४७ दोप थाय छे. इति ४७ भिक्षादोषाः ॥ अथ श्री श्रमणसूत्रम्॥ नमो अरिहंताणं० ॥ करेमि भंते सामाइभं, सव्वं सावज जोगं पच्चरकामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमिन कारवेमि करतं पि अनं न समाजाणामि, तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ ( नमोऽर्हद्भयः ॥ करोमि भदन्त सामायिकं, सर्व सावयं योग प्रत्याख्यामि, यावजीवया, त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कार्यन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमपि श्रन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गहामि आत्मानं व्युत्सृजामि॥१॥) (नमो अरिहंताणं० ) अहंतोने नमस्कार थाो. ए रीते बाकीनो नवकार मंत्र जाणी लेवो. (भंते) हे भगवन् (सा- माइ) सामायिकने ( करेमि) हुं करूं छु. ( सम्वं ) सर्व ( सावज ) सावध-पापव्यापारने (पचकामि ) हुँ पचखुं छं- निषेधुं छु. ( जावजीवाए ) जावजीव सुधी (तिविहं ) मन, वचन, कायाना व्यापाररूप त्रण प्रकारने (तिविहेण ) करवं, करावq अने अनुमोदq ए त्रणे प्रकारे करीने (मणेण) मनवडे (वायाए) वाणीवडे ( कारणं ) कायावडे (न करेमि) सावध व्यापारने नहीं करूं, (न कारवेमि) नहीं करावं, ( करतं पि अनं) करता एवा पण बीजाने (न समणुजाणामि) सारो नहीं जाणुं एटले अनुमोदना नहीं मापुं ( भते ) हे भगवन् ! (तरस) ते सावध योगथी (पडिकमामि ) हुं पालो फरूं छु, ( निंदामि ) आत्म साक्षीए निंदु छु, (गरिहामि ) गुरुनी समक्ष गर्दा करूं छु, (अप्पाणं) सावध कर्म करनारा मारा आत्माने ( वोसिरामि) हुं बोसरावू छु एटले तर्जु छ. १. चत्तारि मंगलं, अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपन्नत्तो धमो मंगलं ॥२॥ (चत्वारो मङ्गलम् , अर्हन्तो मङ्गलम् , सिद्धा मङ्गलम् , साधवो मङ्गलम् , केवलिप्रज्ञप्तो धर्मो मङ्गलम् ॥२॥) (चत्वारि) चार पदार्थो ( मंगलं ) मंगळरूप छे. तेज कहे छे.-(अरिहंता) अहंतो ( मंगलं ) मंगळरूप छ, (सिद्धा) सिद्धो (मंगलं) मंगळ रूप छे, (साहू मंगलं) साधुओ मंगळ रूप छ, तथा ( केवलिपनत्तो) केवळी भगवंते प्ररूपेलो- कहेलो (धम्मो) श्रुत अने चारित्ररूप धर्म ( मंगलं ) मंगळ रूप छे. ॥२॥ चत्तारिलेोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लागुत्तमा,साहू लागुत्तमा,केवलिपन्नत्तो धम्मो लोगुत्तमो ३॥ (चत्वारो लोकोत्तमाः, अर्हन्तो लोकोत्तमाः, सिद्धा लोकोत्तमाः, साधवो लोकोत्तमाः, केवलिप्रज्ञप्तो धर्मों लोकोत्तमः॥३॥) (चचारि) चार पदार्थों ( लोगुत्तमा) लोकोत्तम एटले लोकमां उत्तम छे. तेज कहे छे-(अरिहंता) अर्हतो (लो- गुत्तमा) लोकोत्तम छे, (सिद्धा) सिद्ध भगवानो (लोगुत्तमा ) लोकोत्तम छ, (साहू) मुनि महाराजाभो (लोगुत्तमा) लोकोत्तम छ, तथा ( केवलिपवतो ) केवळी भगवंते प्ररूपेलो (धम्मो) धर्म ( लोगुत्तमो) लोकोत्तम के. ३. (
चत्तारि सरणं पवज्जामि, अरिहंते सरणं पवजामि, सिद्धे सरणं पवजामि, साहू सरणं पवजामि,
केवलिपन्नत्तं धम्म सरणं पवज्जामि ॥४॥
(चतुरः शरणं प्रपद्ये, अर्हतः शरणं प्रपद्ये, सिद्धान् शरणं प्रपये, साधून शरणं प्रपद्ये, केवलिप्रज्ञप्त
धर्म शरणं प्रपद्ये ॥४॥)
( चत्तारि) चारनु (सरणं) शरण ( पवजामि) हुंअंगीकार करुं छु, तेज कहे छे-(अरिहंते) अरिहंतोतुं (सरणं)
शरण (पवजामि) हुं स्वीकारूं छु, (सिद्धे सरणं पवजामि ) हूं सिद्धार्नु शरण स्वीकारुं छु, ( साहू सरणं पवजामि) हुं
साधुअोनुं शरण स्वीकारुं छु, तथा (केवलिपनत्तं धम्म सरणं पवजामि) केवलि भगवंते प्ररूपेला धर्मनुं हुं शरण स्वीकारूं छु. ४.
इच्छामि पडिकमिउं जो मे देवसिओ अइयारो को काइनो वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो
उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झायो दुविचिंतित्रो अणायारो अणिच्छियव्यो असमणपाउग्गो
नाणे दंसणे चरित्ते सुए सामाइए, तिन्हं गुत्तीणं, चउण्हं कसायाणं, पंचगह महब्बयाणं, छण्हं जीव-
निकायाणं, सत्तरहं पिंडेसणाणं, अटुराहं पवयणमाऊणं, नवग्रहं बंभचेरगुत्तीणं, दसविहे समणधम्मे
समणाणं जोगाणं, जं खंडिअंजं विराहिअं तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥५॥
( इच्छामि प्रतिक्रमितुंयो मया देवसिकोऽतिचारः कृतः कायिको वाचिको मानसिकः उत्सूत्र उन्मार्गः अकल्प्योऽकरणीयो दुातो दुर्विचिन्तितोऽनाचारोऽनेष्टव्योऽश्रमणप्रायोग्यः ज्ञाने दर्शने चारित्रे श्रुते सा- मायिके, तिसृणां गुप्तीनां, चतुर्णा कषायाणां, पञ्चानां महाव्रतानां, षणां जीवनिकायानां, सप्तानां पिण्डै- षणानामष्टानां प्रवचनमातृणां, नवानां ब्रह्मचर्यगुप्तीनां, दशविधे श्रमणध श्रमणानां योगानां, यत् खण्डितं यद्विराधितं तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥५॥) (इच्छामि पडिकमिउं) हुँ प्रतिक्रमण करवाने-पाको फरवाने इच्छु छु. (जो)जे (मे ) में (देवसिओ) दिवस संबंधी (अनारो) अतिचार (कओ) कर्यो होय. केवो १ (काइओ) काया संबंधी, (वाइओ) वाणी संबंधी, (माण- सिओ) मन संबंधी, ( उरसुत्तो) उत्सूत्र संबंधी एटले सूत्रमा नहीं कहलो, एज कारण माटे ( उम्मग्गो ) उन्मार्ग संबंधी, एज कारण माटे (अकप्पो) चरण करण रूप कल्प जे आचार तेनाथी रहित, एज कारण माटे (अकरणिजो) नहीं करवा लायक, (दुज्झाओ) दुर्ध्यान करेलो, (दुविचिंतित्रो) दुष्ट रीते विचारेलो, (अंणायारो) साधुने नहीं आचरवा लायक, (अणिच्छियवो) नहीं इच्छवा लायक तथा ( असमणपाउग्गो) साधुने नहीं लायक एवो अतिचार लाग्यो होय, क्यां? (नाणे) ज्ञानने विषे, (दसणे ) दर्शनने विषे, (चरिते ) चारित्रने विपे, (सुए) श्रुतने विपे तथा (सामाइए) सामायिकने विषे जे अतिचार लाग्यो होय, तेमज (तिन्हं गुणिं) त्रण गुप्ति संबंधी, (चउराहं कसायाणं) चार कपाय संबंधी, (पश्चण्डं महध्वयाणं) पांच महावत संबंधी, (एहं जीवनिकायाणं) छ जीव निकाय संबंधी, ( सत्तएहं पिंडे-
सणाणं) सात प्रकारनी पिंडैपणा संबंधी, (अट्ठण्हं पवयणमाउणं) आठ प्रवचन माता संबंधी, (नवएहं बंभचरगुत्तीणं)
नव प्रकारे ब्रह्मचर्यनी गुप्ति संबंधी, (दसविहे समणधम्म) दश प्रकारना साधु धर्म संबंधी (समणाणं जोगाणं) ए सर्व
साधुओना योगोने मध्ये (ज)जे काइ (खंडियं ) देशथी भाग्यु होय तथा (ज)जे काइ (विराहि) सर्व प्रकारे
भाग्युं होय (तस्स) ते अतिचार संबंधी (मि) मारुं ( दुकडं ) पाप (मिच्छा ) मिथ्या एटले फोगट थाओ. ५.
इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए विराहणाए० जाव तरस मिच्छा मि दुक्कडं ॥६॥
(इच्छामि प्रतिक्रमितुं इर्यापथिकायां विराधनायां यावत् तस्स मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥)
(इच्छामि पडिफमिङ) हुँ प्रतिक्रमवाने इच्छु छु. (इरियावहियाए) इर्यापथिकी संबंधी (विराहणाए) विराधनाने विपे
जे अतिचार लाग्यो होय (अहीं इरियावही आखा बोलवा) पछी (तस्स) ते अतिचार संबंधी (मि) मारू ( दुकडं) पाप
(मिच्छा) मिथ्या थाो. ६.
इच्छामि पडिकमिउं पगामसिजाए निगामसिजाए संथाराउवट्टणाए परियणाए आउंटणाए
पसारणाए छप्पईसंघट्टणाए कूइए ककराईए छीए जंभाइए श्रामोसे ससररकामोसे आउलमाउलाए
सोअणवत्तिाए इस्थीविपरित्रासिकाए दिट्ठीविपरिश्रासिश्राए मणविपरित्रासिाए पाणभोषणवि-
प्परिश्रासिवाए जो मे देवसियो अईआरो को तस्स मिच्छामि दुकडं ॥७॥
(इच्छामि प्रतिक्रमितुं प्रकामशय्यया निकामशय्यया संस्तारकोद्वर्तनया परिवर्तनया आकुञ्चनया प्रसारणया पदपदीसंघटनया कूजिते कर्करायिते तुते जृम्भिते श्रामर्षे सरजस्कामर्षे अाकुलाकुलया स्वमप्रत्ययया स्त्रीविपर्यासिक्या दृष्टिविपर्यासिक्या मनोविपर्यासिक्या पानभोजनविपर्यासिक्या यो मया दैव- सिकोऽतिचारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥७॥) ( इच्छामि पडिक्कमि) हुं ते अतिचारोथी प्रतिक्रमवाने-पाछो फरवाने इच्छु छ. ते अतिचारो कया ? ते कहे छे- ( पगामसिजाए) प्रकाम एटले अत्यंत अर्थात् रात्रिना चार पहोर सुधी सुवावडे करीने अथवा विहारना श्रमथी दिवसे पण सुवावडे करीने अथवा अधिक उपकरणवाळा संथारावडे करीने तथा (निगामसिजाए) हमेशां तेज प्रकाम शय्याए करीने, तथा (संथाराउवट्टणाए) संथाराने विषे डाबा पासाथी जमणे पासे फरवावडे करीने, तथा (परियट्टणाए) जमणा पासाथी डाचे पासे फरवावडे करीने, तथा (आउंटणाए) हाथ पग विगेरे अंग संकोचवाए करीने, तया (पसार- णाए) अंग प्रसारवावडे करीने, या सर्व क्रियाओ पुंज्या विना करवाथी अतिचार लागे छे. तथा (छप्पईसंघट्टणाए) जू विगेरेने अविधिथी संघट्ट-स्पर्श करवावडे करीने जे अतिचार लाग्यो होय, तथा ( कूइए ) उघाडे मुखे खांसी करे सते, तथा (कक्कराईए ) कचकच शब्द करती शय्या सते, तथा (छीए) उघाड़े मुखे छींक खाधे सते, तथा (जंभाइए) उघाडे मुखे वगासु खाधे सते, तथा (आमोसे ) अविधिए पुंज्या विना भूमि विगेरेनो हाथवडे स्पर्श करे सते, तथा (स- सरकामोसे ) रजवाळी पृथ्वी विगेरेने पुंज्या विना स्पर्श करे सवे ने अतिचार लाग्यो होय, तथा सुता थका (सोअणव- तिए) स्वमना निमित्तवाळी (आउलमाउलाए ) आकुळ व्याकुळताए करीने एटले स्त्री आदिकनो भोग अने विवाह तथा युद्धादिकनी सामग्रीना स्पर्शथी उत्पन्न थयेली आकुळ व्याकुळताए करीने जे अविचार लाग्यो होय, तथा ( इत्थीविपरियासिाए) सीना विपर्यासथी एटले (खमादिकमां ) मैथुन सेववाथी उत्पन्न थयेली, तथा (दि- ट्ठीविपरियासिआए) दृष्टिना विपर्यासथी एटले स्त्री विगेरेने रागदृष्टिए जोवाथी उत्पन्न थयेली, तथा (मणविपरित्रासिआए) मनना विपर्यासथी एटले स्त्रीने देखी मननो विकार थवाथी उत्पन्न थयेली, तथा (पाणभोमणविप्परिभासिए) पान अने भोजननो विपर्यास एटले रात्रिए पान भोजन करवानी इच्छाथी उत्पन्न थयेली पाकुळ व्याकुळतावडे करीने (जो) जे (मे ) में (देवसिओ) दिवस संबंधी (अईआरो) अतिचार (को) कर्यो होय, (तस्स ) तेनुं (दुकडं ) दुष्कृत- पाप (मे) मारे (मिच्छा) मिथ्या थाओ-ते अतिचार संबंधी मारुं पाप मिथ्या थाओ. ७. हवे गोचरीना अतिचारोने कहे छे.--- पडिकमामि गोयरचरित्राए भिकायरिआए उग्घाडकवाडउग्घाडणाए साणावच्छादारासंघट्ट- णाए मंडीपाहुडियाए बलिपाहुडियाए ठवणापाहुडियाए संकिए सहसागारिए प्रणेसणाए (पाणेस- । णाए) पाणभोषणाए वीअभोणाए हरिप्रभोगणाए पच्छाकम्मिाए पुरेकम्मिाए अदिहडाए आ पद केटलाक मूल ग्रंथोमां लभ्य छे. परंतु पूर्व टीकाकारे तथा बालावबोधकर श्री ज्ञानविमलसूरीश्वरे आ पदनी व्याख्या करी नथी.
दगसंसट्ठहडाए रयसंसट्ठहडाए पारिसाडणियाए पारिद्यावणियाए ओहासणभिकाए जं उग्गमेणं उप्पायणेसणाए अपरिसुद्धं पडिग्गहिश्र परिभुत्तं वा जं न परिटुविधं तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥८॥ (प्रतिक्रमामि गोचरचर्यायां भिक्षाचर्यायामुद्घाटकपाटोद्घाटनया श्ववत्सदारकसंघद्दनया मण्डी- प्राभृतिकया बलिप्राभृतिकया स्थापनाप्राभृतिकया शक्षिते सहसाकारिकेऽनेषणया (पानषणया) प्राणिभो- जनया वीजभोजनया हरितभोजनया पश्चात्कार्मिकया पुरस्कर्मिकयाऽदृष्टाहतया उदकसंसृष्टाहृतया रजःसं- सृष्टाहृनया पारिसाटनिक्या (पारिशातनिक्या) पारिष्ठापनिक्या ओहासनभिक्षया यत् उद्गमेन उत्पादन- पणयाऽपरिशुद्ध प्रतिगृहीतं परिभुक्तं वा यन्न परिष्ठापितं तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥८॥) (गोचरचरित्राए) गायना चरवानी जेवी जे चर्या-फर ते गोचरचर्या तेने विपे तथा (भिकायरिआए) भिक्षा- चर्याने विष मने जे अतिचार लाग्यो होय तेने (पडिकमामि ) हुं पडिकमु छु-आलोवु छ. गोचरीमा अतिचार शी रीते थाय ? ते उपर कहे छे-( उग्घाडकवाडउघाडणाए ) काइक ढांकेला कमाडने पुंज्या विना उघाडवावडे करीने, तथा (सा- णावच्छादारासंघट्टणाए) कूतरो, वाचरडो अने बाळकना संघट्टाए करीने, तथा ( मंडीपाहुडियाए) ढांकणी के वीजा पा- त्रमा प्रथम भात विगेरे काढीने जे अपाय ते मंडीप्राभृतिका कहेवाय छे, ते वडे करीने, तथा (बलिपाहुडिआए) चारे दिशामां अथवा अग्निमां प्रथम वलिंदान नांखीने पछी जे भिक्षा आपे ते बलिप्राभृतिका कल्पे नहीं तेथी तेवडे करीने, तथा ( ठवणापाहुडिश्राए) भिक्षुकोने माटे जूदी स्थापन करी राखेली भिक्षा कल्पे नहीं छतां ते लेवावडे करीने, तथा (संकिए) आधाकर्मादिकनी शंकावाळी भिक्षा ग्रहण करवाए करीने, तथा ( सहसागारिए) सहसात्कारे-उतावळे अकल्पनीय लेवावडे करीने थयेली जे (अणेसणाए) अनेपणा तेवडे करीने तथा (पाणभोप्रणाए)जे भोजनमा लेतां के देतां प्राणीओनी विरा- धना थाय एवी भिक्षावडे करीने तथा (बीअभोषणाए) जे भोजनमां बीजनी विराधना थाय एवी भिक्षावडे करीने, तथा ( हरिअभोणाए) जे भोजनमा हरित तृण ( लीला तृण) नो संघट्टो थतो होय एवी भिक्षा लेवावडे करीने, तथा (पच्छाकम्मिए) भिक्षा आप्या पछी काचा जळवडे वहोरावनारे हाथ विगेरे धोवाथी पश्चात्कम लागे छे एवी क्रिया जे भिक्षा लेता लागे तेवडे करीने, तथा ( पुरेकम्मिए) भिक्षा आप्या पहेला हाथ विगैरे धोवे ते पुरःकर्म कहेवाय छे, तेवी भिक्षाए करीने, तथा (अदिट्ठहडाए) घरनी अंदर रहेली वस्तु जोया विना आणी होय ने लेवावडे करीने, तथा (दगसंसट्ठहडाए) जळना स्पर्शवाळी आणेली भिक्षा लेवावडे करीने, तथा (रयसंसट्ठहडाए) रजना स्पर्शवाळी आणेली भिक्षा लेवावड के- रीने, तथा ( पारिसाडणिपाए) अन्नना कीया अथवा धी विगैरेना बिंदु पडता होय एवी भिक्षा लेवापडे करीने, तथा (पारिट्ठावणियाए) देवाना पात्रमा अकल्प्य वस्तु रहेली होय ते काढी नांखीने ते पात्रवडे जे भिक्षा आपे ते लेवावडे करीने, तथा (ोहाराणभिरकाए) कोइ पण वस्तु मागीने लेवी ते ओहासण कहेवाय छ, एवी भिक्षा लेवा वडे करीने तथा (जं) जे कांइ वस्तु ( उग्गमेणं) आधाकर्मादिक उद्गमना दोपे करीने तथा ( उप्पायणेसणाए) धात्री आदि उत्पादनाना दोपे करीने तथा शंकितादि एपणाना दोपे करीने ( अपरिसुद्धं) अशुद्ध थयेली होय ते ( परिग्गहिअं) में REE ग्रहण करी होय(परिभुतंवा )अथवा खाधी वापरी होय तथा ( जन परिद्वविअं)जे वस्तु परठवा योग्य होय छतां न परठवी (वापरी) होय ते वडे उत्पन्न थया जे अतिचार (तस्स मिच्छामि दुकड)ते अतिचार संबंधी मारुं दुष्कृत-पाप मिथ्या थाो. ८. पडिकमामि चाउकालं सज्झायस्स अकरणयाए, उभयोकालं अंडोबगरणस्त अप्पडिलेहणाए दुप्पडिलेहणाए अप्पमजणाए दुप्पमजणाए अइकमे वइकमे अइयारे अणायारे जो मे देवसियो अइबारो को तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥ ६ ॥ (प्रतिफमामि चतुःकालं स्वाध्यायस्य अकरणन, उभयकालं भाण्डोपकरणस्याप्रतिलेखनया, दुःप्र- तिलेखनयाऽपमार्जनया दुःप्रमार्जनयाऽतिक्रमे व्यतिक्रमेऽतिचारेऽनाचारे यो मया दैवसिकोऽतिचारः कृतस्तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥ ६ ॥ (पडिकमामि) हुं ते अतिचारने पडिकसुं छु, कया अतिचार ?(चाउकाल)चार काळ एटले दिवसना पहेला चे अने रात्रिना ना बे एम चार पहोरने विपे ( समायस्स) स्वाध्याय करवी जोइए ते सूत्र पौरुपीने विपे (अकरणयाए) नहीं करवाए करीने जे अतिचार लाग्या होय, तथा ( उभो कालं ) वे काळ एटले दिवसनी पहेली तथा छेल्ली पोरसीने विपे (भंडोवगरणस्स) वस्त्र पानादिक भांडोपकरणनी (अप्पडिलेहणाए) पडिलेहणा नहीं करवावडे करीने एटले मूळथीज दृष्टिवडे नहीं जोवाए करीने, तथा ( दुप्पडिलेहणाए) दुष्प्रतिलेखनावडे करीने एटले सारी रीते नहीं जोवाए करीने, तथा (अप्पमजणाए) रजोहरणादिकथी प्रमार्जन नहीं करवावडे करीने, तथा (दुप्पमजणाए) दुष्प्रमार्जनवडे करीने एटले विधि रहित जेम तेम ओछु वधतुं प्रमार्जन करवावडे करीने में जे अतिचार कर्या होय, तथा (अइकमे) अतिक्रमने विषे, (वइकमे) व्यतिक्रमने विप, (अइशारे) अतिचारने विषे अने (अणायारे ) अनाचारने विपे (जो)जे (मे) में (देवसिओ) दिवस संबंधी (अइसारो) अतिचार (को) कर्या होय (तस्स मिच्छा मि दुकडं ) ते अतिचार संबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थामओ. अहीं अतिकम विगेरेनुं स्वरूप आ प्रमाणे जाणवू-आधाकर्मादिक दोपवाळा आहार माटे निमंत्रण करे सते ते लेवानी इच्छा जणाववाथी अतिक्रम थाय छे, लेवा जतां व्यतिक्रम थाय छे, लोधे सते अतिचार थाय छे अने भोजनने माटे हाथमां कवळ ग्रहण करे सते अनाचार थाय छे. ६. (आ प्रमाणे दरेक बावतमां अतिक्रमादिकनो अर्थ समजवो.) आ अतिचार संक्षेपथी एक प्रकारे छे, अने विस्तारथी अनेक प्रकारे छे, तेमां एक प्रकारथी आरभीने केटलाक प्रकारो कहे छे. पडिकमामि एगविहे असंजमे ॥१०॥ (प्रतिक्रमामि एकविधेऽसंयमे) (एगविहे ) एक प्रकारना ( असंजमे ) अविरति रूप असंयमने विषे (पडिकमामि ) हुं पडिकसं -पालो फरुं छु, अर्थात् एक प्रकारना असंयमने चिपे में जे अतिचार कर्या होय ते संबंधी मारु दुकृत मिथ्या थारो. श्रा रीते सर्व ठे- काणे जाणवू. १०.
ड्डी पडिकमामि दोहिं बंधणेहिं रागबंधणेणं दोसबंधणेणं । पडिकमामि तिहि दंडेहि मणदंडेणं वयदंडेणं कायदंडेणं । पडिकमामि तिहिं गुत्तीहिं मणगुत्तीए वयगुत्तीए कायगुत्तीए । पडिकमामि तिहिं सल्लेहिं मायासल्लेणं नियाणसल्लेणं मिच्छादसणसल्लेणं । पडिकमामि तिहिं गारवेहि इ. गारवेणं रसगारवेणं सायागारवेणं ॥ ११ ॥ प्रतिक्रमामि द्वाभ्यां चन्धनाभ्यां रागवन्धनेन द्वेषवन्धनेन । प्रतिक्रमामि त्रिभिर्दण्डैः मनोदण्डेन वाग्दण्डेन कायदण्डेन । प्रतिक्रमामि तिसृभिर्गुतिभिः मनोगुप्त्या वारगुप्त्या कायगुप्त्या। प्रतिक्रमामि त्रिभिः शल्यैः मायाशल्येन निदानशल्येन मिथ्यादर्शनशल्येन । प्रतिकमामि विभिगौरवैः ऋद्धिगौरवण रसगौरवेण सातगौरवेण ॥११॥) (पडिकमामि ) कहेवाशे एवा अतिचारने हुँ पडिकमुं छु, ते अतिचारने ज बतावे छे.-(दोहि बंधणेहि ) बे बंधन- पडे करीने जे अतिचार लाग्या होय, ते चे बंधन कहे छे-(रागबंधणेणं) रागना बंधनवडे करीने तथा (दोसबंधणेणं) द्वेपना बंधनवडे करीने, तथा ( पडिकमामि ) हुं पडिकमु छु (तिहि दंडेहिं ) त्रण दंडवडे करीने एटले के ( मणदंडेणं) मन दंडवडे करीने ( वयदंडेहिं ) वचनदंडे करीने अने ( कायदंडेणं) कायदंडवडे करीने जे अतिचार थया होय, तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमु छ (तिहिं गुत्तीहि ) त्रण गुप्तिवडे करीने एटले ( मणगुत्तीए ) मनगुप्तिवडे करीने (वयगुत्तीए) BE वचनगुप्तिवडे करीने अने (कायगुत्तीए) कायगुप्तिवडे करीने (तेप्रमाणे गुप्त न रहेवाथी) जे अतिचार थया होय, तथा (यडिकमामि) पडिकमुंछ (तिहिं सनेहि ) त्रण शल्यवडे करीने एटले (मायासल्लेणं ) माया शल्यवंडे करीने (नियाणसल्लेणं) नि- दान शल्यवडे करीने अने (मिच्छादसणसनेणं) मिथ्यादर्शन शल्ये करीने जे अतिचार कर्या होय तथा (पडिकमामि) हूं पडिकमु छु ( तिहिं गारवेहिं ) त्रण गारव वडे करीने एटले ( इडीगारवेणं) ऋद्धिगारचे करीने (रसगारवेणं ) रसगा- रखे करीने अने ( सायागारवेणं) सातागारवे करीने मारा वडे जे अतिचार कराया होय ते अतिचार संबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थाओ. ११ पडिकमामि तिहिं विराहणाहिं नाणविराहणाए दसणविराहणाए चरित्तविराहणाए। पडिक- मामि चउहि कसाएहिं कोहकसाएणं माणकसाएणं मायाकसाएणं लोहकसाएणं । पडिकमामि च- उहिं समाहिं आहारसम्माए भयसलाए मेहुणसमाए परिग्गहसमाए । पडिकमामि चउहिं विकहाहिं इथिकहाए भत्तकहाए देसकहाए रायकहाए । पडिकमामि चउहिं झाणेहिं अटेणं झाणेणं रुदेणं झाणेणं धम्मेणं झाणेणं सुकेणं झाणेणं ॥ १२ ॥ (प्रतिक्रमामि तिमभिर्विराधनाभिः ज्ञानविराधनया दर्शनविराधनया चारित्रविराधनया । प्रतिक्र- मामि चतुर्भिः कपायैः क्रोधकषायेण मानकषायेण मायाकपायेण लोभकषायेण । प्रतिक्रमामि चतसृभिः संज्ञाभिः श्राहारसंज्ञया भयसंज्ञया मैथुनसंज्ञया परिग्रहसंज्ञया । प्रतिक्रमामि चतसृभिः विकथाभिः स्त्रीकथया भक्तकथया देशकथया राजकथया । प्रतिक्रमामि चतुर्भियानः धातन ध्यानेन रौद्रेण ध्यानेन धर्येण ध्यानेन शुलन ध्यानेन ॥ १२॥) (पडिकमामि) हुं पडिकमु छु (तिहिं विराहणार्हि ) त्रण विराधनाए करीने एटले (नाणविराहणाए ) ज्ञाननी वि- राधनाए करीने (दसणविराहणाए) दर्शन एटले समकितनी विराधनाए करीने अने (चरित्तविराहणाए ) चारित्रनी वि- राधनाए करीन जे अतिचार मने लाग्या होय, तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमुं (चउहि कसाएहिं ) चार कपायवडे करीने एटले ( कोहकसाएणं ) क्रोध कपायवडे करीने (माणकसाएणं) मान कषायवडे करीने (मायाकसाएणं) माया कपायवडे करीने अने (लोहकसाएणं ) लोभ कपायवडे करीने ने मने अतिचार लाग्या होय, तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमुंठे (चउहि सलाहिं ) चार संज्ञावडे करीने एटले (आहारसमाए ) आहार संज्ञावडे करीने (भयसमाए ) भय- संज्ञावडे करीने (मेहुणसमाए) मैथुन संज्ञावडे करीने अने (परिग्गहसमाए)परिग्रह संज्ञावडे करीने जे मने अतिचार लाग्या होय, तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमु छु (चाहिं विगहाहिं ) चार विकथा वडे करीने एटले (इथिकहाए) स्त्री कथा वडे करीने ( भत्तकहाए ) भोजननी कथावडे करीने ( देसकहाए) देशनी कथावडे करीने अने (राजकहाए ) राज्यनी कथा करवावडे करीने मने जे अतिचार लाग्या होय, तथा (पडिकमामि) हुँ पडिकखें धुं (चउहिं झाणेहिं ) चार ध्यान वडे करीने एटले (अद्वेणं झाणेणं) आर्त ध्यान करवावडे करीने ( रुदेणं झाणेणं ) रौद्रध्यान ध्यावावडे करीने (धम्मेणं झाणेणं ) धर्मध्यान नहीं ध्यावाए करीने अने (सुकेणं झाणेणं) शुक्लध्यान नहीं ध्यावावडे करीने जे अतिचार माराथी कराया होय ते अतिचार संबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थाओ. १२ पडिकमामि पंचहि किरियाहिं काइयाए अहिगरणियाए पाउसिाए पारितावणियाए पाणा- इवायकिरिआए ॥ १३॥ प्रतिक्रमामि पश्चाभः क्रियाभिः कायिक्या अधिकरणिक्या प्राद्वेषिक्या परितापनिक्या प्राणातिपात- क्रियया ॥१३॥) (पडिकमामि हुं पडिकमुं छु (पंचहि किरिबाहिं ) पांच प्रकारनी क्रिया करवावडे करीने एटले ( काइयाए) कायाथी थती गमनादिक क्रिया करवावडे करीने (अहिंगरणियाए ) खङ्गादि शस्त्र रूप अधिकरण क्रिया करवावडे करीने ( पाउ- सिवाए ) जीव अने अजीव उपर द्वेष रूप क्रिया करवावडे करीने (पारितावाणाए) पोताने अथवा परने संताप उपजाव- नारी क्रिया करवा वडे करीने तथा (पाणाइवायकिरिश्राए) प्राणातिपात-जीवहिंसा रूप क्रिया करवावडे करीने माराथी जे अतिचार थया होय ते अतिचार संबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थाओ. १३. पडिकमामि पंचहि कामगुणेहिं सदेणं रूवेणं रसेणं गंवेणं फासेणं । पडिकमामि पंचहिं मह- 24 व्वएहिं पाणाइवायाओ वेरमणं मुसावायाश्रो वेरमणं अदिन्नादाणाश्रो वेरमणं मेहुणाओ वेरमणं परिग्गहाश्रो वेरमणं । पडिकमामि पंचहि समिईहि इरियासमिईए भासासमिईए एसणासमिईए आयाणभंडमत्तनिखेवणासमिईए उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाणपारिद्यावणियासमिईए ॥ १४ ॥ (प्रतिक्रमामि पञ्चभिः कामगुणैः शब्देन रूपेण रसेन गन्धेन स्पर्शेन । प्रतिक्रमामि पञ्चभिर्महाव्रतैः प्राणातिपाताद्विरमणं मृषावादाद्विरमणमदत्तादानाद्विरमणं मैथुनाद्विरमणं परिग्रहाद्विरमणं । प्रतिक्रमामि पञ्चभिः समितिभिः ईर्यासमित्या भाषासमित्या एषणासमित्या भाण्डमात्रादाननिक्षेपणासमित्या उच्चारप्रस्रवणखेलजल्लसिंघाणपारिष्ठापनिकासमित्या ॥१४॥) ( पडिक्कमामि ) हुं पडिकमु छ. (पंचहि कामगुणेहि ) यांच प्रकारना शब्दादिक काम रूपी गुणोवडे एटले (सद्देणं) शब्दवडे करीने (रूवणं ) रूपवडे करीने ( रसेणं ) रसवडे करीने (गंधेणं) गंधवडे करीने तथा (फासेणं ) स्पर्शवडे करीने-श्रा पांचे इंद्रियोना विषयोए करीने निषिद्धनुं आचरण विगेरे करवाथी मने जे अतिचार लाग्या होय, तथा (पडि- कमामि ) ९ पडिकमु छु (पंचहिं महव्वएहिं ) पांच महाव्रतोए करीने एटले (पाणाइवायाओ वेरमणं) प्राणातिपातथी एटले जीवहिंसाथी विरम-निवर्तवू (मुसावायाओ वेरमणं) मृषावादथी विरमदूं ( अदिनादाणाओ वेरमणं) अदत्तादान (चोरी) थी विरमवू ( मेहुणालो वेरमणं ) मैथुनथी विरमवू अने (परिग्गहाओ वेरमणं) परिग्रहथी विरमवू. आ पांच महाव्रताने विषे काइ निषिद्ध आचरण करवाथी मने जे अतिचार लाग्या होय, तथा ( पडिकमामि) हुँ पडिकमुं छु (पंचहिं समिईहिं ) पांच समितिए करीने एटले (इरिआसमिईए) इर्यासमितिए करीने ( भासासमिईए ) भाषा समितिए ( एसणासमिईए) एपणा समितिए करीने (आयाणभंडमत्तनिकेवणासमिईए) भांडमान-पात्रादिनुं ग्रहण तथा मूकवू ए संबंधी समितिए करीने तथा ( उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाणपारिद्वावणियासमिईए ) वडीनीती, लघुनीती, खेल-लष्म, जल-शरीरनो मेल अने सिंघाण-नासिकानो मेल विगेरे परठववानी समितिए करीने-आ पांचे समिति पाळवामां प्रमादा- दिकने लीधे जे काइ माराथी अतिचार थया होय ते अतिचार संबंधी माझं दुष्कृत मिथ्या थाओ. १४, पडिकमामि छहिं जीवनिकाएहिं पुढविकाएणं श्राउकाएणं तेउकाएणं वाउकाएणं वणस्सइ- कारणं तसकाएणं । पडिकमामि कहिं लेसाहिं किन्हलेसाए नीललेसाए काउलेसाए तेउलेसाए पउमलेसाए सुक्कलेसाए । पडिकमामि सत्तहिं भयहाणेहिं ॥ १५ ॥ (प्रतिक्रमामि षभिः जीवनिकायैः पृथ्वीकायन अप्कायेन तेजस्कायेन वायुकायेन वनस्पतिकायेन त्रसकायेन । प्रतिक्रमामि षभिः लेश्याभिः कृष्णलेश्यया नीललेश्यया कापोतलेश्यया तेजोलेश्यया पद्मले- श्यया शुक्ललेश्यया। प्रतिक्रमामि सप्तभिर्भयस्थानः ॥ १५॥) (पडिकमामि ) हुं पडिक{ छु ( बहिं जीवनिकाएहिं ) छ जीवनिकाये करीने एटले (पुढविकाएणं) पृथ्वीकाये करीने - .
(पाउकाएणं) अप्काये करीने (तेउकाएणं) तेजस्काये करीने (वाउकाएणं) वायुकाये करीने (वणस्सइकारणं) वनस्पतिकाये करीने अने (तसकारणं.) सकाये करीने अर्थात् आ छ कायना संबंधमां प्रतिषिद्धनुं आचरण करवाथी ते जीवोने कीलामणा विगेरे उपजावयाथी मने जे अतिचार लाग्या होय, तथा (पडिकमामि ) हुँ पडिक{ छु (अहिं लेसाहिं ) छ लेश्यावडे करीने एटले (किन्हलेसाए) कृष्णलेश्याए करीने (नीललेसाए) नीललेश्याए करीने (काउ- लेसाए ) कापोतलेश्याए करीने ( तेउलेसाए ) तेजोलेश्याए करीने (पउमरोसाए ) पद्मलेश्याए करीने अने (सुक्कलेसाए) शुक्ललेश्याए करीने आमां पहेलीत्रण लेश्या आचरण करवाए करीने अने छेल्ली त्रण लेश्यानुं नहीं आचरण करवाए करीने जे भने अतिचार लाग्या होय, तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमु छु ( सत्तहिं भयहाणेहिं ) सात भयनां स्थानो वडे करीने माराथी जे कांइ अतिचार थया होय ते अतिचार संबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थायो. ते सात भय आप्रमाणे-आ लोक भय, परलोक भय, आदान भय, अकस्मात भय, मरण भय, अकीर्ति अपयश भय अने आजीविका भय. १५. अहिं मयट्ठाणेहिं । नवहिं बंभचेरगुत्तीहिं । दसविहे समणधम्भे ॥ १६ ॥ (अष्टभिर्मदस्थानः । नवमिव्रत्मचर्यगुप्तिभिः । दशविधे श्रमणधर्मे ॥ १६ ॥ (अहहिं मयहाणेहि ) प. मदनां रथानवडे करीने जे अतिचार लाग्या होय ते संबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थाओ एम सर्वत्र जाणवू. मदनां पाठ प्रकार या प्रमाणे-जातिमद, कुळमद, रूपमद, बळमद, लाभमद श्रुतमद, तपमद अने अश्वर्यमदं तथा(नवहिं बंभचेरगुत्तीहि)नव प्रकारनी ब्रह्मचर्य गुप्ति पाळचामांप्रमादयी जे अविचार लाग्या होय, ते नव प्रकारनी ब्रह्मचर्य गुप्ति आ प्रमाणे-स्त्री, पशु अने नपुंसकवाळी वसतिन सेवची १, एकली स्त्री साथे अथवा स्त्री संबंधी कथा न करवी २, स्त्रीनी साथे एक आसने बेसबुं नहीं अथवा स्त्री ज्यां बेठी होय ते स्थाने वे घडी थया पहेलां वेसवू नहीं ३, स्त्रीोना अवयवो जोवा नहीं ४, भीतने आंतरे रहेली स्त्रीना मोहकारक शब्दो सांभळवा नहीं ५, स्त्रीनी साथे पूर्वे जे क्रीडादिक कर्यु होय ते संभारवू नहीं ६, प्रणीत भोजन-स्निग्ध आहार करवो नहीं ७, अत्यंत आहार करवो नहीं ८, तथा शरीरनी विभूषा करवी नहीं ९. तथा (दसविहे समणधम्मे) दश प्रकारना साधुधर्ममां जै कांइ अतिचार लाग्या होय. दश प्रकार आ प्रमाणे-चांति (क्षमा), मार्दव (मृदुता-निरभिमानता), आर्जव ( सरलता), मुक्ति (निलाभता), तप, संयम, सत्य, शौच (अचौर्य), अपरिग्रह अने ब्रह्मचर्य. १६. एगारसहि उवासगपडिमाहि ॥ १७ ॥ (एकादशभिः उपासकप्रतिमाभिः ॥ १७ ॥) (एगारसहिं उवासगपडिमाहिं) अग्यार उपासकनी-श्रावकनी प्रतिमावडे करीने एटले ते प्रतिमा आश्री कहेवा कारववामां फेरफार थवाथी काइ पण अतिचार लाग्या होय.ते प्रतिमा आप्रमाणे-पहेली समकित प्रतिमा तेमांएक मास सुधी अतिचार रहित समकित पाळे. १. बीजी व्रत प्रतिमा तेमांवे मास पहेली प्रतिमामां कहा उपरांत अतिचार रहित वार व्रतोनुं पालन करे. २. त्रीजी सामायिक प्रतिमा तेमां पूर्वे कहेली क्रिया सहित ऋण मास सुधी बन्ने काळ निरतिचार सामायिक सहित प्रतिक्रमण करे. ३. चोथी पापधप्रतिमा तेमा पूर्वनी क्रिया सहित चार मास सुधीचार पर्वोने विषे एटले वेभाठम अनेचे चौदशे निरविचार - भा पौषध करे. ४. पांचमी प्रतिमानामनी प्रतिमा तेमांपूर्वोक्त क्रियासहित पांच मास सुधी पौपधने दिवसे राने दोपरहित कायोत्सर्ग करे, पांचमाससुधी स्नान न करे, रात्रे चतुर्विध माहारनो त्याग करे, दिवसे ब्रह्मचर्य पाळे अने रात्रिए मैथुन- परिमाण करे, पण पौषध होय त्यारतोरात्रिएपण सर्वथा ब्रह्मचर्य पाळे ने कायोत्सर्ग करे.५. छठी ब्रह्मचर्य प्रतिमा तेमां पूर्वोक्त क्रिया सहित छमास सुधी रात्रि दिवस निरतिचार ब्रह्मचर्य पाळे, अने कच्छ धारण करे. ६.सातमी सचित्तवर्जन प्रतिमा तेमां पूर्वोक्त क्रिया सहित सात मास सुधी सचित्त आहारनो त्याग करे.७.आठमी प्रारंभवर्जन प्रतिमा तेमां पूर्वोक्त क्रिया सहित आठ मास सुधी पोते काइ पण आरंभ समारंभ करे नहीं. ८. नवमी प्रेष्यवर्जन प्रतिमा तेमां पूर्वोक्त क्रिया सहित नव मास सुधी बीजा पासे पण आरंभ करावे नहीं. ६. दशमी उद्दिष्टवर्जन प्रतिमा तेमां पूर्वनी क्रिया सहित दश मास सुधी पोताने उद्देशीने करेलो आहारादिक ग्रहण न करे. १०. अग्यारमी साधुभूत--साधु जेवी प्रतिमा तेमां पूर्वोक्त क्रिया सहित अग्यार मास सुधी मस्तके मुंडित थइ अथवा लोच करी श्रमणनी जेम विचरे, रजोहरण अने पात्रां राखे अने पोतानी जातिमा विचरी । भिक्षा मागीने खाय. ११. (आबधी श्रावकपणानी उत्कृष्ट करणी छे अने तेमां आगजनी प्रतिमामां पाउली बधी तो साथे । राखवानी ज ले.) बारसहिं भिकुपडिमाहि ॥ १८ ॥ (द्वादशभिभिक्षुप्रतिमाभिः ॥१८॥ (बारसहिं भिकुपडिमाहि) भिक्षुनी-साधुनी बार प्रतिमा आश्री काइ अतिचार थया होय ते प्रतिमा आ प्रमाणे-पहेली -- प्रतिमा एक मासनी, तेमां अलेप भोजन ग्रहण करे अने आहार पाणीनी एक दत्ती ग्रहण करे. बीजी वे मासनी, तेमां वे दत्ती. ए रीते वधतां सातमी सात मासनी, तेमां सात दत्ती ग्रहण करे. आठमी सात अहोरात्रिनी, तेमां चोवीहार उपवास करे, गामनी बहार कायोत्सर्ग कर, उत्तानादिक आसने रही उपसर्गो सहन करे. नवमी सात अहोरात्रिनी, तेमा उत्कटिका- सने अथवा दंडासने रहे, चोविहार उपवास कर अने गाम बहार कायोत्सर्ग करी उपसर्ग सहन करे. दशमी सात अहोरा- विनी, तेमा पूर्वोक्त क्रिया सहित गोदोहिकासने रहे. अग्यारमी प्रतिमा एक अहोरात्रिनी, तेमां चोविहार छठ करे, गाम बहार कायोत्सर्ग करी उपसर्ग सहन कर. बारमी चौविहार अट्ठम करी एक रात्रि ईपत्मागभार शिला पर एकाग्र दृष्टि राखी कायोत्सर्ग करी उपसर्ग सहन करे. आ बधी प्रतिमामां अतिचाररहित प्रवृत्ति करवानी होय छे. आ प्रतिमा उपर श्रद्धा न राखवी विगेरे आश्री अतिचार लागे छे. १८ तेरसहि किरिाठाणेहिं ॥ १६ ॥ (त्रयोदशभिः क्रियास्थानः ॥ १६॥) क्रियाना तेर स्थानको आश्री जे काइ अतिचार लाग्यो होय. ते स्थानको आ प्रमाणे-अर्थ क्रिया-प्रयोजन छते क्रिया करे ते. १. अनर्थ क्रिया-प्रयोजन विना क्रिया करे ते. २. हिंसा क्रिया-आणे मारा स्वजनने मार्यो, हमणां मने मारे थे, भविष्यकाळे मारशे एम धारीने प्रवृत्ति करता जे क्रिया लागे ते. ३. अकस्मात क्रिया-बीजाने मारतां वचमां बीजो मराय ते. ४. दृष्टिविपर्यास क्रिया-मित्रने शत्रु मानवाथी अने शत्रुने मित्र मानवाथी जे क्रिया लागे ते. ५. मृषा क्रिया । गु या -असत्य बोलवू ते.६. अदत्तादान क्रिया अदत्तादान ले ते. ७. पोतार्नु कोइ वांकुं बोलतुं न होय छतां मनमा शंका राखीने दुभाय ते अध्यात्मिकी क्रिया. ८. अभिमानथी बीजानी हीलना करतां मान क्रिया. ६. थोडो अपराध छतां वधारे दंड आये ते अमित्र क्रिया. १०. कपटथी अन्यने छेतरखो ते माया क्रिया ११. अत्यंत तृष्णा वधारवी ते लोभ क्रिया. अथवा कामनो अर्थी पोतार्नु रक्षण करतो बीजाने हणे ते लोभ क्रिया १२. तथा साधुने मार्गे चालतां जे लागे ते ईर्यापथिकी क्रिया कहेवाय छे १३. चउद्दसहिं भूयगामेहिं । पन्नरसहिं परमाहम्मिएहि । सोलसहि गाहासोलसएहिं । सत्तर- सविहे असंजमे ॥ २०॥ (चतुर्दशभिः भूतग्रामैः। पञ्चदशभिः परमाधार्मिकै पोडशभिःगाथापोडशकैः । सप्तदशविधेऽसंयमे ॥२०॥ ( चउद्दसहिं भूयगामेहिं ) चौद प्रकारना भूतग्राम एटले प्राणीसमुदाय तेने पाश्री जे काइ अतिचार लाग्यो होय, तथा ( पनरसहिं परमाहम्मिएहिं ) पंदर परमाधार्मिकने श्राश्री एटले तेमना पापनी अनुमोदना विगैरे करवाथी जे काइ अतिचार लाग्यो होय, तथा (सोलसहि गाहासोलसएहि) सूयगडांगसूत्रना सोळ गाथायध्ययने करीने एटले तेनो पाठ- अभ्यास नहिं करवाथी जे अतिचार लाग्यो होय, तथा (सत्तरसविहे असंजमे) सतर प्रकारना असंयमने आश्रीने जे अतिचार लाग्यो होय. अहीं चौद भूतग्राम आ प्रमाणे छ-सूक्ष्म एकद्रिय १, बादर एकेंद्रिय २, द्वींद्रिय ३, त्रींद्रिय ४, चतुरिंद्रिय -- - - ॥
५, संज्ञि पंचेंद्रिय ६, अने असंज्ञिपंचेंद्रिय ७, ए सात पर्यासा तथा सात अपर्याप्ता मळी चाँद थाय छे. अथवा चाँद गुण- स्थानके वर्तता जीवो चौद प्रकारे जाणवा. पंदर परमाधार्मिकनां नाम आ प्रमाणे-अंब १, अंबरीप २, शाम ३, सबल ४, रुद्र ५, उपरुद्र ६, काल ७, महाकाल ८, असिपत्र ६, धनु १०, कुंभ ११, वालुक १२, वेतरणी १३, खरस्वर (घोप) १४ तथा महाघोप १५. सोळ गाथाध्ययननां नाम-खसमयपरसमयज्ञ १, वैतालिक २, उपसर्ग परिज्ञा ३, स्त्रीपरिज्ञा ४, नरकविभक्ति ५, वीरस्तव ६, कुशीलभाषाज्ञा ७, वीतरजा ८, धर्ममार्ग ६, समाधि १०, समवसरण ११, आहतहा १२, ग्रंथाध्ययन १३, संयममार्ग १४, मार्गाध्ययन १५ अने गाथाध्ययन १६. सतर प्रकारनो असंयम श्रा प्रमाणे-पृथ्वीकाय असंयम १, अप्काय असंयम २, तेजस्काय असंमम ३, वायुकाय असंयम ४, वनस्पतिकाय असंयम ५, द्वींद्रिय असंयम ६, त्रींद्रिय असंयम ७, चतुरिद्रिय असंयम ८, पंचेंद्रिय असंयम ६, अजीच असंयम (पुस्तकादिकनो संघट्ट करवो विगैरे ) १०, प्रेक्षा असंयम ११, उपेक्षा असंयम १२, प्रम प्रमार्जना असंयम १३, पारिष्ठापनिका असंयम १४, मन असंयम १५, वचन असंयम १६ अने काय असंयम १७. अट्ठारसविहे अचंभे । इगुणवीसाए नायज्झयणेहिं । वीसाए असमाहिहाणेहिं ॥ २१ ॥ (अष्टादश विधेऽब्रमणि । एकोनविंशत्या ज्ञाताध्ययनैः । विंशत्याऽसमाधिस्थानः ॥ २१ ॥) (अट्ठारसविहे अचंभे ) अढार प्रकारना अब्रह्मना सेवनादिकने विष (इगुणवीसाए नायज्झयणेहिं ) श्रीगणीश ज्ञाता- सूत्रना अध्ययनोनो पाठ-अभ्यास न करवावडे करीने तथा (बीसाए असमाहिदाणेहिं) पीश असमाधिना स्थानको सेवचा- - वडे करीने जे अतिचार लाग्यो होय. अढार प्रकारे अब्रह्म-मैथुन आ प्रमाणे-दिव्य अने औदारिकने मन, वचन अने कायाए गुणतां छ भेद थाय, तने करवू, करावq अने अनुमोदq ए त्रणे गुणतां अढार भेद थाय के. श्रीगणीश ज्ञाता- सूत्रनां अध्ययनो आ छे.-उत्क्षिप्त १, संघाड २, अंड ३, कूर्म ४, सेलक ५, तुंब ६, रोहिणी ७, मल्लीनाथ ८. माकंदी ६, चंद्रमा १०, दावद्रव ११, उदक १२, मंडूक १३, तेतलीपुत्र १४, नंदीफळ १५, अपरकंका १६, आकीर्णक १७, सुसुमार १८ अने पुंडरीक १६. वीश असमाधिना स्थान आ के.-उतावळु चालवू १, अप्रमार्जित एटले अणपूंजे स्थाने बेसबुं २, दुष्प्रमार्जित एटले सारी रीते नहीं पूंजला स्थाने वेस, ३, मोटो उपाश्रय होवाथी बीजा पण साधुओ आवे तेनी साथे कलह उत्पन्न थाय ते ४, आसन, पीठ, फलक विगेरे वधारे राखयां ते, अथवा शेपकाळ पण पीठफलकादिक पोतानी निश्राए राखवां ते ५, रत्नाधिक गुणवंतनी सामु बोले ६, ज्ञानवृद्धादिकनो उपघात करे ७, प्राणीनो उपघात करे ८, वारंवार कोप करे ६, निरंतर क्रोधी रहे १०, पाछळथी अवर्णवाद बोले ११, क्षणे क्षणे निश्चयवाळी भाषा बोले के आ एमज छे १२, अधिकरणनी उदीरणा करे १३, अकाळे स्वाध्याय करे १४, अस्थंडिल भूमिथी स्थंडिलभूमिमां जइने पगर्नु प्रमार्जन न करे, रजवाळा हाथे भिक्षा ग्रहण करे, अथवा अशुद्ध पृथ्वीपर बेसे के सुवे १५, विकाळे पण मोटा शब्द- वडे बोले अथवा गृहस्थनी भाषा बोल १६, जेनी तेंनी साथे कलह करे १७, झंझाकारी थाय एटले गच्छनो भेद करे १८, घj भोजन करे, सवारथी सांज सुधी मोकळे मोढे खाय, अथवा प्रमादादिकथी देवद्रव्यादिक खाय १६ तथा अनेषणा- समितिनो त्याग न करे २०. आ सर्व पोताने अने परने असमाधिना कारणरूप होवाथी असमाधिरूप छे.
इकवीसाए सबलेहिं ॥ २२ ॥ (एकविंशत्या शयलैः॥२२॥) एकवीश शबळे करीने जे अतिचार लाग्यो होय. शबळ एटले चारित्रने कलुप करवाना हेतु. ते एकवीश आ प्रमाणे छ-हस्तकर्म करवू ते. १. सालंबन मैथुन सेवे एटले अतिक्रम, व्यतिक्रम अने अतिचारवडे मैथुन सेवे. २. सालंबन रात्रि- भोजन करे एटले रात्रे ग्रहण करेलुं दिवसे खाय अने दिवसे ग्रहण करेलु राने खाय. ३. आधाकर्म भोजन करे अथवा हमेशां बेत्रण वार खाय. ४. राजपिंड ग्रहण करे. ५. वेचातो लधिलो पिंड ग्रहण करे. ६. प्रामित्य दोपवाळो एटले उधारे लीधेलो आहार ले. ७. सामो आणेलो पिंड ले. ८. आच्छेद्य एटले कोइवें आंचकीने ले. ६. पचख्खाण करेली वस्तु ले.१०.छमासनी अंदर एक गच्छथी बीजा गच्छमां जाय.११. एक मासमांत्रणवारनदी विगेरे जळाशयो उतरे.१२. एक मासमां त्रणवार मातृस्थान सेवे' एटले मायाकपट करे. १३. जाणी जोइने पृथ्व्यादिक जीवने हणे. १४. जाणीने मृपावाद बोले. १५. जाणीने अदत्तादान ले. १६. अशुद्ध पृथ्वी उपर आसन विगैरे करे. १७. आकुट्टिवडे मूळ, फळ विगेरे खाय. १८. एक वरसमां दशवार उदक लेप करे एटले पात्रमा पाणीनो लेप रही जाय. १६. एक वरसमा दशवार मातृस्थान सेवे एटले मायाकपट कर. २०. तथा काचा पाणीवाळा हाथे आपलं भोजन विगेरे ग्रहण करे. २१. आ सर्वे चारित्रने शबल एटले मलिन करे छे.
बावीसाए परीसहेहिं ॥ २३ ॥ (द्वाविंशत्या परीषदः ॥२३॥) चावीश परीपहो न सहेबावडे करीने जे अविचार लाग्यो होय. यावीश परीपहो पा छे-तुधा परीपह १, पिपासा परीपह २, शीत परीपह ३, उष्ण परीपह ४, दंशमशक परीपह ५, अचेल परीषह ६, अरति रति परीपह ७, स्त्री परीपह , चर्या परीपह , निपद्या परीपह १०, शय्या परीपह ११, आक्रोश परीपह १२, वध परीपह १३, याचना परीपह १४, अलाभ परीपह १५, रोग परीपह १६, तृणस्पर्श परीपह १७, मल परीपह १८, सत्कार परीपह १६, प्रज्ञा परीपह २०, अज्ञान परीपह २१ अने सम्यक्त्व परीपह २२. तेवीसाए सूअगडल्झयणेहिं । चउवीसाए देवेहिं । पणवीसाए भावणाहिं । छब्बीसाए दसाकप्पववहाराणं उदेसणकालेणं । सत्तावीसाए अणगारगुणेहिं ।। २४ ॥ (त्रयोविंशत्या सूत्रकृताध्ययनैः । चतुर्विशत्या देवैः । पञ्चविंशत्या भावनाभिः । षड्विंशत्या दशाकल्पव्यवहाराणानुद्देशनकालैः । सप्तविंशत्याऽनगारगुणैः ॥ २४ ॥ १ अरिहंतेहि इति पाठांतर. २ मईदिः इति वा पाठ: mmam hd . (नेवीमाए सूयगडग्यणेहि ) सुयगडांगनां त्रेवीश अध्ययनोए करीन (तेनी विरुद्ध प्ररूपणादिकथी) तथा (चीमाए देवहिं ) चोवीश देवोए करीने (तेनी आशातना विगैरे करवाथी) अथवा (अरिहंतेहिं) एयो पाठ होय तो नोरीश अरिहंत करीने (तेमनी आशातना विगैरे कग्याथी) तथा (पणवीसाए भावणार्हि) पांच महाव्रतनी पचीश भावनाए करीन (भावना नहीं भाववाथी) तथा (छब्बीसाए दसाकापक्वहाराणं उद्देसणकालेणं) दशाश्रुतम्कंधनां दश अध्ययन, कल्प-जीतकल्पना छ अने व्यवहारनां दश मळी छवीश अध्ययनोना वीश उद्देशाना काळं करीने । तनी विरुद्ध प्ररूपणादिके करीने ) तथा ( सत्तावीसाए अणगारगुणेहिं ) माधुना मताधीश गुणे करीने (तेमां दोप लगाया विगेरेयी ) जे अतिचार लाग्यो होय. अहीं पुंडरीक १, क्रियास्थानक २, आहार परिता ३, पनसाण क्रिया ४. अनगार माग ५, आर्द्रकुमार ६, नालंदक ७ अने चाकीनां सोळ प्रथम कायां चे ते कुल मळी २३ अध्ययनो मुयगडांगरत्रनां छ. चोवीश देवो याप्रमाणे-भवनपति दश प्रकारना, व्यंतर आठ प्रकारना, ज्यातिष्क पांच प्रकारना तथा एक प्रकारना वैमानिक मळी २४ प्रकारना देवी थाय छ भने चोवीश तीर्थंकरो वर्तमान चोपीशीना जाणवा. पचीश भावना-दरेक महावतनी पांच पांच भावना होवाथी पांच महानतनी पीश थाय छे. तेमा पहेला प्राणा- तिपात विरमण व्रतनी-इयोममिति संबंधी १. प्रादाननिक्षेपणा समिति संबंधी २, एपणाममिति मंबंधी ३, संयमन विपे अदुष्ट मन प्रवर्तावया संबंधी ४ तथा अदुष्ट वचन प्रबर्तावया संबंधी ५. ए पांच भावना छे. वीजा महाव्रतनी-हास्य लोभ २, भय ३ अने क्रोधनो परित्याग करवा संबंधी ४ तथा असत्यना पचरूपाण छ माटे विचारीन बोलका संबंधी ५.
म पांच भावनाछे.त्रीजा महाव्रतनी-उपाश्रयना स्वामी पासे पोतेज अवग्रहनी याचना कर १, तृणादिकनी बीजाने अनुज्ञा आपवी होय तो उपाश्रय देनारना कहेवाथी आपे २, आहार पाणीनो, शयननो अने बेसवा विगेरेनो अवग्रह स्पष्ट रीते अनुज्ञा लइने वापरे ३, गुरुनी अथवा बीजानी अनुज्ञा लइने पोते आहार पाणी वापरे ४ तथा साधर्मिक साधुओने माटे पण अवग्रहनी याचना करी पोते स्थानादिक करे ५. ए पांचे प्रकारमा तत्पर रहेवारूप पांच भावनाओ छे. चोथा व्रतनी- प्रमाणथी वधारे अथवा स्निग्ध आहार न करे १, शरीरे विभूषा न करे २, स्त्रीने तथा तेना अवयवोने न जुए अथवा पूर्वनी क्रीडा न संभारे ३, स्त्री पशु पंडकवाळी वसतिमा न रहे ४ तथा स्त्रीओ साथे अथवा स्त्री संबंधी कथा न करे ५. ए पांच प्रकारमा सावधान रहेवा संबंधी पांच भावनाओ छे. पांचमा महाव्रतनी-शब्द, रूप, रस, गंध अने स्पर्श ए पांच विषयो मनोज्ञ जोइ राग न करवो अने अमनोज्ञ जोइ द्वेष न करवो ए पांच भावनाओ छे. अथवा बीजी रीते पण पचीश भावनाओ ग्रंथांतरमा कहेली के ते आ प्रमाणे-अनित्य १, अशरण २, संसार ३, एकत्व ४, अन्यत्व ५, अशुचित्व ६, आश्रय ७, संवर, निर्जरा ह, लोकस्वरूप १०, बोधि ११ तथा धर्मभावना १२ ए बार अने मैत्री १, प्रमोद २, कारुण्य ३ अने माध्यस्थ्य ४ ए चार मळी १६, तेमां आठ दृष्टि मित्रा, तारा विगैरे भेळववाथी २४ अने पचीशमी प्रवचन निःशंकिनी एटले प्रवचनने विषे शंका न करवी ते. २६ अध्ययनो उपर गणावेला छे. हवे साधुना सतावीश गुणो आ प्रमाणे छे-रात्रिभोजन सहित छ महाव्रतो ६, पांच इंद्रियोनो जय ११, भावशुद्धि १२, प्रत्युपेक्षादिकनी शुद्धि १३, क्षमा १४, लोभनो त्याग १५, अशुभ एवा मन, पापश्रुतना प्रसंगे वचन अने कायानो निरोध १८, छकायनी रक्षा २४, संयम योगनी रक्षा २५, शीतादि परीपह सहेवा ते २६ तथा मरण पर्यंत उपसर्गो सहन करवा ते २७. अट्ठावीसाए आयारप्पकप्पेहिं । इगुणतीसाए पावसुअप्पसंगेहिं ॥ २५ ॥ (अष्टाविंशत्याऽऽचारमकल्पैः। एकोनविंशता पापश्रुतप्रसङ्गैः ॥ २५ ॥) अठावीश आचार प्रकल्पे करीने एटले आचारांगना अध्ययनोए करीने तेने विरुद्ध प्ररूपवा विगेरेथी जे अतिचार लाग्यो होय. तथा ओगणत्रीश करीने ते प्ररूपवा विगेरेथी जे अतिचार लाग्यो होय. आचार कल्पना २८ अध्ययनो आ प्रमाणे-शस्त्र परिज्ञा १, लोकविजय २, शीतोष्णीय ३, सम्यक्त्व ४, लोकसार ५, धूताध्ययन ६, महापरिज्ञा ७, विमोक्ष ८, उपधान श्रुत ह, पिंडैपणा १०, शय्या ११, इर्या १२, भाषा १३, वस्त्रैपणा १४, पात्रेपणा १५, अवग्रह प्रतिमा १६, सप्तकसप्ततिका १७, ठाणसप्ततिका १८, निसीहि सप्तैकका १६, उच्चार पासवण सप्तकका २०, रूप सप्लैकका २१, शब्द सप्रेकका २२, अन्योन्यक्रिया २३, भावनाध्ययन २४, विमुक्ति २५, उपघात २६, अनुद्- घात २७ अने आरुहणा २८. आमांना छेल्लां त्रण अध्ययनो निशीथनां छे. भोगणत्रीश पापश्रुत एटले पापशास्त्रां आ प्रमाणे छे.-तेमां आठ प्रकारना निमित्तशास्त्र आवे छे ते आ प्रमाणे-दिव्य-व्यंतरना अट्टहासादिकना विषयवालं १, उत्पात-रुधिरवृष्टि विगेरेना विषयवालं २, अंतरिक्ष-ग्रहभेद, उल्कापात विगैरे विषयवालं ३, भौम-भूमिकंप विगेरे विषयवाळ SHES - ४, अंग-अंग फरक विगैरे विषयवालं ५, स्वर-स्वरना विषयवाळं ६, व्यंजन-शरीर उपरना मस, तल विगेरे विषयवालं ७, अने लक्षण-लांछन तथा रेखा विगेरेना विषयवालं आ आठ प्रकारना निमित्तांग उपर सूत्र, वृत्ति अने वार्तिक ए त्रण त्रण होवाथी २४ थाय छे, तथा गंधर्व २५, नाट्य २६, वास्तुविद्या २७, धनुर्वेद २८ अने आयुर्विद्या २६. आ प्रमाणे २६ पापशास्त्र थाय छे. तीसाए मोहणीयठाणेहिं ॥ २६ ॥ (त्रिंशता मोहनीयस्थानैः॥ २६ ॥) त्रीश प्रकारनां मोहनीयनां स्थानो सेववारडे करीने जे काइ अतिचार लाग्यो होय. ते त्रीश स्थानो आ प्रमाणे छे.- कोइ मनुष्यने पाणीमां नांखी मारे १, मुख विगैरे ढांकी श्वासनो रोध करी मारे २, मस्तक पर वाधरी विगेरे बांधीने मारे ३. मयूरबंध विगैरेथी बांधीने मारे ४, घणा लोकना स्वामी एवा राजाने मारे ५, घणा लोकना आधारभूत श्रेष्ठी विगेरेने मारे ६, पोते साजो छतां साधारण मांदा पडेलानुं औपधादिक न करे ७, साधुने ज्ञानादिक मार्गथी भ्रष्ट करे ८, तीर्थकरना । अवर्णवाद बोले ६, आचार्यादिकना अवर्णवाद बोले १०, आहार विगेरेवडे आचार्यादिकनी भक्ति न करे ११, ज्योतिष विगेरे अधिकरणाने उत्पन करे १२, तीर्थनो भेद करी विराधक बने १३, वशीकरणादिक करे १४, दीक्षा लइने पण काम- १ पक्षी विगैरेनो स्वर, अथवा पोताना कंठनो स्वर, अथवा नासिकानो स्वर.
भोगनी इच्छा राखे १५, हुं बहुश्रुत छु अथवा तपस्वी बुं एम वारंवार बोले अथवा दंभथी मौन धारण करे १६, गाम घर विगेरे सळगावे १७, पोते अकृत्य करीने वीजा पर तेनो आरोप मूके १८, माया कपट करे १६, अशुभ मनवाळो रहे २०, निरंतर कलह कर्या करे २१, विश्वासघात करे २२, विश्वासु मित्रादिकनी स्त्री प्रत्ये गमन करे २३, पोते कुमार नहीं छतां हुं कुमार छु एम कहे २४, अब्रह्मचारी छतां हुं ब्रह्मचारी छु एम बोले २५, जेने आश्रीने धनादिक पाम्यो होय तेना ज धनादिकनो लोभ करे २६, तथा तेने ज विघ्नकारी थाय २७, सेनापति मंत्री विगेरेनो घात करे २८, देवादिकने नहीं देखता छतां हुं जोउं छु एम बोले २६, अने देवनो अवर्णवाद बोले ३० इगतीसाए सिद्धाइगुणेहिं । बत्तीसाए जोगसंगहेहिं ॥ २७ ॥ (एकत्रिंशता सिद्धादिगुणैः। द्वात्रिंशता योगसंग्रहैः ॥ २७॥) सिद्धादिकना एकत्रीश गुणोनी विपरीत प्ररूपणादिके करीने अने बत्रीश योग संबंधी संग्रहमा प्रमादादिके करीने जे अतिचार लाग्यो होय. सिद्धना आदि गुण एटले एकी वखते उत्पन थनारा गुण एकत्रीश छे ते या प्रमाणे-पांच संस्थान, पांच वर्ण, बे गंध, पांच रस, आठ स्पर्श, त्रण वेद, आ अठात्रीशनो अभाव तद्रूप २८ गुण तथा काय रहित २६, संग रहित ३० अने जन्म रहित ३१. अथवा ज्ञानावरणनी प्रकृति ५, दर्शनावरणनी ६, वेदनीयनी २, मोहनीयनी (दर्शन- मोहनी ने चारित्रमोहनी ) २, आयुकर्मनी ४, नाम कर्मनी (शुभ ने अशुभ) २, गोत्रकर्मनी २, अन अंतरायनी ५, : सम्यक आ भाठे कर्मनी ३१ प्रकृतिना क्षयरूप एकत्रीश गुण जाणवा. योग एटले मन, वचन, कायाना शुभ योग तेना बत्रीश प्रकारनो संग्रह या प्रमाणे छे-शिष्ये आचार्य पासे प्रकारे आलोचना लेवी १, प्राचार्ये आलोचना आपी बीजा पासे प्रकाशनी नहीं २, आपत्ति आवे तो पण धर्ममा दृढ रहेवू ३, इहलोक परलोकना फळनी इच्छा रहित क्रियानुष्ठान करवू ४, ग्रहणा अने आसवना बने शिक्षा सेववी५, शरीरने साफ न करवू ६. तप करी वीजाने न जणाववो ७, लोभनो त्याग करवो ८, परीषहादिकनो जय करवो ६, आर्जवता राखवी- कुटिलपणानो त्याग करवा १०, संयमव्रतने विपे निर्मळता-अतिचार रहितपणुं राख ११, समकितनी शुद्धि करवी १२, चित्तनी समाधि राखपी १३, आचारने विषे सावधान रहे, १४, विनयमां तत्परपणुं राख १५, धृतिमां तत्पर रहे, १६, संवेगमा तत्पर रहवू १७, मायारहित वर्तवु १८, सारी रीते सर्व विधि करवी १६, संवर करवो २०, आत्मदोपनो त्याग करवो २१, सर्व कामथी विरक्त थर्बु २२, मूगुण संबंधी पचख्खाण करवू २३, उत्तरगुण संबंधी पचख्खाण करवा २४, द्रव्यथी अने भावथी कायोत्सर्ग करवो २५. प्रमादनो त्याग करवो २६, क्षणे क्षणे दश प्रकारनी सामाचारी पाळवी २७, ध्यानसंवृतपणुं एटले आतरौद्रध्याननो त्याग करवो तथा धर्म अने शुक्लध्याननो आदर करवो २८, मारणांतिक परीपह सहन करवा २६, ज्ञपरिज्ञा अने प्रत्याख्यान परिज्ञानुं पालन करवू ३०, दोष लागे तो प्रायश्चित्त करवू तथा मरण * आमां मोहनीनी वे छे ते अठावीश थवाथी (२६) वधे, ने नामकर्मनी बे छे तेनी (१०३) थवाथी (१०१) वधे. कुल (१२७ ) वधवाथी आठ कर्मनी १५८ उत्तर प्रकृति थाय. ----- . समये आराधना करवी ३२. (आ वत्रीश प्रकारमा सावधानता न रही होय ते.) तित्तीसाए आसायणाए ॥ २८ ॥ (त्रयस्त्रिंशता आशातनाभिः) तेत्रीश आशातना करवावडे करीने जे अतिचार लाग्यो होय. अहीं गुरु संबंधी तेत्रीश पाशातनाओ पाक्षिक सूत्रमा कही गया ीए ते जाणवी. अथवा बीनीरीते अरिहंतादिकनी तेत्रीश आशातना थाय छे ते सूत्रकार ज कहे छे.- अरिहंताणं श्रासायणाए, सिद्धाणं श्रासायणाए, आयरिआणं आसायणाए, उवज्झायाणं आसायणाए, साहूणं अासायणाए, साहुणीणं श्रासायणाए, सावयाणं आसायणाए, सावियाणं अासायणाए, देवाणं आसायणाए, देवीणं आसायणाए, इहलोगस्त घासायणाए, परलोगस्स आसायणाए, केवलिपन्नत्तस्स धम्मस्स आसायणाए, सदेवमणुासुरस्स लोगस्स आसायणाए, सव्वपाणभूअजीवसत्ताणं आसायणाए, कालस्स आसायणाए, सुअस्स श्रासायणाए, सुयदेवयाए आसायणाए, वायणारिअस्स श्रासायणाए, जं वाइद्धं, वच्चामेलिश्र, हीणकर, अञ्चरकर, पयहीणं, विणयहीणं, जोगहीणं, घोसहीणं, सुहृदिन्नं, दुहुपडिच्छिन्नं, अकाले को सज्झाओ, काले न को सज्झाओ, असज्झाइए सज्झाइअं, सज्शाइए न सज्झाइअं, तरस मिच्छा मि दुकडं ॥२६॥ (अर्हतामाशातनया, सिद्धानामाशातनया, प्राचार्याणमाशातनया, उपाध्यायानामाशातनया, साधू- नामाशातनया, साध्वीनामाशातनया, श्रावकाणामाशातनया, श्राविकाणामाशातनया, देवानामाशात- नया, देवीनामाशातनया, इहलोकस्याशातनया, परलोकस्याशातनया, केवलिप्रज्ञप्तस्य धर्मस्याशातनया, सदेवमनुजासुरस्य लोकस्याशातनया, सर्वप्राणभूतजीवसत्त्वानामाशातनया, कालस्याशातनया, श्रुतस्या- शातनया, श्रुतदेवताया श्राशातनया, वाचनाचार्यस्याशातनया, यत् व्याविद्धं, व्यत्यानेडितं, हीनाक्षरम्, प्रत्यक्षरं, पदहीनं, विनयहीनं, योगहीनं, घोपहीनं, सुष्ठुदत्तं, दुष्टुप्रतीच्छितम्, अकाले कृतः स्वा- ध्यायः, काले न कृतः स्वाध्यायः, अस्वाध्यायिके स्वाध्यायितं, स्वाध्यायिके न स्वाध्यायितं, तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥ २६ ॥ (अरिहंताणं आसायणाए) अरिहंतोनी आशातनाए करीने १, (सिद्धाणं आसायणाए) सिद्धोनी भाशातनाए करीने २, (आयरियाणं आसायणाए) आचार्योनी आशातनाए करीने ३, (उपमायाणं आसायणाए) उपाध्यायोनी अशातनाए करीने ४, ( साहूणं आसायणाए) साधुओनी आशातनाए करीने ५, (साहुणीणं श्रासायणाए) साध्वीओनी आशातनाए करीने ६, (साययाणं आसायणाए ) श्रावकोनी आशातनाए करीने ७, (सावियाणं आसायणाए) श्राविकाओनी आशातनाए करीने ८, (देवाणं अासायणाए ) देवोनी आशातनाए करीने ६, ( देवीणं अासायणाए) देवीओनी आशातनाए करीने १०, (इहलोगस्स आसायणाए ) आलोकनी आशातनाए करीने ११, ( परलोगुस्स श्रासा- यणाए ) परलोकनी आशातनाए करीने १२, (केवलिपनत्तस्स धम्मस्स आसायणाए) फेवळीए प्ररूपला धर्मनी आशा- तनाए करीने १३, ( सदेवमणुप्रासुरस्स ) देव, मनुष्य अने असुर सहित एवा (लोगस्स ) त्रण लोकनी (श्रासायणाए) आशातनाए करीने १४, (सव्यपाणभूअजीवसत्ताणं आसायणाए) सर्वे प्राण-दींद्रियादिक, भूत-वनस्पतिकाय, जीव- पंचेंद्रिय अने सच-बाकीना एकद्रियो ए सर्वनी आशातनाए करीने १५, ( कालस्स आसायणाए) काळनी पाशातनाए करीने १६. (सुयस्स प्रासायणाए) श्रुतज्ञाननी आशातनाए करीने १७, (सुयदेवयाए आसायणाए) श्रुतदेवतानी आशातनाए करीने १८, (वायणारिअस्स आसायणाए) वाचनाचार्यनी आशातनाए करीने १६, (जं वाइद्धं ) जे व्याविद्ध एटले उतावळे बोलवू अथवा रत्नमाला विगैरेनी जैम विपरीत कहy, तेथी जे अतिचार लाग्यो होय २०, ..( बच्चामलिअं) बीजा आलावा मेळवीने बोलवू २१, (हीणकरिअं) हीन अक्षर बोलवा २२, ( अच्चरकरित्रं) वधारे अक्षर बोलवा २३, ( पयहीणं) एक वे पदे करीने हीन चोलवू २४, (विणयहीणं ) विनय विना भण, २५, (जोगहीणं) जोग वह्या विना भणयु २६, (घोसहीणं ) उदात्तादि घोपरहित भणवू २७, ( सुट्टदिन्नं ) गुरुए सारी रीते एटले शक्ति करतां अधिक दी, एटले भणाव्यु २८, (दुहृपडिच्छियं ) शिष्ये दुष्ट हृदयथी ग्रहण कर्यु २६, (अकाले को सज्झायो) अकाले स्वाध्याय को ३०, (काले न को सज्झाओ) काळे स्वाध्याय न काँ ३१, (असज्माइए सज्झाइअं) असज्झाय छते स्वाध्याय कर्यो ३२, तथा (सज्झाइए न सज्झाइ) असमाय नहीं छतां स्वाध्याय न कर्यो ३३ था तेत्रीश आशातनाथी जे काइ अतिचार थयो होय (तस्स मिच्छा मि दुकडं ) ते अतिचार संबंधी मारं दुष्कृत मिथ्या थाओ. दश प्रकारनी आकाशनी असज्शय आ प्रमाणे छ.--उल्कापात १, दिग्दाह २, वीजळी ३, गर्जना ४, व्यंतरादि देवकृत मोटी गर्जना ५, संध्याप्रमा-शुदि एकमने रोज कदाचित् चंद्रनी अने संध्यानी बन्ने प्रभा एकठी थती होय ६, आकाशमां अग्निदाह जेवो उद्योत देखातो होय ७, धुंबाड पडती होय ८, हिम विगैरे पडतुं होय ६ तथा रजोवृष्टि थती होय १०. प्रामांनी कोइपण उपद्रव होय तो ते दिवसे सज्झाय थाय नहीं. (वर्षाऋतुमा एटले आनी नक्षत्रथी प्रारंभी स्वाति नक्षत्र सुधी वीजळी, गर्जना अने वादळां थतां होय तथा नक्षत्र ताराओ देखाता न होय तो पण असज्झाय नथी.) चैत्र तथा आश्विन मारामां शुदि पांचमथी आरंभी वदि एकम सुधी चार दिवसनी असज्शाय छे. कोइ ग्रंथमां भादरवा वदि एकमनी पण असज्झाय कहे छे. चौमासानी चौदशे मध्यान्हकाळथी आरंभी पडवाना अंत सुधी अढी दिवसनी असज्झाय छे. (ते दिवसे पाक्षिक सूत्र कहेवामां असज्झाय नथी.) त्रण चौमासा पैकी आषाढ तथा कार्तिक चोमासानी चौदशना मध्यान्हथी पडवाना अंत सुधी अढी दिवसनी असज्झाय छे अने फाल्गुन चोमासामा होळी प्रगट करे त्यारथी रज उडी रहे त्यांसुधी असज्झाय छे. दीवाळीने दिवसे प्रभातकाळे लोको सुपडा विगेरे वगाडे छ ने अळश काढे छे ते वखते असज्झाय छे. वळी दश प्रकारनी औदारिक शरीरनी असज्झाय आ प्रमाणे छे.-अस्थि १, मांस २, रुधिर ३ तथा मूत्र पुरीपादिक अशुचि पदार्थ ४ समपिमा पड्यो होय तो असज्झाय. चंद्र के सूर्यनुं ग्रहण जेटलो वखत रहे तेटलो वखत असज्झाय, पण जो ते घेराएलो ज अरत पामे तो फरी तेनो उदय थाय त्यांसुधी असज्झाय छे. ५. राजा, प्रधान, सेनापति, गामनो नायक विगेरेनुं मरण जे.दिवसे थाय ते दिवसे असज्झाय. ६. राजाओगें परस्पर युद्ध थतुं होय तो तेटला दिवस असज्शाय. ७. पुरुष, स्त्री के गल्लादिकनुं युद्ध थतुं होय तो तेटलो वखत असज्ज्ञाय. ८. खीने ऋतु प्राप्त थाय त्यारथी आरंसीने चोवीश प्रहर सुधी असज्झाय. ६. मनुष्यादिकनुं शरीर तथा पशु पक्षी विगेरेनुं कलेवर, दांत, अस्थि विगेरे सो हाथ सुधीमां अथवा जघन्यथी साठ हाथ सुधीमा पडयुं होय तो तेने दूर लइ जइ परठवे नहीं त्यांसुधी असज्शाय छे. १०. तथा शरीर ज्यांसुधी अपवित्र होय त्यांसुधी असज्झाय छे. विगेरे असज्झायनो विचार विस्तारथी आवश्यकनियुक्तिमां तथा निशीथस्त्रना ओगणीशमा उद्देशामां प्राप्यो छे, त्यांयी जाणी लेवो. अहीं अरिहंतथी प्रारंभीने देवी सुधीना जे दश पदोछे तेमनो अवर्णवाद बोलवाथी आशातना लागे छे. १०. आलोक अने परलोकनी असत्प्ररूपणा करवाथी आशातना लागे छे. १२. प्राकृत भाषामां श्राश्रुत बधुं रचेलुं छे इत्यादि अवर्णवाद बोलवाथी श्रुतनी आशातना लागे छे. १३. देव, मनुष्य अने असुर सहित त्रण लोकनी असत्प्ररूपणा करयाथी आशातना लागे छे. १४. प्राण विगैरेनी हिंसादिकथी आशातना लागे छे. १५. काळनी असत्प्ररूपणा करवाथी आशातनालागे छ.१६. जो ज्ञान मोक्षy कारण छे तो तेने भणवानो काळ के अकाळ शो छ ? निरंतर शा माटे न भणाय ? एम कहेवू श्रुतनी आशातना छे. १७. श्रुतदेवतानी अवर्णवाद विगेरेथी आशातना थाय छे. १८. वाचनाचार्यनी पण अव- .
वाद विगेरेथी पाशातना थाय छे. १६. त्यारपछी सूत्र भणबु अने भणापवू ते संधी चौद आशातना लखी
ते स्पष्ट ज छ. ३३.
णमो चउवीसाए तित्थयराणं उसमादिमहावीरपज्जवसाणाणं । इणमेव निग्गंथं पावयणं सच्चं
अणुत्तरं ॥३०॥
(नमश्चतुर्विशत्यै तीर्थकरेभ्य ऋषभादिमहावीरपर्यवसानेभ्यः। इदमेव नैर्ग्रन्थं प्रावचनं सत्यमनुत्तरम्।।३०)
(उसमादिमहावीरपञ्जवसाणाणं) ऋषभस्वामीथी आरंभी महावीरस्वामी पर्यंत (चउवीसाए) चोचीश (तित्थयराणं)
तीर्थकरांने (णमो) नमस्कार थाओ. (इणमेव) श्रा ज (निग्गंथं) निग्रंथ संबंधी (पावयणं) द्वादशांगीरूप प्रवचन
( सचं) सत्य के एटले सत्पुरुपने हितकारक छे. (अणुत्तरं) आ प्रवचनथी बीजं कोइ उत्तम प्रवचन नथी. तेने हुँ
सद्दहुं छु एम आगळ कहेशे. वळी ते प्रवचन के ले ? ते कहे छे.
केवलियं पडिपुन्नं नेपाउयं संसुद्धं सल्लगत्तणं ॥३१॥ सिद्धिमगं मुत्तिमग्गं निजाणमग्गं
निव्वाणमगं अवितहमविसंधि सव्वदुरुपहीणमग्गं ॥ ३२॥
(कैवलिकं प्रतिपूर्ण नैयायिक संशुद्धं शल्यकर्तनम् ॥ ३१ ।। सिद्धिमार्ग मुक्तिमार्ग निर्यानमार्ग
निर्वाणमार्गमविनयमविसन्धि सर्वदुःखाहीणमार्गम् ॥३२॥
(केवलियं) केवळ-अद्वितीय एटले एना जेवू चीजु कोइ नथी एबुं ते के अथवा ते केवळीए प्ररूपेलुं छे, तथा (पडिपुग्नं) परिपूर्ण एटले मोक्षने प्राप्त करनारा गुणोए करीने भरेलु के, तथा (नेपाउयं) न्यायवडे युक्त छ, तथा (संसुद्ध) समस्त प्रकारे शुद्ध एटले कलंक रहित छे, तथा (सल्लगत्तणं) संसारना हेतुरूप मायाशल्यादिक शल्योने कापनार छे. ३१. तया (सिद्धिमग्गं) सिद्धिना एटले हितार्थनी प्राप्तिना मार्गरूप छ, तथा. (मुत्तिमग्गं) कर्मक्षयरूप मुक्तिना मार्गरूप छ, तथा (निजाणमग्गं) निरुपम यान एटले सिद्धशिला तेना मार्गरूप छ, तथा (निव्वाणमग्गं) निर्वाण एटले आत्यतिक सुख तेना मार्गरूप छे, तथा (अवितहं ) सत्य छ, तथा (अविसंधि) महाविदेहादिकमां निरंतर होवाथी विच्छंदरहित छ, तथा (समदुरूपहीणमग्गं). सर्व दुःखने क्षीण करनार मार्ग छे एटले मोक्षनो मार्ग छे. तेवा प्रवचनने हुं सद्दई छु. ३२. इत्यं ठिया जीवा सिझंति बुझंति मुञ्चति परिनिव्वायंति सम्बदुकाणमंतं करंति ॥ ३३ ॥ (अत्र स्थिता जीवाः सिध्यन्ति युध्यन्ते मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति सर्वदुःखानामन्तं कुर्वन्ति) ( इत्थं ) आ निग्रंथ संबंधी प्रवचनने विषे ( ठिा ) रहेला (जीवा ) जीवो ( सिझंति ) अणिमादिक सिद्धिोने पामे छे, तथा ( युज्झति ) चोध पामे छे एटले केवळी थाय छ, तथा (मुचंति ) कर्मथी मूकाय छ, तथा (परिनिव्यायांत) सर्व प्रकारे सुखी थाय छे, तथा ( सधदुरकाणं अंतं करंति ) सर्व दुःखोनो अंत-विनाश करे छे. ३३, तं धन्मं सदहामि पत्तियामि रोएमि फासेमि पालेमि अणुपालेमि। तं धम्मं सदहतो पसियतो रोश्रतो फासतो पालितो अणुपालितो तस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अब्भुट्ठिोमि आराहणाए, विरोमि विराहणाए, असंजमं परित्राणामि, संजमं उवसंपज्जामि, अबंभं परित्राणामि, बंभं उवसंप- जामि ॥ ३४॥ (तं धर्म श्रदधे प्रतिपद्ये रोचयामि स्पृशामि पालयामि अनुपालयामि।तं धर्मश्रद्दधानः प्रतिपद्यमानः रोचयन् स्थशन पालयन अनुपालयन् तस्य धर्मस्य केवलिमज्ञप्तस्याभ्युत्थितोऽस्मि आराधनायां, विरतोजस्म विराधनायाम् , असंयमं परिजानामि, संयममुपसंपद्ये, अब्रह्म परिजानामि, ब्रह्म उपसंपद्ये ॥ ३४ ॥) (तं धम्म) ते निग्रंथ लक्षण धर्मने (सदहामि ) हुं सद्दई छु, (पत्तिआमि ) अंगीकार करुं छु, (रोएमि) रुचावु छु. ( फासेमि ) फरसुं छु-सवु छु, ( पालेमि) पालं छु अने ( अणुपालेमि ) निरंतर पालं छु. वळी (तं धर्म ) ते धर्मने सदहतो ) सद्दहतो थको, (पत्तिअंता) अंगीकार करतो थको, (रोअंतो) रुचावतो थको, (फासंतो) फरसतो थको, ( पालितो) पाळतो थको तथा (अणुपालितो) निरंतर पाळतो थको (तस्स ) ते ( केवलिपनत्तस्स) केवळीए प्ररूपेला (धम्मस्स ) धर्मनी (अब्भुटिओमि आराहणाए ) आराधनाने विपे हुँ उद्यमवंत थयो छु, ( विरोमि विराहणाए ) विरा- धनाथी विराम पाम्यो छु एटलं निवृत्त थयो छु, (असंजमं परित्राणामि ) असंयमने ज्ञपरिज्ञाए जाणीने प्रत्याख्यान परि- ज्ञाए पञ्चक्टुं छु, ( संजम उवसंपन्जामि) संयमने अंगीकार करुं छु, (अंबंभ परिणामि) अब्रह्मने-मैथुनने निषेधुं छु अने (बंभ उवसंपज्जामि) ब्रह्मचर्यने अंगीकार करुं छु. ३४ अकप्पं परियाणामि, कप्पं उवसंपज्जामि, अन्नाणं परिमाणामि, नाणं उवसंपज्जामि, अकिरिअं परित्राणामि, किरिअं उवसंपज्जामि, मिच्छत्तं परित्राणामि, संमत्तं उवसंपज्जामि, अबोहिं परिणा- णामि, बोहिं उवसंपज्जामि, अमग्गंपरित्राणामि, मग्गं उवसंपज्जामि, जं संभरामि, जं च न संभरामि, जं पडिक्कमामि, जं च न पडिकमामि, तस्स सव्वस्स देवसिअस्स अइआरस्स पडिकमामि ॥ ३५॥ (अकल्पं परिजानामि, कल्पमुपसंपये, अज्ञानं परिजानामि, ज्ञानमुपसंपये, अक्रियां परिजानामि, क्रियामुपसंपद्ये, मिथ्यात्वं परिजानामि, सम्यक्त्वमुपसंपये, अबोधिं परिजानामि, बोधिमुपसंपद्ये अमार्ग परिजानामि, मार्गमुपसंपये, यत् स्मरामि, यच्च न स्मरामि, यत् प्रतिक्रमामि, यच्च न प्रतिक्रमामि, तस्य सर्वस्य दैवसिकस्यातिचारस्य प्रतिक्रमामि ॥ ३५॥) (अकप्पं परिणामि ) साधुने नहिं कल्पे तेवा आहारादिकने हुं पच्चख्खु छु, ( कप्पं उवसंपजामि ) जे कल्पे तेने हुं अंगीकार करुं छु, ( अन्नाणं परिआणामि) अज्ञानने पञ्चख्खुंछु, (नाणं उपसंपज्जामि) ज्ञानने अंगीकार करुं छु, (अकि- रिश्र परित्राणामि ) अक्रियाने एटले नास्तिकवादने हुं पच्चख्खंछु, (किरिअं उपसंपन्जामि) क्रियाने एटले सम्यक् वादने हुं अंगीकार करुं छु, ( मिच्छत्तं परिणामि ) मिथ्यात्वने हुं पञ्चख्खु छु, ( सम्मत् उवसंपन्जामि) समकितने हुं अंगीकार
'काम
करं छु, ( अमोहिं परित्राणामि ) अबोधिने एटले मिथ्यात्वना कार्यने हुँ पञ्चख्खु छु, (बोहिं उवसंपजामि ) बोधिने एटले
समकितना कार्यने अंगीकार करुं छु, ( अमग्गं परिमाणामि ) मिथ्यात्वादिक श्रमार्गने
पचख्खुं छु, ( मग्गं
उपसंपन्जामि) सम्यक्त्वादि मार्गने हुँ अंगीकार करुं छु, (जं संभरामि) जे काइ मने सांभरे छ, (जं च न संभरामि)
अने जे अनुपयोगादिकने लीधे मने सांभरतुं नथी, तथा (जं पडिकमामि ) जाणेलुं एबुं जे काइ पडिकमु छु, (जंच
न पडिकमामि) अने अजाएघु एवं जे काइ हुँ पडिकमी शकतो नथी, ( तस्स सव्वस्स ) ते सर्व ( देवसिअस्स)
दिवस संबंधी ( अइनारस्स ) अतिचारने (पडिकमामि) हुं पडिक{ छु-ते अतिचारथी हुं निवर्तु छु.
समणो हं संजयविरयपडिहयपञ्चकायपावकम्मो अनियाणो दिट्ठिसंपन्नो मायामोसविवजियो
अड्डाइज्जेसु दीवसमुद्देसु पन्नरससु कम्मभूमीसु जावंत केवि साहू रयहरणगुच्छपडिग्गहधारा ॥३६॥
पंचमहव्वयधारा अट्टारससहस्ससीलंगधारा अकयायारचरित्ता ते सव्वे सिरसा मणसा मत्थएण-
वंदामि ॥ ३७॥
( श्रमणोऽहं संयतविरतप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मानिदानो दृष्टिसंपन्नो मायामृषाविवर्जका अर्ध-
तृतीयेषु द्वीपसमुद्रेषु पञ्चदशसु कर्मभूमिषु केऽपि साधवो रजोहरणगोच्छप्रतिग्रहधारिणः ॥३६॥
पञ्चमहाव्रतधारिणोऽष्टादशसहस्रशीलाङ्गधारिणोञ्चताचारचारित्रास्तान सर्वान् शिरसा मनसा मस्तकेन-
वन्दे ॥३७॥)
( समणो है ) हुं श्रमण छु, ( संजय ) संयमवाळो (विरय) विरतिवाळो (पडिहयपच्चरकायपावकम्मो ) हमणां
नहीं करवावडे हएयु छ, अतीत काळनी निंदाए करीने तथा भविष्यमां नहीं करवाए करीने पञ्चख्युं के पाप कर्म जेणे एवो
हुँ छु, (अनियाणो) नियाणा रहित हूं, (दिद्विसंपनो) सम्यग्दर्शनवडे युक्त छु, तथा ( मायामोसविवाजिओ) माया
युक्त मृपावादी रहित थयो छु, तेथी करीने ( अड्डाइजेसु दीवसमुद्देसु ) अदीद्वीप अने में समुद्रने. विषे तथा (पारससु
कम्मभूमीसु) पंदर कर्मभूमिने विषे-पांच भरत, पांच औरवत अने पांच महाविदेहने विपे ( जावंत के वि साहू ) जे
कोइ साधुओ रहेला छे, केवा ? ( रयहरणगुच्छपडिग्गहधारा) रजोहरण, गोच्छक अने प्रतिग्रहने धारण करनारा, ॥३६॥
तथा ( पंचमहव्ययधारा ) पांच महाव्रतोने धारण करनारा तथा ( अट्ठारससहस्ससीलंगधारा) अढार हजार शीलांगने
धारण करनारा, तथा (अक्खयायारचरिचा) अक्षत-परिपूर्ण आचाररूपी चारित्रवाळा छ, (ते सव्वे) ते सर्व साधुओने
(सिरसा) मस्तकवडे, (मणसा) मनवडे तथा कायावडे ( मत्थएण बंदामि) हुं वांदु छु. ३७
आ प्रमाणे साधुओने वांदी हवे सर्व जीवोनी क्षामणा तथा मैत्रीभावने कहे छे-
खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती मे सव्वभूएसु, वेर मज्झ न केणेई ॥१॥
खमा (क्षमयामि सर्वान् जीवान् सर्वे जीवाः क्षमयन्तु माम् । मैत्री मे सर्वभूतेषु वैरं ममं न केनापि ॥ १॥) (खामेमि सव्वजीवे) ९.सर्व जीवोने (सच्चे जीवा खमंतु में) सर्व जीवो मने-मारा प्रत्ये खमो, (मिची मे सब्वभूएस) सर्व प्राणीओने विषे' मारे मैत्री-मित्रभाव. छ, तथा (वेरै मज्झ न केणई) मारे कोइनी साथे वैर नथी. १. एवमहं आलोइत्र, निदिअ गरहिअ दुगंछिअंसम्मातिविहेण पडिकतो, वंदामि जिणे चउव्वीसं ॥२॥ (एवमहमालोच्य निन्दित्वा गर्हयित्वा दुर्गछिकं सम्यक् । त्रिविधन प्रतिक्रामन् वन्दे जिनान् चतुर्विशतिम् ॥ २॥) (एवं) आ प्रमाणे एटले उपर कही गया ते रीते (अहं) हु (दुगंछिय) दुगंछित एवा पापकर्मने (सम्म) सारी रीते (आलोइत्र ) आलोचीने, तथा (निंदिअ) आत्मसाक्षीए निंदीने तथा (गरहित्र) गुरुनी साक्षीए गर्दा करीने तिचिहण) मन, वचन अने काया एं त्रण प्रकारे करीने (पडिकतो) प्रतिक्रमण करतो थको (जिणे चउल्वीसं). चौवीश जिनेश्वरीने (बंदोमि ) वादु छु.२० ॥ इति श्रमणसूत्रं समाप्तम् ...
No text on this page.