University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
संस्कृतप्रबोधः तृतीय भागः
Front matter
Athlth TATERIAL भो३म् COMPILED संस्कृतप्रबोधECKED CHECKED तत्रायमै . तृतीयोभाtars बदर्शदत्त शर्मा संस्कृत-भाषा-व्युत्पिपित्सुनाम् उपकाराय प्राकृतभाषया विनिर्मिती KANGAN I HEA m SANSKRIT PRABOWH 'AI-31 O com A SANSKRIT GRAMMAR PARTI Pr: BY P. BADARI DUTT SILARM MINIKW AT THE LAW IT (AINPORE प्रथमावृत्तौ १०००] १९०७ [मूल्यम्।। 0000 मुद्रणाधिकारः स्वायनः विषयानुक्रमः पृष्ठाङ्कम १ ६ .... २४ .... .... ५ E +4.. ... ७ .... .... *४४ 4... ६ .... ४६ संख्या विषयः १ জিনিথ २ वादिगणः ३ अदादिगणः ४ जुहोत्यादिगणः दिवादिगणः स्वादिगणः तुदागिणः रुधादिगणः तनादिगणः १० क्रया दगणः ११ चुरादिगणः १२ णिजन्तक्रिया १३ मन्नन्तप्रक्रिया १४ यङन्तप्रक्रिया १५ यङलुगन्तप्रक्रिया नामधातुप्रक्रिया भाषकर्मप्रक्रिया १८ कर्मक प्रक्रिया १६ मात्मनेपदप्रक्रिया परम्मैपदप्रक्रिया ૨? लकारार्थप्रक्रिया ५२ ५६ ७२ .... ७६ Rememomen क्रिया ... संस्कृत प्रबोधे तृतीयोभागः ratna .5%2---- और वचन करना और क्रिया उमको कहते हैं, जिससे कुछ करना पाया जाय भार वह काल, पुरुष से सम्बन्ध रखती है। क्रिया के मूल को 'धातु' कहते हैं, धातु के अर्थ से किसी व्यापार का बोध होता है । जैस- 'भू' से होना, 'कृ' से गम्' से जाना । इत्यादि क्रिया दो प्रकार की होती है एक सकर्मक दुसरी अकर्मक ॥ सकर्मक किया वह है, जो कर्म के साथ रहे अर्थात उसका फल कर्त्ता में न जाने पावै किन्तु कर्मही में रहे । यथा-शिष्येण पुस्तकं पठ्यत -शिष्य से पुस्तक पढ़ाजाता है । कविना फाव्यं रच्यते = कवि से काव्य रचाजाता है । इन उदाहरणों में 'पढ़ना' और 'रचना' जो क्रिया का फल है, वह पुस्तक और काव्य कर्म में है, न कि शिष्य और कवि कर्त्ता में, इसलिये एमी क्रिया को सकर्मक कहते हैं । अकर्मक क्रिया वह है, जिसके कर्म नहीं रहता, किन्तु क्रिया का फल कर्ता या भाव में जाता है । यथा-देवदत्त आस्त = देवदत्त बैठता है । यशदत्तन शय्यते = यज्ञदत्त से साथ . सकर्मक क्रियाओं मे बहुतसी ऐसी भी क्रिया है कि जिनके दो कर्म होते है। यथा---अजा ग्रामं नयतिबकरो को गाव मे लेजाता है। शिष्यं धर्म शास्ति-शिष्य को धर्म की शिक्षा करता है । इन उदाहरणो मे 'नयति' और 'शास्ति' क्रियाओ के क्रमशः अजा और प्राम तथा शिष्य और धर्म ये दो २ कर्म है, इस लिये ऐसी क्रियाओ को द्विकर्मक कहते है।
૨ cho । संस्कृतप्रबोधे- सोया जाता है । इन उदाहरणों में बैठना और सोना कप क्रिया का फल क्रमशः कर्ता और भाव में जाता है, अतएव ऐसी क्रिया अकर्मक कहलाती हैं। सकर्मक क्रिया के भी दो भेद हैं, एक कर्तृवाच्य और दूसरी फर्मवाच्य । जिस क्रिया का सम्बन्ध फर्त्ता के साथ हो, वह कर्तृवाच्य और जिसका सम्बन्ध कर्म के साथ हो वह कर्मवाच्य कहलाती है* ॥ कर्तृवाच्य कर्मवाच्य शिष्यः विद्यां पठति शिष्येण विद्या पठ्यते शिष्य विद्या को पढ़ता शिष्य से विद्या पढ़ीजाती है। कृषकः गोधूमान् वपति कृषकेण गोधूमा उप्यन्ते किसान गेहुमों को बोता है। किसान सेगेहूँ बोय जाते है। वदान्यः धनं ददाति वदान्यन धनं दीयते। उदार धन देता है उदारसे धन दियाजाता है। सकर्मक धातुओं से कर्म और कर्ता अर्थ में और अकर्मक धातुओं से भाव और कर्त्ता अर्थ में वक्ष्यमाण दश लकार मोर उनके स्थान में 'ति' आदि प्रत्यय होकर क्रिया बनती है। सकर्मक से कर्म में-गम्यते ग्रामो देवदत्तेन = देवदत्त से गांव जायाजाता है। सकर्मक से कर्त्ता में-गच्छति ग्राम देवदत्तः=देवदत्त गांव को जाता है। मकर्मक से भाव में-आस्यते देवदत्तेन-देवदत्त से बैठाजाता है। * यह बात ध्यान मे रखने योग्य है कि कर्तृवान्य क्रिया के साथ कर्त्ता में सदा प्रथमा विभकिन और कर्म मे द्वितीया विभक्ति रहती है, परन्तु कर्मवाच्य क्रिया के साय कर्ता मे सदा तृतीया ओर कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है । .
क्रियानिरूपणम् । ३ भूतकाल कहते हैं अकर्मक स कर्त्ता में-आस्ते देवदत्तः देवदत्त बैठता है। क्रिया के करने में जो समय लगता है, उसे काल कहते हैं, उसके मुख्य भाग ३ हैं-वर्तमान, भूत और भविष्य ॥ जिस क्रिया का मारम्भ होचुका हो, पर समाप्ति न हुई हो, उसे वर्तमान कहते हैं और इस अर्थ में धातु से 'लट् ' लकार होता है। जैसे-पर्ण पतति= पत्ता गिरता है । अश्वो धावति घोड़ा दौड़ता है। जिस क्रिया की समाप्ति होचुकी हो, उसे और इसके ३ भेद हैं-(१) परोक्ष भूत (२) अनद्यतन भूत (३) सामान्य भूत । जो अपनी प्रास्त्रों के सामने न हुवा हो किन्तु श्रुतिपरम्परासे सुना जाता हो, उसे परोक्षभूत कहते हैं और इस अर्थ में धातु से सदा लिट् लकार होता है। जैसे- पुरा कश्चिद्रामो दाशरथिर्षभूव = पहिले कोई दशरथ का पुत्र राम हुवा था । अद्यतन माज को कहते हैं, जो भाज न हुवाहो किन्तु माज से पहिले पर समीप काल में हुवा हो, उसे अनद्यतन भूत कहते हैं और इस अर्थ में धातु से बङ् लकार होता है। जैसे-ास्तत्रागच्छम् = कल मैं वहां गया था। जो सामान्य प्रकार से होचुका हो चाहे वह अद्यतन हो वा अनद्यतन उसे सामान्य भूत कहते हैं और इस अर्थ में धातु से लकार होता है । यथा-मत्तः पुरा तेऽभूवन् = मुझ से पहिले वे हुवे थे* ॥ भविष्य काल के दो भेद हैं एक अनद्यतन भविष्य दुसरा सामान्य भविष्य । माज से पीछे पर समीप काल में जो होगा वह अनद्यतन भविष्य कहलाता है और इस अर्थ में धातु से लुट् लकार होता है। यथा-परेास्तत्र गन्तास्मि = मैं परसा अनयतन भूत को आसन्न भूत और सामान्य भून को पूर्ण भूत भी कहते है ।
४ संस्कृतप्रबोधे- वहां जाऊँगा । जो सामान्य प्रकार से मागे होनेवाला है, उसे सामान्य भविष्य कहते हैं और इस अर्थ में धातु से लट् लकार होता है। यथा-किन्तत्र त्वं गमिष्यसि क्या वहां पर तू जायगा ॥ - इन तीन कालों के अतिरिक्त विधि, माशीर्वाद और हेतु हेतुमद्भाव अर्थों में भी धातु से लकार होते हैं । विधि आज्ञा वा प्रेरणा को कहते हैं और इस अर्थ में धातु से लोट् तथा लिङ् लकार होते हैं । यथा-स तत्र गच्छतु गच्छेत् वा = वह वहां जावै । माशीर्वाद अर्थ में आशीर्लिङ् होता है। यथा- स्वस्ति ते भूयातू तेरे लिये सुस्त्र हो । कारण को हेतु और कार्य को हेतुमान कहते हैं, ये दोनों जहां साथ २ रहें, उसको हेतुहेतुमद्भाव कहते हैं और इस अर्थ में धातु से लङ् लकार होता है । यथा-यदा सुवृष्टिरभविष्यत्तदा सुभिक्षमप्य- भविष्यत् = जब सुवृष्टि होगी तब सुभिक्ष भी होगा । %3D उक्त तीनों काल और विध्यादि अर्थों से सम्बन्ध रखने वाले सब दश लकार हैं, जिनका निर्देश इस प्रकार किया गया है-लद्, लिट्, लङ्, लुङ्, लु, लट्, लेट्, लोट, लिङ और लङ् । इनमें से सातवां लेट् लकार केवल वैदिक साहित्य से सम्बन्ध रखता है और उसके अनक भेद हैं, इस लिये हम उसको यहां न रखकर पाचवें भाग में (जो केवल वैदिक व्याकरण के विषय में होगा) रक्खेंगे। लिङ् लकार के दो भेद हैं एक विधि लिङ् और दूसरा माशीलिङ् ॥ उक्त दश लकारों में लट्, लङ्ग, लोट् और विधि लिङ् ये चार सार्वधातुक और शेष ६ आर्धधातुक कहलाते हैं । * अनद्यतन भविष्य को आसन्न भविष्य और सामान्य भविष्य को पूर्ण भविष्य भी कहते हैं।
क्रियानिरूपणम् । ५ - उक्त लकारों के स्थान में निम्न लिखित १८ प्रत्यय होते हैं :- परस्मैपद प्रथमपुरुष तिप् एकवचन द्विवचन मध्यमपुरुष सिप थसू उत्तमपुरुष मि वसू तसू झि बहुवचन मस प्रात्मनेपद वचन प्रथमपुरुप मध्यमपुरुष थासू एकवचन द्विवचन उत्तमपुरुष इ वहि महिक माताम् माथाम् बहुवचन ध्वम् के अब दो लकारों में जिन २ रूपों से उक्त प्रत्यय धातु साथ मिलते हैं उनको दिखलाते हैं :- लटू परस्मैपद आत्मनेपद उ०पु० एकव०ति त वचन प्र० पु० म० पु० उ० पु० प्र० पु० म० पु. सि मि से द्विव० तः वः आते माथे बहुव० भन्ति थ मन्त ध्व थः वहे महे tor परस्मैपद एकव० अ अ मात्मनेपद से आथे वहे महे द्विव. अतुः मथुः व माते इरे बहुव० उ: म ६ संस्कृतप्रबोधे- - लङ् व लुङ परस्मैपद मात्मनेपद उ० पु० वचन प्र० पु० म०पु० उ० पु० प्र० पु० म० पु० एकव० तू अम् त थाः द्विव० ताम् तम् आताम् माथाम् वहि बहुव० मन्-उः त म पन्त ध्वम् महि to परस्मैपद एकव० ता तासि तास्मि ता द्विव० तारी तास्थ: तास्वः तारी बहुव० तारः तास्थ तास्मः तारः मात्मनेपद तास ताहे तासाथे तास्वहे ताध्व तास्महे लट् परस्मैपद एकव० स्यति 'स्यसि स्यामि स्यते द्विव० स्यतः स्यथः स्यावः स्यते बहुव० स्यन्ति स्यथ स्यामः स्यन्ते आत्मनेपद स्यसे स्य स्यथे स्यावह स्यध्वे स्यामह लोटू परस्मैपद मात्मनेपद एकव० तु-तातू हि-तात् मानि ताम् स्व ऐ तम् माथाम् प्रावहै बहुव०मन्तु मन्ताम् ध्वम् आमह द्विव० ताम् आव प्रातामू भाम * लुङ् लकार में प्रत्यय से पूर्व किन्हीं धातुओ से सिच, किन्ही से क्स, किन्हीं से चङ् और किन्हीं से अङ् प्रत्यय और होते हैं ।
क्रियानिरूपणम् । ७ विधिलिङ परस्मैपद मात्मनेपद वचन प्र० पु० म०पु० उ०पु० प्र० पु० म० पु० उ० पु. एकव० यातू याः याम् ईत ईथाः ईय द्विव. याताम् यातम् याव ईयाताम् ईयाथाम् ईवहि बहुव० युः यात याम ईरन् ईध्वम् ईमहि आशीलिङ परस्मैपद मात्मनेपद एकव० यात् या: यासम् सीट सीष्ठाः सीय द्विव. यास्ताम् यास्तम् यास्व सीयास्ताम सीयास्याम सीहि बहुव० यासुः यास्त यास्म सीरन् सीध्वम् सीमद्दि लङ परस्मैपद मात्मनेपद एकव०स्यतू स्यः स्याम् स्यत स्यथाः स्ये द्विव० स्यताम् स्यतम् स्याव स्यताम् स्येथाम् स्यावहि बहुव० स्यन् स्यत स्याम स्यन्त स्यध्वम् स्यामहि उक्त १८ प्रत्ययों में पहिले ९ परस्मैपद और पिकल ९ आत्मनेपद कहलाते हैं। परस्मैपद का प्रयोग केवल कर्तृवाच्य क्रिया में ही होता है, कर्मवाच्य और भाववाच्य में नहीं। जैसे-देवदत्तः गच्छति देवदत्त जाता है । परन्तु आत्मनेपद का प्रयोग तीनों प्रकार की क्रियाओं में होता है । कर्तृवाच्य में-देवदत्त भास्ते = देवदत्त बैठता है। कर्मवाच्यमें-यज्ञदत्तेन भोजनं क्रियते = यज्ञदत्त से भोजन किया जाता है । भाववाच्य में-सोमदत्तेन शय्यते सोमदत्त से सोया जाता है ।
संस्कृतप्रबोधे-
प्रत्येक पुरुष
।
परस्मैपद और गात्मनेपद के तीन २ वचन क्रम से प्रथम,
मध्यम और उत्तम पुरुष कहलात हैं । जैसे-परस्मैपद के
तिए, तस्, झि, प्रथम पुरुप । सिप, थस, थ, मध्यम पुरुष,
मिए, वसू, मस् उत्तम पुरुप । ऐसेही मात्मनेपद के त,
माताम्, झ प्रथम पुरुष । थास, माथाम्, ध्वम् मध्यम पुरुष
इट्, वहि, माहि उत्तम पुरुष ॥
के तीन २ वचन क्रम से एकवचन, द्विवचन
मोर बहुवचन संशक होत हैं । जैसे-तिए, एकवचन, तसू
द्विवचन और झि बहुवचन । इसीप्रकार स्लिप आदि में भी
समझना चाहिये।
जिस क्रिया का कर्त्ता अस्मद् शब्द वाच्य हो, वह उत्तम
पुरुष कहलाती है । जैसे--अहं पचामि = मैं पकाताहूँ। तथा
जिस क्रिया का कर्ता युष्मद् शब्द वाच्य हो, वह मध्यम पुरुष
कहलाती है । यथा-त्वं पचसि = तू पकाता है और जिस
क्रिया का कर्ता इन दोनों से भिन्न कोई तीसरा हो, उसे प्रथम
वा अन्य पुरुष कहते हैं । जैसे-सः पचति = वह पकाता है।
यः पचति = जोपकाताहै। कःपचति= कौन पकाता है। इत्यादि
सब धातुमों के तीन भेद हैं, सेट्, अनिट् और वेद । जिन
धातुओं को वलादि आर्धधातुक की प्रादि में इट् का मागम
होता है वे सेट, जिनको नहीं होता वे भनिट और जिनको
विकल्प से होता है वे वेट् कहलाते हैं ।
क्रिया के निरूपण में दश गण और दश प्रक्रिया है, जिनकी
सिद्धि के लिये धातुपाठ
में २००० के लगभग धातुमों का
निर्देश किया गया है। हम संक्षेप के लिये उनमें से कतिपय
प्रसिद्ध और प्रचलित धातुओं के गणशः रूप दिखाते हैं :-
भ्वादिगणः। अथ भ्वादिगणः भू = होना, परस्मैपदी, अकर्मक, सेटू वर्तमान = लट्* प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन भवति भवसि भवामि द्विवचन भवतः भवथः भवावः बहुवचन भवन्ति भवथ भवामः परोक्षभूत लिटा एकवचन बभूव बभूविथ बभूव द्विवचन बभूवतुः बभूवथुः बभूविध बहुवचन बभूवुः बभूव बभूविम अनद्यतनभूत = लङ् * एकवचन अभवत् प्रभवः प्रभवम् द्विवचन प्रभवताम् प्रभवतम् मभवाव बहुवचन भभवन अभवत प्रभवाम सामान्यभूतलुज एकवचन प्रभूत् प्रभूः प्रभूवम् द्विवचन अभूताम् अभूतम् मभूव बहुवचन प्रभूवन् मभूत अभूम मनद्यतन भविष्य = लुट् भविता एकवचन भवितासि भवितास्मि द्विवचन भवितारी भवितास्थः भवितास्वः भवितारः बहुवचन भवितास्थ भवितास्मः सार्वधातुक लकारो मे स्वादिगण के समस्त धातुओं को तिङ् प्रत्यय से पूर्व 'शप' प्रत्यय और होता है. शोर प का लोप होकर केवल 'अ' रह जाता है ।। + लिट् लकार मे धातु को द्विवचन होजरहे, जिसमे प्रथम की अभ्यास संज्ञा हे ।। लङ, लुङ् और लङ् इन तीन लकारो मे हलादि धातु के पहिले 'अ' और बढ़जाता है।
संस्कृतप्रबोधे- - * सामान्य भविष्यलट् प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन भविष्यति भविष्यसि भविष्यामि द्विवचन भविष्यतः भविष्यथः भविष्याव: बहुवचन भविष्यन्ति भविष्यथ भविष्यामः विधि= लोट्* पकवचन भवतु,भवतातू भव, भवतातू भवानि द्विवचन भवताम् भवतम् भवाव बहुवचन भवन्तु भवत भवाम विधि-लिङ् एकवचन भवेत् भवेः भवेयम् द्विवचन भवेताम् भवेतम् भवेव बहुवचन भवेयुः भवेत भवेम माशीः लिङ् एकवचन भूयात् भूयाः भूयासम् द्विवचन भूयास्ताम् भूयास्तम् भूयास्व बहुवचन भूयासुः भूयास्त भूयास्म हतुहेतुमद्भाव =लङ् एकवचन अभविष्यत् प्रभविष्यः प्रभविष्यम् द्विवचन अभविष्यताम् अभविष्यतम् प्रभविष्याव बहुवचन प्रभविष्यन् प्रभविष्यत अभविष्याम " उपसर्गेण धात्वर्थों बलादन्यत्र नीयते उपसर्गों के योग से धातुओं के अर्थ बदल जाते हैं अतएव इसी 'भू' धातुका 'प्र' उपसर्ग के योग में सामर्थ्य (सकना) अर्थ होजाता है- दाने प्रभवति = देने में समर्थ होता है । इसी प्रकार 'सम् उपसर्ग के योग में सम्भव होना अर्थ होजाता है-यत्ने सिद्धिः सम्भवति = यत्न होने पर सिद्धि का होना सम्भव है। " - . %D भ्वादिगणः। 'उत्' के योग में उत्पन्न होना अर्थ होजाता है-क्षेत्रे वीज- मुद्भवति = खेत में वीज उत्पन्न होता है 'अभि' पूर्वक 'भू'धातु का मर्थ दबाना, 'परि' पूर्वक तिरस्कार करना और 'अनु पूर्वक अनुभव करना होजाता है और इन तीनों के योग में 'भू' धातु सकर्मक भी होजाता है । यथा-सूर्यः चन्द्रमभि- भवति = सूर्य चन्द्र को दबा लेता है । खलः साधुं परिभवति दुष्ट साधु का अनादर करता है । विद्यया सुखमनुभवति विद्या से सुख का अनुभव करता है । एथ् = बढ़ना, अात्मनेपदी, अकर्मक, सेट लट्-एधते, एधेते, एधन्ते । एघसे, एघेथ, एधध्वे । एधे, प्रधावहे, एधामहे ॥ लिट्-एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे । एधाञ्चकृषे, एधाञ्चक्राथे, एधाञ्चकृट्वे । एधाञ्चकं, एधाञ्चकृवहे, एधाञ्चकमहे । एधाम्बभूव । एधामास । इत्यादि लिङ्-एधत, ऐधेताम, ऐधन्त । ऐधथाः, एधेथाम्, ऐधध्वम् । ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि ।। | लुङ्-ऐधिष्ट, ऐधिषाताम्, एधिषन । ऐधिष्ठाः, ऐधिषाथाम्, ऐधिध्वम् । ऐधिषि, ऐधिष्यहि, ऐधिष्महि ॥ लुट्-एधिता, एधितारी, एधितारः । एधितासे, एधितासाथ, एधिताध्वे । एधिताहे, एधितास्वह, एधितास्महे ॥ लट्-एधिष्यते, पधिष्यते, एधिष्यन्ते । एधिष्यसे, एधिष्य थे, एधिष्यध्वे । एधिष्य, एधिष्यावहे, एधिष्यामहे ॥ लोट-एधताम्, एधताम, एधन्ताम् । एधथाः, एधेथाम्, एधध्वम् । एथै, एधाव है, एधामहे । अकारादि और ऋछ धातु को छोड़कर शेष सब अजादि धातुओ से लिट् लकार मे आम् प्रत्यय होकर उसके आगे कृ. भू और अस् धातुओ का अनुप्रयोग किया जाता है। जैसे-एधाञ्चक्रे । एधाम्बभूव । एधामास ॥ ल, लुङ् और लङ् लकारों मे अजादिधातुओ के पहिले 'आ' और बढ़जाता है। . ।
१२
संस्कृतप्रबोधे-
विधिलिङ्-एधेत, एधेयाताम्, एधेरन् । एधेथाः, एधेयाथाम,
एधेध्वम् । एधेय, एधेवहि, एधेमहि ॥
माशीलिङ्-एधिषीष्ट, एधिषीयास्ताम्, एधिषीरन्
एधिषीष्ठाः, एधिषीयास्थाम, एधिषीध्वम् । एधिषीय,
एधिषीवहि, एधिषीमहि ॥
लिङ्-एधिष्यत, ऐधिध्येताम्, ऐधिष्यन्त । ऐधिष्यथाः,
ऐधिष्येथाम, ऐधिष्यध्वम् । ऐधिष्ये, ऐधिप्यावहि,
ऐधिष्यामहि ॥
पच् = पकाना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट
लट्-प०-पचति । पचसि । पचामि॥मा-पचते। पचसे।
पचे । इत्यादि ॥
लिट्-५०-पपाच, पेचतुः, पेचुः । पेचिथ-पपक्थ, पंचथुः,
पेच । पपाच-पपच, पचिव, पेचिम ॥
मा०-पेच, पेचाते, पचिरे । पचिपे, पेचाथ, पेचध्व ।
पंचे, पचिवहे, पचिमहे ।।
ल-प०-अपचतू । अपच: । अपचम् ॥ आ०-प्रपचत ।
अपचथाः । अपचं॥
लुङ्-१०-अपाक्षीत् । अपाक्षीः। मपाक्षम् ॥मा०-अपक्त।
अपक्थाः । अपक्षि॥
लुट-प०-पक्ता । पक्तासि । पक्तास्मि ॥ मा०-पक्ता।
पक्तासे । पक्ताह ।।
* जिस धातु के अभ्यास को कोई आदेश न हुवा हो उसको लिट् लकार के
परस्मैपदम प्रथम आर उत्तमपुरुष के एकवचन को छोड़कर शेष सब पुरुषो के सब
वचनो मे '' आदेश और अभ्यास का लोप होजाता है । यथा-पेचतुः। पेचुः ।
इत्यादि । आत्मनेपद मे सर्वत्र होताहे ।।
* लुङ् लकार मे ‘पच् ' धातु को 'तिच् ' होकर परस्मैपद में वृद्धि होजाती है-
अपाक्षीत् ॥
भ्वादिगणः।
१३
लद--१०-पश्यति । पक्ष्यसि । प्रत्यामि ॥ आo-पक्ष्यते ।
पक्ष्यसे । पश्ये॥
लोट-१०-पचतु-पचतात् । पच-पचतातू । पचानि ॥
मा०-पचताम् । पचस्व । पचे।
विधिलिङ्ग-१०-पचेत् । पचेः । पचेयम् ॥ आ०- पचेत ।
पचेथाः। पचेय॥
आबि-१०-पच्यात् । पच्याः। पच्यासम् ॥ मा०-
पक्षीष्ट । पक्षीष्ठाः । पक्षीय।
ल-१०-पक्ष्यतामपक्ष्यः। अपक्ष्यम् ॥ मा०-अपश्यत।
अपक्ष्यथाः । प्रपश्ये॥
-
ईक्ष = देखना, आत्मनेपदी, सकर्मक, सेटू
लट्-ईक्षते ॥लिट्-ईक्षाञ्चके-ईशाम्बभूव-ईक्षामास ॥
लङ्-एक्षत ॥लुङ्-ऐक्षिष्ट ॥लुद्-ईक्षिता॥ लट्-ईक्षिष्यते॥
लोट -ईक्षताम् ॥ विधिलिङ्ग ईक्षेत॥माशीलिङ्-इक्षिषीष्ट ॥
लङ्ग-ऐक्षिष्यत ॥
'प्र' उपसर्ग के योग में 'इंच' धातु का अर्थ प्रेक्षा
जानना, 'प्रति' के योग में प्रतीक्षा उत्सुकता से चाहना,
अप' के योग में अपेक्षा-मावश्यकता, परि' के योग में
परीक्षा निर्णय करना, 'सम्' के योग में समीक्षा=विवेचन
करना और 'उप' के योग में उपेक्षा = उदासीनता होजाता है,
इनमें से केवल 'उप' के योग में यह धातु प्रकर्मक और
सब में सकर्मक रहता है । यथा-बुद्धिमान कार्याकार्य
प्रेक्षते= बुद्धिमान कार्याकार्य को जानता है। विद्यालये छात्रा
अध्यापकं प्रतीक्षन्ते = स्कूल में विद्यार्थी अध्यापक की प्रतीक्षा
करते हैं । जनः स्वार्थमपेक्षते मनुष्य स्वार्थ को चाहता
है।
. संस्कृतप्रबोधे- वैध औषधं परीक्षते-वैद्य मौषधकी परीक्षा करता है। विद्वानेव ग्रन्थस्य सारासारंसमीक्षते-विद्वान् ही प्रन्थ के सारासार की समालोचना करता है। दुर्गुणेषूपेक्षन्ते सजनाः सजन ४.दुर्गुणों में उदासीनता वर्तते हैं। वदि = नमना वा सराहना, आत्मनेपदी, सकर्मक सेट लट्-वन्दते ॥ खिट-घवन्दे ॥ लङ्-प्रवन्दत ॥ लुङ-मवन्दिष्ट ॥ लुट्- वन्दिता ॥ लट्-वन्दिप्यते ॥ लोट- वन्दताम् ॥ विधिलिङ्-वन्देत ॥ मालिङ्-वन्दिषीष्ट ॥ लङ्-प्रवन्दियत॥ तप् = तपाना = सताना, परस्मैपदी, अकर्मक, अनिटू तपति ॥ तताप, तेपतु, तेपुः ॥' अतपत् ॥ प्रताप्सीत् मताप्ताम्, प्रताप्सुः ॥ तप्ता ॥ तप्स्यति ॥ तपतु-तपतात् ॥ तपेतू ॥ तप्यातू ॥भतप्स्यत् ॥ पत् = गिरना, परस्मैपदी, अकर्मक, सेट पतति ॥ पपात, पेततुः, पेतुः ॥ अपतत् ॥ अपतत्, अपप्तताम्, अपसन् ॥ पतिता ॥ पतिष्यति ॥ पततु-पतवात् ।। पतेत् ॥ पत्यात् ॥प्रपतिष्यत् ॥ उत्' उपसर्ग के योग में 'पत्' थातुमा पर्थ अन्रको जाना होजाता है-माकाश उत्पतति पतंगः= माकारा में पक्षी ऊपर को जाता है। प्र-नि के योग में नमस्कार और 'मनु' के * वदि धातु इकारान्त है, इकारान्त सब धातुओ की 'इ' को 'न् ' होजाता है । जङ्गलकार में 'पत्' धातु की अर होकर उसके पहिले 'पुर ' का मागम होजाता है।
वादिगणः। योग में पीछे जाना अर्थ होजाता है और इन दोनों अर्थों में पत्' धातु सकर्मक भी होजाता है-पितरं शिरसा प्रणिपतति-पिता को शिरसे प्रणाम करता है । स्वामिनमनु- पतति भृत्यः =भृत्य स्वामी के पीछे जाता है। क्रम् = चलना, परस्मैपदी, सकर्मक, सेट - है सम्' के काम्यति-कामति ॥ चक्राम, चक्रमतुः, चक्रमुः ॥ प्रक्राम्यत्-मक्रामत् * ॥ प्रक्रमीत् । अक्रीः । प्रऋमिषम् ॥ ऋमिता ॥ ऋमिष्यति ॥ काम्यतु-कामतु* ॥ काम्येत्- कामेत् ॥ म्यात् ।। अनमिष्यत् ॥ मा' उपसर्ग के योग में 'फ्रम्' धातु का अर्थ भाक्रमण करना और 'पति' के योग में अतिक्रमण करना होजाता है- शत्रुमाफ्रामति = शत्रु पर माक्रमण करता है। धर्ममतिकामति, भतिक्रमते वा%3D धर्म का अतिक्रमण करता योग में साथ चलना मोर 'नि' के योग में निकलना मर्थ होता है और इन दोनों प्रर्थों में यह धातुमकर्मकभी होजाता है- मित्रैः संक्रामति-मित्रों के साथ चलता है।गृहान्निष्कामति घर से निकलता है। 'परा'के योग में पराक्रम करना और 'प्र' तथा 'उप' के योग में आरम्भ करना तथा उत्साह करना अर्थ होजाते हैं और इनके योग में यह प्रकर्मक तथा मात्मनेपदी भी होजाता है-युद्ध शूराः पराक्रमन्ते = युद्ध में शूर पराक्रम दिखाते हैं। ग्रन्थस्य प्रक्रमते उपक्रमते वा=ग्रन्थ का आरम्भ करता है । अध्ययनाय प्रक्रमते उपक्रमते वा = पढ़ने के लिये उत्साह करता है। . 'क्रम् ' धातु को सार्वधातुक लकारों में विकल्प से 'श्यन् ' प्रत्यय होकर क्राम्यति और कामति ये दो २ रूप सिद्ध होते हैं ।
संस्कृतप्रयोधे- गम् = जाना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट्र गच्छति। ॥ जगाम, जग्मतुः । जग्मुः ।जगमिथ-जगन्ध । अगच्छत् ॥ मगमत् ॥ गन्ता ॥ गमिष्यति ॥ गच्छतु।। गच्छेत् ॥गम्यात् ॥ प्रगमिष्यत् ॥ गम्' धातु का 'आ' उपसर्ग के योग में माना, मधि' के योग में पाना, 'सम्' के योग में संगति करना और 'मनु' के योग में पीछे जाना अर्थ होजाते हैं । 'अधि' और 'मनु' के योग में तो यह सकर्मकही रहता है, परन्तु 'आ' और 'सम्' के योग में अकर्मक होजाता है-विद्यामधिगच्छति विद्या को प्राप्त होता है। गुरुमनुगच्छतिगुरु के पीछ जाता है । प्रामा- दागच्छति =ग्राम से माता है । समायां संगच्छते =सभा में संगत होता है। दृश् = देखना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट् पश्यति । ददर्श । ददर्शिथ-दद्रष्ठ । ददर्श ॥ अपश्यत् ॥ प्रदर्शन-पद्राक्षीत् ॥ द्रष्टा ॥ द्रक्ष्यति ॥ पश्यतु* ॥ पश्येत् दृश्यात् ॥ अद्रक्ष्यतू ॥ कृष् = खींचना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट कर्षति ।। चकर्ष ॥ अकर्षत् ॥ प्रक्राक्षीतू-मका त् ॥ ऋष्टा-कर्श ॥ क्रश्यति-कर्यति ॥ कर्षतु ॥ कर्षत् ॥ कृप्यात् ॥ मक्रयत्-प्रकक्ष्यत् ॥ 1'गम्' धातु के मकार को सार्वधातुक लकारो मे 'कृ' होकर 'गच्छति' इत्यादि रूप होते है । +लिट् लकार मे तीनो पुरुषों के एकवचन को छोड़कर शेष वचनो मे उपधा के अकार का लोप होकर जग्मतुः । जग्मुः इत्यादि रूप होते हैं। लुङ् में 'अङ्' होकर अगमत् इत्यादि रूप होते हैं । मा लट् और लङ् मे इद होकर गमिष्यति और अगमिष्यत् इत्यादि रूप होते हे ॥ दृश् धातु को सार्वधातुक लकारो में 'पश्य' आदेश होकर 'पश्यति' इत्यादि रूप होते हैं । , .
भ्वादिगणः।
रुच्चमकना मोर पसन्द होना, आत्मनेपदी, भकर्मक, सेह
रोचते ॥रुरुचे॥मरोचत॥ अरुचत्-मरोचिष्ट ॥ रोचिता ॥
रोचिष्यते ॥ रोचताम् ॥ रोचेत ॥ रोचिषीष्ट ॥ अरोचिप्यत ॥
रुह = उगना, परस्मैपदी, अकर्मक, अनिट
राहति ॥ रुरोह ॥ प्ररोहत् ॥ अरुक्षत् ॥ रोढा ॥ रोक्षति ॥
रोहतु ॥ गेहेत् ॥ रुह्यात् ॥ अरोक्ष्यत् ॥
'आ' 'उपसर्ग के योग में 'रुह्' धातु का अर्थ चढ़ना
और 'प्रब' के योग में उतरना होजाता है और 'आ' के
योग में यह सफर्मक भी होजाता है-अट्टालिकामारोहतिः
मटारी पर चढ़ता है। पर्वतादवरोहति = पर्वत से उतरता है।
वस् = वसना, परस्मैपदी, अकर्मक, अनिट्र
वसति ।। उवास । ऊषिथ । ऊषा अवसत् ॥ अवात्सीत् ।
मवात्सीः । वात्सम् ॥ यस्ता ॥ वत्स्यति ॥ वसतु ॥ वसंत् ।।
उध्यात् ॥ अवत्स्यत् ॥
वस्थातु का 'प्र'के योग में विदेश जाना और 'उप'
के योग में भोजन न करना अर्थ होजाते हैं-वाणिज्यार्थ
प्रवसति = घाणिज्य के लिये प्रवास करता है । अजीर्णे
सत्युपवसति = अजीर्ण होने पर उपवास करता है । मनु,
मधि और आ के योग में अर्थ तो वसनाही रहता है, पर
धातु सकर्मक होजाता है-गृहमनुवसति, अधिवसति,
मावति वा=घर में रहता
यत् = यत्न करना, अात्मनेपदी, अकर्मक, सेट
यतत ॥ येते ॥ मयतत ॥ प्रयतिष्ट ॥ यतिता ॥ यतिष्यते ॥
यतताम् ॥ यतेत ॥ यतिषीष्ट ॥ प्रयतिप्यत ॥
,
।
'रुह् ' धातु को लुङ्मे क्स' होकर अरुक्षत् इत्यादि रूप होते है ।
वम धातु के ' ' को लिट् और आशीलिड् मे '3' सम्प्रसारण होगया है।
.
१ संस्कृतप्रबोधे- कम् = चाहना, श्रात्मनेपदी, सकर्मक, सेट * कामयते॥ चकमेकामयाचक्रेमकामयतामचीकमत- भचकमत ॥ कामयिता-कमिता कामयिभ्यते-कमिष्यते ॥ कामयताम् ॥ कामयेत ॥ कामयिषीष्ट-कमिषीय ॥ प्रकाम- यिष्यत-प्रकमिष्यत॥ त्रप् = लज्जा करना,आत्मनेपदी,अकर्मक, वेट त्रपते ॥ त्रेपे॥ मत्रपत ॥ अपिष्ट-प्रत्रप्त ॥ त्रपिता-ऋता॥ अपिष्यते-त्रप्स्यते ॥ त्रपताम् ॥त्रपेत ॥ अपिषीष्ट-त्रप्सीष्ट । अत्रपिष्यत-अत्रप्स्यत॥ भाष = बोलना, आत्मनेपदी, द्विकर्मक, सेट भाषते ॥ बभाष ॥ अभापत ॥ अभाषिष्ट ॥ भाषिता भाषिष्यते ॥ भाषताम् ॥ भाषत ॥ भाषिषीष्ट ॥ अभाषिष्यत ॥ 'भाष' धातु 'सम्' उपसर्ग पूर्वक संवाद में मार 'वि' पूर्वक विकल्प में वर्तता है-सहाध्यायिनः परस्परं सम्भापत = सहाध्यायी मापस में संवाद करते हैं। विप्रतिपत्तीविभाषन्त = सन्देह में विकल्प करते हैं। वृत् = वतना, मात्मनेपदी, सकर्मक, सेट। वर्तते ॥ ववृते ॥ प्रवर्तत ॥प्रवृतत्-प्रतिष्ट ॥ वत्तिता ॥ वस्य॑ति-वतिष्यते ॥ वर्तताम् ॥ वर्तत ॥ वत्तिषीष्ट ॥ अवय॑तू-प्रवत्तिष्यत ॥ वृत धातु का 'प्रति-आ' उपसर्ग के योग में लौटना और 'परि' के योग में बदलना अर्थ होजाता है-ग्रामात्प्रत्यावर्तते- ग्राम से लौटता है। काल:परिवर्तते समय बदलता है । . कम्' धातु को सार्वधातुक लकारों में 'अय् ' प्रत्यय और वृद्धि होकर 'कामयते' इत्यादि रूप बमते हैं, प्रार्धधातुको मे विकल्प से 'अय ' प्रत्यय और वृद्धि होती है, इसलिये कामयिता और कमिता इत्यादि दो २ रूप होते है । + वृत्त धातु को लुर, लट् और ना इन तीन लकारों में परस्मैपद और आत्मनेपद दोनो के प्रत्यय होने हैं, परन्तु परस्मैपद में इट-का आगम नहीं होता ॥
ज्यादिगणः।
रम् रमण करना, आरमनेपदी, प्रकर्मक, मनिट
रमते॥रेमे ॥ अरमत॥अरस्त ॥ रत्तास्यते॥रमताम् ।।
रमेत ॥रंसीष्ट मरस्यत॥
'रम्' धातु का अर्थ 'उप' के योग में निवृत्त होना और
'वि' के योग में विश्राम करना होजाता है और इन दोनों के
योग में यह धातु उभयपदी होजाता है-कार्यादुपरमति,
उपरमते घा= कार्य से निवृत्त होता है। श्रान्तः पान्थो विरमति
विरमते वा थका हुवा मुसाफिर विश्राम करता है ।
लम् = पाना, मात्मनेपदी, सकर्मक, अनिष्ट
लभते ।। लेभे ॥ मजमत ।। अलब्ध लब्धा॥ लप्स्यते ॥
लभताम् ॥ लभेत । लप्सीष्ट ॥ अलप्स्यत ।।
लभ धातु का अर्थ 'आ' के योग में छूना और मारना तथा
'उप-मा' के योग में निन्दा करना होजाता है-पुत्रमालभंत =
पुत्र को स्पर्श करता है । पशुमालभते = पशु को मारता है ।
शत्रुमुपालभते = शत्रु की निन्दा करता है।
यज़ = पूजना, मिलना, देना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट्र'
यजति । यजत ॥ इयाज । ईजे ॥ प्रयजत् । अयजत ॥
अयाक्षीत् । प्रयष्ट ॥ यष्टासि । यष्टासे॥ यक्ष्यति । यक्ष्यते ॥
यजतु । यजताम् ॥ यजेत् । यजेत ॥ इज्यातू । यक्षीष्ट ॥
प्रयक्ष्यतू । प्रयक्ष्यत ।।
व - बोना, मूंडना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट'
यपति । वपते ॥ उवाप । ऊपे ॥ भवपत् । अवेपत ॥
मवापीत् । प्रवत ॥ वप्तासि । वप्तासे ॥ वस्यति । षस्यते ॥
यज, वप् और वह धातु को लिट् और विधिलिङ मे सम्प्रसारण होता है । य,
घ, र, ल इन चार हलो के स्थान में क्रमश इ, उ, ऋ, त इन चार अचों का होना
सम्प्रसारण कहलाता है।
-
संस्कृतप्रबोधे-
-
वपतु ॥ वपताम् ॥ चपेत् । वपेत ॥ उप्यात् । वपसीष्ट ॥
मत्रप्स्यत्। भवप्स्यत॥
वह = लेजाना, ढोना, उभयपदी, द्विकर्मक, प्रनिट'
वहति । वहते ॥ उचाह । ऊहे ॥ अवहत् । अवहत ॥
अवाक्षात् । अवोढ़ ॥ इत्यादि वप के समान ॥
'उद्' उपसर्ग पूर्वक यह धातु का अर्थ विवाह करना
होजाता है-भार्यामुवहति, उद्वहते वा भार्या को व्याहता है ॥
पा-पीना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट् ।
पिबति ।। पपौ, पपतुः, पपुः ।। अपिबत् ।। अपात् ।। पाता ॥
पास्यति ॥ पिबतु ॥ पिबेत् ॥ पेयात् ।। प्रपास्यत् ॥
स्था = ठहरना, परस्मैपदी, अकर्मक, अनिट् ।
तिष्ठति । तस्थौ । अतिष्ठत् ॥ अस्थात् ॥ स्थाता ॥ स्थास्यति ॥
तिष्ठतु । तिष्ठेत् ॥ स्यात् ।। अस्थास्यत् ।।
'उद्' उपसर्ग के योग में 'स्था' धातु का अर्थ उठना और
प्र' के योग में जाना होजाता है-आसनादुत्तिष्ठति प्रासन
से उठता है । गृहात्प्रतिष्ठते = घर से जाता है ।
जि=जीतना, परस्मैपदी, द्विकर्मक, मनिट् ।
जयति ॥ जिगाय, जिग्यतुः, जिग्युः॥ अजयत् ॥ अजैषीत् ॥
जेता ॥ जेष्यति ॥ जयतु ।। जयेत् ।। जीयात् ॥ मजेष्यत् ।।
'जि' धातु का 'वि' के योग में तो जीतना ही मर्थ
रहता है, परन्तु 'परा' के योग में हारना अर्थ होजाता है और
इन दोनों के योग में यह आत्मनेपदी भी होजाता है-शत्रून्
विजयते = शत्रुमों को जीतता है । साहसं पराजयते = हिम्मत
को हारता है।
+'पा' धातु को सार्वधातुक लकारों में पिब' आदेश और 'स्था' को 'तिष्ठ'
मादेश हो जाता है।
* 'जि' धातु के जकार को सन् और लिट् परे हो तो गकार आदेश होजाता है ।
L mainmitraa भ्वादिगणः। २१ स्मि = आश्चर्य करना, आत्मनेपदी, अकर्मक, अनिट् स्मयते ॥ सिम्मिये ॥ प्रस्मयत । अस्मयिष्ट ॥ स्मयिता ।। स्मयिष्यते॥स्मयताम् ॥ स्मयत ॥ स्मायपीट ॥ अस्यप्यत॥ नी पहुँचाना, उभयपदी, द्विकर्मक, मनिट नयति । नयते ॥ निनाय । निन्य । अनयत् । मनयत ॥ अनेषीत् । अनेष्ट ॥ नेतासि । नेतासे । नेप्यति । नेप्यते ।। नयतु । नयताम् ॥ नयेत् । नयेत ॥ नीयात् । नषीष्ट ।। अनेप्यत् । अनेष्यत ।। 'नी' धातु के अर्थ 'प्र' के योग में बनाना, योग में मिटाना, 'उप' के योग में दीक्षा देना, 'उत्' के योग में ऊँचा होना, 'परि' के योग में विवाह करना, अभि' के योग में खेलना और मनु तथा घि के योग में नमना होजाते हैं- ग्रन्थं प्रणयति ग्रन्थ को बनाता है। क्रोधमपनर्यात-क्रोध को मिटाता है। शिष्यमुपनयते शिष्य को दीक्षा देता है । सदा- चारेणात्मानमुन्नयति = सदाचारसे अपन को उन्नत करता है । नातकः समावृत्तः सन् भार्या परिणयति स्नातक समावृत्त होकर भार्या को व्याहता है । नाटकमभिनर्यात = नाटक खेलता है। सुजनःविद्ययाऽत्मानमनुनर्यात, विनयते वासुजन विद्या से अपने को नम्र करता है। श्रु सुनना, परस्मैपदी, सफर्मक, अनिट शृणोति* ॥ शुश्राव ॥ प्रणोत् ॥ अनौपीत् ॥ श्रीता ।। श्रोष्यति ॥ शृणोतु ॥ शृणुयात् ।। श्रूयात् ॥ प्रश्रीप्यत् ।। 'श्रु' धातु का अर्थ प्रति, मा और सम् उपसर्गों के योग में अंगीकार करना होजाता है और सम्' के योग में यह धातु मर्मक और प्रात्मनेपदी होजाता है-पितुरादशं प्रतिशृणोति, 'शु' धातु को सार्वधातुक लकारो मे 'शू' आदेश और 'नु' प्रत्यय होकर 'शृयोति' इत्यादि रूप बनते हैं।
૨૨ संस्कृतप्रबोधे- शृणोति घा-पिता की माज्ञा को अंगीकार करता है। चा संशृणुते = वाणी से मंगीकार करता है ।। पू = शोधना, आत्मनेपदी, सकर्मक, सेट पवते ॥ पुपुवे ।। अपवत । अपविष्ट । पविता । पविष्यते ॥ पवताम् ॥ पवंत ॥ पविषीष्ट ॥ अपविष्यत ॥ ह= हरना, उभयपदी, द्विकर्मक, अनिद हरति । हरत ॥ जहार । जह ॥ महरत् । अहरत ।। महार्षीत् । अहत ।। हत्तासि । हासे ॥ हरिष्यति। हरिष्यते॥ हरतु । हरताम् ॥ हरेत् । हरेत । हियात् । हृषीष्ट । महरिष्यत् । अहरिप्यत ।। ह' धातु का अर्थ 'प्र' के योग में प्रहार करना, 'अप' के योग में दूर करना, 'सम्' के योग में संहार करना, 'वि' के योग में विहार करना, 'मा' के योग में माहार करना, 'उद् के योग में उद्धार करना, 'उप-सम्' के योग में समाप्त करना, 'वि-आ' के योग में कहना और 'मभि-सव' के योग में खाना होजाना है और केवल 'वि' के योग में अकर्मक भी होजाता है- शत्रुपहरति = शत्रु पर प्रहार करता है । मन्यु- मपहरति = क्रोध को दूर करता है । ईश्वरः सृष्टिं निर्माय पुनः संहरति = ईश्वर सृष्टि को बनाकर फिर संहार करता है। उद्याने विहरति = उद्यान में विहार करता है । भक्ष्यमाहरति= भक्ष्य को खाता है । विपन्नानुद्धरति = दु:खियों का उद्धार करता है । ग्रन्थमुपसंहरति = ग्रन्थ को समाप्त करता है। वाक्यं व्याहरति = वाक्य को कहता है । भोज्यमभ्यवहरति भाज्य को स्वाता है॥ ग्ले = मुरझाना, परस्मैपदी, मकर्मक, मनिट ग्लायति ।। जग्ली ॥ अग्लायत् ॥ अग्लासीत् ।। ग्खाता ॥ ग्लास्यति ।। ग्लायतु । ग्लायेत् ॥ ग्लायात् ॥ मग्खास्यत् ।।
भवादिगणः। प्राकृतभाषायां परिवर्तनीयानि कुरुषु युधिष्ठिरो धर्मात्मा बभूव । अस्माकमग्रजाः धर्मा- चरणेनैधन्त । भुक्तमन्नं जाठराग्निःपचति । त्वं तत्र मां नैक्षयाः। समागमे सति गुरुन् वन्देत । य इदानीं श्रेयोनाचरन्ति ते पुनस्तप्तारः। मदेनोद्धताः पुरुषा गरे पतिष्यन्ति। शिक्षितोऽश्वः सुष्टु काम्यति । पुरा व्यासादयो महर्षय उपदेशार्थ विविधान देशान् जग्मुः। तत्राहं त्वा मद्राक्षम् । यदि कृषकाः श्रमेण क्षेत्र- मक्ष्यन्तहिं तस्मिन् बाहुल्यन वीजान्यरोक्ष्यन् । बालस्य पयः पानं रोचते । पुरा पठनार्थमहं वाराणस्यामवात्सम् । शुभ कर्मणि सततं यतेत । दमयन्ती स्वयंवरे नलं च कमे। धृष्टः धर्षितोऽपि न अपते । अहं पृष्टःसन् तत्राभाषिषं न त्वपृष्टः । मात्मवत् सर्वेषु भूतेषु वर्त्तताम् । किन्त्वं पुनरप्यIयसि रंस्यसे ? श्रमेण विद्यामलप्स्यध्वं चेहि धनं कीर्तिञ्चालप्स्य- ध्वम् । स्वर्गीयाग्निष्टोमेन यज । याशं वीजमवप्स्यत ताहशं तस्य फलमवक्ष्यत । श्रीमतामाशीभिरहं सततं धर्मधुरमुह्याम् । सद्गुरुमधिगम्य शास्त्रामृतरसौघान् पास्यामः । यो गुरूणा- मादेये तिष्ठति सएव कुशलाय कल्पते । यः सर्वेभ्यो बलवत्तरं थर्बु क्रोधं जयेत् सएव शूरतमः । हीनांगं विपन्नं वा दृष्ट्वा कदापि मा स्मयताम् । त्वामहं तत्र नेष्यामि । हे शिष्य ! त्वं सदा गुरूणां हितवचनानि श्रूयाः । सदाचारेणात्मानं सर्वथा पवथाः । त्वमेव प्रपन्नस्यात्ति हर्चासि । मद्य यत्पुष्पितं पुष्पं श्वो ग्खास्यति तदेव ह। संस्कृतभाषायां परिवर्तनीयानि जो विद्या पढ़ेगा वह पण्डित होगा। प्रधर्म से कोई नहीं बढ़ता। वह हमारे लिये खाना पकाये। में वहां जाकर उसको देखूगा । मैंने गुरु को प्रणाम किया था । सूर्य ग्रीष्म ऋतु में , - संस्कृतप्रबोधे- तपता है । वृक्ष से फल गिरते हैं। यह मेरे साथ नहीं चलेगा। कल में वहां गया था। उसने मुझे देखा। किसान अपने खेत को जोतता है। कल्लर भूमि में अंकुर नहीं उगता । अधर्म से बढ़ने की रुचि मत करो। हम वहां जाकर बसेंगे। सत्पुरुष दूसरों की भलाई के लिये यत्न करते हैं । यह धन को चाहता है । बुरे काम से बजाओ। कठोर वचन किसी से न बोलो। जैसा जिसके साथ वोंगे वैसाही वह तुमसे वर्तगा । वह सदा सत्कों में ही रमण करता है। जो धर्म का पालन करेगा वह सुख पायेगा।मैं पौर्णमासी को यक्ष करुंगा। पराये खेत में बीज कभी मत बोमो । गृहस्थ सब आश्रमों का भार उठाता है। मैंने कल केवल दूध पिया था। मैं कभी दुर्जनों के पास नहीं ठहरूँगा । श्रीकृष्णचन्द्र की सहायता से पाण्डवों ने कौरवों को जीता था। वह मुझको देखकर मुस्कुराया था । मैं उसको वहां गया था । कल सभा में हमने एक उत्तम व्याख्यान सुना था । अग्नि और वायु सब पदार्थों को पवित्र करते हैं। ओपधि रोग को हरती है। कमल शाम को मुरझाते हैं । इति भ्वादिगणः ॥ १॥ (२) अदादिगणः भद् = साना, परस्मैपदी, सकर्मक, मनिद लट्-मत्ति, अत्तः, अदन्ति । मत्सि, अत्यः, अत्य । मधि, अद्धः, प्रदूमः॥ लिट्-माद, भारतुः, मादुः॥पचमें 'घ' मादेश होकर जघास, जचतुः, अक्षुः ॥ इत्यादि बङ्-मादत्, मात्ताम्, मादन ॥ लड्-मधसत्* ॥ खुद-मचा ॥ल-अरस्वति ।। खो-अच, मचात् ॥ लिट में विकल्प से और मुह में नित्य अद' धातु को 'धम् ' आदेश होजाता है। - - है प्रवादिगण। ૨ विधिवि-प्रचात, मचाताम, मयुः । मारिन- अचाद, मचास्ताम,प्रपासुला-मात्स्यत् । अस् = होना, परस्मैपदी, अकर्मक, सेट बट-मस्ति, स्ता, सन्ति । मसि, ला, लि, स्वः,स्मः॥ पक्-मासीत, मास्ताम, मासन् । मासी, मास्तम, भास्तामासम्,भास्व, भास्म। बोद-प्रस्तु-स्तात, स्ताम, सन्तु । पधि-स्तान, स्तम्, स्त । मसानि, प्रसाध, मसाम ॥ विधिविड-स्यात, स्याताम, स्युः । स्याः, स्यातम, स्यातास्याम, स्याव, स्याम॥ विद् = जानना, परस्मैपदी, सकर्मक, सेटू वेत्ति, वित्तः, विदन्ति । अथवा-धेद, विदतुः, विदुई। विवेद । विदाञ्चकार ॥ प्रवेत् ॥ भवेदीत् ॥ वेदिता ॥ वैविध्यति वेत्त । विद्धि । वेदानि ॥ विद्यात् । विद्यात् ॥ मवेदिप्यत॥ 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'घिदू' धातु आत्मनेपदी और अकर्मक होजाता है-विधया संवित्तेविद्या से जानता है ।। शास-माझादेना वा शिक्षा करना, परस्मैपदी, द्विकर्मक, सेट शास्ति, शिष्टः, पासति ॥ सास ॥ प्रपात, प्रशिष्टाम्, प्रशासुः॥ अधिषत ॥ शासिता ॥ शासिष्यति ॥ वास्तु । शाधि। शासादि । शिष्यात् ।विष्यात् ॥ प्रशासिध्यत् ॥ भाधानुक कारों में 'अम्' धातु को 'भू' प्रादेश होकर भूधात के समान कप होगाते हैं। 'विद्' धातु को बद नकार में विकल्प से लिट् लकार के प्रत्यय भी होते हैं। +'शास्भात को मैं अौर स्पषामाकारकोपकार होजाता शिवत ।।
२१ . . संस्कृतप्रबोधे- मा' उपसर्ग के योग में 'सास्' धातु मात्मनेपदी और माया करमे के मर्थ में होजाता है-सजनाः सततं लोकहित- मेवाशासते - सज्जन सदा जोक के हित को ही चाहते हैं। हन = मारना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट्र* हन्ति, हतः, प्रन्ति । हंसि, हथः, हथ । हन्मि, हम्वः, इन्मः ॥ अधान, जनतुः, जघ्नुः* ॥ अहमू, महताम, मनन् । अवधीत, भवधिष्टाम्, भवधिषुः ॥ हन्ता ॥ हमिष्यति ॥ इन्तु । जहि । हनानि ॥हन्यात् ॥ वध्यात् ॥ महनिष्यत् ॥ प्रति' उपसर्ग के योग में 'हन्' धातु का अर्थ प्रतिघात, मभि' और 'मा' के योग में माघात तथा 'वि-मा' के योग में व्याघात होजाता है-माहतःसन् शूरो रणे शत्रु प्रतिहन्ति = मारा दुवा शूर युद्ध में शत्रु को पुनः मारता है । रणे शूराः रावनमिनन्ति, मानन्ति वारण में शूर राघुमों को सब मोरसे मारते हैं। मृषावादी स्वकथितमेव व्याहन्ति -झूठ बोलनेवाला अपने कहे हुवे को ही मारता है । प्रास् = बैठना, प्रात्मनेपदी, अकर्मक, सेट पास्ते, पासाते, आसते॥मास्से । आसे ॥ प्रासाउचके । भासत ॥ मासिष्ट ॥ मासिता ॥ मासिष्यते ॥ प्रास्ताम् ॥ आसीत ॥ मासिषीष्ट ॥ आसिष्यत ॥ 'उद्' पूर्वक 'आर' धातु उदासीनता के अर्थ में वर्तता है- कर्तव्येबलसा उदासतेमालसी कर्तव्यों में उदासीन होते हैं ॥'प' के योग में यह धातु सकर्मक और उपासना के अर्थ में होजाता है--विद्यामुपासते सुस्वार्थिनः = मुखार्थी विद्या की उपासना करते हैं ।। ॥ 4 लिट् के अभ्यास में 'हन् । के 'ह' को 'ज' होजाता है, तथा जुर और लिस में 'इन् ' को 'वधू ' अदिश होजाता है।
।
अदादिगणः1
दुइ = दुहना,भरना,उभयपदी,हिकर्मक,अनिट्र
दोग्धि, दुग्धः, दुहन्ति । दुग्धे, दुहाते, दुहते ॥ दोह ।
दुदुहे ॥ मधोक । मदुग्ध ॥ अधुक्षत् । अधुक्षत-मदुग्ध* ॥
दोग्धासि । दोग्धासे ॥ धोक्ष्यति । धोक्ष्यते ॥ दोग्धु । दुग्धाम् ।।
दुह्यात् । दुहीत ॥ दुह्यात् । धुक्षीष्ट ॥ मधोश्यत् । मधोयत ॥
या = जाना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट
याति ॥ ययौ ॥ अयात् ॥ मयासीत् ॥ याता। यास्यति ।
यातु ।। यायातू ।। यायात् ॥ प्रयास्यत् ॥
मा' के योग में 'या' धातु अकर्मक और आने के अर्थ में
होजाता है-ग्रामादायाति = ग्राम से भाता है
इ = जाना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट्र
पति, इतः,यन्ति ॥ इयाय, ईयतुः,ईयुः॥ऐत, पेताम, मायन्।
अगात ॥ एता ॥ एष्यति ॥ एतु ॥यात् ॥ ईयात् ॥ ऐण्यत् ॥
'मनु' उपसर्ग के योग में 'इ' धातु का अर्थ पीछे चलना
वा सम्बद्ध होना है । यथा-यूथपतिमन्धति सेना = सेना
यूथपति के पीछे चलती है । शब्दमन्वत्यर्थः = मर्थ शब्द से
सम्बद्ध होता है । 'उप' के योग में समीप होना-गुरुमुपैति
शिष्यः = शिष्य गुरु के समीप प्राप्त होता है । ' अभि-उप' के
योग में स्वीकार करना वा प्राप्त होना-धर्मादर्थमायुपैति =
धर्म से अर्थ को स्वीकार करता है वा प्राप्त होता है । 'मधि'
के योग में स्मरण करना-मित्रमध्येति सङ्कटे-सकट में
मित्र को स्मरण करता है। 'मति' के योग में अतिक्रमण
करना-राठो मर्यादामत्येति = शठ मर्यादा का अतिक्रमण
'दुइ । धातु को लुङ् लकार के परस्मैपद में 'बस' प्रत्यय नित्य भौर
आत्मनेपद मे विकल्प से होता है।
1'इ' धातु को लुङ् मे 'गा' आदेश होता है।
- २९ संस्कृतप्रबोधे- करता है। 'मभि-प्र' के योग में चाहना-हितमभिप्रेति जनः प्राणी हित को चाहता है। 'परि' के योग में व्याप्त होना मर्य होता है-विभुः सर्वान् पयति = विभु सब में व्यापक होता है, अब जिन उपसों के योग में ' ' धातु अकर्मक होजाता है, उनको दिखाते हैं-'प्र' के योग में परलोक जाना-सर्व विहाय जीवःप्रेति सब को बोड़कर जीव परलोक जाता है। 'उत' के योग में प्रकाश करना- सूर्यः पूर्वस्यां दिश्युदेति सूर्य पूर्वदिशा में उदय होता है। ममि' के योग में सम्मुख जाना-दीपस्याभ्येति शलभः पतंग हीप के अभिमुख जाता है। प्रप' के योग में मलग होना-धर्मादपैति यः स एवानर्थः = धर्म से जो अलग होता है वही अनर्थ है। 'निर' के योग में निकलना-गृहाभिगच्छति विरक्त-विरक्त घर से निकलता है। 'निर्' के योग में '' को 'गच्छ' आदेश होजाता है। 'आ' के योग में माना- गुरुगृहादेति मातकः ब्रह्मचारी गुरु के घर से आता है। 'वि-परि'के योग में उबटा होना अर्थ होजाता है-विपत्ता- वनुकूल मपिविपर्येति विपत्ति में अनुकूल भी उलटा होजाता है अधि-इ = पढ़ना,आत्मनेपदी,सकर्मक,अनिट्र* मधीते, अधीयाते, मधीयते ॥ प्रधिजगे ॥ अध्येत ॥ मध्यष्ट-मध्यगीष्ट ॥ अध्येता । मध्येप्यते ॥ अधीताम् ॥ मधीयीत ॥ मध्येषीष्ट ॥ अध्यष्यत-मध्यगीप्यत ॥ शी = सोना, आत्मनेपदी, अकर्मक, सेट येते, रायाते, थेरते ॥ विश्य, शिश्याते, शिश्यिरे ॥ मयेत ॥ * अधि पूर्वक 'इ' धातु को लिट् में नित्य और लुक व ता में विकल्प से 'गा' भादेश होताहै॥ + 'शी' धातु को सार्वधातुक नकारों में गुण और उनके प्रथमपुरुष के बहुवचन में ‘अत् । प्रत्यय के पहिले 'ए' और होता है। - .
.
महारिगणः ।
मयिष्ट ॥शयिता ।।शयिष्यते ॥ येताम् । यातापयिषीर ।।
मशयिष्यत॥
'प्रधि' के योग में 'शी' धातु सकर्मक होजाता है-
अय्यामधियेते =अय्या में सोता है।
युमिखाना वा भलग करना, परस्मैपदी, सफर्मक, सेट
योति, युतः, युवन्ति ॥ युयाव ॥ अयौत् ॥ प्रयावीत् ॥
यविता ॥ यविष्यति ॥ यौतु ॥ युयात् ॥ यूयात् ॥ भयविष्यत् ।।
ब्रू = बोलना, उभयपदी, द्विकर्मक, सेट्'
ब्रवीति-माह * । ब्रूते ॥ उवाच । ऊचे ॥ मनवीत् । अब्रूत ॥
अवोचत । मवाचत ।। वक्तासि । घक्तासे॥ वक्ष्यति । वक्ष्यते।।
ब्रवीतु । ब्रूताम् ॥ ब्रूयात् । ब्रुवीत ॥ उच्यात् । वीष्ट ।
अवक्ष्यत् । अवक्ष्यत ।
सू = जनना, आत्मनेपदी, सकर्मक, वेट
सूते, सुवाते, सुवते ॥ सुषुवे ॥ असूत । असोष्ट-भसविष्ट ।
सोता-सविता ॥ सोप्यते-सविष्यते ॥ सूताम् । सुवेत ॥
मविषीष्ट ॥ असोप्यत-प्रसविष्यत ॥
जागृ = जागना, परस्मैपदी, अकर्मक, सेट्र
जागत्ति, जागृतः जामति ॥ जजागार-जागराञ्चकार ।।
प्रजागः, अजागृताम्, अजागरुः ॥ मजागरीतू ॥ जागरिता ॥
जागरिष्यति॥ जागर्त ॥ जागृयात् ॥ जागर्यात् ॥ अजागरिष्यत् ॥
प्राकृते नेतव्यानि
पुरा ऋषयः स्वयमुप्तानि नीवाराधनानि जक्षुः । अस्यां
लट् के पांच वचनों में 'यू' धातु को विकल्प से 'आह' प्रादेश होकर दो २
रूप होते हैं और आर्धधातुक लकारों में '' को 'वत' प्रादेश होमाता है, लुद में
भर होकर 'र' और नजाता है ।।
संस्कृतप्रबोधे- on- पाठशालायां कति छात्राः सन्ति । चेदितोऽपि स नायेदीत .। गुरयोऽस्मान् सदा शिष्यासुः । महनिष्यत चेत्कामादि शत्रुताई सुखमवेत्स्यथ । ह्यः सभायां त्वं कुनासथाः १ स यज्ञाय गां तुदोह । पठनार्थं यूयं कुत्र यातास्थ ? यदाऽहं भवत्पार्श्व मायंस्तदेव भवन्तस्तत्र गताः । शिक्षांसमाप्य व्याकरणमध्येष्ये । पुरा भीष्मः शरशय्यायां शिश्ये । गोपाला: धीरे जलं युवन्ति । अस्मासु थो वाग्मी स एव सदसि ब्रूयात्। अन्तर्वती तघ पत्नी किमसोष्ट पुत्रं वा दुहितरम् । किमहं रात्रावपि जागृयाम्? संस्कृते नेतव्यानि भजीर्ण में खाना मत खाओ। क्या तुम कल वहां पर थे ? क्या तुम मुझे नहीं जानते ? गुरु शिष्य को शिक्षा करता है। धृष्टद्युम्न को अश्वत्थामा ने मारा था । वृद्धों के सामने उखासन पर मत बैठो। राजा प्रजा के लिये पृथ्वी को दुहता है । वह पढ़ने के लिये वहां जाता है । अवकाश होने पर मैं वहां माऊँगा। उसने मेरे साथ ही व्याकरण पढ़ा था। दिन में कभी मत सोयो। किसान अन्न में से भुसको अलग करते हैं। यदि सत्य बोलोगे तो सब तुम्हारा विश्वास करेंगे। स्त्री पुरुप अपने अनुरूपही सन्तान उत्पन्न करते हैं । चोर रात को जागते हैं । इत्यादिगणः अथ जुहोत्यादिगणः हु = होम करना, देना और स्वाना, परस्मैपदी, सकर्मक, प्रनिट जुहोति, जुहुतः, जुहूति ॥ जुहाव, जुडुवतुः, जुहुवुः । इस गण के सब धातुओं से सार्वधातुक लकारो में 'बलु ' प्रत्यय होकर धातु को द्विवचन होजाता है 'श्ल' मे श और ल का लोप होकर केवल 'उ' रहलाता है। .
३२
,
जुहोत्यादिगणः।
जुहोच-विथ । जुहवाम्चकार ॥ भजुहोत, मजुहुताम,
अजुवुः ॥ महौषीत, महौष्टाम, महौषुः ॥ होता ॥ होप्यति ॥
जुहोतु ॥ जुहुयात् ॥ स्यात् ॥ महोष्यत् ॥
हा = छोड़ना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट
जहाति, जहितः-जहीतः, जहति ॥ जही ॥ मजहात् ।।
प्रहासीत् ॥ हाता॥ हास्यति ॥ जहातु । जहाहि-जहिहि-
जहीहि ॥ जह्यात् ॥ हेयात् ॥ महास्यत् ।।
हा = जाना, आत्मनेपदी, सकर्मक, अनिट
जिहीते, जिहाते, जिहते ।। जहे ॥ अजिहीत ।। महास्त ।।
हाता । हास्यते ।। जिद्दीताम्॥जिहीत ॥ हासीष्ट॥ महास्यत।
दा = देना, उभयपदी सकर्मक, अनिट्र
ददाति, दत्तः, ददति । इत्ते, ददाते, ददते ॥ ददौ । ददे ।।
भददात् । भदत्त ॥ प्रदात् । प्रदित ॥ दातासि । दातासे ।।
दास्यति । दास्यते ॥ ददातु । दत्ताम् ॥ दद्यात् । ददीत ।।
दयात् । दासीष्ट ॥ प्रदास्यत् । मदास्यत ।।
'आ' उपसर्ग के योग में 'दा' धातु का अर्थ लेना और
यह प्रात्मनेपदी भी होजाता है-विद्यामादत्त -विद्या का
ग्रहण करता है ॥
भी डरना, परस्मैपदी, सकर्मक, मनिट
बिभेति, बिभितः-विभीतः, विभ्यति ॥ विभाय, विश्यतुः,
विभ्युः । बिमयांचकार ॥ भविभेत् ॥ मभैषीत् , अभेष्टाम्,
प्रभैषुः ॥ भेता ।। मेष्यति ॥ बिभेतु ॥ विभियात्-विभीयात् ।।
भीयात् ॥ अमेष्यत् ॥
भृ=धारण और पोषण, उभयपदी, सकर्मक, मनिट
वित्ति, विभृतः, बिभ्रति । विभृते, बिनाते, बिभ्रते ॥
। '३२ संस्कृतप्रबोधे- बमार, बभ्रतुः, पद्मः। बमर्थ । बिभराञ्चकार । बने ॥ भविभः, प्रविभृताम, अविमरुः । प्रविभ्रत ॥ प्रभार्षीत् । गभृत ॥ भर्तासि । भासे ॥ भरिभ्यति भरिष्यते॥बिभर्तु । विभृताम्॥ विभृयात्।विभ्रीत ॥नियात् ।भूषीष्ट ॥ अमरिष्यत्।भभरिष्यत॥ पृ= पालन मोर पूरण परस्मैपदी, सकर्मक, मनिट पिपत्ति, पिपूर्तः, पिपुरति ॥ पपार, पपरतुः-पप्रतुः, पपरु:-पनुः ॥ अपिपः, अपिपूर्ताम्, भपिपरुः ॥ अपारीत् ।। परिता-परीता ॥ परिष्यति-परीष्यति ।। पिपरी ।। पिपूर्यात् ॥ पूर्यात् ॥ अपरिध्यत्-मपरीष्यत् ॥ प्राकृते नेतव्यानि अतीतायां पौर्णमास्यां सोमेना होषम् । भूतिकामस्त्वं व्यसनानि सर्वथा हेयाः । जिज्ञासुः शास्त्रस्य प्रवक्तारमाचार्य जिहीते । बुभुक्षितायानं देहि । सिंहाजन्तवः सर्वे बिभ्यति । आश्रितं शरणापन्नं च या न बित्ति स नृशंसतमः । सत्य- कामोऽहं कथं स्वप्रतिज्ञा न पिपूर्याम् ? संस्कृते नेतन्यानि भानेवाली अमावस्या को अवश्य होम करूँगा । दुःख में जो नहीं छोड़ता वही सच्चा मित्र है । अन्धा लाठी के सहारे जाता है । मैंने उसको पुस्तक दिया था । पालक प्रजनी से उरता है । सती पातिव्रत्य को धारण करती है । किसान पानी से खेतों को भरते हैं। इति जुहोत्यादिगणः दिवादिगणः । . अथ दिवादिगणः* विव-खेलना मादि, परस्मैपदी, अकर्मक, सेट दीव्यति ॥ दिदेव ॥ अदीव्यत् ॥ भदेवीत् ॥ देविता ॥ देवियति ॥ दीव्यतु ॥ दीव्येत् ॥ दीव्यात् ॥ अदेविष्यत् ॥ नृत् = नाचना, परस्मैपदी, सकर्मक, सेट नृत्यति ॥ ननर्स, ननृततुः, नन्तुः ॥ भनृत्यत् ॥ मनीत् ॥ नतिता ॥ नतिष्यति-नस्यति । नृत्यतु ॥ नृत्येत् ॥ नृत्यात् ॥ भनतिष्यत्-मनस्य॑त् ॥ प्रस् = डरना, परस्मैपदी, अकर्मक, सेन प्रस्यति-त्रसति । तत्रास, सतुः-तत्रसतुः, सुः-तत्रमः॥ पत्रस्यत्-मत्रसत् ॥ मत्रसीत् ॥ त्रसिता ॥ प्रसिध्यति ।। त्रस्यतु ॥ त्रसतु ॥ त्रस्येत् ॥ प्रसेत् ॥ त्रस्यात् ।। अत्रसिध्यत् ।। पुष्=पुष्ट होना, परस्मैपदी, सकर्मक, प्रनिट पुष्यति ॥ पुपोष ॥ अपुष्यत् ॥ प्रपोषीत् ॥ पाष्टा ।। पोष्यति ।। पुष्यतु ॥ पुष्येत् ॥ पुष्यात् ॥ प्रपोक्ष्यत् ।। नश्प्रदर्शन, न दीखना, परस्मैपदी, प्रफर्मक, वेट् । नश्यति ॥ ननाश, नेशतुः, नेशुः । ननंष्ठ ॥ अनश्यत् ॥ मनशत् ॥ नंष्ठा-नरिता ॥ नंश्यति-नशिष्यति ॥ नश्यतु ।। नश्येत् ॥ नश्यात् ॥ मनंक्ष्यत् ॥ अनशिष्यत् ॥ तृप्=तृप्त होना, परस्मैपदी, मकर्मक, वेद तृष्यति ॥ ततर्प । तत्रप्थ-ततर्थ ॥ अतृप्यत् ॥ अतापसीत- प्रतीत-अत्राप्सीतू-मतपत् ॥ तर्पिता-त्रता ॥ तर्पियति- अप्स्यति ॥ तृप्यतु॥ तृप्येत् ॥ तृप्यात् ॥मर्पियत्-प्रत्रप्स्यत् ॥ - - • दिवादि गण के सब धातुओं से सार्वधातुक नकारों में 'श्यन् । प्रत्यय होताडे, परन्तु 'पम्' धातु को विकल्प से होता है। श और न् का लोप होकर 'य' रहलाता है ।। t'नश' धातु को अनिट् पस में नुम् का प्रागम होकर नंष्ठा । नश्यति । इत्यादि रूप होते हैं। .
संस्कसबोधे- . मसू = फेंकना, परस्मैपदी, सकर्मक, सेन अस्यति ॥ मास ॥ मास्यत् ॥ मास्थत् ॥ मसिता ॥ भसिष्यति ॥ अस्यतु । गस्येत् ॥ भस्यात् ।। आसिध्यत् ॥ सम्' के योग में 'मस्' धातु का अर्थ संक्षेप करना, 'वि' के योग में विस्तार करना और निर् तथा नए के योग में परास्त करना तथा 'ममि' के योग में प्रयास करना होजाता है-विगृहीतं वाक्यं समस्यति, समस्तं व्यस्थति- विगृहीत वाक्य का समास करता है और समस्त का विमह करता है । जल्पेन वितण्डया च प्रतिवादिन निरस्थति, अपास्यति वा जल्प और वितण्डा से प्रतिवारी को परास्त करता है । शब्दबोधार्थ व्याकरणमभ्यस्यति=शब्दबोधक लिये व्याकरण का अभ्यास करता है ॥ जन् = उत्पन्न होना, प्रकट होना, मात्मनेपदी, भकर्मक, सेट जायते ॥ जो ॥ अजायत ॥ मजनि-प्रजनिष्ट ॥ जनिता ॥ जनिष्यते ॥ जायताम् ॥ जायेत ॥ जनिषीष्ट ॥ मजनिष्यत॥ विद होना, आत्मनेपदी, अकर्मक, अनि विद्यते ॥ विविदे। भविद्यत ॥ वित्त ॥वेत्ता ॥ वत्स्यते॥ विधताम् ॥ विधेत ॥ वित्सोष्ट ।। भवेत्स्यत ।। मन् जानना, आत्मनेपदी, सकर्मक, अनिद् मन्यते । मेने ॥ अमन्यत ॥ ममंस्त, भमंसाताम, प्रमंसत॥ मन्ता । मस्यते ॥ मन्यताम् ॥ मन्येत ॥ मंसीष्ट ॥ ममस्यत॥ अभि के योग में 'मन्' धातु का अर्थ अभिमान, 'सम्' के योग में सम्मान, अप और अव के योग में अपमान और अनु' के योग में अनुमति होजाता है-मात्मानमभिमन्यतः 'अस्' धातु को लुक में प्रङ् होकर 'स्थुक का मागम होजाता है। + 'जन् ' धातु को सार्वधातुक लकारों में 'जा' आदेश होजाता है । है -- . - विवादिगणः । ३५ अपने को बड़ा मानता है। गुर सम्मन्यते - गुरु का सम्मान करता है । शत्रुमपमन्यते, प्रवमन्यते वा शत्रुका अपमान करता है । स कस्याप्यनुमति नानुमन्यते यह किसी की सखाइको नहीं मानता ॥ सक्षम सहता, उभयपदी, सकर्मक, सेट मुष्यति । मुम्यते । समर्ष । ममृषे । अमृप्यत् । अमृश्यत ॥ समर्षीत । भषिष्ट । मर्षितासि । मर्षितासे । मर्षियति । मर्षिष्यते । मुख्यतु । मृभ्यताम् ॥ मृष्येत । मृध्येत । मृण्यात । मर्षिषीष्ट ॥ ममर्षियत् । समर्षियत ॥ र रंगना, उभयपदी, सकर्मक, प्रमिद रज्यति। रज्यते । सरकारले ॥ मरज्यत् । भरज्यत । मराशीत । भरक्त ॥ रक्तासि । रक्तासे ॥ रक्ष्यति ॥ रक्ष्यते ॥ रज्यतु । रज्यताम् ॥ रज्येत् । रज्येत ॥ रज्यात् । रक्षीष्ट ॥ भरझ्यत् । अरक्ष्यत । अनु"पूर्वक 'रज्' धातु प्रीति और 'वि' पूर्वक अप्रीति के प्रर्थ में और इन दोनों के योग में अकर्मक भी होजाता है+मनात्मवादिनः संसारे अनुरज्यन्ति = अनारम- वादी संसार में अनुरक्त होते हैं । आत्मवादिनस्वनात्मवन्तं सर्व नश्वरं मत्वा अस्मात् विरज्यन्ति और मात्मवादी मनात्मवान् सबको नाशशील मानकर इससे विरक्त होते हैं। नह = बान्धना, उभयपदी, सकर्मक, अनि नयति । नाते ॥ ननाह । नेहिथ-ननद । नेहे ॥ मनात् । मनात । अनात्सीत् । अनख । नासि । नखासे । नत्स्यति। नत्स्यते ॥ नातु । नाताम् ॥ मह्येत् । न त ॥ नह्यात् । नत्सीष्टमनस्यतू । प्रनत्स्यत॥ 'सम्' के योग में 'नह' धादु अकर्मक और समय .
संस्कृतपरोध- होने के अर्थ में होजाता है-युवाव समझते युरो चिये सनद (तयार) होता। उड्-डी खड़मा, मात्मनेपदी, सकर्मक, सेर रहीयते ॥ उहिये । उबडीयत ॥ उदयिष्ट इयिता। उइविध्यते ॥ उडीयताम्॥ उडीयेत ॥ उइथिषीय उदयिष्यत॥ 'हो' धातु प्रायः 'उद्,' उपसर्ग पूर्षकही प्रयुक्त होता है। स- उत्पन्न होना, भात्मनेपदी, सकर्मक, पेट् सूयते ॥ सुपुवे ॥ भसूयत ॥ असविष्ट-प्रसोष्ट ॥ सविता- सोता। सविण्यते-सोप्यते ॥ सूयताम् ॥ सूबेत ॥ संविषीष्ट- सोषीष्टमसविष्यत-असोग्यत । दू-तुःसी होना, मात्मनेपदी, अकर्मक, सेन दूयते ॥ दुदुधे ॥ अयत ॥ प्रविष्ट ॥ दविता ॥ दषिष्यते॥ द्यताम् ॥ येत ॥ दविषीष्ट ॥ प्रदवियत ।। = जीर्ण होना, परस्मैपदी, अकर्मक, सेट जीर्यति ॥ जजार, जजरतुः-जेरतुः ॥ अजीर्यत् ॥ मजारीत-मजरत् ॥जरिता-जरीता॥ जरिष्यति-जरीप्यति ॥ जीर्यतु । जीर्येत् ॥ जीर्यात् ।। मजरियत्-मजरीप्यत् ॥ प्राकृते नेतव्यानि युधिष्ठिरः शकुनिना सह प्रदिदेव । हस्तत्र नर्सका अनृत्यम् । बाल्ये सर्पादत्रसिषम् । वीतरोगस्त्वमचिरेणैव पोटासि । अन्यायकार्यवश्यमेव नश्यति । हत्येन देवाः कव्येन पितरच तृप्यन्ति । कृपे रज्जुमस्यत । कुपुत्रो जायेत कचिदपि कुमाता न भवति । यदि तत्र त्वमवेत्स्यथास्तबमस्ते सौभाग्यमात्मनः । साधवः सखवचनानि मृष्यन्ते । शुरः स्ववस्त्राणि रुधिरेण' रज्यति । कोग्नुरम्बेत भर्तिमान विषयेयपहारिषु। मनुष्यः बुद्धिरवेन मदोन्म हस्तिनमपि स्वादिगणः। नाते । माकारो पक्षिणउड्डीयन्ते । सुभद्रा अभिमन्यु सुपुषे । दूयन्ते पापिन:पापकर्मणा। जीर्यन्ति जरामापन्नाः ।। संस्कृते नेतव्यानि मैं जुवा कदापि नहीं खेलूँगा । कामी पुरुष गणिकामों को नचाते हैं। क्या में फायर हूँ जो युद्ध से डर? व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है । मापस की फूट से कौरवों का नाश हुवा था । भूस्खा बातों से तृप्त नहीं होता । प्राकारा में देखा फेंकोगे तो नीचे गिरेगा। तेरी पत्नी धार्मिक पुत्र उत्पन्न करे। निखों में तेल होता है पर बालू में नहीं होता। राम ने पिता की माशा को माना था। दुर्घल सबल के अत्याचार को में धर्म के रंग से अपने हृदयपट को गूंगा । वह केवल ईश्वर में अनुराग करता है । शान्ति की रज्जु से मनरूप हस्ती को बान्धो । कल पिंजरे में से तोता उड़गया । गोषर में से कीड़े उत्पन्न होते हैं । जो किसी को सतावेगा वह आप भी दुःख पावेगा। कान पाकर सब वस्तु जीर्ण होते हैं ।। इति विवादिगणः॥ सहता है। अथ स्वादिगणः* सु-मलना, मर्क खींचना, उभयपदी, सकर्मक, सेन सुनोति । सुनुते ॥ सुषाव । सुपुवे ॥ अमुनोत् । असुनुत । असावीत् । मसविष्ट-प्रसोष्ट ॥ मोतासि।सातासे ॥सोण्यति। सोप्यते ॥ सुनोतु । सुनुताम् ॥ सुनुयात् । सुन्धीत ॥ सूयात् । सविषीष्ट-सोषीष्ट ॥ प्रसोयत् असोष्यत । . * स्वादिगण के समस्त धातुओं से सार्वधातुक लकारों में 'ख' प्रत्यय, और बढ़जाता है
संस्कृतप्रबोधे-
।
मि = फेंकना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट
मिनोति मिनुते ॥ मिमाय । मिम्ये ॥ अमिनोत् । अमिनुत ।
भमासीत् । अमास्तमातासिामातासे |मास्यति ।मास्यते ॥
मिनोतु मिनुताम् ॥ मिनुयात् । मिन्वीत ॥ मीयात् । मासीष्ट ।
ममास्यतू । अमास्यत॥
अनु' के योग में 'मि' धातु का अर्थ अनुमान 'उप' के
योग में उपमान और 'प्र' के योग में प्रमाण होजाता है।
यथा-पुत्रं दृष्ट्वा पितरमनुमिनोति-पुत्र को देखकर पिता का
अनुमान करता है । गां दृष्ट्वा गवयमुपमिनोति-गाय को
देखकर नीलगायका उपमान करता है। प्रमाणैरर्थ प्रमिणाति =
प्रमाणों से मर्थ को प्रमाणित करता है।
चि = चुनना, उभयपदी, द्विकर्मक, अनिद्र
चिनोति । चिनुते ॥ चिकाय-चिचाय । चिक्ये ॥
प्रचिनोत् । मचिनुत । भचैषीत् । मचेष्ट ॥ घेतासि । चेनासे।
चष्यति । चेष्यते ॥ चिनोतु।चिनुताम् ॥ चिनुयात् । चिन्वीत ॥
धीयातू । चेषीष्ट । मचेष्यत् । प्रचंष्यत ।
उप' के योग में 'चि' धातु का अर्थ बढ़ाना और अप
के योग में घटाना होजाता है-यः धर्ममुपचिनोति स एव
दुःखमपचिनोति =जो धर्म को बढ़ाता है वही दुःन को घटाना है
स्तु %दकना, छिपाना, उभयपदी, सकर्मक, अनिर
स्तृणोति । स्तृणुते ॥ तस्तार । तस्तरे | मस्तृणोत् ।
मस्तृणुत ॥ अस्तार्षीत् । अस्तृत ॥ स्तासि । स्तासे॥
स्तरिष्यति । स्तरिष्यते ॥ स्तृणोतु । स्तृणुताम् ॥ स्तृणुयात् ।
स्तृण्वीत ॥ स्तर्यात् । स्तृषीष्ट ॥ अस्तरिष्यत् । अस्तरिष्यत ॥
'वि' के योग में फैलाना और 'सम' और 'मा' के
योग में विकाना अर्थ होजाता है-विस्तृणोति यशा= यश को
.
स्वादिगणः।
फैलाता है । कुशान संस्तुणोति मास्तृणोति वा-कुशों को
बिछाता है।
शक = सकना, परस्मैपदी, अकर्मक, अनिट्र
शक्नोति ॥ शशाक, शेकतुः, शेकुः । शशक्थ ॥ प्रशनोत् ।।
प्रशाक्षीत-अशकतू ॥ शक्ता ॥ शक्ष्यति ॥ शनोतु ॥ शक्नुयात् ।।
शक्यातू॥मराक्ष्य।
4
श्राप = पाना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट्र
मानोति ॥माप, भापतुः, मापुः ॥ मामोत् ॥ मापत् ॥
आप्तामाप्स्यति ॥ मामोतु ॥ भाप्नुयात् ॥माप्यात् ।माप्स्यत्।।
'वि' पूर्वक 'आप' धातु व्याप्ति पोर 'सम्' पूर्वक
समाप्ति के अर्थ में धर्तता है-विभुःसवै व्यामोति-विभु सब में
व्यापक होता है । भृत्यः कार्य समाप्नोति=भृस्य कार्य को
समाप्त करता है।
अश् = पाना, आत्मनेपदी, सकर्मक, वेटू
मश्नुते ॥ मानणे ॥ आश्नुत ॥ प्राशिष्ट-माष्ट ॥ प्रशिता-
मष्टा ॥ पशिष्यते-प्रक्ष्यते ॥ मश्नुताम् ॥ मनुवीत ॥
मशिषीष्ट-पक्षीष्ट ॥ माशिष्यत-आक्ष्यत ॥
प्राकृते नेतव्यानि
यज्ञार्थ सोमं सुनुत । शिशवः कन्वुकानि अमिन्वन् ।
मालाकारः पुष्पाणि चिनुते । वर्भः वेदिं स्तृणुयात् । विद्यायाः
पारं गन्तुं कोऽपि नाशकत् । धर्माय चेदशश्यत तर्हि
सुखमाप्स्यत । विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥
संस्कृते नेतव्यानि
उसने दशमूल का मर्क खींचा था। वह धूम से अग्नि का
मनुमान करता है। अध्यापक परीक्षा के लियेयोग्य विद्यार्थियों को
संस्कृतप्रयांधे-
चुनेगा। ये सब वस्त्रों से शरीर को ढकते हैं । अर्जुन कृष्ण की
महायता से कर्ण को मारने में समर्थ हुवा था । उद्योग से
अवश्य में अपने अभीष्ट को पाऊँगा । थे सदा सुख और
यशको पाई।
इति स्वादिगणः॥
अथ तुदादिगणः
तुद् = पीड़ादेना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट्
तुदति । तुदते ॥ तुतोद । तुतुवे ॥ मतुदत् । मतुदत ॥
मतौत्सीत् ।मतुत्ता तोत्तासातोत्तासे । तात्स्थति । तोत्स्यते॥
तुदतु । तुदताम् ॥ तुदेत् । तुदेत ॥ तुद्यात् । तुत्सीष्ट ॥
अतोत्स्यत् । अतोत्स्यत ।
इषु = चाहना, परस्मैपदी, सकर्मक, सेटू
इच्छति ॥ इयेष, ईषतुः, पुः॥ ऐच्छत् ॥ ऐषीत् ॥ एपिता-
एटा ॥ एषिष्यति ॥ इच्छतु ॥ इच्छेत् ॥ इण्यात् ॥ एषिष्यत् ॥
अधि' पूर्वक 'इष्' धातु सत्कार और 'प्रति' पूर्वक
ग्रहण करने के अर्थ में वर्सता है-गुरुमधीच्छति -गुरु का
सत्कार करता है। दानंप्रतीच्छति-दान को ग्रहण करता है
वश्च = काटना, परस्मैपदी, सकर्मक, वेट
वृश्चति ॥ घनश्च ॥ अवृश्चत् ॥ प्रवचीत-भवाक्षीत् ॥
प्रश्चिता-बष्टा ॥ ब्रश्चियति-वक्ष्यति ॥ वृश्चतु ॥ वृश्चेत् ।।
प्रश्च्यात् ॥ अवश्चिष्यत्-प्रवक्ष्यत् ॥
॥
तुदादिगण के समस्त धातुओं को सार्वधातुक लकारी में 'श' प्रत्यय होता है ।
'इ' धातु के 'ए' को सार्वधातुक लकारों में 'छ' प्रादेश होजाता है।
* 'पूरच्' धातु के 'र' को सार्वधातक लकारों में 'ऋ' सम्प्रसारण होजाता है ।।
तुदादिगणः।
प्रच्छ = पूछना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट्र"
पृच्छति ॥ पप्रच्छ ॥ मपृच्छत् । प्रमाक्षीत् ॥ प्रष्टा ॥
प्रक्ष्यति ॥ पृच्छतु ॥ पृच्छेत् ॥ पृच्छयात् ॥ अप्रक्ष्यत् ॥
सृज = बनाना, परस्मैपदी, सकर्मक, अनिट्र
सृजति ॥मसर्ज। सर्जिघ-सस्रष्ठ॥ भसृजत् ॥ अनाक्षाद।
स्रष्टा ॥ स्रक्ष्यति ॥ सृजतु ॥ सृजेत् ॥ सृज्यात् ॥ अस्त्रक्ष्यत् ।।
'उद्' पूर्वक 'सृज्' धातु छोड़ने के मद्य में वर्तता है-
विरक्तः सर्वमुत्सृजति=विरत. सब को छोड़ता है ।
विश् = प्रवेश करना,परस्मैपदी,सकर्मक,अनिद्र
विशति ॥ विवश ।। अविशः ॥ अविक्षत् ॥ चेष्टा ॥ वेश्यति ।
विशतु ॥ विशेत् ॥श्यात् ॥ अवक्ष्यत् ॥
'सम्' पूर्वक विश्' धातु शयन और 'उप' पूर्वक
स्थिति अर्थ रखता है और अकर्मक भी होजाता है-रात्री जनाः
संविशन्तिा रात्रि में मनुष्य सोत हैं । गेहे उपविशतिः
में ठहरता है।
सद = दुःखी होना वा माश्रयलेना, परस्मैपदी, अकर्मफव:
सकर्मक, भनिन ।
सीदति ॥ ससाद । सेविथ-ससत्थ ॥ मसीदत् ॥ मसदत् ।।
सत्ता ॥ सेत्स्यति ॥ सीदतु ॥ सीदेत् ॥ मद्यात् ॥ असेत्स्यत् ।।
'प्र' पूर्वक 'सद्' धातु प्रसाद घि' पूर्वक विषाद 'मव'
पूर्वक अघसाद (हास ) 'उद' पूर्वक उत्साद ( नाश) और
'मा' पूर्वक सामीप्य अर्थ में वर्तता है और 'मा' को बीड़
कर इन सय उपसर्गों के योग में अकर्मक भी होजाता है-
प्रच्छ्' धातु के 'र' को भी सार्वधातुक लकारों में '' सम्प्रसारण होता है ।।
1 'सद्' धातु दुःखी होने के अर्थ मे अकर्मक और आश्रय लेने के अर्थ में सकर्मको
k
ર
संस्कृतप्रबोधे-
मनः धर्माचरणेन प्रसीदति, तदेव पापाचरणेन विषीदति मन
धर्माचरण से प्रसन्न होता है और यही पाप के माचरण सं
विषन्न होता है । अकर्मण्योऽवसीदति = भालसी हास को
प्राप्त होता है। पापकत्सीदति = पापी नष्ट होता है । गुरु
मासीदति-गुरु के समीप जाता है।
जुष - सेवन करना, आत्मनेपदी, सकर्मक, सट्
जुबते । जुजुषे ॥ अजुषत ॥ अजाषिष्ट ॥ जाषिता ॥
जोषिष्यते ॥ जुषताम् ॥ जुषत ॥ जोषिषीष्ट ॥ भजापियन ॥
= डरना, आत्मदी, अकर्मक, संद
उद्विजते॥ उद्विविज। उदविजत ॥ उदविजिष्ट । उद्विजिता ।।
उद्विजिध्यते ॥ उद्विजताम् ॥ उद्धिजत ॥ उद्विजिपीष्ट ॥
उदविजिष्यत॥
'विज्' धातु सर्वत्र उद्' उपसर्ग पूर्वक ही प्रयुक्त होता है
क्षिप् = फेंकना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट
क्षिपति ॥क्षिप्त ॥ चिक्षेप।चिक्षिपे॥ अविपत् । मक्षिपत ॥
प्रक्षेप्सीत् । प्रक्षिप्त ॥ क्षेप्तासि । क्षप्तासे ॥ क्षेप्यति । क्षेप्स्यते ॥
क्षिपतु । क्षिपताम् ॥ क्षिपेत् । क्षिपेत ॥ क्षिप्यात् । क्षपसीष्ट ॥
प्रक्षेप्स्यत् । प्रक्षेप्स्यत॥
सम्' के योग में 'क्षिप्' धातु का अर्थ संक्षेप, 'उत्क
योग में उत्क्षेप, 'प्रच' के योग में प्रवक्षेप और 'मा' के
योग में आक्षेप होजाता है-पदानि समासेन संक्षिपति
पदों का समास से संक्षेप करता है । जोष्टमुरिक्षपति =देखे
को ऊपर फेंकता है । कूपे रज्जुमवक्षिपतिकूप में रस्सी
को नीचे फेंकता है । मनःसाधुमाक्षिपति = स्खल साधु पर
माक्षेप करता है।
1
४३ १ तुरादिगणः। मुच = छूटना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट मुञ्चति । मुंचते ॥ मुमोच । मुमुचे ॥ अमुञ्चत् । ममुम्चत ॥ ममुचत् । अमुक्त ॥ मातासि । मोक्तास ॥ मोश्यति । माक्ष्यते । मुम्चतु । मुञ्चताम् ॥ मुञ्चत् । मुञ्चेन ॥ मुच्यात् । मुक्षीष्ट ॥ अमोक्ष्यत् । प्रमोक्ष्यत । 'मुच 'फे ही समान विद = पाना और सिच्=सींचना धातुमा के रूप भी होते है । 'नि' पूर्वक 'सिच्' धातु निषेक, 'अभि' पूर्वक अभिषेक और 'उत्' पूर्वक उत्सेफ (गर्व ) मर्थ में वर्तता है--पुमान् योषिति वीर्य निषिञ्चति = पुरुष स्त्री में वीर्य का निषक करना है। राजा योधराज्ये ज्येष्ठपुत्रमभिषिञ्चति = राजा यौवराज्य में ज्येष्ठपुत्र का अभिषेक करता है । उत्सिञ्चति मदोद्धतः मद स उद्धत गर्व करता है। मा-६ = मादर करना, प्रात्मनेपदी, सफर्मक, अनिद आदियते ॥ मादद् ॥ आद्रियत ॥ मारत ॥ भावा । आदरिप्यते ॥माद्रियताम् । माद्रियेत॥माहीष्ट ॥ मादरिष्यत॥ 'ह धातु सर्वत्र 'मा' उपसर्ग पूर्वकही प्रयुक्त होता है । मृ= मरना मात्मनेपदी तथा परस्मैपदी प्रफर्मक, अनिद्रा । म्रियते ॥ ममार॥ भनियत ॥ अमृत ॥ मर्त्ता ॥ मरिष्यति । नियताम् ।। म्रियेत ॥ मृषीष्ट ।। अमरिष्यत् ।। प्राकृते नेतव्यानि दुर्योधनः राज्यसोभेन पाण्डवान तुतुरे । बस्सभायां सर्वे त्वदागमनमैच्चत् । तक्षाकाष्ठार्थ वृक्षमवृश्चत् । त्वं मत्तःकंप्रभ मुच, विद और सिन् धातुओं को सार्वधातुक लकारो में (मुम् ) का भागम होजाता है॥ +'म 'धातु से सार्वधातुक लकारों में आत्मनेपद और प्रार्धधातक लकारो मे आशीलिङ को होड़कर परस्मैपद के प्रत्यय होते है। . . -
संस्कृतप्रबोधे-
प्रष्टासि ? पुष्पेभ्यः न नश्यामि । स गृहं प्रविशति । पड़ेगीः
सीदति । शिशुः भीतःसन् मातरमासीदतिखार्थी सदा धर्म
जुषेत । तव शत्रवः सदोद्विजिषीरन् । कृषकाः वीजानि क्षेत्र
क्षिपन्ते । स एव त्वां मुञ्चतु मृत्युपाशात् । जीवतोः पित्रोग्य
सुखमविदम् । सेकास्म्यचिरणेव क्षेत्रम् । सर्वदा गुरूनाद्रियेत॥
प्रकाले कोऽपि मा मृषीष्ट ।।
संस्कृते नेतव्यानि
उपेक्षा किया हुवा रोग पीछे सतावेगा । भूस्खा मन को
चाहता है। हरे और फल वाले वृक्ष को मत काटो। तू मुझम
क्या पूछता था ? कुम्हार घड़े को बनाता है । मल्लाह जल में
प्रवेश करते हैं। उसने केवल धर्म का माश्रय लिया था । मैं
पाप का कभी सघन न काँगा । बालक सर्प से डरता है ।
यदि खेत में बीज फेंकोगे तो मन्त्र पाओगे । तत्त्वज्ञानी बन्धन म
छटना है। धर्म से अर्थ को पाना चाहिये । यदि फल चाहते हो
तो मूल को सींचो । सुशाल वृद्धों का आदर करते हैं। रोगस
प्रतिदिन सैकड़ों मनुष्य मरते हैं ।।
इति तुदादिगणः ॥
अथ रुधादिगणः
रुध = रोकना, उभयपदी, सकर्मक, मनिट
यदि, सम्धः, रुन्धन्ति । रुन्धे, रुन्धाते, रुधिरे । सरोध।
रुरुधे । गणत् । भरुन्ध ॥ अरुधत्-भरोत्सीत् । मरुद ॥
रोखासिारोवासे॥रोत्स्यति।रोत्स्यते॥रुणधु । रुन्धाम् ।
सन्ध्यात्। सम्धीत । रुध्यात्। रुत्सीष्ट मरोत्स्यत्। अरोत्स्यत॥
*धादिगम के सब धातुभो से सावधातुक नकारों मे 'भम् ' प्रत्यय होता
श और म् का जोप होकर केवल 'न' राजाता है।
रुधादिगणः।
४५
'घि' के योग में 'रुध्' धातु का विरोध, 'अनु' के
योग में अनुरोध और 'नि' के योग में निरोध प्रर्थ होता है-
हितं विरुणद्धि मूर्खः = मूर्ख हित का विरोध करता है। आग्रही
स्वपक्षमनुरुन्धे =माग्रही अपने पक्ष का अनुरोध करता है ।
गर्बु निरुणद्धि = शत्रु का निरोध करता है ।
भित् = तोड़ना, फोड़मा, उभयपदी, सकर्मक, प्रनिद
भिनत्ति । भिन्ते ॥ विभेद । बिभिद ॥ अभिनत् । अभिन्त ।
मभिदत्-ममत्सीत् । मभित्त ॥ भेत्तासि । भेत्तासे ॥ भेत्स्यति॥
भत्स्यते ॥ भिनत्त । भिन्ताम् ॥ भिन्द्यात् । भिन्दीत ॥ भिधात् ।
भिस्सीष्ट ॥ प्रभेत्स्यत् । प्रभेत्स्यत ॥
युज-मिलाना, जोड़ना, उभयपदी, सकर्मक प्रनिट
युनक्ति । युक्ते । युयोज । युयुजे ।। मयुनक् । मयुन ।।
मयुजत्-मयोक्षीत् । प्रयुक्त ॥ योक्तासि । योक्तासे ॥याक्ष्यति ।
योश्यते ॥ युनक्तु । युङ्क्ताम् ॥ युज्यात् । युञ्जीत ॥ युज्यात् ।
युतीष्ट ॥ अयोत्स्यन् । प्रयोत्स्यत ।
'प्र' उपसर्ग के योग में 'युज्' धातु का अर्थ प्रयोग
करना, 'उद्' के योग में उद्योग करना, 'नि' के योग म
नियत करना, 'मनु' के योग में प्रश्न करना और 'उपक
योग में उपकार करना होजाता है-अपदं न प्रयुञ्जीत = पद
रहित वाक्य का प्रयोग नहीं करना चाहिये । साधवः पर
हितायोधुञ्जते सजन पर हित के लिये उद्योग करते हैं।
सेवायां भृत्यं नियुक्त = सेवा में भृत्य को नियुक्त करता है।
शिष्यः गुरुमनुयुक्तं -शिष्य गुरु से पूछता है । धनं पर
हितायोपयुङ्क्ते - धन को परहित के लिये जगाना है। इनमें से
कंघल 'उद्' के योग में यह धातु मकर्मक होजाता है।
संस्कृतप्रबोध- पिष् = पीसना, परस्मैपदी, सकर्मक, मनिट पिनधि, पिष्टः, पिंपन्ति ॥ पिपेष, पिपिषतुः, पिपिषुः ॥ भपिनट, अपिष्टाम, मषिन् ॥ अपिषत् ॥ पेष्टा । पेक्ष्यति ॥ पिनष्टु ॥ पिंच्यात् ।। पिज्यात् ॥ अपेक्ष्यत् ॥ विज्= = डरना, कांपना, परस्मैपदी, मकर्मक, से चिनक्ति । विधेज ॥ भविनक । प्रविजीत् ॥ विजिता ॥ विजिष्यति ॥विनक्तु ॥ विळ्यात् ॥ विज्यात् ॥ प्रविजिष्यत् ॥ = पालना और खाना, परस्मै० आत्मने सकर्मक, भनिट भुनक्ति । मुङ्क्ते । बुभोज । बुभुजे ॥मभुनक् । प्रभुङ्क्त ।। मभौक्षीत् । प्रभुक्त ॥ भोक्तासि । भोक्तासे ॥ भोक्ष्यति । भोश्यते ॥ भुनक्तु । भुक्ताम् ॥ भुज्यात् । भुञ्जीत ॥ भुज्यात्॥ भुशीष्ट ॥ प्रभोक्ष्यत् । अभोक्ष्यत ॥ हिम = मारना, परस्मैपदी, सकर्मक, भनिद हिनस्ति ॥ जिहिंस ॥ महिनतू ॥ अहिंसीत् ॥ हिंसिता ॥ हिंसिष्यति ॥ हिनस्तु ॥ हिंस्यात् ॥ हिस्यात् ॥ महिंसिध्यत् ।। प्राकृते नेतव्यानि अभिमन्युः चक्रव्यूहेन भीष्मादीनां षण्णां महारथिनां मार्ग रुरुध ॥ स मुष्टिना मृत्पिण्डमभिनत् । तक्षा यकटे धुरमयुक्त। शिलापट्टे माषान् पेक्ष्यामि । शिशुः चित्रलिखितात् सिंहादपि विनक्ति । स राजा धर्मतः सर्वा भुनक्तु पृथिवीमिमाम् । क्षुधा चीत । मा हिंस्यात् कमपि प्राणिनम् ॥ संस्कृते नेतन्यानि मैं उसे वहां जाने से रोकेंगा । जापान ने इस का मान तोड़ दिया। राक्टर टूटी हुई हड़ी को जोड़ता है। अगरेजों की -- मुम्' धातु पालन अर्थ में परस्मैपदी और भक्षमा अर्थ मे आत्मनेपदी है ।
तनादिगणः ।
कृपा से कलै मन पीसती हैं। जिस राज्य में बलवान से निर्मल
कांपते हैं वह राज्य कैला ? जो पृथिवी को पाखेगा यही उसके
मधुर फलों को स्वावेगा । उसने सिवाय अपने मन के और
किसी को नहीं मारा।
इति रुधादिगणः॥
अथ तनादिगण
तन् - फखाना, बढ़ाना, उभयपदी, सकर्मक, सेट
तनोति । तनुते ॥ ततान, तेनतुः, तेनुः । तेने ॥ मतनोत् ।
अतनुत । प्रतनीत्-प्रतानीत । मतत-अतनिष्ट । अतथा:-
मतनिष्ठाः ॥ तनितासि । तनितासे ॥ तनिष्यति । तनिध्यते ॥
तनोतु । तनुताम् ॥ तनुयात् । तन्वीत ॥ तन्यात् । तनिषीष्ट ॥
मतनिष्यत् । प्रतनिष्यत ॥
मन् मानना, मात्मनेपदी, सकर्मक, सेन
मनुते ।। मेने ॥ ममनुत ॥ ममनिष्ट ॥ मनिता ॥ मनिष्यते ॥
मनुनाम् । मन्चीत ॥ मनिषीष्ट ॥ प्रमनिष्यत ॥
कृ= करना, उभयपदी, सकर्मक, अनिष्ट
करोति । कुरुते ॥ चकार, चक्रतुः । चकर्थ । च ॥
अकरोत् । मकुरुत ॥ मकार्षीत् । अकृत ॥ कर्तासि । कामे ॥
करिष्यति । करिष्यते ॥ करोतु । कुरु । करवाणि । कुरुताम् ।
कुरुष्व । करवै ॥ कुर्यात् । कुर्वीत ॥ क्रियात । कृषीष्ट ।
अकरिष्यत् । मकरिष्यत ।।
सम्' के योग में 'क' धातु का मर्थ संस्कार-प्रनिना
जलं संस्करोति-मग्नि से जल का संस्कार करता है। प्रधि' के
-
-
* ननादिगण के सब धातुओं से सार्वधातुक लकारों में 'ड' प्रत्यय होता है।
अप
क
संस्कृतप्रबोधे-
योग में अधिकार-शत्रुमधिकरोति-शत्रु पर সন্ধিা
करता है। अनु' के योग में अनुकरण-पितरमनु-
करोति-पिता का अनुकरण करता
परा और
'निर-मा' के योग में निवारण -- शत्रून् पराकरोति, निरा
=शत्रुमों को निवारण करता है । 'वि' के
योग में विकार-क्रोष्टा विकुरुते स्वगन् = शृगाल स्वरों को
विकृत करता है अर्थात् अपशब्द करता है।
योग में अपकार-शत्रुमपकुरुते शत्रु का अपकार करता है।
' के योग में उपकार-मित्रमुपकुरुते मित्र का
उपकार करता है। 'प्रति' के योग में प्रतीकार-रोग प्रति
करोति =रोग का प्रतीकार करता है। 'माविस्के योग में
माविष्कार-कलामाविषकरोति -कलाका माविष्कार करता
है। ‘नमस्' के योग में नमस्कार-गुरुन् नमस्करोति -
गुरुओं को नमस्कार करता है । 'ऊरी' 'उररी' के योग में
स्वीकार -प्रतिशातमर्थमूरीकरोति, उररी करोति वा प्रतिज्ञा
किये हुवे अर्थ को स्वीकार करता है । और 'तिरस ' के योग
में तिरस्कार होजाता है-धूर्त तिरस्करोति = धूर्त का
तिरस्कार करता है।
प्राकृते नेतव्यानि
सुचरित्रस्त्वमात्मनो यशस्तनितासे । समदर्यात्मवत्
मर्वाणि भूतानि मनुते । केनापि सह विवादं मा कुर्वीत ॥
संस्कृते नेतव्यानि
विद्या ने बुद्धि फैलती है । शास्त्र की आशा को सदा
मानना चाहिये। जो गुरु आज्ञा देंगे वह
मैं कगा॥
इति तनादिगणः॥
क्रयादिगणः।
अथ क्रयादि गणः
*
क्री खरीदना, उभयपदी, सकर्मक, अनिट
फ्रीणाति । क्रीणीते ॥ चिक्राय। चिक्रिये ॥ अक्रीणात् ॥
प्रक्रीणीत । अषात् ॥ अष्ट । क्रेतासि ॥ क्रेतासे । वेष्यति ॥
ऋष्यते। क्रीणातु । क्रीणीताम् ॥ क्रीणीयात् ॥ क्रीणीयीत ॥
क्रीयात् । ऋषीष्ट ॥ अष्यत् , अऋष्यत ।
'वि' के योग में 'फ्री' धातु का अर्थ बेचना और प्रति' के
योग में बदलना होजाता है-मन्नं विक्रीणाति = अन्न को
बचता है। तिलेश्यः माषान् प्रतिक्रीणीते तिलों से उड़दों
को बदलता है ॥
पू=शोधना, उभयपदी, सकर्मक, सेट
पुनाति । पुनीते ॥ पुपाव । पुपुवे ॥ अपुनात् । अपुनीत ॥
मपावीत् । अपविष्ट ॥ पवितासि । पवितासे ॥ पविष्यति ।
पविष्यते ॥ पुनातु । पुनीताम् ॥ पुनीयात् । पुनीत ॥ पूयात् ।
पविषीष्ट ॥ अपविष्यत् । अपविष्यत ॥
वृविभाग करना, आत्मनेपदी, सकर्मक, सेट
वृणीते । वृणाते । वृणते ॥ ववे, ववाते, वधिरे ॥ अवृणीत ।
प्रवरिष्ट--अवरीष्ट-प्रवृत ॥ वरिता-वरीता ॥ वरिष्यते-
वरीष्यते ॥ वृणीताम् । वृणीत ॥ वरिषीट--तृपीष्ट ॥
सवरिष्यत-अवरीष्यत ॥
बन्ध् = बान्धना, परस्मैपदी, सकर्मक, प्रनिट
बध्नाति ॥ बबन्ध ॥ प्रबनात् ॥ अभान्त्सीतू, अबान्धाम,
प्रभान्त्सुः ॥ बन्धा ॥ भन्स्यति ॥ बनातु । बधान ॥ बनीयात् ॥
बध्यातू ॥ ममन्त्स्यत् ॥
-
* क्रयादिगण के समस्त धातुओ मे मार्वधातुक नकारों मे 'आ' प्रत्यय होताहै।
५०
संस्कृतप्रबोधे-
-
'प्र' के योग में प्रबन्ध, 'सम' के योग में सम्बन्ध,
'नि' के योग में निबन्ध 'प्रति' के योग में प्रतिवन्ध और
मनु' के योग में अनुबन्ध अर्थ होजाते हैं-पूर्तये कार्यान्
प्रबध्नाति = पूर्ति के लिये कार्यों का प्रबन्ध करता है । गार्हस्थ्याय
दारैरात्मानं सम्बध्नाति = गृहस्थ के लिये स्त्री से अपने को
सम्बद्ध करता है । कविः यशसे, लाभाय च अन्य निबध्नाति
कवि यश और लाभ के लिये ग्रन्थ को बनाता है । सुकार्ये
घिनाः पुरुषं प्रतिबध्नन्ति = सुकार्य में विघ्न मनुष्य को प्रति
बन्धक होते हैं । भवे भवे संस्कारा अनुबन्ति प्राणिनम् = जन्म
जन्म में संस्कारों का प्राणी को अनुबन्ध होताहै ॥
ज्ञा = जानना. परस्मैपदी, सफर्मक, अनिट् *
जानाति ॥ जशी॥प्रजानात् ॥मज्ञासीत् ॥ज्ञाता॥नास्यति॥
जानातु ॥ जानीयात् ॥ ज्ञायात्-ज्ञेयात् ॥ अज्ञास्यत् ॥
प्रश् = खाना, परस्मैपदी, सकर्मक, सेट
.' अशाति ॥ प्राश ॥ पानात् ॥ माशीत् ॥ प्रशिता ॥
अशिष्यति ॥ प्रभातु ॥ प्रशान ॥ अभीयात् ॥ अश्यात् ।।
आशिष्यत् ॥
ग्रह = ग्रहण करना, उभयपदी, सकर्मक, सेट
गृह्नाति । गृीते ॥ जग्राह । जगृहे ॥ प्रगृह्णात् ।
भगृहणीत ॥ अग्रहीत् । अग्रहीष्ट ॥ ग्रहीतासि । ग्रहीतास ॥
ग्रहीष्यति । ग्रहीष्यते ॥ गृह्णातु । गृहणीताम् ॥ गृहणीयात् ।
गृणीत ॥ गृह्यात् । ग्रहीपीष्ट ॥ अग्रहीप्यत् । अग्रहीप्यत ॥
सम् ' के योग में ग्रह धातु का अर्थ संग्रह, 'नि' के
योग में निग्रह, 'वि' के योग में विग्रह, 'मा' के योग में
आग्रह, 'प्रति' के योग में प्रतिग्रह, 'मनु' के योग में
-
* 'ज्ञा' धातु को साधातुक लकारों में 'जा' आदेश होजाताहै।
क्रयादिगणः ।
अनुग्रह और 'अव' के योग में अवग्रह ( वृष्टिप्रतिबन्ध )
होजाताई-गृहस्थो योगक्षमार्थ अन्नादीन् संगृहणाति = गृहस्थ
योगक्षेम के लिये अन्नादिका का संग्रह करता है । धीरः
स्वमन एव निगृह्णाति-धीर अपने मन को ही निग्रह
करता है। अध्यापकरछात्राणां योधाय समस्तं पदं विगृह्णाति =
अध्यापक छात्रों के बोध के लिये समस्त पद का विग्रह
करता है । शूराः युद्ध शत्रून् विगृहन्ति = शूर युद्ध में
शत्रुमों से विग्रह करते हैं । आग्रही स्ववचनमेवागृहणाति =
आग्रही अपने वचन का ही आग्रह करता है । दीनाः दानं
प्रतिगृह्णन्ति = दीन दान का प्रतिग्रह करते हैं । दयाबवः
प्राणिमात्रमनुगृह्णन्ति
दयालु
प्राणीमात्र पर अनुग्रह
करते हैं । पाश्चात्यो वातः वृष्टिमवगृह्णाति = पश्चिम का
वायु वृष्टि का प्रवग्रह करता है ।
प्राकृते नेतव्यानि
कृषकेश्यो वणिगनमक्रीणीत । कदा स्वागमनेन मद्गृहं
पवितास्थ ? स मरणात्प्रागेव पुत्रादिभ्यो धनमवृत । पशून्
गोष्ठे बनीयाः । विद्वानेव विजानाति विद्वज्जनपरिश्रमम् ।
नहि बन्ध्या विजानाति गुरू प्रसबवेदनाम् ॥ मजीर्णे ज्वरे वा
कदापि नाभीयात् । धर्मादपेतमर्थ न ग्रहीष्यामि ॥
संस्कृते नेतव्यानि
धन से अन्न खरीदूंगा । मन के भावों को पवित्र करना
चाहिये । दाता याचकों के लिये दान का विभाग करता है।
तृणों का समूह हाथी को बांधता है। अपने हित को पशु भी
जानते हैं । भूख लगने पर खाऊँगा । अन्याय से किसी के
पदार्थ को मत ग्रहण करो।
इति क्रयादिगणः
-
૧૨ संस्कृतप्रबोधे- अथ चुरादिगणः* चुर् चोरी करना, उभयपदी, सकर्मक, सेन चोरयति । चोरयते ॥ चोरयाश्चकार । चोरयाम्बभूव । चोरयामास । चोरयाञ्चके ॥ मचोरयत् । अचोरयत ॥ मचूचुरत् । अचूचुरत ॥ चोरयितासि । चोयितासे ॥ चोरयिष्यति । चारयिष्यते ॥ चोरयतु । चोरयताम् ॥ चोरयेत् । चोरयेत ॥ चोर्यात् । चोरयिषीष्ट ॥ अचोरयिष्यत् । मचोरयिष्यत॥ इसी प्रकार पूज् पूमना, भूष्= सजना, मृष् = सहना, कथ= कहना, गण =गिनना और स्पृह् = चाहना इत्यादि चुरादिगणीय धातुभों के रूप होते हैं । प्राकृते परिणामयितव्यानि तस्य वक्रं चन्द्रमसोऽभिरामतामचूचुरत् । गुरून् वृद्धांश्च सदा पूजयेत् । विनीतश्छात्रः विद्ययात्मानं भूषयते । शान्त्यै तस्य दुर्वचनान्यप्यमर्षयम् । सः स्वमुस्वादवात्मचरितं कथयिष्यति । न गणयति क्षुद्रो अन्तुः परिग्रह फल्गुताम् । कस्याप्यनिष्टं न स्पृहयेत् ॥ संस्कृते परिणामयितव्यानि चोर रात को चोरी करते हैं। वह अपने मातापिता की पूजा करता है । पूर्वकाल की स्त्रियां विद्या के भूषण से भूषित होती थीं। यी दूसरे की उन्नतिका नहीं सहता। तुमको जो कुछ कहना है कहो । बुद्धिमान कार्यार्थी सुख र दुःख को कुछ नहीं गिनता ।। इति चुदिगणः चुरादिगण के सब धातुओं से “णिच् ' प्रत्यय होकर प्रयोजक व्यापार में जैसे क्रियाओं के रूप होते है वैसे ही होजाते हैं । चुरादिगणीय धातुओ से परस्मैपद और मात्मनेपद दोनों के प्रत्यय होते हैं, जहां क्रियाफल कर्तृगामी न हो वहां परस्मैपद भौर जहां कर्तृगामी हो वहां आत्मनेपद होता है । मौर .
- णिजन्तप्रक्रिया। उक्त दशगणों के अतिरिक्त (जिनका वर्णन हुधा) दयही प्रक्रिया भी हैं जिनमें प्रत्ययों के भेद से क्रियानों के रूप में कुछ परिवर्तन हो जाता है, अब हम संक्षेपसे क्रमशः उनका भी निरूपण करते हैं :- (१)णिजन्तप्रक्रिया कारक विषय में कह आये हैं कि प्रेरणा करनेवाले को प्रयोजक कहते हैं और उसी की हेतु संज्ञा भी है और जिसको प्रेरणा की जाती है, वह प्रयोज्य कहलाता है । जहां (हेतु) प्रयोजक कत्ती का व्यापार हो अर्थात् क्रिया प्रयोजक का द्वारा सम्पादन हुई हो, वहां धातु से णिच् ' प्रत्यय होकर दश लकारों की उत्पत्ति होती है-भवन्तं प्रेरयति-भावयति । कारयति । इत्यादि। यह बात भी स्मरण रखनी चाहिये कि मण्यन्त क्रिया का कती ण्यन्त क्रिया के प्रयोग में प्रायः कर्म बन जाता है। -शिष्यः पुस्तकं पठति =शिष्य पुस्तक को पढ़ता है। यहां शिष्य जो कत्ता है वह-शिष्यं पुस्तकं पाठयति=शिष्य को पुस्तक पढ़ाता है । इस णिजन्त के प्रयोग में कर्म होगया । प्रायः प्रयोजक कर्ता में प्रथमा विभक्ति और प्रयोज्य कत्ता में तृतीया विभक्ति रहती है। यथा-देवदत्तः यज्ञद सेन दापयति =देवदत्त यज्ञदत्त में दिखाता है । विष्णुमित्रः सोम- दत्तेन पाचयति =विष्णुमित्र सोमदत्त से पकवाता है । गत्यर्थक, बुद्धचर्थक, भोजनार्थक, शिक्षणार्थक तथा मकर्मक धातुमों से जो प्रेरणार्थक क्रियायें बनती हैं, उनमें प्रयास्य कर्ता फर्म होकर द्वितीयान्त होनाता है । गत्यर्थक - मन्त्री दूतं गमयति, यापयति वा= मन्त्री दूत को भिजवाता है। परन्तु गत्यर्थकों में भी 'नी' और 'वह' धातु का प्रयोज्य कती - संस्कृतप्रबोधे- तृतीयान्तही रहता है-स्वामी भृत्येन भारं नाययति, बाहयति चा स्वामी भृत्य से बोझ उठवाता है । बुद्धयर्थक-पिता पुत्रं बोधयति, वेदयति वा-पिता पिता पुत्र को जनाता है । भोजनार्थक -यजमानः ब्राह्मणं भोजयति, प्राशयति वा यजमान ब्राह्मण को खिचाता है । शिक्षणार्थक-गुरुः शिष्य- मध्यापयति, पाठयति वा=गुरु शिष्य का पढ़ाता है। प्रकर्मक गृहस्थोऽतिथिमासयति = गृहस्थ अतिथि को बिठनाता है। माता वत्सं शाययतिमाता बालक को सुलाती है ॥ प्रेरणार्थक ह और कृ धातुओं का प्रयोज्य का द्वितीयान्त और तृतीयान्त दोनों रहता है-स तं तेन वा भारं हारयति, श्रमं कारयति= वह उसको वा उससे बोझ उठवाता है, श्रम कराता है॥ णिजन्त धातुभों से यदि क्रियाफल कर्त्ता में जावै तो आत्मनेपद और यदि क्रियाफर फर्मगामी हो तो परस्मैपद होता है। अब हम संक्षेप के लिये इन प्रक्रियाओं में केवल तीन लकारों के रूप सो भी प्रथमपुरुष के एकवचन में दिखलायेंगे अर्थात् वर्तमान में लट् के भूत में लुङ् के और भविष्य में लङ्के । शेष लकारों तथा पुरुषों और वचनों के रूप सुधी पाठक स्वयं अनुसन्धान करके बनायें ॥ धातु वर्तमान भूत भविष्य भू भावयति-ते प्रवीभवतू-त भावयिष्यति-ते पाययति-ते प्रपीप्यतू-त पायविष्यति-ते शापयति-ते प्रतिष्ठिपतू-त स्थापयिष्यति-ते गम् गमयति-ते प्रजीगमतू-त गमयिष्यति-ते श्रु श्रावयति-ते भशिश्रवतू-त श्रावयिष्यति-ते अशुभ्रवतू-त ।
णिजन्तप्रक्रिया। ५५ धातु वर्तमान भूत भविष्य वृतू वर्तयति-ते भवीवृततू-त वर्तयिष्यति-ते अववर्तत्-त पच पाचयति-ते अपीपचतू-त पाचयिष्यति-ते यज याजयति-ते अबीयजतू-त याजयिष्यति-ते लभ खम्भर्यात-त अललम्भतू-त मम्मयिष्यति-त वप् वापयति-त प्रवीवपतू-त वापयिष्यति-ते अधीङ् अध्यापयति-ते मध्यजीगपतू-त अध्यापयिष्यति-ते अध्यापिपत्-त हन घातयति-ते अजीघनतू-त घातयिष्यति-ते भी भापयति-ते भविभीपतू-त भापयिष्यति-ते अबिभीषत भीषयिष्यते दा दापयति-ते अदीदिपत्-त दापयिष्यति-ते नृत् नर्तयति-ते मनीनृतत्-त नयिष्यति-ते अननतंतू-त मृष् मर्षयति-ते अमीमृषत्-त मयिष्यति-ते अममर्पतू-त चि चाययति-ते अचीचयत्-त चायविष्यति-त चापयति-ते प्रचीचपतू-त चापयिप्यति-ते धृ धारयति-ते मदीधरतू-त धारयिष्यति-ते मुच मोचयति-त भमूमुचतू-त मोक्षयिप्यति-ते भुज भोजयति-त प्रभुजतू-त भोजयिष्यति-ते कारयति-ते मचीफरतू-त कारयिष्यति-त ज्ञा झापयति-त अजिशपत्-त झापयिष्यति-त क्री अचिक्रपतू-त कापयिष्यति-त गण गणयति-ते अजीगणलू-त गणयिष्यति-ते - कापयति-ते Premwwwamro- ५६ । संस्कृतप्रबोधे- प्राकृते परिणमयितव्यानि . गुरुः शिष्यं भावयति । पाययति शिशुं जननी पयः । नियोजयति पुत्रं हिताय जनकः । गमयति भृत्यानापणे । श्राव- यति धर्म श्रोतृभ्यः । श्रावयते शास्त्रं पुण्याय । अध्यापयति शिष्यानाचार्यः । नर्तन्ति गणिकां स्टेणाः।प्रमीमृषन् पाण्डवा: कौरवापराधान् । युधिष्ठिरः कृष्णस्याधिपत्ये राजसूय- मचीकरत । रावणः मार्गचेन सीतामजीहरत् । प्रतिथयेऽनं पाचयति । याजयन्ति यजमानं ऋत्विजः । याजयन्ते धनाय याक्षिकाः । क्रापयते वणिग्भिः वस्तूनि । रात्री तस्कराःजनान् भीषयन्ते । राजाऽधमणेनोत्तमाय ऋणं दापयिष्यति । भूस्वामिनः क्षेत्रेषु वीजानि वापयन्ते । मालाकारः वाटिकायां पुष्पाणि चाययति चापति वा । ईश्वरः सूर्यादिना विश्वं धारयति । अचिरेगौव बन्धनात्त्वां मोक्षयिष्यामि । कारुणिको बुभुक्षितान भाजयति । घातयति न्यायाध्यक्षः मनुष्यघातिनम् ॥ संस्कृते परिणामयितव्यानि वह अपराधी को दण्ड दिखाता है। शङ्कर ने मण्डन शास्त्रार्थ में गया था । राजा मधिकारियों से प्रजा का शामन कगता है। पाचन की हुई प्रजा राजा को बढ़ाती है। बढ़ी हुई बता वृक्ष को चपेटती है। माता थपकी से बच्चे को सुलाती है। वह फंकमार कर अग्निको जलाता है। कामहारथियों के बीच में अकला अभिमन्यु भजागया था। किसान बैलों से खेतों को सिंचवाते हैं । सूर्य अपनी किरणों से फमनों को निजाता है । सेनापति अपने बुद्धिकौशल से सेना को जिताता है। भाचार्य शिष्यों को सदाचार सिखाता है ॥
सन्नन्तप्रक्रिया। ५७ मू पठ (२)सन्नन्तप्रक्रिया, धातु से इच्छा अर्थ में सन् प्रत्यय होकर उक्त दशवकारों की उत्पत्ति होती है-कर्त्तमिच्छति चिकीर्षति ॥ सन्नन्त प्रक्रिया में परस्मैपदी धातु से परस्मैपद, मात्मने- पदी धातु से आत्मनेपद और उभयपदी से उभयपद के प्रत्यय होते हैं-बुभूषति । विद्धिषतं । चिकीर्षति-चिकीपते ।। धातु वर्तमान भूत भविष्य बुभूषति प्रबुभूषत् बुभूषिर्यात पिपरिषति मपिठिषत् पिपठिषिष्यति पिपासति अपिपासतू पिपामिष्यति गम् मिगमिषति भजिगमिषत লিনমিত্তিান जि जिगीषति मजिगीषत् जिगीषिष्यति चि चिनीषति मचिचीषत् चिचीषिष्यति चिकीषति मचिकीषत् चिौषिष्यति रुरुचिषते महरुचिषत रुरुचिषिष्यत रुरोचिषते प्रगचिषत रुरोचिषिष्यते इ जिहीपति-ते मजिहीर्षत्-त जिहीर्षिष्यति-ते यज् यियक्षति-ते भयियक्षत्-त यियक्षिष्यति-त पुपूषते मपुपूषत पुषिष्यते लम् बिमते अलिप्सत लिप्सिष्यते वृत् विवृत्मति भविवृत्सत् विवृत्स्यति विवर्तिषते अवित्तिषत विवर्तिमप्यत भद जिघमति अजिघत्सीत् जित्मिष्यति शी शियिषत সাহাথির शियिषिष्यते विद् विविदिर्षात प्रविविदिषत् विविदिषिष्यति अधीङ् अधिजिगांसते माजगांसिष्ट अधिर्धाजगांसिष्यते or संस्कृतप्रबोधे- ज्ञप् আন্ত वर्तमान भविष्य जिघांसति मजिघांसीत् जिघांसिष्यति दित्सति-त अवित्सत-त दित्सिष्यति-ते दिघ दुयूषति भदुधूषत् दुधूसिष्यति दिदविषति भदिदेविषत् दिदेविषिष्यति आप इंपति ऐपमीत् इसिध्यति सिच सिमिक्षति-ते असिसिक्षत्-त सिसिक्षिष्यति-ते ध दिधरिषत अदिधरिषत दिधरिषिष्यते भुज बुभुक्षति-ते अबुभुक्षत्-त बुभुक्षिष्यति-ते चिकीर्षति-ते अचिकीर्षत्-त चिकीर्षियति-ते ग्रह जिघृक्षति-ते अजिघृक्षत्-त जिघृक्षिप्यति-ते शीप्सति मशीप्सत् झीप्सिष्यति प्राकृते परिणामयितव्यानि शब्दबोधाय व्याकरणं पिपठिषामि । क्षुधानिवृत्तयेऽग्नं जिघत्सति । कोरवा अन्यायेनाबुभूषन् । पाण्डवाः न्यायेनाऽ- विवद्धिषन्त । भ्रमणाभिभूनाः कृषकाः शिशयिषन्ते । जिज्ञासवो धर्म विविदिषन्ति । ते तत्र कथं न जिगमिषिष्यन्ति? विद्यार्थिनः शास्त्राण्यधिजिगांसन्त । नृपः शत्रन् जिगीषति । मनुष्याः हिंस्रान् जन्तून् जिघांसन्ति । गृही सर्वानाश्रमान दिधरिषते । व्याधः मत्स्यान् जिघृक्षति । पौर्णमास्यां पक्षष्टिना यियक्षामि। कितयाः द्यूतेन दुघुपन्ति दिदेविषन्ति वा । लोलुपः परार्थान् लिप्सते । पाश्यां धनं दित्सामि, दित्से वा । कृषकः क्षेत्र- माससिक्षत् ॥ संस्कृते परिणामयितव्यानि वह धर्म से बढ़ना चाहता है । गूंगा अपने अभिप्राय को संकेतों से जताना चाहता है । वह बाग़ में फूलों को चुनना यङन्तप्रक्रिया। चाहता था । वह मधुरवचन से अपनी वाणी को पवित्र करना चाहता है। वह मुझ से पढ़ना चाहता था। मैं उसके पास जाना नहीं चाहता। वह मुझे कुछ देना चाहता था, पर मैं उससे कुछ लेना नहीं चाहता । वह उसके काम को करना नहीं चाहता। (३) यङन्तप्रक्रिया . हलादि वा एकाच धातुओं से वारंवार वा बहुतायत से होने के अर्थ में 'यङ्' प्रत्यय होकर उक्त दश बफारों की उत्पत्ति होती है । यथा-पुनः पुनरतिशयेन वा भवति = बो- भूयते = बार बार वा बहुतायत से होता है । गत्यर्थक धातुओं से कुटिलता के अर्थ में ही 'या' प्रत्यय होता है, बहुतायत में नहीं-कुटिलं गच्छति = जङ्गम्यते । कुटिलं फ्रामति = चक्रम्यते टेढ़ा जाता है। किन्हीं किन्हीं धातुओं मे भावनिन्दा अर्थ में भी यह होता है-निन्दितं अपति = जाप्यते =निन्दित जप करता है अर्थात् जप के व्याज से लोगों को ठगता है ॥ यन्त धातुओं से केवल भात्मनेपद ही होता है, परस्मैपद नहीं॥ धातु वर्तमान भूत भविष्य भू बोभूयते प्रबोभूयिष्ट बोभूयिष्यते पपीयते अपेपीयिष्ट पेपीयिष्यते सास्मयते प्रसास्मयिष्ट सास्मर्यिप्यते व्र प्रवाजिष्ट वाव्रजिष्यते वृत् वरीवृत्पते भवरीवृतिष्ट वरीकृतिष्यते यज् यायज्यते মাথার मायजियते स्मृ वाव्रज्यते संस्कृतप्रबोधे- - शाशक्यते कृ धातु वर्तमान भूत भविष्य जेनीयते मजेनीयिष्ट जेनीयिष्यते जङ्घन्यते সমনি जङ्घनिष्यते शी शाशय्यते সায়াছ शाशयिष्यते जोहूयते मजोहूयिष्ट - जोडूयिष्यते जन् जाजायत मजाजायिष्ट जाजायिष्यते जअन्यते अजनिष्ट जलनिष्यते शक প্রয়ায় शाशकिप्यते অঙ্কু पाप्रच्यते अपाप्रच्छिष्ट पाप्रविष्यते भुज बोभुज्यते प्रबोभुजिष्ट योभुजिष्यते ग्रह जागृह्यते प्रजाग्रहिष्ट जाग्रहिष्यते चक्रीयत अचेक्रीयिष्ट चेक्रीयिष्यत मृष् मरीमृष्यते अमरीमृषिष्ट मरीमृषिष्यते प्राकृते परिणामयितव्यानि सरसि कमलं जाजायते, जअन्यते वा । युधिष्ठिरः स्वर्गीय प्रयायजिप्ट । भूतिकामः हितवचनानि सास्मयते । पथ्यश्वः चक्रम्यते । अयस्काराः तप्तायसं बेभिद्यन्ते । होता अग्नी हव्यं जोहूयते । वधिकः निरागसान पशून जेनीयते, जङ्घन्यते वा । वर्षासु जलाशयाः परीपूर्यन्ते । ब्राह्मणाः श्राद्धान्नं बोभुज्यन्ते । बोधाय शिष्यः गुरुं पापच्छयते ॥ संस्कृते परिणामयितव्यानि विनाश के समय यादवों ने बहुतायत से मदिरा पी थी। किसान बारबार अपने खेत को सींचता है । सांप सदा तिरछा चलता है। व्यापारी वस्तुमों को बारबार खरीदता है। दानशीब सुपात्रों को बारबार देता है ॥
भू गम् 4 नामधातुप्रक्रिया। (४) यङ्लुगन्तप्रक्रिया यङ् प्रत्यय का लोप होजाने पर भी उसी अर्थ में दश लकार सम्बन्धी तिबादि प्रत्यय होते हैं-पुनः पुनरतिशयेन वा भवति = बोभवीति, बोभोति= बहुतायत से वावारवार होताहै। इस प्रक्रिया में धातुओं से केवल परस्मैपद के प्रत्यय होते हैं। धातु वर्तमान भूत भविष्य बोभीति प्रबोभवीतू बोभविष्यति बोभोति प्रबोभोत् जङ्गमीति अजङ्गमीत् जङ्गमिष्यति जङ्गन्ति प्रच्छ पाप्रच्छीति,पाप्रष्टि अपानच्छीत् पाप्रच्छिष्यति ग्रह जाग्रहीति,जाग्राढि अजाग्रहोत् जाग्रहिष्यति उदाहरण इसके भी यङन्त के ही समान समझो ॥ (५) नामधातुप्रक्रिया संज्ञा वा प्रातिपदिक को (जिसका वर्णन प्रथमभाग में होचुका है ) नाम कहते हैं, उससे किसी विशेष अर्थ में प्रत्यय होफर धातुवत् लकारों की उत्पत्ति जिसमें होती है, उसे नाम धातु प्रक्रिया कहते हैं । इस प्रक्रिया में अर्थ विशेष के बल से प्रातिपदिक भी तिङन्त होजाता है । जहां अपने लिये इच्छा कीजाय वहां संज्ञा से कर्मकारक में क्यच् ' प्रत्यय होकर लकार सम्बन्धी तिबादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं । यथा-मात्मनः पुत्रमिच्छति = पुत्रीयति = अपने लिये पुत्र चाहता है। उक्त अर्थ में प्रातिपदिकसे 'काम्यच्' प्रत्यय भी होताहै- मात्मनः धनमिच्छति=धनकाम्यति = अपने लिये चाहता है। यशस्काम्यति = अपने लिये यश चाहता - धन है - संस्कृतप्रबोधे- माचार (पत्तने) के अर्थ में जिससे उपमा दीजावे, उपमान बाचक कर्म से भी ‘क्यच् ' प्रत्यय होता है-पुत्र- भिवाचरति = पुत्रीयति छात्रम् शिष्य को पुत्र के समान वर्तता है । पितरमिवाचरति-पित्रीर्यात गुरुमगुरु को पिता के समान आचरण करता है । उपमान वाचक मधिकरण से भी उक्त प्रर्थ में 'क्यच' प्रत्यय होता है -पर्यङ्कमिवाचरति = पर्यवीयति मञ्चके टांड में पलंग के समान माचरण करता है । गृहीयति कुट्याम् = कुटी में गृह के समान वर्तता है। उपमान वाची कत्ता से उक्त अर्थ में 'क्य' प्रत्यय होता है-इंस इवाचरति = हंसायते वकःबगला हंस के समान माचरण करता है ॥ भृशादि गण पठित शब्दों से प्रभूततद्भाव (न होकर होने के ) अर्थ में 'क्यङ् ' प्रत्यय होता है-मभृशो भृशो भवति = भृशायते = जो बहुत न धा बहुत होता है । इसी प्रकार-मन्दायते । चपलायत । पण्डितायते। उत्सुकायते । उन्ममायत । इत्यादि में भी समझो। शब्द, वैर, फन्दह, अभ्र, कण्व और मेघ शब्दोंसे करने के अथ में 'क्यङ्' प्रत्यय होता है-शब्दं करोति = शब्दायते = शब्द करता है । इसी प्रकार-धरायते । कलहायते । मनायते। इत्यादि में समझा ॥ सुखादिगणपठित शब्दों से कर्तृवेदना (स्वयं अनुभव करने ) के पर्थ में 'फ्यङ्' प्रत्यय होता है-सुखं वेदयते- सुस्वायते= सुम्न = सुत्र को मनुभव करता है। ऐसेही-दुःखारते । तृप्तायनं । कृच्छायत । फरुणायते । इत्यादि ॥ क्यङ् प्रत्ययान्त से 'आत्मनेपद एवं क्या, क्या और काम्पच् प्रत्ययान्त स परस्मैपद के प्रत्यय होते हैं । । - प्रत्यय किस अर्थ में वर्तमान भूत भविष्य पुत्र क्यच स्वेच्छा राजन पुत्रीयति राजीयति घाच्यति " P-Ret वाच " " " कर्तु मेथुनेच्छा मपुत्रीयीत पराजीयीतू भवाच्यीतू अवाचीत् अगव्यीत् भकीयीत् भाश्वस्यीत् अक्षीरस्थीत प्राशनायीत् मौदन्यीतू प्रधनायीत मयशस्काम्यीत अहंसायिष्ट नामधातुप्रक्रिया। पुत्रीयिष्यति राजीयिष्यति वाच्यिष्यति वाचिष्यति गव्यिष्यति कीयिष्यति পাহাবি क्षीरस्यिप्यति मशनायिष्यति उदयिष्यति धनायिष्यात यशस्फाम्यिष्यति इंसायिष्यते क्षीर लालसा गव्यति कीयति प्रश्वस्यति क्षीरस्यति अशनायति उदन्यति धनायति यशस्काम्यति हंसायते मरान बुभुक्षा पिपासा लिप्सा उदक धन यशस काम्यच् स्वेच्छा क्य आचरण वर्तमान भविष्य किस अर्थ में भूत नाम प्रत्यय अप्सरस क्य মাথা पयस् क्लीव विप राजन् अप्सरायते पयायते पयस्यते क्लीबायते क्लीबते राजायत भृशायते लोहितायति कष्टायते वाष्पायते शब्दायते सुखायते नमस्थति ओप्सरायिष्ट अपयायिष्ट अपयसिष्ट मक्लीबायिष्ट मक्लीबिष्ट भराजायिष्ट अभृशायिष्ट भलोहितायीत् अकष्टायिष्ट भवाष्पायिष्ट अशब्दायिष्ट मसुम्नायिष्ट मनमस्यीत् प्रप्सरायिध्यते पयायिष्यते पयसिष्यते क्लीवायिष्यते क्लीबिष्यते राजायिष्यते भृशायिष्यते लोहितायिष्यति कष्टायिष्यते वाष्पायिष्यते शब्दायिष्यते सुखायिष्यते नमस्यिध्यक्ति संस्कृतप्रबोधे- भभूततद्भाव भृश लोहित क्यष् भाव क्य क्रमण वाष्प उद्धमन " शब्द करण कर्तृवेदन नमस् क्यक - सत्करण भावकर्मप्रक्रिया। प्राकृते परिणामयितव्यानि दशरथः पुत्रष्टया अपुत्रीयीत् । यशे हविः समिध्यति । उत्तरकुरुदेशे प्रजैव राजीयति । मूकः कथं न वाचिष्यति ? गोपाला गव्यन्ति । कार्य सदा स्वनिष्पत्तो कर्जयति । वडवा अश्वस्यति । बालः क्षीरस्यति । बुभुक्षिताः दुर्भिक्षे प्रयनायन्ति। "ग्रीष्म पिपासितोदन्यति । लुब्धः लिप्सया धनायति । सजनाः परोपकारेणैव यशस्काम्यन्ति । बहुदारकस्य दाराः परस्परं सपनायन्ते । सुचरित्रस्य सती पत्नी अप्सरायते । उपस्कृतं जलं पयायते, पयस्यते वा । स्त्रैणास्त्वचिरेणैव क्लीयिष्यन्ते । विदुषामभावे मूर्खा अपि पण्डितायन्ते । निरस्तपादपे देशे ऐरण्डोऽपि द्रुमायते । वर्षासु वीरुधो हरितायन्ति । पापिन: स्वकर्मभिरेव कष्टायिष्यन्ते । निदाघे सूर्य ऊष्मायते । प्रावृषि पूर्वीयो बातः मेघायते । सजनाः परस्य व्यसनोदये दुःखा- यन्ते । दयालवो दीनेषु करुणायन्ते । छात्रः गुरून नमस्यति ॥ संस्कृते परिणमयितव्यानि यशस्वी प्रपने लिये यश चाहता है । यजमान यज्ञ से स्वर्ग चाहता है । वह अपने लिये धन चाहेगा। शीत काल में धूप वस्त्र का सा आचरण करती है। वह उनके साथ हमारा सा आचरण करता है । युद्ध में वीर सिंह का सा माचरण करते हैं । परीक्षा में तीव्रबुद्धि छात्र भी मन्द होजाता है । धीर पुरुष विपत्ति में भी उदास नहीं होते। दुर्जन सजनों से विना कारण ही वैर करते हैं । दूसरों को उन्नत देख कर सजन सुख का अनुभव करते हैं । (६) भावकर्मप्रक्रिया मष तक जिस क्रिया का वर्णन हुवा, वह कर्तृवाच्य कहलाती है, इसलिये कि का इसमें प्रधान रहता है। .
t - C संस्कृतप्रबोध- यथा-देवदत्तः पठति = देवदत्त पढ़ता है। यज्ञदत्तःपाठयति यज्ञदत्त पढ़ाता है । सोमदत्तः पिपठिषति - सोमदत्त पढ़ना चाहता है। ब्रह्मदत्तः पापठ्यते, पापठीति वा ब्रह्मदत्त वार वार पढ़ता है। इन्द्रदत्तः पुत्रीयति = इन्द्रदत्त पुत्र चाहता है। इन सब क्रियागों में कर्ता ही प्रधान है, इसलिये ये सब फर्तृवाच्य है, अब हम भाव और कर्मवाच्य क्रिया का वर्णन : संक्षेप से करते हैं। धातु के अर्थ को भाव कहते हैं, जैसे होना, जाना, करना, इत्यादि । भाव के एक होने से उसमें द्विवचन और बहुवचन की सम्भावना नहीं होसकती और न मध्यम और उत्तम पुरुष ही होते हैं, किन्तु सर्वत्र प्रथमपुरुष का एकवचन होता है। यथा-तेन, तैः, त्वया, युष्माभिः, मया, अस्माभिर्वा मास्यते उस, उन, तुझ, तुम, मुझ और हमसे बैठा जाता है । भाववाच्य और कर्मवाच्य का बक्षण यह है कि अकर्मक धातुओं से भाववाच्य मार सकर्मक धातुओं से फर्मवाच्य क्रिया बनाई जाती हैं । भाववाच्य-'भू' से-भूयते । आस्' से-मास्यते । 'शी' से-शय्यत । इत्यादि । कर्म पाच्य -'गम्' से-गम्यते । 'पठ' से-पठ्यत । 'श्रु' से- श्रूयते । इत्यादि । यह बात स्मरण रक्खा कि सफर्मक से भाव में और अकर्मक से कर्म में प्रत्यय नहीं होत ॥ भाववाच्य और कर्मवाच्य क्रियामों के रूप एक जैसे होते हैं, केवल इतना अन्तर है कि कर्मवाच्य क्रिया में कर्तृवाच्य के सदृश तीनों पुरुष और तीनों बचन होते हैं, परन्तुभाववाच्य में केवल प्रथमपुरुष का एकवचनही होता है। भाववाध्य क्रिया में भाव प्रधान और कर्मवाच्य में कर्म प्रधान रहता है। भाव और कर्म में थातु से सदा भारममेपद ही होता है धातु सकर्मक वा अका वर्तमान भविष्य भाव या कर्म भू मकर्मक भूयते भाववाच्य भनुभू सकर्मक मनुभूयते कर्मवाच्य " प्रकर्मक सफर्मक ममावि भविष्यते भाविष्यते मन्वभावि अनुभविष्यते मनुभाविप्यते अपायि पायिष्यते प्रदायि दायिष्यते अस्थायि स्थायिष्यते प्रगामि गमिष्यते भस्मारि स्मरिष्यते प्रदर्शि द्रक्ष्यते अलाभि, मनम्भि लप्स्यते महारि हरिष्यते भनायि नयिष्यते मावकर्मप्रक्रिया। गम भाववाच्य कर्मचाच्य पीयते दीयते स्थीयते गम्यते स्मयते रश्यते लभ्यते हियते नीयते स्मृ नी " धातु सकर्मक वा प्रक० घर्तमान भूत भविष्य भाव या कम पच् सकर्मक पच्यते इज्यते कर्मवाच्य क यज् अकर्मक भाववाच्य रुद्र विदू ग्री प्रपाचि मयाजि अतप्त भरोदि अवैदि प्रशायि मासि कर्मवाच्य सकर्मक प्रकर्मक भाववाच्य " संस्कृतप्रबोधे- आस अधि-इ पश्यते यक्ष्यते तप्स्यते रोदिष्यते वेत्स्यते शयिष्यते आसिष्यते मध्येष्यते धोक्ष्यते होप्यते भरिष्यते जनिष्यते मर्षियते तप्यते रुद्यते विद्यते शय्यते प्रास्यते मधीयते दुह्यते हूयते भ्रियते जायते, जन्यते मृष्यते सकर्मक मध्ययि कर्मवाच्य " " दु " भू अदोहि अहावि मभारि मजनि भमर्षि " मकर्मक सकर्मक भाववाच्य कर्मवाच्य मृ सकर्मक वा मक वर्तमान 'धातुः भूत भविष्य भाव या कर्म कर्मवाच्य At4 सकर्मक भकर्मक सकर्मक भाववाच्य चि कमवाच्य सृज् मृ भकर्मक सकर्मक भाववाच्य कर्मवाच्य धृ हन्यते शक्यते चीयते. सुज्यते म्रियते ध्रियते, धार्यते मुच्यते भिद्यते क्रियते ज्ञायते पूयते गृह्यते अघानि, भवधि अशाकि प्रचायि असर्जि प्रमारि प्रधारि प्रमोचि प्रभेदि अकारि भज्ञायि अपावि अग्राहि हनिष्यते शक्ष्यते चयिष्यते स्रक्ष्यते मरिष्यते धरिष्यते मोक्ष्यते भेत्स्यते करिष्यते ज्ञास्यते पविष्यते ग्रहीष्यते भावकर्मप्रक्रिया। भिद कृ " पू ग्रह ६९ - संस्कृतप्रबोधे- इनके अतिरिक्त णिजन्त, सन्नन्त पौर यङन्त से भी भाव और कर्म में प्रत्यय होते हैं- णिजन्त से भाव में-भाव्यते । अभावि । भावयिष्यते । णिजन्त से कर्म में-श्राव्यते । अश्रावि । श्रावयिष्यते । सन्नन्त से भाव में-बुभूष्यते । अबुभूषि । बुभूषिष्यते । सन्नन्त से फर्म में-शुश्रूष्यते । अशुश्रूषि । शुश्रूयिष्यते । यङन्त से भाव में-योभूय्यते । प्रयोभूयि । बोभूयिष्यते । यङन्त से कर्म में-शोधूय्यते । अशोश्रूषि । शोशूयिष्यते । भाव और कम में मात्मनेपद के इन ९ प्रत्ययों के सिवाय नव्य मौरक्त मादि और भी कई प्रत्यय होते हैं, जिनका वर्णन कृदन्त में आवेगा॥ प्राकते परिणमयितव्यानि मनुभूयते धर्मात्मना शश्वदानन्दः । घिरज्यता पुरुषेण सर्वस्वं पात्रेश्यो दीयते । दुरात्मभिः श्रेयसः पथि न स्थीयते । पितुरादेशाद्रामेण वनमगामि । यनिष्कामो धर्मः सेव्यते तैरेव विमलं यशो लभ्यते । भूतिमिच्छद्भिः शिष्यैः गुरूणां वचना- न्याद्रियन्ते । पुरुषार्थमन्तरा केनाप्यर्थ नावाप्यते । घेदार्थ- जिज्ञासुभिः षडङ्गान्यधीयन्ते । साधुभिः खलानां दुर्वचनानि मृप्यन्त । यैः ब्रह्मचर्यो धरिष्यते तैरेव शूरः पुत्रो जनिष्यते । कल्पादौ ब्रह्मणा सर्गः सृज्यते । क्षीणदोषाः सर्व पापल्या मुच्यन्ते । मनुष्यस्योन्नतिः घिद्ययैव सम्भाव्यते । उपदेशकेन श्रोतृभ्यो धर्मः श्राव्यते । सर्वैः सर्वावस्थासु बुभूप्यते । केनाऽपि स्वस्य प्रतिकूलानि न चिकीर्घ्यन्ते । संसारेऽस्मिन् जीवैः स्वकर्मभिर्जाजाय्यते । भूतिकामेन गुरूणां हितवचनानि सास्मर्यन्ते ॥ ।
कर्मकर्तृप्रक्रिया।
७१
संस्कृते परिणमयितव्यानि
हम से वहां जाया नहीं जाता । क्या किसी से विना
भूख के भी खाया जाता है । विद्या से सब कुछ जाना जाता है।
खेत पानी से सींचे जाते हैं। तुमसे वहां क्यों नहीं बैठा जाता?
सजनों से दूसरों का दुःस्न हरा जाता है। आलसी से अपना
बोझ भी नहीं उठाया जाता । ईश्वर से यह जगत् धारण और
पालन किया जाता है। उससे वहां नहीं ठहरा गया ।
(७) कर्मकर्तृप्रक्रिया
जिस कती में कर्म के समान क्रिया उपलक्षित हो, वह
कर्मवत् माना जाता है और ऐसी क्रिया को (जिसमें कसी
कर्मवत् माना जावै) कर्मकर्तृक्रिया कहते हैं । यथा-भिद्यते
काष्ठम् = काष्ठविक्षीण होताहै। पच्यतेप्रांदनः-चावल पकता है
कर्मकर्तृप्रक्रिया में प्रायः सकर्मक धातु भी प्रकर्मक
होजाते हैं और उनसे फर्म में प्रत्यय न होकर भाव में होते हैं।
यथा-पचयते ओदनेन = चावल से पका जाता है । भिद्यते
काष्ठेन = काष्ठ से विदीर्ण हुवा जाता है ॥
फरण और अधिकरण में भी कहीं २ पर कर्तृव्यापार
देखा जाता है । जैसे-
-असिश्चिनत्ति = तलवार काटती है।
स्थानी पचति = बटलोई पकाती है। परन्तु इनका कत्ती कर्मवत्
नहीं होता और इसलिये उससे भाव और कर्म में प्रत्यय भी
नहीं होते।
कर्तृवाच्य क्रियानों को कर्मवाच्य और भाववाच्य बनाने के
लियेही कर्मवत् प्रतिदश किया गया है । जैसे-मोदनं पचति।
काष्ठं भिनत्ति । इन पाक्यों में जो मोदन और काष्ठ कर्म थे, वे
मोदनः मोदनेन या पध्यते । काष्ठं काष्टन वा भिद्यते । इन
.
७२
-
संस्कृतप्रबोधे-
वाक्यों में की हैं। बस कर्म का कर्तृत्वेन परिणाम होनाही
इस प्रक्रिया का प्रयोजन है ।।
कर्मकर्तृवाच्य क्रियाओं के रूप वैसेही होते हैं, जैसे कि
भाववाच्य और फर्मवाच्य क्रियाओं के दिखलाये जाचुके हैं,
मतः उनके पृथक् लिखने की भावश्यकता नहीं ।
(८) आत्मनेपदप्रक्रिया
क्रियाओं के दो भेद हैं, एक आत्मनेपद और दूसरा
परस्मैपद । पद नाम संज्ञा और क्रिया दोनों का है । जिस
क्रिया का फल अपने में मावै, वह मात्मनेपद और जिसका
फल दूसरे में जावै वह परस्मैपद है । जैसे-स्वर्गाय यजते-
स्वर्ग के लिये यज्ञ करता है। भोजनाय पचते-खाने के लिये
पकाता है। यहां यज्ञ करना और पकाना रूप क्रिया का फल
कर्ता के अपने लिये होने से मात्मनेपद हुवा । याजकाः
यजन्ति =याजक यज्ञ करते हैं । पाचकाः पचन्ति=पाचक
पकाते हैं। यहां यज्ञ करना और पकाना कप क्रियाओं का
फल कर्ता के लिये न होने से किन्तु यजमान और स्वामी के
लिये होने से परस्मैपद हुवा । यह सामान्य नियम है, अष
विशेष नियम दिखलाते हैं-
अनुदात्तेत और जित् धातुओं से मात्मनेपद होता है ।
अनुदात्तेतू-मास = आस्ते । वसू-वस्ते ॥ इत्यादि ङित् =
गोङ् = शेते । सूङ् = सूते । इत्यादि ।
भाव और कर्म में भी धातुओं से आत्मनेपद होता है ।
भाव में--मास्यते त्वया । शथ्यते मया ॥ फर्म में क्रियते
परः । नीयते भारः । इत्यादि ।
'नि' उपसर्ग पूर्वक 'विश्' धातु से मात्मनेपद होता है।
निविशते।
-
आत्मनेपदप्रक्रिया। ७३ परि, विभोर व उपसर्ग पूर्वक 'फ्री' धातुसे भीमात्मनेपद होता है-परिक्रीणीत । विक्रीणीते । मवक्रीणीते ॥ वि और परा उपसर्ग पूर्वक 'जि' धातु से भी प्रात्मनेपद होता है-विजयते । पराजयते ॥ 'मा' उपसर्ग पूर्वक 'दा' धातु से मुंह न चलाने के अर्थ में आत्मनेपद होता है-विद्यामादत्ते विधाको ग्रहण करता है, मुंह चलाने के अर्थ में परस्मैपद होता है-मुखं व्याददाति = मुंह चलाता है॥ मा, अनु, सम् और परि उपसर्ग पूर्वक 'फ्रीड' धातु से भी मात्मनेपद होता है-माक्रीडते । अनुक्रीडते । संक्रीडते । परिक्रीडते ॥ सम्, प्रव, प्रमौर वि उपसर्ग पूर्वक 'स्था' धातु से भी मात्मनेपद होता है-संतिष्ठते । भवतिष्ठते । प्रतिष्ठते । वितिष्ठते ॥ उद्' उपसर्ग पूर्वक 'स्था' धातु से भी यदि उठना अर्थ न हो तो मात्मनेपद होता है-गहे उत्तिष्ठते = घर में ठहरता है। उठने के अर्थ में परस्मैपद होगा-मासनादुत्तिष्ठति= आसन से उठता है॥ उद् पौर वि उपसर्ग पूर्वक प्रकर्मक 'तप' धातु से आत्मनेपद होता है-ग्रीष्मे सूर्य उत्तपते । वितपतेग्रीष्म में सूर्य तपता है । सफर्मक से परस्मैपद होगा-उत्तपति सुवर्ण सुवर्णकारः = सुनार सोने की तपाता है । वितपति पृष्ठं सविता-सूर्य पीठ को तपाता है * ॥ आ' उपसर्ग पूर्वक भकर्मक यम और हन् धातु से भी मात्मनेपद होता है-आयच्छते । आइते । सकर्मक से नहीं • उपसर्गों के योग से प्रायः अकर्मक धातु सकर्मक और सकर्मक कर्मक होजाते हैं।
७४ संस्कृतप्रबोधे- होता-मायच्छति कूपाद्रज्जुम् = कुवे से रस्सी को खींचता है। माहन्ति वृषलं पादेन नाच को पैर से मारता है। 'सम्' उपसर्ग पूर्वक अकर्मक गम, ऋच्छ, प्रच्छ, स्थ, ऋ, श्रु, दृश् और विद् धातुमों से भी आत्मनेपद होता है- संगच्छते । समृच्छते । सम्पृच्छते । संस्वरते। समरते । संणुते । संपश्यते । संवित्त । नि, सम्, उप मौर वि उपसर्ग पूर्वक 'हे' धातु से मात्मनेपद होताहै-निह्वयते । संह्वयते । उपह्वयते । विह्वयंत । स्पी (मुकाबले) के अर्थ में 'मा' उपसर्ग से भी मात्मनेपद होता है-- मला मल्लमास्यते मल मल्ल को चलेंज देता है। स्पर्धा से भन्यत्र-गुरुः शिष्यमाह्वयति = गुरु शिष्य को बुलाता है । मारण, प्रवक्षेपण, सेवन, साहसिक्य, प्रतियत्न, प्रकथन और उपयोग अर्थों में 'कृ' धातु से प्रात्मनेपद होता है। मारण-शत्रनुत्कुरुते= शत्रुषों को निर्मूल करता है। प्रवक्ष- पण-श्येनो वत्तिफामुदाकुरुते = बाज़ बत्तक को दबाता है। सेवन-पितरमुपकुरुत -पिता की सेवा करता सिक्य-परदारान् प्रकुरत = पराई स्त्री को रखता है । प्रतियत्न-उदफस्योपस्कुरुत = जल का संस्कार करता है । प्रकथन-निन्दा प्रकुरते-निन्दा करता है। उपयोग-धर्मार्थ शतं प्रकुरुते = धर्मार्थ सौ रुपये खगाता है। विजय करने के अर्थ में 'भधि' पूर्वक 'कृ' धातु से भी मात्मनेपद होता है-शत्रुमधिकुरुते = शत्रु को वश में करता है। विजय से अन्यत्र परस्मैपद होगा-मर्थमधिकरोति = धन को अधिकार में लाता है। शब्दकर्मफ और भकर्मक 'वि' उपसर्ग पूर्वक 'कृ' धातु से भी आत्मनेपद होता है । शब्दकर्मक-कोष्टाविकुरुते स्वरान् = है । साह- आत्मनेपदप्रक्रिया। शृगाल स्वरों को बिगाड़ता है । अकर्मफ-अनुत्तीर्णारछात्रा विकुर्वते = अनुत्तीर्ण छात्र विकार को प्राप्त होते हैं । सम्मानन, उत्क्षेपण, आचार्यकरण, शान, भृति, ऋणदान भोर व्यय इन प्रों में 'नी' धातु स आत्मनेपद होता है । मम्मानन-शिष्यं शास्त्र नयते-शिष्य को शास्त्र में जाता है। शास्त्र की प्राप्ति से शिष्य का सम्मान सूचित होता है । उत्क्षेपण-दण्डमुन्नयत =दण्ड को ऊपर फेंकता है । आचार्य- करण-माणवकमुपनयते = बालक को उपनीत करता है। ज्ञान-तत्त्वं नयते तत्त्व का निश्चय करता है । भृति-भृत्या- नुपनयते भृत्यों को वेतन देता है । ऋणदान-फरविनयते कर देता है । व्यय-शतं विनयते =सौ का खर्च करता है। इनसे अन्यत्र परस्मैपद होगा-मजां ग्रामं नयति= बकरी को गांव में लेजाता है॥ यदि कोई शरीर का अवयव 'नी' धातुका फर्म न हो तो भी उससे मात्मनेपद होता है-क्रोधविनयते= फ्रोध को दूर करता है अन्यत्र-करंमुखे विनयति = हाप को मुहं में जाता है । मप्रतिबन्ध, उत्साह और विस्तार मर्थ में 'क्रम्' धातु से मात्मनेपद होता है । मप्रतिबन्ध-शास्त्रेवस्य बुद्धिः क्रमते = शास्त्रों में इसकी बुद्धि चलती है अर्थात् रुफतीनहीं । उत्साह--- मध्ययनाय क्रमते = पढ़ने के लिये उत्साह करता है। विस्तार--- क्रमतेऽस्मिन् विद्या=इसमें विद्या फैलती है। परा उपसर्ग के योग में भी उक्त धातु से आत्मनेपद होता है-पराक्रमते । 'मा' उपसर्ग के योग में भी यदि नक्षत्रभ्रमण अर्थ हो तो मात्मनेपद होता है-आक्रमन्ते ज्योतींषि = नक्षत्र घूमते हैं । 'वि' उपसर्ग पूर्वक 'क्रम्' धातु से पाइविक्षेप मर्थ में (जो धातु का निज अर्थ है ) प्रात्मनेपद होता है-सुष्टु विक्रम- तऽश्वः = घोड़ा मच्छा कदम चलता है। प्र और उप उपसर्गों के संस्कृतप्रबोधे- जानीत योग में भी यदि प्रारम्भ अर्थ हो तो आत्मनेपद होता है- प्रक्रमते भोक्तुम् = खाने को प्रारम्भ करता है । उपक्रमते गन्तुम् =जाने को भारम्भ करता है। अकर्मक 'शा' धातु से भी आत्मनेपद होता है-सर्पिषो घृत से प्रवृत्त होता है। यहां प्रज्ञानार्थक 'शा' धातु के होने से करण में षष्ठी हुई है । सकर्मक से परस्मैपद होता है-स्वरेण पुत्रं जानाति = मावाज़ से पुत्र को पहचानता है मनुष्यों के स्पष्ट और सम्यक् उधारण अर्थ में 'पद्' धातु से प्रात्मनेपद होता है-संप्रवदन्ते विद्वांसः विद्वान् संवाद करते हैं । 'मनु' पूर्वक प्रकर्मक 'बद्' धातु से भी उक्त अर्थ में आत्मनेपद होता है-अनुवदते कठः कलापस्य = कठ कलाप के समान स्पष्ट बोलता है । विवाद अर्थ में उक्त धातु से आत्मनेपद और परस्मैपद दोनों होते हैं-विप्रवदन्ते, विप्रवदन्ति वा वैयाकरणाः- वैयाकरण विवाद करते हैं। 'मव' पूर्वक 'गृ' धातु से आत्मनेपद होता है-प्रवगिरते- निगखता है। प्रतिज्ञान अर्थ में 'सम्' पूर्वक 'गृ' धातु से भी मात्मनेपद होता है-शब्दं संगिरते- शब्द को जानता है । प्रतिक्षान से अन्यत्र-संगिरति ग्रासम् = ग्रास को निगलता है। 'उद्' उपसर्ग पूर्वक सकर्मक 'चर्' धातु से आत्मनेपर होता है-धर्ममुञ्चरते धर्म का उल्लंघन करता है । अकर्मक से परस्मैपद होता है-वाष्पमुञ्चरति = धुवां ऊपर को जाता है । तृतीया विभक्ति के योग में 'सम्' पूर्वक 'चर' धातुसं भी प्रात्मनेपदहोता है-अश्वन सश्चरत घोडसेविचरता है। 'सम्' पूर्वक 'दा' (यच्छ) धातु से तृतीया के योग में यदि यह तृतीया चतुर्थो के अर्थ में हो तो प्रात्मनेपद होता है। अशिष्ट ( निन्दित ) व्यवहार में तृतीया चतुर्थी के अर्थ में होती है-धेश्यया सम्प्रयच्छते कामुकः कामी पुरुष वेश्या के . मात्मनेपदप्रक्रिया। लिये देता है । और जहां तृतीया चतुर्थी के अर्थ में न होगी वहां परस्मैपद होगा-पाणिना संप्रयच्छति -हाथ से देता है। 'उप' पूर्वक 'यम्' धातु से पाणिग्रहण अर्थ में प्रात्मनेपद होता है-भार्यामुपयच्छते = पत्नी को प्राप्त होता है । पाणि- ग्रहण से अन्यत्र-गणिकामुपयच्छति = वश्या को प्राप्त होताहै। सन् प्रत्ययान्त ज्ञा, श्रु, स्मृ और दृश् धातुमा से आत्मनेपद होता है-धर्म जिज्ञासते = धर्म को जानना चाहता है । शास्त्र शुश्रूषते = शास्त्र को सुनना चाहता है । पठितं सुस्मूर्षते = पढ़े हुवे को स्मरण करना चाहता है । नृपं दिक्षते = राजा को देखना चाहता है । परन्तु 'अनु' उपसर्ग पूर्वक सन्नन्त 'ज्ञा धातु से तथा प्रति भोर मा उपसर्ग पूर्वक सन्नन्त 'श्रु' धातु मे मात्मनेपद नहीं होता-मित्रमनुजिज्ञासति = मित्रको जानना चाहता है । धर्मस्य महिमानं प्रतिशुश्रूषति, माशुश्रू- पति = धर्म के महिमा को सुनना चाहता है ॥ शद्' धातु से सार्वधातुक लकारों में अर्थात् लट्, लङ्, लोट् और विधिलिङ् में मात्मनेपद होता है, मार्धधातुकों में परस्मैपदशीयते । मशीयत । शीयताम् । शीयेत ॥ मृ' धातु से उक्त ४ लकारों के सिवाय लुङ भौर माशीलिङ्ग में भी मात्मनेपद होता है-म्रियते । मनियत । अमृत । नियताम् । म्रियेत । मृषीष्ट ॥ जो धातु मात्मनेपदी हैं, उनसे 'सन्' प्रत्यय होकर भी मात्मनेपद ही होता है-जैसे आत धातु मात्मनेपदी है-आस्ते । रोते । इनसे सन्नन्त में भी-मासिसिषते । शिशयिषते । मात्मनेपद ही होगा ॥ जिस धातु से 'माम' प्रत्यय होता है, उसही के समान मनुप्रयुक्त 'क' धातु से भी आत्मनेपद होता है-एधाश्चके । ईश्चक्रे॥ ' मौर शी संस्कृतप्रबोधे- प्र और उप उपसर्ग पूर्षक 'युज्' धातु से यज्ञपात्रों का प्रयोग न हो तो प्रात्मनेपद होता है-शब्दान् प्रयुक्त = शब्दों का प्रयोग करता है । अर्थानुपयुक्त = अर्थों का उपयोग करता है । यज्ञपात्रों के प्रयोग में-यज्ञपात्राणि प्रयुनक्ति । परस्मैपद होगा । उद् और नि उपसर्ग के योग में भी 'युज' धातु को मात्मनेपद ही होता है -उद्युक्ते । नियुङ्क्ते ।। 'सम्' पूर्वक 'क्ष्णु' धातु से भी प्रात्मनेपद होता है- संक्ष्णुते शस्त्रम् = शस्त्र को तीक्ष्ण करता है। भुज्' धातु से भोजन पर्थ में मात्मनेपद और पालन मर्थ में परस्मैपद होता है-भोज्यंभुङ्क्ते = भोज्य को खाता है। महीं भुनक्ति = पृथिवी का पालन करता है ॥ यदि कर्तृवाच्य का फर्म हेतुवाच्य का फर्ता होजाये तो हेतुवाच्य क्रिया से आत्मनेपद होता है-भृत्याः स्वामिन पश्यन्ति = भृत्य स्वामी को देखते हैं। यहां भृत्य कर्ता भीर स्वामी कर्म है । स्वामी स्वात्मानं भृत्यान् दर्शयते = स्वामी अपने आप को भृत्यों को दिखलाता है । यहां स्वामी जो पूर्व वाक्य में कर्म था का होगया, अतएव प्रात्मनेपद हुबा ॥ हेतुवाच्य भी मौर स्मि धातुओं से भी यदि हेतु से भय उपस्थित हो तो आत्मनेपद होता है-धूतॊ भीषयत= डराता है। जटिलोविस्मापयते = जटावाखाविस्मय दिखाता है। 'भी' को षुक और स्मि' को पुक का आगम होजाता है । गृध्र और वञ्च् धातु से प्रलम्भन (प्रतारण) अर्थ में मात्मनेपद होता है-साधु गर्धयते साधु को ठगाता है । बालं घचयते= बालक को बहकाता है। ण्यन्त 'कृ' धातु से यदि मिथ्या शब्द उपपद में हो तो मात्मनेपद होता है-पदं मिथ्या कारयते = पद को मिथ्या कराता है। अन्यत्र-पदं सुष्टु कारयति = पद को शुद्ध कराता है धूर्त ७६ परस्मैपदप्रक्रिया। णिजन्त धातुओं से भी यदि क्रियाफल कर्तृगामी हो तो आत्मनेपद होता है-कार्य कारयते = कार्य कराता है । भोदनं पाचयते = चावल पकवाता है। इत्यात्मनेपद प्रक्रिया . (९) परस्मैपदप्रक्रिया जिन धातुमों से जिन अवस्थाओं में मात्मनेपद कहागया है उनसे शेष धातुमों से तद्भिन्न अवस्थामों में दि कर्तृगामी क्रिया फल हो तो परस्मैपद होता है-भवति । गच्छति । पठति । पिबति । याति । मत्ति । प्रविशति । इत्यादि । मनु और परा उपसर्ग पूर्वक 'कृ' धातु से भी परस्मैपद होता है-अनुकरोति । पराफरोति ॥ भभि, प्रति और अति उपसर्ग पूर्वक क्षिप् धातु से भी ।, परस्मैपद होता है-अभिक्षिपति । प्रतिक्षिपति । अतिक्षिपति । इनसे अन्यत्र-भाक्षिपते ।। 'प्र' उपसर्ग:पूर्वक 'वह' धातुमे भी परस्मैपद होता है-- भवहति । अन्यत्र आवहंत ॥ 'परि' उपमर्ग पूर्वक मृण् धातु से भी परस्मैपद होता है- परिमृष्यति । अन्यत्र-मामृप्यते ॥ वि, मा, परि और उप उपसर्ग पूर्वक 'रम्' धातु से भी परस्मैपद होता है--विरमति । प्रारमति । परिरमति । उपर- मति । इनसे अन्यत्र-अभिरमते । परन्तु 'उप' उपसर्ग पूर्वक अकर्मक 'रम्' धातु से परस्मैपद और प्रात्मनेपद दोनों होते हैं- भोजनादुपरमति, परमते वा = भोजन से निवृत्त होता है । णिजन्त बुध्, युध्, नश, जन, इ, पू, टु, और न धातुओं में फर्तृगामी क्रियाफल में परस्मैपद होता है-बोधयति । - संस्कृतप्रबोध- योधयति । नाशयति । जनयति । अध्यापयति । प्रावयति । द्रावयति । स्रावयति। भोजनार्थक और कम्पनार्थक णिजन्त धातुओं से भी परस्मैपद होता है । भोजनार्थक-माशयति । स्वादयति । मादयति । भोजयति । निगारयति ॥ कम्पनार्थक-फम्पयति । वेपयति । धूनयति । चलयति ॥ भकर्मक धातुमों से ण्यन्तावस्था में यदि चित्तवान् का हो तो परस्मैपद होता है-आसयति गुरुम् = गुरु को बिठलाता है। शाययति शिशुम् = बालक को सुलाता है । जहां चित्तवान् का न हो वहां प्रात्मनेपद होगा-शोपयते व्रीहीनातपः= धूप धानों को सुखाती है ॥ णिजन्त पा, दम, मायम, आयस, परिमुह, रुच्, नृत्, यद् और वस् धातुओं से कर्तृगामी क्रियाफल में परस्मैपद नहीं होता किन्तु प्रात्मनेपद होता है-पाययते । दमयते । मायामयते । मायासयते । परिमाहयते । रोचयते । नर्सयते। वादयते । वासयते । परन्तु कर्मगामी क्रियाफल में इनसे परस्मै- पद होता है-पाययति शिशुं पयः = को दूध पिलाता है क्यप् प्रत्ययान्त धातुओं से परस्मैपद और प्रात्मनेपद दोनों होते हैं-खोहितायति । लोहित यते ॥ घुनादि गणपठित धातुमों से लक खकार में परस्मैपर और मात्मनेपद होते हैं-अद्युतत् । प्रद्योतिए । प्रवृतत् अत्तिष्ट । प्रवृधत् । अवधिष्ट । वृत, वृध, गृथ्, पौर स्यन्दू धातुओं से लट्, लङ्ग और सन् प्रत्यय में भी उक्त दोनों होते हैं यस्य॑ति । वत्तिष्यते । भवस्य॑त् । भवत्तिष्यत । विवृत्सति । वितिषतं । इसी प्रकार वृध् मादि में भी समझो । 'कृप् धातु से उक्त अवस्थागों के अतिरिक्त लट् लकार में ভাষান্ধব। ८१ भी परस्मैपद और भात्मनेपद दोनों होते हैं-फल्मासि । कल्लासे । कल्प्स्यति । कल्पिध्यते । प्रकल्प्स्यत् । प्रकल्पियत । चिकल्पसति । चिफल्पित ॥ इति परस्मैपदप्रक्रिया (१०) लकारार्थप्रक्रिया किन्हीं विशेष दशामों में लकारों के मर्थ और काल में जो परिवर्तन होता है, उसका संक्षेप से वर्णन इस प्रक्रिया में किया जावेगा॥ सामान्य भविष्य अर्थ में लट् लकार कहा गया है, परन्तु जब कोई स्मरणार्थक पद क्रिया के समीप में हो तो अनद्यतन भूत में भी लट् हो जाता है-स्मरसि मित्र ! सनं घत्स्यामः = हे मित्र ! तुमको स्मरण है हम मागरे में बसे थे । उक्त वाक्य में यदि ' यद्' सर्वनाम और मिला दिया जाये तो 'लट् न होगा किन्तु 'लङ्' ही रहेगा-जानासि मित्र! यदिन्द्रप्र- स्थेऽवसाम =जानते हो मित्र ! कि जो हम दिल्ली में बसे थे । परोक्ष भून में केवल लिट् लकार कहा गया है, परन्तु यदि ह भौर शश्वत् अव्ययों का योग हो तो इस अर्थ में लङ् भी होता है-इति ह चकार । इति हाकरोत् = ऐसा किया था। शश्वञ्चकार । शश्वदकरोत् =वार २ किया था | समीप काल में जो प्रश्न किया गया हो तो भी उक्तार्थ में बिट मौर बङ दोनों होते हैं-किस जगाम ? किं सोऽगच्छत् = क्या वह गया? यदि प्रश्र समीप काल का न हो तो केवल खिन् ही होगा-कि भीमः जरासन्धं जघान ? =क्या भीम ने जरासन्ध को मारा था । 'स्म' अव्यय का योग होने पर परोक्षभूत में लट् होता है- यजति स्म युधिष्ठिरः = युधिष्ठिर ने यक्ष किया था । - ८२ संस्कृतप्रधाधे- और % 3D अपरोक्ष मनद्यतन भूत में भी 'स्म' का योग होने पर बट होता है-एवं ब्रवीतिस्मोऽध्यायः= उपाध्याय ने ऐसा कहा था। ननु 'मव्यय का योग हो तो प्रश्न के उत्तर में भूतार्थ में लट होता है-किमपठीस्त्यम् ? ननु पठामि भोः !=क्या तैन पढ़ा था ? हां मैंने पढ़ा था । 'पुरा' मव्यय का योग हो परोक्षभूत में लट्, लिट्, लङ् और लुङ् चारों लकार होते हैं- वसन्तीह पुग छात्राः । ऊषुरिह पुरा छात्राः । प्रवमनिह पुग छात्राः । भवात्सुरिह पुरा छात्रा: यहां पहिलं छात्र बमते थे। यावत् पुग अव्ययों के योग में भविष्यदध में लट लकार होता है -यावद्भुङ्क्ते = जबतक नायगा। पुराभुङ्क्ते पहिल वायगा॥ कदा और काहि अव्ययों के योग में भविष्यार्थ में बट, लुत् भार लट् तीनों लकार हाते हैं-कदा, कहिं वा भुङ्क्त, भोक्ता, भोक्ष्यत चा= कब खावगा ॥ लिप्मासूचक 'किम्' मर्वनाम का योग हो तो भी भविष्यदर्थ में बट, लुट् भार लट् ताना लकार हात है-कं भाजयाम,भाजयित सि,भोजयिष्याम ? =किम को खिलावेगा? जहां लिप्म्यमान ( इच्छुक ) में सिद्धि की माशा हो वहां भी उक्तार्थ में तीनों लकार होत हैं-यः दीनेभयोऽन्नं ददाति, दाता, नास्यति वा स सुस्त्रं लभते, लब्धा, लप्स्यते वाजा दोनों को प्रन्न देगा यह सुस्त्र पावंगा ॥ लोट् लकार के अर्थ में वर्तमान धातु मे भविष्यत् काल में उक्त तीनों खकार होने हैं-उपाध्यायश्चेदागच्छति, मागन्ता, मागमिष्यति वा हि त्वं व्याकरण मधीष्य = यदि उपाध्याय मावै तौ तू व्याकरण पद ॥
लकागर्थप्रक्रिया। ८३ - यदि वर्तमान के समीप में भून और भविष्य की क्रिया हों तो उनसे भी एक पक्ष में वर्तमान के सदृश लट् लकार होजाता है । भूत में वर्तमान-कदाऽऽगतोऽसि = तू फष माया है? अयमागच्छाम्यागमं वा = यह पाया हूं। यहां प्रागमन किया यद्यपि भूतकाल की है, तथापि वर्तमान के समीप होने से लट् का भी प्रयोग होगया । भविष्यत् में वर्तमान- कदा गमिष्यसि ? = कब जायगा ? एष गच्छामि. गन्ता, गमिष्यामि चा= यह जाता हूँ। यहां गमन क्रिया भविष्य काल की है॥ माशंसा ( अप्राप्त प्रिय वस्तु की आशा ) में भविष्य काल की क्रिया से भून और वर्तमान के सदृश भी प्रत्यय होते हैं- एप्टिश्चेदभूत, भवति, भविष्यति वा प्रभूनान्यमान्यलप्स्महि, भामहे, लप्स्यामह वा वृष्टि होगी तो बहुत से प्रश्नों को पावंग क्षिप्र और उसके पयाय वाचक शब्दों का योग हो तो भविष्य काल में कंवल लट् लकार ही होता है-वृष्टिश्चक्षिप्रं भविष्यति वीजानि शीघ्रं वस्यामः = यदि दृष्टि शीघ्र होगी तो वाज जल्दी बोवंगे॥ यदि किसी कार्य की सम्भावना हो तो भविष्य काल में t; लिङ् लकार होता है-उपाध्यायश्चेदुपेयादाशंसेऽधीयीय : यदि उपाध्याय भावेगा तो सम्भावना करताहूँ कि पढूँगा ॥ समानार्थक उत मौर अपि अव्ययों के योग में भविष्य में लिङ् लकार होता है-उताधीयीत । मप्यधीयीत= सम्भव है कि पढ़ेगा। सम्भावन में ये दोनों समानार्थक होते हैं। मभिलाष के प्रकट करने में यदि कश्चित् शब्द का प्रयोग { न हो तो भी धातु से लिङ् होता है-कामो मे भुञ्जीत भवान् = १) मेरी इच्छा है कि माप भोजन करें । कश्चित् के प्रयोग में रद् होगा-कश्चित् ते भुञ्जते- क्या वे खाते हैं।
संस्कृतप्रयोधे- मसम्भावित अर्थ के प्रकाश करने में भी लिङ्लकार हो -अपि गिरि शिरमाभिन्द्यात् = पर्वत को शिर से ताइदेगा सम्भावित प्रर्थ के प्रकाश करने में लिङ्ग पोर लट् दो होते हैं--मपि सिंह शस्त्रंण हन्यात, हनिष्यति वा = सिंह शस्त्र से मारेगा॥ हेतु और हेतुमान् ( कारण और कार्य ) की विवक्षा लिङ् और लङदोनों लकार होत है- धर्म कुर्याश्चत्सुखं यायात धर्ममकरिष्यश्चत्सुखमयास्यत् = धर्म करेगा तो सुख पांबगा विधि, निमन्त्रण, भामन्त्रण, अधीष्ट, संप्रश्न और प्रार्थ इन६अर्थों में धातुम लिङ् पोर लोट् लकार होते हैं । विधि- स तत्र गच्छेत्, गच्छतु वा=यह वहां जाये । निमन्त्रण--हा भवान् भुजीत भुङ्क्तांधा = माप यहां भोजन करें। मामन्त्रण- इह भवानासीत, मास्तां धा=आप यहां बैठे । मधीष्ट- माणवकमध्यापयेयुः, मध्यापयन्तु वा = बालक को पढ़ामो संप्रम-किमहं व्याकरणमधीयीय, मध्ययै था-क्या । व्याकरण पढूं? प्रार्थन-मह्य भोजनं पद्याः, देहि धाम लिये भोजन दो॥ माशीर्वाद मर्थ में धातु से गाशामिङ् और खोट् लकार होर हैं--स्वस्ति तेभूयात् । स्वस्ति ते भवतात् = तेरे लिये सुन हो मा' अव्यय के योग में धातु से लुङ् लकार होता है... माकार्षीः-मत कर । यदि 'मा' से मागे 'स्म' अव्यय में हो तो ल भी होता है-मास्मकरोः।मास्म कार्षीः = मत कर इति कारार्थप्रक्रिया समाप्तश्चायं तृतीयो भागः ॥ - मा' के योग में 'अट् ' का आगम नहीं होता।
No text on this page.