Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Prachin Gurjar Kavya Sangrah Part-i
Front matter
FOREWORD. Owing to the untimely death of Mr C D Dalal, M.A, the editor, this work is published for the present without its Intorduction and Notes We are also aware that owing to the great pressure of other work that Mr Dalal had on his bands at the time he was editing this work, he could got correct the several mistakes that have crept 19 the text Scholars of old Gujarati are only a few in number and those few are not free or prepared to undertake to complete this work just at present Hence this First Part of the work containing only the Text is sent out to the public with a promise that it will be followed soou with a Second Part which will contaiu a cntical Introduction and Notes written by the veteran old Gujarati scholar Mr Keshay Harshad Dhruva, B A , of Ahmedabad. 10-4-20 JS KUDALKAR Curator of State Libraries, BHARATIYA TIDYA प्राचीनगुर्जरकाव्यसंग्रहः S.N............ THAVAN अनुक्रमणिका. TIMIT पद्यसंग्रहा Page. 1 .. रेवंतगिरिराम नेमिनाथचतुष्पदिका उवएसमलिकहाणयप्पय 8 11 समराराम 27 ... 38 ... ... 41 ... ... ... सिरियूलिभरफागु जंबूसामिचरिय समक्षेविराम काढूटीरास सालिभरकक 47 ... ... ... 59 ... ... ... 62 ... ... दूहामातृका 67 ... ... चर्च रिका 71 ... ... 74 ... .. 78 मातृकाचापड़ सम्पकत्वमाईचउपइ श्रीनेमिनाथफागु ... ... 83 गद्यसंग्रहः B6 भाराधना ... ... ". ... ... ... 87 88 ... 89 ... ... अतिचार सर्वतीर्थनमस्कारस्तवन नवकारस्यास्पानम् अतिचार पृप्तीपदचरित्र घरतरपावलीपट्पदानि 91 ... ... ". ... ... 93 ... ... ... 131 ...
2 APPENDICES. Page. 1 I श्रीवस्तुपावतीर्थयात्रावर्णनम् II रेवयाप्पसंसेवो ... 8 ... III उजयन्तस्तव ... ... 10 12 ... ... 15 ... 44 17 ... ... 19 IV उमयन्तमहातीर्यकप v रक्ताल्प VI अविशदेवीरा VII श्रीगिरिनारकल्प VIII Inscription of the Reign of Alapkhan in the temple of Sthambhana Pårglanatha at Cambay IX Inscriptions on the Satrunjaya Hill pertaining Samara's installation of the image of Âdishvara x पेधडरास 23 ... ... ...
(VEDATED
ॐ
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
प्रथमो भागः
रेवंतगिरिरासु
परमेसरतित्थेसरह पयपंकय पणमेवि ।
भणिसु रासु रेवंतगिरे अंबिकदिवि सुमरेवि ॥१॥
गामागरपुरवणगहणसरिसरवरि सुपएसु ।
देवभूमि दिसि पच्छिमह मणहरु सोरठदेसु ॥ २॥
जिणु तहिं मंडलमंडणउ मरगयमउडमहंतु ।
निम्मलसामलसिहरभरे रेहइ गिरि रेवंतु ॥ ३ ॥
तसु सिरि सामिउ सामलउ सोहगसुंदरसारु ।
जाइवनिम्मलकुलतिलउ निवसइ नेमिकुमाम ॥ ४ ॥
तसु मुहदसणु दसदिसि वि देसदेसंतरु संघ ।
आवह भावरसालमणउ हलि रंगतरंग ॥५॥
पोरुयाडकुलमंडणउ नंदणु आसाराय ।
वस्तुपाल घरमति तहिं तेजपालु दुइ भाय ।। ६ ।।
गुरजरधरधुरि घबलकि वीरधवलदेवराजि.।..
विहु बंधवि अवयारियउ सूम इसममाझि ॥७॥
नायलगच्छह मंडणउ विजयसेणॉरिराउ ।
उवएसिहि बिहु नरपवरे धम्मि धरिउ दिदु भाउ ॥ ८॥
तेजपालि गिरनारतले तेजलपुरु नियनामि ।
कारिउ गढमढपवपवरु मणहरू घरि आरामि ॥९॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्कहः तहि पुरि सोहिउ पासजिणु आसारायविहार । निम्मिा नामिहि निजजणणि कुमरसरोवर फार ॥ १० ॥ तहि नयरह पूरवदिसिहि उग्रसेणगढदुग्गु । आदिजिणेसरपमुहजिणमंदिरि भरिउ समग्गु ॥ ११ ॥ वाहिरिगढ दाहिदिसिहि चरियवेदिविसालु। लाडकलहहियओरडीय तडि पसुठाइकराल ॥ १२ ॥ तहि नयरह उत्तरदिसिहि सालथंभसंभार । मंडण महिमंडल सयल मंडप दसह उसार ॥ १३ ।। जोइड जोइउ भवियण पेमिं गिरिहि दुयारि । दामोदरु हरि पंचमउ सुचन्नरेहनइपारि ॥१४॥ अगुण अंजण अविलीय अंबाडय अंकुल्लु । उंबरु अवरु आमलीय अगरु असोय अहल्लु ॥ १५ ॥ करवर करपट करुणतर करवंदी करवीर। कुडा कडाह कयंव कड करव कलि कंपीर ॥ १६ ॥ चेय चंजल्लु बउर बडो घेडस वरण विडंग। वासंती वीरिणि विरह वंसियालि वण वंग ॥ १७ ॥ सौंसमि सिंवलि सिरसमि सिंधुवारि सिरखंड । सरल सार साहार सप सामु सिगु सिणदंड ।। २८॥ पल्लवफुल्लफललसिय रेहह ताहि वणराइ । तहि उजिलतलि धम्मियह उल्लट अंगि न माइ ॥ १९॥ वोलावी संघहतणीय कालमेघंतरपंथि । मेल्हविय तहिं दिढ घणीय वस्तपाल घरमंति ॥२०॥ (प्रथमं कडवम् ) दुविहि गुजरदेसे रिजरायविहंडणु । कुमरपाल भूभालु जिणसासणमंडणु । तेण संठाविओ सुरठदंडाहियो। अंबओ सिर सिरिमालकुलसंभवो। पाज सुविसाल तिणि नठिय । अंतरे धवल पुणु परव मराविय ॥ १ ॥ 1
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रेवंतगिरिरासु
धनु सु धवलह भाउ जिणि पाग पयासिय ।
बारविसोत्तरवरसे जसु जसि दिसि वासिय ।
जिम जिम चडई तडि कडणि गिरनारह ।
तिम तिम ऊडई जण भवणसंसारह ।
जिम जिम सेउजलु अग्गि पालाट ए।
तिम तिम कलिमलु सयलु ओहह ए॥२॥
जिम जिम वायइ चाउ तहि निज्झरसीयल ।
तिम तिम भवदुहदाहो तरकणि तुइ ।
निश्चलु कोइलकलयलो मोरकेकारवो ।
सुंमए महुयरमहुरुगुंजारवो।
पाज चडंतह सावयालोयणी ।
लापारामु दिसि दीसए दाहिणी ॥ ३ ॥
जलदजालववाले नीझरणि रमाउलु ।
रेहइ उज्जिलसिहरु अलिकजलसामल ।
पहलवुहुधातुरसमेउणी।
जत्थ उलदलइ सोवन्नमइ मेउणी।
जत्थ दिप्पंति दिवो सही सुंदरा ।
गुहिर वर गरुय गंभीर गिरिकंदरा ॥४॥
जाइ कुंदु विहसंतो जे कुसुमिहि संकुलु।
दीसइ दस दिसि दिवसो किरि तारामंडलु ।
मिलियनवलवलिदलकुसुमझलहालिया।
ललियसुरमहिवलयचलणतलतालिया ।
परिपालकमलमयरंदजसकोमला।
विउल सिलवह सोहंति तहिं संमला ॥५॥
मणहरघणवणगहणे रसिरहसिय किंनरा।..-
गेउ मुहुरु गायंतो सिरिनेमिजिणेसरा।
जत्य सिरिनेमिजिणु अच्छप अच्छरा ।
असुरसुरउरगकिंनरयविबाहरा ।
मउडमणिफिरणपिंजरियगिरिसेहरा।
हरसि आवंति बहुभत्तिभरनिन्भरा ॥ ६ ॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
सामियनेमिकुमारपयपंकयलंबिउ
धरधूल वि जिण धन्न मन पूरइ वंछिउ ।
जो भव कोडाकोड्डि
अन्नु सोवनु घणु दाणु जउ दिनए।
सेवउ जडकम्मघणगंठि जउ तिजए।
तउ उर्जितसिहरु पाविजए ॥७॥
जम्मणु जोव जीविय तसु तहिं कयत्थू ।
जे नर उर्जितसिहरु पेरकइ घरतित्थू ।
आसि गुरजरधरय जेण अमरेसरु ।
सिरिजयसिंघदेउ पवरु पुवीसरु ।
हवि सोरठु तिणि राउ पंगारउ ।
ठविउ साजणु दंडाहिवं सारउ ॥८॥
अहिणवु नेमिजिणिंद तिणि भवणु कराविउ ।
निम्मल चंदन बिवे नियनाउं लिहाविउ ।
थोरविरकंभवायंभरमाउलं ।
ललियपुत्तलियकलसकुलसंकुलं ।
'मंडपु दंडघणु तुंगतरतोरणं ।
धवलिय वज्झिरुणझणिरिकिंकणिघणं ।
इफारसपसहीउ पंचासीय पच्छरि।
नेमिभुयशु उद्धरिउ साजणि नरहरि ॥९॥
मालपमंडलगुहमुहमंडणु।
भापडसाहु दालिधुग्यंडणु।
आमलसारसोचन्नु तिणि कारिउ ।
किरि गयणंगण सम अवयारिउ ।
अवरसिहरवरकलस झलहलइ मणोहर ।
नेमिभुषणि तिणि दिट्टट दुइ गलइ निरंतर ॥ १० ॥
(दिनीयं कड़वम्)
दिमि उत्तर कममीरदेसु नेमिहि उम्माहिय ।
अजिउ रतन दुइ बंध गम्य संघाहिय आविष ॥ १ ॥
रेवंतगिरिरासु
हरसवसिण घणकलस भरिवि ति न्हवणु करंतह ।
गलिउ लेवमु नेमिविबु जलधार पडतह ॥ २ ॥
संघाहिबु संवेण सहिउ नियमणि संतविउ ।
हा हा धिगु धिगु मह विमलकुलगंजणु आविउ ॥३॥
सामियसामलधीरचरण मह सरणि भवंतरि ।
इम परिहरि आहार नियम लइउ संघधुरंधरि ॥४॥
एकवीसि उपवासि तामु अंबिकदिवि आविय ।
पभणइ स पसन्न देवि जय जय सद्दाविय ॥५॥
उद्देविणु सिरिनेमिवियु तुलिउ तुरंतउ ।
पच्छलु मन जोएसि वच्छ तुं भवणि वलंतउ ॥६॥
णइ वि अंवि"""कंचण"वलाणइ ।
..."विंधु मणिमउ तहिं आणइ ॥७॥
पढमभवणि देहलिहि देउ छुडि पुडि आरोविउ ।
संघाहिवि हरिसेण तम दिसि पच्छलु जोइउ ॥ ८॥
ठिउ निचल देहलिहि देवु सिरिनेमिकुमारो।
कुसुमबुट्टि मिल्हेवि देवि किउ जइजइकारो॥९॥
वइसाहीपुंनिमह पुनवतिण जिणु धप्पिर ।
पच्छिमदिसि निम्मविउ भवणु भवदुहतरु कप्पिउ ॥१०॥
न्हवणविलेवतणीय वंछ भवियणजण पूरिय ।
संघाहिव सिरिअजितुरतनु नियदेसि पराइय ॥ ११ ॥
सयलवित्ति कलिकालि कालकलुसे जाणवि छाहिउ ।
झलहलंति मणिविवकंति अंबिकुलं आइय ॥ १२ ॥
समुद्दविजयसियदेविपुत्तु जायवकुलमंडणु ।
जरासिंघदलमलणु मयणभडमाणविहंडणु ॥ १३ ॥
राइमईमणहरणु रमणु सिवरमणि मणोहरू ।
पुनवंत पणमंति नेमिजिणु सोहगुसुंदरु.॥ १४ ॥
यस्तपालि वरमंति भूयणु कारिउ रिसहेसम् ।
अट्ठाययसंमेपसिहरवरमंडपुमणहरू ॥ १५ ॥
कउडिजकु मन्देवि दुह वि तुंगु पासादउ ।
धम्मिय सिरु धूणंति देव वलिवि पलोइउ ॥ १६ ॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसद्धहः
तेजपालि निम्मविउ तत्थ तिहुयणजणरंजणु ।
कल्याणउ तउ तुंगु भुयणु संघिउगयणंगणु ॥ १७ ॥
दीसह दिसि दिसि कुंडि कुंडि नीझरणउमालो।
इंद्रमंडपु देपालि मंत्रि उहरिउ विसालो ॥ १८ ॥
अइरावणगयरायपायमुद्दासमटंकिउ ।
दिख गयंदमु कुंड विमलनिज्झरसमलंकिउ ॥ १९ ॥
गयणगंग जं सयलतित्थअवयारु भणिज्जा ।
पकालिवि तहि अंगु दुक जलअंजलि दिजइ ॥ २० ॥
सिंदुवारमंदारकुरवककुंदिहि सुंदरु ।
जाइजूइसयवत्तिविन्निफलेहि निरंतर ॥ २१ ॥
दिड य छत्रसिलकडणि अंबवणु सहसारामु ।
नेमिजिणेसरदिकनाणनिव्वाणह ठामु ॥ २२ ॥
(तृतीयं कडवम्)
गिरिगम्यासिहरि चडेवि अंबजवाहिं बालिए।
संमिणी ए अंबिकदेविदेउलु दीठु रम्माउलं ए ॥ १॥
वनइ ए तालसाल वनइ मदल गुहिरसर ।
रंगिहिं नचइ वाल पेखिवि अंबिकमुहकमलु ॥२॥
सुभकरु ए ठविउ उच्छंगि विभकरो नंदणु पासिक ए।
सोहइ ए जिलसिंगि सामिणि सोहसिंघासणी ए ॥३॥
दावइ ए दुकहं भंगु पूरइए वंछिउ भवियजण ।
रकइ ए चउविहु संघु सामिणि सीसिंघासणी ए॥४॥
दस दिसि ए नेमिकुमारि आरोही अवलोइए।
दीजई ए तहि गिरनारि गयणंगणु अवलोणसिहरो ॥५॥
पहिलइ ए सांवकुमाम बीजइ सिहरि पज्जून पुण।
पणमईए पामई पारु भवियण भीसण भवभमण ॥ ६ ॥
ठामि ठामि स्यणसोचन बिंध जिणेसर तहिं ठविय।
पणमा ए ते नर धन जे न कलिकालि मलमयलिया ए॥७॥
जं फल्लु ए सिहरसमेयअट्ठावयनंदीसरिहिं ।
तं फल ए भवि पामेइ पेवेविणु रेवंतसिहरो ॥ ८॥
७ खंतगिरिरामु गहगण ए माहि जिम भाणु पध्वयमाहि जिम मेमगिरि । त्रिहु भुयणे तेम पहाणु तित्यमाहि रेवंतगिरि ॥९॥ धवलधय चमर भिंगार आरति मंगलपईव । तिलय मउड कुंडल हार मेघाडंबर जावियं ए॥१०॥ दियहिं नर जो पवर चंद्रोय नेमिजिणेसरवरभुयणि । इह भवि ए मुंजवि भोय सो तित्थेसरसिरि लहइ ए ॥ ११ ॥ चउविहु ए संघु करेइ जो आवइ उजिंतगिरे । दिविस बहू रागु करेइ सो मुंचइ चउगइगमणि ॥ १२ ॥ अठविह ए जय करंति अठाई जो तहिं करइ ए। अठविह ए करम हणंति सो अठभवि सिज्झइ ए ॥ १३ ॥ अंबिल ए जो उपवास एगासण नीवी करई ए। तसु मणि ए अछई आस इहभव परभव विवहपरे ॥ १४ ॥ पेमिहि मुणिजण अन्नह दाणु धम्मियवच्छलु करई ए। तसु कही नहीं उपमाणु परभाति सरण तिणउ ॥ १५ ॥ आवइ ए जे न उजिंति घर धरइ धंधोलिया ए। आविही ए हीयह न जंति निष्फलु जीविउ सासुतणउं ॥१६॥ जीविउ ए सो जि परि धन्नु तासु संमच्छर निच्छणु ए। सो परि ए मासु परि धनु बलि हीजइ नहि यासर ए ॥ १७ ॥ जहिं जिणु ए उजिलठामि सोहगसुंदु सामल ए। दीसइ ए तिहणसामि नयणसंलूणउं नेमिजिणु ॥ १८ ॥ नीझरण चमर ढलंति मेघाडंवर सिरि धरीइं। तित्थह एसउ रेवंदि सिंहासणि जयइ नेमिजिणु ॥ १९॥ रंगिहि ए रमइ जो रासु सिरिविजयसेणिमॅरि निम्मविउ ए। नेमिजिणु तूसइ तासु अंपिक पूरइ मणि रली ए॥ २० ॥ (चतुर्थ कडवम्) ॥ समत्तु रेवंतगिरिरामु ।।
प्राचीनगूर्जर काव्यसङ्ग्रहः नेमिनाथचतुष्पदिका (सोहगसुंदरु घणलायन्न सुमरवि सामिउ सामलवन्नु । सखि पति राजल चडि उत्तरिय वारमास सुणि जिम बजरिय ॥१॥ नेमिकुमरु सुमरवि गिरनारि सिद्धी राजल कन्नकुमारि ॥ आंकिणी ॥ श्रावणि सरवणि कडुयं मेहु गजइ विरहिरि झिज्झइ देहु । विज्जु झवकइ रकसि जेव नेमिहि विणु सहि सहियइ केम ॥२॥ सखी भणइ सामिणि मन झूरि दुजणतणा म वंछित पूरि । गयउ नेमि तउ विणठउ काइ अछइ अनेरा वरह सयाइ ॥ ३ ॥ वोलइ राजल तउ इहु वयणु नत्थी नेमिसमं वररयणु। धरह तेजु गहगण सवि ताव गयणि न उग्गइ दिणयम जाव ॥४॥ भाद्रवि भरिया सर पिकेवि सकरुण रोअइ राजलदेवि । हा एकलडी मइ निरधार किम ऊबेपिसि करुणासार ॥५॥ भणइ सखी राजल मन रोइ नीठुरु नेमि न अप्पणु होइ । सिंचिय तरुवर परि पलवंति गिरिवर पुण कड डेरा हुंति ॥६॥ साच सखि परि गिरि भिजति किमइ न भिन्नइ सामलकति । घण परिसंतइ सर फुति सायम पुण घणुओह झुलिंति ॥७॥ आसोमासह अंसुपयाह राजल मिल्हइ विणु नमिनाह । दहा चंदु चंदणहिमसीउ चिणु भत्तारह सउ वि वरीउ ॥ ८॥ सन्धि नपि वीना नेमिहिरसि भन आपणपर तउं खय नेसि । जिणि दिरकाडिउ पहिलउं छेटु न गणित अभवंतरनेटु ॥९॥ नेमि दयालू सग्वि निरदोसु कीजइ उग्रसिणऊपरि रोसु। पसुयभराविउ मूकउ वाटु मुझु प्रियसरिसर कियउ विहाह ॥१०॥ फत्तिग क्षित्तिग ऊगइ संझ रजमति झिझिउ हुइ अतिझंश । राति दिवसु अछइ विलयंत वलि बलि दय करि दयकरि कंत ॥ ११ ॥ नेमितणी सम्वि मूकि न आस कायम भग्गउ सो घरवास । इमह इमी सनेहल नारि जाइ कोई घंटवि गिरनारि ॥ १२ ॥ फायर किम मग्वि नेमिजिणंदु जिणि रिणि जित्तउ लस्कु नरिंदु । फुरइ सासु जा अग्गलि नास ताव न मिल्हडं नेमिहि आस ॥ १३ ।।
नेमिनाथचतुष्पदिका
१
मगसिरि मग्गु पलोअइ बाल इणपरि पभणइ नयणविसाल ।
जो मह मेलइ नेमिकुमार तसुणी वेल बहउ सविवार ॥१४॥
एहु कदाग्रह तउ सखि मिल्हि करिसि काइ तिणि नेमिहि हिल्लि।
मैडि चडाविउ जो किर मालि हे हे कु करइ टोहणकालि ॥ १५ ॥
अठभव सेविउ सखि मइ नेमि तसु ऊमाहउ किम न करेमि ।
अवगन्नेसइ जइ मइ सामि लग्गी अछिसु तोइ तसु नामि ॥ १० ॥
पोसि रोस सवि छडिवि नाह राग्वि राखि मह मयणह पाह।
पडइ सीउ नवि रयणि विहाइ लहिय छिद्द मवि दुरक अमाइ ॥ १७ ॥
नेमि नेमि तृ करती मुद्धि जुव्वणु जाइ न जाणिसि सुद्धि ।
पुरिसरयणभरियउ संसारु परणि अनेरउ कुइ भत्तारु ॥ १८ ॥
भोली तउ सग्वि ग्वरी गमारि वरि अच्छंतह नेमिकुमारि ।
अन्नु पुरिसु कुइ अप्पणु नटइ गइवरु लहिउ कुरासभि चडइ ॥१९॥
माहमासि माचइ हिमरासि देवि भणइ मइ प्रिय लह पासि ।
तइ विणु सामिय दहइ तुसार नयनवमारिहि मारइ मारु ॥२०॥
इहु सखि रोइसि सहु अरन्नि हत्यि कि जामइ धरणउ कन्नि ।
तउन पती जिसि माहरी माइ सिद्धिरमणिरत्तउ नमि जाइ ॥ २१ ॥
कति वसंतइ हियडामाहि याति पहीज किमह लसाइ ।
सिद्धि जाइ तउ काइत बीह सरसी जाउ त उग्रसेणधीय ॥ २२ ॥
| फागुण वागुणि पन्न पडंति राजलदुरिक कि तम रोयंति ।
गम्भि गलिवि हउँ काइ न भूय भगइ विहंगल धारणिध्य ।। २३ ॥
अजिउ भणिउ करि सम्वि विम्मासि अछड भला वर नेमिहि पास ।
अनु सम्वि मोदक जउ नवि हुंति छुहिय सुहाली कि न म्चंति ॥२४॥
मणह पासि जड पहिलउ होड नेमिहि पासि तनलउ न कोह ।
जह सग्वि घर त सामल धीरु घणविणु पियह कि चातक नीर ॥२०॥
चनमासि यणसह पंगुरह वणि वणि कोयल दहका करह ।
पंचवाण करि धनुप घरेपि वेझह मांडी राजलदेवि ॥ २६ ॥
जुह सग्यि मानउ मासु यमंतु इणि पिलिब जद हुइ कंतु ।
रमियह नय नय करि मिणगाम लिबह जीवियजुवणमाम ॥२७॥
सुणि सपि मानिउ मुझु परिणयणु नवि कारि थिउ बंधवययणु ।
जह पडिवनइ चुपड नेमि जीविय जुन्यणु जलणि जलेमि ॥२८॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसनहः वसाहह विहसिय चणराइ मयणमित्तु मलयानिलु वाइ। फुहिरि हियडा माझि वसंतु विलवइ राजल पिरिकर कंतु ॥ २९ ॥ सम्बी दुक बीसरिया भणइ संभलि भमरउ किम मणझुणइ । दीस पंच धिरु जोव्यणु होइ खाउ पियउ विलसा सहु कोइ ॥ ३०॥ रमणि पसंसइ राजल कन्न जीह कंतु वसि ते पर धन्न । जसु प्रिउ न करइ किमइ मुहाडि सा हउं इकाज भुंडनिलाडि ॥ ३१॥ जि विरटु जिम नप्पइ सरु घणविओगि सुसियं नइपूरू । पिरिकउ फुल्लिा चंपइविल्लि राजल मूछी नेहगहिल्लि ॥ ३२ ॥ मूछी राणी हा सखि धाउं पडियउ खंडइ जेवडु घाउ । हरिय मूछ चंदणपवणेहिं सखि आसासइ प्रियवयणेहिं ॥ ३३ ॥ भणड देवि विरती संसार पडिखि पडिखि मइ जादवसार । नियपडिवनाउं प्रभु संभारि मइ लइ सरिसी गढि गिरिनारि ॥ ३४ ॥ आसाढह दिढु हिय करेवि गज्जु विज्जु सवि अवगन्नेवि । भणइ ययणु उग्रसेणह जाय करिसु धम्मु सेविसु प्रियपाय ॥३२॥ मिलिउ सखी राजल पभणंति चिणय जेम नमिरिय ग्बजति । अउगी अच्छि सखि झखि मन आल तपु दोहिल्लर त सुकुमाल॥३६॥ अठ भव विलसिउ प्रियह पसाइ किमइ जीयु सखि सुग्व न धाइ । हिव प्रिय सरिसउंजीविय मरणु इणभविपरभवि निमि जु सरणु॥३७॥ अधिक मासु सवि मासहि फिरइ छहरितुकेरा गुण अणुहरइ । मिलिवा प्रिय ऊबाहुलि हय सउ मुकलाविउ उग्रसेणधूय ॥ ३८ ॥ पंच सखीसह जसु परिवारि प्रिय ऊमाही गइ गिरिनारि । सखीसहित राजल गुणरासि लेइ दिक परमेसरपासि ॥ ३९॥ निम्मल केवलनाणु लहेवि सिद्धी सामिणि राजलदेवि । रयणसिंहॉरि पणमवि पाय वारइ मास भणिया मइ भाय ॥ ४० ॥ नेमिकुमरु मुमरवि गिरनारि सिही राजल कन्नकुमारि । इति श्रीविनयचन्द्रसूरिकृतनेमिनाथचतुष्पदिकाः ।।
उबएसमालकहाणयछप्पय PARATI उवएसमालकहाणयछप्पय KHERI छप्पयछंद विजय नरिंद जिणिवीरहस्थिहिं वय लेविणु । धम्मदासगणि नामि गामि नयरिहिं विहरइ पुणु । नियपुत्तह रणसोहराय पडिवोहणसारिहिं । करइ एस उवएसमालजिणवयणवियारिहिं। सयपंचच्यालगाहारयणमणिकरंड महियलि मुणउ । सुहभावि सुद्ध सिद्धतसम सवि सुसाहु सावय सुणउ ॥१॥ रिसहनाह निरहार परिस विहरिउ अपमत्तउ । वडमाण छम्मास करइ तप गुणहि निरुत्तः । अवर वि जिणवर दिक लेवि तव तवइ सुनिम्मल । तिणि कारणि उपदेशमाल धुरि तप किय बहुफल । नियसत्तिसारि अणुसारि इणि तपआदर अहनिसि करउ । भो भविय भावि जम्मणमरणदुहसमुद्द दुत्तर तरउ ॥२॥ सव्व साहु तुम्हि सुणउ गणउ जग अप्पसमाणउ । कोह कह वि परिहरउ धरउ समरस संपराणउ । तिहुयणगुरु सिरिवीर धीर पण धम्मधुरंधर । दासपेसदुव्वयण सहइ घणदुसह निरंतर । नरतिरियदेवउपसग्ग बहु जह जगगुरु जिणवर खमइ । तिम खमउ खंति अग्गलि करी जेम्म रिउदलबल नमइ ॥ ३ ॥ सव्व सुणइ जिणवयण नयणउल्हासिहिं गोयम । जाणइ जइ वि सुयत्व तह वि पुच्छइ पहु कहु किम । भद्दकचित्त पवित्त पढम गणहर सुयनाणी । न करइ गव्य अपुव्व करवि मनि मन्नइ वाणी। छंडीइ मान ज्ञानहतणउ विणउ अंगि इम आणीइ । गुरुभत्ति कह वि नवि मिल्हीइ ग्रंधकोडि जइ जाणीइ ॥४॥ दहिवाहणनिवधूय वीरजिणपढमपवत्तणि । चंदनवाल विसाल गुणिहिं गजइ गुहिरप्पणि ।
प्राचीनगूर्जरकाव्यसतहः अहनिसि रायकुंयारिसहस सेवई पय भत्तिहिं । जाणइ नाणनिहाण माण पुण नाणइ चित्तिहिं । दिणदिकिय देरिकय आवतु द्रमक साधु सा ऊठि करी। अभिगमण नमण वंदण विणय सुणइ वयण आणंदभरी ॥५॥ वाणारसिनयरीनरिंद नामिहिं संवाहण । पुर अंतेउर पवर अवर हय गय बहु साहण । कन्नासहस सुरूव अछइ पुण पुत्त न इकय । राय पत्त पंचत्त लच्छि लिवइ रिउ दुकय । नेमित्तिवयणि राणीउयरि कुंयर जाणि पहिहिं चविउ । तिणि अंगवीरि अरि त्रासुवी रनबंध सहु राहविउ ॥ ६ ॥ कियसिंगारउदार अंग आरीसइ पिकइ । पाणी पडी मुंद्रडी सयल तणु तिणिपरि दिरका । अंतेउरआवासि पासि भववासि विरत्तउ । भरहेसर वरझाण न ण केवल संपत्तउ । एउ चकवधि विसयारसिहि रमइ रंगि जणु इम गणइ । तसु अप्पकन अप्पिहिं सरित्रं किं परजणजाणावणइ ॥७॥ सेणिय करइ पसंस दुमुदुच्वयणि निवारइ । रायरिसि कासग्गि रहिउ रणि अरिअण मारइ । सिरककजि सिरि हत्य घल्लि संजम संभालइ । मनिहिं बद्ध बहु पाप आप आपिहि परकालइ । गति कहइ वीर सत्तम नरय मगहराय अचरिज भयउ । तिणि समइ देव जय जय भणइं प्रसनचंद केवलि जयउ॥८॥ भरहसरिसु बल झुज्झि बुज्झ संजम अणुसरयु। कुण वंदइ लहुभाय ठाय तिणि कासग्ग करयु । इह अपानं नाण माण धरि पच्छर रहियु । सहइ भुक बहु दुक तह वि न हु केवल लहियु। नियवहिनिबंभिसुंदरिवयणि मयमयगल जव परिहरइ । रिसहेसरनंदणवाहुबलि सयल कन्ज तरकणि सरइ ॥९॥ कहिय इंदि अतिरूप सुणिय सुर भणवेसिहि । पुहवि पत्त मन्त्रणइ रूप पेस्तई सुविसेसिहि ।
उवएसमालकहाणयछप्पय कियसिणगार सणंकुमार नरनाह निरंतरु । हकारइ अस्थाणि जाणि आवि देसंतरु । खणि देहि हाणि इम वयण सुणि रज छडि संजम गहिउ । सयसत्त परिस चारित्तधर सहइ रोग लडिहिं सहि ॥ १० ॥ करइ रज कंपिल्लनयरि छख्खंडनरेसर । जाइसमरणि जाणि पुन्वभववंधव मुणिवर । बोहइ बहु उवएस सहसि पुण तोइ न बुज्झइ । भोग भवंतरि बद्ध तिण विसयारस मुज्झइ । सो बंमदत्त बंभणि किउ अंध अधिक पातग करी । संपत्तउ सत्तउ सत्तमनरगिसु जि साधु पत्त सिद्धहं पुरी ॥ ११ ॥ सेणियकुलि कोणियनरिंदसुय निवइ उदाइय। पाइलिपुरि गुरुभत्त रत्त पोसहसामाइय। खत्तियपुत्त जाणि तिणि देसह कट्टिउ । उजेणिं पजोयराय ओलगइ अणिट्टिउ । इणि वयरि अवर अलहंत छल वरिस बार व्रत धारयुं । तिणि दुठि तह वि अवसर लहवि निव उदाइ निसि मारयु ॥१२॥ चंपापुरि सुनार नारिसयपंचह सामी। सासिमत्त अहरत्ति गेह नवि छंडइ कामी । तिणि मारी इक नारि अवरनारिहिं सो मारीउ । पदम भज नररूपि विप्पकुलि सो पुण नारीउ । सयपंच भन्ज जे चोर तस घरणि इकु सा नारि हय । पहुवीरपासि पुच्छह सु नर जा सा सा सा विप्पधूय ।। १३ ।। कोसंबी ससि सूर वीर वंदइ सविमाणय । मिग्गवइ महासत्ति जंत चंदण नवि जाणइ। निसि एकल्ली जाइ पाइ लग्गेचि ग्वभावइ । पडिवजइ नियदोस रोस मिल्हइ मिल्हावइ । सुहभावि शुद्ध केवल भयु भुजग विनाणिहि जाणियउ। जिम पवत्तणी स भवपार गय विनय अंगि तिम आणियउ॥१४॥ जंयूकुमर विलासभवणि पडिबोहइ भब्रह् । प्रभव पंचसयजुत्त पत्त तहिं परधणकन्नह ।
प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः कणयनवाणुकोडि छोडि व्रत वंछइ सुहमणि । तं पिकवि तसु वयणि सयल पडिबुज्झइ तरकणि । सगवीसअधिकसयपंचसिरायग्गिहि संजम लयउ। सो दृसमि पंचमगणहरह सीस चरिमकेवलि भयउ ॥ १५ ॥ सुसुमरागिहिं रत्त पत्त रायग्गिनियरिहिं । दात चिलाइपुत्त जुत्त धणघरि बहुचोरिहिं । कुंयरि करीय करि नट्ट दुट्ट अडविहिं अणुसरिउ । वाहर पत्तउ पुहि सिटि पुत्तिहिं परिवरित । सो रिति दिक्षि बिहु अक्षरिहिं खग्गसीस छंडइ करम । कीडियहं कहि अढइ दिवसि सहरसारि दीसइ परम ॥ १६ ॥ जाययपुत्त जिणिंदसीस ढंढण गुणजुग्गह । अंतराय जाणिइ लेइ नियलद्धि अभिग्गह । चारवई छम्मास भमइ गुणि रमइ समिद्धउ । भुरक दुक बहु सहइ लहइ आहार न सुद्धउ । मोदफासीहकेसरसहिय कर्म कूटि केवल कलिउ । संपत्त सिद्धि संपत्ति सुह तपतरु इम पुफिय फलिउ ॥ १७ ॥ हुंति जि पंडियपवर अवरदुव्वयणि न कुप्पइ । ग्वंदगमरिसुसीस जेम आपार न लुप्पद । पालयकयउपसग्ग लग्ग मण तीहं सज्झाणिहिं । जंनिहिं जीविय चत्त पत्त सवि सिडह ठाणिहिं । सो अग्गिव नरगिर्हि गयउ वाडय भव भमिसिइ घणउ । भो भविय भावि इम कोह अरि ग्यंतिवम्गि हेला हणउ ॥ १८ ॥ पुबइ मुरवर पाय राय नितु नमहं निरग्गल । सपि सिज्झई नवनिदि सिद्धि सवि सरई समग्गल। तपर रेस हरिपसयलह जिम जगि जस होयह । न कुनयम न पमिद्धि रिद्धि नवि तसु फुड जोयद । निंदुधा जरफ पपत्तलि सुलह यहुयंभण चाहिय यलिहिं । कोसलियधुपपरिणीनि जीय भजीय सुद्धि अच्छिपकृतिहिं ॥१९॥ पसु माटुआचारसार जा लोभि न अस्टइ। यपरसामि संपत्त नयरि पाहल सम तुरहाइ ।
उबएसमालकहाणयापय सुणवि तासु गुणवत्त रत्त धणसिडिकुमारी । कणयकोडिसंजुत्त पत्त सासई वरनारी । गुरुरयणवयणपडिवोह सुणि सुद्धसीलसंजमि रहि । जिम तेणि मुक तिन मुक्क्रीड रमणि रयणकोडिहिं सही ।। २० ।। नंदिसेण दोहम्गनडि निरणयंभणसुय । भयविरत्त चारित्त गरि तव तवइ अचम्भुय । चेयावच्चपसंस इंदकियकसिहिं पहुत्तउ । बंधिय अंति नियाण सम्गि सत्तमि सो पत्तउ । दसचउरसारनरखयरधूयसहसवहुत्तरिरमणिवर । सोहग्गसार वसुदेव हय हरिकुल वंसपयासकर ॥२१॥ पत्त दिवसि चारित्त कन्हलहुबंधव रयणिहिं । गयसुकुमाल मसाणि रहिउ कासगि जिणवयणिहिं । बंभणि बंधवि पालि सीसि वइसानर दिवउ । सिरह सरिस दुकम्म दहवि मुणि तरकणि सिद्धउ । तस दुट्ठदुरियभारभूरिय उयर फुट नरय गमह । जिम सहि तेणि तिम संसहु लहु लच्छि सुपरफमह ॥ २२ ॥ थूलभद्द गुरुवयणि कोसवेसाहरि पत्तः । चित्तसालि चउमासि रहिउ रसविगइ निरत्त । पुववेर संभारि समर समरंगणि जित्तउ । जिणसासणि जयवंत सुहड सुपरिहिं विदित्तउ । ग्घरग्बग्गधारसिरि संचरिउ सरिउ सीह जिम इकमन । जे सोलभाव दुद्धर धरइं ते सुसाटु ते धन्न धन ॥ २३ ॥ तबसी इक उपकोसगेहि गिउ गुरु अचमनिय। थूलभद्दमुणिसरिसु करिसु तव इम मनि मनिय । अत्यलाभ सुणि वयण रयणकंबल भणि चल्द । सहवि अवत्य सुवत्य आणि बेसाकरि मिल्हह । चंपेवि ग्वालि पडिवोहिउ सुगुम्पामि पत्तउ भणड । निंदीड लोकि सो गुरुययण अप्पमाण इह जो कुणइ ।। २४ ।। गुणिअणसरिस गब्ध म करि भूरव मच्छरि यमि । न हुनिव्वडइ समत्य जइ चि गद्दह गयमरकसि।
१६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः सुहडभणी संभृतविजय दुकर ति पसंसिय । तसु सीसिहिं पुण थूलभद्दमुणिवरगुण खिसिय। तिणि कम्मि कोसवेसिहिं नडिऊ चडिउ हत्थ दुजणतणई । अपकित्ति अलिय अन्ज वि अजस महिमंडलमाहि रुणझणइ ॥२०॥ म करउ मच्छर माण जाण सरिसउ जगि कोइ । पूरउ पुण्य प्रभावि पावि पुण हीणउ होइ। वाहुसुवाहु मुसाहु सुणवि गुण किउ मनि मच्छर। तिणि होणत्तण पत्त पीढमहपीढिहिं दुहकर । परजम्मि बंभिसुंदरि सुधृय महि महिला महियलि मुणउ । सिरिरिसहभरहवाहुवलिहिं त्रिहुं प्रभाव पुन्नहतणउ ।। २६ ।। अणगल नीर विपार सुहम जीवाइअरकण। इण कारणि बहुकष्ट अप्पफल कहइ वियरकण । छहिहिं सहिसहस्स परिस तप तपइ अज्ञानिहिं । पारण पुण इकवीसवारजलधोइयधानिहिं । सो तामलि रिसि एरिस तपी मास दुन्नि अणसणि सरिउ । जपान इंद्र ईसाणि तिणि मुस्कमग्ग न हु अणुसरिउ ॥ २७ ॥ कंवलरयणविनाणि जाणि जग उत्तमचंगिम । नरवरपिरकणि जाइ माइ पुत्तह पभणइ इम । आवि इक खण पुत्त पत्त सेणिय तुह मंदिर । लेउ क्रियाण माइ ठाइ ठावउ जिणि तिणि परि । न फ्रयाण कुइ एउ सामि तुम्ह सालिभद्द य वयण सुणि। भववासविरत्त चरित्त लिइ छडि सुरक सहु कणयमणि ॥२८॥ अयवंतीसुकुमाल नयरि उज्जेणि पसिद्ध । नलिणीगुलमविचार सुणवि तस्कणि पडियुद्धउ । अजमुनियमणिदहल्थि ए लेवि सासरियति । कासगि रहिउ सीयालि खड मण लग्गु विमाणिहिं । सुहझाणि ठाणि तिणि सुर हुओ रमणि वत्तिसे व्रत लिउ । तसु नंदणि तिणि थानकि पछइ महाकालदेउल किउ ॥ २९ ॥ रायग्गिहि मेयज भवनववर विवहारिउ । पुव्वमित्त सुरि बोहि दिरक दुस्तिहिं लेवारिउ ।
१७ उवएसमालकाणयछप्पय विहरंतउ तिहिं पत्त मुट्ठसोनारह मंदिरि । कौचि कणय जय खद्ध वद्ध बद्धउ तिणि तस सिरि। दृदघाइ दिहि दुइ नीकलीय ढलिय धरणि निचलु भयउ तस पंग्विप्राण रक्षा करी धरी ध्यान सिद्धिहि गयउ ॥ ३० ॥ धणगिरिधरणिसुनंदउयरि जायउ जाईसर । छम्मासिउ पिउपासि वयर संपत्तउ वयधर । तस समीवि मुणिकजि गुरिहि वायण अणुजाणीय । धन्न सीहगिरिसीस जेहिं मनिय इय वाणीय । जे माणगण मनि परिहरी सुगुरुवयण इम सद्दहइ । ते सुद्ध साधु सुकुलीण सविगुणनिहाण गुरुयटि लहई ॥३१॥ संगमसूरि गिलाण वासि संजमविहि रकइ । धम्मच्छलि तस सीस दत्त गुरुदोस निरिकइ । वित्तविहार सविन पिंड अंगुलि दिप्पंतिय । नित्यवास नितु सरसु असणु दीवय मणि चिंतिय । मन्नंतउ मुनि अप्पउं सगुण निगुण भणवि गुरु परिभवइ । घोरंधधार घण सद्द करि सम्मदिहि सुर सिरकवह ॥ ३२॥ यद्धमाण विहरंत नयरि सावत्यिहिं आवई । गोसालउ चउसाल आप तित्ययर भणावड । मंग्वलिपुत्तसख्य कहह पटु पुच्छिउ सीमिहि । जिणवरमंमुह मुक तेउलेसा तिणि रीसिहि । तं पिकि सुगुरुपरिभव असह सुनकत्त मुनि विचि थयउ । तिणि तेजि दट्ट आराधना करवि सम्गि अच्युति गयउ ॥ ३३ ॥ नाहियवादि नरिद नयरि सेतंबी पएसी। पाससीस विहरत पत्त तहिं गणहर केसी । नरयगमणि इकचित्त सुगुम्बयणिहिं पडिवोहिउ । साययधम्म सुरम्म करवि तिणि अप्पर सोहिउँ । लहुकालि काल करि सु जि सरिउ मरिआभमुविमाणि सुर । इम दुरियदुरक दृरिहिं हणी सयल सुरक साधड सुगुरु ॥ ३४ ॥ तुरमिणिपुरीनरिंद दत्त वंभणकुलि बहुबल। माउलकालिगमारिपामि पुच्छड जन्नह फल । ३ १८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसद्धहः अंगपीड अंगमिय सुगुरु सचं चिय जंपइ । जागि जीववधि नरय सुणवि सु जि कोपई कंपइ । अहिनाण जाण सत्तमदिवसि मलप्रवेश मुहि तुझतणइ । दक्किन्न दुट्ठभय परिहरिय धम्मवयण मुणि इम भणइ ॥ ३५ ॥ आसि मरीइ मुणिंद भरहसुय नियवय छंडइ । कियपरिवायगवेस रिसहपहुसरिस त हिंडइ । पडिबोहइ बहुलोय दिक जिणपासि लिवारइ । अन्नदिवसि अतिकुटिल कपिल तसु चयण विचारह । तसु शिप्यकाजि फुड नवि कहइ इत्य उत्थि बहु धम्म छह । भव कोडिसागर भमिउ हुउ वीरजिण तउ पछइ ॥ ३६ ॥ कन्हमरणि बलभद्द तवइ तव तुंगियगिरिसिरि । जाइ सरण इक हरिण रहइ अहनिसि रिपिपरिसरि । कट्टकन्नि रहकार पत्त पनि साख कपावइ । जिमणवेल जाणेवि लेवि मुणि मृग तहिं आवइ । ओ दियइ दान ओ सुद्धनप ओ विहुगुण मनि चितवइ । सिरि पडइ डाल समकाल बिहुं वंभलोय सुरगति हवइ ॥ ३७ ।। पूरणसिट्टि विभेलगामि लिइ तापसदिका । दोण खयरजलथलचरह अप्प चिहुभागिहिं भिका । वारवरिस बहुक छट्टतप करइ दयाविण । पायालिहिं चमरिंद चमरचंचाहिव हुय तिण । अभिमाणि सग्गि सोहम्मि गयउ वनदंड पिकवि पुलिउ । सिरिवीरनाहपयतलि रहिउ तउ सयल वि धंधलु टलिड ३८॥ सुसुमारपुररोहि कहइ निव सउणसमीहओ। वारत्तयरिपि भीयबालप्रति भणइ म बीहउ । इयवयणह बलि धंधमारि पनोय सु जित्तउ । नेमित्तिउ भणि हसइ राउ रिसिपासि पहुत्तउ । इम गिहिपसंग सुट्टयमुणिह थोडउ अइमालिनकर । परिहरई दृरि इण कारणिहिं सव्वसंग चारित्तधर ॥ ३९ ॥ चंदवडिस नरिंद नयरि साकेइ सुसावय। निश्चिई नियआवासि मुठ सामाइय ठावय ।
उचएसमालकहाणयछप्पय १९ दीवअवधि कासग्ग करिय निचल हुइ पालइ । दासी पुण दीवेल घल्लि चउपहर उजालइ । पूरिय प्रतिज्ञ प्रहउग्गमणि परम प्रीति पामिउ पवर । सुकुमालअंग सुहझाणमण सग्गलोइ संपन्न सुर ॥ ४०॥ सावय सागरचंद रहिउ कासग्गि महावनि । कमलामेलाहरणवैर नभसेन धरइ मनि । घल्लइ सिरि अंगार तह वि सो झाणनिरत्तउ । पोसहवय दृढ पालि टालि सग्गि पहुत्तउ। जइ हुंति दुसह उपसग्ग सहइ स गिहत्य सुकुमालतणु । ता अइदुद्धरचारित्तधर साहु केम न सहति पुण ॥४१॥ चंपापुर अढारकोडिधणवइ को९विय । पोसह करि कासग्गि रहिउ निसि भुज आलंविय । इंद्रप्रसंस असद्दहंत अमरहिं परिस्किय । मत्तगइंदभुयंगघोररकसभय दकिय । नहु चलिउ मेरचूलाअचल कामदेव गिहवइ सुधिर । पहुचीर पयासिउ प्रहसमड सोसवग्गअग्गलि सुचिर ॥ ४२ ॥ रायग्गिहि इक रंक अछइ अइदुरिकर अग्गड । उन्नाणी जण जत्त पत्त तहिं भिक सु मग्गड । अलहंतउ अइरोसि दोसि नियकम्मिहिं नडिउ । चूरिसु लोग समग्ग एम चिंतिय गिरि चटिउ । ढोलेड टोल परवततणा गडघडाट सुणि नट्ट सहु । पापाणि तेणि सो चंपिऊ नरयदुक पामिऊ दुसहु ॥ ४३ ।। वडमाण वय लिड जाय वीजऊ वरसालऊ। मुंद तुंड मंडेवि पुंठि विलगऊ गोसालक। जिणवयणिहिं विधि जाणी तेजलेल्या तपि साधी। तह अटुंगनिमित्त कह वि विना तिण लाधी। उम्मग्गचारि अनरथभरिउ गुन्द्रोही गरविहिं नडिउ । मंगलिय मोघ फिलेस फरि दुहसायरि दुत्तरि पटिउ ॥४४॥ दृढपहारि वह चोर जाइ कुसथलिमिउं चोरिहिं । पीरकन्नि धान विप्प मारिउ तिणि घोरिहिं ।
२० प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः वंभणभन्न सगम्भ हणिय बालक फुरकंनउ । पिकवि भववेरग्गि लेइ संजम दिप्पंतउ । संभरणअवधि छंडिय असण तिणि ज गामि छम्मास रहि । अक्कोम बंधवह दुसहसह सिद्धि पत्त दुक्कम दहि ॥ ४२ ॥ वीरसेणसेवक सहसमल्ल त्ति पसिद्धउ । कालसेनरिउराप जेण विहुवांहिहिं बद्धउ । तिणि गुणि संग्वनरिदि किड सामंत विदित्तउ । वेरग्गिहिं व्रत लेवि तीण अरिदेसि पहुत्ता । पचारिय पूरव बाहुवल कालसेनि कुद्याविउ । सव्वट्टसिद्धि सुरवर सरिउ कोह कह वि तस नाविउ ॥४६॥ मावत्थीनिवकणयकेतुसुय ग्वंद्ग नामिहिं । दिक लेवि जिणकप्प करड विहरइ पुरगामिहि । व्रत लिडइ तस ताय नेहि सिरि छत्त धरावड । तह वि अवडउ बंधुपासि कंतीपुरि आवइ । तस बहिन सुनंदा रायघरि मग्गि जंतु तिणि दिठ्ठ मुणि । नरवरि अलीकशंका धरिय हरिय प्राण तस तिणि रयणि ॥ ४७ ॥ दीरघसि रइरत्तचित्त चुलुणी मयणातुरि । वंभदत्तनियपुत्तदहण दरकइ लरकाहरि । वरधन मंत्रि सुरंगसंगि रस्किउ परपंचिहिं । फिरिय फिरिय महिमज्झि रन पुण लहइ सुसंचिहि । इह कस्स कोइ न हु वल्लहर भवसरूप नडपिरकणउं । मुहियां जि मूढ मोहिय भगइ हणइ कन्न पर तहतणउ ॥४८॥ तेयलिपुरि निच कणयकेतु पउमावड राणी । मंत्री तेयलिपुत्त भन्न तस पुहिल नाणी । जाय मत्त सवि पुत्त राय निय लोभि मरावह। राणी मंत्रि कहेवि एक सुय छन्न रहावइ । नरनाह पत्त पंचत्त सु जि कुंयर राय महतह कियउ । महतउ पुण पुष्टिलसुरवयणि पडिबुद्धउ केवलि थियउ॥ ४२ ॥ रजलोभ मनि घरवि भरह पहत्तउ समरंगणि। वायलिहि तर्हि दिटिमुट्टिझुन्झिहि जित्तर पणि ।
उवएसमलकहाणयछप्पय २१ रोसि चडिउं रणि चक भरह भाइसिरि मिल्हइ । धिग विसयारसि लुद्ध मुद्ध सासयसुह ठिल्लइ । इम चित्ति चिंति संजम सवल वाहुब्बलि कासगि रहिउ । भरहेसर पत्त अवज्झपुरि भायनेह कित्तिम कहिउ ॥५०॥ भान्जा विसयविकारिभारि पइमारणि चल्लइ । सरियकंत कलत्त भत्तभीतर विस घल्लइ । रायपएसि सुधम्म रम्म पोसहवय पारिय। करइ पारण जाव ताय तस्कणि विसि धारिय। सुहाणि ठाणि निअ आणि मण सग्गलोइ संपन्न सुर । दुकमचारि सा नारि पुण भमइ भूरि भव भीडभर ॥ ५१ ॥ वीरवयणि जाणेवि नरय सेणिय चिंतइ मनि । कोणिय रज ठवेसु लेसु संजम जाई वनि । हल्लविहल्लहं हार गुरुयगयवरसिउ दिद्धउ । कूड करी कोणिकि रायसेणिय तय घडउ । नियताय कट्टपंजरि धरी खाण पाण बे राहवइ । सयपंच घाय दिणि दिणि दियइ पुत्तनेह एरिस हवह ॥५२॥ पणियपुत्त चाणिक कवड बहुयुद्धि वियाणइ । चंदगुत्तसाहिजकनि पव्वयनिव आणइ । तससरिसी अतिप्रीति करीय अरिकंटय टालिय । नंदनरिंदह रज्जनयरि पाटलि उद्दालिय । चिसकन्न जाणि परिणाविउ सो चि मित्त जमपुरि लयउ । नियकन्न करवि विहडिउ पछइ मित्तनेह एरिस भयउ ॥५३॥ परसुराम जमदग्गिपुत्त रेणुयभंगुभम । कत्तविरिय नरनाह हणइ मासीसुय दुद्दम । अप्पण पह तस रन लेवि हत्यिणपुरि रहियउ । वत्तियवंस असेस फरसुझालिहिं निणि दहियउ । निवघरणि नह पच्छन्न टिय तस सुभूम सुय चयइ । निहलद वंस बंभणतणउ निययनेह परिस हवद ॥ २४ ॥ अन्नमहागिरिमरि भूरिभवपापनिवारण । गिह जिणकप्पि करंति तस्स तुलणा अहदारण।
प्राचीनगूर्जर काव्यसहहः कुलघरनियसुहसयणसंग निस्सा सवि छंडिय। अपडिवडविहारसार संजमगुणमंडिय । सावयघरि अन्जसुहत्यि गरि गुणपसंस हरपिहिं करिय। अइआदर दिकि सुकारणिहिं पाडलपुर तिणि परिहरिय ॥५५॥ सेणियधारणिपुत्त मेह भन्न विमुक्किय । वीरपासि वय लिद्ध बुद्धि निसि संजम चुक्रिय । पुब्बजम्म परिकहिय पुण वि थिर किहउ वीरिहिं । वहुजइजणसंघह सहई अदुसह सरीरिहिं । सो रायसअवयंसमणि मणिन अप्प तृणसम गणइ । चापरइ विजयवेमाणि सुह रहिज सिद्धि घरअंगणइ ॥ ५६ ॥ चेडयध्यसुजिट्टसुद्धमहासइअंगुठभम । विजाहरपेढालपुत्तु विज्ञावलनुद्दभ । ग्वायगसम्मद्दिहि अंग इग्यारंइ जाणइ । तह वि विमयरसरंगि अंगि अतिदुपण आणइ । उन्नेणि उमावेसायसिहि करवि कूड हेला हणिउ । सो सवइ सचई नरय गय विसयदोस एरिस भणिउ ॥ ५७ ॥ वारयईपुरि पत्त नेमिपहु केवलनाणी । दसदसारनरनाह कन्द निसुणइ जिणवाणी । सहसभढार मुणिंदचंद विधियंदणि बंदह । नरपभूमि चिहुगुरूगरक निम्मूल निकंदइ । तित्ययरगुत्त बंधद सुदृढ असुहफम्म हेला दरद । पूजाप्रणामचंदणविणय सगुणसासंगति करइ ॥५८॥ चंडमद गुरु गद्दरोसि रीसाल विदित्तउ । उनणीउमाणि सगुणसीसिहिसि पत्तउ । नयपरणीत कुमार हसिय पभणड दिउ दिसा । सरि सीस तस चंपि फेस लुधिय दिय सिरका । सो सीसभावि संजम लियह मग्गि लग्गि गुरु मिर घरी। निम सहइ पाप मुखपण जिम साइ वे केवलसिरि ॥५॥ गपकलभे परिचरिउ सयर सुमिण मुणि दिन । सिणि अहिनाणि सुसीससहिय पुण फुगुरु अणिहउ ।
उबएसमालकहाणयछप्पय २३ निसि चंपइ अंगार सूगविण मन्नइ प्राणिउ । तव अंगारयमद्द सूरि अभविय इम जाणिउ । ते सीस सवे निवपुत्त द्वय सरि करह वरकरभरिउ । तिहिं देखि सयंवरि आवते पुव्बजम्म तरकणि सरिउ ॥६०॥ पुप्फवासुय पुप्फचूल भइणी तह भन्जा । सुमिणि नरयदुह देखी पुष्फचुला वयसजा । अनियसुयगुरुकजि खीणजंघावल जाणी । आणंती सा भत्तपाण हुय केवलनाणी। पुच्छेइ सूरि मह नाण कहिं सु पण गंगभीतरि कहइ । तव दुदेवि उवसग्ग सहि सुगुरु तत्थ केवल लहइ ॥ ६१ ॥ सिद्धि पत्त मरदेवि तपिहिंविणु इणि आलंवणि । के विकरंति पमाय ति पणि अच्छेरयसम गिणि। जिणि कारणि पुव्वंमि जम्मि थावरतरुभीतरि । बोरिसंगि बहु अंगि सहिय दुह कम्म विनिजरि । सुहभावि पावि परिमुक्कमण सरलसार संतोसमय । जिणणि नाभिकुलगरघरणि रिसह झाणि निव्वाणि गय ॥ १२ ॥ लद्धि पत्त पत्ते य बुद्ध सुहसिद्धि समाणइ । अच्छेरयसमतुल्ल बुल्ल किवि ते मनि आणइ । निहिसंपत्ति स चित्ति धरवि विवसाय ति छंडइ। सामग्गी परिहरिय करिय पातग निय दंडइ । करकंडदुमुहनमिनग्गइ चिहुचरित्त चिंतिय सुपरि । धरि धम्म रम्म उजमसहिय मुक माय अपमाय करि ।। ६३ ॥ ससगभसगनिवपुत्तवहिणि सुकुमालिय कुमरी । चंपापुरि चारित्त लेइ रूपिहिं किर अमरी। फिरइ तरुण तस पासि रागि रत्ता गयगमणी। रकइ यंधव वेउ लेइ तिणि अणसण समणी। बहुदिवसि तापि तपि भूरळामुइय जाणि वनि परठवी। ओसहविसेसि सु जि सन्ज करि सत्यवाहि गेहिणि ठवी ॥ ६४ ॥ मु बहुसीसपरिवारसार मिहनविदित्तः । महुरापुरि सिरिमंगुसूरि रसणिदिई जिताउ ।
प्राचीनगूर्जरफाव्यसङ्ग्रहः नयरखालि उप्पन्न जक बहु दुक निहालइ । सुविहियजणपडियोहकनि नियजीद दिवालइ । जिप्पह मुणिंद रसणिदियह अणजित्तइ एरिसु हुउ । जग्गह जि जोग जुगतिहिं सदा म म म मोहनिद्रां मुउ ॥ १५ ॥ गिरिसुय ग्रहिउ पुलिंदि पुप्फसुय तथसी सेवइ । सुघडा अडवीमज्झि अछइ पकोदर वेवइ । इक भणइ लिउ मारि अवर पुण विणय पयासह । अंतरसंगविसेसि दोस गुण नरनइपासइ । इम जाणि निगुणसंगति तिजउ सगुणसंग अणुदिण करउ । झगमगइ जेम जगमज्झि जस भवसमुद तरकणि तरउ ॥ ६६ ॥ सिरियावचापुत्तमृरि सुकसूरि अणुकमि । सेलगसरि पमायपंकि पडियउ अइदुद्दमि । गया सीस सवि छंडि एक पंथग मुणि रहिउ । खामंतई पगि लागि पव्ववासरि तिणि कहियउ । मियमहुरवयणि सुनिपुणपणइ ठविउ सुद्धसंजमि स गुरु । सो सूरि पुण वि चारित्त वरि सित्तुंजय सिन्हउ सधर ॥ ६७ ॥ सेणियनंदण नंदिसेण बारस संवच्छर । चीरसीस वय छंडि वेस धरि वसइ समच्छर। दस प्रतिबोध्याचिणु न लेइ आहार निरंतर । इक ने बुज्झइ भणइ वेस दसमा तुम्हि सुंदर । वेसवयणि पुण घेसधर चरण चरवि सुर संपजह । इय जस्स सत्ति देसुणतणी अहह सोचि संजम तिजइ ॥ ६८ ॥ वरससहस नव कट्ट करिय कंडरिय न सुडउ । अंनि दुट्ठपरिणाम कामवश नरयनिवडर । अचिरकालि परिपालि सुद्ध संजम संपत्तउ । पुंडरीक सव्वसिद्धि सुहबुद्धिनिरुत्तर । बहु दुक सहवि नवि लद्ध सुह अप्प दुरित बहुसुग्व लहिउ । विहु बंधव एवड अंतरउ भावभेदि भगवति कहिउ ॥ ६९ ॥ नपरि कुसुमपुरि राय भाय दुइ ससि सूरप्पह । ससी न मनह धम्म रम्म मन्नइ विसयासुह ।
उवएसमालकहाणयछप्पय तपजपविण सो पत्त नरगि त्रीजइ दुहतत्तउ । करवि सूर दुहचूर सग्गि सत्तमइ स पत्तउ । ससि रडइ सूरसुरअग्गलिहिं तणु तच्छिय दुह दिकवउ । सो भणइ जीव विणु तणु दहिहिं नरयदुक किम ररिकवउ ॥ ७० ॥ सुग्गइमग्गपईय नाण जे दियई निरुप्पम । तिहं गुरु किं पि अदेय नत्थि जगमज्झि जगुत्तम । दिखउ जेम पुलिंदि सिवगजकह नियलोयण। तिण सरिस सुर वत्त करइ भत्तह दिय चोयण । केवलई दाणि तूसइ न गुरु अंतरंगभत्तिहिं वरइ । तिणि कारणि बिहुपरि करि विणय जिम बाहिरि तिम अंतरइ ॥७१॥ अवचोर चंडाल चडिउ अभयडकरि कंपइ । दय नामिणी सुविन मज्झ इम सेणिउ जंपइ । विणयविवजिय विजकज करिवइ नवि जग्गइ । सिंहासणि वइसारि भारि गुरु करि सो मग्गइ । ओ कहइ विज ओ लहइ फल बिहुह कज तकणि सरिउ । इण कारणि जिणसासणि विणय सुगुरु सीस अणुक्कमि करिउ ॥७२॥ दगमयरउ तिदंडि तामलित्ती पुरि अच्छड । नापितपासि सुविज लेवि देसंतरि गच्छद । महिमा मोहिम पत्त दंड गयणंगणि रहियउ । पुच्छिउ नरवरि जाम ताम सञ्चउ नवि कहियउ । गुरुलोपि कोपि विजा गई गयणदंड गडयडि पडिउ । लज्जियउ लोकि हसिउ सयलि इम सु नाणनिन्हवि नडिउ ।।७३ ॥ बंभण एक अनेककूडकवडाइनिरुत्तउ । उज्जेणिहिं कट्टियउ देसि चम्मारि स पत्तउ । त्रिहुंगामहं विच्चालि करइ तप वेसि त्रिदंडी। भगतलोकघरसार मुसइ निसि सु जि पाखंडी। अहंच डिउ हत्यि नरवरतणइ नयण कडि नडियौ घणउ । बहु झुरइ अति सोचइ सु चिर निंदड नियकुडकणउ ॥ ७४ ।। दुरंग वरदेव कुहिरूपिहिं पहु चंदइ । छौंक करइ जव चोर नाम मरि कहि अभिणंदह । ४ २६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्कहः सेणियप्रति चिर जीव अभयप्रति जा चड बिहुपरि । कालसरप्रति कहइ म मरि म म जीविय अणुसरि । मगहेसर पुच्छइ. ए कवणु कवण एस परमत्य पुण। जिण भणइ विप्पसेड्यचरिय चिहु प्रकारि नरआचरण ॥ ७ ॥ वरि अंगमीइ मरण सरण जिणधम्म धरिजइ । जियहिंसा पुण घोर घोरदुहहेउ न किन्नइ । कालसूरियह पुत्त सुलस जिम पाय निवारउ । परपीडा परिहरह तरह संसार असारउ । कुलकारण किं पिम लिफवउ गुणह रूप गुरुयडि धरउ । परलोगमग जाणउं सुपरि कुपरि कुकम्म म आयरउ ॥ ७६ ॥ हेजिइ हित अरिहंत कह वि नवि प्राणि करावइ । तं पुण दिइ उपदेस जेण किडइ सुख आवइ । जं सुरवइ सुरवग्गि सग्गि एरावणवाहण । जं भरहादिव रजसज्ज झुंजइ सुहसाहण । जं जं अवर वि सुरअसुरनरमुक सुरक माणइ घणउ । तिहुयणह मज्झि तं सयल फल जिणवरउवएसहतणउं ॥ ७ ॥ ग्वत्तियकुंडि जमालि वीरजामाइ खत्तिउ । सुदंसणभत्तार सार वयभारपवत्तिः । नवि मन्नइ किज्जंत किड इय आगमवाणी। निन्हवि तेण कुदिहि दुष्टि किय बहु गुणहाणी। नियकित्ति मुसिय सुर किब्विसिय मिलिउ मिच्छमइ मोहियउ। सयपंच माहु साहुणि सहस ढंकसहि पुण वोहियउ ॥ ७८ ॥ जिम मासाहम पंग्वि मुग्विहिं मा साहस जंपई। वग्यवयणि पइसेवि मंम लिंतउ नयि कंपद। तिम अवरह उपएम दिति किवि फुटवयणरफ़रि । पणि अप्पणि न करंति रम्म जिणधम्म तणीपरि। रग्गवाणि नड उच्चरह जलहि जालि पाणी गलइ । इम कम्मभारि भारिय भणी जाइ भूर भवजलतलइ ॥ ७॥ धम्मवीय जिणराह आणि दीवंतर दिडउ । अयिरति मयल वि पर देमचिरते अध ग्वडउ ।
समगरासु
२७
पासत्थे पुण खुहि खित्ति खाइव सहु हारिउ ।
संजमि ए सुभखित्ति सब्य वावीय वडारिउ ।
बिहु भेदि जीव ते करसणी राजदंडि अप्पउं दहह ।
मुविहियमुणि रायपसायवसि मुख सुगालि लच्छी लहइ ॥ ८० ॥
इणिपरि सिरिउवएसमालकहाणय ।
तवसंजमसंतोसविणयविज्जाइ पहाणय ।
सावयसंभरणत्व अस्थपय छप्पयछंदिहिं ।
| रयणासीसरीससीस पभणइ आणदिहि ।
अरिहंतआण अणुदिण उदय धम्ममूल मत्थइ ह ।
भो भविय भत्तिसत्तिहिं सहल सयल लच्छिलीला लहउ ॥ ८१ ।।
॥ इति श्रीउपदेशमालासर्वक्थानकछप्पया ।।
समरारासु
पहिलउ पणमिउ देव आदीस सेत्तुजसिहरे ।
अनु अरिहंत सव्वे वि आराह बहुभत्तिभरे ॥१॥
तउ सरसति सुमरेवि सारयससहरनिम्मलीय ।
जसु पयकमलपसाय मूरुषु माणइ मन रलिय ॥२॥
संघपतिदेसलपूनु भणिसु चरिउ समरातणउ ए।
धम्मिय रोल निवारि निसुणउ अवणि सुहावणउ प ॥३॥
भरह सगर दुइ भूप चक्रवति तहअ अतुलबल ।
पंडव पुरिमचंट तीरथु उधरइ अतिसवल ॥ ४ ॥
जावडतणउ संजोए हुअ म दसम तव उदए ।
समइ भलेरइ सोइ मंत्रि बाहडदेउ ऊपजए ॥५॥
हिव पुण नवी य ज पात जिणि दीहाडइ दोलिए।
खत्तिय ग्वग्गु न लिंति साहसियह साहसु गलए ॥६॥
तिणि दिणि दिनु दिकाउ समरसीहि जिणधम्मवणि ।
तमु गुण कर उद्योउ जिम अंधारइ फटिकमाण ॥ ७ ॥
सारणि अमियतणी य जिणि यहावी मरमंटलिहिं ।
किउ कृनजुगअवतार कलिजुगि जीतउ बाहुवले ॥८॥
. ३० प्राचीनगूर्जरकाव्यसहः समरऊ ए साहसधीरु वाहविलग्गउ यह अजण । बोलई ए असमवीरू दूसमु जीपइ राउतवट ए॥१॥ अभिग्रह ए लियइ अविलंबु जीवियजुब्बणयाबलि । उधरज ए आदिजिणविंचु नेमु न मेल्हउ आपणउ ए । भेटिज ए तउ पानपानु सिरु धूणइ गुणि रंजियउ ए ॥२॥ वीनती ए लागु लउ वानु पूछए पहुता केण कजे । सामिय ए निसुणि अडदासि आसालंवणु अम्हतणउ ए । भइली ए दुनिय निरास ह ज भागी य हींदअतणी ए। सामिय ए सोमनयणेहिं देपिउ समरा देइ मानु ॥३॥ आपिऊ ए सव्ववयणेहिं फरमाणु तीरथमाडिवा ए। अहिदर ए मलिकआएसि दीन्ह ले श्रीमुखि आपण ए। पतमत ए पानपएसि किउ रलियाइतु घरि संपत्तो । पणमई ए जिणहरि राउ समणसंघो तद्दि वीनविउ ए ॥ ४॥ संघिहि ए कियउ पसाउ बुद्धि विमासिय वयपरे । सासण प वर सिणगारु वस्तपालो तेजपालो भने । दरिसण ए छह दातार जिणधर्मनयण बे निम्मला ए। आइसी ए रायसुरताण तिणि आणीय फलही य पवर ॥५॥ दृसम ए तणी य पुणु आण अवसरो कोइ नही तसुतणउ ए। इह जुग ए नही य वीसासु मनुमाने इय किम छरए। तउ तुह ए पुन्नप्रकासु करि ऊधरि जिणवरधरम् ॥६॥ चतुर्थभाषा-संघपतिदेसलु हरपियउ अति धरमि सचेतो। पणमइ सिधसुरिपयकमलो समरागरसहितो। वीनती अम्हतणी प्रभो अवधारउ एक । तुम्ह पसाइ सफल किया अम्हि मनोरहनेक ॥१॥ सेतुजतीरथ अघरिवा ऊपन्नउ भावो । एकु तपोधनु आपणउ तुम्हि दियउ सहाउ । मदन पंडितु आइसु लहवि आरासणि पहुचइ । सुगुरक्यणु मनमाहि धरिउ गाढउ अति रूचइ ॥२॥ राणेरा तहि राजु करइ महिपालदेउ राणउ । जीवदया जगि जाणिजए जो वीर सपराणउ ।
WILL VID 's. N...... .. Nitin LIBRARY समरारासु पातउ नामिहि मंत्रिवरो तसुतणइ सुरज्जे। चंद्रकन्हइ चकोक जिसउ सारइ बहुकज्जे ॥३ राणउ रहियउ आपुणपई पाणिहि उपकंठे। टंकिय वाहइ सूत्रहार भांजइ घणगंटे । फलही आणिय समरवीरि ए अतिबहुजयणा । विरोलिउ वासुगिहिं जिम लाधा रयणा ॥४॥ कूआरसि उछयु हअउ बिसींगमइनहरे । फलही देपिउ धामियह रंगु माइ न सहरे । अभयदानि आगलउ करुणारसचित्तो। गोत्ति मेल्हावइ पडरालुअह आपड बहुवित्तो ॥५॥ 'भांडू आव्या भाउधणउ भवियायण पूजइ । जिम जिम फलही पूजिजए तिम तिम कलि धृजइ । खेला नाचइ नवलपरे घाघरिरवु झमकइ । अचरिउ देपिउ धामियह कह चित्तु न चमकद ॥ ६ ॥ पालीताणइ नयरि संघु फलही य वधावह । वालचंद्र मुनि वेगि पवरु कमठाउ करावद । किं कप्पूरिहि घडीय देह पीरसायरसारिहि ॥७॥ सामियमूरति प्रकट थिय कृप करिउ संसारे । मागी दीन्ह वधावणी य मनि हरपु न माए । देसलऊवह चरित्रि सह रलियातु थाए ॥ ८॥ पञ्चमी भापा-संधु बहुभत्तिहिं पाटि वयसारिउ । लगनु गणिउ गणपरिहिं विचारिउ । पोसहसाल खमासण देयए। सरिसेयंवरमुनि सवि संमहे ए ॥१॥ धरि वयमपि करी के वि मन्नादिया।' के वि धम्मिय हरसि धम्मिय धाइया । यहुदिसि पाठविय कुंकुमपत्रिया। संधु मिलइ पहुभली य मज्जाइया ॥ २॥ सुहगुमसिघसुरिवामि अहिसिंचिउ। संघपति कल्पना अमिय जिम सिंचित ।
२८
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
ओसवालकुलि चंदु उदयउ एउ समानु नही ।
कलिजुगि कालइ पाखि चांद्रिणउं सचराचरिहिं ॥९॥
पाल्हणपुरु सुप्रसीधु पुनवंतलोयह निल।
सोहइ पाल्हविहारु पासभुवणु तहि पुरतिलउ ॥ १० ॥
भास-हाट चहुदा रूअडा ए मढमंदिरह निवेमु त ।
वाविकूवआरामघण घरपुरसरसपएस त।
उवएसगच्छह मंडणउ ए गुरु रयणप्पहरित।
धम्मु प्रकासई तहि नयरे पाउ पणासइ दरि त ॥ १ ॥
तसु पटलच्छीसिरिमउडो गणहरु जखदेवतरित।
हंसवेसि जसु जसु रमए सुरसरीपजपूरि त ॥२॥
तमु पयकमलमरालुलउ ए ककसूरि मुनिराउ त।
ध्यानधनुपि जिणि भंजियउ ए मयणमल्ल भटियाउ त ॥ ३ ॥
सिद्धसूरि तमु सीसवरो किम वन्नई इकजीह त ।
जसु घणदेसण सलाहिजय दुहियलोयवप्पीह त ॥४॥
तसु सीहासणि सोहई ए देवगुप्तसूरि बईठु त ।
उद्याचलि जिम सहसकरो जगमतउ जिण दीठु त ॥५॥
तिह पहुपाटअलंकरणु गच्छभारपोरेउ त।
राजु करइ संजमतणउ ए सिद्धिसूरिगुरु एहु त ॥ ६ ॥
जोइ जसु वाणीकामधेनु सितवनि विचरेज त ।
सावइजणमणइच्छिय घण लीलइ सफल करेउ त ॥७॥
उवएसवंसि वेसटह कुलि सपुरिसतणउ अवतारु त ।
वयरागरि कउतिगु किसउ ए नही य ज रतनह पारु त ॥८॥
पुन्नपुरुषु ऊपन्नु तर्हि सलपणु गुणिहि गंभीरु त ।
जणआणंदणु नंदणु तसो आजड्ड जिणधमधीरु त ॥९॥
गोत्रउदयकरु अवयरिउ ए तमु पुत्रु गोसलसाहु त ।
तसु गेहिणि गुणमत भली य आराहइ नियनाहुत ॥ १० ॥
संघपति आसघरू देसलु लूणउ तिणि जन्म्या संसारि त ।
रतनसिरि भोली लाच्छि भणउं तोहतणी य घरनारि त ॥ ११ ॥
देसलधरि लच्छी य निमुणि भोली भोलिमसार त ।
दानि सीलि लणाघरणि लाछि भली सुविचार त ॥१२॥
समरारासु द्वितीयभाषा-पतनकुपि कुलि निम्मली य भोलीपुत्तु जाया। सहजउ साहणु समरसीहु बहुपुन्निहि आया ॥१॥ लहूअलगइ सुविचारचतुर सुविवेक सुजाण । रत्नपरीक्षा रंजवइ राय अनु राण ॥२॥ तउ देसल नियकुलपईव ए पुत्र सधन्न । रूपचंत अनु सीलवंत परिणाविय कन्न ॥३॥ गोसलसुति आवासु कियउ अणहिलपुरनपरे । पुन्न लहइ जिम रयणमाहि नर समुद्रह लहरे ॥४॥ चउरासी जिणि चउहदा यरवसहि विहार । मढ मंदिर उत्तंग चंग अनु पोलि पगार ॥५॥ तिहिं अछइ भूपतिहिं भुवण सतखणिहि पसत्यो । विश्वकर्मा विज्ञानि करिउ धोइड नियहत्थो ॥६॥ अमियसरोवरु सहसलिंगु इकु धरणिहिं कुंडलु । कित्तिभु किरि अवररेसि मागइ आखंडलु ॥७॥ अज्ज वि दीसइ जत्थ धम्मु कलिकालि अगंजिउ । आचारिहिं इह नयरतणइ सचराचरु रंजिउ ॥ ८॥ पातसाहि सुरताणभीबु तहिं राजु करेई । अलपखानु हींदृअह लोय घणु मानु जु देई ।। ९॥ साहु रायदेसलह पूतु तसु सेवइ पाय । कला करी रंजविउ खानु बहु देइ पसाय ॥ १०॥ मीरि मलिकि मानियइ समझ समरथु पभणीजइ । परउवयारियमाहि लीह जसु पहिली य दीजइ ॥ ११ ।। जेठसहोदरि सहजपालि निज प्रगटिउ सहजू । दक्षणमंडलि देवगिरिहि किउ धम्मह वणिजू ॥ १२ ॥ चवीसजिणालय जिणु ठविउ सिरिपासजिणिदो । धम्मधुरंधरु रोपियउ धर धरमह कंदो ॥ १३ ॥ साहणु रहियउ पंभनयरि सायरगंभीरे । पुव्वपुरिसकीरितितरंड पूरइ परतीरे ॥ १४ ॥ तृतीयभाषा-निसुणऊ ए समहप्रभावि तीरथरायह गंजणउ ए। भवियह ए करुणारावि नीठुरमनु मोहि पडिउ ए।
३० प्राचीनगूर्जरकाव्यसवाहः समरऊ ए साहसधीरु वाहविलग्गउ वह अ जण । बोलई ए असमवीरू दूसमु जीपइ राउतवट ए॥१॥ अभिग्रह ए लियइ अविलंबु जीवियजुव्वणवाबलि । उधरज ए आदिजिणविवु नेमु न मेल्हउ आपणउ ए। भेटिऊ ए तउ पानपानु सिम धूणइ गुणि रंजियउ ए ॥२॥ धीनती ए लागु लउ वानु पूछए पहुता केण कजे । सामिय ए निसुणि अडदासि आसालंवणु अम्हतणजए। भइली ए दुनिय निरास ह ज भागी य हींदृअतणी ए। सामिय ए सोमनयणेहिं देपिउ समरा देइ मान ॥ ३ ॥ आपिऊ ए सव्ववयणेहिं फरमाणु तीरथमाडिया ए। अहिदर ए मलिकआएसि दीन्ह ले श्रीमुखि आपण ए। पतमत ए पानपएसि किउ रलियाइतु घरि संपत्तो । पणमई ए जिणहरि राउ समणसंघो तहि वीनविउ ए॥४॥ संघिहि ए कियउ पसाउ बुद्धि विमासिय वयपरे। सासण ए वर सिणगारु वस्तपालो तेजपालो मंत्रे । दरिसण ए छह दातारु जिणधर्मनयण वे निम्मला ए। आइसी ए रायसुरताण तिणि आणीय फलही य पवर ॥५॥ दुसम ए तणी य पुणु आण अवसरो कोई नही तसुतणउ ए। इह जुग ए नही य वीसासु मनुमाने इय किम छरए । तर तुह ए पुन्नप्रकासु करि अधरि जिणवरघरमु ॥६॥ चतुर्थभाषा-संघपतिदेसलु हरपियउ अति धरमि सचेतो। पणमइ सिधसुरिपयकमलो समरागरसहितो। चीनती अम्हतणी प्रभो अवधार एक । तुम्ह पसाइ सफल किया अम्हि मनोरहनेक ॥१॥ सेत्तुजतीरथ ऊधरिवा ऊपन्नउ भावो । एकु तपोधनु आपणउ तुम्हि दियउ सहाउ । मदनु पंडितु आइसु लहवि आरासणि पहुचइ । सुगुरक्यणु मनमाहि धरिउ गाढउ अति रुचद ॥२॥ राणेरा तहि राजु करइ महिपालदेउ राणउ । जीवदया जगि जाणिजए जो वीरु सपराणउ ।
BHA 'S.N... LIBR समरारासु पातउ नामिहि मंत्रिवरो तसुतणइ सुरज्जे । चंद्रकन्हइ चकोरु जिसउ सारइ बहुकज्जे ॥ ३ ॥ राणउ रहियउ आपुणपई पाणिहि उपकंठे । टंकिय वाहइ सूत्रहार भांजइ घणगंठे । फलही आणिय समरवीरि ए अतिवहुजयणा । समुद्र विरोलिउ वासुगिहिं जिम लाधा रयणा ॥४॥ कूआरसि उछयु हुअउ त्रिसींगमइनइरे । फलही देपिउ धामियह रंगु माइ न सइरे । अभयदानि आगल करुणारसचित्तो। गोत्ति मेल्हावइ पहरालुअह आपइ बहुवित्तो ॥५॥ (भांडू आव्या भाउघणउ भवियायण पूजइ । जिम जिम फलही पूजिजए तिम तिम कलि धूजइ । खेला नाचइ नवलपरे घाघरिरवु झमकह । अचरिउ देपिउ धामियह कह चित्तु न चमकह ॥ ६ ॥ पालीताणइ नयरि संघु फलही य वधावइ । वालचंद्र मुनि वेगि पवरु कमठाउ करावइ । किं कप्पूरिहि घडीय देह पीरसायरसारिहि ॥ ७॥ सामियमूरति प्रकट थिय कृप करिड संसारे । मागी दीन्ह वधावणी य मनि हरपु न माए । देसलऊत्रह चरित्रि सह रलियातु थाए ॥ ८॥ पञ्चमी भापा-संधु बहुभत्तिहिं पाटि वयसारिउ । लगनु गणिउ गणधरिहिं विचारिउ । पोसहसाल खमासण देयए । सरिसेयंवरमुनि सवि संमहे ए॥१॥ घरि वयसवि करी के वि मन्नादिया। के वि धम्मिय हरसि धम्मिय धाइया । वहुदिसि पाठविय कुंकुमपत्रिया। संघु मिलह बहुभली य सज्जाइया ॥२॥ सुहगुरुसिधसुरिवासि अहिसिंचिउ । संघपति कल्पतरु अमिय जिम सिंचिउ। .
३२ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः कुलदेवत सचिया वि भुजि अवतरइ । सूहब सेस भरइं तिलकु मंगल करई ॥३॥ पोसवदि सातमि दिवसि सुमुहत्तिहिं। आदिजिणु देवालए ठविउ सुहचित्तिहिं । धम्मघोरी य धुरि धवल दुइ जुत्तया । कुंकुमपिंजरि कामधेनुपुत्तया ॥४॥ इंदु जिम जयरथि चडिउ संचारए । सूहवसिरि सालिथाल निहालए। जा किउ ह्यवरो वसहु रासिउ हउ । कहइ महासिधि सकुनु इहु लहउ । आगलि मुनिवरसंघु सावयजणा। तिलु न पिरह तिम मिलिय लोय घणा ॥५॥ मादलयमविणाझुणि वज्जए। गुहिरभेरीयरवि अंबरो गज्जए। नवयपादणि नवउ रंगु अवतारिउ । सुपिहि देवालउ संग्वारी संचारिउ ॥६॥ घरि वयसवि करि के वि समाहिया । समरगुणि रंजिउ विरलउ रहियउ । जयतु कान्टु दुइ संघपति चालिया। हरिपालो लंढुको महाधर दृढ धिया ॥७॥ पठी भापा-बाजिय संग्व असंग्व नादि काल दुगुडिया। घोडे चइ सल्लारसार राउत सींगडिया। तउ देवालउ जोनि वेगि धापरिरयु झमकइ । मम विमम नवि गणद कोइ नवि वारिउ धपाई ॥१॥ सिजवाला धर घटहडइ बाहिणि बहुवेगि। धरणि धटपाइ रजु ऊहए नवि सूझइ मागो। हय होसइ आरसइ करह वेगि यहइ यइल्ल । साद किया थाहरह अवरु नवि देई बुल्ल ॥२॥ निमि दीदी अलहलाहि जेम अगिउ तारायणु । पायलपार न पामियए वेगि यहइ सुग्यासण ।
समरारासु
आगेवाणिहि संचरए संघपति साहुदेसल।
बुद्धिवंतु बहुपुंनिवंतु परिकमिहिं सुनिश्चल ॥३॥
पाछेवाणिहि सोमसीहु साहुसहजापूतो।
सांगणुसाहु लूणिगह पतु सोमजिनिजुत्तो।
जोड करी असवारमाहि आपणि समरागरु ।
चडीय हीड चहुगमे जोह जो संघअसुहकरु ॥४॥
सेरीसे पूजियउ पासु कलिकालिहिं सकलो ।
सिरपेजि थाइउ धवलकए संघु आविउ सयलो।
धंधूकउ अतिक्रमिउ ताम लोलियाणइ पहुतो।
नेमिभुवणि उछयु करिउ पिपलालीय पत्तो ॥५॥
सप्तमीभाषा-संघिहिं चउरा दीन्हा तहिं नयरपरिसरे ।
अलजउ अंगि न माए दीठउ विमलगिरे।
पूजिउ परवतराउ पणमिउ बहुभत्तिहिं ।
देसलु देयए दाणे मागणजणपंतिहिं ॥१॥
अजियजिणिंद्जुहारो मनरंगि करेवि ।
पणमइ सेजसिहरो सामिउ सुमरेवि ॥२॥
पालीताणइ नयरे संघ भयलि प्रवेमु ।
ललतसरोवरतीरे किउ संघनिवेसु ।
कजसहाय लहुभाय लहु आवियउ मिलेवि ॥३॥
सहजउ साहणु तीहि त्रिन्हइ गंगप्रवाह ।
पासु अनइ जिण वीरो घंदिउ सरतीरिहिं ।
पंपि करइ जलकेलि सरु भरिउ बहुनीरिहिं ॥४॥
सेन्जसिहरि चडेवि संघु सामि ऊमाहिउ ।
सुललितजिणगुणगीते जणहु रोमांचउ ।
सीयलो वायए वाओ भवदाहु ओल्हावए ।
माडीय नमिय मरुदेवि संतिभुवणि संघु जाए ॥५॥
जिणविंबह पूजेवी कवडिजकु जुहारए।
अणुपमसरतडि होई पहुता सोहद्वारे ।
तोरणतलि वरसंते घणदाणि संघपत्ते ।
भेदिउ आदिजगनाहो मंडिउ पनीठमहछवो ॥६॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यससह- अष्टमी भाषा-चलउ चला सहियडे सेजि चडिय ए। आदिजिणपत्रीठ अम्हि जोइसउंए। माहसुदि चउदसि दूरदेसंतर संघ मिलिया तहिं अति अवाह॥१॥ माणिके मोतिए चाकु सुर पूरइ रतनमह वेहि सोवन जवारा । अशोकवृक्ष अनु आम्र पल्लवदलिहि रितुपते रचियले तोरणमाला ॥२॥ देवकन्या मिलिय धवलमंगल दियह किंनर गायहि जगतगुरो। लगनमहरतु सुरगुरो साधए पत्रीठ करइ सिधसूरिगुरो ॥३॥ भुवनपतिव्यंतरजोतिसुर जयउ जयउ करइ समरि रोपिउ दिदु धरमकंदो। दुंदुहि वाजिय देवलोकि तिहुअणु सोचिउ अमियरसे ॥ ४ ॥ देउ महाधज देसलो संघपते ईकोतरु कुल ऊधरए । सिहरि चडि रंगि रूपि सोपनि धनि वीरि रतनि वृष्टि विरचियले ॥५॥ रूपमय चमर दुइ छत्त मेघाडंवर चामरजुयल अनु दिन्नदुन्नि । आदिजिणु पूजिउ सहलकतिहिं कुसुम जिम कनकमयआभरण ॥६॥ आरतिउ धरियले भावलभत्तारिहिं पुदवपुरिस सग्गि रंजियले । दानमंडपि थिउ समर सिरिहि वरो सोवनसिणगार दियइ याचकजन ॥७॥ भत्ति पाणी य वरमुनि प्रतिलाभिय अचारिउ वाहइ दुहियदीण । वाविउ सुधम वितु सिडखेत्रि इंद्रउच्छचु करि ऊतरए ॥८॥ भोलीयनंदणु भलइ महोत्सयि आविउ समा आवासि गनि । तेरइकहत्तरह तीरथउडारु यउ नंद जाव रविससि गयणि ॥९॥ भवमी भाषा-संघवाछल करी चोरि भले माल्हंतडे पूजिय दरिसण पाय । सुणि सुंदरे पूजिय दरिसण पाय । मोरठदेस संधु संचरिउ मा० चउंडे रयणि विहाइ ॥ १॥ आदिभातु अमरेलीयह माल्हं० आविउ देसलजाउ । अलवेसन अल जवि मिलए माल्हं० मंडलिकु सोरठराउ ॥२॥ ठामि ठामि उच्च हुअइ माल्हं० गर्दि जूनह संपत्तु । महिपालदेउ राउलु आवए माल्हं० सामुहउ संघअणुरतु ।। ३ ।। महिपु समरु विउ मिलिय सोहई माल्हं० इंदु किरि अनइ गोविंदु । तेजि अगंजिउ तेजलपुर मा० पूरिज संघआणंदु । सुणि० ॥ ४ ॥ पउणधलीचेप्रमवाटि कर माल्हं० तलहट्टी य गढमाहि । अजिलपरि चालिया ए माल्हे० पउब्बिहसंघमाहि । सुणिः ।
समरारासु दामोदर हरि पंचमउ माल्हं० कालमेघो क्षेत्रपालु । सुणिः । सुवनरेहा नदी तहिं वहए माल्हं० तरुवरतणउं झमालु ॥५॥ पाज चडता धामियह मा० क्रमि मि सुकृत विलसति । सुणिः । ऊची य चडियए गिरिकडणि मा० नीची य गति पोडंति ॥ ६॥ पामिउ जादवरायभुवणु मा० त्रिनि प्रदक्षिण देह । सिवदेविसुतु भेटिउ करिउ मा० ऊतरिया मढमाहि । सुणि। कलस भरेविणु गयंदमए मा० नेमिहिं न्हवणु करेइ । पूज महाधज देउ करिउ मा० छत्र चमर मेल्हेइ ॥ ७ ॥ अंबाई अवलोयणसिहरे मा० सांबिपज्जूनि चडंति । सुणि। सहसारामु मनोहरु ए मा० विहसिय सवि वणराइ । सुणि । कोइलसादु सुहावणउ ए मा० निसुणियइ भमरझंकारु । सुणि० ॥८॥ नेमिकुमरतपोवनु ए मा० दुह्र जिय ठाउं न लहंति । सुणि । इसइ तीरथि तिहुयणदुलभे मा० निसिदिनु दानु दियंति ॥९॥ समुविजयरायकुलतिलय मा० वीनतडी अवधारि । सुणि । आरतीमिसि भवियण भणइं मा० चतुगतिफेरडउ वारि । सुणि०॥२०॥ जइ जगु एक मुहु जोड्यए मा० त्रिपति न पामियइ तोइ । सुणि । सामलधीर तउं सार करे मा० वलि वलि दरिसणु देजि। सुणि०॥११॥ रलीयरेवयगिरि ऊतरिउ ए मा० समरडो पुरुषप्रधानु । घोडउ सीकिरि सांकलिय मा० राउल दियइ बहुमानु । सुणि० ॥१२॥ दशमी भापा-रितु अवतरियउ तहि जि वसंतो सुरहिकुसुमपरिमल पूरतो समरह वाजिय विजयदया। सागुसेलुसल्लइसच्छाया केसयकुडयकयंवनिकाया संघसेन गिरिमाहइ वहए। बालीय पूछई तरुवरनाम यादइ आवई नव नव गाम नयनीझरणरमाइलहं ॥१॥ देवपटणि देवालउ आवइ संघह सरयो सरु पूरावह अपूरवपरि जहिं एक हुई। तहिं आवइ सोमेसरछत्तो गउरवकारणि गरुड पहनों आपणि राणउ मूघराजो ॥२॥ पान फूल कापड बहु दीजई लुणसम कपूल गीजह जवाधिहि मिग लिंपिया १६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः ताल तिविल तरविरियां वाजई ठामि ठामि धाकणा करीजई पगि पगि पाउल पेपण ए॥३॥ माणुस माणुसि हियर्ड दलिजा घोडे बाहिणिगाहु करीजइ हयगय सूझइ नविजणह । दरिसणस देवालउ चल्लइ जिणसासणु जगि रंगिहिं मल्हइ जगतिहिं आव्या सिवभुवणि ॥४॥ देवसोमेसररिसणु करेयी कवडिबारिजलनिहिं जोएवी मियमेलइ संघु ऊतरिउ। पहुचंदप्पहपय पणमेवी कुसुमकरंडे पूज रएवी जिणभुवणे उच्छवु कियउ॥५॥ सिवदेउलि महायज दीधी सेले पंचे पन्नसमिडी अपूरवु उच्छत्रु कारविज। जिनवरधरमि प्रभावन कीधी जयतपताका रवितलि बडी दीनु पयाणउं दीवभणी। कोडिनारिनिवासणदेवी अंबिक अंबारामि नमेंबी दीवि वेलाउलि आविघउ ए॥६॥ एकादशी भाषा-संधु रयणापरतीरि गहगहए गुहिरगंभीरगुणि । आविउ दीवनरिंदु सामुह ए संघपतिसब सुणि ॥ १॥ हरपिउ हरपालु चीति पटुतउ ए संधु मोलविकरे । पभणई दीवह नारि संघह ए जोअण ऊनावली ए। आउलां वाहिन वाहि वेगुलइ ए चलावि प्रिय बेडली ए ॥२॥ किसउ सुपुनपुरिपु जोइड ए नयणुलां सफल फरउ । नियछणा नेत्रि करेसु ऊनारिम्प कपूरि ऊआरणा ए। वेदीय वेडीप जोहि पलियऊ ए कीघउंबंधियारो ॥३॥ लेउ देवालउमाहि यहठउ ए संघपति संघसहित । लहरि लागई आगासि प्रवहणु ए जाह विमान जिम । जलपटनाटक जोइ नवरंग प रास सउडारस ए॥४॥ निरुपम होह प्रयेसु दीसई ए मवडला धवलहर । तिहां अच्छह फुमरविहाक महज ए कभडुला जिणमुवण । तीर्थकर तीर चंदेवि यदिए सयंभू आदिजिणु ।
समरारासु दीठज वेणिवच्छराजमंदिरु ए मेदनीउरि धरिउ । अपूरवु पेपिउ संघु उत्तारिऊ ए पइली तडि समुदला ए ॥५॥ द्वादशी भाषा-अजाहरवरतीरधिहिं पणमिउ पासजिणिंदो। पूज प्रभावन तहिं करहिं अजिउ ए अलिउ ए अजिउ सफल सुछंदो ॥१॥ गामागरपुरवोलितो वलिउ सेतुजि संपत्तो । आदिपुरीपाजह चडि ए वंदिऊ ए वंदिऊ ए वंदिऊ ए ममदेविपूतो ॥२॥ अगरि कपूरिहिं चंदणिहि मृगमदि मंडणु कीय । कसमीराकुंकुमरसिहिं अंगिहिं ए अंगिहि ए अंगो अंगि रचीय । जाइबउलविहसेवत्रिय पूजिसु नाभिमल्हारो। मणुयजनमुफलु पामिऊ ए भरियऊ ए भरियऊ ए भरियऊ सुकृतभंडारो॥३॥ सोहग ऊपरि मंजरिय बीजी य सेजि उधारि । "ठिय ए समरऊ ए समरऊ ए समरु आविउ गुजरात । पिपलालीय लोलियणे पुरे राजलोक रंजेई । छडे पयाणे संचरए राणपुरे राणपुरे राणपुरे पहुचेई ॥ ४ ॥ वढवाणि न विलंबु किउ जिमिउ करीरे गामि । मंडलि होईउ पाडलए नमियऊ एनमियऊ ए नमियऊ नेमि सु जीवतसामि । संखेसर सफलीयकरणु पूजिउ पासजिणिंदो। सहजसाहु तहिं हरपियउ ए देपिऊ ए देपिऊ ए देपिउ फणिमणिवृंदो ॥५॥ डुंगरि डरिउन खोहि खलिउ गलिउ न गिरवरि गव्यो। संधु सुहेलइ आणिउ ए संघपती ए संघपती ए संघपतिपरिहिं अपुव्यो॥ ६॥ सजण सजण मिलीय तहिं अंगिहिं अंगुलियते। मनु विहसइ ऊलटु घणउ ए तोडरू ए तोडरू ए तोडर कंठिठवते ॥७॥ मंत्रिपुत्रह मीरह मिलिय अनु पवहारियसार। संघपति संघु वधावियउ कंठिहिं ए कंठिहिं ए कंठिहि घालिय जयमाल । तुरियघाटतरवरि य तहिं समरउ करइ प्रवेसु । अणहिलपुरि वडामणउ ए अभिनवु ए अभिनवु ए अभिनवु पुननिवासो॥८॥ (संवच्छरि इकहत्तरए धापिउ रिसहजिणिंदो। चैत्रवदि सातमि पहुत घरे नंदऊ ए नंदऊ ए नंदऊ जा रविचंदो ॥९॥ पासडसृरिहिं गणहरह नेऊअगच्छनिवासो। तसु सीसिहिं अंबदेवसूरिहिं रचियज ए रचियऊ ए रचिय समरारासो । 232
प्राचीनगूर्जरकाव्यसाद
एह रासु जो पढइ गुणइ नाचिउ जिणहरि दे ।
अवणि सुणइ सो वयठऊ ए तीरथ ए तीरथ ए तीरथजात्रफल लेई ॥१०॥
इति श्रीसघपतिसमरसिंहरास ॥
सिरिथूलिभद्दफागु।
पणमिय पासजिणंदपय अनु सरसइ समरेवी ।
धूलिभद्दमुणिवइ भणिसु फागुवंधि गुण केवी ॥१॥
अह सोहगसुंदरख्ववंतु गुणमणिभंडारो।
फंचण जिम झलकंतकंति संजमसिरितारो।
थूलिभमुणिराउ जाम महियलि बोहंतउ ।
नयररायपाडलियमादि पहुतउ विहरंतउ ॥२॥
परिसालइ चउमासमादि साह गहगहिया ।
लियइ अभिग्गह गुरह पासि नियगुणमहमदिया।
अनविजयसंभूयसरि गुरु वय मोकलावइ ।
तसु आपसि मुणीस कोसरेसाघरि आवइ ॥३॥
मंदिरतोरणि आवियउ मुणिवा पिरतवी।
चमकिय चित्तिहि दासडिय वेगि जाइ बधावी।
थेसा अतिहि उतावलि यहारिहि लहकती
आविय मुणियररायपासि फरयल जोडती ॥ ४ ॥
भास-धर्मलामु मुणिवइ भणिसु चित्रसाली मंगेयी।
रहियउ सीरफिमोर जिम धोरिम हियह घरेयी ॥५॥
शिरिमिरि मिरिमिरि तिरिमिरि ए मेहा परिसंति ।
पलाल पाल परालयाला वहति ।
झवझव झरझर झरझर ए योजुलिय झयाइ ।
धरार धरर थरार ए विररिणिमणु कंपद ॥ ६ ॥
मारगंभीरमरण मेह जिम जिम गाजते ।
पंचनाण निय कुसुमयाण निम तिम साजते ।
जिम जिम फेनकि मरमहंत परिमल विसावद ।
तिम निम फामि य परण लग्गि निपरमणि मनावह ॥७॥
1 सिरियूलिभदफागु सीयलकोमलसुरहि वाय जिम जिम वायते । माणमडप्फर माणणि यतिम तिम नाचते। जिम जिम जलभरभरिय मेह गयणंगणि मिलिया। तिम तिम कामीतणा नयण नीरिहि झलहलिया ॥८॥ भास-मेहारवभरऊलटि य जिम जिम नाचइ मोर। तिम तिम माणिणि खलभलइ साहीता जिम चोर ॥ ९॥ अिइ सिंगारु करेइ वेस मोटइ मनऊलटि । रइयरंगि बहुरंगि चंगि चंदणरसऊगटि । चंपयकेतकिजाइकुसुम सिरि घुप भरेह । अतिआछउ सुकमाल चीरु पहिरणि पहिरेइ ।। १० ।। लहलह लहलह लहलह ए उरि मोतियहारो। रणरण रणरण रणरण ए पगि नेउरसारो। झगमग झगमग झगमग ए कानिहि वरकुंडल। झलहल झलहल झलहल ए आभरणहं मंडल ॥ ११ ॥ मयणखग्ग जिम लहलहंत जसु वेणीदंडो। सरलउ तरलउ सामलउ रोमावलिदंडो। तुंग पयोहर उल्लसइ सिंगारथवफा । कुसुमवाणि निय अमियकुंभ किर थापणि मुकार ॥ १२ ॥ भास-काजलि अंजिवि नयणजय सिरि संथउ फाडेई । बोरीयावडिकांचुलिय पुण उरमंडलि ताडेइ ॥ १३ ॥ कन्नजुयल जसु लहलहंत किर मयणहिंडोला । चंचल चपल तरंगचंग जसु नयणकचोला । सोहह जासु कपोलपालि जणु गालिमसूरा । कोमल विमलु सुकंतु जासु वाजइ संस्त्रतूरा ॥ १४ ॥ लवणिमरसभरकूवडिय जसु नाहिय रेहह । मयणराय किर विजयखंभ जसु अरू सोहइ । जसु नहपल्लव कामदेवअंकुस जिम राजइ । रिमिझिमि रिमिझिमि ए पायकमलि घाधरिय सुवाजह ॥१५॥ नवजोवनविलसंतदेह नवनेहगहिल्ली । परिमललहरिहि मयमयंत रइकेलिपहिल्ली ।।
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः अहरबिंब परवालखंड वरचंपावन्नी । नयणसलूणी य हावभाववहुगुणसंपुन्नी ॥ १६ ॥ भास-इय सिणगार करवि वर जव आवी मुणिपासि । Lजोएवा करतिगि मिलिय सुरकिंनर आकासि ॥ १७॥ अह नयणकडकहं आहणए वांकउ जोवती। हाव भाव सिणगार भंगि नवनवि य करंति। तह वि न भीजइ मुणिपवरो तउ वेस बोलावइ । तवणुतुल्लु तुह देह नाह मह तणु संतावह ॥ १८ ॥ वारहवरिसहंतणउ नेहु किणि कारणि छंडिउ । एचड्ड निठुरपणउ कंइ मूसिउ तुम्हि मंडिउ । थूलिभद्द पभणेइ वेस अह खेदु न कीजइ । लोहिहि घडियउ हियउ मज्झ तुह वयणि न भीजह ॥ १९ ॥ मह विलवंतिय उवरि नाह अणुराग धरीजइ । एरिसु पावसु काल सयल भूसिउ माणीजइ । मुणिवइ जंपइ वेस सिद्धिरमणी परिणेवा । । मणु लीणउ संजमसिरीहिसुं भोग रमेवा ॥ २० ॥ भास-भणइ कोस साचउ कियउ नवलइ राचइ लोउ । मूं मिल्हिवि संजमसिरिहि जउ रातउ मुणिराउ ॥ २१ ॥ उसमरसभरपूरियत रिसिराउ भणेइ । चिंतामणि परिहरवि कवणु पत्थर गिइ । तिम संजमसिरि परियएवि बहुधम्मसमुबल । आलिंगइ तुह कोस कवणु पसरंतमहावल ।। २२ ॥ पहिलउ हिवडा कोस कहइ जुम्वणफलु लीजइ । तयणंतरि संजमसिरीहि सुह सुहिण रमीजइ । मुणि बोलइ जि मइ लियउ तं लियउ ज होइ । कवणु सु अच्छइ भुवणतले जो मह मणु मोहइ ॥ २३ ॥ भास-इणपरि कोसा अवगणिय थूलिभद्दमुणिराइ । तसु धीरिम अवधारिकरि चमकिय चित्ति सुहाइ ॥ २४ ॥ अबलवंतु सु मोहराउ जिणि नाणि निधाडिउ ।
जयूसामिचरिय झाणखडग्गिण मघणसुभड समरंगणि पाडिउ । कुसुमबुठि सुर करइ तुहि हुउ जयजयकारो। धनु धनु एहु जु थूलिभद्द जिणि जीतउ मारो॥ २५ ॥ पडिवोहिवि तह कोसवेस चउमासिअणंतरु । पालिय भिग्गह ललिय चलिय गुरुपासि मुणीसरु । दुझारदुफरकारगुत्ति सरिहि सु पसंसिउ । संखसमुज्जलजसु लसंतु सुरनरहं नमंसिउ ॥ २६ ॥ नंदउ सो सिरिथूलिभद जो जुगह पहाणो । मलियउ जिणि जगि मल्लसल्लरइवल्हमाणो। ग्गरतरगच्छि जिणपदमसूरिकियफागु रमेवउ । खेला नाचहं चैत्रमासि रंगिहि गावेवउ ॥ २७ ॥ । सिरिथूलिभदफागु समत्तु ।। जंबुसामिचरिय जिग चउवीसह पय नमेवि गुरुचलण नमेवी। जंबूसामिहितण चरिय भविउ निसुणेवी । करि सानिध सरसत्तिदेवि जिम रयं कहाणउं । जंबूसामिहि गुणगण संखेवि वपाणउं ॥१॥ जंबूदीपद भरहखित्ति तिहि नयरपहाणउं । राजगृह नामेण नयर पहुवि वरकाणउं । राज करड सेणियनरिद नरवरहं जु सारो। तासुतणइ पुत्त बुद्धिमंत मंति अभयकुमारो ॥२॥ अन्नदिगंतरि वडमाण विहरंत पहतउ । सेणिउ चालिज बंदणह बहुभत्तितुरंतु । मागि वहंतु माहाराज केस पेखेड । भोगविरत्तउ पसनचंद बहुतवण तवेइ ॥३॥ धनु धनु माया एहरसि पसंसिउ वंदद। दुमुग्ववयणि सो चलिउ ध्यानि कुमारगि चल्छ । धम्मलाभ नवि दीयइ जाम मुनि हउ अभागो।
४२ प्राचीनगूर्जरफाव्यसह. ईहं सह को एक मानि रंको अनु राओ ॥ ४ ॥ सामिय वंदिउ वडमाण सेणीयं पूछीई। जइ पसनचंद हिव करेइ काल कीछे ऊपजइ । मन जाणेविण पसनचंद सामी वोलीजइ । नरगावासइ सातमए नीछई ऊपजह ॥५॥ वीजी पूछहं मणुय होइ त्रीजी अणउत्तर । दुंदुहि वाजी देवकीय चालीय तिहिं सुरवर । सेणिउ पूछइ सामिसाल कांहां जाईजइ । केवलमहिमा पसनचंद देवे कीजीजइ ॥ ६ ॥ सेणिउ मनि चिंताचडिओ सामी वलि पूछा। जं प्रभु तम्हे वोलीय तं अम्हे न बूझिउं । सेणिय तम्हि बूझियउं तअंतिसत होए । मणपरिणामह विसमगति जीवहं पुण होड ॥७॥ केवलनाणउ भरहखेति केतूं वरतेसिइ । सामी दापीउ विज्जुमालियउ छेदु होसिइ । चउसठि देवे परियरिउ चउदेवे सहीउ । अतिसई दीसइ देहकति सेणीचिति चडीउ ॥८॥ देवहं नवि हुइ पहु नाणु यउ किम होएसिइ । आजूना दीह सातमए इणि नयरि चवेसिइ । किकारण पुण एकंतिं किंस्यह अतिसउ। कवणह धम्महतणइ भावियर देवअइसउ ॥९॥ उपणि-महाविदेहताइ विजय वीतसोय नपरी । पदमरथ नामेण राउ वनमाला घरणी। तास ऊयरि ऊपन्न पुत्रु सुरलोयहहंतु। बडइ नामिई सिवकुमार बहुगुणिहिं संजुत्तउ ॥१०॥ पुवभवंतरतणइ नेहि सागरमुणि पहुतु । आवीउ बंदण सिवकुमार बहुभत्तितुरंतउ । हजाणत मुणिहिं नाह कोछे मई दीठउ । एह जन्मह तइयभवि मुझ भाइ य हृतउ ॥ ११॥ ऊहापोह करेहि जाम पाछिलउ भव देपइ ।
जंबूसामिचरिय १३ जा मई मूकी सुरह रिद्धि या कीणइं लेखई । तु चिंताविउ सिवकुमार अथिरउ संसारो। भवनिन्नासण लेइसिउं अम्हि संजमभारो॥ १२ ॥ माइ न मेल्हई एकपूत सो मुनिहिं थाई। दृढधम्मेण सावरण जायवि बोलावीउ । पारि पारि दृढधम्म भणइ अम्ह भणीउ कीजइ । बेडी मणुयजम्म जतनिहिं रापीजइ ॥ १३ ॥ कहइ धम्म सो मुणिहिं जाम तसु चयण मनेई । बिहुं उपवासहं पारणइ ए आंबिल पाई। फासुयवेसण भत्तपाण दृढधम्मो आणइ । माहि थीउ अंतेउरहं सो सील ज पालइ ॥१४॥ नवकरवालीतीषधार करमं सवि सूडइ । निणइ मोहकंदप्पराउ भवपरीयण मोडइ । वारहं घरसहंतणइ अंति आऊयूं पूरीजह । पंचमदेवलोकि सिवकुमार सो देव ऊपजइ ॥१५॥ कवणह नारिहितणइ उयरि एह जीव चवैसिइ । कवणह वापहतणइ कुलि एउ मंडण होसिइ । उसभदत्तसेठिहिं घरणि धारणिउरि नंदण । होसिइ नामिइं जंबुसामि तिहुयणि आणंदण ॥ १६ ॥ ऊठीउ देव अणाढिउ हरपिइं नाचेई । धनु धनु अम्हतणउं कुल एसु पुत्त होसिइ । चविउ विमाणह वंभलोय धारणिउरि आविउ । सुमिणप्रभाविहं उसभदत्त अंगेहि न माईड ॥ १७ ॥ जायउ पुत्रु पहाण जाम दसदिसि उदयंतउ। वडइ नामिहिं जंबुसामि गुणगहण करंतु। अठवरीसउ हउ जाम गुरुपासि पहृतु । ब्रह्मचारि सो लियइ नीम भववासविरत्तउ ॥ १८ ॥ जोयणवेसह पहुतु जाम कन्ना मग्गावइ । वीजा धूया पाठवए तस विधारा वय । मन देजिङ तम्हि अम्ह देसु अम्हि इस करेशई।
प्राचीनगूर्जरताव्यसङ्ग्रह. सांझहं परणी प्रहह जाम नीछई व्रत लेसि ॥ १९ ॥ माय दुलंघीय तणइं चयणि परिणेवउ मन्नीउ । आठइ कन्या एकवार परिणीय घरि आवीउ । आठइ परणी मृगनयणी युझवणइ बइठ । पंचसएचोरेहंसिउं प्रभवर घरि पहठउ ॥ २० ॥ नीद्र अणावीय सोयणीय आभरण लीयंता। ते सवि अछह थंभीया टगमग जोयंता । प्रभवउ भणइ हो जंबुसामि एक साठि ज कीजइ । बिहुं विजावडई एक विज थंभणीय ज दीजइ ॥ २१ ॥ हिव हूं कहि नवि ज लेवि पुण किस करेसो । आठह परिणी ससिवयणी नीछई व्रत लेसो। रूपवंत अणुरत्त रमणि पउ एम चएसिइ । अणहंतासुहतणी य आस मुझ जीव करेसिड ॥ २२ ॥ एव? अंतर नरहं होइ प्रभवउ चिंतेई । संवेगरसि जउ गय मन प्रभवउ पूछेई । सिडिरमणिऊमाहीया ह तम्हि संजम लेसिउ । करणई विलवई माइबप्प किम किम मेल्लेसिउ ॥ २३ ॥ इंदियाल नवि जाणीइ ए को किम होइसिइ । अढार नानां एकभवि जंवृस्वामि कहेई । पितर तम्हारा जंबुसामि किम तृपति लझेशदं । पिंड पडइ लोयहंतणइ प ऊभा जोसिहं ॥ २४ ॥ चाप मरवि भइंसु हुऊ पुत्रजन्मि हणीजह । इणपरि प्रभवा पितरवृति तिणि धीवरि कीजह । अणटुंतासुहतणी य आस ह त छांडेसिउ । तिण करसणि जिम कलत्र भणड अवतरता करेशिउ ॥ २५ ॥ तम्ह सपिहिं हउँ लोभ कर देपि मणहर स्पटउं । हत्थिकडेवर काग जिम भवसायर निवड । बीजी कलत्र कहेवि नाह जड अम्ह ठंडेसिडे। तिणि वानरि जिम पच्छुताव बहु चीति घरेसि ॥ २६ ॥ विदुसमाण विसयसुरू आदर किम कीजइ ।
BHARA
S.N ४५
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जबूसामिचरिय
इंगालवाहग जेम तुम्हि तृस किम न छीपद ।
त्रीजी कलन भणइवि नाह जड अम्ह छांडेसिउ ।
तिणि जंबुकि जिम साणहार बहुखेद करेशउ ।। २७ ॥
ऊतर पडि ऊतर वह य संखेवि कहीजई।
विलखी हुई ते सबि बाल जंबूसामि न बूझई ।
आसातरुवर सुक जाम अम्हि इश करेश।
नेमिहिसि राइमह जिम वयगण करेशउं ॥ २८ ॥
आउड कलत्रह बूझवीय पंचसयसिमभवउ ।
माइ वाप बेउ भणइं ताम अम्ह साधुसरीसउ ।
ठवणि-प्रह विहसइ सुविहाण प्रभवु विनवड जंबुसामि ।
सजनलोक मोकलावि तम्हिसिउं संजम लेसि ॥ २९ ॥
ग्वण एक पडपाएवि राय मोकलावण चालीय।
तु सुहडसमूह करेवि भुइं कंपई भडभडवर्ड ॥ ३० ॥
जस भय धसका राउ जस भय नींद्र न वयरीयहं ।
एसउ प्रभवउ जाइ नरनारी जोयण मिलीय ।
पहुतु रायदुवारि पडिहारिई वोलावीउ ।
येगिइं राउ भेटावि अम्हि अछउं उत्सुकमणा ए ॥३१॥
पुत्ततणउ विझ राय तुम्ह दहिसणि ऊमाहीउ ओ ।
कारण जाणीउ राय वेगिहिं सो मेल्हावीउ ओ।
देटि न ग्वंडइ राउ प्रभवउ देपी आवतउ ।
साचऊ ए भडिवाउ पुरुषह आकृति जाणीइ ए ॥ ३२ ॥
रूपगुणे संपन्न रायरमणिमन चोरतु ओ।
सोहइ पूलिपचंद अइद्रव कोणी प्राणमीर।
नुतउ अडसीय शरीर जइ कोइ जणणीजाइड ।
नयणे छूटुं नीर संवेगजलदरि वरिसिर ।
सामी खमि अपराध अम्हे लोक संतावीया प॥३३॥
पडिवज बोलइ राउ कोणी मनि आणंदियउ ।
धन पनुती माइ इसिउ पुन जिणि जाईउ ओ।
तो मोकलावी राउ चोरपल्ली सासंचरए।
सजनह कहीई एउ अम्हे संजम लेडश ॥ ३४ ॥
मार पिग्गादपि REलमं॥४१॥ प्राचीनगरमाव्यमवह मिण कारणि चइरागतं कारण अम्ह वोलीइ ए। मेल्ही अट्टइ वाल कणयकोडि नवाणवड ए। अनड रिडि वहत निहिं पुण पार न जाणीयए। जंयूसामिचरित महिमंटलि हरं अच्छरीय ॥ ३५॥ इणि कारणि ययराग तृण जिम दीठ मेल्हतउ ओ। प्रम्ह सोड जि सामि नमन अजिज ओ। मोरमरिंदा अझ मंजममिति झझसि ओ॥३६॥ ठवणिप्रभवर पंचमाण अवश्यरमाइबप्पो । मयिकहं परूल जाट नीयधरहंतु नीसरहए। चाली एसिवपुरिमाय मारययय निहिं जंयुसामि । तिरपणी ए जयजयकार मोहम देपी3 जंबुसामि । कंचण एरपणि दाण जिम घण घरमह भादवए। मपतक पईह गोलोक भवियजणमगरी॥३७॥ ठवणि यमग पिड मार पुत्र कला धन्न घण। देमी कृतिमारिच्छ जिण जिम जंबू परिहरए। अनइ लोक यान बन लेया तिरिं चालीउ । मंदिय जिणभरणा मारम्ममामिपामि गयउ ॥ ३८॥ भवसापर उतारि जन्मण मरणर वीर तउ ओ। पंचमात्ययभार मेग्ममाण अंगमदए। अनु तेतर परिवार मोरममामिहिं दिरफीउ ओ। हर दमाण मंजमरान । पालनांग ॥ ३१ ॥ पारनिणिंदा नापि ये लिप पाटिलउ । प्रभाव पारीउ पाटि मिरि पटतु जंयुभ्यामि । शंसमामिपरिन पांगुणा जे मंभल। मिरिमुग्ण भणन ते नर मोनाहि पामिभिः ॥ ४ ॥ मगिरिगुमगार पम्म भगा तो मजा गिन रानिदिपमि न सिरिधि उमाया पागयरमा पायित नापने me! श्रीम
सप्तक्षेत्रिरासु
सप्तक्षेत्रिरासु
सवि अरिहंत नमेवी सिद्ध सूरि उवझाय ।
पनरकर्मभूमिसाहू तीह पणमिय पाय ॥ १॥
जिणसासणहमाहि जो सारो चउदह पूरवतणउ समुधारो।
समरिज पंचपरमिष्ठि नवकारो सप्तक्षेत्रि हिव कह विचारो॥२॥
धुनु धुनु ते जि संसारे जीहं जिणवर स्वामी।
गुरु सुसाहु जिणभणि धम्मु सुग्गडगामी ॥३॥
बारि अंगि दुलहु मणुजम्मु अनी अ विशेषिहि जिणवरधम्मु ।
सम्मत रयणु चिति निवसइ जीह सोहग ऊपरि मंजरि तीह ॥ ४॥
पुणु जिणसासणु दुलहलं जीव संभलि कथनु निरुपमु ।
नाणुपहाणु एकु जि जिनवरधम्मु ॥५॥
भरहखित्ति खट्पंडह थित्ति केवलनाणि जिणवर जपति ।
वैतात्यपरहां त्रिनि खंड होइ तहि धरमनामु निवरतन तोइ ॥६॥
उल्या निहु खंडि थित्ति केवलि हम आपइ ।
तीहमांहि दुनि पंडने पडिया पापड ॥ ७ ॥
मझिम पंड इकु वइनी मडिउ तेउ बिहभागि पाछइ पडिउं ।
चउथउ भाग धरमन लागे तेउ जोईजड सयमइ भागे ॥ ८॥
ते अ नवाणवह भाग साह मिथ्यातिहि जडिउं ।
थाकतउं कुमतिकुबोधिकुगुरुग्गहि पडिउं ॥९॥
थोडा जीव केई दीसंते जे जिणभणिों मनिहि करंति ।
हिव तिहुयणिहि सारु समिकतु पामिउ जीवि जिनभणिउ नवतत्तु ॥१०॥
वार वरत तई पामिउ जे जिणयरि वुत्ता।
सुगइनिबंधण सत्ता जीव मुगति दीयंता ॥ ११ ॥
प्राणातिपातनतु पहिल होई वीजा सत्यवचनु जीव जोई।
त्रीजइ ति परधनपरिहारो चउथड शीलतणउ सचारो ॥ १२ ॥
परिग्रहतणउं प्रमाणु व्रतु पांचमइ कीजई।
इापरि भवह समुद्दो जीव निश्चय तरीजह ॥ १३ ॥
छह व्रतु दिसितणउ प्रमाणु भोगुवभोगवत सातमह जाणु ।
अनरयनतु दंड आवम होइ नयम व्रत सामायक तोह ॥ १४ ॥
४८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसदहः देसावगासी दसमुं व्रतु नथी मूल । पोपधनतु इग्यारमउ संजमसमतूल ॥ १५ ॥ व्रतु बारमउं अतिथिसंविभागुउ तोइ मुकतिनयर न न मागो। जे ईणइ मारगि चालइ संसारे धनु सक्रियारथ ते नरनारे ॥ १६ ॥ समकितमूल व्रतु बारइ गहियधरमि पालेवउ । सप्तक्षेत्रि जिनभणिया तिह वित्तु वावेवउ ॥ १७ ॥ सप्तक्षेत्रि जिन कहिया महामुनि वितु वावेजिउ विवहपरे । जिनवचनु आराधीउ अवक्रमु साधिउ लहइ पारु संसारुसरे ॥ १८ ॥ सप्तक्षेत्रि जिनसासणिहि सबली कहीजई। अथिरु रिधि धनु द्रव्यु बीजउ तहि जि वावीजइ । तेहि क्षेत्रि वावेत्रणा थानकि लाभइ देवलोको । कणनी थाहरु मुक्तिफलो पामउ निसंदेहो ॥ १९ ॥ पहिलङ क्षेत्र सु जिणह भुवण करावउ चंगू। जीछे महिमा करइ सहु श्रीचरविहसंधू । मूलगभारउगूढमंडपुछकुचउकीसहिउ । आगइ कीजइ रंगमंडपु जो पुस्तकि कहिउ ।। २० ॥ तहिं आतरइ बलामणु कीजइ आवेरउ । जिम जिनभवनह नालिमाहि दीसइ नीकर । उत्तंगतोरणु थंभयोरु घांटु अतिनीकउ । कडीयइ नानाचिधि रूपि सारु चारु तहि नीसर जडिउ ॥२१॥ विहु पक्ष फरती देहरी कीजइ अतिरूडी। ठवीजह मूर्ति जिनहतणी माहि तेवड तेवडी। कणयकलस दंड घांटीइं घज पूरीय कियजइ । छोरपकतमासा भलउ जीव नीपाइजइ ॥२२॥ तहि जिनवारि कमाड भला कीजइ अतिसुविघट। सारूआर दृढ प्रागू प जो आवइ संपुट । तालां कुंची सांकली अतिनीसल कीजइ । जउ आयमणत जाइ मृर तर संपुट दीजइ ।। २३ ।। अनिमा जिणह भुयणु किरि अमरविमाणु । दासह मूरति वीनराग माहि निहुयणुभाणु ।
सप्तक्षेत्रिरासु
कवणु रूप वीतरागतणु जोइ कवणु विशेषु।
अठ प्रतिहारि ज जिणहतणइ वृक्ष होइ अशोकू ॥ २४ ॥
भामंडलुसुरकुसुमवृष्टिसीहासणुछत्तू।
भेरिचमरदेवंडुणिहिण जोइ कवणु प्रभुत्तू।
ए थिति एसी चीतराग मेल्ही अवर न होई
सूरादिक जिनसेव करई नवि सगलई जोई ॥ २५ ॥
तर जिनजीर्णउदारु भवि जीव विशेपिहि करीयइ ।
भागउ लागउ जिणह भुवणि तेउ तोइ समुद्धरिया।
लीपिउ धउलीउ भीगु देइ चीत्रामु लिपीजइ ।
इणपरि भुयणु समारीय जन्मह फल लीजइ ॥ २६ ॥
अनीउजु काई किंपि ठामु जिणभुवण सीदाइ ।
तं निश्चिई करावीयए बहुफलु बोलाइ ।
आपणि सामिउ वीतरागु ईणपरि भणेइ ।
जीर्णोडारहतणा पुण्य तेह अंत न होइ ॥ २७ ॥
बीजं खेनु सुजिनह बिंदु ते इहां विचारो।
मणिमय रयण सुवर्णमए विंव रूपम कारो ।
हिव जिनभुवणह गृहचैत्यदेवरा छ कहीसह ।
कीजइ कणयभिंगार कलस जे नीर भरीसइ ॥ २८ ॥
तउ सीलमइ करावीयइ जिनभवन ठवीजह ।
पारइ पीतलमइ भलां ग्रिहचैति पूजीजइ ।
घरि देवालाई कराविय नीकाइ मणोहर ।
जीछे तिहुयणसरण सामि पूजीजइ जिणवर ॥ २९ ॥
सुगंधि नीरि सनाथु करइ जिण जीणि आणदिहि ।
ते संसार कसमलह नवि छीपइ विदिय ।
अंगलूहणे सक्षम करउ सुफरां बहुमूलां।
नियनियसक्ति करावियइ कीजे देवंगतृलां ॥३०॥
कीजइ ओरसु ख्यडा सिरवंट घसेवा।
कपूरवटे वाटीइ कपूर जिनस्वीमुग्वि देवा ।
मूंकइ जिणभुयणिहि धोति अतिनीकी धूपी ।
चालाकुची पूंजणोइ पीगाणी ङ्केपी ॥ ३१ ॥
५०
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रह
अतिसुगंधिहि सिरखंडिहि कपूरिहि आंगी।
कीजइ सामी वीतराग प्रभु नवनवभंगी।
कस्तूरिहिं कुंकुमिहि तिलउ निलाडिहिं सामी ।
ते पुण वितपति करह भली अतिनीका धामी ॥ ३२ ॥
तउ आभरण चडावियइ सोत्रणमय घडिया।
हीरे माणिकि मोतीए वहुरयणे जडिया ।
अतिख्यड आभरणउ भल कीजइ संपूरउ ।
नीकडं सिहर पूठिउं हृतलि अनइ मनरउ ॥ ३३ ॥
कानिहि कुंडल सिरि मुकुटु किरि गिउ भाणूं।
जाणे तिहयणि सयल लोक अभिनवउं विहाणूं।
उरह माल कंठि सांकल मुक्तावलिहार ।
नयणि निहालिन वीतरागु ख्यटउ सुरसार ॥ ३४ ॥
वाजुयलि वेउ वहिरवा अतिनीका सोहई ।
टोलूउं श्रीवत्सु साख्यार भवियण मणि मोहइ ।
सोनाकेरी पालठी कीजइ जिनपत्ते ।
सोरह वोजउर ख्यड सामीजिणहत्थे ॥ ३५ ॥
इणि विकिहि घटु य विशेपिहि जिणवरपूज सलरकणी य ।
करउ मनरंगिहि नवनयभंगिहि श्रीसंघनयणसुरामणी य ॥३६॥
एती अ जोइ आभरणतणी पूजा नीपन्नी।
हिय आरंभिसु जिण अंगि सुरहां कुसमन्नी ।
कीजह कुसमे चंगेरीया पूज फारणि रूपडी।
यावरीह दीहु देवकाजि अन्नइ छाजी छचटी ॥ ३७ ।।
रायचंपु केतकी जाइ सेवनी परिमल ।
यउलि सिरीवालउ चेअलु अनु करणी पाडल ।
नीलउग्री विचि पूजमाहि सोहइ अतिचंगी ।
वितपति दीसह ख्यडे तिणि नवनवभंगी ।। ३८ ॥
नीफर फणयह पूजमाहि यरणकि सोहंती।
परिमलु पसरह कुसुमजाति पाउद विहसंती ।
पुंदु अनइ मुचुछंदु धालु ई परिजाते।
पसे कुसुमि करउ पूज तुम्हि नियणपत्ते ॥ ३९ ॥
राप्तक्षेत्रिरासु सुरहउ सख्यउ बावची अनइ कल्हार । सहुयह सोहह वीतराग सामी सुरसार । नीलउन्त्री नागवेलि पानमाहि जा सोहह । ईणपरि पूजइ सामिसाल नरनारी धन्न ॥४०॥ एहि रामणीयइ पूज तोइ नीकी सोहंती। तउ नक्षत्रहतणी माल दीवाशू चंगी य । खेलीयइ माहि भुयण जिणविवहकेरी। आणी कुसुमे पूजियइ ते सवि संखेवी ॥ ४१ ॥ समोसरणु जो पूजीयए जो तिन्निपयारूं । चिहु पखि दीसइ वीतरागु जहि तिहुयणसारू । तउ पूजा नीपनी पूठि धूपउटजउ लीजइ । वीजणिय ऊखेवितु गुरु तहि घंटी वाजइ ।। ४२ ।। धूप अगुरु सातिवारेसि डाबडी जि कीजइ । दंडासणे अतिख्यडे जिणभुवणु पुंजीजइ। आखेरिहिं मंजूस भली अन्नय चउकीवट । ढोइउ आखे करउ भली य मंगलीक आठ य ॥४३॥ वद्धमाणु वरकलसु अनइ भद्दासणु छत्तू। दप्पणु नंदापरतु तहि साथिउ श्रीवत्सू । अठ मंगलीक तीण पाटि भरिया जिनआगइ। इणपरि जं धन वेवीइ ए तं लेखह लागइ ॥ ४४ ॥ दीवा कीजइ जिनमुवणि छत्रत्रउ दीजड़। चमर ढलते वीतराग तेहि धनु वेवीजइ । तेउलोच कारावियइ जिणभुवणमज्झारे । वाचोटा मरवर अलंब कीजइ जिनवारे ॥४५॥ तोरण वंदुरवाली वारि सापि जिणभुवणि । पूजा जोइ सहु कोइ आपइ तीणि पिणि । पूजा जोइवा जिगह भुयणि तोइ सुहगुम आयइ । तउ संघिहि आग्रह करीउ तोछे रहाविय ॥४६॥ पडपउ वेला एक प्रभु अहां उच्छचु होसिइ । संघक्यणु मानेवि सुगुम निसि सिखं पइसई ।
५२ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः तिणि वेलां वइसणां पाटि जोइ पाटल्ला । चउकीवटि वासंति सुगुरु तउ भावइ भल्ला ॥४७॥ वइसइ सहइ श्रमणसंघ सावय गुणवंना। जोयइ उच्छयु जिनह भुवणि मनि हरप धरता । तीळे तालारस पडइ बहु भार पदंता। अनइ लकुटारस जोइई खेला नाचता ॥४८॥ सविह सरीया सिणगार सवि तेवर तेवटा । नाचइ धामीय रंभरे तर भावइ रूडा। सुललित वाणी मधुरि सादि जिणगुण गायंता। तालमानु छंदगीत मेलु पार्जिन वाजंता ॥ ४॥ तिविला झालरि भेरु करडि कंसालांवाजई । पंचशब्द मंगलीकहेतु जिणभुवणई छाजइ । पंचशब्द वाजंति भाटु अंबर बहिरंती। इणपरि उच्छवु जिणभुवणि श्रीमंधु करंतउ ॥५०॥ तउ आरत्ती परुगुणउं की आरती पटऊपरि। ठिउ संघपति विधिहि सहित तज साहीउ विहुकरि । नीर लुण अतारियए कुसुम ऊनारी। संघपति ऊठी सेसि भरई सइहत्यिहि माडी। संघपति आरती लिया हुइ जउ बार वडेरी। आरती जोगी थांभली अ आणउ गमारी ॥५१॥ पाछइ जिणगुण गाइ पढइ सह पालउ लोक। श्रीसंघु तीह अ दानु दियई जीह जैसा जोगू। ज्तारीइ आरतीअ तोइ संघपति सइ हरखिउ । रोमांचीसारीक तहि जिणदंसणु देखीउ ॥५२॥ मंगलीकु ऊतारीयए घंट वाजइ सहई। श्रीसंघु करइ प्रभावना जिणसासणि गरुई । तउ विधि बांदियउ वीतराग श्रीसंघु उतारीउ । इणपरि सुकृतभंडारु तोइ भव्यजीविहि भरियउ॥५३॥ जे जिन भुवणतणां कृत्य ईह छेडइ कहिया । ते गृहचैत्य करावियइ सविशेपिहि सहिया ।
सप्तक्षेत्रिगसु अनि अ ज काई कोइ ठामु मूं हुई वीसरियउं । तेउ तुम्हि भविय करावि जि अ सहइ सांभरियड ॥ ५४॥ उछयूँ जिनभुवयणि हरपि नियमणि करइ संघु जयवंतु । नितु हिव त्रीजउ क्षेनु कहिसु पवित्तू सुणउ जीव जे जिणभणितृ॥५५।। जीजउ क्षेत्र सु संभलउ ए वरलोयणे जं भणि वीयराइ । गुणगंभीर सो जिणह वयणु मृगलोयणे तमु नवि ऊपम काइ ॥ ५६ ॥ वचन इकेका मूल नहीं वरलोयणे जं बोलइ भगवंतु । निहु भुवणे चूडामणिय मृगलोयणे सह जाणइ अरिहंतु ॥५७॥ पढ कवण व्याप जिनवचनतणउ वर० बुज्झइ लोकु अलोकु । सउ जि सिद्धत जसलहीअइ ए मृग० देअइ सिद्धिसंजोगु॥१८॥ गणधर करइ जं पुब्बधर वर० सुयकेवलिहि करंतु । दसपूरवधर जं करइ मृग० तं भणियउ यइ सिडिंतु ॥ ५९॥ बिहु भुवणहतणउ जाणियइ घर० आगममाहि विचाम् । चउदपूरव इग्यार अंग मृग० करइ गोतमु सुतिहार ॥ ३० ॥ सूत्रहार तहि निउछणा ए वर० जिणि जाणिउ एउ सूत्र । त्रिपदी आपी य वीरनाधिद मृग० आघउं गोतम वृतु ।।१।। केवलनाण चुच्छिति गयउं वर० गया सवि पूरवधर । जे हुंता गुरु प्रज्ञघणउं मृग० गया सु ते मुनिवरा ॥ १२ ॥ अल्पप्रजह नवि थाहरए वर० जिणवयणुं निम्पम् । तीण कारणि श्रीसंघ मिलीय मृग० पोथे ठवीउ आगमु ॥३३॥ भक्षाभक्ष सो बुज्झियए यर० अन्नी गम्मागंमु । कृत्याकृत्य परीछियए मृग० जाणीयदृ धर्माधर्म ॥ ६४ ॥ धन जीयी लाहुउ लिउ ए वर० युझियह पहु विचार । श्रीसिद्धंतु लिग्नावियए मृग० जोउ बिहुभुवणह साम् ॥ ५॥ जीजउ क्षेत्र इस धावीयए पर० चित्ति संवेगु धरउ । येवीउ वित्त लिम्बावियए मृग० श्रीसिहान्त जउ ॥ १६ ॥ वाहदंड पोया कराउए यर० पोषीय नीकी य तोट । ज्ञानलगद सवि लाभ हुइ मृग० एह पिचार तूं जोड ॥ ३७॥ पाठां दोरी वीटणां पर० यर मिहांतह भत्ति । पानीदौरा ऊतरीय मृगलोयणे पोथीय पोथीय सत्ति ।। ६८॥
प्राचीनगूरफान्यसबारः कामदेव जिम चलइ नही वीतरागह धर्म । वीरनाहु जिणवम दियइ तसुनी जपम्म ॥ १७ ॥ सदाचार सुविचार कुसलु अनइ निरहंकार । शीलवंत निकलंक अनइ दीनगणआधार । जिनह वचनि तिम सातधातु जीह श्रावक भेदी । जाणे तीह गर्भवासवेलि मूलहुंति छेदी ।। ९८ ।। जाणइ चितु सह काय साच3 वियहार । त्रिधा सुद्धि मनमाहि वसइ इकु निश्वउ साम । उत्सर्ग अनइ अपवाद एह जाणइ सविसेपू । भणियइ आवतणी भावीय मूलिइ सा जीह पहु विवेक ॥१९॥ जे पुण श्रावकतणा भविय कहीयइ जिणसासणि । ते गुणु जिण भणइ प्रावियह जाणेया नियमा ॥ १०० ॥ विधा सुहि वीतराग वसइ मनभीतरि जीह । सुलहउ मिवपुरतणउ वासु तो श्रापक तीह । पढइ गुणा जिणवयणु सुणइ संवेगि संपूरिय । मील सनादि पहिरिइ ग्रामपरि सरी ।। १०१ ॥ इंह तु धायकनगर क्षेत्र वायु मवि दीस । जे तुम्हि भविपउ अचाइ काइ धर्मनणी जगीस । जिम भरयेमरि वावी रिसहेमरनंदणि । गृहवासपरि ज्ञानु जासु पमरी नियणि ॥ १०२॥ तिम तुम्हि यारेउ भलीपरि भविउ उ वितु । लहिसउ फल निरयाणनयरि तिम नियां यहतु । पहिलं कीजद महाविनई गुणधायक जाणी। पार पपालीय महाशि सेउ कृम पाणी ॥ १० ॥ पार भोजन भलीयभक्ति मयिगकिहि महिपा। दीजा प्रायफयायिकां पर आगमि कहिउ । उपरि गरि पल पान कपट अनुमानिए । दीजा नितमगि भनांगागद याहुमानि ॥ १०४॥ भरंगमर सिम पायकह दीनद आपासे । मोगा सिनयमणि भरा गुण नियाम ।
सप्तक्षेनिरासु
५७
वाछिलनी परि एक कीसउ परि हुअइ असंख ।
विधिमानु फरसइ सह कोइ नरनारी दुःख ॥ १०५ ॥
वाछिलनी परि एकजीभ हउं कहि न सकउं ।
एकह वारु सारु सकृ तुम्ह कहीउ अज मू किउं ।
जं जं कीजड कुणवकाजि अतिभलां भलेरा।
ता कीजह साहमिय प्रति अजी अधिकेरां ।। १०६ ॥
कीधे काजे कुटंवतणे अतिघणउ संसारो।
जं कीजइ साहमिअकेरउ काजि ते परत भंडारो।
इणपरि वाछिल आवकह कीजइ सुरचंगू ।
हव ते कहीइसिड जिणभवणि वाछिल अंतरंगू ॥ १०७॥
जिणपरि लोग समाराअए सवि साहमिअकेरु ।
थाकइ जिम संसारमझि पलि पलि एउ फेरु ।
कीजइ भावकभाविकारहि यरपोपधशाल।
जीछे करिसिइ धरमध्यान तु हरपि सवि काले ॥ १०८ ।।
पटुजीवरक्षा सवि काल तीछे दीसंती।
समकितसिउं वार य व्रत जीव अनेकिद लहंती।
प्रतिमा नीम अभिग्रह संपनड तिणि हाट ।
अनेकि सुकृत ऊपजइ कुहियाकडेवरमाट ॥ १०९ ।।
तीछे सुगुरु वपाणु करड आगमभंडार ।
सह समाधियह सांभलइ व्यय नरनारे ।
थापनाचार्य चउकीवट सिंहासण कीजह ।
नउकरवाली चिरवला मरपत्ती मुंफीजइ ।। ११०॥
संथारा ऊतरउट पाटि कीजद पुंछणा।
कर पोसाल पाटला अनइ दंडाळणा |
काजामेलणी य पउंजणी य काजाजधरणी।
पौषधसालातणइ ठामि ए काजह करणी ॥ ११२ ।।
कीजह कमली ठवणी य याचीजड सिद्धांतु ।
ज्ञान पदंता जोय तोरा फर्मक्षय अनंतु ।
जइ ज्ञान पटिलेल्या मोरचीती य के ताई।
दोसई आपर पटवदा अनड जदणा होई ॥ ११ ॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः त्रीजउ क्षेत्र इम पायउ निरुपम लियउ लाभु हुंतातणउ । जिम अट्टकम्म गंजीउ भवदुह भंजीउ सिद्धिनयरि खेमिइ मुणउ ॥६९॥ हिव श्रीश्रमणसंधभत्ति करउ जीव तुम्हि यथासक्ति । पहिलर कीजइ तोइ पावयणा अनी य विशेपिहि आयरियठवणा॥७॥ इणपरि श्रमणुक्षेनु वावीजइ निश्चय भवसायरु तरीजइ । जे जिनपरि मुनि कहिया आगमि क्रियासार अनइ खरतर संजमि७१॥ पंचमहब्बयभारु धरंता दस अनु च्यारि उपगरण वहता। नव कल्पिइ विहार करता ते मुनि भणियई चारित्तवंता ॥७२॥ जे मुनि पंच समिति छइ समिता बिहुहि गुप्तिहि जे अछइ गुपिता। सीलंग सहसअढार चहता ते मुनि भणियइ उपसमवंता ॥ ७३ ॥ जे मुनि निम्मल निरहंकार सदाचार दीसइ सुवियार । जे धुरि जूता गणगच्छभारा ते मुनि भणिया गुणह भंडारा ॥ ७४ ॥ ईणपरि भल्ला क्षेत्र विशेपि दियउ दानु तुम्हि भवि हरखि । जिम तु छुटउ भवना भार पामउ सिवसुखु निरुपमसारु ॥७॥ जे जिनआण सदा छइ रत्त बावीस परीसह सहइ अपमत्त । जिनआदेसु धरइ सिरिऊपरि ते जि महामुनि नमीयइ सुरवरि ॥७६ ॥ वईतालीसदोपसुविसुद्धउ लियइ आहार जे जिणवरि दिउ । इंदियविपयव्यापिनवि गूचइ तवि नीमि संजमि खण विनमूचइ ॥७॥ किसुं घणउं हां कहउ विचारो मुनिरयणगुण न लहउं पारो। अनुनतु चालइ जे जिनआण ते मुनि भणीयह मेरुसमाण ||७८ ॥ प्रसंसीइ मुनि जिहि गुणि सहिया ते गुण जिणवरि श्रमणी कहिया। एक विशेष पुण श्रमणी दीसइ यहइ उपगरण तोह पंचवीसह ॥ ७९ ॥ चालइ ग्यद्गधार तोइ ऊपरि सीलवंत ति नमीई सुरवरि । महासती जे छइ अपमत्त धारा भणइ तेहि पवित्त ॥ ८ ॥ जीह जिनआण हियह परिणमी ते श्रमणो तोइ मेरह समी। जे सिडी जिणआण करती धनु धनु श्रमणी ते महासती ॥ ८१ ॥ जिणसासणु जेहि य इम उन्नालिउ कसिमल पावपंकु पग्वालिउ । एउ साह अनद श्रमणी वित्त वाविन धामी हुई उ सचित्त ॥ ८२ ॥ जा हिवहांतं संपति अच्छह इसीय परापन पामिसि पछइ । जउ भलरोत्रिहि चित्त नबाविसिपाछह परभवि किसउ लुणाविसि|८३।।
सप्तक्षेत्रिरासु पराप टली वितु याविसि सारु गिसि खडसलु काइ कतवार । जउ भलक्षेत्रि वरापहं वाविसि तउ इकुगुगइ अर्णतगुणं पाविसि ॥८४॥ ए भलं क्षेत्रं जिनवरि कहिया वावे धम्मी भावणसहिया । तउ सीचे अनुमोदनापाणी जिम हुइ सफली गय निरुवाणी ॥ ८५ ॥ ईणपरि वावीजइ मुनिखेनु दीजई भक्त पानु सूझंत । विद्यादानुं जउ दीजई सारु जिणु भणइ तेह पुन्य नहीं पारु ॥ ८६ ॥ ओषधआदि सहु सझतउ तं तं दीजई नियरिहंतउं । अनिउज काई मुनि उपगरइ तं सूझतूं वहरसं करह ।। ८७ ॥ जं जं मुनि जोअइ सृझंतचं तं तं दीजई नियघरुहुंतउं । गुरु आवंता कीजइ अभिगमणउं दीजइ भक्ति थोभवंदनउ ॥ ८८ ॥ विनउ वेयावचु अनीउ विशेपिउ कीजइ भवीउ महामुनि देखीउ । पर्युपास्ति तही कीजइ घणी य जिम जिम जिनवरि आगमि भणीय॥८॥ एह ज परि श्रमणी जाणेवी करउं भक्ति तुम्हि हरिख धरेवी । जे मृझ महामुनि दीजइ तं तं श्रमणी कीजइ ॥ ९० ॥ आगह तोह पूर्विहि सुणीजइ धनु धनु सारथवाह कहीजइ । घीउ विहिराविउ जिणि मुणिंदउ तिणि फलि हयउ पढम जिणंद ॥२१॥ हथिणाउरि नयरि श्रेयंसिहि पाराविउ रिपुभु इक्षुरसिहिं । तिणि फलि तिण भवि केवल ज्ञानु दिइन भविकु मुनि इणपरि दानु॥५॥ वीर जिणेसर छट्ठा मास चंदण पारावह कोमास । तीणि दानि शिव संपति पामी दियउ दानु तुम्हि अनुबन धामी ॥१३॥ जोहन संगमि की मुनि पारावीउ ग्वंट खो घीउ । तिणि फलितु सर्वार्थसिद्धि पामी पाछइ होसिइ सिवसुहगामी ॥१४॥ इउ भहउ खेतू वाघउ वितू अतिफलीभइ संवेगचित्तू। सिवसुह संपत्ती देइन भत्ति सामिसाल आगमि भणित्ति ।।१५।। हिव तोह श्रावकतण क्षेच भवी कहीसह । जउ जिणसासणतणी भूमि अतिभलउ फलोमिह । फिसर सुश्रावक जाणियउ जिणसासणभिंतरि । श्रीवीतरागतणी प आण मानइ सिरपरि ॥१६॥ ममकिनमूल बार वरत पालइ नरनारि । नियसइ हिगटइ घीनरागु एक जि सुरसार ।
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः ईइ सातइ क्षेत्र इम बोलीया आगमअणुसारे । पुण तुम्हे वावीयं भलीयपरि वित्त आपणरे ॥ ११३ ॥ न्यायनीति वितु लिङ तीउ थानकि वावे । जिणसासणि वेवीतु कुलि कमल सु चडावे । संघसमुदाइ सहू कोइ तीरथ चंदावे । देवजात्र गुरुजात्र करीइ तउ भलउ भणावे ॥ ११४ ॥ इम वितु सु वेयर धम्म सु संचड अप्पं जीव म पंचसुत्र । चली न लहिसउ प्रस्तायु एसउ करउ सफल भव माणसउ ॥ १२५ ॥ सातक्षेत्र इम बोलिया पुण एकु कहीसिइ । कर जोडी श्रीसंघपासि अविण मागीसह । कॉईड ऊणं आग बोलिउं उत्सत्र । ते बोल्या मिच्छा दुकडं श्रीसंघविदीतुं ॥ १६ ॥ मूं मूरप तोह ए कुण मात्र पुण सुगुरुपसाज । अनइ ज त्रिभुवनसामि वसइ हियडइ जगनाहो । तीणि प्रमाणिइ सातक्षेत्र इम कीधऊ रासो। श्रीसंधु दुरियह अपहरउ सामी जिणपासो॥ ११७ ॥ संवत तेरसत्तावीसए माहमसवाटइ। गुम्बारि आवी य दसमि पहिलइ पग्ववाडइ । तहि पूरु हऊ रासु सिव सुग्व निहाणूं। जिण चश्वीसइ भवीयणह करिसिइ कल्याणूं ॥ १२८॥ जां सिसि रवि गयणंगणिहि ऊगइ महिमंडलि । ता बरतउ एउ रासु भविय जिणसासणि । निम्मल ज ग्रह नक्षत्र तारिका च्यापई । गययंतु श्रीसंच अनह जिणसासणु ॥ ११९ ॥ इनि सप्तक्षेनरासः समाः।
कलीगसः ५९ कछलीरासः गणवह जो जिम दुरीउविहंडणु रोलनिवारणु तिहयणमंडणू पणमवि सामीउ पासजिणु। सिरिभद्देसरसरिहिं वंसो बोजीसाहह वंनिसु रासो धमीय रोल निवारीउ । सग्गपंड जिम महीयलि जाणउं अठारसउ देसु वपाणउं गोउलि धन्नि रमाउलउ ॥ अनलकुंडसंभम परमार राजु करई तहिंछे सविवार आबूगिरिवरु तहिं पवरो। विमलडवसहीं आदिजिणंदो अचलेसरु सिरिमासिरि चंदो तसु तलि नयरी य वन्नीयए। जणमणनयणह कम्मणमूली कली किरि लंकविसाली सरप्रवचावि मणोहरी य ॥ वस्त-तम्हि नयरी य तम्हि नयरी य वसइं वह लोय । चिंतामणि जिम दुच्छीयहं दीइं दानु सविवेय हरिसि य । सच्चई सीलि ववहरई कूडकपटु नवि ते य जाणई। गलीउं जल वाडी पीइ धम्मकम्मि अणुरत्त । एकजीह किम वन्नीइ कली सु पवित्त ।। हिमगिरिधवलउ जिसु कविलासो गुरुमंडपु पुतलीयविणासो पासभूयणु रलीयामण। भवीयहं गुरु मणि आणंदु आणइ जसहटनंदणु तं परिमाणइ सतरि भेदि संजमु परिपालइ । विहिमगि सिरिपहसुरि गुण गाजइ एगंतर उपवास करेइ वीजा दिण आंबिल पारे । सासणदेवति देसण आवइ रयणिहिं ब्रह्मसंति गुरु वंदीइ कविलकोटि श्रीय- सुरि विहरंतई। मालारोपण कीयां तुरंतई सइ नर आवीय पंचसयाई समिति नंदई वह य ययाहा छाहटनंदणु बहु गुणवंतउ दीग्य लीइ संसारविरत। लापणछंदपरमाणपरिररुणु आगमधम्मयियारवियरफणु । छत्रीसी गुमगुणि जुत्तउ जाणीड नियपदि विउ निम्न।
६० प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः माणिकपहुसूरि नामू श्रीयसरिप्रतीछीउ कछूलीपुरि पासजिणभूयणि अहिठी॥ सावयलोय करई तमु भत्ती नवनवधम्ममहसवजुत्ती । श्रीयसरि आरासणिअठाही अणसणविहि पहतउ सुरनाही। निवीय आंविलि सोसीय नियकाया माणिकपहसरि चंदउ पाया। विणठदेह जस धवलह राणी पायपखालणि हुई य पहाणी । माणिकसरि जे कीध जिणधम्मपभावण इकमुहि ते किम बन्नड भवपाव- पणासण ॥ कालु आसन्नु जाणेवि माणिकसूरि नयरिफछुलि जाएवि गुणमणिगिरि । सेठि बासलसुर वादिगयकेसरी विरससंसारसरिनाहतारणतरी । संधु मेलवि सिरिपासजिणमंदिरे वेगि नियपाटि गुरु ठविउ अइसइ परे । उदयसिंहसूरि कीउ नामि नाचती ए नारिंगण गच्छभरु सयलु समपीजए। सम जिम भवियकमलाई विहसंतओ नयरि चड्डावली ताव संपत्तओ ॥ वन चत्तारि वरवाणि जो रंजए राउलो घंघलोदेउ मणि चमकए । कोइ कम्माली पाऊयारूढओ गयणि खापरिथीइं भणइ हर वादीओ। पंडित भणे तापसे हारियं राउलोधंधलोदेविहिं चिंतियं । वादिहिं जीत नयरो नवि कोउ हरावइ उदयसूरि जइ होए अम्ह माणुरहावइ ।। यस्त--जित्त नयरि य जित्त नयरि य सपलमुणिसीह । नीरंतई नीम पडो गल्यदंडटयक करंतई। धंधल राउल विनवइ सामिसाल पइ मझि संतई। वंभण तपसीय पंडीया जंतन बंधई बाल । सु गुरु कम्मालिउ निजणीउ अम्ह अप्पर वरमाल । धंघलजिणरि सवि मिलिय राणालोय असेस । उयहरि संघिहिसहीउ नियसह ए नियसइ प निवसद वरहरि पीठि ।। सत्थिपमाणी हरावीउ मंनिहिं ए मंत्रिहिं ए मंत्रिहिं पादुकमठो ॥ सेपंवर त हिव रहिजे जे गुरु सिद्धिहि चंडो। बिमहरू आयतु परिपलि जे लंपीउ ए लंपीउ ए लंपाउंदंदु पयंटो॥ तउ गुरि मुहंतां मिल्हिकार होई गरड पणेण । घाईउ लोपउ चंयुपडे गिलीउ ए गिलीउ ए गिलीउ छालभुयंगो ॥ पाउपिल्लि वि संमुहीय टरहरंतु थीउ वायो। जोयणहार सवि पलभलीय हीयहई एहीपटई प हीपडइ पीउ दायो।
सालिभद्दकफ तउ गरि मूकीउ रयहरणु कीघउ सोहु करालो। वाघह जं ता दुरि थीउ हरिसीउ ए हरिसीउ ए हरिसीउ नयरु सवालो। इत्यंतरि मुणि गयणठिय तमु सिरि पाडीय ठीव । हुउ कमालीउ कालमुहो लोकिहिं ए लोकिहिं प लोकिहिं वाईय चूंब ॥ छंडीउ माणु कवालघरो धाईड वंदइ पाय । खमि स्वमि सामि पसाउ करी जीतउं एजीत ए जीतउ तई मुणिराय॥ वस्त–ताव संधीउ ताव संघीउ ठीव मंतेण। गणहरि करि कम्मालीयह भित्रभरीउ अप्पीउ मुहत्तिण । रामिहिं जिम वायसह इक निजुत्त सु हरीउ सत्तीण। धारावरसि कयंतसमिभिंडीउ डिंभीउ ताम । प्रतपउ कोडि वरीस जिनउदयसरिरवि जाम ॥ चड्डावलिहिं विहरीउ प्रभु पहुतउ मेवाडि । पासु नमसीउ नागदहे समोसरीउ आहाडि ॥ जाल फुदालिय नीसरणी दीवउ पारउ पेटि । वादीय टोडरु पइ धरए पहुत्तउ पमणउ पेटि ॥ केवलिभुकति न जिणु भणए नारिहिं सिद्धि सजाणि । उदयसूरि पमणउ पलीउ जयत ल रायअथाणि ॥ केवलि कति म भंति करे नारि जति ध्रुव सिन्हि । तिसमयसिद्धा पनि जीय लीई आहार विसुद्ध । पीच पीर दीठंतु दीड जित्तु नंदिमुणिदेवि । गयकुंभयलि आरुहीय पदमसिद्ध मन्देवि ॥ विवरणु पिंडविसुद्धि कीउ धमविहिग्रंयु प्रसिद्ध । चीयवंदणदीचीय रचीय गणहरू भूअणि प्रसिद्ध । अम्हहं साजणसेटे छम्मासहं कालो। यसतिणि ऊरि अपनउ पदि टाविजि वालो। तेरदुरोत्तरयरिसे अप्प साई। घडावलि दिविहो जगि लोह लिहावी ॥ फछ्ली जाएवि परमकाल सुगमभागधरो। पंचम परिस यहंति सजणनंदणु दीपोउ । देवाएसु सहेवि गोठीय सत्तमे वरिस लहो ।
६२
प्राचीनगूर्जग्काव्यसग्रहः
चउदीसि मेलीउ संघु आरीठवण विविहपरे ।
गोतमसामिहिं मंन्नु आपात्रीजइ दिणी दीइए।
जोगवहाणु वहेवि अंग इग्यारइ सो पढए ।
त संजमि रणि जीतु सयरह चुकर पंचसरो॥
गूजरघर मेवाडि मालव ऊजेणी वह य ।
सावय कीय उवयार संघपभावण तहिं घणी य॥
सानीसइ आपाडि लम्बमण मयधरसाहुसओ।
छयणीनयरमझारि आरिठयणर्ड भीमि किओ ॥
कमलसूरि नियपाटि सई हधि प्रज्ञासुरि टवीओ।
पमीउ पमावीउ जीयु अणसणि अप्पा सधु कीओ ॥
पणि पहुत्तउ सुरलोइ गणहरू गंगाजलविमलो।
तासुसीसु चिरकालु प्रतपउ प्रजातिलकहरे ॥
जिणसासणिनहचंदु सुदगुरु भवीयहं कलपतरो।
ता जगे जयवंत उम्हाउ जांजगि ऊगइ सहसकरो।
तेरत्रिसाठइ रासु कोरिंटावडि निम्मिउ ।
जिणहरि दितसुणतं मणवंछिय सवि पूरवउ ॥
कलीरासः समाप्तः ॥
सालिभद्दकक
भलि भंजणु कम्मारिवल वीरनाह पणमेवि ।
पउनु भणइ ककरकरिण सालिभद्दगुण केइ ॥१॥
कित्य वच्छ कुवलयनयण सालिभद्द सुकमाल ।
भद्दा पभणइ देव तुहु कह थिउ इत्तियवार ॥२॥
कारनामयनीरनिहि समवसरणि ठिउ सामि ।
अज्जु माइ मई बंदियउ चीरनाहु सिकगामि ॥ ३॥
खरचं कुड्डु ता पुत्त कहि का देसण किय वीरि।
(कवणु अत्यु वखाणिइउ कंचणगोरसरीरि ॥४॥
खारसमुद्दह आगलउ माइ कहिउ संसारु ।
संजमपवहणहीण तसु किमइ न लभइ पार ॥५॥
सालिमद्दकक
गयममत्त वीरियपवर जे जगि पुरिसपहाण ।
सालिभद्द भद्दा भणइ संजमु सोहइ ताण ॥६॥
गारववजित विन्नव काइउ मग्गउं माइ ।
जइ मोकलउ तउ व्रतु लियउं तुम्हह पाय पसाई ।। ७ ॥
घणकुंकुमचंदणरसिण तुह तणु वासिर वच्छ ।
वयह परीसह किम सहिसि मुणि गंगाजलसच्छ ॥ ८॥
धाणइ पीलिय पंचसई खंदगसरिहि सीस ।
साहु माइ दुस्सहु सहई एरिस धम्म जिगीस ॥९॥
नवि घर लिनइ तरुणपणि सालिभ६ सुकुमाल ।
महु कुलमंडण कुलतिलय कुलपईव कुलचाल ॥ १०॥
नाउं गविहिं कुलतणई पाविजइ भक्छेउ ।
माइ मरीचि भव भमिउ चद्धमाणजिणुदेउ ॥ ११ ॥
चरणु लेसिजइ पुत्त तुहु नंदण नीयपवीण ।
रोअंती भद्दा भणई मई किम मेल्हिसि दीण ॥ १२ ॥
चारुचहिवलदेव तह वासुदेव बलवंत ।
माइ तडि हिय परियणह कड्डिः लेइ कयंतु ॥ १३ ॥
छण मइलंछणसमवयण तुह भन्ना बत्तीस ।
ते विलवंती पेमभरि किम करिसि कुलईस ॥ १४ ॥
छारु जेम उड्डइ सपल अंतेउरु घरसारु ।
माइ जी जर संचरइ उंडेविणु ढंढाम् ॥ १५ ॥
जणणि भणइ जां बालपणु तां पुत्तह पडिबंधु ।
तासन्नइ बुल्लाविअउ बहु उन्नाडइ कंधु ॥ १६ ॥
जाणिज देह असारबलु भरहिं मूकर मोहु ।
ताव माइ तमु विहिडियउं केवलनाण निरोहु ॥ १७॥
झलकंतर कंचणघडिड सत्ताहमिपासाउ।
विहवह कोडाकोडि घण कहि कोइ जण ठाउ ॥ १८॥
झाणानलि जिणि कम्मवणु बालिउ गहिउं नाणु ।
वीरनाहु महु हिव सरणि रिद्धि रमणि अपमाणु ॥ १९ ॥
नरबह सेणिउ तुम्ह पहु सुरगोभद्दु सुनाउ ।
नित्तु नवलं आभरणु कहि को चित्ति विसाउ ॥ २० ॥
प्राचीनगृर्जरकाम्यसहस
नाइकु सेणिउ तुम्ह महु जइ फिरि कहिइड माइ ।
ता घणु कंचणु गेहबलु ग्यण विन चित्ति मुहाइः॥ २१ ॥
टरटलेसि धम्मत्थ पुण धम्मगहिल्ला वाल ।
धम्म करेवा महु समउ तुहु धणुरकण वाल ॥ २२ ॥
टालिसि चरण म माइ मई देह महावपसिक।
बदमाणजिणवरकिरिहिं पुन्निहिं लन्भइ दिस ॥ २३ ॥
ठणकइ पुत्त सु चित्ति महु पुत्तचिहणिय मारि ।
विहवह मुचइ दुहु सहइ दीणी परधरवारि ॥२४॥
ठामिठामि जिउ हिंदिइउ भव चउरासीलरक ।
माइ जि सहिया नरयदुह ताह कु जाणइ संग्ख ॥ २५ ॥
डरपिसि सुणियइ सीहसरि निसुणिसि सिपफिकार ।
मुस्किइउ तिसिइउ वच्छ तुह किम हिंडिसि नरसार ॥ २६ ॥
डालिहि चडिया डालिसउ माइ महल्लायेउ ।
पच्छद कहि ह चरणु कहि वहमाणुजिणदेउ ।। २७ ।।
ढिलई चमर वर पुत्त तुहु सीसि धरिजइ छत्तु ।
मणिसीहासणि वठणउं किणि कारणि वइचित्तु ॥ २८॥
ढाउ विलग्गउ माइ महु सिवपुरि रजहरेसि ।
योलावउ ठिउ धीरजिणु रहिसु न भवह किलेसि ॥ २९ ॥
नयउं अंतेउस नवउं घर नवजोवणु नवरंगु ।
सालिभ नवकणयतणु ढल करि चरणपसंगु ॥ ३०॥
नाणु रसायणु करिसु हउँ कम्भिधणदाहेण ।
तिणि आऊरिसु माइ तणु जरा न दुधाइ जेण ॥ ३१ ॥
तिम्रतलि आवासु मुणि भिरकर भोयणु पाणु।
प्रमंडलि आसणु सयणु वच्छ चरणु दुहठाणु ॥ ३२॥
तालब भंजिवि पइसरइ माइ गेहि जमराज।
छुइ वालु न वुड्डु जणु पडइ अचिंतित्र घाउ ॥३३ ।।
'थल डूंगर पाहण सघण कक्कर कंट तुसार ।
पाणहवजिउ गुरि सहिउ हिंडिसि केम कुमार ॥ ३४॥
थाहररहि न मझुमणु माइ कहिउ तउ सम्म ।
वीरनाहु जिणु क्वहरउ लेसु चरणु धणु धम्मु ॥ ३५॥
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सालिभदकक
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दहविह धम्मु करेसि किम किम सोसिसि निय अगु.
वच्छ तहं ता दोहिल होसिह तुह सोलंगु ॥ ३६॥
दाणसीलतवभावणह अणु न सोसिउ जेहिं । LIBRART:
माइ मणूभव दुल्लहउ आलिहि हारिउ तेहिं ॥ ३७॥
'धम्मु किइउ जिम रिसहजिणि तिम किजइ सुअ इत्यु ।
पहिल साखिहि पसरिर अंति पयासिउ तित्यु ॥ ३८॥
धाडउ जमरायहतणउ पडइ अचिंतिउ माइ।
कहिउ लिजइ जीयु तिणि धुंब न बाहर काई ।। ३९ ॥
नवकप्पूरिदि पूरिया नंदण कोमल केस ।
केतगिवालई वासिया किम उद्धरिसि असेस ॥ ४०॥
नारायणबंध निसुणि तहिं दिणि दितिउ वालु।
सीसु अग्गि दुस्सहु सहइ माइ सु गयसुकुमाल ।। ४१ ।।
पट्ट सुअ तइं पहरियां रसियउं दिव्य अहार ।
सुअ उव्वासिहिं सोसिया केम करेसि विहारु ॥ ४२ ॥
पालिसु पंच महव्वई वारस अंग पढेसुं ।
चीरनाहिसं माइ हडं नवकाप्पिहि विहरेसु ॥ ४३ ॥
फणिरायह सिरि पुतं मणि मुल्लेण य बहुमुल्लु ।
(सा गिण्हता पाणहर संजमभर तस तुल्टु ॥ ४४ ॥
फाडिजइ करवत्तु सिरि पाइजइ कधीरु ।
माइ दुख नारय सुणिउ महु उद्धसइ सरीरु ॥ ४५ ॥
बत्तीसहं पहंकि त सयणु करइ नितु जाइ।
डूंगरि कासुगि करिसि किम बलि किन्न तह काय ॥ ४६ ।।
चार मास कासग्गि रहिउ वाहवलि मुणिराउ ।
नाणह कारणि तिणि सहित सीअ अ जल घाउ ॥ १७ ॥
भमिसि विहारिहिं भारिअओ नंदण तुं सुकुमाल ।
वीर जिणंदह चरणु पुणु मुणि बावन्नउं फाल ।। ४८॥
भारु माइ भुरिकय वहइ रासयसहपमुक ।
आरंकुसकसि ताहियई ताहं फु जाणइ दुख ॥ ११ ॥
मयलंधण जिम तारयहं सयलह किल भत्ताम् ।
तं यत्तीसहं बहुअरहं पछु देव आधार ॥ १० ॥
६६
प्राचीनगूर्जरयान्यसवहः
माइ महामुणि पोजिणु कुलगुरु मह संताणि ।
तसु मई अप्पं अप्पिडं जिम सुह होइ नियाणि ॥५१॥
यह त संजमु लेसि सुअ मेल्हिवि सयल सिणेहु ।
ता गोभक्षु अभागिइड हा धिगु छुउ गेहु ॥ ५२ ॥
याइवनाइगु नेमिजिणु गुणसोहग्गनिवासु।
माइ सिद्धिपणि गयउ मेल्हेविणु गियासु ॥ ५३ ॥
'रहि रहि नंदण क्यणु सुणि मा मा महं संतावि।
तुह विशु नितु कुंण पूरिसइ मुकाहरणह पावि ॥ ५४॥
राहडि पूरिय माइ तई महुकेरी सविवार ।
दिल दियावह जिणभणिय जा तियलोअह सार ॥ ५५ ॥
लहकईस संजमु लियए नंदसेणु मुणिराउ ।
सो संजमुप्पत्यइपडिउ सुअ भोगह कम्मपसाय ॥५६॥
लाहई विणिज करेसु हउँ छेहउ माइ चएसु ।
ईणि असारि देहडि य संजमु सारु गहेसु ॥ १७ ॥
वच्छ ति नारी दुकनिहि जाहं न कंतु न पुत्तु ।
महुत्तई नंदण जाइयई हिंव आविउं निरुतु ॥ ५८॥
वार स माइ सलकणीय तं मुहुत्तु सुपवित्तु ।
धन्न ति बंधव जणइजण चरण लेइजइ पुत्त ।। ५९॥
'सहसाकारिहिं गहियवउ सुमइ कंडरिएण ।
नंदण तेण य नरइदुह पामिय भट्टयएण ॥२०॥
सारउं साटउँ मिलिय मुह माइ कहिउ तउ सम्म ।
वीरनाहु किड ववहरओ लेसु चरणु धणु रम्मु ॥ ६१ ॥
'पलह मगरद पूजिसइं सजग होसिइ सोतु।
नंदण तुं थाइसि समणु एउ महु कम्महं दोसु॥ १२ ॥
पाससासवेयणपमुहवाहि माइ तणु मूल ।
जीयु तेहिं धंधोलिया उड्डइ जिम लहु तूलु ॥ ६३ ॥
समल देह कप्पड समल रत्तिदिवस गुरुआण ।
होइसिई तुं भद्दा भणइ परआइत्त पराण ॥ ६४ ॥
३५
दूहामातृका
सालिभद्दु जंपइ जणणि ए महु कहिउ जिणेण ।
संजमविणु भवभयहरणु ताणु न किजइ केण ॥६५॥
हसतरोअंता पाहुणउ ताम हसंता होउ ।
सालिभद्द संजमु लियइ महु युज्झिअइ पमोहु ।। ६६ ।।
हारमउडकुंडलकलिउ चडिज पुरिसविमाणि ।
वीरपासि पहुतउ कुमरु जण दिलंतइं दाणि ॥ ६७ ॥
क्षमासमणि भद्दातणई दिलिउ जिणिहि कुमारू ।
सालिभहु बहु तत्रु करइ आगमु पढइ अपार ॥ ६८ ॥
क्षामेविणु जिण मुनिसहिउ अणसुंणु गहिउ उचन्नु ।
सव्वट्ठह सिद्धिहि गयउ सालिभद्द तहिं धन्नु ।। ६९ ।।
महाविदेहि सु मुणि गहयि केवलनाणु लहेवि ।
सासयसुकु वि पाविसहि भवियह धम्मु कहेवि ॥ ७० ॥
इह कहियउ ककह कुलउ इकहत्तरि कडुयाह ।
भवियउ संजमु मणि धरउ पढह गुणहु निसुणे ॥ ७ ॥
सालिभदकाक समाप्त.
दूहामातृका
भले भलेविणु जगतगुरु पणमउं जगह पहाणु ।
जासु पसाई मूढ जिय पावइ निम्मल नाणु ॥१॥
उफारिहि उच्चरज परमिटिहि नवकारु ।
सिवमंगलु कल्लाणकरो जासु वि नामुचाम ॥२॥
नवनिहि धम्मिहि संपडए सफचफहरिरिद्धि ।
धम्मु इछ करि धीर जिव सइ कर आवइ सिद्धि ॥ ३ ॥
मणगयवर झाणुंकुसिण ताणिउ आणउ ठाउँ ।
जह भंजेसइ सीलवणु करिसइ सिवफलहाणि ॥ ४ ॥
सिज्झइ तमु सवि कन्नद जसु हियइ अरिहंतु ।
चिंतामणिसारिच्छ जिय पहु महाफन्ट मंतु ॥ ५॥
धंधइ पडियउ जीव तुटुं प्पणि पणि तुइ आउ ।
दुग्गड़ कोइ न ररिफसइ सपणु न बंधयु ताउ॥६॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसद्वहः अणहंता पयडेसि तुहु दोस पराया मूढ । नियदोसण पध्वयसरिस ते सवि कारिस गृढ ॥७॥ आइ किजिय जिणधम्मु करि सुत्थइ संबलु लेवि । अगइ किंपिन पामिसए अत्यइ भरिया गेह ॥ ८॥ इण भवि लद्धी रिद्धि पद परभवि केव लहेसि । अच्छिसि तिणि धणि मोहिया जइ न सुपत्तह देसि ॥९॥ ईसरु देस्किर कोइ नरु नीधिणु मणि दृमेइ । एउ न जाणइ मूढ जिउ जणु वावियर्ड लुणेइ ।। १० ।। उप्पलदलजलविंदु जिव तिव चंचलु तणु लच्छि । धणु देखता जाइसए दइ मन मेलत अच्छि ॥ ११ ॥ ऊयरु जउ भरिव कुपुरिसह तो भरियउ भंडार। इकि जीव पुन्निहि पवर लरकह कोडि आधार ॥ १२ ॥ रिणि राउलि जलि जलणि घरि तकरि धणु घणु जाइ। धम्मकन्जि जउ मग्गियए ताव परमुहु थाइ ॥ १३ ॥ रीस करंता जीव रीह अच्छइ अवगुण तिन्नि । अप्पर ताविसि पर तवसि परतह हाणि करेसो ॥ १४ ॥ लिहिय लम्भइ सिरतणउं जइ चालियइ समुदु । लच्छिहि केसवु संगहिउ तिणि विसि घारिउ रुद्दु ॥ १५ ॥ लीलइ धम्मु जु होइंसए सेवंता जिणनाहु । तं नवि मिच्छत्तिहि सहिउ जइ तपु करिसि अवाहु ॥ १६ ॥ एकहि ठावि वसंतडा एघड अंतरु होइ । अहिडं किउ महियलु मरए मणि जीवइ सहु कोइ ॥ १७ ॥ ऐ आणाइ समतण जीव न बूझइ हेव । हिंडइ रोसिं पूरिया न करइ उपसमसेव ॥ १८ ॥ ओदउ तहु लोभहतगउ जीव न फिइ निच्चु । अहनिसि तेण भमाडियउ न गणइ किच्चु अकिच्चु ॥ १९ ॥ औसरि नेह अभिग्ग पुणु पिच्छिस हिय भन्नति । चंदपल किरणेहि तहि दूरठिया विहसंति ॥ २० ॥ अंघउ अंघइ ताणियए कवणु कहेसह मग्गु ।
दूहमिातृका ६९ केवलिपहु निव्वाणि गउ धम्म मतंतरि भग्गु ॥ २१ ॥ अकयधम्मि जइ माणुसह हुइ नवकारु वि अंति । तिणि पुन्निहि तह देवगइ अहवा मुत्ति न भंति ॥ २२ ॥ कवडिहि माया मूढ जिउ वंच लोउ अप्पाणु । तिणि पाविहि भवि भवि दुहिय नवि पावइ निव्वाणु ॥ २३ ॥ खज्जइ काल कयंत जगि को अज वि को कल्लि । संजमि गयवरि आरुहिउ सिद्धिसरणि जिय चल्लि ॥ २४ ॥ गयवरमत्ता जेम हिव मा हिंडसि नरसीह । हणि कसाय दमि इंदियइ गणिया लम्भइ दीह ॥ २५ ॥ घडिय न लब्भइ अग्गलिय इंदह अकइ वीरु । यउ जाणि जिणधम्मु करि जायह वहइ सरीरु ॥ २६ ॥ ङवि जाणिजइ सो दिवसु जणु पुणु मरइ निरुतु । छड्डेविणु घरहल्लोहलउ धम्मु करेवा जुत्तु ॥ २७॥ चंचल चित्तु पचंगु जिम वयवंधण न धरेसि । धम्मारामि विणासियइ मूढा हत्थ म लेसि ॥ २८ ॥ छन्नउ पयडउ जीच तुहुं उजमु करि जिणधम्मि । सुहियं दुहियं माणुसह पासु न मेल्हइ कम्मु ॥ २९ ॥ जरजजरि देहडी हुई य पंडरि हया केस । अरि जिय धम्मु करेजि त गइय स बालियवेस ॥ ३० ॥ झलहलंत जिणवरपडिम जेइ करावइ दवि । सग्गपवग्गहतणा सुह ते पामेसइ सव्वि ॥ ३१ ॥ जहु चिंतंता विहवसिण कन्जु अनेरउ होइ। राउलि बलियउ दुब्बलउ देव न बलियउ कोइ ।। ३२ ॥ टलह मेरु नियठाणह जइ पच्छिम उग्गह सूरु । पुन्च कियउं तो नवि चलइ कम्ममहाभरपूर ॥ ३३ ॥ ठगियउ हिंडिसि जीव तुह धारिउ विसि मिच्छत्ति। सम्मत्तह रयणह रहिउ न लहसि सिवसंपत्ति ॥ ३४॥ डणउ जेम्व गलि संकलिउ भरि भवि कुणबउ जीव । नवि छुद्धिजइ तो वि तह जइ लंघिजइ दीवु ॥ ३५॥ दणहणंति इंदिय तुरय पाडेसह भवखोहि ।
प्राचीनगरकाव्यसहहः देविण वरसंजमिकविउ अरि जिय सन्गि निरोहि ॥ ३६ ॥ णवि हसंतु विजोइयए निचलु झाणु घरेवि । ता दीसह जिम जगतगुरु सहजाणंदु सु देउ ॥ ३७ ।। त एकालउ सहसि जिप खाएसइ परिवारू । वियु विहंचिउ लेइ जणु पाव न विहचणहार ॥ ३८॥ थक्केसइ घणु सयणु जणु कोइ न सरिस जाए। पावु पुन्नु तं अनियए तं परि अग्गइ थाइ ।। ३९ ।। देइ देइ मन आलसु करि महुरालाविहि दाणु । चलिय देह हिव विहवसिण करि सफलउ अप्पाणु ॥४०॥ धर उप्पाजइ केवि नर परउवयारसमस्य । कइ देइ के कम्मवसि जणजण उड्डइ हत्य ॥ ४ ॥ नइ वहमाणी सघणजल सुकइ इयर तलाय । दायर बइ रिडिडी मग्गण निधण धाइ ॥ ४२ ॥ पदिउ गुणिउ घणु तवु तविउ संजमु किउ चिरकालु । जइ कसाय नवि वसि करसि ता सहु इंदियजालु ॥४३॥ फलु दिक्कित तरवरतण दिहि म घल्लिसि वाल । तं नवि पाविसि पुन्नविणु छड्डिसि पारी लाल ॥ ४४ ॥ बलि किजउं तह सुहगुरुह जा जगु मारगि लाइ । उम्मग्गह दसणि गमणि जणु पुणु पुहवि न माइ ॥ ४५ ॥ भरहेसरि आयरिसघरे उप्पन्नउं वरनाणु । भावण सव्वहि अग्गलि य तपु संजमु अपमाणु ॥ ४२ ॥ मयणु न खीणउ जाहतणि ते नवि वंभचारि । मयणविहूणह संजमि लंचणि छारि न दोरि ॥४७॥ जसि धवलिउ जगु जेहि मुणि नाउं लिहाविउ चंदि। कम्म हणवि जे सिद्धि गय ताह चलण नितु वंदि ॥४८॥ रे वाहा मग्गेण वहि मा उम्मूलि पलास । कल्हे जलहरु थकिसए कयण पराई आस ।। ४९ ॥ लइ ययभर परिहरवि घरु भंजिवि भवनियलाई। जाव न पहुच्चइ तुज्झतणि जमरावस्स दलाई ॥५०॥ वयणु न जंपउ दोणु कसु जं भावइ तं था।
चर्च रिका अथिरकडेवरकारिणिहि कहि किम खिजइ काउ ॥५१॥ सुमिणंतरि मेलावडउ अहनिसि पहर चियारि । पसरिय नियनिय दिसि चलए अरिजिय सुमणु विचारि ॥५२॥ परकिसोर मत्तकरि दमइ करि करेविणु कटु । निय जीयु कोवि न वसि करए थिउ गलियारु विघटुः ॥ ५३॥ संजमि नियमिहिं जे गया ते गणि सारा दीह । अवर जि पावारंभि गय ताह फुसिजाउ लीह ॥ ५४॥ हिंडेविणु भवकोडिसह लद्धउ माणुसजम्मु । तत्थ वि विसयह मोहियउ न करइ जिणवरधम्मु ॥ ५५॥ क्षणभंगुरु देहहतणउं अरि जिय कोइ विसासु । भाव न मुच्चइ जिणु मणह जाव फुरकाइ सासु ॥ ५६ ॥ मंगलमहासिरिसरिसु सिवफलदायगु रम्म । दूहामाई अस्कियइ पउमिहिं जिणवरधम्मु ॥ ५७ ।। इति श्रीधर्ममातृका समाप्ता। चर्चरिका जिण चउचीस नमेविणु सरसहपय पणमेचि । आराहउं गुरु अप्पणउ अविचलु भावु धरेवि ॥१॥ कर जोडिड सोलणु भणइ जीविउ सफल करेसु । तुम्हि अवधारह घंमियउ चचरि हउ गाएमु ॥२॥ मणि उंमाह अंमि सुह मोकल्लि करिउ पसाउ। जिम्व जाइपि उचितगिरि चंद तिहुयणनाहु ।। ३ ।। मइ विसमी टुंगर घणा पूत दुहेलउ मग्गु । भूपदियह सासि तुई वलि होसह अंगु ॥४॥ वालइ जोयणि नंगिया अंमि जि तहिं गिरिनारि। ते जमतरि दृत्थिया हिंडहि परघरवारि ॥५॥ इंअ असारी देहडी अंमि जि विढपद सार। तिणि फारणि नितगिरि चंद्र नेमिकुंआम ॥६॥ फरि फरयत्ती कृयटी सिरि पोटली ठयेथी।
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः मिलियउ धम्मियसापड उजिलमारिग वहेई ॥७॥ इह वढवाणइ चउहटइ दीसइ सीहविमाणु । रंनडुलइ वोलायो अमुलअग्गेवाणि ॥ ८॥ इय बदवाणइ जि हइ हियड रह न करेइ । दिवि दिवि धंदइ नेमिजिणु चडिया गिरिसिहरहिं ॥९॥ पाइ चहुइ कक्करीउ उन्हालइ लू वाई । जे कायर ते बलिया जे साहसिय ते जाई ॥१०॥ साहिलडा सरवरतलिहिं अग्गिउ दवणछोड । जिलि जैते धंमिए गुंघिउ नेमिहिं मउडू ॥११॥ सहजिगपुरि योलेविणु गंगिलपुरहिं पहुत्तु । माडी कहिजि संदेसडउ अंनु जिणेजे पुत्तु ॥ १२ ॥ जइ लखमीधरु वोलिय पेखिवि बहु य पलास । तउ हियड निवरु थिउं मुक्त कुटुंबह आस ॥ १३ ॥ विसमिय दोत्तडि नइ धणिय डंगर नत्यिच्छेऊ । हियड नेमि समम्पिय जं भावइ तिव नेऊ ॥ १४ ॥ करवंदियालं चोलियां अणंतपुरू जहिं ठाई। दिन्नउ तहि आवासडउ हियर्ड विअद्धि थाई ॥ १५ ॥ नालियरीटुंगरितडिहिं बहुचोराउलिठाई। घम्भियडा वोलिउ गिया अमुलतणइ सहाई ॥१६॥ भालडागदुसुंनउ अवियडउं बसेइ । धम्भिय कियउ वीसावट सुरधारडीयरेहिं ।। १७ ॥ ओ दोसइ उटुंधलउ सो डुंगरु गिरनार । जहिं अच्छइ आवासियउ सामिड नेमिकुमार ॥ १८ ॥ मंगूखंभि न मणु रहिउ अनु वहडेड दिटु । खइहड अंगु पखालियं गोवाडलिहि पहुटु ॥ १९ ॥ भावनई जह वोलिउ नाचइ धंमिउ लोउ । उजिलि दीवउ वोहिया सुरठडिय हड जोउ ॥ २० ॥ खंडइ देउलि जउ गिया सांकलि पोलिवि। छमिय कियउ आवासडउ वंचूसरितलि नेई ॥२१॥ जजिलमगि यहंता रजु लागइ जसु अंगि।
३ चर्चरिका बलि किजउं तसु धमियह इंदु पसंसह सग्गि ॥ २२ ॥ जे मलि मइला पहियडा ते मइला म भणेजे। पायमली जे मइलिया ते महला ह सुणेजे ॥ २३ ॥ एउ पाउह लोड कोट तलि गिरिनारु । ओ दीसइ ववणधली धवलियतुंगपयार ॥ २४ ॥ घर पुर देउल धवलिया धज धक्ली दीसंति । धंमी सा ववणथली अजिलितलि निवसंती ॥ २५॥ वडणथली मेलेविणु जउ लागउ गढमग्गि। तर धमिउ आणंदियउ हरिसुन माइउ अंगि ॥ २६ ॥ रिसहजिणेसर बंदियउ गढि आवासु करेवी। नाचइ धमिउ हरसियउ हियडइ नेमि धरेवी ।। २७ ॥ गदु वोली जउ चालीयउ तउ मणि पूरिय आस । बलि किजड हर्ष जंघडिय जोयण बूढ पंचास ॥ २८ ॥ टोलह उपरि मागड सो लंघणउ न जाइ। पाउ खिसियउ विसमा पडइ हियं विअडई थाई ।। २९ ।। अंचणवाणी नइ यहइ दिगु दमोदर देउ । अंजणसिलहिं जि अंजिया धन ति नयणा बेउ ॥ ३० ॥ तरवस्तणइ पलांवडे रुख मागु जंथेचि । कालमेघु जोहारियउ वस्त्रापदि जाएवी ॥ ३१ ॥ अंबाजबूराइणिहिं बहु वणराइ विचित्त । अंबिलिए करवंदिएहिं वंसजालि सुपवित्त ॥ ३२॥ नीझरपाणिउ खलहलह वानर करहिं चुकार। कोइटसष्टु सुहापणउ नहिं डुंगरि गिरिनारि ॥ ३३ ॥ जउ मई दिट्ठी पाजडी उंच दिहु चडाऊ। तर धमिउ आणंदियउ लड सियपुरि ठाउ ॥ ३४ ॥ हियडा जंघउ जे वहई ता ऊर्जिति चडेजे । पाणि पीड गइंदवइ दुग्य जलंजलि देजे ॥५॥ गिरिवाई झंझोटियउ पाय धाहर न लहति । कडि नोददं कडि थकी हियडउं सोसह जति ॥३६॥ जाव न धंधलि घल्लिया लखुपत्तीपाण । . १०
प्राचीनगरकाव्यसहहः
तांव कि लम्भहिं चिंतिया हियडा ऊणत्ताण ॥ ३७॥
डुंगरडा अधो फरिं लग्गउ सीयलि वाउ ।
हय पुणं नवदेहडी अंमुलि कियउ पसाऊ ॥ ३८॥
चर्चारिका समाना
मातृकाचउपई
त्रिभुवनसरणु सुमरि जगनाहु जिम फिटइ भवदवं दुहदाहु ।
जिणि अरि आठ करम निर्दलीय नमो जिन जिम भवि नावऊ पलिय ॥१॥
आंचली-सवि अरिहंत नमिवि सिद्ध सूरि उज्झावय साह गुणभूरि ।
माईयवावनअक्षरसार चउपईचंधि पढिउं सुविचारु ॥१॥
भले भणेविणु भणीअइ भल तिहयणमाहि सारु एतल ।
जिनु जिनवचनु जगह आधार इतीउ मूकिउ अवरु अस्सारु ॥२
मीडर पडिउं भवनागमा जउ समिकत्ति लीणु आतमा ।
जिनह धयणि करिजे निहु ठाउ हृदय रहवि तिहुयणनाहु ॥ ३ ॥
लीह म लंघिसि जिणवरिभणी जो रिधि वंच्छह सिवसुहतणी।
चहुंगति फीटइ फेरउ बडउ पाच्छइ जाइउ सिवगढि चडउ ॥ ४ ॥
लोहं बीजी वे उपरि करे देवु गुरु हीयडइ संभरे।
क्षणु एक मन करिसि प्रमादु जिम तुम्हि पामउ मुक्तिसवादुः ॥५॥
ॐकारि सुमरि अरिहंतु जो अठकमहं काल कियंतु ।
अनु सिवसुरूतणउ दातार मनह म मेल्हिसि तिहयणसारु ॥६॥
नव निहाण ते पामई तिम जीह जिणवयणु हियइ परिणमइ ।
सिवसंपत्ति तीहहकडी जीह जिणआण हियइंस जडी ॥७॥
मनु चंचलु जे अविचलु करई जिणह आण सिरऊपरि धरई।
हणई कसाय इंदीय संवरहं ते सिवनयरि सुखि संचरई ॥ ८॥
सिद्ध काजु सहू तोहतणउं जेहि जीवि कीघ जिणवरमणि ।
छेदिउ आठकरमनी वेलि गया मुक्ति दुई पेलावेलि ॥९॥
वंघई पडिया दोह मन गमउ अप्पारामि जिणयरिस रम।
भयह तापु नवि लागई अंगि उद् वहुफलु पामउ सिवसंगि ॥२०॥
मातृकाच उपई
अनुव्रतु जिनह आण मनि धरै उपसमु विवेकु संवरु कर।
अरिवर्तु अंतरंगु निग्रहे इणि परि जीव सुकृत संग्रहे ॥ ११ ॥
आलिहि अलीउ म झंपिसि किमइ जे जिनुवयणु हियई तू गमइ ।
करमुबंधु पडतउ चीतवे भाषासमि वि सहजि अनुभवे ॥ १२ ॥
इणि संसारि इपभंडारि लइन जीव काय धम ऊगारि ।
वीतरागि जं आगमि कहीउ करे तइ जि यणु भावनसहीउ ॥ १३ ॥
ईमइ म कारसि कूडउ सोसु सोचइ जिनह वयणि करि तोसु ।
जोइड आगमतणउ विचारू पाच्छइ भरिन परतभंडारु ॥ १४ ॥
उप्पलदलउपरि जिम नीरु ते स चंचलु जीव सरीरु ।
घणु कणु रइणु सइणु तिम सह दोसइ धम्मु एच घर रह ॥ १५ ॥
उपरि देखि दैव न हु हाथु तेरहि तिहुयणि कोइ न सनाधु ।
नासीउ परसिजान जिनसरणि जिम न पामीअह जमणमरणि ॥ १६॥
रिद्धिहितणउ लाभु इम लेजि सातिहि पेति वीतु वावेजि ।
उपर सिंचे भावनानीरि बगसरु नोही जिम ताहरइ सीरि ॥ १७ ॥
रीणु दीणु ते चहुगति भमइ जे जिन वीतरागु नवि नमइ ।
नोही काइ धरमवासना ते नहीं जाई मुक्तिआसना ।। १८ ॥
लिपावीइ सुतु सीद्धंतु तेह लाभ नवि लाभइ अंतु।
ज्ञानतणउ गुण एवटु कोइ वीतराग तु ज्ञानलगु होइ ॥ १९ ॥
लीलअमत संसाफ तरेसि जइ जीव जिनधमु परहुणु लेसि ।
सुगुरनी जाम विलगीउ करी जान जीव भवसाइरु तरी ॥२०॥
एकह परि पामिसि भवपारु जइ समिकत कर अंगीकारु ।
वीरनाथु कहइ आगमि तोइ विणु समिकत सिद्धि नवि होइ ॥ २१॥
ए अ वचनु जोइ जिणवरतणुं तहि ऊपमा किसी हर्ष भण।
जिणहं वहण न अपम काइ त्रिभुवनतणी सुद्धि जेह माहि ॥ २२ ॥
ओघहं पडीउ पापु जे फरिसि तउ संसारु अनंतउ फिरिसि ।
जोईउ पणु सिद्धत विचारु करिसि धम्म तउ पामिसि पारु ॥ २३ ॥
ओपधु करे जीव जिनि भणि अछइ दुषु अठकरमहतणउं ।
पाहिलि ओपदि काई तु थाइ धरमोपविणु डुपु न जाइ ॥२४॥
अंतु न लाभई इह संसार कां तु जीव हीइ न विचार ।
एक जु धमु करे सपाइ लेउ मेल्हा सिवनअरीमाहि ॥ २५॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
अनुदिनु भत्ति करे जिनराय पूजि त्रिकाल तासु पहुपाय ।
मानपतु दोहिलई पामेसि पाच्छइ जिनपति काहा नमेसि ॥ २६ ॥
कपटिहि मायांवंचई लोकु ते नवि लहई सिद्धिसंजोगु ।
भमडइं जीव चहुंगतिहि मज्झारि इणपरि भव पूरई संसारि ॥ २७ ॥
खनइ जगु एउ कालकु अंति एह एतला नही काइ भंति ।
जिणह वइणु विडिजा इकमण भउ फीटिसइ क्रितांतहतणउ ॥२८॥
गम्भवासि जो दिलउं जाण तउ त माने जिनवरआण।
फेडइ सुपु सहू जिनराज तउ सिवनहरि अ पावइ ठाउ ॥ २९ ॥
घरि घरु हिंडिसि जीव अणाहु जइ न नमिसि जिनु तिहअणनाहु ।
जिनुधमविणु सुषु नहीं संसारि अवर टमालि दोस मन हारि ॥ ३० ॥
उश्चई सरिसु धम्मु जइ करिसि तउ भंडोरु परत नउ भरिसि।
जे यणु लागिसि लोकप्रवाहि रडभड हुइसइ चुडंगतिमाहि ॥३१॥
चक्रवति पटूपंडह धणी हंती रिडि तीहंनइ घणी ।
जो रिडिहिं परिताणु होउ त वंभु संभुमु निरगि नवि जंत ॥ ३२॥
छविह जीव करेजे रप जइ तुम्हि जिणसासणि छउ दप ।
आतमवत्तु जीव सवि गणे धम्मह त सारु इउ मुमे ॥ ३३ ॥
जगगुरु जगरपणु जगनाहु जगवंधयु जगसथवाहु ।
जगतारणु जिउ जगआधार जिणविणु अवरि नही भवपारु ॥ ३४ ॥
जडइ पापु जिम तम्भरि पनु जइ मनमाझि यसह इकु जिन्नु ।
जापुलसेपुलि कांइ करेसि जिनि एकलई मुकति पामेसि ॥ ३५ ॥
मसिदिनु पंचप्रमिष्ठि सुमरेजि इणपरि असुभुं करमु पपेजि ।
सुभउं करमु वाघजे घणउं जिम सुषु लह सिवनगरीतणउं ॥३६॥
रलइ मेस जो परवतराजु जो रवि पच्छिम ऊगई आजु ।
जो सापरु मिल्हइ मन्नाइ तोह जिनभासिर अलीउ न थाइ ॥ ३७॥
ठगीसि रापे फुगुरि कुवोधि जिनकसवट्टी लेजे सोधि ।
पूजइवानी आसतणी रिधि संग्गहे सुमितनी घणी ॥ ३८॥
टसीह कालभूअंगमि लोकु तेह नवि लागई औपधजोगु ।
वीतराग मंत्रवादी य विण विसु पसरह अठकरमहतण ॥ ३९ ॥
दलिइ पासह देने दाउ घणरुणजीवन फरिसि म गाउ ।
जगतरुपु देपे इंदीआल कर धम् परहरीउ टमाल ॥ ४०॥
मातृकाचउपइ
७७
णवणवपरि भग्गऊ भवचारु सांमीअ करिउ अम्हारी य सार ।
असरणसरणु तुहुं जि जगनाह भवि पडत अम्ह देजे बाहु ॥ ४१ ॥
तनु धनु जीवोउ जौचनु जोइ रिद्धि समिद्धि सइअणु सहू कोई।
दिवस पांच मेलावा होइ पाछइ वलीउ न दोसइ कोइ ॥ ४२ ॥
थरथर कंपई काइरचित्त देपीउ मुनिवर माहासत्त ।
धीरा सत्तवंत जे जाण पालई दीपसहीउ जिणआण ॥ ४३ ॥
दमि इंदिअ दुग्गइआर लूसीउ लिअइं सुक्रितु सवियार ।
जे न जिणिसि जिणवयणविचारि देसिई इषु बहूसंसारि ॥४४॥
धरमध्यांनि करि निमलु चितु जिम हुइ जीव जनमु सुपवितु ।
धमिहि सिवह सौपसंपत्ति धमिहि वलीउ न भवि उतपत्ति ॥४५॥
नर नीतु नमो नीमि जिणनाहु आठकरम जिणि दिन्हो दाउ ।
मोहराउ रिणि भंजीउ करी लीलहं लई सामि सिवपुरी ॥ ४६॥
पढइ गुणइ वरकाणई सुतु पुणु बुझई नही तोइ ततु ।
राग देपु मनभीतरि धरई ईमइ वेखविडंवउ करई ।। ४७ ॥
फलइ करमु परभवहतणउं जइ रिद्धिरहि जीउ होडइ घण।
दुपु सुपु सह पइ लागम आवइ निजिङ सरिसु आतमा ॥४८॥
बलि कीउ जीवीउ तीहं संसारि जे दिन गमइ पापव्यापारि ।
सफल जनमु तीहं नरनारि जे जिनधमि द्रिढ चित्तमझारि ॥ १९ ॥
भविं भवु बोलई जीव अनंत जाणई नही वइणु अरिहंत ।
न मुणई अंतर पावह पुन्नु तीहं सोकल कांई सिरिज्या कान ॥५०॥
मइणु जि मारई ते जगि सर जे मारीयई मइणि ते भूर ।
धीरा सुभट सतु ऊटवइ मारीउ मयणु ना नीठवई ॥५१॥
य करई तप्पु नीम संचमु तीहं दुर्गतिनउ नही कोई गंमु ।
जीहं स रोई हुई जिनधंसु विलसई मुकतिसोपु निरुपंमु ॥ १२ ॥
रहिसिई पूत कलत घरवास रहिसिइ सइणु सह परिवार।
रहिसिइ धणुकणुरइणुभंडारु जीउ एकलउ जाइ निधारु ॥५३॥
लह जिनदीप मूकि संसारु आठकरम दही करि च्छार ।
निरुपमु सुपु सिवनहरीतण लाहिसि जीय आगमि जिनमणिउ ॥१४॥
वचनच्यापु जोइ निणवरतणउ अरथ गंभीरु अच्छइ तहिं घणउ ।
जो साइरि जलविंदहं पातउ लभइ सिद्धतविचारु ॥६६॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसहदः
शरउपरि मूढा मन पेलि जिनधनु लाघउ पाइ म ठेली।
तिहअचिंतामणि जिनधम्मु करीन जीव भाजइ भवनंम् ।। ५६ ॥
पणि पणि आउ गलंतउ देपि भवि पडंतु अपु म ज्वेपि ।
करि न धम्मु जं केवलिकहीउ जा सिवपुरि लेपउं विखहीउ ॥१७॥
सहजि जीउ भवगूतलि करइ कर्म वुहुरादाणी घणु धरइ ।
जे कर्मतणज नही य ऊधार भवगोतिहिं दुखु सहिसि अपार ॥५४॥
हरिपु विपादु करिसि-मन कोइ जइ जीव आपद संपदं होइ ।
अवशु फलीसइ पुवभवकिड नं भोगवै कोई अणकिउं ॥ ५९॥
जंघई दीव पुहवि समुद्द गिरिकंदरा भमइ बहुरुद्द ।
रिद्धिकाजि इत्तीउ रझभडइ न करै धम्मु जिणि रिधि संपडइ ॥ ६॥
क्षुणुभंगुरू एउ सहइ जाणि म फरिसि जीव धरमनी काणि।
विणसइ सहु कहइ आगम्मु अविनसुरु एकु जिणधम्मु ॥ ६१ ॥
मंगल कर सवि अरिहंत जे अच्छई सिवलच्छीकंत ।
मंगल सिद्धि सरि उचज्झाय मंगलं कर साहुणा पाय ॥ ३२॥
मंगलमूल सवहिं आगम्मु जो जगमाहि अच्छइ निरुपम्मु ।
जसु अतिसइ न लाभइ अंतु मंगल करउ सोइ जि सिहंतु ।। ६३ ।।
जा ससिसूरु भूपशु व्यापंति जा ग्रह नक्षत्र तारा हुंति ।
जा वरतइ वसुहव्यापारु तां सिवलच्छि करउ मंगलाचार ॥६४ ॥
मातृकाचउपइ समाता
सम्यकत्वमाईचउपइ
भले भणउँ माईधुरि जोइ धम्मद मूलु जु समिकतु होइ ।
समकतुविणु जो क्रिया करेइ तातइ लोहि नीरु धालेइ ॥१॥
ऊंकारि जिणु पणमेसु सतगुरुतणउं वयणुं पालेसु ।
आगम नवतत बूज्झिसि तिमई समिकतु रयणु होइ तसु तिमइ ॥२॥
नर नवकार सुमरि जगसारु चउदह पुव्वह जो समुद्घारु ।
समिकत जइ लाभइ संसारिं जाणे छुरी पडी भंडारि ॥३॥
मनु चंचल अटझाणि पडेइ घडियमाहि सातमिय ह नेइ ।
मनु मयगल शुभ ध्यानु करंति प्रसंनचंद जिम सिडिहिं जंति ॥ ४॥
सम्यकत्वमाईचउपई
सिद्धिसुरु जगि सहु को लहइ दृढसमिकतु जइ हियडइ रहइ।
दृढ समिकतु श्रेणिकराय होइ प्रथम तिथंकर होसइ सोइ ॥५॥
धन जि गुरपारपउ करंति गुरु विणु समिकतु किमह न हुंति ।
मुहुतु एक समिकतु फरसेइ पुदगल अरधमाहि सिद्धि विनेइ ॥६॥
अच्छड् मोहचरड इणि समइ समिकतु रयणु न लाभइ किमइ ।
कुगुरु सुगुरु अंतमन हु करइ इणि कारणि चउगति जिउ फिरइ ॥७॥
आगमययणु पंचमइ अरइ केवलनाणु प्रभव हुइ परइ ।
इसइ कालि समिकतढचित्त ते नर जाणे जगह पवित्त ॥८॥
इणि भवि परभवि सुकु लहेड सतगुरुतण वयणु पालेहु ।
वीतराग जउ बंदिसि पाय ऊडइ पापु होइ निम्मल काय ॥९॥
इंदियालु जगि दीसह लोइ वालवृद्ध न हु छूटइ कोइ ।
धरमसंवलु जह सरिसउ लेइ पार गया तउ सुखु माणेइ ॥१०॥
ऊगमतइ जे नर दीसंति चउंजणकंधि चडिया ते जति।
सुकिय दुकिय वे सरिसा चलई सजनमीत बोलावी वलई ॥ ११ ॥
ओसरि वाषियइ लाभु न हुंति सजल होइ वीजह चूकति ।
सधडं दानु मुनिहि जो देइ संगमतणज लाभु सो लेइ ॥ १२ ॥
रिद्विहितणउ लामु जगि लेहु दस खेत्रे तुम्हि धनु वावेहु ।
दीन्हादानह मासु म जोइ सुपात्रि दीन्हइ बहुफलु होइ ।। १३ ॥
रीतिहि दानह नथी निवार उचितु दानु दीजइ सविवार ।
कृसनभयसिड जउ खटु वारंति पात्रविसेपिहि पीरु स दिति ॥१४॥
लिहियं जगि लोडइ सर कोई कुपात्रु विसहरसाहसु होइ ।
खीर आणि जड मुखि धातियइ पात्रविसेपिहि तसु विसु थियह॥१५॥
लोहन लंघउ सतगुरतणी क्रिया करउं जा आगमि भणी।
विधिमारगु मानउँ सविवार जाण जइ छूटउं संसार ॥ १६॥
एहु करेवडं नर संसारि त्रिनि बार जब चडिउ विहारि।
वीतराग जउ भणि करेसु दस आसातन नितु राखेसु ॥ १७ ॥
ऐ वार मेल्हिउ जिणु पूजेसु रयणिहिं रमणिगमणु वारेसु।
न्हवणुतं दिजहि निसिभरि रहई तं विहिमंदिर सतगुरु कहह ॥१८॥
ओ दीसह मंदिर जगि सारु धम्मरयपाकेर संडास।
चउरासी आसातन नितु रापेसु मंदिर दिवसह वलि होएमु ॥१९॥
८०
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
ओया दीसहं बहुत गमार धमहतणी न पूछई सार।
जिण गुरि दीठइ दूरिहि जति दुलहु माणुसुजंमु आलि गमंति ॥२०॥
अंतरु विधि अविधिहि जाणंति मंदिर पइठ निसिहि न करंति ।
तालारासु रयणि न हु देइ लउडारसु मूलह वारेइ ॥ २१ ॥
अइसउ मंदिरु जगि प्रवहणु होइ धमिउ लोउ चडइ सुह कोइ ।
पंचप्रमिहिनी जापउ करउ संसारसमुदु जिम लीलई तरउ ॥ २२ ॥
कहियइ थूलिभद्दु मुणिराउ मयण चरड भंजइ भडिवाउ ।
छ विगइ सो जनु चित्रसाली रहइ जगहमाहिथूलिभदुलीह लहइ ॥२३॥
खडभड रापि न इणि संसारि जुगप्रधान जोई धंमु विचारि ।
सुद्धउ धरसु करिसि जइ किमइ जमणमरणह दिसि तिमइ ॥ २४॥
गलइ आउ जिम अंजलिनीरु सोलु जु पालइ सो नर धीरु ।
कपिलनारि पेलइ विनाणि सीलु सुदरसणतणउं वखाणि ॥ २५ ॥
घडतउ फोडतउ वार न लाइ कर्मतणी विसमी गति काइ ।
जंज करमु करइ तं होइ लपमणि दससिरु जीतउ जोइ ॥ २६ ॥
निच्छद साहसिउ बजकुमार इंदु पसंसइ जो दयसारु ।
सुर वे आविया जउ सत पडइ कुमरु पारेवास घडि चडइ ॥ २७ ॥
चल्लइ सबलवाहणु नरनाहु वीरवंदन हुउ अतिघणुं भाउ ।
दसाणभहु अतिगरयु करेइ इंदिहि जीत रिधि दाखेइ ॥२८॥
छंडइ राजु रिद्धि पणमाहि इंदि जीतउ तं न सुहाइ।
वीरपासि संजमुभरु लेइ इंदिहिं हारिउ चलण नमेइ ॥ २९ ॥
जनमु पयरसामिउ त्तिमसमइ छ मास रोयतउरहइ न किमइ ।
धणगिरि विहरतु पहुतउ घरेइ साति पूतु हिव झोली घरेइ ॥३०॥
झटकह तउ झोली घातिपउ भारि गुरुह लेउ समपिउ ।
गुरु पभणइ पउ तिणि आपेहु कुमरह आवो सार करेहु ॥ ३१ ॥
निच्छद जुगप्रधान जिउ होइ इह गुणवन्नणु सकइ न कोई ।
पालणइ सनउ अवणि सुणेइ इगारअंग तउ आणायेइ ॥ ३२॥
टलह न पायज कुमरह किमह मायटी झगडउ मांडियउ तिमह ।
राज विदीतु पूतु हउँ लेसु मंदिर नेतउ परिणायेसु ॥ ३३ ॥
ठफर मिलिया जगदउ फरई कुमरु अपणावी तर पिचि धरई।
वणफल रमणा सा दोएइ घणगिरि रजोहरणु दापेइ ॥ ३४ ॥
सम्यकस्यमाईचउपई
डगडगतउ मनु रहइ न किमइ मायटी भवि भवि लाभइ तिमइ ।
सुगुरुमेलावउ दुलहउ हुँति पंचमहानत सीहगिरि दिति ॥ ३५ ॥
ढाढसु कीयउं बालकुमारि सीहगिरि तउ हालियउ विहारि ।
सीस भणई अम्ह वयण कु देइ वयरड मुनि तुम्ह काजु करेइ ॥ ३६॥
न गण अवरसीस जयसीह सीहगिरितणा सीस हुइ लीह ।
अभिनवदीपितु वयण कु देइ सीहगिरितण वयणु मानेइ ॥३७॥
तपु संजमु किउ परिससहस्सु जीवदया पालिय गुणह निवासु ।
अंतकालि अटझाणि पडंति कंडरीकु सातमियहं जंति ॥ ३८॥
पुंडरीकु चरिससहसु कीउ रज्जु विउ घडियहं तउ सारिउ कज्ज।
पावज ले गुरु संमुहउ थाइ पंचविमाणे पुंटरीकु जाइ ॥ ३९ ॥
दस दिसि पसरिज जगि जसवाउ नवअंगवित्तिकरणु गुरुराउ ।
धंभणि थप्पिउ पासजिणंदु पणमहु सुहगुरु अभयमुणिंदु ॥ ४० ॥
धनु सु जिणवल्लहु वरकाणि नाणरयणकेरी छइ ग्वाणि ।
वइतालीसमुह पिंटु विहरेइ त्रिविधुमंदिरु जगि प्रगट करेइ ॥ ४१ ॥
नर निसुणहु सतगुर वरकाणु अंतस घूझउ थिउ सुजाणु ।
फुगुरवाणि तउ विसु उतरेइ सुगुरवाणि जउ अमिउ झरेइ ॥ ४२ ॥ ।
परिणइ अट्ठ नारि करि लेइ वृझवणइ बइठउ कथा कहेइ ।
मभयु चोरु मंदिरि पइसेइ असुयणनिंद सयलजण देह ॥ ४३ ॥
फहउ जंयुकुमरु इम भणइ विवाहुमहोच्छयु प्रभवु न गणइ ।
जंयुकुमम जउ इसउ भणंति सवि धंभिया टगमग जोयंति ॥ ४ ॥
बंधव अम्हस साटि करेज पिहुं विद्यावटड इक भणी देज ।
कुमरु भणइ विद्या फिसउं करेसु रिद्धि परिहरी प्रहहं तु लेसु॥४३॥
भणइ प्रभवु नवजोवण नारि परणिय पुन्नवमिण संमारि ।
कामभोग भोगवि इणि समइ जोवण गइ व्रतु लेजे तिमइ ॥४६॥
मयणु चरट्ट सो मई यसि फिर मोहराउ पाहिउ नाथिय ।
मधुविंदसाहस इहु संसार निसुणि प्रभव तुष्टु जोइ विगार ॥४॥
जगु पिंटाणु सपल परतेह तुह पिणु पितरह पिंटु कु. देह ।
महेसरदत्तक्या जउ कहइ प्रभउ मांभलिउ मनमाहि रहा ॥ १८ ॥
रतिपति जाण तई यमि किया नानातण मंवंधु रिम घिय ।
अदारह नावारुया कहंनि प्रभयु मांभली तर चूमंति ॥ ४ ॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः लहणउ लाभइ इह जगमाहि जंयुसामिघरि रिडि न माइ। हूंती रिद्धि कुमरु परिहरइ प्रभवु पराई लेवा फिरइ ॥ ५० ॥ वयणु कहउ पुणु नीजइ वाइ जंबुकुमर तुहु परिणि काई । वालकुमारउ त व्रतु लियत नियनियमंदिरि अट्ठय रहत ॥५१॥ सांभलि प्रभव ज काइ हुंत जइ घरि रह त संसारि पडत । कथा कहिउ प्रतिवोघेसु नारि वलिउ न आवई इणि संसारि ॥५२॥ पडभड केही रिडिहितणी नयाणवइ कोडि सोना छई घणी । जीमणइ हाथिहि तउ हउं देसु मणवंछिय मागण पूरेसु ॥ ५३॥ सा सिवकाजउ प्रगुणी करइ दान दियंतउ त नीसरह । माय बापु अहनारि चडंति पंचसयसहितु प्रभवु वासंति ॥५४॥ हल्लिय सिविका गाजे रली पन्जिय ढक युभ काहली । सिविका उत्तरिउ चलण नमंति सुहमसामि सइं हाय तु दिति॥५५॥ लंघिउ सायरु जउ व्रतु लिउ पंचमगतिप्रस्थान कियउ । जंबुसामिउच्चु देखेइ बहुतु लोकु जाइउ ऋतु लेइ ॥ ५६ ।। खयउं पापु जउ पावज लई घरसंसारचिंत तउ गई। मनि जीतइ इंद्रिय वसि थाई करम जिणिय नर सिलिहि जाई ॥१७॥ मंगल पहिला सोहमसामि वीजउ मंगल जंबूसामि । अगणिउ मंगल प्रभव भणंति चउत्थउ मंगलु नारिहि हुंति ॥५८॥ गणियइ जुगवरु सोहमसामि बीजडउ जुगवरु संसामि । नीजउ जुगवर प्रभवु भणति सिझंभवु चउथउ जाणंति ॥१९॥ लंछणि सीह गोयमु पुच्छति जुगप्रधान जगि केता हुंति । विसहस चउं आगला कहेइ छेहिलउ दुपसहु तउ जाणेइ ॥ ६०॥ मंनउं जुगयरु जिणेसरसरि पायु पणासइ दरिसण दृरि । संदेहु मकरहु जिम समिकतु रहइ भविभवि वोधिवीजु जिउ लहइ॥२१॥ हासामिसि घउपईवंधु कियउ माईतणउ छेटु मइ नियउ । ऊण आगलउ किंपि भणेउ जूगड भणइ संधु सपलु खमेउ ॥१२॥ श्रीनंदउ समुदापरि रहइ नंदउ विहिमंदिरु कवि कहह । नंदउ जिणेसरसूरि मुणिंदु जा रवि ऊगइ जगह चंदु ॥ १३ ॥ माईतणउ अवसर धुरि कियउ चडसठिचउपइया बंधु थियउ । सुइ मनि जे नर निसुगंति अणंतसुकु सिद्धिहि पायंति ।। ६४॥ सम्यमत्वमाईवउपइ सम्पूर्णा.
श्रीनेमिनाथसागु ८३ श्रीनेमिनाथफागु मिद्धि जेहिं सह घर परिय ते नित्ययर नमेगी। फागुवंधि पहुनेमिजिणुगुण गाएस केवी ॥१॥ अह नवजुब्यण नेमिकुमम जादयकुलधयलो काजलसामल ललयलउ सुलरियमुहकमलो। समुदविजयसियदेविपतु सोहगसिंगारो जरासिंधुभटभंगभीमु बलि कवि अप्पारो॥२॥ गहिरसधि हरिसंतु जेण परिय उईटो हरि हरि जिम हिंदोलियउ भुयदंडपयंडो। तेयपरिपामि आगल पुणि नारिविरत्तर सामि सुलरफणसामल सियसिरिअणुरत्तउ ॥३॥ हरिदलहरस नेमिपहरोलइ मास पसंतो। हावि भावि भिन्नइ नही य भामिणिमाहि भमंतो॥४॥ अह सेल पटोगलिय नीरि पुणु मयणि नमायद हरितेउरमाहि रमड पुणि नाटुन राचद । नयणमलूणउ लटसदंतु जउ तीरिहिं आविउ मायापि बंधविहिं मांट यीवार मनाविउ ॥५॥ घरि घरि उत्सव यारया राउल गरगहए तोरण यंदुरपाल फलस घययः सरलहा। फहदि मागिप उग्गसेणधूप राजल लाया मिज्माीप पाल अभिनेर नियना ॥६॥ राइमएमम तिट भयणि अपर न अल्प नारं। मोराविल्लि नसलटीय उप्पनीय मंसार ॥७॥ र सामलफामल पेगपास किरि मोरमलाउ। अरुनंदमनु भालु मपशु पोमट भट्याउ । पंधिमाटी मुंटियां भरि मुपशु भमाटर माडी टोपणना गुरमुर मागा पाटा ॥८॥ रिरि मिमिसिंग फार दिन करता नामा पंगा गरमगंगु दारिमाल देना।
८४ प्राचीनगूर्जरकाव्यसदहः अहर पवाल तिरेह कंदुराजलसर रूडट जाणु वीणु रणरणई जाणु कोइलटहकडला ॥९॥ सरलतरल भुयवल्लरिय सिहण पीणघणतुंग। उदरदेसि लंकाउली य सोहइ तिवलतुरंग ॥ १० ॥ अह कोमल विमल नियंबविव किरि गंगापुलिणा करिकर ऊरि हरिण जंघ पल्लव करचरणा। मलपति चालति वेलहीय हंसला हरावइ संझारागु अकालि वाल नहकिरणि करावद ॥ ११ ॥ सहजिहिं लडहीप रायमए सुलखण सुकमाला घण घणेरडं गहगहए नवजुव्यण बाला । भंभरभोली नेमिजिणवीवाह सुणेई नेहगहिल्ली गोरडी हियडइ विहसेई ॥ १२ ॥ सावणसुकिलछहि दिणि वावीसमउ जिणंदो चहइ राजलपरिणयण कामिणिनयणाणंदो ॥ १३ ॥ अह सेयतुंगतरलतुरइ रहरहि चडह कुमारो कनिहि कुंडल सोसि मउड गलि नवसरहारो। चंदणि ऊगटि चंद्धवलकापडि सिणगारी फेवडियाल पु भरवि वंकुडउ अतिफारो॥ १४ ॥ धरहि छत्तु वितु चमर चालहिं मृगनयणी लूणु उत्तारिहिं वरबहिणी हरिसुबलवयणी। चहुपरि वइसइ दुसारकोडि जाद्वभूपाला हयगयरहपापयाचपासीकिरिहिं झमाला ॥ १५ ॥ मंगल गायहिं गोरडीय भह जपजपकारो उगसेणधरनारि यरो पहुत उ नेमिकुमारो १५ १६ ॥ अह सहिय पर्यपय हल सहि प तुह वाहह आवह मालिभटालिहिं चडिउ लोउ मण नयणु सुहाया । गउखि बइठी रायमए नेमिनाहु निरवह पसइपमाणिहिं चंचलिहिं लोअणिहिं कहम्बई ॥ १७ ॥ (किम किम राजलदेवितण सिणगार भणेवउ । चंपइगोरी आधोइ अगि चंदनुलेवा । ।
आराधना खूपु भराविउ जाइकुसमि कसतूरी सारी सीमंतइ सिंदूररेह मोतीसरि सारि ॥ १८॥ नवरंगि कुंकुमि तिलय किय रयणतिलउ तसु भाले। मोतीकुंडल कन्नि थिय विवालिय करजाले ॥१९॥ अह निरतीय कजलरेह नयणि मुहकमलि तंबोलो नगोदरकंठलउ कंठि अनु हार विरोलो। मरगदजादर कंचुयउ फुडफुल्लहं माला करि कंकण मणिवलयचूड खलकावइ बाला ॥ २० ॥ रुणुझुणु ए रुणुझुण ए रुणुझुणु ए कडि घघरियाली रिमिझिमि रिमिझिमि रिमिझिमि ए पयनेउरजुयली। नहि आलत्तउ वलवलउ सेअंसुयकिमिसि अंखडियाली रायमए प्रिउ जोअइ मनरसि ॥२१॥ • चाडउ भरिउ जीवडहं दलवलंत कुरलंत। अहठकोडिरूं उन्हसिय देषइ राजलकंतो ॥२२॥ अह पूछइ राजलकंतु काइ पसुबंधणु दीसह सारहि बोलइ सामिसाल तुह गोरखु हुस्यइ । जीव मेल्हाबद नेमिकुमरु सरणागइ पालइ धिगु संसारु असार इस्यउं इम भणि रहु वालइ ॥ २३ ॥ समुद्विजय सिवदेवि रामु केसवु मन्नावह नइपवाह जिम गयउ नेमि भवभमणु न भावइ । धरणि धसका पडइ देवि राजल विहलंघल रोअइ रिजइ वेसु स्वु बहु मन्नइ निष्फलु ॥ २४ ॥ उग्गसेपाधूय इम भणइ दूपहिं दाझइ देहो कां विरतउ कंत तुहं नयणिहि लाइवि नेहो ॥ २५ ॥ आसा पूरइ बिहुभुवण मू म करि हयासी दय करि दय करि देव तुम्ह हर्ड अछउं दासी। सामि न पालइ पडिवनउं तउ कासु कहीजह मयगलु उवट संचरए किणि कानि गहीजइ ॥ २६ ॥ नेमि न मन्नइ नेहु देह संवच्छरदाणूं जजलगिरि संजम लियउ हुय केवलनाणूं।
८६ प्राचीनगूर्नरकाव्यसवहः राजलदेविस सिडि गयउ सो देउ युणीजइ मलहारिहिं रायसिहरसूरि किन फागु रमीजइ ॥ २७ ॥ इति श्रीनेमिनाथफागु. प्राचीनगद्यसङ्ग्रहः आराधना ( संवत् १३३० मा लखेला ताडपत्रमाथी ) ज्ञानाचारि पुस्तकपुस्तिकासंपुटसंपुटिकाटीपणांकवलीऊतरीठवणीपाठा- दोरीप्रभृतिज्ञानोपकरणअवज्ञा, अकालिपठन अतिचार विपरीतकथनु उत्सू. अप्ररूपण अश्रद्दधानप्रभृतिकु आलोयहु । दर्शनाचारि देवद्रव्यु भक्षित उपेक्षितु प्रज्ञाहीनत्यु जिनभुवनआशातना अधोयति देवपूजा गुरुद्रव्य- ग्रहणु गुरुनिंदा द्रव्यलिंगिएसउं संसर्ग विवआशातना स्थापनाचार्यआशा- तना शंका आकांक्षा विचिकित्सा मिथ्यादृष्टिप्रसंसा मिथ्यादृष्टिपरिचउ ए पांच अतिचार आलोय । चारि आचारि प्राणातिपात मृपावाद अदत्तादान मैथुनपरिग्रह ए पांच अणुव्रत दिगुविरति भोगपरिभोगविरति अनर्धदंड- विरति ए तिन्नि गुणवत । सामायिकु देसावकासिक पौपधु अतिधिसंविभागु एच्यारि सिक्ष्यावत; ईहतगइ विपइ जु कोइ अतिचारु आसेवियउ सु हुं आलोयहं । तपाचारि अनशन ऊनोदरिता वृत्तिसंक्षेपु रसत्याग कायक्लेश संलीनता पविधवाथतपतणइ विपइ प्रायश्चित्तु विनउ वैयावृत्यु स्वाध्यानु कायोत्सर्ग पड्विधआभ्यंतरतपतणइ विपइ जु अतीचारु सु हुं आलोयहुँ । वीर्याचारि संतइ बलि संतइ वोर्जि जु धर्मानुष्ठानि उद्यम नहीं कियउं सु हुँ आलोपहुं । सम्यक्त्वप्रतिपत्ति करहु, अरिहंतु देवता सुसाधु गुरु जिनम- णीत धर्मु सम्यक्त्वदंडकु ऊचरहु, सागारप्रत्याखानु ऊचरहु चऊहु सरणि पइसरहु । परमेश्वरअरहंतसरणि सकलकर्मनिर्मुक्तसिद्धसरणि संसारपरी- वारसमुतरणयानपानमहासत्त्वसाधुसरणि सकलपापपटलकवलनकलाकलितु- फेलिपणीतुर्मुसरणि सिद्ध संघगण केवलि श्रुत आचार्य उपाध्याय सर्वसाधु प्रतिणी श्रावक प्रायिका इह ज काइ आशातना की हुंती ताह मिच्छा मि दुपाई । पुढधिकाइ जीव आउकाइ जीव तेउकाइ जीव वाउकाइ जीप यणपदकाइ जीव वेइंदिय दिय चरिंद्रिय जलचर स्थलचर रोचर सर्वतीर्थनमस्कारस्तवन ८७ जि जंतु ताह मिच्छा मि दुसडं । पनर कर्मभूमि जि मनुष्य त्रीस अमर्मभूमि जि मनुष्य तीहिं मिच्छा मि दुफडं। छप्पनअंतरदिपतणा मनुष्य तीहं मि. च्छा मि दुकडं । सातनरकतणा नारकि दशविध भवनपति अष्टविध व्यंतर पंचविध जोइसी दैविध वैमानिकदेवा किंबहुना । दृष्ट अष्ट ज्ञात अज्ञात श्रुत अश्नुत स्वजन परजन मिनु शत्र प्रत्यक्षि परोक्षि जे केइ जीव चतु- रासी लक्षयोनि ऊपना चतुर्गतिकि संसारि भ्रमंता मई हुमिया वंचिया सेहिया सीरीविया हसिया निंदिया किलामिया दामिया पाछिया चूकिया भवि भवांतरि भवसति भवसहस्रि भवलक्षि भवकोटि मनि वचनि काई तोह सर्वहई मिच्छा मि दुकटं । अढार पापस्थान बोसिरावह इहुसर्च प्राणा- तिपात सर्च मृपावाद सर्छ अदत्तादान, सधैं मैयुनू सर्दू परिग्रह सर्च मोधू सर्दू मानू सर्वइ माया सळू लोभू प्रेमु ठेपु कलहु अभ्याख्यानु रति अरति पैशून्यु मिथ्यादर्शनशल्यु परपरिवाद अढार पापस्थान विविधिहि मनि वचनि काइ करणि करावणि अनुमति परिहरउ । अतीतु निंदउ वर्तमान संवरहु अनागतु पावसउ । पंचपरमेष्ठिनमस्कार जिनशासनिसार चतुर्दश- पूर्वसमुदार संपादितसकलकल्याणसंभारु विहितदुरितापहार क्षुद्रोपद्रय- पर्वतवज्रप्रहारु लीलादलितसंसार सु तुम्हि अनुसरहु, जिणि कारणि चतु- दशपूर्वधर चतुर्दशपूर्वसंबंधित ध्यानु परित्यजिउ । पंचपरमेष्ठिनमस्काम स्मरहि, तउ तुम्हि विशेपि स्मरंवउ, अनइ परमेश्वरि तीर्थकरदेवि इस अर्यु भणियउ अच्छइ, अनइं संसारतणउ प्रतिभउ म फरिसर, अनइ रुद्धिनमस्कारु इहलोकि परलोकि संपादियइ ।। आराधना समातेति ॥ यदप्तरं परिभ्रष्टं मानाहीनं च यद्भवेत् । क्षन्तव्यं तदुधैः सर्व कस्य न स्सलते मनः संवन् १९३० वर्षे आधिनमुदि ५ गुगधेट माशापयाम् ॥ अतिचार (संरग १३४० ना मरसामा रसापला जगाता साहपमापी) फालयेला पढयं, विनपहीण यमानामीण उपभानहीणु गुरुनिण्डव अने. रारुपहई पदा, अनेरई कहदं व्यंजना अर्थकट तभपाट दर असत कानइ मानि आगलर ओएज देयंदणयांदणः परिपामणा सक्षा करतां ८८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः पढतां गुणतां हुउ हुयइ, अर्थकूड कहई हुइ, सूनु अर्थ वेउ कूडां कहां हुइ, ज्ञानोपकरण पाटी पोथी कमली सांपुढं सांपुडी आशातन पगु लागउ धुंकु- लागउं पढतां प्रदेष मच्छरु अंतराइउ ह कीधउ हुई, तथा ज्ञानद्रव्यु भक्षित उपेक्षितु प्रज्ञापराधि विणास्य विणासितउं जवेख्यं हुंती सक्ति सारसंभाल न कोधियइ, अनेरह ज्ञानाचारिउ कोइ अतीचारु हुउ सुक्ष्मवादरु मनि वचनि काइ पक्षदिवसमांहि तेह सवहि मिच्छा मि दुकई ॥ सातमइ भोगोपभोगवति सचित्तद्रव्यविगइ खासहाइ पाणही पानि फोफलि वइसणि आसणि सयणि न्हाणुअइ अंगोहलि फलि फूलि भोजनि आच्छादनि जु कोइ अतिचारु हुयउ पक्षदिवसमाहि वारि भेदि तपु छहि भेदि वाह्य अणसण इत्यादि उपवास आंबिल नीविय एकासणु पुरिमट्ठ व्यासणं यथाशक्ति तपु, तथा ऊनोदरितपु वृत्ति- संखेवु । रसत्यागु कायकिलेसु, संलेखना कोधी नहि, तथा प्रत्याख्यान एका- सणां विपुरिमट्ठ साढपोरिसि पोरिसिभंगु अतीचारु नीविय आंविलि उपयासि कीघा विरासई सचित्त पाणीउ पीध हुयइ पक्षदिवसमाहि प्रतिपिद्ध जीवहिंसादिकतणइ करणि कृत्य देवपूजा धर्मानुष्ठानतणइ अकरणि जि जिनवचनतणइ अश्रद्दधानि विपरीतपरुपणा एवं बहुपकारि जु कोइ अतीचारु हुपउ पक्षदिवसमांहि ॥ -- सर्वतीर्थनमस्कारस्तवन (संवत् १३५८ मां लपायेला फागना पुस्तकमांथी) पहिल निकालु अतीन अनागत वर्तमान यहत्तरि तीर्थंकर सर्वपाप- क्षयंकर हउँ नमस्कर। तदनंतम पांचे भरते पांचे ऐरवते पांच महाविदेहे सत्तरिसउ उत्कृष्ट- कालि विहरमाण हउँ नमस्कर। तर पहिलइ सौम्मि देवलोकि वत्रीस लाख, वीजइ ईसानि देवलोकि अठ्ठावीस लाग्य, प्रीजइ सनतकुमारि देवलोकि धारलाग्य, चउत्थइ माहेंद्र- । देवलोकि आठ लाग्य, पांचमइ व्रत्मदेवलोकि च्यारि लाख, छट्टइ लांतकि ८९ नरमारव्याख्यानम् देवलोकि पंचास सहस, सानमइ शुकदेवलोकि च्यालीस सदस, आठमइ सहस्रारि देवलोकि छ सहस, नयमइ आणति देवलोकि बिसइ, दसमइ प्राण- नि देवलोकि विसइ, इग्यारमई आरणि देवलोकि बारमइ अच्युतदेवलोकि विह उह दउड सर, अनइ देटिले त्रिह अवेयके इग्यारोत्तम सड, माहिले विह अवेयके सत्तोत्तर सउ, अपहले निह वेयकि एक मउ, पंच पंचोत्तरवि- माने, एवंझारइ स्वर्गलोकि चउरासी लाग्य सत्ताणवइ सहस चीन आगला जिनभुवन चांदउँ । अनंता भुवनपतिमझे असुरकुमारमज्झे चउमहि लाप, नागकुमारमज्झे चउरासी लाग्य, सुवनकुमारमझे बहत्तरि लाय, पाया- मारमझे छन्नवइ लाग्य, दीवकुमार दिसाकुमार अहिटकुमार विज्जुकुमार थुणियकुमार अग्गिकुमार छहं मध्यभागे छहत्तरि छहत्तर लाग्य, एवंफारइ पाताललोकि सातकोडि बहत्तरिलाग्ब जिनमंदिर स्तयउं । अथ मनुष्यलोकि नंदीसर परि दीपि वायन, च्यारि कुंडलयलिग, च्यारि भयकि वल्गि, च्यारि मानुषोत्तरि पर्वति, च्यारि दक्षार पर्वति, पंच्यासी पांचे मेरे, धीस गजदंत पर्वति, दस फुरपर्वति, त्रीस सेलसिहरे, असीय क्षारसेलमिटर, सरि- मउ चैतादयपर्वति, एवं च्यारि सइ त्रिसहि जिणालइपडिमं, एवं आठ कोटि छप्पन्न लाग्य सत्ताणवर सरस च्यारि सइ छियामिया नियलुके नासतानि महामंदिर त्रिकाल तोह नमस्कार कर ।। सांनीर्यनमस्कारनानम्। नवकारव्याख्यानम् नमो अरिहंताणं ॥ १ ॥ माहरउ नमस्कान अरिहंत । फिमा जि अरिहंत; रागडेपपिआ अरि ययरी जेहि हणिया, अधया तुपष्टि इंद्र- मयंधिनी पूजा मतिमा अरिहद; जि उत्पन्नदिव्यविमलयेवलमान, घटत्रीम अविरापि समन्वित, अष्टमहामानिहायशोभायमान महाविदेदि गेत्रि विहरमान तीर अरिहंत भगवंत माहरउ नमस्कार ह॥॥ नमो मिगाणं ॥२॥ महारउ नमरकाम सिदएउ । किमा जि मिर; दृष्टाष्टकर्मक्षर फरिउ, लि माक्षिया । आठ कर्म रिमा भणियद भानावर जीउ ? दरिमणावरणीउ २ वेदनीउ : मोहनीउ ४ आयु ५ नाम । गोनु ७ अंतराउ आउरुक्षउ फरिति मिटि ग्या । फिमी ज मिति तणय अमयिभागि पंचत्ताटीम लक्षजनप्रमाणि जिगर जाणु इन ९० प्राचीनगूर्जरकाव्यसद्धहः तिसइ आकारि ज सिद्धिसिला, अमलनिर्मल जलसंकास जु अजरामर- स्थानु, तेह ऊपरि योजनसंबंधियइ चउवीसमह य विभागि जि सिद्ध अनंत सुखलीण ति सिद्ध भणियइ । तीह सिद्ध माहरउ नमस्कारु हउ ॥२॥ नमो आयरियाणं ॥३॥माहरउ नमस्कारु आचार्य हुउ । किसा जि आचार्य; पंचविधु आचारु जि परिपालइ ति आचार्य भणियह । किस पंच- विधु आचारु । ज्ञानाचारु, दर्शनाचारु, चारित्राचार, तपाचार, वीर्या- चारु, यउ पंचविधु आचारु जि परिपालइ ति आचार्य भणिइ । तीह आचार्य माहरउ नमस्कारु हउ ॥३॥ नमो उवज्झायाणं ॥ ४ ॥ माहरउ नमस्कार उपाध्याय हुउ । किसा जि उपाध्याय; द्वादशांगी जि पढइ पढावइ । किसी ज द्वादशांगी; आचा- रांगु १ सुयगड २ ठाणांगु ३ समवाउ ४ विवाहपत्ति ५ ज्ञाताधर्मकथा ६ उवासगदसा ७ अंतगडदसा ८ अणुत्तरोववाइयदसा ९ पण्हवागरणु १० विपाकश्रुतु ११ दृष्टिवादु १२ ए बार आंग जि पढइ पढावइ ति उपाध्याय भणियइ । तीह उपाध्याय माहरउ नमस्कारु हुउ ॥४॥ नमो लोए सव्वसाहणं॥५॥ईणि लोकि जि केई अछह साधु । यउ लोकु च किसउ भणियइ । अठाई दीपसमुद्र पनर कर्मभूमि । जि किसी; पांच भरत पांच ऐरवत पांच महाविदेह खेत्र, ईह पनर कर्मभूमिमाहि जि केई अच्छइ साधु । किसा जि साधु; रत्नबउ जि साधइ । किसउ रत्ननग; ज्ञानु दर्शनु चारितु यउ रत्नबउ जि साधइ ति साधु भणियइ । तीह साधु पंचमहा- व्रतपरिपालक । पंचमहाव्रत किसा भणियइ । प्राणातिपात्तु १ मृपावादु २ अदत्तादानु ३ मैथुनु ४ परिग्रहु ५ रात्रीभोजनु । जि विवजह ति साधु भणियइ । तीह साधु सर्वहीं माहरउ नमस्कारु हुउ ॥५॥ एसो पंच नमोकारो॥६॥ एउ पंच परमेष्ठिनमस्कारु । पंचपरमेष्ठि किसा । जि पूर्वोक्तभणिया अरिहंत १ सिद्ध २ आचार्य ३ उपाध्याय ४ साधु ५ इह पंचपरमेष्ठिनमस्कार भावि क्रियमाणु हुंत किस करह ॥६॥ सव्वपावपणासणो॥७॥ सर्वपापप्रणासकारियउ हुइ । ईणि जीवि चतुर्गतिकि संसारि भवभ्रमणु करतइ हुंतइ जि असुभलेश्या उपायी पापु सु ईणि पंचपरमेष्ठिनमस्कारि महामंत्रि सुमरीतइ हुंतइ क्षउ हुयइ ॥७॥ मंगलाणं च सव्वेसिं पढम होइ मंगलं ॥ ८॥ ईणि संसारि दधिचंदन- दुर्वादिक मंगलीक भणियह । तीह मंगलीक सर्वहीमांहि प्रथम मंगल पहु।
अतिचार ९१ ईणि कारणि सुभकार्यआदि पहिलई सुमरेवउं, जिय ति कार्य एहतणइ 'प्रभावह द्धिमंता हुयइ । यउ नमस्कारु अतीतअनागतवर्तमानचउवीसी. आदिजिनोतसार, सुतुम्हे विसेपहइ हिवडातणइ प्रस्तावि अर्धयुक्तु पेयु ध्यातव्यु गुणेवउ पढेवउ । जु किसउ । जिणसासणस्स सारो चउदसपुव्वाण जो समुद्धारो। जस्स मणे नवकारो संसारो तस्स किं कुणइ ।। अनइ एहु नमस्कारु स्मरता इहलोकतणा भय नासइ । यदुक्तं -अडविगिरिरन्नमझे भयं पणासेइ चिंतिओ संतो। रकइ भवियसयाई माया जह पुत्तभंडाइ ॥ चाहिजलजलणतकरहरिकरिसंगामविसहरभएहि । नासंति तकणेणं जिणनवकारप्पभावेणं ॥ हियइगुहाए नवकारकेसरी जाण संठिओ निचं । कम्मट्टगंठिदोघघयं ताण परिनटं ॥ नमस्कारस्य स्वरूपं भण्यते । ईणि नवकारि नव पद पांच अधिकार सत्त. सहि अक्षर, तीहमाहि छ भारी इकसठि लघु। इस नमस्कारतणउं माहातम्यु। एसो मंगलनिलओ भयविलओ सयलसंतिसुहजणओ। नवकारपरममंतो संतियमित्तो सुहं देउ। अप्पुब्यो कप्पतरू एसो चिंतामणी य अप्पुब्यो। जो झाइ सपलकालं सो पावइ सिवसुहं विउलं ।। नवकारव्याख्यानं समाप्तम् ॥ अतिचार. संवन् १३६९ मा लखेला ताडपत्रमाथी. नउ तुम्हि ज्ञानाचार दरिसणाचार चारित्राचार तपाचार वीर्याचार पंचविधआचारविपइया अतीचार आलोउ । ज्ञानाचारि कालवेला पहिड गुणिउ विनयहीनु बहुमानहीनु उपधानहीन गुगनिन्हयु अनेरीकन्दा पहि अनेरउ कहिउ । व्यंजनकूट अक्षरकूट कानइ मान आगला ओ देववं. दणइ पडिकमणइ सज्झाओ करतां पढ़तां गुणतां हुओ हुइ, अर्थकट तनु- भयकूट, ज्ञानोपकरणि पाटी पोथी ठवणी कमली सांपटा सांपटी पतिआसा. तना पगु लागउ घुकु लागउ पढतां गुणतां प्रठेपु मच्छर अंतराइ हुड कीवर्ड ९२ . प्राचीनगरकाव्यसङ्घः हुइ भवसगलाहइमांहि तेह मिच्छा मि.दुक्कडं । मृवावादि सहसातकारि आलु अभ्याख्यान दीधर, रहसमंत्रभेदु कीघइ, मृपोपदेसु दीघउ, कुडउ लेखु लिखित, कुडी साखियापणि मोसउ, कुणहइसउ राडि भेडि कलहु विद्वाविदि, जु कोइ अतिचारु मृपावादिति भवसगलाइमाहि हुउ त्रिविधि निविधि मिच्छा मि दुखाई। अदत्तादानि विराइउं छान फोटुउं लीध दोध वावरि धरि बाहिरि खेत्रि खलइ पाडइ पाडोसि अणमोकलाविउ चोरीच्छाई चोर- प्रति प्रयोग कीघउ, नवउं पुराणउ रसु विरसु सजीयु निजी मेलिउं, कूडी तृल कृडइ धापि कूडउ कहिउ हुइ, अतीचारु अदत्तादानि व्रति भवसगलाइ- मांहि हुउ तेह सवहइ मिच्छामि दुफड। मैथुनव्रति लुहुडपणि आपणा विराया सील खंडया सिउणइ सिउणांतरि, दृष्टिविपर्यासु, आठमि चउदसितणानी- मभंगु, अनंगकोटा परविवाहकरणु तिवभिलापु धरिउ हुइ, अनेरा जु कोइ अतिचार मैथुनव्रति भवसगलाइमांहि हुअउ तेह सवहइ त्रिविधि निविधि मिच्छामि दुमडं । हव हियामाहिं सम्यक्त्व धरउ । अरिहंत देवता, सुसाधु गुरु, जिणप्रणीतु धर्म, सम्पक्त्वदंडकु ऊचरउ । हिव अठार पापस्थानक वो. सिरावउ । सर्व प्राणातिपात, सर्व मृपावाद, सर्दू अदत्तादान, सर्व मैथुनु, सर्व परिग्रह, सर्व क्रोधु, सर्व मानु,सर्दू माया, सर्व लोभु, राग, देपु, कलहु, अभ्या- ख्यानु, पैशुन्यु, रति,अरति, परपरिवादु, मायामृपावादु, मिथ्यात्वदरिसण- सल्युए अढारपापस्थान मोक्षमार्गसंसर्गविधनसमान त्रिविधि त्रिविधियोसिरा- वउ, अतीतु निंदउ, अनागतु पचरकर, वर्तमान संवरु । सागाम्पत्यारयानुउ । समिउं खमावि मई ग्वमिउ छव्यिह जीवनिकाय । सिद्धह दिन्ना लोयणा नइ मह वह न पाचु । हिव दुकृतगरिहा कर। जु अणादि संसारमाहि हीडतइ हतइ ईणि जीवि मिथ्यात्यु प्रयाविउ । कुतीर्घ संस्थापित, कुमार्ग प्रापिउ, सन्मार्ग अवलपिउ । हियु ऊपाजि मेल्हि सरीक कुटुयु जु पापि प्रवर्तिज, जि अधि- गरण एलऊ पल घरट घरटी म्यांडो कटारी अरह पावटा कूपतलाव की कराव्यां अनुमोद्या, ते सवे प्रिविधि त्रिविधि वोसिरावउ । देवस्थानि द्रवि वि पूजा महिमा प्रभावना कीधी, तीर्थजात्रा रथजात्रा कीधी, पुस्तक लिगाव्यां, सार्मिकरायल्य कीयां, तप नीयम देवचंदन वांदणांइ सज्याइ अनेराइधर्मानुष्ठानतणइ विषइ जु ऊजमु कीघउ सु अम्हारउ सफलु हुओ। इति भावनापूर्वक अनुमोदन .
पृथ्वीचन्द्रचरित्र (वाग्विलास) 40%OF00- या विश्वकल्पवल्लीवल्लीलया कल्पितप्रदा । प्रदत्तां वाग्विलासं मे सा नित्यं जैनभारती ॥ १ ॥ धर्मश्चिन्तामणिः श्रेष्ठो धर्मः कल्पद्रुमः परः । धर्मः कामदुधा धेनुर्द्धर्मः सर्वफलप्रदः ॥२॥ पुण्यलगइ पृथ्वीपीठि प्रसिद्धि , पुण्यलगइ मनवांछितसिद्धि; पुण्यलगह निर्मलवुद्धि, पुण्यलगइघरि कवृिद्धि; पुण्यलगइ शरीर नीरोग, पुण्यलगइ अभं- गुरभोग;पुण्यलगइ कुटुंबपरिवारतणा संयोग, पुण्यलगइ पलाणीयइंतुरंग, पुण्य- लगइ नयनवा रंग; पुण्यलगइ धरि गजघटा, चालतां दीजई चंदनछदा; पुण्य- लगइ निरुपम रूप, अलक्ष्य स्वरूप; पुण्यलगइ वसिवा प्रधान आवास, तुरंगम- तणी लास, पूजई मन चीतवी आस; पुण्यलगइ आनंदायिनी मूर्ति, अद्भुत स्कृति; पुण्यलगइ भला आहार, अद्भुत शृंगार; पुण्यलगइ सर्वत्र बहुमान, घj किस्युं कहीयइ पामीयइ केवलज्ञान । एह पुण्यपरि राजाधिराज पृथ्वीचंद्रतणउ कथासंबंध भणीयइ । ता ईणई राजुपमाणि रत्नप्रभापृथ्वीपीठि असंख्याता द्वीप समुद्र वर्तई । तोह माहि पहिलउ जंबुद्धीप लक्षयोजनप्रमाण जाणिवउ । तेह पापलि लवणसमुद्र दिलक्षयोजनममाण जाणिवातेहपरइं धातकीखंडद्वीप च्यारिलक्षयोजनप्रमाण जाणिवउ । तेह पापलि कालोदधि समुद्र आठलक्षयोजनप्रमाण जाणिवत । तेह परई पुष्फरवरद्वीप सोललक्षयोजनप्रमाण जाणिवउ । तेह पापलि पुष्करव- रसमुद्र वत्रीसलक्षयोजनप्रमाण जाणिवउ । आगलि वारुणिदीप ६४ लक्षयो- जनप्रमाण जाणिवउ । तेह पापलि वारुणीसमुद्र एककोडि २८ लक्षयोजनप्रमाण जाणिवउ । इणिपरि ठाण विमणा द्वीप समुद्र जाणिवउ । कवण कवण क्षीर- दीप क्षीरसमुद्र घृतदीप घृतसमुद्र इक्षुदीप इक्षुसमुद्र नंदीसररठीप नंदीस- रसमुद्र अरुणदीप अरुणसमुद्र अरुणवरदीप अरुणवरसमुद्र अरुणवरावभास- दीप अरुणवरावभाससमुद्र इत्यादिक द्वीपसमुद्र असंख्यात । तेहमाहि पहिलु जे जंबूदीप, तेहनी नाभिई मेरुपर्वत जिसिउ प्रदीप, तेहy दक्षिण उत्तरई सातक्षेत्र चऊद महानदी छ वर्षधर पर्वत वर्तई । १३-१ ९४ प्राचीनगूर्जरकाव्यससहः किसा ते क्षेत्र । भरतक्षेत्र १ हैमवतक्षेत्र २ हरिवर्पक्षेत्र ३महाविदेहक्षेत्र ४ रम्यकक्षेत्र ५ ऐरण्यवतक्षेत्र ६ ऐरवतक्षेत्र ७। किसी महानदी । गंगा १ सिंधु २ रोहिताशा नदी ३ रोहिता ४ हरिकांता नदी ५हरिसलिला नदी ६ सीतोदा ७ सीतानदी ८ नारीकांता ९ नरकांता १० रूप्यकूला नदी ११ सुवर्णकूला नदी १२ रक्तवती १३ रक्तानदी १४ । किस्या किस्या वर्षधर । हिमवंतपर्वत ? महा- हिमवंत २ निषध ३ नीलवंत ४ रुक्मीपर्वत ५ शिखरीपर्वत ६। हिव जे कहिउँ भरतक्षेत्र तेहमाहि २५ योजनप्रमाण वैताट्यपर्वत ३२ सहस्र देश । ईहमाहि साढापंचवीसदेश आर्य,थाकताअनार्य जाणिवा। ऋपभदेवता पुत्रतणेनामिई सयलदेश जाणिवा । ते कुण कुण काश्मीरदेश १ कीर २ काबेर ३ कांवोज ४ कमल ५ उत्कल ६ करहाट ७ कुरु ८ काण ९कथ १० कौशक ११ कोसल १२ केशी १३ कास्त १४ कारूप १५ कछ १६ कर्णाट १७ कोकट १८ केकि १९ कौलगिरि २० कामरूप २१ कुंकण २२ कुंतल २३ कालिंग २४ करकूट २५ करकंठ २६ केरल २७ पस २८ पर्पर २९ पेट ३० गौड ३१ अंग ३२ गौप्य ३३ गांगक ३४ चौड.३५ चिल्लिर ३६ चैत्य ३७ जालंधर ३८ टंकण ३९ कोडि- याण ४० डाहल ४१ तुंग ४२ ताज़िक ४३ तोसल ४४ दशाण ४५ दंडक ४६ देवसभ ४७ नेपाल ४८ नर्तक ४९ पंचाल ५० पल्लव ५२ पुण्ड्र ५२ पाड ५३ प्रत्यग्रथ ५४ अर्बुद ५५ बभ्रु ५६ वंभीर ५७ भट्टीय ५८ माहिष्मक महो- य ६० मुरुंड ६१ मुरल ६२ मेद ६३ मरु ६४ मुद्गर ६५ मंकन ६६ मल्लवत ६७ महाराष्ट्र ६८ यवन ६९ रोम ७० राटक ७१ लाट ७२ ब्रह्मोत्तर ७३ ब्रह्मावर्त ७४ ब्राह्मणवाहक ७५ विदेह ७६ यंग ७७ वैराट ७८ यनवास७९वनायुज ८० वाल्हीक ८१ यल्लव ८२ अवंति ८३ वह्नि ८४ शक ८५ सिंहल ८६ सुम्ह ८७ सूपर ८८ सौवीर ८९ सुराष्ट्र ९० सुहड ९१ अस्मक ९२ हुण २३ हांक ९४ हर्मोज ९५ हंस ९६ हुहुक ९७ हेरक ९८ एवं देश अट्ठाणू अनइ आदन हावस मुगदिसुं धनगिरि सीकोत्तर चोलनाट पांड्य तोलीउ बिहति भोट महाभोट घीण महाचीण बंगाल पुरसाण मग्ध वच्छ गाजणाममुप अनेक देश वतई । तीहमाहि वपाणीयइ मरहट्टदेस । जीणइ देसि ग्राम, अत्यंत अभिराम; भला नगर, जिहां न मागीयई कर । दुर्ग, जिस्यां हुइ स्वर्ग; धान्य, न नीप- जह सामान्य; आगर, सोनारूपातणा सागर । जेह देसमाहि नदी वहई, लोक सुपई निर्वहई । इसिउ देश, पुण्यतणउ निवेश, गरूअउ प्रदेश । तीणि देसि पाटाणपुर पाटण यतई; जिहां अन्याय न वर्तई । जीणई नगरि फउसीसे करी सदाकार पापलि पोहउ प्राकार; उदार, प्रतोली दार; पातालभणी धाई, महा- पृथ्वीचन्द्रचरित्र काय पाई, समुद्र जेहतु भाई; जे लिइ कैलासपर्वतसिउ वाद, इस्या सर्वज्ञदेव- तणा प्रासाद; करइं उल्लास, लक्षेश्वरीकोटीध्वजतणा आवास; आनंदई मन, गरुड राजभवन; उपरि अपंड, सुवर्णमय दंड, ध्वजपटल लहलहई प्रचंड । जेह पाटणमाहि अनेक आश्चर्य वापरइं, चउरासी चउटा कलकलाट करई। किस्यां ते चउहदां। सोनीहटी १ नाणावटहटी २ जवहरीहटी ३ सौगंधीपाहटी ४ फोफलिया ५ सूत्रिया ६ पटसृत्रिया ७ घीया ८ तेलहरा ९ दंतारा १० चलीयार ११ मणीयारहटी १२ दोसी १३ नेस्ती १४ गांधी १५ कपासी १६ फटीया १७ फडीहटी १८ एरंडिया १९ रसणीया २० प्रवालीया २१ ब्रांवहटा २२ सांपहडा २३ पीतलगरा २४ सोनार २५ सीसाहडा २६ मोतीपोर्टी २७१, सालची २८ मीणारा २९ कुंआरा ३० चूनारा ३१ तूनारा ३२ कटारा ३३ गुलीयारा ३४ परीयदा ३५ घांची ३६ मोची ३७ सुई ३८ लोहटिया ३९ लोढारा ४० चीत्राहरा ४१ सतृआरा ४२ कागलीया ४३ मद्यपहटी ४४ वेश्या ४५ पणगोला ४६ गांछा ४७ भाटभुजा ४८ वीवाहडा ४९ ब्रांवडीया ५० भइंसापत ५१ मलिन नापित ५२ चोपा नापित ५३ पाटीवणा ५४ प्रांगडीया ५५ वाहीवा ५६ काठवीठीया ५७ चोपावीठीया ५८ सूपडीया ५९ सायरीया ६० तेरमा ६१ वेगटीया ६२ यसाह ६३ साथूआ ६४ पेरूआ ६५ आटीआ ६६ दालीया ६७ दउढीआ ६८ मुंजकूटा ६९ सरगरा ७० भरधारा ७१ पीतलहदा ७२ कंसारा ७३ पनसागीआ ७४ पासरीआ ७९ मंजीठीया ७६ साकरीया ७७ सायूगर ७८ लोहार ७९ सूत्रहार ८० वणकर ८१ तंबोली ८२ कंदोई ८३ बुद्धि- टी ८४ कुत्रिकापणहटी एवं चउरासी चउहदां जाणिया । जीणई नगरि अनेक पामीयहं रत्न, जीहतणां कीजहं यत्न । फिस्यां ते रत्न । अन्वरत्न गजरत्न पुरुपरत्न स्त्रीरल अनइ पद्मराग पुष्पराग माणिक सींघलिया गुम्दोद्दारमणि मरकन कर्फतन वन चैर्य चन्द्रकांत सूर्यकांत जलकांत शिवकांत चंद्रप्रभ साफरमभ प्रभानाथ अशोक चीतशोक अपराजित गंगोदक मसारगल्ल हंसगर्भ पुलिक सौगंधिक सुभग सौभाग्यफर विपहर धृतिकर पुष्टिकर शत्रुहर अंजन ज्योतीरम शुभचि गुलमणि अंशुकालि देवा- नंद रिटरत्न कोटपनि कसाउला धूमराइ गोमूत्र गोमेद लमणीया नौला तृण- पर पइगइ यजधार पट्कोण कणी गापडी पिरोजा प्रयाला मौक्तिमममुग रत्नकरी दीसई भरियां होट, अनेकनुवर्णमय घाट; पिली चाट, घाला घोटा- तणां घाट, लोकनई नहीं फिसिउ उचाट । जिहां पुण्य विगाल, तीसी पोमाल, प्राचीनगूजरकाव्यसद्धहः जिहां छात्र पढई चउसाल, तिसी नेसाल; जिहां अध्यात्मतणी वात दृढ, तिसां अनेक मढ़; जिहां लोक जिमई अपार, तिसा सत्रूकार; जिहां पाणी पियइ सर्व, तिसी पर्व: जिहां रमलि कीजई स्वभावि, तिसी वावि; जिहां आनंद हुआ, तिसा कूआ, पद्मवनखंडमंडित प्रवर, महाकाय सरोवर; जिहां रंगि कीजई रयवाडी, तिसी वाडी; जिहां सीतल फुरकइ पवन, तिसां पापलियां चन; इसुं अन्यायरहई दाटण, पृथ्वीपीठि प्रसिद्ध पुहिठाणपुर पाटण । तीणि पाटणि राजाधिराज पृथ्वीचंद्र इसिई नामिई राज्य 'प्रतिपालइ, भुजवलिकरी पइरी वर्ग टालई । जीणि राजा गौडदेशनउ राउ गांजिउ, भो. टनउ भांजिउ; पंचालनउ राउ पालउ पुलई, कानडादेसनउ कोठारि रुलई, ढोरसमुद्रतउ ढोयणां ढोयइ, वावरउ वारि बइठउ टगमग जोयह; चौडनउ दंडि चांपिउ, कास्मीरनउ कांपिउ; सोरठीयउ सेवइ, तुडि न करई देवई; अंगदे- सनउ अंगि ओलगइ, जालंधरनउ जीवितव्यकारणि रिगइ; घणुं किस्युं कही- यइ, रिपुकुलकालकेतु शरणागतवज्रपंजर पंचम लोकपाल । जीणं रिपु सर्वे नि- धोट्या दुर्ग सर्वे आपणा कीधा, वयरीनई देसवटा दीधा। इसिउं नि:कंटक सा- म्राज्य प्रतिपालइ । तेह नरेश्वरनई बुदिनिधान, परमहंसनामि प्रधान; जेउ सहि- जिई रूपिई रूडउ, पाटरहिं नहीं कूडउ; राउलउ अर्थ सारई, लोक ऊगारइ, घपरविग्रह पारइ, पालइ दीन दुस्थित निराधार, करइ साधुजन उपगार; शस्त्रि शास्त्रि कुशल अपार, गुहिर गंभीर, अतिहिं धीर; मुहि मीठउं भापई, काज कीधां जि दापइ चिहुं युडितण निधान, सविहुं अमात्यमाहि मूलिगु प्रधान; रायतण प्रतिशरीर, इसि ते मंत्रीश्वर; नरेश्वररहई, शिवमय सुपमय क- ल्याणमय दिवस अतिक्रमई। अन्यदा प्रस्तावि राजा रातितणई प्रस्तावि स्वप्न एक दीठउ, जेहन फल छह अत्यंत मोटउं । किस ते स्वप्न । इसिउं जाणइ नरेश्वर सुवर्णवर्ण- फांति, देवरहई मन भ्रांति; पलकते नेउरि झलकते कुंडलि हाथि वरमाल, अर्द्धचंद्रसमभाल; रूपि विशाल, इसी वालदेवी देपइ भूपाल । जेतलइ तेहतणी परमाला कंटिकंदलि लागो, तेतलई रायनई निद्रा भागी; जागिउ नरेश्वर, पीतवड़ अलयेसर । किसिउ स्वप्नतणउ घटइ विचार, तेतलइ प्रभातावस. रि हउ मांगलिकशंग्य तणउ ओंकार हआ तिवलितणा दोंकार, मृदंगतणा घोंकार; भतणा मांगलिक्यध्वनि, राजा आनंदिउ मनि शुभहेतु स्वप्नतणउ मनि विचार घरी, पालंक परिहरी; क्षणु एक राजा महापाडइ आव्या । मल्ल पृथ्वीचन्द्रचरित्र सिउ विनोद नीपजाव्या पछइ लानमन्जनादिक प्रभातकरणीय कीधुं, याचकर- हइ दान दीधउं । ति वारें गणनायक दण्डनायक पायक वृत्तिनायक वहीवाहक तलवर माडम्बिक कौटुंबिक इन्द्रजाली फूलमाली धातुर्वादी मन्त्रवादी तन्त्र- वादी यन्त्रवादी कपटाइत चपटाइत अङ्गरक्षक अङ्गमर्दक मीठाबोला सुहावो- ला कथावोला साचाबोला जूठावोला अनइ अनेक राजराजेश्वर मण्डलेश्वर सा- मन्त तंत्रपाल तलवर्ग चउरासीया महामात्य मन्त्रीश्वर श्रीगरणा वयगरणा धर्माधिगरणा सेनाधिपति आगरीया व्यवहारीया राजद्वारिक भण्डारी कोठारी कापडभण्डारी पूगभण्डारी रसोईया पाणहरी श्रेष्ठि सार्थवाह पीठमर्द चारवधू वीणकार वंशकार उतिकार आउजी पखाउजी पटाउजी आलवणकार लाक्षणिक तार्किक छान्दसिक मुखमाङ्गलिक वैद्य ज्योतिषी पाहरी पङ्गधर कुन्तधर धनुर्धर छत्रधर वालकहार सेजपाल थईयात पण्डित कवि लेखक योघ महायोघ माल मसाहणी पाण्डव पउतारप्रमुखसकललोकि करी सश्रीक राजा राजसभां बईठा। राजसभा किसी छइ । जीणि राजसभां कुंकुमजलि छटा दीधी छइ, विविधमुक्ताफलि चतुष्क पूरिया छइं, कर्पूरतणा शंख आलिष्या छई, कृष्णा- गरजवाधितणा परिमल महमहई छई, मोतीतणी सिरि लहलहइंछई, फूलपगर भरिया छई, कटीप्रमाणपायपीठसंयुक्त पुरुषप्रमाण सुवर्णमय सिंहासन मांडिउं छई। तीणि सिंहासणि राजा वहठा । किसउ राजा दीसइ छइ, मस्तकि श्वेतातपत्र छड़; पासई ढलई चामर पवित्र, वाजई विचित्र वादिन, मस्तकि मुगट, कानि कुण्डल, हृदयि हारा हार, महाउदार, धनदतणउ अवतार, रुपतणु भण्डार । घणउं किसिउं कहीयइ । जिसउ पृथ्वीलोकतणउ इन्द्र, जिसउ सोलकलासम्पूर्ण चन्द्र, इसउ दोसइ छह पृथ्वीचन्द्र नरेन्द्र । तिसिइ अवसरि प्रतीहार आविउ प्रणाम नीपजाविउ । राजांसाह्मी दृष्टि दीधी, ऊणि वीनती कीधी; जी अयोध्यानगरीहूंतउ दृत तम्हारइ दारांतरि आविउ मनितणई उत्साहि, जइ हुइ आदेस तु मेल्हउं माहि । हउ राजा- तणउ आदेस, दूति कीधउ सभामाहि प्रवेस । रायरहइ कीघउ जुहार, अलं- करि योग्य आसण उदार । राजा इतरहइ बहुमान दीघउ, कुशल प्रश्न कीघउं । आनन्द ऊपनउ अत्यन्त, हिय दूत वीनवह कार्य विशेप चन्न । जिहां लोकरहई नही किसिउ क्लेश, जिहा नही वइरीतणउ प्रवेश, पुण्यतणउ निवेश; अनेक ग्रामनगर, सोनारूपातणा आगर; मनोहर छइ कोसलादेस ।
९८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रह । तिहां छई नगरी अयोध्या । किसी ते नगरी । धनकनकसमृद्ध, पृथ्वी- पीठि मसिक; अत्यंत रमणीय, सकललोकस्पृहणीय; पृथ्वीरूपिणीकामिनीरह- ई तिलकायमान, सर्वसोंदर्यनिधान; लक्ष्मीलीलानिवास, सरस्वतीतगउ आ- वास; अतुलदेवकुलि मंडित, परचक्रि अखंडित, सदा सुठाकुरि पालित, रमणी- यराजमार्गि शोभित, उत्तंगप्राकारवेष्टित; सदा आश्चर्यतणउ निलय, वसुधाच- नितावलय, निरुपमनागरिकतण ठाम, मनोभिराम; जनितदुर्जनक्षोभ, सन्ज- नोत्पादितशोभ; पुगपरत्नोत्पत्तिरोहिणाचल, कुलवधूकल्पलतारत्नाचल।जीणइ नगरी देवगृह मेरुशिपरोपमान, धवलगृह स्वर्गविमानसमान; अनेक गवाक्ष वेदिका चउकी चित्रसालीजाली विकलसांतोरण धवलगृह भूमिगृर भांडागार कोष्टागार सत्रागार गढ मढ मंदिर पड़वां पटसाल अघटी फडहटा दंडकलस आमलसार आंचली वंदरवाल पंचवर्ण पताका दीपई। सर्वोसर मंत्रोसर मांजणहरां सप्तदारांतर प्रतोली रायंगण घोडाडि अपाडउ गुणणी रंगमंडप सभामंडपसमूहि करी मनोहर एवंविध आवास । जेह नगरिमाहि दोसी नेस्ती साह वसार पटउलीया पडसत्रिया पजूरीआ बीजउरीआ कणसारा भण- सारा मपारा नवकर भोजकर भला लामा अनेक लोक वसइ । पांचसई व्यव- साईया व्यवसायविपइ उल्लसइ । जेह नगर पापलीया अनेकि कृया वावि स- रोवर नइ नोक निरुपम उद्यान आंव नीव जांबू जंबीर बीजपूरप्रमुख वृक्षावली करी प्रधान च्यारि पोलि, प्रधान कोसीसातणी ओलि; प्रभातसमइ सूर्यतणे किरणेकरी प्रासादतणे शिपिरि धजकलश झलकइ, धजऊड ललकइ । घण किसं कहीइ, जिसी होइ अमरावती भोगावती अथवा अलका लंका इसी नगरी अयोध्या वपाणीइ । तीणि नगरी इक्ष्वाकुवंशावतंस विहितवयरीकुलविध्वंस निजकुलकमलराजहंस अतुलबल पराक्रम त्रिवि- क्रमसमान राजा श्रीसोमदेव राज्य प्रतिपालइ, प्रजा संसालइ, अन्याय टालइ । जे राजा सत्यवाचा राजा श्रीहरिचंद प्रतिज्ञा राजाश्रीयुधिष्ठिर निर्भय भीम आपन्न जीमूतवाहन विद्या बृहस्पति लावण्य लवणार्णव रूपि कंदर्प प्रताप मात्तंड ओदायिं वलि राजा अद्भुतदानि चिंतामणि सेवकजनकल्पवृक्ष चतुरंग- वाहिनीसमुद्रघणउ किशिउ कहीइ महासासनु अरडकमलजगझंपणउ प्रता- पलंकेश्वर परराष्ट्रीरायहृदयशल्य इसिउ प्रतापीउ राजा राज्य प्रतिपालइ । तेह राजातणउ अंतःपुरिमाहि प्रधान गुणनिधान भ रतणी भक्तिविषय महासा- पधानि स्त्री कमललोचना इसिहं नामि पट्टराज्ञी वर्तइ । जेह राणी, सहिजि पृथ्वीचन्द्रचरित्र ९९ मधुरवाणी; सीलवंतिमाहियपाणी, गुणि करी जाणी; घणूं किसई; इंद्राणी, जिह आगलि यहिद पाणी। तेह राणीतणइ कुक्षितउ समुत्पन्न मदनभ्रमनणी मंजरी, कुंकमि करी पिंजरी, रत्नमंजरी, इसइ नामिई कन्या वर्तइ । ते कन्या जइ भ- णिवा गुणिया योग्यहई तु पंडितरहिं आपी। तोणिआपणकहइ संस्थापी, पंडि- त अणसंतापी कन्या समग्रकला व्यापी; ताते कन्या वहुत्तरि कला जागइ, चउ- सहि विज्ञान वपाणइ । किसी ते बहुत्तरि कला लिपितकला १ पठित २ गणित ३ गीत ४ नृत्य ५ वाद्य ६ व्याकरण ७ काव्य ८ छंद : अलंकार १० नाटक ११ साटक १२ नखच्छेद्य १३ पत्रच्छेद्य १४ आयुधाभ्यास १५ गजारोहण १६ तुरगारोहण १७ गजशिक्षा १८ तुरंगमशिक्षा १९ रत्नपरीक्षा २० पुरुपलक्षण २१ स्त्रीलक्षण २२ पशुलक्षण २३ मंत्रवाद २४ यंत्रवादतंत्रवाद २५ रसवाद २१ विपवाद २७ गंधवाद २८ विद्यानुवाद २९ युद्ध ३० नियुद्ध ३१ तकवाद ३२ संस्कृत ३३ प्राकृत ३४ उत्तर ३५ प्रत्युत्तर ३६ देशभापा ३७ कपट ३८ वित्त- जान ३९ विज्ञान ४० सिद्धांत ४१ वेदांत ४२ गारुड ४३ इंद्रजाल ४४ विनयकला ४५ आचार्यविद्या ४६ आगम ४७ दान ४८ ध्यान ४९ पुराण ५० इतिहास ५१ दर्शनसंस्कार ५२ खेचरी ५३ अमरी ५४ याद ५५ पातालसिद्धि ५६ धूर्तशं- वल ५७ वृक्षचिकित्सा ५८ सर्वकरणी ५९ काष्टघटन ६० कृत्रिममणिकर्म ६१ वाणिज्य६२वश्यकर्म६३ चित्रकर्म ६४ पापाणकर्म ६५नेपथ्यकर्म ६६ धर्मकर्म ३७ धातुकर्म ६८ यंत्ररसवतीकर्म ६९ हसित७० प्रयोगोपाय७१ केवलीविधिकला७२ एबहुत्तरि कला जाणइ । हिव चउसठि विज्ञान किस्यां। नृत्य ? कवित रचित्र वादिन४मंत्र यंत्र तंत्र विज्ञान ८ दंभ जलकर्म१० गीतगान११तालयायण १२ मेयवृष्टि १३ फलकृष्टि १४ आरामरोपण १५ आकारगोपन १६ धर्मविचार २७ शकुनसार १८ मियाकल्प १९ संस्कृतजल्प २० प्रासादरीति २१ धर्मनीति २२ यर्णिकावृद्धि २३ सुवर्णसिद्धि २४ सुरभिलकरण २९ लीलामंचरण रु गजान्यनिरीक्षण २७ पुरुषन्त्रीलक्षण २८ यसुवर्णभेद २९ अष्टादशलिपि परिच्छेद ३० तत्कालयुखि ३१ यास्तुसिद्धि ३२ वैद्यमिया ३३ काममिया ३४ घटनम सारिपरिभ्रम३६ अंजनयोग ३७ पूर्णयोग ३८ हस्तलाघय ३९ गा. नपाटय ४० नेपथ्यविधि ४१ वाणिज्यविधि ४२ मुग्यमंटन ४३ मालिपंटन। कथाकथन ४५ पुष्पग्रयन ४६ यझोक्ति ४७ काव्यशक्ति ४८ मारवेप ४५सर लभापाविशेप ५० अभिधानज्ञान ५१ आभरणपरिधान ५२ नृत्योपयार ५३ गृहाचार ५४ रंधन ५५ केशबंधन ५६ यीणानाद ५७ विनंटाबाद ५८ अंकविचार प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः । ५९ लोकव्यवहार ६० वशीकरण ६१ वारितरण ६२ प्रश्नप्रहेलिकाज्ञान ६३ धर्मध्यान ६४ ए कहीयई सर्वकलाविज्ञान, जाणइ सकल शास्त्र वषाणइ चउसहि विज्ञान। इति श्रीअञ्चलगच्छे श्रीमाणिस्यसुन्दरसूरिविरचिते श्रीपृथ्वीचन्द्रचरित्रे वाग्विलासे प्रथमोल्लासः। द्वितीयोल्लासः हिव ते कुमरि, चडी यौवनिभरि; परिवरी परिकरि, क्रीडा करइ नवनवी परि । इसिई अवसरि आविउ आषाढ, इतरगुणि संबाढ; काटइयाई लोह, घामतणउ निरोहः छासि पाटी, पाणी वीयाइ माटी; विस्तरित वर्षाकाल, जे पंधीतणउ काल, नाठउ दुकाल । जीणिइ वर्षाकालि मधुरध्वनि मेह गाजइ, दुर्भिक्षतणा भय भाजइ, जाणे सुभिक्षभूपति आवतां जयढका वाजह; चिहुं दिसि वीज झललइ, पंथी घरभणी पुलइ; विपरीत आकाश, चंद्रसूर्य पारियास; राति अंधारी, लवई तिमिरी; उत्तरनउ ऊनयण, छायउ गयण, दिसि घोर, नाचई मोर; सधर, वरसइ धारावर; पाणीतणा प्रवाह पलहलई, वाडिऊपरि वेला वलई, चीपलि चालतां शकट स्खलई, लोकतणां मन धर्मऊपरि वलई; नदी महापूरि आवई, पृथ्वीपीठ प्लावई; नवां किसलय गहगहई। वल्लीवितान लहलहई; कुटुंबीलोक माचइ, महात्मा बइठां पुस्तक वाचई; पर्वततउ नीझरण विछूटई, भरियां सरोवर फूटइ । इसिइ वर्षाकालि राजा सोमदेवतण करावि सरोवर भराणुं, समुद्रसमाणउं; वधावणीउ धायउ, राजाकन्हइ आपउ; राजा मनि गहगहतर, सरोवर जोड्या पुहुतज. दीठउं भरिउं सरोवर, अपनउ आनंभर; जोसी तेडी महोत्सवतणुं मुहर्त लीघउं,अभीष्ट जनरहई तेडउं कीघउं; इसि करतां आविउ आसो मास,दिसि सप्रकास; कमलवन उल्लास, हंसतणु विलास; कादव सूकई, नइ निरर्गलपण भूकई; विकसई कुसमकली, परमेश्वर सर्वज्ञ पूजतां पूजइ मनतणी रली; तिसिइ आसोसुदि पंचमीतणइ दिवसि मोटइ आडंवरि नरेश्वर सरोवरतणी पालि पुहुता, घजपट दीसइ लहलहता। तिसिइ समई अनेक ब्राह्मण मिलिया । कवण कवण । दुवे बिवाडी व्यास पाठक देवाईत मोपाईत सराईत चंद्राईत देवशर्म मोपशमं यज्ञशर्म पृथ्वीचन्द्रचरित्र १०१ सोमशर्म श्रीधर देवधर गंगाधर गदाधर लक्ष्मीधर श्रीवच्छ पद्मनाभ पुरुषो- त्तमप्रमुख ब्राह्मण मिलिया, शांति करिवानई कारणि कलिकलिया; गले नागा, वेद्ध्वनि उच्चरिवा लागा। जे ब्राह्मण १८ पुराण १८ स्मृति जाणइ । ते किस्या पुराण । भागवतपुराण १ भविष्योत्तरपुराण २ मत्स्यपुराण ३ मार्कंडेयपुराण ४ विष्णुपुराण ५ वाराहपुराण ६ शिवपुराण ७ वामनपुराण ८ ब्रह्मपुराण ९ ब्रह्मांडपुराण १० ब्रह्मवैवर्तपुराण ११ आग्नेयपुराण १२ पद्मपुराण १३ लिग- पुराण १४ नारदपुराण १५ स्कंदपुराण १६ कर्मपुराण १७ गरुडपुराण १८ ॥ ते किसी स्मृति । मानवीस्मृति १ आत्रेयीस्मृति २ वैष्णवीस्मृति ३ हारीतकीस्मृति ४ याज्ञवल्कीस्मृति ५ शनैश्चरीस्मृति ६ अंगिरास्मृति ७ आपस्तंबीस्मृति ८ सांवतकीस्मृति ९ कात्यायनीस्मृति १० बृहस्पतीस्मृति ११ पारासरीस्मृति १२ शंखीस्मृति १३ लिखितास्मृति १४ दाक्षीस्मृति १५ गौतमीस्मृति १६ शातातपीस्मृति १७ वाशिष्टीस्मृति १८ । तिसिइ रत्नमंजरी कुंअरिराजारहई बीनती करावी, तिहां कुतिग जोइवा आवी ।जेहतगड परिवारि, सपी अनेकमकारि; कस्तृरिका करिका लीलावती पद्मावती चंद्रावती चंद्रउली चंपू हंसी सारसी वगुलीप्रमुख अनेक सपी वर्तइ । तीहं सहित तिहां आवी । पितारहई प्रणाम नीपजावी उत्संगि बइठी, दिव्य रूप देषी रायतणइ मनि चिंता पइठी । एयोग्य कवण वर, किंनर, किं विद्या- धर, इसीउं चीतवतई नरेश्वर, सरोवरभणी दृष्टि दीधी । तु निर्मल जलि, बइठा कमलि; हंस करई रमलि, च्यारइ दिसि वासीइं परिमलि; कारंड कुरंज कल- हंस कलगलई,ताप टलई मोर वासई, सर्प नासह; आडि पंपीआ तरई, स्नान करई; माहि शतपत्रसहस्रपत्र कमलवन, दीसतां प्रीति पमाडइंमनदेहुरी दंडफलस झलहलई, लहरि ऊछलई । इम जोतां राजहंस एक सरोवरहंतउ ऊडी वहठउ राजातणई हाथि, निहालिउ नरनाथि ।तु रूडउ रूपवंत, मलीयामणउ, सोहामणउ; श्वेत, लावण्योपेत; जिसिउं लक्ष्मीदेवतातणउ चमर, जीणई मोही- यई अमर, कुंदकुसुमस्तबकसमान प्रधान पक्षिकुलावतंस । इसिउ हंस कुति- गकरी कुमारी लीधर, राजा दीघउ । जेतलइ जोअइ कुमरी, तेतलह हंसि जिमणी पाप विस्तारी; कुमरि पापमाहिघाती, भलीपरि साती। पटिउ हंसु, तत्काल पडिउ ध्वंसु । धसमसतउ ऊठिउ राउ, कहइ भाउ धाउ, वलिउ नी. माणि घाउ । राउतपायक पलभलिया, वीर सपि मिलिया। धाउंगणा, प्राण ब्राह्मण १२-२ १०२ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवाहः घरभणी ऊजाणा; दुवे नाठा, सवे त्रिवाडी वाठा। बुंब पडी राउ धायउ हंस- पूटिई जेतलई, हंस धाई पइठउ कमलमाहि तेतलई । जे वारू, ते पठा सरो• वर माहि तार; समग्र सरोवर गाहिउ, पणि हंस न साहिउ। निश्वास मेल्ही राउ पाउ पलिज, परिघउ परिवार मिलिउ । राणी ते वात जाणी, मूळ पामी सप्राणी, सचेत कीधी छांटी छोटी पाणी; राजा आवासी आल्या, कन्यानणुं दुःख धरता छ मास अतिकमाया । तिसिइ आविउ वसन, हउ शीततणउ अंत, दक्षिणदिसितणउ शीतल याउ वाई, विहसई वणराई। सव्वे भल्ला मासडा पण वइसाह न तुल्ल । जे दवि दाचा रूंपडां तीह माधइ फुल्ल ।। मउरिया सहकार, चंपक उदार; येउल बकुल, भ्रमरकुल संकुल, कल- रय करई कोकिलतणां कुल । प्रवर नियंगु पाडल, निर्मल जल, विकसित क- मल; राता पलास, सेवंत्री वास; कुंद मुचकुंद महमहई, नाग पुन्नाग गहगहई। सारसतणी श्रेणि, दिसि पासीई कुसुमरेणि; लोकनणे हाथि वीणा, वस्त्रावर शीणा; धवल शृंगार सार, मुक्ताफलतणा हार; सर्वांगसुंदर, धनमाहि रमइ भोग पुरंदर । एकि गीत गवारई, दान दिवारई; विचित्र वादिन वाजई, रमलि- तणां रंग घाजहं पकिचादिई फूल चूदई, वृक्षतणा पल्लय पूंटई हीडोलई हीनई, झोलतां यादिइं जलिई मीचई; केलिहरां कउतिग जोभई,मीतमंन होयइ।यनपा. लकि अक्सर लही वसंत अवतरियातणी वार्ता फही। राजा सोमदेव आल्या पनमाहि, तेह जि सरोवर देपी कुंअरि सांभली मनमाहि । तेतलई पुपि एक तेह सरोयरहंतुं एक कमल लेइ रापरहह दीघर, राजा हाधि लीघउं । तेतलई तेह जि कमलमध्यहंती नीसरी रत्नमंजरी फुमरि, दीठी नरेश्वरि । दुपतणां च्याप पूरियां, लोक आश्चर्य परिया। नगरमध्य याती जणायी, राज्ञी फमललोचना आयो । दोठी चेटी, शुद परमानंदतणी पेटी, परियरी पेटी। तिहां मांदिया यधामणां, महोत्सवि फरी सुदामणां; विचित्र वादिन याजिया लागा। ते पायण करण । यीणा विपंनी यल्लकी नकुलोष्टी जपा विनिनिमा स्तिका परयादिनी फुन्जिमा घोपयनी मारंगी उदंबरी निसरी झंपरी आलपिणि पाना रायणाला ताल फमाल पंट जय शालरि गरि पुरकगि फमरउ पापरी द्वारा भार म नीमाण तांची फगालि मेला फांमी पाठी पृथ्वीचन्द्रचरित्र १०३ , पाऊ सांप सींगी मदन काहल भेरी धुंकार तरवरा । ईणिपरि मृदंगपटुपडहप्रमुप वादित्र वाज्यां, दुःख दूरि ताज्यां । इकवीस मूर्छना इगुणपंचास तान, इस्यां हुई गीत गान; याचक योग्य प्रधान वस्त्रदान । किस्यां ते वस्त्र । सृथिला संग्रा- मां दाडिमां मेववनां पांडुरां जादरा कालां पीयला पालेवीयां ताकसीनीयां कपूरीयां कस्तूरीयां फूदडीयां चउकडीयां सलवलीयां ललवलीयां हंसवाडि गजवडि उडसाला नर्म पीठ अटाण कताण झुना झामरतली भइरव सुडभइरव नलीबद्धप्रमुख वस्त्र जाणिवां । ईणिपरि महोत्सवभरि, साथि कुमार, नरेश्वर पहुता नगरि । मनतणइ उल्लासि, आव्या आवासि। रायरहइ कुमरीतण स्वरूप विमासतां ऊपनी आकाशवाणी, ए वार्ता कहिस्यई केवलनाणी । राजा तां आश्चर्य धरतई हुंतइ प्रधान तेडाविउ, तिहां आविउ । ते प्रणाम करी वइ- ठउ तउ राजां बोलाविउ । हे मंत्रीश्वर विचारि, पाणिग्रहणयोग्य हुई रत्नमंजरी कुमारि । तु मंडावीयइ स्वयंवर, मेलीयई सवे नरेश्वर, कन्या आपणी इच्छा वरह वर । इसिउ आलोच कीघउ, तु राजा सविहुं दूतरहई आदेश दीधउ; जु को पृथ्वीपीठि राय नइ राणउ, तम्हे जाणउ, ते समग्र ईणि स्थानकि आणउ । तिवारपूटिइं स्वयंवरमंडप सूत्रधारपाहिं कराविवा मंडाविउ, हुं तुम्हकन्ह आविउ । हिव तुम्हे तिहां पाउ धारउ, ए वीनती अवधारउ, राजासोमदेवतणइ मनि आनंद वधारउ । इसी वार्ता सांभली दूतहुई बहुमान देतु कटक लेइ राजा पृथ्वीचंद्र स्वयंवरभणी चालिज, कटकभारि पातालि शेप नाग हालिउ । हाथीया घोडा, नहीं थोडा।किस्या ते हाथीयाछइ । सिंहलदीपतणा,जाजनगरतणा, भद्रजातीक, उल्ललितसुंडादंड, प्रचंड, पर्वतसमान, जलधरवान, चपलकान, मद्जल झरता, आलि करता, अतुलवल, उच्मुखल, गलगर्जित करता गजेंद्र सांचरियां, तर- लतेजी तरवरिया । किस्या ते। हयाणा भयाणा कुंकणा कास्मीरा हयठाणा पह- ठाणा सरसईया सौंधउरा केकाइला जाइला उत्तरपंथा पाणीपंथा ताजा तेजी तोरका काच्छूला कांबोजा भाडेजा आरट वाल्हीकज गांधार चांपेय तैतिल त्रैगर्त आर्जनेय कांदरेय दरद सौवीर क्षेत्रशुद्ध प्रमाणशुद्ध चपल सरल तरल संचासणा परीक्षणा । जोयउं सहई, वपूकारिया रहई; वांकी द्रेटी, सभर पूटि; छोटे काने, सूधइ वानि; सहरनी ललवलाई, नीछटनी कलाई, पूंछतणी आय- ताई; पलाणतणी सामंत्राई; बांकी तुंडवालि, बहुली पेटवालि, मुहि रूपा, १०२ प्राचीनगरकाव्यसङ्ग्रहः घरभणी ऊजाणा; दुवे नाठा, सवे त्रिवाडी नाठा। बुंव पडी राउ धायउ हंस- पूटिइंजेतलई, हंस धाई पइठउ कमलमाहि तेतलई । जे वारू, ते पइठा सरो- वर माहि तारू, समग्र सरोवर गाहिउ, पणि हंस न साहिउ । निश्वास मेल्ही राउ पाछउ बलिउ, परिघउ परिवार मिलिउ । राणी ते वात जाणी, मूर्छा पामी सप्राणी, सचेत कीधी छांटी छोटी पाणी; राजा आवासी आव्या, कन्यातणुं दुःश्व धरता छ मास अतिक्रमाया । तिसिइ आविउ वसंत, हउ शीततणउ अंत, दक्षिणदिसितणउ शीतल वाउ वाई, विहसई घणराई। सव्वे भल्ला मासडा पण वइसाह न तुल्ल । जे ददि दाधा ख्पडां तीह माथइ फुल्ल ॥ मउरिया सहकार, चंपक उदार; वेउल बकुल, भ्रमरकुल संकुल, कल- रय करई कोकिलतणां कुल । प्रवर प्रियंगु पाडल, निर्मल जल, विकसित क- मल; राता पलास, सेवंत्री वास; कुंद मुचकुंद महमहई, नाग पुन्नाग गहगहई। सारसतणी श्रेणि, दिसि वासीई कुसुमरणि; लोकतणे हाधि वीणा, यन्त्रावर झीणा; धवल शृंगार सार, मुक्ताफलतणा हार; सर्वागसुंदर, वनमाहि रमइ भोग पुरंदर । एकि गीत गवारई, दान दिवारई; विचित्र वादिन वाजई, रमलि. तणां रंग छाजई। एकिवादिई फल चूदई, वृक्षतणा पल्लव पूंटइं; होडोलई हीचई, शीलनां यादिई जलिई सींचई; केलिहरां कउतिग जोअई,प्रीतमंत होयह । वनपा- लकि अवसर लही वसंत अवतरियातणी वार्ता कही। राजा सोमदेव आव्या चनमाहि, तेह जि सरोवर देपी कुंअरि सांभली मनमाहि । तेतलई पुरुपि एकई तेह सरोवरहंतुं एक कमल लेइ रायरहइ दीघउं, राजा हाथि लीघउं । तेतलाई तेह जि कमलमध्यस्ती नीसरी रत्नमंजरी कुमरि, दीठी नरेश्वरि । दुग्वतणां व्याप त्रियां, लोक आश्चर्य पूरिया। नगरमध्य वार्ता जणावी, राजी कमललोचना आयी। दीठी वेटी, हुइ परमानंदतणी पेटी, परिवरी चेटी। तिहां मांटिया यधामणां, महोत्सवि फरीसुहामणां; विचिन्न वादिन याजिया लागा। ते कवण कवण । वीणा विपंची वल्लकी नकुलोष्टी जया विचित्रिका हस्तिका फरवादिनी कुन्जिका घोपचनी सारंगी उदंबरी बिसरी झंपरी आलपिणि छ स्ना रायणहत्या ताल कंसाल घंट जयघट झालरि उंगरि कुरकचि कमरउ घाघरी द्वारा टाक हाफ धूम नीसाण तांपकी कटुआलि सेला कांसी पाठी - पृथ्वीचन्द्रचरित १०५ , तेहमाहि नरेश्वरतणां कटक न लहई माग, न लहइ नदीतणा ताग; न साह चाली घोडा हाथी, न को जाणइ साथी। विषम पर्वतमाला, डावी जिमणी वतणी ज्याला, जई न सकई चडिया नइ पाला, तेतलई दीसिवा लागा भील अत्यंत काला। तिवारई राजापृथ्वीचंद्र चीतविउं आवी विषम वेला, जई थाई भील भेला; तु किम झूझीयई, जइ परदल नबूझीयई। जेतलई राजा इसिउं चीत- विउं तेतलई ते कटक अटवीऊपरि हुई पारि पहुतुं, मनि गहगहतुं।आगलि नगर एक देपइ, ते हर्प कुणतणइ लेपइ । सवे कटकीया लोक आश्चर्य धरई, परस्परई इसी बात करई । कुणहि काई जाणिलं, ए कटक इहां फुणि आणिउं; देव ख्राउ, पुणि देव दाणव कोइ तूठउ; जीणई एवढें सानिध्य कीधर, हेलांमात्र कटक इहां लीघउं । अथवा राजा पृथ्वीचंद्र धन्य, जेहनुं गरूडं पुण्य । जेह कारणि इस्युं कहइ।जे गया विदेसि, पडिया ग्लेशि; ताणीया पाणीनइ पूरि, आक्रम्या कूरि; चांया सधरि, डसिया विपरि; घरियां राइ, भेल्या घणे घाइ; मुरडिया मोगे, दहविया रोगे; ऊपाटिया बंदि, पडिया विछंदि; तीहं सविडं- नई धर्मनउ आधार, ए साचउ विचार । लोकरहई इसी बात करतां राजाई तिहां आंचापक्षहेठलि आव्या, अतारा नीपजाव्या । तेतलइ धातु, पुलतु; पाछउ जोतउ, कायरपणह रोतउ; पुरुप एक नरेश्वरतणइ शरणि पइटउ । तेतलह तरूआरि ताकता, हणिहणि भणी हाकना; केई पुरुप आव्या । तेहह राजा बोलाव्या।आपुए चोर, महाकठोर, जे पहनई रापइ ते ढोर। तियारई राजातणे सेवके कहिउँ अरे ए फहीइं राजा पृथ्वीचंद्र, एहस्युं पहुची न सफडं इंद्र। तिवा- रहं ते पुम्प कहिया लागा। नरेश्वर पहिल यात अवधारउ, तउ चोर ऊगार। अम्हे तलार, करउं नगरतणी सार । पुणि ए चौर, दुर्दान्त अपार; प विवि- घवेसि हेरइ, बोलाविउ बोल फेरह; चटह मालि अटालि, पइसह परनालि पालि; कमाड ज्याटइ, पुणि स्तु कोइ न जगाटड, अयोर निद्रा दिन कान- फोटना आभरण लिइ, कटारी पायबंधन वाढइ, पर्वतप्राय केमण काह; पडिर्ड चोर पवाडई, राउला भंडार फार; दीसह दिसि शांत, पुणि राघि साक्षात् कृतान्त; विणासीतउ न मानई चोरी, पांघहर बाढी जाइ दोरी; लोर सांकल मोटर, घदी न रहई पोडइ; फिर जाद, धिर धमी घार, करि फीघद करयालि, जाइ लोकलक्षविचालि; गढमंदिर फाटर, घोजि अदह । इस्यु ए चोर गहनइ परनालि पदमतउ लापर, पाही यांघउ, दति दोर नोटि १०४ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवादः आसणि सूधा; हसमंत यहेपारवि अंबर बधिर करता । सरवीर साहसिक कालूआ किरडिया किहाडा नीलडा सेराहा कविला धूसरा मांकडा दोरीया वोरीया द्वादशावर्त्तव्यंजनगुणि शोभित शालिहोत्रशास्त्रप्रणीतलक्षणलक्षित । ससई धसई, साटि पइसई, जुडई, दउडई।जिस्या सूर्यतणा रथ छूटा हुई तिस्या अनेक तुरंगम सांचरिया । तर पायक पहटिया । किस्या ते पायक । सरवीर विक्रांत दुर्दीत पड्न पेडे लीधे श्रमई, वयरीरहई आक्रमई, पवनवेगिपुलिइं, योधस्युं जुटई, सेल्ल कुंत तोमर ताकई, वयरीरहई हाकई; वेला लामी, न मेल्हई स्वामी; नवनवां आयुध लिई, एक वार आकाश पडतां धाढ दिइ । किहांई न दीसह धाका, जीह लगइ हुइ जयपताका; जे धाई पुलई अच्छलई । इस्या पायकनी मिली कोडि, जीह माहि नहीं पोडि । हिव रथ विस्तरिया । किस्या ते रथ । चपलतुरंगमजूता, सुखिई सुभट चालाई माहि बइठा सता; छत्रीसे दंडायुधे भरिया, वायुवेगि सांचरिया धडहडादि धरामंडल धंधोलई, रजमाहि रविविंव रोलई; ऊपरि घज लहलहई, जाणे देवसंबंधीयां विमान गहगहई; घांट वाजई, वयरी भाजइं; तिवंता जिस्या मनोरथ, इस्या अनेक सांचरिया रथ । ईणिपरि चतुरंग दल चालतो हतां नरेश्वररहई वाटइं अनेक ग्राम नगर आवई, लोक नवनयां भेटणां नीपजावइ । मार्गि जातां आवी एक अटवी । हिव ते किसीपरि वर्णविधी । जेह अटवीमाहि तमाल ताल हंताल मालर खर्जूर अर्जुन चंदन चंपक बकुल विचिकिल सहकार कांचनार जांबू जवीर वानीर फणवीर कीर केलि कदंब निव नारिंग नालीयरि द्वाप दाडिमी देवदार अंकुल्ल ककिल्लि नाग पुन्नागवल्ली यूधिका मालती माधवी जपा मम्बक दमनक पारधि केतकी मुचकुंद कुंद मंदार सगर सेवत्री राजगिरि सिरोपां सौंवलि सिरघू सीसमि साग टीडूसार आक आकमंदार कपित्य बोल यहिहां करण घरण घव पदिर पलाश यह वेडस पीपल पीपरि ऊंयर फटंबड घाटी धामण पीप पेजड पीरणी कहर करंज बाउल वीजुरी आमली आंबिली वोरि इंगोरि गोरडीयाममुख वृक्षायली दीसई, वोहंतां मर्यतणां किरण मादि न पहमदं । अनटं किहां सिवानणा पेकार, कनणा घृत्तार; व्याघ्रः तणा पुरहराट, न लाभई वाट नइ घाट; माहि यानरपरंपरा उछलइ, मदोन्मत्त गजेंद्र गुलगलाई; सिंहनादभयभीन मपगल पलभलई । जिस्या दविं दाधा पील, निस्या भीलामभर पुरकर,पीना युरफट; येताल फिलमिलई, दायानल प्रज्यना; रांड मांचरई, यिम्तणा यूध विचरई । इसी महारौद्र अटयो ।
पृथ्वीचन्द्रचरित्र १०७ ४ पग ५ छुरिका ६ तोमर ७ कुंत ८ त्रिशूल ९ भाला १० भिंडमाल ११ मु- संदि १२ मक्षिक १६ मुद्गर १४ अरल १५ हल १६ परशु १७ पटि १८ शवि- प्ट १९ कणय २० कंपन २१ फर्तरी २२ तरवारि २३ कुद्दाल २४ दुस्फोट २९ गदा २६ प्रलय २७ काल २८ नाराच २९ पाश ३० फल ३१ यंत्र ३२ द्रस ३३ दंड ३४ लगड ३५ कटारी ३६ वहि । इस्यां थीआर झलहलहं, कायर पुलई । रथ जूडंता दूरापाती लघुसंधानी शब्दवेधी धनुर्धर धाया, वाण मेल्हते आकाश छाया । एकि घोडे चडई, एकि ऊतावला पडई; कायर रडई, सुभट भिडई, योघ जुडई । घोडा मुह मूकी धाई,बेटे पगि ऊजाई; हस्तीतणा सुंडादंड Jटई, एकिना शिर फूटई । इसिह युद्धि प्रवर्ततइ हुँतइ राजा पृथ्वीचंद्रत' दल चयरीए एकवार भागू, नासिवा लागू । समरकेत हउ सानंद, पृथ्वीचंद्र हुउ निरानंद, चीतवइ ए किसी बात, माहरा दलरहई काई हुर उपघात । राजा चीतवतइ हंतइ वीर एक आकाशमार्गि आविउ, तीणई कउतिग नीपजा- विउ । तीणं दीठइ वयरीना हायतु हथियार पडियां, पृथ्वीचंद्रना कटकरहई चडियां । राजासमरकेतु बांधी पृथ्वीचंद्रतणे पगतली आणिउ, पुण ते वीर तियारपूठिहं कुणही न जाणिउ । तत्काल जयजयारव ऊछलिउ, राजापृथ्वी. चंद्रतणउ वीरवर्ग मिलिउ। इति श्रीमंचलगच्छे श्रीमाणित्यसुंदरसूरिविरचिते श्रीपृथ्वीचंद्रचरित्रे द्वितीयोल्लासः । तृतीयोल्लासः जइ मान मोडिउ, तउ समरकेतु बंधहृतउ छोटिउ; पिहरायी बोलायोउ। तुं मनि गर्व आणे, माहरी वात न जाणे । किवारहं सूर्य पूर्व छांटी पश्चिम उदय मांटह, समुद्र मर्यादा छांडइ; मेरु ढलइ, आकाशनउ नक्षत्रराशि गल; पापीया- घरि धर्म पलइ, पाणीमाहि अग्नि प्रज्वलई; भूमंटल पलभलई, फुलाचलचक चलइ; अमृतहतउ विप धाइ, पृथ्वी रसातलि जाइ; कृपणि दान दीजइ, पुणि मुझकन्हइ प्राणि शरणागत पोरइ किम लीजड़ । निवारई जे आविड सद गरणि, ते लागु राजातणे चरणिं; स्वामी तुं धन्य जीणि तइ ९ ऊगारिज, नहींतु तलारे हंतु मारिउ; पटतउ संसारि; होयत मनुष्यजन्मनणी हारि। गजा कहिउं तु मिमिउ, जहनुं मन इमि । यिचारि ते फहिया लागु | अंग- । प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्कहः नाटउ, तुम्हनई शरणइ पइठ । पुणि ए पापी, जीणि प्रजा संतापी; ए तुम्ह म थापर, अम्हरहइं आपउ । नहींतु घायमहार देसिड, प्राणिहिं लेसिङ । अम्हा. रउ टाकुर सपराणा, तेह आगलि कोई राय नइ राणउ । सांभलउ ए वात, ए आगलि दीसइ पद्मपुरनगर महाविख्यात । तिहां छइराजा समरकेतु, अति- सचेतु, वयरी प्रति साक्षात् केतु । जेतलइ तेउ ए बात जाणिसिइ, तेतलई ताहरा अहंकारतणउ अंत आणिसिइ । एह कारणि चोर आपी निर्दोप धाउ, पछइ तुन्हे भावइ तिहां जाउ । इसी वाती सांभली आपणां सुभटसाम्ह जोई राजा पृथ्वीचं हस्या, तउ ते सुभट उल्हस्या । अठिया ते वीर, ताकवा लागा तोमर तीर । नाठा तलार, नासता पूटिइं याजइ महारनीठ ते जई नगरमा- हि पइटा, तु नाभिई सास बहठा । जब पीनविउ समरकेतु राउ, देपाडई आ. पण घाउ । समरकेतु राजा कीधर कोप, हउ दलवई निरोप; तत्काल साम- हि दल, मिलई सुभट सबल; वाजई प्रयाणभेरी, चीहई वयरी; पाटहस्ति गु- डिउ, तेहपरि राजा चडिउ । रथ हथियारे भरिया, तुरंगम पापरिया, पायक सांचरिया; चतुरंग दल नीकलिउ, बाहिरि एकठाउं मिलिज; दोसई छत्रध्वज, ऊछलई रजति तेह दृप्त मोकलिउ तिहां रही, तीणे पृथ्वीचंद्रमतिइं इसी वात कही।तुं पियारइ देसि पइस, अन्याय करी इहां वयस;तरतुं अज्ञाण,अजी मानि स्वामीसमरकेतुतणी आण, नहींतु प्रकदि प्राण; चोरदंड तुझनई होसिई, लोक कउतिग जोइसिइ । ईणई वातई दूत अपमानी बाहिरि कादी राजा पृथ्वीचंद्रि दल सामहावित्रं, ए आपणइ पर्व आविरं । चाल्यां बेन दल, ऊपडई धूलिप- डल; कोइ.आपपर विभागबूझवह नहीं, पितापुत्र सुझइ नहीं।नजाणीई आपण दल, न जाणीइ पिरायु दल, नजाणीयइभूतल, न जाणोइ नभोमंडल; न जाणीइ पूर्व न जाणीइ पश्चिम एकाकार हई । बिहुँ दल मिलते मादल वाजी, जयढक वाजी, रणचहण काहली वाजी; रणतर वाजियां । त्र्यंबकतण ब्रहनहाटि जाणे बिन्हा त्रिभुवन टलटलिया लागा, भेरीतणे भूभूयाटि भुहि भिलिहि फाटी, कालतणे कोलाहले कायर कमकम्या,नीसाणतणे निनादि उच्चाया ऊकनिउ, ऐरावण ऊमंडिउ, दिग्गज डहडहिया, दाकवूक वाजी, धुंबारव फाटी, विहुं दलि घालते सेवनाग सलवालज, कुलाचलचन चलिउ, कर्म करोटि भाजइ, अंबर गाजइ अकालि अमस्ताविप्रलयकालनी शंका हुई।बाध्याक्रोध,झूझइयोध; घाय जालवई, उन्नीस दंडायुव चालवई । किस्यां तै। वज्र १ चक्र २ धनुष ३ अंकुश पृथ्वीचन्द्रचरित्र १०९ - दकालनु मेह; थोडा मेहनउ बेह, वहिल आवइ छेह । लक्ष्मीतणउंत न्याय नीपनउ, हिव वैराग्य अपन3; तापसदीक्षा लेसु हिव, जिम हुइ सदासिव । हिव समरकेतु राजा ते वार्ता सांभली मनि वैराग्य पामिर, राजापृथ्वीचं. द्रप्रतिई शिरु नामिउ।अनइ इसी वात कही, ताहरु पुण्य अद्भुत सही। तुरहिइ कोइ अदृष्ट देवता सानिध्य करइ, सर्व विन्न हरइ। ताहरु अद्भुत भाग्य, मुझ- नइ ऊपनु वैराग्य। विमासी जोयुं तउ असार, संसार । जिशि पीपलनुं पान, जिशिउं गजेद्रनु कान; जिशिउ संध्यानु राग, जिशिउ भमरीनु पाग, जिशिड मांकडनु वैराग; जिसिड वीजनु झवकु, जिसिउ पोइणिनइ पाति पाणी- नउ टवकउ; जिशिउ समुद्रनु कल्लोल, जिशिउ धजनु अंचल, तिसिउ सं- सार चंचल । तुं एक कहिलं करि, माहरु राज्य अंगीकरी । हउं तापसी दीक्षा लेउसु, तप करिसु, संसार तरिसु । पृथ्वीचंद्रि तीहं विहुप्रति कहिउं तुम्हे करुवउ धर्म, पणि नथी जाणता मर्म । सांभलउ वन ते वर्णवीइ जे वृक्षवंत, नदी ते जे नीरवंत, कटक ते जे वीरवंत, सरोवर ते जे कमलवंत, मेघ ते जे समावंत, महात्मा ते जे क्षमावंत, प्रासाद ते जे ध्वजावंत, वाट ते जे यूथवंत, हाट ते जे वस्तुवंत, घाट ते जे सुवर्णवंत, भाट ते जे वचनवंत, मठ ते जे मुनिवंत, गढ ते जे अभंगवंत, देव ते जे अरागवंत, गुरु ते जे क्रियावंत, वचन ते जे सत्यवंत, शिप्य ते जे विनयवंत, मनुष्य ते जे धर्मवंत, तुरंगम ते जे तेजवंत, हस्ती ते जे भद्रजातिवंत, प्रधान ते जे बुद्धिवंत, कर ते जे चाय- वंत, राय ते जे न्यायवंत, व्यवहारीया ते जे मयावंत, धर्मी ते जे दयावंत । अहो महाभागउ, हीयाने लोचने जागउ । जेतलं अंतर राणी अनइ दासि, जेतलूं अंतर दही नइ छासि, जेतलूं अंतर मधुरध्वनि नइ धासि; जेतलूं अंतर समुद्र नइ कृया, जेतलं अंतर सोनईया नइ ख्या, जेतलूं अंतर बाप नइ फ्या; जेतलूं अंतर नरेश्वर नइ आहीर, जेतलूं अंतर रूपा नइ कथीर; जेतलूं अंतर सुवर्ण नइ माटी; जेतलूं अंतर वारू भीति नइ घाटी; जेतलूं अंतर पटउला नइ छाटी; जेतलूं अंतर पडसूत्र नइ सूतली, जेतलूं अंतर जी- वता माणस नइ पूतली; जेतलूं अंतर खट्न नइ छुरी, जेतलूं अंतर तंदुल नइ बुरी; जेतलूं अंतर सूर्य नइ तारा, जेतलूं अंतर साकर नइ पारा; जेतलूं अंतर सीह नइ सीआल, जेतलूं अंतर प्रभात नइ वीआल; जेतलूं अंतर रंगा नइ राग, जेतलं अंतर सीबलि नइ साग; जेतलूं अंतर अलसला नइ नाग, १२-३ प्राचीनगरकाव्यसहा देशि श्रीपुरिनगर, तिहां श्रेष्ठि लक्ष्मीधर, श्रीलक्ष्मीई सघर । तेहतणु पुत्र हुं श्रीपति, पणि विषम देवगति; दसकोडि द्रव्य हंती, पणि यापुजीसाथि पहुती। पिता परोक्ष हुआ पूठिई जं वाहणमाहि घातिउं, तं समुद्र सातिउं; कई याणउने प्रसिरहाट चोरे मुसिथलबटनउ थलवटइरहिउँ, काई ठाकुरे ग्रहिउं; घर वलिउं, समत्र मंडाण टलि; समग्र द्रव्य निस्तरित्रं, एकलक्ष द्रव्य ऊगरिउ। पछइ अवर काजकाम छांडिउं, प्रवण पूरिया मांडिउं । भलइ दिवसि प्रवण पूरिउ, विन्नि सई साठि क्रियाणां चटाव्या, सतविध पकवान चडा- व्यां; सप्तविध करवा लिया, पोतां सपाणी भरिया, देवसमुद्र वायस पूजाव्या । पाभिल मादल वाजिघा लागां, वावरि कोलणि नाचेवा लागी,गलेला हेलाहेल करवा लागा; कूउपभउ ऊभउ कीघउ, नागरउ पाडिउ, सिढ ताडिउ; धामतीउ घामतउ लीचइया लागु, वाजरीक तलि पइठउ, नीजामउनालिवइट।आउलां पडई, सूकाणी सूकाण चालवई, मालिम पाहण जालवई; सुरवर लहलह्या, वादिननादि समुद्र गाजी रह्या । हिव आगलि जातां हूंता चिली वाय वायां, आकाशि हई मेयछाया; ऊडिउ पवन प्रवल, समुद्र हउ उच्छृखल; कल्लोल आकाशि ऊपढई, बोहतां लोकरहई डीवा चडइ वेला लामी, वस्तु वामी; एक हा दैव करइ, एक देवध्यान धरई । वाहणि पर्वत आफली भाग, श्रीपतिह हाथि पाटीउ लागउँ।तेहनइ आधारितरतउतरतउबिहु दिवसि पारि आविउ, वनमाहि सरोवरि जल पीउ, फलभक्षण नीपजाविउ । आगलि जाता दीठउ योगी एक, मइ साचविउ नमस्कारतणउ विवेक । जोगी कहि तृरहिइ एक देसु, बीजउ लेहसु।मई कहिउँ दिह,पछइ मुज निईनकन्हई जं देपइ तं लहिई। जोगी बंधछोडणी विद्या देइ मस्तकि मागिउं । मई चीतवइउं, वली पूर्व- भवपातक जागिउं । जोगी धायु पूटि, मइ नासिवा वांधी मूठि । नासतु ईणि नगरि आवी रात्रि गढतणइ पालि पयसी रहिड, तलारके ग्रहिउतइ रापित, मोट उपगार दापित। छासिईकरउ आफरु दासिइके नेह । कंवलकेस मोली पिसत न लागइ पेव ।। माहरी लक्ष्मी इहसरीपी हुई, तउ कहीइ । आभातणी छांह, कुपरिसतणी वाह आढनउ तर, नदीनूं पूर; ठाकुरनउ प्रसाद, माफडनउ विपादः वहीनउ पटीगण, मृपटानउ उठीगण; दीवान तेज, मात्रेईन हेग; दासीनु स्नेह, गर- पृथ्वीचन्द्रचरित्र दकालनु मेह; थोडा मेहनउ बेह, वहिल आवइ छेह । लक्ष्मीतण त न्याय नीपनउ, हिव वैराग्य ऊपनउ; तापसदीक्षा लेसु हिव, जिम हुइ सदासिव । हिव समरकेतु राजा ते वार्ता सांभली मनि वैराग्य पामिङ,राजापृथ्वीचं- द्रप्रतिइं शिरु नामि।अनइ इसी बात कही, ताहरु पुण्य अद्भुत सही। तूरहिइ कोई अदृष्ट देवता सानिध्य करह, सर्व विघ्न हरइ। ताहरूं अद्भुत भाग्य, मुझ- नइ ऊपनु वैराग्य। विमासी जोयुं तउ असार, संसार। जिशिर्ड पीपलनुं पान, जिशिउं गजेद्रनु कान; जिशिउ संध्यानु राग, जिशिउभमरीनु पाग, जिशिउ मांकडनु वैराग; जिसिउ वीजनु झवकु, जिसिउ पोइणिनइ पाति पाणी- 'टवकर; जिशिउ समुद्रनु कल्लोल, जिशिउ धजनु अंचल, तिसिउ सं- सार चंचल । तुं एक कहिलं करि, माहरु राज्य अंगीकरी । हउं तापसी दीक्षा लेउसु, तप करिनु, संसार तरिसु । पृथ्वीचंद्रि तीहं बिहुप्रति कहि तुम्हे करुवउ धर्म, पणि नथी जाणता मर्म । सांभलउ धन ते वर्णवीइ जे वृक्षवंत, नदी ते जे नीरवंत, कटक ते जे वीरवंत, सरोवर ते जे कमलवंत, मेघ ते जे समावंत, महात्मा ते जे क्षमावंत, प्रासाद ते जे ध्वजावंत, वाट ते जे यूथवंत, हाट ते जे वस्तुवंत, घाट ते जे सुवर्णवंत, भाट ते जे वचनवंत, मठ ते जे मुनिवंत, गढ ते जे अभंगवंत, देव ते जे अरागवंत, गुरु ते जे क्रियावंत, वचन ते जे सत्यवंत, शिप्य ते जे विनयवंत, मनुष्य ते जे धर्मवंत, तुरंगम ते जे तेजवंत, हस्ती ते जे भद्रजातिवंत, प्रधान ते जे बुद्धिवंत, कर ते जे चाय- वंत, राय ते जे न्यायवंत, व्यवहारीया ते जे मयावंत, धर्मी ते जे दयावंत । अहो महाभागउ, हीयाने लोचने जागउ । जेतलूं अंतर राणी अनइ दासि, जेतलूं अंतर दही नइ छासि, जेतलं अंतर मधुरध्वनि नइ धासि; जेतलूं अंतर समुद्र नइ कूया, जेतलूं अंतर सोनईया नइ ख्या, जेतलूं अंतर बाप नइ फ्या; जेतलूं अंतर नरेश्वर नइ आहीर, जेतलूं अंतर रूपा नइ कथीर; जेतलं अंतर सुवर्ण नइ माटी; जेतलूं अंतर वारू भीति नइ त्राटी; जेतलं अंतर पटउला नइ छाटी; जेतलूं अंतर पडसूत्र नइ सृतली, जेतलूं अंतर जी- वता माणस नइ पूतली; जेतलूं अंतर खड्ग नइ छुरी, जेतलूं अंतर तंदुल नई बुरी; जेतलूं अंतर सूर्य नइ तारा, जेतलूं अंतर साकर नइ पारा; जेतलूं अंतर सीह नइ सीआल, जेतलं अंतर प्रभात नइ वीआल; जेतलं अंतर रंगा नइ राग, जेतलूं अंतर सीवलि नइ साग; जेतलं अंतर अलसला नइ नाग, ११० प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः जेतलं अंतर हंस नइ काग; जेतलइ लूण नइ कपूर, जेतलइ पजूया नइ सर जेतलइ डाकिली नइ तर, जेतलइ खाल नइ गंगापूर; जेतलइ साधु नइ चोर, जेतलइ हार नइ दोर; जेतलइ गजेंद्र नइ ससा, जेतलई गुरुड नइ मसा; जेत- लइ कोडि नइ सवा विशा, जेतलइ काविला घाट नइ गोहीस; जेतलइ मोटा वृक्ष नइ रोहीस, जेतलइ व्यवसाय नइ कुठाकुर सेव; तेतलूं अंतर अपरदैवत अनइ श्रीसर्वज्ञदेव । एह कारणि इस मनि निश्चियु आणिवउ । जिम श्री सूर्यपापइ दिवस नही, पुण्यपापइ सौख्य नहीं, पुत्रपापइ कुल नही, गुरुपदेशपापड विद्या नही, हृदयशुद्विपापइ धर्म नही, भोजनपापिइ त्रिपति नही, साहसपापइ सिद्धि नही, कुलस्त्रीपापड घर नही, वृष्टिपापड सुभिक्ष नही, तिम श्रीवीतरागपापड़ मुगति नही । अनइ जिहां हिंसा, तिहां नहीं धर्मतणी प्रशंसा । जेह कारणि इसिउं कहिई । जिम विलंब विणसइ काज, कुठकुरि विणसइ राज, मार्जा- रिप्रचारि विणसइ छाज, अणबोलिई विणसइ व्याज; पडपि विणसइ दान, कुसंगति विणसइ संतान, स्वरपापड विणसइ गान, लूई विणसइ मइपान, व्याधिई विणसइ वान, कुमरणि विणसइ अवसान; कुपंडित विणसइ छात्र, क्षयणि विणसइ गात्र, पीपलि विणसइ प्रासाद, सिंदूरि विणसइ साद; आक- दूधि विणसइ नेत्र, तोडे विणसइ नीपन क्षेत्र; चीभडी विणसइ कणकनु वाक, विपश्मयोगि विणसइ रसवतीतणउ पाक; परसालइ विणसइ शस्त्र, पयरी विणसइ वस्त्र, जिम कुव्यसनि विणसइ सत्कर्म, तिम जीवहिंसा विणसइ धर्म । राजा पृथ्वीचंद्र समरकेतु श्रीपतिप्रतिइ कहिइ छइ । सांभलु परमार्थ हिव, टालिड मिथ्यात्वतणी टेब; आदरु दयाधर्म नइ श्रीअरिहंत देव, करउ सद्गुरनी सेव; जिम टलइ पापकर्मतणा लेव । ए वार्ता सांभली तीह विहुंरहिइं मिथ्यात्वतणी भ्रांति टली, जैनदीक्षा लेवा हुई मनि रुली । तेतलइ भाग्ययोगि देवसंयोगिई चारण श्रमगमाहत्मा एक तिहां आविउ, नेहे सविहु तेहरहइं प्रणाम नोपजाविउ । पगि लागी, दीक्षा मागी; तीणि दीधी, वांछितवार्ता सीधी । तिवारपूठिई तेहे ऋपीवर राजा मोकलावी विहारझम कीधु, नरेश्वरि आघउ पीयाणउ दोघउ पहिलं पहुतु पद्म- पुरि, लोक हर्ष पमाडिया भलोपरि। विहां परमहंस प्रधान स्थापिउ, कंवारनु भार आपिउाहिव राजा पृथ्वीचंद्र तेह नगरहंता साते पीयाणे अयोध्या नगरी पृथ्वीचन्द्रचरित्र पहुता, स्वयंवरि आव्या दीठा राय सवे गहगहता । राजा सोमदेवि साम्हई आवी महोत्सवि करी माहि लिया, भला उतारा दिया। तेतलई सूत्रहारे स्वयंवरमंडप नीपायु, पोयणिने पाने छायु । कर्पूर कस्तूरी महमहई, ऊपरि ध्वज लहलहई; चंदूआतणी विचित्राइ, पूतलीतणी काविलाई; धमकुंभीतणा मनोहर घाट, पठंइ भाट; रत्नमई तोरण नइ मोतीसरि, अलंकरिउ कुसुमतणे प्रकरि; वादिन वाजई, मांगलिक्यगीत छाजई; आरीसा झलकई, चालतां स्त्रीना नेउर पलकई । इसिइ मंडपि राययोग्य मांड्यां नामांकित सिंहासण, मागणहारनई पगि पगि दीजइ वासण। तु राजासोमदेवदूत सांचरिया, ऊतारे फिरिया; राय सविहुं योग्य आकारण नीपजाव्या; मोटे आडवरि समग्र नरेश्वर मंडपमाहि आव्या । जिस्या देवलोकसंबंधीया हुई देव, तिस्या दीसई सवि नरेश्वर सिंहासणि बइठा हेव । तिसिइ अवसरि राजा पृथ्वीचंद्र, जिसिउ साक्षात् हुइ इंद्र । इसिउ आवी स्वयंवरि सभामाहि घटउ, सविहुं रायतणे मनि इसिउशंकाभाव पइठउ । एउ सही कन्या वरिसिइ, अम्हारडं आचि- वर्ड किसिइ करिसिइ । राजातणइ मस्तकि छन्त्र, अनइ चमर ढलई पवित्र । राजा पृथ्वीचंद्र देपी सकललोक इसिउ विमासई । जिम अक्षरमाहि ओंकार, मंत्रमाहि ह्रींकार, गंधर्वमाहि तुंवरु; वृक्षमाहि सुरतरु, सुगंधवस्तुमाहि कपूर, वस्त्रमाहि पाटणनउं चीर, वीरमाहि शुद्रकवीर, गढमांहि कालिंजरु, पाणिमाहि वहागरु; दीपमाहि जंबुद्धीप, प्रदीपमाहि रत्नप्रदीप; पर्वतमाहि मेरु. भूधर, जीवनहेतुमाहि जलधर; जिम हस्तीमाहि ऐरावण, मंडलेश्वरमाहि रावण; तुरंगममाहि उच्चैःश्रवा तुरंग, हरिणमाहि कस्तूरीउ कुरंग; धवलमाहि वृपभ, प्रशस्यदिशिमाहि उत्तरककुभ; अचलमाहि धूमंडल, क्षमावंतमाहि भूमंटल; जिम नागमाहि शेपनाग, रागमाहि श्रीराग; जिम ध्यानमाहि शुक्ल ध्यान, दानमाहि अभयदान; मंत्रीश्वरमाहि अभयकुमार प्रधान, पानमाहि नागर- खंडउ पान; ज्ञानमाहि केवलज्ञान, विमानमाहि सवार्थसिद्धि विमान, गरू- आमाहि गगन, पवित्रमाहि पवन, दर्शनमाहि जैनदर्शन; जिम देवमाहि इंद्र, ग्रहगणिमाहि चंद्र; तिसिउ सविहुं रायमाहि दीसह पृथ्वीचंद्र नरेंद्र । तिवारपूठिई राजा सोमदेवि प्रतीहारपाहि कन्यारहई तेटर विराविउ, तउ सघवं स्त्रीए धयलमंगलपूर्व कन्पाइं मांगलिक लान कराविरं । अंगरू- क्षण अनंतर कन्या सदश श्वेत कपड पहिरियां, आभरणे अंग उपांग अलं.
११२ प्राचीनगरकाव्यसवहः करियां । किस्यां किस्यां ते आभरण । हार अढहार त्रिसर प्रालंब प्रलंब कटी- सूत्र कांची कलाप रसना किरीट मुकुट पट शेपर चूडामणि मुद्रिका तबक दशमुद्रिका केयूर कटक कंकण अवेयक अंगुलीयक अंगुस्थल हेमजाल मणि- जाल रत्लजाल गोपुच्छक उरत्रिक चित्रक तिलक कुंडल अभ्रमेचक कर्णपीठ हस्तसंकली नृपुरप्रमुख आभरण जाणिवां । ईहमाहि स्त्री योग्याभरणि कन्या हुई अलंकृतगात्र, हुई रूपतणउ पात्र, मस्तकि धरियां सीकिरितणां छात्र । कन्यातणइ सिरि सिंदृरि भरिउ माग, मुखि तांबूलराग; आविडं नरविमान, तीणि चडी ते चाली देवांगनासमान । आगलि हुइ धादिबध्वनि अनइ गीत गान । ईणिइं परिई सकललोकहुई आश्चर्य करती, हाथि वरमाला धरती; महो- त्सवसहित कुमरि, पहुती मंडपतणइ दारि । ते देपी नरेश्वर सवे मकरध्वजइ मनाविया हारि, चीतवइ ए रंभा कि तिलोत्तमातणइ अवतारि । तेहतणा पाणिग्रहणतणी वांछा घरई, विविध चेष्टा करई । एकि राय आपणा हीयानउ हार हलावई, एकि वाहतणा पहिरपा चलावई; एकि रत्नमय दडा ऊलालई, एकि छुरी ऊछालई; एकि मित्रसि धार्तालाप मांडई, पकि दृष्टिरहई विनोद ऊपजावई, क्षणु एक पांडई, एकि संभालई कानि कुंडल, ईणिपरि विविध चेष्टा करई राजमंडल । तिसि समइ जि जोइवा आव्या आकाश देव अनइ दानव, पृथ्वीपीटि संख्या नही मानव; मिलिया सिद्ध अनइ किंनर, संख्या नहीं विद्याधर । हिय कन्या आमरणितेजि उहसती, रंभारहई हसती; स्वयं- परमंटपमाहि आवी, तु यशोधरा इसिइं नामिई प्रतीहारीई बोलावी । अहे कुमरि, अद्भुत गुण ताहरा सारि, जेहे आकर्षिया हुंता आसमुद्रांतपृथ्वी. तणा राय मिलिया, इसि जाणिउं जेहरई तुं वरसि तेहना मनोवांछित पासा दलिया, मनोरय फलिया। दिय. जोह तुझ्.आगलि. दमाममाघदेमतणन मरेपर, रहिनि पर वेश्वर; राजगृहनगरतणउ राजा मकरध्वज इसिद नामि दीसह । जेह राजा- तणहं कृपाणि राज्यलक्ष्मी यसइ, मुखि मरस्यती उससहा तूठउ दारिब हरइ, दीठउ आनंद करइ रणांगणि गयवरतणी गुडि गांजइ, शनुमट मांजड़ इस्यु भूपाल, एहतगइ कठि घाति यरमाल । अथवा पजोड वाणारसीतणउ राउ, भांजह ययरीनगउ भटियाउ; एसरागदृष्टि अयटोकी, जेहतणउ प्रताप प्रसि. दउ निएं लोकि; जेहतमा गजलि चालतइ टुंतइ इंद्रहुंह सपक्षपर्वततणी पृथ्वीचन्द्रचरित्र शंका नीपजई। जेहतणइ तरलतुरंगमि प्रसरइ हुँतइ बहरीरहतइ प्रलयकालोद्ध- तसमुद्रकल्लोलतणी शंका नीपजइ । इसिउ प्रचंडबल, अखंडभुजबल; अकल, सकल; कर्मचंद्रनामा नरेश्वर वरि, माहरु कहिउं करि । अथवा विदर्भदेस कुं- डिनपुरनगरीतणउ नरपति निहालि, जे विषमकालि; वहइ कर्णदानेश्वरतणउ अवतार, धनुर्घरपणई हरइ अर्जुनतणउ कीर्तिप्रारभार; जेहतणइ अतुल भंडार, प्रबलकोठार, झूझारतणउ नही पार; करइ शत्रुसंहार, करइ भट कइवार; म- लाइवार, महाउदार, कंठि वरमाल घाती ए मकरध्वज राजा अंगीकरि भार । अथवा गौडदेस हंसपुरपाटणनु स्वामी सिंहरथ राजा जोइ, जीणि दीठइ आणंद होइ । जेह राजासंबंधीयइ कुंद्मचकुंदकुमुदकेतकीकर्पूरधवलि कीर्ति में- डलि प्रसरतइ हुंतई नवी सृष्टि स्थापी, तं अंजनाचलपर्वतरहइ कैलासपर्वततणी पदवी आपी; यमुनातणइ स्थानकि कीधउ गंगाप्रवाहु, मित्र कीधा चंद्र नइ राह; सरीपा कीधा हार नइ नाग, अंतर टालिउं बग नइ काग; ईश्वरहुई नीलकंठपण टालिङ, विष्णुहुई कृष्णपणउं पखालिउ; बलदेव वांधवपणउँ उजुआलिउँ । ईणिपरि जीणि ब्रह्मातणी सृष्टि फेरी, तेहनी किसी यात चपाणीयइ अनेरी । इसिउ अलवेश्वर, सिंहरथ नरेश्वर, करि तुं आपणउ जीवितेश्वर । ईणिपरि तीणई प्रतीहारीयई राजा हरिकेतु सिंहकेतु मकरकेतु धूमकेतु पद्मरथ वीर्यवाहु सुवर्णवाहु शंग्वध्वज पद्मदेव पनानंद क्षेमंकर पृथ्वीधर सुबाहु रत्नांगद हेमां- गद हेमरथ मणिरथ मणिशेपर रत्नशेखर चंद्रसोम सोमप्रभ सूरमभप्रमुख नरेश्वर वर्णव्या वपाण्या, पणि रत्नमंजरी कुंअरि मनइमाहि ना आण्या। हिव आगलि दीठउ राजा पृथ्वीचंद्र, निहालिउ तेहतणउ गुपचंद्र, ऊलटिउ आनंदसागर, मनि चीतवइ एउ सही गुणतणउ आगर । तिवारई प्रतीहारीयई कहिलं हे कुमरि सांभलि, पुरा पूर्वई सगर चक्रवर्ति हउ वि. ख्यात वसुधातलि । जेह सगरचक्रवर्तितणइ चउरासी लाप हस्ती, जीहतणि गति महाप्रशस्ती; चउरासी लाप तुरंग, ऊललता जिस्या हुई कुरंग, चउरासी लाप रथ सहिजिई सुरंग; चउरासी लाप नींसाण वाजई, ययरीना भडयाउ भाजह; अत्यंत अभिराम, छन्नु कोडि ग्राम; गाम घोडउं काढतां छन्नू कोडि साहण मिलई, छन्नू कोडि पायक कलकलई; चऊद सहस्र संवाघ, चऊद सहस्र अमात्य अत्यंत साधु; जेहनइ चऊदरत्न, देवता करइ यत्न; नवनिधान, बहुत्तरि सहस्र नगर प्रधान; अन्यायरहई दाटण, अडतालीस सहस्र पाटण; जेहे वसई प्राचीनगरकाव्यसवाहा अनेक कुटंब, इस्या चउबीस सहन मटंव;जीहना वर्णनतणी कीजइ जेड, इस्या सोलसहस्र पेड; जेह चक्रवर्तितणइ सवाकोडि व्यापारी, रिद्धि अत्यंत सारी; चरणि रुणझुणइ नेउर, इस्या चउसहि सहस्र अंतेजर विहितोल्लास, अट्ठावीस- उ लाप पिंडविलास; बत्तीससहस्र राय, प्रभाति प्रणमई पाय; प्रत्यक्ष, पंचवी- ससहस्र यक्ष, वीससहस्र सोनारूपातणा आगर, नवकोडि ध्वजाघर, छत्रीस लाप दीवटीया उदार, निन्निसई साठि सूआर। एवंविध प्रचंडभुजदंड, साधित भरतक्षेत्रपट्पंड; निरुपमस्फत्ति, अद्भुतमूर्ति, इसिउ हूउ सगरचक्रवर्ति । हिव भगीरथ राजा हर सगरतणउ पुत्र, जीणइं गंगा समुद्रिघाति रापिउ आप- णउं चरिन्न । तीणइं राज्य पालिउ अनेक कोडिवरस, तेहनइ पुत्र हुआ दस । तेहमाहिइ एकरहई कुंतल इसिउं नाम, तेह कुंतलरहई दीधउं मरहटदेसि ठाम। तेह कुंतलतणइ पंसि जयवंत जयध्वज देवचंद्र देवानीकप्रमुख राय हुआ, तेहना प्रघटक कुणइ वर्णवाइं जूजुया। देवानीकतणउ पुग्न हउ राजा पृथ्वीशे- पर । जीणि पुहिठाणपुर पाटण थापिउं, स्वर्गतणउ दर्शन प्रत्यक्ष आपिउ । हिव मधुरवाणि, तेहतणउ राजा पृथ्वीचंद्र जाणि। एउ नरेश्वर, ऐश्वर्यगुणि सा- क्षात् सुरेश्वर, धैर्यगुणि मेरु महीधरु, दानिगुणि नवीन जलधर, गांभीर्यगुणि क्षीरसागर, निर्मलपणई गंगाजल, सौम्पपणई शशिमंडल, रूपिगुणि अश्वि- नीकुमार, परकलत्रपरिहरणगुणि गांगेयतणउ अवतार; विवेकगुणि राजहंस, चातुर्पगुणि वृहस्पतितणीपरि लब्धप्रशंस; पृथ्वीभारवणि शेषनाग, एहऊपरि धरि तु अनुराग, इहां छई ताहरउ लाग । घणउं किसिगं कहींई। एह राजा विक्रमाक्रांतक्षोणीमंडल, शौर्यश्रीवदनारविंदप्रद्योतन, सकलमहीपाललीला- ललितशासन, पालिनश्रीजिनशासन, तुज वरिया योग्य छइ । ते रत्नमंजरी कुमारि प्रतीहारितणां इस्यां वचन सांभली अंगि रोमांच धरती, नेउरतणा झमझमकार करती; हर्पभर बहती, राजाकडी पुहती । लाज टेली, कंठकंदलि वरमाल मेल्ही; तत्काल जयजयारव ऊछलिया, लोक कलकल्या; विद्याधर पुष्पवृष्टि करई, भह जयजयशब्द उच्चरइं; गंधर्व गीत गाई, यादिनीया चादित्र पाई; यापरइ धवलमंगल, हुई महामहोत्सव विपुल । इति श्रीअंघलगच्छे श्रीमाणिक्यमुन्दरसूरियते श्रीपृथ्वीचन्द्रचरित्रे वाग्विलास तृतीय उल्लासः।
पृथ्वीचन्द्रचरित्र ११५ चतुर्थ उल्लासः हिव तिसिइ अवसरि तेह राजालोकमाहि जे धूमकेतु राजा कहिउ तेह- रहई धूमकेतुदेवतणउ मंत्र स्फुरइ, तीणई जं चीतवइ तं करइ । धूमकेतुदेव अठ्यासीग्रहमाहिलउ जाणिवउ । कवण कवण । अंगारक १ विकालिक २ लोहितांक ३ शनैश्वर ४ आधुनिक ५ प्राधुनिक ६ कण ७ कणकणक ८ कणक ९ वितानक १० कणसंतानक ११ सोम १२ सहित १३ अश्वासन १४ रुत १५ कार्योपग १६ कर्बुरक १७ अजकरक १८ दुंदुभक १९ शंख २० शंखनाभ २२ शंखवर्णाभ २२ कंस २३ कंसनाभ २४ कंसवर्णाभ २५ नील २६ नीलाव- भास २७ रुप्य २८ रुप्यावभास २९ भस्मक ३० भस्मराशि ३१ तिल ३२ तिलपुष्पवर्ण ३३ दक ३४ दकवर्ण ३५ काय ३६ वंध्य ३७ इंद्राग्नि ३८ धूम- केतु ३९ हरि ४० पिंगल ४१ घुध ४२ शुक्र ४३ बृहस्पति ४४ राहु ४५ अगस्ति ४६ माणय ४७ कामस्पर्श ४८ धुर ४९ प्रमुख ५० विकट ५१ विसं- धिकल्प ५२ प्रकल्प ५३ जटाल ५४ अरुण ५५ अग्नि ५६ काल ५७ महा- काल ५८ स्वस्तिक ५९ सौवस्तिक ६० बर्द्धमान ६१ प्रलंब ६२ नित्यालोक ६३ नित्योद्योत ६४ स्वयंप्रभु ६५ अवभास ६६ श्रेयस्कर ६७ क्षेमंकर ६८ आरंभकर ६९ प्रभंकर ७० अरजा ७१ विरजा ७२ अशोक ७३ वीतशोक ७४ वितप्त ७५ विवस्त्र ७६ विशाल ७७ शाल ७८ सुव्रत ७९ अनिवृत्ति ८० एकजटी ८१ द्विजटी ८२ कर ८३ करिक ८४ राजा ८५ अर्गल ८६ पुष्प ८७ भावकेतु ८८ । इह अध्यासीग्रहमाहि धूमकेतु जाणिवउ । जिवारइ पृथ्वीचंद्रराजातणइ कठि वरमाला पडी, तेतलइ धूमकेतुराजा- हुई रीस चडी। रोसें हूड विकराल, धूमकेतुदेवतातणउ मंत्र स्मरीनइ उछालिङ करवाल । ते खड्ग फीटी हड वेताल, जे उंचउ नवताल; कंठाविलंवितह- माल, करतलि कपाल; बुभुक्षाभिभूत, जिसिउ यमदूत; कान टापरा, पग छापरा; आंपि ऊंडी, पेटि कूडी; आंपि राती, हाथि काती; विकराल वेश, मोकला केश; हडहडाटि हसइ, धरामंडलि धसइ मस्तकि अंगीठउ वलइ, भैरया जिम कलकलइ । इसिउं रुद्र रूप, केतलं वपाणीयइ तेहनूं स्वरूप । इसिउ वेताल देपी सह भयभ्रांत हउ । तेतलहं धूमकेतुराजा ऊठी कन्या उपाटी रविधातिवा लागउ । तेतलई राय राणा धसमसिवा लागा । तेतलई तेह जि वेतालहतउ अं.
११६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसदद धकार प्रसरि । जीणइं अंधकारि प्रसरतई हुंतई अवर कवण लेखइ, कोई आपणी छांह न देपइ । गजेंद्र गलगलारवि जाणीयई, रथचक्र चीत्कारपणई जाणीयई; चिंधपताका किंकिणीकाणि करी जाणीयई, तूर्य शन्दि करी जाणी- यई, नीसाण द्रवहाटि जाणीयई । इसिउ अंधकार विपहर दिवसतणा, च्यारि प्रहर रात्रितणा; छप्रहर गर्भवास सरीपुं प्रवर्ति । दिव ह प्रभात, फीटी राक्षसनी वात, दलिउ अंधकारवत; अदृश्य नक्ष- अपटल, गगन उज्ज्वल; निःशब्द घूककुल, निर्मल दिग्मंडल; आनितपूर्वाचल, हुउं रविमंडल; विहसई कमल, विस्तरई परिमल; वायु वाई शीतल, प्रसन्न महीतल; जिस्या रातापारेवातणा चरण, तिस्यां विस्तरई सूर्यतणा किरण । इसिइ प्रभाति हुँतह दोसई घोडा हाधीया, दीसई पूरिया साथीया; दीसई रायराणापरिवार, पुणि न दीसई रत्नमंजरी कुमारि सार । तिवारइं सोमदेव राजा हर सचिंत, परिवार हउ शोरुवंत, पृथ्वीचंद्र राय हउ विधाय । स्वजनव- संबंधीया राईराणा तिसिइ अयसरि उल्हाणा । ते मंडप रत्नमंजरीपापइ नि:- श्रीक दीसिवा लागउ । जिम लवणहीन रसवती, व्याकरणहीन सरस्वती; गंधरहित चंदन, धृतरहित भोजन; खांडरहित पकवान, मानरहित दान; छंदरहित कवि, शारहित पवि; विवेकरहित मणु, वेदरहित ब्रामणु; स्वर्ग- रहित ऐरावण, लंकारहित रावण; शस्त्ररहित पायक, न्यायरहित नायक; फ- लरहित वृक्षु, तपोरहित भिक्षु, वेगरहित तुरंगम, प्रेमरहित संगम; नासिका. रहित मुखमंडल, कर्णपालिरहित कर्णकुण्डल, वनरहित शृङ्गार, सुवर्णरहित अलंकार; तांबूलरहित भोग, प्रसिद्धिरहित प्रयोग; कंकणरहित वादृदंड, पणि- छरहित कोदंड; चरणरहित वाल, राज्यरहित भूपाल, स्तंभररित प्रासाद, दानरहित मान; मुष्टिरहित कृपाण; ठउलीरहित वाण; अणीरहित छुरी, लोक- रहिन नगरी । जिम पाणीरहित सरोवर, तिम रत्नमंजरीपापड ते न शोभह लोकतण न्यतिकर । ते सभा, हुई निष्पभा। रोझह इंते जेररहई दीजई मोतीतणा घाट, तीह भाट बोलतां न जोइ कोइ वाट; जीह रीझह चीत, ते कोइ न गाह गीत; जेहे ऊपजई चित्र, ते न याजई वादिनः जीणं धूणीइ मस्तक, ते कोइ न वांचइ पुस्तक, जीरन धपाणीयई औचित्य, निसिन होइ नृत्य । इमिइ दुःमि स्वयंवरमाहि पवर्ततइ हतपृथ्वीकपि एदउ । धृजइ धंभ, पूजई कुंभ, धूजइ रायराणा आसणपीठ, वठे रहीहं नीठ; एकि पृथ्वीचन्द्रचरित्र धूजतां पडई, कायर रडई।इम धूजि विछूटी, पछई सभाविचालि पृथ्वी फूटी। विवर नीपर्नु । तेह ज माहि तेज प्रगट हउं । जोताहतां तेह विवरमाहि दिव्यरू- पधारिणी सिंहासणि वइटी स्त्री एकि दीसिवा लागी । तेह स्त्रीतणइ उत्संगि शोभमान तेजभारि, दीठी रत्नमंजरी कुमारि । सह आश्चर्यपूरित हउं । तीणे स्त्रीई विहं हाथि कुंअरि ऊपाडी बाहिरि मेल्ही, आपणपई माहि गई, पृथ्वी वली तिसीह जि हुई । असमाधि फेडी, राजा कंअरि आधी तेडी। तिवार लोकतणा मेला, वात पूछिवातणी नही वेला। हिव हर्पिड़ लोक कलकलिया, विशेषतु उच्छव ऊकलिया । राजा कुमारि अनइ पृथ्वीचंद्र सहित आवासि पहुता । राय ऊतारे हया। भोजन मंडपपरि घज लहलहिया, विवाहमहोत्सव गहगहिया । हुई धवलगान, नीपनां पकवान; केलवीयई धान, स्वजनहुई बहुमान; यापरई पान, जिमाडीयइं जान । कामकाजना धणी पलवटि वांधी हीडइ आकुला, मेलई चाउरी चाकुला । मेलई आडणी, हिय भोजनतणी मांडणी । बइठी पांति, जिमणहार परीसणहार विहुरहहं पांति । पहिलउं परीस्या फलावली खंडग्वाद्य पक्कान्न, पछइ परीस्यां उपहा अन्न। तां विशालस्थालि, परीसी शालिदालि; ततणी नालि, पापलि शा. करणी पालि; ऊपरि कर करवा दही वापरई, ईणिपरि लोक भोजन करई । आ- चमनअनंतर दोघां कपूरमिश्र वीडा, लक्ष्मीवंततणे सत्रे वस्तु संपजइ मीडां । हिव वेलाऊपरि राजापृथ्वीचंद्रहुई कराविउं मंगलस्नान, विवाहयोग्य पहिरियां वस्त्र प्रधान । सर्वाग शृंगार धरिउ, जाणे इंद्र अवतरिउ । गाउ गजेंद्र आविउ, उत्तिम स्त्री वधाविउ । गजेंद्रहंतउं ऊतरी डायद पगि सिरावसंपुट चांपतउ माहि पहुतु । आचारविचार हआ, चउरीसमाहि च्यारि मांगलिक यां, हाथ- मेलावणई दान भवत्यौ। राजासोमदेविवरहुई गजरथ तुरंगमदान दीयउं, राजा- पृथ्वीचंद्रि महोत्सवसहित रत्नमंजरीतणउं पाणिग्रहण कीघउं । पछइ विशे- पर्वत उत्सवसंयुक्त ऊताराभणी चालिउ, सकललोक जोडया मिलिउ । पकि बपाणइ पृथ्वीचंद्र भूप, एकि वपाणइ रत्नमंजरीतणउं रूप; पकि यपाणड भाग्य, एकि धपाणइ सौभाग्य; एकि यपाणइ शरीरतणा शृंगार, पकि यपाणइ परिवार; एकि यपाणइ ऊहतणां कुल, पकि वपाणइ विहुंतणां शोल निर्मला; पकि वपाणह लावण्य, एकि वपाणइ पुण्य । इसीपरि वाणीतु स्थानकि आ विउ, विश्वहुई आनंद ऊपजाविउ । राजासोमदेवि सपिहुं रायहुई आवर्जन पृथ्वीचन्द्रचरित्र ११९ धिवललोचन; जिसिउ चालतउ हुइप्रासाद, अथवा कैलासपर्वतयुं लिइ बाद । इसिउ अत्यंत शुभ, दोठउ पभ २। तउ राणीयइ दीठउ सीहु । किसिउ ते सीह । रूप्यपिंडपांडुर, अद्भुतप्रभादंबर, रक्तोत्पलमुकुमालताल, तालूह लागी आरक्त जिह्वा जिसि हुइ अशोकप्रवाल विस्तीर्णकेशरसटाशोभित- स्कंध, वज्रसारशरीरवंध; प्रवरपीवरप्रकोष्ठ, कमलदल रक्तोष्ट, तीक्ष्णदादाविडं- चितवदन, पराममतणउं सदन; पुच्छच्छटां पृथ्वी आस्फालतउ, पीतलोचनि भूमिकांति निहालतउ, मूषागतसुवर्णसमान फिरतां पिंजरनेत्र, शौर्यवृत्ति- तण क्षेत्र; अकलअगंजित, सवल अपराजित; अवीह, एवंविध दीठउ सीह ३ तु दीठी देवी लक्ष्मी । ते किसी । हिमवंतपर्वततणइ शिपरि, महामखरि; पद्म- द्रहमाहि योजनप्रमाणविमलकमलि संनिविष्ट, चंद्रसमानवदन, कमलसमान- लोचन, निर्जितसूर्यमंडल, देदीप्यमानकुंडल; उदारप्रलंवितहार, अदुतशृंगार; दिग्गजेंद्रे अमृतकलसि करी अभिपिच्यमान, पगतलि चांपी रही नवनिधान; एवंविध सकलकल्याणपात्र, मनोज्ञगात्र, देवी लक्ष्मी दीठी शतदनंतर अशोक चंपक नाग पुन्नाग प्रियंग पाडल सेवन्त्री जाइ जूही वेउल बउल श्रीदमणा मरूआ मंदार मुचकंद केतकीप्रमुखयनस्पतीतणे कुसुमि निप्पन्न भ्रमरभरभुज्य- मानपरिमल एवं विध दीठउ मालायुग्म ५। तउ दीठउ चंद्रमा। ते किसीउ चंद्र- मा।रात्रिलणइ समयि उदयि करी, सकल ताप हरी; रोहिणीरमण यामिनीजी- वितेश्वर अमृतमयमूर्ति उज्वलधवल, प्रीणितचकोरकुल, एवंविध चंद्रमंडल ६॥ तउ दीठउ श्रीसूर्य । किसिउ ते सूर्य । प्रभाततणइ समइ जेह श्रीसूर्यतणइ उदइ मासादतणां दार ऊघडई, देवहुई पूजा चडइ; पंथ सये वहई, मुनीश्वर धर्मकथा कहई, लोक वादविशेष लहई, मेघ मल्हार गाइइ । मांहि अनेक शतपत्र सहस्रपत्र लक्षपन्न कोटिपत्र सूर्यवंशी कोमल विहसई, चक्रयाक उल्हसइं; एवंविध प्रखरकिरणनिकर, दीठः सहस्रकर ७। तउ दीठउ ध्वज । फिसिउ ते ध्वज । कृताहाद, कोई एक गरूउ प्रासाद; प्रखरि, तेहतणद शिपरि; अखंड, सुवर्णमयदंड; तेजि करी अंकुश, कनकमय कलश; भली, रत्नमय पाटली; तिहां जिसी स्वर्गतउ ऊदाली, इसी फाली; निरुपम स्वरूप, तिहांसी. हतणउं रूप । इसिउ घंटागणि गहगहतर थाइ लहलहनु निर्मल नीरज, राणी दीठउ ध्यजमाता दीटर पूर्णकलस। किसिउ ते पूर्णकलस । सुवर्णयटित रल- मप पडघीयां स्थापित, कंठि पुष्पमाला व्यापित; माहि अमृतपूरित घरजगली- १२० प्राचीनगूर्जरकाव्यसद्धहः विराजमान, आम्रफलमधान; मांगलिक लक्ष्मीप्रदानतणइ विपड अनलस, दीटर पूर्णकलस ९तउ दीठ सरोवर, वृक्षतणउ परिकर; पालिउन विस्तर, देहरी. नउ समहर, पाणीनउ आकर । चउकी चउपंटी झलहलई, परड वाइ लहरि अच्छलई, ऊपर जाण भरीयई, पड कृइ तरीयइ। अमृतोपम नीर, दीठई ठरइ शरीर; सारस कुरल कपिजल कलहंस कलगलई, तापतणा व्याप टलई; राज- हंस रमई, भ्रमर भमई; चकोर चक्रवाक कृजई, जलकेलिना कोड पृजई; मोर वासई, सर्प नासई; आडि पंपीया तरदं, ब्राह्मण रनान करई; आस्तिक लोक नित्य सारई, कश्मल निवार; संध्याविधि साधई, अघमर्पणमंत्र आराधई; धोतीयां धोयई, कमंडल ढोयई। सिसिरगुणतणउ सहवास, जलदेवतातणउ निवास । देहरी दंडकलस आमलसारा झलकइ, जलहारिणीकुलवधूतणां नूपुर पलकई; तडि कोतिस्तंभ दोसइ, हीय विहसइ । वग थलइ जाइड, मेघ मल्हार गाइइ । माहि अनेक शतपत्र सहस्रपत्र लक्षपत्र कोटिपत्र सूर्यवंशी सोमवंशी कमलवन विकाश पामई, देवता जिहां क्रीडा कामई । एवंविध उदार, वृत्ताकार; अत्यंतसार महामनोहर; दीठउं पनवनग्वंडमंडित सरोवर १० । तउ दीठउ समुद्र । किसिउ ते समुद्र ! अनंतजलु, अनंतकल्लोलकोटोसंकुल । माहि मत्स्य महामत्स्य ना न्चमा पाठीन पीठ तिर्मिगिलितणां कुल पडइ, एकि ऊपडइ । लहरि वाजई, पाणी गाजई; दक्षिणावर्तशंखतणां यूथ फिरइं, माहि अनेक प्रयण सांचरई । एकि पूरीई, एकि नांगरीयई, वाहण वाहणरहई एकि मिलि- तां आफलई । मोतीप्रवाला आगरथकां लीजइ, किहां एकड मेघिई पाणी पी- जई। इसिउआश्चर्यतणउ निलय, पृथ्वीपीठहुइ वलय; गुहिर गंभीर, अनंतनीर; समुद्र, राणीयइ दीटर समुद्र ११ । तर दीठ विमान । किसि विमान । सुवर्णमपभित्ति, रत्नमयविच्छित्ति; प्रशस्यकलशि करी शोभमान, गगनल- क्ष्मीहुई कुंडलसमान; जेहभाहि अनेक देव देवी रमलि करई, एकि श्रुति घर- इं; पकि गीत गायई, पकि वादिन वाई; हीयई हर्ष न माई । अनेककुसुम- तणा प्रकर, चंद्रूआतणा निकर; मोतीतणी सरि लहकई, कपूरकस्तृरीतणा परिमल वहकई; ध्वजा लहलहई, मन गहगहई। एवंविध विवुधवधूजनक्रीडा- स्थान, तेजःपरलि निर्जितलानुप्रधान, दीठउं विमान १२ । तउ दीठउ रत्नरा. शि। किसिउ ते रत्नराशि । अनेक वन वैडूर्य चंद्रकांत जलकांत पुष्पराग प- मराग मरकत कर्केतन चंद्रप्रभ साकरप्रभ प्रभानाथ अशोक चीतशोक अप- पृथ्वीचन्द्रचरित्र राजित गंगोदक मसारगल्ल हंसगर्भ लोहिताक्षप्रमुखरत्नतणउ राशि विर- चितविश्वप्रकाश देपइ राणी मनतणइ उल्लासि १३ । तउ दीठउ निधूम वैश्वा- नर । किसिउ ते वैश्वानर । कांतिभरकमनीय, प्रदक्षिणावर्त्तज्याला करीय रम- णीय; मधुप्तधनपरिपिच्यमान, कूर्चरहितदेवतामुखसमान; धूमरहित, तेज- सहित; मांगलिक्यमूल, विश्वानुकूल; प्रवर, एवंविध दीठउ वैश्वानर ४१ । ए चतुर्दश स्वम देषी राणी जागी, निद्रा भागी, मनि विमासिवा लागी। मई ला ए चऊद सुमिणां दीठां, ईहतणां फल हुसिइ अत्यंतमीठांत स्वा- मीकन्हइ जाइसु, निःसंदेह थाइसु । इसिउं विमासी कइ न बोलावी दासी; सखी महिली सवि पाली, राणी स्वयमेय चाली। हंसगति हरपिई गहगहती, जिहां राजा तिहां पहुती जयविजय करती । रायहुई निद्रा टाली राजातणइ आदेसि भद्रासनि बइठी । स्वमवार्ता सांभली राजा फल कहिउं; राजी हदपि अहिडं। तिवार पूठिई आपणइ स्वस्थानकि आवी, पल्यंक वइसी सस्त्रीसहित धर्मजाग- रिका नीपजावी। प्रभाति नरेश्वरि सत्तामादि स्वमपाठकपाहिदं विचार कहा- विउ, दान देउ निमित्तीवर्ग अदरिद्र नीपजाविउ । संपूर्ण दिवस अतिक्रमे हते परमेश्वरतणउ हउ अवतार, देवता करई जयजयकार । इति श्रीअञ्चलगन्छे श्रीमाणिक्यसुन्दरसूरिविरचिते श्रीपृथ्वीचन्द्रचरित्र वाग्विलासे चतुर्थीलासः। पञ्चमोल्लासः -000- तत्काल मनतणी रली, छप्पन्न दिपमारिफा मिली।ते कयण कवण । भोग- करा १ भोगवती र सुभोगा ३ भोगमालिनी ४ तोयधारा ५ विचिया ६ पुष्प- माला ७ आनंदिता ८ मेघंकरा : मेघवती १० सुमेया २१ मेघमालिनी १२ सुबत्सा १३ वत्समित्रा १४ वारिपेणा १५ बलाहका १६ नंदोत्तरा १७ नंदा १८ आनंदा १९ नंदर्दिनी २० विजया २१ वैजयन्ती २२ जयंती २३ अप राजिता २४ समाहारा २५ सुप्रदत्ता २६ सुप्रबुद्धा २७ यगोधरा २८ लक्ष्मी- पती २९ शेपवती ३० चित्रगुता ३१ वसुंधरा ३२ इलादेवी ३३ सुरादेवी ३४ पृथ्वी ३५ पद्मावती ३६ एकनाशा ३७ नवमिका २८ भद्रा ३९ सीता अलंयुसा ४१ मितकेशा ४२ पुंडरीका ४३ यारणी ४४ हासा ४९ सर्वममा ४० प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्घहः श्री ४७ ही ४८ सुतारा ४९ चित्रकनका ५० चित्रा ५१ सौत्रामणी ५२ रूप ५३ रूपांसिका ५४ सुरूपा ५५ रूपवती ५६ एवं अधोलोकनिवासिनी ८ ऊर्ध्व- लोकनिवासिनी ८ रुचकपर्वतचतुर्दिशिनिवासिनी प्रत्येक ८,८, विदिसिनिवा- सिनी ४ मध्यरुचकनिवासिनी ४ ईणिपरि छप्पन्नदिकमारिका आची । तेहे सूतिकर्मतणी समग्ररीति नीपजावी। तदनंतर सौधर्मादिकदेवलोकइंद्ररहई आसनप्रकंप नीपनउ । पहिलउं इंद्रहुई कोप ऊपनउ । वन ऊलालि, ज्ञानदृष्टि निहालिउँ । जाणिरं परमेश्वरतणउ अवतार, ऊलटिउ भक्तिभार । इंद्र मनि गहगहिउ, आसण छांडी उत्तरासंग करी गूड़े थइ मस्तकि हाथ जोडी शक्र- स्तव कहिउ । इंद्रि आसणि बइसी हरिणगमेसी देव बोलाविउ, तत्काल आविउ । इंद्रतणइ आदेसि सुघोपा घंटा आस्फालीनइ देवलोकि जणाविउ । इंद्र लक्षयोजनप्रमाणि पालंकि विमाने चडी पंचरपि परमेश्वर लेउ मेरुपर्व- ति आविउ । चरसठि इंद्र मिलिया, देवसमूह हर्षि कलकलिया । आठ सहस्र चउसहि आगला कलसि करी निर्मलजलि भरी स्नान कीधउं । तदनंतर अंग- रूक्षण करी विलेपन २ वस्त्रयुगल ३ वासपूजा ४ पुष्पारोहण ५ माल्यारोहण ६ वर्गारोहण ७ चूर्णारोहण ८ ध्वजारोहण ९ आभरणारोहण १० पुष्पग्रह ११ पुष्पप्रकर १२ अष्टमंगलकरण १३ धूपोत्क्षेप १४ गीत १५ नृत्य १६ पादित १७ सत्तरभेदपूजातणउं करणीय सीधुं। तीणि अवसरि गगन गाजियां, इगुणपंचासभेदि वाजिन बाजियां । क- यणकवणपरिई । उद्धमंताणं शंखाणं संगीयाणं खरमुहीयाणं परिपरियाणं अहम्मंताणं पणवाणं पडहाणं अफालिलंताणं भंभाणं हारंभाणं तालिजं. ताणं भेरीणं झल्लरीणं दुंदुभीणं आलिप्पंताणं मुखाणं मुत्तिगाणं नदीमुत्तिगाणं घटिजंताणं कच्छभीणं चित्तयोणाणं आमोडिनंताणं झुकाणं नउलाणं छिप्पं- ताणं दुंदुकीणं चिंपार्ण चाइज्जताणं करडाणं डिडिमगाणं उत्तालिजंताणं त- लाणं तोलाणं कंसतालाणं घटिळताणं रिकिसिकाणं सुंसरिकाणं दुंदुकीणं - मिळताणं यंसाणं वेणूणं एवमाईणं एगृणवन्नाए पयाइज्ज़ताणं । ईणि युक्तिई, भावभक्तिई, आत्मशक्निई, परमेश्वरहुई स्नानमहोत्सघ करी पुनरपि पंचरूपिई इंद्र होई देव मातातणई समीपि मुंकि । वत्रीस वत्रीस स्थाल सिंहासनादिक यत्रीसकोटि सुवर्णरत्नतपी वृष्टि करी, स्वामीतणद दक्षिणहस्तांगुष्टि करी अमृत संचारी, यानयुगल कुंटल श्रीदाम मेल्ही इंद्र स्वस्थानकि पछतु ।
पृथ्वीचन्द्रचरित्र १२३ , वि प्रभाति दासीमहिलीए राउ वधाविउ, स्वामी तम्हारे पुत्र आविउ । राजा वधामणी दीधी, नगरमाहि सर्व महोत्सवतणी पद्धति कीधी। अलंकरित पीकार, शृंगारियां मतोलीबार। मंच अतिमंचतणी रचना हुई, स्वर्गपुरीतणी शोभा लई । ध्वजपताका लहकई, पुष्पपरिमल बहकई । नाचई पात्र, राजाभ- पनि आवई अक्षतपात्र । सोमाई भणतां आवई छात्र, लोक अलंकरई आभर- णि गात्र, उत्सव करिवा एहइ ज वात । तीणि वेलां न ऊऊई कोरण, वांधी- पई तोरण; वांधीयई वंदरवाल, उत्सव विशाल; गुलघीउ लाहीयई, मन ऊमा- हीयइ । ईणि युक्ति जन्ममहोत्सव हुआ । नामगरणतणइ अवसरि माताहुई डोलइ धर्म बुद्धि हुई । एहभणी धर्म इसि नाम दीघउ, परमेश्वरि रमलि करतां बालपणुं लीघउ, यौवनवयि राजकन्यातणउ पाणिग्रहण कीघउं । अदई लाप वरस कुमारपणउं पाली पंचासवरस राज्यलक्ष्मी पामी, पछह विरक्ति- युक्त हउ स्वामी । नवविधलोकांतिकदेवतणी बीनतीलगइ सांवत्सरिकदान दोघउं, पछइ महोत्सव सहित चारित्र लीघउं । वि चरस छमस्थ काल अति ममी, केवललक्ष्मी पामी, विहारक्रम करई, भव्यलोक तारई। दिव राजा पृथ्वीचंद्र अनइ सोमदेव उद्यानपालकरहई साढावारलारस सुवर्णदान दे समस्तपरिवारसाथिई लेई परमेश्वर नमस्करिया सांचरिया, स- काललोक ऊलटि धरिया । पृथ्वीरहई अलंकरण, दीठ स्वामीतण समोसरण । किसिउँ ते । समग्र देव आवई, समोसरण नीपजावई । तां पहिलं वायुकुमारदे- वतानिर्मित संवर्तक वायु विस्तरई, ते तृण काष्ठ कचचर हरई, आकासि मेघ- पदल पसरई, गंधोकि वृष्टि करई, फूलपगर भरई । गरूअउं रत्नमय पीठ वाधी ऊपरि जानुप्रमाण पंचवर्ण कुसुम यरसई, चिहुं दिसि दिव्य परिमल विलसई। रत्नमय सुवर्णमय रूप्यमय निन्नि प्रकार रूपि करी उदार, अनेक प्रकार, मणिरत्नसुवर्णमय कउसीसां सदाकार, च्यारि मतोलीद्वार । तिहां बिह पासे उच्चस्तर सुवर्णमय स्तंभ, अपरि मणिमय कुंभ, इंद्रधनुपमानमूरण, रत्नमय तोरण, प्रत्यक्ष जिसी मांगलिक्यनी पालि, इसी बंदरवालि । अनेकि विचित्र, विशाल छत्र, उदारस्वरूप, कनकमय पूतलीतणां रूप; जेहे लिपित सिंह शार्दूल गज, इस्यां निर्मल नोरज, पंचवर्ण धज । इस्या समोसरणविचा- लि, मणिद्वपीठि विशालि; सकलमांगलिक्यमुग्य, गरूर अशोकक्ष; जि. मिउ प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, इसिउ बारगुण प्रत्यक्ष । नेतणी छायां रत्नमय
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प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्घहः
सिंहासंण, जगन्नाथहुई बइसण । तेजिइं जोई सकीयइ नीठ, इसिउं रत्नमय
पादपीठ; जिस्यां विकसित सहस्रपत्र, तिस्यां पनर छनातिन; अमर, देवहुई
ढालई चमर; अधरीकृतआदित्यमंडल, तीर्थंकरलक्ष्मीकर्णकुंडल; पूठई झलकई
भामंडल । जेहतणइ दनि मिथ्यात्वपटल टलई, इसिउ आगलि धर्मचक्र
झलहलई; दिव्य दुंदुभि वाजइ, तीणि निर्घोप गगनांगणि गाजई, परतीर्थिक-
तणउ भडवाउ भाजइ । सहस्रप्रमाणयोजन इंद्रधज लहलहई, धूपतणा परिमल
महमहइं, धादिवतणी कोडि हुनुहई। मनुष्यतणी कोडि आवई,मनि रहरहा ।
ईणि इसिइ समोसरणि परमेश्वर जगदीश्वर नवसुवर्णकमलि पाय स्थाप-
तर, पूछिया ऊतर आपतुः प्रभाई दसइ दिसि च्यापतउ, भविकलोकहई
पाप मूंकायतउ, पूर्वदिसितणइ द्वारि पइसह, पूर्वाभिमुख सिंहासनि वइसइ
चतुर्मुग्य होइ, भविकसंमुख जोई। संपूरी, वारपरिपदपूरी; मिथ्यात्वमानमूरी,
पापपटलचूरी, सर्वसत्त्वसाधारिणी, अमृतानुकारिणी, मधुरवाणी; लाभ जाणी;
घखाण करइ, धर्म मार्ग विस्तरइ ।
हिव बेउ नरेश्वर मनि गहगहना, समोसरणिमाहि पहुता । श्रीधर्मनाथ-
हुइं प्रदक्षिणा देउ, आगलि बइठा नरेश्वर बेउ । तियार राजापृथ्वीचंद्रि आप-
गई विशेपर्वतई रूपि लावण्ये करी देवदानयइंद्रहुई आश्चर्य कीथु, श्रीधर्मनाथि
तीर्थकरि उपदेश दीघउ । किस्यु ते ।
सदंशजन्म गृहिणी स्पृहणीयशीला लीलायितं वपुपि पौरुपभूपणा श्रीः ।
पुत्राः पवित्रचरिताः सुहृदोऽपदोपाः स्युर्धर्मतः ग्वलु फलानि पचेलिमानि॥१॥
अहो भव्य जीव ए इस्यां धर्मनां फल जाणिवां । कवण कवण । पहिलं
तां उत्तिमकुलि अवतार, ए धर्मतणां फल सार । जइ जीव नीचकुलि अवत-
रइ, तु किसिउ पुण्य करइ ! एह विश्वमाहि एक माछीतणां कुल, भीलतणां
कुल, कोलोरणां कुल । ईणिपरि थोहरी आहेडी यागुरी पाटकी मद्यप घांची
चोर वेश्या वावरी मेय डुंव पाणपेरणीयांतणां पापतणां कुल जाणिवां। जीव
एहे कुले अवतरी पाप करी नरकि जाइ, लाधु मनुप्यजन्म निरर्थक थाइ ।
पुणि जीवहुई उत्तिम कुल दुर्लभ । कुण तेउ उत्तम कुल ।
चंसाणं जिणवंसो सव्वकुलाणं च साश्यकुलाई।
मिद्धिगई य ईणं मुत्तिसुहं मन्यसुक्ग्वाणं ॥ २ ॥
पृथ्वीचन्द्रचरित्र वंश ते प्रशंसि जेहे जितणउ अवतार, वंशतणउ कवण विचार । इक्ष्याकुवंश सूर्यवंश चंदिल्ल चाहूआण सोलंकीवंश वालावंश वाघेला वाघरो- लावंश गुलवंश गुलबरवंश सोभटा भाटीया सीदा बांदा दाहिणमा कच्छवाह कणवाहा हणवंश हरीयड शकट सिलार धान्यपालवंश अनंगपाल राजपाल दधिपाल कलाप परमार मोरीवंश यादव सैंधव निकुंभ गुहिलउत्त डोडीवंश डोडीयाणवंश मंकआणा खइरवंश सीलणवंश घोडाणवंश दहीयावंश प्रमुख वहीयावंश प्रमुग्ववंश जाणिवा । अनइ ब्राह्मणादिक कुलविशेष जातिविशेप जाणिवा । जिम कलिकाल प्रवर्तमानि चउरासी ज्ञाति बोलीयई। किसी से जाति । श्रीश्रीमाली उसवाल चावेरवाल डीडू पुष्करवाल डीसावाल मेडत- वाल भाभू सराणा छन्नवाल दोहिल सोनी पडवड पंडेरवाल पोरूआड गूजर मोढ नागर जालहरा पडाइता कपोल जांबू वायडा वाव दसउरा करहीया नागदहा मेवाडा भटेउरा कथरा नरसिंहरा हारल पंचमवंश सिरपंडला कमोह रोतकी अगरवाल जिणाणी बांभ घांघ पाल्हाउत उचित वगडू अहिछ- बाल श्रीगउड वाल्मीकि टाकी तेलटा तिसरा अठवनी लाडीसाखा बधन- उरा सुहडवाल वीघू पद्मावती नीमा जेहराणा माथुर धाकड पल्लीवाल हरसउरा चित्रउडा गोला गहिवरिया लोहाणा भाटीया नागउरा आणंदउरा सतला कड- कोलापुरी रायकवालपेसीया पेख्या गोमित्री नारायणा दींटू गजउडा गोपर आ अजयमेरा कंडोलीया कायस्थ सगउडा सीहउरा जेसवाल नादेवा जाइलवाल- चावेल । एणि सविहुं ज्ञातिकुलवंशमाहि वपाणीइ सुश्रावककुल । जीणि सुश्रावकतणइ कुलि जीववधु टालीयइ, जीवदया पालीयइ; मिथ्यात्व परिहरी, यह, सम्यक्त्व अंगीकरीयह: पाणी भलीपरि गालीपइ, इंधण सोधी ज्वालीयइ; अथाणू न रापीइ, अणंतकाई न चापीई; चोरी न कीजइ, सुपात्रि दान दीजइ- सुतीथि वित्त वावी लाभ लीजइ; आलोअण लेई पाप घोईई, परिग्रहममाणि पुण्यवंत होईइ उभयकाल सामायक त्रिकाल देवपूजा समाचरीइ, पुण्यभंडार भरीइ वावीस अभक्ष बबीस अणंत काय टालीयइ, आठमि चऊदसि पूनिम अमावास चउमासी पजूसण पर्व पालीपई, पुण्यमार्ग उजुआलोयइ । इसु श्रा- यफतणड कुल, तउ पामीवइ जइ पोतइ पुण्य हुइ विपुल । उत्तिमकुलि लाधइ हुँतइ गृहस्थरहई जय हुइ । कुकलत्रतणउ संयोग, तु हुइ पुण्यतणउ वियोग । किसी ते कुकलन । जे चालती कउयछि, साची अलछि; आत्मकुटुंवर्भ- जकि, प्रचित्तरंजकि, कपटविपइ पटिष्ट, अतिहिं अनिष्ट; वोलति छउड ऊनार इरोसई छोरू मारह; जीभई जव छोलइ, अलविहं असंबद्ध वोलहं, वगाई करती १२६ प्राचीनगूर्जरफायसवह गोद१ गिलइ, घरि विनोड करी बाहिरि मिलइ, वोलाची विसई हाथ उछलइ फुफ्ती सापिणी, चालती चीत्रिणी; पुण्यदारतणी आगल, नगरतणी भागल । धणूं किसिउं कहीयद । जिसी मिरीतणी ऊगटि, जिसि चालतउं पलेवणउं; जिसी दाबञ्चरतणी वहिनि, इसी संतापकारितु संपजइ नारी, जउ जीव पाप- कर्मि भारी । अनः तु हुइ सुकलत्र, जइ पोतइ छुड पुण्यपवित्र । किसी ते। सुशील सुलील सदाचार सत्ययंती विनयवंती विवेकयंती पुनवंती वोलवती सुजाणि मधुरवाणि देवगुरतणइ विपइ भक्त, पुण्यतणइ विपद आसक्त; सरजि सलावण्य, इसी सुझलनतु संपजइ जइ पोतइ पुण्य । अनड जं शरीरि संपजई लीलावंतपणूं, तं पुण्यतणउंप्रमाण।जंमधुरगति चालइ, पापमुद्विपालइ सहजि विचक्षण, शरीरि वत्रीसलक्षण; अलिफुलफजलश्यामल केशपाश, अष्टमीचंद्र- समान भालस्थल, कामदेवकोदंडाकार भ्रूभंग, पूर्णचंद्रसमान वदनमंडल, आद- शनलसमान कपोलयुगल; मोक्तिकश्रेणिसमान दशनमाल, वक्षस्थल विशाल; प्रचंड भुजदंड, इसी रूपलमी अवंड, तु संपजइ जड़ पोनइ प्रचुरपुण्यपिंड। अनइ जे द्रव्य ऊपार्जिवातणइ कारणि पकि लोक देवदेवता आराधई, मंत्र विद्या सधरपणई साधइं; राजसभा युद्धियंत भणी यइसई, रणक्षेनि पहिला पइसइ, व्यापारकला रेलवई, धूर्तपणई भलारह भोलवई; जलमार्ग सलमार्ग आदरि आक्रमहं, भूमंडलि भूजालि भमई; जोगीपठिई लोभि लुमधा लागई, कि मोटा ठाकुर मागई; कि पाला पुलता पंधि चालई, पकिरादेव भणी यइरागरि घाउ घालहंकि हल पेटई, उलग करई लागा ठाकरकेडई; रसगरणि रसपिका पडई, कि फलकलत समुद्रि पर; कि निग्निंसई माठि मिपाण पटरदं, पिरायां कवित्य पा रह; फष्ट साई विपुल, पुणि लक्ष्मी तु पाम जद पोनई छुइ पुण्य परिघल; घरि सुवर्ण मणिरता प्रवाल, प्रधान मुक्ताफल, गजरधनुरंगमादिक जाणिया लक्ष्मीनणा विलास मफल । रियजं मंपनड सत्सुत्र, पर पुण्यतण चरित्र । एकई तण कि कु. पुत्र एजे यालपणि पालो लाली. पणि जेतला पावनभरि जाई, तेतलई मारीतनामा पाई; कृत्य अन्य न गिण, यहांनणां यचन निरण; माची. प्रमानांनी बोल भणडं, अशरिण; लक्ष्मीमदि कृपानि परम, पुभानगि पिटम, पिराई भूमि ग्रम, पाहा पनि उलम, कटी पात परनां मामां धमा; स्वाननी परि ममई, अपरा एम; पापरी उमः गः, गर्भगनां निपद न यमर, दरयां पुत्र अमर अजाण, 7 पापन' + +- , पृथ्वीचन्द्रचरित्र १२७ प्रमाण । अनइ जं पुत्र विवेकीया विचारवंत, सहजिई संत सौभाग्यवंत, गरू- आंप्रति भक्तिवंत गुणवंत; देवगुरुधर्मतगइ विपइ तत्पर, सुपुत्र पानीयइ जइ पोतइ पुण्यतणउ भर। हिव तु पामीयइ सुमित्र उत्तम, जइ पोतइ पुण्य हुइ निरुपम । एक जीव सहजई दुर्जनप्रकृति, पापतणइ विपइ मोटी आकृति; मुहि मीठउ, चित्ति विणठउ; पिरायां छलछिद्र जोइ, विणास विण विगोई; उपगारिकेतलईन लीजई, परप्रशंसा मनमाहि पीजइ; आपणपउँ घणुं देवइ, अवर नहीं किसिई लेखइ; सजन संकटि पाडइ, परदोष ऊघाड; राउलइ वानइ, देवगुरु अपमानई; मूर्ति- वंत अधर्म, चोलइ पिराया मर्म । जिसिउँ विषवृक्षनउ वन, इसिउ जाणिवर्ड दुर्जन । एकि जीव, सहजिई उत्तमस्वभाव, पुण्यकपरि भाव; उपगार करई, परमर्म हीपडइं धरई; परदोप न प्रकासई, असत्य न बोलई हासई; उन्मार्गि न चालई, पापवाती दालई, गुरूपदेश झालई, धर्मत न हालई; नवे क्षेत्रे वेवई धन, जिसिउ वापनुं चंदन; इस्यां जीहनां सीतल मन, इस्या कहीयइ सज्जन । संपजइ सुमित्र सजन सुजाण,तं पुण्यतणउ प्रमाण । इस्यां धर्मफल देथी, प्रमाद ऊवेषी; आलस परिद्री, आदर करी; पुण्यतणइ विपद भावनासहित लाभ लेवउ । जेह कारणि इसिड कहीइ । जिम प्रासाद शोभइ ध्वजाधारि, जिम हृदय शोमई हारि; जिम गृह शोभई उत्तिम नारि; जिम मस्तक शोभइ केशमा- ग्भारि जिम कर्ण शोभइ स्वर्णालंकारि, जिम शरीरि शोभइ शीलभंगारि; सरोवरि शोभइ कमलि,पुष्प शोभइ परिमलि; मुप शोभइ निर्मलि नेत्रयुगलि, रात्रि शोभइ चंद्रमंडलि; विवाह शोभइ कूरि, उत्सव शोभइ तरि, नदी शोभइ पूरि; जिम सम्यक्त्व शोभइ प्रभायना, तिम धर्म शोभइ भावना । एह कारणि भावनासहित पुण्यवंति लाभ लेवउ । जिसिई पुण्यप्रभावि सक- लश्रेयकल्याण संपजई। इसिउ उपदेश सांभली, मनतणी रुली, परमेश्वरप्रतिई बिहुं नरेश्वरि चीनती कीधी चली । हे जगन्नाथ! संदेह भांजिवानई ऊभउ हाथ; तुझ टाली अपरि संदेह न भाजई, संदेहभंजन विरुद तूंरहई छाजई । जेहि कारणि इसिड कहीई । समुद्रि उलंघीयद भारंडि न मसइ, गजेंद्र विडारीयइ सीहि न ससई, विषधरतणां विप जोरविपई गुरुडि न कृकडई, वृक्षसिहरतणां फल लीजई तडबडई न दूंकडइं; संग्रामभूमिई भिडीयइ राउति न दयामणद, भंडा- रीतणा भार झालियइ अभीष्टि न अलपामणई; पर्वततणां टोल ताणीयई १२८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः नदीतणइ पूरिन वाहलई, रायतणइ मनि रंगि रहावीयई मधुस्वरि न पाहलई; समुद्रि सेतुबंध वांधीइ पर्वते न काकरई; दृढगढतणी पोलि भांजियइ गजेंद्रि न वाकरइं, याचकजननां दरिद्र टालीयई दातारि लक्ष्मीवंति न आजन्मदुस्थि; सकलसंदेह भांजीइ केवलीए न छद्मस्थि । तेह कारणि तर हे स्वामिन् अम्हारा संदेह टालि, एक संदेह ऊपनउ सरोवरतणि पालि; एक ऊपनउ अटवीठामि, एक संग्रामि; एक स्वयंवरि, ए सवे संदेह अपहरि । इसी चीनती सांभली जगन्नाथ कहइ छइ अहो नरेश्वर सांभलउ । हिव कहीइ छ। पूर्वभव, जिसिउ हुउं अनुभव । ईणइ क्षेत्रि भृगुकच्छनामिइं नगर, जिहां नर्मदा नदी प्रवर; प्रौढ धवलगृह, लोक पुण्यविषइ सस्पृह; जीणि नगरि महाधर मंडलीक सेल- हत्य चरवीर राउत डवइत भाषाइत अडणाइत फलहकार छुरीकार नलीकार कुंभकार सींगडीया सावलीया जेठी यंत्रवाहा भंडारी कोठारीप्रभृति राज- लोक वसई, संवैज्ञभवन देपी मन उल्लसइ। जिहां पद्मश्रीनामि सरोवर, महामनोहर, जिहां राज्य पालई द्रोणनामा नरेश्वर । तेहतगइ सागर अनइ पूरण इसिइ नामि पवित्रचरित्र, वि पुत्र । ते वेउ नर्मदानदीमाहि बेडी चढी मत्स्य विणासि वाप्रवत्तिया। तिसिइ अवसरि मत्स्य एक साम्हन जोई तीहा तिई बोलिउ । रे दुराचारउ म करउ पाप, नरकि इस्यां हुसिइ संताप, नहीं छूटउ करताइ विलाप; जइ न मानउ तउ पूछउ आपणउ चाप। ए बात सांभली चेज कुमर भयभ्रांत हुआ । तिसिइ नदीना कंठि एक दीठउ मुनीश्वर । तेहे वेडीत तरी नमस्करिउ । वच्छउ तुम्हे म्हारा पौत्र, ह पालडं चारित्र; तुम्हे करउ अक्षत्र । तीणइं सोनई किसि कीजई जीणइं त्रूटई कान, तीणई उपाध्यायि किसि कीजई जीणई चूकई ज्ञान, तीणई ठाकुरि फिसि कीजई जीणई पामीइ पगि पगि अपमान; तीणइं धर्मि किमि कीजह जीणई वाधइ मिथ्यात्ववाद, तीणई वयरई किसिउं कीजई जीणि पाछइ ऊपजड़ विपवाद, तीणि मिनि क्रिसिडे कीजई जीणिई थाई प्रमाद; तीणिइं घरि किसि कीजई जेहमाहि फुफ्इ साप, तीणइंजीई किसिउं कीजई जेहतु नितु संताप, तीणई रामतिई किसिउं कीजई जीणि कराइ पाप । वत्स मुझ भक्त व्यंतरि, मत्स्यमुग्धि अवतरी; तुम्हे जगाटिया, पुण्यमार्गि लगाडिया । हिय पाप परिहरउ, पुण्य कर । तीणई कपीश्वरि पुण्यनणी परठ कही, तेहे विठं ग्रही । आच्या आपणइ घरि, करई पुण्य नवनवीपरि; दिहं दान, धरई अरिहंततण ध्यान; करइ सुगुरुभक्ति, जाणई विवेकयुक्ति; करावई प्रासाद, पृथ्वीचन्द्रचरित १२९ . पटावडं सबूकारि साद, पालइ सम्यक्त्व, जाणइ नवतत्त्व; करई सामायक सार, स्मरड पंचपरमेष्ठि नमस्कार, वे कुमार इसीपरि भरइं पुण्यभंडार । अन्यदा प्रस्ताचि द्रोणि राजां तीह बिहुँहुई राज्य दीघउं, आपणपई राजी. सहित चारित्र लीधउं । निर्मल चारित्र पाली भावविशेपि पातालि वलीन्द्र अवतरिउ, राणीइं इंद्राणि थईनइ तेह जि अणसरिउ । दिव पूरणनणइ पद्मश्री इसिह नामि हुई कलन्न, जे महासचरित्र । ते सागर पूरण पद्मश्री पुण्य करी पता देवलोकि, सोख्य भोगवी अवतरिया मनुष्यलोकि । सगरतणउ जीय उ तु सोमदेव नरेन्द्र, पूरणनउ जीव हा पृथ्वीचंद्र। पद्मश्री ईहां रत्नमंजरी अवतरी। पूर्वतण धर्म फलिउ, सर्वसंयोग मिलिउ । विडं नरेश्वरि ईणिपरि उपदेश सांभलिउ, श्रीधर्मनाथतीर्थंकरि वली कहि। हिव सांभल जे पूछिया संदेह, तेरनु कोजइ छे । जिसिंह समड रन- मंजरी सरोवरतणी पालिई पितातणड उत्संगि बडठी, कुणरहई देवातणी चिंता पइठी; तिसिइ अवसरि, बलाद्रदानवेश्वरि, शानिप्रमाणि, पूर्व जाणी, पुत्रवीचंद्रनिमित्त रापिवा रत्नमंजरी हंसरूपिई अपहरी आपण कन्नड आणी । छमास पातालि स्थापी, पछड अवसरि पाछी आपी। राजा पृथ्वीचंद्र- हुई स्वम दोध, अश्वी अनइ संग्रामांगणि महासान्निध्य कीधउं । अनइ स्वयं- परि जेतला धूमकेतु राजां वेतालांधकार विस्तारीनइ रनमंजरी रवि पाती, तेतलई बलीद्वतणी इंद्राणी ते मेल्हिउ निपाती। प्रहर पातालि रापी, प्रभाति प्रकट करी दापी; उहे दिपाडिउ पूर्वभवस्नेह, पतलई टलियां सवे संदेह । अहो पृथ्वीचंद्र ताहरू विशेपवंत छड भाग्य, अद्भुत सौभाग्य । जेह कारणि गृत्स्यपि हाथिय घडतां ईणइ जि भघि उपजिसिह केवलजान, एह भणी " भाग्य प्रधान । सोमदेवदुहं प्रीजइ भवि मुक्ति, इसी छह पुक्ति । एवार्ता मनि घरी, श्रावफयोग्य धर्म आदरी, परमेयर नमस्करी; वे नरेश्वर मपरिवारि स्वस्थानकि आन्या, परमेश्वरि विहारमम नोपजाया। हिव राजा पृथ्वीचंद्र सुसरउराउ मोफलायी रामंजरीसहित आपण पुरिठाणपुरि पारणि आया, प्रयानि प्ररेश मरोत्सव कराया । माल लोक Pाट पाटण काज काम परितरी आभरण सूटते, वेणीदंड घटते; पटरले फाटते, पारडे विणसते; घसमसाटि जोडया घाउ राजा महोत्तरसारित आपणर आयासि आइउ । रामंजरी पहराणी स्थापी, फोति जगत्रयी च्यापी। राज्यसोभाग्य भोगपना अवसरि रवमंजरी मीयर इमिदं नामिई १३० प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः पुत्र जन्मिउ । ते सर्वांगसुंदर, रुपिई पुरंदर विवेकवंधुर राज्यधुरंधर सत्पुरुप. सिंधुर नामि महीधर प्रवर्द्धमान हउ । राजापृथ्वीचंद्ररहइं राज्य करतां नव- लाप नवाणवइ सहस्र नवसई नवोत्तर वरस अतिक्रन्यां । तिसिइ अवसरि कानडदेसनउ राउ सिंहकेतु इसिई नामिई अकस्मात् पुहठाणपुरि पारणि- ऊपरि चडी आविउ, लोकरहई आतंक ऊपजाविउ । तत्काल चरपुरुषि पृथ्वी- चंद्ररहई जणाविउ । ते सांभली राजापृथ्वीचंद्र कोपि करी करवाल ऊलालतु सामहिउ, सुभटवर्ग गहगहिउ; भंभा वाजी, गगनांगण रहिउ गाजी। राजा आप जेतलई हाथि चडिउ, तेतलई मनि विमासण पडिउ । रे आत्मन् हुं घाघवहरी पूठिई धाउं, अंतरंगवहरी पूठिन धाउं । कुण ए बुद्धि, किसी शुद्धि, जीतउ जोईयइ क्रोध, जेहतउचालइ विरोध; जीतु जोईयइ मान, जेह- हुई पर्वतन उपमान; जीती जोईयइ माया, जेहतु पामीयइ स्त्रीतणी काया; जीतु जोईयइ लोभ, जेहतु संसारि समयक्षोभ, जीतु जोईयइ काम, जेहतु फेडई पुण्यतण ठाम । ईणिपरि नरेश्वरहुई चीतवतां ऊपन शुक्लध्यान, तत्काल अपनउं केवलज्ञान । आव्या देव, करई सेव; वइरी समिउ, आवी नमिउ; वाजई वादिन, महोत्सव विचित्र । देवे चेप दीधउ, राजऋपि लोधउ; हंसजमलि, बइठउ सुवर्णकमलि दिइ उपदेश, हउ पुण्यतणउ निवेश । एके आदरिउं सम्यक्त्व, एके श्रावकत्य; एके संयम, एके नियम । ईणिपरि लोक- हुई लाभ देई पृथ्वीमंडलि विहारक्रम करी पृथ्वीचंद्रि राजा सिद्धिसाम्राज्य लीवलं, तेहतणइ पुत्रि महीधरि पहुंठाणपुरि अखंडप्रतापि राज्य कीघउं । पृथ्वीचंद्रनरेश्वरतण चरित्र सांभली, मनतणी रली, वली; वली, विवेकवंति पुण्यवंत लाभ लेवउ । जिसिइं. पुण्पतणा प्रभावनउ सकल श्रीसंघहुई श्रेय. कल्याण ऋद्धिवृद्धिपरंपरा संपजई ।। श्रीमदञ्चलगच्छे श्रीगुरुमाणिक्यसृरिणा। पृथ्वीचन्द्रनरेन्द्रस्य चरित्रं चारु निर्मितम् ॥ संवत् १४७८ वर्षे श्रावण मुदि५ वौ पृथ्वीचन्द्रचरित्रं पवित्रं पुरुषपचने निर्मित समर्थितम्। यावन्मेरुमही यावत् यायचन्द्रदिवाकरौ । वाच्यमानो जनस्तापदग्रन्योऽयं भुवि नन्दतात् ॥ इति श्रीअन्धलगच्छे श्रीमाणिक्यमुन्दरसूरिस्ते श्रीपृथ्वीचन्द्रचरित्रे वापिलासे पञ्चम उल्लासः ।
KATILA IHEO खरतरपट्टावलीषट्पदानि SN जिण दिइ आनंदु चडइ अइरहसु चउग्गुणु । जिण दिवइ फडहडइ पाउ तणु निम्मलु हुइ पुणु । जिण दिट्टइ सुहु होइ कट्टु पुबुकिउ नासइ । जिण दिट्ठा हुइ रिद्धि दृरि दालिद्द पणासइ । जिण दिइ सुइ धम्ममइ अबुहहु काइ उइक्वहहु । पहु नवफगमंडिउ पासजिणु अजयमेरि कि न पिक्खहहु ॥ १ ॥ मयण म करि धरि धणु वाण पुणि पंचम पयडहि । रूविण पिम्मपयानि बंभहरिहरु मन विणडहि । रूप पिम्सु ता वाण मयण तायरिसहि घणहरु । नवफणमंडिउसीस जाव न हु पिक्खिउ जिणवरु । जह पडिहसि पासजिणिंदवसि नाणवंत णिम्मलरयण । तनु धणुहरु वाण न रूप नहि न भुयप्पिम्मु हुइ हइमयण ॥२॥ नयफणिपासजिणिंदु गढिउ अन्नल्लि जु दिहउ । अजयमेरि संमरिनरिंदु ता नियमनि तुटउ । कंचणामउ अह कलसु सिहरि साणउ रनवियउ । जणु सुतरणि तउ तवइ तिब्बु आयासिसउन्नउ । जा बुजुमिसिण ढकारविण कर उज्झिवि फरहरइ धर । जिणदत्तरि घर धवलि जसि ता पसिद्धि सुरभवणि कथ ॥ ३ ॥ देवसूरिपहु नेमिचंदु बहुगुणिहि पसिद्धउ । उज्जोयणु तह बदमाणु खरतरवर लखउ । सुगुरु जिणेसरसरि नियमि जिणचंदु सुसंजमि । अभयदेव सव्वंगु नाणि जिणवल्लह आगमि । जिणदत्तसरि ठिउ पहि तहि जिण उजोइउ जिणचलणु । सावइहि परिक्खिवि परिवरिज मुल्लि महग्घउ जिम रयणु ॥ ४ ॥ घणुहर घयवड धरिय सार सिंगार सुसन्जिय । सोगिण गुडगुडिय पंच वर पडिम निमल्जिय । तियड अ ते अग्गलिय पिम्मपडिकारनित्तिय । रहरणरहसुचलिय गरुयमाणिण मइ अनिय । करि कडपड मुणिमहिवइहि रहिअ अ संपुन्नभय । निणदत्तसृरिसीरह भयण मयणकरटिघड विहडि गय ॥५॥ तवनलफभोसणह धम्मधीरिमसुविसालह ।
१३२ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः संजमसिरभासुरह दुसहवयदाढकरालह । नाणनयणदारुण नियमनिसनहरसमिदह । कम्मकोवणिदुरह विमलपुच्छपसिद्धह । उपसमणउपरघरदुविसह गुणगुंजारवजीहह । जिणदत्तसरि अणुसरह पय पापकरडिघडसीहह ॥ ६ ॥ जरजलपहलरउद्द लोहलहरिहिं गन्नतउ । मोहमच्छउच्छल्लिर कोवकल्लोल वहंतउ । मयमयरिहि परिवरिउ चंयवहुबेलदुसंचन । गंथगरुयगंभीरु असुहआयत्तभयंकरु । संसारसमुहु जु परिसउ जसु पुणु पिक्विवि सुदरियइ । जिपदत्तस्मृरिउवएसु सुणि त परतरंडइ सुतरिया ॥७॥ सावय किवि कोयलिय केवि खरहरिय पसिद्धिय । ठाइ ठाइ लक्खियहि मूढ नियवित्तिविरुद्धिय । दरहि न किंपि परत बेचि सुपरुप्पर जुज्झहि । सुगुरु कुगुरु मणि मुणिवि न किवि पतरु वुज्झहि । जिणदत्तसूरि जिन नमहि पयपउम सच्चु नियमणि बहहि । संसारउयहि दुत्तरि पडिय जि न हु तरंडइ चडि तरहि ॥८॥ तवसंजमसयनियमि धम्मकम्मिण वावरियउ । लोहकोहमयमोह तह व सप्पिहि परिरियउ । विसमछंदलक्खणिण सस्थअत्थत्थविसालह । जिणवल्लहगुरुभत्तिवंतु पयडउ कलिकालह । अन्निहिवि गुणिहि संपुन्नतणु दीणदुहियउद्धरणु धर । जिगदत्तसरि पर पल्ह भणु तत्तवंत सलहियइ धर ॥९॥ चक्खाणियइ परमतत्तु जिण पाउ पणासइ । आराहियइ त वीरनाह कइपल्हु पयासइ । धम्मु त दयसंजुत्तु जेण वरगइ पाविजइ । चाउ त अणखंडियउ जु बंदिण सलहिजइ । जइ ठाइ त उत्तिममुणिवरह पवरवसहिहो चउर नर । तिम सुगुरुसिरोमणि सरिवर खरतरसिरिजिणदत्त पर ॥१०॥ इति श्रीपट्टावलीपट्पदानि । संवत् ११७० वर्षे अश्वयुगाद्यपक्षे ११ तिथौ श्रीमद्धारानगर्या श्रीसरतरगच्छे विधिमार्गप्रकाशिवसतिवासिनीजिगदत्तसूरीणां शिष्येण जिनरक्षितसाधुना लिखितानि ।
APPENDIX1
श्रीवस्तुपालतीर्थयात्रावर्णनम्
अयं क्षुब्धक्षीरार्णवनवसुधासन्निमचिता-
नुपाकण्याकर्णानुपदमुपदेशानिति गुरोः ।
समस्तध्वस्तैना जनितजिनयात्रापरिकरो
ऽकरोत्सुस्थं प्रास्थानिकविधिमधीशो मतिमताम् ॥१॥
श्लाघ्योऽतिसतसहितः स हितः प्रजानां श्रीमानथ प्रथमतीर्थकृदेकचित्तः ।
सम्भापणाद्भुतसुधाभवचाश्वचार वाचालयारिदपथो रथचक्रनादः ॥ २ ॥
सान्नैपर्युपरिवाहपदाग्रजाग्रडूलीपटैटिति कुहिमतामटङ्गिः।
मार्ग निरुद्धखरदीधितिधामसझे सहस्तदा भवनगर्भ इवायभासे ॥३॥
नाभेयप्रभुभक्तिभासुरमनाः कीर्तिप्रभाशुभिमा.
काशः काशहदाभिधेऽथ विधे तीर्य निवासानसौ ।
चक्रे चारमना जिनार्चनविधि तत्मचर्यव्रता-
रम्भस्तम्भितविष्टपत्रयजयश्रीधामकामस्मयः॥४॥
पुष्टिभक्तिभरतुष्टया रयादम्बया हततमःकदम्यया ।
एत्य दृक्पथमय प्रतिश्रुतं सन्निधिं समधिगम्य सोऽचलत् ॥५॥
ग्रामे ग्रामे पुरि पुरि पुवरोतिभिर्मर्त्य मुख्यैः
फ्लप्तमावेशिकविधितता व्योम्नि पश्यन्पताकाः ।
मूर्ताः कीर्तीरयममनुत प्रौढनुत्तमपञ्च-
व्यापल्लीलामृतभुजलतापर्णनीयाः स्वकीयाः ॥ ६ ॥
अध्यायास्य नमस्पकीर्तिविभवः श्रीसद्धमंहस्तमः-
स्तोमादित्यमुपत्यकापरिसरे श्रीमहदेवानुजः ।
श्रीनाभेयजिनेगदर्शनसमुत्कण्ठोल्लमन्मानस-
वस्पन्मोहमधाम्रोट विमलक्षोणीधरं धीरधीः ॥ ७ ॥
तत्र स्नानमहोत्मवत्र्यसनिनं मार्तण्टण्टभुति-
फ्रान्तं सहजनं निरीक्ष्य निग्विलं मान्द्रीभवन्मानसः ।
सेयो माद्यदमन्दमेदुरतरप्रमानिधिः शुरधीः
मन्ग्रीन्दः स्ययमिन्द्रमण्डपमपं प्रारम्भयामासिवान् ॥८॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः मन्त्री मौलौ किल जिनपतेचित्रचारित्रपात्रं स्नानं कृत्वा कलशलुठितः स्मेरकाश्मीरनीरैः। चक्रे चञ्चन्मृगमदमयालेपनस्वर्णभूषा- वायः पूजाकुसुमवसनस्तं स कल्पद्रुकल्पम् ॥ ९॥ मन्त्रीशेन जिनेश्वरस्य पुरतः कर्पूरपूरागुरु- प्लोषप्रेतितधूपधूमपटलः सा कापि तेने मुदा । पावरमहाध्वजप्रणयिनी स्वर्लोककल्लोलिनी मिश्रेयं रविकन्यकेति वियति प्रत्यक्षमुत्प्रेक्ष्यते ॥ १० ॥ इत्थं तत्र विधाय निर्मलमनाः सन्मानदानक्रियां सानन्दप्रमदाकुलां कुलनभोमाणिश्यमष्टाहिकाम् । विनोन्मकिपर्दियक्षविहितप्रत्यक्षसान्निध्यतः श्रद्धावर्द्धितसम्मदाहुदतरन्मन्त्रीज्वरो भूधरात् ॥ ११ ॥ अजाहराख्ये नगरे च पार्श्वपादानजापालपालपूज्यान । अभ्यर्चयन्नेप पुरे च कोडीनारे स्फुरत्कीर्त्तिकदम्बमम्वाम् ॥ १२॥ देवपत्तनपुरे पुरन्दरस्तृयमानममृतांशुलान्छनम् । अर्चयनुचितचातुरीचितः कामनिर्मथन निर्मलद्युतिम् ॥ १३ ॥ प्रीतस्फीतरुचिश्विराय नयनर्वामध्रुवां वामन- स्थल्यामेप मनोविनोदजननं क्लसप्रवेशं पुरि। धीमान्निर्मलधर्मनिर्मितिसमुल्लासेन विस्मापयन् देवं रैवतकाधिरोहमकरोत्सडेन सद्देश्वरम् ॥ १४ ॥ (विशेषकम् ) गजेन्द्रपदकुण्डस्य तत्र पीयूपहारिभिः । चकार मजनं मन्त्री वारिभिः पापहारिभिः ॥१५॥ जिनमजनसजसज्जनं कलशन्यस्ततम्बुकुङ्कुमम् । अथ सवमवेक्ष्य सङ्करे विद्ये वासवमण्डपोद्यमम् ॥ १६ ॥ संरम्भसङ्घटितसङ्घजनौघदृष्टामष्टाह्निकामयमिहापि कृती वितेने। सद्भूतभावभरभासुरचित्तवृत्तिरुवृत्तकीर्तिचयचुम्वितदिक्कदम्बः ॥ १७॥ लुम्पन रजो विजयसेनमुनीशपाणिवासप्रवासितकुवासनभासमानः । सम्यक्त्वरोपणकृते विततान नन्दिमानन्दमेदुरमयं रमयन्मनांसि ॥१८॥ दानरानन्य वन्दिनजमसृजनिरिमाहारदानं मानी सम्मान्य साधूनपुपदपि मुखोद्धाटकर्मादिकानि ।
३
यस्तुपाउतीर्थयात्रावर्णनम्
मन्त्री सत्कृत्य देवार्चनरचनपरानेर्चयित्वापमुचै-
रम्बाप्रद्युम्नशाम्बानिति कृतसुकृतः पर्वतादुत्ततारं ॥ १९ ॥
असाधि साधर्मिकमानदानैरनेन नानाविधधर्मकर्म ।
अबाधि सा धिकरणेन माया निर्माय निर्मायमनःसुपूजाम् ॥२०॥
पुरः पुरः पूरयता पयांसि घनेन सान्निध्यकृता कृतीन्दुः।
स्वकीर्तिवन्नव्यनदीर्ददर्श ग्रीप्मेऽतिभीप्मेऽपि पदे पदेऽसौ ॥२१॥
इति प्रतिज्ञामिव नव्यकीर्तिप्रियः प्रयाणैरतिवाद्य वीथीम् ।
आनन्दनिस्यन्दविधिविधिज्ञा पुरं प्रपेदे धवलशाकं सः॥ २२ ॥
समं तेजःपालान्वितपुरजनैर्वीरधवल-
प्रमः प्रत्युद्यातस्तदनु सदनं प्राप्य सुकृती ।
युतः सङ्घनासौ जिनपतिमयोत्तार्य रथत-
स्ततः सङ्घस्या_मशनवसनाद्यैर्व्यरचयत् ॥ २३ ॥
अथ प्रसादाभः प्राप्य वैभवमद्भुतम् ।
मन्त्रीशः सफलीचक्रे स्वमनोरथपादपम् ॥ २४ ॥
भक्त्याखण्डलमण्डपं नवनवश्रीकेलिपर्यद्धिका-
वयं कारयति स्म विस्मयमयं मन्त्री स शत्रुक्षये।
यत्र स्तम्भनरैवतप्रभुजिनौ शाम्बाम्बिकालोकन-
प्रद्युम्नप्रभृतीनि किश्च शिखरापयारोपयामासिवान् ॥ २५ ॥
गुरुपूर्वजसम्बन्धिमित्रमूर्तिकदम्बकम् ।
तुरङ्गसङ्गतं मूर्तिद्वयं स्वस्यानुजस्य च ॥ २६ ॥
शातकुम्भमयान कुम्भान्पश्च तत्र न्यवेशयत् ।
पञ्चधा भोगसौख्यश्रीनिधानकलशानिय ॥ २७ ॥
सौवर्ण दण्डयुग्मं च प्रासादयितये न्यधात् ।
श्रीकोत्तिकन्दयोन्द्यनूतनाङरसोदरम् ॥ २८ ॥
कुन्देन्दुसुन्दरग्रावपावन तोरणद्वयम् ।
इहेच श्रीसरस्वत्योः प्रवेशायैव निर्ममे ॥ २९॥
अर्कपालित ग्राममिह पूजाकृते कृती।
श्रीवीरधवलक्ष्मापाद्दापयामास शासने ॥ ३०॥
श्रीपालितास्ये नगरे गरीयस्तरङ्गलीलादलितानापम् ।
तडागमागक्षयहेतुरतयकार मन्त्री ललिताभिधानम् ॥ ३॥
प्राचीनगूर्जरफाव्यसङ्घदः
हर्षोत्कर्षे न केपो मधुरयति सुधासाधुमाधुर्यगर्ज-
सोया सोऽयं तडागः पथि मथितमिलत्पान्थसन्तापपापः।
साक्षादम्भोजदम्भोदितमुदितसुखं लोलरोलम्बशब्दै-
रब्देव्यो दुग्धमुग्धां त्रिजगति जगदुर्यत्र मन्त्रीशकीतिम् ॥ ३२ ॥
पृष्ठपत्रं च सौवर्ण श्रीयुगादिजिनेशितुः ।
स्वकीयतेजःसर्वस्वकोशन्यासमिवार्पयत् ॥ ३३ ॥
प्रासादे निः काम्यकाञ्चनं कलशत्रयम् ।
ज्ञानदर्शनचारित्रमहारत्ननिधानवत् ॥ ३४ ॥
किञ्चतन्मन्दिरदार तोरणं तन्न पोरणम् ।
शिलाभिर्विघे ज्योत्लागर्वसर्वस्वदस्युभिः ॥ ३५ ॥
लोकैः पाञ्चालिकानृत्तसंरम्भस्तम्भितेक्षणः ।
इहाभिनीयते दिव्यनाट्यप्रेक्षाक्षणः क्षणम् ॥ ३६ ।।
प्रासादः स्फुटमच्युतैकमहिमा श्रीनाभिसूनुप्रभो-
स्तस्याग्रस्थितिरेककुण्डलकुलां धतेतरां तोरणः।
श्रीमन्त्रीश्वर वस्तुपाल कलयन्नीलाम्बरालम्विता-
मत्युच्चैर्जगतोऽपि कौतुकमसौ नन्दी तवास्तु श्रिये ।। ३७ ।।
अन यात्रिकलोकानां विशतां व्रजतामपि ।
सर्वथा सम्मुखैवास्ति लक्ष्मीरुपरिवर्तिनी ॥ ३८ ॥
यत्पून निराकृतं सुकृतिभिः साम्मुरुपवैमुख्ययो-
दैतं तन्मम वस्तुपालसचियेनोन्मूलितं दुर्यशः ।
आशास्तेद्भुततोरणोभयमुखी लक्ष्मीस्तदस्मै मुदा
श्रीनाभेपविभुप्रसादयशतः साम्मुख्यमेवाऽधुना ॥ ३९ ॥
तस्यानुजश्च जगति प्रथितः पृथिव्यामव्याजपौरुषगुणगुणीकृतश्रीः ।
श्रीतेजपाल इति पालयति क्षितीन्दुमुद्रां समुद्ररसनावधिगीतकीर्तिः ॥ ४०॥
समुद्रत्वं श्लाचेमहि महिमधाम्नोऽस्य बहुधा
यतो भीष्मग्रीष्मोपमविपमकालेप्यजनि यः।
क्षणेन क्षीणायामितरजनदानोदकततौ
दपावेलाहेलादिगुणितगुणत्यागलहरिः ॥ ४१ ॥
वनापयस्य पन्यास्तपस्विनां ग्रामशासनोडारात् ।
येनापनीय नवकरमनयकरः कारयान्चने ॥४२॥
५ वस्तुपालतीर्थयात्रावर्णनम् पुण्योल्लासविलासलालसधिया येनात्र शत्रुये श्रीनन्दीश्वरतीर्थमर्पितजगत्पाविन्यमासूत्रितम् । एतचानुपमासरः परिसरोदेशे शिलासश्चय- व्यानडोडतवन्धमुखरपयःकल्लोललुप्सक्रमम् ॥ ४३ ।। स्फुटस्फटिकदर्पणप्रतिमतामिदं गाहते मुधाकृतसुधाकरच्छविपवित्रनीर सरः। विकस्वरसरोरुहप्रकरलक्ष्यतो लक्ष्यते यन सरिदङ्गनावदनविम्बताडम्बरः ॥ ४४ ॥ शत्रुञ्जये यः सरसी निवेश्य भीरैवताद्रौ च जडाधराणाम् । ग्रामस्य दानेन करं निवार्य सड्डस्य सन्तापमपाचकार ॥ ४५ ॥ क्षोणीपीठमियद्रजःकणमियत्पानीयविन्दुः पतिः सिन्धूनामियदगुलं वियदियत्ताला च कालस्थितिः । इत्थं तथ्यमवैति यस्त्रिभुवने श्रीवस्तुपालस्य तां धर्मस्थानपरम्परां गणयितुं शङ्के न सोऽपि क्षमः ॥ ४६ ॥ पतत्सुवर्णरचितं विश्वालङ्करणमनणुगुणरत्नम् । सहाधीश्वरचरितं हतदुरितं कुरत हृदि संतः ॥ ४७ ॥ श्रीनागेन्द्रमुनीन्द्रगच्छत्तरणिः श्रीमान्महेन्द्रप्रभु- जज्ञे क्षान्तिसुधानिधानकलश: पुण्याधिचन्द्रोदयः । सम्मोहोपनिपातकातरतरे विश्वेऽत्र तीर्थेशितुः सिद्धान्तोऽप्यविभेद्यतर्कविपमं यं दुर्गमाशिश्रिये ॥ ४८ ॥ तत्सिंहासनपूर्वपर्वतशिराप्रान्तोदयः कोऽप्पभू- नास्वानस्तसमस्तदुस्तमतमाः श्रीशान्तिसूरिप्रमुः। प्रत्युद्धीवितदर्शनातिलसयौघपमाफर तेज उन्नदिगम्बरं विजयते तद्यस्य लोकोत्तरम् ॥४९॥ आनन्दसूरिरिति तस्य बभूव शिष्यः पूर्वापरः शमधनोऽमरचन्द्रससि। धर्मविपस्य दशनाविध पापवृक्ष- क्षोदक्षमा जगति यो विशदी विभातः ॥५०॥ अस्ताघयामपपपोनिधिमन्दराद्वि- मुद्रापुपोः किमनयोः स्तुमहे महिम्नः ।
६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्कहः बाल्पेऽपि निर्दलितवादिगजौ जगाद यौ व्यापसिंहशिशुकाविति सिद्धराजः ॥ ५१ ।। सिद्धान्तोपनियन्निपण्णदयो धीजन्मसस्तत्पदे पूज्यः श्रीहरिभद्रसूरिरभवञ्चारित्रिणामग्रणीः । भ्रान्त्वा शन्यमनाश्रयैरिव चिरायस्मिन्नवस्थानतः सन्तुष्टैः कलिकालगौतम इति ख्यातिर्वितेने गुणैः ॥५२॥ श्रीविजयसेनसूरिस्त पट्टे जयति जलधरध्वानः । यस्थ गिरो धारा इव भवदवभववथुविभवभिदः ॥ ५३ ।। पश्वासराहवनराजविहारतीर्थे पालेयभूमिधरभूतिधुरन्धरेऽस्मिन् । साक्षाद्घाकृतभवा तटिनीच यस्य व्याख्येयमच्युतगुरुक्रमजा विभाति ॥ ५४॥ भवोगटवनावनीविकटकर्मवंशावलि- च्छिदोच्छलितमौक्तिकप्रतिमकीर्तिकर्णाम्बरम् । असिश्रियमशिश्रियद्विततभीव्रतं यहृतं क्षितौ विजयतामयं विजयसेनहरिगुरुः ॥ ५५ ॥ शिष्यं तस्य प्रशस्यप्रशमगुणनिधि रभ्यदारण्यदाव- ज्वालाजिहालदीप्तिर्भविकजनविपद्धतिवाद कपर्दी । देवी चाम्बा निशीथे समसमयमुपागत्य हर्षाभ्रुवी- मेयश्रेयासुभिक्षाविति निजगदतुर्गद्गदोद्दामनादम् ॥ ५६ ।। नाभूवन्कति नाम सन्ति कति नो नो या भविष्यन्ति के किं न कापि कदापि सङ्घपुरुपः श्रीवस्तुपालोपमः। यत्रेत्यं महरन्नहर्निशमहो सर्वाभिसारोडरो येनायं विजितः कलिविधता तीर्थेशयात्रोत्सवम् ॥ ५७ ।। तस्मादस्य यशस्विनः सुचरितं श्रीवस्तुपालस्य य. दाचास्माकममोघया किल यथाध्यक्षीकृतं सर्वथा । त्यं श्रीमन्नुदयमभ प्रथय तत् पीयूपसर्वपः श्लोकैर्यत्तव भारती समभव""""यते ॥५८॥ इत्युक्त्वा गतयोस्तयोरथ पयो दृष्टेः प्रभातक्षणे विज्ञाप्य स्वगुरोः पुरः सविनयं नम्रीभवन्मौलिना ।
७
वस्तुपालतीर्थयात्रावर्णनम्
माप्यादेशममुं प्रभोलिरचयामासे समासेदुपा
प्रागल्भीमुदयप्रभेण चरितं निस्यन्दरूपं गिराम् ॥ ५९॥
किश्च श्रीमलधारिंगच्छजलधिप्रोल्लासशीतयुते-
स्तस्यश्रीनरचन्द्रसूरिसुगुरोर्माहात्म्यमाशास्महे ।
यत्पाणिस्मितपशवासविकसत्किन्सल्कसंवासिताः
सन्तः सन्ततमाश्रिताः किल मया भृगयेव भान्ति क्षितौ ॥६॥
श्रीधर्माभ्युदयालयेऽत्र चरिते श्रीसखभर्तुर्मया
दधे काव्यदलानि सहरयितुं कौन्तिकत्वं परम् ।
किन्तु श्रीनरचन्द्रसरिभिरिदं संशोध्य चके जग
त्पावित्र्यक्षमपादपङ्कजरजापुजैः प्रतिष्ठास्पदम् ॥ ६१ ॥
नित्यं व्योमनि नीलनीरजरुचौ यावत्त्विपामीश्वरो
दिक्पालावलिवन्धुरे कुचलये यावच हेमाचलः ।
हृत्पद्म विदुपामिदं सुचरितं तावन्नवाविर्भव-
सौरभ्यप्रसरं चिरं कलयतात् किअल्कलक्ष्मीपदम् ॥ १२॥
इति श्रीविजयसेनसूरिशिष्यश्रीमदुदयप्रभसूरिविरचिते श्रीधर्माभ्युदयनाम्नि श्रीसद्धपतिच-
रिते लक्ष्म्यक महाकाव्ये श्रीवस्तुपालतीर्थयात्रोत्मववर्णनो नाम पञ्चदशः सर्गः ।
मुक्तांग यदेतद्विरचितमुचित सङ्गभर्तुश्चरित्रं
सत्रं पावित्र्यपात्रं पथिकजनमनःखेदविच्छेदहेतुः ।
अस्मिन्सौरभ्यगर्भामसमरसवती सत्कयां पान्थसार्थाः
माप्य श्रीवस्तुपाल प्रवरनवरसास्वादमास्वाद्यन्ति ॥१॥
श्रीशारदैकसदनं हृद्यालय के नो सन्ति हन्त सकलासु कलासु निष्णाः ।
तादृक्परस्य ददृशे सुकवित्वतत्वबोधाय बुद्धिविभवस्तु न वस्तुपालात् ॥२॥
नैव व्यापारिणः के विद्धति फरणग्राममात्मैकवश्य
लेभे सद्योगसिद्ध फलममलमलं केवलं यस्तुपालः।
आकल्पस्थायि धर्माभ्युदयनवमहाकाव्यनाम्ना यदीयं
विश्वस्यानन्दलक्ष्मीमिति दिशति यशोधर्मरूपं शरीरम् ॥३॥
APPENDIX II. रेवयकपसंखेवो सिरिनेमिजिणं सिरसा नमिउं रेषयगिरीसकप्पंमि । सिरिवइरसीसभणि जहा य पालित्तएणं च ॥१॥ छत्तसिलाइसमीवे सिलासणे दिकं पडिवन्नो नेमी, सहसंबवणे केवल- नाणं, लरकारामे देसणा, अवलोअणं उद्यसिहरे निव्वाणं । रेवयमेहलाए कण्हो तत्य कल्लाणतिगं काऊण सुवन्नरयणपडिमालंकिअं चेइअतिगं जीवंतसा- मिणो अंबादेविं च कारेइ । इंदो वि बजेण गिरि कोरेऊण सुपन्नवलाण रूप्पमयं चेईअंरयणमया पडिमा पमाणवन्नोववेया, सिहरे अंबा रंगमंडवे अव- लोअणसिहरं वलाणयमंडवे संवो एयाई कारेइ । सिद्धविणायगो पटिहारो; तप्पडिख्वं श्रीनेमिमुखात् निर्वाणस्थानं ज्ञात्वा निर्वाणादनन्तरं कण्हेण ठा- विरं । तहा सत्त जायवा दामोयराणुरुवा कालमेह १ मेहनाद २ गिरि- विदारण ३ कपाट ४ सिंहनाद ५ खोडिक ६ रेवया ७ तिव्यतवेणं कोडणेणं वित्तवाला उववन्ना। तत्थ य मेहनादो समद्दिट्ठीनेमिपयभत्तिनुत्तो चिट्टइ। गिरिविदारणेणं कंचणवलाणपंमि पंच उडारा विउब्धिआ । तत्थेगं अंबापुरओ उत्तरदिसाए सत्तहिअसयकमेहिं गुहा । तत्थ य उववासतिगेणं वलिविहाणेणं सिलं उप्पाडिऊण मज्झे गिरिविदारणपडिमा। तत्य य कमपण्णासं गए बलदेवेणं कारिअं सासयजिणपडिमारूवं नमिऊण, उत्तरदिसाए पण्णासकर्म चारीतिगं । पढमवारिआए कमसयतिगं गंतूण, गोदोहिआसणेणं पविसिजण, उपवासपंचगं भमरत्वं दारुणं सत्तेणं उप्पाडिऊणं, कम्मसत्ताभो अहोमुहं पविसिऊण, बलाणयमंडवे इंदादेसेण धणयजककारियं अंबादेविं पूइऊण, सुवण्वजालीए ठायव्वं । तत्यट्टिएणं सिरिमूलनाहो नेमिजिपिदो बंदिअव्यो । घीवारीप एगं पायं पृइत्ता, सयंवरवावीए अहो कमचालीसंगमित्ता, तत्य णं मज्झवारीए कमसत्तसएहिं कूयो । तत्य वरहसहिअत्तेण इहाचि मूलनापगो यंदेयव्यो । तइअवारीए मूलदुवारपवेसो अंबाएसेण न अन्नहा । एवं कंचन- बलाणयमग्गो । तत्य य अंबापुरओ हत्यवीसाए विवरं । तत्य य अंबाएसेण उयवासतिगेण सिलुम्घाडणेण हत्यवीसाए संपुडसत्तगं समुग्गयपंचर्ग अहो रसविआ अमावसाए अमावसाए उग्घटइ । तत्य य उववासतिगं काऊण खयकम्पसंखेवो ९ अंबाएसेण पूयणेण वलिविहाणेणं गिहियव्वं । तदा य सुपणकूडे उययास- तिगं काऊण सरलमग्गेण बलिपूअणेणं सिद्धविणायगो उबलम्भइ । तत्य य चितिअसिद्धी दिनमेगं ठाएयव्वं । जइ तहा पच्चको हवइ तहा रायमईगुहाग कमसपणं गोदोहिआए रसविआ कसिणचित्तयवल्ली राइमईए पडिमा रयणमया अंवाया रूप्पमयाओ अणेगओसहीओ अचिटुंति । तह छत्तसिलाघ- रसिलाकोडिसिलातिगं पण्णत्तं । छत्तसिलं मज्झं मज्झेणं कणयवही सहस्संव- वणमझे रथयसुवण्णमयचवीसं लकारामे वावत्तरीचउवीसजिणाण गुहा प- पणत्ता । कालमेहस्स पुरओ सुवण्णवालुआए नईए सडकमसयतिगेण उत्तरदि- साए गमित्ता गिरिगुहं पविसिऊण उदए पहवणं काऊण, विए उपवासपओपहिं दुवारमुग्घाडेह । मज्झे पढमदुवार सुवपणखाणी, दुइअदुवार रयणवाणी, संघहे अंबाए विउविआ। तत्थ पण काहभंडारो। अण्णो दामोदरसमीये । अंजणसिलाए अहोभागे रययसुवण्णधूली पुरिसवीसेहिं पण्णत्ता। तस्सत्यमणे मंगलयदेवदालीय संतु रससिद्धी। सिरिवइरोवस्कायं संघसमुद्धरणकमि ॥ सस्सकडाई मज्झे गिण्हित्ता कोडिबिंदुसंयोगे। घंटसिलाचुपणयजोयणाओ अंजणसिद्धी । विज्ञापाहुदेसाओ स्वयकप्पसंखेयो सम्मत्तो।।
APPENDIX III, - श्रीउजयन्तस्तवः नामभिः श्रीरवतकोजयन्तायैः प्रथामितम् । श्रीनेमिपावितं स्तौमि गिरिनारं गिरीश्वरम् ॥१॥ स्थाने देशः सुराष्ट्राख्यां बिभर्ति भुवनेष्वसौ । यद्भूमिकामिनीभाले गिरिरेप विशेषकः ॥२॥ शृङ्गारयन्ति खडारदुर्ग श्रीपभादयः । श्रीपार्श्वस्तेजलपुरं भूपितैतदुपत्यकम् ॥ ३॥ • योजनद्वयतुङ्गेऽस्य शृङ्गे जिनगृहावलिः । पुण्यराशिरिवाभाति शरचन्द्रांशुनिर्मला ॥ ४ ॥ सौवर्णदण्डकलशामलसारकशोभितम् । चार चैत्यं चकास्त्यस्योपरि श्रीनेमिनः प्रभोः ॥५॥ श्रीशिवामृनुदेवस्य पादुकान निरीक्षिता । स्पृष्टाऽर्चिता च शिष्टानां पापव्यूह व्यपोहति ॥ ६ ॥ प्राज्यं राज्यं परित्यज्य जरवृणमिव प्रभुः । धन्धन्विधूय च स्निग्धान् प्रपेदेऽच महावतम् ॥ ७॥ जत्रैव केवलं देवः स एव प्रतिलब्धवान् । जगजनहितंपी स पर्यणेपीच निधृतिम् ॥ ८ ॥ अत एपान कल्याणत्रयमन्दिरमादधे । श्रीवस्तुपालो मन्त्रीशचमत्कारितभव्यहृत् ॥९॥ जिनेन्द्रविम्वपूर्णेन्द्रमण्डपस्या जना इह । श्रीनेमेननं कर्तुमिन्द्रा इव चकासति ॥ १० ॥ गजेन्द्रपदनामास्य कुण्ड भण्डयते शिरः । सुधाविधैर्जलैः पूर्ण लानाईत्लपनक्षमः ॥ ११ ॥ शत्रुवपावतारंऽत्र वस्तुपालेन कारिते। प्रापभः पुण्डरीकोऽष्टापदो नन्दीश्वरस्तथा ॥ १२ ॥ सिंहयाना हेमवर्णा सिधुडमुतान्विता । कम्राग्लुम्बिभृत्पाणिरत्राभ्या सहविमहत् ।। १३ ।।
उज्जयन्वस्तवः श्रीनेमिपत्पझपूतमवलोकननामकम् । विलोकयन्तः शिखरं यान्ति भव्याः कृतार्थताम् ॥ १४ ॥ शाम्बो जाम्बवतीजातस्तुझे शृङ्गेऽस्य कृष्णाजः । प्रद्युम्नश्च महाद्युम्नस्तेपाते दुस्तप तपः ॥ १५ ॥ नानाविधौपधिगणा जाज्वलन्त्यत्र रात्रिपु। किञ्च घण्टाक्षरच्छत्रशिला: शालन्त उच्चकैः ॥ १६ ॥ सहस्राम्रवर्ण लक्षारामोऽन्येपि वनव्रजाः। मयूरकोकिलाभृतीसगीतिसुभगा इह ॥ १७ ॥ न स वृक्षो न सा वल्ही न तत्पुष्पं न तत्कलम् । नेक्ष्यतेऽवाभियुक्तर्यदित्यैतिायविदो पिडुः ॥ १८॥ राजीमती गुहागर्भ कैन नामात्र बन्यते । सपनेमिर्पयोन्मार्गात्सन्मार्गमयतारितः ॥ १९ ॥ पूजालपनदानानि तपश्चात्र कृतानि चै। सम्पद्यन्ते मोक्षसौख्यहेतवो भव्यजन्मिनाम् ॥ २० ॥ दिग्भ्रमावपि योऽनाद्री झाप्यमार्गेऽपि सञ्चरन् । सोऽपि पश्यति चैत्यस्था जिनाच : स्नपितार्चिताः ॥ २१ ॥ काश्मीरागतरत्नेन कूष्माण्डयादेशतोऽन च । लेप्यबिम्बास्पदे न्यस्ता श्रीनेमेमूर्तिराश्मनी ॥ २२ ॥ नदीनिझरकुण्डानां बनीनां वीरधामपि । विदाङ्करोत्वत्र सद्धया: सहयावानपि कम्बल ॥ २३ ॥ आसेचनकस्पाय महातीर्थाय नायिने । चैत्यालङ्कृत्तशीपि नमः श्रीरयनाद्ये {{ २४ ।। स्तुतो मयेति मूरीन्द्रयर्णितावृजिनप्रभः । गिरिनारस्तारहेमसिद्धिभूमिसुदेऽस्तु यः ।। २ ।। इति श्रीउनयन्तातयः॥
APPENDIX VI. श्रीउज्जयन्तमहातीर्थकल्पः अस्थि सुरट्ठाविसए उर्जितो नाम पव्वओ रम्मो। तस्सिहरे आरुहिउँ भत्तीए नमह नेमिजिणं ॥१॥ अंबाइअं च देवि ण्हवणचणगंधधूवदीवहिं । पूइयकयप्पणामा ता जोअह जेण अत्यत्थी ॥२॥ गिरिसिहरं कुहरकंद्रनिज्झरणकवाडचिअडकवेहिं । जोएह खत्तवायं जह भणियं पुब्बसूरीहिं ॥ ३ ॥ कंदप्पदपकप्परणकुगइविद्दवणनेमिनाहस्स । निव्याणसिला नामेण अत्थि भुवर्णमि विरकाया ॥४॥ तस्स य उत्तरपासे दसधणुहेहिं अहोमुहं विवरं । दारंमि तस्स लिंग अवयाणे धणुह चत्तारि ॥५॥ तस्स पसुमुत्तगंधो अत्थि रसोपलसएण सयतंबं । विधेहि कुणइ तारं ससिकुंदसमुज्जलं सहसा ॥६॥ पुन्यदिसाए धणुहंतरेसु तस्सेव अत्यि जागवई । पाहाणमया दाहिणदिसागए बारसधणूहि ॥७॥ दिस्सह अ तत्य पयडो हिंगुलवपणो अ दिव्यपवररसो। विधेइ सब्बलोहे फरिसेणं अग्गिसंगेणं ॥ ८॥ उन्जिते अत्थि नई विहला नामेण पवई पडिमा। दावेइ अंगुलीए फरिसरसो पवईदारं ॥९॥ सकावयार उज्जितगिरिवरे तस्स उत्तरे पासे। सोवाणपंतिआए पारेवयवणिया पुढवी ॥ १०॥ पंचगव्येण यद्धा पिंडीघमिआ करेइ परतारं । फेडइ दरियाहिं उत्तारइ दुरूकंतारं ।। ११ ॥ सिहरे विसालसिंगे दीसते पायकुष्टिमा जत्य । तस्सासन्ने सिहरे कन्चडहढपासहोतारं ॥ १२ ॥ उन्जितरवयवणे तत्य य सुद्दारवानरो अस्थि । सो वामकपणछित्तो उग्घाडइ विवरवरदारं ॥ १३ ॥ हत्यसरण पविट्टो दिकइ सोवण्णवण्णिा मरका ।
३ श्रीउजयन्तमहातीर्थकल्पः नीलरसेण सवंता सहस्सवेही रसो नूर्ण ॥ १४ ॥ तं गहिऊण निअत्तो हणुवंतं छिवह यामपाएण। सो ढका वरदारं जेण न जाणइ जणो को वि ॥ १५ ॥ उन्जितसिहरस्वरि कोहंडिहरं खु नाम विरकायं । अवरेण तस्स य सिला तदुभयपासेसु ओसं तु ॥ १६ ॥ तं अयसितिल्लमीसं धंभइ पडिवायवंगिअं वंग। दोगच्चवाहिहरणं परितुहा अंविआ जस्स ॥१७॥ वेगवई नाम नई मणसिलवण्णाइ तत्य पाहाणा । तो पिडि धमिज संते समसुद्धे होइ वरतारं ॥१८॥ उज्जंते नाणसिला तस्स अहो कणयवणिआ पुढची। वोकडयमुत्तपिंडी खहरंगारे भवे हेमं ॥ १९ ।। नाणसिलाकयपुढची पिंडीवद्धा य पंचगव्वेण । हढपाए वसइ रसो सहस्सवेही हवह हेमं ॥२०॥ गिरिवरमासन्नठि आणीयं तिलविसारणं नाम । सिलवडगादपोडे बे लका तत्य दम्माणं ॥ २१ ॥ सेणा नामेण नई सुपण्णतित्यमि लड्डअपहाणा । पडियाएण य सुच्चं करिति हेमं न संदेहो ।। २२ ।। विल्लरलयंमि नयरे मउहहरं अत्यि सेलगं दिव्यं । तस्स य मामि ठिओ गणपइरसकुंटओ उपरि ॥ २३ ॥ उबवासी कयपूओ गणवइओ वल्लिऊण पचररसो। पामापेवी अस्थि अ यंभड वगं न संदेही ।। २४ ।। सहसासवं ति तित्यं करंजकरण मणहरं सम्म । तत्य य तुरयायारा पाहाणा तेमि दो माया ॥ २२॥ इफो पारयभाओ पिहो सुत्तेण अंघम्साए । धमिओ फरइ तारं उत्तारइ दुरफतारं ।। २६ ।। अवलोअणसिहरसिला अपरेण तत्य यररसो सरह । सुअपररुसरिसवपणो करेंड सुपं यरं हेमं ।। २७ ।। गिरिपज्जुन्नयधारे अंविसमासमपर्य प नामेण । तत्य विपीमा पुहयी हिमवाए होई परहेमं ॥२८॥ नाणसिला मिते तस्स प मूटमिमहिमा पीआ।
१४ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्घहः साहामिअलेवेणं छायामुकं कुणइ हेमं ॥ २९ ॥ उजितपढमसिहरे आरुहिउं दाहिणेण अवयरिउं । तिणि धणूसयमित्ते पूईकरं जं विलं नाम ॥ ३०॥ उग्धाडिउं विलं दिकिजण निउणेण तत्य गंतव्वं । दंडंतराणि वारस दिब्बरसो जंबुफलसरिसो ॥ ३१ ॥ जउ घोलिअमि भंडे सहस्सभाएण विधए तारं । हेमं करइ अवस्सं हद तं सुंदरं सहसा ॥ ३२ ॥ कोहंडिभवणपुग्येण उत्तरे जाव तावसा भूमी। दीसई अ तत्य पडिमा सेलमया वासुदेवस्स ॥ ३३ ॥ तस्तुत्तरेण दीसइ हत्येसु अ दससु पचई पडिमा। अवराहमुहरअंगुडिआइ सा दावए विवरं ॥ ३४॥ नवधणुहाई पविठ्ठो दिकड कृडाइं दाहिणुत्तरओ। हरिआललकवण्णो सहस्सवेही रसो नृणं ॥ ३५ ॥ उज्जिते नाणसिला विकाया तत्थ अत्थि पाहाणं । ताणं उत्तरपासे दाहिणय अहोमुहो विवरो ॥ ३६ ॥ तस्स य दाहिणभाए दसघणुभूमीइ हिंगुलयवण्णो । अत्यि रसो सयवेही विंधइ सुचं न संदेहो ॥ ३७॥ उसहरिसहाइकूडे पाहाणा ताण संगमो अत्यि । गययरलिंडाकिपणा मज्झे फरिसेण ते वेही ॥ ३८॥ जिणभवणदाहिणेणं नई घणुहेहिं भूमिजलुभयरी । तिरिमणुअरत्तचिद्धा पडियाग तंवए हेमं ।। ३९ ।। वेगवई नाम नई मणसिलवपपा य तत्य पाहाणा। सुच्चस्स पंचवेहं सर्वति घमिआ तयं सिग्धं ॥ ४० ॥ इय उज्जयंतरुप्पं अविअप्पं जो करड जिणभत्तो। कोहंदिस्यपणामो सो पावइ इच्छिअंसुर्स ॥ ४१ ।। श्रीउन्नयतमहातीर्थकल्मा APPENDIX V रैवतकल्पः पच्छिमदिसाए सुरट्ठाविसए रेवयपव्ययरायसिहरे सिरिनेमिनाहस्स भवणं उत्तुंगसिहरं अच्छह । तत्थ किर पुब्धि भयवओ नेमिनाहस्स लिप्पमई पडिमा आसि । अन्नया उत्तरदिसाविभूमणकम्हीरदेसाओ अजियरयणना- माणो दुन्नि बंधवा संघाहिबई होऊण गिरिनारमागया । तेहिं रहसवसामो घणघुसिणरससंपूरिअकलसेहिं पहवणं कयं । गलिआ लेवमई सिरिनेमिनाह- पडिमा । तो अईय अप्पाणं सोअंतेहिं तेहिं आहारो पचकाओ । इक- वीसउववासाणंतर सयमागया भगवई अंबिआ देवी । उहाविओ संघबई । तेण देवि दट्टण जयजयसदो कओ। तओ भणिों देवीए इमं विवं गिहिसु परं पच्छा न पिच्छिअव्वं । तओ अजिअसंघाहिवइणा एगतंतुकडिरयणमयं सिरिनेमिबिंब कंचणबलाणए नीआपढमभवणस्स देहलीए आरोवित्ता अइ- हरिसभरनिन्भरेणं संघवइणा पच्छाभागो दिहो । ठिअं तत्थेव विवं निचलं । देवीए कुसुमयुट्टी कया जयजयसद्दो अफओ । एअं च विंबं पहसाहपुन्निमाए अहिणवकारिअभवणे पच्छिमदिसामुहे उविरं संघवइणा । न्हवणाइमहसवं काउं अजिओ सबंधवो निअदेसं पत्तो । कलिकाले कलुसचित्तं जणं जाणि- ऊण झलहलंतमणिमयबिंवस्स कंती अंबिआदेवीए छाइआ । पुचि गुज्जरध- राए जयसिंहदेवेणं खंगाररायं हणित्ता सनणो दंडाहियो ठापिओ। तेण य अहिण नेमिजिणंदभवणं एगारससयपंचासीए विकमरायवच्छरे कारा. विरं । मालवदेसमुहमंडणेणं साहुभावडेणं सोवणं आमलसारं कारि। चालुक्कचकिसिरिकुमारपालनरिंदसंठविअसोरहदंडाहिवण सिरिसिरिमाल- कुलुम्भवेण पारससयवीसे विकमसंघच्छरे पना काराविआ । तन्भावुणा धवलेण अंतराले पचा भराविआ। पजाए चडतेहिं जणेहिं दाहिणदिसाए लकारामो दीसइ । अणहिल्लवाडयपट्टणे य पोरवाडकुलमंडणा आसराय- कुमरदेवितणया गुजरधराहिवइसिरिवीरधवलरज्जधुरंधरा वस्तुपालतेजपाल- नामधिबा दो भायरो मंतिवरा हुत्या। तत्थ तेजपालमंतिणा गिरनारतले निअनामंकिअं तेजलपुरं पवरगढमढपवामंदिरआरामरम्मं निम्माविरं । सत्य य जणंपनामंकि आसरायविहार त्ति पासनाहभवणं काराविजणणीना- मेणंघ कुमरसरुतिसरोवरं निम्मायितेजलपुरस्स पुवदिसाए उग्गसेणगई १६ प्राचीनगर्जरकाव्यसवादः नाम दुग्गं जुगाइनाहप्पमुहजिणमंदिररेहिलं विजइ । तस्स य तिणि नाम- धिलाई पसिहाई । तं जहा उग्गसेणगढं ति वा खंगारगढ़ ति वा ज्जुण्णदुग्गं नि वा । गढस्स बाहिं दाहिणदिसाए चरिआवेईलअओवरिआपसुवाडया. इठाणाई चिट्ठति । उत्तरदिसाए विसालधंभसालासोहिओ दसदसारमंडयो। गिरिदुवारे य पंचभो हरी दामोअरो सुवष्णरेहानईपारे वइ । कालमेहसमीवे चिराणुवत्ता संघस्स बोलाविआ। तेजपालमंतिणा मिल्हाविआ । कमेण उज्जयंतसेले वत्थुपालमंतिणा सित्तुजावयारभवणं अहावयसंमेअमंडवो कव- डिजकमरुदेविपासाया य काराविआ। तेजपालमंतिणा कल्लाणत्तयचेइअं, इंदमंडवो अ देपालमंतिणा उद्धाराविओ । परावणगयपयमुद्दाअलंकिङ गइंद- पयकुंडं अच्छइ । तत्थ अंगं परकालित्ता दुकाण जलंजलिं दिति जत्तागय- लोआ । छत्तसिलाकडणीए सहस्संबवणारामो, जत्य भगवओ जायवकुलपई- घस्स सिवासनुद्दविजयनंदणस्स दिलानाणनिव्वाणकल्लाणयाई संजाआई। गि- रिसिहरे चडित्ता अंविआदेवीए भवणं दीसइ । तत्तो अवलोअणं सिहरं तत्थ- हिएहिं किर दसदिसाओ नेमिसामी अवलोइजति । तओ पढमसिहरे संवकु- मारो वीअसिहरे पज्जुण्णो । इत्थ पचए ठाणे ठाणे चेइएसु रयणसुवण्णमय- जिणबिंबाइं निचन्हविअचिआई दीसंति । सुवण्णमेयणी अ अणेगधाउरसभे- इणी दिप्पंती दीसह । रत्तिं च दीवउव्य पजलंतीओ ओसहीओ अवलोइजति। नाणाविहतरुवरवल्लिदलपुप्फफलाइं पए पए उवलम्भंति । अणवरयपझरंतनि- ज्झरणाणं खलहलारावा य मत्तकोयलभमरझंकारा य सुर्चति त्ति । उजयंतमहातित्यकप्पसेसलवो इमो। जिणप्पहमुर्णिदेहिं लिहिओत्थ जहासुअं॥ श्रीरैवतकल्पः समाप्तः APPENDIX VI अम्बिकादेवीकल्पः सिरिजजयंतसिहरसेहरं पणमिऊण नेमिजिणं । कोहंडिदेविकप्पं लिहामि युट्टोवएसाओ ।। अत्थि सुरहाविसये धणकणयसंपयजणसमिद्धं कोडीनारं नाम नपरं । तत्य सोमो नाम रिद्धिसमिदो छक्कम्मपरायणो वेयागमपारगमो बंभणो हुत्या । तस्स घरिणी अंबिणी नाम महग्घसीलालंकारभूसियसरीरा आसि । तेसिं विसयसुहमणुहवंताणं उत्पन्ना दुवे पुत्ता पढमो सिद्धो वीओ बुद्ध ति । अन्नया समागए पिअरपरके भहसोमेणं निमंतिआ वंभणा सदिणे । कत्थ वि ते वेयमुच्चारन्ति, कत्थ वि आठवन्ति पिण्डपयाणं, कल्य वि होमं करिति वइसदेवं च । सम्पाडिआ सालिदालिवंजणपकन्नभेअखीरखण्डपमुद्दा जेमणा । अविणीए असासुआ पहाणं काउं पयट्टा । तम्मिअवसरे एगो साह मासोबवास- पारणए भिकहा संपत्तो । तं पलोइत्ता हरिसभरनिभरपुलइअंगी उहिआ अंविणी । पडिलाभिओ तीए मुणिवरो भत्तिबहुमाणपुब्बं अहापवित्तेहि भत्त- पाणेहि । जाव गहिअभिरको साह पलिओ ताव सासुआ वि पहाजण रसबई- ठाणमागया। न पिच्छइ पदमसिहं । तओ तीए कुविआए पुट्ठा बहुआ। तीए जहटिए बुत्ते अवाडिआ सा अज्जूए । जहा पावे किमेयं तए कयं, अज वि देवया न पूईआ अज बि न भुलाविआ विप्पा अन वि न भरिआई पिंडाई अग्गसिहा तप किमत्थं साहुणो दिना । तउ तीए भणिओ सम्बो वि यइअरो सोमभहस्स । तेण संम्टेण अप्पच्छंदिअ त्ति निकालिआ गिहाओ। सा पडिभवदृमिमा सिद्ध करंगुलीए धरित्ता बुद्धं च कडीए चढावित्ता चलिआ नयराओ चाहिं । पंथे तिसाभिभूगहिं दाराहिं जलं मग्गिआ। जान सा अंसुजलपुनलोअणा संवुत्ता ताव पुरओ ठिअंसुफसरोवरं तिस्सा अणग्घेणं सोलमाहप्पेणं तकणं जलपूरिसं जायं । पाइआ दोनि सीमलं नीरं । तओ छुहिएहिं भोअणं मग्गिा बालरहिं । पुरओ सुशासयारतरू तरुणं फलि- ओ। दिन्नाई फलाई । अविणोए तेसिं जाया ते सुत्या ! जाच सा अठायाए घोसमद ताप जं जायं तं निसामेह जनोग वालयाई पदम जैमाविआतेमिभुत्तु तरं पत्तलीओ तीए चाहिं उदिभाओआसि ताओसीलमाहप्पाकपिप्रमणाए सासणदेवयाए सोयनाचोलयस्याओ कयाओ । जे अ उचिट्ठसित्यरुणा भूमोए पडिआ ते मुत्तिआई मपाईआई । अग्गमिहा य मिहरेमु तहेव प्राचीनगूर्जरकान्यसदहः दंसिआ । एअमचन्भु सासुए दट्टण निवेई सोमविप्पस सिद्धं च जहा वच्छ सुलक्षणा पइचया य एसा बहता पचाणोहिं एअं कुलहरं ति जणणीपे- रिओ पच्छायावानलडझंतमाणसो गओ वहुयं वालेउं सोमभट्टो। तीए पिडओ आगच्छन्तं दिअयरं निअवरं दट्टण दिसाओ पलोईआओ। दिट्टओ अग्गओ मरगवओ। तओ जिणवर मणे अणुसरिऊण सुपत्तदाणं अणुमोअंतीए अप्पा कूवंमि झंपाविओ। सुहज्झवसाणेण पाणे चइऊण ऊप्पन्ना कोहंडविमाणे सोहम्मकप्पहिढे चाहिं जोअणेहिं अंबीअदेवी नाम महडिआ देवी।विमाणना- मेणं कोहंडी वि भन्नइ । सोमभट्टेण वि तीसे महासईए कूचे पडणं दटुं अप्पा तत्यैव झपायिओ। सो अमरिऊण तत्व जाओ देवो। आभिओगिअफम्मुणा हिरवं विउव्चित्ता तीए चेव वाहणं जाओ । अन्ने भणति अंविणी स्वयसिहराओ अप्पाणं झंपावित्ता तप्पिट्ठओ सोमभट्टो वि तहेव मओ । सेसं तं चेव । सा य भगवई चउन्भुआ दाहिणहत्थेस्तु अंबलुवि पासं च धारेइ यामहत्येसु पुण पुत्तं अंकुसं च धारद उत्सत्तकणयसवण्णं च धपण- मुव्यहइ सरीरे। सिरिनेमिनाहस्स सासणदेषय त्ति नियसइ रेवइगिरिसिहरे । मउडकुंडलमुत्ताहलहाररयणकंकणनेउराइसव्यंगीणाभरणरमणिजा पूरेइ सम्म. दिहीण मणोरहे निवारइ विग्यसंधाय । तीए मंतमंडलाईणि आरोहिताणं भविआणं दीसंति अणेगरूवाओ रिद्धिसिन्द्विओ, न पद्घति भूअपिसायसा- इणीविसमग्गहा, संपन्जति पुत्तकलत्तमित्तधणधरजसिरिओ ति। अंबिआमंता इमे। वयवीअसकुलकुलजलहरिदयअनपेआई। पणइणियापावमिओ अंविअदेवीइ अह मंतो ॥१॥ धुवभुषणदेवि संघुद्धिपासअंकुसतिलोअपंचसरा । णहसिाहिकुलकलअझासिधमायापरपणामपयं ॥२॥ वागुन्भय तिलोअं पाससिणीहाउ तहअवनस्स। कुहंडअंविआए नमु त्ति आराहणामंतो॥३॥ एवं अन्ने वि अंबादेवीमंता अप्पपररका चि सथा सुरमणा जुग्गा मग्ग- पेमाइगोअरा य बहवो चिटुंति । ते अतहा मंडलाणि अ इत्य न भणिआणि गंधविस्वरभएणं ति गुम्मुहाओ नायच्याणि । एअं अंपियदेवीकप्पं अविअप्पचित्तवित्तीणं । पापंतसुणताणं पुनति समीरिआ अत्या ॥ १ ॥ इति श्रीविकादेवीकला।
APPENDIX VII.
श्रीगिरिनारकल्पः।
वरधर्मकीर्तिविद्यानन्दमयो यत्र चिनतदेवेन्द्रः।
स्वस्लिमीनेमिरसौ गिरिनारगिरीश्वरो जयति ॥१॥
नेमिजिनो यदुराजीमतीत्य राजीमतीत्यजनतो यम् ।
शिश्राय शिवायासौ गिरिः ॥२॥
स्वामी छत्रशिलान्ते प्रवज्य यदुच्चशिरसि चक्राणः ।
नभावलोकनमसौ गिरि० ॥३॥
यत्र सहस्राबवणे केवलमाप्यादिशबिभुर्धर्मम् ।
लक्षारामे सोऽयं गिरि० ॥४॥
निवृतिनितम्बिनीवरनितम्बसुखमाप यन्नितम्वस्थः ।
श्रीयदुकुलतिलकोऽयं गिरि० ॥५॥
वुवा कल्याणत्रयमिह कृष्णो रूप्यरुपममणिविम्बम् ।
चैत्यत्रयमकृताऽयं गिरि० ॥ ६ ॥
पविना हरिर्यदन्तर्विधाय विवरं व्यवादजतचैत्यम् ।
कानवलानकमयं गिरि०॥७॥
तन्मध्ये रत्नमयों प्रमाणवर्णान्वितां चकार हरिः ।
श्रीनेमेमूर्तिमसौ गिरिः ॥ ८॥
स्वकृनैतदिम्बयुतं हरित्रिविम्ब सुराः समवसरणे ।
न्यदधन्त यदन्तरसौ गिरि॥९॥
शिखरोपरि पन्नाम्वाऽवलोकनशिरसि रङ्गमण्डपके ।
शम्चो बलानकेऽसौ गिरि० ॥ १० ॥
यत्र प्रद्युम्नपुरः सिद्विधिनायकसुरः मतीहारः।
चिन्तितसिद्धिकरोऽसौ गिरि० ॥ ११ ॥
तत्पतिरूपं चैत्यं पूर्वाभिमुखं तु निवृतिस्थाने ।
पत्र हरिश्चनोऽसौ गिरि० ॥१२॥
तीर्थेतिस्मरणाड् यत्र यावाः सप्त कालमेघाद्याः ।
क्षेत्रपतामापुरसौ गिरि०॥ १३ ॥
२०
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
विभुमर्चति मेघरवो वलानकं गिरिविदारणश्चक्रे ।
यन्त्र चतुर्दारमसौ गिरि० ॥ १४ ॥
पत्र सहस्राम्रवणांतरस्ति रम्या सुवर्णचैत्यानाम् ।
चतुरधिकविंशतिरयं गिरि० ॥ १५ ॥
द्वासप्ततिर्जिनानां लक्षारामेऽस्ति यत्र तु गुहायाम् ।
सचतुर्विंशतिकासौ गिरि० ॥ १६ ॥
वर्पसहस्रद्वितयं प्रावर्तत यत्र किल शिवासनोः।
लेप्यमयी प्रतिमासौ गिरि० ॥ १७ ॥
लेपगमेऽम्वादशात्प्रभुचैत्यं यत्र पश्चिमाभिमुग्वम् ।
रत्लोऽस्थापयत्तासौ गिरि०॥ १८ ॥
काश्चनवलानकान्तः समवसृतेस्तन्तुनेह विम्वमिदम् ।
रत्नेनानीतमसौ गिरि० ॥ १९॥
बौद्धनिपिद्धः सङ्घो नेमिनती यत्र मन्त्रगगनगतिम् ।
जयचन्द्रमादिशदसौ गिरि० ॥२०॥
तारां विजित्य बौद्धानिहत्य देवानवन्दयत्संघम् ।
जयचन्द्रो यत्रायं गिरि० ॥ २१ ॥
नृपपुरतः क्षपणेभ्यः कुमायुदितगाथयाम्वयार्थ्यत यः।
श्रीसड्डाय सदायं गिरि० ॥ २२॥
नित्यानुष्ठानान्तस्ततोऽनुसमयं समस्तसकेन ।
यः पठ्यतेऽनिशमसौ गिरि०॥ २३ ॥
दीक्षाज्ञानध्यानव्याख्यानशिवावलोकनस्थाने ।
प्रभुचैत्यपावितोऽसौ गिरि०॥ २४ ॥
राजीमतीचन्द्रदरीगजेन्द्रपदकुण्डनागझर्यादौ ।
यः प्रभुमूर्तियुतोऽयं गिरि० ॥ २५ ॥
छत्राक्षरघण्टाचनविन्दुशिवशिलादि यत्रहार्यस्ति ।
कल्याणकारणमयं गिरि०॥ २६ ॥
पाकुडबमात्यसजनदण्डेशाद्या अपि व्यधुर्यत्र ।
नेमिभवनोबृतिमसौ गिरि० ॥ २७ ॥
कल्याणत्रयचैत्यं तेजःपालो न्यवीविशन्मन्त्री।
यन्मेखलागतमसौ गिरि० ॥२८॥
श्रीगिरिनारकल्प । २१ शत्रुक्षयसम्मेताष्टापदतीर्थानि वस्तुपालस्तु । यत्र न्यवेशयदसौ गिरि० ॥ २९ ॥ यः पविंशतिविंशतिपोडशदशकद्वियोजनाऽस्त्रशतम् । अरपट्क उच्छ्रितोऽयं गिरि० ॥ ३० ॥ अद्यापि सावधाना विद्धाना यत्र गीतनृत्यादि। देवाः श्रूयन्तेऽसौ गिरि० ॥ ३१ ॥ विद्याप्राभृतकोतपादलिसकृतोजयन्तफल्पादेः । इति वर्णितो मयाऽसौ गिरिनारगिरीश्वरो जयति ॥ ३२ ॥ इति श्रीधर्मयोपसूरिकृत श्रीगिरिनारकल्प ।
APPENDIX VIII Inscription of the reign of Alapkhan in the temple of Sthambhana Parsvanatha at Cambay. ॐ अर्ह संवत् १३६६ वर्षे प्रतापाक्रान्तभूतलश्रीअलावदीनसुरवाण- प्रतिशरीरश्रीअल्पखानविजयराज्ये श्रीस्तंभतीर्थे श्रीसुधर्मास्वामिसंताननभो. नभोमणिसुविहितचूडामणिप्रभुश्रीजिनेश्वरसरिपटालंकारप्रभुश्रीजिनप्रबोधन- रिशिष्यचूडामणियुगप्नधानप्रभुश्रीजिनचंद्रसूरिसुगुरूपदेशेन ऊकेशवंशीयसा- हजिनदेवसाहसहदेवकुलमंडनस्य श्रीजेसलमेरो श्रीपार्श्वनाथविधिचैत्यकारित- श्रीसम्मेतशिखरमासादस्य साहकेसवस्य पुत्ररत्नेन श्रीस्तंभतीर्थे निर्मापितस- कलस्वपक्षपरपक्षचमत्कारिनानाविधमार्गणलोकदारिद्रयमुद्रापहारिगुणरत्नाकर- स्य गुरुगुरुतरपुरप्रवेशकमहोत्सवेन संपादितश्रीशनुजयोजयंतमहातीर्थयात्रा- समुपार्जितपुण्यप्राग्भारेण श्रीपत्तनसंस्थापितकोद्दडिकालंकारश्रीशांतिनाथवि- धिचैत्यालयश्रीश्रावकपौषधशालाकारापणोपचितप्रसृमरयशसंभारेण भ्रातृ- साहराजुदेवसाहवोलियसाहजेहडसाहलपपतिसाहगुणधरपुत्ररत्नसाहजयसिं- हसाहजगधरसाहसलपणसाहरत्नसिंहप्रमुखपरिवारसारण श्रीजिनशासनप्र- भावकेण सकलसार्मिकवत्सलेन साहजेसलसुश्रावकेण कोद्दडिकास्थापनपूर्व श्रीश्रावकपोपधशालासहितः सकलविधिलक्ष्मीविलासालयः श्रीअजितस्वामि- देवविधिचैत्यालयः कारित आचन्द्रार्फ यावन्नंदतात् ॥ शुभमस्तु । श्रीभूयात श्रमणसंघस्य । श्री।
APPENDIX IX Inscriptions on the Satrunjaya Hill pertaining Samari's installation of the image of Adisvara. संवत् १३७२ वर्षे माहमुदि सोमे श्रीमदूकेशवंशे वेसटगोत्रीयसा० सलपणपुत्रसा आजडतनयसागोसलभार्यागुणमतीकुक्षिसंभवेन संघपति- आसाधरानुजन सा लूणसीहाग्रजेन संघपतिसाधुश्रीदेसलेन पुत्रसा सहज- पालसा साहणपालसा सामंतसा समरसा सांगणप्रमुखकुटुम्बसमुदायोपेतेन निजकुलदेवी ( सच्चि ) कामूर्तिः करिता । यावयोमनि चंद्राकौं यावन्मेरुन- हीतले । तावत् श्री ( सञ्च ) का मूर्तिः' संवत् १३७२ वर्षे माहसुदि १४ सोमे ज्ञातीयराणकनीमहीपाल- देवमूत्तिः संघपतिश्रीदेसलेन कारिता श्रीयुगादिदेवचैत्यालये। संवत् १३७१ वर्ष माहसुदि १४ सोमे श्रीमदृकेशवंशे वेसटगोत्रे सा० सलपणपुत्रसा०आजडतनयसागोसलभार्यासागुणमतिकुक्षिसम्भूतेन संघ- पतिसा आशाधरानुजेन सा लुणसोहाग्रजेन मंधपतिसाधुश्रीदेसलेन सा०- सहजपालसासाहणपालसा सामंतसा समरसीहसा०सांगणसासोमप्रभृ- तिकुटुंवसहायोपेतेन वृद्धभ्रातृसंघपतिआसाधरमूर्तिः श्रेष्ठिमाढलपुत्रीसं- घरत्नश्रीमूर्तिसमन्विता कारिता । आशाधरः कल्पतस्त्रहोयमाशात्रिक पूरित ।.." लंकृतवाहुयुगो युगादिदेवं प्रयतः प्रणीति ॥ चिरं नंदतात् ।। ॥ शुभं भवतु ॥ संवत् १४१४ वर्षे वैशापसु १० गुरौ संघपतिदेसलसुतसा समरस- मरश्रीयुग्मं सा सालिगसा सज्जनसिंहाभ्यां कारितं । प्रतिष्ठितं श्रीकशासूरि- शिष्यः श्रीदेवगुप्तसरिभिः। शुभं भवतु ॥
APPENDIX X
पेथडरासः
विणयवयणि वीनवउं देवि सामिणि वागेसरि
हंसगमणि आकाशभमणि तिहयणि परमेसरि ।
वीरजिणिदह नमीय चलण चउविहुश्रीसंघिहिं
कवडजक जरकाधिराज समरीय मनरंगिहिं ॥१॥
कोडीयनपरनिवासिणी य वंडं अंविकदेवि ।
शासनदेवति मनि धरीय गुरुचलण नमेवि ॥२॥
रास रमेवउ जिणभुवणि तालमेल ठवि पाउ ।
संघतलायन रोपीउ ए सभगिरि विभगिरि वेवि ॥३॥
निसुणउ धामी एकमनि महीयलिमज्झि पहाण ।
जास वोध निरवमतिलउ पेथ अगंजीयमाण ॥४॥
पिण एक तस गुण संभलउ संघपति साहसधीर ।
अकलीअ कलि जिम छेतरीअ गरूड गुहिर गंभीर ॥५॥
पोरूआडकुलिमंडणउ वर्डमाणकुलिलीह।
चांडसोहकुलि अवतरीया पेयपमुह सुतसीह ॥६॥
जिम कंचण कसवडीयए पामिउ बहुगुणरेह ।
बंधवि पेथपरीषीयइ बहअ कालि घरि एह ॥७॥
बइसीय पेथड पाटे बंधव वोलावड्
नरसीहरतनह कारे मनि मंत्र चलावइ ।
मणूयजन्म अतिदुलह अनइ श्रावयजम्म
जीव लहइ बहुपुण्य जगि जिणवरधम्म ॥ ८॥
घणकणरयणभंडार ते सवि अछह य असार ।
संचइ मोहनबंध ते सव्वि जाणे गमार ॥९॥
लाधितणउ जउ गरव करेई लीजइ राउल छल ह धरैई।
मणूयजनम हवं सफल करीजइ जीविययौचनलाहउ लीजह ॥ १० ॥
अथिरलाछि किम धिर ह करीजइ जिणह धंम तस ऊपम दोजइ ।
सेजि रिसहसामि वंदीजह विविहनकारिहं प्रभु पूजीजइ ॥ ११ ॥
पेथडरासः मिलि बंधवि कीयउ वयण प्रमाण एकचित्ति सवि समाण जाण । साते पंधवि कीयउ विचार सविहुं काजि लिउ नरसीअ भार ॥ १२ ॥ धम्मीय निसुपाउ लोयमज्झि संघतणउ समाहड भवीअणउ आणूंअ दीजइ भत्तिजत्ति भवीया लहइ लाहउ धणकणउ । पेलसि रुलीयई रंगि रास हवं नवरस नवरंग नवीयपरे सुणि सामहणी संघतणी जो करई निरंतर घरेहिं घरे ॥ १३ ॥ जोइन देवालउ सामुहिउं तोहं माहि सुरेसर जिण ठवीय । देसदेसाउर वरनयर तिहिं लेवि कंकोत्री पाठवीय ॥ १४ ॥ पाटणि पइसीय सामति तहिं कर्णनरेसर भेटीय वीनवीउ । तीरथजात्र जायव देव तहिं देसवटउ सपसाउ कीउ ॥ १५ ॥ तहिं वेगि लेउ पण आधीउ ए सयलसंघ तहिं हरसीय नीयमणि नयर पसाइरउ कीधउ तक्खणि तहिं नाचई कुतिगकुतिगीयां। घरि घरि बइसीय लोय मनावीय साजणसाहसरिस संम्हावी गामागर- पुरपाटणह ॥१६॥ दूसमसमइ अहि जिम तिरीयु तारणतरंड रिसह मनि धरीय फल लीजइ जनमहतण। एकभावि नर जिणह धम्म परिरिहवरकलीय रमाउलीय ॥ १७ ॥ केवि कुतिग नर जोई निरंतर भलां भलेरां अतिहिं वहिला अपभवर । कामिणि धामिणि धवल दियंती गायंती गुण जिणवरह । अतिऊमाहु जात्र समाहर करीयल कंनि सुणतीहं य ॥१८॥ ते चउरा रूडा तडयां ताडी नवांनवेरां दीसहं गेहणमण सधण । ने घणाघणेरा समविसमेरा संखि न दीसई असंखि पुण ॥ १९ ॥ देवालइ बालीय नयणि विसालीय दितीय ताली रंगि फिरती हरिसभरे। तहि नाचई खेला बहुयत चेला बाला भोला लउडा रसि रमदं ॥ २०॥ अतिरंगि पूरी दिता भमरी नवपरि नयरंगद तिपसपरे । परममहोच्छच कोउ देवालइ फागुणपंचमि वीतसीयालइ प्रस्थान कीयं पवरदिणि ॥ २१॥ संघपति सोहडदेउ चीनचीई तीरथजान जाइयउं गोसामीय । सेलहुत सीपामणह वहुय परघउ पणवि रहावीय । यहथमल्ल लेउ पत्तनि आधीय संघ देवालइन रोपीउ ए॥ २२ ॥ १६ " प्राचीनगूर्जरफाव्यसवहः संघपूज तिहां कीध अवारी भोयण सयल लोय सवि पूरीय महोच्छव कारवीय ॥२३॥ लक्षण ॥ फागुणदसमि दिणंद चलीय संघ दहदिसितणउ । हसमस धसमस जोइ मिलीय लोक पण अतिघणउ ए॥२४॥ वहतमल्ल अगेवाण तुरीय ठाठ जोई पापरीय । पुलेहिं पलाण जोइ इकि देवालइ फिरीय ॥२५॥ पहिल दीथी लागि जोइन देवालां संचरई ए। अपंड पीयाणे जाइ पहिलउं पीलूयाणइ रहीय ॥ २६ ॥ चलीय संघसंजुत्त पहुतउ बेगि डाभलनयरे । . तीह दीन्हा वास भास रास रुलीयामणांए। देवालइ ऊछाहु चैत्रप्रवाडि सोहामणी.ए ॥ २७ ॥ वडराउत वपाणि करणराउ मनि सलहीइए। देद दद्यापरजाम वोल्हणवंस वपाणीइ ए॥ २८ ॥ पहुतउ देवालइ तोइ हरसीय संघ प्रसंसीइ ए। पेथडसमउ न कोई मारगि मन तुम्हि वीहिसिउ ए ॥ २९ ।। दीन्ह पीयाणउं तोइ मयगलपरि तुम्हि संचरीय । वेगि पहृता तोइ नयरमाहि ते तरवरीय ॥ ३० ॥ आंगणि दीन्हा वास देवाला पापलि फिरीय । भविया पणमउ पास जिण भूयण कलीयामणउं । कीधीय चैत्रमवाडि देवदेवांगणि पेपणउं ए॥३१॥ संघह कोउं वत्सल्ल धम्मी नागलपुरतणे ए। चलीय पीयाणइ जाम मारगि माग न जाणीइ ए ॥ ३२ ॥ महू यालइ गीयं ताम संघपति पेथ धपाणीइ ए। नपणि निहालइ लोक पुण्यवंत धनवंत तहिं ॥३३॥ पूजीया जिणभूयणाई भविया मणोरह चित्ति घरे । की पीयाणउं भावि अवलीयछीतीयहारि तहिं ॥ ३४ ॥ पेथावाडइ जाइ भेटीय मंडणदेव तहिं । लाध मानप्रमाण सोकिरि आवइं गुणपवरो ॥ ३५ ॥ भयु मनि करिवउ तुम्हि मारगि जाउ तम्हि । गिया ते जंबु जाम संघह पार न पामीय ए। .
पेधडरासः
२७
भेटीय झलु ताम पणवि पीयाण धामीयहं ॥ ३६ ।।
भडकूए आवास गोहिलसंडउ धरीय मनि ।
बहुगुणवंत सुजाण राण पहूतउ तेण खणि ।। ३७ ।।
संघह दीन्ही धीर वलीय संघपति एकमनि ।
राणपुरे संपत्त संघ कनालइन रहइ ए ॥ ३८ ॥
चलीय सरीस उपराण वसहसंड संघपति भणइ ए।
मई मन मेल्हि निरास प्राण राणहूं मन हरेसो ।। ३१॥
चइठउ संघपतिपासि रंजीय म्लीयायत हरिसे ।
गुणगान मुम्बराउ लोलीयाणपुरसई घणीय ॥ ४० ॥
घर धर्मनज ठाउ भवीय भावि तीणइ यह भणीय ।
दीन्ह पीयाणनीयाण उपरि पीपलाइनणीय ।
चउरा दीन्ह विहाण डूंगरा देषीय मनि म्लीय ॥४॥
दीटउ डूंगर दृरिथियां चडीय सरोवरपाले ।
संघपति दई बधामणी हरिपीऊ ए हरिपीऊ ए हरिपीउ नयणि निहाले ॥४२॥
कुंकुमिच्छडउ दिवारीउ ए तहिं पाथरीया पाट।
चाउलि चउक पूरावीउ ए सपरिपरे सपरिपरे सपरि पढई बहुभा ॥ ४३ ॥
पदई भार संघपति निसुणि पेयड पुण्यपवित्त
चंडसीधरि अवतरीउ गुरुदेवे गुन्देवे गुरुदेवे सुप सत्त।
थापीउ डूंगर पण तिलउ फूलपगर ते चंग
पाउल नाचई रंगभर गायंती ए गायंती ए गायंती मनह सरंग ।। ४४ ॥
कापड कंचण दिन्ह तहिं बहुगुण पूरी आस ।
संघपति करइ बधामणउं चलीज ए चलीऊ ए चलीउ पालीयताण यास॥४॥
गंगाजल जिम निर्मल ललतासर सुपचित्त ।
सीधपेत्र तीरथतिल तिससयर तिससपरे तिससयरे संपत्त ।। ४६ ॥
मरुदेवि सामिणि पय नमीय संतिनाह सुरराउ ।
पालितसरिमतिदिउ ए सोलम् ए सोलम ए सोलमा जिणराउ ॥७॥
हूंगरसिरि जे पाहरीय कवडिजश्वपटिहारो।
संघ जि सांनिध सो करइ पहिलं प पहिलं ए पहिलं पास जुहारे ॥ १८ ॥
अणुपम सर देपेवि तहिं पहूंता पालिद्यारि ।
सरगारोहण दिट्ठ तर्हि अहिणय प अहिणय ए अहिणव ईणं संसारे ॥४९॥
२८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवः अष्टापद अवलोईई ए इंद्रमंडप अतिचंग। नंदीसर अहिणव तहिं देपीऊ ए देपीऊ ए देपीउ मनिहिं सुरंग ॥५०॥ मंडपि पहुतउ पवित्र तहिं लोटींगणां करेउ । पणमीय सामीय रिसजिण तिन्नि प्रदक्षिण तिन्निपदक्षिण तिन्नि प्रदक्षिण दोठल्ला पद्महकमल निम्मल युगादि जिण पयठला सामी पढमजिण विम• लगिरे। भवीयच्छुणंत सामी लागल्ला तम्ह घई नामि नमोय नमो नमो सेजसिहरो२२ वायवद्धामण अतिहिं सोहामणुं रिसहभूअणि रुलीआमां ए भवीपजन कलस कंचणमय मंडियले ए दुकाव जलंजलि देयंति कुसुमंजले ॥ धुणंति दीणरीण जीण ऊतारंति जललवण नम्हण करंति सामी सुगंधजले ॥ कपूरिपूरि पूरीय तिणि कीय लि मृगनाभिमंडण त्रिजगगुरु गुणनिलउ देवाधिदेव जोउ वेलवउ सेवत्रीपाडल पहल कुसुम परमल विपुल पूजहे। वायवडामणं ॥ भवीयमणि वहआणदि आरती उतारइ जिणिंद पढई भट मंगलिक रिसह- सामि। तिलक भला लि कीय ले कंठि वरमाला ठविय ले चाउलि सिरि बद्धावीय लि। धन धामी वडामणउं॥ भवीयजण रंजिप मनि दियंति ते दीण दुथीय जण मग्गण दाणु मचंति नवनवी रमणि वीणवंसमृदंगमणि तिवल्लि तालनिनाद सुणि पूरीय भवण । वाइवदामपुं०॥ आय कि रिसहेसर तम्ह परमेसर सामीसाल चिरकालि मुधिवर । तम्हची पाय ए कमलममर भविक जन जय जगनाथ तुं जगतगुरो ॥ वाय- वडाम०॥ आवंडकोडाकोडि सिद्धि ले तीथयर गोत्र बंधीय ले पूजीयु हरिसह मनि मन मिली। आयस मग्गीय जव चलीय पूरीय संघ मालीप मनि निचंतीय पेयटकंठि टो. डर ढलीउ । वायवद्धामणं० ॥ आयस मग्गिय पेय ज चलीउ दलीय टोडर संघपति मोकलावए सपलसंघो पहत पालीताणए घरि घरि सामीपच्छल कारए। .
पेयडरासः वावीय वित्त तिहि सयलसिद्विक्षेत्र जन्मफल लेउ जो बहुधणवंत रूपावटी चलीय पीयाणए। वरउ संघातिपति लोक वखाणए सेलटीया संघ पहत तहि चलयउ अखंड पोआणए। जाइ अमरेलीयपीयाणए पहता वेगि तहिं पण विक्रीयाणए विसमगिरि लं- घीयउ पूरि मनि आसह ॥ तेजलपुरि अंगणि दीन्हा वास उग्रसेनमंदिरु दीठ पगार अयनरकवि भणई गढवि खइंगार। गअउ दीसए पो रिपगार नरपम नरसीअ नरआधार ॥ मंदलकि मंडिउ वास तहिं विसमए सुरठ वडदेस भोल लोक तहि नियसयए । गिरि गुरूउ गिरनार स पसिद्ध ता लदि दमोदरो देय प्रसिद्धउ वहि सोवन- रेख नदी जलपूरीय। कालमेघो क्षेत्रपाल गिरिपाहरी मनिवाइड देवि पाज करावीप धवलीय वर परव तीण करावीय। विसम डूंगर गुरुङ गिरनारो चटीय नेमिकुमरि लीपउ संजमभारो दिनि चडपनि घरमाण ऊपजइए जगतिगुरु जिणिह यर तसु सिहरे सिज्या ।। सीधु सामी सामलउ तसु सिहरि संथ पहता ऊलट आंगिहिं अतिवणउ देपीउ राजलकन! तहि नाचिनए प सहिलडीएलला गीय गिरिनारे राजलिवर कलिआमणउ सामलडउ संसारो। तहिं नाचिनए॥ अंग पखालि सुगयंदमइ ए जल पहरीय धोति प्रचीत । इंद्रमहोत्सब आयरंभी तहिं वय लि यहुधणवंत । तहि नाचिनए सहि० ।। इंद्रमालउच्छाद करी जो वेवीय विभव नीयाणि । सफलमणोरह पूरीय संघपति चटीयलि इन्द्रपिमानि ॥ तहिं नाचिनए० ॥ चमरधारि सरतारसवंगी गावंती बहु आसीस। सामलसापि किरि संघपति नंदर बहत परीस ॥ तहिं नाचिनाए । गर्यदमइ प नीरि कलस जलभरीय लि कपूरिहिं भंगी महापूज अहिमीम ! नय कलीय लि आरती उतारउ मंगलिक संघपति ईम ॥ तहिं ना० ॥ अंविकि आस मणोरह पूरी अवलोईय जगताय सांबपजन जुहारीय वलीयउ पेध जन्म सुकीयाध ।। तहिं नासहलली ए मली. था गई गिरिनारि॥
प्राचीनगूर्जरकाव्यसददः
सोमनाथचंदपह वंदीय देखीउ वलीउ जाम
दिउ पीयाणं हिव मन रहिसउ मंडलिक भणद ईम ॥ तहिं ना० ॥
दिउ पीयाणं वेगितहिं हरीयाला सूटा रे सूरवाहे संपत्त मनीला सूटारे ।
इति श्रीमायादवामौक्तिकच्य० पेवडगसः समाप्तः ।।